दलाली की लंका में एक शख्स ने यूं लगाई आग

यह एक अदभुत आलेख है. कहानी की तरह. लेकिन पूरी तरह सच्ची. सत्ता के इर्द-गिर्द फैले दलालों की अंतर्कथा. कैसे एक दोस्त अपमान, उपेक्षा और दुर्व्यवहार के चलते विभीषण बनकर पूरी लंका ढहा डालता है. दलाली की लंका के इस भेदिये आर. पांडेय की अंतर्कथा को प्रकाशित किया है प्रभात खबर ने. आर. पांडेय ने कैसे बिनोद सिन्हा के सारे दस्तावेज हासिल किए, किस तरह आर. पांडेय के एक सगे ने उन दस्तावेजों के बदले बिनोद सिन्हा से 10 लाख रुपये में सौदा कर लिया, किस तरह आर पांडेय जीवन-मौत के खौफ के बीच अपने अभियान को चलाते रहे, पूरा विवरण खुद मुहैया करा रहे हैं आर. पांडेय.

आर पांडेय कौन हैं, वे आप उनके द्वारा कही गई बातों को पढ़कर जान जाएंगे. प्रभात खबर में इस आलेख को ‘पड़ाव पर पहुंच गया है मेरा संघर्ष’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है. प्रकाशन से पहले प्रभात खबर की तरफ से एक संक्षिप्त इंट्रो भी है, जो इस प्रकार है- :: बिनोद सिन्हा-मधु कोड़ा प्रसंग उजागर कैसे हुआ? वर्षों से यह सवाल मीडिया से लेकर सत्ता गलियारे में रहस्य का विषय रहा है. किसी ने कहा, किसी औद्योगिक घराने ने कराया. किसी ने कहा, अमुक अखबार ने किया. किसी ने कहा, फलां व्यक्ति ने निजी वैमनस्य से खुलासा करवाया. जितने मुंह, उतनी बातें. पर सच क्या है? यह भी आज लोगों को जान लेना चाहिए. 17 सितंबर 2008 को मुंबई एयरपोर्ट पर संजय चौधरी डिटेन हुए. विश्वकर्मा पूजा के कारण रांची के अखबार बंद थे. पर, विभिन्न टीवी चैनलों पर यह खबर खूब चली. इस प्रकरण के बाद ईटीवी ने सबसे पहले बिनोद सिन्हा एंड कंपनी के विदेशी बिजनेस के दस्तावेज दिखाये. शायद 17 सितंबर या 18 सितंबर 2008 से. कुछेक दिनों तक लगातार. रांची से प्रकाशित एक अन्य अखबार में भी विदेशी धंधे के दस्तावेज छपे. 19 या 20 सितंबर 2008 से. आरंभ में चार-पांच दिनों तक यह चैनल और समाचारपत्र ही विदेशी व्यवसाय से जुड़े दस्तावेजों को छापते या दिखाते रहे. फिर प्रभात खबर ने कोशिश की कि यह दस्तावेज उसे भी मिले. हफ्ते भर बाद प्रभात खबर को भी दस्तावेज मिलने लगे. हां, यह उल्लेखनीय है कि बिनोद सिन्हा कौन हैं और कैसे कोड़ा राज में वह सबसे प्रभावी व्यक्ति बन गये, यह प्रभात खबर ने ही 2007 में छापा था. उससे भी पहले जब मधु कोड़ा मंत्री बने, तब बिनोद सिन्हा और बैंक ऑफ बड़ौदा का प्रकरण प्रभात खबर में ही छपा.बिनोद सिन्हा एंड कंपनी के विदेशी व्यवसाय और धंधों के प्रकरण को सामने लाने का काम किया, एक नौजवान ने. जो बिनोद सिन्हा एंड कंपनी के चक्कर में अपमानित हो चुका था. अपमान से उपजे संकल्प ने इस युवा को प्रेरित किया, तब दुनिया के सामने यह सच आया. पढ़िए इस प्रकरण के खुलासे की पूरी खबर, उसी युवा की कलम से. -प्रभात खबर ::



