संजय से स्वामीजी को कमरा बंद करके चर्चा क्यों करनी पड़ी?

: अब  एक और संजय नहीं : वह लगभग चौदह-पन्द्रह वर्ष का लड़का था… नाम था संजय.. आश्रम में सफाई और इधर-उधर के छोटे-मोटे काम करता… तवे सा काला रंग, फटी पैंट, बड़े-बड़े दाँत, मैली टीशर्ट और हमेशा चेहरे पर रहने वाली हँसी उसकी पहचान थी… उसके दिन भर हँसते रहने से आश्रम आने वाले यात्री परेशान होते और इसी से वह सबकी डांट खाता… एक दिन उसे किसी ने इसी बात पर थप्पड़ मार दिया और वह रोता हुआ मेरे पास आया… मैंने उसे चुप कराते हुए कहा कि तुम सफाई से रहने की आदत डालो और मुझसे रसोई का काम सीखो.

मेरे जाने के बाद स्वामीजी की सेवा करना… यहाँ तुम्हे कोई कुछ नहीं कहेगा… मैं लगभग दो महीना हरिद्वार रहती ही थी… उसी दौरान मैंने उसे सब काम समझा दिया और उसने भी निष्ठा से सीखा… उसे ज़िम्मेदारी सौंपकर मैं वापस शाहजहाँपुर आ गयी… लगभग आठ महीने बाद दोबारा हरिद्वार जाना हुआ… वहाँ पहुँच कर देखा तो पुराना संजय पहचान में ही नहीं आया… कान में बाली, गले में सोने की चेन, ऊँगली में अंगूठी, कलाई में घड़ी, नोकिया के तीन-तीन महंगे सेट, दस से ज्यादा जोड़ी चप्पल-जूते, और अनगिनत ब्रांडेड कपड़े… मैं हैरान रह गयी… स्वामीजी के साथ ऐसे लोग भी थे जो दस साल की उम्र में आये और आज दस साल के बच्चे के पिता हैं… मैंने कभी भी स्वामीजी को उनके प्रति इतना उदार नहीं देखा… वेतन के अलावा सामने होते तो पर्वों पर सौ-दो सौ दे देते… इसके अलावा उनके द्वारा इस्तेमाल की हुई वस्तुओं पर ही कर्मचारियों की दृष्टि होती थी और वे उन्हें पाकर प्रसन्न भी होते थे.

नया खरीद कर देना तो काफी नयी घटना थी मेरे लिये… दो दिन बाद संजय को स्वामीजी के आसन पर सोते देखा… क्रोधित हो मैंने उसे डांटा तो वह खड़ा हो गया और बोला, दीदी स्वामीजी ने ही कहा था कि यहाँ सो जाया करो… यह एक और नयी बात थी… मुझे विश्वास नहीं हुआ… मैंने स्वामीजी से पूछा तो उन्होंने माना… अपनी उस समय की स्थिति को मैं शब्दों में नहीं बता सकती… जो आश्रम से जुड़े हैं वह समझ सकते हैं कि यह कितनी बड़ी बात थी… मेरे वहाँ न रहने पर वह सोफे पर बैठता और कर्मचारियों को घंटी बजाकर बुलाता… ऐसा स्वामीजी के अलावा और कोई नहीं करता था… पहली बार में जो देखा उससे स्तब्ध थी… धीरे-धीरे आगे और बातें सामने आती गयीं और हैरानी की जगह गुस्से ने ले ली… जो हो रहा था वह ठीक नहीं था… स्वामीजी से क्या कहती और निर्लीप्त रह नहीं पा रही थी… बस गंगा जी से मानसिक शांति की गुहार लगाती.

जाने क्यों तब तक मुझे यही लगता रहा कि स्वामीजी यह सब जानते नहीं हैं या फिर फुर्सत न होने के कारण जानना ही नहीं चाहते… वह वहाँ लगभग चार साल रहा… इस बीच बहुत कुछ हुआ… पूरे आश्रम में कोई नहीं था जो उसे कुछ कह पाता.. जिस किसी ने कभी कुछ कहा तो स्वामीजी ने कहने वाले को सबके सामने मारा… किसी से झगड़ा होने पर वह स्वामीजी के मोबाइल पर फोन करता और स्वामीजी जहाँ होते वहीँ से उसका पक्ष लेते… स्वामीजी की अनुपस्थिति में भी उनके निवास की चाबी उसके पास रहती और वह उसी में रहता… उनके आसन पर बैठकर टीवी देखता, वहीँ सोता… वहीँ खाता… यह इसलिए भी अनुचित था कि स्वामीजी का निवास आश्रम की मर्यादा का हिस्सा था… भक्तों के लिये वह मंदिर ही था… इसके अलावा नीचे भण्डार चलता था और सभी आश्रम वासी उसी में खाते थे.

मर्यादा की तो यहाँ क्या बात करूँ… उसके कमरे में टीवी और म्यूज़िक सिस्टम था… जिसे वह अपने गाँव जाने के पहले बेच देता और वापस आने पर नया खरीदता… जब भी गाँव जाता स्वामीजी उसे मुँह माँगा पैसा देते… कभी दस हज़ार कभी बीस हज़ार… डेढ़ हज़ार वेतन पाने वाले कर्मचारी के हिसाब से यह बहुत अधिक था और उसके घर में ऐसी कोई आपदा भी नहीं थी कि उसे इतना पैसा सहायता के तौर पर दिया जाता हो… मुझे यह इसलिए पता था कि उसके गाँव के और भी लोग वहाँ काम करते थे… पैसे के अलावा लगभग हर बार वह एक फोन भी घर पर देकर आता… उसके और उसके घर के इन सभी मोबाइल का खर्च स्वामीजी ही उठाते थे.

इस बीच उसे शराब की लत भी लग चुकी थी… वह चोरी से अलमारी से शराब निकालता और आश्रम के अपने खास मित्रों को उपर बुलाकर उनके साथ पीता… इसके अलावा उसे जो लत थीं उनका यहाँ किन शब्दों में उल्लेख करूँ समझ नहीं पा रही हूँ… मैंने स्वामीजी से ससंकोच इशारे में चर्चा की तो वे टाल गये… वह आश्रम में रहने वाले संन्यासियों तक से अभद्रता करता… मैं परेशान थी कि जो हो रहा है वह बाबा को दिख क्यों नहीं रहा… धीरे-धीरे एक के बाद एक बातें खुलती गयीं और स्थिति साफ़ हो गयी… वह सब मेरे लिये ही नया था वरना वह और स्वामीजी दोनों ही आश्रम में चर्चा का विषय बन चुके थे… लोग चिरौरी करते कि आप यहीं रहिये… यह आप ही का लिहाज करता है… स्वामीजी तो इसे कुछ कहते नहीं… न मेरे लिये संभव था उस गन्दगी को बर्दाश्त करना और न स्वामीजी ही चाहते थे कि मैं हरिद्वार में रह कर उनकी निजी जिंदगी में दखल दूँ… यह सब ऐसे ही चलता रहा… अचानक चार साल बाद कुछ हुआ… स्वामीजी ने उसे कमरे में बुलाया… दस मिनट बाद वह कमरे से निकला और अपना सामान लेकर आश्रम से चला गया.

उसके कुछ दिन बाद स्वामीजी को शायद कुछ पता चला और उन्होंने अपने ड्राइवर को भेज कर उसे दोबारा बुलवाया… उसके आते ही कमरा अंदर से बंद हो गया… आखिरी बार फिर बंद कमरे में स्वामीजी की और संजय की कुछ बात हुई और तब से आज तक संजय की कोई खबर नहीं… वह ऐसे गया जैसे कभी था ही नहीं… क्या हुआ मुझे पता नहीं… उसे क्यों निकाला मुझे पता नहीं… सफाई करने वाले लड़के से भारत के पूर्व गृह राज्यमंत्री और इतने बड़े आश्रम के अध्यक्ष को कमरा सील करके चर्चा क्यों करनी पड़ी, मुझे पता नहीं… यह रहस्य वह अपने साथ ही ले गया… उसके जाने के बाद मेरा क्रोध शांत हो गया और मैं उसकी सारी गलतियाँ भूल गयी… याद रह गया तो केवल उसका वही हँसता हुआ चेहरा… उसका दौडकर आकर पाँव छूना और बच्चे सा ठुनकना… उसका भोलापन इस हश्र का अधिकारी नहीं था… अपनी आँखों को पोंछते हुए खुद से ही वादा करती हूँ कि वह कभी मिला तो उसकी जिंदगी को वापस पटरी पर लाने का ईमानदार प्रयास करुँगी… यह बहुत आवश्यक इसलिए है कि आजकल स्वामीजी के पास रहने वाले लड़के शत्रुघ्न के लिये भी लोग यही कहते हैं कि यह भी संजय बन गया है… संजय का नाम ही मानो गाली हो गया है… अब कोई तीसरा लड़का संजय न बने ऐसी प्रार्थना और प्रयास है.

साध्वी चिदर्पिता गौतम का यह लिखा उनके ब्लाग मेरी ज़मीं मेरा आसमां से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. साध्वी चिदर्पिता गौतम से संपर्क sadhvichidarpita@gmail.com के जरिए किया जा सकता है

जिम मालिक और पत्रकारों में मारपीट

हल्‍द्वानी से खबर है कि पत्रकारों और एक स्‍थानीय व्‍यक्ति के बीच मारपीट हो गई, जिसमें उसने पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करा दिया है. अमर उजाला और जागरण ने इस खबर को दो गुटो में मारपीट बताकर छापा है. पूरा मामला यह है कि कुछ पत्रकार शनिवार को सीआरपीएफ के आई की प्रेस कांफ्रेंस में गए हुए थे. इस दौरान ये लोग डहरा में क्षतिग्रस्‍त पुल देखने गए.

इस दौरान डहरा गांव में मुनीश कुमार सक्‍सेना ने किराए पर मकान लेकर प्रोजेक्‍ट कार्यालय खोल रखा है तथा जिम बना रखा है. कुछ पत्रकार वहां पहुंच गए तथा पूछताछ शुरू कर दी. किसी बात को लेकर पत्रकार तथा जिम मालिक में बहस हो गई. मालिक ने तीन पत्रकारों से मारपीट की तथा बंधक बना लिया. इसकी सूचना जब अन्‍य पत्रकारों को हुई तो वे मौके पर पहुंच गए तथा जिम मालिक को पीट दिया. सूचना मिलने पर पहुंची पुलिस ने मामले को शांत कराया.

गुडगांव निवासी जिम मालिक ने किसी वरिष्‍ठ व्‍यक्ति से एसएसपी को फोन कराके अज्ञात लोगों के खिलाफ बलवा, लूटपाट तथा जान से मारने की धमकी देने का मुकदमा दर्ज करवा दिया. पत्रकारों की तरफ से मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया है. पत्रकारों के संस्‍थानों ने भी अपने पत्रकारों की एक नहीं सुनी और घटना को दो पक्षों में झगड़ा बताकर छाप दिया. नीचे अमर उजाला में प्रकाशित खबर. जागरण ने भी ऐसी ही खबर प्रकाशित की है.

अमृतपुर में दो पक्षों में झगड़ा

हल्द्वानी। अमृतपुर स्थित डहरा गांव में शनिवार दोपहर दो पक्षों में झगड़ा हो गया। पुलिस ने एक पक्ष की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया है। जबकि दूसरे पक्ष की ओर से अभी तक पुलिस को तहरीर नहीं सौंपी गई है।

जानकारी के मुताबिक हल्द्वानी के कुछ लोग अमृतपुर स्थित क्षतिग्रस्त डहरा पुल देखने गए थे। डहरा गांव में ही मुनीश कुमार सक्सेना निवासी पोडसी, गुड़गांव ने किराए पर मकान लिया है। मकान में प्रोजेक्ट कार्यालय खोला है और बाहर से जिम का सामान रखा है। मकान की दीवारों पर बेहद आकर्षक रंगों से डिजायन बना है। दीवारों पर आकर्षक डिजायन एवं व्यायामशाला को देखकर लोग वहां रुक गए और व्यायामशाला के बारे में पूछताछ करने लगे। इसी बीच व्यायामशाला संचालक ने उनके साथ गाली गलौज एवं मारपीट शुरू कर दी। अभद्रता होने पर कुछ लोग बाहर निकल आए, जबकि तीन लोगों को व्यायामशाला के अंदर ही बंधक बना दिया। बाहर निकले लोगों ने पुलिस की मदद से अपने बंधक साथियों को बाहर निकलवाया। व्यायामशाला संचालक के साथ हाथापाई हो गई। इसी बीच पुलिस मौके पर पहुंच गई। व्यायामशाला संचालक ने अज्ञात लोगाें के खिलाफ भीमताल थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया है। एसएसपी अनंत राम चौहान ने बताया कि मुनीश कुमार एनजीओ चलाता है और डहरा में उसका प्रोजेक्ट चल रहा है। किसी बात को लेकर दो पक्षों में कहासुनी और मारपीट हो गई।

महुआ न्‍यूज से विनोद पांडेय का इस्‍तीफा

महुआ न्‍यूज से खबर है कि विनोद पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर प्रोड्यूसर थे तथा आउटपुट हेड तथा प्रोग्रामिंग हेड के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी निभा चुके थे. नए प्रबंधन ने नहीं बन पाने के कारण उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा सौंप दिया. दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि उनसे इस्‍तीफा मांगा गया था. विनोद पांडेय महुआ की लांचिंग टीम के सदस्‍य थे. विनोद महुआ से पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

आवेश तिवारी की जगह विजय विनीत बनाए गए सोनभद्र के ब्‍यूरोचीफ

हिंदुस्‍तान, वाराणसी से खबर है कि राहुल श्रीवास्‍तव की जगह सोनभद्र के ब्‍यूरोचीफ बनाए गए आवेश तिवारी की जगह विजय विनीत को नया ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया है. आवेश को लेकर रहस्‍य अभी भी कायम है. सूत्रों का कहना है कि आवेश को अभी ना तो हटाया गया है और ना ही उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है. खबर है कि आवेश ने अपनी नियुक्ति के समय किसी कॉलम को नहीं भरा था, उसी को आधार बनाकर उनकी सोनभद्र में नियुक्ति टाल दी गई है. बताया जा रहा है कि यह पूरी कार्रवाई प्रबंधन अपने एक पूर्व पत्रकार के इशारे पर कर रही है.   

इधर सोनभद्र के प्रभारी बनाकर भेजे गए सीनियर रिपोर्टर विजय विनीत हिंदुस्‍तान की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए हैं. उनकी गिनती हिंदुस्‍तान के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. बताया जा रहा है कि सोनभद्र में हिंदुस्‍तान की हालत अत्‍यन्‍त खराब है. इस जिले में अखबार का सर्कुलेशन मात्र ढाई से तीन हजार के बीच बताया जा रहा है. पिछले पन्‍द्रह सालों से यहां का प्रभार देख रहे राहुल श्रीवास्‍तव को अखबार की दुगर्ति के कारण ही हटाया गया था. सूत्रों का कहना है कि आवेश को इसी लिए जिले का प्रभार नहीं दिया गया है ताकि देर सबेर राहुल श्रीवास्‍तव की वापसी कराई जा सके. सोनभद्र के मोर्चे पर भेजे गए विजय विनीत अखबार को कितनी ऊंचाई दे पाते हैं तथा प्रबंधन उन्‍हें यहां कितने दिन तक टिकने देता है. यह देखने वाली बात होगी.  

इधर, हिंदुस्‍तान, वाराणसी के एक वरिष्‍ठ सहयोगी ने आवेश के खिलाफ जांच की पुष्टि की थी. इस संदर्भ में जब पिछले तीन दिनों में हिंदुस्‍तान के संपादक अनिल भास्‍कर से वास्‍तविक जानकारी चाही गई तो उन्‍होंने पहली बार दिल्‍ली में होने तथा पूरा मामला संज्ञान में न होने की बात कहकर मामला टाल दिया. दूसरे दिन जब उनसे संपर्क किया गया तो मीटिंग में होने की बात कही. तीसरे दिन जब भड़ास ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो उन्‍होंने फोन रिसीव नहीं किया. आसानी से समझा जा सकता है जो संपादक किसी तथ्‍य पर खुलकर बात नहीं कर सकता वो किसी मामले पर खुलकर अपनी कलम कैसे चला सकता है. राहुल श्रीवास्‍तव को हटाए जाने के समय भी संपादक अनिल भास्‍कर ने इनकार किया था कि राहुल को हटाया नहीं गया है, जबकि राहुल ने अपने इस्‍तीफे की पुष्टि की थी.  

वे एजुकेटेड हैं और परखने के बाद शादी कर रही हैं : बिट्टा कराटे

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ-आर) के चेयरमैन और पूर्व आतंकवादी फारुख अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे घर बसाने जा रहे हैं। माशूका के साथ। 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में खौफ का दूसरा नाम रहे बिट्टा करीब 16 साल देश की तमाम जेलों में रहे हैं। जम्मू में जेल तोड़कर भागने की कोशिश का मामला अभी भी बिट्टा कराटे पर चल रहा है।

बिट्टा की मंगेतर असाबा अर्जमंद खान पत्रकारिता में एमए हैं। असाबा जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं। मौजूदा वक्त में वह जम्मू कश्मीर के लोक प्रशासन विभाग में प्रशिक्षु-अधिकारी हैं।1 नवंबर 2011 को असाबा से निकाह होने से कुछ रोज पहले (4 अक्टूबर 2011 को) न्यूज-एक्सप्रेस चैनल के एडिटर (क्राइम) संजीव चौहान ने कश्मीर घाटी में बिट्टा कराटे से लंबी गुफ्तगू की। इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बिट्टा कराटे से उनकी निजी-जिंदगी (प्रेम-प्रसंग, शादी) पर भी खुलकर बातचीत हुई। पेश हैं इंटरव्यू के खास अंश-

– बिट्टा कराटे की नज़र में प्यार क्या है?

— प्यार के आगे कुछ भी नहीं है। प्यार इंसान ऊपर वाले से भी कर सकता है। मां, बहन, माशूका और बीबी से भी।

– बिट्टा कराटे के तो बीबी है नहीं, तो फिर प्यार किससे किया?

— नहीं। इंगेजमेंट है मेरी। इंगेजमेंट हो चुकी है।

– कैसे हुई इंगेजमेंट..मतलब किसके साथ?

— इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहूंगा।

– आप नाम मत खोलिये किसी का। मैं किसी का नाम खुलवाना नहीं चाहता। मैं ये जानना चाहता हूं कि सलाखों के पीछे, हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़े बिट्टा कराटे को कभी किसी से मोहब्बत हुई? प्यार हुआ!

— बाहर आकर (जेल से) मैं किसी को पसंद करता हूं। कोई मुझे पसंद करता है।

– बात कहां तक पहुंची है?

— मैं विलीव करता हूं, जिससे शादी करो उसी से प्यार भी करो। इसमें मैं बिलीव करता हूं।

– इसका मतलब शादी उसी से कर रहे हैं, जिससे प्यार किया है?

— माशाअल्लाह। उसी से शादी करुंगा।

– क्या सोचकर वो आपसे शादी करेगी? आपका इतिहास तो रुह कंपा देने वाला है?

— ये सवाल तो आप उससे ही करें तो बेहतर रहेगा।

– उसे सब कुछ पता होगा आपके इतिहास के बारे में, जिससे आपको मुहब्बत हुई है?

— सही सवाल पूछा आपने। वो पढ़ी-लिखी है। एजूकेटिड है। उसको सबकुछ पता है, मेरे बारे में। वो 'मैच्योर' है।

– कैसे मिले थे आप लोग? प्यार की शुरुआत कैसे हुई? बिट्टा कराटे ने खुद उनको (होने वाली बेगम) अपनी असलियत बताई थी?

— उनको पता था। जाहर सी बात है। वो पढ़ी-लिखी है। उसी प्रोफेशन (पत्रकारिता) से जुड़ी रही है, जिससे आप ताल्लुक रखते हैं। उसको सबकुछ पता है कि मैं (बिट्टा कराटे) क्या था, क्या हूं।

– बिट्टा कराटे में क्या देखकर वो लड़की मर-मिटी?

— मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। इस पर। न मैंने इस पर ध्यान दिया।

– कभी तो पूछा होगा?

— हां जी। पूछा था उन्होंने। कहा आप(बिट्टा कराटे) स्टेट फारवर्ड हो, आपकी ईमानदारी पसंद आयी।

– जिस लड़की से शादी कर रहे हैं आप, उसमें क्या नज़र आया था आपको? जिससे बात शादी तक आ पहुंची।

— दिल की बराबरी। दिल को अच्छी लगी। उनका उठना-बैठना। बात करने का ढंग।

– जेल-डायरी और प्यार की कहानी में से पहले किसे लिखेंगे?

— जाहिर सी बात है, जो प्यार के मुतल्लिक बातें हैं, वो बाद में लिखूंगा। पहले तो मैं जेल चला गया। उसके बाद बाहर (जेल से) आया, तो वो (असाबा) मेरी जिंदगी में आ गई।

– बिट्टा कराटे का ये पहला प्यार है, दूसरा या तीसरा? कितने प्यार अब तक किये हैं बिट्टा कराटे ने?

— एक ही प्यार किया है मैंने जिंदगी में।

– ये (असाबा) पहला और आखिरी प्यार है?

— आई विलीव इन वन लव। मैं आवारा नहीं हूं। मेरा दिल आवारा नहीं है।

– लड़की को कैसे समझा पाये कि मैं (बिट्टा कराटे) ठीक इंसान है। उसके साथ शादी गलत साबित नहीं होगी।

— पहले उसने मुझे परखा। हम बैठे। बातें हुईं।

– आपने उसे प्रपोज किया या लड़की ने आपको पहले प्रपोज किया?

— जाहिर सी बात है लड़की प्रपोज नहीं करती है अपनी तरफ से। मर्द ही प्रपोज करता है। लड़कियां अगर किसी को प्यार करती हैं, तो प्रपोज नहीं करती हैं। साभार : न्‍यूज एक्‍सप्रेस

वे एजुकेटेड हैं और परखने के बाद शादी कर रही हैं : बिट्टा कराटे

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ-आर) के चेयरमैन और पूर्व आतंकवादी फारुख अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे घर बसाने जा रहे हैं। माशूका के साथ। 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में खौफ का दूसरा नाम रहे बिट्टा करीब 16 साल देश की तमाम जेलों में रहे हैं। जम्मू में जेल तोड़कर भागने की कोशिश का मामला अभी भी बिट्टा कराटे पर चल रहा है।

बिट्टा की मंगेतर असाबा अर्जमंद खान पत्रकारिता में एमए हैं। असाबा जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं। मौजूदा वक्त में वह जम्मू कश्मीर के लोक प्रशासन विभाग में प्रशिक्षु-अधिकारी हैं। 1 नवंबर 2011 को असाबा से निकाह होने से कुछ रोज पहले (4 अक्टूबर 2011 को) न्यूज-एक्सप्रेस चैनल के एडिटर (क्राइम) संजीव चौहान ने कश्मीर घाटी में बिट्टा कराटे से लंबी गुफ्तगू की। इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बिट्टा कराटे से उनकी निजी-जिंदगी (प्रेम-प्रसंग, शादी) पर भी खुलकर बातचीत हुई। पेश हैं इंटरव्यू के खास अंश-

– बिट्टा कराटे की नज़र में प्यार क्या है?

— प्यार के आगे कुछ भी नहीं है। प्यार इंसान ऊपर वाले से भी कर सकता है। मां, बहन, माशूका और बीबी से भी।

– बिट्टा कराटे के तो बीबी है नहीं, तो फिर प्यार किससे किया?

— नहीं। इंगेजमेंट है मेरी। इंगेजमेंट हो चुकी है।

– कैसे हुई इंगेजमेंट..मतलब किसके साथ?

— इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहूंगा।

– आप नाम मत खोलिये किसी का। मैं किसी का नाम खुलवाना नहीं चाहता। मैं ये जानना चाहता हूं कि सलाखों के पीछे, हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़े बिट्टा कराटे को कभी किसी से मोहब्बत हुई? प्यार हुआ!

— बाहर आकर (जेल से) मैं किसी को पसंद करता हूं। कोई मुझे पसंद करता है।

– बात कहां तक पहुंची है?

— मैं विलीव करता हूं, जिससे शादी करो उसी से प्यार भी करो। इसमें मैं बिलीव करता हूं।

– इसका मतलब शादी उसी से कर रहे हैं, जिससे प्यार किया है?

— माशाअल्लाह। उसी से शादी करुंगा।

– क्या सोचकर वो आपसे शादी करेगी? आपका इतिहास तो रुह कंपा देने वाला है?

— ये सवाल तो आप उससे ही करें तो बेहतर रहेगा।

– उसे सब कुछ पता होगा आपके इतिहास के बारे में, जिससे आपको मुहब्बत हुई है?

— सही सवाल पूछा आपने। वो पढ़ी-लिखी है। एजूकेटिड है। उसको सबकुछ पता है, मेरे बारे में। वो 'मैच्योर' है।

– कैसे मिले थे आप लोग? प्यार की शुरुआत कैसे हुई? बिट्टा कराटे ने खुद उनको (होने वाली बेगम) अपनी असलियत बताई थी?

— उनको पता था। जाहर सी बात है। वो पढ़ी-लिखी है। उसी प्रोफेशन (पत्रकारिता) से जुड़ी रही है, जिससे आप ताल्लुक रखते हैं। उसको सबकुछ पता है कि मैं (बिट्टा कराटे) क्या था, क्या हूं।

– बिट्टा कराटे में क्या देखकर वो लड़की मर-मिटी?

— मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। इस पर। न मैंने इस पर ध्यान दिया।

– कभी तो पूछा होगा?

— हां जी। पूछा था उन्होंने। कहा आप(बिट्टा कराटे) स्टेट फारवर्ड हो, आपकी ईमानदारी पसंद आयी।

– जिस लड़की से शादी कर रहे हैं आप, उसमें क्या नज़र आया था आपको? जिससे बात शादी तक आ पहुंची।

— दिल की बराबरी। दिल को अच्छी लगी। उनका उठना-बैठना। बात करने का ढंग।

– जेल-डायरी और प्यार की कहानी में से पहले किसे लिखेंगे?

— जाहिर सी बात है, जो प्यार के मुतल्लिक बातें हैं, वो बाद में लिखूंगा। पहले तो मैं जेल चला गया। उसके बाद बाहर (जेल से) आया, तो वो (असाबा) मेरी जिंदगी में आ गई।

– बिट्टा कराटे का ये पहला प्यार है, दूसरा या तीसरा? कितने प्यार अब तक किये हैं बिट्टा कराटे ने?

— एक ही प्यार किया है मैंने जिंदगी में।

– ये (असाबा) पहला और आखिरी प्यार है?

— आई विलीव इन वन लव। मैं आवारा नहीं हूं। मेरा दिल आवारा नहीं है।

– लड़की को कैसे समझा पाये कि मैं (बिट्टा कराटे) ठीक इंसान है। उसके साथ शादी गलत साबित नहीं होगी।

— पहले उसने मुझे परखा। हम बैठे। बातें हुईं।

– आपने उसे प्रपोज किया या लड़की ने आपको पहले प्रपोज किया?

— जाहिर सी बात है लड़की प्रपोज नहीं करती है अपनी तरफ से। मर्द ही प्रपोज करता है। लड़कियां अगर किसी को प्यार करती हैं, तो प्रपोज नहीं करती हैं। साभार : न्‍यूज एक्‍सप्रेस

जेडे मर्डर केस में एक पत्रकार की भूमिका संदिग्‍ध

मुंबई क्राइम ब्रांच 4 नवम्‍बर तक जेडे हत्‍याकांड में अपनी चार्जशीट दाखिल करेगी. संभावना है कि इस चार्जशीट में छोटा राजन को ही वांटेड दिखाया जाएगा. इस हत्‍याकांड में 100 से ज्‍यादा लोगों को गवाह बनाया गया है, जिसमें कई पत्रकार भी शामिल हैं. जेडे हत्‍याकांड में एक अंग्रेजी दैनिक के पत्रकार का नाम भी संदिग्‍ध लोगों की लिस्‍ट में आया है. इस पत्रकार ने जाने-अनजाने छोटा राजन को जेडे की बाइक का नम्‍बर, घर और ऑफिस का पता दिया था.

संभावना है कि सबूतों के अभाव में इस पत्रकार का नाम चार्जशीट में नहीं होगा, पर क्राइम ब्रांच ने इस पत्रकार को अपनी संदिग्‍ध सूची में डाल रखा है. इस पत्रकार के एक लेख पर भी क्राइम ब्रांच की नजर है. पत्रकार की भूमिका को लेकर एक खबर मुंबई मिरर ने भी प्रकाशित की है. 

The J Dey murder charge sheet, scheduled to be submitted to the MCOCA court before November 4, is likely include what has been an open secret in police and journalistic circles: that a journalist had a crucial role to play in the senior scribe's killing. Highly placed sources in the Crime Branch told this newspaper that the charge sheet may point a finger of suspicion, if not directly implicate the said journalist.

J Dey, who reported on the underworld for a city tabloid, was gunned down by four motorcycle-borne assailants on June 11 in Powai. Mumbai Crime Branch, a month later, arrested 11 accused who said they had conducted the operation on the instructions of Underworld don Chhota Rajan. Later, Rajan himself gave interviews to TV channels claiming responsibility for the murder.

The journalist who works with a mainstream broadsheet came under the police radar after investigations revealed that it was this reporter who gave Chhota Rajan the registration number of J Dey's bike as also his office and residential address.

It was based on this information, alleges Crime Branch, that Rajan aide Satish Kaliya and his associates carried a reconnaissance of J Dey's office and residence, watched his movements and finally shot him dead while he was returning from his mother's home in Ghatkopar.

Crucially, police, however, believe that the journalist played the role of an intermediary unwittingly and had no malafied intentions towards J Dey.

To support its claim of the journalist’s involvement, the agency has attached the statement of yet another journalist who has stated that Rajan in an interview after the murder admitted that he had got J Dey’s personal details from the reporter under suspicion. The agency is also in possession of certain recordings that corroborate this claim.

To bolster its allegation the Crime Branch has also cited some circumstantial and incidental evidences. It has added that it was this journalist who told Rajan that J Dey had been writing ill about him in his reports. Weeks before he died, J Dey had written two reports that indicated waning influence of Rajan in the underworld.

Famously the underworld don does not read newspapers choosing to get his information from TV. "We have information that it was this journalist who told him about J Dey’s reports which in turn infuriated him enough to order kill," said a Crime Branch officer who did not wish to come on record.

He reiterated that the journalist was unaware that Rajan would take such a drastic step. "The journalist also did not know why Rajan sought the registration number of J Dey’s bike. The journalist was over-eager to help Rajan in an effort to become the don’s confidante and get exclusive stories from the gang. J Dey himself had been very close to Rajan and his men for several years," said the officer.

Sources who have worked on the charge sheet added details of an incident that indicated professional rivalry between this journalist and Dey. A few months before Rajan’s chief aide Farid Tanashah was gunned down in his Tilak Nagar house, J Dey along with a colleague had gone to meet Tanashah at his residence.

While he was leaving the house, the concerned journalist arrived and there was heated arguement between the two over whose source Tanashah really was. The journalist, alleges Crime Branch, warned J Dey not to venture near Tanashah.

Putting together its case after several interviews with other crime reporters, the agency has questioned the conduct, if not the intent, of the journalist post the murder. "The journalist should have come to police after his murder and told us that Rajan had sought details related to J Dey. Instead, the journalist chose to write misleading reports about Iqbal Mirchi being involved in the murder," said the officer. The said journalist has already been questioned and has denied all charges. Courtesy : Mumbai mirror

आगरा में दैनिक जागरण के पच्‍चीस वर्ष पूरे

आगरा में रविवार को दैनिक जागरण ने पच्‍चीस साल पूरे किये. नरेंद्र मोहन गुप्‍त ने 30 अक्‍टूबर 1986 को दैनिक जागरण की नींव यहां रखी थी. जागरण यूनिट में इस दौरान हवन पूजन का कार्यक्रम हुआ. जागरण के रजत जयंती के अवसर पर डाक विभाग ने एक विशेष आवरण और डाक टिकट जारी किया. इस मौके पर अखबार ने अपने इंटरनेट सेक्‍शन में यहां से प्रकाशित पहले दिन के अखबार को पहले पन्‍ने पर जगह दी है. नीचे जागरण में इस मौके पर प्रकाशित खबरें. जागरण ने अपने पाठकों का भी आभार जताया है.  

आगरा। ताज नगरी में दैनिक जागरण ने रविवार को पच्चीस बरस पूरे कर लिए हैं। रविवार को सफलता के इस पड़ाव रजत जयंती पर आयोजित समारोह में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच हवन-यज्ञ में आहुति दी गई। निदेशक धीरेंद्र मोहन गुप्ता और तरुण गुप्ता ने संस्थापक स्व. पूर्णचंद गुप्त और पूर्व प्रधान संपादक स्व. नरेंद्र मोहन गुप्त के चित्र पर माल्यार्पण कर समारोह का शुभारंभ किया।30 अक्टूबर 1986 को दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक स्व. नरेंद्र मोहन गुप्त ने ताज नगरी को दैनिक जागरण की सौगात दी थी।

निदेशक धीरेंद्र मोहन गुप्ता ने कहा कि सफलता के इस पड़ाव पर पहुंचने में निष्पक्ष पत्रकारिता के साथ पाठकों के प्रेम और सहयोग की महती भूमिका रही है। संस्थान के कर्मचारियों में जोश भरते हुए उन्होंने कहा कि इसी जज्बे के साथ प्रकाश फैलाते रहें। निदेशक तरुण गुप्ता ने कहा कि ताज नगरी में ये पच्चीस बरस बहुत चुनौतियों भरे थे, फिर भी हमने कामयाबी की नई रेखाएं खीचीं। जागरण परिवार के सदस्यों की इसी मेहनत और लगन से भविष्य में भी हम सफलता के नये मुकाम हासिल करेंगे।

समारोह में 25 बरस से जुड़े रहने वाले जागरण परिवार सदस्यों को निदेशक धीरेंद्र मोहन गुप्ता ने शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। इस दौरान समाचार संपादक आनंद शर्मा, यूनिट मैनेजर सीएस शुक्ला, क्षेत्रीय विज्ञापन प्रबंधक मुकेश मैनी, विज्ञापन प्रबंधक जुगल किशोर, प्रसार प्रबंधक सौरभ मित्तल मुख्य रूप से मौजूद थे।

आभार

मय का चक्र तेजी से घूमता है। आपके बीच हमें 25 बरस हो गए और अब हम 26वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। 25 वर्ष पहले आज ही के दिन जब दैनिक जागरण ने ब्रज की इस धरा को नमन करते हुए कदम रखा था तो पाठकों ने हमें हाथों हाथ लिया। गंगा-जमुनी संस्कृति को हमने आत्मसात किया और ब्रजवासियों ने दैनिक जागरण को। रजत जयंती वर्ष पूरा करते समय हमें बरबस यह स्मरण हो आता है कि इस भूमि के कण-कण में किस तरह भारतीय संस्कृति की परंपराओं के साथ-साथ सद्भाव की विरासत और भक्ति भावना समाहित है। यहां बांके बिहारी की कृपा का रस बरसता है, तो सम्राट अकबर के दीन ए इलाही के पैगाम का असर भी दिखता है। श्रृंगी ऋषि ने इसी पवित्र भूमि पर अपना आश्रम बनाया। महर्षि परशुराम की ननिहाल भी यहीं थी और उनकी मां रेणुका के नाम पर ही रुनकता है। यहां उनका प्राचीन मंदिर भी है। यहां सूर साधना स्थली भी है, जहां उनकी अपने गुरू बल्लभाचार्य से मुलाकात हुई। बटेश्वर शहर का प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहां 108 शिव मंदिर यमुना के किनारे बने हुए हैं। यहीं जैन तीर्थंकर नेमिनाथ की तीर्थस्थली है। नाथ संप्रदाय का भी यह प्रमुख नगर है, जहां नामदेव, उदयनाथ और लालनाथ ने विभिन्न मंदिरों की स्थापना की। मुगलिया सल्तनत ने यहां ताजमहल के रूप में बेमिसाल इमारत पेश की, जिसे दुनिया प्रेम के अनोखे उपहार के रूप में जानती है। यह एक ऐसा उपहार है जो आगरा ही नहीं, भारत की भी पहचान है। इस शहर से संविधान निर्माता डा.भीमराव अंबेडकर का भी लगाव रहा। 1956 में उन्होंने यहां चक्कीपाट पर भगवान बुद्ध की प्रतिमा का लोकार्पण किया। पूरे देश में सबसे ज्यादा अग्रवंशी आगरा में ही हैं। इसीलिए एक समय यह शहर अग्रवन के नाम से भी जाना जाता था। आगरा की एक पहचान साहित्य और संस्कृति के स्थल के रूप में भी है और उद्योग नगरी के रूप में भी। 25 बरस का यह कालखंड अपने को साबित करने की यात्रा तो है ही, आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने और आपका विश्वास जीतने का अनुभव भी है। आपके स्नेह, विश्वास और सहयोग के संबल के चलते ही हम शहर के क्षितिज पर छाए और अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने में कामयाब रहे। यह हमारी लगन में आपके अविस्मरणीय सहयोग की ही परिणति है कि दैनिक जागरण शहर की पहचान ही नहीं, धड़कन भी बन गया है। शून्य से शिखर की इस यात्रा में 26वां बरस हमारे लिए एक पड़ाव भर है। मंजिल अभी और आगे है। आप सब हमारे हमराही भी हैं और मार्गदर्शक भी। हमारे इस गर्व में आपकी सक्रिय-सक्षम भागीदारी है कि शहर की दशा-दिशा तय करने में हम एक सशक्त आवाज हैं। हमारे इस गर्व में समाहित है आप सब शहरवासियों का प्यार, जिसने 25 बरस पहले नवांकुरित हमारे इस प्रयास को अपने आशीष से सींचकर वृक्ष बनाया। इस सफर के साक्षी आगरा शहर का हृदय से आभार। इस कामयाब सफर के साथ हम एक बार फिर उन मूल्यों-मान्यताओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं, जिनके लिए दैनिक जागरण जाना जाता है और जो उसकी पहचान हैं। दैनिक जागरण न केवल भारतीय मूल्यों का संवाहक है, बल्कि उसके प्रति समर्पित भी है। समरसता और सद्भावना के साथ राष्ट्रभाव का जागरण हमारा मूल मंत्र है और हम इसी से पे्ररित होते रहेंगे। हम इसके प्रति भी संकल्पबद्ध हैं कि आने वाले समय में दैनिक जागरण आगरा का समग्र रूप से नेतृत्व कर सके। हमारी आकांक्षा है कि जैसे दैनिक जागरण ने डिजिटल युग में प्रवेश कर अपनी क्षमता बढ़ाने के साथ अपनी अलग पहचान बनाई है वैसे ही आगरा भी अपनी पूरी ऊर्जा और आभा के साथ चहुंमुखी प्रगति कर सके। धन्यवाद। साभार : जागरण

नवीन जिंदल ने गिफ्ट बांटने में किया भेदभाव, कई पत्रकारों ने मिठाई वापस लौटाई

सम्पादक, भड़ास4मीडिया मैं आपके माध्यम से बताना चाहता हूं कि दिवाली पर इस बार कुरुक्षेत्र लोकसभा क्षेत्र से सांसद नवीन जिन्दल के कार्यालय द्वारा किस तरह पत्रकारों के साथ भेदभाव किया गया. यह काम किसके द्वारा किया गया इसके बारे में तो कोई जानकारी नहीं है, लेकिन कई पत्रकारों को अपमानित करने का काम सांसद कार्यालय द्वारा जरूर हुआ. सांसद नवीन जिन्दल द्वारा जो दिवाली गिफ्ट कैथल और पुडरी में पत्रकारों को भेजे गये, उनमें पत्रकारों के चेहरे देखकर भेदभाव किए गए. 

सांसद की तरफ से कई खास पत्रकारों को तो मिठाई के साथ एक-एक कंबल दिया गया, पर ज्‍यादातर पत्रकारों को महज एक-एक मिठाई का डब्बा भेजा गया, जिससे कई पत्रकारो ने इसे अपनी निरादर ही समझा. तमाम पत्रकारों ने तो सांसद के मिठाई के डिब्‍बे वापस भिजवा दिये हैं, क्योंकि जिन पत्रकारों के साथ भेदभाव किया गया वो सभी पत्रकार सक्रिय पत्रकार बताये जाते हैं. इनमें से कई पत्रकार तो चैनलों से जुडे़ हैं. इस बात को लेकर कई पत्रकारों में रोष है कि जिस तरह पत्रकारों से भेदभाव किया गया है, वह अनुचित है. नाराज पत्रकार अब सांसद कार्यालय की खबरों को प्रमुखता ना देने का मन बना रहे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

श्रीलालजी तिकड़मों से अनजान नहीं थे पर उसकी परवाह नहीं की

श्रीलाल जी कहा करते थे कि कोई काम करना हो तो यह समझ कर करो कि मृत्यु तुम्हारे सिर पर खड़ी है और कोई विद्या सीखनी हो तो यह समझकर सीखो कि तुम अजर-अमर हो। यह शायद उनके जीवन का मंत्र था और हर किसी के लिए यह सफलता का महामंत्र बन सकता है। मंत्र वही दे सकता है, जो स्वयं सिद्ध हो, असिद्ध का मंत्र फलता नहीं, काम नहीं करता। कौन अस्वीकार कर सकता है इस बात से कि वे साहित्य के संत थे, अपनी कला के सिद्ध थे।

एक लंबी, दीप्त और प्रखर साधना में तपकर वे जिस ऊंचाई पर पहुंचे, वह असाधारण थी। लेकिन असाधारण होकर भी  अत्यंत साधारण की तरह प्रस्तुत होना उनकी सिद्धि थी। बेशक यह बहुत कठिन है लेकिन जो कठिन चुनौतियों को साध सकता है वही बड़ा हो पाता है। कठिनाइयां हमेशा कद बढ़ाती हैं, बशर्ते उन्हें पार करने की जिद हो, जिजीविषा हो।

जब कोई अपने शिखर को पा लेता है, चोटी पर पहुंच जाता है तो चाहे-अनचाहे ऊंचाई का दर्प उसकी धमनियों में उतर ही आता है, लेकिन कोई विरला होता है जो इससे अपने को बचा ले जाता है। श्रीलाल जी को ऐसे लोगों में ही गिना जाना चाहिए। वे एक बड़े लेखक थे, इससे पहले वे एक सच्चे मनुष्य थे। अगर आप मनुष्य नहीं हैं, तो आप लोगों की पीड़ा, उनके दर्द को नहीं समझ सकते, उनकी दिक्कतों, कठिनाइयों को नहीं समझ सकते। संवेदनशीलता लेखक होने की पहली शर्त है और यह संवेदनशीलता ही आदमी की पशुता का परिष्कार करती है, उसे मनुष्य बनाती  है, उसे इस लायक बनाती है कि वह दूसरों के दर्द को महसूस कर सके। लेखन के नाम पर अनुभवातीत काल्पनिक मनोराज्य की रचना करना और कुछ कागज काला कर खुद को  लेखक घोषित कर देना बहुत आसान काम है, बहुत सारे लोग ऐसा कर भी रहे हैं। यह भी कठिन नहीं है कि किसी आलोचक से बड़ा लेखक होने का सर्टिफिकेट लेने में भी  कामयाबी मिल जाय, लेकिन किसी भी लेखक को बड़ा न तो उसका बहुत लिखना बनाता है, न ही किसी महान आलोचक का फतवा।

लेखक को बड़ा बनाते हैं, उसके पाठक। पाठक किसी भी रचना के सबसे महत्वपूर्ण आलोचक होते हैं। उनकी पसंद-नापसंद ही किसी रचनाकार को स्थापित करती या खारिज करती है। श्रीलाल शुक्ल अगर बड़े लेखक हैं, बड़े व्यंग्यकार हैं तो इसलिए नहीं कि कुछ मूर्धन्य साहित्यालोचक ऐसा मानते हैं बल्कि इसलिए कि बड़ा पाठक वर्ग ऐसा मानता है, ऐसा स्वीकार करता है। वैसे तो उन्होंने कई उपन्यास लिखे लेकिन राग-दरबारी जैसी रचना अकेले उन्हें एक शीर्ष उपन्यासकार, व्यंग्यकार के रुप में स्थापित कर देने के लिए पर्याप्त है। वे रचते रहे और सिर्फ रचते रहे। इसके बदले उन्होंने कुछ चाहा नहीं। जिस तरह के तिकड़म आजकल साहित्य में चल रहे हैं और जिस तरह लोग कुछ जिल्दें बंधवाकर पुरस्कार पाने वालों की लाइन में खड़े हो जाते हैं, उसे हासिल करने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं, उससे श्रीलाल जी अनजान नहीं थे लेकिन उन्होंने कभी  इसकी परवाह नहीं की। सम्मान उनके पीछे आते रहे। उन्होंने अपने रचना कर्म को तरजीह दी, कभी  सम्मान के मोह में नहीं फंसे। उन्हें बहुत सारे सम्मान मिले लेकिन इससे गौरव उन सम्मानों का बढ़ा। वे किसी भी पुरस्कार, सम्मान से बड़े थे।

जब उन्हें ज्ञानपीठ दिया गया तब उनके प्रशंसकों को बहुत खुशी नहीं हुई, सबने महसूस किया कि हिंदी लेखकों को सम्मानित-पुरस्कृत करने वाली बड़ी संस्थाएं बहुत देर करती हैं, लेखकों की उपेक्षा होती है लेकिन तब भी श्रीलाल जी ने यह कहकर अपने बड़प्पन का संकेत दिया कि देर से ही सही लेकिन उन्होंने मुझे भुलाया नहीं। जिसे लाखों पाठकों, प्रशंसकों ने अपने हृदय में बिठा रखा हो, उसके लिए अपने पाठकों के प्यार से बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है। श्रीलाल जी ने आम, मध्यमवर्गीय जीवन के संघर्ष को अपनी रचनाओं में स्वर दिया, उन्होंने जितने भी पात्र गढ़े, वे आज भी  गांवों, कस्बों और शहरों में लड़ते और झुकने से इनकार करते मिल जायेंगे।

जीवन इतना विद्रूप हो चुका है कि सच उपहास रचता सा लगता है। कोई सिर्फ सचाई बयान करे तो वह तंज जैसी चोट करती है। ऐसे समय में भी कुछ लोग सच के साथ जीने की हिम्मत करते हैं, यह बहुत बड़ा जोखिम है। श्रीलाल जी के उपन्यासों में ऐसे पात्र देखे जा सकते हैं। सामाजिक, राजनीतिक जीवन की जटिल विद्रूपता को भेदकर दिखाने की कोशिश उनके लेखन में आर-पार दिखायी पड़ती है। उनके उपन्यासों में असल जीवन है। उन्हें पढ़ते हुए आम आदमी खुद को वहां मौजूद पा सकता है। इसी नाते श्रीलाल शुक्ल श्रीलाल शुक्ल हैं और इसी नाते वे पार्थिवत्व त्यागकर भी  हमारे बीच हमेशा मौजूद रहेंगे। उन्हें प्रणाम।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 08853002001 के जरिए किया जा सकता है.

मनीष ने हिंदुस्‍तान एवं रीतेंद्र ने प्रभात खबर ज्‍वाइन किया

बिहार में प्रभात खबर और हिंदुस्‍तान के बीच एक दूसरे के पत्रकारों को अपने पाले करने क्रम जारी है. नई खबर है कि हिंदुस्‍तान ने प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर में कार्यरत सीनियर सब एडिटर मनीष वत्‍स को अपने पाले में कर लिया है. मनीष ने हिंदुस्‍तान, भागलपुर में ज्‍वाइन किया है. वे काफी समय से प्रभात खबर से जुड़े हुए थे. मनीष इसके पहले दैनिक जागरण, भागलपुर को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. संपर्क करने पर मनीष ने बताया कि बेहतर अवसर के चलते उन्‍होंने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया है. 

वहीं प्रभात खबर ने हिंदुस्‍तान के एक स्ट्रिंगर को अपने साथ जोड़ा है. हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर में कार्यरत सुपर स्ट्रिंगर रीतेंद्र कुमार को प्रभात खबर ने स्‍टाफर बना दिया है. रीतेंद्र काफी समय से हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे रहे थे. संभावना है कि अगले कुछ दिनों और कई लोग इधर से उधर हो सकते हैं.

काले धन को सफेद करने के लिए खुलते हैं न्‍यूज चैनल!

क्‍या है न्‍यूज चैनल लाने, लांच करने या चलाने का फंडा? क्‍यों धनपशु, चिडफंडिए या राजनेता ही खोलते हैं न्‍यूज चैनल. जब न्‍यूज चैनल घाटे में चल रहे हैं तो क्‍यों नहीं उन पर वीआईओ की तरह तालाबंदी कर दी जाती है, क्‍यों पत्रकारों का खून चूसते हुए भी इसे चलाया जाता है? अब अगर आंकड़ों को देखे तो यह पूरा मामला पॉवरगेम या जनहित से ज्‍यादा काले को सफेद करने का दिखता है. हालांकि इंडिया टुडे से बातचीत में सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने भी न्‍यूज चैनलों का प्रयोग धौंस जमाने के लिए माना है, पर आंकड़े इससे भी ज्‍यादा की चुगली करते हैं.

न्‍यूज चैनलों की अंधेरखाने में भटकती दुनिया के चार-पांच बड़े चैनलों को छोड़ दे तो ज्‍यादातर के पीछे की कहानी काले को सफेद में बदलने की ही दिखती है. आइए अब नजर डालते हैं टीवी इंडस्‍ट्री पर. देश में टेलीविजन इंडस्‍ट्री का मार्केट 30,000 करोड़ का है, जिसमें 20,000 इंस्‍क्रीप्‍शन मार्केट यानी पे चैनलों का है. इसमें ज्‍यादातर इंटरटेनमेंट और स्‍पोर्टस चैनल शामिल हैं. देश के गिने चुने न्‍यूज चैनल ही चैनल पे चैनल हैं. बाकी न्‍यूज चैनल फ्री टू एयर हैं. टीवी इंडस्‍ट्री में 10,000 करोड़ का सालाना विज्ञापन मार्केट है. इसमें से मात्र सत्रह प्रतिशत यानी 1700 करोड़ का मार्केट न्‍यूज चैनलों का है.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के रिकार्ड के अनुसार देश भर में 338 न्‍यूज चैनलों को लाइसेंस दिया गया है, जिसमें सभी भाषाओं के नेशनल और रीजनल न्‍यूज चैनल शामिल हैं. अपुष्‍ट आंकड़ों के अनुसार इसमें 170 से 180 के बीच हिंदी न्‍यूज चैनल हैं. सत्रह सौ करोड़ के न्‍यूज इंडस्‍ट्री विज्ञापन मार्केट को देखें तो इन टीवी न्‍यूज चैनलों को औसतन पांच करोड़ से कुछ ही ज्‍यादा सालाना आमदनी होती दिखती है, जबकि वास्‍तविक आंकड़ा ऐसा है कि इस विज्ञापन मार्केट पर भी ज्‍यादातर बड़े न्‍यूज चैनलों का हिस्‍सा है. छोटे या रीजनल चैनल की सालाना आमदनी तो शायद एक करोड़ से भी काफी कम होगी. हम न्‍यूज चैनलों के खेल के गोरखधंधे को समझाने के लिए आइए नजर डालते हैं, बाजार के लीडर तथा बड़े न्‍यूज चैनल ग्रुप टीवी टुडे पर.

टीवी टुडे ग्रुप ऐसा ग्रुप है, जो अपने कर्मचारियों को बेहतर सेलरी व सुविधाएं देने के साथ अपने बेहतर हालात के लिए जाना जाता है. पर पिछले कुछ समय में इस ग्रुप के हालात भी बदतर हुए हैं. इस ग्रुप को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाले सीईओ जी कृष्‍णन को भी इसी मार्केटिंग स्‍ट्रेटजी पर कमजोर होने के चलते ही जाना पड़ा. सूत्र बताते हैं कि बीते वित्‍तीय वर्ष में टीवी टुडे ग्रुप का टर्न ओवर 292 करोड़ का था, जिसमें मात्र बारह करोड़ रुपये का लाभ प्राप्‍त हुआ है. पिछले साल इस ग्रुप ने केवल डिस्‍ट्रीब्‍यूशन पर 84 करोड़ रुपये खर्च किए. सेलरी मद में कंपनी ने एक अप्रैल 10 से 31 मार्च 11 तक 87 करोड़ रुपये खर्च किए. अन्‍य खर्च दीगर रहे, जबकि यह चैनल पे चैनल है तथा इसका मार्केट रीच भी दूसरे चैनलों से अधिक है. इसके बावजूद इसका मार्केट पहले से कमजोर हुआ है. 2009 में इस ग्रुप ने 32 करोड़ रुपये का लाभ कमाया था वहीं 2010 में यह घटकर 18 करोड़ रह गया था.

जब आजतक जैसे चैनल के हालत इस कदर हो चुके हैं तो नए आने वाले चैनलों के बारे में आसानी से समझा जा सकता है. प्रणब राय जैसे फेस वैल्‍यू रखने वाले पत्रकार-मालिक के चैनल के हालात ठीक नहीं हो रहे तो नए चैनल कैसे सर्वाइव कर सकेंगे यह बड़ा सवाल है. प्रणब राय की कंपनी को अपने दो चैनल इमैजिन यूनिवर्सल ग्रुप को बेचना पड़ा, जिसे अब टर्नर ने ले रखा है. एनडीटीवी-हिंदू को थांती ग्रुप के हाथों बेचना पड़ा. एनडीटीवी शो बिज, लेमिनार तथा मेट्रो नेशन दिल्‍ली जैसे चैनल बंद करने पड़े. जब देश के नामी पत्रकार गिने जाने वाले प्रणब राय की कंपनी के ये हालात हैं तो आने वाले चैनल, जिनके पास न फेस वैल्‍यू है और नहीं मार्केट में तत्‍काल लाभ लेने का फंडा, क्‍योंकर इस फील्‍ड में आ रहे हैं? सूत्र बताते हैं कि मीडिया फील्‍ड के बड़े नामों में शामिल सहारा ग्रुप भी लगातार घाटे में चल रहा है. बीते सत्र में कंपनी ने अपने पूरे मीडिया स्‍ट्रक्‍चर पर 350 करोड़ रुपये खर्च किए परन्‍तु आमदनी मात्र 152 करोड़ की हुई. सूत्रों का कहना है कि चैनलों के डिस्‍ट्रीब्‍यूशन पर ही सहारा को लगभग 60 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े.

