14 जनवरी को लखनऊ से लांच होगा कैनविज टाइम्‍स

लखनऊ से साप्‍ता‍हिक के रूप में प्रकाशित हो रहा कैनविज टाइम्‍स नए साल पर लोगों के पास दैनिक के रूप में भी पहुंच जाएगा. दैनिक अखबार की लांचिंग मक्रर संक्रांति के दिन चौदह जनवरी को तय की गई है. अखबार की लांचिंग वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन के नेतृत्‍व में होगी, जो इस अखबार समूह के प्रधान संपादक हैं. बताया जा रहा है कि अखबार के लिए पत्रकारों की पूरी टीम तैयार कर ली गई है.

इस अखबार की टीम में हिंदुस्‍तान, जागरण, अमर उजाला, जनसंदेश टाइम्‍स समेत तमाम अखबारों के चुनिंदा पत्रकार जोड़े गए हैं. बताया जा रहा है कि अखबार सोलह से बीस पेज का होगा. कुछ सप्‍लीमेंट भी अखबार के साथ पाठकों तक पहुंचेंगे. भड़ास4म‍ीडिया से बात करते हुए  प्रभात रंजन दीन ने बताया कि अखबार बिल्‍कुल प्रोफेशनल तरीके से निकाला जाएगा. और यह अखबार प्रो पीपुल होगा. हम इसमें आम लोगों को अधिक से अधिक स्‍थान देने की कोशिश करेंगे. उन्‍होंने बताया कि अखबार की पूरी टीम तैयार हो चुकी है. ज्‍यादातर ऐसे साथियों का चयन किया गया है जो जमीन से जुड़े हुए हैं. एलिट सोच वाले लोगों को अखबार का हिस्‍सा नहीं बनाया गया है. प्रयास है कि एक ऐसा अखबार लोगों तक पहुंचे जो उनकी आवाज बने, उनकी जरूरत पूरी करे.

ईटीवी उर्दू पर ”इलेक्‍शन न्‍यूज लाइन” तय करते दिखेंगे संतोष भारतीय

देश के जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार और 'चौथी दुनिया' हिंदी-उर्दू साप्ताहिक अखबारों के प्रधान संपादक संतोष भारतीय एक बार फिर टीवी पर नए अवतार में आने वाले हैं. देश की राजनीतिक रग पर जबर्दस्‍त पकड़ रखने वाले संतोष भारतीय इस बार ईटीवी उर्दू पर लेकर आ रहे हैं 'इलेक्‍शन न्‍यूज लाइन', इसके जरिए वे पांच राज्‍यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में नेताओं की हालत और जनता के मन की थाह लेंगे. 

दो जनवरी से प्रारम्‍भ होने वाले इस विशेष चुनावी कार्यक्रम का प्रोमो भी ईटीवी के चैनलों पर नजर आने लगा है. देश के निर्भीक व विश्‍वसनीय पत्रकार माने जाने वाले संतोष भारतीय इसके पहले भी ईटीवी के हिंदी चैनलों पर 'दो टूक' प्रस्‍तुत करके सुर्खियां बटोर चुके हैं. इलेक्‍शन न्‍यूज लाइन हर रोज आठ बजे से प्रसारित होगा. सप्‍ताह में छह दिन यह कार्यक्रम आधे घंटे का होगा जबकि रविवार को पूरा एक घंटा दिखाया जाएगा. जैन टीवी के जमाने में स्‍टूडियो बेस्‍ड कार्यक्रमों को पीपुल ओरिएंटेड बनाकर एक ट्रेंड शुरू करने वाले संतोष भारतीय इस बार भी कुछ उसी अंदाज में नजर आने वाले हैं.

ईटीवी के सूत्रों का कहना है कि कंटेंट के लेकर चूजी माने जाने वाले संतोष भारतीय पत्रकार के साथ सांसद भी रहे हैं, लिहाजा वे राजनीति के हर रंग से वाकिफ हैं, जिसका साफ असर ईटीवी उर्दू के कार्यक्रम में देखने को मिलेगा. बताया जा रहा है कि यह प्रोग्राम चुनाव पर विशेष कार्यक्रम करने वाले दूसरे चैनलों के लिए भी एक चुनौती होगा. बताया जा रहा है कि यह प्रोग्राम न्‍यूज बेस्‍ड तो होगा लेकिन पीपुल ओरिएंटेड होगा. चुनावों के दौरान यह ईटीवी उर्दू का फ्लैगशिप कार्यक्रम होगा.

नक्षत्र से जुड़े पंकज प्रसून

रांची से खुलने वाले नये चैनल नक्षत्र न्यूज से सीनियर लोगों के जुड़ने का सिलसिला जारी है। देश लाइव रांची को अलविदा कह पंकज प्रसून ने नक्षत्र ज्वाइन किया है। वे यहां सीनियर प्रोड्यूसर और एंकर होंगे। पंकज प्रसून देश लाइव में जुड़ने से पहले मुंबई से चलने वाले बॉलीवुड चैलन ज़ूम में असिस्टेंट प्रोड्यूसर थे। उन्होंने मुंबई दूरदर्शन और सीएनबीसी आवाज़ में रिपोर्टिंग भी की है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में करीब सात साल गुजार चुके पंकज प्रसून बिज़नस, इंटरटेन्मेंट और राजनीतिक मामलें के अच्छे जानकार माने जाते हैं।

मीडिया में सबकुछ अच्‍छा होने में वक्‍त लगेगा : एनके सिंह

: मीडिया के चौथा स्‍तम्‍भ होने के वहम में खुद को रखते हैं पत्रकार – उर्मिलेश : वर्धा : महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में सामाजिक विज्ञान अधिवेशन के चौथे दिन संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र की ओर से राष्‍ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। परिसंवाद के विषय ‘मीडिया राजसत्ता और उत्तरदायित्व’ विषय पर बोलने के लिए देश के प्रमुख मीडिया हस्तियों को आमंत्रित किया गया, जिसकी अध्यक्षता प्रेस परिषद के सदस्य शीतला सिंह ने की।

परिसंवाद में दैनिक भास्कर समूह के संपादक श्रवण गर्ग, दैनिक भास्कर, नागपुर के स्थानीय संपादक मणिकांत सोनी, लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक विकास मिश्र, साधना न्यूज चैनल के प्रमुख और भारतीय प्रसारण संघ के सचिव एनके सिंह, राज्यसभा चैनल के संपादक उर्मिलेश और संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. अनिल कुमार राय ‘अंकित’ मंचस्थ थे।

परिसंवाद को संबोधित करते हुए विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि वर्तमान संदर्भों में मीडिया के उत्तरदायित्वों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्‍यकता है। उन्होंने कहा कि मीडिया किसी सामान्य उत्पादकों की तरह नहीं है जो यह कह कर बच जाए कि हम तो उत्पाद बेच रहे हैं। सामाजिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह की अपेक्षा मीडिया से ही की जा सकती है। उन्होंने कहा कि मीडिया शुद्ध व्यापार का रूप ले रहा है, लेकिन व्यापार के लिए मीडिया में इतनी गिरावट नहीं होनी चाहिए कि उसे पेड न्यूज का सहारा लेना पड़ जाए।

इस दौरान भारतीय प्रसारण संघ के सचिव एनके सिंह ने कहा कि मीडिया के सही कार्यों का पता लोगों को नहीं चलता है लेकिन एक गलती होने पर तमाम सवाल खडे़ किए जाते हैं। उन्होंने टेलीविजन का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय टेलीविजन के महज 16 साल हुए हैं। इतनी शैशवास्था में इसमें गलतियां हो सकती हैं। मीडिया में सब कुछ अच्छा होने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा। उन्होंने कहा कि अन्ना के आंदोलन का कवरेज करने पर मीडिया पर सवाल खड़ा किया जाता है, लेकिन सरकार के पक्ष में सकारात्मक खबरों के प्रसारण पर कोई सवाल नहीं उठाता है। दंगों के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया की वजह से ही समाज में दंगें नहीं होते, क्योंकि दंगाइयों में मीडिया का खौफ कायम है।

दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि सरकार ने 1991 में ही पूरी दुनिया के लिए बाजार खोल दिए फिर मीडिया के बाजारीकरण पर सवाल क्यों खड़ा किया जाता है? उन्होंने कहा कि जिस काम को करने में सरकारी समाचार तंत्र असफल साबित हो रहे हैं, उसे पूरा करने की अपेक्षा निजी समाचार संस्थानों से क्यों की जाती है? सोशल नेटवर्किंग साइट को प्रतिबंधित करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि 75 के आंदोलन के दौरान तो कोई सोशल साइट नहीं था फिर इतना बड़ा आंदोलन कैसे खड़ा हो गया? उन्होंने कहा कि एक ओर तो सरकार देश की नीति अर्थशास्त्र से तय करती है, दूसरी ओर मीडिया से ऐसी नीति की अपेक्षा की जाती है, जिसमें मीडिया का अस्तित्व समाप्त हो जाए। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत लाभ के लिए मीडिया को निशाना बनाया जा रहा है।

लोकमत समाचार के संपादक विकास मिश्र ने कहा कि मीडिया की हालत उतनी बुरी नहीं है जितनी बताई जाती है। उन्होंने कहा कि राज्य की जितनी साख आम जनता के बीच है, उससे कई गुणा ज्यादा साख मीडिया की आम लोगों के बीच में बची है। उन्होंने कहा कि जिस नीरा राडिया मामले को लेकर मीडिया को निशाने पर लिया जा रहा है उसे भी उजागर करने का काम मीडिया ने ही किया है। दैनिक भास्कर, नागपुर के स्थानीय संपादक मणिकांत सोनी बतौर वक्ता बोले कि मीडिया को सवालों के कटघरे में खड़ा करने का मतलब खुद पर सवाल खड़ा करना है। मीडिया एक मास्टर चाभी की तरह है। एक मात्र मीडिया ही है जो हर भाषा, हर समाज को एक मंच पर लाकर खड़ा करता है।

राज्यसभा चैनल के प्रमुख उर्मिलेश ने कहा कि मीडिया सही मायने में चौथा स्तंभ नहीं है बल्कि मिथक है, लेकिन उसके वहम में पत्रकार खुद को रखते हैं। जबकि संविधान द्वारा ऐसा कोई भी उपबंध पत्रकारों के लिए नहीं किया गया है। उन्होंने वर्तमान मीडिया परिस्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि मीडिया हमेशा क्षरित होते जा रहा है। मीडिया पर हमेशा राजसत्ता हावी होने का प्रयास करती है, जिसमें बदलाव करने की आवश्‍यकता है। मीडिया यदि हमेशा लाभ के लिए काम करे तो उसका भविष्‍य खतरे में आ सकता है।

अध्यक्षीय वक्तव्य में भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य शीतला सिंह ने कहा कि मीडिया का औद्योगीकरण हो गया है। देश के जितने बड़े उद्योगपति हैं उन्होंने अपने मीडिया संस्थान तैयार कर लिया है। मीडिया के नैतिकताओं का विकास यदि पूंजी के आधार पर होगा तो वह मीडिया को गर्त में ले जाएगा। इस दौरान संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र के प्रो. रामशरण जोशी, प्राध्यापक डॉ. अख्तर आलम, राजेश लेहकपुरे, संदीप कुमार वर्मा और भारी संख्या में शोधार्थी और छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

भाजपा-कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं, घाटे में रहेगी बसपा

प्रदेश में आखिरी चुनाव 2009 में पार्लियामेंट के लिए हुआ। कांग्रेस बिजनौर, मेरठ, बुलन्दशहर व सहारनपुर में चौथे स्थान पर रही। गाजियाबाद में यह राजनाथ सिंह से सीधे मुकाबले में दूसरे नम्बर पर रही। यहाँ राजनाथ सिंह को हराने के लिए सपा ने कांग्रेस को समर्थन कर दिया था। लोक सभा चुनावों में भी सोनिया गाँधी व राहुल गाँधी स्टार प्रचारकों में थे, परन्तु कोई प्रभाव मतदाता पर नहीं छोड़ पाये। मुस्लिम मतदाताओं की धारणा है कि भाजपा को तीसरे नम्बर पर स्थापित करने का कार्य सपा ने ही किया हैं।

कांग्रेस को चार नम्बर से उठा कर संघर्ष में लाने का काम तो कोई चमत्कार ही कर सकता है। वैसे भी 2009 से अब तक केन्द्र सरकार ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया कि वोटर भरोसा कर सके। अधि‍क समय घोटाले करने व उससे बचने में ही रहा। सहारनपुर से प्रभावशाली मुस्लिम नेता रसीद मसूद इस बार कांग्रेस के साथ हैं। सहारनपुर में समर्थकों से अधिक विरोध की राजनीति प्रभावी है। सहारनपुर में सपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व कद्दावर रहे नेता स्व0 राम शरणदास, पुराने कांग्रेसी चौ0 यशपाल सिंह व रसीद मसूद ‍त्रिकोण के तीन कोनों पर विरोध की मुद्रा में बैठ रहे। अब रसीद मसूद के राजनीति में दखल करते उनके कुनबे के कारण कभी खास चेले रहे जगदीश राणा व संजय गर्ग भी विरोधी पाले में आ खडे़ हुए हैं।

रसीद मसूद पिछली बार सपा में थे तो उनके विरोधियों ने बसपा को ताकत पहुँचाई थी। उनके प्रभाव का लाभ कांग्रेस को मिले भी तो भी विरोधियों के कारण सपा लाभ में रहेगी। यहाँ बसपा सर्वाधिक हानि में रहेगी। भाजपा ने तीसरे पायदान से उठने की कोशिश नहीं की, अलबत्ता तीसरा स्थान भाजपा के लिए सुरक्षित रहेगा। ऐसे में कांग्रेस अपने को चौथे पायदान पर रखने में कामयाब रहेगी। देखना है कि बसपा के पांच वर्ष के शासन की त्रासदी का लाभ सपा को कितना मिलता हैं?

लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। इन दिनों समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के हिस्से हैं।

दीपराज राणा को दिया जाएगा ‘कैलाश गौतम गौरव सम्मान’

: ठिठोली-2012 इस बार 17 मार्च को, जुटेंगे नामचीन कवि : इलाहाबाद। आसरा फाउंडेशन द्वारा आयोजित होने वार्षिक आयोजन ठिठोली-2012 कार्यक्रम की रूपेरखा तय कर ली गई है। जनकवि कैलाश गौतम की याद में प्रत्येक वर्ष होली के अवसर पर होने वाले ठिठोली का आयोजन इस बार 17 मार्च को प्रीतमनगर में किया जाएगा। आयोजन में ‘कैलाश गौतम गौरव सम्मान-2012’ इस बार शहर से निकलकर मुंबई की क्षितिज पर पूरे बालीवुड में इलाहाबाद का नाम रौशन करने वाले कलाकार दीपराज राणा को दिया जाएगा। इसका निर्णय प्रीतम नगर स्थित आर पी मेमोरियल स्कूल में शनिवार को हुई बैठक में लिया जाएगा।

इस अवसर पर होने वाले कवि सम्मेलन में अरुण जैमिनी हरियाणा, सुनील जोगी, कीर्ति काले, सुरेंद्र दुबे, सरिता शर्मा, जाहिल सुल्तानपुरी, सरोज त्यागी, प्रीता बाजपेयी, सुमन दुबे, अनिल चौबे, भूषण त्यागी आदि आमंत्रित किए गए हैं। इसकी जानकारी देते हुए मीडिया प्रभारी इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने बताया कि बैठक में कोषाध्यक्ष संतोष तिवारी ने पिछले वर्ष के आयोजन का आय-व्यय का ब्यौरा प्रस्तुत किया। इसके बाद आयोजन की तिथि और कैलाश गौतम गौरव सम्मान-2012 के विषय पर चर्चा हुई। बैठक की अध्यक्षता समाजसेवी विनोद चंद्र दुबे ने की।

फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रदीप तिवारी ने पिछले वर्ष के सफल आयोजन के लिए सभी को धन्यवाद देते हुए कहा कि इस वर्ष का आयोजन और बेहतरीन तरीके से किया जाएगा। इस अवसर पर संस्था के सचिव डा0 पीयूष दीक्षित, चायल ब्लाक प्रमुख दिलीप पाल, सुनील द्विवेदी एडवोकेट, विवेक श्रीवास्तव, इम्तियाज अहमद गाजी, संजय सागर, चंद्रशेखर ओझा, पंकज पाठक, श्रीरंग पांडेय, अनिवाश जायसवाल, विनोद सिंह, शशि प्रकाश सिंह, लक्ष्मीकांत मिश्र आदि लोग मौजूद रहे। बैठक का संचालन युवा कवि श्लेष गौतम ने किया।

गालिब का व्यक्तित्व ‘भारत रत्न’ से बड़ा : यश मालवीय

: ग़ालिब को भारत रत्न दिए जाने के विषय पर बैठक : इलाहाबाद। साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में हरवारा, धूमनगंज में बैठक आयोजित की गई, जिसमें मशहूर शायर मिर्ज़ा गालिब को ‘भारत रत्न’ पुरस्कार दिए जाने की मांग पर चर्चा की गई। एहराम इस्लाम ने कहा कि पूरी दुनिया मिर्जा गालिब की शायरी की कायल है, उर्दू अदब के नाक हैं गालिब, इसलिए यदि उनको भारत रत्न एवार्ड दिया जाता है तो यह हम सभी के लिए हर्ष का विषय होगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुझे लगता है कि यदि भारत सरकार ऐसा निर्णय लेती है तो इसका कोई विरोध भी नहीं करेगा।

गीतकार यश मालवीय की राय उनसे भिन्न रही। उन्होंने कहा कि गालिब का व्यक्तित्व भारत रत्न से बहुत बड़ा है, सौ भारत रत्न मिलकर भी गालिब की बराबरी नहीं कर सकते। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि इस तरह की मांग उठाने का कोई औचित्य नहीं है, अगर ऐसी मांग होगी तो फिर तुलसी, मीर, सूर आदि कवियों को भारत रत्न क्यों नहीं दिया जा सकता? दरअसल, इन सब रचनाकारों का व्यक्तित्व ‘भारत रत्न’ से बहुत बड़ा है।

गुफ्तगू पत्रिका के संरक्षक इम्तियाज अहमद गाजी का कहना था कि गालिब, सूर, निराला, मीर आदि कवियों का व्यक्तित्व और कृतित्व बहुत बड़ा है, इसलिए इनको भारत रत्न दिए जाने के बजाए वर्तमान समय के जो बड़े रचनाकार हैं, जिनकी रचनाओं में देशभक्ति के पुट हैं, उनको यह एवार्ड दिए जाने की मांग उठानी चाहिए। यह बड़े दुख की बात है कि भारत रत्न के लिए जिन लोगों के नामों पर चर्चा की जा रही है, उनमें साहित्यकारों को शामिल नहीं किया गया है। साहित्यकार जयकृष्ण राय तुषार ने कहा कि गालिब जैसे रचनाकार तब के हैं, जब भारत रत्न पुरस्कर की शुरुआत भी नहीं हुई थी, उनको यह एवार्ड दिए जाने की मांग करना ठीक नहीं हैं, उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि इससे बेहतर तो यह होता कि निदा फाजली जैसे शायरों को गालिब एवार्ड दिए जाने की बात की जाती, क्योंकि निदा फाजली के पिता पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन वे भारत में ही रहे, उनके व्यक्तित्व में भारतीयता झलकती है।

मुशायरों के मशहूर संचालक नजीब इलाहाबादी ने कहा कि गालिब जैसे बड़े शायर को यह एवार्ड जरूर दिया जाना चाहिए, क्योंकि इन्होंने अपनी शायरी का परचम पूरे विश्व में लहराया है। आसरा फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रदीप तिवारी का कहना था कि जिस तरह भारत रत्न पुरस्कार देने के लिए खिलाड़ियों के नाम पर चर्चा की जा रही है, उसी तरह निश्चित रूप से साहित्यकारों के नाम पर भी विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। बैठक में इनके अलावा स्वालेह नदीम, अख्तर अजीज, संतोष तिवारी, शिवपूजन सिंह, वाकिफ अंसारी, सुनील दानिश, रमेश नाचीज, संजय सागर, डा0 शैलेष गुप्त ‘वीर’ आदि ने विचार रखे।

यूपी का घमासान : राहुल के कांधे पर कांग्रेस, माया की राह में अपने कांटे

बाइस सालों से यूपी की सत्ता से बाहर कांग्रेस को फिर से सत्ता में लाने के लिये कांग्रेस के युवराज उत्तर प्रदेश की खाक छानने में लगे है। कांग्रेस ने मिशन यूपी को कामयाब बनाने के लिये चुनाव से ठीक पहले मुसलमानों को अरक्षण का दांव खेला है, वहीं पिछडे़ मतदाताओं को भी पार्टी में जोड़ने के लिये भारी संख्या में टिकट बांटे हैं। जबकि सपा के युवराज पर अपनी प्रतिष्ठा बचाने का दबाव है। सपा को अपने कुछ नेताओं की कमी इस चुनाव में जरूर खल रही है। भाजपा ने अपने पुराने चेहरों पर ही दांव लगया है। मायावती सोशल इंजीनियरिग के भरोसे फिर से सरकार बनाना चाहती हैं, बसपा की चुनावी डगर में अपने ही पार्टी के नेता ही रोड़ा बनने लगे हैं।

कांग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने मिशन यूपी की कमान अपने हाथों में लेकर प्रदेश में ताबड़तोड़ चुनावी सभायें करनी शुरू कर दी है। पहले चरण में वह पूर्वांचल में थे तो दूसरे चरण में बदायूं से शुरुआत की और कानपुर में बड़ी सभा कर खत्म किया। तीसरे चरण में सीतापुर से चुनाव प्रचार शुरू कर कल सहारनपुर में विशाल जन सभा कर चुनाव प्रचार को और गति दी। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की सत्ता में बाइस सालों बाद सत्ता में लाने के राहुल गांधी के सपने को साकार करने के लिये उन की बहन प्रियंका भी चुनाव प्रचार में अमेठी और रायबरेली के बाहर भी चुनाव प्रचार के लिये निकल सकती हैं। वहीं कांग्रेस अल्पसंख्यकों को 4.5 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर पहले ही मुसलमानों को खुश कर चुकी है। साथ ही समाजवादी पार्टी के बरिष्‍ठ नेता रसीद मसूद को अपने साथ कर वह मुसलमानों के वोट पर सेंधमारी कर रही है। बेनी प्रसाद वर्मा का केन्द्र सरकार में कद बढ़ाकर पिछड़ों को भी अपने पार्टी के साथ जोड़ने का दांव चला है। कांग्रेस के टिकट बंटवारे में मुसलमानों और पिछड़ों को अधिक अहमियत दी गई है।

कांग्रेस के युवराज यूपी में चुनाव प्रचार के मामले में अभी सभी पार्टियों से आगे चल रहे हैं। वह जहां-जहां सभा करने जाते हैं अपने विरोधियों को घेरने में नहीं चूक रहे हैं। यूपी में सत्तारूढ़ बसपा के खिलाफ वह कुछ अधिक ही मुखर हैं। सभी सभाओं में राहुल गांधी लखनऊ में डिजाइनदार बैठा हाथी विभागों का पैसा खाने की बात कर जनता से तालियां बटोर रहे हैं। राहुल को देखने और सुनने के लिये भारी भीड़ जुट रही है, देखने वाली बात यह होगी कि राहुल की सभा में आने वाली भीड़ कांग्रेस के लिये वोट करती है?

जिस तरह से मुख्यमंत्री मायावती ने अपने मत्रिमंडल के 20 मंत्रियों को भ्रष्ट्राचार और क्षेत्र में खराब फिजा के कारण मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया है। माया का यह नया फार्मूला क्या जनता में बसपा की फिजा सुधारने में कारगर होगी, यह तो वक्त ही बतायेगा पर मयावती ने अपने ही एक सौ से भी अधिक मंत्री, विधायकों का टिकट काटकर चुनावी समर में अपनी राह में कांटे बिछाने का काम किया है।

समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव समाजवादी क्रांति रथ यात्रा लेकर यूपी में सपा के लिये माहौल बनाने में जुटे हैं और फिर से यूपी में सरकार बनाने के लिये भरसक प्रयास कर रहे हैं, पर अखिलेश को अपने पुराने नेता अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, रसीद मसूद की कमी भी खल रही है। आजम खॉ के सहारे सपा मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने के प्रयास में है। देखने वाली बात यह होगी कि आजम खॉ सपा को कितना फायदा पहुंचा पाते हैं।

भाजपा अपने पुराने चेहरों के सहारे ही मिशन यूपी फतह करने के लिये निकल पड़ी है। भाजपा कल्याण सिंह की कमी को पूरा करने के लिये उमाभारती को मैदान में उतारा है, वहीं  मायावती की सोशल इंजीनियरिंग को तोड़ने के लिये ब्राह्मण चेहरे के रूप में कलराज मिश्र को और ठाकुरों को पार्टी के साथ लाने के लिये राजनाथ सिंह को यूपी चुनाव की कमान सौंपी गई है। यदि पिछले बाइस सालो में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक उठा पटकर पर नजर डालें तो 1991 में राम के नाम पर वोट बटोर ने के बाद भाजपा सत्ता में आई भाजपा का बिरोध कर मुलायम सिंह ने मुसलमानों को अपने साथ जोड़ लिया और तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पाई। वहीं मायावती तीन बार भाजपा के सहारे यूपी की मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुईं। 2007 में मायावती को यूपी की जनता ने पहली बार पूर्ण बहुमत दिया। इन बाइस सालों में कांग्रेस ने कई उतार-चढ़ाव देखे मुसलमान, दलित और ब्राह्मण वोट पार्टी से छिंटक कर दूर चला गया। रही सही कसर नरेश अग्रवाल ने पार्टी के विधायकों को तोड़ कर पूरी कर दी।

लेखक सौरभ दीक्षित शाहजहांपुर में आईबीएन7 के पत्रकार हैं.

चित्रा मुद्गल को रूस का अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान

मास्को। मानवीय सरोकारों की पैरोकार हिन्दी की जानी-मानी लेखिका चित्रा मुदगल को रूस का अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान-2009 दिए जाने की घोषणा की गई है।  रूस के 'भारत मित्र समाज' की ओर से प्रतिवर्ष हिन्दी के एक प्रसिद्ध लेखक-कवि को मास्को में हिन्दी-साहित्य का यह महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मान दिया जाता है। इस क्रम में समकालीन भारतीय लेखकों  में अपना विशिष्ट स्थान रखने वाली और कथा-लेखन के प्रति विशेष रूप से समर्पित चित्रा मुदगल को जल्द ही यह सम्मान मास्को में आयोजित होने वाले गरिमापूर्ण कार्यक्रम में दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि पहली बार यह सम्मान किसी महिला लेखिका को मिला है।

मूल रूप से मानवीय संवेदना के पक्ष में खड़ी नज़र आने वाली लेखिका चित्रा मुदगल का जन्म 10 दिसम्बर 1943  को चेन्नई में हुआ था और अब तक उनके नौ कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और संपादन की छह पुस्तकों सहित विविध विधाओं की कुल 41 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस भरी-पूरी साहित्यिक सम्पदा वाली लेखिका चित्रा मुदगल की अंतरराष्ट्रीय ख्याति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी अनेक पुस्तकों का चेक, इतालवी, स्पेनिश, चीनी और नेपाली सहित कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। मराठी, बंगाली,  मलयालम, पंजाबी, कन्नड़, उर्दू,  गुजराती,  तमिल, असमिया आदि भारतीय भाषाओं में भी उनकी पुस्तकों का अनुवाद बहुत पहले ही हो चुका है।

चित्रकला में गहरी रुचि रखने वाली चित्रा मुद्गल ने जे० जे० स्कूल ऑफ़ आर्टस से फ़ाइन आर्टस का अध्ययन किया और  पढ़ाई के दौरान श्रमिक नेता दत्ता सामंत के संपर्क में आकर श्रमिक आंदोलन से भी जुड़ीं, जहाँ उन्होंने उत्पीड़न और बदहाली में जीवन-यापन करने वाली महिलाओं के उत्थान और बुनियादी अधिकारों के साथ-साथ दलित, उत्पीड़न और निम्नवर्ग के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

हिन्दी साहित्य के अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित चित्रा मुदगल, के० के० बिड़ला फाउंडेशन का तेरहवाँ व्यास सम्मान पाने वाली प्रथम लेखिका हैं। सहस्त्राब्दि का पहला इंदु शर्मा कथा सम्मान (यूके) भी उन्हीं खाते में दर्ज़ है। 2010 में चित्रा मुदगल को उदय राज सिंह सम्मान और तमिलनाडु का चिन्नप्पा भारती सम्मान से  भी सम्मानित किया गया है। 'भारत मित्र' समाज के महासचिव अनिल जनविजय ने मास्को से जारी विज्ञप्ति में यह सूचना  दी  है कि प्रसिद्ध रूसी कवि अलेक्सान्दर  सेंकेविच की अध्यक्षता में हिन्दी साहित्य के रूसी अध्येताओं व  विद्वानों की पाँच सदस्यीय निर्णायक-समिति ने चित्रा मुद्गल को वर्ष 2009 के अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान के लिए चुना है। इस निर्णायक-समिति में हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध रूसी विद्वान ल्युदमीला ख़ख़लोवा, रूसी कवि अनातोली पारपरा, कवयित्री और हिन्दी साहित्य की विद्वान अनस्तसीया गूरिया, कवि सेर्गेय स्त्रोकन और लेखक व पत्रकार स्वेतलाना कुज़्मिना  शामिल थे। सम्मान के अन्तर्गत चित्रा मुदगल को पन्द्रह दिन की रूस-यात्रा पर बुलाया जाएगा।  उन्हें रूस के कुछ नगरों की साहित्यिक-यात्रा कराई जाएगी तथा रूसी लेखकों से उनकी मुलाक़ातें आयोजित की जाएँगी।

चित्रा मुद्गल से पहले यह सम्मान हिन्दी के कवि विश्वनाथप्रसाद तिवारी, उदयप्रकाश, लीलाधर मंडलोई, आलोक श्रीवास्तव, बुद्धिनाथ मिश्र, पवन करण, कहानीकार हरि भटनागर और महेश दर्पण आदि को दिया जा चुका है। चित्रा मुद्गल इन दिनों दिल्ली में रहती हैं और उनसे 09873123237 पर संपर्क किया जा सकता है।

रूस स्थित ’भारत मित्र’ समाज द्वारा 31 दिसम्बर 2011 को प्रेस के लिए जारी विज्ञप्ति.

कुशीनगर में अपने ही सहयोगी को पीटा जागरणकर्मियों ने

: प्रबंधन के पूछे जाने पर सभी ने मारपीट की घटना से किया इनकार : कुशीनगर से खबर है कि शैलेंद्र मणि के जागरण छोड़ने के बाद जिलों में जारी तनाव के बीच संपादकीय कर्मचारियों ने अपने ही एक सर्कुलेशन कर्मी को पीट दिया. जैसा कि बताया जा चुका है कि कुशीनगर का पूरा स्‍टाफ जनसंदेश टाइम्‍स में जाने को तैयार बैठा है. इस सूचना के बाद से ही प्रबंधन सतर्क है. मैनेमेंट ने अफवाह और सत्‍य दोनों के बीच अंतर करने के लिए सर्कुलेशन के अपने एक खास व्‍यक्ति विनीत गुप्‍ता को कार्यालय में जासूसी करने का काम सौंप दिया था.

बताया जा रहा है कि मैनेजमेंट से आर्डर मिलने के बाद फास्‍ट हुए विनीत ने कार्यालय के लोगों पर नजर रख रहा था. इसकी जिले के संपादकीय तथा अन्‍य लोगों को भी हो गई थी. इसी बीच विनीत कोई रजिस्‍टर उलट-पलट रहा था, जिस एक संपादकीयकर्मी ने ऐसा करने का कारण पूछा तो विनीत ने कुछ तीखा जवाब दिया. बात बढ़ी और पहले से खार खाए संपादकीय एवं अन्‍य विभाग के कर्मचारियों ने विनीत को धुन दिया. विनीत ने अपने साथ हुई घटना की जानकारी जागरण के उच्‍चाधिकारियों को दी, जिससे सभी से पूछताछ हुई. बताया जा रहा है कि चपरासी से भी इस बात की पूछताछ की गई, परन्‍तु दिचलस्‍प बात यह रही कि सभी ने ऐसी किसी घटना से इनकार कर दिया.

इस घटना के बाद से संपादकीय तथा अन्‍य विभागों के इनकार के बाद प्रबंधन को भी समझ में आ गया है कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि कुशीनगर में पूरी दाल काली हो रही है. खबर है कि प्रबंधन को भी अंदेशा हो गया है कि यहां के कार्यरत कर्मी अचानक झटका दे सकते हैं, लिहाजा अब वो संभावित खतरे से निपटने के लिए हर तरह के दांव आजमाने की रणनीति बना रहे हैं. अब देखना है कि यह जनसंदेश टाइम्‍स में जाने वाली एकता है या विनीत से परेशान होने वाली एकता.

बिहार-झारखंड में पांव पसारेगा नक्षत्र न्‍यूज, नए साल पर होगी लांचिंग

उड़ीसा से चलने वाला उड़िया न्यूज चैनल नक्षत्र न्यूज अब हिंदी भाषी राज्यों में अपने पांव फैलाने की तैयारी में लगा है। एन.के.मीडिया ने अपने इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिये दीपक अम्बष्‍ट और रजत गुप्ता जैसे पुराने धुरंधरों को अपनी टीम के साथ जोड़ा है। नक्षत्र हिंदी केबल के साथ-साथ तमाम डीटीएच प्लेटफार्म पर भी देखा जा सकेगा। एचडी टेक्नोलॉजी और डीटीएच के साथ यह झारखंड से चलने वाला अकेला न्यूज चैलन होगा। अपने पहले फेज में नक्षत्र हिंदी बिहार, झारखंड और उड़ीसा में जनवरी के आखिरी हफ्ते से दिखना शुरू हो जायेगा, फिर इसके बाद हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश में इसके विस्तार की योजना है।

नक्षत्र हिंदी के ग्रुप हेड रजत गुप्ता कहते हैं कि बिहार-झारखंड में हमारा मुकाबला सहारा समय और ईटीवी जैसे चैनलों से है। बिहार-झारखंड के दर्शक राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और यहां आप भूत-प्रेतों की कहानियां दिखाकर नहीं टिक सकते। हमारी चुनौती इन दो राज्यों के सुधी दर्शकों के सामने गहराई वाले एनालिटिकल प्रोग्राम पेश करने की होगी। नक्षत्र न्यूज हिंदी के साथ ही एन.के. मीडिया इन दो राज्यों में अखबार भी निकालेगा। पिछले दो दशकों से हिंदी पत्रकारिता के स्तंभ माने जाने वाले दीपक अम्बष्‍ट कहते हैं कि हमने अपनी टीम में वैसे लोगों को जगह देने की कोशिश की है जो तपे तपायें हैं, और जिनकी अपनी साख अच्छी है। हम क्वालिटी से कोई समझौता नहीं करने वाले।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दैनिक जागरण से इस्‍तीफा दिया

दैनिक जागरण, गोरखपुर से खबर है कि शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अखबार को अलविदा कह दिया है. 25 सालों से लगातार जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे शैलेंद्रमणि ने भरे मन से जागरण को अलविदा कहा. शैलेंद्र मणि पिछले चौदह सालों से गोरखपुर में जागरण का नेतृत्‍व कर रहे थे. सन 97 में यूनिट हेड प्रकाशक, मुद्रक एवं संपादकीय प्रभारी बनने के बाद उन्‍होंने अखबार को उंचाइयों पर पहुंचाया था. खबर है कि शैलेंद्र मणि के इस्‍तीफे के बाद जागरण में हड़कम्‍प मचा हुआ है. 

शैलेंद्र मणि को जागरण में किनारे लगाए जाने की प्रक्रिया डेढ़ साल पहले उस समय शुरू हुई जब रामेश्‍वर पांडेय को स्‍टेट हेड बनाया गया. तभी से शैलेंद्र को झटका देने की रणनीति पर काम चल रहा था. पहले चरण में शैलेंद्र मणि के खास लोगों में रहे अशोक चौधरी, संजय मिश्रा एवं विजय उपाध्‍याय का स्‍थानांतरण किया गया. दूसरे चरण में चंद्रकांत त्रिपाठी यानी सीकेटी को सीजीएम बनाकर लाया गया. कुछ महीने पहले इन्‍हें सभी पदों से हटाकर अपकंट्री के विज्ञापन हेड की जिम्‍मेदारी दे दी गई थी, जिसके बाद से शैलेंद्रमणि काफी आहत चल रहे थे.

बताया जा रहा है कि इसी के बाद से शैलेंद्र मणि के मन में प्रबंधन को लेकर कड़वाहट आ गई थी. जब इनका तबादला कानपुर के लिए कर दिया गया तब मन के अंदर की कड़वाहट बाहर निकल आई और इन्‍होंने जागरण को अलविदा कह दिया. खबर है कि अब शैलेंद्र मणि के नेतृत्‍व में ही जनसंदेश टाइम्‍स की लांचिंग कराई जाएगी. इन्‍हें अखबार का एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर बनाया गया है. जनसंदेश की टीम भी लगभग तैयार कर ली गई है. जिलों में तो जागरण का स्‍ट्रक्‍चर ही तबाह हो गया है, तमाम जिलों में ज्‍यादातर पत्रकारों ने जनसंदेश से जुड़ने की हामी भर दी है. गोरखपुर में भी जागरण की टीम को शैलेंद्र मणि की टीम खोखला करने में लगी हुई है.

उल्‍लेखनीय है कि जब शैलेंद्र मणि ने जागरण की कमान संभाली थी तब जागरण की 32 हजार कापियां बिकती थी, जिसे उन्‍होंने एक लाख सत्‍ताइस हजार तक पहुंचाया था. रिवेन्‍यू भी कई गुना बढ़ा दिया था। पर पिछले कुछ समय से जागरण के अंदर की राजनीति से अखबार के सर्कुलेशन पर भी प्रभाव पड़ा है. दूसरी तरफ ये भी खबर है कि जब शैलेंद्र मणि ने इस्‍तीफा दिया तब मुख्‍य महाप्रबंधन सीकेटी अ‍ाफिस में नहीं थे. वे दस दिनों की छुट्टी पर बरेली गए हुए हैं. सूत्रों का कहना है कि इस्‍तीफा देते समय शैलेंद्र मणि के आंखों में आंसू भरे हुए थे तथा उन्‍होंने अपने सहकर्मियों से कहा कि बहुत भरे मन से यह निर्णय लिया है.

सूत्रों का कहना है कि जागरण प्रबंधन को शैलेंद्र मणि के इस कदम की आशंका तो थी, पर वे इतना बड़ा नुकसान होने की बात सपने में भी नहीं सोचे थे. जिस तरह से खबरें आ रही हैं उससे लगता है कि जनसंदेश की लांचिंग के समय जागरण को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि कल ही खबर आई थी कि गोरखपुर के कुछ पेज बनारस से बनकर आए थे, पर सूत्रों ने इस बात से इनकार कर दिया था, लेकिन जो भी हो शैलेंद्र मणि के जाने के बाद जागरण मैनेजमेंट होने वाले नुकसान का आकलन करते हुए डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर काम करने में लग गया है.

”भूमाफिया पत्रकार स्वतंत्र मिश्रा के खिलाफ गैंगेस्टर के तहत कार्यवाही के संबंध में”

सेवा में, माननीया मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ। विषय- भूमाफिया पत्रकार स्वतंत्र मिश्रा के खिलाफ गैंगेस्टर के तहत कार्यवाही के सम्बन्ध में। महोदय, निवेदन है कि नरेन्द्रनगर कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाईटी लि0, लखनऊ को एल0डी0ए0 द्वारा 51 भूखण्ड कपूरथला स्थित सेक्टर-एफ अलीगंज में आवंटित एवं निबंधित है। एक पूर्व सचिव कुँवर सिंह द्वारा वर्ष 2002 में उक्त भूखण्डों में से बी-1/8, बी-1/9, बी-1/10 (सभी 3803 वर्गफीट) रजिस्ट्रयां कर दी गयी थीं। इनके विरूद्ध मध्यस्थ न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय वर्ष 2004 पर पीड़ित पक्षों द्वारा उक्त समिति के विरूद्ध अपीलें दायर की गयी जो आज भी उ0प्र0 सहकारी ट्रिब्यूनल में विचाराधीन है। Continue reading

प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट सूरतसिंह शेखावत का निधन

झुंझुनूं। कार्टूनिस्ट सूरत सिंह शेखावत का 87 साल की उम्र में गुरुवार रात करीब 9 बजे हृदय गति रुकने से राजस्थान के झुंझुंनू जिले के झेरली गांव में निधन हो गया। उनका दाह संस्कार शुक्रवार को उनके पैतृक गांव झेरली में ही किया गया। उनके दाह संस्कार में विधायक सुन्दरलाल सहित सहित सभी पार्टियों के कई प्रमुख राजनीतिज्ञों और उनके चाहने वाले क्षेत्र के हजारों लोगों ने शामिल होकर उन्हें अन्तिम विदाई दी।

उनके एक पुत्र डॉ. मूलसिंह शेखावत झुंझुनूं से विधायक भी रह चुके हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद शीशराम ओला से भी उनके करीबी रिश्ते रहे हैं। सूरत सिंह एक बार सूरजगढ़ पंचायत समिति के प्रधान, 12 साल तक उपप्रधान और लगातार 35 साल तक झेरली ग्राम पंचायत के सरपंच भी रहे थे। उनके निधन का समाचार पता चलते ही जिले भर में शोक की लहर फैल गई। स्व.सूरतसिंह देश में ख्यातनाम कार्टूनिस्ट थे, उनके बनाये कार्टून देश के हिन्दी व अंग्रेजी समाचार पत्रों व विभिन्न पत्रिकाओं में वर्षों तक छपते रहे हैं। ख्यातनाम कार्टूनिस्ट आर के. लक्ष्मण के करीबी रहे स्व. सूरतसिंह को राजस्थान के बेस्ट कार्टूनिस्ट के पुरस्कार से भी नवाजा गया था।

सूरतसिंहजी की हाजिरजवाबी के किस्से पूरे इलाके में चर्चित रहे हैं। वे आजादी से र्पूव प्रतिष्ठित जे स्कूल ऑफ आर्टस के विद्यार्थी रहे हैं, जिस स्कूल में उनके साथी रहे प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर के. लक्ष्मण को भी प्रवेश नहीं मिल सका था। उनके कार्टून से नाराज होकर एक बार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने उन पर मुकदमा भी दर्ज करवा दिया था, मगर जब वे सूरतसिंहजी से मिले तो उनकी हाजिरजवाबी और तर्कों से सहमत ही नहीं हुए, बल्कि उन पर किया गया मुकदमा भी वापस ले लिया।

दरअसल डॉ. अंबेडकर लोकसभा में एक बिल लेकर आए थे, जो सूरतसिंहजी के दृष्टिकोण से सही नहीं था। इस बिल को टारगेट कर सूरतसिंहजी का एक कार्टून प्रतिष्ठित अखबार में छपा। कार्टून में एक मरे भैंसे को आदमी को घसीटते हुए दिखाया गया था। डा. अंबेडकर को यह बुरा लगा, पर जब दोनों की मुलाकात हुई तो अंबेडकर उनकी बातों से सहमत हो गए। सूरतसिंहजी के चाहने वालों ने इसे एक जिंदादिल इंसान, हाजिर जवाब राजनेता का जाना तथा एक युग का अवसान बताते हुए शोक जताया है। वे अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़कर गए हैं।

झुंझुनूं से रमेश सर्राफ की रिपोर्ट.

बनारस में हिंदुस्‍तान की कमर तोड़ने की तैयारी में जनसंदेश टाइम्‍स, कई के जुड़ने की खबर

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस हिंदुस्‍तान की कमर तोड़ने की तैयारी कर रहा है. जिस तरह से गोरखपुर में दैनिक जागरण के हालात हैं ठीक वैसा ही हालात बनारस में हिंदुस्‍तान का हो गया है. खबर है कि हिंदुस्‍तान से एक दर्जन से ज्‍यादा लोग जनसंदेश ज्‍वाइन करने वाले हैं. सूत्रों का कहना है कि इन लोगों का चयन हो गया है बस ज्‍वाइनिंग लेटर मिलना बाकी है. इन खबरों के बाद से हिंदुस्‍तान प्रबंधन के होश उड़े हुए हैं.

खबर है कि जनसंदेश से जुड़ने वालों में नए और पुराने दोनों हिंदुस्‍तानी शामिल हैं, जिनमें विजय विनीत, योगेश गुप्‍ता पप्‍पू, राधेश्‍याम कमल, लक्ष्‍मीकांत द्विवेदी, असद कमाल लारी, पवन सिंह, वशिष्‍ठ नारायण सिंह और सर्कुलेशन से रामदुलार सिंह एवं एक अन्‍य व्‍यक्ति शामिल हैं. योगेश गुप्‍ता पप्‍पू दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिंदुस्‍तान समेत कई अखबारों में काम कर चुके हैं. इस समय वे काशी पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष भी हैं. लारी पिछले पन्‍द्रह सालों से हिंदुस्‍तान के साथ थे, परन्‍तु कुछ दिन पहले ही उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था. पवन सिंह भी हिंदुस्‍तान के साथ जुड़े रहे हैं और पुराने साथी हैं. बनारस के क्राइम रिपो‍र्टिंग में इनकी अच्‍छी पकड़ है.

विजय विनीत हिंदुस्‍तान में सीनियर रिपोर्टर हैं. पिछले ढाई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय विजय विनीत अपने खोजी खबरों के लिए पहचाने जाते रहे हैं. दैनिक जागरण के साथ लखनऊ, बरेली, अमर उजाला के साथ बरेली तथा हिंदुस्‍तान के साथ बनारस में रह चुके हैं. विजय के पास दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिंदुस्‍तान के सात एडिशनों को लांच कराने की भी अनुभव है. वे बरेली, देहरादून, हिमाचल, हरियाणा, जालंधर, बनारस में इन अखबारों की लांचिंग में शामिल रहे हैं. जनसंदेश टाइम्‍स उनके लांचिंग पैड का आठवां डेस्‍टीनेशन होगा. 

खबर है कि जनसंदेश के संपादकीय कर्मियों के चयन में आशीष बागची, विजय विनीत और असद कमाल लारी की तीन सदस्‍यीय कमेटी गठित की गई है. सूत्रों का कहना है कि विजय विनीत को कोआर्डिनेशन की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. वे सिटी एवं डेस्‍क का कोआर्डिनेशन देखेंगे. सिटी का काम असद कमाल लारी के जिम्‍मे रहेगा जबकि अपकंट्री के प्रभारी वशिष्‍ठ नारायण सिंह होंगे. खबर है कि विजय विनीत ने अभी हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा नहीं दिया है, वे मेडिकल लीव पर चल रहे हैं. विजय फिलहाल सोनभद्र ब्‍यूरोचीफ की जिम्‍मेदारी निभा रहे हैं. खबर है कि जल्‍द ही कई और लोग भी हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देकर जनसंदेश ज्‍वाइन करने वाले हैं.

साल जाते-जाते यशवंत पर दो और लोग लगा गए आरोप

यशवंत न हुए गांव के भौजाई हो गए. जो आए, आंख मारे, छेड़े, और आगे बढ़ ले. पर ठीक भी है. दूसरे बेइमान छेड़े जाने के लिए मिलते कहां हैं. और हम हैं कि छेड़वा छेड़वा के मुग्ध हुए जा रहे हैं. पर इस प्रक्रिया ने सचमुच मुझे अंदर से बदल दिया है. खुद के खिलाफ छापने का तर्क जबसे ढूंढा है तबसे तगड़े से तगड़ा अपने खिलाफ पत्र छाप दे रहा हूं. और इस प्रक्रिया ने मेरे अंदर भयंकर बदलाव ला दिया है. सच में, मान अपमान से परे होने लगा हूं. बहुत हरामी आदमी भी मान-अपमान से परे हो जाता है और संत किस्म का आदमी भी मान-अपमान से उपर उठ जाता है.

मैं किस कोटि का हूं, यह आपके उपर छोड़ रहा हूं. मेरे विरोधी मुझे राकस उर्फ राक्छ्स उर्फ ड्रैगन मानें, मुझे चाहने प्यार करने वाले देवता, साधु, प्रिय मानें…. दोनों के मानने न मानने से भी मेरे पर अब कोई फरक नहीं पड़ने वाला. स्वभाव में यह स्वाभाविक अपग्रेडेशन भड़ास ने किया है. अगर दुनिया भर के लोगों की पोलपट्टी छापने का काम मैं करता हूं तो मुझे अपने खिलाफ आने वाली चिट्ठियों आरोपों को भी उसी सहजता से छापने का माद्दा होना चाहिए. तभी मैं भड़ास का संपादक कहलाने का अधिकारी हूं अन्यथा दुनिया में ढेर सारे संपादक हैं जो चोरी चोरी चोरकटई करके खुलेआम साधु बने घूम रहे हैं.

पर इधर न तो साधु बनने का शौक है और न राक्षस बनाए जाने से कोई दुख. स्थितप्रज्ञ हो जाना अब समझ पा रहा हूं. दुनिया अब जिधर जा रही है उसमें पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता से ज्यादा बड़ा मुद्दा ट्रांसपैरेंसी होगा और ट्रांसपैरेंट होना सबसे बड़ा मेरिट बन जाएगा. इसकी झलक दिखाई भी पड़ रही है. जूलियन असांजे पर कितने तरह के आरोप लगाए गए, टीम अन्ना पर कितने तरह के आरोप लगाए गए, लेकिन जनता को पता है कि ये आरोप अगर सच हुए तो भी उससे असांजे या टीम अन्ना का महत्व कम नहीं हो जाता. लंबी बहस है, जारी रहेगी. और, मैं स्वागत करूंगा अपने खिलाफ लिखने वालों का. वे जरूर लिखें. सबसे पहले मैं छापूंगा.

मैं इतना ही कहूंगा कि मैं भी एक मनुष्य हूं. काम क्रोध लोभ मोह जैसे प्राचीन व मानवीय अवगुण मेरे अंदर भी हैं. इंद्रियजन्य वासनाएं मेरे अंदर भी हैं.  और, सभी अवगुणों व वासनाओ को नाना प्रकार से जीता जानता सीखता आया हूं. गल्तियां करते और उससे बूझते समझते आगे बढ़ता रहा हूं. भिड़ते गिरते धूल पोंछते आगे चलता रहा हूं. और, वही गल्ती करता है जो काम करता है. वही गिरता है जो लड़ता है. द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास पूरी जिंदगी इस प्रयत्न में गुजार देता है कि उसके दामन पर दाग न लगे भले वह पर्दे के पीछे दाग पर दाग खुद लगाए जा रहा हो…. और, यह भी कि उसकी निगाह में आए लोगों में से किस किस के दामन कितने दागदार हैं, किसी के उजले हैं तो क्यों उजले हैं, इस पर विश्लेषण करते.

