लो जी, हेमंत-कलहंस ने फर्जी चुनाव करा के खुद को विजयी घोषित कर दिया

(आज हुए मतदान का एक दृश्य)


Yashwant Singh : लखनऊ में पत्रकारों ने अपना नेता चुनने के लिए कल भी वोट दिया और आज भी दे रहे हैं. जानते हैं क्यों? क्योंकि मान्यताप्राप्त पत्रकारों के दो गुट हो गए हैं और एक गुट जो बेहद बदनाम, लालची, सत्तापरस्त रहा है, किसी भी कीमत पर अध्यक्ष व सचिव पद नहीं जाने देना चाहता, वे चाहते हैं ताउम्र इस पद पर बने रहें. इसी से साबित हो जाता है कि ये कितने बड़े अलोकतांत्रिक और कितने बड़े लायजनर हैं. क्या इससे अलग भी कोई प्रमाण चाहिए. ये दो सज्जन हैं हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस.

इन दोनों यानि हेमंत और कलहंस ने कल अपने हिसाब से चुनाव करवाया जिसमें करीब दो सौ पत्रकारों का वोट डाक से आया वोट बताकर खुद के नाम पर डाला दिखाकर पूरा चुनाव फर्जी तरीके से अपने पाले में कर लिया. डाक से वोट? जी हां. मानों पत्रकार न हों, सीमा पर तैनात फौजी हों. असल में हेमंत और कलहंस की रणनीति यही थी कि डाक से वोट नामक कैटगरी क्रिएट कर इसके माध्यम से आए-लाए वोट को खुद के नाम मिला वोट दिखा कर खुद को जिता लेना है. ये सारी कार्यवाही गोपनीय, अलोकतांत्रिक और अपारदर्शी तरीके से की गई ताकि इसका कोई रिकार्ड न रहे. लोगों को कहा गया कि वो फोन पर ही बोल दें कि उनका वोट डाक कैटगरी का रहेगा, बस, वो वोट देने आएं या न आएं. उसके बाद तो उनका वोट हेमंत-कलहंस अपने पाले में दिया गया वोट दिखा ही लेंगे. 

उधर, आज जो चुनाव हो रहा है उसमें डाक से वोट की व्यवस्था बिलकुल नहीं की गई है. आइए और वोट डालिए. आज जो चुनाव हो रहा है वह वीडियो रिकार्डिंग के बीच हो रहा है ताकि कोई भी विवाद न हो और सब कुछ ट्रांसपैरेंट रहे. कल हुए चुनाव के बाद शाम को हेमंत तिवारी ने फिर से खुद को अध्यक्ष घोषित कर लिया और सिद्धार्थ कलहंस ने खुद को सचिव. आज हुए चुनाव का नतीजा देर रात आने की उम्मीद है. लखनऊ के जितने भी ठीकठाक पत्रकार हैं, वे सभी आज वोट देने गए.

देखना ये है कि उत्तर प्रदेश की सरकार की तरफ से किस कमेटी को मान्यता दी जाती है. हालांकि यूपी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव जानते हैं कि हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस मार्केट में पूरी तरह गंधा चुके हैं, फिर भी वे नौकरशाहों की सलाह पर इन्हें ही मान्य नेता घोषित कर शपथ दिला सकते हैं. वजह? आप देख ही रहे हैं कि यूपी में जंगलराज है. जो दागी है, जो दलाल है, जो रीढ़विहीन है, जो यसमैन है, वह सत्ता संरक्षित है. ये वही यूपी है जहां जेल से छूटा आईएएस मलाईदार पोस्टिंग पा जाता है और जो आईएएस-आईपीएस सत्ता की गलत नीतियों के बारे में बोल देता है उसे निलंबित कर दिया जाता है, उसे वीआरएस लेने को मजबूर कर दिया जाता है. ऐसे उलटबांसी भरे प्रदेश में होना तो उल्टा ही है.

यह भी सच है कि लखनऊ की जो असली मीडिया है, चैनल वाले हैं, अखबार वाले हैं, वो सब हेमंत व कलहंस के खिलाफ हैं और आज के चुनाव में वोट डालने गए. यानि हेमंत कलहंस अगर सरकारी समर्थन फिर से नेता आरोपित कर भी दिए गए तो जो लखनऊ की मीडिया है उसे कैसे आगे टैकल कर पाएंगे हेमंत और कलहंस. कुल मिलाकर बहुत रोचक मोड़ पर आ चुका है लखनऊ के मान्यता प्राप्त पत्रकारों का चुनाव. देखना है नौकरशाह नवनीत सहगल किस गुट पर वरदहस्त रखते हैं. हालांकि यह तय माना जा रहा है कि अगर हेमंत और कलहंस के गुट को सरकार ने मान्यता दी तो लखनऊ के बाकी सभी पत्रकार सड़क पर उतर जाएंगे. 

