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दैनिक जागरण के शोषण की चक्की में इस तरह फंसते और पिसते हैं पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा!

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कानपुर: मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई के दौरान माननीय कोर्ट जिन दस्तावेजों को सिरे से नकार चुका है, दैनिक जागरण प्रबंधन उन्हीं के आधार पर बेरोजगार युवाओं की मजबूरी का लाभ उठाकर उनको समाचार देने के लिए संवाद सहयोगी के रूप में जेकेआर (छद्म कंपनी) में रखता है।

इसके बाद उनसे समाचार लेने के साथ संस्करण भी निकलवाता है। एक दिन में आठ की जगह 15-16 घंटे काम करवाकर उनका शारीरिक, मानसिक व आर्थिक शोषण करता है।

ऐसा ही दैनिक जागरण कानपुर में कार्यरत हरेन्द्र सिंह के साथ हुआ है। जागरण ने खबर लेने की बात खुद लिखित रूप से स्वीकार की है। जबकि संस्करण दिखवाने के साक्ष्य भी भड़ास के हाथ लगे हैं। घोर उत्पीड़न के बाद भी मानदेय बेहद कम। आइए देखते हैं नियुक्ति की प्रक्रिया व उससे संबंधित कागजात।

दैनिक जागरण प्रबंधन नियुक्ति के समय मजीठिया से बचने के लिए गरीब, असहाय बेरोजगार युवाओं की मजबूरी का फायदा उठाकर उनसे 10 रुपये के स्टाम्प पेपर के साथ एक एक अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करवाता है। इसमें परिवार का पेट पालने के लिए नौकरी की चाह रहने वाले युवाओं से यह लिखवाया जाता है कि वह शौकिया पत्रकार के रूप में प्रशिक्षण लेना चाहते हैं, उनका खुद का व्यापार है (हकीकत में भले न हो)।

उनसे लिखवाया जाता है कि वह संस्थान में कार्यरत किसी सीनियर के अंडर में यह प्रशिक्षण लेंगे, इसके एवज में उनको कोई वेतन नहीं चाहिए, जिस सीनियर के साथ वह काम करेंगे यदि वो चाहें तो कुछ मानदेय दे सकते हैं।

सवाल यह है कि क्या कंपनी का कोई अधिकारी भी वेतन या मानदेय स्वयं के पास से किसी को दे सकता है? यह भी लिखवाया जाता है कि प्रशिक्षु कभी भी कहीं भी जागरण का कर्मचारी होने का दावा नहीं करेगा। केवल समाचार भेजना उसका कार्य होगा।

जिस सीनियर का नाम उसके प्रशिक्षक के रूप में इन कागजातों में दर्ज होता है, उसकी ओर से ही वेतन देने की बात लिखवाने के बावजूद जागरण स्वयं अपनी तरफ से उसके खाते में हर माह कुछ रुपये भेजता है। आपका कितना भी पत्रकारिता का अनुभव हो या कितने भी पढ़े-लिखे हों, परिवार पालना है तो प्रशिक्षु बनना ही पड़ेगा।

समाचार संकलन की बात लिखित में लेने के बावजूद इसके साथ संस्करण भी निकलवाकर धोखा व 420सी करता है। संस्करण में गलती होने पर लिखित रूप से सजा भी देता है। सालों साल प्रशिक्षु बताकर रोजाना 24 घंटे में समाचार संकलन के साथ संस्करण दिखवाकर 15-16 घंटे काम करवाता है। यहां प्रशिक्षण का कोई समय निर्धारित नहीं होता। प्रशिक्षण जीवन भर भी चल सकता है।

बेतहाशा काम के कारण जब इनका प्रशिक्षु बीमार होता है तो बीमारी में भी 15-16 घंटे काम लिया जाता है। जब वह छुट्टी ले लेता है तो उस अवधि का मानदेय काट लिया जाता है। लगातर अधिक काम लेने पर जब प्रशिक्षु बार-बार बीमार होता है तो कभी भी उसको बिना लिखित आदेश बाहर कर दिया जाता है।

जब कहीं जिला प्रभारी के रूप में कर्मचारी की जरूरत होती है तो उस प्रशिक्षु को मैनेजमेंट की ओर से जिला प्रभारी भी बना दिया जाता है। सवाल ये भी है कि अब एक प्रशिक्षु जिला प्रभारी कैसे बन सकता है। ट्रांसफर लैटर में नियुक्ति पत्र का भी जिक्र होता है। चलो कुछ देर के लिए फिर भी यह मान लिया जाए कि वह सिर्फ प्रशिक्षु है, तो उससे 24 घंटे में रोजाना 15-16 घंटे काम क्यों कराया जाता है। समाचार लेने के साथ उससे संस्करण क्यों निकलवाया जाता है। उपस्थिति रोजाना सिर्फ 6-9 घंटे ही क्यों दिखाई जाती है। प्रशिक्षण का समय एक-दो या अधिक साल क्यों नहीं निर्धारित किया जाता है।

प्रशिक्षण नए कर्मचारियों को दिया जाता है या किसी भी उम्र के कितने भी अनुभवी व्यक्ति को। बीमारी में भी प्रशिक्षु से काम क्यों कराया जाता है। बीमार होने पर अवकाश की स्थिति में वेतन क्यों काटा जाता है। बीमारी के सर्टिफिकेट देने के बावजूद उसे बिना लिखित काम से क्यों रोका जाता है।

केवल समाचार देने की बात कह रात में संस्करण निकलवाकर इस तरह शारीरिक, मानसिक व आर्थिक रूप से उत्पीड़न क्यों किया जाता है। प्रशिक्षु है तो क्या कुछ भी कराया जाएगा उससे। नियुक्ति कहीं और किसी कंपनी या व्यक्ति के अंडर (छद्म कंपनी या रूप) में दिखाकर दैनिक जागरण कंपनी से कुछ मानदेय खाते में भेजना क्या छद्म कंपनी एक्ट के अंतर्गत नहीं आता।

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  • मुझसे तो सन 2001 में ही ऐसे प्रिंटेड टाइपशुदा स्टांप पर ये सब लिखकर दस्तखत करवा लिए थे लखनऊ जागरण के टाइम आफिस में मिश्रा जी ने।

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