हां, मैंने फोड़ा बिनोद सिन्हा का भांडा

-आर पांडेय-

यह एक आश्चर्यजनक अनुभव है, जो मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना बन गयी. 2006 के सितंबर तक मैं एक सामान्य कांट्रैक्टर था. भविष्य में अपने परिश्रम और प्रयास से बड़े व्यवसायियों की कतार में शामिल होना चाहता था. तब तक मेरा संपर्क किसी राजनीतिक दल या किसी नेता से नहीं था. एक दिन समाचार पत्रों से मुझे पता चला कि पश्चिम सिंहभूम के कोल्हान क्षेत्र के एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बने हैं. यह समाचार कि एक निर्दलीय विधायक भी किसी राज्य का मुख्यमंत्री हो सकता है, मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि वाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए रोमांचित करनेवाला था.

मैं विधि के विधान में, भाग्य में और कठिन परिश्रम में पूर्ण आस्था रखने वाला व्यक्ति हूं. मुझे लगता है कि जीवन की हर घटना या दुर्घटना का कोई न कोई औचित्य जरूर होता है. नवंबर 2006 में माघे मिलन के दिन नोवेल्टी होटल के प्रवेश द्वार पर, हमारी मुलाकात एक प्रतिष्ठित व्यवसायी से हुई, जिनका व्यवसाय बिहार व झारखंड में फ़ैला हुआ है. झारखंड में चांडिल स्थित उनके कारखाना में हम लोगों ने कांट्रैक्टर के तौर पर काम किया था. उन्होंने हम लोगों का परिचय उस वक्त की राज्य सरकार में महत्वपूर्ण व प्रभावशाली, दो व्यक्तियों से कराया. ये व्यक्ति थे बिनोद सिन्हा और संजय चौधरी.

बातचीत के दौरान बिनोद सिन्हा और संजय चौधरी ने हमारे कार्यकलाप एवं व्यवसाय के बारे में विस्तृत जानकारी ली. उन्होंने रांची में राज्य सरकार के बिजली बोर्ड का कोई काम दिलवाने का आश्वासन दिया और अपनी कंपनी प्रोफ़ाइल के साथ रांची आने के लिए कहा. दो दिन बाद संजय चौधरी ने हमें फ़ोन कर जमशेदपुर के अपने डिमना रोड स्थित आवास पर बुलाया. लगा कि ‘बिन मांगे मोती मिले’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. मैं और मेरे मित्र फ़ूले नहीं समा रहे थे कि हमारी पहुंच उन व्यक्तियों तक हो गयी है, जो झारखंड के मुख्यमंत्री के अत्यंत करीबी हैं. संजय चौधरी से हम उनके निवास पर मिले. उन्होंने बताया कि हम लोगों को ‘बिनोद भाई’(बिनोद सिन्हा का प्रचलित नाम) से मिलने रांची जाना होगा. मैं अपनी कंपनी के दस्तावेज लेकर रांची के लिए निकल पड़ा. रांची पहुंच कर मुख्यमंत्री आवास के बगल में स्थित अरुण कुमार श्रीवास्तव (मुख्यमंत्री के निजी सहायक) के आवास पर बिनोद सिन्हा से मिलने के लिए इंतजार करने लगा. कुछ देर बाद हमारी मुलाकात बिनोद सिन्हा से हुई. उनके आश्वासन से हमलोग मंत्रमुग्ध हो गये.

