बड़े पत्रकार, बड़े दलाल

रूबी अरुण
रूबी अरुण
पद्मश्री और एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त और एचटी के सलाहकार वीर सांघवी. दो ऐसे नाम, जिन्होंने अंग्रेज़ी पत्रकारिता की दुनिया पर सालों से मठाधीशों की तरह क़ब्ज़ा कर रखा है. आज वे दोनों सत्ता के दलालों के तौर पर भी जाने जा रहे हैं. बरखा दत्त और वीर सांघवी की ओछी कारगुज़ारियों के ज़रिए पत्रकारिता, सत्ता, नौकरशाह एवं कॉरपोरेट जगत का एक ख़तरनाक और घिनौना गठजोड़ सामने आया है. देश की जनता हैरान है.

एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर एवं एंकर बरखा दत्त और हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक, मौज़ूदा संपादकीय सलाहकार एवं स्तंभकार वीर सांघवी ने पत्रकार होने के अपने रुतबे और साख को दौलत की अंधी चमक से कलंकित कर दिया. एक सवाल और भी है, जो लोगों को परेशान कर रहा है कि दलाली में इतने बड़े दो नाम एक साथ भला कैसे हो सकते हैं. वैसे मीडिया के लोगों को कमोबेश इस बात की जानकारी है कि वीर सांघवी और बरखा दत्त के बीच क्या कनेक्शन है. पर आम लोगों को शायद ही पता हो कि वीर और बरखा, दोनों ही बेहद घनिष्ठ मित्र हैं. जब वीर सांघवी को न्यूज़ एक्स से इस्तीफ़ा देना पड़ा था, तब कहा गया था कि इसकी वजह भी बरखा ही बनी थी. शायद इसलिए दलाली में भी दोनों ने साथ ही हाथ काले किए.

जनवरी 2006 में जब ए राजा पर्यावरण मंत्री थे, तब होटल ताज मानसिंह में बरखा दत्त, वीर सांघवी और नीरा राडिया की एक लंबी मुलाक़ात हुई थी. नीरा की राजा से यह पहली मुलाक़ात थी. यह कमरा नीरा राडिया के नाम से बुक था. इसके बाद उनके मिलने का सिलसिला चल निकला. सीबीआई सूत्र बताते हैं कि बात भले ही चार कंपनियों की की जा रही है, पर कंपनियों की कुल संख्या नौ है. कुल तीन सौ दिनों तक नीरा की बातें टेप की गई हैं. जो बातें निकल कर सामने आई हैं, उसकी बिना पर कल यह खुलासा भी हो सकता है कि इन नौ कंपनियों में बरखा और वीर की भी हिस्सेदारी हो. पिछले दिनों एक कार्यक्रम में प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस गजेंद्र नारायण रे ने टिप्पणी की थी कि आज की पत्रकारिता वेश्यावृत्ति में बदल गई है. बरखा दत्त और वीर सांघवी ने अपने कुकृत्य से उनकी बात पर मुहर भी लगा दी है.

पत्रकारिता के पेशे की आड़ में काली कमाई कर रहे इन दोनों नामचीन पत्रकारों के नाम आयकर विभाग और सीबीआई की सूची में बतौर दलाल दर्ज हो चुके हैं. आयकर विभाग और सीबीआई के पास इन दोनों के ख़िलाफ़ सबूतों की लंबी फेहरिस्त है. सीबीआई और आयकर महानिदेशालय के पास मौजूद टेपों में इन दोनों दिग्गज पत्रकारों को दलाली की भाषा बोलते हुए साफ सुना जा सकता है. सीबीआई की एंटी करप्शन शाखा ने जब टेलीकॉम घोटाले के सिलसिले में नीरा राडिया के ख़िलाफ़ 21 अक्टूबर 2009 को मामला दर्ज किया और छानबीन शुरू की, तब पाया कि नीरा राडिया अपनी चार कंपनियों के ज़रिए टेलीकॉम, एविएशन, पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कॉरपोरेट सेक्टरों के फ़ायदे के लिए बिचौलिए का काम करती हैं. नीरा अपने काम को पूरा कराने के लिए देश के नामचीन पत्रकारों को मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करती हैं, जिसकी भरपूर क़ीमत भी नीरा इन पत्रकारों को देती हैं.

