संजय डाल-डाल तो डीबी कार्प पात-पात

प्रेस कांफ्रेंसकारपोरेट घरानों का झगड़ा कितना भीषण होता है, किस तरह एक-दूसरे की मुखबिरी की और कराई जाती है, किस तरह एक दूसरे को पछाड़ने-निपटाने के लिए साम-दंड-भेद हर तरीकों का इस्तेमाल प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है, यह अनिल अंबानी और मुकेश अंबानी नामक दो सगे भाइयों के झगड़े से हमको-सबको पता हो चला है. भास्कर वालों के झगड़े में भी यह सब देखने को मिल रहा है. संजय अग्रवाल चाहते थे कि वे दिल्ली में जब प्रेस कांफ्रेंस करें तो उस जगह का पता डीबी कार्प के लोगों को न चल सके ताकि वे क्या खुलासा करने जा रहे हैं, इसकी जानकारी भास्कर वालों को प्रेस कांफ्रेंस होने तक न मिल सके.

उन्होंने पीसी के लिए दो जगह बुक कराया फिर कैंसल किया. उन्होंने आज होने वाली प्रेस कांफ्रेंस के लिए कल के दिन पहले प्रेस क्लब बुक कराया. उसे कैंसल करा दिया. फिर आईएनएस में पीसी करना तय किया. उसे भी कैंसल किया. आखिरकार सबसे सेफ जगह मान कर दिल्ली के एक होटल क्लेरीजेज में प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया. बहुत शार्ट नोटिस पर मीडियाकर्मी बुलाए गए. कल आधी रात से दिल्ली के अखबारों-चैनलों के ब्यूरो चीफों के नंबर तलाशे जाने लगे. आज सुबह सभी तक न्योता पहुंचा.

संजय अग्रवाल के खास सहयोगी शैलेंद्र सक्सेना, जो कभी दैनिक भास्कर, नोएडा में काम करते थे, ने दिल्ली के चुनिंदा मीडियाकर्मियों को फोन कर प्रेस कांफ्रेंस में आने का न्योता दिया. शैलेंद्र ने किसी को भी यह नहीं बताया कि मैटर क्या है. सिर्फ इतना कहा कि एक अखबारी घराने के विवाद से जुड़ा कुछ मसला डिस्कस-डिस्क्लोज किया जाएगा. पर होटल क्लेरीजेज में तय समय पर अन्य मीडियाकर्मियों के साथ दैनिक भास्कर, दिल्ली के नेशनल ब्यूरो में कार्यरत एक महिला पत्रकार पहुंच गईं.

संजय अग्रवाल की प्रेस कांफ्रेंस
संजय अग्रवाल की प्रेस कांफ्रेंस

संजय कहते हैं कि पहले तो मैं इस महिला पत्रकार को देखकर चौंका. फिर सोचा, संभव है, भास्कर छोड़कर किसी अन्य संस्थान में काम कर रहीं हों. लेकिन बाद में पता चला कि डीबी कार्प वालों को पीसी की भनक लग गई थी और अपने ब्यूरो की रिपोर्टर को पीसी में पहुंचने के लिए कह दिया ताकि वहां क्या कुछ बातें हो रही हैं, इसका पता चल सके. पीसी में करीब दर्जन भर पत्रकार-फोटोग्राफर दिखे. पीसी के बाद लंच की भी व्यवस्था थी. भास्कर समूह के झगड़े पर काफी देर तक पीसी में संजय बोलते रहे. रिपोर्टरों के सवालों, शंकाओं को दूर करते रहे.

निजी बातचीत में संजय के चेहरे पर बेचैनी साफ देखी-पढ़ी जा सकती है. वे तनाव में रहते हैं. उन्हें खानदानी झगड़े में कई तरह के डर भी सता रहे हैं. हमले और हिंसा का भी उन्हें डर है. वे ऐसी जगहों पर रुकते-रहते हैं जो लगभग अज्ञात होती हैं. धमकियों भरे कई फोन काल्स आते रहने की बात वे पहले भी स्वीकार कर चुके हैं. मतलब, यह खानदानी जंग पूरी तसल्ली और हर दांव-पेंच के साथ लड़ी जा रही है.

