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अगर कोरोना संक्रमित होने के बाद ज़िंदा बच गए हैं तो समझिए कोरोना आगे आपका कुछ न उखाड़ सकेगा!

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गिरीश मालवीय-

बिग बिग ब्रेकिंग : इंडियन पब्लिक हेल्थ असोसिएशन के प्रेजिडेंट और एम्स में कोवैक्सीन ट्रायल के प्रिसिंपल इंवेस्टिगेटर प्रोफेसर डॉ. संजय राय का कहना है कि नेचुरल इम्युनिटी (संक्रमण होने के बाद मिली इम्युनिटी) किसी भी वैक्सीन की तुलना में ज्यादा वक्त तक और ज्यादा बेहतर प्रोटेक्शन दे रही है। इसलिए जिन लोगों को कोराना संक्रमण हो गया है उन्हें वैक्सीन की जरूरत नहीं है।

जब उनसे यह पूछा गया कि ऐसे मामले भी आए हैं जिन्हें पिछले साल भी कोरोना संक्रमण हुआ था और इस बार भी संक्रमण हुआ है? तो इसपर उन्होंने कहा कि ऐसे केस ज्यादातर माइल्ड हैं।

उन्होंने बताया कि मैंने दोनों ग्रुप की तुलना की है। एक ग्रुप वह है जिसे संक्रमण होने के बाद फिर से संक्रमण हुआ और दूसरा ग्रुप वह जिसे वैक्सीन लगी है। दोनों को देखें तो वैक्सीन वाले ग्रुप में ज्यादा मामले संक्रमण और मौत के आ रहे हैं। उन्होंने कहा के नेचुरल इम्युनिटी वाले मामले में डेथ बहुत कम हो रही है।

पहली बार किसी डॉक्टर ने नेचुरल इम्युनिटी की तुलना वेक्सीन से प्राप्त इम्युनिटी से की है और उसे कमतर करार दिया है साथ ही यह भी कहा है कि तुलनात्मक रूप से वेक्सीन लगवाने लोगो में संक्रमण और मौतों की तादाद अधिक है।

अगर वह यही बात पुरे तथ्यात्मक प्रमाण के साथ दुनिया के सामने रख दे तो मानवता की बहुत बड़ी सेवा होगी। पर ऐसा होने के चांस नही के बराबर है

इसलिए मुझे तो फिर भी यकीन है कि कोई कुछ भी बोले। वैक्सीन तो सबको लग कर ही रहेगी क्योकि वैक्सिनेशन से दूसरे बड़े गोल सेट किये जा चुके है और शायद ऐसे बयान इसलिए सामने लाए जा रहे है ताकि भारत में मोदी सरकार को थोड़ा और टाइम मिल जाए।

सेकंडरी इंफ़ेक्शन से मौतें!

आज भारत के बारे में एक नई रिपोर्ट आई है जिसमे कहा गया है कि कोविड-19 के जिन रोगियों को सेकेंडरी वायरल या फंगल संक्रमण होता है, उनमें से आधे से अधिक की मौत हो जाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक किसी संक्रमण के इलाज के दौरान या बाद में एक अन्य संक्रमण का हो जाना सेकेंडरी इंफेक्शन कहलाता है। एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया भी कहते हैं कि यह कोरोना संक्रमितों में अधिक मौत का कारण बन रहा है।

कोरोना की पहली लहर में जून से लेकर अगस्त 2020 तक देश के 10 अस्पतालों में 17,534 रोगियों जो आईसीयू और अन्य वार्डों में भर्ती थे उन पर यह अध्ययन किया गया।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि कोविड-19 रोगियों में उपचार के दौरान या बाद में सेकेंडरी बैक्टीरियल या फंगल इंफेक्शन के मामले देखने को मिले हैं। आश्चर्यजनक यह है कि इनमें से आधे से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। ज्यादातर लोग रक्त और श्वसन तंत्रिका संबंधी सेकेंडरी इंफेक्शन के शिकार हो रहे हैं। मौजूदा समय में ब्लैक, व्हाइट और येलो फंगस को भी सेकेंडरी इंफेक्शन के रूप में देखा जा रहा है।

आईसीएमआर की प्रमुख वैज्ञानिक और अध्ययन की नेतृत्वकर्ता डॉ कामिनी वालिया ने चिंता जाहिर करते हुए बताया है कि ज्यादा मात्रा में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग करते रहने से ड्रग रेजिस्टेंस उत्पन्न हो जाता है। पहली लहर के दौरान हमने पाया कि 10 फीसदी रोगियों को एंटी-फंगल दवाएं दी गईं हालांकि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं थी।

अब मजे की बात सुनिए यह रिपोर्ट जनवरी के तीसरे हफ्ते में तैयार कर ली गयी थी लेकिन पब्लिश की गई 24 मई को इस दरम्यान दूसरी लहर आकर भी गुजर गई अगर यह रिपोर्ट पहले सामने आ जाती तो हो सकता है कि दूसरी लहर में जो सेकेंडरी इंफेक्शन सामने आया है उसे काफी हद तक रोक दिया जाता।

भारत मे इन सब बातों की कोई कदर ही नही है। WHO के विशेषज्ञ ने सही कहा था “These mistakes occur because healthcare systems are not suitably designed to deal with these errors and learn from them,” the expert said, while admitting that many medical facilities hide what they did wrong, which often keeps them from taking steps to make sure these mistakes are not repeated in the future.

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