सवाल है कि इस तरह के न्‍यूज चैनल मार्केट में आखिर क्‍यों चिटफंड से जुड़े, राजनेता या धनपशु ही आ रहे हैं, जिनके तीन पांच के दूसरे साइड बिजनेस भी हैं. पिछले दिनों अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप ने भी डेढ़ दर्जन से ज्‍यादा चैनलों का लाइसेंस लिया, परन्‍तु  इसमें एक भी न्‍यूज चैनल नहीं था. शायद रिलायंस ग्रुप को न्‍यूज चैनल का बिजनेस स्‍ट्रेटजी पता है और लाभ का खेल न देखते हुए इसने न्‍यूज चैनलों के लिए आवेदन नहीं किया. खासकर हिंदी बेल्‍ट के लिए खुलने वाले अधिकांश न्‍यूज चैनल चिटफंड कंपनियां या धनपुश ला रहे हैं, जिनके संबंध राजनेताओं से हैं. जीएनएन न्‍यूज, पी7 न्‍यूज, सीएनईबी, न्‍यूज एक्‍सप्रेस, खबर भारती, आजाद न्‍यूज, एमके न्‍यूज जैसी तमाम अन्‍य चैनल चिटफंड से जुड़ी मदर कंपनियों से ताल्‍लुक रखती हैं. हमार टीवी, फोकस टीवी, एचवाई टीवी, न्‍यूज 24, ई24, दर्शन24, इंडिया न्‍यूज, जनसंदेश न्‍यूज, यूपी न्‍यूज जैसी कंपनियां राजनेताओं की हैं. इनमें तो कई चैनल लगातार घाटे में चल रहे हैं. इसके बाद भी इनके मालिक इन चैनलों को घाटा सहते हुए चला रहे हैं, जबकि उनका भविष्‍य भी साफ नहीं दिख रहा है.

आर्यन टीवी, कशिश, महुआ टीवी जैसे रीजनल चैनल के मालिकों के भी असली धंधे दूसरे हैं. इन लोगों ने भी बस चैनल इस लिए डाल रखे हैं ताकि पॉवर ब्रोकर बन सकें, पर इन्‍हें अब लाभ मिलता नहीं दिख रहा तो अब चैनल में पैसा लगाना बंद कर रखा है. तमाम चैनलों में पत्रकार एवं कर्मचारी सेलरी न मिलने से परेशान हैं. इसके बावजूद न्‍यूज चैनल का धंधा मंदा नहीं पड़ रहा है. हर दिन किसी न किसी नए चैनल का नाम सुनने को मिल रहा है. जब इस धंधे का मार्केट लिमिट है फिर क्‍यों तमाम कंपनियों के मालिक न्‍यूज चैनल लाने में ही दिलचस्‍पी दिखा रहे हैं. क्‍या ये नादान हैं या फिर इन्‍हें न्‍यूज इंडस्‍ट्री के मार्केट का ज्ञान नहीं हैं. शायद इनमें से ये दोनों ही नहीं हैं. ये शायद निहायत ही चालक और मार्केट का ज्ञान रखने वाले लोग हैं.

न्‍यूज इंडस्‍ट्री से जुड़े सूत्र बताते हैं कि न्‍यूज चैनल जनसेवा या लाभ के लिए नहीं खोल जा रहे हैं बल्कि ये पॉवर ब्रोकरी और काले धन को सफेद में बदलने के लिए खोले जा रहे हैं. ज्‍यादातर कंपनी चार-पांच करोड़ का घाटा सहकर सैकड़ों करोड़ काले धन को सफेद कर रही हैं. चिटफंड या दो नम्‍बर से आए पैसे को चैनलों में लगाकर इसे सफेद किया जा रहा है. न्‍यूज चैनल होने के चलते वैसे ही सरकार तथा अधिकारियों पर दबाव रहता है, वे चैनल के मामलों में जल्‍दी हाथ नहीं डालना चाहते, दूसरे खटाखट एक रुपये की जगह हजार रुपये का उल्‍टा सीधा खर्च दिखाकर काला धन सफेद किया जा रहा है. यही कारण है कि तमाम नए तथा छोटे न्‍यूज चैनलों में कर्मचारियों को पे स्लिप तक नहीं दिया जाता है. अगर पांच-सात बड़े हिंदी चैनलों को छोड़ दें तो अधिकांश बस काला को सफेद बनाने का खेल कर रहे हैं.

आलोक शुक्‍ला बने दैनिक जागरण, हल्‍द्वानी के संपादक

: दिनेश ने जनवाणी ज्‍वाइन किया : दैनिक जागरण, हल्‍द्वानी से खबर है कि आलोक शुक्‍ला यहां के नए स्‍थानीय संपादक बना दिए गए हैं. अब तक इस पद पर जिम्‍मेदारी निभा रहे राजीव शुक्‍ला को असिस्‍टेंट संपादक बना दिया गया है. गौरतलब है कि आलोक शुक्‍ला इसके पहले हल्‍द्वानी में ही अमर उजाला के संपादक के पद पर कार्यरत थे. प्रबंधन ने उनकी जगह मेरठ में तैनात सुनील शाह को संपादकीय प्रभारी बनाकर हल्‍द्वानी भेज दिया था तथा आलोक शुक्‍ला को नोएडा स्थित कारपोरेट ऑफिस से अटैच कर दिया था. इसके बाद उन्‍होंने अमर उजाला से इस्‍तीफा दे दिया. इस संदर्भ में और जानकारी के लिए जब आलोक शुक्‍ला को फोन किया गया तो उनका मोबाइल स्विच ऑफ बताता रहा.  जब दैनिक जागरण, बरेली के सीजीएम एएन सिंह से संपर्क किया गया तो उन्‍होंने आलोक शुक्‍ला को हल्‍द्वानी का संपादक बनाए जाने की पुष्टि की.

हिंदुस्‍तान, रुद्रपुर से खबर है कि दिनेश अवस्‍थी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां स्ट्रिंगर के पद पर कार्यरत थे. वे अपनी नई पारी जनवाणी, देहरादून से करने जा रहे हैं. उन्‍हें यहां रिपोर्टर बनाया जा रहा है. दिनेश काफी समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं तथा कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दी हैं.

हिंदुस्‍तान के स्ट्रिंगर को ब्रेन ट्यूमर, कंपनी नहीं कर रही मदद

छोटे-मझोले स्‍तर के पत्रकारों की नियति में ही घुट-घुटकर तड़प-तड़प कर जीने को लिखा रहा है. ऐसा ही हो रहा है रुद्रपुर के स्ट्रिंगर विमल शर्मा के साथ. फोर्ब्‍स की सूची में सौ अमीर भारतीयों में शामिल शोभना भरतिया की मीडिया कंपनी हिंदुस्‍तान में काम करते हैं विमल. काफी समय से रुद्रपुर में अखबार को सेवा दे रहे हैं. खबर है कि विमल शर्मा को ब्रेन ट्यूमर हो गया है. मात्र कुछ हजार पाने वाले विमल की आर्थिक स्थिति अच्‍छी नहीं है.

इलाज के लिए अपने जानने-पहचानने वालों से मदद मांगी पर बिना लाभ दिखे कोई मदद क्‍यों करता भला. इसके बाद उन्‍होंने अपने संस्‍थान से सहायता के बारे में बात की, पर वहां भी उनकी सुनने वाला कोई नहीं है. आखिर वो अखबार के स्‍थाई कर्मचारी जो नहीं है. शायद मेहनतकाशों के खून-पसीनों को चूसना ही अमीर बनने का सरल रास्‍ता होता है.

अब नए अवतार में लांच होगा गूगल टीवी

गूगल नए सिरे से अपने टीवी को आकार देने जा रहा है। उसका इरादा इंटरनेट टीवी के बढ़ते बाजार में अपने अन्य उत्पादों की तरह ज्यादा से ज्यादा हिस्सा बटोरने का है। यह तब है जब गूगल टीवी को लांचिंग के लगभग वर्ष भर बाद भी वेब सेवी का ठंडा-गर्म रिस्पांस ही मिला है। इस कड़ी में गूगल ने पिछले दिनों गूगल टीवी सर्विस का नया वर्जन प्रस्तुत किया है। साथ ही उसने घोषणा की है कि वह सौ के लगभग ऑनलाइन चैनल भी शुरू करेगा। ऑरिजनल वीडियो प्रोग्रामिंग से जुड़े ये चैनल यू-ट्यूब पर लांच किए जाएंगे।

मीडिया घरानों से साझेदारी : अपनी टीवी सर्विस को लोकप्रिय और सफल बनाने के लिए गूगल ने विभिन्न मीडिया घरानों से साझेदारी की है। इनकी मदद से वह मौलिक कार्यक्रम तैयार करेगा। साझेदारों में कई लोकप्रिय हस्तियां भी शामिल हैं। इनमें भी प्रमुख हैं रैपर जे-जेड, मेडोना और स्केटबोर्डर टोनी हॉक। गूगल से जुड़े एक नजदीकी सूत्र के मुताबिक इस साझेदारी के तहत कंपनी 100 मिलियन डॉलर खर्च कर टीवी कार्यक्रम तैयार कराएगी।

ऐसा है नया गूगल टीवी : गूगल ने अपनी टीवी सर्विस को 2.0 वर्जन में प्रस्तुत किया है। इसमें फिल्म प्रेमियों को विकल्प उपलब्ध कराने के लिए नए चैनल्स दिए गए हैं। इसके जरिए यूजर्स टीवी कार्यक्रमों समेत ऑनलाइन वीडियो भी देख सकेंगे। कंपनी का इरादा इसके जरिए एप्प निर्माताओं को टीवी के लिए नए-नए एप्प बनाने के लिए प्रेरित करने का भी है।

गूगल ने फिलहाल ‘टीवी एंड मूवी’ एप्प पेश किया है, जो यूजर्स को पसंदीदा फिल्में और कार्यक्रम डॉउनलोड करने में मदद करेगा। गूगल टीवी सोनी कंपनी के कुछ टीवी सेटों के साथ बाजार में उपलब्ध है। इसके अलावा लॉगीटेक भी अपने सेट टॉप बॉक्स के साथ गूगल टीवी का ऑफर दे रही है।

इसकी मदद से लोग ऑन लाइन वीडियो एसेस कर अपने घर के ड्राइंगरूम में टीवी पर ही देख सकेंगे। गूगल अपने टीवी सॉफ्टवेयर को सैमसंग और विजियो टीवी सेट पर भी अगले वर्ष तक पेश कर देगा। इसके अलावा गूगल टीवी सर्विस हनीकोंब वर्जन पर एंड्रॉयड सपोर्ट भी दे रहा है ताकि स्मार्टफोन के यूजर्स हैंडसेट पर ही गूगल टीवी सर्विस का लुत्फ ले सकें।

यू-ट्यूब पर चैनल : अपने टीवी को लोकप्रिय बनाने के लिए गूगल ने यू-ट्यूब पर 20 श्रेणियों में अलग-अलग कार्यक्रम पेश करने की योजना बनाई है। शुरुआत स्पोर्ट्स, कॉमेडी और न्यूज चैनल से होगी। कंपनी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक पहला चैनल अगले माह लांच कर दिया जाएगा। फिर साल भर के अंदर-अंदर अन्य दूसरे चैनल लांच किए जाएंगे।

मोटरोला आएगा काम : टीवी बाजार पर ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी बनाने में मोटरोला मोबिलिटी होल्डिंग्स काफी मददगार साबित होगी। यह कंपनी केबल टीवी सेट टॉप बॉक्स बनाने के अलावा मोबाइल हैंड सेट बनाती है। इसका गूगल ने पिछले ही दिनों अधिग्रहण किया है।

यूजर्स को होगा फायदा : अभी यू-ट्यूब के ज्यादातर वीडियो यूजर्स द्वारा ही अपलोड किए जाते हैं। ऐसे में क्वालिटी के मामले में वे बहुत ज्यादा अच्छे नहीं होते। लेकिन गूगल द्वारा ऑरिजनल प्रोग्रामिंग कराए जाने से यूजर्स को क्वालिटी के साथ अच्छे वीडियोज देखने को मिलेंगे।

कम नहीं चुनौतियां : अपनी टीवी सर्विस को लोकप्रिय बनाने के लिए गूगल के रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे पहली तो यही है कि कंपनी को मौलिक कार्यक्रमों का डाटा बैंक तैयार कराने में ही समय लगेगा। इसके अलावा उसे एप्पल और क्युइरोज से भी मुकाबला करना होगा, जो पहले से ही ऑनलाइन टीवी सर्विस के क्षेत्र में मौजूद हैं। सबसे बड़ी बात पिछले वर्ष गूगल टीवी सेवा को लोगों का बहुत अच्छा प्रतिसाद नहीं मिला है। संभवत: यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञों ने गूगल के 1.0 वर्शन को फ्लॉप तक करार दे दिया था।

इसके अलावा गूगल टीवी अपना सबसे सस्ता डिवाइस 299 डॉलर में पेश कर रहा है, जो बाजार के लिहाज से काफी महंगा है। यही नहीं, गूगल की चुनौती को देखते हुए कुछ टीवी नेटवर्क ने अपने शो के वेब बेस्ड वर्शन को गूगल टीवी के लिए ब्लॉक कर दिया है। देखते हैं गूगल का नया टीवी वर्जन इस बार क्या रंग दिखाता है। साभार : भास्‍कर

न्‍यूज चैनलों की मालिकाना पद्धति काफी संदिग्‍ध है

केंद्र सरकार ने पिछले दिनों एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिये नए चैनल खोलने के इच्छुक आवेदकों के लिए भावी दिशानिर्देश जारी किए। दरअसल, अगले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और फिर दो साल बाद होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर कई चैनल मालिक इस बहती गंगा में हाथ धोने की तैयारी में हैं। इस समय तकरीबन 578 टेलीविजन चैनल सक्रिय हैं, जो धर्म, मनोरंजन, खान-पान, क्षेत्रीयता और विभिन्न समुदायों से जुड़ी तमाम चीजें परोसते रहते हैं। इनमें 122 समाचार चैनल हैं।

अखबारों के ज्यादातर पाठक दुनिया की ताजातरीन घटनाओं से खुद को अपडेट रखना चाहते हैं। अब देखने वाली बात यह है कि ये चैनल समाचार के भूखे इन दर्शकों की क्षुधा को किस तरह शांत करते हैं। पहली बात यह कि अधिक से अधिक छह चैनलों को छोड़कर ज्यादातर समाचार चैनल कुछ खास क्षेत्रों में नए चैनल खोल रहे हैं, लेकिन उन्हें कारोबार में घाटा हो रहा है। इन क्षेत्रों के दर्शकों के लिए परोसी जाने वाली समाचार सामग्री पक्षपातपूर्ण होती है। वे अकसर एक राय बनाते हैं, जो स्थानीय आबादी की नहीं, बल्कि चैनल मालिक के हितों की पूर्ति करता है।

साथ ही समाचार चैनलों की मालिकाना पद्धति काफी संदिग्ध है। तकरीबन 90 फीसदी मामलों में देखा गया है कि समाचार चैनल के मालिक बिल्डर हैं। इनमें से कुछ अपनी फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल विदेश में प्रसारण के लिए कर रहे हैं। मसलन, एक ऑपरेटर दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स और कनाडा के वैंकूवर के दर्शकों के लिए इसका इस्तेमाल कर रहा है। यह ऑपरेटर एक धार्मिक और एक मनोरंजन चैनल भी चला रहा है।

एक दूसरे चैनल ऑपरेटर ने शराब ठेकेदार के रूप में अपने पारिवारिक कारोबार की शुरुआत की थी। इसके बाद वह निर्माण क्षेत्र में आया और फिर उसने फिल्म उद्योग में हाथ आजमाया। आज उनके पास एक हिंदी समाचार चैनल और चार क्षेत्रीय समाचार चैनल हैं। अब यह एक अंगरेजी समाचार चैनल शुरू करने की तैयारी में है। यह सूची काफी लंबी है। इसके अलावा टेलीविजन क्षेत्र में कई बड़े नाम हैं। इनमें से कुछ स्विट्जरलैंड, अमेरिका, सऊदी अरब और अन्य संदिग्ध स्रोतों से धन प्राप्त कर रहे हैं।

इसी तरह देश में गरीबों के हितों के लिए लड़ने की कसम खाने वाले वामपंथी नेताओं का पैसा एक अंगरेजी समाचार चैनल में लगा हुआ है। अगर इन चैनलों की सामग्री पर गौर करें, तो निश्चित रूप से घोटालों की भयावहता का अंदाजा खुद-ब-खुद होने लगेगा। अधिकांश समाचार चैनल केवल शहरों की खबरों को तवज्जो देते हैं। भारत एक विशाल देश है और हर गांव में तमाम अच्छी खबरें छिपी रहती हैं। क्या कोई समाचार चैनल गांवों की खबरों के लिए समय दे रहा है? क्या ये चैनल यह दिखाने की जरूरत महसूस करते हैं कि ग्रामीण भारत में क्या हो रहा है?

सभी समाचार चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज का तमाशा साफ देखा जा सकता है। पिछले साल एक चैनल ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त के कुत्ते की गुमशुदगी की खबर पूरे दिन ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चलाई। अखबारों के शीर्षकों की तुलना अगर समाचार चैनल में दिखाई जाने वाली खबरों से करें, तो पता चलता है कि कोई खबर जिसे राष्ट्रीय स्तर के अखबार में एक छोटे पैराग्राफ में जगह मिलती है, वही एक राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनल में पूरे दिन चलती रहती है।

समाचार चैनलों पर कॉमेडी से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। सवाल यह है कि जब उन्हें केवल समाचार दिखाने का लाइसेंस मिला हुआ है, तो वे इस तरह के बेहूदा कार्यक्रम क्यों दिखाते हैं? समाचार की जगह से घंटों तक फिल्मों के ट्रेलर और फिल्मी कलाकारों के साक्षात्कार क्यों दिखाते हैं। दर्शकों को इन सबसे राहत इसलिए नहीं मिल पा रही है, क्योंकि इसके लिए कोई स्वतंत्र नियामक निकाय नहीं है। समाचार चैनलों के सामग्री की निगरानी के लिए अब केंद्र सरकार ने एक नियामक की नियुक्ति की ओर संकेत किया है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में टेलीविजन उद्योग युवा पीढ़ी को ज्यादा शिक्षित, जवाबदेह और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने के प्रति जवाबदेह नहीं है। दरअसल, टेलीविजन अज्ञानता और मूर्खता के सूचकांक को बढ़ावा देने वाला एक साधन बन चुका है। इसलिए कहा जा सकता है टेलीविजन देखना बेहतर बेवफूक बनने की सही विधि है।

गौतम कौल का यह लिखा अमर उजाला में प्रकाशित हो चुका है. इसे वहीं से साभार लिया गया है.

प्रभात रंजन दीन के घर लाखों की चोरी

वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन के लखनऊ स्थित आवास पर पिछले दिनों भीषण चोरी हो गई. चोरों ने लाखों रुपये मूल्‍य के सामान, नकदी और जेवरात पर हाथ साफ कर दिया. इस चोरी की सूचना पुलिस को दे दी गई है, परन्‍तु पुलिस अब तक इस मामले का खुलासा नहीं कर पाई है. जिससे पत्रकारों में रोष व्‍याप्‍त है. इसके पहले आईबीएन7 के पत्रकार शलभमणि त्रिपाठी के घर भी चोरों ने हाथ साफ कर दिया था. 

पॉलिटिक्‍स और मीडिया में तूफान लाने वाली नीरा राडिया बंद करेंगी पीआर एजेंसी

नई दिल्ली। बहुचर्चित टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले से चर्चा में आई नीरा राडिया ने निजी कारणों का हवाला देते हुए जनसंपर्क कारोबार से अपना हाथ समेटने की घोषणा की। राडिया ने अपने बयान में कहा कि पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी निजी कारणों को प्राथमिकता देने के लिए उन्होंने जनसंपर्क कारोबार छोड़ने का निर्णय लिया है।

आरआईएल के प्रवक्ता ने कहा कि राडिया के निर्णय पर उन्हें खेद है। टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा ने कहा कि टाटा समूह नीरा राडिया की निजी इच्छाओं की कद्र करता है। राडिया वैष्णवी ग्रुप कंसलटेंसी की मालिक और प्रमोटर हैं। इस कंसलटेंसी के पास टाटा समूह और मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल)जैसे प्रमुख ग्राहक हैं। राडिया ने कहा कि यह काफी दुखद निर्णय है जो उन्होंने काफी विचार विमर्श के बाद लिया है। उन्होंने यह फैसला लेने में मदद करने वालों और उनकी परेशानी समझने के लिए अपने प्रमुख ग्राहकों का धन्यवाद अदा किया।

गौरतलब है कि राडिया का नाम पिछले वर्ष उस वक्त चर्चा में में आया जब उनकी बातचीत की टेप मीडिया में सामने आए थे। हालांकि उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं है लेकिन जांच एजेंसिंयों ने उनसे स्पेक्ट्रम मामले में बतौर गवाह पूछताछ की थी। साभार : पत्रिका

फिर शुरू होगी ‘रवीश की रिपोर्ट’

यह खबर सुनने को मिली तो एक सुखद आश्‍चर्य हुआ. प्राइम टाइम में स्‍नो पाउडर लगाकर स्‍टूडियो में बहस करते, झगड़े सुलझाते रवीश कुमार एक बार फिर सड़कों-गलियों, खेतों-खलिहानों, बाजार-हाट, कस्‍बों-झोपड़पट्टी की धूल भरी सड़कों पर अपने चिरपरिचित अंदाज में नजर आएंगे. लोगों से खुद को इंटरेक्‍ट करते दिखेंगे. अपनी अलहदा शैली में लोगों से बतियाते, उनकी परेशानियों-तकलीफों को अपने देशी अंदाज में अपने शब्‍दों की चाशनी में लपेटते-भिगोते-डूबोते नजर आएंगे. एक बार फिर स्‍टूडियो से बाहर सुनने को मिलेगा, नमस्‍कार मैं रवीश कुमार..! क्‍योंकि अब एनडीटीवी पर एक बार फिर शुरू होने जा रहा है 'रवीश की रिपोर्ट'.

एक बड़ा वर्ग जो न्‍यूज चैनलों पर अपनी खबरें भूसे के ढेर में पड़ी सुई की तरह खोज रहा है, उसके लिए यह बड़ी खबर हो सकती है. यह बड़ा वर्ग, जिसकी मार्केटिंग और ग्‍लोबल दुनिया में सुनने वाला कोई नहीं है, रवीश की रिपोर्ट को अपनी आवाज समझता था. यह रिपोर्ट उसकी अपनी बन गई थी, आम लोगों के बीच धूल फांकते, उनकी झोपड़ी में बैठते रवीश आम भारतीय की आवाज लगते थे, पर एनडीटीवी ने इस कार्यक्रम को ख‍तम करके रवीश को स्‍टूडियो का एयरकंडिशनजीवी शोपीस बना डाला था.

अब जब एक बार फिर रवीश की रिपोर्ट शुरू होने की चर्चा है तो मेरे जैसे तमाम लोग खुश होंगे, जो इस रिपोर्ट का इंतजार करते थे तथा बंद हो जाने के बाद दुखी हो गए थे. बुलेट न्‍यूज और भागती-दौड़ती-हांफती-कांपती-दुहाराती सूचनाओं के बीच एक बार फिर खबरों की उम्‍मीद जग रही है. एक बार फिर उम्‍मीद कर सकते हैं कि रवीश स्‍टूडियो में लगी जंग को झाड़कर अपने उसी तेवर के साथ 'रवीश की रिपोर्ट' प्रस्‍तुत करते दिखेंगे. खबरिया चैनलों की विजुअल नौटंकी के बीच लोग आधा घंटा के लिए ही सही पर राहत तो ले ही सकते हैं. अभी यह जानकारी नहीं मिल पाई है कि इसका प्रसारण पुराने समय और दिन पर होगा या कोई नया टाइम तय किया जाएगा.

लुटेरों ने जागरण के दो कर्मचारियों को लूटा

खबर है कि दैनिक जागरण, जालंधर के पत्रकार व एक आपरेटर को अज्ञात लुटेरों ने लूट लिया। लुटने वालों में दैनिक जागरण के सब एडिटर संत लाल व आपरेटर रमेश चंद डोगरा हैं। कुछ महीनों के भीतर यह आठवीं घटना है, जब जागरण के स्टाफ का कोई व्यक्ति लूटा गया हो। दोनों रात को अपनी ड्यूटी खत्म करके घर जा रहे थे कि सोढल नामक स्थान पर इनको लुटेरों ने घेर लिया तथा दोनों की गर्दनों पर तलवारें लगा दीं। दोनों के मोबाइल सेट व पर्स निकाल कर ले गए।

यहां पर हास्यास्पद तो यह है कि जागरण के स्टाफ मेंबरों के लगातार लुटने के बावजूद प्रबंधन मौन साधे बैठा हुआ है। यहां तक कि संपादकीय प्रभारी ने भी अपने लोगों का साथ देने की बजाए अपनी नकारात्मक सोच को दर्शाते हुए टका सा जबाव दे दिया कि गेट के बाहर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। गौरतलब है कि जागरण के दो स्टाफ मेंबरों को तो लुटेरे तेजधार हथियारों से निशाना भी बना चुके हैं तथा अभी एक मेंबर सिर पर लुटेरों द्वारा किए गए वार के जख्म झेल रहा है। प्रबंधकों व संपादकीय प्रभारी की ऐसी सोच के कारण स्टाफ दहशत व सकते में हैं।

प्रेस परिषद के दायरे में आए विजुअल मीडिया : काटजू

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नियंत्रण की मांग की है. न्यूज चैनलों में सामाचारों की जगह जारी तमाशेबाजी से दुखी काटजू ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक खत भी लिखा है. जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने मांग की है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की निगरानी में लाया जाए. प्रेस काउंसिल को ज्यादा अधिकार दिए जाएं.

टेलीविजन चैनल सीएनएन-आईबीएन के एक कार्यक्रम में काटजू ने कहा, "मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है और कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को प्रेस काउंसिल के अंतर्गत लाया जाए और इसे मीडिया काउंसिल कहा जाए. हमें और अधिकार दिए जाएं. इन अधिकारों को इस्तेमाल अत्यंत कठिन परिस्थितियों में किया जाएगा."

प्रधानमंत्री ने चिट्ठी का जवाब दिया है और कहा है कि "इस संबंध में विचार किया जा रहा है." सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस इस मुद्दे पर विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से भी मिल चुके हैं. सुषमा भी जस्टिस काटजू से सहमत हैं.

मीडिया पर बरसे : बीते कुछ सालों में भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छवि बेहद खराब हुई है. जस्टिस काटजू कहते हैं, "उन्हें (मीडिया) लोगों के हितों के लिए काम करना चाहिए. लेकिन वे लोगों के हितों के लिए काम नहीं कर रहे हैं. कई बार वे लोगों के हितों के खिलाफ काम करते हैं. 80 फीसदी जनता गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई जैसी तकलीफों से जूझ रही है. लेकिन मीडिया लोगों का ध्यान इन चीजों से हटाता है. आप (मीडिया) फिल्म स्टार और फैशन परेडों को ऐसे दिखाते हैं जैसे यही लोगों की दिक्कत है."

नियंत्रण के सवाल पर उन्होंने तुलसीदास की एक सूक्ति "भय बिन प्रीत न होत गुसाईँ" कही. कहा कि डर के बिना प्रेम नहीं होता है. प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के भीतर जवाबदेही का डर बैठाना जरूरी हो गया है. वह कहते हैं, "क्रिकेट समाज के लिए अफीम की तरह है. रोमन शासक यह कहा करते थे कि अगर आप लोगों को रोटी नहीं दे सकते तो उन्हें सर्कस दिखाएं. भारत में भी यही है कि अगर आप लोगों को रोटी नहीं दे सकते तो उन्हें क्रिकेट दिखा दें."

कैसे हो नियंत्रण : मशहूर पत्रकार करण थापर ने जब पूछा कि प्रेस काउंसिल किस तरह के अधिकार चाहती है, तो काटजू ने कहा, "मैं यह ताकत चाहता हूं कि सरकारी विज्ञापन बंद हो जाएं. मैं चाहता हूं कि अगर कोई मीडिया बेहद निंदनीय व्यवहार करता है तो कुछ समय के लिए उसका लाइसेंस निलंबित कर दिया जाए, उस पर जुर्माना लगाया जाए. लोकतंत्र में हर कोई जवाबदेह है. आजादी के साथ कुछ तर्कसंगत पाबंदियां भी होती हैं. मैं भी जवाबदेह हूं और आप भी जवाबदेह हैं. लोगों के प्रति हमारी जवाबदेही है." हालांकि उन्होंने कहा कि चरम परिस्थितियों में ही ऐसे कड़े कदम उठाए जाने चाहिए.

समाचार या तमाशा  :  न्यूज चैनलों में छिड़ने वाली बहस पर भी काटजू ने असंतोष जताया. उन्होंने कहा कि मेहमानों में कोई अनुशासन नहीं दिखाई पड़ता है, "यह कोई चीखने की प्रतियोगिता नहीं है."

उन्होंने मीडिया पर कभी कभी राष्ट्रहित के खिलाफ काम करने के आरोप भी लगाए. बम धमाकों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, "आप ईमेल या एसएमएस देखते हैं, यह कोई भी शरारती व्यक्ति भेज सकता है. लेकिन उसे टीवी पर दिखा कर आप इस तरह का संदेश देते हैं जैसे सभी मुसलमान आतंकवादी और बम फेंकने वाले हैं. मुझे लगता है कि जानबूझकर की जाने वाली ऐसी हरकतों से मीडिया लोगों को धर्म के आधार पर बांटता है, यह पूरी तरह राष्ट्रहित के खिलाफ है."

भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शुरुआत 1990 के दशक में हुई. पहले आधे घंटे का न्यूज बुलेटिन आया करता था. बाद में 24 घंटे के कुछ न्यूज चैनल आए. उस दौर को एक संचार क्रांति की तरह देखा गया. लोगों के मीडिया की सराहना की. लेकिन 2004-2005 तक तस्वीर बदल गई. सात-आठ की जगह दर्जनों न्यूज चैनल बाजार में आ गए. विज्ञापन पाने की होड़ ऐसी छिड़ी की खबरों के नाम पर चूहा, बिल्ली, भूत, प्रेत, क्रिकेट, अपराध, सिनेमा और अटपटी चीजें सुबह से देर रात तक चलने लगीं. गंभीर खबरों में भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर जल्दबाजी और गैर पेशेवर ढंग से काम करने के आरोप लगते गए. साभार : डायच वेले 

श्रीलालजी को समुचित सम्मान दिया जनसंदेश टाइम्स ने

सूचना और संचार के इस बेहद प्रगतिशील वक्त में वस्तुत: उन चीजों को प्राय: हाशिए पर पाया गया है, जिन्हें अपनी बेदाग और विश्वसनीय सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण केंद्र में होना था, लेकिन गुजरे कुछ वक्त में सूचना और संचार के इन प्रचलित नियमों और जरूरतों के विरुद्ध जाकर लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स ने जिस तरह से इस हाशिए का विस्तार किया है, वह हमारी सामाजिक निष्ठा को प्रदर्शित करता है।

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, इस तरह से देखें तो जनसंदेश टाइम्स ने अपनी शुरुआत से ही साहित्य को सम्मान के साथ प्रमुखता से स्थान दिया है। कस्बों, शहरों और राजधानी में होने वाली साहित्यिक, सांस्कृतिक गोष्ठियों से लेकर सामाजिक परिष्कार और आम जन को उनके अधिकार दिलाने वाली गतिविधियों को इस समाचार पत्र ने लगातार तरजीह दी। लखनऊ में हुए प्रगतिशील लेखकों के दो दिनी सम्मेलन की विस्तृत आलोचनात्मक कवरेज की देश भर के रचनात्मक क्षेत्र में चर्चा हुई।

इस सिलसिले में अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को संयुक्त रूप से ज्ञानपीठ मिलने की खबर को न सिर्फ पहले पृष्ठ पर मुख्य खबर का स्थान दिया गया, बल्कि भीतरी पृष्ठों पर भी इस खबर से जुड़ी हुई सामग्री को सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया गया। साहित्य की दुनिया की किसी खबर को किसी समाचार पत्र द्वारा प्रथम पृष्ठ पर मुख्य खबर की तरह प्रकाशित किये जाने का व्यापक स्वागत किया गया। स्तंभकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने न केवल इसकी चर्चा अपने ब्लाग पर की बल्कि फेसबुक पर भी लगाया। साहित्य की दुनिया में यह बड़ी चर्चा का विषय बना।

पिछले शुक्रवार को जब ‘राग दरबारी’ के बहुचर्चित रचनाकार श्रीलाल शुक्ल का देहांत हुआ, तब भी जनसन्देश टाइम्स ने इसे साहित्य और समाज को प्रभावित करने वाली एक बड़ी घटना की तरह दर्ज किया। इस दुखद घटना का व्यापक कवरेज करते हुए श्रीलाल जी और उनके साहित्य, रचना कर्म से जुड़े प्रत्येक पहलू को पाठकों के सामने लाने की कोशिश की। प्रयाग  विश्वविद्यालय के दृश्य कला विभाग के अध्यक्ष और प्रख्यात कलाकार अजय जेटली के हाथों बना श्रीलाल जी का स्केच इस समाचार पत्र ने पहले पृष्ठ पर उनके निधन की खबर के साथ प्रकाशित किया। श्रीलाल जी के साथ ही ज्ञानपीठ सम्मान पाने वाले प्रसिद्ध कथाकार अमरकांत की टिप्पणी भी प्रथम पेज पर छपी। इसी के साथ प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय, सुपरिचित लेखक लीलाधर मंडलोई के आलेखों के साथ ही श्रीलाल जी की रचनाओं के अंश भी प्रकाशित किये।

जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय का कहना है कि यह आज के समाज की जरूरत है। लोग कुछ बेहतर, सकारात्मक और कुछ रचनात्मक पढ़ना चाहते हैं पर अख़बारों में उन्हें वैसी सामग्री नहीं मिलती। जन सन्देश टाइम्स के प्रयास को बहुत कम समय में पाठकों और लेखकों, साहित्यकारों, चिंतकों का उत्साहवर्धक समर्थन मिला है।

लेखक अविनाश जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ से जुड़े हुए हैं.

Union Ministry of I & B underperforms in the Eleventh Plan!

The Union Ministry of Information and Broadcasting which is charged with the responsibility for catering to the entertainment and intellectual needs of our people and to focus attention on issues of national integrity, communal harmony, environmental protection, health care, family welfare, eradication of illiteracy, development of women, children, weaker sections of society and flagship rural and urban poverty alleviation programmes of the Government of India, has underperformed during the first four years of the current  Eleventh Five Year Plan (April 2007- March 2012) ending March 31, 2011.

Of the total allocation of Rs.6, 311 crores including the enhanced outlay for High and Lower Power Transmitters for Jammu & Kashmir Border Areas, Commonwealth Games 2010 and related programmes for the Plan period, the actual expenditure during the first four years of the Plan ending March 31, 2011, is Rs.1, 917.43 crores. This includes Information sector Rs.254.83 crores, Film sector Rs.198.25 crores and Broadcasting sector Rs.1, 464 crores. This is just 30.38 per cent of the total budgetary allocation for the 11th Plan period, as ascertained from the official sources.

In the current fiscal year, which is the terminal year of the 11th Plan, the situation is no better. At it all, four major programmes of Global Film School, setting up of National Centre of Excellence for Animation, Gaming and Special Effects, National Film Heritage Mission under film sector, and International Channel under broadcasting sector were yet to be accorded necessary approval, whereas the current plan period is to terminate in the first quarter of 2012. The figures speak out in volume the unsatisfactory performances of the Ministry, considered to be broad firmaments for dissemination of official information and publicity.

  With a lackluster Minister Ambika Soni at the helm, the Ministry of Information and Broadcasting appears to be presiding over liquidation of the present UPA 11 Government in the 2014 General Elections for its dismal failure on all counts to inform the people about various welfare programmes of the Government in the positive light, thus allowing the people to be carried away by negative publicity, propaganda and campaign in the private media against it (Government) creating a growing public perception that this Government is corrupt, indecisive, non-functional  and somehow tottering. This is also indicative of failure of Ambika Soni in managing politically media to the advantages of the Government. She lacks in right drive and innovative political skills to carry the media with her.

One wonders why is she being continued in this important and high profile portfolio despite her perceptible failure to counter out and out adverse and negative propaganda and campaign in the mushroomed private media!

Coming to the official media units, Press Information Bureau (PIB), which is the prime source media for all official information of the Government, continues to be sliding with its present head, bombastically designated as Principal Director General (Media & Communications), in other words, known as Principal Spokesperson of the Government. She is misfit for the job, having been most unpopular, intemperate, with her inability to carry all the functionaries together and further inability to perform most unpleasant job with pleasure. PIB has lost its sheen except as the platform for briefing by the Ministers on decisions of the Cabinet and other issues. Number of press releases on developmental aspects has declined.

Present day Departmental Publicity Officers are not easily accessible, a glaring deficiency in media and public relations, much less hold the fort in rightly and timely briefing the media persons individually or collectively. Media persons consider it as wastage of their precious time and energy in maintaining rapport with the media managers in the Bureau. Everything appears to be adrift. Data relating to number of press releases is fudged. One is at ones wits end why such incompetent chief media manager is allowed to continue at the helm, when there are precedents of outright removal of two such professionals in the past, who were competent and popular with the media, They were Dr.A.R.Baji during Emergency in 1976 and the second S, Narendra in 1998 during the NDA Government.

The continuance of the present incumbent, who is unable to establish right chord with the media, is understood to be a parochial nexus with the Minister and the PM. Nothing more. Nothing less. The way she messed up with the much tom med Public Information Campaign or Media Out reach Programme on the flagship welfare measures of the UPA Government on the specious suggestion of the lady controller of accounts in the Ministry that the same may be handed over to the States for handling such publicity, notwithstanding the large scale siphoning of Central funds by the state governments with impunity, a case is made out to dispense with such non-performing official at the helm in order to reactivate PIB in dishing out multi-lingual and multi-media all round publicity of the Government.

 As for Prasar Bharati comprising All India Radio and Door Darshan, they have got oft-repeated alibis as a public broadcaster not linked with commercial and profiteering to hide their inertia, incompetence and underperformance, notwithstanding the fact that such excuses cannot be stumbling block for improving programme contents, developmental contents of news services and launching new marketing strategies to enhance their revenues. Perhaps Ambika Soni has no time to goad them in action to bring about perceptible improvements in the broadcasting services to the nation. All left to the private electronic media, the country will be in for heightened social tensions and more and more chaos.

DAVP (Directorate of Advertising and Visual Publicity) is mired in releasing advertisements to small and medium newspapers on quid pro quo of cuts and commission basis and over invoicing of its propaganda and campaign literature whereas actual printouts of such materials is much less. Such malpractices are a game of fudging data and nice presentation to the authorities that every thing is honky dory in a collusive culture where everybody colludes with everybody else to eat up and milk the system from within. The Minister is busy politicking and has no time to look into such malpractices. Same syndrome is prevailing in the RNI (Registrar of Newspapers for India) where nothing moves without underhand and under table speed money.

Other important media units like Directorate of Field Publicity (DFP), Songs & Drama Division, Publications Division and Films Division, which have been doing very good works, have been truncated and are morbid and moribund with the Government in the Ministry of I & B, euphemistically known as Ministry of Inertia (Incompetence) & Bureaucrats (non-functional) at the apex.

This, in short, sums up the gross mismanagement of the publicity and propaganda machinery of the Government of India under the stewardship of Ambika Soni, who has failed miserably to contain the drift!

the writer M.Y.Siddiqui is ex. director Public relations for Railways and Law and Justice Ministry, Govt. of India.

प्रभात खबर, कोलकाता के आरई बने तारकेश्‍वर मिश्रा

राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर से तारकेश्‍वर मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर न्‍यूज एडिटर थे तथा पब्लिकेशन हेड के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. वे अब प्रभात खबर, कोलकाता के साथ जुड़ गए हैं. उन्‍हें यहां का स्‍थानीय संपादक बनाया गया है. दो दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय इसके पहले भी लम्‍बे समय तक कोलकाता में पत्रकारिता की है. उन्‍होंने करियर की शुरुआत ही कोलकाता से की थी. दस सालों तक सन्‍मार्ग अखबार से चीफ रिपोर्टर के रूप में जुड़े रहे. बाद में खास खबर के ब्‍यूरोचीफ बने.

इसके बाद वे ईटीवी राजस्‍थान के प्रभारी के रूप में हैदराबाद चले गए. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद राजस्‍थान पत्रिका, कोलकाता से जुड़ गए. यहां न्‍यूज एडिटर रहते हुए संपादकीय प्रभारी तथा ब्रांच इंचार्ज का दायित्‍व निभाया. यहां से इस्‍तीफा देकर भोजपुरी न्‍यूज चैनल महुआ के इनपुट हेड बने, पर यहां की स्थितियां रास नहीं आने पर ढाई महीने में ही इस्‍तीफा देकर खुद को अलग कर लिया. इसके बाद फिर राजस्‍थान पत्रिका के साथ जुड़ गए.

इस संदर्भ में पूछे जाने पर तारेकश्‍वर मिश्रा ने प्रभात खबर के साथ जुड़ने की पुष्टि की तथा कहा कि मेरा सपना और मेरी इच्‍छा दोनों इस ज्‍वाइनिंग से पूरी हो गई है. उन्‍होंने कहा कि मेरा सपना था हरिवंश जी के साथ काम करने का, जो पूरा हो गया. आज राष्‍ट्रीय स्‍तर के चुनिंदा पत्रकारों में वो ऐसे पत्रकार हैं, जिस पर गर्व किया जा सकता है. और उनके साथ जुड़ना ही बहुत बड़े सम्‍मान की बात है. इसके साथ ही कोलकाता वापस आने की इच्‍छा भी पूरी हो गई.

कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस में बंटी मिठाइयां और मिला बोनस

हाथरस : बड़े-बड़े बैनर वाले अखबार के दफ्तरों में दिवाली के मौके पर कर्मचारी मुंह मीठा करने के लिए भी तरसते देखे गए, परन्‍तु एक साल पहले ही लांच हुए कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस ने इन बड़े बैनर के अखबारों के गाल पर तमाचा जड़ दिया. कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस प्रबंधन ने अपने कार्यालय में कर्मचारियों को मथुरा की प्रसिद्ध मिठाई व सेलरी का 60 प्रतिशत बोनस देकर उनकी दिवाली खुशियों से सराबोर कर दी.

अब इस खबर को जानने के बाद दूसरे अखबारों से जुड़े लोग इसे झूठ बताकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं. पर जो सच जान रहे हैं वो भौचक्‍क हैं. इसको लेकर हाथरस में चर्चाओं का दौर चल रहा है. 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पत्रकारों का उपहार डकार गया जनसम्‍पर्क मंत्री का पीआरओ

भोपाल। मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा सरकार और पत्रकारों के बीच तालमेल बैठाने का हर संभव प्रयास करते हैं। शायद इसीलिए वे हर साल दिवाली पर पत्रकारों को महंगे उपहार भेजते हैं, लेकिन उनका पीआरओ मंगलाप्रसाद मिश्रा मंत्री की मंशा के ठीक उलट सरकार और पत्रकारों के बीच दरार गहरी करने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देता है। इसका ताजा उदाहरण यह है कि इस दिवाली पर जनसम्पर्क मंत्री ने जो उपहार पत्रकारों के घरों पर भेजे थे वह अधिकतर पत्रकारों को मिले ही नहीं।

इस बात का खुलासा तब हुआ जब कुछ पत्रकारों ने मंत्री को फोन पर बधाई दी तो मंत्री ने उपहार के बारे में पूछ लिया, तो अमुक पत्रकार ने उपहार के बारे में अनभिज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि आपके द्वारा भेजा गया उपहार मेरे घर पहुंचा ही नहीं। क्योंकि बात उपहार की थी इसलिए वहीं खत्म हो गयी। मंत्री ने भी बात को तूल देने की बजाय खामोश रहना ठीक समझा। लेकिन पत्रकारों की आपसी बातचीत में यह बात सामने आई कि अधिकतर पत्रकारों को मंत्री द्वारा भेजा गया दिवाली का उपहार नहीं मिला है। यह जानकर कुछ पत्रकार बिफर पडे़ और पड़ताल शुरू कर दी। पता चला कि पिछले वर्षों की तुलना में इस बार का उपहार अधिक मंहगा था सो पीआरओ ने हाथ की सफाई दिखा दी। ऐसी भी चर्चा है कि मंत्री के पीआरओ ने कुछ उपहार बांटने के बाद बाकी के उपहार अपने नाते-रिश्तेदारों में बांट दिए। चपरासी से अधिकारी बने ऐसे व्यक्ति से और क्या आशा की जा सकती है।

अरशद अली खान

भोपाल

प्रशांत का महुआ न्‍यूज एवं पंकज का कशिश न्‍यूज से इस्‍तीफा

महुआ न्‍यूज, रांची से खबर है कि प्रशांत कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर क्राइम रिपोर्टर थे. प्रशांत महुआ की लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. बताया जा रहा है कि प्रशांत नोएडा में एसाइनमेंट के खराब व्‍यवहार तथा नए प्रबंधन की उपेक्षा के चलते नाराज चल रहे थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी कशिश न्‍यूज के साथ शुरू की है. कशिश में अच्‍छी सेलरी तथा अच्‍छे पद पर ज्‍वाइन किया है. खबर है कि महुआ के स्ट्रिंगर भी नाराज चल रहे हैं. उन्‍हें छह माह से पैसा नहीं मिला है.

कशिश न्‍यूज से खबर है कि पंकज कुमार ने यहां से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर वीडियो एडिटर थे. बताया जा रहा है कि वे चैनल हेड गंगेश गुंजन के रवैये से नाराज थे. वे काफी समय से कशिश से जुड़े हुए थे. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.  

86 हजार रुपये दीजिए और हेराल्‍ड में अपना इंटरव्‍यू छपवाइए!

पेड न्‍यूज को लेकर पूरे देश में हलचल है. प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में पनपे इस रोग का लोग विरोध कर रहे है, इसके बावजूद तमाम अखबार चोरी छिपे अब भी पेड न्‍यूज छाप रहे हैं. हालांकि पिछले दिनों हिंदुस्‍तान ने यूपी चुनाव के दौरान पेड न्‍यूज न छापने का वादा किया है, अपने वादे पर वह कितना खरा उतरेगा यह तो आने वाला समय बताएगा. पर उसकी पहल सराहनीय हैं पर इसके उलट गोवा में अंग्रेजी दैनिक हेराल्‍ड नैतिक तकाजों को ताख पर रखते हुए जमकर पेड इंटरव्‍यू छाप रहा है.

गोवा में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. हेराल्‍ड टिकट चाहने वाले राजनीतिक व्‍यक्तियों का जमकर इंटरव्‍यू छाप रहा है तथा अपने लोकल न्‍यूज चैनल पर दिखा रहा है. इसके लिए वो 86, 400 रुपये प्रतिव्‍यक्ति वसूल रहा है. इसका खुलासा मायाभूषण नागवेंकर ने अपने ब्‍लॉग 'पेड न्‍यूज इन गोवा' में किया है. उन्‍होंने इस सदंर्भ में कई सबूत भी जुटाए हैं. नीचे मायाभूषण के ब्‍लॉग पर छपी खबर.

GOA'S PAID PIPER — Paid political interview in Goa's Herald newspaper for Rs 86,400

“The phenomenon of ‘paid news’ has acquired serious dimensions. Today, it goes beyond the corruption of individual journalists and media companies and has become pervasive, structured and highly organized. In the process, it is undermining democracy in India.”

These are the grave opening remarks of the Press Council of India’s (PCI) report on paid news in the Indian media, in July last year. The report compiled by the PCI was based on the findings of its sub committee which pored through evidence, in form of published articles in newspapers both vernacular and English, which were suspected as ‘paid news’ content.

The four audio files and transcripts below go a step ahead. The conversations in these audio files with the marketing manager for both Herald newspaper, Goa’s leading English daily and Herald Cable Network (HCN) a cable news channel owned by the same media group, lays bare how a typical political paid news deal is struck, especially with elections around the corner. Many in the media and other informed sections of society, would already know that piety pouting newspapers across the country have been brazenly cracking ‘editorial content for cash’ deals, but these conversations show how easy it really is to crack a paid news deal in the Indian — and case in point here — the media in Goa.

Buying editorial space in a newspaper is almost as easy as walking up to a store counter and buying a change of underwear.

Here we have a reputed Goan media house welcoming paid news content and dishing out a rate chart for paid political interviews, both on behalf of its English daily news paper ‘Herald’ and for its sister concern, a local cable news channel, Herald Cable Newtork (HCN).

It is necessary to mention here, that although I am a journalist by profession, I have undertaken this ‘paid news buster’ exercise, solely as a reader of the newspaper, which I subscribe to at home. That is one of the reasons why I chose this newspaper.

The other reason being that, Herald over the last few weeks has been running dubious interview after interview of ‘potential’ candidates for the forthcoming state assembly elections which are scheduled to happen sometime next year.

A source in the Herald informed me that money was being exchanged by the newspaper’s employees – both editorial and marketing – for publishing the political interviews.

I called up the Herald boardline on October 20 posing as Bernard Costa, a fictitious person wanting to contest assembly elections from the Velim assembly constituency in south Goa. On the same day, Herald had carried another dubious and suspected paid political interview of Raymond D’Sa, who had claimed that he vying for a Congress ticket for the Cortalim assembly seat and had wanted to “serve the poor and needy” (sic).

The receptionist at the Herald gave me the number to Tulsidas Desai 9822568376 – a marketing manager at the Herald. What unfolded between Tulsidas and ‘Bernard’ (i.e. me) is represented below in form of four audio files. They are unedited phone conversations, transcripts for which are also available. Here's audio file number 2. http://youtu.be/JjhIhQSCkTw

I have already dispatched a complaint to the Press Council of India, Election Commission of India, Goa Union of Journalists as well as several media blogs, journalists and concerned civil society persons, in order to put the information I had in the public domain and with the relevant authorities.

Keeping the current example in context, Herald is not the only news paper which has been institutionally allowing paid news content in Goa at the moment, but I put forth this case because I could establish a connection between the editorial content and the price that is to be paid for it. There are a couple of other vernacular newspaper published from outside Goa, who have already cracked deals with a young Congress minister and it is showing in the content. The newspaper’s editor and the vernacular newspaper’s very special correspondent is involved in this particular deal.

In the Herald case too, it would be naive to believe that a marketing manager, in this case Tulsidas, can push a deal like this without the consent, tacit or otherwise, of the editorial leadership of the newspaper.

Here in the case before you, the deal Tulsidas cracked with me was to publish my interview in the Herald for Rs 86,400 (for a fifteen inch and eight column spread) and on HCN, a half an hour interview thrice a day.(audio file number 3) http://youtu.be/8U8YBT7Tv6M

And the gall of these guys to tell the interviewee to drop by with a questionnaire himself!!!!

The things to look out for in this story are:

We are not just talking about paid news in the air here. When Tulsidas is asked about the rates for political paid interviews, he mentioned the Raymond D’sa interview published in the Herald on Oct 20 and the nearabouts price the newspaper got paid for it. Tulsidas is no novice intern at the Herald, he is a marketing manager and obviously knows the paid news rate card set by the newspaper.

Raymond’s was not the only published paid political interview in print. There are several other dubious article which have been publised by the Herald earlier, which should be looked into by the Press Council of India and the newspaper’s readers. Interestingly most of these interviews were carried in the same slot, on Page four top deck.

There was an interview of Sankalp Amonkar, a potential Congress candidate published on October 3 also carrying the same byline.

There was Somnath Zuwarkar, another potential Congress candidate’s interview published on September 19.

Another political hopeful Sameer Salgaonkar was interviewed on September 12.

Michael Lobo who is a potential BJP candidate from Calangute constituency has been interviewed on August 15.

Tulio de Souza, son in law of former deputy chief minsiter Wilfred de Souza and also a potential election candidate from the Saligao constituency has already been positioned as a winner, in perhaps one of the most lopsided ‘constituency analysis’ segment.

Not too surprising, that all the potential candidates here have one thing common other than the fact that they have featured in Herald’s suspected paid news interviews. All of them are extremely rich folks. 

How the silver earned in exchange for the paid news interviews was shared, is anybodys' guess!

P.S. If any media persons wants to run a story on this revelation, I could send across a zip file containing all the relevant details. I am on mayabhushan@gmail.com.

P.P.S. Readers, who believe the paid news needs to be addressed can spread the story and the audio files around on mail and social networking sites.

P.P.S. If you guy wish to take up the paid news issue with Herald and want to register your protest, feel free to contact the 'people's paper' and its reps on:

Board numbers
0091-832-2224202, 2224460, 2228083/ info@oheraldo.in
Editor in chief and owner Raul Fernandes 0091 9822100188
Editor Sujay Gupta 0091 9923057937
General Manager Michael Pereira 9822122304
Marketing Manager Tulsidas Desai 9822568376

ODDS AND ENDS:

Youtube links to four unedited paids news audio files with transcripts if you click the "Show More" scroll:

Paid News I
Paid News II
Paid News III
Paid News IV

Paid News quotation sent to me by Herald's marketing manager Tulsidas Desai from his official email ID (Please read bottom up)

from Bernard Costa bennygoa15@gmail.com
to TULSHIDAS DESAI <td@herald-goa.com>
date Sat, Oct 22, 2011 at 1:04 PM
subject Re: Advertisement Proposal from H C N &
HERALD
mailedby
gmail.com
hide details Oct 22 (3 days
ago)

Ok ok I will come with the cash on Monday or Tuesday
– Hide quoted text –

On Sat, Oct 22, 2011 at 1:02 PM, TULSHIDAS DESAI <td@herald-goa.com> wrote:
once we meet in our office will discuss on this.

On 22 October 2011 12:48, Bernard Costa <bennygoa15@gmail.com> wrote:

I got it Tulsidas. Thank you. I am happy with the rate you have quoted.
Just for clarity sake, I do not want it published like an advertisement or advertorial but
like a news interview so that your readers know it is news and not an ad.
Please revert on this point
and thank you again
Bernard
Viva Velim!

On Sat, Oct 22, 2011 at 11:51 AM, TULSHIDAS DESAI <td@herald-goa.com> wrote:

To,
Dear Bernard,
with reference to our telephonic conversation about your projection as a part of your
election campaign first instance we will arrange to shoot your 30 minutes one to one
interview & will telecast 3 times within one particular day & will announce it on Herald
as a press note to drive peoples attention. We will bill you Rs. 50,000/- for the same as a
production & telecasting charges.

Besides as a part of same campaign we will arrange a space of 15 c.m. x 8 col. color advt
of your interview on page no. 2 on HERALD @ Rs.86,400/-. Payment to be issued in
advance.

