काला सफेद आरोपों पर गुरदीप सप्पल का जवाब पढ़ें

गुरदीप सप्पल-

आज फिर हवा में अपने ख़िलाफ़ प्रॉपगैंडा उछाला गया कि स्वराज एक्सप्रेस ने पत्रकारों की सैलरी नहीं दी, जबकि सच ये है कि सबको ऑफ़िस के अंतिम दिन तक की सैलरी मिल चुकी है। लेकिन सबसे पहले कुछ तथ्य:

  1. चैनल लाइसेन्सधारक द्वारा 8 अगस्त, 2020 को अचानक बंद कर दिया गया, जिसकी हमें कोई सूचना नहीं दो गयी। इसके विरोध में जबलपुर हाई कोर्ट में उसके विरुद्ध मुक़द्दमा दायर किया गया है।
  2. चैनल दोबारा शुरू करने की कोशिशें पूरे एक महीने की गयीं। लेकिन कहीं से कोई सफलता न मिलने की वजह से 7 सितम्बर, 2020 को ऑफ़िस बंद करने की दुखद घोषणा की गयी।
  3. लॉकडाउन के वक्त ऑफ़िस में क़रीब 190 लोग काम करते थे और सितम्बर तक 160।
  4. दो -तीन लोगों के अतिरिक्त (जो दिल्ली से बाहर रहते हैं), सभी कर्मचारियों की 7 सितम्बर तक की सैलरी दी जा चुकी है।
  5. हमारे अधिकांश साथियों को कोई शिकायत नहीं रही। केवल 37 लोग असंतुष्ट थे, जिन्होंने आखिरी महीने की सैलरी लेबर कमिश्नर के यहाँ केस करने के बाद उन्हीं की मौजूदगी में ली है।
  6. यही 37 लोग ज़्यादा मुआवज़े के लिए आंदोलन कर रहे हैं और लेबर कमिश्नर के यहाँ अपील में हैं।
  7. जहाँ तक स्ट्रिंगर की पेमेंट का सवाल है, उनके कुल जमा क़रीब 5 लाख बकाया हैं, जो पत्रकारों की आख़िरी सैलरी देने के बाद उन्हें देने का वादा किया गया था।

अब थोड़ा इस पर कि हंगामा क्यों बरपा?

सारा खेल पैसा वसूली का है। आजकल चलन हो गया है कि किसी को भी बदनामी का डर दिखाओ और दबाने की कोशिश करो।

बस कह दिया कि काला धन सफ़ेद करने का खेल चल रहा था और सोचा कि लोग तो यक़ीन कर ही लेंगे।

लेकिन कभी कभी ऐसे लोगों का पाला कुछ सच्चे और ईमानदार लोगों से भी पड़ जाता है। ऐसे लोग जीवन में जो सबसे ऊपर नैतिक शुचिता को रखते हैं। इसीलिए हमारी कम्पनी में न तो एक भी पैसा कैश लगा था, न ही एक भी पेमेंट कैश में होती थी। अच्छी पत्रकारिता का प्रयास कर रहे थे। जानते थे कि ताक़तें भी हमारी हर कमी को, हमें परेशान करने के लिए इस्तेमाल करेंगी। सो हर काम ठीक से किया। बस ये नहीं समझे कि कुछ लोग केवल शराब का खर्च चलाने के लिए भी पैसा वसूलना चाहेंगे और अनर्गल आरोप मढ़कर बदनाम करने की कोशिश करेंगे। ख़ैर, वो तो अपने आरोप अब कोर्ट में ही साबित करें कि कौन सा काला धन लगा था, कौन सा सफ़ेद हुआ। आज ही उन्हें नोटिस मिल जाएगी, आएं और साबित करें।

यह सच है कि स्वराज एक्सप्रेस चैनल दिक़्क़त में था। यह भी सच है कि जैसी पत्रकारिता हम कर रहे थे, उसमें व्यापारिक सफलता हमेशा से चुनौतीपूर्ण थी। लेकिन फिर भी हमारी कोशिश थी कि अच्छी पत्रकारिता की मिसाल दें। लेकिन पहले कोविड और फिर अचानक लाइसेन्स छिन जाने से हम असहाय हो गये।

लेकिन मेरा पूरा विश्वास है कि हमारे साथ काम करने वाले अधिकांश साथी स्वराज एक्सप्रेस में की गयी पत्रकारिता से संतुष्ट होंगे। वो गवाह होंगे कि कैसे तमाम दबावों के बावजूद अच्छी पत्रकारिता की मिसाल साबित की, बल्कि ऑफ़िस माहौल भी उन्हें अच्छा मिला। जो काले धन को सफ़ेद करने के लिए चैनल चलते हैं, वो ऐसी सच्ची और बेख़ौफ़ पत्रकारिता नहीं करते हैं।

और एक बात, सनसनी फैलाने के लिए लिख दिया कि 15 करोड़ के उपकरण की बंदरबाँट चल रही है। बतायें कि बंदरबाँट किनके बीच चल रही हैं। सारे उपकरण तो कम्पनी के ही हैं, पूरे स्वामित्व के साथ।अपनी चीज़ के लिए बंदरबाँट? बस कह दो ताकि अपने अनर्गल आरोप कुछ मज़बूत लगें।

बाक़ी जो कुछ कह रहे हैं, कोर्ट में भी कहियेगा। भाग नहीं जाइयेगा। क्योंकि सच की लड़ाई कठिन होती है बहुत, जिसे हम तो लड़ने के लिए तैयार हैं।

-गुरदीप सप्पल

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