अमिताभ ठाकुर की 11 साल पुरानी इस मेल पर आज नजर गई!

अमिताभ ठाकुर जेल में हैं. बारह से पंद्रह साल हो गए होंगे उनसे परिचय के. ये परिचय कब अपनापा में तब्दील हो गया, पता न चला. हम लोग दूर भले ही रहते रहे हों लेकिन दिल से जुड़े रहे. कभी कोई कानूनी या पुलिस से जुड़ी समस्या हो तो फौरन अमिताभ जी को फोन करता और अमिताभ जी बजाय पूरा मामला समझने के, सीधे बोल पड़ते- ‘मुझे किसको फोन करके क्या कहना है, बस इतना बता दीजिए. मुझे विश्वास है आप कभी कोई गलत काम कह ही नहीं सकते.’

इस लेवल का आपसी भरोसा था हम लोगों में. मुलायम सिंह यादव ने जब अमिताभ ठाकुर को फोन कर धमकाया था तो उस आडियो को अमिताभ जी ने मुझे भेजा और अनुरोध किया कि कुछ बड़े मीडिया हाउसों में इसे भेजकर चलवाया जाए. मैंने काफी कोशिश की लेकिन मीडिया हाउसों ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ एक शब्द भी छापने से मना कर दिया. आखिरकार मैंने खुद ही भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल पर आडियो को अपलोड कर खबर का प्रकाशन किया.

कहने का आशय ये कि हम सुख दुख के साथी रहे. आज जब अमिताभ जी जेल में हैं और उनके पक्ष में उठने वाली आवाजें धीरे धीरे शांत होती जा रही हैं तो कहीं दिल के कोने में एक हूक सी उठती है कि जब तक आदमी सामने होता है, सक्रिय रहता है, दुनिया उसे सलाम करती है, वाह वाह कहती है, जिस दिन से वह नेपथ्य में चला जाता है, कोई पूछता तक नहीं.

दो दिनों से सोच रहा हूं कि नूतन भाभी को फोन कर जमानत वगैरह की प्रक्रिया का हाल जाना जाए लेकिन फोन नहीं कर पा रहा हूं. हम सब अपने अपने खोल में इतने सिकुड़े सिमटे हैं कि दूसरों के लिए कुछ करने कुछ दर्द लेने की जहमत ही नहीं उठाते.

आज मेल के स्टोरेज के फुल शो करने से पुरानी मेल्स की छंटनी कर रहा था. जिन मेल पर स्टार लगाकर सेव किया हुआ था, उन्हें भी एक एक देखकर डिलीट या सेव करने में लगा हुआ था. उसी प्रक्रिया में अमिताभ जी की ये मेल दिख गई.

अमिताभ जी के अंदर एक पुण्यात्मा वास करती है जो बहुत खिलंदड़ है. वह सब कुछ भांप लेती है और सब कुछ जान लेती है लेकिन रहती सहज है. अमिताभ जी ने अतीत में अपने करियर और कामों को लेकर कई प्रायश्चित पोस्ट्स भी लिखें. कहां कहां कब कब उनसे ज्यादतियां हुईं, उन्होंने इसे लिखा और कुबूला भी. इसीलिए मैं अमिताभ को कबीर कहता हूं जो सच सच सब कह देता है, कुबूल कर लेता है.

फिलहाल वो मेल पढ़ें जिसमें अमिताभ जी ने मेरे और कुमार सौवीर जी के एक प्रसंग का जिक्र किया है. इसे पढ़ते हुए याद आया कि हां इस घटना में अपन लोगों ने काफी रिस्क लिया था. कानपुर लखनऊ के बीच में कहीं बस से उतरकर सड़क किनारे बेंच पर मैं लेटा हुआ था और कुमार सौवीर अपनी कार से मुझे तलाश रहे थे… पूरी कहानी नीचे पढ़ें-

-यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया


जय और वीरू की कहानी

अमिताभ ठाकुर-

(16 सितंबर 2010)

इस संसार में पागल बहुत कम हैं और शानदार पागल तो और भी कम. इन पागलों का पूरे पागलपन के साथ सम्मान किया जाए इसके लिए कुछ पागल भी होना पड़ता है. मैं कुछ इसी तरह का प्रयास यहाँ करना चाहूँगा जिसमे इस “कुशल हैं, कुशल चाहता हूँ” और “सब ठीक-ठाक है” वाली दुनिया में ऐसे लोगों को कुछ अलग से पेश करूँ जो बस पागल ही हैं. अभी हाल ही में मैंने एक कविता लिखी, जिसका शीर्षक था बावला. इसकी चार पंक्तियाँ शायद ऐसे लोगों के बारे में कुछ बता पाने में मदद करें, जो बात मैं कहना चाहता हूँ-

उसकी तो बस जिद निराली,
उसके अपने ही रास्ते हैं,
सोचती दुनिया जो बातें,
सोच ही पाता नहीं है.

