मेरे करियर का आगाज रिक्शा चलाने से हुआ

अर्जुन शर्मा पंजाब के ऐसे पत्रकारों में हैं, जिनकी प्रतिभा बहुमुखी है. बहुत डूब के करते हैं वो, जो कुछ भी करते हैं. खुल के कहते हैं वो, जो कुछ भी कहना चाहते हैं. आजकल वेब मीडिया का दौर है, न्यू मीडिया का दौर है. जिसे देखो, वेब व ब्लाग बनाए जा रहा है.

अच्छा है. बेहद कम खर्चे का यह मीडिया माध्यम वैश्विक पहुंच रखता है. वैसे भी, अगर आपकी एक पर्सनालिटी है तो आपके पास आपकी जरूर एक वेबसाइट होनी चाहिए, या ब्लाग होना चाहिए. तो हिंदी में वेब ब्लाग के इस दौर में भला अर्जुन शर्मा कैसे पीछे रहते. उन्होंने एक वेबसाइट अपने लिए व अपने चाहने वालों के लिए लांच की है. अर्जुन के तीर नाम से. इस वेबसाइट को खोलते ही जिस पहले राइटअप से आपका पाला पड़ता है, वो अर्जुन का जीवन परिचय है. पूरी ईमानदारी से अर्जुन ने अपने पत्रकार बनने की कहानी बयान की है. लेखन में ऐसी ईमानदारी व ऐसी राइटिंग स्टाइल अब कम देखने को मिलती है. अर्जुन के पत्रकार बनने के अनुभव को आप भी पढ़ें. बेहद प्रेरक और रोचक.

-एडिटर, भड़ास4मीडिया


मुकेश कुमार से अर्जुन शर्मा व टेलरिंग लेबल एजेंट से पत्रकार की यात्रा

अपने बारे में लिखना मानों सबसे बड़ी कठिनाई है। मेरे मां बाप ने मेरा नाम मुकेश कुमार रखा था। मेरी पैदायश 19 नवंबर 1967 की है। उस दौर में फिल्मी गायक मुकेश साहिब की तूती बोलती थी। मेरी मां बताया करती है कि मेरे चाचा ललित जेतली (जो मेरे जीवन में बालपन के दौर में मेरे गुरु रहे) ने मेरा नाम मुकेश रखने की तजवीज की थी। शायद मेरे घर वालों को ये उम्मीद थी कि मैं बड़ा होकर मुकेश साहिब जैसा नामचीन गायक बनूंगा। उनकी यह इच्छा अधूरी भी न रह सकी पर पूरी भी न हुई। स्कूल के दौर में मैं अंतर स्कूल संगीत प्रतियोगिताओं में अवार्ड जीतने वाला गायक था।

आज चालीस से भी तीसरा साल पार होने जा रहा है पर दो पैग लगाने के बाद मैं मुकेश साहिब के गीत पूरी तरन्नुम तथा उदासी की उसी पिच पर गा सकता हूं। पर मैं प्रोफैशनल गायक न बन सका। असल में बचपन के दौर ने उतना समय ही नहीं दिया। आठ जमात पास करने के बाद घर की मुश्किलों ने संघर्ष के राह का साथी बना दिया। पिता जी का जबरदस्त एक्सीडेंट हुआ। एक टांग तीन जगह से फ्रैक्चर। घर के बर्तन तक डाक्टरों के पास चले गए। मां काफी हौसले वाली थी, पर खाली जेब हौसलामंदी का क्या प्रमाण दिया जा सकता है। पिता जी अस्पताल में। एक छोटा भाई, एक बहन। अभी पढ़ते थे।

