क्या ‘योर स्टोरी’ या ‘बेटर इंडिया’ जैसे पोर्टलों पर सफलता की फ़र्ज़ी कहानियाँ छपती हैं?

पंकज मिश्रा-

ऐसे किसान कहाँ पाए जाते हैं, जो एक एकड़ खेती से एक करोड़ की कमाई करते हैं। करोड़पति बन जाते हैं। अक्सर योर स्टोरी या बेटर इंडिया जैसे पोर्टलों पर इनकी सफलता की कहानियाँ पढ़ता हूँ तो मन हीनभावना से भर जाता है।
मेरी जमीन तराई के सबसे साधन संपन्न इलाके में हैं। सबसे उपजाऊ है..! मेरी तो जमा भी नहीं लौटती है…!

दिल्ली की एक कंपनी अभी सम्पर्क में आई। उसने सब्जियाँ के उत्पादन को लेकर कुछ बातें कीं। उन्हें सब्जियाँ चाहिए थीं लेकिन उससे ज्यादा वे मेरे खेतों-किसानों के फोटो वीडियो लेने में रुचि दिखा रहे थे। उन्हें सिर्फ मार्केटिंग से जुड़ी चीजें चाहिए थीं। आर्गेनिक कैसे पैदा होंगी, क्या टेक्नीक प्रयोग होगी आदि बातों में उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। सीधी बात यह कि सब्जियाँ उन्हें आर्गेनिक बताकर बेचनी थीं लेकिन आर्गेनिक चाहिए नहीं थीं। मेरी उनकी बात नहीं बनी क्योंकि यह मुश्किल काम हो गया है।

किस तरह की सब्जियाँ ऑर्गेनिक कहकर बेची जा रही होंगी, आप समझ सकते हैं!

एक धारणा और प्रचलित है कि अगर सब्जियाँ टेढ़ी-मेढ़ी, रंगहीन हैं तो ये जहरमुक्त होंगी, इसलिए अब ऐसी सब्जियों का बाजार भी बन रहा है।

इस तरह की पोस्टों को मेरा ऑर्गेनिक विरोध न माना जाए। कुछ छोटे-छोटे किसान बेहतरीन काम कर रहे हैं लेकिन इनका उत्पादन बाजार के लिए अपर्याप्त है। जैविक तरीके से सब्जियाँ भी उगा रहे हैं लेकिन इन्हें एक बड़े व्यापक वर्ग के लिए उगा पाना मेरी समझ से मुश्किल कार्य है। मेरा मकसद इस बहाने हो रही ठगी पर बात करना है।

प्रतिबंधित कीटनाशकों का प्रयोग अंधाधुंध हो रहा है, यह सर्वविदित है। इसे कम कैसे किया जाए, इस पर बात फिर कभी करेंगे। अभी यह कि जहर में से कम जहर कैसे चुने!!

कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएँ-

सिद्धार्थ सचान- पंकज जी, योर स्टोरी वगैरह सब पी आर प्लेटफॉर्म है, जिसमे आप अपनी स्टोरी पब्लिश करा सकते है जैसे चाहे। तो उनके बारे में मत सोचिये। आप अपने काम को गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ाते हुए अपना ब्रांड कैसे बना सकते हैं वो देखिये। ब्रांड ही बिकेगा। ब्रांड की ही वैल्यू है।

अंशुल तिवारी- आपने दिल की बात कह दी। इन वेबसाइट्स पर 5000 की पूंजी लगाकर 5 करोड़ का टर्नओवर तुरंत हो जाता है।

मोहित बजाज- कुछ नही करते है ये सिर्फ आप जितना बताते हो उसमे एक या दो शून्य बढ़ा के स्टोरी छाप देते है।

शुभम कुलश्रेष्ठ- आज का युग ऐसे ही पत्रकारों का है भईया, जो करोड़ों में एकड़ से कमवा दें, सरगुजा को केसर बता दें, शिल्पा शेट्टी के लगायें बैगन गा दें और किसानों पर चढ़ी थार को देशभक्ति बता दें।

सत्येंद्र पीएस- मेरे एक सीनियर थे डॉ उपेंद्र। उन्होंने खूब खबर लिखी कि एक एकड़ स्टीविया लगाकर साल में 10 लाख कमाया जा सकता है। एक दिन उनके साथ बैठे और बोले कि सर मेरे पास 10 एकड़ जमीन है। मैं तो साल भर में एक करोड़ कमा सकता हूँ। आपका आदेश हो तो ये 15 हजार की झटही नौकरी छोड़ें। इतना खून पीते हैं सब, इससे तो आजीवन एक करोड़ नहीं कमाया जा सकता। उन्होंने कहा, जो कर रहे हो, चुपचाप करो। मेरे पास 40 एकड़ जमीन है।