सीबीआई के एंटी करप्शन ब्यूरो के डीआईजी विनीत अग्रवाल को जब इस बात के प्रमाण मिले तो उन्होंने आयकर महानिदेशालय के इंवेस्टीगेशन आईआरएस मिलाप जैन से नीरा राडिया से जुड़ी जानकारी मांगी. आयकर महानिदेशालय के ज्वाइंट डायरेक्टर आशीष एबराल द्वारा सीबीआई को भेजे गए सरकारी पत्र में जवाब आया कि  नीरा राडिया पहले से ही संदिग्ध हैं और इस बिना पर गृह सचिव से अनुमति लेकर नीरा और उनके सहयोगियों का फोन टेप किया जा रहा था. इस दरम्यान ही यह कड़वी हक़ीक़त सामने आई कि वैष्णवी कॉरपोरेट कंसल्टेंट, नोएसिस कंसल्टिंग, विटकॉम और न्यूकॉम कंसल्टिंग कंपनियों के माध्यम से टाटा, अंबानी जैसे कॉरपोरेट घरानों को फ़ायदा पहुंचाने की खातिर नीरा राडिया बरखा दत्त और वीर सांघवी जैसे रसूखदार पत्रकारों का इस्तेमाल करती हैं.

बरखा और वीर सांघवी नीरा राडिया जैसी बिचौलिया के ज़रख़रीद बन सियासी गलियारों में तोल-मोल का खेल रचते हैं. पत्रकारिता के बूते बने अपने संपर्कों का उपयोग वे मंत्रिमंडलीय जोड़-तोड़ में करते हैं. अपने मतलब के कॉरपोरेट घरानों की सहूलियत के मुताबिक़ मंत्रियों को विभाग दिलवाते हैं और बदले में भारी-भरकम दलाली खाते हैं. सबूत कहते हैं कि दलालीगिरी का खेल ये दोनों बहुत पहले से करते आ रहे हैं, पर इनका भांडा फूटा ए राजा को संचार मंत्री बनवाने के बाद. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नहीं चाहते थे कि आरोपों से घिरे ए राजा को संचार मंत्री बनाया जाए. मनमोहन सिंह ने ए राजा के नाम पर ग़ौर करने तक से मना कर दिया था. मनमोहन सिंह चाहते थे कि देश को अत्याधुनिक सूचना क्रांति से जोड़ कर समाज को समृद्घ बनाने में बेहद अहम भूमिका निभाने वाला संचार मंत्रालय ऐसे व्यक्ति के हाथ में जाए, जो कॉरपोरेट घरानों की कठपुतली न हो. उसकी छवि बेदाग़ हो. पर नीरा राडिया के हाथों बिक चुके बरखा दत्त और वीर सांघवी ने कांग्रेस के पावर कॉरिडोर में ऐसी ज़बरदस्त घेराबंदी की कि प्रधानमंत्री तो बेबस हो ही गए, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की भी एक न चली.

सीबीआई और आयकर विभाग की फाइलों और टेलीफोन टेपों में बरखा और वीर सांघवी के ख़िलाफ़ दर्ज साक्ष्य उनकी दलाली की हौलनाक कहानी कहते हैं कि देश के नामचीन पत्रकार होने का इन दोनों ने किस क़दर ओछा लाभ उठाया. नीरा राडिया के हाथों की कठपुतली बन कर दोनों ने ही टाटा और अंबानी जैसे देश के टॉप कॉरपोरेट घरानों को व्यवसायिक फ़ायदा पहुंचाने की गरज़ से लगातार पैरवी कर सरकार के कई नीतिगत फैसलों को बदलवाया. एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल के ज़बरदस्त विरोध के बावजूद दयानिधि मारन की बजाय ए राजा संचार मंत्री बने तो इसी कारण कि बरखा दत्त और वीर सांघवी जैसे सफेदपोश बड़े पत्रकार राजा की पैरवी कर रहे थे. जांच से यह बात भी सामने आई है कि नीरा राडिया, बरखा दत्त और वीर सांघवी की तिकड़ी पुरानी है.

नीरा राडिया की चारों कंपनियों में बतौर अधिकारी तमाम रिटायर्ड नौकरशाहों की भरमार है. इन सभी को वीर सांघवी और बरखा की तैयार की गई सूची के आधार पर ही रखा गया हैं. ये वे अधिकारी हैं, जिन्होंने विभिन्न मंत्रालयों में ऊंचे पदों पर काम किया है और जिन्हें मंत्रालयों के अंदरूनी कामकाज की बख़ूबी जानकारी है. इन्हें पता है कि मुनाफे के फेर में किस तरह सरकार को करोड़ों-अरबों का चूना लगाया जा सकता है. किस तरह विदेशी पूंजी निवेश क़ानून की धज्जियां उड़ा कर अरबों के वारे-न्यारे किए जाते हैं. बहरहाल, फिलहाल तफ्तीश चल रही है. सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच के जिस डीआईजी विनीत अग्रवाल की जांच पर नीरा, बरखा और वीर की दलाली के खेल का पर्दा़फाश हुआ है, उनका ट्रांसफर किया जा चुका है. अपनी गिरफ्तारी की आशंका से नीरा राडिया पहले ही देश छोड़कर भाग चुकी हैं. हर ख़बर पर बावेला मचाने वाला मीडिया इस मसले पर चुप है. तो क्या उम्मीद की जाए कि इतने बड़े घोटाले और महान पत्रकारों की दलाली का सच सामने आ पाएगा? अभी एक नाम आना और बाकी है. एक बड़े न्यूज़ चैनल के प्रबंध संपादक का नाम, जो इस तिकड़ी को दलाल चौकड़ी बना देगा. बस कुछ दिन और इंतज़ार कीजिए.

