कनपुरिया संपादक भोपाल के पत्रकारों को कोरोना संक्रमित कराने में जी-जान से जुटे!

भोपाल : कोरोना संक्रमण में भी खुद को देश में नम्बर-1 बताने वाले अखबार के सम्पादक अस्पताल में भर्ती कोरोना पॉजिटिव स्टाफ से खबरें मंगा रहे हैं। जिन निगेटिव कर्मचारियों को ऑफिस बुला रहे थे, वे भी आ गए पॉज़िटिव! कनपुरिया सम्पादक सारी हदें पार कर जान लेने पर आमादा हैं।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में उत्तर प्रदेश से आये एक कनपुरिया सम्पादक इन दिनों खासी चर्चा में हैं। चर्चा है अखबार प्रेम को लेकर। अब इसके लिये पत्रकार चाहे कोरोना पॉजिटिव होकर मर ही क्यों न जाएं। दरअसल पिछले हफ्ते इस अखबार के कुछ पत्रकार कोरोना पॉजिटिव हुए तो सम्पादक जी ने उन्हे छुट्टी नहीं दी। नतीजा पॉजिटिव पत्रकारों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पर संपादक जी लगातार दबाव बना रहे हैं कि नहीं दफ्तर आओ। वर्क फ्रॉम होम कुछ नहीं होता।

दिलचस्प बात ये है कि कनपुरिया संपादक फोन पर दबाव बनाकर जिन कर्मचारियों को जबरन ऑफिस बुलाने धमका रहे थे, उन कर्मचारियों की रिपोर्ट भी पॉजीटिव आ गई। बस चले तो पूरा पॉजिटिव को भी अस्पताल से ऑफिस बुला लेंगे औऱ खुद घर मे दुबके बैठे हैं। तो साहब आलम ये है कि संपादक जी का पत्रकारों से प्रेम पत्रकारों पर ही भारी पड़ रहा है। मीडिया में खासकर प्रिंट मीडिया में कोरोना पॉजिटिव पत्रकारों के साथ ऐसे व्यवहार की खबरें आम होती जा रही हैं।।इस अखबार के मालिकान तो राज्यसभा सदस्य भी हैं।

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Comments on “कनपुरिया संपादक भोपाल के पत्रकारों को कोरोना संक्रमित कराने में जी-जान से जुटे!

  • S Siddharth says:

    नवदुनिया भोपाल के क्रूर संपादक का मुफ्तखोरी वाला चेहरा

    मुफतखोर संपादक की कालगुजारिया
    राजधानी के प्रतिष्‍ठीत अखबार में एक संपादक महोदय ऐसे है जो मुफतखोरी के लिए जाने जाते है। संपादक जी हमेशा अपने प्रतिनिधियों के साथ दोयम दर्जे का व्‍यवहार भी करने के लिए मशहूर है। उत्‍तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले ये महोदय मुफत में सामान प्रतिनिधियों से मंगवाने उन्‍हें मानसिक रुप से प्रताडित करने और दूसरों के वाहन का संपूर्ण उपयोग करने के कारण सुर्खियों में है। इन महोदय के बारे में बताया जा रहा है कि ये सुबह और शाम की बैठकों में खबरों से ज्‍यादा किस्‍से कहानियों में ज्‍यादा रूचि रखते है। हर दिन उबाऊ भाषण और लालच की परिकाष्‍ठा पार कर देने वाली बाते इन दिनों इस अखबार के प्रतिनिधियों के साथ हो रही है। संपादक जी के भोपाल शहर में आए अभी जुम्म-जुम्‍मा चार महीने ही बीत पाए है कि यहां का एक सिटी चीफ मानसिक रोग का शिकार हो गया। संपादक जी से पहले तो पटरी ठीक बैठी लेकिन जैसे -जैसे सिटी चीफ महोदय का मर्ज बढता गया। संपादक ने उनसे दूरिया बना ली। अब संपादक जी इनकी सैलेरी भी इन्‍हें नहीं दे रहे है। दुख के इस काल में संपादक महोदय अपने ही साथियों को लूट-खसोट का शिकार बना रहे है। संपादक जी ने हाल ही में अपने एक प्रतिनिधि से कहा कि फल और सब्‍जी वालों से संजिदा संबंध बना लो। मुझे हर महीने फल और सब्‍जी लगती है। इससे पहले अपनी बिटिया का नेट न चलने का बहाना बनाकर एक प्रतिनिधि इंटरनेट डिवाइस ही वे डकार चुके है। धर्म समाज के प्रतिनिधि से भरी मीटिंग में कह चुके है कि मंदिरों में चढावा चढता है। खूब मालामाल हो कुछ हम तक भी पहुंचवाए। एक प्रतिनिधि को गैस सिलिंडर के लिए पाबंद कर दिया गया है। इस अखबार के एक वरिष्‍ठ प्रतिनिधि विगत दिनों बडी गाडी से आ रहे थे तो संपादक जी के नजरों में वे भी चढ गए। संपादक ने इन पर फबतियां कसते हुए कहा कि बडी बडी गाडियों अा जाते है और झोला लेकर चले जाते है। यह तो चंद उदाहरण मात्र है। संपादक के पास खुद की कार है इसके बावजूद वे एक ब्‍यूरो प्रमुख की कार से आना जाना करते है, लेकिन इस कार में कभी पेट्रोल नहीं डलवाते है। वह भी तब जब उनके परिवार को सबसे ज्‍यादा जरूरत है इस दौरान उनकी कार का पूरा उपयोग संपादक नाम का लालची प्राणी कर रहा है। कल की ही बात है इस अखबार में दवाईयों के लिए जिस प्रतिनिधि को पाबंद किया गया था उसे कोरोना हो गया। इस पर संपादक ने बबाल मचा दिया, लेकिन किसी को रियायत नहीं दी। अखबार के सभी कर्मचारी काफी परेशान है और लालची संपादक को अपनी पडी है। संपादक ने स्‍पष्‍ट कह दिया है कि जो दफतर नहीं आएगा उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा। आखिर इस तरह के व्‍यक्‍ित को संपादक की जिम्‍मेदारी कौन देता है। क्‍या जिसने इन्‍हें संपादक बनाया वे भी इसी तरह की मानसिक के शिकार है। पत्रकारिता कौम को बदनाम होने का कारण इस पेशे में इस तरह के लोगों का आना ही है। जो अपने स्‍वार्थ के लिए पद का दुरुपयोग करते है। ऐसे संपादक पत्रकारिता के लिए कलंक के समान है जो प्रतिनिधियों को घर का नौकर और चाकरी करने वाला समझते है।

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    • Ajai Bhadauria says:

      संस्थान को ऐसे संपदक को तत्काल बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए, क्योंकि ऐसे ही लोगों के कारण पीत पत्रकारिता को बढ़ावा मिलता। पत्रकारिकता जैसे पवित्र मिशन को ऐसे भ्रष्टाचारियों ने अर्थ का बाजार बना दिया है। पत्रकारों का दोहन, उत्पीड़न करने वाले ऐसे लोग चमचागिरी करके ही संपादक बने होंगे। अगर हर दिन इन्हें संपादकीय लिखने कह दिया जायेतो नानी मर जायेगी। ऐसे लोग संस्थान के भी हितैषी नहीं होते। घृणित मानसिकता से लवरेज ऐसे संपादक अपने भले के लिए कोरोना काल में अधीनस्थों की जान के दुश्मन होते हैं?

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