कथा सेबी के काले दूध और सोनिया-मन मोहन-चिदंबरम के रचे लाक्षागृह की!

स्कूल के दिनों में कहीं पढ़ा था कि किसी देश के लिए सेना से भी ज़्यादा ज़रुरी होती है न्यायपालिका। सच जिस देश और समाज में न्या्य न हो उस के पतन को कोई रोक नहीं सकता। इसी लिए न्याय व्यवस्था किसी भी सभ्य समाज की अनिवार्य ज़रुरत है, अनिवार्य पहचान है। लेकिन क्या यह न्याय व्यवस्था? जो अपने विवेक से काम करने के बजाय कुछ राजनीतिक स्वार्थ में न्यस्त लोगों का खिलौना बन जाए? यह न्याय व्यवस्था?

सेबी और सुप्रीम कोर्ट दोनों ही देश की प्रतिष्ठित संवैधानिक संस्था हैं। समाज में इन दोनों ही संस्थाओं की खासी साख है। लेकिन कभी-कभी कुछ व्यक्ति आ जाते हैं ऐसी संस्थाओं में भी जो इस की साख पर यदा-कदा बट्टा लगाते दिख जाते हैं। अपवाद के तौर पर ही सही। और कि बात बिगड़ जाती है। किसी निरपराध की इज़्ज़त सरे-आम नीलाम हो जाती है। वसीम बरेलवी के दो शेर याद आ रहे हैं इसी बात के मद्दे नज़र :

हर शख्स दौड़ता हैं यहां भीड़ की तरफ़
और चाहता है कि उसे रास्ता मिले

इस दौरे मुंसिफ़ी में ज़रुरी नहीं वसीम कि
जिस शख्स की खता हो उसी को सज़ा मिले

सहारा इंडिया परिवार और सहाराश्री को आज की तारीख में वसीम बरेलवी के इस शेर की रोशनी में देखा जाना बहुत ज़रुरी है। कारण यह है कि सेबी हालिया कुछ सालों से सहारा और उस के व्यवसाय के पीछे नहा-धो कर पड़ गया है। तो सिर्फ़ इस लिए कि वर्तमान केंद्र सरकार की आका श्रीमती सोनिया गांधी की सहारा पर तिरछी नज़र है। सो सेबी सोनिया गांधी के इशारे पर कठपुतली बना नाच रहा है। और कहते हैं ना कि राजा का बाजा बजा। सो सेबी और उस के चेयरमैन  राजा का बाजा बजा रहे हैं। सेबी की सहारा के बाबत मुसलसल कारगुज़ारियों को देख कर एक पुराना लतीफ़ा याद आता है। आप भी इस लतीफ़े का लुत्फ़ लीजिए :

एक लड़का था। एक शाम स्कूल से लौटा तो अपनी मम्मी से पूछने लगा कि, 'मम्मी, मम्मी ! दूध का रंग काला होता है कि सफ़ेद?

'ऐसा क्यों पूछ रहे हो ?' मम्मी ने उत्सुकता वश पूछा।

'कुछ नहीं मम्मी, तुम बस मुझे बता दो !'

'लेकिन बात क्या है बेटा !'

'बात यह है मम्मी कि आज एक लड़के से स्कूल में शर्त लग गई है।' वह मम्मी से बोला कि,  'वह लड़का कह रहा था कि दूध सफ़ेद होता है और मैं ने कहा कि दूध काला होता है !' वह मारे खुशी के बोला, 'बस शर्त लग गई है !'

'तब तो बेटा, तुम शर्त हार गए हो!' मम्मी ने उदास होते हुए बेटे से कहा, 'क्यों कि दूध तो सफ़ेद ही होता है!'

