साध्‍वी चिदर्पिता ने स्‍वामी चिन्‍मयानंद पर लगाया रेप का आरोप

शाहजहांपुर से एक बड़ी तथा चौंकाने और हतप्रभ करने वाली खबर आ रही है। भाजपा के शासन काल में गृहराज्‍य मंत्री रहे तथा मुमुक्ष आश्रम (परमार्थ आश्रम हरिद्वार के अध्यक्ष) के अधिष्‍ठाता स्‍वामी चिन्‍मयानंद सरस्‍वती के खिलाफ उनकी शिष्‍या साध्‍वी चिदर्पिता ने बलात्‍कार का आरोप लगाया है। पूर्व गृह राज्यमंत्री के विरुद्ध शाहजहांपुर कोतवाली में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। मुमुक्षु आश्रम शाहजहांपुर की प्रबंधक साध्वी चिदर्पिता के सनसनीखेज संगीन आरोपों की तहरीर एक सप्‍ताह पहले ही पुलिस को दी थी, जिसकी जांच एसपी सिटी कर रहे थे,  बुधवार को साध्‍वी के बयान दर्ज करने के बाद कई धाराओं में रिपोर्ट लिखने की कार्रवाई की गई।

तहरीर में साध्वी चिदर्पिता ने आरोप लगाये हैं कि परिवार में आते-जाते रहने वाले स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती राजनैतिक व आध्यात्मिक ज्ञान लेने को प्रेरित करने का वादा कर वर्ष 2001 में अपने दिल्ली स्थित सांसद निवास में रखने लगे। इस दौरान उनके साथ कई कमेटी दौरे और धार्मिक स्थलों की यात्रा कर ज्ञान और अनुभव भी पाया। वह वर्ष 2004 तक वह गुरु की ही तरह सिखाते रहे और वह उन्हें संरक्षक मानते हुए शिष्या की ही तरह सीखती रही, जिससे उन पर प्रार्थिनी को भाई या पिता से भी अधिक विश्वास हो गया, तभी वर्ष 2004 में प्रार्थिनी को जप-तप और धार्मिक अनुष्ठान कराने के बहाने हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम में ले आये। यहां उन्होंने कुछ ज्ञान बर्धक बातें सिखाई भीं, लेकिन अचानक प्रार्थिनी को उनकी नियत में परिवर्तन दिखने लगा, जिससे प्रार्थिनी किसी तरह से निकलकर भागने की मन ही मन युक्ति सोच ही रही थी कि तभी वह वर्ष 2005 में अपने व्यक्तिगत अंगरक्षकों के बल पर अपनी गाड़ी में कैद कर शाहजहाँपुर स्थित मुमुक्षु आश्रम ले आये और आश्रम के अंदर बने दिव्य धाम के नाम से बुलाए जाने वाले अपने निवास में लाकर बंद कर दिया।

साध्‍वी ने तहरीर में आरोप लगाया है कि यहाँ कई दिनों तक शारीरिक सम्बन्ध बनाने का दबाव बनाया गया, जिसका उन्‍होंने ने विरोध किया, तो उन्होंने अज्ञात असलाहधारी लोगों की निगरानी में दिव्यधाम में ही कैद कर दिया, पर प्रार्थिनी शारीरिक सम्बन्ध बनाने को किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थी, लेकिन अपने रसोईये के साथ साजिश कर खाने में किसी तरह का पदार्थ मिलवा कर उन्होंने प्रार्थिनी को किसी तरह अन्‍न ग्रहण करा दिया, जिससे प्रार्थिनी शक्तिहीन हो गयी। उसी रात शराब के नशे में धुत्त स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती कामयाब हो गये, लेकिन उनके दिव्य धाम स्थित निवास में कैद होने के कारण प्रार्थिनी कुछ नहीं कर पायी। बलात्कार करते समय उन्होंने वीडियो फिल्म बना ली थी, जिसे दिखा कर बदनाम करने व परिवार सहित जान से मारने की धमकी भी दी, तभी दहशत के चलते उनके कुकृत्य की किसी से चर्चा तक नहीं कर पाई।

साध्‍वी ने तहरीर में कहा है कि इस बीच प्रार्थिनी दो बार गर्भवती भी हुई। वह बच्चे को जन्म देना चाहती थी, लेकिन स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती ने प्रार्थिनी की इच्छा यह कहते हुए ख़ारिज कर दी कि उन्हें संत समाज बहिष्कृत कर देगा, जिससे सार्वजनिक तौर पर मृत्यु ही हो जायेगी। ऐसा होने से पहले या तो वह आत्महत्या कर लेंगे या फिर प्रार्थिनी को मार देंगे। इतने पर भी प्रार्थिनी गर्भपात कराने को तैयार नहीं हुई तो उन्होंने अपने ऊँचे राजनैतिक कद का दुरुपयोग करते हुए पहले बरेली स्थित अज्ञात अस्पताल में और दूसरी बार लखनऊ स्थित अज्ञात अस्पताल में जबरन गर्भपात करा दिया, जिससे दोनों बार प्रार्थिनी को बेहद शारीरिक और मानसिक कष्ट हुआ और महीनों बिस्तर पर पड़ी रही। उस समय प्रार्थिनी की देखभाल करने वाला तक कोई नहीं था। स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती प्रार्थिनी को अपने लोगों की निगरानी में छोडक़र हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम में जाकर रहने लगे। प्रार्थिनी कुछ समय बाद स्वत: ही स्वस्थ हो गयी और स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के वापस आने पर दोनों बार प्रार्थिनी ने जबरन कराये गये गर्भपात का जवाब माँगा तो उन्होंने प्रार्थिनी को दोनों बार बुरी तरह लात-घूंसों से मारा-पीटा ही नहीं, बल्कि एक दिन गले में रस्सी का फंदा डालकर जान से मारने का भी प्रयास किया और कनपटी पर रायफल रख कर यह चेतावनी देकर जान बख्शी कि जीवन में पुन: किसी बात को लेकर सवाल-जवाब किया तो लाश का भी पता नहीं चलने देंगे, तो दहशत में प्रार्थिनी मौन हो गयी और डर के कारण उसी गुलामी की जिंदगी को पुन: जीने का प्रयास करने लगी, तो पता चला कि उनके अन्य दर्जनों बालिग, नाबालिग व विवाहित महिलाओं से नाजायज संबंध हैं।

तहरीर में आगे कहा गया है कि प्रार्थिनी को सामान्य देखकर स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती ने प्रार्थिनी को कुछ समय पश्चात मुमुक्षु आश्रम के साथ दैवी सम्पद संस्कृत महाविद्यालय का प्रबंधक व एसएस विधि महाविद्यालय में उपाध्यक्ष बनवा दिया और पुन: प्रार्थिनी का भरपूर दुरुपयोग करने लगे, क्योंकि वह प्रार्थिनी से एक बार में लगभग सौ-डेढ़ सौ कोरे कागजों पर जबरन हस्ताक्षर करवाते और उनका अपनी इच्छानुसार प्रयोग करते, जिस पर प्रार्थिनी को आशंका है कि उन्होंने हस्ताक्षरों का भी दुरुपयोग किया होगा, लेकिन प्रार्थिनी ने सभी दायित्वों का निष्ठा से निर्वहन किया। इसके साथ ही स्वयं को व्यस्त रखने व मानसिक संतुलन बनाये रखने के लिये प्रार्थिनी ने आगे की शिक्षा भी ग्रहण की। प्रार्थिनी को हालात से समझौता करते देख वर्ष 2010 में श्री शंकर मुमुक्षु विद्यापीठ का प्रधानाचार्य भी नियुक्त कर दिया गया। प्रार्थिनी मन से दायित्व का निर्वहन करने लगी थी तो अब उनके असलाहधारी लोगों की निगरानी पहले की तुलना में कम हो गयी और प्रार्थिनी मोबाइल आदि पर इच्छानुसार व्यक्तियों से बात करने लगी। इस बीच प्रार्थिनी ने विवाह कर लिया, जिससे स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती बेहद आक्रोशित हैं, जिसके चलते वह प्रार्थिनी को धमका रहे हैं और उसका बकाया वेतन भी नहीं दे रहे हैं।

प्रार्थिनी ने जब उनसे मोबाइल पर वेतन देने की बात कही तो काफी दिनों तक वह आश्वासन देते रहे, लेकिन बाद में स्पष्ट मना करते हुए धमकी भी देने लगे कि वह उसकी जिंदगी बर्बाद कर देंगे और पति को सब कुछ बताकर वैवाहिक जीवन तहस-नहस करा देंगे, साथ ही चेतावनी दी कि किसी से उनके बारे में चर्चा तक की तो चाहे तुम धरती के किसी कोने में जाकर छिप जाना, छोडेंगे नहीं। आरोप है कि स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती के पास आपराधिक प्रवृति के लोगों का भी आना-जाना है, जिससे प्रार्थिनी उनकी धमकी से बेहद डरी-सहमी है, क्योंकि वह कभी भी कुछ भी करा सकते है। उक्त तहरीर पर एक सप्ताह पर पूर्व एसपी शाहजहांपुर ने एसपी सिटी को मामले की जांच करने के निर्देश दिये, जिस पर आज साध्वी चिदर्पिता ने बयान दर्ज कराये।

गौरतलब है कि स्‍वामी चिन्‍मयानंद सरस्‍वती जौनपुर लोकसभा से भाजपा के सांसद बने तथा केंद्र में गृहराज्‍य मंत्री बनाए गए। तमाम विवादों में भी रहे। साध्‍वी चिदर्पिता के बिल्‍सी से चुनाव लड़ने चर्चाओं के बीच खबर थी कि चिन्‍मयानंद इनसे काफी खफा हैं तथा राजनीति में न जाने का दबाव बना रहे हैं। इसी बीच साध्‍वी चिदर्पिता से बदायूं के जाने माने पत्रकार बीपी गौतम से विवाह कर लिया, जिसके बाद से गुरु एवं शिष्‍या के संबंध काफी तनावपूर्ण हो गए थे। हालांकि इन आरोपों को लेकर तरह तरह की चर्चाएं हैं। कुछ समय पहले तक साध्‍वी और स्‍वामी के संबंध अच्‍छे बताए जा रहे हैं। इधर, इन आरोपों के बाद राजनीतिक भूचाल आने की भी संभावना बढ़ गई है।

इधर शाम को एसपी रमित शर्मा ने प्रेस वार्ता आयोजित कर बताया कि उन्होंने इस मामले में एफआईआर करने के आदेश जारी कर दिये हैं। सदर कोतवाली में धारा 342, 376, 504, 307, 323 व 313 तहत के दर्ज कराया जा रहा है, जिसकी विवेचना कोतवाली प्रभारी को ही दी जा रही है। इस दौरान साध्वी चिदर्पिता ने मीडिया को बताया कि उनकी जान को खतरा है, लेकिन उन्हें कानून और पुलिस पर पूरा विश्वास है, साथ ही न्याय न मिलने तक वह कानूनी लड़ाई जारी रखेंगी। सुरक्षा की दृष्टि से एसपी के निर्देश पर इंस्पेक्टर ने उन्हें शाहजहांपुर की सीमा से बाहर पहुंचाया। एसपी ने बताया कि जांच निष्‍पक्षता से की जाएगी।

वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

इंडिया टुडे से जुड़ेंगे दिलीप मंडल

आईआईएमसी से जुड़े दलित चिंतक एवं लेखक दिलीप मंडल अपनी नई पारी इंडिया टुडे के साथ शुरू करने जा रहे हैं. सूत्रों ने बताया कि वे जल्‍द ही इस मैगजीन के साथ जुड़ रहे हैं. बेबाक ब्‍लॉगर और कई किताबों के लेखक दिलीप फिलहाल आईआईएमसी से संबद्ध हैं. दिलीप मंडल के अपने करियर की शुरुआत नवभारत टाइम्‍स से की थी. इसके बाद दैनिक जागरण, अमर उजाला, जनसत्‍ता, इंटर प्रेस सर्विस के लिए काम किया.

इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में भी दिलीप ने लम्‍बा समय बिताया है. परख न्‍यूज मैगजीन, आजतक, स्‍टार न्‍यूज, जी टीवी, सीएनबीसी आवाज के साथ भी जुड़े रहे. इकोनॉमिक टाइम्‍स ऑन लाइन के संपादक भी रहे. इन दिनों बेब पत्रिकारिता में भी लगातार चर्चा में रहते हैं. इंडिया टुडे के साथ दिलीप की यह दूसरी पारी है.

‘मंत्रालय में उल्लू’ का लोकार्पण

नागपुर : व्यंग्यकार टीकाराम साहू 'आजाद' के ताजातरीन व्यंग्यसंग्रह 'मंत्रालय में उल्लू' (समय प्रकाशन, दिल्ली) के लोकार्पण और समीक्षण के अवसर पर महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने अध्‍यक्षता करते हुए कहा कि व्यंग्य लेखन बेहद गंभीर कर्म है। व्यंग्य के मानी केवल हंसाना नहीं है। बात तो तब है जब व्यंग्य पढ़ते हुए हंसते-हंसते आंखों से आंसू छलक आए। हास्य कवि की भांति व्यंग्यकार की भूमिका मात्र मनोरंजनात्मक नहीं है।

लोहिया अध्ययन केंद्र की ओर से केंद्र के मधु लिमये स्मृति सभागृह में आयोजित समारोह में प्रख्‍यात समाजवादी विचारक और गांधीवादी चिंतक व लेखक रघु ठाकुर ने व्यंग्य संग्रह 'मंत्रालय में उल्लू' का लोकार्पण किया। सुप्रसिद्ध कथाकार से.रा. यात्री विशेष रूप से उपस्थित थे। श्री राय ने कहा कि आजादी के बाद चाहा गया कि एक रोशन ख्‍याल निजाम कायम हो, पर ऐसा न हो सका। हाशिए पर पड़े हुए स्वप्‍न और मोहभंग की स्थिति का अविकल अंकन श्री आजाद की व्यंग्य रचनाओं में है। वे पूरे देश में उपजी निराशा का प्रतिनिधित्व करती हैं। श्री राय ने प्रासंगिक रूप से हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के नागपुर से संबंधों का जिक्र किया। उर्दू के इब्‍ने इंशा को याद किया जिन्होंने सत्‍तर के दशक में पाकिस्तानी समाज की स्थिति पर नुकीली टिप्‍पणियां दी हैं।

पुस्तक की भूमिका लिखने वाले रघु ठाकुर ने चुटकी लेते हुए कहा कि संग्रह का नाम 'मंत्रालय में उल्लू' के बजाय 'उल्लुओं का मंत्रालय' होना था। आजाद की प्रवृत्तिगत विशेषताओं को रेखांकित करते हुए उनका कहना था कि वे समस्या के किसी एक पहलू को उठाकर उस पर प्रहार करते हैं। जैसे एक्‍टर, क्रिकेटर और लीडर ही नहीं, आए दिन भ्रष्ट लोगों के भी बनते हुए मंदिर, प्रधानमंत्री का ख्‍वाब पालते नेता और आतंकवादी हमले की संकटग्रस्त घड़ी में शिवराज पाटिल का तीन बार कपड़े बदलना जैसी अनेक हास्यास्पद विसंगतियां उनके व्यंग्य की गिरफ्त में हैं। व्यंग्य में मात्र चिकोटी काटना पर्याप्‍त नहीं है। समग्र चिंतन को फलक पर रखा जाना चाहिए। आजाद के व्यंग्य 'देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर' को चरितार्थ करते हैं। अपने उपनाम के अनुरूप आजाद में लेखकीय निष्पक्षता है। वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है। चौतरफा व्यंग्यबाण चलाते हैं।

'आजाद' ने अपने मनोगत में कहा कि स्वस्थ समाज की संकल्पना को साकार करना ही लक्ष्य है। उनके व्यंग्यों में निजी नहीं, आम आदमी की पीड़ा का अनुरणन है। देश भर में विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित चुनिंदा 45 व्यंग्यों का यह संग्रह है। समय-समय पर लिखे गए ये व्यंग्य आज भी प्रासंगिक है। डा. ओमप्रकाश मिश्र ने भूमिका निवेदित की। उन्होंने बड़ी शिद्दत से कहा कि आजाद के व्यंग्यों में परिवर्तन की चाह बड़े ही सकारात्मक ढंग से रखी गई है। तमिल कवि मुथ्थु स्वामी ने इस अवसर पर डा. लोहिया पर स्वरचित हिंदी गीतों को सस्वर प्रस्तुत किया। केंद्र के सचिव हरीश अड्यालकर ने केंद्र की गतिविधियों पर प्रकाश डाला।

संचालन व्यंग्यकार राजेंद्र पटोरिया तथा आभार प्रदर्शन डा. गोविंद उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्‍या में प्रबुद्घजन उपस्थित थे जिनमें वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त, इंदिरा किसलय, कृष्ण नागपाल, ओमप्रकाश शिव, मधु पाटोदिया, नरेंद्र परिहार, डा. शशिवर्धन शर्मा 'शैलेश', विश्वास इंदुरकर, जयदीप हर्डीकर, राजेंद्र प्रसाद सिंह 'राज', राजेंद्र मन, उमेश यादव, डा. संतोष मोदी, उमेश शर्मा, कृष्णकुमार द्विवेदी, डा. प्रमोद शर्मा, कमलकिशोर गुप्ता, डा. राजेंद्र मालोकर, जनकराम साहू, अविनाश बागड़े, रमेश उदेपुरकर, विनोद व्यास, अनिल चंदेल आदि का समावेश था। प्रेस रिलीज

प्रशांत भूषण ने अखबार के संपादक को नोटिस भेजा

अन्‍ना टीम के प्रमुख सदस्‍य प्रशांत भूषण ने राजस्‍थान के भिलवाड़ा से प्रकाशित अखबार डायमंड इंडिया के संपादक को लीगल नोटिस भेजा है. प्रशांत अन्‍ना टीम के दूसरे सदस्‍य अरविंद केजरीवाल के वकील के तौर पर यह नोटिस भेजा है. नोटिस डायमंड इंडिया में प्रकाशित एक खबर पर भेजी गई है. खबर में बताया गया है कि अन्‍ना के आंदोलन को आरएसएस का पूरा समर्थन था तथा अरविंद केजरीवाल अंदरुनी तौर पर आरएसएस और भाजपा के संपर्क में थे.

खबर में अरविंद केजरीवाल के सांप्रदायिक होने का आरोप भी लगाया गया है. अखबार ने यह भी लिखा है कि अरविंद मारवाड़ी परिवार से ताल्‍लुक रखते हैं और इनके पिता तथा चाचा आरएसएस से जुड़े रहे हैं. और भी कई आरोप लगाए गए हैं. अखबार के संपादक भंवर मेघवंशी को भेजे गए नोटिस में प्रशांत भूषण ने कहा है कि इसके मिलने के पन्‍द्रह दिन के भीतर अखबार बिना शर्त के माफीनामा प्रकाशित करें. माफीनामा प्रकाशित नहीं करने की दशा में उनका क्‍लाइंट सिविल तथा क्रिमिनल केस करने के लिए बाध्‍य होगा.

लोकपाल से बाहर हो मीडिया : अरविंद

टीम अन्ना के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल ने मीडिया को लोकपाल से बाहर रखने की वकालत करते हुए कहा कि इसके लिए प्रेस काउंसिल सक्षम संस्था है। फिर भी अगर काम नहीं चल रहा है तो उसके लिए अलग से कानून बनाया जा सकता है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि तमाम सामाजिक संस्थाओं और मीडिया में भ्रष्टाचार है। उन्होंने सीबीआई को भी सरकार के नियंत्रण से बाहर रखने की मांग उठाई।

'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के कौशांबी स्थित कार्यालय में मंगलवार को संवाददाताओं से बातचीत में केजरीवाल ने कहा कि सरकार चाहती है कि गांव स्तर की रामलीला कमेटियों, खेलकूद प्रतियोगिता कराने वाली संस्थाओं को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। जबकि सरकारी संस्थाओं को लोकपाल के दायरे में लाना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि उनमें भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर है। समूह ग तक के कर्मचारी भ्रष्ट हैं। उदाहरण के तौर पर एक डाकिया भी अगर गांव में कोई मनीआर्डर, पासपोर्ट लेकर जाता है तो वह उसके बदले में कुछ न कुछ धन अवश्य लेता है। ऐसे भ्रष्टाचार से गरीब तबका पीड़ित है। किसी कार्यालय में की गई शिकायत पर सुनवाई न होने पर उसे बड़े अधिकारी के समक्ष ले जाया जाता है, फिर भी सुनवाई नहीं होती है। इस स्थिति को देखते हुए ब्लाक स्तर पर न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति होनी चाहिए। ताकि न्याय के लिए लोगों को अधिक परेशानी न उठानी पड़े। उन्होंने कहा कि सीबीआइ को सरकार के नियंत्रण से बाहर रखने की जरूरत है। इस जांच एजेंसी का सभी सत्ताधारी दलों ने अपने लिए इस्तेमाल किया है। साभार : जागरण

चेतन आनंद नोएडा एवं गौरव त्‍यागी गाजियाबाद के ब्‍यूरोचीफ बनाए गए

हिंदुस्‍तान, नोएडा से खबर है कि दो ब्‍यूरोचीफों को आपस में बदल दिया गया है. यह बदलाव गाजियाबाद के ब्‍यूरोचीफ चेतन आनंद के खिलाफ रिपोर्टिंग टीम में फैले असंतोष को देखते हुए किया गया है. सूत्रों का कहना है कि चेतन आनंद गाजियाबाद को ठीक से संभाल नहीं पा रहे थे, जिसके चलते उन्‍हें अंतिम चेतावनी देते हुए गाजियाबाद से हटाकर नोएडा का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. यह कार्रवाई उन पर ज्‍यादा निगरानी रखने के लिए की गई है.

वैसे दिलचस्‍प तथ्‍य यह है कि जब संपादक प्रताप सोमवंशी गाजियाबाद का हालचाल लेने वहां पहुंचे थे तब चेतन आनंद किसी रैली को हरी झंडी दिखा रहे थे. कार्यालय आने के बाद उन्‍हें भी हरी झंडी दिखाकर गाजियाबाद से नोएडा भेज दिया गया. वहीं नोएडा के ब्‍यूरोचीफ गौरव त्‍यागी को गाजियाबाद का नया ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया है.

जागरण, बनारस : चीफ सब एडिटर करेंगे जिले में नौकरी, राजाराम का हस्‍ताक्षर से इनकार

दैनिक जागरण, वाराणसी से दो खबरें हैं. शुरुआत करते हैं चीफ सब एडिटर श्‍याम बिहारी श्‍यामल के तबादले की खबर से. श्‍यामल को बनारस से सोनभद्र भेज दिया गया है. यह सजा दी गई है वेबसाइट पर हुई एक गलती के चलते. हालांकि सूत्रों का कहना है कि यह गलती से ज्‍यादा आंतरिक राजनीति का परिणाम है. इसी कारण चीफ सब एडिटर श्‍यामल को सोनभद्र भेजा गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि उन्‍हें प्रभारी बनाकर नहीं बल्कि सोनभद्र के ब्‍यूरोचीफ राकेश पाण्‍डेय का सहयोगी बनाकर भेजा गया है, जो पद में उनसे जूनियर हैं. लिखने-पढ़ने में माहिर श्‍यामल यहां की लॉबी को काफी समय से खटक रहे थे. पहले उन्‍हें सिटी चीफ से डाक पर लाया गया. अब सजा का बहाना बनाकर जंगल-पहाड़ पर लिखा-पढ़ी करने के लिए भेज दिया गया है. गलती तो एक बहाना है.

दूसरी खबर है जागरण के हस्‍ताक्षर अभियान की. यहां पर मशीन विभाग में कार्यरत हेल्‍पर राजाराम ने मजीठिया वेज बोर्ड के चलते चलाए जा रहे प्रबंधन के हस्‍ताक्षर अभियान पर साइन करने से इनकार कर दिया है. यह घटना शनिवार की है. राजाराम इसके पहले भी दैनिक जागरण प्रबंधन को नाको चने चबवा चुके हैं. वे पिछले बीस सालों से जागरण से जुड़े हुए हैं. वे इसके पहले भी लेबर कोर्ट में केस कर चुके हैं. बाद में प्रबंधन ने इस मामले में समझौता कर लिया था. तब से प्रबंधन की मजबूरी बने हुए हैं राजाराम. कुछ समय पहले उन्‍होंने बनारस के मैनेजर अंकुर चड्ढा तथा मशीन इंचार्ज साहू के गाली ग्‍लौज करने के बाद मुकदमा दर्ज करा दिया था, जिसमें काफी बवाल हुआ था. इस बार भी राजाराम ने हस्‍ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया है. उन्‍होंने इसके खिलाफ अपर श्रमायुक्‍त कार्यालय एवं डीआईजी के पास शिकायत भी की है. अब देखना है कि प्रबंधन राजाराम से निपटता है या राजाराम प्रबंधन से निपटते हैं.

वैसे भी दैनिक जागरण के डरपोक-नपुंसक पत्रकारों के बीच में राजाराम के हिम्‍मत की जबर्दस्‍त चर्चा है. बड़े तथा पढ़े-लिखे पत्रकारों ने चुपचाप हस्‍ताक्षर कर दिया वहीं राजाराम ने प्रबंधन से सीधा पंगा ले लिया है. इसके पहले भी जागरण के पत्रकार तीस प्रतिशत अं‍तरिम वाले मामले में चुपचाप साइन कर चुके हैं. इस मामले में तो जागरण के वरिष्‍ठों से लेकर कनिष्‍ठों तक ने प्रबंधन के दबाव में प्रेस क्‍लब की सदस्‍यता से भी इस्‍तीफा दे दिया था, जबकि प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष योगेश कुमार गुप्‍ता पप्‍पू एवं कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी दादा इन पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहे थे. बनारस के डरपोक पत्रकारों के बीच एक सकून देने वाली बात यह है कि पिछले ढाई साल से नौकरी विहीन रहते हुए योगेश गुप्‍ता पप्‍पू एवं मुखर्जी दादा इन लोगों की हर लड़ाई लड़ रहे हैं. बिना अपने वर्तमान एवं भविष्‍य की परवाह किए. फिर भी यहां के पत्रकार न तो खुलकर न ही अंदर से इनके सहयोग के लिए आगे आ रहे हैं.   

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नेटवर्क18 ने बी साई कुमार को सीईओ बनाया, विगनेश न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस में वीपी बने

नेटवर्क18 से खबर है कि सीओओ एवं फोर्ब्‍स इंडिया के पब्लिशर बी साई कुमार को प्रमोट करके सीईओ बना दिया गया है. उन्‍हें हरेश चावला की जगह सीईओ बनाया गया है, जिन्‍होंने कुछ समय पहले इस पद से इस्‍तीफा दे दिया था. श्री कुमार पिछले बारह सालों से नेटवर्क18 के साथ जुड़े हुए हैं. वे पहले वॉयकॉम18 और होमशॉप18 बोर्ड में सदस्‍य पद पर ज्‍वाइन किया था. श्री कुमार के जिम्‍मे स्‍ट्रैटजिक एवं ऑपरेशन मैनेजमेंट होगा. वे ग्रुप की खबरों, वेब, प्रकाशन एवं बिजनेस की जिम्‍मेदारी देखेंगे.

द न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस से खबर है कि विगनेश कुमार ने यहां वाइस प्रेसिडेंट मार्केटिंग के पद पर ज्‍वाइन किया है. इससे पहले वे डीटीएच कंपनी टाटा स्‍काई को अपनी सेवाएं दे रहे थे. विगनेश द न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डाइरेक्‍टर मनोज कुमार संथोलिया को रिपोर्ट करेंगे.

आपरेटरों ने बीबीसी चैनल दिखाना बंद किया

पाकिस्तान में केबल ऑपरेटरों ने बीबीसी के अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनल बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ को 'ब्लॉक' करना शुरु कर दिया है यानी कई शहरों में अब ऑपरेटर अब इस चैनल को नहीं दिखा रहे हैं. संवाददाताओं का कहना है कि पाकिस्तान के अधिकतर शहरों में बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ को देखना संभव नहीं है और संभावना है कि इस प्रतिबंध को बुधवार तक ग्रामीण इलाक़ों में भी लागू कर दिया जाएगा. ऑपरेटरों का कहना है कि ये क़दम बीबीसी की टीवी डॉक्यूमेंटरी 'सीक्रेट पाकिस्तान' को प्रसारित किए जाने के बाद उठाया गया है.

ऑल पाकिस्तान केबल ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने मंगलवार को घोषणा की कि बुधवार से जो भी विदेशी चैनल 'पाकिस्तान विरोधी' कार्यक्रम दिखाएँगे उनको दिखाना बंद कर दिया जाएगा. केबल ऑपरेटरों की संस्था ने पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी (पेमरा) से कहा – "यदि विदेशी चैनल देश के लिए नुक़सानदेह जानकारी प्रसारित करते पाए जाते हैं तो उनके लैंडिंग राइट्स यानी ऑपलोडिंग और प्रसारण के अधिकार रद्द कर दिए जाएँ."

बीबीसी के प्रवक्ता ने कहा, "हम ऐसी हर कार्रवाई की निंदा करते हैं जो हमारी संपादकीय स्वतंत्रता पर अंकुश लगाती है और हमारी निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ सर्विस को जनता तक पहुँचने से रोकती है. हम आग्रह करेंगे कि बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ और अन्य अंतरराष्ट्रीय चैनलों को दोबारा जनता तक पहुँचने दिया जाए." बीबीसी की डॉक्यूमेंटरी 'सीक्रेट पाकिस्तान' में पाकिस्तान की तालिबान के चरमपंथ से लड़ने की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए गए हैं.

अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के अधिकारियों के हवाले से इसमें पाकिस्तान के कुछ लोगों पर आरोप लगाए गए हैं कि एक ओर वे सार्वजनिक तौर पर अमरीका के सहयोगी होने का दावा करते हैं और दूसरी ओर वे ख़ुफ़िया तरीके से अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान के हथियार और प्रशिक्षण देते हैं. ग़ौरतलब है कि हाल में पाकिस्तान में अफ़ग़ान सीमा के पास नाटो सैनिकों के हमले में पाकिस्तान के 24 सैनिकों के मारे जाने के बाद पाकिस्तानी मीडिया में चल रही आलोचनाओं के बीच बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ को ब्लॉक करने का फ़ैसला लिया गया है. साभार : बीबीसी

पेज बनाने के फरमान के बाद रिपोर्टर परेशान

वॉयस ऑफ लखनऊ के रिपोर्टर परेशान हैं. उनकी परेशानी का कारण प्रबंधन का नया फरमान है. प्रबंधन ने रिपोर्टरों को फरमान सुना दिया है कि जिसे पेज बनाना नहीं आएगा उन्‍हें अपनी नौकरी खोनी पड़ेगी. यह फरमान एक दिसम्‍बर से लागू होगा. वैसे ही कम सेलरी मिलने को लेकर पत्रकारों में नाराजगी है, जब से नया फरमान सुनाया गया है तब रिपोर्टर और अधिक तनाव में आ गए हैं. कितने तो नौकरी जाने के डर से रात में आकर पन्‍ना बनाना सीख रहे हैं.

खबर है कि कुछ रिपोर्टर तो इस फरमान के बाद नए ठिकानों को खोजने में लग गए हैं. हालांकि अभी तक किसी को सफलता नहीं मिली है पर अंदरखाने प्रयास जारी है. आफिस में भी पेज बनाने की नोटिस चस्‍पा कर दी गई है. चर्चा यह भी है कि प्रबंधन ने छंटनी का मूड बना लिया है, इसीलिए यह कवायद की जा रही है. साथ ही लोकल पेज किसको बनाने हैं यह भी तय कर दिया गया है. अब देखिए एक दिसम्‍बर के बाद यहां क्‍या होता है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

चप्पल फेंक कर मारने वाली महिला पत्रकार

कलकत्ता से प्रकाशित अंग्रेज़ी दैनिक टेलीग्राफ के दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख शेखर भाटिया थे. वह अखबार के राजेन्द्र नगर गेस्ट हाउस में कभी-कभी बैठक बुलाकर समस्याओं को दूर करते, साथ साथ खाना भी खाते रहते. एक दिन एक महिला पत्रकार तवलीन सिंह ने गुस्से में आकर न जाने किस कारण उन्हें मारने के लिए चप्पल फेंका. इतने में एक पत्रकार उठे जिनका नाम जगमीत उप्पल था. जगमीत उप्पल ने वह चप्पल उठाकर एक प्लेट में रखा और शेखर भाटिया के सामने रख दिया और कहा कि सर यह आपके लिए तवलीन सिंह का तोहफा है.

अभी यह प्रक्रिया चल ही रही थी कि तब तक दूसरा चप्पल आ गया. वह भी उन्हें नहीं लगा. जगमीत उप्पल ने उसे भी प्लेट में रख कर कहा ,'सर आपके लिए.'  एक दिन पत्रकार तवलीन सिंह ने दफ्तर का टाइप राइटर उठाकर दूसरे पत्रकार के ऊपर फेंक दिया था. परन्तु वह उन्हें लगा नहीं. उस पत्रकार ने उस दिन आईएनएस बिल्डिंग के अपने आफिस से भाग कर अपनी जान बचाई थी. नेहरू जी के घरेलू नौकर उमाशंकर दीक्षित की पुत्रवधू शीला दीक्षित उन्नाव से चुनाव लड़ना चाहती थीं. परन्तु उन्नाव से हथकरघा मंत्री जेडआर अंसारी सांसद थे. उसी सरकार में राजीव गांधी के परिवार के एक अन्य सदस्य अरुण नेहरू भी मंत्री थे.

आजकल तो शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं. अरुण नेहरू ने शीला दीक्षित को उन्नाव से टिकट दिलाने की एक नई तरकीब निकाली. अरुण नेहरू की एक महिला परिचित थी. उस परिचित की बेटी मुक्ति दत्ता एक एनजीओ चलाती थी. एक साजिश के तहत अरुण नेहरू और मुक्ति दत्ता की माँ ने मुक्ति दत्ता को केंद्रीय मंत्री जेडआर अंसारी के पास भेजा. मंत्री के पास से जैसे ही मुक्ति दत्ता बाहर आई उसने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मंत्री मेरे साथ बलात्कार करना चाहता था. जब इस पर हो हल्ला मचा तो महिला संगठनों को साथ लेकर मुक्ति दत्ता ने अपना मुंह ढँक कर प्रेस क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस की. प्रेस क्लब का ऊपरी हाल खचाखच भरा था. पत्रकारों के सामने मुक्ति दत्ता ने अपने भविष्य का कार्यक्रम बताया कि कल से हम लोग कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय के सामने धरना देंगे और अंसारी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करवाएंगे.

मुक्ति दत्ता से एक पत्रकार ने कहा कि आपने मुंह क्यों ढँक कर रखा हुआ है. मुंह पर से यह कपड़ा हटाइए तभी तो पता चलेगा कि आप कौन हैं. इतने में पत्रकार तवलीन सिंह जो मुक्ति दत्ता के पास बैठी हुई थीं, उसने कहा कि आप ऐसा करने के लिए इन्हें विवश नहीं कर सकते. मैंने तवलीन सिंह से पूछ लिया कि आप पत्रकार हैं या इनका साथ देने वाली एक्टिविस्ट या इनकी प्रवक्ता? इस पर तवलीन सिंह ने एक चप्पल फेंका जो टाइम्स आफ इण्डिया के ब्यूरो प्रमुख को लगा. वहां पर इस बात पर हंगामा हो गया. हंगामे के बाद कुछ महिलाओं ने तवलीन  सिंह और मुक्ति दत्ता को एक घेरे के अंदर बचाकर बाहर निकाला. यह सब महिलायें अपनी कारों से चली गयीं. इस घटना से जेडआर अंसारी बहुत आहत हुए थे. थोड़े दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गयी.

जगमीत उप्पल ने टाइम्स आफ इण्डिया के संपादक गिरिलाल जैन की बेटी संध्या जैन से शादी कर ली. संपादक की बेटी से शादी के बाद उनका दिमाग सातवें आसमान पर चला गया. जगमीत उप्पल टाइम्स आफ इण्डिया को गवर्नमेंट आफ इण्डिया समझने लगे थे. संपादक का दामाद बन कर वे खुद को ही संपादक समझने लगे थे. वह रात को १ बजे के बाद दारू के नशे में लोगों को फोन कर के गालियाँ देने लगे थे. एक दिन उन्होंने राज्यसभा की तत्कालीन उप सभापति नजमा हेपतुल्ला को भी रात में फ़ोन पर गालियाँ दीं. उनका परिचित एक पत्रकार आईएनएस बिल्डिंग के सामने एक दिन जगमीत उप्पल के बारे में बता रहा था कि जगमीत ने किस तरह से नजमा जी को गालियां दी थीं. दूसरे पत्रकार ने कहा कि इसमें क्या बड़ी बात है. वह तो आजकल किसी को भी रात में फोन करके गाली देता है. उसने तो कल मुझे भी फोन करके गाली दी थी.

लेखक विजेंदर त्यागी देश के जाने-माने फोटोजर्नलिस्ट हैं और खरी-खरी बोलने-कहने-लिखने के लिए चर्चित हैं. पिछले चालीस साल से बतौर फोटोजर्नलिस्ट विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए कार्यरत रहे. कई वर्षों तक फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम किया और आजकल ये अपनी कंपनी ब्लैक स्टार के बैनर तले फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हैं. ''The legend and the legacy : Jawaharlal Nehru to Rahul Gandhi'' नामक किताब के लेखक भी हैं विजेंदर त्यागी. यूपी के सहारनपुर जिले में पैदा हुए विजेंदर मेरठ विवि से बीए करने के बाद फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हुए. विजेंदर त्यागी को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर अभी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीरें खींची हैं. वे एशिया वीक, इंडिया एब्राड, ट्रिब्यून, पायनियर, डेक्कन हेराल्ड, संडे ब्लिट्ज, करेंट वीकली, अमर उजाला, हिंदू जैसे अखबारों पत्र पत्रिकाओं के लिए काम कर चुके हैं. विजेंदर त्यागी से संपर्क 09810866574 के जरिए किया जा सकता है.

सुनील एवं अभिषेक ने हिंदुस्‍तान के साथ नई पारी शुरू की

दैनिक जागरण, इलाहाबाद से खबर है कि सुनील गिरी ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी इलाहाबाद में ही हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. वे काफी समय से दैनिक जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बताया जा रहा है कि संपादकीय प्रभारी से परेशान सुनील ने मौका मिलते ही जागरण को अलविदा कह दिया.

अभिषेक पाठक ने अपनी नई पारी इलाहाबाद में हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें फोटोग्राफर बनाया गया है. इसके पहले वे अमर उजाला तथा राष्‍ट्रीय सहारा को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

पूर्व महिला पत्रकार ने आत्‍महत्‍या की

A 30-year-old assistant manager of Infosys allegedly committed suicide in her house in Geddalahalli on Monday. The deceased has been identified as Smitha Rao, an ex-journalist. Preliminary investigation suggested that she took the extreme step due to harassment by her husband Rohith Anantha Krishna, an employee of Google. The police have taken Rohith into custody for interrogation. A suicide note was not found in the house.

Assistant commissioner of police (KR Puram) Narayanaswamy said Smitha’s mother Padmaja Rao and other relatives alleged that she committed suicide due to harassment by Rohith. “We have registered a case against Smitha’s husband Rohith based on the complaint lodged by her mother. We are investigating the case and will find out the exact reason behind her extreme step,” Narayanaswamy said.

Around 10am, Rohith found Smitha hanging in the house. Smitha was rushed to Columbia Asia Hospital, where she was declared brought dead. The body was shifted to Dr BR Ambedkar Hospital for postmortem before it was handed over to family members. Smitha and Rohith were married four years ago. Smitha had worked with various newspapers in the city before joining Infosys in 2010. She was handling the online content of the company’s website. Courtesy : DNA

मुंबई प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष गुरबीर सिंह गिरफ्तार, आज होगी पेशी

मुंबई से खबर है कि मुंबई प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष गुरबीर सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. गुरबीर के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी होने के बाद पुलिस ने उन्‍हें गिरफ्तार किया है. बताया जा रहा है कि कुछ साल पहले रास्‍ता रोको आंदोलन के दौरान उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था. इस मामले में उन्‍हें कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया गया था. कई सुनवाइयों के बाद भी गुरबीर सिंह सुबुर्बन दिनदोषी की कोर्ट में हाजिर नहीं हुए, जिसके बाद उनके विरुद्ध कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी कर दिया था.

गुरबीर सिंह को पुलिस आज कोर्ट में पेश करेगी. जहां इस मामले में आगे की सुनवाई होगी. नीचे पीटीआई की खबर.

Mumbai(PTI) : Senior journalist Gurbir Singh was today arrested for not appearing before a court in connection with a rasta roko case registered against him a few years ago, police said. "As journalist Gurbir Singh did not appear in a court at suburban Dindoshi, a non-bailable warrant was issued against him," said Additional Police Commissioner Ramrao Pawar. In response to the non-bailable warrant, police today arrested Singh, who is the president of the Mumbai Press Club, he said. Singh will be produced before the court in connection with the case tomorrow.

विश्‍वविद्यालय के कर्मचारी ने की पत्रकार से अभद्रता, मामला दर्ज

आगरा में पत्रकारों के साथ बुरे बर्ताव का सिलसिला जारी है. मंगलवार को हिंदुस्‍तान एक्‍सप्रेस के पत्रकार नीरज सिंह से विश्‍वविद्यालय के कुलपति के यहां तैनात एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ने अभद्रता कर दी, जिसके बाद एकजुट होकर पत्रकारों इसका विरोध किया है. नीरज सिंह किसी खबर को लेकर कुलपति का वर्जन लेने के लिए उनके कार्यालय गए थे. वो कुलपति के बारे में पूछताछ कर ही रहे थे कि यहां तैनात कर्मचारी विनोद अग्निहोत्री ने नीरज के साथ अभद्रता कर दी.

सूचना मिलने पर तमाम पत्रकार कुलपति कार्यालय पहुंचे उन्‍होंने कुलसचिव एवं कुलपति से मिलकर इसकी शिकायत की. पर विश्‍वविद्यालय के इन अधिकारियों ने पत्रकारों की नहीं सुनी तब पत्रकार आक्रोशित हो गए और उन्‍होंने हरिपर्वत थाने में जाकर कुल‍पति एवं दुर्व्‍यवहार करने वाले चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी विनोद अग्निहोत्री के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. गौरतलब है कि आजकल आगरा विश्‍वविद्यालय में हालात बेकाबू हैं. विश्‍वविद्यालय में जमकर धांधली चल रही है, जिस पर अधिकारियों को जवाब देते नहीं बन रहा है. ऐसे ही एक खबर के सिलसिले में नीरज विश्‍वविद्यालय पहुंचे थे, जिस पर उनसे अभद्रता की गई. घटना के बाद कुलपति से मिलने वालों में पवन तिवारी, विशाल शर्मा, राहुल सिंघाई, डीके सिंह, नीरज सिंह समेत कई पत्रकार मौजूद रहे.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आध‍ारित.

फरार नागेंद्र से महुआ ने किनारा किया!

अपनी रसिक मिजाजी के लिए कुख्यात और फिलहाल फरार चल रहे महुआ न्यूज के कथित टेक्निकल हेड नागेंद्र मिश्र की ताजा लोकेशन अब इलाहाबाद बतायी जा रही है। बताते हैं कि लखनउ में हुए बवंडर के बाद से महुआ न्यूज के दिल्ली में बैठे उनके आकाओं की हालत खुद ही पतली हो गयी है. मामले की आग भड़कती देखकर नागेंद्र को आनन-फानन नोएडा से चलता कर दिया गया. आकाओं को डर है कि नागेद्र की नोएडा या दिल्ली में मौजूदगी खुद उनके चेहरे भी झुलसा सकती है.

बहरहाल, ताजा हालातों में नागेंद्र को यह सलाह दी है कि कम से कम अगले 20-25 दिन तक वो भूमिगत ही रहें। उधर खबर है कि नागेंद्र ने खुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि उन्हें इंडिया टीवी वालों ने फंसाया है. नागेंद्र को इंडिया टीवी से महुआ न्यूज लाने वाले उनके आकाओं ने नागेंद्र को अगले कुछ दिनों तक अज्ञातवास पर ही रहने की सलाह दी है. खबरों के मुताबिक नागेंद्र से कहा गया है कि नोएडा या दिल्ली में उनकी मौजूदगी उनके हितैषियों पर काफी भारी पड़ सकती है, इस लिए नागेंद्र को चलता कर दिया गया है. इस बीच उनके संरक्षक इस मामले को रफादफा करने की कोशिशों में जुट गये बताये जाते हैं.

गौरतलब है कि नागेंद्र मिश्र की करतूतों के चलते लखनऊ और दिल्ली के मीडिया जगत में हंगामा उठ खड़ा हुआ है. यूपी पुलिस कई दिनों से उनकी तलाश कर रही है.  पिछले पांच दिनों से नागेंद्र फरार हैं. फरारी ने हंगामे को और भी भड़का दिया है. अफवाहों का बाजार गर्म है और इसकी तपिश में कई और लोगों के चेहरे भी बुरी तरह झुलसते जा रहे हैं. नित नये हो रहे खुलासों में गंदगी और कीचड़ के छींटे कई ऐसे लोगों पर भी पड़ रहे हैं जो अब तक सफेदपोश माने जाते रहे हैं.

वैसे नागेंद्र के करीबियों का कहना है कि नागेंद्र को उनकी रसिक मिजाजी के लिए नहीं, बल्कि इंडिया टीवी से चल रहे पंगे के चलते परेशान किया जा रहा है. इन लोगों का दावा है कि इंडिया टीवी की आईडी नागेंद्र ने वापस नहीं की थी, बस इंडिया टीवी वाले उनसे इसी बात पर खार खाये बैठे हैं, लेकिन इन लोगों के पास इसका कोई भी जवाब नहीं है कि आखिर आईडी जैसी चीज नागेंद्र के पास कैसे आयी और अगर आयी भी तो उसे सात महीने बीत जाने के बाद तक इंडिया टीवी को वापस क्यों नहीं किया गया. सवाल तो यह भी अनुत्तरित ही है कि आखिर इतनी छोटी से बात पर नागेंद्र को फरार होने की क्या जरूरत पड़ गयी. गौरतलब है कि भूपेंद्र नारायण सिंह उर्फ भुप्पी जब नागेंद्र को महुआ में लाये थे, तब तक नागेंद्र इंडिया टीवी में कार्यरत थे.

लखनऊ से केएस की रिपोर्ट.

प्रेस एसोशियेशन का चुनाव और कैसे-कैसे उम्‍मीदवार

नई दिल्ली में पीआईबी के मान्यता प्राप्त पत्रकारों की एक संस्था है, प्रेस एसोशियेशन. बहुत पहले इसके बाकायदा चुनाव हुआ करते थे. आजकल तो एक ही व्यक्ति इस पर जमा हुआ है, चुनाव को अपने हिसाब से मैनेज कर लेता है. बहुत पहले एक बार प्रेस एसोशियेशन के चुनाव के दौरान कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि कल आप प्रेस क्लब आकर प्रेस एसोशियेशन के चुनाव को देखें और हम लोगों को थोड़ा सहयोग करें. मैंने उन लोगों से कहा कि भाई लोगों, मैं तो आपके एसोशियेशन का सदस्य नहीं हूँ. उन्होंने कहा कि इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

मैं उनके द्वारा बताये गए समय पर सीढियां चढ़कर चुनाव स्थल पर पंहुच गया. वहां कुछ लोगों ने बताया कि अध्यक्ष पद के लिए चार उम्मीदवार हैं. माधवन कुट्टी, शैलेन्द्र चटर्जी, राजेन्द्र प्रभु और वीवी बनियाल. बनियाल साहब हिन्दुस्तान टाइम्स में नौकरी करते थे. हाल में बैठे लोगों में से एक ने माइक से मेरा नाम पुकारा और कहा, 'दोस्तों हमारे बीच में त्यागी जी हैं, वह आप लोगों से कुछ बात करना चाहते हैं. उनमें से एक ने मुझे ले जाकर माइक के सामने खड़ा कर दिया और कहा कि आप निःसंकोच अपनी बात कहिये. मैंने कहा कि वैसे तो मुझे आप लोगों के बीच आना नहीं चाहिए था परन्तु जब यहाँ पर आ कर अपनी बात कहने का आदेश हुआ है तो कह देता हूँ.

मैंने आपके चुनाव में अध्यक्ष पद के चार उम्मीदवार देखे हैं. आप लोगों के सामने मैं भी इन सभी का सम्मान करता हूँ. परन्तु शायद आप लोग इन लोगों का बैक ग्राउंड नहीं जानते हैं. इनमें से एक उम्मीदवार शैलेन्द्र चटर्जी हैं. बुज़ुर्ग आदमी हैं. चटर्जी साहब कहते घूमते हैं कि मैं गांधी जी का परिचित हूँ. मैं नोआखाली में उनके साथ था. हमने माना कि साथ थे परंतु जिस दिन यानी ३० जनवरी, १९४८ को गांधी जी की बिरला हाउस में नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या की, उस दिन शैलेन्द्र चटर्जी साहब ने गांधी जी की हत्या की खबर अपनी एजेंसी को क्यों नहीं दी? लोगों का कहना है कि चटर्जी साहब किसी न्यूज़ एजेंसी के लिए काम नहीं करते थे, वे तो ब्रिटिश इंटेलिजेंस एजेंसी के लिए काम करते थे. दोस्तों आप लोग बताएं कि  क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जितायेंगे जैसे कि चटर्जी साहब हैं.

दूसरे उम्मीदवार माधवन कुट्टी साहब हैं. कुट्टी साहब पूर्व रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन के पीए रह चुके है. इनकी पत्नी शैली माधवन और इन्होंने कृष्णा मेनन साहब की खूब सेवा तन और मन से की थी. उन्होंने इन्हें सब कुछ दिया. यहाँ तक कि नई दिल्ली के वसंत विहार में डेढ़ एकड़ का प्लाट भी दिलवाया. इसमें यह एक स्कूल चलाते हैं. विदेशी एम्बैसी के कर्मचारियों से डालर में पैसा लेते हैं. कोचीन में एक फैक्टरी है जो बियर बनती है. अन्य मादक पदार्थ भी बनाती है. माधवन कुट्टी साहब उसके डाइरेक्टर हैं. इनका कुछ धंधा डालर को रूबल में बदलने का भी है. क्योंकि उनकी कोचीन वाली फैक्टरी का मालिक रूस में रहता है. अगर आप देखना चाहते हैं तो उस सुपर स्टार डिस्टिलरी की एनुअल जनरल बाडी की प्रिंटेड रिपोर्ट यह आपके सामने है. मैं यह रिपोर्ट प्रेस एसोशियेशन को उसके रिकार्ड के लिए देता हूँ. क्या आप माधवन कुट्टी को अब भी अपना अध्यक्ष चुनेंगे?

तीसरे उम्मीदवार राजेन्द्र प्रभु साहब हैं. सरकार ने इन्हें भोपाल में एक सरकारी मकान एलाट कर रखा था, उसका इन्होंने किराया नहीं दिया था, जब मध्य प्रदेश सरकार ने किराया वसूलने के लिए दबाव बनाया तो यह भोपाल से दिल्ली भाग आये. जब उगाही के लिए नोटिस दिल्ली आया तो इन्होंने लिखवा दिया कि राजेन्द्र प्रभु की मौत हो गयी. कुछ समय बाद वह अधिकारी दिल्ली आया तो उसने मध्य प्रदेश सरकार की ओर से एक संवाददाता सम्मलेन बुलाया. उसमें राजेन्द्र प्रभु साहब मौजूद थे. उस आईएएस अधिकारी ने अपने जूनियर अधिकारी से राजेन्द्र प्रभु के बारे में जानकारी माँगी और बताया कि रिकार्ड में तो इनकी मौत हो चुकी है. इस खुलासे के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने इनके खिलाफ वारंट जारी किया. फिर मध्य प्रदेश पुलिस इन्हें गिरफ्तार करके दिल्ली से हथकड़ी पहनाकर भोपाल ले गयी थी. मित्रों आप बताइये कि क्या आप ऐसे व्यक्ति को प्रेस एसोशियेशन का अध्यक्ष चुनेंगे.

अब बचे हैं चौथे उम्मीदवार बनियाल साहब. बनियाल साहब पंडित सुखराम से तालमेल रखते हैं. लोग कहते हैं कि बनियाल साहब तत्कालीन संचारमंत्री सुखराम के चमचे हैं. बताते हैं कि   बनियाल कांग्रेसी मंत्री की चमचागीरी इसलिए करते हैं कि बनियाल साहब हिमाचल प्रदेश से चुनाव लड़ना चाहते हैं और सुखराम साहब इन्हें टिकट दिलाने में सहयोग करेंगे. मित्रों चमचागीरी इतना बड़ा अपराध नहीं है. आपको अपना अध्यक्ष तो इन्हीं चारों उम्मीदवारों में से ही चुनना है इसलिए बनियाल साहब कम अपराधी हैं. आप इन्हें ही जिताइये मेरा ऐसा म़त है. शाम को जब परिणाम आया तो बनियाल साहब माला पहने नीचे प्रेस क्लब के बार में आये मुझसे कहने लगे कि गुरु मैं तो जीत गया.

लेखक विजेंदर त्यागी देश के जाने-माने फोटोजर्नलिस्ट हैं और खरी-खरी बोलने-कहने-लिखने के लिए चर्चित हैं. पिछले चालीस साल से बतौर फोटोजर्नलिस्ट विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए कार्यरत रहे. कई वर्षों तक फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम किया और आजकल ये अपनी कंपनी ब्लैक स्टार के बैनर तले फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हैं. ''The legend and the legacy : Jawaharlal Nehru to Rahul Gandhi'' नामक किताब के लेखक भी हैं विजेंदर त्यागी. यूपी के सहारनपुर जिले में पैदा हुए विजेंदर मेरठ विवि से बीए करने के बाद फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हुए. विजेंदर त्यागी को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर अभी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीरें खींची हैं. वे एशिया वीक, इंडिया एब्राड, ट्रिब्यून, पायनियर, डेक्कन हेराल्ड, संडे ब्लिट्ज, करेंट वीकली, अमर उजाला, हिंदू जैसे अखबारों पत्र पत्रिकाओं के लिए काम कर चुके हैं. विजेंदर त्यागी से संपर्क 09810866574 के जरिए किया जा सकता है.

मुख्‍य सचिव करेंगे अमिताभ के आरोपों की जांच, चार माह में देनी होगी रिपोर्ट

: दो सदस्‍यीय खंडपीड ने दिया आदेश : आईपीएस अधिकरी अमिताभ द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव (गृह), विजय सिंह, सचिव, मुख्यमंत्री एवं अन्य पर स्वयं को एक लंबे समय से प्रताडित करने के आरोप लगाते हुए दायर रिट याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच ने यह आदेश निर्गत किया है कि अमिताभ मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को अपने समस्त शिकायतों को बताते हुए एक प्रत्यावेदन देंगे जिस पर मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश चार माह के अंदर अपनी जांच पूरी करेंगे.

जस्टिस डी पी सिंह और जस्टिस एस सी चौरसिया की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि वैसे तो अमिताभ को विभाग का प्रमुख होने के नाते अपना प्रत्यावेदन प्रमुख सचिव (गृह) को देना चाहिए था किन्तु चूँकि मामले में आरोप स्वयं फ़तेह बहादुर पर लगाए गए हैं, अतः प्रशासन के वरिष्ठतम अधिकारी के रूप में मुख्य सचिव इस मामले की जांच करेंगे. आदेश में यह भी कहा गया है कि मुख्य सचिव इस मामले की सुनवाई के दौरान अमिताभ को अपनी बात कहने का मौका देंगे और विपक्षीगण कुंवर फ़तेह बहादुर और विजय सिंह का भी पक्ष सुनेंगे. उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह कहा कि यदि किसी शासकीय कर्मी को किसी प्रकार की कोई शिकायत है तो उसका उचित प्रकार से निस्तारण किया जाना चाहिए और यूँ ही नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए. आदेश में यह भी कहा गया कि यह रिट याचिका भी मुख्य सचिव को दिये गए प्रत्यावेदन का हिस्सा हो. इससे पूर्व याचिकर्ता की ओर से अधिवक्ता अशोक पाण्डेय ने यह कहा कि उनके मुवक्किल को गलत बात नहीं मानने और गलत कार्य नहीं करने की सजा दी जा रही है.

इस रिट याचिका में अमिताभ ने कई ऐसे दृष्टांत दिये हैं जिनमें उन्हें इन अधिकारियों द्वारा जानबूझ कर व्यक्तिगत वैमनस्य के तहत परेशान किया जाता रहा है. इसमें एक प्रकरण उन्हें स्टडी लीव नहीं देने का है जिसमे कैट, लखनऊ और हाई कोर्ट में आठ मुक़दमे दायर करने के बाद उन्हें आईआईएम लखनऊ में अध्ययन हेतु दो सालों का अध्ययन अवकाश मिल सका था. इस मामले में जहां अन्य आईपीएस अधिकारियों के मामले सौ दिनों के अंदर निस्तारित किये गए थे, वहीँ अमिताभ के प्रकरण में कई सालों तक मामले को लटकाया गया था. दूसरा मामला उनके एसपी गोंडा के रूप में निलंबन से सम्बंधित है, जिसमें इन अधिकारियों ने जानबूझ कर मामले को बहुत लंबे समय तक लंबित रखा था और अंत में चुनाव आयोग द्वारा कुंवर फ़तेह बहादुर को प्रमुख सचिव (गृह) पद से हटाये जाने पर मंजीत सिंह द्वारा प्रमुख सचिव (गृह) के रूप में 01 मई 2008 को न्याय करते हुए प्रकरण को तत्काल समाप्त किया गया था.

तीसरे मामले में इनके एसपी देवरिया के रूप में एक जांच के 25 मई 2007 को समाप्त हो जाने के बाद इन अधिकारियों द्वारा उसे विधि के प्रावधानों के विपरीत दुबारा प्रारम्भ किया गया था जिसे कैट, लखनऊ ने वाद संख्या 177/2010 में 08 सितम्बर 1011 के अपने आदेश में विधि विरुद्ध पाते हुए निरस्त करने का आदेश किया था. चौथे मामले में अमिताभ को उनके विरुद्ध कोई जांच लंबित नहीं होने के बावजूद उनको इन्हीं अधिकारियों की शह पर डीआईजी के पद पर नियमानुसार प्रोन्नति नहीं दी जा रही है. इसी तरह उन्हें एसपी रूल्स और मैनुअल के पद पर जानबूझ कर तैनात किया गया जबकि यह अस्तित्वहीन पद है और यह विभाग शासन द्वारा अभी बना तक नहीं है. इसके साथ कई ऐसे उदाहरण भी दिये गए हैं जहां विजय सिंह ने मुख्यमंत्री के नाम पर उनका आदेश बताते हुए कई आदेश कर दिये और उसमें दूसरे मुख्यमंत्री के आदेशों को परिवर्तित कर दिया, जो पूर्णतया नियमविरुद्ध है.

अमिताभ द्वारा अपने सभी मामलों को सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री को 10 जून 2011 एवं 16 अगस्त 2011, मुख्य सचिव को 04 अक्टूबर 2011, प्रमुख सचिव (गृह) को  15 जून 2009, 05 अगस्त 2011, 16 अगस्त 2011 एवं 31 अक्टूबर 2011 एवं पुलिस महानिदेशक को 25 जुलाई 2011 को कई पत्र प्रेषित कर उनके द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच कराने और दोषी पाए गए अधिकारियों को दण्डित करने की मांग की गयी, किन्तु इनमें से किसी पत्र का उत्तर प्रदेश शासन के अधिकारियों द्वारा कोई भी संज्ञान नहीं लिया गया. लिहाजा उन्हें बाध्य हो कर हाई कोर्ट से यह गुहार करनी पड़ी थी.

डॉ. नूतन ठाकुर

कन्वेनर

नेशनल आरटीआई फोरम, लखनऊ

टीसीरीज वालों की गुंडई, गाना बजाने पर भिजवा रहे जेल

टी सीरीज वाले खुद कितने बड़े चोर हैं, यह बालीवुड या संगीत की दुनिया से जुड़ा कोई भी शख्स बता सकता है. दूसरों की धुनें, गाने, लाइनें चुराकर और गायकों-संगीतकारों आदि से लगभग मुफ्त में काम करवाकर अरबपति-खरबपति बने ये टीसीरीज वाले आजकल कापीराइट कानून को लेकर बड़े सजग-सतर्क नजर आ रहे हैं. जो भी इनकी कंपनी से निकले गानों को बजाता मिल जा रहा है, उसे ये पुलिस के जरिए पकड़वाकर जेल भिजवा रहे हैं.

ताजा शिकार बने हैं रेडियो मस्का डाट काम के निदेशक अनिल शर्मा. सूत्रों का कहना है कि टी सीरीज वालों ने पुलिस को अच्छा खासा पैसा खिला रखा है, इसी कारण टी सीरीज वालों की तरफ से शिकायत आते ही पुलिस तत्काल आरोपी को उठा लेती है और कोर्ट में पेश कर रिमांड पर ले लेती है. वैसे अगर आपके घर में कुछ हो जाए, कोई खो जाए, कोई लुट जाए तो पुलिस घंटों तक निष्क्रिय बनी रहती है और कोशिश करती है कि रिपोर्ट न लिखनी पड़े तो ही अच्छा लेकिन टीसीरीज का मामला आते ही पुलिस बड़ी फास्ट भागने लगती है.

इस देश में कापीराइट कानून पर बहस चलाने की जरूरत है. आखिर क्यों किताब, संगीत आदि पर किसी एक कंपनी को जिंदगी भर कमाते रहने की छूट मिलनी चाहिए. इन चीजों को कुछ एक बरस के बाद कापीराइट फ्री कर देना चाहिए. जैसे हवा पानी पर किसी एक का हक नहीं उसी तरह संगीत किताब ज्ञान पर भी किसी एक का हमेशा के लिए हक नहीं बनना चाहिए. पर पूंजी के खेल के इस दौर में चोर उचक्के टाइप के लोग हमारी ही चीजों को चुराकर बेचते हैं और जब हम उसी फ्री में हासिल करना चाहते हैं तो हमें चोर बताते हैं.

टीसीरीज वालों की चोरकटई-गुंडई का मुंहतोड़ जवाब यही हो सकता है कि इनके कारनामों, करतूतों, चोरियों, चिरकुटई का भरपूर खुलासा सभी ब्लागरों-पोर्टलों को करना चाहिए. दूसरे, हर ब्लागर, पोर्टल वाले को अपने अपने अपने यहां टीसीरीज के गानों को जमकर बजाना चाहिए, देखते हैं ये चोर लोग कितने लोगों को गाना बजाने के आरोप में जेल भिजवाते हैं. रेडियो मस्का के निदेशक अनिल शर्मा की गिरफ्तारी के बारे में दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर इस प्रकार है–

रेडियो मस्का डॉट कॉम के निदेशक गिरफ्तार

नई दिल्ली : दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने रेडियो मस्का डॉट कॉम के निदेशक अनिल शर्मा के खिलाफ कापीराइट एक्ट के उल्लंघन का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपी को पटियाला हाउस कोर्ट स्थित एसीएमएम की अदालत में पेश किया। वहां से पुलिस ने उन्हें दो दिन की रिमांड पर ले लिया। टी-सीरीज कंपनी के अध्यक्ष नीरज कल्याण ने पुलिस को रेडियो मस्का डॉट कॉम के संचालक अनिल शर्मा के खिलाफ शिकायत दी थी।

शिकायत में नीरज का कहना था कि रेडियो मस्का डॉट कॉम द्वारा बिना उनकी अनुमति या लाइसेंस के उनकी कंपनी के कैसेट के गानों को प्रसारित किया जा रहा है। यह गतिविधि कॉपीराइट एक्ट के उल्लंघन के दायरे में आती है। आर्थिक अपराध शाखा की पुलिस ने जांच कर अनिल शर्मा के खिलाफ कॉपीराइट एक्ट का मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस ने उसके पास इंटरनेट पर टी सीरीज के गानों की ब्राडकास्टिंग से जुड़ा कुछ सामान भी बरामद किया है।

इस संबंध में टीसीरीज के अध्यक्ष नीरज कल्याण ने बताया कि वे इंटरनेट के माध्यम से होने वाली डिजीटल पायरेसी के खिलाफ विशेष अभियान चला रहे हैं। इससे पहले वे डिजीटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट के मामले में गुरुजी डॉट कॉम, यू-ट्यूब, माईस्पेस डॉट काम इत्यादि कई वेबसाइट के खिलाफ कार्रवाई करा चुके हैं। फिलहाल उन्होंने कॉपीराइट के मामले में दिशांत डॉट कॉम को भी नोटिस भेजा है।

चैनल-अखबार के मालिक कार्तिक की शादी में मीडिया की मैच फिक्सिंग

यशवंत भाई, नमस्कार.. आपको जेसिका लाल हत्‍या मामले में सजा काट रहे मनु शर्मा के भाई की शादी में मीडिया ने किस तरह का खेल खेला, इसकी जानकारी दे रहा हूं. चूंकि ताकतवर नेता के बेटे की शादी थी तो बड़े-बड़े अफसर वहां बेयरे की तरह तीमारदारी की और पांच जिलों की पुलिस हरियाणा के अंबाला में हुई इस शादी की रिसेप्‍शन में तैनात रही. जिसे कि सिर्फ टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने प्रकाशित किया कि पार्टी में मनु शर्मा की पुलिस वालों ने भी खूब‍ तीमारदारी की. और कैसे अफसरों ने खुद को लायल दिखाने के लिए सब्जियों के भगोने तक उठाए.

टाइम्‍स ऑफ इंडिया के अलावा किसी अखबार ने सच नहीं लिखा बल्कि दूसरे अखबारों ने तो शादी की अच्‍छी खबरें लगाने के लिए नेता जी से अच्‍छा खासा विज्ञापन लिया. चूंकि नेता जी इसमें पूरे विधानसभा स्‍तर के हर गांव को न्‍योता दिया लिहाजा सभी गांवों के लोगों को शादी में आने की अपील के साथ विज्ञापन छपा.

अखबारों ने इस बात की भी गारंटी ली कि कोई गलत खबर शादी को लेकर नहीं जाएगी बल्कि शादी की बड़ी सुंदर न्‍यूज लगेगी. पंजाब केसरी और भास्‍कर तो हाथ फैलाकर विज्ञापन मांगा. इन अखबारों के हरियाणा संस्‍करणों में पिछले दिनों की खबरें इसका जीता जागता प्रमाण है. नीचे टाइम्‍स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर.

Ambala cops try to impress Manu Sharma, convict in Jessica Lal murder case

AMBALA: The wedding reception party of Ambala City MLA Venod Sharma's son saw many policemen and district administration officers in attendance in Sector 8, HUDA ground, on Thursday. Many were seen impressing Manu Sharma, a convict in Jessica Lal murder case and son of the MLA.

Police force from five neighboring districts was called a day before the function. The district administration officials left no stone unturned to prove their loyalty towards Sharma and were seen serving in the 'pandal'.

The reception party looked more like a political rally, with thousands of people from every village under Sharma's constituency invited. Even auto-rickshaw drivers and rickshaw-pullers were there.

As the reception began around 11:30 am, everybody was looking for Manu, with many speculating that he might not appear before the public.

But after 2 pm, Manu in a white kurta-payjama reached the VVIP section where a number of VIPs including BJP leader Murli Manohar Joshi and Aasha Hooda, wife of CM Bhupinder Hooda, were having lunch. Police personnel in plain clothes were seen around Manu, praising his humility. On noticing him, a number of old loyalists of Sharma from nearby villages of Ambala hugged him.

Manu too talked in rural dialect to please the rural supporters of his family. When some family loyalists asked about his well-being, he laughed loudly and said, "Mai ek dam changa hun". There were many wanting a picture with him.

Of the district administration officials, SDM Mukesh Ahuja was seen standing at the gate of VIP 'pandal' and district senior sanitary inspector Rishi Raj Gautham was carrying a bowl at lunch stand. Besides, DC Shekhar Vidyarthi and DCP Shasank Anand, too, spent some hours in the 'pandal'. However, the DCP said with many VIPs there, he was present for security reasons.

Joshi, leader of opposition who is related to Sharma, had come along with some of his family members, who were seen talking to Manu.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बढ़ रहे हैं कदम अराजकता की ओर!

पिछले दिनों दिल्ली में था. संसद के शीत सत्र के गरम होने की चर्चाओं के बीच संसद भवन के गलियारों के रंग-रोगन का काम जोर-शोर से चल रहा था. विपक्ष महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को घेरने और हंगामा खड़ा करने की रणनीति में और सत्तापक्ष उसकी काट के उपाय ढूंढने की रणनीति तैयार करने में जुटा था. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी देश के विभिन्न हिस्सों में तकरीबन 7600 किमी की ‘जन चेतना यात्रा’ कर लौट रहे थे. लगा कि इस बार संसद का शीत सत्र गंभीर और उग्र चर्चाओं से वाकई गरम होगा. लेकिन जैसा कि हाल के संसदीय सत्रों में देखने को मिलता रहा है, इस बार भी संसद में हंगामा खड़ा करने के नाम पर संसद की कार्यवाही को ही जाम करने का शुरुआती नजारा देखने को मिला. लगातार चार दिन संसद की कार्यवाही ठप सी रही.

अब यह गिनाने-बताने का कोई अर्थ नहीं कि संसद की एक-एक मिनट की कार्यवाही चलने पर कितनी रकम खर्च होती है और ठप रहने पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई का कितना बड़ा हिस्सा बरबाद हो जाता है. जो सत्ता में होता है, इस तरह के आंकड़े पेश करता है लेकिन विपक्ष में होने पर इसे ही वह अपना सबसे बड़ा संसदीय धर्म और कर्म समझता है. इस बार मुख्य विपक्षी दल भाजपा और उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम का त्यागपत्र होने तक उनके बहिष्कार की घोषणा कर रखी है. कारण, तत्कालीन वित्त मंत्री के बतौर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में कथित तौर पर उनकी भूमिका भी संदिग्ध रही है. लिहाजा भाजपा का तर्क है कि उन्हें पद से हटना चाहिए और नहीं हटने की हालत में उन्हें हटाया जाना चाहिए. लेकिन किसी जांच आयोग अथवा अदालत ने उन्हें दोषी तो नहीं ठहराया है?

तो क्या हुआ, भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर का तर्क सुन लीजिए. वे कहते हैं, ‘‘राजग सरकार में तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस के खिलाफ भी कहां किसी अदालत ने टिप्पणी की थी. उनके खिलाफ कहां कोई मामला दर्ज हुआ था. लेकिन कांग्रेस (तब मुख्य विपक्षी दल) ने संसद में कितने दिनों तक उनका लगातार बहिष्कार किया था.’’ यानी इस मामले में भाजपा और उसके नेतृत्ववाले राजग के लोग कांग्रेस का ही अनुसरण कर रहे हैं. उम्मीद तो थी कि इस बार संसद के शीत सत्र में सुरसाकार महंगाई और अनियंत्रित भ्रष्‍टाचार, देश-विदेश में जमा काले धन, लोकपाल विधेयक आदि के बारे में सार्थक बहस और चर्चाएं होंगी. सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग मिलजुलकर कोई रास्ता निकालेंगे जिससे एक बार फिर वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी को कुछ राहत मिल सकेगी. लेकिन इसके बजाए हमारे राजनीतिक दल एक-दूसरे को नीचा दिखाने और एक दूसरे के विरुद्ध राजनीतिक स्कोर खड़ा करने में ही ज्यादा व्यस्त दिख रहे हैं.

दूसरी तरफ राजनीतिज्ञों के खिलाफ जनाक्रोश तेजी से बढ़ रहा है. 24 नवंबर, गुरुवार को नई दिल्ली में कृषि मंत्री शरद पवार के साथ जो कुछ हुआ उसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता. वह सर्वथा निंदनीय है. लोकतंत्र में अभिव्यक्ति लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी हर किसी को है लेकिन अभिव्यक्ति पर मार-पीट की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती. इससे तो अराजकता ही पैदा होगी जो लोकतंत्र के लिए घातक ही कही जा सकती है. लेकिन चंद रोज पहले दूसंचार घोटाले के आरोप में सजा भुगतने जेल जा रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम और फिर श्री पवार पर हाथ उठाने वाले हरविंदर सिंह को सिरफिरा और सनकी कहकर समस्या को खारिज भी नहीं किया जा सकता.

चिंता की बात यह है कि इस तरह की प्रवृत्ति बढ़ रही है. इससे पहले भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री चिदंबरम, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्‍ण आडवाणी, कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी, सुरेश कलमाणी पर जूता-चप्पल उछाले जा चुके हैं. यहां तक कि भ्रष्‍टाचार और कालेधन के विरुद्ध जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का आंदोलन चला रहे गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की टीम के सदस्यों-प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल के साथ भी हाथापाई हो चुकी है. जो लोग महंगाई के नियंत्रित नहीं होने पर जनता के हिंसक होने की भविष्‍यवाणियां कर रहे हैं और जो लोग जाने-अनजाने शरद पवार के गाल पर पड़े थप्पड़ को जायज ठहराते हुए उसे अपर्याप्‍त घोषित करने वाले बयान जारी करने के बाद सफाई दे रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह की बह रही प्रवृत्ति से कोई अछूता नहीं रह सकेगा. आज जरूरत इस बात के गंभीर विवेचन की है कि इस तरह की घटनाएं किसी के साथ भी क्यों हो रही हैं. क्या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की गुंजाइश नहीं रही.

इसके साथ ही संसदीय लोकतंत्र के सभी स्तंभों को संचालित करने वालों को भी अपनी भूमिका के बारे में भी गंभीरता से विवेचन करने की आवश्यकता है कि वे अपने दायित्वों का निर्वाह जिम्मेदारी और जवाबदेही के साथ कर रहे हैं? खासतौर से सरकार चलाने वालों को चाहे महंगाई हो अथवा भ्रष्‍टाचार, महज परिस्थितियों का विवेचन करने, एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने के बजाय अपनी सरकार और मंत्रालयों के द्वारा किए जा रहे ऐसे ठोस उपायों के बारे में बताना होगा, जिससे इन पर नियंत्रण पाया जा सके, जनता के दुख दर्द को कम किया जा सके. कई बार तो हमारे माननीय मंत्रियों के बयान भी आम जनता के दुख-दर्द पर मरहम लगाने के बजाय उन पर नमक छिड़कने, उनको मुंह चिढ़ाने और उन्हें डरानेवाले जैसे भी लगते हैं. अगर ऐसा ही चलते रहा तो देश को अराजकता की अंधी सुरंग में जाने से रोकने में भारी कठिनाई हो सकती है.

लेखक जयशंकर गुप्‍त जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार एवं लोकमत समाचार के कार्यकारी संपादक हैं.

गोरखपुर में शर्मिष्‍ठा शर्मा ने ली आई-नेक्‍स्‍ट वालों की क्‍लास

: दैनिक जागरण, बरेली में साइन करने को लेकर मामला गरम, कई ने किया इनकार : आई-नेक्स्ट, लखनऊ की एडिटर व अन्य यूनिटों की कोआर्डिनेटर शर्मिष्‍ठा शर्मा ने अपने 26 एवं 27 नवम्‍बर के गोरखपुर दौरे के दौरान आई-नेक्स्ट अखबार की कार्यप्रणाली को देखा. जागरण में मजीठिया वेज बोर्ड लागू ना करने की कवायद के तहत पहले ही आई नेक्‍स्‍ट के कर्मचारियों से साइन कराया जा चुका है. कर्मचारियों के असंतोष को देखते हुए उन्‍हें समझाने या पुचकारने की बजाय शर्मिष्‍ठा ने जमकर हड़काया. काम ठीक से करने की नसीहत भी दी. और कहा कि अब किसी का इंक्रीमेंट नहीं होगा. सभी का इंक्रीमेंट और प्रमोशन अप्रैल माह में किया जाएगा.

खबर है कि उन्‍होंने कई लोगों का इंटरव्‍यू भी लिया. इसमें दो लोगों को फाइनल किया गया है. एक ले आउट में तथा एक संपादकीय में. संपादकीय में आने वाला बंदा अभी अमर उजाला काम्‍पैक्‍ट को सेवाएं दे रहा है. हालांकि अभी तक किसी ने ज्‍वाइन नहीं किया है, पर माना जा रहा है कि औपचारिकताएं पूरी होने के बाद कम से कम ये दो लोग तो आई नेक्‍स्‍ट ज्‍वाइन कर ही लेंगे. अन्‍य लोगों के बारे में आगे सोचा जाएगा.

इधर, बरेली से सूचना है कि जागरण के हस्‍ताक्षर अभियान पर कुछ पत्रकारों ने साइन करने से मना कर दिया है. हालांकि कितने पत्रकार इस प्रोफार्मा पर साइन से इनकार किया है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. पर बताया जा रहा है कि यहां पर माहौल काफी गरम है. कुछ कर्मचारी बगावत के मूड में बताए जा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि विरोध भी बच बचाकर किया जा रहा है. कुछ लोग पीछे के रास्‍ते से कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की कोशिश में भी लगे हुए हैं.

हिंदुस्‍तान के समाचार संपादक कर रहे हैं जिले में नौकरी!

हिंदुस्‍तान, कानपुर में अपनी-अपनी नौकरी बचाने को लेकर हड़कम्‍प मचा हुआ है. प्रबंधन ने आला अफसरों को अखबार सुधारने के लिए लाइन पर लगा रखा है. सूत्रों का कहना है कि अगर जल्‍द हालात नहीं सुधरे तो कुछ लोगों की छुट्टी भी हो सकती है. पिछले दिनों दिल्‍ली एवं लखनऊ से एचएमवीएल के आला अधिकारियों ने अखबार की गुणवत्‍ता पर नाराजगी जताई थी. बताया जा रहा है कि इसके लिए न्‍यूज एडिटर अंशुमान तिवारी को जिम्‍मेदार माना गया.

खबर है कि इसके बाद से ही अंशुमान तिवारी अखबार के कंटेंट को सुधारने को लेकर परेशान हैं. वे पिछले चार दिन से औरैया में डेरा डाले हुए हैं. वो रोज सुबह नौ बजे ऑफिस पहुंचकर यहां के रिपोर्टरों को निर्देश दे रहे हैं तथा काम करने का सलीका सिखा रहे हैं. इसके पहल भी वो एक-दो जिलों में अपना डेरा डंडा जमा चुके हैं. इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब न्‍यूज एडिटर औरैया में डेरा जमाए हैं तो उनकी जिम्‍मेदारी कौन निभा रहा है. वैसे भी तमाम कवायद के बाद भी कानपुर में अखबार की हालत बद से बदतर होती जा रही है.

कानाफूसी कटेगरी के लिए.

आईपीओ लाकर बाजार से दस अरब डॉलर जुटाएगी फेसबुक

न्यूयार्क : अमेरिकी मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार सोशल नेटवर्किंग इंटरनेट वेबसाइट फेसबुक अप्रैल और जून, 2012 के बीच अपना प्रथम सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने का विचार कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार शेयर बेचकर बाजार से 10 से 12 अरब डालर की पूंजी जुटाने की उसकी योजना है। अखबार वालस्ट्रीट जर्नल की रपट के अनुसार, फेसबुक के अंदर इस समय चर्चा चल रही है कि इस निर्गम के लिए प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (अमेरिकी शेयर बाजार नियामक) के सामने आवेदन पेश करने का समय क्या रखा जाए। रिपोर्ट के अनुसार कंपनी का इरादा अप्रैल-जून 2012 के बीच बाजार में उतरने का है।

इस मुद्दे के जानकार सूत्रों के हवाले से अखबार ने कहा है कंपनी को उम्मीद है कि बाजार में उसकी हैसियत कम से कम 100 अरब डालर की आंकी जाएगी। सूत्रों के अनुसार फेसबुक के संस्थापक और मुख्यकार्यकारी मार्क जुकरबर्ग ने अभी आईपीओ के बारे में कोई अंतिम निर्णय नहीं किया है। उन्होंने इससे पहले कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने के बारे में अपनी अनिच्छा प्रकट की थी। रिपोर्ट के अनुसार फेसबुक के प्रवक्ता लैरी यू ने कहा कि हम आईपीओ के बारे में की जा रही अटकलबाजियों में शामल नहीं होना चाहते। फेसबुक को इस समय 80 करोड लोग इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें से 50 करोड़ लोग रोजाना इसका इस्तेमाल करते हैं। साभार : एजेंसी

बिग बॉस का प्रदर्शन बंद करने के लिए कोर्ट में याचिका

जोधपुर : कलर्स चैनल पर दिखाए जा रहे सीरियल बिग बॉस के निर्माताओं व कलाकारों के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसका प्रदर्शन बंद करने की गुहार की गई है। याचिका में सीरियल में कथित रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग करने व कलाकारों की अश्लील हरकतों पर ऐतराज जताते हुए इसे समाज विरोधी व लोगों की भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाया गया है।

याचिकाकर्ता आसित त्रिवेदी व दिनेश कलवाणी की ओर से अधिवक्ता मनोज बोहरा ने याचिका में बताया है कि वाई कॉम 18 मीडिया प्रा. लि की ओर से प्रस्तुत किए जा रहे इस सीरियल में कनाडा की पॉर्न स्टार सन्नी लियोन को भी शामिल किया गया है। उसकी हरकतों व संवादों को परिवार के सदस्यों के साथ बैठ कर नहीं देखा जा सकता। बोहरा ने बताया कि याचिका की सुनवाई शीघ्र ही हाईकोर्ट में होगी। साभार : भास्‍कर

महुआ ने शत्रु से भी की ठगी, नहीं दिया केबीसी भोजपुरी का मेहनताना

प्रसिद्ध अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने सिने एंड टीवी कलाकार संघ (सिंटा) में महुआ चैनल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उनका अरोप है कि चैनल ने 'कौन बनेगा करोड़पति' शो के भोजपुरी संस्करण का संचालन करने के लिए उनके मेहनताना की रकम अदा नहीं की है। मुहआ चैनल पर प्रसारित हुए प्रसिद्ध शो कौन बनेगा करोड़पति के भोजपुरी संस्करण का संचालन शत्रुघ्न ने ही किया था।

सिंटा के महासचिव धर्मेश तिवारी ने बताया कि शत्रुघ्न ने शिकायत दर्ज कराई है। अब संघ ने चैनल को सात दिन का समय दिया है। अब तक चैनल द्वारा कोई जबाव नहीं दिया गया है। बताया जाता है कि शत्रुघ्न ने शिकायत दर्ज कराने से पहले चैनल से भी बात की थी। शत्रुघ्न के अलावा शो में मेहमान के तौर पर आयी हेमा मालिनी, धर्मेंद्र, सोनाक्षी सिन्हा और गोविंदा जैसे कलाकारों को भी उनके द्वारा जीती हुई रकम अदा नहीं की गई है। यह राशि परमार्थ के लिए घोषित की गई थी।

तिवारी ने बताया कि फिलहाल सिन्हा ने ही इस मामले में उनके पास शिकायत दर्ज कराई है। तिवारी का कहना है कि नियमों के अनुसार चैनल को अब सात दिन का समय दिया गया है और यदि सात दिन की अवधि के भीतर चैनल की तरफ से कोई जवाब नहीं आता है तो उनको पुन: सूचना भेजी जाएगी। साभार : एजेंसी

वरिष्‍ठ पत्रकार गीत दीक्षित ने प्रदेश टुडे ज्‍वाइन किया

मध्‍य प्रदेश के वरिष्‍ठ पत्रकार गीत दीक्षित अब प्रदेश टुडे से जुड़ गए हैं. उन्‍होंने भोपाल में ज्‍वाइन किया है. अपने दो दशक के करियर में गीत कई अखबारों के संपादक रहे हैं. पत्रकारिता एवं राजनीति में समान पकड़ रखने वाले गीत क्रिकेट के अच्‍छे खिलाड़ी भी हैं. स्‍वदेश से करियर की शुरुआत करने वाले गीत दीक्षित इसके बाद नवभारत जबलपुर को भी अपनी सेवाएं दी. इसके बाद वे भोपाल में दैनिक जागरण से जुड़ गए.

अग्निवाण के इंचार्ज एडिटर रहे. पीपुल्‍स समाचार में भोपाल तथा जबलपुर के संपादक का दायित्‍व निभाया. राज एक्‍सप्रेस में भी जबलपुर और इंदौर में संपादक रहते हुए उन्‍होंने अखबार को एक अलग पहचान दी. गीत दीक्षित एमपी की सीएम रहीं उमा भारती के मीडिया सलाहकार भी रहे. उमा भारती के भाजश पार्टी के मीडिया प्रभारी का दायित्‍व भी निभाया. वह भोपाल में पत्रकारों के क्रिकेट टीम के कैप्‍टन भी रहे हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने के लिए इन्‍हें लगभग डेढ़ दर्जन पुरस्‍कार भी मिल चुके हैं.

इन्हीं कागजातों पर जागरणकर्मियों से कराया जा रहा है हस्ताक्षर

ये उस कागज़ की मोबाइल से ली गई तस्वीरें हैं, जिस पर दैनिक जागरण वाले मजीठिया बोर्ड के खिलाफ ज़बरन हस्ताक्षर करवा रहे हैं. हस्ताक्षर न करने वाले कर्मचारियों को धमकाया जा रहा है. धमकी के ऑडियो को भी इकट्ठा कराया जा रहा है. शायद जल्द आ जाए. फिलहाल तो हस्ताक्षर कराए जाने वाले कागजों की फोटो देखें. इन कागजों पर साइन न करने वालों के लिए भी अलग से कागज़ बनाया गया है, जिस पर साइन कर देने को इस्तीफा माना जाएगा।

इस मुद्दे पर तो बैंड बज जानी चाहिए दैनिक जागरण की। लेकिन अपन लोगों के देश में नियम-कानून गरीबों व देहातियों के लिए होते हैं। लोकतंत्र का मतलब अब अमीरतंत्र होने लगा है। है किसी माई के लाल में दम जो जागरण प्रबंधन को इस कुकृत्य के लिए जेल की सजा खिलवाए!

पहलवान को पटखनी देकर भी क्यों रो रहे हैं कांडा!

: कांग्रेस को काँटा बन के चुभने लगे हैं कांडा : जूता विक्रेता से जहाज़ कंपनी के मालिक, निर्दलीय विधायक और फिर फटी में पच्चर की तरह हरियाणा की लुंज पुंज सरकार में गृह (राज्य) मंत्री हो गए गोपाल कांडा अब कांग्रेस को कांटे की तरह चुभने लगे हैं. पहले हरियाणा की राजनीति में उनका अतीत, वर्तमान और भविष्य जान लें फिर बताते हैं कि कांग्रेस को वे आज किस भाव पड़ रहे हैं.

कांडा ब्रदर्स, गोपाल और गोबिंद बनियों की बेहतरीन संतानों में से दो हैं. जूते की दूकान से छोटा मोटा कारोबार करते सिरसा के बाज़ार से उठे दोनों भाई भारत के आकाश पर एम.डी.एल.आर. बन के उड़े. नेता उन्हें हमेशा डराते रहे. वैसे ही जैसे किसी भी कारोबारी को डराते हैं. ख़ास कर उनको जो बहुत महत्वाकांक्षी हों. खुद के भीतर राजनीति में आने की ललक तभी आई होगी. और वो आई तो एक ऐसे मौके पर कि जब सिरसा पर सालों साल राज करने वाले लछमन दास अरोड़ा थक और बुढ़ा चुके थे. चौटाला का गढ़ माने जाने वाले सिरसा में कांग्रेस अरोड़ा के बुढ़ाने से पैदा हुई रिक्तता को भरने के चक्कर में हम नहीं तो कोई नहीं तर्ज़ गाते कांग्रेसियों से कलुषित हुई पड़ी थी. ऐसे में गोपाल कांडा निर्दलीय के रूप में बाज़ी मार गए. शायद इस लिए भी कि चौटाला उनके भी जीत सकने से बेफिक्र कांग्रेस की ही काट करते रह गए. या कहिये कि सिरसा से सांसद रहे उनके ही डा. सुशील इंदौरा ने उनसे टिकट न मिलने का बदला लिया. कांडा जीत गए. और ऐसे माहौल में जीते कि जब कांग्रेस की नब्बे के सदन में कुल चालीस ही सीटें आईं.

समीकरण कुछ यों बना कि कांग्रेस 40, इंडियन नेशनल लोक दल एक सहयोगी अकाली सहित 33, कुलदीप बिश्नोई की जनहित कांग्रेस छह, भाजपा चार और निर्दलीय सात. भाजपा ने इनेलो को विधानसभा चुनाव से ऐन पहले मंझधार में छोड़ा फिर भी कुलदीप का साथ नहीं दिया. अगर कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए भाजपा चार विधायकों का सहयोग दे भी दे तो कुलदीप के मिला कर भी कुल 43. अध्यक्ष के लिए एक विधायक जोड़ कर देखें तो पूरे 45 दिखने के लिए भी कम से कम तीन निर्दलीय और चाहियें. कांग्रेस ने सातों निर्दलीयों की किसी न किसी मजबूरी का फायदा उठाया. उन्हें साथ लेकर सरकार बना ली. मुंह माँगा देना पड़ा. किसी भी राज्य में गृह और उद्योग दो बड़े मंत्रालय होते हैं. कांडा ने दोनों लिए. गृह उन्हें इस लिए भी चाहिए था कि असल में तो इनेलो के गढ़ में अमन, चैन और सुरक्षा से रह सकें.

शुरू में सोचा कांग्रेस ने ये था कि जनहित कांग्रेस को छोड़ कर आये पाँचों विधायकों और दो तीन दूसरे निर्दलीय विधायकों के सहारे सरकार चला ले जाएगी. कांडा से एक तरह से मुक्ति पा लेना उसके दिमाग में था. लेकिन पाँचों जनहित कांग्रेसियों के खिलाफ हाई कोर्ट में दलबदल याचिका और उस पर तेज़ी से सुनवाई वाले रुख से कांडा जैसों की धौंस झेलना कांग्रेस की नियति हो गई. सिरसा से सांसद हुए कांग्रेसी अशोक तंवर कांडा को कतई नहीं सुहाते. ऐसा वो मानते, कहते ही नहीं दिखाते भी हैं. बल्कि एक दफे सी.एम. को सिरसा बुलवा कर कोई दर्जन भर शिलान्यास करा रहे थे कांडा. इस जिद के साथ कि सांसद को नहीं बुलाएंगे किसी भी फंक्शन में. संचार की आवाज़ से भी तेज़ रफ़्तार वाले इस दौर में ये जानकारी पहुंची दिल्ली. तंवर राहुल गाँधी की मर्ज़ी से कांग्रेसी उम्मीदवार बने थे. दिल्ली से फटकार लगी. हुड्डा को कहना ही पड़ा कि तंवर नहीं आएँगे तो शिलान्यास भी नहीं होंगे. भीड़ जुटा चुके थे कांडा. फंस गए. जाना, मनाना और बुलाना पड़ा तंवर को. मगर शिलान्यास कर मुख्यमंत्री के जाते ही कांडा ने अपनी मंत्री वाली कार सरकारी गेस्ट हाउस पे खड़ी करवा दी. अपने गनमैन भी छोड़ दिए. सरकार के हाथ पाँव फूल गए. खबरें छपीं. खूब किरकिरी हुई. कांडा कोई हफ्ता भर चक्करघिन्नी खिला कर दफ्तर आये. कांग्रेस की हालत देखने लायक थी. पार्टी के सयानों ने कहा सब्र करो. मौका आने का इंतज़ार करो. पार्टी के पास भी बड़ा दिमाग है. वो कनिमोज़ी के जेल जाने और जमानत तक न मिल पाने से पैदा हुई मानसिक स्थिति में भी करूणानिधि को हिलने नहीं देती. न पेट्रोल की कीमतों या विदेशी निवेश पे ममता बनर्जी को. कांग्रेस से बगावत करने वालों के लिए एक मिसाल जगन रेड्डी भी हैं. कांडा तो जगन रेड्डी भी नहीं हैं.

खबर ये है कि अब गोपाल कांडा के भाग निकलने के रास्ते बंद किये जा रहे हैं. खासकर उनकी सांसद अशोक तंवर से हाथापाई की हिमाकत के बाद. कांडा और तंवर के बीच की खुंदक मारपीट की हद तक पंहुच गई है और ये मुख्यमंत्री हुड्डा की मौजूदगी में हुई. आपको ये भी बता दें कि कांडा ने तंवर को मारा क्यों? कांडा को मलाल है कि रतिया विधानसभा उपचुनाव की एक सभा में उनके मौजूद होने के बावजूद न उन्हें बोलने दिया तंवर ने, न उनके भाई गोबिंद कांडा को मंच पे बैठने ही दिया. इसकी सारी रिपोर्ट हाईकमान को पंहुची है. और वो इसे गंभीरता से ले रहा है. विचारने को विचार कांग्रेस ने इस पर भी किया है कि कांडा से मंत्रालय छीन लेने के बाद वे क्या कर सकते हैं. जहां तक इस विकल्प की बात है तो कांग्रेस को कोई फ़िक्र नहीं है. वो तब हो जब कांडा इधर छोड़ के कहीं और जा सकने की हालत में हों. वैसा कुछ है नहीं. कांडा को होने जा रहे पांच राज्यों के चुनावों के बाद हटाया जा सकता है. कांग्रेस ये मान के चल रही है कि कांडा अगली बार जीत नहीं पाएंगे. उनको कांग्रेसी उम्मीदवार के रूप में पेश करना भी कांग्रेस नहीं चाह रही. उसे लगता है कि इस से उसके परंपरागत वोटर नाराज़ होंगे. पुराने कांग्रेसियों में बगावत भी हो सकती है.

सो, कांडा आज भले ही कांग्रेस को नाकों चने चबवा रहे हों. उनका राजनीतिक भविष्य कोई बहुत उज्जवल दिखाई नहीं दे रहा. उनके शहर सिरसा में लोग एक मिसाल देते हैं. कहते हैं एक कमज़ोर ने पहलवान को पटक लिया और ऊपर बैठ के जोर जोर से रोने लगा. लोगों ने पूछा इतने बड़े पहलवान को पटखा है तूने तो, खुश होने की बजाय रो क्यों रहा है? वो बोला, गिर तो गया है दरअसल ये एक तुक्के से. लेकिन अब जब उठेगा तो मारेगा बहुत. सिरसा में लोग कहने लगे हैं कि कांग्रेस कांडा को पालेगी नहीं और उसने छोड़ा तो चौटाला छोड़ेगा नहीं. जब सब ये कह रहे हैं तो लग कहीं न कहीं खुद कांडा को भी रहा है. उन्हें अब राजनीति के बाद सुरक्षा का एक आवरण चाहिए. सो वे न्यूज़ चैनल लाये हैं. उसपे हर दूसरे मिनट खुद उनकी कोई खबर या स्ट्रिप चलती है.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहने के बाद इन दिनों न्यू मीडिया में जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम समेत कई पोर्टलों के जरिए सक्रिय हैं. इनसे संपर्क journalistcommunity@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

इंडिया न्यूज और आज समाज में शीर्ष स्तर पर जिम्मेदारियों में बदलाव, मेल जारी

एक दिसंबर से इंडिया न्यूज चैनल और आज समाज अखबार में कामकाज में विभाजन कर दिया गया है. इस दिन से रवीन ठुकराल इस समूह के हिस्से नहीं रहेंगे. वे द ट्रिब्यून ज्वाइन करेंगे. तब इंडिया न्यूज चैनल और आज समाज अखबार में काम कौन देखेगा, इस बाबत एक विस्तृत आंतरिक मेल जारी कर दिया गया है.

इस मेल की खास बात है को राहुल देव का कहीं कोई नामोनिशान तक नहीं है. आज समाज अखबार के कार्यविभाजन में भी राहुल देव का नाम नहीं है. इससे इस कयास को बल मिलता है कि राहुल देव की प्रत्यक्ष तौर पर अब कोई भूमिका इस समूह में नहीं रह गई है. वे सिर्फ मालिकों की दया पर एक एक दिन गिन रहे हैं. नए बदलाव में कार्तिक शर्मा, जिनकी शादी अभी हाल में ही हुई, को चैनल व अखबार की कमान सीधे तौर पर दे दी गई है. चैनल में तीन चार लोग मिलकर अलग अलग फ्रंट पर काम देखेंगे और सीधे एमडी कार्तिक शर्मा को रिपोर्ट करेंगे. उसी तरह अखबार में तीन चार लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है. पूरी मेल इस तरह है–

URGENT : Work Flow for ITV and Aaj Samaj (Ambala and Hissar) : w.e.f Dec 1, 2011 : In the absence of Mr Raveen Thukral Editor in Chief, all channel heads –Mr Ram (Rajasthan); Mr Israar (Haryana) and; Mr Rohit (Bihar) – will report directly to the MD. All mails for approval will be sent to new mail ids – edit.mdoff@itvnews.tv  and edit.mdoff@gmail.com.

The channel heads will be directly responsible for the working and performance of their individual channels and their respective staff would be reporting to them for all administrative matters including leave. Long leave will have to be recommended to the MD (at above ids) for approval. The channel heads, in consultation with the MD, will decide the day-to-day important coverage and seek advise/approvals on the above-mentioned mail ids.

For proper co-ordination and accountability, it’s necessary that the senior staffs stick to the responsibilities assigned to them and do not interfere in the affairs of the other channels/functionaries. All regional channels must finalise their evening Prime Time topics by 3 PM and a mail for the same has to be sent to the MD at the above-mentioned ids.

India News National

The working of India News National will be co-ordinated by a committee of four people – Dharmender Tripathi and the three channel heads, Ram, Rohit and Israar. Editor News Rajiv Ranjan Nag will be involved in deciding the topics for IPT discussion and the political coverage of the Delhi reporting and bureau teams. Entertainment would be looked after by Israar. National Assignment will report to Ram. National Output will be reporting to Dharmender Tripathi.

Conduct of morning and Evening Editorial Meetings

All channel heads; assignment heads of individual channels, Editor News and representatives from output, sports, crime and entertainment must ensure their presence at the morning and evening editorial meetings. The committee members will discuss important stories finalised for the day with MD and the topics for IPT discussions will be also finalised in a similar manner. The time for morning meetings will be 10 AM and it must commence under any circumstances by 10.15 am. The evening meeting will be held by 3.30 PM.

Programming

Programming department will coordinate their working with the editorial committee of the national. Mithelesh, who is presently looking after the working of the programming department, will continue to do so in consultations with the editorial committee.

Promos

For day-to-day functioning, the promo department will coordinate with the respective channel heads and national editorial committee.

Recruitment Panels

The standard procedure for recruitment will be a test (for all junior and middle level appointments) followed by a panel interview and then the final decision in consultations with the MD

A panel of four people – Dharmender Tripathi, Israar, Rohit and Ram- will conduct output recruitments.

A panel of five people – Dharmender, Ram, Jyoti, Rohit and Israr- will conduct assignment recruitments.

A panel of four people – Ram, Dharmnder, Rajiv Nag and Rohit – will conduct reporters recruitment.

A panel of four people – Rohit, Shilpa, Dharmender and Ram

Recruitment of interns – all approvals for interns will be obtained on mail from edit.mdoffice. HR will not entertain any recruitment of interns without the approval.

These panels will be reconstituted after three months.

Aaj Samaj (Ambala and Hissar)

Similarly wef Dec 1, 2011, Chandigarh’s Haryana and Punjab bureaus, including Political Editor, will report to Sr. Assocaite Editor, Sanjiv Shukla, for all editorial and administrative (including leave) affairs. Sanjiv Shukla will be reporting directly to the MD. All communication, including PDFs of all page 1 for approval, have to be sent to the mail ids – edit.mdoff@itvnews.tv and edit.mdoff@gmail.com The units will continue to function independently of the Delhi edition.

Content Editor, Deputy News Editor and all Chief subs, will report to Sanjiv Shukla.

Executive Editor, Ajay Shukla, will continue to coordinate the functioning of Chandigarh Aaj samaj staff and will be the link for all editorial matters between Chandigarh office and Ambala. He will also report directly to the MD on mail ids edit.mdoff@itvnews.tv and edit.mdoff@gmail.com..

Rajshekhar Mishra will continue to handle the weekly pull-outs in consultation with Sanjiv Shukla and Ajay Shukla. He will also continue to assit Sanjiv Shukla on any matter concerning the desk and editing.

Chander Sharma – will continue to send daily review on the above mentioned IDs and will report to Sanjiv Shukla.

Recruitments

The standard procedure for recruitment will be a test (for all junior and middle level appointments) followed by a panel interview and then the final decision in consultations with the MD

Desk Recruitments- Panel will comprise of Sanjiv Shukla, Ashutosh and Rajshekhar.

Reporters Recruitment (for all editions under Ambala and Chd)– Sanjiv Shukla, Ajay Shukla and Sanjay Tyagi.

This issues with the approval of MD.

For strict compliance.

Thanks.

Dr Umakant Mishra
Director HR
ITV & GMI

पोल खोलने वाले पत्रकारों का हो रहा पुलिसिया उत्‍पीड़न

: मनपावृत्‍त स्‍नेह सम्‍मेलन में पत्रकारों ने उठाई आवाज : मुंबई से प्रकाशित मराठी दैनिक मनपावृत्त की ओर से 26 नवंबर को गोवंडी के शिवाजी नगर में पत्रकारों का एक स्नेह सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें मुंबई के अनेक पत्रकार, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता व राजनीतिज्ञ मौजूद थे। कार्यक्रम के आरंभ में 26 नवंबर, 2008 को आतंकवादियों द्वारा मुंबई पर हुए हमले के दौरान शहीद हुए पुलिस अधिकारियों हेमंत करकरे, विजय सालसकर, अशोक कामटे आदि को श्रद्धांजलि दी गई और उस हमले की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की चुनौतियों पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित भ्रष्टाचार निर्मूलन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवीन्द्र द्विवेदी ने सभी पत्रकारों को स्वच्छ पत्रकारिता करने की अपील की। उन्होंने कहा कि पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार का जाल तेजी से फैल रहा है, जिस पर परदा डालने के लिए पिछले कुछ दिनों से मुंबई पुलिस अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने से भी नहीं हिचक रही है। भ्रष्टाचार का पोल खोलने वालों और किसी भी घटनाक्रम की वास्तविकता को उजागर करने वाले संपादकों, पत्रकारों के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई हो रही है, जो समाज के विकास के लिए बाधक साबित हो रही है। 

मनपावृत्त के संपादक जयवंत दामगुड़े ने कहा कि सच्चाई लिखने वाले पत्रकारों के खिलाफ पुलिस झूठे मामले दर्ज कर रही है और पत्रकारों को बेवजह परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि क्राइम रिपोर्टिंग करते समय किसी अपराधियों से बात करने का मतलब यह नहीं होता है कि उनकी सांठगांठ किसी अपराधी के साथ है। सम्मेलन में पत्रकारिता कोश के संपादक आफताब आलम ने सभी पत्रकारों को एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने की अपील की। राष्ट्रमित्र के संपादक ज्ञानेश्वर ठोंबरे, हिंद गौरव पत्रकार संघ के अमृतपाल सिंह, आरपीआई के मुंबई अध्यक्ष गौतम सोनावणे, गुन्हा खोज के मुख्य संपादक एम.जे. हुसैन, पत्रकार संजय वाघमारे, मोतीलाल चौधरी ने भी पत्रकारों पर हो रहे हमले की निंदा की और पुलिस प्रशासन को अपने अधिकारों का दुरुपयोग बंद करने की बात दोहराई।

कार्यक्रम में पत्रकार श्याम सुंदर शर्मा, दोपहर का सामना के संवाददाता रवि निषाद, नरेश शर्मा, मुंबई चक्र के संपादक फरीद खान, मुंबई अमरदीप के संपादक उपेंद्र पंडित, पत्रकारवाणि के संपादक अनिल रोकड़े, प्रेस फोटोग्राफर सलीम खातिब, लोकगौरव के उदय पगारे, जनादेश चैनल के संवाददाता सुरेश पाटिल, बाबा साहेब मालवदे, वामन पानसरे, सुंदर पारेख, स्वर्णा भोसले, राजकुमार तिवारी, नासिर शेख, लक्ष्मण धोगे, संभाजी आत्यालकर, जगदीश खांडेकर, सतीश मिश्रा, संदीप कांबले, आदि सहित अनेक लोग मौजूद थे।

जेडे की हत्‍या के लिए जिग्‍ना ने राजन को उकसाया था!

: पुलिस कर रही मुख्‍य आरोपी बनाने की तैयारी : नई दिल्ली। मुंबई के क्राइम रिपोर्टर जे डे की हत्या में महिला पत्रकार जिग्ना बुरी तरह फंस चुकी हैं। मुंबई पुलिस के क्राइम ब्रांच के सूत्रों की मानें तो जिग्ना ने सबूत मिटाने की काफी कोशिश की। लेकिन पुलिस के हाथ उसके खिलाफ काफी कुछ है। आईबीएन7 को मुंबई क्राइम ब्रांच के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जे डे हत्याकांड के पहले और बाद में अखबार एशियन एज की इस डिप्टी ब्यूरो चीफ ने बहुत से ऐसे काम किए हैं जिनकी वजह से वो इस केस की सबसे अहम आरोपी बन चुकी है।

क्राइम ब्रांच के सूत्रों का कहना है कि जिग्ना अपने एक करीबी रिश्तेदार के बैंक अकाउंट को डील कर रही थी जिसमें 3 बार संदिग्ध लेन-देन हुआ। इनमें से एक बार दुबई से और बाकी 2 बार अन्य जगहों से किया गया। ये लेन-देन जे डे की हत्या से कुछ समय पहले हुआ। इसके अलावा क्राइम ब्रांच को जे डे के घर से कई अहम दस्तावेज भी मिले हैं।

दरअसल जे डे की हत्या के कुछ दिन बाद से ही पुलिस महिला पत्रकार जिग्ना पर नजर बनाई हुई थी और धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियां बनती गईं कि जिग्ना पुलिस की गिरफ्त में आ गई। पुलिस सूत्रों के मुताबिक जिग्ना और जे डे हत्याकांड के एक आरोपी विनोद असरानी की चेंबूर के एक होटल में मुलाकात हुई थी। पुलिस सूत्रों का कहना है कि ये मुलाकात राजन के कहने पर हुई थी और इसी मुलाकात के दौरान जिग्ना ने असरानी को ये बताया कि जेडे की हत्या कब और कैसे करनी है।

आईबीएन7 को पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक क्राइम ब्रांच को जिग्ना के घर से कुछ कागजात मिले हैं जो संदिग्ध हैं। इसमें एक डायरी के फटे हुए पन्ने भी हैं। सूत्रों का कहना है कि इन पन्नों पर कुछ नंबर लिखे हैं, मिलने की जगह लिखी है और प्लानिंग लिखी है। और फिर उसे पेन से घिसकर काटने की कोशिश की गई है। इसके बाद इन पन्नों को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े किया गया है।

क्राइम ब्रांच के सूत्रों की मानें तो जे डे छोटा राजन पर बैंकाक में हुए हमले और उससे जुड़ी कुछ उन जानकारियों को लेकर एक किताब लिखने की तैयारी में थे जो अबतक किसी को पता नहीं थी और इस वजह से वो छोटा राजन के खासमखास फरीद तनाशा के काफी नजदीक भी थे। जिग्ना को ये नागवार था। ऐसे में जब फरीद तनाशा की हत्या हुई तब जिग्ना ने इस हत्या के पीछे जे डे को जिम्मेदार ठहराते हुए छोटा राजन के कान भरने शुरू किए।

सूत्रों की मानें तो इस मामले में एक आरोपी विनोद असरानी के छोटे भाई और छोटा राजन के बीच बातचीत से भी इस बात के सुराग मिले हैं। ये बातचीत पुलिस के पास है। पुलिस सूत्रों का ये कहना है कि जिग्ना खुद ही सुराग दर सुराग छोड़ती गई। उसने जे डे की हत्या में छोटा राजन का नाम आने के बाद खुद को समेटना शुरू कर दिया। पुलिस सूत्रों के मुताबिक चेंबूर के होटल में उसने विनोद से वादा लिया था कि जिस दिन वो मुंबई में नहीं हो उसी दिन जे डे पर हमले को अंजाम दिया जाए। हैरानी की बात ये है कि जे डे की हत्या के बाद खुद क्राइम रिपोर्टर होते हुए भी ना तो जिग्ना ने किसी पुलिस वाले को फोन किया और ना ही मीडिया में अपने किसी साथी को। यही नहीं, उसने अपने फेसबुक अकाउंट और पर्सनल मेल आईडी को बंद कर दिया। ब्लैकबेरी मैसेंजर से खुद को दूर कर लिया।

आईबीएन7 को मिली जानकारी के मुताबिक मुंबई पुलिस अपनी चार्जशीट में जिग्ना को मुख्य आरोपी बनाने की तैयारी कर रही है। जे डे के कत्ल की कहानी अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन से शुरू होकर छोटा राजन पर ही खत्म होती है लेकिन पुलिस सूत्रों के दावों की मानें तो इस कहानी की असल स्क्रिप्ट राइटर जिग्ना वोरा थी। पुलिस सूत्रों के मुताबिक कभी क्राइम रिपोर्टिंग में जे डे की जूनियर रही जिग्ना जे डे से आगे जाना चाहती थी। यही बात जे डे को बुरी लगी। मुंबई के दिग्गज क्राइम रिपोर्टर ने इस बात के लिए जिग्ना को फटकारा भी। पुलिस के सूत्रों का कहना है कि जिग्ना ने इसका बदला लेने के लिए खेल खेलना शुरू किया।

सूत्र बताते हैं कि पहले वो जे डे को अपने पुराने दोस्त और राजन के गुर्गे फरीद तनाशा के जरिए सबक सिखाना चाह रही थी और फरीद ने उसे विक्की मलहोत्रा के साथ मिलकर जे डे को फंसाने का प्लान भी बनाया था। लेकिन इसी बीच फरीद की उसके घर पर ही हत्या कर दी गई।

सूत्रों की मानें तो फरीद की हत्या से जिग्ना को झटका लगा। राजन भी इस हत्या से बौखलाया हुआ था। पुलिस सूत्रों के मुताबिक राजन ने फरीद के हत्यारों की जानकारी हासिल करने का माध्यम जिग्ना को बनाया। सूत्रों का कहना है कि इसी मौके का फायदा जिग्ना ने उठाया। सूत्रों की मानें तो जिग्ना ने जे डे के खिलाफ छोटा राजन के कान भरने शुरू कर दिए। पुलिस सूत्रों का कहना है कि जिग्ना ने राजन को ये तक कहा कि जे डे के जरिए छोटा शकील आपको भी मारना चाहता है।

अब तक राजन ने भी जे डे को खत्म करने का पूरा प्लान तैयार कर लिया था। जेडे से जुड़ी तमाम जानकारी जिग्ना ने उसे मुहैया करा दी थी। फिर उसे खत्म करने की ज़िम्मेदारी उस सतीश कालिया को सौंपी गई जो पिछले कई महीनों से मुंबई से बाहर था और पिछले 3 सालों में उसके नाम पर एक मामला तक दर्ज नहीं था।

जेडे की हत्या हो गई। लेकिन हत्या के कई दिनों बाद छोटा राजन को असलियत का पता चला। आईबीएन7 को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जे डे की हत्या के प्रमुख आरोपी बिनोद असरानी की गिरफ्तारी के दो दिन बाद छोटा राजन ने बिनोद के भाई को खुद फोन किया। ये फोन पुलिस टेप कर रही थी। पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस फोन कॉल में छोटा राजन ने जिग्ना को काफी बुरा-भला कहा। उसने यहां तक कहा कि जिग्ना ने गलत बातें बोल कर जे डे को मरवा दिया। वो जिग्ना से काफी नाराजगी दिखा रहा था। मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के सूत्रों की मानें तो इसी फोन की वजह से जिग्ना इस कांड में बुरी तरह फंस गई। अब देखना ये है कि कोर्ट में मुंबई पुलिस के सबूत कितने काम के साबित होते हैं। साभार : आईबीएन7

इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को पीसीआई के दायरे में लाने की तैयारी

: पेड न्‍यूज को लेकर सरकार गंभीर : सरकार इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को अपने अधिकार क्षेत्र में लाने की तैयारी कर रही है. पिछले काफी समय से इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की आजादी पर प्रहार करने वाली सरकार अब इसे कानूनी चाबुक से हांकने की तैयारी में जुटी हुई है. सरकार की तरफ से सूचना एवं प्रसारण राज्‍य मंत्री सीएम जातुया ने बताया कि भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) ने प्रेस परिषद कानून, 1978 में संशोधन कर इलेक्ट्रोनिक मीडिया को भी अपने अधिकार क्षेत्र में लाने का तथा अपना नाम बदलकर मीडिया परिषद किए जाने का प्रस्ताव भेजा है. इस कानून में संशोधन का प्रस्‍ताव विचाराधीन है और यदि जरूरी समझा गया तो विभिन्‍न पक्षों के साथ व्‍यापक विचार विमर्श करके तथा मीडिया से संबंधित मुद्दों पर सर्वसम्‍मति बनाने के बाद इसका प्रारुप तैयार किया जाएगा.

जातुया ने अनिल माधव दवे के सवालों के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी. उन्होंने डी राजा के एक अन्य सवाल के जवाब में बताया कि पीसीआई के अध्यक्ष ने मीडिया को उचित प्रकार से अपने कार्यो को निष्पादित करने की खातिर संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त मीडिया की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के साथ काम करने के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता के मुद्दे को उठाते हुए सरकार को एक पत्र लिखा है. उन्‍होंने कहा कि पीसीआई ने ‘पेड न्यूज’ जैसे गंभीर मुद्दे का संज्ञान लिया है और इस संबंध में एक रिपोर्ट जारी की है. उन्होंने कहा कि सरकार ने एक मंत्री समूह का गठन किया है जो पेड न्यूज संबंधी पीसीआई की रिपोर्ट की जांच करेगा तथा इस समस्या का समाधान निकालने के लिए एक व्यापक नीति तैयार करने और एक संस्थागत तंत्र स्थापित करने पर अपनी राय देगा. मंत्री ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव के दौरान पेड न्यूज की घटनाओं को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं. (इनपुट : आजतक)

अगले साल 30 जून तक महानगरों में बंद हो जाएगा केबल सर्विस

अगर आप भी केबल टीवी की सेवाओं का लुत्फ उठाने वालों में से हैं तो यह खबर सीधे तौर पर आपसे जुड़ी हुआ है। दरअसल देश में 2014 तक एनालॉग केबल टीवी सेवाएं पूरी तरह बंद हो जाएंगी और उसका स्‍थान डिजिटल सेवाएं लेंगी। सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री सीएम जातुया ने कहा कि सरकार ने चरणबद्ध तरीके से देश में केबल टीवी सेवाओं में डिजिटलीकरण को लागू करने का फैसला किया है जिससे 2014 के अंत तक एनालॉग टीवी सेवाएं पूरी तरह बंद हो जाएंगी।

जातुया ने कहा कि इसे चार चरणों में लागू किया जाएगा और पहले चरण के तहत 30 जून 2012 तक सभी महानगरों को इसमें शामिल किया जाएगा। दूसरे चरण में दस लाख से अधिक आबादी वाले 38 शहरों को शामिल किया जाएगा। इसके बाद के दो चरण में छोटे शहर शामिल किए जाएंगे। उन्होंने टीएम सेल्वागणपति के सवालों के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी। जातुआ ने एक अन्‍य सवाल के जवाब में बताया कि सरकार ने ट्राई की सिफारिशों के आधार पर टीवी चैनलों की अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग की खातिर मौजूदा नीतिगत दिशानिर्देशों में कुछ संशोधन के लिए एक प्रस्ताव किया था जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सात अक्टूबर 2011 को मंजूर कर लिया है।

फोटोग्राफर शिव ने लांच की अपनी वेबसाइट

देश-विदेश में अपनी फोटोग्राफी से कई पुरस्‍कार पा चुके शिव कुमार ने अपनी फोटो वेबसाइट लांच की है. शिव वेडिंग फोटोग्राफी नाम से लांच इस वेबसाइट में शिव की खींची गई तमाम तस्‍वीरें मौजूद हैं. शिव  लंदन के रायल फोटोग्राफी सोसायटी से एआरपीएस तथा पेरिस के फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल डे ला आर्ट फोटोग्राफिक से सम्‍मान भी पा चुके हैं. राष्‍ट्रीय एवं अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर 1000 से ज्‍यादा बेहतरी फोटो खींचने का श्रेय भी शिव को हैं. वे सौ से ज्‍यादा छोटे-बड़े पुरस्‍कार अपने फोटोग्राफी के लिए पा चुके हैं.