मार्च 2007 का अंत आते-आते हमारे संबंध बिनोद सिन्हा और संजय चौधरी से घनिष्ठ हो गये. मैं अपने मुख्य कार्य कांट्रैक्टरी के अतिरिक्त बिनोद सिन्हा व संजय चौधरी के दिल्ली से लेकर रांची तक के अन्य कार्यों में दिलचस्पी लेने लगा. इसमें मेरा स्वार्थ भी था. मुझे लगता था कि भविष्य में मेरी कंपनी को कोई बड़ा कार्य आवंटित हो जायेगा और मैं एक सफ़ल व्यवसायी के रूप में जाना जाने लगूंगा. उसी दौरान बिनोद सिन्हा ने मेरा परिचय उनके करीबी रोहिताश कृष्णन और ब्रजेश कुमार सिंह से कराया. ये दोनों दिल्ली स्थित दो भिन्न निजी कंपनियों में कार्यरत थे और  बिनोद सिन्हा के आदेश पर दिल्ली से रांची आये थे. इन दोनों ने बिनोद सिन्हा के कहने पर दिल्ली स्थित ‘बैस मैनेजमेंट एंड सोल्युसन प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी का अधिग्रहण किया और एक नयी कंपनी ‘क्वांटम पावर टेक एंड इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड’ का गठन किया. उपर्युक्त कंपनियों के अधिग्रहण एवं गठन का मात्र एक ही उद्देश्य था कि आने वाले समय में झारखंड सरकार के बिजली विभाग, सड़क विभाग और खनन विभाग में निकलने वाले अधिकतम टेंडरों को इन्हीं कंपनियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दिलवाया जाये.

समय के साथ-साथ ब्रजेश कुमार सिंह व रोहिताश कृष्णन अपनी मंशा में सफ़ल हुए. बिजली बोर्ड व पथ निर्माण विभाग के लगभग डेढ़ सौ करोड़ रुपये का काम परोक्ष रूप से अपनी कंपनी द्वारा करने लगे. इस बीच बिजली विभाग से मेरी कंपनी को भी रामगढ़ जिले में एपीडीआरपी का एक कार्य आवंटित हुआ, पर वह काम छीन लिया गया. बिजली बोर्ड के एक अधिकारी पीके सिन्हा (तत्कालीन कार्यपालक अभियंता) ने कहा कि 27 करोड़ की इस निविदा में आप एल-1 हैं, मगर कार्यादेश के लिए रोहिताश कृष्णन से मिलिए. रोहिताश कृष्णन ने कहा कि आप अपना इलेक्ट्रिकल लाइसेंस और दस्तखत किया हुआ चेक बुक मेरे पास जमा कीजिए. जिसे मैंने कर दिया. इसके बाद उन्होंने कहा कि यह काम आपके नाम पर क्वांटम पावर टेक करेगी. काम पूरा होने के बाद आपको 20 लाख रुपये मिल जायेंगे. मैंने यह शर्त मंजूर नहीं की. नतीजा हुआ कि मेरा इलेक्ट्रिकल लाइसेंस और दस्तखत किये हुए चेक बुक के पन्ने अभी भी उन लोगों के ही पास हैं. काफ़ी प्रयास के बाद भी मैं इन्हें हासिल नहीं कर पाया हूं.

रोहिताश कृष्णन के प्रभाव एवं दबाव के आगे मुझे घुटने टेकने पड़े. मेरी महात्वाकांक्षा और बड़ा काम करने की चाहत धूल चाटने लगी. इस घटना ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया. लगा, मैं मृगतृष्णा के पीछे दौड़ रहा था. मैं बिना किसी कार्य के नेताओं और उनके चमचों के पीछे भटकनेवाला व्यक्ति बन गया था. मैंने कई दिनों तक आत्ममंथन किया. तत्पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के इस मायावी जाल को तोड़ना होगा. अपने हक और अच्छे भविष्य के लिए सत्ता के इन दलालों से संबंध विच्छेद कर लड़ाई लड़नी होगी. मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए सत्ता में विराजमान मधु कोड़ा और परोक्ष रूप से सत्ता को अपनी मनमरजी से चलाने वाले बिनोद सिन्हा एवं उनके करीबी लोगों के खिलाफ़ युद्ध की तैयारी बहुत कठिन एवं काल्पनिक थी. यह सत्य मेरे मन मस्तिष्क में घूमता रहता है कि जो पानी का जहाज जितना विशाल होता है, उसके डूबने पर नुकसान भी उतना ही बड़े पैमाने पर होता है. भले ही उसके डूबने का कारण एक छोटी-सी तकनीकी भूल ही क्यों ना हो. लेकिन नियति को अभी कुछ ही मंजूर था.