अंजुले- गैरपारंपरिक विधि से खेती में लाभ तो है… लेकिन उसकी लागत भी उसी तरह से बहुत ज्यादा है… दूसरे उसके लिए मार्किट भी तलाश करनी होती है… और अगर किसी वजह से फसल तबाह हुई तो आप कहीं के भी नहीं रहेंगे। एक बात और कहूंगा… इजरायली खेती टेक्निक विधि से सक्सेज पाने वाले किसान वगैरह की जो स्टोरी या वीडियो आप देखते हैं. वे बेसिकली pr हैं. इसमें आपको उस तथाकथित किसान से मोटी फ़ीस देकर ट्रेनिंग वगैरह व चीज़ें लेने के लिए इनडायरेक्टली प्रेरित किया जाता है… हालांकि इसके जरिए करोड़ों कमा लेने की स्टोरी मुझे अकसर फ़र्जी ही प्रतीत होती है। अगर सक्सेज रेट इतना ज्यादा और बढ़िया होता तो हर किसान उसके पीछे भाग रहा होता… लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा है नहीं. कुछ खेत अपने भी हैं उनसे जो अनुभव हुए हैं उससे यही कह सकते हैं कि पारम्परिक और कम से कम लागत में जो आधुनिक टेक्निक के मिश्रण से फसल ऊगा कर ही खेती से कुछ मिलने की उम्मीद कर सकते हैं. वरना खेती घाटे का ही सौदा है… हां पारम्परिक खेती विधि आपको मरने नहीं देगी. लेकिन इजरायली टाइप की पूरी तरह से टेक्निकल खेती… मुझे लगता है लोगों को बर्बाद कर देगी अगर फसल तबाह हुई किसी भी वजह से..

नरपत सिंह उदावत- ऐसे गिने चुने उदाहरण होते है। सच्चाई भी होती हैं। हमारे इधर एक बन्धु गुलाब के फूलों की खेती पॉलीहाउस में करते हैं, इनकी कलिया एक्सपोर्ट होती हैं, अमीरजादों की बर्थडे पार्टी के लिए। एक फूल की कली ही सात से दस रुपये देती हैं। लेकिन यह रसूख वालो के धंधे हैं।
एक बन्धु पाली हाउस में सब्जी बोते हैं, एक एकड़ से सालाना तीस लाख का खीरा लेते हैं। मुझे आंवलों से एक एकड़ से सालाना 4 लाख की आय होती हैं। पारम्परिक कृषि में बहुत कम लाभ होता है। इस बार मेरे एक एकड़ की मक्के की फसल को पूरा ही जंगली सूअर खा गए। बारिश की कमी से 10 एकड़ में बोए तिल बिल्कुल नहीं हुए।

पंकज मिश्रा- पॉली हाउस वाले व्यापारी हैं, किसान कम हैं। इसमें लागत बहुत आती है। सामान्य किसान की बात कर रहे हैं। रिस्क ज्यादा है।

नरपत सिंह उदावत- अगर मौसम साथ दे तो परम्परागत खेती जिसमे मक्का, बाजरा, मूंग,गेंहू, चना, सरसो कपास आदि फसल की खेती करने पर प्रति एकड़ सालाना पचास हजार रुपये से अधिक आय हमारे इधर नहीं होती हैं।

सुहैब मंसूरी- शुरुआती वक़्त में ज़्यादा लागत आती है, समय और अनुभव के साथ लागत घटने लगती है. होती है कमाई, यह फ़सल पर निर्भर करता है, जैसे मेवे और मसालों की खेती.
सिर्फ़ केशर की खेती को ही देख लें तो यह कम जगह से सोना उगल सकती है.खेती के लिए सही जानकारी और सही वातावरण निर्माण की ज़रूरत है. केशर की खेती पर मैं भी विचार कर चुका हूँ, कभी वक़्त मिला तो इसपर भी फ़ोकस करूंगा.

पंकज मिश्रा- भाई, 90 प्रतिशत किसान गेहूं, धान, दलहन, तिलहन उगाता है। इसी की जरूरत है। यही कृषि है। हमें इनकी बात करनी चाहिए। आपके साथ केसर उगाने में मैं भी साझीदार बनना चाहूँगा।

आशीष आनंद- मेरा तजुर्बा तो यही है, कि आप वही सबसे अच्छा कर सकते हैं जो आपको आता है। मतलब आप अच्छा लिख सकते हैं, भले ही खेतीबाड़ी और किसान पर लिखें, अगर आपकी इसी में दिलचस्पी है, उस लिखे पर डाक्यूमेंट्री या फिल्म बनाएं-बनवाएं… फावड़ा लेकर फोटो खींचना, चूल्हा जलाकर शहरियों को आकर्षित करना क्षणिक है… आपको यह स्वीकारना चाहिए कि आप खेत वाले हैं लेकिन किसान नहीं, बुनियादी तौर पर लेखक हैं। आप किसानों के लेखक हो सकते हैं…

पंकज मिश्रा- मैं किसान नहीं हूँ, ऐसा हो सकता है लेकिन भाई खेती खुद ही करता हूँ। बाकी मेरे बारे में आपकी समझ का स्वागत है।

पुष्पेंद्र अवधिया- किसान बहकावों और छलावों के चक्कर मे और कई बिना खर्च के इनपुट्स के चक्कर में सही रास्ता छोड़ देते हैं। बाद में स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि दवाई दुकान वाले के निर्देश पर भारी भरकम कीटनाशकों और अन्य चीजों का प्रयोग करना ही पड़ता है। ऐसी विडंबना है कि खाद को भी रासायनिक कहकर बुराई करने वाले आखिर में कैंसर कारक दवाइयों का खुद छिड़काव करते हैं। उत्पादन भी नहीं आता, बेतहाशा खर्चा होता है, जमीन और पर्यावरण की बर्बादी होती है और जहरमुक्त का उद्देश्य तो दूर की कौड़ी है! प्रकृति अनुकून सही रास्ते चलें तो ये सब उद्देश्य सफल हो सकते हैं।

कमल जीत- आर्गेनिक फार्म की योजना यदि अपने आसपास के 7 किलोमीटर इलाके में बसने वाले 2000 घरों के 10% यानी 200 घरों को हर रोज 60 रुपये के फल सब्जी उपलब्ध कराने पर बनाई जाए तो हर रोज 5000 रुपये का प्रॉफिट बनाया जा सकता है।

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