TULSHIDAS DESAI
Manager – Marketing
HERALD & H C N
Mob : 9822568376
E-mail : td@herald-goa.com

TRANSCRIPTS I to IV

Paid News I – First Call
Transcript
Conversation with Tulsidas Desai, marketing manager Herald
Date: Oct 20, 2011
Phone contacted: 9822568376

Me: Hello
Tulsidas: Ya…
Me: Err… Mr Tulsidas
Tulsidas: Right
Me: My name is Bernard Costa, I am calling from Velim
Tulsidas: Velim ya…
Me: I am contesting elections from Velim… I want to and your office gave me your number
Tulsidas: Ok
Me: Er… I want an interview in the Herald.
Tulsidas: On Herald? Or HCN channel?
Me: On Herald… Herald…
Tulsidas:  Ok
Me: So how do I go about it?
Tulsidas: What kind of interview, because there are two types of interviews. If it a paid one editorial… advertorial interview can come.
Me: Ok how much will it cost me?
Tulsidas: If it is a quarter page in black and white it will be 36000 (rupees)
Me: Ok
Tulsidas: And if it is colour then it is double.
Me: Thirty six and double… Any discounts I can get?
Tulsidas: No.. 36000 is the net you have to give for black and white
Me: For an interview?
Tulsidas: For an interview
Me: And how do I make the payment, where do I make the payment?
Tulsidas: You can make the payment on Herald publications private limited
Me: Ok ok.. and this is a paid interview no? I can give you the questions?
Tulsidas: Ya ya you can give me questions.
Me: Ok ok
Tulsidas: This will be like a advertorial, advertising come editorial…
Me: No no like today you have interview no of er… my friend from Cortalim Raymond
Tulsidas: Ah Raymond D’Sa
Me: Like that I want an interview. Money is not a problem yaar, but how do we do it?
Tulsidas: Ok I’ll just I’ll just speak with my concerned people and get back to you on this
Me: ok fine ya ya..
Tulsidas: Bye

Paid News II – Second Call
Transcript
Conversation with Tulsidas Desai, marketing manager Herald
Date: Oct 20, 2011
Phone contacted: 9822568376

(phone Ringing)

Tulsidas: Hello
Me: Mr Tulsidas…
Tulsidas: Ya
Me: Bernard
Tulsidas: Ya tell me.
Me: I spoke to you today morning.
Tulsidas: Ya right what happened no… Time being I think it is very much costlier kind of thing which I got to know you know
Me: Ok
Tulsidas: It is in terms of more than lakhs of rupees kind of
Me: For one interview?
Tulsidas: Vhoi.. ya. That is what I heard, so I thought not to take kind of this thing. What I can help is that within a limited this thing… I can take a half an hour interview which will be shown three times on the TV
Me: No… on HCN no HCN is not very powerful, Herald is powerful no…
Tulsidas: But when your news will come on Herald that watch HCN today at so and so time for the one to one interview of your candidature.
Me: Actually money is not a problem, can you tell me how much so that I can prepare myself?
Tulsidas: No they are telling a huge amount that is what I am really thing this
Me: Approximate. Tell me approximate how much approximate na. If I am willing then I can might as well go ahead with it.
Tulsidas:  Best thing know they were saying is approximately two lakh (rupees).
Me: So Raymond’s interview was two lakh (rupees).
Tulsidas: Ya ya ya ya ya…
Me: Ok ok ok… Actually one interview I would not mind spending that much.
Tulsidas: Ok I will just check with them.
Me: Ya ya ya
Tulsidas: I’ll just get back to you…
Me: Ya ya ya ya.

Paid News III – Third Call
Transcript
Conversation with Tulsidas Desai, marketing manager Herald
Date: Oct 20, 2011
Phone contacted: 9822568376

Tulsidas: Hello
Me: Hello
Tulsidas: Ya Bernard
Me: Tulsidas I was traveling, I am sorry I missed you. Ya tell me.
Tulsidas: Ok.. This is what we decided no. What we can plan like you know. First we’ll do one to one interview on TV on HCN TV and after that episode next week, we can carry the same kind of write up… how it is appeared today no…
Me: In interview form.. I want in interview form so that people know no…
Tulsidas: Right… In that format only, how it has appeared today no
Me: And no advertorial no?
Tulsidas: Ah?
Me: No advertorial no
Tulsidas: Advertorial only
Me: But you are not going to say advertorial no?
Tulsidas: No… Today how nothing is mentioned no? Like that only…
Me: Ok ok.. and whom should I make payments and how much?
Tulsidas: See the HCN thing you have to make a payment of 50,000 thousand (rupees)
Me: Ok
Tulsidas: And this particular size for Herald, it will be 86,400 (rupees).
Me: 86400 for half page like it has appeared today.
Tulsidas: Actually it is not half page, it is fifteen centimeter height eight columns.
Me: I don’t know… its seemed like half page…
Tulsidas: No no no no
Me: It will be more than half page.
Tulsidas: No this is little lesser than half page… Todays… todays.
Me: Ok ok. And whom should I contact for the interview?
Tulsidas: No… if you come to… first you can prepare yourself with the questionnaire and all
Me: Ok ok
Tulsidas: And then we’ll fix up your interview in our studio in Panjim
Me: Ok.. hanh
Tulsidas: Ok HCN studio
Me: Yes
Tulsidas: And once that interview is taken with that only we can get question and answers positively for you benefit
Me: Ok ok
Tulsidas: and that will appear as a… your interview on paper
Me: Ok ok… and when can I make an appointment for this?
Tulsidas: This you can tomorrow…
Me: Sometime… I might be a little out over the weekend. So Monday maybe? Monday… Tuesday?
Tulsidas: No problem we’ll fix it on Monday Tuesday… no problem.
Me: And I will get to meet the editor and all with this no, so that I can also tell him what I am doing for this?
Tulsidas: No… that is what when your interview… one to one interview will be taken on the HCN channel, so that is from our editorial people only no?
Me: Ok ok ok ok
Tulsidas: Only you have to prepare from side which kind of questions you will like to answer comfortably
Me: I will come with a list of questions which will help project my image better for elections.
Tulsidas: No that is the reason. Monday you ring me up and I will fix up appointment for interview within a couple of days and before you come down here, you have to send me a soft copy of the questions
Me: So then Monday we do it for HCN and Tuesday Wednesday we can do it for Herald.
Tulsidas: Herald we’ll keep one four five days gap.
Me: Ya ya because it is not good immediately.
Tulsidas: It should not hammer the this thing no
Me: So I’ll get in touch with you on Monday or Tuesday
Tulsidas: No better you do one thing. Monday personally you come to my office
Me: Monday I will come to Panaji… You have been most helpful.
Tulsidas: Panjim Panjim… Our office is in Campal trade centre
Me: Ya ya I know, I came to meet somebody one day it is shifted I think now.
Tulsidas: Ya Campal trade centre it is
Me: Ya I will see you there. Thank you so much
Tulsidas: Ya…welcome bye
Me: Bye

Paid News IV Fourth Call
Transcript
Conversation with Tulsidas Desai, marketing manager Herald
Date: Oct 22, 2011
Phone contacted: 9822568376

Tulsidas: Hello
Me: Tulsidas
Tulsidas: Ya.
Me: Bernard
Tulsidas: Ya Bernard.
Me: How are you man
Tulsidas: Fine Fine
Me: Ok see I spoke to my campaign manager yesterday and he said he wants two interviews, one maybe this week… next week and one maybe four to five weeks later
Tulsidas: Interview
Me: On Herald. Two interviews for the same price that you mentioned. So that 86 (000) four hundred no?
Tulsidas: 86,400 right
Me: Into two.
Tulsidas: Ya ok         
Me: But I want them
Tulsidas: Monday you are coming no?
Me: Ya but can you just send me a quotation? A rough quotation?
Tulsidas: No.. Actually this kind of this no… this is like a editorial kind of things no, I cant mention on the paper you know
Me: Something yaar… so that I also have to show that somewhere no?
Tulsidas: Ok I’ll do that
Me: Take my email address
Tulsidas: You text me on this because I am driving.
Me: And er… listen how do I make the payment?
Tulsidas: You can make the cheque payment… that is no problem
Me: Cash is ok… because it is election expenditure and stuff like that
Tulsidas: No problem… no problem
Me: Cash I’ll come with cash
Tulsidas: Election expenditure you cannot put now no because election expenditure start in the code of conduct
Me: I have to make it my books also no somewhere?
Tulsidas: Ok ok
Me: I will come with cash on Monday… Monday or Tuesday. I’ll give you a call ya
Tulsidas: Ok
Me: I will just message you the email
Tulsidas: Ok ok

Glossary

Me: Mayabhushan Nagvenkar… Herald reader
Tulsidas Desai: Tulsidas Desai is a senior marketing executive who represents Herald newspaper and the Herald Cable Network
HCN: Herald Cable Network, a local cable news channel operating in Goa.
Herald: Goa’s leading English language daily
Bernard Costa: Mayabhushan posing as a fictitious individual who wants to contest elections from the Velim assembly constituency in south Goa.
Raymond D’Sa: A politician from the Cortalim assembly constituency who is lobbying for a Congress ticket and whose interview was published in the Herald on October 20.
Campal Trade Centre: A building complex located in central Panaji which houses the Herald office.

चैनल के नाम पर बेरोजगारों को ठगने वाला एमडी लौटाएगा पैसे

शिमला। बेरोजगारों के साथ ठगी के मामले में फंसे एक निजी न्यूज चैनल का एमडी बेरोजगारों का पैसा वापस लौटाएगा. पुलिस की हिरासत में एक सहयोगी के आने के बाद एमडी ने सभी 22 बेरोजगार युवाओं के पैसे लौटाने का वादा किया है. शनिवार को न्‍यूज चैनल में नौकरी के नाम पर ठगे गए युवाओं तथा एमडी का आमना-सामना थाना सदर में हुआ. पुलिस की मौजूदगी में तमाम तरह के आरोप-प्रत्‍यारोप लगे. अंत में एमडी ने सभी बेरोजगारों के पैसा वापस करने का वायदा किया है. पुलिस ने उसको एक सप्‍ताह की मोहलत दी है.

पुलिस द्वारा की गई अब तक की जांच में खुलासा हुआ है कि इस पूरे प्रकरण का मास्टर माइंड कथित न्‍यूज चैनल का एमडी राजेंद्र विधान है. इस मामले में पुलिस हिरासत में लिये गए  प्रेम सिंह को भी उसने मोहरा के रूप में इस्‍तेमाल किया. पुलिस का कहना है ठगी के शिकार युवा चाहते हैं कि उनका पैसा उन्‍हें वापस मिल जाए. आरोपी एमडी भी पैसा वापस लौटाने को तैयार है. इस स्थिति में अगर उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है तो बेरोजगारों का पैसा अटक जाएगा. इसलिए बेरोजगार भी कानूनी कार्रवाई की बजाय पैसे वापस दिलाने का दबाव डाल रहे हैं. फिलहाल एमडी के पास अभी 50 हजार रुपये हैं, जबकि कुल रकम करीब साढ़े तीन लाख है. पुलिस ने बताया कि इतनी रकम का इंतजाम करने के लिए उसे एक सप्‍ताह का वक्त दिया गया है. डीएसपी सिटी बलबीर जसवाल ने कहा कि राजेंद्र विदान पैसा लौटाने को तैयार हो गया है. यह पूरे मामले का मास्टर माइंड है. आरोपी की गिरफ्तारी तय है.

कथित निजी न्यूज चैनल के एमडी का मोहरा बने प्रेम सिंह वर्मा ने कहा कि नेटवर्क डायरेक्टर के पद पर उसे तैनाती दी गई. हिमाचल में नेटवर्क खड़ा करने के आदेश दिए कहा कि प्रत्येक रिपोर्टर से 15,000 हजार और प्रत्येक ब्यूरो प्रमुख से 25,000 हजार लेने हैं. यह पैसा उनके प्रशिक्षण पर खर्च होगा. प्रशिक्षण के तुरंत बाद इन्हें प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र, पहचान पत्र और वेतन दिया जाएगा. प्रेम सिंह ने आरोप लगाया कि उसने पांच महीने तक काम किया पर इस दौरान उसे वेतन के रूप में एक रुपया तक नहीं दिया गया. वह खुद राजेंद्र विधान की ठगी का शिकार हुआ है, उसको जो भी पैसा या चेक मिला उसने राजेंद्र विधान को दे दिया. इसका रिकार्ड भी उसके पास मौजूद है.

राज एक्‍सप्रेस के मालिक को फिर झटका देने की तैयारी में शिवराज सरकार!

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान और उनकी सरकार से पंगा लेना दैनिक राज एक्सप्रेस के मालिक अरुण सहलोत को लगातार महंगा पड़ता जा रहा हैं. कुछ माह पहले सरकार ने भोपाल में उनके मिनाल माल का एक बड़ा हिस्‍सा अवैध बताकर ढहा दिया था. अब फिर से लगाम टाइट करने की तैयारी चल रही है. पुराने झटकों से अभी अरुण सहलोत उबरे भी नहीं हैं कि नए झटके देने की तैयारी शुरू हो गई है.

भोपाल नगर निगम ने राज एक्‍सप्रेस के मालिक अरुण सहलोत के हाउसिंग इकाई राज होम्‍स का लाइसेंस भी रद्द कर दिया है. यह कार्रवाई एक तरफा न लगे इसलिए तीन अन्‍य कोलनाइजरों के लाइसेंस भी रद्द किए गए हैं. अब निर्धारित ले आउट के उल्‍लंघन मामले में कार्रवाई की तैयारी की जा रही है. इसके चलते राज होम्‍स द्वारा बनाए गए पौने सात सौ फ्लैटों एवं मकानों पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं. राज एक्‍सप्रेस के मूल धंधे यानी प्रॉपर्टी पर लगातार सरकारी हमले का असर अब अखबार पर भी पड़ने लगा है. यहां लगातार स्थितियां खराब होती जा रही हैं. प्रदेश सरकार से पंगा लेना अब इस ग्रुप को भारी पड़ता जा रहा है. अब देखने वाली बात होगी कि शिवराज सरकार अरुण सहलोत को बख्‍श देती है या फिर राज होम्‍स में तोड़ फोड़ करवाकर फिर झटका देती है?

सूचना विस्‍फोट पर प्रतिबंध का ढक्‍कन लगाने की तैयारी!

मीडिया को लेकर देश के लगभग सभी राजनीतिक दल इस समय परेशान हैं। अधिकांश विपक्षी दल भी कम से कम इस एक मुद्दे पर तो सरकार के साथ हैं कि मीडिया पर लगाम लगाने की जरूरत है। सत्तारूढ़ सरकारें समय-समय पर मीडिया को कसने के प्रयोग करती रही हैं। आपातकाल के दौरान भी विपक्ष के पैरों में बेड़ियां व मीडिया के हाथों में चूड़ियां पहनाई गई थीं।

मीडिया का एक प्रभावशाली वर्ग तब घुटनों के बल झुकने की मांग करने पर रेंगने को भी बेताब था। पर तब भी प्रेस के खिलाफ सेंसरशिप का पुरजोर विरोध किया गया था। राजीव गांधी के शासनकाल में भी प्रेस को नियंत्रित करने का प्रयत्न हुआ था, पर तब भी इतना विरोध उभरा था कि वह संभव नहीं हो पाया था।

मीडिया एक बार फिर सरकार की चर्चा और सांसदों के हमलों की चपेट में है और उसके इरादों और नीयत को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं। अन्ना के आंदोलन के दौरान मीडिया द्वारा अपनाई गई भूमिका को लेकर फब्तियां कसी जा रही हैं और उसके ‘बेलगाम’ कवरेज पर सवाल उठाए जा रहे हैं। समझदार लोगों को और समझाया जा रहा है कि अगर मीडिया का समर्थन नहीं होता तो अन्ना के आंदोलन को इतना व्यापक समर्थन नहीं मिलता।

निष्कर्ष यह कि सरकार के खिलाफ सिविल सोसायटी के किसी भी सार्थक आंदोलन को अगर भोथरा करना हो तो उसके लिए पहले मीडिया पर डंडे चलाना जरूरी है। मीडिया को अनुशासित करने की पहल दो स्तरों पर की जा रही है। पहली यह कि अगर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों द्वारा प्रसारित की जाने वाली सामग्री के लिए निर्धारित शर्तो और ‘अनुशासन’ में उल्लंघन होता है तो उनके लाइसेंसों का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। नए चैनलों के लिए लाइसेंस जारी करने को लेकर भी नए सिरे से प्रावधानों की व्याख्या की गई है। इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने ‘स्वानुशासन’ के पालन में न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की देखरेख में अपने लिए पहले से दिशा-निर्देश तय कर रखे हैं और उनका यथासंभव पालन भी किया जा रहा है। पर सरकार की नई पहल इन आशंकाओं को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को उसके ‘स्वानुशासन पर्व’ से मुक्त करना जरूरी है।

मीडिया पर लगाम कसने का दूसरा उपक्रम वर्ष 2009 के चुनावों के बाद ‘पेड न्यूज’ को लेकर उठी बहस से उत्पन्न हुआ है। कहा जा रहा है कि पेड न्यूज की बुराई पर रोकथाम के लिए कड़े से कड़े कानूनी प्रावधानों की जरूरत है। पेड न्यूज के मुद्दे को हथियार बनाकर समाचार पत्रों की कथित ‘मनमानी’ रोकने को लेकर भी सभी दलों की सोच लगभग समान है। ‘जनहित’ के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिशें केंद्र में भी की जा रही हैं और उन राज्यों में भी, जहां कतिपय मुख्यमंत्री इतने ताकतवर हो गए हैं कि मौका मिलने पर प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाने की भी महत्वाकांक्षा रखते हैं।

मीडिया को लेकर चल रही बहस में अब भारतीय प्रेस परिषद के नवनियुक्त अध्यक्ष न्यायमूर्ति मरकडेय काटजू का वह उद्बोधन भी शामिल हो गया है, जो उन्होंने पिछले दिनों दिया था। श्री काटजू के अनुसार कई लोगों, जिनमें जो सत्ता में हैं वे ही नहीं, बल्कि आमजन भी शामिल हैं, ने कहना शुरू कर दिया है कि मीडिया गैरजिम्मेदार व स्वच्छंद हो गया है, अत: उसे नियंत्रित किया जाना जरूरी है। उनका यह भी कहना है कि मीडिया की स्वतंत्रता भी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही हिस्सा है। पर कोई भी स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती। उस पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।

श्री काटजू का यह भी मानना है कि मीडिया की कमियों को दूर करने के दो ही तरीके हैं। एक तो प्रजातांत्रिक तरीका, जिसमें आपसी चर्चा और समझाइश की व्यवस्था है, जिसे कि वे स्वयं भी महत्व देना चाहेंगे। दूसरा यह कि अगर मीडिया सुधरने से इंकार कर दे तो अंतिम उपाय के रूप में उसके खिलाफ कड़े कदम भी उठाए जा सकते हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि गलती करने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए, उनके सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए जाएं, लायसेंस रद्द कर दिए जाएं। श्री काटजू ने यह भी आरोप लगाया कि मीडिया तथ्यों को तोड़ता-मरोड़ता है, गैर-जरूरी मुद्दों को उछालता है, देश की कड़वी आर्थिक सच्चाइयों की तरफ आंखे मूंदे रखता है और बम-धमाकों आदि घटनाओं की जानकारी देने के दौरान एक समुदाय विशेष को आतंकवादी या बम फेंकने वाला दर्शाने की प्रवृत्ति मीडिया की रहती है। श्री काटजू पूछते हैं कि क्या मीडिया का जाने-अनजाने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का हिस्सा बनना उचित है?

सरकार को सिविल सोसायटी के आंदोलन व उसके मीडिया कवरेज से परहेज है। टीम अन्ना पर किए जा रहे लगातार हमले इसका प्रमाण हैं। विपक्षी पार्टियों को सलाह दी जा रही है कि वे नकारात्मक रवैया छोड़ें यानी सरकार की कमियों और गलतियों को ढूंढ़ना बंद कर दें। न्यायपालिका के बारे में कहा जा रहा है कि वह लक्ष्मण रेखा लांघ रही है। और अब मीडिया को अनुशासित करने के लिए अलग-अलग माध्यमों की मदद ली जा रही है। इस भ्रम का कोई इलाज नहीं है कि मीडिया और मीडियाकर्मियों को ‘अनुशासित’ और ‘नियंत्रित’ करके सूचना के विस्फोट पर प्रतिबंधों के ढक्कन नहीं लगाए जा सकते।

‘मुक्त व्यापार’ और ‘नियंत्रित समाचार’ की जुगलबंदी की कोई भी कोशिश लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। मीडिया लक्ष्मण रेखा लांघता है तो उससे निपटने को बाजार की ताकतें व एक परिपक्व दर्शक/पाठक वर्ग हमेशा तैयार बैठा है। मीडिया को इस समय समाज की उन ताकतों के खिलाफ संरक्षण की जरूरत है, जो उसकी आवाज को कुचलने और कुतरने के षड्यंत्र में लगी हुई हैं। इसमें निहित स्वार्थो वाले सभी तरह के राजनेता, धर्मगुरु, कॉपरेरेट घरानों के लॉबिस्ट और हर तरह का माफिया शामिल हैं। एक तरफ सूचना उजागर करने वालों (व्हिसलब्लोअर्स) के खिलाफ हमलों की वारदातें बढ़ रही हैं और दूसरी तरफ ‘सूचना के अधिकार’ और ‘सूचना के वाहकों’ को नियंत्रित करने की कोशिशें भी जारी हैं। इन विरोधाभासी मुखौटों के साथ अपने लोकतंत्र का दुनिया से अभिषेक करवाने की उम्मीदें नहीं की जा सकतीं।

लेखक श्रवण गर्ग वरिष्‍ठ पत्रकार एवं दैनिक भास्‍कर के संपादक हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में छप चुका है. इसे वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. 

पत्रकार आबिद सुहेल को मिलेगा इस साल का मौलाना अबुल कलाम आजाद पुरस्‍कार

उत्‍तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने उर्दू के प्रख्‍यात उपन्‍यासकार एवं पत्रकार आबिद सुहैल को 2011-12 के प्रतिष्ठित मौलाना अबुल कलाम आजाद पुरस्‍कार के लिए चुना है. श्री सुहेल का चयन उर्दू साहित्‍य तथा पत्रकारिता में उनके योगदान के लिए किया गया है. इस पुरस्‍कार के तहत उन्‍हें पांच लाख रुपये तथा प्रशस्‍ति पत्र प्रदान किया जाएगा. लखनऊ निवासी आबिद सुहेल ने करियर की शुरुआत अंग्रेजी दैनिक द नेशनल हेराल्‍ड के साथ की थी. 

आबिद ने उर्दू भाषा में 15 से जयादा किताबों का लेखन किया है, जिसमें महशूहर उपन्‍यास 'गुलाम गर्दिश' और 'सबसे छोट गम' भी शामिल है. इनकी ऑटोबायोग्राफी पर दिल्‍ली उर्दू अकादमी इन्‍हें फेलोशिप भी प्रदान कर चुकी है.

दिवाली पर कहीं बैग और बोनस मिला तो कहीं मिठाई के लिए तरसे पत्रकार

दिवाली अलग-अलग संस्‍थानों के पत्रकारों के लिए अलग-अलग अनुभव लेकर आई. कई जगहों पर दिवाली के मौके पर पत्रकारों को मिठाई नसीब नहीं हुई तो कहीं पत्रकारों को मिठाई के साथ छोटे मोटे गिफ्ट भी मिले. चैनलों के हाल बुरे रहे. छोटे चैनलों के पत्रकारों को मिठाई तक नहीं मिली. जबकि अखबारों के कार्यालयों में कम से कम सभी जगह कर्मचारियों को मिठाइयां मिलीं.

दैनिक भास्‍कर के कई यूनिट में पत्रकारों को मिठाई मिलीं. चंडीगढ़ समेत कई यूनिटों में प्रबंधन ने पत्रकारों को दिवाली के मौके पर ट्राली बैग गिफ्ट के रूप में दिया. दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्‍तान के भी कई यूनिटों में मिठाइयां बंटी. इसको लेकर भी कहीं खुशी कहीं गम देखने-सुनने को मिला. बनारस के लगभग सभी अखबारों में दिवाली पर मिठाइयां बांटी गईं. अखबार के कार्यालयों में लगभग सभी जगह मिठाई बांटे जाने की सूचना है.

सबसे बुरा हाल न्‍यूज चैनलों का रहा. न्‍यूज24 और सीएनईबी जैसे चैनलों ने बिस्‍कुट बांटा तो खबर भारती, हमार टीवी, फोकस टीवी, आगरा के मून टीवी में पत्रकार मिठाई के लिए भी तरस गए. हमार टीवी में तो पत्रकारों को उनकी सेलरी तक दिवाली के मौके पर नहीं मिली. डेढ़ से दो महीने लेट चल रही सेलरी भी अब एकाउंट में आने की बजाय चेक से दी जा रही है. दिवाली से पहले यहां काम करने वाले पत्रकारों को चेक भी नहीं मिला और मिठाई भी नहीं बांटी गई. साधना न्‍यूज के कर्मचारियों के लिए दिवाली बढि़या रही. यहां बिस्‍कुट के पैकेट मिलने के साथ बोनस के रूप में 2100 रुपये भी कर्मचारियों को बांटे गए.

न्‍यूज एक्‍सप्रेस से सरफराज सैफी का इस्‍तीफा, सुनील बने शिक्षक

न्‍यूज एक्‍सप्रेस से सरफराज सैफी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर प्रोड्यूसर कम एंकर थे. बताया जा रहा है कि सरफराज जल्‍द ही यूपी-उत्‍तराखंड से लांच होने वाले एक चैनल से सीनियर पद पर जुड़ने वाले हैं. चैनल हेड मुकेश कुमार के नजदीकी माने जाने वाले सरफराज के इस्‍तीफा देने के कारणों का पता नहीं चल पाया है. सरफराज ने अपने करियर की शुरुआत आठ साल पहले मेरठ में आजतक के रिपोर्टर के रूप में की थी. उसके बाद वे एसवन तथा आजाद न्‍यूज के लांचिंग टीम के सदस्‍य के रूप में भी लंबी पारियां खेलीं. आजाद न्‍यूज से ही इस्‍तीफा देकर वे न्‍यूज एक्‍सप्रेस पहुंचे थे. सरफराज की पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश एवं उत्‍तराखंड में राजनीतिक तथा प्रशासनिक हलको में बढि़या पकड़ मानी जाती है.

बनारस से खबर है कि संपादक पर कई आरोप लगाकर इस्‍तीफा देने वाले सुनील कुमार ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय से संबद्ध एक कॉलेज में पत्रकारिता के शिक्षक के रूप में ज्‍वाइन किया है. सुनील पिछले डेढ़ दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इस संदर्भ में सुनील से बात करने का प्रयास किया गया परन्‍तु उनसे संपर्क नहीं हो पाया. 

‘डीएम मुझसे लड़कियां मांगता है’

मध्‍य प्रदेश का एक डीएम अपने जिले के चिकित्‍सा अधिकारी से लड़कियों की मांग करता है. डीएम अच्‍छी नर्सों को अपने बंगले पर लेकर आने को कहता है. दिल्‍ली से आने जाने के लिए हर महीने प्‍लेन का किराया मांगता है. उसकी मांगें पूरी नहीं करने पर जातिसूचक शब्‍दों की गालियां देता है. यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि ऐसा आरोप लगाया है मध्‍य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मुख्‍य चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य अधिकारी डा. आरएस चौहान ने.

डा. चौहान ने मानवाधिकार आयोग समेत कई विभागों और अधिकारियों को भेजे गए पत्र में आरोप लगाया है कि छिंदवाड़ा के डीएम पवन शर्मा उनसे तमाम तरह के अनावश्‍यक मांग करते रहते हैं. और मांग न माने जाने पर लगातार परेशान कर रहे हैं, जिससे शासकीय कार्य भी प्रभावित हो रहा है. डा. आरएस चौहान ने आरोप लगाया है कि पवन शर्मा उनसे कहते हैं कि अच्‍छी नर्सों को उनके आवास पर लेकर आओ. पूर्व जो अधिकारी तुम्‍हारे पद पर था, वो मेरे लिए लड़कियों की व्‍यवस्‍था करता था. अगर जिले में रहना है तो यह सब करना पड़ेगा. 

डा. चौहान ने यह भी आरोप लगाया है कि डीएम उनसे महीने में दो बार दिल्‍ली आने-जाने का टिकट की भी मांग की गई, जब उन्‍होंने डीएम की मांग पूरी नहीं की तो उन्‍होंने उनको प्रताडि़त करना शुरू कर दिया. तमाम सरकारी कामों में बाधा उत्‍पन्‍न किया गया, जिसके चलते जिले में चिकित्‍सा सेवा प्रभावित हो रहा है. उन्‍होंने डीएम पवन शर्मा पर और भी कई संगीन आरोप लगाए हैं. इस संदर्भ में जब छिंदवाड़ा के जिलाधिकारी कार्यालय में डीएम पवन कुमार शर्मा का पक्ष जानने के लिए फोन किया गया तो उनके स्‍टेनो ने बताया कि वो जिला जज के साथ किसी म‍ीटिंग में हैं, बाद में बात हो पाएगी. बाद में जब डीएम के मोबाइल पर कॉल किया गया तो उन्‍होंने फोन रिसीव नहीं किया, जिससे उनका पक्ष नहीं जाना जा सका.   नीचे डा. चौहान द्वारा तमाम लोगों को भेजा गया पत्र.

राजीव कटारा बने कादंबिनी के सहयोगी संपादक

हिंदुस्‍तान मीडिया वेंचर लिमिटेड की पत्रिका कादंबिनी के कार्यकारी संपादक रहे गोविंद सिंह के इस्‍तीफा देने के बाद खाली हुए पद का प्रभार वरिष्‍ठ पत्रकार राजीव कटारा को सौंपा गया है. भड़ास को देर से मिली सूचना के अनुसार राजीव कटारा कादंबिनी के प्रभारी संपादक बनाए गए हैं. पत्रिका में उनका नाम सहयोगी संपादक के रूप में जा रहा है. इसके पहले वे हिंदुस्‍तान में खेल पेज की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. कादंबिनी के संपादक पद पर किसी की स्‍थाई नियुक्ति नहीं की गई है. कभी अपनी अलग पहचान रखने वाली यह पत्रिका आज हाशिए पर चली गई है.

प्रबंधन इस पत्रिका को अब गंभीरता से नहीं ले रहा है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कभी विष्‍णु नागर जैसे साहित्‍यकार के संपादन में निकलने वाली पत्रिका में संपादक का पद पिछले काफी समय से खाली है. इस पत्रिका के संपादक रहे गोविंद सिंह के यहां से इस्‍तीफा दिए काफी समय हो चुका है, उसके बाद भी इस पद पर किसी संपादक की स्‍थाई नियुक्ति नहीं हो पाई है. गोविंद सिंह फिलहाल उत्‍तराखंड मुक्‍त विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर बन चुके हैं. कभी एक दर्जन से ज्‍यादा लोगों के सहारे निकलने वाली पत्रिका को मात्र तीन-चार लोग मिलकर निकाल रहे हैं. पत्रिका के सहयोगी संपादक बनाए गए राजीव कटारा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा चौथी दुनिया, अमर उजाला समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं.

लखनऊ से लांच हुआ चेतना मंच, राजेश श्रीनेत बने संपादक

नोएडा से प्रकाशित मिडे डे दैनिक चेतना मंच अब अपना विस्‍तार शुरू किया है. अखबार का संस्‍करण नोएडा के साथ लखनऊ से भी प्रकाशित होगा. लखनऊ एडिशन का संपादक वरिष्‍ठ पत्रकार राजेश श्रीनेत को बनाया गया है. राजेश श्रीनेत लम्‍बे समय तक अमर उजाला के साथ रहे हैं. वे उजाला को बरेली तथा इलाहाबाद में अपनी सेवाएं दी हैं. हिंदुस्‍तान, वाराणसी की लांचिंग भी राजेश श्रीनेत ने ही कराया था. हिंदुस्‍तान के आरई के रूप में इन्‍होंने अखबार को पहचान दी थी. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे लखनऊ में रहकर खुद की एक पत्रिका का प्रकाशन करने लगे थे. इसके बाद सहारा प्रबंधन ने इन्‍हें आरई बनाकर देहरादून के लांचिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी थी. बाद में उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था.

इस संदर्भ में पूछे जाने पर चेतना मंच के प्रधान संपादक आरपी रघुवंशी ने बताया कि हम विस्‍तार की योजनाओं पर काम कर रहे हैं. इस दिशा में यह पहला कदम है. राजेश श्रीनेत वरिष्‍ठ एवं सुलझे हुए पत्रकार हैं, उनके नेतृत्‍व में चेतना मंच लखनऊ में भी नई पहचान बनाएगा तथा लोगों की आवाज बनेगा. हम आगे भी नए एडिशन लांच करेंगे. नीचे राजेश श्रीनेत के फेसबुक पर डाला गया चेतना मंच के लांचिंग का पोस्‍ट. 

लखनऊ। अदब के शहर लखनऊ में ताजा एवं निष्पक्ष खबरों का आगाज लेकर हिन्दी दैनिक चेतना मंच ने शुक्रवार को जोश खरोश के साथ शुरुआत की। अपर पुलिस महानिदेशक मानवाधिकार आयोग रिजवान अहमद ने तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच चेतना मंच कार्यालय का फीता काटकर चेतना मंच परिवार की खुशियों में चार चांद लगाया। उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों के माध्यम से ही आम जनता की समस्याएं अफसरों तक पहुंचती है और उनका निराकरण भी किया जाता है।

अपर पुलिस महानिदेशक ने कहा कि समाचार पत्रों को निष्पक्ष और विश्वसनीय रहना बेहद जरूरी है क्योंकि समाचार पत्र औरा पाठक एक दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि खोजी पत्रकारिता के कारण ही देश के हाई प्रोफाइल वारदातों का खुलासा भी हुआ। श्री रिजवान अहमन ने चेतना मंच समाचार पत्र की दिनोदिन तरक्की की दुआएं भी की। लांचिंग के मौके पर मशहूर जादूगर राकेश श्रीवास्तव भी अपना कला दिखाने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने एडीजी से एक रद्दी कागज पर आग लगवाई और जब कागज पूरी तरह से जल गया तो डिब्बे से चेतना मंच अखबार निकला। जादूगर ने तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच वाहवाही लूटी। जादू के माध्यम से चेतना मंच की एचआर हेड सुश्री आभा वर्मा का दिमागी टेस्ट भी लिया गया लेकिन अफसोस कि वह इस टेस्ट में फेल हो गईं। प्रबंध निदेशक सर्वेश राय व मोहमद ताहिर ने मुख्‍य अतिथि को बुके भेंट किया।

संपादक राजेश श्रीनेत ने कहा कि लखनऊ में अभी तक मिड-डे अखबारों का चलन नहीं था। लेकिन पाठकों की सहूलियतों को देखते हुए एक प्रयास किया गया है उमीद है कि पाठकों को यह प्रयास पसंद आएगा। श्रीनेत ने कहा कि जिन पाठकों को कोई भी समस्या हो वह बेहिचक चेतना मंच के माध्यम से अपनी आवाज उठा सकता है। इस अवसर पर प्रदेश के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री राम आसरे, काजी आसिफ, वरिष्‍ठ पत्रकार शिव सरन सिंह, एसपी सिंह, पंकज झा, उमेश पाठक, नासिर खान, नादिर वहाब, आसिफ जाफरी, जितेन्द्र त्रिपाठी, मनीष श्रीवास्तव, कलाम खान, विजय कुशवाहा, अलाउद्दीन खान, अभिनव पांडेय, डीआईजी के पीआरओ पीके श्रीवास्तव, चौकी प्रभारी विनोद सिंह,राशिद सगीर, मो तैय्यब, मोहमद इसराइल पिपरसा, संजय जंगवान, सदाकत एडवोकेट सहित चेतना मंच परिवार के सुश्री आभा वर्मा, अजेश गुप्ता, सुमईया राना गजल, सोमेश शुक्ल, मोहमद अतहर रज़ा, सगीर, तौकीर, बलराम सिंह, श्यामबाबू मिश्र, जीवन लाल, असमा खान, इरशाद, हनीफ व लड्डन आदि मौजूद थे।

चला गया दरबारी और सूना हो गया राग दरबार

श्रीलाल शुक्ल जी के निधन से एक युग का अंत हो गया है। वह युग जो भारतेंदु से प्रारंभ और व्यंग्य लेखन के शीर्ष तक पहुंचा। उन्होंने ऐसी खिड़की बनाई जिससे भारत का सच्चा रूप देखा जा सकता था। गांव-शहर के बीच के सम्बन्ध पर ऐसी तस्वीर किसी और उपन्यास में नहीं जैसा राग दरबारी में है। रूप में विद्रूप का यह स्वरूप ‘राग दरबारी’ की एक महाकाव्यात्मक उपलब्धि है, जो अपने प्रथम अनुच्छेद से ही बांध लेता है.. हमारे ट्रक हमारी सड़कों से कैसा सलूक करते हुए गुजरते हैं। और उस ट्रक में जो युवा है वह संजय के समान कस्बे में बदलते गांव की तस्वीर बांचते चले गये।

शनिचर, वैद्यजी, रूपम बाबू, छोटे पहलवान और मास्टर, जो कक्षा में कम अपनी आटा चक्की पर ज्यादा दिखते हैं। गांव की सतही लेकिन गहरी राजनीति ..सब कुछ का व्यंग्य की नई भाषा गढ़ते हुए अद्भुत चितण्रहुआ है। राग दरबारी से पहले हालांकि अंगद का पांव व्यंग्य उपन्यास वे लिख चुके थे लेकिन राग दरबारी सातवें दशक के अंत के न केवल भारत का बल्कि पूरे विश्‍व का अनूठा उपन्यास बन गया। व्यंग्य की जो वर्णनशैली उन्होंने ईजाद की वह उनके व्यक्तित्व का प्रतिफल या हिस्सा नहीं थी। जब वे संवाद करते थे, गहन गंभीर आलोचक और सुपठित ज्ञानी की तरह लेकिन जब वे लिखते थे तो कोई ऐसा वाक्य नहीं होता था, जिसमें कोई आंकी- बांकी अदा न हो। निरीक्षण की अद्भुत क्षमता रखने वाले श्रीलाल जी ने एक जगह कहा है,‘उनकी बांछें खिल गई, जो शरीर में पता नहीं कहां होती है’ और यह सच है कि बांछें खिलने का मुहावरा हिन्दी क्षेत्र का प्रत्येक व्यक्ति मानता है लेकिन कहां होती हैं, किसी को नहीं मालूम। उनका व्यंग्य भी बांछों की तरह था, जो उनके साहित्य में खिलता और खिलखिलाता था।

ग्रामीण परिवेश की रोमानी अवधारणा को उन्होंने एक झटके में ध्वस्त कर दिया। ‘अहा! ग्राम्य जीवन’ भी क्या है की मुग्धता का विदग्ध उत्तर है-राग दरबारी। आजादी के बाद के मुग्धत्व को उन्होंने बड़ी व्यंग्यपरक निर्ममता से तोड़ा। बिम्बों में वर्णन करते हुए शब्दों को नये अर्थ-प्रसंग प्रदान किये। आज विश्रामपुर का संत का रचयिता स्वयं विश्रामपुर पहुंच गया लेकिन मैं कहता हूं कि उनका व्यंग्य हालिफलहाल के रचनाकारों द्वारा अंगद के पांव की तरह इधर-उधर डोलाया भी जा नहीं सकता। एक और बड़ी बात थी उनमें कि जहां वे एक ओर अज्ञेय के प्रशंसक और समीक्षक थे, भगवतीचरण वर्मा और अमृतलाल नागर के अवदान पर समीक्षाएं लिखते थे, वहीं दूसरी ओर हिन्दी कविता की वाच्य परम्परा को भी प्यार करते थे। लखनऊ के ‘अट्टाहास’ द्वारा आयोजित अनेक काव्य-गोष्ठियों और संगोष्ठियों में मैंने उन्हें सुना और पाया कि वे साहित्य के लिए सम्प्रेषण को जरूरी मानते थे। रूपवादियों और कलावादियों को पसंद करने के बावजूद वे उनके पक्षधर नहीं थे। युवा साहित्यिकों को भरपूर प्रोत्साहन देते थे।

मैं उनके स्नेह में नहाया हूं। सातवें विश्‍व हिन्दी सम्मेलन के दौरान सूरीनाम में उनसे अच्छा सत्संग रहा। पिछले बरस में उनसे साक्षात्कार लेने के लिए उनके घर पर गया था। उनके साथ बिताये हुए वे कुछ घंटे मेरी स्मृति में भी हैं। वे अस्वस्थ थे और अपनी एक पुस्तक मुझे भेंट करना चाहते थे, जिसकी केवल एक प्रति कहीं बची थी। पूरे परिवार ने खोजा, पुस्तक मिली तो वे बच्चों की तरह प्रसन्न हुए और मैं उसको पाने के बाद और भी छोटे बच्चे की तरह मगन हुआ। तीन दशकों तक लखनऊ के रास्ते आने-जाने के बाद और सभा-संगोष्ठियों में अनेकों बार मुलाकात के बाद इस बार दिल्ली से प्रण कर  के गया था कि उनके घर जाना है। जो ईमारत दिखाई दी वह भी किताबों जैसी नजर आई। लगा लोहे के फाटक के पीछे अलग-अलग ऊंचाइयों पर रखे हुए गेरुए रंग से पुते अपार गमले थे। उनमें तरह-तरह के आड़े-तिरछे पौधे, जैसे राग दरबारी के चरित्र हों और जिस तरह मुखपृष्ठ पर कई बार लेखक का चित्र छपा होता है।

उसी तरह से शुक्ल जी दिख गए बरामदे में एक टेढ़ी बिछी हुई चारपाई पर लेटे हुए। शुक्ल जी आधे लेटे आधे बैठे हमारे बैठने की चिंता करने लगे। जैसे अच्छी पुस्तक मिले तो पहले आवरण पर हाथ फिराने का मन करता है। मन किया उनके चरणों पर हाथ फिरा लिए जाएं। यही वे चरण हैं, शिवपालगंज के गंजहों की बस्ती में घूमने के बहाने भारतीय मन और मनीषा की वीथियों में अस्सी साल से ज्यादा बसंत और पतझड़ रौंद चुके हैं। आशीष के कुछ बुदबुद स्वर सुने। मैंने आठवें वि हिन्दी सम्मेलन के समय की स्मारिका दी। अब वे लगे चश्मा ढूंढ़ने। पहला स्पष्ट वाक्य जो सुनने में आया, वह था, आधी उमर तो चश्मा ढूंढने में निकल गई। उठकर बैठने के लिए कहने लगे, पिछले दो महीने से यही दिक्कत हो गई है, लेट जाओ तो बैठना कठिन, बैठ जाओ तो पता नहीं चलता कि पीछे झुकते-झुकते कहां तक बिना झटके जाया जाए कि लेटना सम्पन्न हो जाए। चल लेता हूं, बीमारी कोई नहीं है। उम्र है। उम्र विस्तार पाए तो शिराएं सिकुड़ने लगती हैं। न्यूरो सर्जन ने भी देखा, कोई क्लॉट नहीं मिला। प्लॉट जो दिमाग में आते हैं, वे डाक्टर अभी देख नहीं सकते। ठीक हो जाऊंगा। पायल को उन्होंने आशीर्वादनुमा धन्यवाद दिया।

मैं चादर और मसनद के चौखानों में अटका हुआ था। लेखक किन-किन चौखानों से देखता है और किन-किन चौखटों में शब्दों के चित्र फ्रेम कर देता है। टेढ़े चौखटे, सीधे चौखटे, गोल मसनद, कटे शंकु जैसे गमले, उनके पौधों में त्रिशंकु जैसे लटके कुछ फूल। वे सम्मेलन समाचार पलट रहे थे। फिर उन्होंने पुस्तिका बंद करके पूछने लगे, ‘आज लखनऊ महोत्सव के कवि सम्मेलन में कौन-कौन कवि आ रहे हैं। मैंने बताया अनूप जी ने बीस-बाईस कवि बुलाए हैं। उनमें श्रीयुत रामाधीन भीखमखेड़वी और जनाब टांडवी भी नाम बदल कर आ रहे हैं। इस पर उन्होंने ठहाका लगाया और मैंने भी। ये दोनों कवि राग दरबारी के कवि पात्र थे। पुस्तक से निकलकर कवि सम्मेलन में शरीक होने प्राय: आते रहते हैं। अब हमें तो घर की पुस्तक के यानी श्रीलाल जी के घर अंदर जाना था। गए मकान की पुस्तक के अंदर। यहां पलंग पर चौखाने नहीं थे। फूल पत्तियां थीं। कोणार्क के पहियों जैसी आकृति के हत्थेवाली बेंत की एक शानदार कुर्सी थी। उस पर बैठ गया चक्रधर। फूल-पत्तियों पर बैठ गए थे शुक्ल जी। आज वे ही श्रीलाल जी अज्ञातवास में चले गए। उन्होंने भी जीवन जगत में आदमी के महत्त्व को सर्वाधिक करीब से जाना। यहां से वहां तक उमराव नगर से विश्रामपुर तक साहित्य का घर उनका घर है। हालांकि वे कहते रहे कि यह घर मेरा नहीं है।

लेखक अशोक चक्रधर कवि एवं साहित्‍यकार हैं. उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.

दैनिक जागरण के पत्रकार को पितृशोक

चंदौली : दैनिक जागरण के पत्रकार बद्री प्रसाद केशरी के पिता काशी प्रसाद केशरी का 95 वर्ष की अवस्था में शुक्रवार को निधन हो गया. वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे तथा उनका इलाज चकिया स्थित उनके आवास पर चल रहा था. वे अपने पीछे चार पुत्र एवं चार पुत्रियों का भरा पूरा परिवार छोड़ गये हैं. कल देर शाम उनका अंतिम संस्‍कार कर दिया गया. काशी प्रसाद के निधन के शोक में व्‍यापारियों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं. उपजा की बैठक में भी बद्री केशरी के पिता के निधन पर शोक जताया गया.

श्रीलाल होने का अर्थ

श्रीलाल शुक्ल के निधन से पूरा साहित्य जगत स्तब्ध है, क्योंकि वह जिस स्तर के रचनाकार थे, वैसे रचनाकार विरले ही होते हैं। हमारे साथ उनकी कृतियां हैं, जो हमें उनके होने की महत्ता की याद दिलाती रहेंगी। मैं उनसे बहुत घनिष्ठ रूप से नहीं जुड़ा था, लेकिन अकसर हम लोग विभिन्न गोष्ठियों वगैरह में मिलते रहते थे। उनके साथ जिए कुछ पलों के बड़े ही बेहतर संस्मरण हैं।

श्रीलाल शुक्ल का लेखन आज पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है। उन्होंने अपने बहुचर्चित उपन्यास राग दरबारी में जिस व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और ग्रामीण विसंगति को बहुत ही व्यंग्यात्मक शैली में लिखा है, वह उससे भी भ्रष्टतम रूप में आज हमारे सामने है। उस समय राजनीति व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के जिस दलदल में फंसी थी, वह आज और गहरा गया है। ग्रामीण जीवन की विसंगतियों को भी उन्होंने राग दरबारी में कलात्मक तरीके से दर्शाया है। राग दरबारी को प्रेमचंद के गोदान और फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आंचल की तरह क्लासिकल का दरजा हासिल है।

उत्तर प्रदेश के गांव के लोगों के चरित्र, उनके पाखंड, विसंगतियां, कमचोरी, आलस्य, काइयांपन आदि सब कुछ को उन्होंने निर्ममतापूर्वक पाठकों के सामने परोसा है। लेकिन तब भी श्रीलाल जी ने प्रेमचंद की तरह ग्रामीण जीवन को बहुत ज्यादा अपनी रचनाओं में नहीं लिया है। इसलिए इस मामले में प्रेमचंद से उनकी तुलना नहीं हो सकती। बेशक दोनों ने ग्रामीण जीवन के यथार्थ को उकेरा।

हालांकि दोनों हिंदी साहित्य के महान रचनाकार हैं, लेकिन उनके लेखन के विषय, शैली और एप्रोच अलग-अलग हैं। श्रीलाल जी ने व्यवस्थागत विसंगतियों और हमारी संस्थाओं और लोगों में बढ़ती मूल्यहीनता को बहुत बारीकी से दर्ज किया है। राग दरबारी में आजादी के बाद के ग्रामीण भारत की मूल्यहीनता को उन्होंने जिस तरह परत दर परत उघाड़कर हमारे सामने उद्घाटित किया है, उससे व्यवस्था के मारे आम लोगों का सहज ही तादात्म्य बन जाता है। यही कारण है कि प्रकाशन के इतने वर्षों बाद भी वह उपन्यास काफी लोकप्रिय है।

मैं श्रीलाल जी के लेखन की शैली और उनके विषयों को चुनाव का घोर प्रशंसक रहा हूं। उन्होंने कथ्य के अनुरूप लेखन के लिए शिल्प को अपनाया और उसी तरह की भाषा चुनी। इस लिहाज से कहें, तो विषयों के चुनाव, क्लीनिकल परीक्षण शैली और चीजों को देखने की बारीकी उन्हें एक बड़ा उपन्यासकार बनाती है।

ऐसी अपेक्षा रखना तो शायद ठीक नहीं होगा कि उनकी हर रचना राग दरबारी की तरह लोकप्रिय क्यों नहीं हुई या वह उससे बेहतर आगे क्यों नहीं लिख सके। दरअसल हर लेखक की हर रचना महान नहीं होती। लेकिन श्रीलाल शुक्ल के अन्य उपन्यास भी काफी अच्छे और महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जहां मध्यवर्गीय जीवन को कथ्य बानाकर विश्रामपुर का संत जैसा उपन्यास लिखा, वहीं आदमी का जहर जैसा जासूसी उपन्यास भी लिखा। अब विश्रामपुर का संत की ही बात ले लीजिए, इसमें उन्होंने जयंती प्रसाद नाम के एक मध्यवर्गीय व्यक्ति की यातना-कथा को जिस अद्भुत बारीकी, संवेदना और क्लीनिकल परीक्षण की ईमानदारी से लिखा है, वह अन्यत्र विरल है।

एक तरह से कहें, तो मुझे विश्रामपुर का संत स्वतंत्र भारत के सत्ता खेल का सार्थक रूपक लगता है-लगभग कनफेशन की उदात्तता लिए हुए। दरअसल विश्रामपुर का संत मध्यवर्ग की अपनी संस्कृति की आत्महंता गाथा है, जो अपने ही छद्म के बोझ तले दम तोड़ रही है। यहां श्रीलाल जी की भाषा भी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में है। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उनकी अन्य रचनाएं कमजोर हैं। इसी तरह सिर्फ यह भी नहीं कहा जा सकता कि श्रीलाल शुक्ल मूलतः राग दरबारी के कारण ही जाने जाएंगे। हां, यह जरूर है कि राग दरबारी उन्हें एक विशिष्ट पहचान देती है।

अकसर एक सवाल यह उठाया जाता है कि अगर श्रीलाल शुक्ल ने व्यंग्य के फॉर्म में राग दरबारी नहीं लिखा होता, तो क्या वह इतना ही लोकप्रिय या महान होता। दरअसल फॉर्म तो लेखक की अपनी शैली होता है, जो वह कथावस्तु के अनुरूप चुनता है। यह संयोग ही है कि श्रीलाल जी ने राग दरबारी के लिए हास्य-व्यंग्य की चुभने वाली शैली चुनी। अलबत्ता इसमें संदेह है कि सपाट रूप से लिखने पर राग दरबारी इतना महत्वपूर्ण होता भी या नहीं।

इतने महान साहित्यकार को ज्ञानपीठ पुरस्कार पिछले दिनों दिया गया। उन्हें यह सम्मान बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। दरअसल हमारे यहां पुरस्कारों की संस्कृति बहुत अजीब है। लेखकों-कलाकारों को सम्मानित तब किया जाता है, जब उनकी उम्र अधिक हो जाती है। हमारे यहां युवावस्था में सम्मानित करने की परंपरा क्यों नहीं है, यह एक अलग सवाल है। पता नहीं, हमारे यहां पुरस्कारों की संस्कृति कब बदलेगी।

लेखक राजेंद्र यादव वरिष्‍ठ साहित्‍यकार और हंस पत्रिका के संपादक हैं. यह लेख अमर उजाला से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

मीडिया को काबू करने का काम कहीं न्यायपालिका तो नहीं करेगी!

मीडिया को भी संभल कर रहने का संदेश बहुत ही साफ़ ज़बान में मिलना शुरू हो गया है. देश के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अखबार से जुड़े हुए अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल ने पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामलों से पर्दा उठाया है कि कुछ नेताओं के लिए बहुत ही मुश्किल पैदा हो गयी है. सुरेश कलमाड़ी के कारनामों के बारे में लगभग हर शुरुआती जानकारी इसी चैनल से आई. हालांकि कलमाडी साहब मुगालते में रहे लेकिन आखिर में घिर गए और आजकल जेल की हवा खा रहे हैं.

ज़ाहिर है कि उनके दिमाग में इस चैनल को लेकर बहुत गुस्सा है. बताते हैं कि एक बार उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि इस चैनल को वे कभी माफ़ नहीं करेंगे और इसको तबाह कर देंगे. उनकी इस बात को एक परेशान आदमी का गुबार मान कर मीडिया बिरादरी ने इग्नोर कर दिया था लेकिन अब बात साफ़ होने लगी है. देश के कई शहरों में कलमाडी के लोगों ने इस  चैनल और इसके संपादक पर मानहानि का मुक़दमा कर दिया है. कई मामले तो पुणे शहर में ही दाखिल कर दिए गए हैं. सुरेश कलमाड़ी मूल रूप से पुणे के ही रहने वाले हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वालों को यह मालूम रहता है कि अगर गलती हुई तो मानहानि के मुक़दमे दायर होंगे. इसीलिये हर ईमानदार पत्रकार कोशिश करता है कि गलती न हो और अगर गलती हो जाए तो फ़ौरन माफी मांग ली जाए.

देश के लगभग सभी बड़े मीडिया संस्थाओं से गलती हो चुकी है. और जब गलती के लिए माफी मांग ली जाती है तो आमतौर पर पीड़ित पक्ष मुक़दमे नहीं दायर करता है. अगर किसी ने मुक़दमा दायर कर भी दिया तो दो बातें होती हैं या तो अदालत मीडिया संस्थान की माफी को स्वीकार कर लेती है और फैसला कर देती है. अगर गलत सूचना के तुरंत बाद माफी नहीं माँगी गयी है तो कोर्ट का फैसला आ जाता है कि जिस प्रमुखता से खबर को प्रकाशित और प्रचारित किया गया था, उसी प्रमुखता से गलत खबर के लिए माफी माँगी जाए. लेकिन अगर मीडिया हाउस ऐसा नहीं करता तो उसके ऊपर जुर्माना होता है.

हालांकि इस मामले का कलमाड़ी से कोई लेना देना नहीं है लेकिन देश के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अखबार से जुड़े हुए चैनल के मामले में ऐसा नहीं हुआ. बार-बार माफी मांगने के बाद भी उनके ऊपर ट्रायल कोर्ट ने एक सौ करोड़ रूपये का जुर्माना ठोंक दिया. चैनल वालों ने जब हाई कोर्ट में अपील की पेशकश की तो माननीय हाई कोर्ट ने कहा कि आप बीस करोड़ रुपया जमा कर दीजिये और अस्सी करोड़ रुपये के लिए गारंटी दे दीजिये तब अपील ली जायेगी. अब लोग सुप्रीम कोर्ट गए हैं. गुहार यह है कि अगर निचली अदालत के फैसले में किये गए जुर्माने को जमा करके ही अपील होनी है तब तो न्याय के मार्ग में बाधा पड़ सकती है. इस मामले में जब चैनल के अधिकारियों से बात की गयी तो उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. कहा कि मामला अदालत के अधीन है, इसलिए वे कोई बात नहीं करेंगे.

हालांकि यह केस बहुत ही दिलचस्प है २००८ में किसी खबर के सन्दर्भ में सुप्रीम के कोर्ट के एक रिटायर्ड जज साहब की गलत तस्वीर लग गयी थी. यह तस्वीर १०-१५ सेकण्ड आन एयर रही. गलती का एहसास तुरंत ही हो गया था. चैनल वालों ने माफी मांगना शुरू कर दिया और तीन-चार दिन तक माफी मांगते रहे. लेकिन फिर भी मुक़दमा हो गया. ट्रायल कोर्ट ने माफी वाली बात को स्वीकार नहीं किया और एक सौ करोड़ रुपये का जुर्माना कर दिया. अपील के लिए जब हाई कोर्ट गए तब पता चला कि बीस करोड़ रुपये जमा करना पडेगा. ज़ाहिर है कि कोई भी मीडिया कंपनी इतनी बड़ी रक़म जमा नहीं करेगी. वैसे भी मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक जाना ही है तो पैसे जमा करने वाली बात बहुत समझ में नहीं आती. लेकिन यह सच्चाई है और इसका समाज के हर स्तर पर विवेचन किये जाने की ज़रुरत है. जहां तक अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल का प्रश्न है, उसके पास तो इतना जमा करने के लिए रक़म होगी ही लेकिन अगर किसी छोटे अखबार या न्यूज़ चैनल के ऊपर गलती और उसकी बाद माफी मांगने के बाद यह सज़ा होगी तो मीडिया की स्वतंत्रता को ख़त्म होने से कोई नहीं रोक सकता.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

श्रीलाल शुक्‍ल की मौत और मेरे अंदर के खन्‍ना मास्‍टर साहब

राग दरबारी वाले शुकुल जी की मौत हो गयी. होनी ही थी. बुज़ुर्ग थे. उनकी मौत के बाद अपनी भी छाती में शूल चुभ रहा है. लगता है जैसे अपने ही सगे काका मर गए हों. दरअसल श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी ने ज़िंदगी में कहीं बहुत अंदर तक जाकर अपने को संबल दिया था. हालांकि किसी परीक्षा में हम कभी फेल नहीं हुए लेकिन ज़िंदगी के ज़्यादातर इम्तिहानों में अपने रिज़ल्ट वही रहे. हर बार फेल होना.

अभी दयानंद पाण्डेय को पढ़ा, उन्होंने भी लिखा है कि वे भी कभी-कभी अपने आपको को रंगनाथ समझते थे. मैं भी ऐसा ही समझता था. लेकिन यह अनुभव बहुत दिन तक नहीं रहा. सच्ची बात यह है कि अपनी ज़िंदगी में शुरू में ऐसे अवसर बार-बार आये जब मैंने अपने आप को लंगड़ समझा था. हर गलत काम के खिलाफ अपने आपको खड़ा पाया था लेकिन दसवीं पास करने के बाद मेरे अंदर का लंगड़ कहीं मर गया, दुबारा उसने कभी भी चूँ चपड़ नहीं की. लंगड़ की मौत के बाद मैं कुछ दिन तक सनीचर हो गया था, जब मामूली ज़रूरतों के लिए भी घर से मदद मिलनी बंद हो गयी थी, दूसरों का मुंह ताकता था लेकिन आदमी की फितरत का क्या कहना. जैसे ही डिग्री कालेज में मास्टरी मिली, मेरे अंदर खन्ना मासटर की आत्मा प्रवेश कर गयी, बिना किसी सपोर्ट के मैं बागी बन गया. नौकरी हाथ से गयी.

अजीब बेवक़ूफ़ था मैं. हर नौकरी के बाद इस खन्ना मास्टर का अभिनय करता रहा और बहुत सारी नौकरियाँ छूटती रहीं. लेकिन इस रंगनाथ से कभी पिंड न छूटा. यह हर बेतुका मौके पर आता रहा और मुझे समझौते करने से रोकता रहा. आज साठ साल की उम्र पार करके लगता है कि वास्तव में मैं कुछ भी नहीं था. मैं रामाधीन भीखमखेडवी ही था और वही हूँ, जो करने चला था, कुछ नहीं कर सका लेकिन मुझे किसी तरह की ग्लानि नहीं है क्योंकि मैंने राग दरबारी को पढ़ा है और उसेक रचयिता को छूकर देखा भी है. आज वह साहित्यकार तो नहीं है लेकिन उसने मुसीबतों को हँसकर उड़ा देने का जो संबल राग दरबारी के ज़रिये  दिया था वह मेरे पास है, आने वाली पीढ़ियों के पास भी रहेगा. और हर उस रामाधीन भीखमखेडवी को ताक़त देता रहेगा जो कालेज खोलने का मंसूबा बनाएगा और आटे की चक्की खोलकर अपनी रोटी कमाएगा. 

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

भाषा की भंगिमा बदल देने वाले लेखक थे श्रीलाल

श्रीलाल शुक्ल का संपूर्ण लेखन समाज और साहित्य दोनों में हर तरह ‘हम्बग’ यानी ढकोसले, पाखंड और छल-छद्म के खिलाफ एक सर्जनात्मक अभियान है। प्रकारांतर से यही बात श्रीलाल जी ने अपने समानधर्मा साहित्यकार हरिशंकर परसाई के हवाले से भी कही है। परसाई का एक लेख है- ‘साधना का फौजदारी अंत’। दरअसल यह लेख एक अपर डिवीजन क्लर्क यानी एक यूडीसी की कहानी है, जो किसी आश्रमभोगी ठग अर्थात गुरु के चक्कर में पड़कर सत्य की खोज का व्रत ले लेता है। अब परसाई और उस क्लर्क की बातचीत का एक टुकड़ा – पहले वह क्लर्क, फिर परसाई!

‘मैं जानता हूं कि आप भी सत्य की खोज करते हैं। आप जो लिखते हैं, उससे यही मालूम होता है।’ ‘यह तुम्हारा गलत ख्याल है। मैं तो हमेशा झूठ की तलाश में रहता हूं, कोने-कोने में झूठ को ढूंढ़ता हूं। झूठ मिल जाता है तो बहुत खुश होता हूं।’ इसके बाद हरिशंकर परसाईजी यहां अपनी टिप्पणी करते हैं, ‘न वह समझा, न उसे विश्वास हुआ। वह मुझे अपनी ही तरह सत्यान्वेषी समझता रहा।’ और अंत में श्रीलाल जी की अपनी टिप्पणी : ‘यहां परसाई ने व्यंग्य की एक विशिष्ट प्रवृत्ति का संकेत दिया है। स्पष्ट है कि वे जान-बूझ कर कोई सिद्धांत निरूपण नहीं कर रहे हैं, पर उन्होंने जो कहा है वह प्रसंगत: व्यंग्य को एक विशेष अर्थ में परिभाषित करता है : व्यंग्य सत्य की खोज नहीं, झूठ की खोज है। यही उसका पेंचदार रास्ता है। झूठ की खोज के सहारे, या उसके बहाने ही यहां सत्य को पहचानने की प्रक्रिया चलती है।’

इसका निष्कर्ष यह कि ‘व्यंग्य के टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजर कर हम उन मूल्यों तक पहुंचते हैं जो मूलत: उत्कृष्ट साहित्य का अंतिम लक्ष्य रहे हैं।’ कहना न होगा कि ‘रागदरबारी’ से लेकर ‘विश्रामपुर का संत’ तक श्रीलाल जी इसी झूठ की खोज करते हुए टेढ़े-मेढ़े रास्ते से सत्य को पहचानने की कोशिश करते रहे हैं और लोग इसे सिर्फ ‘व्यंग्य’ कहकर हाशिए पर डालते रहे हैं। याद करें तो रघुवीर सहाय ने भी श्रीलाल शुक्ल की छोटी-सी पुस्तक ‘यहां और वहां’ के ‘परिचय’ में इसी बात को इन शब्दों में व्यक्त किया है कि ‘उनका व्यक्तित्व विकृति की सृष्टि नहीं, विकृति की खोज करता है।’

यह ‘विकृति’ कहीं-न-कहीं श्रीलाल जी के ‘पेंचदार रास्तों’ और ‘टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता’ की ओर इशारा करती दिखाई पड़ती है। एक तरह से यह टेढ़ी अंगुली से घी निकालने वाली बात है, क्योंकि अक्सर घी सीधी अंगुली से नहीं निकलता। कभी आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी कहा था कि ‘प्रच्छन्नता का उद्घाटन कवि-कर्म का एक मुख्य अंग है’ क्योंकि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे, त्यों-त्यों कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।’

कहना न होगा कि सभ्यता के तथाकथित विकास के साथ-साथ छल-छद्म भी घना होता जा रहा है। उसे भेदना भी कठिन से कठिनतर हो रहा है। जिसे श्रीलाल जी ने ‘टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता’ कहा है, वह लेखक के लिए टेढ़ी मेढ़ी ‘भाष’ ही है और उसी का नाम व्यंग्य है।

संस्कृत के प्राचीन काव्यशास्त्र में इसी को ‘वक्रोक्ति’ कहा जाता था। आचार्य कुंतक ने ‘वक्रोक्ति’ को ‘वैदध्य-भंगी-भणिति’ के नाम से परिभाषित किया है। जब लेखक विदग्ध होगा : उसका हृदय विशेष रूप से दग्ध होगा, अत्यंत जला हुआ और संतप्त होगा तो उसकी जबान भी टेढ़े-मेढ़े ही चलेगी और उसकी भाषा में विशेष प्रकार की भंगिमा होगी। यह आकस्मिक नहीं है कि श्रीलाल जी बार-बार जोर देकर व्यंग्य को भंगिमा कहते हैं। फिर भी श्रीलाल शुक्ल की भाषा की प्रशंसा करने वाले भूल जाते हैं उस अंदर के कोठे को, जहां से स्वर निकलते हैं।

वे व्यंग्य के छिटपुट स्फुलिंग या फुलझड़ियां नहीं छोड़ते, बल्कि उनकी आद्यन्त भंगिमा ही ऐसी है। ऐसी भंगिमा के बूते पर वे ‘रागदरबारी’ के लगभग पांच सौ पृष्ठों तक व्यंगोक्ति को निभा ले जाते हैं, जो किसी भी रचनाकार के लिए वास्तव में एक बहुत बड़ी चुनौती है। सच तो यह है कि जिस ‘हम्बग’, ढकोसला, छल-छद्म को वे तार-तार करके उघाड़ना चाहते हैं, उसके लिए सबसे कारगर हथियार यह वक्र और बांकी भाषा ही है। विकल्प में या तो आक्रोश की भाषा है या फिर गाली-गलौज। लेकिन इस विकल्प के साथ दिक्कत यह है कि इससे क्रुद्ध लेखक कुछ देर के लिए अपने आपको भले ही हल्का कर ले, सामान्य पाठक खाली-का-खाली ही रहता है।

इस स्थिति में निश्चित रूप से श्रीलाल शुक्ल की वक्रता कहीं अधिक सहृदय है, जिसे पढ़ने में न सिर्फ मजा आता है, बल्कि जिसे बार-बार पढ़ने को जी चाहता है और कहना न होगा कि किसी साहित्यिक कृति के अस्तित्व की यह पहली शर्त है, जो दिन-पर-दिन लगातार दुर्लभ होती जा रही है।

नामवर सिंह का यह लिखा ‘श्रीलाल शुक्ल : जीवन ही जीवन’ से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

साहित्यपुर के संत और उन के रंगनाथ की दुनिया

विश्रामपुर के संत ने जब आज अंतिम विश्राम ले ही लिया है तो यह सोचना लाजिमी हो गया है कि क्या श्रीलाल शुक्ल ही रंगनाथ भी नहीं थे? जी हां, मैं उनके रागदरबारी के नायक रंगनाथ की बात कर रहा हूं। सच यह है कि जब रागदरबारी मैंने पढ़ा था तब तो लगता था कि मैं भी रंगनाथ ही हूं। ‘पाव भर का सीना और ख्वाहिश सायराबानो की’ जैसे संवाद में धंसे व्यंग्य की धार और रंगनाथ के दर्पण में अपना अक्स देखना तब बहुत भला लगता था।

कई बार लगता था कि वैद्य जी से, उनकी मान्यताओं, उनकी उखाड़-पछाड़ से रंगनाथ ही नहीं, मैं भी टकरा रहा हूं। तो यह सिर्फ श्रीलाल जी के रचे पात्र रंगनाथ का जादू भर नहीं था, यह सिस्टम से टकराने का चाव भी था। उन दिनों तो हर युवा रंगनाथ ही था। कम से कम मेरे आसपास के युवा। उन दिनों विद्यार्थी था। प्रेमचंद के बाद अगर कोई आहट मन में भरता था तो कथा- कहानी में श्रीलाल जी और उनका रागदरबारी ही। हालांकि तब कविताएं लिखता था और धूमिल और दुष्यंत का रंग ज्यादा चटक था पर रागदरबारी का लंगड़ भी रह-रह कर सामने खड़ा हो जाता था। क्या तो चरित्र है लंगड़ का! वह लंगड़ जिसे कचहरी में नकल लेने के लिए रिश्वत नहीं देनी थी। चाहे जितने भी पापड़ बेलने पड़े। नकल नहीं मिलती है तो न मिले। सोचिए भला कि बिना रिश्वत दिये भला आज भी किसी को नकल मिल सकती है किसी कचहरी में?

वह लंगड़ आज भी दौड़ रहा है और नकल नहीं पा रहा। और रागदरबारी के समय कचहरी भर ही रिश्वत का प्रामाणिक स्थल थी। अब तो समूचा सिस्टम ही लंगड़ के खिलाफ खड़ा है। अब जहां भी जाएं कोई काम करवाने कचहरी का दस्तूर मुंह बाए खड़ा है। पहले नजराना, शुकराना था, अब जबराना है। जनता लंगड़ है और सारा सरकारी अमला कचहरी। यह प्रतीक और गहरा, और मारक, और यातनादायक बनता गया है। श्रीलाल जी के रागदरबारी का तंज तेग बन कर अब हमारे सामने उपस्थित है। कोई अब इसे हिला नहीं सकता। सरकारी नौकरी मे रहते हुए ऐसी कालजयी रचना लिखना आसान नहीं था। खतरे बहुत थे। पर श्रीलाल जी ने उठाये। बार-बार उठाये। रागदरबारी सीधे-सीधे सरकार और उसकी मशीनरी के खिलाफ बजाया गया बिगुल है, सिर्फ एक उपन्यास भर नहीं। और हम सब जानते हैं कि श्रीलाल जी प्रशासनिक अधिकारी थे। न सिर्फ लिखने में वरन व्यवहार में भी वह रंगनाथ ही थे। वह तब के दिनों पीसीएस अधिकारी थे।

तब का एक वाकया सुनिये। अब के दिनों की तरह तब भी पीसीएस एसोसिएशन की सालाना मीट थी। हेमवतीनंदन बहुगुणा तब मुख्यमंत्री थे। पीसीएस एसोसिएशन की मीट में कुछ मांगें रवायत के मुताबिक मानते हुए बहुगुणा जी ने ऐलान किया कि नगरपालिकाओं में प्रशासक का पद भी पीसीएस अधिकारियों को दिया जाएगा। और कि लखनऊ नगर पालिका का पहला प्रशासक श्रीलाल शुक्ल को नियुक्त किया जाता है। श्रीलाल शुक्ल फौरन उठ कर खड़े हो गये और मुख्यमंत्री से साफ तौर पर कहा कि, ‘क्या यह आप हमारे संवर्ग पर एहसान कर रहे हैं? कि भीख दे रहे हैं? अगर ऐसा है तो यह लीजिये और रखिये अपना यह पद अपने पास। हमें ऐसी बख्शीश नहीं चाहिये।’ यह सुनते ही लोग सकते में आ गये। सन्नाटा फैल गया पूरी सभा में। तब के मुख्यमंत्री बहुगुणा को हार मान कर कहना पड़ा कि, ‘यह पद कोई बख्शीश में नहीं दे रहे हम। यह आपका हक है।’

उस मीट में उपस्थित तब के एक अधिकारी दिवाकर त्रिपाठी यह वाकया सुनाते हुए अजब उत्साह से भर उठते हैं। वह बताते हैं कि तब छाती चौड़ी हो गयी थी यह सोच कर कि हमारे कैडर में भी ऐसा निर्भीक अधिकारी है। दिवाकर त्रिपाठी तब नये-नये पीसीएस हुए थे। सिस्टम से टकराना एक आम आदमी का मुश्किल होता है तो श्रीलाल जी तो नौकरशाह थे। पर वह सिस्टम से बार-बार टकराना जानते थे। टकराते ही थे। ‘मकान’ और ‘विश्रामपुर का संत’ जैसी रचनाओं में भी उनकी यह टकराहट की आंच अपनी पूरी त्वरा में उपस्थित है। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि श्रीलाल जी के रागदरबारी का शिवपालगंज अधिकांशत: गोरखपुर की तहसील बांसगांव का है। जहां वह 1956-58 में एसडीएम रहे थे। लोग तो मोहनलालगंज का भी कयास लगाते हैं शिवपालगंज के बाबत।

हो सकता है कुछ मिट्टी मोहनलाल गंज की भी हो शिवपालगंज में पर बांसगांव की मिट्टी- पानी रागदरबारी के शिवपालगंज में कुछ ज्यादा है। लंगड़ या आटा चक्की वाले मास्टर साहब, वैद्य जी, पहलवान सब के सब चरित्र एक समय बांसगांव की हवा में तलाशे जा सकते थे। बल्कि कुछ सूत्र अभी भी शेष हैं। जैसे रंगनाथ अपने गांव जा रहा है। अंधेरा हो चुका है। सड़क पर से जब उसका ट्रक गुजरता है, तो रास्ते में सड़क किनारे शौच के लिए बैठी औरतें उठ खड़ी होती हैं। ऐसे गोया सलामी दे रही हों। औरतों का यह कष्ट अभी भी बदस्तूर है। हालांकि रागदरबारी जैसी किसी कृति को किसी बांसगांव या किसी मोहनलाल गंज के एक फ्रेम में कैद करना असंगत ही है, पर बातें तो होती ही है, उन्हें भला कैसे बिसरा दिया जाए। खैर।

रागदरबारी का पहला मंचन गोरखपुर में गिरीश रस्तोगी के नाट्य रुपांतरण और निर्देशन में किया गया। जिसे देखने श्रीलाल जी भी गोरखपुर पहुंचे थे। यहीं मैं उनसे पहली बार मिला भी। तब के मंचन से वह संतुष्ट नहीं थे। तो भी उसी नाट्य रुपांतरण पर बाद में दूरदर्शन पर एक धारावाहिक भी दिखाया गया। श्रीलाल जी इस धारावाहिक पर बहुत कुपित भी थे। कुछ विवाद भी हुआ। फिर उनकी किसी रचना पर कोई फिल्म या नाटक किया गया हो, मुझे याद नहीं आता। हां याद आती है उन की रंगत, उनकी रंगीनमिजाजी। वह जब सुर में आ जाते थे, गाने भी लगते थे। गालिब का एक बहुत मशहूर शेर है ‘आगे आती थी हाले दिल पर हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती।’ वह कई बार इस शेर की पैरोडी बना कर गाते थे ‘आगे आती थी एक इशारे पर हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती।’ कई बार तो अचरज होता था कि कितना तो वह संगीत के बारे में जानते हैं। संगीत ही क्यों, नाटक या किसी और कला पर, वह पूरा ठहर कर बोलते थे और अनायास ही। यह नहीं कि अपनी विद्वता बताने या जताने के लिए।

अचानक कोई प्रसंग आ जाता और वह एक से एक डिटेल देना शुरू कर देते कि मुंह खुला का खुला रह जाता। क्या संस्कृत क्या अंग्रेजी! जब वह धाराप्रवाह बोलने लगते तो लगता जैसे किसी हरहराती पहाड़ी नदी के बीच से आप गुजर रहे हों। और यह हरदम नहीं ही होता। होता कभी-कभी ही। घर जाने पर अकसर लोग चाय आदि से आप का स्वागत करते हैं। पर श्रीलाल जी अकसर मदिरा आदि से स्वागत करते। एक बार मैं भरी दोपहरी पहुंच गया उनके घर। दो किताबें छप कर आयी थीं, देने गया था। बहुत मना किया पर वह माने नहीं। कहने लगे कि दो किताबें लाए हैं तो कम से कम दो पैग तो होना ही चाहिए। मैंने ऑफिस जाने की आड़ ली। पर वह बोले, ‘कुछ नहीं, पान खा लीजिएगा।’ मैंने फिर भी हाथ जोड़े तो बोले, ‘ठीक है। पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा।’ माननी पड़ी उनकी बात। हर बार कमोबेश ऐसा ही होता।

मदिरा प्रेम उनका खूब मशहूर है। तरह-तरह के किस्से हैं। वह जब 75 के हुए तो दिल्ली में बाकायदा समारोह मना कर हुए। लौटे तो कहने लगे कि अब प्रतिष्ठित मौत मिलेगी। नहीं पहले मर जाता तो लोग कहते कि शराबी था, मर गया! और कह कर हंसने लगे थे। मुझे याद है कि जब सफदर हाशमी की हत्या हुई थी तब मुख्यमंत्री का घर घेरने कुछ लेखकों और सांस्कृतिककर्मियों का जुलूस गया था। विरोध वक्तव्य श्रीलाल जी ने लिखा था। बहुत ही मारक और सरकार की धज्जियां उड़ाने वाला। पर जब पढ़ना हुआ तब तक वह मुश्किल में आ गये थे और वह वक्तव्य वीरेंद्र यादव ने पढ़ा। पर वह हाथ उठा-उठा कर अपना विरोध दर्ज करते रहे। लगातार। अभी इस साल भी जब एक साथ मेरे दो उपन्यास छप कर आये तो उन्हें देने गया। उस दिन कोई क्रिकेट मैच हो रहा था। वह लेटे-लेटे देख रहे थे। मैं चुपचाप बैठ गया। जब ब्रेक हुआ तब उनको नमस्कार किया। बेटे की मदद से वह उठे। और बैठ गये। फिर मैं ने जरा तेज आवाज में दो-तीन बार अपना नाम जोर- जोर से बता कर याद दिलाना चाहा उन्हें। वह अचानक नाराज हो गये। धीरे से बोले, ‘स्वास्थ्य खराब हुआ है, याददाश्त नहीं। जरा धीरे बोलिए सुन रहा हूं।’

फिर खुद ही बधाई देते हुए कहने लगे कि, ‘सुना है आप के दो उपन्यास आए हैं।’ मैं ने सिर हिलाते हुए कहा कि, ‘जी आपके लिए भी लाया हूं।’ उन्होंने अपने हाथ बढ़ा दिए। मैं भाग कर बाहर गया। गाड़ी से किताबें लाकर उनका नाम लिख कर उन्हें देने लगा तो वह फिर नाराज हो गये। कहने लगे, ‘आप मेरे लिए तो लाये नहीं थे। रख लीजिए मत दीजिए।’ मैंने उनसे क्षमा मांगी। कहा कि, ‘आप से मिलने की धुन में बाहर ही भूल गया था किताबें।' वह मुस्कुराए और कहने लगे, ‘अच्छा-अच्छा। तो भी रहने दीजिए। पढ़ने लायक अब नहीं रह गया हूं।’ तो भी मैंने उन्हें जब किताब दी तो उनके चेहरे पर निराशा आ गयी। बीते दिनों की याद में जाते हुए बोले, ‘सेलीब्रेट तो अब की नहीं हो पाएगा! माफ कीजिए। जश्न नहीं हो पाएगा।’ मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि, ‘कोई जरूरत भी नहीं है। आपको किताब दे दी यही जश्न है।’ वह मुस्कुरा कर रह गये। फिर वह देश दुनिया बतियाने लगे। बात राजनीति की आयी तो मुख्यमंत्रियों की भी। वह बोले, ‘अभी तक जितने मुख्यमंत्री मैंने देखे उनमें बेटर रामनरेश यादव ही थे। कम से कम बेइमान तो नहीं थे।’

उनका लोगों के बारे में विजन बहुत साफ होता था। ऐसे ही एक बार बात चली लखनऊ के लेखकों पर तो मैंने बात ही बात में चंद्रकिरण सोनरिक्सा का नाम ले लिया। वह नाम सुनते ही मगन हो गये। फिर मैंने उनके पति सोनरिक्सा जी का जिक्र किया। यह तब की बात है जब सोनरिक्सा जी की आत्मकथा पिंजरे की मैना नहीं आयी थी। मैंने जितना उनको जद्द-बद्द कहना था कहने लगा। उन्होंने प्रतिवाद किया। मैंने कहा कि, ‘आप के कैडर के हैं इसलिए आप उनका पक्ष ले रहे हैं।’ वह धीरे से बोले, ‘आप कभी मिले भी हैं उस आदमी से?' मैंने सिर हिला कर हां कहा और फिर शुरू हो गया। श्रीलाल जी सुनते-सुनते उठ कर खड़े हो गये। बोले, ‘मेरे साथ आइए।’ अंदर के अपने बेडरूम में ले गए। अपनी एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो दिखाई, जो पत्नी के साथ थी। फोटो दिखाते हुए बोले, ‘यह फोटो कैसी है?’ मैने फोटो गौर से देखी और मुंह से बेसाख्ता निकल गया, ‘बेमिसाल’ वह धीरे से बोले, ‘मेरी है इसलिए?’ मैंने कहा कि, ‘नहीं, फोटो भी बेमिसाल है।’ वह धीरे से बोले, ‘है ना!’ फिर जैसे उन्होंने जोड़ा, ‘यह उसी सोनरिक्सा ने खींची है।’ मैं चुप हो गया।

फिर वह सोनरिक्सा जी की फोटोग्राफी पर विस्तार से बतियाने लगे। फोटोग्राफी पर भी उनके पास अनेक विस्मयकारी जानकारियां थीं। मैं चकित था उनका यह रूप देख कर। अभी तक उनका संगीत और संस्कृत सुना था, अब फोटोग्राफी सुन रहा था। ठीक वैसे ही जैसे कभी साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित भगवतीचरण वर्मा पर लिखित पुस्तक पढ़ कर चकित हुआ था, अब फिर चकित हो रहा था। वह चले गये हैं इसका दुख भी भरपूर है पर इस बात का संतोष भी है कि उन्हें वह सब कुछ मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था। साहित्य अकादमी सम्मान तो उन्हें जवानी में ही मिल गया था, बाकी सम्मान भी। बस पद्मभूषण और ज्ञानपीठ में देरी जरूर हुई। और उन्होंने कहा भी कि हर्ष तो है पर रोमांच नहीं, तो ठीक ही कहा था। मुद्राराक्षस से उनके मतभेदों की र्चचा अक्सर चलती रही है। पर सच यह है कि मुद्राराक्षस के अध्ययन और उनकी जानकारी के जितने मुरीद श्रीलाल जी थे, कोई और नहीं।

बहुत समय पहले उनके गांव अतरौली गया था। यह कोई 1986 की बात है। श्रीलाल जी के बड़े भाई मिले, जो फौज से रिटायर हुए थे। हम कुछ पत्रकारों को प्रशासन द्वारा ले जाया गया था। विकास कार्यक्रमों का जायजा लेने के लिए। लेकिन श्रीलाल जी के गांव अतरौली में मोहनलालगंज से शुद्ध सड़क तक नहीं थी। लौट कर रिपोर्ट लिखने के पहले उनसे बात की और कहा कि आप के गांव की सड़क तक शुद्ध नहीं है। वह बेपरवाह हो कर बोले, ‘क्या पता! 22 साल से मैं भी नहीं गया हूं अपने गांव’। मैंने पूछा, ‘ऐसा क्यों?’ वह बोले, ‘क्यों क्या नहीं गया तो नहीं गया। होगी कोई बात!’ और वह टाल गये। ऐसे ही जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया। पर श्रीलाल जी टाल गये। मैंने पूछा, ‘यह प्रस्ताव क्यों टाल गये?’ वह बोले, ‘मुलायम अपने अधीन काम करवाना चाह रहे थे। मैंने उनसे कहा कि आप तो हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा दिए हुए हैं। तो उपाध्यक्ष बना रहे हैं कि अपना मातहत? यह नहीं हो पाएगा।’

अभी तो जाते-जाते श्रीलाल जी को ज्ञानपीठ मिला। पर जब उन्हें व्यास सम्मान मिला तो एक दिन ‘जश्न’ में थे। कुछ और लखटकिया पुरस्कार उन्हीं दिनों उन्हें मिले थे। तो कहने लगे कि, ‘इतना पैसा तो अब तक रायल्टी में भी मुझे नहीं मिला।’ मैंने कहा कि, ‘रागदरबारी तो आप का बेस्ट सेलर है।’ वह खीझ गये। बोले, ‘बेस्टसेलर नहीं मेरे गले में पत्थर बन कर लटका है। कोई रागदरबारी से आगे की बात ही नहीं करता!’ वह जरा रुके और बोले, ‘आप रायल्टी की बात कर रहे हैं? तो सुनिए रायल्टी की भी हकीकत! एक बार मैं दिल्ली गया। राजकमल की शीला संधु आईं मिलने। नयी किताब मांगने लगीं। बेटा साथ था। वह बोल पड़ा, ‘ 50 हजार रुपये एडवांस दे दीजिए।’ वह बोलीं, ‘ठीक है।’ दूसरे दिन उन्होंने 50 हजार रुपये भिजवा भी दिये। अब मैं खुश कि, ‘हिंदी के लेखक की इतनी हैसियत हो गयी है कि 50 हजार एडवांस भी मिलने लगा है एक किताब का। पर जल्दी ही यह गुमान टूटा। पता चला कि साल के आखिर में सारी किताबों की रायल्टी के हिसाब में वह 50 हजार माइनस हो गया था। कोई एक किताब का एडवांस नहीं था वह। ऐसे ही एक बार मन में आया कि छुट्टी ले कर पहाड़ पर चलूं और कुछ लिखूं। गया भी। पर जल्दी ही यह एहसास हो गया कि जो खर्चा होगा किताब लिखने पर प्रकाशक तो उतना भी नहीं देगा। और फिर लौट आया वापस।’

‘विश्रामपुर का संत’ लिखने वाले इस संत की इतनी बातें उमड़-घुमड़ कर सामने उपस्थित हो रही हैं कि अब क्या कहूं और क्या न कहूं कि स्थिति है। बस यही कह सकता हूं कि रागदरबारी का वह दरबार तोड़ने वाले श्रीलाल शुक्ल अब कोई दरबार तोड़ने के लिए हमारे बीच नहीं है। जो कि सिस्टम में रह कर भी सिस्टम तोड़ने की बात कर सके और कि कह सके-यह ठीक नहीं है। बंद कीजिए यह सब! साहित्यपुर के इस संत को शत-शत नमन! इसलिए भी कि रागदरबारी का वह रंगनाथ जो हम युवाओं में कभी गूंजता था, उसकी गूंज कभी जाने वाली तो है नहीं, वह अक्स कभी मिटने वाला तो है नहीं। न ही उस वैद्य की साजिशें, न लंगड़ की वह लड़ाई खत्म होने वाली है। वह सारी इबारतें समय की दीवार पर अभी भी चस्पा हैं जो श्रीलाल जी लिख गये हैं। उन का कथात्मक और व्यंग्यात्मक गद्य अभी भी हमारे सामने जस का तस उपस्थित है अपने पूरे वेग और वजन के साथ।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है. इसे वहीं से साभार लिया गया है. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

ट्रेन की चपेट में आने से पत्रकार की मौत

नीमच के पत्रकार सुखवंत सिंह चौहान की शुक्रवार को एक ट्रेन की चपेट में आ जाने से मौत हो गई. जीआरपी से मिली जानकारी के अनुसार शुक्रवार की दोपहर नीमच रेलवे स्‍टेशन से तीन किलोमीटर दूर बिसलवास कलां सिग्‍नल के पास सुखवंत एक ट्रेन से टकरा गए. बताया जा रहा है कि वह उस समय पटरी पार कर रहे थे कि अचानक ट्रेन की चपेट में आ गए.

ट्रेन के चालक ने स्‍टेशन पर घटना की सूचना दी. मौके पर जब पुलिस पहुंची तब सुखवंत का शव पटरी के बीच में पड़ा था. उनके सिर में गंभीर चोटें थीं. सुखवंत सिंह कई स्‍थानीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों से लम्‍बे समय तक जुड़े रहे. सुखवंत के निधन से पत्रकारों में शोक है.

सीएनईबी में मार्निंग शिफ्ट में एक घंटे की वृद्धि

: बुलेटिन की शुरुआत में हुई देरी की मिली सजा : सीएनईबी न्यूज चैनल से सूचना है कि यहां मार्निंग शिफ्ट में एक घंटे की वृद्धि कर दी गई है. 27 अक्टूबर को एक नया आदेश जारी हुआ कि मॉर्निंग शिफ्ट अब 6 बजे की बजाय 5 बजे से शुरू होगी.  यानि कर्मचारियों को मॉर्निंग शिफ्ट में एक घंटा ज़्यादा काम करना पड़ेगा. पर इसके बदले तनख्वाह ज़्यादा नहीं मिलेगी. दीपावली पर बोनस व मिठाई न मिलने से कर्मियों को मुंह पहले से ही लटका था, उपर से एक घंटे काम की अवधि बढ़ाने से ज्यादातर लोग परेशान हो गए.

दिवाली के गिफ्ट के नाम पर सभी को एक बिस्किट का गिफ्ट पैक दिया गया जिसे कई लोग क्रोध में एचआर को लौटा कर चले गए. बताते हैं कि 27 अक्टूबर की सुबह सीएनईबी चैनल का पहला बुलेटिन 18 मिनट देरी से शुरू हो पाया. मार्निंग में पहला बुलेटिन हिट होने का वक्त 7 बजे का है लेकिन 18 मिनट की देरी हो गई. गलती कुछ लोगों ने की, लेकिन इसकी सजा सबको मिली. सभी को आदेश दे दिया गया कि अब शिफ्ट एक घंटे ज्यादा की होगी और सभी को छह बजे की बजाय पांच बजे ही आफिस आना होगा. सुबह की शिफ्ट वाले आपस में सवाल कर रहे हैं कि आखिर गलती किसी एक ने, या दो ने, या तीन ने ही की होगी, फिर सब एक घंटा फालतू नौकरी क्यों करें? एक सवाल और भी है कि अगर अब भी किसी दिन बुलेटिन देर से चला तो क्या एक घंटा शिफ्ट को और बढ़ा दिया जाएगा?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर आप उपरोक्त बातों-तथ्यों से इतर कुछ जानते हैं, कुछ कहना चाहते हैं तो नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं.

अन्ना हजारे को कुमार विश्वास का पत्र- कोर कमेटी भंग करें

श्रीमान अन्ना हजारे, रालेगन सिद्धि, महाराष्ट्र, आदरणीय अन्ना जी, प्रणाम, आशा है आप स्वस्थ एवं सानंद होंगे. पिछले कुछ दिनों से एक विशेष मुद्दे पर आप से बात करने का मन था. यद्यपि मैं नहीं चाहता था कि आपके पवित्र मौन की ऊर्जा इस षड्यंत्रकारी कोलाहल की सूचना से भंग करूँ, तथापि मैं विवश हो कर यह पत्र आपको लिख रहा हूँ.

व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब आपने बिगुल बजाया, तो कोटि-कोटि उद्वेलित और चेतना-संपन्न भारतीय आपके सात्विक नेतृत्व में बढ़ चले. स्वाधीनता के बाद देश को पहली बार ऐसा लग रहा है कि स्वराज और जनतंत्र की मूल अवधारणा, विचार और क्रिया के स्तर पर एक होने वाली है. रामलीला मैदान पर आपके साहसिक अनशन ने पूरे देश में एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा का समावेश किया है, जिसे रोक पाना भ्रष्ट ताक़तों के बस में नहीं है. एक बड़े सरोकार को पाने की दिशा में बढ़ते भारत के इस अहिंसक और शक्तिशाली आवेग को देख कर पूरा विश्व आपके नेतृत्व को श्रद्धा से प्रणाम कर रहा है.

रामलीला मैदान में उमड़ी जनता की शक्ति ने तथा विश्व भर में हुए उसके समर्थन ने केंद्र सरकार को मजबूर किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मज़बूत जन-लोकपाल लाने की तरफ कदम बढ़ाए. लेकिन कुछ भ्रामक कदम उठाने के अलावा सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर कोई ठोस कार्यवाई नहीं की. एक ओर तो माननीय प्रधानमंत्री जी पत्र लिख कर आपको आश्वस्त करते हैं कि लोकपाल की दिशा में आवश्यक कार्यवाई होगी, तो दूसरी ओर सत्ताधारी पार्टी के नेतागण आपकी और कोर कमिटी के एक-एक व्यक्ति की सार्वजनिक छवि एवं विश्वसनीयता को धूमिल करने में जी-जान से जुटे हैं.

दरअसल इस संघर्ष में विराट जन-शक्ति के अलावा तीन महत्वपूर्ण भाग और हैं, जिन में आप के नेतृत्व, आप के सन्देश के अतरिक्त एक संगठनात्मक  ढांचा भी प्रमुख तत्व है .

आन्दोलन का नेतृत्व आपके हाथो में है जिस के प्रति पूरे देश को अखंड और अटूट विश्वास है. यही कारण है कि आप को लक्ष्य करना भ्रष्टाचारियों के बस में अब नहीं है .पहले जब कुछ राजनैतिक चेहरों द्वारा आपके ऊपर मौखिक रूप से हमला करने की जो कोशिश की गयी, तब उसे जनता ने एक सिरे से ख़ारिज कर दिया था. अत: यह भ्रष्ट, कुचक्री और षड्यंत्रकारी ताक़क्तें समझ गयी हैं की आप पर हमला करने से जन-लोकपाल के बढ़ते क़दमों को रोकना संभव नहीं.

आन्दोलन का सन्देश भी आप की ही तरह सरल और स्पष्ट है- "भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सार्थक संवैधानिक लड़ाई". संपूर्ण देश को इस पवित्र आन्दोलन के सन्देश (उद्देश्य) पर भी रंच मात्र संदेह नहीं है. पूरा देश भ्रष्टाचार से व्यथित हैं. इसलिए वाह आपकी एक आवाज़ पर चल पड़ने के लिए तत्पर है.

इस आन्दोलन की तीसरी महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं वे कुछ लोग, जो आपके सहायक के रूप में इस आन्दोलन के लिए अहर्निश कार्यरत हैं. इन सब सामान्य पारिवारिक भारतीय नागरिकों की व्यथा भी अपने करोड़ों भारतीय भाई-बहिनों की तरह भ्रष्टाचार से उपजी अराजकता ही है. इन सब लोगो के समूह, जिसे सामान्य लोग 'कोर-कमिटी' और मीडिया के मित्र 'टीम-अन्ना' कहते हैं, पर भ्रष्ट ताक़तों की ओर से एक-एक कर किए गए व्यक्तिगत हमले इस बात का प्रमाण हैं, कि ये ताक़ते इस बड़े संघर्ष में सक्रिय लोगों को झूठे, तात्कालिक, बे-बुनियाद और छोटे आरोपों कि आड़ में आहत, तटस्थ या निष्क्रिय करना चाहती हैं. इन सब भ्रष्टाचारियों का मुख्य उद्देश्य इस जन-आन्दोलन को कमज़ोर करना और जन-लोकपाल की बजाए संगठन को ज्यादा बड़ा मुद्दा बना कर भ्रामक तथ्यों के आधार पर आन्दोलन को दिशा-भ्रमित करना है. ये वही लोग हैं जो सार्वजनिक रूप से सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों या समूहों को धमकी देते हैं कि उन का भी वही हाल किया जायेगा जो ऐसी आवाज़ उठाने वाले अन्य लोगों का पूर्व में किया जा चुका है. यद्यपि हम ऐसे लोगों या ताकतों को अपने विचार या मन में कुछ भी स्थान नहीं देते किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि इन सब हमलों और उन की सफाई देने से मूल मुद्दे से धयान हटाने का इन का षड़यंत्र बलशाली होगा. ऐसा होने पर न केवल जन-लोकपाल का मुद्दा प्रभावित होगा, अपितु करोडो भारतवासियों के उस विश्वास को भी आघात पहुंचेगा, जिसमे वो संवैधानिक, अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीके से देश की समस्याओं का हल ढूंढते हैं.

ऐसी स्थितयों में बड़ी सहजता, आदर और आपके अद्वितीय नेतृत्व में संपूर्ण विश्वास के साथ मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ, कि आप सीमित लोगों की इस कोर कमिटी को विस्तार दे कर इसे १२१ करोड़ लोगों की 'हार्ड-कोर कमिटी' में रूपांतरित कर दें. जैसा कि आप भी कहते हैं, कि ये लड़ाई व्यक्ति या सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि व्यवस्था-परिवर्तन की लड़ाई है. जन-लोकपाल के साथ-साथ और बाद में 'राईट तो रिजेक्ट', 'राईट तो रिकाल' तथा अन्य महत्त्वपूर्ण व्यवस्था परिवर्तक आन्दोलन जो हमें देश की जनता के साथ मिलकर लड़ने हैं, उनमें आपको हर मोर्चे पर एक नयी 'कोर-कमिटी' और एक नयी 'टीम अन्ना' की ज़रुरत पड़ेगी, जो आप की एक आवाज़ पर चल पड़ने के लिए उत्सुक, प्रतिबद्ध एवं प्रस्तुत हैं. इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैं पुन: आपसे निवेदन करता हूँ कि आप इस वर्तमान कोर कमिटी को स्थगित कर एक नयी व्यवस्था का सृजन करें, जिस से भ्रष्टाचार-मुक्त नव-भारत का हम सब का सपना साकार हो सके.

सादर

डा. कुमार विश्वास

मोहन राजपूत गए थे चीन, पहुंचा दिए गए हल्‍द्वानी

दैनिक जागरण, उधमसिंह नगर के ब्यूरो चीफ मोहन राजपूत चीन के पांच दिवसीय दौरे से लौट आए हैं। वह प्रमुख औद्योगिक संगठन कुमाऊं गढ़वाल चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के शिष्‍टमंडल के साथ चीन गए थे। शिष्टमंडल वहां के सुप्रसिद्ध कैंटन फेयर में हिस्सा लेने गया था। इसका मकसद वहां से आधुनिक मशीनरी, उत्पाद व तकनीक का आयात करना था, जिससे  चैंबर से जुड़े उद्यमी अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ा सकें।

चीन का कैंटन फेयर आयात निर्यात मेले के नाम से जाना जाता है तथा विश्व भर के व्यवसायी यहां आते हैं। श्री राजपूत की यह आफिशियल विजिट थी। इस दौरे के लिए जागरण के टॉप मैनजमैंट ने उन्हें चीन जाने और वहां से कवरेज की अनुमति दी थी। यह पहला मौका है कि जागरण के किसी ब्यूरो से किसी पत्रकार को मैनेजमेंट ने विदेश यात्रा पर भेजा हो। श्री राजपूत ने अपना दायित्व बखूबी निभाया। तेजतर्रार, समर्पित पत्रकार होने के साथ उन्‍हें कई विषयों पर कलम चलाने में महारत भी हासिल है। अंग्रेजी का ज्ञान भी ठीक ठाक है।

श्री राजपूत इस विदेश यात्रा से खुश भी थे लेकिन उनकी यह खुशी ज्यादा समय तक नहीं टिक पाई क्योंकि उनके आते ही स्थानीय प्रबंधन ने उनका तबादला हल्द्वानी कर दिया। सूत्रों का कहना है कि उनकी विदेश यात्रा व टॉप मैनेजमैंट से मिली अनुमति स्‍थानीय प्रबंधन को नागवार गुजरी। अब बेचारे मोहन राजपूत हल्‍द्वानी का चक्‍कर काटने को मजबूर हैं। वैसे चुटकी लेकर कहा जा रहा है कि स्‍थानीय प्रबंधन ने यह तबादला जलन के चलते किया है। बड़े लोगों को पूछे जाने की बजाय ब्‍यूरोचीफ को पूछा गया तो तकलीफ तो होनी ही थी।

राजीव सारस्वत सम्मान डॉ. अशोक चक्रधर को

मुंबई : साहित्यिक संस्था श्रुति संवाद साहित्य कला अकादमी द्वारा शनिवार, 5 नवंबर, 2011 को सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अशोक चक्रधर (नई दिल्ली) को हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लि. के कार्यकारी निदेशक पुष्प जोशी "राजीव सारस्वत सम्मान" प्रदान करेंगे। "शब्द युद्धः आतंक के विरूद्ध" नामक यह कार्यक्रम वाशी, नवी मुंबई के मराठी साहित्य संस्कृति व कला मंडल में दो सत्रों में आयोजित होगा। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध साहित्यकार व महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. दामोदर खडसे, नवी मुंबई के पुलिस आयुक्त अहमद जावेद, साहित्यकार एवं बैंक ऑफ बड़ोदा अहमदाबाद के प्रबंधक (राजभाषा) उपस्थित रहेंगे।

समारोह के पहले सत्र में सम्मान समारोह और अतिथियों के वक्तव्य होंगे जबकि दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन होगा, जिसमें डॉ. अशोक चक्रधर, हस्तीमल हस्ती, वीरेंद्र सिंह, डॉ. मुकेश गौतम अपनी रचनाएं प्रस्तुत करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सुविख्यात लेखक व चिंतक डॉ. रामजी तिवारी करेंगे। पहले सत्र का संचालन केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण उप संस्थान, भारत सरकार के सहायक निदेशक डॉ. अनंत श्रीमाली करेंगे जबकि दूसरे सत्र का संचालन देवमणि पाण्डेय करेंगे।

डॉ. अशोक चक्रधर हिंदी के ऐसे मंचीय कवि हैं जो मूलतः हास्य के लिए जाने जाते हैं। 8 फरवरी, 1951 को खुर्जा, उत्तर प्रदेश में जन्मे डॉ. अशोक चक्रधर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के दस पुरस्कार/सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। लगभग 30 देशों की यात्रा करने वाले डॉ. अशोक चक्रधर के लगभग 15 काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। वे ऊर्जा मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति, भारत सरकार तथा हिमाचल कला संस्कृति और भाषा अकादमी हिमाचल प्रदेश सरकार, शिमला के सदस्य रह चुके हैं। सुप्रसिद्ध हास्य कवि काका हाथरसी के दामाद डॉ. अशोक चक्रधर ने आठ टेलीविजन, पांच वृत्तचित्र निर्देशित किए जो खूब चले। कई धारावाहिकों में उन्होंने अभिनय के झंडे भी गाड़े, जिनमें डीडी-1 के "बोल बसंतो" तथा सोनी टीवी पर प्रसारित "छोटी सी आशा" प्रमुख हैं। 13 धारावाहिकों की लेखन/प्रस्तुति उनके खाते में है जिनमें "वाह वाह" और "चुनावी चकल्लस" प्रमुख है। 15 वृत्त चित्रों का लेखन किया है जबकि चार धारावाहिकों का लेखन/निर्देशन करने के साथ ही रंगमंच पर भी खूब काम किया है।

गौरतलब है कि 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में महानगर के सुप्रसिद्ध लेखक, कवि एवं हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लि. मुंबई में कार्यरत प्रबंधक (राजभाषा कार्यान्वयन) राजीव सारस्वत सरकारी दायित्व निभाते हुए ताज होटल में शहीद हो गए थे। चूंकि राजीव सारस्वत श्रुति संवाद साहित्य कला अकादमी के संस्थापक में से एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ और कोषाध्यक्ष थे इसिलए उनकी स्मृति में अकादमी की ओर से हर वर्ष देश के एक प्रमुख साहित्यकार को सम्मानित किया जाता है। इससे पहले वर्ष 2009 में जगदीश सोलंकी (राजस्थान) तथा 2010 में वेदव्रत वाजपेयी (लखनऊ) को राजीव सारस्वत सम्मान प्रदान किया जा चुका है।

मुंबई से आफताब आलम की रिपोर्ट.

सुदर्शन न्‍यूज से बिकास एवं राष्‍ट्रीय सहारा से अजीत पांडेय ने इस्‍तीफा दिया

सुदर्शन न्‍यूज, नोएडा से खबर है कि बिकास प्रसाद ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी फ्रंटियर न्‍यूज, गुवाहाटी के साथ शुरू की है. इन्‍हें न्‍यूज प्रोड्यूसर बनाया गया है. मूल रूप से वेस्‍ट बंगाल के आसनसोल के रहने वाले बिकास प्रसाद ने करियर की शुरुआत सहारा समय से की थी. इसके बाद सुदर्शन न्‍यूज से जुड़ गए थे.

राष्‍ट्रीय सहारा, चंदौली से खबर है कि अजीत पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर थे. बताया जा रहा है कि ब्‍यूरोचीफ से विवाद होने के बाद उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा प्रबंधन को सौंप दिया. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. अजीत की जगह मुगलसराय ऑफिस में तैनात राजीव गुप्‍ता को चंदौली का संवाददाता बना दिया गया है. राजीव काफी समय से राष्‍ट्रीय सहारा से जुड़े हुए हैं. उसके पहले वे युनाइटेड भारत समेत कई अखबारों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

विश्‍व भर के पांच बेहतरीन टीवी पत्रकारों में चुनी गईं बरखा दत्‍त

एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्‍त के नीरा राडिया से संबंध को लेकर भले ही मीडिया का एक वर्ग और जनता के लोग कुछ भी कहते रहे, इससे बरखा दत्‍त की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. उल्‍टे वह पहले से भी ज्‍यादा पापुलर हो गई हैं. कुछ इस तर्ज पर कि बदनाम हुए तो क्‍या नाम ना हुआ. जी हां, पहले नीरा राडिया के लिए लाबिंग करने के विवादों को दरकिनार करते हुए प्रणब राय ने उन्‍हें एनडीटीवी का ग्रुप एडिटर बनाया. अब उन्‍हें विश्‍वभर के पांच बेहतरीन टीवी पत्रकारों में चुना गया है.

39 साल की बरखा दत्‍त को लंदन बेस्‍ड एसोसिएशन ऑफ इंटरनेशनल ब्रॉडकास्टिंग यानी एआईबी ने विश्‍वभर के पांच चुनिंदा टीवी पत्रकारों पर्सनालिटी ऑफ द इयर चुना हैं. 1993 में स्‍थापित एआईबी पिछले सात सालों से पर्सनालिटी ऑफ द इयर का वार्षिक अवार्ड प्रदान कर रही है. लंदन में 9 नवम्‍बर को आयोजित एक कार्यक्रम में इन पांचों में से फाइनल विजेता के नाम की घोषणा की जाएगी. बरखा के अलावा जिन अन्‍य चार लोगों का चयन फाइनल के लिए किया गया है, उनमें ब्रिटिश स्‍काई ब्रॉडकास्टिंग के सर डेविड एटेनब्राग, बीबीसी वर्ल्‍ड न्‍यूज की मिस मिशल हुसैन, कतर चैनल के टिम सेबेस्टियन एवं ब्रिटिश स्‍काई ब्रॉडकास्टिंग के रॉस केम्‍प शामिल हैं.  

बरखा का चयन उनकी मिस्र और लीबिया के साथ ओसामा बिन लादेन के मौत के आपरेशन की खबरों के बेहतर प्रस्‍तुतिकरण के लिए किया गया है. बरखा दत्‍त के अलावा उनके टीवी चैनल का भी चयन कई कटेगरी के पुरस्‍कारों के लिए किया गया है. एनडीटीवी के अलावा स्‍टार न्‍यूज एवं आईएनएक्‍स न्‍यूज का चयन भी दो कटेगरी में किया गया है. नीचे श्रीलंका गार्जियन में प्रकाशित बरखा की गुणगान करती खबर.

The 39-year-old Barkha Dutt, the versatile TV journalist of India who is the Group Editor of NDTV, a national 24-hour news channel, has been short-listed along with four other TV greats, for consideration for selection as the International TV Personality of the Year 2011 by a panel of independent judges.

The prestigious and highly coveted Award as the International TV Personality of the Year is given every year, along with awards in 15 other professional categories, by the London-based Association of International Broadcasting (AIB), which is the industry association for TV and radio globally. It was established in 1993.Its annual awards for media (TV and radio) excellence were instituted seven years ago. The awards for 2011 will be announced at a function in London on November 9.

The nominations for the awards in the 16 categories are submitted by different TV and radio companies all over the world. These are scrutinised by different panels of judges and short lists prepared for different categories for a final scrutiny by independent judges, who will decide the winners.

The most coveted of the awards in the 16 categories is that of the International TV Personality of the Year. The nominees for the short list are chosen on the basis of their contribution to TV Excellence during the year. The fact that out of dozens of nominations received, Barkha has been included in the short list of five is a recognition of her contribution to TV Excellence during the year.

Barkha is a versatile TV professional, who has made a name for her excellence in field reporting, interviews and talk shows. During the year 2011, she distinguished herself by her outstanding and courageous reporting, inter alia, from Egypt and Libya and by her coverage of the sequel to the killing of Osama bin Laden by the US Navy Seals in Pakistan on May 2. Her weekly talk show titled We The People , which is widely viewed in South Asia, completed 10 years in 2011. She also hosts a four-times-a- week current affairs talk show titled “The Buck Stops Here”.

She also produced some excellent documentaries of which two have been chosen by the preliminary team of judges of the AIB for consideration in other categories. These are “The Women of Tahrir Square” and the “Battle For Libya”.

Her NDTV channel, with which she has been associated since its inception, has had the honour of being a channel from India short-listed in the largest number of categories relating to Egypt, Libya, the Tsunami in Japan and Sports.

Two other Indian channels have also received the honour of being short-listed in two categories—Star News For Creative Marketing and the INX News Pvt Ltd, India – India Endangered—for Current Affairs Documentary (Domestic).

The other four nominess, along with Barkha, in the short list of International TV Personality of the Year are Sir David Attenborough of the British Sky Broadcasting, Ms. Mishal Hussain of BBC World News, Tim Sebastian, formerly of BBC World News who now works for a Qatar channel, and Ross Kemp of the British Sky Broadcasting.

Barkha has a large circle of admirers and well-wishers in the Indian sub-continent and abroad. They will be watching with bated breath as the final winners are announced at London on November 9.

Whatever be the final result, the fact that Barkha has made her way into the short list of five TV Greats of 2011 is a great honour to her, her channel and India. Courtesy : Sri Lanka Guardian

हिमाचल की वादियों में जनवरी में कदम रखेगा ‘हिमाचल दस्‍तक’

हिमाचल प्रदेश में अगले साल जनवरी माह से एक और अखबार कदम रखने जा रहा है. इख अखबार का नाम होगा 'हिमाचल दस्‍तक'. इस दैनिक अखबार को लेकर आ रहे हैं केपी भारद्वाज. केपी हिमाचल प्रदेश की पत्रकारिता में जाने पहचाने नाम हैं. अपना अखबार लाने से पहले ये चौदह सालों तक दिव्‍य हिमाचल के मैनेजिंग डाइरेक्‍टर रहे हैं. हालांकि बीच में ये उस समय विवादों से भी घिर गए थे, जब इनके गाड़ी से भारी मात्रा में देशी-विदेशी मुद्रा की बरामदगी हुई थी और जिसका संबंध करमापा मठ से बताया गया था. फिलहाल इस मामले की जांच चल रही है.

फिलहाल इस नए लांच होने वाले अखबार 'हिमाचल दस्‍तक' से वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद कंवर को जोड़ा गया है. वे अखबार की लांचिंग में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. अरविंद इसके पहले 'आपका फैसला' अखबार लांच करा चुके हैं. अखबार के लांचिंग के लिए तैयारियां शुरू कर दी गई हैं. इस संदर्भ में जब केपी भारद्वाज से बात की गई तो उन्‍हों ने बताया कि अखबार युवा वर्ग को खासकर ध्‍यान में रखकर किया जा रहा है. इसमें हिमाचल की उन खबरों को प्राथमिकता दी जाएंगी, जिसे दूसरे अखबार नहीं देते हैं. उन्‍होंने बताया कि इस अखबार का प्रकाशन सेंट्रल ट्रस्‍ट के माध्‍यम से किया जाएगा. लांच करने की तैयारियां शुरू की जा चुकी हैं. टीम बनाने का काम चल रहा है. संभावना है कि अखबार जनवरी के मध्‍य या अंत तक लांच कर दिया जाएगा.

एफवन रेस के बायकाट की धमकी दी इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने

: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया : बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट, नोएडा में चल रहे फार्मूला वन रेस को कवर करने के लिए न्‍यूज चैनलों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया है. अपने वैश्‍विक मानक के अनुसार एफओएम यानी फार्मूला वन मैनेजमेंट कभी किसी भी देश के न्‍यूज चैनल को रेस फीड बांटने का परमीशन नहीं देता है. एफओएम के नियम कानूनों को देखते हुए भारतीय इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने नोएडा में एफवन रेस के बायकाट करने की चेतावनी दी है.  

सूत्रों के अनुसार कुछ न्‍यूज चैनलों के प्रतिनिधि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों से इस संदर्भ में बातचीत की है. इस पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने न्‍यूज चैनलों को खुद ही एफओएम से मामला सुलझाने को कहा है. इसके बाद से न्‍यूज चैनल वाले परेशान हैं. सूत्रों का कहना है कि अब तक एफवन के कवरेज को लेकर कोई निर्णय नहीं निकल पाया है. ऐसे में यह देखना दिलचस्‍प होगा कि न्‍यूज चैनल एफवन रेस का बायकाट करते हैं या फिर टीआरपी के डर से किसी तरह इस आयोजन को प्रमुखता से दिखाते हैं.

प्रख्‍यात साहित्‍यकार श्रीलाल शुक्‍ल का निधन

लखनऊ : ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल का शुक्रवार को सुबह एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे तथा पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। दस दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल. जोशी ने उन्‍हें अस्‍पताल में ही ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया था। श्रीलाल शुक्ल अपने पीछे एक पुत्न तथा तीन पुत्नियों का भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी का निधन कुछ वर्ष पहले ही हो चुका है।

31 दिसंबर 1925 को जन्मे शुक्ल ने 'राग दरबारी' उपन्यास से शोहरत पाई थी। हाल ही में इन्‍हें प्रख्‍यात साहित्‍यकार अमरकांत के साथ संयुक्‍त रूप से हिंदी के 45वें अतिप्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्‍कार के लिए चुना गया था। 2008 में उन्हें पदमभूषण से भी सम्‍मानित किया गया था। श्री शुक्ल के निधन पर हिन्दी साहित्य में शोक की लहर दौड़ गई है। भारतीय ज्ञानपीठ, जनवादी लेखक संघ प्रगतिशील लेखक संघ समेत कई साहित्यिक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। श्रीलाल शुक्ल ने ‘राग दरबारी’, ‘मकान’, ‘सूनी घाटी का सूरज’, ‘पहला पड़ाव’, ‘अज्ञातवास’ तथा ‘विश्रामपुर का संत’ जैसी कालजयी रचनाओं से साहित्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी।

विकीलीक्‍स को सपोर्ट करने वाले भारतीयों का आभार जताया असांज ने

पूरे विश्‍व में तहलका मचाने वाला विकीलीक्‍स आर्थिक दिक्‍कतों से जूझ रहा है. जूलियन असांज ने विकीलीक्‍स का प्रकाशन अस्‍थाई रूप से बंद करने का ऐलान किया है. वे किसी भारतीय बैंक में अपना खाता खोलने की कोशिशों में जुटे हुए हैं ताकि विकीलीक्‍स को मिलने वाले अनुदान को जमा कर सकें. असांज ने विकीलीक्‍स को सपोर्ट करने वाले लोगों का आभार भी जताया है. असांज से एनडीटीवी ने कई मुद्दों पर विस्‍तार से बात की. वहीं से साभार लेकर असांज का साक्षात्‍कार प्रकाशित किया जा रहा है.

Sonia Singh : Mr Assange, it's been a year since the blockade, which you linked to the publication of diplomatic cables by the WikiLeaks. Why have you been driven to this stage where you have to suspend operations?

Julian Assange : Well, according to a 24 country poll that had 18,000 people, WikiLeaks has the support of almost 75 per cent of the world's population. And, in fact, one of the strongest supporters is the Indian population. But despite that, these US-based financial services companies – Visa, MasterCard, PayPal, Bank of  America and Western Union – have continued, since December last year, to conduct an extra judicial blockade, entirely outside of any administrative or judicial process. In fact, there has been only one formal US government enquiry into the issue and that was by the US Treasury and the US Treasury found, in January this year, that we should not be added to any kind of US government financial blacklist. But this blockade by these corrupt financial institutions continues.

Sonia Singh : And of course, in India you made the point that the huge support you got after this cash-for-votes scandal, that whole cable which talked about a trunk being found in some aide of a Congress politician's house, we have seen the revelations of Mayawati, and the more interesting ones, the ones which NDTV had also sourced with the Pakistani, the Pakistani-US diplomatic cables, trace key points on contradictions. Now you said the whole attempt to target WikiLeaks. You yourself are, of course, currently under virtual house arrest, under a court decision in Great Britain on an extradition in Sweden on alleged rape charges. You said those charges are politically motivated. Now you have had to suspend WikiLeaks operations. If WikiLeaks does shut down permanently, will this mean that the establishment that you fought against has won?

Julian Assange : Well, it is a possibility that the establishment will win. Certainly, it has been difficult for us for the last 11 months; we have been removed from 95 per cent. We have been surviving on cash reserves and the last 11 months, because if the situation continues, it can continue, if it does continue their need is inevitable. Sometime during next year, Wikileaks would completely run out of money and that would be the end of the organisation. So, we have decided to take this moment to fight back, to put everything we have got and to call on the world population to help us fight back, to try and attack this blockade, work out ways to get out of this blockade and politically demand that the blockade be removed. To investigate into these organisations, the European Commission has already launched investigation of MasterCard and Visa and to push past it, if Wikileaks is not successful, in defeating the blockade, then yes, the forces of darkness, sorry to speak, will have won the elimination of Wikileaks. They would not have won the battle. The big battle was to get this information out. For the past four months, we have been almost completely victorious in that big battle, but to do that battle cost the institution itself. That is a possibility, unless we all successfully, put everything we have got, into knocking down this blockade. Now we have put up some new mechanisms – You can send SMS donations, in some countries international bank transfers through some banks. Not through the Bank of America, and now we are in a process of setting up a local Indian bank account, so our strong Indian support can be represented. We are doing the same in similar countries. We are also looking for ideas from other people about how do you get around this problem. Personally, what we would like to see is that Visa and MasterCard and the Bank of America are simply banned for engaging in this sort of activity. They should be banned from India. The Icelandic Parliament is looking into banning them and European Commission, as I said before, is looking into whether they could start the prosecution against them.

Sonia Singh : Well, of course, that being an important decision soon. You made the point that the local bank account coming up in India – in so many ways WikiLeaks has touched revolutionary movements around the world – the Arab Spring, the Anna Hazare anti-corruption movement in India, Occupy Wall Street that started in America and spread around the world, and many have linked it to WikiLeaks and the way it challenged the traditional government structures. Does that hearten you? Do you think it will live on much beyond the WikiLeaks sight and institution?

Julian Assange : Well, this movement which we have been a part of, in the Arab spring, of the movement in India, for the anti-corruption movements in Madrid, which spread into Wall Street – some of our people are directly involved in the Wall Street movement as well. Yes, they may eliminate WikiLeaks, although, of course, we hope not. It is too late to stop some of the changes WikiLeaks has brought about, but cannot undo the movements. We would like to say that the courage is contagious. And we can say, that in occupying Wall Street and the movement in Arab spring, courage is contagious. On the other hand, the defeat of courageous people and courageous institutions is also contagious. So we have to be careful to make sure that this encouraging example is not set through the attempted elimination of WikiLeaks. It's important for us, it's important for other institutions in the movement, to make sure that the other banks do not win. I do not think that they will win. I actually think that this press conference and the support they were trying to stage today will continue on in the weeks and people will rally together and we will attack these institutions and it is a successful attempt to occupy Wall Street. And the other US corrupt financial institutions need to be held to account. I think we can all pull together and we can knock them down.

Sonia Singh : Right, of course, in internet we have already seen support pouring in for you and WikiLeaks after that press conference. But the larger issue, if you are fighting for open government, you are fighting to strengthen democracy, but why don't you let the democratic process do its job? You are under criticism for releasing this unredacted cables… a short while ago people asking whether that endangers security…why don't you let the democratic government function? The elected governments are voted in, if you don't like them, vote them out. Does WikiLeaks impede democracy? Is it anarchist?

Julian Assange :  Well, this seems to be not true. You know, as the publishing organisation, all the fruits of our labour are public. Everything that we do goes to the public. And the public chooses to support us with their wallets and thousands and thousands of people have done so. The average donation to WikiLeaks is 25 dollars. It is simply that we have very broad public support. So that interaction between us and the public occurs weekly. Weekly the public demonstrates their support for what we do. Not every four years, not as a result of huge corrupt campaigns but weekly, as a result of our publishing activities. So to that degree WikiLeaks is an expression of the democratic process and we can't say that everything, you know, the traditionally-elected governments do is an expression of the people's will. Is it an expression of the people's will that these parliamentarians have their huge fat pensions? That is not the expression of the people. No one actually votes for that, rather it is an expression of the power that these people have and the corruption of their position of power to take money and use it for their own interest. Courtesy : NDTV

अजय सेतिया नहीं बन पाए उत्तराखंड के चौथे सूचना आयुक्त

जुलाई महीने में भड़ास4मीडिया पर खबर छपी थी कि 'पत्रकार अजय सेतिया होंगे उत्‍तराखंड के चौथे सूचना आयुक्‍त'. इस खबर के छपने पर काफी बवाल हुआ था. उत्तराखंड के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में भी चौथे सूचना आयुक्त के रखे जाने और प्रदेश के बाहर के व्यक्ति को यह पद देने को लेकर हलचल देखी गई थी. उत्तराखंड में राज्यपाल ने डा. निशंक के जमाने में किए गए इस फैसले को अनुमति नहीं दी और फाइल लौटा दी थी.

विपक्ष ने भी इस नियुक्ति पर सवालिया निशान लगाते हुए विपक्ष के नेता की राय न लिए जाने के कारण आपत्ति जताई थी. आखिरकार बड़े वितंडे और राज्यपाल की अनुमति ने मिलने के कारण अजय सेतिया की नियुक्ति की मामला अधर में लटक गया. बाद में खुद अजय सेतिया ने इस प्रकरण से अपने को अलग कर लिया. वर्तमान में उत्तराखंड में मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में एनएस नपलच्याल कार्यरत हैं, जबकि विनोद नौटियाल, प्रभात डबराल और अनिल शर्मा सूचना आयुक्त हैं.

राज्य सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त एनएस नपल्चयाल ने भी नए सूचना आयुक्त की नियुक्ति को गैर जरूरी बता दिया था. इस प्रकरण के बारे में अजय सेतिया ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहा कि उनकी नियुक्ति को लेकर उत्तराखंड में जो विवाद उठ खड़ा हुआ था, उस कारण उन्होंने खुद के नाम को वापस ले लेना उचित समझा. अजय ने बताया कि वे इन दिनों एक नए प्रोजेक्ट की तैयारी में हैं. जल्द ही अपनी नई शुरुआत के बारे में जानकारी देंगे.

‘कलिनायक’ किताब में लगाए गए आरोपों पर रमेश चंद्र अग्रवाल से जवाब तलब

'कलिनायक' किताब और 'कलिनायक' प्रकाशन के बारे में सबको पता होगा. इस किताब में दैनिक भास्कर के मालिक रमेश चंद्र अग्रवाल पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं. दरअसल दैनिक भास्कर ब्रांड नेम को लेकर अग्रवाल फेमिली में गंभीर विवाद चला है और अब भी चल रहा है. इस लड़ाई में जीत के लिए हर तरह के छल-बल का इस्तेमाल किया जा चुका है. रमेश चंद्र अग्रवाल ने अगर अपने हिस्से के भास्कर को बढ़ाने व दूसरों को पछाड़ने के लिए सारे हथकंडे अपनाए तो उनके विरोधी खेमे के लोग उनकी करतूतों का भंडाफोड़ करने व उन्हें नीचा दिखाने के लिए हर तरह के प्रयास करते रहे.

बताते हैं कि 'कलिनायक' किताब इसी विवाद की उपज है. इस किताब के प्रकाशकों ने चतुराई दिखाते हुए रमेश चंद्र अग्रवाल विरोधी इस किताब के विज्ञापन का प्रकाशन दैनिक भास्कर के सभी एडिशन्स में एक बार करा दिया था. तब भड़ास4मीडिया ने इसका खुलासा किया था. कलिनायक किताब का प्रकरण अदालत और पुलिस के पास पहुंच गया है. रमेश चंद्र अग्रवाल खेमे ने कोर्ट व पुलिस के जरिए कलिनायक प्रकाशन वालों को पकड़ने-जकड़ने की तैयारी की है तो इस किताब के प्रकाशकों ने भी तू डाल डाल तो मैं पात पात के अंदाज में पुलिस और अदालत के जरिए रमेश चंद्र अग्रवाल को घेरने की भरपूर कोशिश की है.

इसी क्रम में मध्य प्रदेश पुलिस ने कलिनायक किताब के जरिए रमेश चंद्र अग्रवाल पर लगाए गए आरोपों के बारे में खुद रमेश चंद्र अग्रवाल से जवाब तलब किया है. जांच अधिकारी ने कलिनायक प्रकाशन के वकील को पत्र के जरिए इसकी सूचना भी दी है कि रमेश चंद्र अग्रवाल से आरोपों के बारे में पूछा गया है और अभी तक उनका जवाब नहीं आया है. ये रहे पत्र…

सरकार ने माना न्‍यू मीडिया की ताकत, सोशल मीडिया को अपनाने पर गंभीर

नई दिल्ली: आमतौर पर सरकारी विभागों पर लाल फीताशाही और जनता से कटे होने का आरोप लगता रहता है लेकिन विदेश मंत्रालय, दिल्ली पुलिस, दिल्ली मेट्रो और अब इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आना सीधे आम आदमी से जुड़ने की कोशिश माना जा रहा है। साइबर मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ स्तंभकार पीयूष पांडे ने कहा है कि भारत में 10 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और दुनिया की सबसे बड़ी सर्च इंजन कंपनी गूगल का मानना है कि वर्ष 2015 तक भारत में 30 करोड़ लोग मोबाइल और कंप्यूटर के जरिये इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगेंगे।

उन्होंने कहा कि इन भारतीय इंटरनेट उपभोक्ताओं में बड़ी संख्या में लोग सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और माइक्रो ब्लागिंग साइट ट्विटर पर सक्रिय हैं। इसलिये अब सरकार के लिये सोशल मीडिया को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। पांडे ने कहा कि हैती का भूकंप, मुंबई की बाढ़ और अन्ना हजारे के आंदोलन कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें आगे बढ़ाने में सोशल नेटवर्किंग साइटों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।  उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण दुनियाभर के 72 शहरों में अन्ना हजारे के समर्थन में एक साथ रैली निकाली गई । इससे यह संदेश गया कि देश में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है।

कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी हाल ही में कहा था कि सरकार ने इस आंदोलन से सोशल मीडिया वेबसाइटों ट्विटर, फेसबुक, यू ट्यूब और ब्लॉग की ताकत को समझा है और इससे सबक लिया है। उन्होंने माना कि सरकार ने ट्विटर की ताकत को नजरअंदाज किया। पांडे ने बताया कि सरकार अब यह बात समझ गई है कि इससे जुड़ने में ही समझदारी है। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान सरकार ने इस बात की बेहद कमी महसूस की कि सोशल मीडिया पर उनका पक्ष रखने वाला कोई नहीं है।

पीयूष पांडे ने कहा है कि हजारे के आंदोलन के बाद सरकार के अंदर इस बात को लेकर बेचैनी है कि कैसे सोशल मीडिया पर सरकार का पक्ष रखा जाये। सूचना तकनीक मंत्रालय ने सरकारी विभागों के लिये सोशल मीडिया नीति के बारे में लोगों से सुझाव मांगे थे और इस साल के अंत तक सरकार की सोशल मीडिया नीति आ सकती है। सरकार सोशल मीडिया के जरिये नीतियों को बनाने में लोगों की राय जानना चाहती है। विदेश मंत्रालय का इंडियन डिप्लोमेसी के नाम से ट्विटर अकाउंट है, दिल्ली पुलिस फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय है। साभार : एजेंसी

भारत के सौ अमीरों में चार मीडिया घरानों के मालिक भी शामिल

मशहूर बिजनेस पत्रिका फोर्ब्‍स द्वारा सौ अमीर भारतीयों की सूची घोषित की गई है. इस लिस्‍ट में मुकेश अंबानी पहले पायदान पर हैं, जबकि लक्ष्‍मी निवास मित्‍तल दूसरे तथा अजीम प्रेमजी तीसरे नम्‍बर पर हैं. पर इन सबके बीच चार मीडिया मुगल भी सौ अमीर भारतीयों में अपना स्‍थान बनाने में सफल रहे हैं. इस सूची में सबसे ऊपर जी नेटवर्क के सुभाष चंद्रा का नाम है. सुभाष चंद्रा 22वें स्‍थान पर हैं. उनके ठीक बाद यानी 23वे स्‍थान पर पूर्व केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन के भाई और सन टीवी के कर्ताधर्ता कलानिधि मारन हैं.

इस सूची में हिंदुस्‍तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड की चेयरपर्सन शोभना भरतिया का भी नाम शामिल है. शोभना को इस सूची में 67वां स्‍थान मिला है. वहीं दैनिक भास्‍कर ग्रुप के मालिक रमेश चंद्र अग्रवाल भी 85वां स्‍थान पाकर टॉप हंड्रेड में आने में सफल रहे हैं. सौ अमीर भारतीयों की सूची नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके देखा जा सकता है.

सौ अमीर भारतीय  

बीबीसी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी पाकिस्‍तानी सेना!

पाकिस्तान की सेना बीबीसी के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने पर विचार कर रही है. मामला बीबीसी की उस डॉक्यूमेंट्री का है, जिसमें सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी पर अफ़ग़ानिस्तान के चरमपंथियों की मदद का आरोप लगाया गया है.

सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल अतहर अब्बास ने बीबीसी डॉक्यूमेंट्री में दिखाए गए सबूतों को ख़ारिज किया, जिसमें बताया गया था कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में गुप्त रूप से चरमपंथियों को प्रशिक्षण और हथियार दे रहा है. उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अमरीकी और पश्चिमी देशों के अधिकारियों के आरोप आधारहीन हैं. साभार : बीबीसी 

महुआ से इस्‍तीफा देने वाले विवेक बहल ने टर्नर इंटरनेशनल ज्‍वाइन किया

महुआ के सीईओ पद से इस्‍तीफा देने वाले विवेक बहल ने नई पारी टर्नर इंटरनेशनल के साथ शुरू की है. विवेक ने यहां पर चीफ कंटेंट ऑफिसर के पद पर ज्‍वाइन किया है. वे एक नवम्‍बर से अपनी नई जिम्‍मेदारी संभाल लेंगे. विवेक मुंबई में ही बैठेंगे तथा टर्नर के इंटरटेनमेंट चैनल इमैजिन टीवी, कार्टून नेटवर्क, पोगो और वार्नर ब्रदर्स का डेवलपमेंट और कंटेंट स्‍ट्रेटजी देखेंगे. वे अपनी रिपोर्टिंग टर्नर ब्राडका‍स्टिंग सिस्‍टम एशिया पैसेफिक इंक के चीफ कंटेंट ऑफिसर मार्क आयर्स को करेंगे.

विवेक महुआ के साथ कंटलटेंट सीईओ की भूमिका निभा रहे थे, परन्‍तु वहां की खराब स्थितियों के चलते उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था. विवेक इससे पहले एक्‍जीक्‍यूटिव वाइस प्रेसिडेंट के रूप में स्‍टार नेटवर्क से जुड़े हुए थे. वे कई अन्‍य संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे पिछले ढाई दशकों से इस फील्‍ड में कार्यरत हैं.

‘लाइव इंडिया’ बिकने को तैयार, मिल नहीं रहे खरीदार!

लाइव इंडिया न्यूज चैनल के बारे में खबर आ रही है कि इसे अब बेचने का फैसला इसकी पैरेंट कंपनी एचडीआईएल के मालिकों ने कर लिया है. कभी अधिकारी ब्रदर्स से इस चैनल को खरीदने वाले मुंबई के एचडीआईएल समूह का दिल अब इस चैनल से भर चुका है. सूत्रों के मुताबिक एचडीआईएल प्रबंधन लाइव इंडिया चैनल के खुद के पास होने से कोई खास फायदा नहीं देख पा रहा है. दूसरे, एचडीआईएल प्रबंधन अपने जमीन के मूल धंधे में इन दिनों मुश्किलों का सामना कर रहा है. कंपनी के पास बाजार से कैश फ्लो न आने के कारण लाइव इंडिया को दी जाने वाली मासिक बजट पर गाज गिरा दी गई है. इस कारण चैनल अब त्रिशंकु स्थिति में आ चुका है. दिवाली के ठीक पहले कर्मचारियों को सेलरी देकर फौरी तौर पर मुंह बंद कराने का प्रयास किया गया है. लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अगले महीने सेलरी मिलेगी या नहीं.

सूत्रों के मुताबिक एचडीआईएल प्रबंधन अपने मूल धंधे की दिक्कतों में इतना उलझा है कि उसे चैनल पर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं है. साथ ही प्रबंधन हर महीने कई करोड़ रुपये चैनल पर फूंकने और कोई रिटर्न न मिलने की स्थिति से उब चुका है. इस कारण चैनल को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है. सूत्रों के मुताबिक एचडीआईएल के मालिकों ने चैनल को त्रिशंकु स्थिति में लटकाकर लाइव इंडिया के सीईओ और एडिटर सुधीर चौधरी को एक तरह से इशारा कर दिया है कि वे या तो चैनल को चलाने भर का खर्च खुद जुटाएं या फिर चैनल को किसी अन्य को बिकवाने में मदद करें.

सूत्रों का कहना है कि लाइव इंडिया चैनल बिक्री के लिए लगभग तैयार है. खरीदारों की तलाश की जा रही है. पर समस्या ये है कि लगातार घाटे में चलने वाले ज्यादातर हिंदी न्यूज चैनलों की दशा-दिशा को देखकर इन सफेद हाथियों के खरीदार कहां मिलेंगे. बताया जाता है कि एचडीआईएल प्रबंधन अगले कुछ महीनों में यह तय कर लेगा कि उसे लाइव इंडिया न्यूज चैनल अपने पास रखना है या किसी को बेच देना है. अगर उचित खरीदार न मिला तो एचडीआईएल प्रबंधन चैनल को बेहद लो कास्ट के माडल पर ले जाएगा और डिस्ट्रीव्यूशन समेत कई तरह के खर्चों पर पूरी तरह लगाम लगा देगा. एक कमजोर किस्म की चर्चा ये भी है कि एचडीआईएल प्रबंधन लाइव इंडिया के लिए सुधीर चौधरी का विकल्प तलाश रहा है और नए नेतृत्व के आने तक चीजों को यूं ही उलझा कर रखा जाएगा. इन चर्चाओं-अफवाहों में कितना दम है, यह तो वक्त बताएगा. पर हिंदी न्यूज चैनल इंडस्ट्री में लोग यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में लाइव इंडिया रूपी उंट किस करवट बैठता है.

बसपा ने पत्रकार को दिया विधानसभा का टिकट

उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावा में मेरठ जनपद की हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्र से पत्रकार प्रशान्त गौतम को बहुजन समाज पार्टी ने उम्मीदवार घोषित किया है. प्रशांत हिंदी दैनिक 'सत्ता की परख' से जुड़े हुए हैं. पत्रकार प्रशांत को टिकट दिए जाने पर बहुजन पत्रकार एसोसिएशन ने बसपा सुप्रीमो मायावती का आभार व्यक्त किया है. अपने एक बयान में बहुजन पत्रकार एसोसिएशन ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में बसपा को छोड़ कर किसी भी राजनीतिक दल ने अब तक अपने घोषित उम्मीदवारों में किसी पत्रकार को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया है.

बहुजन पत्रकार एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश के सभी सदस्य चुनाव के दौरान पत्रकार प्रशान्त गौतम को जिताने के लिए पूरी मेहनत से कार्य करेंगे. बहुजन पत्रकार एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश के महामंत्री  कपिल कुमार सिंह ने एक बयान में बताया कि हस्तिनापुर से टिकट पाने वाले प्रशान्त गौतम वर्ष 1992 से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हैं. प्रशान्त गौतम साप्ताहिक 'फार्मर सन्देश' के लम्बे समय तक सम्पादक रहे हैं. इसके बाद वर्ष 2005 से हिन्दी दैनिक सत्ता की परख के राजनीतिक संवाददाता के रूप में कार्यरत होने के साथ ही कई शैक्षिक संस्थानों से भी जुड़े हैं. कपिल ने बहुजन समाज पार्टी द्वारा प्रशान्त गौतम को उम्मीदवार घोषित किये जाने पर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को धन्यावाद दिया है. प्रेस रिलीज

हत्या के आरोप में दैनिक भास्कर का पत्रकार गिरफ्तार

जालंधर में आठ अक्टूबर को हुए भट्ठा मालिक बहादुर सिंह की हत्या की गुत्थी को जालंधर पुलिस ने सुलझा लिया है. पुलिस ने इस मामले में हिंदी अखबार दैनिक भास्कर के पत्रकार और उसके साथी को गिरफ्तार किया है. एसएसपी देहात हरदयाल सिंह मान ने एक पत्रकार सम्मलेन के दौरान बताया कि पत्रकार हरभजन सिंह के सतबीर कौर नाम की एक महिला से प्रेम सम्बन्ध थे. 

सतबीर कौर के साथ भट्ठा मालिक बहादुर सिंह सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर रहा था. इसी कारण उसकी हत्या कर दी गयी. इस तरह कमबख्त इश्क ने एक पत्रकार को कातिल बना डाला. यह मामला जालंधर के गाँव कोटला का है. बहादुर सिंह इसी कोटला गाँव मे ईंट भट्टा चलाता था. पुलिस की तफ्तीश में सामने आया कि सतबीर कौर पर बुरी नज़र रखता था बहादुर सिंह. सतबीर के प्रेमी पत्रकार हरभजन सिंह ने अपने साथी विक्रमजीत के साथ मिल कर बहादुर सिंह की गोली मार हत्या कर दी और फिर मौके से फरार हो गया.

पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर आगे की तफ्तीश शुरू कर दी है. पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गयी गन और मोटरसाइकिल बरामद कर लिया है. पुलिस ने आरोपियों के पास से पचास से ज्यादा सिम कार्ड बरामद किये हैं. पुलिस इस बात की जाँच कर रही है कि ये लोग इतने सारे सिम कार्ड का इस्तेमाल किस मकसद से कर रहे थे.

शोभना भरतिया, अमित चोपड़ा, शशि शेखर, अकु श्रीवास्‍तव एवं विनोद बंधु के खिलाफ याचिका दायर

: अवैध प्रकाशन को लेकर मुंगेर में दायर हुआ मुकदमा : मुंगेर। मुंगेर के सामाजिक कार्यकर्ता मंटू शर्मा ने मुख्‍य न्यायिक दंडाधिकारी मनोज कुमार सिन्हा की अदालत में 'द हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड' (एचएमवीएल) की अध्यक्ष शोभना भरतिया, नई दिल्ली, प्रधान संपादक हिन्दुस्तान शशि शेखर, कार्यकारी संपादक हिन्दुस्तान, पटना संस्करण अकु श्रीवास्तव, उप-स्थानीय संपादक, भागलपुर संस्करण विनोद बंधु, प्रकाशक अमित चोपड़ा और मुद्रक के विरूद्ध प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एवं बुक्‍स एक्ट, 1867 की धारा 8/बी 14 एवं 15 और भारतीय दंड संहिता की धारा 420/471 एवं 476 के तहत 18 अक्‍टूबर को परिवाद-पत्र, जिसकी संख्या- 993सी0/2011 है, दायर किया है।

24 अक्‍टूबर को मुंगेर के वरीय अधिवक्ता अशोक कुमार ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मनोज कुमार सिन्हा के समक्ष परिवाद पत्र को स्वीकार करने, वादी मंटू शर्मा का बयान दर्ज करने और इसे संज्ञान लेकर एचएमवीएल के नामजद सभी लोगों के विरूद्ध सम्मन जारी करने की प्रार्थना की। उन्होंने न्यायालय को बताया कि देश के इस शक्तिशाली मीडिया समूह ने किस प्रकार 2001 से अब तक बिना अखबार का रजिस्‍ट्रेशन कराए भागलपुर स्थित प्रिंटिंग प्रेस से अवैध ढंग से दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन किया है और अब तक करता आ रहा है। एचएमवीएल के पक्ष के सभी लोग अवैध ढंग से बिना रजिस्‍ट्रेशन के ही मुंगेर संस्‍करण छापकर वितरित कर कर रहे हैं और केन्द्र और राज्य सरकारों से करोड़ों रुपये सरकारी विज्ञापन के मद में बटोर रहे हैं। यह ससबूत सरकारी लूट का मामला है। इस लूट में सरकार के अधिकारी भी शामिल हैं।

मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने वरीय अधिवक्ता अशोक कुमार से एक प्रश्न का जवाब मांगा– ‘अखबार के अवैध प्रकाशन और राजस्व लूट से संबंधित क्रिमिनल अफेंस की धाराएं कहां हैं?’’ वरीय अधिवक्ता अशोक कुमार ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एवं बुक्‍स एक्ट की धारा 14 और 15 पेश किया और कहा कि इन धाराओं के तहत अवैध प्रकाशन के लिए 6 माह की सजा और दो हजार रुपए जुर्माना का प्रावधान है। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने संबंधित धाराओं से संबंधित ला बुक को अधिवक्ता से रेफरेंस के लिए सुपुर्द करने का आदेश दिया। अधिवक्ता ने संबंधित धाराएं 14 और 15 से संबंधित प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एंव बुक्‍स एक्ट की पुस्तक न्यायालय को सुपुर्द कर दिया।

न्यायालय ने इस परिवाद पत्र को स्वीकार करने के बिन्दु पर अपना फैसला 25 अक्‍टूबर तक सुरक्षित रखा। पुनः न्यायालय ने इस परिवाद पत्र को न्यायालय में स्वीकार करने के बिन्दु पर अपना फैसला 29 अक्‍टूबर तक सुरक्षित रखा है। न्यायालय में बहस के दौरान वरीय अधिवक्ता अशोक कुमार के समर्थन में वरीय अधिवक्ता काशी प्रसाद, अजय तारा, बिपिन मंडल एवं अन्य ने सहयोग किया।

परिवाद पत्र के समर्थन में वादी मंटू शर्मा ने 30 जून, 2011 और 01 जुलाई, 2011 का मुंगेर संस्करण का दैनिक हिन्दुस्तान सुपुर्द किया है। 30 जून, 11 के दैनिक हिन्दुस्तान में अखबार ने प्रिंट लाइन में अपने अखबार का रजिस्‍ट्रेशन नं0-44348/86 लिखा है जबकि एक दिन बाद इसी अखबार ने अपने प्रिंट लाइन में रजिस्‍ट्रेशन नंम्‍बर के स्थान पर ‘आवेदित’ लिखा है। परिवाद पत्र में मंटू शर्मा ने लिखा है कि इससे प्रमाणित होता है कि अखबार 2001 से अवैध ढंग से फर्जी रजिस्ट्रेशन नंम्बर छापकर सरकार का करोड़ों रुपए का विज्ञापन गलत तरीके से बटोर रहा था।

वादी मंटू शर्मा ने अपने मुकदमे के समर्थन में भागलपुर के जिला पदाधिकारी की उस रिपोर्ट की प्रति संलग्न की है, जिसमें जिलाधिकारी ने पत्रांक-145/जि0ज0स0/दिनांक-3 अप्रैल, 2010 के जरिए उप-प्रेस पंजीयक, नई दिल्ली को पत्र लिखकर सूचित किया है कि भागलपुर के जिलाधिकारी के कार्यालय में दैनिक हिन्दुस्तान के निबंधन से संबंधित दस्तावेजी सबूत उपलब्ध नहीं है। मंटू शर्मा ने अपने मुकदमे के समर्थन में प्रेस रजिस्‍ट्रार, नई दिल्ली के कार्यालय की अनुभाग अधिकारी पूर्णिमा मलिक के उस पत्र की फोटोप्रति सुपुर्द की है, जिसमें पूर्णिमा मलिक ने स्पष्ट लिखा है कि हिन्दुस्तान समाचार पत्र का मुद्रण केवल पटना से ही हो सकता है, क्योंकि उसने केवल पटना से ही मुद्रण की स्वीकृति ली है। यह पत्र पूर्णिमा मलिक ने 20 अप्रैल, 2006 को बिहार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के सचिव विवेक कुमार सिंह को भेजा था। मंटू शर्मा ने अपने मुकदमे के समर्थन में बिहार सरकार के वित्त जांच विभाग का अंकेक्षण प्रतिवेदन संख्या- 195/05-06 की वह रिपोर्ट संलग्न की है, जिसमें अंकेक्षण दल ने स्पष्ट लिखा है कि दैनिक हिन्दुस्तान किस प्रकार अवैध ढंग से भागलपुर और मुजफ्फरपुर से अखबार प्रकाशित कर रहा है और राज्य सरकार का सरकारी विज्ञापन अवैध ढंग से छाप रहा है, जो राशि वसूलनीय है।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.

बाजारवादी समाज और प्रायोजित सफलता की कहानियों के बीच

नवभारत टाइम्स, दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण एक भयानक सड़क हादसे में बुरी तरह जख्मी होने के बाद कई महीनों तक बिस्तर पर पड़े रहे. इस दौरान न लिख पाने, न चल पाने की दिक्कतों से जूझते हुए वे लगातार सोचते-गुनते और विचारते रहे. जब वे थोड़ा बहुत लिखने-टाइप करने लायक हुए तो अपने मन की बात को अपने ब्लाग 'पहलू' पर उतार डाला.

एक संवेदनशील नागरिक जिसका सरोकारी अतीत रहा हो, आज के दौर के समय व समाज को किस तरह देखता-महसूस करता है, उनके इस छिटपुट 'तुक्के' के जरिए जाना जा सकता है. 'हाल के कुछ तुक्के' शीर्षक से पिछले महीने उनके ब्लाग पर प्रकाशित उनकी पोस्ट को यहां साभार प्रकाशित कर रहे हैं. -यशवंत, भड़ास4मीडिया

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सड़क चलता कोई व्यक्ति एक्सिडेंट का शिकार हो जाए, इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं होती। लेकिन इस दुर्घटना का चौतरफा असर जब उसके जीवन पर पड़ना शुरू होता है तो वह इसे एक अलग-थलग घटना मानकर आगे नहीं बढ़ पाता। उसे इसके पीछे कोई तर्क चाहिए होता है, ताकि जीवन में आए इस आकस्मिक व्यवधान को वह सिरे से खारिज कर सके। यहां परंपरा उसकी मदद के लिए आगे आती है। जीवन का कोई विशेष घटनाक्रम मनुष्य के कर्म का नतीजा है या भाग्य का, इस पर अपने यहां हजारों साल से वाद-विवाद होता आया है। मामले को और जटिल बनाने के लिए प्रारब्ध, नियति या पूर्वजन्मों के कर्मफल जैसी कुछ और गुत्थियां भी इसमें डाल दी गई हैं। लेकिन ये सारी चीजें मिलकर भी किसी के जीवन को उसकी मनचाही दिशा में मोड़ नहीं पातीं और इनकी कुल भूमिका ज्योतिषियों का भला करने तक ही सिमट कर रह जाती है। क्या हम जीवन को एक तयशुदा रास्ते के बजाय आकस्मिक घटनाओं का ही एक प्रवाह मानकर संतुष्ट नहीं रह सकते? ऐसा करके हम ज्यादा सुखी भले न हो पाएं लेकिन दुख की संभावना को कुछ कम जरूर कर लेंगे।

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अपनी रोज की रोटी की तरह हर रोज हमें अपने लिए थोड़ी आशा भी जुटानी पड़ती है। यह न हो तो रोटी कमाते नहीं बनता। कमा भी लो तो वह तन को नहीं लगती। सामान्य स्थितियों में आशा कोई दुर्लभ वस्तु नहीं जान पड़ती। जिस बाजारवादी समाज में हम जी रहे हैं, उसमें निराशा के लिए कोई जगह ही नहीं है। वहां चारों तरफ सफलता की कहानियां बिखरी हुई हैं। प्रायः प्रायोजित सफलता की कहानियां। आशावाद की तो जैसे हर तरफ बाढ़ आई हुई है। लेकिन आप यह देखकर चकित हो सकते हैं कि नाकामी का एक धक्का भी किस तरह आपको समूची भीड़ से छांटकर अलग कर देता है। हित-मित्र, कुल-कुटुंब सभी अचानक आपको दूर से देखने लगते हैं। उनकी सांत्वनाएं और बाहर उमड़ रहा सारा का सारा आशावाद तब आपके लिए किसी काम का नहीं रहता। ऐसे में हमें हर रोज अपने भीतर न सिर्फ आशा की फसल उगानी होती है, बल्कि हमलावर निराशाओं से उसकी रक्षा भी करनी होती है।

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बचपन…जवानी…बुढ़ापा …मौत। समय का तीर हमारे भौतिक अस्तित्व को सीधे वेधता हुआ निकल जाता है। लेकिन हमारे मानसिक या आत्मिक अस्तित्व के सामने उसकी धार कुछ कुंद सी हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे शरीर की उम्र लगातार बढ़ती जाती है, लेकिन मन की उम्र भंवर में फंसे पानी की तरह कभी आगे कभी पीछे होती रहती है। एक झटके में यह कभी बुजुर्गियत के करीब पहुंच जाता है तो कभी बिल्कुल बच्चा बन जाता है। फारसी के महाकवि रूमी अपने एक शेर में कहते हैं- घास-फूस की तरह मैं सूख-सूख कर फिर हरा हो जाता हूं। मी चू सब्ज़ा बारहा रूईद: एम। जिन लोगों को अपने जीवन के शुरुआती दौर में ही बड़े झटकों से गुजरना पड़ा होता है वे रूमी की उक्ति की तस्दीक ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकते हैं। मानवीय प्रकृति की इस दुर्लभ विशेषता के बिना उनके जीवन का निराशा के गर्त से उबरकर दोबारा पटरी पर आना शायद संभव न हो पाता।

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पीपुल्‍स समाचार, इंदौर : रमन रावल बने नए आरई, प्रबंधन से नाराज यूनिट हेड छुट्टी पर

: इस बार पत्रकारों को दीपावली पर नहीं मिली मिठाई : वरिष्‍ठ पत्रकार रमन रावल को पीपुल्‍स समाचार, इंदौर का स्‍थानीय संपादक बना दिया गया है. ग्रुप एडिटर एनके सिंह से विवाद के बाद स्‍थानीय संपादक प्रवीण खारीवाल ने इस्‍तीफा दे दिया था, तभी से यह पद खाली चल रहा था और अस्‍थाई रूप से राधेश्‍याम धामू इसकी जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. पीपुल्‍स समाचार ज्‍वाइन करने से पहले रमन रावल चौथा संसार में संपादक के पद पर कार्यरत थे. रमन रावल पिछले तैंतीस साल से इंदौर में ही पत्रकारिता कर रहे हैं. दैनिक भास्‍कर में सीनियर पदों पर रहे. भास्‍कर टीवी के प्रधान संपादक रहे. नई दुनिया में भी वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. 

पीपुल्‍स समाचार, इंदौर से दूसरी खबर यह है कि यूनिट हेड श्रीराम कृष्‍ण मैनेजमेंट के रवैये से नाराज होकर छुट्टी पर चले गए हैं. चर्चा के अनुसार उनकी नाराजगी का कारण दिवाली पर दिया गया अत्‍यधिक विज्ञापन टार्गेट है. पर सूत्रों का कहना है कि वो मैनेजमेंट के गलत नीतियों से पहले ही नाराज चल रहे थे, उस पर यह विज्ञापन टार्गेट ने घी का काम कर दिया. चर्चा है कि वे प्रदेश टुडे से जुड़ सकते हैं. प्रदेश टुडे प्रबंधन ने पहले भी उनकी निकटता रही है. कहा जा रहा है कि अगर वे प्रदेश टुडे ज्‍वाइन करते हैं तो यह उनके लिए घर वापसी जैसी होगी.

पीपुल्‍स समाचार, इंदौर से तीसरी खबर यह है कि इस बार दीपावली पर पत्रकारों को एक मिठाई तक नहीं दी गई. इससे पहले पत्रकारों को दिवाली के मौके पर प्रबंधन द्वारा मिठाई दी जाती थी, परन्‍तु इस बार यह परिपाटी टूट गई. प्रबंधन के इस रवैये से पीपुल्‍स समाचार के पत्रकार अंदर से खिन्‍न हैं. हालांकि दूसरे अखबारों में भी इसको लेकर काफी चर्चाएं हो रही हैं कि पीपुल्‍स की औकात अब अपने पत्रकारों को मिठाई देने की भी नहीं रही.

योगराज शर्मा, सलीम सैफी, कामता प्रसाद की नई पारी

योगराज शर्मा इन दिनों ए2जेड न्यूज चैनल में कार्यरत हैं. देर से मिली जानकारी के मुताबिक चार महीने पहले ही योगराज ने ए2जेड न्यूज चैनल ज्वाइन कर लिया. वे कई न्यूज चैनलों और अखबारों में काम कर चुके हैं. इंडिया न्यूज हरियाणा से इस्तीफा देने के बाद योगराज ने अखबार शुरू किया, न्यूज पोर्टल लांच किए और अपना मीडिया स्कूल शुरू किया. इस बीच ए2जेड मैनेजमेंट की तरफ से प्रस्ताव मिलने के बाद उन्होंने ए2जेड न्यूज चैनल में रीजनल हेड के पद पर ज्वाइन कर लिया.

उधर, ए2जेड न्यूज चैनल से ही सूचना है कि सीनियर करेस्पांडेंट संजय दीक्षित एक एक्टूबर से छुट्टी पर चल रहे हैं. उनके लंबी छुट्टी पर जाने के कारण कई तरह की चर्चाएं हैं. सूत्रों का कहना है कि संजय प्रबंधन के रवैये से खफा होकर छुट्टी पर हैं.

देहरादून से खबर है कि सलीम सैफी ने मुंसिफ टीवी में एक्जीक्यूटिव एडिटर (यूपी-उत्तराखंड) के बतौर नई पारी की शुरुआत की है. सलीम सैफी कई न्यूज चैनलों के लिए वेस्ट यूपी और उत्तराखंड प्रभारी के रूप में काम कर चुके हैं. मुंसिफ टीवी का मुख्यालय हैदराबाद में है. दैनिक जागरण से मिली एक सूचना के मुताबिक कामता प्रसाद ने दैनिक जागरण, हिसार में ज्वाइन किया है. वे इसके पहले पायनियर हिंदी, लखनऊ में कार्यरत थे.

राष्‍ट्रीय सहारा, पटना के आफिस में पीने का पानी भी बंद

राष्‍ट्रीय सहारा, पटना में डेस्‍क पर काम करने वाले तथा सिटी रिपोर्टर परेशान हैं. पिछले दो महीने से ऑफिस में चाय तो बंद ही थी अब पीने के लिए पानी मिलना भी बंद हो गया है. डेस्‍क वाले तो किसी तरह अपना काम चला रहे हैं पर दिन भर इधर-उधर से दौड़ कर के आने के बाद सिटी रिपोर्टरों को अब पानी भी नसीब नहीं हो रहा है. एसी भी काफी समय से खराब है, जिससे फजीहत और बढ़ गई है. 

राष्‍ट्रीय सहारा के सिटी रिपोर्टर काम की अधिकता के बाद अब पानी को लेकर परेशान हैं. सिटी और ब्‍यूरो में काम बंटवारे को लेकर पूरी तरह से अंधेरगर्दी है. सिटी के चार से पांच पेजों को भरने की जिम्‍मेदारी मात्र छह रिपोर्टरों की है. इसमें भी लगभग हर दिन एक रिपोर्टर साप्‍ताहिक अवकाश के चलते छुट्टी पर होता है. यानी औसतन पांच रिपोर्टर ही इन पेजों के लिए काम पर होते हैं. वहीं ब्‍यूरो के पास एक पेज भरने की जिम्‍मेदारी होती है, पर इनके पास रिपोर्टरों की संख्‍या नौ है. इन मुश्किलों से जूझ रहे सिटी रिपोर्टरों की परेशानियां और ज्‍यादा बढ़ गई हैं. 

बिल्डिंग के सातवें तल पर स्थित राष्‍ट्रीय सहारा के आफिस के न्‍यूज रूम का एसी भी खराब है. बंदरों का आतंक अलग से है. कई लोगों को ये बंदर काट चुके हैं. बिल्डिंग के लिए पानी की जो टंकी बनाई गई है उसका मुंह खुला हुआ है. इसमें बंदरों के स्‍नान करने से लेकर चील-कौवों की बीट तक पड़ी रहती है, लिहाजा कोई भी इसे पीने में इस्‍तेमाल नहीं करता है. राष्‍ट्रीय सहारा में भी पीने के लिए अलग पानी का इंतजाम किया जाता था, पर चाय के बाद अब उसे भी बंद कर दिया गया है. राष्‍ट्रीय सहारा में काम करने वाले सिटी रिपोर्टर तो जल्‍द से जल्‍द यहां से पलायन करने की कोशिश में लगे हुए हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

ब्राह्मणवाद के पैरोकारों ने महिषासुर जैसे पात्रों का विकृतिकरण किया है

: जेएनयू में याद की गई महिषासुर की शहादत : जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सोमवार को देर रात आयोजित एक कार्यक्रम में महिषासुर की शहादत को याद किया गया। यह वही, महिषासुर है, हिंदू मिथकों में जिसकी हत्‍या देवी दुर्गा द्वारा की जाती है। लार्ड मैकाले की जयंती की पूर्व संध्‍या पर आयोजित इस कार्यक्रम में वक्‍ताओं ने उत्‍तर भारत में प्रचलित हिंदू मिथकों की बहुजन दृष्टिकोण से पुनर्व्‍यख्‍या की जरूरत पर बल दिया। कार्यक्रम का आयोजन आल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंस फोरम (एआईबीएसएफ) और यूनाइटेड दलित स्‍टूडेंटस फोरम (यूडीएसएफ) ने किया। पिछले कई दिनों से जेएनयू प्रशासन इस कार्यक्रम में विभिन्‍न गुटों के बीच मारपीट की घटना को लेकर आशंकित था। कार्यक्रम सफलता पूर्वक संपन्‍न होने पर जेएनयू प्रशासन ने राहत की सांस ली है।

'लार्ड मैकाले और महिषासुर : एक पुनर्पाठ' नाम से आयोजित इस कार्यक्रम को संबांधित करते हुए प्रसिद्ध दलित चिंतक कंवल भारती ने कहा कि पराजितों का भी अपना इतिहास होता है, उसकी नये तरीके से व्‍याख्‍या की जरूरत है। महिषासुर न्‍यायप्रिय और प्रतापी राजा थे, जिनका वध आर्यों ने छल से करवाया था। उन्‍होंने कहा कि 'असुर' शब्‍द का अर्थ प्राणवान होता है लेकिन ब्राह्मणवाद के पैरोकारों ने परंपराओं, पात्रों समेत शब्‍दों का भी विकृतिकरण किया है। उन्‍होंने कहा कि दलितों के एक तबके ने दशहरा नहीं मनाने का फैसला बहुत पहले ही कर लिया था। दशहरा हो या होली, हिंदुओं के अधिकांश त्‍योहार बहुजन तबकों के नायकों की हत्‍याओं के जश्‍न हैं। कहीं हिरण्‍यकश्‍यप मारा जाता है तो कहीं महिषासुर। उन्‍होंने कहा कि अब ओबीसी तबके को हिंदुवादी पुछल्‍लों से मुक्‍त हो जाना चाहिए।

फारवर्ड प्रेस के मुख्‍य संपादक आयवन कोस्‍का ने पोस्‍टमार्डनिज्‍म के सबसे बडे़ उपकरण विखंडनवाद के हवाले से कहा कि हमारे नायक इतिहास के गर्त में दब गये हैं, उन्‍हें बाहर लाने की जरूररत है। हमें मिथकों के जाल में नहीं फंसना है, अगर हम ऐसा करते हैं तो हम उसी ब्राह्मणवाद का पोषण करेंगे। लार्ड मैकाले के योगादानों की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि उन्‍हें अंग्रेजी समर्थक रूप में गलत तरीके से प्रचारित किया जाता है। मैकाले का असली योगदान भारतीय दंड संहिता का निर्माण है, जिससे मनु का कानून ध्‍वस्‍त हुआ।

युद्धरत आम आदमी की संपादिका व सामाजिक कार्यकर्ता रमणिका गुप्‍ता ने कहा कि झारखंड में अभी भी 'असुर' नाम की जनजाति है, जिनकी संख्‍या 10 हजार के आसपास है। ये मूलत: लोहे संबंधित काम करने वाले लोग हैं, जिन्‍हें करमाली और लोहारा आदि नामों से भी जाना जाता है। ये असुर जातियां दुर्गा की पूजा नहीं करतीं। उन्‍होंने कहा कि हम एक विरोधाभासी समय में जी रहे हैं, एक ओर हम आधुनिक होने का स्‍वांग कर रहे हैं तो दूसरी तरफ अपनी मानसिकता में हम 16 वीं सदी से बाहर नहीं निकल रहे। उन्‍होंने मैकाले की भाषायी नीतियों का विरोध करते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता संबंधी योगदान के लिए लार्ड मैकाले को याद किया जाना चाहिए। प्रेस रिलीज 

दिवाली की रोशनी, घायल पुष्‍पा और अंधेरे दिलों वाली दिल्‍ली

जब पूरी दिल्ली दीपावली के मौके पर पटाखों, मिठाइयों, तोहफों के दायरे में असली-नकली खुशियों को पाने के लिए करोड़ों रुपए बरबाद कर रही थी, ठीक उसी समय एक बूढ़ी मां पुष्पा, जिसकी उम्र 62 साल है और जो हिंदुस्तान की धार्मिक नगरी वाराणसी की रहने वाली हैं, अपने बेटों की तलाश में दिल्ली में कदम रखती है. और कदम रखते ही दर्द की एक ऐसी कहानी शुरू होती है, जो देश के राजधानी की व्यवस्था पर सवाल तो खड़े करती ही है साथ ही साथ मानवता और इंसानियत के शिखर पर पहुंचने का दावा करने वाले हम हिंदुस्तानियों के उपर एक ऐसा कलंक लगाती है, जिसके अंधकार को धाने के लिए पावन दीप पर्व और करोड़ों रुपए के पटाखों की रोशनी भी शायद कम पड़ जाए.

दीपावली से ठीक कुछ दिन पहले ही पुष्पा अपने बेटों की तलाश में वाराणसी से दिल्ली पहुंचती हैं. उनके चेहरे पर बेटों को पाने की उम्मीद और पास में कुछ रुपए के साथ-साथ एक कागज के टुकड़े पर बेटों का पता लिखा था. पुष्पा दिल्ली पहुंच कर बेटों की तलाश शुरू करती उससे पहले ही उसके उम्मीदों की रोशनी कम होने लगती है, क्योंकि पुष्पा सड़क पार करते वक्त एक तेज गाड़ी की चपेट में आ जाती हैं और उसका बांया पैर पूरी तरह जख्मी हो जाता है. दुर्घटना के दिन से ही चोटों की जगह से खून का रिसाव लगातार जारी है, जिसके कारण पुष्पा के जख्म अब बड़े घावों का रूप अख्तियार कर चुके हैं.

पुष्पा के दर्द के बाद दिल्ली की व्यवस्था की विडंबना शुरू होती है और हरदम आप के साथ का दावा करने वाली पीसीआर की गाड़ी आनन-फानन में आती है और अपने कार्यों को अंजाम देकर पुष्पा को दिल्ली के सबसे बड़े नगर निगम के अस्पताल हिंदूराव में ले जा कर छोड़ देती है. लेकिन अस्पताल प्रशासन उनको भर्ती करने की बजाय उनके हाल पर उसे छोड़ देता है. और पिछले आठ दिनों से पुष्पा अस्पताल के ओपीडी परिसर में ही पड़ी हुई हैं. और लगातार जख्मों में तेज दर्द होने के कारण कराह रही हैं. जब भी कोई आदमी उनका हाल जानने की कोशिश करता है तो पुष्पा सिर्फ हाथ जोड़ कर कहती हैं कि जल्द से जल्द मेरा इलाज करवा दो, मुझे अपने बेटों को ढूंढना है. पुष्पा ने कई बार लोगों की मदद से अस्पताल में भर्ती होने की कोशिश की लेकिन आज एक सप्ताह बाद भी दिवाली के दिन अपने हाल पर जीने के लिए पुष्पा मजबूर हैं. ये उनकी मजबूरी हो सकती है लेकिन आज दीयों के त्योहार के मौके पर काश दिल्ली के लोग या दिल्ली के व्यवस्था में लगे लोग पुष्‍पा के दर्द को समझ पाते तो दिवाली हमारी और आप की तरह उसकी भी रोशन होती.

