आशुतोष के शिकार एक आम पत्रकार की कहानी

साथी, मैं बहुत दिन से यह लिख रहा था। लेकिन अब समाचार मिला कि आशुतोष ने आप का दामन थाम लिया है। लगता है कि कुछ देर हो गई है। लेकिन जितना लिखा है, वह भेज रहा हूं। हो सके तो छापिएगा। मेरा दर्द कुछ कम होगा। और आम आदमी पार्टी को ऐसे बहरुपिए के बारे में थोड़ी जानकारी मिलेगी। जो व्यक्ति रिलायंस के इशारे पर अपने साथियों को नौकरी से निकाल देता है और अपनी नौकरी बचा लेता है, वह व्यक्ति राष्ट्र के लिए क्या लड़ेगा?

मैं आपसे झूठ नहीं कहूंगा। यह मेरा फर्जी नाम है। असली नाम मैंने छिपा लिया है। कहीं काम कर रहा हूं। बच्चे पालने है। मां-बाप की देखभाल करनी है। बहुत थोड़े पैसे मिलते हैं। किसी तरह काम चलाता हूं। अभी नौकरी बहुत जरूरी है।

आपका

राज


कुछ दिनों पहले जब मुझे आईबीएन 7 की नौकरी से निकाला गया तो भीतर बहुत गुस्सा था। मैंने पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया था, बार-बार यही सवाल उठता कि आखिर मुझे क्यों चुना गया? क्या ईमानदारी और मेहनत की यही कीमत होती है? कई ऐसे लोग बचाए गए हैं जो हफ्तों दफ्तर नहीं आते। जिनकी तनख्वाह में मेरे जैसे कई लोग बचाए जा सकते थे, लेकिन हमें नहीं बचाया गया। हमारी मेहनत और ईमानदारी की जगह उन लोगों की चाटुकारिता चुनी गई। तभी मन किया कि लिखूंगा। लिखने बैठा भी। लेकिन गुस्सा, आक्रोश और बेइज्जती का अहसास इतना हावी था कि भावनाओं को तार्किक आधार नहीं दे सका। शब्द बहक जाते थे। लेकिन आज थोड़ा ठीक महसूस कर रहा हूं। संतुलित तो अब भी नहीं हूं। उस "भावनात्मक चोट" से तो अब भी नहीं उबरा हूं। लेकिन उस दिन की तुलना में थोड़ा संभला हुआ जरूर हूं। शायद इसलिए शब्द ढूंढ पा रहा हूं। लहराता हुआ ही सही कुछ लिख पा रहा हूं।

आप सोच रहे होंगे कि नौकरी जाने को मैंने आर्थिक चोट की जगह भावनात्मक चोट क्यों कहा है। दरअसल पत्रकारिता में आने का फैसला ही भावनात्मक था। चाहता तो कुछ और कर सकता था। सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई कर सकता था। नहीं मिलने पर दुकान चला सकता था। और कुछ नहीं तो दलाली तो कर ही सकता था जो आईबीएन 7 में रहते हुए कुछ लोग कर रहे हैं। आपके और हमारे आस-पास कई ऐसे लोग होंगे जो पत्रकारिता की खाल में दलाली करते होंगे। वह काम तो मैं कर ही सकता था। लेकिन मेरी नियति तो पत्रकार बनना लिखा था, इसलिए पत्रकार बना। और मैंने अपना कर्म ईमानदारी से किया। इसलिए जब संपादक… ओह! माफ करें… मैनेजिंग एडिटर (आशुतोष गुप्ता को मैनेजिंग एडिटर कहलाने का बड़ा शौक है… एक बार उन्होंने संजय पुगलिया की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि वह सिर्फ एडिटर है और मैं मैनेजिंग एडिटर हूं) की तरफ से कहलवाया गया कि मुझे दूसरी नौकरी ढूंढ लेनी चाहिए तो मैं सदमे में चला गया। कमजोर दिल होता तो हार्टअटैक ही आ गया होता। मेरा एक दोस्त अक्सर कहा करता है कि काम करने वाले को इनाम में और अधिक काम ही मिलता है। यह बात मुझ पर भी लागू होती रही। सभी कहते थे कि मैं काम अच्छा करता हूं, लेकिन कभी पैसा उस अनुपात में बढ़ाया नहीं गया। काम बढ़ता रहा तब भी इस बात का संतोष था कि चलो काम लायक तो समझा जाता है। लेकिन इस बार तो हद ही हो गई। साजिश करके काम नहीं करने की चिट्ठी थमा दी गई।