यानि कि दुनिया के कुछ दस्तूर होते हैं, कुछ कायदे-कानून, कुछ पैमाने और तमाम बंदिशें. फिर इंसान का स्वभाव ऐसा कि छोटे-छोटे फायदे, तुरंत की लाभ-हानि और परेशानियों से बचने की आदत. ऐसे में बहुत बड़ा तबका ऐसा नज़र नहीं आता जो सही शब्दों में वैसा नज़र आये जिसे हम गर्व से “उत्पाती” और “खुराफाती” कह सकते हैं. लेकिन जैसा एक पुरानी फिल्म का गाना है-

“ये दुनिया उसी की ज़माना उसी का,
मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का”

उसी तरह से असल में ये दुनिया तो ऐसे ही धुरंधर पागलों की है जो हैं तो हैं, नहीं हैं तो नहीं.

इस श्रृखला को शुरू करने के लिए कोई वीर तो चाहिए ही था. मैंने सोचा की क्यों ना एक पंथ दो काज कर लूँ. एक तो अपनी तरफ से बाबू यशवंत सिंह (यानि इस उत्पात के सूत्रधार और हाई-लेवल भडासिया) की चमचागिरी भी कर लूँ और दूसरी ओर धर्म-शास्त्रों की तर्ज़ पर गणेश जी की अनुकृति बने महमहाते सौवीर जी (महुआ टी वी, उत्तर प्रदेश के हेवीवेट कर्णधार) का भी स्मरण कर लूँ.

इस तरह कहानी शुरू हो रही है जय और वीरू की. जय यानि धीर-गंभीर उधमी बड़े भाई सौवीर जी और वीरू यानि छोटे और खतरनाक यशवंत. मैं इन दोनों के विषय में अपनी ओर से अधिक टिप्पणियाँ और विचार नहीं प्रकट करते हुए आप के सम्मुख उन दोनों का चित्रण मात्र एक कहानी के जरिये करना चाहूँगा जो इन्ही दोनों महापुरुषों की जुबानी सुनने का अवसर मिला था. बात तब कि जब वीरू किसी स्टोरी पर काम करने (यानि किसी अखबार का वाट लगाने के चक्कर में) कानपुर गए थे. दिन भर जो खुराफात करना था किया, रात के लिए निश्चिन्त थे क्यूंकि अपने किसी दोस्त को रात में ठहरने का इन्तेजाम करने को कह चुके थे. रात हुई. उस होटल में पहुंचे जहां रुकना था. बड़े शौक से गए थे पर वहां देखा तो हालात खराब. ऐसी स्थिति कि रात गुजारना लगभग मुश्किल. खाने और पीने की भी लगभग वही हालत. खैर बड़ी मुश्किल से खाया और उससे भी मुश्किल से पीया. उसके बाद सोने का प्रयास करने लगे. लेकिन ये सोने आये थे और बिस्तर के कई प्राणी उसी समय जाग रहे थे. द्वंद्व शुरू हुआ. इधर पेट में पडा खाना तो लगभग सो गया पर पीना जाग रहा था. और जैसे-जैसे रात बीत रही थी, मदिरा-देवता वैसे-वैसे जाग्रत होते जा रहे थे. जब लगभग बारह बज गए तो मदिरा देव ने वीरू उर्फ़ यशवंत को जोर से झकझोरा और आदेशित किया कि उसी समय उस सज्जन से वार्तालाप करें जिन्होंने इस होटल के रूकने की व्यवस्था की थी. फिर देर काहे की थी- वीर रस से ओत -प्रोत वीरू ने उस भले (या बुरे) आदमी को वो सारी उपाधियाँ दे दीं जो उसे तीन-चार रातों तक जगाये रखने को काफी था.