लेखिका रूबी अरुण वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों चौथी दुनिया में कार्यरत हैं.

Comments on “बड़े पत्रकार, बड़े दलाल

  • kundan sahoo says:

    tikdi se chaukadi ! ? roobiji ab aur mat dahalaiye ! loktaantrik vyavastha ke chauthe stambh patrakaarita mein ye chautha dalal patrakaar bharat ke patrakar hone ka fakr karnewalon ke liye charo khane chitt hone jaisa rahega . kah deejiye ki aur koi chautha dalal patrakaar samne nahi aayega ?

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  • kumar hindustani says:

    behatreen aur poorna lekh. media jagat ki is bhayawaah haqeekat se roobaroo karane ke liye hardik shukriiya.lekin ek prashna dimag me abhi bhi makadi ke jaale ki bhaanti ujajha hua hai. kya sirf barkha aur veer hi media ke aise chehre hain jo is tarah ki karyawaai me lipt hain? kya baaki media ke varistha, sampdak aur diggaz bedaag aur saaf hai? kya media aur dalali apas me ghul mil nahi chuke hai? kya media aaj apne vastvik uddeshya se nahi bhatak chuki hai? kya media ke corporatization kewal paise kamane ka jariya bhar nahi ban gaya hai? kya media karmi apne niji hiton ki poorti ke liye koi galat kaam nahi karte?

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  • Satya Prakash says:

    वाह रूबी अरुण जी वाह …चौथे दल्ला पत्रकार को भी जल्द बेनकाब कीजिये

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  • Abdul Wahid says:

    Amazing Ruby ji… Your article is so informative.
    I was shocked that such as media professionals are palying a sblack sheep.
    I think the fourth estate is aslo flooded with corruption and no one can help it.

    Abdul Wahid
    Hyderabad.

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  • baat bilkul sahi kah rahin hain rubi ji AAP. PATRKARITA ME ABHI BAHUT SE DALAALO KA NAAM AANA BANKI HAI ,AGAR WO BHI JALD BENAKAB HO JAYENGE TAB PATA CHALEGA KI ISME KITNI SATYTA HAI. DESH KO BACHANE KI OCCHI BAAT KARNE WAALE YE LOG WASTWIK ME CHOR HI HAIN. EK TARAF DUSRE KO GAALI DETEN HAIN LEKIN APNI TARAF NAHI DEKHTEN HAIN. WAH RE PATRKARITA JAGAT KE AISE DHURANDHAR. TELEVISION AUR AKHBAAR ME BADI JOSH ME BAATEN KARTEN HAI LEKIN DUSRI TARAF DALAALI HAI .WAH RE KHEL AUR ISKE KHILADI ?????? INLOGO KO PATRKARITA NAHI PESHKARITA HI SAHI RAHEGI.

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  • Rajesh Sharma says:

    While knowing well that a big number of journalists instead of doing real journalism have been indulging in “dalaali” i felt not to continue with this profession and left active journalism soon after producing and presenting “MERI AWAAZ” on Doordarshan. I was harassed and humiliated for daring to take on the government and ministers, but i left only after completing my mission to raise the voice of the common man in 52 episodes of this programme. I got my ancestral house mortgaged to gather funds for producing such a top most programme which changed the policies and thinking of the government regarding health, welfare of backward communities, women and child, scavengers, food adulteration and lives of villagers in remote areas of the country. Media can play pivotal role in pressing government, ministers, bureaucrats, politicians, top cops and administration by exposing them and their misdeeds but when media people whom masses adore them become “dalaals of the system” then nobody can save this country. As i never buckled under pressures from ministers, politicians, bureaucrats, administration etc. i was forced to pay to Doordarshan telecast fee to keep my on air instead of Doordarshan to pay me for producing such a fantastic programme for masses. ON the contrary Doordarshan asked me to close the programme after 52 episodes even while there are programmes which are running more than 1000 of episodes without any reasonable TRP ratings. Doordarshan is actually an ”addaa” of corruption where big ”dalaal” journalists are obliged by the ministers. And those channels who are big “chamcchas” are given huge government advertisements worth hundreds of crores of rupees and those who are writing or showing programmes in the interests of masses (considered to be anti government) are “punished” by not releasing any ads in their channels or newspapers. There must be transparency in this regard also.
    I am glad you have very well written and exposed black sheep in the fourth pillar of democracy. We must keep vigilant eye on such fraudulent journalists even if they reach any level they are not above law and country.