मुद्दे पर लौटते हैं. दो नए साथियों ने मेरे पर आरोप लगाए हैं. एक साथी ने मेल भेजकर गरियाया है तो दूसरे साथी ने फेसबुक पर कमेंट डालकर आरोप लगाया है. इन दोनों मित्रों के आरोपों को यहां प्रकाशित कर रहा हूं. सोच रहा हूं कि भड़ास4मीडिया पर ही एक 'यशवंत विरोधी कोना' क्यों न शुरू कर दूं ताकि मुझे गरियाने के लिए किसी को इधर उधर न भटकना पड़े. नीचे दोनों पत्र असंपादित प्रकाशित किए जा रहे हैं. आप सभी को नए साल की ढेरों शुभकामनाएं. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया (09999330099)


सेवा में यशवंत भाई,  आपको खबर भेजी थी की आगरा में पंजाब केसरी दिल्ली के आगरा में तीन तीन ब्यूरो हैड हैं जिसे अपने छापा नहीं। मुझे ऐसा प्रतीत होता हैं की कही आप पंजाब केसरी दिल्ली के संपादक अश्वनी कुमार से दर तो नहीं गए क्या। या फिर अश्वनी कुमार आप को भड़ास 4 मीडिया को चलाने का पैसा देते हैं। अगर  यह बात सही हैं तो फिर आप को भड़ास को बंद कर देना चाहिए। क्योंकि भड़ास 4 मीडिया पत्रकारों को न्याय दिलाने का मंच हैं नाकी उनकी आवाज को बंद करने का मंच। आप को पता होना चाहिए की आगरा में पंजाब केसरी के ब्यूरो हैड के रूप में श्री एसके शर्मा जो कि पतरकारिता की आड़ में अपना धनदा चलते हैं तो वही दूसरी और दिनेश भदोरीयआ हैं। इसके साथ साथ श्री निवास गुप्ता भी लटके पड़े हैं।

Abhishek Media

abhishek.media@yahoo.in


ये वही नम्बर 1 न्यूज़ पोर्टल है जिसने वीओआई की एक खबर को पैसे लेकर दबा दिया था। जब मैं जबलपुर में वीओआई का ब्यूरोचीफ़ था। यशवंत जी आपकी मोटी चमड़ी का जवाब नही !! मैंने आपको फ़ोन भी किया था लेकिन आप बच्चों की पढ़ायी की व्यस्तता बता कर मुझे ऐसे चुप करा दिये थे जैसे जिले का कलेक्टर !! आपने सिन्हा साहब और मालवीय साहब से पैसा बटोर लिया। हाँ हर वह पत्रकार चूतिया है जो आपको अपनी वेदना सुनाता है और आप उसकी वेदना को कैश कर लेते हैं. मेरी उसी खबर को एक दूसरी वेबसाइट ने प्रमुखता से छापा था । जब वी ओ आई को अमित सिन्हा ने टेक ओवर किया था।  चाल चरित्र और चेहरा स्थूल रहना चाहिये यशवंत जी ! वक्त किसी का सगा नहीं लेकिन जो जिस बात की दलाली करता है उसे वक्त वहीं ला खड़ा करता है । तब उसे वो सारी बातें याद आती हैं। जो उसने दम्भ में किया था । जिस मकसद से आपने भड़ास शुरू किया था क्या वो शाश्वत रहा है? मैने उपर लिख दिया है भड़ास के भतीजे भूखे रहे और आपने पैसे लेकर ……॥ यशवंत जी हाँथ जोड़ कर माफ़ी मांगने से बच्चों की चित्कार नही सुनायी दे ऐसा हो सकता है क्या? मै नही मानता हूं कि आप सड़क से उठे आदमी हो अगर सड़क से उठे हो तो आदमी नही हो !! यशवंत जी ब्लॉग और साईट्स बहुत हैं लेकिन जिन्हें प्राथमिकता मिल गयी है उन्हें मानवी संवेदनाओ को छोड़ना भी नही चाहिये ।

अनिलराज तिवारी

ब्यूरोचीफ़, हरिभूमि अखबार

सतना (मध्य प्रदेश)

tiwari.anilraj@gmail.com


(अनिलराज तिवारी से फेसबुक पर हुई लंबी चैटबाजी के सिर्फ उस हिस्से को यहां एकसाथ प्रकाशित किया गया है जो अनिलराज की तरफ से मेरे लिए कहे गए. मैंने अपना पक्ष यहां नहीं दिया है. और अब देना जरूरी भी नहीं समझता. जिस वीओआई के बारे में कहा जाता है कि वह भड़ास के चलते ही एक्सपोज हुआ, और आखिरकार बंद हुआ, उसको लेकर क्या कहूं. वीओआई में कार्यरत सैकड़ों लोगों को सेलरी या बकाया या पीएफ या अन्य बकाया अभी तक नहीं दिया गया, तो उसमें से एक अचानक आकर कहे कि यशवंतजी, आपके कारण नहीं मिला तो मुझे इस पर क्या कहना चाहिए. जो लोग भड़ास को एक पैसे का भी सपोर्ट नहीं करते, वे अगर मुझे भूख, बच्चे, दूध आदि की दुहाई देकर गरियाते हैं तो मन करता है कि कहूं कि यार, अपने बच्चे और दूध-भूख की ही तरह थोड़ा भड़ास की भी भूख, सेहत आदि की चिंता कर लेते तो ज्यादा अच्छा रहता. लेकिन सेल्फ सेंटर्ड सोच के इस दौर में हर आदमी चाहता है कि उसके दुख कोई दूसरा आकर खुद ब खुद दूर कर दे और वह दूसरों के दुखों की परवाह करे या न करे, उसे कोई ना टोके. अनिलराज तिवारी जी का प्रकरण क्या था, और किस हालात में मेरे यहां नहीं छपा, एक बार देखना पड़ेगा, लेकिन बताना चाहूंगा कि सैकड़ों की संख्या में आने वाले मेल में से अगर दो तीन दर्जन ही रोज छप पाते हैं तो बाकियों को यह कहां से कहने का अधिकार मिल गया कि मैंने उनकी खबरों पर पैसा ले लिया? अगर न छापा जाना ही पैसे लेने का तर्क है तो चलो भइया मान लेता हूं कि मैं हर रोज कम से कम लाख दो लाख तो बना ही लेता हूं. पर मेरी माली हालत जानने वाले जानते हैं कि मेरे पास कितने पैसे हैं, कैसी जगह पर रहता हूं, किस तरह से गुजारा करता हूं. पर मैं सफाई किस किस को और क्यूं दूं. प्रणाम. -यशवंत)

कांग्रेस के हसीन सपने

जब संसद में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का बिल पेश हो रहा था, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव प्रबंधक अपनी जीत की रणनीति बनाने में जुटे थे। अल्पसंख्यकों को आरक्षण देकर कांग्रेस कितने वोट ‘उगाह’ पाएगी, अभी कहना मुश्किल है, लेकिन कांग्रेस के ‘चुनाव प्रबंधकों’ का दावा है कि कांग्रेस यूपी में सरकार बनाने जा रही है, जबकि राजनीतिक विश्लेषक इसे ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ जैसा करार देते हैं।

उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है, कांग्रेस की न केवल बेचैनी बढ़ गई है, बल्कि उसे लखनऊ की कुर्सी सपने में नजर आने लगी है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का यह भी दावा है कि यदि कांग्रेस अपनी सरकार नहीं बना पाई, तो इतना अवश्य होगा कि उसके बिना सरकार बनाना भी संभव नहीं होगा। जिन इलाकों में कांग्रेस ने दो दशकों से एक भी सीट नहीं जीती, उन इलाकों की अधिकतर सीटें कांग्रेस की झोली में जाने का दावा कांग्रेस के चुनाव प्रबंधक कर रहे हैं। याद रहे कि बिहार के चुनावों के दौरान कांग्रेस के प्रबंधकों ने राहुल को चुनाव जीतने की तस्वीर पेश की थी और मुंह के बल गिर पड़े थे। कांग्रेस की चुनावी रणनीति और क्षेत्र में जुटे चुनाव प्रबंधकों की सही तस्वीर हम आपके सामने रखेंगे, लेकिन उससे पहले एक ‘ओपिनियन पोल’ पर चर्चा कर लेते हैं।

अभी पिछले हफ्ते ही एक निजी चैनल ने चुनाव से पहले का ओपिनियन पोल जारी कर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में शिरकत करने वाली तमाम बड़ी राजनीतिक पार्टियों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस पोल में जहां बसपा को मात्र 120 सीटें देकर उसकी स्थिति कमजोर बताई गई है, वहीं सपा को 135 सीटों के साथ सबसे मजबूत उभरती पार्टी दिखाया गया है। इसी तरह कांग्रेस को 68 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। सीटें बढ़ने की बात तो भाजपा के बारे में भी कही गई हैं। इस सर्वे में भाजपा को 65 सीटें आने की बात कही गई है। पिछले चुनाव में भाजपा को 51 सीटें मिलीं थी। कुल मिलाकर यह शुरुआती ओपिनियन पोल जहां बसपा को सत्ता से बाहर कर रहा है, वहीं सपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती नजर आ रही है। लेकिन कांग्रेस के चुनाव प्रबंधकों को 65 सीटों पर नाराजगी है। 22 से 65 सीटें मिलने के बावजूद कांग्रेस का मानना है कि उसके साथ पोल करने वालों ने छल किया है। किसी साजिश के तहत उसे कम आंका गया है।

403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा वाले राज्य को कांग्रेस ने चुनावी रणनीति के तहत 10 जोनों में बांटकर वहां अपने महत्वपूर्ण और राजनीति के चतुर सुजान घाघ लोगों को बैठा दिया है। हर जोन के पास लगभग 40 सीटों की जिम्मेदारी है। आप यह भी कह सकते हैं कि सात से आठ जिलों को मिलाकर यह जोन बनाया गया है। इन 10 जोनों के प्रमुख हैं- सदानंद सिंह, मदनमोहन झा, जगदीश मेहरा एवं प्रेमचंद्र गुड्डू, अश्क अली टाक, मुजफ्फर हुसैन, भाई जगत प्रताप, रामेश्वर नीखरा, अशोक कुमार, चंदन बागची और शकिरूर्जमां अंसारी।

सबसे पहले आपकी मुलाकात मदनमोहन झा से कराते हैं। झा साहब बिहार की राजनीति करते रहे हैं। चुनावी गणित की अच्छी जानकारी रखने वाले झा साहब जोन नंबर 10 में तैनात हैं। जोन 10 में बुंदेलखंड का इलाका है। कानपुर से चित्रकूट तक का इलाका। इस जोन में करीब 40 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इस जोन से 2007 के चुनाव में कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं। झा साहब को इस बार यहां से 20 से ज्यादा सीटें आने की संभावना दिखाई पड़ रही है। इसके पक्ष में उनका तर्क भी है। वे कहते हैं, ‘अभी 40 में से 20 सीटों की उम्मीदवारी ही हम तय कर पाए हैं और बाकी सीटें अभी तय होनी हैं। इस बार हम इस इलाके से 20 से ज्यादा सीटें जीतने की स्थिति में हैं। लोग मुलायम और माया के राज से तंग आ चुके हैं और यहां राहुल गांधी का करिश्मा चल रहा है।’ झा साहब की यह भविष्यवाणी कितनी खरी उतरती है, यह तो वक्त ही बताएगा।

बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सदानंद सिंह को कांग्रेस ने इलाहाबाद जोन में तैनात किया हुआ है। इस जोन में 39 सीटों पर नजर रखने की जिम्मेदारी सदानंद सिंह पर है। सिंह साहब कहते हैं कि हमारी स्थिति करीब 28 सीटों पर अच्छी है और सीधे टक्कर वाला मामला है। राहुल और कांग्रेस के पक्ष में लोगों को देखकर सपा और बसपा के लोग भयभीत हो रहे हैं। मुलायम शासन में गुंडई और माया राज में पार्क के नाम पर करोड़ों की लूट को जनता देख रही है। हम विकास के नारों पर काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि लोकपाल से गरीबों का कोई लेना-देना नहीं है। हम उनके लिए फूड सिक्योरिटी बिल ला रहे हैं।’

एक हैं भाई जगत प्रताप। महाराष्ट्र में अभी एमएलसी हैं। पार्टी ने चुनावी जोन चार में इनकी तैनाती की है। इस जोन के तहत शाहजहांपुर, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, पीलीभीत और फर्रुखाबाद जिले हैं। इस जोन में 43 सीटें आती हैं। पिछले चुनाव में इस जोन से कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। बाद में एक भाजपा से और एक सपा के विधायक कांग्रेस में शामिल हुए। भाई जगत प्रताप कहते हैं, ‘भले ही पिछले चुनाव में यहां से कोई सीट पार्टी को नहीं मिली हो, लेकिन इस बार 20 से ज्यादा सीटें हम जीत रहे हैं। हम या तो खुद सरकार बनाने की स्थिति में होंगे, नहीं तो हमारे बगैर सरकार नहीं बन सकती है। आने वाले दिनों में हम और बेहतर होंगे।’

पूर्व सांसद जगदीश मेहरा को कांग्रेस ने जोन एक (गाजियाबाद, पश्चिमी उप्र) की जिम्मेदारी दे रखी है। इनके साथ उज्जैन के सांसद प्रेमचंद्र गुड्डू को भी लगाया गया है। मेहरा कहते हैं कि हमें कम से कम 80 से 90 सीटें तो मिल ही जाएंगी और सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो हम 100 से ऊपर भी जा सकते हैं। राहुल जी की वजह से कांग्रेस के प्रति युवाओं में जो उत्साह देखने को मिल रहा है, वह कल्पना से परे है। बसपा और सपा की राजनीति से लोग तंग आ चुके हैं, इसलिए एक बार कांग्रेस की सरकार को भी युवा पीढ़ी देखना चाह रही है।’

रामेश्वर नीखरा की जिम्मेदारी जोन पांच को संभालने की है। जोन 5 का मुख्यालय लखनऊ में रखा गया है। नीखरा अपने इलाके में ‘चाणक्य’ के नाम से मशहूर हैं। उन्होंने कहा कि जो ओपिनियन पोल हाल में सामने आए हैं, वह गलत है और झूठे भी। आज सारा वातावरण कांग्रेस के पक्ष में है और हम सरकार बनाने की स्थिति में हैं। हम विकास का मुद्दा लेकर जनता के पास जा रहे हैं और जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है, यह सब मीडिया का इश्यू है। लखनऊ में बैठे नीखरा को वहां के ग्रामीण जिला अध्यक्ष सिराज भाई का सहयोग मिल रहा है। सिराज भाई पर कांग्रेस को जिताने की जिम्मेदारी है, लेकिन सिराज भी राहुल की भाषा ही बोलते नजर आ रहे हैं। सिराज कहते हैं, ‘पिछले 22 सालों से कांग्रेस सत्ता से बाहर है और नई पीढ़ी को कांग्रेस शासन का अहसास भी नहीं है। अब प्रदेश के युवा राहुल के साथ आ रहे हैं और भीड़ में आने वाले युवा वोट में बदल गए, तो कांग्रेस की बड़ी जीत पक्की है।’

चंदन बागची को तो आप जानते ही होंगे। बिहार विधानसभा चुनाव में भी बागची सक्रिय थे। बिहार में भी कांग्रेस की सरकार को सभी ‘चुनाव प्रबंधक’ बना रहे थे। हालांकि राहुल को बिहार की स्थिति की सही जानकारी थी, लेकिन इतना खराब परिणाम आएगा, इसकी कल्पना राहुल को नहीं थी। इस बार कांग्रेस ने बागची साहब को भी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी है। बागची साहब जोन 7 को देख रहे हैं। गोरखपुर समेत 40 विधानसभाओं की जिम्मेदारी बागची पर है। वह कहते हैं, ‘इस बार माया और मुलायम गफलत में न रहें। कांग्रेस के सामने उनकी नैया डूब चुकी है। माया और मुलायम ने जिस तरह से यूपी को बर्बाद किया है, उसी तरह जनता इन्हें समाप्त करने जा रही है। हम इस बार सरकार बनाने जा रहे हैं। हम पूर्वांचल और बनारस में अच्छी सीटें ला रहे हैं। परिणाम देखकर आप दंग हो जाएंगे।’

जोन 6 बस्ती और उसके पड़ोसी जिले को नियंत्रित कर रहा है। यहां के प्रभारी हैं समस्तीपुर के अशोक कुमार। वह राहुल के काफी नजदीक भी हैं। कांग्रेस को इस जोन में कुल दो सीटें पिछले चुनाव में मिलीं थीं। इस जोन में कुल 40 सीटें हैं और अशोक कुमार को यकीन है कि इस बार इस जोन से 20 से ज्यादा सीटें कांग्रेस को मिल सकती हैं। अशोक कुमार कहते हैं, ‘सर्वे में कांग्रेस को कम सीटें दिखाई गई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस के अलावा किसी पार्टी के लिए कोई जगह नहीं है। हम कई इलाकों में वन-टू-वन फाइट में हैं। इस इलाके से भाजपा का सफाया हो रहा है। हम 150 से ज्यादा सीटें ला रहे हैं। हम सरकार बनाएंगे और सरकार नहीं बनती है, तो किसी के साथ एलायंस नहीं करेंगे।’

जोन दो की जिम्मेदारी अश्क अली टाक को दी गई है। इस जोन में आगरा, अलीगढ़ समेत 43 जिले हैं। टाक कहते हैं, ‘पिछले चुनाव में यहां से तीन सीटें कांग्रेस को मिलीं थी, लेकिन इस बार 15 से 20 सीटें हमें मिल रही हैं। यहां से बसपा और सपा का नामों-निशान नहीं बचेगा। चुनाव होने दीजिए, तब पता चलेगा कि असली हीरो कौन है। राहुल के सामने कोई टिकेगा नहीं।’ कांग्रेस की जमीनी हकीकत चाहे जो हो, आप इतना तो देख ही रहे हैं कि कांग्रेस के सभी दिग्गज चुनाव प्रबंधक ‘राहुल फोबिया’ के शिकार हैं। ये वही सारे लोग हैं, जो बिहार चुनाव में भी राहुल की जीत मान रहे थे। संभव है कि राहुल की मेहनत से प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस को कुछ सीटें और मिल सकती हैं, लेकिन सरकार बनाने की बात लोगों के गले उतर नहीं रही है। गरोठ, झांसी के सपा विधायक और अखिलेश यादव के नजदीकी दीपनारायण यादव कहते हैं कि चुनाव के पहले कुछ भी कहना ज्यादा है। राहुल मीडिया में भले ही दिखाई पड़ रहे हों, लेकिन वह चुनाव जीतने नहीं जा रहे हैं। सपा अपने सिद्धांतों पर चल रही है और हमारी जीत तय है। यह तो चुनाव में ही तय हो जाएगा कि असली हीरो कौन है?’

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल का यह लिखा हमवतन अखबार में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

लोकपाल मुद्दे पर मीडिया की मंथरा टाइप चुगलखोरी वाली पत्रकारिता

लोकपाल लटक गया. काँग्रेस भाजपा को दोष दे रही है, भाजपा सरकार को कोस रही है, ममता भी नाराज़ हैं, लालू के लोग बिल फाड़ रहे हैं तो मुलायम के लोग हल्ला कर रहे हैं कि लोकपाल कमज़ोर है. कोई अन्ना को असफल बता कर खुश है तो कोई संसद को सर्वोपरि साबित करने में व्यस्त है, नेता बयानबाज़ी में मस्त हैं और जनता भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी से त्रस्त है. पता नही इस आठ नौ माह की मशक्कत में किसको क्या मिला मगर लोकपाल के लिये की गई मेहनत, जन आंदोलन और संसद में अचानक हुये गर्भपात का घिनौना सच सबने देखा.

इस एक बिल के लिये नेता और जनता के बीच कड़ुवाहट के बीज़ पनपते नज़र आये और अब उस नाटक के लिये ज़िम्मेदारी तय करने के लिये स्वयंभू ठेकेदार मीडिया की जो भूमिका रही वो तो और ज्यादा शर्मनाक है. उसने आपको ये कहा, आपका क्या कहना है, आप को वो ये कह रहा है, आप क्या कहेंगे, बस मंथरा टाइप की चुगलखोरी को पत्रकारिता का नया स्वरुप देकर सिर्फ और सिर्फ वैमनस्यता और कडुआहट ही बढाई है. क्या इस तरह की बकवास / बहस जरूरी होती है? क्या बहस के बहाने आरोप प्रत्यारोप दिखाना जरूरी है? क्या इस देश में समाचारों के नाम पर सिर्फ नेताओं के विषवमन को सारे देश में फैलाना जरूरी है? दिन भर की बकवास देखने के बाद मुझे समझ में ही नही आया कि आखिर बहस का मतलब ही क्या है?

रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार अनिल पुसदकर Anil Pusadkar ने उपरोक्त टिप्पणी अपने फेसबुक वॉल पर लिखी है. वहीं से साभार.

सौ से ज्यादा विधायक और दर्जनभर से ज्यादा सांसद नक्सलियों के मददगार!

नक्सल प्रभावित इलाकों के अधिकतर विधायक और सांसद इस बात से हैरान-परेशान हैं कि उन्हें केंद्र के ‘इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान’ से दूर रखा जा रहा है। उनका तर्क है कि विधायक और सांसद स्थानीय स्तर की सभी समस्याओं को जानते हैं, लोगों को पहचानते हैं और सबसे बड़ी बात कि स्थानीय भूगोल की अच्छी समझ भी रखते हैं, उन्हीं लोगों के बीच से चुनकर भी आते हैं। तब क्या कारण है कि केंद्र की विकास योजनाओं में उन्हें पूछा तक नहीं जा रहा?

इन नेताओं का अपना तर्क है कि यदि सरकार सहयोग लेती है, तो नक्सली इलाकों के विकास में न सिर्फ तेजी आ सकती है, बल्कि राह से भटके लोगों को भी सही रास्ते पर लाया जा सकता है। सवाल है कि जब तमाम सरकारी योजनाओं के संचालन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सांसद और विधायकों की भूमिका होती है, तो फिर नक्सली इलाके से जुड़ी विकास की इस महत्वपूर्ण योजना से जनप्रतिनिधियों को क्यों अलग रखा जा रहा है?

छत्तीसगढ़ कोटा के कांग्रेसी विधायक लखमा कवासी कहते हैं, ‘अगर सरकार की आईएपी योजना को सही लोगों तक पहुंचाना है, तो स्थानीय नेताओं को उससे जोड़ना ही चाहिए। शहरी इलाकों में इस योजना के दर्शन तो हो जाते हैं, लेकिन जंगल के भीतर और गांवों में जहां इस योजना की ज्यादा जरूरत है, वहां इसका नामों-निशान तक नहीं है। केवल पुलिस और कलेक्टर के जरिए इस काम को अंजाम नहीं दिया जा सकता। ऐसे में हम कह सकते हैं कि नक्सली इलाकों की यह योजना ‘लूट’ की शिकार हो रही है और सरकारी महकमों के लिए यह लूट का जरिया बन गया है।’

ऐसा नहीं है कि आईएपी के बारे में कांग्रेस नेता ही इस तरह की बात कह रहे हों। इस प्रदेश के कई भाजपा नेता भी इस योजना को लूट के सिवा कुछ नहीं मान रहे हैं। घोर नक्सली जिला दंतेवाड़ा से विधायक हैं भाजपा के भीमा मांडवी। मांडवी कहते हैं, ‘हम जनता के प्रतिनिधि हैं और जनता हमें वोट देती है। हमलोग यहां के भूगोल से परिचित हैं और साथ ही जनसमस्याओं से भी। इस योजना में अगर सरपंच से लेकर विधायक और सांसद को जोड़ा जाता, तो संभव है योजना के कुछ बेहतर परिणाम निकल कर आते। हर जिले को मिले 30 करोड़ रुपये कहां जा रहे हैं? यह तो सरकार ही बता पाएगी।’ कुछ इसी तरह के विचार कांकेर से भाजपा की विधायक सुमित्रा मारकोले का भी है। सुमित्रा कहती हैं, ‘आईएपी योजना से हम लोगों का कोई मतलब नहीं है। विधायकों को विश्वास में लेकर अगर नक्सली इलाकों में यह योजना चलाई जाए, तो परिणाम ज्यादा अच्छे निकल सकते हैं। सरकार को इस योजना से स्थानीय नेताओं को जोड़ना चाहिए।’

बिहार जहानाबाद के वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजित सिंह केंद्र सरकार की इस योजना से काफी नाराज हैं। अजित सिंह की सोच है कि नक्सली इलाकों में काम करना इतना आसान होता, तो अभी तक इलाके का कायाकल्प हो गया होता। अक्सर देखा गया है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों का विरोध होने की बात सामने आती है और सरकारी या निजी एजेंसियां जान के भय से काम को अंजाम तक नहीं पहुंचा पातीं। इस सवाल का जवाब लखमा कवासी देते हैं। कवासी का मानना है कि नक्सलियों के विरोध के बावजूद जनता वोट तो देती है, लेकिन विकास के मसले पर उनकी राय नहीं ली जाती। ऐसे में मुट्ठी भर नक्सली विकास कामों का विरोध कर जाते हैं और वोट डालने वाली वही जनता कुछ नहीं कर पाती। इसके लिए जरूरी है, विकास कामों में जनता और नेताओं की भागीदारी का होना।’

उत्तर प्रदेश का सोनभद्र इलाका भी नक्सलवाद की चपेट में है। यहां के दो विधान सभा क्षेत्र दुद्धी और राबर्ट्सगंज से बसपा विधायक हैं सत्यनारायण जैसल। जैसल कहते हैं कि नक्सली क्षेत्र में अब तक कोई भी काम ठीक से नहीं हो पा रहा है। जहां तक केंद्र सरकार की आईएपी योजना का सवाल है, तो इस योजना को पूरी तरह से पुलिस और कलेक्टर के हवाले कर दिया गया है। सच्चाई यह है कि इस योजना का अभी तक कोई लाभ इस इलाके को नहीं मिला है।’ केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक नौ राज्यों के 83 जिले नक्सलवाद की चपेट में हैं। आंध्रा के कुल 22 जिलों में 16, बिहार के।

क्या है आईएपी योजना : आईएपी योजना, पंचायती राज मंत्रालय के अंतर्गत चलने वाली पिछड़े और जनजातीय इलाकों के विकास के लिए योजना आयोग द्वारा संचालित कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आईपीए के फंड मूल रूप से बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड से ही लिए जा रहे हैं। इस योजना को देश के उन जिलों में 2010 से चलाया जा रहा है, जो अति पिछड़े और जनजातीय इलाके हैं। इन्हीं इलाकों में नक्सलवाद ज्यादा है। इस योजना को चलाने की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर, जिला एसपी और फॉरेस्ट अफसर के ऊपर है। इसके लिए जिला स्तर पर एक कमेटी बनाई गई है। यही कमेटी इलाके के लिए योजना बनाती है। योजना के तहत सड़क, आंगनवाड़ी, स्कूल बिल्डिंग, स्वास्थ्य व्यवस्था, पानी और बिजली को प्राथमिकता में रखा गया है। पिछड़े और जनजातीय इलाकों में तैनात अर्द्धसैनिक बल और ‘कोबरा’ से इस योजना को चलाने में सहयोग लिया जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल का यह लिखा हमवतन अखबार में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

गिरफ्तार हुआ पत्रकार पर पिस्‍तौल तानने वाला डाक्‍टर

: कोर्ट ने 14 दिन के न्‍यायिक हिरासत में भेजा : अंबाला : दैनिक भास्‍कर के पत्रकार सनमीत सिंह से मारपीट करने तथा उस पर पिस्तौल तानने के आरोपी डाक्टर अरुण दलाल को पुलिस ने आखिरकार घटना की पांचवीं रात गिरफ्तार किया। पुलिस ने उसे ड्यूटी मजिस्ट्रेट की कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने आरोपी डाक्टर को 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में भेज दिया, जबकि उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई शनिवार को निर्धारित की है।

डाक्टर अरुण दलाल के खिलाफ जो धाराएं लगाई गई थी, उसमें पुलिस ने आम्‍र्स एक्ट धारा को पेंडिंग रख दिया था। पुलिस डाक्टर दलाल को लेकर सुबह 11 बजे के करीब कोर्ट में पेश करने के लिए पहुंची। पुलिस आरोपी डाक्टर को उस रास्ते से लेकर कोर्ट पहुंची, जहां से मजिस्ट्रेट व जज आते हैं। मुजरिम के वकील ने जब बहस शुरू की तो पत्रकार के वकील शैलेंद्र शैली ने कोर्ट को बताया कि डाक्टर पहले भी पिस्तौल का इस्तेमाल कर चुका है। वकील शैली की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

डाक्टर की गिरफ्तारी को लेकर अंबाला के पत्रकार पिछले चार दिन से पूरी तरह से मुखर होकर विरोध कर रहे थे। नाराज पत्रकार अंबाला के डीसी शेखर विद्यार्थी से मिले थे। उसके बाद वीरवार को पुलिस कमिश्नर से भी पत्रकारों की एक्शन कमेटी ने मुलाकात की थी। कमिश्नर को पूरे हालात के बारे में जानकारी दी थी। इसी के चलते बलदेव नगर पुलिस को वीरवार रात को ही डाक्टर दलाल को गिरफ्तार करना पड़ा था।

पुलिस ने एक और धारा जोड़ी : पुलिस ने जहां आर्म्‍स एक्ट के तहत केस को पेंडिंग कर डाक्टर दलाल को कोर्ट में पेश करने से पूर्व तरह से बचाव करने की कोशिश की वहीं पुलिस ने डाक्टर दलाल के खिलाफ एक और धारा 510 भी जोड़ दी है।

दैनिक जागरण, गोरखपुर : ‘अरबी बसंत’ की आस अधूरी

: कानाफूसी : संपादकीय विभाग के कर्मियों से हो रही है खूब बदतमीजी : घुटन में जी रहे जागरण के स्थापना काल से जुड़े पत्रकार : सूचनाएं मिलने के बाद भी चुप है कंपनी का शीर्ष प्रबंधन : अरब देशों के क्रूर तानाशाहों की करतूतें जब जब हद से गुजरने लगी तब लोगों ने मौत को हथेली पर लेकर जनविद्रोह किया। नतीजा हुआ कि तीन अरब देशों में तानाशाहों को अपने तख्त-ओ-ताज छोड़ना पड़ा। यह सब इसीलिए हुआ कि वहां के लोगों ने निर्भीक होकर क्रूर तानाशाहों से लड़ने की हिम्मत जुटाई। अरब के लोगों की इस सफलता को ‘अरबी बसंत’ का नाम दिया गया।

पिछले करीब एक वर्ष से तानाशाही के साए में जी रहे दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग के कर्मी यह सोच रहे थे कि नया साल उनके लिए भी ‘अरबी बसंत’ जैसा होगा, पर उनकी यह आस न सिर्फ अधूरी रही, बल्कि रोज-रोज और हालात बिगड़ रहे हैं। दैनिक जागरण, गोरखपुर के स्थापना काल से ही जुड़े अनेक वरिष्ठ संपादकीय कर्मी आजकल इसलिए घुटन में जी रहे हैं कि रात में ड्यूटी के दौरान वे जो भी 8-10 घंटे दफ्तर में गुजारते हैं, इस बीच उन्हें यह भय सताता रहता है कि उनके विभाग का स्वयंभू विभागाध्यक्ष कभी भी उनसे बदतमीजी कर सकता है।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब गोरखपुर के सीजीएम सीकेटी ने यूपी स्टेट हेड काका को कथित औकात बताई थी तबसे कुछ समय तक उनका यह ‘चेला’ और दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग का स्वयंभू विभागाध्यक्ष शांत रहा। पर, इधर कुछ दिनों से फिर उसके तेवर में गर्मी आने लगी है। लगता है कि काका ने उसे यह छूट दे दी है यहां के संपादकीय कर्मियों से अपनी बदतमीजी बदस्तूर जार रखो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। शायद यही वजह है कि उक्त कथित विभागाध्यक्ष नए-नए बहाने खोजकर यहां के वरिष्ठों, पुराने और योग्य संपादकीय कर्मियों से बदतमीजी कर रहा है। इसी हफ्ते जागरण, गोरखपुर के न्यूज रूम में तीन घटनाएं हुई, जिसकी चर्चा न सिर्फ गोरखपुर बल्कि लखनऊ, कानपुर और दिल्ली तक है।

पहला वाकया उस वक्त हुआ जब इनपुट विभाग के सेकेंड हेड ने बाहर भेजी जाने वाली खबरों से संबंधित कुछ प्लानिंग करके कथित विभागाध्यक्ष को सौंपी। प्लानिंग को देखते ही अपनी आदतों के अनुसार विभागाध्यक्ष ने उसमें मीन-मेख निकालना शुरू किया। नतीजा यह हुआ काफी दिनों से उसकी बदतमीजी झेलते हुए खून की घुंट पीने वाले सेकेंड इनपुट हेड को भी गुस्सा आ गया और उन्होंने उसे भी लताड़ते हुए चुनौती दे डाली। इतना सुनते ही वह शर्माई बिल्ली की तरह खंभा नोचने लगा। शायद यह पहली बार था, जब किसी ने ‘तानाशाह’ के सामने तेज आवाज में बोलने की हिम्मत जुटाई थी। वरना, अधिकतर लोग तो उसकी बदतमीजी को न जाने क्या मानकर ग्रहण कर लेते हैं, यह कोई नहीं समझ पाता। इस घटना के बाद संपादकीय विभाग के पीड़ित-प्रताड़ित कर्मियों में क्षणिक खुशी देखी गई।

अभी इस प्रकरण की चर्चा चल ही रही थी कि उक्त ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ अगले ही दिन एक और संपादकीयकर्मी (देश के शीर्ष स्तंभकारों में शुमार) से उलझ गया। उक्त कर्मी कुछ महीना पहले ही वेस्ट यूपी के किसी यूनिट से स्थानांतरित होकर गोरखपुर आया था। सूत्रों का कहना है कि यह नया संपादकीयकर्मी  ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ की नजर में कुछ दिनों से इसीलिए खटक रहा था कि उसकी सीकेटी से निकटता क्यों है। फलस्वरूप, उसने उक्त चर्चित पत्रकार से भी बदतमीजी कर डाली। इन दोनों मामलों को लेकर जागरण, गोरखपुर के संपादकीयकर्मी उच्च प्रबंधन से मिलकर अपनी समस्या बताने की योजना बना ही रहे थे कि ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ 29 दिसंबर की शाम किसी को खबर को छापने के सवाल पर विज्ञापन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से उलझ से गया। कहा जा रहा है कि विज्ञापन विभाग के कर्मचारी भी उस ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ के खिलाफ रणनीति बनाने में जुट गए है। साथ ही यहां के जागरणकर्मी बड़ी बेसब्री से अब उस निरीह दुर्भाग्यशाली संपादकीय कर्मी को ढूंढ रहे हैं, जिसे ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ अपना अगला निशाना बनाने वाला है।

सूत्रों का कहना है कि दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग के भयाक्रांत कर्मियों की दुर्दशा के बारे में सीजीएम सीकेटी द्वारा शीर्ष प्रबंधन को अवगत करा दिया गया है, किन्तु उस पर कोई सुनवाई न होना, यह सिद्ध करता है कि शायद जागरण प्रबंधन ही यहां की लुटिया डुबोना चाहता है। कहा जा रहा है कि ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ की कार्यशैली से खून की आंसू रो रहे संपादकीयकर्मी किसी नए ठौर की तलाश में हैं। यदि सूत्रों पर भरोसा करें तो मौका मिलते ही संपादकीय विभाग के 90 फीसदी से अधिक पत्रकार एकसाथ अचानक वहां शिफ्ट हो सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ और उसके संरक्षक काका की ही होगी।

उधर, ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ के एक करीबी पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि काका की ओर से सर (‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’) को पूरी छूट है। काका ने कह रखा है कि चाहे कुछ भी हो जाए चुनाव में जमकर ‘खेलो’। जो भी होगा, वह चुनाव बाद ही होगा। चुनाव से पहले तुम्हें नहीं हटने दूंगा। यही वजह है कि सर का हौसला बुलंद है।

बताया गया कि सर जबसे गोरखपुर आए हैं, तबसे एक और खास रणनीति पर काम कर रहे है। इसके तहत वह अपने से ज्ञानी किसी को इसलिए नहीं मानते कि यदि किसी दूसरे प्रतिभावान व्यक्ति की चर्चा प्रबंधन तक होगी तो उनकी कुर्सी तुरंत खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए वे खुद को इन्साइक्लोपीडिया मानते हुए गलत बातों को भी मनवाने की जिद पर अड़े रहते हैं। फिलहाल, दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग के कर्मियों को इस शुभकामना के साथ नए वर्ष की बधाई कि आप लोगों की दशा जल्द सुधरे। वैसे मौजूदा हालात को देख यह नहीं कहा जा सकता कि वहां ‘अरबी बसंत’ की कल्पना की जा सकती है।

गोरखपुर से एक पत्रकार की रिपोर्ट पर आधारित. जरूरी नहीं कि उपरोक्त बातें सच ही हों. इसलिए प्रकाशित किया गया है ताकि अंदरखाने की उछलकूद किसी भी तरीके से और किसी भी रूप में बाहर आ सके. अगर आप उपरोक्त बातों से इत्तफाक नहीं रखते तो अपनी असली बात लिख भेजिए, आपके नाम व पहचान का खुलासा न करने की गारंटी भड़ास4मीडिया की है. भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

मेरे खिलाफ वही लाबी है जो स्वतंत्र मिश्र के खिलाफ लगी रही : पंकज दीक्षित

: भड़ास4मीडिया ने मेरे इस्तीफे की गलत खबर प्रकाशित की है : प्रिय यशवंत जी, मैं ये बिलकुल नहीं कहूँगा कि आपने मेरे कार्यमुक्त होने की खबर क्यूँ लगायी, क्यूंकि खबर लगाना किसी भी पत्रकार और संपादक का अधिकार का होता है। एक बात और मेरे सहारा से कार्यमुक्त होने या नहीं होने की खबर से भी मुझ पर कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि मेरी पहचान अपने इलाके में एक सनकी एवं कठोरतम पत्रकार पंकज दीक्षित से है, न कि किसी बैनर से। फिर भी आपके भड़ास के शुरुआती दिनों से जुड़ा होने के कारण अधिकार पूर्वक कहने का हक रखता हूँ, इसलिए कमेन्ट न लिख आपको मेल कर रहा हूँ।

मैंने आपसे वर्जन लेते समय खबर का सोर्स पूछा था, अपने कहा क्यूँ बताऊ? भाई कोई बात नहीं न बताओ, मगर मैं ये बता दूं कि आपके फोन के बाद मैंने अपने सीनियर जिन्हें मैं रिपोर्ट करता हूँ उनसे अपने सहारा में काम करने के बारे में पूछा तो मुझे जबाब मिला था ऐसा कुछ भी नहीं है। उन्होंने बताया कि भ्रम फैलाया जा रहा है और मेरे खिलाफ वही लाबी है, जो स्वतंत्र मिश्र के खिलाफ लगी रही, लेकिन मेरे द्वारा कोई काम बंद नहीं किया जाये। 

दूसरी बात आपकी खबर में जो लिखा है कि मेरी आईडी जमा करा ली गयी वो भी गलत है। मैंने आज ही एक खबर बनायीं और भेजी। आ डी मेरे पास है। मुझे काम बंद करने के लिए भी नहीं कहा गया। रही बात जाँच एवं आरोप की तो हर जिले में चोर टाइप के चिलमचोर पत्रकार होते हैं, जिनका काम बस अधिकारियों की चमचागिरी और खबरचियों को ऊँगली करने का होता है। मेरे साथ भी होता रहता है। ऐसे ही कुछ दलालों का शिकार मैं भी दो साल पहले हुआ था और एक पत्रकार ने मेरे खिलाफ भ्रामक खबर चलाने का मुकदमा लिखा दिया था। इन दलालों के गिरोह में रमेश अवस्थी का भाई अजय अवस्थी भी था, जिसे हटाकर मुझे सहारा टीवी में काम करने को कहा गया था।

एक बात और, मैंने जिला पंचायत फर्रुखाबाद में भर्ती घोटाला की खबर लिखी थी, जिसके कारण घोटाला न हो सका और उन सभी पत्रकारों का भी हिस्सा मारा गया। सारा खेल 50 लाख का था। वैसे मैं सब प्रचारित नहीं करना चाहता कि मैंने कोई कद्दू में तीर मारा था, ऐसी जाने कितनी ही खबरें हम रोज करते हैं। देखने वाली बात ये थी कि जिला पंचायत वालों ने मेरे खिलाफ मुक़दमा नहीं लिखाया कि मैंने फर्जी खबर लिखी थी, मगर दलाल पत्रकारों ने ये कारनामा कर डाला। इसके सिवा तो कोई आज तक मुझ पर कोई दाग नहीं लगा। इसी बात की जाँच क्या होगी जब मैं ख़ुद अपने बायोडाटा में भी इस बात का जिक्र कर देता हूँ। इस बात की शिकायत भी मेरे ज्वाइन करने से पहले हुई थी।

खैर, आपको भेजी गयी सूचना/खबर नितान्त झूठी एवं मुझे नीचा दिखाने के लिए थी, मगर मुझ पर अब इन खबरों से कोई असर नहीं पड़ता क्यूंकि मैं सेल्फ मेड पर्सन हूँ, जो आपसे छुपा नहीं है। ये बात सच है कि मैंने सहारा में ज्वाइन करने के बाद केवल बड़ी खबरे भेजी। हर रोज सड़कों पर कैमरा लेकर सबको चेहरा दिखाना मेरी फितरत में नहीं रहा। शायद इसी से कुछ भ्रम फ़ैल गया। ये सभी आज भी मेरे लिए दिन भर सोचते रहते हैं और मैं अपना काम करता रहता हूँ। बात मेरे जैसे के लिए हाथी के चलने और विरोधियों के कुत्ते जैसे भौंकने की है। इस बात की पुष्टि के लिए आप कानपुर ब्यूरो अनिरुद्ध जी से बात कर सकते हैं। नव वर्ष आप सभी को मंगलमय हो!

आपका अनुज

पंकज दीक्षित

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गाजियाबाद में पेड न्‍यूज हो तो राम बहादुर राय से शिकायत करें

विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की नजर प्रत्याशियों की प्रत्येक गतिविधि पर रहेगी। यदि किसी प्रत्याशी के खिलाफ आचार संहिता का उल्लंघन करने की शिकायत मिली तो आयोग का उड़न दस्ता तुरंत छापा मारेगा और कार्रवाई करेगा। इस बार प्रत्याशियों को नामांकन से पूर्व बैंक में खाता भी खोलना होगा और चुनाव में उसी से धन निकालकर खर्च करना होगा। पेड न्‍यूज पर भी प्रशासन की नजर रहेगी। इसमें दो अधिकारियों समेत दो पत्रकारों को भी रखा गया है।

जिलाधिकारी शशिभूषण ने मंगलवार को संवाददाता सम्मेलन में चुनाव आचार संहिता का पालन करने के लिए कलेक्ट्रेट सभागार में मीडिया की कार्यशाला का आयोजन किया। इस अवसर पर उन्होंने बताया कि आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। प्रत्याशियों की खर्च सीमा 16 लाख निर्धारित की गई है। डीएम ने बताया कि आयोग द्वारा निर्वाचन व्यय पूरी तरह से निर्धारित कर दिया गया है। यदि प्रत्याशी द्वारा धन, बल या कोई उपहार या लालच देकर मतदाता को प्रभावित करने का प्रयास करेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। साथ ही मीडिया में प्रकाशित व प्रसारित समाचारों पर भी नजर रखी जाएगी। इसके अलावा प्रत्याशियों को प्रकाशित कराए गए पंपलेट पर प्रिंटिंग प्रेस का नाम व फोन नंबर भी प्रकाशित करना होगा।

उन्‍होंने बताया कि पेड न्‍यूज पर नजर रखने के लिए सूचना विभाग कार्यालय में एक कंट्रोल रूम बनाया जाएगा, जिसमें तीन-तीन टीवी लगाए जाएंगे और आयोग द्वारा गठित कमेटी समाचारों का आकलन करेगी। यदि पेड न्यूज प्रकाश में आती है तो कार्रवाई की जाएगी। इस कमेटी का नाम मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनीटरिंग कमेटी रखा गया है, जिसमें जिला निर्वाचन अधिकारी, जिला जनसंपर्क अधिकारी तथा वरिष्‍ठ पत्रकार राम बहादुर राय समेत दो पत्रकारों को शामिल किया गया है। दूसरे पत्रकार कुलदीप तलावार हैं। उन्होंने बताया कि निर्वाचन व्यय पर नजर रखने के लिए व्यय प्रेक्षक की तैनाती आयोग द्वारा तैनात की जाएगी जिसमें भारतीय राजस्व सेवा, उत्पाद एवं केंद्रीय उत्पाद सेवा तथा आयकर के अधिकारी शामिल होंगे। जो रुपए के आदान प्रदान पर ध्यान रखेंगे।

सपा ने कहा मीडिया भी आए लोकपाल के दायरे में

नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने कहा कि मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में आना चाहिए। उन्होंने राज्यसभा में बहस के दौरान सभी सांसदों से कहा कि इस विषय में लाए उनके संशोधन का समर्थन करें। भ्रष्टाचार का मामला कोर्ट में चलने के दौरान होने वाला मीडिया ट्रायल गलत है और इस पर अंकुश तभी लग सकता है, जब मीडिया को लोकपाल के दायरे में लाया जाए।

उन्होंने सीबीआई की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए कहा कि इसकी कार्मिक मंत्रालय पर निर्भरता खत्म होनी चाहिए। यह तभी हो सकता है, जब सीबीआई निदेशक का कार्यकाल पांच साल के लिए तय किया जाए। उन्होंने पूर्व सांसदों को लोकपाल के दायरे में लाने की मुखालफत करते हुए कहा कि उनकी सदस्यता खत्म होने के बाद उन्हें लोक सेवक नहीं माना जाना चाहिए। लोकपाल के चयन के मामले में सपा नेता रामगोपाल यादव ने कहा कि अभी इसमें सरकारी वर्चस्व है, जो ठीक नहीं है। इसकी चयन समिति में राज्यसभा में विपक्ष के नेता को भी रखा जाना चाहिए। उन्होंने लोकसभा के अध्यक्ष को रखे जाने का समर्थन नहीं किया। उन्होंने भी लोकायुक्त के मामले में संघीय ढांचे से छेड़छाड़ नहीं करने की बात करते हुए कहा कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। साभार : सहारा

सहारा प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों से मांगा जमीन-जायदाद का ब्‍योरा

: भू-माफिया टाइप पत्रकारों में हड़कंप : सहारा मीडिया से खबर है कि प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों से जमीन-जायदाद का ब्‍योरा मांगा है. इसको लेकर सहारा मीडिया में दो तरह की चर्चाएं हो रही हैं. बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने इसलिए जमीन का ब्‍योरा मांगा है ताकि पता किया जा सके कि सहारा मीडिया की आड़ में खेल करके तो नहीं जमीन-जायदाद बनाया जा रहा है या बनाया गया है. दूसरी तरफ ऐसी भी खबरें हैं कि सहारा प्रबंधन अपने पत्रकारों की जमीन ही हड़पने की फिराक में है. हालांकि इस खबर में उतना दम नहीं दिख रहा जितनी पहली खबर में है.

सहारा से जुड़े सूत्र बता रहे हैं कि सहारा मीडिया के एक वरिष्‍ठ अधिकारी का लखनऊ में जमीन प्रकरण के चर्चा तथा विवाद में आने के बाद प्रबंधन ने ये फरमान जारी किया है. इस फरमान के बाद सहारा मीडिया से जुड़े पुराने लोग परेशान हैं. खबर है कि तमाम ऐसे लोग हैं जो मीडिया के नाम पर धौंस देकर जमीनों पर कब्‍जा किया हुआ है. हालांकि अभी इस मामले में विस्‍तार से जानकारी नहीं मिल पाई है, पर भड़ास की टीम जल्‍द ही इसका खुलासा करेगी. कोशिश होगी कि ऐसे लोगों को भी सामने लाया जाए जो मीडिया के नाम पर सही-गलत तरीके से जमीनों पर कब्‍जा करते हुए भू-माफिया होते जा रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि सहारा प्रबंधन को अपने कई लोगों की जमीन कब्‍जाने-हड़पने जैसी शिकायतें मिली थी. हर तरफ से निराश-हताश लोगों ने प्रबंधन को इन तथाकथित मीडिया मैनेजरों की हरकत-शिकायत भेजी थी, जिसके बाद प्रबंधन ने अपने सभी कर्मचारियों को, जो बड़े पदों पर हैं, अपनी-अपनी जमीन का ब्‍योरा उपलब्‍ध कराने का फरमान सुनाया है. सबसे परेशान वे लोग हैं, जो विभिन्‍न प्रकार का हथकंडा अपनाकर बहुत बड़े भूपति बन गए हैं और अपने परिजनों तथा रिश्‍तेदारों के नाम पर जमीन खरीद रखा है. खबर है कि ब्‍योरा मिलने के बाद सहारा प्रबंधन आंतरिक जांच भी कराएगा ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके. 

दुष्‍यंत कुमार लोकतंत्र के बड़े एवं उम्‍मीदों के कवि थे

: पुण्‍यतिथि पर याद किए गए दुष्‍यंत कुमार : उदयपुर। दुष्यंत कुमार लोकतंत्र के बड़े एवं उम्मीदों के कवि थे। लोकतंत्र में उम्मीद एवं ना उम्मीद दोनों भाव होते हैं पर दुष्यंत कुमार नाउम्मीदी के बीच उम्मीद के कवि-शायर थे। दुष्यंत की शायरी बर्फानी झील में रोशनी और उष्मा देने वाली रही है। ये विचार प्रो. नंद चतुर्वेदी ने कवि-शायर दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि पर आयोजित स्मरणांजलि कार्यक्रम में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन प्रसंग संस्थान एवं वर्धमान महावीर कोटा खुला विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

वर्धमान महावीर कोटा खुला विवि सभागार में आयोजित कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि लोककलाविज्ञ डॉ. महेन्द्र भानावत ने कहा कि दुष्यंत कुमार भाषाई सौहार्द के कवि थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में विश्वास जगाया एवं नवोदित कवि-शायरों को गजलों की परंपरा दी। प्रारंभ में विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. अरूण चतुर्वेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए प्रसंग संस्थान के संस्थापक-अध्यक्ष डॉ. इन्द्र प्रकाश श्रीमाली ने दुष्यंत कुमार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में खलील तनवीर, इकबाल सागर, मुश्ताक चंचल, शिवरतन तिवारी, हाजी मोहम्मद आदिल आदि ने भी शायर दुष्यंत कुमार की सृजन-यात्रा पर विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर दुष्यंत कुमार की चर्चित गजलों को डॉ. रजनी चतुर्वेदी, डॉ. देवेन्द्रसिंह हिरण एवं डॉ. प्रेमसिंह भंडारी ने सस्वर प्रस्तुत किया। प्रसंग संस्थान की महासचिव डॉ. मंजु चतुर्वेदी ने दुष्यंत कुमार के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करते हुए सभी सुधि श्रोताओं का आभार प्रकट किया। कार्यक्रम में ए.एल. दमामी, डॉ. विश्वंभर व्यास, कौस्तुभ प्रकाश सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

कांपैक्‍ट, बरेली से इस्‍तीफा देने वाले अविनाश, आशीष, अशोक एवं निधि जागरण से जुड़े

: अभय प्रभात खबर पहुंचे : खबर है कि अमर उजाला के शिशु अखबार कांपैक्ट से न्यूज एडिटर आलोक समेत इस्‍तीफा देने वाले पांच पत्रकारों में से चार ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है. आलोक ने अभी कहीं ज्‍वाइन नहीं किया है. अन्‍य चारों ने बरेली में ही जागरण ग्रुप के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. अविनाश चौबे, आशीष सक्‍सेना और अशोक आर्या ने दैनिक जागरण ज्‍वाइन किया है, जबकि निधि गुप्‍ता को आई नेक्‍स्‍ट में काम मिला है. सभी सब एडिटर बनाया गया है.

हिंदुस्‍तान, मुजफ्फरपुर से खबर है कि अभय वर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे एकाउंट विभाग में कार्यरत थे. अभय ने अपनी नई पारी मुजफ्फरपुर में ही प्रभात खबर के साथ शुरू की है. वे कई अन्‍य संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

हिंदीभाषी समाचार पत्रों ने सबको पीछे छोड़ा

नई दिल्ली। देश का प्रिंट मीडिया उद्योग लगातार विकास के पथ पर अग्रसर है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चालू वित्त वर्ष में इसमें 6.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बात का पुख्ता सबूत है। देश में प्रेस की स्थिति के संबंध में जारी 55वीं वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि प्रिंट मीडिया दिनोंदिन तरक्की कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार समाचारपत्रों के प्रकाशन के मामले में हिन्दी सभी भाषाओं पर भारी है।

चालू वित्त वर्ष में प्रकाशित हो रहे हिन्दी समाचारपत्रों की संख्या 7,910 है। एक हजार 406 समाचारपत्रों के प्रकाशन के साथ अंग्रेजी दूसरे स्थान पर और 938 समाचारपत्रों के साथ उर्दू तीसरे स्थान पर है। समाचारपत्रों के पंजीयक टी. जयराज की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सचिव उदय कुमार वर्मा को पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि गुजराती के 761, तेलुगु के 603, मराठी के 521, बांग्ला के 472, तमिल 272, ओडिया 245, कन्नड 200 और मलयालम के 192 समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं।

प्रसार संख्या के मामले में भी हिन्दी के अखबार अव्वल हैं। हिन्दी अखबारों की कुल प्रसार संख्या 15 करोड़ 54 लाख 94 हजार 770 है, जबकि अंग्रेजी के समाचारपत्रों की कुल प्रसार संख्या दो करोड़ 16 लाख 39 हजार 230 प्रतियां हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में पंजीकृत समाचारपत्रों की कुल संख्या 82 हजार 237 है और पिछले वर्ष की तुलना में इसमें 6.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साभार : वार्ता

पत्रकार दीनबंधु, विशाल एवं मृगांक सम्‍मानित किए गए

पटना। आज के युवा दूसरे के बनाए रास्ते पर नहीं चलना चाहते। वह घिसे-पिटे लीक से हटकर कुछ नया करना चाहते हैं। एक ऐसे ही युवा है दीनबंधु सिंह, जो पेशे से पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आज जब हमारा युवा वर्ग लैपटॉप और मोबाइल के पीछे भाग रहा है, तब वह गांवों में पुस्तकालय खोलकर ज्ञान का अलख जगा रहे हैं। देश-दुनिया की घटनाओं से महरूम रहने वाले गांव के लोगों को इससे रूबरू करा रहे हैं।

जाहिर है उन्होंने कुछ नया किया है तो उनका सम्मान भी होगा। उन्हें ' नैशनल इन्फर्मेशंस अवेयरनेस अवॉर्ड 2011 ' से नवाजा गया है। सिंह को यह अवॉर्ड वर्ल्ड मैनेजमेंट कांग्रेस की ओर से दिया गया। इंडिया-इंटरनैशनल सेंटर के सभागार में आयोजित समारोह में उन्हें गांवों में पुस्तकालय खोलने और जागरूकता फैलाने की दिशा में अच्छा कार्य करने के लिए इस अवॉर्ड से नवाजा गया। यह अवॉर्ड नगालैंड ओपन यूनिवर्सिटी के चांसलर डॉ पी. आर. त्रिवेदी और सिवान के लोकसभा सांसद ओम प्रकाश यादव ने संयुक्त रूप से दिया।

दीनबंधु सिंह गांवों में पुस्तक संस्कृति के द्वारा लोगों को जागरूक करने के दिशा में काम करते हैं। उन्होंने बिहार के सिवान जिला स्थित अपने छोटे से गांव खुलासा में इसी साल 'बागेश्वरी ग्रामीण पुस्तकालय एवं जागरूकता केंद्र' की स्थापना की है। इसके साथ ही युवा लेखक और पत्रकार विशाल तिवारी को बेस्ट मिडिया रिसर्चर अवॉर्ड और न्यू मीडिया के पत्रकार मृगांक विभू को न्यू मीडिया एनालाइजर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। साभार : एनबीटी

बीबीसी के विवादित एंकर ने उड़ाया भारत का मजाक

लंदन : ब्रिटेन में हड़ताल करने वाले सरकारी कर्मचारियों को उनके परिजन के सामने खड़ा करके गोली मारने जैसी अजीबो-गरीब टिप्‍पणी करने वाले बीबीसी के प्रस्तोता जेरमी क्लार्कसन इस बार भारतीय संस्कृति का मजाक उड़ाकर नस्लीय भेदभाव के आरोपों से घिर गए हैं। डेली मेल में प्रकाशित खबर के मुताबिक क्लार्कसन ने बीबीसी पर क्रिसमस के मौके पर प्रसारित विशेष कार्यक्रम टॉप गियर में भारतीय रेल, शौचालयों, कपड़ों, भोजन और इतिहास का मजाक उड़ाया था।

इसे देखने के बाद दर्शक बहुत नाराज हैं। उनकी नाराजगी इसलिए भी अधिक है, क्योंकि हाल में ब्रिटेन में एक भारतीय छात्र अनुज बिदवे की हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के ठीक दो दिन बाद यह कार्यक्रम प्रसारित किया गया है। अनुज की हत्या के पीछे पुलिस नस्लीय भेदभाव को कारण बता रही है। कार्यक्रम के दौरान इस विवादित प्रस्तोता ने भारत में गरीबों के बीच साफ-सफाई की खराब स्थिति को दर्शाने के लिए शौचालय युक्त जगुआर कार से झुग्गी-बस्ती का चक्कर लगाया।

बीबीसी की प्रवक्ता का कहना है कि बुधवार की शाम प्रसारित कार्यक्रम में भारत की छवि खराब करने वाले सामग्री के बारे में 23 शिकायतें आई हैं। उन्होंने कहा कि अगर दर्शक या धार्मिक संस्थाएं शिकायत करना चाहती हैं तो वह बीबीसी से शिकायत करें। हम मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रिया नहीं देंगे। क्लार्कसन इसी महीने एक अन्य विवाद में भी फंसे थे जिसके बाद उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी। उन्होंने बीबीसी-1 पर अपने शो के दौरान कहा था कि हड़ताल कर रहे सार्वजनिक उपक्रम के कर्मचारियों को उनके परिवार के सामने खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए।

रिपोर्ट में कहा गया कि कार्यक्रम के एक सीन में क्लार्कसन को दो गणमान्य भारतीयों को पैंट प्रेस करना सिखाने के लिए उनके सामने ही अपनी पैंट उतारते हुए दिखाया गया है। एक अन्य सीन में टॉप गियर की टीम ने रेल पर ब्रिटिश उद्योग का प्रचार करता हुआ बैनर लगा रखा है। उन बैनरों पर लिखा, ब्रिटिश आइटी आपकी कंपनी के लिए बेहतर है और इंग्लिश मफिन खाओ, लेकिन रेल डिब्बों के अलग होने पर यह संदेश अशलील संदेशों में बदल जाते हैं। साभार : एजेंसी

माया ने चार और मंत्रियों को बाहर निकाला, टिकट भी काटे

लखनऊ: यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर अपने चार और मंत्रियों के हटा दिया है. शुक्रवार को वन मंत्री फतेह बहादुर सिंह (पनियारा महाराजगंज), प्राविधिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) सदल प्रसाद (बांसगांव-गोरखपुर), अल्पसंख्यक कल्याण एवं हज राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू (बीसलपुर-पीलीभीत) तथा मुस्लिम वक्फ राज्य मंत्री शहजिल इस्लाम अंसारी (भोजीपुरा-बरेली) को बर्खास्त करते हुए चारों की आगामी विधान सभा चुनाव के लिए पार्टी उम्मीदवारी समाप्त कर दी है.

गौरतलब है कि इसके पहले मायावती ने पिछले एक सप्‍ताह के भीतर छह मंत्रियों को बाहर किया है, जबकि आज एक मंत्री ददन मिश्र ने नैतिकता के आधार पर खुद ही इस्‍तीफा दे दिया है. हालांकि यह दूसरी बात है कि लोकायुक्‍त जांच में घिरे मायावती के करीबी मंत्री नसीमुद्दीन अब भी बचे हुए हैं. मायावती मंत्रिमंडल से विभिन्‍न कारणों और आरोपों के चलते अब तक 25 मं‍त्री बाहर किए जा चुके हैं. 

बीएसपी प्रवक्ता ने बताया कि इन मंत्रियों को मंत्रिमण्डल की सदस्यता से भी पदमुक्त कर दिया गया है, ताकि ये मंत्रिगण विधान सभा चुनाव के दौरान अपने पद का दुरुपयोग न कर सकें और लोगों पर अनावश्यक दबाव न डाल सकें. प्रवक्‍ता ने बताया कि इन मंत्रियों के खिलाफ जन समस्याओं पर ध्यान न देने और क्षेत्र की घोर उपेक्षा करने की भी शिकायतें थीं. जनता की कठिनाइयों की अनदेखी करने और पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने के कारण इनके प्रति लोगों में काफी असंतोष था, जिसके चलते पार्टी सुप्रीमों ने इन्‍हें मंत्रिमंडल से बाहर करने का निर्णय लिया.

आशीष त्रिपाठी एवं भाटिया को मिला एचटी एक्‍सीलेंसी अवार्ड

हिंदुस्‍तान प्रेस, मुरादाबाद में सिटी चीफ आशीष त्रिपाठी और सीनियर रिपोर्टर भाटिया जी को एचटी एक्‍सीलेंसी अवार्ड मिला है. यह आवार्ड इन लोगों के बेहतरीन कार्य को देखते हुए दिया गया है. अवार्ड के साथ सर्टिफिकेट तथा 15 हजार रुपये भी प्रदान किए गए. अवार्ड मिलने पर तमाम लोगों ने इन दोनों को बधाई दी है.

यूपी के मंत्री ददन मिश्र ने ‘नैतिकता’ के चलते इस्‍तीफा दिया

लखनऊ। यूपी में चल रहे मंत्री बर्खास्‍त करों मौसम में आयुर्वेद चिकित्सा राज्य मंत्री ददन मिश्र ने 'नैतिकता' के आधार पर मायावती मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है। साढ़े चार से ज्‍यादा समय तक नैतिकता को खूंटी पर टांगने वाले मिश्र ने कहा कि पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगने के बाद मैंने नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री मायावती को मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया है, लेकिन पार्टी के लिए पूरी निष्ठा से काम करता रहूंगा।

श्रावस्ती जिले की भिनगा सीट से विधायक मिश्र ने यह भी कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी है कि बीएसपी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए उनका टिकट काट दिया है। उन्‍होंने कहा कि क्षेत्र के विकास की उपेक्षा और पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगने के बाद मैंने गुरुवार को ही नैतिकता के आधार पर मंत्री पद से इस्‍तीफा देने का फैसला कर लिया था। अब मैंने आगे का फैसला पार्टी सुप्रीमो पर छोड़ दिया है। उल्‍लेखनीय है कि मायावती अब तक अपने मंत्रिमंडल से एक दर्जन से ज्‍यादा मंत्रियों को बर्खास्‍त कर चुकी हैं।

पाकिस्‍तानी पत्रकार को सेना ने दी धमकी

दिल्ली। लोकतंत्र में सेना की भूमिका का लगातार विरोध करने वाले वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार नजम सेठी ने अपने टीवी टॉक शो में खुलासा किया है कि उन्हें लगातार धमकी मिल रही है। उनका इशारा सेना की ओर था। नजम सेठी मानते हैं कि पाकिस्तानी जनता को झूठी जानकारी दी जाती है। पाकिस्तान 71 की जंग में बुरी तरह हारा था। 1965 और कारिगल की जंग में भी उसकी हार हुई थी। इसकी सारी जिम्मेदारी सेना की है। जबकि पाकिस्तान के लोगों को बरगलाया जाता है कि 65 की जंग में पाकिस्तान जीता था।

सेठी ने कहा है कि उन्हें धमकी भरे कई संदेश मिले हैं। उन्होंने कहा है कि अगर उन्हें धमकी भरे संदेश मिलने बंद नहीं हुए तो वे इसके लिए जिम्मेदार संगठन और अधिकारियों के नाम का खुलासा कर देंगे। किसी खुफिया एजेंसी का नाम लिए बगैर सेठी ने बुधवार की रात प्रसारित अपने शो में कहा कि मुझे धमकी देने वाले कई अन्य वरिष्ठ पत्रकारों को धमकी देने में लगे हुए हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकार धमकी की बात को सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं, क्योंकि वे इस मुद्दे पर अस्थिरता नहीं फैलाना चाहते, लेकिन अब समय आ गया है कि पत्रकार बिरादरी सामने आए और इस बात को सार्वजनिक रूप से कहे। सेठी ने कहा कि अब वह युग नहीं रहा है, जब खुफिया अधिकारी अपने ही लोगों को धमकी दिया करते थे। अब इस तरह की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

सेठी ने यह खुलासा पत्रकार हामिद मीर के उस बयान के एक सप्ताह बाद किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें सुरक्षा एजेंसियों की ओर से धमकी दी जा रही है। साप्ताहिक ‘द फ्राइडे टाइम्स’ के प्रधान संपादक सेठी को पहले भी सुरक्षा एजेंसियां परेशान करती रही हैं। कुछ माह पहले भी सेठी और उनके परिवार के लोगों को धमकियां मिली थी। इस वजह से उन्हें कुछ महीने अमेरिका में रहना पड़ा था। हाल ही में वे अमेरिका से लौटे हैं। सूत्रों के अनुसार पिछले पांच साल में पाकिस्तान में 29 पत्रकारों की हत्या हुई है। इनमें से अधिकांश को उनकी रिपोर्ट और लेख के लिए निशाना बनाया गया है। इस साल मई में पत्रकार सैयद सलीम शहजाद का अपहरण कर लिया गया था। बाद में इस्‍लामाबाद में उनकी हत्या कर दी गई थी। इससे दो दिन पूर्व उन्होंने एक लेख लिखा था, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तानी नौसेना में अल-कायदा के लोग घुस गए हैं। साभार : ओआईएच

आखिरी दांव की ओर मुलायम के कदम

दांव तो सिर्फ दांव ही होता है जिसका इस्तेमाल हर मौके पर किया जा सकता है, लेकिन राजनीति में चलता है सबसे अधिक आखिरी दांव। जिसे हर नेता अपने आप को सत्तासीन होने की गरज से बार-बार ऐसे ही दांव चलने का सिगूफा छोड़ता है, जिसमें कुछ कामयाब होते हैं, कुछ नाकामयाबी का दंश झेल करके आगे-पीछे होते रहते हैं। साल 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव की तिथि का ऐलान कर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश में 5 राज्यों के साथ ही चुनाव कराने का ऐलान चुनाव आयोग ने कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सात चरणों में संपन्न करवाये जाएंगे। पहले चरण के लिए अधिसूचना 10 जनवरी को जारी की जाएगी। पहले चरण के लिए मतदान 4 फरवरी को संपन्न होगा। इसके बाद 8 फरवरी, 11 फरवरी, 15 फरवरी, 19, फरवरी, 23 फरवरी और 28 फरवरी को विभिन्न चरणों में मतदान करवाये जाएंगे।

यह चुनाव कई राजनैतिक दलों के लिये आखिरी दांव के माफिक होता हुआ नजर आ रहा है। इस आखिरी दांव मे सबसे बड़ा दांव लगा है मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी का। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिये प्रभावी ढंग से संर्घषरत है लेकिन समाजवादी पार्टी में हुये हालिया उठापटक के बाद सपा में कई स्तर का संकट दिख रहा है। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को अपना वजूद बरकरार रखने का खतरा मंडरा रहा है, यह तभी संभव है जब समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश में सरकार बने, लेकिन आज के हालात इस बात की पुष्टि नहीं करती कि सपा की एक बार फिर से उत्तर प्रदेश में सरकार बनने जा रही है। भले ही तमाम एक्जिट पोल समाजवादी पार्टी के पक्ष में आकंडे़ सबसे बडे़ दल के रूप में काबिज होने के दे रहे हों, लेकिन ऐसी गिनती का कोई आंकड़ा सामने नहीं आ पा रहा है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार उत्तर प्रदेश में बनने का संकेत दे रहे हो।

खेत खलिहान और किसानों के हिमायती समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के जीवन का करीब-करीब यह ऐसा आखिर चुनाव माना जा सकता है, जिसमें सपा कुछ कमाल करने का सपना संजो करके रखे हुये है। ऐसे मे क्या मुलायम सिंह यादव का यह सपना हकीकत में अमली जामा पहन पायेगा या फिर सिर्फ सपना ही बन करके रह जायेगा। मुलायम सिंह यादव के सामने कई किस्म का संकट बताया जा रहा है। एक बात सपा में अभी तक सीटों का सही ढंग से बंटवारा नहीं हो सका है। रोज-रोज किसी ना किसी प्रत्याशी को बदला जा रहा है। इससे साफ हो रहा है कि सपा की टिकट वितरण प्रणाली में कहीं ना कहीं लोच है, तभी तो ऐसा माहौल देखा जा रहा है।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव का गांव सैफई इटावा से करीब 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। जहां के लोग मुलायम सिंह यादव से इस बाबत उम्मीद लगाये बैठे हुये हैं कि सपा की आने वाले विधानसभा चुनाव में सरकार बनेगी और गांव देहात और किसानों का भला होगा। मुलायम सिंह यादव से उम्र में एक दो साल बडे़ सैफई गांव के प्रधान दर्शन सिंह का कहना है कि मुलायम सिंह यादव किसान के बेटे हैं इस लिये वे किसानों की तकलीफों को भली-भांति समझते हैं। किसान इस समय बेहद परेशान हैं, मायावती के राज में किसानों की कोई मदद किसी भी स्तर पर नहीं हो रही है, चाहे उसे खाद की जरूरत हो या फिर बीज की। किसी भी चीज की भरपाई नहीं हो पा रही है ऐसे में सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही उत्तर प्रदेश की बिगड़ी हुई किस्मत का सितारा बुलंद कर सकते हैं। मुलायम सिंह यादव के सहपाठी रहे दर्शन सिंह करीब 35 साल से सैफई से मुलायम सिंह यादव के प्रेम के चलते प्रधान बनते चले आ रहे हैं। मुलायम सिंह यादव की वजह से दर्शन सिंह के खिलाफ कोई भी आदमी चुनाव मैदान में उतरने की हिम्मत नहीं कर पाता ऐसे में दर्शन को प्रधान तो बनना ही होगा। किसी भी के लिये इतना सब कुछ करने वाले के लिये दुआ तो निकलेगी ही, इसी लिये दर्शन सिंह भी मुलायम सिंह यादव को उत्तर प्रदेश का ताज पहनाने के लिये दुआ करने में लगे हैं।

2007 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता से मुलायम सिंह यादव बेदखल हो गये थे और मायावती की ताजपोशी होते ही मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई में जारी विकास कार्य को विराम लग गया। यहां पर कई करोड़ की लागत से बन रहा मल्टी परपज स्टेडियम, सैफई हवाई अड्डा, इटावा मैनपुरी रेल परियोजना और किसानों को रोजगार देने की नीयत से बनाया जा रहा दुग्ध विकास केंद्र का निर्माण अधर में लटक गया है। इसी इलाके के कुइया गांव के प्रधान चंदगीराम का मानना है कि मुलायम सिंह यादव की जब तक ताजपोशी नहीं होती तब तक यह विकास योजनायें ठप ही पड़ी रहेंगी और मुलायम की वापसी के बिना इनका कोई भी तारणहार नहीं हो सकता है। इसलिये अब की बार मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री बने। यह तो रही मुलायम सिंह यादव के गांव के लोगों की बात, ऐसा ही उनके जिले इटावा के लोगों का भी सोचना है।

2012 के चुनाव में जहां सत्तारूढ बहुजन समाज पार्टी अपनी ताकत का एहसास करने के लिये एक बार फिर से वापसी का सपना सजोये बैठी हुई हैं, वहीं समाजवादी पार्टी बसपा को पद से हटाने के लिये संघर्षरत नजर आ रही है। इसके लिये उनके पुत्र और प्रदेश अध्‍यक्ष अखिलेश यादव पूरे उत्तर प्रदेश के दौरे पर अपने पिता के उस क्रांतिरथ को लेकर निकले हुये हैं, जिससे 1989 मे मुलामय सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने में कामयाबी पाई थी। जो अब तक करीब-करीब पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा सत्ता हासिल करने के लिये कर चुके हैं। उनके मुकाबले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी उनके ही आगे-पीछे यात्रायें करने में लगे हुये हैं। दोनों युवाओं के बीच इस बात की भी स्‍पर्धा बनी हुई है कि अपने-अपने दल का जनाधार बढ़ा करके अपने-अपने दल को मजूबती प्रदान की जाए।

मुलायम सिंह यादव के प्रभाव वाले मध्य उत्तर प्रदेश में सपा कई किस्म के संकटों के दौर से गुजर रही है, जहां मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र मैनपुरी में उनकी समधिन उर्मिला यादव ने बगाबत कर दी है। वो कांग्रेस में आकर इसी क्षेत्र के करहल विधानसभा से सपा को ही चुनौती देने के लिये अखाडे़ में कूद चुकी हैं। उर्मिला यादव धिरोर विधानसभा से 1992 और 1997 में सपा से एमएलए रह चुकी हैं। इसके अलावा एटा संसदीय इलाके के पूर्व सपा सांसद देवेंद्र यादव भी ताल ठोंक करके बसपा में जाने के बाद एक बार फिर से नये दल कांग्रेस में चले गये हैं। 24 दिसंबर को देवेंद्र के कद को नापने के लिये कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने कासगंज में कांग्रेस की रैली करा के देवेंद्र की ताकत को नाप गये। सबसे हैरत की बात है कि रैली से पहले ही देवेंद्र की विवाहित बेटी बासु यादव को पटियाली विधानसभा का टिकट भी दे डाला गया है।

2009 के संसदीय चुनाव में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के मेहबरबानी के चलते राममंदिर आंदोलन के कभी नायक रहे कल्याण सिंह एटा सांसद बन चुके हैं। इस सीट से कल्याण को जितवाने के लिये मुलायम सिंह यादव ने अपने दल के प्रत्याशी को चुनाव मैदान में नहीं उतारा था। मुलायम सिंह यादव के सहयोग से सांसद बनने के बाद दोनों के बीच अमर सिंह के बयानों के बाद बेहद कटुता आ गई है। कल्याण के विकल्प के रूप में मुलायम अपने पुराने साथी मुस्लिम नेता आजम खां को वापस ले आये हैं, जिन पर सपा के मजबूत वोट बैंक को एकजुट करने का दारोमदार है।

बात कर लेते है फिरोजाबाद संसदीय सीट की। पार्टी के कद्दावर लोगों को जनता की अदालत में खड़ा करने की बजाय जिस प्रकार से उन्होंने अपनी वधु पर दांव खेला, जिसमें घर की बहू डिंपल यादव की हार के बाद तो वास्तव में मुलायम अपना आत्मसम्मान ही खो बैठे और इसकी वजह साफ है कि मुलायम के परिवार की यह पहली घटना है कि वर्चस्व बनाने के बाद मुलायम परिवार का कोई सदस्य पहली मर्तबा जनता की अदालत में अपने ही परिवार के उस सदस्य के सामने बौना साबित हुआ, जिसने राजनीति के गुर उन्हीं सपा मुखिया से सीखे थे।  अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं की हार ने आज मुलायम को तोड़ दिया हैं, हालांकि अब वह इससे निजात पाने की मुहिम छेड़ना चाहते हैं परंतु शायद अब उनके तरकस में वह तीर नहीं रह गए जिनकी बिना पर वे अपने रूठों को मना सकें और पार्टी की मुख्यधारा से जोड़ सकें।

मुलायम सिंह यादव एक बार नहीं तीन-तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इतना ही नहीं मुलायम केंद्र में एच.डी. देवेगौडा और इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल में देश के रक्षा मंत्री भी रहे। मुलायम जिस राजनीति को साधते हुये कांग्रेस के दरवाजे पर पहुँचे हैं, असल में वह राजनीति देश में उस वक्त की पहचान है, ऐसे में मुलायम की लोहिया से सोनिया के दरवाजे तक की यात्रा के मर्म को समझना होगा। यहां पर इस बात का भी जिक्र करना जरूरी है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मुददे को जितना देश के दूसरे नेताओ ने नहीं उछाला होगा उससे कहीं अधिक मुलायम सिंह यादव ने उछाल कर एक खाई पैदा कर ली थी। एक समय तो ऐसा लगता था कि जैसे मुलायम सिंह यादव से बड़ा कोई दूसरा राजनैतिक दुश्मन सोनिया गांधी का नहीं होगा, लेकिन मुलायम सिंह यादव के इस गुस्से का शायद बदला सोनिया गांधी ने परमाणु मुद्दे पर कांग्रेस के लिये सपा से समर्थन लेकर मुलायम सिंह यादव को ठेंगा दिखा दिया।

मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी का उदय कांग्रेस के विरोध की राजनीति के साथ शुरू हुआ था, परंतु जिस प्रकार से कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की पार्टी के साथ गठबंधन कर कांग्रेस की जड़ों को खोखला कर दिया था, कमोवेश उसी तरीके से जुलाई 2009 में परमाणु करार के मुद्दे पर केन्द्र सरकार बचा कर एक बार फिर से राजनैतिक एवं ऐतिहासिक भूल कर डाली। इस भूल ने मुलायम को वामपंथियों से दूर कर दिया, यह भूलें यहीं पर थम जाती तब भी ठीक था। मुलायम सिंह यादव कांग्रेस को अपना खास समझने लगे कि 2009 के संसदीय चुनाव में फिर चुनावी खाका बना डाला, मुलायम को अपनी गलती का एहसास तब हुआ जब आखिरी दौर में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने गठबंधन की राजनीति बंद करने की घोषणा कर दी।

1997 मे मायावती ने राजनैतिक तौर पर मुलायम सिंह यादव को कमजोर करने की गरज से इटावा को बांट करके औरैया को जिले का दर्जा दिया था, उसके बाद इस जिले में भी सपा की हालत अच्छी नहीं मानी जा रही है। मुलायम के सबसे खास रहे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धनीराम वर्मा अपने बेटे को नेता बनाने के चक्कर में मुलायम सिंह से दूर जा चुके हैं। महेश वर्मा धनीराम वर्मा के बेटे हैं, जो बसपा के टिकट पर मुलायम के बेटे अखिलेश यादव से कन्नौज लोकसभा के चुनाव 2009 में हारने के बाद औरैया जिले की बिधूना सीट पर हुये उपचुनाव में बसपा के एमएलए बन गये। इससे पहले महेश के पिता और मुलायम सिंह यादव के सबसे खास धनीराम वर्मा एमएलए थे। मैनपुरी लोकसभा सीट से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं। इस सीट पर किशनी विधानसभा से सपा की एमएलए संध्या कठेरिया भी बागी हो कर बसपा में जा चुकी हैं। मैनपुरी जिले की धिरोर विधानसभा को नये परिसीमन मे खत्म करके उसका आधा हिस्सा करहल और आधा फिरोजाबाद जिले की नवसृजित सीट सिरसागंज मे जोडं दिया गया है। इस सीट से कभी एमएलए और मुलायम सरकार में राजस्व मंत्री रहे बाबूराम यादव के बेटे अनिल यादव को भाजपा ने करहल से प्रत्याशी बना करके सपा के लिये मुश्किल खड़ी कर दी है।

मुलायम सिंह यादव के गृहनगर इटावा में भी सपा के दिन बेहतर नहीं कहे जा सकते हैं क्यों कि मुलायम के भाई शिवपाल सिंह यादव के निर्वाचन क्षेत्र जसवंतनगर से बसपा ने एक बागी सपाई मनीष यादव को अपना प्रत्याशी बनाया है। मनीष यादव परंपरागत सपाई हैं। साल 2003 में इनके भाई समाजवादी पार्टी की छात्र ईकाई के अध्यक्ष दलवीर सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के बाद से मनीष यादव के खिलाफ कई अपराधिक मामले सपा सरकार में दर्ज कराये गये। परिणामस्वरूप मनीष ने बदले के रूप में शिवपाल सिंह यादव के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने की मन बनाया तो मायावती ने उसे पूरा भी कर दिया। मनीष यादव कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव का तिलस्म अब टूट रहा है। पिछले साल हुये पंचायत चुनाव में इसी इलाके से शिवपाल सिंह यादव का बेटा आदित्य यादव जिला पंचायत पद के लिये खड़ा हुआ था, लेकिन मुलायम के तिलस्म के बाबजूद भी वो हार गया। इसलिये यह कहा जा सकता है कि मुलायम चूक गये हैं।

इटावा सदर सीट से मुलायम सिंह यादव के सबसे खास और 2002 मे पहली बार जीते महेंद्र सिंह राजपूत 2007 के चुनाव में सपा से जीते लेकिन उनका मन सपा नेताओं से उचट गया तो बसपा में चले गये। इस सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें बसपा ने महेंद्र को उम्मीदवार बनाया और महेंद्र लगातार तीसरी बार जीत करके हैट्रिक कायम की। यह है मुलायम सिंह यादव के घर का हाल तो पूरे उत्तर प्रदेश का हाल खुद आंका जा सकता है। मुलायम ने अपने घर की सीट इटावा सदर से सपा को काबिज कराने के लिये अपने दल से दो बार के सांसद रहे रघुराज सिंह शाक्य पर दांव खेला है, जो बसपा के महेंद्र सिंह राजपूत से मुकाबला करेंगे।

इस सबके बाबजूद सपा के छोटे-बडे़ नेताओं को पूरा भरोसा है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत ही नहीं मिलेगा बल्कि सपा सरकार बना करके एक नया आयाम कायम करेगी और माया के लूट राज से लोगों को राहत देगी। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव का आखिर दांव जरूर कामयाब होगा क्यों कि राजनैतिक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि मायाराज में जो कुछ भी काला सफेद हुआ लोगों ने देखा है। उससे निजात दिलाने मे सपा ही कामयाब हो सकती है इसलिये जिस समय जनमत का दिन आयेगा उस दिन आम मतदाता मायाराज के कारनामों को ही मददेनजर रख करके मतदान करेगा।

लेखक दिनेश शाक्‍य सहारा समय उत्‍तर प्रदेश-उत्‍तराखंड के इटावा में रिपोर्टर हैं.

आरटीआई एक्टिविस्ट के मर्डर के लिए पुलिस कप्तान भी कम दोषी नहीं

बेखौफ अपराधियों ने 8 दिसंबर को लखीसराय जिले के बभनगांवा गांव में आरटीआई कार्यकर्ता रामविलास सिंह की गोली मारकर हत्या कर दिया था। मृतक श्री सिंह सूचना के अधिकार को लेकर जिले के आला अधिकारियों से लेकर दंबग जन प्रतिनिधियों के आंखों की किरकिरी बन गये थे। हत्या को एक महीना पूरा होने को है, फिर भी नामजद अभियुक्तों में से सिर्फ एक की गिरफ्तारी कर पुलिस अपना दामन बचाने में लगी रही।

हत्‍या के मामले में पुलिस के इस रवैये को आम जनता से लेकर मानवाधिकार आयोग तक ने कठघरे में खड़ा किया है। आज भी इनका एकलौता अनाथ पुत्र अपने पिता के हत्या में पुलिस प्रशासन को जिम्मेदार मान रहा है। आज भागलपुर प्रक्षेत्र के आईजी की वार्षिक बैठक कानून-व्यवस्था को लेकर लखीसराय एवं बेगूसराय के पुलिस अधीक्षक के साथ थी। पर निदंनीय यह रहा कि बैठक के बाद जब आईजी मीडिया से रूबरू हुए तब उन्हें पता चल पाया कि यहां एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई है। इस बात से साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले की पुलिस इस हत्या के मामले को किस तरह आईजी साहब के नजरों से ओझल रखना चाहती थी।

हालांकि मीडिया द्वारा इस मामले की जानकारी मिलते ही उन्हों ने एसपी से हत्या की रिर्पोट मांगी। उन्होंने मीडिया को आश्‍वासन भी दिया कि अब दोषी जल्द ही नपेंगे। हालांकि इस मामले को देखते हुए एसपी ने विभिन्न थानों में पदस्थापित 16 पुलिस अवर निरीक्षकों को इधर से उधर किया है, लेकिन इनमें वह थानेदार नहीं हैं, जिन पर आरटीआई कार्यकर्ता हत्या मामले का आरोप लगा है। ऐसे में पुलिस पर यह साफ आरोप लग रहा है कि आखिर पुलिस क्यों नही लखीसराय के थाना प्रभारी को निलंबित कर रही है। इससे पूर्व रामविलास ने अपने जान के सुरक्षा की गुहार लखीसराय थाने में लगायी थी। तब लखीसराय पुलिस ने उनकी एक न सुनी। तब उन्‍हों ने स्पीड पोस्ट के माध्यम से थाना, एसपी सहित सरकार तक अपने सुरक्षा की गुहार लगायी। बावजूद उनको किसी तरह की सुरक्षा नहीं दी गयी। अब ऐसे में साफ देखा जा सकता है कि यहां के थाना से लेकर जिले के पुलिस कप्तान भी इसमें कम दोषी नजर नही आते।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

जीएनएस गुजरात डॉट कॉम वेबसाइट लांच, कई वरिष्‍ठ पत्रकार जुड़े

गुजरात से खबर है कि वहां के कई सीनियर पत्रकारों ने एक साथ मिलकर जीएनएसगुजरात डॉट कॉम (www.gnsgujarat.com) नाम की एक वेबसाइट लांच की है. इस वेबसाइट के जरिए टीम की योजना पाठकों तक रीयल टाइम न्‍यूज, ब्रेकिंग न्‍यूज एवं दुनिया भर की खबरें पहुंचाने की है. इसका कार्यालय अहमदाबाद में खोला गया है.

इस वेबसाइट से दिव्‍य भास्‍कर के दो सीनियर पत्रकार स्‍टेट ब्‍यूराचीफ रह चुके गौतम पुरोहत एवं नार्थ गुजरात एडिटर ऋत्विक त्रिवेदी, इंडियन एक्‍सप्रेस के पूर्व सीनियर जर्नलिस्‍ट बशीर पठाण, भास्‍कर की वेब से अक्‍सेस सावलिया, सोनल प‍ढीयार, टीवी9 ग्रुप से इनपुट एडिटर जय शुक्‍ला, सीनियर रिपोर्टर मौलिक दवे, खुशबू मजीठिया, संदेश अखबार से हिरेन उपाध्‍याय, वैशाली गज्‍जर सहित 28 लोग जुड़े हैं. ग्रुप जल्‍द ही हिंदी और अंग्रेजी वेबसाइट भी लांच करने वाला है. वेब के साथ हिंदी और गुजराती टीवी न्‍यूज भी लांच करने की तैयारी में हैं. 

सुनील कौशिक एवं चंद्रभूषण अमर भारती से जुड़े, महेंद्र का तबादला

खबर है कि सुनील कौशिक को दैनिक अमर भारती के आगरा संस्करण का समाचार संपादक और चंद्रभूषण दीक्षित को कार्यालय का प्रभारी नियुक्त किया गया है। इसके अलावा अमर भारती के आगरा संस्करण से कुछ और लोगों के जुड़ने की भी खबर है। कौशिक इससे पहले डीएलए फिरोजाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौथी दुनिया में बतौर प्रबंध संपादक के रूप अपनी सेवाएं दे चुके हैं। जबकि चंद्रभूषण दीक्षित चैनल वन में असाइन्मेंट डेस्क पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। बाद में उन्होंने दैनिक अमर भारती के राष्ट्रीय संस्करण, दिल्ली कार्यालय में प्रभारी पद पर कार्य किया। इसके बाद उन्हें अमर भारती के आगरा संस्करण का कार्यालय प्रभारी नियुक्त किया गया।

हिंदुस्‍तान, गोरखपुर से खबर है कि यहां के सीनियर रिपोर्टर महेंद्र तिवारी का स्‍थानांतरण बनारस के लिए कर दिया गया है. बताया जा रहा है कि बनारस यूनिट को मजबूत करने के लिए महेंद्र को यहां भेजा जा रहा है. वे गोरखपुर से लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए हैं.

पंकज सहारा समय से कार्यमुक्‍त, दीप्ति की नई पारी

सहारा समय, फर्रुखाबाद से खबर है कि संवाददाता पंकज दीक्षित को प्रबंधन ने न्‍यूज भेजने और कवरेज करने से मना कर दिया है. प्रबंधन ने कुछ समय पहले ही जिला संवाददाता अजय अवस्‍थी के स्‍थान पर पंकज को नियुक्‍त किया था. पंकज पर कुछ आरोप लगे थे, जिसकी जांच के बाद उन्‍हें खबर भेजने से मना कर दिया गया है. खबर है कि उनके सहारा समय की आईडी भी वापस ले ली गई है. पंकज दीक्षित ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में ऐसी किसी बात से इनकार किया है.

जनसंदेश न्‍यूज से खबर है कि दीप्ति नेगी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर थीं. दीप्ति ने अपनी नई पारी शीघ्र लांच होने जा रहे न्‍यूज चैनल 4रीयल न्‍यूज के साथ की है. इन्‍हें यहां भी उसी पद पर लाया गया है. 

पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए सन्‍मार्ग के संपादक हरिराम पांडेय सम्‍मानित

कोलकाता : उत्तर चौबीस परगना के खड़दह स्थित रवीन्द्र भवन में टीटागढ़ डॉ. भीमराव अम्बेडकर शिक्षा निकेतन की ओर से विगत वर्ष की तरह इस वर्ष भी सांस्कृतिक कार्यक्रम व सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर राज्य के वित्त मंत्री अमित मित्रा ने सन्मार्ग के सम्पादक हरिराम पांडेय को भीमराव अंबेकर आउटस्टैंडिग जर्नलिस्ट ऑफ दि इयर 2011 अवार्ड से सम्मानित किया।

अन्य विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ. कुंतल राय, द्दुतीमान बनर्जी, रमेश नांगलिया, विश्वजीत लाहिरी को भी सम्मान प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम को विधायक निर्मल घोष, अशोक पांडे, मुरार भाई, श्यामल सेन आदि ने सम्बोधित किया।

क्या ‘गीता’ वाकई अतिवादी विचारों का ग्रंथ है?

गीता में है क्या? क्या इसमें असहिष्णुता की हिमायत की गयी है? क्या इसमें धार्मिक भेदभाव की गुंजाइश है? गीता को अपने-अपने ढंग से समझने की तमाम लोगों ने कोशिश की है। किसी ने इसे ज्ञान का ग्रंथ कहा तो किसी ने जीवन में स्वतंत्रता के मूल्यों के लिए संघर्ष का? मैंने भी इसे समझने की कोशिश की, अभी भी कर रहा हूं। कहते हैं यह कृष्ण के उपदेश हैं पर कृष्ण के पास उस समय इतने लंबे उपदेश का वक्त कहाँ था, जब दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं और अर्जुन विषादग्रस्तता और हताशा में डूब रहा था।

नहीं, गीता कृष्ण द्वैपायन यानी वेद व्यास की प्रतिभा से उपजी रचना है। अर्जुन, भीष्म, द्रोण, दुर्योधन इसके पात्र हो सकते हैं, कृष्ण का राजनीति कौशल इसकी प्रेरणा हो सकता है लेकिन इसका विराट रचनात्मक वैभव व्यास की उत्कट प्रतिभा का परिणाम है। गीता का कृष्ण एक असाधारण विवेकशील मनुष्य है, जिसने स्वयं को खोज लिया है, जिसके जीवन में पराजय के लिए कोई जगह नहीं है, जो युद्ध को जय या पराजय की दृष्टि से नहीं बल्कि युद्ध की दृष्टि से देखता है।

समूचा जीवन ही युद्ध है। युद्ध से कैसे भाग  सकते हो। युद्ध से भागने का मतलब जीवन से भागना है। मेरे ख्याल से यह कृष्ण असामान्य तो है पर अलौकिक नहीं। यह कृष्ण या तो उस मिथकीय कृष्ण से अलग है, जिसके पैदा होते ही कारागार के ताले खुल जाते हैं, जो बाँसुरी की धुन पर पेड़ों, पशुओं को नचाता है, जो सैकड़ों ग्राम्य युवतियों के साथ महारास करता है या फिर व्यास ने स्वयं उसे अलग कर दिया है। व्यास ने गीता के नायक के रुप में जिस कृष्ण को चुना, वह जीवन की बाँसुरी में हवा फूंकता है, उसकी सम-विषम धुनों को पहचानता है, मनुष्य के विकास की संभावनाओं को अनेक स्तरों पर समझता है। जब व्यास अपने कृष्ण को रचते हैं तो वे हर मनुष्य में उसके होने की संभावना के साथ रचते हैं। मनुष्य का तर्क, उसका विवेक और उसका चैतन्य ही व्यास का कृष्ण है।

कृष्ण की परम संभावना काल्पनिक नहीं है, वह हर व्यक्ति के भीतर निहित है। यह आप पर है कि आप अपनी संभावना को कितना जगा पाते हैं, आप स्वयं को कितना खोज पाते हैं। सबको अलग-अलग तरीके से खुद को खोजना पड़ता है। यह नितांत वैयक्तिक है। कोई भी दो आदमी एक रास्ते पर नहीं जाते। सबको अपना पथ स्वयं बनाना पड़ता है। व्यास का मानना है कि ये पथ आगे जाकर तीन बड़े राजपथों पर खुलते हैं। कर्म, ज्ञान और भक्ति। इनमें कौन सा श्रेष्ठ है, इस पर बहस होती रही है, हो सकती है। मेरी समझ में ये तीनों अलग-अलग रास्ते नहीं बल्कि मनुष्य के विकास के तीन चरण हैं। जाने-अनजाने सहज रूप से हर कोई इसी तरह विकसित होता है। जो इस प्रक्रिया को नहीं जानते, उनके भटकने की आशंका रहती है पर जो जानते हैं, वे भटकते नहीं, वे अपना विकास तेज कर सकते हैं। भक्ति पहले। यह उस बेचैनी का नाम है जो स्वयं की तलाश के लिए प्रेरित करती है। भजन अपना ही। मैं हूं क्या, कौन, किसलिए? मेरी अर्थवत्ता क्या है, मेरे जीवन का युद्ध क्या है, सरोकार क्या है? यह प्रेरणा ज्ञान तक ले जाती है। ज्ञान निर्णय तक पहुंचने, जीवन के लक्ष्य को निश्चित करने, युद्ध की दिशा तय करने का क्षण है। यह बहुत आसान काम नहीं है। इसमें समय लग सकता है। इस प्रक्रिया में कई बार भ्रम भी होता है कि ज्ञान हो गया इसलिए उसका परीक्षण भी जरूरी है। समाज, देश, काल की जरूरतों के सन्दर्भ में उसकी परीक्षा करनी होती है।

एक बार विवेकसम्मत और तार्किक ढंग से अपने दुश्मन और अपने युद्ध का निश्चय करने के बाद कर्म की बारी आती है। ज्ञान कोई एकरस और अंतिम निश्चय जैसी अवधारणा नहीं है, नये सन्दर्भ और नयी परिस्थितियां इसका परिष्कार भी करती रहती हैं। हाँ, उसके परिष्कार की भी दिशा होती है, यह निरुपाय या अनिर्दिष्ट नहीं होता। भक्ति और ज्ञान का परिपाक कर्म में होता है। व्यास के समय में कभी भक्ति या ज्ञान श्रेष्ठ रहा हो तो रहा हो पर जीवन की जटिलताएं जिस तरह बढ़ी हैं, संघर्ष का फलक जिस तरह विराट हुआ है, वंचना जिस तरह पूरे परिदृश्य पर छाती जा रही है, उसमें कर्म ही श्रेष्ठ पथ है। पर व्यास निष्काम कर्म की सलाह देते हैं। कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। व्यक्ति जब केवल अपने लिए कुछ करना चाहता है तो वह परिणाम से संचालित होता है। केवल परिणाम का चिंतन कर्म की गतिशीलता भंग  करता है और कई बार हताशा में भी ले जाता है। हम खड़े-खड़े परिणाम के बारे में ही सोचते रह जाते हैं, समय निकल जाता है। चूंकि परिणाम केवल  व्यक्ति के प्रयास, उसकी मेधा या उसकी क्रियाशक्ति की परिणति नहीं होता, उसमें कई अनजाने, अनाहूत कारक भी अपनी भूमिका अदा करते हैं, इसलिए प्रयास की निरंतरता परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

एक बात और, अगर आप स्वार्थ संकल्प को स्थगित कर दूसरों के दुख, दर्द, पीड़ा, वंचना, समाज की बेहतरी के संकल्प से सक्रिय होते हैं तो अनायास आप परिणाम की चिंता से मुक्त हो सकते हैं। समाज के लिए आप के विचार और कर्म की उपयोगिता ही तय करती है कि आप का कर्म श्रेष्ठ है या नहीं। अगर आप निरंतर ज्ञान यानी विचार से लैस होकर सामाजिक विषमताओं को खत्म करने में जुटे हुए हैं तो आप के पास परिणाम की चिंता के लिए वक्त नहीं होगा। अतीत और भविष्य की चिंता किये बगैर हर परिणाम को स्वीकार करना और आगे बढ़ना ही कर्मयोग है। जो इस रास्ते पर चल रहा है वही गीता का सार तत्व समझ सकता है, कोई और नहीं। 

लेखक डा. सुभाष राय लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

इंटरनेट की दुनिया में हिंदी वालों के लिए कुछ उपयोगी लिंक

मेल के जरिए कई लोग इंटरनेट की दुनिया में हिंदी के इस्तेमाल को लेकर कई तरह के सवाल रोजाना पूछते रहते हैं. कोई पूछता है कि चाणक्या फांट को यूनीकोड मंगल में कैसे कनवर्ट करें. कोई पूछता है कि हिंदी में कैसे टाइप किया जा सकता है. कोई कहता है कि वह अपने लैपटाप पर फोनेटिक या रेमिंगटन टाइपिंग का टूल किस तरह इंस्टाल कर सकता है. दर्जनों सवाल होते हैं. इनके जवाब नेट पर उपलब्ध है. लेकिन हम लोग खोजना नहीं चाहते. इसी को ध्यान में रखकर इंटरनेट की दुनिया में हिंदी से संबंधित ढेर सारे उपयोगी लिंक यहां भड़ास4मीडिया पर दिए जा रहे हैं. अगर यह पहल आपको अच्छा लगे या आपके मन में कोई अन्य सवाल हो तो उसे नीचे कमेंट बाक्स के जरिए हम तक पहुंचा सकते हैं. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

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गूगल आनलाइन के जरिए रोमन इंग्लिश लिखें और उसे खुद ब खुद हिंदी में कनवर्ट होते देखते जाएं… जिन्हें हिंदी टाइपिंग नहीं आती, एसएमएस के तरीके से रोमन इंग्लिश में लिखते हैं, उनके लिए ये काम का लिंक है…

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रवि रतलामी की तरफ से हिंदी औजारों की कुछ कड़ियां

शाहजहांपुर में खुसरो मेल के संवाददाता की गोली मारकर हत्‍या

उत्तर प्रदेश में सरकार अपराध रोकने में नाकाम साबित हो रही है। आम जनता तो परेशान है ही, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को भी अपराधी बख्श नहीं रहे हैं। पुलिस पत्रकारों पर हो रहे लगातार हमलों को गंभीरता से नहीं ले रही है। इसी का परिणाम है कि यूपी में एक और पत्रकार को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है।

ताजा मामला शाहजहांपुर में खुसरो मेल के तिलहर तहसील संवाददाता सर्वेश शर्मा उर्फ सोनू की हत्या का है। पत्रकार सर्वेश तिलहर में खुसरो मेल के लिए रिपोर्टिंग करते थे और बाइक द्वारा प्रतिदिन तिलहर से निगोही अपने घर आते जाते थे। रोज की तरह गुरुवार को भी सर्वेश तहसील गए थे, लेकिन शाम को घर नहीं लौटे। परिजन रात भर उसकी चिंता में जागते रहे। उसका फोन भी मिलाया, लेकिन काल रिसीव नहीं हुई। सुबह करीब छह बजे उसकी लाश निगोही से करीब एक किमी दूर तिलहर मार्ग पर ग्राम पिपरिया खुशाली गांव के पास सड़क किनारे पड़ी मिली। पास में ही उसकी बाइक पड़ी थी। इस घटना से सनसनी मच गई। विलाप करते पहुंचे परिजनों ने पुलिस को सूचना दी।

पुलिस को एक किमी दूर घटनास्थल तक आने में ढाई घंटे लग गए। पुलिस भी तब मौके पर पहुंची, जब उच्चाधिकारियों को बताया गया। सीओ सदर शिष्यपाल क साथ पहुंची पुलिस को देखकर परिजन आक्रोशित हो गए। परिजनों ने घटनास्थल पर ही शव को रखकर जाम लगा दिया। इसी बीच एएसपी सिटी दयाराम सरोज भी आ गए। पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो मृतक की कनपटी के पीछे और नाक पर घाव मिला। परिजनों का मानना है कि उसकी कनपटी पर गोली मारी गई। एएसपी के समझाने पर भी परिजनों ने जाम नहीं खोला। करीब बारह बजे एसपी रमित शर्मा ने मौके पर जाकर परिजनों को समझाया तब जाकर परिजन माने। इसके बाद सर्वेश का शव पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। घटना के बाद से जनपद के पत्रकारों में रोष और गुस्‍सा फैल गया है।

बंद हो सकता है लखनऊ में लोकमत, चेयरमैन बकाया हड़पने के मूड में

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। ठीक उसी तरह से लखनऊ में लोकमत का भी हाल हुआ है। लखनऊ में संस्करण शुरु करते हुए अपने पहले सम्बोधन में ही लोकमत के चेयरमैन हर्षवर्धन सिंह ने कहा था कि लोकमत में कभी अश्लील विज्ञापन नहीं छापे जाएंगे और समाचार हमेशा स्तरीय होंगे। साथ में उन्होंने यह भी कहा था कि हमे नहीं पता कि हमारा यह समाचार पत्र कितने दिनों चलेगा, हो सकता है कि यह साल भर भी न चले और हो सकता है कि चलता ही रहे।

पर उन्हों ने इस बात पर ज्यादा जोद दिया कि साल भर में हमारी क्या स्थिति होगी उसके बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता हैं कि कितने दिनों तक हम मैदान में रहेंगे। आज उनकी बातें सही साबित होने जा रही हैं और जल्द ही लोकमत का लखनऊ से प्रकाशन बन्द हो सकता है। कम से कम स्थितियां तो साफ-साफ इसी तरफ इशारा कर रही हैं। स्थितियों को देखते हुए अब चेयरमैन ने बकाया न देने का मन बना लिया है। हमे उम्मीद है कि उन्हें ये सारी बाते याद होंगी। और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह हैं कि उन्हों ने अपने पत्रकारों से कहा था कि वो उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया कराएंगे लेकिन अफसोस से कहना पड़ रहा है कि उन्हों ने अपने पत्रकारों को किसी भी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई है। इतना ही नहीं अब तो वो अपने पत्रकारों को गाली भी बकने लगे हैं।

मालूम हो कि अभी कुछ दिन पहले तक पैसे की तंगी झेल रहे हर्षवर्धन सिंह आफिस आने से कतराते थे, लेकिन जैसे ही पैसे उनके पास आए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से गाली-ग्‍लौज पर उतारु हो गए। अब तो उन्हों ने हद ही कर दी है। उन्हों ने और तथाकथित सम्पादक बने उत्कर्ष सिन्हा साथ मिलकर पत्रकारों का पैसा हड़प करने का अनोखा खेल-खेल रहे हैं। दोनों मिलकर पत्रकारों का पैसा मारने के लिए हिसाब न बनने का बहाना बनाकर एक दूसरे के पास दौड़ा रहे हैं। कर्मचारी कभी सम्पादक के पास तो कभी चेयरमैन के पास दौड़ने का काम कर रहा है। इसी बीच खबर यह भी है कि चेयरमैन ने अपने सम्बंधी पत्रकार को पैसा भुगतान कर दिया है, लेकिन कुछ ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्हों ने काम किया और चार से पांच माह का भुगतान न होने की वजह से लोकमत छोड़ दिया है। अब वो पैसे के लिए लोकमत आफिस के चक्कर लगा रहे हैं।

तो महानुभाव इन पत्रकारों के पैसे का भुगतान कर दें नहीं तो आने वाले समय में आपको पत्रकार ढूंढे नहीं मिलेगें और करीब-करीब ऐसी स्थिति आ भी गई है। सूचना यह भी हैं कि कई ऐसे पत्रकार और हैं, जो लोकमत छोड़ने का मन बना चुके हैं इन्तजार है तो बस अच्छी जगह का। चेयरमैन महोदय आपको सुझाव है कि अपनी आदतों को सुधारिए और पत्रकारों के बकाए पैसे का भुगतान कर दीजिए ताकि आपकी छवि बाजार में पैसा मारु की न होने पाए।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

सहाराकर्मियों की बढ़ती तनख्वाह पर ग्रहण

: कानाफूसी : सहाराकर्मियों का सेलरी इनक्रीमेंट फिर रोक दिया गया है… कई अखबारों में सेलरी बढ़ाने का विज्ञापन देने वाले सहारा ग्रुप में सेलरी इनक्रीमेंट पर फिर ग्रहण लग गया है… इस बार मैनेजमेंट का अलग ही बहाना है… मैनेजमेंट की तरफ से तर्क दिया जा रहा है कि वेतन वृद्धि की प्रक्रिया पैराबैंकिंग के स्टाफ के लिए शुरू की गई थी… लेकिन पैराबैंकिंग डिवीज़न ने अब तक वेतनवृद्धि का चार्ट प्रबंधन को नहीं दिया है और ऐसे में अगर सहारा मीडिया में सेलरी बढ़ा दी जाएगी तो पैराबैंकिंग स्टाफ नाराज़ हो जाएगा… इसलिए सबका वेतन एक महीने बाद एक साथ बढ़ाया जाएगा.