नवंबर 2007 की सुबह को झारखंड के समाचार पत्रों के माध्यम से मुझे पता चला कि बिनोद सिन्हा एवं उनके अनुज विकास सिन्हा की एक कंपनी मेसर्स इंडिया डीजल एंड ट्रैक्टर्स के खिलाफ़ चाईबासा स्थित बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने रांची हाइकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर सीबीआई जांच की मांग की है. मैंने सोचा कि अगर मैं इस केस में बिनोद सिन्हा की मदद करने में सफ़ल रहा, तो मेरी कंपनी के दस्तावेज, चेक बुक्स एवं अन्य जरूरी कागजात लौट सकते हैं. साथ ही मेरी कंपनी को अवसर भी मिल सकता है. मैंने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि मेसर्स इंडिया डीजल एंड ट्रैक्टर्स से संबंधित विचाराधीन मामले में मैं उनकी मदद कर सकता हूं. पहले तो वे राजी नहीं हुए, मगर कुछ समय बाद उन्होंने मुझे इस केस में न्यायोचित हस्तक्षेप करने की इजाजत दे दी. इस घोटाले का मुख्य बिंदु ऋण धारकों के बैंक खातों का एनपीए होना था, इसलिए मैंने बैंक ऑफ़ बड़ौदा के तत्कालीन सीएमडी और कार्यपालक निदेशक से मुलाकात कर ऋण की राशि सूद समेत वापस करने की योजना बनायी. इस बीच रोहिताश कृष्णन के माध्यम से एक राष्ट्रीय विपक्षी दल के एक बड़े नेता के छोटे भाई ने भी इस मामले में रूचि लेना आरंभ कर दिया. उनके प्रयास से यह मामला सुलझ गया. बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने बिनोद सिन्हा की कंपनी पर लगाये गये सभी आरोप वापस ले लिये. लगभग दो साल से चली आ रही एक विकट समस्या से बिनोद सिन्हा निजात पा गये. वस्तुतः मनोज पुनमिया और अरविंद व्यास ने इसके लिए पैसों का इंतजाम किया.

इन दोनों व्यक्तियों के बिनोद सिन्हा, संजय चौधरी एवं मधु कोड़ा से प्रगाढ़ संबंध थे. ये दोनों बिनोद सिन्हा के गैरकानूनी ढंग से कमाये हुए पैसों को भारत एवं भारत के बाहर दुबई या अन्य स्थानों पर हवाला के माध्यम से पहुंचाने और निवेश करने का कार्य देखते थे. इन्हीं लोगों के आधिपत्यवाली मुंबई की कंपनी ‘अमितोस लिजिंग एंड फ़ायनांस’ ने बैंक ऑफ़ बड़ौदा को लगभग पांच करोड़ रुपये का भुगतान जून 2008 में किया. इसके बाद इंडिया डीजल एवं ट्रैक्टर के पक्ष में बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने हाइकोर्ट रांची में हलाफ़नामा दायर कर अपना केस वापस ले लिया. लेकिन एक बार फ़िर मेरे  प्रयास को धक्का लगा. मैं अपनी कंपनी और अपने आप को सत्ता के गलियारों में घूमनेवाले दलालों के चंगुल से निकाल नहीं सका. आये दिन रोहिताश कृष्णन एवं बीके सिंह जैसे व्यक्तियों द्वारा मुझे मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा. मैंने सत्ता के गलियारे में घात लगाये बैठे दलालों को जड़ से मिटाने की ठान ली. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं इनसे दो-दो हाथ करने की शुरुआत कहां से और कैसे करूं? कभी मुझे अपने परिवार, अपने बच्चों, तो कभी खुद की चिंता परेशान कर जाती. इनके धन, बल और साधन संपन्नता के सामने मैं काफ़ी कमजोर था. जान से मार दिये जाने के बाद मेरे परिवार के समक्ष आनेवाली परेशानियों की कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठता था.

