मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई में जब लीगल इश्यू की डफली बजने लगेगी तो कमेटी की बात पीछे रह जायेगी : एडवोकेट उमेश शर्मा

सुप्रीमकोर्ट के जाने माने एडवोकेट उमेश शर्मा जब अपने चिर-परिचित अंदाज में सुप्रीम कोर्ट में बहस करते हैं तो अखबार मालिकों की घिग्घी बंध जाती है। मीडियाकर्मियों के पक्ष में पालेकर वेज बोर्ड, बछावत वेज बोर्ड, मणिसाना वेज बोर्ड और अब जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे उमेश शर्मा को लेबर लॉ का काफी अनुभव है। साफगोई से हर बात कहने वाले मृदुभाषी उमेश शर्मा ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर देश भर में मीडियाकर्मियों के लिये एक आंदोलन खड़ा किया। हमेशा बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले उमेश शर्मा से आठ नवंबर को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई और उसके बाद आये आर्डर पर बात किया मुंबई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह ने। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश…

– 8 नवंबर को मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई के बाद आये आर्डर को आप किस रूप में लेते हैं?
-ये आर्डर उस तरह से नहीं है जो बहस हुयी थी. सुनवाई के दौरान जिस तरह से जज साहब लोगों ने कहा कि हम एक मानीटरिंग कमेटी बनायेंगे, वो इस आर्डर में तो नहीं है। यह बात स्पष्ट है कि लेबर कमिश्नर की रिपोर्ट मंगा कर मजीठिया लागू कराने का विचार अब त्याग दिया गया है। कमेटी के बारे में उन्होंने बोला था और आर्डर में हल्का सा इंडिकेट भी किया है लेकिन अगली डेट पर जब लीगल इश्यू की डफली बजने लगेगी तो कमेटी की बात पीछे रह जायेगी।

-लीगल इश्यू वाले मुद्दे को आप कितना सही मानते हैं क्योकि कई बार आप बोल चुके हैं कि लीगल इश्यू की नाव चलेगी तो डूबने का खतरा है?
-मैं आज भी अपने इस बात पर कायम हूं। लीगल इश्यू जो फ्रेम हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई के बाद यह बोल दे कि २० जे का मामला विवादित है और ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता तो हम इस पर कुछ नहीं कर सकते हैं। दूसरी चीज अगर सुप्रीम कोर्ट यह बोल दे कि कंंटेंप्ट के तहत हमारे अधिकार क्षेत्र में कमेटी बनाना नहीं है, अगर सुप्रीम कोर्ट यह भी बोल दे कि यह स्पष्ठ नहीं हो रहा कि मालिको ने जान बूझ कर अवमानना की है तो हो गया ना सबको नुकसान। इसका तरीका यह है कि पहले जांच कमेटी बनाने पर जोर दिया जाता फिर जांच कमेटी के सामने २० जे व अन्य समस्याओं के बारे में तथ्य इकट्ठा कर सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया जाये तो सुप्रीमकोर्ट भी इसे गंभीरता से लेती।

-जो रिपोर्ट भेजी गयी है राज्यों के लेबर कमिश्नरों द्वारा आप उससे कितने संतुष्ट हैं?
-ये रिपोर्ट पूरी तरह फेक है। सुप्रीमकोर्ट को इसे तोड़ना चाहिये। इस रिपोर्ट की एक कमेटी बनाकर इसकी जांच करानी चाहिये। झूठ बोलने वाले कमिश्नरों को जेल भेजना चाहिये सीधा। ये हमेशा कोर्ट को गुमराह करते हैं।

-ये लेबर कमिश्नर का सुनवाई के दौरान प्रयास यही रहता है १७ (१) के पूरे मामले को १७ (२) में भेज दिया जाये। आप भी हमेशा विरोध करते हैं कि १७ (१) का मामला १७(२) में नहीं जा सकता है. 
-बिल्कुल सही बात है कि १७ (१) का मामला १७ (२) में भेजना पूरी तरह गलत है। ऐसा एक्ट में कहीं नहीं है। एक तो १७ (१) के मामले का ये लोग सही तरीके से कंडक्ट नहीं कर रहे हैं और इसे मिस यूज कर रहे हैं। अगर यूज करते तो मध्यप्रदेश की तरह सभी राज्यों के लेबर कमिश्नर अखबार प्रबंधन के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करते। मिस यूज ये कर रहे हैं कि १७ (१) के अप्लीकेशन को ये लोग १७(२) में भेजकर पीछा छुड़ा लेते हैं जबकि उन्हें १७(१) के एप्लीकेशन को १७(२) में भेजने का प्रावधान ही नहीं है। अब इन्होंने पीछा छुड़ा लिया और अब आप लड़ते रहिये।

-अवमानना के मामले में जिन अखबारों के बारे में सुप्रीमकोर्ट में रिपोर्ट भी चली गयी है कि इन अखबारों के प्रबंधन ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया और कुछ अखबारों के मालिकों के खिलाफ आरसी भी कट गयी है फिर उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला क्यों नहीं बनता है?
-इस मामले को मैने ८ नवंबर की सुनवाई में रखा था लेकिन जज साहब इस पर कुछ अटक गये। मैने यही कहा कि जिनकी रिपोर्ट में आ गया है कि इन्होंने वेज बोर्ड नहीं लागू किया उनके खिलाफ तो सीधे सीधे मामला बनता है तो जज साहब ने पूछा कि क्या बनता है, तब मैंने कहा कि सर अवमानना का मामला बनता है।