जय प्रकाश पाल

पत्रकार

मोबाइल नम्‍बर – 9953609314

झारखंड में विज्ञापन के नाम पर हो रहा है लाखों का लूट

: करोड़ों का घोटाल हो चुका है अब तक :  झारखंड राज्‍य बनने के बाद से ही इस राज्‍य की यह विडम्‍बना रही है कि जो जहां पर है इसे लूट रहा है. जिसे मौका मिला उसने लूटा, क्‍या नेता, क्‍या पदाधिकारी सभी इस लूट के खेल में बराबर के साझीदार हैं. अब इस खेल में पिछले कुछ वर्षों से मीडिया के नाम पर भी लूट का खेल चालू हो गया है. इसमें भी 100 करोड़ रुपये तक का घोटाला हो चुका है. आइए अब समझते हैं इस खेल को.

अखबारों को सरकार के जनसम्‍पर्क विभाग द्वारा विज्ञापन दिया जाता है. विज्ञापन देने के लिए केंद्र सरकार और डीएवीपी की स्‍पष्‍ट एक नीति लागू है. जनसम्‍पर्क विभाग में 3-4 पदाधिकारी भ्रष्‍ट हैं, जिन्‍हें लोग सांपनाथ और नागनाथ के नाम से जानते हैं. सरकार विज्ञापन किस अखबार को देगी वो ये ही तय करते हैं. ये इतने शक्तिशाली हैं कि अपने विभाग के सचिव तक की कुर्सी को हिला सकते हैं. इतना ही नहीं सरकार बदल गई. सरकार का मुखिया बदल गया पर इन्‍हें कोई नहीं बदल सकता. तो ये इतने रसूख वाले हैं कि इनकी पहुंच रांची से लेकर दिल्‍ली तक बताई जाती है. इनके लिए बिचौलिए का काम करते हैं बड़े-बड़े नामवर पत्रकार. 

आइए देखते हैं कैसे ये सरकार खजाने का दुरुपयोग कर रहे हैं. सरकार द्वारा उर्दू अखबार के नाम पर सरकारी विज्ञापन देने का प्रावधान है. यह विज्ञापन केवल उन्‍हें मिलना है, जो डीएवीपी के नियमों एवं कानूनों पर खरा उतरते हों, यानी अखबार की प्रसार संख्‍या के आधार पर डीएवीपी द्वारा दर तय की जाती है, उसके अनुसार ही उन्‍हें विभाग से विज्ञापन दिया जाता है. सरकार और डीएवीपी को अपनी प्रसार संख्‍या कागजों पर 45 से 50 हजार दिखाकर तीन-चार उर्दू अखबार केवल एक वर्ष में 199.9 लाख रुपये का विज्ञापन ले चुके हैं, जबकि उनकी असल प्रसार संख्‍या 200 से 2000 के बीच बताई जाती है.

इन अखबारों में काम करने वाले कर्मचारी राजधानी रांची के नेताओं के इर्दगिर्द चक्‍कर लगाते रहते हैं और अखबार में उनकी बड़ी-बड़ी तस्‍वीर प्रकाशित कर उन्‍हें खुश रखने का प्रयास करते हैं. जनसम्‍पर्क विभाग द्वारा उन्‍हें विज्ञापन तीस से चालीस प्रतिशत की कमीशन पर दिया जाता है. इसके लिए एक-दो दलाल भी विभाग के निदेशक और सहायक निदेशक ने पाल रखे हैं, जो रोजाना शाम को इनके साथ बैठकर शराब भी पीते हैं. जिसकी तस्‍वीर भी कुछ पत्रकारों के पास है. इसी प्रकार कुछ हिंदी दैनिक के नाम पर भी इस लूट में शामिल हैं. सरकार द्वारा विज्ञापन इसलिए दिया जाता है कि सरकार की योजनाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सके, पर यहां सैकड़ों की संख्‍या में प्रकाशित होने वाले अखबार पर आंख मूंद कर विश्‍वास का यह खेल कई वर्षों से जारी है.

मैंने इस पर रांची के प्रभात खबर के वरिष्‍ठ संपादक अनुज सिन्‍हा जी से भी कई बार कहा, पर वो सरकार के इतने पॉवरफुल पदाधिकारियों के विरुद्ध कोई कदम उठाने में अपने को असमर्थ पाते हैं. बाबूलाल मरांडी भ्रष्‍टाचार की बात करते हैं, मैं ने उन्‍हें भी इस बाबत कहा लेकिन वो भी चुप्‍पी लगा लेते हैं. मीडिया के नाम पर इस लूट के खिलाफ कोई बोलने को तैयार नहीं है. इसमें एक अखबार (उर्दू दैनिक) का संबंध दुबई में बैठे माफियाओं के साथ भी होना बताया जाता है. मूल रूप से वो पटना के निवासी हैं और पटना निवासी आठवीं कक्षा पास अखबार का बंडल बांधने वाले लड़के को प्रबंधक बनाकर लूट का खेल चला रखा है. सरकार के निगरानी विभाग को मैंने इस पर लिखित शिकायत झारखंड में राष्‍ट्रपति के शासन के समय ही दिया था, पर अब तक इसपर कोई भी कार्रवाई नहीं हुई है. अब यह मामला पीआईएल के जरिए उच्‍च न्‍यायालय में जा रहा है.

शाहनवाज हसन

संपादक

बिरसा वाणी

हिंदी साप्‍ताहिक 

महुआ के हेड राणा यशवंत का कवि रूप

जी न्यूज में काम कर चुके, आजतक में वरिष्ठ पद पर रहे और इन दिनों महुआ चैनल की कमान संभाले राणा यशवंत कविताएं व ग़ज़ल भी लिखते हैं. उनका एक ब्लाग है, ''बोलो रामखेलावन'' नाम से. इस ब्लाग पर एक सरसरी नजर डालने से राणा यशवंत की संवेदनशीलता, विचारधारा व रचनाधर्मिता को जाना जा सकता है. राणा यशवंत की कविताओं और ग़ज़लों का एक संग्रह जल्द आने वाला है. उनके ब्लाग से साभार लेकर कुछ रचनाएं पेश हैं-

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इक राह तेरी याद सी, चलती है रातभर
इक साक़ी इक सुराही भी चलती है रातभर

चूल्हे की आग को लिये सदियां गुजार दीं
इक रोटी आसमान में चलती है रातभर

उसने भी चलो सीख लिया हंसने का सलीका
करवट बदल के यार वो, रोती है रातभर

मिटना कबूल क्या करे शबनम को इश्क है
सूरज के इंतजार में सजती है रातभर

फिर वही खुशबू है, बारिश, कागजों की कश्तियां
मासूम सी शरारत कोई, मचलती है रातभर

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कभी यार, कभी फरिश्ता, कभी खुदा लगता है
गाढे वक्त में मददगार, क्या क्या लगता है

अपना सुना औऱ लिहाज भी नहीं रखा आपने
फरेब औरों का सुनना तो बड़ा अच्छा लगता है

अपने पसीने की पूरी कीमत मांगते हैं
हमारा ख़ून भी उन्हें सस्ता लगता है

शहर में सबकुछ मिलेगा,बोलिये क्या चाहिये
बाजार को मोटी जेबवाला अच्छा लगता है

साथ जीने मरने की कसमें पुरानी हो गयीं
लैला को मजनूं कहां अब अच्छा लगता है

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मेरे दौर में ये कैसी राज़दारी है
ज़मीन हल्की है, हवा भारी है

गोलियों पर उसी ने नाम लिखा था
भीड़ में आज जिसकी तरफदारी है

तोड़ डाले बुतखाने के सारे खुदा जिसने
बुतपरस्तों से अब उसी की यारी है

इंसां जबसे मौत का सामान बन गया
कभी मुंबई, कभी रावलपिंडी, धमाका जारी है

दिहाड़ी से दोगुनी थाली हो गयी है
ये कैसी जम्हूरियत, कितनी मक्कारी है

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नीरा राडिया

वो शैतान के जादू की शापित छड़ी है
रात बिछाती है दिन में
रात में दिन पसारती है
कौवों को सफेद
कबूतरों को काला बनाती है।

देवलोक की गुफाओं में
अबूझ कंदराओं में
कुबेर का करिश्माई दीया है
हर आराध्य बड़ा साफ दिखता है
मरी मुरादों को भी संजीवनी पिलाता है।

उसने खुद खड़ा किया है अपना इंद्र
मेनका की मृगतृष्णा बनाई है
नारद की वीणा के राग गढे हैं
लक्ष्मी के कदम साधे हैं
वो मायानगरी की सबसे बड़ी माया है।

उसने सोख लिया है धरती का रस
छीन ली है वेताल की शक्ति
पंगू कर दिए हैं यक्ष के प्रश्न
पहाड़ भी पनाह मांगता है
उसने शेषनाग को साध रखा है।


अन्य रचनाएं, लेख आदि पढ़ने के लिए राणा यशवंत के ब्लाग तक इस लिंक के जरिए पहुंच सकते हैं- www.ranayashwant.blogspot.com

वेज बोर्ड को मंजूरी पर मालिक चिल्लाए- चौथे स्तंभ पर संकट

एक खबर को दैनिक जागरण ने बिजनेस पेज पर आल एडिशन छापने को अनिर्वाय कर दिया था. इसके लिए आदेश जारी किया गया. और वह खबर छपी भी. खबर वेज बोर्ड लागू किए जाने के खिलाफ मालिकों के बयान पर आधारित है. कल के अखबार में यह खबर छपी. मालिकों ने वेज बोर्ड लागू किए जाने के कैबिनेट के फैसले पर चिंता जाहिर करते हुए इसे चौथे स्तंभ पर संकट बताया है.

सोचिए, ये मालिक लोग कैसे होते हैं. जब अपने कर्मियों को पैसे देने की बात आई तो चौथे स्तंभ पर संकट के बादल छा गए और जब पेड न्यूज करने-कराने को होता है तो चौथे स्तंभर पर संकट के बादल नहीं मंडराते. इस दोगलई की कोई सीमा है. लीजिए, पढ़िए, दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर-

चौथे स्तंभ पर संकट के बादल : आईएनएस

जेएनएन, नई दिल्ली : भारतीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं की प्रतिनिधि संस्था इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी (आइएनएस) ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी पर गहरी चिंता जाहिर की है। इस बोर्ड ने अखबारों और समाचार एजेंसियों के पत्रकार व गैर-पत्रकारीय कर्मचारियों के वेतनमानों में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया है। आइएनएस के प्रेसीडेंट आशीष बग्गा के मुताबिक प्रस्तावित वृद्धि को सहना फिलहाल मीडिया उद्योग के बस के बाहर है। इससे देश भर में ज्यादातर छोटे और मध्यम आकार के समाचार पत्र बंद हो जाएंगे। बग्गा ने आगाह किया कि बड़े प्रकाशनों को भी प्रस्तावित वृद्धि को लागू करने में भारी दिक्कत पेश आएगी। उन्होंने खेद जताया कि सरकार ने आइएनएस के उस आग्रह को भी तवज्जो नहीं दी, जिसमें वेतन बोर्ड की इस त्रुटिपूर्ण और एक पक्षीय रिपोर्ट पर पुनर्विचार करने को कहा गया था। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर खतरा मंडरा रहा है। मीडिया की पहचान अब तक स्वामित्व में बहुलता के कारण रही है। सरकार के फैसले से मीडिया की ताकत कुछ गिने-चुने हाथों में चली जाएगी। छंटनी और बेरोजगारी का दौर शुरू हो जाएगा। मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के साथ वर्किंग जर्नलिस्ट एंड अदर न्यूज पेपर एंप्लॉइज एंड मिसलेनियस प्रोविजंस एक्ट, 1955 को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन हैं। मंत्रिमंडल ने मंगलवार को वेतनबोर्ड की सिफारिशों को मंजूरी दी।

आज किरण को माफ़ करें, कल कनिमोझी को!

किरण बेदी कह रहीं हैं कि खुद को कष्ट देकर जो पैसे उन्होंने हवाई टिकटों से बचाए हैं, अब (पर्दाफ़ाश होने के बाद) वे वापिस कर देंगी. भाई लोग कह रहे हैं कि वे इंसान हैं और गलती चूंकि इंसान से हो ही सकती है और पैसे भी जब वे वापिस दे ही रहीं हैं तो किस्सा ख़त्म समझा जाना चाहिए. कुछ भाई लोगों को लगता है कि अब इसके बाद उनके इस बचत कर्मकांड के बारे में कुछ भी कहना अन्ना आन्दोलन को बदनाम करने की कोशिश है.

वाह, क्या तर्क है? अरे भई, अगर किरण बेदी इंसान हैं तो क्या राजा और कनिमोजी नहीं हैं? क्या फर्क है इनमें और उनमें? क्या कहेंगे आप अगर कल वो भी पैसे वापिस दे दें? उन दोनों ने तो माना भी नहीं है. न अदालत ने ही उन्हें दोषी ठहरा दिया है. किरण ने मान भी लिया कि हाँ, लिए थे पैसे ज़्यादा. बचाए भी थे. उनके ये कह देने से कि ट्रस्ट के लिए बचाए थे क्या उन्हें उनके अपराध से मुक्त कर देता है? क्या झूठ या हेराफेरी (या खुद को इकानामी क्लास में सफ़र करा कर) ट्रस्ट के लिए ही सही पैसे बटोरना कानूनी और नैतिक रूप से उचित है? जो फिर कहेंगे कि हाँ (जब दे ही रहीं हैं पैसे वापिस) तो उन्हें बता दें किसी भी अपरोक्ष तरीके से किसी के लिए भी धनसंचय करना है तो अपराध ही.

और फिर उनके खिलाफ उठने वाली कोई भी आवाज़, कोई भी सवाल या किसी के मन में आया कोई भी संशय अन्ना आन्दोलन की बदनामी कैसे है? क्या किरण बेदी ने ट्रस्ट अन्ना के लिए बनाया? ये यात्राएं उन के लिए कीं? या पूछा था अन्ना से कि ऐसे पैसे बचाऊँ या नहीं? …और क्या किरण बेदी गलत हों तो भी सही हैं क्योंकि वे अन्ना के साथ हैं? शायद यही वो कारण है कि किरन बेदी गलत भी हों तो उन्हें सही ठहराने या फिर उन्हें माफ़ कर देने की बातें तो कही ही जा रहीं हैं.

सच बात तो ये है कि आज किरण बेदी जैसे प्रकरणों पर कुछ भी कह पाना संभव या कहें कि एक तरह से खतरे से खाली नहीं रह गया है. हालात ये हो गए हो हैं कि पब्लिक परसेप्शन के खिलाफ कुछ लिखने, बोलने वाले की बोलती बंद की जा सकती है. जनता जब अंधभक्त हो कर अन्ना आन्दोलन के साथ थी तो सरकार की बोलती बंद थी. किसी भी मंत्री का घर घेर लेने के सुझाव थे. मनीष तिवारी को अपनी उस प्रेस कांफ्रेंस के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी जो निश्चित ही उन से खुद कांग्रेस ने करवाई होगी. यानी खुद कांग्रेस ने माफ़ी मांगी. इस लिए नहीं कि कांग्रेस या मनीष तिवारी के मन में एकाएक कोई बहुत बड़ी श्रद्धा या आस्था जाग पड़ी थी अन्ना या आन्दोलन के लिए. वो डर था. आज किरण बेदी डरी हुई हैं. क्योंकि हम सब डर के माहौल में जी रहे हैं. गौर से देखिये तो आप पाएंगे कि आन्दोलन के आजू बाजू एक तरह का आतंक उपजने लगा है. सरकार ने आन्दोलन, टीम के किसी सदस्य के खिलाफ कुछ बोला नहीं कि घेराव. अखबार ने कुछ छापा नहीं कि बहिष्कार. उधर खुद आन्दोलन से जुड़े लोग भी एक तरह की दहशत या कहीं कुछ भी हो सकने की आशंका के साथ जी रहे है. ये तो गनीमत है कि प्रशांत भूषन पे हमला करने वाले दूर दूर तक भी कांग्रेसी नहीं निकले. वरना बवाल खड़ा हो जाता. न सिर्फ अन्ना टीम की तरफ से, बल्कि विपक्षी पार्टियों की तरफ से भी.

हम सब जैसे बारूद के ढेर पे आ बैठे हैं. सच पूछिए मैं तो सुबह नहा धो के अपनी प्रभु साधना में सब से पहले सब से ज्यादा, अन्ना के स्वास्थ्य और लम्बी आयु की कामना करता हूँ. भगवान् करे उन्हें मेरी भी उमर लगे. लेकिन मैं डरता हूँ कि खुदा न खास्ता उन्हें कहीं स्वाभाविक रूप से भी कुछ हो गया तो आज के माहौल में एक छोटी सी भ्रान्ति भी देश को दावानल में झोंक देगी. मेरा आग्रह ये है कि हम भावना की बजाय तर्क की बात करें. तर्क की बात ये है कि भ्रष्टाचार बातों, कसमों या ह्रदय परिवर्तनों से भी ख़त्म नहीं होगा. कानून चाहिए. जिस देश में लोग अपनी खुद की हिफाज़त के लिए हेलमेट न पहनने के लिए भी बहाने ढूंढ लेते हों वहां कानून तो चाहिए. कैसा हो ये अलग बहस का विषय है. लेकिन वो अभी आया नहीं और अब रिकाल का अधिकार भी चाहिए. क्या आगे से आगे से बढ़ते नहीं जा रहे हम? जिस देश की आधी आबादी दस्तखत करना तक न जानती हो, उसे मालूम है कि अपने सांसद को क्यों वापिस बुलाने जा रही है वो? मान के चलिए कि अगर मिला तो रिकाल का अधिकार दिलाएंगे अन्ना, मगर उसका इस्तेमाल हर महीने करेंगे विरोधी नेता. और तब आप चला लेना इस देश में कोई संसद या लोकतंत्र. मुझे तो नहीं लगता कि बहुत पढ़े लिखे भी मेरी इस आशंका से सहमत होंगे. जो कभी पढ़ते ही नहीं, न जानते देश या लोकतंत्र के बारे में मतदान के दिन के अलावा वे क्या समझेंगे आज कि ये आन्दोलन या ये देश किधर की ओर अग्रसर है.

यकीनन इस देश में बेहतरी या किन्हीं अच्छे बदलावों के लिए कमर कसने वाले अरविन्द केजरीवालों की तारीफ़ और हिफाज़त की जानी चाहिए. लेकिन उनका भी फ़र्ज़ बनता है कि वे भोली भाली जनता को भावुक कर वो सब न करें जिसका कि जनादेश उन्हें नहीं मिला हुआ है. ये सही है उनकी बात कि संविधान के प्रिएम्बल में संविधान भारत की जनता में निहित होने की बात कही गई है. इस अर्थ में निश्चित रूप से संविधान और उसमें निहित संप्रभुता भारत की जनता को समर्पित है. ध्यान दें, जनता को! अन्ना, केजरीवाल, उनकी टीम या उनके लिए नारे लगाने वाली भीड़ को नहीं, जनता को! देश की सारी जनता को. माफ़ करेंगे ये महानुभाव. ये सारी जनता नहीं हैं. कल आपके साथ लाखों लोग आ के खड़े हो जाएँ किसी चाइना स्क्वेयर या तहरीक चौक की तरह. तो भी वो आन्दोलन तो हो सकता है. विद्रोह भी हो सकता है. जनता द्वारा परिभाषित, प्रत्याक्षित, निर्वाचित और इसी लिए संविधान सम्मत कोई नीति-निर्णय नहीं हो सकता. इस देश के अस्तित्व के लिए अगर लोकतंत्र ही श्रेष्ठ प्रणाली है औ उसके संविधान में किसी भी बदलाव के लिए प्रावधान और प्रक्रिया भी उसी के तहद अपनानी पड़ेगी. उसके लिए ज़रूरी है कि चिंतन, मनन और संवाद हो. और वो होना तो किसी आन्दोलन के साए में भी नहीं चाहिए. धमकियों के आतंक में  तो कतई नहीं होना चाहिए. मगर दुर्भाग्य से हो वही रहा है. असहनशीलता इसी लिए है. पलटवार भी इसी लिए है और चरित्रहनन भी इसी लिए.

इसी लिए ये और भी ज़रूरी है कि, आन्दोलन की सफलता की खातिर भी, किरण बेदियों का चरित्र और आचरण शक शुबह के दायरे से बाहर हो. गलत या सही, उन पे भी अब भरोसा उठा तो ये और भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा. अन्ना के ज़रिये जो देश हित और राष्ट्रीयता जो की भावना पैदा हुई है वो कमज़ोर होगी. ये नहीं होनी चाहिए. किसी भी कीमत पर. ऐसे में ज़रूरी है कि किरण बेदी के आचरण और ट्रस्ट के आय व्यय की पड़ताल हो. बेहतर है वे स्वयं इसकी मांग करें. उनको बचाने की कोई भी कोशिश या व्याख्या करना किसी को भी नैतिक रूप से कमज़ोर और कठघरे में खड़ा करेगा.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

मुसलमानों को गुमराह और सहारा को बदनाम कर रहे हैं बर्नी

नेशनल काउन्सिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू मीडिया में एक संगोष्ठी के दौरान सहारा उर्दू अखबार के संपादक, अजीज बर्नी ने जो कुछ भी कहा वह एक सफेद झूठ है. उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उनकी माफी जो सहारा उर्दू और हिन्दी अखबार में प्रकाशित किया गया था, वह उनके द्वारा नहीं लिखा गया था बल्कि यह सहारा के बड़े अधिकारी ने लिखा था. ऐसा कह कर वह मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी खोई छवि हासिल करने की कोशिश कर रहे, साथ ही सहारा को बदनाम करने की कोशिश भी.

वह किस तरह के जर्नलिस्ट हैं लोग अच्छी तरह से पहचान गए, अब कोई भी उनकी लेखनी पर भरोसा नहीं करता. वह पहले लिखते हैं और फिर खुद ही उसका खंडन करते हुए माफ़ी मांगते हैं. इस तरह वह उर्दू पाठकों को गुमराह भी करते रहे हैं, परन्तु अब किसी की भी रूचि उनकी लेखनी में नहीं रह गयी. और यही कारण है कि वह मुसलमानों को फिर से रिझाने के लिए झूठे बयान दे रहे हैं.

अगर अज़ीज़ बर्नी को मुंबई हमले की साजिश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी तो उन्हें उस मुद्दे पर किताब नहीं लिखनी चाहिए थी, और अगर उनके पास अपनी लेखनी का कोई आधार था तो फिर उन्हें माफ़ी नहीं मांगनी चाहिए थी, तथा अपने लेखों पर कायम रहना चाहिए था. परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और अपनी लेखनी की वजह से सहारा मीडिया के लिए भी विचित्र स्थिति पैदा कर दी थी, जिसके कारण बर्नी को एक महीने तक फोर्स्ड लीव पर भेज दिया गया था. अगर माफी उनकी नहीं थी, तो वो जब अपने काम पर वापस लौटे थे तो उन्होंने तब क्यों नहीं इसका स्पष्टीकरण अपने अखबार में छापा?

अब, उन्हें एहसास हुआ की लोगों की विशेषकर मुसलमानों की रूचि उनकी लेखनी में नहीं रह गयी तथा लोगों का उनपर एवं उनकी लेखनी पर से विश्वास उठ गया है तो उन्होंने दुबारा से लोगों को गुमराह करने के लिए झूठे दावे करना शुरू कर दिया. उन्हें यह सोचना चाहिए की वो आज जो कुछ भी हैं वो सिर्फ सहारा मीडिया की वजह से ही हैं, और उनकी निराधार लेखनी एवं बेतुके बयानों से सहारा की छवि पर भी दाग़ लगता है.

आये दिन बर्नी अपनी लेखनी से मुसलमानों के साथ-साथ सहारा समूह के लिए भी बदनामी मोल लेते रहते हैं. हाल के दिनों में भी अज़ीज़ बर्नी ने हैदराबाद की एक घटना को अपने अखबार के पहले पन्ने की सुर्खियाँ बना कर पेश किया एवं कुरान के फटे हुए पृष्ठ को अपने अख़बार के पहले पन्ने पर छाप कर उसका अपमान भी किया था, जिसे शुक्र है लोगों ने नज़र अंदाज़ कर दिया, वरना उनकी यह ग़लती तो माफ़ी के लायक भी नहीं है. इस तरह की पत्रकारिता देश और समाज को तोड़ने का प्रयास ही माना जाएगा, जो किसी भी हाल में भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश एवं सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है. अज़ीज़ बर्नी को अब यह बात मान लेना चाहिए की देश का मुसलमान अब उन्‍हें पूरी तरह पहचान चुका है, अतः वे अब उनके बहकावे में नहीं आएगा, चाहे वो लाख झूठे दावे कर लें या उन्हें बरगलाने की जितनी भी कोशिश कर लें.

सैयद असदर अली

वरिष्ट पत्रकार

नयी दिल्ली  

राष्‍ट्रीय सहारा पहुंचे कमलेश, टीवी100 से आसिफ-नीरज निकले

स्‍वतंत्र चेतना, गोरखपुर से कमलेश सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. कमलेश यहां क्राइम रिपोर्टर थे. वे बीच के कुछ माह को छोड़कर पिछले बारह सालों से स्‍वतंत्र चेतना को अपनी सेवाएं दे रहे थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी गोरखपुर में ही राष्‍ट्रीय सहारा से शुरू की है. इन्‍हें यहां भी क्राइम रिपोर्टर बनाया गया है. स्‍वतंत्र चेतना से ही करियर शुरू करने वाले कमलेश सिंह कुछ समय के लिए हिंदुस्‍तान के साथ भी जुड़े, परन्‍तु जल्‍द ही वापस स्‍वतंत्र चेतना लौट गए थे. कमलेश के जाने के बाद कुछ अन्‍य पत्रकार भी स्‍वतंत्र चेतना को झटका दे सकते हैं.

टीवी100 से आसिफ शेख एवं नीरज राठी ने इस्‍तीफा दे दिया है. आसिफ शेख एंकर एवं वीओ आर्टिस्‍ट थे. संभावना जताई जा रही है कि आसिफ चैनल वन से जुड़ सकते हैं. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. नीरज प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे तथा रन डाउन संभालते थे. नीरज फिलहाल नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं. बताया जा रहा है कि वे एक नवम्‍बर को वीओएन ज्‍वाइन करेंगे. दोनों लोगों के इस्‍तीफे की पुष्टि चैनल हेड राजीव पंछी ने की.

काली नहीं हुई लाइव इंडिया की दिवाली, सेलरी मिली

लाइव इंडिया 'लाइव' रहेगा कि नहीं, इसको लेकर संशय और रहस्‍य लगातार बरकरार है. दीप पर्व से एक दिन पहले सेलरी मिल जाने से यहां के कर्मचारियों की दिवाली काली होने से बच गई है. शूट बंद है. कर्मचारियों को पिक और ड्राप की सुविधा भी नहीं मिल रही है. किराए पर अपने साजो सामान, वाहन देने वाले अपने पैसे के लिए दवाब बनाए हुए हैं. वहीं लोगों का फोन ना उठाने तथा एसएमएस का जवाब ना देने वाले सुधीर चौधरी आफिस भले ही न आ रहे हों पर वे भी दीपावली धूमधड़ाके से मना रहे हैं. ऐसा उन्‍होंने खुद अपने ट्विटर पर लिख रखा है.

लाइव इंडिया के कर्मचारियों को पिछले दो महीनों से सेलरी नहीं मिली थी, जिससे यहां काम करने वाले कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दी थी. बताया जा रहा है कि इसके बाद प्रबंधन ने दीपावली से पहले सभी कर्मचारियों को सेलरी दे दिया है. पर सीईओ कम चैनल हेड सुधीर चौधरी के कदम को लेकर अनिश्‍चय की स्थिति बरकरार है. सुधीर चौधरी का रुटीन ब्रेक हो चुका है. वे न प्राइम टाइम पर टीवी में नजर आते हैं और न ही पहले जैसा कामधाम देख रहे हैं, और ना ही किसी का फोन उठा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि एचडीआईएल के पार्टनर अब इस चैनल को बेचने की दिशा में भी सोच रहे हैं. दबी जुबान से चैनल में वित्‍तीय अनियमितताओं की भी बात कही जा रही है. पर खुल कर कोई बोलने को तैयार नहीं है. कुछ मुद्दों को लेकर पार्टनरों के बीच मनमुटाव है.

चैनल में सेलरी भले ही मिल गई हो पर कर्मचारी बेचैन हैं. उन्‍हें चैनल का भविष्‍य समझ में नहीं आ रहा है. चैनल में शूटिंग बंद हो गई है. रिपोर्टर भी बाहर नहीं जा रहे हैं. रिपोर्टिंग के लिए गाडि़या नहीं हैं. बस जैसे-तैसे यहां वहां से फीड काटकर चैनल चलाया जा रहा है. वेंडर भी हैरान-परेशान हैं. उनके लाखों रुपये चैनल पर बकाया हैं. चैनल पर हर महीने करोड़ों रुपये फूंकने वाले एचडीआईएल प्रबंधन को न्यूज चैनल खोलने का कोई लाभ नहीं दिख रहा है. जिन सरकारी और गैर-सरकारी विभागों के उत्पीड़न-उगाही से एचडीआईएल प्रबंधन पहले से परेशान था, वहां से वे लोग आज भी परेशान है. उल्टे कई नए दुश्मन पैदा हो गए हैं. आमदनी चवन्‍नी भी नहीं है और खर्च रुपैया भर हो रहा है.

चैनल के कर्मचारियों की दिवाली तो काली होने से बच गई पर उनका अगला त्‍यौहार ठीक रहेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है. कर्मचारी दूसरे चैनलों में भी जगह तलाश रहे हैं. अपुष्‍ट खबरों में बताया जा रहा है कि खुद सुधीर चौधरी एक चैनल में अपनी इंट्री को लेकर बात कर रहे हैं. पर अभी उधर से कोई पॉजिटिव जवाब नहीं मिला है. लाइव इंडिया का क्‍या होगा इसको लेकर सस्‍पेंस लगातार बरकरार है.

बीबीसी बंद करेगा इन हाउस मैगजीन ‘एरियल’

बीबीसी अपने कास्‍ट कटिंग योजना के अंतर्गत साप्‍ताहिक इन हाउस मैगजीन 'एरियल' का प्रकाशन बंद करेगी. अब यह पत्रिका दिसम्‍बर से ऑनलाइन उपलब्‍ध रहेगी. बीबीसी वेबसाइट पर पोस्‍ट एक ब्‍लॉग में संपादक कैनडिडा वाटसन, जो खुद अपना पद खो चुके हैं, ने लिखा है कि बचत कटौती की जद में यह पत्रिका आ चुकी है.

बीबीसी एरियल का प्रकाशन पिछले 75 वर्षों से कर रहा था. यह इन हाउस पत्रिका बीबीसी के स्‍टाफ के लिए उनकी शिकायतों को आवाज देने का काम कर रही थी. खासकर इसका पत्र पेज पत्रकारों की समस्‍याओं, परेशानियों को सामने लाता था. बीबीसी ने घोषणा की है कि इस साप्‍ताहिक मैगजीन का आखिरी प्रकाशन इस साल दिसम्‍बर के लास्‍ट में होगा. उल्‍लेखनीय है कि बीबीसी ने इस मैगजीन के संपादक पद के लिए जुलाई 2009 में विज्ञापन निकाला था, जब एंड्रू हार्वे ने आठ साल इस पद पर रहने के बाद इस्‍तीफा दे दिया था. 

साहित्‍यकार डा. जगदीश पांडेय का निधन

पटना। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, बिहार संस्कृत संजीवन समाज और दशाधिक साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के अध्यक्ष डॉ. जगदीश पांडेय का सोमवार रात्रि 11 बजे एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। उनके निधन से संपूर्ण साहित्यिक जगत में शोक की लहर दौड़ गयी। उनके पार्थिव शरीर को राजेन्द्रनगर स्थित मनोरमा भवन में मंगलवार को दर्शनार्थ रखा गया था जहां दिन भर साहित्यकारों और संस्कृतकर्मियों का तांता लगा रहा। उनका अंतिम संस्कार वाराणसी में किया जाएगा।

डॉ. पांडेय इसी वर्ष लगातार चौथी बार बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गये थे। उनके कार्यकाल में सम्मेलन की गतिविधियों में काफी विस्तार हुआ। सोमवार रात 11 बजे ली अंतिम सांस ली। साभार : राष्‍ट्रीय सहारा

आगरा में गंदा हो गया है मीडिया का धंधा

: दिवाली में कइयों का निकाला दिवाला : आगरा में पत्रकारिता का हाल बहुत बुरा हो गया है। रहिमन तेरे देश में… जैसी हालत यहां के मीडिया में चल रही है। एक और जहां दिन प्रतिदिन आगरा के अंदर समाचार पत्रों की संख्‍या  बढ़ती जा रही हैं वहीं दूसरी ओर यहां की मीडिया के लोगों का स्‍तर भी गिरता जा रहा है। अपने अखबारों के लिए विज्ञापन जुटाने हेतु आगरा में पत्रकारों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गयी हैं जो कि दिन भर विज्ञापन पार्टियों के पास पड़ी रहती हैं।

वैसे भी आगरा के कई मीडिया संस्थान में तो स्‍पष्‍ट आदेश है कि अगर फील्ड में काम करना हैं तो आगरा के लालाओं के दरवाजों पर दरबार लगानी पड़ेगी, आगे आपकी मर्जी। इस खेल में वो अखबार भी शामिल हैं जो अपने आप को देश का नंबर एक, दो और तीन का अखबार बताते हैं। मामला मंगलवार का ही ताजातरीन हैं। आगरा के एक मशहूर उद्योगपति, जिनका नाम पूरन डावर हैं, डावर इंडस्ट्रीज़ का संचालन करते हैं। आगरा के दो बड़े पत्रकार, जो कि एक बड़े समाचार पत्र से ताल्लुक रखते हैं, आगरा के इस उद्योगपति के संस्थान डावर शूज पर पहुंचे और वहाँ से दिवाली का गिफ्ट लेने पहुँच गए, जबकि यह गिफ्ट पत्रकारों के लिए कोई अनिवार्य नहीं होता हैं।

इस मामले में सबसे बड़ी बात यह हैं कि आगरा में मीडिया की पोजिशन इतनी बुरी हो गयी हैं कि आगरा के पत्रकार इस तरह से त्‍यौहारी मांगने लगे हैं, जैसे कि किसी घर में साफ सफाई करने वाले, धोबी या अन्‍य कोई काम करने वाले परजुनिया लोग मांगते हैं। जैसे ये लोग घर घर डोलते हैं उसी तरह से आगरा के पत्रकार दीपावली के मौके पर आगरा के हर विधायक, मंत्री, अधिकारियों के यहां जाकर गिफ्ट की मांग करते हैं। सभी लोग इन पत्रकारों से त्रस्‍त हो गए हैं। इतना ही नहीं अभी हाल ही में आगरा में चार नए अखबार आने के लिए बेताब पड़े हैं, जाहिर हैं कि यह भीखमंगई और अधिक बढ़ेगी। जिस तरह की स्थिति दिवाली पर दिख रही है उससे यह तो तय है कि अब आगरा की मीडिया का भगवान ही मालिक है। जिस तरह का माहौल है उसमें यह कहना अतिश्‍योक्ति नहीं होगा कि आगरा में मीडिया का धंधा बाजारू औरत को भी पीछे छोड़ देगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

ईटीवी के चैनल प्रभारी सहित तीन जमानती वारंट से तलब

जयपुर। एसीजेएम (क्रम-आठ) अदालत ने पूर्व विधायक संयम लोढा के परिवाद पर प्रसंज्ञान लेते हुए ईटीवी न्यूज चैनल के प्रभारी जगदीश चन्द्र सहित तीन जनों को जमानती वारंट से तलब किया है। परिवाद में गलत खबरें प्रसारित कर पांच लाख रूपए मांगे जाने का आरोप लगाया गया है।

परिवाद में ईटीवी के जालौर संवाददाता हरिपाल सिंह व सिरोही की शिवगंज नगरपालिका के पार्षद अशोक कुमार को भी आरोपी बनाया गया है। इसमें कहा गया है कि आरोपियों ने परिवादी की प्रतिष्ठा को आघात पहंुचाने के लिए भय दिखाकर आपराधिक षड़यंत्र रचा।

परिवादी के खिलाफ पांच लाख रूपए के लिए गलत खबर प्रसारित की, जिसमें नगरपालिका अध्यक्ष व संयम लोढा के इशारे पर अतिक्रमण किए जाने की बात कही गई। इसके बाद 22 मई को अशोक व हरिपाल सिंह परिवादी के घर आए और उनसे पांच लाख रूपए मांगे। रूपए नहीं देने पर और खबरें चलाने की धमकी दी। परिवाद के साथ संयम लोढा ने एक सीडी भी पेश की है, जिसमें उनके खिलाफ प्रसारित खबर की रिकॉर्डिग है। साभार : पत्रिका

बड़े पत्रकार मनाएंगे दिवाली, स्ट्रिंगरों की रहेगी काली

: जनसंदेश चैनल, मौर्य टीवी, जीएनएन न्‍यूज, हमार टीवी, महुआ, आर्यन टीवी के कई स्ट्रिंगरों को नहीं मिला पेमेंट : केंद्र सरकार ने अखबार तथा एजेंसियों के पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को कुछ बदलाव के साथ मानकर दिवाली का तोहफा दिया है. पर स्ट्रिंगर के रूप में काम करने वाले पत्रकारों की कौन सुनेगा. जनसंदेश चैनल, मौर्य टीवी, महुआ न्‍यूज, जीएनएन न्‍यूज, हमार टीवी, आर्यन जैसे चैनलों को अपनी सेवा देने वाले अनेकों स्ट्रिंगरों को दिवाली पर बोनस मिलना तो दूर उनको मिलने वाला पेमेंट अब तक नहीं दिया गया है. नवदुनिया के पत्रकार भी प्रबंधन के रवैये दुखी हैं.

इन चैनलों के कई स्ट्रिंगरों ने ई-मेल भेजकर भड़ास4मीडिया को अपना दर्द भेजा है. हालांकि इन लोगों को बिना सेलरी वाली नौकरी जाने का भी डर है और इनके अनुरोध पर हम इन लोगों का नाम नहीं दे रहे हैं, पर इनके पत्र को प्रकाशित कर इनकी आवाज इन तथाकथित चैनलों के प्रबंधन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. जनसंदेश चैनल के स्ट्रिंगर ने अपने मेल में लिखा है कि जनसन्देश चैनल ने शायद इस बात की कसम खा रखी है कि स्ट्रिंगर से काम कराओ मगर पैसे के नाम पर सिर्फ आश्वासन देते रहो. पहले पुनीत कुमार ने करीब 17 महीने का पेमेन्ट एक साथ कराने के नाम पर काट-छांट कर कराने का आश्वासन देकर स्ट्रिंगरों को राजी कर लिया और पेमेन्ट सेटलमेण्ट के नाम पर आधा पैसा दे दिया गया. कहा गया कि शेष पैसा अगले 15 दिन में पूरा करा दिया जायेगा. फिर 1 दिन में तीन-तीन खबर मांगने लगे, पर पेमेंट आज तक नहीं दिया.

मार्च 2011 तक का पेमेन्ट सेटेलमेन्ट में जोडा गया, जिसका 50 हजार रुपये हुए उसका सेटेलमेन्ट कर दिया 10 हजार में. दिये 5000 और कहा कि 15 दिन में पूरा पैसा दे दिया जाएगा पर आज तक नहीं मिला. मार्च 2011 से अब तक के पेमेन्ट का तो कोई पता ही नहीं. असाइनमेंट से चैनल चलता रहे इस लिये प्रमोशन का लॉलीपाप देकर चैनल चलाया जा रहा है. यूपी के चुनाव को मिशन मानने वाले चैनल के लोग कब समझेंगे कि पैसा नही देंगे तो चुनाव में उनके नेताओं की गली मोहल्लों की सभा एसाइनमेंट तक कौन पहुंचायेगा, क्योंकि खबर इनको स्टार न्‍यूज, आजतक से भी पहले चहिये होती है.

मौर्य न्‍यूज यूपी को सेवाएं देने वाले स्ट्रिंगर लिखते हैं कि यशवंतजी, आपको यह पत्र भेज रहा हूँ ताकि यूपी के स्ट्रिंगरों का दर्द आप मौर्य टीवी प्रबंधन तक पहुंचा कर दीपावली पर हमारे दुःख को साझा कर सकें. हमारा नाम आप सार्वजानिक नहीं करेंगे इस विश्‍वास के साथ आपको बता रहा हूँ कि यूपी में अपना कदम बढ़ाने के लिए मौर्य टीवी ने पूरे प्रदेश में स्ट्रिंगर रखे. चैनल को पहचान और मुकाम दिलाने के लिए स्ट्रिंगरों ने न सिर्फ कड़ी मेहनत की बल्कि खबरें भी खूब भेजीं, लेकिन मौर्य टीवी ने खबरें चलायी तो जरूर लेकिन स्ट्रिंगरों को पारिश्रमिक देने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया. यूपी भर के स्ट्रिंगरों द्वारा एक साथ खबरें भेजना बंद करने पर प्रबंधन ने दीपावली से पहले तक पारिश्रमिक देने का आश्वासन दिया. अब दीपावली भी आ गयी लेकिन पैसा नहीं आया. मौर्य में काम करने वाले स्ट्रिंगर अब परेशान हैं कि बिना पैसे कैसे मनाये दिवाली. चैनल के मुखिया प्रकाश झा क्या नहीं जानते कि स्ट्रिंगरों की काली होती दीवाली पैसे की जरूरत पड़ती है. मौर्य टीवी से जुड़े स्ट्रिंगरों को पैसा कब मिलेगा? अभी कुछ नहीं पता है.

जीएनएन न्‍यूज के छत्‍तीसगढ़ के स्ट्रिंगर का कहना है कि जीएनएन न्‍यूज के लांचिंग से पहले से हमलोग इस चैनल से जुड़े हुए हैं. शुरू में सब ठीक रहा तो हम लोगों ने मन लगाकर काम किया, पर जब इस चैनल की लांचिंग हुई है तब से हमलोगों का पैसा चैनल प्रबंधन ने नहीं दिया है. पैसे के बारे में बात करने पर बस आश्‍वासन मिलता है कि इतने तारीख को दिया जाएगा, उतने तारीख को दिया जाएगा. हम इस मजबूरी में छोड़ नहीं रहे कि जितना दिन मेहनत किया कम से कम उतने दिन का पैसा तो मिल जाए. छत्‍तीसगढ़ के अलावा दूसरे प्रदेशों के कई स्ट्रिंगरों को भी इन्‍होंने पैसा नहीं दिया है. वैसे इसके पहले भी एक स्ट्रिंगर का मेल आने पर भड़ास4मीडिया ने कंसल्टिंग एडिटर अमिताभ भट्टाचार्य से संपर्क किया था तो उन्‍होंने कहा था कि सभी को दिवाली का गिफ्ट तथा पैसे भेजे जा रहे हैं, पर एक बार फिर मेल आने के बाद ऐसा लग रहा है कि प्रबंधन ने अभी तक सभी स्ट्रिंगरों का पैसा नहीं दिया है. 

इसी तरह से एक दो लाइन के मेल भेजकर हमार टीवी, आर्यन टीवी और महुआ के स्ट्रिंगरों ने कहा है कि उन्‍हें पेमेंट दिए जाने के आश्‍वासन तो दिए जा रहा है पर पेमेंट नहीं दिया जा रहा है. इन लोगों ने बताया कि इन्‍हें न्‍यूनतम दो महीने से लेकर अधिकतम आठ महीने तक का पेमेंट नहीं दिया गया है. दिवाली पर उम्‍मीद थी कि सभी चैनल पेमेंट कर रहे हैं तो हमारे चैनल भी हमारा बकाया दे देगा पर निराशा ही हाथ लगी है. नवदुनिया अखबार के पत्रकार ने पत्र भेजकर कहा है कि प्रबंधन कर्मचारियों का बोनस खा गया. ईएसआई कटौती की लिमिट पन्‍द्रह हजार सेलरी वालों की है और बोनस केवल दस हजार तक की सेलरी वाले कर्मचारियों को दिया गया.

यह तथ्‍य कई चैनलों के स्ट्रिंगरों द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित है. लिहाजा इसमें कुछ कमी-बेसी हो सकती है. इस संदर्भ में जिसको कुछ कहना है वो मेल भेजकर या नीचे कमेंट बाक्‍स में अपनी बात लिख सकता है.      

अखबारकर्मियों के धरने के सौ दिन पूरे, मीडिया जगत बेखबर

भारत के एक बड़े अखबार समूह के खिलाफ जारी धरने के 100 दिन 23 अक्टूबर, 2011 को पूरे हो गये। इस बीच धरना देते हुए छंटनीग्रस्त कर्मचारी और यूनियन के सहायक सचिव दिनेश कुमार सिंह की 10 सितम्बर, 2011 को उचित इलाज के बिना मौत हो चुकी है। कर्मचारी की मौत के बाद धरनार्थियों ने दिनेश की लाश के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना के फ्रेजर रोड स्थित कार्यालय के मुख्य द्वार पर रोषपूर्ण प्रदर्शन किया।

यूनियन की मांग है कि धरनारत मृतक कर्मचारी को स्वास्थ्य बीमा के बावजूद बीमा लाभ से रोकने वाली टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन को मुआवजे की भरपाई करनी होगी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पटना में कार्यरत अपने 44 अखबारकर्मियों को अचानक 20-25 वर्षों की स्थायी नौकरी से निकाल-बाहर कर सड़क पर फेंक दिया है, जिनके बकाये वेतन के भुगतान संबंधी याचिका पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय 31 अक्टूबर 2011 को फैसला सुनायेगी। छंटनीग्रस्त कर्मचारी 100 दिनों से टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना के फ्रेजर रोड स्थित मुख्य कार्यालय के सामने धरने पर बैठे हैं, पर बिहार के किसी मीडिया समूह के लिए यह प्रकाशन योग्य समाचार नहीं है। सरकारी दूरदर्शन, आकाशवाणी और कुछ स्थानीय चैनलों ने धरने की खबर को प्रसारित किया है। धरने पर बैठे सभी छंटनीग्रस्त कर्मचारी भूमिहीन और बेहद गरीब हैं। बिहार के बहुल मीडिया समूह ने जिस तरह से गरीब छंटनीग्रस्त अखबारी कर्मियों के 100 दिनों से जारी खबर को प्रकाशन से बाहर रखा है, इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि बिहार में गरीब और सताए हुए समाज की पत्रकारिता बंद हो चुकी है।

धरने, अनशन, जनांदोलनों की खबर को मीडिया समूह अब मुद्दे की बजाय खाद्य-पदार्थ की तरह देख रहे हैं। बावजूद मीडिया समूह से अपेक्षा की जाती है कि देश के किसी हिस्से में अगर न्यायोचित हकों के लिए धरना-आंदोलन चल रहा हो तो इसे समाचार का विषय बनाया जाये। प्रायोजित तरीके से पेश की गयी कथित आर्थिक मंदी के दौर में भारतीय समाचार चैनलों और अखबार समूहों ने दो वर्षों के अंतराल में 5 हजार से ज्यादा पत्रकारों की छंटनी कर दी थी। सभी छंटनी संविधान प्रदत्त भारतीय श्रम कानून की हिदायतों को धत्‍ता दिखाते हुए की गयी लेकिन हमारी जानकारी में किसी एक पत्रकार ने भी अपने हक के लिए अपने नियोक्ता के विरुद्ध श्रम न्यायालय में याचिका दायर नहीं की। मीडियाकर्मियों के साथ मीडिया स्वामियों की ज्यादती को समाचार का विषय नहीं बनानेवाला भारतीय मीडिया, देश के सबसे ताकतवर अखबार समूह टाइम्स ऑफ इंडिया की ज्यादती के सामने इस बार भी मौन हो गया है।

गौरतलब है कि टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इम्प्लॉइज यूनियन समाचार समूह से जुड़ा देश का छोटा होने के बावजूद सशक्त ट्रेड यूनियन है, जो 16 वर्षों से श्रम न्यायालय, पटना, पटना हाइकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। छंटनीग्रस्त सभी कर्मचारी वेज बोर्ड के तहत कार्यरत थे। जानकार मानते हैं, पत्रकारों ने जब से वेज बोर्ड की बजाय कांट्रैक्ट नौकरी स्वीकारी, तभी से ‘‘कांट्रैक्ट जर्नलिज्म’’ शुरू हो गया। मीडिया घरानों ने किस तरह वेज बोर्ड के पत्रकारों-गैर पत्रकारों को कांट्रैक्ट पर जाने के लिए मजबूर किया, इसके अलग-अलग किस्से हैं। आप ठीक से देखिए तो इस कांट्रैक्ट जर्नलिज्म ने पत्राकारिता के मेरूदंड को तोड़ दिया। संपादक-पत्रकार रीढ़हीन होंगे तो मीडिया घरानों को मनमर्जी से कौन रोकेगा। आप इस समय भारत में आर्थिक उदारवाद की 20वीं सालगिरह मना रहे हैं। इस उदारवाद को सबसे ज्यादा खतरा ट्रेड-यूनियनों से था। 1991 में उदारवाद आया। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ और 1995 में हिन्दी पट्टी के प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण का प्रकाशन टाइम्स समूह ने अचानक बंद कर दिया। अचानक अखबार बंद करने से 250 पत्रकारों, गैर-पत्रकारों की छंटनी हो गयी।

टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इम्प्लॉइज यूनियन के सचिव लाल रत्नाकर और बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने श्रम न्यायालय, पटना में नवभारत टाइम्स के प्रकाशन को बंद करने के विरुद्घ चुनौती दी। 2009 में श्रम न्यायालय ने नवभारत टाइम्स की बंदी को गैर कानूनी करार दिया। नवभारत टाइम्स बंद कर बेनेट कोलमेन कंपनी ने टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स में कार्यरत कर्मचारियों के भविष्य निधि कोष को डकारने की कोशिश की। टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इम्प्लॉइज यूनियन की पहल पर क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त, पटना ने पत्रकारों, गैर-पत्रकारों की भविष्य निधि डकारने के मामले पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली स्थित केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त से हस्तक्षेप का आग्रह किया। केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त ने बेनेट कोलमेन कम्पनी के विरुद्ध इस संदर्भ में दिल्ली हाइकोर्ट में अपील की। दिल्ली हाइकोर्ट ने अखबारकर्मियों के हित में फैसला सुनाते हुए नवभारत टाइम्स के सभी छंटनीग्रस्त पत्रकार, गैर-पत्रकार और टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना में कार्यरत कर्मियों के बकाये भविष्य निधि के भुगतान का निर्देश दिया।

टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इम्प्लॉइज यूनियन के सचिव लाल रत्नाकर टाइम्स ऑफ इंडिया पटना में उपसंपादक की नौकरी करते हुए कंपनी के दमन के विरुद्ध मुकदमेबाजी करें, यह कंपनी क्यों बरदाश्त करे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने 1999 में लाल रत्नाकर का पटना से पूर्णिया स्थानांतरण कर दिया। श्रम न्यायालय, पटना ने यूनियन के सचिव लाल रत्नाकर के स्थानांतरण को दुर्भावनापूर्ण करार दिया। श्रम विभाग ने इस आरोप में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के विरुद्ध सिविल कोर्ट में मुकदमा दर्ज कराया। पटना उच्च न्यायालय ने इस स्थानांतरण को विद्वेषपूर्ण और गैरकानूनी बताया। अब लाल रत्नाकर टाइम्स समूह की नौकरी के बजाय अदालत की सीढ़ियों पर यूनियन की नौकरी कर रहे हैं। हिन्दी अखबार नवभारत टाइम्स के छंटनीग्रस्त पत्रकारों को न्याय दिलाने के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया में कार्यरत पत्रकार लाल रत्नाकर के त्याग का संघर्ष एक अखबारी यूनियन को हर हाल में बचाने का हठयोग है, जिसे कहीं दर्ज नहीं किया गया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया का पटना संस्करण 15 जुलाई 2011 को कुम्हरार स्थित टाइम्स समूह के प्रिंटिंग प्रेस में ही छपा था। 16 जुलाई का टाइम्स ऑफ इंडिया, टाइम्स हाउस के निजी प्रिंटिंग प्रेस की बजाय प्रभात खबर के प्रिंटिंग प्रेस से क्यों छपने लगा? अखबार समूह ने अचानक प्रिंटिंग प्रेस बंद करने की इजाजत बिहार सरकार से क्यों नहीं ली? जाहिर है कि टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इम्प्लॉइज यूनियन अपने कामगारों को न्यायमूर्ति मनीसाना वेज बोर्ड के द्वारा तयशुदा वेतन दिलाने की लड़ाई श्रम न्यायालय, पटना से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ रहा है। प्रबंधन वेज बोर्ड के अंतर्गत कार्यरत पत्रकारों, गैर-पत्रकारों को यह कहकर मनीसाना वेतनमान देने से इनकार करती रही कि टाइम्स समूह के ढांचे में बेनेट कोलमेन, टाइम्स पब्लिसिंग हाउस, एक्सेल पब्लिशिंग और पर्ल प्रिंट वेल लिमिटेड नामक चार अलग-अलग कंपनियां हैं और बेनेट कोलमेन के अलावा अन्य किसी कंपनी पर मनीसाना का वेज बोर्ड लागू नहीं हो सकता है। पटना हाइकोर्ट में न्यायमूर्ति अखिलेश चंद्र ने प्रबंधन के दावे को पूरी तरह निराधर बताया। अब पटना के टाइम्स कर्मियों को मनीसाना वेज बोर्ड के बकाये वेतन के साथ-साथ मजीठिया वेतन आयोग से तयशुदा वेतनमान की उम्मीद जगी।

पटना के टाइम्स यूनियन के मामले में एस.एल.पी. (क्रिमिनल)-10134/2010, 1884/2011, 1956/2011 और 1957/2011 सभी मुकदमों की एक साथ सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने 5 जनवरी 2011 को यथास्थिति बनाये रखने का निर्देश देते हुए सापफ कहा था- ‘‘इश्यू नोटिस, स्टेटस को, ऐज ऑफ टुडे, शैल बी मेन्टेन्ड’’। यूनियन की ओर से बकाये वेतनमान की वसूली के लिए दायर याचिका एस.एल.पी. (सिविल) 34045/2009 के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश है- ‘‘पोस्ट फॉर फाइनल डिस्पोजल’’। यह निर्णय 31 अक्टूबर 2011 को सुनाया जायेगा। ऐसी स्थिति में टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट के द्वारा यथास्थिति बनाये रखने के निर्देश की अनदेखी कर माननीय सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की है। इंडस्ट्रीयल डिस्प्यूट एक्ट का प्रावधान है कि न्यायिक विवाद के दौर में सेवा शर्तों में किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में कॉरपोरेट सेक्टर के सभी कार्य राष्ट्रीय कानून के तहत निर्धरित होते हैं। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन ने अपने कार्यरत कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक सेवामुक्त करने का अधिकार कहां से प्राप्त कर लिया? क्या मनीसाना आयोग का बकाया वेतन और मजीठिया आयोग वेज बोर्ड के लाभ से रोकने के लिए यह रास्ता न्यायपूर्ण है कि अपने कर्मियों को धक्‍का मारकर सड़क पर फेंक दो।

16 जुलाई 2011 को पटना के कुम्हरार स्थित टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रिंटिंग प्रेस पर अचानक तालाबंदी और 44 कर्मचारियों की सेवा मुक्ति की खबर इंदौर में प्रभाष जोशी को समर्पित भाषायी पत्रकारिता महोत्सव तक पहुंची तो संघर्षरत टाइम्स कर्मियों के समर्थन में तत्काल एक प्रस्ताव पारित किया गया। भाषायी पत्राकारिता महोत्सव की ओर से वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय और अरविन्द मोहन का हस्ताक्षर युक्त प्रस्ताव बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास भेजा गया। धरनारत अखबारकर्मियों ने 27 जुलाई, 2011 को धरना स्थल के सामने से गुजर रहे मुख्यमंत्री से अपना दुखड़ा सुनाने की योजना बनायी। शांतिपूर्ण धरना दे रहे अखबारकर्मियों को पटना पुलिस ने वज्रवाहन और पुलिस बल की ताकत से सख्त घेरेबंदी कर दी। धरनार्थियों को पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने चेतावनी दी, मुख्यमंत्री के सामने खबरदार कोई मुख नहीं खोल सकता है। धरना दे रहे छंटनीग्रस्त बताते हैं कि वजीरे-आला-बिहार ने उनकी तरपफ देखने से बेहतर सामने से गुजरते हुए अखबार से अपना मुख ढंक लिया था। (सब जानते हैं, वजीरे-आला का सबसे पसंदीदा अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इण्डिया ही है।)

धरनार्थियों में चंदू झा, प्रेम सिंह और राकेश सिंह पटना आर्ट कॉलेज से बी.एफ.ए. उत्तीर्ण आर्टिस्ट हैं। ये छंटनीग्रस्त कलाकारकर्मी धरना स्थल पर टाइम्स प्रबंधन के खिलाफ चित्रांकन कर रहे हैं। यह धरना राजनीतिक नहीं, अखबारी है पर इस धरने के समर्थन में पटना के नामचीन अखबारनवीस अपनी कोई राय व्यक्त करने से बच रहे हैं। इस धरने ने स्पष्ट कर दिया है कि बिहार के पत्रकार साम्यवादी, समाजवादी, गांधीवादी कुछ भी नहीं, सिर्फ वेतनवादी-कंपनीवादी हैं। एक अखबार में काम करने वाले दूसरे अखबार से हटाये गये कर्मियों के बारे में लिखने-बोलने या समर्थन करने से इसलिए भी बच रहे हैं कि कहीं उनका प्रबंधन बुरा न मान जाये। राज्यसत्ता के चुप रहने से भी सत्तापरस्त पत्रकारिता के सूत्रधार अपनी कोई भूमिका नहीं ले पाये। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेघा पाटकर ने टाइम्स कर्मियों के संघर्ष को जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम.) का समर्थन भेजा है। टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इम्प्लॉइज यूनियन के अध्यक्ष अरुण कुमार भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य भी हैं। यूनियन के अध्यक्ष अरुण कुमार और सचिव लाल रत्नाकर माननीय सुप्रीम कोर्ट के संभावित न्याय-निर्णय की प्रत्याशा में अहिंसात्मक-शांतिपूर्ण धरना अंतिम विकल्प मानते हैं। इधर श्रम न्यायालय, पटना ने प्रिंटिंग प्रेस बंद करने की कारवाई को श्रम कानून का उल्लंघन मानते हुए टाइम्स प्रबंधन को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। 31 अक्टूबर, 2011 को माननीय सुप्रीम कोर्ट का इस संदर्भ में सुनाया जाने वाला फैसला मीडिया उद्योग के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा।

लेखक पुष्पराज जनांदोलनों के पत्रकार हैं तथा नंदीग्राम डायरी का लेखन करते हैं.