उस वक्त की एक घटना का उल्लेख यहां करना प्रासंगिक होगा. यह घटना उस वक्त की राजनीतिक स्थिति में अवैध कमाई करनेवालों के प्रभाव और बढ़ते मनोबल को दर्शाती है. सितंबर 2006 में मधु कोड़ा की सरकार अल्पमत में आ गयी. इस सरकार को यूपीए का समर्थन प्राप्त था. शिबू सोरेन ने उन्हें भविष्य में मख्यमंत्री बने रहने के लिए समर्थन देने से इनकार कर दिया. वह वक्त बिनोद सिन्हा,  संजय चौधरी, रोहिताश कृष्णन एवं  बीके सिंह एवं अन्य सहयोगियों के लिए एक दुस्वप्न से कम नहीं था. ‘झारखंड मुक्ति मोरचा’ ने अपने सारे विधायकों को रांची में एकत्रित होने और भविष्य में सरकार के गठन की प्रक्रिया को सुनिश्चित करने और शिबू सोरेन को नया मुख्यमंत्री बनाने के लिए एक बैठक बुलायी थी. इस बैठक में झारखंड मुक्ति मोरचा के सभी विधायक भाग नही ले सकें, इस मंशा से रोहिताश कृष्णन अपनी गाड़ी में रुपयों से भरा हुआ बैग लेकर मोहराबादी मैदान के आस-पास मंडराता रहा और विधायकों से संपर्क करने की कोशिश करता रहा. विडंबना थी कि उस गाड़ी को चलाने वाला व्यक्ति कोई और नहीं, मैं ही था!

14 अगस्त 2008 की दोपहर में रांची स्थित क्वांटम पॉवर टेक के ऑफ़िस में गया, व़हां मेरी मुलाकात रोहिताश कृष्णन, बीके सिंह एवं रामजी पॉवर के अशोक सिंह से हुई. यह लोग वहां पहले से बैठे हुए थे और झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड के नये अध्यक्ष के पद पर मनोनुकूल व्यक्ति को मनोनीत कराने के बारे में वार्तालाप कर रहे थे. बातचीत से आभास हुआ कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के खासम-खास एक व्यक्ति को यह काम करवाने के लिए घूस के तौर पर एक करोड़ 75 लाख रुपये दिये जाने थे. इसे लेने के लिए उनके सुपुत्र आनेवाले थे.

इसके दो दिन पूर्व, 12 अगस्त 2008 की रात, मैं अपने एक चचेरे भाई के रांची स्थित आवास पर इंटरनेट पर काम कर रहा था. मैं शारीरिक रूप से तो उस वक्त कमरे में मौजूद था, परंतु दिमाग में सत्ता के दलालों के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने की कवायद चल रही थी. मेरी लड़ाई ऐसे लोगों के खिलाफ़ थी, जो पैसों के बल पर पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करना चाहते थे. एकाएक मेरे दिमाग में एक विचार बिजली की गति से कौंध गया. एक क्षण के लिए मैं सोचने लगा कि अपनी महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में दुखों का अंबार खड़ा करने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए. किंतु दूसरे ही क्षण मुझे लगा सत्ता के इन दलालों के खिलाफ़ युद्ध का आगाज करने में मुझे अपना पराया जैसी चीजों से ऊपर उठना होगा.