आज उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की नई कार्यकारिणी के लिए जो चुनाव हो रहा है, उसमें पंद्रह पदों के लिए कुल 43 उम्मीदवार हैं. लगभग 475 पत्रकारों ने निर्धारित सौ रुपये सदस्यता शुल्क देकर मतदान के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया हैं. ये चुनाव एक साल पहले ही हो जाने चाहिए थे. मगर पदाधिकारी हीलाहवाली कर रहे थे. इसलिए 14 अगस्त को जनरल बाडी ने चुनाव समिति गठित कर एक माह में चुनाव कराना का निर्देश दिया. मगर निवर्तमान पदाधिकारियों ने अपना अलग गुट बनाकर स्वयम को फिर से निर्वाचित घोषित कर दिया, जिससे पत्रकारों में भारी आक्रोश है. काफी रस्साकशी के बाद ये चुनाव हो रहे हैं. अत: देश भर के पत्रकारों, मीडिया से जुड़े लोगों में इस चुनाव की चर्चा है. पांच वरिष्ठ पत्रकारों की समिति पारदर्शी तरीके से इस चुनाव का संचालन कर रही है . समिति के सदस्य हैं सर्वश्री शिव शंकर गोस्वामी, विजय शंकर पंकज, किशोर निगम, संजय राजन एवं मनोज छाबड़ा.

उधर, हेमंत और कलहंस गुट ने कल जो चुनाव कराया, उसमें खुद ही को विजयी घोषित बताया, प्रेस रिलीज जारी कर. पढ़िए उनकी तरफ से कल जारी की गई प्रेस रिलीज….


राज्य मान्यता संवाददाता समिति का परिणाम घोषित : हेमंत अध्यक्ष, सिद्धार्थ सचिव चुने गए

लखनऊ, 30 अगस्त. उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में हेमंत तिवारी को अध्यक्ष और सिद्धार्थ कलहंस सचिव के पद पर दोबारा जीत हासिल हुई है. छायाकार इन्द्रेश रस्तोगी को नई कार्यकारिणी में कोषाध्यक्ष का पद हासिल हुआ है. एनेक्सी मीडिया सेंटर में आज संपन्न हुए मान्यता समिति के चुनाव में 435 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. अध्यक्ष पद पर तीन प्रत्याशियों प्रभात त्रिपाठी, शशि नाथ और हेमंत तिवारी ने अपना भाग्य आजमाया. हेमंत तिवारी सबसे ज्यादा 335 वोट पाकर निर्वाचित घोषित किये गए. शशिनाथ को 40 और प्रभात त्रिपाठी को मात्र 31 वोट पर ही संतोष करना पड़ा. उपाध्यक्ष पद के लिए 5 प्रत्याशियों ने अपना भाग्य आजमाया. 257 वोट पाकर अरुण त्रिपाठी और 184 वोट पाकर मोहम्मद ताहिर निर्वाचित घोषित किये गए. सचिव पद पर 223 वोट हासिल कर सिद्धार्थ कलहंस निर्वाचित हुए. कोषाध्यक्ष के एक पद के लिए 183 वोट पाकर इन्द्रेश रस्तोगी निर्वाचित हुए. इस पद के लिए चुनाव लडे संजय चतुर्वेदी 122 पाकर उपविजेता रहे. तीसरे नंबर पर आये अतुल शर्मा को 101 वोट पर संतोष करना पड़ा. संयुक्त सचिव के पद पर 221 वोट हासिल कर श्रीधर अग्निहोत्री और 145 वोट हासिल कर रूपेश सोनकर विजयी रहे. कार्यकारिणी सदस्य के 11 पदों के लिए 20 प्रत्याशी मैदान में थे. इनमें एकमात्र महिला उम्मीदवार तमन्ना फरीदी ने सबसे ज्यादा 278 वोट हासिल किये. अन्य कार्यकारिणी सदस्यों में टीबी सिंह (259), दिलीप सिन्हा (227), नवेद शिकोह (215), भारत सिंह (210), अनुभव शुक्ल (202), जितेन्द्र कुमार (196), सत्य प्रकाश त्रिपाठी (182), अब्दुल अज़ीज़ सिद्दीकी (130), अखिलेश कुमार सिंह (128) और शबीहुल हसन (124) निर्वाचित घोषित किये गए.


लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

इसी प्रकरण पर लखनऊ के एक पत्रकार की लिखी रिपोर्ट पढ़ें…

उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के चुनावी महाभारत में जीत गया अहंकार, खंडित हो गयी पत्रकार एकता



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Comments on “लो जी, हेमंत-कलहंस ने फर्जी चुनाव करा के खुद को विजयी घोषित कर दिया

  • राहुल गुप्ता says:

    Yashwant Sir.

    जो कल चुनाव हुआ है वह एक तरीके से अबैध तरीके से अपने सीपलाहार जमा कर लड़ा गया है।

    और आज जो चुनाव हो रहा है, उसमे पारदर्शिता है, ईमानदारी है, कुछ टेड़े भी है कुछ मेढे भी है, लेकिन कोई कहे ईमानदार है?? यह हज़म नहीं है। अगर ईमानदार है, दिखा दे शासन और प्रशासन को उसकी औकात???

