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हमबिस्तर होना करियर की नई शर्त!

वर्तमान पत्रकारिता कहां खड़ी है : जब टावर पर बैठने वाले लोग भी नियतिहीन कोने के बारे में बात करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि इस नियतिहीन कोने की गूंज काफी ऊपर तक सुनाई दे रही है। वैसे सुनाई तो पहले से दे रही थी और लोग तिलमिला कर इसकी अनदेखी भी कर रहे थे। लेकिन अब इनके सब्र का बांध टूटता जा रहा है। यह कहना बेहतर होगा कि इनकी चेतना इनका साथ छोड़ रही है और अचेतन के वशीभूत होकर ये  इस नई दुनिया को नकारने पर तुल गये हैं। अभी कुछ देर पहले अखिलेश अखिलेश जी से बात हो रही थी। पत्रकारिता में व्याप्त सेक्सबाजी पर वह इन दिनों अपने ब्लाग पर विस्तार से लिख रहे हैं। इसमें वह खुलेआम लिख रहे हैं कि पत्रकारिता में सक्रिय रंडीबाज पत्रकारों और संपादकों का गिरोह किस कदर पत्रकारिता को रसातल में ले जा रहा है। एक बेबाक बहस की शरुआत तो उन्होंने कर ही दी है। क्या इस तरह की बहस पुरातन मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रानिक) में कभी संभव है, जबकि इन जगहों पर यह सब कुछ धड़ल्ले से चल रहा है?

वर्तमान पत्रकारिता कहां खड़ी है : जब टावर पर बैठने वाले लोग भी नियतिहीन कोने के बारे में बात करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि इस नियतिहीन कोने की गूंज काफी ऊपर तक सुनाई दे रही है। वैसे सुनाई तो पहले से दे रही थी और लोग तिलमिला कर इसकी अनदेखी भी कर रहे थे। लेकिन अब इनके सब्र का बांध टूटता जा रहा है। यह कहना बेहतर होगा कि इनकी चेतना इनका साथ छोड़ रही है और अचेतन के वशीभूत होकर ये  इस नई दुनिया को नकारने पर तुल गये हैं। अभी कुछ देर पहले अखिलेश अखिलेश जी से बात हो रही थी। पत्रकारिता में व्याप्त सेक्सबाजी पर वह इन दिनों अपने ब्लाग पर विस्तार से लिख रहे हैं। इसमें वह खुलेआम लिख रहे हैं कि पत्रकारिता में सक्रिय रंडीबाज पत्रकारों और संपादकों का गिरोह किस कदर पत्रकारिता को रसातल में ले जा रहा है। एक बेबाक बहस की शरुआत तो उन्होंने कर ही दी है। क्या इस तरह की बहस पुरातन मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रानिक) में कभी संभव है, जबकि इन जगहों पर यह सब कुछ धड़ल्ले से चल रहा है?

अखिलेश जी की भाषा में आक्रामकता है, लेकिन कंटेंट की सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है। पहले अखबार और टीवी पर दिखाई जाने वाली खबर ही खबर होती थी, न्यू मीडिया खबरों के पीछे के खेल का खुलासा कर रहा है। सूचना क्रांति को सही मायने में दूर-दूर तक फैला रहा है। न्यू मीडिया ने सूचना पर गिरोहबाजी के युग का अंत कर दिया है। यही कारण है कि गिरोहबाजी को प्रश्रय देने वाले लोग अब आक्रामक मुद्रा में आते जा रहे हैं। न्यू मीडिया ने क्रिया और प्रतिक्रिया के समानांतर युग की शुरुआत कर दी है। इधर आपने पोस्ट किया उधर सहमति और अहसमति के कमेंट्स आपके पोस्ट पर पटकने शुरु हो गये। क्या पुरातन मीडिया में यह संभव है? अखबारों में पाठकों के पत्र परोसने का रिवाज रहा है। यदि आप पत्र लिखते हैं तो वह अखबारों में कब प्रकाशित होगा, पता नहीं। प्रकाशित होगा भी या नहीं, यह भी पता नहीं। न्यू मीडिया प्रतिक्रिया के ताबड़तोड़ युग का प्रतिनिधित्व कर रहा है। अमिताभ बच्चन, राम गोपाल वर्मा, आमिर खान जैसे लोग भी इस न्यू मीडिया के महत्व को अच्छी तरह से समझ रहे हैं और अपने–अपने ब्लाग के माध्यमों से अपने प्रशंसकों के साथ डायरेक्ट कम्युनिकेशन कर रहे हैं और फीडबैक प्राप्त कर रहे हैं। नया जेनरेशन तेजी से उछाल मार रहा है और इस न्यू मीडिया से जुड़ता जा रहा है। इसकी अनदेखी करना अपने आप को रसातल में फेंकने वाली बात है। न्यू मीडिया फ्रीडम टू स्पीक को सही मायने में मूर्तरूप प्रदान कर रहा है।    