ऐसे में वेतनवृद्धि को लेकर खासे उत्साहित दिख रहे सहारा मीडिया के कर्मचारी खुद का ठगा सा महसूस कर रहे हैं… वैसे अंदर की खबर तो ये भी है कि स्वतंत्र मिश्रा एंड कंपनी का शायद सफाया हो सकता है और राय बहादुरों की फिर से वापसी हो सकती है… कहा ये भी जा रहा है कि उपेंद्र राय दिल्ली के किसी होटल में बैठकर पिछले कई दिनों से स्वतंत्र मिश्रा से रिपोर्ट ले रहे हैं और उपेंद्र राय के ही कहने पर वेतन वृद्धि की प्रक्रिया रोकी गई है… क्योंकि जिस तरीके से स्वतंत्र मिश्रा ने उपेंद्र राय के जाने के बाद सारी प्रक्रिया दोबारा शुरु कराई थी उसी तरह से उपेंद्र राय ने भी वही दांव आज़माया है… खबर ये भी है कि उपेंद्र राय को सीबीआई की तरफ से क्लीनचिट मिल सकती है और ऐसा होते ही उपेंद्र राय फिर से सहारा में वापसी कर सकते हैं… अब ये सहारा है… इसकी रहस्यमई दुनिया कोई आज तक समझ नहीं पाया… देखते हैं क्या होता है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मायावती को जनता से डर लगता है : राहुल गांधी

: भाजपा राम के नाम की दलाली करती है  : शाहजहांपुर : कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा राम नाम की दलाली कर सत्ता में पहुंची थी, जो पार्टी भगवान के नाम को भुनाने में भी नही चूकी वह आम जनता का क्या ध्यान रखेगी, जबकि पिछले बाइस सालों में गैर कांग्रेसी सरकारों के मुखिया माया और मुलायम ने उत्तर प्रदेश में विकास की ओर ध्यान न देकर अपने विकास पर ज्यादा ध्यान दिया। राहुल ने कहा कि बसपा की मुख्यमंत्री मायावती को डर लगता है। एक बार वह उनके दिल्ली के निवास पर गये थे, जहां उनके मकान की दीवारें 40 फीट ऊंची है, जो खुद डरती है वह आप की सुरक्षा क्या करेंगी।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिये राहुल गांधी प्रदेश में ताबड़तोड़ सभाएं कर रहे हैं। वह शाहजहांपुर के पुवायॉ विधानसभा क्षेत्र के पुवाया इंटर कालेज मैदान में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्हों ने विपक्षी पार्टियों सपा, बसपा और भाजपा पर कडे़ प्रहार किये। राहुल ने कहा कि भाजपा राम के नाम की दलाली कर सत्ता में आई और उसके बाद मुलायम सिंह को आप ने सत्ता में भेजा तो उनके राज में थानों पर गुंडों ने कब्जा कर लिया। मुलायम के राज में अपराध और गुंडागर्दी चरम पर थी। 2007 में आप ने मुलायम सिंह से नाराज होकर मायावती को पूर्ण बहुमत की 208 सीटें दी, आज आधे से अधिक मंत्रिमंडल जेल में है। मायावती को डर लगता है। उन्हों ने कहा कि वह उनके दिल्ली निवास पर गये थे, उनके मकान की दीवारें चालीस चालीस फीट ऊंची है, जिस नेता को खुद इतना डर लगता है वह आप की सुरक्षा क्या करेंगी। यूपी में बसपा सरकार के मंत्री चार साल तक जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा लूटते रहे और मायावती आंखें बंद किये रहीं, चुनाव आया तो एक महीने पहले अपनी पार्टी को क्लीन दिखाने के लिये और लोकायुक्त की जांच में फंसे 15 मंत्रियों को मंत्रिमडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

राहुल गांधी जनता को यह भी बताना नहीं भूले कि लखनऊ में मायावती ने एक ऐसी डिजाईन का हाथी बनवाया है जो माया सरकार के कई विभागों का पैसा खा रहा है। यह हाथी जब पैसे को हजम कर जाता है तो मायावती उस विभाग के मंत्री को बाहर कर देती हैं। राहुल गांधी ने नसीमुददीन सिद्दीकी का नाम तो नहीं लिया पर यह जरूर कहा कि माया ने जिन मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया उनके विभाग उन मंत्रियों से भी ज्यादा भ्रष्ट्र मंत्री को दे दिये। हम गरीबों के लिये भोजन का अधिकार लाना चाहते है, जिस में 35 किलो आनाज देश के सभी गरीबों को दिया जायेगा। हमारा यह प्रयास है कि देश में कोई भी भूखे पेट न सोये पर मायावती इस बिल का विरोध कर रही हैं, वह अपने को दलितों की नेता बताती हैं। इस कानून से सबसे ज्यादा फायदा दलितों को ही होगा क्योंकि सबसे ज्यादा गरीब दलित है उत्तर प्रदेश में।

राहुल गांधी ने युवाओं को भी रिझाने की भी कोशिश की। युवाओं से मुखातिब होते हुये राहुल गांधी ने कहा कि मैं चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश के युवाओं को यहीं रोजगार मिले, उन्हें महाराष्ट्र, दिल्ली काम की तलाश में न जाना पडे़। हम दस साल में प्रदेश को बदल देंगे आज यहां का युवा बाहर काम करने जाता है दस साल बाद तमिलनाडु का इंजीनियर यहां काम मांगने आएगा। मैं उत्तर प्रदेश में चुनाव के लिये नहीं आया हूं, यूपी को बदलने आया हूं। सभा को तिलहर से कांग्रेस की प्रत्याशी सुनीता सिंह, ददरौल से प्रत्याशी कौशल मिश्रा, पुवायॉ से कांग्रेस के प्रत्याशी चेतराम ने भी सभा को सम्बोधित किया। सभा का संचालन कांग्रेस के जिलाध्यक्ष धर्मेन्द्र दीक्षित ने किया। राहुल की सभा में दिग्विजय सिंह, प्रमोद तिवारी और जितिन प्रसाद भी मौजूद थे।

शाहजहांपुर से सौरभ दीक्षित की रिपोर्ट.

निखिल मौर्य टीवी से जुड़े, मिथिलेश कार्यमुक्‍त

: प्रकाश की नई पारी : इंडिया न्‍यूज बिहार के पॉलिटिकल एडिटर के रूप में कार्यरत निखिल आनंद के बारे में सूचना है कि वे मौर्य टीवी से जुड़ गए हैं. उन्‍हें ब्‍यूरो चीफ बनाया गया है. निखिल पिछले तेरह सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इसके पहले वे ईटीवी, सहारा समय और जी न्‍यूज जैसे संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

राष्‍ट्रीय सहारा, औरैया से खबर है कि सिटी रिपोर्टर मिथिलेश दुबे को कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. उनको कार्यमुक्‍त किए जाने के कारणों के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसका भी पता नहीं चल पाया है. मिथिलेश के स्‍थान पर हिंदुस्‍तान से प्रकाश को लाया गया है.

नक्सलियों से हिसाब मांग रहे हैं ये नौनिहाल

भारत के भविष्य कुछ स्कूली बच्चों ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ प्रदेश के सुदूर कांकेर जिले में नक्सलियों के खिलाफ एक रैली निकाली. अद्भुत था वो दृश्य जब छोटे-छोटे बच्चे चिल्ला-चिल्ला कर नक्सलियों से अपने स्कूल के भवन को बमों से उड़ा देने का हिसाब मांग रहे थे. जिले के अंतागढ़ नामक कस्बे में एकत्रित स्कूली छात्र-छात्राओं का यह समूह कुछ दिन पूर्व वहां के ग्राम ‘बोंदानार’ में नक्सलियों द्वारा नव निर्माणाधीन हायर सेकेंडरी स्कूल भवन में बम विस्फोट कर उड़ा देने के विरोध में नारेबाजी कर रहे थे. वे शिक्षा के क्षेत्र में बाधक बन रहे नक्सलियों के खिलाफ बैनर, पोस्टर लेकर दो टुक यह कह रहे थे कि नक्सलियों द्वारा आये दिन स्कूली भवनों का तोड़-फोड निंदनीय है, गलत है.

बच्चों का कहना था कि उनका आखिर क्या कुसूर है? उन्होंने क्या अपराध किया है जिसकी सज़ा नक्सली उन्हें दे रहे हैं? छात्र-छात्राओं ने इस रैली के माध्यम से नक्सलियों को सन्देश दिया कि वे इस तरह शिक्षा के मंदिरों को नष्ट कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करें. वैसे ही काफी पिछड़े शिक्षा स्तर वाले उनके इस क्षेत्र में हिंसा और खून-खराबा करके नक्सली न केवल देश का वर्तमान बल्कि बच्चों का भविष्य चौपट कर रहे हैं. इस विशाल रैली का स्थानीय लोगों ने ने केवल स्वागत किया बल्कि उनमें शामिल छात्र छात्राओं के लिए पीने का पानी और चॉकलेट आदि की व्यवस्था भी स्थानीय नागरिकों द्वारा किया गया. बहरहाल.

एक कथानक की तरह यह कहा जा सकता है कि भारत का भविष्य (और वर्तमान भी) केवल और केवल उस चिड़िया में कैद है जिसे ‘लोकतंत्र’ कहा जाता है. रंग, रूप, भेष-भूषा, भाषा, भोजन, भजन पद्धति आदि की इतनी विविधताओं के बाद भी अगर भारत युगों से कायम है तो इसलिए कि ‘तंत्र’ पर ‘लोक’ को ज्यादा महत्व देने की संस्कृति यहां सदियों से रही है. भारत में तो यहां तक की कहा गया है ‘यद्यपि शुद्धम् लोक विरुद्धम, न करनीयम-न करनीयम.’ यानी अगर उचित भी हो और लोक विरुद्ध हो तो उसे नहीं करना चाहिए. तो सभ्यता के विकास के आरंभिक चरण से लेकर वर्तमान तक इस भूमि ने कभी ‘लोक’ के प्रति अपनी आस्था को कम नहीं होने दिया. दुनिया को सबसे पवित्र तन्त्र के रूप में लोकशाही से परिचय कराना वास्तव में ‘शून्य’ के आविष्कार से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण रहा है. इसी तन्त्र का यह चमत्कार है कि कोई सहज-सरल लेकिन प्रतिभाशील ग्रामीण बालक भी कल होकर देश का प्रधान मंत्री तक बन सकता है. लेकिन बावजूद दुनिया के इस सबसे बड़े, सबसे पुराने, सबसे सफल, भारत के लोकतंत्र में चुनौतियां भी कम नहीं है. हालांकि यहां चुनौतियों से जूझने, उससे निपटने का माद्दा भी कायम है. ऊपर वर्णित बच्चों का हालिया उद्धरण इसी बात की तो गवाही देते हैं.

तो यह तथ्य है कि भविष्य के लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती माओवाद ही है. एकाधिक बार केन्द्र ने भी इस तथ्य को स्वीकारते हुए इसे देश के आंतरिक सुरक्षा पर सबसे बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया है. अगर उपलब्ध आंकड़ों पर गौर करें तो किसी को भी जान कर ताज्जुब हो सकता है कि सभी तरह की आतंकी गतिविधियों को मिलाकर, सुदूर पूर्वोत्तर से लेकर देश की सीमाओं पर हो रहे हर तरह की कारवाई में जितने लोग हताहत होते हैं उससे दस गुना लोगों की मृत्यु केवल और केवल नक्सल मामले में ही होती है. उसके अलावा स्कूल भवन ढहा कर, सड़कों को नष्ट कर, लेवी वसूली आदि से देश का राजस्व और विकास की गतिविधियों को क्षति पहुंचती है वो अलग. हमारी सरकारों को यह ध्यान रखना होगा कि आज नक्सलवाद न केवल आंतरिक सुरक्षा के लिए ही बल्कि देश की एकता और अखंडता के लिए भी खतरनाक है. आंध्र के तिरुपति से (वाया बस्तर) पशुपति – काठमांडू- होकर जिस लाल गलियारा बनाने की बात की जा रही है, वह केवल भारत और नेपाल तक ही नही रुकने वाला बल्कि आगे यह रास्ता चीन तक भी जाता है. और ऐसे रास्ते चीन द्वारा भी भौतिक रूप से भी बनाने की खबर गाहे-ब-गाहे कई बार समाचार माध्यमों में आते ही रहते हैं.

जब हम इस आतंक को ‘विचार’ के शक्ल में देखते हैं तो दहशत का पारावार नहीं रहता. यह सोच कर ही रूह काँप जाती है कि नक्सलवाड़ी में इस चीनी वायरस का नया वर्ज़न बनाने वाले स्व. चारु मजुमदार का घोषित नारा रहा है कि ‘चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन हैं.’ तो अगर आगे ऐसे गलियारा बन जाने के बाद कभी चीन से युद्ध की नौबत आयी तो उसके अपने सशक्त सेनाओं के अलावा भारत के आस्तीन में से भी उसे एक संगठित गिरोह समूचे कोरिडोर के लिए मिल जाएगा. उसके बाद भविष्य के लोकतंत्र की क्या बल्कि भविष्य के भारत के बारे में भी सोच कर आपके रोंगटे खड़े हो सकते हैं.  

तो क्या यह मान लिया जाय कि अब भारत का बेड़ा गर्क होना ही है? या अब भारत में लोकतंत्र चंद दिनों की मेहमान है? नहीं, बिलकुल नहीं, कदापि नहीं. ऊपर की तमाम बातें न हमें डराने के लिए है न ही चिंतित होने के लिए. बस ज़रूरत है जागरुक होने की और स्थिति की भयावहता को समझने की. समझ कर हर तरह के दबावों और द्वंद्वों से मुक्त हो निर्णय लेने की और लिए गए निर्णय पर कायम रहने की. अभी यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अभी कहा कि विकास ही नक्सलवाद का जबाब हो सकता है. इससे पहले गृह मंत्री चिदंबरम भी इस बात को एकाधिक बार दोहरा चुके हैं. लेकिन इस समस्या को समझ, थोड़ा इसकी तह में जाकर देखें तो एक ही निष्कर्ष निकलता है कि विकास से नक्सल उन्मूलन संभव नहीं बल्कि नक्सल उन्मूलन के बाद ही संबंधित क्षेत्रों में आप विकास की कल्पना कर सकते हैं. इसमें कोई दो मत नहीं हो सकता.

विकास का मतलब तो ज़ाहिर है वही पुल-पुलिये-सड़क-स्कूल का बनना होता है, जिसे बनाने देने में पहले तो नक्सलियों को लेवी चाहिए. और जब फिर वो स्कूल भवन आदि बन कर तैयार हो जायेंगे तो फिर उसे तोड़ कर ‘क्रान्ति’ कर देने का विकल्प तो रहेगा ही, जिसका विरोध करने वो बच्चे एकत्रित हुए थे. हाल ही में छत्तीसगढ़ के दांतेवाडा में एक बड़े औद्योगिक समूह का पन्द्रह लाख रुपया नक्सलियों तक पहुंचाते हुए एक ठेकेदार और उसके सहयोगी को गिरफ्तार किया गया है. एक आकलन के अनुसार केवल बस्तर से नक्सल समूह 1500 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की वसूली करते हैं. तो असली समस्या वो गरीबी-शोषण या उपेक्षा आदि नहीं है जैसा कि माओवादी या उसे वैचारिक समर्थन देने वाले मानवाधिकारी समूह आदि प्रचारित करते हैं. इन समस्याओं के कारण नक्सलवाद फैला ये बात भी पूरा सच नहीं है. इसके उलट सच्चाई तो ये है कि नक्सलवाद को फैलने के लिए कुछ समस्याओं की दरकार थी, थोड़े से बहाने चाहिए थे जिसे उन कारणों ने पूरा कर दिया. अगर ये कारण नहीं होते तो ये गिरोह कोई और कारण तलाश लाते. ये न होता तो कोई दूसरा गम होना था. तो चूंकि सब जानते हैं कि कोई भी समाज कभी ‘समस्या मुक्त’ तो हो नहीं सकता. अगर आपको खून ही बहाने हैं, लूट ही मचाने हैं तो अभी तक डाकुओं-मवालियों के पास भी जब इसके लिए बहाने मिल गए थे तो माओवादियों के पास तो अपनी कथित विचारधारा भी है. खैर.

तो जिस तरह देश के अन्य हिस्से के बच्चे केवल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर प्रभात फेरी निकालने ही सड़क पर आते हैं उसी तरह आगे से दुबारा कभी अन्तागढ़ के बच्चों को भी गणतंत्र दिवस अमर रहे …यही नारे लगाने सड़क पर आना पड़े, इस हेतु सरकारों को कुछ प्रयास करने, कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है. अव्वल यह कि उसे तय करना होगा कि क्यूंकि विकास कार्यों का दूसरा मतलब नक्सलियों तक संसाधनों की आपूर्ति भी होना, लेवी पहुंचना भी है. तो कथित विकास से नक्सल उन्मूलन नहीं बल्कि नक्सल उन्मूलन कर वो विकास करेंगे. दूसरा ये कि इसे कहीं से भी देश की समस्याओं, उसकी विसंगतियों के कारण पैदा हुआ मान कर नहीं बल्कि ये सोच कर कारवाई करेंगे कि ये सीधे तौर पर आतंकवाद और अलगाववाद है. ये भी मान कर की ये आतंकी भी देश के दुश्मन हैं इसलिए इनके साथ केवल और केवल सख्ती से ही पेश आयेंगे. हालांकि साथ ही अगर कोई अपने, राह से भटके युवा मुख्यधारा में शामिल होना चाहे तो उसके लिए भी दरवाज़े खुले रखेंगे.

नक्सलवाद के विरुद्ध जिस तरह छत्तीसगढ़ की रमन सिंह की सरकार जी-जान से जुटी है या जिस तरह अभी ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल ने दुर्दांत किशन जी को मार कर सफलता हासिल की है उसका अनुसरण कर इस समस्या से पार पाने की ज़रूरत है. याद रखें ..भविष्य का भारत या भविष्य का लोकतन्त्र इस बात पर ही निर्भर करेगा कि वर्तमान में हमने नक्सल समस्या से पार पाने हेतु किस तरह की कोशिश की और उन प्रयासों में कितने सफल रहे हैं.

लेखक पंकज झा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं. इन दिनों रायपुर से प्रकाशित छत्तीसगढ़ भाजपा की पत्रिका दीप कमल के संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

बहुत बड़े चिरकुट हैं जागरण वाले, पढ़िए खबर और शेम शेम कहिए

भाई साहब, कितने बड़े चिरकुट हैं दैनिक जागरण वाले. खबरों का रोजगार करते-करते अब इंसानियत की भी बनियागिरी करने लग गए हैं. पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार तथा अपने पत्रकारों का शोषण करने वाले इस संस्‍थान में प्रबंधकों की संवेदनाएं मर चुकी हैं. तभी तो दैनिक जागरण के बिलासपुर आफिस में बतौर चपरासी काम करने वाले गोपाल मोहन की 24 दिसम्‍बर को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो जाती है, लेकिन अगले दिन जो खबर अखबार में छपती हैं उसमें उन्‍हें मात्र नगर का निवासी बताया जाता है.

गोपाल मोहन के निधन पर संवेदनहीन जागरण एवं कर्ताधर्ता शोक भी नहीं जताते हैं, जबकि गोपाल पिछले दो सालों से जागरण को अपनी सेवाएं दे रहा था. गोपाल की तैनाती अरुण डोगरा ने करवाई थी, लेकिन जून महीने में दैनिक जागरण ने अरुण डोगरा को भी बाहर कर दिया था. बताते हैं कि उसके बाद से गोपाल काफी दुखी रहता था. अब अरुण डोगरा द्वारा रखवाए गए अनूप शर्मा कार्य कर रहे हैं.

इसी दिन दैनिक जागरण के नए प्रभारी राजेश्‍वर ठाकुर के दादाजी का भी स्‍वर्गवास हुआ और ये समाचार राज्‍य पृष्‍ठ पर प्रकाशित किया गया. उसमें जागरण के प्रबंधक निशिकांत ठाकुर ने भी शोक प्रकट किया है. यानी प्रभारी के दादा के निधन पर तो शोक व्‍य‍क्‍त किया जाता है लेकिन अपने कर्मचारी के लिए एक शब्‍द भी नहीं कहा गया. यहां तक कि उसे अपना कर्मचारी बताने में भी शर्म महसूस की गई. यहां तक कि उसके किसी परिजन तक को फोन नहीं किया गया, जिससे पता चलता है कि जागरण अपने कर्मचारियों की कितनी खैर करता है. किसी संस्‍थान के इस तरह के दोगले चरित्र का सामने आना जरूरी है.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

दूज का चांद से चौदहवीं का चांद बन गया हिंदी विवि : नामवर सिंह

: हिंदी विवि के 14वें स्‍थापना दिवस पर हुए विविध कार्यक्रम : वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विवि के चौदहवें स्‍थापना दिवस के अवसर पर विवि परिसर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रख्‍यात आलोचक व विवि के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में विश्‍वविद्यालय के तेजी से हुए विकास को देखकर मेरी छाती दुगुनी हो गई है। इस विकास का श्रेय जाता है कुलपति विभूति नारायण राय को। दूज के चांद को उन्‍होंने चौदहवीं का चांद बना दिया है। अपने कार्यकाल में इसे वे पूर्णिमा का चांद बनायेंगे, ऐसी आशा है। इनका कार्यकाल बढ़ेगा तो विश्‍वविद्यालय की प्रगति शिखर पर पहुंच जाएगी।

उन्‍होंने कहा हिंदी को सर्वजन की भाषा बनाने के लिए यहां के शिक्षक और छात्रों को निरंतर प्रयत्‍न करना चाहिए। 14 वें स्‍थापना दिवस के मौके पर जाने माने पर्यावरणविद और समाजसेवी राजेन्‍द्र सिंह ने कहा कि महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी काफी जिम्‍मेदारियां पूरी की हैं और उसके सामने अब भी अनेक ऐसे लक्ष्‍य हैं जिसे पूरा करना है। आज सबसे ज्‍यादा जरूरत इस बात की है कि देश के जो पारंपरिक संसाधन हैं उसका शोषण रोका जाय और उनका उपयोग देश के लोगों के लिए किया जाय। इसके लिए आज संघर्ष चलाने की जरूरत है। वैसे तो हिंदी प्‍यार की भाषा है लेकिन उसे अपने हक के लिए संघर्ष की भाषा बनना पड़ेगा। इस विवि ने हिंदी को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर गौरव दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभायी है। हिंदी विवि के सामने मैं एक प्रस्‍ताव रखना चाहता हूं कि वह विभिन्‍न इलाकों में ग्राम स्‍वराज्‍य के लिए चल रहे आंदोलन को हिंदी में लिपिबद्ध कराए।

स्‍वागत वक्‍तव्‍य में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में विवि ने अनेक शिखर स्‍तर की उपलब्धियां हासिल की हैं कोलकाता और इलाहाबाद केंद्र खोले गए और आने वाले दिनों में मॉरीशस में भी केंद्र खालने की योजना है। अगली योजना में विवि के अंतर्गत चार नए विद्यापीठ खोलने की स्‍वीकृति मिल चुकी है, यह हमारी उत्‍साह को बढ़ाने वाला है। अब हम विश्‍वास के साथ कह सकते हैं कि हमारा विश्‍वविद्यालय उड़ान पर है। इस विवि को अंतरराष्‍ट्रीय यूं ही नहीं कहा गया था इसके पीछे एक स्‍पष्‍ट अवधारणा है। दुनिया के 200 विश्‍वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है उनमें समन्‍वय का काम हमारा विश्‍वविद्यालय करने की कोशिश में है। श्री राय ने कहा कि दुनियाभर के देशों से लोग हमारे यहां हिंदी पढ़ने आ रहे हैं और यहां से ज्ञान समृद्ध होकर जा रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि हमने वर्धाकोश की योजना पर काम शुरू कर दिया है। हिंदी में स्‍पेल चेक बनाने का काम चल रहा है और हम जल्‍दी ही समग्र हिंदी व्‍याकरण पर काम शुरू करने वाले हैं।

स्‍वागत वक्‍तव्‍य में प्रतिकुलपति प्रो. ए.अरविंदाक्षन ने कहा कि विवि की शोध परियोजनाएं काफी लोकप्रिय हो रही हैं। हमारी कोशिश है कि 12 वीं योजना में हिंदी सभी भारतीय भाषाओं का मंच बने, हमारा कोलकाता केंद्र पूर्वी भात के भाषा में समन्‍वय स्‍था‍पित करेगा, ऐसी आशा है। इस अवसर पर मंचस्‍थ अतिथियों के हाथों हिंदी विवि का कैलेण्‍डर का लोकार्पण किया गया। साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल की वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्‍तक '21 वीं सदी का पहला दशक और हिंदी कहानी' का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में जहां विवि के डिबेटिंग सोसायटी की ओर से आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्‍कृत किया गया वहीं खेल विभाग की ओर से आयोजित बैडमिंटन, बॉलीवाल, क्रिकेट प्रतियोगिता के विजेता और उपविजेताओं को भी पुरस्‍कृत किया गया। मुख्‍य समारोह के पश्‍चात सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में श्री श्री गोविंदजी नत संकीर्तन, मणिपुर की लोक नृत्‍य प्रस्‍तुति ने उपस्थितों को खूब रिझाया। संचालन साहित्‍य विद्यापीठ की रीडर डॉ. प्रीति सागर ने किया तथा कुलसचिव डॉ. के.जी.खामरे ने धन्‍यवाद ज्ञापन किया।

आसिफ इकबाल यूपी न्‍यूज से जुड़े, संजीव का तबादला

महुआ न्‍यूज से इस्‍तीफा देने वाले आसिफ इकबाल ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है. अ‍ासिफ ने शीघ्र लांच होने जा रहे यूपी न्‍यूज में पॉलिटिकल हेड एवं दिल्‍ली ब्यूरोचीफ के रूप में ज्‍वाइन किया है. आसिफ दिल्‍ली के साथ पूरी यूपी पर नजर रखेंगे. उल्‍लेखनीय है कि एक दिन पहले ही आसिफ ने प्रबंधन से विवाद के बाद महुआ से इस्‍तीफा दे दिया था. वे यहां पर पॉलिटिकल रिपोर्टर थे.

हिंदुस्‍तान, पटना से खबर है कि संजीव सिंह का तबादला लखनऊ के लिए कर दिया गया है. संजीव यहां पर सीनियर सब एडिटर के रूप में तैनात हैं. वे लखनऊ में चुनाव डेस्‍क पर अपनी जिम्‍मेदारी निभाएंगे. संजीव को संपादक अक्‍कू श्रीवास्‍तव का नजदीकी माना जाता है. संजीव इसके अमर उजाला, वाराणसी में थे.

प्रत्‍याशी के साथ घूम रहे पांच असलहाधारी पकड़े गए

गोरखपुर : बांसगांव विधान सभा सीट से राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी की उम्मीदवार घोषित की गई जिला पंचायत सदस्य और गगहा थाना क्षेत्र के पूरे गांव निवासी बीना देवी के साथ गुरुवार को घूम रहे असलहाधारियों को पुलिस ने कैंट क्षेत्र में शास्त्री चौराहे के पास से गिरफ्तार कर लिया। इस संबंध में किसी ने जिलाधिकारी संजय कुमार को सूचना दी थी। बाद में जिलाधिकारी के निर्देश पर असलहाधारी पकड़े गए।

इनमें से दो खिलाफ धारा 144 का उल्लंघन करने और तीन पर बिना लाइसेंस के असलहा लेकर चलने की कार्रवाई की गई है। पुलिस ने असलहों के लाइसेंस निरस्त कराने की कार्रवाई करने की भी बात कही है। गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में आयोजित पार्टी की एक बैठक में बीना देवी की प्रत्याशिता की घोषणा की जानी थी। इसी सिलसिले में वह अपने लाव-लश्कर के साथ बैठक में भाग लेने आई थीं। उनके साथ उनकी गाड़ी में एक व्यक्ति बंदूक लेकर और चार लोग राइफल लेकर बैठे थे। उनके गाड़ी से उतरते ही किसी ने फोन से इसकी जानकारी जिलाधिकारी संजय कुमार को दे दी।

इस पर जिलाधिकारी ने कैंट पुलिस को असलहाधारियों को गिरफ्तार करने का निर्देश दे दिया। जिलाधिकारी के निर्देश पर मौके पर पहुंची पुलिस ने बीना देवी के साथ असलहा लेकर चल रहे राजू निषाद, नेबूलाल, देवेन्द्र यादव उर्फ गोली, दीपक और महेश को गिरफ्तार कर लिया। इंस्‍पेक्टर कैंट रवि कांत पारासर ने बताया कि असलहाधारियों में से दो ने लाइसेंस दिखाया है, इसलिए उनके खिलाफ धारा 144 का उल्लंघन करने के आरोप में कार्रवाई की गई है जबकि तीन अन्य के लाइसेंस न दिखा पाने की वजह से आ‌र्म्स एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है। साभार : जागरण

गोरखपुर में प्रशासन ने कहा – पेड न्‍यूज से दूर रहे मीडिया

गोरखपुर : जिला प्रशासन ने विधान सभा चुनाव में मीडिया से सहयोग की अपेक्षा की है। खासतौर से पेड न्यूज को लेकर वार्ता की गई। गुरुवार को कलेक्ट्रेट सभागार में जिला निर्वाचन अधिकारी संजय कुमार ने पेड न्यूज को लेकर निर्वाचन आयोग द्वारा जारी निर्देशों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए तीन सदस्यीय समिति होगी, जो चुनाव से संबंधित सभी खबरों पर नजर रखेगी।

निवार्चन अधिकारी ने बताया कि आयोग के निर्देश के अनुसार पेड न्‍यूज पर निगरानी का आशय ऐसी खबरों से है, जो मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किसी पार्टी या विशेष प्रत्याशी की प्रशस्ति करते हुए अथवा विपक्षी दलों की निंदा करते हुए न्यूज आर्टिकल या रिपोर्ट के रूप में दी जाती है, ऐसी खबरों को प्रकाशित करने से बचना है।

उन्होंने बताया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 127 (क) के अंतर्गत विज्ञापन, पैम्फलेट आदि के प्रकाशक अथवा मुद्रक का नाम-पता छापना जरूरी होगा। ऐसा न करने पर दो हजार तक का जुर्माना और दो साल की सजा हो सकती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 171 (एच) के अनुसार चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थी की अनुमति के बिना विज्ञापन व्यय प्रतिबंधित होगा। जिला निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि प्रत्याशियों के खर्च पर नजर रखने के लिए व्यय प्रेक्षक भी मौजूद रहेंगे। साथ ही अगर प्रत्याशी चाहेंगे तो एक अपना खर्च एजेंट भी रख सकेंगे।

फरजंद अहमद ने कहा – ‘स्‍वैच्छिक खुलासे’ पर जोर दे पंचायती राज विभाग

: आरटीआई के एक मामले की सुनवाई के दौरान कही ये बात : बिहार राज्‍य के सूचना आयुक्‍त फरजंद अहमद ने खगडि़या जिले में पंचायती राज से संबंधित एक आरटीटाई के मामले में राज्‍य के मुख्‍य सचिव एवं पंचायती राज विभाग के प्रमुख सचिव को कहा कि वे पंचायती राज विभाग में स्‍वैच्छिक खुलासे के लिए सिटस्‍ट पर दबाव डालें और सबसे बेहतर तो यही रास्‍ता है कि विभाग अपने वेबसाइट को रेगुलर अपडेट करे, सूचनाएं चाहने वालों ज्‍यादातर को बिना दिक्‍कत के सूचनाएं मिल सकेंगी, इससे विभाग में पारदर्शिता भी आएगी.

उन्‍होंने कहा कि सूचनाओं के प्रतिदिन अपडेट होते रहने से न सिर्फ एक बेहतर शासन प्रणाली को मजबूती मिलेगी बल्कि ट्रांसपैरेंसी के जरिए भ्रष्‍टाचार खतम करने में भी सहायता होगी. नीचे पढि़ए पूरा मामला –

       “Voluntary Disclosures” of Information guarantees transparency

In a first-ever move to ensure transparency in the functioning of government from state secretariat to Panchayat levels the Bihar State Information Commission on Tuesday called upon the State Chief Secretary and the Principal Secretary of Panchayati Raj Department to enforce the system of “voluntary disclosures” under the Right to Information Act-2005.

The Information Commission said: “Voluntary disclosures and their regular updating on the web and internet is the best way to help information-seekers in getting the information they need in a hassle free manner without affecting the day to day functioning of the government offices and officials. This would strengthen roots of good governance and help banish corruption through transparency”.

This was stated by Farzand Ahmed, journalist turned Information Commissioner in an order relating to functioning of three-tier Panchayati Raj system in Khageria district.

Using Commission’s power under section 25 [5] of RTI Act, Ahmed recommended to the head of the state bureaucracy to issue a directive to all development-related government departments to put all information in public domain. He pointed out that Section 4 [1] [i] makes it mandatory for every ‘Public Authority’ to ‘maintain all its records duly catalogued and indexed in a manner and the form which facilitates the right to information under this Act and ensure that all records that are appropriate to be computerized are, within a reasonable time and subject to availability of resources, computerized and connected through a network all over the country on different systems so that access to such records is facilitated’.

Bihar state Information Commission has already established itself as the Number One in the country through innovative implementation of RTI Act. Implementation of this recommendation to the Chief Secretary would not only add another feather to its cap but would also go a long way to stop intimidation to Information-seekers and delays, said BSIC sources.

Ahmed made this suggestion in the wake of a case from Khageria. Petitioner Manoj Kumar Mishra, a resident of Gogri in Khageria had sought information regarding general body meetings of Panchayats in different years, decisions regarding development schemes and implementation between 1995-2009. He wanted all these information to be supported with documents and audit reports.

When the petitioner did not get satisfactory information, Information Commissioner Ahmed asked the District Magistrate of Khageria to set up a high-level inquiry Committee with the petitioner as a member. Though the DM quickly informed the Commission about setting up of the committee including Deputy Development Commissioners and BDOs of Blocks concerned as well as the petitioner as a member, he indicated that it might take time as there were other pressing works to do too by the officials.

The DM also referred to some Supreme Court rulings in which it was stated that in course of collection of information day to day work should not suffer.

The Information Commissioner in his order told the District Magistrate that his reply indicated his sincerity as well as his Hamlet-like dilemma to do or not do. He also used a line from Faiz Ahmad Faiz’s famous couplet [Aur bhie ghum hain zamane mein mohabbat ke siwa] to indicate confusion and reminded the District Chief that despite everything Right to Information is the basic right of every citizen and information sought by him must get priority over other things.

He said DM’s sincerity in setting up the committee must be appreciated. But at same time he [DM] must also prove his sincerity by getting the matter investigated. “Such an inquiry may expose huge corruption”.

The Information Commissioner gave the DM three months time for the inquiry to be completed and asked him to send a copy of the report to the Commission too.

पत्रकार ने भाजपा नेता पर लगाया धमकी देने का आरोप

उत्‍तराखंड के उधमसिंह नगर के नानकमता थाना क्षेत्र में रहने वाले पत्रकार गौरव वर्मा ने पुलिस को शिकायती पत्र देकर आरोप लगाया है कि एक भाजपा नेता उनको जान से मारने की धमकी दे रहा है. नानाकता थानाध्‍यक्ष को दिए गए पत्र में गौरव ने लिखा है कि भाजपा युवा मोर्चा का मण्‍डल अध्‍यक्ष भवानी जोशी उनके साथ अकेले में गाली ग्‍लौज करते हैं तथा जान से मारने की धमकी भी दी है.

गौरव को धमकी देने की खबरें उत्‍तराखंड की कई अखबारों ने भी ने भी प्रकाशित की है.  

नए साल पर आएगा दुनिया का पहला 3डी चैनल

पेइचिंग : ग्लोबल टेक्नोलॉजी को अपनाते हुए चीन जल्द ही देश का पहला 3डी टीवी चैनल शुरू करने वाला है। अखबार चाइना डेली के मुताबिक, पहले 3डी टीवी चैनल का ट्रायल पहली जनवरी से शुरू होगा। फरवरी में स्प्रिंग फेस्टिवल के दौरान इसे आधिकारिक तौर पर शुरू किया जाएगा। इस पर दर्शकों को 3डी प्रोग्राम देखने की सुविधा मिलेगी।

यह चैनल एनिमेशन, स्पोर्ट्स, डॉक्यूमेंट्री, ड्रामा से जुड़े प्रोग्राम तो टेलिकास्ट करेगा ही, लाइव प्रसारण भी किया जाएगा। 3डी चैनल का लुत्फ उठाने के लिए स्पेशल टीवी और स्पेशल चश्मे की जरूरत होगी। आई एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि स्पेशल चश्मे के बिना यह चैनल देखने पर आंखों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहेगी। 3डी चैनल शुरू होने के बाद ऐसे टीवी सेट्स की बिक्री बढ़ेगी और इकॉनमी की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है। साभार : पीटीआई

”लोकतांत्रिक राजनीति टीवी धारावाहिक नहीं”

आमतौर पर मीडिया जिन्हें चढ़ाता है, उन्हें गिरा भी देता है। सीएनएन आईबीएन के इंडियन ऑफ द ईयर अवार्ड के दौरान अन्ना हजारे ने बड़े भोलेपन से स्वीकारा कि उन्हें महाराष्ट्र के क्षेत्रीय नेता से राष्ट्रीय आइकॉन बनाने के लिए मीडिया जिम्मेदार था। ‘यदि आपके कैमरे हर जगह मेरा पीछा नहीं करते तो भला मुझे कौन जानता?’ यह इस समाजसेवी का ईमानदार वक्तव्य था।

अब वही मीडिया मुंबई में अन्ना के फ्लॉप शो की खबरें मुस्तैदी से दिखा रहा है और हमें बता रहा है कि किस तरह एक आंदोलन एंटी-करप्शन से एंटी-कांग्रेस बन गया और किस तरह अन्ना के अनशन दबाव बनाने वाले ब्लैकमेल की तरह हो गए। गत सप्ताह मणिशंकर अय्यर, जो कि सत्ता-वर्ग के अंतिम मूर्तिभंजक हैं, ने अन्ना को ‘फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर’ बताया। अय्यर अनेक नेताओं के इस दृष्टिकोण को ही प्रतिफलित कर रहे थे कि मीडिया द्वारा रचे गए अन्ना संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। लेकिन क्या अन्ना की लार्जर दैन लाइफ छवि के लिए मीडिया ही जिम्मेदार था?

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले नौ माह में अन्ना हजारे के सलाहकारों ने मीडिया का बेहतरीन इस्तेमाल किया। प्राइम टाइम प्रेस वार्ताएं, मेड फॉर टीवी तमाशे, सोशल नेटवर्किग, अन्ना को मीडिया कवरेज की अधिकता से बहुत लाभ मिला। हां, कुछ अवसरों पर मीडिया का कवरेज अतिनाटकीय था और कुछ पत्रकार अन्ना के चीयरलीडर भी बन गए, लेकिन अन्ना को विशुद्ध रूप से मीडिया द्वारा रची गई परिघटना के रूप में देखना एक गंभीर भूल ही होगी। लोग अन्ना की ओर केवल इसीलिए आकर्षित नहीं हुए थे, क्योंकि सभी टीवी कैमरे उनकी ओर खिंचे चले जा रहे थे। लोग अन्ना की ओर इसलिए आकर्षित हुए थे, क्योंकि वे उन्हें नैतिक रूप से कंगाल राजनीतिक नेतृत्व का विलोम जान पड़े थे।

अप्रैल की घटनाओं को याद करें, जब अन्ना पहली बार राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे थे। जंतर-मंतर पर किए गए अपने पहले अनशन से ठीक पहले अन्ना प्रेस क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए थे। कांफ्रेंस में नाममात्र की संख्या में लोग मौजूद थे और अन्ना काफी हद तक राष्ट्रीय मीडिया के लिए विस्मय का विषय ही थे। लेकिन अनशन द्वारा सुर्खियों में जगह बना पाने से भी पहले वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री शरद पवार द्वारा लोकपाल के लिए गठित मंत्रिसमूह से त्यागपत्र देना अन्ना के इस दावे को लगभग उचित ठहराना ही था कि एक ‘भ्रष्ट’ मंत्री एंटी-करप्शन लॉ पेनल में नहीं हो सकता।

दो दिन बाद जब सरकार ने अपने आधिकारिक राजपत्र में औपचारिक अधिसूचना जारी करते हुए एक सशक्त लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी गठित की तो इससे अन्ना के आंदोलन को और बल मिला। कमेटी के सदस्यों में आधे सरकार के मंत्री थे और आधे ‘टीम अन्ना’ के सदस्य। ९ अप्रैल तक अन्ना भ्रष्टाचार-रोधी कानून पर जारी बहस में महज एक और आवाज भर ही थे, लेकिन उन्हें और उनकी ‘टीम’ को लोकपाल पर सरकार से औपचारिक वार्ता करने की अनुमति मिलते ही वे ‘सिविल सोसायटी’ के एकमात्र प्रवक्ता बन गए। अचानक वे अरुणा रॉय, लोकसत्ता के जयप्रकाश नारायण सहित लोकपाल कानून पर कड़ी मेहनत कर चुके कई अन्य समाजसेवियों जितने ही प्रतिष्ठित हो गए।

क्या मीडिया ने सरकार से कहा था कि टीम अन्ना को सिविल सोसायटी की ओर से वार्ताकार बनाए या यह एक ऐसी सरकार का विचार था, जो गैरसरकारी संगठनों को संतुष्ट करने को आतुर थी? जब ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकार की ओर से चर्चा करने के लिए कांग्रेस के मंत्रियों को नियुक्त कर दिया गया, तब तो यह पूरी जोर-आजमाइश प्रभावी रूप से कांग्रेस बनाम टीम अन्ना बनकर रह गई। यदि 9 अप्रैल को सरकार से गलती हुई थी तो 5 जून को तो वह भारी भूल ही कर बैठी। कालेधन के मसले पर अनशन कर रहे बाबा रामदेव के आंदोलन को समाप्त करने के लिए दिल्ली पुलिस ने आधी रात को बलप्रयोग किया, जबकि महज 72 घंटे पहले सरकार के चार वरिष्ठ मंत्री योग गुरु की अगवानी करने हवाई अड्डे पहुंचे थे।

लेकिन सबसे बड़ी भूल हुई 16 अगस्त को, जब दिल्ली पुलिस ने अपने दूसरे अनशन की तैयारी कर रहे अन्ना को गिरफ्तार कर लिया। पहले अन्ना को अनशन स्थल प्रदान करने में आनाकानी करके और फिर न्यायिक हिरासत में भेजकर सरकार ने उन्हें एक भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता से एक शहादतपूर्ण मसीहा में बदल दिया। अन्ना के अप्रैल अनशन के दौरान उनके मंच पर भारत माता का विशाल पोस्टर था और बाबा रामदेव भी मंचासीन थे, लेकिन अगस्त में रामलीला मैदान पर हुए अनशन के दौरान भारत माता के पोस्टर की जगह महात्मा गांधी के चित्र ने ली और बाबा रामदेव भी मंच से दूर हो गए।

अन्ना की गिरफ्तारी के बाद देशभर में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। अब यह केवल लोकपाल कानून की लड़ाई ही नहीं रह गई थी, बल्कि यह एक भ्रष्ट और अहंकारी माने जाने वाले सत्तातंत्र के प्रति आम जनता का मोहभंग था। आक्रोशित भारतीयों के लिए अन्ना का त्यागपूर्ण व्यक्तित्व सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। ‘मैं भी अन्ना’ टोपियों और टी-शर्ट की भारी बिक्री ने इस आंदोलन का पूरी तरह ‘वैयक्तिकरण’ कर दिया। जब संसद ने अन्ना का अनशन समाप्त कराने के लिए हड़बड़ी में लोकपाल बिल लाने पर प्रस्ताव पारित किया, तो इसे अन्ना की संपूर्ण विजय माना गया। लेकिन क्या मीडिया ने सरकार को अन्ना की गिरफ्तारी के लिए बाध्य किया था या वह एक घबराए हुए सत्तातंत्र का बुद्धिहीन कृत्य था?

वास्तव में सरकार और टीम अन्ना दोनों ने इस माध्यम को समझने में भूल की। टीम अन्ना ने उन्मादी कवरेज को अपना हथियार मान लिया, लेकिन यह भूल गई कि लोकतांत्रिक राजनीति कोई टीवी धारावाहिक नहीं, बल्कि वार्ताओं और समझौतों की एक यंत्रणापूर्ण प्रक्रिया है। दूसरी तरफ सरकार भी नहीं समझ पाई कि कर्कशता हमेशा उस मीडिया के परिवेश का एक अनिवार्य अंग होगी, जिसकी देशभर में 350 से अधिक समाचार चैनल और सैकड़ों ओबी वैन हैं। मीडिया आगे भी न केवल टीम अन्ना, बल्कि अनेक आंदोलनों का लाउडस्पीकर बना रहेगा। सशक्त नेता इस शोरगुल से व्यथित नहीं होंगे और विवेकशील सिविल सोसायटी कैमरा लेंसों के बिना भी समाज की मान्यता पाती रहेगी।

लेखक राजदीप सरदेसाई नेटवर्क18 के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित हो चुका हैं, वहीं से साभार लिया गया है.

रिपोर्टर पर पिस्‍तौल तानने वाले डाक्‍टर की गिरफ्तारी नहीं, पत्रकार नाराज

: प्रशासन कर रहा आरोपी को बचाने का प्रयास : अंबाला : अंबाला में एक राष्ट्रीय अखबार के पत्रकार पर चार दिन पहले सिविल अस्पताल के डॉक्टर अरुण दलाल द्वारा रिवॉल्वर ताने जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस मामले में पुलिस और प्रशासन डाक्‍टर को बचाने में पूरी तरह लगे हुए हैं। आरोपी डाक्‍टर दलाल को अब तक गिरफ्तार न किए जाने को लेकर पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। पुलिस की ढुलमुल कार्रवाई के खिलाफ गुरुवार को पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस आयुक्त अनंत कुमार ढुल्ल से मुलाकात की।

ढुल्ल ने पत्रकारों को आश्वासन दिया है कि वे इस मामले को पूरी तरह से देखेंगे। वहीं, पत्रकार यूनियन ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि पुलिस ने इस मामले में शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई तो पुलिस के खिलाफ आंदोलन चलाया जाएगा। उल्‍लेखनीय है कि रविवार रात करीब 9 बजे अंबाला के ट्रॉमा सेंटर में तैनात डॉक्टर अरुण दलाल ने नशे की हालत में दैनिक भास्‍कर के पत्रकार सनमित सिंह थिंद से हाथापाई की और बाद में उन पर रिवॉल्वर तान दी थी। पुलिस ने पत्रकार की शिकायत पर आरोपी दलाल के खिलाफ आर्म्स एक्ट व अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया था।

सोमवार सुबह जब पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल अंबाला के पुलिस कमिश्नर अनंत कुमार ढुल्ल से मिलने उनके निवास पर गया था तो उन्होंने यह कहकर मिलने से इनकार कर दिया था कि आज छुट्टी है, मंगलवार सुबह 11 बजे आएं। हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के प्रदेश महासचिव सहित अन्य पत्रकारों ने पुलिस आयुक्त को बताया कि इस मामले के जांच अधिकारी किस तरह दलाल के खिलाफ गवाही देने वाले लोगों को धमका रहे हैं। पत्रकारों ने जांच अधिकारी को भी बदलने की मांग की। घटना के पांच दिन होने के बाद भी आरोपी डाक्‍टर को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया है।

दूसरी तरफ, अंबाला के डीसी शेखर विद्यार्थी ने पत्रकारों को बताया कि उन्होंने अंबाला के सीएमओ डॉक्टर सतीश अग्रवाल से इस मामले की पूरी रिपोर्ट लेकर आला अधिकारियों को भेज दी है। इस बारे में आरोपी डाक्टर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में अंबाला शहर के विधायक ने भी इस घटना की निंदा की है। पत्रकारों के साथ दूसरे तमाम संगठनों ने भी आरोपी डाक्‍टर की जल्‍द गिरफ्तारी न होने की दशा में आंदोलन करने की चेतावनी दी है। इस घटना को लेकर आसपास के जिलों के पत्रकार भी गुस्‍से में हैं।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर को ब्रेन स्ट्रोक

: मदद की जरूरत : लखनऊ से सूचना है कि कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके और अपने बेबाक लेखन,  स्पष्टवादिता व साहस के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की तबीयत काफी बिगड़ गई है. उन्हें ब्रेन स्ट्रोक होने की सूचना मिली है. पता चला है कि हाई ब्लडप्रेशर की वजह से उनके दिमाग में ब्लड क्लाटिंग हो गई. इस वजह से उन्हें तत्काल एक निजी नर्सिंग होम के आईसीयू में एडमिट कराना पड़ा. लखनऊ के पत्रकार और शुभचिंतक कुमार सौवीर के बेहतर उपचार के लिए पूरी मदद कर रहे हैं.

