क्या ये वही अमेरिकन हैं जिनसे मैं मिली थी

ओसामा बिन लादेन
ओसामा बिन लादेन
अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका से लौटी हूँ और वहाँ के लोगों की कई सारी बातों से बहुत अधिक प्रभावित भी हुई हूँ. उन लोगों की कर्तव्यनिष्ठा, कार्य के प्रति लगन, अनुशासन के प्रति लगाव, नियमों का पालन करने की प्रवृत्ति, आम तौर पर दूसरे लोगों के साथ व्यवहार- यह सब देख कर सचमुच बहुत अच्छा लगा था.

यह महसूस हुआ था कि यह एक ऐसा देश है जहां मनुष्य की बहुत अधिक कीमत है, मनुष्यों के बीच भेदभाव बहुत कम है. खास कर हमारे देश की तुलना में, जहां बड़े और छोटे का भाव बहुत अधिक रहता है. लेकिन आज एक ऐसी खबर पढ़ी जिसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि किस तरह पूरी दुनिया के इंसान एक ही तरीके के होते हैं और एक ही प्रकार से सोचते हैं. ओसामा की मौत पर अमेरिकी जनता की प्रतिक्रिया. यह तो हम सभी जानते हैं कि ओसामा ही न्यूयोर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ध्वस्त किये जाने का प्रमुख जिम्मेदार माना जाता है और इस घटना के बाद से अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया में आतंकवाद को लेकर नजरिया ही बदल गया है.

यह भी हम जानते हैं कि अमेरिकी सरकार ने ओसामा को अपना दुश्मन नंबर एक करार दिया था और खुलेआम यह घोषणा करती रहती थी कि वह ओसामा से उसके करनी का बदला लिये बिना चैन से नहीं बैठेगी. इसके लिए अमेरिकी सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थी पर उसे अब तक सकारात्मक परिणाम नहीं मिल रहे थे.

कल जा कर अंत में अमेरिका की टीम को ओसामा मिला और उसकी मौत को अंजाम दिया जा सका. यानि अब ओसामा इस दुनिया में नहीं है. यानि अमेरिका ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का बदला ले लिया. यहाँ तक तो ठीक है पर जिस तरह से अमेरिका की आम जनता ने इस खबर को पाने के बाद प्रतिक्रया दिखाई है और जिस तरह से आचरण किया है उससे यही दिखता है कि आज सभ्यता की इतनी प्रगति के बाद भी इंसानी स्वभाव में कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ है. आज भी बदला, प्रतिशोध, हिंसा हम लोगों की मूल मानवीय भावना है, चाहे यह कथित तौर पर पिछड़े हुए अफ़्रीकी जनजातियों का मामला हो या फिर सबसे अधिक आधुनिक और सुसंस्कृत अमेरिका के लोगों का.

तभी तो एक व्यक्ति की मौत (जिसे हम हत्या भी कह सकते हैं) के बाद पूरा अमेरिका जश्न में डूबा हुआ है. मुझे याद है अभी हाल में भारत के विश्व कप जितने के बाद पूरे देश में जश्न और खुशी का एक माहौल सा बन गया था जो टीवी, इन्टरनेट और अखबारों के जरिये पूरे विश्व की जानकारी में आया था. कमोबेश वैसा ही माहौल इस समय अमेरिका में भी छाया हुआ है जहां क्या बूढ़े और क्या जवान, क्या महिलायें और क्या पुरुष, सभी लोग खुशियों में डूबे हुए हैं.