मेरे कैरियर का आगाज रिक्शा चलाने से हुआ। जालंधर के अच्छे खासे खानदान का चश्मो चिराग था पर पिता जी ने अपने परिवार से कुछ न लेने का व परिवार के लोगों ने कुछ न देने का मन बनाया हुआ था। सो छह महीने तक शाम से देर रात तक मुंह ढ़ंक कर रिकशा चलाता। घर फिर से चलने लगा। पर पिता जी की हालत कई साल बाद सुधरी जब छोटा भाई भारतीय वायू सेना में चला गया व आर्मी अस्पताल से पिता जी का इलाज होना शुरू हुआ। जीवन का पहिया कितना पीछे रह जाता है कि कई बार अतीत की खिड़कियों-दरवाजों पर कुछ लोग ताला लगा दिया करते हैं ताकि बीते दौर का कड़वा सच वर्तमान में रुसवाई न करवा दे। पर मुझे सब कुछ याद है व मैने अपने अतीत के दरवाजों को कभी बंद रखने की कोशिश नहीं की क्योंकि बड़ी शिद्दत से महसूस होता रहा कि अतीत मेरी उर्जा की संजीवनी है। जब कहीं असफलता मिले तो अतीत की औकात व वर्तमान की स्थिति की तुलना आदमी को निराशा की गर्त में नहीं जाने देती।

खैर लंबा संघर्ष चला। कभी कपड़े की दुकान पर तो कभी दवाईयों की दुकान पर नौकरी व शाम को पढ़ाई। कभी इलैक्ट्रीशियन का काम तो कभी खराद की फैक्ट्री में काम। वैसे ये जानकारी सबके लिए रोचक रहेगी कि मैं पत्रकार कैसे बना? उम्र 19 साल की थी। दसवीं पास कर चुका था। अंग्रेजी के पेपर में बिना नकल के पास होना संभव नहीं था सो ये पुण्यकर्म भी किया। बस, वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास पढऩे की ललक थी। पढ़ते पढ़ते मैं अक्सर ही उनके एक पात्र ‘विकास’ में आत्मसात हो जाता क्योंकि मेरा कद 6 फुट हो चुका था। कराटे भी सीखा करते थे। भारत पर जान न्यौछावर करने के लिए खुफिया विभाग का जासूस बनने को तड़प रहा था।

उन दिनों मैं अपने बचपन के मित्र शक्ति लखनपाल (इन हजरत का नाम भी घर वालों ने बचन सिंह रखा था, पर उपन्यास के लेखक बनने के चक्कर में इन्हीं को सपना आया कि इनका नाम शक्ति होना चाहिए और मेरा नाम अर्जुन) के साथ टेलरिंग लेबल की एजेंटी किया करता था। चाचा गुरु ललित अंकल को शायद मेरे भीतर की जानकारी थी। सो वे हमेशा उत्साह बढ़ाते। एक दिन बातों ही बातों में मैने अपनी, जासूस बनने की बचपने वाली बेवकूफी भरी इच्छा जताई। वे हंसे। उन्होंने कहा कि यदि इस तरफ रुझान है तो जासूसी संगठन कैसे काम करते हैं, इसकी जानकारी लो। उन्होंने डांटने के बजाए पुस्तक महल प्रकाशन द्वारा जासूसी पर श्रंखला में प्रकाशित पुस्तकों को पढऩे व वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों से दूर रहने की सलाह दी।

शायद वे समझते थे कि उपन्यासों की तिलस्मी दुनिया से निकल कर जब हम गंभीर किस्म की उन पुस्तकों को पढऩे की कोशिश करेंगे तो जासूस बनने का फितूर अपने आप दिमाग से निकल जाएगा। उन्हें क्या पता था कि हम उनकी सलाह को इस हद गंभीरता से लेंगे कि सारी दुनिया की खुफिया एजेंसियों के कामकाज का तरीका, नाम की सार्थकता व कारनामों को तोते की तरह कंठस्थ कर लेंगे। शक्ति मुझ से बहुत ज्यादा समझदार था। जबकि मैं बेहद जुनूनी किस्म का था। एक साल बाद चाचा जी से मुलाकात हुई। मैंने बताया कि उनके द्वारा सुझाई गई किताबों को पढ़ लिया गया है। वे हैरान थे। असल में वे तो हमारी खुराफातों का अपने तौर पर अंत कर चुके थे पर जब मैंने जिद करनी शुरू की कि अब आगे का कदम बताएं तो उन्होंने कहा कि परीक्षा लूंगा। मैं तैयार था। उन्होंने ब्रिटेन की एमआई-5 (मिलिट्री इंटेंलीजेंस) से लेकर इज्रायल की मोसाद, अमेरिका की फैड्रल ब्यूरो आफ इनवेस्टीगेशन (एफबीआई) तक की जानकारियां पूछ डाली। सभी का जवाब टनाटन।