कुमार सौवीर अचानक हुए ब्रेन स्ट्रोक से दिमाग में ब्लड क्लाटिंग के कारण अपने परिचितों को भी नहीं पहचान पा रहे थे और कुछ भी बोल पाने में दिक्कत महसूस कर रहे थे. दो-चार दिनों के इलाज के बाद अब वे ढेर सारे लोगों को पहचानने लगे और बातचीत भी कर ले रहे हैं. लेकिन पहले जैसी स्थिति अभी नहीं आ सकी है. वे इस वक्त लखनऊ के इंदिरा नगर के सेक्टर 25 स्थित चौराहे के नजदीक स्थित सीएनएस अस्पताल के थर्ड फ्लोर के प्राइवेट वार्ड में भर्ती हैं.

जिंदगी भर ईमानदारी और सरोकार की पत्रकारिता करने वाले कुमार सौवीर पिछले कुछ वक्त से आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हैं. कुमार सौवीरआर्थिक दिक्कतों से उबरने के लिए उन्होंने वाराणसी में किश्तों पर खरीदा गया अपना एक कमरे का एलआईजी मकान बेच दिया. कुमार सौवीर के बेहतर इलाज के लिए दिल्ली के जर्नलिस्ट टर्नल्ड उद्यमी शीतल सिंह, लखनऊ के हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट के चेयरमैन प्रो. निशीथ राय, आईबीएन7 के यूपी ब्यूरो चीफ शलभ मणि त्रिपाठी, वीकेंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा, आईपीएस अधिकारी अमिताभ, भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी, सिद्धार्थ कलहंस आदि ने अपने-अपने स्तर पर यथासंभव मदद की.

फक्कड़ और कबीर स्वभाव वाले कुमार सौवीर के खराब स्वास्थ्य के बारे में सूचना मिलने से उनके चाहने वाले दुखी हैं.  कुमार सौवीर की स्थिति तेजी से सुधर रही है. लेकिन उनका इलाज लंबे समय तक चल सकता है. पहले वाली सहज व सामान्य स्थिति आने में वक्त लगेगा. पैसे के लिए कभी किसी के आगे मुंह न खोलने वाले और अपने दुखों को कभी किसी के सामने न गाने वाले कुमार सौवीर के लंबे इलाज के लिए और भी पैसों की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में, अगर कोई मदद करना चाहे, तो वह कुमार सौवीर की पुत्री साशा सौवीर के इस एकाउंट में ''Sasha Sauvir, Saving AC 20097430317, State Bank of India, Branch- Aminabad, Lucknow'' पैसे जमा कर सकता है. कुमार सौवीर का मोबाइल 09415302520 फिलहाल उनकी बड़ी बेटी बकुल सौवीर के पास है.

कुमार सौवीर की बीमारी के बारे में पता चलने पर किन्हीं किरण श्रीवास्तव ने फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, वह इस प्रकार है….


किरण श्रीवास्तव : मित्रो, हमारे प्रिय फेसबुक मित्र जिन्हें हम प्यार से "बापू" कहते हैं, उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आया है.  अभी उनकी सुपुत्री ने मुझे फोन पर यह सूचना दी. उन्होंने हमेशा ही मुझे पुत्री तुल्य स्नेह दिया है और हमारा मार्गदर्शन भी करते रहे है! मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि ईश्वर उन्हें जल्द स्वस्थ करें. वह हम सबके बीच फिर से आ सकें और फिर से हमारा उसी तरह से मार्गदर्शन कर सकें !! हरि ॐ !!


कुमार सौवीर के फेसबुक एकाउंट पर आप इस लिंक के जरिए पहुंच सकते हैं–http://www.facebook.com/kumarsauvir

बाबूलाल कुशवाहा और अनंत मिश्र अंटू सीबीआई पूछताछ में पसीना क्यों फेंक रहे?

: रामचंद्र प्रधान की पत्नी अनिता प्रधान से भी हुई पूछताछ : लखनऊ। दो सीएमओ के मर्डर, जेल में डिप्टी सीएमओ की हत्या व एनआरएचएम के हजारों करोड़ के घपले में सीबीआई ने बुधवार को बसपा सरकार के पूर्व मंत्री अनंत मिश्र उर्फ अंटू से पूछताछ की। एक दिन पहले सीबीआई ने बाबूसिंह कुशवाहा से पूछताछ की थी। कुशवाहा ने अंटू के बारे में भी एजेंसी को खासी जानकारी दी थी। यही जानकारी अंटू के खिलाफ हथियार बनी। पूछताछ के दौरान जब भी उन्होंने गोलमोल जवाब दिए सीबीआई अफसरों ने उन्हें टोक दिया। उनसे गुरुवार को भी पूछताछ की जाएगी।

अंटू से सीबीआई ने कमोबेश वही सवाल किए जो मंगलवार को बाबूसिंह कुशवाहा से किए गए थे। अफसरों ने अलग-अलग कई बार सवालों के एक ही फॉर्मेट पर अंटू से जवाब पूछे। अंटू ने गोल-मोल जवाब देने की कोशिश की तो उन्हें टोक दिया गया कि वे सोच-समझ कर जवाब दें। सीबीआई के सूत्र बताते हैं कि अंटू मिश्र कई सवालों का जवाब नहीं दे सके और उन्हें पसीने छूटने लगे। सूत्र की माने तो मंगलवार को कुशवाहा से जब पूछताछ हुई थी तब उन्होंने अंटू की कार्य-प्रणाली और उनकी कमजोरियों के बारे में सीबीआई को बताया था।

यह भी बताया था, किन वजहों से उनमें और अंटू में मतभेद हुआ? कौन से अधिकारी और ठेकेदार अंटू मिश्र के खास थे और किन मामलों में ठेकों को दिलाने में अंटू की पैरवी थी। सीबीआई के सूत्र बताते हैं कि कुशवाहा ने घोटाले की जांच से जुड़े कई ऐसे पहलुओं का सीबीआई को इशारा किया है। अंटू से पूछा गया कि वह सीएमओ हत्याओ के बारे में क्या जानकारी रखते हैं। उन्होंने दोनों सीएमओ को किन-किन ठेकेदारों को काम देने या कौन-कौन से मामलों में फाइल को ओके करने अथवा भुगतान करने के लिए कहा। उनकी जानकारी में कौन से ऐसे लोग हैं, जिनका भुगतान रुकने पर सीएमओ की हत्या की जा सकती थी। डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईएस सचान को ऐसी क्या जानकारी थी कि उन्हें मरना पड़ गया।

एनआरएचएम के बजट में किस तरह बंदरबांट की गई। इसका किस को लाभ मिला। उन्होंने कितना लाभ उठाया। उन्होंने कितनी संपत्ति बनाई। सत्तारूढ़ दल में उनके अलावा और किसको एनआरएचएम के बजट का फायदा मिला। जिन सवालों पर वे अटके उन पर उनसे कई बार पूछा गया, लेकन वे साफ जवाब नहीं दे सके। अंटू ने बुधवार को सीबीआई कार्यालय पहुंचने में ही खासा विलंब कर दिया था, इसी वजह से देर शाम तक पूछताछ होती रही।

पूर्व मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा के नजदीकी एमएलसी रामचंद्र प्रधान की पत्नी अनिता प्रधान के नाम से सीबीआई ने बुधवार को लखनऊ आफिस में दो घंटे से अधिक पूछताछ की। राजधानी सहकारी बैंक की चेयरमैन अनिता से उनकी उस फर्म को लेकर पूछताछ की गई, जिसे एनआरएचएम में लाखों के ठेकों का भुगतान किया गया। एनआरएचएम धांधली की जांच के दौरान सीबीआई ने कई अन्य फर्मों के साथ ही श्रेया इंटरप्राइजेज के संचालकों व इस फर्म से जुड़े ठेकेदारों से भी पूछताछ की थी। इस सिलसिले में जब सीबीआई ने नमित टंडन से पूछताछ की, तब नमित ने ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या करने की भी कोशिश की थी। अनिता प्रधान के नाम पंजीकृत श्रेया इंटरप्राइजेज पर एनआरएचएम की योजना में एमएलसी रामचंद्र प्रधान के परिचित रिजवान आगा और नमित टंडन ने लाखों के ठेके लिए थे।

रिजवान आगा और नमित ने निर्माण कराए थे और जिसका उनके खातों में लंबा भुगतान हुआ था। इसी वजह से सीबीआई ने बुधवार को अनिता प्रधान से पूछताछ की। सीबीआई ने पूछा कि अगर उन्होंने अपनी फर्म को दूसरे को काम करने के लिए दिया था तो इसके बदले मिला भुगतान पूरा उसे क्यों नहीं दे दिया गया। उस भुगतान का मोटा अंश उनकी फर्म के ही खाते में क्यों पड़ा रहा। इस तरह के और कितने भुगतान लिए गए। उनसे पूछा गया कि उनकी फर्म पर जो काम हुआ, उसका उन्हें अब तक कितना लाभ मिला। किस-किस ने उनकी फर्म पर काम किया और कौन सा काम किया। उनके पास एनआरएचएम की विभिन्न योजनाओं में हुए कार्यों व उसके भुगतान के बारे में क्या जानकारी है। पत्नी से हुई पूछताछ के सिलसिले में रामचंद्र प्रधान ने कहा कि वे पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में हैं और जहां तक उन्हें पता है पूछताछ सामान्य प्रक्रिया के तहत की गई। प्रधान ने कहा कि उन्होंने अपने कुछ जानकारों की मदद करने के उद्देश्य से उन्हें अपनी फर्म पर काम करने की अनुमति दे दी थी। इसी वजह से पूछताछ हो रही है। साभार : अमर उजाला

गोरखपुर में जनसंदेश टाइम्‍स की तैयारी : जागरण पर पड़ सकती है भारी

दैनिक जागरण, गोरखपुर में हलचल मची हुई है. शैलेंद्र मणि त्रिपाठी के तेवर से जागरण प्रबंधन सकते में है. जागरण प्रबंधन अपने दो दिग्‍गजों को जिस सोच के लिए एक जगह किया था, उसका असर तो दिखने लगा है, पर इससे जागरण गोरखपुर के भी लहूलुहान होने की स्थिति बनती दिख रही है. कहा जा रहा है कि शैलेंद्र मणि जागरण को बहुत तेज झटका देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. कयास लगाया जा रहा है कि गोरखपुर से जुड़े जिलों में तो उन्‍होंने जागरण को पटखनी देने की पूरी तैयारी कर ली है.

चंद्रकांत त्रिपाठी यानी सीकेटी के गोरखपुर आने के समय ही कहा जा रहा था कि जागरण ने एक कांटा से दूसरा कांटा निकालने की रणनीति अपनाई है. सीकेटी का आना ही शैलेंद्र मणि त्रिपाठी यानी एसएमटी के लिए बड़ा झटका था. गोरखपुर में उनके एकछत्र राज पर इसे हमला माना जा रहा था. जागरण प्रबंधन की सोच के हिसाब से अब एक कांटा निकलने की स्थिति में तो पहुंच गया है पर इससे दैनिक जागरण के पंखों को भी नुकसान पहुंचने की पूरी संभावना बन गई है. गोरखपुर में दैनिक जागरण को खड़ा करने वाले एसएमटी अब इसकी जड़ में ही मट्ठा डालने पर उतारू हो गए हैं. तबादला के आदेश के बाद तो उन्‍होंने अपने इस अभियान को और ज्‍यादा तेज कर दिया है.

खबर है कि आज शैलेंद्र मणि आज दैनिक जागरण्‍ा कार्यालय पहुंचे थे, परन्‍तु बदलाव यह देखने को मिला कि वो जागरण की गाड़ी की बजाय एक सफेद कलर की एकदम नई और चमचमाती महंगी कार से वहां पहुंचे थे. चर्चा है कि उनको यह गाड़ी जनसंदेश टाइम्‍स के प्रबंधन ने दिया है. शैलेंद्र मणि अपने केबिन में कई कामों को निपटाने में भी व्‍यस्‍त रहे. समझा जा रहा है कि वो एक जनवरी से पहले ही अपना इस्‍तीफा दे देंगे. प्रबंधन ने उन्‍हें एक जनवरी तक कानपुर में ज्‍वाइन करने का फरमान जारी किया है. खबर है कि कल यानी बुधवार को जनसंदेश टाइम्‍स की एचआर हेड ने कई लोगों का इंटरव्‍यू लिया है और जल्‍द ही सभी के नाम फाइनल कर दिए जाएंगे. 

जिन लोगों के इं‍टरव्‍यू हुए हैं उनमें ज्‍यादातर दैनिक जागरण से जुड़े हुए लोग ही हैं. सूत्र बता रहे हैं कि जिन लोगों ने इंटरव्‍यू दिया है उनको जागरण से पांच से दस हजार रुपये अधिक एवं एक से दो पद के प्रोन्‍नति का आश्‍वासन भी दिया गया है. इसमें एडिटोरियल से लेकर मार्केटिंग और सर्कुलेशन के लोग भी शामिल हैं. हालांकि इंटरव्‍यू देने वाले लोग भी फूंक-फूंक के कदम रख रहे हैं. पहले तो जनसंदेश टाइम्‍स का पूरा प्रोफाइल पता कर रहे हैं और दूसरे अपनी सेलरी का इंतजार कर रहे हैं. हालांकि इन लोगों को कहा गया है कि जल्‍द ही एप्‍वाइंटमेंट लेटर इन लोगों को मिल जाएगा. खबर है कि पिछले साल जागरण से रिटायर हुए सात से आठ लोगों को भी अखबार से जोड़ा जा रहा है, इसमें एडिटोरियल, सर्कुलेशन एवं अन्‍य विभागों के लोग भी शामिल हैं.

खबर है कि शैलेंद्र मणि ने जागरण के जिला कार्यालयों का कमर तोड़ने की स्थिति में पहुंच गए हैं. चर्चा है कि कुशीनगर का पूरा जागरण स्‍टाफ जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ने को तैयार है. इसी तरह देवरिया, महाराजगंज, बस्‍ती, सिद्धार्थनगर से भी काफी संख्‍या में पत्रकारों के जनसंदेश में लाने की तैयारी हो चुकी है. एक तरह से जिलों में जागरण का स्‍ट्रक्‍चर पूरी तरह ढहाने की तैयारी हो गई है. बसारतपुर में अखबार के आफिस को भी अंतिम रूप दिए जाने की सूचना है. बताया जा रहा है कि गोरखपुर और बनारस दोनों जगहों से जनसंदेश टाइम्‍स एक साथ पंद्रह जनवरी को लांच किया जाएगा. सूत्रों का कहना है कि जनसंदेश टाइम्‍स यूपी-उत्‍तराखंड में बारह जगह से प्रकाशन करने की तैयारी कर रहा है.

‘प्लेयर्स’ का प्रमोशन : दैनिक जागरण के नोएडा आफिस जाएंगे अभिषेक बच्चन

अभिषेक बच्चन अपनी नई फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में इधर-उधर टहल रहे हैं. पता चला है कि कल वे दैनिक जागरण के नोएडा आफिस में पहुंचने वाले हैं. हालीवुड की एक फिल्म के आफिसियल रीमेक के रूप में बनी ''प्लेयर्स'' के प्रमोशन के सिलसिले में अभिषेक दैनिक जागरण के नोएडा आफिस आकर क्या करेंगे, यह तो नहीं पता चल पाया है लेकिन इतना जरूर है कि दैनिक जागरण के नोएडा आफिस में बालीवुड का कोई चर्चित स्टार पहली बार आ रहा है. आमतौर पर स्टार्स के प्रमोशनल प्रोग्राम दैनिक जागरण के कानपुर और लखनऊ के आफिसों में हुआ करते हैं. पर इस बार नोएडा आफिस में प्रमोशनल कार्यक्रम किया जा रहा है.

आपके पास भी कोई सूचना हो तो हम तक bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं. रिक्वेस्ट करने पर आपका नाम गोपनीय रखा जाएगा.

भिखारी की गोद में किसका बच्‍चा है?

ब्लैक एंड ह्वाइट के जमाने में एक फिल्म आई थी बूट पालिस। इस फिल्म में सौतेली मां की क्रूर निर्दयता की कहानी दिल को झकझोरती है। कैसे मासूम बच्चे न चाहते हुए भी भीख मांगने के लिए मजबूर हैं। हालांकि वे इस पेशे को छोड़ना चाहते हैं, लेकिन उन्हें कहीं से इसके लिए प्रोत्साहन नहीं है। तब समाज में ऐसे लोग थे जो ऐसे नौनिहालों को गले लगाकर अपनी संतान की तरह परवरिश करते थे। लिहाजा, फिल्म का अंत सुखांत होता है। जमाना बदला। स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म आई। नौनिहालों का शोषण धंधे में बदल गया, मगर ऐसे बच्चों को गले लगा कर बचाने वाले नहीं बचे।

भीख मांगने का कारोबार करोड़ों में है। बच्चों को बहला-फुलसलाकर या गरीबों से खरीद कर उन्हें बड़े शहरों में भीख मंगवाने का धंधा तेजी से फल फूल रहा है। ताजा उदाहरण ऐसे शहर का है, जो देश और दुनिया में आईटी हब के नाम से प्रसिद्ध है। जी हां बेंगलुरु की ही बात हो रही है। यहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चमक-धमक और विकास की तेज रफ्तार के बीच दूसरे का बचपन बेच मोटी कमाई के धंधा का उजागर हुआ है। दिसंबर के मध्य में बेंगलुरु पुलिस ने भिखारी माफिया के चंगुल से लगभग 3 सौ बच्चों को छुड़ाया। महानगरों की सड़कों पर गरीब मांओं की गोद में भूखे, बीमार, लाचार बच्चे और उनके द्वारा भीख मांगे जाने का दृश्य किस ने नहीं देखा होगा। यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि मासूम अपनी असली मां की गोद में है या किराए पर लाया गया है। बेंगलुरु में जिन बच्चों को पुलिस ने छुड़ाया है, उनमें से अधिकतर दूसरे राज्यों से अपहृत अथवा मां-बाप द्वारा बेच दिए गए या किराए पर दिए गए बच्चे थे। केवल गरीबी के कारण ही बच्चे इस स्थिति में नहीं पहुँच रहे हैं।

क्रूरता यह है कि नशा करवाकर मासूमों से भीख मंगवाने का संगठित धंधा चलाकर कुछ अपराधी कानूनी पंजे से दूर ऐश मौज कर रहे हैं। दो महीने से दो साल तक तक के अबोध बच्चों को नशे का आदी बनाकर फिर किराए की मांओं की गोद में डाल दिया जाता है। ताकि ये भूख से रोएं नहीं या किसी और की गोद में जाने की जिद न करें, बस अचेतन अवस्था में पड़े रहें और इनसे ऐसी स्थिति में रख कर भीख मांगने में आसानी हो। पुलिस ने अब तक सिर्फ 3 सौ बच्चे छुड़ाएं हैं, लेकिन सैकड़ों और बच्चे अभी भी ऐसे गिरोहों के चंगुल में फंसे हो सकते हैं। छुड़ाए गए बच्चों में कर्नाटक के अलावा आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के बच्चे भी थे। इन बच्चों को बेहद बुरी हालत में पुलिस ने पाया। कई घंटे बाद ये बच्चे होश में आ पाए और इनमें से अधिकतर भूखे थे।

आंकड़ों के मुताबिक सालाना साठ हजार बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस के पास दर्ज होती है। इनमें से कितने बच्चे अपने मां-बाप के पास सुरक्षित पहुंचते होंगे, कहना कठिन है। लेकिन यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पुलिस, गैर सरकारी संगठनों व अन्य कल्याणकारी संस्थाओं की मदद जिन बच्चों तक नहीं पहुंच पाती होगी, जिन्हें आपराधिक संगठनों के चंगुल से नही बचाया जाता होगा, उनका भविष्य क्या होता होगा और इनसे बनने वाले देश का भविष्य क्या होगा? हो सकता है राज्य सरकारों की कार्रवाई से कुछ लोग कानून के फंदे में आ जाएं। किंतु अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी है।

एक समाचारपत्र ने अपने संपादकीय में इस घटना पर तीन सवाल उठाया। बच्चों को नशा करवा कर उनसे भीख मंगवाने जैसे गंभीर अपराध करने वालों के लिए कितनी कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि यह केवल भीख मंगवाने का अपराध और मासूमों की जिंदगी की बलि देकर अपनी जेब भरने का धंधा भर नहीं है, बल्कि उन मासूमों को नशे की दुनिया में धकेलने का क्रूर खेल भी है, जिन्होंने अभी ठीक से आंखें खोलकर दुनिया देखना भी नहीं सीखा है। दूसरा सवाल, गरीबी के कारण समाज में पनपने वाले अपराध को समाजशास्त्रीय, राजनीतिक और आर्थिक नजरिए से परख कर उसका निदान किस तरह नीति-नियंता करेंगे? तीसरा सवाल यह है कि विकास की चमक से चौंधियाई हमारी आंखें समाज में पनप रहे इस अंधकार को कब तक अनदेखा करती रहेंगी?

बेंगलुरु में ऐसे गैंग का पर्दाफाश तब हुआ जब कुछ गैरसरकारी संस्थाओं की शिकायत पर पुलिस ने कार्रवाई की। ऐसे गैर-सरकारी संस्थाओं को कार्य समाज में सम्मान के योग्य हैं। इनसे प्रेरणा लेकर व्यक्तिगत स्तर पर भी बच्चों का बचपन बचाने के लिए हरसंभव कोशिश के संकल्प से नये साल का शुभारंभ किया जा सकता है। क्या आप ले रहे हैं बचपन को एक छांव देने के प्रयास का संकल्प?

लेखक संजय स्‍वदेश पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा भास्‍कर सहित कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

अरुण पुरी की बेटी का मोटापा भी बन गया ‘किताब’

मोटापा से छुटकारा पाना क्या इतनी बड़ी उपलब्धि है कि इस अनुभव पर कोई किताब ही लिख दी जाए। हो आपको है ये अटपटा लग रहा हो, लेकिन इंडिया टुडे ग्रुप के संस्थापक अरुण पुरी की बड़ी बेटी कल्‍ली पुरी ने कुछ ऐसा ही किया है। 38 साल की कल्‍ली, जो इंडिया टुडे के डिजिटल विंग की मुख्य परिचालन अधिकारी के रूप में काम संभाल रही हैं, ने अपना वजन 103 किलो से घटाकर 59 किलो कर लिया है। छरहरी दिख रही कल्‍ली ने अपने मोटापे और इससे छुटकारे पर 'कन्फेशन ऑफ ए सीरियल डाइटर' नाम की किताब लिख डाली है। इस किताब के कुछ अंश इंडिया टुडे ने भी प्रकाशित किए।

कल्‍ली की इस किताब को इंडिया टुडे के ज्‍वाइंट वेंचर इंप्रिंट हार्पर कॉलिंस ने प्रकाशित किया है। कल्‍ली ने किताब में विस्तार से बताया है कि कैसे वो जब चार साल की थी तो जैम टोस्ट खाते 32 किलो की हो गई थी। जिस तरह आज की यूथ ब्रिगेड न सिर्फ जीवन के हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा करती है बल्कि खुद को सर्वोत्तम साबित करने का माद्दा भी रखती है, कमोबेश कुछ ऐसा ही बताने की कोशिश कल्‍ली पुरी ने अपनी किताब में की है। आज का युवा फैशन की अंधी दौड़ में सरपट दौड़ रहे हैं। रुप सौंदर्य को फोटोशाप के क्लिक और बोटोक्‍स से बदलने को तैयार युवाओं के लिए कल्‍ली एक प्रेरणा हो सकती हैं।

कल्‍ली ने अपनी किताब में विस्‍तार से लिखा है कि कैसे बढ़ते-बढ़ते उनका वजन 103 किलो तक पहुंच गया था। कल्‍ली लिखती हैं कि 16 साल की उम्र में उनका वजन 63 किलो तक पहुंच गया था। जब उनको मोटापा खलने लगा तक वो डाइटिंग करने लगीं और नारियल पानी, नींबू पानी जैसे पेय पदार्थों पर रहकर जीवन गुजारने लगीं। डाइटिंग की बदौलत कल्‍ली ने 24 साल की उम्र में अपना वजन 59 किलो कर लिया, पर खाने-पीने वाले परिवार में पैदा होने तथा जीभ के चटोरेपन के चलते एक बार फिर कल्‍ली 35 साल की उम्र में 103 किलो के वजन को भी पार कर गईं, जो उन्‍हें असहज करने लगा। कल्‍ली ने किताब में बेबाक तरीक से अपने अनुभव लिखें हैं। 

कल्‍ली कहती हैं कि वजन के सौ किलो पार कर जाने के बाद शुरू हुआ वजन घटाने का अभियान। वजन कम करने के लिए वो पंजीरी लड्डू खाया करती थीं। कल्‍ली बताती है रविवार को  चिकन बिरयानी और पराठे खाने वाले उनके परिवार में डाइट करना बहुत मुश्किल था, परन्‍तु मेरे फ्रेंच बहनोई ने इसमें उनकी काफी मदद की। उन्‍होंने मेरे खाने में थोड़ा बदलावा किया और शैंपेन को इसका हिस्‍सा बनाया। डाइट और एक तय मात्रा में शैंपेन के सेवन ने उनको लक्ष्‍य पाने में काफी मदद की। और शायद यही वजह थी की 38 साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने अपना वजन 44 किलो घटाकर 59 किलो तक पहुंचा लिया। अपनी पुस्तक में कल्‍ली ने साइज 18 से 8 तक पहुंचाने के हर अहम बिंदु को कलमबद्ध किया है।

वजन कम करना तो सभी चाहते हैं लेकिन सबके लिए ये संभव नहीं हो पाता इसके लिए कल्‍ली कहती भी हैं- ‘प्यार से बड़ा उत्साह बढ़ाने वाला कुछ भी नहीं होता। मैंने वजन कम करने के अपने अभियान को दिल से चाहा, एक समय सीमा तय की और उसे पा लिया।‘  इस पुस्तक में उसने विस्तार से उन 46 खाद्य पदार्थ का जिक्र किया है, जिससे उसकी मोटापा घटाने के अभियान में उन्‍हें जीत हासिल हुई। उसे जानने वाले अक्सर उससे पूछते हैं, आखिर ये संभव कैसे हुआ। शायद कल्‍ली ने ये पुस्तक उन्हीं लोगों के लिए लिखा है, जो मोटापा से बेहद परेशान हैं और क्या करें, क्‍या ना करें और कैसे करें के बीच उलझा हुआ महसूस करते हैं।

अंबानी ब्रदर्स में भरत मिलाप से हरामखोर संपादकों को क्यों हुई परेशानी

अंबानी भाई गले क्या मिले, रिलायंस के शेयर भले बढ़े, कई मीडिया घरानों के शेयर डाउन हो गए लगते हैं. इन मीडिया घरानों के हरामखोर संपादकों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं. वजह? अरे भाई, अभी तक दोनों अंबानी भाई अलग-अलग कंपनियों के मालिक हैं तो विज्ञापन भी दो अलग अलग ग्रुपों की ओर से मिलते हैं. खुदा के वास्ते अगर दोनों फिर से एक हो जाएंगे तो विज्ञापन इनका कामन हो जाएगा और एक ही रिलीज होगा. इस तरह मीडिया हाउसों की कमाई घट जाएगी.

दोनों भाइयों की कंपनियों और प्रोडक्ट्स के विज्ञापन काफी मात्रा में अखबारों चैनलों में छपते चलते हैं. अंबानी ब्रदर्स भरत मिलाप पर एक कार्टूनिस्ट ने हरामखोर संपादकों के भाव को कुछ यूं उकेरा है. समझ सकते हैं, मार्केट इकानामी ने पत्रकारिता में सबसे ज्यादा किसी पद को भ्रष्ट किया है तो वह है संपादक का पद. महामार्केटियर मालिक अब संपादक के पद पर महालायजनर टाइप के लोगों को ही नियुक्त करना चाहता है. इसी कारण तो संपादक जी की चिंता में संस्थान का घटता-बढ़ता बिजनेस भी शुमार है. इस कार्टूनिस्ट भाई को बधाई. रघुनाथ जी को इसलिए बधाई कि उनके लिंक के जरिए इस कार्टून तक पहुंच पाया. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

अंग्रेजी न्यूज चैनलों के पत्रकारों-संपादकों में सुपरहिट हैं अरनब गोस्वामी!

ये देखिए विज्ञापन. अरनब गोस्वामी सब पर भारी दिख रहे हैं. टाइम्स नाऊ के एडिटर इन चीफ के न्यूज आवर को देखने के लिए अंग्रेजी दर्शक बाकी न्यूज चैनलों से मुंह मोड़ लेते होंगे, तभी तो अरनब का ग्राफ इतना उंचा है.

अर्जुन शर्मा पंजाब केसरी एवं हरेंद्र श्रीटाइम्‍स से जुड़े

जालंधर से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार अर्जुन शर्मा अब पंजाब केसरी से जुड़ गए हैं. अर्जुन को पंजाब केसरी के वेब डिविजन का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. अर्जुन इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उल्‍लेखनीय है कि पंजाब केसरी इस समय पांच वेबसाइट और दो वेब न्‍यूज चैनल संचालित कर रहा है तथा इस प्रोजेक्‍ट को पंजाब केसरी के संयुक्‍त संपादक अविनाश चोपड़ा के पुत्र अभिजय चोपड़ा संभाल रहे हैं.

लखनऊ से खबर है कि जल्‍द लांच होने जा रहे अखबार श्रीटाइम्‍स कुंवर हरेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें यहां सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. हरेंद्र ने करियर की शुरुआत 2007 में हिंदुस्‍तान से की थी. इसके बाद वे छत्‍तीगढ़ के विलासपुर से प्रकाशित अखबार युगभेद से जुड़ गए. वे सन्‍मार्ग, भुवनेश्‍वर, दैनिक जागरण, कानपुर और आज समाज, अंबाला को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

चर्चा है कि… चेतन गुरुंग अमर उजाला, देहरादून से निकाले जाएंगे

अमर उजाला, देहरादून में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार चेतन गुरुंग के बारे में चर्चा है कि उन्हें अमर उजाला से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है. सूत्रों के मुताबिक चेतन गुरुंग के खिलाफ भ्रष्टाचार की कुछ शिकायतों की जांच की जा रही है. प्रबंधन उनका या तो तबादला कर सकता है या फिर इस्तीफा ले सकता है. फिलहाल चेतन गुरुंग अमर उजाला, देहरादून में बने हुए हैं.

सूत्रों का कहना है कि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के करीबी पत्रकारों में से माने जाने वाले चेतन गुरुंग ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सरकार में कुछ उद्यमियों के पेंडिंग पड़े कामों की फाइलों को उचित मुकाम तक पहुंचवाया. कुछ लोगों का कहना है कि चेतन गुरुंग के साथ-साथ एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार भी जांच के दायरे में हैं जो इन दिनों फिलहाल तबादले के शिकार होकर देहरादून से बाहर हैं. इस पूरे प्रकरण की आधिकारिक स्तर से पुष्टि नहीं हो पाई है. फिलहाल यह देखना है कि चेतन गुरुंग के खिलाफ चल रही जांच में क्या निकल कर आता है.

दैनिक भास्कर, छत्तीसगढ़ के स्टेट हेड राजीव सिंह के पिता का निधन

कानपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार राजीव सिंह के पिता के निधन की सूचना है. राजीव इन दिनों दैनिक भास्कर के छत्तीसगढ़ राज्य के हेड हैं. पिता पीडी सिंह की उम्र करीब 82 वर्ष के आसपास थी. उनकी तबीयत काफी समय से खराब चल रही थी. कई महीने से उनका कैंसर का इलाज चल रहा था. पिता के खराब स्वास्थ्य के कारण राजीव सिंह पहले से ही कानपुर में थे. पिता पीडी सिंह अपने पीछे तीन पुत्र और कई पोते-पोतियां छोड़ गए हैं.

राजीव सिंह के बड़े भाई दैनिक जागरण, कानपुर से लंबे समय से जुड़े हुए हैं और वरिष्ठ फोटोग्राफर के रूप में कार्यरत हैं. मंझले भाई कानपुर में ही बिजनेसमैन हैं. राजीव सिंह ने लंबे समय तक कानपुर में अमर उजाला में काम किया. वे अमर उजाला, आगरा में भी रहे. दैनिक जागरण, नोएडा में संपादक पद पर लंबी पारी खेलने के बाद उन्होंने दैनिक भास्कर समूह ज्वाइन कर लिया. दैनिक भास्कर, लुधियाना एडिशन की लांचिंग के बाद उनको प्रमोट करके दैनिक भास्कर, छत्तीसगढ़ हेड के पद पर भेज दिया गया.

खूनी अस्‍पताल को देश के बेहतरीन अस्‍पतालों में बताया था इंडिया टुडे और द वीक ने

आज के परम बाजारू दौर में चीजें कैसे बेची जाती हैं, कैसे बिकती हैं, कलम कैसे बंधक रखवाया जा सकता हैं, कैसे खतरनाक चीजों का महिमामंडन किया जाता है, इन सारे सवालों का जवाब कोलकाता के खूनी अस्‍पताल में छुपा हुआ है. 93 बीमार, मासूम लोगों की जिंदगी और उनके परिवार के लोगों की उम्‍मीदों को जला कर मार डालने वाला एएमआरआई अस्‍पताल देश के कुछ चुनिंदा और बेहतरीन अस्‍पतालों में था. 

आप मत चौंकिए, यह हम नहीं कह रहे हैं. इसे तो उस खूनी अस्‍पताल की वेबसाइट बता रही है. वो भी हवा हवाई तरीकों से नहीं बल्कि देश के दो सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के हवाले से. अस्‍पताल की वेबसाइट पर तमाम खबरों की कटिंग मौजूद हैं, जिसमें अस्‍पताल की गतिविधियां और अच्‍छाइयों को दिखाने का प्रयास किया गया है. इमामी एवं स्राची ग्रुप का यह ज्‍वाइंट वेंचर मरीजों की सेवा के लिए नहीं खोला गया था, इसे खोला गया था लाभ के लिए, पैसा बनाने के लिए, बिजनेस करने के लिए. वैसे भी सेवा भाव का चादर ओढ़कर पैसे बनाने के लिए अस्‍पताल खोलने से बढि़या कोई फैक्‍टरी आज के समय में है ही नहीं. आप किसी मरीज का खून मरने तक चूस सकते हैं, मरने के बाद भी पैसे डूबने का कोई रिस्‍क नहीं. मरा आदमी पैसे मिलने की गारंटी, यानी मरने की बाद भी बड़े अस्‍पताल लाश तभी देते हैं जब उनके पूरे पैसे मिल जाते हैं. कोई रहम नहीं, कोई दया नहीं, कोई भाव नहीं, कोई मोल-भाव भी नहीं, कोई मुरौव्‍वत नहीं फिर भी धंधा चोखा.  

एएमआरआई अस्‍पताल भी सेवाभाव का चादर ओढ़कर पैसा रुपी घी पी रहा था. इस अस्‍पताल के बोर्ड ऑफ डाइरेक्‍टर में भी ज्‍यादातर उसी कौम के लोग शामिल थे, जो दिन भर पाप करने के बाद शाम को किसी गाय को घास खिलाकर अपना पाप धो लेती है. गोयनका, अग्रवाल, तोदी जैसे लोग बिजनेस करना जानते हैं. उन्‍हें पता है कि बिजनेस करने के लिए कौन-कौन से हथकंडे अपनाए जाते हैं या अपनाए जा सकते हैं. इन्‍हीं हथकंडों के बल पर ये देश के दो बड़े पत्रिकाओं की कलम को खरीद कर खुद को देश के बेहतरीन और चुनिंदा अस्‍तपतालों में शुमार करा लिया था. बढि़या मार्केटिंग का प्रभाव भी पड़ता है. कुछ पैसा मार्केटिंग पर खर्च करो और उससे कई गुना ज्‍यादा कमाओ. 93 लोगों को निगलने वाले अस्‍पताल से आज यानी गुरुवार की सुबह भी धुंआ उठता देखा गया, पर फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों तीन दमकलों के साथ तत्‍काल आग पर काबू पा लिया. हालांकि यह अस्‍पताल घटना के बाद से बंद है इसलिए जान-माल का नुकसान नहीं हुआ. 

तो एएमआरआई अस्‍पताल भी इन दोनों पत्रिकाओं के चुनिंदा लिस्‍ट में था. द वीक पत्रिका ने इस खूनी अस्‍पताल को 'बेस्‍ट हास्‍पीटल' की श्रेणी में रखा था. साथ ही बेस्‍ट हास्‍पीटल ऑफ इमरजेंसी केयर में कोलकाता का पहला तथा बेस्‍ट सुपरस्‍पेसियालिटी हास्‍पीटल में दूसरे स्‍थान पर रखा था. इंडिया टुडे ने भी इस मौत की इमारत को देश के चुनिंदा 'केयरिंग हास्‍पीटल' की श्रेणी में रखा था. सवाल यह नहीं है कि ये हास्‍पीटल देश के बेहतरीन हास्‍पीटल हैं या नहीं, बल्कि सवाल उस पत्रकारिता पर है, जो करोड़ों देशवासियों के प्रति जवाबदेह होने की बजाय अनजान कारणों से कुछ लोगों के प्रति ही जवाबदेही दिखाती है. अब किस आधार पर दोनों पत्रिकाओं ने इस खूनी अस्‍पताल को अपने लिस्‍ट में शामिल किया था, वे और उनके लिए काम करने वाले ही बेहतर बता सकते हैं.

पर बीस रुपये रोज कमाने वाले आधे भारत के लिए ऐसे अस्‍पतालों में इलाज दिवास्‍वप्‍न भी नहीं हो सकता, क्‍योंकि ऐसे अस्‍पताल में इलाज तो उनके सपने और सोच से भी बाहर होते हैं. तमाम सरकारी अस्‍पताल इन प्राइवेट अस्‍पतालों से बेहतर हैं, जहां हर रोज सैकड़ों-हजारों लोगों की जिंदगियां डाक्‍टर अथक मेहनत करके बचाते हैं. मरीज को न बचा पाने पर सहानुभूति भी जताते हैं. पर पत्रकारिता का धंधा करने वाले लोगों को ये बातें नजर नहीं आती हैं. द वीक और इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं का सच शायद सामने भी नहीं आता अगर इस अस्‍पताल में इतना बड़ा हादसा न हुआ होता. अच्‍छा होता कि इन पत्रिकाओं का सच सामने आने की बजाय 93 लोग बच जाते. पर ऐसा हो न सका. शायद इन पत्रिकाओं का पैमाना भी देश के टीआरपी सिस्‍टम की तरह है, जहां सबसे ज्‍यादा देखा जाने वाला दूरदर्शन इनके पैमाने में नहीं आता. 

सहारा मीडियाकर्मियों से उनके बॉस ने ही कर डाला डबल धोखा

: साठ फीसदी इनक्रीमेंट की बात झूठी निकली : दो-दो बार अप्रेजल फार्म भरवाया गया, लेकिन सहारा मीडियाकर्मियों की सेलरी नहीं बढ़ी : सहारा के दूसरे विभागों के चपरासी सहारा मीडिया के सीनियर लोगों से ज्यादा पा रहे सेलरी : सहारा मीडिया के एक कर्मी ने भड़ास4मीडिया तक पहुंचाई सहारा मीडिया के परतंत्र बॉस के छल-कपट की कहानी :

dear yashwant

ek baar phir sahara media ke senior officials ne apne employees aur management ko bewakoof banaya hai. 2 mahine pahle badi bhabhi (Mrs swapna roy) ne paper me advertisement dekar announcement ki thi ki sahara ke saare employees ki salary 60% tak increase hogi par aisa sahara media me nahi hua. jabki sahara ke para-banking aur housing sahit sabhi section me employees ko pahle appraisal aur uske baad 60% tak ka increement mil chuka hai.

Swatantra Mishra ka kahna hai ki company ki haalat theek nahi hai aur media me increement ke liye budget nahi hai. doosra parent company ko sahara media kama kar nahi de raha hai. Sahara Media ke partantra boss Swatantra Mishra se puchha jaana chahiye ki ve aakhir apne hi faayde ke liye jiyenge ya sahara media karmiyo ka bhi kuchh bhala karayenge. mei apke portal ke jariye ye jaanna chahta hu ki…

1- agar ghar me koi baccha kam kamata hai to kya maata pita use pet bhar khaana nahi dete?

2- Sahara Media me har saal appraisal form bharwaya jaata hai, es baar to 2 baar aisa hua par kisi ka ek rupiya nahi bada, haalat ye hai ki Sahara ki other wings ke peon media ke senior logo se jyada salary paa rahe hain.

3- jab kabhi Sahara problem me hota hai to usko sabse jyada support media wing karta hai, tab ye kamaau poot kaha chale jaate hain?

4- Sahara Media mei top management mei baithe loag apne employees ki problem sahara shri ko kyo nahi bataate?

yashwant ji, aapse request hai ki ese publish kare aur please mera naam mat de, apko hazaro logo ki dua lagegi.

regards
xyz

चर्चा है कि… विकास मिश्र महुआ छोड़कर जाएंगे आजतक!

अभी हाल में ही महुआ न्यूज के यूपी चैनल के हेड बनाए गए विकास मिश्र के बारे में चर्चा है कि वे महुआ ग्रुप से जल्द विदा लेने वाले हैं. कयास है कि वे अपने पुराने संस्थान आजतक वापस लौट रहे हैं. विकास मिश्र आईआईएमसी के उसी बैच के छात्र रहे हैं जिस बैच के सुप्रिय प्रसाद हैं. सुप्रिय ने न्यूज24 से रिजाइन करने के कई महीनों बाद आजतक न्यूज चैनल ज्वाइन कर लिया. अब विकास के बारे में बड़ी तेज चर्चा है कि वे भी वापस आजतक जाने वाले हैं. विकास कई अखबारों और चैनलों में काम कर चुके हैं.

अमर उजाला और दैनिक जागरण के बाद वे आईबीएन7,  आजतक, न्यूज24 आदि में रहते हुए महुआ पहुंचे. फिर से आजतक जाने की चर्चा की पुष्टि विकास मिश्र के स्तर से नहीं हो पाई है. मतलब, यह कनफर्म होना अभी बाकी है कि विकास मिश्र महुआ छोड़ रहे हैं या नहीं.

चर्चा है कि… राजेश जेटली अमर उजाला छोड़कर हिंदुस्तान जाएंगे!

अमर उजाला से एक बड़ी कानाफूसी बाहर आई है. कुछ लोगों का कहना है कि एक्जीक्यूटिव एडिटर के पद पर कार्यरत राजेश जेटली, जो पूरे ग्रुप के अखबारों-मैग्जीनों की डिजायनिंग, लेआउट आदि के हेड हैं, जल्द इस्तीफा देने वाले हैं. चर्चा है कि वे हिंदुस्तान अखबार का दामन थामेंगे. सूत्रों के मुताबिक यशवंत व्यास के भीमकाय इगो के कारण अमर उजाला में इन दिनों कई वरिष्ठ लोग परेशान हैं. उन्हीं में से एक राजेश जेटली भी हैं. स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी के बेहद प्रिय रहे राजेश जेटली के सामने कई बार दूसरे ग्रुपों से आफर आए लेकिन उन्होंने अतुल जी और अमर उजाला के प्रति अपनी निष्ठा के कारण कहीं और जाने से मना कर दिया. वे करीब दस वर्षों से अमर उजाला के साथ हैं.

अमर उजाला, कांपैक्ट आदि के लेआउट व डिजायनिंग को समय-समय पर अपग्रेड करते रहने वाले राजेश जेटली को हिंदी मीडिया जगत के अच्छे डिजायनर्स में माना जाता है. यही कारण है कि जब उनकी प्रतिभा को अतुल माहेश्वरी ने देखा तो उन्हें समय-समय पर जबरदस्त प्रमोशन देकर अमर उजाला के साथ जोड़े रखा. लेकिन राजुल माहेश्वरी की अगुवाई में चल रहे अमर उजाला में अब सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा. चीजें निगेटिव शक्ल लेती जा रही हैं. राजेश जेटली अगर इस्तीफा देते हैं तो यह अमर उजाला के लिए बड़ा झटका साबित होगा. राजेश के हिंदुस्तान अखबार में जुड़ने से यूपी में अमर उजाला को खा जाने की हिंदुस्तान प्रबंधन की रणनीति व अभियान को बल मिलेगा. पर यह कनफर्म होना अभी बाकी है कि राजेश जेटली अमर उजाला से इस्तीफा दे रहे हैं या नहीं.

ताकि समय ठीक रहे… कांग्रेसी शिल्‍पी की ओर से पत्रकारों को घड़ी भेंट

: प्रेस कांफ्रेंस में बांटा उपहार : बाजपुर में कांग्रेस प्रचार समिति की सह-संयोजिका गदरपुर निवासी एवं गदरपुर विधानसभा के टिकट की दावेदार सुश्री शिल्पी अरोड़ा ने बाजपुर में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों को मात्र एक हाथ घड़ी, सोनाटा कम्पनी की जिसकी कीमत रु 700 है, का उपहार देकर कृताज्ञ किया। गदरपुर में तो पत्रकार केवल कप सेट में ही बिक गये। इन पत्रकारों ने मानको को इतना गिरा दिया है कि नेता या प्रत्याशी पत्रकारों की औकात कप सेट तक ही आकलन कर रहे हैं।

समाचार पत्रों के वरिष्ठ भी खबरों के गिरते स्तर को भी नहीं देख रहे। कुछ दिनों पहले भाजपा विधायक अरविन्द पाण्डे द्वारा भी पत्रकारों को रु 5000-5000 देकर अपने प्रभाव में लिया गया था, ताकि ये लोग उनके लिए चाटुकारी पत्रकारिता कर सकें। बाजपुर क्षेत्र में तो नेताओं एवं खबर लगवाने वालों के लिए पत्रकार की औकात केवल गिफ्ट तक ही सीमित है। गिफ्ट व पैसा दो जैसा मर्जी खबर लगवाओ।

आईआईएमसी प्रशासन को झुकाइए, पी. साईंनाथ की किताब गिफ्ट पाइए!

योगेश कुमार शीतल युवा, क्रांतिकारी और तेजतर्रार पत्रकार हैं. देश के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले पत्रकारिता शिक्षण संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन से हाल-फिलहाल कोर्स कंप्लीट करके इन्होंने मीडिया की असल दुनिया में कदम रखा है. पिछले दिनों शीतल उस समय चर्चा में आए थे जब इंडिया गेट पर एनडीटीवी वाली और राडिया टेपकांड की खलनायिका बरखा दत्त करप्शन के मुद्दे पर कोई लाइव पब्लिक शो कर रहीं थीं. तब शीतल ने सरेआम यह सवाल बरखा के सामने उठाया था कि जब आप खुद करप्शन के मामले में फंसी हैं तो कैसे करप्शन के मुद्दे पर प्रवचन दे सकती हैं. इसको लेकर बड़ा बवाल हुआ था.

एनडीटीवी वालों ने शीतल को काफी डराया धमकाया. इनके आईआईएमसी के टीचरों से शिकायत की. सबने शीतल को लाइन में लाने की कोशिश की पर शीतल ने खुद को अपनी विचारधारा पर कायम रखके यह बता-जता दिया कि दुनिया में चाहे जितना पतन हो जाए, धरती वीरों से खाली नहीं होगी. शीतल की बात यहां इसलिए हो रही है कि उन्होंने अपने फेसबुक एकाउंट के जरिए एक बड़ा मजेदार आफर रखा है, उन छात्रों के सामने जो इस साल आईआईएमसी से कोर्स कंप्लीट करके मीडिया के असल दुनिया में कदम रखने के लिए कैंपस प्लेसमेंट इंटरव्यू आदि के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं. अपनी कहिन के साथ शीतल ने अपना एक अंग्रेजी का लेख भी अटैच किया है जो एक अखबार में प्रकाशित हो चुका है. पहले शीतल की सलाह, और फिर उनका लेख, यहां है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Yogesh Kumar Sheetal : आईआईएमसी में पढ़ रहे साथियों, आपका कैम्पस प्लेसमेंट अब जल्द होने वाला है, बाहर का निर्मम बाजार आपका इंतज़ार कर रहा है. मुंबई की अखवार में छपा ये कोलम पूरी तरह आपको समर्पित है. समय है आपस में एक बैठक करके कैम्पस प्लेसमेंट में आने वाली कंपनी के सामने एक न्यूनतम वेतन का प्रस्ताव आईआईएमसी प्रशासन के माध्यम से रखिये. डरिये मत, इधर हम लोग हैं. आपमें से जो कैम्पस प्लेसमेंट को लेकर ऐसी कोई शर्त पर प्रशासन को झुकाने में सफल होगा, उसे मेरी तरफ से पी. साईनाथ की एक किताब उपहार में दी जायेगी. शुभकामनाएं.


Media Studies in India : Miles to go

YK Sheetal

It would had been better if Justice Markandey Katju had been noted on the media study and a build up of media institution in last few years in metro cities, too, as he earlier candidly remarked on the intellectual worth of media persons, specially in mainstream, during lashing out at Indian media in an interview with a news channel. Fascinatingly, Media, which is in paranoia, after Katju’s slap on it’s activity and had been badly criticised for it’s flawed behaviour in civil society and must be x-rayed by one more angle right now to disclose some hidden fractures.

The grass root problem of Indian Media is not only infrastructural designing but also the quality of man power in a broad prospect. How can anyone expect a good and ideal family without having a bunch of healthy members? Is it possible? No, of course, because ideas and understandings have a key role in building an ideal family and without having such ornaments family would be like a widow. Correspondingly anyone can’t anticipate an objective and dutiful media until and unless the manpower, who is devoted to concerned Press, would be of that level.

‘‘People, who are good at writing and have outstanding communication skills can opt for journalism. A career in journalism brings with it many challenges. With the arrival of so many news channels, journalists have scope for ample growth and are paid good remuneration. You may also work with the leading Hindi and English newspaper of your city’’ according to an advertisement of a Delhi based private media institution.

Unquestionably, being a good writer is an essential spirit for a good author but it can never be a guarantee for a good journalist. If truth prevailed everywhere then there was no need of copy editor or proof editor in a newspaper or news channel. The soul of journalism is watch dog except representation. Representation is the secondary process but where the process starts need a keen observation, information and imagination. It can be better understood by photo journalism. Photo journalism is an art according to which someone searches a message in the blue, which are normally overlooked by everyone. Editing and presenting that picture by using softwares are the secondary process and must not be defined as the supreme part of journalism. There are so many examples in Hindi language state where stringer of news channels as well as mufassil reporter doesn’t have any degree or certificate of a media institution, still their work catches audience’s attention. P Sainath, a renowned journalist of the world also mentioned respectfully by Katju during that interview, has been a student of history from JNU, New Delhi. Even majority of contemporary journalists belong to the same background including Law, Literature, Science, Arts except an authentic degree or certificate of Journalism from any institute. According to P Sainath, ‘There are two kinds of journalists. While of those are journalists, the other are stenographers’. Now, certificates and degrees of journalism are the gate pass for entering in any Media Houses.