यह सुन कर वह लड़का भी उदास हो गया। लेकिन थोड़ी देर बाद जब वह खेल कर लौटा तो बोला, 'मम्मी, मम्मी! मैं शर्त फिर भी नहीं हारुंगा।'

'वो कैसे भला ?' मम्मी ने उत्सुकता वश बेटे से मार दुलार में पूछा।'

'वो ऐसे मम्मी कि जब मैं मानूंगा कि दूध सफ़ेद होता है, तब ना हारुंगा !' वह उछलते हुए बोला कि, ' मैं तो कहता ही रहूंगा कि दूध काला ही होता है और लगातार कहता रहूंगा कि दूध काला होता है। मानूंगा ही नहीं कि दूध सफ़ेद होता है। सो मम्मी मैं शर्त नहीं हारुंगा !'

'क्या बात है बेटा ! मान गई तुम को !' मम्मी ने बेटे को पुचकारते हुए कहा, 'फिर तो तुम सचमुच शर्त नहीं हारोगे।'

यह तो खैर लतीफ़ा है। पर देखिए न कि कैसे तो समूचे देश को सोनिया और उन के नवरत्नों ने लतीफ़े में बदल दिया है। घोटालों और सिर्फ़ घोटालों में पूरे देश को रंग दिया है। खैर यह कहानी बहुत लंबी है। इस का विस्तार अभी यहां प्रासंगिक नहीं है।

असल मुद्दे पर आइए। और अब एक क्षण के लिए मान लीजिए कि वह मम्मी सोनिया गांधी हैं और उन का वह दुलरुआ बेटा सेबी है, बल्कि सेबी के चेयरमैन यू के सिनहा हैं। और कि वह दूध को सफ़ेद बताने वाला लड़का सहारा है बल्कि सहाराश्री हैं। तो बात समझने में ज़रा नहीं पूरी आसानी हो जाएगी। बस थोड़ी सी तब्दीली यहां इस कहानी में यह और है कि उस लतीफ़े में तो सिर्फ़ लड़का कुतर्की और मनबढ़ था और उस कि उस की मम्मी उस को शह दे रही थी। पर यहां तो मम्मी खुद बेटे को न सिर्फ़ कुतर्क सिखा रही हैं बल्कि बेटे को तोते की तरह निरंतर रटाती जा रही हैं कि बेटा जान लो दूध तो काला ही होता है और कि तुम्हें यह हरगिज-हरगिज नहीं मानना है कि दूध सफ़ेद होता है। सहारा वाले या सहाराश्री को कहते रहने दो कि दूध सफ़ेद होता है। तुम को हर हाल में यह शर्त जीतनी है सो मन में पक्की तरह गांठ बांध लो कि दूध तो काला ही होता है। क्यों कि तुम्हें तो जीतना ही, जीतना है। बतर्ज़ इस दूध के सहारा और सहाराश्री कहते रहें कि हम ने अपनि निवेशकों को पैसा दे दिया है पर तुम तो मानो ही न कि सहारा ने पैसे दे दिया है। कोई निवेशक पैसा मांगने भी नहीं आता है तो न आए, अपनी बला से ! तुम तो बेटा बस लगे रहो और अड़े रहो कि दूध काला ही होता है। और हां, इस बेटे को एक्स्ट्रा कोचिंग देने वाले एक और अध्यापक भी हैं, वित्त मंत्री पी चिदंबरम।

बस आप को सारी कहानी समझ में आ जाएगी।

अब पूछेंगे आप कि श्रीमती सोनिया गांधी को आखिर इतनी कसरत क्यों करनी पड़ रही है? और कि वह सहारा या सहाराश्री के कारोबार के पी्छे न सिर्फ़ खुद बल्कि सेबी के चेयरमैन को भी क्यों लगाए पड़ी है? अभी तो सब के सामने सेबी ही दिखाई पड़ रही है। पर सच यह है कि किसी भी कारोबार को नियंत्रित करने वाली रिजर्व बैंक से लगायत जितनी भी वित्तीय एजेंसियां, संस्थाएं हैं हर किसी एजेंसी को सहारा के पीछे बीते एक दशक से पागल सांड़ की तरह दौड़ा लेने का निर्देश दे रखा है श्रीमती सोनिया गांधी और उन के प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह तथा वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने। इन सब की फ़ेहरिश्त बहुत लंबी है। जिन के व्यौरे जल्दी ही आप मित्रों को विस्तार से पढवाऊंगा।

