एक संपादक का अलविदा पत्र

दीपक अंबष्ठ
दीपक अंबष्ठ
प्रभात खबर, धनबाद के संपादक दीपक अंबष्ठ ने प्रबंधन को पत्र भेजकर अखबार से मुक्ति की अपील की है. ऐसा उन्होंने स्वास्थ्य कारणों के चलते किया है. किडनी, डायबिटीज, सुगर की बीमारियों से पीड़ित दीपक अंबष्ठ की उम्र पचास के आसपास है. उन्होंने जीवन में शराब तो छोड़िए, चाय तक नहीं पी. सादा जीवन जीते रहे. सादा खाना खाते रहे.

इस सादगी का नतीजा ऐसा निकला कि वे कई रोगों से परेशान होकर देर रात तक वाली अखबारी नौकरी न कर पाने की स्थिति में आ गए है. वे रांची जाकर अपने परिवार के साथ रहना चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने प्रभात खबर प्रबंधन को पत्र भेजकर अखबार से मुक्त कर देने की अपील की है. प्रबंधन ने उन्हें नई व्यवस्था होने तक पद पर बने रहने को कहा है.

25 दिसंबर 1960 को जन्मे दीपक अंबष्ठ ने रांची विश्वविद्यालय से इतिहास में बीएन आनर्स की डिग्री ली और 1984 में प्रभात खबर अखबार के रांची से शुरू होने के समय इससे जुड़ गए. 1985 में वे पटना के ब्यूरो चीफ बने. 1987 में चीफ सब एडिटर पद पर प्रमोट हुए.  प्रभात खबर से इस्तीफा देकर वे 1988 में रांची एक्सप्रेस के हिस्से डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में बन गए. बाद में वे 1989 में लोकमत समाचार में सीनियर सब एडिटर बनकर पहुंचे.  1992 में फिर रांची एक्सप्रेस में आए और न्यूज एडिटरर बने.

वर्ष 2000 में हिंदुस्तान, रांची में चीफ सब के रूप में नियुक्त हुए. वर्ष 2002 में हिंदुस्तान में उनका तबादला भागलपुर के लिए कर दिया गया. वहां वे डिप्टी न्यूज एडिटर बनकर पहुंचे. वर्ष 2003 में वे हिंदुस्तान, जमशेदपुर के न्यूज एडिटर बनाए गए. अगले साल वे यहीं संपादकीय प्रभारी बना दिए गए. वर्ष 2008 में फिर से वे प्रभात खबर में जुड़ गए और धनबाद के स्थानीय संपादक बना दिए गए. तबसे वे धनबाद में ही जमे हैं.

भड़ास4मीडिया के अनुरोध पर दीपक अंबष्ठ ने अपनी मनःस्थिति को एक संक्षिप्त टिप्पणी के जरिए प्रकट की है. अपनी पत्रकारीय यात्रा के विराम लेने की बात कहते हुए दीपक आश्वस्त करते हैं- ”मैं पत्रकारिता की मीठी यादें लिए जा रहा हूं”.  दीपक ने जो कुछ लिखकर भेजा है, वह इस प्रकार है-


अखबारी कागज की महक से दूर होने की बेला

साथियों, अखबार जगत में दो दशक से भी अधिक का सफर अपने अंतिम पड़ाव पर आ गया है. पत्रकारिता के कई मरहलों से गुजरता हुआ मैं प्रभात खबर, धनबाद के स्थानीय संपादक के पद तक पहुंचा. लंबी कहानी है यह. इसकी बात फिर कभी. अभी तो मैं उन्हें याद कर रहा हूं, जिनसे मैं प्रभावित हुआ. अस्सी के दशक से मैंने पत्रकारिता की शुरुआत की. पहले खेल पत्रकार रहा. रिपोर्टिंग की. फिर डेस्क पर आया. डेस्क पर काम करने के दौरान भी रिपोर्टिंग नहीं छूटी. रिपोर्टिंग की लत आज भी लगी है. खबर मिलने पर कभी कभार निकल ही जाया करता हूं. पर आने वाले 20-25 दिनों में ये बातें मेरे जेहन में इतिहास हो जायेंगी, क्योंकि तब मैं अखबारी कागज की महक से दूर हो चुका होउंगा. हर शाम उन शामों से एकदम जुदा होंगी, जो अखबार के ऑफिस में हुआ करती है.