    की 3 साल बाली पत्रकारिता गयी, जो दिखेगा वही हूबहू दिखेगा और छपेगा। इसमें कुछ् लोगो को दिक्कत आएगी, जब आप अपनी भड़ास पर नंगा करके धो देते है, फिर इनको क्या दिक्कत होती है, जो सच है उसको हूबहू वैसा ही दिखाने में???

    एक बात और सर – क्या कल के चुनाव या आज के चुनाव को लेकर कोई मनमुटाव हुआ तो कोर्ट किसका पक्ष लेगी। 3 साल के दलालो का या इस नयी उम्मीद की किरण जो आज अपना जन्म लेगी उसका????

    आपकी रायशुमारी मिल जाए तो मजा आ जाए,

    Reply
  • प्रयाग पाण्डे says:

    श्री यशवंत जी । नमस्कार ।
    मित्र !. “उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति” के चुनाव को लेकर “भड़ास” ने बेवाकी के साथ खूब खबरें छापी । इसके लिए “भड़ास” निश्चित ही बधाई का पात्र है । इन चुनावों के बहाने असल – नकल , ईमानदार – बेईमान और पत्रकार एकता समेत कई सवाल उठे ,जिन्हें उठना भी चाहिए । लेकिन ये तमाम मुद्दे / सवाल महज .” उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति” तक ही क्यों सीमित रहें ? ये सवाल देश भर के पत्रकार ट्रेड यूनियनों के संदर्भ में भी उठने या उठाए जाने नहीं चाहिए ? देश की पत्रकार यूनियनों में पिछले कई वर्षों से एकाधिकार जमाए बैठे कतिपय स्वनामधन्य पत्रकार नेताओं ने अपने निहित स्वार्थों के चलते अनेक राज्यों में पत्रकारों की कई यूनियनें बनवा कर उन्हें कितने टुकड़ों में विभक्त कर दिया है ? कई पत्रकार यूनियनों के नेता जी तो राज्य इकाइयों की संबद्धता को ऐसे बेच रहे हैं , जैसे कि कुछ सियासी पार्टियां चुनावी टिकट बेचती हैं । कुछ पत्रकार यूनियनों के नेताओं ने तो एक राज्य में एक या दो नहीं बल्कि तीन – चार तक यूनियनों को संबद्धता के पत्र जारी कर दिए हैं । पत्रकारों को एक मंच पर लाकर उनकी समस्याओं के निराकरण का दंभ भरने के नाम पर गठित कथित राष्ट्रीय पत्रकार यूनियन कई राज्यों के पत्रकारों के बीच आपस में ही सिर – फुटव्वल करने में जुटे हैं । उत्तराखंड राज्य इसका जिन्दा उदाहरण है । उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन अपने गठन के वक्त से ही राष्ट्रीय स्तर पर आईएफडब्ल्यूजे से उत्तराखंड इकाई के रूप में संबद्ध था और क़ानूनी तौर पर आज भी है । आईएफडब्ल्यूजे से उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की संबद्धता के रहते आईएफडब्ल्यूजे उत्तराखंड के भीतर तीन से ज्यादा पत्रकार युनियों को संबद्धता का पत्र जारी कर चुका है ।जिसके चलते आज उत्तराखंड के पत्रकार अपनी समस्याओं और उत्पीड़न जैसे सवालों को लेकर सरकार से लड़ने के बजाय आपस में ही लड़ रहे हैं । पत्रकार यूनियनों के बीच अपने को असल और दूसरे को नकली बताने की होड़ सी मची है । पत्रकारों की सारी सांगठनिक ऊर्जा बेवजह पैदा किए गए इन विवादों में ही जाया हो रही है । हालाँकि उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन से आईएफडब्ल्यूजे से संबद्धता यह मामला जिला न्यायालय होते हुए अब हाई कोर्ट तक पहुँच गया है । मामला फ़िलहाल उत्तराखंड हाई कोर्ट में विचाराधीन है । पर मेरा अनुरोध सिर्फ यह है कि पत्रकारों की एकता के सवाल को एक यूनियन या एक नगर तक सीमित कर देखना क्या उचित है ? मेरी राय में लखनऊ के बहाने इस सवाल को व्यापक परिपेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है । सादर ।

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  • Ashish Jalota says:

    सिद्धार्थ कलहंस और हेमंत तिवारी सबसे बड़े चोर और दल्ले पत्रकार हैं। इन हरामियों के गले में जूतों की माला डाल कर पूरे लखनऊ में परेड करवाना चाहिए। दलाली की दूकान चैनल समाचार प्लस वाले दल्लाश्री उमेश कुमार शर्मा को यूपी में घुसेड़वाने वाले यही दोनो लोग है। बेईमानी के पैसों के दम पर हनक हांकना चाहते हैंं। इन सालों का बहिष्कार किया जाना चाहिए।

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