पत्रकारिता के एक संत का यूं ही चले जाना

हरीश पंत
: जनसत्‍ता के पूर्व चीफ सब एडिटर हरीश पंत का निधन : चंडीगढ़ जनसत्ता में पूर्व मुख्‍य उपसंपादक रहे हरीश पंत ने मंगलवार को चंडीगढ़ के पीजीआई में अंतिम सांस ली। उन्हें अचानक तबीयत बिगडऩे के बाद अपने गांव नाहन (हिमाचल प्रदेश) से यहां लाया गया था। डाक्टरों के अथक प्रयास के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। बुधवार को नाहन में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

पंत जी बिल्कुल स्वस्थ नहीं थे, लेकिन सेहत इतनी खराब भी नहीं थी कि अचानक छोड़कर चले जाए। होनी को जो मंजूर था वही हुआ। उनके न रहने की खबर के बाद उनकी इकलौती बेटी को गहरा सदमा लगा और वे अचेत हो गई। बेटी के साथ उनका लगाव ज्यादा था। पिछले दिनों इंजीनियरिंग के लिए बेटी को प्रवेश दिलाने के लिए वे चेन्नई गए थे। यह कोई पंद्रह-बीस दिन पहले की बात है। अगर स्वास्थ्य खराब होता तो वे इतनी लंबी यात्री नहीं कर पाते। वे आराम से गए और आराम से आ गए। आने के बाद उनसे बात हुई तो उन्होंने खुद ही बताया था कि स्वास्थ्य ठीक रहता है। अगर अपने गांव नाहन में ही कोई रिपोर्टिंग का काम मिल जाए तो वे करने को तैयार हैं। चंडीगढ़ या आसपास भी वे काम करने के इच्छुक थे। उन जैसे व्यक्ति को कोई भी अच्छी जगह पर रखने को तैयार हो जाता लेकिन उन्होंने इसके लिए कभी गंभीरता से प्रयास नहीं किया।

उनकी पत्नी राज्य सरकार की नौकरी में है। पंतजी के न रहने पर उनकी क्या दशा हुई होगी इसे आसानी से समझा जा सकता है। डाक्टरों के जवाब देने के बाद वे भी अपनी सुध बुध खो बैठी थी लेकिन सब कुछ उन्हें ही करना था इसलिए संयम उनके लिए जरूरी था और उन्होंने ऐसा किया भी। चंडीगढ़ में पंतजी के खास सहयोगी से उन्होंने फोन से संपर्क करना चाहा लेकिन बात हो नहीं सकी। परिचितों और अन्य लोगों से संपर्क कर उनके सहयोग पंतजी को नाहन ले जाया गया। ऐसी जीवन वाली और गजब की हि मत रखने वाली महिला को नमन है।

हरीश पंत की विशेषताओं का अंत नहीं है, इतनी खूबियों वाला इंसान जो पहली ही मुलाकात में किसी को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ लोग अपना प्रभाव क्यों छोड़ देते हैं? और कुछ छोडऩे का प्रयास करते हैं लेकिन निष्प्रभावी ही रहते हैं। दरअसल ऐसे लोगों का कोई धरातल नहीं होता, सब कृत्रिम होता है। पर पंतजी जमीन से जुड़े हुए वे इंसान थे जिनमें किसी तरह का छदम नहीं था। साम, दाम, दंड, भेद से कोसों दूर जैसे उनका कभी इनसे कोई नाता ही न रहा हो। बहुत बार वे अपने काम में इतने व्यस्त रहते कि उन्हें पता भी नहीं रहता कि आसपास डेस्क पर कोई बातचीत भी हो रही है। वे बोलते बहुत कम थे लेकिन जितना बोलते थे उसमें गंभीरता होती थी, ठोस बातें होती थी। वे आलोचना से दूर रहते थे।

कभी-कभार मूड होता तो मजाक कर लेते वरना सहयोगी उनसे ही मजाक करते थे जिसका वह कोई बुरा नहीं मानते थे। कुछ शर्मीले भी थे, लिहाजा अपनी तरफ से कोई ऐसा बात नहीं करते जिसका बतंगड़ बन जाए। एक बार किसी फिल्म का डायलाग -बच्चे की जान लोगे क्या, उन्हें पसंद आ गया और बहुत दिन वह उनकी जुबान पर चढ़ा रहा और वे इसका इस्तेमाल करते रहे। जब बहुत काम कर लेते और फिर कोई काम आ जाता और शिफ्ट इंचार्ज उन्हें कह देते पंतजी देखना तो वे मजाक में कह देते बच्चे कि जान लोगे क्या और सबसे पहले खुद ही खिलखिला कर हंस देते। बहुत दिन तक यह सिलसिला चला। रात की शिफ्ट में काम करके गए और कभी दिन की शिफ्ट में आने के लिए कह दिया जाता तो वे वही मजाक में कह देते, क्या बच्चे की जान लोगे, वे यह सब मजाक में कह देते लेकिन अगले दिन ड्यूटी पर आते।

पंतजी बहुत विनम्र स्वभाव के थे। शायद ही कोई होगा जो यह कह सके कि पंतजी को उसने गुस्से में देखा या इसी लहजे में बात की हो। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों की ठोस जानकारी थी। किसी भी विषय पर कोई भी जिज्ञासा हो उनसे लोग पूछते और संतुष्ट होते थे। भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी, हिंदी और अंग्रेजी में समान अधिकार था। हिंदी की कापी का संपादन करना हो तो वे बिना ज्यादा कांट-छांट के उसे अच्छी खबर बना देते। इसमें वे वह सामने वाले पर अपनी विद्वता साबित करने का प्रयास नहीं करते जैसा अक्सर लोग किया करते हैं। उनका स्वभाव ही ऐसा था वे किसी को हतोत्साहित नहीं बल्कि उसका हौसला बढ़ाने में भरोसा करते थे।

अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में तो उन्हें महारत हासिल थी। खबरों की उन्हें बेहद समझ थी। साथी लोग उन्हें चलता फिरता शब्द कोश्‍ा या फिर इंसाइक्लोपीडिया भी कहते थे। कुछ अपवाद को छोड़कर उन्हें हर विषय की तह तक जानकारी होती थी। अगर किसी की जानकारी नहीं होती तो वे फट से कह देते उन्हें इस बारे में पता नहीं है। बहुत बार हिंदी में ही स्टीक शब्द के लिए जब बहुत माथापच्ची के बाद भी कोई विकल्प नहीं मिलता तो पंतजी से पूछने पर वह मिल जाता। अचानक किसी खबर के संदर्भ में फ्रांस की क्रांति की बात आ जाए तो पूछने पर पंतजी उसका पूरा खुलासा कर देते थे।

नक्सलवादी आंदोलन हो या फिर पंजाब में आतंकवाद, बोडो आंदोलन हो या फिर अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति उन्हें बहुत कुछ जानकारी होती थी। यह केवल एक उदाहरण मात्र है बहुत बार विज्ञान के विषयों पर उनकी जानकारी को देखकर साथी लोग दंग रहते रहे हैं। इस सबके बावजूद वे अपने को सामान्य ही मानते थे। वे बहुत काबिल आदमी थे और इसकी बदौलत वे बहुत ऊपर तक जा सकते थे लेकिन वे जहां थे वहीं खुश थे। संतोषी वृत्ति के व्यक्ति थे और हर हाल में खुश रहना जानते थे।

होली के मौके पर चंडीगढ़ जनसत्ता में मजाकिया खबरें छपा करती थी। लगभग सभी खबरों में बाइलाइन भी हुआ करती थी। संवाददाताओं के अलावा डेस्क के लोगों के नाम भी होते थे लेकिन कुछ बिगड़े हुए रूप में, कुछ तो ऐसे बना दिए जाते कि साथी लोग उनसे कई दिन तक मजाक भी करते रहते। पंतजी का नाम भी जाता था लेकिन कमाल देखें उनके नाम को भी बिगाड़ा नहीं जा सकता था। लिहाजा ज्यादा से ज्यादा हरीश पंत की जगह हरीश संत लिखा जाता था। सचमुच वह संत प्रवृति के थे और यह नाम पंत से भी ज्यादा सार्थक है।

इतने विनम्र, संस्कारी, नेकदिल और सच्चे पुरुष पंतजी को न जाने क्यों अंगूर की बेटी से लगाव हो गया। शुरुआती दौर में लोगों को हैरानी हुई इसलिए उन्हें इससे दूर रहने की ही सलाह देते थे। शुरू के दौर में वे कहते थे कि बस कभी कभार रोज नहीं, लेकिन वे इस लत बना बैठे और इसने उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया। उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया, काम में किसी तरह की कमी नहीं आई लेकिन वे अब गुमसुम और उदास के अलावा एकाकी रहने लगे थे। सहयोगियों ने इसकी वजह भी पूछी लेकिन उन्होंने शायद ही किसी को बताया होगा। वह अंतर्मुखी व्यक्ति थे इसलिए संभव है उन्होंने लत की वजह किसी ही बताई हो।

जम्‍मू में भी उनकी यह आदत छूटी नहीं। ज्यादा होने पर जब शरीर झेलने में नाकाम होने लगा तो उन्होंने सब छोड़ छाड़कर घर जाने का फैसला किया। वीआरएस लेने के बाद वे जम्‍मू से हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के अपने गांव नाहन में आ गए। गांव आने के बाद उनके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा क्योंकि अब उन्होंने अपनी आदत पर काफी हद तक काबू पा लिया था। कुछ सालों तक उन्होंने यह सब देख लिया था। घर से बाहर रहते बात और होती लेकिन अब घर में यह सब ठीक नहीं यही मानकर वे इस लत पर काबू पा सके। इसके बाद उनके स्वास्थ्य में बहुत सुधार हुआ, न केवल वह बल्कि परिवार के लोग भी कहते अब सब कुछ ठीक हो गया है। मंगलवार को उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी

जनसत्ता चंडीगढ़ संस्करण के स्थगित होने के बाद वे इंडियन एक्सप्रेस के जम्‍मू संस्करण में मुख्‍य उपसंपादक के तौर पर चले गए। अंग्रेजी और हिंदी उनके लिए एक समान थी लिहाजा वहां भी जनसत्ता जैसा ही प्रभाव हो गया। वह प्रभाव जमाते नहीं थे बल्कि खुद-ब-खुद हो जाता था। उनकी आलोचना कोई नहीं करता था, कर भी नहीं सकता था क्योंकि वे निर्विवाद थे। किसी का अहित नहीं करते थे, किसी को अपनी जुबान से कड़वा नहीं बोलते थे। कोई गलती भी कर जाए तो उसे हलका सा समझा भर देते थे।

ऐसे व्यक्ति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है और लोगों ने सीखा भी है। किस तरह से इतनी विद्वता के बाद भी विनम्र बने रहा जा सकता है। इतने संस्कारी, ज्ञानी, और आदर्श पुरुष का इस तरह से चले जाना मन को व्यथित कर गया। उनके न होने की खबर से मन बहुत उदास हुआ। न जाने क्यों मुझे हिंदी की पुरानी फिल्म बंदिनी का वह गीत स्मरण हो गया – ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना..।  आदरणीय पंतजी को शत-शत प्रणाम। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। उनके परिवार को कठिन हालात का मुकाबला करने की शक्ति प्रदान करें।

महेंद्र सिंह राठौड़ की रिपोर्ट. महेंद्र सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

Comments on “पत्रकारिता के एक संत का यूं ही चले जाना

  • शायद अच्छे लोगों की जरुरत भगवान के यहां भी होती है . इसलिए उन्होंने पंत जी को अपने पास बुला लिया . ईश says:

    श्रीकांत सौरभ

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  • harish pant jarur sant rehe honge varna patrkar ka sant se kya lena dena. esse log bhaut kam hi hote hain. unko parnam hai. aapne kammon se esse log hemesha yaad kiye jate rehenge. name bhi harish hai or kaam bhi harishchandra jesse the.

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  • rakesh rocky says:

    bahut kam log jiwan men Pant ji jaise mile….jankari ka khazana or tabiyat main aise manon koi farishta….unhen shat-shat shradhanjli..ve bahut yaad ayenge…rathore ji ka unhen is andaz main yaad karne ke liye shukriya…

    rakesh rocky
    jansatta/chandigarh

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  • bara dukh hua hai. nahan (hp) ke the harish pant to eek terah se unhone devbhumi ka maan hi badhaya hai. esse log shrir chod sakte hain lakin hemesha man mai bane rehete hain. nuke bare mai jana to pata chala ki esse log bhi hain.