शिव को वेडिंग फोटोग्राफी में भी महारत हासिल है. उनका मानना है कि वो अच्‍छे और प्‍यारी यादों को संजोकर खुश होते हैं. फोटोग्राफी के अलावा शिव को लिखने और शार्ट फिल्‍म बनाने का भी शौक है.

मशहूर साहित्‍यकार इंदिरा गोस्‍वामी का निधन

गुवाहाटी : प्रख्यात असमिया लेखिका इंदिरा गोस्वामी का लम्बी बीमारी के बाद मंगलवार सुबह यहां एक अस्पताल में निधन हो गया। वह 69 साल की थीं। गोस्वामी ने प्रतिबंधित युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) और केंद्र सरकार के बीच शांति वार्ता में अहम भूमिका निभाई थी। गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के चिकित्सकों का कहना है कि गोस्वामी के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था, जिसके चलते सुबह पौने आठ बजे उनका निधन हो गया।

वह मामोनी रायसन गोस्वामी नाम से लिखती थीं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में एक शिक्षिका थीं। उन्हें भारतीय साहित्य जगत का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ मिला था। गोस्वामी ने उल्फा और केंद्र सरकार के बीच शांति वार्ता में अहम भूमिका निभाई थी लेकिन साल 2005 में उन्होंने खुद को इससे अलग कर लिया।

असम के मुख्‍यमंत्री तरुण गोगोई ने भी उनके निधन पर शोक व्‍यक्‍त किया है. उन्‍होंने कहा कि इंदिरा जी के जाने से साहित्यिक परिदृश्‍य में एक शून्‍य पैदा हो गया है। खबर है कि अस्‍पताल से उनका शव घर ले जाया जाएगा, जहां लोगों के दर्शन के लिए रखा जाएगा। इंदिरा गोस्‍वामी के निधन की खबर से उनके शुभचिंतकों में शोक व्‍याप्‍त है। संभावना है कि बुधवार को उनका अंतिम संस्‍कार किया जाएगा। असम सरकार ने राजकीय सम्‍मान के साथ उनका अंतिम संस्‍कार करने का निर्णय लिया है।

सहारा और मौर्य टीवी ने गलत खबर चलाकर दहशत फैलाई

बिहार-झारखंड के दो खबरिया चैनल सहारा समय और मौर्य टीवी ने आगे निकलने की होड़ में गलत खबर दिखाकर लोगों के बीच दहशत फैलाने का काम किया. दरअसल 27 नवम्‍बर की देर रात गिरीडीह जिले के हजारी बाग रोड रेलवे स्‍टेशन के समीप रेलवे ट्रैक पर केन बम होने बात आरपीएफ को पता चली. इसके बाद महुआ, ईटीवी एवं कशिश पर ट्रैक पर केन बम होने की आशंका का ब्रेकिंग देर रात को चला. इस खबर को देखकर सहारा समय और मौर्य टीवी ने खुद ही ये खबर चला दी कि ट्रैक पर तीन-चार केन बम हैं, जिसे निकाला गया.

सुबह हुई और जब पुलिस उस स्‍थान पर पहुंची तो देखा कि ट्रैक पर बम नहीं है बल्कि स्‍टील का खाली कंटेनर रखा हुआ है. यहां के बाद जिन चैनल ने बम की आशंका की खबर चलाई उनकी तो साख बच गई लेकिन सहारा और मौर्य टीवी की काफी किरकिरी हुई. जब अंदर की बात पता की गई तो मालूम हुआ कि सहारा और मौर्य में इस खबर को सनसनी बनाने का काम दोनों चैनलों के धनबाद के रिपोर्टर क्रमश: बलराम दुबे और नितेश मिश्रा ने किया.

दरअसल दोनों रिपोर्टर चैनल में अपनी छाप सबसे तेज रिपोर्टर की तरह छोड़ना चाहते हैं, तभी दूसरे जिले की खबर को दोनों ने ब्रेक कराया. खबर है कि दोनों की इस रिपोर्ट की शिकायत चेनल वरिष्‍ठ लोगों से दोनों चैनलों के गिरीडीह के रिपोर्टर ने की है. अब देखना है कि इनके खिलाफ कुछ एक्‍शन लिया जाता है या फिर खबरों को सनसनी बनाने के लिए छोड़ दिया जाता है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अजय कुमार की लड़ाई से घबरा गया है राजस्‍थान पत्रिका

: अन्‍य अखबार के पत्रकारों के लिए भी सबक : प्रबंधन को कोर्ट में घसीट रखा है इस पत्रकार ने : अपने हक की आवाज उठाना राजस्‍थान पत्रिका के वरिष्‍ठ पत्रकार अजय कुमार बिहारी को मुश्किल में डाल गया है. इसके बावजूद यह पत्रकार अपने तथा राजस्‍थान पत्रिका के तमाम पत्रकारों के हितों को देखते हुए पीछे हटने को तैयार नहीं है. अजय की आवाज दबाने के लिए अखबार प्रबंधन ने उन्‍हें गलत तरीके से टर्मिनेट कर दिया, जिस पर उन्‍होंने कोर्ट की शरण ली और मुंबई लेबर कोर्ट में प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा दायर किया है, जो अब भी चल रहा है.

राजस्‍थान पत्रिका के मुंबई ब्‍यूरो में सात साल से काम कर रहे अजय कुमार बिहारी ने पिछले साल मनीसाना और कुरुप वेज बोर्ड के तहत सेलरी और अं‍तरिम देने की मांग प्रबंधन से की थी. प्रबंधन को अजय की यह मांग नागवार गुजरी. प्रबंधन ने अजय को सबक सिखाने के लिए सजा के तौर पर इनका तबादला राजस्‍थान में पाकिस्‍तान के बार्डर से लगे बाड़मेर जिले के लिए कर दिया. साथ ही तीन दिनों में बाड़मेर में रिपोर्ट करने को कहा. श्री बिहारी का कांट्रेक्‍चुअल कर्मचारी बनने से इनकार करना भी इस तबादला का एक बहुत बड़ा कारण बना. परन्‍तु अजय बिहारी ने प्रबंधन के सामने झुकने से इनकार कर दिया. 

प्रबंधन के रवैये तथा तबादले के विरुद्ध अजय कुमार बिहारी ने मुंबई के औद्योगिक कोर्ट में चुनौती दिया, जो अब भी पेडिंग हैं. इसी बीच प्रबंधन ने अजय बिहारी के खिलाफ एक आंतरिक जांच शुरू करा दी. जांच रिपोर्ट श्री बिहारी के खिलाफ तैयार हुई, जिसके आधार पर प्रबंधन ने उन्‍हें 14 जून 2010 को टर्मिनेट कर दिया. इसके खिलाफ भी अजय बिहारी लेबर कोर्ट पहुंचे. एक लंबी सुनवाई प्रकिया के बाद लेबर आफिसर ने श्री बिहारी की नियुक्ति एवं पूरा वेतन की मांग के बाद इस केस को 26 अगस्‍त 2011 को मुबई के छठे लेबर कोर्ट के पास स्‍थानंतरित कर दिया है. जहां इसकी आगे की सुनवाई होनी है.

पत्रिका प्रबंधन के खिलाफ अजय बिहारी के इस संघर्ष में इस अखबार के तमाम पत्रकार भी आर्थिक एवं मानसिक रूप से उनका सहयोग कर रहे हैं. इस ऐतिहासिक लड़ाई के चलते पत्रिका प्रबंधन परेशान है. वहीं अजय बिहारी किसी भी कीमत पर पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड के अनुसार सेलरी पैकेज दिलवाने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं. अब देखना दिलचस्‍प होगा कि एक बड़ी लड़ाई लड़ रहे अजय कुमार बिहारी के संघर्षों को कब मंजिल मिलती है और कब कोर्ट अपना फैसला सुनाता है. साथ ही यह लड़ाई अन्‍य अखबारों के पत्रकारों के लिए भी नजीर होगा, जो अपने पत्रकारों का हक मारने के लिए किसी भी स्‍तर पर जाने से परहेज नहीं करते.

इरफान, कार्टून, जनसत्ता, भोपाल और मेरी भड़ास

किसी अखबार में सबसे छोटी जगह लेकर सबसे बड़ी बात कहने का मादा रखता है कार्टून और इसी कार्टून जगत की एक हस्ती हैं इरफानजी, पत्रकारिता जगत में बड़ा नाम है। लेकिन ना जाने क्यों अपने भोपाल आगमन पर ये नाम अपनी गूंज को थोड़ा कम कर गया या यूं कहिये कि उनके बारे में कुछ लाउड बातें हुईं कि उनके नाम की गूंज स्वतः ही कम सी सुनाई दी। भूमिका को ही लेख की शक्ल ना देते हुये सीधा पांइट पर आता हूँ।

हुआ यूं कि अभी जनसत्ता के इरफान जी का भोपाल आना हुआ। परपज था कि ‘‘बेटी है तो कल है’’ की थीम पर अपनी कलम कूंची चलायेंगे और बेटी बचाओ की बात जन जन तक पहुँचायेंगे। तो माहौल बना और कार्टून प्रदर्शनी लगाई गयी। और जनसत्ता के कार्टूनिस्ट ने सबका मन मोहा …सबका मतलब जो लोग स्वराज वीथिका, रवीन्द्र भवन पहुंचे। जी हाँ वहीं लगाई गयी थी कार्टून प्रर्दशनी जनसत्ता के कार्टूनिस्ट इरफानजी के कार्टून्स की।

शायद मेरी भड़ास पर आपको भी भड़ास आ जाये कि मैं बार-बार जनसत्ता का नाम क्यों ले रहा हूँ तो मेरे भड़ास मित्रों भड़ास तो यही है कि इरफान जी बार-बार ये मेन्शन करते पाये गये कि वे जनसत्ता से हैं और बस इसीलिये उन्हें तवज्जो से बढ़कर तवज्जो दी जाये। तो उन्हें शासन से पैसा (कुल मिलाकर लगभग 15-16 लाख रुपये) तो मिला ही और पत्रकारिता जगत के मित्रों से चाटुकारिता उन्होंने जनसत्ता के नाम पर कमाई। माना भोपाल के पत्रकारिता मित्रों ने उन्हें सम्मान दिया पर चाटुकारिता की आदत ना होने की वजह से भड़ास निकालना तो बनती है। अब इतना बड़ा व्यक्तित्व जो कार्टून बनाते बनाते सच में लोगों को कार्टून समझने लगे ये भी ठीक नहीं है ना।

और फिर भड़ास ढाई गुना तब हुई जब खर्चे की बात सुनी। मेरा अंकगणित ठीक नहीं है लेकिन अगर स्वराज वीथिका में कार्टून प्रर्दर्शनी देखने पहुँचे दर्शकों को इस पूरे आयोजन के खर्च के साथ रखें तो कुछ 50 हजार का एक दर्शक पड़ेगा। अगर ये बात उन दर्शकों को पता लग जाती तो वो अपने आपको एक दिन का आधा लखपति तो समझकर खुश हो जाते। भड़ास बस यही है कि आखिर इतना खर्च करके इरफान जी को बुलाया, वो आये, उन्होंने कार्टून बनाये, वर्कशॉप के नाम पर शायद कुछ कार्टून बनाने भी सिखाये, वैसे तो इस सबके लिये उन्होंने दाम पाये, लेकिन फिर भी हम उनके आभारी हैं…. बस जनसत्ता के नाम पर जो उन्होंने रौब दिखाया वो पत्रकारिता क्षेत्र के लिये एक बीमारी है, कहीं ये चाटुकारिता करवाने की लत सबको ना लग जाये यही सोच के दिल भारी है…… और यही भड़ास हमारी है। आप भी निकालिये अब आपकी बारी है….।

दुर्गा

durgabhopal@gmail.com

आजतक के रिपोर्टर से युवकों ने की मारपीट

जालौन से खबर है कि आजतक न्‍यूज चैनल के पत्रकार अलीम के साथ कुछ लड़कों ने बदतमीजी की एवं मारपीट करने की कोशिश की. इस घटना की जानकारी जब अन्‍य मीडियाकर्मियों को हुई तो वो भी मौके पर पहुंच गए तथा घटना से पुलिस को अवगत कराया. जानकारी के अनुसार अलीम रविवार को किसी काम से जालौन से उरई जा रहे थे. रास्‍ते में कुछ युवा ने उनकी गाड़ी में टक्‍कर मार दी. उन्‍होंने ठीक से गाड़ी चलाने को कहा तो वे अलीम से उलझ गए.

उनसे मारपीट करने की भी कोशिश की. शोर शराबा होते देख वहां भीड़ एकत्रित हो गई, जिसका फायदा उठाकर सभी लड़के फरार हो गए. सूचना मिलने पर कई पत्रकार भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस को भी इसकी सूचना दी गई. पुलिस मामले की जांच में भी जुटी. पर बताया जा रहा है कि युवकों के अभिभावकों ने अलीम से आकर क्षमा मांग ली, जिसके बाद उन्‍होंने सदाशयता दिखाते हुए तथा युवकों के भविष्‍य को देखते हुए किसी प्रकार की कानूनी या पुलिस कार्रवाई करने से इनकार कर दिया. इस संदर्भ में जब अलीम से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि वे युवा थे, इतनी बड़ी गलती नहीं थी कि उनका भविष्‍य खराब किया जाए, लिहाजा मामले को तूल नहीं दिया गया. 

पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सांध्यकालीन पाठयक्रमों में आवेदन करने की अंतिम तिथि कल

भोपाल । माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा प्रारम्भ किये गये सांध्यकालीन पाठयक्रमों के इच्छुक उम्मीदवार कल सायं 5 बजे तक प्रवेश हेतु आवेदन कर सकते हैं। विश्वविद्यालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार सांध्यकालीन पाठयक्रमों में आवेदन करने की अंतिम तिथि 30 नवम्बर 2011 निर्धारित की गई है। विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक सत्र 2011-12 में वेब संचार, वीडियो प्रोडक्शन, पर्यावरण संचार, भारतीय संचार परम्पराएँ तथा योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार जैसे विषयों में सांध्यकालीन पी.जी. डिप्लोमा पाठयक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। यह पाठयक्रम विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के साथ-साथ नौकरीपेशा व्यक्तियों, सेवानिवृत्त लोगों, सैन्य अधिकारियों तथा गृहणियों के लिए भी उपलब्ध होंगे।

विश्वविद्यालय द्वारा पाँच सम्भावनाओं से भरे क्षेत्रों में सांध्यकालीन पी.जी.डिप्लोमा पाठयक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। विश्वविद्यालय का सांध्यकालीन वेब संचार पाठयक्रम अखबारों के ऑनलाईन संस्करण, वेब पोर्टल, वेब रेडियो एवं वेब टेलीविजन जैसे क्षेत्रों के लिए कुशलकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है। वीडियो कार्यक्रम के निर्माण सम्बन्धी तकनीकी एवं सृजनात्मक पक्ष के साथ स्टूडियो एवं आउटडोर शूटिंग, नॉनलीनियर सम्पादन, डिजिटल उपकरणों के संचालन आदि के सम्बन्ध में कुशल संचारकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से वीडियो प्रोडक्शन का सांध्यकालीन पाठयक्रम प्रारम्भ किया गया है। पर्यावरण आज समाज में ज्वलंत विषय है। पर्यावरण के विविध पक्षों की जानकारी प्रदान करने एवं इस क्षेत्र के लिए विशेष लेखन-कौशल विकसित करने के उद्देश्य से पर्यावरण संचार का सांध्यकालीन पाठयक्रम तैयार किया गया है। योग, स्वास्थ्य और आध्यात्म के क्षेत्र में व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने तथा इस क्षेत्र के लिए कुशल कार्यकर्ता को तैयार करने के उद्देश्य से योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार का सांध्यकालीन पाठयक्रम प्रारम्भ किया गया है। भारतीय दर्शन एवं प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों में मौजूद संचार के विभिन्न स्वरूपों की शिक्षा एवं वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में उनके सार्थक उपयोग की दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय संचार परम्पराओं में सांध्यकालीन पाठयक्रम तैयार किया गया है।

पाठयक्रमों में प्रवेश स्नातक परीक्षा में प्राप्त अंकों की मेरिट के आधार पर दिया जायेगा। पाठयक्रमों की अवधि एक वर्ष है। प्रत्येक पाठयक्रम का शुल्क 10,000 रुपये रखा गया है जो विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित किश्तों में देय होगा। प्रवेश हेतु विवरणिका एवं आवेदन पत्र विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर में 150/- रुपये (अ.ज./अ.ज.जा. के लिए 100/- रुपये) जमा कर प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.mcu.ac.in से विवरणिका एवं आवेदन पत्र डाउनलोड कर निर्धारित राशि के डी.डी. के साथ आवेदन जमा किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए टेलीफोन नम्बर 0755-2553523 पर सम्पर्क किया जा सकता है। प्रेस रिलीज

फर्जी प्रकाशन स्‍थल के सहारे लाखों के विज्ञापन डकारे

देहरादून। दूसरों को आईना दिखाने वाला चौथा खम्बा अगर खुद फर्जी तरीके से अधिकारियों को गुमराह कर लाखों डकाराने शुरू कर दे तो उसकी विश्वसनीयता कितनी होगी इसका आंकलन खुद ही किया जा सकता है। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इसी सम्पादक मंडल द्वारा डीएवीपी रेट गलत तरीके से प्रस्तुत कर लाखों का घोटाला किया जा चुका है, जिसके चलते समाचार पत्र से अधिक वसूल किए गए धन की रिकवरी भी हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश में ब्लैक लिस्ट होने के बाद देवभूमि उत्तराखण्ड में समाचार पत्र दैनिक निष्पक्ष समाचार ज्योति एवं उर्दू दैनिक हालात-ए-वतन के प्रकाशक/सम्पादक द्वारा फर्जी प्रकाशन स्थल बताकर डीएवीपी के अधिकारियों को गुमराह कर लाखों रुपये का भुगतान हासिल कर लिया गया। इतना ही नहीं उत्‍तराखण्ड के देहरादून में जब इस प्रकरण की एसएसपी देहरादून द्वारा 27 मार्च 2011 को एलआईयू जांच कराई गई तो पता चला कि उर्दू दैनिक समाचार पत्र हालात-ए-वतन का प्रकाशन स्थल 14 डी मीडो प्लाजा दर्शाया गया है, जबकि वहां से इस नाम का कोई भी समाचार पत्र प्रकाशित नहीं होता। पुलिस की एलआईयू जांच रिर्पोर्ट में 14डी मीडो प्लाजा से दैनिक/साप्ताहिक नजरिया खबर के प्रकाशित होने की बात कही गई है, जिसके बाद निष्पक्ष समाचार ज्योति समाचार पत्र का प्रकाशन स्थल भी पूरी तरह से फर्जी पाया गया है, जिस पर सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग के संयुक्त निदेशक राजेश कुमार द्वारा बीती 29 सितम्बर 2011 को निष्पक्ष समाचार ज्योति के सम्पादक सुमन गुप्ता एवं उर्दू दैनिक हालात-ए-वतन के सम्पादक डा0 रामलखन गुप्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

शिकायतकर्ता गीता जायसवाल ने महानिदेशक विज्ञापन एवं दृश्य प्रसार निदेशालय, नई दिल्ली को शिकायती पत्र भेजकर सम्पादक द्वारा फर्जी प्रकाशन स्थल बताकर डीएवीपी के अधिकारियों को गुमराह किये जाने का आरोप लगाने के साथ-साथ डीएवीपी से दैनिक निष्पक्ष समाचार ज्योति के नाम पर एक लाख से अधिक एवं उर्दू दैनिक हालात-ए-वतन के नाम पर 10 लाख से अधिक का भुगतान हासिल किए जाने की बात कही है। उक्त सभी भुगतान की वसूली रामलखन गुप्ता से किए जाने के साथ साथ डीएवीपी में गलत व झूठे अभिलेख प्रस्तुत कर समाचार पत्रों को डीएवीपी में सूचीबद्व किए जाने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई किए जाने की मांग भी की गई है। प्रकाशन स्थल का जिस तरह से पता गलत दर्शाया गया है, उससे समाचार पत्र की निष्पक्षता के साथ साथ जमीनी हकीकत का भी पता चल जाता है। वहीं रामलखन गुप्ता द्वारा कई अन्य राज्यों से भी समाचार पत्रों को चलाया जा रहा है। लेकिन उत्तराखण्ड में जिस तरह से उक्त सम्पादक द्वारा फर्जी प्रकाशन स्थल के सहारे लाखों रुपये डीएवीपी से विज्ञापन के रूप में हासिल किए गए हैं वह निश्चित रूप से शर्मनाक पहलू है।

वर्तमान में दोनों ही समाचार पत्रों के प्रकाशन स्थल दूसरी जगह दर्शाकर समाचार पत्र को प्रकाशित किया जा रहा है। इसके अलावा दैनिक निष्प़क्ष समाचार ज्योति पर 13 मई 2011 को अंक संख्या 306 के पृष्ठ संख्या 16 में स्वास्थ्य विभाग का विज्ञापन प्रकाशित किया गया है, जबकि 17 मई 2011 को अंक संख्या 310 के पृष्ठ संख्या 16 में प्रकाशित किया गया। एक ही तिथि में प्रकाशित अंको में 1 अंक में प्रकाशित किया गया जबकि दूसरे अंक में प्रकाशित नहीं किया गया। उक्त संबंध में सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक राजेश कुमार द्वारा समाचार पत्र से कारण स्पष्ट करने का नोटिस जारी किया गया था लेकिन दो महीने बाद भी अभी तक इस मामले में क्या कार्रवाई की गई इसका जवाब स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ सूचना विभाग के पास भी मौजूद नहीं है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आर्यन टीवी से जुड़े संजय कुमार एवं अंकुर झा

मौर्य टीवी को यूपी में लांच करने की योजना अधर में लटक गई है. मौर्य को यूपी में लांच करने के लिए लगाए गए ज्‍यादातर लोग चैनल से विदा हो गए हैं. ताजा खबर है कि मौर्य टीवी यूपी के ब्‍यूरो कोआर्डिनेटर संजय कुमार ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. अब वे आर्यन टीवी के साथ जुड़े गए हैं. उन्‍हें यूपी का ब्‍यूरो चीफ बनाया गया है. संजय अपने साथ मौर्य टीवी को सेवा दे रहे कई जिलों के स्ट्रिंगरों को भी आर्यन टीवी ले गए हैं.

थोड़ी देर से मिली सूचना के अनुसार मौर्य टीवी से अंकुर कुमार झा ने इस्‍तीफा देकर आर्यन टीवी ज्‍वाइन कर लिया है. वे यहां पर एंकर थे. इसके पहले वे नेपाल चैनल से जुड़े हुए थे. अंकुर आर्यन टीवी में भी एंकरिंग की जिम्‍मेदारी निभाएंगे.

गरीब पत्रकारों के शोषण के लिए तैयार है सी न्‍यूज

सेवा में संपादक महोदय भड़ास पर आपने कल सी न्यूज़ आगरा के बारे में एक खबर प्रकाशित की थी जिस पर मैं आपको एक जानकारी देना चाहता हूँ । आज से केवल चंद मात्र कुछ साल पहले इस चैनल के मालिक पंकज जैन और नीरज जैन आगरा के एक लोकल चैनल मून न्यूज़ के केबल के ऑपरेटर हुआ करते थे। इसके बाद धीरे-धीरे इन्‍होंने अपना एक लोकल चैनल सी न्यूज़ खड़ा किया और यह केबल चलाने लगे। चूंकि उस समय आगरा में मून केबल का साम्राज्य हुआ करता था सो यह मून केबल का स्टार प्लस चुरा चुरा कर चलाने लगे।

जब मून वालों को इसकी जानकारी हुयी तो उन्होंने इसकी शिकायत कर दी, असर यह हुआ कि स्टार प्लस का सी केबल से प्रसारण बंद हो गया। अब इन्‍होंने आगरा में कोर्ट केस किया और यह जीत गए सो इन्हें स्टार ग्रुप से नवाजा गया। इसके बाद यह ब्याज का धंधा करने लगे और आगरा के मशहूर जैन समाजी व्‍यवसाई बैनारा समूह ने इनका सहयोग किया और यह जमकर ब्याज का कारोबार चलाने लगे। जब सन 2007 में आगरा में डीजी केबल का पदार्पण हुआ तब इनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी, इनको एक लोकल केबल ऑपरेटर प्रदीप उपाध्याय से धमकी दी गयी कि मैं तुम्हारे बच्चे उठा लूँगा। चूंकि प्रदीप उपाध्याय मथुरा के माँट से विधायक पंडित श्याम सुंदर उपाध्याय के भाई कैलाश चन्द्र, जो कि मथुरा में neo न्यूज़ का एक छत्र संचालन करता हैं, का दायां हाथ हुआ करता था, इस कारण उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुयी।

इस मामले में सबसे बड़ी बात यह हैं कि मथुरा के माँट से विधायक पंडित श्याम सुंदर उपाध्याय के बारे में कहा जाता हैं कि उत्तर प्रदेश में सरकार किसी की हो लेकिन वो मथुरा के अंदर सलाम श्याम सुंदर को ही करती हैं। सो यह बहुत डर गए लेकिन सपोर्ट आगरा के ही मून न्यूज़ के एमडी राहुल पालीवाल ने कर दिया अन्यथा तस्वीर कुछ और ही होती। और ये जैन बंधु गरीब पत्रकारों का शोषण नहीं कर पाते। अब यह वर्तमान में सी न्यूज़ उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड सी एक्सप्रेस हिन्दी दैनिक .जिनवाणी, नामोकार चैनल के साथ बाज़ार में हैं, क्योंकि इन्‍होंने फर्म लिमिटेड करके मार्केट से करोड़ों रुपया उठाया हैं। और यह गरीब पत्रकारों के शोषण के लिए तैयार हैं। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

खंडूरी का असली चेहरा दिखाने वाला संपादक

अमर उजाला, देहरादून के एडिटर विजय त्रिपाठी ने वो काम कर दिया जो देहरादून में बड़े बड़े संपादक नहीं कर पाए. मुख्यमंत्रियों की लल्लो-चप्पो में लगे रहने और विज्ञापन पाते रहने की प्रवृत्ति को ब्रेक करते हुए इस शख्स ने जनपक्षधर पत्रकारिता का वो मानक स्थापित किया है जिसकी चर्चा उत्तराखंड में बहुत दिनों तक रहेगी. भाजपा नेता खंडूरी को सीएम की कुर्सी इसलिए मिली क्योंकि भाजपा नेता निशंक के कार्यकाल में बहुत भ्रष्टाचार था और इस भ्रष्टाचार के मुद्दे की वजह से भाजपा की लुटिया प्रदेश में डूब रही थी. खंडूरी कुर्सी संभालते ही भ्रष्टाचार के खिलाफ ''घोषणा-बहादुर'' बन गए, जमीनी लेवल पर कोई काम नहीं किया.

निशंक के कार्यकाल के किसी भी भ्रष्टाचारी के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ और न ही किसी के खिलाफ छापा पड़ा. दूसरे, खंडूरी को उसी चांडाल चौकड़ी ने फिर घेर लिया जिसने उनके पहले वाले कार्यकाल में कई गुल खिलाए थे. अमर उजाला, देहरादून के नए संपादक विजय त्रिपाठी ने खंडूरी और उनके आसपास के लोगों की जब असली हकीकत का प्रकाशन शुरू किया तो रंगे सियारों में खलबली मचना स्वाभाविक था. जनलोकपाल बिल के नाम पर उत्तराखंडवासियों को मूर्ख बनाकर चुनाव जीतने के सपने पालने वाले जनरल खंडूरी का अलोकतांत्रिक दिमाग सच-सच खबरें प्रकाशित होते ही सक्रिय हो गया और इन्होंने पहला व बड़ा अलोकतांत्रिक काम किया कि अमर उजाला अखबार का विज्ञापन बंद करा दिया.

यह आजकल हर प्रदेश में ट्रेंड है कि कोई अखबार अगर सत्ता के मुताबिक न चले तो उसका विज्ञापन बंद कर दो. बिहार में नीतीश कुमार यही करते हैं, यूपी में मायावती यही करती हैं, तो उत्तराखंड में भला जनरल खंडूरी क्यों नहीं करते. निशंक के शासनकाल में अमर उजाला, देहरादून के एडिटर निशीथ जोशी हुआ करते थे जिनके बारे में कहा जाता है कि वे काफी कुछ निशंक से मैनेज थे. विजय त्रिपाठी ने संपादक का पद संभालने के बाद किसी से भी किसी तरह का कोई कंप्रोमाइज न करने का निर्देश अपने रिपोर्टरों को दिया और लगे सत्ता प्रतिष्ठान की पोल खोलने वाली खबरें प्रकाशित करने. भ्रष्ट नेताओं और अफसरों को बचाने वाला जनलोकपाल बिल लाकर खुद की पीठ थपथपाने वाले जनरल खंडूरी को यह अंदाजा नहीं था कि कोई अखबार उनकी हकीकत का बयान पूरी सच्चाई से कर देगा. सो, ऐसा जब अमर उजाला ने किया तो उनका गुस्सा आसमान पर पहुंच गया और विज्ञापन रोकने के आदेश दे डाले.

देखिए, ये एक खबर, जो अमर उजाला में पहले पेज पर छपी है. ऐसी खबरें छपने से खंडूरी खेमा अमर उजाला अखबार से आहत है. पर, सोचिए, अगर सभी अखबार इसी तरह की निष्पक्ष पत्रकारिता करने लगते तो इन नेताओं, मुख्यमंत्रियों की इतनी औकात होती कि वे सभी के विज्ञापन रोक लेते? पर, ज्यादातर अखबारों के मालिक और संपादक अखबार का मतलब ही रेवेन्यू बढ़ाने की मशीन मानते हैं इसलिए वे मुख्यमंत्रियों-सत्ताधारियों को खुश रखने के लिए सच्ची व विस्फोटक खबरों की बलि चढ़ाते रहते हैं…

सहारा को फिलहाल थोड़े दिनों की राहत

सर्वोच्च न्यायालय ने सहारा समूह को राहत देते हुए आज कहा कि प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (एसएटी) के उस आदेश पर अमल के लिए अगले साल 8 जनवरी तक इंतजार किया जा सकता है, जिसके तहत सहारा समूह की कंपनियों से निवेशकों के 17,400 करोड़ रुपये लौटाने को कहा गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि निवेशकों की रकम वापसी के लिए एसएटी की ओर से दिए गए 6 सप्ताह की अवधि को फिलहाल ठंडे बस्ते में रखा जाएगा और इस मामले में अगला आदेश 8 जनवरी को सुनवाई के बाद दिया जाएगा।

इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने इन कंपनियों से कहा कि वे 30 नवंबर तक अपनी-अपनी शुद्घ परिसंपत्तियां दर्शाएं और वित्त वर्ष 2010-11 की बैलेंस शीट एवं खातों के स्टेटमेंट पेश करें। प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिय़ा की अध्यक्षता वाले पीठ ने सहारा समूह की 2 कंपनियों- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन को यह भी निर्देश दिया कि वे पहले से एकत्रित फंडों के आवेदन और उन परिसंपत्तियों के बारे में हलफनामा दायर करें, जिनकी देनदारी बनी है। शीर्ष न्यायालय के आदेश में कंपनियों से यह भी बताने को कहा गया है कि उन्होंने देनदारियों और डिबेंचर धारकों की जमा रकम को कैसे सुरक्षित किया है।

कुल मिलाकर 2.3 करोड़ निवेशकों की रकम लौटाने के आदेश पर रोक अगले साल 9 जनवरी तक जारी रहेगी, जब दोनों कंपनियों द्वारा हलफनामा दायर किए जाने के बाद इस मामले पर एक बार फिर गौर किया जाएगा। एसएटी ने वैकल्पिक तौर पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचरों के लिए निवेशकों से जुटाई गई रकम पर विवाद के मामले में अपील करने के लिए आज तक का समय दिया था। हालांकि एसएटी के आदेश का बचाव करने के लिए पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के वकील अदालत में पेश हुए, लेकिन न्यायालय ने विनियामक को औपचारिक नोटिस जारी किया।

सहारा की कंपनियों की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील एफ एस नरीमन ने ऐसे बॉन्डों के 3 सेट अदालत में जमा कराया, जिन्हें इन कंपनियों ने जारी किया है और उन्हें 4 वर्षों बाद या उससे पहले भुनाया जा सकता है। लाखों निवेशकों ने इन डिबेंचरों को परिपक्वता अवधि से पहले भुनाया है और उनमें से किसी ने भी स्कीम के खिलाफ शिकायत नहीं दर्ज कराई है।

फिर भी न्यायाधीशों ने सवाल किया कि कंपनियां यह कैसे सुनिश्चित करती हैं कि पैसे लौट दिए जाएंगे और निवेशकों के हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है। उन्होंने कंपनियों से कहा, 'हमें आंकड़े, बैलेंस शीट और परिसंपत्तियां दिखाएं।. उन्होंने पाया कि ये असुरक्षित ऋण हैं। न्यायाधीशों ने कहा, 'बगैर सिक्योरिटी, नकदी या कोई भी अन्य साधन के बॉन्ड नहीं जारी किए जा सकते।

सेबी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अरविंद दतर जानना चाहते थे कि लोगों से जुटाए गए धन का क्या हुआ। उन्होंने सवाल उठाया, 'यदि धन फंस जाता है तो सुरक्षा के क्या उपाए किए गए हैं?. दतर ने अपनी दलील में कहा कि इस स्कीम का खतरनाक पहलू यह है कि इसमें बांध और हवाई अड्डों जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं की बात कही गई है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कीम के कुछ अन्य पहलू भी हैं, जो स्पष्ट नहीं हैं। साभार : बीएस

sebi sahara

चौबीस घंटे में बदल गए राष्‍ट्रीय सहारा के संपादक के तेवर!

वाह रे सहारा! गोरखपुर के राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय विभाग में कैसे काम होता है इसका एक नमूना शनिवार को और दूसरा रविवार को देखने को मिला. संपादक ने शनिवार को चेकिंग की तो संपादकीय विभाग के 11 में से 8 बंदे गायब मिले. संपादक मनोज तिवारी ने गायब मिले आठों पर रेड लगा दिया, मतलब लेट आए तो अनुपस्थित हो गए. काम किये लेकिन उस दिन की तनख्‍वाह नहीं बनेगी. लेकिन वही संपादक रविवार को इतने नार्मल हो गये कि लोगों को विश्‍वास ही नहीं हुआ.

सिटी डेस्क के भुत्भवन मिश्रा दो घण्टे लेट आये तो उनके इन्तजार में मीटिंग देर से शाम को छह बजे की बजाय आठ बजे शुरू हुई. अब लोग कह रहे है कि अचानक संपादक के तेवर में चौबीस घंटे में इतना परिवर्तन कैसे आ गया. कहा जा रहा है कि सहारा में किसी का नहीं चलता है, इसिलिए लोग कार्रवाई करने में डर रहे हैं. संपादक का तेवर भी ज्‍यादा दिन तक नहीं चल पाएगा.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

फौजी सीएम ने दिखाया हिटलरी चेहरा, अमर उजाला का विज्ञापन रोका

: अपनी आलोचना बर्दाश्‍त नहीं कर पा रही भाजपा सरकार : उत्‍तराखंड में रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा की गई भ्रष्‍टाचार की गंदगी साफ करने के लिए भाजपा ने बीसी खंडूरी को कमान दी. बिल्‍ली के भाग्‍य से टूटे छींके के सहारे एक बार फिर सीएम की कुर्सी पर बैठे खंडूरी जमकर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का ऐलान किया. लोकायुक्‍त कानून बनाकर वाहवाही भी लूटी. पर इस रिटायर्ड फौजी के दिखाने के दांत कुछ और खाने के दांत कुछ और हैं. अब असलियत सामने आने लगी है. निशंक ने जिस जगह भ्रष्‍टाचार को छोड़ा था अब खंडूरी उसी जगह से उठाकर चलने लगे हैं. निशंक से दो कदम आगे बढ़कर खंडूरी अब मीडिया को अपने मायावी हुनर से सरकारी पेरोल पर बंदी बना लिया है.

इस मायावी हुनर का ही जादू है कि निशंक के समय में अंधा बन बैठा मीडिया अब गूंगा और बहरा भी हो गया है. बड़े बड़े कलमवीर और तोपची अपने हथियार जनरल के सामने डाल दिए हैं. इसी का फल है कि लोकायुक्‍त में मौजूद छेद और उत्‍तराखंड के सीने को रौंद रहा भ्रष्‍टाचार किसी अखबार को नजर नहीं आ रहा है. अमर उजाला ने जब आंख दिखाना शुरू किया तो ईमानदारी की खाल ओढ़े बीसी खंडूरी अपना असली चेहरा दिखाने लगे हैं. निशंक के सिपहसलारों से घिरा यह फौजी, शेर की बजाय अब भेडि़या बनकर अमर उजाला पर हमला कर रहा है. पर भूल गया है कि भ्रष्‍टाचार से परेशान जनता अखबारों को सरकारी विज्ञापनों से खरीद लेने से बदलने वाली नहीं है. वह अपने साथ हुए हर अन्‍याय का बदला लेगी, जैसे खंडूरी के सीएम रहते लोकसभा चुनाव में लिया था.

अब इस जनरल को अपने चारण गीत गाने वाले अखबार औरे उसके संपादक पंसद आ रहे हैं. सच और आलोचना खंडूरी साहब को पसंद नहीं आ रहा है. वैसे भी निशंक के समय से आंखों पर पट्टी बांधे गुणगान करने वाले संपादक-पत्रकार अभी तक उबर नहीं पाए हैं कि जनरल खंडूरी उनसे भी दो हाथ आगे निकल गए हैं. सभी अखबार अब सरकार वंदना करने में जुटे हैं. इसलिए अमर उजाला की आईना दिखाने वाली खबरें, सच दिखाने वाली खबरें फौजी सीएम को चुभ रही हैं. इससे बौखलाए बीसी खंडूरी और उनकी धूर्त मंडली ने अमर उजाला की विज्ञापन रुपी रसद लाइन काट दी है. ताकि फड़फड़ाकर यह अखबार भी हथियार डाल दे. पर तारीफ करनी होगी अखबार के मैनेजमेंट और स्‍थानीय संपादक की कि अभी तक इन लोगों ने अपने हथियार नहीं डाले हैं.

अमर उजाला में सच छपने का ही परिणाम है कि पिछले एक सप्ताह से खंडूरी ने राज्य के सूचना विभाग से जारी होने वाले विज्ञापन इस अखबार को जारी करने पर रोक लगा रखी है. मिसाल के तौर पर 28 नवम्बर को देहरादून से प्रकाशित हो रहे हिन्दी के चार प्रमुख अखबारों में से तीन अखबारों दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान और राष्ट्रीय सहारा में राज्य के सूचना विभाग की ओर से पांच विज्ञापन छपे हैं, लेकिन अमर उजाला में एक भी विज्ञापन नहीं है. यह तब हो रहा है जब अमर उजाला, उत्तराखंड का सबसे बड़ा अखबार है. सर्कुलेशन ही नहीं, न्यूज कंटेट के मामले में भी अमर उजाला की अपनी साख है. पिछले कुछ सालों में वैसे ही शशि शेखर और उनके चेले-चपेटों ने अपनी टुच्चईपन से इस अखबार की जमकर वॉट लगाई है. जब से शशि शेखर एंड कंपनी का अमर उजाला से नाता टूटा, तब से यह अखबार अपनी पुरानी रंगत में आने की कोशिश में सरकारों को आईना दिखाने की कोशिश कर रहा है.

हालांकि आज के निर्मम बाजारू दौर में जब संपादकों को खबरों से ज्यादा विज्ञापनी धंधे से नत्थी कर लिया गया है, तब सत्ताशीनों के काले कारनामों की परतें उधेड़ने की किसी चरम सीमा तक जाने के लिए हर अखबार की सीमाएं मालिक और नेताओं की दूरभि संधि ने तय कर रखी है. इसी संधि का फायदा भ्रष्‍ट सरकारें उठाती आई हैं. उत्तराखंड में भी यही हो रहा है. मुख्यमंत्री रहते हुए निशंक ने मीडिया पर नकेल कसने के लिए जो कुकर्म किए, ठीक वैसे ही बीसी खंडूरी भी करने लगे हैं. करीब चार माह पहले निशीथ जोशी की विदाई के बाद उत्तराखंड में अमर उजाला की बागडोर विजय त्रिपाठी के हाथों में आने के बाद से ही सरकार का इस अखबार से तनातनी शुरू हुई है. मैनेजमेंट के नजरिए से भले ही अमर उजाला विज्ञापनों की कमी से परेशान हो रहा हो, पर यह अखबार अब अपने तेवर से उत्‍तराखंड में सबके दिलों में तेजी से जगह बनाता जा रहा है.

अपने धारदार खबरों से अमर उजाला उस तेवर के आसपास पहुंचने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए कभी अखबार जाने जाते थे. जिनके स्‍याही की फिसलन से सत्‍ता हिल जाया करती थी. पर अब जनप्रतिनिधि की बजाय तानाशाह बन चुके नेताओं को अपनी या अपने सरकार की सकारात्‍मक आलोचना भी पसंद नहीं आ रही है. जनता के ऊपर बम से हमले होने पर भी इन तानाशाहों की एकता नहीं दिखती है, अपनी डफली तथा अपना राग अलापते हैं, पर जनता का एक थप्‍पड़ इन्‍हें एक कर देता है तब पूरी बिरादरी पर पहाड़ टूटने लगता है. इसी असंवेदनशील नेताओं की कड़ी को तेजी से खंडूरी अपनाते जा रहे हैं. उन्‍हें अब अपने खिलाफ एक आवाज सुनना गंवारा नहीं हो रहा है. वो मीडिया को निशंक की तरह अपना चारण-भाट बनाने की कोशिश कर कर रहे हैं.

निशंक के पाप के खिलाफ झंडा उठाने वाले खंडूरी को व्यापक कवरेज देने वाला अमर उजाला आज इसी खंडूरी के कोप का भाजन हो रहा है. ये वही खंडूरी हैं जो सीएम बनने से पहले इस अखबार की खूब तारीफ के पुल बांध रहे थे, लेकिन सत्ता में लौटते ही अब वही अखबार खंडूरी को रास नहीं आ रहा है, क्‍योंकि सत्‍ता में आने के बाद सच की चुभन बढ़ गई है. अमर उजाला के खिलाफ खंडूरी का यह हिटलरी चेहरा यह समझने के लिए काफी है कि न केवल वे निशंक के ही भाजपाई कलोन है, बल्कि फौजी पृष्ठिभूमि का यह मुख्यमंत्री लोकतांत्रिक आचार-व्यवहार में कहीं ज्यादा खतरनाक है. भाजपा को भी समझना चाहिए कि अगर अब अपने इस फौजी सीएम की हिटलरशाही पर रोक नहीं लगाया तो आने वाले विधानसभा चुनावों में भी वही हाल होगा जो इसके सीएम रहते लोकसभा चुनावों में हुआ. इसी सीएम की इमानदारी पर विकीलीक्‍स भी तमाचा लगा चुका है.

बीसी खंडूरी का विकीलीक्‍स की नजरों में सच जानने के लिए क्लिक करें – बीसी खंडूरी की ईमानदारी पर विकीलीक्स का तमाचा

लेखक दीपक आजाद उत्तराखंड के युवा और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं. साफ-साफ और खरी-खरी बात लिखने के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क deepakazad09@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कुंवर फतेह बहादुर और आरएन सिंह की लोकायुक्‍त से शिकायत

मेरे द्वारा लोकायुक्त, उत्तर प्रदेश को कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव, गृह, उत्तर प्रदेश शासन और आरएन सिंह, एडीजी, ईओडब्ल्यू के विरुद्ध एक परिवाद दायर किया गया है. यह परिवाद दो आपराधिक मुकदमों में जानबूझ कर सोची-समझी साजिश के तहत पूर्व में नियमानुसार किये गए समस्त विवेचनाओं को एक सिरे से दरकिनार करते हुए उन अभियुक्तों की गलत ढंग से मदद पहुंचाये जाने सम्बंधित है जिन्हें इससे पूर्व स्वयं ईओडब्ल्यू विभाग ही लगातार मुल्जिम बता रहा था.

इनमें पहला प्रकरण मे. श्री एसिड एंड केमिकल्स लि०, गजरौला, से सम्बंधित अन्वेषण संख्या 83/04 है जो इस कंपनी के डाइरेक्टरों के विरुद्ध धारा 420/467/468/471/477ए भा०द०वि० में वर्ष 1998-99 तथा 1999-2000  में भारी मात्र में रॉक फोस्फेट फर्जी बिलों के आधार पर क्रय करने और उससे फर्जी एस०एस०पी० खाद का उत्पादन दिखा कर भारत सरकार से फर्जी सब्सिडी हासिल करने के बारे में है. ईओडब्ल्यू विभाग ने विवेचना के बाद दिनांक 24 दिसंबर 2009 को गृह विभाग को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके अनुसार मे. श्री एसिड लि. द्वारा वर्ष 1998-99 में एक प्राइवेट फर्म श्री राम ट्रेडिंग कंपनी, ललितपुर से 2269.81 मै. टन रॉक फोस्फेट केवल कागज़ पर ख़रीदा गया और इन फर्जी प्रविष्टियों के आधार पर 4203 मै. टन एस०एस०पी० खाद का उत्पादन फर्जी रूप से दिखाया कर करीब 32.61 लाख रुपये की सब्सिडी हड़प लिया. अतः इसके लिए श्री एसिड लि० के एमडी रवि मित्तल और उनके सगे भाई कंपनी के ज्वायंट एमडी संदीप मित्तल को धारा 420/467/468/ 471/ 477ए का दोषी पाया गया. इनमें से संदीप मित्तल ने कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव (गृह) से अपने रिश्तों के बल पर कई बार शासन को प्रार्थना पत्र दिये जिनमें बार-बार ईओडब्ल्यू विभाग ने यही बात कही गयी कि दोनों भाई रवि मित्तल और संदीप मित्तल कंपनी के कार्यों के लिए समान उत्तरदायी थे. अंत में जून 2011 में एसपी, ईओडब्ल्यू मेरठ द्वारा एक बार फिर दोनों भाइयों को मुज्लिम बताते हुए रिपोर्ट भेजी गयी लेकिन आरएन सिंह, एडीजी, ईओडब्ल्यू ने अब तक की गयी समस्त विवेचनाओं और जांचों को बिना समुचित आधार के बदलते हुए  गलत रूप से यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि इस मामले में संदीप मित्तल दोषी नहीं हैं और इस गलत रिपोर्ट को उतनी ही तत्परता से गृह विभाग द्वारा अनुमोदित कर दिया गया.

दूसरे मामले में मे० अमरोहा ट्रेडफिन लि० कंपनी, जे पी नगर के डाइरेक्टरों अशोक कुमार जैन, अजय कुमार टंडन, पंकज मित्तल एवं अजय कुमार चौहान द्वारा लुभावने वायदे कर के निवेशकों से पैसा जमा कराया गया और जमा धनराशि की अवधि पूरी होने के बाद पैसा वापस नहीं किये गए जिस सम्बन्ध में ईओडब्ल्यू विभाग द्वारा अन्वेषण संख्या- 81/07 पर विवेचना की गयी और इन चारों निवेशकों को दोषी मानते हुए धारा 406/420 का अभियुक्त पाते हुए ईओडब्ल्यू के तत्कालीन एडीजी द्वारा इन्हें रु. 45,99,893 के गबन करने के आरोप में गृह विभाग को अपनी रिपोर्ट दिनांक 21 अगस्त 2009 को प्रेषित की. यहाँ अजय कुमार टंडन ने कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव, गृह, से सम्बन्ध के बल पर कई बार गृह विभाग में प्रार्थना पत्र दिये जिनमें बार-बार ईओडब्ल्यू विभाग ने चारों निवेशकों को अभियुक्त बताया. आर एन सिंह ने ईओडब्ल्यू के एडीजी के रूप में दवाब बना कर अंतिम रिपोर्ट लगवाने का प्रयास किया और मेरठ सेक्टर में असफल रहने पर यह विवेचना मेरठ सेक्टर से मुख्यालय सेक्टर स्थानांतरित कर दी और आनन-फानन में इस मामले में अंतिम रिपोर्ट लगाने की संस्तुति उत्तर प्रदेश शासन को कर दी, जिसे गृह विभाग ने तुरंत अनुमोदित भी कर दिया. आरएन सिंह ने फाइनल रिपोर्ट धारा 45 क्यू, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट के आधार पर इस तर्क से लगवाया कि धारा 45 क्यू, आरबीआई एक्ट भारतीय दंड संहिता के अपराध को रोकता है, जबकि धारा 45 क्यू, आरबीआई एक्ट के अंतर्गत इस तरह से फाइनल रिपोर्ट प्रेषित करना कानूनी रूप से गलत है, क्योंकि धारा 45 क्यू, आरबीआई एक्ट कहीं से भी भारतीय दंड संहिता के अपराध को नहीं रोकता है.

जिस किसी अधिकारी ने इन कार्यों का विरोध किया उसे ठिकाने पर लगा दिया गया. ईओडब्ल्यू मेरठ सेक्टर के एसपी अमिताभ ठाकुर को बीच सत्र में ही अचानक बिना कारण के दिनांक 12 अक्टूबर 2011 को ईओडब्ल्यू विभाग से हटा कर एकपक्षीय ढंग से रिलीव भी कर दिया गया. मे. श्री एसिड कंपनी प्रकरण के विवेचक कालू राम शर्मा को दिनांक 19 अक्टूबर  को अचानक इस विवेचना से हटाते हुए उन्हें बलिया खाद्यान्न घोटाले से संबद्ध कर दिया गया. इसी मामले में ईओडब्ल्यू मुख्यालय के लिपिक संजय श्रीवास्तव को दिनांक 29 अक्टूबर को निलंबित कर दिया गया. मैंने लोकायुक्त को ये सभी तथ्य प्रस्तुत करते हुए उनसे इनमे गहराई से जांच करा कर दोषी पाए गए सभी लोक सेवकों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही करने की मांग की है.

डॉ. नूतन ठाकुर

सामाजिक कार्यकर्ता एवं कन्वेनर,

नेशनल आरटीआई फोरम

पेमा का विवाद बढ़ा, दो पत्रकारों ने जनरल बाडी में शामिल होने से इनकार किया

जालंधर में टीवी मीडिया द्वारा हाल ही में गठित की गयी पत्रकारों की संस्था पंजाब इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन (पेमा) में चुनाव के दिन से पैदा हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा ..जालंधर के दो वरिष्ठ पत्रकारों ने पेमा की जनरल बाडी में शामिल होने से इनकार कर दिया है ..सीएनबीसी के पत्रकार नरेश अरोड़ा और एनडीटीवी के पत्रकार अश्वनी मल्होत्रा ने पेमा की बाडी में किसी भी तरह का पद लेने से साफ़ मना कर दिया..

नरेश अरोड़ा पिछले करीब बारह साल से मीडिया में हैं और करीब दस साल से टीवी मीडिया से जुड़े हैं …एनडीटीवी के पत्रकार अश्वनी मल्होत्रा भी पिछले करीब सात-आठ साल से टीवी मीडिया में हैं… इस से पहले पेमा के अध्यक्ष परमजीत रंगपुरी द्वारा शनिवार को बुलाई गयी बैठक में चुनाव में हिस्सा लेने वाले बाइस सदस्यों में से करीब दर्जन भर सदस्य ही बैठक में  शामिल हुए.. .इस से पहले एटूजेड चैनल के पत्रकार पवन धूपर ने पेमा के चुनाव में उन्हें वोट का अधिकार न दिए जाने के आरोप लगाये थे.. इस चुनाव में परमजीत रंगपुरी ग्यारह वोट के साथ प्रधान चुने गये थे, लेकिन विपक्षी उमीदवार अश्ह्वानी मल्होत्रा ने महज चुनाव में खड़े होने की औपचारिकता ही पूरी की और चुनाव प्रचार तक नहीं किया, जबकि रंगपुरी खेमे ने चुनाव एक लिए पूरा जोर लगा दिया था… शनिवार को हुयी पेमा की बैठक में स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई पत्रकार भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो पेमा की बाडी उसके मतदान का अधिकार रद्द कर सकती है..

पेमा के विवाद को जानने के लिए इस खबर पर क्लिक करें – गठन से पहले विवाद में 'पेमा'

पत्रिका से चीफ रिपोर्टर का इस्‍तीफा, संपादकीय प्रभारी का तबादला

: भारतेन्‍दु, हरीमोहन, राजेश, बॉबी एवं नितिन की नई पारी  : राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर से खबर है कि चीफ रिपोर्टर मनीष गोधा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे काफी समय से पत्रिका से जुड़े हुए थे. उन्‍होंने दैनिक भास्‍कर के सेकेंड ब्रांड डीएनए से अपनी नई पारी शुरू की है. अभी कुछ दिन पहले ही पत्रिका ने जयपुर संस्‍करण के संपादकीय प्रभारी राजीव तिवाड़ी को हटाकर अपने सेकेंड ब्रांड डेली न्‍यूज भेज दिया है. इसे पत्रिका में दोयम दर्जे का अखबार माना जाता है. कहा जा रहा है कि यह तिवाड़ी का डिमोशन है. खबर है कि राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर में अंदरखाने सबकुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है. 

दैनिक जागरण, मथुरा से भारतेन्‍दु सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर असिस्‍टेंट ब्‍यूरोचीफ की भूमिका निभा रहे थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी आगरा से लांच होने जा रहे द सी न्‍यूज एक्‍सप्रेस के साथ शुरू की है. भारतेन्‍दु की गिनती मथुरा के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. उन्‍हें मथुरा का प्रभारी बनाया गया है. वे इसके पहले अमर उजाला को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. मथुरा में ही द सी न्‍यूज एक्‍सप्रेस के साथ हरीमोहन रावत ने अपनी नई पारी शुरू की है. इसके पहले वे अमर उजाला एवं हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर राजेश भाटिया ने भी अपनी नई पारी शुरू की है. इन दोनों लोगों को रिपोर्टर बनाया गया है. दैनिक जागरण को अपनी सेवाएं दे चुके बाबी मिश्रा भी फोटोग्राफर के रूप में द सी न्‍यूज एक्‍सप्रेस से अपनी पारी शुरू की है.

नितिन मुकेश सिन्‍हा ने अपनी नई पारी एमएचवन न्‍यूज के साथ शुरू की है. उन्‍हें असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. वे इसके पहले टीवी100 को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

आर्यन टीवी : इस्‍तीफा देंगे समीर रंजन, श्‍वेता, मंजूल एवं अरशद जुड़े

आर्यन टीवी से खबर है कि कई लोगों ने अपनी नई पारी शुरू की है. वहीं आउटपुट हेड संस्‍थान से विदाई लेने वाले हैं. खबरों के अनुसार आउटपुट हेड समीर रंजन आर्यन टीवी से 30 नवम्‍बर को विदा हो जाएंगे. उन्‍होंने संस्‍थान को अपना नोटिस दे दिया है. खबर है कि वे दिल्‍ली आने वाले हैं, पर किस चैनल से जुड़ेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

दूसरी तरफ साधना न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर श्‍वेता झा ने अपनी नई पारी आर्यन टीवी के शुरू की है. श्‍वेता झा साधना में एंकर थीं. उन्‍हें आर्यन टीवी में भी एंकरिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी जा रही है. श्‍वेता इसके पहले यूएनआई टीवी एवं हमार टीवी को भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. ताजा टीवी से इस्‍तीफा देकर मंजूल मंजरी ने भी आर्यन टीवी के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. इन्‍हें भी यहां एंकरिंग की जिम्‍मेदारी दी गई है. आजाद न्‍यूज से इस्‍तीफा देने वाले अरशद भी आर्यन टीवी के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. अरशद पिछले काफी समय से पत्रकारिता में हैं. इन्‍होंने आउटपुट में ज्‍वाइन किया है.