वह तो सहाराश्री  और सहारा  का एक दर्शन है सामूहिक भौतिकवाद का जो उसे हिमालय की तरह माथा ऊंचा कर के खड़ा रखे है। यह सहारा की नीतिगत, नैतिक और व्यावहारिक ताकत है कि बीते दस सालों से निरंतर आंधी-तूफ़ान के बीच भी पूरी ताकत से वह अपने व्यवसाय में न सिर्फ़ खड़ा है बल्कि निरंतर प्रगति के नित नए आंकड़े भी दर्ज करता जा रहा है। अपने को देश में ही नहीं वरन दूसरे देशों में भी फैला रहा है। गरज यह कि सहारा अब ग्लोबलाइज हो चुका है। उस की तरक्की किसी सोनिया, मनमोहन, चिदंबरम या सिनहा के रोके रुकने वाली है नहीं। तो इस लिए भी कि सहारा के लिए व्यवसाय से ज़्यादा बड़ा देश है। सहारा के लिए धन बल से बड़ा श्रम बल है। ढेर सारे उस के सामाजिक सरोकार हैं। यही उस की बड़ी ताकत है। नहीं ध्यान दीजिए कि देश और दुनिया से तमाम पैराबैंकिंग कंपनियां लोगों के पैसे ले कर चंपत हो गईं, करोड़ो लोगों की मेहनत की कमाई पानी में डूब गई और यह हमारी तमाम वित्तीय एजेंसियां कान में तेल डाले, आंख पर पट्टी बांधे सोती रहीं। इन भगोड़ी कंपनियों और उन के कर्ता-धर्ताओं का राई-रत्ती भी कुछ नहीं बिगाड़ सकीं। असंख्य लोग रोते रहे, मरते रहे अपनी गाढ़ी कमाई इन भगोड़ी कंपनियों में लगा कर। पर किसी एजेंसी के कान पर जूं नहीं रेंगा। न श्रीमती सोनिया गांधी और उन के लेफ़्टिनेंट पी चिदंबरम के कान पर। लेकिन  आज की तारीख में सहारा इन सब की आंखों की किरकिरी बन गया है। इस लिए भी कि सहारा कोई भगोड़ी कंपनी नहीं है।

तो क्यों बन गया है इन के आंख की किरकिरी सहारा ? यह एक ज़रुरी सवाल है।

कारण कई एक हैं। पर यहां कुछ मुख्य कारणों को बताना बहुत ज़रुरी है। यह कथा दरसल वर्ष १९९१ से शुरु होती है। देश के दुर्भाग्य से पी वी नरसिंहा राव देश के प्रधान मंत्री बने। और कि मन मोहन सिंह उन के वित्त मंत्री। इसी बीच बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा।, मुंबई दंगे हुए। हर्षद मेहता कांड हुआ। देश की अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिर गई। देश कई साल पीछे चला गया। तिस पर तुर्रा यह कि आर्थिक उदारीकरण और डंकल प्रस्ताव जैसे तमाम डंक देश को लगने शुरु हो गए। देश की अर्थव्यवस्था वर्ल्ड बैंक के पास गिरवी रखने की नीं व रखी जाने लगी। जो कि अब देश को जर्जर करते हुए एक बड़ी मीनार के रुप में हमारे सामने उपस्थित है। देश का बाज़ार विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की बात होने लगी। देसी कंपनियों के मुंह पर जूता मारते हुए विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए सारे  दरवाज़े खोल दिए गए। विदेशी निवेश की आरती उतारी जाने लगी। एक घटना और घटी इस बीच। कि सहारा ग्रुप ने मीडिया जगत में पूरी ताकत से कदम रखा। राष्ट्रीय सहारा नाम से हेंदी और उर्दू में अखबार निकाल कर। वर्ष १९९१ में ही। बाद में अंगरेजी में भी और तमाम चैनल भी। खैर, अब हुआ यह कि सहाराश्री के नेतृत्व में न सिर्फ़ अखबार निकला सहारा का बल्कि राष्ट्रीय सहारा ने पूरे दम-खम से मनमोहन सिंह के इस आर्थिक उदारीकरण, डंकल प्रस्ताव, विदेशी निवेश आदि का न सिर्फ़ विरोध किया बल्कि अखबार के माध्यम से एक जोरदार मुहिम बल्कि एक बड़ा आंदोलन भी चलाया। लंबे समय तक। मनमोहन सिंह बोलते कम हैं। पर बिन बोले भी लोगों से बदला ले लेते हैं। सहारा उन के निशाने पर आ गया। तभी से वह साइलेंट आपरेटर बन गए सहारा के खिलाफ़, सहारा के व्यवसाय के खिलाफ़। लेकिन बाद के दिनों में गैर कांग्रेस सरकारें आईं। बदला लेने की स्थितियां थम सी गईं। सहारा को नेस्तनाबूद करने की उन की मंशा पर पानी फिर गया।

पर वो कहते हैं न कि करेला और नीम चढ़ा। वही हो गया।

क्यों कि वह समय भी आया जब यू पी ए की सरकार सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनने की बात होने लगी। तमाम और लोगों की तरह सहाराश्री ने भी सोनिया के विदेशी मूल के होने का सवाल खड़ा करते हुए उन के प्रधान मंत्री न बनने के लिए मुहिम छेड़ दिया। सोनिया प्रधान मंत्री नहीं बन पाईं। पर अपनी एक कठपुतली मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री बनाने में वह कामयाब हो गईं। अब क्या था करेला और नीम एक साथ हो गए। करेले और नीम के इस संयोग में एक तड़का और लग गया अमिताभ बच्चन और सहाराश्री की गहरी दोस्ती का। अमिताभ बच्चन और सोनिया गांधी के छत्तीस का आंकड़ा अब किसी से छुपा नहीं है। तो देश प्रेम, विदेशी निवेश और विदेशी मूल का विरोध और अमिताभ बच्चन से गहरी दोस्ती की कीमत सहारा और सहाराश्री को इस तरह जेल जा कर, अपमानित हो कर चुकानी पड़ेगी यह तो बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित, कानून के जानकार और व्यवसाय जगत  के लोग भी नहीं सोच सके थे। पर सोनिया, मनमोहन और चिदंबरम के बनाए लाक्षागृह में सहारा और सहाराश्री तात्कालिक रुप से फंस गए। पर सहाराश्री बतौर सूत्र एक बात अकसर कहते रहते हैं कि सत्य परेशान हो सकता है, पर पराजित नहीं हो सकता।

और सहारा इंडिया परिवार के लाखो कार्यकर्ता और करोड़ो सम्मानित जमाकर्ता जानते हैं कि सहाराश्री आज की तारीख में भले परेशान हों और कि सोनिया-मन मोहन-चिदंबरम के बनाए लाक्षागृह यानी कारागार में हों पर वह पराजित नहीं होंगे यह तय है। एक दिन उन का सत्य सोने की तरह तप कर सब के सामने उपस्थित होगा। और बहुत संभव है सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्याय मूर्ति लोग कल अपने विवेक का इस्तेमाल करें और कि सेबी के लोग भी अपनी ज़िद तोड़ें और सहाराश्री को सोनिया-मन मोहन के लाक्षागृह से रिहा कर दें। बहुत मुमकिन है कि ऐसा ही कल हो जाए। क्यों कि किसी भी चीज़ की अति बहुत अच्छी नहीं होती। कबीर कह ही गए हैं कि :

अति की भली न बोलना, अति की भली न चूप
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

वहीं रमानाथ अवस्थी अपने एक गीत में लिखते हैं कि:

किसी से कुछ कहना क्या
किसी से कुछ कहना क्या
अभी तो और चलना है !