मैं यह सब अपना दुखड़ा रोने के लिए नहीं लिख रहा हूं। मैं यह इसलिए लिख रहा हूं कि मीडिया जगत के इस "आपराधिक षणयंत्र" पर बहुत कुछ लिखा जाना चाहिए था, लेकिन किसी ने गंभीरता से नहीं लिखा। इस "नरसंहार" का लाभ उठा कर उन कारणों की विवेचना होनी चाहिए थी जिसकी वजह से बार बार छंटनी की नौबत आ जाती है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उन गुनहगारों की शिनाख्त होनी चाहिए थी जिनके कारण एक साथ इतने लोगों की बलि चढ़ाई गई, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। मगर आज मैं अपने पुराने संस्थान से जुड़े इन तमाम सवालों पर चर्चा करूंगा। इस नरसंहार के कारणों पर चर्चा करूंगा और उन गुनहगारों के बारे में बताऊंगा जिनकी वजह से सैकड़ों पत्रकारों और तकनीकी लोगों को अपनी रोजीरोटी से हाथ धोना पड़ा। उनमें से मेरे जैसे कुछ तो थोड़ा संभल गए हैं लेकिन बहुतेरे ऐसे हैं जिनकी जिंदगी का संघर्ष बढ़ गया है। कुछ उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां संघर्ष के नतीजे अच्छे नहीं होते। मगर वो संघर्ष करने को मजबूर हैं। सुनते हैं कुछ दोस्त अपने गांव-कस्बों की ओर लौट गए हैं। दशकों इस महानगर में जीने के बाद गांव-कस्बे उन्हें अपनाएंगे इस पर मुझे संदेह है। इन सब मुद्दों पर सोचता हूं तो आंख भर आती है। दिल फफक-फफक कर रोने का करता है। यह सलीका आता तो शायद दुख कुछ कम हो जाते। दर्द आंसुओं की शब्द में थोड़ा बाहर निकल जाता।

हम मुद्दों पर आते हैं। आखिर आईबीएन7 या नेटवर्क 18 में छंटनी की नौबत क्यों आई? और छंटनी किन लोगों की हुई? सवाल यह भी है कि क्या छंटनी में हुई साजिश के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा? या फिर साजिशों को दौर जारी रहेगा? अगर साजिशें जारी रहेंगी तो फिर निशाने पर कौन-कौन लोग हैं? छंटनी से यह साफ है कि आईबीएन 7 का  रेवेन्यु मॉडल फेल हो गया है? आखिर यह रेवेन्यु मॉडल फेल क्या है और यह फेल क्यों हुआ? किसी मीडिया संस्थान के रेवेन्यु का आधार क्या हो सकता है? क्या कोई मीडिया संस्थान छोले-भटूरे, कपड़े-जूते या फिर मोटरसाइकिल-कार बेच कर पैसा कमा सकता है? या उसे कंटेंट पर आधारित प्रोडक्ट ही बेचना होगा? तो फिर वह कंटेंट कैसा होना चाहिए? और जब किसी मीडिया संस्थान का कंटेंट बेचने लायक नहीं हो तो उसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराना चाहिए? संपादकों को या सीईओ को? क्या आप जानते हैं कि सबसे पहले सीएनएन-आईबीएन के सीईओ की छुट्टी की गई?