अधर्म का मौन सहभागी होना भी एक अपराध है. विचारों के इस ऊहापोह में मैंने यह निर्णय लिया कि मैं सत्ता के गलियारों में आधिपत्य जमाये बैठे इन लोगों के खिलाफ़ यथासंभव साक्ष्य संग्रहित करूंगा. इस काम के लिए सबसे पहले मैंने संजय चौधरी के व्यक्तिगत ई-मेल एकाउंट तक पहुंच बनायी. उनके ई-मेल एकाउंट से कई सनसनीखेज दस्तावेज निकाले. और उनका विश्लेषण आरंभ किया. इस कार्य में मेरे चचेरे का भरपूर सहयोग मिला. ई-मेल से प्राप्त ये दस्तावेज केवल किसी बड़ी वित्तीय लेन-देन तक सीमित नही थे. ये एक संगठित आर्थिक अपराध के कारनामों के पुख्ता प्रमाण थे. कोड़ा के मुख्यमंत्री के काल में करोड़ों रुपयों को झारखंड से दुनिया के कई देशों में भेजे जाने की काली दास्तान उस व्यक्तिगत ई-मेल एकाउंट में उपलब्ध थी. इस संदर्भ में मैंने अपने चचेरे भाई से विस्तृत विचार विमर्श किया. हम दोनों के विचारों में गहरा मतभेद था. उस समय मैं इसकी गहराई समझ नहीं पाया था. कुछ लोग पैसा कमाने वालों को ईश्वर की तरह पूजते हैं और बिना उस आय के स्रोत को जाने उस अर्जित धन का हिस्सा बनना चाहते हैं.

‘उत्तरदायित्व का बोध, बहुधा, हमारे संकुचित विचारों का सुधारक होता है.’ मेरे करीबी लोग चाहते थे कि मैं ई-मेल एकाउंट से प्राप्त सनसनीखेज दस्तावेजों की एवज में बिनोद सिन्हा एवं उनके सहयोगियों से धन की उगाही करूं और धन के बदले सारे कागजात बिनोद सिन्हा को वापस कर दूं.  किंतु मैंने ऐसा नहीं किया. क्योंकि उस वक्त मेरे लिए पैसा कमाने से ज्यादा अहम थी अपने स्वाभिमान की रक्षा. मेरी प्राथमिकता थी सत्ता पर काबिज दलालों से संघर्ष करने की. उस दौरान मैंने कई दस्तावेज रांची स्थित दैनिक समाचार पत्रों को उपलब्ध कराया, जिसे उन्होंने प्रकाशित किया और झारखंड में कैंसर की तरह फ़ैलते भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज बुलंद करने में मेरी मदद की.

इसी बीच 17 सितंबर 2008 को प्रातः नौ बजे दुबई जा रहे संजय चौधरी को मुंबई एयरपोर्ट पर कस्टम अधिकारियों ने डिटेन कर लिया. उनके पास सीमा से अधिक भारतीय एवं विदेशी मुद्रा पायी गयी. इस घटना को मीडिया एवं समाचार पत्रों ने बहुत जोर-शोर से प्रसारित किया. जब यह सूचना मिली उस समय बिनोद सिन्हा और मैं दिल्ली के जिमखाना क्लब के एक कमरे में एक साथ बैठे थे. मैं एनडीटीवी को इस घटना की सूचना उपलब्ध करवाने की जुगत में था. उस समय बिनोद सिन्हा की मनःस्थिति देखकर मुझे विश्वास हो गया कि पैसा कमा कर व्यक्ति बड़ा बनने की भरपूर कोशिश तो करता है, किंतु गलत तरीके से पैसा कमा कर व्यक्ति निर्भीक नहीं बन सकता है. इस अनुभुति ने मुझे आत्मबल प्रदान किया और मैंने अपनी लड़ाई और तेज कर दी.