जेपी मूवमेंट के समय बहुत बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे नौजवानों ने इसमें भागीदारी की थी। मूवमेंट के बाद बेरोजगारी से जूझते हुये कुछ बहुत बड़ी संख्या में लोग पत्रकारिता की राह पकड़ते चले गये। ये लोग बदलाव और नैतिकता की भावना से ओतप्रोत थे। पत्रकारिता ने इसी चीज को बढ़ावा दिया। इसके बाद पत्रकारिता के रंग बदलते गये। नई पीढ़ी के लोगों ने उन लोगों की पत्रकारिता पर सवालिया निशान लगाना शुरु किया। पत्रकारिता के नये प्रतिमान गढ़े जाने लगे। इसे नई तकनीक से लैस किया गया। इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद पत्रकारिता के फलक में विस्तार हुया। इसकी मारक क्षमता बढ़ी साथ ही इममें काम करने वाले लोगों के हावभाव भी पुरातन प्रिंट पत्रकारिता से अलग होते गये। उदारीकरण के पहले फेज का असर भी इस पर दिखा। पत्रकारिता की संस्कृति बदली, चाल ढाल बदले। तमाम तरह के मीडिया घराने धन कमाने की मशीन में तब्दील हुये। इसकी डगर पर बढ़ते हुये लोग संसद तक में पहुंचने लगे। इसमें काम करने वाले लोगों की मनोवृति भी बदली। पत्रकारिता से दूर-दूर तक सरोकार नहीं रखने वाले लोग भी धन और प्रतिष्ठा की लालसा में इसमें पूंजी झोंकने लगे। पत्रकारिता की पढ़ाई के नाम पर तमाम तरह के प्रतिष्ठान खुलने लगे और इसमें से निकलने वाले किस्म किस्म के पौध की भीड़ती बढ़ती गई। महत्वकांक्षा के वशीभूत होकर ऊंची छलांग लगाने वाली लड़कियां बहुत ही सहजता से मठाधीशों की गोदों में अटखेलियां करने लगी। विकासवादी नजरिये से देखा जाये तो इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। सबकुछ क्रमश होता गया, सहजता के साथ।

लेकिन पिछले एक दशक में पत्रकारिता के बदलते हुये रूप ने अखिलेश अखिल जैसे पत्रकारों को निसंदेह अंदर से आंदोलित किया है। इसी का नतीजा है कि वह न्यू मीडिया पर मुखर हुये हैं। जिस जुबान में उनकी कलम चल रही है, वह समय की मांग है। अपनी बात को बेबाकी से कहने का अवसर उन्हें न्यू मीडिया ने ही दिया है। बड़ी सहजता से इस नये तकनीक का इस्तेमाल करते हुय वह पत्रकारिता में व्याप्त एक अनछुये गंदगी को कुरेद रहे हैं, हालांकि इसकी संड़ाध लंबे समय से जमीनी पत्रकार महसूस कर रहे हैं। उनकी इस रपट पर कई प्रतिक्रियाएं भी आई हैं जिसमें लोग यह भी कह रहे हैं कि परस्पर हम बिस्तर होना दो व्यक्तियों की आपसी रजामंदी का मामला है। कुछ लोग सेक्स रिव्योल्यूशन की बात कर रहे हैं और इस मामले में अखिलेश अखिल को सलाह दे रहे हैं कि वह भी उदार हो जाये। निसंदेह उदारीकरण का यह चेहरा अब कामन हो गया है। महानगरीय पत्रकारिता में संस्थानों के अंदर इसे सहजता से लिया जा रहा है। यह पत्रकारिता के बदले हुये मानदंड को दर्शाता है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या कोई पिता अपनी पुत्री को पत्रकारिता में जाने के लिए इस मानदंड से गुजरने को कहेगा?? यदि नहीं तो पत्रकारिता के इस बदले हुये मानदंड में कहीं न कहीं कोई खोट जरूर है।