जातिवादी है मीडिया, दिल्‍ली प्रेस क्‍लब में ब्राह्मणवाद को बढ़ावा

2जी घोटाले की एफआईआर में देश के कई दिग्गज पत्रकारों का नाम दलाल के रूप में आया तो मीडिया जगत में हंगामा हो गया। कहा जाने लगा कि  मेकअप में चमकने वाले इन चेहरों का असली रंग अब देश की जनता देखेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, इन चेहरों पर अभी भी मेकअप पुता है, हां इनकी दलाली की कहानी जरूर पुरानी हो गई है। जस्टिस काटजू ने प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनते ही मीडिया को आईना दिखा दिया। कई सालों बाद अपना चेहरा देखकर मीडिया भी घबरा गई। कुछ के जहन तो कुछ के अहंकार पर चोट हो गई। जस्टिस काटजू द्वारा उठाए गए गंभीर सवालों की आलोचना तो कई ने की लेकिन जवाब (सही या गलत) कोई नहीं दे सका।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार जे डे की हत्या में एक महिला पत्रकार का नाम आया तो फिर से पत्रकारिता जगत ने हो हल्ला शुरु किया जो अभी तक जारी है। मीडिया का सांप्रदायिक होना भी किसी से छुपा नहीं है। मालेगांव धमाकों के आरोपियों की रिहा होने की खबर का कवरेज इस बात का गवाह है। अगर मीडिया सांप्रदायिक नहीं है तो क्यूं बटला हाउस ‘एनकाउन्टर’ में मारे गए लड़कों की सारी डिटेल पुलिस की कहानी के अनुसार बता रहा था और बता रहा था कि वहां ‘जेहादी’ साहित्य मिला। क्या इस मीडिया ने ये खबर दी कि उस मकान में ‘पंचतंत्र की कहानियां’ भी मिलीं? क्या पंचतंत्र की कहानियां भी जेहादी साहित्य है? क्या किसी मीडिया के अक़लमंद धुरंधर ने इस बात पर रोशनी डालने का कोशिश किया कि ‘जेहादी साहित्य’ क्या होता है? फिर किस आधार पर मीडिया की खूबसूरत बालाएं चिल्ला-चिल्लाकर कहती हैं कि जेहादी साहित्य मिला? मीडिया के पूर्वाग्रही और सांप्रदायिक होने के एक नहीं एक लाख उदाहरण हैं।

मीडिया के चरित्र पर सवाल यहीं खत्म नहीं होते…एक गंभीर सवाल जो बार-बार उठता रहा है और हाल ही में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हए घटनाक्रम ने जिसे फिर ताजा कर दिया है वो मी़डिया के जातिवादी चरित्र पर है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के सदस्यों की नई लिस्ट जारी हुई है..जिसके नामों में मिश्रा, तिवारी, शुक्ला, उपाध्याय जैसे सरनेम प्रमुखता से हैं। एक बार फिर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की मेंबरशिप बांटने में पारदर्शिता और योग्यता पर ब्राह्मणवाद हावी हो गया। प्रेस क्लब में इस ब्राह्मणवाद का कारण कई योग्य पत्रकारों को मेंबरशिप नहीं मिला पाई। इस समय संदीप दीक्षित जी प्रेस क्लब के महासचिव हैं। उनके इशारे पर ही प्रेस क्लब के मेंबरशिप में ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया गया ताकि अगली बार भी ब्राह्मण कार्ड खेलकर संदीप जी आसानी से प्रेस क्लब का चुनाव जीत सकें।

ये ब्राह्मणवाद का ही नतीजा है कि प्रेस क्लब में शामिल होने के तमाम क्रायटेरिया ताक पर रख दिए गए। राष्ट्रीय चैनलों और अखबारों के पत्रकार बेचारे ताकते रह गए जबकि दमदम टाइम्स जैसे अखबारों के पत्रकारों ने प्रेस क्लब में शान से प्रवेश किया। लेकिन अब पारदर्शिता को ताक पर रखना उतना भी आसान नहीं है जितना की प्रेस क्लब के सदस्य सोच रहे हैं। अपने खिलाफ माहौल बनता देख संदीप जी ने कुछ पत्रकारों को फोन पर धमकियां भी दी हैं, जिन्हें रिकॉर्ड कर लिया गया है। जरूरत पड़ने पर कॉल रिकार्डिंग को भी पेश किया जाएगा। खैर दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया है तो ब्राह्मणवाद भी है लेकिन मुंबई के प्रेस क्लब के बारे में सुनकर तो आप चौंक ही जाएंगे। मुंबई के एक बुजुर्ग पत्रकार द्वारा आरटीआई के जरिए हासिल किए गए दस्तावेजों के मुताबिक मुंबई प्रेस क्लब ही अधिकारिक नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि जब यह प्रेस क्लब ही अधिकारिक नहीं है तो वो फिर वो चुनाव कैसे कराता है?

बुजुर्ग पत्रकार अली मुहम्मद मुंडिया द्वारा हासिल की गई जानकारी प्रेस क्लब पर कई और गंभीर सवाल खड़े करती है, जैसे, जो पत्रकार और फोटोग्रॉफर सरकार से मान्यता ही नहीं रखते उन्हें चुनाव में वोट देने की अनुमति कैसे दी गई? अली का आरोप यह भी है कि इन गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों से क्लब लाखों रुपए भी लेता है। अली साहब के सवाल यहीं खत्म नहीं होते। उन्होंने मुंबई प्रेस क्लब को सरकार से मिलने वाले करोड़ों रुपए के फंड और क्लब के अंदर शराब की बिक्री पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि स्कूल कॉलेजों, हॉस्पिटल और कोर्ट के नजदीक बार नहीं चल सकते। लेकिन इस आदेश का उल्लंघन कर मुंबई प्रेस क्लब में शराब प्रस्तुत की जाती है।

दिल्ली में संदीप दीक्षित पत्रकारों को धमकियां दे रहे हैं तो मुंबई में प्रेस क्लब अली मुहम्मद को धमकियां दे रहा हैं। अब बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पत्रकार खुद ही जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, खुद पर सवाल उठने पर धमकियां दे रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं तो फिर वो अपनी रिपोर्टों में किस नैतिकता से दूसरों पर सवाल खड़े कर सकते हैं। इससे भी बड़ा सवाल यहां यह खड़ा होता है कि क्या ऐसे पत्रकारों और प्रेस क्लबों में कोई नैतिकता है?

लेखक अफ़रोज़ आलम साहिल पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

दैनिक भास्‍कर, रतलाम में हड़कम्‍प, नीमच के सिटी चीफ हटाए गए

दैनिक भास्‍कर, रतलाम में हड़कम्‍प मचा हुआ है. भ्रष्‍टाचार के आरोपों के बाद प्रबंधन ने जांच के लिए भोपाल के स्‍थानीय संपादक आनंद पांडे को रतलाम भेजा था. उनकी रिपोर्ट के बाद खबर है कि नीमच जिले के सिटी चीफ मूलचंद खिची को हटा दिया गया है. वे काफी समय से भास्‍कर के साथ जुड़े हुए थे. डेस्‍क इंचार्ज कैलाश नागर से भी मैनेजमेंट ने त्‍याग पत्र देने को कह‍ दिया है. इतना ही नहीं विनोद सिंह सोमवंशी से पहले यहां के संपादक रहे तथा वर्तमान में भंटिडा में एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर का काम देख रहे महेंद्र कुशवाहा की भी जांच कराई जा रही है.

यह कार्रवाई भ्रष्‍टाचार के आरोप लगने के बाद की गई है. इसके बाद से ही रतलाम में हड़कंप मचा हुआ है. बताया जा रहा है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद कुछ और लोगों पर भी गाज गिर सकती है. फिलहाल इस घटना को लेकर तरह तरह की चर्चाएं हो रही हैं. इस संदर्भ में आनंद पांडे से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु सफलता नहीं मिल पाई.

धमकी, चमकी और दस्‍तखत : दैनिक जागरण ने पंद्रह साल पुराना खेल दोहराया

मजीठिया वेतन बोर्ड की संस्‍तुतियों की अधिसूचना के बाद प्रेसकर्मियों को दबाने कुचलने का खेल और तेज हो गया है। दैनिक जागरण को नई संस्‍तुतियों से सर्वाधिक परेशानी है। पिछले चार दिनों के भीतर एक फर्जी सहमति पत्र पर आनन-फानन दस्‍तखत कराए गए हैं। जागरण के अधिकांश कर्मी तो जानते भी नहीं सहमति पत्र का मजमून क्‍या है। मजमून अंग्रेजी में लिखा हुआ था और इस पर दस्‍तखत संस्‍थान के सफाईकर्मियों , चतुर्थ श्रेणी कर्मियों और मशीन के ऐसे कर्मियों ने भी किया है जो अंग्रेजी भाषा नहीं जानते।

जिन कर्मियों ने हिमाकत करते हुए मजमून को पढ़ लिया उनके मुताबिक प्रबंधन ने उनसे संतुष्टि पत्र ले लिया है। मसलन उन्‍हें पिछले वेतन बोर्ड मणिसाना के मुताबिक सुविधाएं, भत्‍ते और वेतन मिलते हैं। कंपनी ने अंतरिम राहत दे दी है। वे कंचन चर रहे हैं सुखी है और प्रबंधन से उन्‍हें कोई शिकायत नहीं है। प्रबंधन के इस छल प्रपंच से आहत कर्मचा‍रियों में भारी गुस्‍सा है। बस अनुकूल समय का इंतजार है जिस दिन गुस्‍सा फूटे।

जागरण की सभी 36 यूनिटों में दस्‍तखत का यह खेल चला है। कहीं कही प्रतिरोध भी हुआ है। बताते हैं कि इस काम में सबसे गंदी भूमिका संपादकीय प्रभारियों ने निभाई है। जिन्‍होंने दस्‍तखत में हीलाहवाली की उन्‍हें नौकरी से हाथ ही नहीं धोने, फर्जी मुकदमों में फंसाने, कुछ ऐसा कर देने कि पत्रकारिता के पेशे लायक ही न रह जाएं, की धमकी दी गई। इस काम में कुछ वरिष्‍ठ रिपोर्टरों की भूमिका भी काफी शर्मनाक रही। वे अपने सहकर्मियों को जीवन जगत का व्‍यवहार समझाने में लगे रहे। प्रबंधन की नजर में सुखर्रू बनने के लिए इन्‍होंने अपने साथ प्रतिदिन काम करने वाले साथियों पर ही बेजा दबाव बनाया। ये अलबत्‍ता है कि ये रिपोर्टर बाहर भीतर थू थू का शिकार हो रहे हैं।

वेतन और भत्‍ते के मामले में जागरण समूह का रिकार्ड काफी गंदा है। इस कंपनी में मणिसाना की संस्‍तुतियां ही अब तक नहीं लागू हो पाई हैं। 15 साल पहले जब मणिसाना की संस्‍तुति आई तब भी इसी तरह सहमति पत्र पर दस्‍तखत कराए गए थे। कर्मचारियों की वेतन स्लिप पर as pur agreement लिखा रहता है। जिससे कानूनी तौर पर इस कुकृत्‍य को चुनौती न दी जा सके। कोई संगठन, यूनियन बनने ही नहीं दी गई जिससे संगठित आवाज उठ पाए। जिन्‍होनें बोलने की कोशिश की उन्‍हें नौकरी से बाहर होना पड़ा। कुछ लोग अभी भी मुकदमें में घिसट रहे हैं। श्रम विभाग खुद संज्ञान नहीं लेता। इंसपेक्‍टर्स आते हैं और प्रबंधक के कमरे में चाय पीकर उनके उपलब्‍ध कराए दस्‍तावेज और सूचनाएं लेकर चले जाते है।

हालत यह है कि राज्‍य सरकार के सफाईकर्मियों के वेतन से भी कम वेतन में एडीटोरियल के 80 फीसदी सब एडीटर, रिपोर्टर, सीनियर सबएडीटर और सीनियर रिपोर्टर काम कर रहे हैं। इन्‍हे श्रम कानूनों के मुताबिक नाइट एलाउंस नहीं मिलता। एचआरए और अन्‍य सुविधाओं की तो कल्‍पना भी बेमानी है। कम वेतन पर मशीन की तरह काम। अब मल्‍टीमीडिया का कांसेप्‍ट लाया गया है जिसके तहत जागरण के भविष्‍य के प्रकल्‍प टीवी चैनल के लिए भी रिपोर्टर को बिना कुछ अतिरिक्‍त लिए काम करना पड़ेगा। काम के घंटे तय होने का भी कोई मतलब नहीं है। हाजिरी के लिए गेट पर बायोमीटरिक मशीन लगी है। यह मशीन कंपनी के फ्राड का एक नमूना है। यह कर्मचारियों के 8 घंटे से ज्‍यादा श्रम को रिकार्ड नहीं करती। अलबत्‍ता जैसे ही 8 घंटा से कम काम हुआ वेतन काट लेती है। लिहाजा कंपनी में ओवरटाइम देने का सिस्‍टम ही बंद हो गया।

अपील लोकतांत्रिक संगठनों, प्रेस कौसिंल, प्रेसकर्मियों के संगठनों से-

1- जागरण के प्रबंधन को हजारों की संख्‍या में निंदा पत्र प्रेषित करें। उन्‍हें बताएं सच की रक्षा, सात सरोकारों और सात संस्‍कारों के प्रति प्रतिबद्धता का दावा करते है तो अपने कर्मचारियों को उनका वाजिब हक दें।

2-उप श्रमायुक्‍तों को चिटठी लिखे, ज्ञापन दे और उनपर दबाव बनाएं कि वे जागरण के कर्मचारियों को अपने कार्यालय बुलाकर उनके बयान लें। बैंक और पीएफ आपिफस से वास्‍तविक वेतन भुगतान का रिकार्ड हासिल करें और सत्‍यापन करें कि क्‍या दिया जा रहा है। जो दिया जा रहा है वह पिछले वेतन बोर्ड के अनुरूप है अथवा नहीं। और ऐसे में कर्मचारियों के दस्तखत वाला कथित सहमति पत्र फ्राड नहीं तो और क्‍या है।

3-आम पाठक जो कि दैनिक जागरण में अपनी आवाज तलाशते हैं, उन्‍हें इस सच्‍चाई को बताया जाय कि दरअसल जागरण कर्मचारियों का खून चूसकर सत्‍य की रक्षा का ढोंग कर रहा है। उसका लक्ष्‍य पाठकों की आवाज बुलंद करना नहीं अपना मुनाफा बढाना है। यह मुनाफा भी अखबार की प्रगति और बेहतरी में नहीं खर्च होना है। इससे जागरण समूह के मालिकान शराब के कारखाने, रियल स्‍टेट, माल समूह का नया साम्राज्‍य खड़ा करना चाहते हैं।

आपसे सहयोग की उम्‍मीद में

हम हैं जागरण के कर्मचारी

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अनुराग बत्रा ने की Abusive and Repeated Calls की शिकायत

: Abusive and Repeated Calls from Aegon Religare Staff : Dear All, I am hereby mentioning a case study of DND, were a Insurance Company regularly does promotional calls to a customer, despite of the fact that the customer always mentioned that the number is registered under DND. The most shocking part was once when the customer care executive of the company ended up the call by abusing. The mobile was a default call recording mobile and the stuff got recorded. I would like you all to escalate this issue in public interest which will help me for the legal case in future.

Summary
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ð 21/09/2011 at 12:10 P.M. approx got a call from Sumit, Executive Aegon Religare were he ended up the call by abusing when not listened to his promotional call. (recording available)

ð 23/09/2011 at 12:45 P.M. approx got a call from Samira Meghani, Executive-Customer Relations from Mumbai office the details of abusive & repeated calls were explained to her. (recording available)

ð On Fri, 23 Sep 2011 12:55:04 +0530 Samira Meghani, Executive-Customer wrote and apologized for the annoyance/inconvenience caused and assured for necessary steps to be taken.

ð Friday, September 23, 2011, 5:55 PM Wrote complaint to the following : sunil.godhwani@aegonreligare.com; Rajiv Jamkhedkar; shachindra.nath@aegonreligare.com; anil.saxena@aegonreligare.com; adarsh.kishore@aegonreligare.com; douglas.henck@aegonreligare.com; bertjaap.brons@aegonreligare.com; vimal.bhandari@aegonreligare.com; kashi.memani@aegonreligare.com; sivakumar.sundaram@aegonreligare.com Cc: *AEGON Religare Life Insurance-Customer Care;

ð On Mon, 26 Sep 2011 12:25 pm Approx Debarati Guha Senior Manager-Customer Relations called up and assured that such things will not happen in future and apologized for the Same. (recording available)

ð On Mon, 26 Sep 2011 12:47:10 +0530 Debarati Guha Senior Manager-Customer Relations wrote at the outset please accept my sincere apology for the inconvenience caused to you. We have taken note of this feedback and will be taking necessary action at our end.

ð On Wed, 28 Sep 2011 14:12 PM Debarati Guha Senior Manager-Customer Relations (Mobile Number – 09821233535) called up and assured that the matter has been discussed with the senior management of the company and assured no such inconvenience will happen in future. (recording available)

ð On Wed, 28 Sep 2011 15:15 PM Again got promotional call from Mr. Nikhil Verma explaining religare insurance products. Informed Debarati Guha Senior Manager-Customer Relations on the same at 17:00pm (recording available)
=========================================================================================

I would like you all to escalate this issue in public interest which will also help me for the legal case in future.

Thanks & Regards
Anurag Batra
+ 91 – 945 1 945 945
Lucknow

PS Debarati Guha, Senior Manager-Customer Relations: Kindly let me know whether the notice send has been replied or not by your company.

On Mon, 26 Sep 2011 12:38:57 +0530 debarati.guha@aegonreligare.com wrote

Dear Mr Batra

I refer to the telephonic discussion we had today with regards to your complaint of receiving abusive call.

We thank you for bringing this to our notice as these are not the service levels we aspire.

At the outset please accept my sincere apology for the inconvenience caused to you.

We have taken note of this feedback and will be taking necessary action at our end.

In case of any further issues you may please contact me on the below co- ordinates.

Regards,

Debarati Guha

Senior Manager-Customer Relations

AEGON
Religare Life Insurance Co. Ltd.

(022-61180253/09821233535)

Visitus
at:www.aegonreligare.com

We are committed to
provide the Best Customer Service Experience in Insurance Industry!!

_____________________________________________________________________________________________________________________________________________

From: BATRA anurag
banurag@rediffmail.com
Sent: Friday, September 23, 2011 5:55 PM
To:
sunil.godhwani@aegonreligare.com; Rajiv Jamkhedkar; shachindra.nath@aegonreligare.com;
anil.saxena@aegonreligare.com; adarsh.kishore@aegonreligare.com;
douglas.henck@aegonreligare.com; bertjaap.brons@aegonreligare.com;
vimal.bhandari@aegonreligare.com; kashi.memani@aegonreligare.com;
sivakumar.sundaram@aegonreligare.com
Cc: *AEGON Religare Life Insurance-Customer Care;
banurag@rediffmail.com
Subject: Complaint

Dear All,

I got a call from your delhi office regarding promotional activity of your financial product, due to non
clarity in the call I could not understand the voice, the executive of your office ended up the call by abusing.

I would like to know few things:-

1. If a number is registered in DND why your company is making promotional calls on it.
2. Does your executive have a right to abuse to any person.

Please clarify
Thanks & Regards
Anurag Batra
+91- 945 1 945 945

On Fri, 23 Sep 2011 12:55:04 +0530 wrote

Dear Mr. Batra,

Thank You for writing to us at AEGON Religare Life Insurance Company Ltd.

As per our conversation today, I'd like to inform you that we have made a note
of your concern and basis your complaint we shall investigate the matter and
taken necessary steps as per the company guidelines.

I also requst you to indly register your number DNC list on the follwoing link:

http://www.aegonreligare.com/dnc.php

I apologize for the annoyance/inconvenience that this may have caused to you.

Incase of any further information required please feel free to write to us at
customer.care@aegonreligare.comor visit our website at www.aegonreligare.com.

We thank you for your association with us and look forward to an enduring
relationship.

Regards,

Samira Meghani

Executive-Customer Relations

AEGON Religare Life Insurance Co. Ltd.

मशहूर खेल पत्रकार सुभाष कुमार शाम का निधन

मुंबई : मशहूर खेल पत्रकार सुभाष कुमार शाम का सोमवार को दादर पारसी कालोनी स्थित अपने आवास पर निधन हो गया। वह 71 वर्ष के थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी हैं। शाम की पत्नी लता ने बताया, ‘मैं सुबह छह बजे लाफ्टर क्लब की मीटिंग में गई थी जब वह सो रहे थे। मैंने लौटकर घंटी बजाई पर उन्होंने दरवाजा नहीं खोला। मैं भीतर गई तो उन्हें मृत पाया।’

शाम ने अपने 50 बरस के करियर में क्रिकेट विश्व कप, टेस्ट मैच, भारतीय टीम का 1985- 86 का ऑस्ट्रेलिया दौरा, दिल्ली एशियाई खेल 1982 और सोल ओलंपिक 1988 कवर किए थे। वह दो दशक तक मुंबई के फ्री प्रेस जरनल के खेल संपादक रहे। वह ‘न्यूज टाइम्स’, ‘इंडियन पोस्ट’ और ‘आब्जर्वर’ से भी जुड़े रहे। साभार : एजेंसी

प्रेस क्लब की नई लिस्ट में छाए हैं संदीप दीक्षित के “ब्राह्मण”

: प्रेस क्लब की मेंबरशिप मैनेज कर रहे हैं संदीप दीक्षित : प्रेस क्लब की सदस्यता की दूसरी लिस्ट बाहर आ गई है। इसमें एक तरफ से संदीप दीक्षित के खासमखास और खासतौर पर ब्राह्मणों को जगह दी गई है। इस लिस्ट में 90 फीसदी ब्राह्मण हैं और ये वे ब्राह्मण हैं जो दीक्षित जी के गुट के हैं। संदीप दीक्षित प्रेस क्लब के महासचिव हैं। पिछले एक साल के कामकाज की पूरी चाभी संदीप दीक्षित के ही हाथ में रही है। प्रेस क्लब की नई लिस्ट में संदीप दीक्षित की ही मनमानी चली है।

मिश्रा, तिवारी, शुक्ला, उपाध्याय जैसे लोगों को खासतौर पर जगह दी गई है। वजह संदीप दीक्षित की असुरक्षा की भावना है। वह दुबारा चुनाव जीतना चाहते हैं। मगर फटी कमीज के धब्बे सामने आ चुके हैं। दिसंबर में चुनाव कराने की तैयारी और उसके पहले यह लिस्ट निकालना इसी का हिस्सा है। प्रेस क्लब के मौजूदा समीकरण में जीत पाना उनके लिए टेढ़ी खीर हो चुका है। ऐसे में तेजी के साथ एक के बाद दूसरी लिस्ट जारी करके दीक्षित जी अपने लोगों को प्रेस क्लब का मेंबर बनाकर अपने सपने को साकार करना चाहते हैं।

साफगोई और पारदर्शिता के नाम पर जीतकर आए दीक्षित जी ने कोई भी क्राइटेरिया नहीं रखा। प्रेस क्लब का मेंबर किसी पत्रकार को क्यूं बनाया जा रहा है, क्यूं उसे बाहर किया जा रहा है, इसका कोई क्राइटेरिया नहीं है। यही वजह है कि राष्ट्रीय चैनलों और अखबारों के पत्रकारों को इस लिस्ट में जगह नहीं मिल सकी है, दूसरी ओर दमदम टाइम्स जैसे पत्रकारों की पौ बारह है जो दीक्षित जी की चरण परिक्रमा करने को तैयार हैं। 

इस तानाशाह रवैए के खिलाफ विद्रोह भड़कने की शुरुआत हो चुकी है। संदीप दीक्षित की जातिवादी, संकीर्ण राजनीति के खिलाफ लोकतांत्रिक हल्लाबोल की पूरी तैयारी है। अब दीक्षित जी धमकाने में जुटे हैं। भड़ास पर जल्द ही दीक्षित जी के काल रिकार्ड और मोबाइल पर दी गई, उनकी धमकियों का खुलासा किया जाएगा, जो रिकार्ड  हो चुकी हैं। इस खुलासे से साबित हो जाएगा कि वे किस तरह अपनी बिरादरी के लोगों को सदस्य बना रहे हैं और गैर बिरादरी के लोगों को बाकायदा धमका रहे हैं।

एसोसिएट मेंबरशिप की आड़ में भी दीक्षित जी ने निराला खेल खेला है। ऐसे ऐसे लोगों को एसोसिएट मेंबरशिप दे दी है जिनका नाम सामने आते ही हाथों से तोते उड़ जाएंगे। खास बात यह भी है कि दीक्षित जी ने प्रेस क्लब मेंबरशिप चयन कमेटी का मुखिया भी अपनी ही ब्राहमण बिरादरी से चुना था ताकि बिरादरी के हितों का पूरा ख्याल रखा जा सके। 

लेखक भगत शेखर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

श्रीश्री को फर्जी तरीके से लाइव दिखाने पर सीएनएन-आईबीएन ने मांगी माफी

पिछले दिनों मुंबई के विनय जोशी ने श्री श्री रविशंकर को फर्जी तरीके से लाइव दिखाने पर सीएनएन-आईबीएन के उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा था. पत्र का जवाब सीएनएन-आईबीएन की तरफ से जो आया है, उसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. इस जवाब में साफ साफ बताया गया है कि सीएनएन-आईबीएन ने अपनी गलती के लिए श्रीश्री से माफी मांग ली है.

———- Forwarded message ———-

From: Kshipra Jatana kshipra.jatana@network18online.com

Date: 25 November 2011 12:37

Subject: RE: Complaint regarding content

To: Vinay Joshi murdikar@gmail.com, complaint complaint@network18online.com

Dear Mr. Joshi,

Thank you for your email to us.

Face The Nation, is a late night–10pm–show. Often our esteemed panelists cannot come to our studio or OB location at that time as they are in remote locations or unavailable at 10pm at night. We thus record small interviews with them, after taking their consent that this will be played in the Face The Nation debate. This was done with Sri Sriji as he was in Mirzapur, UP, and not able to come to our studio at 10pm.

We should have made it clear to our viewers that it was a recorded interview and not a Live interview. We accept our mistake and have given an unqualified and unconditional apology for the error on our channel. We have even called on Sri Sriji in Bangalore and tendered our apologies to him. He has forgiven us and said for him the matter is closed.

There was absolutely no intention on our part to disrespect a universally beloved and esteemed spiritual leader like Sri Sri Ravishankar.

At CNNIBN we remain committed to fair and impartial journalism and do not intend any disrespect towards any religion or community. If we unwittingly did so, we are deeply apologetic.

Thank you for your interest in CNN IBN

Regards,

Kshipra Jatana | EVP & Head Legal

TV18 Broadcast Limited

हिन्दी फिल्म अध्ययन : ‘माधुरी’ का राष्ट्रीय राजमार्ग (दो)

'रिकार्ड तोड़ फीचर' स्तंभ में गानों की पंक्तियों से अटपटे सवाल पूछे जाते थे, या कटुक्तियाँ चिपकाई जाती थीं, कुछ इस बेसाख़्तगी से कि बोल के अपने अर्थ-संदर्भ गुम हो जाते थे, उनमें असली जीवन की छायाएँ कौंध जाती थीं। कुछ मिसालें मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:

क) ओ, पंख होते तो उड़ जाती रे…..
….चिड़िया नहीं तो फ़िल्मी हीरोइन तो हो, हवाई जहाज़ में क्यों नहीं उड़ आतीं?

ख) तख़्त क्या चीज़ है और लालो-जवाहर क्या है,
      इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं….
…..हाँ जी, दूसरे का माल लुटाने में क्या लगता है!

ग) जज़्बा-ए-दिल जो सलामत है तो इंशाअल्लाह
     कच्चे धागे में चले आएँगे सरकार बँधे।

…..जनाब, वो नज़ाकत-नफ़ासत के ज़माने लद गए, अब तो लोहे की हथकड़ियों में बांधकर घसीटना पड़ेगा सरकार को।

घ) और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे
     कारवाँ गुज़र गया, बहार देखते रहे…
    ….निकम्मों की यही पहचान होती है पुत्तर! (24 सितंबर, 1965).

क्या प्यारा हश्र हुआ है नीरज के पश्चाताप के आँसू रोते इस मशहूर भावुक गीत का! मूलत: हल्के-फुल्के हास्यरस का यह फ़ीचर बहुत लंबा नहीं चल पाया, लेकिन समझने लायक़ बात ये है कि यह उस परम-यथार्थवादी युग की दास्तान भी कहता है, जो तथाकथित फ़ॉर्मूला फ़िल्मों की हवा-हवाई बातों में आने से इन्कार कर रहा था, लिहाज़ा 'ये बात कुछ हज़म नहीं हुई' वाले अंदाज़ में प्रतिप्रश्न कर रहा था। जिसे आगे जाकर 'समांतर' सिनेमा कहा गया, उसका शबाब भी तो अँगड़ाइयाँ ले रहा था इस दौर में, जिसकी घनघोर प्रशंसिका बनकर ख़ुद माधुरी उभरती है। संक्षेप में, सत्यजीत राय, आदि के नक़्शे-क़दम चलकर लोकप्रिय मुख्यधारा की फ़ंतासियों के बरक्स ठोस दलीलें और वैकल्पिक फ़िल्में देने का वक़्त आ गया था, इन फुलझड़ियों से भला क्या होना था! उसके लिए तो उन साहित्यिक कृतियों के नाम गिनाए जाने थे, जो पता नहीं कब से फ़िल्म-रूप में ढल जाने को तैयार होकर बैठी थीं, और निर्माता कहते फिरते थे कि अच्छी कहानियाँ नहीं हैं। दरमियानी धारा की फ़िल्में भी कई बनीं इस समय और साहित्यिक कृतियों पर भी, पर शुद्ध कलात्मक फ़िल्में माधुरी के परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन के बाद भी बहुत नहीं चल पाईं। अपवादों को छोड़ दें तो उनमें से ज़्यादातर के नसीब में सरकारी वित्तपोषण, फ़िल्मोत्सवी रिलीज़ और 'आलोचनात्मक प्रशंसा' ही आई।

साहित्यप्रियता

जितने अभियान माधुरी ने चलाए, जितने पुल इसने सिरजे, उनमें एक पुल और एक अभियान का ज़िक्र ज़रूरी है। साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु बनाने में माधुरी ने कोई कसर नहीं उठाई, हिन्दी को हरेक अर्थ में प्रतिष्ठित करने की भी हर कोशिश इसने की। इसने इसरार करके हिन्दी के दिग्गजों से लेख लिखवाए, हरिवंश राय बच्चन से गीतों पर, पंत से फ़िल्मों की उपादेयता, उनके गुण-दोषों पर और 'दिनकर' को तो बाक़ायदा एक फ़िल्म दिखवाकर उसी पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी भी छापी। एक तरफ़ कवि, गीतकार, लेखक और विविध भारती के पहले निदेशक बनकर आए नरेन्द्र शर्मा से फ़िल्मी  गीतों की महत्ता' पर लिखवाया तो दूसरी ओर गुलशन नंदा से यादवेन्द्र शर्मा चंद्र की आत्मीय बातचीत छापी। ये याद दिलाना बेज़ा न होगा कि विविध भारती (ये शर्मा जी का रचनात्मक अनुवाद था अंग्रेज़ी के 'मिस्लेनियस प्रोग्राम' का) की स्थापना एक तरह से केसकर साहब के नेतृत्व वाले सूचना व प्रसारण मंत्रालय की बड़ी हार थी, लोकरंजक फ़िल्मी गीतों की ज़बर्दस्त लोकप्रियता के आगे। क्योंकि 1952 में भारतीय जनता को अपने मिज़ाज के माफ़िक बनाने के चक्कर में उन्होंने आकाशवाणी से फ़िल्मी गीतों के प्रसारण पर अनौपचारिक रोक लगा दी थी। जनता ने रेडियो सीलोन, और रेडियो गोआ की ओर अपने रेडियो की सूई का रुख़ कर दिया। अमीन सायानी इसी दौर में (बिनाका/सिबाका) गीतमाला के ज़रिए जो आवाज़ की दुनिया के महानायक बने तो आज तक हैं। घाटा भारतीय सरकारी ख़ज़ाने का हुआ जो पूरे पाँच साल तक चला, आख़िरकार केसकर साहब ने घुटने टेके, 'विविध भारती' चलायी, जिसे बाद में व्यावसायिक सेवा में तब्दील कर दिया गया। बाक़ी तो देखा-भाला इतिहास होगा आपमें से कइयों के लिए। तो जब नरेन्द्र शर्मा ने माधुरी के लिए लिखा कि 'फ़िल्म संगीत इंद्र का घोड़ा है: आकाशवाणी उसका सम्मान करती है' तो वे भी सरकार की तरफ़ से उसको नकेल कसने की कोशिश की नाकामियों का इज़हार ही कर रहे थे, और क्या ठोस वकालत की उन्होंने फ़िल्मी गानों की। गुलशन नंदा ने, जिनका नाम आज तक हिन्दी साहित्यिक जगत में हिकारत से लिया जाता है, पर जिनके उपन्यासों पर कई सफल और मनोरंजक फ़िल्में बनीं, उस बातचीत में बग़ैर किसी शिकवा-शिकायत के, मुतमइन भाव से, अपनी बात रखी। तो माधुरी जहाँ एक ओर शुद्ध साहित्यिकों से बातचीत कर रही थी, वहीं दूसरी ओर फ़िल्मी लेखकों-शायरों – मजरूह सुल्तानपुरी, हसरत जयपुरी, गुलज़ार, राही मासूम रज़ा, मीना कुमारी, सलीम-जावेद आदि से मुसलसल संवादरत थी। नायक-नायिकाओं के साथ-साथ गायक-गायिकाओं को काफ़ी तवज्जो दी गई तो कल्याणजी-आनंदजी की चुटकुलाप्रियता की स्थानीय शोहरत को राष्ट्रीय में तब्दील करने में उनके माधुरी के स्तंभ का बेशक योगदान रहा होगा। नए-पुराने लिखने वाले निर्माता-निर्देशकों से भी साग्रह लिखवाया गया:  किशोर साहू, बिमल राय, के.एन सिंह आदि की जीवनी/आत्मकथा धारावाहिक छपी तो राधू करमारकर जैसे छायाकार की कहानी को भी प्रमुखता मिली। शैलेन्द्र तो अरविन्द जी के प्रिय गीतकार और मित्र थे ही, तीसरी क़सम के बनने, असफल होने और शैलेन्द्र के उस सदमे से असमय गुज़र जाने की जितनी हृदयछू कहानियाँ माधुरी ने सुनाईं, शायद किसी के वश की बात नहीं थी। इनमें शोकसंतप्त रेणु की आत्मग्लानि से लेकर राजकपूर के अकाल-सखा-अभाव को वाणी देतीं भावभीनी श्रद्धांजलियाँ शुमार की जा सकती हैं।

लेकिन साहित्य को सिनेमा से जोड़ने के सिलसिले में सबसे रचनात्मक नुस्ख़े जो माधुरी ने कामयाबी के साथ आज़माए उनमें एक-दो ख़ास तौर पर उल्लेखनीय हैं। हालाँकि नायक-नायिकाओं के चित्रों के साथ काव्यात्मक शीर्षक देने की रिवायत पुरानी थी – उर्दू की मशहूर फ़िल्मी पत्रिका शमा में पचास के दशक में इसकी मिसालें मिल जाएँगी। वैसे ही जैसे कि तीस-चालीस के दशक की साहित्यिक पत्रिकाओं में 'रंगीन' तस्वीरों के साथ दोहा या शे'र डालने का रिवाज था। माधुरी में भी उर्दू के शे'र मिलते थे लेकिन कभी-कभार ही, उनकी जगह यहाँ हिन्दी कवियों को प्रतिष्ठित किया गया। दो-चार उदाहरणों से बात साफ़ हो जानी चाहिए। पूरे पृष्ठ पर 'पत्थरों में प्राण भरने वाले शिल्पी अभिनेता जीतेन्द्र' की सुंदर-सुडौल सफ़ेद-स्याह आवक्ष चित्ताकर्षक तस्वीर छपी है, लेकिन उसमें अतिरिक्त गरिमा डालने के लिए दिनकर की उर्वशी से पुरुरवा का दैहिक वर्णन डाल दिया गया है:

सिंधु सा उद्दाम, अपरंपार मेरा बल कहाँ है?
गूँजता जिस शक्ति का सर्वत्र जय-जयकार
उस अटल संकल्प का संबल कहाँ है?
यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ,
सूर्य के आलोक से दीपित समुन्नत भाल,
मेरे प्यार का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है।

जिसे हिन्दी साहित्य पढ़ने-पढ़ानेवालियों ने अवश्य सराहा होगा। उसी तरह सायरा बानो की दिलकश रंगीन तस्वीर के साथ टुकड़ा लगाया 'कनक छरी-सी कामिनी' और जानने वालों ने अपनी तरफ़ से दोहे की दूसरी अर्धाली अनायास जोड़ी होगी, 'काहे को कटि क्षीण'! उससे भी ज़्यादा जाननेवालों ने इस दोहे के साथ औरंगज़ेबकालीन कृष्णभक्त कवि आलम को भी याद किया होगा और उस रंगरेज़न को भी, जिसने कहते हैं, इस दोहे की दूसरी पंक्ति – 'कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन' – पूरी कर दी, और उसके बाद तो आलम उसके इश्क़ में गिरफ़्तार ही हो गए। माधुरी को सायरा बानो की आवरण-कथा का सिर्फ़ एक शीर्षक देना था, इसलिए उसका काम पहली अर्धाली से ही हो गया था, लेकिन दूसरी अर्धाली और पंक्ति न देकर शायद इसने अपने 'पारिवारिक' आत्मसंयम का भी परिचय दिया, कि चतुर-सुजान ख़ुद कल्पना कर लें! वरना 'यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ' और 'कुचन मध्य धरि दीन' में यही तो फ़र्क़ है कि पहले में पुरुष-देह-सौंदर्य बखाना गया है, और दूसरे में स्त्री-सौंदर्य की ओर इशारा है! वैसे, आगे चलकर जब रंगीन पृष्ठ बढ़ते हैं, तो कई स्थापित या संघर्षशील तारिकाओं की अपेक्षाकृत कम या छोटे कपड़ोंवाली तस्वीरें भी माधुरी छापती है, और पाठकों के पत्रों में सेन्सरशिप की गुहार नहीं मचती दिखती है, तो ये मान लेना चाहिए कि वक़्त के साथ इसके पाठक भी 'वयस्क' हो रहे थे। वैसे फ़िल्म सेन्सरशिप के तंत्र की आलोचना – 'अंधी कैंची, पैनी धार' – बासु भट्टाचार्य जैसे दिग्दर्शक माधुरी के पृष्ठों में कर ही रहे थे, सो पाठकों तक पत्रिका का उदारमना संदेश तो जा ही रहा होगा। मौखिक और लिखित तथा छप-साहित्य की जानी-मानी लोकप्रिय विधा – समस्यापूर्ति – का भी ख़ूब इस्तेमाल किया माधुरी ने। पाठकों से अक्सर किसी (सिर्फ़ बड़े नहीं) सिनेसितारे की दिलचस्प छवि के जवाब में मौलिक कविता माँगी जाती थी, और तीन-चार अच्छी प्रविष्टियों पर नक़द ईनाम भी दिए जाते थे। एक और आवरण कथा थी माला सिन्हा पर, बग़ीचे में लताओं व पेड़ों के बीच इठलाती उनकी तीन रंगीन तस्वीरों के साथ, साथ में छपा था विद्यापति कृत ये काव्यांश;

कालिन्दी पुलिन-कुंज बन शोभन।
नव नव प्रेम विभोर।
नवल रसाल-मुकुल-मधु मातल।
नव-कोकिल कवि गाय,
नव युवति गन चित उमता भई।
नव रस कानन धाय।

जिसे उद्धृत करने के पीछे मेरा ध्येय सिर्फ़ माधुरी के काव्य-चयन का विस्तृत दायरा दिखाना है। कुछ मिसालें उर्दू शायरी से भी। शर्मीला टैगोर का चित्र है, शीर्षक में मजरूह का शे'र:

यह आग और नहीं, दिल की आग है नादाँ,
शमअ हो के न हो, जल मरेंगे परवाने।

एक और जगह रंगीन, जुड़वाँ पृष्ठों पर शर्मीला और मनोज कुमार आमने सामने हैं, एक ही ग़ज़ल के दो अश'आर से जुड़े हुए:

शर्मीला: किस नजर से आज वह देखा किया।
            दिल मेरा डूबा किया उछला किया।।
मनोज:  उनके जाते ही ये हैरत छा गई।
          जिस तरफ़ देखा किया, देखा किया।।(10 सितंबर, 1965)

वाह! वाह!!

हिन्दीप्रियता
इन उद्धरणों से यह साफ़ हो गया होगा कि हिन्दुस्तानी सिनेमा और उर्दू के बीच जो पारंपरिक दोस्ताना रिश्ता था, उसके बीच माधुरी हिन्दी के लिए भी जगह तलाशने की कोशिश कर रही थी। इस तरह की कोशिशें हिन्दी की तरफ़ से कई पीढ़ियाँ कम-से-कम सौ साल से करती आ रही थीं : चाहे वह छापे की दुनिया के भारतेन्दु और उनके बाद के दिग्गज रहे हों, जो कविता में हिन्दी को ब्रजभाषा-अवधी वग़ैरह के बरक्स 'खड़ी' करने में, या पारसी नाटक-लेखन के क्षेत्र में पं. राधेश्याम कथावाचक के सचेत प्रयास हों, या फिर रेडियो की दुनिया में पं. बलभद्र नारायण दीक्षित 'पढ़ीस' के परामर्श हों या पं. रविशंकर शुक्ल की आक्रामक राजनीतिक मुहिम हो, इन सबका एक सामान्य सरोकार उन इलाक़ों में हिन्दी की पैठ बनाना रहा जो उसके लिए नए थे। ये इलाक़े हिन्दीवादियों को भाषायी नुक्ता-ए-नज़र से ख़ाली बर्तन की तरह नज़र आते थे, जिन्हें हिन्दी की सामग्री से भरना इन्हें परम राष्ट्रीय कर्तव्य लगता था। अगर ग़लती से किसी और ज़बान, और ख़ुदा न करे उर्दू का वहाँ पहले से क़ब्ज़ा हो, तब तो मामला और संगीन हो उठता था, युद्ध-जैसी स्थिति हो उठती थी, कि हमें इस 'विदेशी' ज़बान को अपदस्थ करना है, अपनी ज़मीन पर निज भाषा का अख़्तियार क़ायम करना है। बेशक आज़ादी के बाद स्थिति तेज़ी से बदली, हिन्दी का अधिकार-क्षेत्र बढ़ा, उर्दू विभाजन और मुसलमानों की भाषा बनकर हिन्दुस्तान में बदनाम और बेदख़ल कर दी गई, लेकिन, जैसा कि हम नीचे देखेंगे, तल्ख़ियाँ अभी बाक़ी हैं, घाव अभी तक ताज़ा हैं। माधुरी 'हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान' के लिए चले इस लंबे संघर्ष में हिन्दूवादी बनकर तो शायद नहीं, लेकिन कम-से-कम फ़िल्मक्षेत्रे हिन्दी राष्ट्रवादी हितों का हामी बनकर ज़रूर उभरती है।

अपनी बात की पुष्टि के लिए चलिए एक बार फिर एक संपादकीय, 'हमारी बात' से ही यात्रा शुरू की जाए, जिसका शीर्षक था 'हिन्दी की फिल्में और हिन्दी':

कुछ पुरानी और कुछ आनेवाली फिल्मों के नाम इस प्रकार हैं: 'फ्लाइट टू बैंकाक', 'गर्ल फ्राम चाइना', हण्डरेड एण्ड एट [डेज़] इन कश्मीर', 'पेनिक इन पाकिस्तान', 'द सोल्जर', द कश्मीर रेडर्स', 'अराउण्ड द वर्ल्ड', 'लव इन टोकियो', 'ईवनिंग इन पेरिस', 'जौहर एण्ड जौहर इन चाइना', 'लव इन शिमला', मदर इंडिया', सन आफ इंडिया', मिस्टर एण्ड मिसेज फिफ्टी फाइव', मिस्टर एक्स इन बाम्बे, लव मैरिज', होलीडे इन बाम्बे'….। इन नामों को पढ़कर क्या आपको भ्रम नहीं होता कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है और कुछ सिरफिरे लोग बिना मतलब 'हिन्दी-हिन्दी' की रट लगाए रहते हैं? यह छोड़िये। सिनेमाघर में जब आप फिल्म देखते हैं तो आपको इतना तो अवश्य ही लगता होगा कि यदि भारत की भाषा हिन्दी, उर्दू, हिन्दुस्तानी या इससे मिलती जुलती कोई और भाषा हो भी तो उसकी लिपि नागरी अरबी नहीं, रोमन है। इस सन्देह की पुष्टि तब और मिलती है, जब सड़कों, मुहल्लों के रोमन लिपि में लिखे नामपटोंपर कोलतार पोतने वाली राजनीतिक पार्टियाँ फिल्मोंकी रोमन नामावली पर चुप्पी साध लेती हैं। इन पार्टियों के सदस्य फिल्में नहीं देखते होंगे – इस पर तो विश्वास नहीं होता।
आपने अकसर यह दावा सुना होगा : हिन्दी के प्रचार में सबसे बड़ा योगदान फिल्मों का है। फिल्मकार इस आत्मछलपूर्ण दावेसे अपनेको हिन्दी सेवकोमें सबसे अगला स्थान देना चाहें तो आश्चर्य नहीं। आश्चर्य तब होता है जब आम लोग हिन्दी फिल्मों की लोकप्रियता देखकर इस दावे को सत्य मान लेते हैं। यह ऐसा ही है कि पूर्व में सूर्योदय और पश्चिम में सूर्यास्त देख कर लोग समझते रहे कि सूर्य धरतीकी परिक्रमा करता है।

इस तरह की कोपरनिकसीय भाषावैज्ञानिक क्रांति को स्थापित करने के बाद हिन्दी फिल्मकारों के 'हिन्दी-प्रेम' की पोल ये कहकर खोली जाती है कि फ़िल्म कला का एक तरह का थोक व्यवसाय है, जिसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाकर ही लाभ कमाया जा सकता है, लिहाज़ा, इसकी ज़बान औसत अवाम की ज़बान रखी जाती है। लेकिन अफ़सोस कि नामावली और प्रचार-प्रसारमें एक प्रतिशत अंग्रेज़ी-भाषी जनता की लिपि को प्रश्रय दिया जाता है, जबकि 35 प्रतिशत पढ़े-लिखे लोग टूटी-फूटी हिन्दी और देवनागरी जानते हैं। "ऐसा करके निर्माता वस्तुत: अपने पाँव में आप कुल्हाड़ी मार रहे होते हैं। बेहतर प्रचार होता अगर वे कुछ और पैसे ख़र्च करके भारत की दीगर लिपियों में भी फिल्म का नाम दें: हाल ही में निर्माता-निर्देशक ताराचंद बड़जात्या ने अपनी फिल्म 'दोस्ती' के प्रचारमें इस नीतिको अपनाकर उचित लाभ उठाया था। बंगला फिल्मोंके अधिकांश निर्माता नामावलीमें बंगला लिपि ही काम में लाते हैं। लेकिन हिन्दीमें हाल यह है कि भोजपुरी फिल्मों में भी रोमन नामावली होती है (जबकि ये फिल्में हिन्दी क्षेत्रके बाहर कहीं नहीं देखी जाती)। यहाँ तक कि उन मारकाट वाली स्टण्ट फिल्मोंमें भी, जिन्हें अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग नहीं देखते। कई बार यह देखकर निर्माताओं की व्यावसायिक बुद्धिहीनता पर हंसी ही आती है।"

इस संपादकीय से आरंभ करके माधुरी ने जैसे रोमन नामावली के ख़िलाफ़ बाक़ायदा जिहाद ही छेड़ दिया, जिसका कई पाठकों ने भी खुले दिल से समर्थन किया। मसलन जब वे पत्र लिखते तो ये शिकायती स्वर में बताना नहीं भूलते कि फ़लाँ-फ़लाँ फिल्म में नामावली रोमन में दी गई है। लेकिन इस मुहिम की सबसे सनातन रट तो फ़िल्म समीक्षा के स्तंभ 'परख' में सुनाई पड़ती है। चाहे समीक्षक की राय में पूरी फ़िल्म अच्छी ही क्यों न हो, अगर नामावली नागरी में नहीं है तो उस पर एक टेढ़ी टिप्पणी तो चिपका ही दी जाती थी। माधुरी के अंदरूनी पृष्ठों पर सिने-समाचार नामक एक अख़बार भी होता था, अख़बारी काग़ज़ पर अख़बारी साज-सज्जा लिए, जिसमें 'जानने योग्य हर फिल्मी खबर' छपती थी। उसका 15 दिसंबर, 1967 का अंक मज़ेदार है क्योंकि इसके मुख्य पृष्ठ पर सुर्ख़ी ये लगाई गई थी: 'फिल्म उद्योग में हिन्दी नामों की जोरदार लहर: हिन्दी के विरुद्ध दलीलें देने वालों को चुनौती'। उपशीर्षक भी हमारे काम का है: 'उपकार, संघर्ष, अभिलाषा, विश्वास, समर्पण, जीवन मृत्यु, परिवार, धरती, वासना, भावना आदि फिल्मों के कुछ ऐसे शीर्षक हैं जो इस मत का खण्डन करते हैं कि केवल उर्दू या अंग्रेजी के नाम ही सुंदर होते हैं'। जैसा कि ऊपर उद्धृत संपादकीय से भी ज़ाहिर है, भाषा की माधुरी की अपनी आधिकारिक समझ वैसे तो आम तौर पर व्यापक है, पर कुछ और मिसालें लेने पर हमें उस आबोहवा का अंदाज़ा लग जाएगा, जिसमें हस्तक्षेप करने की चेष्टा वो कर रही थी। संपादकीय इस पंक्ति के साथ ख़त्म होता है: "अहिन्दी भाषी क्षेत्रोंके लिए फिल्म का नाम व अन्य मुख्य नाम हिन्दी के साथ दो-तीन अन्य प्रमुख भारतीय लिपियों(जैसे बंगला व तमिल)में भी दिए जा सकते हैं।" पूछना चाहिए कि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में नाम नागरी में क्यों दिए जाएँ, केवल स्थानीय भाषा में ही क्यों नहीं। लेकिन ऐसा मानना हिन्दी-हित के साथ समझौता करना होता, चूँकि इस भाषा की पहचान इसकी लिपि से नत्थम-गुत्था है, आख़िरकार लिपि की लड़ाई लड़कर ही तो भाषा अपनी स्वतंत्र इयत्ता बना पाई थी। ठीक है हिन्दी-विरोध की हवा है, ख़ासकर दक्षिण में तो इतना मान लिया जाता है कि उनकी लिपि भी चलेगी: 'भी'; 'ही' – कत्तई नहीं। इस सिलसिले में दिलचस्प है कि माधुरी ने किसी प्रोफ़ेसर मनहर सिंह रावत से दक्षिण का दौरा करवाके एक लेख लिखवाया जिसका मानीख़ेज़ शीर्षक था – 'दक्षिण का नारा: हमें फिल्मों में हिन्दी चाहिए'। लब्बेलुवाब ये था कि भारत की ज़्यादातर भाषाएँ संस्कृत के नज़दीक हैं, दक्षिण की भी। इसलिए वहाँ के लोगों के लिए संस्कृत के तत्सम-तद्भव शब्द सहज ग्राह्य हैं। साथ ही संस्कार का सनातन सवाल भी है:

एक सामान्य भारतीय के लिए गुरू-उस्ताद, रानी-बेगम, विद्यालय-मदरसा, कला-फन, ज्ञान-इल्म,, धर्म-मजहब, कवि-सम्मेलन-मुशायरा, हाथ-दस्त, पाठ-सबक, आदि शब्द युग्मोंमें बिम्ब ग्रहण या संस्कार शीलताकी दृष्टि से बहुत बड़ा अंतर आ जाता है जो कि अनुभूत सत्य है।
पर इसके साथ ही हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि जन-साधारणकी भाषामें जो शब्द सदियों से घुलमिलकर उनके जीवन संस्कार के अंग बन चुके हैं, उन्हें जबरदस्ती हटाकर एक नयी बनावटी भाषाका निर्माण करना भी बहुत हानिकारक होगा। फिर वे प्रचलित शब्द या प्रयोग कहीं से क्यों न आये हों। मातृभाषा के प्रति अनावश्यक पूर्वाग्रह, ममत्व… द्वेषनात्मक दृष्टिकोण का ही सूचक है। सरल भाषाकी तो केवल एक ही कसौटी होनी चाहिये कि किसी शब्द प्रयोग या मुहावरेसे सामान्य जनता कितनी परिचित या आसानिसे भविष्य में परिचित हो सकती है। उदाहरणके लिये यदि हम कहें – “यह बात मुझे मालूम है।" तो साधारण हिन्दीसे परिचित श्रोताओंको भी समझनेमें कोई कठिनाई नहीं होती। पर इसी बातको अगर हम अनावश्यक रूप से अल्प परिचित संस्कृतनिष्ठ भाषामें कहें कि – "प्रस्तुत वार्ता मुझे विदित है।" तो यह भाषाका मज़ाक उड़ाने-जैसा हो जाता है।
इसके साथ-साथ कुछ सुन्दर सरल, उपयुक्त तथा अर्थ व्यंजक शब्द हमें जहां कहीं भी प्रादेशिक भाषाओं से मिलें, विशेषत: एसे शब्द जिनके समानार्थी या पर्यायवाची शब्द हिन्दीमें उतने निश्चित प्रभावोत्पादक एवं व्यापक अर्थोंको देनेवाले नहीं होते तो उन्हें नि:संकोच स्वीकार कर लेना चाहिये। (30 जुलाई, 1965)

रावत साहब से पूछने लायक़ बात यह है कि ये सामान्य भारतीय कौन है, और क्या पूरे दक्षिण की भाषाओं-उपभाषाओं की  संस्कृतमयता यकसाँ है? अगर हाँ तो इतनी सदियों तक वे संस्कृत से अलग अपनी इयत्ता बनाकर क्यों रख पाईं? अगर हाँ तो ये सभी भाषाएँ संस्कृत ही क्यों नहीं कही जातीं। क्या तमिल भाषा के अंदर कई तरह की अंतर्विरोधी धाराएँ नहीं बह रही थीं, एक पारंपरिक ब्राह्मणवादी किंचित संस्कृतनिष्ठ तमिल के साथ-साथ दूसरी, दलित तमिल, भी तो उन्हीं दिनों अपने को राजनीतिक, साहित्यिक और फ़िल्मी गलियारों में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। तो दार्शनिक धरातल पर जहाँ रावत साहब उदारमना हैं, वहीं 'संस्कार' का सनातन सवाल उन्हें भाषाओं की उचित व्यावहारिक स्थिति का आकलन करने से रोक-रोक देता है। सवाल अंतत: शुद्धता का है, जैसा कि पटना की कुमुदिनी सिन्हा के इस ख़त से ज़ाहिर हो जाएगा:

माधुरी' एक एसी जनप्रिय पत्रिका है, जिसने हम जैसे हजारों पाठकों का दिल जीत लिया है। 10 सितंबर के अंक में 'आपकी बात' स्तंभ में प्रकाशित मधुकर राजस्थानी के विचार पढ़े…. वास्तव में आज अच्छे से अच्छे कलाकार, लेखक, कवियों का फिल्म जगत में प्रवेश आवश्यक है। फिल्म ही आज एक ऐसा माध्यम है, जो जन-जन तक पहुँचता है।
इसी स्तंभ में कलकत्ता के भाई निर्मल कुमार दसानी का पत्र पढ़ा, उन्हें भी धन्यवाद देती हूँ। इस लोकतंत्र राष्ट्र में हिन्दी के नाम पर खिचड़ी अधिक चल नहीं सकती। उसका एक अपना अलग रूप होना ही चाहिए और इसमें फिल्मों का सहयोग आवश्यक है। फिल्म के हरेक कलाकार, गीतकार को चाहिए कि फारसी-उर्दू मिश्रित भाषा त्यागकर यथाशक्ति संशोधित, परिमार्जित और मधुर हिन्दी व्यवहृत कर उसे फैलाने में अपना सहयोग दें।
अंत में पुन: माधुरी की लोकप्रियता और सफलता की कामना करती हूँ। (ज़ोर हमारा)

एक तरफ़ जहाँ दशकों पुरानी गुहार – कि हिन्दी साहित्यकार सिनेमा की ओर मुड़ें – को बदस्तूर दुहराया गया है, वहीं लोकतंत्र की अद्भुत परिभाषा भी की गई है कि यहाँ फ़ारसी-उर्दू मिश्रित खिचड़ी भाषा नहीं चलेगी। एक तरफ़ लोकप्रियता की अभिलाषा, दूसरी तरफ़ परिमार्जित, संशोधित और परिनिष्ठित हिन्दी की वकालत – ज़ाहिर है कि लेखिका को इन दोनों चाहतों में कोई विरोधाभास नहीं दिखाई देता। लेकिन भाषायी ज़मीन पर क़ब्ज़े की युयुत्सा तब ख़ासी सक्रिय हो उठती है जब मुक़ाबले में हिन्दी की पुरानी जानी दुश्मन उर्दू खड़ी हो जाए, और कुछ नहीं बस अपना खोया हुआ नाम ही माँग ले तो यूँ लगता था गोया क़यामत बरपा हो गई।  मिसाल के तौर पर एक विवाद का ज़िक्र करना उतना ही ज़रूरी है जितना कि उसकी तफ़सील में जाना।  सिने-समाचार में छपी इस ख़बर को देखें:

साहिर द्वारा हिन्दी के विरुद्ध विष वमन: फिल्म उद्योग में आक्रोश
(माधुरी के विशेष प्रतिनिधि द्वारा : तथाकथित प्रगतिशील शायर साहिर लुधियानवीकी उर्दू-हिन्दी का विवाद उठाकर साम्प्रदायिक तनाव पैदा करनेकी कोशिशशों की फिल्म उद्योग में सर्वत्र निंदा की जा रही है।)

हाल ही में एक मुशायरे में साहिरने कहा कि भारतमें 97 प्रतिशत फिल्में उर्दू में बनती हैं, इसलिए इन फिल्मोंकी नामावली उर्दू में होनी चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि 'हिन्दी साम्राज्यवाद' नहीं चलने दिया जायेगा।
सारी दुनियाके शोषित वर्ग का रहनुमा बननेवाले इस शायर की साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की यह कोई पहली हरकत नहीं है। कुछ ही मास पूर्व बिहारके बाढ़ पीड़ितोंकी सहायताके लिए चन्दा एकत्रित करने के उद्देश्यसे साहिर, ख्वाजा अहमद अब्बास, सरदार जाफरी आदि ने बिहार, उत्तर प्रदेश राजस्थान, पंजाब आदि प्रदेशों का दौरा किया था। लेकिन बिहारके अकाल का सिर्फ एक बहाना बन रह गया। हर मुशायरेमें सम्बन्धित प्रदेश की द्वितीय राजभाषा बनायी जानेका प्रचार किया गया।
आम चुनाव से पूर्व बम्बईके कुछ उर्दू पत्रकारों को इन्हीं शायर महोदय ने सलाह दी थी कि उत्तर प्रदेश के साथ महाराष्ट्र में भी द्वितीय राजभाषा का स्थान उर्दू को देने के लिए आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि महाराष्ट्र में सम्मिलित मराठवाड़ा क्षेत्र के निजामके आधीन था और वहाँ के वासी उर्दू बोलते हैं। इस आंदोलन में तन-मन-धनसे सहायता देनेका आश्वासन भी उन्होंने दिया था।
साहिर द्वारा साम्प्रदायिक आग भड़कानेकी इन कोशिशों से फिल्म उद्योगमें आक्रोश फैल गया है। फिल्म लेखक संघ के अध्यक्ष ब्रजेन्द्र गौड़ने साहिर की निन्दा करते हुए कहा कि फिल्म उद्योग में साम्प्रदायिकता फैलाने की यह कोशिश सफल नहीं हो सकेगी।       
सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोजकुमार, निर्माता शक्ति सामंत, गीतकार भरत व्यास, मजरूह सुल्तानपुरी, पं. गिरीश, संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी आदि ने भी 'माधुरी' प्रतिनिधि से हुई भेंट में साहिर की इन हरकतों की निन्दा की। (16 दिसंबर, 1967)

देखा जा सकता है कि माधुरी का हिन्दी राष्ट्रवाद जागकर गोलबंदी शुरू कर चुका है। साहिर ने अक्षम्य अपराध जो किया है, उर्दू की अपनी ज़मीन को अपना कहने का, इसके आगे उनके सारे प्रगतिशील पुण्य ख़ाक हो जाते हैं, अब तक के सारे भजन-कीर्तन बेकार, सारी लोकप्रियता ताक पर। आज का पाठक यह पूछ सकता है कि अगर हिन्दी के लिए आंदोलन चलाना साम्प्रदायिक नहीं था तो उर्दू में ऐसी क्या ख़ास बात थी जिसके स्पर्श मात्र से आपकी तरक़्क़ीपसंदगी मशकूक हो जाती थी? यह उसी 'शूच्याग्रे न दत्तव्यं' वाले युयुत्सु उत्साहातिरेक का लक्षण था जो हिन्दी के हिमायतियों में पचास और साठ के दशक में ज़बर्दस्त तौर पर तारी था, जो कुछ राज्यों में उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा देने के नाम पर ही अलगाववाद सूँघने लगता था। पाठकों ने एक बार फिर माधुरी के मुहिम की ताईद करते हुए कई ख़त लिखे, सिर्फ़ एक लेते हैं:

'साहिर का असली चेहरा'  शीर्षक-पत्र में कहा गया: "साहिरकी लोकप्रियता प्रगतिशील विचारोंके कारण ही बढ़ी है। एक प्रगतिशील साहित्यजीवी अगर संकीर्णता और अलगाववादी लिजलिजी विचारधाराको प्रोत्साहन देता है तो ऐसी प्रगतिशिलता को 'फ्राड' ही कहा जाएगा। साहिर निश्चय ही उर्दू का पक्षपोषण कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रभाषा का अपमान करके या अपमान की भाषा बोलकर नहीं। साहिर साहब को यह बतानेकी आवश्यकता नहीं है कि राष्ट्र और राष्ट्रभाषा की क्या अहमियत होती है। उर्दू को हथियार बनाकर हिन्दीपर वार करना कौन देशभक्त हिन्दुस्तानी पसंद करेगा?…फिरकापरस्तों की यह कमजोरी होती है कि वे वतन की मिट्टी के साथ, उसकी पाकीजा तहजीब के साथ, उसकी भावनात्मक एकता के साथ गद्दारी ही नहीं बलात्कार तक करने की कोशिश करते हैं।…अच्छा हो साहिर साहब अपने रुख में परिवर्तन कर लें अन्यथा प्रगतिशीलता का जो नकाब उन्होंने चढ़ा रखा है, वह हमेशा के लिए उतार फेंके ताकि असली चेहरे का रंग-रोगन तो नजर आए।"

इस धौंस-भरे विमर्श में राष्ट्रभाषा हिन्दी तो सदा-सर्वदा लोकाभिमुख रही है, वह तो जनवाद के ऊँचे नैतिक सिंहासन से जनता से बोलती हुई जनता की अपनी भाषा है, उसको साम्राज्यवादी भला कहा कैसे जा सकता है! ऐसा पूर्वी बंगाल में बांग्ला के साथ पाकिस्तान भले कर सकता है, जबकि भारत की पूरी तवारीख़ में आक्रामकता के उदाहरण नहीं मिलते। दिलचस्प यह भी है कि इस विवाद के दौरान साहिर को कभी अपनी स्थिति साफ़ करने का मौक़ा नहीं दिया, हाँ चौतरफ़ा उनपर हल्ला अवश्य बोला गया। इस विवाद की अनुगूँज अंग्रेजी फ़िल्मफ़ेयर में भी उठी, पर वहाँ कम-से-कम कुछ ऐसी चिट्ठियों को भी छापा गया जो उर्दू व हिन्दुस्तानी यानि साहिर का पक्ष लेती दिखीं, जबकि एक भी ऐसी चिट्ठी माधुरी की उपलब्ध फ़ाइलों में नहीं दिखी।

माधुरी से ही एक आख़िरी ख़त – चूँकि यह इस मुद्दे पर सबसे उत्कृष्ट बयान है – देकर इस विवाद और लेख की पुर्णाहुति की जाए। फिल्मेश्वर ने अपने अनियत स्तंभ 'चले पवन की चाल' में 'हिन्दी-उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले साहिर के नाम एक खुला पत्र' लिखा, जिसमें सिद्ध किया गया कि हिन्दी-उर्दू दो अलहदा भाषाएँ नहीं हैं, गोकि उनकी लिपियाँ एक नहीं हैं: ग़ालिब ने अपने को हिन्दी का कवि कहा, और ख़ुद साहिर की नागरी में छपी किताबें उर्दू संस्करणों से ज़्यादा बिकी हैं, वो भी बग़ैर अनुवाद के, तो हिन्दी साम्राज्यवादी कैसे हो गई? और फिल्मों की भाषा अगर 97 प्रतिशत उर्दू है, तो वो हिन्दी हुई न? पिर झगड़ा कैसा!  इस ख़त में साहिर के पूर्व-जन्म के पुण्य को बेकार नहीं मानकर उनके 'अलगाववादी' उर्दू-प्रेम पर एक छद्म अविश्वास, एक मिथ्या आहत भाव का मुजाहिरा किया गया है, कि 'साहिर, आप तो ऐसे न थे' या 'आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी'। छद्म और मिथ्या विशेषणो का सहारा मैंने इसलिए लिया है क्यूँकि शीर्षक में ही निर्णय साफ़ है, बाक़ी पत्र तो एक ख़ास अंदाज़े-बयाँ है, कोसने का एक शालीन तरीक़ा, बस। बहरहाल, पत्र-लेखक बेहद हैरत में है:

आख़िर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर सम्प्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्यमें आजादी के बीस सालोंमें इतना करिश्मा तो किया ही है कि हमारे अन्दर जो संकुचित भावनाओं की आग घुट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है, और उसे हिन्दी-उर्दूका नाम दे कर हम उसे छिपाने की कोशिश करते [रहते] हैं।

आप अपनी भावुक शायरी में कितनी ही लफ्फाजी करते रहते हों, यह सही है कि आपके दिल में एक दिन इनसान के प्रति प्रेम भरा था। आप सब दुनियाके लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाए, आप हिन्दी-उर्दूकी आड़ में किस नफरत के शोलेसे खेलने लगे? सच कहूँ तो आपकी आवाज से आज जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था:

नीले गगन के तले,
धरती का प्यार पले  

यह पत्र लिखते समय मुझे उस गीत की याद हो आयी, इसलिए आपको देशद्रोही कहनेको मन नहीं होता। पर मुशायरे में आपकी तकरीरको पढ़कर आपको क्या कहूँ यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तानकी एक पीढ़ी, जिसमें पाकिस्तान की भी एक पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालोंसे(खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं, हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी साम्प्रदायिकता की एक झलक दिखा कर तोड़ दिया।…आपने एक बार लिखा था:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकलकी गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है कि ये आपकी भावनाएँ नहीं थीं, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्रकी भावनाएँ लिख रहे थे…सारे हिन्दुस्तान में फिल्म उद्योग एक ऐसी जगह थी जहां जाति, प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था। और आप इन्सानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया। लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजर में सिर्फ एक है:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आख़िरमें इतनी ही दुआ करना चाहता हूँ: खुदा उर्दूको आप जैसे हिमायतियों से बचाये! (15 दिसंबर 1967).

एक झटके में साहिर लुधियानवी जैसा लोकप्रिय शायर 'फ़्राड', 'फिरकापरस्त', 'साम्प्रदायिक' और अमूमन 'देशद्रोही' क़रार दिया जाता है। इसमें इतिहास के विद्यार्थी को कोई हैरत नहीं होती क्योंकि फिल्मेश्वर की आलोचना चिरपरिचित ढर्रे पर चलती है, और इसको अपने मंत्रमुग्ध पाठक-समूह पर पूरा भरोसा है। कई दशकों से साल-दर-साल चलते आ रहे मुख्यधारा के राष्ट्रवादी विमर्श ने एक ख़ास तरह की परंपरा का सृजन किया था, और उसमें जो कुछ पावन, महान और उदात्त था, उसे अपनी झोली में डाल लिया था, और जो अल्पसंख्यक एक ख़ास तरह के सांस्कृतिक वर्चस्व को मानने से इन्कार करते थे, वे अलगाववादी कह कर अलग-थलग कर दिए गए थे। ये दोनों धाराएँ परस्पर प्रतिद्वंद्वी मानी गईं जबकि दोनों एक ही राष्ट्रवादी नदी के दो किनारे-भर थे। हिन्दी राष्ट्रवाद इस प्रवृत्ति का एक अतिरेकी विस्तार-मात्र था, वैसे ही जैसे कि उर्दू राष्ट्रवाद। जब इन दो किनारों को मिलाने वाली फ़िल्मी दुनिया की बिचौलिया पुलिया ज़बान को उर्दू के शायर ने उर्दू नाम दिया तो इस हिमाकत पर उन्हें वैसे ही संगसार होना ही था, जैसे एक-डेढ़ पीढ़ी पहले गांधी को उनकी हिन्दुस्तानी की हिमायत के लिए।

बतौर निष्कर्ष यह कहा जा सकता है कि माधुरी ने सिनेमा को हिन्दी जनपद में सम्मानजनक, लोकप्रिय और चिंतन-योग्य वस्तु बनाने में अभूतपूर्व, संयमित, रचनात्मक योग दिया। लेकिन जिस तरह फ़िल्म-निर्माताओं की व्यावसायिक चिंताओं को समझे बग़ैर मुख्यधारा का सिनेमा नहीं समझा जा सकता, उसी तरह माधुरी की हिन्दी-प्रियता का आकलन किए बग़ैर इसके सिनेमा-प्रेम और सिने-अध्ययन की इसकी विशिष्ट प्रविधि का जायज़ा नहीं लिया जा सकता।

इस विशिष्ट पद्धति की एक आख़िरी मिसाल। हम मुख्यधारा के फ़िल्म अध्ययन में कथानक को संक्षेप में कहते हैं, और जल्द ही काम के दृश्य के विश्लेषण पर बढ़ जाते हैं। लेकिन अरविंद कुमार ने बक़लम ख़ुद फ़िल्म को क़िस्सागोई के अंदाज़ में पेश किया। फ़िल्मों को शॉट-दर-शॉट, बआवाज़, शब्दों में पेश करने की पहल करके उन्होंने एक नई विधा को ही जन्म दे दिया, जो आप कह सकते हैं कि किसी हिन्दुस्तानी सिनेमची के हाथों ही संभव था। क्योंकि यहीं पर आपको ऐसे लोग बड़ी तादाद में मिल सकते हैं जो कि फ़िल्म देखकर आपसे तफ़सील से उसकी कहानी बयान करने को कहेंगे। ख़ास तौर पर उस ज़माने में, जब आप ये नहीं कह सकते थे कि देख लेना, टीवी पर आ जाएगा, या देता हूँ, है मेरे पास। इस क़दर विस्तार से सुनने के लिए, और कहने के लिए वक्ता-श्रोता के पास फ़ुर्सत का वक़्त होना भी ज़रूरी है। ये बात भी याद रखने की है कि आठवें दशक के उस दौर में एक मौखिक लोकाचार को अपनी पसंद की पुरानी फ़िल्मों को कहन शैली में ढालकर उन्होंने अपने चिर-सहयोगी और नए संपादक विनोद तिवारी का हाथ भी मज़बूत किया, कि संपादकी का संक्रमण-काल सहज गुज़र जाए, पत्रिका वैसी ही लुभावनी व ग्राह्य बनी रहे। धारावाहिक रूप में छपने वाली इस शृंखला में आदमी, प्यासा, महल, बाज़ी, देवदास, जैसी शास्त्रीय बन चुकी कई लोकप्रिय फ़िल्मों का पुनरावलोकन किया, और यह लेखमाला 'शिलालेख' के नाम से जानी गई।

और भी बहुत कुछ ऐतिहासिक और दिलकश था माधुरी में, पर बाक़ी पिक्चर फिर कभी।

…..समाप्त….

(इसके पहले का यहां पढ़ें- पार्ट एक)

लेखक रविकांत इतिहासकार हैं और सीएसडीएस में एसोसिएट फेलो के रूप में जुड़े हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ के दीवाली विशेषांक, 2011 में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

यूपी महुआ न्‍यूज के कथित प्रोग्रामिंग हेड नागेंद्र मिश्रा को तलाश रही है यूपी पुलिस

: तलाश में तीन बार पुलिस ने की छापामारी : लड़कियों के शोषण का आरोप : लखनऊ : महुआ न्‍यूज में यूपी के कथित प्रोग्रामिंग हेड के तौर पर तैनात नागेद्र मिश्र आजकल फरार हैं। मामला है लड़कीबाजी का। बताते हैं कि नागेंद्र एक लड़की के साथ रफूचक्‍कर हो चुके हैं। उधर खबर है कि लड़की की तलाश में नागेंद्र के घर पुलिस तीन बार छापा मार चुकी है। लखनऊ से लेकर दिल्‍ली तक के मीडिया जगत में यह खबर इस समय बेहद गर्म है।

महुआ न्‍यूज यूपी में भले ही लांच न हो पाया हो, लेकिन इस हवाई चैनल के अलम्‍बरदारों की करतूतों ने उसे खबरों में जरूर ला पटका है। ताजा मामला है लड़कियों को एंकर बनाने के सपने दिखाने के नाम पर उनके साथ रंगरेलियां मनाने का। फिलहाल नागेंद्र मिश्र फरार है। एक कैमरामैन के तौर पर अपना जीवन शुरू करने वाले नागेंद्र पर भोली-भाली लड़कियों को फंसाने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं।

इंडिया टीवी में लड़कीबाजी और दलाली के कई आरोपों से हटाये गये नागेंद्र को हाल ही उसके करीबी और दोस्‍त भूपेंद्र नारायण सिंह उर्फ भुप्‍पी महुआ न्‍यूज में बतौर यूपी प्रोडक्‍शन हेड के तौर पर ले आये थे। गौरतलब है कि भुप्‍पी भी अपनी दलाली के चलते आज तक चैनल से तब निकाल बाहर किये गये थे जब हिमाचल प्रदेश के मुख्‍यमंत्री ने उनकी दलाली की खबर आजतक चैनल के प्रबंधन को दी थी। तब भुप्‍पी चंडीगढ से हिमाचल और पंजाब के प्रभारी थे।

फेसबुक पर नागेंद्र की प्रोफाइल का एक अंश जिसमें उसकी तस्वीर व परिचय आदि है

बहरहाल, नागेद्र ने अब तक कई लड़कियों को एंकर बनाने के सपने दिखाकर अपने जाल में फंसाया है। फेसबुक पर लड़कियां फंसाने के लिए वह लड़कियों की वाल पर जाकर उन्‍हें टीवी एंकर बनने के लिए उकसाता था। फिलहाल जिस लड़की के साथ नागेंद्र फरार बताया जा रहा है, उसके फेसबुक वाल पर नागेद्र ने बीते 17 अक्‍तूबर को यह कमेंट किया था कि:- आप टीवी का फेस हो।

अभी कुछ दिन पहले तक नागेंद्र का चक्‍कर लखनऊ की किसी निमि (बदला हुआ नाम) के साथ चल रहा बताया जाता है। इतना ही नहीं, एक लड़की को एंकर बनाने के लिए नागेंद्र ने बाकायदा एक सीरियल तक प्‍लान कर लिया जिसका नाम रखा गया था- भाग्‍यचक्र। साधना टीवी पर उसे दिखाने की बात पक्‍की हुई थी।

लेकिन ऐन वक्‍त पर साधना वालों को नागेंद्र की पसंद की एंकर पर ऐतराज हो गया। कहा गया कि यह सीरियल तब भी लिया जाएगा जब एंकर बदली जाए। इस पर नागेंद्र ने बखेडा खड़ा कर दिया था। कारण यह कि नागेंद्र के शोषण से आजिज इस लड़की ने साफ कह दिया था कि उसे एंकर बनने का मौका नहीं मिला तो वह सारी पोल-पट्टी खोल देगी।

खबर है कि कुमार सौवीर द्वारा ब्‍यूरो प्रमुख का पद छोडने के बाद नागेंद्र और भुप्‍पी ने गोमती नगर में आफिस के लिए एक नया भवन किराये पर लिया था। भारी भरकम किराये वाले इस भवन का भुगतान महुआ न्‍यूज से किया जा रहा था। लेकिन सात महीना बीत जाने के बाद भी वहां आफिस नहीं खोला गया। जानकार बताते हैं कि उस दफ्तर का इस्‍तेमाल ऐयाशी के लिए किया जाता था। बताते हैं कि इसकी सारी व्‍यवस्‍था नागेंद्र के जिम्‍मे थी। लखनऊ भ्रमण के नाम पर भुप्‍पी भी अपना काफी समय इसी भवन में गुजारा करते थे। दफ्तर के किसी अन्‍य कर्मचारी को यहां की सख्‍त मनाही थी।

भुप्‍पी और नागेंद्र की जुगलजोड़ी के चलते कई और भी घोटाले हुए बताते जाते हैं। खबर है कि महुआ न्‍यूज के कैमरे को नागेंद्र मिश्र बिग-शो नाम की अपनी कम्‍पनी के कार्यक्रमों के लिए किराये पर चलाता था। महुआ के दूसरे कैमरामैन भी इस काम में मजबूरन उसकी मदद किया करते थे। एक कैमरामैन प्रवेश रावत ने एक बार जब इस पर आ‍पत्ति जतायी, तो उसे नौकरी से ही निकाल दिया गया। बहरहाल, नागेंद्र मिश्र अब फरार है। कोई उसे मुम्‍बई में तो कोई दिल्‍ली में होने की बातें कर रहा है। उधर खबर है कि भुप्‍पी ने उसे छिपने के लिए कहीं जगह मुहैया करा रखी है।

लखनऊ से केएस की रिपोर्ट.

अगर इस रिपोर्ट में उल्लखित तथ्यों में किसी को कोई त्रुटि या आपत्ति नजर आए तो वह अपनी बात नीचे दिए गए कमेंट बाक्स या फिर bhadas4media@gmail.com पर रख सकता है.

बाबू सिंह कुशवाहा बसपा से निकाले गए

लखनऊ : बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने यहां बताया कि अनुशासनहीनता एवं पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने के कारण बाबू सिंह कुशवाहा, पूर्व मंत्री को बीएसपी से हमेशा के लिये निष्कासित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि श्री कुशवाहा ने कभी सीधे चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखायी। उन्होंने कहा कि श्री कुशवाहा ने पार्टी से अनुरोध किया था कि यदि उन्हें एमएलसी बना दिया जाये तो मुझे अपने समाज को जोड़ने में थोड़ी मदद मिल जायेगी। उनके इस अनुरोध पर पार्टी ने उन्हें दो बार एमएलसी बनाया।

श्री मौर्य ने कहा कि इसके अलावा श्री कुशवाहा ने पार्टी हाईकमान से अनुरोध किया था कि यदि उन्हें मंत्री बना दिया जाये तो उनके लिये पूरे प्रदेश में पार्टी से अपने समाज को जोड़ना और ज्यादा आसान हो जायेगा। श्री कुशवाहा के इस अनुरोध को स्वीकृत करते हुए पार्टी ने उन्हें बड़े विभाग का मंत्री बनाया। इसके बाद श्री कुशवाहा ने कुछ समय के बाद पार्टी हाईकमान से यह भी अनुरोध किया कि यदि उन्हें परिवार कल्याण विभाग का मंत्री बना दिया जाये तो उन्हें इस पद के माध्यम से प्रदेश में शोषितों, दलितों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लोगों की सेवा करने का अवसर मिलेगा। इस पर उन्हें परिवार कल्याण विभाग का मंत्री भी बनाया गया।

श्री मौर्य ने कहा कि लेकिन दुःख की बात यह है कि इस विभाग के श्री कुशवाहा ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक ढंग से नहीं किया। जिसके कारण श्री कुशवाहा के मंत्री रहते हुए ही इस विभाग में दो सीएमओ की हत्या हुई तथा एक और की भी जिला कारागार में मृत्यु हुई। श्री कुशवाहा के मंत्री रहने के दौरान इस प्रकार के कृत्य होने पर सरकार और पार्टी की छवि खराब होते देख उन्हें बुलाकर उनसे मंत्री पद से त्याग पत्र ले लिया गया और फिर इस विभाग की जिम्मेदारी श्री नसीमुद्दीन सिद्दकी जी को सौंप दी गयी।

श्री मौर्य ने कहा कि विरोधी पार्टियों तथा इनके परिवार जनों की मांग को ध्यान में रखते हुए माननीया मुख्यमंत्री जी द्वारा परिवार कल्याण विभाग में हुई इन हत्याओं तथा मृत्यु की जांच सी0बी0आई0 को सौंप दी गयी। उन्होंने कहा कि इसके बाद श्री कुशवाहा ने जो कुछ किया, वह किसी से छिपा नहीं है। वे पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो गये तथा उनके द्वारा लगातार पार्टी को छति पहुंचाने का कार्य किया जाने लगा। इसके साथ ही उन्होंने बी0एस0पी0 से जुड़े अपने समाज के लोगों को, अपने घर पर बुलाकर, उन्हें पार्टी के खिलाफ काम करने के लिये भी काफी उकसाया गया और इसी ही प्रकार की बीएसपी कार्यकर्ताओं द्वारा भी लगातार शिकायतें मिल रही थीं।

बीएसपी प्रदेश अध्यक्ष ने आगे यह भी बताया कि हाल ही में विधान परिषद के आहूत सत्र में श्री कुशवाहा ने भाग तक भी नहीं लिया, इसके अलावा उन्होंने विपक्षी पार्टियों के सदस्यों को सरकार के विरूद्ध हंगामा करने के लिये भी भड़काया, ताकि आम जनता की नजरों में पार्टी और सरकार की छवि खराब हो। उन्होंने राज्य सरकार के सम्बन्ध में असत्य एवं भ्रामक बयानबाजी करके सरकार की प्रतिष्ठा खराब करने की कोशिश की। उन्हांेने कहा कि श्री कुशवाहा ने यह सभी कार्य अपने निजी फायदे के लिये किये हैं, उनको पार्टी की मूवमेन्ट से कोई लेना देना नहीं है, वह भाईचारा कमेटी से जुड़े लोगों की उपेक्षा कर रहे थे। जब यह जानकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष को मिली तो उन्होंने इन समितियों को भंग कर इसकी जिम्मेदारी पार्टी के अन्य लोगों पर सौंप दी।

प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि श्री कुशवाहा एनआरएचएम तथा सीबीआई जांच से अपने को बचाने के लिये कांग्रेस पार्टी के लगातार सम्पर्क में भी हैं। इसके अलावा श्री कुशवाहा विपक्षी पार्टी के नेताओं से मिलकर सरकार एवं पार्टी के विरूद्ध षड़यंत्र बराबर रच रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब जब श्री कुशवाहा चारों तरफ से कानूनी शिकंजे में घिर रहे हैं, तो उन्हें पार्टी के अपने सहयोगी मंत्री श्री नसीमुद्दीन सिद्दकी, मंत्रिमण्डलीय सचिव तथा प्रमुख सचिव गृह से अपनी जान का खतरा होने लगा है। उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा कि जब श्री कुशवाहा पार्टी में थे और एक मंत्री के रूप में इन लोगों के साथ लम्बे समय तक काम किया, तो इन्हें, इन लोगों से अपनी जान का खतरा नजर क्यों नहीं आया। श्री मौर्य ने कहा कि बीएसपी एक अनुशासनप्रिय राष्ट्रीय पार्टी है और किसी भी कीमत पर पार्टी विरोधी आचरण तथा निर्देशों का उल्लंघन कतई बर्दाश्त नहीं करती। इसीलिए श्री कुशवाहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने के कारण इन्हें हमेशा के लिये पार्टी से निकाल दिया गया है।
 

चपरासी से रिपोर्टर बने शख्स ने दलाली का इतिहास रचा

देश के एक बड़े अखबार की एक यूनिट में एक चपरासी के रिपोर्टर बनने का सफ़र काफी घिनौना है. चपरासी का रिपोर्टर बनना अच्छी बात है लेकिन यह बंदा जिस सोच व मानसिकता से काम कर रहा है, वह काफी घिनौना है. यह चपरासी लगभग 4 साल पहले तक यूनिट के ही एक कार्यालय में स्टाफ के लोगों को पानी और चाय पिलाता था. एक पूर्व संपादक की सनक ने इससे चपरासी की जगह रिपोर्टर का काम लेना शुरू कर दिया.

उसके जाने के बाद नए संपादक की चपरासीगिरी करके यह कागजों में भी रिपोर्टर बन गया. इसी के बाद इसने दलाली और ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू कर दिया. पत्रकारिता की आड़ में इसने जमकर दलाली और ब्लैकमेलिंग की और लाखों रुपये कमा डाले. यहाँ तक कि अपने भाइयों और रिश्तेदारों को ठेकेदार बना डाला. आज शहर में इसका लाखों रुपए का एक फ्लैट और दूसरी जमीनें हैं. इसकी बदली जीवनशैली का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि कभी एक एक दाने को मोहताज यह चपरासी आज 3-4 हजार रूपए के जूते पहनता है.

अपनी कमाई का एक हिस्सा यह ऑफिस के कुछ पुराने साथियों को भी पहुंचाहता है. बदले में साथी लोग इसकी खबरों को सही करके अच्छे पन्ने पर छापने की जिम्मेदारी लेते हैं. बीते दिनों जब इसकी बीट बदली गई तो ऑफिस की एक लाबी भड़क गई थी. रिपोर्टर भी छुट्टी बीच में छोड़कर वापस भाग आया था. लेकिन संपादक नहीं माना. पूरे शहर में ये रिपोर्टर नहीं बल्कि दलाल के रूप में पहचाना जाता है.

सब इसकी काली कमाई का रास्ता भी जानते हैं लेकिन अखबार में फिर भी सालों से जमा है. इसकी वजह से अखबार भी बदनामी झेल रहा है. अभी भी घाघ टाइप के पुराने लोगों के चलते कमाई वाली बीट मिली हुई है. इसने पहले डाक्टरों के बीच में अखबार को दलाल के रूप में बदनामी दिलाई अब सांसद और बन विभाग के अधिकारियों में लुटिया डुबो रहा है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

हिन्दी फिल्म अध्ययन : ‘माधुरी’ का राष्ट्रीय राजमार्ग (एक)

बहुतेरे लोगों को याद होगा कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की फ़िल्म पत्रिका माधुरी हिन्दी में निकलने वाली अपने क़िस्म की अनूठी लोकप्रिय पत्रिका थी, जिसने इतना लंबा और स्वस्थ जीवन जिया। पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में अरविंद कुमार के संपादन में ''सुचित्रा'' नाम से बंबई से शुरू हुई इस पत्रिका के कई नामकरण हुए, वक़्त के साथ संपादक भी बदले, तेवर-कलेवर, रूप-रंग, साज-सज्जा, मियाद व सामग्री बदली तो लेखक-पाठक भी बदले, और जब नवें दशक में इसका छपना बंद हुआ तो एक पूरा युग बदल चुका था।

इसका मुकम्मल सफ़रनामा लिखने के लिए तो एक भरी-पूरी किताब की दरकार होगी, लिहाजा इस लेख में मैं सिर्फ़ अरविंद कुमार जी के संपादन में निकली ''माधुरी'' तक महदूद रहकर चंद मोटी-मोटी बातें ही कह पाऊँगा। यूँ भी उसके अपने इतिहास में यही दौर सबसे रचनात्मक और संपन्न साबित होता है।

माधुरी से तीसेक साल पहले से ही हिन्दी में कई फ़िल्मी पत्रिकाएँ निकल कर बंद हो चुकी थीं, कुछ की आधी-अधूरी फ़ाइलें अब भी पुस्तकालयों में मिल जाती हैं, जैसे, रंगभूमि, चित्रपट, मनोरंजन आदि। ये जानना भी दिलचस्प है कि हिन्दी की साहित्यिक मुख्यधारा की पत्रिकाओं – मसलन, सुधा, सरस्वती, चाँद, माधुरी – में भी जब-तब सिनेमा पर गंभीर बहस-मुबाहिसे, या, चूँकि चीज़ नई थी, बोलती फ़िल्मों के आने के बाद व्यापक स्तर पर लोकप्रिय हुआ ही चाहती थी, तो सिनेकला के विभिन्न आयामों से ता'रुफ़ कराने वाले लेख भी छपा करते थे। फ़िल्म माध्यम की अपनी नैतिकता से लेकर इसमें महिलाओं और साहित्यकारों के काम करने के औचित्य, उसकी ज़रूरत, भाषा व विषय-वस्तु, नाटक/पारसी रंगकर्म/साहित्य से इसके संबंध से लेकर विश्व-सिनेमा से भारतीय सिनेमा की तुलना, सेंसरशिप, पौराणिकता, श्लीलता-अश्लीलता, सार्थकता/अनर्थकता/सोद्देश्यता आदि नानाविध विषयों पर जानकार लेखकों ने क़लम चलाई। इनमें से कुछ शुद्ध साहित्यकार थे, पर ज़्यादातर फ़िल्मी दुनिया से किसी न किसी रूप से जुड़े लेखक ही थे।

इन लेखों से हमें पता चलता है कि पहले भले हिंदू घरों की औरतों का फ़िल्मी नायिका बनना ठीक नहीं समझा जाता था, वैसे ही जैसे कि उनका नाटक करना या रेडियो पर गाना अपवादस्वरूप ही हो पाता था। पौराणिक-ऐतिहासिक भूमिकाएँ करने वाली मिस सुलोचना, मिस माधुरी आदि वस्तुत: ईसाई महिलाएँ थीं, जिन्होंने बड़े दर्शकवर्ग से तादात्म्य बिठाने के लिए अपने नाम बदल लिए थे। पारसी थिएटर का सूरज डूबने लगा था, ऐसी स्थिति में रेडियो या सिनेमा के लिए गानेवालियाँ 'बाई' या 'जान' के प्रत्यय लगाने वाली ही हुआ करती थीं। पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्डों पर भी आपको वही नाम ज़्यादातर मिलेंगे। अगर आपने अमृतलाल नागर की बेहतरीन शोधपुस्तक ये कोठेवालियाँ पढ़ी है, तो आपको अंदाज़ा होगा कि मैं क्या अर्ज़ करने की कोशिश कर रहा हूँ।

हिन्दी लेखकों ने ज़्यादा अनुभवी नारायण प्रसाद 'बेताब' या राधेश्याम कथावाचक या फिर बलभद्र नारायण 'पढ़ीस' की इल्तिजा पर ग़ौर न करते हुए प्रेमचंद जैसे लेखकों के मुख़्तसर तजुर्बे पर ज़्यादा ध्यान दिया, जो कि हक़ीक़तन कड़वा था। उन्होंने आम तौर पर फ़िल्मी दुनिया को भ्रष्ट पूंजीपतियों की अनैतिक अय्याशी का अड्डा माना, माध्यम को संस्कार बिगाड़ने वाला 'कुवासना गृह' समझा, उसे छापे की दुनिया में होने वाले घाटे की भरपाई करके वापस वहीं लौट आने के लिए थोड़े समय के लिए जाने वाली जगह समझा। पर पूरी तरह चैन भी नहीं कि उर्दू वालों ने एक पूरा इलाक़ा क़ब्ज़िया रखा है। हिन्दी और उर्दू के साहित्यिक जनपद के बुनियादी फ़िल्मी रवैये में अगर फ़र्क़ देखना चाहते हैं तो मंटो को पढ़ें, फिर उपेन्द्रनाथ अश्क और भगवतीचरण वर्मा के सिनेमाई संस्मरण, रेखाचित्र या उपन्यास पढ़ें। भाषा के सवाल पर गांधी जी से भी दो-दो हाथ कर लेने वाले हिन्दी के पैरोकार, अपवादों को छोड़ दें तो, अपने सिनेमा-प्रेम के मामले में काफ़ी समय तक गांधीवादी ही रहे।   

बेशक स्थिति धीरे-धीरे बदल रही थी, पर 1964 में जब माधुरी निकली तब तक इसके संस्थापक संपादक के अपने अल्फ़ाज़ में "सिनेमा देखना हमारे यहाँ क़ुफ़्र समझा जाता था।" उन्होंने इस क़ुफ़्र सांस्कृतिक कर्म को हिन्दी जनपद में पारिवारिक-समाजिक स्वीकृति दिलाने में अहम ऐतिहासिक भूमिका अदा की। माधुरी ने कई बड़े-छोटे पुल बनाए, जिसने सिनेमा जगत और जनता को तो आपस में जोड़ा ही, सिनेमा को साहित्य और राजनीतिक गलियारों से, विश्व-सिनेमा को भारतीय सिनेमा से, हिन्दी सिनेमा को अहिन्दी सिनेमा से, और सिनेमा जगत के अंदर के विभिन्न अवयवों को भी आपस में जोड़ा। पत्रिका की टीम छोटी-सी थी, और इतनी बड़ी तादाद में बन रही फ़िल्मों की समीक्षा, उनके बनने की कहानियों, फ़िल्म समाचारों, गीत-संगीत की स्थिति, इन सबको अपनी ज़द में समेट लेना सिर्फ़ माधुरी की अपनी टीम के ज़रिए संभव नहीं था। अपनी लगातार बढ़ती पाठक संख्या का रुझान भाँपते हुए, उसके सुझावों से बराबर इशारे लेते हुए माधुरी ने उनसे सक्रिय योगदान की अपेक्षा की और उसके पाठकों ने उसे निराश नहीं किया। प्रकाशन के तीसरे साल में प्रवेश करने पर छपा यह संपादकीय इस संवाद के बारे में बहुत कुछ कहता है:

हिन्दी में सिनेपत्रकारिता सभ्य, संभ्रांत और सुशिक्षित परिवारों द्वारा उपेक्षित रही है। सिनेमा को ही अभी तक हमारे परिवारों ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। फ़िल्में देखना बड़े-बूढ़े उच्छृंखलता की निशानी मानते हैं। कुछ फ़िल्मकारों ने अपनी फ़िल्मों के सस्तेपन से इस धारणा की पुष्टि की है। ऐसी हालत में फ़िल्म पत्रिका का परिवारों में स्वागत होना कठिन ही था।

सिनेमा आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक मनोरंजन बन गया है। अत: इससे दूर भागकर समाज का कोई भला नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसमें गहरी रुचि लेकर इसे सुधारें, अपने विकासशील राष्ट्र के लायक़ बनाएँ। नवयुवक वर्ग में सिनेमा की एक नयी समझ उन्हें स्वस्थ मनोरंजन का स्वागत करने की स्थिति में ला सकती है। इसके लिए जिम्मेदार फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं की आवश्यकता स्पष्ट है। मैं कोशिश कर रही हूँ फ़िल्मों के बारे में सही तरह की जानकारी देकर मैं यह काम कर सकूँ। परिवारों में मेरा जो स्वागत हुआ है उसको देख कर मैं आश्वस्त हूँ कि मैं सही रास्ते पर हूँ। आत्मनिवेदन: (11 फ़रवरी, 1966).

इस आत्मनिवेदन को हम पारंपरिक उच्च-भ्रू संदर्भ की आलोचना के साथ-साथ पत्रिका के घोषणा-पत्र और इसकी अपनी आकांक्षाओं के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ सकते हैं। पत्रिका गुज़रे ज़माने के पूर्वग्रहों से जूझती हुई नयी पीढ़ी से मुख़ातिब है, सिनेमा जैसा है, उसे वैसा ही क़ुबूल करने के पक्ष में नहीं, उसे 'विकासशील राष्ट्र के लायक़' बनाने में अपनी सचेत जिम्मेदारी मानते हुए पारिवारिक तौर पर लोकप्रिय होना चाहती है। कहना होगा कि पत्रिका ने घोर आत्मसंयम का परिचय देते हुए पारिवारिकता का धर्म बख़ूबी निभाया, लेकिन साथ ही 'करणीय-अकरणीय' की पारिभाषिक हदों को भी आहिस्ता-आहिस्ता सरकाने की चतुर कोशिशें भी करती रही। भले ही इस मामले में यह अपने भगिनी प्रकाशन 'फ़िल्मफ़ेयर'-जैसी 'उच्छृंखल' कम से कम समीक्षा-काल में तो नहीं ही बन पाई। बक़ौल अरविंद कुमार, जब पत्रिका की तैयारी चल रही थी, तो सुचित्रा की पहली प्रतियाँ सिनेजगत के कई बुज़ुर्गों को दिखाई गईं। उनमें से वी शांताराम की टिप्पणी थी कि इस पर फ़िल्मफ़ेयर का बहुत असर है। यह बात अरविंद जी को लग गई गई, और उन्हें ढाढ़स भी मिला। लिहाज़ा, माधुरी ने अपना अलग हिन्दीमय रास्ता अख़्तियार किया, और मालिकों ने भी इसे पर्याप्त आज़ादी दी। अनेक मनभावन सफ़ेद स्याह, और कुछ रंगीन चित्रों और लोकार्षक स्तंभों से सज्जित माधुरी जल्द ही संख्या में विस्तार पाते बड़े-छोटे शहरों के हिन्दी-भाषी मध्यवर्ग की अनिवार्य पत्रिका बन गई, जिसमें इसके शाफ़-शफ़्फ़ाफ़ और मेहनतपसंद संपादन – मसलन, प्रूफ़ की बहुत कम ग़लतियाँ होना – का भी हाथ रहा ही होगा। यहाँ 'मध्यवर्ग की पत्रिका' का लेबल चस्पाँ करते हुए हमें उन चाय और नाई की दुकानों को नहीं भूलना चाहिए, जहाँ पत्रिका को व्यापकतर जन समुदाय द्वारा पढ़ा-देखा-पलटा-सुना जाता होगा। अभाव से प्रेरित ही सही, लेकिन हमारे यहाँ ग्रामोफोन से लेकर सिनेमा-रेडियो-टीवी, पब्लिक फोन, और इंटरनेट(सायबर कैफ़े, ई-चौपाल) तक के आम अड्डों में सामूहिक श्रवण-वाचन-दर्शन-विचरण का तगड़ा रिवाज रहा है। संगीत रसास्वादन वॉकमैन और मोबाइल युग में आकर ही निजी होने लगा है। तो इस वृहत्तर पाठक-वर्ग तक फ़िल्म जैसे माध्यम को संप्रेषित करने के लिए माक़ूल शब्दावली जुटाने में मौजूदा शब्दों में नये अर्थ भरने से लेकर नये शब्दों की ईजाद तक की चुनौती संपादकों और लेखकों ने उठाई लेकिन अपरिचित को जाने-पहचाने शब्दों  और साहित्यिक चाशनी में लपेट कर कुछ यूँ परोसा कि पाठकों ने कभी भाषायी बदहज़मी की शिकायत नहीं की। शब्दों से खेलने की इस शग़ल को गंभीरता से लेते हुए अरविंद जी ने अगर आगे चलकर शब्दकोश-निर्माण में अपना जीवन झोंक दिया तो किमाश्चर्यम, कि यह काम भी क्या ख़ूब किया!

सिने-जनमत सर्वेक्षण

बहरहाल, पूछने लायक़ बात है कि माधुरी के लिए सिनेमा के मायने क्या थे। ऊपर के इशारे में ही जवाब था – विशद-विस्तृत। पत्रिका ने न केवल दुनिया-भर में बन रहे महत्वपूर्ण चित्रों या चित्रनिर्माण की कलात्मक-व्यावसायिक प्रवृत्तियों पर अपनी नज़र रखी, बल्कि कैसे बनते थे/बन रहे हैं,  इनका भी गाहे-बगाहे आकलन पेश किया, ताकि फ़िल्मी दुनिया में आने की ख़्वाहिश रखने वाले – लेखक, निर्देशक, अभिनेता, गायक – ज़रूरी हथियारों से लैस आएँ, या जो नहीं भी आएँ, वे जादुई रुपहले पर्दे के पीछे के रहस्य को थोड़ा बेहतर समझ पाएँ। इस लिहाज से ये ग़ौरतलब है कि माधुरी ने अपने पन्नों में सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेताओं को जगह नहीं दी, बल्कि तकनीकी कलाकारों – छायाकारों, ध्वनि-मुद्रकों और 'एक्स्ट्राज़' को भी, ठीक वैसे ही जैसे कि महमूद जैसे 'हास्य'-अभिनेताओं को आवरण पर डालकर, या फ़िल्म और टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, पुणे से उत्तीर्ण नावागंतुकों की उपलब्धियों को समारोहपूर्वक छापकर अपनी जनवादप्रियता का पता दिया। उनकी कार्य-पद्धति समझाकर, उनकी मुश्किलों, मिहनत को रेखांकित करते हुए उनकी मानवीयता की स्थापना कर सिनेमा उद्योग के इर्द-गिर्द जो नैतिक ग्रहण ज़माने से लगा हुआ था, उसको काटने में मदद की।   

इस सिलससिले में घुमंतू परिचर्चाओं की दो शृंखलाएँ मार्के की हैं: पहली, जब माधुरी ने मुंबई महानगरी से निकलकर अपना रुख़ राज्यों की राजधानियों और उनसे भी छोटे शहरों की ओर किया ये टटोलने के लिए कि वहाँ के बाशिंदे बन रही फ़िल्मों से कितने मुतमइन हैं, उन्हें उनमें और क्या चाहिए, क्या नहीं चाहिए, आदि-आदि। जवाब में मध्यवर्गीय समाज के वाक्पटु नुमाइंदों ने अक्सरहाँ फ़िल्मों की यथास्थिति से असंतोष जताया, अश्लीलता और फ़ॉर्मूलेबाज़ी की भर्त्सना की, सिनेमा के साहित्योन्मुख होने की वकालत की। इन सर्वेक्षणों के आयोजन में ज़ाहिर है कि माधुरी का अपना सुधारवादी एजेंडा था, लेकिन इनसे हमें उस समय के फ़िल्म-प्रेमियों की अपेक्षाओं का भी पता मिलता है। हमारे पास उनकी आलोचनाओं को सिरे से ख़ारिज करने के लिए फ़िलहाल ज़रूरी सुबूत नहीं हैं, लेकिन ये सोचने का मन करता है कि इन पिटी-पिटाई, और एक हद तक अतिरेकी प्रतिक्रियाओं में उस ढोंगी, उपदेशात्मक सार्वजनिक मुखौटे की भी झलक मिलती है, जो अक्सरहाँ जनता के सामने आते ही लोग ओढ़ लिया करते हैं, भले ही सिनेमा द्वारा परोसे गए मनोरंजन का उन्होंने भरपूर रस लिया हो। मामला जो भी हो, माधुरी ने अपने पाठकों को भी यदा-कदा टोकना ज़रूरी समझा : मसलन, फ़िल्मों में अश्लीलता को लेकर हरीश तिवारी ने जनमत से बाक़ायदा जिरह की और उसे उचित ठहराया। उस अंक में तो नहीं, लेकिन गोया एक सामान्य संतुलन बनाते हुए लतीफ़ घोंघी ने हिन्दी सिनेमा के तथाकथित फ़ोहश दृश्यों की एक पूरी परंपरा को दृष्टांत दे-देकर बताना ज़रूरी समझा। लेकिन फिल्मेश्वर ने चुंबनांकन को लेकर जो मख़ौलिया खिलवाड़ किस न करने वाली भारतीय संस्कृति के साथ किया, वह तो अद्भुत था। थोड़े मुख़्तलिफ़ तरह का एक दूसरा सर्वेक्षण भौगोलिक था। याद कीजिए कि उस ज़माने में कश्मीर फ़िल्मकारों का स्वर्ग जैसा बन गया था। एक के बाद एक कई फ़िल्में बनी थीं, जिनका लोकेशन वही था, और पूरा कथानक नहीं तो कम-से-कम एक-दो गाने तो वहाँ शूट कर ही लिए जाते थे। जान पड़ता है कि लोगों को कश्मीर के प्रति निर्माताओं की यह आसक्ति थोड़ी-थोड़ी ऊब देने लगी थी। माधुरी ने एक पूरी शृंखला ही समूचे हिन्दुस्तान की उन अनजान आकर्षक जगहों पर कर डाली जहाँ फ़िल्मों को शूट किया जा सकता है, बाक़ायदा सचित्र और स्थानीय इतिहास और सुविधाओं की जानकारियों मुहैया कराते हुए। इस तरह 'भावनात्मक एकता' का जो नारा मुल्क के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने उस ज़माने में बुलंद किया था,  उसकी किंचित वृहत्तर परिभाषा कर कश्मीरेतर दूर-दराज़ की जगहों को फ़िल्मों के भौतिक साँचे में ढालने की ठोस वकालत माधुरी ने बेशक की।   

सिने-माहौल और नागर चेतना

चलिए, आगे बढ़ें। सिनेमाघरों की दशा पर केन्द्रित माधुरी का तीसरा सर्वेक्षण अपेक्षाकृत ज़्यादा दिलचस्प था। इसकी प्रेरणा पाठकों से मिले शिकायती ख़तों से ही आई मालूम पड़ती है: जब पत्रों में अपने शहर के सिनेमा हॉल के हालात को लेकर करुण-क्रंदन थमा नहीं तो माधुरी ने उसे एक वृहत्तर अनुष्ठान और मुहिम का रूप दे दिया। इस मुहिम की अहमियत समझने के लिए आजकल की मल्टीप्लेक्स-सुविधा-भोगी हमारी पीढ़ी को मनसा उस ज़माने में और उन छोटे शहरों में लौटना होगा, जब सिनेमा देखने को ही समाज में सम्मानजनक नहीं माना जाता था तो देखनेवालों को सिने-मालिक लुच्चा-लफ़ंगा मान लें तो उनका क्या क़ुसूर। जैसे दारू के ठेकों पर सिर-फुटव्वल आम बात थी, या है, वैसे ही पहले दिन/पहले शो में हॉल के बाहर टिकट खिड़की पर लाठियाँ चल जाना भी कोई अजीब बात नहीं होती थी। आप ख़ुद देखिए, लोगों ने फ़िल्म देखने के लिए कितने त्याग किए हैं, पूंजीवादी समाज की कैसी बेरुख़ी झेली है, एक-दूसरे को कितना प्रताड़ित किया है। माधुरी का शुक्रिया कि इसने सिनेमा हॉल को साफ़-सभ्य-सुसंस्कृत-पारिवारिक जगह बनाने की दिशा में पहल तो की। नीचे पेश है एक बानगी उज्जैन, झाँसी, कानपुर, जमशेदपुर जैसे शहरों से दर्ज शिकायतनामों की। चक्रधर पुर, बिहार, से किसी ने लिखा कि हॉल में पीक के धब्बों और मूँगफली के छिलकों की सजावट आम बात है। सीटों पर नंबर नहीं और, लोग तो जैसे 'धूम्रपान निषेध' की चेतावनी देखते ही नहीं। फ़िल्म प्रभाग के वृत्तचित्र हमेशा अंग्रेज़ी में ही होते हैं, और जनता राष्ट्रगान के समय भी चहलक़दमी करती रहती है। (8 सितंबर,1967). इसी अंक में होशंगाबाद से ख़बर है कि किसी ने गोदाम को सिनेमा हॉल बना दिया है, पीने को पानी नहीं है, हाँ, खाने की चीज़ ख़रीदने पर ज़रूर 'मुफ़्त' मिल जाता है। फ़रियादी की दरख़्वास्त है कि महीने में कम-से-कम एक बार तो कीटनाशक छिड़का जाए, मूतरियों को साफ़ रखा जाए, और टिकट ख़रीदने के बाद के इंतज़ार को आरामदेह बनाया जाए। झाँसी से एक जनाब फ़रमाते हैं कि वहाँ दो-ढाई लाख की आबादी में कहने को तो सात सिनेमाघर हैं, लेकिन एक को छोड़कर सब ख़स्ताहाल। फटी सीटें, पीला पर्दा, गोया किसी फोटॉग्रफर का स्टूडियो हो; लोग बहुत शोर मचाते हैं, जैसे ही बिजली जाती है या रील टूटती है, 'कौन है बे' की आवाज़ के साथ सीटियों का सरगम शुरू हो जाता है; गेटकीपर ख़ुद ब्लैक करता है और मना करने पर रौब झाड़ता है; पार्किंग में भी टिकट मिलता है, लेकिन साइकिल वहीं लगाने पर; अंग्रेज़ी-हिन्दी दोनों ही फ़िल्में काफ़ी देर से लगाई जाती हैं। 'महारानी लक्ष्मीबाई ने नगर' के इस शिकायती ने क्रांतिकारी धमकी के साथ अपनी बात ख़त्म की : अगर संबंधित अधिकारी कुछ नहीं करते तो झाँसी की जनता को फ़िल्म देखना छोड़ देना पड़ेगा। वाह! इसी तरह तीन सिनेमाघरों वाले बीकानेर से एक जागरूक सज्जन ने लिखा: एक हॉल तो कॉलेज से बिल्कुल सटा हुआ है, टिकटार्थियों की क़तार सड़क तक फैल जाती है, ब्लैक वालों के शोर-ओ-गुल से कक्षाएँ बाधित होती हैं; फ़र्स्ट क्लास की सीटें भी जैसे कष्ट देने के लिए ही बनाई गई हैं, एयरकंडीशनिंग ऐसी कि उससे बेहतर धूप में रहें, कभी सफ़ाई नहीं होती, कचरे के ढेर लगे होते हैं; तीसरे सिनेमा हॉल में तो बालकनी की हालत फ़र्स्ट क्लास से भी बदतर है।  फ़र्स्ट क्लास का दर्शक जब 'सिनेमा देखने में मग्न हो तब अचानक ऐसा लगता है कि किसी सर्प ने काट खाया हो या इंजेक्शन लगा दिया गया हो।  बरबस दर्शक उछल पड़ता है। पीछे देखता है तो मूषकदेव कुर्सियों पर विराजमान हैं। हॉल में कई चूहों के बिल देखने को मिल सकते हैं। सरदार शहर के एक सिनेमची ने शिकायत की कि वहाँ हॉल के अति सँकरे दरवाज़े से घुसने के बाद दर्शक और बदरंग पर्दे के बीच में दो-एक खंभे खड़े होकर फ़िल्म देखते हैं, ध्वनि-यंत्र ख़राब है, उससे ज़्यादा शोर तो छत से लटके पंखे कर देते हैं; बारिश में छत चूती है, कुर्सियों के कहीं हाथ तो कहीं पैर नहीं, कहीं पीठ ही ग़ायब है; आदमी ज़्यादातर ख़ुद को सँभालता रहता है: कोई नया हॉल बनाना भी चाहे तो लाइसेन्स नहीं मिलता। दरभंगा से रपट आई कि चार में से तीन सिनेमाहॉल तो 'उच्च वर्गों' के लिए हैं ही नहीं; नैशनल टॉकीज़ पूरा कबूतरख़ाना है; लोग हॉल में आकर अपनी सीट से ही टिकट ख़रीदते हैं, सीट संख्या नहीं होने पर काफ़ी कोहराम मचा होता है; मेरा साया शुरू हुआ तो पंखे की छड़ ऐन पर्दे पर नमूदार हो गई, और जिस तरह की फ़िल्म थी, हमें लगा ज़रूर कुछ रहस्य है इस साये में! लेकिन बात हँसने वाली नहीं। कौन इनका हल करेगा – सरकार या व्यवस्थापक? कोई नहीं, क्योंकि उनकी झोलियाँ तो भर ही रही हैं। सिनेमा का बहिष्कार ही एकमात्र रास्ता बचता है। एप्रील फ़ूल देखकर आए गुरदासपुर के एक सचेत नागरिक ने हॉल वालों को तो आड़े हाथों लिया ही कि वहाँ निर्माण कार्य कभी बंद ही नहीं होता और पुराने प्रॉजेक्टर का शोर असह्य है, साथ ही दर्शकों के व्यवहार से भी घोर असंतोष ज़ाहिर किया:  'कामुक दृश्यों पर भद्दी आवाज़ों का शोर तमाम नैतिक मापदंडों की हत्या करके भी शांत नहीं होता। शायद यही कारण है कि कोई भी भलामानुस माँ-बहनों के साथ फ़िल्म देखने का साहस नहीं जुटा पाता…राष्ट्रगान के समय दरवाज़ा खुला छोड़ दिया जाता है, लोग बाहर निकल जाते हैं, जो अंदर भी रहते हैं, वे या तो बदन खुजाते या जम्हाइयाँ लेते दिखाई देते हैं।…अच्छी और सफल फ़िल्में जो पंजाब के बड़े शहरों में वर्ष के आरंभ में प्रदर्शित होती हैं, यहाँ अंत तक पहुँचती हैं, नतीजा ये होता है कि गणतंत्र दिवस की न्यूज़ रीलें हम स्वतंत्रता दिवस पर देखते हैं: हमें अभी तक अनुपमा और आए दिन बहार के का इंतज़ार है!

आरा से आकर एक सज्जन बड़े नाराज़ थे:

छुट्टियाँ बिताने आरा गया हुआ था। यहाँ के सिनेमा-हॉल और व्यवस्थापकों की लापरवाही देखकर दुख हुआ। सिनेमा हॉल के बाहर कुछ लोग लाइन में खड़े रहते हैं जबकि टिकट पास के पान की दुकान पर मिल जाता है। नोस्मोकिंग आते ही लोग बीड़ी जला लेते हैं। अगर कोई रोमाण्टिक सीन आ जाए तो उन्हें चिल्लाकर ही संतोष होता है, जिन्होंने अभी सीटी बजाना नहीं सीखा है। सिनेमा शुरू होने का कोई निश्चित समय नहीं है। अगर किसी अधिकारी की फ़ेमिली आने वाली है तो सिनेमा उनके आने के बाद ही शुरू होगा। हॉल में घुसते ही कुछ नवयुवक इतनी हड़बड़ी में आते हैं कि जल्दबाज़ी में फ़ेमिली स्वीट्स में घुस जाते हैं। (29 दिसंबर 1967).

