सचिन ने आई-नेक्‍स्‍ट, जीवन ने जनवाणी ज्‍वाइन किया

अमर उजाला, मेरठ में रिपोर्टिंग टीम का हिस्‍सा रहे सीनियर सब एडिटर सचिन त्‍यागी ने आई-नेक्‍स्‍ट, मेरठ में बतौर सिटी चीफ प्रमुख संवाददाता ज्‍वाइन किया है। सचिन का प‍त्रकारिता का करियर चार-पांच साल के करीब का है। इस दौरान उन्‍होंने कई संस्‍थान बदले। शुरुआत राष्‍ट्रीय सहारा मेरठ से की, उसके बाद दैनिक जागरण मेरठ, अमर उजाला मेरठ, दैनिक जागरण मेरठ, आई नेक्‍स्‍ट मेरठ, हिन्‍दुस्‍तान मेरठ, राष्‍ट्रीय सहारा गाजियाबाद, दैनिक जागरण मेरठ, अमर उजाला मेरठ में रहे। अब आई नेक्‍स्‍ट का फिर से हिस्‍सा बने हैं।

उधर, डीएलए, मेरठ में जीवन भारद्वाज ने इस्‍तीफा दे दिया है। डीएलए प्रबंधन द्वारा आगरा से भेजे गए सिटी इंचार्ज अजय गहलौत से पटरी नहीं बैठ पाने के कारण उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है। जीवन डीएलए से इस्‍तीफा देने के बाद अपनी नई पारी जनवाणी के साथ मेरठ में शुरू की है।

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Comments on “सचिन ने आई-नेक्‍स्‍ट, जीवन ने जनवाणी ज्‍वाइन किया

  • अगर लायल्टी की बात की जाय तो सचिन त्यागी बिल्कुल भी लायल नही कहे जा सकते,पहले जागरण,फिर उजाला,फिर आईनेक्सट,फिर हिंदुस्तान, फिर पारिवारिक कारणों की वजह से हिंदुसतान से इस्तीफा,फिर जागरण ने सहारा दिया तो उसे छोड़कर उजाला और फिर आईनेक्सट,वाह रे भईया

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  • sachin ke tez hone ke vishay me kuchh nahi kah sakta, lekin unki soch kar ghabrata hu jo na jane kaise anubhav ki andekhi karte hai. kya jo log 10-15 sal se patrkarita me hai, unki barabari koi 5 sal ka noujawn kar sakta hai…..hum sab ko jod-tod se upar bhi uthh ke sochna hoga.

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  • rahul tripathi says:

    बधाई हो डियर, समय के साथ चलने में कोई बुराई नहीं है, आज की पत्रकारिता का जैसे कोई मानदंड नहीं रह गया है, वैसे ही पत्रकारों को भी अपना पैमाना बनाना कोई गलत नहीं है. तुम जहां जहां भी रहे, सभी जानते हैं की तुमने वहाँ अपना १०० फीसद दिया. तुम सबसे अलग तरह के पत्रकार हो इसलिए अखबारों ने तुम्हे हाथों हाथ लिया और आगे भी तुम्हारी येही वेलू रहेगी. इसीको कहते हैं की काबिल बनो, नौकरी तो झक मार के मिलेगी, बस अपनी आग तो ठंडा मत होने देना. तुम नई पत्रकार पीढ़ी के लिए अच्छा उदहारण सेट कर रहे हो इससे बड़ी बात क्या हो सकती है.

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  • rahul tripathi says:

    बधाई हो डियर, समय के साथ चलने में कोई बुराई नहीं है, आज की पत्रकारिता का जैसे कोई मानदंड नहीं रह गया है, वैसे ही पत्रकारों को भी अपना पैमाना बनाना कोई गलत नहीं है. तुम जहां जहां भी रहे, सभी जानते हैं की तुमने वहाँ अपना १०० फीसद दिया. तुम सबसे अलग तरह के पत्रकार हो इसलिए अखबारों ने तुम्हे हाथों हाथ लिया और आगे भी तुम्हारी येही वेलू रहेगी. इसीको कहते हैं की काबिल बनो, नौकरी तो झक मार के मिलेगी, बस अपनी आग तो ठंडा मत होने देना. तुम नई पत्रकार पीढ़ी के लिए अच्छा उदहारण सेट कर रहे हो इससे बड़ी बात क्या हो सकती है.

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