पत्रकारिता को मिशन के बजाय अब कैरियर के रूप देखा जा रहा है। और हमबिस्तर होना कैरियर बनाने की शर्त बन सी गई है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने के दौरान मैंने एक वरिष्ठ महिलाकर्मी को एक कनिष्ठ महिलाकर्मी को समझाते हुये सुना था, चिंता मत करो, अभी नई नई आई हो, बहुत जल्दी चंठ हो जाओगी। अब पत्रकारिता बाजार की भाषा की बोलने लगी है, इसका चरित्र भी सामान्यतौर पर बाजारू हो गया है। पत्रकारिता में लंबे समय से एडि़या घसने वाली महिला पत्रकार भी इस परिवर्तन को लेकर आक्रोशित हैं। उन्हें भी इस बात का अहसास है कि अब पत्रकारिता शरीर के रास्ते से होकर गुजर रहा है। वे कसमाशा रहीं है, और मौका मिलने पर इसे लेकर मुखर भी होने की कोशिश कर रही हैं। प्रतिक्रियाओं के जवाब में अखिलेश अखिल महिला पत्रकारों की इस विवशता को भी कुरेद कर सामने ला रहे हैं।

स्टिंग आपरेशन में नेताओं और फिल्म से जुड़ी हस्तियों को कई बार निशाना बनाकर बड़ी खबर के रूप प्रस्तुत किया गया। यदि अखिलेश अखिल के खिलाफ उठने वाले विरोधी तर्कों पर गौर करे तो ये नेता और फिल्मी हस्तियां भी कहीं ना कही आपसी रजामंदी से ही महिलाओं को बिस्तर तक ले जा रहे हैं। फिर इनपर खबर क्यों बनाया जा रहा है ? सीधी सी बात है कि ये लोग सार्वजनिक पर्सनाल्टी हैं। और सार्वजनिक पर्सनाल्टी से एक गरिमा की उम्मीद की जाती है। इसी तरह  पत्रकारिता भी पत्रकारों से सार्वजिनक चरित्र की मांग करती है। पत्रकारिता से जुड़ा प्रत्येक पद अपने आप में गंभीर होता है, और यह गंभीर उत्तरदायित्व का मांग करता है। अखिलेश अखिल अपनी रपट में इसी उत्तरदायित्व की भावना पर जोड़ देते हैं। कैरियर मेकिंग के इस दौर में उनकी रपट को सहजता से नकारा जा सकता है, लेकिन पूरी ईमानदारी से वह पत्रकार बिरादरी को आइना दिखा रहे हैं। आप खुद की छवि इसमें आलोक नंदनदेखकर तय कर सकते हैं आपके कदम किस ओर बढ़ रहे हैं, और वर्तमान पत्रकारिता कहां खड़ी है? वैसे इतना तो स्पष्ट हो चुका है कि न्यू मीडिया ने सरोकारों की पत्रकारिता करने वाले अखिलेश अखिल जैसे तमाम पत्रकारों के स्वर को फिजा में फैला रही है, टावर पर बैठकर इस नीयतिहीन कोने के बारे चाहे जो कुछ कहा जाये, इसके लौ के लपेटे की आंच से कुछ भी नहीं बच पाएगा।

लेखक आलोक नंदन तेवरदार पत्रकार हैं. इन दिनों मुंबई में फिल्मों से जुड़े हुए हैं. आलोक से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. s. p. verma

    January 29, 2010 at 7:34 am

    dddddddddddddddddddddddddddddddddddddddddd

  2. kushwaha

    January 29, 2010 at 8:29 am

    I am so happy that your view have seen
    Thanking you

  3. sapan yagyawalkya

    January 29, 2010 at 8:47 am

    sachai isliye nahin jhuthi jani chahiye ki vah kadwi hai. atmavlokan ke kram me ish vishay par khule samvad me akhir burai kya hai.Sapan yagyawalkya/bareli/mp