डेविड धवन की हालिया फ़िल्म राजा बाबू की बरबस याद आ जाती है, जिसमें तामझाम से सजे लाल बुलेट पर घूमने वाला गोविंदा का किरदार सिनेमा हॉल में जाकर अपने मनपसंद दृश्य को 'रिवाइन्ड' करवाके बार-बार देखता है। साठ के दशक में छोटे शहरों के असली बाबू भी राजा बाबू से कोई कम थे! लेकिन ये शिकायती स्वर इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि सिनेदर्शक अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत हो रहा था, और सिने-प्रदर्शन में हो रही अँधेरगर्दी की पोल खोलने पर आमादा था। लेकिन इस तरह की परेशानियाँ सिर्फ़ छोटे शहरों तक सीमित नहीं थीं। एक आख़िरी उद्धरण देखिए, राजकुमार साहब के हवाले से:          

दिल्ली के कुछ सिनेमा हॉल जो कि पुरानी दिल्ली में हैं बहुत ख़राब दशा में हैं। महिलाओं को केवल एक सुविधा प्राप्त है, और वो है टिकट मिल जाना। और इसके अलावा कोई सुविधा नहीं। अन्दर जाकर सीट पर बैठे तो क्या देखेंगे कि पीछे के दर्शक महोदय बड़े आराम से सीट पर पैर रख कर बैठे हुए हैं। ऐसा करना वे अपना अधिकार समझते हैं। आसपास के लोग बड़े प्रेम से घर की या बाहर की बातें करते नज़र आएँगे जबकि फ़िल्म चल रही होगी। मना किया जाय तो वे लड़ने लगेंगे और आप (जो कि माँ या बहन के साथ बैठे होंगे) लोगों की नज़रों के केन्द्र बन जाएँगे। यदि कोई प्रेम या उत्तेजक सीन होगा तो देखिए कितनी आवाज़ें कसी जाती हैं, गालियाँ दी जाती हैं, और सीटियाँ तो फ़िल्म के संगीत का पहलू नज़र आती हैं। यदि पास बैठी महिला के साथ छेड़छाड़ करने का अवसर मिल जाए तो वे हाथ से जाने नहीं देते। ये सब बातें सिर्फ़ इसलिए होती हैं कि सिनेमा हॉल में आगे बैठे लोग सिर्फ़ दो-तरफ़ा मनोरंजन चाहते हैं। इस तरह सिनेमा देखना तो कोई सहनशील व्यक्ति भी गवारा नहीं करेगा।  (29 दिसंबर 1967, पत्र).

क़िस्सा कोताह ये कि दर्शकों की इन दूर-दराज़ की – सिनेव्यापार की भाषा में 'बी' 'सी' श्रेणी के शहरों-क़स्बों से आती –  आवाज़ों को राष्ट्रीय गलियारों तक पहुँचाने का काम करते हुए माधुरी ने निहायत कार्यकर्तानुमा मुस्तैदी और प्रतिबद्धता दिखाई। इसका कितना असर हुआ या नहीं, कह नहीं सकते, लेकिन सिनेमा देखने वाले लोग भी नागरिक समाज की बुनियादी सहूलियतों और दैनंदिन सदाचरण के हक़दार हैं, अंक-दर-अंक यह चीख़ने के पीछे  कम-से-कम माधुरी का तो वही भरोसा रहा, जो फ़ैज़ का था: 'कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएँगे'। और नहीं तो कम-से-कम शेष पाठकों तक तो नाले गए ही होंगे क्योंकि चंद संजीदा क़िस्म की शिकायतें तो आम जनता, ख़ासकर पुरुषों, को ही संबोधित हैं! एक और दिलचस्प बात आपने नोट की होगी इन ख़तों में कि हिन्दी-भाषी पुरुष उस ज़माने में सिर्फ़ 'माँ-बहनों' के साथ फ़िल्म देखने जाता था!

मधुर संगीतप्रियता

अच्छा साहब, बहुत हो लीं रोने-धोने की बातें। आइए अब कुछ गाने की भी की जाएँ। माधुरी ने यह बहुत जल्द पहचान लिया था कि रेडियो और ग्रामोफोन के ज़रिए लोग सिनेमा को सिर्फ़ देखते नहीं हैं, उसे सुनते भी हैं, वैसे लोग भी जो नहीं देखते, गुनगुनाते ज़रूर हैं, और इसके लिए वे बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दिनों से ही सस्ते काग़ज़ पर छपे चौपतिया मार्का 'कथा-सार व गीत' या बाद में नारायण ऐण्ड को., सालिमपुर अहरा, पटना जैसे प्रकाशकों द्वारा मुद्रित 'सचित्र-गीत-डायलॉग' के बेहद शौक़ीन थे, बल्कि उन पर मुनहसर थे। क्योंकि इससे बार-बार सिनेमा जाकर या रेडियो पर सुन-सुनकर कॉपी पे उतारने की उनकी अपनी मेहनत बचती थी। सिनेमा के गीतों ने  एक अरसे से रोज़ाना की अंत्याक्षरी से लेकर औपचारिक, शास्त्रीय हर तरह की महफ़िलों में अपना रंग जमा रखा था, तो जो लोग राग-आधारित गाने गाना चाहते थे, उनके लिए गीत के बोल के साथ-साथ स्वराक्षरी देने का काम संपादक ने संगीत-मर्मज्ञ श्रीधर केंकड़े से काफ़ी लंबे अरसे तक करवाया। उन पृष्ठों पर संगीतकार-गीतकार-गायक-गायिका का नाम बड़े सम्मान से छापा जाता था। लेकिन जल्द ही 'रिकार्ड तोड़ फ़ीचर' और पैरोडियाँ भी स्तंभवत छपने लगीं, जो जनता के हाथों पुराने-नए मशहूर गानों के अल्फ़ाज़ की रीमिक्सिंग (= पुनर्मिश्रण, पुनर्रचना) के लोकाचार का ही एक तरह से साहित्यिक विस्तार था। इसलिए स्वाभाविक ही था कि हुल्लड़ मुरादाबादी और काका हाथरसी जैसे मशहूर कवियों के अलावा बेनाम तुक्कड़ों ने अच्छी तुकबंदियाँ पेश कीं। इस तरह की हास्य-व्यंग्य से लबरेज़ नक़्क़ाली के विषय अक्सर सामाजिक होते थे, कई बार फ़िल्मी, पर बाज़ मर्तबा राजनीतिक भी, जैसे कि सदाबहार मौज़ू 'महँगाई' को लेकर सीधे-सीधे भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री से पूछा गया सवाल, जो कि बतर्ज़ 'बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं' गुनगुनाये जाने पर सामान्य से किंचित अतिरिक्त फैलती मुस्कान की वजह बनता होगा:

इतना महँगा गेहूँ, औ इतना महँगा चावल

बोल इन्द्रा बोल सस्ता होगा कि नहीं

कितने घंटे बीत गए हैं मुझको राशन लाने में

साहब से फटकार पड़ेगी देर से दफ़्तर आने मे

इन झगड़ों का अन्त कहीं पर होगा कि नहीं॥ बोल इन्द्रा बोल…

दो पाटों के बीच अगर गेहूँ आटा बन जाता है

क्यों न जहाँ पर इतने कर हों, दम सबका घुट जाता है

कभी करों का यह बोझा कम होगा कि नहीं।। बोल इन्द्रा बोल…

हम जीने को तड़प रहे ज्यों बकरा बूचड़ख़ाने में

एक नया कर और लगा दो साँस के आने-जाने में

आधी जनता मरे चैन तब होगा कि नहीं? बोल इन्द्रा बोल…(22 सितंबर 1967).

अब आप ही बताइए साहब कि ये नक़ल, असल से कविताई में कहीं से उन्नीस है? इसी तरह काका ने एक पैरोडी बनाई थी संत ज्ञानेश्वर के मशहूर गीत 'ज्योति से ज्योति जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो' पर, 'नोट से नोट कमाते चलो, काले धन को पचाते चलो, जिसका थीम इतना शाश्वत है कि कभी पुराना नहीं होगा। पता नहीं हम ऐसे ख़ज़ाने का जमकर इस्तेमाल क्यों नहीं करते। पुनर्चक्रण पर्यावरण-प्रिय युग की माँग है। माधुरी ने तो अपनी पुनर्चक्रण-प्रियता का सबूत इस हद तक दिया कि एक पूरा फ़िल्मी पुराण और एक संपूर्ण फ़िल्मी चालीसा ही छाप दिया,  जिसमें फ़िल्मी इतिहास के बहुत सारे अहम नाम सिमट आए हैं। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, आप ख़ुद पाठ करें, तर्ज़ वही है गोस्वामी तुलसीदासकृत हनुमान चालीसा वाली:

दोहा:  सहगल चरण स्पर्श कर, नित्य करूँ मधुपान
सुमिरौं प्रतिपल बिमल दा निर्देशन के प्राण
स्वयं को काबिल मानि कै, सुमिरौ शांताराम
ख्याति प्राप्त अतुलित करूँ, देहु फिलम में काम

चौपाई:  जय जय श्री रामानंद सागर, सत्यजीत संसार उजागर
दारासिंग अतुलित बलधामा, रंधावा जेहि भ्राता नामा
दिलीप 'संघर्ष' में बन बजरंगी, प्यार करै वैजयंती संगी
मृदुल कंठ के धनी मुकेशा, विजय आनंद के कुंचित केशा।

विद्यावान गुनी अति जौहर, 'बांगला देश' दिखाए जौहर
हेलन सुंदर नृत्य दिखावा, लता कर्णप्रिय गीत सुनावा
हृषीकेश 'आनंद' मनावें, फिल्मफेयर अवार्ड ले जाएं
राजेश पावैं बहुत बड़ाई, बच्चन की वैल्यू बढ़ जाई

बेदी 'दस्तक' फिलम बनावें, पबलिक से ताली पिटवावें
पृथ्वीराज नाटक चलवाना, राज कपूर को सब जग जाना
शम्मी तुम कपिदल के राजा, तिरछे रोल सकल तुम साजा
हार्कनेस रोड शशि बिराजें, वाम अंग जैनीफर छाजें

अमरोही बनायें 'पाकीजा', लाभ करोड़ों का है कीजा
मनोज कुमार 'उपकार' बनाई, नोट बटोर ख्याति अति पाई
प्राण जो तेज दिखावहिं आपैं, दर्शक सभी हांक ते कांपै
नासैं दुख हरैं सब पीड़ा, परदे पर महमूद जस बीरा

आगा जी फुलझड़ी छुड़ावैं, मुकरी, ओम कहकहे लगावैं
जुवतियों में परताप तुम्हारा, देव आनंद जगत उजियारा
तुमहिं अशोक कला रखवारे, किशोर कुमार संगित दुलारे
राहुल बर्मन नाम कमावें, 'दम मारो दम' मस्त बनावें

नौशादहिं मन को अति भावें, शास्त्रीय संगीत सुनावें
रफी कंठ मृदु तुम्हरे पासा, सादर तुम संगित के दासा
भूत पिशाच निकट पर्दे पर आवें, आदर्शहिं जब फिल्म बनावें
जीवन नारद रोल सुहाएं, दुर्गा, अचला मा बन जाएं

संकट हटे मिटे सब पीड़ा, काम देहु बलदेव चोपड़ा
जय जय जय संजीव गुसाईं, हम बन जाएं आपकी नाईं
हीरो बनना चाहे जोई, 'फिल्म चालीसा' पढ़िबो सोई
एक फिलम जब जुबली करहीं, मानव जनम सफल तब करहीं

बंगला कार, चेरि अरु चेरा, 'फैन मेल' काला धन ढेरा
अच्छे-अच्छे भोजन जीमैं, नित प्रति बढ़िया दारू पीवैं
बंबई बसहिं फिल्म भक्त कहाई, अंत काल हालीवुड जाई
मर्लिन मनरो हत्या करईं, तेहि समाधि जा माला धरईं

दोहा: बहु बिधि साज सिंगार कर, पहिन वस्त्र रंगीन
राखी, हेमा, साधना, हृदय बसहु तुम तीन. (वीरेन्द्र सिंह गोधरा, 15 सितंबर 1972.)

मज़ेदार रचना है न, बाक़ायदा दोहा-चौपाई से लैस, भाषा व शिल्प में पुरातन, सामग्री में यकलख़्त ऐतिहासिक और अद्यतन, फ़िल्म भक्ति के सहस्रनाम-गुण-बखान में निहायत समावेशी, नामित आराध्य की भक्ति में सराबोर लेकिन साथ ही अमूर्त देवी-देवताओं के 'काले कार्य-व्यापार' से आधुनिक आलोचनात्मक दूरी बनाती हुई भी, जो आख़िरी चौपाई में मुखर हो उठती है। हमारे ज़माने में 'चोली के पीछे क्या है', के कई काँवड़िया संस्करण बन चुके हैं – अगले सावन में 'मुन्नी बदनाम हुई' के भी बन जाएँगे – अब अगर प्रामाणिक धर्म-धुरंधरों को इस तथाकथित अश्लील आयटम गीत की तर्ज़ पर शिवभक्ति अलापने में परहेज़ नहीं है तो उस ज़माने में माधुरी को इसकी उलट पैरोडी पेश करने में भला क्यों होता। फ़िल्म का एहतराम करना तो उसका घोषित धर्म ही ठहरा, और पाठक अगर धार्मिक पैकेजिंग में ही सिनेमा को घर ले जाना चाहते हैं तो वही सही। उन्हीं दिनों की बात है न जब जय संतोषी माँ आई थी तो लोग श्रद्धावश पर्दे पर पैसे फेंककर अपनी भक्ति का इज़हार कर रहे थे, जैसे कि किसी आयटम गाने पर ख़ुश होकर वे हॉल में सिक्के फेंकते पाए जाते थे, गोया किसी तवायफ़ की महफ़िल में बैठे हों। कैसा मणिकांचन घालमेल, कैसी अजस्र निरंतरता पायी जाती है हमारे लोक के धर्म-कर्म, नाच-गाने, और रुपहली दुनिया में कि शुद्धतावादियों का दम घुट जाए। वैसे माधुरी ने चंद बहसें धार्मिक फ़िल्मों के इतिहास व वर्तमान, उसके निर्माण के औचित्य-अनौचित्य पर भी चलाईं, एक ऐसे विशेषांक में अपना जवाब ख़ुद देता सवालिया प्रस्थान-बिंदु याद आता है: क्या धार्मिक फ़िल्मों के रथ को व्यावसायिकता का छकड़ा ढो रहा है? ये तय है कि धर्म को लेकर माधुरी न तो भावुक थी न ही संवेदनशील; अगर किसी एक धर्म में इसकी अदम्य आस्था देखी जा सकती है, तो उसका नाम हमें राष्ट्रधर्म देना होगा। इसपर कुछ बातें, थोड़ी देर में।

…जारी…

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लेखक रविकांत इतिहासकार हैं और सीएसडीएस में एसोसिएट फेलो के रूप में जुड़े हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ के दीवाली विशेषांक, 2011 में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

ये है ‘सी न्यूज’, इन्हें भी हर खबर पर विज्ञापन चाहिए

मैं भी एक नए न्यूज़ चैनल के बारे में शिकायत करना चाहता हूँ. शायद आपके जानकारी में "सी न्यूज़" होगा. ये न्यूज़ चैनल आगरा से लॉन्च हो रहा है. इसमें चैनल हेड कल्याण कुमार बनाये गए हैं. ये इससे पूर्व में वोइस ऑफ़ इंडिया में एसाईनमेंट हेड हुआ करते थे. फिलहाल चैनल की बात करते हैं. इस चैनल का भी वही हाल है जो यूपी न्यूज़ का है. इन्हें भी हर खबर के पैसे चाहिए. कल्याण जी फ़ोन करते हैं तो अपने हर रिपोर्टर और स्ट्रिंगर से सिर्फ ये बात करते हैं कि चुनाव करीब है, आपको एक-एक विधायक से कम से कम पच्चीस लाख रूपए का विज्ञापन लेना है.

किसी नेता की बाईट चलानी है तो उससे पांच लाख रूपए का विज्ञापन लेना है. कमिश्नरी बुलेटिन में जिस व्यापारी या अधिकारी की बाईट चलेगी उससे भी विज्ञापन लेना है. हर खबर पर विज्ञापन चाहिए. तभी आप सबको पेमेंट मिलेगी. सर हद तो तब हो गयी जब इन्होंने कहा कि आप अपने जिले के दस बड़े व्यापारी से बात कर लें, उनसे "सी न्यूज़" के लिए एक साल का तीस लाख का विज्ञापन ले लीजिये. इस तीस लाख से "सी न्यूज़" उनके हर कार्यक्रम को कवर करेगा. उनको गाड़ी में लगाने के लिए "सी न्यूज़" का स्टीकर मिलेगा.

इसके अलावा उनके लिए वो पुलिस थाने का भी मसला भी हल करेगा. अब सर आप ही बताइए इतने नियम शर्तों के साथ कौन इनके साथ काम कर सकेगा. पिछले ३ महीनों से इस संस्थान ने एक भी रूपए नहीं दिए हैं अपने किसी भी रिपोर्टर और स्ट्रिंगर को. जब पैसों की बात करो तो एक ही जवाब मिलता हैं कि बिल बनाकर भेज दो, पेमेंट जल्द हो जाएगी, सबको पैसा मिलेगा, हम चोर नहीं हैं. सर आपसे अनुरोध है कि क्या कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जा सकता है जिससे इस तरह के चैनल पर रोक लग सके ताकि ये धंधेबाज चैनल वाले जिलों में काम कर रहे स्ट्रिंगरो और रिपोर्टर का फायदा न उठा सकें. उनको जो झूठा आश्वासन दिया जाता है कि आपकी पेमेंट आपको मिलेगी, इन सब झंझटों से मुक्ति मिल सके.

सर मैंने श्री काटजू  जी के बारे में सुना है कि वो न्यायप्रिय व्यक्ति हैं. सर, मैं अपनी ये समस्या उन तक पहुचाना चाहता हूँ. आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मेरा मार्गदर्शन करें ताकि इस तरह के चैनल बंद हों और इनके मालिक और चैनल में बैठे उच्चपदासीन अधिकारी जो सिर्फ लोगों को बेवकूफ बनाते हैं, उन पर नकेल कसी जा सके.

यूपी के एक जिले से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. भड़ास4मीडिया ने अपने लेवल पर तथ्यों की तहकीकात कर ली है जो पूरी तरह सही पाई गई है. अगर इस पर सी न्यूज या कल्याण कुमार या अन्य किसी को कुछ कहना हो तो अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

टूजी केस में दो हजार करोड़ के हेरफेर में एनडीटीवी और चिदंबरम का भी नाम!

: दिल्ली में कार्यरत एक इनकम टैक्स कमिश्नर ने दायर की सीबीआई कोर्ट में याचिका : An application is said to have been filed in the CBI court, Patiala House, in reference to in 2G Scam case, by a serving Income Tax Commissioner seeking examination as prosecution witness in the case and alleging involvement of NDTV and Chidambaram in money laundering (in excess of Rs. 2000 crores), misuse/abuse of power, etc. (embedded document). Some excerpts are provided from an application which detail…

-how a case of corporate money laundering of illegal slush funds in excess of Rs. 2000 crores occurred through Mauritius in the context of 2G scam;

-how a Finance Minister (and later as Home Minister) harasses a senior IT official;

-how corporate veil is used to get investments made in ‘Letterbox shell companies’ in UK and Holland, stating them to be subsidiaries and which are later merged into the Indian company;

-how a senior IT official seeks CBI to investigate the complaints made and applies to court to be examined as prosecution witness;

-how bribe/corruption takes many forms;

-how some bureaucrats play to the tune of the political bosses;

-how political bosses control investigative agency cadres like those of CBI;

-how some bureaucrats become whistle-blowers.

Hopefully, whistle-blowers will get due protection under the Rule of Law, and recognition by the public-spirited citizens, when they come forth to expose illegal activities including acts of corruption, black money generation, money-laundering and stashing away in or routing funds through tax havens such as Mauritius.

There are lessons to be learnt in the ongoing actions envisaged to prevent corruption, to punish corrupt people in public offices and to monitor the financial transactions of ‘politically exposed persons’ as defined under international law and as recognized, for instance, in the Swiss Law effective 1 Feb. 2011 for Restitution of Illicit Assets stashed in Swiss bank accounts.

Excerpts:

Application by Comm. of IT, Delhi, u/s 319 and 311 of CrPC on receipt & laundering of bribe money of 2G scam in excess of Rs. 2000 crores by M/S NDTV Ltd. through illegal hawala route and fictitious jamakharch entries as share capital/contribution of subsidiaries of M/S NDTV Ltd… embezzlement of public money to the extent of Rs. 1,46,82,836/- through forgery and fraud, paying bribe and illegal gratification…

…Had the applicant not been constructively prevented by Sri P. Chidambaram, Honb'le Finance Minister from conducting and continuing with the inquiries in the affairs of M/S NDTV Ltd. through fictitious and mischievous charge sheets and fraudulent suspension as ordered by Sri. P. Chidambaram, Hon'ble Finance Minister (the then) on fraudulent charges of sexual harassment, sexual assault, molestation and rape of Ms. Sumana Sen (IRS 99005) and Ms. Ashima Neb (IRS 99010), women of dubious repute involved in serial and organized prostitution and prostitutes in terms of Clause 2(f) of Section 2 of Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956 and illicit extra-marital sexual relations with large number of male colleagues and recruited and deployed by M/S NDTV Ltd. to fake sexual harassment, sexual assault, molestation and rape, the 2G Scam would have got detected in 2007 itself and would have perhaps got nipped in its bud, sparing the Public Exchequer plunder of Public revenue. Applicant is benumbed by desperate and hysterical acts of Sri P. Chidambaram who was under oath to adhere to the Rule of law and to protect and upheld the Constitution of the country, to protect and shield M/S NDTV Ltd. in its theft of Public money and public revenue (Rs. 1,200 crores of lawful txes) and laundering of illegal slush funds in excess of Rs. 2000 crores being bribe received by Public servants in 2G scam and commit and allow and sponsor committing of fraud and forgeries by his chosen and accomplice IRS officers like debauched and serial offenders Sri PK Mishra (IRS 70017), Sri R Prasad (IRS 70036), Ms Sumana Sen (IRS 99005), Ms Ashima Neb (IRS 99010), Ms. R. Bhama (IRS 86018), etc. and to permit and patronize organized serial prostitution in Income Tax Deptt. to opiate the pain and shock emanating of his disgusting acts and despicable conduct…

(Pages 6, 7)… That, applicant is further strengthened in his assessment that money (about Rs. 2,000/- Crores) laundered by M/s NDTV Ltd. belongs to Public servants and is part of@GScam bribe received by those Public servants by the despicable and nauseating acts of Sri P. Chidambaram in preventing the applicant from proceeding with inquiries against M/s NDTV Ltd. by implicating the applicant in mischievous and malafide departmental proceedings through forged and counterfeit records and documents while he was the Finance Minister (counterfeit Refund Approval Register forged by Sri P. Chidambaram and his cronies, fictitious Writ Petition and forged judicial orders of Hon'ble Delhi High Court forged by Sri P. Chidambaram and his cronies, forged letters in the name of applicant sent to various authorities, etc., which are articles of charge pressed against applicant, in Charge Sheet dt. 3.4.2006 U/r 14 of CCS (CCA) Rules, 1965,at the behest of Sri P. Chidambaram), to name only a few instances of forgery and counterfeiting by Sri P. Chidambaram and his cronies and mischievous criminal cases through forged official records and forged judicial orders after Sri P. Chidambaram became Hon'ble Minister of Home Affairs (FIR No.- 153 of 2009 U/s 509 of IPC, 1860 by P.S. Barakhambha Road, Delhi on tiie allegations of enraging the modesty of Ms. Sumana Sen and Ms,. Ashima Neb in September, 2009 and FIR No.-514 of 2009 U/s 509 and 500 of IPC, 1860 on the allegation^ enraging the modesty of Ms. Ashima Neb) and getting the applicant arrested twice in the course of the day on 8.1.2010 though offences alleged against applicant were bailable and applicant was fully cooperating with the Police and wherein applicant was "granted bail by the Court immediately. The desperation and malafide of Sri P. Chidambaram to scare and intimidate the applicant to give up his quest for justice in the matter of laundering of money by M/s NDTV Ltd. And consequent and resultant persecution heaped upon him for having discharged his duties as per law and the utter helplessness of CBI and its decision making hierarchy, who are under the Cadre Control authority of Sri P. Chidambaram being Hon'ble Minister of Home Affairs, further corroborates reasonable assessment of applicant that money laundered by M/s NDTV Ltd. is part of bribe received by Public servants in 2 G Scam. '

That, M/s NDTV, has historically been accused of paying bribe to Public servants to get illegal and unlawful benefits and then hush '" up its crime and criminality and has been prosecuted for that by, inter-alia, CBI among other investigating agencies. One such FIR registered by CBI against M/s NDTV Ltd. and Sri Pronoy Roy {FIR No.-RC.2(A)/98 SCU (II), dt. 9.1.1998 U/s 120 B IPC r/iv 13 (2) r/w 13 (1) (d) of P.C. Act, 1988 and substantive offences naming Sri Pronoy Roy, MD, M/s NDTV Ltd. and M/s NDTV Ltd. & Ors as accused), which is only illustrative and not exhaustive compilation of criminal activities of M/s NDTV Ltd., is being relied upon by the applicant to support the submissions made herein. That, corrupt unlawful acts and conduct of M/s NDTV Ltd. involving the inquiry initiated by applicant against that company in 2006-07 was judicially noticed though not proceeded against because of technical reasons by Hon'ble Delhi High Court in Court On Its Own Motion vs State Arid Others, Crl. /W.P. No.-796 of 2007, judgment dt. 21.08.2008 and is extracted as under "45. As far its Mr. Anand is concerned, he stated in his affidavit dated 3rd October, 2007 that he was handed over a file containing serious., allegations of a tax fraud committed by NDTV and some other entities. He was in the process ofsettling a First Information Report to the police and initiating a public interest litigation in connection with the tax fraud. NDTV was aware of the fact that Mr. Anand was in possession of the relevant- papers and so the telecast was made on 30th May, 2007 to deter him from bringing the taxfraud out in the open."

(Pages 8, 9)… That, the applicant states that M/s NDTV Ltd. and its owners, Directors, employees, inculpable Public servants like Ms. Sumana ~Sen, Ms. Ashima Neb, etc. and accomplices has committed various offences under various acts by receiving bribe money of 2 G Scam in excess of Rs. 2,000/- Crores on behalf of corrupt Public servants, laundering bribe money of 2 G Scam in excess of Rs. 2,000/- Crores through illegal hawala route and fictitious jamakharch entries of Share Capital/Share contribution of two foreign based companies, M/s NDTV Network Pic.. U.K. and M/s NDTV Network BV. Holland which has not been disclosed by M/s NDTV Ltd. in its accounts submitted to Registrar of Companies and Income Tax authorities though that was mandatory to be disclosed and has got the matter hushed up by paying bribe and providing illegal gratification to corrupt Public servants like Sri R. Prasad (formerly CCIT, Delhi V and presently Member, Competition Commission of India), Sri A.K. Handa (formerly CCIT, Delhi V and presently Income Tax Ombudsman), Sri P.K. Mishra and Ms. Sunita Kaila (both former CVOs of CBDT), Sri N.C. Joshi, (formerly CIT (OSD) (Vig) in the O/o CVO, CBDT and presently CCIT in Mumbai), Ms. Kiran O. Vasudev (formerly DIT (Vig), North and presently CCIT in Mumbai), Sri BPS Bisht (formerly CIT (Vig) in CBDT and presently CIT in Kanpur), Sri N.K. Sangwan (formerly DIT (Vig) North and currently CIT in Mumbai), Sri Prakash Chandra (formerly CIT, Delhi V), Sri S.S.N. Murthy (formerly Chairman, CBDT), Ms. Sumana Sen formerly Assessing Officer of M/s NDTV Ltd.), Sri B.K. Jha, Sri S.S. Rana, Ms. Ashima Neb, Ms. R. Bhama, etc.-and by getting applicant implicated in false criminal -and departmental through forged and fabricated records and and documents and women of dubious, repute, character and reputation like Ms. Sumana Sen (IRS 99005) and Ms, Ashima Neb @ Ms. Ashimina Nele @ Smt. Ashima Neb being prostitutes involved in illicit extra-marital sexual relations with several of male colleagues and on the pay-roll of M/s NDTV Ltd. And its owners/ Directors and employees, based upon which Sri P. Chidambaram, Hon'ble Finance Minister (the then) issued 2 Charge sheets to applicant and placed him under suspension on allegations of sexually harassing, molesting, sexually assaulting and raping Ms. Sumana Sen and Ms. Ashima- Neb, at their homes/in NOIDA and offices in Delhi, keeping him under illegal suspension during the period M/s NDTV Ltd. was busy laundering the illegal slush funds in excess of Rs. 2,000/- Crores being bribe received in 2 GScam by Public servants with the malafide intent and motives to stall inquiry in the affairs of M/s NDTV Ltd. as that would have led the applicant to money laundering exercise of M/s NDTV Ltd. and possibly even the real recipient of bribe in 2GScam who had to be someone who was the decision maker and who had either not taken the decision required to be taken or who had taken some decision that was not required to be, undertaken by that person/ authority in the facts and circumstances of the case.

That, crime, criminality and offences of M/s NDTV Ltd. is evident from its having concealed affairs of its 100 %owned subsidiaries M/s NDTV Network Pic U.K and M/s NDTV Network BV, Holland by not including those subsidiaries in its audited accounts and although M/s. NDTV Ltd. moved application before Ministry of Corporate Affairs for condoning of its lapse, it did not disclose and has not disclosed those subsidiaries till date when it has received huge amount of money allegedly through Private Placements in those companies subsequently brought into M/s NDTV Ltd. Via Mauritius and another set of subsidiaries {M/s NDTV Imagine Ltd., M/s NDTV Life style Ltd., M/s NDTV Labs Ltd., M/s NDTV Convergence Ltd. and M/s NpTV Media Services Ltd., (100%owned subsidiaries merged with M/s NDTV Ltd. to complete the money laundering exercise)} and thus it is clear that omission to include and ^w»'m/s NF>TV Network Pic…U.K. and M/s NDTV Network BV. Holland in its audited accounts by M/s NDTV Ltd. Was deliberate and wilful aimed at preventing scrutiny of affairs of those subsidiaries, as that would have revealed money laundering and receipt of unaccounted money by M/s NDTV Ltd. and would have also led to the real owner/recipient of bribe in 2 G Scam, on whose behalf, M/s NDTV Ltd. has laundered the bribe money.

(Pages 10 to 15) That, it is ridiculous that when no one was willing to invest in M/s NDTV Ltd. with all its profile and businesses, Private investors chose to dump their money in little known Letter Box Shell companies M/s NDTV Network Pic. U.K. and M/s NDTV Network BV. Holland) which had no business, no Share Capital base, no projects in hands, no offices, no.staff and absolutely no activity to attract investment^that those subsidiary companies are claimed to have attracted by M/s NDTV Ltd. and which was in any case concealed by M/s NDTV Ltd. from scrutiny by excluding that from its audited accounts when M/s NDTV Ltd. was unable, with all of its and inspite of its profile to attract any investment or ,any investor, either in Public domain or through Private Placement.

That, farce and fraud of M/s NDTV Ltd. is evident from the one way journey of money in those subsidiaries i.e. M/s NDTV Network Pic, III, and M/s NDTV Network BV. Holland where money received through alleged Private Placements was first taken to Mauritius and then brought into books of M/s NDTV Ltd. through its Indian subsidiaries which makes one squirm in utter astonishment that if someone was interested in investing in M/s NDTV Ltd,, why was that investor taking so much trouble to carry its money through so much travelling i.e. first investing in little known companies in U.K. and Holland, then carrying that money to Mauritius, then bringing that into another set of subsidiaries of M/s NDTV Ltd. and finally getting that money parked in M/s NDTV Ltd., when that investor could have, very easily invested directly in M/s NDTV Ltd. Obviously, someone was attempting to hide something and M/s NDTV Ltd. was aiming tq lose the tr^il of money brought into its_ books, which alone warranted inquiry in its affairs and to prevent which M/s NDTV Ltd. did not and has, till date, not disclosed the affairs of M/s NDTV Network Pic. U.K. arid M/s NDTV Network BV,Holland in its audited accounts, though that was mandatory and has not been permitted to M/s NDTV Ltd. by Ministry of Corporate Affairs while condoning its lapses.

That, fraud and farcical alibi of M/s NDTV Ltd. is further clear from the fact that M/s NDTV Network Pic, U.K. and M/s NDTV Network BV. Holland while having made investments in Indian subsidiaries of M/s NDTV Ltd. (M/s NDTV Imagine Ltd., M/s NDTV Life style Ltd., M/s NDTV Labs Ltd., M/s NDTV Convergence Ltd. and M/s NDTV Media Services Ltd.) did not ask for matching allotment/allocation of shares of M/s NDTV Ltd. when those subsidiaries were merged with M/s NDTV Ltd. and legally and financially, investments of M/s NDTV Network Plc/UX and M/s NDTV Network BV. Holland came to cease forever with the merger of companies in' which those investments were; made by those companies. It is diabolically horrendous that why investors in M/s NDTV Network Pic. U.K. and M/s NDTV Network BV, Holland would agree for such criminal and unlawful misappropriation and disappearance of its money and investment by the acts of M/s NDTV Ltd., which is what happened by the merger of subsidiaries of M/s NDTV Ltd. with that company i.e. M/s NDTV Ltd: 13. That, fraud and farcical alibi of M/s NDTV Ltd. is also clear from the fact that M/s NDTV Network Pic. U.K. and M/s NDTV Network BV. Holland have not paid any dividend or given any return to any of its so-called Private or otherwise investors, which is tell-tale sign of ownership of money invested in those companies lying with none but M/s NDTV Ltd. itself and to prevent scrutiny of which, M/s NDTV Ltd. did not disclose and include the affairs of M/s NDTV Network Pic. U.K. and M/s NDTV Network BV. Holland in its audited accounts arid has riot disclosed and included till date which was never permitted by Ministry of Corporate Affairs.

14. That, it is quite widespread to launder legal blackmoney through jamakharch entries as Share Capital and with far less effort and expenditure, M/s NDTV Ltd. would have got that done had its blackmoney been legal, i.e. generated in legal business but not accounted for paying taxes under various taxation laws.) However, the blackmoney with M/s NDTV Ltd. being illegal blackmoney i.e. generated in illegal activities and then concealed from taxation authorities not only to avoid paying taxes on that but also to cover up the source of that money as any inquiry in the taxability of that money would have ted to its source i.e. bribe received by Public servants in 2 G Scam'and to avoid that, M/s NDTV Ltd. took the trouble of floating 100% owned subsidiaries in U.K. and Holland, introducing its illegal slush money in those subsidiaries as Private Placements, carry that money first to Mauritius and then to Indian subsidiaries and to merge those subsidiaries with M/s NDTV Ltd. to complete the laundering and parking exercise of illegal slush money in excess of Rs. 2,000/- being bribe received by Public servants in 2 GScam, taking about 4years to complete the work that would have taken maximum of 6 months, had that been done through normal jamakharch entry operators.

That, Inspection of the case of M/s NDTV Ltd. that was undertaken by the applicant in the matter of allowance of inadmissible deductions U/s 80 HHF of I.T. Act, 1961 to M/s NDTV Ltd. and the dubious role of Ms. Sumana Sen. in facilitating that fraud, would have certainly led the applicant to the laundering of illegal slush funds in excess of Rs. 2,000/- Crores that was underway at the time, applicant had undertaken the Inspection of the case of M/s NDTV Ltd. and desperate to stall that, Ms/ NDTV Ltd. used its influence with. Sri P. Chidambaram, Hon'ble Finance Minister (the then) and got,issued to applicant a Charge sheet through fake, forged, fabricated and counterfeit records and documents and when that also did not seem to working, it deployed Ms. Sumana Sen and Ms. Ashima Neb being on its pay-roll and involved in prostitution and illicit extra-marital sexual relations with large number of male colleagues as consideration to evade inquiries in their acts of corruption and embezzlement of Public money and Public revenue in excess of Rs. 3,00/^ Crores escorting their Clients as wives under fake and incorrect names (as was done by Ms. Ashima Neb who escorted her clients as Ms. Ashimina Nele and signed Guest Registers as Smt. to cover up her prostitution) and staying in Hotels and Guest Houses as man and wife (as was done by Ms. Sumana . Sen who stayed with Sri F.K. Mishra in Suite No-10 of InfantryRoad Guest House of Income Tax Deptt. in Bangalore to provide sexual gratification to Sri P.K. Mishra and others) to fake sexual harassment, sexual assault, molestation and repeated rapes by the applicant and through such despicable and nauseating ploy, Sri P: Chidambaram removed the applicant from the trail of M/s NDTV Ltd. and saved that company from the lawful consequences of its unlawful activities by placing him under suspension and extending the suspension repeatedly even.;when Hon'ble Courts kept quashing the suspension of the. applicant. The conduct of Sri P. Chidambaram is bizarre.

That, applicant is amply supported in his conclusions by the strange conduct of Sri Milap Jain, DGIT (Inv.)-, Delhi who did not allow operation U/s 132 (1) of I.T. Act, 1961 in 2008 in the case of M/s NDTV Ltd. in an independent investigation conducted by another officer completely independent of inquiries by applicant even though there were adequate and overriding evidence collected by that officer to warrant such action and insured that investigation in the affairs of M/s NDTV Ltd. got stalled and did not proceed at all. Obviously, the Finance Ministry headed by Sri P. Chidambaram, did not want any investigation in the case of M/s NDTV Ltd. and was keen to let it have free run.

That, it is matter of record that M/s NDTV Ltd. has not disclosed the accounts of two foreign based companies, M/s NDTV Network Pic, U.K. and M/s NDTV Network BV. Holland its 100 % owned subsidiaries in its accounts where it was raising huge amounts of money in the garb of Share Capital/Share contribution being fictitious jamakharch entries that was mandatory and though it got the lapse ex-post facto condoned by Ministry of Corporate Affairs, it did not disclose the affairs of those two companies even then and thus perpetuated the illegality and criminality, but no action was permitted by superior authorities in.the case of M/s NDTV Ltd, though that was exactly what was recommended by concerned investigations officers. Obviously, someone high enough in the Ministry of Finance headed by Sri P. Chidambaram, did not want ' investigation in the affairs of M/s NDTV Ltd., as that would have revealed not only the money laundering exercise of M/s NDTV Ltd., but its linkage with the 2 G-Scam and possibly the owner of bribe money of about Rs. 2,000/- Crores that was being laundered by M/s NDTV Ltd. during that period.
' 18. That, present applicant, while working as Addl. DIT (Inspection), incharge of Inspection Division Of CBDT and Preventive Vigilance set up in Income Deptt. that functions administratively under the control of CBDT but for technical supervision and control works under Comptroller & Auditor General of India and Public Accounts Committee of Parliament, received credible intelligence that Ms. Sumana Sen, DCIT Circle 13 (1), Delhi, whose spouse Sri Abhisar Sharma was an employee of M/s 'NDTV Ltd. (during October, 2003 to October, 2007) has not complied with the requirements of Rule 4 of CCS (Conduct) Rules," 1964 to,disclose and intimate the Govt, about the- employment status of her spouse Sri Abhisar Sharma with private companies/firm and by concealing that crucial and material fact from Govt., got her appointed as Assessing Officer of M/s NDTV Ltd. under various Direct Tax Acts referred to in Para 1 and has conspired and connived with M/s NDTV Ltd. in theft of Public revenue and Public money in excess of Rs. 2,00/- Crores.

That, on formal action, allegations were found to be correct and applicant ordered an inspection of M/s NDTV Ltd. whereby an Inspection Note was raised by applicant on 7.3.2007 and sent to CCIT, Delhi V which was accepted by the Govt, and assessment of M/s NDTV Ltd. for A.Y. 2002-03 was cancelled U/s 263 of I.T. Act, 1961 by CIT, Delhi V on 29.3. 2007 with directions to Assessing Officer do the assessment de-novo which was duly done on• 31.12, 2007 accepting the findings of applicant and making appropriate additions and bringing additional revenue to Public Exchequer that was hitherto evaded by M/s NDTV Ltd. in collusion with corrupt Public servants like Ms. Sumana Sen and others.
20. That, subsequently, applicant in course of his defence in various departmental inquiries set up against him by Sri P. Chidambaram, Hon'ble Finance Minister (the then) learnt that Ms. Sumana Sen was paid bribe arid provided with illegal gratification by M/s NDTV Ltd. to facilitate evasion of not only the lawful taxes due to Public Exchequer but also laundering of illegal slush funds in excess of Rs. 2,000/- Crores, that was part of bribe,.etc received in 2 G Scam by corrupt Public 'servants in a position to take decisions.

21. That, Ms. Sumana Sen and Ms. Ashima Neb, in course of proceedings before the Court ofld. CJM, NOIDA, U.P. in the matter of directions of Court U/s ,156 (3) for registration of FIR^ for being involved, inter-alia,in prostitution, etc. has claimed that because of complaints of applicant certain inquiries/investigation were undertaken by CBI against them and CBI officers visited the O/o CCIT (CCA), Delhi and after inspecting the records, exonerated them of all the allegations of bribe taking, etc. that was alleged by applicant in his complaints against those women i.e. Ms. Sumana Sen (IRS 99005) and Ms. Ashima Neb (IRS 99010).

(Page 20)… The all expenses paid free pleasure trip to Europe as provided to Ms. Sumana Sen and the amount spent by M/s NDTV Ltd. x>n pleasure trip ofMs. Sumana Sen to Europe during 12* April, 205 to 20th April, 2005 by British Airways Flights BA 142 &BA 143, was plain and simple bribe paid to Msl: Sumana Sen. consideration for and in lieu of her having facilitatedi).

Illegal issuance of unlawful Refund of Rs. 1,46,82,836/- in A.Y. 2004-05 on 28.3.2005 to M/s NDTV Ltd., ii). Evasion of tax in excess ofRs. 2,00/- Crores in the matter of HHF of IT. Act, 1961 by not reporting the matter U/s 263 of IT. Act, 1961, iii). Laundering of illegal slush funds of more than Rs. 2,000/- Crores, most likely part of bribes, etc. of 2 G Scam, through illegal hawala route and jamakharch entries by M/s NDTVLtd. and corresponding evasion of about Rs. I,200/- Crores of lawful taxes, ' iv). Unlawful access to secret and confidential records and documents of Govt, stolen,by Ms. Sumana Senfrom the O/o CCH, Delhi, for providing to M/s NDTV Ltd. and its foreign associates,

(Page 21)… I have no means to verify the authenticity of the claims of Ms. Sumana Sen and Ms. Ashima Neb nor do I know about any investigation carried out by CBIin the matter but it is matter ofrecord that I have, in course of my official duties had detected and reported evasion of lawful Public revenue in excess of Rs. 2,00/- Crores by M/s NDTV Ltd. in the -matter of bogus claim and allowance of deductions U/s 80 HHF of IT. Act, 1961, laundering of illegal slush funds of about Rs. 2,000/' Crores by M/s NDTV Ltd. that is most likely political kickback in 2 G scam belonging to a powerful Tam.ilha.du based politician having Prime Ministerial ambitions through illegal hawala and jamakharch entries routed through two foreign based companies, M/s NDTV Network Pic. U.K. and M/s NDTV NetWork BV, Holland (being 100 % owned subsidiaries of M/s NDTV.Ltd.) and 5 Indian companies, M/s NDTV Imagine Ltd., M/s NDTV Life style Ltd;, MM NDTV Labs Ltd., M/s NDTV Convergence Ltd. and M/s NDTV Media Services Ltd., (again 100 %owned subsidiaries of M/s NDTV Ltd., since merged with M/s NDTV Ltd. to complete the money laundering exercise), embezzlement and misappropriation of Rs. 1,46,82,836/ from Govt, account in criminal conspiracy, with Ms. Sumana Sen and other Public servants, payment of bribe sand illegal gratification to Public servants like all expenses paid pleasure trip to M/s Sumana Sen costing about Rs. 1.00.00.000/- in April, 2005 (performed during 12th April 2005 to 20th April. 2005 by British Airways Flights No.-BA 142 and BA 143). criminal conspiracy, cheating, forgery, fraud, criminal breach of trust by Public ,servants, etc. and do accept the responsibility for my official communications.

(Page 23)… In the circumstances, I would request for an urgent audience with the Director, CBI or if that is not feasible, with some senior officer preferably at the level of Joint Director to substantiate my reports about loot of Public Exchequer by corrupt Public servants in lieu of bribe and illegal gratification provided by M/s NDTVLtd. And examine myself as prosecution witness. As provisions of Cr.PC, 1973 apply to Delhi Special Police Establishment Act, 1948, lean be examined by CBI as prosecution witness in the matter and since, CBI is obligated to consider complete facts and circumstances before taking any decision either to prosecute the suspect/accused or closing the case, no harm would visit anyone if CBI considers my above request while in the event of my evidence notgetting examined, by CBI, grave-and irreparable prejudice would be caused to cause of prosecution and guilty/accused would get away from lawful consequences oftheir guilt/offences by default.

That, so far, in the case of 2 GScam investigation, only the lapses ' ' committed by Public servants has been brought out by the CBI and the consideration for those lapses are yet to be found out. It is requirement of law that Public servant must be shown to have received something that is not his lawful remuneration for doing something or not something and without that, and the case of prosecution will certainly be. weaker as incompetence cannot be construed to be misconduct. Investigation into illegal enrichment of M/s NDTV Ltd. during the period 2006-10 and its having bribed Ms. Sumana Sen, its Assessing Officer and other assorted offences would reveal, the-missing link in 2 G Scam, as applicant has reasonable assessment that money laundered by M/s NDTV Ltd. was part of2 GScam received by some influential Public servant, to protect whom Sri P. Chidambaram, Hon'ble Finance Minister (the then) acted illegally and unlawfully to persecute the applicant and thereby prevent any inquiry in the affairs of M/s NDTV Ltd. and it is because of the pre-imminent position of Sri P. Chidambaram as Hon'ble Minister of Home Affairs and thus Cadre Controlling Authority ofIPS that, CBI is unable to act and proceed against M/s NDTV Ltd. when it has acted against the same accused earlier in 1999. The only difference being diabolical influence of Sri P. Chidambaram, which was not there earlier when CBI registered FIR against M/s NDTV Ltd. and Sri Pronoy Roy [FIR No.-RC.2(A)/98SCUffl, dt. 9.1. 1998 U/s 120 BD?C r/w 13 (2) r/w 13(1) (d) of PC Act, 1988 and substantive offences naming Sri Pronoy Roy, MD,M/sNDTV Ltd. andM/s NDTV Ltd. &Ors as accused), investigated the case and filed report U/s 173 of Cr.P.C, 1973 in the matter of far smaller amount of bribe, etc.

अदम गोंडवी का लीवर डैमेज, अस्‍पताल में भर्ती

: हालत गंभीर : दुष्यंत के बाद हिंदी के बहुचर्चित गज़लकार श्री अदम गोंडवी यानी रामनाथ सिंह की हालत नाजुक है. अदम साहब को गोंडा के आर्यन पांडेय हास्‍पीटल में भर्ती कराया गया है. दो महीने से बीमार अदम गोंडवी लम्‍बे इलाज के बाद कुछ समय पहले ही अस्‍पताल से घर आए थे. अब एक बार फिर उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती होना पड़ा है. उनका लीवर डैमेज कर गया है. डाक्‍टरों की टीम उनका इलाज कर रही है. उनके तमाम चाहने वाले शुभचिंतक अस्‍पताल में मौजूद हैं.

22 अक्‍टूबर 1947 को कर क्षेत्र के करीब परसपुर (गोंडा) के आटा ग्राम में स्व. श्रीमती मांडवी सिंह एवं श्री देवी कलि सिंह के पुत्र के रूप में रामनाथ सिंह का जन्‍म हुआ है. अदम गोंडवी के नाम से सुविख्‍यात हुए रामनाथ सिंह ने हिंदी गजल को अलग पहचान दी. मुशायरों में घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा मटमैला कुरता और गले में सफ़ेद गमछा डाले जब अदम साहब गंवई अंदाज में पहुंचते थे तो लोग बहुत ध्‍यान नहीं देते थे, पर जब यह निपट गंवई इंसान चमकीली गजल-कविता सुनाता तो लोग हैरान रह जाते थे. धरती की सहत पर, समय से मुठभेड़ अदम साहब की प्रमुख रचनाएं हैं. पिछली बार बीमारी के दौरान यूपी के पूर्व मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी अदम साहब का हालचाल जाना था.

अदम साहब के भतीजे दिलीप कुमार सिंह ने बताया कि अभी भी उनकी हालत नाजुक बनी हुई है. डाक्‍टर अल्‍ट्रासाउंड समेत तमाम जांच कर रहे हैं. अभी उनकी हालत गंभीर बनी हुई है. कुछ कहा नहीं जा सकता है. वे पिछले दो महीने से बीमार थे पर कल से हालत ज्‍यादा बिगड़ गई है. उन्‍होंने बताया कि तमाम लोग उनका हालचाल जानना चाह रहे हैं. गौरतलब है कि अदम साहब ने अपनी गजलों और कविताओं से आम आदमी के दिलों में अपनी पहचान बनाई है. नीचे उनकी कुछ गजलें.

  एक

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में

 दो

ग़र चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे
क्या इनसे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे

जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आई
मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे ?

जो अक्स उभरता है रसख़ान की नज्मों में
क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे ?

तारीख़ बताती है तुम भी तो लुटेरे हो
क्या द्रविड़ों से छीनी जागीर बदल दोगे ?

तीन

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं ;  जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब ,क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

चार

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है

लगी है होड़ – सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

धोखेबाज है एसवन न्यूज चैनल का सीईओ समीर दीक्षित

: मैं बेचारा, एस1 का मारा : श्रीमान यशवंत सिंह जी, संपादक भड़ास4मीडिया। महोदय, मैं सतेंद्र कुमार एसवन न्यूज चैनल में सीनियर आरएफ इंजीनियर के पद पर कार्यरत था। मैंने एसवन से जून 2011 में इस्तीफा दे दिया था और चैनल वन ज्वाइन कर लिया था। इस्तीफा देते समय एसवन के सीईओ समीर दीक्षित ने मुझसे कहा था कि जरूरत होने पर हम बुलाए तो आते रहना, इसलिए जून से सितंम्बर के बीच जब-जब भी किसी एसवन के टेलीकॉस्ट में दिक्कत आई और मुझे बुलाया गया तो मैं बिना किसी भेद-भाव या लालच के एसवन की प्रॉब्‍लम ठीक करता रहा। सितंबर में एसवन को रिज्वाइन करने के लिए फिर से बुलाया गया। मैंने से अपने पीएफ, ईएसआई और ईएल, सीएल के समायोजन की शर्त पर रिज्वाइन कर लिया।

यह भी तय हुआ था कि जो सेलरी चैनल वन में मिल रही है उसी के आधार पर सेलरी दी जाएगी। मुझे सेलरी नवंबर में दी गई तो वही पुराना स्केल लगाया गया। मैंने सीईओ समीर दीक्षित से कहा कि ये तो वादा खिलाफी और धोखा है। तो उन्होंने तल्ख और अपमान जनक भाषा में कहा कि अपना हिसाब कर लो हमें तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है। जब मैंने अपने पीएफ, ईएसआई और ईएल, सीएल के समायोजन-भुगतान करने को कहा तो उन्होंने साफ-साफ इंकार कर दिया। इसके बाद मैंने उन्हें एक नोटिस भी दिया ताकि थाना पुलिस के बिना ही मुझे मेरा बाजिव हक और मेहनत का पैसा मिल जाए। लेकिन एसवन के इन मालिकों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

हार कर मैंने नोएडा सेक्टर 24 थाने को अपनी तहरीर दे दी। और अपने बाजिव हक के लिए आगे की कानूनी लड़ाई खुद अकेले लड़ने की ठानी है। हक और न्याय की इस लड़ाई में अगर कोई साथ देगा तो उसका आभारी रहूंगा। आपके माध्यम से मैं सभी पत्रकार और गैर पत्रकार मीडिया कर्मियों से साथ और सहयोग की प्रार्थना करना चाहूंगा। मैंने नोटिस की कॉपी पीएफ और ईएसआई अफसरों के अलाबा एनबीए और प्रेस काउंसिल को भेजी है। पता नहीं कोई मेरी व्यथा सुनेगा भी या नहीं। आपको भी ईमेल कर रहा हूं इस भरोसे से कि आप जरूर व्यथा समझेंगे। मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूं, इस लिए बातें बना कर नहीं लिख सकता जो जैसा है वैसा लिख दिया है। नोटिस की कॉपी आपको भी भेज रहा हूं।

धन्यवाद,

सतेंद्र कुमार

मोबाइल नम्‍बर 9868678629

satenders1@yahoo.com

हरियाणा न्‍यूज के मालिक एवं राज्‍यमंत्री गोपाल कांडा के सत्रह सहयोगियों को कारावास

सिरसा। फास्ट ट्रैक न्यायालय ने हरियाणा के गृहराज्यमंत्री गोपाल कांडा के 17 सहयोगियों को आयकर विभाग के अधिकारियों व मीडिया कर्मियों से मारपीट व दुर्व्‍यवहार करने के मामले में पांच-पांच वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। दोषियों को एक-एक हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया गया है। अर्थदंड की अदायगी न करने पर सभी दोषियों को दो-दो माह अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। इस दौरान एक आरोपी की मौत हो चुकी है।

मामले के अनुसार तीन साल पहले 31 जनवरी 2008 को रानियां रोड स्थित कांडा बंधुओं के कार्यालय में आयकर विभाग के एडीआईटी मुंशी राम की टीम ने छापेमारी की थी। इस दौरान नवीन गर्ग, सुशील शर्मा पुत्र रामशरण शर्मा निवासी बेगू रोड, अमित पुत्र धनराज निवासी पुरानी हाऊसिंग बोर्ड कालोनी, सुशील सैनी पुत्र बीरबल राम सैनी निवासी गऊशाला मोहल्ला, मदन लाल जांगड़ा पुत्र कांशी राम निवासी मोहल्ला जंडवाला, भूप सैनी पुत्र सीताराम सैनी निवासी रामनगरिया, गुरदयाल उर्फ दयाला पुत्र इस्सर राम सैनी निवासी बरनाला रोड, सूरत सैनी पुत्र फूल चंद सैनी निवासी कीर्तिनगर, जरनैल सिंह पुत्र रामचन्द्र निवासी चत्तरगढ़ पट्टी, नरेश सैनी पुत्र श्याम सुंदर निवासी कीर्तिनगर, हरफूल पुत्र हरीश चन्द्र शर्मा निवासी रामकालोनी, प्रेम पुत्र देवीलाल सैनी निवासी रामनगरिया, कृष्ण लाल सैनी पुत्र सूरजा राम निवासी रामनगरिया, गुलाब चंद पुत्र गोपाल दास गुज्जर निवासी रानियां गेट, राजू उर्फ राजकुमार पुत्र लीलू राम सैनी निवासी रामनगरिया, शंकर लाल पुत्र राजकुमार अग्रवाल निवासी नोहरिया बाजार, मुकेश महाजन पुत्र सीताराम निवासी हिसारिया बाजार तथा जीतेन्द्र कुमार पुत्र प्रताप सिंह धानक निवासी चत्तरगढ़पट्टी ने अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ मारपीट की। न्यायालय ने उक्त सभी को भारतीय दंड संहिता की धारा 332, 353, 186, 204 व 395 के तहत दोषी मानते हुए उपरोक्त सभा सुनाकर दंडित किया। इसमें जीतेंद्र कुमार की मौत हो चुकी है।

तारा बाबा कुटिया में की थी कर्मियों से मारपीट :रानियां रोड स्थित तारा बाबा कुटिया में 31 जनवरी 2008 को आयकर विभाग के एडीआईटी मुंशी राम की टीम ने छापेमारी की थी। छापेमारी की दौरान आयकर विभाग के कर्मचारियों के हाथ एक लैपटॉप लगा, जिसमें कांडा बंधुओं के व्यवसाय से संबंधित लेखा जोखा था। इसी छापेमार कार्रवाई के दौरान कार्यालय में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में कांडा बंधुओं के व्यवसाय से संबंधित दस्तावेजों को छिपाने का प्रयास किया गया। इसी दौरान मीडियाकर्मी भी कांडा बंधुओं के कार्यालय जा पहुंचे तो कांडा बंधुओं के सहयोगियों ने आयकर विभाग के अधिकारियों व मीडियाकर्मियों के साथ दुर्व्‍यवहार करना शुरू कर दिया। पुलिस ने एडीआईटी मुंशी राम की शिकायत पर मामला दर्ज कर चालान पेश किया था। फास्ट ट्रैक न्यायालय के न्यायाधीश सुक्रमपाल ने अपने फैसले में आरोपियों को दोषी ठहराया।

कुमार सौवीर को जर्नलिस्‍ट ऑफ द इयर से सम्‍मानित किया खंडूरी ने

: नीरज उत्‍तराखंडी एवं अनिरुद्ध सिंह को भी सम्‍मान : देहरादून : उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री और रिटायर्ड मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी ने यहां आयोजित एक समारोह में पत्रकार कुमार सौवीर, नीरज उत्‍तराखंडी और अनिरूद्ध सिंह को सम्‍मानि‍त किया। इन सभी को पत्रकारिता के क्षेत्र में किये गये उनके योगदान के लिए सम्‍मानित किया गया। समारोह का आयोजन पंडित हरिशंकर द्विवेदी फाउंडेशन और विजन-2020 द्वारा संयुक्‍त रूप से किया गया था।

पॉम सिटी में आयोजित इस समारोह में बड़ी संख्‍या में पत्रकारों, समाजसेवियों और विभिन्‍न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भाग लिया। इस मौके पर श्री खंडूरी ने पत्रकारों से बेलौस पत्रकारिता की अपील की, लेकिन कहा कि अति-व्‍यावसायिकीकरण का मौजूदा उफान पत्रकारिता के लिए घातक साबित हो सकता है। उनका कहना था कि अब यह पत्रकारों को ही तय करना है कि उनकी दिशा क्‍या होगी। खंडूरी बोले कि समाज के दूसरे क्षेत्रों के लिए प्रकाशस्‍तंभ और गहरी आलोचना का अधिकार रखने वाले इस समाज के लिए बेहतर होगा कि वह अपने लिए खुद ही मार्ग-दर्शक सिद्धांत तय करे। हालांकि, उनका मानना था कि इस समाज पर भी जनता की उतनी ही गहरी निगाह है, ऐसे में पत्रकारों की जिम्‍मेदारी और भी बढ़ जाती है। पत्रकार समाज से अलग नहीं, बल्कि समाज का ही हिस्‍सा हैं।

मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूड़ी ने ''विज़न 2020'' परिवार द्वारा शुरू की गई मैगजीन ‘ट्रैवल अपडेट’ की साज-सज्जा को लेकर खुशी जताई और कहा कि यह पत्रिका भारतीय पर्यटन की खूबसूरती का परिचय विदेशी सैलानियों से करवाने में सफल होगी।

इस मौके पर लखनऊ के कुमार सौवीर को पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्यों के लिए उन्‍हें जनर्लिस्‍ट ऑफ द इयर- 2011 का सम्‍मान दिया गया। श्री खंडूरी ने उन्‍हें प्रमाणपत्र, स्‍मृतिका और शाल से सम्‍मानित किया। यंग जनर्लिस्‍ट ऑफ इयर- 2011 का सम्‍मान सहारा समय के अनिरूद्ध सिंह और स्‍वतंत्र पत्रकार नीरज उत्‍तराखंडी को दिया गया। कार्यक्रम का संचालन फाउंडेशन के अध्‍यक्ष हर्ष वर्द्धन द्विवेदी, विजन के सम्‍पादक सुखवीर सिंह तोमर के अलावा मयंक ने भी किया। इस मौके पर वसंत निगम, मनीष चंद्र, मनीष श्रीवास्‍तव, मोहम्‍मद अरशद समेत बड़ी तादात में पत्रकार भी उपस्थित थे।

क्‍या चैनलों को संयम बरतने के लिए हर बार सामूहिक कसम खानी पड़ेगी?