इन सभी सवालों पर एक के बाद एक विस्तार से चर्चा होगी। इस चर्चा की शुरुआत चैनल के रेवेन्यु मॉडल और आईबीएन 7 के कंटेंट से करते हैं। मैं दावे से इतना तो कह ही सकता हूं कि आईबीएन 7 का कंटेंट और उस कंटेंट को परोसने का तरीका दोनों का स्तर मीडिया बाजार के दूसरे ब्रांड्स से काफी छिछला है। यही वजह है कि यह चैनल टीआरपी रेस में काफी चोटी के चैनलों में आ ही नहीं सका। दरअसल, इस चैनल का नाम आईबीएन की जगह पर चीख चैनल होता तो ज्यादा अच्छा रहता। यहां पर सब चीखते हैं। मैनेजिंग एडिटर चीखता है। उसका नंबर वन सुपारी किलर कार्यकारी संपादक संजीव पालीवाल चीखता है। उसके चेले चीखते हैं। चैनल देखने पर लगता है कि इसकी हर खबर में चीख है। स्टोरी दर्द की हो, खुशी की हो, धर्म की हो, अधर्म की हो, राजनीति की हो, कारोबार की हो, खेल की हो, खिलाड़ी की हो, सिनेमा की हो या फिर सितारों की हो… खबर चाहे किसी भी प्रकृति की हो, किसी भी चेहरे की हो… वह चीखती है। क्योंकि इसका मैनेजिंग एिडटर चीखता है। शायद उसकी निजी जिंदगी में खुशी की जगह चीख भरी हुई है इसलिए वह दर्शकों को चीख सुना कर सेडिस्टिक प्लेजर लेता है। अब आप बताइये कि चीख को बाजार में कितना बेचा जा सकता है? कोई दर्शक कितनी देर चीख सुन सकता है?

यह सच है। सौ फीसदी सच। आज आईबीएन 7 चीख चैनल है और इस चैनल को चीख में तब्दील करने वाले दो सबसे बड़े गुनहगार हैं इसके मैनेजिंग एडिटर आशुतोष गुप्ता और इनके नंबर वन सुपारी किलर संजीव पालीवाल। यह दोनों अपनी महत्वाकांक्षा में चैनल का हर रोज बलात्कार कर रहे हैं और बलात्कार के बाद विभत्स तरीके से हंसते हैं। चैनल के ग्रुप मैनेजिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई इनकी नंगई पर खामोश रहते हैं।

ब्रेक के बाद: टॉप 10 सवाल

1. आईबीएन 7 चीख चैनल में तब्दील कैसे हुआ?
2. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल चैनल का बलात्कार कैसे करते हैं?
3. राजदीप सरदेसाई इस पर खामोश क्यों है?  
4. कहीं राजदीप मजबूर तो नहीं?   
5. अगर राजदीप मजबूर हैं तो वह मजबूरी क्या है?
6. आशुतोष गुप्ता की जाति क्या है? और इस जाति का चैनल के कामकाज में क्या लेना-देना है?
7. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल किस बात से सबसे अधिक डरते हैं?
8. आईबीएन 7 की संपादकीय बैठक में एक डॉयरेक्टर यानी किसी कंपनी का एक मालिक भी बैठता है। वह कंपनी कौन सी है और उसके मालिक का नाम क्या है?
9. जब चैनल का कोई व्यक्ति अपनी कंपनी नहीं चला सकता है तो फिर संपादकीय बैठक में हर रोज शामिल होने वाले इस शख्स को यह खुसी छूट किसने दी है और क्यों दी है?
10. एक सच जिसके सामने आते ही आशुतोष गुप्ता, संजीव पालीवाल और राजदीप सरदेसाई के पैरोंतले की जमीन खिसक जाएगी। आखिर वह सच्चाई कौन सी है? उस सच्चाई का खुलासा।
 
पार्ट टू –

आज हम चार सवालों पर एक साथ चर्चा करेंगे और बाकी सवालों पर उसके बाद। यह चारों प्रश्न हैं:

1. आईबीएन 7 चीख चैनल में तब्दील कैसे हुआ?
2. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल चैनल का बलात्कार कैसे करते हैं?
6. आशुतोष गुप्ता की जाति क्या है? और इस जाति का चैनल के कामकाज में क्या लेना-देना है?
7. आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल किस बात से सबसे अधिक डरते हैं?

