पत्रकार कुणाल प्रियदर्शी को मिली बड़ी जीत, प्रभात खबर को देना होगा 17 लाख रुपये

बिहार से मजीठिया क्रांतिकारी को मिली इस जीत से हक की लड़ाई लड़ रहे शेष मीडियाकर्मियों में खुशी का माहौल

मजीठिया क्रांतिकारियों के लिए बिहार से बड़ी खुशखबरी आयी है। मुजफ्फरपुर के कुणाल प्रियदर्शी ने ढाई साल की लंबी लड़ाई के बाद आखिर प्रभात खबर अखबार (न्यूट्रल पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड द्वारा प्रकाशित) के प्रबंधन को पराजित करने में सफलता पायी है।

यह बिहार के मजीठिया क्रांतिकारियों में पहली जीत है।

मुजफ्फरपुर लेबर कोर्ट ने कुणाल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए प्रभात खबर प्रबंधन को दो महीने के भीतर 17 लाख रुपये आठ प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया है। ब्याज की राशि 03 दिसंबर, 2017 से तब तक जोड़ी जायेगी, जब तक कंपनी पूरी राशि का भुगतान नहीं कर देती।

कुणाल की यह जीत इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि बिहार के एक बड़े वकील द्वारा जीत की संभावना से इनकार कर दिये जाने के बाद उन्होंने न सिर्फ लड़ाई खुद ही लड़ी, बल्कि बिहार में लेबर कानून के बड़े जानकार माने जाने वाले एक बड़े वकील को पराजित भी किया।

पर ऐसा नहीं है कि उन्होंने इसके लिए किसी वकील से मदद नहीं ली। करीब एक हजार किलोमीटर दूर दिल्ली में रह रहे वकील हरीश शर्मा ने समय-समय पर उनकी मदद की, जिससे की लडाई आसान होती चली गयी। यहां ध्यान देने वाली बात है कि कंपनी की ओर से जिस बड़े वकील ने बहस की, वे ही बिहार में कमोबेश सभी अखबार प्रबंधन का पक्ष मजीठिया केसों में रख रहे हैं।

ऐसे में यह जीत बिहार के सभी मजीठिया क्रांतिकारियों के लिए एक टॉनिक की तरह है।

नवंबर, 2017 में शुरू हुई लड़ाई

कुणाल की लड़ाई नवंबर, 2017 में शुरू हुई। मजीठिया वेज बोर्ड की मौखिक डिमांड करने पर अखबार प्रबंधन की ओर से उन्हें लगातार प्रताड़ित किया जाने लगा। तब 03 दिसंबर 2017 को उन्होंने न सिर्फ न्यूज राइटर के पद से इस्तीफा दिया, बल्कि मजीठिया वेज बोर्ड की डिमांड भी की।

अपने त्यागपत्र में उन्होंने प्रताड़ना की पूरी कहानी का जिक्र भी किया। मजीठिया का लाभ नहीं मिलने पर कुणाल ने डीएलसी मुजफ्फरपुर के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज करायी। अप्रैल 2018 में डीएलसी ने यह केस श्रमायुक्त बिहार के यहा अग्रसारित कर दिया। अगले छह महीने तक जेएलसी-2 ने मामले की सुनवाई की व समझौता नहीं होने पर मामले को लेबर कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया। जुलाई, 2019 में लेबर कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई।आखिर 08 फरवरी, 2020 को कोर्ट ने कुणाल के पक्ष में फैसला जारी कर दिया. हालांकि, लॉकडाउन के कारण इसकी घोषणा 06 जून को हुई।

बहस के दौरान कंपनी के वकील ने एमडी व चीफ ह्यूमन रिसोर्स ऑफिसर को व्यक्तिगत तौर पर पार्टी बनाये जाने का दावा किया. पर, कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। अपने जजमेंट में कोर्ट ने लिखा है कि डब्ल्यूजे एक्ट अखबार में काम करने वाले वर्किंग जर्नलिस्ट व अन्य कर्मियों से जुड़ा है। ऐसे में कोई व्यक्तिगत कैपेसिटी में पार्टी बनाया ही नहीं जा सकता. पार्टी जब भी बनेगा तो वह न्यूजपेपर स्टेबलिशमेंट ही होगा। यही नहीं कोर्ट ने कंपनी की ओर से सेक्शन 20(जे) के तहत भरे गये डॉक्ट्रीन ऑफ वेभर (डीओडब्ल्यू) को भी फर्जी पाया। साथ ही साफ किया कि यह तभी मान्य होगा, जब कर्मी को वेज बोर्ड से बेहतर सैलरी मिल रही हो।

कोर्ट वैलिडिटी तय नहीं करती, रेफरेंस पर फैसला देती है

बहस के दौरान कंपनी के वकील ने रेफरेंस की वैधता पर सवाल उठाये। इस पर कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया, जो कि अन्य क्रांतिकारियों के लिए भी फायदेमंद हो सकता है. कोर्ट ने नेशनल इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज लिमिटेड व राजस्थान सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा है कि लेबर कोर्ट या इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल को रेफरेंस की वैधता तय करने का अधिकार नहीं है। वे सिर्फ रेफरेंस के बिंदु पर ही फैसला दे सकते हैं। फिलहाल इस फैसले से मजीठिया क्रांतिकारियों में खुशी की लहर है।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

9322411335



भड़ास व्हाट्सअप ग्रुप ज्वाइन करें-  https://chat.whatsapp.com/JYYJjZdtLQbDSzhajsOCsG

भड़ास का ऐसे करें भला- Donate

भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849



Comments on “पत्रकार कुणाल प्रियदर्शी को मिली बड़ी जीत, प्रभात खबर को देना होगा 17 लाख रुपये

Leave a Reply to Virendra Cancel reply

Your email address will not be published.

*

code