”पापियों का नाश हर हाल में उचित है!”

अमिताभ
अमिताभ
: आतंकवादी के इनकाऊंटर पर फेसबुक पर छिड़ी बहस : आज मैंने एक प्रश्न अपने फेसबुकी मित्रों के सम्मुख प्रस्तुत किया- “एक आतंकवादी जो किसी अन्य तरीके से नहीं समाप्त हो पाता, एक पुलिस अधिकारी द्वारा किसी माध्यम से मार दिया जाता है. क्या आप इस कृत्य का समर्थन करते हैं?”

उसी प्रश्न को दूसरी तरह से कुछ यूँ भी कहा- “एक पुलिस अफसर उस कमीने बदमाश को किसी तरह मार देता है जो घटिया, कुत्सित, घृणित है और समाज का आतंक है. क्या ऐसा इनकाऊंटर अनुमन्य हो ?”

इस सम्बन्ध में मुझे जो विभिन्न प्रकार के उत्तर मिले, उन पर एक बार निगाह डालना मानव प्रकृति को समझने का एक अच्छा जरिया हो सकता है. इनमें बड़ी भारी संख्या में पत्रकार साथी भी हैं. एक  मित्र, रजनीश कुमार जो सामजिक रूप से सक्रिय हैं और बिहार के उस इलाके से आते हैं जहां नक्सल गतिविधियाँ हैं का साफ़ कहना है- “भरपूर समर्थन करते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं को भी चाहिए कि ऐसे तत्व जो दूसरों के मानवाधिकारों का जानबूझकर बार-बार हनन कर रहे हैं, सुधार की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ रहे उनके खात्मे का सोचें, उनके खात्मे के लिए मानवाधिकार आंदोलन चलायें। ऐसा थोड़े है कि मानवाधिकार सिर्फ आतंकवादियों का है, आम आदमी को जीने का अधिकार नहीं है क्या? और ये सब जो बातें हैं ना आतंकवादी भी हमारे परिवार के सदस्य हैं, बिल्कुल फालतू, बाहियात, बेमतलब, किताबी और काल्पनिक। हमलोग व्यावहारिक बातें जानते तो अच्छी तरह हैं पर सार्वजनिक मंच पर उसे नकार जाते हैं। अरे परिवार की बात छोड़ दीजिए न, आपके शरीर का कोई अंग जहरीला हो जाता है तो स्वस्थ रहने के लिए ऑपरेशन के जरिए उसे काट कर फेंक दिया जाता है। हाँ, मैं इस तरह के परिवार में विश्वास नहीं करता, ये सब लफ्फाजी है और आतंकवादियों के मंसूबे बढ़ाने वाली बातें।”

लखनऊ में इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े एक पत्रकार साथी ज्ञानेंद्र शुक्ल  भी ऐसा ही कहते हैं- “पापियों का नाश हर हाल में उचित है” इसके विपरीत पत्नी नूतन का कहना है- “पुलिस वाले अपनी उसी सोच पर आ ही जाते हैं. मैं ऐसे किसी भी कार्य को हत्या से कम नहीं मानती”. लगभग  यही सोच दिल्ली के एक प्रतिष्ठित पत्रकार की   भी था जब उन्होंने कहा  – ” सभ्यता की अपनी शर्तें होती हैं, जिसे समाज क़ानून कहता है.”

जहां एक ओर लखनऊ के एक युवा छात्र इन्द्र कुमार मिश्रा कहते हैं- “बिलकुल  मैं  इसका  पूरा  समर्थन  करता  हूँ, आतंकवादियों के साथ ऐसा  ही करना चाहिए जो निर्दोष लोगों को मारते हैं. बताएं अजमल आमिर कसाब की सुरक्षा में सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है. दूसरे देशों में ऐसा  बिलकुल नहीं  है”। वहीँ लखनऊ के ही एक सामजिक कार्यकर्ता धनंजय सिंह इसके ठीक विपरीत बात कहते हैं- “बंजारा और उनकी टीम के आईपीएस जो जेल में हैं, से पता करवा के बतलाता हूँ। वैसे भी आतंकवादियोँ को मानव बताकर उनके अधिकार का नारा बुलन्द करने वालों से डर लगता है। ”  लेकिन आगरा के पर्यावरण पर कार्य कर रहे साथी जीतेन्द्र शर्मा कहते हैं- “अमिताभ जी, कांटे को कांटे से निकाला जा सकता है, शायद पुष्प से  नहीं।”

