मीडिया को जब आर्थिक रिश्वत देने की शुरुआत हुई तो आप सरीखे लोगों ने आवाज क्यों नहीं उठाई?

Sumant Bhattacharya : अपने अग्रज Chanchal Bhu ने एक सवाल उठाया… इस चुनाव में सबसे बड़ी हार अगर किसी की हुई है तो वह मीडिया की है। अब यहां से मेरा सवाल शुरू होता है, मीडिया को जब आर्थिक रिश्वत देने की शुरुआत हुई तो आप सरीखे लोगों ने क्या आवाज उठाई थी… मेरा सवाल है क्यों पत्रकारों को मान्यता प्राप्त या गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार का तमगा दिया जाता है… क्या इससे सरकार की अनुकंपा हासिल करने की होड़ नहीं मची पत्रकारों में…

क्यों पत्रकार को रेलवे में रियायत दी जाती है… वैसे ये काम आपके पुराने मित्र नीतीश कुमार ने ही शुरू किया था… क्यों पत्रकारों को सरकारी आवास दिए जाते हैं…. कल्पना कीजिए यदि यह काम अंग्रेजों ने किया होता, और गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर गांधी और तिलक, सब मान्यता प्राप्त पत्रकार होते तो शायद हम किसी और भारत के बारे में बतिया रहे होते.


वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए प्रमुख कमेंट इस प्रकार हैं…

Sandeep Verma आपके इस सवाल का जवाब तो गैर-पत्रकार ही दे सकते है . पत्रकार तो रफू और पैबंद की भाषा ही प्रयोग करेंगे . वैसे सरकारी सहायता या मदद से उन्हें इमानदार बने रहने में मदद मिलनी चाहिए थी ,मगर हुवा शायद इसका उलटा ही है.
 
Alok Joshi सही सवाल है Sumant ईमानदारी किसी मदद की मोहताज नहीं होती। एकदम सही बात है। पत्रकारों को पत्रकारिता करने के लिए सरकारी मदद क्यों चाहिए। वो भी इस दौर में जब कंपनियां तरह तरह की सुविधाएं दे रही हैं, और अच्छे पत्रकारों की तो बाजार में डिमांड भी खूब है।

Rajneesh Agrawal सुमन्त भाई दिल बावला हो जाता है आपके लेखन को देखकर। हालाँकि मैं आपके इस कथन से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूँ कि गांधी और गणेश विधार्थी भी बिकाऊ थे। वास्तव मैं उनकी पत्रकारिता का उद्देश्य भिन्न था। कृपया उनसे मिलान न करें।
 
Arvind Vidrohi jo patrkar sarkari suvidha nahi lete, manyta nahi liye hain unko sahi Patrkar nahi mana jata Sumant Bhattacharya bhai ji
 
Sumant Bhattacharya सबसे पहले आलोक भाई को साधुवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मुख्यधारा की पत्रकारिता में होने के बावजूद इस सवाल पर नैतिक समर्थन दिया….

Sumant Bhattacharya अब रजनीश के प्रश्न पर आता हूं…मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि यदि अंग्रेज इस कौशल से वाकिफ होते तो शायद जनआवाज को कब का नेस्तनाबूत कर देते, बिकाऊ पत्रकारों की एक भीड़ के हमले में गांधी,तिलक, अली भाई, विद्यार्थी अलग-थलग पड़ चुके होते…..

Sumant Bhattacharya अरविंद भाई, दरअसल ये सवाल मैंने सिर्फ इस लिए उठाया कि चंचल भाई ने कहा कि, इस चुनाव में यदि किसी की सबसे बड़ी हार हुई तो मीडिया की…मैं यही निवेदन करना चाहता हूं कि मीडिया तो बहुत पहले ही हार चुका है..तभी जब चंचल भाई के समाजवादी मित्र मुलायम सिंह यादव, पत्रकारों के घर-कार दे रहे थे…जेपी के चेले नीतीश रेल के सफर में 50 फीसदी की रियायत दे रहे थे…जब शुचितावादी प्रेस की आजादी या अभिव्यक्ति के संकट पर चीखते हैं तो मन जुगुप्सा से भर उठता है,,ये तब क्यों खामोश रहते हैं जब मीडिया को सरकार आर्थिक रिश्वत देती है…तब क्यों नहीं शुचिता का प्रश्न उठाते हैं..तब क्यों नहीं कहते हैं कि अभिव्यक्ति को खरीदा जा रहा है…..आज उस मीडिया की हार का सवाल उठा रहे हैं जो कब का हार चुका है..कब का मर चुका है..आज तो सिर्फ उसके अस्थिकलश को लेकर जुलूस निकाला जा रहा है……

Arvind Vidrohi Sumant Bhattacharya bhai ji — sab media ko apne tarike se hankna chahte hain aur jab piche rah jate hain is daud me tab gariyate hain aur ab baat yaha tak aa gai
 
Sumant Bhattacharya अरविंद भाई …यही तो हैरानी होती है कि एक भी माई का लाल पत्रकार ये साहस नहीं दिखा पाता है कि खुल कर कहे…मैं नहीं लूंगा सरकार की रिश्वत….आखिर रिश्वत लेने वाला स्वतंत्रता की गुहार कैसे लगा सकता है…
 
Arvind Vidrohi Sumant Bhattacharya bhai ji — patrkar bandhu ab kisi na kisi party ya neta ke prati vafadar hain
 
Alok Joshi मैंने १९९२ में कहा था। आज फिर दोहरा रहा हूँ। आपने याद दिला दिया। जब बाबरी मस्जिद ढहाई गईँ तो पत्रकारों की भी जमकर पिटाई हुई। मीडिया ने ख़ूब हल्ला मचाया कि हमें भी नहीं छोड़ा। .. तब मेरा सवाल था – देश के क़ायदे क़ानून को ताक पर रखकर मनमानी कर रही भीड़ से भी आप शिष्टाचार की उम्मीद कर ही कैसे सकते हैं। मगर प्रेस गैलरी और मान्यता के ही भरोसे पत्रकारिता करनेवाले तो दंगे और युद्ध में भी प्रेस गैलरी की उम्मीद करेंगे? नहीं?

Sumant Bhattacharya बिल्कुल दुरुस्त फरमाया आलोक भाई आपने….यदि आप पड़ताल करें तो यहां पीआईबी की ओर से राशनकार्ड हासिल करने के लिए पत्रकारों में लॉबिंग होती है….

Sumant Bhattacharya मेरी विनम्र शिकायत है चंचल भाई से..उन्होंने बदलते दौर को देखा है….यदि वो अपने अनुभवों की सच्चाई को ही निर्भिकता से बयां करें तो वाकई बाद की संतति अनुग्रहित होगी….पर्दे में छिपे कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं..बदलते दौर को कहीं अधिक स्पष्टता से युवा पीढ़ी समझ सकता है..इतिहास की गलतियों को दोहराने से बच सकता है….लेकिन शायद अपने चंचल भाई ऐसा नहीं करेंगे..उनके लिए रिश्तों की पूंजी शायद कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है……

Arvind Vidrohi उनके लिए रिश्तों की पूंजी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है……@ Sumant Bhattacharya bhai rgt

Sanjaya Kumar Singh सुमंत भाई आप बहुत निष्पक्ष होने के फेर में मूल बात को ही हल्का कर दे रहे हैं। सवाल महत्त्वपूर्ण होता है, सवाल उठाने वाला नहीं। इसी तरह यह भी ठीक नहीं है कि यह, वह सब होता रहा है इसलिए इससे क्यों शुरू करें। कहीं से तो शुरुआत करनी होगी। मुलामय ने मकान-पैसे,प्लॉट आरक्षण दिए, तब मैंने नहीं कहा कि गलत है (मान लीजिए मेरी हैसियत नहीं थी या मैं लेने वालों की लाइन में था) इसका मतलब यह नहीं है कि मैं इसपर चर्चा नहीं कर सकता।
    