पुरानी कहावत है। किसी को उसकी औकात से अधिक दे दो तो वह बौरा जाता है। उसका दीमाग फिर जाता है। इसी को थोड़ा उलट कर कहें तो कुएं का मेंढक जब बाहर निकलता है तो अकबका जाता है। कुछ ऐसा ही आशुतोष और संजीव पालीवाल के साथ हुआ। इन दोनों ने पत्रकारिता का प भी नहीं सीखा था कि इन्हें चैनल चैलाने की जिम्मेदारी मिल गई। यह कुछ भी अच्छे नहीं थे। न इन्हें अच्छी स्टोरी लिखने आती है। ना अच्छा लेख। ना ही यह अच्छे एंकर थे। ना ही प्रोडक्शन में अच्छे थे। औसत समझ और औसत से भी कमतर सोच, संकीर्ण मानसिकता और दिल वाले इन दोनों व्यक्तियों को आईबीएन 7 चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मगर इन दोनों में ही दो क्षमताएं प्रचूर मात्रा में थीं। एक यह दोनों झूठ बोलने में उस्ताद हैं और इनमें मक्कारी कूट-कूट कर भरी है। इसलिए इन दोनों ने एक दूसरे को डैमेज करने की जगह एक दूसरे का पूरक बनने में भलाई समझी और एक अघोषित समझौता किया कि वह एक दूसरे के कम्फर्ट जोन में सेंध नहीं लगाएंगे। एक दूसरे की अय्याशियों पर अंगुली नहीं उठाएंगे और राज करेंगे।

इसे समझाने के लिए आपके समक्ष कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना जरूरी है। किसी भी समाचार चैनल का एजेंडा उसके संपादकों से तय होता है। इसके लिए संपादकों में खबर की समझ होनी बहुत जरूरी है। अब इन दोनों में खबर की समझ कितनी और यह दोनों कितने बेहतर इंसान हैं इसका अंदाजा आपको इस उदाहरण से लग जाएगा। कुछ समय पूर्व चलती गाड़ी में एक महिला के बलात्कार की खबर अखबार में छपी। उसी दिन मॉर्निंग मीटिंग यानी सुबह दस बजे की बैठक में खबरों पर चर्चा होने लगी। इस अपराध का जिक्र होने लगा। आईबीएन 7 की प्लानिंग टीम रणनीति तैयार करने के लिए बैठी थी। आशुतोष गुप्ता, संजीव पालीवाल, मृत्युंजय कुमार झा समेत सभी दिग्गज बैठे थे। सुश्री किरणदीप भाटिया जी भी मौजूद थीं। उस मीटिंग में 35-40 मिनट तक बात इस पर होती रही कि आखिर चलती गाड़ी में बलात्कार कैसे किया जा सकता है? कुछ तो चटखारे लेते हुए ब्योरा दे रहे थे कि ऐसे किया जा सकता है, वैसे किया जा सकता है। उस मीटिंग में मौजूद कुछ संवेदनशील किस्म के लोगों ने बाहर आने पर यह जानकारी दूसरे लोगों को दी और छन-छन कर इस बैठक का ब्योरा हम जैसे निचले स्तर के लोगों को भी मिल गया। सोच कर घिन आती है, लेकिन क्या कीजिएगा पूरे कुएं में ही भांग घुली है।

