विकास के मलबे में दबे एक सितार का राग

घने जंगलों व पहाड़ों से घिरा यह कस्बा हबीब तनवीर साहब को कुछ ज्यादा ही पसंद था, इसलिये जब कभी भी मौका मिलता वे यहां अपने परममित्र चुन्नीलाल डोंगरे जी के यहां चले आते। स्थानीय इप्टा इकाई के जनक डोंगरे जी हबीब साहब की खिदमत में तंदूरी मुर्ग पेश करने के अलावा बांसुरी की तान अथवा सितार के तार छेड़ते थे। अब न हबीब साहब हैं न डोंगरे जी। डोंगरे जी के सितार को खामोश हुए कोई 15 बरस से ज्यादा अरसा गुजर चुका है। तब से उनके सुपुत्र सुधीर डोंगरे इस सितार को उसी खामोशी के साथ संभाले हुए थे। कल यह सितार विकास के मलबे में दब कर चूर हो गया।

मध्यप्रदेश के हरसूद से लेकर उड़ीसा के कलिंगनगर तक और महाराष्ट्र के जैतापुर से लेकर छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ तक विकास की

बांसुरी की तान छेड़ते डोंगरे जी
कहानी एक ही है। यह गाथा लोगों को उजाड़ने, विस्थापित करने और तोड़-फोड़ के साथ ही प्रारंभ होती है। चूंकि हम एक सुसभ्य-लोकतांत्रिक राष्ट्र में रहते हैं इसीलिये हम अपनी सरकारें महज इसलिये चुनते हैं कि वे हमारा विकास कर सकें और वे बाज मौकों पर हमारा विकास करते भी हैं। अब ये बात अलहदा है कि हमारी सरकारें शायराना मिजाज में हमारी तरक्की तय करती हैं और हमें कहना पड़ता है कि ‘‘ वो बेदर्दी से सर काटें अमीर और मैं कहूं उनसे/हुजूर आहिस्ता-अहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता।’’

लेकिन अपने मुल्क को चरागाह की तरह भारी-भरकम विदेशी कंपनियों के लिये खोल देने के बाद कोई सरकार विकास का कोई भी काम आहिस्ता-आहिस्ता करना कैसे बर्दाश्त कर सकती है? विकास की गाड़ी अपने मुल्क में सरपट दौड़ सके इसलिये सड़कों का चौड़ा होना जरूरी है। सड़कें चौड़ी करनी है तो लोगों का उजाड़ना होगा। उजाड़ते समय यह देखने की भी जरूरत नहीं है कि उजड़ने वाला बेजा कब्जे में है या अपनी मिल्कियत वाली जमीन पर। यदि आप अंबानी-मित्तल-माल्या नहीं हैं, तो उजड़ना आपके नसीब में बदा है। आप बेजा क़ब्ज़े में है तो बेमुआवज़ा और यदि बज़ा़ क़ब्जे़ में है तो बामुआवज़ा उजड़ेगें, पर उजड़ेगें जरूर।

एक समय इस कस्बे में कोयले वाले इंजिनों का धुआँ फलक पर तारी होता था। डोंगरे जी रेलवे में मजदूरों को उनकी बेहतरी के लिये इकट्ठा करते थे और बाहर समाज की बेहतरी के लिये थियेटर करते थे। लिखने से लेकर बांसुरी की तान व सितार के तार छेड़ने का काम इसी थियेटर के प्रति उनके कमिटमेंट का हिस्सा था। एक बार हँसते-हँसाते उन्होंने बताया था कि रेल के इंजिन के हॉर्न में निषाद होता और कभी-कभार वे अपनी बॉंसुरी को इसी से ‘ट्यून’ कर लेते हैं।

अब न वो रेल के इंजिन का धुआँ है, न बाँसुरी की तान है और न ही वो हॉर्न की आवाज है जो पाकीजा़ फिल्म के एक गाने में इंतिहाई सुरीली सुनाई पड़ती है। समय के साथ इस कस्बे की चमक भी फीकी पड़  गयी होती अगर यहां एक अदद पहाड़ी वाला मंदिर नहीं होता। इस मंदिर की घंटियों की खनक बीते दिनों में पूरे सूबे में सुनाई पड़ने लगी और देखते ही देखते यह छोटा-सा कस्बा -टूरिस्ट प्लेस हो गया जहां सड़कों का लकदक और चौड़ा होना लाजमी था। इस बात का जिक्र लोग बड़े गुमान से करने लगे और तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि यही गुमान उनके घरों को तोड़ने वाला है। बकौल सुधीर सक्सेना:

हाथी के दुश्मन हो गए हाथी दाँत,
गेंडे के दुश्मन उसी के सींग,
हिरनों का बैरी हुआ उन्हीं का चर्म,
शेरों-बाघों की शत्रु उन्हीं की खाल और अवयव.
विषधर का शत्रु हुआ उसी का विष,
समूर की ज़ान का गाहक हुआ उसी का लोम,
इसी तरह

तनवीर साहब के साथ डोंगरे जी

प्रेमियों की जान ली प्रेम ने
सुकरात को मारा सत्य ने,
ईसा को प्रेम ने,
और करूणा ने कृष्ण को
गाँधी को मारा गोडसे ने नहीं,
गाँधी के उदात्त ने.
नदी का शत्रु हुआ उसका प्रवाह,
पहाड़ को डसा ऊँचाई ने,
और वनों की देह छलनी की काठ ने.
इसी तरह
इसी तरह
आदमी के भीतर
आदमी को मारा
आदमी के गुमान ने?

लब्बो-लुआब यह कि कल जब प्रशासनिक अमला बुलडोजरों के साथ सड़क के किनारे घरों को रौंदने निकला था तो  डरे-सहमे बाशिंदे खुद ही अपने घरों को तोड़ने में लगे थे कि कम से कम माल-असबाब का नुकसान तो न हो। इन्हीं में से एक डोंगरे जी के  साहबजादे सुधीर भी थे जो एक-एक  ईंट जोड़कर बनाये अपने ही घर के एक हिस्से को तोड़ने में लगे थे ताकि सामने से विकास की चमचमाती हुई बहुत चौड़ी सड़क निकल सके। इस घर के साथ बहुत-सी यादें भी जुड़ी थीं। डोंगरे जी की भी और तनवीर साहब की भी। लेकिन प्रशासन शायरी से नहीं कानून से चलता है और कानून ने सुधीर को इतना  मौका नहीं दिया कि वह ऊपर के कमरे में रखे डोंगरे जी के सितार को बचा पाते। डोंगरे जी का सितार एक झटके में मलबे में दबकर चूर हो गया। कसे हुए तारों की चोट खाती-गुनगुनाती आवाज मैंने कई बार सुनी है पर एक बेआवाज सितार ने जब अपना दम तोड़ा होगा तो उसकी कराहती हुई आवाज कैसी रही होगी, इसका मुझे कोई अंदाजा नहीं है।

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग इप्‍टानाम पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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