सुधांशु महराज उर्फ छोटे शशि शेखर

: पुराने हिन्दुस्तानी हिंदुस्तान से जाएं तो जाएं कहां : नई दिल्ली। किसी अखबार में बदलाव का सबसे बुरा दौर हिंदुस्तान देख रहा है। यहां के एडीटोरियल विभाग में इस्तीफा देने का दौर लगातार जारी है। शशि शेखर की अमर उजाला नोएडा की लगभग पूरी टीम यहां आ चुकी है। छोटे ओहदे से लेकर बड़े ओहदे तक अमर उजाला के कर्मियों की फौज यहां पर पूरे अस्त्र-शस्त्र के साथ मोर्चा संभाल चुकी है।

हिंदुस्तानियों के साथ सबसे बुरा इसलिए हो रहा है क्योंकि यहां के लोग अमर उजाला की ओर भी रुख नहीं कर सकते। यहां का जब कोई व्यक्ति अमर उजाला में साक्षात्कार के लिए जाता है तो सुधांशु महराज (छोटे शशि शेखर) को वहां बचे-खुचे करीबी लोग तुरंत उसकी खबर आधुनिक उपकरणों (मेल, टेक्सट मैसेज व मोबाइल) के माध्यम से हिन्दुस्तान पहुंचा देते हैं। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हिंदुस्तान का सताया बेचारा पत्रकार उजाला में उजाले की किरण को तरस जा रहा है। अगर पिछला रिकॉर्ड उठाकर देखें तो अमर उजाला से हिन्दुस्तानी बनने की राह पर सैकड़ों गए हैं लेकिन कोई हिन्दुस्तानी, एकाध को छोडक़र, उजाला की चमक बढ़ाने नहीं पहुंचा। ऐसा नहीं है कि हिन्दुस्तानियों की ख्वाहिश यहां आने की नहीं है पर क्या करें जब कोई अपने देश में गुलाम होता है तो वह किसी और देश में भला आजादी की उम्मीद कैसे कर सकता है।

संसार कमीना हुआ तो मीडिया ने उसे उजागर कर दिया। पुलिस वाले ने दारू पी तो मीडिया के कैमरे उसे नेशनल पटल पर लाकर बदनाम करने के लिए पटक देते हैं। किसी और कंपनी में किसी कर्मचारी की नौकरी जाए तो मीडिया उसे ऐसे हाईलाईट करता है जैसे देश भक्ति सिर्फ इन्हीं लोगों ने सीखी है। लेकिन भैया! जब मीडिया वाले कमीनेगिरी पर उतारू हैं, किसी टैलेंटेड बंदे की नौकरी खा लें सिर्फ इसलिए कि वह संपादक का चमचा नहीं है तो इसे क्या कहा जाए। खुद दारू पीकर कहीं लुढक जाएं तो इसके बारे में कौन बताएगा। अपने साथ काम करने वाली लड़कियों को अपनी प्रापर्टी समझें तो इस कुकृत्य को कौन उजागर करेगा। आपको नहीं लगता कि ये नाइंसाफी है। उदाहरण के तौर पर देखें तो शशि शेखर के लेख सामाजिक बुराइयों का ऐसे पर्दाफाश करते हैं जैसे कोई क्रांतिकारी फिर से क्रांति की मसाल लिए दौड़ रहा हो। पर जब बात अपने छुटकऊ कर्मचारियों से बात करने की आती है तो उनका भरोसा सिर्फ सुधांशु जी महराज पर है और सुधांशु जी महराज पूरी दुनिया को अपना बेटा मानते हैं।

सुधांशु के बारे में कहा जाता है कि जब वे किसी को बेटा बोलना शुरू करें तो उस बेटे को समझ लेना चाहिए कि उसकी नौकरी अब अंतिम सांस ले रही है। बीते कुछ महीनों के दौरान सुधांशु जी ने अपने कई बेटों की शहादत हिन्दुस्तान को आजाद कराने के लिए दी है। अब ये बात दूसरी है कि इन शहीदों की खैर-खबर लेने वाला कोई नहीं है। अरे हां एक बात तो रही गई जो कल तक अमर उजाला में पेजिनेटर हुआ करते थे आजकल हिन्दुस्तान में कंटेंट का जिम्मा संभाले हुए हैं।

मैनेजमेंट का एक मशहूर फंडा है जब किसी कंपनी में इनफार्मल ग्रुप जन्म लेता है तो उस संस्थान का वाट लगने में समय नहीं लगता। अरे यार जो है उससे काम चलाओ भला क्यूं किसी की नौकरी खाते हो। कल तक मृणाल जी अपने पहले के हिंदुस्तानी संपादकों के साम्राज्य का संहार कर अपने बंदों को भरने में जुटी हुईं थीं, आज नए आए लोग मृणाल पांडे जी के साम्राज्य का संहार करने में जुटे हैं। लेकिन जानिए बड़े भाई, तुम भी अमर नहीं हो इसलिए जब कोई और तुम्हारी जगह आएगा तो उन बेचारों का क्या होगा जो आपकी सत्ता में आज प्रजा, दरबारी, मंत्री और मुख्यमंत्री हैं।

बात पते की :-

‘घटिया बनना आसान है वो तो हर कोई बन जाता है

बनना है तो अच्छा बनो जिसकी दिव्यता दिखे,

बस शर्त इतनी है चमक लिखावट में नहीं

बल्कि चेहरे पर झलकनी चाहिए’

 

आज की आवाज :-

‘हिन्दुस्तान की कसम, न झुकेगा सिर, ये मेरा इस संस्थान की कसम.’

 

हिंदुस्तानी खबर:-

सचिन शंकर जो कि हिन्दुस्तान के स्पोर्टस पेज पर वरिष्ठ संवाददाता थे, ने इस्तीफा दे दिया है। वे कहां ज्वाइन कर रहे हैं इसका पता नहीं है।

 

मेरा परिचय:-

मैं समय हूं जो रुकता नहीं, तुम्हारे साथ काम नहीं करता इसलिए स्वतंत्र हूं, पर तुम भी मेरे खास हो इसका मुझे एहसास है, फिर भला क्यों अपनों को सताते हो। कोई भी मुझसे मिलना चाहे तो अपने में झांककर देखे मैं उसकी आवाज हूं।

फिलहाल इतना ही.

लेकिन खबरें हैं ढेर सारी. आएंगे करके तैयारी. तब तक के लिए गुडबाय. बिलकुल न करिएगा हाय-हाय.

 


हिंदुस्तान, दिल्ली में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार के मेल पर आधारित. उन्होंने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है. इसलिए इसे बेनामी प्रकाशित किया जा रहा है.

 

Comments on “सुधांशु महराज उर्फ छोटे शशि शेखर

  • अमित गर्ग. जयपुर. राजस्थान says:

    क्या दिन आ गए हैं पत्रकारों के.अब वरिष्ठ पत्रकारों को भी बेनाम लिखना पड़ रहा है. अरे अपने दर्द को इतना भी कमजोर मत बनाओ की गुमनामी में कहीं गुम हो जाए.

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  • ek sanwaddata says:

    ye kewal hindustan aur amar ujala ki hi baat nahi he. ye to sabhi sansthano me ho raha he.. damado ko talash kar ke bulaya ja raha he…aur beto ko bahar ka rasta dikhya ja raha he…upar pahuncne ke baad neeche chalne wale kide makode nazar aate he..

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