लेकिन अभी तो बहुत कुछ बाकी था. उसी समय हमारे वीरू ने अपना सामान उठाया, होटल से बाहर निकले, रिक्शा लिया, बस स्टेशन पहुँच गए. वहां देखा तो एक साथ दो बस दिखी. एक आगरा जा रही थी और एक वाराणसी. दोनों में जाने को तैयार- दोनों के अलग-अलग तर्क. तभी तीसरी बस भी दिखी लखनऊ की. और तभी अचानक दिमाग में आये जय दादा यानि सौवीर भाई. तुरंत वहीँ से फोन किया- दादा आ रहा हूँ. सौवीर भाई अभी बस अपना “दो बूँद जिंदगी के” ले ही रहे थे. खुश हो गए. कुछ मूलभूत जानकारी ली और कहा तुरंत आ जाओ.

वीरू बस में और जय दादा लखनऊ में. लेकिन कुछ देर बाद जय दादा को लगगे लगा कि वीरू को शायद आने में दिक्कत होगी, पता नहीं किस अवस्था में होगा. सौवीर भाई उसी समय हाफ पैंट में ही कूच कर गए, जल्दी में चप्पल पहनना भी भूल गए. ड्राईवर को कानपुर की तरफ चलने का आदेश दिया. फिर यशवंत बाबू को आदेश दिया- “तुम्हे लखनऊ आने में दिक्कत होगी. जहां हो वहीँ उतर जायो. मैं कानपुर की तरफ चल दिया हूँ.” वीरू ने भी बिना कुछ पूछे-ताछे बस कंडक्टर को बस रोकने को कह दिया. कंडक्टर कुछ चकराया फिर बस रोक दिया. जहां बस रुका था, वहां पूरी विरानगी थी, दूर-दूर तक सन्नाटा, ढुंढ़ो तो कोई आदमी नहीं. पर जब उतर गए तो उतर गए. कुछ देर यहाँ वहां देखा, कुछ-कुछ डर भी लगना शुरू हुआ. पर अब क्या करते. खोजने पर एक बेंच मिला वहीँ जा कर लेट गए,

उधर जय दादा अर्थात सौवीर भाई पूरी तेजी से कानपुर के रास्ते पर. दोनों में लगातार बात-चीत हो रही है. वीरू इधर-उधर से देख कर जय को कुछ लोकेशन बता रहे हैं. मालुम हो गया कि उन्नाव जिले में नवाबगंज के पास कहीं पर वीरू हैं- सड़क के बगल में ही.

गाडी यशवंत बाबू के बगल से गुजर गयी, यशवंत बाबू कुछ झपकी ले चुके थे. सौवीर भाई को आगे बढ़ने के बाद फिर लगा कि शायद पीछे छूट गया हो. इस तरह कई बार कोशिश कर के दोनों अंत में मिल पाए, बज गया था सुबह का चार. लखनऊ सौवीर भाई के घर पहुँचते पहुंचते पांच. लेकिन दोनों को कोई ख़ास अंतर नहीं. छोटे ने एक भजन की तान शुरू कर दी तो बड़ा साथ देने को बाध्य हो गया. घर पर बेटियाँ समझ गयीं कि अभी कुछ देर ये सब चलेगा. नाश्ते का इंतज़ाम करने में लग गयीं.

मैं इस कहानी के जरिये इन वीर-बांकुरों की कोई तारीफ़ नहीं कर रहा हूँ पर इतना जरूर कहना चाहूँगा कि काश हर आदमी की ज़िन्दगी में उतना ही आनंद, उमंग, मस्ती, फक्कडपन और मौज हो जैसा उन दोनों ने उस दिन जिया. और साथ ही यह भी कि किसी को दोस्त भी मिले तो इन जय और वीरू जैसे जो कभी भी अपने दोस्त के घर धमकने का हक़ रखें और अपने दोस्त के लिए बिना चप्पल पहने घर से रात में बारह बजे निकल जाने का भाव रखें. नहीं तो बाकी सब लोग पार्टियों और फंक्शन में मिल ही तो रहे हैं, मुस्कुरा भी रहे, हाथ भी मिला रहे हैं और साथ में फोटो भी खिचवा रहे हैं. क्यूंकि ये सब लोग भले लोग हैं- पागल नहीं हैं.

दोनों पागलों को मेरा सलाम

अमिताभ ठाकुर
amitabhthakurlko@gmail.com

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One comment on “अमिताभ ठाकुर की 11 साल पुरानी इस मेल पर आज नजर गई!”

  • M Shakil Anjum says:

    बहुत खूब दिल को भा गया ऐसा दीवानगी का मुरब्बा।

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