उत्‍तराखंड में सरकारी चाटुकारिता का ठेका ईएमएस को

दीपक आजाद: पिछले पांच सालों में 32 लाख का भुगतान : यह अपने उत्तराखंड में ही हो सकता है कि सरकार मीडिया संस्थानों को अपनी चाटुकारिता में लगाने के लिए सालाना लाखों रुपयों का ठेका देने में भी किसी तरह की कोई शर्म या हया महसूस नहीं करती। सूचना महकमे में सालों से अपनी खबरों के लिए कम, धंधेबाजी के लिए कुख्यात एक्सप्रेस मीडिया सर्विस के साथ मिलकर सूचना विभाग के बाबू यह कमाल दिखा रहे हैं।

राज्य सरकार की स्तुतिगान कराने के लिए बकायदा सूचना विभाग हर साल ईएमएस को अपने पक्ष में खबरें छपवाने के लिए लाखों का ठेका दे रहा है। जब कोई सरकार ही किसी मीडिया संस्थान को अपने पक्ष में खबरें छपवाने के लिए इस तरह ठेका देगी तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य में मीडिया संस्थान सरकार के हाथों किस हदतक बंधक बने हुए हैं।

उत्तराखंड राज्य गठन के वक्त से ही मीडिया के धंधेबाज सरकार की चाटुकारिता में इतने मशगूल हैं कि उन्हें उसके आगे-पीछे कुछ नहीं सूझता है। राज्य में संसाधनों की खुली लूट में हिस्सेदारी चाहने वाले पत्रकारिता के भेष्‍ा में नौकरशाहों और नेताओं के साथ मिलकर जमकर चांदी काट रहे हैं। जो लोग कल तक फटीचर हाल में थे, वे इन सालों में मालामाल हो गए। ऐसे पत्रकारों में ईएमएस नाम की समाचार एजेंसी के ब्यूरो प्रमुख संजय श्रीवास्तव भी शामिल हैं। राज्य गठन के तत्काल बाद ईएमएस का ब्यूरो प्रमुख बनकर श्रीवास्तव देहरादून आ टपके। कुछ दिन यहां के नेता-नौकरशाहों का मिजाज भांपने के बाद इन साहब ने सूचना विभाग के भ्रष्ट बाबुओं के साथ ऐसी खिचड़ी पकाई कि राज्य सरकार की चाटुकारिता करने के लिए खबरों का सरकारी ठेका ही अपने नाम करवा लिया। हालांकि इसमें ये सज्जन अकेले नहीं थे। ईएमएस की तर्ज पर ही एनएनआई को भी कुछ समय के लिए इसी तरह का ठेका दिया गया था।

ईएमएस ने 2001 में सूचना विभाग को सरकार के पक्ष में राज्य के दर्जनों अखबारों में खबरें छपवाने के लिए प्रस्ताव दिया। सूचना विभाग के बाबुओं ने भी वर्ष 2002 में संजय श्रीवास्तव के प्रस्ताव को हरी झंडी देते हुए ईएमएस को सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं की खबरें छपवाने के लिए जनपदवार 14 हजार रुपये महीने के हिसाब से ठेका दे दिया। इस लिहाज से ईएमएस को महीना 1 लाख 82 हजार रुपये का ठेका दिया गया। वर्ष 2007 तक यह ठेका बिना किसी रोकटोक के चलता रहा। इसी वर्ष सूचना विभाग के सचिव डीके कोटिया ने ईएमएस को इस तरह सरकारी चाटुकारिता में लगाने पर सवाल खड़ा करते हुए इसकी उपयोगिता को ही सिरे से खारिज कर दिया। लेकिन सूचना के धंधेबाजों ने यहां भी ऐसा कमाल दिखाया कि ईएमएस को ठेका दिलाने के लिए संजय श्रीवास्तव को रास्ता दिखाते हुए सीधे मुख्यमंत्री से मंजूरी दिला दी। इसी दौरान मुख्यमंत्री से इस बिहाफ पर मंजूरी दी गई कि ईएमएस सरकारी खबरों को अमर उजाला, जागरण और नवभारत टाइम्स जैसे नामी गिरामी अखबारों के साथ ही पचास से ज्यादा छोटे-बड़े अखबारों में प्रकाशित कराने का काम करेगी।