लखनऊ के एक युवा व्यवसायी गगन कुमार सिंह भी मानते हैं – “निस्संदेह! समर्थन होना ही चाहिये, आज के इस हालात में किसी ना किसी को तो ये ज़िम्मेदारी लेनी ही होगी, समाज से गंदगी साफ करने की! अदालत के भरोसे बैठने से कोई हल नही निकलेगा!”

साइबर इन्जीनियर प्रदीप सामंत कहते हैं- “यदि सभ्य समाज में इस तरह की व्यवस्था कायम होती है तो लोग अपनी रंजिशें निकालने के लिए हमें या आप को अपराधी बना के मार देंगे. यह सत्य है कि न्यायिक निर्णय समय लेता है किन्तु इसका मतलब ये नहीं है की सजा देने का अधिकार लोगों के विवेक पर छोड़ दिया जाये। भावनाओं में बहने से सिर्फ नुकसान ही होगा। लोगों को आगे बढ़ कर न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने का कार्य करना चाहिए।”

सिद्धार्थ नगर के पत्रकार नजीर मलिक पुलिस के इन कार्यों को इस प्रकार से व्याख्यायित करते हैं- “पुलिस फोर्स में डाका, कत्‍ल, रेप ही नहीं साम्‍प्रदायिकता फैलाने वाले लोग भी बैठे हैं। एक तरह वह भी अपराधी ही हैं, तो क्‍या उनका इनकाउंटर कर दिया जाना वाजिब है? देश में जंगलराज चलने दिया जाए क्‍या? आखिर जब हम ही आरोपी को अपराधी मान लेंगे तो फिर अदालतें क्‍या करेंगी?? माफ कीजिए अमिताभ जी, गुनाहगारों को सजा सिर्फ अदालत ही दे सकती है। जब जब पुलिस अपने निकम्‍मेपन के कारण बदमाशों के खिलाफ सबूत नहीं जुटा पाती तो उसके पास इनकाउंटर का समर्थन करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता है।”

अंत में एक बार फिर नूतन की इस बात के साथ इन मंतव्यों को यहीं समाप्त करता हूँ- “आप एक पुलिस वाले हैं तो शायद ऐसी सोच आ जाती हो. पर पहली बात तो मैं यह मानती ही नहीं कि किसी एक आदमी को दूसरे की ह्त्या करने का अधिकार है. फिर इनमे कौन सही है और कौन गलत, ये फैसला बहुत ही मुश्किल है. ये तो नज़रिए का फर्क हो सकता है. हाँ, अदालतें बनी हैं, उन्हें दोनों पक्ष की बात सुन कर जो उचित लगे, फैसला करें, फिर भी ठीक है. मैं ऐसे किसी भी काम का तीव्र विरोध करती हूँ.”

फिर इनमे से कौन सा पक्ष सही है और कौन गलत? दोनों अपनी जगह सही दिखते हैं, तो फिर किसके पालन का रास्ता बेहतर हो?

अमिताभ ठाकुर

आईपीएस

उत्तर प्रदेश

Comments on “”पापियों का नाश हर हाल में उचित है!”

  • जैसे के साथ तैसा होना ही चाहिए लेकिन कौन पुलिसवाला अपनी निजी दुश्मनी निकल रहा है कैसे पता लगाएँगे.पुलिस के भेष में कौन आतंकवादी या भ्रष्टाचारी के दलाल है कैसे पता चलेगा.. रसूखदार पुलिस का दुरुपयोग नहीं करेंगे इस बात कि क्या ग्यारंटी

    Reply
  • Aap ne pucha — एक पुलिस अफसर उस कमीने बदमाश को किसी तरह मार देता है जो घटिया, कुत्सित, घृणित है और समाज का आतंक है. क्या ऐसा इनकाऊंटर अनुमन्य हो ?
    Amitabh ji , Police kisi kamine ko maar de to bahut achcha hai, par *Kamina* Aap kise maan te hain ? 1) Bhrasht Netaaon ko ? 2) Bhrasht naukarshaahon ko ? 3) Bhrasht Police waalon ko ? 4) Ya Aatankwaadiyon ya Gundon (jinhe paalta kaun hai, ye sab jaante hain ) ko ?