  4. jaishanker suman

    January 29, 2010 at 11:05 am

    पत्रकारिता में सक्रिय रंडीबाज पत्रकारों और संपादकों का गिरोह किस कदर पत्रकारिता को रसातल में ले जा रहा है। एक बेबाक बहस की शरुआत तो कर दी है। क्या इस तरह की बहस पुरातन मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रानिक) में कभी संभव है, जबकि इन जगहों पर यह सब कुछ धड़ल्ले से चल रहा है? फ़िलहाल नया जेनरेशन तेजी से मिडिया में उछाल मार रहा है और मीडिया से जुड़ता जा रहा है। महत्वकांक्षा के वशीभूत होकर ऊंची छलांग लगाने वाली लड़कियां बहुत ही सहजता से मठाधीशों की गोदों में अटखेलियां करने लगी। इसके लिए जिम्मेदादर किसको ठहराना चाहिए यह बहस का मुद्दा होना चाहिए न की किसी के ऊपर आरोप लगा कर , आरोप लगाना सहज है परन्तु उस पर अमल करना मुश्किल है, कुल मिला कर देखा जाये तो इन सब के लिए जिम्मेदार गलत करने वाले जितना है उतनी ही गलती करने वाली भी है , क्योकि जब तक लड़की तैयार नहीं होगी तब तक मठाधीश उनके साथ हमबिस्तर कैसे होंगे, जब अच्छे पत्रकारों को वेरोजगार कर उनके जगह लेगी तो कीमत तो उन्हें चुकाना ही पड़ेगा , कबिकियत के दम पर नौकरी करने वाली लडकिया क्यों इनके गोद में बैठेगी, इनकी वजह से कही न कही इससे अच्छे लोग सफ़र करते है

  5. jhattan singh

    January 29, 2010 at 9:58 am

    bhai sahab kya khoob likha hai aapne, lekin kya Aap in sabhi chijo se door reh sakte hai kya..

    jhattan singh..

  6. RAMANUJ SINGH

    January 29, 2010 at 10:27 am

    alok jee,
    aap ke lekh ko padhne ke bad mujhe koi ashachariy nihi hua…..kiyon main in ghatnaon ko roj dekh raha hoon…. karib karib har media houses me is tarh ki ghatna hoti rahati hai……..tarkki pane ke liye hath kande aapnye jate hain….

  7. manish kr

    January 29, 2010 at 10:32 am

    very true, This is real fact today’s. some alleged media people are doing this tipe of work for self promot.

  8. Ankit Raghav

    January 29, 2010 at 11:13 am

    i can’t believe everything is fake u r lieng

  9. shani singh

    January 29, 2010 at 11:26 am

    yeh sahi hai

  10. deepankar jain

    January 29, 2010 at 12:11 pm

    this is ture esmai sabse jayada nuksan strugling jornalist ka hai jo mahnath ke sath work karta hai but koi bhi success nahi milti mai bhi two year se ,ek channel mai work kar raha hu or chahata hu ke es kahaber ko or jayada deep se likha or esmai ghatit logo ke verjan dale thank u

  11. vineet kumar

    January 29, 2010 at 8:23 pm

    कभी सटीक निशाना लगाकर अर्जुन, ने मछली की आँख पर मार द्रोपती को स्वयम्बर में जीत लिया था। महाभारत के उस युग में गुरुकूल में केवल छत्रिय और ब्राहमण के बच्चे ही उच्च शिक्षा ग्रहण करते थे । टीवी पर यह धारावाहिक देख में बड़ा हुआ। मैंने सपने में भी कभी नहीं सोचा था की वही धारावाहिक के पात्र मेरी पत्रकारिता जीवन में भी मुझे दिखाई पड़ेगे । इसलिए शायद मुझे अन्न्न्यास वही ज़माना याद आ रहा है ।
    आलोक सर, के गाइडेंस में मैंने अपनी पत्रकारिता की शुरूआत की थी। लम्बे समय के बाद आपकी, विष्णु और विकास सर की याद ताज़ा हो गई ।बात तो, सौ टके सही है सर।

  12. vijay shankar

    January 29, 2010 at 1:47 pm

    AKHILES BHAYEE,
    main Aapko 25 Sal Pahale Ki Patrakarita Ki Duniya Me le jana Chahta hue, Tab Bhi halat esase Khuchh Milate Julate The Aur Sampakad Aur Unake Ird-Gird Rahane Wale Karibi Patrakar Bhi Bahati Nadi Me hath Dhote The. Magar Us samay Sart Naukari Aur Promotion Nahi Hota Tha balki Aiyashi Hoti thi. Badale Jamane Aur Akhabari Patan Ka Yah Bhi Hissa Ban Chuka hai. Bhale aur Sulajhe Tatha samajikSarokar Rakhane Wale Patrakar Mane Ya na ManeK Virodh Chahe Jitana Ho yah Asthapit Hokar Rahega aur Achachhe Patrakar Harkar Is Peshe Se Tauba Karne Lagenge. Bas Dekhate Jayiye . Main Bihar Se Huen Aur yah mamala bhi Bihar ka hai.
    Bus Nam-Pata NA CHHAPE TO ITIHAS BHI KHOL SAKTA HUN.