सूचना का अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2005 से 2009-10 तक ही ईएमएस को सूचना महकमे के बाबुओं ने 32 लाख रुपये का भुगतान किया है। इससे पहले भी ईएमएस को लाखों रुपयों का भुगतान किया गया। यह भुगतान भी कायदे कानूनों को दरकिनार कर किया गया। ठेका शर्तों के अनुसार एजेंसी को प्रत्येक जिले में अपना कार्यालय खोलकर अपने संवाददाता तैनात करने थे, जो सरकार की चाटुकारिता करते हुए खबरें दे सकें। ताकि ईएमएस के जरिये ऐसी खबरों को अखबारों में छपवाया जा सके। खैर कई जिला सूचना अधिकारियों की प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद हर साल ईएमएस को लाखों रुपयों का चढ़ावा चढ़ाया जा रहा है।

संजय श्रीवास्तव ने जब सूचना विभाग के सामने खबरों का ठेके लेने के लिए आवेदन किया था तो तब एसईएमएस यानी श्रीमंत एक्सप्रेस मीडिया सर्विस के नाम से आवेदन किया था, लेकिन सूचना विभाग से पूरा लेन-देने ईएमएस के नाम पर हो रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि इसमें भी बड़ा गोलमाल हो रहा है। अब यह मुख्यमंत्री निशंक की महिमा है कि जहां सूचना विभाग के बाबुओं के मार्फत वे ईएमएस की प्रतिद्वंद्वी समाचार एजेंसी, जो कुछ साल पहले तक सरकारी ठेके में हिस्सेदार थी, को इन दिनों सरकार विरोधी खबरें जारी करने के लिए सबक सिखाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। हाल में ही निशंक ने एनएनआई पर सरकार और उनकी छवि धूल-धुसरित करने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया है, वहीं दूसरी ओर ईएमएस को वही निशंक सरकार इसलिए पालपोस रही है कि वह सरकार से लाखों रुपये लेकर सरकार के उस सूचना विभाग के बाबुओं की कठपुतली बनी हुई है जो कमीशन भी खा रहे हैं, अपना राजधर्म भी निभा रहे हैं।

दरअसल, उत्तराखंड में मीडिया को सरकारी चाटुकारिता में लगाने के लिए सूचना विभाग के बाबुओं ने महारत हासिल कर ली है। राज्य में पत्रकारों की एक बड़ी जमात ऐसी है जिसके नैनिक पतन के लिए काफी हदतक सूचना के ये बाबू भी जिम्मेदार हैं। इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन पत्रकार के भेष में धंधेबाजी कर रहा है और कौन नहीं। बल्कि इन्हें वे ही लोग मुफीद लगते हैं, जो विज्ञापनों के एवज में इन बाबुओं को उनका हिस्सा देने में देरी नहीं करते। संजय श्रीवास्तव जैसे शख्स पर सूचना के इन बाबुओं की मेहरबानी को आसानी से समझा जा सकता है। इस सबके बावजूद एक अहम सवाल उठता है कि क्या किसी सरकार को द्वारा इस तरह किसी मीडिया संस्थान को सरकारी खबरें छपवाने के लिए ठेका देना कितना वाजिब है। इस तरह अगर सरकार ठेका देकर खबरें छपवाने का धंधा करेंगी तो पेड न्यूज के सवाल पर मीडिया घरानों को ही कोसने भर से क्या होगा।

लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.

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Comments on “उत्‍तराखंड में सरकारी चाटुकारिता का ठेका ईएमएस को

  • amal aks varanasi says:

    मित्र आजाद जी आपका लेख पढ़ा पढ़ कर हसी भी आई और अफ़सोस भी हुआ क्यों की अभी तक आप को म गंभीर पत्रकार मानता था
    लेकिन अब मुझे पता चल गया की आप भी उन्ही भीड़ में से १ हो जो बस अफवाहों को खबर मानते है और उसे फैलाते रहते है

    खैर मुझे आप से कुछ बाते कहनी है हो सकता है आप उससे सहमत हो और हो सकता है की आप उससे नहीं भी सहमत हो लेकिन लोकतंत्र में सबको सहमत और असहमत होने का पूरा अधिकार है
    मित्र सबसे पहले तो एम्स न्यूज़ एजेंसी के बारे में ये एजेंसी उत्तराखंड समेत राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में भी सरकारों को अपनी सेवाए प्रदान करती है
    इस एजेंसी के पास इस समय जहाँ तक मेरी जानकारी है की २४० से अधिक समाचारपत्र है जो इसकी सेवाए लेते है इसकी जाँच आप पत्रकार है कर सकते है
    अब आते है संजय श्रीवास्तव पर आप अगर इनको जानते हतो आप को ये भी पता होना चाहिए की ये कभी फटे हाल नहीं थे आज से ९ साल पहले जब ये देहरादून आये थे तो इनके पास अपनी खुद की मारुती वन थी जो आज भी है इन्होने इन्गिनियारिंग की शिक्षा रूस से की है उसके बाद इन्होने मुंबई डेल्ही और हैदराबाद में नौकरी की ये १९९७ की बात है उसके बाद ये अपने भाई के कहने पर सी फील्ड में आये इनके भाई आज भी जौनपुर कलेक्ट्रेट में वरिस्थ पद पर कार्य कर रहे है इनके बड़े भाई कभी उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री रहे अरुण मुन्ना के सबसे करीबी रहे और आज भी मुन्ना समेत कांग्रेस के बड़े नेता इन्ही के जौनपुर आवास पर रुकते है उस समय भी इनका परिवार जौनपुर का सबसे रसूख दार परिवार था और अब भी है इसी कारन जब निशंक जी पिछले दिनों जौनपुर गए थे तो टीडी कॉलेज के प्रभंधक अशोक सिंह और जौनपुर सदर के पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह चीफ मिनिस्टर के साथ इन्हें भी उस जनपद का होने के कारन आमंत्रित किया था जिसमे जब ये गए तो इनसे जलने वाले लोगो ने उसे मुद्दा बनाया खैर मई ये सब बाते इसलिए बता रहा हु क्योकि आज पत्रकार के खिलाफ पत्रकार का इस्तेमाल अच्छा नहीं लगा मुझे वो कहावत याद आ रही है की १ कूता जब तीर्थ करने चला तो बाकि उसकी बिरादरी ने उसका रास्ता रोका और उसे वापस कर दिया मतलब इस राज्य में राजनेताओ की लड़ाई में कैसे पत्रकारों का लाभ उठाया जाता है उसका ये उदहारण है खैर ये जो बाते आप ने लिखी है उसके आप के आपने सोर्से होंगे लेकिन मई संजय को व्यक्तिगत जनता हु इसलिए ये सारी बाते लिख रहा हु रही दूसरी बात जो है इस एजेंसी से पुरे उत्तराखंड में लघभग ४० पत्रकार जुड़े हुए है तो क्या इसकी सरकार के पक्ष की खबरे सभी छापते है तो क्या सभी ४० पत्रकार भ्रस्त है हो सकता है ऐसा हो क्यों की आप देहरादून में है लेकिन मई भी देहरादून में रहा हु और देखा है की कैसे वहा के पत्रकार छोटे छोटे स्वार्थ के लिए आपस में तंग खिचाई करते है / खैर दीपक जी आप ने इस विषय को उठाया है तो इसकी जाँच पड़ताल भी करो और वो चाहे संजय हो या फिर सर्कार को ब्लैक मेल करने वाले हमारी बिरादरी के अन्य लोग उनकी पोल खुलनी चाहिए लेकिन वक्तिगत खुन्नस की वजह से किसी पर उंगली उठाना उचित नहीं/

    दूसरी बात मई प्रिय यशवंत जी से कहूँगा की आप की फिलासफिकल बाते मुझे बहुत अच्छी लगती है लेकिन आप भी इस मुद्दे की जाँच पड़ताल करे और जो सच है उसका साथ दे तो अच्छा है/
    मित्र हमारी किसी मुख्यमंत्री से कोई दोस्ती नहीं है और न ही दुश्मनी लेकिन अगर कोई मुख्यमंत्री किसी पत्रकार की ब्लैक मेल करे तो मई पत्रकारों के साथ खड़ा होना पसंद करूँगा लेकिन हम पत्रकार है तो हमारे अंदर इतनी आत्मिक हिम्मत तो होनी ही चाहिये की अगर हमारा ही भाई कोई गलत कम करेगा तो उसको सबक शिखाना चाहिये/ मित्र यशवंत आपसे इतनी तो उम्मीद है ही की आप कम से कम इस मामले पर कोई सार्थक बहस चेदेगे/

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  • amal aks varanasi says:

    मित्र आजाद जी आपका लेख पढ़ा पढ़ कर हसी भी आई और अफ़सोस भी हुआ क्यों की अभी तक आप को म गंभीर पत्रकार मानता था
    लेकिन अब मुझे पता चल गया की आप भी उन्ही भीड़ में से १ हो जो बस अफवाहों को खबर मानते है और उसे फैलाते रहते है

    खैर मुझे आप से कुछ बाते कहनी है हो सकता है आप उससे सहमत हो और हो सकता है की आप उससे नहीं भी सहमत हो लेकिन लोकतंत्र में सबको सहमत और असहमत होने का पूरा अधिकार है
    मित्र सबसे पहले तो एम्स न्यूज़ एजेंसी के बारे में ये एजेंसी उत्तराखंड समेत राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में भी सरकारों को अपनी सेवाए प्रदान करती है
    इस एजेंसी के पास इस समय जहाँ तक मेरी जानकारी है की २४० से अधिक समाचारपत्र है जो इसकी सेवाए लेते है इसकी जाँच आप पत्रकार है कर सकते है
    अब आते है संजय श्रीवास्तव पर आप अगर इनको जानते हतो आप को ये भी पता होना चाहिए की ये कभी फटे हाल नहीं थे आज से ९ साल पहले जब ये देहरादून आये थे तो इनके पास अपनी खुद की मारुती वन थी जो आज भी है इन्होने इन्गिनियारिंग की शिक्षा रूस से की है उसके बाद इन्होने मुंबई डेल्ही और हैदराबाद में नौकरी की ये १९९७ की बात है उसके बाद ये अपने भाई के कहने पर सी फील्ड में आये इनके भाई आज भी जौनपुर कलेक्ट्रेट में वरिस्थ पद पर कार्य कर रहे है इनके बड़े भाई कभी उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री रहे अरुण मुन्ना के सबसे करीबी रहे और आज भी मुन्ना समेत कांग्रेस के बड़े नेता इन्ही के जौनपुर आवास पर रुकते है उस समय भी इनका परिवार जौनपुर का सबसे रसूख दार परिवार था और अब भी है इसी कारन जब निशंक जी पिछले दिनों जौनपुर गए थे तो टीडी कॉलेज के प्रभंधक अशोक सिंह और जौनपुर सदर के पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह चीफ मिनिस्टर के साथ इन्हें भी उस जनपद का होने के कारन आमंत्रित किया था जिसमे जब ये गए तो इनसे जलने वाले लोगो ने उसे मुद्दा बनाया खैर मई ये सब बाते इसलिए बता रहा हु क्योकि आज पत्रकार के खिलाफ पत्रकार का इस्तेमाल अच्छा नहीं लगा मुझे वो कहावत याद आ रही है की १ कूता जब तीर्थ करने चला तो बाकि उसकी बिरादरी ने उसका रास्ता रोका और उसे वापस कर दिया मतलब इस राज्य में राजनेताओ की लड़ाई में कैसे पत्रकारों का लाभ उठाया जाता है उसका ये उदहारण है खैर ये जो बाते आप ने लिखी है उसके आप के आपने सोर्से होंगे लेकिन मई संजय को व्यक्तिगत जनता हु इसलिए ये सारी बाते लिख रहा हु रही दूसरी बात जो है इस एजेंसी से पुरे उत्तराखंड में लघभग ४० पत्रकार जुड़े हुए है तो क्या इसकी सरकार के पक्ष की खबरे सभी छापते है तो क्या सभी ४० पत्रकार भ्रस्त है हो सकता है ऐसा हो क्यों की आप देहरादून में है लेकिन मई भी देहरादून में रहा हु और देखा है की कैसे वहा के पत्रकार छोटे छोटे स्वार्थ के लिए आपस में तंग खिचाई करते है / खैर दीपक जी आप ने इस विषय को उठाया है तो इसकी जाँच पड़ताल भी करो और वो चाहे संजय हो या फिर सर्कार को ब्लैक मेल करने वाले हमारी बिरादरी के अन्य लोग उनकी पोल खुलनी चाहिए लेकिन वक्तिगत खुन्नस की वजह से किसी पर उंगली उठाना उचित नहीं/

    दूसरी बात मई प्रिय यशवंत जी से कहूँगा की आप की फिलासफिकल बाते मुझे बहुत अच्छी लगती है लेकिन आप भी इस मुद्दे की जाँच पड़ताल करे और जो सच है उसका साथ दे तो अच्छा है/
    मित्र हमारी किसी मुख्यमंत्री से कोई दोस्ती नहीं है और न ही दुश्मनी लेकिन अगर कोई मुख्यमंत्री किसी पत्रकार की ब्लैक मेल करे तो मई पत्रकारों के साथ खड़ा होना पसंद करूँगा लेकिन हम पत्रकार है तो हमारे अंदर इतनी आत्मिक हिम्मत तो होनी ही चाहिये की अगर हमारा ही भाई कोई गलत कम करेगा तो उसको सबक शिखाना चाहिये/ मित्र यशवंत आपसे इतनी तो उम्मीद है ही की आप कम से कम इस मामले पर कोई सार्थक बहस चेदेगे/

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  • I hail from the Uttarakhand. The way corruption cases are come to light in Uttarakhand is very shameful. After so many decades of struggle, we got the state with a view fast development of Uttarakhand particularly hill areas. It is sad to learn that our own people are behind big scam in the state.

    I hail from district Bageshwar. The development work is very-2 poor and mirgration from hill is at peak.. These corrupt people are busy in looting public money on name of development.

    Shame shame!!

    M S Mehta
    http://www.merapahadforum.com/anti-corruption-board-of-uttarakhand/mega-corruptions-cases-in-uttrakhand/new/#new

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  • amal jee…aap ko is khabar per ..comment karana tha ya sanjay jee ki safai deni thi …jo bhi hai …ajad is ajad …action to hana hi chaiye

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  • Lagta hai sanjay ji ne kuch nai tarha ki post criet ki hai jo unke khilaf likhane walon ko sanjaynama sunane & samjhane ka kaam karti hai !

    ise news agense ki jai ho

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  • guddu chopra says:

    दीपक आजाद जी ने कुछ गलत नहीं लिख। वह कभी गलत लिखते भी नहीं हैं। हां! उनकी गलती यह है कि उन्होंने अकेले संजय श्रीवास्तव जी को दलाल साबित कर दिया जबकि सच्चाई यह है कि यहां हर साख पर उल्लू नहीं बल्कि लुटेरे बैठे हुये हैं। उत्तराखण्ड को लूटने के लिये न जाने कहां-कहां से आ गये। यहां ऐसे ही दलालों की मौज है। मेरे अनुमान से संजर जी पत्रकारिता की आड़ में मालोमाल तो हो ही रहे हैं मगर उनसे भी आगे कई छिपे रुस्तम हैं। संजय जी की एजेसी की औकात ही उतनी है मगर जिनके अखबार देहरादून में खूब चलते हैं या ईटी बी जैसा लोकल चैनल चलाने वाले सत्ता की दलाली की हदें पार कर चुके हैं। बेचारा संजय तो जो चूस रहा है वह सबको दिख रहा है मगर जो हिन्दुस्तान का पाठक और अमर उजाला का गोरखा चेतन तथा उसका गुरु जोशी ईटीबी को गोविन्द सिंहं कपटीयाल जैसे पत्रकार चूस रहे हैं उन्हें दीपक आजाद जी ने नहीं देखा। इनका भी एक गुरू है मगर वह आज कल परेशान है। उसका नाम उमेश है जिसके पीछे निशंक पड़ गया है।

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  • Ems ko Brasth Bananey ka asli Byakti Sanad Jain aur uska Beta hai. Ye hi hai jo sabko margdarshan kartey hai. Sanjay Srivastav Jaisey log sirf Mohra hai.

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