सच्चाई यही है कि आशुतोष गुप्ता किसी लिहाज से संपादक बनने लायक नहीं है। मेरा यह निजी मत है कि बेहतरीन संपादक वही हो सकता है जो बेहतरीन इंसान हो। यह कहने का मतलब कतई यह नहीं कि हर बेहतरीन इंसान बेहतरीन संपादक बन सकता है। बल्कि सिर्फ इतना है कि बेहतरीन संपादक होने के लिए बेहतरीन इंसान होना एक अनिवार्य शर्त है। इसे आप उदाहरण से समझिए…। प्रभाष जोशी बेहतरीन संपादक थे, क्योंकि वह बेहतरीन इंसान भी थे। कमर वहीद नकवी बेहतरीन संपादक रहे, क्योंकि वह बेहतरीन इंसान भी हैं। एस पी सिंह बेहतरीन संपादक थे और एक बेहतरीन इंसान भी। सुनते हैं कि पराड़कर लाजवाब व्यक्तित्व थे और उतने ही बड़े संपादक भी। कुलदीप नैयर बेहतरीन संपादक रहे और बेहतरीन इंसान भी। लेकिन आशुतोष गुप्ता एक औसत से कमतर इंसान हैं। इसलिए यह अपने जीवन में कभी भी बेहतरीन संपादक नहीं हो सकते।

अब बात उठती है कि क्या यह कामयाब संपादक बन सकते हैं? कामयाब संपादक होने के लिए बेहतरीन इंसान होना जरूरी नहीं है। आपको ऐसे कई संपादक मिल जाएंगे जो इंसान के तौर पर अच्छे नहीं हैं लेकिन पेशेवर तौर पर कामयाब रहे हैं। उन कामयाब संपादकों और आशुतोष में क्या अंतर है? पहला अंतर तो यह है कि एक दो अपवादों को छोड़ कर कामयाब संपादक एंकर नहीं होंगे और आशुतोष गुप्ता एंकर हैं। इसलिए कामयाब संपादकों की सोच का दायरा थोड़ा बड़ा रहता है। मतलब वह चैनल के बारे में सोचते हैं। वह ऐसी स्टोरी के बारे में सोचते हैं, जिस पर खेला जा सकता है। वह ऐसे तरीके के बारे में सोचते हैं जिसके जरिए खेला जा सकता है। आत्मकेंद्रित सभी हैं लेकिन उनके आत्मकेंद्रित होने के दायरे में चैनल आ जाता है। उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि चैनल अच्छा करेगा तो वह अच्छा करेंगे। वह अच्छा करेंगे तो चैनल अच्छा करेगा। इसलिए उदय शंकर, सुप्रिय प्रसाद, विनोद कापड़ी और साजी जमा जैसे लोग चैनल को दांव पर लगा कर खुद को आगे बढ़ाने के बारे में नहीं सोचते हैं। यहां आशुतोष इन सबसे अलग हैं।
 
आशुतोष गुप्ता एक ऐसा सेल्फ ऑब्सेस्ड क्रिचर (आत्मकेंद्रित जीव) है जो खुद को महान विद्वान मान बैठा है। और जब औसत से भी कमतर बुद्धि, समझ और विवेक वाले इंसान में महान विद्धान होने का भ्रम बैठ जाए तो वह भस्मासुर हो जाता है। वह जिस वस्तु, प्राणी और संस्थान पर हाथ रखेगा… उसे भस्म होना ही है। आईबीएन 7 की भी यही स्थिति है। इसे विस्तार देने के लिए मीडिया जगत का एक पुराना किस्सा आप लोगों को सुनाता हूं। देश के एक बड़े और ताकतवर अखबार समूह का संपादक होने के नाते एक दिग्गज पत्रकार को सभी जगह बड़ा सम्मान मिलता था। वह जिस मंत्री के यहां जाएं, वह उन्हें छोड़ने दरवाजे तक आता। वह जिसे फोन करें, वह तुरंत उनसे बात करता। धीरे-धीरे उस संपादक को लगने लगा कि वह प्रधानमंत्री के बाद देश का दूसरा सबसे ताकतवर इंसान है। और यह बात उसने कुछ-एक जगह कहनी शुरू कर दी। बातें फैलती हैं। बातें उड़ती हैं और यह बात भी फैलते-फैलते, उड़ते-उड़ते उस अखबार के मालिक तक जा पहुंचीं। उसने तुरंत संपादक को पैदल कर दिया। अब संपादक को अहसास हुआ कि दरअसल ताकतवर वह नहीं, वह ओहदा था जिस पर वह बैठा था। आज भी वह संपादक कभी-कभार टीवी चैनलों पर ज्ञान देते नजर आते हैं। लेकिन अब उनका अंहकार टूट गया है।