मैं याद करता हूं अपने मित्र छोटे भाई और कभी लोकमत नागपुर में सहयोगी तथा एक साथ रहने वाले पुण्य प्रसून बाजपेयी को जो इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़ने के बाद भी कहा करते थे ‘यार, कागज की महक मुझे अखबार की ओर खींचती है’. कुछ ऐसी ही बातें मेरे जेहन में भी हैं. प्रभात खबर के पहले संपादक एस. एन. विनोद और पत्रकारिता में मेरे संभवतः अंतिम संपादक वह भी प्रभात खबर के ही हरिवंश, दोनों एकदम अलग तरह के व्यक्ति हैं, पर दोनों से सीखने लायक कई बातें रही हैं. वरिष्ठ पत्रकार उदय सिन्हा भी वैसे लोगों में रहे, जिनके साथ काम करने का अलग मजा रहा.

श्री बलवीर दत्त, बैजनाथ मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, विजय भाष्कर, रजत कुमार गुप्ता, दिनेश जुयाल, अजय शुक्ला, प्रदीप अग्निहोत्री, कुमार पीयूष, लोकमत के कल्याण कुमार सिन्हा, प्रकाश चंद्रा, मणिमाला और न जाने कितने लोग… जिनके साथ काम करने का मौका मिला. कुछ मेरे वरीय रहे तो शेष सहयोगी, इनकी यादें साथ हैं. मैं पत्रकारिता की मीठी यादें लिये जा रहा हूं, क्योंकि अच्छी चीजें ही जीने का सहारा बनती हैं. कभी अनजाने में किसी को कोई दुख पहुंचाया हो तो माफ करिएगा. मैं अपनी कमियों-गल्तियों के लिए क्षमा चाहता हूं. उम्मीद करता हूं कि आप सभी का प्यार, स्नेह व संबंध बना रहेगा.

शुक्रिया….

दीपक अम्बष्ठ

स्थानीय संपादक

प्रभात खबर

धनबाद

संपर्क : 09470572555


Comments on “एक संपादक का अलविदा पत्र

  • shaishwa kumar says:

    is tqarah ek patrakar ka patrakarite se jana achacha nahi laga. aapke sehat ke liye upar wale se prathna.

    Reply
  • amarnathsinha says:

    sir apke sath kam kiya.kai chije sikhne ko mili. asha hai ki aage bhi apse sahyog ki apchha rakhunga. apke swasthya ki mangal kamna karta hoon
    amarnath sinha giridih 9431163134

    Reply
  • arvind kumar says:

    sir mujh jaise reporter ko aap ke sath kam karke bahut huchh sikhne ko mila. apke swasthya ki mangal kamna karta hoon.

    Reply
  • shailendra singh says:

    दीपक सर,

    आपका पत्र पढ़कर अच्छा नहीं लग रहा है…आप मीडिया और उस कागज की महक से दूर जाने की बात कर रहे हैं…जो आपके दिलो दिमाग में रचा बसा है…और लगातार आप उसे सीचते रहे हैं…स्वास्थ्य गवाही नहीं दे रहा…ये तो सही है…लेकिन पत्रकार में हमेशा खबरों में जीता है…इसीलिए हम आपको सदा पत्रकार के रूप में ही देखना चाहेंगे…आप बड़े भाई है…आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला…।

    Reply
  • Deepak bhai, iswar kare aap sabhi pareshanion se mukt hokar swasth our lambi jindagi jiyen. aapki bimari ki khabar se mujhe bahut dukh hua hai lekin akhbar ko alvida karane ki khabar sachmuch andar tak jhakjhorane wali hai. mai waise logons me se hoon jisane aapko 1984 se patrakarita ki suruat karate dekha hai. aapka sneh our aashirwad mujhe aage bhi milata rahe aisi hardik kamana karta hoon. iswar biparit paristhition me bhi aapka housla buland rakhe.

    Reply
  • harendra nath thakur says:

    jaha tak mera manna hai, patrakar kabhi budha aur uske retire ki koi umra sima nahi hoti. DEEPAK SIR( inse meri yu to koi pehchan nahi hai par ha meri patrkarita ki shuruaat bhi dhanbad me prabhat khabar se hi hui thi, raghvendra sir ke jamane me.) mujhe pura viashwas hai ki patrakarita ke vishal gagan me dhurbtaare ki tarah aap hamesha chamkte rahenge aur aapke editorial/article kisi na kisi akhbar me padhne ko mil hi jaya karega. AAPKA HARENDRA

    Reply
  • ashish soni says:

    ashish soni sub editor raj bpl
    aap ko padkar lgta he ki ab bhi patrakarita jeevit he to aap jaise logo ke karan. aapko salaan.

    Reply
  • पढ़कर झटका लगा. शब्द नहीं हैं. अपने मुझे जो दिया उसके लिए जीवन भर आभारी रहूँगा

    Reply

Leave a Reply to harendra nath thakur Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *