क्‍यों नहीं खतम हो रही देश से जाति आधारित राजनीति?

2009 के लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश के एक दूरस्थ गांव में जब लकड़ी बिनने गयी एक बूढ़ी महिला से एक पत्रकार ने पूछा- ‘अम्मा किसको वोट दोगी’ तब उसका जवाब था- ‘इन्द्रा गांधी कै’। 62 साल के गणतांत्रिक व्यवस्था के बाद भी इस महिला के वोट की कीमत वही है जो कि प्रजातंत्र में मीन-मेख निकालने वाले किसी सुजान व्यक्ति की। द्वंदात्मक प्रजातांत्रिक व्यवस्था की मूल अवधारणाओं में एक है जिसके तहत राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह जनता को मुद्दों के प्रति शिक्षित करेगी। यही वजह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सभी प्रजातांत्रिक समाज में बहुत ऊंचा मकाम दिया गया है।

राजनीतिक वर्ग संचार माध्यमों या मीडिया का सहारा लेकर मुद्दों को उठाता है। मीडिया से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वह किसी भी मुद्दे का हर पहलू जनता के सामने रखे और उन्हें अपना दृष्टिकोण तैयार करने में मदद करे। 62 साल के गणतंत्र के बाद भी आखिर क्या कारण है कि भारत से जाति पर आधारित राजनीति खत्म नहीं हो रही है। अभी जारी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव इसका ताजा उदाहरण है।

हमने फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम (एफ.पी.टी.पी यानि जो पहले खंभा छुए वही विजेता या यूं कहें कि जो सबसे ज्यादा वोट पाए वो विजेता) चुनाव पद्धति अपनायी है। जब हम संविधान बना रहे थे तब हमारे सामने कुछ अन्य पद्धतियां भी थीं लेकिन हमने ब्रिटेन के मॉडल को अंगीकार करते हुए इस पद्धति को सर्वश्रेष्ट समझा। नजीज़ा यह हुआ कि चौधरी के कहने पर वोट देने वाला बारम्बार ठगा हुआ किसान हो या प्रजातंत्र की बारीकियां समझने वाला व्यक्ति, दोनों का वोट समान माना गया। भारतीय समाज में गरीबी, अशिक्षा व सामंतवादी अवशेषों की वजह से इस पूरी अवधारणा को पटरी से उतार दिया गया। एफ.पी.टी.पी पद्धति की जो सबसे बड़ी खराबी अब तक देखने में आयी वह यह कि, यह पद्धति समाज को विभाजित करती है और यह विखण्डन की प्रक्रिया तब तक नहीं रुकती जब तक कि सबसे छोटा पहचान समूह भी विखण्डित नहीं हो जाता।

उदाहरण के तौर पर एक विधानसभा क्षेत्र में मान लीजिए नौ प्रत्याशी हैं जिनमें से आठ को 9000 के आस-पास वोट मिले हैं लेकिन नौवें प्रत्याशी को 9005 हज़ार वोट मिले हैं, नौवां प्रत्याशी विजयी घोषित होगा। हालांकि 88 प्रतिशत मतदाताओं ने उसे खारिज किया है। अगले चुनाव में यह सभी आठों प्रत्याशी इस बात की कोशिश में लग जाएंगे कि किसी तरह से छोटे-छोटे पहचान समूहों की भावनाओं को उभारा जाए और कोशिश की जाए कि किस तरह महज छह प्रतिशत वोट और बढ़ाए जाएं ताकि अगले चुनाव में जीत हासिल हो। चूंकि यह पहचान समूह धार्मिक, जातिगत, क्षेत्रीय, उपजातीय व भावनात्मक आधार पर परंपरागत रूप से ही पहले से बने होते हैं इसलिए राजनीतिक दलों के लिए आसान पड़ता है कि उन्हीं में से किसी एक को अपने साथ जोड़े। एक दूसरी दुश्वारी यह भी है कि नए और तार्किक आधार पर पहचान समूह बनाना मसलन प्रोफेश्नल्स का ग्रुप, विकास के मुद्दों के आधार बनाया गया व्यक्ति समूह एक मशक्कत का कार्य होता है इसलिए राजनीतिक पार्टियां पहले विकल्प को चुनती हैं।

राजनीतिशास्त्र के सर्वमान्य विश्लेषणों के मुताबिक अशिक्षित व अतार्किक समाज में भावनात्मक मुद्दे अचानक ही तेजी से उभरते हैं और कई बार इतने प्रबल हो जाते हैं कि मूल मुद्दों से भारी पड़ते हैं और पूरी विधिमान्य और तार्किक व्यवस्था को या संवैधानिक संस्थाओं को अपने अनुरूप ढालना शुरू कर देते हैं। 1984 में शुरू हुआ राममंदिर का उबाल इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। लेकिन चूंकि भावनात्मक मुद्दे अतार्किक सोच व पहचान समूह के आधार पर ही होते हैं इसलिए दूसरा राजनैतिक दल फौरन ही कोई अन्य भावनात्मक मुद्दा और इसी बड़े पहचान समूह में से एक छोटा पहचान समूह पकड़ता है। 1984 के राममंदिर-जनित हिंदू एकता की प्रतिक्रिया के रूप में मण्डल कमीशन सामने आता है और हिंदुओं में ही एक नए पहचान समूह (हालांकि यह पहचान समूह पहले से ही सुसुप्त लेकिन अस्तित्व में था) को राजनीतिक पार्टियां उभारना शुरू करती हैं लिहाज़ा 1990 तक आते-आते देश बैकवर्ड और फॉरवर्ड में बंट जाता है। बात यहीं नहीं रुकती। इसी के साथ शुरू होता है जातिगत राजनीति का जबर्दस्त तांडव और तब होता है काशीराम, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव की राजनीति का अभ्युदय जिसे नाम दिया जाता है- ‘सामाजिक न्याय वाली पार्टियां’। सिलसिला यहीं नहीं रुकता। आन्ध्रप्रदेश में कम्मा और कापू पूरी तरह से तलवार तान लेते हैं। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कलिगा अलग हो जाते हैं, उत्तर भारत में यादव-कुर्मी बंट जाते हैं, ब्राह्मण-ठाकुर बंट जाते हैं। सिलसिला इतने से भी नहीं रुकता। पसमांदा मुसलमान और अशरफ मुसलमानों को अलग करने की कोशिश की जाती है, पिछड़ों और अति-पिछड़ों के बीच एक नया पहचान समूह बनाने का उपक्रम होता है और यहां तक कि दलितों में भी एक महादलित पहचान समूह खड़ा करने की कोशिश की जाती है। चमार को पासी से अलग करने का प्रयास होता है।

राजनीति शास्त्र के अवधारणाओं का एक अन्य पहलू होता है जिसके तहत प्रजातंत्र में राजनीतिक दल के स्वीकार्यता की एक शर्त होती है कि उसका अपना एक कैडर हो जो नीचे तक जाकर जनता से अपनी बात कहे लेकिन भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में कुछ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को छोड़ कर किसी क्षेत्रीय दल ने यह जहमत उठाना गंवारा नहीं किया। उसका कारण यह था कि कैडर खड़ा करने के लिए सैद्धान्तिक संबल की ज़रूरत होती है, जिसका क्षेत्रीय दलों में सर्वथा अभाव रहा। इस अभाव को पूरा करना बहुत आसान था, जब इन पार्टियों के नेताओं ने पहचान समूह के साथ अपने को जोड़ा और उनमें सशक्तिकरण की एक झूठी चेतना जगायी। अगर “मंदिर वहीं बनाएंगे” के नारे से भाजपा ने अपनी दुकान खड़ी की तो मुलायम ने अपने आदमियों से “परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा” कहलवाकर अपना धंधा रातों-रात चमकाया। “तिलक-तराजू” का नारा इसी दौर में आता है। मुलायम सिंह ने अपने शासन-काल में पी.ए.सी की भर्ती में यादवों को भरना शुरू किया, बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंच से कहना शुरू किया- देखो आज जिले के इतने कलक्टर और इतने कप्तान दलित वर्ग के हैं। लालू यादव ने भरे दरबार में सवर्ण चीफ सेक्रेटरी को जब बड़े-बाबू कहते हुए उपहास के लहजे में बोला तब उनका एक बड़ा वर्ग जो सदियों से दबा-कुचला था, अचानक से अपने को सशक्त समझने लगा। हेलीकॉप्टर से उतरकर लालू यादव ने चुनाव के दौरान यादव बाहुल्य राघोपुर में एक जनसभा में सिर्फ तीन मिनट का भाषण दिया। ‘अब यहां पेड़ से ताड़ी उतारते हो तब कोई टैक्स तो नहीं मांगता?’ उत्साहित भीड़ का जवाब था- ना साहिब। लालू ने दूसरा सवाल दागा- ‘नदी से मछली मारते हो तब कोई सरकारी आदमी कुछ कहता तो नहीं?’ जनता से जवाब आया- ‘जी, ना’। लालू यादव की अगली सलाह थी- ‘खूब ताड़ी पियो, मछली खाओ, मस्त रहो’। हेलीकॉप्टर का रॉटर नाचा और लालू यादव उड़ गए। उस विधानसभा से उनको जबर्दस्त जीत हासिल हुयी।

सशक्तिकरण की झूठी चेतना के लिए सामाजिक न्याय के इन पुरोधाओं ने राज्य के संवैधानिक व कानूनी संस्थाओं को तोड़ना-मरोड़ना शुरू किया, नतीज़ा यह हुआ कि कप्तान व एस.पी अपमान से बचने के लिए सजदे के भाव में आ गए। कलक्टर और एस.पी ने बहनजी का चप्पल उठाना शुरू किया, सार्वजनिक अवसरों पर मंत्री मुख्यमंत्री के सामने हांथ बांधे खड़े रहने लगे और लगा कि पूरा शासन और कानूनी व्यवस्था इन तथाकथित सामाजिक न्याय के पुरोधाओं के चेरी हो गयी है। इसी बीच दो राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस और भाजपा ने अपना राजनीतिक धरातल छोड़ना शुरू किया। स्थिति यहां तक आ गयी कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के वोट महज सात से आठ प्रतिशत रह गए तो बीजेपी को 14 से 16 प्रतिशत। अगर देश भर में देखें तो जहां कांग्रेस 2009 के चुनाव में 27 प्रतिशत वोट हासिल कर सकी वही बीजेपी सिर्फ 18 प्रतिशत। उधर दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों को लगभग 40 प्रतिशत वोट मिले। दरअसल समाज को बांटने वाले खेल की शुरुआत करने के बाद भाजपा और कांग्रेस खुद ही बाहर हो गए।

लेकिन समाजशास्त्रीय अवधारणाओं के हिसाब से भावनात्मक मुद्दों की राजनीति की एक मियाद होती है। अगर किसी पहचान समूह की तर्कशक्ति व शिक्षा का स्तर शुरू से ही अपेक्षाकृत बेहतर रहा है तब वह जल्दी ही समझ जाता है कि सशक्तिकरण झूठा था, भावनाएं सिर्फ अपनी रोटी सेंकने के लिए जगायी गयी थी और तब उसका मोहभंग होता है। बिहार में यही हुआ। उत्तर प्रदेश में भी जिन-जिन जिलों में दलित शिक्षा बेहतर हुयी है वहां बहुजन समाज पार्टी को अपेक्षाकृत कम मत मिले हैं। आज उत्तरप्रदेश में ही नहीं बल्कि उत्तर भारत में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग है जो पहचान समूह की राजनीति से हटकर सभी दलों से पूछ रहा है मुझे अपनी जाति का कप्तान और कलक्टर देने के बजाय घर के सामने सड़क दो। यानि विकास को तरजीह देने की एक नयी शुरुआत हुयी है। प्रजातंत्र के लिए यह एक नया संकेत माना जा सकता है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के राष्‍ट्रीय सहारा में भी प्रकाशित हो चुका है.

भोजपुरी फिल्‍मों की मशहूर अभिनेत्री रूबी सिंह ने की आत्‍महत्‍या

मुंबई: भोजपुरी फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री रूबी सिंह ने खुदकुशी कर ली. पुलिस के मुताबिक रूबी को फिल्मो में काम न मिलने से वो डिप्रेशन का शिकार हो गईं थीं. मिस पटना रह चुकी रूबी सिंह ने फिल्म 'हो गइल बा प्यार ओढनिया वाली से' अपने  करियर की शुरुआत की थी. महज 25 साल की उम्र में रूबी ने भोजपुरी सिनेमा में अपनी अलग जगह बना ली थी, लेकिन शुक्रवार को ऐसा क्या हुआ कि सिनेमा के पर्दे पर हमेशा चहकने और चमकने वाले चेहरे ने अपने चाहनेवालों से खुद को हमेशा के लिए दूर कर लिया.

पुलिस के मुताबिक रूबी ने गोरेगांव के अपने फ्लैट में पंखे से लटककर खुदकुशी कर ली. पुलिस का दावा है कि करियर के शुरुआती दौर में ही कामयाबी देख चुकी रूबी को इन दिनों फिल्मों में काम नहीं मिल रहा था. शायद इस वजह से वो ज्यादा डिप्रेशन में थी. लेकिन रूबी की मौत अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है. क्या रूबी ने इतना बड़ा कदम सिर्फ डिप्रेशन की वजह से उठाया? क्या कारण था कि इन दिनों इस कामयाब हीरोइन को काम नहीं मिल रहा था? क्या निजी जिंदगी में रूबी अकेले रह गई थी? या फिर सिनेमा की चमक दमक के पीछे की हकीकत ने रूबी को ऐसा करने पर मजबूर कर दिया. कोई तो होगा जो रूबी की सच्चाइयों से वाकिफ होगा. पुलिस की माने तो रूबी ने करीब डेढ़ साल पहले भी एक बार खुदकुशी की कोशिश की थी. फिलहाल पुलिस हर एंगल से तफ्तीश कर रही है. मौके से एक सुसाइड नोट मिलने का दावा भी पुलिस ने किया है. गौरतलब है कि दो दर्जन से ज्यादा भोजपुरी फिल्मों में काम कर चुकी रूबी के पिता बिहार पुलिस में डीएसपी हैं. साभार : एनबी

महका जगत ने पूरे किए एक साल, संपादक ने जताया आभार

राजस्‍थान के उदयपुर जिले से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र 'महका जगत' ने दस फरवरी को अपने एक साल पूरे किए. इस अखबार की शुरुआत युवा पत्रकार जयप्रकाश माली ने 10 फरवरी 2011 में की थी, तब इसे लेकर तमाम तरह के कयास लगाए गए थे, परन्‍तु युवा पत्रकार एवं संपादक जयप्रकाश माली ने इस सफलता पूर्वक एक साल चलाकर दिखा दिया कि युवा किसी से कम नहीं हैं. तमाम दिक्‍कतों से मोर्चा लेते हुए उन्‍होंने अखबार का प्रकाशन जारी रखा.

इसी का परिणाम है कि महका जगत उदयपुर में बड़े अखबारों के बीच अपनी पहचान बन चुका है. लोगों ने संपादकीय टीम को तथा अखबार को गौरवमयी सफलता का एक साल पूरा करने पर बधाइयां तथा शुभकामनाएं दीं. संपादक जयप्रकाश माली ने इस दौरान सबका आभार जताया.

अप्रिय बनने की बजाय मीडिया व्‍यवस्‍था का अंग बनता जा रहा है

कितना स्वतंत्र है मीडिया या फिर कितना स्वतंत्र है अभिव्यक्ति का अधिकार? हाल के तीन भाषणों से यह सवाल उभरता है। इनमें पहला भाषण है उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का, दूसरा है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का और तीसरा प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू का। धमकी के कारण सलमान रुश्दी जयपुर साहित्य महोत्सव में शामिल नहीं हो सके। इस कारण अभिव्यक्ति के अधिकार का सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। इसी तरह भाजपा की छात्र शाखा के विरोध के कारण पुणे में कश्मीर पर बनी डाक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग नहीं हो सकी।

उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों ने ही अपने भाषणों में मीडिया को अपनी भूमिका के बारे में आत्मनिरीक्षण करने की सलाह दी है। उनके भाषणों में मीडिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, किसी तरीके से नियंत्रण लगाने का कोई संकेत तक नहीं था। हालांकि न्यायमूर्ति काटजू ने चेतावनी दी कि कुछ नियंत्रण भी लगाए जा सकते हैं, क्योंकि आत्मनियंत्रण सही मामले में नियंत्रण नहीं हैं। आपातकाल के दौरान लगाई गई सेंसरशिप को छोड़कर आजादी के बाद से इस मामले में सरकार का साफ-सुथरा रिकार्ड रहा है।

केंद्र की सरकारें पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का अनुसरण करती आई हैं। नेहरू ने 3 दिसंबर, 1950 को अखिल भारतीय समाचार पत्र संपादक सम्मेलन को आश्वस्त किया था कि मैं प्रेस को पूरी स्वतंत्रता दूंगा, लेकिन जस्टिस काटजू दूसरी राह पर नजर आ रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि प्रेस काउंसिल का गठन प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हुआ था। दुर्भाग्यवश उनके भाषणों में मीडिया की कार्यशैली या संस्कृति की झलक नहीं दिख रही। प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष बनने के एक ही दिन बाद उन्होंने पत्रकारों को निरक्षर घोषित कर दिया। अगर किसी व्यक्ति में सही तरीके से लिखने, समाचार को समझने या विश्लेषण की काबलियत न हो तो कोई व्यक्ति अपनी डिग्री के बल पर पत्रकार नहीं बन सकता। हमें जानना चाहिए कि भारत में जो शीर्ष पत्रकार हुए हैं उनमें प्रमुख एस मुलगांवकर ग्रेजुएट भी नहीं थे।

मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि मीडिया व्यवस्था का अंग बनता जा रहा है। स्वतंत्र समाज में प्रेस का काम निर्भय होकर निष्पक्ष तरीके से लोगों को घटनाओं की जानकारी देना है। कभी-कभी यह काम अप्रिय भी हो सकता है, लेकिन इसे करना पड़ता है, क्योंकि स्वतंत्र सूचना के आधार ही स्वतंत्र समाज बनता है। अगर प्रेस का काम सिर्फ सरकारी विज्ञप्तियां या आधिकारिक बयान प्रकाशित करना रहे तो फिर खामी या गलती निकालने की कोई जरूरत नहीं रहेगी। दुर्भाग्य से ऊंचे पदों पर बैठे लोग इस धारणा के साथ काम करते हैं कि इस बात सिर्फ वे ही जानते हैं कि देश को क्या और कब बताया जाना चाहिए? जब कभी उनके मनमाफिक खबर नहीं छपती तो वे उत्तोजित हो जाते हैं। सबसे पहले तो वे इसका प्रतिवाद करने की कोशिश करते हैं। इससे काम न चलने पर आधा-अधूरा स्पष्टीकरण दे दिया जाता है। मैं प्रेस काउंसिल में रहा हूं। उस समय हर सदस्य चाहता था कि प्रेस काउंसिल को बिना दांत का होना चाहिए। इसका गठन जांच करने वालों की जांच करने वाले संगठन के तौर पर किया गया था।

जस्टिस काटजू का यह तर्क कि इसे दंड देने का अधिकार भी होना चाहिए, इसके गठन के मकसद को खत्म कर देता है। प्रेस काउंसिल कोई अदालत नहीं है। उसका गठन इस मकसद से किया गया था कि गलती करने वाले प्रकाशन अपनी गलती को कैसे सुधार सकते हैं, इसका फैसला करने का अधिकार काउंसिल के सदस्यों यानी संपादकों, पत्रकारों और मालिकों को ही दे देना चाहिए। फिसलन तब शुरू हुई जब काउंसिल ने जिन प्रकाशनों की निंदा की उन्होंने अपने खिलाफ काउंसिल के फैसले को छापना भी बंद कर दिया। मेरा मानना है कि काउंसिल के निर्णयों को प्रकाशित करना अनिवार्य बना देना चाहिए, भले ही निर्णय कितना भी अप्रिय क्यों न हो। जस्टिस काटजू को काउंसिल के रिकार्डो को देखना चाहिए। काउंसिल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का ही अंग है। काउंसिल का सबसे बुरा हाल आपातकाल के दिनों में था। बाद में भी काउंसिल अपने स्वतंत्र अस्तित्व के मुताबिक काम नहीं कर सकी।

जहां तक सलमान रुश्दी का मामला है, उन्हें अपनी यात्रा जान पर खतरे के भय से रद करनी पड़ी है। संभवत: सरकार उन्हें सुरक्षा प्रदान करने को लेकर अनिश्चय की स्थिति में थी, लेकिन सवाल यह नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। सलमान रुश्दी की किताब 'द सैटनिक वर्सेज' का विरोध करने वाले कुछ कट्टरपंथियों ने पूरे मुस्लिम समुदाय को बंधक बना लिया। उदारवादी मुसलमानों ने कुछ नहीं कहा, जबकि वे हिंदुओं के गलत कामों के खिलाफ खुलकर बोलते रहते हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं को अहसास होना चाहिए कि पंथनिरपेक्ष समाज में संविधान फतवा से ऊपर है। एमएफ हुसैन को हिंदू कट्टरपंथियों के कुछ ऐसे ही व्यवहार का सामना करना पड़ा था। इसी तरह कश्मीर पर बनी डाक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रद कर सिमबोसिस कॉलेज ऑफ आ‌र्ट्स एंड कॉमर्स ने भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति का उल्लंघन किया है। संजय काक की इस डाक्यूमेंट्री 'जश्ने-आजादी' में सेना का विरोध किया गया है। इसके विरोध में मैं सिमबोसिस के प्रोफसर एमिरेट्स के पद से इस्तीफा दे रहा हूं। नि:संदेह पूरी दुनिया में स्वतंत्र अभिव्यक्ति की जगह सिकुड़ रही है। फिर भी मेरा मानना है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति के दमन की इस मरुभूमि में भारत हरे-भरे स्थान की तरह है, लेकिन कट्टरपंथियों एवं लचर सरकारों ने मुझे गलत साबित कर दिया है। रुश्दी के मामले में उत्तार प्रदेश के चुनाव के कारण स्थिति और बिगड़ी, क्योंकि राज्य में करीब 15 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं।

लेखक कुलदीप नैयर देश के जाने-माने तथा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

”पेड न्‍यूज निगरानी समिति में डा. जिंदल को शामिल कर पत्रकारिता का मजाक उड़ा रहा है प्रशासन”

सेवा में, मुख्य चुनाव अधिकारी, विधानसभा निर्वाचन-2012, उत्तर प्रदेश। विषय- सोनभद्र में पेड न्यूज की निगरानी के लिए गठित प्रशासनिक समिति के संदर्भ में…। महोदय! अवगत कराना है कि केंद्रीय चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश विधानसभा निर्वाचन-2012 में पेड न्यूज पर अंकुश लगाने के लिए जिला स्तर पर पेड न्यूज निगरानी समिति का गठन करने का निर्देश दिया है। केंद्रीय चुनाव आयोग के निर्देश के तहत राज्य के सभी जिलों में जिला प्रशासन ने पेड न्यूज निगरानी समिति का गठन भी किया है। सोनभद्र में भी पेड न्यूज की निगरानी के लिए जिला प्रशासन द्वारा एक समिति का गठन किया गया है जिसमें जिलाधिकारी बतौर जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में अध्यक्ष हैं।

समिति के अन्य सदस्यों के रूप में जिला सूचना अधिकारी के रूप में भी एक प्रशासनिक अधिकारी की नियुक्ति की गई है क्योंकि यहां पर पिछले कई सालों से जिला सूचना अधिकारी का पद खाली है। इसके अलावा समिति में जिला मनोरंजनकर अधिकारी और आकाशवाणी ओबरा के प्रभारी को शामिल किया गया है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इन लोगों के अलावा समिति में बतौर पत्रकार और समाजसेवी के रूप में पूरी तरह से एक व्यवसायिक व्यक्ति को शामिल किया गया है, जिनका नाम डॉ. जिन्दल है। डॉ. जिंदल एक चिकित्सक हैं। उनका सामाजिक सेवा में इस इलाके में कोई भी बड़ा योगदान नहीं है। इसकी आप जांच भी करा सकते हैं। रही बात पत्रकारिता के क्षेत्र की तो उनका पत्रकारिता से भी कोई लेना देना नहीं है। डॉ. जिंदल पूर्णतया एक व्यवसायिक व्यक्ति हैं जो व्यक्तिगत लाभ के लिए अखबार का प्रकाशन करते हैं। न्यायाधीश नाम से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र के मालिक, प्रकाशक और संपादक डॉ जिंदल खुद ही हैं, जिसकी मुश्किल से हजार प्रतियां प्रकाशित होंगी। रही बात जनता में इस अखबार के प्रसार की तो उसकी भी आप जांच करा सकते हैं। वे इस अखबार को सिर्फ सरकारी और निजी विज्ञापनों से होने वाली आमदनी के लालच में प्रकाशित करते हैं। अगर पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके व्यक्ति योगदान की बात करें तो वे समाचार-पत्र की एक लाइन तक नहीं लिखते और ना ही संपादन करते हैं। सोनभद्र में एक कमरे में उनका दफ्तर चलता है, जहां वो खुद भी नहीं बैठते। वे हमेशा अपने क्लिनिक में बैठे रहते हैं और मरीजों के इलाज में मशगूल रहते हैं। जिसकी जांच भी कराई जा सकती है।

पूरी तरह से एक व्यवसायिक व्यक्ति को पेड न्यूज की निगरानी करने वाली समिति में शामिल किया गया है जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता। ना ही इस कदम से केंद्रीय चुनाव आयोग की मंशा पूरा होती है। डॉ. जिंदल के अलावा सोनभद्र में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनका समाज के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान है। डॉ. जिंदल को पेड न्यूज की जिला निगरानी समिति में शामिल किया जाना एक साजिश का हिस्सा है। साथ ही उत्तर प्रदेश के इस पिछड़े जिले में ईमानदारी से पत्रकारिता करने वालों की उपेक्षा। सूत्रों की माने तो डॉ. जिंदल को पेड न्यूज की जिला निगरानी समिति में जिला सूचना कार्यालय में तैनात उर्दू अनुवादक अनुवादक निसार अहमद की सलाह पर शामिल किया गया है जो आए दिन यहां के अच्छे पत्रकारों को नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह की कोशिश करते रहते है। पिछले कई सालों से जिला सूचना अधिकारी की नियुक्ति नहीं होने के कारण निसार अहमद ही यहां के कार्यों का संपादन करते रहते हैं, जिसके कारण पत्रकारों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अतः आपसे निवेदन है कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग की निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने की मंशा को पूरा करने के लिए इस पूरे मामले की जल्द से जल्द जांच कराकर डॉ. जिंदल को पेड न्यूज की निगरानी समिति से बाहर करें। साथ ही उनके स्थान पर एक ऐसे पत्रकार या समाजसेवी को निगरानी समिति में शामिल करें जो जिम्मेदारी के साथ चुनाव आयोग की मंशा को पूरा कर सके।

भवदीय

शिव दास
ग्राम- तिनताली, पोस्ट-बहुअरा
जिला-सोनभद्र पिन कोड- 231216

2012 में ही फिर से होंगे यूपी में विस चुनाव!

पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में सर्वाधिक चर्चा यूपी अर्थात उस उत्तर प्रदेश की ही हो रही है, जिसको चार भागों में बॉंटने के बाद मायावती इसका नाम ही समाप्त कर देना चाहती हैं। जिन प्रस्तावित चार प्रान्तों में यूपी को विभाजित करने की मायावती की योजना है, उनमें यूपी का कहीं नाम ही नहीं है। यह तो एक अलग विषय है, लेकिन यूपी के चार में से कम से कम दो राज्यों पर अनन्त काल तक शासन करते रहने की तमन्ना पूरी करने की खातिर यूपी के चार टुकड़े करने की इच्छुक बसपा सुप्रीमो की बसपा के यूपी सहित हर राज्य में बार-बार टुकड़े होते रहे हैं। इसके उपरान्त भी बसपा का अस्तित्व आज भी कायम है।

शायद इसलिये भी यूपी के टुकड़े करने की प्रस्तावित योजना में मायावती को खतरा कम और लाभ अधिक दिख रहा है। ये अलग बात है कि मायावती ने यूपी को विभाजित करने का दांव केवल राजनैतिक चातुर्य दिखानेभर को चला है, जो उनकी ओर से यूपीए की कांग्रेस नीत केन्द्र सरकार को और लोकसभा में प्रतिपक्ष भारतीय जनता पार्टी को मतदाता के समक्ष कटघरे में खड़ा करने के लिये फेंका गया था, लेकिन विधानसभा चुनावों में खुद मायावती ही इस मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाने में पूरी तरह से असफल रही हैं। या उनको अपनी गलती का अहसास हो गया लगता है!

इसी बीच चुनाव आयोग के एक निर्णय ने बसपा के हाथी को बैठे बिठाये चुनावी मुद्दा बना दिया, जिसके चलते मायावती के धुर कट्टर वोटर माने जाने वाले जाटवों के बिखराव को रोककर फिर से एकजुट होने का अवसर मिला है। जिसका बसपा को लाभ होना तय है, लेकिन इस सबके बावजूद भी उत्तर प्रदेश की राजनीति की गहरी समझ रखने वालों के जमीनी कयासों तथा भाजपा एवं कांग्रेस के राजनेताओं की बातों पर विश्‍वास किया जाये तो उत्तर प्रदेश का राजनैतिक भविष्य कम से कम इन विधानसभा चुनावों के बाद अस्थिर ही नजर आ रहा है। जिसके पुख्ता और प्रबल कारण भी हैं। हम सभी जानते हैं कि राजनेताओं को अपने बयान और सिद्धान्त बदलने में एक क्षण का भी समय नहीं लगता है। इस सम्बन्ध में कोई भी दल किसी से पीछे नहीं है। स्वयं मायावती जो ‘‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’’ का नारा देते देते-‘‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु और महेश है’’-का नारा देकर यूपी में पांच वर्ष तक सत्ताशीन रह चुकी हैं| भाजपा और कांग्रेस भी अनेक बार सिद्धान्तों को बलि देकर राजनैतिक समझौते करने का इतिहास बना चुकी हैं।

इसके उपरान्त भी चुनावी राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस बार यूपी में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने वाला नहीं है और इस बार यूपी में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपने अस्तित्व की लड़ाई पूरी ताकत झोंककर लड़ रही हैं। इसलिये इस बार, इस बात की नगण्य या बहुत कम सम्भावना है कि चुनावों में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर ये दोनों पार्टी बसपा या समाजवादी पार्टी में से किसी को भी समर्थन दे सकें या किसी से समर्थन ले सकें। हालांकि जानकारों का यह भी मानना है कि उत्तर प्रदेश में असली मुकाबला मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और मायावती की बसपा के बीच ही होना है। कांग्रेस और भाजपा तो तीसरे नम्बर की ताकत के रूप में उभरने के लिये चुनाव लड़ रही हैं। लेकिन इसके ठीक विपरीत कांग्रेस और भाजपा दोनों ही बिना किसी के समर्थन के यूपी में अपनी-अपनी सरकार बनाने तथा किसी कारण से स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर विपक्ष में बैठने की बातें सीना तानकर कह रही हैं। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं, ऐसे हालात में जबकि भाजपा पहले ही बसपा और सपा से चोट खा चुकी है और कॉंग्रेस तथा भाजपा दो विपरीत धुव हैं। ऐसे में भाजपा फिर से किसी के साथ समझौता करके कोई रिस्क लेना नहीं चाहेगी। इस माने में भाजपा द्वारा किसी को समर्थन देने या किसी अन्य पार्टी से भी समर्थन लेने के समीकरण बनने की सम्भावना कम ही आंकी जा रही है।

हां, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच केन्द्र में परोक्ष सहमति के कारण पहली नजर में यूपी में समझौता हो जाने की सम्भावना बनती अवश्य दिखती है, लेकिन यदि राहुल गॉंधी के बयानों पर गौर किया जाये और उनके बयानों को सच्चे तथा ईमानदार कथन माने जायें तो किसी से भी समझौते की कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही है। हालांकि यह बात फिर से दोहराना जरूरी है कि राजनेताओं के चुनावी बयानों पर भरोसा करना आज के इस माहौल में असम्भव सा लगता है। फिर भी राहुल गॉंधी के तेवरों को देखकर एक प्रबल सम्भावना यह भी प्रतीत होती है कि इस बार पूर्ण या स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर कॉंग्रेस किसी भी पार्टी से भी समझौता नहीं करने वाली है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में अस्थिर राजनीति का नजारा दिखाई देता है और कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने आपको किसी से भी कम नहीं आंक रही है। इन हालातों में यूपी में यदि कोई बड़ा चमत्कार नहीं होता है तो और साथ ही यूपी के बयान बहादुर अपने बयानों से नहीं पलटते हैं तो एक प्रबल सम्भावना चुनावों के बाद कुछ समय के लिये यूपी में राष्ट्रपति शासन और राष्ट्रपति शासन के दौरान ही फिर से 2012 में ही पुन: विधानसभा चुनावों के आसार भी बनते दिख रहे हैं।

जो हालात बिहार में बने थे, वही हालात यूपी में दोहराये जा सकते हैं। जहां पर लालू और पासवान दोनों को जनता ने धराशाही कर दिया था। यदि यूपी में ऐसा होता है तो माया की बसपा और मुलायम की सपा को नुकसान होना तय है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस को यूपी में अपने आप को खड़ा करने का एक बड़ा अवसर मिल सकता है, जिसे ये पार्टियॉं अपनी जीत में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली हैं। इस दूरन्देशी राजनैतिक सम्भावना को फिलहाल तो खयाली पुलाव ही समझा जायेगा, क्योंकि अभी तो चुनावों के कई चरण पूरे होने हैं। देखना होगा कि चुनाव का अन्तिम चरण पूर्ण होने तक राजनेता और जनता क्या-क्या नजारे पेश करते हैं?

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' होम्योपैथ चिकित्सक तथा मानव व्यवहारशास्त्री, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

हाईकोर्ट ने याहू इंडिया की याचिका खारिज की

नई दिल्ली। वेबसाइट पर आपत्तिजनक सामग्री परोसने के मामले में याहू इंडिया के खिलाफ निचली अदालत के आदेश पर रोक लगाने की मांग हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। याहू इंडिया ने निचली अदालत द्वारा उनके आला अफसर को समन करने के आदेश को चुनौती दी थी। निचली अदालत इस मामले में याहू इंडिया, फेसबुक, गूगल इंडिया समेत 21 वेबसाइटों के खिलाफ दर्ज अपराधिक मामले में सुनवाई कर रही है। निचली अदालत ने इस बाबत सुनवाई के लिए 13 मार्च की तारीख तय कर रखी है।

न्यायमूर्ति सुरेश कैत ने याहू इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की उस मांग को खारिज कर दिया जिसमें निचली अदालत में चल रहे अपराधिक मामले में रोक लगाने की मांग की गई थी। याहू की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरविंद निगम ने दावा किया कि शिकायत में कंपनी का नाम नहीं आया है। उन्होंने मांग की कि इसके मद्देनजर निचली अदालत के आदेश पर रोक लगाई जानी चाहिए। पीठ ने इस मामले में एक मार्च को सुनवाई करने की बात कहते हुए कहा कि निचली अदालत में शिकायत करने वाले पत्रकार विनय राय का कहना है कि उन्हें याचिका की प्रति अभी तक नहीं मिली है जिसके चलते जवाब दाखिल करना कठिन है। इससे पहले बीस जनवरी को हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को याहू इंडिया की याचिका पर नोटिस जारी किया था।

याहू ने मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा कथित रूप से आपत्तिजनक सामग्री दिखाने के मामले में उसके नाम नोटिस जारी किए जाने को चुनौती दी थी। अदालत ने कल ही गूगल इंडिया और फेसबुक इंडिया की याचिका की सुनवाई 23 जनवरी के लिए टाल दी थी। इस मामले में निचली अदालत ने 23 दिसम्बर 2010 को अपराधिक साजिश, अश्लील किताबों और युवाओं को अश्लील सामग्री बेचने के कथित अपराध में 21 वेबसाइटों को समन जारी किए थे। इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से निचली अदालत में कहा गया था कि 21 वेबसाइटों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री है, अत: उनके खिलाफ मुकदमा चलना चाहिए। वेबसाइटों ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए जारी समन को खारिज करने की मांग करते हुए कहा था कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। इस बाबत शिकायती पत्रकार विनय राय के वकील की ओर से कहा गया कि इसके लिए वे अपने अपराधिक कृत्य से बचने का अधिकार नहीं रखतीं। साभार : रास

गूगल लांच करेगा मुफ्त ऑनलाइन हार्ड ड्राइव

वाशिंगटन : लोकप्रिय सर्च इंजन गूगल शीघ्र ही मुफ्त ऑनलाइन हार्ड ड्राइव स्टोरेज सिस्टम लांच करने जा रहा है। यह पर्सनल कंप्यूटर के हार्ड ड्राइव की तुलना में अधिक फाइलों को स्टोर कर सकेगी। इससे पहले भी ड्रॉपबॉक्स नामक कंपनी ग्राहकों को ऑनलाइन फाइल स्टोरेज सर्विस उपलब्ध करा रही है। गूगल ने ड्रॉपबॉक्स को टक्कर देने के लिए अपनी योजना तैयार की है। वर्तमान में ड्रॉपबॉक्स का 4 अरब डॉलर (करीब 198 अरब रुपये) का कारोबार है।

वॉल स्ट्रील जर्नल ने अज्ञात सूत्रों के हवाले से बताया कि गूगल की इस सेवा का नाम ड्राइव होगा और यह गूगल के सभी अकाउंट होल्डर के लिए नि:शुल्क होगी। वीडियो, दस्तावेज और संगीत पर्सनल कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव की बजाए गूगल के डाटा केंद्र में स्टोर किए जा सकेंगे। वैसे तो गूगल की ड्राइव सेवा को नि:शुल्क रखा जाएगा, लेकिन बड़ी मात्रा में डाटा स्टोर करने वाले यूजर्स को फीस चुकानी होगी। फीस कितनी होगी इस बारे में अभी नहीं बताया गया है। वर्तमान में गूगल की दूसरी ऑनलाइन डाटा स्टोरेज सर्विस गूगल डॉक्यूमेंट भी यूजर को एक जीबी तक डाटा स्टोर करने की सुविधा देती है। इस समय एपल कंपनी भी आइ क्लाउड नाम से डाटा को ऑनलाइन स्टोर करने की सुविधा दे रही है। यह उसकी मोबाइल ऑपरेटिंग सर्विस के नवीनतम वर्जन आइओएस 5 के यूजर्स के लिए नि:शुल्क है। माइक्रोसॉफ्ट भी इस प्रकार की सेवा देती है, लेकिन इसके बदले में शुल्क लेती है।

यूजर्स के लिए गूगल की सेवा उसी तरह आसान होगी, जैसी ड्रॉपबॉक्स की है। ड्रॉपबॉक्स यूजर्स को किसी भी चीज को कहीं भी स्टोर करने की सुविधा देता है। उल्लेखनीय है कि प्रवर्तन निदेशालय ने इंटरनेट क्षेत्र की प्रमुख कंपनी गूगल को विदेशी विनिमय उल्लंघन का नोटिस भेजा है। कंपनी पर अपनी विदेशी इकाइयों को धन के स्थानांतरण में कथित तौर पर अनियमितता बरतने का आरोप है। निदेशालय ने कंपनी की भारतीय इकाई से कहा है कि वह इस बारे में भारतीय रिजर्व बैंक से प्राप्त सभी मंजूरियों का खुलासा करे। साथ ही देश में आईटी रिटर्न के साथ अपनी आमदनी का स्रोत भी बताए। (एजेंसी)

वेस्‍ट बंगाल विस परिसर में प्रेस कांफ्रेंस वर्जित

कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी ने शुक्रवार को एक आदेश जारी किया कि विधानसभा परिसर में अब संवाददाता सम्मेलनों का आयोजन नहीं होगा जिस पर विपक्षी माकपा ने तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए इसे ‘निरंकुश’ और अस्वीकार्य करार दिया। यह आदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र की ओर से कल विस परिसर स्थित मीडिया केंद्र में संवाददाता सम्मेलन के के बाद आया है।

विधानसभाध्यक्ष की ओर से मिश्र को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि विपक्ष के नेता के निजी सचिव के अनुरोध के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के नेता को संवाददाता सम्मेलन को 15 मिनट में (शाम 4.30 बजे से 4.45 बजे तक) समाप्त करने का अनुरोध किया था। लेकिन प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में खबर आयी है कि संवाददाता सम्मेलन इससे आगे भी जारी रहा। (एजेंसी)

चैनल24 के मालिक को जमानत, रुपए लौटाने पर हुआ सहमत

शिमला : धोखाधड़ी के मामले में रोहतक से गिरफ्तार चैनल24 के मालिक राजेंद्र सिंह विदान को अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया है। उस पर चैनल24 में नौकरी देने के एवज में बेरोजगारों से पैसे लेने का आरोप था। पुलिस ने जब उसे पहली बार पकड़ा था तब उसने पैसे वापस लौटाने का आश्‍वासन दिया था, लेकिन उसके बाद भूमिगत हो गया था। उसे दोबारा पुलिस ने रोहतक से गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया था।

चैनल मालिक ने पुलिस को बताया कि दूसरे पक्ष की ओर से समझौते की पेशकश के बाद उन्होंने कुछ युवकों को 50 हजार रुपये भी लौटा दिए थे। नौकरी के एवज में लिए गए पैसों को युवकों के प्रशिक्षण पर खर्च किया गया। राजेंद्र ने पुलिस को बताया कि कुछ युवकों द्वारा दिए चेक खाता में पैसे न होने के कारण बाउंस हो गए थे। उन्होंने ठगे गए युवकों को पैसे लौटाने पर भी पुलिस के सामने हामी भरी। एएसपी रमेश पठानिया ने बताया कि धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार आरोपी को कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने आरोपी को जमानत पर रिहा कर पुलिस जांच में सहयोग करने के आदेश दिए हैं। पठानिया ने कहा कि मामला लगभग सुलझा लिया गया है। 

खुद को पत्रकार बता युवती ने वृद्धा से ठगे बारह लाख रुपये

कोलकाता : एक युवती द्वारा खुद को इलेक्ट्रानिक मीडिया का पत्रकार बताकर मकान मालकिन से 12 लाख रुपए ठगकर फरार होने का मामला सामने आया है। यह घटना दक्षिण कोलकाता के 1/1 सदर्न पार्क इलाके में स्थित ए-4 नंबर फ्लैट में घटी। ठगी की शिकार वृद्धा का नाम रेखा बंद्योपाध्याय (75) बताया गया है। रेखा का कहना है कि गत वर्ष अप्रैल में उत्तर 24 परगना जिले के रानाघाट की रहने वाली रुमझुम मुखर्जी नाम की युवती खुद को इलेक्ट्रानिक मीडिया का पत्रकार बताकर उनके फ्लैट में किराए पर रहने लगी।

धीरे-धीरे रुमझुम से उनकी अच्छी दोस्ती हो गई। एक दिन रेखा ने अपनी बेटी को एक फ्लैट खरीद कर देने की बात रुमझुम को बताई, जिसके बाद रुमझुम ने रेखा को सस्ते में फ्लैट दिलाने की बात कहते हुए उससे 7 लाख नगद रुपए लिए। इसके बाद किस्तों में रेखा से रुमझुम ने 5 लाख के गहने भी हथिया लिए। कुछ महीनों बाद जब रेखा को रुमझुम पर शक हुआ तो उसने अपनी बेटी को सारी बातें बता दी। इस बात की भनक लगते ही रुमझुम गुरुवार रात अपना सामान बटोरकर घर से फरार हो गई। इस घटना की लिखित शिकायत स्थानीय थाने में दर्ज करा दी गई है। पुलिस उस फर्जी पत्रकार की तलाश कर रही है। साभार : जागरण

श्री अनुज पोद्दार, मैंने काम किया है और मुझे पारिश्रमिक चाहिए

प्रेषक: Hare Prakash Upadhyay (hpupadhyay@gmail.com), दिनांक: 9 फरवरी 2012 9:45 अपराह्न, विषय: पत्र, प्रति: anuj.poddar@yahoo.com, श्री अनुज पोद्दार, मैं आपको यह पत्र अत्यंत व्यथा और विक्षोभ के साथ लिख रहा हूं। आपका जैसा आचरण और जैसी गति है, उसमें संवेदना और विनम्रता जैसे तंतु तलाशना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है और यह पर्याप्त और समुचित वजह है कि आपसे कोई संवाद, संबंध या संपर्क कदापि न रखा जाए। यही वजह है जनसंदेश टाइम्स में आप जब से पधारे मेरे जैसे व्यक्ति का वहां काम कर पाना खासा असुविधाजनक हो गया था और संपादक श्री सुभाष राय अगर वहां बने भी होते तो अब मेरा वहां बने रह पाना कतई संभव नहीं था और मैंने सोच लिया था कि एक फरवरी से मुझे वहां नहीं होना है।

सुनने में यह आया है कि आपने जनवरी महीने में मेरे द्वारा जनसंदेश टाइम्स को दी गई सेवा का मेहनताना इसलिए रोक रखा है कि मैंने वहां छपनेवाले लेखकों के संपर्क नंबर या उनके लिखे लेख आपको नहीं सौंपे। आपका यह तर्क आपकी समझ को मेरे सामने और स्पष्ट करता है और मुझे आश्वस्त करता है कि संस्थान से अलग होने का मेरा निर्णय अत्यंत उचित है। आप वही शख्स हैं जिसने कभी मुझे फोन कर कहा था कि लेखकों से कहो कि वे जनसंदेश टाइम्स के लिए विज्ञापन का प्रबंध करें तब उनके लेख प्रकाशित करो। आपने करीब आठ महीने से लेखकों की पारिश्रमिक रोक रखी है जो अत्यंत न्यूनतम भुगतान के विश्वास पर भी लगातार लिखते रहे हैं। आपको शायद पता नहीं है कि आपके यहां नियमित लिखनेवाले ये लेखक दूसरी जगहों पर आपके यहां से भुगतान के लिए तय की गई राशि की करीब आठ गुनी दर पर अपने लेख या दूसरी रचनाएं देते हैं। मुझे दुःख है कि रचनाओं और लेखकों के संबंध में आपसे निहायत किराना दुकान वाली भाषा में बात करनी पड़ रही है। आप बार-बार कहते रहे हैं कि आपको इन्हें छापना ही नहीं है। आखिर ऐसा अब क्या है कि आपको इन लेखकों से संपर्क आदि की जरूरत पड़ गई।

मैं जबसे जन संदेश टाइम्स में आया तब से संपादकीय और फीचर के कुल पांच पृष्ठों की सामग्री रोज ही प्रबंध कर प्रकाशित करता रहा और रविवार के दिन नौ पृष्ठ। इधर आकर आप उन पन्नों से घृणा वश उन्हें बंद करने पर तुले थे और काफी पेज कम कर दिए थे। मैंने चुनाव के चार पृष्ठों पर भी अपनी देख-रेख में लगातार गंभीर सामग्री प्रकाशित की। मैं जब आया तो मुझे भी कहीं से एक मैटर संस्थान ने तो दिए नहीं थे। सब अपने बल बूते ही तो किया।

दूसरी बात यह कि जिस दिन मैंने संस्थान को छोड़ा, उस दिन भी अपने सारे पेज मैंने बखूबी प्रकाशित किए और जब मैं वहां से बाहर निकला तो वहां कोई सन्नाटा नहीं था, सारा स्टाफ भरा हुआ था। मैंने करीब आठ बजे रात्रि तक अपना सारा काम समाप्त कर लिया था। पूछिए वहां के तमाम काम करने वाले लोगों और गार्ड से कि मैं अपने साथ क्या लेकर निकला था। आपको पता होना चाहिए कि मैं अपनी करीब तीन-चार हजार की निजी किताबें और पत्रिकाएं वहां छोड़ आया हूं। मेरी मेज की दराज और आलमारी जिसने खोली होगी उससे पूछ लें। मेरे जाने के बाद वहां किसने चीजों की क्या उलटफेर की, उसके बारे में मैं क्या बता सकता हूं। आपको यह तो मेरे आसपास बैठनेवाले लोगों और अपने दूसरे वहां के कर्मचारियों से यह जानकारी लेनी चाहिए।

आपने जिन नए लोगों की भर्ती की है, वे भी आपकी तरह ही प्रचंड प्रतिभा से भरे लगते हैं। जब मैं सारे लेखकों के मोबाइल नंबर लेखों के साथ ही प्रकाशित करता रहा हूं फिर भी वे उनसे संपर्क नहीं कर पा रहे हैं, तो महोदय सोचिए थोड़ा कि आपसे वे लेखकों के संपर्क नंबर मांगकर क्या आपको ही मूर्ख नहीं बना रहे हैं? साथ ही यह भी कि अगर लेखकों से उनके अपने संपर्क ही नहीं हैं तो आप उन्हें वह काम सौंपकर जो लेखकों के सहयोग से होता है, खुद को ही मूर्ख नहीं बना रहे हैं? खैर, यह आपकी समस्या है।

एक चीज आपको यह भी ध्यान दिलाना पड़ेगा कि दैनिक अखबारों में छपने वाले लेख अत्यंत सामयिक होते हैं, उन्हें तत्काल प्रकाशित किया जाता है, उनका बैंक नहीं बनाया जाता। घटनाएं तुरंत पुरानी पड़ जाती हैं, इसलिए दैनिकों के लिए पहले से लिखाकर रखे गए लेखों का संदर्भ बासी हो जाता है, इसलिए वे अनुपयोगी हो जाते हैं। खैर मुझे इन सब चीजों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। मैंने काम किया है और मुझे पारिश्रमिक चाहिए। अगर अतिशीघ्र आपने जनवरी महीने का मेरा वेतन मेरे खाते में जमा नहीं करवाया तो मैं कानूनी कार्रवाई के लिए बाध्य होऊंगा।

हरे प्रकाश उपाध्याय
फीचर एडिटर
हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट, लखनऊ
पूर्व फीचर एडिटर
हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ

देवनाथ बने अमर भारती में मुख्‍य समाचार संपादक

अमर भारती से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार देवनाथ को प्रबंधन ने समूह का मुख्‍य समाचार संपादक बना दिया है. साथ ही उन्हें अमर भारती हिंदी दैनिक के आगरा एवं लखनऊ संस्करण के सम्पूर्ण संचालन का भी प्रभार देकर सर्वाधिकार संपन्न बनाया गया है. लखनऊ संस्करण का अवतरण मार्च २०१२ के अंतिम सप्ताह में करने की तैयारियां चल रही हैं. जिसके लिए अनेक पदों पर नियुक्तियों के लिए लखनऊ/ दिल्ली कार्यालय में साक्षात्कार चल रहे हैं. अभी तक देवनाथ 'समाचार सम्पादक' के पद पर कार्यरत थे.

देवनाथ ने लगभग एक दशक पूर्व पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी जीवन-यात्रा अमर भारती प्रकाशन समूह से ही प्रारंभ की थी. प्रबंधन द्वारा सौंपी गईं सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन उन्होंने बड़ी ईमानदारी और निष्ठापूर्वक किया है. अमर भारती समूह के प्रमुख व समूह सम्पादक श्री शैलेन्द्र कुमार जैन के अनुसार देवनाथ उनके सबसे प्रिय और भरोसेमंद सेनापति हैं. उन्हीं के कन्धों पर समूह के सभी प्रकाशनों के सार्थक और सफल संचालन की जिम्मेदारी है. अमर भारती हिंदी दैनिक समाचार पत्र के संस्करणों का विस्तार उन्हीं के प्रयासों व लगन से संभव हुआ है.

गाइडलाइन के विरुद्ध जाने पर जागरण ने हस्तिनापुर के रिपोर्टर को निकाला

मवाना। हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्र के पीस पार्टी के अपराधिक छवि के प्रत्याशी विधायक योगेश वर्मा के कार्यालय में प्रबंधतंत्र को बिना सूचना दिये जाने पर दैनिक जागरण ने अपने हस्तिनापुर के रिपोर्टर विपिन वर्मा को तत्काल प्रभाव से नौकरी से निकाल दिया है। विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के बाद से ही दैनिक जागरण समूह ने अपने पत्रकारों को प्रत्याशियों के कार्यालय में जाने पर रोक लगा दी है, लेकिन बुधवार की देर रात में दैनिक जागरण के जनपद मेरठ के हस्तिनापुर कस्बे में तैनात रिपोर्टर विपिन वर्मा अपने साथी अमर उजाला के पत्रकार फतेह सिंह निर्मल के साथ में हाल में ही बपसा से निकाले गये अपराधिक छवि के पीस पार्टी के प्रत्याशी योगेश वर्मा के मवाना में स्थित मुख्य कार्यालय में पहुंच गये।

पत्रकारों के कार्यालय में पहुंचने की सूचना किसी व्यक्ति ने जागरण के मेरठ देहात के प्रभारी राजकुमार शर्मा को दी, जिस पर शर्मा ने आनन फानन में मवाना कार्यालय के प्रभारी सुशील विहान को तुरन्त मौके पर जाकर जांच करने के आदेश दिये। कार्यालय प्रभारी ने अपने अधिनस्थ संजीव पांडेय और छायाकार कुलदीप कुमार को पीस पार्टी के कार्यालय पर भेजा। जागरण के पत्रकारों के पहुंचते ही विपिन वर्मा दरवाजे के पीछे दुबक गये, लेकिन जागरण कर्मियों ने विपिन वर्मा को पकड़ लिया और तत्काल इसकी सूचना मेरठ देहात के प्रभारी राज कुमार शर्मा को दी। शर्मा ने संस्थान की हाई मैनेजमेंट को प्रकरण की सूचना दी जिस पर जागरण प्रबंधतंत्र ने तत्काल प्रभाव से हस्तिनापुर के जागरण के पत्रकार को बर्खास्त कर दिया। बताया गया है कि पीस पार्टी के प्रत्याशी योगेश वर्मा के सजातीय होने के कारण विपिन वर्मा योगेश का सर्मथन कर रहे है। गौरतलब है कि एक पखवाडे पूर्व ही जागरण ने अपने फलावदा के पत्रकार तनवीर को भी गलत कामों के आरोप में बर्खास्त कर दिया था। पर इस मामले में दिलचस्‍प तथ्‍य यह है कि यहां पर दोनों मामलों में अमर उजाला के पत्रकार भी संलिप्‍त पाए गए पर एक में तो प्रबंधन ने जांच के बाद क्‍लीन चिट दे दी, जबकि दूसरे मामले में हस्तिनापुर के पत्रकार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।  

उत्‍तराखंड के मंत्री ने सहाराश्री को भेजा पत्र, रिपोर्टर व चैनल पर लगाया दुर्भावना से ग्रसित होकर खबरें दिखाने का आरोप

उत्‍तराखंड के नगर विकास, पर्यटन, गन्‍ना विकास समेत कई मामलों के मंत्री मदन कौशिक ने आरोप लगाया है कि उत्‍तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान सहारा चैनल और उसके रिपोर्टर ने उनके खिलाफ दुर्भावना और पूर्वाग्रह से ग्रस‍ित होकर खबरें चलाईं. जिससे वे काफी दुखी हैं तथा उनके मान-सम्‍मान को ठेस पहुंचने के साथ उनका चुनाव भी प्रभावित हुआ है. इस संदर्भ में मंत्री महोदय ने सहारा के चेयर मैन को पत्र एवं मेल भेजकर इस संदर्भ में कार्रवाई किए जाने की मांग की है. उन्‍होंने एक प्रति भड़ास के पास भी भेजी है, जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

सेवामें,
चेयरमैन,
सहारा मीडिया,

महोदय,

लोकतंत्र की रक्षा और विकास में मीडिया की अहम भूमिका है। लेकिन बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपका मीडिया समूह इस दिशा में ठीक तरीके से काम नहीं कर रहा है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान आपके चैनल और आपके रिपोर्टर ने मेरे खिलाफ दुर्भावना के तहत खबरें दिखाईं जिससे मैं काफी आहत हुआ हूं। इस संदर्भ में मैंने कोरियर से आपको पत्र भी भेजा हुआ है। जिसकी कॉपी इस मेल के साथ भी भेज रहा हूं। कृपया इस संदर्भ में जल्द से जल्द कठोर कार्रवाई करें।

मदन कौशिक
 मंत्री
नगर विकास, पर्यटन, गन्ना विकास, चीनी उद्योग तथा
बाह्य सहायतित परियोजनाएं
 उत्तराखंड

नसीमुद्दीन और मुन्‍काद बसपा के दलाल : अवधेश वर्मा

: भाजपा महासचिव ने कांग्रेसी और बसपा नेताओं को सूपर्णखा और खर-दूषण बातया : शाहजहांपुर। भाजपा के ददरौल विधान सभा से भाजपा प्रत्याशी के नामांकन से पूर्व एक सभा को सम्बोधित करने आये भाजपा के राष्‍ट्रीय महासचिव ने यूपी के चुनाव की तुलना रामायण से कर डाली और कहा कि जिस तरह से रामायण में राक्षस मायावी रूप धर कर के छलने और काम बिगाड़ने का काम करते थे ठीक उसी प्रकार कांग्रेस तथा बसपा के नेता यूपी के चुनाव में क्रीम पाऊडर लगाकर कहीं सूपर्णखा, खरदूषण और मारीच आ रहे है, तो कही सुरसा आ रही है। वह जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे है जनता को इन मायावी राक्षस रूपी नेताओं से बच कर रहने की जरूरत है।

अवधेश के नामांकन से पूर्व एक जनसभा को संबोधित करते हुये भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नरेन्द्र सिंह तोमर ने यूपी के चुनावो की तुलना सतयुग से कर डाली तोमर ने कहा किस जिस तरह से रामायण में एक पक्ष राम का था तो दूसरा असुरों का। असुर मायावी रूप धर कर छलने का काम करते थे, ठीक उसी प्रकार यूपी की जनता को छलने के लिये क्रीम पाऊडर लगाकर सूपर्णखा, खरदूषण,मारीच और सुरसा आ रहे हैं। जनता को इन मायावी नेताओं की मीठी मीठी बातों से बचना चाहिए। और अब समझ-बूझ का परिचय देते हुये भाजपा के पक्ष में मतदान करने की जरूरत है। जिस से यूपी की सत्ता में राक्षस रूपी नेताओं के हाथों में न जाने पाये। नरेन्द्र सिंह के यूपी में क्रीम पाऊडर लगाकर सूपर्णखा, खरदूषण, मारीच और सुरसा आ रही है, किस के लिये कहा, कहीं कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को खरदूषण और उनकी बहन प्रियंका के लिए सूपर्णखा की तरफ तो इशारा नहीं था, कहीं मारीच कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह को तो नहीं बता गये नरेन्द्र सिंह तोमर। सुरसा का इशारा कहीं मायावती की तरफ तो नहीं था, इस तरह की चर्चा करते हुये जनता को सुना गया।

यूपी की बसपा सरकार में पिछडावर्ग कल्याण मंत्री रहे अवधेश वर्मा को मायावती ने मंत्रिमडल से बर्खास्त कर उनका टिकट भी काट दिया था। मंत्री पद से बर्खास्तगी और टिकट कटने के बाद दो जनवरी को अपने आवास पर हवन करने के बाद समर्थकों के बीच पहुंचे अवधेश वर्मा एक दम दहाडे़ मार कर रोने लगे। मंत्री पद गंवाने और टिकट कटने से आहत अवधेश के रोने के बाद उसी शाम वह भाजपा में शामिल हो गये और भाजपा ने ददरौल से टिकट भी दे दिया। आज वह ददरौल से भाजपा प्रत्याशी के तौर पर नामांकन कराने के लिये शहर से बाहर गीतापुरम कालोनी में अपने सर्मथकों को संबोधित करते हुये अवधेश वर्मा ने नसीमुद्दीन और मुन्काद अली को बसपा का दलाल बता दिया। नामांकन में देरी हो जाने की वजह से अवधेश को एक किलो मीटर लम्बी दौड़ लगानी पड़ी तब कही जाकर वह समय से नामांकन परिसर में पहुंच सके। वहीं जब अवधेश से दौड़ के बारे में पूछा गया तो वह बोले कि वह जनता के हर सुख और दुख में दौड़ लगा कर उस के साथ खडे़ होंगे। 

शाहजहांपुर से सौरभ की रिपोर्ट.

शराब-साड़ी बांटने पर गाजीपुर में बसपा प्रत्‍याशी डा. राजकुमार समेत चार पर मुकदमा

यूपी में वोटरों के लुभाने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं. इसी कड़ी में गा‍जीपुर में वोटरों को प्रलोभन देने के आरोप में सदर विधानसभा से बसपा प्रत्‍याशी डा. राजकुमार सिंह गौतम समेत चार लोगों के खिलाफ देर रात आचार संहिता उल्‍लघंन का मामला दर्ज कियो गया है. बताया जा रहा है कि नंदगंज थाना क्षेत्र के माताबांध, अलीपुर, बनगांवा में बसपा प्रत्‍याशी के समर्थकों द्वारा मतदातओं को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए शराब, साड़ी तथा रुपये बांटते हुए पकड़ा गया.

बताया जा रहा है कि पुलिस छापेमारी में इन लोगों के वाहन में 43 हजार रुपये की नगदी, 100 साडि़या और शराब की बोतलें बरामद हुईं. पुलिस ने सारे सामान तथा वाहन को जब्‍त करते हुए बसपा प्रत्‍याशी डा. राजकुमार सिंह गौतम समेत चार लोगों के खिलाफ नंदगंज थाने में मुकदमा दर्ज की है. इसकी जानकारी आयोग को भी दे दी गई है. गौरतलब है कि डा. वर्तमान में जमानियां विधानसभा सीट से बसपा विधायक हैं. परिसीमन के बाद वे इस बार सदर सीट से बसपा प्रत्‍याशी बनाए गए हैं.

उबल रहे हैं यूपी के पुलिसकर्मी, आजमगढ़ में सामूहिक इस्‍तीफे की धमकी

: आईपीएस अधिकारियों के दोहरे रवैये से हैं नाराज : आजमगढ़ जिले के पुलिसकर्मी उबल रहे हैं. ये उबाल आईपीएस अधिकारियों के दोहरे चरित्र के चलते आया है. अधिकारियों के रवैये से नाराज पुलिसकर्मी एक दिन का सांकेतिक भूख हड़ताल भी कर चुके हैं. अब सामूहिक इस्‍तीफे की बारी है. वे उसी राह पर चल रहे हैं, जिस राह पर बस्‍ती में कमिश्‍नर और एसपी विवाद के बाद आईपीएस अधिकारी चले थे. अधिकारी मामले को दबाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं पर आग अब तेज होती जा रही है. ऐसा लग रहा है कि यह आग पूरे यूपी में फैल सकती है.

अमर उजाला ने आज अपने पहले पन्‍ने पर छापा है इस खबर को. खबर के अनुसार पुलिसकर्मियों ने सामूहिक इस्‍तीफे की धमकी दी है. यूपी में पुलिस कल्‍याण संगठन बनाने की मांग काफी अर्से से चल रही है. सिपाही बृजेंद्र सिंह यादव ने पुलिस विभाग में व्‍याप्‍त अनियमितताओं को लेकर अर्से से संघर्षरत रहे हैं. इनको कई बार बर्खास्‍त किया गया है. इनके भाई को भी बर्खास्‍त किया गया. वो भी इस आधार पर कि पुलिस बल को संगठन बनाने की मनाही है. संगठन बनाकर दबाव बनाना विद्रोह की श्रेणी में आता है. इसे आधार बनाकर पुलिसकर्मियों को संगठन बनाने से रोक दिया गया, पर इन्‍हीं अधिकारियों के दोहरे रवैये के बाद यह आग फिर से सुलग चुकी है. और अगर शीघ्र इन मांगों पर अधिकारियों ने ध्‍यान नहीं दिया तो इसे धधकने से रोक पाना बहुत मुश्किल होगा.

अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार पुलिस कल्‍याण संगठन ने अपनी ग्‍यारह सूत्रीय मांगों को लेकर एक पर्चा छपवाया है. इसमें पुलिसकर्मियों की गृह जनपद में पोस्‍िटंग, बिना परीक्षा के प्रोन्‍नति, अध्‍यापक के समान वेतन, पुलिस रेगुलेशन एक्‍ट की धारा 1861 में बदलाव, आठ घंटे की ड्यूटी, वोट देने का अधिकार समेत कुछ अन्‍य मांगें भी शामिल हैं. बृजेंद्र सिंह यादव काफी अर्से से इंस्‍पेक्‍टर स्‍तर तक के पुलिसकर्मियों के वेतन से पुलिस कल्‍याण के नाम पर पैसे काटे जाने का विरोध करते रहे हैं. उन्‍होंने अब तक के कथित करोड़ों के घोटालों के खिलाफ अदालत की चौकठ भी खटखटा चुके हैं. पिछले दिनों बस्‍ती में हुए घटनाक्रम के बाद यह मामला एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है.

बताया जा रहा है कि एक फरवरी को कथित नोटिस के बाद आजमगढ़ के पुलिसकर्मियों ने दो फरवरी को पुलिस लाइन की मेस में खाना ना खाकर सांकेतिक हड़ताल किया. हालांकि अधिकारी स्‍तर पर इस मामले को दबाने की बात हुई. पर पर्चे के जगह जगह चिपकाए तथा बंटवाए जाने के बाद इसे दबा पाना संभव नहीं हो पाया. इस पर्चे में बृजेंद्र सिंह यादव का नाम  निवेदक के रूप में दिया गया है. खबर है कि पुलिसकर्मियों ने 15 फरवरी को सामूहिक इस्‍तीफे की धमकी दी है. इससे पुलिस अधिकारियों के हाथ-पांव फूले हुए हैं. बताया जा रहा है कि पुलिसकर्मी इस बात को लेकर नाराज हैं कि जब वे संगठन बनाने की बात करते हैं तो उसे विद्रोह की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाता है.

पुलिसकर्मियों का कहना है कि आईपीएस अधिकारियों ने पिछले दिनों जो किया क्‍या वह विद्रोह की श्रेणी में नहीं आता है? आईपीएस अधिकारियों के रवैये के बाद से ही पुलिसकर्मियों को ऊर्जा मिली है. उल्‍लेखनीय है कि बस्‍ती के कमिश्‍नर अनुराग श्रीवास्‍तव द्वारा सिद्धार्थनगर के एसपी के साथ दुर्व्‍यवहार के बाद तमाम आईपीएस अधिकारियों ने आईपीएस एसोसिएशन को इस्‍तीफा देकर सरकार पर दबाव बनाया था तथा सफल भी रहे थे. आईपीएस अधिकारियों के दबाव में कमिश्‍नर का तबादला भी कर दिया गया था. पर वो ही अधिकारी पुलिसकर्मियों के मामले में दोहरी नीति अपनाने लगते हैं. उन्‍हें पुलिसकर्मियों की मांग विद्रोह लगने लगती है.

बताया जा रहा है कि आईपीएस अधिकारियों के इस कदम ने पुलिसकर्मियों को भी उद्देलित एवं उत्‍तेजित कर दिया है. वे भी अब अपना संगठन बनाने तथा अपनी मांगे मनवाने के लिए सामूहिक इस्‍तीफे के हथियार के इस्‍तेमाल की योजना बना रहे हैं. अभी शुरुआत आजमगढ़ से होने जा रही है. बताया जा रहा है कि आजमगढ़ के पुलिसकर्मी 15 फरवरी को सामूहिक इस्‍तीफा देने की बात कह रहे हैं. अगर आजमगढ़ में मामला नहीं सुलझा तो समझा जा रहा है कि यह पूरे यूपी में संक्रामक रोग की तरह फैल जाएगा. पुलिसकर्मियों की सबसे ज्‍यादा नाराजगी आईपीएस अधिकारियों के दोहरे रवैये को लेकर है.

वरिष्‍ठ खेल पत्रकार सुरेश गावड़े का निधन

इंदौर : वरिष्ठ खेल पत्रकार और मध्यप्रदेश टेबल टेनिस संघ के अध्यक्ष सुरेश गावड़े का निधन हो गया। गावड़े 75 वर्ष के थे। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय से आंशिक रूप से अस्‍वस्‍थ महसूस कर रहे गावड़े की तबीयत गुरुवार की शाम अचानक बिगड़ गई। उन्‍होंने आज तड़के घर में आखिरी सांस ली। गावड़े ने हिंदी दैनिक नई दुनिया को लम्‍बे समय तक अपनी सेवांए दीं। वह कई अन्‍य अखबारों से भी जुड़े रहे। मध्‍य प्रदेश में गावड़े को टेबल टेनिस के पितृ पुरुषों में गिना जाता है. गावड़े भारतीय टेबल टेनिस महासंघ में भी म‍हासचिव समेत कई अहम पदों पर रहे। उनके कोई पुत्र नहीं है। वे अपने पीछे पत्‍नी तथा बेटी व दामाद छोड़ गए हैं।

बदलाव : जो माया के अपने थे, अब होने लगे मुलायम के

नौकरशाह, उद्योगपति और मीडिया की चाल और मूड से देश में होने वाली गतिविधियों और भावी परिवर्तनों को आसानी से समझा जा सकता है, क्योंकि जनता और शासन के मध्य ये तीनों एक पुल की भांति होते हैं, और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से इनका सत्ता और जनता से गहरा जुड़ाव और रिश्ता होता है। ऐसे में अगर इन तीनों की चाल, मूड, भाषा, स्वभाव और कार्यशैली में बदलाव दिखाई दे तो यह समझ लेना कुछ होने वाला है या फिर बदलाव के संकेत है। बसपा शासनकाल में जो लोग सता के नाक के बाल थे वो एक-एक करके किसी न किसी बहाने से उससे दूर छिटक रहे हैं, या दूर होने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। माया मेमसाहब के सबसे करीबी नौकरशाह केन्द्र में प्रतिनियुक्ति के लिए अर्जी लगा रहे हैं तो बहनजी के खासम खास उद्योगपति भी बोरिया बिस्तर समेटने की कवायद में जुट गये हैं।

बदलाव की हवाओं से मीडिया भी अछूता नहीं है, बदलाव के खुशबू सूंघकर मीडिया ने चाल और भाषा बदल दी है। ये चर्चा जनता में भी आम है कि अबकि बदलाव तो जरूर होगा। आम आदमी के मन में यह सवाल उमड़-घुमड़ रहा है कि सत्ता की चाबी किसको मिलेगी। अलग-अलग विचार और गणित हैं, लेकिन कुल मिलाकर बदलाव होगा ये बात तय हो चुकी है। खुफिया और मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नौकरशाह इस बात को सबसे पहले समझ गये कि बहनजी की सरकार बनना मुश्किल है, ऐसे में सत्ता से दूरी बनाने में ही भलाई है। पंचम तल में बैठने वाले बहनजी के खासमखास नौकरशाह ने तो चुनाव की घोषणा से पहले ही समाजवादी पार्टी में लाइजनिंग और मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया था, सूत्रों की माने तो नेताजी के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव की लखनऊ में आयोजित शादी की रिसेप्शन पार्टी का सारा प्रबंध इसी नौकरशाह के चम्मचों ने किया था।

चुनावी शंखनाद के साथ ही बसपा सरकार के डूबते जहाज से कूदने और साथ छोड़ने वाले अफसरों की लाइन ही लग गयी। हालत यह है कि बहनजी की आंख, कान और हाथ माने जाने वाले एक दर्जन से अधिक अफसर बदलाव की सुगबुगाहट के बीच केंद्र में प्रतिनियुक्ति के लिए राज्य सरकार के समक्ष अर्जी लगा चुके हैं। प्रतिनियुक्ति चाहने वालों में मुख्य सचिव अनूप मिश्र के अलावा पंचम तल के ताकतवर नौकरशाह रवीन्द्र सिंह, जेएन चौम्बर, प्रदीप शुक्ला, आरपी सिंह, अनिल संत, सुशील कुमार, मोहम्मद मुस्तफा और कई आईपीएस आफिसर भी हैं। इसके अलावा बहनजी के करीबी एक दर्जन के करीब आईएएस और आईपीएस अफसरों ने समाजवादी खेमे में आमद दर्ज करा ली और इन दिनों ये महानुभाव सपा नेताओं को पटाने और आगे की गोटियां फिट करने में समय बिता रहे हैं। नौकरशाहों की तरह बहनजी के आर्थिक स्त्रोतों अर्थात उद्योगपतियों ने भी बहनजी और सत्ता से दूरी बनानी शुरू कर दी है।

बहनजी के राज में सोनभद्र से लेकर नोएडा तक की बेशकीमती जमीनें लूटने और प्राकृतिक संसाधनों के लुटरे जेपी ग्रुप ने तमाम विकास योजनाओं के काम से हाथ खींच लिया है, बैंक गारंटी के तौर पर जमा धनराशि की वापसी की कार्रवाई शुरू कर दी है। जेपी ग्रुप के पास ही बहनजी के ड्रीम प्रोजेक्ट यमुना एक्सप्रेसवे का ठेका था। लेकिन बदलाव की सूंघ लगते ही कम्पनी ने काम बंद करने और पीछे हटने में ही भलाई समझी है। बहनजी के सबसे खास उद्योगपति और शराब माफिया पोंटी चड्डा ने भी सोची समझी रणनीति और बहन जी को दुबारा सत्ता हासिल होते न देख दूरी में ही भलाई समझ आ रही है। सूत्रों की माने तो पोंटी जिस तरह से बसपा से दूरी बना रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगला शासन मायावती का नहीं होगा। पोंटी को बखूबी पता है कि पिछले पांच सालों में उनके और माया सरकार के करीबी रिश्तों को लेकर खूब चर्चा हुई है, ऐसे में अगर कोई अन्य सरकार बनी तो वह उनकी कम्पनी को अछूत समझकर किनारे लगा सकती है। यह बात यह बिजनेस मैन होने के नाते पोंटी कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि पोंटी ने ही अपने ठिकानों पर खुद आयकर विभाग के छापे की कार्रवाई करवाई है। छापों के बाद अब कोई यह नहीं कह पाएगा कि पोंटी के पास काले धन की खान है दूसरा पोंटी के करीबी यह कहते हुए बसपा को उसका ‘हक’ देने से बच जाएंगे कि उन्होंने कुछ कमाया ही नहीं तो देंगे कैसे।

सपा सुप्रीमो के साथ पोंटी के अच्छे संबंध रहे हैं, मुलायम ने बसपा से गठबंधन सरकार के जमाने में पोंटी को मायावती से मिलवाया था। ऐसे में मुलायम की नजरों में पाक-साफ दिखने के लिए अपने कांग्रेसी संबंधों की मदद से पोंटी ने आगे की राह साफ कर ली है। बदलाव की हवा जेपी ग्रुप और पोंटी चड्डा के अलावा कई दूसरे औद्योगिक घरानों ने सूंघ ली है। सूत्रों के अनुसार इस बार औद्योगिक घरानों ने सबसे अधिक चंदा सपा को ही दिया है और परिवर्तन भांपकर औद्योगिक घराने आगे की रणनीति को समाजवादी नजरिये से देखने-समझने की जुगत में लगे हैं। ऐसे में मीडिया जगत को बखूबी पता है कि सूबे में अगली सरकार बसपा की नहीं होगी यह तय है। ऐसे में बसपा को कम कवरेज से लेकर मीडिया जगत में हलचल और भावी सरकार से जुड़े पत्रकारों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाने की कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। अधिकतर अखबार प्रबंधन और मीडिया हाउस अखबार और चैनल की बागडोर यूपी में उनके हाथ में सौंप रहा है जिनका समाजवादी पार्टी से मधुर संबंध हैं। सूबे में चुनावी मौसम में दर्जनों नये अखबार और चौनल इस कड़ी का हिस्सा है, और लगातार अखबार और चैनल के उच्च पदों पर परिवर्तन और नयी नियुक्तियां परिवर्तन की संभावना की वजह से ही हैं।

लब्बोलुआब यह है कि सूबे की सत्ता में परिवर्तन होगा, यह नौकरशाह, उद्योगपति और मीडिया के बदले रूख और चाल से समझा जा सकता है। असल में होगा क्या है यह तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे लेकिन सत्ता के सबसे करीबी लोगों और संगठनों में अचानक बदलाव, हलचल और तेजी दिखाई दे तो कहानी समझ में आ ही जाती है और यूपी में जिस तरह से नौकरशाह, उद्योगपति और मीडिया में जो अस्वाभाविक परिवर्तन दिख रहे हैं, वो साफ तौर पर सत्ता परिवर्तन की चुगली कर रहे हैं।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ लखनऊ में स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

”हमार टीवी अपने सदस्‍य पर हुए हमले से अचंभित है”

हमार टीवी परिवार अपने एक सदस्य पर हुए हमले से अचंभित है। लखनऊ के हमार संवाददाता खालिद गौरी पर हुआ हमला दरअसल कलम पर बंदूक का वार दिखाता है। हमार टीवी प्रबंधन ने पहले गलतफहमी का शिकार हो के जिस व्यक्ति पर भरोसा किया था। उस चंद्र प्रकाश सिंह उर्फ सीपी सिंह नाम के व्यक्ति ने हिंसा के जरिए जवाब देने की कोशिश की। दरअसल इस  हादसे में भड़ास4मीडिया की भी एक भूमिका है।

जब लखनऊ के सीपी सिंह हमार टीवी से जोड़े गए थे तब भड़ास4मीडिया ने ही अपनी जिम्मेदारी का परिचय देते हुए सीपी सिंह का कच्चा चिट्ठा उजागर किया था। जिसमें बताया गया था कि कैसे चंद्रप्रकाश सिंह उर्फ सीपी सिंह पर कई तरह के आपराधिक मामले दर्ज हैं। कब उन्हें फर्जी कमिश्नर बनकर घूमते हुए गिरफ्तार किया गया। उन्हें लाल बत्ती और अपने रुसूख का इतना शौक है कि उन्होंने दिल्ली स्थित अपने संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए एक सैटेलाईट चैनल की ब्यूरो चीफ की पदवी हासिल कर ली। खबर आने के बाद हमार टीवी प्रबंधन ने जांच की और पाया कि सीपी सिंह वाकई कई हथियारबंद लोगों के साथ घूमते हैं। कई तरह के गलत धंधों में उनका हाथ तो है ही वो खुलेआम सड़कों पर वसूली भी करते हुए चलते हैं। ऐसे में किसी भी मीडिया संस्थान को अपनी छवि की चिंता होनी लाजिमी है।

इसके बाद भड़ास4मीडिया की खबर पर कार्रवाई करते हुए चंद्र प्रकाश सिंह का अनुबंध हमार टीवी से रद्द कर दिया गया और जिला संवाददाताओं और मार्केटिंग अधिकारियों को उनसे संपर्क नहीं रखने का आदेश जारी कर दिया। इस बारे में हमार टीवी पर लगातार कई दिनों तक न्यूज स्क्रोल भी चलता रहा। इसके अलावा सीपी सिंह को बिना जांच के संस्थान में लाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को भी विदाई दे दी गई। पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के चेयरमैन मतंग सिंह ने खुद पहल करके ये कदम उठाया। हमार टीवी के चैनल हेड अंशुमान आनंद ने सीपी सिंह से अनुबंध रद्द होने से संबंधित बयान भी प्रसारित किया। इस प्रकरण से बौखलाए सीपी सिंह ने लखनऊ में कार्यरत हमार टीवी की टीम पर हमला करके कायराना कदम उठाया है। इस बारे में हमार टीवी प्रबंधन समुचित कानूनी कार्रवाई कर रहा है। इसके अलावा बाकी के मीडिया संस्थानों से अपील भी जारी करता है कि सीपी सिंह जैसे पत्रकारिता को बदनाम करने वाले व्यक्ति को खुद से दूर रखके अपने दामन को दागदार होने से बचाएं। प्रेस रिलीज

आगरा से लांच हुआ टुडे एक्‍सप्रेस मैगजीन

Dear Sir, We have launched a new national news magazine "Today Express" from Agra. This magazine focuses on the awareness of the society. We will follow the rich history of the Agra Journalism. We would like to be the voice of Today's India. With this aim we are in front of you with our very good team. We will always try that we will not do any partiality with anyone. The Today Express Family is listed below:

Group Chairman :                     Dharmendra Agarwal

Owner, Publisher & Printer :       Vijay Agarwal

Chief Editor :                                    Deepak Raj

Editor :                                              G.S. Sharma

Editorial Team:                                
Sunit Sharma
(Senior Journalist)

Dr. H. S. Solanki
(H.O.D.- C.H.I., Journalism Dept)

Dr. Rajshankar Sharma
 (Profesor, Journalism Dept.)

B.K. Sharma   
(Principal- A.I.I.M.S.)

Achal Sagar Ji Maharaj
 (Writer: Agrasen Puran)

B.B. Dixit

Rajkumar ‘Uppal’

Executive Editor :                           Sushil Sharma

Sub- Editor :                                    Sanjay Kulshreshtha

Marketing Manager :                     Padam Singh

Circulation Manager :                   Sachin Kumar Gupta

Advertisement Manager :             Ajay Parashar

Legal Advisor :                                Piyush Upadhyaya

Design Layout Head :                    Anil Kumar

Photo Journalist Team:                Bablu Bhardwaj (Senior Camera Person)
                                                         Amit Gaur
                                                         Yogesh Kumar

Bureau Head:        

Delhi/NCR :                                      ER. Shyam Mohan Sawasal

With our Today Express Family we expect your blessings.

Thanks and Regards
Vijay Agarwal
Publisher
Today Express.

Press Release

गांधी के धोखेभरे निर्णयों को भी तो सहना ही होगा

पॉंच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में किसका ऊंट किस करवट बैठेगा, इस बात का सही-सही पता तो चुनाव परिणामों के बाद ही चलेगा, लेकिन हर ओर उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणामों के बारे में सर्वाधिक चर्चा हो रही है। हो भी क्यों नहीं, जब दिल्ली की सत्ता का किला उत्तर प्रदेश के रास्ते ही फतह किया जा सकने की सारी सम्भावनाएँ हैं। यूपीए की केन्द्रीय सरकार को उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले ओबीसी के अन्दर अल्पसंख्यकों को अलग से आरक्षण प्रदान करने की बात याद आ रही है। यही नहीं भाजपा को भी उत्तर प्रदेश की सत्ता के लिये राम का नाम और राम मन्दिर याद आने लगा है। इतना ही नहीं भाजपा और भाजपा से सम्बद्ध संगठनों को पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की चिन्ता भी सताने लगी है, जबकि सामान्यत: ये सारे कथित राष्ट्रवादी, हिन्दूवादी और भारतीय संस्कृति के महारक्षक हर राजनैतिक और गैर-राजनैतिक मंच से सामाजिक न्याय की संवैधानिक अवधारणा के विरोध में बयान जारी करते रहते हैं।

इसी सोच के चलते इन लोगों ने जाति आधारित जनगणना का कड़ा विरोध करने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। जिसकी भी असली वजह है, कि ये महामहिम राष्ट्रवादी लोग चाहते ही नहीं कि इस देश के सभी वर्गों और सभी जातियों के लोगों को उनकी जनसंख्या के अनुसार सत्ता, प्रशासन और संसाधनों में संविधान की मूल भावना के अनुसार समान हिस्सेदारी मिले। ये लोग चाहते हैं कि अन्य पिछड़ा वर्ग सहित, सभी आरक्षित वर्गों की सही-सही जनसंख्या का देश की सरकार को पता ही नहीं चलना चाहिये। अन्यथा इनके पास कोर्ट को भ्रमित करने के सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे। यही नहीं इन सबकी नजर में सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ों को भी यदि बहुत जरूरी हो तो आरक्षण देने का प्रावधान केवल और केवल आर्थिक आधार पर ही नजर आता है और दूसरी ओर आर्थिक रूप से पिछड़े अन्य पिछड़ा वर्ग को उच्च शिक्षा में आरक्षण प्रदान करने पर ये ही लोग गला फाड़-फाड़ कर उसका विरोध करने के लिये सड़कों पर उतर आते हैं। आज इन लोगों को भी ओबीसी के आरक्षण में से साढे़ चार फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों को दे देने पर, महान भारत राष्ट्र के खण्डित होने के खतरे सहित, ओबीसी के साथ कथित रूप से हो रहे घोर अन्याय के कारण हार्ट अटैक आने जैसी वेदना हो रही है।

जबकि कड़वी सच्चाई यही है कि अल्पसंख्यकों की केवल और केवल उन्हीं पिछड़ी जातियों को ही साढे़ चार फीसदी आरक्षण प्रदान किया गया है, जो ओबीसी वर्ग में पूर्व से ही शामिल हैं और जिनका समानुपातिक दृष्टि से साढे़ चार फीसदी हक ओबीसी के सत्ताइस फीसदी आरक्षण में बनता है। यही नहीं ऐसा निर्णय करने से पूर्व भारत सरकार ने हर प्रकार से अध्ययन और जानकारी एकत्रित करके इस बात को जॉंचा-परखा है कि अल्पसंख्यकों की जातियों को ओबीसी वर्ग में कितनी हिस्सेदारी मिल रही है। जिसके बाद ही अलग से आरक्षण प्रदान करने का निर्णय लिया गया है। यह अलग बात है कि यह निर्णय राजनैतिक लाभ पाने के लिये पॉंच राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पूर्व लिया गया है। जिसे संवैधानिक भावना के अनुकूल नहीं माना जा सकता। इस सबके उपरान्त भी लगातार आरक्षण और आरक्षित वर्गों के हितों का विरोध करने को ही राष्ट्रहित बतलाने वाली भाजपा और भाजपा के अनुसांगिक संगठनों को भारत सरकार के इस निर्णय का विरोध करने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है।

जहॉं तक धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण प्रदान करने की बात है तो ये बात तो प्रारम्भ से ही लागू की जाती रही है। ओबीसी की सूची में इस्लाम से सम्बन्धित जातियों को शामिल किया गया है। यही नहीं अजा एवं अजजा वर्गों की सूचियों में भी किस-किस धर्म की कौन-कौन सी धर्म-परिवर्तित जातियों को आरक्षण प्राप्त होगा और किस-किस धर्म की धर्म-परिवर्तित जातियों को आरक्षण प्राप्त नहीं होगा। इस बारे में स्पष्ट नीति बनाकर लागू की हुई है। जिसका आज तक इसी आधार पर विरोध क्यों नहीं किया गया? इस बात पर भी चर्चा होनी चाहिये। भाजपा और भाजपा के अनुसांगिक संगठनों को क्या यह नहीं पता कि आदिवासियों के सत्तर फीसदी हक को केवल कुछ मुठ्ठीभर ईसाई आदिवासी छीन रहे हैं। इस बारे में एक भी आवाज सामने नहीं आती है। क्योंकि निरीह आदिवासियों के बारे में भाजपा और उससे सम्बद्ध लोग क्योंकर अपनी ऊर्जा खपाने लगे?

इसी सन्दर्भ में यह बात भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि वेब मीडिया सहित अनेक मंचों पर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि आने वाले दिनों में यदि अजा एवं अजजा वर्गों में शामिल अल्पसंख्यक जातियों को भी अलग से आरक्षण प्रदान किया जायेगा, तब अजा एवं अजजा के प्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं, विचारकों और बुद्धिजीवियों का क्या विचार (तर्क) होगा। मैं इस बारे में यहॉं पर यह कहना बेहद जरूरी समझता हूँ कि जिन मानदण्डों और जिन पैमानों के आधार पर ओबीसी वर्ग की सूची में शामिल अल्पसंख्यक वर्ग की जातियों को अलग से साढे़ चार फीसदी आरक्षण दिया गया है। यदि उन्हीं सब मानदण्डों और पैमानों पर अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि अजा एवं अजजा वर्गों में शामिल अल्पसंख्यक धर्मावलम्बियों की जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है तो अवश्य ही उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में अलग से ‘आरक्षण के अन्दर आरक्षण’ दिया ही जाना चाहिये। केवल यही नहीं-अजा एवं अजजा वर्ग में शामिल हिन्दू या अहिंदू या अन्य धर्मावलम्बी जातियों में भी विभाजन होना चाहिये। जिससे सभी जातियों और समूहों को संविधान की सामाजिक न्याय की मंसा के अनुरूप सत्ता और प्रशासन में अपने-अपने प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिल सकें। आखिर हमें, हमारे संविधान की भावना का आदर तो करना ही होगा।

बेशक यह सब हमें सेपरेट इलेक्ट्रोल के हक को मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी द्वारा धोखे से छीने जाने के कारण सहना और करना पड़ रहा है। अन्यथा यदि डॉ. भीमराव अम्बेड़कर की सेपरेट इलेक्ट्रोल की न्यायसंगत मांग को मानकर के भी गॉंधी द्वारा छलपूर्वक देश पर पूना पैक्ट नहीं थोपा गया होता तो सरकारी सेवाओं में और सरकारी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण नाम की कोई अवधारणा भारत में होती ही नहीं! गॉंधी की विरासत को संभालते हुए हमें एम के गॉंधी के निष्ठुर और हृदयहीनता के परिचायक धोखेभरे निर्णयों को भी तो सहना ही होगा।

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' होम्योपैथ चिकित्सक तथा मानव व्यवहारशास्त्री, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

पांच लाख मिलने का जश्‍न नहीं मना पाए आशीष, हिंदुस्‍तान ने बैठाई जांच

: शिक्षा विभाग ने दिया है पत्रकार को ये पैसे : पटना का शिक्षा विभाग सौ साल पूरे होने पर इतना दरियादिल हो गया है कि किसी को भी पैसा बांट दे रहा है. जिसको मन कर रहा है उसको, तभी तो राष्‍ट्रीय सहारा ने कल खबर प्रकाशित किया है कि 'जश्‍न मनाना है तो शिक्षा विभाग आएं'. पर राष्‍ट्रीय सहारा की खबर ने पैसा पाकर जश्‍न मना रहे एक पत्रकार को मुश्किल में डाल दिया है. अब बेचारे पत्रकार को प्रबंधन के सवालों के जवाब देने पड़ रहे हैं. बेचारे कोस रहे होंगे उस घड़ी को जब राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार ने यह खबर लिखी होगी.

पटना के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं आशीष कुमार मिश्र. हिंदुस्‍तान के ब्‍यूरो आफिस में काम करते हैं. सालों से शिक्षा बीट पर जमे हुए हैं. शिक्षा विभाग के लोगों से बहुत याराना हो गया है. सब मानते हैं. जब शिक्षा विभाग के सौ साल पूरे हुए तो सरकार की तरफ से उसे खर्च करने के लिए दस करोड़ रुपये मिले. अब इतनी बड़ी रकम वह कैसे खर्च करे यह समझ में नहीं आया, तब उसने ऐसे-वैसे तथा खास लोगों में पैसा बांटना शुरू किया. तो अपने पत्रकार मित्र को भी शिक्षा विभाग नहीं भूला. विभाग ने आशीष कुमार मिश्र को 4 लाख 95 हजार रुपये दिए. इसका किसी को पता नहीं चला. उनके अखबार हिंदुस्‍तान को भी नहीं.

पत्रकार महोदय खुश थे, विभाग भी उन्‍हें उपकृत करके खुश था, पर राष्‍ट्रीय सहारा की खबर में जश्‍न में खलल डाल दिया. खबर में पैसे पाने वालों की सूची में आशीष कुमार मिश्र नाम भी आ गया और शुरू हो गई बेचारे की खुशियों में खलल. प्रबंधन को भी पैसा वाली बात पता चल गई. और शुरू हो गई आशीषजी से पूछताछ. प्रबंधन ने पूछा भइया किस मद में शिक्षा विभाग ने आपको पैसा दिया है, वो भी पांच लाख में पांच हजार कम. ऐसा कौन सा काम आपने कर दिया कि शिक्षा विभाग आप पर मोहित हो गया है. इतनी पूछताछ होती तो गनीमत थी कि कुछ भी बताकर बचा जा सकता था. पर बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने जांच की कार्रवाई शुरू कर दी है.

प्रबंधन अब पता लगाने में जुटा हुआ है कि आखिर इतना पैसा शिक्षा विभाग ने इन्‍हें क्‍यों और किस मद में दिया है. क्‍या करने वाले हैं आशीष या क्‍या कर चुके हैं, जो इतनी बड़ी सरकारी रकम वो भी लीगल तरीके से इन्‍हें दी गई है. दूसरी तरफ ये खबर भी है कि शिक्षा बीट देखने वाले दूसरे अखबारों के पत्रकार भी अब शिक्षा विभाग से नाराज हो गए हैं. इन लोगों का मानना है कि जब मिश्र जी को उतना पैसा दिया जा सकता है तो कुछ पैसों पर तो उनलोगों का भी हक बनता ही था, आखिर वे लोग भी तो इस बीट को कवर करते हैं. खैर, अब देखना है कि इस मामले में हिंदुस्‍तान प्रबंधन क्‍या निर्णय लेता है. नीचे राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित खबर.  


                                जश्न मनाना है तो शिक्षा विभाग आयें

पटना। जश्न मनाने की इच्छा रखने वालों के लिए शिक्षा विभाग ने दरवाजा खोल दिया है। यह दरियादिली शिक्षा विभाग बिहार के सौ साल पूरा होने के उपलक्ष्य में दिखायी है। सरकार ने शिक्षा विभाग को बिहार दिवस के लिए नोडल विभाग घोषित किया है। विभाग ने भी सरकार की इस सोच को जमीन पर उतारने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती है। शिक्षा विभाग इसके आयोजन पर दस करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया है। बिहार दिवस का मुख्य समारोह 22 से 24 मार्च तक गांधी मैदान में आयोजित होगा। गांधी मैदान के अंदर लाइव टेलीकॉस्ट करने के लिए शिक्षा विभाग ने साक्षी कम्युनिकेशन को दायित्व दिया है। इस पर करीब छह लाख रुपये खर्च होगा। लगभग इतनी ही राशि बुजुर्ग नागरिकों के अनुभव और यादों को समेटने पर खर्च करने का फैसला किया है। इसके तहत बुजुर्ग व वृद्ध जनों की यादों को पुस्तक के रूप में संरक्षित किया जायेगा।

विभाग के सहायक निदेशक ओंकार प्रसाद सिंह के अनुसार इससे बिहार की युवा पीढ़ी अपने गौरवशाली अतीत को जान सकेगी एवं बुजुर्गों को भी अपनी संवेदना और विचारों को अभिव्यक्त करने का अवसर मिलेगा। शिक्षा विभाग ने इसके लिए दस दिनों के अंदर विचारों को मांगा है। एक से चार मार्च तक होने वाले वि कप महिला कबड्डी खिलाड़ियों के प्लेन टिकट और वाहन उपलब्ध कराने के लिए प्रथम किस्त में चालीस लाख रुपये दिये गये हैं और बीस लाख रुपये और दिया जाना बाकी है। इसी कार्यक्रम के लिए होटल सम्राट इंटरनेशल, होटल मगध को बुक किया गया है और इसके लिए करीब दो लाख अस्सी हजार रुपये का भुगतान किया गया है। मुम्बई की संस्था आर्ट एंड आर्टिस्ट को तिरंगा कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए 25 लाख रुपये की राशि दी गयी है। दो लाख रुपये खर्च कर सरकार ने चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में इंटर कॉलेज फेस्टीवल पर खर्च करेगी। इसी तरह बिहार के ऐतिहासिक पुरातात्विक विरासत को फिल्म में समेटने के लिए काशी प्रसाद जायसवाल को एक लाख रुपये दिये हैं।

अब भी अपने कार्यक्रम से बिहार दिवस में रौनक लाने की दावा करने वाले लोगों का शिक्षा विभाग में आना जाना लगा है। बिहार के सौ साल पूरा होने के उपलक्ष्य में विभाग ने दिखायी दरियादिली आयोजकों को चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर मिल रही स्वीकृति 1. आर्ट एंड आर्टिस्ट इंडिया प्रा. लि. 25 लाख रुपये 2. सूत्रधार, खगौल पटना एक लाख रुपये 3. भारतीय जननाटय़ संघ, पटना 75 हजार रुपये 4. श्रीमती नीतू कुमारी पांच हजार रुपये 5. श्री मनोरंजन ओझा पांच हजार रुपये 6. आरबी सिंह, साक्षी कम्यूनिकेशन पांच लाख पांच हजार 50 रुपये 7. आशीष कुमार मिश्र, पत्रकार चार लाख 95 हजार रुपये 8. डा.एसपी सिंह चाणक्या लॉ यूनिवर्सिटी, पटना दो लाख रुपये 9. डा. सुनीता राय और प्रो. प्रभाकर झा पटना विवि एक लाख रुपये 10. डा. विजय कुमार चौधरी निदेशक, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान एक लाख रुपये.

धोखाधड़ी का आरोपी चैनल24 का मालिक गिरफ्तार, रिमांड पर भेजा गया

शिमला : धोखाधड़ी के आरोपी और चैनल24 के मालिक और ठगे गए बेरोजगारों के बीच तीन माह पहले हुआ समझौता सिरे नहीं चढ़ पाया है। इस पर पुलिस चैनल के मालिक राजेंद्र सिंह विदान को रोहतक से गिरफ्तार कर शिमला ले आई। आरोपी को गुरुवार को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे शुक्रवार तक पुलिस रिमांड पर भेजने का आदेश दिया गया। इस मामले में चैनल के महाप्रबंधक प्रेम शर्मा को पुलिस ने पिछले वर्ष गिरफ्तार कर लिया था, मगर चैनल मालिक भूमिगत हो गया था।

चैनल मालिक बीते साल नवंबर में पुलिस पुलिस के हत्थे चढ़ा। गिरफ्तारी के बाद उसने बेरोजगार युवकों व युवतियों का पैसा लौटाने की पेशकश की। युवाओं ने इस पेशकश को स्वीकार करते हुए लिखित रूप में पुलिस को दिया कि यदि उन्हें पैसा लौटा दिया जाता है तो वह शिकायत वापस ले लेंगे। हालांकि आरोपी ने समझौते के बाद कुछ युवकों को 50 हजार रुपये दे दिए, लेकिन शेष राशि पर नहीं दी। चैनल मालिक तीन लाख रुपये और देने की बात कर रहा था, मगर दूसरा पक्ष साढ़े पांच लाख रुपये पर अड़ा रहा। समझौता सिरे नहीं चढ़ने के बाद आरोपी हरियाणा में फिर भूमिगत हो गया था।

गौरतलब है कि राजधानी में चैनल लांच करने से पहले राजेन्द्र विदान ने पत्रकार वार्ता का आयोजन किया था, जिसमें झारखंड के एक स्थानीय नेता ने भी शिकायत की थी। नौकरी पर रखने से पहले आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को प्रशिक्षण देने का प्रावधान किया गया था। इसके लिए उम्मीदवारों से 15 से लेकर 25 हजार रुपये की राशि ली गई। बेरोजगारों से पैसे लेने के बाद उन्हें न तो प्रशिक्षण दिया गया तथा न ही नौकरी पर रखा गया। बाद में पीड़ित बेरोजगारों ने सदर पुलिस थाना में मामला दर्ज करवाया। इसके बाद वह पुलिस तथा पीडि़तों को झांसा देकर भूमिगत हो गया था।  कार्यकारी एसपी रमेश पठानिया ने बताया कि चैनल मालिक को रोहतक से गिरफ्तार किया गया। अदालत ने उसे शुक्रवार तक पुलिस रिमांड पर भेजा है।

पत्रकार ऋतभ बने सीएम के प्रेस सलाहकार

कोलकाता : कोलकाता में इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार ऋतभ भट्टाचार्य को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रेस सलाहकार बनाया गया है। यह जानकारी राज्य सचिवालय ने दी है।  भट्टाचार्य शुक्रवार को अपना कार्यभार संभालेंगे। ऋतभ की गिनती राज्‍य के तेजतर्रार पत्रकारों में होती है। उन्‍हें पहले से ही सीएम ममता बनर्जी का नजदीकी माना जाता रहा है। बताया जा रहा है कि सीएम की मीडिया से जुड़ी सारी जिम्‍मे‍दारियां ऋतभ के पास ही रहेगा। 

न्‍यूज चैनल के मालिक के खिलाफ हत्‍या का मामला दर्ज

लाहौर। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में प्रशासन ने दुनया टीवी के मलिक मिया अमर महमूद के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। इसके तुरंत बाद न्यूज चैनल ने मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ की प्रातीय सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। पंजाब ग्रुप आफ कालेजिज के मालिक महमूद पर एक संगीत समारोह के दौरान मची भगदड़ में तीन छात्राओं की मौत के मामले में शिक्षण संस्थानों के प्रशासनिक अधिकारियों समेत मुकदमा दर्ज किया गया है।

पंजाब ग्रुप आफ कालेजिज ने पिछले माह लाहौर में संगीत समारोह का आयोजन किया था, जिसमें आतिफ असलम जैसे गायकों ने भाग लिया था। बीती रात महमूद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के तुरंत बाद दुनया टीवी ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में लिया और कहा कि वह लोगों को सच्‍चाई बताने में सरकार के दबाव के आगे नहीं झुकेगी। चैनल ने दावा किया कि उसके एंकरों और संवाददाताओं को शरीफ सरकार की ओर से उनके खराब प्रशासन की कलई खोलने के लिए जान से मारने की धमकिया मिल रही हैं। इसमें एक फैक्ट्री के ढहने तथा सरकारी अस्पताल में दी गई खराब दवाओं के चलते 170 लोगों की मौत का मामला शामिल है।

लाहौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष सरमद बशीर ने कहा कि प्रातीय सरकार ने हताशा में महमूद के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार प्राथमिकी रद्द करने के बदले में चैनल के प्रबंधन से सरकार के खिलाफ टाक शो को बंद करने के लिए सुलह समझौता करने की कोशिश करेगी। दुनया टीवी को कुछ राजनीतिक दलों का भी समर्थन हासिल है जिनमें इमरान खान की तहरीक ए इंसाफ, मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट तथा पीएमएल क्यू शामिल हैं। नवाज वराइच की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई है जिसका कहना था कि संगीत समारोह में मची भगदड़ में उसकी एक बेटी मारी गई तथा एक अन्य घायल हो गई। साभार : जागरण

देवरिया जिले में 147 उम्‍मीदवारों के भाग्‍य का फैसला करेंगे 22 लाख मतदाता

: इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ने के आसार : देवरिया। उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में बसे देवरिया जिले को कभी देव भूमि के नाम से उच्चारित किया जाता था। देव भूमि यानि दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्त और सभी सुखों से सम्पन्न भूमि। लेकिन आज वास्तविकता कुछ अलग ही कहानी कह रही है। अनगिनत समस्याओं से प्रतिदिन दो-चार होता हुआ यह जिला पीड़ा और दुःखों से जार-जार रो रहा है। आजादी के 64 साल भी किसानों को खाद व बीज के लिए पुलिस की लाठियां खानी पड़ती है। नहरों में पानी नही है। कल कारखाने बन्द है। शिक्षा एवं स्वास्थ्य में भ्रष्टाचार का घुन समा गया है। स्वास्थ्य विभाग खुद बीमार हो गया है और उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को बाहर जाना पड़ता है।

जिले की पांच चीनी मिलों में से चार बन्द हो चुकी है। यही वजह है कि चीनी का कटोरा कहे जाने वाले इस क्षेत्र में आज गन्ने की खेती 35 हजार हेक्टेयर से घट कर 12 हजार  हेक्टेयर तक रह गई है। लेकिन कोई भी नेता इसकी चर्चा अपनी चुनावी भाषणों में नहीं करता है। कोई भी नहीं बता रहा कि रोजगार के लिए विदेश खासतौर से खाड़ी देश जाने की विवशता से कब मुक्ति मिलेगी। सभी नेताओं ने अपनी चुनावी भाषणों में खुद को पाक साफ तथा दुसरों को दागदार साबित करने में अपनी सारी उर्जा झोंकी। विकास और उत्थान की ज्वलन्त मुददों एवं चर्चाओं से कोसों दूर इन नेताओं ने केवल वादों की फुलझड़ियों में केवल और केवल वोट पर ही अपने निशाने साधे। वर्ष 2007 के चुनाव में सात सीटों में से चार सीट सपा और तीन बसपा को मिली थी। इस बार दोनों को भाजपा एवं कांग्रेस तगड़ी चुनौती दे रही है।

16वीं विधान सभा के लिए यहां के सात सीटों पर कुल 147 प्रत्याशी अपनी किस्मत चमकाने के लिए 11,93,795 पुरुष और 09,78,348 महिला मतदाताओं के भरोसे है। इन सभी प्रत्याशियों जिनमें कुछ दिग्गज नेता भी हैं, सभी का भाग्य रविवार को ईवीएम में कैद हो जाएगा। वर्ष 2007 में 11,62,539 पुरुष एवं 9,71,502 महिलाओं अर्थात कुल मतदाताओं 21,34,041 में से मात्र 48 प्रतिशत मतदाताओं ने ही प्रत्याशियों के किस्मत को लिखा था। इस बार मतों के प्रतिशत में 20 से 30 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। इस बार युवाओं में मतदान के प्रति खासा उत्साह है। 

रामपुर कारखाना क्षेत्र के छोटी गण्डक नदी पर बने पटनवा पुल पर बरईपुर लाला गांव के सेवा निवृत्त जय प्रकाश श्रीवास्तव कहते हैं कि चीनी मिलों के बन्द हो जाने से किसान परेशान है। पिछले वर्ष के पहली तारीख को ही जटहवा बाबा की हत्या और उसके बाद उत्पन्न हुए दंगो की आंच अभी भी यहां सुलग रही है। लेकिन किसी भी नेता ने उस प्रकरण पर चर्चा नहीं की। जबकि चुनाव में सपा की विधायक गजाला लारी और भाजपा के राजीव मिश्र पूरी तैयारी से हैं। इन सबके बीच निर्दल गिरिजेश शाही उर्फ गुडडू शाही दमदारी से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। लेकिन उन पर हमला होने के कारण वह पीजीआई लखनऊ से ईलाज कराकर क्षेत्र में तो आ गए हैं, लेकिन वे अभी भी अस्वस्थ हैं। उनकी पत्नी पुष्पा शाही ही मतदाताओं से वोट की अपील कर रही है।

देवरिया सदर विधान सभा क्षेत्र की रामगुलाम टोला मुहल्ले की रहने वाली गृहणी पुष्पा कहती हैं कि जनता खास तौर से गृहणियों की परेशानियों से किसी दलीय उम्मीदवार को मतलब नहीं है। आज भी हमें खाना पकाने के लिए गैस सिलिण्डर के लिए महीनों इन्तजार करना पड़ता है। यहां के काग्रेस के जे पी जायसवाल, भाजपा के जन्मेजय सिंह, बसपा के प्रमोद सिंह और सपा के दीनानाथ कुशवाहा के बीच मुकाबला है।

बरहज विधायक राम प्रसाद की दरिया दिली क्षेत्र में चर्चा में है। बरहज में एक चाय की दुकान पर उनके दो बेटों की तिलक समारोह में सत्तर हजार लोगों की दावत और अभी हाल ही में कुछ माह पूर्व सम्पन्न हुए 101 कन्याओं की विवाह पर खूब बात हो रही है। लेकिन मईल में देवरहवा बाबा की आश्रम की भूमि पर दबंगों द्वारा किए जा रहे अवैध कब्जा एवं आश्रम की दुर्दशा पर सब खामोश हैं। विधायक राम प्रसाद जायसवाल की जगह उनकी पत्नी रेनू जायसवाल चुनावी जंग में सपा के प्रेम प्रकाश सिंह, पीस पार्टी से दुर्गा मिश्रा, कांग्रेस के विरेन्द्र चौधरी और भाजपा के नरेन्द्र मिश्रा से दो-दो हाथ कर रहीं है।

पथरदेवा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के मुकाबले सपा के पूर्व विधायक और मंत्री शाकिर अली, बसपा के संजय सिंह और कांग्रेस के सुयश मणि मैदान में है। कंचनपुर चौराहे के आगे एक दर्जन नौजवान दिखे। चुनाव चर्चा पर मेडिकल स्टारे चलाने वाला प्रकाश कहता है कि चुनाव बीतने के बाद कोई झांकने तक नहीं आता है। दलों और नेताओं से क्या अपेक्षा की जाय। भीखू सपाट बोलता है कि नेता लोग क्यूं वादा करते हैं। वादा करके किसको मूर्ख बनाते हैं खुद को या जनता को।

रूद्रपुर प्रतिवर्ष बाढ़ग्रस्त एवं अत्यधिक पीड़ित क्षेत्र है। रूद्रपुर को दूसरा काशी कहे जाता है दुग्धेश्वर मंदिर के पास बैठे संजय कहते है करहकोल घाट और सेमरा घाट पर पुल बनाए जाने का ख्वाब पिछले कई दशकों से यहां के वोटरों को दिया जा रहा है लेकिन इसे आज तक कोई निभा नहीं पाया। बाढ़ से हो रही प्रतिवर्ष की क्षति और पलायन का कोई नाम लेवा नहीं। यहां बसपा के सुरेश तिवारी, कांग्रेस के अखिलेश प्रताप सिंह, भाजपा के जयप्रकाश और सपा के मुक्तिनाथ यादव के बीच घमासान है।

सलेमपुर सुरक्षित सीट हो गई है। इसलिए यहां से सपा की विधायक गजाला लारी रामपुर कारखाना विधान से एक बार फिर किस्मत आजमा रही हैं। पुलिस कर्मी जितेन्द्र सिंह बताते हैं कि बताते हैं कि ओवर ब्रिज बनने में देर हो रही है। अनुआपार में रेलवे क्रासिंग नहीं बन पा रहा है। जिसके क्षेत्र के लोग परेशान है। जो यहां की खास आवश्यकता है। यहां सपा के मनबोध प्रसाद, भाजपा की विजय लक्ष्मी गौतम, कांग्रेस के राम अधार और बसपा के बलिराम में चुनावी जंग है।

भाटपाररानी में भी मुददे हाशिये पर हैं और लोगों के जेहन में बस यही सवाल है कि बसपा के सभाकुंवर, सपा के कामेश्वर उपाध्याय, भाजपा के राजकुमार शाही और कांग्रेस की बिन्दा कुशवाहा में से सीधी लड़ाई में से कौन है। बिहार राज्य की सीमा पर होने के कारण यहां तस्करों और अपराधियों से पूरा इलाका दहशत के साये में जीता है। मेडिकल प्रतिनिधि दिनेश सिंह कहते हैं कि कि उत्तर प्रदेश में सबसे पिछड़ा जिला देवरिया और देवरिया में सबसे पिछड़ा इलाका भाटपाररानी। यहां समस्याओं और दिक्कतों के आलावा कहने-सुनने के सिवा कुछ नहीं है।  

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

सूत न कपास : सीएम पद के लिए बेनी-पुनिया कर रहे बकवास

कांग्रेस के कुर्मी चेहरे एवं केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और दलित चेहरे एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पन्ना लाल पुनिया की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है. ताजा घटनाक्रम में बेनी बाबू ने बाराबंकी सांसद पीएल पुनिया को बाहरी बता विवाद को जन्म दे दिया है. मंत्री वर्मा ने दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र में पुनिया के लिए ये बात कही. दरियाबाद से वर्मा का बेटा राकेश कांग्रेस प्रत्याशी हैं. बेनी ने कहा पुनिया पंजाब के हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं है. ये बयान पुनिया के उस बयान से जोड़ कर देखा जा रहा है जिसमें पुनिया ने कहा था कि पार्टी ने किसी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया है.

ऐसे में आज जब उन्होंने कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया को पंजाब का निवासी बता डाला तो कांग्रेस की गुटबाजी भी उभरकर सामने आ गयी. असलियत यह है कि बेनी बाबू अभी से ही अपने को प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री मान चुके हैं और उनके लिए कांग्रेस हाई कमान भी कोई खास मायने नहीं रखता. बताते चले कि बेनी प्रसाद उत्तर प्रदेश में कुर्मियों के बड़े नेता माने जाते हैं, और मध्य एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनका अच्छा प्रभाव व रसूख है. वहीं पुनिया भी कांग्रेस और प्रदेश के रसूखदार दलित नेता हैं, सूबे के दलित उन्हें पूरा आदर व मान देते हैं. खुद को भावी मुख्यमंत्री का योग्य और सक्षम उम्मीदवार साबित करने की जंग में बेनी और पुनिया के बीच छिड़ी लड़ाई से अगले छह चरणों के मतदान और मिशन 2012 को गहरा धक्का लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. विवाद को ठंडा करने के लिए दिग्विजय सिंह ने वर्मा को संयम बरतने की सलाह दी है. सिंह कहा कि दोनों ही पार्टी के कद्दावर नेता हैं. वर्मा को ऐसे बयान नहीं देने चाहिए.

पीएल पुनिया और बेनी के बीच छिड़ी लड़ाई कोई नयी नहीं है. केन्द्र में पद मिलने के बाद भी दोनों महानुभावों का अधिकतर समय यूपी में ही बीतता है. असल में पुनिया और बेनी दोनों की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी है. यह बात पार्टी हाइकमान से लेकर आम कार्यकर्ता तक को बखूबी मालूम है. दोनों को पार्टी और मंत्रिमंडल में महत्व देने की पीछे उनकी जाति का फैक्टर सबसे सबल पक्ष रहा है. कांग्रेस ने दलितों को साधने के लिए पुनिया और कुर्मियों को अपने पाले में लाने के लिए बेनी को खूब तवज्जों दी जाती है. सपा छोड़कर कांग्रेस में आए बेनी बाबू के पीछे स्ट्रांग कुर्मी वोट बैंक है, तो वहीं नौकरशाह से नेता बने पीएल पुनिया को मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के गरज और इरादे से पार्टी में खास जगह दी गयी है. कांग्रेस ने बेनी और पुनिया दोनों को केन्द्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण पद सौंप रखे हैं, बावजूद इसके दोनों का अधिकतर समय यूपी में ही बीतता है. बेनी बाबू के अजेंडे में केन्द्र की कुर्सी से ज्यादा सूबे की कमान महत्वपूर्ण हैं.

लखनऊ एयरपोर्ट से लेकर बहराइच तक मेन सड़क के किनारे इस्पात मंत्रालय के लगे बड़े-बड़े होर्डिंग बेनी बाबू की राजनीतिक महत्वकांक्षा और मन में दबी भावनाओं का खुलकर प्रदर्शन करते हैं. पीएल पुनिया भी यूपी से जुड़े दलित अत्याचार, अपराध के मुद्दे को अति गंभीरता से लेते हैं, जिसके चलते राष्ट्रीय स्तर का आयोग यूपी में ही सिमटकर रह गया है. बेनी और पुनिया दोनों एक दूसरे को पटखनी देने और एक दूसरे पर शब्द बाण चलाने का कोई अवसर छोड़ते नहीं है. बेटे के चुनाव प्रचार में व्यस्त बेनी बाबू को जैसे ही वोटिंग के दिन फुर्सत मिली उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी पुनिया पर हमले करने में देरी नहीं की और उन्हें बाहर का बताकर मुख्यमंत्री की रेस से बाहर करने का अचूक दांव चला. फिलहाल पुनिया ने इस मुद्दे पर सधा जवाब देकर एक बार फिर यह साबित किया कि वे संगठन के दायरे में रहने वाले नेता हैं. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि बेनी और पुनिया मुख्यमंत्री बनने के सपने किस आधार पर देख रहे हैं.

विधानसभा में कांग्रेस के 22 विधायक हैं, राहुल बाबा की दिन रात की मेहनत और दलित एवं मुसलमान प्रेम की बदौलत बहुत ज्यादा छलांग लगाकर कांग्रेस दुगनी सीटें पा जाएगी इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है. वोटरों को भरमाने और बरगालाने के लिए सभी दल अपने दम पर सरकार बनाने के दावे ठोंक रहे हैं लेकिन असलियत किसी से छिपी नहीं है. कांग्रेस की हालत और प्रदर्शन से राहुल खुद ही झुंझलाए और झल्लाए हुए हैं, उनकी हताशा, निराशा और चुनाव नतीजों की झलक वाराणसी में हुई प्रेस कांफ्रेस में दिख ही चुकी है, ऐसे में जो थोड़ा बहुत बेहतरी होने की संभावना है भी वो बेनी और पुनिया जैसे नेताओं की बयानबाजी और झगड़े की वजह से मिट्टी में मिल रही है. आज कांग्रेस आलाकमान पार्टी को सूबे में आईसीयू से बाहर निकालने में जुटा है और उसके नेता खुद को मुख्यमंत्री की दौड़ में अव्वल बनाने में जुटे हैं, बेनी और पुनिया के झगड़े को देखकर पुरानी कहावत न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठ साबित होती है.

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ लखनऊ के स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

भाजपा ने ‘युवा’ टीवी चैनल लांच किया

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने 'युवा' नाम से गुरुवार को अपने खुद के टीवी चैनल की लांचिंग की। इस इंटरनेट टीवी चैनल का शुभारंभ पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने बीजेपी मुख्‍यालय में किया। गडकरी ने इस मौके पर कहा कि कोई भी व्यक्ति या नेतृत्व अपने आप में पूरी तरह से दोषरहित नहीं होता है, सबमें अच्‍छाइयों के साथ बुराइयां भी होती हैं। इस टीवी चैनल से पार्टी के लोगों को खुद को बेहतर बनाने का मौका मिलेगा, क्योंकि 'युवा' चैनल से केवल पार्टी के विचार ही प्रसारित नहीं होंगे, बल्कि बीजेपी से इतर विचारों और आलोचनाओं को भी पूरा स्थान और सम्‍मान मिलेगा।

उन्होंने बताया कि युवा चैनल के लिए बीजेपी मुख्यालय में ही एक स्टूडियो बनाया गया है, जहां से कार्यक्रमों का प्रसारण होगा। उन्होंने कहा कि इस टीवी चैनल के जरिए बीजेपी जनता, खासकर युवाओं के साथ जुड़ने की कोशिश करेगी। युवा चैनल के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि पार्टी की विचारधारा, कार्यक्रमों और आंदोलनों की जानकारी देने के साथ ही इस पर मनोरंजन के कार्यक्रम भी प्रसारित किय जाएंगे। उन्‍होंने बताया कि न्‍यूज चैनलों की तर्ज पर विभिन्‍न मामलों पर बहस के लिए युवा टीवी के स्‍टूडियो में पार्टी से अलग विचार रखने वाले लोगों को भी बुलाया जाएगा। गौरतलब है कि इस युवा इंटरनेट टीवी चैनल को पार्टी की आईटी सेल ने विकसित किया है। इसका प्रसारण प्रत्‍येक दिन पांच से शाम सात बजे तक होगा।

असम ट्रिब्‍यून ने मजिठिया वेज आयोग की सिफ‍ारिश लागू की

: ऐसा करने वाला देश का पहला और अकेला अखबार : गुवाहाटी। असम ट्रिब्यून समूह ने अपने ट्रेड यूनियनों के साथ एक करार में पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के लिए मजिठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया है। यह करार इस साल जनवरी से प्रभावी होगा। असम ट्रिब्‍यून समूह मजिठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने वाला पहला और देश का एकलौता अखबार बन गया है। समूह में करीब 450 कर्मी काम करते हैं।

केन्द्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार मजिठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को एक जुलाई 2010 से लागू किया जाना है, लेकिन समूह ने एक जनवरी 2012 से लागू करने का फैसला किया है। उल्‍लेखनीय है कि असम ट्रिब्‍यून ने इसके पहले के मणिसाना वेतन आयोग की सिफारिशें भी अपने यहां लागू कर रही थीं। यह देश के कुछ चुनिंदा अखबारों में शामिल है, जो अपने कर्मचारियों के हितों का पूरा ध्‍यान रखते हैं।

मीडिया सलाकार समिति‍ गठित, संजय, प्रवीण, हरिओम, विजयपाल सदस्‍य बने

शिमला : प्रदेश सरकार ने हिमाचल प्रदेश मीडिया सलाहकार समिति का गठन किया है। भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य अशोक कपाटिया को समिति के उपाध्यक्ष के पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है। धर्मशाला के संजय शर्मा, मंडी के प्रवीण शर्मा, ऊना के हरि ओम भनोट और हमीरपुर के विजय पाल सिंह सोहरू समिति के सदस्य होंगे। गुरुवार को जारी बयान में सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि प्रधान सचिव सूचना एवं जनसंपर्क समिति के सरकारी सदस्य होंगे। इसके अलावा निदेशक सूचना एवं जनसंपर्क को समिति के सदस्य सचिव बनाए गए हैं।

फेसबुक में पक्‍की नहीं है जुकरबर्ग की नौकरी, कभी भी निकाला जा सकता है

वाशिंगटन। सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन यह सच है। सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक में उसी के संस्थापक और मुखिया मार्क जुकरबर्ग की नौकरी पक्की नहीं है। उन्हें कारण बताकर या बिना बताए कभी भी निकाला जा सकता है। यह बात उस वक्त सामने आई, जब बहुप्रतीक्षित आइपीओ लाने के लिए कंपनी ने अमेरिकी बाजार नियामक एसईसी के पास विवरण पुस्तिका दाखिल की।

इसके मुताबिक, अन्य कर्मचारियों की तरह कंपनी के सीईओ जुकरबर्ग कड़ी शर्तों के तहत काम करते हैं। इनमें में कई ऐसी हैं, जिनका उल्लंघन उनकी नौकरी खा जाने के लिए पर्याप्त है। फेसबुक के साथ जुकरबर्ग का रोजगार करार कहता है कि नौकरी करते हुए वह फेसबुक की प्रतिस्पर्धी कंपनी स्थापित नहीं कर सकते, न ही ऐसा करने में किसी की मदद कर सकते हैं। वह फेसबुक के किसी कर्मचारी या कंसल्टेंट को प्रतिद्वंद्वी कंपनी में भेज भी नहीं सकते हैं। उनके साथ ये शर्ते सीओओ शेरिल सैंडबर्ग, सीएफओ डेविड एबर्समैन और वाइस प्रेसीडेंट माइक शू्रफर पर भी लागू होती हैं।

वैसे, कंपनी को छोड़ने के बाद उन पर ये शर्ते लागू होती हैं या नहीं, इस पर करार में कुछ नहीं कहा गया है। कंपनी का कहना है कि करार के तहत जुकरबर्ग और उनके तीन सहयोगियों को वेतन और बोनस के रूप में करीब 20 लाख डॉलर [करीब 10 करोड़ रुपये] मिलेंगे। वहीं, इसके तहत ही कंपनी किसी भी समय, किसी कारण या बिना किसी कारण के उन्हें बर्खास्त कर सकती है। खुद जुकरबर्ग को भी कंपनी छोड़कर कभी भी बाहर जाने का अख्तियार है। (एजेंसी)

सरकार ने गूगल पर कसा फेमा का शिकंजा

नई दिल्ली : आपत्तिजनक सामग्री प्रदर्शित करने के आरोप में दिल्ली हाईकोर्ट के निशाने पर आई दुनिया की सबसे बड़ी सर्च वेबसाइट गूगल पर अब फेमा का शिकंजा भी कस गया है। भारत में की गई कमाई को अवैध तरीके से विदेश भेजने के आरोप में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गूगल की भारतीय इकाई गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। इस सिलसिले में ईडी गूगल को नोटिस भेज चुका है।

इसके साथ ही आयकर विभाग ने भी गूगल इंडिया को लगभग 12 करोड़ रुपये कर चुकाने का नोटिस थमा दिया है। राजस्व विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बहुत ही चतुराई से भारत में की गई कमाई को भारतीय रिजर्व बैंक को सूचित किए बिना आयरलैंड स्थित गूगल को स्थानांतरित कर रहा है। इसके लिए उसने बाकायदा गूगल आयरलैंड के साथ करार कर रखा है। पर फेमा नियमों के मुताबिक ऐसे किसी करार से भारत में की गई कमाई को बिना कर चुकाए विदेश नहीं भेजा जा सकता है।

दरअसल, मुफ्त में किसी भी छपी हुई सामग्री को खोजने की सुविधा देने वाला गूगल इंडिया विज्ञापन के माध्यम से सालाना करोड़ों रुपये की कमाई करता है। पर इस कमाई पर टैक्स चुकाए बिना ही अपनी दूसरी कंपनियों के मार्फत विदेश भेज देता है। इसके लिए भारत में ही उसने गूगल इंडिया के अलावा इंडोक्सोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और विरोकेम इंफो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी भी बना रखी है। राजस्व विभाग के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक गूगल इंडिया ने इन दोनों कंपनियों में बड़ी मात्रा में निवेश किया है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गूगल इंडिया पैसे भेजने के लिए विदेश स्थित अपनी ही कंपनी से ली गई तकनीक या दूसरी सेवाओं की कीमत काफी बढ़ा चढ़ाकर दिखाता है। आयकर विभाग और ईडी के अधिकारी इसकी जांच में जुटे में हैं। गूगल इंडिया के पिछले छह सालों के बही खातों की पड़ताल से आयकर विभाग को 12 करोड़ की कर चोरी के सबूत मिले हैं। आयकर विभाग भले ही केवल गूगल इंडिया से केवल छुपाए गए कर को वसूलने तक सीमित हो, पर ईडी की नजर उसके द्वारा विदेश में भेजे गए पूरी रकम है। इसके लिए ईडी भारतीय रिजर्व बैंक से मदद ले रहा है। फेमा उल्लंघन का मामला साबित होने की स्थित में गूगल इंडिया को पूरी रकम का तीन गुना तक जुर्माना भरना पड़ सकता है। साभार : जागरण

पोंटी के खिलाफ छापेमारी (दो) : कहानी जमीन से आसमान तक पहुंचने की

 छापे के दौरान आयकर विभाग यह समझने की कोशिश में जुटा रहा कि विभाजन के समय पाक के मोंटगोमरी से भाग कर पहले रामनगर और उसके बाद मुरादाबाद के रिफ्यूजी क्वार्टर्स में पनाह लेने वाला यह परिवार किस तरह इतनी बड़ी सल्तनत का मालिक बन बैठा। इस परिवार ने न केवल दौलत कमाई बल्कि दहशत भी फैलाई। पोंटी के बाबा को तो लोग कोई खास नहीं जान पाए लेकिन बेटे कुलवंत सिंह ने 1960 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद से शराब के धंधे में पांव रखा तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कुलवंत सिंह की कोठी मुरादाबाद के पॉश इलाके सिविल लांइस में है। इस कोठी का नाम सुनकर लोगों के मुंह से शब्द भले न निकलते हों लेकिन चेहरे पर दहशत का एक अजीब से भाव जरूर दिखाई पड़ जाता है। पिता कुलवंत के पद चिन्हों पर ही नहीं चला उनका बड़ा बेटा पोंटी। बल्कि उसने अपने पिता को भी काफी पीछे छोड़ दिया।

पोंटी के पिता ने अपना कारोबार उत्तर प्रदेश के बाद पंजाब में फैलाया तो पोंटी ने उत्तर प्रदेश और उतराखंड के नेताओं के सहारे खूब नोट बटोरे। मुलायम सिंह से नजदीकियां हासिल करके पोंटी ने उत्तर प्रदेश के शराब व्यवसाय पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया। यह वह दौर था जब मुलायम और माया साथ मिलकर चल रहे थे, मुलायम ने ही पोंटी की मुलाकात माया से कराई। इसके बाद तो पोंटी मुलायम से अधिक माया के करीबी बन गए। यहां तक कि आबकारी विभाग जो पॉलिसी बनाता उस पर भी पोंटी की छाप दिखती। पोंटी ने सरकार से करीबी का फायदा उठा कर कई चीनी मिले कौड़ियों के भाव में हथिया लीं। पोंटी के पिता ने जो कारोबार जमीन पर शुरू किया था, उसे पोंटी ने आसमान की बुलंदियों पर पहुंचा दिया।

                          आबकारी मंत्री  से लोकायुक्त ने मांगा जवाब

उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त ने एक निजी कंपनी को कथित रूप से लाभ पहुंचाने के लिए सरकार की आबकारी नीति का उल्लंघन करने के आरोप में मिली एक शिकायत पर प्रदेश के गन्ना विकास एवं आबकारी मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को नोटिस जारी करके उनका जवाब मांगा है। लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने बताया है कि इलाहाबाद के विनय कुमार मिश्र ने शिकायत की थी कि नसीमुद्दीन ने एक निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए वर्ष 2007 में निर्धारित आबकारी नीति की अवहेलना की है।

न्यायमूर्ति मेहरोत्रा ने बताया कि वर्ष 2007 में जो नीति बनी थी, उसके तहत शराब के थोक व्यापार का लाइसेंस निगमों को दिये जाने की बात तय हुई थी, मगर बाद में यह लाइसेंस चीनी संघ के साथ साझे में ब्लू वाटर प्राइवेट लिमिटेड को दे दिया गया। लोकायुक्त ने बताया कि इस प्रकरण में मंत्रिपरिषद के निर्णय के आधार पर बनायी गयी आबकारी नीति के उल्लंघन का आरोप प्रथम दृष्टया सही पाया गया है और मामला दर्ज करके नसीमुद्दीन से 19 फरवरी तक अपना पक्ष रखने की नोटिस भेज दिया गया है और इस संबंध में मुख्यमंत्री मायावती को भी सूचित कर दिया गया है।

लेखक संजय सक्‍सेना पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

पोंटी के खिलाफ छापेमारी (एक) : ‘वाइन किंग’ ने एक तीर से साधे कई निशाने

वाइन किंग पोंटी चड्ढा के 25 ठिकानों पर एक साथ छापे मारकर आयकर विभाग ने खूब सोहरत बटोरी। आयकर विभाग की कार्यशैली से ऐसा लगा मानो पोंटी के पास काले धन की टकसाल होगी। यूपी-पंजाब और उत्तराखंड ही नहीं देशभर में लोग उत्सुकता से इस बात का इंतजार करने लगे कि क्या पोंटी का तिलिस्म टूटेगा? यह वो लोग थे जिनके लिए वाइन किंग का ‘साम्राज्य’ एक अबूझ पहेली जैसा था। भले ही उसकी चर्चा वाइन किंग के रूप में होती थी, लेकिन रंगीन पानी का यह सौदागर यहीं तक सीमित नहीं था। उसने कई धंधों में अपने पांव पसार रखे थे। रीयल स्टेट, चीनी मिल, ब्रासवेयर कारोबार, फिल्मी क्षेत्र आदि कई व्यवसायों में उसका हजारों करोड़ रुपया लगा हुआ था।

पोंटी की कार्यशैली बेहद गुपचुप तरीके से परवान चढ़ती थी, वह मीडिया से दूर रहता तो राजनीतिक मंचों पर भी कभी नहीं दिखता, लेकिन राजनेताओं को अपने इशारे पर नचाने की उसे महारथ हासिल थी। कुबेर जी उस पर मेहरबान थे तो वह बड़े-बड़े नेताओं पर ‘लक्ष्मी’ की मेहरबानी दिखाकर उन्हें अपना मुरीद बना लेता। शराब माफिया के रूप में कार्य करने वाला पोंटी अपने रिश्ते सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं से तो मजबूती के साथ बनाकर रखता ही था, विपक्षी दलों के नेताओं को भी वह कभी इस बात का अहसास नहीं होने देता कि विपक्ष में होने के कारण पोंटी के लिए वह गैर-जरूरी हैं।

उसके आका और हमदर्द सभी दलों में मौजूद हैं। भले ही पोंटी उनसे काम ले या न ले लेकिन वह किसी का हक नहीं मारता था, जब इन हमदर्दो को पोंटी की जरूरत पड़ती है तो वह उनके साथ खड़ा दिखाई देता तो यह हमदर्द पोंटी के लिए कायदे-कानून को ठेंगा दिखाने से पीछे नहीं रहते थे। यही वजह थी, वर्षों से तमाम विवादों में घिरे होने के बाद भी पोंटी के ‘गिरेबान’ में किसी की हाथ डालने की हिम्मत नहीं हुई। लीकर किंग की हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई राज्यों की सरकारें उसके एक इशारे पर नीतिगत फैसलों में भी बदलाव से हिचकिचाती नहीं थीं। यह बात एक ही उदाहरण से समझी जा सकती है। बात वर्ष 2007 की है जब मुलायम सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद उत्तर प्रदेश में माया सरकार सत्तारूढ़ हुई थी। माया के मुख्यमंत्री बनने ही लोगों को लगा कि मुलायम के करीबी पोंटी के दिन खत्म हो जाएंगे। इसका कारण भी था मायावती और मुलायम के बीच 36 का आंकड़ा। मायावती चुन-चुनकर हर उस नौकरशाह, पुलिस अधिकारी, उद्योगपति, व्यापारी को हाशिए पर डाल रही थी जो मुलायम की गुडलिस्ट में शामिल था। उनकी जगह वह अपने पसंदीदा लोगों को बैठा रही थी। मुलायम राज में अनिल अंबानी जैसे उद्योगपति और अमिताभ बच्चन तथा अमर सिंह सरीखे लोगों को उनका करीबी समझा जाता था। वहीं माया राज में इस जगह की भरपाई सतीश मिश्र, जेपी ग्रुप जैसे लोगों ने की।

ऐसा ही कुछ नौकरशाहों के साथ हुआ मुलायम राज में आईएएस अखंड प्रताप सिंह, सतीश अग्रवाल, चन्द्रमा प्रसाद, नीरा यादव, नवीन चन्द्र वाजपेई, अनीता सिंह, आईपीएस अधिकारी बाबू लाल यादव और डीजी बुआ सिंह की तूती बोलती थी। खासकर चन्द्रमा प्रसाद और अनीता सिंह तो मुलायम के कई राजनैतिक फैसलों में भी उनको राय देते थे। मुलायम राज में आईएएस अधिकारी मुख्य सचिव नवीन वाजपेई और डीजी बुआ सिंह सपा कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में मंच के ऊपर तक दिखाई दिए। इसको लेकर काफी बवाल मचा। जब मायावती ने राजपाठ संभाला तो उन्होंने सबसे पहले इन अधिकारियों को ही किनारे किया। माया की वजह से ही गैर आईएएस अधिकारी शंशाक शेखर कैबिनेट सचिव के पद पर विराजमान होकर कई आईएएस अधिकारियों को दिशा-निर्देश दे रहे हैं, लेकिन कोर्ट भी इस मामले में कुछ खास नहीं कर पाई। अदालत में काफी समय से शशांक को कैबिनेट सचिव बनाए जाने का मामला चल रहा है। माया राज में उनके बड़े अधिकारी मौका पड़ने से यह बताना नहीं भूलते कि किसे पार्टी से निकाला गया है। शशांक शेखर और आईएएस अधिकारी फतेह बहादुर सिंह बसपा सरकार की नाक-कान बने हुए थे तो पुलिस महानिदेशक बृजलाल भी वफादार अधिकारियों की लिस्ट में शामिल थे। इन अधिकारियों का बसपा शासनकाल में कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया, यह और बात थी कि चुनाव आयोग ने आते ही सबसे पहले इन अधिकारियों को चुनावी प्रक्रिया से किनारे करने का काम किया।

बसपा काल में अलग-अलग बैक ग्राउण्ड से आए उक्त लोगों ने खूब दौलत और शोहरत कमाईं। अगर माया ने मुलायम के किसी एक वफादार को नहीं छेड़ा तो वह वाइन किंग पोंटी चढ्डा ही था, जिसका सिक्का दोनों ही राज में खूब चला। पोंटी के अलावा यदि कोई और नाम माया राज में सबसे अधिक चर्चा में रहा तो वह जेपी ग्रुप था, जिसने खूब माल कमाया, लेकिन जब माया सरकार के जाने की उल्टी गिनती शुरू हुई तो उसने ‘गंगा एक्सप्रेस वे’ जैसी बसपा सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं से अपना पैसा वापस लेकर उसे अधर में लटकाने में भी देरी नहीं की। बहरहाल, बात पोंटी के लिए माया सरकार द्वारा नीतिगत फैसले बदलने के उदाहरण की कि जाए तो इसकी बानगी बसपा शासनकाल के शुरुआत में ही दिख गई थी। बसपा सरकार का गठन होते ही उत्तर प्रदेश चीनी निगम के माध्यम से पोंटी चड्ढा की अपनी ‘ब्लू वाटर लिमिटेड’ को शराब व्यवसाय का लाइसेंस प्रदान किया गया, इस पर जब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो सरकार ने जवाब दाखिल कर दिया कि आबकारी विभाग ने अपनी नीति बदल दी है। इसके बाद एक और बदलाव करते हुए सरकार के आकाओं ने मेरठ जोन के 23 जिलों में शराब कारोबार का लाइसेंस उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी मिल संघ को दे दिया, जिसने पोंटी चड्ढा की ही दूसरी कंपनी ‘फ्लोर एंड फेना लिमिटेड’ के हाथों में शराब करोबार की डोर थमा दी। ऐसे ही तमाम फैसले लिए गए जिससे पोंटी और उसकी कंम्पनियां सीधे तौर पर फायदे में रहीं। आबकारी विभाग और पोंटी की मिलीभगत से शराब के शौकीन मोहताज हो गए, पोंटी जिस कंपनी की जो दारू लोगों को पिलाना चाहते, वह पिलाते कोई कुछ बोल नहीं सकता था। पैसे भी ज्यादा देना पड़ते थे। आबकारी मंत्री नसीमुद्दीन अपनी सरकार की सुप्रीम पॉवर और पोंटी के बीच ‘डील मैनेज’ करने का काम करते थे। बसपा के लिए लीकर किंग चड्ढा ‘एटीएम’ मशीन जैसा हो गया था।

पोंटी और बसपा गठजोड़ से उत्तर प्रदेश के छोटे कारोबारी बर्बादी के मुहाने पर पहुंच गए। इन लोगों ने कई बार इसके खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन जहां रक्षक ही भक्षक जैसे हों तो किसी का भला कैसे हो सकता था। वहीं उन नेताओं को भी यह गठजोड़ अच्छा नहीं लगता जिनको पोंटी ने घास नहीं डालनी बंद कर दी था। खासकर, समाजवादी पार्टी के नेताओं को बसपा और पोंटी का मेल-मिलाप बहुत खराब लगता। उत्तर प्रदेश में पोंटी रूपी पौध को ‘बागवान’ मुलायम ने ही बोया और सींचा था, लेकिन जब यह पौध पेड़ बनकर फलदार हुई तो दूसरा ‘बागवान’ (मायावती) आ गया। वह ‘फल’ खाने लगा। यह बात सपा के तो बर्दाश्त के काबिल थी ही नहीं, कांग्रेस भी इस धन-कुबेर को अपने पाले में लाने को लालायित थी, लेकिन उसके साथ मजबूरी यह थी कि वह उन राज्यों में कायदे से खड़ी ही नहीं थी जहां से पोंटी का धंधा पानी चलता था। फिर भी, पोंटी ने धंधे की खातिर दिल्ली और लखनऊ में बैठे कुछ कांग्रेसी नेताओं से अपनी करीबी बना रखी थी, इसके अलावा एक ही जिला मुरादाबाद के वाशिंदे होने के कारण पोंटी के गांधी परिवार के एक पारिवारिक सदस्य से भी काफी नजदीकियां हो गईं थीं। पोंटी को पता था कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस का यह सबसे ताकतवर ‘मोहरा’ उसके काम आ सकता है।

समय के साथ पोंटी पर संकट के बादल गहराते जा रहे थे, उसका दिनदूनी रात चौगनी तरक्की करना कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा था। इसी बीच उत्तर प्रदेश में चुनाव का समय आ गया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जो काफी समय से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी के लिए हाथ-पैर मार रहे थे, वह तेजी से सक्रिय हो गए। उन्होंने मायावती सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार साबित करने की मुहिम चला दी तो दूसरी तरफ कांग्रेस गठबंधन की केन्द्र सरकार पर सपा-भाजपा और बसपा भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर उसके खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी माहौल गरम करने में लगे थे। राहुल को जनता के सामने यह साबित करने में पसीना आने लगा कि केन्द्र और राज्य में से कौन सी सरकार ज्यादा भ्रष्ट है। इस जंग में कभी बसपा सुप्रीमो मायावती का पलड़ा भारी लगता तो कभी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का। माया सरकार पर कई तरह के भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे तो वाइन किंग पोंटी की नजदीकी को लेकर वह कटघरे में खड़ी थी। कांग्रेस को पता था कि पोंटी और बसपा सरकार के रिश्तों को लेकर प्रदेश की जनता के बीच मायावती की छवि बेहद खराब है, इसी को भुनाने के लिए कांग्रेस ने एक तुरूप का पता चला। उसके एक इशारे पर आयकर विभाग की टीम पोंटी के खिलाफ सबूत जुटाने में लग गई। इस बात का अहसास पोंटी को भी था कि आयकर विभाग कभी भी उसके खिलाफ जाल बिछा सकता है। चुनावी संग्राम सिर चढ़कर बोल रहा था। आचार संहिता से बंधी मायावती सरकार पोंटी की किसी भी तरह की मदद करने में असमर्थ थीं तो चुनाव खर्च की बात कहकर बसपा सहित कई पार्टी के बड़े नेता उस पर चंदे के लिए दवाब डाल रहे थे। इसमें कुछ कांग्रेसी नेता भी शामिल थे, लेकिन पोंटी को वह कैश नहीं करा पा रहे थे।

उधर, उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के धुंआधार प्रचार और जीत के दावों से आत्ममुग्ध कांग्रेसियों को लगा कि यह समय पोंटी पर पकड़ बनाने के लिए मुफीद रहेगा। आयकर विभाग ने पोंटी के खिलाफ सबूत पहले से ही जुटा रखे थे। ऊपरसे इशारा पाते ही पोंटी के ठिकानों पर आयकर विभाग की छापेमारी शुरू हो गई। लखनऊ, दिल्ली, नोयडा, मुरादाबाद, बरेली आदि जिलों में एक साथ पोंटी के 25 ठिकानों पर छापामारी की गई। उस समय पोंटी सात समुंदर पार दुबई में मौजूद था। छापे में अरबों रुपया का काला धान सामने आने की बात कही जाने लगी। आयकर विभाग के छापों से वाइन किंग पोंटी चड्ढा बेचैन हो उठा। लीकर लॉबी के बादशाह और रीयल स्टेट में नई ऊंचाइयां हासिल करने वाले पोंटी को ऐसे समय पर आयकर विभाग ने जख्म दिया था, जब न तो बसपा सुप्रीमो उनकी कोई मदद कर सकती हैं और न सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव। कुछ दिनों बाद ही उसकी बेटी की शादी होने वाली थी, वह और उसका परिवार उसमें व्यस्थ्य था। भले ही आयकर विभाग की नियत में कोई खोट न हो लेकिन उसने छापा कार्रवाई के लिए जो समय चुना वह कई संकेत दे गया। आयकर विभाग ने पोंटी के ठिकानों पर छापे मारकर शादी के मौहल में रंग में भंग पैदा कर दिया। इतेफाक से जिस दिन पोंटी के यहां छापे की कार्रवाई हुई उसी दिन सोनिया गांधी और बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल फूंका था।

पहले बसपा के निष्कासित नेता और मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के सहारे बसपा को घेरने की कोशिश फिर कुशवाहा के करीबी मुरादाबाद के ही सौरभ जैन की गिरफ्तारी और उसके बाद पोंटी पर शिकंजा। बसपा वाले इसमें राजनीति तलाशने लगे और उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि कहीं न कहीं कांग्रेस, सीबीआई और आयकर विभाग जैसे अपने नियंत्रण वाले विभागों के माध्यम से बसपा को घेरना चाहती है। गौरतलब हो जिस दिन पोंटी पर कार्रवाई की गई उसी दिन माया ने एक जनसभा में केन्द्र पर सीबीआई और आयकर विभाग के बेजा इस्तेमाल का भी आरोप लगाया था। पोंटी के ठिकानों पर छापा मारने वाली आयकर विभाग की टीम ने जिस तरह से व्यवहार किया उससे भी लोगों की शंका पुख्ता होने लगी। आयकर विभाग जो गुपचुप तरीके से काम करता है, वह छापे की कार्रवाई की खबरें लीक करने लगा। खासकर, नोयडा के एक माल के बेसमेंट में एक बड़ी तिजोरी में अरबों रुपया होने की बात को खूब हवा दी गई। छापा कार्रवाई चल ही रही थी कि आश्चर्यजनक रूप से यूपी के कई जिलों में प्रिंट रेट पर शराब बिकने लगी, जबकि पहले एमआरपी पर पांच रुपए से लेकर 50 रुपए तक प्रति बोतल अधिक वसूली हो रही थी। कहा यह जाता था यह पैसा चंदे के रूप में बसपा को मिलता है।

खैर, पोंटी के यहां आयकर विभाग के छापे की खबर जैसे ही उसके हमदर्दों को लगी, उन्होंने गुपचुप तरीके से छापे की हवा निकालने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया। पोंटी के हमदर्दो को पता था कि छापामारी के पीछे कांग्रेस का ही हाथ है। डैमेज कंट्रोल के लिए निकले पोंटी के लोगों ने गांधी परिवार के उस सदस्य से सबसे पहले सम्पर्क साधा जो मुरादाबाद में रहता तो था ही पोंटी से उसके पुराने संबंध भी थे। बात शुरू हुई तो बनने में देर नहीं लगी। धन कुबेर पोंटी चड्ढा के लोगों ने कुछ ही घंटों में सब कुछ मैनेज कर लिया। आयकर विभाग के जो अधिकारी छापामारी के समय आत्मविश्वास से लवरेज थे, उसके चेहरों पर ऊपर से आए एक आदेश ने कुठाराघात कर दिया। विभागीय अधिकारी हाथ मलते रह गए। जिस तिजोरी में अरबों रुपए की बात कही जा रही थी, उसमें एक पैसा भी नहीं मिला। सब कुछ मैनेज कर लेने के बाद पोंटी के अधिकारी सीना चौड़ा करके बात करने लगे उनकी तरफ से आयकर विभाग को कटघरे में खड़ा करने वाला बयान आया, ‘हमारी कम्पनी कोई गलत या नबंर दो का काम नहीं कर रही है, जितना भी कारोबार किया जा रहा है, उसका लेखा-जोखा कम्पनी के पास है और आयकर का भुगतान भी समय से किया जा रहा है।’’

  आयकर विभाग को मुंह की खानी पड़ी और पोंटी का बालबांका नहीं हुआ। आयकर विभाग ने फजीहत से बचने के लिए शिगूफा छोड़ दिया गया कि सम्भवत: छापे की खबर लीक हो गई होगी, जिस कारण पोंटी के लोग सारा पैसा ठिकाने लगाने मे सफल हो गए। बहरहाल, छापे के बाद पोंटी को फायदा यह हुआ कि अब पोंटी के पास न कोई चंदा लेने आ रहा है न कोई यह पूछ रहा है कि क्या उसकी आस्था बदल गई हैं। कांग्रेस ने एक ही झटके में पहले पोंटी को झटका और उसके बाद उसे सहारा देकर उबार लिया। इसे लोग कांग्रेसी राजनीति और रणनीति बता रहे हैं। वैसे इससे इत्तर कहने वाले यह भी कह रहे थे वाइन किंग ने ही अपने खिलाफ छापेमारी का जाल बिछवाया था, इसके बदले में उसने मोटी रकम भी खर्च की थी, लेकिन यह रकम उस रकम से काफी कम थी जिसकी उम्मीद पोंटी से हासिल करने की उम्मीद बसपा आलाकमान लगाए हुए था। आयकर विभाग की छापेमारी कराकर पोंटी ने एक साथ कई निशाने साधे हैं। एक तो अब कोई यह नहीं कह पाएगा कि पोंटी के पास काले धन की खान है दूसरा पोंटी के करीबी यह कहते हुए बसपा को उसका ‘हक’ देने से बच जाएंगे कि उन्होंने कुछ कमाया ही नहीं तो देंगे कैसे। पोंटी जिस तरह से बसपा से दूरी बना रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगला शासन मायावती का नहीं होगा। वह माया से दूरी बनाकर और कांग्रेस एवं समाजवादी पार्टी के करीब आकर अपने भविष्य पर लगे ग्रहण को भी कम करना चाहते हैं। उन्हें पता है कि पिछले पांच सालों में उनके और माया सरकार के करीबी रिश्तों को लेकर खूब चर्चा हुई है, ऐसे में अगर कोई अन्य सरकार बनी तो वह उनकी कम्पनी को अछूत समझकर किनारे लगा सकती है। यह बात यह बिजनेस मैन होने के नाते पोंटी कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। बसपा से दूरी बढ़ाकर पोंटी एक तीर से कई निशाने लगाने के चक्कर में हैं।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

इंटरनेट पत्रकारिता पर ये दाग अच्‍छे नहीं

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जबकि इस खबर के साथ कर्नाटक विधानसभा, कर्नाटक मैप या फिर मंत्री की फोटो लगायी जा सकती है। लेकिन कुछ वेबसाइट ऐसी हैं, जिन्‍हें यह गवारा नहीं। उन्‍हें इन सबकी जगह ब्‍लू फिल्‍म की सीधी बेडरूम से खींची गई तस्‍वीर लगाना ज्‍यादा शोभा देता है। क्‍या हम अखबार या न्‍यूज चैनल में ऐसा कर सकते हैं। शायद नहीं। क्‍या हमें इंटरनेट पत्रकारिता में आने के बाद अपने इन मूल्‍यों को ताक पर रख देना चाहिये। आज तमाम वेबसाइटें ऐसी हैं, जो अपने कंटेंट पर क्लिक पाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती हैं।

जनता पर इसका क्‍या असर होता है? : न्‍यूज वेबसाइटों पर परोसे जाने सेक्‍स की वजह से आज आलम यह है कि लोग हम इंटरनेट पर काम करने वाले पत्रकारों को हलके में लेने लगे हैं। लोग सोचते हैं कि इलेक्‍ट्रॉनिक चैनलों और अखबारों में जो वजन है, वो इंटरनेट पर नहीं। इसलिए आप इंटरनेट पर बड़ी से बड़ी खबर भी लिख देते हैं उसका असर नहीं होता, हां अगर कोई अखबार आपकी साइट से कॉपी कर के छाप दे, तो अधिकारी से लेकर नेता तक हिल जाते हैं।

मुझे लगता है कि अगर हमें अखबारों और इलेक्‍ट्रॉनिक चैनलों की तरह अपनी पत्रकारिता में दम भरना है तो ऐसी अश्‍लील पत्रकारिता को छोड़ना होगा, महज हजार डेढ़ हजार क्लिक्‍स का मोह त्‍यागना होगा। अगर आप इंटरनेट पत्रकारिता से जुड़े हैं, तो इस बात को गंभीरता से सोचिए, कहीं ऐसा न हो कि भविष्‍य में हमारी पत्रकारिता महज पोर्न कंटेंट तक सीमित रह जाये।

अजय मोहन

बेंगलुरु

विवेक हिंदुस्‍तान से कार्यमुक्‍त, विकास कशिश न्‍यूज एवं अनिल हरिभूमि पहुंचे

हिंदुस्‍तान, औरैया से खबर है कि विवेक विश्‍नोई को कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. विवेक रिपोर्टर थे. विवेक विशेश्‍वर कुमार के शिकार बन गए. विशेश्‍वर कुमार ने अपने तबादले का आदेश आने के बाद जाते-जाते विवेक को कार्यमुक्‍त कर गए. विवेक ने खुद को निकाले जाने का कारण पूछा तो विशेश्‍वर कुमार ने कुछ भी नहीं बताया. बताया जा रहा है कि विवेक ने नवीन जोशी को भी इस बारे में बताया पर उन्‍होंने संज्ञान नहीं लिया.

कशिश न्‍यूज से खबर है कि विकास कुमार ने अपनी नई पारी शुरू की है. विकास को इनपुट से जोड़ा गया है. विकास ने पत्रकारिता की शिक्षा साधना एकेडमी से पूरी करने के बाद सीएनईबी चैनल के साथ ट्रेनी के रूप में छह माह तक काम किया. उसके बाद उन्‍होंने कशिश ज्‍वाइन कर लिया.

राष्‍ट्रीय सहारा से खबर है कि अनिल पटेल ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी की शुरुआत दैनिक हरिभूमि से शुरू की है. इन्‍हें यहां भी रिपोर्टर बनाया गया है. अनिल ने करियर की शुरुआत 2006 में पंजाब केसरी से किया था.

अब दिमागी नहीं शारीरिक रूप से मजबूत पत्रकार तैयार करेगा एमसीयू

लगता है अब पत्रकारों की नियुक्ति भी किसी वेटलिफ्टर या पहलवान की तरह किलो वर्ग के आधार पर होगी. इसकी शुरुआत की है भोपाल स्थित एशिया के पहले हिंदी पत्रकारिता को समर्पित माखनलाल विश्वविद्यालय के वर्तमान और चर्चित कुलपति कुठियाला ने. माखनलाल में जिम का शुभारंभ किया गया है… जहाँ भावी पत्रकार शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन करते नजर आएंगे. पहले ही अपनी हड़तालों और हंगामों के चलते प्रसिद्ध इस विश्वविद्यालय में कोई आश्चर्य नहीं अगर पत्रकारों के मारपीट के किस्से सामने आएँ.

कमाल यह है कि यहाँ की लाइब्रेरी में नई किताबों के दर्शन दुर्लभ है.. दिमागी कसरत के लिए कोई सहूलियत उपलब्ध नहीं है तो शायद प्रशासन ने सोचा कि शरीर ही बना दिया जाए क्योंकि कहीं पढ़ा था कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है… भाई लोगों ने इस कहावत को अपने अंदाज पर समझ लिया. वैसे भी कुलपति मेहरबान तो पत्रकार पहलवान… शायद यह सही भी था क्योंकि कई दफा ऐसी खबरें सामने आती रहीं हैं कि पत्रकार पिट कर आ गए तो जरुरी है, शायद अब ऐसी खबरें सामने आएँ कि पत्रकारों ने फलाँ भ्रष्ट नेता की जमकर पिटाई की. पत्रकारिता को नई दिशा देने वाले प्रबंधन का सार्वजनिक सम्मान निहायत ही जरूरी है.

माखनलाल से सिर्फ 'पत्रकार' नहीं बल्कि 'पहलवान टाइप के पत्रकार' निकलेंगे। लंबे समय से परिवर्तन का इंतजार कर रहा माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय का स्टूडियो, जिसकी हालत अब भी दयनीय है, वो तो ठीक हुआ नहीं, हां लेकिन सेहत बनाने के लिए जिम अवश्य खुल गया है। क्या वाकई 'स्टूडियो' से ज्यादा आवश्यकता 'जिम' की है। यकीं ना हो तो इस फोटो पर गौर फरमाइये। कुछ जाने पहचाने चेहरे नजर आ ही जायेंगे (फोटो आशीष जोशी जी के प्रोफाइल से साभार लिया गया है)। क्या हिन्दी पत्रकारिता का गढ़ कहलाने वाला माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय कुछ लोगों के निजी स्वार्थों की आरामशाला बन गया है?

ऐसे में जबकि भोपाल के बिशन खेडी क्षेत्र में नए परिसर बनने का प्रस्ताव है. कुछ ही माह पूर्व इसका भूमिपूजन भी हुआ है, ऐसे में फिर इस पुराने और एक ऐसे भवन में जो साल दो साल में किसी दूसरे काम में लाया जाना हो, में इतना निवेश करना कहां तक उचित है? "अमां खां मिया कुठियाला साहब… यही पैसे किसी ऐसे काम में लगते जहाँ स्टूडेंट्स का भला होता  तो शायद उचित होता… सच में दुःख होता है विश्वविद्यालय कि इस दशा को देखकर… एमसीयू का पास आउट होना मीडिया संस्थानों में गाली बनता जा रहा है… वैसे जिमखाना खोलने का आशय कुछ समझ नहीं आया… क्यूँ कि आपके सभी खासम-खास आशीष जोशी जी, सौरभ मालवीय जी, राघवेन्द्र प्रताप जी सहित अन्य तो काफी स्वस्थ हैं.. हाँ नन्द किशोर त्रिखा जी के सेहत कि चिंता हो सकती है लेकिन वो तो नॉएडा में हैं फिर ये किसके लिए..?? समझ नहीं आ रहा."

लेखक क्षितिज कुमार पांडेय एमसीयू से पास आउट हैं तथा फिलहाल एक बड़े दैनिक अखबार में कार्यरत हैं.

अर्थकाम का तीर निशाने पर, जागरण बढ़ा दस फीसदी से ज्यादा

अर्थकाम धीरे-धीरे वित्तीय मामलों से जुड़ी इकलौती ऐसी वेबसाइट बनती जा रही है जो न केवल गूढ़ आर्थिक व वित्तीय मसलों  की गुत्थी सुलझाकर पेश  करती है बल्कि शेयरों में निवेश की सिफारिशों में भी उसकी साख बढ़ती जा रही है। पुरानी बात छोड़ दें तो उसने करीब दो हफ्ते पहले ही लिखा था (जिसे हमने भड़ास पर दूसरे संदर्भों के साथ लगाया भी था) कि जागरण प्रकाशन का शेयर 10-15 दिन में 10 फीसदी बढ़ जाएगा। और, सचमुच इस शेयर ने 15 दिन पूरा होने से पहले ही 7 फरवरी तक करीब 14 फीसदी बढ़त हासिल कर ली। आज भी इस शेयर में रुझान बढ़ने का दिख रहा है।

अर्थकाम ने आज शेयर बाजार खुलने से पहले अपनी इस उपलब्धि पर लिखा है, “15 दिन में बंद भाव से बंद भाव तक का रिटर्न 14 फीसदी। अर्जुन की तरह तीर ठीक निशाने पर मारनेवाला आखिर कौन-सा धनुर्धर है जो इतने ऐलानिया तौर पर आपको मुफ्त में धन बनाने के सूत्र दे रहा है?” आगे उसने कहा है कि भविष्य में वह इस तरह पक्के रिटर्न की सिफारिशों की सेवा को पेड-सर्विस बना सकता है।

गौरतलब कि अर्थकाम को वरिष्ठ पत्रकार अनिल रघुराज मुंबई से संचालित करते हैं। दैनिक जागरण से लेकर अमर उजाला, डॉयचे वेले रेडियो, एनडीटीवी इंडिया, सीएनबीसी आवाज़, स्टार न्यूज़ और बिजनेस भास्कर तक में करीब 20 साल तक नौकरी करने के बाद उन्होंने अप्रैल 2010 से हिंदी में वित्तीय साक्षरता के लिए यह वेबसाइट शुरू की। अर्थकाम को इकनॉमिक टाइम्स और आईआईएम अहमदाबाद द्वारा साल 2010 में आयोजित प्रतिस्पर्धा ‘पावर ऑफ आइडियाज़’ के 74 विजेताओं में चुना गया था।

हिंदुस्‍तान, फिरोजाबाद धड़ल्‍ले से छाप रहा पेड न्‍यूज, आयोग मौन

चुनाव घोषित होने से पूर्व हिंदुस्तान समाचार पत्र के प्रधान संपादक शशि शेखर ने कहा था कि हम किसी भी हालत में पेड न्यूज़ नहीं छापेंगे. लेकिन जनपद फिरोजाबाद में हिन्दुस्तान पेपर में धड़ल्ले से पेड न्यूज़ छपी जा रही है. पाठक देखते ही अंदाज लगा लेते हैं कि ये एक ख़ास पार्टी का विज्ञापन किया जा रहा है. लेकिन न तो जिला प्रशासन और न ही चुनाव आयोग के कर्मचारी ही इस पर कोई कार्रवाई कर रहे है. इससे हिन्दुस्तान अखबार की साख को बट्टा लग रहा है, वो भी चंद रुपयों की खातिर. इस पेड न्यूज़ के अंत में MMI वर्ड का कोड भी दिया जा रहा है.

गौरतलब है कि ये पेड़ न्यूज़ सिर्फ हिन्दुस्तान में ही छापी जा रही है, बाकी के अखबार इस तरह की खबरों को छापने से परहेज कर रहे हैं. आपकी सुविधा के लिए हम 9 फरवरी के हिन्दुस्तान के फिरोजाबाद संस्‍करण में बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में छ्पी खबर भी भेज रहे हैं. आप खुद ही अंदाजा लगा लें कि यह पेड न्यूज़ नहीं तो और क्या है. अब यह कैसे संभव है कि पेड न्‍यूज छपे और संपादक को पता न हो. आखिर पत्रकारों की इतनी हिम्‍मत कैसे हो गई कि अपने प्रधान संपादक के आदेशों की खुले आम अवहेलना करे.

इन खबरों से तो ये ही जाहिर होता है कि प्रधान संपादक अपने संस्‍थान के भीतर चल रहे गोरखधंधे से वाकिफ नहीं हैं या फिर उनके खाने के दांत और दिखाने के दांत और हैं. अब मैं भड़ास के माध्‍यम से यह बात प्रधान संपादक तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं कि अगर वे इस मामले से अनजान हैं तो जान लें. मैं दो खबरों की कटिंग भी भेज रहा हूं, जिसमें एक की हेडिंग 'जन-जन का मिल रहा खालिद को समर्थन' तथा दूसरा 'ना झंडे, ना पर्चा, हर तरफ खालिद की चर्चा' है. इन खबरों को पढ़ने के बाद आसानी से समझ में आ रहा है कि हिंदुस्‍तान धड़ल्‍ले से पेड न्‍यूज छाप रहा है. इन खबरों में खालिद के पिता नसीरुद्दीन, जो इस बार बसपा से विधायक रहे हैं उनके भी विकास कार्यों की लंबी लिस्‍ट महिमा मंडन के साथ छापी गई है.

हिंदुस्‍तान के 8 फरवरी का अंक
हिंदुस्‍तान के 9 फरवरी के अंक में प्रकाशित खबर

सीपी सिंह बने जनता टीवी के नेटवर्किंग डाइरेक्‍टर, अवनीश हिंदुस्‍तान पहुंचे

हमार टीवी एवं फोकस टीवी के यूपी ब्‍यूरोहेड पद से अलग होने वाले सीपी सिंह ने अपनी नई पारी जनता टीवी के साथ शुरू की है. सीपी सिंह को जनता टीवी का नेटवर्किंग डाइरेक्‍टर बनाया गया है. सीपी सिंह कुछ समय पहले पॉजिटिव मीडिया ग्रुप से जुड़े थे. सीपी सिंह अब यूपी में जनता टीवी की पूरी जिम्‍मेदारी संभालेंगे. खबरों एवं बिजनेस दोनों के लिए जनता टीवी प्रबंधन ने उनपर विश्‍वास जताया है. सीपी सिंह के प्रयास से हमार टीवी कुछ ही समय में यूपी में कई जिलों में दिखने लगा था. सीपी इसके पहले भी कई अखबार में काम कर चुके हैं. सीपी सिंह के जनता टीवी से जुड़ने की पुष्टि करते हुए चैनल के वाइस प्रेसिडेंट गुरबिंदर सिंह ने कहा इससे चैनल को मजबूती मिलेगी.

अमर उजाला, बरेली से खबर है कि अवनीश पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर क्राइम रिपोर्टर के रूप में कार्यरत थे. खबर है कि वे अपनी नई पारी बरेली में ही हिंदुस्‍तान के साथ करने जा रहे हैं. जहां उन्‍हें क्राइम रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी ही सौंपे जाने की संभावना है. अवनीश पिछले साल ही अमर उजाला से जुड़े हुए थे. माना जा रहा है कि हिंदुस्‍तान के क्राइम रिपोर्टर रहे सीपी सिंह के चीफ रिपोर्टर बन कर अलीगढ़ चले जाने के बाद हिंदुस्‍तान की क्राइम रिपोर्टिंग काफी कमजोर हो गई थी, इसलिए क्राइम टीम को मजबूत करने के लिए अवनीश को हिंदुस्‍तान ने अपने साथ जोड़ा है.

खबर रिपीट : ये सहारा वालों का अमर प्रेम है या कोआर्डिनेशन की कमी

गोरखपुर में बुधवार को जब राष्‍ट्रीय सहारा लोगों के हाथों में पहुंचा तो यह देखकर लोगों को ताज्‍जुब हुआ कि अमर सिंह की एक ही खबर दो जगहों पर लगाई गई है. जो खबर पहले पन्‍ने पर छपी है वही खबर सात नम्‍बर पेज पर भी लीड के रूप में लगी है. वो भी दो फोटो के साथ. अन्‍य अखबारों के दफ्तरों में सहारा के इस अमर प्रेम को लेकर खूब बातें चलीं. हालांकि खबरों का दो जगह प्रकाशित होना अमर प्रेम के कारण नहीं बल्कि कोआर्डिनेशन की कमी है.

बताते चलें कि राष्‍ट्रीय सहारा में लगातार स्‍टाफ कम होते जा रहे हैं. कई लोग इस्‍तीफा देकर दूसरे संस्‍थानों से जुड़ गए पर नई भर्तियां नहीं की गई. कई पद रिक्‍त पड़े हुए हैं. सहारा में कार्यरत प्रदीप श्रीवास्‍तव की मौत हो गई. आनंद सिंह संस्‍थान छोड़कर चले गए, राकेश श्रीवास्‍तव और कपिल सिन्‍हा का बनारस तबादला हो गया. नीरज श्रीवास्‍तव दैनिक जागरण एवं प्रमोद सिंह जनसंदेश टाइम्‍स चले गए. पर इनके सापेक्ष इन पदों पर भर्तियां नहीं हुईं. कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे सहारा में काम का इतना दबाव है कि आए दिन खबरों की रिपीटेशन और त्रुटियां होती रहती हैं. कई खबरें तो बिना एडिट ही प्रकाशित हो जाती हैं. विधानसभा चुनाव के लिए पटना से तीन लोग आए हैं, लेकिन तीनों मिलकर केवल एक पेज तैयार करते हैं, वो भी तब जब सभी खबरें जिलों से सज-सजा के आती हैं. नीचे अमर की दो बारे प्रकाशित खबर.


                                             सत्ता,भत्ता, कट्टा ही सपा की पहचान

चौरीचौरा (एसएनबी)। गंगा, जमुना, भगवान विश्‍वनाथ की धरती बनारस, कबीर, भगवान बुद्ध, जयशंकर प्रसाद, बिसमिल्लाह खां, सारनाथ, कैफी आजमी, फिराक गोरखपुरी सहित अन्य महापुरुषों की जन्मस्थली के लोग जब महाराष्ट्र में जाकर नौकरी करते हैं तो उन्हें भइया कहकर बाल ठाकरे के लोग मारते-पीटते हैं और अपमानित करते हैं। क्या इस पूर्वांचल में ही यहां के लोगों के लिए रोजगार के अवसर नहीं दिये जा सकते? अगर ऐसा नहीं हो सका तो इसका दोष सपा, बसपा, भाजपा तथा कांग्रेस को जाता है। उक्त बातें भारतीय लोकमंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमर सिंह ने कही। वह मंगलवार को विधानसभा चौरीचौरा क्षेत्र के सरदानगर स्थित मजीठिया प्ले ग्राउंड में दल के प्रत्याशी शिवमंदिर पासवान के समर्थन में आयोजित एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे।

अमर सिंह ने कहा कि देवी-देवताओं से लेकर महापुरुषों की स्थली रही पूरब की माटी में जन्मे लोग बाहर के प्रदेशों में जाकर जो अपमान झेल रहे हैं इसका सारा दोष उत्तर प्रदेश की कमान सम्भालने वाले नेताओं की है। उन्होंने कहा कि पूरे उत्तर प्रदेश में ज्यादा बिजली पूर्वांचल में पैदा होती है लेकिन यह बिजली यहां के लोगों को न मिलकर सैफई एवं बादलपुर में भेज दी जाती है। मैं यहां की जनता से पूछता हूं कि ऐसी उपेक्षा आप लोग क्यों सहते हैं। उन्होंने कहा कि भदोही, गाजीपुर, सठियांव, बलिया, भटनी, बैतालपुर, गौरी बाजार, छितौनी, धुरियापार चीनी मिलों के अलावा गोरखपुर खाद कारखाना वर्षों से बंद पड़ा है आखिर इसे चलवाने के लिए प्रदेश तथा केन्द्र सरकार में बैठे लोगों ने क्यों नहीं पहल की। पूर्वाचल के विकास के मद में जितना हिस्सा मिलना चाहिए आखिर वह क्यों नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार सत्ता, भत्ता, कट्टा तथा हत्या करवाकर राज करना जानती है। बेनी प्रसाद वर्मा, राज बब्बर, रसीद मसूद, संजय दत्त, सलीम शेरवानी, जया बच्चन, सदी के नायक अमिताभ बच्चन सहित सब सपा को छोड़कर चले गये हैं सपा में बचे है तो सिर्फ मुलायम सिंह और अखिलेश यादव। आजम खां को इस लिए रखा गया है कि यह हिन्दुओं पर कटाक्ष कर मुसलमानों को रोके रहें।

उन्होंने बसपा की मुखिया मायावती पर कहा कि तीन बार भाजपा के सहयोग से बसपा अध्यक्ष मुख्यमंत्री बनीं तो साम्प्रदायिक नहीं थी और जब लालजी टण्डन के हाथ की राखी की डोर कमजोर पड़ गई तो भाजपा से बुरी पार्टी बसपा के लिए नहीं रह गई। बसपा ने तो भ्रष्ट्राचार की पार्टी बना ली हैं। इसके 21 मंत्री सरकार को ऐसे दूहते रहे जैसे गाय के थन से दूध निकाला जाता है। सांसद तथा फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा ने कहा कि हमने महराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा पंजाब का दौरा किया लेकिन विकास के मामले में जितना पूर्वांचल पीछे है उतना प्रदेश का कोई हिस्सा नहीं हैं। पूर्वाचल के लोगों के जीवन में खुशहाली आये और चेहरों पर रौनक दिखाई दे यही हमारे नेता अमर सिंह की चिंता हैं।


एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

लाइव कार्यक्रम में एंकर के चेहरे पर कुत्‍ते ने काटा

कोलोराडो के डेनवर मने एक दिग्गज टीवी एंकर को उस वक़्त हॉस्पिटल पहुंचना पड़ा जब एक लाइव टीवी शो के दौरान एक कुत्ते ने उनके चेहरे पर हमला कर काट दिया। इस कुत्ते को हाल ही में अथक प्रयास से बचाया गया था। मैक्स नाम के इस अर्जेण्टीनी बड़े कुत्ते ने अपने दांतों को एंकर कायली ड्येर के चेहरे में गड़ा दिया जब वह उसे दुलार करने के लिए बुधवार को प्रसारित हो रहे सुबह के शो कुसा-टीवी के दौरान उसेक पास आईं।

मैक्स नाम का यह कुत्ता सोमवार को एक ठन्डे तालाब में गिर गया था। काफी कोशिश के बाद भी यह बाहर नहीं आ सका था। बाद में अग्निशमन विभाग ने इसे बचा लिया था। इस घटना के बाद पशु नियंत्रण अधिकारियों ने मैक्स को एक पिंजड़े में बंद कर दिया है और कुत्ते के मालिक माइकल रॉबिन्सन पर जुर्माना लगाया गया है। सुश्री ड्येर की हालत ठीक है। ड्येर डेनवर अस्पताल में कुत्ते के काटने से उबर रही है। (एजेंसी)

देखिए एंकर को कुत्‍ता काटने की वीडियो :  http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=jPvF1HTntfs

पॉजिटिव मीडिया के सीईओ विनीत सक्‍सेना कार्यमुक्‍त

पॉजिटिव मीडिया ग्रुप से खबर है कि सीईओ के रूप में कार्यरत विनीत सक्‍सेना को कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. विनीत छह महीने पहले पॉजिटिव मीडिया के साथ सीईओ के रूप में जुड़े थे. उन्‍हें फाइनेंसर एक्‍पर्ट माना जाता था. उनके पास ग्रुप के चैनल एनईटीवी, फोकस टीवी, हमार टीवी, एनई बांग्‍ला, एचवाई, एनई हाईफाई की जिम्‍मेदारी थी. विनीत सक्‍सेना पॉजीटिव ग्रुप से जुड़ने वाले दूसरे सीईओ थे. यह छह महीना भी पॉजिटिव मीडिया के साथ काम नहीं कर पाए. पहले सीईओ राजीव अरोड़ा भी इस संस्‍थान के भीतर के विवाद से परेशान होकर इस्‍तीफा दे दिया था. वे यहां तीन महीने तक भी नहीं टिक पाए थे.

विनीत सक्‍सेना का संस्‍थान से नाता टूटने के संदर्भ में पूछे जाने पर ग्रुप के एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर जीके शास्‍त्री ने बताया कि विनीत को जो टार्गेट दिए गए थे, उन्‍हें वे पूरा नहीं कर पाए थे, जिसके चलते प्रबंधन ने यह निर्णय लिया. उन्‍होंने उम्‍मीद जताई कि जल्‍द ही यह ग्रुप अपनी अलग पहचान बनाएगा.

लखनऊ में हमार टीवी की टीम पर हमला, पूर्व ब्‍यूरोचीफ पर आरोप

: दोनों तरफ से मामला दर्ज कराया गया : लखनऊ में हमार टीवी की टीम के ऊपर हमला हुआ है. छह से आठ की संख्‍या में मौजूद युवकों ने आवास विकास कार्यालय के पास हमार टीवी के डाइरेक्‍टर जीके शास्‍त्री की गाड़ी रोकी तथा उसमें बैठे खालिद गौरी, कैमरामैन मनोज दुबे तथा ड्राइवर मनोज को मारा-पीटा. इसके बाद चले गए. हमार टीवी की टीम ने लखनऊ के गौतमपल्‍ली थाने में पूर्व ब्‍यूरोचीफ सीपी सिंह समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है. वहीं सीपी सिंह ने भी उन्‍हें झूठे फंसाने तथा बकाया पैसा न देने का मुकदमा दर्ज करा दिया है.

बताया जा रहा है कि बुधवार को हमार टीवी की टीम लखनऊ में एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर जीके शास्‍त्री के साथ किसी काम से जा रही थी. तभी आवास विकास के कार्यालय के पास इनलोगों की गाड़ी रोककर छह से आठ लोगों ने मारपीट तथा हाथापाई की. इसके बाद वे लोग फरार हो गए. हमला नए ब्‍यूरोचीफ खालिद, कैमरामैन मनोज दुबे एवं ड्राइवर मनोज पर किया गया. हमार की टीम की तरफ से गौतमपल्‍ली थाने में हमार टीवी के पूर्व ब्‍यूरोहेड सीपी सिंह समेत कई लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 323 तथा 506 के तहत मामला दर्ज करा दिया गया. इसके बाद सीपी सिंह ने भी पॉजिटिव मीडिया के एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर जीके शास्‍त्री एवं खालिद समेत कई लोगों पर आईपीसी की धारा 406, 504 तथा 506 के तहत मामला दर्ज करा दिया गया. पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है.

इस संदर्भ में पूछे जाने पर सीपी सिंह ने बताया कि पॉजिटिव मीडिया प्रबंधन बिना वजह उन्‍हें फंसाने की कोशिश कर रहा है. मेरा उन लोगों के ऊपर 23 लाख रुपये बकाया है. मैं उसकी मांग कर रहा हूं इसिलिए उनको फंसाने की साजिश रची गई है ताकि मैं अपने पैसे ना मांग सकूं. उन्‍होंने कहा कि मुझसे एक करोड़ तीस लाख रुपये का विज्ञापन मांगा गया, जिसको देने में मैंने असमर्थता जताई तथा मैंने संस्‍थान छोड़ दिया. इसके बाद मैं ने कमिशन एवं अन्‍य खर्च के बकाया अपने पैसे मांगे तो मुझे फंसाने की साजिश रची गई. मैं घटनास्‍थल पर मौजूद भी नहीं था, पर मेरे नाम से एफआईआर दर्ज करा दी गई. खालिद पहले से विवादित रहे हैं. एक स्ट्रिंगर से पन्‍द्रह हजार रुपये मांगने की खबर भी आपके पोर्टल पर चल चुकी है. अब ऐसे लोगों पर कोई भी हमला करे तो उसमें मेरा नाम घसीटा जाना कहा तक न्‍यायसंगत है.

इस संदर्भ में जब पॉजिटिव मीडिया के एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर जीके शास्‍त्री से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि संस्‍थान में आने के बाद सीपी सिंह के पुराने कारनामों का मुझे पता चला. इनके खिलाफ कई शिकायतें भी आईं. तमाम आरोप भी इनपर लगे, जिसको संज्ञान में लेते हुए एवं पत्रकारिता की नैतिकता को ध्‍यान में रखते हुए मैं ने इन्‍हें टर्मिनेट कर दिया. इसके बाद से ही ये लोग खफा चल रहे थे. जब मैं अपनी टीम के लोगों के साथ किसी से मिलने जा रहा था तो इनके लोगों ने हमला किया. शास्‍त्री ने एक करोड़ तीस लाख रुपये के विज्ञापन मांगे जाने के सीपी सिंह के आरोपों को फर्जी बताते हुए कहा कि यह सब हटाए जाने के बाद प्रबंधन को बदनाम करने की कोशिश है. अब आप सोच सकते हैं कि कई दशक के करियर में मेरे नाम पर एक भी धब्‍बा नहीं लगा लेकिन सीपी सिंह ने मेरे खिलाफ भी मुकदमा करा दिया है. 

भाजपा के गले की हड्डी बने बाबू सिंह कुशवाहा देवरिया में बेआबरु हुए

: भाजपाइयों ने नहीं दिया भाव : देवरिया। कभी बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता रहे बाबू सिंह कुशवाहा न घर के रहे न घाट के। जिस बसपा की सरकार में वे एक महत्वूपर्ण पद पर रह कर प्रदेश में अपनी हनक पैदा करते थे और उनकी तूती बोलती थी, आज उनकी स्थिति यह है कि वह जिला प्रशासन के प्रोटोकाल तक में शामिल नहीं है। यही नहीं वह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के प्रचार के लिए देवरिया जिले के पथरदेवा विधान सभा क्षेत्र में बड़ी उम्मीद लेकर आए थे लेकिन भाजपाइयों की बेरुखी और अपमानजनक व्यवहार से वह तीन में से दो जनसभाओं को बिना सम्बोधित किए हुए ही चले गए।

श्री कुशवाहा की हालात इतनी बदतर हो गई है कि कोई भी भाजपाई उनके बारे में बोलना तक पसन्द नहीं कर रहा है। पथरदेवा विधान सभा के जिस तरकुलवा क्षेत्र में वे गए थे वहां के एक भाजपा कार्यकर्ता अनिल ने बाबू सिंह कुशवाहा का नाम सुनते ही उन्हें काफी भला बुरा कहा। हांलाकि पुलिस थाना तरकुलवा के दरोगा गौरव सिंह के अनुसार भाजपा नेता अनिल के ही मित्र जय प्रकाश सिंह के यहां ही बाबू सिंह ने दिन का भोजन किया है। खुद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही तो इस मामले में बात तक करने के लिए तैयार नहीं दिखे। उन्होंने संवाददाता का फोन तक नहीं उठाया। यह अलग बात है कि श्री शाही के जिला मुख्यालय स्थित आवास से ही इस संवाददाता को बाबू सिंह कुशवाहा के भ्रमण कार्यक्रम का फोटो कापी देकर उनके भ्रमण कार्यक्रम के बारे में पूरी जानकारी दी गई।

इस बारे में भाजपा के जिला मीडिया प्रभारी विजय शुक्ल ने बहुत मुश्किल से कहा कि बाबू सिंह कुशवाहा भाजपा के सदस्य नहीं है। उनका अलग संगठन है। इसलिए भाजपा से उनको जोड़ना गलत है। कहा जा रहा है भारतीय जनता पार्टी के दामन को पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने बड़ी मजबूती एवं जिस उम्मीद के साथ पकड़ा था, वही भाजपा अब बाबू सिंह कुशवाहा से पीछा छुड़ाने के मूड में है। शायद तभी तो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही की बात तो बहुत दूर है, उनके निर्वाचन क्षेत्र पथरदेवा विधान सभा में किसी भी भाजपा नेता या कार्यकर्ता तक ने उन्हें जरा भी भाव नहीं दिया। श्री कुशवाहा बड़े बे आबरु होकर देवरिया से विदा हो गए। शायद यही वजह रहा कि कुशवाहा आरक्षण बचाओ मोर्चा के संरक्षक के रूप में जिले में आए और खुलकर भाजपा के लिए वोट भी नहीं मांगने पाए। बताया जाता है कि कुशवाहा को अपनी उपेक्षा का आभास काफी पहले से ही हो गया था, इसी वजह से वे जिले में तीन स्थानों पर आयोजित जनसभा में से मात्र एक को ही थोड़ी देरे के लिए सम्बोधित किया और चले गए।

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

आडवाणी की सभा रद्द, बिफरे योगी ने प्रशासन को बसपा का एजेंट बताया

गोरखपुर : लालकृष्ण आडवाणी की बुधवार की शाम यहां होने वाली जनसभा की प्रशासन द्वारा अनुमति नहीं दी गई। प्रशासन द्वारा सभा कार्यक्रम को अचानक रद्द किए जाने की सदर सांसद योगी आदित्यनाथ ने तल्ख शब्दों में निंदा की है। प्रशासन के इस रवैये के विरोध स्वरूप उन्होंने टाउनहाल स्थित गांधी प्रतिमा स्थल पर पत्रकारवार्ता की और कहा कि सभा रद्द कर प्रशासन ने लोकतंत्र की हत्या की है। पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका बसपा के एजेंट जैसी है। इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता का दावा तार-तार हुआ है। आयोग को इस मामले की जांच करानी चाहिए। उन्होंने जनता से अपील की कि वह प्रशासन की इस निरंकुशता का जवाब 11 फरवरी को बैलेट से दे।

उन्होंने कहा कि प्रशासन इसके लिए सुरक्षा का जो तर्क दिया वह गले से नीचे उतरने वाली नहीं। 2007 में इसी जगह आडवाणी, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज और केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा की सभा हुई थी। ऐसे में कौन से हालात बन गए कि प्रशासन को सुरक्षा कारणों से सभा रद्द करनी पड़ी। अगर सुरक्षा कारण ही वजह है तो गुरुवार को यहां केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के सभा की अनुमति क्यों और कैसे दी गई? इस मौके पर गोरखपुर शहर और ग्रामीण से भाजपा उम्मीदवार क्रमश: डा.राधामोहन दास अग्रवाल, विजय बहादुर यादव, महानगर अध्यक्ष डा.धर्मेद्र सिंह भी मौजूद थे। तीनों ने विरोधस्वरूप मुंह पर काली पट्टी बांध रखी थी। मालूम हो कि बुधवार की शाम पांच बजे टाउनहाल स्थित कचहरी क्लब मैदान पर भाजपा के शहर और ग्रामीण क्षेत्र के प्रत्याशियों के पक्ष में श्री आडवाणी और शत्रुघ्न सिन्हा की जनसभा होने वाली थी।

प्रशासन की इस भूमिका से बुद्धिजीवी मतदाताओं का रुझान एकतरफ़ा भाजपा की तरफ़ होने लगा है. सभी यही कह रहे हैं कि प्रशासन बसपा की तरफ़दारी में है. आडवाणी की सभा की अनुमति नहीं मिलने के प्रशासनिक निर्णय का भाजपा कार्यकर्ताओं ने काली पट्टी बांधकर विरोध जताया। नगर मजिस्ट्रेट ने बताया कि कचहरी क्लब मैदान में सभा के संबंध में एसपी सिटी की तरफ से सुरक्षा समेत पांच बिंदुओं पर आपत्ति जतायी गई। जिसके बाद कचहरी क्लब मैदान में सभा कराये जाने की अनुमति नहीं दी गई।

नरसिम्‍हा राव की गलती की सजा भुगत रही है कांग्रेस : दिग्विजय

: मुलायम सिंह ने बाबरी मस्जिद ढहाने वालों को इज्‍जत दी : नई दिल्ली : कांग्रेस के महासचिव और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव अभियान में लगे दिग्विजय सिंह ने कहा है कि अब उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में उनका मुकाबला समाजवादी पार्टी से है. उन्होंने दावा किया कि अब तक चुनाव में सक्रिय रही बहुजन समाज पार्टी अब तीसरे स्थान पर खिसक गयी है. अपने इस दावे के साथ दिग्विजय सिंह ने समाजवादी पार्टी के  अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के ऊपर सीधा हमला बोला और कहा कि मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवन में एक बार भी आरएसएस के खिलाफ कभी कोई बयान नहीं दिया है.

लखनऊ में मौजूद दिग्विजय सिंह ने आज चुनाव के पहले दौर के दिन टेलीफोन पर इस संवाददाता को बताया कि उत्तर प्रदेश में सेकुलर जमातें पूरी तरह से कांग्रेस के साथ हैं. राज्य की जनता ने साम्प्रदायिक राजनीति के नुकसान को देखा है. अब वह किसी भी साम्प्रदायिक जमात को सत्ता में नहीं आने देगी. इसी वजह से बीजेपी यूपी की लड़ाई से बाहर हो गयी है. बीजेपी की मदद से कई बार मुख्यमंत्री बन चुकी मायावती भी अब जनता के गुस्से का सामना कर रही हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी भी कई बार आरएसएस और बीजेपी से मदद ले चुकी है. उनका कहना था कि २००३ में मायावती को हटाकर जो सरकार मुलायम सिंह यादव ने बनाई थी उसे बीजेपी का समर्थन मिला हुआ था. उन्होंने आरोप लगाया कि मुलायम सिंह मुसलमानों के दोस्त नहीं हैं. उन्होंने बाबरी मस्जिद के विध्वंस के मामले में सुप्रीम कोर्ट से दिन भर की सज़ा पा चुके  कल्याण सिंह को अपने साथ लिया, उनको बुलंदशहर से लोकसभा का चुनाव जीतने में मदद की और अपनी पार्टी के आगरा अधिवेशन में कल्याण सिंह के जिंदाबाद के नारे लगाए. जबकि कल्याण सिंह बाबरी मस्जिद के विध्वंस के केस में अभियुक्त हैं.

दिग्विजय ने कहा कि इसी तरह से एक अन्य अभियुक्त साक्षी महाराज को मुलायम सिंह यादव ने राज्य सभा का सदस्य बनवाया. जब उनको याद दिलाया गया कि उनकी पार्टी की सरकार केंद्र में थी और बाबरी मस्जिद को ज़मींदोज़ कर दिया गया तो दिग्विजय सिंह बोले कि वह कांग्रेस पार्टी के नेता और प्रधान मंत्री पीवी नरसिम्हा राव से चूक हुई, वे कल्याण सिंह और बीजेपी को ठीक से समझ नहीं पाए. कांग्रेस पार्टी की सेकुलर छवि को उसके बाद बहुत नुकसान हुआ जिसका खामियाजा आज तक भुगता जा रहा है. उन्होंने दावा किया राजनीति में सक्रिय होने के बाद कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी, महासचिव राहुल गांधी और पार्टी के अन्य नेताओं ने उस भूल को ठीक करने की कोशिश की है. २००४ में जब केंद्र में यूपीए की सरकार बनी उसके बाद सच्चर कमेटी बनी, रंगनाथ मिश्रा कमीशन बना और अल्पसंख्यक मंत्रालय बनाया गया. इस सारे संगठनों का मकसद मुसलमानों को इंसाफ़ देना ही है. कांग्रेस ने पिछड़े मुसलमानों के लिए साढ़े चार प्रतिशत का आरक्षण दिया. दिग्विजय सिंह को उम्मीद है कि अब मुसलमान कांग्रेस की ६ दिसंबर १९९२ की भूल को भूल चुके हैं और उत्तर प्रदेश में मुसलमानों सहित सभी सेकुलर ताक़तें कांग्रेस के साथ हैं.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा जनसंदेश टाइम्‍स के रोविंग एडिटर हैं.

सहारा के उर्दू अखबार में कार्यरत मुशीर अहमद का निधन

नोएडा। सहारा ग्रुप के उर्दू अखबार ‘रोजनामा राष्ट्रीय सहारा’ के कला विभाग में कार्यरत मुशीर अहमद कुरैशी का बुधवार रात अचानक निधन हो गया। वह 49 वर्ष के थे। मुशीर सहारा इंडिया परिवार से 1 अक्टूबर 1992 से जुड़े थे और नोएडा में कार्यरत थे। वह अपने परिवार के साथ अहाता केदार चौक बाड़ा हिन्दू राव में रहते थे। बताया जा रहा है कि बीती रात वह रात्रि पाली का काम खतम करने के बाद घर गए और खाना खाकर सो गए।

सोने दौरान ही उनकी मौत हो गई। उनकी मौत का पता सुबह तब चला जब उनके बच्चों ने उन्हें स्कूल ले जाने के लिए उठाने की कोशिश की। काफी हिलाने पर भी जब वे नहीं उठे तो घर में कोहराम मच गया। आसपास के तमाम लोग उनके घर पर जुट गए। मुशीर के मौत के कारणों का पता नहीं चल सका। बुधवार को दोपहर मुशीर को कब्रिस्तान चमेलियान में सुपुर्दे खाक कर दिया गया। इस मौके पर सहारा इंडिया परिवार के उनके सहयोगी और परिजन मौजूद थे। मुशीर के परिवार में पत्नी रुकैया समेत उनके दो पुत्र अहमद बिलाल और अहमद जुहैब तथा पुत्री सेहर निदा हैं। नोएडा परिसर में मुशीर के निधन पर एक शोकसभा का आयोजन किया गया जिसमें मृतक की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन धारण किया गया और परिवार को यह दुख सहने की शक्ति देने की प्रार्थना की गयी।

मदन कलाल, विश्‍वनाथ जैन, ओम थानवी, मोइनुद्दीन चिश्‍ती समेत कई पत्रकार होंगे सम्‍मानित

: 16 फरवरी को दिया जाएगा सम्‍मान : जयपुर। पिंकसिटी प्रेस क्लब की ओर से 16 फरवरी की शाम चार बजे जवाहरलाल दर्डा पत्रकारिता पुरस्कार और अशोक गहलोत लोकमत मित्रता पुरस्कार समारोह आयोजित किया जाएगा। क्लब अध्यक्ष एलएल शर्मा ने बताया कि प्रेस क्लब परिसर में आयोजित होने वाले इस समारोह के मुख्य अतिथि राज्यपाल शिवराज पाटिल होंगे। समारोह की अध्यक्षता मुख्यमंत्री अशोक गहलोत करेंगे। विशिष्ट अतिथि केन्द्रीय सड़क और परिवहन मंत्री डा सीपी जोशी, सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री डा. जितेन्द्र सिंह और सांसद एवं लोकमत समाचार पत्र समूह के अध्यक्ष विजय दर्डा होंगे। समारोह में वर्ष 2011 का जवाहरलाल दर्डा पत्रकारिता पुरस्कार जोधपुर के स्वतंत्र पत्रकार मोइनुद्दीन चिश्ती को दिया जाएगा।

वर्ष 2010 का पुरस्कार संयुक्त रूप से दैनिक भास्कर-जयपुर के मदन कलाल और राजस्थान पत्रिका झुंझुनूं के विश्वनाथ सैन को प्रदान किया जाएगा। वर्ष 2011 का अशोक गहलोत लोकमत मित्रता पुरस्कार जनसत्ता-नई दिल्ली के संपादक ओम थानवी को दिया जाएगा। वर्ष 2010 का अशोक गहलोत लोकमत मित्रता पुरस्कार प्रख्यात पत्रकार और राजस्थान सरकार के पूर्व सूचना एवं जनसंपर्क निदेशक राजेन्द्र शंकर भटट को दिया जाएगा। वरिष्ठ पत्रकार वेद व्यास को भी इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

यूनेस्‍को ने पत्रकार आतिफ की हत्‍या पर नाराजगी जताई

संयुक्त राष्ट्र। तालिबानी आतंकवादियों के हाथों हाल में एक पाकिस्तानी पत्रकार की हत्या की निंदा करते हुए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनेस्को ने पाकिस्तान से देश में पत्रकारों के लिए हालात बेहतर करने को कहा है। यूनेस्को महासचिव इरीना बोकोवा ने कहा, 'मैं मुकर्रम खान आतिफ की हत्या की निंदा करती हूं।'

गौरतलब है कि वॉइस ऑफ अमेरिका (वीओआई) में काम करने वाले आतिफ की पेशावर की एक मस्जिद में नमाज अदा करते वक्त हत्या कर दी गई थी। वह दुनिया समाचार चैनल के संवाददाता के तौर पर भी काम कर चुके थे और मोहमन्द एजेंसी प्रेस क्लब का अध्यक्ष रहे थे। बोकोवा ने कहा, 'यह लोकतंत्र और कानून के लिए आवश्यक है कि अधिकारी इस अपराध की जांच करे और अपराधी को सजा दें। मैं अधिकारियों से कहना चाहती हूं कि पाकिस्तान में काम करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा के लिहाज से हत्यारों को सजा दिलाने के लिए कदम उठाए जाएं।' (एजेंसी)

मालदीव में विद्रोही सैनिकों ने सरकारी टीवी स्‍टेशन पर कब्‍जा किया

मालदीव से आ रही ख़बरों के मुताबिक़ विद्रोही पुलिस अधिकारियों ने सरकारी टेलीविजन स्टेशन पर क़ब्ज़ा कर लिया है. विद्रोही राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के त्यागपत्र की मांग कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि स्‍टेशन पूरी तरह विद्रोहियों के कब्‍जे में हैं. सोमवार को तक़रीबन 50 पुलिसकर्मियों ने सरकारी आदेश को मानने से इनकार करते हुए देश के पूर्व शासक अब्दुल गयुम के समर्थकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से मना कर दिया था. गयुम समर्थक वर्तमान सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे तथा नारे लगा रहे थे.

खबर आई थी कि फौज ने गयुम समर्थकों के खिलाफ रबर की बुलेट का इस्‍तेमाल किया था, पर राष्‍ट्रपति कार्यालय ने इन खबरों से इनकार किया है. कार्यालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी. मालदीव में अशांति का दौर पिछले महीने एक वरिष्ठ जज की गिरफ़्तारी के बाद शुरू हुई थी, जिन्होंने विरोधी दल के एक कार्यकर्ता की रिहाई के आदेश दिए थे. इसके बाद से ही मालदीव में तनाव है.

चोरों ने पत्रकार के घर को बनाया निशाना, हजारों का माल उड़ाया

नवांशहर : बलाचौर शहर में चोरी की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। चोरों के हौसले इतने बुलंद हो गए है कि अब उन्होंने दिनदहाड़े चोरी की वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया है। उनके मन में पुलिस को लेकर कोई खौफ नहीं रह गया है। बुधवार दोपहर को दिनदहाड़े पुलिस को चुनौती देते हुए चोरों ने बलाचौर के वार्ड नंबर दो स्थित टीचर कालोनी में एक दैनिक अखबार के पत्रकार के घर को निशाना बनाया तथा वहां से 35 हजार रुपये की नकदी व सोने के आभूषण चोरी कर लिए। मामले की जानकारी घर वालों के वापस लौटने पर हुई। 

भुक्‍तभोगी पत्रकार सुशील पांडे ने बताया बुधवार दोपहर को 12 बजे के करीब उनकी मां राज किशोरी पांडे व उनकी पत्नी दवाई लेने के लिए पास के एक डाक्टर के यहां गई थीं। जब दोनों लोग दवाई लेकर आधे घंटे बाद वापस लौटीं तो घर का मुख्य दरवाजे का ताला टूटा हुआ था। इसके बाद जैसे ही वह घर के भीतर दाखिल हुई तो अंदर कमरों के ताले भी टूटे हुए थे। कमरे के अंदर अलमारियों के ताले भी चोरों ने तोड़ डाले थे। सारा सामान बिखरा पड़ा था। सुशील पांडे ने बताया कि घर की अलमारी में से चोर 35 हजार रुपये की नकदी, सोने के दो टॉप्स, दो बालियां व एक सोने की चैन चुरा कर ले गए। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस ने मौके पर पहुंच कर तफ्तीश शुरू कर दी है। पुलिस ने उम्‍मीद जताई है कि जल्‍द ही चोर पकड़ लिए जाएंगे।

अकेले क्‍या कर लेंगे राहुल, कांग्रेसी ही नहीं पहुंचने देंगे कांग्रेस को सत्‍ता के पास

एक पुरानी कहावत है कि अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह कहावत कांग्रेस पर एक दम फिट बैठ रही है। राज्य के सारे कांग्रेसियों की यह सोच बन रही लगती है कि केवल राहुल गांधी ही उन की नैया पार लगा सकते हैं। उप्र कांग्रेस की यह सोच कांग्रेस पार्टी के लिए तो घातक है ही साथ ही राहुल गांधी के लिए भी शुभ नहीं है। राहुल गांधी राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए जितनी मेहनत कर रहे हैं कांग्रेस के लोग अगर उस की आधी भी महनत करें तो कांग्रेस की इस राज्य में सत्ता की वापसी सुनिश्चित हो सकती है, मगर कांग्रेस जन ऐसा नहीं कर रहे हैं।

राहुल गांधी किसानों, दलितों और आम जनता के बीच आते हैं तो कांग्रेस जन अपना चेहरा दिखाने के लिए अपने साथ समर्थकों की भीड़ लेकर उपस्थित हो जाते हैं, मगर राहुल गांधी के जाते ही फिर अपने घरों में घुस जाते हैं। राहुल गांधी द्वारा बोई गई फसल को सींचने का प्रयास नहीं किया जाता। जिस फसल को लहलहाना चाहिए था समुचित देख भाल के अभाव में वह कुम्हलाने लगती है। राहुल गांधी की सभाओं में उमड़ी भीड़ को देख कर ये लोग गदगद हो जाते हैं और समझने लगते हैं कि बस उनका उद्धार हो गया। उस भीड़ को वोट में बदलने का प्रयास नहीं किया जाता।

पिछले दिनों राहुल गांधी की भट्टा पारसौल से ले कर अलीगढ़ तक की गई यात्रा का उदाहरण हमारे सामने है। राहुल गांधी पहले भट्टा पारसौल गए और फिर इस क्षेत्र के किसानों की समस्याओं को उजागर करने के लिए उन्होंने अलीगढ़ तक पद यात्रा की तो इस क्षेत्र के किसानों को लगा कि उन की समस्याएं हल हो सकती हैं और हुईं भी। राहुल गांधी की यात्रा से डरी बसपा सरकार ने किसानों के लिए कई घोषणएं कीं, इस प्रकार कांग्रेस के लिए शून्य इस क्षेत्र में कांग्रेस का नाम लेने लगे थे, मगर राहुल गांधी की इस यात्रा के बाद कांग्रेस ने राहुल गांधी मुहिम को आगे बढ़ाने का प्रयास नहीं किया। राहुल गांधी की यात्रा के बाद स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने फिर किसानों के बीच जाने का प्रयास नही किया। बस सब स्थानीय नेता आगामी विधान सभा चुनाव के लिए टिकट हासिल करने के लिए लखनउ और दिल्ली कूच कर गए। जब नेताओं को ही चिंता नहीं तो फिर आम कार्यकर्ता भला क्यों चिंता करने लगा। भट्टा पारसौल ही नहीं जहां जहां भी राहुल गांधी जा रहे हैं उन सभी जगह पर लगभग यही हाल है। राहुल गांधी की यात्रा के बाद जो फालोअप एक्शन होना चाहिए वह नहीं हो रहा है।

अब अकेले राहुल गांधी क्या क्या कर सकते हैं। फालोअप एक्शन तो वह नहीं कर सकते यह काम तो स्थानीय नेताओं को ही करना चाहिए, मगर वह ऐसा नहीं करते और यह मान कर बैठ जाते हैं कि अब राहुल जी ने कमान संभाल रखी है तो उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। बस यही भावना कांग्रेस के हित में नहीं है और इस से राहुल गांधी जो महनत कर रहे हैं कांग्रेस जनों की उदासीनता के कारण उस का भी आपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकेगा। दर असल दो दशक से भी अधिक सत्ता से बाहर रहने के कारण कांग्रेस के लोग आलसी हो गए हैं और किसी करिश्मे की उम्मीद पर बैठे हैं। मगर नहीं जानते कि करिश्मा तभी हो सकता है जब वह अपने दड़बों से बाहर निकल कर लोगों के बीच जा कर उन से सीधा सम्पर्क उसी प्रकार कायम करें जिस प्रकार राहुल गांधी कर रहे हैं।

इस समय राज्य में राहुल गांधी के लगातार दौरों के कारण कांग्रेस का माहौल बन रहा है, चुनाव से पहले किसी दल या नेता के बारे में जो अंडर करेंट होता है वैसा कांग्रेस के बारे में भी महसूस किया जा रहा है। पता नही कांग्रेस के लोग इसे महसूस कर रहे हैं या नहीं मगर लोग सोच रहे हैं क्योंकि राज्य की वर्तमान सरकार की छवि में निरंतर गिरावट आ रही है। कारण साफ है कि राज्य में भ्रष्टाचार की हालत यह है कि मायावती सरकार के आधा दर्जन मंत्री भ्रष्टाचार चलते अपनी कुर्सी गंवा चुके हैं और दर्जन भर से भी अधिक मंत्रियों एवं विधायकों पर लोकायुक्त की जांच की तलवार लटकी हुई है। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी सरकार के इतने सारे मंत्रियों को भ्रष्टाचार के चलते अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी हो। मंत्री ही नहीं अब तो मुख्यमंत्री के भाई भी भ्रष्टाचार के लपेटे में आ गए हैं। कांग्रेस के लिए इस से अच्छा मौका और क्या हो सकता है। राहुल गांधी तो इन सब बातों को ले कर जनता के बीच जा ही रहे हैं, स्थानीय नेता यदि राहुल गांधी की भांति मेहनत करें तो चुनाव आने तक राज्य में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा बन सकता है और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर चली आंधी में यह सरकार उड़ सकती है।

कांग्रेस के लिए एक अच्छी बात यह है कि इस समय राज्य में भाजपा वेंटीलेटर पर चल रही है। शीर्ष नेतृत्व में आपसी खींचतान चरम पर है। राज्य के पुराने नेता इस बात से खफा हैं कि नेतृत्व ने मध्य प्रदेश में अपनी साख गंवा चुकी उमा भारती को उनके उपर थोप दिया है। जब यह चर्चा चलती है कि उमा भारती को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जाएगा तो राज्य के पुराने भाजपाई मन मसोस कर रह जाते हैं। भाजपा का पुराना वोट बैंक अब उस से खिसक कर कांग्रेस की ओर आने का मन बना रहा है। राहुल गांधी इस बात को समझ रहे हैं और प्रयासरत हैं कि यह मतदाता कांग्रेस के पास लौट आए मगर अकेले राहुल गांधी के प्रयास से यह संभव नही लग रहा इस के लिए तो कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को जी जान से जुटना पड़ेगा। अगर ये नेता केवल राहुल गांधी के ही भरोसे पर अपने घरों से बाहर नही निकले तो उन्हें इस की कीमत चुकानी पड़ सकती है। राज्य का जो मतदाता भाजपा द्वारा चलाई गई साम्प्रदायिकता की आंधी में बहक गया था अब उस का भाजपा से मोह भंग हो गया है और वह वापस कांग्रेस में आने का मन बना रहा है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति काफी अनुकूल हो सकती है बशर्ते कि कांग्रेस इस मतदाता को अपने खेमे में लाने के लिए कोई कसर बाकी न छोड़े।

जहां तक राज्य की विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी का सवाल है तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव अपनी मनमानी तथा साम्प्रदायिक शक्तियों से गलबहियां डालने के कारण इतने अविश्वसनीय हो गए हैं कि अब उन पर भले ही वह कितनी ही माफी मांगें सहज ही विश्वास नहीं होता। इस बीच उनके कई खांटी समाजवादी साथी भी उनका साथ छोड़ कर कांग्रेस व अन्य दलों की शरण में चले गए हैं। इस के अतिरिक्त उनका पुराना एमवाई यानि मुस्लिम यादव समीकरण भी अब वैसा नहीं रहा जैसा पहले हुआ करता था। दूसरे मुख्यमंत्री मायावती अपने इस शासन काल में मुसलमानों के लिए सिवाय प्रधानमंत्री को पत्र लिखने के और कुछ नहीं कर सकी हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस जी जान से प्रयास करे तो मुसलमान फिर कांग्रेस को अपना लेंगे। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की कुनबा परस्ती भी सपा में शामिल मुस्लिम नेतृत्व को रास नहीं आ रही है। ये सारे समीकरण ऐसे हैं जिनके चलते मुसलमानों का सपा से मोह भंग हो रहा है।

वर्तमान बसपा सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार और बिगड़ती कानून व्यवस्था के चलते आए दिन हो रही हत्याएं, डकैतियां, लूट, बलात्कार और अपहरण के कारण जनता इस सरकार को बदलने के लिए तैयार बैठी है। बसपा सरकार की गिरती साख, भाजपा की अंतर्कलह और सपा के बिगड़ते समीकरण ये सारी बातें कांग्रेस के पक्ष में माहौल तैयार करने में मददगार साबित हो सकती हैं। बस शर्त यही है कि कांग्रेस के लोग आलस त्याग कर मैदान में आ जाएं। वह और कुछ न कर के केवल इतना कर लें कि राहुल गांधी जो माहौल तैयार कर रहे हैं उसे अगर वे आगे न बढ़ा सकें तो कम से कम उसे डाउन न होने दें अगर ये लोग इतना भर भी कर लेते हैं तो राज्य में कांग्रेस की वापसी संभव हो सकती है।

लेखक डा. महीर उद्दीन खान वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा कई अखबारों में संपादक रह चुके हैं.

म्‍यांमार में मीडिया पर से पाबंदी हटेगी!

यंगून : म्यांमार नया मीडिया कानून लागू करने की तैयारी में है। यह कानून करीब 50 साल पुरानी कड़ी पाबंदियों को हटा सकता है। म्यांमा की नई सरकार स्वतंत्र प्रेस की अनुमति देने की ओर बढ़ रही है जिससे लोकतंत्र समर्थक आंग सान सू च्यी के बारे में खबरें देना निषेध नहीं होगा। इसी सिलसिले में जेल में बंद पत्रकारों को भी रिहा किया गया है। सूचना मंत्रालय के महानिदेशक ये हतुत ने कहा कि संसद में सभी इस बात पर सहमत हैं कि सेंसरशिप बोर्ड रद्द होना चाहिए। (एजेंसी)

बच्‍चों से जुड़े मामले में मीडिया के लिए हो दिशा निर्देश : दिल्‍ली हाई कोर्ट

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने फलक एवं बच्चों से सम्बंधित ऐसे मामलों में तथ्यों का खुलासा करने एवं मीडिया को दिशा निर्देश देने के लिए बुधवार को राज्य सरकार से एक समिति का गठन करने के लिए कहा। न्यायालय ने ऐसे मामलों में मीडिया पर नियंत्रण के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ए.के. सीकरी एवं न्यायमूर्ति आर.एस. एंडलॉ की खंडपीठ ने मीडिया को दिशा निर्देश देने के लिए दिल्ली सरकार से एक समिति का गठन करने के लिए कहा जिससे इसकी प्रारम्भिक रपट सात मार्च तक आ सके।

गम्भीर रूप से घायल दो वर्ष की फलक को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में 18 जनवरी को भर्ती किया गया था। बच्ची के शरीर पर मानव दांत के निशान भी थे। इस समिति में बाल न्याय बोर्ड के प्रमुख, केंद्र एवं दिल्ली सरकार, 'नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड्स राइट्स', भारतीय प्रेस परिषद, मीडिया और गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। एक अधिवक्ता की फलक जैसे मामले में मीडिया के कवरेज पर दिशा निर्देश की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने केंद्र एवं राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में फलक एवं उसे एम्स लाने वाले 15 वर्षीय किशोरी को लेकर मीडिया में मची खलबली की तरफ संकेत किया गया था। याचिकाकर्त्ता ने कहा, "मीडिया के कवरेज ने दोनों बच्चों के जीवन को इस हद तक सनसनीखेज बना दिया है कि दोनों बच्चे इस घटना को कभी भुला नहीं पाएंगे।" (एजेंसी)

हाई कोर्ट ने स्‍टार न्‍यूज एवं सहारा को नोटिस जारी किया

इलाहाबाद : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टीवी चैनलों, समाचार पत्रों एवं मीडिया को एक्जिट पोल करने एवं इसका प्रसारण करने पर रोक लगा दी है और कहा है कि मीडिया 12 जनवरी 12 को जारी निर्वाचन आयोग की अधिसूचना का कड़ाई से पालन करें। न्यायालय ने एक्जिट पोल का प्रसारण करने वाले टीवी चैनल, स्टार न्यूज व सहारा न्यूज नेटवर्क को नोटिस जारी की है और स्पष्टीकरण मांगा है कि क्यों न उनके विरुद्ध चुनाव आयोग की अधिसूचना का उल्लंघन करने पर कार्यवाही की जाय।

न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को भी निर्देश दिया है कि वह बताए कि उसने 12 जनवरी 12 की अधिसूचना का पालन करने के लिए क्या कदम उठाए हैं। न्यायालय ने राज्य सरकार व अन्य विपक्षीगण से दो सप्ताह में याचिका पर जवाब मांगा है और याचिका की अगली सुनवाई की तिथि 29 फरवरी नियत की है। यह आदेश न्यायमूर्ति अमर सरन तथा न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने अधिवक्ता सैयद मुहम्मद फजल की जनहित याचिका पर दिया है। याचिका पर सैयद मुहम्मद डी फजल व आयोग के अधिवक्ता भूपेंद्र नाथ सिंह ने पक्ष रखा। याची का कहना है कि भारत के निर्वाचन आयुक्त ने 12 जनवरी की अधिसूचना के जरिये एक्जिट पोल कराने तथा इसके प्रसारण पर प्रतिबंध लगा रखा है।

आयोग ने यह अधिसूचना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126(ए)(1) के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारी का प्रयोग करते हुए जारी किया है। यह अधिसूचना उप्र, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड व गोवा विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जारी किया है। याची का कहना है कि टीवी चैनल इस अधिसूचना का उल्लंघन करते हुए एक्जिट पोल परिणाम का प्रसारण कर रहे हैं जिन्हें रोका जाय। न्यायालय ने याचिका में उठाए गए मुद्दे को गंभीर माना और कहा कि प्रथम द़ष्टया मीडिया द्वारा एक्जिट पोल कराने व इसके प्रसारण पर रोक लगाया जाना चाहिए। साभार : जागरण

जस्टिस काटजू ने सरकारों से मीडिया का बकाया भुगतान करने को कहा

 प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने केंद्र तथा राज्य सरकारों के सभी विभागों को मीडिया से जुड़ी बकाया राशि का तत्काल भुगतान करने को कहा है। सूत्रों ने बताया कि परिषद के अध्यक्ष ने सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर कहा कि केंद्र, राज्य सरकारों व उनके विभागों को विज्ञापनों और मीडिया संस्थानों से जुड़े अन्य सभी बकाया का एक माह के भीतर भुगतान करना चाहिए, जो सरकार भुगतान करने में असफल रहती है, उसे 12 फीसद की दर से भुगतान करना पड़ेगा।

उन्‍होंने कहा कि सरकार तथा कोई भी संवैधानिक संस्था आम नागरिकों के लिए रोल माडल होता है। इसलिए सरकार तथा उसके किसी भी विभाग को तत्काल प्रभाव से नागरिकों के प्रति अपनी भूमिका निभानी चाहिए, जिससे आम लोगों में संवैधानिक संस्‍थानों की विश्‍वसनीयता बनी रहे।

राकेश न्‍यायिक के पत्र पर बसीसीसी ने कलर्स को चेताया

कलर टीवी पर प्रसारित हुआ बिग बॉस सीजन फाइव में इं‍डो-कैनेडियन पोर्न स्‍टार सन्‍नी लियोन की इंट्री को लेकर खासा विवाद हुआ था. सन्‍नी की इंट्री को चैनल एवं कार्यक्रम की टीआरपी तथा सनसनी बढ़ाने के लिए कराई गई थी. सन्‍नी की बिग बॉस सीजन 5 में इंट्री से आहत बनारस के सामाजिक कार्यकर्ता राकेश श्रीवास्‍तव 'न्‍यायिक' ने इसकी शिकायत मिनिस्‍ट्री आफ इंफामरेशन एंड ब्रॉडकास्‍िटंग, प्रेसिडेंट सेक्रेटिरिएट और पीएमओ को किया था, जिसको संज्ञान में लेते हुए ब्राडकास्टिंग कंटेंट कम्‍पलेन काउंसिल ने जांच की कार्रवाई शुरू की.

काउंसिल ने न्‍यायिक को पत्र लिखकर अवगत कराया है कि कार्यक्रम के सीडी की जांच की गई तथा चैनल प्रबंधन से भी पूछताछ की गई. सेक्रेटरी अमरनाथ सिंह द्वारा भेजे गए इस पत्र में बताया गया है कि जांच के दौरान चैनल से पूछताछ की गई. पत्र के अनुसार किसी भी कार्यक्रम में एक चर्चित पोर्न स्टार सन्नी लिओन का भाग लेना, पोर्नोग्राफी को बढ़ावा देना, भारत में एक क्रिमिनल अफेन्स है जिसका कौन्सिल विरोध करती है. पत्र में बताया गया है कि इसके तहत चैनल को आगे ऐसा न करने के लिए आगाह किया गया, लेकिन चैनल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि शो के दौरान कोई आपत्तिजनक चीजें नहीं परोसी गई. काउंसिल ने कड़े शब्दों में कहा है कि सन्नी लिओन के शो में पार्टीसिपेशन का लाभ अपनी वेबसाइट की प्रमोशन के लिए करने का अधिकार नहीं है, लिहाजा चैनल यह सुनिश्चित करे कि सन्नी लिओन की किसी वेबसाइट पर शो का कोई रेफरेन्श नहीं होना चाहिए, जिसके तहत चैनल ने तुरत-फुरत सन्नी लिओन के सभी साइट्स के मैनेजमेंट को तुरन्त आगाह किया गया कि वेबसाइट पर शो से सम्बन्धित किसी प्रकार की सामग्री नहीं होनी चाहिए. साथ चैनल पार्टनरों को भी ताकीद दी गई कि वह अपनी सोशल नेटवर्किंग साइट व ट्विटर से सन्‍नी लिओन से सम्बन्धित सभी पोस्ट्स तुरन्त हटा लें.

बेनी ने पुनिया को बाहरी बताया, कांग्रेसी सकते में, शीतयुद्ध सतह पर

 बाराबंकी। केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा जब भड़ास निकालने पर उतरते हैं तो उनकी जबान फिसल ही जाती है और दिल का गुबार जुबां पर आ ही जाती है। ऐसे में आज जब उन्होंने कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया को पंजाब का निवासी बता डाला तो कांग्रेस की गुटबाजी भी उभरकर सामने आ गयी। फिलहाल पुनिया ने इस मुद्दे पर सधा जवाब देकर एक बार फिर यह साबित किया कि वे संगठन के दायरे में रहने वाले नेता हैं। कांग्रेस के बड़े नेताओं का दुरावपन प्रथम चरण के चुनाव के सम्पन्न होते ही सतह पर आता दिखाई दिया। यहां एक बार फिर बेनी प्रसाद वर्मा की बाराबंकी जनपद का नेता बनने की छटपटाहट प्रत्यक्ष तौर पर नजर आयी।

आज जब वर्मा सिरौलीगौसपुर में वोट डालने के लिए पहुंचे और वापस होने लगे तो उनसे सवाल किया गया कि क्या कांग्रेस में टिकट वितरण में कांग्रेस सांसद पुनिया की नहीं चली? क्या कांग्रेस में टकराव है? फिर पुनिया जी जिले में पार्टी के प्रचार से दूर क्यों रहे? इस बात पर एकाएक तमतमाये बेनी वर्मा बोले क्या बात करते हैं। पुनिया को बाराबंकी के बारे में क्या मालूम है। वह पंजाब से यहां आये हैं। मेरा दावा है कि हमारी पार्टी जिले की सभी आधा दर्जन सीटों पर विजय प्राप्त करेगी। इतना कहकर राहुल गांधी के लाडले वर्मा गाड़ी में बैठकर चलते बने। दूसरी तरफ बेनी के इस उवाच के बाद इसे लेकर सियासी जगत में खासा हंगामा खड़ा हो गया। क्योंकि कांग्रेसी सांसद पुनिया हरियाणा के रहने वाले हैं और अब तो उन्होंने बाराबंकी में ही अपना निजी आवास भी बना लिया है। ऐसे में उनके ही दल के एक वरिष्ठ नेता के द्वारा यह बात कहना कहीं न कहीं कांग्रेस में मचे घमासान की चुगली कर गया। जिसे लेकर विरोधी तो विरोधी कांग्रेस के लोग भी चर्चा परिचर्चा में गुथ कर रह गये।

विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक बाराबंकी की कांग्रेस में टिकट वितरण से पहले अथवा बाद में बहुत कुछ सही नहीं चल रहा है। गाहे-बगाहे पुनिया व बेनी के बीच चल रहे शीतयुद्ध के दर्शन होते रहे हैं। यहां पुनिया पुराने कांग्रेसियों व संगठन को साथ लेकर चलते दिखाई दिये तो बेनी दूसरे दलों के नये कांग्रेसियों को टिकट दिलवाकर जिले में अपनी मनमानी कांग्रेस को मजबूत करने में जुटे रहे। कांग्रेस के नेता शिवशंकर शुक्ला तो उनके विरोध के कारण पार्टी से ही बाहर कर दिये गये। यही नहीं खबर तो यह भी है कि कई पुराने कांग्रेसियों ने चुनाव तक चुप रहने की सलाह पर अपने होंठ सिले हुए हैं। साफगोई से इस प्रकार यदि कहा जाये तो बेनी ने अपनी चलाकर पूरी कांग्रेस में पहले के सपाइयों को न सिर्फ मर्ज किया बल्कि उन्हें टिकट दिलवाकर पुनिया को उनके ही जिले में अपनी ताकत का एहसास भी कराया। खबर है कि यदि बेनी की चलती तो हैदरगढ़ के कांग्रेस प्रत्याशी को भी बदल दिया जाता। यही वजह रही कि पुनिया टकराव टालने के लिए एक दो मौके छोड़ जिले में प्रचार के दौरान बेनी के साथ एक मंच पर नहीं दिखाई दिये। हद तो तब दिखती है जब वर्मा के चहेते नवजात कांग्रेसी भी संगठन की बैठक में पुराने कांग्रेसियों को आंख दिखाते नजर आते हैं।

उधर दूसरी तरफ कांग्रेस सांसद डा. पीएल पुनिया ने इस संबंध में पूछने पर कहा कि न तो दलित बेनी वर्मा जी के खिलाफ है और न ही बेनी जी के समर्थक मेरे खिलाफ हैं। हम सभी कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो यह हास्यस्पद है। उधर कांग्रेस के प्रभारी दिग्विजय सिंह ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए इस पूरे मामले को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर ही लगा डाला। लेकिन कहते हैं कि सत्य कभी छिपता नहीं। बेनी भले ही गोंडा के सांसद हों उन्हें वहां कांग्रेसियों ने बोलने तक न दिया हो लेकिन आज भी वे बाराबंकी का मोह छोड़ नहीं पाये हैं। यह इसलिए भी है कि क्योंकि यहां पर उनका लाडला पुत्र राकेश वर्मा चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में वर्मा किसी भी हालत में राकेश को जिताना ही चाहते हैं। खास बात यह भी है कि बेनी ने जब हैदरगढ़ में यह कहा कि यहां के प्रत्याशी को पुनिया ने खड़ा किया है। वर्मा बिरादरी के लोग इन्हें देख लें तो उसका असर यह हुआ कि उनका अपना कुनबा भाजपा की ओर चला गया। अर्थात जहां पुनिया का नाम दिखा बेनी ने वहां पर अपनी दुनिया का सिक्का चलाना चाहा। ऐसे में कांग्रेसी गुटबाजी उभरकर सामने आ ही गयी।

साभार : जनसत्‍ता

डीडी वन के कांट्रैक्‍चुअल कर्मचारियों ने एओ को धुना

प्रसार भारती के डीडी वन चैनल का कार्यालय आज घमासान का मैदान बन गया. दूरदर्शन के सैकड़ों कर्मचारियों ने निकाले जाने के विरोध में एडमिनिस्‍ट्रटिव ऑफिसर को धुन दिया. बाद में मामला किसी तरह सलटाया गया. अभी हालांकि एओ ने कोई कानूनी प्रकिया नहीं अपनाई है, पर तनाव का माहौल बना हुआ है. बताया जा रहा है कि डीडी वन के एक सौ से ज्‍यादा कर्मचारियों को कांट्रैक्‍ट खतम कर दिया गया है. यह निर्णय एओ ने लिया था, इसी से डीडी वन के कर्मचारी नाराज थे.

बताया जा रहा है कि डीडी वन में एक सौ सात के आसपास कर्मचारी कांट्रैक्‍ट बेसिस पर कार्यरत थे, जिनमें से ज्‍यादातर टेक्निकल से जुड़े हुए हैं. पिछले दिनों इनके कांट्रैक्‍ट खतम हो गए थे, जिस पर डीडीजी जेनखानी ने आदेश दिया था कि जब तक कोई निर्णय नहीं हो जाता इन सभी को कांटीन्‍यू किया जाए. पर एओ मिस्‍टर ओबराय ने इन सभी लोगों का कांट्रैक्‍ट खतम कर दिया तथा इनलोगों को बताया कि उनके पास कांटीन्‍यू करने का कोई आदेश नहीं आया है. इसी से सारे कर्मचारी नाराज हो गए. विवाद बढ़ने लगा. इसके बाद जब दोनों पक्षों में गरमा-गरमी बढ़ी तो कर्मचारियों ने एओ पर हाथ छोड़ दिया. बताया जा रहा है कि उन्‍हें अच्‍छी मार पड़ गई है. हालांकि यह पुष्‍ट नहीं हो पाया है कि उन्‍होंने इसके खिलाफ मामला दर्ज कराया है या नहीं.

अखबार या ड्रामेबाजी का मंच : जागरण, हिंदुस्‍तान और उजाला ने की चंदौली एसपी के जांच की प्रायोजित खबर

बड़ी शर्म आती है मीडिया और मीडियाकर्मियों में बढ़ती चाटुकारिता पर. अखबार ना हुआ ड्रामा का मंच हो गया, जब जैसे मन करे नाटक कर लें. अब तक पेड न्‍यूज को लेकर ड्रामा होता था, अब पेड न्‍यूज नहीं मिल पा रहा है तो प्रायोजित न्‍यूज करके पत्रकारिता का छीछालेदर किया जा रहा है. और सारा खेल इसलिए कि कप्‍तान महोदय से नजदीकी बनी रहे. एकाध तबादला-पोस्टिंग कराकर कमाया-धमाया जा सके. गलत-सही मौकों पर उनका उपयोग किया जा सके. शायद अपने एसपी साहब भी प्रचार के पूरे भूखे हैं कि खबर ही प्रायोजित करा डाली. अब इस खबर को आयोग या कोई संस्‍थान कैसे पेड न्‍यूज बताएगा. किस आधार पर कोई कार्रवाई होगी?

मामला चंदौली जिले का है. एसपी साहब यानी शलभ माथुर ने सादे वर्दी में पिस्‍टल खोंसकर इनोवा गाड़ी से चेकिंग पर निकले. चेकिंग पर निकलने लगे तो अपने पत्रकार साथियों को बुला लिया ताकि जांच अभियान की पूरी नौटंकी और ड्रामा देखकर ये लोग दरबारी कवि स्‍टाइल में चारणगान कर सकें. दैनिक जागरण के ब्‍यूरोचीफ रत्‍नाकर दीक्षित, हिंदुस्‍तान के आनंद सिंह एवं अमर उजाला के अमित द्विवेदी को साहब अपने साथ बैठा लिए और निकल पड़े चेकिंग अभियान पर. अब जैसे सादे ड्रेस में चेकिंग करके वो अपनी ड्यूटी न निभा रहे हो बल्कि समाज के ऊपर, जिले वासियों के ऊपर एहसान कर रहे हों. ठीक उन नेताओं की तरह जो माल बटोरते समय तो मीडिया की परछाई भी नहीं देखना चाहते लेकिन अगर किसी स्‍कूल पर एक पेड़ लगा रहे होते हैं तो पूरे अखबार और चैनल वालों को नेवत देते हैं, जैसे बहुत बड़ा काम कर दिया हो.

वैसे भी चेकिंग अभियान अचानक होता है, जिसमें किसी को खबर नहीं होती, पर माथुर साहब तो प्रचार-प्रसार की पूरी व्‍यवस्‍था करके निकले. वो भी अपने खास दोस्‍तों के साथ, अगर इतना ही चेकिंग करनी थी तो जिले में तमाम अखबारों के पत्रकार हैं उनको भी नेवता बंटवा दिया होता, सारे लोग जय-जयकार करते, पर साहब ने तीन लोगों पर ही विश्‍वास जताया ताकि अगर कोई पोल खुले तो छीछालेदर न हो. साहब ने जांच किया, किसी को फटकारा तो किसी को दुलार किया. ये खबर अगर एक अखबार में छपी होती या बिना फोटो की प्रकाशित होती तो लोग एक बारगी मान भी लेते कि पत्रकार भाई मुस्‍तैद थे और साहब की चेकिंग अभियान के बारे में जान लिया. साहब की भी जय जयकार होती. पर ड्रामा तो ड्रामा ही होता है. उसको खुलते देर नहीं लगती. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है. 

जब खबर मैनेज थी तो तीनों अखबारों में छपनी ही थी, छपी भी. वो भी फोटो के साथ तीनों अखबारों में एसपी साहब की मफलर से ढंकी फोटो छपी. ऐसा बखान किया गया कि साहब ने तो इतनी अच्‍छी व्‍यवस्‍था कर डाली है कि चुनाव के दौरान कोई परिंदा पर भी नहीं मार सकता. अखबारों का लेखन भाव ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे ये कप्‍तान साहब नहीं होते तो पता नहीं चुनाव हो भी पाता या नहीं हो पाता. अगर कोई कप्‍तान अपनी ड्यूटी कर रहा है तो वो आम जनता पर कोई एहसान थोड़े ही कर रहा है. वो वर्दी में जाए का सादे कपड़ों आम आदमी को उससे कौन सा फर्क पड़ जाना है. उसे तो फर्क उस समय पड़ेगा जब कानून-व्‍यवस्‍था सही हो. वैसे भी पुलिस विभाग कौन सा इन प्रायोजित जांच की नौटंकी से सुधर जाने वाला है. इस तरह की जांच की नौटंकी और ड्रामा चाहे जितना किया जाए यह विभाग नहीं सुधर सकता. हां साहब जरूर आम जनता तथा आयोग की नजरों में चमक सकते हैं.

पर क्‍या कहा जाए चंदौली जिले के इन पत्रकारों को, जो एक स्‍वस्‍थ्‍य पत्रकारिता करने की बजाय चाटुकारिता की पत्रकारिता पर उतर गए हैं. आम आदमी की आवाज कहे जाने वाले पत्रकार अब उसी आवाज से दूर होते जा रहे हैं. डीएम, एसपी से नजदीकी बढ़ाकर आम हित से जुड़ी खबरों को घोंट जाते हैं कि इन नौकरशाहों को कहीं खबरें चुभ ना जाएं. सही भी है आम आदमी क्‍या करेगा, क्‍या बना देगा और क्‍या बिगाड़ लेगा. जब वो नेता, अधिकारी, सरकारी कर्मचारियों का अब तक कुछ नहीं बिगाड़ सका तो इन पत्रकारों का क्‍या कर लेगा, जो ऐसे ही प्रायोजित खबरों के बल पर इन तीनों के चहेते बने हुए हैं.

शर्म आती है ऐसे पत्रकारों पर जिन्‍हें किसानों को खाद नहीं मिलने, नहर में पानी नहीं आने, जमाने भर की सड़के टूटी होने, गरीबों के लिए आने वाले अनुदानों में लूट मची होने, अस्‍पतालों में दवा नहीं मिलने, बैंकों से जरूरतमंदों को लोन नहीं मिलने, एनएचआरम, मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में भ्रष्‍टाचार होने की खबरें नहीं दिखती. शर्म आती है एसपी साहब पर भी कि उनकी नाक के नीचे अलीनगर में तेल डिपो और उसके आसपास नकली डीजल-पेट्रोल बनाने का धंधा हर दिन चलता है, पर आग के शोलों पर खड़े अलीनगर क्षेत्र की जनता के दुख को कम करने के लिए साहब छापेमारी नहीं करते. छापेमारी करते हैं तो बस प्रचार पाने के लिए. अब इन प्रायोजित खबरों पर आयोग और प्रेस परिषद क्‍या कहेगा.

भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की रिपोर्ट.

हिंदुस्‍तान को सोनभद्र में झटका, प्रशांत को छोड़ पूरी टीम जनसंदेश टाइम्‍स पहुंची

हिंदुस्तान, बनारस की मुश्किल कम होने का नाम नहीं ले रही है. अभी तक बनारस से कई लोग इस्‍तीफा देकर जनसंदेश पहुंचे थे, अब खबर है कि हिंदुस्‍तान, सोनभद्र से भी कई लोग जनसंदेश से जुड़ गए. हिंदुस्‍तान की टीम में केवल एक पत्रकार रह गया है. वहां अखबार की स्थिति पहले से ही दयनीय थी, एक बार भी हालत पतला हो गया है. खबर है कि विजय विनीत एवं जुल्‍फेकार हैदर के बाद शशिंकात एवं राजेश कुमार पाठक भी जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ गए हैं. ब्‍यूरो कार्यालय में अब केवल प्रशांत रहे गए हैं. प्रबंधन के सामने सोनभद्र को कंट्रोल करना मुश्किल होता जा रहा है.

उल्‍लेखनीय है कि सोनभद्र में हिंदुस्‍तान के ब्‍यूरोचीफ राहुल श्रीवास्‍तव हुआ करते थे. एक दशक से ज्‍यादा समय से राहुल ही अखबार को सोनभद्र में संभाल रहे थे. हालांकि उनके नेतृत्‍व में अखबार कभी भी जागरण या अमर उजाला को पीछे नहीं छोड़ पाया. उन पर खबरों को मैनेज करने के आरोप बराबर लगते रहते थे, पर प्रबंधन को खुश रखने की नीति से उनका बाल भी बांका नहीं हो पाता था. सारे संपादक राहुल के कुशल व्‍यवहारिकता से प्रसन्‍न रहते थे. अगर किसी को ओबेलाइज करना हो तो राहुल से सीखा जा सकता था, पर उच्‍च स्‍तर पर किसी मामले की शिकायत हो जाने के बाद राहुल को संस्‍थान से जाना पड़ा.

हालांकि स्‍थानीय संपादक अनिल भास्‍कर ने अपने प्रिय ब्‍यूरोचीफ राहुल को बहुत बचाने की कोशिश की परन्‍तु सफल नहीं हो पाए. ऊपर से फरमान आने के बाद, न चाहते हुए भी मजबूरी में उन्‍हें राहुल के लिए विदाई गीत गानी पड़ी. फिर सोनभद्र के तेजतर्रार पत्रकार आवेश तिवारी को सोनभद्र का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया, पर संपादक व राहुल एंड कंपनी ने तमाम तरह के झूठे सही आरोप लगाकर आवेश से भी ब्‍यूरोचीफ की कुर्सी छीन ली. हालांकि इसके पीछे कारण यह बताया गया कि राहुल श्रीवास्‍तव नहीं चाहते थे कि आवेश तिवारी सोनभद्र में अखबार के ब्‍यूरोचीफ बने, क्‍योंकि इससे उनके साम्राज्‍य को खतरा था. इ‍सलिए संपादक ने एक खास रणनीति के तहत जांच समिति गठित की. जांच की जिम्‍मेदारी संपादक भास्‍कर ने अपने खास एवं डाक इंचार्ज आदर्श शुक्‍ला को सौंपी. आदर्श ने संपादक के मनमाफिक रिपोर्ट सौंपी और आवेश की कुर्सी चली गई.

इसके बाद प्रबंधन ने सीनियर रिपोर्टर विजय विनीत को ब्‍यूरोचीफ बनाकर सोनभद्र भेजा. विजय विनीत सोनभद्र गए पर उनकी वरिष्‍ठता को देखते हुए यह उनके डिमोशन जैसा था. बताया जा रहा है कि यह काम भी इनको किनारे करने के लिए लगाया गया था. पहले से ही नाराज चल रहे विजय विनीत ने सोनभद्र ज्‍वाइन तो कर लिया पर वहां रम नहीं पाए. पहले उन्‍होंने मेडिकल लीव ली उसके बाद वे हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देकर जनसंदेश टाइम्‍स में वरिष्‍ठ पद पर ज्‍वाइन कर लिया. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने ही सोनभद्र में हिंदुस्‍तान को झटका दिया है. प्रशांत को छोड़कर सारे लोगों को जनसंदेश टाइम्‍स से जोड़ दिया. गौरतलब है कि जिलों में लोगों की नियुक्ति की जिम्‍मेदारी विजय विनीत ही संभाल रहे हैं. दूसरी तरफ हिंदुस्‍तान के सूत्रों का कहना है कि सोनभद्र में टीम के जाने से खुशी हैं क्‍योंकि राहुल श्रीवास्‍तव को फिर से कमान देने की राह लगभग तैयार हो चुकी है.

पेड न्‍यूज का मामला है टीम अन्‍ना की खबरों से किनारा!

: भ्रष्‍टाचार की बजाय लैपटॉप की बातें कर रही है मीडिया : यूपी में चुनावी सरगर्मी चरम पर है। पहले चरण का मतदान भी आज हो रहा है। स्वयं को नंबर एक बताने वाले बड़े अखबार से लेकर छोटे समाचार पत्र चुनाव कवरेज कर रहे हैं। इस दौरान कई नये चैनलों और अखबारों के होर्डिंग भी राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश के कई शहरों में लग गये हैं। यह समझना कठिन नहीं है कि चुनावी मौसम में नये अखबारों और चैनलों की मैजूदगी का उद्देश्य क्या है। जो नये चैनल दिख रहे हैं उन पर केवल पार्टी नेताओं के लम्बे इंटरव्यू और एक दो चुनावी सभाओं का पूरा प्रसारण दिन भर दिखाया जा रहा है।

पेड न्यूज पर कड़ी निगाह रखने का दावा रहा चुनाव आयोग भी ऐसे चैनल और अखबारों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा। पहले से स्थापित अखबार और चैनल भी इन दिनों यूपी के चुनाव में कवरेज के नाम पर पेड न्यूज कर रहे हैं। कई पार्टियों के नेता भी इस बात से खासे नाराज हैं कि प्रियंका गांधी केवल दो जिलों में घूम कर महज दस सीटों पर प्रचार कर रही हैं तो आईबीएन सेवन, एनडीटीवी और आजतक जैसे चैनल सुबह से शाम तक उनका गुणगान कर रहे हैं। जबकि उनके नेता दिन भर में दर्जनों सीटों और कई जिलों में प्रचार करने बावजूद उतना मीडिया कवरेज नहीं पा रहे जिसके वे हकदार हैं।

ऐसा ही हाल प्रदेश के बड़े अखबारों का भी है। एक-एक सीट का चुनावी विश्लेषण करते हुए बड़े अखबारों के कई पन्ने भरे रह रहे हैं। उसमें अपील, विज्ञापन, बयान सबकुछ है लेकिन यूपी की खाक छान रही टीम अन्ना की भारी जनसभाओं वाली खबरें नदारद हैं। टीम अन्ना को चुनौती देने वाले बेनी प्रसाद वर्मा के जिले बाराबंकी से टीम अन्ना ने अपना जन जागरुकता अभियान शुरु किया था। भारी भीड़ जुटाने वाली टीम अन्ना की सभाओं की छिटपुट खबरें एक दो दिन तो अखबारों में छपीं लेकिन अब सबने टीम अन्ना की खबरों से किनारा कर लिया है।

सूत्रों के मुताबिक आओ राजनीति करें का अभियान चलाने वाला हिन्दुस्तान सहित अमर उजाला, दैनिक जागरण आदि सभी अखबारों ने पार्टियों से टीम अन्ना को तवज्जो न देने की डील कर ली है। इंडिया अगेंस्ट करप्शन तले चल रहे टीम अन्ना का जागरुकता अभियान इस समय पूर्वांचल में आजमगढ़ के आस पास चल रहा है। इसके पहले टीम ने फैजाबाद, बहराइच, अकबरपुर व अयोध्या में जनसभाएं की जहां भारी भीड़ ऊमड़ी। ताज्जुब है कि पैसे खर्च करके भीड़ जुटा रही पार्टियों को कवरेज मिल रहा है जबकि रामलीला मैदान में टीम अन्ना के आगे दुम हिलाने वाली मीडिया उस भीड़ को भाव नहीं दे रही जो स्वेच्छा से जुट रही है। यह भी गौर करने वाली बात है कि चुनावी खबर के नाम पर लोगों से हेलीकॉप्टर, लैपटॉप पर सवाल पूछे जा रहे हैं भ्रष्टाचार और लोकपाल का सवाल नहीं उठाया जाता। मीडिया से हुए डील का एक पहलू यह भी है कि रोज शाम को सभी चैनलों पर होने वाली बहसों में अब टीम अन्ना से किसी को नहीं बुलाया जाता। चैनल पत्रकारिता के एक अनुभवी पत्रकार ने बताया कि यही तो डील है कि चुनाव तक टीम अन्ना को दरकिनार रखना है। यह तो ऐसा पेड का मामला है कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे।

मुकेश कुमार मिश्रा की रिपोर्ट.

महुआ ग्रुप पर सीबीआई की टीम ने मारा छापा!

महुआ न्‍यूज से खबर है कि एक बार फिर सीबाआई टीम ने प्रज्ञा एवं महुआ न्‍यूज की बिल्डिंग पर छापा मारा. दर्जनों की संख्‍या में पहुंचे अधिकारियों ने दोनों बिल्डिंगों को अपने कब्‍जे में ले लिया. इसके बाद उन्‍होंने किसी के भी अंदर-बाहर जाने पर रोक लगा दिया. बताया जा रहा है कि दोनों बिल्डिंगों में जमकर तलाशी ली गई. सीबीआई अधिकारी घंटों कम्‍प्‍यूटर तथा कागजात की जांच-पड़ताल की. बताया जा रहा है कि सीबीआई अधिकारियों के हाथ कुछ अहम सबूत भी लगे हैं. ये छापेमारी क्‍यों की गई है इसकी जानकारी नहीं हो पाई है.

वैसे बताया जा रहा है कि पीके तिवारी के घालमेल करने की शिकायत पर यह छापेमारी हुई थी. इसके पहले भी मार्च में महुआ ग्रुप पर इनकम टैक्‍स तथा प्रवर्तन निदेशालय की टीम छापेमारी कर चुकी है. वो छापा पीके तिवारी की लंदन वाली कंपनी के लेनदेने के मामले में किया गया था. बताया जा रहा है कि इस बार का सीबीआई छापा भी कुछ उसी तरह की शिकायतों के बाद किया गया है. पीके तिवारी की कंपनी के खिलाफ बैंक एवं बीमा कंपनियों से भी लेनदेन में घालमेल और गड़बड़ ट्रांजिक्‍शन की शिकायतें सुनने को मिल चुकी हैं. बताया जा रहा है कि यह छापेमारी वित्‍तीय गड़बडियों के चलते ही की गई है.

वैसे भी इनकम टैक्‍स तथा प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के बाद आर्थिक संकट से उबरने के लिए चैनल प्रबंधन बंपर छंटनी कर चुका है. महुआ ग्रुप का बाग्‍ला चैनल बंद हो चुका है. के बनी करोड़पति में कई लोगों का पैसा फंसा हुआ है. शत्रुघ्‍न सिन्‍हा, सौरव गांगुली समेत कई लोगों का बकाया महुआ ग्रुप पर बताया जा रहा है. बताया जा रहा है कि इसी तरह की तमाम गड़बडि़यों की शिकायत के बाद ही इस कार्रवाई को अंजाम दिया गया है. हालांकि सीबीआई के छापेमारी की खबरों को चैनल हेड राणा यशवंत सिंह ने अफवाह बताया तथा इस तरह की किसी भी छापेमारी की कार्रवाई से पूरी तरह इनकार करते हुए कहा कि यह कंपनी को बदनाम करने की साजिश है. 

हिंदुस्‍तान, बनारस ने अपने बिछड़े यारों से बिछड़ने का कारण पूछा

: प्रोफार्मा भरवाकर पूछा गया हाल : हिंदुस्‍तान, बनारस को लेकर प्रबंधन परेशान है. उसकी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर लोग क्‍यों इस अखबार से भाग रहे हैं. कांट्रैक्‍ट होने के बावजूद पिछले दिनों अखबार से इस्‍तीफा देने वाले लोगों को प्रबंधन ने बुलाया था. सभी को एक प्रोफार्मा दिया गया, जिसमें हिंदुस्‍तान छोड़ने के तीन कारणों समेत कई सवाल पूछे गए थे. हिंदुस्‍तान की अच्‍छाइयों तथा बुराइयों के बारे में पूछा गया था. उल्‍लेखनीय है कि पिछले दिनों हिंदुस्‍तान छोड़कर कई लोगों ने जनसंदेश टाइम्‍स ज्‍वाइन कर लिया था.

इसमें विजय विनीत, सुरोजित चटर्जी, जितेंद्र श्रीवास्‍तव, सुधीर गरोड़कर, रवींद्र नारायण सिंह, राकेश राय, परितोष त्रिपाठी एवं कैलाश जैसे लोग शामिल हैं. सभी से उक्‍त प्रोफार्मा भरवाया गया है. सब ने अपने-अपने तरीके से अपनी परेशानियां बताई हैं. ज्‍यादातर लोगों ने वरिष्‍ठों का आचरण सही न होने का कारण बताया है. हालांकि कुछ और भी कारण बताए गए हैं, जिनमें नियमानुसार प्रमोशन न होना, इंक्रीमेंट न होना भी श‍ामिल है. अब देखना है कि प्रबंधन इस प्रोफार्मा के आधार पर कौन की कार्रवाई सुनिश्चित करता है. वैसे भी प्रबंधन की देर से शुरू की गई इस कवायद को सांप चले जाने के बाद लाठी पीटने की कवायद बताई जा रही है.

गोरखपुर में अपने पाठकों को गुरुवारीय देगा जनसंदेश टाइम्‍स

गोरखपुर में जनसंदेश टाइम्‍स अभी ठीक से भले ही लांच न हुआ हो, पर उसने घोषणा की है कि अब वह प्रत्‍येक गुरुवार को गुरुवारीय निकालेगा. इसकी सूचना अखबार के पेज नम्‍बर तीन पर प्रकाशित की गई है. गोरखपुर के साहित्‍यकारों के लिए यह खुशखबरी जैसी है. उल्‍लेखनीय है कि जब शैलेंद्र मणि त्रिपाठी दैनिक जागरण के सर्वेसर्वा हुआ करते थे तब गुरुवारीय नाम से एक टैबलाइड अखबार दैनिक जागरण के साथ हर गुरुवार को मुफ्त दिया जाता था.

जागरण के गुरुवारीय में संस्‍कृति‍, भोजपुरी व्‍यंग्‍य, धर्म, आध्‍यात्‍म, चुटकुले और विद्वानों के विचारोतेजक लेख प्रकाशित होते थे. शैलेंद्र मणि का 'चिंतन', शैलेश त्रिपाठी का 'मोबाइल बाबा' नर्वदेश्‍वर पाण्‍डेय का 'देहाती की दिल्‍लगी' सहित कई कॉलम प्रकाशित होते थे, जो गोरखपुर एवं आसपास के जिलों में धूम मचाए हुए थे. शैलेंद्र मणि अब उसी गुरुवारीय का प्रयोग जनसंदेश टाइम्‍स में भी करने जा रहे हैं. माना जा रहा है कि इससे पाठकों का एक बड़ा वर्ग इससे जुड़ेगा. वैसे भी इस अखबार के पूर्व संपादक एवं साहित्‍यकार डा. सुभाष राय ने इस अखबार को बुद्धिजीवी पाठकों के अखबार के रूप में स्‍थापित किया है. गुरुवारीय प्रबुद्ध वर्ग के पाठकों के लिए टॉनिक जैसा काम करेगा.

पर लांचिंग के साथ सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि जनसंदेश टाइम्‍स केवल गुरुवारीय के सहारे अपने प्रतिद्वंद्वी अखबारों से कितना लोहा लेगा. इसने जागरण को क्षति तो पहुंचाई है, पर जिस अनप्रोफेशनल तरीके से भर्तियां की गईं उसने जागरण को राहत दे दी है. जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ने का विचार रखने वाले तमाम लोग इसके चलते अपने कदम पीछे खींच लिए. अब देखना है कि गोरखपुर में प्रतिष्ठि अखबारों के बीच कैसे यह अपनी जगह बनाता है. माना जा रहा है कि जनसंदेश टाइम्‍स का सर्कुलेशन जितना बढ़ेगा, जागरण को उतना नुकसान उठाना पड़ेगा.

इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के एक्जिट पोल दिखाने पर तीन मार्च तक रोक

नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में विधानसभा चुनाव संपन्न होने तक एक्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया है जो तीन मार्च तक प्रभावी रहेगा। आयोग ने मंगलवार को जारी एक अधिसूचना में इलेक्ट्रानिक मीडिया पर किसी प्रकार के ओपिनयन पोल पर भी रोक लगा दी है। जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 126 के तहत यह प्रतिबंध मतदान समाप्त होने के 48 घंटे पहले से प्रभावी होगा।

आयोग के अनुसार एक्जिट पोल पर लगी रोक इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया दोनों के लिए तीन मार्च शाम साढ़े पांच बजे तक के लिए होगी जबकि ओपिनयन पोल पर लगी रोक सिर्फ इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए होगी। आयोग ने कहा कि प्रिंट मीडिया में ओपिनयन पोल पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा क्योंकि जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 126 प्रिंट मीडिया पर लागू नहीं होती।

रोडवेज को भारी पड़ा पत्रकार राजेंद्र गुंजल को सीट न देना

अजमेर। वोल्वो बस में रिजर्वेशन के बावजूद यात्री को सीट उपलब्ध नहीं कराना राजस्थान रोडवेज को महंगा पड़ गया। रोडवेज को सेवा में कमी और लापरवाही का दोषी मानते हुए उपभोक्ता मंच ने पीड़ित यात्री को साढ़े पांच हजार रुपए हर्जाना चुकाने के आदेश दिए हैं।

एक सीट, यात्री 2 : मंच के समक्ष वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र गुंजल ने वकील सूर्यप्रकाश गांधी के जरिए परिवाद पेश किया था। गुंजल का कहना था कि वे अधिस्वीकृत पत्रकार हैं। वे रोडवेज की वोल्वो व एसी बसों के अलावा अन्य बसों में निशुल्क यात्रा के हकदार हैं। 13 जून 2011 को उन्हें दिल्ली जाना था। इसके लिए साधारण बस की जगह वोल्वो बस में एक दिन पहले 225 रुपए अदा कर रिजर्वेशन कराने पर सीट नंबर 11 दी गई। यात्रा तिथि को जब परिवादी बस में सवार हुए तो उनकी रिजर्व सीट का टिकट अन्य महिला यात्री को दे दिया गया। परिवादी द्वारा सीट रिजर्व होने का हवाला देने पर महिला ने भी अपना टिकट दिखा दिया। बस में कोई सीट खाली नहीं होने पर गुंजल को कंडक्टर की सीट पर यात्रा करनी पड़ी। सीट आरामदायक व पुश बैक नहीं होने से परिवादी की यात्रा कष्टदायक रही।

रोडवेज ने मानी गलती : रोडवेज ने आरक्षित सीट अन्य को देने की बात तो मानी लेकिन कंडक्टर सीट पर यात्रा से इनकार किया। परिवादी ने टिकट पेश किया जिस पर स्पष्ट लिखा था कि कंडक्टर परिवादी को अपनी सीट पर ले जा रहा है।

साढ़े पांच हजार का जुर्माना : मंच अध्यक्ष कमलराज सिंघवी और सदस्य रेनु द्विवेदी ने परिवाद मंजूर कर निर्णय में कहा कि रोडवेज ने लापरवाही और सेवा में कमी की है। मंच ने रोडवेज को आदेश दिया कि परिवादी को क्षतिपूर्ति व परिवाद व्यय के रूप में साढ़े पांच हजार रुपए अदा करे। साभार : भास्‍कर

सभा में मायावती ने कहे अपशब्‍द, आयोग ने सीडी मंगाई

गोरखपुर की एक सभा में बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती द्वारा मंच से अपशब्द (किसी ने पालतू कुत्ता भेज दिया होगा) कहने को चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने सोमवार रात में ही मामले की सीडी गोरखपुर प्रशासन से मांगी थी। मंगलवार को इसे चुनाव आयोग को भेज दिया गया। गौरतलब है कि सोमवार को मुख्यमंत्री मायावती की सभा में एक महिला ने विरोध प्रदर्शित करने का प्रयास किया था। इस पर मायावती ने विरोधी दलों पर आरोप लगाते हुए अपशब्द का प्रयोग किया था। मीडिया से घटना का संज्ञान लेकर मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इसकी वीडियो फिल्म मंगाई थी। मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा ने बताया कि उक्त वीडियो उन्होंने देखा नहीं है। उसे आयोग को भेजा गया है। वहां से निर्देश आने पर ही आगे कोई कदम उठाया जाएगा।

गोरखपुर के चंपा देवी पार्क में चल रही मुख्यमंत्री मायावती की चुनावी सभा के बीच जब ‘अवरोध’ आया तो उनका मिजाज बिगड़ गया। भाषण के दौरान मायावती पूरे रौ में थीं। विरोधियों पर हमले बोल रही थीं। इसी बीच पीछे से कोई महिला आगे आने की जिद करने लगी। सुरक्षाकर्मियों ने रोक दिया। वह कुछ कह रही थी। लोगों को खड़ा होते देख मुख्यमंत्री बोल पड़ीं। बैठिए क्यों खड़े हो गए हैं। बहुत लोग बीच में आ जाते हैं। ‘कुत्ता’ समझ इग्नोर कर दीजिए। बोलीं, विरोधी पार्टियां बौखला गईं। किसी ने पालतू कुत्ता भेज दिया होगा। उसके भौंकने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

सिद्धार्थनगर, बस्‍ती में बारिश, भाजपा-कांग्रेस के हाथ-पांव फूले

गोरखपुर : पहले चरण के हो रहे विधान सभा के चुनाव में मौसम खराब हो गया है. खराब मौसम के चलते अगड़ी जातियों के मतदाता घरों से नहीं निकल रहे हैं. अनुमान लगाया जा रहा है कि इसका खामियाजा भाजपा एवं कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ेगा, जिनका मतदाता वर्ग अगड़ी जातियां मानी जाती हैं. बस्ती और सिद्धार्थनगर में सुबह ही बरसात शुरू हो गयी. स्वर्ण मतदाता घरों से नही निकल रहे है, नीचे तबके के लोगों में मतदान के प्रति काफ़ी उत्साह नज़र आ रहा है. वे लोग बरसात में भीग कर भी बूथों पर पहुंच रहे हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पहले चरण के लिए मतदान शुरू हो गया है.

इस चरण में बस्ती और सिद्धार्थनगर में मतदान हो रहा है जिसके लिए प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए हैं. बस्ती (सदर) से कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल के बेटे अभिषेक पाल तो विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और समाजवादी पार्टी नेता माता प्रसाद पांडे सिद्धार्थनगर सीट से मैदान में हैं. सिद्धार्थनगर और बस्ती में पाँच-पाँच सीटों पर मतदान है पर बारिश ने सभी प्रत्‍याशियों की धड़कने बढ़ा दी है.

बाराबंकी में छह सीटों के लिए मतदान शुरू, 20 लाख मतदाता करेंगे 110 प्रत्‍याशियों के भाग्‍य का फैसला

बाराबंकी। विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण में होने वाले चुनाव का मतदान कल बुधवार को होगा। इस दौरान जिले की 6 विधानसभा सीटों के 110 दलीय व निर्दलीय प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला कुल 19 लाख 90 हजार 281 मतदाताओं के हाथों होगा। चुनाव को सकुशल सम्पन्न कराने के लिए 2027 मूल व कुल 2099 मतदेय स्थलों पर 20 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किये गये हैं। जबकि पूरे जिले को सुरक्षा के लिहाज से तीन सुपर जोन व 150 सेक्टरों में बांटा गया है।

बीते सोमवार की शाम को चुनाव प्रचार के बंद होने के बाद प्रथम चरण के चुनाव मतदान की बेला से एक दिन पूर्व आज प्रत्याशी व प्रशासन दोनों मतदाताओं को ज्यादा से ज्यादा मतदेय स्थलों तक लाने की कसरत करते रहे। हैदरगढ़, दरियाबाद, रामनगर, कुर्सी, जैदपुर, बाराबंकी विधानसभाओं में सियासी गतिविधियां जारी तो रहीं लेकिन सादगी व गुपचुप सक्रियता के साथ। चुनाव में लगे अधिकारी अथवा प्रेक्षक मतदान के दौरान मतदाताओं को कोई परेशानी न हो, कोई भी अराजकतत्व किसी भी प्रकार की गड़बड़ी न फैला पाये। ऐसे सभी बिन्दुओं पर अधिकारियों के द्वारा गहन चर्चा व मंत्रणा की गयी। मतदान उत्सव में इस बार युवाओं का भी काफी वोट बढ़ा है। इस क्रम में बाराबंकी विधानसभा में भाजपा के प्रत्याशी संतोष सिंह, सपा प्रत्याशी सुरेश यादव धर्मराज, बसपा प्रत्याशी संग्राम सिंह वर्मा, निर्दलीय प्रत्याशी मुकेश सिंह, कांग्रेस प्रत्याशी छोटेलाल यादव, पीस पार्टी अजय वर्मा सहित कुल 26 प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रहे हैं। यहां पर कुल 177610 पुरूष तथा 149059 महिला मतदाता सहित 326669 मतदाता हैं। बीएलओ के द्वारा 251718 पर्चियां वितरित भी की जा चुकी हैं। विधानसभा में कुल 322 पोलिंग बूथ हैं।

हैदरगढ़ विधानसभा में तीन लाख 15 हजार 561 मतदाता हैं। यहां 327 पोलिंग बूथों के पर पुरूष 169074, महिला 141687 मतदाता के रूप में अपने मतों का प्रयोग करेंगे। हैदरगढ़ में भाजपा से कपिल देव कुशमेश, सपा से राममगन रावत, बसपा से रामनरायन रावत, कांग्रेस से आरके चौधरी, लोकमंच से रानी कनौजिया, निर्दलीय चन्द्रशेखर सहित कुल दस प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। यहां बीएलओ ने बताया कि मतदान से एक दिन पूर्व 273768 पर्चियां उसके द्वारा वितरित की जा चुकी है। दरियाबाद विधानसभा में 354016 मतदाता कुल 16 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे। कुल मतदाताओं में से 161449 महिला, 192567 पुरूष मतदाता हैं। यहां पर 337 पोलिंग बूथों पर मतदान होगा।

आयोग की दरियाबाद पर कुछ खास ही नजर है। यहां 300116 पर्चियां दी जा चुकी है। यहां कांग्रेस से पूर्व कारागार मंत्री बेनी पुत्र राकेश वर्मा, बसपा से विवेकानंद पाण्डेय, सपा से राजाराजीव कुमार सिंह, भाजपा से पंडित सुन्दर लाल दीक्षित सहित सभी प्रत्याशियों का भाग्य कल मतदान के बाद ईवीएम मशीनों में कैद हो जायेगा। जैदपुर विधानसभा में कांग्रेस के बैजनाथ रावत, सपा के रामगोपाल रावत, बसपा के वेद प्रकाश रावत, जस्टिस पार्टी के भवननाथ पासवान, भाजपा के रामनरेश रावत सहित कुल 16 प्रत्याशी कल मतदाताओं के बटन दबाओ अभियान की कसौटी पर होंगे। जैदपुर में 339569 कुल मतदाता 359 बूथ तथा 183123 पुरूष व 156446 महिला मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।

जिले की रामनगर विधानसभा जहां से सपा के प्रत्याशी अरविन्द सिंह गोप, बसपा से अमरेश शुक्ला, भाजपा से रामसजीवन वर्मा, कांग्रेस से रामवीर सिंह, लोकमंच से विवेक मिश्रा सहित कुल 18 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। इनके भाग्य का फैसला 294457 मतदाताओं के हाथों होगा। रामनगर में 323 पोलिंग बूथ हैं। यहां महिला मतदाता 131402 व पुरूष 163055 हैं। कुर्सी
विधानसभा क्षेत्र में 343616 कुल मतदाता 24 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे। 343 बूथों वाले इस विधानसभा में सपा से फरीद महफूज किदवाई, कांग्रेस से मोहम्मद निजाम, भाजपा से राजलक्ष्मी वर्मा, बसपा से मीता गौतम सहित कुल 24 प्रत्याशी चुनाव मैदान में है। इस प्रकार कुल 110 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला बुधवार को होगा। सुरक्षा के लिहाज से आयोग के द्वारा जिले को 3 सुपर जोन व 150 सेक्टरों में बांटा गया है। मतदान को सकुशल सम्पन्न कराने के लिए 20 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किये गये हैं।

24 घंटे मोबाइल पर उपलब्ध रहेंगे प्रेक्षक : बाराबंकी। चुनाव निर्वाचन को पारदर्शी बनाने के लिए आयोग के निर्देश पर नियुक्त किये गये प्रेक्षकों के मोबाइल नम्बर खुले रहेंगे। इस दौरान चुनाव के सम्बन्ध में किसी भी शिकायत को कोई भी मतदाता इन फोन नम्बरों के जरिये प्रेक्षक से कर सकता है। इसमें विधानसभा 266 कुर्सी के प्रेक्षक राजेश मिश्रा का मोबाइल नं. 7376240970, रामनगर प्रेक्षक श्रीमती एमएस जया का मो. नं. 7376240962, बाराबंकी प्रेक्षक बी आनंद 7376240963, जैदपुर के प्रेक्षक केएम नागर गोजे का मो0 नं. 7376240964, दरियाबाद, विधानसभा के प्रेक्षक आर शान्थाराज का मो. नं. 7376240965, हैदरगढ़ प्रेक्षक सुश्री राजीप्रमोद श्रीवास्तव का मो. नं. 7376240966 पर कोई भी आमजन 11 से 12 बजे के मध्य चुनाव संबंधी शिकायत दर्ज करा सकता है। जबकि प्रेक्षक गण अपने मोबाइल नम्बरों पर 24 घंटे कार्य करेंगे। इसी श्रंखला में व्यय प्रेक्षक रोहित शर्मा तथा पुलिस प्रेक्षक राजकुमार दिवानगन का मोबाइल नम्बर 7376240967 है।

बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

इक्‍वाडोर में विवादास्‍पद मीडिया कानून लागू

क्विटो। इक्वाडोर में एक विवादास्पद कानून अस्तित्व में आया है जो मीडिया को ऐसी खबरें प्रसारित और प्रकाशित करने से रोकेगा जिन्हें सरकारी अधिकारी किसी खास उम्मीदवार या विचारधारा के पक्ष में मानते हैं। इक्वाडोर में 2013 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं। वामपंथी राष्ट्रपति राफेल कोरीया फिर से देश के शीर्ष पद पर आरूढ़ होने के लिए चुनावी समर में उतर सकते हैं। राफेल सार्वजनिक तौर पर मीडिया से भिड़ते रहे हैं और आलोचकों का आरोप है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के करीबी माने जाने वाले इस वामपंथी अर्थशास्त्री ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम किया है।

इस नए कानून में यह नहीं कहा गया है कि इसका उल्लंघन करने वालों से असल में क्या सलूक किया जाएगा, लेकिन चुनावी अदालत को इसे नहीं मानने वालों पर जुर्माना लगाने का अधिकार होगा। पत्रकार संगठनों ने सरकार के इस कदम की निंदा की है और इसे उनकी आवाज दबाने की कोशिश तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया है। एजेंसी

सीआईसी ने सरकार से कहा प्रसार भारती की रिपोर्ट सार्वजनिक करे

नई दिल्ली : केंद्रीय सूचना आयोग ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह प्रसार भारती के कामकाज पर सीवीसी की रिपोर्ट को सार्वजनिक करे। इस रिपोर्ट में प्रसार भारती के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी एस लाली को दोषी बताया गया है। प्रसारण अधिकारों के आवंटन में कथित धांधली और वित्तीय कुप्रबंधन का ब्यौरा देने वाली इस रिपोर्ट को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने यह कहते हुए सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया था कि इससे जांच प्रक्रिया बाधित होगी।

यह मामला एक आरटीआई (सूचना के अधिकार) आवेदनकर्ता असीम तकयार से संबंधित है, जिसने मंत्रालय से प्रसार भारती के तत्कालीन सीईओ लाली के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) तथा महानियंत्रक एवं लेखा परीक्षक की रिपोर्ट मांगी थी। मंत्रालय ने कहा कि आपने आवेदन के जरिए जो सूचना मांगी है , वह एक ऐसे मामले से संबंधित है जिसकी जांच चल रही है । ऐसे में सूचना उपलब्ध कराने से जांच प्रक्रिया बाधित होगी और इसीलिए सूचना से इनकार किया जाता है। जिस नियम के तहत मंत्रालय ने सूचना नहीं देने की बात कही है, वह ऐसी सूचना को रोकने की अनुमति प्रदान करता है जिससे जांच की प्रक्रिया बाधित होती हो या सरकारी विभाग द्वारा चूककर्ताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने की प्रक्रिया में अड़चन आती हो। एजेंसी

राजनाथ तिवारी जनसंदेश टाइम्‍स पहुंचे, शशिकांत का हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा

आई नेस्‍क्‍ट, बनारस से इस्‍तीफा देने वाले सिटी इंचार्ज राजनाथ तिवारी ने अपनी नई पारी जनसंदेश टाइम्‍स से शुरू कर दी है. उन्‍हें यहां चीफ सब एडिटर बनाया गया है. माना जा रहा है कि मानव संसाधन की कमी से जूझ रहे जनसंदेश टाइम्‍स को राजनाथ तिवारी के आने से मजबूती मिलेगी. राजनाथ तिवारी पिछले लगभग 30 सालों से बनारस की पत्रकारिता में रमे हुए हैं. जनमुख से करियर शुरू करने वाले तिवारी दैनिक जागरण, अमर उजाला तथा हिंदुस्‍तान होते हुए आई नेक्‍स्‍ट पहुंचे थे.

हिंदुस्‍तान, बदायूं से खबर है कि शशिकांत ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर थे. शशिकांत जून में इलाहाबाद से बदायूं आए थे. बताया जा रहा है कि मानदेय न मिलने से परेशान होकर शशिकांत ने अखबार से इस्‍तीफा दिया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

फेसबुक, गूगल, याहू को कोर्ट में घसीटने वाले मुफ्ती की वेबसाइट पर साइबर हमला

नई दिल्ली : फेसबुक, गूगल, याहू तथा अन्य वेबसाइट को कथित आपत्तिजनक सामग्री के मामले में अदालत में घसीटने वाले इस्लामिक विद्वान की वेबसाइट से किसी ने छेड़छाड़ कर इसे विकृत बना दिया है और इस पर संदेश लिखा है कि सोशल नेटवर्किग साइट को लेकर इतनी नाराजगी ठीक नहीं। याचिकाकर्ता मुफ्ती ऐजाज अरशद कासमी ने बताया कि उनकी वेबसाइट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट फतवाऑनलाइन डॉट इन पिछले एक सप्ताह से विकृत है। अब उन्होंने इसके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की योजना बनाई है।

कासमी ने बताया कि वेबसाइट पर लिखे संदेश में तीन जनवरी, 2012 की तिथि अंकित है। यह संदेश समाचार तथा वेबसाइट के अन्य अद्यतन स्तम्भ में पिछले सप्ताह लिखा गया। उन्होंने बताया कि होम पेज पर संदेश के अतिरिक्त वेबसाइट के कुछ अन्य खंड भी ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। साइबर हमले का इन पर भी असर हुआ है। वेबसाइट पर इस साइबर हमले को सोशल नेटवर्किग साइट के खिलाफ अपनी याचिका से जोड़ते हुए कासमी ने कहा कि हैकर सम्भवत: नहीं चाहते कि यह मामला अदालत में चले। वेबसाइट पर 5,000 से अधिक पृष्ठ हैं और इसका उद्घाटन 21 मई, 2006 में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने किया था। इसका संचालन इस्लामिक पीस फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा किया जाता है। दक्षिणी दिल्ली के जामिया नगर में रहने वाले कासिम ने बताया कि इस वेबसाइट के जरिए वह लोगों के इस्लाम से संबंधित सवालों के जवाब देते हैं। फेसबुक, याहू, गूगल तथा अन्य वेबसाइटों के खिलाफ कथित आपत्तिजनक सामग्रियों को लेकर कासिम की याचिका पर दिल्ली की एक अदालत में सुनवाई एक मार्च को होगी।

दिख सकती हैं फेसबुक से हटाई गई तस्वीरें : लंदन : आपको यह जानकर झटका लग सकता है कि आपने अपनी जिन निजी तस्वीरों को अपने फेसबुक एकाउंट से हटा दिया था वे अब भी इंटरनेट की दुनिया में उपलब्ध हैं। उन्हें आसानी से देखा जा सकता है। तस्वीरों को हटाने के बाद भी वे इंटरनेट की दुनिया से गायब नहीं होतीं। डेली मेल के मुताबिक फेसबुक से संबद्ध कंपनी ने स्वीकार किया है कि उसकी प्रणाली में तस्वीरें हमेशा एक उचित अवधि में नहीं हटाई जाती हैं। साइट को देखने पर आपको लगेगा की उससे आपकी फोटोग्राफ्स हट गई हैं लेकिन तस्वीरों के सीधे यूआरएल लिंक के जरिए इन्हें देखा जा सकता है। इसका मतलब है कि ई-मेल के जरिए कोई तस्वीर भेजी जाए तो वह इंटरनेट पर रहती है और उसे कोई भी देख सकता है। (एजेंसी)

जस्टिस काटजू का ट्विटर एकाउंट डिलीट

कुछ दिन पहले ही प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ट्विटर पर आए थे. उनके ट्विटर पर आते ही तमाम लोग उनके फालोवर बन गए. उन्‍होंने अपनी आलोचना पर तार्किक जवाब देकर लोकतांत्रिक सोच की मिसाल प्रस्‍तुत की. अपने तर्कों से कई लोगों को माफी मांगने पर भी विवश किया. खबर है कि अब उनका ट्विटर एकाउंट डिलीट हो गया है. अभी यह पता नहीं चल पाया है कि उनका एकाउंट किस वजह से डिलीट हुआ है, पर कई तरह की चर्चा है. कहा जा रहा है कि उनके ट्विटर पर आने से घबराए लोगों ने उनका एकाउंट डिलीट करवाया है. वहीं कहा जा रहा है कि ट्विटर की तरफ से ही जस्टिस काटजू का एकाउंट डिलीट किया गया है. हालांकि इनमें से किसी की पुष्टि नहीं हो पा रही है. गौरतलब है कि छेड़छाड़ की बढ़ोत्‍तरी के चलते गूगल एवं कुछ अन्‍य वेबसाइटों ने कुछ सामग्री नेट से हटाई है. 

अमर उजाला, देहरादून के चीफ रिपोर्टर बने पंकज प्रसून, जितेंद्र डेस्‍क पर गए

अमर उजाला, देहरादून से खबर है कि यहां कुछ आतंरिक बदलाव किए गए हैं. अब तक चीफ रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी संभाल रहे जितेंद्र अंथवाल को हटाकर डेस्‍क पर भेज दिया गया है. उनकी जगह पंकज प्रसून को चीफ रिपोर्टर बना दिया गया है. यह आदेश तत्‍काल प्रभाव से लागू हो गया है. सूत्रों का कहना है कि जितेंद्र आज रुटीन मीटिंग के दौरान संपादक विजय त्रिपाठी से चीफ रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी मुक्‍त करने को कहा. बताया जा रहा है कि वो संपादक पर दबाव बनाने के लिए अक्‍सर इसी तरह की बातें कहते थे. जितेंद्र के इन क्रियाकलापों से अखबार का काम भी प्रभावित होता था.

कुछ सहकर्मी बताते हैं कि जितेंद्र को इस बात का गुमान था कि उनके बिना अखबार का काम नहीं चल सकता, इसलिए वो संपादक विजय त्रिपाठी पर दबाव बनाने के लिए जिम्‍मेदारी मुक्‍त किए जाने की बात करते थे. बताया जा रहा है कि संपादक ने अखबार की बेहतरी तथा उनके निवेदन को देखते हुए यह बदलाव किया है. 

आई नेक्‍स्‍ट, बनारस से सिटी चीफ राजनाथ तिवारी का इस्‍तीफा

आई नेक्‍स्‍ट, बनारस से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार एवं सिटी इंचार्ज राजनाथ तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे जागरण ग्रुप के इस बच्‍चा अखबार की लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. सूत्रों का कहना है कि अखबार के संपादकीय प्रभारी विश्‍वनाथ गोकर्ण ने राजनाथ तिवारी के सामने इस तरह की स्थिति पैदा कर दी थी कि उन्‍होंने इस्‍तीफा देना ही बेहतर समझा. राजनाथ तिवारी लगभग तीन दशकों से बनारस की पत्रकारिता में सक्रिय हैं तथा तेजतर्रार पत्रकार माने जाते हैं.

सन 83 में जनमुख से अपना करियर शुरू करने वाले तिवारी सन 85 में दैनिक जागरण से जुड़ गए. एक दशक से ज्‍यादा समय तक सेवा देने के बाद ये 97 में अमर उजाला चले गए. सन 2000 में हिंदुस्‍तान पहुंचे तथा लांचिंग टीम के सदस्‍य बने. 2007 में जब आई नेक्‍स्‍ट बनारस में लांच होने जा रहा था तब राजनाथ तिवारी ने इसके साथ अपनी पारी शुरू की. तब से यही थे. पर बताया जा रहा है कि विश्‍वनाथ गोकर्ण कार्यालय के भीतर इस तरह की स्थितियां पैदा कर दी हैं कि लोग इस टैबलाइड को छोड़ने की मजबूर हैं. एक बड़ा सवाल आई नेक्‍स्‍ट प्रबंधन के सामने भी है कि आखिर क्‍या कारण है कि एक के बाद एक लोग अखबार छोड़कर जा रहे हैं, पर उनकी जगह कोई आना नहीं चाहता है.

गौरतलब है कि विश्‍वनाथ गोकर्ण की आदतों से परेशान होने के चलते ही अम्‍बुजेश शुक्‍ला, आशीष तिवारी, कुमार विजय, प्रमीला तिवारी, अमित यादव, आशुतोष पाण्‍डये, अरुण मिश्रा, वीणा तिवारी एवं रितु सिंह जैसे लोगों को अखबार छोड़ना पड़ा. रितु सिंह को तो जिन परिस्थितियों में संस्‍थान से जाना पड़ा उसने तो बनारस की प‍त्रकारिता में भूचाल ला दिया था. अभी पिछले दिनों फोटोग्राफर मदन मेहरोत्रा विश्‍वनाथ गोकर्ण के निशाना बने. उन्‍हें जबरिया परेशान करके जमशेदपुर भिजवाया गया. खबर है कि वहां भी उनके साथ सौतेला व्‍यवहार किया जा रहा है. सवाल यह है कि आखिर प्रबंधन ने अपने आंख पर कौन सी पट्टी बांध रखी है कि उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है.

दिल्‍ली को कांग्रेस और यूपी को मायावती लूट रही हैं : गडकरी

देवरिया। कांग्रेस पार्टी दिल्ली लूट रही हैं और मायावती उत्तर प्रदेश लूट रही है, और यह सब हो रहा है आप मतदाता लोगों की वजह से। आप लोगों ने ऐसी ही सरकार चुनी है जो हर जगह लूट खसोट कर रही है। यह कहना है भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का। वे मंगलवार को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के पथरदेवा विधान सभा में देसही देवरिया स्थित पकड़ी वीरभद्र इण्टर कालेज के मैदान एक चुनावी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जब तक देश में जातिवादी व्यवस्था रहेगी तब तक न तो देश से गरीबी समाप्त होगी और न ही देश का विकास होगा।

भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि भारत एक गौरवशाली राष्ट्र है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री अत्यन्त कमजोर है। उनको कुछ पता ही नहीं रहता है और दिन पर दिन देश कमजोर होता जा रहा है। भारत देश सुखी होने का सपना देख रहा है लेकिन वास्तविकता यह है कि देश की जनता बहुत ही गरीब है। उन्होंने आम जनता से अपील की कि उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने के लिए भाजपा को चुनना जरूरी है। इस अवसर पर भाजपा की उत्तर प्रदेश प्रभारी उमा भारती ने कहा कि पथरदेवा में पत्थर के लोगों से अपील करती हूं कि वे गरीब और गाय के लिए भाजपा को वोट दें। 

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

गिरीश गुरनानी देहरादून, दिनेश पाठक कानपुर और विशेश्‍वर कुमार भागलपुर जाएंगे

: रामेंद्र सिन्‍हा भागलपुर से पटना भेजे गए : हिंदुस्‍तान से बड़ी खबर आ रही है. चार संपादक इधर-उधर किए गए हैं. भड़ास ने पहले ही सूचना दी थी कि दिनेश पाठक का अगले स्‍टेशन का टिकट कट गया है और गिरीश गुरनानी देहरादून के नए संपादक बनाए जाने वाले हैं. अब खबर बिल्‍कुल पुष्‍ट हो गई है कि गिरीश देहरादून में हिंदुस्‍तान के संपादक होंगे. दिनेश पाठक को हिंदुस्‍तान, कानपुर का संपादक बनाकर भेज दिया गया है. अब वे कानपुर को मजबूती देने का काम करेंगे.

अब तक कानपुर में संपादक की भूमिका निभा रहे विशेश्‍वर कुमार को भागलपुर भेजा जा रहा है. विशेश्‍वर कुमार के आने के बाद कानपुर यूनिट पूरी तरह से विवादित रहा तथा कंटेंट तथा सर्कुलेशन के मामले में भी अखबार पिछड़ गया था. पिछले दिनों फर्रुखाबाद में हिंदुस्‍तान के कार्यालय पर हमला हुआ. इटावा में अखबार की दुगर्ति हुई. अन्‍य जिलों में भी अखबार को झटका लगता जा रहा था. माना जा रहा है कि इसके चलते ही प्रबंधन ने विशेश्‍वर कुमार को भागलपुर भेजने का निर्णय लिया है. भागलपुर में विनोद बंधु के बाद से रामेंद्र सिन्‍हा को संपादकीय प्रभारी बनाया गया था. रामेंद्र सिन्‍हा को अब भागलपुर से पटना बुला लिया गया है.

दूसरे चरण में दिखेगा मनी-मसल एवं जातीय पॉवर का जोर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का दूसरा चरण काफी अहम है।‘मनी’ और ‘मसल पॉवर’ वाला यह क्षेत्र जातीय समीकरण के लिए भी जाना जाता है। यहां 11 फरवरी को पूर्वाचल के नौ जिलों के एक करोड़ से अधिक मतदाता करीब ग्यारह सौ उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। बसपा के हाथी को पिछली बार यहां की जनता ने खूब पुचकारा था। नतीजतन बसपा के खाते में करीब आधी सीटों पर जीत दर्ज हुई। समाजवादी पार्टी यहां दूसरे और भारतीय जनता पार्टी अपने गठबंधन के साथी जनता दल यू के साथ तीसरे स्थान पर रही थी। राहुल गांधी इस बार पूर्वांचल से काफी उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन 2007 के चुनाव में पूर्वांचल कांग्रेस के लिए बुरे सपने जैसा रहा था। दूसरे चरण में जिन नौ जिलों की 59 सीटों पर मतदान होना है उसमें अधिकतर क्षेत्रों में ब्राह्मण मतदाताओं का दबदबा है। पिछड़ों तथा अनुसूचित जातियों का भी यह गढ़ माना जाता है। यही वजह है कि 2007 में बसपा का दलित-ब्राह्मण कार्ड ने यहां खूब चला।

दलित वोट बैंक के साथ ही ब्राह्मण मतदाताओं के रूझान ने बसपा सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त किया था। इसके पूर्व यह इलाका सपा का गढ़ रहा था। अबकी यहां कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा की नींद उड़ाने के लिए पीस पार्टी का खतरा सभी दलों पर मंडरा रहा है। यह योगी आदित्यनाथ का गढ़ माना जाता है। भाजपा को योगी आदित्यनाथ की नाराजगी से कितना नुकसान होता है, यह भी देखने वाली बात होगी। सपा से बगावत करके बाहर निकले अमर सिंह को भी इस इलाके से काफी उम्मीद है। उनका राष्ट्रीय लोकमंच अगर इस इलाके में अपनी पैठ नहीं बना पाया तो अमर के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। वह काफी समय से पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग करके जनता के बीच अपनी पैठ बनाने में लगे हैं। दूसरे चरण में भी दागी और करोड़पति उम्मीदवारों का दबदबा देखने को मिलेगा। जहां करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या 235 है, वहीं 118 दागी प्रत्याशी पूर्वांचल में अपनी किस्मत अजमा रहे हैं। दूसरे चरण में प्रमुख रूप से करीब डेढ़ दर्जन महिला उम्मीदवारों के भी भाग्य का फैसला होगा।

दूसरे चरण में जिन दिग्गत नेताओं के भाग्य का फैसला होना है उसमें भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही, विधान सभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर, बसपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति शास्‍त्री, पीस पार्टी के अध्यक्ष डा. अय्यूब, पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के पुत्र तथा हाल ही में बसपा से निष्कासित पूर्व वन मंत्री फतेह बहादुर सिंह, बसपा सरकार के राजस्व मंत्री फागू चौहान, सपा विधानमंडल दल के उपनेता अम्बिका चौधरी, कांग्रेस के पूर्व मंत्री बच्चा पाठक, सपा के प्रदेश महामंत्री ओम प्रकाश सिंह, सपा के ही ब्रहमाशंकर त्रिपाठी, बसपा से निकाले गए राजेश त्रिपाठी, पूर्व मंत्री शाकिर अली, कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह तथा एनआरएचएम घोटाले में चर्चित रहे बसपा विधायक राम प्रकाश जायसवाल की पत्नी रेनू जायसवाल, देवरिया में कांग्रेस के जेपी जायसवाल के अलावा बाहुबली उम्मीदवारों में आजमगढ़ से दुर्गा यादव, मऊ से मुख्तार अंसारी, गाजीपुर से शिबगतुल्ला अंसारी, देवरिया से प्रेम प्रकाश सिंह, चिल्लूपार से हरिशंकर तिवारी आदि शामिल हैं। पूर्वांचल में कई उम्मीवार ऐसे हैं जो चुनाव तो यहां से गरीब-गुरबों की बात करके लड़ते और जीतते हैं, लेकिन इन लोगों ने अपनी सम्पति और साम्राज्य दिल्ली, नोयडा, गुड़गांव, देहरादून, हल्द्वानी और महाराष्ट्र तक में फैला रखा है।

सोलहवीं विधानसभा के लिए दूसरे चरण के चुनाव में 9 जिलों महाराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, संत कबीर नगर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, बलिया और गाजीपुर की 59 सीटों पर चुनाव होने है। पिछले चुनाव में इन जिलों में 61 सीटें थीं, जिसमें लगभग आधी यानी 29 सीटों पर बसपा, 19 सीटों पर सपा और 8 सीटों पर भाजपा तथा 2 सीटों पर उसका सहयोगी  जदयू तथा 2 सीटों पर ही कांग्रेस को  विजय मिली थी। नये परिसीमन में इस क्षेत्र की 2 विधानसभा सीटें कम हो गयी हैं। दूसरे चरण के चुनाव में अन्य के अलावा बाढ़ भी बडा मुद्दा है। सभी नौ जिलों का ज्यादातर इलाका प्रतिवर्ष विभिन्न नदियों की बाढ़ में चपेट में आ जाता है। यहां का अन्नादाता किसान भी अपनी दुर्दशा से दुखी है। गन्ना तथा अन्य कृषि उत्पादों का समुचित मूल्य न मिलना और कृषि विकास की कोई कार्य योजना न होने से यहां का अन्नादाता हमेशा परेशान रहता है। रोजी-रोटी की तलाश में इस इलाके के लोग बड़ी संख्या में दिल्ली, मुम्बई आदि महानगरों की तरफ पलायन करने को मजबूर होते हैं। वैसे तो इन लोगों की कोई सुध नहीं लेता लेकिन चुनाव की आहट होते ही इन लोगों को पैसे के बल पर वोट डालने के लिए बुलाने में विभिन्न दलों के नेता पीछे नहीं रहते हैं। दूरदराज कामधंधे में लगे लोगों का ट्रेनों में आरक्षण काफी पहले करा दिया गया है। सबके घर वालों को हफ्ते से लेकर पन्द्रह दिन तक की दिहाड़ी पेशगी दे दी गई है।

बहरहाल, तमाम परेशानियों के बाद भी हार नहीं मानने वाले पूर्वांचल के किसानों ने अपने इलाके का नाम कभी डूबने नहीं दिया। यही वजह है पूर्वांचल की गिनती देश के उपजाऊ क्षेत्रों में होती है। किसानों को न समय पर खाद मिलती है और न, बीज। बिजली तथा सिंचाई जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उसे मुहैया नहीं हो पाती हैं। पहले चरण की तरह दूसरे चरण में भी बसपा सपा में ही संघर्ष होने के आसार हैं। वैसे कुछ स्थानों पर भाजपा व कांग्रेस के कारण लड़ाई चतुष्कोणीय होने की संभावना है। परन्तु पीस पार्टी, जद यू तथा अन्य कुछ जातीय व क्षेत्रीय समीकरण की पार्टियों के कारण चुनावी समीकरण बदलने की स्थिति पैदा हो सकती हैं। दूसरे चरण में आदित्य योगी नाथ और माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के दबदबे वाली गोरखपुर-बस्ती मंडल की 31 सीटें शामिल हैं। पूर्वांचल का चुनावी इतिहास काफी कुछ कहता है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां के परिणामों के आधार पर ही कहा जाता रहा है कि जो पूर्वांचल जीतता है, यूपी की सत्ता उसी की होती है।

पूर्वांलच का उक्त इलाका बीते  कई सालों से जानलेवा इंसेफलाइटिस और बाढ़ की विभीषिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा है। भूख व कुपोषण से हुई मौतों ने इस इलाके का नाम काफी बदनाम किया। बात उद्योग-धंधों की करी जाए तो कभी पूरे उत्तर भारत में चीनी का कटोरा कहा जानेवाला यह इलाका चीनी मिलों की बंदी, गन्ना किसानों की बदहाली और बुनकरों की आर्थिक दुर्दशा से लिए भी जाना जाता है। विकास के मामले में यूपी के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में शामिल यह इलाका इस चुनाव में भी इस उम्मीद के साथ मैदान में है कि जाति धर्म को परे कर राजनीतिक दल इस बार विकास को प्रमुख मुद्दा बनाएंगे और चुनाव बाद इस दर्द की दवा भी करेंगे।

इस क्षेत्र से सांसद रमाकान्त यादव के बेटे के चुनाव मैदान में होने के कारण इनकी प्रतिष्ठा दांव पर हैं । दूसरे चरण में पार्टियों ने युवाओं व महिलाओं पर भी खासा भरोसा जताया हैं प्रमुख दलों से दर्जन भर से अधिक युवा व तकरीबन इतनी ही महिला प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। बात दागियों की करी जाए तो विधानसभा चुनाव के पहले चरण में जहां 109 दागी प्रत्याशी ताल ठोक  रहे थे, वहीं दूसरे चरण में भी इनकी संख्या 118 तक पहुंच गई हैं। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक सभी प्रमुख पार्टियों ने दागी उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। निर्वाचन क्षेत्र मऊ और घोसी के कौमी एकता दल के उम्मीदवार मुख्तार अंसारी पर सर्वाधिक 15 मुकदमें हैं जिनमें नौ गंभीर अपराध वाले हैं।

उप्र इलेक्शन वाच व एडीआर ने दूसरे चरण में चुनाव लड़ रहे 1098 प्रत्याशियों के हलफनामों का विश्लेषण किया। इनमें 387 प्रत्याशियों में से 18 (35 फीसदी) ने अपने विरूद्ध आपराधिक मामलों की पुष्टि की। पिछले विधानसभा चुनाव में दागी उम्मीदवार सिर्फ 28 फीसदी थे। एडीआर के रिपोर्ट के मुताबिक सभी प्रमुख पार्टियों ने आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट देकर मैदान में उतारा है। इन प्रत्याशियों में से 55 ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। हत्या जबरन, धन उगाही,चोरी, रिश्वत व हत्या का प्रयास के मामले में भाजपा के नौ, बसपा के दस, सपा के 12, पीस पार्टी के तीन, कांग्रेस के दस, जनतादल (यू) के सात, कौमी एकता दल के दो व अपना दल के एक उम्मीदवार के खिलाफ मुकदमा चल रहा है। कवयित्री मधुमिता हत्याकांड में सजा काट रहे पूर्व मंत्री और दंबग नेता अमरमणि त्रिपाठी का पुत्र अमनमणि त्रिपाठी समाजवादी पार्टी से उम्मीदवार है। 

गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे विभिन्न दलों के प्रत्याशियों संख्या  

पार्टी   उम्मीदवार  दागी

बसपा     59     23
 कांग्रेस    59      19
  सपा     59     30
बीजेपी     55     20
जेडीयू      50    12
पीस पार्टी   35    08
कौमी एद.   14    04
अपना दल  04    01
आईएनडी   01    01

टॉप टैन दागी प्रत्याशी

प्रत्याशी            मुकदमे  
मुख्तार अंसारी      15
             उपेन्द्र       11
जावेद इकबाल       05
            प्रदीप         12
      उत्पल राय       09
यशपाल सिंह रावत  09
         राम इकबाल   03
 अरुण कुमार सिंह   07
             उमाशंकर   04

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

इलाहाबाद में आचार संहिता के उल्‍लंघन में बसपा व सपा प्रत्‍याशी पर गाज गिरी

: बसपा प्रत्‍याशी स्‍वामी प्रसाद मौर्य का रिश्‍तेदार : इलाहाबाद जिले के 254 फाफामऊ विधानसभा क्षेत्र में चुनाव आचार संहिता की खुलेआम जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आचार संहिता उल्लंघन के मामले में बसपा प्रत्याशी गुरुप्रसाद मौर्य और सपा के पूर्व मंत्री अंसार अहमद के तीन प्रचार वाहनों को चुनाव आयोग के अधिकारियों ने सीज कर दिया। धरपकड़ की यह कार्रवाई 7 फरवरी को शाम साढ़े चार बजे इलाहाबाद-लखनऊ राजमार्ग पर नवाबगंज में की गई। इन वाहनों को नवाबगंज थाने में लाकर सीज किया गया है।

बसपा प्रत्याशी गुरुप्रसाद मौर्य नवाबगंज क्षेत्र के निवर्तमान विधायक हैं। इसके अलावा यह बसपा के वरिष्‍ठ नेता व कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के रिश्‍तेदार हैं, जबकि सपा शासनकाल में पूर्वमंत्री रहे अंसार अहमद चर्चित माफिया डान अतीक अहमद के खासमखास माने जाते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इसके पूर्व 24 जनवरी को कांग्रेस प्रत्याशी शेखर बहुगुणा के खिलाफ रोड शो और चार पहिया वाहनों के भारी भरकम जुलूस निकालने के मामले में होलागढ़ थाने में मुकदमा दर्ज किया जा चुका है। शेखर बहुगुणा कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के भाई और पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र हैं। इनकी मां स्वर्गीय कमला बहुगुणा इस क्षेत्र की सांसद रह चुकी हैं। बड़ी ही जद्दोजहद और स्थानीय कांग्रेसियों के कड़े विरोध के बाद शेखर को यहां से कांग्रेस का टिकट मिला। इनका टिकट घोषित होने के बाद इलाके में कांग्रेसियों ने ही करीब आधे दर्जन जगहों पर शेखर बहुगुणा और रीता बहुगुणा जोशी का पुतला दहन किया था।

इलाहाबाद से वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. 

शशांक शेखर नोएडा पहुंचे और हलचल शुरू, गिर सकता है एक विकेट

लखनऊ से नोएडा शशांक शेखर त्रिपाठी पहुंच गए हैं। उनके पहुंचने के साथ ही नोएडा में परिवर्तन शुरू हो गया है। शशांक शेखर त्रिपाठी के आते ही जागरण डाट काम को जागरण पोस्ट वाली जगह मुहैया करा दी गई है और बताया जा रहा है कि यह सिर्फ इसलिए किया गया है क्योंकि जागरण डॉट काम में कोई केबिन नहीं थी और शशांक शेखर के कद को देखते हुए उन्हें सामान्य व्यक्ति की तरह कैसे बैठाया जा सकता था। यानी तुष्टिकरण के लिए उन्हें जागरण पोस्ट वाली जगह मुहैया करा दी गई है। इसी केबिन की किचकिच में संभवतः एक दिन जागरण पोस्ट के संपादक अविनाश झा अपनी झिझक मुहैया कराते हुए नजर आ रहे हैं।

सूत्रों ने बताया कि इस समय वह हमेशा उखड़े उखड़े रहते हैं औऱ उखड़न में वह अपनी टीम के साथी औऱ सीजीएम निशिकांत ठाकुर के रिश्तेदार तक से भिड़ बैठे। वैसे बताया जा रहा है कि अविनाश झा ने अंजनी झा के लिए असंसदीय भाषा का भी प्रयोग किया। हालांकि दंड़ित अंजनी को ही किया गया क्योंकि संपादक महोदय को तो कोई कुछ कर नहीं सकता। वैसे सूत्र बता रहे हैं कि इसमें अंजनी झा की कोई गलती नहीं थी। संपादक ने ही अंजनी को भला बुरा कहा जिससे बहुत कम बोलने वाले अंजनी भड़क गए। जिसके बाद उन्हें दो दिन तक फोर्स लीव पर भी रहना पड़ा। पर यह किस न्याय की किताब में लिखा है कि गलती कोई करें और भुगते कोई।

डा. अविनाश झा के पर कतरने की तैयारी चल रही है। संभव है कि उन्हें शशांक शेखर के अंडर में कर दिया जाए और उन्हें शशांक शेखर को रिपोर्ट करना पड़े। वैसे शशांक शेखर त्रिपाठी के आने के बाद जागरण डाट काम में भी कम हलचल नहीं है। कई लोग परेशान हैं तो कई लोग इधर उधर हाथ मारने लगे हैं। वैसे कुछ लोग बता रहे हैं कि जब से शशांक शेखर आए हैं उन्हें सिर्फ यूपी की सियासी खबरें भी नजर आती हैं उनकी अपेक्षा होती है कि ज्यादा से ज्यादा खबरें यूपी की सियासत की ही लगें। इसी हलचल से खबर है कि यहां से एक सब एडिटर इस्तीफा दे चुकी है तो दो लोग इस्तीफे की कतार में है जिसमें एक सीनियर सब औऱ एक चीफ सब एडिटर शामिल हैं। हालांकि माना जा रहा है कि जागरण डाट काम से जल्द ही एक और बड़ा विकेट गिर सकता है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आ‍धारित.

”हमलोगों को दो माह से वेतन नहीं मिला, विजय प्रकाश सिंह गाडि़यां बदल रहे हैं”

सर जी नमस्ते, आप के माध्यम से लोगों तक यह जानकारी देना चाहता था कि हिन्दी पायनियर हो या इंग्लिश पायनियर, दोनों जगह दो महीने का वेतन रूका हुआ है। काम भी जम कर लिया जा रहा है और वेतन नहीं दिया जा रहा है। लोग अगर वेतन मांग रहे हैं तो उनसे कहा जा रहा है जहां मिल जाए वहां चले जाओ। वेतन देने में विजय प्रकाश लापरवाही कर रहे हैं और वेतन मांगने पर धमकी देते हैं। इतना ही नहीं वेतन मरने के चक्कर में लोग कहीं दूसरी जगह भी नहीं जा पा रहे हैं। कई लोग छोड़ना चाहते हैं पर छोड़ नहीं पा रहे हैं।

सुना है कि पायनियर के प्रधान सम्पादक मित्रा जी ने वहां सबका वेतन भेज दिया है पर इन्होंने यहां नहीं बाटा है और विजय प्रकाश सिंह ने अपने लिए एक नयी गाड़ी खरीद ली है। मित्रा जी पिछले आठ सालों से एक होण्डा सिटी गाड़ी से चल रहे हैं वहीं विजय प्रकाश सिंह हर साल-दो साल पर गाड़ियां खरीद रहे हैं। पायनियर में काम कर रहा हर कर्मचारी उनके पीठ पीछे उन्हें गालियां देता है पर उनके मुंह पर नहीं कह पाता। लोगों का वेतन खा कर गाड़ियां खरीद रहे विजय प्रकाश सिंह पायनियर के कर्मचारियों को कर्जे में डूबोते जा रहे हैं और अपने मौज कर रहे हैं। हिन्दी पायनियर की असफलता का सबसे बड़ा कारण विजय प्रकाश खुद हैं। लगातार पिट रहा हिन्दी पायनियर के कर्मचारियों को दो बार रद्दी बेच-बेच कर वेतन बांटा है। लगातार कर्मचारियों का शोषण कर रहे विजय प्रकाश सिंह कई लोगों की हाय ले रहे हैं। हम आपके माध्‍यम से चंदन मित्रा जी से कहना चाहते हैं कि वो दो महीने से रूका हम लोगों का वेतन दिलवाएं ताकि हम लोग चैन रह सकें।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

हॉकरों की हड़ताल, उदयपुर में नहीं बंटा पत्रिका और भास्‍कर

उदयपुर में दैनिक भास्‍कर और राजस्‍थान पत्रिका आज अपने पाठकों तक नहीं पहुंच पाया. दोनों अखबारों की एक भी प्रतियां वितरित नहीं हो पाईं. कमिशन बढ़ाने की मांग को लेकर हॉकरों ने हड़ताल कर दी, जिससे अखबार लदे ट्रक ही इन बाहर नहीं निकल पाए. पिछले दो दिनों से कमिशन बढ़ाने को लेकर हॉकर तथा प्रबंधन के बीच विवाद चल रहा था. आज वह विवाद बड़े रूप में सामने आया और हॉकरों ने हड़ताल कर दी. खबर है कि आज फिर दोनों अखबारों के प्रबंधन तथा हॉकरों के प्रतिनिधियों के बीच इस मामले को लेकर बातचीत हो रही है.

उदयपुर में राजस्‍थान पत्रिका ढाई रुपये तथा दैनिक भास्‍कर सवा दो रुपये में बिकता है. इसमें हॉकरों को 65 से 70 पैसे कमिशन के तौर पर मिलते हैं. हॉकर काफी समय से कमिशन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. दो दिन पूर्व उन्‍होंने अपने इस मांग को तेज कर दिया. राजस्‍थान पत्रिका तथा दैनिक भास्‍कर प्रबंधन से इस मुद्दे पर हॉकरों की बात हुई, तो हॉकर अखबार की कीमत का पचास प्रतिशत कमिशन के रूप में देने की मांग पर अड़ गए, जिसके चलते बात नहीं बन पाई. बताया जा रहा है कि दोनों अखबार का प्रबंधन कमिशन बढ़ाने की हामी भरी है पर अखबार के मूल्‍य का पचास फीसदी देने को तैयार नहीं है, जबकि हॉकर कीमत का पचास फीसदी कमिशन लेने पर अड़े हुए हैं. बात नहीं बनने पर हॉकरों ने दोनों अखबारों को प्रिंटिंग एरिया से ही बाहर नहीं निकलने दिया. वे अखबार लदे वाहनों के सामने लोट गए, जिससे अखबार सेंटरों तक नहीं पहुंच सका.

यूपी चुनाव : काले धन पर अपनी नीति और नीयत दिखा राहुल ने गंवा दिया अवसर

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सोमवार को वाराणसी में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में जो कुछ भी मीडिया के सामने कहा उससे राहुल गांधी की नीति, दर्शन और भविष्य की योजनाओं को आसानी से समझा जा सकता है। राहुल की भाव-भंगिमा और भाषाशैली सीधे तौर पर यह इशारा कर रही थी कि उनका मिशन 2012 मंजिल से पहले ही हांफने लगा है। प्रथम चरण की वोटिंग से दो दिन पहले चुनाव अभियान के बीच राहुल का प्रेस कांफ्रेंस करना किसी खास रणनीति का हिस्सा है। राहुल ने बड़ी बेबाकी से पत्रकार बंधुओं के सवालों का जवाब दिया, जिससे उनकी पार्टी का ग्राफ ऊपर उठ सकता था, या फिर चुनावों में तात्कालिक लाभ मिल सकता था, लेकिन काले धन के अहम सवाल पर उन्होंने जिस तरह गोल-मोल जवाब दिया, उससे कांग्रेस की नीति और नीयत दोनों का एकबार फिर खुलासा हो गया।

असल में चुनाव के समय काले धन के बड़े सवाल पर राहुल को पार्टी की नीति का खुलासा देश-विदेश की मीडिया के सामने करना चाहिए था, लेकिन राहुल ने लड़कपन में एक बड़ा अवसर हाथ से गंवा दिया। अगर राहुल में थोड़ी सी भी परिपक्वता, राजनीतिक समझ या दूरदर्शिता होती तो राहुल काले धन के सवाल को रामदेव के विरोध या काले झण्डे से जोड़कर नहीं देखते, बल्कि एक जिम्मेदार नेता और देश की सत्ताधारी पार्टी के महासचिव के तौर पर देशहित और आम आदमी से जुड़े कालेधन के मुद्दे पर अपने विचार और नीति का खुलासा करके विरोधियों की हवा बिगाड़ने के साथ देश की जनता का ध्यान भी अपनी ओर खींच सकते थे।

राहुल ने जिस तरह काले धन के मुद्दे को रामदेव के साथ जोड़ा है। उससे रामदेव को मुफ्त का प्रचार मिला। राहुल का यह बयान कि अगर रामदेव समझते हैं कि अपने चार-पांच लोगों को मुझे काले झंडे दिखाने के लिए भेजकर डरा देंगे तो वह गलतफहमी में हैं। राहुल ने कहा कि चाहे काले झंडे दिखाओ या जूता मारो, राहुल गांधी डरने वाला नहीं है। मुझे डरना नहीं आता और यह सीख मुझे अपनी दादी इंदिरा गांधी से मिली है। राहुल के बयान से देश के आम आदमी में यह संदेश गया कि देश की सत्ताधारी पार्टी का महासचिव जिसे उसकी पार्टी पीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करती है, वो रामदेव के अभियान और विरोध से घबराता है। राहुल और कांग्रेस पार्टी रामदेव के अभियान से भयभीत और घबराई है तभी तो राहुल कालेधन के सीधे सवाल पर सीधा जवाब देने की बजाय रामदेव के सर्मथकों के विरोध पर तीर चला रहे हैं। कालेधन से काले झण्डे पर पहुंचे राहुल को चार जून को रामलीला मैदान में आधी रात निहत्थे सोये हुए प्रदर्शनकारियों, जिनमें स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे पर कांग्रेस सरकार द्वारा चलाए गए काले डंडे भी नहीं भूलने चाहिए। 

गौरतलब है कि यूपी को साधने के लिए राहुल गांधी पिछले पांच साल से दिन-रात एक किये हुए हैं, लेकिन चुनाव के समय मन मुताबिक परिणाम मिलते न देखकर राहुल झुंझला और परेशान हो गए हैं। एक-एक करके राहुल की हर चुनावी रणनीति और योजना की कलई खुलती जा रही है, ऐसे में घबराए राहुल ने चुनावी रैली और सभा के बीच प्रेस कांफ्रेंस करना जरूरी समझा। राहुल ने चुनाव की घोषणा से पूर्व ही बसपा पर सीधे हमले करके सपा को मैदान से बाहर दिखाने का प्रयास किया था, लेकिन उनका ये दांव सफल नहीं हो पाया। उसके बाद राहुल ने सपा को भी निशाने पर लिया, लेकिन ये बात भी जनता को पता चल ही गयी कि चुनाव बाद सपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बनाने के सपने बुन रहे हैं। भाजपा को तो राहुल दौड़ और मैदान से बाहर समझ ही रहे हैं लेकिन उमा भारती को चरखारी से चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा ने राहुल के बने बनाये खेल को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। उमा भारती के चरखारी से चुनाव मैदान में उतरने से झुंझलाए राहुल ने बचकानी बयानबाजी पर उतर आए। चुनाव प्रचार के हवा निकलते और आपसी गुटबाजी में उलझी कांग्रेस की गति देखकर राहुल ने छोटी बहन प्रियंका को चुनाव अभियान में उतार दिया। प्रियंका ने मीडिया के सामने राहुल की स्थिति, नीति और रानजीति को क्लियर करने की कोशिश की थी।

वाराणसी में राहुल भी अपनी स्थिति साफ करते दिखाई दिये। राहुल ने कहा कि जब तक यूपी अपने पैरों पर नहीं खड़ा हो जाता, वह यहां से नहीं जाने वाले हैं। मेरा मकसद प्रधानमंत्री बनना नहीं, बल्कि यूपी को बदलना है। राहुल ने कहा कि जब तक यूपी के गरीबों, किसानों और मजदूरों को इज्जत नहीं मिल जाती, मेरा काम यहां खत्म नहीं होने वाला। मैं यहां गांवों में, झुग्गियों में और गरीबों के बीच आपको नजर आऊंगा। आखिरकर चुनाव के समय राहुल और प्रियंका को ऐसी बयानबाजी की जरूरत क्यों पड़ी, यह अहम सवाल है? 

राहुल को एक के बाद एक कई अवसर मिले जब वो भ्रष्टाचार, कालेधन और लोकपाल बिल पर पार्टी का रूख और अपने विचार देश के सामने रख सकते थे, लेकिन लगता है राहुल ने जान बूझकर सारे मौके हाथ से गंवा दिये। योगगुरु रामदेव के कालेधन विरोधी अभियान से लेकर अन्ना को लोकपाल और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान यूपीए सरकार ने जनभावनओं का सम्मान करने की बजाय हठधर्मिता और बेशर्मी का परिचय दिया। बाबा रामदेव के समर्थकों पर रामलीला मैदान में आधी रात लाठियां बरसाकर लोकतंत्र की हत्या करने का काम किया। रामदेव के बाद अन्ना के साथ भी सरकार ने बदसलूकी करने की हिमाकत की लेकिन भारी जनदबाव और समर्थन के कारण सरकार के मंसूबे पूरे नहीं हो पाये। अगस्त में अन्ना के आंदोलन के समय यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी इलाज के लिए विदेश में थी, पार्टी और सरकार की दारोमदार राहुल के युवा कंधों पर था, लेकिन उस समय राहुल ने अदूरदर्शिता और अनाड़ीपन दिखाकर सरकार की किरकरी करवाई और आम आमदी की नजर में कांग्रेस को गुनाहगार साबित कर दिया। राहुल में अगर थोड़ी सी भी राजनीतिक समझ और परिपक्वता होती तो वो संसद में रटा-रटाया भाषण देने की बजाय दिल से बोलते और जनता की आवाज और भावना को सम्मान देते। असलियत यह है कि पिछले तीन सालों में ऐसे कई मौके आए जब राहुल जनता की आखों के तारे बन सकते थे लेकिन ऐसे हर मौके पर राहुल सीन से पूरी तरह गायब नजर आए। यूपी में दलित और किसान के मुद्दे उठाकर राहुल ने सहानुभूति बटोरी थी, और पार्टी की छवि को सुधारा भी था लेकिन बहुत जल्द ही राहुल की सच्चाई सामने आ गयी कि राहुल भाषणों में चाहे जितनी लंबी-चौड़ी बाते करें लेकिन असलियत में उनका मकसद कुर्सी हड़पने की ही है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले पांच साल में मिशन 2012 के लिए राहुल ने कई नये प्रयोग किये और वो अपने मकसद में कामयाब होते दिख भी रहे थे, लेकिन भ्रष्टाचार, लोकपाल और कालेधन के सवाल राहुल के सामने बार-बार आकर खड़े हो जाते हैं और राहुल की पेशानी पर बल पड़ जाते हैं। राहुल बार-बार इन सवालों का सीधा और सही जवाब देने से बचने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन एक न एक दिन उन्हें इन सवालों का जवाब देना ही होगा। क्योंकि जो व्यक्ति खुद यह कह रहा हो कि उसका मकसद प्रधानमंत्री बनना नहीं सेवा करना है, उसकी बात को आसानी से समझा जा सकता है कि वो प्रधानमंत्री बनने के लिए कितना उतावला है, ऐसे में राहुल को वाराणसी की प्रेस कांफ्रेस में एक बार फिर सुनहरा अवसर मिला था जब वो कालेधन पर पार्टी का स्टैण्ड मजबूती से रख सकते थे, लेकिन कालेधन के सवाल का गोल-मोल जवाब देकर राहुल ने देश की जनता को एक बार फिर सोचने को मजबूर किया है कि राहुल और कांग्रेस पार्टी कालेधन के मुद्दे पर जनता को साफ संदेश देने की बजाय गुमराह करने की कोशिश कर रही है, चुनाव के समय राहुल का कालेधन पर गोल-मोल जवाब उनके चुनावी गणित को भी कहीं गोल-मोल ही न कर दें। चुनाव नतीजे तो आने वाला वक्त ही बताएगा फिलहाल राहुल ने एक सुनहरा अवसर हाथ से गंवा दिया है, जो उनकी राजनीतिक अदूरदर्शिता और नासमझी से बढ़कर कुछ और नहीं कहा जा सकता है। 

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ लखनऊ के स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

बीबीसी के लिए ईरान में काम करने वाले कई गिरफ्तार

तेहरान : बीबीसी की फारसी सेवा के लिए गोपनीय तरीके से काम कर रहे कई स्थानीय लोगों को ईरान में गिरफ्तार कर लिया गया है। यह जानकारी समाचार एजेंसी मेहर ने जारी की है। एक सूत्र के अनुसार,ऐसे कई लोगों को सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार कर लिया है, जिन्हें बीबीसी के लिए ईरान में खबरें और सूचनाएं जुटाने के लिए कहा गया था। सूत्र ने कहा है कि गिरफ्तार लोगों को बीबीसी से बड़ी मात्रा में धनराशि प्राप्त हुई थी। हालांकि गिरफ्तार लोगों की सही संख्या के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई है।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, ईरानी खुफिया बलों ने नवम्बर 2011 में हसन फाथी नामक स्थानीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। यह व्यक्ति लम्बे समय से बीबीसी के लिए काम कर रहा था। इस पर देश के बारे में झूठ फैलाने और ईरानी जनता के विचारों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश करने का आरोप था। ज्ञात हो कि ईरानी खुफिया मंत्रालय ने पहले ही ईरानी नागरिकों को बीबीसी के साथ काम न करने की चेतावनी दे दी थी। (एजेंसी)

कवरेज करने गए पत्रकारों को भी पुलिस ने पीटा, कैमरा छीना

नडाला से खबर है कि एक धरने-प्रदर्शन को कवर करने गए मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस ने लाठियां चटकाईं. उनसे दुर्व्‍यवहार किया गया तथा एक पत्रकार का कैमरा छीन लिया गया. इससे पत्रकारों में रोष है. खबर के अनुसार जगतमीत इंडस्‍ट्रीज हमीरा के पांच हजार से ज्‍यादा कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर दो दिन से धरनारत थे. प्रबंधक एवं कर्मचारी नेताओं में समझौता नहीं हो पाया, जिससे कर्मचारियों ने हड़ताल शुरू कर दी. प्रबंधकों ने पुलिस को बुला लिया.

मामले की सूचना मिलने पर कई पत्रकार भी घटना स्‍थल पर पहुंचे तथा कवरेज करने लगे. पुलिस द्वारा ए.एस.पी. भुलत्थ राहुल कुमार व एस.पी. कपूरथला सुरेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में बिना किसी चेतावनी के इंडस्ट्री के गेट आगे सड़क पर धरने पर बैठे कर्मचारियों पर लाठीचार्ज शुरू कर दिया गया. गुस्साए कर्मचारियों ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया. पुलिस ने स्थिति बिगड़ती देख हवाई फायरिंग शुरू कर दी तथा लाठीचार्ज शुरू कर दिया. इसमें पत्रकारों को भी नहीं बख्‍शा गया. कवरेज कर रहे पत्रकारों पर भी पुलिसवालों ने जानबूझकर लाठियां चटकाईं. खासकर इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों के साथ सबसे ज्‍यादा दुर्व्‍यवहार किया गया. पुलिस ने एक पंजाबी अखबार के पत्रकार का कैमरा भी छीन लिया. अन्‍य पत्रकारों ने भागकर अपनी जान बचाई. इस घटना के बाद से पत्रकारों में नाराजगी है.

फाक्‍स ट्रैवलर ने अब बंगाली भाषा चैनल लांच किया

कोलकाता। भारत के क्षेत्रीय टेलीविजन बाजार में बड़ा निवेश करते हुए ट्रैवल और लाइफस्टाइल चैनल फॉक्स ट्रैवलर ने बंगाली भाषा में भी चौबीसों घंटे की अपनी सेवा आरंभ कर दी है। फॉक्स इंटरनेशनल चैनलों की उपाध्यक्ष देवार्पिता बनर्जी ने कहा कि क्षेत्रीय स्तर पर निवेश हमेशा से हमारा लक्ष्य रहा है। हम दर्शकों भाषा के जितने नजदीक होंगे उनके लिए हमें और प्रसारित सामग्री को समझना आसान होगा। इसी क्रम में हमने बंगाली भाषा में सेवा की शुरुआत की है। 

उन्होंने कहा कि हिन्दी भाषा में हमारे दर्शकों की संख्या सबसे अधिक है। बंगाली और तमिल भाषा में अपने चैनल शुरू करके हम अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं। हम कार्यक्रमों में स्थानीय तड़का लगाना चाहते हैं। उल्‍लेखनीय यह चैनल फिलहाल भारत में अंग्रेजी, हिन्दी और तमिल भाषा में अपनी सेवाएं दे रहा है। अब चौथी भाषा के रूप में बांग्‍ला में कदम रखा है। 

गिरीश गुरनानी ने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया, बन सकते हैं देहरादून के संपादक

अमर उजाला, हिमाचल के प्रभारी संपादक पद से इस्‍तीफा देने वाले गिरीश गुरनानी ने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन कर लिया है. सूत्रों का कहना है कि गिरीश को देहरादून का संपादक बनाया जा सकता है. हिंदुस्‍तान के मौजूदा संपादक दिनेश पाठक की रवानगी को लेकर पहले से ही खबरें आ रही थीं. अमर उजाला, मुरादाबाद के संपादक नीरजकांत राही के हिंदुस्‍तान, देहरादून का संपादक बनाए जाने की चर्चाएं थीं, पर अब गिरीश गुरनानी का नाम आ गया है.

दिनेश पाठक को पूर्व मुख्‍यमंत्री निशंक की नजदीकी ले डूबी है. दिनेश निशंक का गुणगान करते थे तो निशंक इन्‍हें और इनके संस्‍थान को उपकृत करते थे. जब खंडूरी आए तो मामला उलट गया. साथ ही हिंदुस्‍तान ग्रुप के विश्‍वविद्यालय का प्रोजेक्‍ट भी लटक गया. बताया जा रहा है कि इसी गाज दिनेश पाठक पर गिरने वाली है. सूत्रों की माने तो उन्‍हें काफी पहले ही देहरादून से रवानगी के लिए तैयार रहने का संदेश दे दिया गया था, पर उचित दावेदार नहीं मिल पाने से वे अब तक टिके हुए थे. गिरीश गुरनानी के ज्‍वाइन करने के बाद अब माना जा रहा है कि प्रबंधन दिनेश पाठक को अगले स्‍टेशन की टिकट थमा देगा.

…तो माफिया अतीक मांग रहा है दरियाबाद में राकेश के लिए वोट!

: बेनी के एहसान का वास्ता दे गद्दी समाज को सुना चुका है फरमान : बाराबंकी। केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा अपने पुत्र राकेश वर्मा को दरियाबाद से जिताने के लिए आज कुछ भी करने को तैयार हैं। खबर है कि वर्मा ने क्षेत्र के गद्दी समाज के लोगों को कांग्रेस के पाले में लाने के लिए पूर्वांचल के माफिया अतीक अहमद का भी सहयोग लेने से कोई गुरेज नहीं किया है? इसके लिए बकायदा माफिया से नेता बने इस तारणहार ने अपने समाज के लोगों को बुला-बुलाकर बेनी के एहसान का वास्ता देकर उन्हें कांग्रेस का समर्थन करने का फरमान भी सुनाया।

इतिहास गवाह है कि पुत्र दुर्योधन के लिए धृतराष्ट्र ने अपने पूरे कुटुम्ब का सर्वनाश करवा डाला था। यह श्रृंखला आज भी कहीं न कहीं दिख ही जाती है। खासकर राजनेता अपने पुत्र को राजनीति में स्थापित करने के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं। अति विश्वस्त सूत्रों से छनकर आयी खबरों के मुताबिक जिले में दरियाबाद विधानसभा में कुछ ऐसा ही पुत्र मोह दिखाई दे रहा है। पता चला है कि केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के पुत्र कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व कारागार मंत्री राकेश वर्मा का प्रचार उनके समर्थक व कांग्रेसजन तो कर ही रहे हैं। अलबत्ता पूर्वांचल का माफिया व इलाहाबाद पश्चिम से विधायक और अब अपना दल प्रत्याशी अतीक अहमद भी यहां राकेश का प्रचार अपने सम्पर्कों के जरिये कर रहा है।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक माफिया अतीक अहमद अथवा अतीक चकिया चूंकि गद्दी समाज से सम्बन्ध रखता है इसलिए वह अपने चहेते नेताओं के लिए चुनाव में सक्रिय रहकर जहां-जहां भी उसके अपने समाज के लोग रहते हैं वहां-वहां उसका समर्थक अथवा फरमान जारी रहता है। खबर मिली है कि गद्दी समाज जो कि मुस्लिम समाज से सम्बन्धित है इसके लगभग 12 से 15 हजार मतदाता दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र में बसते हैं। इनके लिए स्वयं श्री वर्मा व कांग्रेस के कई खास लोग अपने स्तर से काफी प्रयास भी कर चुके हैं। पता चला है कि बकायदा गद्दी समाज के लोगों के लिए दरियाबाद में एक कैम्प तक अघोषित रूप से बनाया गया था। जहां पर इस समाज के लोगों के लोगों की जमकर खातिरदारी की गयी। लेकिन जब संदेह के बादल नहीं छंटे तो नहले पर दहला लगाने की युक्ति के साथ सहारा लिया गया माफिया अतीक अहमद का!

विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक माफिया अतीक जेल में रहते हुए अब तक क्षेत्र के गद्दी समाज से जुड़े तमाम लोगों को अपने पास बुलवाकर कांग्रेस का समर्थन करने का फरमान दे चुका है? मालूम हुआ है कि इस समाज के प्रमुख लोगों को अतीक से मिलवाने के लिए साधन भी मुहैया करवाये गये। वहां से लौटे कई गद्दी समाज के लोगों ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अतीक भाई ने हमसे कहा कि आप लोगों को कांग्रेस प्रत्याशी राकेश वर्मा का समर्थन करना है। क्योंकि बेनी प्रसाद वर्मा जी के मुझ पर काफी एहसान हैं। कई ने तो यह भी बताया है कि उन्हें यह चेतावनी भी मिली कि यदि गड़बड़ की तो उसका परिणाम भी उन्हें भुगतना पड़ेगा।

साफ है कि चुनावी जंग में जीत मिले इसके अलावा कांग्रेस नेता को और कुछ नहीं दिखाई देता। उनकी सोच है कि वोट संत का हो या डकैत का, सब बराबर है। समर्थन भी बिलकुल बराबर। लक्ष्य भेदना है तो सब कुछ करना पड़ेगा। खासकर तब जब युद्ध में अपना पुत्र संघर्ष कर रहा हो। इस संबंध में कांग्रेस ने इन सभी चर्चाओं व आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए इसे विरोधी दलों की बदनाम करने वाली चाल बताया है। कांग्रेस का कहना है कि विरोधी राकेश वर्मा की लोकप्रियता से घबरा गये हैं। इसलिए ऐसे बेतुके आरोप हवा में लगा रहे हैं। उधर आल इण्डिया गद्दी यूथ फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मो. तारिक ने इस संबंध में कहा कि हां हमारे समाज के लोगों ने मुझे इस बात की जानकारी दी है कि उन्हें अतीक के जरिये फरमान दिया गया। लेकिन मेरा मानना है कि सभी को वोट देने का अपना अधिकार है। किसी पर ऐसा दबाव बनाया जाना गलत है। मेरा संगठन इसकी निन्दा करता है।

बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

सोशल मीडिया की ताकत : ट्विटर के बाद फेसबुक पर आने की तैयारी में पीएमओ

नई दिल्‍ली : ट्विटर पर मौजूदगी दर्ज कराने के दो हफ्ते बाद प्रधानमंत्री कार्यालय अब फेसबुक पर उतरने की तैयारी में है। ट्विटर अकाउंट @ पीएमओ इंडिया से 38,500 लोग जुड़ गए हैं। अब पीएमओ में सोशल मीडिया के जरिए इसे संचालित करने के लिए एक छोटा दफ्तर खोला जाएगा। सूत्रों के मुताबिक पीएमओ फेसबुक के विकल्प पर भी विचार कर रहा है।

सूत्रों के अनुसार सोशल मीडिया के जरिये लोगों से संवाद करने और उनकी समस्याओं के निदान के प्रभावी संचालन के लिए पीएमओ में जल्द ही एक छोटा दफ्तर बनाया जाएगा। प्रधानमंत्री की मीडिया टीम ट्विटर अकाउंट एट द रेट पीएमओइंडिया को लोगों से संवाद के लिए बेहतर बनाने की कोशिशों में जुटी है। हालांकि कहा जा रहा है सोशल मीडिया बहुत नया है इसलिए थोड़ा वक्‍त लोगों को इसे समझने में लगेगा। पीएमओ फेसबुक पर खाता खोलने की सम्भावनाएं भी तलाश रहा है। इस वक्त फेसबुक पर पीएमओ का खाता कुछ प्रशंसकों द्वारा चलाया जा रहा है, जो आधिकारिक नहीं है। जल्‍द ही आधिकारिक एकाउंट खोलने की तैयारी की जा रही है।

इस बीच सूचना तकनीक और संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट ने कहा है कि सरकार का इरादा किसी सोशल नेटवर्किंग और अन्य वेब साइटों को बंद करने का नहीं है। लेकिन इन साइटों को भारतीय कानून की सीमा में रहकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार बोलने की आजादी पर अंकुश नहीं लगाएगी लेकिन इन वेबसाइटों को भारतीय परिवेश के अनुरूप अपनी जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। जिससे समाजिक ढांचे को कोई खतरा ना हो।

चंडीगढ़ में अमर उजाला के रीजनल आफिस का उद्घाटन

: ताकत के साथ मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ी – शिवराज : पंजाब के गवर्नर और चंडीगढ़ के प्रशासक शिवराज पाटिल ने कहा है कि ताकत बढ़ने के साथ मीडिया की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। अखबारों को इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए। श्री पाटिल सोमवार शाम अमर उजाला चंडीगढ़ केंद्र के सेक्टर-9 डी स्थित नए रीजनल आफिस के शुभारंभ अवसर पर बोल रहे थे। इससे पहले उन्होंने मंत्रोच्चार के बीच नारियल तोड़ और फीता काटकर नए आफिस में रीजन के विशिष्टजनों के साथ प्रवेश किया।

इसके बाद अमर उजाला के पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और चंडीगढ़ रीजन के अब तक के सफर और सुनहरी प्रस्तुतियों से सजाई गई विशिष्ट प्रदर्शनी का भी गवर्नर ने अवलोकन किया। उनके साथ हरियाणा के उद्योग मंत्री रणदीप सुरजेवाला, शिक्षा मंत्री गीता भुक्कल, हरियाणा के लोकायुक्त जस्टिस (सेवानिवृत्त) प्रीतम पाल, पीयू के वाइस चांसलर आरसी सोबती, रॉक गार्डन के निर्माता नेक चंद, अंबाला रेल मंडल के सीनियर डिवीजनल कामर्शियल मैनेजर जीएम सिंह समेत पंजाब-हरियाणा और चंडीगढ़ के वरिष्ठ अफसर मौजूद रहे। सभी ने अमर उजाला परिवार को शुभकामना देने के साथ खबरों को देने में अखबार की निष्पक्षता का बार-बार उल्लेख किया। साभार : अमर उजाला 

गोरखपुर कांग्रेस प्रत्‍याशी के बेटे पर फायरिंग, जदयू विधायक आचार संहिता के उल्‍लंघन में गिरफ्तार

गोरखपुर : बस्ती के कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र के गांव एकडंगवा के पास अज्ञात बदमाशों ने कांग्रेस प्रत्याशी राणा कृष्ण किंकर सिंह के बेटे राणा नागेन्द्र प्रताप सिंह और उनके समर्थकों पर गोलियों की बौछार कर दी। सोमवार रात हुए हमले वह बाल-बाल बच गए। उनकी सफारी क्षतिग्रस्त हो गई। बदमाशों ने करीब पांच-छह राउंड फायरिंग की है। वारदात की जानकारी के बाद तत्काल मौके पर एसपी और प्रेक्षक पहुंच गए। राणा नागेन्द्र सिंह के पिता राणा कृष्ण किंकर सिंह कप्तानगंज विधानसभा से कांग्रेस प्रत्याशी हैं। पिता के पक्ष में प्रचार करने के लिए नागेन्द्र कुछ समर्थकों के साथ एकडंगवा गांव गए थे।

गोरखपुर : योगी आदित्यनाथ के विरोधी भाजपा विधायक और तुलसीपुर से जद यू के प्रत्याशी कौशलेंद्र नाथ गिरफ्तार का लिए गये है. आरोप है कि वो आचार संहिता का उल्‍लंघन कर रात में 10 बजे तुलसीपुर में अपने समर्थकों के साथ वोट माँग रहे थे. बताया जा रहा है कि तुलसीपुर में समय 5 बजे ही चुनाव प्रचार बंद करने का निर्देश था. लेकिन कौशलेन्द्र महराज नियमों की अनदेखी कर रात में भी प्रचार कर रहे थे.

बनारस में सिटी से लांच हुआ जनसंदेश टाइम्‍स, डाक के लिए अभी इंतजार

जनसंदेश टाइम्‍स ने सोमवार को बनारस में अपना अखबार लांच कर दिया है. अखबार की लांचिंग सिर्फ सिटी में हुई है. बनारस के ग्रामीण क्षेत्र या डाक एडिशनों की लांचिंग नहीं की गई है. 20 हजार प्रतियों के साथ लांच हुए अखबार को बनारस भर में बांटा गया. इस दौरान कंपनी के एमडी अनुज पोद्दार एवं मैनेजर अनिल पाण्‍डेय भी वाराणसी में मौजूद थे. पहले दिन यह अखबार 20+4 पेज का प्रकाशित हुआ. पर अखबार में कुछ भी ऐसा नहीं दिखा जिससे कि लोग इसे हाथोंहाथ ले सकें.

लांचिंग के साथ यह भी सवाल खड़ा हो गया है कि दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्‍तान जैसे स्‍थापित अखबारों के बीच बिना बेहतर कंटेंट के कैसे यह अखबार पांव जमा पाएगा. न तो राष्‍ट्रीय सहारा जैसी योजना या संसाधन ही प्रबंधन के पास दिख रही है, जिससे यह पाठकों तक अपनी पहुंच बना सके. सूत्र बताते हैं कि अखबार में कर्मचारियों का अभाव है. दूसरे संस्‍थानों से आए कुछ पेजिनेटर तो यहां का माहौल देखकर वापस हो लिए. दूसरे संस्‍थानों से आए मजबूरों की टीम कितना बढि़या काम कर पाएगी, यह अखबार के लांचिंग से ही दिखने लगा है. जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़े ज्‍यादातर अपने पूर्व संस्‍थानों में उपेक्षित थे या फिर बेरोजगार थे. नाम गिनाने की जरूरत नहीं है, पर जरूरत पड़ी तो इन लोगों के नाम भी गिनाए जाएंगे.

अगर पाठक को 'ये पलटा, वो लुटे, चार मरे-पांच घायल, राजू नगर में, पप्‍पू शहर में, और विज्ञप्तियां' ही पढ़ने को मिलेंगी तो वो जनसंदेश टाइम्‍स को क्‍यों पढ़ेगा, दूसरे स्‍थापित अखबार क्‍यों नहीं? बताया जा रहा है कि सिटी एवं डेस्‍क पर भी काम करने वालों की कमी है, जिससे डाक एडिशन लांच करने की हिम्‍मत प्रबंधन नहीं दिखा सका. वैसे भी बताया जा रहा है कि जिस तरह की योजना जिलों में अपनाई जा रही है उससे इस अखबार को अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलने में नाकों चने चबाने पड़ेंगे. जिलों में विवादित रहे या फिर नौसिखिए लोगों को प्रभार दिया गया है. प्रबंधन 20 से 25 हजार में पूरे जिलों को संचालित करने की योजना तैयार कर रखी है. अब आजमगढ़, गाजीपुर, सोनभद्र, बलिया जैसे बड़े जिलों में किस तरह से काम होगा यह आसानी से समझा जा सकता है.

अखबार की एजेंसी लेने वाले ही पत्रकारिता भी करेंगे. या फिर वे लोग पत्रकार बनाए गए हैं, जो अपने पैसे के बलबूते पत्रकारिता कर सकें तथा अखबार और उसकी इज्‍जत दोनों को बेच सकें. अखबार को विज्ञापन के कमिशन के सहारे पत्रकारिता करने वालों की जरूरत है. अब ऐसा पत्रकार विज्ञापन खोजेगा या पत्रकारिता करेगा? तो क्‍या पाठक विज्ञापन देखने के लिए अखबार खरीदेगा! जब नींव ही ऐसी है तो इमारत का अंदाजा लगाया जा सकता है. बलिया में अखबार की एजेंसी जागरण प्रतिनिधि प्रमोद उपाध्‍याय के भाई के पास है. पर बताया जा रहा है कि नाम भले भाई का है असली काम प्रमोद ही करेंगे. उनको देखकर ही उनके भाई के नाम एजेंसी की गई है. ऐसे ही अन्‍य जिलों में भी कई विवादित लोग अखबार से जुड़े हैं. अखबार को स्‍तरीय पत्रकार नहीं मिल पा रहे हैं क्‍योंकि पैसे की गांठ नहीं खुल पा रही है. सूत्र ये भी बता रहे हैं कि जो दूसरे संस्‍थानों से आए हैं वो अब पश्‍चात कर रहे हैं.

चैनलों पर दिखाए जाने वाले प्री एक्जिट पोल रोकने के लिए पीआईएल दाखिल

 इलाहाबाद : इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष विधानसभा चुनाव का एक्टिज पोल व जनता की राय के प्रसारण व टीवी चैनलों पर दिखाए जाने पर रोक लगाने की मांग में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याची का कहना है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 (ए) के अंतर्गत इसकी मनाही की गई है। इसके बावजूद टीवी चैनलों पर उनका प्रसारण किया जा रहा है जो आपराधिक कृत्य है। याचिका की सुनवाई 8 फरवरी को होगी।

याचिका में भारत के निर्वाचन आयुक्त प्रदेश के निर्वाचन आयुक्त व प्रदेश के मुख्य सचिव को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में इन अधिकारियों का कानूनी उपबंधों का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश जारी करने की मांग की गई है। याची का कहना है कि एक्जिट पोल, ओपीनियन पोल का प्रसारण स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के खिलाफ है जो कि मतदाताओं के मस्तिष्क को प्रभावित करता है। याचिका सैयद मुहम्मद फैजल ने दाखिल की है। अधिनियम में स्पष्ट रोक के बावजूद टीवी चैनलों द्वारा प्रसारण किया जा रहा है जिससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और इस प्रसारण से चुनाव प्रक्रिया दूषित हो रही है। साभार : जागरण

पत्रकार से मारपीट करने वाले एएसआई गिरफ्तार

बिहार के खगड़िया जिले में एक स्थानीय पत्रकार के साथ मारपीट के तेरह साल पुराने मामले में यहां की निचली अदालत के आदेश पर सोमवार को एक एएसआई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। खगड़िया के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी जेपी किस्कू के आदेश पर एएसआई पीएन सिन्हा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। सिन्हा अभी मुंगेर जिले के तारापुर थाना में नियुक्‍त हैं।

खगड़िया के पत्रकार सिकन्दर आजाद बख्त ने 25 फरवरी 1998 में मानसी थाना में पदस्थापित सिन्हा के खिलाफ मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष परिवाद पत्र संख्या 268 सी -98 दर्ज कराया था। उन्‍होंने एएसआई पर मारपीट करने का आरोप लगाया था। इस मामले में कोर्ट द्वारा बार-बार नोटिस के बावजूद एएसआई पेश नहीं हो रहे थे। इसके बाद अदालत ने 2002 में सिन्हा को फरार घोषित कर दिया था। वह सोमवार को इस मामले में जमानत लेने प्रथम श्रेणी न्यायायिक दंडाधिकारी के समक्ष पहुंचे थे, लेकिन अदालत के आदेश पर उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया।

अहमद बुखारी मुसलमानों के एकमात्र रहनुमा नहीं

दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने मुसलमानों से समाजवादी पार्टी को वोट देने की अपील करना निहायत की गैरजिम्मेदाराना हरकत है। वह भी उस सूरत में जब उनका दामाद भी सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। अगर उनका दामाद सपा के बजाय किसी और पार्टी से चुनाव लड़ता, तो क्या तब भी वह सपा को जिताने की अपील मुसलमानों से करते? क्या बुखारी देश या उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के एकमात्र रहनुमा हैं? उन्हें यह हक किसने दिया कि वह मुसलमानों को किसी विशेष पार्टी के हक में वोट देने की अपील करें? किसी भी व्यक्ति को यह हक है कि वह चाहे किसी को भी अपना वोट दे, किसी दूसरे का हस्तक्षेप वह क्यों बर्दाश्त करे? अपील करने से पहले बुखारी को इसका खुलासा करना चाहिए था कि उन्होंने किन मुसलिम मुद्दों और मांगों को मुलायम सिंह यादव के सामने रखा? हालांकि उनके वालिद कई पार्टियों को जिताने की अपील मुसलमानों से कर चुके हैं। पार्टी ने जीतने के बाद मुसलमानों के हक में क्या किया, यह आज तक किसी को पता नहीं है।

इतना जरूर है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से जरूर कीमत वसूली। इसका उदहारण 1989 कर चुनाव है। राजीव गांधी की सरकार पर बौफोर्स तोप दलाली को लेकर वीपी सिंह बयानों के गोले दाग रहे थे। सरकार जनता में विश्वसनीयता खो चुकी थी। दूसरी ओर राम मंदिर आंदोलन पूरे उफान पर था। सांप्रदायिक दंगों की आग में उत्तर प्रदेश के कई शहर जल रहे थे। राममंदिर पर राजीव गांधी की दोगली नीतियों और मलियाना और हाशिमपुरा में पुलिस और पीएसी की ज्यादती के कारण मुसलमानों का कांग्रेस से मोह भंग हो गया था। वे वीपी सिंह को अपने रहनुमा के तौर पर देख रहे थे। मरहूम अब्दुल्ला बुखारी ने मुसलमानों का रुख देखा, तो मुसलमानों से जनता दल को वोट देने की अपील कर दी। समर्थन देने की एवज में उन्होंने जनता दल सरकार से पूरी कीमत वसूली। अपने आदमियों को राज्यसभा में भेजा और जामा मस्जिद पचास लाख रुपये का अनुदान लिया। उन रुपयों का बुखारी परिवार ने क्या किया, यह आज तक किसी को पता नहीं है। यह पूछने की हिम्मत न तो किसी की हुई और न हो सकती थी।

मलियाना और हाशिमपुरा कांड के विरोध स्वरूप अब्दुल्ला बुखारी ने जामा मसजिद को काले झंडे और बैनरों से पाट दिया था। 1989 उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार बनी। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ही थे। मलियाना कांड पीड़ितों का एक प्रतिनिधिमंडल अब्दुल्ला बुखारी से मिलने गया था। प्रतिनिनिधि मंडल ने उनसे आग्रह किया था कि वह वीपी सिंह और मुलायम सिंह यादव से कहकर मलियाना जांच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करवाएं और दोषियों पर मुकदमा चले। इस पर अब्दुल्ला बुखारी का जवाब था, ‘राजीव गांधी, वीपी सिंह, या मुलायम सिंह यादव हों, कोई भी मुसलमानों का हमदर्द नहीं है।’ उनके इस जवाब पर प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य ने कहा था, ‘जब कोई राजनीतिक दल मुसलमानों का हमदर्द ही नहीं है, तो आप क्यों बार-बार किसी दल को समर्थन देने की अपील मुसलमानों से करते हैं?’ इस सवाल पर बुखारी बोले थे, ‘मुझसे किसी की सवाल करने की हिम्मत नहीं होती, तुमने कैसे सवाल करने की जुर्रत की।’ उनके जवाब से जाहिर था कि मुसलमानों के नाम पर बुखारी परिवार सिर्फ अपने स्वार्थ साधता रहा है। सवाल करने की जुर्रत तो उनके साहबजादे अहमद बुखारी से भी किसी की नहीं हो सकती। पिछले साल लखनऊ में एक उर्दू पत्रकार ने उनसे एक सवाल कर लिया था, तो उनके समर्थकों ने पत्रकार को बुरी तरह मारापीटा था।

ऐसे समय में जब मुसलमानों का रुख लगभग पहले से ही सपा की ओर है, तो बुखारी की अपील उन्हें नुकसान भी कर सकती है। पूरा चुनाव मुसलमानों के इर्दगिर्द होने से नई चीजें पैदा हो रही हैं। आरएसएस भाजपा उम्मीदवार के कमजोर होने की सूरत में अपने कैडर को बसपा को वोट देने की अपील कर चुका है। सपा के मुस्लिम चेहरे आजम खान और बुखारी परिवार के बीच हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। उनका क्या रुख रहेगा, यह भी देखने वाली बात होगी। वह बुखारी की अपील पर नाराजगी का इजहार भी कर चुके हैं। कल्याण सिंह मुद्दे पर आजम एक बार पार्टी छोड़ चुके हैं। बुखारी प्रकरण से आजम और मुलायम सिंह के रिश्तों के बीच फिर से खटास आ सकती है, जो अंतत: सपा को ही नुकसान पहुंचाएगी। इतिहास बताता है कि जब भी दिल्ली की जामा मस्जिद से किसी के पक्ष में वोट करने की अपील जारी हुई, हवा का रुख देखकर ही हुई। 1977 में जनता पार्टी, 1980 में कांग्रेस और 1989 में जनता दल के पक्ष में अपील जारी हो चुकी हैं। इन चुनावों में यदि बुखारी अपील भी न करते, तो मुसलमान वोट उसी पार्टी को करता, जिसके पक्ष में अपील की गई थी। इस तरह की अपीलों का एक खतरनाक पहलू यह भी है कि दूसरे समुदायों में यह संदेश जाता है कि मुसलमानों का ध्रुवीकरण हो रहा है, जिससे गैर मुस्लिम वोटरों का भी ध्रुवीकरण होता है, जो लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। अहमद बुखारी 2004 में मुसलमानों से भाजपा को वोट देने की अपील भी कर चुके हैं, जिसे सिरे से खारिज कर दिया गया था। वह मुसलमानों की भावनाओं के विपरीत था, इसलिए मुसलमानों ने जमकर उसकी आलोचना की थी। उसके बाद ही अब सवाल यह है कि क्या सैयद बुखारी की अपील के सहारे मुलायम चुनाव की नैया पार लगा सकेंगे?

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी ब्लागर और जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों वो मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी से जुड़े हुए हैं.

यूपी में वृक्ष तले कामकाज निपटा रहा एक आईपीएस

सिस्‍टम में रह कर सिस्‍टम की गंदगी के‍ खिलाफ लड़ने के लिए जाने जाते हैं आईपीएस अधिकारी अमिताभ. ईमानदारी एवं दिलेरी के चलते मुश्किलें भी झेलते रहते हैं. परेशान भी होते हैं, पर लड़ना कभी नहीं छोड़ते. जेन्‍यूइन मुद्दों पर लड़ने के चलते वे हमेशा से सरकार एवं ताकतवर नौकरशाहों के निशाने पर रहे हैं. सस्‍पेंड किए गए, बिना महत्‍व की जगहों पर भेजे गए, पढ़ने के लिए छुट्टी नहीं दी गई, पर इन्‍होंने कभी हार नहीं मानी. लड़े और जीते. सिस्‍टम को मजबूरी में इन्‍हें बहाल करना पड़ा.

पहले मेरठ में भ्रष्‍टाचार अनुसंधान विभाग में भेजे गए. अपनी आदत के अनुसार जब इन्‍होंने यहां भी भ्रष्‍टाचारियों के गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किए तो चोर-गिरहकट परेशान होने लगे. ताकत लगाया अपने शुभचिंतकों तक बात पहुंचाई. फिर अमिताभ का तबादला कर‍ दिया गया. इस बार इन्‍हें पुलिस के रुल्‍स एवं मैन्‍युल्‍स विभाग में एसपी बनाकर भेजा गया. अपनी आदत के अनुसार यहां भी इन्‍होंने काम करना चाहा तो पता चला कि यहां तो कोई काम ही नहीं है. यानी यहां वो ही लोग भेजे जाते हैं जिन्‍हें काले पानी की सजा देनी हो. यहां भी ये सिस्‍टम को समझने में जुट गए. वायरलेस चौराहा स्थित रेडियो मुख्‍यालय में दो कमरो में संचालित होता है, रुल्‍स और मैन्‍युअल्‍स का कार्यालय. एक में डीजी ओपी दीक्षित बैठते हैं तो दूसरे कमरे में अमिताभ एवं राहुल अस्‍थाना.

छोटे से कार्यालय में दो आईपीएस यानी एक कुछ खटपट करे तो दूसरे का ध्‍यान भंग. कहा जा रहा है कि ऐसा हर रोज होता है. सूत्र बताते हैं कि दूसरे साहब पूरे पुलिस वाले हैं. तेज आवाज और गाली-ग्‍लौज के बिना बात करना उन्‍हें पसंद नहीं है. बताया जा रहा है कि इससे अमिताभ को भी परेशानी होती थी. इस लिए उन्‍होंने सिस्‍टम में बैठे जिम्‍मेदार लोगों को पत्र लिखकर एक अलग कमरा एलाट करने की गुजारिश की. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने डीजीपी, प्रमुख सचिव गृह समेत उन तमाम लोगों को पत्र लिखा जो नियमानुसार उन्‍हें अलग कमरा एलाट करा सकते थे. पर सिस्‍टम अपने तरीके और अपने रफ्तार से ही चलता है जब‍ तक कि कोई इसे झकझोरे नहीं. इस बार भी ऐसा ही हुआ. चार दिन बीतने के बाद भी अमिताभ की बात का संज्ञान नहीं लिया गया. उन्‍हें अलग कमरा एलाट नहीं किया गया.

पर अपनी संघर्ष करने की आदत से मजबूर अमिताभ ने फिर एक रास्‍ता निकाला. बिना किसी शोर-शराबे के वो रेडियो मुख्‍यालय में स्थित पार्क में एक पेड़ के नीचे पहुंच गए. एक टेबल और चार कुर्सियां डाली बन गया कार्यालय. अब वे इसी खुले कार्यालय में वो अपना काम निपटा रहे हैं. पर सवाल खड़ा होता है कि अपने देश और राज्‍य के सिस्‍टम में हर बार ईमानदार को ही क्‍यों इतनी परीक्षाएं देनी पड़ती हैं या उनकी इतनी परीक्षाएं क्‍यों ली जाती हैं. अब देखना है कि पेड़ के नीचे अपना काम काज निपटा रहे इस आईएएस को शासन-प्रशासन एक अलग कमरा एलाट कराता है या फिर उन्‍हें पेड के नीचे ही कार्यालय चलाने के लिए छोड़ देता है. बहरहाल यह कार्यालय लखनऊ की मीडिया में भी सरगर्म है.

अंबिका से पंगा पड़ा महंगा, हरीश खरे को नहीं मिल रहा ठौर!

नई दिल्ली। कल तक देश के वज़ीरे आज़म के नाक का बाल बने रहे हरीश खरे आज आशियाने के लिए दर दर भटकने पर मजबूर हैं। स्वाभिमान से लवरेज़ हरीश खरे अपनी प्रतिष्ठा को अक्ष्क्षुण रखने की खातिर अब जमीन तलाश रहे हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमती सोनिया गांधी से मिलने का सपना मन में लिए हरीश खरे अब कांग्रेस में सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) में घुसने के लिए सीढ़ी तलाश रहे हैं।

10, जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि पीएमओ से बाहर किए गए हरीश खरे ने सोनिया गांधी के पारिवारिक मित्र और पत्रकार सुमन दुबे से मदद की गुहार लगाई है। दरअसल, सुमन दुबे और हरीश खरे की इस बैठक को सुमन दुबे के समधी ने आयोजित किया। सुमन दुबे के पुत्र का विवाह इकानामिक टाइम्स के एक वरिष्ठ पत्रकार की भतीजी के साथ हुआ है। इस बैठक के बाद जो बातें छन छन कर बाहर आ रही हैं, उनके अनुसार हरीश खरे की तमन्ना है कि वे एक मर्तबा सोनिया गांधी से मिलकर अपना दर्द हल्का करना चाह रहे हैं। उधर, हरीश खरे के अघोषित तौर पर धुर विरोधी पुलक चटर्जी ने इस बात की घेराबंदी कर रखी है, कि हरीश खरे सोनिया गांधी से न मिल पाएं।

पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि पुलक चटर्जी के संज्ञान में जबसे यह बात आई है कि सुमन दुबे और हरीश खरे के बीच एक सिटिंग हो चुक है, तबसे उनका रक्तचाप भी कुछ बढ़ सा गया है। सूत्रों ने कहा कि अब चटर्जी इस प्रयास में हैं कि सुमन दुबे को इस बात के लिए राजी कर लिया जाए कि वे हरीश खरे को 10, जनपथ से दूर ही रखें। इधर, खबर ये भी आ रही है कि हरीश खरे की रवानगी में महती भूमिका सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने निभाई। जिस दिन हरीश खरे ने पीएमओ में आमद दी थी उसी दिन से हरीश खरे की पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव से नजदीकी को बड़े ही करीने से उकेरना आरंभ कर दिया गया था। गौरतलब है कि हरीश खरे पूर्व वज़ीरे आज़म नरसिंहराव के बेहद करीबी समझे जाते रहे हैं।

पीएमओ के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि हरीश खरे ने अपने अहम के चलते मनमोहन सिंह की पंजाबी जुंडाली और सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी से पंगा ले लिया था। हरीश खरे ने अनेक मौकों पर पीएम के पंजाबी मित्रों विशेषकर अंबिका सोनी को नीचा दिखाया था। अंबिका सोनी मन ही मन हरीश खरे को सबक सिखाने की फिराक में ही दिख रहीं थीं। बताते हैं कि अंबिका सोनी की नाराजगी का पारा तब आसमान पर पहुंचा जब मुश्किल की घड़ी में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को चुनिंदा संपादकों की टोली के साथ हरीश खरे ने चाय पर बुला भेजा। दो बार पीएम मीडिया के चुनिंदा लोगों से रूबरू हुए, इन दोनों ही मर्तबा हरीश खरे ने देश की सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी को विश्वास में लेना उचित नहीं समझा।

उधर, अंबिका सोनी के करीबी सूत्रों का कहना है कि हरीश खरे पर पलटवार करने की तैयारी में बैठी अंबिका सोनी के हाथ तत्काल ही एक मौका लगा। वह मौका था चुनिंदा संपादकों की टोली के साथ चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री का बंग्लादेश के बारे में कहा गया ‘ऑफ द रिकार्ड‘ बयान केंद्र सरकार की आधिकारिक विज्ञप्ति जारी करने वाले सूचना प्रसारण मंत्रालय के एक अंग पत्र सूचना कार्यालय की वेब साईट पर अपलोड हो गया। इस बयान से कूटनतिक विवाद पैदा हो गया था। इस मौके ने अंबिका सोनी के काम को और आसान कर दिया। रही सही कसर पंकज पचौरी की पीएमओ में नियुक्ति से पूरी हो गई। साभार : मेरी खबर

अनिल मिश्रा के बाद रतन सिंह, आलोक एवं अनूप भी फोर्स लीव पर, महंगी पड़ी माफिया की खबर

: बनारस में भुअरा गैंग के भविष्‍य को लेकर चर्चा-ए-आम : बनारस और पेड न्‍यूज में बहुत गहरा याराना है. अखबरों में खबरें मैनेज ना हो या पेड न्‍यूज ना छपे यह संभव ही नहीं है. यहां हर अखबार में ऐसे लोगों का एक मजबूत सिंडिकेट तैनात है, जो खबरों को मैनेज करने से लेकर मेनूपुलेट करने का काम करता है. खासकर पेड न्‍यूज के मामले को लेकर बनारस में सबसे ज्‍यादा हिंदुस्‍तान और दैनिक जागरण ही बदनाम हैं. इन दोनों ही अखबारों में एक बड़ा सिंडिकेट है, जो इस काम को प्रोफेशनल तरीके से अंजाम देता है.