  13. rajivji

    January 29, 2010 at 2:00 pm

    ye sach hai lakin ye bhi sach hai taali ek haanth se nahi bajti…

  14. purushottam kumar singh

    January 29, 2010 at 2:13 pm

    six year main three regnal chhanel main kaam karne ke daurn maujhe bhi randibaaj senoir se paala para hai .mudda sahi hai aapko jaan kar aaschariya nahi hoga ki taraki ke liye ladkion ko aapna sikar banane wale aise logon ke liye head office main to sikar mil hi jata hai lekin is tarah ke log jaab noida se bahar chote jaghon par jaaten hain to mood fresher ki mang apne se junior logo se bekhoof ho kar karte hai tab junior ki halat dekhne layak hoti hai.ek waqya hai bihar ke gaya ki noida se air hone wale ek chhanel ke head wanha award lene gaye hue the, wanha ke bureo chief ne apne level se badhkar khatirdari ki ,umda srab ,3star hotel main room ,khana.main sanyog se wanha gaya hua tha sab log chhanel head ke khatirdari main lage the.achank hotel ke room se wanha ka cameraman bahar nikala to uska mood kharab tha .paas ke hi ek dukan par hum log sutta marne khade ho gaye. cameraman ne baatya ki sahab moodfresher mang rahe hain.is baat ko leker dono ke bich kaha suni bhi ho gai.aur is ka aanjam do sal baad camerman ko apni naukri dekar bhugatna pada.halaki aaj wo chhanel head nahi raha .log aaj bhi noida main mother dairya ke smane jab chai pene khade hoten hain to uske randibaaaji ke kisse dusron ko sunaten hai.naukri ke liye try kar rahe ladkon ko kaha jata hai ki bagal main M naam ke hospital main ja kar side main ek banba lo to naukri aaram se milyegi. patrakarita main randibaji utna hi sach hai jitna sach mirtu hai. main to kah ta hun in randibajon ko jute ki maala pehna kar sansthan ke samne khada karna chahiye kiun ki aise logon ki pehchan chupi nahi hai saab log jaante hain.

  15. zahid Hasan

    January 29, 2010 at 2:34 pm

    Your Bhadas about this matter is the best Uplabdhi For media.
    Thankyou…………….

  16. amitvirat

    January 29, 2010 at 2:34 pm

    where friction there attraction
    ye koi nai baat nahin hai farzi ki bahes karne se behter hai kuchh achhi bahes ki jae

  17. zahid Hasan

    January 29, 2010 at 2:37 pm

    Aap ne jo is bat ka khulasa kiya hai Is bat se sari duniya khush hai.
    Thank you……..

  18. sonu sharma

    January 29, 2010 at 2:45 pm

    aise hi 1 mahashey noida k ek channel me b hai?????jinke malik saab muslim hai??

  19. aamir

    January 29, 2010 at 5:39 pm

    keval media house ko kosne se kaam nahi chalega …..ye ghradit karya har us organization ka hai jahan naukari bistar se badi ho jaati hai …jaha famous hone ke liye kisi bhi had tak guzarne ki chahat hoti hai ….jab reality show ki trp bhadhaane ke liye ladkiyan ladkon ke baathroom me ghus sakti hai aur ise ham bade chaao se dekhte hai iska virodh nahi karte …to janab isme koi badi baat nahi……