आशुतोष अभी इसी अहंकार और इसी भ्रम में जी रहे हैं। वह अक्सर कहते हैं कि मैं किसी का भविष्य बना सकता हूं और किसी का बिगाड़ सकता हूं। उन्होंने कुछ लोगों का भविष्य बिगाड़ा भी है। लेकिन बनाने और बिगाड़ने का यह भ्रम … एक तुच्छ सोच का नतीजा होता है। सच तो यही है कि तात्कालिक खेल में कोई किसी शख्स का नुकसान जरूर कर दे, वह उस शख्स की नियति तय नहीं कर सकता। इसलिए आशुतोष ने जिन लोगों का भविष्य बिगाड़ा है (अपनी तुच्छ सोच के तहत), कुछ समय बाद उनमें से कुछ यकीनन तौर पर आशुतोष गुप्ता से अधिक ताकतवर स्थिति में होंगे। वैसे क्या होगा और क्या नहीं होगा, यह दर्शन का दायरा है और इसे हम यहीं छोड़ देते हैं। अभी बात आशुतोष की हो रही है तो इसी पर हम ध्यान केंद्रित रखते हैं। तो आशुतोष गुप्ता ने आईबीएन 7 को एक उत्कृष्ट बनाने की जगह अपनी निजी ब्रांडिंग का जरिया मात्र बना दिया। इससे तीन नुकसान हुए। प्रथम कि यह चैनल चोटी के चैनलों की लिस्ट से बाहर हो गया। इसकी हैसियत और ताकत घट गई। द्वितीय, चैनल आर्थिक स्तर पर कमजोर हो गया। और तृतीय, ब्रांड आशुतोष तो बना, लेकिन जब चैनल कमजोर हो तो उससे जुड़े ब्रांड की भी अहमियत ज्यादा नहीं रहती। इसे आप टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी के उदाहरण से समझ सकते हैं। अर्णव ने भी अपना ब्रांड बनाया है, लेकिन चूंकि उनकी रणनीति अच्छी रही है और चैनल को आगे रखा इसलिए उनके ब्रांड की बाजार में एक कीमत है। वहां टाइम्स नाउ और अर्णव एक दूसरे को मजबूत करते हैं। एक दूसरे को आधार देते हैं। यहां आईबीएन7 आशुतोष गुप्ता की संकीर्ण सोच का खामियाजा उठा रहा है और नतीजतन खुद ब्रांड आशुतोष की कोई खास वैल्यू नहीं है। यह बाजार का नियम है और इसे वही समझ सकता है जिसकी सोच बड़ी है और समझ साफ हो। एक कुंठित व्यक्ति यह कभी नहीं समझ सकता।