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  • adarsh prakash singh says:

    itne nek patrakar ka jana vastav me dukhdai hai. unhe meri shradhanjali. aise log aj ki patrakarita me gine chune hai.
    adarsh prakash singh
    news editor
    jansandesh times lucknow

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  • Pankaj Mishra says:

    भगवान पन्त जी की आत्मा को शांति प्रदान करे !
    दुःख की इस घड़ी ईश्वर पन्त जी के परिवार को शक्ति प्रदान करे !
    पंकज मिश्र , फर्रुखाबाद

    Reply
  • Pankaj Mishra says:

    भगवान पन्त जी की आत्मा को शांति प्रदान करे !
    दुःख की इस घड़ी में ईश्वर पन्त जी के परिवार को शक्ति प्रदान करे !
    पंकज मिश्र , फर्रुखाबाद 🙁

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  • pant ji ka is tarah se asamay chala jana wakayi rula deta hai is tarah ke insaan ab patrkarita mai ginti ke hi hain lekin honi balwan hoti hai magar pant ji ko hamari sharaddhanjli yahi hogi ki unke bataye aur dikhaye raste par chala jaye aur patrkarita mai phaili gandgi ko door kiya jaye.pant ji ke ghar walon ko upar wala sabr de aur unki atma ko shanti.m faisal khan.saharanpur.9412230786

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  • ganesh prasad jha says:

    Pant ji ka achanak is tarah chale jana mere liye bahut dukhad hai. Jansatta chandigarh ki launching team me pantji mere sathi the. Mera unka ek sal ka hi sath raha tha waha. Phir wo bhi idhar-udhar bhagte rahe aur mai bhi door chala gaya so sampark toot gaya. Ishwar unki atma ko shanti pradan kare. Ganesh Jha- 09650069229

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  • vijay srivastava says:

    aaj ki patrakarita me aise shaks ka hona bahut badi baat thi, usse bhi badi baat hai unka duniya se chale jana. unke jane ka dukh hum sabko hai. bbhagwan unki aatma ko shanti den. aur pant ji fir se is duniya me waisa hi nek insaan bankar janam len, yehi kaamna aur prarthna hai.

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  • kumar dinesh says:

    Shri harish pant ko meri sharandhijali. mai unhhe kabhi mila to nahi lakin kuch logo na bataya ki wo bahut intelgente the. esse log patrkarita mai kam hi hai jo sab kuch hote hue bhi aapne ko samanaya samjte rehe. pantji esse hi honge tabhi to sabhi log udnhe yaad karte hain.

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  • kumar dinesh says:

    mujhe lagta hai shri harish pant jesse log patrkarita ke liye thik nahi kyonki esse intellegent logo ko acchi service mai jana chahiye. kam se kam apni yogygta se kuch ban to sakege. mera unko parnam.

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  • surinder pal says:

    eek sant patarkar ka yun jana se pata chala ki harish pant kya the. kash inse kabhi mila hota. unke jane se patrkarta se eek or accha insan chala gaya.

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  • haryana union ki or se Shri harish ji pant ko sharandhjali. pant jesse log journilsm mai kam hi hote hain. bhagwan unki aatma ko shanti pardan kere.

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  • prem lata parik says:

    pant ji ko mera naman. unki beti aab thik hogi or patni bhi. pariwar ki mukya ke ne rehne se sab kuch garbar ho jata hai lakin samay essa merham hai sab thik ho jata hai. yahi zindi hai. pant ji hemesha yaad rehenge.

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  • sanjay rathee says:

    mai haryana union of journilst ki or se shri harish pant ji ke nidhan per dukh parkat karta hun. ghagwan unki aatma ko shanti pardan kere or unke pariwar jano ko himmit. mai unko niji tour per unse kabhi nahi mila lakin jansatta ki kuch sathion ke bateye anusar wo bahut hi nek dil insan the. union ki or se unko sharandhali.

    SANJAY RATHEE, PRESIDENT HARYANA UNION OF JOURNILSTS, 94678-22222

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