भारत की विश्व कप की जीत तो चलिए एक खेल में विजय प्राप्ति पर थी, पर इसको क्या कहा जाए जब एक तरफ तो एक इंसान की मौत हो रही है और दूसरी तरफ लोग उसकी लाश का जश्न मना रहे हैं? मैं नहीं कह रही कि इन लोगों के पास इसके कोई कारण नहीं हैं. कारण तो है ही. ट्रेड सेंटर की घटना से पूरा अमेरिका दहल गया था और इस कदर घबरा गया था कि उसे अपने पूरे अस्तित्व पर ही एक भयानक संकट मंडराता दिखने लगा था. इस पूरे घटना के मुख्य जिम्मेदार ओसामा बिन लादेन माने गए थे और इस तरह पूरी अमेरिकी जनता की निगाहों में ओसामा सबसे बड़े खलनायक के रूप में उभर कर सामने आये थे. वे ट्रेड सेंटर के विध्वंस  के साथ-साथ हज़ारों निरीह और बेगुनाह अमेरिकियों की मौत के भी जिम्मेदार समझे गए और उनके प्रति उभरा आक्रोश अकल्पनीय था. उस समय के सिसकते हुए अमेरिका के जिम्मेदार हुकुमरानों ने खुलेआम ऐलान किया था कि इस कृत्य का बदला लिया जाएगा और अब जा कर उन्होंने अपना वचन पूरा भी कर दिया.

इस रूप में ओसामा की मौत का जश्न समझ में आता है पर इंसान के अंदर नफरत और घृणा की भावना इतने गहरे तक पैठ जाया करती है यह बात टीवी पर अमेरिकन लोगों के आनंद प्रदर्शन और खुशियाँ मनाते देख कर ही समझा जा सकता है. मनुष्य में बदले की इतनी तीव्र भावना भी होती है यह बात ओसामा खून लगे चेहरे और गोली से छलनी आँखों वाले पोस्टरों को लहराते अमेरिकी लोगों की अंदर से निकल कर आ रही खुशी ही बयान करती है. कोई पटाखे चला रहा है, कोई उछल कूद रहा है और कोई अपने मन से करतब कर रहा है. ये सभी लोग यह जान रहे हैं कि एक आदमी की मौत हुई है और यह भी कि आदमी की मौत से बड़ी दुखद घटना कोई नहीं होती, क्योंकि हमारे जीवन में जो कुछ महत्वपूर्ण है उसमे सबसे ऊपर तो यह जीवन ही है. फिर भी इंसान के अंदर छिपा उसका सच उसे एक दूसरे आदमी की लाश पर, उसकी मौत पर अबाध गति से खुशियाँ मनाने को प्रेरित कर रहा है. ये सभी लोग, जो कल मेरे अमेरिकी यात्रा के दौरान बहुत ही सभ्य और सुसंस्कृत, शांत और अपने में मगन दिख  रहे थे, आज अपने एक कथित शत्रु और अपने देश के लोगों के हत्यारे की मौत पर एकदम खुले भाव से झूम रहे हैं. क्या ये दोनों लोग एक ही हैं या अलग-अलग. या फिर इंसान का मूल स्वभाव ऐसा होता ही है जहां घृणा और प्रतिशोध सबसे बड़ी ताकत के रूप में काम करते हैं?

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

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Comments on “क्या ये वही अमेरिकन हैं जिनसे मैं मिली थी

  • Dr.Ajeet Tomar says:

    आदरणीय नूतन जी,

    आपने मेरे दिल की बात कह दी है…मै मनोविज्ञान पढाता हूँ इसलिए ये देखकर मै भी चिंतित हूँ कि मानव व्यवहार कितना अनप्रीडिक्टेबल किस्म का हो सकता है…और इसमे विकसित सभ्यता होने का विशेष महत्व नही है..।

    संवेदनशील लेखन के लिए बधाई
    डॉ.अजीत तोमर
    हरिद्वार

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  • Ankit Khandelwal says:

    Nutan Ji,
    Aap kyun yeah bhool jaati hain yeah bhawana hamarein desh main bhi vidhyman hain.
    Main aapko ek udaharan deta hoon. Main kaafi samay se videsh main hoon or Pakistani,Afghani or lagbhag saarein South Asian log kaafi mil jul karke rehte hain.. lagta hi nahi hain ki ham ek dussre se nafrat karne ki sochenge bhi.. In fact is baar ka India-Pakistan match to logo ne mil jul karke dekha tha or koi gila shiva nahi

    Per kuch saal pehle jab Mumbai main hamla hua to logo ka savbhav ek sa nahi reha… us samay bhale hi ham dussre desh main ho. per dosti kam dushman jayada lag rahe the..