NUJ (I) welcomes Government decision on Wage Board

New Delhi: October 25: The National Union of Journalists (India) today welcomed the Government decision to accept the recommendations of the Justice Majithia Wage Boards on the emoluments of working journalists and non-journalists in the newspapers and news agencies.

In a statement, issued in New Delhi today, the NUJ (I) president Pragyananda Choudhury and Secretary General Ras Bihari said they welcome the Government decision accepting the recommendations of the Majithia Wage Boards but at the same time regret the long delay of ten months in government coming to a decision after the recommendations were received on December 31, 2010.

We also congratulate the Confederation of Newspaper Employees Unions and its General Secretary M.S. Yadav for the relentless effort put in along with the NUJ (I) and other constituent unions to bring the Boards into existence and successfully conclude their work and then get the Government to adopt the recommendations, they said in the statement.

The statement further said the newspaper/news agency employees  displayed exemplary unity of purpose and readiness to sacrifice for the cause of getting the Wage Boards function, recommend and get the government notify the recommendations. This solidarity would further strengthen the trade union movement among the newspaper/news agency employees under the leadership of the Confederation.

The NUJ (I) would wait for the Government notification on the issue before giving its detailed response to the long delayed step raising the emoluments of the employees, working journalists and non-journalists alike that has come, it is recalled, 13 long years after the last revision.

Ras Bihari
Secretary-General                                                                                       
Pragyananad Choudhary
President

पत्रकारों को तोहफा : मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशें मंजूर

नई दिल्ली : सरकार ने समाचार पत्रों एवं समाचार एंजेसियों के पत्रकारों एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों को आज दिवाली का तोहफा देते हुये उनके लिये गठित मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को आज कुछ बदलावों के साथ मंजूर कर लिया जिससे उनके मूल वेतन में 30 प्रतिशत बढोतरी का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खडगे ने यहां मंत्रिमंडल की बैठक के बाद बताया कि यह फैसला वेतन बोर्ड को लेकर उच्चतम न्यायालय के फैसले पर निर्भर करेगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने संवाददाताओं को बताया कि ये सिफारिशें एक जुलाई 2010 से लागू होगीं। लेकिन परिवहन और मकान किराया भत्तों का भुगतान अधिसूचना जारी होने के दिन से ही किया जाएगा।

श्री खडगे ने सरकार के इस फैसले को पत्रकारों के लिये दिवाली का तोहफा बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्ताव को जल्द से जल्द अधिसूचना के लिये विधि मंत्रालय के पास भेजा जायेगा। इस फैसले से समाचार पत्रों एवं समाचार समितियों के करीब 45 हजार कर्मचारियों को फायदा मिलेगा। पत्रकारों एवं गैर-पत्रकारों के लिए वेतन बोर्ड का गठन मई 2007 में हुआ था और बोर्ड ने 31 दिसंबर 2010 को अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप दी थी।

कोलकाता के हिंदी पत्रकारों की स्थिति खराब, खून पी रहा दैनिक जागरण

कोलकाता में हिंदी पत्रकारिता वैसे ही दुर्दिन में चल रही है, उस पर खुद को देश का नंबर एक अखबार बताने वाले दैनिक जागरण की हालत भी खराब हो गई है. जनसेवा के नाम पर पत्रकारिता की दुकानदारी चलाने वाला जागरण अब अपने पत्रकारों को ठीक से वेतन भी नहीं दे रहा है. पहले ही यहां के पत्रकारों से कम वेतन पर काम करवाया जा रहा है. दूसरे कुछ पत्रकारों को अपना तनख्‍वाह बाजार से ही उठाने का निर्देश दे दिया गया है. यानी विज्ञापन से लाओ चाहे मार्केट से किसी को ब्‍लैकमेल करके के उठाओ इससे जागरण को कोई मतलब नहीं है. 

कोलकाता में दैनिक जागरण समेत हिंदी के पत्रकारों की इस दशा को देखने वाला कोई नहीं रह गया है. कोलकाता प्रेस क्‍लब में भी हिंदी के पत्रकारों को वैसे ही दूसरे दर्जे की मान्‍यता प्राप्‍त है. बड़े-बड़े हौसले और आश्‍वासन देने वाले यहां आते जरूर हैं, मगर हिंदी की गर्दन पर कुर्सी रखकर बैठे कुछ दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं, जिसके कारण हिंदी के पत्रकारों को न तो ढंग के पैसे मिल पाते हैं और ना ही वो सम्‍मान, जिसके वे हकदार होते हैं. यहां सिर्फ कुछ मठाधीश अपनी दुकानदारी चलाए जा रहे हैं. कोलकाता में जन्‍मी पत्रकारिता कब मर गई पता ही नहीं चला! अब तो हिंदी के पत्रकारों की दशा बहुत बुरी है, खासकर दैनिक जागरण के पत्रकारों की. पत्रकार भुखमरी के कगार पर हैं, अगर कोई बचा सकता है तो बचा ले. हालांकि इसके आसार दूर दूर तक नजर नहीं आ रहे. यहां संवाददाताओं और बंधुआ मजदूरों में कोई ज्‍यादा अंतर नहीं है. नाम स्ट्रिंगर, काम पूरा और वेतन, मत पूछिए हुजूर यह अंदर की बात है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गये पत्र पर आधारित.  

मीडिया में जाने के दो ही रास्‍ते, जुगाड़ या फिर मोटी रकम वसूलने वाले मीडिया स्‍कूल

आदरणीय महोदय, मैंने अपने एक पत्रकार मित्र से आपके पोर्टल के बारे में लगभग एक साल पहले सुना और तब से घर रहने पर प्रतिदिन मैं इस पोर्टल को जरुर देखता हूँ. इस पोर्टल पर विज्ञापित कई समाचार पत्रों और चैनलों में रिपोर्टर के लिए आवेदन भी किया, किन्तु कहीं से कोई जवाब नहीं आया. यहाँ तक कि मैंने अपना रिज्यूमे आपको भी भेज कर आपसे सहायता की अपील की थी.

महोदय, मुझे ऐसा लगता है कि आज के समय में मीडिया में जाने के लिए दो ही रास्ते हैं. एक यह क़ि आपका जुगाड़ हो या दूसरा यह क़ि मीडिया घरानों द्वारा अवैध ढंग से खुलेआम चलाये जा रहे मीडिया संस्थानों में प्रवेश लेकर फीस के रूप में मोटी रकम देकर. देश के तमाम विश्वविद्यालयों द्वारा चलाये जा रहे पत्रकारिता कोर्सों को करने के अलावा पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव रखने का कोई मतलब नहीं रह गया है, यदि इन दोनों में से कोई एक आपके पास नहीं है. आश्चर्य है क़ि मीडिया घरानों द्वारा चलाये जा रहे प्रशिक्षण संस्थानों के कोई कोर्स मान्यता प्राप्त नहीं है फिर भी इनकी दुकानदारी धड़ल्‍ले से चल रही है, न तो सरकार क़ी हिम्मत है क़ि इनसे पूछ-ताछ कर सके. दूसरे समाचार पत्रों तथा चैनलों के लिए तो ये कोई खबर ही नहीं हो सकती क्योंकि यह तो बिरादरी क़ी बात है.

सुधीर कुमार

पडरौना

sd.sudhirkumar@gmail.com

दैनिक पहुना और क्रांतिकारी संकेत में खुली जंग, एक दूसरे के कर्मचारी को तोड़ने की कोशिश

छत्‍तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के दो स्थानीय अखबारों के बीच प्रतिस्पर्धा अब जंग में तब्‍दील हो चुकी है। हाल में शुरू हुए दो रंगीन अखबार 'दैनिक पहुना' और 'क्रांतिकारी संकेत' में एक दूसरे को पीछे धकेलने की होड़ लगी हुई है। इससे पत्रकारों की भी बल्‍ले-बल्‍ले है। दोनों अखबारों के मालिक एक दूसरे के कर्मचारियों को तोड़कर अपने साथ शामिल करने की कोशिश में सारी हदें पार करने पर तुले हैं। इससे बड़े बैनर के अखबार के कर्मचारी भी अब अछूते नहीं रहे हैं।

,क्रांतिकारी संकेत ने जब अपने रिलांचिंग के होर्डिंग्‍स लगाए तब दैनिक पहुना ने मैदान में पहले आगाज कर उससे आगे निकलने में सफलता अर्जित कर ली। इसके बाद क्रांतिकारी संकेत के कई कर्मचारी भी दैनिक पहुना जा पहुंचे, जिसके चलते क्रांतिकारी संकेत को लांच होने में काफी ज्‍यादा वक्‍त लग गया। अब यही प्रतिस्‍पर्धा इन दोनों के बीच जंग के रूप में तब्‍दील हो चुकी है। दोनों अखबार एक दूसरे पर हावी होने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। दैनिक पहुंना के एक मात्र पंज कंपोजर को तोड़ने के लिए क्रांतिकारी संकेत ने मुंहमांगी तनख्‍वाह देने की भी पेशकश की है। वहीं तल्‍ख मिजाज के दैनिक पहुना के प्रधान संपादक ने भी क्रांतिकारी की लुटिया डूबोने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं, मुकाबला रोमांचक है.. देखना है कि आगे और क्‍या-क्‍या होता है।

राजनांदगांव से विक्रम बाजपेयी की रिपोर्ट.

मीडिया एक्‍शन फोरम के संयुक्‍त सचिव बने दीपाली भारद्वाज और तनेराज सिंह

राजस्थान मीडिया एक्‍शन फोरम के प्रदेश संयुक्त सचिव के पद पर जोधपुर की पत्रकार दीपाली भारद्वाज और बाड़मेर के तनेराज सिंह को नियुक्त किया गया है। राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम की महासचिव शकुन्तला सरूपरिया ने बताया कि फोरम के अध्यक्ष अनिल सक्सेना ने प्रदेश के संयुक्त सचिव पद पर अभियान राजस्थान अखबार जोधपुर की प्रबंध संपादक दीपाली भारद्वाज और दैनिक मरू पत्रिका बाड़मेर के संपादक तनेराज सिंह को नियुक्त किया है।

उन्होंने बताया कि शीघ्र ही प्रदेश के सभी जिलों के जिला अध्यक्षों की घोषणा की जाएगी। साथ ही प्रदेश में होने वाले मीडिया एक्‍शन फोरम के कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी। उल्लेखनीय है कि दीपाली पूर्व में एचबीसी न्यूज चैनल के साथ जुड़कर कार्य कर रही थी और तनेराज सिंह पूर्व में कई वर्षों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़कर पत्रकारिता कर रहे थे। वर्तमान में दोनों  संपादन का कार्य कर रहे हैं।

अजीज बर्नी ने कहा संघ से उन्‍होंने नहीं मांगी माफी, उपेंद्र राय ने लिखा था माफीनामा

: जस्टिस काटजू की उपस्थिति में भिड़े उर्दू के दिग्‍गज पत्रकार : रविवार को नेशनल काउन्सिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू ने मीडिया में मुसलमानों की इमेज के बारे एक संगोष्ठी का आयोजन किया था. इसकी अध्यक्षता प्रेस क्‍लब ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मारकंडेय काटजू कर रहे थे. संगोष्ठी में उस समय बवाल हो गया जब डेली जदीद मेल के संपादक ज़फर आगा ने सभा में उपस्थित उर्दू सहारा के संपादक अज़ीज़ बर्नी की इस बात के लिए प्रशंसा करना शुरू कर दी कि वह मुस्लिमों के लिए अपने अखबार के द्वारा बहुत कुछ कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि मुस्लिमों का अपना अखबार न होने के कारण सारी कठिनाई है. उन्होंने सहाराश्री की तारीफ़ करते हुए मिड डे ग्रुप के मालिकों पर हमला कर दिया और कहा कि उन्होंने मुसलमानों के एक बड़े अखबार को जागरण समूह के हाथ बेच कर बड़ा ग़लत काम किया. इस पर वहां उपस्थित दैनिक इन्‍कलाब के संपादक शकील शम्सी भड़क गए और उन्होंने ज़फर आगा को बीच में ही टोक दिया. उन्होंने कहा कि आगा इस प्रकार की बात दुर्भावना और व्यक्तिगत स्‍वार्थों के लिए कर रहे हैं. इस पर आयोजकों को हस्‍तक्षेप करना पड़ा और उन्हों ने ज़फर आगा से कहा कि वह इस प्रकार की बात न करें.

इसी मामले पर बोलते हुए उर्दू दैनिक हमारा समाज के संपादक खालिद अनवर ने कहा कि ज़फर आगा किस मुंह से सहारा ग्रुप की तारीफ कर रहे हैं. इसी सहारा ग्रुप ने श्री बर्नी को इस बात के लिए मजबूर किया था कि वह संघ से माफ़ी मांगें. इस प्रकार सहारा ने उर्दू के इतने बड़े संपादक को ज़लील किया था. इस पर श्री बर्नी ने कहा कि उन्हों ने कभी माफ़ी नहीं मांगी और सहारा के प्रथम पृष्‍ठ पर जो माफ़ीनामा छपा उस को शकील शम्सी ने उस समय लिखा था, जब वह सहारा उर्दू में कार्य करते थे. इस पर श्री शम्सी ने कहा कि अब वह सहारा में नहीं हैं इस लिए कुछ बोलना उचित नहीं है, लेकिन यहाँ पर इतने पत्रकार मौजूद हैं इसलिए मैं बताना चाहूँगा कि जिस समय श्री बर्नी को श्री उपेन्द्र राय ने फ़ोर्स लीव पर भेज कर उन्हें उर्दू सहारा का चार्ज दिया था, तब उपेन्द्र राय के कार्यालय से ही वह माफ़ीनामा इस निर्देश के साथ उर्दू विभाग भेजा गया था कि इस को बिना किसी परिवर्तन के पहले पेज पर छापा जाये.

श्री शम्सी ने कहा कि उन्होंने फ़ोन पर यह माफ़ीनामा श्री बर्नी को पढ़ कर सुनाया था और श्री बर्नी ने उसे सुन कर एक छोटा सा परिवर्तन बताया था, जिसे उपेन्द्र राय ने नामंज़ूर कर दिया और चूँकि उपेन्द्र राय श्री बर्नी से बड़े अधिकारी थे इस लिए उन का फैसला आखिरी और सर्वमान्य था. इस लिए माफ़ीनामा उसी रूप में छापा गया जिस रूप में वह प्राप्त हुआ था. श्री बर्नी द्वारा उपेन्द्र राय के सहारा में किनारे कर दिए जाने के बाद इस प्रकार का बयान दिए जाने से लग रहा है कि सहारा परिवार ने अब सारी कवायद का ठीकरा उपेन्द्र राय के सिर पर फोड़ना शुरू कर  दिया है. उधर उर्दू अख़बार पढ़ने वाले लोग पूछ रहे हैं कि यदि श्री बर्नी का माफ़ीनामा गलत था तो वह अपने अखबार में उस का खंडन क्यों नहीं कर रहे हैं? लोगों का मानना है कि श्री बर्नी उर्दू पाठकों में फिर से लोक प्रिय होने के लिए अब संघ के सामने पेश किये गए माफ़ीनामे से इनकार कर रहे हैं. अब जवाब स्‍वतंत्र मिश्र को देना है कि वह माफ़ीनामा झूठा था या सहारा परिवार की मंज़ूरी उस को प्राप्त थी?

लखनऊ फिल्‍मोत्‍सव में दिखा स्त्रियों का प्रतिरोध संघर्ष

जन संस्कृति मंच के तत्वावधान में आयोजित चौथा लखनऊ फिल्म समारोह 21 अक्टूबर की शाम उप्र संगीत नाटक अकादमी के वाल्मीकि रंगशाला, लखनऊ में शुरू हुआ और 23 अक्टूबर तक चला। इस बार के लखनऊ फिल्म समारोह की मुख्य थीम ‘स्त्री संघर्ष और कला’ थी। फिल्म फेस्टिवल महिलाओं के संघर्ष पर बनी फिल्मों पर केन्द्रित रहा। फेस्टिवल में फिल्मों का चयन भी इसी थीम पर किया गया। फिल्म फेस्टिवल में महिला फिल्मकारों की फिल्मों को खास तौर पर शामिल किया गया था ताकि सिनेमा में महिला फिल्मकारों के योगदान को अलग से रेखांकित किया जा सके।

इस फिल्म समारोह का उदघाटन प्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा पूंजी के बाजार में जनसंघर्षों से जुड़कर जनता की आवाज को मुखरित करने का प्रयास है। सिनेमा एक कठिन लेकिन ताकतवर माध्यम है। दुर्भाग्य है कि हिन्दी पट्टी में सिनेमा की तकनीक, कला पर गंभीर काम नहीं हुआ। उन्होंने डाक्यूमेंट्री और टेली फिल्म निर्माण के अनुभव को साझा करते हुए कहा कि फिल्म सभी तरह की कलाओं का सामंजस्य है और यह गहन संवेदना के साथ हमारे जीवन में उतरता है।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे कवि व फिल्म समीक्षक अजय कुमार ने कहा कि फिल्म कला का सबसे ज्यादा इस्तेमाल शासक और शोषक वर्ग ने किया है। इन्होंने इसे जनता के प्रतिरोध को कुंद करने का माध्यम बनाया। प्रतिरोध का सिनेमा समाज, देश को बदलने के लिए चल रहे संघर्ष का आईना है। इस आंदोलन को तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है।

जन संस्कृति मंच ‘द ग्रुप’ के संयोजक संजय जोशी ने प्रतिरोध के सिनेमा की यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि लखनऊ का यह फेस्टिवल हमारा 20वां आयोजन है। पिछले छह वर्ष की यह यात्रा हमने जनता के सहयोग से पूरी की है। प्रतिरोध का सिनेमा, आवारा पूंजी, कारपोरेट पूंजी के दम पर बन रहे सिनेमा और उसको दिखाने के तंत्र का जनता के सहयोग से दिया जाने वाला जवाब है। संचालन करते हुए जसम लखनऊ के संयोजक कवि कौशल किशोर ने कहा कि सिनेमा के जरिए प्रतिरोध संघर्ष की आवाज को हम मुखरित कर रहे हैं। हमारा यह प्रयास जनता के संघर्ष के साथ जुड़ा हुआ है।

जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष व प्रसिद्ध नाटककार गुरुशरण सिंह, जसम के संस्थापक सदस्य, कथाकार व कला समीक्षक अनिल सिन्हा और प्रख्यात फिल्मकार मणि कौल की स्मृति में आयोजित इस फेस्टिवल के शुभारंभ के पहले हाल में दिवंगत गुरुशरण सिंह, अनिल सिन्हा, मणि कौल, रामदयाल मुंडा, एम एफ हुसैन, बादल सरकार, कमला प्रसाद, चन्द्रबली सिंह, कुबेर दत्त और गजल गायक जगजीत सिंह को दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

फेस्टिवल में कवि भगवान स्वरूप कटियार द्वारा संपादित जसम फिल्मोत्सव-2011 स्मारिका का लोकार्पण भी किया गया। स्मारिका में फेस्टिवल के दौरान दिखाई जाने वाली फिल्मों का सारांश व परिचय तो दिया ही गया है साथ ही ‘ईरानी फिल्मों में औरत’, गुरुशरण सिंह का भाषण, अनिल सिन्हा व मणि कौल पर लेख भी शामिल किए गए हैं। प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा संयोजित चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई। प्रदर्शनी में प्रख्यात जनवादी चित्रकारों चित्त प्रसाद, जैनुल आबदीन और सोमनाथ होड़ के 21 प्रतिनिधि चित्रों को प्रदर्शित किया गया। गोरखपुर पिफल्म सोसाइटी और लेनिन पुस्तक केन्द्र द्वारा पुस्तकों व डाक्यूमेंट्री फिल्मों की प्रदर्शनी भी लगाई गई।

संकल्प, बलिया का गायन व रंग प्रस्तुति : जसम की सहयोगी सांस्कृतिक संस्था, बलिया की संकल्प ने क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की कविता ‘समझदारों का गीत’, उदय प्रकाश की कविता ‘बचाओ’, अदम गोंडवी की कविता ‘चमारों की गली’ और निर्मल पुतुल की कविता की शानदार रंग प्रस्तुति की। इसके अलावा संस्था ने भिखारी ठाकुर की अमर कृति विदेशिया नाटक के कई गीत भी गाए। संकल्प की इन प्रस्तुतियों कों दर्शकों ने काफी पसंद किया। आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में इन कार्यक्रमों में संकल्प के दस रंगकर्मियों ने हिस्सा लिया।

फीचर फिल्मों में दिखा पुरुषवादी सत्‍ता के विरुद्ध स्त्रियों का संघर्ष : फेस्टिवल के पहले दिन के अंतिम सत्र में ईरान के मशहूर फिल्मकार जफर पनाही की फिल्म ‘आफ साइड’ दिखाई गई। यह फिल्म ईरान में महिलाओं के फुटबाल मैच देखने की पृष्ठभूमि पर बनी है। कुछ लड़कियां पाबंदी के बावजूद विश्वकप क्वालीफाइंग के लिए ईरान और बहरीन के बीच हो रहे मैच को देखने चली जाती हैं। उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के लिए पुरुषों का कपड़ा पहन लिया है। इसके बावजूद वे पकड़ी जाती हैं और उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया जाता है। निगरानी कर रहे सिपाहियों से लड़कियों की डिवेट होती है और सिपाही उनके पक्ष में हो जाते हैं। वे उन्हें मैच का आखों देखा सुनाने लगते हैं। जफर पनाही इस फिल्म के जरिए ईरान की पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था पर चोट करते हैं। साथ ही किरदारों के माध्यम से संघर्ष के निर्णायक दौर में लोगों का सत्ता के खिलाफ खड़े हो जाने की स्थिति सामने लाते हैं। 88 मिनट की इस फिल्म ने दर्शकों को पूरी तरह से सम्मोहित कर लिया।

फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन स्त्री जीवन के संघर्ष पर आधारित दो महान फिल्मकारों ऋत्विक घटक की फीचर फिल्म ‘मेघे ढाका तारा’ और मणि कौल की ‘दुविधा’ दिखाई गई। मेघे ढाका तारा का परिचय कराते हुए पत्रकार प्रतिभा कटियार ने कहा यह फिल्म स्त्री विमर्श का सशक्त स्वंरूप सामने लाती है। फिल्म में ध्वनियों व संगीत का बहुत प्रभावकारी उपयोग है। यह फिल्म बांग्लादेश से आए शरणार्थी परिवार की एक स्त्री के जीवन संघर्ष की कहानी है। फिल्म की नायिक नीता गंभीर बीमारी से अपने जीवन का अंत होते देखती है लेकिन उसके अंदर जीवन जीने की जबर्दस्त जिजीविषा है, जो फिल्म में प्रकृति के दृश्यों के जरिए दर्शकों के सामने आता है। फिल्म में एक स्थान पर नीता कहती है कि उसने जीवन में एक ही गलती की कि उसने गलत का विरोध नहीं किया। वह बादलों से घिरा तारा नहीं बनना चाहती बल्कि सूरज बनकर जीना चाहती है। उसका यह कथन महिलाओं की स्थिति और उसकी चाह का एक मुकम्मल बयान है। ‘दुविधा’ प्रसिद्ध कहानीकार विजयदान देथा की कहानी पर मणि कौल द्वारा बनाई गई एक बेहतरीन फिल्म है। यह फिल्म एक स्त्री के प्रति अन्याय और उसके कठिन जीवन का आख्यान है।

महिला फिल्मकारों की फिल्मों में दिखे संघर्षशीली जीवन के विविध रंग : फिल्म समारोह में फिल्मकार संजय जोशी ने भारतीय सिनेमा में महिला फिल्मकारों का हस्तक्षेप पर अपने व्याख्यान प्रदर्शन में कहा कि आज डाक्यूमेन्ट्री सिनेमा के क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक महिला फिल्मकार हाशिए के लोगों के जीवन, कामगारों की स्थिति, मानवाधिकार, स्त्री विमर्श आदि विषयों पर काम कर रही है और उन्होंने एक नई सिने भाषा विकसित की है। उन्होंने इन महिला फिल्न्मकारों की फिल्मों के फुटेज भी दिखाए। फिल्म समारोह के दूसरे दिन तीन महिला फिल्मकारों की डाक्यूमेन्ट्री ससुराल (मीरा दीवान), सिटीज आफ फोटोज (निष्ठा जैन) और अनुपमा श्रीनिवासन की आई वंडर दिखाई गई।

‘ससुराल’ पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के दोयम दर्जे की स्थिति का मार्मिक बयान है। फिल्म हर स्थान पर महिलाओं की स्थिति का परीक्षण करती है और उन औरतों के दर्द को दर्शकों से रूबरू कराती है जो घर और मायके दोनों स्थानों से बेदखल पागलखाने में पड़ी हैं। ‘सिटी आफ फोटोज’ स्मृतियों इच्छाओं और अनुभवों के फोटोग्राफी के गहरे जुड़ाव से परिचय कराती है। इसके लिए निर्देशिका ने शहरों में फोटो स्टूडियों का सहारा लिया है और उनके जरिए वह शहर की कहानी भी सामने लाती हैं। ‘आई वंडर’ में निर्देशिका अनुपमा श्रीनिवासन ने राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडू सहित कई प्रदेशों के दूर-दराज क्षे़त्रों में स्कूलों में शिक्षा से बच्चों के प्राकृतिक व पारम्परिक कौशल की तुलना करते हुए यह बताने की कोशिश की है कि आखिर क्यों हमारी शिक्षा व्यवस्था में बच्चे उत्साह, उमंग और स्वभाविक रूप से भागीदारी नहीं कर पाते। इस मौके पर अनुपमा श्रीनिवासन खुद उपस्थित थीं और उन्होंने दर्शकों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब भी दिए।

दूसरे दिन महिला फिल्मकार फैजा अहमद खान की ‘मालेगांव का सुपर मैन’, वसुधा जोशी की ‘फॉर माया’, नीरा मोहन की ‘कमलाबाई’ दिखाई गई। मालेगांव का सुपरमैन, महाराष्ट के मालेगांव के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले फिल्म निर्माण के शौकीन एक ग्रुप की कहानी है। यह ग्रुप सुपरहिट फिल्मों की पैरोडी बनाता है। फिल्म बनाने का यह जुनून उनके लिए शहर के धार्मिक तनावों और आर्थिक कठिनाइयों से भागने का मजेदार रास्ता भी है। हाजिर जवाब, दिल को छू लेने वाली यह मजेदार फिल्म सुपरमैन की शूटिंग की तैयारियों पर केन्द्रित है। वसुधा जोशी की ‘फार माया’ चार पीढ़ी की महिलाओं के पारिवारिक और सामाजिक परिवेश की स्थिति का कई स्तरों पर आकलन करती है। इस फिल्म में नानी और चौथी पीढ़ी की बच्ची के बीच संवाद बहुत अर्थपूर्ण है। छह वर्ष की बच्ची अपनी नानी से कहती है-मै चाहती हूं कि दशरथ की चार लड़िकयां हों। वह ताड़का और सीता की दो आयामी चरित्र को स्वीकार नहीं कर पाती। यह फिल्म मध्यवर्गीय पढ़े-लिखे परिवारों में स्त्रियों पर नैतिकता के नाम पर थोपी जाने वाली दमन की स्थिति पर गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है। इस फिल्म के प्रदर्शन के अंत में दर्शकों का फिल्म में अभिनय करने वाली प्रेमा जोशी से रोचक संवाद हुआ। उन्होंने दर्शकों से अल्मोड़ा और अपने समय में महिलाओं की स्थिति, आजादी के संघर्ष के बारे में यादे साझा की। रीना मोहन की फिल्म ‘कमलाबाई’ प्रथम मूक फिल्म और मराठी नाट्य मंच की मशहूर अभिनेत्री कमलाबाई पर बनी सहज किंतु गंभीर फिल्म है। यह फिल्म कमलाबाई के संघर्ष के साथ-साथ फिल्म जगत के प्रारम्भिक दिनों और दादा साहब फाल्के जैसे निर्देशक की कार्यशैली पर प्रकाश डालती है। अत्यन्त वृद्धावस्था में कमलाबाई के घर पर फिल्म की शूटिंग की गई है और फिल्म में वह अपने व्यावसायिक अनुभव, परिवार, मां सबको याद करती हैं।

नदियों के साथ सैर : फिल्मकार एवं यायावर अपल द्वारा फिल्म समारोह में प्रस्तुत नदियों के साथ सैर कार्यक्रम बेहद रोमांचक अनुभव था। अपल ने फोटो और वीडियो के जरिए गंगा, ब्रहमपुत्र, गोमती और जाम्बेजी की रोमांचक यात्रा को बहुत ही अनूठे ढंग से वर्णन किया। वह और उनके साथी विशेष नाव से इन नदियों के उद्गम स्थल से लेकर इनके सागर में मिलने के स्थान तक यात्रा करते हैं। वह सिर्फ नदियों के बारे में जानकारी नहीं एकत्र करते बल्कि नदियों के किनारे रहने वाले समुदायों के जीवन हालात की भी खोज खबर लेते हैं। इसमें वह पाते हैं कि दक्षिण अफ्रीका की जाम्बेजी नदी के तट पर रहने वाले लोग मलेरिया से मर रहे हैं तो गोमती, गंगा, ब्रहमपुत्र के तट पर रहने वाले समुदाय आज भी बेहद गरीब हैं और उन तक स्वास्थ्य, शिक्षा व जरूरी सुविधाओं की पहुंच नहीं बन पाई है। वह यह भी बताते हैं कि गोमती लखनऊ से 20-25 किमी पहले पूरी तरह स्वच्छ है तो इसलिए क्योंकि वहां रहने वाले समुदाय का नदी के साथ एक जीवंत रिश्ता है। अपल ने इस प्रस्तुति के जरिए चिंता जाहिर की कि हमारा रिश्ता तो नदियों से खत्म तो हो ही रहा है हम उसके बारे में सोच भी नहीं रह रहे हैं।

पितृसत्ता के सम्पूर्ण ढांचे पर करारे प्रहार की जरूरत -उमा चक्रवर्ती : प्रसिद्ध इतिहासकार एवं नारीवादी चिंतक उमा चक्रवर्ती ने फिल्म फेस्टिवल के अंतिम सत्र में अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि पितृसत्ता के समूचे ढांचे पर एक साथ करारा प्रहार करने की जरूरत है। पितृसत्ता सिर्फ एक माइंडसेट का मामला नहीं है। यह केवल सामंती अवशेष भी नहीं है जो अपने आप स्वत खत्म हो जाएगा, इसे ढाहने के लिए यत्न करना पड़ेगा। उन्होंने नारीवादी आंदोलन की चर्चा करते हुए कहा कि महिलाओं की लड़ाई सिर्फ उनकी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की लड़ाई है क्योंकि पितृसत्तामक व्यवस्था में सभी पीडित हैं। उन्होंने कहा कि हमने संघर्षों को डिब्बों में बांट दिया है। उमा चक्रवर्ती ने नारीवादी आंदोलन ने धर्म पर भी प्रहार किया है क्योंकि धर्म यथास्थितिवाद को बनाए रखता है। इस मौके पर उमा चक्रवर्ती की फिल्म ए क्वाइट लिटिल इन्ट्री भी दिखाई गई। इस फिल्म में मैथिली अपनी दादी सुबुलक्ष्मी की कहानी ढूंढ रही है, जो डायरियां लिखकर उन्हें बक्से में रखती जाती हैं। मैथिली उनकी डायरियों के जरिए उनके संघर्ष को सामने लाती है।

बच्चों ने संडे को देखी फीचर फिल्म सडे और एनिमेशन फिल्में : फिल्म समारोह में परम्परा रही है बच्चों के लिए फिल्मों के एक सत्र का। इस चौथे फिल्म समारोह के अन्तिम दिन की शुरुआत बच्चों के सत्र से हुई। इस सत्र में चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी द्वारा बनाई गई पंकज आडवानी की फीचर फिल्म संडे और एनीमेशन फिल्में-गौरेया की चम्पी, मां मां मां, आसमान से गिरा दिखाईं गईं। संडे में एक नटखट बच्चा अपनी मां के साथ पिता को रेलवे स्टेशन पर रिसीव करने जाता है। रेलवे स्टेशन जाते समय और उसके पिता के स्टेशन पर न उतर पाने की कथा में कई मजेदार घटनाएं घटित होती हैं जिन्हें इस फिल्म में बहुत करीने से पिरोया गया है।

कवि विद्रोही पर बनी फिल्म और उनके काव्य पाठ ने दर्शकों को रोमांचित किया : फिल्म समारोह के अंतिम दिन दर्शकों के लिए कवि रमाशंकर विद्रोही पर बनी फिल्म मैं तुम्हारा कवि हूं और समारोह के समापन में कवि विद्रोही का कविता पाठ एक न भूलने वाली यादगार शाम बन गई। कवि विद्रोही के जीवन और उनकी कविताओं पर नितिन के पमनानी द्वारा बनाई गई 40 मिनट की यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कथा है जो कविता में रहता है। विद्रोही अपने बारे में फैली किवंदतियों के बीच दो दशक से ज्यादा समय से जेएनयू के नागरिक हैं। कवि विद्रोही ने कविता कभी लिखी नहीं, वे आज भी कविता कहते है। यह उनके काव्य पाठ को सुनकर दर्शकों ने महसूस किया। वह बिना लाग लपेट कर गरीबों व मेहनतकशों की तरफदारी में बोलते हैं। उनकी कविता-हर जगह ऐसी ही जिल्लत/ हर जगह ऐसी ही जहालत /हर जगह पर पुलिस/ और जगह पर अदालत। उनकी एक और कविता-जब कवि गाता है/ तब भी कविता होती है / और जब कवि रोता है / तब भी कविता होती है। अंत में जन संस्कृति मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष व कवि भगवान स्वरूप कटियार ने फिल्म फेस्टिवल को सफल बनाने के लिए सभी को धन्यवाद दिया।

लो, एनडीटीवी भी करने लगा पेड न्यूज!

: 40 करोड़ रुपये लेकर साक्षी टीवी के जरिए भ्रष्टाचारी रेड्डी को बचाने में जुटा एनडीटीवी प्रबंधन? : भड़ास4मीडिया के एक पाठक ने बड़ा महत्वपूर्ण सवाल उठाया है. उन्होंने जो पत्र भेजा है, वह पेड न्यूज के बारे में बड़े फलक पर सोचने को मजबूर करता है. चुनाव आयोग कहता है कि पेड न्यूज सही नहीं है. न्यूज चैनलों को चुनाव से महीनों पहले पेड न्यूज और राजनीतिक विज्ञापन दिखाने पर रोक है. लेकिन अगर कोई बड़ा नेता पेड न्यूज वाला पैसा व विज्ञापन का पैसा किसी दूसरे को देने की जगह खुद का ही चैनल खोल ले और जमकर अपनी मार्केटिंग करने लगे तो भला कोई क्या कर लेगा.

और ऐसा हो भी रहा है. दक्षिण भारत में जो साक्षी टीवी है, उसके बारे में सब जानते हैं कि यह वाईएस जगन मोहन रेड्डी का है. इनके पिता सीएम थे जिनकी जहाज हादसे में मौत हो गई. वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने साक्षी टीवी को चला पाने में असफलता के कारण इसको एडिटोरियली चलाने का जिम्मा एनडीटीवी को सौंप दिया है. इसके लिए एनडीटीवी को 40 करोड़ रुपये दिए गए हैं. अब एनडीटीवी प्रबंधन साक्षी टीवी के कंटेंट को देख रहा है. सीबीआई ने रेड्डी के पास अस्सी करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति के बारे में खुलासा कर चार्जशीट दायर करने की बात कही है तो आंध्र प्रदेश की लोकल मीडिया ने इस मुद्दे के जरिए रेड्डी को घेरने का काम शुरू कर दिया है. ऐसे में एनडीटीवी के एडिटोरियल नेतृत्व वाली साक्षी टीवी की टीम ने अब लोकल मीडिया के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है. जाहिर है, इसका मकसद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अपने मालिक व नेता रेड्डी को बचाना है. तो, क्या यह पेड न्यूज नहीं हुआ? यह तो बहुत बड़े लेवल का पेड न्यूज है और इसे बड़ी सफाई से अंजाम दे रहा है एनडीटीवी. वही एनडीटीवी जो अपनी सादगी और ईमानदारी के गुन गाते नहीं थकता. उस एनडीटीवी ने 40 करोड़ रुपये लेकर अपना ईमान बेच दिया है. भड़ास4मीडिया के पास जो पत्र आया है, वह इस प्रकार है–

killing Journalism

Marriage of SakshiTV and NDTV killing Journalism There is a lot of hue and cry on paid news. Press council banned paid news and stopped political advertising 6 months prior to the election. But what if a politician himself launches a newspaper or News TV station? He will propagate his party and himself 24/7. Is this not paid news? Our respected regulatory bodies do not have answer for this. Should we allow these media organizations function at the election hour propagating the owner-politicians and their respective political parties? No one has answer to this. Y.S. Jagan Mohan Reddy, President of YSR Congress Party has launched a newspaper and News TV channel in the State of Andhra Pradesh. He spent crores of rupees to start SakshiTV to support his activities. After an year of the launch he found out that he failed to run the channel and handed over the editorial responsibility to NDTV. NDTV got Rs. 40 Crores in this deal. Now CBI found out that there is illegal wealth to the tune of Rs. 80,000 crores with Jagan Mohan Reddy. CBI filed charge sheet on Jagan Mohan Reddy and started raiding his properties. Local media started covering this. NDTV lead editorial team of SakshiTv started attacking local media. It named Eenadu, Andhrajyothy and TV9 as corrupt channels and warned them not to telecast news of CBI raids on Jagan. One can understand the fate of the news channel started by a black money politician. But an organization like NDTV which always talks about the ethics in the media supporting this kind of activity is surprising. Values in the media up for sale for mere Rs. 40 Crores?

संगमनगरी की फिजा में फैल गया ‘फ़ैज़’ का फ़ैज़

: हिंदी विश्‍वविद्यालय द्वारा आयोजित जन्‍मशती समारोह में जुटे दिग्‍गज साहित्‍यकार :  शहर इलाहाबाद और यहां की अदबी रवायत व गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए 22 व 23 अक्‍टूबर का दिन यादगार बन गया क्‍योंकि ‘हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे/ इक खेत नहीं देश नहीं, सारी दुनिया मांगेंगे,/ बोल की लब आजाद हैं तेरे…/ बोल की जां अब तक तेरी है…’ जैसी विश्‍व क्‍लासिक शायरी रचने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन्‍मशती के अवसर पर महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा व प्रगतिशील लेखक संघ के सहयोग से दो दिवसीय अंतरराष्‍ट्रीय समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें पाकिस्‍तान, जर्मनी सहित भारत के नामचीन अदीबों ने विमर्श किया।

‘शख्शियत : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़’ पर आधारित उद्घाटन सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए विवि के कुलाधिपति व हिंदी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह ने फ़ैज़ को मद्धम स्‍वर में दिलों में आग भर देने वाला शायर बताते हुए कहा कि अवाम में क्रांतिकारी चेतना जगाने की कुव्‍वत रखने वाले फ़ैज में गुरूर जरा भी नहीं था। लोकप्रियता की ऊंचाई पर होने के बावजूद वे बेहद शालीन थे। उन्‍होंने इस बात पर प्रसन्‍नता जाहिर की कि वर्धा हिंदी विवि फ़ैज़ की जन्‍मशती पर इतना बड़ा कार्यक्रम करनेवाला पहला विश्‍वविद्यालय बना। साथ ही इलाहाबाद में कार्यक्रम करना इसलिए भी सार्थक रहा क्‍योंकि गंगा-जमुनी तहज़ीब का असली संवाहक यही स्‍थल है।

फ़ैज़ की बेटियां सलीमा हाशमी और मुनीज़ा हाशमी व पाकिस्‍तान की सुप्रसिद्ध लेखिका किश्‍वर नाहिद की मौजूदगी ने हिन्‍द-पाक के अवामी और तहज़ीबी रिश्‍तों को नए जोश और मोहब्‍बत से भर दिया। इलाहाबाद संग्रहालय का सभागार अदब और तहजीब से जुड़े लोगों से खचाखच भरा था। यह इस बात की तस्‍दीक करता है कि फ़ैज़ की दीवानगी किस कदर आम लोगों पर हावी है। बकौल फ़ैज़ की बेटियां, यह सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि फ़ैज़ का किसी से नफ़रत का रिश्‍ता नहीं था। वह इंसानियत और मोहब्‍बत की नुमाइंदी करते थे। फ़ैज़ की दोनों बेटियों ने संगमी नगरी में मिले प्‍यार और मोहब्‍बत पर खुशी जाहिर की। कहा कि यहां का माहौल देखकर वे समझ सकती हैं कि फ़ैज़ के दिल में हिन्‍दुस्‍तान के प्रति इतनी मोहब्‍बत क्‍यों थी। बतौर वक्‍ता नाहिद किश्‍वर बोलीं, फ़ैज़ हमेशा सीखने की कोशिश करते थे और दूसरों के हुनर को सराहते भी थे, यह बड़ी शख्शियत की पहचान है। उनसे मोहब्‍बत और इंसानियत की जो सीख मिली वह बड़े काम की निकली। प्रो.अकील रिजवी ने फ़ैज़ से जुड़े संस्‍मरण सुनाते हुए सन 1981 में इलाहाबाद विवि में हुए कार्यक्रम का जिक्र किया और बताया कि तमाम आशंकाओं के बावजूद फ़ैज़ को सुनने के लिए इतना बड़ा मज़मा जुटा जो फिर कभी दिखायी नहीं दिया। उन्‍होंने कहा कि हिंदी में फ़ैज़ की इतनी बड़ी अहमियत है जितनी शायद उर्दू में भी नहीं।

वर्धा हिंदी विवि द्वारा ‘बीसवीं शताब्‍दी का अर्थ : जन्‍मशती का सन्‍दर्भ’ श्रृंखला के तहत ‘फ़ैज़ एकाग्र’ पर आयोजित समारोह में स्‍वागत वक्‍तव्‍य देते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि फ़ैज़ भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े कवियों में से एक हैं और हमारी साझा संस्‍कृति के उत्‍कृष्‍टतम नमूना हैं। समकालीन संदर्भ में फ़ैज़ जैसे बड़े कवि पर विमर्श होने से हम लाभान्वित होंगे। बीसवीं सदी में कई ऐसे रचनाकार हुए जो परिवर्तनगामी चेतना से समकालीन चुनौतियों से लड़ र‍हे थे। कुलाधिपति नामवर सिंह ने जिम्‍मेदारी सौपीं थी कि जिन रचनाकारों की जन्‍मशती है, उनपर समग्र रूप से वैचारिक विमर्श हो। वर्धा से शुरू हुई इस श्रृंखला के तहत यह विवि का छठवां आयोजन है। इसके पूर्व नागार्जुन, उपेन्‍द्र नाथ अश्‍क, केदार नाथ अग्रवाल और भुवनेश्‍वर पर क्रमश: पटना, इलाहाबाद, बांदा एवं इलाहाबाद में वैचारिक विमर्श के लिए कार्यक्रम हुए और अब इलाहाबाद में फ़ैज़ पर विमर्श कर रहे हैं।

‘शख्शियत : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़’ विषय पर आधारित उद्घाटन सत्र में मंच पर वे लोग मौजूद थे जिनका फ़ैज़ से या तो निजी रिश्‍ता था या जिन्‍होंने फ़ैज़ को बहुत करीब से देखा हो, उनसे मिले हों। वक्‍ताओं ने जब फ़ैज़ की शख्शियत पर अपनी बात रखनी शुरू की तो श्रोता खुद-ब-खुद जुड़ते चले गए। क्‍योंकि वहां मौजूद लगभग हर शख्‍स फ़ैज़ से दिली लगाव महसूस कर रहा था, उनकी शायरी या नज्‍म़ से वाकिफ था। समारोह का संचालन करते हुए प्रलेस के अली जावेद ने कहा कि हम किसी भी शायर को छोटा करके नहीं देखते हैं। यह फैज ही हैं जिसने कि मजाज पर लिखा कि इंकलाब को नगमा बनाना हमने मजाज से सीखा है। मजाज को भी हम उतना ही एहतराम देते हैं जितना कि फ़ैज़ को। वर्धा हिंदी विवि के इलाहाबाद केन्‍द्र के प्रभारी व ‘बीसवीं शताब्‍दी का अर्थ : जन्‍मशती का सन्‍दर्भ’ श्रृंखला के संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने आभार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि यह सभागार बहुत छोटा पड़ गया है पर फ़ैज़ के चाहने वालों का दिल बड़ा है। हम खुशनसीब हैं कि इतने बड़े अदीबों को सुना तथा फ़ैज़ की दोनो बेटियों को न सिर्फ देखा बल्कि उनको सुना भी।

पाकिस्‍तान की सु्प्रसिद्ध क‍वयित्री व लेखिका नाहिद किश्‍वर तथा पटना के खगेन्‍द्र ठाकुर की संयुक्‍त अध्‍यक्षता में प्रतिरोध की कविता और फ़ैज़ ‘लाजि़म है कि हम भी देखेंगे’ पर आधारित द्वितीय अकादमिक सत्र में वक्‍ताओं ने वैचारिक विमर्श किया। खगेन्‍द्र ठाकुर बोले, फ़ैज़ जैसे शायर के लिए प्रोटेस्‍ट बहुत हल्‍का शब्‍द है। वे इन्‍कलाब के शायर हैं। आज कविता में इन्‍कलाब की चर्चा होना बंद हो चुकी है। खासकर हिंदी कविता में मजदूरों के पसीने की गंध नहीं आ रही है। जहां फ़ैज़ ने इश्‍क पर शायरी लिखी वहीं उन्‍होंने इन्‍कलाब पर भी लिखा। फ़ैज़ जिस दौर में रहते थे वह इंकिलाबी दौर था। हम देख रहे हैं कि आज का दौर बदल गया है। इस पूंजीवादी व्‍यवस्‍था व नव औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ हम फ़ैज़ को एक विरासत के रूप में पाते हैं, हमें अपने लेखन में प्रतिरोध की चेतना से लबरेज होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि आधुनिक युग में जनता का हस्‍तक्षेप समाज को बदलने के लिए होना चाहिए।

बकौल नाहिद किश्‍वर, फ़ैज़ हमेशा आम अवाम के लिए लिखते थे। उन्‍होंने कहा कि अच्‍छी शायरी वही है जो हर दौर के हालात को बयां कर दे। समकालीनता में उठ रहे दर्द के लिए उनकी शायरी सटीक प्रतीत होती है। फ़ैज़ को उर्दू अदब के चश्‍मे से नहीं देखता हूं, का जिक्र करते हुए लखनऊ से आए रमेश दीक्षित ने कहा कि उनकी कविता में आजादी की अनुगूंज थी। उन्‍होंने फिलीस्‍तीन, नेपाल, इंडोनेशिया सहित कई देशों में तानाशाही के खिलाफ चल रहे आजादी के लिए कविता लिखी। उन्‍होंने कहा कि वे तो जुर्म के खिलाफ लड़ने वाले शायर थे। अविनाश मिश्र ने कहा कि फ़ैज़ ने सामंतवाद, उपनिवेशवाद, लियाकत अली खां, जियाऊल हक जैसे सियासतों के तानाशाही को झेला था। उनकी शायरी आम आवाम से जुड़ती हैं। दुनिया में जहां भी अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर नव उपनिवेशवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष हो रहे हैं, फ़ैज़ और भी प्रासंगिक लगते हैं। कवि बद्री नारायण ने कहा कि फैज की कविता में प्रतिरोध की चेतना दिखाई देती है। फ़ैज़ कहते हैं कि कातिल मेरे पास रहो। यह प्रतिरोध कोई छिछला नहीं है। 1950 के दौर में जब पाकिस्‍तान का समाज व देश बन रहा था और हमारा मोह भंग हो रहा था। वे मोहभंग में भी कविता रचते हैं। फ़ैज़ को दुनिया के परिवर्तन का कवि बताते हुए उन्‍होंने कहा कि वे सामाजिक संघर्षों से जूझते हुए सीमांत प्रदेशों में गाये जाने वाले लोक गीतों की श्रृंखला को जोड़ते हैं। भोपाल के राजेन्‍द्र शर्मा ने कहा कि फ़ैज़ की शायरी को किसी मुल्‍क से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। जर्मनी से आए आरिफ नकवी ने फ़ैज़ को आम आदमी के दर्द को बयां करने वाला शायर बताया। कार्यक्रम में ज़फर बख्‍त ने वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा कि फ़ैज़ इंसानियत के हक़ के लिए लड़ते थे। मंच का संचालन प्रो.ए.ए. फातमी ने किया तथा जयप्रकाश धूमकेतु ने आभार व्‍यक्‍त किया।

अंतरराष्‍ट्रीय समारोह के दूसरे दिन फ़ैज़ की बेटी सलीमा हाशमी व शमीम फ़ैज़ी की संयुक्‍त अध्‍यक्षता में फ़ैज़ : गद्य के हवाले से ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’ पर आधारित अकादमिक सत्र में शाहिना रिज़वी, अबू बक़र आज़ाद, अजीजा बानो ने बतौर वक्‍ता के रूप में वैचारिक विमर्श किया। सलीमा हाशमी ने वालिद के साथ बिताए अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि  हिन्‍दुस्‍तान-पाकिस्‍तान बंटवारे के दर्द को खत्‍म करने की अपील की और फ़ैज़ के उन वाकयों व ख़तों का जिक्र किया कि, फ़ैज़ ने अपनी पत्‍नी एलिस से आवामी एकता और इंसानियत की हिफाजत को लेकर चिंता जताई थी साथ ही मुल्‍क के बंटवारे पर भी गहरा अफसोस जाहिर करते रहे। मुल्‍क विभाजन के बाद अम्‍मी को एक पत्र में वे लिखते हैं कि डार्लिंग ब्रिटिश अपने मंसूबों पर कामयाब हो गया और हम बंट गए। ब्रिटिश इससे बड़ा कोई और अपराध नहीं कर सकता था, जो उन्‍होंने किया। वालिद के सामने जो दर्द था वह आज भी है, ये खत्‍म होना चाहिए। बतौर वक्‍ता शमीम फ़ैज़ी ने कहा कि फ़ैज़ द्वारा संपादित लोटस आज तीसरी दुनिया में चल रहे नव औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ एक मेनीफेस्‍टो की तरह है। बनारस से आईं शाहिना रिज़वी ने कहा कि फ़ैज़ ने दबे कुचले ज़ुबानों को आवाज दी। बकौल फ़ैज़ ‘मुकाम फैज़ कोई राह में जंचा ही नहीं…, वे तरक्‍कीपसंद इंकिलाबी थे। दिल्‍ली विवि के अबू बक़र आज़ाद ने कहा कि फ़ैज़ न तो अपने दोस्‍तों की बात को सही कहते थे और न ही विरोधियों के सही को गलत। अजीजा बानो बोलीं, फ़ैज़ में जिंदगी से जुड़ी समस्‍याओं को रखने का अंदाज अलग था। फ़ैज़ एक अच्‍छे आलोच‍क भी थे वे अपने समय के उपन्‍यासकारों पर भी सवाल खड़े करते दिखाई देते हैं। सत्र का संचालन साहित्‍यकार असरार गांधी ने किया।