भास्कर परिवार के विवाद की कहानी काफी लंबी और उलझाव वाली है. पर इतना तो समझ में सभी को आ रहा था कि डीबी कार्प के लोग दैनिक भास्कर टाइटिल के जरिए काफी आगे बढ़ गए, सफल हो गए और डीबी स्टार, डीएनए, दिव्य स्टार जैसे अखबार भी निकालने में सक्षम हो गए. लेकिन इस टाइटिल के अन्य को-आनर अपने-अपने इलाकों में कुछ खास नहीं कर पाए. बावजूद इसके, रमेश चंद्र अग्रवाल अपनी सफलता के अभियान में अपने परिवार के अन्य लोगों को शरीक नहीं कर रहे हैं, उनसे सहमति नहीं ले रहे हैं, उन्हें मिलाकर नहीं चल रहे हैं तो ऐसे में दैनिक भास्कर टाइटिल के अन्य मालिकों को बुरा लगना लाजिमी है.

प्रेस कांफ्रेंस के बाद लंच टाइम
प्रेस कांफ्रेंस के बाद लंच टाइम

कहा जाता है कि रमेश चंद्र अग्रवाल ने अपनी सफलता के लिए कोई तरीका नहीं छोड़ा. खुद की कंपनी को आगे ले जाने के लिए परिवार के लोगों का स्ट्रेटजिक इस्तेमाल किया. जरूरत पड़ने पर सबको पुचकारा और साथ में मिलाया. अकेले पूरा लाभ लेने के लिए कभी सबको दुत्कारा और सबकी भावनाओं की अनदेखी की. पर इतना तो सभी मानते हैं कि रमेश चंद्र अग्रवाल और उनके पुत्रों ने जो तेजी दिखाई, जो प्रतिभा विकसित की, जो समझ और विजन डेवलप किया, उसके कारण ये लोग आगे बढ़ते गए. पर परिवार का यह विवाद इनकी सफलता पर किसी दाग-घाव की तरह है जो रह-रह कर रिसता रहता है.

यह रिसाव इन सभी को एहसास कराता रहता है कि आदमी चाहे जितना बड़ा हो जाए, उसके पीछे कुछ चीजें ऐसी बची-लगी होती हैं जिसे अगर वे सुलझा नहीं पाए, ठीक नहीं कर पाए, काबू नहीं कर पाए, सुलह नहीं कर पाए तो उनकी सफलता की गाथा के समानांतर, साथ-साथ अपयश की एक

पीसी में शैलेंद्र सक्सेना और संजय अग्रवाल
पीसी में शैलेंद्र सक्सेना और संजय अग्रवाल
महागाथा तैयार होती रहती है. यही झगड़ा हर जगह है. पैसा का झगड़ा. हिस्से का झगड़ा. इलाके का झगड़ा. मालिकाना हक का झगड़ा. जागरण वालों का मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ को लेकर जो आपसी विवाद है, वह भी जगजाहिर है. कोर्ट और कलह, लगातार चलते रहते हैं. अमर उजाला के मालिकों का झगड़ा तो बिलकुल ताजा-ताजा है.

आर्थिक रूप से बड़े घरों में ये झगड़े नए नहीं हैं. मध्य काल में राजे-रजवाड़े शासन-सत्ता के लिए मां-बाप-बहिन तक को मार दिया करते थे. कुर्सी, ताज, सोना, रुपया के चक्कर में जाने कितने घर तबाह-बर्बाद हुए. फिर भी कोई सबक लेने को तैयार नहीं है. शायद मानव की यही नियति है. ज्यादा से ज्यादा पा लेने, ज्यादा से ज्यादा कब्जा लेने की जो चिर-आदिमानवी गंध हम सबके नथुनों में समाई है, वह उत्तेजित करती रहती है दूसरों को दबाकर आगे बढ़ जाने के लिए.