In fact, the structure of Media institution in India must be scanned in big sphere. The number of university-qualified journalists continues to grow all around the world including India, but the quality of journalism has declined universally in proportion to the technical hype. It’s hard to believe now that anyone can become a journalist without possessing an authentic certificate of journalism. If you choose not to get a journalism degree, it might be okay for a while, but it is likely to be a decision you will eventually regret. It clearly means you will have to achieve a degree to cross check the point of journalism, specially in Metro cities.

According to Francis Wade, writer and sub-editor for Democratic Voice of Burma, “When deciding on a school for journalism studies, the key factor is whether your place of choice effectively balances the hands-on, practical side of reporting with a good insight into how the media industry works. Both play key roles in the quality of your output and in helping you to understand the credibility of whatever organisation/institution you choose. The majority of media groups are increasingly sacrificing good journalism for material that can be generated quickly and that satisfies a mainstream audience, regardless of the strength of the story, and a strong school should help you to develop both a sharp insight into how the industry functions, and equip you with the necessary tools to make you a driven, but sensitive, journalist.”

Now the burning question is of balances among the definitions of journalism. Of course, you can’t weight out all kinds of journalism equally. For example, ‘Wikileaks has a difference in opinion with Aljazeera’. We must not forget that the source of economy of any media houses decide what should be the definition of journalism. In the era of Brand Capital, Private Treaty, Media Partner, Paid News etc, the definition of journalism and media has been changed. Earlier, this stream was defined as the fourth pillar of democracy. If Julian Assange or Jimmy Wales are looking for economic help, it can’t be ignored as just news. In India, a famous Hindi web portal requested for donation from it’s audience, too. No need to say that after 2009 Paid News episode and Nira Radia Tape controversy the definition of Media has been changed drastically.

Now, coming to the point, Indian education system in itself is suffering so many challenges due to lack of good policies. Indian institutions don’t find a mention in the world’s top ten list. The situation is even worse in the field of Journalism. Government Media institutions are at par with Prasar Bharti, where seats continue to remain vacant. As number of media channels is rising day by day, private media institutions too are growing up correspondingly but number of government Journalism Colleges are in stand by mode! Indian Institute of Mass Communication, a prestigious Government Media Institution, is on hold for 3 years, at least, for allowing Master Degree in Journalism and Mass Communication! In the mirror of IIMC, one can identify with the government awareness towards Journalism education. In the era of LPG (Liberalisation, Privatisation and Globalisation), such policies boost Private Sector to fly as it can and the consequences of that policy has been seen on the ground where at least, more than hundred Private Media Institutions emerge in the streets of New Delhi and other Metro cities with a new definition of Media, Mass Communication and Journalism in too, where target audience, TRP and Market values have more regard than ethics, morality, reality, truth, objectivity and all what Markandey Katju talked about.

Let’s welcome a counter of Andrew Spooner, a renowned blogger and travel writer for The Guardian, according to whom “Having taught Journalism to undergraduates, I would probably ask something about what links they have to the industry. Do they have good quality guest speakers and some lecturers with a proven and published track record? In the UK do they think to NCTJ courses, or if elsewhere, do they promote similar standard? Do they also promote critical thinking and engage student on broader issues? It is easy to teach student to do things-harder to get them to actually think what/how/why they are doing it.”

In India, almost all channels inaugurated their Media schools during last few years. Was it for teaching Journalism? Yes. Which type of journalism? This question is still unanswered because of so many definitions of journalism exist after globalisation in India. Most of these colleges don’t even have a proper library or group discussion programmes which is mandatory for any media institution, still these institution are making progress day by day. The fee structure of private institution starts from 2 lakhs onwards. Clearly students, who join such institutes, speculate a job after courses by so called campus placements so that he or she could get money back what he or she invested in study. Even, there’s no standard entrance exam or interview for admission at all except for some private Media institutions. Everyone knows the Hindi journalism students of IIMC have been placed in different Media houses at a remuneration of Rs 6000 to 7000 per month. IIMC is one among the reputed library holder in the world and organises all India level entrance examination still less than 40 per cent student in session (2009-10) have been placed with average remuneration of Rs 7000 per month in Hindi Journalism.

Now, analyse a news published recently from Allahabad dateline of a Delhi based Hindi newspaper. “Chand kee tasdik ke sath aai khushiyan, aaj se muharram” is just an example of what’s going on in Media. Who cares? One famous incident must be underlined here. In 1993, Sainath applied for a Times Of India fellowship. At the interview he spoke of his plans to report from rural India. When an editor asked him, “Suppose I tell you my readers aren’t interested in this stuff”, Sainath riposted, “When did you last meet your readers to make any such claims on their behalf?’  It’s the time when the burning questions concerning media studies must be discussed otherwise it will be too late.

http://www.afternoonvoice.com/column_Media-Studies-in-India-Miles-to-go_26_12_11.html

आरक्षण दिला पाएगा कांग्रेस को मुस्लिम वोट?

इसे इत्तेफाक कहा जाए या सोची-समझी रणनीति कि लोकपाल का मुद्दा भी कांग्रेस की मुस्लिम-नवाज रणनीति के दायरे में आ गया। इस मुद्दे पर भी कांग्रेस ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि वह रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में ही मुसलमानों को आरक्षण नहीं दे रही है, बल्कि लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संस्था में भी उन्हें आरक्षण देने का प्रयास कर रही है। संसद में लोकपाल पर होने वाली बहस में मूल मुद्दा तो पीछे चला गया, पूरी चर्चा अल्पसंख्यक सियासत पर सिमट कर रह गई।

अपने सहयोगी दलों के दबाव की आड़ में सरकार ने आखिरकार लोकपाल के पदों में घोषित आरक्षण के दायरे में अल्पसंख्यकों को भी शामिल कर लिया। दरअसल किसी संवैधानिक संस्था के पदों पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की व्यवस्था नहीं है, इसलिए केंद्र सरकार ने मूल विधेयक में अल्पसंख्यक आरक्षण की बात, जो पहले शामिल थी, उसे हटा दिया। इसकी वजह से लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस पर संघ परिवार से गठजोड़ करने का आरोप लगाया था। यह चुनावी सियासत का ही असर था कि इस मुद्दे पर लोकसभा को दिन में तीन बार स्थगित करना पड़ा।

राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव सदन के बाहर ही कह चुके थे कि जब तक अल्पसंख्यकों को कोटा नहीं दिया जाएगा, वह सदन में बहस नहीं चलने देंगे। सदन में पहले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव लालू के समर्थन में आए, फिर बसपा और वामदल भी अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने के मसले में कूद प़डे, क्योंकि ये दल भी अपने आप को मुसलमानों के मसलों का चैंपियन मानते हैं। बसपा ने कहा कि अल्पसंख्यक आरक्षण के बिना उसे लोकपाल मंजूर नहीं होगा, बल्कि उसने यहां तक कहा कि अगर अल्पसंख्यकों को कोटा देने में संविधान में संशोधन की जरूरत है तो बसपा केंद्र सरकार का सहयोग करने को तैयार है। अंतत: सरकार ने इस मामले पर झुकना ठीक समझा ताकि मुसीबत बन चुके लोकपाल विधेयक को पारित करवाया जा सके।

दरअसल अल्पसंख्यकों का कोटा शामिल करने के लिए  सरकार को संवैधानिक संशोधन लाना होगा, जिसके लिए उसे दो तिहाई बहुमत की मंजूरी लेनी होगी। कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा इसका समर्थन नहीं करेगी, इसलिए ऐसा संशोधन मंजूर ही नहीं होगा। तब वह आरक्षण के लिए दबाव डालने वाले लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं को यह जताने की कोशिश करेगी कि हमने तो अपनी तरफ से कोशिश जरूर की, लेकिन भाजपा ने इसमें रोड़ा लगा दिया। अगर लोकपाल विधेयक संसद में पारित हो भी गया तो अल्पसंख्यक आरक्षण के मुद्दे पर यह मामला उच्चतम न्यायालय में जा सकता है।

भाजपा का कहना यह है कि धार्मिक आधार पर आरक्षण संविधान के प्रतिकूल है, इसलिए मुसलमानों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने धमकी दी कि वह अल्पसंख्यक आरक्षण हटाने के लिए संशोधन प्रस्ताव लाएंगी। अगर भाजपा अड़ जाती है तो लोकपाल के मुद्दे पर सहमति के तार जोड़ना मुश्किल हो जाएगा और लोकपाल जैसा महत्वपूर्ण मुद्दा सियासी खींचतान की भेंट चढ़ जाएगा। समूची बहस अल्पसंख्यक समर्थक बनाम अल्पसंख्यक विरोधी खानों में बंट कर रह जाएगी। तमाम सियासी दलों ने लोकसभा में जो व्यवहार किया, उससे लगता है कि राजनीतिक दलों की नजर में ज्भ्रष्टाचार की तुलना में अल्पसंख्यक का मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार से लड़ने वाली संस्था में समाज के कमजोर वर्ग, खासतौर से अल्पसंख्यकों को लेना जरूरी है? जहां तक इसके कानूनी पहलू का सवाल है, कानून विशेषज्ञों की इस सिलसिले में मिली-जुली राय है। भारत के दो पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे.एस. वर्मा और जस्टिस वी.एन. खरे ने इस बात पर सहमति जताई है कि लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था में समाज के सभी वर्गो का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसमें भारत की सांस्कृतिक विविधता भी नजर आनी चाहिए। इसके विपरीत सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्णा का कहना था, लोकपाल का काम है भ्रष्टाचार से लड़ना। इसमें उन्हीं लोगों को लेना चाहिए जो इस काम में सक्षम हों। यह नहीं देखा जाना चाहिए कि कौन ब्राह्मण है और कौन मुसलमान। भारत के पूर्व महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने कहा, नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में तो आरक्षण देना ठीक है पर भ्रष्टाचार से लड़ने वाली संस्था लोकपाल में इस आरक्षण की कोई तुक नहीं है।

दलितों और मुसलमानों के हिमायती के रूप में चर्चित जस्टिस राजीव धवन का कहना था, लोकपाल एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मामला है। इसे आरक्षण के तमाशे में बदलना मुनासिब नहीं होगा। जबकि उधर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस थॉमस का कहना है कि चूंकि संविधान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है, इसलिए आस्था और धर्म के आधार पर उन्हें आरक्षण कैसे दिया जा सकता है? राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य केकी एन. दारूवाला की राय है कि चूंकि लोकपाल एक जांच एजेंसी है, लिहाजा इसमें आरक्षण का कोई सवाल ही नहीं है। इसमें ईमानदार और अपने काम में दक्ष लोगों की ही आवश्यकता है।

बहरहाल अभी तक तो लोकपाल बिल टीम अण्णा और कांग्रेस के बीच कशमकश का जरिया बना हुआ था, अब उसे आरक्षण जैसे कई और विवादों में भी घसीटा जा सकता है, ताकि यह कभी परवान ही न चढ़ सके। कांग्रेस इस मामले में कितनी ईमानदार है, यह तो वक्त ही बताएगा, फिलहाल तो उसकी नजर उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव में लोकपाल के मुद्दे को ज्मुस्लिम रंग देकर इसे भी भुनाने पर है। अण्णा हजारे को आरएसएस का एजेंट बता कर वह पहले भी मुसलमानों को इसके खिलाफ लामबंद करने का प्रयास करती रही है।

उधर नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा भी विवादों में उलझता दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग कोटे में अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत कोटा निर्धारित कर उत्तर प्रदेश चुनाव में मुसलमानों के एकमुश्त वोट हासिल करने का सपना तो जरूर देख रही है मगर यह उतना आसान नहीं है, जितना कि उसे लग रहा है। अधिकांश मुस्लिम संगवनों और नेताओं ने इस कोटे को नाकाफी बताया है।

राजनीतिक स्तर पर भी केंद्रीय कैबिनेट के फैसले पर असंतोष जताया जा रहा है। समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में 18 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की है तो मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों के लिए अलग से 10 प्रतिशत और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण की जरूरत पर जोर दिया है। भाजपा तो अल्पसंख्यक आरक्षण का विरोध कर ही रही है। इसके उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी का कहना है, हुकूमत ने मुसलमानों के साथ सियायी फ्रॉड किया है। इससे मुसलमानों को कोई फायदा नहीं होगा। सरकार के इस कदम से धार्मिक वैमनस्य पैदा होगा। सरकार ने किसी के हक को छीन कर किसी दूसरे को देने का काम किया है। इससे तो देश में ज्सिविल वार की स्थिति पैदा हो सकती है।

जमात-ए-इस्लामी  हिंद के अध्यक्ष मौलाना जलालुद्दीन उमरी की शिकायत है कि आरक्षण के लिए मुसलमानों की जो मांग थी, उसे सरकार ने पूरा नहीं किया। सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक मुसलमानों को 10 फीसदी आरक्षण अलग से मिलना चाहिए। मौलाना उमरी का मानना है कि इससे तो खुद मुसलमानों के विभिन्न वर्गो में खींचतान पैदा होगी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना कल्बे जव्वाद भी इस आरक्षण से संतुष्ट नहीं हैं। उनको इस बात पर एतराज है कि मुसलमानों को कोटे में से कोटा दिया गया है। दूसरी बात यह कि इससे सिर्फ पिछ़डे मुसलमानों को फायदा होगा जबकि शेख, सय्यद, मुगल और पठान जैसे उच्च वर्गो की हालत उनसे भी ज्यादा खराब है।

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सरकार के इस फैसले को धोखा करार देते हुए कहा, इसे 18 प्रतिशत होना चाहिए। 4.5 फीसदी कोटे से अल्पसंख्यकों का भला नहीं होगा। मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने भी कैबिनेट के फैसले को असंतोषजनक बताया है। उन्होंने कहा है, रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछ़डेपन के आधार पर मुसलमानों के लिए 10 और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत की सिफारिश की गई थी। जमीयत उल उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने केंद्र सरकार से आग्रह  किया है कि वह इस फैसले को सिर्फ चुनावी हथकंडा बनने से बचाए, ताकि इसके सकारात्ममक परिणाम सामने आ सकें। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना निजामुद्दीन ने इस फैसले को ऐतिहासिक तो माना, क्योंकि इस तरह का निर्णय पहली बार लिया गया है, मगर उन्होंने कहा है कि इस तरह के आरक्षण से मुसलमानों का भला नहीं होगा।

उधर लखनऊ से मिली सूचना के अनुसार एक-दो को छोड़ कर उत्तर प्रदेश के तमाम मुस्लिम संगठन और उलेमा मुस्लिम आरक्षण के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और यह कोटा उन्हें अपर्याप्त ही नहीं, अतार्किक भी लगता है। विधानसभा चुनाव में इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा। सिर्फ कांग्रेस ही अपनी सरकार के इस फैसले से संतुष्ट नजर आ रही है। कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा अति उत्साह से कहते हैं, यह फैसला सपा को साफ माया को हाफ और कांग्रेस को टॉप कर देगा। बहरहाल अल्पसंख्यक आरक्षण के मामले में कांग्रेस की यह पहल उत्तर प्रदेश चुनाव में उसके लिए फायदेमंद भी साबित हो सकती है। यह माना जा सकता है कि मुस्लिम आरक्षण को कम बताने की यह कवायद महज राजनीतिक दांवपेंच है। 

''शुक्रवार'' मैग्जीन में प्रकाशित सगीर किरमानी का विश्लेषण

तो ये है पेड न्यूज करने वाले छोटे न्यूज चैनलों का फंडा

: हम अपने खर्चे देखें या पत्रकारिता के मानदंडों की चिंता करें? : 2012 में खबरिया चैनलों के लिए बुरी खबर : नोट के मामले में न्यूज चैनलों के लिए बीत रहा साल बुरा, आने वाला भी बुरा : चैनलों में  विज्ञापनों (मार्केटिंग) के लिए अक्सर बहुत मारा-मारी मची रहती है। शीर्ष रेटिंग पर चल रहे मनोरंजन और खबरिया चैनलों पर राजस्व ठीक-ठाक जुटता रहता है लेकिन छोटे और क्षेत्रीय भाषा के चैनलों के सामने राजस्व जुटाने के लिए बहुत बड़ी मुश्किल खड़ी रहती है। बाजार के कई ब़डे जानकारों का कहना है कि राजस्व की दृष्टि से साल 2010-11 कोई खास नहीं रहा लेकिन आशंका जताई जा रही है कि साल 2012 भी राजस्व के दृष्टिकोण से अच्छा साबित नहीं होगा।

बाजार के जानकार कह रहे हैं कि साल 2012 में टीवी चैनलों के विज्ञापनों में 50 फीसदी तक गिरावट दर्ज हो सकती है। टीवी चैनलों पर घट रहे विज्ञापनों के बारे में की गई रिसर्च से यह बात सामने आई है कि बड़ी एफएमसीजी कंपनियां अपने विज्ञापनों के कैंपेन में भारी कटौती कर रही हैं। टीवी पर इस वक्त मोबाइल फोन, बैंक, इंश्योरेंस, म्यूचुअल फंड, ऑटोमोबाइल और लाइफ स्टाइल के विज्ञापन ज्यादा आते हैं।

चैनलों को विज्ञापन हासिल करने के लिए काफी प्रतियोगिता करनी पड़ती है, तब उन्हें खर्चे पूरे करने लायक विज्ञापन मिल पाते हैं। यह भी देखा गया है कि उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण करने वाली अधिकांश कंपनियां पहले दूरदर्शन पर विज्ञापन देना पसंद करती हैं। उनकी दूसरी पसंद मनोरंजन चैनल होते हैं। उसके बाद हिंदी और अंग्रेजी के दो-चार चैनलों को ही विज्ञापन मिल पाते हैं। एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी से जु़डे व्यक्ति बताते हैं कि टॉप फोर चैनलों के बाद दूसरे चैनलों पर विज्ञापनों के लिए एजेंसी अपनी शर्त और रेट के हिसाब से चैनलों के लिए विज्ञापन जारी करती है। 2011 की तिमाही में इसी वजह से टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों की संख्या घटी है।

एफएमसीजी कंपनियों ने जब से प्रिंट और दूसरे  माध्यमों से अपने विज्ञापन जारी करने का काम किया है, तब से उनका रुझान टीवी चैनलों के विज्ञापनों के प्रति कम हुआ है। बड़ी विज्ञापन एजेंसियों का कहना है कि वे क्षेत्रीय समाचार पत्रों, स्थानीय एफएम स्टेशनों और वॉल पेंटिग के माध्यम से अपने प्रचार-प्रसार का काम पूरा कर रही हैं जिसमें टीवी चैनलों के विज्ञापनों की अपेक्षा खर्च कम आता है। विज्ञापन के जानकारों की मानें तो साल 2012 मनोरंजन चैनलों के लिए तो ठीक-ठाक साबित हो सकता है लेकिन खबरिया चैनलों के लिए यह ज्यादा मुफीद साबित नहीं होगा। विशेषज्ञ कहते हैं कि कंपनियों ने बाजार की प्रतिस्पद्र्घा के चलते अपने दामों में बढ़ोतरी नहीं की लेकिन अपने प्रोडक्ट का खर्चा कम करने के लिए उन्होंने उसके विज्ञापन कैंपेन में 75 फीसदी की कटौती कर दी है। इससे एक तरह से ग्राहकों को सीधा फायदा पहुंचा लेकिन उसका असर टीवी चैनलों की जेब पर सबसे ज्यादा पड़ा।

विशेषज्ञ 2012 जनवरी से अप्रैल तक टीवी चैनलों के लिए खराब वक्त बता रहे हैं। यही वह वक्त है जब नए प्रोडक्ट बाजार में आते हैं और देश का वार्षिक बजट तय होता है। विज्ञापनों में कमी की संभावनाओें को देखते हुए कई टीवी चैनलों में अपने टैरिफ कॉर्ड में भी खासा परिवर्तन किया है, उनके रेट पहले के मुकाबले काफी कम देखे जा रहे हैं। स्थिति यह है कि छोटे और क्षेत्रीय भाषा के चैनलों के पास तो विज्ञापन के कोई रेट ही निर्धारित नहीं हैं। उनके यहां तो किसी भी रेट पर विज्ञापन चलने को तैयार रहता है। यही वजह है कि छोटे चैनल विज्ञापन न मिलने की दशा में पेड न्यूज दिखाने से भी परहेज नहीं करते। वे पेड न्यूज के सहारे ही अपना धंधा आगे बढ़ाने में लगे हैं। चुनावों के वक्त तो ऐसे चैनलों की बन आती है और वे पूरी मनमर्जी पर उतर आते है, हालांकि निर्वाचन आयोग ने चुनावों के दरमियान पेड न्यूज पर निगाह रखने के लिए एक समिति का गठन कर रखा है लेकिन फिर भी ऐसे चैनल उसकी आंखों में धूल झोंकने में कामयाब रहते हैं।

पेड न्यूज चलाने  वाले चैनलों को पत्रकारिता के मानदंडों की तनिक भी चिंता नहीं रहती। वे कहते हैं हम अपने खर्चे देखें या पत्रकारिता के मानदंडों की चिंता करें? दरअसल किसी भी चैनल को चलाने के लिए प्रतिदिन लाखों रुपये का खर्च होता है जिसे पूरा करने के लिए टीवी चैनलों को विज्ञापनों की सख्त दरकार रहती है। विज्ञापनों से ही चैनल की नैया पार होती है। 2012 में टीवी चैनलों के विज्ञापन बाजार में गिरावट की आशंका जताई जा रही है। अगर ऐसा हुआ तो खबरिया चैनलों पर उसका सबसे ज्यादा असर प़डेगा।

पर्ल ग्रुप की राष्ट्रीय हिंदी मैग्जीन ''शुक्रवार'', जिसके संपादक जाने-माने साहित्यकार व पत्रकार विष्णु नागर हैं, के मीडिया कालम में यह विश्लेषण प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का हथियार है फेसबुक!

: सोशल नेटवर्किंग से दुश्मनों का फायदा है : विकीलीक्स के चर्चित संस्थापक जुलियन असांजे ने कुछ महीने पहले एक रूसी अखबार को दिए इंटरव्यू में यह ‘सनसनीखेज रहस्योद्घाटन‘ किया था कि फेसबुक और कुछ नहीं बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का हथियार है। उन्होंने कहा, अपने फेसबुक अकाउंट में किसी नए दोस्त या रिश्तेदार का नाम जोड़ते वक्त यह मत भूल जाइए कि आप अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का काम आसान कर रहे हैं। आप असल में उनका डेटाबेस तैयार करने में हाथ बंटा रहे हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां फेसबुक का इस्तेमाल जानकारियां जुटाने और अपराधियों, राष्ट्रविरोधियों तथा प्रतिद्वंद्वी देशों के अधिकारियों पर नजर रखने के लिए करती हैं, लेकिन जुलियन असांजे के बयान का लब्बोलुआब यह था कि फेसबुक है ही अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की ईजाद। मार्क जुकरबर्ग (फेसबुक के संस्थापक और सीईओ) इससे रत्ती भर भी सहमत नहीं होंगे लेकिन इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर विदेशी गुप्तचर एजेंसियों की हरकतों को लेकर रक्षा प्रतिष्ठानों में गहरी चिंता जरूर है। सिर्फ सीआइए और एफबीआइ ही क्यों, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और यहां तक कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां भी सूचनाओं के इस खजाने को खंगालने में जुटे हैं। और सूचनाएं ही क्यों, वे और भी बहुत कुछ ‘जुटा‘ रहे हैं।

भारतीय रक्षा  मंत्रालय ने पिछले दिनों  सेना और अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों को फेसबुक से दूर  रहने की सलाह दी है। वजह? सोशल नेटवर्किंग साइटें दोस्तों और रिश्तेदारों के संपर्क में रहने का जरिया भर नहीं हैं। विदेशी खुफिया एजेंसियां लगातार उन्हें मॉनीटर कर रही हैं और उनकी नजर प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रों के अधिकारियों को बहलाने-फुसलाने पर है। गुप्तचर एजेंसियां ही क्यों, चिंता के जरिए और भी कई हैं। माओवादी, नक्सली, नगा जैसे बागी संगवनों से लेकर आतंकवादी तक और सरकारी सीक्रेट चुराने वाली विदेशी ताकतों से लेकर हैकर्स तक अपने-अपने मकसद के लिए फेसबुक पर लॉग इन कर रहे हैं। अगर फिर भी कोई कसर रह गई हो तो पोनरेग्राफी के कारोबारी और वायरस-निर्माता हैं न!

यूं तो रक्षा  सेनाओं, गुप्तचर एजेंसियों और सुरक्षा बलों के अधिकारियों को इंटरनेट पर अपनी पहचान उजागर न करने की ‘सलाह‘ दी जाती है लेकिन इसका हश्र वही होता है जो ‘सलाहों‘ का आम तौर पर हुआ करता है। पुलिस अफसर, सैनिक, नौसैनिक, वायुसैनिक और खुफिया अधिकारी तक फेसबुक, गूगल प्लस तथा ऑरकुट का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। वे खुद को आकर्षक बांके फौजी जवान के रूप में पेश करने का लालच छोड़ नहीं पाते क्योंकि युवतियों में सेना की वर्दी के प्रति पारंपरिक रूप से क्रेज रहा है। उन्हें लुभाने के लिए हमारे वीर सैनिक सब कुछ करते हैं- अपना नाम-पता और ठिकाना बताने के साथ-साथ फौजी ड्रेस में असली हथियारों के साथ खींचे गए फोटो पोस्ट करने तक। युवतियां तो आकर्षित होती ही होंगी लेकिन ऐसे बांके जवानों की तरफ विदेशी खुफिया एजेंसियां भी खिंची चली आती हैं। वे अपनी आकर्षक एजेंटों को इन नौजवान सैनिकों तथा अफसरों से ऑनलाइन प्रेम संबंध विकसित करने में लगा देती हैं जो धीरे-धीरे उन्हें जासूसी की ओर खींच लेती हैं। आप जानते ही हैं कि प्रेम गुप्तचरी के कारोबार का अहम हथियार है।

इस उभरते ट्रेंड ने हमारे रक्षा तंत्र  और सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। समय रहते चेत जाएं तो अच्छा है वरना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय सूचनाएं कहां की कहां पहुंच सकती हैं। यह इंटरनेट जो है! पहले ही चीनी हैकरों ने केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों की वेबसाइटों तथा संचार तंत्र पर निशाना साध रखा है। वे गाहे-बगाहे रक्षा मंत्रालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक के सीक्रेट उड़ा ले जाते रहे हैं और वह भी बिना किसी शख्स की मदद लिए। ऐसे में फेसबुक के जरिए बने ‘मित्रों‘ के जरिए क्या कुछ नहीं किया जा सकता! कई संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात सैन्य अधिकारियों को विदेशी खुफिया एजेंसियों के एजेंटों के साथ चैट करते हुए पकड़ा गया है। ये एजेंट ‘युवतियों‘ के रूप में उन्हें फुसलाने में लगे रहते हैं।

सोशल मीडिया के जमाने में फेसबुक-प्रेम, युवा सुलभ उत्साह और दूसरों को इम्प्रैस करने की बेताबी सिर्फ हम हिंदुस्तानियों की समस्या नहीं है। दूसरे देशों की सेनाएं भी इससे परेशान हैं। कुछ अरसा पहले इजराइल की सेना को फिलस्तीनी इलाके में की जाने वाली एक सैनिक कार्रवाई इसलिए रोक देनी पड़ी थी क्योंकि एक उत्साही नौजवान सैनिक ने अपने फेसबुक पेज पर इसकी शेखी बघार दी थी। उसने अपने पेज पर टिप्पणी बता दिया कि फलां तारीख को इतने बजे फलां इलाके में फिलस्तीनी गुटों पर धावा बोला जाएगा और मैं भी (जी हां, मैं भी) इसमें हिस्सा लूंगा। इस टिप्पणी पर वक्त रहते इजराइली खुफिया एजेंटों की नजर पड़ गई वरना कौन जाने पहले से सतर्क फिलस्तीनी बांके इन हमलावर इजराइलियों का क्या हश्र करते!

बात जब फेसबुक पर चली जाती है तो वह कानाफूसी वाली बात नहीं रह जाती। वहां कोई भी सूचना डालने का मतलब उसे लाउडस्पीकर पर जोर-जोर से दुनिया को सुनाने जैसा है। और अगर वह सूचना गोपनीय हो तो? अमेरिका में  इस समस्या को बरसों पहले महसूस  कर लिया गया था और इसी का नतीजा था ऑनलाइन कम्युनिकेशंस टू प्रीवेन्ट वायलेशन्स ऑफ ऑपरेशन्स सिक्योरिटी नामक क़डे नियम जिनके तहत वहां न सिर्फ इंटरनेट पर गोपनीय सूचनाएं लीक करने तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति हानिकारक तत्वों से संपर्क की कोशिशों को रोका जाता है, बल्कि पहले से डाल दी गई सूचनाओं को इंटरनेट से हटाने की भी मुहिम चलाई जाती है। पता लगाया जाता है कि कहां कौन, सैनिक योजनाओं, रणनीतियों, कार्रवाइयों वगैरह से जुड़ी किसी जानकारी का स्रोत बन सकता है। कोशिश की जाती है कि उसे ऐसा करने से रोका जाए। यह परहेजी या निवारक रणनीति है, हमारी तरह अपराध हो जाने के बाद हाय-तौबा मचाने और अपराधी को ढूंढ़ने में जुटने वाली फॉलो-अप रणनीति नहीं। शायद हम इस मामले में अमेरिका से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

यह अपनी तरह की अकेली चुनौती नहीं है।  फेसबुक के यूजर्स पर आतंकवादियों और बागी गुटों की ललचाई निगाहें भी लगी हुई हैं। यहां अपना दुष्प्रचार अभियान चलाना और युवकों को गुमराह करना असली दुनिया की तुलना में ज्यादा आसान है। इंटरनेट उन्हें अपनी पहचान बताए बिना कुछ भी कहने और करने की आजादी जो देता है। सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल जेहादियों की भर्ती के लिए भी हो रहा है। कुछ समय पहले ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने खुलासा किया था कि ‘अहलुस सुन्ना वल जमा‘ नामक फेसबुक पेज पर, जिसका ताल्लुक प्रतिबंधित आतंकी संगवन ‘अल मुहाजिरून‘ से है, नए आतंकी रंगरूटों की भर्ती की जाती है। इजराइली खुफिया एजेंसी ‘शिन बेत‘ भी वहां के नागरिकों को चेतावनी दे चुकी है कि वे ध्यान रखें कि कहीं फेसबुक पर किसी फिलस्तीनी या दूसरे अरब आतंकी संगवन के शिकार न हो जाएं। ये संगठन उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं और इजराइल के ही विरुद्घ जासूसी में लगा देते हैं। वहां की राष्ट्रीय सुरक्षा तो खतरे में है ही, खुद इन नागरिकों की अपनी सलामती पर भी खतरा है क्योंकि बतौर शिन बेत उनके बारे में सारी जानकारी जुटा चुके आतंकी उन्हें अपहृत और ब्लैकमेल तो कर ही सकते हैं, कहीं बुलाकर उनकी हत्या भी कर सकते हैं।

दहशत फैलाना ही तो आतंकवादियों का मकसद है! बहुत दूर क्यों जाएं, हमारे पड़ोस में पाकिस्तानी जेहादी संगठन भी फेसबुक का इस्तेमाल करने में पीछे नहीं हैं। मुंबई के आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले जमात-उद-दावा (पहले लश्करे तैयबा) और कई नृशंस बम विस्फोटों के लिए जिम्मेदार सुन्नी आतंकी संगठन सिपाहे सहाबा के फेसबुक पेजों पर जमकर गैर-मुस्लिमों के विरुद्घ जहर उगला जाता है। सोशल नेटवर्किंग साइटें उनके लिए अपना एजेंडा आगे बढ़ाने का बेहतरीन जरिया बन गई हैं। यह ऐसा मीडिया है, जिसके इस्तेमाल में कहीं कोई रुकावट या सेंसरशिप नहीं है। बहुत से आतंकवादी सरगनाओं और संगठनों की तारीफ में फेसबुक पेज भी बनाए गए हैं और उनके ‘प्रशंसकों‘ की संख्या सैकड़ों में है। सोशल नेटवर्किंग ने, हमारा ही नहीं, समाज के दुश्मनों का काम भी पहले से कुछ आसान कर दिया है।

इस आलेख के लेखक बालेंदु शर्मा दाधीच हैं. इसे ''शुक्रवार''' मैग्जीन से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

यूपी में भ्रष्टाचार : बसपा प्रत्याशी के गोदाम से हजारों बोरे अनाज मिले

: नई दिल्ली : बसपा के खिलाफ दिनोंदिन बनता जा रहा है माहौल : यूपी में बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल में भ्रष्टाचार का क्या आलम है, इसके बारे में आप समय समय पर सुनते जानते आए हैं. खुद मायावती दर्जनों लोगों को करप्शन में पाकर हटा, भगा, निकाल चुकी हैं, लेकिन यह सब वह तब कर रही हैं जब चुनाव सिर पर आ गया. एनएचआरएम घोटाले में सीबीआई जांच चल रही है और जल्द ही इसमें कुछ बड़े अफसर व नेता गिरफ्तार होने वाले हैं. ताजी सूचना बसपा के एक प्रत्याशी को लेकर है. यूपी के कुशीनगर जिले के फाजिलनगर विधानसभा सीट से बसपा प्रत्याशी कलामुद्दीन के गोदाम से लाखों बोरे अनाज मिले हैं. इन अनाज का कोई रिकार्ड नहीं है.

जानकारी के मुताबिक बसपा प्रत्याशी कलामुद्दीन के गोदाम से बारह हजार गेहूं के बोरे, छत्तीस हजार चावल के बोरे, अट्ठाइस हजार धान के बोरे मिले हैं. दर्जनों हजार अन्न के अन्य बोरे भी मिलने की संभावना है. इन अनाज का कोई रिकार्ड नहीं है. कुछ लोगों का कहना है कि यह गरीबों के वितरण के लिए आया राशन था जिसे हड़प लिया गया. इस घटना के सामने आने से इस इलाके में बीएसपी की फजीहत शुरू हो चुकी है. फिलहाल यूपी में बसपा के खिलाफ करप्शन बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है. और आखिरी समय में मायावती जिस तरह फ्रस्ट्रेट होकर भ्रष्टाचारियों-दागियों पर कार्रवाई कर रही हैं उससे वह अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार रही हैं. यूपी की जनता तक इसके जरिए यह संदेश जा रहा है कि साढ़े चार साल तक करप्शन किया और आखिर के कुछ महीनों में दाग धोने की कार्रवाई का नाटक हो रहा है.

उधर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन जिन लोगों के खिलाफ मायावती ने एक्शन लिया है, वे सब चुपचाप बसपा को हराने के अभियान में जुट गए हैं. इस तरह कई दर्जन सीटों पर बसपा की हार इसलिए होने जा रही है क्योंकि वहां के जीते लोगों को भ्रष्टाचार के आरोप में सरकार व पार्टी से निकाल दिया गया. ये निकाले गए लोग अपने नेटवर्क व समर्थकों के बल पर बसपा प्रत्याशी को हराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे.

बसपा से निकाले गए लोगों को विरोधी पार्टियों यही टारगेट भी दे रही हैं कि वे अगर अपने अपने इलाके में बसपा प्रत्याशियों को हरवा सकें तो चुनाव बाद उन्हें मदद दी जा सकती है. कुल मिलाकर यूपी का चुनाव दिनोंदिन बसपा के खिलाफ होता जा रहा है. माना जा रहा है कि सीबीआई ने अगर एनएचआरएम घोटाले में एक बड़े अफसर को गिरफ्तार कर लिया तो वह बसपा के कई बड़े लोगों का राजफाश कर सकता है. उससे ऐन चुनाव के बीच बसपा की बहुत बड़ी फजीहत हो जाएगी.

लखनऊ से लौटकर यशवंत सिंह की रिपोर्ट

आसिफ का महुआ से इस्‍तीफा, अमित हिंदुस्‍तान से कार्यमुक्‍त

महुआ न्‍यूज से खबर है कि आसिफ इकबाल ने इस्‍तीफा दे दिया है. आफिस यहां पर पॉलिटिकल रिपोर्टर थे. आसिफ अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. आसिफ का जाना महुआ के लिए झटका माना जा रहा है. आसिफ महुआ की लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे.

सूत्रों का कहना है कि कुछ दिन पहले आसिफ का भूपेंद्र नारायण सिंह भूप्‍पी से किसी बात को लेकर बहस हो गई थी. इसके बाद से ही आसिफ ने कार्यालय जाना बंद कर दिया था. अब उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा सौंप दिया है. आसिफ इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. बताया जा रहा है कि उनके पास किसी चैनल का ऑफर है. हालांकि इसका खुलासा नहीं हो पाया है.

हिंदुस्‍तान, बदायूं से खबर है कि मार्केटिंग विभाग में कार्यरत अमित कुमार को कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. खबर है कि अमित को बरेली में आयोजित मीटिंग में नहीं पहुंचने के चलते कार्यमुक्‍त किया गया है. अमित की जगह बरेली में तैनात प्रवीण को बदायूं भेजा गया है. अमित अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

ईटी हिंदी की बंदी : हिंदीवालों को दोयम समझनेवाले खुद निपटे

इकनॉनिक टाइम्स एकमात्र दिल्ली से छपनेवाला अपना हिंदी संस्करण बंद करने जा रहा है। आज, गुरुवार को उसकी टीम आखिरी बार अखबार का काम करेगी और कल शुक्रवार को उसका आखिरी अंक आएगा। फिर पटाक्षेप। तीन साल दस महीने दस दिन पहले 19 फरवरी 2008 को जब यह अखबार शुरू हुआ था तो प्रबंधन की तरफ से बड़े-बड़े वादे किए गए थे। हिंदी समाज को भी इससे बड़ी अपेक्षाएं थीं। लेकिन कम से कम लागत में ज्यादा से ज्यादा धंधा बटोरने के मकसद से शुरू हुआ यह ‘उद्यम’ बंद ही होना था।

इस अखबार में कुछ भी मौलिक नहीं था। सारा कुछ अंग्रेजी संस्करण का अनुवाद। वह भी इतना घटिया कि असली बात को समझने के लिए मूल अंग्रेजी संस्करण पढ़ना पड़ता था। जहां अमूमन किसी भी सामान्य दैनिक हिंदी अखबार में कम से कम 50-60 लोगों को संपादकीय विभाग होता है, वहीं आर्थिक व वित्तीय मसलों पर केंद्रित यह अखबार मात्र 20-22 लोगों से चलाया जा रहा है। वह भी उद्योग के औसत से कम वेतन देकर। हिंदी इकनॉमिक टाइम्स का कोई अलग संपादक नहीं था। सारे के सारे अनुवादक।

जाहिर है, समीर जैन के नेतृत्व वाली बेनेट कोलमैन एंड कंपनी ने हिंदी समाज व पाठकों को बस नोट खींचने का जरिया समझा था। उनकी प्रबंधन टीम की आंतरिक सोच-समझ थी कि इन ‘घटिया’ लोगों को कुछ भी फेंक दो, चलेगा। कोई जवाबदेही नहीं, बस नोट कमाने की फितरत। अब डंका बजाया जाएगा कि हिंदीभाषी समाज में तो निवेशक ही नहीं हैं। वहां आर्थिक व वित्तीय मसलों को जानने की कोई इच्छा नहीं नहीं है।

यह देश के करीब 55 करोड़ के हिंदी भाषी समाज का अपमान है। लेकिन एक सकारात्मक बात भी इस घटना में छिपी है कि जमीन से जुड़े इस समाज को चरका पढ़ाना इतना आसान नहीं है। इसके सामने कुछ ही फेंककर नहीं चला जा सकता। यहां उसकी जरूरत व समझ को समझकर ही उस तक कोई उत्पाद या सेवा पहुंचाई जा सकती है। यहां मौलिकता ही चलेगी, फेंकी गई जूठन नहीं।

हालांकि इकनॉमिक टाइम्स की शुरुआत करते हुए बड़े मौलिक दावे किए गए थे। उन्हीं के शब्दों में, “इकनॉमिक टाइम्स अब डेली अखबार पेश कर रहा है, जो न सिर्फ बिज़नस की खबरें देगा, बल्कि आपके हिसाब से उसकी अनैलसिस भी करेगा। मुकेश अंबानी अपने रिटेल वेंचर में आगे क्या करने जा रहे हैं, यह जानकारी आपको दी जाती है। लेकिन अगर आपको यह नहीं बताया जाए कि मुकेश अंबानी के इस कदम से हमारे उन रीडर्स पर क्या असर पड़ेगा, जो बिज़नस से जुड़े हैं तो ऐसी सूचना का महत्व कम हो जाएगा। अगर वित्त मंत्री किसी प्रॉडक्ट पर इनडायरेक्ट टैक्स बढ़ा दें या किसी चीज में सेस (अधिभार) जोड़ दें तो इस खबर के साथ यह भी बताना होगा कि टैक्स चुकाने वाले कंस्यूमर पर इसका क्या असर पड़ेगा।”

आप इकनॉमिक टाइम्स के उक्त दावे को पढ़कर समझ सकते हैं कि पहले ही दिन से इसका बंद होना क्यों तय था। जो अखबार हिंदी पाठकों को पहले दिन से ‘रीडर्स’ कह रहा हो, उसकी जुबान एक न एक दिन कटनी ही थी। लेकिन दिक्कत यह है कि समीर जैन एंड कंपनी ने हिंदी में आर्थिक अखबार चलाने की हिम्मत करनेवालों की नाक एक बार फिर काट दी है। इससे भी ज्यादा दुःखद यह है कि इसने उन दो लाख हिंदी पाठकों की भावनाओं पर कुठाराघात किया है जिसने शुरुआत में इस अखबार को हाथोंहाथ लिया था। इन्हीं में एक पाठक की शुरुआती प्रतिक्रिया पर गौर फरमाइए…

“इकनॉमिक टाइम्स का हिंदी में छपना केवल एक नए अखबार का लॉन्च नहीं है, यह देश के बदलते आर्थिक परिदृश्य और हिंदी को अर्थ और बाजार में मिलते महत्व को भी दर्शाता है। देशी-विदेशी कॉरपोरेट जगत के समाचारों को हिंदी में पढ़ने का अलग ही मजा है। उम्मीद है कि शेयर बाजार जैसे विषय अब केवल अंग्रेजी जानने वालों के लिए ही नहीं होंगे और अंग्रेजी न जानने वाले भी अब शेयर बाजार में अधिक मात्रा में अपने हाथ आजमाएंगे। अब हिंदी पढ़ने वाले इस अखबार से समृद्ध हों या नहीं इतना तय है कि इस संस्करण से हिंदी कुछ और समृद्ध हुई है।”

वरिष्‍ठ पत्रकार अनिल रघुराज का यह लेख अर्थकाम से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

अमर उजाला के इस कस्बाई पत्रकार की विपदा को कौन सुनेगा?

उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद के मिहींपुरवा कस्बे के अमर उजाला के पत्रकार सुधीर मदेशिया के ऊपर पुलिस प्रशासन ने आगज़नी और लूट-पाट सम्बन्धी तमाम मामलों में जनपद के मोतीपुर थाने में एफ.आई.आर. दर्ज कर रखी है. जबकि इस पत्रकार का कुसूर सिर्फ इतना ही था कि वह पत्रकार होने के नाते कस्बे में दुर्गा पूजा के दौरान हुई आगज़नी और साम्प्रदायिक तनाव की घटना को कवर करने के लिए घटनास्थल पर गया था.

सुधीर मदेशिया जहाँ स्वयं अमर उजाला के बहराइच में लांचिंग के समय से ही उससे जुड़ा हुआ हैं. वहीँ उसके पिता दिलीप नारायण मदेशिया भी हिन्दुस्तान अखबार की लांचिंग के समय से ही करीब 11 वर्षों से उसके मिहींपुरवा कस्बे के संवाददाता हैं. सुधीर मदेशिया पर दर्ज हुए इस एफ.आई.आर. की पृष्ठभूमि में एक स्थानीय सत्ता पक्ष के कद्दावर नेता का हाथ माना जा रहा है. 27 सितम्बर से कस्बे में एक बहुचर्चित हत्याकांड का खुलासा इस पत्रकार पिता-पुत्र की जोड़ी ने अपने-अपने अखबारों में किया था. इस हत्याकांड में फिरौती लेने के बाद हत्या हुई थी. इस घटना के सामने आने और इसके तार कुछ लोगों से जुड़े होने के कारण तथा पुलिस द्वारा इसके खुलासे में नाकाम रहने के कारणों का विस्तार से पत्रकार सुधीर मदेशिया द्वारा खुलासा किया गया. इन्ही बातों को लेकर पुलिस और कुछ दबंग नेताओं के निशाने पर सुधीर बना हुआ था.

इसी नाराजगी का खामियाजा इन्हें उस समय उठाना पड़ा जब मिहींपुरवा कस्बे में 7 अक्टूबर को दुर्गा पूजा के दौरान हुई साम्प्रदायिक तनाव और आगज़नी को कवर करने गये. इस घटना में आगज़नी और तमाम तोड़-फोड और लूट की घटनाओं में पहले से ही लोगों और पुलिस के निशाने पर रहे अमर उजाला के इस पत्रकार को उपद्रवी के रूप में प्रशासन ने चिन्हित कर लिया गया. उसके बाद इस पर एक साथ तीन एफ.आई.आर. दर्ज हुई, जिसमें एक तो तत्कालीन मोतीपुर थानाध्यक्ष के द्वारा स्वयं वादी के रूप में दर्ज कराइ गई. इस पूरी घटना को बीते करीब 3 माह का समय गुजर जाने के बाद भी सुधीर मदेशिया को जमानत नहीं मिल सकी है. इसी के साथ ही उसका पूरा परिवार अनजान भय की आशंका से ग्रसित बना हुआ है. इस मामले दो बड़े नाम वाले अखबारों के पत्रकारों का मामला होने के बाद भी दोनों अखबारों की तरफ से ना तो स्थानीय और ना ही ऊपर के लोगों से सुधीर के पक्ष में कुछ भी किया गया है. जिससे उसे कोई राहत मिल सके.

अखबार के माध्यम से अपनी कारगुजारियों और रौब ग़ालिब करने वाले स्टाफ से भरा अमर उजाला जो अभी हाल में ही अपने जिला संवाददाता के हटाने के भीतरघाती तरीके से पूरे जनपद के पत्रकारों में चर्चित है. उसने भी अपने इस पत्रकार की कोई मदद नहीं की है. इसी के साथ ही हिन्दुस्तान जो अब अपने काम से ज्यादा नाम से चर्चित है, उसकी ओर से से भी कोई भी राहत की बात नहीं की गई है. एक कस्बाई पत्रकार की चुनातियों और उसके पीछे लाबी के ना होने का खामियाजा इस पत्रकार को भुगतना पड़ रहा है. एक पत्रकार के साथ घटित इन घटनाओं पर अखबारों का चुप होना उचित नहीं लगता है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

लखनऊ के प्रदर्शनकारी पत्रकारों की मांग- मीडिया संस्‍थानों पर दबाव बनाएं सियासी पार्टियां

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मीडिया कर्मियों ने जोरदार प्रदर्शन कर सरकार से इस मामले में मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाने की मांग की। कन्फेडरेशन ऑफ न्यूज पेपर इम्पलाइज के बैनर तले हुए इस प्रर्दशन में 100 से ज्यादा पत्रकार व गैर पत्रकार मीडिया कर्मचारी शामिल थे। प्रेस क्लब के गेट पर हुए इस प्रर्दशन में मीडिया कर्मियों ने राजनैतिक दलों से भी मांग की कि वो अपने स्तर से हस्तक्षेप करें और मालिकों पर वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने का दबाव बनाएं।

प्रर्दशन के बाद हुयी सभा में पीटीआई इम्पलाइज यूनियन के यूपी अध्यक्ष राकेश पांडे ने कहा कि मीडिया कर्मियों के लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें मान तो लीं पर अब उन्हें लागू करने में अखबार मालिक आनाकानी कर रहे हैं। पांडे ने कहा कि बड़े अखबारी समूह हर हाल में वेज बोर्ड को लागू नही होने देना चाहते हैं और इसके लिए अदालत का सहारा लेने में नही चूक रहे हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया कर्मियों को वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करवाने के लिए लंबी लड़ाई लडऩे के लिए तैयार होना होगा।

यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने कहा कि पत्रकारों को उनका वाजिब हक दिलाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि हाल ही में प्रेस कांउसिल के चेयरमैन ने भी कहा कि न्याय संगत बात के लिए किसी अखबार का सरकारी विज्ञापन बंद करना कहीं से भी गलत नहीं है। सिद्दीकी ने कहा कि जो मीडिया समूह वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू नहीं करते उनके सरकारी विज्ञापन बंद किए जाएं।

आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय सचिव हेमंत तिवारी ने कहा कि दुर्भाग्‍य की बात है कि देश का सबसे बड़ा हिंदी अखबार होने का दावा करने वाला समूह अपने कर्मचारियों से जबरन इस शपथपत्र पर दस्तखत करवा रहा है कि उन्हें वेज बोर्ड नहीं चाहिए। तिवारी ने कहा कि वेज बोर्ड को लागू न होने देने के लिए सभी आखबार मालिकों ने हाथ मिला लिया है। उनका कहना था कि अखबार मालिकानों का मुनाफा बढ़ता जा रहा है और पत्रकारों का शोषण भी बढ़ता जा रहा है। हेमंत ने कहा कि पत्रकारों को एकजुट होकर अखिल भारतीय स्तर पर वेज बोर्ड के लिए जंग छेडऩी होगी।

यूपी प्रेस क्लब के अध्यक्ष रवींद्र सिंह ने कहा कि पेड न्यूज के लिए अखबार मालिकों ने पत्रकारों का इस्तेमाल किया और अपनी झोली भरी। उन्होंने चिंता जतायी कि आज राजनेता भी पत्रकारों के खिलाफ अखबार मालिकों के साथ नजर आते हैं। वरिष्ठ पत्रकार और प्रेस क्लब के पदाधिकारी अभिनव पांडे ने कहा कि पत्रकारों की एकजुटता बहुत जरूरी है बिना उसके वेतन भत्तों के साथ-साथ काम करने के हालात नहीं सुधरेंगे।

भारतीय जनता पार्टी के विधायक सुरेश तिवारी ने कहा कि वो अपने दल के शीर्ष नेताओं तक पत्रकारों की बात पहुंचाएंगे और अनुरोध करेंगे कि वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू कराने के लिए अपने स्तर पर प्रयास करें। समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि मुजीबुर्रहमान बबलू ने कहा कि उनकी पार्टी पत्रकारों व मीडिया कर्मियों पर होने वाले किसी अन्याय के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी भी पत्रकारों के हक के लिए सडक़ पर उतर कर लड़ाई लड़ेगी। सभा में पीटीआई यूनियन के महासचिव राकेश, शलभ, इंडियन एक्सप्रेस के मनोज व कई अन्य शामिल थे।

झारखंड में आर्यन टीवी की हालत खराब, आईआरपीडी ने भेजा विज्ञापन बंद करने का नोटिस

आर्यन टीवी, रांची से खबर है कि भुजंग भूषण के इस्‍तीफा देने के बाद से चैनल की स्थिति पूरे झारखंड में बदतर हो गई है. आफिस में अराजकता जैसी स्थिति है. तो आईआरपीडी ने भी विज्ञापन बंद करने का नोटिस चैनल को दे दिया है. स्ट्रिंगरों का भुगतान नहीं हुआ है, जिससे वे फीड नहीं भेज रहे हैं. खबरें नहीं चल रही हैं. चैनल के भविष्‍य को लेकर ही उहापोह की स्थिति बन गई है. पटना से रांची भेजे गए संजय सिंह भी स्थिति संभाल नहीं पा रहे हैं.