    Aapki baat se main bilkul bhi agree nahi karta.. Isse Nationalism ka junoon kehna jayada better hain.. Ab cricket main jab ham pakistan se jitte hain.. to vo bhi nationalism ka junoon hota hain… aap is baat ke liye Americans ko gunheghar nahi thara sakti.. yeah sabhi main hota hain..

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  • काश कि ओसामा सिर्फ एक आदमी होता| काश कि लोगों की ख़ुशी सिर्फ उस एक आदमी के मरने की होती| पर, न तो ओसामा सिर्फ एक आदमी था, और न लोगों को ख़ुशी एक आदमी के मरने की है| लोग खुश हैं कि जब तक कोई नया ओसामा पैदा नहीं हो जाता कम-से-कम तब तक वो बिना डर के शांति से रह सकेंगे| लोग खुश हैं कि इस्लामी आतंकवाद का पर्याय, अशांति का दाता, जिसने अमेरिकियों के स्वाभिमान को छलनी किया, 9/11 आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाला ओसामा आखिरकार अमरीकियों द्वारा मार डाला गया| आतंकवादियों (आंतरिक और बाहरी) को बिठा के खिलाने (और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को मार डालने) की परंपरा आधुनिक भारत की हो सकती है, स्वाभिमानी राष्ट्र की नहीं|

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  • Indian citizen says:

    क्या नूतन जी, मानवता के दुश्मन और एक आदमखोर के मरने पर (आपने हत्या प्रयोग किया है) जश्न मनाना गलत है. फिर तो आपके अनुसार जल्लाद भी बहुत बड़ा हत्यारा होगा. उन लोगों के दिल पर क्या गुजरती होगी जिनके परिवार के लोग आतंकी हमलों में मारे जाते हैं उनके बारे में भी तो सोचिये..

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  • kcmishra says:

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  • पंकज झा says:

    किसी भी राक्षस की मौत पर जन्म उत्सव और जश्न मनाना बिलकुल सही, बाजिब और विशुद्ध मानवीय भावना है. आखिर मन में छुपे नफरत की भावना का निकल जाना इससे संभव होता है. कुंठा और तनाव से भी इससे मुक्ति मिलती है. हर धर्म और संस्कृति में ऐसे उत्सव मनाने का रिवाज़ है. तभी तो हम भी आज तक रावण को जला कर प्रतीकात्मक रूप से उसकी मौत का उत्सव मनाते हैं. मुसलामानों में भी शैतान को पत्थर मारने की प्रथा इसी तरह के भावनाओं का प्रकटीकरण है. आज अगर अमेरिकन जश्न मना रहे हैं तो वो इसके हकदार भी हैं. अन्यथा आज अगर ओसामा भारत में कहीं होता और अगर अमेरिका का डर नहीं होता तो यूपीए सरकार तो उसकी मेहमाननवाजी कर अगला चुनाव जीत जाती. जैसे अजमल और अफजल को ज़िंदा रख कर अभी तक जीतती आयी है. यह उत्सव अमेरिका के पौरुष का है न की भारत जैसे राष्ट्र के नपुंसक रहनुमाओं का.

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  • औत्तर परदेस जैसे पिछड़े राज्य से पहली बार कोई अमरीका गया, वह भी एक महिला ये अत्यंत हर्ष का विषय है. ये मानव के चाँद पे कदम रखने के सामान है. ऐसा बार बार नहीं होता. मैं भड़ास4मीडिया के माध्यम से इसका साक्षी बना, आभारी हूँ सभी का.

    नूतन जी आपके यात्रा संस्मरण पढ़ के और आपके बोल-वचनों पे आधारित अमिताभ सर के लेख पढ़ के मैंने द्रढ़ निश्चय हो अमरीका के इतिहास और उससे सम्बंधित अन्य विषयों की पुस्तके कबाड़ी को बेच दी हैं. अब मेरे पास अगर कुछ बचा है तो बस आपका फोन नंबर. अमरीका के विषय में यदि कुछ भी जानना होगा तो अब मैं आपको कष्ट दूंगा. आशा है आप निराश नहीं करेंगी.