आशुतोष गुप्ता की खबरों की समझ कितनी है उसे जानने के लिए आपको दिमाग पर जोर डालने की जरूरत नहीं है। आप कभी भी चैनल ऑन कर लीजिए आपको अंदाजा हो जाएगा। मसलन अगर मौसम आम का है बाकी चैनल आम की बोली लगा रहे होंगे तो यह अमरूद बेचते दिखेंगे। अगर किसी मजबूरी में आम बेचना पड़े तो यह दशहरी को लंगड़ा बता कर बेचने लगेंगे। इनकी समझ इतनी ही है कि कुछ समय पहले हिंदुस्तान में इनका एक लेख छपा था। लेख कर्नाटक के चुनावी नतीजों पर था। लेकिन उसकी शुरुआत फेदरीको फेलिनी की फिल्म से हुई। तीन पैरा आंय-बांय लिखने के बाद चौथे पैराग्राफ में कर्नाटक का जिक्र आया। उस लेख में फिल्म के जिक्र का कोई मतलब नहीं था और फेदरीको फेलिनी कौन है यह हिंदी का आम पाठक शायद ही जानता हो। लेकिन इनके जैसे सेल्फ ऑब्सेस्ड लेखक और पत्रकार की यह बीमारी है कि वह खुद को महान-विद्वान साबित करने के लिए दो-चार महान लोगों के नाम गिराएंगे ही। उन ऐतिसाहिक लोगों की महानता के साथ ही इनकी छद्म और स्वघोषित महानता बढ़ती है। यह सियासत पर बात करेंगे तो वर्ल्ड सिनेमा बीच में ले जाएंगे और वर्ल्ड सिनेमा पर बात करेंगे तो सियासत बीच में पेल देंगे। यह अंदाज है। यह खुद को बेचने का हुनर है। इसलिए आप देखेंगे कि इन तमाम स्वघोषित और सेल्फ ऑब्सेस्ड संपादकों, पत्रकारों की अगुवाई वाला चैनल डूब जाता है लेकिन यह फल-फूल जाते हैं।

अब आप यहां पर पूछ सकते हैं कि मौजूदा दौर में ऐसा कौन सा संपादक है जो अच्छा है? मेरा यह निजी मत है कि कुछ समय पहले तक नकवी एक ऐसे संपादक थे जिनके प्रति सम्मान पैदा होता था और आजतक से उनकी विदाई के बाद संजय पुगलिया ही इकलौते संपादक बचे हैं जिनको देख कर सिर सम्मान में झुकता है। वरना तो इन दिनों संघर्ष अच्छे संपादकों के बीच है ही नहीं। अभी हिंदी चैनलों पर लुच्चे और उठाइगिरे किस्म के लोगों का कब्जा है। आईबीएन 7 में भी ऐसे लोगों की भरमार है। इसे और बेहतर तरीके से समझने के लिए अभी का ही उदाहरण लीजिए। अभी चैनल पर निर्भया बलात्कार कांड के आरोपियों के छिछोरे और घृणित वकील के बयान पर आईबीएन7 पर चर्चा चल रही है। वैसे तो इस घृणित बयान पर चर्चा का कोई मतलब नहीं बनता। एक ओछे आदमी के बयान को घंटों राष्ट्रीय चैनल पर चलाने का कोई तुक नहीं था। लेकिन कुछ चैनलों के औसत दर्जे के संपादकों ने इसे मुद्दा बना दिया। और आशुतोष गुप्ता जैसे महान विद्वान को भी दो दिन बाद लगने लगा कि इस पर खेला जा सकता है। मतलब आशुतोष गुप्ता की इतनी ही औकात है। यह जूठन परोस सकते हैं और वह भी दूसरे चैनलों से खराब तौर तरीके से।