चाचा ने आखरी तीर चलाया व केजीबी की फुल फार्म पूछी। जब मैंने धारा प्रवाह अंदाज में कहा कि गोसुदरसतवेनोई बैजो पास्तोनोस्ती। चाचा ने माथा पकड़ लिया। फिर उन्होंने पूछा कि जनाब आजकल कर क्या रहे हैं? मैने बताया कि टेलरिंग लेबल की एजेंटी। उनकी हंसी छूट गई और वे बोले- चलो कोई बात नहीं, इंटेलीजेंस के एजेंट नहीं बने, कम से कम टेलरिंग लेबल के एजेंट तो बन गए। फिर उन्होंने पूछा कि किस इलाके में बुकिंग के लिए जाते हो तो मैंने बताया कि फिरोजपुर, अमृतसर और गुरदासपुर। वे बुदबुदाए, तीनों जिले बार्डर के! फिर वो कुरेदने लगे, अपना ये ज्ञान बस के सफर के दौरान तो साथ वालों से जरूर बांटते होंगे। मैने बड़ी खुशी से बताया कि साथ बैठे लोग तो कभी मेरा ज्ञान सुन कर हैरान हो जाते हैं। उन्होंने फिर से माथा पकड़ लिया।

ये 1987 की बात है। पंजाब में उन दिनों आतंकवाद अपने चरम पर था व जिन तीन जिलों में मैं जाया करता था वहां तो इसका बहुत ज्यादा प्रभाव था। चाचा को दो टूक घोषणा करनी पड़ी। उन्होंने कहा तुमको मैं बच्चा समझ कर बहला रहा था। दसवीं जमात पास को तो इंटेलीजेंस में चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल सकती। जबकि तुम्हारे इस प्रकार के भौंडे प्रदर्शन से तुम्हारी जान भी जा सकती है। साथ बैठा यात्री कोई आतंकवादी भी हो सकता है, तुम्हें इंटेलीजेंस का आदमी समझ सकता है। फिर वे थोड़ा सोचने के बाद बोले कि तुम ओवर इंटेलीजेंट हो गए हो। जासूस बनने का सपना व वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों को जला दो और किसी तरह पत्रकार बन जाओ क्योंकि इस वर्ग के लोग ओवर इंटेलीजेंट होते हैं। तुम्हारी ज्ञान गंगा को छिपाने व तुम्हें इस माहौल में बचाने का और कोई उपाय मेरे पास नहीं है।

इस तरह मुकेश कुमार से अर्जुन शर्मा व टेलरिंग लेबल एजेंट से पत्रकार की यात्रा शुरू हुई। उसके बाद मैंने अकाली पत्रिका के समाचार संपादक गुरदीप साजन से संपर्क किया। एकाध खबर भी दी पर बात जमी नहीं। इस दौरान मेरे पुराने मालिक आज्ञापाल चड्ढा उर्फ रब्ब उस्ताद, जिनकी बिजली की दुकान पर मैं बतौर इलैक्ट्रीशियन काम किया करता था, उन्होंने कहा कि रविवार को होटल स्काईलार्क में एक फंक्शन है। मिलाप के संपादक श्री यश चीन यात्रा से वापिस आने के बाद अपने संस्मरण सुनाएंगे। प्रोग्राम उन्हीं (रब्ब उस्ताद) ने स्पांसर किया है।