न्यूज चैनलों की दुनिया में इन दिनों खासी उथल-पुथल है. प्रेस काउंसिल के नये अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के बयानों और इरादों से हड़कंप है. ऐसा लगता है कि चैनलों को जस्टिस काटजू के डंडे का डर सताने लगा है. नतीजा, काटजू के भूत से निपटने के लिए चैनलों के अंदर कुछ कम लेकिन बाहर कुछ ज्यादा आत्मानुशासन और आत्मनियमन का जाप होने लगा है.

आत्मनियमन को लेकर अपनी ईमानदारी का सबूत देने के लिए चैनलों के संपादकों ने मिल-जुलकर ‘तीसरी कसम’ के हीरामन की तर्ज पर तीन नहीं, दस कसमें खाई हैं. इनका लब्बोलुआब यह है कि चैनल जानी-मानी अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के बच्चे के जन्म की रिपोर्टिंग करते हुए बावले नहीं होंगे. वैसे कहते हैं कि कसमें तोड़ने के लिए ही होती हैं. देखें, इस कसम पर चैनल कितने दिन टिकते हैं और सबसे पहले इसे कौन तोड़ता है? नहीं-नहीं, संपादकों और उनकी कसम की ईमानदारी पर मुझे कोई शक नहीं है. उनकी बेचैनी भी कुछ हद तक समझ में आती है. उनमें से कई थक गए हैं, कुछ पूरी ईमानदारी से उस अंधी दौड़ से बाहर निकलना चाहते हैं जिसके कारण चैनलों के न्यूजरूम में अधिकतर फैसले संपादकीय विवेक से कम और इस डर से अधिक लिए जाते हैं कि अगर हमने इसे तुरंत नहीं दिखाया तो हमारा प्रतिस्पर्धी चैनल इसे पहले दिखा देगा.

लेकिन क्या इस अंधी दौड़ से बाहर निकलना इतना आसान है? शायद नहीं. असल में, सिर्फ संपादकों के हाथ में कंटेंट की बागडोर होती है. उन पर कोई बाहरी दबाव मतलब टीआरपी का दबाव नहीं होता तो शायद इतनी मुश्किल नहीं होती. लेकिन कमान उनके हाथ में नहीं है. वह बाजार के हाथ में है. बाजार टीआरपी से चलता है. इसलिए चैनलों के लिए कंटेंट के मामले में नीचे गिरने की इस अंधी दौड़ से बाहर निकलना न सिर्फ मुश्किल बल्कि नामुमकिन दिखने लगा है. वजह साफ है. जहां टीआरपी के लिए ऐसी गलाकाट होड़ हो, संपादकीय फैसले प्रतिस्पर्धी चैनलों को देखकर लिए जाते हों और सभी भेड़ की तरह एक-दूसरे के पीछे गड्ढे में गिरने को तैयार हों, वहां इस अंधी दौड़ का सबसे पहला शिकार आत्मानुशासन और आत्मनियमन ही होता है.

यह संभव है कि इस बार ऐश्वर्या राय के मामले में न्यूज चैनल अपनी कसम निभा ले जाएं. लेकिन इस कसम की असल परीक्षा यह नहीं है कि ऐश्वर्या राय के मामले में चैनलों ने अपनी कसम कितनी ईमानदारी से निभाई. असल सवाल यह है कि क्या चैनलों को ऐसे हर मामले पर संयम बरतने के लिए सामूहिक कसम खानी पड़ेगी. क्या चैनलों का अपना संपादकीय विवेक इतना कमजोर हो चुका है कि वे खुद यह फैसला करने में अक्षम हो गए हैं कि क्या दिखाया जाना चाहिए और क्या नहीं? क्या यह इस बात का सबूत नहीं है कि चैनल बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के आत्म- नियंत्रण करने में सक्षम नहीं रह गए हैं? सवाल है कि जिन मामलों में चैनलों ने सामूहिक कसम नहीं खाई होगी मतलब बीईए ने निर्देश नहीं जारी किए होंगे, क्या उन चैनलों को खुला खेल फर्रुखाबादी की छूट होगी? हैरानी की बात नहीं है कि जिन दिनों ऐश्वर्या राय के मामले में बीईए के निर्देशों को आत्म-नियमन के मेडल की तरह दिखाया जा रहा था, उन्हीं दिनों दो हिंदी न्यूज चैनलों ने खुलकर और कुछ ने दबे-छुपे राजस्थान के भंवरी देवी हत्याकांड में भंवरी और आरोपित कांग्रेसी नेताओं की सेक्स सीडी दिखाई. सवाल है कि इस सेक्स सीडी को दिखाने के पीछे उद्देश्य क्या था? इसमें कौन सा जनहित शामिल था? क्या यह ‘अच्छे टेस्ट’ में था? आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार ने इस मामले में दोनों चैनलों को नोटिस भेजने में देर नहीं लगाई. सवाल है कि सरकार को अपनी नाक घुसेड़ने का मौका किसने दिया.

दूसरी ओर, एक गंभीर अंग्रेजी चैनल में आत्मनियमन का हाल यह है कि उसके एक प्राइम टाइम लाइव शो में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का घंटों पहले किया गया इंटरव्यू ऐसे दिखाया गया मानो वे उस चर्चा में लाइव शामिल हों. साफ तौर पर यह धोखाधड़ी थी. कार्यक्रम के अतिथि रविशंकर के साथ भी और दर्शकों के साथ भी. इसके लिए चैनल की खूब लानत-मलामत हुई है. शुरुआती ना-नुकुर और तकनीकी बहानों के बाद चैनल ने अपनी गलती को ‘अनजाने में हुई गलती’ बताते हुए माफी मांग ली है. लेकिन क्या यह अनजाने में हुई गलती थी या समझ-बूझकर की गई थी? इसी चैनल पर कुछ महीने पहले प्राइम टाइम में फर्जी ट्विटर संदेश दिखाने का आरोप लगा था. न सिर्फ ये ट्विटर संदेश फर्जी और न्यूजरूम में लिखे गए थे बल्कि उनमें बहस में एक खास पक्ष लिया गया था. चैनल ने उसे भी ‘अनजाने में हुई गलती’ बताकर माफी मांग ली थी. इन दोनों प्रकरणों से एक बात पक्की है कि चैनल के संपादक ‘जाने में’ मतलब सोच-समझकर काम नहीं कर रहे हैं. ऐसे में, यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि इस हालत में कितने चैनलों को मौके पर उन कसमों-निर्देशों की याद आएगी और कितने अनजाने में उन्हें भूल जाएंगे. देखते रहिए.

आईआईएमसी के प्राध्‍यापक आनंद प्रधान का यह लेख तहलका में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.

एक पत्रकार का इंटरव्‍यू

एक पत्रकार का यह इंटरव्‍यू पाकिस्‍तान के महान कामेडियन उमर शरीफ ने लिया है. ड्रामा 'उमर शरीफ हाजिर हों' से लिए गए इस भाग को जी टीवी से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार पुण्‍य प्रसून बाजपेयी ने अपने ब्‍लॉग पर प्रकाशित किया है. इस भाग को वहीं से साभार लिया जा रहा है. आप भी इस इंटरव्‍यू का आनंद लीजिए.

उमर- आप जो कहेंगे सच कहेंगे सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे।

पत्रकार- माफ़ कीजिए हमें ख़बरें बनानी होती है।

उमर- क्या क़बरें बनानी होती हैं?

पत्रकार- नहीं-नहीं ख़बरें।

उमर- ओके ओके। सहाफ़त (पत्रकारिता) और सच्चाई का गहरा बड़ा ताल्लुक़ है, क्या आप ये जानते हैं?

पत्रकार- बिल्कुल, जिस तरह सब्ज़ी का रोटी से गहरा ताल्लुक़ है, जिस तरह दिन के साथ रात बड़ा गहरा ताल्लुक़ है, सुबह का शाम के साथ बड़ा गहरा ताल्लुक़ है, चटपटी ख़बरों का अवाम के साथ बड़ा गहरा ताल्लुक़ है, इसी तरह अख़बार के साथ हमारा भी बड़ा गहरा ताल्लुक़ है।

उमर- क्या आपको मालूम है मआशरे (समाज) की आप पर कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है?

पत्रकार- देखिए आप मेरी उतार रहे हैं।

उमर- ये आपकी ख़्वाहिश है, मेरा इरादा नहीं है, जी बताइए।

पत्रकार- हां, हमें मालूम है हम पर मां-बाप की ज़िम्मेदारी है, हम पर भाई-बहन की ज़िम्मेदारी है, बीवी-बच्चों की कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, रसोई गैस, पानी और बिजली के बिल की कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, कोई समाज की एक मामूली ज़िम्मेदारी ही नहीं है।

उमर- पत्रकारों पर एक और इल्ज़ाम है कि आप लोग फ़िल्मों को बड़ी कवरेज देते हैं, क्या ये हीरो लोग आपको महीने का ख़र्चा देते हैं?

पत्रकार- देखिए आप मेरी उतार रहे हैं।

उमर- कुछ पहन के आए हैं तो डर क्यों रहे हैं, बताइए फ़िल्म वाले आपको महीने का ख़र्चा देते हैं क्या?

पत्रकार- आप नहीं समझेंगे।

उमर- क्यूं, मैं छिछोरा नहीं हूं क्या, आप रिपोर्टरों ने पाकिस्तान के लिए 50 साल में क्या किया?

पत्रकार- देखिए आप मेरी उतार रहे हैं।

उमर- आप मुझे मजबूर कर रहे हैं, चलिए बताइए।

पत्रकार- जो देखा वो लिखा, जो नहीं देखा वो बावसूल ज़राय (सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर) से लिखा, करप्शन को हालात लिखा, रिश्वत को रिश्वत लिखा, रेशम नहीं लिखा, सादिर (नेतृत्व करने वाले) को नादिर (नादिर शाह तानाशाह का संदर्भ) लिखा।

उमर- ये आपको ख़ुफ़िया बातों का पता कहां से चलता है?

पत्रकार- अजी छोड़िए साहब, हमें तो ये भी मालूम है कि रात को आपकी गाड़ी कहां खड़ी होती है? लंदन में होटल के रूम नम्बर 505 में आप क्या कह रहे थे? सिंगापुर में आप….।

उमर (रिश्वत देते हुए)- चलिए ख़ुदा हाफ़िज़।

पत्रकार- शुक्रिया, शुक्रिया फिर मिलेंगे, ख़ुदा हाफ़िज़।

कांग्रेस विधायक ने पीटीसी चैनल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई

कपूरथला : कांग्रेस के भोलथ से विधायक सुखपाल खैरा ने सुखबीर बादल एवं उनके पंजाबी चैनल पीटीसी समेत नौ लोगों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई. यह शिकायत चैनल पर हाल में उस खबर के प्रसारण के बाद दर्ज कराई गई है जिसमें आरोप लगाया गया था कि राजपुरा में जो हवाला का धन बरामद किया गया वह उन्हें दिया जाना था. इसके बाद से ही खैरा ने दावा किया था कि वो कोर्ट की शरण लेंगे.

कपूरथला के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किरण बाला ने यहां भोलथ विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक सुखपाल खैरा और तीन गवाहों का बयान दर्ज किया और मामले की सुनवाई की तारीख नौ जनवरी निर्धारित की. उल्‍लेखनीय है कि राजपुरा पुलिस द्वारा नाकेबंदी के दौरान 3.64 करोड़ की हवाला बरामद की गई थी, जिसमें पीटीसी चैनल ने भोलथ के कांग्रेसी विधायक  सुखपाल खैरा का नाम जोड़ दिया था. इसी से क्षुब्ध खैरा ने शनिवार को कपूरथला की एक अदालत में उपमुख्यमंत्री, जिला योजना बोर्ड के चेयरपर्सन, चैनल के एडिटर सहित 9 लोगों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दी है. इन लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 499-500-501बी-120-बी के तहत लिखित आपराधिक शिकायत दी है.

यूजर्स की सूचनाएं विज्ञापनदाताओं को बेच रही फेसबुक!

लंदन : लोकप्रिय सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक विवादों में घिर गई है। उस पर यूजर्स की निजी सूचना निकालने और उसे विज्ञापनदाताओं को बेचने का आरोप लगा है। ब्रिटिश अखबार द संडे टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचार, लैंगिक पहचान, धार्मिक आस्थाएं और यहां तक कि उनका अता-पता भी जमा कर रही है। यूरोपीय आयोग इस मुद्दे पर फेसबुक केखिलाफ कार्रवाई की तैयारी में है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोग चाहे अपनी प्राइवेसी सेटिंग कुछ भी रखें, फेसबुक अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर लोगों की सूचनाएं जमा कर, उसे विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध करा रही है। इसके चलते यूरोपीय आयोग अगले साल जनवरी में नया दिशा-निर्देश जारी करने वाला है। इसमें इस तरह के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान होगा। नियमों का पालन न करने पर फेसबुक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यूरोपीय आयोग के उपाध्यक्ष विविएन रीडिंग ने कहा कि वर्तमान यूरोपीय दस्तावेज संरक्षण कानून में संशोधन करके नए दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि हमने सेवा प्रदाताओं, खासकर सोशल मीडिया साइटों से कामकाज को लेकर पारदर्शिता बरतने को कहा है। यूजर्स को पता होना चाहिए कि आंकड़ों का संग्रह क्यों किया जा रहा है। इनका भविष्य में कहां इस्तेमाल होगा। हालांकि फेसबुक ने इन आरोपों से इंकार किया है। साभार : एजेंसी

पटना के वरिष्‍ठ पत्रकार मुरली मनोहर मिश्रा का निधन

: राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार रामदेव को पितृशोक : पटना के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा हिंदुस्‍तान से चार दशक तक जुड़े रहे मुरली मनोहर मिश्रा का गुरुवार को निधन हो गया. उन्‍हें सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ होने के बाद पटना सिटी स्थित एनएमसीएच में भर्ती कराया गया था, जहां उन्‍होंने अंतिम सांस ली. वे 72 साल के थे. इस समय वे प्रदैप अखबार से जुड़े हुए थे. वे अपने पीछे पत्‍नी सुनैना मिश्रा, चार पुत्र एवं एक पुत्री का भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं. उनके बड़े पुत्र रमेश कुमार मिश्रा प्रभात खबर के पटना सिटी इंचार्ज हैं तथा दूसरे पुत्र मुकेश कुमार मिश्रा हिंदुस्‍तान टाइम्‍स से जुड़े हुए हैं. मुरली मनोहर का अंतिम संस्‍कार पटना सिटी के खाजेकलां श्‍मशान घाट पर किया गया. मुखाग्नि उनके बड़े पुत्र रमेश कुमार मिश्रा ने दी. इस अवसर पर पीडब्‍ल्‍यूडी मिनिस्‍टर नंद किशोर यादव समेत तमाम गणमान्‍य लोग मौजूद रहे.

उत्‍तर प्रदेश के शाहजहांपुर में सिधौंली के राष्ट्रीय सहारा के संवाददाता रामदेव वर्मा के पिता टीकाराम का निधन हो गया. वह 65 वर्ष के थे. टीकाराम पिछले कुछ महीने से बीमार चल रहे थे रामदेव के पिता के निधन की जानकारी सिधौंली के पत्रकारों को हुई तो उनके शोक छा गया. टीकाराम का अंतिम संस्‍कार गांव बारापुर के श्मशान घाट पर किया गया. शाहजहांपुर के पत्रकारों ने रामदेव के पिता के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया. शोक सभा में आरिफ सिद्दीकी, महमूद खान, सौरभ दीक्षित, जगेन्द्र सिंह, दीप श्रीवास्तव, विनय गुप्ता, आसिफ खां, मंकज गुप्ता, शमिन्दर सिंह, अवनीश मिश्रा, सुशील शुक्ला, सुदीप शुक्ला, राज बहादुर, अमर दीप, शिव प्रकाश, राशिद, जितेन्द्र मिश्रा, मनोहर लाल, विनय पाण्डे, संजय श्रीवास्तव, सोनू कश्यप, चन्दन कश्यप आदि पत्रकार मौजूद थे.

भास्‍कर के नेशनल ब्‍यूरो से स्मिता मिश्रा का इस्‍तीफा

: यतीश राजावत के व्‍यवहार से नाराज हैं पत्रकार : दैनिक भास्‍कर के नेशनल ब्‍यूरो में स्थितियां बहुत खराब हो चुकी हैं. बिजनेस भास्‍कर के संपादक एवं मैनेजिंग एडिटर यतीश राजावत के व्‍यवहार से पत्रकारों में नाराजगी है. खबर है कि राजावत के व्‍यवहार से क्षुब्‍ध दैनिक भास्‍कर की स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट स्मिता मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. स्मिता का जाना भास्‍कर के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. स्मिता ने भास्‍कर के लिए कई खबरें ब्रेक की हैं. सूत्रों का कहना है कि स्मिता के बाद कुछ और सीनियर पत्रकार यतीश राजावत के रवैये से नाराज चल रहे हैं और जल्‍द ही इस्‍तीफा दे सकते हैं.

स्मिता साढ़े चार साल से भास्‍कर के साथ जुड़ी हुई थीं. अमर उजाला, जम्‍मू से चौदह साल पहले करियर की शुरुआत करने वाली स्मिता ने आतंकवाद के चरम दौर में कई स्‍टोरियां ब्रेक की, कई मानवीय एवं संवेदनशील स्‍टोरियां लिखीं. इसके बाद वे दिल्‍ली में ईटीवी एवं जनमत के साथ भी जुड़ी रहीं. जनमत से इस्‍तीफा देने के बाद वे भास्‍कर के साथ जुड़ गई थीं, जहां उन्‍होंने कई खबरें ब्रेक कीं. सूत्रों का कहना है कि जल्‍द ही वे दिल्‍ली में ही किसी नेशनल हिंदी अखबार के साथ जुड़ने वाली हैं. स्मिता मिश्रा ने अपने इस्‍तीफे की बात ट्विटर पर भी लिखा है. बताया जा रहा है कि राजावत के व्‍यवहार से नाराज कम से कम दो और सीनियर पत्रकार अपना इस्‍तीफा सौंप सकते हैं.

गौरतलब है कि इसके पहले भी भास्‍कर में सत्‍ता केंद्रों को लेकर टकराव की बात सामने आई थी, जब समूह संपादक श्रवण गर्ग को विश्‍वास में लिए बगैर यतीश राजावत ने अग्निमा दुबे और प्रमोद कुमार सुमन को निकाले जाने का फरमान सुना दिया था. यतीश के खिलाफ काफी समय से बगावत की आग सुलग रही है. कहा जा रहा है कि टॉप मैनेजमेंट ने अगर ध्‍यान नहीं दिया तो भास्‍कर के नेशनल ब्‍यूरो में स्‍तरीय पत्रकारों का टोटा हो जाएगा.

बाकी सूचनाएं तो ठीक, इंडिया न्यूज पंजाब के बंद होने वाली बात गलत

यशवंत जी सबसे पहले तो मैं आपकी वेबसाईट पर छपी उस खबर के बारे में आपसे बात करना चाहता हूं जो कि इंडिया न्यूज़ से रवीन ठुकराल के जाने और इंडिया न्यूज़ पंजाब के बंद होने से संबंधित है…आपकी वेबसाईट हमेशा ही हम मीडियाकर्मियों के लिए सही मार्गदर्शक बनती आई है… असली खबर ये है कि रवीन ठुकराल तो संस्थान को अलविदा कह ही रहे हैं…पर उनकी सलाह पर चैनल लगातार चलता रहेगा….वहां तक तो आपकी खबर सही है..लेकिन जहां तक सवाल पंजाब चैनल के बंद होने का है वहां आकर आप और आपकी वेबसाईट गलत साबित होती है…इंडिया न्यूज़ पंजाब बंद नहीं हो रहा है..कुछ दिनों के लिए डिले हो रहा है…

आप खुद ही बताइए जो चैनल टेस्ट सिग्नल पर काफी दिनों से चल रहा है वो बंद कैसे हो सकता है..(तस्वीर भी आपको भेजी जा रही है) और जहां तक आपकी खबर में छपा है कि लाइसेंस के चलते बंद हो रहा है..तो आपको खुद सोचना चाहिए कि बिना लाइसेंस के क्या कोई चैनल टेस्ट सिग्नल पर चल सकता है…दूसरी बात कि क्यों नहीं चल रहा है..तो आपको बता दूं कि पंजाब में केबल नेटवर्क पर बादल सरकार का कब्ज़ा है..ये बात किसी से छिपी नहीं है..जिसके चलते ज़ी पंजाबी जैसे चैनल को पंजाब में दिखने में 4 साल लग गए…और ना जाने कितने ही चैनल अभी भी पंजाब में नहीं दिखाई दे रहे हैं..ऐसे में मैनेजमेंट ने कुछ सोच समझ कर ही कोई फैसला लिया होगा चैनल को डिले करने का…

अब बात करता हूं उस शख्स की जो पंजाब को हैड कर रहें हैं..तो आपको बता दूं कि वो अकेले पंजाब ही नहीं बल्कि इंडिया न्यूज़ हरियाणा (जो कि हरियाणा का नंबर वन चैनल है), इंडिया न्यूज़ हिमाचल ( जो कि जल्द ही आएगा) और इंडिया न्यूज़ का इंटरटेनमेंट पिछले लम्बे समय से देख रहे हैं…ये कोई नई बात नहीं है…बात रही इंडिया न्यूज़ यूपी की तो आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अभी तक यूपी चैनल के लिए कोई भी पद किसी को भी नहीं दिया गया है…तो कृप्या करके उस खबर को दुरूस्त करें…और अगर सही समझें तो इस पोस्ट को अपनी वेबसाईट पर डालें…ताकि सही खबर लोगों तक पहुंच सके….

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

यशवंतजी, क्या आपने ‘सी न्यूज’ से पैसा लिया है?

: sea news uttarpradesh – uttarakhan – kalyan kumar ya satyanash kumar :  hi yashwant ji, aap agra main chal rahe sea news uttar pradesh, uttarakhand ki khabar kyun nahin chhapte? kya aapne neeraj jain, vivek jain ya kalyan kumar se paisa liya hai? sea news uttarpradesh, uttarakhan ka hal kitna bura hai ki aap soch bhi nahin sakte. yahan pehle vivek jain channel head tha. wo zee news up main bhi kaam karta hai……dohri naukri karta hain. wo malik neeraj jain ka chachera bhai hai. khud to moti kamai karta hai par yahan employees ko paisa dene main iski nani marti hai. ab ise news director bana diya gaya hai.

vivek jain ke nikammepan se pareshan ho kar malik neeraj jain ne kuchh din ke liye apne mamere bhai chakresh jain ko is channel ka kaam sonpa tha. chakresh jain jinwani channel ko bhi dekh raha hai…..isliye wo lambe samay tak yahan nahin tika. phir malik neeraj jain ne voice of india se badnam hue kalyan kumar ko channel head bana diya kyunki kalyan kumar ne neeraj jain ko kafi sabj baag dikhaye ki wo advertisement ke roop main unhain caroron rupey dilayega. kalyan kumar ek number ka harami hai. ise kaam dhaam to aata nahin bus malikon ki chaaploosi karna aur unahin bade bade sapne dikhana aata hai.
 
isne apane voice of india ke ek champoo shoaib husain ko input head aur senior producer srinivas pant ko output ka jimma de diya hai. dono hi akal se paidal hain aur aapas main ladte rehte hain. kuchh din pehle to shoaib husain ne malikon ko mail bhej kar dhamki di thi ki office main ya to wo rahega ya pant. srinivas pant ke bare main to aap jante hi ho. uske bare main bhadas main pehle hi chhap chuka hai. wo apne kharab swabhav aur badtmeeji ke liye badnam hai. usne apne pichle malik manish verma (voice of nation) se bhi gali galoj ki thi…..yahan bhi iski badtmeeji ka daur jari hai. ye hai to senior producer lekin sajhta khud ko output editor hai.
 
kalyan aur ye lambi lambi dinge marne ke alawa khud to koi kuchh kaam nahin karte lekin inhone editorial staff ke liye 12 – 12 ghante ki shift banayi hai aur unse kaha hai ki unhain teen mahine tak koi chhuti nahin milegi. exertion ke karan pichhle ek mahine main yahan teen log behosh ho chuke hain……lekin ye log koi sudhar karne ke liye tayar nahin hai.
 
vivek jain kehne ko to news director hai…..lekin wo office main kam hi milta hai. khud neeraj jain news room main aa kar logon se poonchhta hai ki wo kab aata hai aur kab jaata hai. ek bar to neeraj jain ne sabke samne vivek jain ko phone par dant bhi lagayi. aise main kalyan kumar nanga naach kar raha hai. log ab poonchhne lage hain ki ye kalyan kumar hai ki satyanasth kumar. ek taraf to neeraj jain kehta hai ki wo apne channel ko world class banana chahta hai dusri taraf kalyan kumar ne ise banda times se bhi badtar bana diya hai………
 
kalyan kumar dawa karta hai ki wo aapka dost hai aur aap uski ko khabar nahin chhapoge. agar aap yeh khabar chhapte ho to hum aapko sea news ke bare main aur bhi kai badi khabrain denge.

jignesh jain

jigneshjain007@gmail.com

काटजू को पत्र लिख सौवीर ने किया चैनल के पेड न्यूज का खुलासा

श्री काटजू चाचा, सादर प्रणाम, पेड न्‍यूज के खिलाफ आपका जेहाद जायज है, आप सही लड़ रहे हैं। मैं प्रशंसक हूं आपका। और ताजा शिकार भी हूं पेड न्‍यूज के धंधेबाजों का। नीचे दो लिंक हैं, जिनका खुलासा मैंने किया है, साथ ही उन्‍हें नोटिस भी भेजी है। यह नोटिस मैं मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त, सूचना सचिवों, निदेशकों के साथ ही सभी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों को भी भेज रहा हूं। ताकि वे ऐसे धंधेबाजों से परिचित हों और सावधान रहें- अगर चाहें तो।

आपको इसलिए भेज रहा हूं ताकि भारतीय प्रेस परिषद के पुरोधा को भी बता दिया जाए कि पेडन्‍यूज के धंधेबाज आखिर क्‍या-क्‍या गुल खिला रहे हैं। कैमरा इसलिए फिलहाल जब्‍त कर रखा है ताकि वे एक तो मेरा भुगतान कर दें और दूसरा यह कि भविष्‍य में कोई भी धंधेबाज यह जान ले कि उसकी घिनौनी हरकतों का जवाब देने की शुरूआत इस तरह भी हो चुकी है। और कुछ नहीं। बस, आपका आशीर्वाद चाहिए।

http://bhadas4media.com/print/662-2011-11-25-08-26-41.html

http://bhadas4media.com/print/663-2011-11-25-08-36-01.html

आपका
कुमार सौवीर

लो, मैं फिर हो गया बेरोजगार।

अब स्‍वतंत्र पत्रकार हूं और आजादी की एक नयी लेकिन बेहतरीन सुबह का साक्षी भी।

जाहिर है, अब फिर कुछ दिन मौज में गुजरेंगे।

मौका मिले तो आप भी आइये। पता है:-

एमआईजी-3, सेक्‍टर-ई

आंचलिक विज्ञान केंद्र के ठीक पीछे

अलीगंज, लखनऊ-226024

फोन:- 09415302520

मेल:- kumarsauvir@yahoo.com

हिन्‍दुस्‍तान वाराणसी से गयी दो वरिष्‍ठों की नौकरी

: लारी ने की नौकरी से तौबा : कंप्‍यूटर लिट्रेट न होने का आरोप : वाराणसी: कर्मचारियों की कत्‍लगाह बनते जा रहे हिन्‍दुस्‍तान के वाराणसी कार्यालय में दो वरिष्‍ठ लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया है। जबकि एक ने खुद ही नौकरी छोड़ने का फैसला करते हुए प्रबंधन को नोटिस दे दी है। बताया जाता है कि नोटिस देने वाले पत्रकार को अपने नये कार्यदायित्‍व रास नहीं आ रहे थे। साहित्यिक मिजाज के सियाराम यादव और अरविंद चौबे का नाम अब हिन्‍दुस्‍तान वाराणसी के इतिहास में दर्ज होने जा रहा है।

प्रबंधन ने इन दोनों को नौकरी तलाश लेने का नोटिस पकड़ाया है। प्रबंधन का तर्क है कि काफी कोशिशों के बावजूद इन दोनों को वह कम्‍प्‍यूटर सिखा नहीं पाया। ऐसे में इन लोगों को नौकरी में बनाये रखने का कोई औचित्‍य ही नहीं है। खासबात यह है कि यह दोनों ही लोग अपने काम में माहिर हैं। अरविंद चौबे को संपादन और पेज मेकिंग में महारत है जबकि सियाराम यादव साहित्यिक अभिरूचि के चलते अपना बनारस नाम से हर हफ्ते एक परिशिष्टि निकालते रहे हैं। इन दोनों की बीस साल से भी ज्‍यादा समय से प्रबंधन सेवाएं ले रहा था। हैरत की बात है कि इस बारे में जब एचआर से सम्‍पर्क किया गया तो श्री लोकनाथ ने ऐसी किसी भी कार्रवाई से साफ इनकार कर दिया।

उधर असद लारी ने खुद ही नौकरी छोड़ने का नोटिस प्रबंधन को दे दिया है। कहा जाता है कि प्रबंधन ने उन्‍हें सीट छोड़कर फील्‍ड पर जाने का निर्देश दिया था। कहा गया था कि वे चूंकि पिछले लम्‍बे समय से चीफ रिपोर्टर हैं लेकिन एक भी खबर उनके द्वारा नहीं दी गयी है, इसलिए वे अब खबरों की लिस्‍ट तैयार करने के बजाय खबर खोदने-खोजने में जुटें। उधर कुछ लोगों के अनुसार लारी ने अपने स्‍वास्‍थ्‍य कारणों का हवाला देते हुए खुद ही नौकरी छोड़ देने का फैसला किया है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

वेबसाइट संपादक और उनके पति को जान से मारने की धमकी

: भाजपा नेता ने दी धमकी, सीएम से लगाई रक्षा की गुहार : देहरादून से खबर है कि समाचार पत्र भड़ास4इंडिया की संपादक रंजना परगाई और उनके पति नारायन परगाई को उत्‍तराखंड भाजपा के प्रदेश उपाध्‍यक्ष राजू भंडारी ने जान से मारने की धमकी दी है. नारायन ने इसकी लिखित शिकायत मुख्‍यमंत्री बीसी खंडूडी समेत कई लोगों से की है. नारायन ने सीएम को लिखे पत्र में आरोप लगाया है कि राजू भंडारी ने फोन पर उन्‍हें तथा उनकी पत्‍नी को गालियां देते हुए जान से मारने की धमकी दी है.

अपने पत्र में नारायन ने लिखा है कि इसके बाद से मेरा परिवार काफी डरा सहमा हुआ है. उन्‍होंने दोषी राजू भंडारी के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग भी की है.

अमर उजाला में डाइरेक्‍टर बने वीरेन डंगवाल

मशहूर कवि, वरिष्ठ पत्रकार, शिक्षक, बेहतरीन इंसान यानी बहुमुखी प्रतिभा के धनी वीरेन डंगवाल एक बार फिर अमर उजाला परिवार से जुड़ गए हैं. दो साल पहले अमर उजाला, बरेली के संपादक के पद से इस्‍तीफा देने वाले वीरेन दा को अमर उजाला का डाइरेक्‍टर बना दिया गया है. वे इसके पहले लगभग 27 वर्ष से अमर उजाला के ग्रुप सलाहकार, संपादक और अभिभावक के तौर पर जुड़े रहे हैं. उनका अमर उजाला से अलग होना एक बड़ा झटका माना गया था.

अपने धुन के पक्‍के वीरेन दा वरुण गांधी के विषैले भाषण पर किए गए कवरेज की नाराजगी मन में रखे बिना अमर उजाला से इस्‍तीफा दे दिया था. मनुष्यता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र में अटूट आस्था रखने वाले वीरेन डंगवाल ने इन आदर्शों-सरोकारों को पत्रकारिता और अखबारी जीवन से कभी अलग नहीं माना. वे उन दुर्लभ संपादकों में से रहे हैं जो सिद्धांत और व्यवहार को अलग-अलग नहीं जीते. अतुल माहेश्‍वरी के गुरू रहे वीरेन डंगवाल का उजाला परिवार में हमेशा से काफी इज्‍जत और सम्‍मान की नजरों से देखा जाता रहा है. उनका जुड़ना एक अभिभावक के आ जाने के रूप में देखा जा रहा है.

5 अगस्त सन 1947 को कीर्तिनगर, टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) में जन्मे वीरेन डंगवाल साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी कवि हैं. उनके जानने-चाहने वाले उन्हें वीरेन दा नाम से बुलाते हैं. उनकी शिक्षा-दीक्षा मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और अन्त में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1968 में एमए फिर डीफिल करने वाले वीरेन डंगवाल 1971 में बरेली कालेज के हिंदी विभाग से जुड़े. उनके निर्देशन में कई (अब जाने-माने हो चुके) लोगों ने हिंदी पत्रकारिता के विभिन्न आयामों पर मौलिक शोध कार्य किया. इमरजेंसी से पहले निकलने वाली जार्ज फर्नांडिज की मैग्जीन प्रतिपक्ष से लेखन कार्य शुरू करन वाले वीरेन डंगवाल को बाद में मंगलेश डबराल ने वर्ष 1978 में इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार अमृत प्रभात से जोड़ा. अमृत प्रभात में वीरेन डंगवाल 'घूमता आइना' नामक स्तंभ लिखते थे जो बहुत मशहूर हुआ. घुमक्कड़ और फक्कड़ स्वभाव के वीरेन डंगवाल ने इस कालम में जो कुछ लिखा, वह आज हिंदी पत्रकारिता के लिए दुर्लभ व विशिष्ट सामग्री है. वीरेन डंगवाल पीटीआई, टाइम्स आफ इंडिया, पायनियर जैसे मीडिया माध्यमों में भी जमकर लिखते रहे.  वीरेन डंगवाल ने अमर उजाला, कानपुर की यूनिट को वर्ष 97 से 99 तक सजाया-संवारा और स्थापित किया. इसके बाद बरेली में भी अमर उजाला को एक पहचान दी.

वीरेन डंगवाल के बारे में विस्‍तार से जानने के लिए पढ़ें – मेरे अंदर काफी गुस्सा है, मैं क्रोधित हूं : वीरेन डंगवाल

अखबारों ने निभाई स्‍टाफगीरी, नहीं छपी सुब्रत राय वाली खबर

स्टाफगीरी के चलते चालक, परिचालक बसों में फ्री चलते हैं, इसी तरह एक नाई दूसरे नाई से शेव करने के पैसे नहीं लेता। ऐसी ही स्टाफगीरी अखबार की दुनिया में निभाई जाने लगी है। यह स्टाफगीरी सही है या गलत, इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता, पर सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय के मामले में अखबारों की स्टाफगीरी देख कर वाकई आश्चर्य हुआ।

हालांकि पिछले दिनों सेबी की कार्रवाई वाली सुब्रत राय की खबर को अधिकांश अखबारों ने प्रथम पेज पर स्थान दिया था, लेकिन अगले ही दिन सुब्रत राय ने अधिकांश अखबारों में प्रथम पेज पर विज्ञापन के माध्यम से अपना पक्ष रखा, तो फिर सभी अखबारों से खबर गायब हो गयी, जबकि वह विज्ञापन की जगह प्रेसवार्ता के माध्यम से ही अपना अधिकारपूर्ण पक्ष रख सकते थे और अखबारों को उनका पक्ष प्रकाशित भी करना पड़ता, पर उन्होंने ऐसा करने की बजाये विज्ञापन के माध्यम से सभी अखबारों की आत्माओं को खरीदना उचित समझा, लेकिन अखबार मालिक तर्क दे रहे हैं कि सुब्रत राय मीडिया से जुड़े हैं, इसलिए उनके विरुद्ध खबरें नहीं छापनी चाहिए।

अखबार मालिकों के इस तर्क पर सवाल उठता है कि उन्होंने जब सेबी वाली खबर छापी थी, तब उनका तर्क कहां गया था? तर्क को अगर सही भी मान लिया, तो सवाल यह भी उठ रहा है कि सटोरिये या दाउद इब्राहिम भी अखबार निकालने लगें, तो क्या उनके साथ भी स्टाफगीरी निभायेंगे? खैर, तर्क जो भी दिये जायें, पर असलियत यही है कि सुब्रत राय ने अधिकांश अखबारों को खरीद लिया है, तभी सुब्रत राय को अदालत द्वारा भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई की खबर किसी बड़े अखबार में नहीं छापी गयी है। बदायूं में अधिकांश पाठक बड़े अखबारों की आलोचना करते नजर आये, क्योंकि बदायूं अमर प्रभात ने इस खबर को प्रथम पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

बदायूं से बीपी गौतम की रिपोर्ट.

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार परमेश्वर द्विरेफ का निधन

झुंझुंनू। राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं कवि परमेश्वर द्विरेफ का शनिवार को निधन हो गया। वे 83 साल के थे तथा पिछले कुछ समय से वे बीमार चल रहे थे। शनिवार की सुबह तबीयत अधिक बिगडऩे पर उपचार के लिये उन्हें जयपुर ले जाते समय रास्ते में चौमू के पास उनका निधन हो गया। उनके निधन का समाचार मिलने के बाद पत्रकारों व साहित्यकारों में शोक की लहर दौड़ गई।

द्विरेफ ने हमेशा ईमानदारी पूर्वक पत्रकारिता की व पत्रकारों के अधिकारों के लिए सदैव संघर्षशील रहते थे। वो राजस्थान सरकार से अधिस्वीकृत पत्रकार थे। उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक मीरा महाकाव्य को राजस्थान व उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कारों से नवाजा गया था। उनकी पुस्तक कमला नेहरू खण्ड महाकाव्य पर पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया था। उन्होने धूल के फूल, मरू के टीले सहित कई पुस्तकों की रचना की थी। उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी, जयपुर द्वारा विशिष्ट साहित्यकार सम्मान से भी सम्मानित किया गया था। राजस्थान दिवस समारोह समिति जयपुर की और से उन्हें ताम्र पत्र भेंट किया गया था। द्विरेफ के निधन पर झुंझुंनू प्रेस क्लब के पदाधिकारियों  सहित पत्रकारों व साहित्यकारों ने  गहरा शोक व्यक्त किया है। उनका अन्तिम संस्कार झुंझुंनू जिले के चिड़ावा कस्बे में किया गया। उनके अन्तिम संस्कार में काफी संख्या में पत्रकार व गणमान्य लोग शामिल हुये।

झुंझंनू से रमेश सर्राफ की रिपोर्ट.

आकाशवाणी के महानिदेशक ने दी निर्मम छंटनी की धमकी

आकाशवाणी दिल्ली का अत्यंत लोकप्रिय ऍफ़ एम गोल्ड चैनल पिछले दो वर्षों से विवादों के घेरे में रहा है. फिर चाहे वह कार्यक्रम प्रस्तोताओं के पारिश्रमिक में भारी विलम्ब का मामला हो, कार्यक्रम अधिशासियों के तानाशाही पूर्ण रवैये का मसला हो या फिर एक बड़े घोटाले के तौर पर देखा जाने वाला ऍफ़ एम गोल्ड की फ्रीक्वेंसी बदले जाने का विवाद हो. हालांकि ये सभी मामले मीडिया की सुर्खियाँ बनने के चलते समय रहते सुलझा लिए गए मगर कार्यक्रम प्रस्तोताओं की कई गंभीर समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहीं.

गौरतलब है कि इसी वर्ष जनवरी-फरवरी माह में चैनल के प्रस्तोताओं ने शिकायत और सुझावों से भरे पत्र आकाशवाणी महानिदेशक नौरीन नक़वी तथा प्रसार भारती बोर्ड के सदस्यों वी.शिवकुमार और ए. के. जैन को सौंपे थे मगर उन पर कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई. आहत प्रस्तोताओं ने ड्यूटी, पारिश्रमिक, अनावश्यक स्वरपरीक्षाओं, पहचान पत्र, पुराने उपकरणों और उनको नियमित या लम्बी अवधी के करार पर नियुक्त किये जाने जैसे मुद्दों को लेकर एक और पत्र तैयार किया और उसे सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी के कार्यालय में दिया, साथ ही इन्हीं शिकायतों और सुझावों से युक्त एक पत्र सीईओ प्रसार भरती के कार्यालय में भी सौंपा.

हालांकि सीईओ कार्यालय का स्टाफ उन्हें टरकाने का काम करता रहा मगर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से उन्हें (मंत्री से मिलने का समय तो नहीं मिला) लेकिन उनकी मांगों पर उचित कार्रवाई का आश्वासन ज़रूर मिला. नतीजतन 25 नवम्‍बर 2011 को समझा जाता है कि मंत्रालय के दबाव में आकाशवाणी महानिदेशक लीलाधर मंडलोई ने प्रस्‍तोताओं को मीटिंग के लिए बुलाया. मगर मीटिंग में महानिदेशक के बर्ताव ने उन्हें संशय की स्थिति में डाल दिया है.

मीटिंग की शुरुआत के दस मिनट मंडलोई ने आत्म प्रशंसा में खर्च किए और शेष पैंतालीस मिनट प्रस्तोताओं को अकुशल बताकर उनकी खिल्ली उड़ाने में बिताए. प्रस्तोताओं के मुताबिक़ मंडलोई ने उनसे बार-बार कहा कि आपका प्रस्तुतीकरण निराशाजनक है, आपके काम में कहीं भी परिश्रम नज़र नहीं आता, आपको उर्दू भाषा के नुक़तों का ज्ञान नहीं है और आपका उच्चारण दोषपूर्ण है. मज़े की बात यह है कि एक ज़माने में आकस्मिक उद्घोषक के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले मंडलोई के खुद के भाषण में नुक़ते अक्सर नदारद रहे और वे बारम्बार जाने माने ब्रोडकास्टर अमीन सायानी का नाम अमीन शियानी उच्चारित करते रहे. मंडलोई प्रस्तोताओं को मिली कमज़ोर ट्रेनिंग पर भी चिंता जताते रहे मगर शायद उन्हें इस बात का भान नहीं रहा कि आकाशवाणी अपने प्रस्तोताओं को तैयार करने के लिए कोई ठोस ट्रेनिंग नहीं देती सिवाय वानी नाम की छोटी सी ट्रेनिंग के, जिसका उद्देश्य प्रस्तोताओं से मोटी फीस डकारना ही होता है.

आखिरकार मंडलोई की बातों से आजिज़ आ चुके प्रस्तोताओं ने सभ्यता के साथ ड्यूटी, पारिश्रमिक, पहचान पत्र, उपकरणों और रात की ड्यूटी करने वाली महिला प्रस्तोताओं की सुरक्षा से सम्बंधित मुद्दे उठाए, जिस पर मंडलोई ने सलाह दी कि उन्हें विषम परिस्थितियों में काम करने की आदत डालनी चाहिए. और जब प्रस्तोताओं ने उन्हें नियमित किए जाने या लम्बी अवधि के करार पर रखे जाने की मांग की तब मंडलोई ने धमकी भरे अंदाज़ में उनसे कहा कि अगर वो ऎसी मांग उठा रहे हैं तो उन्हें एक निर्मम छंटनी की कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए. अब प्रस्तोता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कल को उनकी मांगों को मानने की आड़ लेकर उन्हें आकाशवाणी से ही चलता करने के इंतजाम न किए जा रहे हों. गौरतलब है कि ये सब वही प्रस्तोता है जो ऍफ़ एम गोल्ड चैनल को लोकप्रियता की आज की ऊँचाइयों पर लेकर आए हैं.

थप्‍पड़ की कीमत पचास हजार

: इंदौरी वकील ने सिखाया पार्षद पति को सबक : इंदौर। इंदौर के एक वकील महाशय पूर्व पार्षद पति को सबक सिखाते हुए राजीनामा करने को तैयार तो हुए किंतु इस शर्त पर कि 50 हजार की राशि हर्जाने के तौर पर दी जाएं यही नहीं उन्होंने यह राशि हाईकोर्ट व जिला बार एसोसिएशन को आधी-आधी दान करवा दी। माजरा इस प्रकार है कि 25 जुलाई 2008 को एडवोकेट रोमेश दवे अपने चार पहिया वाहन से आरएनटी मार्ग पर ट्राफिक प्‍वाइंट पर खड़े थे चूंकि उस समय रेड बत्ती थी इसलिए वे रूके थे। तभी उनके पीछे एक टाटा गाड़ी में सवार पूर्व पार्षद संध्या अजमेरा के पति सुनील अजमेरा पहुंचे और आगे निकलने की बात पर तू-तू, मैं-मैं करने लगे।

मामला तब बिगड़ गया जब अजमेरा ने श्री दवे को थप्पड़ रसीद कर दिए और मामला तुकोगंज थाने जा पहुंचा जहां पुलिस ने अजमेरा के खिलाफ आईपीसी की धारा 294, 506 (बी), 341 व 323 में केस दर्ज कर लिया किंतु आरोपी के प्रभावशाली व्यक्ति होने से उसकी गिरफ्तारी नहीं की। लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होन पर बार एसोसिएशन ने एक जनहित याचिका दायर की थी जिस पर जबलपुर हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद पुलिस को उचित कार्रवाई के निर्देश जारी किए थे।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने अजमेरा को गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ निचली अदालत में चालान पेश किया। मामले में दिसंबर 2010 से गवाही भी शुरू हो गई थी। इसी बीच आरोपी पक्ष ने राजीनामे की कोशिशें की तो श्री दवे ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव अमित उपाध्याय व सीनियर एडवोकेट शेखर भार्गव से मशविरा किया। इसके बाद इंदौर बार एसोसिएशन के सचिव गोपाल कचोलिया से भी दवे ने चर्चा की और सशर्त केस वापस लेने की मंशा जताई। इसके बाद अजमेरा को ऑफर दिया गया कि यदि वे 25-25 हजार की राशि वकीलों के कल्याणार्थ इंदौर व हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में अलग-अलग जमा कराएं और उसकी पावती पेश करे तो मामले में समझौता किया जा सकता है। अजमेरा ने ऐसा ही किया और 24 नवंबर को स्पेशल मजिस्ट्रेट डा. शुभ्रासिंह की अदालत में राजीनामे की अर्जी पेश कर दी, अब 28 नवंबर को इस राजीनामे पर आदेश होगा। बहरहाल एक वकील द्वारा पार्षद पति को सबक सिखाने और हर्जाने के तौर पर मिली राशि वकीलों के हित में दान किए जाने के निर्णय की विधिजगत में भूरि-भूरि सराहना हो रही है। साभार : पीपुल्‍स समाचार

पत्रकारों पर हमले से क्षुब्‍ध काटजू ने मांगा जवाब

नई दिल्ली : श्रीनगर में आयोजित विरोध-प्रदर्शनों का समाचार संकलित करते पत्रकारों व छायाकारों की केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों द्वारा पिटाई का प्रेस परिषद ने संज्ञान लिया है। अखबारों ने भी जवानों द्वारा बर्बर पिटाई से संबंधित खबरें प्रकाशित की हैं।

खबरों के मुताबिक पत्रकार उमेर मेहराज, स्वतंत्र प्रेस छायाकार यावर काबली और शौकत शफी को इस पिटाई के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। कश्मीर फोटो जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने प्रेस छायाकारों के साथ हुए इस दु‌र्व्यवहार की भ‌र्त्सना की है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री से पूछे गए इस आशय के संदेश में प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू ने प्रशासन को संविधान की अनुच्छेद 19 की धारा 1ए का हवाला दिया है। मालूम हो कि संविधान का यही अनुच्छेद संचार-माध्यमों की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।  ये रहा काटजू का जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और भारत के गृहमंत्री को लिखा गया पत्र…

To,

1. The Chief Minister,

State Government of J& K,

Srinagar.

2. The Home Minister,

State Government of J & K,

Srinagar. 

Dear Sir,

It has been reported in The Hindu and other newspapers that some journalists were beaten up by CRPF personnel in J&K while covering protests in Srinagar recently.  It is also reported that photojournalists and a video journalist were hospitalized.

It is reported that  Umer Mehraj, working as a video journalist for Associated Press Television News (APTN) and Yawar Kabli and Showkat Shafi both freelance photojournalists were taken to SKIMS Hospital, after being beaten up by CRPF personnel. The Kashmir photojournalists Association has condemned the attack If these reports are true it is a serious matter affecting the freedom of the media guaranteed by Article 19(1)(a) of the Constitution.  

Please immediately give me your comments on these reports and also all what steps you have taken so that the media is able to discharge its duties effectively.  

With regards,

Yours sincerely,

Justice Markandey Katju

Chairman, Press Council of India

मैं इप्टा की सदस्य नहीं हूँ, मेरे माता-पिता इप्टा में थे

: बिहार इप्टा का 14वां राज्य सम्मेलन : फासिस्टवादी फिरकापरस्त ताकतों से मानवता की रक्षा करने का आवाह्न : सहरसा के एमएलटी महाविधालय के मैदान में रंगकर्मियों का बेहतरीन जमावड़ा ‘इप्टा के 14 वें राज्य सम्मेलन’ में दिखा। देश के विभिन्न हिस्से से आये रंगमंच   के नामचीन शख्सियतों का यह समागम कोसी इलाके के लिए ऐतिहासिक था। तीन दिनों (25, 26, और 27 नवम्बर) तक चलने वाला यह सम्मेलन फैज, नगार्जुन और शमशेर की विरासत को समर्पित रहा।

इस सम्मेलन में रंग जगत के चर्चित चेहरे से रू-ब-रू होने का मौका यहाँ के लोगों को मिला। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी कीर्ति जैन, प्रवीर गुहा, तनवीर अख्तर, राजेन्द्र राजन (महासचिव बिहार प्रलेस), उदय नारायण सिंह, विनोद कुमार, अनिल पतंग आदि की उपस्थिति ने सम्मेलन को सम्मेलन यादगार बना दिया। दिल्ली से आई एनएसडी की पूर्व निदेशक कीर्ति जैन ने उद्घाटन भाषण में कहाकि – मैं इप्टा की सदस्य नहीं हूँ,  मेरे माता-पिता इप्टा में थे। रेखा जैन व नेमीचन्द्र जैन से मुझे यह विरासत में मिला। अतः इप्टा मेरी खून में है। यह अकेली संस्था है जो देश को नई दिशा, नई सोच और नई दृष्टि दे रही है।  इससे पहले उदय नारायण सिंह (प्रतिकुलपति- विश्वभारती विश्ववि. शांति निकेतन) ने नाटक का उदेश्य और विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए कहाकि गांव से शहर तक इप्टा का यह सांस्कृतिक आन्दोलन चलते रहना चाहिए।

प्रसिद्ध रंगकर्मी एवं राज्य इप्टा के महासचिव तनवीर अख्तर ने आवाम की पूरी आवाज को अपने नाटक में रखने की बात कही तथा हर गांव में रंगशाला हो, इसके लिए इप्टा 3 अप्रैल से आंदोलन करेगी। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव  राजेन्द्र राजन ने इप्टा के गठन और आजादी के दिनों और आज भी सामंती शक्तियों के खिलाफ इसकी संघर्ष गाथा को रेखांकित किया। उन्होंने मानवता की हिफाजत के लिए इप्टा के प्रयासों की सराहना की। रंगकर्मी विनोद कुमार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत बतायी।

पेशे से पत्रकार जीतेन्द्र ने पिछले दिनों फारबिसगंज में पुलिसिया जुल्म के विरूद्ध एक प्रस्ताव रखा उन्होंने इस कांड पर मीडिया की चुप्पी पर भी सवाल उठाया। कोलकते से आये चर्चित रंगकर्मी प्रवीर गुहा ने रंगमंच से अपने गहरे ताल्लुकात का जिक्र करते हुए दिवंगत बादल सरकार को स्मरण व नमन किया। उन्होंने कहा कि ‘बादल दा से मैंने बहुत सीखा’। अध्यक्ष मंडल की ओर से वक्तव्य देते हुए डा. यतीन्द्र नाथ सिंह ने आजादी के दिनों में हम सक्रिय थे हम आज भी सक्रिय हैं क्योकि इप्टा एक आन्दोलन का नाम है जो अनवरत चलता रहेगा।

श्रमिक आन्दोलन से जुड़े ओमप्रकाश जी ने इप्टा के जनगीतों की प्रासंगिगता एवं जनआन्दोलन में इप्टा की भूमिका को अपने ओजपूर्ण वक्तव्य से दर्शक एवं श्रोताओं को अह्लादित कर दिया। अजय सिंह ने कहाकि बिहार की धरती राह दिखाती है। इस धरती ने गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी को मार्ग दिखाया। मैं इतिहासकार डा. रामशरण शर्मा का छात्र रहा हूँ और रंगकर्म अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। हरिहर प्रसाद गुप्ता ने कहाकि यह संस्था सच्चाई से जुड़ा हम रंगमंच के माध्यम से जन-जन को जाग्रत करते हैं।

सम्मेलन में प्रसिद्ध गायक व निदेशक सीताराम सिंह एवं उनकी मंडली द्वारा फै़ज, नागार्जुन एवं शमशेर की कविताओं का सस्वर गायन से उपस्थित रंगकमी झूम उठे। कार्यक्रम का संचालन युवा रंगकर्मी फिरोज अशरफ ने किया। उक्त कार्यक्रम के पूर्व इप्टा के प्रांतीय अध्यक्ष समी अहमद ने झंडोतोलन किया तथा रंगकर्मियों ने नगर में सांस्कृतिक रैली निकाली रैली में झूमते -गाते रंगकर्मियों ने शहरवासियों का आकर्षित किया। इस रैली के साथ ही सहरसा में तीन दिनों तक चलने वाले इप्टा के 14वें राज्य सम्मेलन सह नाट्य महोत्सव का आगाज हुआ।

अरविन्द श्रीवास्तव (09431080862) की रिपोर्ट

अमर उजाला पर मायावती की नजर टेढ़ी!

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के साथ सरकार अपने विपक्ष में उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए येन-केन-प्रकारेण जुट गयी है। पूर्वमंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के बगावती बोल के बाद उनको पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने के साथ बंगला खाली करने की नोटिस भी थमा दी गयी है। मीडिया में मनमाफिक खबर न छपने पर प्रदेश सरकार का नजरिया किस तरह बदल जाता है, इसका नमूना है अमर उजाला के प्रदेश के सभी संस्करणों के भवन व दफ्तरों की जांच-पड़ताल का।

21 नवबंर को विधानसभा के सत्र में प्रदेश के बंटवारे को लेकर अमर उजाला ने जो लीड की हेडिंग बनाने के साथ अंदर जो सामग्री लखनऊ में परोसी गयी उसको लेकर सरकार का नजरिया टेढ़ा हो गया है। सोलह मिनट में बीस करोड़ की किस्मत तय हेडिंग के साथ अंदर के पेज नंबर 2 व 3 पर जो सामग्री परोसी गयी, उसको लेकर सरकार का मानना है कि अमर उजाला खुद विपक्ष बन गया है। शशि शेखर जब अमर उजाला के समूह संपादक थे तो प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से संबंध इतने मधुर थे कि अपना नया बंगला देखने के लिए आमंत्रित किया था। अब वही मुख्यमंत्री अमर उजाला के प्रदेश में मौजूद सभी संस्करणों के भवनों की पड़ताल कराने में जुट गयी है।

नगर विकास, औद्योगिक विकास महकमे से जुड़े पदाधिकारी इसके लिए प्रदेश के विभिन्न संस्करणों के मुख्यालय पर जाकर कागजों की जांच-पड़ताल करने में लगे हैं। बनारस के चांदपुर इंड्रीस्टियल एस्टेट में बने भवन का पर्याप्त नक्शा न होने का मामला सामने आया है, वहीं लखनऊ में तीसरी मंजिल के निर्माण को गैरकानूनी ठहराया जा रहा है। आगरा में विकास प्राधिकरण के अधिकारी तो भरतपुर हाउस (इसमें अशोक अग्रवाल) रहते हैं, उनके घर की जांच-पड़ताल करने पहुंच गए है। अमर उजाला के खिलाफ चल रही इस कार्रवाई को रोकने के लिए प्रबंधन सरकार के नुमाइंदों को मैनेज करने में जुट गया है। फिलहाल इस घटनाक्रम को लेकर तरह तरह की कानाफूसी जारी है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. कानाफूसी कैटगरी में प्रकाशित खबरों जरूरी नहीं सच हो, इसलिए पढ़ने के बाद तथ्यों की पड़ताल खुद के स्तर पर करें और तभी भरोसा करें. अगर कोई कुछ नई जानकारी देना चाहता हो तो नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकता है या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं टूटा करते… सन्दर्भ : शरद पवार थप्पड़ प्रकरण

मेरे एक परिचित की नौकरी पुणे में एक निजी बैंक में लगी थी. काले धन को देश में ही गोरा बना देने में वह बैंक काफी प्रसिद्ध है. तो उस बैंक ने मेरे उस मित्र सहित अपने कुछ अधिकारियों को महाराष्ट्र के कुछ धनिकों की सूची देते हुए आंतरिक रूप से एक आकलन पेश किया था. उस आकलन के अनुसार शरद पवार की संपत्ति भारत के कुछ राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादे आंकी गयी थी. उपरोक्त आकलन के पक्ष में इस लेखक के पास कोई सबूत नहीं है और न ही वह बैंक कोई सबूत देने की बात करता था. ज़ाहिर है बैंक की तो बस अपने कर्मचारियों से यही उम्मीद रही होगी कि वे इनलोगों पर ध्यान रखें और कोशिश करें कि ऐसे लक्ष्मी पुत्रों को अपना ग्राहक बनाया जाय. खैर.