Sanjaya Kumar Singh चंचल जी से मैं नहीं मिला, फेसबुक पर ही उन्हें जाना। आपकी बात अपनी जगह सही है कि, यदि वो अपने अनुभवों की सच्चाई को ही निर्भिकता से बयां करें तो वाकई बाद की संतति अनुग्रहित होगी – पर यह उनकी आजादी है। वे चाहे तो ना करें। पर इसका मतलब चयह नहीं है कि वो जो बया करें उसे आप या कोई भी इसलिए खारिज कर दे कि उन्होंने वह नहीं बताया। वो क्या बताएंगे क्या नहीं यह वही तय करेंगे। इस आधार पर आप उनके बारे में राय बना सकते हैं पर जो बता रहे हैं वो तो बताने दीजिए। रिश्तों की पूंजी या कोई भी पूंजी (बेईमानी, मक्कारी और चोरी की काली कमाई भी) जिसकी होती है उसकी होती है। हम आप उसे लुटाने या बांटने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। उसे जब्त करने का कोई कानून हो तो उसपर कार्रवाई होनी चाहिए।
 
Alok Joshi रिश्तों की पूँजी मेरे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है।
 
Nitin Pandey Waah sir maza aa gaya
     
Sumant Bhattacharya संजय भाई…मूल बात तो यही है ना कि मीडिया हार गया, या हार जाएगा…तो मैं यही कहना चाह रहा हूं कि हार तो वो कब का गया है…दरअसल हम भारतीयों में किसी भी संवैधानिक या संविधान इतर संस्थानों को बनाए रखने की कूवत ही नहीं है,…..क्योंकि हमें नहीं पता है कि किन मानकों पर कोई संस्थान बनाए रखे जाते हैं…

Sumant Bhattacharya संजय भाई ,..आपकी दूसरी बात पर मेरी राय है कि या तो आप रिश्तों की पूंजी का संरक्षण कर लीजिए या फिर सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात…बीच का रास्ता कैसे मुमकिन है…..ये ठीक वैसे ही जैसे कोई नौकरशाह रिटायरमेंट के बाद व्यवस्था को कोसता है,..तब एक सहज सवाल उठता है कि आखिर नौकरी में रहते हुए कौन से मुर्गी के अंडे सें रहा था…..हां…संजीव चतुर्वेदी…..अशोक खेमका जैसे नौकरशाहों को इस पंगत में नहीं रखा जा सकता है…

Sanjaya Kumar Singh ऐसा नहीं है कि जिन नौकरशाहों के काम और नाम मीडिया में नहीं आते या जिनकी सार्वजनिक रूप से तारीफ नहीं होती वो कायदे का काम नहीं करते या चोर और बेईमान ही होते हैं। इसके बावजूद अगर वे रिटायरमेंट के बाद व्यवस्था परिवर्तन के लिए काम करना चाहे तो मैं उसे गलत नहीं मानता। जब जागा तभी सबेरा। और रिश्तों की पूंजी के साथ सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात… को अगर बीच का रास्ता मान भी लूं तो एक-एक जोड़कर सौ नहीं होगा क्या। जो जितना कर सकता है करे, क्या बुराई है। और अंत में मीडिया की हार। एक गोल की हार और 10 गोल की हार में फर्क है। ऐसा नहीं है कि बाकी के नौ गोल की हार पर हम चर्चा नहीं करते। मेरी चिन्ता है कि आपका प्रयास सराहनीय है। मुद्दों पर बहस होनी चाहिए। पर सबको (बहस करने वालों को और मुद्दों को भी) खारिज करते जाएंगे तो बहस कैसे होगी।

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