-जिन मीडियाकर्मियों ने भी जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगा उनका ट्रांसफर टर्मिनेशन कर दिया जाता है। इसका क्या उपाय है क्योंकि ये काफी गंभीर मामला है?
-ये कमेटी में तय हो जायेगा। कमेटी जब बनेगी तब इस मामले को कमेटी गंभीरता से देख लेगी। एक तो दिक्कत ये है जितने भी लेबर कमिश्नर होते हैं वे बहुत ज्यादा मजीठिया वेज बोर्ड या वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के बारे में नहीं जानते हैं। तुर्रा यह है कि एक तो वे करना नहीं चाहते दूसरा उनको आता नहीं और वे सक्षम भी नहीं हैं। उनको सौ पेज की बैलेंसशीट दे दीजिये, बेचारे घबड़ा जाते हैं। सर्कुलेशन फीगर तक इनको नहीं पता रहता है।

-कई जगह के अखबार मालिक अपना 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट नहीं दे रहे हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?
-ये चीजें कमेटी तय करेगी। एसआईटी तो हमने नाम दे दिया। अब सोचिये जांच कमेटी अगर कहेगी कि आप २००७ से १० तक की बैलेंससीट लेकर आईये, अगर वे नहीं लेकर आयेंगे तो कमेटी सीधे सुप्रीमकोर्ट को रिपोर्ट भेज देगी। सुप्रीमकोर्ट कहेगी कि तुम कमेटी की बात भी नहीं मान रहा है तो आ जाओ कंटेम्प्ट में। वो तभी सीधा होंगे। अभी क्या है लेबर कमिश्नरों के उपर अखबार मालिक दबाव डलवाते हैं। कमेटी एक रिटायर जज के नेतृत्व में होगी जो कि इन बातों को अच्छी तरह से समझ सकती है। आखिर मजीठिया वेज बोर्ड भी तो ऐसे ही रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में काम कर रहा था और सारी बातों को सुन परख कर ही तो अवार्ड दिया है. समिति भी इसी तर्ज पर काम कर सकती है.

-लीगल इश्यू की सुनवाई के दौरान और कौन कौन से मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिये?
-नहीं, लीगल इश्यू पर अभी बहस कराना खतरनाक है। एक उदाहरण देता हूं।  २० जे पर अगर सुप्रीमकोर्ट बोल दे कि कर्मचारियों ने साईन किया है तो हम क्या कर सकते हैं तो हो गया ना सबका नुकसान। इसलिये मैं कह रहा हूं कमेटी बनवा लीजिये। कमेटी से चर्चा कर लीजिये और फिर सुप्रीम कोर्ट में बहस करा लीजिये, लीगल इश्यू पर तो अपना पक्ष मजबूत होगा। अभी तो कई फैक्ट आये नहीं है। गोल गोल घुमाया जा रहा है। अगर खिलाफ गया तो क्या करेंगे आप।

-आप मीडियाकर्मियों के पक्ष में पहले भी कई वेज बोर्ड के लिये भी लड़े हैं। आपकी लेबर लॉ पर अच्छी पकड़ है। दूसरे वेज बोर्ड से जस्टिस मजिठिया वेज बोर्ड को आप कैसे अलग मानते हैं?
-जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड इन सबों में सबसे बेहतर पोजिशन में हैं। इसको सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है और अपने आदेश दिनांक ७/२/२०१४ में स्पष्ट रूप से निर्देश दे कर लागू करने को कहा है और पहली बार अवमानना में इतना समय देकर हर तरह से इसे लागू करने में लगा है। इसके पहले के वेज बोर्ड बहुत सारे संस्थानों ने लागू किया था और कहीं कहीं ग्रेड और फिटमेंट को लेकर ज्यादा विवाद था। कोई कंपोजर था तो उसको दूसरा कोई काम दिया जाता था। वो विवाद था बाकी इसे लोगों ने लगभग लागू कर दिया था। बछावत के बाद तो सही तरीके से लागू ही नहीं हुआ कोई वेज बोर्ड।

-अखबार मालिक आखिर जेल कब जायेंगे?
-अभी टाईम लगेगा लेकिन अगर लीगल इश्यू का कोई पेंच फंस गया तो सारे के सारे बच जायेंगे। अगर कमेटी बनाकर मामला चला तो कोई ना कोई जरूर फंसेगा, जैसे पिछली सुनवाई में इनाडु के मालिक फंस रहे थे। इनाडु के बारे में लिखा है कि इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया है मगर लीगल इश्यू को लेकर इतना दायें बायें हो गया कि इस ओर से जज का ध्यान हट गया। 

-इस मामले में सभी मीडियाकर्मियों की मंजिल एक है फिर आप और कोलिन सर और परमानंद पांडे जी एक साथ बैठकर मुद्दे क्यों नहीं तय कर लेते हैं कि किस मुद्दे पर बहस सुप्रीम कोर्ट में करना है?
-मुझे कोई प्राब्लम नहीं है। कई बार लोगोें ने काफी प्रयास भी किया। मैं तो हमेशा तैयार रहता हूं ताकि आमने-सामने बैठकर बात किया जाये।

शशिकांत सिंह 
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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Comments on “मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई में जब लीगल इश्यू की डफली बजने लगेगी तो कमेटी की बात पीछे रह जायेगी : एडवोकेट उमेश शर्मा

  • मंगेश विश्वासराव says:

    तीनो साथ हो लिए तो बहुत कुछ बन सकता हैं…अगर इस मामलों में न्याय नहीं मिला तो कानून पर से सबका विश्वास उठ जाएगा…सोचनेवाले, लिखनेवाले कोई इस व्यवसाय में नहीं आएंगे…चौथा स्तंभ क्या कानून ही गिरा देगा..? अरे, कानून वालो कुछ तो शर्म करो.

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