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  • Deependra singh solanki says:

    dalali or blakmailing se patrkarita badnam ho rahi hai, saf chabi wale patrakar ko is se bachana cahia

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  • vineet kumar gkp 09936809770 says:

    Ruby jee really aap na sahi kaha hai bada patrakar bada dalal. yah to bangi bhar hai abhi media main bhouta se patrakar type ka dalal hai patrakarita ko badnaam kar rahyian hai.:(

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  • firoz khan baagi says:

    kya kare hamari nasl hi kharab ho chali hai .in dalalo ke chalte hi hamari samaj me kirkiri ho rahi hai.iski mukhya wajah ye bhi hai ki aaj kal paise ke dam par log patrkar ban rahe hai ,jis se orignel patrkaro ko unka samman nahi mil pa raha hai shayad yahi wajah ho ki kuchh varishth patrkar samman ki khatir dalali shuru kar diye ho .

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  • Adarsh Srivastava says:

    I feel that Barkha is not the old whore in this profession. There are other more powerful persons reigning in that whorehouse. These fucking journalists should be slammed onto the walls and given the heat of their lives.

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  • Nadim Akhter, Dhanbad says:

    May I know is Neera radia also from St. Stephens college, delhi. Rubi ji, u can investigate how many St. stephians (A strong bond between Barkha and them) r der in d list.
    thanks

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  • Rakesh yadav says:

    rubi ji patrakarti jagat ab totali dalal jagat me tabdil ho chuka hai isme ko do rai nahi hai. patrkati jagat me kuch chuninda patrkaro ke naam bataye jo ab bhi apne ausolo ka pakka ho.

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  • pankaj kapahi says:

    मै खुद जर्नलिज्म का छात्र हु और हमे शुरू से ही सिखाया जाता है की वरखा दत जेसे बनो वीर संघवी जेसे बनो यह हमारे लिये आदर्श मने जाते थे की एक दिन पूरी कोशिश कर इन जेसे जरूर बनेगे . सब का सपना होता था की काश हम भी ४एक दिन वरखा दत बन जाये………………..इसमें भी कोई दो राय नही की अगर देश में मीडिया को चोथा स्तम्ब मन जाता है तो वरखा दत को भी मीडिया का स्तम्ब माना जाता है पर रुब्ब्य जी मुझे आपका अर्किक्ल पड़ बड़ी हेरानी हुयी की क्या यह भी एसा कर सकते है मंत्रियों को तो घोटाले करते बड़ा देखा था पर अब देश का आयना ही एसा करेगा जिन्हें आदर्श मान कर विधार्थी आगे निकलते है उन पर क्या बीतीगी उनका तो पहले से ही मीडिया की सचाई से विश्वास उठ जायगा !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
    पंकज कपाही

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  • Dhananjay Jha says:

    Dear Ruby..
    u are also senior journalist,hope you also did corporate corruption, time to be honest and review. 2nd thing, in your article, you write about telecom scam, kindly write about big journalist Names with assets also?
    Everybody know, big journalist known assets. as per my knowledge from last 60 years indian journalist doing these type of corporate corruption, nothing new in this?
    now common people see true face of journalist, its paining for journalist, i think so?

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  • ACCHA LIKHA BARKHA DATTA KAHE KI JOURNALIST HAI VO SILVER SCREEN PE LATKE ZHATKE DIKHANE ME AAGE RAHATI HAI

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  • RUBY JI APNE JINKO BE NAKAB KIYA THEEK KIYA. BUT MEDIA ME AISE DALLA MATHADHISHON KI SANKHYA LAGATAR TEEVRA GATI SE BADH RAHI HAI. MAGAR EK SUJHAO DEN KI HUM JUNIOR REPORTER KITNI MEHNAT SE SAMACHAR LATE HAIN.BARI KHABRON PAR BARE LOG DALALI KARNE LAGTE HAIN ISE KAISE ROKA JAI.

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  • Satya Prakash says:

    Ruby ji, not only Vir Sanghvi and Barkha Dut are involved such kind of activities if you will visit Western Court, Eastern, North Avenue, South Avenue you will find number of senior journalist including big media company owners dealing with MP’s for Rajya Sabha seats and big business.

    note: I am writing after three years of work experience, after interviewing five MP’s and one minister family

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  • ak media karmi ko jail ke andar ja kar kaidiyo se milne ka niyam hai ya nahi, hai to kis se anumati leni padti, please send my email id jai sir

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