    ANS:- Police pahle 3 catagory ke *Kaminon* ko , Is maamle mein qanoon apna kaam karega, jaisee naseehat ke saath *Sharif * maan kar chod deti hai ! 4th catagory ko *Asli Kamina* maan kar khatm kar deti hai !

    Reply
  • भाई अमिताभ जी ,
    मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं। शठे शाठ्यं समाचरेत्
    अर्थात दुष्‍ट के साथ दुष्‍टता का ही व्‍यवहार करना चाहिये । वरना हमारी सरकार तो आतंकवादियों को भी दामाद की तरह पाल रही है।
    पर अरबाज जी का भी कहना सही है कि – ”जैसे के साथ तैसा होना ही चाहिए लेकिन कौन पुलिसवाला अपनी निजी दुश्मनी निकल रहा है कैसे पता लगाएँगे.पुलिस के भेष में कौन आतंकवादी या भ्रष्टाचारी के दलाल हैं कैसे पता चलेगा.. रसूखदार पुलिस का दुरुपयोग नहीं करेंगे इस बात कि क्या गारंटी है” । इस बात का कोई हल आपके पास हो तो बताइयेगा।

    पु‍नीत निगम

    सम्‍पादक – खास बात मासिक पत्रिका एवं खबरदार शहरी साप्‍ताहिक
    कानपुर ।

    Reply
  • chandan srivastava says:

    agar police ka koi adhikari wo b IPS adhikari farji incounter ka samarthan kare to badi ajeeb bat hai. jis kanoon ne farji incounter ko galat thahraya hai usi ne ye kaam bhi police ko saunpa hai ki apradhi ke khilaf imandari se janch karke sachhi case diary taiyar kare taki use saja mil sake. ab amarmani tripathi ka hi exp le lijiye. cbi ne kayde se invstgt kiya aur natija samne hai. mujhe lagta hai farji incounter invstigation me jyada na dimag lagana pade aur likha padhi me jyada waqt na jaya ho is vajah se b kar dee jati hogi. vaise jyadatar incounter spcialisto ke mafiyao se sampark ke hi kisse baad me samne aate hai.

    Reply
  • शशिकान्‍त अवस्‍थी says:

    मै इस बात से बिलकुल इत्तेफाक नही रखता हू जिस देश में पूर्व प्रधानमंत्री,मुख्‍य मत्री को भी जेल भेजा जा सकता है ऐसे में एक आतंकवादी की हैसियत ही क्‍या है । अगर अपराध साबित होता है तो हमारी न्‍याय व्यवस्‍था उसको सही सजा देगी । क्‍या धनंजय काण्‍ड इसका सही उदाहरण नही है । अगर हम आप (पुलिस) खुद ही निर्णय करने लगेंगें तो इस देश में अदालतो का वजूद ही खत्‍म हो जायेगा ।

    Reply
  • मदन कुमार तिवारी says:

    आपको मालुम है पुलिस की ड्यूटी । क्या आप्को अधिकार है । फ़ैसले देने का ।? आप सिर्फ़ अनुसंधान तक सिमित हैं। आप किसी को जेल भी नही भेज सकते । मेमो आफ़ एविडेंस चाहिये । सबसे बडी समस्या यह है की हर आदमी अपने काम की बजाय दुसरे का काम करना चाहता है। पुलिस सिर्फ़ ठोस सबुत ईकठ्ठे करे । सबुत का मतलब सिर्फ़ गवाह का बयान नही । रही गई अन्य लोगों की प्रतिक्रिया तो एक हत्ारे , बलात्कारी , आतंकवादी से बडा अपराधी मिलावट करने वाला , टैक्स चुाने वाा और दलाली करने वाला है। अपना -अपना नजरिया है अपराध को देखने का । साईकिल चोरी करने या छोटी -मोTटी चोरी करने वाले को मैं अपराधी नही मानता। वह मजबुरी है।

    Reply

Leave a Reply to .xyz. Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *