बाल रंगने के चक्कर में पीएम मनमोहन की मीटिंग की भी परवाह नहीं करती थीं शोभना भरतिया!

: बारू की किताब में सिद्धार्थ वरदराजन, वीर सांघवी, प्रणय राय, विनोद मेहता और शेखर गुप्ता के बारे में क्या-क्या कहा गया, यहां जानिए :  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की पुस्तक 'द एक्सीडैंटल प्राइम मिनिस्टर' में मीडिया की कई हस्तियों के बारे में भी खुलासे किए गए हैं. हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स अखबार की मालकिन शोभना भरतिया से लेकर टाइम्स आफ इंडिया की मालकिन इंदू जैन तक के बारे में रोचक जानकारी दी गई है. बताया गया है कि प्रधानमंत्री सुबह 8.30 बजे नाश्ते पर सम्पादकों और मीडिया मालिकों के साथ मुलाकात किया करते थे.

वह समय पर पहुंच जाते थे, लेकिन मीडिया वाले मनमोहन सिंह की तरह सुबह जल्दी नहीं उठते थे. जब 2004 में पब्लिशरों को आमंत्रित किया गया तो हिंदुस्तान टाइम की शोभना भरतिया देर से आईं. उन्होंने कहा कि वह अपने बाल रंग रही थीं इसलिए कुछ समय लग गया. टाइम्स ऑफ इंडिया की इंदू जैन ने कहा कि वो अपनी सुबह की प्रार्थना खत्म करके आई हैं.

2004 और 2008 के बीच मीडिया सलाहकार के पद पर काम करने वाले बारू ने लिखा कि वाजपेयी सरकार के दौरान वरिष्ठ सम्पादकों को विशेष अधिकार दिए गए थे. बारू के मुताबिक- ''मुझे बताया गया कि वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्या की बहुत से वरिष्ठ सम्पादकों के साथ मित्रता थी. वह इस बात को यकीनी बनाने में निजी तौर पर रुचि लेते थे कि पी.एम.ओ. पत्रकारों की अच्छी तरह देखभाल करे. मैंने ऐसे सभी अधिकारों को खत्म कर दिया और कुछ महानुभवों के क्रोध का शिकार भी बना'

किताब में बारू ने लिखा है कि उनको यह देखकर कुछ राहत मिली कि अधिकांश पत्रकार अपने पेशेवर नजरिए से अपना काम बढिय़ा कर रहे थे, उनका प्रयास एक अच्छी खबर या कहानी प्राप्त करने का होता था। वह अपनी रिपोर्टिंग में यर्थाथवादी होते थे। मेरे सख्त रवैए के बावजूद वह अपना सही काम करते थे। पत्रकारों की दूसरी श्रेणी में वे लोग थे जो हर तरह की सुविधाएं चाहते थे। उनकी तरफ विशेष ध्यान देना पड़ता था जैसे उनको एक छोटी सी विदेश यात्रा करवाना या फिर एक विशेष स्टोरी बनवाना होता। तीसरी श्रेणी के पत्रकार पक्षपात करने वाले होते थे। जो भाजपा समर्थक, वाम समर्थक, सोनिया समर्थक, अर्जुन समर्थक और प्रणव मुखर्जी समर्थक होते थे। मेरा नजरिया यही रहता था कि उनसे दूरी बनाए रखी जाए। मेरे इस रवैए से कुछ सम्पादक बहुत तिलमिला उठे, विशेषकर वे जो सोनिया के करीब थे जिनकी धारणा ये थी कि सरकार उनकी जेब में है और पी.एम.ओ. को अलग से व्यवहार करना चाहिए।

किताब में मीडिया की कुछ हस्तियों के बारे में जो रोचक जानकारी है, वह इस प्रकार है…

सिद्धार्थ वर्द्धराजन के बारे में : तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जे.एन. दीक्षित कुछ यात्राओं के लिए वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वर्द्धराजन को प्रधानमंत्री के विमान में सवार होने की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे। बारू ने लिखा कि प्रधानमंत्री कार्यालय के भीतर पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का रवैया तानाशाही जैसा था। जो मेरे काम से टकराव में आ गया। हमारी पहली असहमति इस बात को लेकर हुई कि प्रधानमंत्री के सरकारी विमान के साथ कौन यात्रा कर सकता है। टाइम ऑफ इंडिया के पत्रकार वर्द्धराजन जो बाद में द हिंदू के सम्पादक बन गए, का नाम मीडिया सूची में देखकर दीक्षित ने एक नोट भेजकर मुझे सूचित किया कि सिद्धार्थ एक भारतीय नागरिक नहीं बल्कि अमरीकन नागरिक हैं। विदेशी नागरिक होने के कारण वह प्रधानमंत्री के विमान में यात्रा नहीं कर सकते। बारू ने इस मामले में प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करवाया और वर्द्धराजन को विमान में सवार होने की अनुमति दी गई।

प्रणय राय : 2005 में मनमोहन सिंह पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह को अपनी तरफ लाने की कोशिश कर रहे थे ताकि भारत-अमरीका नागरिक परमाणु ऊर्जा समझौते को संसद में पेश किया जाए। जब एन.डी.टी.वी. ने यह खबर दी कि नटवर सिंह का पी.एम.ओ. द्वारा जारी रिपोर्ट कार्ड में प्रदर्शन खराब था। नटवर काफी हताश हुए और उन्होंने एक दिन का अवकाश ले लिया व कहा कि वह बीमार हैं। प्रधानमंत्री उस समय मास्को में थे जब यह घटनाक्रम हुआ। उन्होंने बारू से कहा कि वह तुरंत एन.डी.टी.वी. के मालिक प्रणय राय को फोन करें। मनमोहन सिंह ने बारू से फोन अपने हाथ में लेते हुए राय को झाड़ा। राय उस समय मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार हुआ करते थे जब वह नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री थे। प्रधानमंत्री ने राव को इस तरह डांटा जैसे वह एक बच्चे को गलती करने पर डांटते हैं और कहा कि यह ठीक नहीं। कुछ समय बाद राय ने मुझे फोन किया और कहा कि मनमोहन सिंह ने एक प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, एक हैडमास्टर की तरह बात की है।

वीर सांघवी : बारू ने सांघवी पर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से एक ही दिन में ‘भाड़े’ के और सख्त प्रश्र पूछने का आरोप लगाया। सांघवी तब द हिंदुस्तान टाइम्स के सम्पादक थे। बारू ने लिखा कि 12 अक्तूबर 2007 को सोनिया गांधी और डा. सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्स सम्मेलन में भाषण दिया। सांघवी ने पूर्व स्वीकृत प्रश्नो में से सोनिया से एक प्रश्न पूछा तो उसके जबाब में सोनिया ने उसके जबाब में रकहा कि परमाणु समझोते की बजाय सरकार को बचाय रखना अधिक महत्वपूर्ण है। इसके शीघ्र बाद ही मनमोहन सिंह उसी मंच से भाषण देने उठे। तो सांघवी ने उनसे कहा कि आप ने जो  एक ब्यान समाचार पत्र में दिया है वह आपके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता और इसी कारण सारा विवाद शुरू हुआ है, क्या आप समझते हैं कि आपने अपनी सीमा लांघ दी है। तो सिंह ने कहा कि उन्होंने कोई सीमा नहीं लांघी। वह जानते हैं कि समय क्या करना चाहिए या क्या  नहीं कहना चाहिए।

विनोद मेहता : बारू ने आऊटलुक पत्रिका के तत्कालीन सम्पादक विनोद मेहता पर सोनिया-मनमोहन विवाद में सोनिया गांधी का पक्ष लेने का आरोप लगाया। बारू ने लिखा आऊटलुक ने अपनी कवर स्टोरी में 2004 में लिखा कि मनमोहन सिंह ने परमाणु सौदे मामले पर खुद को साबित किया। साथ ही सतर्कतापूर्वक इस बात का उल्लेख किया कि सोनिया गांधी ने ही सिंह को ऐसा करने के लिए सहयोग दिया। पत्रिका ने लिखा कि सोनिया चाहती थी कि मनमोहन एक राजनीतिक प्रधानमंत्री बनें न केवल प्रशासक की तरह काम करें।

शेखर गुप्ता : 2004 में मीडिया सलाहकार के रूप में पी.एम.ओ. में शामिल होने से पूर्व बारू फाइनैंशियल एक्सपै्रस के सम्पादक थे जब उन्होंने अपने बॉस को अपनी नई नौकरी के बारे में बताने के लिए फोन किया तो इंडियन एक्सप्रैस ग्रुप के तत्कालीन सी.ई.ओ. शेखर गुप्ता ने उन्हें बताया कि वह अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। क्योंकि सरकार 6 महीने से अधिक समय तक नहीं चलेगी। गुप्ता को पूरा यकीन था कि कांग्रेस और वामदल मिलकर काम नहीं कर पाएंगे। उन्होंने फाइनैंशियल एक्सप्रैस को 6 महीने तक चलाया। उनको आशा थी कि बारू वापस लौट आएंगे।

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