आईबीएन 7 अच्छा नहीं कर सका और अच्छा नहीं कर रहा तो इसकी पहली जिम्मेदारी इसके मैनेजिंग एडिटर आशुतोष गुप्ता पर आती है। हालांकि आशुतोष अपने नाम के आगे गुप्ता नहीं लगाते हैं और आपमें से कुछ लोग यकीनन यह सोच रहे होंगे कि मैं बार-बार उनके नाम के आगे उनका सरनेम क्यों लिख दे रहा हूं। दरअसल, सरनेल छिपाना भी प्रगतिशीलता का एक पाखंड है। अगर सरनेम/लास्टनेम/उपनाम/जातिनाम नहीं लगाने से आदमी गैरजातिवादी हो जाता तो सरकार को इसे अनिवार्य कर देना चाहिए। लेकिन सच्चाई यही है कि आदमी जातिनाम लगा कर भी गैरजातिवादी हो सकता है और जातिनाम हटा कर भी घोर जातिवादी हो सकता है। आशुतोष गुप्ता भी घोर जातिवादी हैं। इसलिए इस छंटनी में ज्यादातर वैश्य-बनिया समुदाय के लोग बचा लिए गए हैं। इन लोगों की फेहरिस्त देना मेरा मकसद नहीं है, क्योंकि इनमें से कुछ प्यांदे हैं तो कुछ की औकात प्यादों से हल्की सी ज्यादा है। इसलिए जब बात सिपहसालारों की हो रही हो तो प्यांदों का जिक्र क्या करना?

पार्ट तीन

मतलब आईबीएन 7 में छंटनी के खेल में मुख्यपात्र दो ही हैं। आशुतोष गुप्ता और संजीव पालीवाल। यह दोनों बड़े खिलाड़ी हैं, लेकिन इन दोनों में ज्यादा तेज संजीव पालीवाल हैं। वह कार्यकारी संपादक हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि किसी चैनल का कार्यकारी संपादक किसी दूसरी कंपनी डायरेक्टर हो? यानी वह निजी व्यवसाय भी करता हो। सुनते हैं कि संजीव पालीवाल का अपना रिसॉर्ट है और अपनी कंपनी है। यह भी सुनते हैं कि वह न्यूजरूम में कभी-कभार यह कहते भी रहे हैं। लेकिन वह आईबीएन 7 का कार्यकारी संपादक भी है। यह कंपनी के गाइडलाइन्स के खिलाफ है और इसकी जानकारी राजदीप सरदेसाई को भी होगी। लेकिन शायद यह बात राघव बहल से छुपा कर रखी गई होगी। यह कार्यकारी संपादक शाम होते ही अपना झोला उठा कर दफ्तर से बाहर चला जाता है। यानी शाम के प्राइम टाइम में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। लेकिन चैनल की वास्तविक कमान इन्हीं के हाथ में है। जैसे इसी छंटनी में संजीव पालीवाल ने अपने हर बंदे को बचा लिया।

बरेलवी गिरोह का हर सदस्य बच गया। तस्लीम खान, इकबाल रिजवी, सरदार साजिद (इसका पूरा नाम आज तक मैं नहीं जान पाया… यह रोज आते, न्यूज़रूम में बैठते, बात होती तो पता चलता) सब बच गए। पंकज श्रीवास्तव, आलोक वर्मा, पंकज भार्गव जैसे लोग भी बच गए। यह सब मोटी तनख्वाह वाले लोग हैं, लेकिन चैनल चलाने में इनकी कोई अहम भूमिका नहीं। इनमें से एक-दो आपको प्राइम टाइम पर फिल्म सिटी में वॉक करते दिखेंगे। फिटनेस जरूरी है। कुछ बैडमिंटन खेलते नजर आएंगे। सेहतमंद रहने के लिए खेलना जरूरी है। फेसबुक-फेसबुक करते दिखेंगे। नेटवर्किंग जरूरी है। मतलब वह हर काम करते नजर आएंगे, जिसका पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं। लेकिन इन पर आंच नहीं आई। मारा कौन गया? निचले और मध्यम ओहदों पर काम करने वाला मेरे जैसा वह पत्रकार/कर्मचारी जो मेहनत करता था और जो ना तो आशुतोष गुप्ता के गुट में था और ना ही संजीव पालीवाल के गुट में था। मतलब जिन दो लोगों की नाकामी और गुटबाजी की वजह से छंटनी की नौबत आई, उन दोनों की सेहत पर कोई आंच नहीं आई है। यह इंसाफ का कौन सा तरीका है, यह हम लोगों की समझ से परे है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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