इसी दौरान रांची में मेरी मुलाकात सरयू राय से हुई. मैं उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता था. पर इनसे संपर्क होने के बाद मैं काफ़ी प्रभावित हुआ. वक्त के साथ इनके विचारों और इनकी सोच का मैं सम्मान करने लगा. वह पहले से खनन पट्टा आवंटन में भ्रष्टाचार और अनियमितता का मामला उठा रहे थे. उन्होंने यह विषय भी 20 अक्तूबर 2008 को प्रेस कांफ्रेंस में उठाया और ई-मेल से मिले दस्तावेजों को सार्वजनिक किया. इसके बाद आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने घोटालाबाजों के ठिकानों पर छापेमारी की. इस बीच यदाकदा मेरी मुलाकात बिनोद सिन्हा एवं उनके सहयोगियों से होती रहती थी. उनकी आंखों मे मेरे प्रति शक स्पष्ट नजर आता था. इसके बावजूद मैं अपने विवेक के आधार पर चुने हुए रास्ते पर आगे बढ़ता चला गया. 17 जनवरी, 2009 को दिल्ली स्थित मेरे आवास से कुछ जरूरी दस्तावेज गायब कर मेरा एक सगा बिनोद सिन्हा एवं रोहिताश कृष्णन से जा मिला. मात्र 10 लाख रुपये के एवज में बिनोद सिन्हा को मेरी सभी गतिविधियों से अवगत करा दिया.

19 जनवरी 2009 को प्रात 8.30 बजे बिनोद सिन्हा ने मुझे फ़ोन किया और बिना समय गंवाये मुझसे पूछा कि आप मेरे खिलाफ़ कई विभागों को सूचनाएं उपलब्ध करवा रहे हैं. कुछ इधर-उधर की बातें करने के बाद बिनोद सिन्हा ने मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की. फ़ोन पर बात खत्म होने के बाद साफ़ हो गया कि मेरे अपने ने ही धोखा किया है. बिना समय गंवाये मैंने अपने मित्रों और शुभचिंतकों को फ़ोन कर सारी बातों से अवगत करा दिया. उस दिन दोपहर से ही मेरे घर पर बिनोद सिन्हा के करीबी लोगों का आना शुरू हो गया. शाम होते-होते यह स्थिति बन गयी कि मुझे बिनोद सिन्हा से मिलने रांची जाने के लिए विवश होना पड़ा. इस दौरान मेरी पत्नी, जो अबतक की घटनाओं से अनभिज्ञ थी, विस्मित होकर कई प्रश्नों का उत्तर ढूंढ़ रही थी. मैंने अपने एलआइसी और अन्य कई जरूरी कागजात, जिनकी उपयोगिता मेरे मरने या मारे जाने के बाद मेरे परिवार के लिए अत्यावश्यक हो जाती, को व्यवस्थित किया और अपनी पत्नी के सुपुर्द कर बिनोद सिन्हा के छोटे भाई विकास सिन्हा के साथ रांची जाने के लिए घर से निकल पड़ा. शीघ्र ही मुझे इस बात का आभास हो गया कि मुझे रांची नहीं बल्कि कोलकाता ले जाया जा रहा है. मैंने इसकी सूचना अपनी पत्नी को छोड़ उन सभी व्यक्तियों को एसएमएस के माध्यम से दे दी, जो मेरे शुभचिंतकों की लिस्ट में शामिल थे.