शरद पवार को एक सरफिरे का तमाचा और ऊपर के वर्णन में कोई साम्य हो ऐसी बात नहीं है. उस युवक के तमाचे को नागरिकों के आक्रोश का प्रतीक मान लिया जाय, ऐसे सरलीकरण की भी ज़रूरत नहीं है. हमले के बाद के प्राइम टाइम में सभी टीवी चैनलों पर सरकारी पक्ष भी या तो यह साबित करने में तुला था कि ये घटना कहीं से भी लोगों के क्रोध का प्रतीक नही है या फिर ये कि यह भाजपा नेता यशवंत सिन्हा द्वारा दिए गए उकसाऊ बयान का परिणाम है. वहीं शेष लोग निंदा की औपचारिकता के बाद इस आक्रमण को महंगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन आदि पर आम जन के गुस्सा से या फिर अपने-अपने एजेंडे अनुसार इसे खुद के उठाये गए सवालों से को-रिलेट कर रहे थे. मसलन टीम अन्ना की मानें तो यह थप्पड़ तो केवल लोकपाल के लिए था. आदि-आदि.

तो अंधे की हाथी की तरह लोग भले ही अपने-अपने हिसाब से इस घटना को व्याख्यायित करें, इसे जनाक्रोश की अभिव्यक्ति भले न माना जाय, लेकिन घटना के बाद आमजनों द्वारा व्यक्त की गयी प्रतिक्रया सही अर्थों में जनाक्रोश को तो व्यक्त करता प्रतीत हो रहा है, इस बात से शायद ही किसी को इनकार होगा.

आप फेसबुक या ट्विटर जैसी साइटों या ब्लॉग आदि पर जा जाकर देखें. शायद दस प्रतिशत भी ऐसे स्टेटस या पोस्ट आपको ऐसा नहीं मिलेगा जहां किसी भी तरह से इस घटना की निंदा की गयी हो. हां अगले कुछ दिनों तक लगातार आप अखबारों में या टीवी चैनलों पर ज़रूर चीज़ों को छन कर देखेंगे या पढेंगे. चुकि अखबारों या अन्य प्रसार माध्यमों को कई अनदेखे-अप्रत्यक्ष सेंसर से गुजरना पड़ता है (गुजरना भी चाहिए) तो वहां का कोई लेख आपको वास्तविक तस्वीर नहीं दिखा सकता है. उदाहरण के रूप में अगर आप इस थप्पड़ को जनता के आक्रोश की परिणति मानते भी हों तब भी अखबार में छपने के लिए घटना की निंदा करना ही होगा या टीवी पर भी जाने के लिए पल भर को लोकतंत्र और अहिंसा से प्यार का स्वांग भरना ही होगा, झूठा ही सही. लेकिन नया मीडिया आपको यह सुविधा देता है कि वहां जा कर आप जनता की नब्ज़ थाम्ह सकते हैं. वहां कोई एडिटर नहीं बैठा है. कोई बाजारू दबाव नहीं है, ‘हो रहे भारत निर्माण’ के विज्ञापन का लोभ भी नहीं, खुद को धर्म निरपेक्ष, शर्म निरपेक्ष या निष्पक्ष दिखाने के बेजा दबाव से मुक्त होने के कारण भी आप जन भावनाओं उसके आंतरिक इच्छाओं के प्रकटीकरण का माध्यम नए मीडिया के रूप में स्थान बनाते वेब मीडिया को मान सकते हैं, इस माध्यम से कर सकते हैं.

और यह मीडिया आपको सीना तान कर यह कहने की आज़ादी देता है कि हां हमें नफरत है नेताओं से. हम घृणा करते हैं कलमाडियों से. खुशी होती है राजा और कनिमोझी को दीवाली पर भी ज़मानत नहीं मिलने पर. गुस्सा आता है हमें पवारों और मोरानियों के संबंध पर. लवासा और आदर्श पर. 2G और K G पर. रोज़मर्रा के चीज़ों की कमरतोड कीमतों और बावजूद उसके उसे पैदा करने वाले किसानों की आत्महत्या पर. बिचौलियों-जमाखोरों का नेताओं के गठजोड़ से किये जा रहे लाखों-करोड के महंगाई घोटाले पर. कृषि मंत्री के क्रिकेट मंत्री हो जाने पर. जनता के प्रति ज़िम्मेदार होने के बदले किसी मंत्री के चीनी मिल मालिक के रूप में ही अपनी भूमिका निभाने पर भी. कपास उत्पादक किसान के दुःख-दर्द में शामिल होने के बजाय शूटिंग-शर्टिंग वाली कंपनियों के फैशन परेड में शामिल होने पर भी. सुदखोरों से क़र्ज़ लेकर जिंदगी भर शोषण के चक्रव्यूह में फंस जाने वाले मिहनतकशों के देश में दानवों द्वारा काले धन की सारी पूंजी नकारात्मक व्याज पर विदेशों में ज़मा कर लेने पर भी. कहोऊ कहाँ लगि ‘दाम’ बडाई…! बहरहाल.

राजनेता इस विसंगतियों का किसी भी तरह का समाधान खोज कर ले आयेंगे उसकी तो उम्मीद ही व्यर्थ है. लेकिन लोगों का आक्रोश थप्पड़ के रूप में न निकले इस हेतु मीडिया से भी कुछ विधि-निषेध की अपेक्षा है. आप गौर करें. भारत के किसी जिले में अगर दस हज़ार किसान इकट्ठे होकर एक आंदोलन करते तो क्या उनकी बात इस तरह से सुनी जाती जैसे उस युवक की सुनी गयी? किसी सुदूर जिले की ही क्यूं? अभी पिछले दिनों ही देश के कोने-कोने से आकर, विश्व के सबसे बड़े मजदूर संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक ढंग से प्रदर्शन कर अपनी मांगे रखी. आपने किसी चैनल में उनकी मांगों पर आधारित कोई भी कार्यक्रम शायद ही देखा होगा. तो अगर एक थप्पड़ को ही हर तरह के धरना प्रदर्शनों पर भारी बना दिया जाय तो आखिर क्यूं कर लोग ऐसा शोर्ट कट अपनाना नहीं चाहेंगे. इसके अलावा बार-बार प्रचार पाने के हथकंडा के तौर पर भी ऐसे घटना को निरूपित किया जाता है. तो मीडिया से सवाल यह है कि ऐसे प्रचार आखिर देते क्यूं हो? मत दिखाओ ऐसे किसी युवक का चेहरा, मत लीजिए उसका बार-बार हज़ार बार नाम. अगर आप घटना का कवरेज करते हुए, हमलावर को प्रसिद्धि नहीं देंकर केवल घटना को दिखाएँगे तो ज़ाहिर है अगली बार से कोई सस्ते प्रसिद्धि को भूखा कोई व्यक्ति तो ऐसे हरकतों को अंजाम नहीं ही देगा.

खैर. ‘रस्ते को भी दोष दे, आँखे भी कर लाल, जूते में जो कील है पहले उसे निकाल.’ आप निश्चय ही ऐसे घटनाओं की जम कर निंदा करें. क़ानून भी अपने अनुसार काम करे. लेकिन ऐसे घटनाओं के बाद लोगों की प्रतिक्रया जानने के लिए नेताओं को चाहिए कि वो फेसबुक या ट्विटर पर थोड़ी देर बैठ जाए. उन्हें पता चल जाएगा कि वह कहाँ खड़े हैं. आत्म-निरीक्षण को मजबूर होंगे वे सभी कि जिस राजनीति को आज़ादी के समय और उसके बाद भी दशकों तक सम्मान की नज़र से देखा जाता था, काँटों का ताज रहने पर भी आजादी से पूर्व जहां देश के सबसे कुलीन, सबसे पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आना चाहते थे वहीं मात्र कुछ दशक में ही क्या हो गया कि कोई भी भलामानुष राजनीति की गली का रुख करने से पहले हज़ार बार सोचेगा.

टीवी की बहस में एक एंकर ने हालांकि जनता को भी ठीक ही सन्देश दिया है. उसने कहा कि –जैसा उसका फेसबुक और ट्विटर एकाउंट बटा रहा है- यह सही है कि उसके द्वारा की गयी चर्चा से देश की नब्बे प्रतिशत जनता सहमत नहीं है, फिर भी अपनी भावना समय आने पर ‘ईवीएम’ से  ज़ाहिर करें न कि थप्पड़ को प्रोत्साहित कर.’  तो नेताओं से भी यही कहा जा सकता है ‘इक चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है.’ किसी एक के हाथ छोड़ देने से आपके और जनता के बीच रिश्ते टूट नहीं जायेंगे लेकिन उसे मजबूत बनाने की जिम्मेदारी आप की है. शर्त यह कि आपका हाथ जनता की जेब साफ़ करना बंद करे, उसके गर्दन को नहीं नापे. अगर आम आदमी का हाथ ईएवीएम के बदले आपके गाल तक पहुच गए हैं तो इसीलिए कि आप उसके जान और माल की हिफाज़त में न केवल असफल रहे हैं अपितु आपकी भूमिका ‘बाड के रूप में खेत खाने’ की हो गयी है. खैर…बीती ताहि बिसारि कि आगे की सुधि लेहि.

लेखक पंकज झा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं. इन दिनों रायपुर से प्रकाशित छत्तीसगढ़ भाजपा की पत्रिका दीप कमल के रूप में कार्यरत हैं.

Delhi’s best theatre directors to showcase their masterpiece work during Bhartendu Natya Utsav

New Delhi : To promote progressive and dynamic theatre among the city’s literati and culture enthusiasts, Sahitya Kala Parishad (SKP), the cultural wing of the Delhi Government, will be presenting eight theatre performances as part of the Bhartendu Natya Utsav from 28th November to 8th December, 2011 (except 2nd, 3rd and 4th December, 2011).  These plays will be staged at Shri Ram Center for Performing Arts (SRCPA), 4, Safdar Hashmi Marg, Mandi House, New Delhi.

An annual theatre event Bhartendu Natya Utsav will be presented this year with a different approach. Earlier the selection committee comprising of leaders from diverse fields unrelated to any theatre group (in Delhi) were appointed every year by SKP to select 8 – 10 outstanding plays of the year that were then presented at the festival. However, this year the format has been changed and instead of choosing the best plays, this year, they have chosen the best directors and have given them the liberty to showcase any of their plays, which they think is their best creation, in this festival.

Many eminent theatre directors will be presenting their best plays during this festival:
28th November 2011 –  Mr. Rajender Nath (Play:Tyagpatra),
29th November 2011- Ms. Sohela Kapoor (Play: O),
30th November 2011- Ranjit Kapoor- (Play: Aadamzaat),
1st December 2011- Devender Raj Ankur- (Play: Vaapasi Ke Baad Ayodhya Babu),
5th December 2011- Torit Mitra (Play: Garbh),
6th December 2011- Baapi Bose (Play: Socrates),
7th December 2011- Satish Anand (Play: Ek Inspector Se Mulakaat) and
8th December 2011- Bhau Bharti (Play: Tamasha Na Hua)

The theatrical event will not be less than a treat to theatre enthusiasts According to Sh. Shekhar Vaishnavi, Secretary, SKP, “Showcasing the best theatre performances under one roof to give a tremendous experience to the viewers is the main objective of Bhartendu Natya Utsav and Sahitya Kala Parishad is pleased to organize this event once again this year. The format, however, has been changed slightly.  In the past the committee formed by Sahitya Kala Parishad used to select best plays to be showcased during this event but this year the committee has selected some of the best directors from the world of theatre and has given them the liberty to present their best creation at the event. We are expecting good response from the public on this change.”

About Sahitya Kala Parishad

Sahitya Kala Parishad, the cultural wing of the Government of NCT of Delhi was setup in 1968 for the promotion and propagation of Art and Culture in Delhi. Hon'ble Chief Minister of Govt. of NCT of Delhi is the Chairperson of the Sahitya Kala Parishad. As one of the most interactive department of the Delhi Government, Sahitya Kala Parishad for the past three decades and more has been carrying out its mandate with full vigor and dedication. The Parishad has, on one hand, revived and projected the age old, time tested traditions of the country and on the other hand, it has tried to encourage and provide platform to the new and innovative trends in plastic and performing arts which represent our lives and times. Parishad's programmes are, at the same time, deep rooted in traditions and also branching out towards open skies crossing the boundaries of caste, creed, colour and geographic limits. Its projects and programmes concentrate more on youth, women and weaker sections of society. More can be found on www.artandculture.delhigovt.nic.in/sahitya/default.html

Press Release

केनेडी मर्डर को रिपोर्ट करने वाले एनटी के जर्नलिस्ट की मृत्यु

राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी की 22 नवंबर 1963 को हत्या के समय उनके काफ़िले में मौजूद वरिष्ठ अमरीकी पत्रकार-स्तंभकार की मृत्यु हो गई है. न्यूयॉर्क टाइम्स (एनटी) अख़बार के लिए रिपोर्टिंग करते रहे टॉम विकर 85 साल के थे. केनेडी की हत्या के बाद अफ़रा-तफ़री के माहौल में विकर ने पब्लिक फ़ोन के ज़रिए न्यूयॉर्क टाइम्स अख़बार को केनेडी पर गोली चलने, ऑपरेशन टेबल पर उनकी मृत्यु और लिंडन जॉनसन को राष्ट्रपति बनाए जाने का पूरा ब्यौरा दिया था.

क़रीब 3700 शब्दों के इस रिपोर्ट को आज भी विस्तृत विवरण के लिए याद किया जाता है. इस हत्याकांड के बाद टॉम विकर दुनिया भर में एक प्रतिष्ठित पत्रकार के तौर पर प्रसिद्ध हो गए थे और सालों तक वे स्तंभकार भी रहे.

डॉ. खलील चिश्ती की रिहाई के लिए काटजू ने लिखा सोनिया गांधी को पत्र

रिश्तेदार की हत्या के मामले में अजमेर सेंट्रल जेल में सजा काट रहे पाकिस्तान के माइक्रो बायोलॉजिस्ट डॉ. खलील चिश्ती को रिहा करने की अपील कई लोगों और संगठनों ने की लेकिन फिलहाल इन अपीलों-अनुरोधों का कहीं कुछ असर होता नहीं दिख रहा है. नौकरशाहों ने डा. खलील चिश्ती की फाइल को ठंढे बस्ते में डाल रखा है. पर पढ़े-लिखे और संवेदनशील लोगों का तबका नाउम्मीद नहीं है. ये लोग डा. खलील की रिहाई के लिए सक्रिय है.

डा. खलील चिश्ती के परिजन पहले ही रिहाई के लिए गुहार लगा चुके हैं. सामाजिक संगठन पीयूसीएल ने भी रिहाई की अपील की थी. अब जाने-माने जज और प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने यूपीए सरकार की चेयरपरसन सोनिया गांधी को एक पत्र लिखकर डा. खलील की रिहाई के लिए प्रयास करने की मांग की है. ज्ञात हो कि डॉ. खलील चिश्ती की रिहाई के लिए उनके परिजन और पीयूसीएल की ओर से राज्यपाल के समक्ष क्षमा व दया याचना अर्जी विचाराधीन है.

पूर्व में राज्यपाल ने अर्जी पर आपत्तियां जाहिर करते हुए राज्य सरकार को वापस भेज दी थी, आपत्तियों पर जबाव प्रस्तुत कर सरकार की ओर से अर्जी दुबारा राज्यपाल के समक्ष पेश की गई है. डॉ. खलील की पत्नी मेहरुन्निसा और परिजनों को उम्मीद है कि राज्यपाल उनकी याचना स्वीकार करेंगे. काटजू द्वारा सोनिया को लिखे पत्र से उम्मीद की जानी चाहिए कि पाकिस्तानी वैज्ञानिक की रिहाई हो सकेंगी. यह है पूरा पत्र….

Mrs. Sonia Gandhi, Chairperson,
UPA Government,
10 Janpath, New Delhi.
Dear Soniaji,

The release of Dr. Khalil Chishty. 

I am making this appeal to you in the name of humanity for release of Dr. Khalil Chishty, who is at present in the Ajmer Central Jail, so that he can go back to his home and family in Karachi, Pakistan.

Dr. Chishty was an eminent Professor of Virology in Karachi University, and holds a PhD from Edinburgh University. He is presently about 80 years of age and has several ailments. He is a heart patient, and has a fractured hip, and is unable to walk.

He had come to India in 1992 to meet his ailing mother in Ajmer. It appears that some quarrel took place at that time between Dr. Chishty’ family and their collaterals and as a result one person was killed. Several persons were implicated in the FIR, including Dr. Chishty. Dr. Chishty was granted bail but on the condition that he should not leave Ajmer and report to a police station every fortnight, which condition he complied with.

The criminal case went on for 19 years, and ultimately the judgment of the Ajmer District Court was delivered in January 2011 awarding life sentence to the accused including Dr. Chishty.

Dr. Chishty filed an appeal in the Rajasthan High Court, which was heard finally in July 2011 and judgment reserved, but as yet the judgment has not been delivered. The prayer for suspension of his sentence was rejected.
 
I had made an appeal to the Prime Minister Shri Manmohan Singh in the month of April 2011 requesting him to grant a pardon under Article 72 of the Constitution to Dr. Chishty. The Prime Minister referred the matter to the Home Minister Mr. P. Chidambaram. I wrote to Mr. Chidambaram, but to no avail. I then wrote to the Rajasthan Governor, Shri Shivraj Patil but he did not even show the courtesy of replying to my letter, although at that time I was a sitting judge of the Supreme Court of India.

In this connection I may mention that I had made an appeal to the Pakistan Government to release one Shri Gopal Das who had been in a Pakistan prison for a long period. The Pakistan Government honoured my appeal and released Gopal Das who returned to India. I am sad that while the Pakistan Government honoured my appeal, the Indian Government has not done so.

In these circumstances I make an appeal directly to you as my appeal to the aforementioned three authorities have been to no avail. I may mention that according to the decision of the Supreme Court in Nanavati’s case, AIR 1961 S.C, 112 a pardon can be granted even if a case is pending.

Dr. Khalil Chishty is an old man of about 80 years and does not have very long to live. It would be a disgrace for our country if he dies in jail. On the other hand, the prestige of our country will go up if he is released forthwith.

I therefore fervently appeal to you in the name of humanity to intervene in the matter and immediately get Dr. Chishty released.  Please treat this as most urgent.

Dr. Chishty’s aged wife, his daughter Shoa, grandson Ali are in Delhi and have met me personally this evening. They would like to personally meet you in this connection, if you could spare some time. They can be contacted on mobile number 09660366320.

With regards,   

Yours sincerely

(Markandey Katju)

November 26, 2011

डा. कुमार विमल नहीं रहे

साहित्य-सृजन के क्षेत्र में जाने माने शख्सियत डा. कुमार विमल का कल पटना में निधन हो गया। उन्होंने 13 अक्टूबर 2011 को अपना 80वां जन्म दिन मनाया था। 80 साल के हो जाने के बावजूद साहित्य-सृजन करते रहे। ''आजकल'' के दिसंबर अंक में उनका लेख प्रकाशित हुआ है। विभिन्न विधाओं में उनकी दर्जनों पुस्तकें जहां चर्चित हैं वहीं साहित्य के क्षेत्र में धरोहर के रूप में स्थापित भी हैं। डा. कुमार विमल के निधन पर साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है।

डा. कुमार विमल जी का परिचय

जन्मः- 12 अक्टूबर, 1931

साहित्यिक जीवनः- साहित्यिक जीवन का प्रारंभ काव्य रचना से, उसके बाद आलोचना में प्रवृति रम गई। 1945 से विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी और आलोचनात्मक लेख आदि प्रकाषित हो रहे हैं। इनकी कई कविताएं अंगे्रजी, चेक, तेलगु, कष्मीरी गुजराती, उर्दू, बंगला और मराठी में अनुदित।

अध्यापनः-  मगध व पटना  विष्वविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक।   बाद में निदेषक बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना । संस्थापक आद्य सचिव, साहित्यकार कलाकार कल्याण कोष परिषद्, पटना नांलदा मुक्त विष्वविद्यालय में कुलपति

अध्यक्ष बिहार लोक सेवा आयोग
बिहार विश्वविद्यालय कुलपति बोर्ड
हिन्दी प्रगति समिति, राजभाषा बिहार
बिहार इंटरमीडियएट शिक्षा परिषद्
बिहार राज्य बाल श्रमिक आयोग

सदस्य
ज्ञानपीठ पुरस्कार से संबंधित हिन्दी समिति
बिहार सरकार उच्च स्तरीय पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष
साहित्य अकादमी, दिल्ली, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर और भारत सरकार के कई मंत्रालयों की हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य रह चुके हैं।

सम्मान

कई आलोचनात्मक कृतियां, पुरस्कार-योजना समिति (उत्तर प्रदेश) बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना,राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह विशेष साहित्यकार सम्मान, हरजीमल डालमिया पुरस्कार दिल्ली, सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार, आगरा तथा बिहार सरकार का डा. राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान

प्रकाशनः-

अब तक लगभग 40 पुस्तकों का प्रकाशन

महत्वपूर्ण प्रकाशनः-

आलोचना में ‘‘मूल्य और मीमांसा‘‘, ‘‘महादेवी वर्मा एक मूल्यांकन’’, ‘‘उत्तमा‘‘ ।
कविता में – ‘‘अंगार‘‘, ‘‘सागरमाथा‘‘।
संपादित ग्रंथ- गन्धवीथी  (सुमित्रा नंदन पंत की श्रेष्ठ प्रकृति कविताओं का विस्तृत भूमिका सहित संपादन संकलन), ‘‘अत्याधुनिक हिन्दी साहित्य‘‘ आदि।

पटना से संजय कुमार की रिपोर्ट

कई पत्रकारों ने अपने-अपने दर बदले

नवभारत टाइम्‍स से खबर है कि अनुराग अन्‍वेषी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे समाचार संपादक बनकर अमर उजाला से जुड़ने जा रहे हैं. अनुराग नोएडा स्थित कारपोरेट आफिस में अपनी सेवाएं देंगे. अमर उजाला, नोएडा से दूसरी खबर यह है कि रवि राव ने यहां से इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी नोएडा में ही दैनिक जागरण के साथ शुरू कर रहे हैं. दैनिक जागरण, नोएडा से खबर है कि यहां से विप्‍लव चतुर्वेदी ने विदाई ले ली है. वे सब एडिटर के रूप में अमर उजाला, नोएडा से जुड़ रहे हैं.

हिंदुस्‍तान, दिल्‍ली से खबर है कि मिथिलेश कुमार यहां से इस्‍तीफा देकर इंदौर में दैनिक भास्‍कर के साथ जुड़ने जा रहे हैं. इसके पहले भी वे भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे स्‍पोर्टस डेस्‍क पर काम करेंगे. इंदौर से दूसरी खबर है कि दैनिक भास्‍कर में ललित उपाध्‍याय को फिर से सिटी चीफ बना दिया गया है. पहले भी ललित भास्‍कर में सिटी चीफ थे परन्‍तु वे जागरण के साथ जुड़ गए थे, जिसके बाद रुमनी घोष को सिटी चीफ बना दिया गया था. अब दुबारा उन्‍होंने वापसी कर ली है.

अमर उजाला, उन्‍नाव से खबर है कि अंकित मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. खबर है कि वे अपनी नई पारी राष्‍ट्रीय सहारा के साथ शुरू करने जा रहे हैं. नए लांच होने जा रहे खबर इंडिया न्‍यूज चैनल से खबर है कि अजय कुमार ने यहां सीनियर कैमरामैन के रूप में ज्‍वाइन कर लिया है. वे इसके पहले जीएनएन से जुड़े हुए थे.

बनारस में हस्‍ताक्षर का मामला अपर श्रमायुक्‍त के पास पहुंचा, हड़कम्‍प

: पत्रकार नेता योगेश गुप्‍ता पप्‍पू एवं अजय मुखर्जी दादा ने की शिकायत : दैनिक जागरण, बनारस में म‍जीठिया वेज बोर्ड मामले में पत्रकारों की अनिच्‍छा के बावजूद जबरिया हस्‍ताक्षर करा रहे प्रबंधन के विरुद्ध समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन ने मोर्चा खोल दिया है. दैनिक जागरण की चिरकुटई से भलीभांति अवगत काशी पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष योगेश गुप्‍ता पप्‍पू एवं समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी दादा ने वाराणसी परिक्षेत्र के अपर श्रमायुक्‍त को पत्र लिखकर कर्मचारियों के उत्‍पीड़न का आरोप लगाया है.

गौरतलब है कि बनारस में दैनिक जागरण एवं आई नेक्‍स्‍ट के पत्रकारों से उनकी इच्‍छा के विरुद्ध प्रबंधन के लोगों ने जबरिया हस्‍ताक्षर करा लिए. सूत्रों ने बताया कि शनिवार को अपकंट्री के कई पत्रकारों को कार्यालय बुलाकर उनके हस्‍ताक्षर कराए गए. कई जिलों में नियुक्‍त स्‍टाफरों को सख्‍त आदेश दिया गया था कि वो बनारस स्थित कार्यालय पहुंचकर प्रबंधन द्वारा तैयार प्रोफार्मा पर हस्‍ताक्षर कर दें अन्‍यथा उन्‍हें इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी. परेशान तमाम जिलों के पत्रकार कार्यालय पहुंचकर अपने हस्‍ताक्षर कर दिए.

इधर, बनारस के पत्रकारों के हितों के लिए लम्‍बी लड़ाई लड़ चुके तथा लड़ रहे योगेश गुप्‍ता पप्‍पू तथा अजय मुखर्जी दादा ने एक बार फिर जागरण प्रबंधन के खिलाफ लड़ाई लड़ने की तैयारी कर ली है. नैतिकता को ताख पर रखने वाले इस संस्‍थान के पत्रकारों के हित में आवाज उठाते हुए दोनों ने कर्मच‍ारियों के उत्‍पीड़न की शिकायत करते हुए अपर श्रमायुक्‍त से उचित कार्रवाई की मांग की है. इन दोनों लोगों ने आरोप लगाया है कि जागरण प्रबंधन के कार्रवाई से औद्योगिक अशांति का माहौल बन रहा है.

गौरतलब है कि इन दोनों पत्रकार नेताओं द्वारा कई अखबारों के पत्रकारों एवं कर्मचारियों को तीस प्रतिशत अंतरिम देने की लड़ाई के मामले में दैनिक जागरण अपने पत्रकारों से जबरिया साइन करवा चुका है कि उनको अंतरिम नहीं चाहिए. आई नेक्‍स्‍ट के एक मामले में मैनेजर अंकुर चड्ढा को भी इन्‍हीं दोनों लोगों के चलते श्रमायुक्‍त के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा था. अभी भी यह मामला पूरी तरह हल नहीं हुआ है. उसके बाद नए हस्‍ताक्षर अभियान ने आग में घी का काम किया है. साथ ही इस बार पत्रकार भी प्रबंधन के रवैये से अंदर ही अंदर कुपित हैं.

किरण बेदी के खिलाफ चौबीस घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश

नई दिल्ली। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए टीम अन्ना की प्रमुख सदस्य किरण बेदी और उनके एनजीओ इंडिया विजन फाउंडेशन के खिलाफ 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता ने किरण बेदी की एनजीओ और मुंबई की वेदांता फाउंडेशन के खिलाफ विदेश से मिले दान के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया था।

याचिका कर्ता देवेंद्र चौहान ने किरण बेदी पर सरकारी जमीन का किराया वसूल करने का भी आरोप लगाया। किरण बेदी की एनजीओ और वेदांता फाउंडेशन ने अर्धसैनिक बलों के जवानों के बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा देने के लिए माइक्रोसॉफ्ट फाउंडेशन से 50 लाख रुपए का दान लिया था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि ट्रेनिंग सेंटरों में मुफ्त शिक्षा के बजाए बच्चों से फीस वसूली गई। इसपर अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी अमित बंसल ने पुलिस उपायुक्त, (अपराध शाखा) को बेदी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया।

इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए किरण बेदी ने ट्वीट किया कि मेरे लिए ये हैरान करने वाली बात नहीं है, इससे मेरा प्रण और मजबूत होगा। माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर बेदी ने कहा कि मुझे सूचित किया गया है कि मेरे खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज हुई है। मेरे लिए यह हैरान करने वाली बात नहीं है! यह मेरे काम करने के संकल्प को और मजबूत बनाता है। साभार : आईबीएन7

शाहजहांपुर के पत्रकार शमिंदर सिंह को मातृशोक

शाहजहांपुर में महामंघा के जिला संवाददाता शमिंदर सिंह वेदी की माता श्रीमती कैलाश कौर का बीते मंगलवार को निधन हो गया। वह अस्‍सी साल की थीं तथा पिछले कुछ समय से सांस की बीमारी से पीडि़त थी। मृदुभाषी पत्रकार शमिन्दर सिंह की माता के निधन का समाचार सुनते ही पत्रकारों व उन के तमाम मिलने वालों में शोक की लहर दौड़ गई। बताते चले कि पत्रकार शमिंदर के पिता सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज के एक वरिष्ठ सैनिक के रूप में कार्य कर चुके हैं। 

श्रीमती कैलाश कौर अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गयी हैं। उनके बडे़ पुत्र रघुवीर सिंह तथा मझले पुत्र कमलजीत सिंह खेती का कार्य देखते है, जबकि रंजीत सिंह वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता हैं। उनकी पुत्रियां श्रीमती भूपेन्द्र कौर व बलविन्दर कौर जालंधर में शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। श्रीमती कौर का अंतिम संस्कार बुधवार को खन्नौत स्थित मोक्षधाम पर किया गया। उनकी आत्मा की शांति हेतु उनके स्टेशन रोड स्थित निवास स्थान पर 1 दिसम्बर को अखण्ड पाठ रखा गया हैं, जिसका भोग व अंतिम अरदास श्री गुरुद्वारा गुरुनानक आश्रम कुटिया साहिब में 3 दिसम्बर को दोपहर 11 बजे सम्पन्न होगा।

उनके निधन पर उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष मो0 इरफान, अनूप बजापेई, अजय अवस्थी, अम्भुज मिश्रा, सौरभ दीक्षित, जागेन्द्र सिंह, दीप श्रीवास्तव, विनय पाण्डे, संजय श्रीवास्तव, अवनीश मिश्रा, सुदीप शुक्ला, सुशील शुक्ला, वरिष्ठ अधिवक्ता वीरपाल सिंह, अर्जुन श्रीवास्तव, राजबहादुर सिंह, रविन्दर सिंह, सतीश चन्द्रा, के0 दीपक सक्सेना, हेमंत डे, शरद राही सहित तमाम गणमान्य नागरिकों व तमाम संगठनों ने शोक व्यक्त किया है।

औरेया-इटावा में हिंदुस्‍तान दो रुपये का हुआ, हालत फिर भी खराब

इटावा और औरैया में हिंदुस्‍तान की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. कानपुर से लेकर दिल्‍ली तक के आला अफसर यहां अखबार के अच्‍छे प्रदर्शन के लिए नाक रगड़ रहे हैं, तमाम उपाय कर रहे हैं, बावजूद इसके यह अखबार लोगों की पसंद नहीं बन पा रहा है. अखबार की कीमत कम करने के बावजूद हिंदुस्‍तान को लाभ मिलता नहीं दिख रहा है. औरैया-इटावा में हिंदुस्‍तान प्रबंधन ने अखबार की कीमत साढ़े तीन रुपये से घटाकर दो रुपये कर दिया है इसके बाद भी प्रसार संख्‍या में कोई खास इजाफा देखने को नहीं मिल रहा है.

वहीं अमर उजाला ने इटावा में कानपुर से अपने तेजतर्रार पत्रकार प्रदीप अवस्‍थी को भेजकर हिंदुस्‍तान के साथ जागरण की भी मुश्किलें बढ़ा दी है. ब्‍यूरोचीफ के रूप में प्रदीप ने कई बड़ी खबरें धड़ाधड़ ब्रेक की, जिसके चलते इन अखबारों के पत्रकारों के सामने भी मुश्किल आने लगा है. हॉकरों को अस्‍सी पैसा में हिंदुस्‍तान मिलने के बाद भी प्रसार संख्‍या में कोई बढ़त नहीं दिख रही है. दिल्‍ली-कानपुर से आए सेल्‍स हेड विजय सिंह, चार यूनिटों के हेड दीपक मुखर्जी समेत कई वरिष्‍ठ लोग इन दोनों जिलों में अखबार की स्थिति को लेकर परेशान हैं. इन लोगों ने कई सेंटरों पर जाकर जायजा लिया, बातचीत की परन्‍तु अभी तक कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है. अखबार के दो रुपये का होने का भी जमकर प्रचार किया गया, जगह-जगह अखबार के बंडल फेंके गए फिर भी हिंदुस्‍तान को वह शुरुआत नहीं मिल पाई है, जिसकी प्रबंधन ने उम्‍मीद की थी.

सुब्रत राय पर कोर्ट ने कसा शिकंजा, भगोड़ा घोषित करने की तैयारी

बदायूं। न्यायालय के आदेशों को गंभीरता से न लेने पर सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय को मजिस्ट्रेट ने भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। मामले की अगली सुनवाई अब 18 दिसंबर को होगी, जिसमें सुब्रत राय हाजिर नहीं हुए तो उनके विरुद्ध कुर्की के आदेश भी हो सकते हैं। सहारा ग्रुप के नेतृत्व में संचालित कंपनी द्वारा पच्चीस साल पहले गोल्डन की एकाउंट नाम की योजना चलाई गयी थी, जिसके तहत देश भर से करीब दस हजार लोगों से पच्चीस सौ रुपये प्रति व्यक्ति जमा कराये गये थे।

योजना के तहत धन जमा करने वाले लोगों के बीच ड्रा होने के बाद विभिन्न इनामों का बंटवारा होना था, जो नियमानुसार दस सालों का निरंतर होते रहना चाहिए था, लेकिन आरोप है कि दो सालों के बाद ड्रा बंद कर दिये गये और धन जमा करने वालों को कोई सूचना भी नहीं दी गई। न ही धन वापस करने के बारे में संतोष जनक उत्तर दिया गया। इस योजना का शिकार कस्बा बिसौली के मोहल्ला होली चौक निवासी एडवोकेट धनवीर सक्सेना भी हुए। उन्होंने सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय और स्थानीय शाखा प्रबंधक को नोटिस देकर जवाब मांगा, पर उन्होंने संतोषजनक उत्तर नहीं दिया, इस पर वर्ष 1997 में मुकदमा संख्या 16-15/1997 के तहत मुंसिफ मजिस्ट्रेट बिसौली के न्यायालय में पीडि़त ने वाद दायर कर दिया। 24 मार्च 1999 को मुरादाबाद जनपद के कस्बा चंदौसी स्थित शाखा के प्रबंधक वेदराम सैलानी व सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय को तलब किया गया। कई तारीखों के बाद शाखा प्रबंधक तो न्यायालय में हाजिर हो गये, पर चेयरमैन की ओर से वकील ने पक्ष रखा।

बाद में शाखा प्रबंधक ने भी आना बंद कर दिया, जिस पर न्यायालय ने सहारा ग्रुप के चेयरमैन व शाखा प्रबंधक के विरुद्ध वारंट जारी किया, पर वह नहीं आये। इसके बाद अदालत के गैर जमानती वारंट जारी करने पर भी वह नहीं आये। न्यायालय के आदेशों की लगातार अवहेलना होने पर न्यायालय ने सुब्रत राय और शाखा प्रबंधक वेदराम सैलानी के विरुद्ध भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। मामले की अगली सुनबाई 18 दिसंबर को होगी। कयास लगाये जा रहे हैं कि उक्त लोग तारीख पर नहीं आये, तो इनके विरुद्ध न्यायालय कुर्की की कार्रवाई कर सकता है।

बदायूं से पत्रकार बीपी गौतम की रिपोर्ट. बीपी से 08979019871 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

इंडिया न्‍यूज से 30 को विदा हो जाएंगे रवीन ठुकराल, पंजाब चैनल होगा बंद

: यूपी चैनल लांच करने की तैयारियां तेज : राहुल देव के एडिटर इन चीफ बनने की चर्चा : इंडिया न्‍यूज से खबर है कि रवीन ठुकराल अब यहां से फाइनली विदा हो जाएंगे. इंडिया न्‍यूज ग्रुप के एडिटर इन चीफ के रूप में संस्‍थान को खड़ा करने वाले रवीन ठुकराल के बारे में शनिवार को सामूहिक मीटिंग करके बता दिया गया कि अब वे इंडिया न्‍यूज से जाने वाले हैं. खबर है कि रवीन 1 दिसम्‍बर से दैनिक द ट्रिब्‍यून के एसोसिएट डिप्‍टी एडिटर के रूप अपना कार्यभार ग्रहण कर लेंगे. तमाम मुश्किलों और विवादों के बीच रवीन ने इंडिया न्‍यूज एवं आज समाज को एक ब्रांड के रूप में खड़ा किया था.

शनिवार को इंडिया न्‍यूज के कार्यालय में कर्मचारियों के साथ मीटिंग में रवीन ठुकराल ने अपने अनुभव को शानदार बताया तथा उम्‍मीद जताई कि यह टीम इंडिया न्‍यूज को एक नई ऊंचाई तक ले जाएगी. हालां‍कि रवीन ठुकराल की विदाई के बाद अब उनके चेले-चपाटी मुश्किल में आ गए हैं. कई तो ऐसे हैं जो काम की बजाय रवीन ठुकराल से नजदीकी के चलते इंडिया न्‍यूज में टिके हुए थे. ऐसे लोगों के सामने मुश्किल आ गई है. वे परेशान हैं. कई ने तो अभी से नए ठिकानों की तलाश शुरू कर दी है.

रवीन ठुकराल के नजदीकी माने जाने वाले तथा पंजाब चैनल की लांचिंग के लिए लगाए गए इसरार शेख भी परेशानी में हैं. सूत्रों का कहना है कि लाइसेंस की दिक्‍कतों के चलते प्रबंधन ने टेस्‍ट सिग्‍नल पर चल रहे इंडिया न्‍यूज पंजाब को बंद करने जा रहा है. इसके बाद से इसरार को लेकर कयास लगने शुरू हो गए हैं. खबर है कि प्रबंधन अब पंजाब चैनल के लिए की गई तैयारियों को इंडिया न्‍यूज यूपी लांच करने इस्‍तेमाल करेगा. चैनल यूपी चुनाव से पहले यूपी चैनल लांच करने की कोशिश में हैं. पंजाब चैनल के लिए तैयार संसाधन से यूपी चैनल को लांच किए जाने की योजना है. यूपी चैनल को एसाइनमेंट देख रहे हनुमंत राव के निर्देशन में लांच किए जाने की योजना थी, परन्‍तु बदली परिस्थितियों में इस चैनल को कौन लांच कराएगा एक बड़ा सवाल बन गया है. हनुमंत भी रवीन के खास माने जाते रहे हैं.

हालांकि खबर यह है कि रवीन ठुकराल ने जाते-जाते पंजाब चैनल पर लटक रहे तलवार को देखते हुए इसरार शेख को इंटरटेनमेंट का हेड बना के गए हैं. अब तक इंटरटेनमेंट की व्‍यवस्‍था देख रहे हाफिज रहमान को साइड लाइन कर दिया गया है. इसरार को बचाने के लिए रहमान एक तरह से बिना काम के कर दिए गए हैं. ग्राफिक्‍स हेड रहे संजय मेहरा को जीएम बना दिया गया है, पर अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि इसके बावजूद इन लोगों के ऊपर तलवार बराबर लटकी हुई है. दूसरी तरफ खबर है कि रवीन ठुकराल के जाने के बाद प्रबंधन किसी नए चेहरे को लाने की बजाय आज समाज की जिम्‍मेदारी संभाल रहे वरिष्‍ठ पत्रकार राहुल देव को ही प्रमोट करके ये जिम्‍मेदारी सौंप सकता है. हालांकि अभी इस खबर की पुष्टि नहीं हो पाई है, परन्‍तु इन हाउस राहुल देव के नया एडिटर इन चीफ बनने की चर्चा जोरों पर है. इस संदर्भ में रवीन ठुकराल से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया.

समाज और देश के हितों को ध्‍यान में रखकर होनी चाहिए पत्रकारिता

: आईजेयू का सातवां प्‍लेनम शुरू : हैदराबाद : इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन का सातवां प्लेनम आज यूनियन के प्रथम सेक्रेटरी जनरल मरहूम कल्याण चौधरी के नाम पर बसाये गए हॉल में हैदराबाद में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन किरणकुमार रेड्डी के उद्घाटन के साथ शुरु हुआ. अपने उद्घाटन भाषण में मुख्यमंत्री ने कहा कि आज पत्रकारिता के बारे में उठ रहे बहुत सारे सवालों के बीच यह सम्मेलन हो रहा है और आज पत्रकारिता के बीच से ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रेस क़ी आज़ादी का मतलब अख़बार मालिकों क़ी आज़ादी है या फिर पत्रकारों क़ी आज़ादी.

आज कहा जा रहा है कि मालिकों ने पत्रकारों और अख़बारों की आज़ादी को मालिकों की आज़ादी का पर्याय बना दिया है. सरकार या सरकारें इस सवाल पर कुछ भी कहने से बचना चाहती हैं. क्योंकि सरकारों के कुछ भी कहने का गलत अर्थ लगाया जा सकता है. कहा जा सकता है कि सरकारें पत्रकारिता कि आज़ादी पर हमला कर रही हैं. बेहतर हो कि इस सवाल पर पत्रकारिता के अंदर में ही स्वस्थ बहस हो. उन्होंने पत्रकारों से यह जरुर कहा कि उन्हें पेज थ्री कि पत्रकारिता से बचना चाहिए और समाज और देश के हितों को ध्यान में रख कर पत्रकारिता करनी चाहिए. आज पत्रकारिता की साख पर जो सवाल उठ रहे हैं उसकी हिफाज़त सिर्फ पत्रकार ही कर सकते हैं. इस अवसर पर बोलते हुए ठसाठस भरे हॉल में पत्रकारों के समूह को संबोधित करते हुए आंध्र प्रदेश विधान परिषद के सभापति ए. चक्रपानी ने भी लगभग इसी आशय का भाषण दिया. उन्होंने कहा आज पत्रकारों और पत्रकारिता के कन्धों पे ये जिम्मेवारी आ गयी है कि वे अपनी साख की रक्षा करें.

आंध्र प्रदेश की सूचना मंत्री डी के अरुणा ने अपने भाषण में पत्रकारों को गरीबों, दलितों, मजलूमों और हाशिये पर पड़े लोगों की आवाज़ बनने की सलाह देते हुए आंध्र प्रदेश सरकार की पत्रकारों के लिए किये गए कार्यक्रमों का परिचय देते हुए कहा कि उन्हें यह जानकर ख़ुशी है कि आंध्र प्रदेश कि सरकार का रिकॉर्ड इस मामले में देश भर में सबसे बढ़िया है. इस सन्दर्भ में उन्होंने पत्रकारों के लिए जारी २.३५ करोड़ की फ्री हेल्थ इंश्‍योरेंस स्कीम और २२ हज़ार पत्रकारों को मान्यता देने, ज़रूरतमंद और बुज़ुर्ग पत्रकारों को सहायता और पेंशन तथा गृह आवास देने कि योजनाओं का ज़िक्र किया. उन्होंने दुहराया कि आंध्र प्रदेश का देश के पैमाने पर पत्रकार कल्याण योजनायें चलने के मामले में एक रिकॉर्ड है. अरुणा ने घोषणा की कि सरकार बहुत ज़ल्द ही राज्य और जिलों के स्तर पर मान्यता कमिटियाँ, वेलफेयर फंड कमिटियाँ, त्रिपक्षीय कमिटियाँ और पत्रकरों के मामले कि तुरत जाँच के लिए हाई पॉवर कमिटी बनाने जा रही है. हॉल में मौजूद पत्रकारों ने तालियों कि गरगराहत के साथ अरुणा की घोषणाओं का स्वागत किया.

अपने अध्यक्षीय भाषण में आइजेयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष एसएन सिन्हा ने यूनियन के संघर्षों के इतिहास का जिक्र करते हुए पूर्व अध्यक्ष श्री सुरेश प्रसाद अखौरी की यूनियन तोड़क गतिविधियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने का आह्वान किया और कहा कि आज जरुरत आन पड़ी है कि ऐसे तोड़क तत्वों का कराराजवाब हर स्तर पर दिया जाये. उन्होंने कहा कि यूनियन को तोड़ने और प्रेस कौंसिल में इसके प्रतिनिधित्व को समाप्त करने की पूर्व अध्यक्ष कि साजिशों को नाकाम कर दिया गया और हमारे दो प्रतिनिधि के. अमरनाथ और अरुण कुमार आज की तारीख में ग्यारहवीं प्रेस कौंसिल में सदस्य के रूप में अपनी शानदार भूमिका निभा रहे हैं. हमारी यूनियन की ही सबीना इन्दरजीत आज आइऍफ़डब्ल्यूजे की एक्‍जीक्‍यूटिव कमिटी में हैं. आज भी मीडिया कमिशन बनाने, सभी इलेक्ट्रानिक, प्रिंट और अन्य किस्म के मीडिया कर्मियों को अपना हक दिलाने, उनको वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट के अंदर लाने, मीडिया के मालिकों की ओर से वेज बोर्ड को ख़तम करने के साजिश के खिलाफ तेज संघर्ष का मौका सामने है, जब हमें अपनी एकजुटता का परिचय देना होगा. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हमारा यूनियन इस संघर्ष में विजय हासिल करेगा. यूनियन के सेक्रेटरी जेनेरल डी. अमर ने धन्यवाद ज्ञापन किया. उद्घाटन भाषण के समय उपाध्यक्ष डी. रवीन्द्र दास, प्रेस कौंसिल सदस्य के. अमरनाथ, अरुण कुमार, यूनियन के संस्थापक प्रथम सेक्रेटरी जेनेरल संतोष कुमार, एल. एस. हरदेनिया भी मंच पर उपस्थित थे.

मीडिया पर चला सरकारी हथौड़ा

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत का खबरिया चैनल टाइम्स नाउ के खिलाफ अभूतपूर्व 100 करोड़ रु. का मानहानि का दावा ठोकना मीडिया को खरा-खोटा कहने के इस मौसम में दंडात्मक कार्रवाई का सबसे ताजा उदाहरण है. न्यायमूर्ति सावंत के नजदीकी सूत्रों के मुताबिक, वे चाहते हैं कि पुणे की सिविल अदालत के एक न्यायाधीश वी.के. देशमुख के 26 अप्रैल को दिए गए एक फैसले से मीडिया को आचारनीति के बारे में एक कड़ा संदेश दिया जाए.

सूत्र कहते हैं, ''यह मामला न्यायमूर्ति सावंत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मीडिया के लिए एक सबक है. अगर मीडिया बेकसूर लोगों की मानहानि करके कोई गलती करता है और अगर गलती उसकी जानकारी में लाई जाती है, तो उसे तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए.'' पुणे के रहने वाले 81 वर्षीय न्यायमूर्ति सावंत, जो भारतीय प्रेस परिषद के भी पूर्व अध्यक्ष हैं, इस मामले को आगे चलाने का इरादा रखते हैं, लेकिन पैसे के लिए नहीं. सूत्र कहते हैं, ''अगर उन्हें 100 करोड़ रु. मिलते हैं, तो वे इसे धर्मार्थ खर्च कर देंगे. हर कोई जानता है कि उन्होंने अण्णा हजारे के हिंद स्वराज ट्रस्ट के खिलाफ आरोपों की 2 साल तक मुफ्त में जांच की थी.''

वे 100 करोड़ रु. की रकम को जायज ठहराते हैं, ''अगर कोई उद्योगपति अपने ही भाई के खिलाफ मानहानि का 10,000 करोड़ रु. का दावा कर सकता है, तो कोई ईमानदार न्यायाधीश एक गलती करने वाले टीवी चैनल के खिलाफ 100 करोड़ रु. का दावा क्यों नहीं कर सकता?'' दस्‍तावेजों से आभास होता है कि न्यायमूर्ति सावंत ने मानहानि का दावा इस कारण ठोका है, क्योंकि वे महसूस करते हैं कि चैनल अपनी गलती के लिए माफी मांगने में ''गंभीर नहीं था.'' चैनल ने 10 सितंबर, 2008 को शाम 6.30 बजे के बुलेटिन में असावधानी से एक सरीखे सुनाई देने वाले न्यायमूर्ति पी.के. सामंत की जगह न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत का चित्र भविष्य निधि मामले में एक अभियुक्त के तौर पर लगा दिया था. चित्र 15 सेकंड तक स्क्रीन पर रहा. न्यायमूर्ति सावंत के निजी सहायक ने बुलेटिन देखा और उन्हें फोन करके इस गलती की सूचना दी. न्यायमूर्ति सावंत ने उसे चैनल को बताने और गलती की सूचना उन्हें देने को कहा, जो उसने कर दिया.

लेकिन जब टाइम्स नाउ ने तुरंत माफी नहीं मांगी तो न्यायमूर्ति सावंत इस पर परेशान हो गए. 15 सितंबर, 2008 को उन्होंने उन्हें एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें कहा गया था कि अगर वे माफी नहीं मांगते, तो वे उनके खिलाफ 100 करोड़ रु. का मानहानि का दावा करेंगे. 25 सितंबर को चैनल ने उन्हें उनके नोटिस का उत्तर भेजा, जिसमें कहा गया था कि वह 23 सितंबर से एक स्क्रॉल दिखा रहे हैं, जिसमें माफी मांगी गई है और यह स्क्रॉल पांच दिन तक चलता रहेगा.

न्यायमूर्ति सावंत ने 27 सितंबर को चैनल को लिखा कि उन्होंने माफी तब मांगी है, जब उन्होंने उन्हें कानूनी नोटिस भेजा. ''यह एक भड़काने वाली बात है और मैं आपके खिलाफ मानहानि का दावा पेश करने जा रहा हूं.'' 1 अक्तूबर, 2008 को चैनल के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी ने न्यायमूर्ति सावंत को पत्र लिखकर मिलने का समय मांगा. 4 अक्तूबर, 2008 को न्यायमूर्ति सावंत ने इसका जवाब देकर उन्हें 11 अक्तूबर को अपने पुणे स्थित निवास पर शाम चार बजे आने को कहा.

8 अक्तूबर को गोस्वामी ने फिर न्यायमूर्ति सावंत को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें शल्य चिकित्सा करवानी है और वह 11 अक्तूबर को उनसे नहीं मिल सकेंगे. लेकिन न्यायमूर्ति सावंत ने देखा कि गोस्वामी ने उस दिन अपना नियमित शो पेश किया. उन्होंने पुणे सिविल अदालत में मानहानि का मामला दर्ज कराने का अपना फैसला पक्का कर लिया. न्यायाधीश देशमुख के सामने सुनवाई में टाइम्स नाउ ने स्वीकार किया कि उन्होंने सावंत का चित्र गलती से लगा दिया था. लेकिन उन्होंने सावंत की ओर से मांगी गई हर्जाने की रकम, 100 करोड़ रु., पर देशमुख के समक्ष अपने तर्कों में या अपने लिखित बयानों में प्रतिवाद नहीं किया. दो गवाहों ने सावंत के पक्ष में गवाही दी, जबकि टाइम्स नाउ ने तीन गवाह पेश किए. 26 अप्रैल, 2011 को देशमुख ने फैसला सुनाया कि टाइम्स नाउ के बुलेटिन ने सावंत की मानहानि की है.

उन्होंने चैनल को हर्जाने के 100 करोड़ रु. का भुगतान उन्हें करने का निर्देश दिया. पुणे अदालत के फैसले के खिलाफ टाइम्स नाउ ने सितंबर 2011 को बंबई हाइकोर्ट में अपील की. न्यायमूर्ति बी.एच. मर्लापल्ले और न्यायमूर्ति निशिता म्हात्रे की खंडपीठ ने चैनल को निर्देश दिया कि अगर वह चाहता है कि उसकी अपील को स्वीकार किया जाए, तो वह 20 करोड़ रु. नकद और 80 करोड़ रु. की बैंक गारंटी जमा कराए. हाइकोर्ट के इस रवैए के खिलाफ टाइम्स नाउ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. लेकिन न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति एस.जे. मुखोपाध्याय ने बंबई हाइकोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाइकोर्ट इस मामले पर इसके गुण-दोषों के अनुसार फैसला कर सकता है. टाइम्स नाउ  ने अभी तक पैसा जमा नहीं करवाया है.

बंबई हाइकोर्ट 20 करोड़ रु., शुरुआत में एक वर्ष के लिए, एक राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा में जमा करवाएगा. ब्याज की मौजूदा दरों के अनुसार, इस पर 9.5 प्रतिशत की दर से, एक वर्ष में 1.9 करोड़ का ब्याज मिलेगा. जो पक्ष मुकदमा जीतेगा, उसे यह रकम ब्याज सहित मिलेगी. अगर न्यायमूर्ति सावंत यह मुकदमा जीतते हैं, और चैनल भुगतान नहीं कर पाता है, तो 80 करोड़ रु. उसकी ओर से गारंटी लेने वाले बैंक को चुकाने होंगे. राज्‍यसभा में विपक्ष के नेता और वकील अरुण जेटली 100 करोड़ रु. के हर्जाने को 'असंगत' करार देते हैं. जेटली कहते हैं, ''भारतीय अदालतें जिस मात्रा में हर्जाना दिलवाती हैं, उसकी जानकारी रखने वाले की हैसियत से, यह आदेश कुछ असामान्य लगता है.'' ''भारतीय मीडिया को बंद कर देने का इससे बेहतर तरीका कोई और नहीं हो सकता है कि पत्रकारों, समाचारपत्रों और टीवी चैनलों के खिलाफ ऐसे दंडात्मक हर्जानों के फैसले सुना दिए जाएं, जो भारतीय समाज में पैसे के मूल्य से पूरी तरह असंगत हों.''

इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (आइएनएस) के अध्यक्ष आशीष बग्गा कहते हैं कि टाइम्स नाउ  का मामला भारत में मीडिया के अस्तित्व का सशक्त खतरा पेश करेगा. यह स्वीकार करते हुए कि मानहानि का कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार की एक महत्वपूर्ण शर्त है, वे कहते हैं कि इसका अर्थ इस ढंग से निकाला जाना चाहिए, जो मीडिया के सहज कामकाज में बाधक न हो. यहां तक कि भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी, जो वैसे मीडिया के आलोचक रहते हैं, अदालतों से उस आदेश पर फिर से विचार करने का आग्रह किया है, जिसे वे  'सही नहीं' कहते हैं. 30 अक्तूबर को, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले काटजू ने पिं्रट मीडिया और टेलीविजन न्यूज चैनलों की देखरेख करने के लिए एक मीडिया परिषद बनाने की जरूरत की चर्चा की थी. इस सुझव को देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने खारिज कर दिया था, जो न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के जरिए स्थापित की गई आत्म नियंत्रण प्रणाली के प्रमुख हैं.

एनबीए का न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंर्ड्स विवाद निपटान प्राधिकरण अक्तूबर 2008 से काम कर रहा है. 45 न्यूज चैनलों की सदस्यता वाला एनबीए पहले ही दिशा-निर्देश बना चुका है और 198 शिकायतें सुन चुका है, नौ ब्रॉडकास्टर्स के खिलाफ आदेश जारी कर चुका है और जुर्माना लगा चुका है. बाकी बचे 320 न्यूज चैनलों को भी एनबीए के दायरे के तहत लाने के प्रयास जारी हैं. न्यायमूर्ति वर्मा ने इंडिया टुडे से कहा, ''आप सारी चीजें रातोरात नहीं बदल सकते. 26/11 को मुंबई पर हुए हमलों के कवरेज के बाद से आत्मशासित नियम लगे हुए हैं. मीडिया ने उनका पालन किया है. स्टिंग ऑपरेशनों से जुड़े दिशा-निर्देशों पर अमल हो रहा है.'' लेकिन वे  मीडिया को चेतावनी देते हैं कि बाहरी नियंत्रण को बुलावा देने से बचने के लिए वह हदें पार न करे. वे कहते ह