स्‍टेट हेड रहे भुजंग भूषण के इस्‍तीफा के कुछ दिन बाद ही सहयोगी कर्मियों ने एक संवाददाता नितेश रंजन से मारपीट कर लिया था. नितेश पर आरोप था कि वो अपने महिला सह‍कर्मियों पर व्‍यंग्‍य करने के अलावा सहयोगियों की शिकायत भी प्रबंधन से कर रहे थे. इसके बाद से ही आफिस में लगातार तनाव बना हुआ है. इधर, झारखंड में चैनल का डिस्‍ट्रीब्‍यूशन नहीं होने से कहीं दिख नहीं रहा है, जिसके चलते झारखंड के आईआरपीडी विभाग ने चैनल प्रबंधन को प्रचार तथा विज्ञापन भुगतान रोकने का नोटिस दे दिया है. आईआरपीडी ने नोटिस में कहा है कि चैनल झारखंड में कहीं दिख नहीं रहा है इसलिए प्रचार एवं भुगतान रोका जा रहा है.

पिछले दिनों भुजंग भूषण की जगह झारखंड का प्रभार संभालने के लिए भेजे गए संजय सिंह स्थिति को संभाल नहीं पा रहे हैं. कई महीने से पैसा नहीं मिलने से स्ट्रिंगर अलग दबाव बनाए हुए हैं. खबरें नहीं भेज रहे हैं. खबर है कि ट्रैवेल एजेंसी ने भी भुगतान ना होने के कारण रिपोर्टरों के लिए गाड़ी भेजने से इनकार कर दिया है. जहां चैनल का आफिस चल रहा है उसके मालिक ने भी दस जनवरी तक मकान खाली करने का नोटिस भेज दिया है. साथ ही मकान मालिक ने बिजली काटने का भी नोटिस जरी कर दिया है. बताया जा रहा है कि रांची का बुरा हाल पटना में चल रहे गुटबाजी के चलते हैं. 

आपसी गुटबाजी के चलते चैनल को रसातल में मिलाया जा रहा है. खबर है कि आजकल चैनल में एचआर हेड निशा का हस्‍तक्षेप ज्‍यादा बढ़ गया है, जिसके चलते कर्मचारी और अधिक परेशान हैं. उनका कहना है कि चैनल के एमडी अनिल सिंह भी एचआर हेड की सारी बात सुनते हैं और उसी पर अमल भी करते हैं, जिसके असंतुष्‍ट लोगों की संख्‍या तो बढ़ी ही है, इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी हो रही हैं. पिछले दिनों एचआर विभाग द्वारा उटपटांग ढंग से पीएफ और टीडीएस काटे जाने पर कर्मचारियों ने सीएमडी के खिलाफ पोस्‍टर लिखकर विरोध भी प्रकट किया था. आयकर विभाग का छापा पड़ने के बाद से चैनल की आंतरिक स्थिति और अधिक गड़बड़ हो गई है.

जनसंदेश टाइम्‍स, वाराणसी के जीएम सीपी राय को पितृशोक

जनसंदेश टाइम्‍स, वाराणसी के जीएम सीपी राय के पिता वशिष्‍ठ नारायण राय का मंगलवार की रात निधन हो गया. वे अस्‍सी वर्ष के थे तथा बीमार चल रहे थे. उनका इलाज बनारस के लक्ष्‍मी मेडिकल सेंटर पर चल रहा था. वहीं पर उन्‍होंने आखिरी सांस ली. वे अपने पीछे तीन पुत्र एवं एक पुत्री का भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं. उनका अंतिम संस्‍कार हरिश्‍चंद्र घाट पर किया गया.

उनके अंत्‍येष्टि के समय बनारस के तमाम गणमान्‍य लोगों समेत भारी संख्‍या में पत्रकार मौजूद रहे. तमाम जगह बैठक करके पत्रकारों ने सीपी राय के पिता के निधन पर शोक जताया तथा उनकी आत्‍मा को शांति देने की प्रार्थना की. 

जयपुर में भी पत्रकार एवं गैर पत्रकार संगठनों ने किया आंदोलन

जयपुर। कन्फेडरेशन ऑफ न्यूज पेपर्स एण्ड न्यूज एजेंसी एम्पलाइज ऑर्गनाइजेशन के आह्वान पर बुधवार को समाचार पत्र और संवाद समितियों के पत्रकारों और गैर पत्रकारों ने जस्टिस मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को तुरंत लागू करने की मांग को लेकर जयपुर में प्रदर्शन कर धरना दिया।

फेडरेशन ऑफ पीटीआई एम्पलाइज यूनियन से सम्बद्ध पीटीआई एम्पलाइज यूनियन राजस्थान, राजस्थान जर्नलिस्ट्स यूनियन (आर.जे.यू.), राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ राजस्थान समाचार पत्र कर्मचारी महासंघ ने कन्फेडरेशन ऑफ न्यूज पेपरर्स एण्ड न्यूज एजेंसी एम्पलाइज ऑर्गनाइजेशन के आह्वान पर धरना दिया। इसके तहत दिये गये धरने में पत्रकार एवं गैर पत्रकारों ने समाचार पत्र मालिकों की हठधर्मिता के विरोध में जयपुर के नारायण सिंह सर्किल पर धरना दिया।

पत्रकार और गैर पत्रकार संगठनों ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से समाचार पत्र के मालिकों से जस्टिस मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करवाने में दखल देने की मांग की है। इन संगठनों ने धमकी दी कि अगर समाचार पत्र मालिकों ने नये वेतनमान से शीघ्र भुगतान नहीं किया तो जयपुर के एक प्रमुख समाचार पत्र के कार्यालय पर धरना दिया जाएगा। साभार : एनबीटी

पंजाब केसरी को आगरा से छपवाने की रणनीति फेल!

: कानाफूसी : आगरा से खबर है कि पंजाब केसरी, दिल्‍ली अब ताजनगरी से प्रकाशित होने के लिए बेताब है. पर उसे कोई ढंग का आसामी नहीं मिल रहा है, जो अखबार को आगरा से छपवा सके. सूत्रों का कहना है कि पंजाब केसरी प्रबंधन की आगरा से प्रकाशित होने वाले एक मिड डे अखबार प्रबंधन से अखबार छापने को लेकर बातचीत हुई, लेकिन दोपहर में प्रकाशित होने वाले अखबार के प्रबंधन ने साफ मना कर दिया.

बताया जा रहा है कि आगरा में पंजाब केसरी के तीन-तीन ब्‍यूरो हेड हैं और अखबार मैनेजमेंट नहीं बता पा रहा है कि इसमें असली ब्‍यूरोचीफ कौन है. पंजाब केसरी, आगरा के ब्‍यूरो में जमकर राजनीति चल रही है, अखबार का ब्‍यूरो कब बंद हो जाए पता नहीं है. अखबार की मार्केट पोजिशन भी खराब बताई जा रही है. इसीलिए कोई भी इस अखबार को आगरा से प्रकाशित करने के लिए तैयार नहीं है. 

गलत खबर छापने पर ‘भास्कर’ को नोटिस!

इंदौर। ‘दबंग दुनिया’ के मालिक किशोर वाधवानी की 26 दिसंबर को स्पेशल मजिस्ट्रेट डा. शुभ्रा सिंह की अदालत में पेशी थी, कारण कि वे एक गुटखा फैक्ट्री पर छापे की कार्रवाई को लेकर बयान के लिए बार-बार समन जारी होने पर भी हाजिर नहीं हो रहे थे। किंतु दैनिक भास्कर ने 27 दिसंबर के अंक में पेज 3 पर जो खबर छापी वो ही गलत थी। खबर में बताया गया था कि वाधवानी का गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया है और उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश सेंट्रल एक्साईज को दिया गया है।

परन्‍तु हकीकत यह है कि वाधवानी का पांच सौ रुपए का जमानती वारंट जारी हुआ था, लेकिन रिपोर्टर ने क्या पता किया भगवान जाने… खबर बताती है कि वाधवानी का गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया, जबकि ऐसा कुछ नहीं था। बहरहाल अपुष्ट खबर मिली है कि वाधवानी ने भास्कर प्रबंधन को मानहानि का नोटिस भेज दिया है। लगता है निरंतर कोर्ट की खबरों में गलतियां कर रहा ‘भास्कर’ किसी दिन कोर्ट में टंगेगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

टीवी100 से फिर फुर्र हुए राजीव पंछी

टीवी100 से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार एवं चैनल हेड राजीव पंछी ने इस जिम्‍मेदारी से खुद को हटा लिया हैं. माना जा रहा है कि काम की अधिकता के चलते उन्‍होंने यह निर्णय लिया है.  पंछी अब इस ग्रुप के दूसरे बड़े प्रोजेक्‍ट की जिम्‍मेदी संभालेंगे. राजीव पंछी ने अपने कैरियर की शुरुआत प्रिन्ट मीडिया के साथ की. नवभारत टाइम्स से जुड़कर उन्‍होंने डेस्क और रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव हासिल किया. राजीव ने अपने कैरियर में कई आयामों पर काम किया. उन्होंने रेडियो में समाचार लेखन और न्यूज रीडर के रूप में भी काम किया.

राजीव पंछी ने मीडिया मैनेजमेन्ट, मीडिया एजुकेशन और प्रोडक्शन हाउसों में भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. उन्होंने सीईओ के तौर पर साधना एकेडमी फार मीडिया स्टडीज को शुरू कराया. इसके अलावा उन्होंने आरके फिल्म्स एंड मीडिया स्टडीज में डायरेक्टर और सुदर्शन टीवी मीडिया एकेडमी में सीईओ के पद पर भी काम किया. राजीव पहले भी टीवी100 में बतौर सीईओ काम कर चुके हैं. इस संदर्भ में पूछे जाने पर राजीव पंछी ने कहा कि उन्‍होंने कुछ बड़े प्रोजेक्‍टों के लिए सिर्फ चैनल की जिम्‍मेदारी से खुद को अलग किया है.

तबादले से नाराज शैलेंद्र मणि के जनसंदेश टाइम्‍स लांच कराने की चर्चा

: गोरखपुर में दैनिक जागरण को तबाह करने में जुटे : गोरखपुर से एक बड़ी खबर है. दैनिक जागरण प्रबंधन ने शैलेंद्र मणि का तबादला कानपुर के लिए कर दिया है. शैलेंद्र को फरमान सुना दिया गया है कि आप एक जनवरी से कानपुर में जाकर बैठें. पर शैलेंद्र ने कानपुर जाने से साफ इनकार कर दिया है. वे अब गोरखपुर में ही दैनिक जागरण की क्रब खोदने की तैयारी कर रहे हैं. खबर है कि शैलेंद्र दैनिक जागरण को बाय करके जनसंदेश टाइम्‍स को गोरखपुर में लाने में जुट गए हैं. चर्चा है उन्‍हें अखबार का संपादकीय प्रभारी बनाया जा रहा है. हालांकि अभी उन्‍होंने जागरण से इस्‍तीफा नहीं दिया है.

बुधवार को गोरखपुर में इस बात की जमकर चर्चा रही. अगर सब कुछ ठीक रहा तो मकर संक्रांति के बाद जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर से प्रकाशित होना शुरू हो जाएगा. फिलहाल संभावना है कि एक प्रेस से 5 जनवरी 2012 से जनसंदेश की डमी निकलने लगेगी. शैलेंद्र ने जागरण की अपनी पुरानी टीम से कई लोगों को तोड़ने की कवायद शुरू कर दी है. कई बड़े पत्रकारों से उनकी बात भी हुई है. वो जागरण को झटका देने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सब अपनाने में लग गए हैं. कई दूसरे अखबारों के पत्रकार भी उनके संपर्क में हैं.

जानकारी के अनुसार दैनिक जागरण के कार्यालय के बगल में ही स्थित गोकुल मैरिज हाउस में जनसंदेश का आफिस खुल गया है. जनसंदेश टाइम्‍स को जन-जन तक पहुंचाने के लिए शैलेंद्र मणि ने दैनिक जागरण में उपेक्षित लोगों को अपना कमांडर बनाने की जुगत में लगे हुए हैं. चर्चा है कि शैलेंद्र मणि ने जागरण के धर्मेंद्र पांडेय, विजय उपाध्‍याय, आशुतोष मिश्रा, सिद्धार्थ मणि, नजीर मलिक जैसे लोगों को दैनिक जागरण से इस्‍तीफा देकर जनसंदेश आने को कहा है. हालांकि ये लोग शैलेंद्र मणि की बात को कितना तवज्‍जो देते हैं ये देखने वाली बात होगी. सुनने में तो यहां तक आया है कि शैलेंद्र ने इलाहाबाद जागरण से अशोक चौधरी, मुरादाबाद जागरण से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी को भी गोरखपुर बुलाया है. अन्‍य जिलों में भी दैनिक जागरण के ब्‍यूरो प्रभारी शैलेंद्र मणि के संपर्क में हैं.

इधर, जागरण वालों का कहना है कि शैलेंद्र मणि अगर उनकी टीम तोड़ते हैं तो इससे अखबार का ही भला होगा, क्‍योंकि उन्‍होंने ज्‍यादातर ऐसे लोगों को ही भर रखा था, जो काम की बजाय गप्‍पेबाजी में उलझे रहते थे. चर्चा है कि जागरण से जूनियर लेबल के कई लोग जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ सकते हैं. गौरतलब है कि जनसंदेश टाइम्‍स बनारस में भी अपने विस्‍तार की तैयारियों में जुटा हुआ है. वरिष्‍ठ पत्रकार एवं कवि डा. सुभाष राय इस अखबार के प्रधान संपादक हैं. बनारस में संपादकीय प्रभारी आशीष बागची को बनाया गया है. सूत्रों का कहना है कि अबखार जल्‍द ही इलाहाबाद से भी लांच होने वाला है.   

राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार धीरेंद्र सिंह को पितृशोक

अलीगढ़। राष्ट्रीय सहारा हिंदी दैनिक के प्रतिनिधि धीरेंद्र सिंह के पिता श्री विजयपाल सिंह निवासी पाली रजापुर का 87 वर्ष की उम्र में महावीर धाम स्थित आवास पर मंगलवार 27 दिसम्बर की दोपहर को निधन हो गया। वह काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनका अंतिम संस्कार सराय हरनारायन स्थित श्मशान घाट पर किया तथा मुखाग्नि उनके छोटे पुत्र धीरेन्द्र सिंह ने दी।

इस अवसर पर हुई शोकसभा में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन धारण कर ईर से प्रार्थना की गई। इसमें श्रद्धांजलि देने वालों में पंकज शर्मा, प्रकाश शर्मा, रामखिलाड़ी शर्मा, सुदीप शर्मा, दिलीप शर्मा, केएम माहेरी, जितेन्द्र सिंह आदि शामिल थे। साभार : सहारा

दिलीप मंडल एवं कुमुद शर्मा को भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र पुरस्‍कार

नई दिल्ली। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने वर्ष २००९-१० के भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार वितरित किए। शास्त्री भवन में आयोजित समारोह में हिंदी में मौलिक लेखन को बढ़ावा देने के लिए ये पुरस्कार पत्रकारिता एवं जनसंचार विषयों के अलावा महिला विमर्श, बाल साहित्य और राष्ट्रीय एकता से जुड़े विषयों पर लिखी पुस्तकों और पांडुलिपियों को हर वर्ष दिया जाता है।

वर्ष २००९ के पत्रकारिता एवं जनसंचार वर्ग में प्रथम पुरस्कार के लिए दिलीप मंडल की पांडुलिपि कारपोरेट लोकतंत्र और पेड न्यूज, द्वितीय पुरस्कार सुश्री कुमुद शर्मा की पुस्तक समाचार बाजार की नैतिकता और तृतीय पुरस्कार के लिए संयुक्त रूप से शिवानंद कामड़े की पाण्डुलिपि कार्टून पत्रकारिता और डा. अकेला भाई की पुस्तक रेडियो साहित्य और पत्रकारिता को दिया गया।

महिला वर्ग २००९ में प्रथम पुरस्कार के लिए श्रीमती लता कोट की पाण्डुलिपि आधा आसमां हमारा और द्वितीय पुरस्कार के लिए डा. सीमा रानी की पाण्डुलिपि नारी की समस्या और समाधान को दिया गया। बाल साहित्य २००९ में प्रथम पुरस्कार के लिए घमंडी लाल अग्रवाल की पुस्तक गीत ज्ञान विज्ञान के और द्वितीय पुरस्कार के लिए सुश्री रेनू सैनी की पाण्डुलिपि बचपन का सफर को चुना गया। राष्ट्रीय एकता वर्ग २००९ में किसी पुस्तक या पांडुलिपि को पुरस्कार के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया।

वर्ष २०१० के पत्रकारिता एवं जनसंचार वर्ग में द्वितीय पुरस्कार के लिए प्रांजल धर की पांडुलिपि समकालीन वैश्विक पत्रकारिता में अखबार को चुना गया। इस वर्ग में प्रथम एवं द्वितीय पुरस्कार के लिए किसी को नहीं चुना गया है। महिला विमर्श वर्ग २०१० में डा. सुमन राय की पुस्तक घरेलू हिंसा में महिला अधिनियम २००५-६ और द्वितीय पुरस्कार के लिए प्रर्मीला केपी की पुस्तक स्त्री यौनिकता बनाम आध्यात्मिकता को चुना गया।

बाल साहित्य वर्ग २०१० में द्वितीय पुरस्कार के लिए संजीव जयसवाल संजय की पुस्तक डूबा हुआ किला व प्रभात की पुस्तक साइकिल पर था कव्वा को संयुक्त रूप से चुना गया। इस वर्ग में प्रथम पुरस्कार के लिए किसी को नहीं चुना गया है। राष्ट्रीय एकता वर्ग २०१० में प्रथम पुरस्कार के लिए डा. शिव कुमार राय की पांडुलिपि मेरी जाति भारतीय को चुना गया है। इस वर्ग में द्वितीय पुरस्कार के लिए किसी भी पुस्तक या पांडूलिपि को उपयुक्त नहीं पाया गया है।

पुरस्कार राशि बढ़ाई गई : वर्ष २००९ से मंत्रालय ने भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कारों की राशि बढ़ा दी है। पत्रकारिता और जनसंचार वर्ग में प्रथम पुरस्कार के लिए राशि ३५ हजार से बढ़ाकर ७५ हजार रूपए कर दी गई है। इसी वर्ग में द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों की की राशि २५ और २० हजार से बढ़ाकर क्रमशः ५० हजार व ४० हजार कर दी गई है। महिला विमर्श, बाल साहित्य और राष्ट्रीय एकता वर्गो में प्रथम पुरस्कारों की राशि १५ हजार से बढ़ाकर ४० हजार रूपए और द्वितीय पुरस्कारों की राशि १० हजार से बढ़ाकर २० हजार रूपए कर दी गई है। गौर करनेवाली बात हैं कि १९८३ में पत्रकारिता और जनसंचार के विषयों पर मौलक लेखन के लिए शुरू की गई भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार योजना मं १९९२-९३ से महिला विमर्श, बाल साहित्य और राष्ट्रीय एकता वर्गो को भी शामिल किया गया है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय कर इस वार्षिक पुरस्कार योजना का आयोजन प्रकाशन विभाग करता है। इस अवसर पर सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री डा. एस. जगतरक्षकन विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे। साभार : अमर उजाला

न्‍यूज चैनल के पत्रकार पर लगा ब्‍लैकमेलिंग का आरोप

कोडरमा। झारखंड में पत्रकारिता एक बार फिर दागदार हुई है। यहां कोडरमा में एक न्‍यूज चैनल के संवाददाता मनोज कुमार सिंह पर ब्लैकमेलिंग का आरोप लगा है। कोडरमा के एक उद्योगपति उमेशचंद्र अग्रवाल ने मनोज सिंह पर 50 हजार रुपये बतौर नजराना मांगने का आरोप लगाते हुए कोडरमा उपायुक्त शिवशंकर तिवारी से लिखित शिकायत की है। बताया गया कि मनोज ने उक्त उद्योगपति के एक बागीचे में कुछ पेड़ों के काटे जाने का विजुअल अपने कैमरे में कैद किया था।

बस इसी बात को आधार बनाकर मनोज ने उमेशचंद्र अग्रवाल को फोन पर खबर चला देने की धमकी दे रहा था। उमेश के मुताबिक यह पत्रकार साधना न्‍यूज चैनल से जुड़ा हुआ है। यह पत्रकार इस खबर की एवज में उनसे 50 हजार रुपए की मांग कर रहा था। फोन पर बार-बार की धमकी से तंग आकर उमेशचंद्र अग्रवाल ने स्थानीय डीसी से इस बात की शिकायत की। साथ ही लोकल स्तर पर तमाम मीडिया को भी इस बात से अवगत करवाया।

गौरतलब है कि पूर्व में कोडरमा में साधना न्यूज का एक अलग ही क्रेज रहा है। खास कर निरुपमा प्रकरण में यहां साधना न्यूज ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। हालांकि उस समय कोडरमा में साधना न्यूज की कमान एक अनुभवी पत्रकार आशुतोष श्रीवास्तव के हाथों में थी, लेकिन कुछ ही समय के बाद आशुतोष ने साधना से रिजाइन करके गिरिडहि में अपना एक लोकल चैनल चलाने लगे। तब से साधना की बागडोर मनोज देख रहे थे। मनोज पर शुरुआती दौर से ही तमाम आरोप लगते रहे हैं। मनोज कोडरमा प्रेस क्लब का उपाध्यक्ष भी है। इस तरह के गंभीर आरोप से न सिर्फ पत्रकारिता के पेशे को धब्बा लगा है। इस खबर को दैनिक जागरण ने भी प्रकाशित किया है.

हिंदुस्‍तान को जरूरत है कॉपी एडिटर, रिपोर्टर एवं सीनियर रिपोर्टरों की

पत्रकारों के लिए अच्‍छी खबर है. हिंदुस्‍तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड को मध्‍य एवं पूर्वी उत्‍तर प्रदेश कॉपी एडिटर, रिपोर्टर एवं सीनियर रिपोर्टरों की आवश्‍यकता है. अखबार ने इन पदों के लिए योग्‍य उम्‍मीदवारों से आवेदन मांगा है. विज्ञापन में लिखा गया है कि जिनको भी इस फील्‍ड में दो से चार वर्ष का अनुभव हो वो उक्‍त पदों के लिए आवेदन कर सकता है. आवेदन आज से तीन दिन के अंदर भेजने को कहा गया है.

आवेदन भेजने का पता है- एचआर विभाग, हिंदुस्‍तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड, मार्केट -2, विभूति खण्‍ड, गोमती नगर, लखनऊ. आवेदक अपना बायोडाटा ई मेल के जरिए भी भेज सकते हैं. ईमेल का पता है – humanresources.up@hindustantimes.com. नीचे हिंदुस्‍तान में प्रकाशित विज्ञापन….

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर पटना में मीडियाकर्मियों का प्रदर्शन

पटना : मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंषाओं को लागू करने के लिए देशव्यापी आंदोलन अभियान के तहत बिहार की राजधानी पटना में दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया न्‍यूज पेपर एम्प्लाइज  यूनियन और पी.टी.आई. कर्मचारी यूनियन के संयुक्त अभियान में राजधानी के मशहूर डाक बंगला चौक पर जोशो-खरोश के साथ नारेबाजी के साथ एक घंटे तक प्रदर्शन किया गया. कार्यक्रम चलाने के बाद प्रदर्शनकारी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मियों ने एक जुलूस निकाला, जो शहर के मुख्य मार्ग फ्रेजर रोड से होते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया पटना के दफ्तर के सामने पहुंचा.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया एम्‍प्‍लाइज यूनियन के सचिव लाल रत्नाकर, मनीष कुमार, अशोक कुमार, सदानंद, फुलेश्वर झा, राकेश सिंह, तारकेश्वर सिंह आदि के नेतृत्व में जब यह जुलूस जब टाइम्स आफ इंडिया के दफ्तर के सामने पहुंचा तो मानो प्रदर्शनकारियों में नई उर्जा का संचार सा हो गया.  जुलूस के नारों की आवाज़ तेज से तेजतर होती गई. यहाँ आकर जुलूस के स्वर कुछ और तीखे से हो गए. मालूम हो कि पिछले १६ जुलाई २०११ को टाइम्स प्रबंधन ने अपना कुम्हरार स्थित प्रिंटिंग प्रेस बंद कर दिया और वहां काम कर रहे ४४ कर्मियों को उसी स्थिति में नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, जब कि उनका मजीठिया वेतन बोर्ड के बकाये का विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था. दीवानी और फौजदारी दोनों ही किस्म के मामले सुप्रीम कोर्ट में न्याय निर्णय की प्रतीक्षा में निलंबित परे थे.

मीडियाकर्मियों ने वहां मजीठिया लागू करो, कर्मचारी विरोधी हरकतों से बाज आओ, सुप्रीम कोर्ट की अवमानना बंद करो, कानून से अपने कॉर्पोरेट सिटीजन की ताकत ज्यादा है, समझने की मानसिकता से बाहर आओ जैसे नारे लगाये. सूत्र बताते हैं कि पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों के गुस्से को देखते हुए प्रबंधन के अधिकांश सदस्य दूसरे और तीसरे तल पर भाग खड़े हुए. मगर प्रदर्शनकारियों ने अपना संयम नहीं खोने दिया और दफ्तर के सामने नारे लगाते रहे. गौरतलब है कि यह प्रदर्शन टाइम्स ऑफ़ इंडिया यूनियन के अध्यक्ष अरुण कुमार की अनुपस्थिति में हुआ और पूरी तरह अनुशाषित रहा. यह यूनियन की प्रौढ़ता की निशानी है.

पटना से लाल रत्‍नाकर की रिपोर्ट.

नए साल में अलग रूप में दिखेगी जागरण की वेबसाइट

: कानाफूसी : जागरण ग्रुप अब अपने अखबार की वेबसाइट को नया रंग रूप देने की तैयारी में है. खबर है कि नए साल पर जागरण अपने ऑनलाइन पाठकों को यह तोहफा दे सकता है. रंग रूप में बदलाव के साथ इसका कलर भी पुरानी साइट से अलग होगा. अब तक जागरण के साइट पर कुछ बड़े एवं चुनिंदा शहरों के ई-पेपर ही उपलब्‍ध होते थे, पर बताया जा रहा है कि नए साइट को इस तरह तैयार किया गया है कि इसमें जागरण के छोटे-बड़े सभी शहरों के एडिशन ई-पेपर के रूप में ऑनलाइन पाठकों के लिए उपलब्‍ध होंगे.

हिंदी अखबारों में इस तरह की सर्विस अभी तक केवल अमर उजाला के पास है. अमर उजाला के किसी भी एडिशन के ई-पेपर को ऑनलाइन देखा जा सकता है. जागरण की ऑन लाइन सर्विस में भी सभी एडिशनों की चुनिंदा खबरें देखी जा सकती थीं, परन्‍तु ई-पेपर देखने की सुविधा नहीं थी. खबर है कि नए साइट में इसका ख्‍याल रखा जा रहा है कि पाठक सभी एडिशनों की पूरी खबरें पढ़ सके. अखबार के साइट पर दिखने वाला केसरिया कलर बदल कर इसे आसमानी किया जा रहा है. खबर है कि इस नए साइट को जागरण के कुछ खास एडिशनों में कर्मचारियों को देखने और समझने के लिए खोल दिया गया है. जागरणकर्मी इसे test.jagran.com के जरिए खोल सकते हैं. हालांकि बाहर वालों को यह नए साल में ही देखने को मिलेगा. संभावना है कि मकर संक्रांति के बाद इसे लांच कर दिया जाए.

भ्रष्‍टाचार का फल : मायावती ने दो और मंत्रियों को निपटाया

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है, दूसरी ओर मुख्यमंत्री मायावती लगातार अपनी सरकार की गंदगी साफ करने में लगी हुई हैं. मायावती ने बुधवार को दो और मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया है. भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे अतिरिक्त उर्जा मंत्री अकबर हुसैन और विज्ञान और प्राद्योगिकी मंत्री यशपाल सिंह की छुट्टी की गई है. इससे पहले मायावती नौ मंत्रियों की छुट्टी कर चुकी हैं. इसमें चार मंत्रियों की छुट्टी उन्‍होंने तीन दिन पहले ही की है.

मुख्यमंत्री ने राज्य में चुनावों की तारीखों के ऐलान के दूसरे दिन यानी रविवार को भ्रष्‍टाचार के आरोपों से घिरे जिन मंत्रियों को हटाया था उनमें उच्च शिक्षा मंत्री राकेश धर त्रिपाठी, कृषि, शिक्षा और अनुसंधान मंत्री राजपाल त्यागी, पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री अवधेश वर्मा और होम गार्ड राज्य मंत्री हरिओम के नाम शामिल हैं. इससे पहले लोकायुक्त की जांच के घेरे में आए पांच को हटाया जा चुका है. उनके नाम रतनलाल अहिरवार, राजेश त्रिपाठी, अवधपाल सिंह, बादशाह सिंह और रंगनाथ मिश्रा हैं.

व‍हीं मायावती अपने सबसे नज़दीकी माने जाने वाले और दर्जन भर विभागों के मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को अब भी बख्‍श रखा है. नसीमुद्दीन भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को लेकर लोकायुक्त जांच में फंसे हुए हैं, लेकिन अब तक मायावती का उनपर आशीर्वाद कायम है. इतना ही नहीं चुनाव से महीने भर पहले दो मंत्रियों समेत 25 विधायकों के टिकट भी काट लिए गए हैं.

चैनल वन प्रबंधन पर एक लाख साठ हजार हड़पने का आरोप लगाया रिपोर्टर ने

: डीजीपी समेत कई लोगों को भेजा शिकायती पत्र : चैनल वन के रिपोर्टर तथा साहिबाबाद (गाजियाबाद) निवासी चंदन राय ने यूपी के डीजीपी को पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि चैनल के डाइरेक्‍टर जहीर अहमद ने उनके एक लाख साठ हजार रुपये हड़प लिए हैं. कृपया इन पैसों को उन्‍हें वापस दिलाया जाए. डीजीपी, आईजी, एसएसपी समेत कई लोगों को भेजे गए अपने पत्र में चंदन ने बताया है कि वो 2009 से इस चैनल से रिपोर्टर के रूप में जुड़े हुए हैं.

शिकायती पत्र में कहा गया है कि चंदन ने चैनल वन प्रबंधन को तीन विज्ञापन चलाने के लिए एक लाख साठ हजार रुपये दिए थे, परन्‍तु यह विज्ञापन चैनल पर नहीं चलाए गए. चंदन ने जब विज्ञापन नहीं चलाए जाने के चलते प्रबंधन से पैसे वापस मांगे तो उन्‍हें डाइरेक्‍टर जहीर अहमद द्वारा चैनल से बाहर निकालने तथा पैसे हड़पने की धमकी दी गई. चंदन ने कहा कि उसे डर है कि उसके साथ कोई अप्रिय घटना घट सकती है, लिहाजा उसके पैसे वापस दिलाए जाएं. नीचे आप भी पढि़ए शिकायती पत्र.. 

रोड रेज में अखबार के फोटोग्राफर की पिटाई

रायबरेली में स्‍वतंत्र चेतना अखबार के फोटोग्राफर को दबंगई भारी पड़ गई. फोटोग्राफर के व्‍यवहार से नाराज एक व्‍यक्ति ने उसकी पिटाई कर दी. हालांकि इस संदर्भ में पुलिस में कोई मामला दर्ज नहीं कराया गया है. जानकारी के अनुसार स्‍वतंत्र चेतना अखबार के फोटोग्राफर अनुज मौर्य अपनी बाइक से कहीं जा रहे थे. उनके बाइके के आगे सोनू गांधी नामक व्‍यक्ति की कार थी. अनुज ने आगे निकलने के लिए हार्न बजाया परन्‍तु जगह नहीं होने के कारण सोनू ने पास नहीं दिया.

इसी बात से नाराज अनुज ने अपनी मोटरसाइकिल किसी तरह कार से आगे निकाली और सोनू की गाड़ी के सामने खड़ी कर दी. इसके बाद सोनू को अपशब्‍द कहने लगा. कार से उतरे सोनू ने पहले तो पास न देने की बात समझाने की कोशिश की, परन्‍तु जब अनुज ने गाली-ग्‍लौज शुरू कर दी तो सोनू भी तैस में आ गए. सोनू के साथ कार में मौजूद व्‍यक्ति ने बीच बचाव करने की कोशिश की, परन्‍तु अनुज ने उनसे भी अभद्रता कर दी, जिसके बाद सोनू ने अनुज को पीट दिया. बाद में कुछ लोगों ने बीच बचाव कर मामले को सुलटाया. इस संदर्भ में अनुज से संपर्क करने की कोशिश की गई परन्‍तु बात नहीं हो पाई.

प्रस्‍तावक के अपहरण के आरोप भी लग चुके हैं बर्खास्‍त मंत्री अवधेश वर्मा पर

: राजनीतिक नाटक कर रही हैं मायावती : उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार अपने ही मंत्रियों की कारगुजारियों से उबर नहीं पा रही है। अभी तक पांच मंत्री लोकायुक्त की जांच में दोषी पाये जाने पर अपनी कुर्सी गंवा चुके हैं। मायावती के करीबी और बसपा सरकार में मुस्लिम चेहरा कहे जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी लोकायुक्त की जांच में फसते नजर आ रहे हैं। उन पर भ्रष्ट्राचार, अवैधरूप से भूमि पर कब्जा करने के आरोप हैं, वहीं अपने परिवार और रिश्‍तेदारों को अपने पद का दुरुपयोग करते हुये लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप भी लगे है। इन सभी विवादों से बसपा उबर भी नहीं पाई थी कि मयावती के मंत्रिमंडल के चार और मंत्रियों के विकेट गिर गये।

उत्तर प्रदेश सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री अवधेश वर्मा की शाहजहांपुर में एक दबंग मंत्री की छवि बन चुकी थी। विधानसभा चुनाव में अवधेश वर्मा अपने साथ-साथ पूरे जिले में बसपा की हार का कारण न बन जायें, जब इस का एहसास मायावती को हुआ तो उन्हों ने अवधेश को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिख दिया। और उनका टिकट भी काट दिया। अवधेश वर्मा ने 2002 में बसपा से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और ददरौल से विधायक चुने गये। उसके बाद जब मुलायम सिंह ने बसपा के विधायकों को तोड़ा उस समय अवधेश वर्मा ने बसपा में अपनी आस्था दिखाई, जिससे वह मायावती के विश्वास पात्रों में गिने जाने लगे। 2007 में चुनाव में विधायक चुने जाने पर मायावती ने बसपा में अवधेश वर्मा को पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बना दिया और वह पार्टी में पिछड़ा चेहरा के रूप में अपनी छवि बनाने लगे। इसी बीच अवधेश वर्मा पर पिररोला में एक साधु की हत्या कराकर उस की जमीन हड़पने का आरोप लगा।

अवधेश वर्मा की गुंडई की हद तो पंचायत चुनाव में खुल कर सामने आई, जब अपने परिवार और रिश्‍तेदारों को ब्लाक प्रमुख बनाने के लिये प्रत्याशियों का अपहरण कराने के आरोप लगे। पहले मामले में तो अपने भाई को बीडीसी सदस्य बनाने के लिये अवधेश वर्मा ने बीडीसी प्रत्याशी के भाई के अपहरण में सरकारी गाड़ी का दुरुयोग किया, जिस में पुलिस ने भारी दवाव में अवधेश वर्मा के भाई के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज किया। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बसपा ने बहादुर लाल आजाद को अपना प्रत्याशी बनाया। बहादुर लाल आजाद के गांव एवं नगर दोनों जगह से वोट होने और पहचान पत्र होने के कारण इलाहबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस में अवधेश वर्मा को लगने लगा कि बहादुर लाल के खिलाफ आदेश हो सकता है तो पुलिस की सहायता से अवधेश ने याचिकाकर्ता को ही उस के घर से जबरदस्ती उठबा लिया था। इस घटना के बाद याचिकाकर्ता के भाई ने अवधेश वर्मा के खिलाफ पुलिस अधीक्षक को भाई के अपहरण की सूचना दी थी।

अवधेश वर्मा के दबाव में याचिकाकर्ता से एक शपथ-पत्र जिलाधिकारी शाहजहांपुर को दिलाया, जिस में याचिकाकर्ता ने कहा कि उस ने किसी तरह की कोई याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट में नहीं दाखिल की है, जिस के बाद जिलाधिकारी ने यही रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेज दी, जिस से वह याचिका निरस्त कर दी गई। इसी मामले की जानकारी करने के लिये एक खबरिया चैनल के पत्रकार ने जब अवधेश वर्मा से फोन पर उन पर लग रहे आरोपों के बारे में सत्यता जानने के लिये बात की तो पहले तो अवधेश वर्मा ठीक से बात करते रहे पर एकाएक वह उस पत्रकार पर हमलावर हो गये और कहा कि आप हमारी इस से पहले भी कई बार रील धो चुके हैं, इस बार यदि आप ने हमारे खिलाफ खबर दिखाई या अपने चैनल पर पट्टी चलाई तो हम आप के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा देंगे।

हद तो 20 दिसम्बर 2010 को तब हो गई, जब अवधेश वर्मा ने मंत्री पद की मर्यादा को भूलते हुये अपने रिश्‍तेदार को ददरौल ब्लाक से निर्विरोध ब्लाक प्रमुख बनवाने के लिये पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में अपने गनर और जिले के हिस्ट्रीशीटर अनिल घुरई, मोहसिन, बार्डर, बहादुर लाल आजाद और नगर विधानसभा से बसपा के प्रत्याशी असलम खां के साथ मिल कर ब्लाक प्रमुख पद के प्रत्याशी दिनेश पाल सिंह (मुन्ना) के प्रस्तावक स्वतंत्र देव को ब्लाक परिसर से अपहृत कर ले गये थे। अवधेश वर्मा की इस गुंडई की कहानी खबरिया चैनलों के कैमरे में कैद हो रही है, इस का भी धयान नहीं दिया। जब कैमरे में अपनी करतूत कैद होने की भनक लगी तो अवधेश वर्मा ने अपने गुर्गों से खबरिया चैनलों के पत्रकारों को पकड़ने का आदेश दे दिया। एक खबरिया चैनल के पत्रकार को मंत्री के गुर्गों ने पकड़ लिया और उस के साथ हाथापाई की और उस के कैमरे से कैसेट निकाल ली। फिर हिदायत देते हुए छोड़ा। एक पत्रकार वहां से अपनी जान बचाकर खेतों के रास्ते से भागने में सफल हो गया। उस समय कई खबरिया चैनलों ने मंत्री की गुंडई की कहानी दिखाई पर मयावती अपने मंत्री का बचाव करती रही।

चुनाव से पहले जिले में बसपा विधायकों और मंत्री की छवि खराब होने की जानकारी जब मुख्यमंत्री को हुई तो अवधेश वर्मा को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। साथ ही विधान सभा ददरौल के टिकट से भी हाथ धोना पड़ा। हालांकि इसे भी मायावती की राजनीतिक चाल ही बताया जा रहा है। कि आखिर उन्‍होंने इतने शिकायत होने के बाद भी यह कार्रवाई करने की याद पहले क्‍यों नहीं आई, चुनाव आते ही क्‍यों तमाम मंत्रियों पर कार्रवाई हो रही है।

लेखक सौरभ दीक्षित शाहजहांपुर में इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार हैं. 

समाजवादी पार्टी में दिख रहा है बसपा का विकल्‍प बनने का दम

: कांग्रेस से अब भी दूर हैं यूपी के मतदाता : चुनाव आयोग द्वारा विधान सभा चुनाव की तिथि घोषित करने के कारण नेताओं की धडक़नें बढ़ी नजर आ रही हैं। शीत ऋतु में भी प्रत्याशियों के माथे पर पसीने की बूंदे छलकती दिख रही हैं, क्योंकि जीत का जादुई आंकड़ा छूने में एक बार सफलता मिल गयी तो वह ग्रीष्म ऋतु की भयानक दोपहरी में भी हर सुख भोग लेंगे, इसीलिए प्रत्याशी रात और दिन का अंतर भूल कर पूरी शक्ति के साथ चुनाव मैदान में डटे नजर आ रहे हैं।

खैर, फिलहाल प्रत्याशियों के साथ सभी दलों के बड़े नेताओं ने भी जीत का आंकड़ा छूने के लिए हर संभव प्रयास करने शुरू कर दिये हैं, पर आश्चर्य की बात यह है कि जनता में चुनाव को लेकर विशेष उत्सुकता नजर नहीं आ रही है। चुनाव की तिथि हर पल पास आती जा रही है, लेकिन अभी तक जनता सर्वश्रेष्ठ विकल्प तय नहीं कर पाई है। आम आदमी की मंशा देख कर यही लग रहा है कि वह अभी किसी एक के सिर पर ताज बांधने को लेकर असमंजस की स्थिति में ही है।

राष्ट्रीय स्तर के दलों की बात की जाये, तो मंहगाई और भ्रष्टाचार को लेकर आम आदमी की नजर में कांग्रेस की छवि बेहद खराब है, जिसे किसी कीमत पर वोट देने वाली नहीं है। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव द्वारा उठाये मुद्दे आम आदमी के लिए खास अहमियत नहीं रखते, पर वह कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार के कार्यकाल में बढ़ी मंहगाई को लेकर ही काफी त्रस्त और आक्रोशित है। अब भाजपा की बात करें, तो लंबे समय से सत्ता से बेदखल होने के कारण भाजपा नेता या कार्यकर्ता आम आदमी से काफी दूर जा चुके हैं। संगठन के नाम पर उत्तर प्रदेश में सिर्फ वीआईपी पदाधिकारी ही बचे हैं, जिनका आम आदमी से मिलना तक दुश्वार लगता है। भाजपा की इस दूरी के कारण ही आम आदमी भाजपा को भी विकल्प के रूप में दूर-दूर तक नहीं देख रहा, इसलिए मायावती सरकार की नीतियों और रीतियों से त्रस्त आम आदमी के सामने समाजवादी पार्टी के रूप में ही अंतिम विकल्प दिखाई दे रहा है, लेकिन प्रदेश के हालात देखते हुए यह भी स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी को भी स्पष्ट बहुमत मिलने वाला नहीं है, पर इतना निश्चित है कि समाजवादी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में सामने उभर कर आने वाली है, क्योंकि विभिन्न मुद्दों को लेकर समाजवादी पार्टी समय-समय पर प्रांतीय स्तर पर आंदोलन करती रही है, साथ ही आम आदमी के साथ स्थानीय स्तर पर भी समस्याओं को उठाती रही है। पांच वर्ष के बसपा शासन में सपा मैदान छोड़ कर नहीं भागी और आम आदमी से जुड़ी रही, जिसका लाभ सपा को चुनाव में मिल सकता है।

आयोग की कड़ाई के बावजूद उत्तर प्रदेश में जाति और धर्म के आधार पर भी चुनाव प्रभावित होगा, पर कांग्रेस की किसी एक जाति या किसी भी धर्म से जुड़े लोगों के बीच खास पैठ नजर नहीं आ रही है। मुस्लिमों की ही बात करें, तो मुसलमान अभी कांग्रेस की ओर जाने के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं। बसपा शासन में भी भ्रष्टाचार और मनमानी का ही बोलबाला रहा है, इसलिए बसपा से मुसलमान भी आक्रोशित नजर आ रहे हैं और भाजपा की ओर तो जा ही नहीं सकता, तभी मुस्लिमों के सामने भी एक मात्र विकल्प सपा ही नजर आ रहा है। हालांकि आजम खां की भी सपा में पुन: वापसी हो गयी है, पर उनकी वापसी का अधिक असर नहीं दिख रहा। उनके आने से सपा को इतना फायदा अवश्य हुआ है कि विरोधी दलों के मुस्लिम नेताओं के सपा पर होने वाले हमले बंद हो गये हैं, जिससे आम मुसलमान सपा के प्रति अब उदार नजर आ रहा है। सवर्णों की बात करें, तो किसी खास दल को लेकर एकमत नहीं दिख रहे, लेकिन बसपा के कुशासन से मुक्ति पाने के लिए सवर्णों को भी सपा ही बेहतर विकल्प नजर आ रहा है, जिनमें ठाकुर व वैश्य वर्ग की पहली पसंद सपा नजर आ रही है, पर अभी तक ब्राह्मण असमंजस में ही नजर आ रहे हैं। समाजवादी पार्टी को इस बात का भी लाभ मिलने वाला है कि उसने समय से अपने प्रत्याशी घोषित कर दिये, जिससे प्रत्याशियों को जनता के बीच पैठ बनाने का भरपूर मौका मिल गया है।

चुनाव बाद की संभावित तस्वीर पर नजर डालें, तो समाजवादी पार्टी सवा सौ और डेढ़ सौ विधायकों के साथ प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी नजर आ रही है, लेकिन सरकार को लेकर उत्तर प्रदेश के हालात विकट नजर आ रहे हैं, क्योंकि सवा सौ के करीब विधायक बसपा के भी जीतने की संभावनायें व्यक्त की जा रही हैं, वहीं साठ के आस-पास भाजपा व पचास के इर्द-गिर्द कांग्रेस भी झपट सकती है और पन्द्रह-बीस विधायकों के साथ रालोद जैसे एक-दो अन्य दल भी अपना अस्तित्व बचाये रखने में कामयाब रह सकते हैं, इस सबके बीच आम आदमी के समझने की अहम बात यह है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश के चुनाव में सबसे बुरी मानसिकता के साथ उतर रही है। कांग्रेस भी स्पष्ट जानती है कि उसे बहुमत नहीं मिलने वाला, इसलिए उसका उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता बनाये रखना ही है। कांग्रेस चाहती है कि किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत न मिले और उसके पचास से अधिक प्रत्याशी जीत जायें, ताकि दबाव बना कर वह अपना मुख्यमंत्री बनाने में सफल हो जाये। चुनाव बाद ऐसा हो भी जाये, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए।

खैर, कांग्रेस की इस रणनीति को विफल करने की शक्ति सिर्फ समाजवादी पार्टी के पास ही नजर आ रही है, पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि सपा तटस्थ मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कितनी सफल रहेगी? अगर सपा ने तटस्थ मतदाताओं को अपनी ओर झुका लिया तो वह जीत के आंकड़े के पास पहुंच सकती है, पर बसपा को कमजोर समझना भी राजनीतिक नासमझी ही कही जायेगी, क्योंकि बसपा का टिकट बदलने का क्रम अभी जारी है। बसपा के नये चेहरे तमाम राजनीतिक भविष्यवाणियों को फेल कर पुन: चौंका भी सकते हैं।

लेखक बीपी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 8979019871 के जरिए किया जा सकता है.

जीएनएन न्‍यूज कर्मियों के पैसे से बनवाएगा फर्नीचर, तीन सौ रुपये काटे

: कानाफूसी : प्रबंधन के रवैये ज्‍यादातर कर्मचारी नाराज : जीएनएन न्‍यूज में काम करने वाले प्रबंधन के रवैये से परेशान हैं. चैनल में काम करने का माहौल तो खराब है ही इस बार आई सेलरी को देखकर जीएनएन के कर्मचारी और नाराज हो गए हैं. खबर है कि प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों के सेलरी में से इस बार तीन सौ रुपये काट लिए हैं. पैसा आफिस के फर्नीचर के मेंटेनेंस के नाम पर काटा गया है.

जीएनएन न्‍यूज में पिछले काफी समय से हालात खराब चल रहे हैं. चैनल की लांचिंग के समय इस चैनल से जुड़े ज्‍यादातर कर्मचारी खुद चैनल छोड़ गए या तो हटा दिए गए. अब स्थिति यह है कि सीमित संख्‍या में स्‍टाफ होने के बाद भी चैनल अपने कर्मचारियों को समय से पैसा नहीं दे पा रहा है. पिछले कई महीने से सेलरी दूसरे महीने के लास्‍ट में आ रही है. इस बार भी ऐसा ही हुआ. नवम्‍बर माह की सेलरी दिसम्‍बर के अंतिम सप्‍ताह में आई. हालांकि सेलरी आने की सूचना पर कर्मचारी खुश थे, पर जब अपना एकाउंट चेक किया तो पैसे कम दिखे.

इस बारे में जब यहां कार्यरत पत्रकारों ने प्रबंधन के लोगों से जानकारी मांगी तो पता चला कि उनके सेलरी से तीन सौ रुपये प्रबंधन ने कुर्सी और अन्‍य फर्नीचर बनवाने या मेंटनेंस करवाने के लिए काट लिए हैं. कर्मचारी भौचक्‍क हैं कि अब क्‍या कुर्सी-टेबुल और फर्नीचर के दूसरे सामान उनकी सेलरी से काटकर मंगाए जाएंगे. चर्चा है कि प्रबंधन ने पत्रकारों से साफ कर दिया है कि कुर्सी पर जो लोग बैठते हैं खर्च भी वो ही लोग देंगे. बताया जा रहा है कि कुर्सी खराब होने का ठीकरा भी प्रबधंन ने कर्मचारियों पर ही फोड़ा है कि उनकी लापरवाही से ही चैनल की कुर्सियां खराब हुई हैं. 

जीएनएन के कुछ कर्मचारियों का कहना है कि प्रबंधन का रवैया असहनीय हो गया है. अगर यहां कार्यरत कर्मचारी समय से पन्‍द्रह मिनट की देरी से भी पहुंचते हैं तो उनके आधे दिन की सेलरी काट ली जाती है, जबकि अगर वो ही कर्मचारी शिफ्ट खतम होने के समय के बाद घंटों काम करे तो उसका ओवरटाइम नहीं दिया जाता है. प्रबधंन के रवैये से चैनल के पत्रकार खिन्‍न हो गए हैं. पिछले दिनों एकाध लोगों ने चैनल से इस्‍तीफा दिया था, खबर है कि इस प्रकरण के बाद चैनल से कुछ और लोग इस्‍तीफा दे सकते हैं. वैसे भी लांचिंग के पहले से ही यह चैनल कई विवादों को लेकर चर्चा में रहा है. 

भास्‍कर के कार्टूनिस्‍ट हरिओम अब छोटे पर्दे पर

भास्कर के कार्टूनिस्ट हरिओम तिवारी अपने बचपन के शौक को पूरा करने के लिए नाटकों के संसार में कूद पड़े हैं। लाइफ ओके (स्टार वन का नया नाम) पर शुरु हुए धारावाहिक तुम देना साथ मेरा में वे त्रिपाठी जी के रोल में नजर आ रहे हैं। इसके अलावा हाल ही में भोपाल के रविंद्र भवन में आयोजित आदि विद्रोही समारोह में सिपाही बहादुर नाटक में एक महत्वपूर्ण रोल में नजर आए। जल्द ही उनके अभिनय के रंग थियेटर और छोटे पर्दे पर नजर आएंगे।

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें http://www.youtube.com/watch?v=DB6zqZwC3Yg&feature=

फेसबुक ने बदला अपना लुक

लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक अपनी पहचान बनाने के लिए रोज नए-नए प्रयोग कर रहा है, जिससे उसके यूजर को आसानी हो तथा उनकी एकाउंट की सुरक्षा मजबूत हो. इसी क्रम में फेस बुक ने अपने लुक में बदलाव किया है. यूजर अब फेसबुक को नए लुक में देखेंगे. इस नए लुक के प्रोफाइल पर क्लीक करते ही यूजर से जुडी सभी जानकारियां एक ही पेज पर मिल जायेंगी.

फेसबुक का नया लुक पहले से बेहतरीन और आकर्षक लग रहा है. यूजर इस नए लुक को काफी पसंद कर रहे हैं. जानकारी मिलने के साथ यूजर अब इसे अपने प्रोफाइल में कनफिगर भी करने लगे हैं. इस नए लुक में जाने के लिए या तो किसी फ्रेंड से इसके लिंक मंगाने पड़ेंगे या फिर खुद किसी भी प्रोफाइल से उसे अपनी प्रोफाइल के रूप में कनफिगर करना होगा. बहरहाल इस लुक को यूजर पसंद कर रहे हैं.

पवन बंसल जागरण साल्‍यूशन के सीओओ बने

जागरण समूह ने पवन बंसल के कद को बढ़ाते हुए उन्‍हें जागरण सॉल्‍यूशन का सीओओ नियुक्‍त किया है. बसंल अब तक जागरण का ओओएच डिविजन को हेड कर रहे थे. जागरण प्रबंधन ने उनकी क्षमता को देखते हुए जागरण साल्‍यूशन के सीओओ की अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी उन्‍हें सौंपी है. बंसल नई जिम्‍मेदारी के साथ अपनी पुरानी जिम्‍मेदारियों को भी निभाएंगे. पवन इसके पहले कैस्‍ट्राल, रेव इंटरटेनमेंट समेत कई अन्‍य कंपनियों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

अरविंद का खबर भारती से इस्‍तीफा, अजय जनवाणी से कार्यमुक्‍त

खबर भारती न्‍यूज चैनल से अरविंद पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर थे. अरिवंद ने अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड के साथ शुरू करने जा रहे हैं.  वे इसके पहले भी कुछ संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

दैनिक जनवाणी, मेरठ से खबर है कि मवाना के रिपोर्टर अजय ठाकुर को कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. अजय अखबार की लांचिंग से ही जुड़े हुए थे. इन पर कुछ आरोप लगने के बाद इन्‍हें संस्‍थान से कार्यमुक्‍त कर दिया गया. अजय इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

थानेश्‍वर जनता टीवी एवं गायत्री परख इंडिया से जुड़ी

जनता टीवी से खबर है कि थानेश्‍वर शर्मा ने यहां से अपनी नई पारी शुरू की है. थानेश्‍वर को इनपुट हेड बनाया गया है. थानेश्‍वर इसके पहले सीएनईबी में कार्यरत थे. वहां भी वे इनपुट से जुड़े हुए थे. थानेश्‍वर इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इस संदर्भ में जानकारी के लिए चैनल के मा‍लिक गुरबिन्‍दर सिंह बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु उनसे बात नहीं हो सकी, हालांकि आफिस से यह कन्‍फर्म किया गया कि थानेश्‍वर अब उनकी टीम के हिस्‍सा बन गए हैं.

परख इंडिया, आगरा से खबर है कि गायत्री पराशर ने अपनी नई पारी शुरू की है. गायत्री की पत्रकारिता में यह पहली पारी है. उन्‍होंने रिपोर्टर के रूप में अखबार ज्‍वाइन किया है.

बेइमानों को नहीं चाहिए प्रभावी लोकपाल, पर जनता लाल करेगी गाल

मध्य प्रदेश में आरटीओ ऑफिस में तैनात एक चपरासी के घर से चालीस करोड़ से अधिक रुपये की सम्पत्ति बरामद हुई। एक आईएएस दम्पत्ति के पास से कई अरब रुपये की जमीन-जायदाद बरामद हुई। हमारे राजनेताओं की बेशुमार दौलत से जुड़े कई मामलों की जांच सीबीआई कर रही है।

होना तो यह चाहिए था कि फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह इन मामलों की जांच करके कुछ महीनों में ही यह अफसर और राजनेता जेल के सीखचों के पीछे होते। मगर इस देश में यह संभव नही है और ऐसा इसलिए है कि सीबीआई केन्द्र में तैनात सरकार की चारण हो गयी है। उसके निशाने पर सिर्फ वही लोग होते हैं जो केन्द्र सरकार को पसंद नही। ऐसे में यह आशा करना ही बेमानी है कि दिल्ली सरकार आसानी से कोई ऐसा लोकपाल बना देगी जिसके अधीन सीबीआई भी आ जाय।

चौरासी साल के बुजुर्ग अन्ना कंपकपांती ठंड में मुम्बई में एक बार फिर अनशन पर बैठ रहे हैं। उनकी भूख-प्यास से हमारे नपुंसक नेतृत्व को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वे तो बेइमानों के सरदार के रूप में काम कर रहे हैं। पूरी सरकार की कोशिश है कि किसी भी तरह अन्ना को भाजपाई या फिर संघी सिद्घ किया जा सके। इस तरह वे धार्मिक आधार पर देश में विभाजन कराकर अपनी बेशर्म मोटी चमड़ी को बचा सकेंगे भले ही देश भ्रष्टाचार के और गर्त में क्यों न चला जाय। पिछले कुछ महीनों से देश में एक नई अंगड़ाई पैदा हुई है। जो लोग सालों से भ्रष्टाचार से त्रस्त थे उन्हें अन्ना के रूप में एक नई रोशनी दिखाई दी। उन्हें लगा कि शायद अन्ना इस भ्रष्ट व्यवस्था में कोई बदलाव ला सकें जिससे आम जन को राहत मिल सके। मगर सरकार पहले दिन से ही अन्ना और उनकी टीम को ही भ्रष्ट साबित करने में तुली हुई है। उसे लगता है कि इस लड़ाई से निपटने का एक ही उपचार है कि सामने से वार कर रहे विपक्षी पर पलटकर पूरी ताकत से हमला किया जाय। पूरी दिल्ली सरकार सिर्फ और सिर्फ इसी योजना पर काम करती नजर आ रही है।

पिछले आंदोलन में भी मनीष तिवारी से लेकर कांग्रेस के सभी राजनेता अन्ना और उनकी टीम को इसी शैली में धमकाते हुए नजर आये। उनको लग रहा था कि इससे अन्ना की टीम भयभीत होगी और उनका काम आसान हो जायेगा। मगर पूरे देश में जिस तरह से अन्ना के पक्ष में लहर उठी उसने इन बेइमान नेताओं की कंपकंपी बढ़ा दी। ये लोग समझ गये कि अगर यह मुहिम जारी रही तो इसके परिणाम गंभीर होंगे। अन्ना के अनशन के आखिरी दौर में देश में क्रान्ति जैसे हालात पैदा हो रहे थे। आखिर में देश के सबसे बड़े सदन ने अन्ना की मांग को मानते हुए लोकपाल बनाने की घोषणा कर दी और अन्ना का अनशन खत्म हुआ। मगर अब जब संसद का शीतकालीन सत्र भी समाप्त हो रहा है तो पूरा देश देख रहा है कि अन्ना के साथ ही नहीं बल्कि पूरे देश के साथ धोखा किया गया है। इस लोकपाल में ऐसी कोई बात नहीं रखी गयी है, जिससे भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सके। साथ ही जब पूरा देश सीबीआई को लोकपाल के अधीन लाने की मांग कर रहा है तब लोग समझ नहीं पा रहे कि सरकार को इससे क्या आपत्ति है।

अब तो सीबीआई का नामकरण भी कांग्रेस ब्यूरो आफ इनवेस्टिगेशन लगने लगा है। जब जब सरकार की स्थिति कमजोर होती है तब-तब सीबीआई संकट मोचक के रूप में सरकार के साथ खड़ी नजर आती है। जो मुलायम सिंह और मायावती सीबीआई को किसी समय में सबसे बड़े अपराधी नजर आते है वही दिल्ली सरकार को समर्थन देते ही दूध के धुले हो जाते हैं। तब सीबीआई इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करती कि उसका काम अपराधियों को दंडित कराना है न कि सरकार के इशारों पर नाचना। मगर अपने काम के विपरीत सीबीआई सिर्फ दिल्ली दरबार की कठपुतली बनी रहती है। दिल्ली दरबार के लोगों को यह भी समझ नहीं आता कि इस देश के लोगों का सब्र का पैमाना छलक रहा है। वह अब और भ्रष्टाचार सहने को तैयार नहीं है और यह स्थितियां भी यूं ही नहीं बनीं। जब देश का एक-एक मंत्री एक लाख छियत्तर हजार करोड़ का घोटाला करता हुआ नजर आए और दिल्ली सरकार उसे बचाने की कोशिश करने में अपना सर्वस्व अर्पण कर दे तो फिर आम आदमी आखिर करे भी तो क्या करे। उसके सीमित संसाधनों में रोज कमी होती नजर आ रही हो। महंगाई सुरसा के मुंह की तरह रोज बढ़ती जा रही हो। ऐसी स्थिति में अब व्यक्ति को हताशा और गुस्सा न आये तो फिर क्या आये।

दिल्ली दरबार के लोगों को यह समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर अन्ना में ऐसा क्या है कि पूरा देश उनके पीछे एक सुर में सुर मिलाता नजर आ रहा है। जो लोग अपनी आत्मा तक बेच चुके हैं, वे ईमानदारी के आत्म बल को महसूस भी नहीं कर सकते। अन्ना की ईमानदारी और उनकी सादगी ने इस देश को महात्मा गांधी की याद दिला दी। ऐसे में अगर भ्रष्ट मंत्री उनके बारे में कुछ कहें तो स्वभाविक है कि किसी को भी बुरा लगेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने पूरे कार्यकाल में इस बात को साबित करने के लिए दिन रात एक कर रहे हैं कि वे बहुत ईमानदार हैं और किसी भी बेईमानी के कारोबार से उनका कोई मतलब नही है। मगर अब ऐसी बातों से देश को गुमराह नहीं किया जा सकता लोगों का कहना है कि जब नेतृत्व इतना दीन हीन हो जाए कि वे अपने अधीनस्थ काम कर रहे लोगों को खुलेआम बेईमानी की छूट दे दे तो ऐसे नेतृत्व से तो बिना नेतृत्व के ही देश ठीक है।

यह बात सही हो भी सकती है कि मनमोहन सिंह ईमानदार व्यक्ति हैं मगर यह बात भी उतनी ही सही है कि उनके अधीनस्थ बेईमान गठबंधनों और नापाक इरादों वाले लोगों का गठजोड़ इकट्ठा हो गया है, जो इस देश को बेचने पर उतारू है। देश का काला धन विदेशों में इकट्ठा हो रहा है और हमारी सरकार अपनी मजबूरी दिखा रही है कि हम इन चोरों का नाम उजागर नहीं कर सकते। होना तो यह चाहिए था कि इस देश की पूंजी विदेश में जमा करने वाले लोगों को सरेआम चौराहों पर खम्भे से लटका देना चाहिए और साफ तौर पर उन्हें संदेश देना चाहिए कि इस देश की आजादी चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खां और गांधी जी जैसे लोगों के बलिदान से मिली है, उसे इन जैसे बेईमानों के हाथों गिरवी नहीं रखा जा सकता। मगर ये इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि इस लिस्ट में हमारे महान राजनेता और आदर्श अफसरों के नाम थोक की संख्या में है। लिहाजा वे न तो इस लिस्ट को जारी होने देंगे और न ही प्रभावी लोकपाल बनने देंगे। मगर समय बलवान है और अगर शरद पवार का गाल इस परिवर्तन का साक्षी बन सकता है तो अभी कुछ और लोग भी लाईन में शामिल हैं, जिनका इलाज जल्दी जनता ही कर देगी।

लेखक संजय शर्मा वीकएंड टाइम्‍स के संपादक एवं लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

संप्रेषण शोध पत्रिका का दूसरा अंक आरटीआई पर केंद्रित

महामना मदन मोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी द्वारा मदन मोहन मालवीय जी की १५०वीं जयंती के स्मृति अंक के रूप में संप्रेषण शोध पत्रिका (ibsn 0976-4410) का प्रकाशन किया गया हैं. इस पत्रिका का यह दूसरा अंक हैं. इस बार का अंक सूचना के अधिकार पर केन्द्रित हैं.

जनवरी माह में संस्थान में सूचना के अधिकार पर दो दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया गया था. इस में देश के जाने माने आरटीआई कार्यकर्ताओं ने भाग लिया था.सेमिनार में प्रस्तुत किये गए शोध पत्रों को पत्रिका में स्थान दे कर सूचना के अधिकार के विभिन्न आयामों से पाठकों को परिचित कराया गया हैं. यह अंक सूचना के अधिकार के सम्बन्ध में अध्ययन, अध्यापन, विश्लेषण की दृष्टि से भी उपयोगी और महत्वपूर्ण हैं. शोध पत्रिका के संपादक प्रो. ओम प्रकाश सिंह एवं संयोजक संपादक प्रो. राम मोहन पाठक हैं.

पत्रिका के संपादक एवं निदेशक प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने संपादकीय में लिखा हैं कि सूचना का अधिकार नया कानून है तथा इसका जीवन अभी छोटा ही है. इस कारण इसके सम्बन्ध में निरंतर अध्ययन और शोध आवश्यक हैं. जिससे पर्याप्त अध्ययन सामग्री एवं सिद्धांतों का विकास हो सके. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए संप्रेषण पत्रिका की विषयवस्तु को सूचना के अधिकार पर केन्द्रित किया गया हैं. प्रो सिंह ने बताया कि संप्रेषक पत्रिका के आगामी अंक के लिए opmg7@hotmail.com ईमेल पर अपने शोध पत्र भेज सकते हैं.

हिंदी विश्‍वविद्यालय के दर्पण में विभूति और बौनी साजिशें

वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीयहिंदी विश्वविद्यालय में सोशल साइंस कांग्रेस का भव्य आयोजन हो रहा है। देशभर के विशेषज्ञ जुट रहे हैं। इस खबर से इस विश्वविद्यालय पर कुछ लिखने की इच्छा हुई। पत्रकारिता की दिनचर्या में डेढ़-दो वर्ष पहले वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की नकारात्मक खबरों से मन में यह जानने की उत्सुकता हुई कि क्या सच में महात्मा गांधी की कर्मभूमि पर स्थित यह विश्वविद्यालय इतना बदनाम है। इस संबंध में एक पत्रकार के रूप में कई मामलों की पड़ताल की। कई आश्चर्यजनक पहलू सामने आएं, जो विश्वविद्यालय धीरे-धीरे तरक्की की राह पर रफ्तार पकड़ रहा था, उसे सुनियोजित तरीके से कलंकित करने का प्रयास चल रहा था।

ऐसे लोगों में वे लोग शामिल थे, जो किसी न किसी तरह से विश्वविद्यालय से येन-केन-प्रकारेण लाभ पाने से वंचित रह गए थे। ऐसे लोगों के एक सक्रिय गैंग ने पिछले कुलपति की कार्यशैली को पंगु बना दिया था। लेकिन जब एक पुलिस के ऊंचे ओहदे को संभाल चुके विभूति नारायण राय को यहां की जिम्मेदारी मिली तो, उन्हें अपने इरादों पर पानी फिरता नजर आने लगा। पुलिस अधिकारी के रूप में अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों वाले लोगों का सामना कर चुके व्यक्तित्व की आंखें सहज ही चोर इरादों को पहचान गई। निश्चय ही राय ने ऐसे सक्रिय गुटों के इरादों पर पानी फेरा होगा, तभी तो प्रतिक्रिया स्वरूप सुनियोजित तरीके से कुलपति और विश्वविद्यालय को बदनाम करने का सिलसिला चल पड़ा। कई लोग तो राय के कार्यकाल में यहां जुड़े और विरोधियों के साथ झांसे में आकर उनके साथ खड़े हो गए। कुछ छात्र भी बहक गये।

एक के बाद एक खबरें विश्वविद्यालय को राष्‍ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में लाईं। आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया में विश्वविद्यालय से संबंधित जितनी भी नाकारात्मक खबरें आईं अधिकतर एकपक्षीय थीं। पत्रकारीय सिद्धांतों के अनुसार जब भी किसी पर आरोप लगाया जाता है, आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौलिक अधिकार होता है, लेकिन ऐसी खबरों को विश्वविद्यालय का पक्ष रखे बगैर पाठकों के सामने परोस दिया गया था। सबसे ज्यादा अन्‍याय आनलाइन मीडिया ने किया। जिनके मन में जो आया, वह बगैर हकीकत जाने लिखता चला गया। हकीकत जानने के लिए किसी ने वर्धा आने तक की जहमत नहीं उठाई। एक बड़े वेबापोर्टल पर भी विश्वविद्यालय की कई नकारात्मक खबरें आईं लेकिन एक मौके पर उस पोर्टल के संचालक वर्धा पहुंचे। हकीकत समझ में आई। तो सुनियोजित तरीके से विश्वविद्यालय को बदनाम करने के लिए भेजी जाने वाली नकारात्मक खबरों को रोक कर पश्चाताप किया।

विश्वविद्यालय की प्रकाशित खबरों से संबंधित लोगों के बारे में जब इधर-उधर से जानकारी जुटाई तो मन में यह बात दृढ़ हो गई कि किसी भी व्यक्ति के परिवेश की यथास्थिति में तनिक भी बदलाव उसके मन में असुरक्षा का बोध जन्म दे देती है। लिहाजा, वह बचाव के लिए हर संभव हथकंड़े अपनाने लगता है। इसी तरह बदनाम कर परेशान करने की एक और घेरेबंदी कहानी पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी की एक पुस्तक में मिलती है। जब उन्हें तिहाड़ जेल का प्रभार मिला और उन्होंने उसमें सुधार करना चाहा तो प्रशासनिक महकमा उनके खिलाफ एकजुट हो गया। लेकिन उनके बुलंद इरादों के आगे किसी की नहीं चली। तिहाड़ में किरण बेदी के सुधार कार्यक्रम से इतिहास बन गये। लेकिन इसका बोध आम लोगों को बाद में हुआ। इसी तरह मीडिया के माध्यम से आम जनमानस तक पहुंची विश्वविद्यालय से संबंधित गलत खबरों से जनता के मन में बनी गलत अवधारणा अब धीरे-धीरे टूटने लगी है। वर्तमान कुलपति विभूति नारायण राय ने यहां की यथास्थिति में विश्वविद्यालय के अवरुद्ध विकास को गति दे दी है। माहौल बदलने लगा है।

जानें विभूति को : विभूति नारायण राय से कभी मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन उनके रचना संसार से उनके व्यक्तित्व का आभास हो गया। कुछ जानकारी मित्रों ने दी। कुछ लोग बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी होते हैं। इसी तरह के व्यक्तित्व की धनी एक शख्सियत है- विभूति नारायण राय। 1974 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस विभूति बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। वे अच्छे और ईमानदार पुलिस अधिकारी के साथ ही साहित्य के अनुरागी भी रहे हैं। वैसे देखा जाए तो हिन्दी में अफसर लेखन की पिछले दशकों में भरमार रही है। ये लेखक अच्छे पोस्ट पर होने की वजह से अपनी रचनाओं को छापने का खुद खर्च उठाकर भी प्रकाशकों को राजी कर लेते हैं। ये अलग बात है कि ऐसी छपी हुई पुस्तकों का कोई खास वजूद नहीं होता। वरना हिंदी साहित्य में अफसर लेखक माटी के माधव ही न बने रहते। ऐसा नहीं है कि साहित्य में अफसर लेखन को दर्जा नहीं मिला। अशोक वाजपेयी और श्रीलाल शुक्ल जैसे हिंदी के जाने-माने लेखक भी उच्च पदस्थ अधिकारी रहे हैं, मगर ये साहित्यिक समाज में अपने स्तरीय लेखन की वजह से सम्मानित हैं।

विभूति नारायण की रचनाओं को पढ़कर सहज ही लग जाता है कि उनके जीवन का साहित्यिक पहलू बाकी चीजों से सर्वथा भिन्न है। उनके लेखन का दायरा बहुआयामी है। साहित्य के प्रति उनके समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण उनका शोध प्रबंध है, जो साम्प्रदायिक दंगे तथा भारतीय पुलिस नाम से प्रकाशित है। भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होने के बावजूद विभूति ने इस शोध प्रबंध में दंगों के समय पुलिस की भूमिका को ही कठघरे में खड़ा किया। ये शोध प्रबंध विभूति की निष्पक्ष सोच और लेखन के प्रति निर्भयता का सटीक उदाहरण है। मजेदार बात ये है कि विभूति ने ये शोध पुलिस फेलोशिप प्रोग्राम के तहत किया था। साम्प्रदायिकता के मसले पर विभूति का उपन्यास शहर में कर्फ्यू काफी चर्चित रहा है। इसमें विभूति ने सांप्रदायिक दंगों में फंसे एक परिवार के हालत का बड़ा ही मार्मिक ढंग से चित्रण किया है।

आजमगढ़ के जोकहारा गांव में जन्मे विभूति ने कहानी, व्यंग्य और उपन्यास लिखे हैं। उनकी रचनाओं के पात्र ऐसे आम आदमी है, जिन्हें हम अपने आसपास महसूस कर सकते हैं। रचना के विषय भी ठहराव वाले न होकर प्रवाहमान हैं। उदाहरण के लिए घर नामक उपन्यास में अगर विभूति रामानुज लाल के गरीब परिवार की समस्याओं पर विमर्श प्रस्तुत करते हैं, तो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था कठघरे में खड़ी नजर आती है। उपन्यास सीधे-सीधे ये सवाल खड़ा करता है कि आजादी के इतने साल बाद भी क्यों नहीं लोगों को पेटभर कर भोजन मिल रहा है। भूखे आदमी के लिए तमाम लोकतांत्रिक अधिकार बेमानी हो जाते हैं, दूसरी तरफ तबादला उपन्यास में विभूति देश में तेजी से फल-फूल रहे तबादला उद्योग पर चोट करते हैं। इसके अलावा विभूति ने एक छात्रनेता का रोजनामचा नाम से एक व्यंग्य संग्रह भी लिखा है। किस्सा लोकतंत का और प्रेम की भूत कथा विभूति की दो चर्चित कृतियां हैं।

मौजूदा समय में विभूति वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति के तौर पर अपनी सेवा से हिंदी के समृद्धि की राह मजबूत कर रहे हैं। वर्धा में आने के बाद उन्होंने हबीब तनवीर जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी को विश्वविद्यालय की फैकल्टी बनाया। यही नहीं वे हिंदी की कई जानीमानी हस्तियों और संबंधित पाठ्यक्रमों के विशेषज्ञों को विश्वविद्यालय से किसी न किसी रूप में जोड़ कर विद्यार्थियों का भविष्य को संवार रहे हैं। बहुत कम लोग जानते होंगे कि विभूति ने अपने गांव में रामानंद सरस्वती नाम से एक पुस्तकालय की स्थापना की है। इसे स्थापित करने के पीछे उनका उद्देश्य लोगों को पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करना है। मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि 1993 में स्थापित यह पुस्तकालय सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। पुलिस सेवा के बाद यह विश्वविद्यालय विभूति की एक ऐसी कर्मस्थली बनने जा रही है, जहां उनकी कामयाबी में आने वाली रूकावटें स्वत: एक-एक कर समाप्त होती नजर आ रही हैं।

लेखक संजय स्‍वदेश महाराष्‍ट्र के पत्रकार हैं. भास्‍कर समेत कई बड़े संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

पत्रकारों पर हमले से जस्टिस काटजू नाराज, महाराष्‍ट्र के सीएम को लिखा पत्र

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्‍यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू मीडिया के कामों को लेकर भले ही निशाना साधते हों पर पत्रकारों पर हमले को लेकर वे काफी गंभीर हैं. जस्टिस काटजू ने 26 दिसम्‍बर को महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पृथ्‍वीराज चव्हाण को पत्र लिखकर पत्रकारों की सुरक्षा को गंभीरता से लेने की बात कही है. जस्टिस काटजू ने अपने पत्र में लिखा है कि पिछले दिनों महाराष्‍ट्र में कुछ मामलों को सबके सामने लाने के चलते योगेश कुटे और गणेश सोलंकी नाम के पत्रकारों के ऊपर हमला किया गया.

जस्टिस काटजू ने कहा है कि महाराष्‍ट्र सरकार ने पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर आश्‍वासन दिया था, परन्‍तु इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. पत्रकारों पर हमले रुक नहीं रहे हैं. उन्‍होंने महाराष्‍ट्र के मंत्री नारायण राणे की अध्‍यक्षता में पत्रकारों के मामले में रिपोर्ट देने के लिए गठित कमेटी की रिपोर्ट भी मुख्‍यमंत्री से मांगी है. काटजू पत्रकारों पर हो रहे हमलों से बहुत नाराज हैं तथा उन्‍होंने महाराष्‍ट्र के सीएम को इस संदर्भ में ठोस कदम उठाने को कहा है. काटजू द्वारा लिखा गया पत्र इस प्रकार है…

झुंझुनू में पीआरओ के खिलाफ निंदा प्रस्‍ताव पारित

: आइसना का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित : झुंझुनूं। ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर एशोसियेशन की झुंझुंनू जिला ईकाई का शपथ ग्रहण समारोह सोमवार को झुंझुंनू के सूचना केन्द्र में आयोजित किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि झुंझुंनू केन्द्रीय सहकारी भूमि विकास बैंक के अध्यक्ष शुभकरण चौधरी थे व अध्यक्षता झुंझुंनू बार एशोसियेशन के अध्यक्ष बिरजू सिंह ने की। जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गयारसीलाल शर्मा, कांग्रेसी नेता विनोद पूनियां मौजूद थे।

अपने संबोधन में चौधरी ने कहा कि पत्रकार समाज का आईना होते है। जो समाज को नई दिशा दिखाने का काम करते है। समारोह में आइसना की जिला ईकाई को शपथ ग्रहण करवाई गई। इसके बाद जनलोकपाल लोकतंत्र व लोकप्रहरी विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें शिक्षाविद़ एन एस सोढा, पानाराम, बंजरगलाल व रामकुमार बेनीवाल ने विचार व्यक्त किये।

शपथ ग्रहण करने वालों में अध्यक्ष सूरज पुरोहित, महासचिव उमेश शर्मा, अकबर कुरैशी, राजेन्द्र सैन, संतोष रोजडा, मोहन सिंघानिया, कुलदीप सांखला, प्रदीप जोशी, गोविन्द हरतिवाल, मनमोहन खांडल और नरोत्‍तम शर्मा थे। समारोह में पीआरओ के असहयोग के निर्णय पर निंदा प्रस्ताव पारित कर उसकी हठधर्मिता के विरुद्व कार्रवाई करने का निर्णय किया गया। इस अवसर पर हीरालाल स्वामी, सुरेन्द्रजीत सिंह हाडा, सुमन चौधरी समेत अन्य पदाधिकारी और सदस्य मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन सुरेन्द्रजीत सिंह ने किया।

झुंझुंनू से रमेश सर्राफ की रिपोर्ट.

जार के उदयपुर जिलाध्‍यक्ष को तुक्तक भानावत को हटाया गया

जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान (जार) के उदयपुर जिला अध्यक्ष तुक्तक भानावत को स्थानीय इकाई के सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव पारित करके पद से हटा दिया। भानावत पिछले दो साल से अध्यक्ष बने हुए थे। भानावत पर साथी सदस्‍यों ने तानाशही के आरोप लगाए थे।

सदस्‍यों ने श्री भानावत पर जार को संगठन के रूप में चलाने के बजाय निजी तौर पर उपयोग करने का भी आरोप भी लगाया था। जार द्वारा प्रकाशित स्‍मारिका २०११ जारोदय के प्रकाशन के बाद होने वाले विमोचन कार्यक्रम में कार्यकारिणी सदस्यों की अवहेलना और उन्हें दरकिनार करने के चलते ही यह असंतोष फैला था, जिसके बाद जार के सदस्‍यों ने भानावत के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव पारित किया। भानावत को हटाए जाने के बाद फिलहाल वहां किसी को अध्यक्ष नियुक्त नहीं किया गया है।

आलमी सहारा का पहला सालगिरह मनाया गया

नई दिल्ली। आलमी सहारा उर्दू न्यूज चैनल ने मंगलवार को अपना एक वर्ष पूरा कर लिया। इस मौके पर नोएडा स्थित सहारा इंडिया काम्प्लेक्स में चैनल की सालगिरह मनाई गई। पिछले साल 27 दिसम्बर को ही सहारा इंडिया के टीवी चैनलों के गुलदस्ते में उर्दू न्यूज चैनल आलमी सहारा का इजाफा हुआ था। इस चैनल की लांचिंग तत्‍कालीन न्‍यूज डाइरेक्‍टर उपेंद्र राय के निर्देशन में हुई थी। आलमी सहारा के पहले सालगिरह पर केक काटकर खुशियां मनाई गई।

इस मौके पर सहारा न्यूज नेटवर्क के अधिकारी श्री अनिल अब्राहम, श्री सीबी सिंह, श्री शैलेंद्र वर्मा, श्री आरएस चौहान और श्री हसन काजमी मौजूद थे। इनके अलावा आलमी सहारा के क्षेत्रीय चैनलों के हेड भी मौजूद थे। इस मौके पर अधिकारियों ने कर्मचारियों को मुबारकबाद देते हुए आने वाले दिनों में आलमी सहारा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प लिया।

आईबीएन7 के पत्रकारों ने उपलब्‍ध कराई स्टिंग की रिकार्डिंग, विधायकों से होगी पूछताछ

: राज्‍य सभा चुनाव में वोट के लिए नोट मांगने का मामला : रांची : झारखंड निगरानी ब्यूरो ने बताया कि 2010 में राज्य सभा के लिए हुए चुनावों में वोट के बदले नोट मांगने वाले पांच विधायकों से ब्यूरो शीघ्र पूछताछ करेगा। निगरानी ब्यूरो के महानिरीक्षक एम.वी. राय ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही। राय ने बताया कि इस मामले में स्टिंग आपरेशन करने वाले संबद्ध टीवी चैनल आइबीएन7 के पत्रकारों ने स्टिंग आपरेशन की रिकार्डिंग की प्रति और अपने बयान ब्यूरो को दिए।

उन्होंने एक सवाल के जवाब में बताया कि चैनल के अधिकारियों को बहुत समझाने बुझाने पर उन्होंने रिकार्डिंग की प्रति ब्यूरो को उपलब्ध करवायी है जिसके चलते ही इस जांच में विलंब हुआ है। उन्होंने कहा कि अब रिकार्डिंग की प्रति मिल जाने, चैनल के चार पत्रकारों द्वारा अपना बयान दर्ज करवाने और स्टिंग के स्थानों के बारे में ब्यूरो को बताये जाने के बाद मामले की जांच तेज कर दी गयी है। उन्होंने बताया कि इस मामले में अब कैमरे पर राज्य सभा चुनावों में उम्मीदवारों और उनके कथित प्रतिनिधियों से रिश्वत मांगते दिखाए गए छह में से पांच विधायकों से ब्यूरो शीघ्र ही पूछताछ करेगा। रिश्वत मांगते दिखाए गए झारखंड मुक्ति मोर्चा के एक विधायक टेक लाल महतो का गत दिनों स्वर्गवास हो गया।

उन्होंने बताया कि ब्यूरो कांग्रेस के विधायकों योगेन्द्र साव, सावना लकड़ा और राजेश रंजन, भाजपा के उमाशंकर अकेला और झामुमो के साइमन मरांडी से इस मामले में पूछताछ करेगा। राव ने बताया कि इस मामले में चुनाव आयोग के निर्देश पर निगरानी ब्यूरो ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच प्रारंभ की थी। साभार : एजेंसी

पत्रकार पर पिस्‍तौल तानने वाले डाक्‍टर के खिलाफ मामला दर्ज, गिरफ्तारी नहीं

: नाराज पत्रकारों ने दिया उपायुक्‍त कार्यालय पर धरना : अंबाला में दैनिक भास्‍कर के पत्रकार पर पिस्तौल तानने व जान से मारने की धमकी देने वाले आरोपी सरकारी डाक्टर के खिलाफ क़ानूनी धारा ३२३ व ५०६ के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है, लेकिन अब तक अंबाला पुलिस ने आरोपी डाक्टर की गिरफ्तारी नहीं की है, जिससे अंबाला जिला के सभी पत्रकारों में रोष है। इसी रोष स्वरूप मंगलवार को उपायुक्त कार्यालय पर अंबाला के सभी पत्रकारों ने धरना दिया व आरोपी डाक्टर और लापरवाही बरतने वाले थाना प्रभारी के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की, पत्रकारों के इस धरने में कई वर्कर्स यूनियनों व सामाजिक संगठनों ने भी सहयोग दिया व जल्द कार्रवाई की मांग की।

देश का चौथा स्तम्भ यानी के मीडिया अब सुरक्षित नहीं है यह बात रोजाना पत्रकारों पर हो रहे हमले से साबित हो रही है। आए दिनों सच छपने की सजा पत्रकारों को मिलती रहती है और उन्हें असमाजिक तत्वों का सामना करना पड़ता है। इतना सब कुछ हो जाने पर भी प्रशासन उफ़ तक नहीं करता और कार्रवाई की बात तो दूर रही। ऐसा ही कुछ हुआ अंबाला के दैनिक भास्‍कर अखबार से पत्रकार सनमित सिंह थिंद के साथ, जिन्होंने एक एक्सीडेंट में मारे गए तीन लोगों की मौत का सही कारण छापा और डाक्टर की लापरवाही को जग जाहिर किया। डा. अरुण दलाल की ड्यूटी से गैरमौजूदगी की वजह से तीनों घायलों को उपचार नहीं मिल पाया था और तीनों की मौत हो गई थी। इस खबर को सनमीत थींद ने प्रमुखता से दैनिक भास्‍कर अखबार में छापा था। लेकिन यह बात अंबाला सिविल हस्पताल में कार्यरत सरकारी डाक्टर अरुण दलाल को नागवार गुजरी और उन्होंने पत्रकार सनमित से मारपीट की और उन पर अपनी पिस्तौल तान दी और जान से मरने की धमकी दी।

इतना सब कुछ होने की जानकारी पुलिस को दी गई लेकिन पुलिस ने कोई भी कदम नहीं उठाया। आरोपी उनकी आँखों के सामने से ही एक एएसआई को गालियां देते हुए निकल गया, पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। काफी देर बाद पत्रकारों का दबाव पडऩे पर मामूली धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया, पर कार्रवाई तब भी नहीं हुई। अंबाला के तमाम मीडिया ने इसकी निंदा की और कार्रवाई की मांग की लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। मंगलवार को उपायुक्त कार्यालय पर पत्रकारों ने सांकेतिक धरना देकर चेतावनी दी है कि अगर जल्द डाक्टर के खिलाफ कार्रवाई ना की गयी तो बुधवार से अम्बाला का तमाम मीडिया अनिश्चितकालीन धरने पर चला जायेगा और इस कड़ी में स्वास्थ्य मंत्री का पुतला भी फूँका जायेगा, क्योंकि अभी तक उन्होंने भी अरोपी डॉक्टर के खिलाफ किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं की है।

अंबाला में पत्रकार पर हुए हमले की निंदा सभी सामाजिक संगठनों व वर्कर्स यूनियनस ने भी की। मंगलवार को उपायुक्त कार्यालय पर दिए गये धरने में इन संगठनों ने भी अपना सहयोग व समर्थन दिया। इस अवसर पर हरियाणा यूनियन आफ जर्नलिस्ट, हरियाणा पत्रकार कल्याण मंच, यूनियन आफ जर्नलिस्ट, रोडवेज, बिजली, सर्व कर्मचारी संघ, कर्मचारी महासंघ हरियाणा, सरगोधा बिरादरी, जाट महासभा, राजपूत सभा, शिव सेना सहित कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने समर्थन दिया व जल्द कार्रवाई की मांग की। एक आरटीआई कार्यकर्ता ने इस मामले में आरटीआई लगा कर प्रशासन से कार्रवाई ना करने का कारण भी पूछा है। पत्रकार पर हमला हुए आज तीन दिन निकल चुके हैं, पर अब तक कोई भी कार्रवाई  पुलिस ने आरोपी डाक्टर के खिलाफ नहीं की है, अगर यही हमला किसी प्रशासनिक अधिकारी या पुलिस कर्मचारी पर हुआ होता तो कानून की धाराएं और मजबूत होती तथा आरोपी सलाखों के पीछे होता, इससे साबित होता है कि अंबाला प्रशासन आम जनता के प्रति कितना इमानदार है।

गोरखपुर में राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार पर हमला

गोरखपुर के पीपगंज थाना क्षेत्र के बनकटवां गांव निवासी राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार व हियुवा नेता अमित सिंह उर्फ मोनू पर खाद माफ़िया के एक गोल ने जानलेवा हमला कर दिया। पत्रकार की नेतागिरी ही उस पर भारी पड़ गयी। अमित सिंह अखबार के बैनर के सहारे नेतागिरी करता है। वह गोरखपुर के सांसद व गोरखधाम मन्दिर के उतराधिकरी योगी आदित्य नाथ के हियुवा टीम का सक्रिय कार्यकर्ता है। पत्रकारिता के सहारे वह अपने इलाके में दबंगई भी दिखाता है। वह ठेकेदारी का भी काम करता है।

घटना के बारे में बताया जा रहा है कि सोमवार को खाद माफियाओं ने साधन सहकारी समिति मखनहां से सैकड़ों बोरी खाद गायब कर दी। किसानों की शिकायत पर इस प्रकरण का समाचार मंगलवार को प्रकाशित हुआ। समाचार के आधार पर मंगलवार को एआर जमुना प्रसाद पांडेय मामले की जांच करने जिला सहकारी बैंक पीपीगंज पहुंचे। जंगल कौड़िया ब्लाक के एडीओ कापरेटिव देवेंद्र सिंह और स्थानीय समितियों के सचिव से उन्होंने जांच पड़ताल शुरू कर दी। जांच से बौखलाए माफियाओं ने फोन करके राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार व हियुवा नेता अमित सिंह उर्फ मोनू को बुलाया। जिस समय उसे बुलाया गया उस समय उसे दफ़्तर में होना चाहिये, लेकिन उसका मनमौजीपन और नेतागिरी उसे वहां खींच ले गयी।

अमित सिंह उर्फ मोनू के पहुंचते ही खाद माफियाओं ने उस पर हमला बोल दिया। एआर ने तुरंत ही मारपीट की सूचना पुलिस को दी। लेकिन दो घंटे तक कोई मौके पर नहीं पहुंचा। थोड़ी ही देर में घटना की सूचना क्षेत्र में फैल गई। पत्रकारों के कई संगठन गोरखपुर में हैं, लेकिन मौके पर किसी संगठन का पदाधिकारी नहीं पहुंचा, अलबत्‍ता हियुवा के प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह समेत सैकड़ों कार्यकर्ता कस्‍बे में जुट गए। लोगों ने घटना के विरोध में हियुवा के साथ मिल कर गोरखपुर-सोनौली मार्ग पर जाम लगा दिया। हाइवे जाम होने पर सैकड़ों गाडियां रास्ते में फ़ंस गईं। पूर्व ब्लाक प्रमुख बृजेश यादव, जिला संयोजक रमाकांत निषाद, विजय शंकर यादव समेत अन्य लोगों ने घटना की निंदा करते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग उठाई। 

बाद में मौके पर पहुंची पुलिस ने पत्रकार की तहरीर पर गांव हरपुर टोला बनकटवा निवासी शिवनारायण सिंह उर्फ मुन्ना, सुशील सिंह, सुनील सिंह तथा प्रेम नारायण सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस ने सुशील सिंह को गिरफ्तार कर लिया है। राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार व हियुवा नेता अमित सिंह उर्फ मोनू पर हमला करनेवाले उसी के गांव के हैं और समझौता के प्रलोभन पर बुला कर हमला कर दिये। उधर, आरोपी शिवनारायण सिंह उर्फ मुन्ना, सुशील सिंह, सुनील सिंह तथा प्रेम नारायण सिंह का कहना है कि अमित सिंह समाचार लिख कर धनउगाही करता है। इस मामले में भी पैसा मांग रहा था। मारपीट दोनों ओर से हुयी, लेकिन हियुवा के प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह समेत सैकड़ों कार्यकर्ताओं के दबाव में पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की।

इकानामिक टाइम्स हिंदी का पहली जनवरी से शटर डाउन

नए साल में प्रवेश करते करते एक बड़ी लेकिन बुरी खबर आ गई है. बेनेट कोलमैन (बीसीसीएल) उर्फ टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप वालों ने अपने हिंदी बिजनेस दैनिक इकानामिक टाइम्स हिंदी का प्रकाशन बंद करने का फैसला ले लिया है. बताया जा रहा है कि पहली जनवरी से यह अखबार मार्केट में नहीं आएगा. इस अखबार के बंद किए जाने से इसमें कार्यरत दर्जनों मीडियाकर्मियों के सड़क पर आ जाने की आशंका है. हालांकि बताया यह भी जा रहा है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को बीसीसीएल के अखबार नवभारत टाइम्स में एडजस्ट करने की कोशिश की जा रही है.

नभाटा के मेरठ, आगरा, देहरादून समेत कई शहरों में एडिशन्स आने वाले हैं. इनमें ईटी हिंदी के लोगों को भेजा जा सकता है. ईटी हिंदी से जुड़े एक शख्स का कहना है कि शुक्रवार से ईटी हिंदी नहीं छपेगा. संपादक राहुल जोशी खुद कोशिश में लगे हैं कि इसमें कार्यरत कर्मियों को नभाटा में लगा दिया जाए. उधर, कुछ लोगों ने दूसरे संस्थानों में भी नौकरी तलाशना शुरू कर दिया है. चर्चा ये भी है कि कहीं ईटी हिंदी की बंदी के बाद से अन्य बिजनेस हिंदी दैनिकों की बंदी का रास्ता भी न खुल जाए. एक समय था जब हर बड़ा मीडिया हाउस धड़ाधड़ हिंदी बिजनेस दैनिक शुरू कर रहा था. भास्कर समेत कई समूह इस वक्त हिंदी बिजनेस दैनिक निकाल रहे हैं. ज्यादातर हिंदी बिजनेस दैनिक घाटे में चल रहे हैं. कहीं अन्य अखबारों का प्रबंधन भी अपने घाटे में चल रहे हिंदी बिजनेस दैनिकों को बंद करने पर विचार न करने लगे.

दो स्‍वीडिश पत्रकारों को ग्‍यारह साल की कैद

अफ्रीकी देश इथियोपिया में यूरोपीय देश स्वीडन के दो पत्रकारों को 11-11 साल की सजा मिली है. उन पर गलत तरीके से देश में घुसने और प्रतिबंधित संगठन की मदद और समर्थन करने का आरोप साबित हुआ है. पिछले हफ्ते ही इन पत्रकारों को दोषी ठहराया जा चुका है, जिसकी सजा मंगलवार को सुनाई गई. इस मामले ने स्वीडन के पत्रकारों में गुस्सा भर दिया है और मामला राजनीतिक मोड़ लेता दिख रहा है.

स्वीडन के पत्रकार मार्टिन शिबी और फोटोग्राफर जोहान पेरसन सोमालिया के स्वायत्त इलाके पुंटलैंड से गैरकानूनी तरीके से इथियोपिया में घुसे थे. वे दोनों जुलाई में विद्रोही ओगादेन नेशनल लिबरेशन फ्रंट के लड़ाकों के साथ इथियोपिया की सरहद में आए थे. राजधानी अदीस अबाबा की एक अदालत में मुकदमा चलने के बाद जज शेमशू सिरगागा ने कहा, "अदालत ने दोनों को 11 साल कैद की सजा सुनाई है. हमने दोनों पक्षों की दलील सुनी है और हमें लगता है कि यह जायज सजा है." जज शेमशू ने कहा कि वैसे तो इस मामले में साढ़े 14 साल की सजा होनी चाहिए लेकिन सरकारी वकील ने दलील दी है कि पत्रकारों के अच्छे व्यवहार के कारण उनकी सजा कम करनी चाहिए.

इसके बाद स्वीडन के विदेश मंत्रालय ने भी बयान दिया, "यह सजा अनुमान से परे नहीं है. लेकिन उनके पत्रकारीय करियर को देखते हुए सजा मिलना दुख की बात है. स्वीडन सरकार अपनी बात प्रधानमंत्री के बयान के जरिए पिछले हफ्ते ही साफ कर चुकी है." स्वीडन के प्रधानमंत्री फ्रेडरिक राइनफेल्ड ने पिछले हफ्ते कहा था कि वह सजा को लेकर बेहद गंभीर हैं और दोनों पत्रकारों को जल्द से जल्द रिहा किया जाना चाहिए. इन दोनों पत्रकारों पर आतंकवाद के मामले भी लगे थे लेकिन अदालत ने नवंबर में उन पर से आतंकी आरोप हटा लिए थे. अदालत का कहना था कि उसे नहीं लगता कि ये दोनों आतंकवादी हमले के लिए इथियोपिया में घुसे थे. दोनों ने बिना किसी परमिट के सरहद में दाखिल होने की बात कबूल ली है.

जिस वक्त सजा सुनाई जा रही थी, शिबी और पेरसन निर्विकार भाव से कोर्ट में मौजूद थे. बाद में अनुवादक की मदद से उन्हें इसकी जानकारी दी गई. अदालत में दोनों पत्रकारों का कोई भी रिश्तेदार मौजूद नहीं था. उनके एक वकील ने कहा कि अब वे ऊपरी अदालत में जाने का विकल्प तलाश रहे हैं लेकिन माफी मांगने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता. दोनों पत्रकारों के स्वीडिश वकील थॉमस ओलसन ने उन्हें बेकसूर बताया है, जो अपना पेशेवर काम करने के लिए वहां मौजूद थे. उन्होंने स्टॉकहोम में एक टेलीविजन चैनल से कहा, "यह उन पत्रकारों के खिलाफ दिया गया आदेश है, जो अपना काम करना चाह रहे हैं."

इथियोपिया में हाल के दिनों में करीब 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें पत्रकार भी शामिल हैं. विपक्षी पार्टियों का कहना है कि सरकार लोकतंत्र को दबाने के लिए इस तरह के कदम उठा रही है. इस घटना की वजह से इथियोपिया और स्वीडन के बीच राजनयिक और कूटनीतिक रिश्ते बेहद खराब हो गए हैं. स्वीडन आए दिन इथियोपिया के मानवाधिकार मामलों पर एतराज जताता आया है. साभार : डीडब्‍ल्‍यू

घाटे में चल रहे रीजनल न्यूज चैनलों को बचाने का जगदीश चंद्र का तीन सूत्री फार्मूला

: ह्विस्पर्स इन द कारीडोर डॉट कॉम नामक वेबसाइट, जो कि प्रशासनिक अफसरों पर केंद्रित है, में प्रशासनिक अफसर से मीडिया एंटरप्रिन्योर बने जगदीश चंद्रा के बारे में एक समाचार छपा है. जगदीश इटीवी के हिंदी न्यूज चैनलों और उर्द चैनल के हेड हैं. जगदीश ने जब इन चैनलों की कमान संभाली थी तो ये भयंकर घाटे में चल रहे थे. पर इनकी पहल से अब ये सारे चैनल फायदे में हैं. अपने के साथ साथ दूसरे रीजनल न्यूज चैनलों के लिए भी जगदीश चंद्र अब लड़ाई लड़ रहे हैं. घाटे में चल रहे रीजनल न्यूज चैनलों के लिए जगदीश चंद्र के पास तीन सूत्री फार्मूला है. क्या है, उसे आप इस खबर के जरिए जान सकते हैं :

जगदीश चंद्रETV's Hindi & Urdu channels head, Jagdish Chandra, has become the face of regional channels in the country. After bringing Hindi & Urdu channels to a profit making venture this year, now Chandra brings a three point formula for the survival of the loss making regional news channels i.e.

(a) to pursue the chief ministers and the state governments to make a separate and adequate budget provision for the regional news channels, which should be more or less equivalent to the print media in that state, without curtailing the print media budget and making only an additional provision for the electronic media

(b) to purse the I&B ministry to issue directions to DAVP/NFDC to provide for a 33% of the total media budget for regional channels only and

(c) to also pursue the finance ministry to issue instructions to PSUs like nationalized banks, LIC, IDBI etc., to release at least those display Ads to regional channels, which are already being issued to regional newspapers.

To implement this three-point agenda, now all the leading regional news channels like Sahara, India News and Sadhana have now joined hands with ETV to put up a brave front before the State governments and the Centre. Recently, Chandra had a tiff with the Chhattisgarh Government on the same issue but he is unfazed and is determined to bring this entire issue to a logical conclusion. On the same lines, Regional Channels Association of India, headed by Kartik Sharma, has also taken up the issue with the five Chief Ministers of North India.

कांग्रेस प्रत्याशी सहित दर्जनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज

: मामला आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने का : जौनपुर । सदर विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में मंगलवार को कम्बल वितरण के लिये लगा स्टाल उस समय फीका पड़ गया जब शहर कोतवाल ने पहुंचकर आदर्श आचार संहिता की बात कहते हुये इसे गलत बताया जिस पर कांग्रेस प्रत्याशी और कोतवाल में हल्की नोक-झोंक हुई। इसी बीच कांग्रेस प्रत्याशी तो रफूचक्कर हो गये लेकिन उड़न दस्ते ने पहुंचकर जहां कुछ कम्बलों को अपने कब्जे में ले लिया, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी, एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता सहित दो दर्जन के खिलाफ कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज हो गयी।

शहर कोतवाल विजयनाथ तिवारी ने बताया कि नगर के कोतवाली चैराहे पर मंगलवार को टांगा स्टैण्ड स्थल पर कांग्रेसजनों ने सदर विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी नदीम जावेद के समर्थन में स्टाल लगाकर गरीबों में ठण्ड से बचाव के लिये कम्बल वितरण का कार्यक्रम बनाया था जिसमें कांग्रेस के पूर्व सांसद कमला प्रसाद सिंह, वरिष्ठ नेता साजिद हमीद सहित तमाम कांग्रेसी उपस्थित थे। जैसे ही इंका प्रत्याशी नदीम जावेद पहुंचे और कम्बल वितरण कार्यक्रम शुरू हो गया, वैसे ही पुलिस ने पहुंचकर आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आदर्श आचार संहिता का हवाला देते हुये वितरण कार्य को रोकवाने का प्रयास किया जिस पर कांग्रेस प्रत्याशी व कोतवाल में हल्की नोक-झोंक का भी होना बताया जाता है।

इसी मध्य आचार संहिता के पालन हेतु जिला निर्वाचन अधिकारी गौरव दयाल द्वारा गठित उड़न दस्ता भी पहुंच गया जिसे देख जहां इंका प्रत्याशी व कांग्रेस के लोग खिसक लिये, वहीं पुलिस ने कुछ कम्बल अपने कब्जे में लेते हुये धारा 171 ई व एफ के तहत इंका प्रत्याशी नदीम जावेद, वरिष्ठ कांग्रेस नेता साजिद हमीद सहित दो दर्जन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर लिया।

जौनपुर से डा. मधुकर तिवारी की रिपोर्ट

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इस साल की होली आने वाली हर होली के ढेर सारे रंग छीन ले गई

इस साल होली आने वाली हर होली के ढेर सारे रंग छीन ले गई और अब यह 27 दिसम्बर- आलोक के नहीं होने के बाद का पहला 27 दिसम्बर! कड़ाके की ठण्ड मे