मुझे आने का न्यौता मिला। मेरे दिमाग की घंटियां टनटनाने लगीं। यश जी हिंदी पत्रकारिता के महान स्तंभ थे। मैं प्रोग्राम में समय पर पहुंचा। सारा कार्यक्रम ध्यान से देखा व सुना। प्रोग्राम खत्म हुआ तो लोग खाने पीने पर लपके और मैने यश जी को जा घेरा। प्रणाम किया। पत्रकार बनने की इच्छा जताई। उन्होंने पूछा हिंदी लिख लेते हो। मैने हां कहा। पढ़ाई का पूछा तो मैट्रिक बताया। उन्होंने कहा कल दस बजे के बाद मिलाप के दफ्तर में आना। बस वहीं से सिलसिला शुरू हो गया। उसके बाद का दौर कमोबेश इसी साईट पर दर्ज है।

आपका

अर्जुन शर्मा

‘अर्जुन के तीर’ डॉट कॉम से साभार

Comments on “मेरे करियर का आगाज रिक्शा चलाने से हुआ

  • anurag mishra says:

    arjun ji aap ke jeevan k kuch ansh jo aapne likhe hain padkar……..kya khayal aaya ye mai shayad likh nahi sakta bas itna hi kah sakta hu ki……….sangharsh hi jeevan hai……….waise mujhe aapse ek apnapan isliye bhi laga kyo ki maine bhi milap jalandhar me kaam kiya hai……….shuruaat to nahi kah sakte lekin haa kafi kuch seekha hai waha se……….fark sirf itna hai ki aap yash g k time pe the aur mai vishwakirti yash g k time pe…….

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  • arjun jee patrakarita to seekhchon se paida hui hai. isme junoon hi kam aata hai. koi chahkar patrakaar nahi ban sakta wo to banta chala jata hai. yah ek prawah hai jisme isme bina junoon ke tairna bhi muskil hai or doobna bhi.. aapke is anuj ne bhi 50 rupaye ki dihadi se lakar 300 rupaye mahina tak me kaam kiya hai or wo bhi jub aathwi me padhta tha. umeed karta hoon filhaal etv me hoon or ummeed karta hoon aap ke ashirwad se ek din patrkarita bhi seekh hi jaunga.

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  • mahandra singh rathore says:

    bhai mukesh kumar aab arjun sharma aapka safanama padha aur jana aap gajab ki himmat wale hain. jalandhar se niklne wali mbd ki patrika mai aapka lekh khub chapta raha hai. sobhgya se mere bhi eek-do artical ussme chappe the, tab se jannta hun. shri parmod khurna ji bhi tab aapke bare mai batya tha. aaj bhadas per dekha to jana. agar reply keroge to accha legega.

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  • mahandra singh rathore says:

    bhai arjun sharma ji, sab kuch padha aur jana. accha laga. viprit halato mai jo saflta mile usska koi jawab nahi hota aapne wahi kiya hai. reply karna dost kuch purani batte taza hongi. aajkal kya kar rehe ho naam dekhne mai nahi aa raha.

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  • Arjun Sharma says:

    माफ़ करना दोस्तों जवाब देने में देरी हुई. असल मैं मुझे भी आज यशवंत भाई ने बताया के भड़ास पर मेरा यह पीस छपा है. मैं जालंधर का रहने वाला हूँ. आजकल डेमोक्रेटिक वर्ल्ड में कार्यकारी संपादक हूँ,पंजाब केसरी,जग बाणी, हिंद समाचार, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट,विस्फोट.कॉम, हिन्दू टाइम्स अमेरिका, के लिए कालम लिखता हूँ अपनी वेबसाइट शुरू की है पर उसका एंगिल कमर्शिअल नहीं है www .arjunketeer .com पर मेरे पत्रकारिता से जुड़े अनुभव, ताज़ा लेख, पत्रकारिता के टिप्स वगेरह होंगे. आप भाईओं ने जो भावनाएं प्रकट की हैं उनका आभार

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