    उपर्युक्त लेख पढ़ के अच्छा लगा. पुनः सिद्ध हुआ के हिन्दुस्तानी से अधिक व्यापक द्रष्टि संसार में और किसी की नहीं होती. ये उन ऋषि मुनियों का आशीर्वाद है जिनकी द्रष्टि दिव्या होती थी, जो कंदराओं में बैठ के समस्त संसार को देख लेते थे. देखिये ना क्षेत्रफल में हिंदुस्तान से बड़े, लगभग 31 करोड़ की आबादी वाले देश की सामजिक सांस्कृतिक मनोवैज्ञानिक नब्ज़ आपने किस सहजता से पकड़ ली. ये तो जुम्मा-जुम्मा आठ दिन की बात है, अगर नौ दिन हो जाते तो…… अहो! अहो!!…..

    अच्छा मै ऐसा समझता था के इन अमरीकियों से अधिक मूढ़ दम्भी और खतरनाक जीव इस धरती पे शायद ही और कहीं पाया जाता हो. मैं गलत था. गोरे और काले लोग वहाँ किस तरह हिल-मिल के रहते है, इसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. मुझे याद है ओबामा की बियर डिप्लोमेसी…..और लम्बा लिखूंगा तो शायद भटक जाऊंगा. आप परेशान ना हों. अमरीका ठीक वैसा ही है जैसा आप देखना चाहती है. यही तो कारण है के वो हिन्दुस्तानी के लिए स्वप्नलोक है.

    आशा है आप पुनः अमरीका जाएँ और नयी ख़ोज करें. आपको बताऊँ आपके अमरीका प्रवास के दौरान अमिताभ सर तो इतने प्रफुल्लित थे के उन्होंने भड़ास पे अपने प्रवचन में कहा के अगर बीवी को खुश रखना है तो उसे एक बार अमरीका जरूर भेजें. वोतो ये सूचना अधिक लोगो के पास नहीं पहूँच सकी क्यूकी सरकार ने वो पोस्ट ही भड़ास से हटवा दी. सरकार को डर था के इसका सीधा असर पुलिस-फोर्स पे पड़ेगा. पुलिस की नौकरी ही ऐसी है पुलिस-वालो की बीवियां ही अपने पतियों से सर्वाधिक अप्रसन्न रहती हैं. ऐसे में डर था कहीं बीवियों का आन्दोलन ना खड़ा हो जाए.

    चलिए ऐसे ही और बढ़िया बढ़िया लिखती रहिये.

    शुभेक्षु
    जातक

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  • girish joshi says:

    Nutan ji ..meri samajh me nahi ata ke aap jaisi soch rakhne wale log akhir chate kya hai…..kya ek aam admi aur ek khukhar aatankwadi me koi fark nahi…aap Americans ke jashan manane ki baat kar rahi hai….zara waha jakar dekhiye ke unki us khusi ke picheh kitna dard chupa hua hai..zara sochiye uus waqt un logo par kya biti hogi jab 9/11 ki subha ghar se unka koi apna jaan se payara ye kehake office ke kiye nikla hoga ki waha aaj zaldi ghar aa jayega aur khuch der baad achanak khabar aati hai ki waha insan ek aatankwadi hamle me mara gaya hai aur ab woh kabhi wapas nahi ayega. aap ke is lekh par ek shri maan Dr. Ajeet tomar ji ne bhi apne comments diye hai ki woh bhi aapki baat se sahmat hain, lekin maaf kijiyega madam mujhe to yah lagta hai ki aap log agar bhagwan Ram ya bhagwan Krishna ke samaye me paida hue hote to Raavan aur Kans ke wadh par bhi khushiya nahi manyi jati balki ye discussion ho raha huta ke hamre samaj ko akhir kya ho gaya hai ect…… Madam ji kehate hain ki dard ka eshas tabhi hota hai jab khud ko chot lagti hai…. Laden inshan nahi ek rakasas tha jiske marne pe jashan zarur hona chahiye…….Thankyou

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