फ़ैज़ ने गज़ल की नई परंपरा की नींव डाली- गज़ल की परंपरा और फ़ैज़ ‘सुलूक जिससे किया हमने आशिकाना किया’ विषय पर आधारित अकादमिक सत्र में अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य देते हुए शीर्षस्‍थ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि फ़ैज़ ने न सिर्फ गज़ल का ढांचा बदला बल्कि उसकी रूह भी बदली, उन्‍होंने गज़ल के तेवर को बदला, अंदाज को बदला। उन्‍होंने गजल की नई परंपरा की नींव डाली। उनकी गज़ल आम तौर की गज़ल नहीं है। वे मीर गालिब की परंपरा से हटकर कहते हैं। इसलिए जैसे-जैसे दुनिया बदलती गई, फ़ैज़ की गजलों के मायने भी बदले।

पाकिस्‍तान की मुनीज़ा हाशमी़ बोलीं, 'ऐसे जलसों की अहमियत है जिनमें हुई बहस से वालिद के बारे में पॉजीटिव व निगेटिव बातें जान पाती हूं। फ़ैज़ हिन्‍दुस्‍तान को अपनी प्रेमिका और पाकिस्‍तान को अपनी पत्‍नी बताते थे, कोई भी इंसान इनमें से किसी को छोड़ना नहीं चाहता।' मशहूर शायर एहतराम इस्‍लाम ने कहा, 'गजल का जन्‍म कसीदा की कोख से और गजल की परंपरा से काफी पहले हुआ। फ़ैज़ ने गजल की परंपरा को टूटने से बचाया। उनकी नज्‍म गजल से बेहतर है। वे परंपरावादी नहीं, गजल के मिसाली शायर हैं।' संजय श्रीवास्‍तव ने कहा, 'फ़ैज़ हमें विश्‍व चेतना से जोड़ते हैं।'  अर्जुमंद आरा बोलीं, 'फ़ैज़ उम्‍मीद की हर जगह शिद्दत से मौजूद मिलते हैं। सूफियों की रवायत को शामिल करते हुए फ़ैज़ उम्‍मीद का पैग़ाम देते हैं।'

सालिहा जर्रीन ने कहा कि उनकी शायरी में समाजी, सियासी रंग दिखते हैं। उदयपुर की सरवत खान बोलीं, 'अज़ीब फनकार के फ़ैज़ पूरी कायनात की बात करते हैं। मार्क्‍सीय दृष्टिकोण से उनकी शायरी इंसानी जज्‍बातों को रखते हैं। उनकी शायरी दुनिया के तमाम आंदोलनों से जुड़ती है।' साहित्‍यकार डी.पी.त्रिपाठी ने फ़ैज़ के रिश्‍तों को ताजा करते हुए कहा, 'यह दूसरा मौका है जब फ़ैज़ को सुनने और समझने के लिए इतना बड़ा जलसा हो रहा है। इलाहाबाद में वर्धा हिंदी विवि की ओर से की गई पहल के लिए कुलपति राय साधुवाद के पात्र हैं।' उन्‍होंने कहा कि फ़ैज़ की शायरी इंकलाब का इंतखाब है। उन‍की शायरी का इंकलाब दुखी बेवाओं, बच्‍चों, मज़दूरों, मेहनतकश के नाम है। फ़ैज़ के इंकलाब को किसी सरहदों में बांधा नहीं जा सकता है। वे मद्धिम व इश्‍क के अंदाज से जुर्म व शोषण के खिलाफ बयां करते थे। उनकी शायरी में जो बहाव है वह किसी समंदर की लहरों की तरह नहीं बल्कि नदी की शांत धारा की तरह है। जर्मनी के आरिफ नकवी बोले, 'फ़ैज़ तरक्‍कीपसंद अदीब हैं जो हमें इंसानियत की राह पर लाते हैं। आज जब हम सारी दुनिया के हालात को देख रहे हैं, नवआबादीयत की तरफ और पुराने कोलोनियल की तरफ जाने के लिए कोशिशें हो रही हैं, इसपर हमें सोचने की जरूरत है और ऐसे में फ़ैज़ और भी प्रासंगिक दिखते हैं।'

बतौर वक्‍ता कुलपति विभूति नारायण राय बोले, 'इस अंतरराष्‍ट्रीय समारोह से फ़ैज़ के कई रोचक पहलुओं से हम रू-ब-रू हुए। स्‍टीफन ज्विंग ने कहा था कि किसी बड़ी हस्‍ती को जानने के लिए उनके समय को जानना महत्‍वपूर्ण होता है। पिछली शताब्‍दी के सौ वर्षों में दो महायुद्ध हुए, विध्‍वंस के नए तरीके औजार आए, उपनिवेशवाद का खात्‍मा हुआ और समाजवाद पनपा व नष्‍ट हुआ, मानवाधिकरों के लिए चार्टर आया और सबसे बड़ी बात है कि इन सौ वर्षों में इतने बड़े साहित्‍यकार पैदा हुए, जिनकी हम जन्‍मशती मना रहे हैं। इतनी बड़ी संख्‍या में यहां लोगों को आते हुए पिछले दस वर्षों में कभी नहीं देखा। यहां जो बहसें हुई इससे हम फ़ैज़ को नए तरीकों से जान पाए।'

कार्यक्रम के दौरान प्रो.एहतेशाम हुसैन और मसीहुज्‍जुमा द्वारा संकलित पुस्‍तक ‘इंतेखाबे जोशे’ का विमोचन मंचस्‍थ अतिथियों के द्वारा किया गया। सत्र का संचालन करते हुए ए.ए.फातमी ने कहा कि जो काम उर्दू विवि या उर्दू अकादमी को करना चाहिए वो काम हिंदी विवि ने किया। इसके लिए कुलपति विभूति नारायण राय धन्‍यवाद के पात्र हैं। नामचीन और अदब की दुनिया से जुड़े लोगों के अलावा सभागार में इलाहाबाद के साहित्‍य प्रेमियों और बड़ी संख्‍या में विद्यार्थियों की मौजूदगी फ़ैज़ की अहमियत पर मुहर लगा रही थी। इस अवसर पर पंकज दीक्षित द्वारा निर्मित पोस्‍टर प्रदर्शनी आकर्षण के केन्‍द्र में थी।

कवि सम्‍मेलन व मुशायरा में बयां होते रहे सच समय के सरोकार- फ़ैज़ एकाग्र पर आयोजित यादगार मुशायरा एवं कवि सम्‍मेलन से अंतरराष्‍ट्रीय समारोह का समापन हुआ। समारोह की अध्‍यक्ष और पाकिस्‍तान की मशहूर शायरा किश्‍वर नाहिद ने ‘खेल सराय, सीढियों पर ठहरी उम्र’ जैसी नज्‍में सुनाकर समां बांधा। उन्‍होंने ‘इस खेल सराय से निकलो, तुम मेरे हो…’ और ‘उठो अम्‍मा, चूल्‍हा कैसा/ अब तो हमारा सारा घर सुलग चुका है/ उठो अम्‍मा, उठो अम्‍मा’ सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। ऐहतराम इस्‍लाम ने पेश किया ‘न जाने कौन सा गुल खिल गया था गुलशन में कि उसके बाद न आई बहार बरसों तक’। इसी क्रम में जेबा अल्‍बी, यश मालवीय, आरिफ नक़वी, सरवत खान, शरीफ इलाहाबादी, अख्‍तर अजीज ने भी रचनाएं सुनाकर श्रोताओं की तालियां बटोरीं। शायरी व कविता के फ़नकारों ने खास इश्किया अंदाज में प्रेम, भाईचारा, एकता व सौहार्द पर शायरी पेश की और श्रोताओं ने तालियों से फनकारों की खूब हौसला आफजाई की। संचालन नंदल हितैशी ने किया तथा प्रो. संतोष भदौरिया ने धन्‍यवाद ज्ञापित किया।

अमित कुमार विश्‍वास की रिपोर्ट.

लोकमत के दीप भव के लोकार्पण पर जुटे मीडिया के दिग्गज

महाराष्ट्र के अग्रणी हिंदी दैनिक ‘लोकमत समाचार’ ने कला, साहित्य और पत्रकारिता के आकाश में नई उड़ान भरते हुए राष्ट्रीय राजधानी से अपनी नई वार्षिकी ‘दीप भव’ का शुभारंभ किया. इस मौके पर जहां लोकमत समाचार की नई पहल का स्वागत किया गया, वहीं कला और साहित्य के क्षेत्र में बढ़ते बाजारीकरण पर चिंता भी व्यक्त की गई.

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शनिवार को हुए एक गरिमामय कार्यक्रम में ‘लोकमत समाचार’ की नई प्रस्तुति को रसिकों को अर्पित करने के लिए सुप्रसिद्ध साहित्यकार कृष्णकुमार, कवि, आलोचक अशोक वाजपेयी, जानी-मानी भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना सोनल मानसिंह, चित्रकार जतिन दास, रंगकर्मी कीर्ति जैन, आलोचक कुलदीप कुमार, अपूर्वानंद, लोकमत मीडिया लिमिटेड के चेयरमैन, सांसद विजय दर्डा और कार्यकारी संचालक करण दर्डा मौजूद थे. इस मौके पर वार्षिकी के लोकार्पण के अलावा ‘हमारी स्थिति’ शीर्षक से रचनात्मक क्षेत्र के वर्तमान हालातों पर विचार- विमर्श किया गया.

सुप्रसिद्ध आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि युवाओं में ललित कलाओं के प्रति आकर्षण बढ़ा है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में विस्फोट हो रहा है, ‘हम सुन कम रहे हैं, देख ज्यादा रहे हैं. आज लोगों को सोचने और विचार करने के लिए प्रवृत्त करने की जरूरत है.’ कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृष्णकुमार ने शिक्षा के क्षेत्र में आ रही बाधाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसद के माध्यम से शिक्षा के अधिकार का कानून बन जाने के बावजूद अनेक बाधाएं दिखाई दे रही हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों को लेकर आज भी हमारे देश में स्थिति स्पष्ट नहीं है. उन्होंने सवाल किया – ‘क्या बच्चे महत्वपूर्ण नहीं हैं?’

शास्त्रीय नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने नृत्य जगत में मूल्यों के क्षरण पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि नृत्य को बेचे जाने के चलते उसमें खोट आने लगी है. उन्होंने सृजन क्षेत्र में तकनीक को लाए जाने पर भी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि कला जगत में आज दिखावा काफी बढ़ गया है. उन्होंने वर्तमान समय में नृत्य चेतना जगाने पर बल दिया.

चित्रकार जतिन दास ने चित्रकला के क्षेत्र में हो रहे बदलावों पर विचार रखते हुए कहा-‘कुछ लोग बचपन से पारंपरिक कलाओं को सिखाने का विरोध करते हैं. वह उसे बाल मजदूरी मानकर विरोध करते हैं. वे पढ़े-लिखे लोग झूठे हैं.’ उन्होंने आज के तकनीकी युग में कला रस गुम होने पर चिंता जताई और उसे जगाने पर बल दिया. रंगकर्मी कीर्ति जैन ने सृजन क्षेत्र में नकारात्मक दृष्टि से बचते हुए कहा कि सारी गड़बड़ियों के बावजूद कुछ नया भी है. लोग नई दिशा में कार्यरत हैं. पहले शिक्षा में रंगमंच को लेकर सवाल उठाए जाते थे, लेकिन आज अभिभावक स्वयं रंगमंच कला सिखाए जाने को लेकर शिक्षकों से संपर्क कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि नए प्रयासों से रंगमंच के क्षेत्र में एक नई ऊर्जा आ रही है.

चर्चा में आलोचक कुलदीप कुमार ने संगीत में घरानों के टूटने को अच्छा बताया, मगर यह भी कहा कि आज कौन क्या गा रहा है, यह भी पता नहीं चल पा रहा है. उनके अनुसार आज नकल की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी विचार करने की जरूरत है. उन्होंने संगीत में तकनीक को अधिक दोष न देते हुए उसके सही इस्तेमाल पर बल दिया और कहा कि तकनीकी परिवर्तन अपरिहार्य है. एक अन्य आलोचक अपूर्वानंद ने समाज और संस्कृति से शिक्षा का संबंध जोड़ते हुए रेखांकित किया कि विद्यार्थियों की नाकामी के पीछे बहुत हद तक शिक्षक जिम्मेदार हैं. उन्होंने संस्कृति और शिक्षा के तालमेल में चल रहे घालमेल पर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उत्तरदायित्व निर्धारित करने पर बल दिया.

शुरुआत में लोकमत मीडिया लिमिटेड के अध्यक्ष व सांसद विजय दर्डा ने स्वागत भाषण करते हुए कहा, ‘हम मराठी भाषी क्षेत्र में हिंदी की अलख लंबे अरसे से जगा रहे हैं. हमारे लिए महात्मा गांधी की वह सोच अनुकरणीय है, जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी ही देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित और संवर्धित कर सकती है.’ उन्होंने कहा कि ‘दीप भव’ साहित्य कला वार्षिकी हर एक सुर को जोड़ने की अभिव्यक्ति है. उन्होंने कहा कि देश की राजधानी में ‘दीप भव’ का विमोचन समारोह सबको जोड़ने और एक साथ लेकर चलने का परिचायक है. उन्होंने कहा कि लोकमत परिवार के पितृ पुरुष, वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. जवाहरलाल दर्डा ने महात्मा गांधी की रहनुमाई में हिंदी के प्रति जो पहल की, आज भी लोकमत परिवार उन्हीं आदर्शो, मूल्यों और संस्कारों को अपनी पूंजी मानता है.

कार्यक्रम के आरंभ में सभी अतिथियों का स्वागत लोकमत मीडिया लिमिटेड के कार्यकारी संचालक करण दर्डा, लोकमत समाचार के संपादक गिरीश मिश्र, विकास मिश्र, लोकमत के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख शीलेश शर्मा, आशीष जैन, प्रलय नंदा और लोकमत समाचार के प्रोडक्ट हेड मतीन खान ने किया. गिरीश मिश्र ने कार्यक्रम की भूमिका रखी और संचालन किया.

इस मौके पर दिल्ली प्रेस के प्रमुख परेशनाथ, ‘दैनिक भास्कर’ के समूह संपादक श्रवण गर्ग, जी-न्यूज के संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, भारत के पूर्व राजदूत और लेखक गौरीशंकर राजहंस, न्यूज एक्सप्रेस टीवी के प्रधान संपादक मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार बनारसी सिंह, अवधेश कुमार, हरीश गुप्ता, अजय झा, राज्यसभा टीवी के सहायक संपादक अरविंद कुमार सिंह, आउटलुक की फीचर संपादक गीताश्री, ‘अमर उजाला’ के सहयोगी संपादक संजय देव, लेखक प्रदीप सरदाना, वर्ग पहेली स्तंभकार हरीश सांसी, डीप वाटर ड्रिलिंग इंडस्ट्रीज के चेयरमैन नरेश कुमार, मध्य प्रदेश फाउंडेशन के महासचिव हरीश भल्ला, न्यूज-24 के ग्राफिक डिजाइनर माधव जोशी सहित पत्रकारिता, कला और उद्योग जगत से जुड़ी अनेक हस्तियां मौजूद थीं. प्रेस रिलीज

जॉय चक्रवर्ती होंगे टीवी टुडे ग्रुप के नए सीईओ

जी इंटरटेनमेंट इंटरप्राइजेज लिमिटेड (जील) के एक्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्‍टर पद से इस्‍तीफा देने वाले जॉय चक्रवर्ती टीवी टुडे ग्रुप में जी कृष्‍णन की जगह लेंगे. टीवी टुडे ग्रुप में उन्‍हें सीईओ बनाया गया है. टीवी टुडे ग्रुप के चेयरमैन अरुण पुरी अपने सहयोगियों को भेजे गए आंतरिक मेल में इसकी जानकारी दी है. पुरी ने मेल में बताया है कि जॉय च्रक्रवर्ती 1 दिसम्‍बर को अपना पदभार ग्रहण कर लेंगे.

उल्‍लेखनीय है कि जॉय ने 22 दिसम्‍बर को जील से इस्‍तीफा दे दिया था. तभी से कयास लगाए जा रहे थे कि वो किसी दूसरी टीवी कंपनी में ज्‍वाइन करने वाले हैं. चक्रवर्ती ने मार्च 2005 में जील के एड सेल्स के हेड के रूप में ज्‍वाइन किया था, जिसे तब ज़ी टेलीफिल्म्स के नाम से जाना जाता था. बाद में उन्‍हें प्रमोट करके उन्हें रीजनल चैनलों का चीफ रेवेन्यू ऑफिसर और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर बनाया गया. वर्तमान में वे एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के रुप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. जॉय चक्रवर्ती जील के अतिरिक्‍त टाइम्‍स ऑफ इंडिया, स्‍टार इंडिया को भी अपनी सेवाएं दी हैं.

विधायक का चमचा बना राजस्थान पत्रिका!

अजमेर के केकड़ी में राजस्थान पत्रिका पूर्ण रूप से विधायक का चमचा बन गया हैं। हालात यह हो गये हैं कि जिला कलक्टर, एसपी की बैठक में जमकर हंगामा होता हैं और अखबार में खबर तक नहीं छपती। यह सिर्फ इसलिये कि अगर खबर छपती तो विधायक जी की इमेज खराब हो जाती। पूरा वाकया यूं हुआ कि 21 अक्टूबर को पुलिस थाने में जिला कलक्टर और एसपी की मौजूदगी में सीएलजी की बैठक चल रही थी, जिसमें भाजपा के अध्यक्ष ने कांग्रेसी विधायक रघु शर्मा पर आरोप जड़ दिया कि उनके विधायक बनने के बाद क्षेत्र में एक भी विकास का कार्य नहीं हुआ।

विधायक जी को यह बात नागवार गुजरी और वो अपने टशन में ही बोलना चालू हो गये और साथ ही साथ उनके लठैत भी… लठैतों ने पुलिस की मौजूदगी में ही भाजपा अध्यक्ष के साथ मारपीट करने की भी कोशिश की परन्तु पुलिस ने हालात भांपते हुए बीच बचाव किया। इसके बाद भाजपा अध्यक्ष वहां से निकल गये और उनके निकलते ही जिस बात के लिये विधायक व पूर्व कांग्रेस कमेटी उपाध्यक्ष रघु शर्मा पूरे राजस्थान में प्रख्यात हैं वही कर दिखाया… विधायक जी ने कह दिया कि ऐसे तेली बहुत आते हैं, साला नेतागीरी दिखा रहा हैं मुझे…. और मजे की बात यह रही कि जिला कलक्टर और एसपी बेचारे बैठे देखते रहे।

इस खबर को सभी समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया परन्तु राजस्थान पत्रिका ही एक ऐसा समाचार पत्र रहा जिसमें इतनी बड़ी खबर नहीं छपी। अब लगता हैं राजस्थान पत्रिका को श्मशान घाट व खेल प्रतियोगिताओं पर ही निर्भर रहना पड़ रहा हैं। हालांकि जब यह पूरा घटनाक्रम चला राजस्थान पत्रिका के दो-दो संवाददाता वहां मौजूद थे। अब इसके बाद तो यही कहा जा सकता हैं साहब कि राजस्थान पत्रिका पूर्ण रूप से विधायक का चमचा बन चुका हैं क्यों कि यह पहली दफा नहीं हैं जब विधायक के खिलाफ खबर को इन्होंने रोका हो इससे पहले भी कई दफा ऐसा हो चुका हैं। बहरहाल अब मीडिया की हालत खराब होती नजर आ रही हैं और मुझे यह लिखते शर्म भी आ रही है।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार मोहित श्रीवास्‍तव को पितृ शोक

राष्ट्रीय सहारा नोएडा के संपादकीय विभाग में कार्यरत वरिष्‍ठ पत्रकार मोहित श्रीवास्तव के पिता भगवान प्रसाद श्रीवास्तव का रविवार को उनके निवास स्थान मोहल्ला टूंडली (टूंडला) जिला फिरोजाबाद में आकस्मिक निधन हो गया। वह 66 वर्ष के थे। वे एयरफोर्स से सेवानिवृत्त होने के बाद से टूंडली में ही रह रहे थे। स्वर्गीय श्रीवास्तव के परिवार में उनकी पत्नी पुष्पा श्रीवास्तव, दो पुत्री सीमा श्रीवास्तव व मनीषा श्रीवास्तव व दो पुत्र ललित श्रीवास्तव व मोहित श्रीवास्तव हैं। श्री श्रीवास्तव का अंतिम संस्कार सोमवार को सुबह आठ बजे टूंडला में किया गया।

सन टीवी को स्‍पेक्‍ट्रम एवं टेलीफोन एक्‍सचेंज आवंटन मामले में सीबीआई ने मारन पर शिकंजा कसा

नई दिल्ली : पूर्व केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन की परेशानी और बढ़ती नजर आ रही है क्योंकि सीबीआई उनके परिवार से जुड़ी डीटीएच कंपनी सन डायरेक्ट को स्पेक्ट्रम तथा घर पर उच्च क्षमता वाली 300 टेलीफोन लाइनें आवंटित करने के मामले में उनकी भूमिका की पड़ताल कर रही है। आरोप हैं कि मारन ने यह दोनों कार्य मंत्री पद का दुरुपयोग करते हुए अपने भाई के स्‍वामित्‍व वाले टीवी चैनल को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया था.

जांच एजेंसी ने डीटीएच ब्रॉडकास्ट कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटित किए जाने से संबंधित फाइलें दूरसंचार विभाग (डॉट) से मांगी है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि डीटीएच ब्रॉडकास्टर्स की जांच का फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि सीबीआई के अधिकारियों ने अपनी जांच में पाया है कि 2जी घोटाले में घेरे में आई कुछ कंपनियां इस सेवा का भी प्रसारण करती हैं। एजेंसी ने जिन कंपनियों की फाइल की जांच की है उनमें डिश टीवी इंडिया लि., रिलायंस बिग टीवी, भारती मल्टी मीडिया लि., भारती बिजनेस चैनल, दूरदर्शन, सन डायरेक्ट टीवी और टाटा स्काई लि. शामिल हैं। हालांकि सन डायरेक्ट के अलावा सीबीआई ने सभी अन्य फाइलें लौटा दी हैं।

सूत्रों का कहना है कि टेलीफोन एक्‍सचेंज मामले के जांच-पड़ताल में अभी दो महीने का वक्त लग सकता है। दस्तावेजों की जांच का काम पूरा होने के बाद सीबीआई इस मामले में नियमित मुकदमा दायर करेगी। एजेंसी ने इस मामले में प्रारंभिक जांच (पीई) दर्ज करने के बाद इस सरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल से दस्तावेज मांगे थे। सीबीआई इस बात का पता लगाने में जुटी है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर आईएसडीएन लाइनें मारन के चेन्नई स्थित आवास तक कैसे ले जाई गईं और किस तरह इन्हें सन टीवी चैनल के दफ्तर से जोड़ा गया। इसके अलावा सीबीआई यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन लाइनों के लिए बीएसएनएल को कितना नुकसान उठाना पड़ा।

पोल खोलने वाला विकीलीक्‍स होगा बंद!

अमेरिकी कूटनीति की गोपनीय बातें इंटरनेट पर सार्वजनिक कर तहलका मचा देने वाली वेबसाइट विकीलीक्स बंद होने के कगार पर पहुंची. विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन अंसाज के मुताबिक पैसे की कमी के चलते बेवसाइट बंद करने की नौबत आई. अमेरिका का गुस्सा झेल रहे विकीलीक्स के पास वेबसाइट चलाने के लिए पर्याप्त धन नहीं बचा है. संस्थापक जूलियन असांज की कानूनी अड़चनें भी बढ़ती जा रही हैं.

सोमवार को लंदन में अंसाज ने खुल कर कह दिया कि विकीलीक्स बंद होने के करीब पहुंच चुका है. उन्होंने कहा, "अगर विकीलीक्स ने बाधाओं से पार नहीं पाया तो साफ तौर पर हम इसे जारी रखने की हालत में नहीं रहेंगे." विकीलीक्स ने दावा किया था कि वह काले धन से जुड़ी कई गोपनीय बातें सामने लाएगा. लेकिन सोमवार को असांज ने कहा कि फिलहाल यह खुलासा टाल दिया गया है. विकीलीक्स के संस्थापक का सारा ध्यान अब पैसा जुटाने पर लग गया है. अमेरिकी कंपनियों वीजा, मास्टरकार्ड, वेस्टर्न यूनियन और पेपाल के प्रतिबंधों की वजह से विकीलीक्स तक आर्थिक मदद पहुंच ही नहीं पा रही है.

विकीलीक्स ने बीते साल अमेरिकी सरकार की गोपनीय जानकारियां सार्वजनिक कर दी थीं. बेवसाइट ने अमेरिकी विदेश मंत्रालय के 2,50,000 केबल लीक कर दिए. इनके जरिए कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं. अमेरिकी सरकार को शर्मिंदा होना पड़ा. विकीलीक्स के उन खुलासों के बाद अमेरिकी कंपनियों ने बेवसाइट को मिलने वाली आर्थिक मदद का रास्ता रोक दिया. विकीलीक्स के खातों में पैसा ट्रांसफर करने पर प्रतिबंध लगा दिया.

जूलियन असांज ने अपनी आत्मकथा के लिए एक पब्लिशिंग हाउस से 15 लाख डॉलर का करार भी किया. लेकिन असांज कह रहे हैं कि इतनी रकम मुकदमा लड़ने और विकीलीक्स को जारी रखने के लिए पर्याप्त नहीं है.

असांज की मुश्किलें : दूसरी ओर स्वीडन में जूलियन असांज पर बलात्कार के आरोप लगे. विकीलीक्स से संबंधित एक कार्यक्रम आयोजित करा रही महिला ने असांज पर बलात्कार का आरोप लगाया. महिला ने कहा असांज ने असुरक्षित यौन संबंध बनाए. असांज कहते हैं कि सेक्स दोनों पक्षों की सहमति से हुआ और उन्होंने कंडोम का इस्तेमाल किया था. स्वीडन की पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए असांज इस वक्त ब्रिटेन में हैं. स्वीडन उनका प्रत्यर्पण चाहता है. आने वाले कुछ हफ्तों में इस मामले पर भी सुनवाई शुरू होगी. असांज के खिलाफ अमेरिका में आपराधिक मुकदमा चल सकता है.

विकीलीक्स का तहलका : 2006 में लॉन्च हुई विकीलीक्स 2010 में अचानक सुर्खियों में आई. वेबसाइट ने दुनिया भर में तैनात अमेरिकी राजनयिकों और अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा एक दूसरे को भेजे गए केबलों को सार्वजनिक कर दिया. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की गोपनीय जानकारियां भी दुनिया के सामने रख दीं. बताया कि किस तरह दुनिया के कई हिस्सों में अमेरिकी सेना मानवाधिकारों को उल्लंघन कर रही है.

विकीलीक्स ने 2004-2009 के दौरान अफगान युद्ध से संबंधित जानकारियां भी सामने रख दीं. पता चला कि किस ढंग से वहां आम लोगों को मारा गया. इराक युद्ध से जुड़े 4,00,000 दस्तावेज लीक किए. इसी साल विकीलीक्स ने ग्वांतानमो जेल से जुड़े दस्तावेज जारी किए. असांज कहते हैं कि उनके पास इंश्योरेंस, काले धन, अमेरिकी सरकार, भारत और रूस के भ्रष्ट लोगों से जुड़े लाखों दस्तावेज हैं. वह बैंक ऑफ अमेरिका की गुप्त जानकारियां हासिल करने का भी दावा करते हैं.

असांज का समर्थन और विरोध : असांज के इन बयानों से बैंक और कई निजी संस्थाएं सकपका गईं. अमेरिका के अलावा कई अन्य देशों के अधिकारी भी असांज पर नकेल कसने का मौका ढूंढ रहे हैं. प्रशासन उनकी आलोचना करता है और लोग तारीफ. विकीलीक्स को 2008 में द इकोनमिस्ट ने न्यू मीडिया अवॉर्ड से सम्मानित किया. 2010 में टाइम पत्रिका के पाठकों ने उन्हें टाईम पर्सन ऑफ द ईयर चुना. असांज कहते हैं कि प्रेस बहुत सी बातें सामने नहीं ला पा रही है इसीलिए वह विकीलीक्स के जरिए कड़वी सच्चाई बाहर लाते हैं. असांज को लेकर दुनिया की राय बंटी हुई है. विकीलीक्स के विरोधी वेबसाइट को हैक करने की कोशिश करते हैं. असांज और फ्री प्रेस के समर्थक विकीलीक्स को नुकसान पहुंचाने वाली कंपनियों की वेबसाइटों पर हमले करते हैं. साभार : डायचे वेले

राजस्‍थान में खुलेगा पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय

 राजस्थान के मुख्यमंत्री और ‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’के मानद सदस्य अशोक गहलोत ने सोमवार को कहा है कि राजस्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय खोलने की संभावना तलाशी जाएगी.‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’की बीसवीं वर्षंगाठ पर आयोजित समारोह में गहलोत ने कहा कि देश में राजस्थान की पत्रकारिता की अलग पहचान है. आजादी के आन्दोलन में भी राजस्थान के पत्रकारों ने महती भूमिका निभाई उन्हें भूला नहीं जा सकता है.

उन्होंने कहा कि राजस्थान में पत्रकारिता को और मजबूती देने के लिए राजस्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय खोले जाने की संभावना तलाशी जाएगी. विश्वविद्यालय स्थापित होने से पत्रकारिता क्षेत्र में जाने वाले युवाओं को अध्ययन की सुविधा मिल सकेगी. गहलोत ने पत्रकारों की समस्याओं को निस्तारण करने का आश्‍वासन देते हुए कहा कि सरकार अन्य राज्यों में पत्रकारों को मिल रहीं सुविधाओं का अध्ययन करके प्रदेश के पत्रकारों को नहीं मिलने वाली सुविधाएं उपलब्ध कराने पर विचार करेगी.

इस मौके पर गहलोत ने कालबेलिया नृत्यांगना गुलाबो को ‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’की मानद सदस्यता प्रदान की. उन्होंने इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण चंद छाबडा, मिलाप चंद डंडिया, याम आचार्य और फोटोग्राफर गोपाल संगर को लाइफ टाइम एचीवमेंट सम्मान से सम्मानित किया. गहलोत ने पत्रकारिता क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ रिपोर्ट, फोटो और इलेक्ट्रानिक कैमरामैन और पत्रकार को भी सम्मानित किया.

गहलोत ने ‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’की ओर से भारत के तीरदांजी के प्रशिक्षक लिम्बा राम और शिक्षाविद्ध पी सी व्यास को प्रेस क्लब की मानद सदस्यता का परिचय पत्र उनकी अनुपस्थिति में उनके परिजन को भेंट किया. राजस्थान के सूचना एंव जनसम्पर्क राज्य मंत्री अशोक बैरवा और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाडी ने भी समारोह को सम्बोधित किया. साभार : समय लाइव

पत्रकारों के लिए पांचवां सबसे खतरनाक है यह देश

पत्रकारों के लिए विश्व में मैक्सिको पांचवां सबसे खतरनाक स्थान है। संयुक्त राष्ट्र और ऑर्गनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेटस की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, मैक्सिको में वर्ष 2000 से अब तक कुल 70 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक, मैक्सिको में 2011 में ही अब तक 13 पत्रकार अपनी जान गंवा चुके हैं। पत्रकारों की हत्या के पीछे जहां बहुत सारी वजहें हैं। सबसे प्रमुख कारण मादक द्रव्य तस्करों के बीच खूनी हिंसा है।

अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अन्वेषक फ्रैंक ला एई ने उन चार देशों का खुलासा नहीं किया है, जो पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है, लेकिन अन्य मीडिया समूहों ने पाकिस्तान और इराक के बाद इस मामले में मैक्सिको को तीसरे स्थान पर रखा है। मध्य अमेरिकी देश होंडुरास भी पत्रकारों की हत्या के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई। मैक्सिको के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सूची के मुताबिक, भी वर्ष 2000 से देश में 70 पत्रकारों की हत्या हुयी है। साथ ही 13 पत्रकार लापता हैं। साभार : हिंदुस्‍तान

शराब पीकर महिलाओं से तेल लगवाते हैं स्वामी चिन्मयानंद

साध्वी चिदर्पिता के जीवन में कुछ भी सामान्य नहीं रहा है. इसलिए मुझे उनके बारे में कुछ जानने की उत्सुकता रहती है और जब भी समय मिलता है, तभी उनकी आत्मकथा सुनने बैठ जाता हूं। उनके जीवन के बारे में जैसे-जैसे पता चलता जाता है, वैसे-वैसे उत्सुकता व सवाल और बढ़ते जाते हैं, लेकिन वह एक-एक सवाल का पूरी ईमानदारी से जवाब देती रहती हैं। प्रत्येक जवाब सुनने के बाद मेरे दिमाग में विस्फोट से होने लगते हैं। अगर आप इस सबसे अब तक अनभिज्ञ होंगे, तो यह सब पढ़ कर आप भी स्तब्ध रह ही जायेंगे।

उत्सुकता के  क्रम में मैंने कल दोपहर अपनी पत्नी साध्वी चिदर्पिता गौतम से अचानक पूछ लिया कि स्वामी जी ( उनके गुरू, आध्यात्मिक हस्ती स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती, पूर्व गृह राज्य मंत्री, भारत सरकार) की क्या दिनचर्या थी, वह धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों में कैसे सामंजस्य बैठाते थे? मेरे सहज भाव से पूछे गये सवाल का ऐसा जवाब मिलेगा, यह मैंने सोचा भी नहीं था। स्वामी जी उनके गुरु हैं, लेकिन उनकी छवि को बचाने के लिये, वह पति से झूठ कैसे बोल देतीं, सो उन्होंने हमेशा की तरह सब कुछ ईमानदारी से ही बताना शुरू किया। स्वामी जी सुबह चार बजे उठते हैं, दैनिक क्रिया से निवृत होने के बाद स्नान किये बिना घूमने निकल जाते हैं और वापस आकर नाश्ता करते हैं। इस पर मैंने पूछा कि आश्रम में तो नित्य प्रार्थना होती है, वह उसमें नहीं जाते? साध्वी जी ने सकुचाते हुए और न बोलने की जगह सिर हिलाते हुए बताया कि व्यस्तता के चलते वह प्रार्थना में नहीं जा पाते। मैंने फिर पूछा कि पूजा कब करते हैं, क्योंकि सन्यास में तो प्रतिज्ञा की जाती है कि मैं ईश्वर ध्यान के बिना अन्न ग्रहण नहीं करूँगा। इस पर उन्होंने कहा कि मिलने वाले बहुत लोग पहले से ही रहते हैं, तो देर हो जाती थी, इसीलिए वह पूजा-पाठ नहीं कर पाते, वह इतने पर भी अपने गुरू महाराज को ही श्रेष्ठ घोषित करने का प्रयास करती दिख रही थीं। अब मैं अपनी भोली पत्नी को कैसे समझाता कि सुबह चार बजे उठकर आराम से तैयार होकर और विधिवत पूजा-अर्चना के बाद भी लोगों से मिलने बैठा जा सकता है, लेकिन उनकी अध्यात्मिक प्रकृति है ही नहीं, क्योंकि मैंने स्वयं शंकराचार्य जी और अन्य कई बड़े सन्यासियों के साथ नेताओं को भी अति व्यस्तता के बाद भी पूजा-अर्चना करते देखा व सुना है।

खैर! मेरे मन में उनकी जो छवि थी, वह धुलती जा रही थी और मैं अपलक एक-एक शब्द बड़े ध्यान से सुनता जा रहा था। उन्होंने बताया कि चाय पीने के बाद वह तीन-चार अखबार पढ़ते हैं, इसके बाद घर में काम करने वाले स्कूल के किसी भी कर्मचारी से पूरे शरीर पर तेल से मालिश कराते हैं। मैंने फिर टोका कि किसी भी कर्मचारी से मतलब? तेल लगाने के लिए तो अलग आदमी होते हैं, तो उन्होंने कहा कि वह बहुत सरल हैं और किसी से भी लगवा लेते हैं। यह जानकर तो मैं वास्तव में अचेत वाली अवस्था में पहुंच गया कि वह घर में काम करने वाले छोटे लड़कों के साथ सफाई करने वाली और बर्तन धोने वाली महिलाओं से भी मालिश कराते हैं, साथ ही महिलाओं से ही तेल लगबाने में अधिक रुचि रखते हैं और महिलायें भी तेल लगाने को आतुर रहती हैं, क्योंकि स्वामी जी इनाम भी देते हैं।

इतने बड़े अध्यात्मिक  गुरू को महिलाओं से तेल लगवाने में कोई संकोच नहीं है, यह जान कर मैं वास्तव में अभी तक आश्चर्य चकित हूं। अब मेरी उनके प्रति धारणा बदल चुकी थी, सो सवाल भी वैसे ही करने लगा, तो पता चला कि तेल लगवाते समय ही महंगी शराब भी पीते हैं और दिन भर के लिए मस्त हो जाते हैं। मैंने पूछा कि लाकर कौन देता है? इस सवाल पर साध्वी जी ने बताया कि एक महाशय कस्टम विभाग में उनकी सिफारिश पर ही लगाये गये थे, वही विदेश से उनकी पसंद के ब्रांड लाकर देते हैं। यह जानकारी आश्रम में अंदर काम करने वाले लगभग सभी कर्मचारियों को भी है, पर उनकी कृपा पर कर्मचारियों की रोजी-रोटी चलती है, इसलिए कोई किसी से चर्चा तक नहीं करता। मेरे लिए हर जानकारी नई थी, सो चर्चा बंद करने का मन ही नहीं कर रहा था। मैं हर सवाल के साथ अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए ध्यान से सब सुनता जा रहा था। तेल लगवाते समय शराब पीते हैं, फिर स्नान करते ही नाश्ता करते हैं और स्कूल या कॉलेज में बने अपने कार्यालय में जाकर बैठ जाते हैं। दोपहर में लौटकर भोजन करते हैं और फिर बिस्तर पर लेटने के बाद कोई कर्मचारी महिला या पुरुष उनके पैर दबाता रहता है और वह सोते रहते हैं। शाम को उठकर फिर चाय पीते हैं और कोई मिलने वाला हो तो उससे मिलते भी हैं। अधिकांश लोग शाम को ही शराब पीते हैं, इसलिए मैंने जिज्ञासावश पूछा कि स्वामीजी शराब सुबह क्यों पीते हैं? अभी और चौंकना बाकी था, क्योंकि वह शराब सुबह इसलिए पीते हैं कि शाम की चाय के बाद भांग का गोला गटकते हैं और सुबह तक उसी के नशे में मस्त रहते हैं। भांग कौन लाकर देता है? जवाब मिला कि बहुत दिन तक जौनपुर के प्रतिनिधि बनारस से डिब्बा भेजते थे, पर जब से राजनीतिक कद घटा है, तब से उन्होंने भेजना बंद कर दिया है और शाहजहाँपुर से ही भांग का बना चूर्ण मंगा लेते हैं, जो स्कूल में काम करने वाला कोई कर्मचारी लाकर दे देता है। इतना सब सुनने के बाद भी मैं उनसे संध्या पूजन की अपेक्षा अब भी कर रहा था, तभी फिर सवाल किया। जवाब में फिर वही संकोचपूर्ण न ही मिली। मेरी पत्नी के साथ उन्होंने कभी कुछ असत्य व्यवहार किया था, इसका मन में गहरा क्षोभ था, पर इसके अतिरिक्त भी समाज में जो जगह थी, उसको लेकर सकारात्मक भाव था, लेकिन यह सब सुनने के बाद आध्यात्मिक गुरु के साथ अनेक धार्मिक और शैक्षिक संस्थाओं के अध्यक्ष और भारत के गृहराज्य मंत्री के दायित्व तक पहुंचने वाली मेरे मन में जो छवि थी, वह तार-तार हो गयी। मैं यह भी सोच रहा था कि यह तो एक दिन की सामान्य दिनचर्या ही है, जिसने मेरे दिमाग की चूलें हिला दी हैं। ऐसा व्यक्ति जब इरादे से कुछ गलत करता होगा, तो मानवता तो आसपास भी नहीं रहती होगी। एक दिन ऐसा है, तो साल के तीन सौ पैंसठ दिन कैसे होते होंगे? फिर भी ऐसे लोग आदरणीय हैं। गाय की खाल में स्वयं को ढक कर ऐसे भेडिय़े करोड़ों मासूमों से धर्म, आस्था और श्रद्धा के नाम पर स्वयं की पूजा कराते हुए देश और समाज को लूट रहे हैं। यह सब जान कर क्षण भर के लिए पत्नी पर भी क्रोध आया कि यह सब जानते-समझते हुए वह चुप क्यूं थी? फिर ध्यान आया कि वह एक भारतीय नारी हैं, भगवान की तरह पूजने वाले अपने गुरू की, वह कैसे निंदा कर सकती थी? आज मैं ही कुछ गलत करने लगूं, तो वह मुझे भले ही सौ बार मना करें/रोकें, पर सार्वजानिक रूप से मेरी निंदा नहीं करेंगी। ….जब यह सोच मन में आयी, तो उन पर तरस भी आया कि इस सात्विक आत्मा ने कैसे वो सब देखा होगा/सहा होगा? जो भी हो, पर ईश्वर कृपा ही है, जो वह उस लंका से भी बुरी राक्षसी साम्राज्य से दूर आ चुकी हैं, जिसका स्वामी रावण से भी बड़ा राक्षस है।

लेखक बी.पी.गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं. अभी हाल में ही साध्वी चिदर्पिता और बीपी गौतम एक दूजे के हुए हैं.

रहस्‍यमय आकृति से गोरखपुर के पुलिस लाइन में सनसनी

: राष्‍ट्रीय सहारा और अमर उजाला ने खबर छापकर दहशत और बढ़ाया : गोरखपुर के पुलिस लाइन में सनसनी फैली हुई है. एक युवक के मोबाइल में अनायास ही एक ऐसी तस्‍वीर खींच गई है, जिसे लोग प्रेत-भूत-आत्‍मा-चुड़ैल मानकर दहशत में हैं. अब हाल यह है कि शाम होते ही बच्‍चे घरों में कैद होने लगे हैं और महिलाओं ने रात में निकलना बंद कर दिया है. इस खबर को राष्‍ट्रीय सहारा और अमर उजाला ने प्रकाशित कर माहौल को और अधिक डरावना बना दिया है. इसके बाद से नई-नई बातें और चर्चाएं सामने आने लगी हैं और डर-भय का दायरा बढ़ने लगा है.

पुलिस लाइन में आटा चक्की के पास एन ब्लाक में तीन मंजिला भवन है. उसमें कुशीनगर जिले में तैनात रिजवान का परिवार रहता है. रिजवान के बेटे आमिर ने नया मोबाइल हैंडसेट खरीदा. करवाचौथ के दिन दोपहर करीब तीन बजे रेलिंग के पास खड़ा होकर सीढ़ी पर रखे साइकिल की वह फोटो खींचने लगा, तभी तस्वीर में उभरी एक आकृति देखकर वह चौंक गया. साइकिल के ऊपर सीढ़ी की जाली से सटी साड़ी पहने महिला की छाया फोटो में नजर आई. उसने अपने दोस्तों को भी फोटो दिखाई.

बिल्डिंग में रहने वाले अनिल के बेटे आदर्श, नंदराज के बेटे अविनाश इत्यादि ने बताया कि रात में कभी-कभी छत पर पायल की छन-छन और महिला के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है. एन ब्‍लॉक के मकान के छत से दस साल के भीतर तीन लोग गिर चुके हैं पर उनको कोई नुकसान नहीं हुआ. अब इन घटनाओं को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा है. एसओजी प्रभारी राजकुमार शर्मा कहते हैं कि पुलिस लाइन में भूत-प्रेत का साया नहीं हो सकता है. मोबाइल में महिला की आकृति का बनना महज संयोग है. यह किसी बालक की शरारत भी हो सकती है. वह इंटरनेट और दूसरे तकनीकी माध्‍यमों से तैयार किया गया भी हो सकता है. बहरहाल, इस मामले पर अभी कुछ भी कहना संभव नहीं है. नीचे राष्‍ट्रीय सहारा में छपी खबर.

पुलिस लाइन में एक भूतनी सी.. दहशत

गोरखपुर (एसएनबी)। पुलिस लाइन के एन. ब्लाक में करवाचौथ के दिन ‘प्रेतात्मा’ दिखी ! यह किसी के आखों का भ्रम था, हकीकत था या किसी मकसद से कोई ‘साइबर खेल’ यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता लेकिन पुलिस लाइन में दहशत है यह स्पष्ट दिख रहा है। कथित प्रेतात्मा की फोटो कई ने अपने मोबाइलों में सेव कर रखा है। पिछले कई वर्षो से रात 12 बजे के बाद होने वाली पायल की झंकार व किसी महिला के रोने की आवाज से लोग सशंकित रहते हैं। रात के आठ बजते ही इस ब्लाक में रहने वाले वर्दीधारी व उनके परिजन खौफ के कारण अपना दरवाजा बंद कर लेते हैं। उधर नेट के जानकारों का कहना है कि तमाम वेबसाइटों पर इस तरह के चित्र उपलब्ध हैं जिसमें छेड़छाड़ कर ऐसी इमेज बनाई जा सकती है। कुछ दिमागी फितूर वाले लोग सनसनी फैलाने के लिए ऐसा कर सकते हैं। करवा चौथ के दिन इस ब्लाक में ऐसी घटना घटी जिसके बाद पुलिसकर्मी व उनके परिजन काफी भयभीत हैं। उस दिन दोपहर का वक्त था। समय यही कोई 2 बजकर 30 मिनट हो रहा था। इस ब्लाक में रहने वाले वर्दीधारी रिजवान का बेटा आमिर अपनी नई मोबाइल से ब्लाक के क्वार्टर संख्या चार व पांच के बीच बनी सीढ़ी के फर्स्‍ट फ्लोर पर जंगले के पास रखी साइकिल की फोटो खींच रहा था। फोटो का व्यू उसने मोबाइल में देखा तो उसके होश उड़ गये। साइकिल की फोटो के साथ ही हवा में खड़ी एक महिला की फोटो भी थी। महिला का साया सफेद वस्त्र में लिपटा था। मोबाइल में कैद तस्वीर में उभरी साफ साया उसने मौके पर मौजूद अपने अन्य मित्रों को दिखाया। सभी के अंदर डर समा गया। इस घटना के बाद से देर रात तक बाहर घूमने, टहलने व कालोनी में अपने दोस्तों के साथ खेलने वाले बच्चे, किशोर व युवा, महिलाएं अब रात के 8 बजते ही अपने को घरों में कैद कर ले रही हैं। जब तक विशेष आवश्यकता न हो लोग रात में दरवाजा खोलने से भी कतरा रहे हैं। एक पुलिसकर्मी ने कहा कि फोटो देखकर अब उसे भी रात में बाहर से आने पर भय लगता है। कक्षा 8 में पढ़ने वाले अविनाश पुत्र नंदराज व कक्षा 6 में पढ़ने वाले आदर्श पुत्र अनिल ने बताया कि रात में छत पर पायल की झंकार किसी महिला के रोने की आवाज उन्होंने सुनी है। महिलाओं ने भी इस बात की पुष्टि की। महिलाओं ने बताया कि पिछले पांच वर्षो में अचानक दो हादसे हुए। सिपाही उमेश की बेटी व एक फालोवर अचानक छत से नीचे गिर गये। तीन मंजिले से नीचे गिरने के बाद भी वे साफ-साफ बच गये। उन्हें मामूली चोट आयी। शाहपुर थाने पर किसी प्रेतात्मा के वास की कहानी शायद ही कोई पुलिसकर्मी हो जो अनभिज्ञ हो। हालात यह है कि शाहपुर थाने पर तैनाती से पुलिसकर्मी कतराते हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र .

बरखा एनडीटीवी ग्रुप एडिटर, सोनिया एडिटोरियल डाइरेक्‍टर

नीरा राडिया प्रकरण में हुए छीछालेदर को दरकिनार करते हुए एनडीटीवी मैनेजमेंट ने बरखा दत्‍ता को प्रमोट करके ग्रुप एडिटर बना दिया है. शीर्ष स्‍तर पर हुए दो प्रमोशनों में सोनिया सिंह को एडिटोरियल डाइरेक्‍टर बनाया गया है. एनडीटीवी ने ग्रुप को और जिम्‍मेदार बनाने के लिए एडिटोरियल बोर्ड और एथिक्‍स कमिटी का भी गठन किया है, जिसका अध्‍यक्ष क्रमश: बरखा दत्‍त और सोनिया सिंह को बनाया गया है.

ये दोनों नए ग्रुप संपादकीय और नीतिगत मुद्दों पर नियमित बैठक करेगा. एडिटोरियल बोर्ड चेयरपर्सन राधिका राय के साथ एनडीटीवी के सभी संपादकीय मामलों के प्रति जिम्‍मेदार होगा. एडिटोरियल बोर्ड का गठन इसलिए किया गया है ताकि वो जटिल-पेंचदार मामलों पर शीघ्रता से कदम उठाए तथा संपादकीय मामलों में एनडीटीवी के अंदर तथा बाहर की शिकायतों पर जवाब दे सके. ज‍बकि एथिक्‍स कमेटी संस्‍था के नीतिगत मामलों पर निगरानी रखेगी तथा अपनी रिपोर्ट राधिका रॉय को देगी.

तीज-त्‍यौहार और साहित्‍यकर्म

हर साल दीवाली जैसे-जैसे नजदीक आती है… अपने शहर की पत्रिकाओं की दुकान याद आने लगती है… इसलिए नहीं कि वहां हर साल दीपावली खास दीयों की रोशनी में मनाई जाती थी… इसलिए भी नहीं कि वहां दीपावली पर पत्रिकाओं और किताबों की खरीद पर खास छूट मिलती है… पत्रिकाओं की वह दुकान इसलिए याद आती थी कि तब पत्रिकाओं के दीपावली विशेषांकों की बाढ़ रहती थी… हर पत्रिका के दीपावली विशेषांक में एक से बढ़कर एक रचनाएं… लेखों का खजाना… क्या नहीं रहता था।

घोर उपभोक्तावाद के इस दौर में पत्रिकाओं की इस तरह से याद …रचनाओं की आहट की खोज… प्रगतिकामियों को असहज कर सकती है.. उन्हें यह नास्टेल्जिक पीड़ा परेशान कर सकती है.. वैज्ञानिकता के युग में पर्व और त्यौहारों को इस तरह याद करना पिछड़ेपन की निशानी मानी जा सकती है। लेकिन सवाल यह है कि जब पश्चिम से आई बाजार की संस्कृति ठेठ देसज भारतीय त्यौहारों को अपने व्यापार-कारोबार को बढ़ावा देने और कमाई के लिए इस्तेमाल कर सकता है तो साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में इन देसज प्रतीकों के जरिए समाज और संस्कृति से जुड़ने की प्रक्रिया को याद करना और उसकी महत्ता को याद करना अवैज्ञानिक और गलत कैसे हो सकता है… बहरहाल यह चर्चा लंबी हो सकती है और फिलहाल यहां मकसद इस प्रवृत्ति को इंगित करना भर है।

करीब दो दशक पहले तक हिंदी की पत्रिकाओं में दीवाली विशेषांकों की बाढ़ दिखती थी… धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान में उन दिनों बेहतर विशेषांक निकालने की होड़ रहती थी। धर्मयुग तो हिंदी के तीन मूर्धन्य ललित निबंधकारों विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय और विवेकी राय के ललित निबंधों को प्रकाशित करता ही करता था। संयोग देखिए कि उन दिनों पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस जिले में अपनी रिहायश थी, ये तीनों रचनाकार उसके आसपास के ही थे। कुबेरनाथ राय और विवेकी राय ने घोर शहरी युग में भी अपनी रचनात्मक ताप को गाजीपुर जैसी छोटी जगह में रहकर पूरे देश के साहित्यिक जगत में महसूस कराया था। खासकर हिंदी की ललित निबंध विधा में दोनों ने संस्कृति की गहरी धाराओं के साथ जिस तरह देसज प्रतीकों को जोड़ा…वह दिल को छू जाता था।

विद्यानिवास मिश्र की रचनाधर्मिता में भी गांव और उसके प्रतीक बार-बार आते थे। लेकिन उसके साथ संस्कृत साहित्य का अवगाहन भी होता रहता था। कई बार खंडवा के रहने वाले निमाड़ी भाषा के मशहूर रचनाकार रामनारायण उपाध्याय की रचनाधर्मिता और ललित साहित्य के दर्शन भी उन विशेषांकों में होते थे। कभी-कभी नर्मदा प्रसाद उपाध्याय की लालित्य शैली मन को मोहती थी… इन रचनाकारों में से सौभाग्यवश नर्मदा प्रसाद उपाध्याय और विवेकी राय ही हमारे बीच हैं… लेकिन इनकी कलम से रचनात्मकता की वह लालित्य धारा कम ही नजर आती है। हालांकि विवेकी राय कहते हैं – ‘अपनी माटी के रागबोध और हृदय के भावबोध सहित मुक्त चिंतन के उपलब्धि वाले परिवेश समकालीन जीवन में लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में क्या आश्चर्य कि अब साहित्य में निबंध विधा की ललित धुरी खिसकने लगे।….लेकिन यह धारा सूखने नहीं पाएगी…कहीं से मुड़कर किसी और नामरूप में उछल पड़े, यह भी संभव है।’

लेकिन यह धारा सूख रही है… तीज-त्यौहारों का देसज संस्कार और रूप साहित्य की इस धारा को बचाकर रखे हुए था। लेकिन अब बाजारवाद में सामानों को बेचने और पत्रकारीय कर्म के लिए तीज-त्यौहार फिल्मी कलाकारों के ग्लैमरस विचारों को परोसने का बहाना भर रह गए हैं…। लेकिन जब साहित्य के सवाल उठते हैं तो रोना यह कि हमारे यहां पाठक हैं कहां…य