तो सहारा और सहाराश्री को इन तमाम बाधाओं को पार करते हुए अभी बहुत सारे काम करने हैं, बहुर सारी मंज़िलें पानी हैं, बहुत सारे व्यवसायिक और सामाजिक कीर्तिमान गढ़ने हैं। यह सब तो मामूली बाधाएं हैं। एक सच यह भी है कि जाने सहारा के साथ क्या है कि जब भी कभी सहारा इंडिया परिवार संकट में पड़ता है, जल्दी ही न सिर्फ़ संकट से उबर जाता है बल्कि और मजबूती से खड़ा हो कर व्यवसाय के ढेर सारे नए कीर्तिमान भी गढ़ता है। सहारा  कोई पहली बार संकट में नहीं फंसा है। बहुत लंबी फ़ेहरिश्त है बीते कुछ सालों में सहा्रा के संकट में फंसने और उबरने की। इस संकट से भी सहारा न सिर्फ़ बाहर आएगा बल्कि और मजबूती से पूरे देश के सामने उपस्थित दिखेगा। यह एक अकाट्य सत्य है।

हाल-फ़िलहाल तो सहाराश्री के व्यक्तित्व के बखान में मशहूर और अजीम शायर मुनव्वर राना को यहां पढ़िए और सहाराश्री के व्यक्तित्व के ताप को महसूस कीजिए। १० जून को सहाराश्री का जन्म-दिन होता है जिसे सहारा इंडिया परिवार समारोह पूर्वक हर साल मनाता है। ऐसे ही एक जन्म-दिन पर देश के अजीम शायर मुनव्वर राना सहारा शहर आए थे सहाराश्री को बधाई देने। तभी उन्हों ने यह नज़्म पढ़ कर सहाराश्री को बधाई दी थी। तो सहाराश्री के बाबत यह नज़्म पढ़िए पूरे इत्मीनान से और उन में जहांगीर सी खुशबू को आत्मसात कीजिए और कि सोनिया-मनमोहन के दुष्चक्र और उन के बनाए लाक्षागृह को तार-तार कीजिए।

सहाराश्री की सालगिरह के ख़ुशगवार मौक़े पर

मुनव्वर राना

दिल में खिलते हों जहां सिर्फ़ मोहब्बत के कमल
सोचता रहता हो दिन रात गरीबी का जो हल

अपने लहजे में समेटे हुए उर्दू की ग़ज़ल
जिस ने आंखों मे बसा रक्खे हों सौ ताज महल

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

सर फिरी मौजों को अपने लिए साहिल कर ले
अपने दुश्मन को भी चाहत से जो हासिल कर ले

अपनी खुशियों में जो औरों को भी शामिल कर ले
हर ज़मीं फूल खिला देने के क़ाबिल कर ले

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

भूले बिसरे हुओं को याद भी जो करता हो
कै़द से चिड़ियों को आज़ाद भी जो करता हो

दिल दुखे लोगों की इमदाद भी जो करता हो
शहर, वीराने में आबाद भी जो करता हो

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

जिस के हर ख़्वाब में शामिल हो वतन की अज़मत
जिस के  अलक़ाब  शामिल हो वतन की अज़मत

जिस के हर बाब में शामिल हो वतन की अज़मत
जिस के  आदाब में शामिल हो वतन की अज़मत

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

चांदनी,धूप को, रातों को जो काजल कर ले
ग़ैर के ग़म में भी आंखों को जो जल-थल कर ले

ख़्वाब में देखे महल और मुकम्मल कर ले
मुश्किलें राह में आएं तो उन्हें हल कर ले

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

देश से, देश के लोगों से मोहब्बत भी करे
खेल से प्यार करे और सख़ावत भी करे

जां लुटाते हुए हर फ़ौजी की इज़्ज़त भी करे
जिस के हर काम की तारीफ़ हुकूमत भी करे

इस तरह सालगिरह उस की मनाई जाए
रोज़ उस के लिए इक शम्मा जलाई जाए

जिस की तसवीर से तक़दीर की खु़शबू आए
ईंट रख दे जहां तामीर की ख़ुशबू आए

ख़्वाब के साथ ही ताबीर की खुशबू आए
उस से मिलिए तो जहांगीर की ख़ुशबू आए

आमीन !

दनपा
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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