रात 11.30 बजे हम कोलकाता स्थित बिनोद सिन्हा के आवास पर पहुंचे. जानकारी मिली कि जिनसे मिलने के लिए मुझे इतनी दूर लाया गया है, उनके आने में अभी देर है. एक सामान्य अतिथि की भांति मुझे भी खाना और पानी उपलब्ध कराया गया. रात 12.30 बजे बिनोद सिन्हा आये और बातों-बातों में उन्होंने कई तीखे प्रश्न मुझसे कर डाले. मैंने कुछ प्रश्नों का सीधा और कुछ प्रश्नों का घुमा कर जवाब दिया. सुबह नाश्ते के टेबुल पर मैंने बता दिया कि यह लड़ाई मैंने ही छेड़ रखी है और इसके लिए मेरा तिरस्कार, मेरी महत्वाकांक्षा का हनन और आप लोगों का दुर्व्यवहार जिम्मेवार है.  उन्होंने मेरे साथ इंसाफ़ करने का भरोसा दिलाया. सुबह मैं उनके साथ कोलकाता से जमशेदपुर के लिए निकल पड़ा. कोलकाता से जमशेदपुर के रास्ते में मैंने यह स्पष्ट कर दिया कि मैंने जो अभियान छेड़ दिया है, उसे रोकने या शिथिल करने में मैं असमर्थ हूं और भविष्य में इसके दूरगामी परिणाम होंगे. यात्रा के क्रम में मैं और बिनोद सिन्हा जादूगोड़ा स्थित रंकिनी मंदिर गये और पूजा पाठ किया. उसके बाद मैं जमशेदपुर स्थित अपने घर आया. घर पहुंचते ही ज्ञात हुआ कि निगरानी विभाग ने  मधु कोड़ा एवं अन्य आरोपियों के खिलाफ़ केस दर्ज कर दिया है. नौ अक्तूबर 2009 को इंफ़ोर्समेंट डाइरेक्टेट (इडी) ने भी इस कांड में एक एफ़आइआर दर्ज किया. इसके उपरांत 29 अक्तूबर 2009 को देश भर में मधु कोड़ा,  बिनोद सिन्हा एवं अन्य सहयोगियों के खिलाफ़ पीएमएलए 2002 एक्ट में इडी और इनकम टैक्स द्वारा देश भर में संयुक्त छापे मारे गये.

इसके बाद मुझे किसी न किसी माध्यम से यह सूचना मिलती रहती थी कि कुछ ही दिनों में मुझे जान से मार दिया जायेगा. परंतु मैं इन बातों से कभी भी विचलित नहीं हुआ. मेरा मानना है कि जन्म और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है न कि इंसान के हाथ में. इस बारे में जो भी जानकारी मुझे मिलती है, उसे मैं विभिन्न जांच एजेंसियों, गुप्तचर संस्थाओं एवं मीडिया से जुड़े लोगों को पहुंचा देता हूं. चार अगस्त 2010 को रांची उच्च न्यायालय ने इस केस की जांच देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी  सीबीआई को सौंप दी. मेरा संघर्ष एक पड़ाव पर पहुंच गया है. मैं गर्व और संतोष का अनुभव कर रहा हूं कि ईश्वर ने इस विपरीत परिस्थिति का सामना करने तथा भय और प्रलोभन से विचलित नहीं होने की शक्ति मुझे मित्रों और शुभचिंतकों को माध्यम बना कर प्रदान की. मैं वैसे सभी लोगों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं, जिन्होंने आत्मसम्मान, स्वाभिमान और महात्वाकांक्षा पर हमला के खिलाफ़ इस लड़ाई में मेरा प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग किया है. मेरा मनोबल बढ़ाया  है. सत्य है कि “A single pure thought and respective effort could bring substantial change into the Universe.”

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Comments on “दलाली की लंका में एक शख्स ने यूं लगाई आग

  • dhirendra pratap singh says:

    realy r.panday ji aap ek sachhe aur achhe insaan h.kyo ki kahavat h ki subah ka bhoola shaam ko ghar aa jaye to use bhoola nahi kahte.aap ne aatma ki aavaj suni aap mahan h.godbless u.thanku

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  • shabash….

    dushyant kuamar ki ye panktiyan aapke liye hi likhi gayee hongi.

    aag me fenko hume, ya zahar de do hume
    hum to taiyar hain sab inthanon ke liye
    jab se humne pankh khole hain udanon ke liye
    hum chunouti ban gaye hain aasmaanon ke liye

    amar anand

    delhi me tv patrakar… mool roop se jharkhand se
    mera url manzilaurmukam.blogspot.com

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