  20. praween kumar

    January 29, 2010 at 5:58 pm

    पत्रकारिता में सक्रिय रंडीबाज पत्रकारों और संपादकों का गिरोह किस कदर पत्रकारिता को रसातल में ले जा रहा है। एक बेबाक बहस की शरुआत तो कर दी है। क्या इस तरह की बहस पुरातन मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रानिक) में कभी संभव है, जबकि इन जगहों पर यह सब कुछ धड़ल्ले से चल रहा है? फ़िलहाल नया जेनरेशन तेजी से मिडिया में उछाल मार रहा है और मीडिया से जुड़ता जा रहा है। महत्वकांक्षा के वशीभूत होकर ऊंची छलांग लगाने वाली लड़कियां बहुत ही सहजता से मठाधीशों की गोदों में अटखेलियां करने लगी। इसके लिए जिम्मेदादर किसको ठहराना चाहिए यह बहस का मुद्दा होना चाहिए न की किसी के ऊपर आरोप लगा कर , आरोप लगाना सहज है परन्तु उस पर अमल करना मुश्किल है, कुल मिला कर देखा जाये तो इन सब के लिए जिम्मेदार गलत करने वाले जितना है उतनी ही गलती करने वाली भी है , क्योकि जब तक लड़की तैयार नहीं होगी तब तक मठाधीश उनके साथ हमबिस्तर कैसे होंगे, जब अच्छे पत्रकारों को वेरोजगार कर उनके जगह लेगी तो कीमत तो उन्हें चुकाना ही पड़ेगा , कबिकियत के दम पर नौकरी करने वाली लडकिया क्यों इनके गोद में बैठेगी, इनकी वजह से कही न कही इससे अच्छे लोग सफ़र करते है es baat se ham bhi sahmat hai………… praween aligarh

  21. think

    January 30, 2010 at 3:57 am

    yah parda ka pich hota hai ladkiya bhi samjhota karti hai upar jana ka liya mara paas aisa bahit udharan hai

  22. manish

    January 30, 2010 at 4:40 am

    it’s true, This is real fact today’s. some alleged media people (frsher media student) are doing this tipe of work for self promot.

  23. Shishir Kumar Das

    January 30, 2010 at 6:04 am

    Dear Alok Sir,
    Beaing a student of journalism, i would like to congrat’s you for such articla.It’s really a horible picture in Media specially in ‘Electronic Media’ now a day. Media forum should take action regarding these short of thing’s!!
    Regards
    —————
    Shishir Kumar Das
    Kushabhau Thakre University Of Journalism & Mass-Communication Raipur, Chhattisgarh.

  24. Shishir Kumar Das

    January 30, 2010 at 6:30 am

    Dear Alok Sir,
    Beaing a student of Journalism, first of all i would like to congrat’s you for publishing such real picture of Media, specially in ‘Electronic Media’.It’s happening now a day.I think due to some blacksheep people in media it’s happening.I do believe Media houses should take action on these worst people.
    Regards
    —————
    Shishir Kumar Das
    M S.c [Electronic Media]
    Kushabhau Thakre University Of Journalism & Mass-Communication Raipur, Chhattisgarh!!

  25. devesh singh

    January 30, 2010 at 3:05 pm

    dear alok ji, aapne jo kush bhe likha hai koi aur nahi likh sakta hahi, jabki sabhi jante hai.

  26. kalamwala-gunda

    February 4, 2010 at 11:16 am

    thanks…………. achhhhhhha likhte ho…………. lage raho sayad ye begert huye patrkar thoda jag jaye……………..

  27. Ajay Kumar Singh

    February 5, 2010 at 10:27 am

    Wonderful artical. keep it up. At least there was some guys in media who was having this kind of Daring and if some people will start this kind of initiative then definately we will see few changes in this.

  28. kamal.kashyap

    February 13, 2010 at 1:21 pm

    sir ji aap ko muoka nahi mila hai aisa lagta hai

  29. RAKESH PANDEY

    May 10, 2010 at 6:27 pm

    YEH KALIYUG HAY BACHCHEY YANH TO YEH HONAA HEE HAI. KEVAL SAMAS SEYA BATNEY SEY KAAM NAHEE CHALEY BAALAA. ISKAA HAL BHEE BATANAA HOTAA HAY.——————————————————A—ISKEE JAD [ROOT] KAHAN HAY——–[B]——IS LEKH MEY LADKEE KAA ANGLEE KAHAN HAY——————[C]–TUMNEY APNEY BASS [EDITOR] KO ROKAA KYNO NAHI—-OR NOKARY CHOD DEE HOGI————————-[D]—BILLY KEY GALEY MEY GANTEE KON BANDEY GA——–[E]—-NEXT LEKH JAB LIKHNAA TAB EK HEE LEH KO DIFFENT ANGLEE SEY LIKHNAA. —–IS KO OR ACHHA KER KEY LIKHO—— NAM LIKHO——-DERNA KYAA——–AB US SAMPADAK KEE NOKARY .THODEY HEE KER REHEY HO. PANDEY

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