मानवीयता, भावनाओं, संवेदनाओं को ताक पर रखकर सिस्टम के शीर्ष पर पहुंचने की मानसिकता, कारोबार में सबसे आगे बने रहने की जिद, ज्यादा से ज्यादा इलाको पर अपना झंडा लहरा देने की ललक का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव सभ्यता का इतिहास. इसके फायदे हैं तो ढेर सारे नुकसान भी. फायदे ये कि इसी मानसिकता ने मानव सभ्यता का अदभुत विकास किया. नुकसान यह कि इसी मानसिकता ने प्रकृति को तबाह किया, मानवीयता का नाश किया और कई बार तो मानवों के बड़े समूहों का संहार किया कराया.

इतने नुकसान के बाद भी हम नहीं चेत रहे तो जाहिर है, यह आदिम नशा है, यह बेसिक इंस्टिक्ट है, मानव नामक जानवर के नथुनों में जन्मना समाई गंध है जो भाषणों से नहीं जाती, उपदेशों से खत्म नहीं होती, श्राप-आशीर्वाद से दूर नहीं होती. यह दूर होती है तो मरने-मारने के बाद ही, लेकिन जिंदा रह गए लोग इसे आगे बढ़ाने के लिए तत्पर रहते हैं, तैयार रहते हैं, उत्सुक दिखते हैं. बात करने से बात बनती है, यह सच है लेकिन कई बार बात करते-करते बात बिगड़ भी जाती है. मिलबैठ कर मामला न सुलझे तो उसे उलझना ही पड़ता है.

लगता है, भास्कर वालों ने अपना झगड़ा काफी उलझा लिया है. पर इस झगड़े में फंसे हैं हजारों मानव. जो इन लोगों के यहां नौकरी-चाकरी करते हैं. इनके झगड़े से इनके यहां काम करने वाले हजारों मानवों के मन में भी डर समाता-उतराता रहता है. इस बार भी सब चिंतित हैं, खासकर रांची में भर्ती किए गए लोग. देखते हैं, इस विवाद का हल क्या निकलता है, फिलहाल तो हम लोग यही कहेंगे कि मिल-बैठ कर निपटिए-निपटाइए. ना निपटे तो फिर कोई क्या करे, ऐसे में जंग में ही रास्ता है.

महाभारत में भी जंग से ही हल निकला. तो हम इस मामले में भी यही कह सकते हैं कि लड़ते रहो भाइयों, जमाना देख-सुन रहा है !!! पर दुर्भाग्य यही है कि जंग वे लोग लड़ रहे हैं या लड़ने जा रहे हैं, जो देश-दुनिया को शांति से रहने का पाठ अपने-अपने अखबारों के जरिए पढ़ाया करते हैं. क्या इनका मन, दिल, दिमाग इतना ही छोटा है कि ये अपने झगड़े खुद नहीं सुलझा पाते? क्या इनमें किसी के अंदर ऐसा बड़प्पन नहीं, त्याग की ऐसी कोई  भावना नहीं है जो सबको एक साथ लेकर चल सकने के लिए प्रेरित करे, एक सूत्र में पिरोकर रखने के लिए कड़ी का काम करे. लगता है अच्छे दिन वाकई सिर्फ किताबों में दर्ज पंक्तियों की तरह हैं जो असल जिंदगी में कभी उतरते-मूर्त होते नहीं दिखते.

लगता है अब दिल, दिमाग, देह, दिन, दृष्टि सब कारपोरेट हो गए हैं.

-यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com & 09999330099

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Comments on “संजय डाल-डाल तो डीबी कार्प पात-पात

  • Dr Matsyendra Prabhakar says:

    corporat jagat ke bhashyakar Chester Lorress ka kahna hai ki ‘In business you do not get what you deserb but you get what you negociate,’ Lagta hai ki sanjay jee ke sath yahi paribhasha charitarth ho rahi hai

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  • arun khare says:

    Bhai yashwant ji apka likha dil ko chu gaya. per hoga kya dunia to ise hi chalti aai he our u hi chalti rahegi.

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