इस सिंडिकेट का काम ही है खबरों से पैसे का खेल खेलना. पर खेल खेलने में माहिर हिंदुस्‍तानी इस बार फंस गए हैं. मामला हाईकमान तक पहुंच जाने के बाद इन लोगों को लेने के देने पड़ रहे हैं. प्रधान संपादक शशि शेखर ने पेड न्‍यूज के खिलाफ घोषित अभियान चला रखा है. हालांकि अंदरखाने कुछ दूसरे तरीके से पेड न्‍यूज के पैकेज की खबरें भी आ रही हैं, पर निर्वाचन आयोग के डंडे के चलते सारे अखबार पेड न्‍यूज नहीं छपने से परेशान हैं तो प्रत्‍याशी भी निर्वाचन आयोग की धन्‍यवाद दे रहे हैं. पत्रकार अब उन्‍हें उस तरह से विज्ञापन और खबर के लिए पैसा देने को नहीं कह रहे हैं, जैसा बीते लोकसभा चुनाव में डंडा कर रखा था.

इस बार प्रधान संपादक एवं चुनाव आयोग के चलते इस सिंडिकेट की चल नहीं पा रही थी. विज्ञापन देकर कोई प्रत्‍याशी फंसना नहीं चाह रहा है, लिहाजा इन लोगों की सारी कमाई प्रभावित हो रही है. सूत्र बताते हैं कि चंदौली के सैयदराजा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे माफिया बृजेश सिंह वाली खबर को भी मैनेज किया गया था. चंदौली से यह बात छनकर आ रही है कि बृजेश सिंह एंड कंपनी ने नामांकन एवं सभा से पहले पैसा लेकर सभी अखबारों के दफ्तर पहुंचे थे, पर चुनाव आयोग की कड़ाई के चलते सब लोगों ने पैसा थामने से इनकार कर दिया था. सूत्र बताते हैं कि हिंदुस्‍तान से एमएम रहमान, संतोष सिंह एवं मनीष कुमार ने दो लाख रुपये के विज्ञापन की डील की थी, पर प्रबंधन ने बृजेश का विज्ञापन छापने से इनकार कर दिया.

बताया जा रहा है कि डील खतम होने के बाद एमएम रहमान ने अपने खास तथा पूर्व ब्‍यूरोचीफ आनंद सिंह से बात की. कहा जा रहा है कि आनंद सिंह ने उपर बात की. सारी चीजें तय हो जाने के बाद खबर को तानकर लगाने की डील हुई. कहा जा रहा है कि इसके लिए बृजेश एंड कंपनी ने एक लाख रुपये की डील फाइनल की. इसके बाद आनंद सिंह भी कमालपुर पहुंचे. स्‍थानीय प्रतिनिधि जमील खां के होने के बाद भी खबर आनंद सिंह एवं एमएम रहमान के निर्देशन में तैयार की गई. तैयार खबर को मुगलसराय ब्‍यूरो कार्यालय भेज दिया गया. हालांकि  सूत्र बताते हैं कि खबर में थोड़ी-बहुत कांट-छांट कर अनूप कर्णवाल ने बनारस भेज दिया. उन्‍होंने खबर के साथ नोट भी लिखा कि इस पर विशेष ध्‍यान दें पेड न्‍यूज जैसी खबर है. इसे किल भी किया जा सकता है. दूसरी तरफ एमएम रहमान इस तरह की किसी भी बात तथा आरोप से इनकार करते हैं. उनका कहना है कि माफिया की खबर या विज्ञापन हम नहीं छाप रहे हैं. विज्ञापन या किसी मद में पैसा नहीं लिया गया है.

इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि अनूप जब से ब्‍यूरोचीफ बने हैं उन्‍हें पुराने लोग पचा नहीं पा रहे हैं. पुराने ब्‍यूरोचीफ एवं मुगलसराय में तैनात कुमार अशोक अपनी हर खबर को लेकर पूछताछ करते रहते हैं. विवादों से बचने के लिए अनूप एंड कंपनी उन लोगों की खबरों में ज्‍यादा काट-छांट नहीं करती है. इस बार भी ऐसा ही हो गया, पर इस बार मेहरबानी दिखाना अनूप को भारी पड़ गया. खबर बनारस पहुंची, अपकंट्री इंचार्ज आदर्श शुक्‍ला के छुट्टी पर होने के चलते चंदौली पेज देखने वाले आलोक राय ने खबर सिटी इंचार्ज रतन सिंह को दिखाई. रतन ने खबर को छोटा करने तथा अनिल मिश्रा से पूछ लेने को कहा. अनिल मिश्रा ने आलोक राय को खबर तानकर छापने को कह दिया. सूत्र बताते हैं कि अनिल मिश्रा ने सिटी पर भी खबर लगाने के लिए योगेश को कहा, पर योगेश ने स्‍थान खाली ना होने की बात कह कर खबर से पल्‍ला झाड़ लिया. बताया जा रहा है कि इसके बाद पूर्वांचल पेज पर भी खबर भेजने के निर्देश मिश्रा जी ने दिए, पर पेज फाइनल होने के चलते बात नहीं बन पाई.

खबर छपने के दूसरे ही दिन हिंदुस्‍तान में हड़कम्‍प मच गया. पूछा-ताछी शुरू हुई. गनीमत यह रही कि जिस दिन यह खबर प्रकाशित हुई उस दिन संपादक अनिल भास्‍कर दिल्‍ली में थे, लिहाजा उनके उपर किसी तरह का आरोप नहीं लगा. मामले में नवीन जोशी के निर्देश पर संपादक ने अनिल मिश्रा, रतन सिंह, आलोक राय एवं अनूप कर्णवाल को फोर्स लीव पर भेज दिया तथा जांच शुरू करा दी. सभी लोगों से घंटों इंट्रोगेट किया गया. सूत्र बताते हैं कि संपादक अनिल भास्‍कर ने अपनी रिपोर्ट नवीन जोशी को भेज दी है. इसमें अनिल मिश्रा को बचाने की कोशिश किए जाने की बात कही जा रही है, जबकि सबसे ज्‍यादा जिम्‍मेदारी उन्‍हीं की बनती है. इधर, एक सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि इस मामले में एमएम रहमान एंड कंपनी से कोई पूछताछ नहीं की गई है. किसी तरह की पूछताछ न करना एक सवाल तो खड़ा करता ही है. बताया जा रहा है कि अनिल मिश्रा के अलावा रतन सिंह, आलोक एवं अनूप को बलि का बकरा बनाया जाएगा.

इससे एक तीर से कई शिकार हो जाएंगे. अनिल मिश्रा के पुराने दुश्‍मन माने जाने वाले रतन सिंह के खिलाफ कोई भी कार्रवाई होती है तो अनिल मिश्रा एंड कंपनी मजबूत होगी, अनूप कर्णवाल के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाती है तो आनंद सिंह एंड कंपनी मजबूत होगी. आलोक राय के आगे नाथ ना पीछे पगहा है तो माना जा रहा है कि बेचारे सबसे निरीह बकरा वो ही हैं, उनकी ही बलि ली जाएगी. बाकी दो का तबादला करके मामले को सलटाए जाने की खबरें आ रही हैं. पर जिस तरह मामला प्रधान संपादक तक पहुंचा है तो सब कुछ इतना आसान भी नहीं है. कहा जा रहा है कि बनारस में पले-बढ़े शशि शेखर यहां की रग-रग से वाकिफ हैं इसलिए इसबार अनिल मिश्रा एंड कंपनी को झटका लग सकता है. हालांकि संपादक अनिल भास्‍कर उनको बचाने की पूरी कोशिश में लगे हुए हैं.

अगर आपको याद हो तो बीते लोकसभा चुनावों में दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान दोनों ने पेड न्‍यूज की गंध मचा रखी थी. इतनी खबरें और विज्ञापन मैनेज हुए कि इन दोनों अखबारों की छीछालेदर होने लगी. जागरण में पेड न्‍यूज की कमान बीरेंद्र कुमार एवं राघवेंद्र चड्ढा ने संभाल रखी थी तो हिंदुस्‍तान में अनिल मिश्रा के पास ये जिम्‍मेदारी थी. दोनों हाथों से पैसे लूटे जा रहे थे. कुछ कंपनी को फायदा हो रहा था तो कुछ अपनी जेब में जा रहा था. पूर्वांचल के सारे जिलों में बाहुबली तथा माफिया टाइप लोगों के विज्ञापन और खबरें धड़ाधड़ अखबारों में प्रकाशित हो रही थी. चंदौली में तो एमएम रहमान एंड कंपनी ने भासपा प्रत्‍याशी तुलसी सिंह की इतनी पेड न्‍यूज पैसे के बल पर छपवाई कि उन्‍हें दूसरे दिन स्‍पष्‍टीकरण छापकर पाठकों से माफी मांगनी पड़ी थी. वो तो भला हो चुनाव आयोग का, जिसके चलते इस बार प्रत्‍याशी से लेकर पाठक वर्ग तक चैन और सुकून की सांस ले रहा है. खैर अब बनारस में चाय की अड़ी पर पत्रकार बिरादरी में इस बात को लेकर चर्चा है कि अब भूअरा गैंग का क्‍या होगा. बहरहाल आप भी इंतजार करिए और देखिए न्‍याय की कसौटी पर पेड न्‍यूज की कहानी.

भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की रिपोर्ट.

गूगल, फेसबुक समेत 22 साइटों को पन्‍द्रह दिन की मोहलत

नई दिल्ली: सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर कंटेट के मसले पर अदालत ने नेटवर्किंग साइट से 15 दिनों के लिखित जवाब दाखिल करने का को कहा है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने इन कंपनियों से 1 मार्च तक रिपोर्ट पेश करने को कहा है। इस बीच सोमवार को फेसबुक इंडिया ने दिल्ली की एक अदालत को वेबसाइट से आपत्ति जनक सामग्री हटाने संबंधी उसके आदेश के अनुपालन से संबंधित रिपोर्ट दी। अदालत ने फेसबुक तथा 21 अन्य वेबसाइट को आपत्तिजनक सामग्री हटाने के निर्देश दिए थे।

गूगल इंडिया ने भी अदालत से कहा कि उसने नेट पर अपनी ‘साइटों’ पर से उन पृष्ठों को हटा दिया है जिसको लेकर याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई थी। इस बीच, फेसबुक, याहू तथा माइक्रोसाफ्ट ने अदालत से कहा कि इस मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है और इस सिलसिले में उनके खिलाफ कार्रवाई करने का कोई औचित्य नहीं है। अतिरिक्त न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने याचिकाकर्ता मुफ्ती एजाज अरशद काजमी की तरफ से मामले में पेश वकील से यह पूछा कि क्या ब्लाग पर किसी व्यक्ति द्वारा कोई सामग्री या सूचना पोस्ट किए जाने से सेवा प्रदाता कंपनियों को पक्ष बनाया जा सकता है।

अदालत ने गूगल से यह भी पूछा कि वह ‘उपयुक्त’ तरीके से जवाब के साथ क्यों नहीं आई। अदालत ने कंपनी की इस दलील को खारिज कर दिया कि उसे फैसले तथा मामले से जुड़े अन्य दस्तावेज की प्रति शुक्रवार को मिली थी। अदालत ने कहा, ‘आप यह मत कहिए कि आपको दस्तावेज की प्रति शुक्रवार को मिली। इस मामले में पिछले कुछ महीने से होहल्ला हो रहा है, ऐसे में आपको इसके लिए तैयार रहना चाहिए था।

अदालत ने याचिकाकर्ता से उन सभी दस्तावेज की प्रति प्रतिवादियों को उपलब्ध कराने को कहा जिसके आधार पर उन्होंने अर्जी दयार की है। इससे पहले, अदालत ने 20 दिसंबर को आदेश जारी कर 21 वेबसाइट को सम्मन भेजा और फोटोग्राफ्स, वीडियो या अन्य रूप में मौजूदा ‘धर्म एवं समाज विरोधी’ सामग्रियों को हटाने का निर्देश दिया था। जिन वेबासाइटों को आपत्तिजनक सामग्री हटाने का निर्देश दिया गया था, उनमें फेसबुक इंडिया, फेसबुक, गूगल इंडिया प्राइवेट लि., गूगल आकरुट, यूट्यूब, ब्लागस्पाट, माइक्रोसाफ्ट इंडिया प्राइवेट लि., माइक्रोसाफ्ट इंडिया, माइक्रोसाफ्ट जोम्बी टाइम, एक्सबोई, बोर्डरीडर, आईएमसी इंडिया, माई लॉट, शइनी ब्लाग तथा टोपिक्स शामिल हैं।

वहीं गूगल इंडिया ने दिल्ली की अदालत से कहा कि उसने कुछ पृष्ठों को वेबसाइट से हटा दिया है। फेसबुक, याहू तथा माइक्रोसाफ्ट ने अदालत से कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई का कोई कारण नहीं है इसलिए हमारे खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है। इससे पहले मामले में  इन कंपनियों पर इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री डालने का आरोप है। याहू, गूगूल, यूट्यूब सहित सभी कंपनियों के कथित आपत्तिजनक सामग्री परोसे जाने के कारण इन पर अभियोग चलाने को कहा गया था। (एजेंसी)

हे भगवान! उत्‍तराखंड को नीतीश या परमार जैसा सीएम देना

उत्तराखंड के भाग्य का फैसला ईवीएम में बंद है. रिजल्ट 6 मार्च को बाहर निकलेगा पर तब तक मैं राज्य के एक वोटर, पत्रकार व शुभ चिन्तक के नाते खुदा व उत्तराखंड के देवताओं से प्रार्थना तो कर ही सकता हूँ कि इस गरीब राज्य को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या फिर हिमाचल प्रदेश के जनक कहे जाने वाले पहले मुख्यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार जैसा मुख्यमंत्री देना जो पहाड़ में रह रहे बीमार महिलाओं का इलाज व खचाखच भरी जीपों में रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर भागते युवाओं को वहीं रोक सके. मेरे पास कई युवा आते हैं जो दो हजार रुपये महीने की नौकरी के जुगाड़ के लिए भी मिन्‍नतें करते हैं यानी हमारी सरकार एक युवक के लिए उसके गांव के निकट दो हजार रुपये की व्यवस्था तक नहीं कर पायी जो अफसोसजनक के साथ दर्दनाक बात भी है.

मैं भगवान बद्रीनाथ से प्रार्थना करता हूँ कि यदि कुछ ऐसा जुगाड़ हो जाए कि उत्तराखंड के भावी मुख्यमंत्री के शरीर में इन दोनों ही नेताओं की आत्मा प्रवेश कर जाए तो इस गरीब प्रदेश का उद्धार ही हो जाए..! खैर, बागवानी के लिए हिमांचल से टक्कर लेने वाले इस प्रदेश में अब तक उस गरीब किसान के खेतों की मिट्टी की जांच की व्यवस्था तक नहीं हो पायी जो अपने खेतों में बागवानी करना चाहते हैं. पहाड़ में कैंसर जैसी भयानक पीड़ा से जूझती महिलाओं के लिए आज भी ग्राम देवता एक मात्र सहारा है जो कांपकर बताता है कि उस पर पड़ोसी महिला (डायन) की छाया है, जिसके कारण यहाँ के सैकड़ों परिवार एक-दूसरे के जान के दुश्मन बन रहे हैं. पहाड़ की रीढ़ कही जाने इन महिलाओं के बारे में किसी को कोई चिंता नहीं है. देहरादून में बैठे नेता तथा नौकरशाह भले ही मुफ्त में सरकार की करोड़ों की दवाएं व टानिक डकार जाते हों पर इन महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच की किसी को कोई चिंता नहीं. कम से कम इनके स्वास्थ्य की जांच करके इन्हें एक हेल्थ कार्ड ही मुहैया करवा दें ताकि वे कर्ज लेकर ही सही अपना सही इलाज तो करवा सकें. एक सर्वे के अनुसार पहाड़ की 60 फीसदी से ज्यादा महिलाओं में खून की कमी है और इतनी ही महिलायें किसी न किसी बीमारी के साथ जी रही हैं.

मुख्यमंत्री खंडूड़ी का अपने चुनाव नामांकन के लिए बर्फ में पैदल चलता एक फोटो अखबारों में छपा, लोगों ने कहा, देखो मुख्यमंत्री पैदल चल रहे हैं..पर इन्हे क्या पता कि वे अपने नामांकन के लिए पैदल चले न कि जनता के किसी काम के लिए. तारीफ़ तो तब है जब मुख्यमंत्री जनता के किसी काम के लिए पैदल चले. हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री डा. परमार अपने पूरे सचिवालय के साथ हफ्तेभर पैदल चलकर पहाड़ी गाँव में ठहरते थे और उनके लिए विकास की योजनायें बनाकर उन्हें लागू करवाते थे. जानकार बताते हैं कि उनके अपने थैले में सरकारी फाइलों के अलावा सुई-तागा भी होता था, जिसके बारे में उनका कहना था कि ..मंत्री हो या संत्री यदि पहाड़ चढ़ते समय पजामा फट जाए तो सुई-तागा ही लाज बचाते हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब अपनी ही पार्टी के बाहुबली गुंडों व माफियाओं को सलाखों के पीछे पहुंचाया और भ्रष्टाचार की कमाई से बनी भव्य इमारतों में गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोले तो बिहार में फैले जातिवाद के कैंसर व राजनीतिक अराजकता ने नीतीश के सामने घुटने टेक दिए.

उत्तराखंड में …खंडूड़ी है जरूरी…के नारे ने जमकर गुल खिलाये… खंडूड़ी से आम उत्तराखंडी को बहुत आस थी उन्हें लगा कि उनके आते ही भ्रष्टाचारी जेल में होंगे पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. मुख्यमंत्री के साथ वही नौकरशाह जमे हैं जिन्हें निशंक सरकार किसी ख़ास मिशन के लिए उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड लाये थे, वे जमे ही नहीं हैं बल्कि खंडूड़ी सरकार के भी ख़ास बने हैं. उत्तराखंड में लोकपाल विधेयक पास हुआ.. उसकी अन्ना ने भी तारीफ़ की पर विधेयक को ड्राफ्ट करने वाले नौकरशाह अपना काम कर गए जिससे यह क़ानून आम आदमी की सुरक्षा करने वाला कम और डराने वाला ज्यादा बन गया. इसके तहत यदि किसी की शिकायत गलत मिली तो उस पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. इस दंड का डर आम आदमी को लोकपाल की चौखट में जाने से रोकेगा. जहां गरीब आदमी थाने व अदालत में अधिकाँश मुकदमे इसलिए हार जाता है कि उसके सच्चे गवाह भी पैसे वालों के सामने टूट जाते हैं, लोकपाल के सामने भी एक पैसे वाला भ्रष्ट नौकरशाह एक गरीब की शिकायत को पैसे के बल पर आसानी से झूठा साबित करवा सकता है. लेने के देने न पड़ जाएँ इसके भय से आम आदमी किसी भ्रष्ट नेता व नौकरशाह के खिलाफ आसानी से शिकायत की हिम्मत नहीं जुटा पायेगा.

दुःख की बात है कि इस बार पहाड़ में विकास के नाम पर नहीं बल्कि जाति व क्षेत्र के नाम पर वोट मांगे गए और किसी भी नारे से हिट रहा मुर्गा व शराब!! मुर्गा भक्षियों से जब मैंने सवाल किया तो उनका जवाब भी निरुत्तर करने वाला था.. उनका कहना था कि वोट के बाद पांच साल तक तो इनका पता नहीं चलेगा इसलिए कम से कम मुर्ग मुसल्लम ही सही कुछ तो हाथ लगे!!! उत्तराखंड के भाग्य विधाताओं से आग्रह है कि वे एक बार उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश की सीमा पर चार दिन का प्रवास जरूर करें और देखे के कैसे सामान प्राकृतिक परिस्थितयों वाल हिमाचल का रोहाड़ू व कोटखाई क्षेत्र बागवानी से बेहद संपन्न हो गया है तो दूसरी ओर उत्तराखंड का मोरी व त्योनी क्षेत्र है जहाँ बेहद गरीबी व बागवानी शून्य है. ऐसे नौकरशाहों को  राज्य से बाहर कर दें जो पहाडी गरीबों को दुत्कारे और उसका मखौल उडाये. देहरादून का सचिवालय ऐसे तत्वों से भरा पडा है और उनके पास सबसे अहम जिम्मेदारियां सौपी गयी हैं पर ईमानदार अधिकारी आज भी किनारे बैठे हैं.

उत्‍तराखंड से वरिष्‍ठ पत्रकार विजेंद्र रावत की रिपोर्ट.

फिरोजाबाद के सूचनाधिकारी से परेशान हैं मीडियाकर्मी, शिकायत की

चुनाव आयोग के दिशा निर्देशन में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ मीडिया भी पारदर्शिता में अहम भूमिका रखता है, पर जिला फिरोजाबाद का सूचना अधिकारी सहयोग तो दूर की बात मीडियाकर्मियों के साथ अभद्र व अशोभनीय व्यवहार पर उतर आता है। यह कितनी शर्मनाक बात है। ए टू जेड चैनल के स्ट्रिंगर राजकुमार ने मुख्य चुनाव अधिकारी लखनऊ, राष्ट्रीय चुनाव आयोग दिल्ली सहित जिलाधिकारी/चुनाव अधिकारी फिरोजाबाद को भी इस तथ्य से अवगत कराते हुए बताया कि यह अधिकारी विगत आठ वर्षों से यहां तैनात है। चुनाव आयोग को यह सूचना 2 फरवरी 2012 को दी जा चुकी है परन्तु आयोग द्वारा कोई कदम न उठाना, आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

राजकुमार ने अपनी शिकायत में कहा है कि उन्‍हें यह भी ज्ञात हुआ है कि यह सूचनाधिकारी सुविधा शुल्क वसूल कर अमान्य पत्रकारों को पास जारी कर देता है। जनपद में होने वाले कार्यक्रमों से मीडिया को अवगत कराना सूचनाधिकारी का कार्य होता है परन्तु इस कार्य को भी जनपद के जिलाधिकारी द्वारा कराया जा रहा है। बताया जा रहा है कि राजकुमार के साथ जिले के कई पत्रकार सूचनाधिकारी के अलोकतांत्रिक एवं भ्रष्‍ट रवैये से परेशान हैं। इन लोगों ने सूचनाधिकारी के खिलाफ न्‍यायसंगत कार्रवाई किए जाने की मांग की है।

विकीलीक्‍स को दस्‍तावेज मुहैया कराने के आरोपी मैनिंग को कोर्ट मार्शल का आदेश

हैगर्सटाउन (मैरीलैंड) : अमेरिकी सेना के एक अधिकारी ने विकीलीक्स पर वाशिंगटन के गोपनीय दस्तावेजों के लीक होने के मामले में निचले स्तर के एक खुफिया विश्लेषक के खिलाफ कोर्ट मार्शल का आदेश दिया है। मेजर जनरल माइकल लिनिंगटन ने शुक्रवार को ब्रैडले मैनिंग के खिलाफ सभी आरोपों को कोर्ट मार्शल जनरल के हवाले कर दिया। अब मैनिंग को कोट मार्शल के दौरान खुद को पाकसाफ साबित करना होगा।

उस पर आरोप है कि उसने विकीलीक्स को अमेरिकी विदेश विभाग के 70 हजार से अधिक गोपनीय दस्तावेज मुहैया कराए। बचाव पक्ष के वकीलों का कहना है कि मैनिंग का कभी गोपनीय दस्तावेजों से वास्ता नहीं पड़ा और ऐसे में दस्तावेज विकलीक्स को मुहैया कराने का सवाल ही नहीं उठता। (एजेंसी)

कल्‍याण में क्राइम रिपोर्टर पर हमला, चेन लूटी

मुंबई। मीडिया पर हमलों का दौर अभी भी नहीं रुक रहा है। मीडियाकर्मियों पर हमले को लेकर प्रेस काउंसिल के अध्‍यक्ष के कई राज्‍यों को पत्र लिखा है, इसके बाद भी हमले जारी हैं। एक  फरवरी को कल्याण स्टेशन पर तीन अज्ञात बदमाशों ने पत्रकार विद्या भूषण माणिक पर जान लेवा हमला किया और उनके गले में पहनी हुई 20 ग्राम सोने की चेन भी छीन लिया। पुलिस ने मामले की शिकायत दर्ज करा दी है। एक आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

जानकारी के अनुसार कल्याण के रहने वाले व मुंबई में क्राईम रिपोर्टर विद्या भूषण कल्याण ब्रिज से रात को नौ बजे घर जा रहे थे। वहां पहले से मौजूद तीन बदमाशों ने अचानक उन पर हमला किया, जिससे वे घायल हो गए। इसके बाद वे पत्रकार की सोने की चेन छिनकर भाग निकले। विद्या भूषण ने तुरंत कल्याण जीआरपी पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत दर्ज कराई। जीआरपी निरक्षक संपत निर्मल ने मामले की जांच शुरु करते हुए एक आरोपी मनीष को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरु कर दी है। दो अन्‍य आरोपियों तथा चेन की तलाश की जा रही है। पत्रकार माणिक तथा मीडिया के लोगों ने मध्य रेलवे जीआरपी के डीसीपी घनशाम भंडारे से मिलकर मामले के अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की। भंडारे ने तुरंत ही अन्य आरोपियों को गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया है। माणिक ने बताया कि आरोपी मनीष एक हॉकर है तथा उसे आरपीएफ निरीक्षक राजेंद्र पांडव का संरक्षण प्राप्‍त है। माणिक ने बताया कि पिछले दिनों कल्याण के अवैध हॉकरों के खिलाफ उन्होंने खबर लिखी थी उसी कारण से उन पर हमला हुआ है।

”पत्रिका निकालने के लिए आपको गैंडा, गिरगिट, बैंगन से बढ़कर होना चाहिए”

गौरव शर्मा नयी दिल्ली के रहने वाले हैं. फेसबुक पर उनके प्रोफाइल के अनुसार वे वर्तमान में क्राइम रिपोर्टर हैं और इससे पूर्व स्वतंत्र पत्रकारिता के अलावा साधना टीवी में काम कर चुके हैं. मैंने जब फेसबुक पर एक छोटी सी टिप्पणी कर मित्रों से पूछा कि “मैं एक हिंदी मासिक पत्रिका निकालना चाह रही हूँ. आपकी राय चाहती हूँ?” तो गौरव जी की एक बड़ी बेबाक, मजेदार और तीखी टिप्पणी आई जिसकी हम सभी पत्रकार साथियों को जानकारी होना जरूरी प्रतीत होता है.

वे कहते हैं- "मैं आपके इस साहस की सराहना करता हूँ, लेकिन ऐसा करने के लिए मना भी करता हूँ. ऐसा नहीं ये मुश्किल काम है, लेकिन आप जैसी महिला के लिए नहीं है. इस काम के लिए जो गुण चाहिए वो आप में नहीं है–

1. आपको मानव रक्त पीना आना चाहिए.
2. बेशर्मी की चमड़ी इतनी मोटी होनी चाहिए कि गैंडा भी आपको सलाम करे.
3. गिरगिट को रंग बदलने का हुनर आपसे सीखना पड़े इतनी जल्दी चेहरे के भाव बदल जाने चाहिए.
4. बैगन की तरह थाली जिधर जाए उधर लुढकने में आप को कोई परहेज़ नहीं होना चाहिए.
5. अहसानफरामोशी आप ऐसे करें कि जैसे ये आप का जन्मसिद्ध अधिकार हो.
6. झपट लेने की क्षमता हो, किसी के घर चाहे रोटी ना हो आप को छप्पनभोग मिलने चाहिए.

आगे आपकी मर्ज़ी, आप जो भी करना चाहें वो कीजिये. अपनी बेबाकी के लिए बदनाम हूँ. माफ़ी चाहता हूँ." क्या अब भी नुझे मासिक पत्रिका निकालने की सोचनी चाहिए?

डॉ. नूतन ठाकुर

स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री

न्‍यू मीडिया पर सेंसरशिप के विरोध में सेव योर वॉयस का लंगड़ा मार्च

इंटरनेट सेंसरशिप के विरोध में देश भर में हो रहे लंगड़ा मार्च की एक छंटा उज्जैन में देखने को मिली. नानाखेडा बस स्टैंड से मुनिनगर चौराहा तक हाथों और पैरों पर प्लास्टर चढ़ाए इंटरनेट लंगड़े जब सड़कों पर निकले तो हर किसी के मन में बस यही सवाल था कि आखिर इतने सारे लोगों को एक साथ क्या हो गया. जिस किसी को भी पता चला कि यह फेसबुक, गूगल और 21 सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सेंसरशिप लगाने के विरोध में किया जा रहा है तो वो भी साथ हो लिया. नानाखेड़ा बस स्टैंड पर तो लोगों का जमावड़ा लग गया.

सेव योर वॉयस कैंपेन के तहत 13 मई को दिल्ली के इंडिया गेट पर एक बड़ा लंगड़ा मार्च निकाला जाएगा, जिसमें देशभर के 50 हजार से भी ज्यादा वेब लंगड़े इकट्ठा होंगे. सेव योर वॉयस की ओर से दिल्ली से आए हुए असीम त्रिवेदी और आलोक दीक्षित ने सेव योर वॉइस कम्पेन के बारे में विस्तृत जानकारी दी और बताया कि सेसरशिप के विरोध में इंडिया गेट से 13 मई को विशाल लंगडा मार्च निकालेंगे और बताएंगे कि सेंसरशिप के बाद ऑनलाइन मीडिया लंगडी हो गई है. इसी कड़ी में अगला मार्च 10 फरवरी को मेरठ में होगा. मार्च में छात्रनेता आदित्य मंडलोई, दिनेश दाहिया, सुनील राठौर, हरीश सिंह भदौरिया, वीर पाल सिंह, आईएसी उज्जैन से सतीश शर्मा, अभिजीत साहू मौजूद थे. मार्च का आयोजन अथक प्रयास के अर्पित गुप्ता और चिराग जोशी ने किया था.

इंडिया टीवी के ‘घमासान लाइव’ में आपस में भिड़े सपा-भाजपा एवं कांग्रेस के समर्थक

इटावा में पांच फरवरी को न्‍यूज चैनल इंडिया टीवी के कार्यक्रम 'घमासान लाइव' में कांग्रेस, सपा व भाजपा समर्थक आपस में भिड़ गए और सचमुच का घमासान शुरू कर दिया. जब तक कोई कुछ समझ पाता तब तक हाथापाई और धक्‍का-मुक्‍की शुरू हो गई. 'घमासान लाइव' कार्यक्रम में कई पार्टी के प्रत्‍याशियों समेत बड़ी संख्‍या में उनके समर्थक भी पहुंचे थे. कार्यक्रम शहर के बीचों-बीच स्थित पक्‍का तालाब पर आयोजित किया गया था, जिसके चलते वहां बड़ी तादात में लोग पहुंचे थे. 

जनपद का एकमात्र उद्योग सूत मिल के बंद हो जाने के मुद्दे पर कांग्रेस प्रत्‍याशी कोमल सिंह कुशवाहा ने समाजवादी पार्टी को दोषी ठहराया. ये बात सपा के कुछ कार्यकर्ताओं को खराब लगी और किसी सपा कार्यकर्ता ने सपा प्रत्‍याशी रघुराज शाक्‍य का पम्‍पलेट कांग्रेस प्रत्‍याशी के ऊपर फेंक दिया. इस बात पर कांग्रेस समर्थक भड़क गए और सपाइयों पर पम्‍पलेट फेंके जाने का आरोप लगाने लगे, लेकिन सपाइयों ने कहा कि यह काम भाजपा कार्यकर्ताओं का है. बस फिर क्‍या था भाजपा प्रत्‍याशी अशोक दुबे समर्थक, कांग्रेस और सपा समर्थक आपस में भिड़ गए. नौबत यहां तक आ पहुंची कि हाथापाई और धक्‍का-मुक्‍की भी होने लगी. एक दूसरे के खिलाफ जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाए जाने लगे. कार्यक्रम में एक समय तो भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई. किसी तरह मामले को बवाल में बदलने से रोका गया. हालांकि इस दौरान बहुजन समाज पार्टी के प्रत्‍याशी एवं समर्थक कहीं नजर नहीं आए.

इटावा से विकास मिश्र की रिपोर्ट.

यूपी में अगली सरकार भाजपा या कांग्रेस की बनेगी : आडवाणी

देवरिया। यूपी में यदि सरकार बनती है तो या तो वह भाजपा की बनेगी या कांग्रेस की। यह भविष्यवाणी भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में की। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार सम्भवतः देश की पहली सरकार है जिसे लगभग प्रत्येक दिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डांट सुननी पड़ती है। भारतीय जनता पार्टी यदि सत्ता में आती है तो भारत वर्ष में स्वराज्य को सुराज बनाकर दिखा देगी। देश में शासन नहीं वरन सुशासन होगा तथा 21 वीं शताब्दी के पूरा होने तक भारत विश्व का नम्बर एक राष्ट्र बन जायेगा। जिला मुख्यालय से करीब 25 कि मी दूर गढ़रामपुर में पूर्व प्रधान मंत्री लाल कृष्ण आडवाड़ी ने कहा कि अयोध्या में राम का मंदिर बनना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे राष्ट्र हित एवं देश हित के बारे में सोचकर वोट दें।

उन्होंने उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के समर्थन में लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि मैनें हिन्दुस्तान की राजनीति में एवं राजनीतिक घटनाक्रम, जो 1947 के बाद से आज तक कल घटित हो रही है, में हिस्सा लेता रहा हूं। लगातार छह यात्रायें की हैं। 1952 से लेकर 2009 तक के चुनाव में पार्टी की कम्पेन के लिए पूरे भारत देश का भ्रमण किया है। मैं भारत वर्ष के लगभग सभी जिलों में घूमा हूं। हिन्दुस्तान को अब तक दुनिया के देशों में पहली पक्ति में पहुंच जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका, जो अत्यन्त दुख का विषय है। उन्होंने कहा कि देश में स्वराज्य आ गया, लेकिन सुराज नहीं आ पाया। जिन लोगों ने देश की आजादी के बाद से भारत का राज सम्भाला वे सुराज नहीं ला सके। देश में शासन आया मगर सुशासन नहीं आया। भारत में गजब का भ्रष्टाचार और बेईमानी कायम हो गया है। उत्तर प्रदेश एवं जिले के बारे में मत सोचिए बल्कि देश के बारे में सोचिए। उन्होंने वादा किया कि यदि भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आती है तो स्वराज्य को सुराज बनाकर दिखाएगी। केवल 22 वर्ष यदि भाजपा को शासन करने का मौका मिलता है तो भाजपा देश का काया कल्प कर देगी।

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

जी24 घंटे से सन्‍नी, भानू एवं किरण कार्यमुक्‍त

जी24 घंटे छत्‍तीसगढ़ से खबर है कि तीन एंकरों को कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. जिन एंकरों कार्यमुक्‍त किया सन्‍नी, भानू और किरण सिंह हैं. इनमें से सन्‍नी, भानू को एंकर हंट के जरिए चुना गया था. किरण सिंह ईटीवी से इस्‍तीफा देकर जी24 से जुड़ी थीं. इन लोगों के कार्यमुक्‍त किए जाने के कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है. तीनों लोग अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

बसपा प्रत्‍याशियों के लिए मुसीबत बनी सत्‍ता की जवाबदेही

बाराबंकी। पिछले विधानसभा चुनाव में बाराबंकी के सपाई दुर्ग को ढहा देने वाली बसपा इस चुनाव में सियासी झंझावतों से घिरी नजर आ रही है। जिले की एक दो सीटों पर यदि उसके मुकाबले को छोड़ दिया जाये तो उसके प्रत्याशियों के लिए अन्य सीटों पर पूरे पांच साल रही सत्ता अथवा उसकी जवाबदेही मुसीबत का रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में यह चुनाव बसपा के लिए अग्निपरीक्षा साबित होते दिखाई दे रहा है।

बसपा सुप्रीमो मुख्यमंत्री ने बाराबंकी मुख्यालय पर भारी भीड़ इकट्ठा कर यह तो दिखा दिया कि आज भी वे अथवा उनका दल जनता में कमजोर नहीं है। लेकिन यदि जिले की आधा दर्जन विधानसभा सीटों के सियासी हालातों पर दृष्टि डाली जाये तो यह स्थिति उभरकर सामने आ रही है कि इस बार बसपा को पुरानी सफलता दोहराने के लिए किसी चमत्कार की प्रतीक्षा है। सत्ता में रही बसपा ने इस बार रामनगर से अपने विधायक अमरेश शुक्ला, कुर्सी से विधायक मीता गौतम, बाराबंकी से राज्यमंत्री संग्राम सिंह वर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है। यही नहीं पूर्व में सिद्धौर से विधानसभा रही व अब समाप्त होकर जैदपुर विधानसभा बनी सीट पर पार्टी ने डा. वेद प्रकाश रावत को अपना प्रत्याशी बनाया है।

ज्ञात हो कि डा. रावत क्षेत्र की विधायक श्रीमती धर्मी रावत के पुत्र हैं। जबकि हैदरगढ़ विधानसभा में संगठन के वरिष्ठ नेता राम नरायन रावत हाथी के निशान से उतारे गये है। वहीं दरियाबाद में पार्टी ने एक बार फिर अपने रनर प्रत्याशी विवेकानंद पाण्डे पर भरोसा जताया है। साफ है कि पार्टी ने पूरा प्रयास किया है कि किसी भी स्तर पर बाराबंकी में पुरानी सफलता को इस बार भी कायम रखना है। लेकिन जो हालात हैं वे बसपा को उसकी मंजिल पर पहुंचायेंगे इसे लेकर बाधाओं के बड़े पहाड़ दिखाये दे रहे हैं?

चर्चा है कि बसपा जहां रामनगर में सपा से सीधे दो-दो हाथ करेगी वहीं विधानसभा दरियाबाद में उसने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। जबकि बसपा के राज्यमंत्री संग्राम सिंह वर्मा बाराबंकी में कांग्रेस व सपा, भाजपा तथा निर्दलीय मुकेश सिंह से घिरकर कड़े मुकाबले में जा फंसे नजर आ रहे हैं। जहां तक सवाल है कि जैदपुर का तो वहां अभी चुनावी युद्ध कांग्रेस और सपा के बीच फंसा नजर आ रहा है। बसपा यहां आगे आने के लिए जद्दोजहद कर रही है। हैदरगढ़ में बसपा पिछले कई चुनावों से नम्बर तीन पर ही रही है यहां पर पार्टी का प्रयास है कि वह मुख्य लड़ाई में आ जाये। फिलहाल बसपाइयों का दावा यही है कि उनकी टक्कर भाजपा से है और वे सफलता से आगे बढ़ रहे है। कुर्सी विधानसभा में बसपा विधायक रही मीता गौतम का चुनाव उनके अपने कर्मों की वजह से ठहराव की ओर नजर आ रहा है। जनता से दूरी और कोई उल्लेखनीय विकास न करवा पाना मीता के लिए परेशानी का सबब सा साबित हो रहा है। दरियाबाद में जरूर विवेकानंद पाण्डे ने कांग्रेस व सपा के साथ बसपा को खड़ा कर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। लेकिन यहां बसपा के लिए भाजपा प्रत्याशी पंडित सुन्दर लाल दीक्षित सिरदर्द बने दिखाई दे रहे हैं।

इस प्रकार साफ है कि बसपा की स्थिति जिले में पिछले चुनाव जैसे होगी इसे लेकर सवालिया निशान है। क्योंकि जनपद में चाहे तराई इलाका हो या फिर चाहे मैदानी इलाका हो अथवा चाहे शहरी क्षेत्र बसपा के पास ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिसे विकास कहके वह चुनाव में जनता के वोट पा सके। जबकि पूर्व में बाराबंकी में बेशकीमती पार्क की जमीन पर बसपा के लोगों का कब्जा करना, स्थानीय एक चीनी मिल को कौड़ियों के दाम बसपा नेता के हाथों बिक जाना पार्टी के लिए मुसीबत बना दिखाई दे रहा है। ऐसे में यह विधानसभा चुनाव सत्ता दल के लिए अग्नि परीक्षा है। इससे वह कैसे उभरेगी यह जाने बसपा अथवा उसके नेता।

बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

हिंदुस्‍तान के फीचर विभाग को मार्केटिंग टीम ने फटकारा

 इन दिनों हिन्दुस्तान दिल्ली में मार्केटिंग के लोगों ने हो हल्ला मचा रखा है।  इन फीचर पन्नों में विज्ञापन निरंतर घटता जा रहा है। खास तौर पर शुक्रवार को छपने वाली महिलाओं की मैगजीन अनोखी का हाल सबसे बुरा है। लेखकों ने इसकी वाट लगा रखी है। मिल रही बहुत सी शिकायतों के चलते प्रबंधन कुछ कड़े कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। आने वाले दिनों में जिम्मेदारियों में भारी बदलाव देखने को मिलेंगे। स्तरहीन कवर स्टोरीज से पाठकों का भी मोहभंग हो रहा है।

खबर है कि एचएमवीएल के सर्वेसर्वा अमित चोपड़ा इन दिनों फीचर पन्नों से बेहद नाराज हैं। इसके संकेत उन्होंने मार्केटिंग टीम के जरिए फीचर टीम तक भी पहुंचा दिए हैं। दरअसल फीचर टीम में कुछ चम्मचों के चलते रंगीन पन्नों की रेटिंग लगातार नीचे आ रही है। कहने को 17 लोगों की टीम फीचर देख रही है परंतु गुणवता की कसौटी में अन्य अखबारों के फीचर की तुलना में 19 ठहरते हैं। फीचर इंचार्ज अपने सथियों से करीब 200 मीटर की दूरी अपने केबिन में बैठती हैं।

फीचर में काम करने वाले 95 प्रशित लोग अपने ड़यूटी समय से 1 बजे की बजाय दोपहर 3 बजे ऑफिस पहुंचते हैं। डेस्क महिला कर्मियों को हाल तो बहुत ही बुरा है। वे ऑफिस में कुल 6 घंटे टिकती हैं। इसमें से भी करीब आधा समय वे फेसबुक में अपने चैट फ्रेंड के साथ व्यस्त रहती हैं। पिछले दिनों प्रधान संपादक ने कुछ महिला कर्मियों को हिदायत दी थी कि पेज मेकिंग सीख लें वरना अंजाम बुरा होगा। परंतु कर्मियों ने एक कान से सुना दूसरे से निकाल दिया।

शायद काम के प्रति इतनी लापरवाही इन दिनों सरकारी दफ्तरों में भी देखने को न मिले। कुछ कर्मी जो ऑफिस आते ही आओ राजनीति नहीं करते अपने काम से काम रखते हैं। उन्हें उपेक्षित रखा जाता है। खाने-पीने का सामान मंगाने पर उन्हें झूठे मुंह ही सही पूछा तक नहीं जाता। विभाग का ऑफिस के कुल समय का बहुत बड़ा हिस्सा खाने-पीने, फेसबुक में, अपनी सीट से नदारद होकर खरीदारी करने में बीतता है। प्रमोशन की बंदरबाट का यह नतीजा है कि चीफ कॉपी एडिटर पर काम कर रहे कुछ कर्मी इंटर्न की तरह काम कर रहे हैं। विभाग में जब से महिला कर्मी बढ़ी हैं हालात बद से बदतर हो गए हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

चुनावी सभा बना जंग का मैदान : बसपा समर्थकों ने कांग्रेस प्रत्‍याशी काजल पर किया हमला

गोरखपुर। बेलीपार के महाबीर छपरा चौराहे के पास दो प्रत्याशियों की चुनावी सभा जंग के मैदान में तब्दील हो गई। टीवी अभिनेत्री और कांग्रेस प्रत्याशी काजल निषाद और बसपा प्रत्याशी रामभुआल निषाद के समर्थकों के बीच जमकर मारपीट हुई। जिसमें काजल निषाद और उनके समर्थकों को चोटें आईं। खून से लथपथ काजल अपने ऊपर हमले के खिलाफ सड़क पर बैठ गईं। आरोप रामभुआल और उनके समर्थकों पर लगाते हुए उनकी गिरफ्तारी की मांग करने लगीं।

उधर, रामभुआल अपने समर्थकों के साथ घटनास्थल से निकल गए। बवाल बढ़ता देख मौके पर पीएसी और पुलिस फोर्स लगा दी

बसपा समर्थकों के हमले में घायल कांग्रेस प्रत्‍याशी काजल निषाद
गई। देर रात काजल निषाद को जिला अस्पताल में भ्‍ार्ती कराया गया। पुलिस और प्रशासन के अफसर भी मौके पर पहुंच गए। गोरखपुर-बनारस मार्ग करीब तीन घंटे जाम रहा। सड़क पर कई किलोमीटर तक गाड़ियों की लंबी लाइन लग गई। करीब 9.30 बजे कार्रवाई का आश्वासन मिलने पर जाम हटा।

रामभुआल निषाद की सभा चल रही थी। इसी बीच शाम को करीब पौने छह बजे काजल निषाद अपने समर्थकों के साथ सभा करने पहुंच गईं। आरोप है कि जब काजल निषाद पहुंची तो रामभुआल की सभा से कुछ पब्लिक काजल की सभा में आने लगी। इससे गुस्साए रामभुआल समर्थकों के बीच कहासुनी हुई और यह कहासुनी मारपीट में बदल गई। महावीर छपरा का सभा स्थल देखते ही देखते जंग के मैदान में बदल गया। दोनों पक्षों के समर्थकों ने जमकर मारपीट की। कई लोग घायल हो गए। मारपीट के बाद रामभुआल वहां से निकल गए जबकि काजल निषाद ककराखोर गांव के पास अपने समर्थकों के साथ गोरखपुर-बनारस हाइवे पर बैठ गई। हमले में काजल निषाद के बाएं हाथ पर चोट लगी। काजल के हाथ से खून बहता देख उसके साथ सैकड़ों महिलाएं भी सड़क पर बैठ गईं। काजल की मांग थी कि रामभुआल पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर तत्काल गिरफ्तार किया जाए। उनकी प्रत्याशिता रद्द कर एसओ बेलीपार को भी हटाया जाए। अफसरों ने मांगों पर त्वरित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।

काजल का आरोप है कि हमले में रामभुआल खुद शामिल थे, उन्होंने अपने भाई मनोज और समर्थकों के साथ मेरे ऊपर हमला किया है। उनकी सभा से भीड़ मेरी सभा में आने पर वे लोग बौखला गए थे। इन लोगों ने हमारे समर्थकों दौड़ा-दौड़ा कर पीटा है, गाड़ियों के शीशे टूट गए हैं। स्थानीय पुलिस भी रामभुआल के समर्थन में थी और उन्हें गाड़ी में लिफ्ट देकर वहां से हटा दिया है। रामभुआल पर मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए। 

हिंदुस्‍तान : पेड न्‍यूज जरा सलीके से

देश में सबसे तेजी से बढ़ने वाले अखबार का दावा करने वाला हिन्दुस्तान अपने पाठकों के साथ किस कदर छलावा, धोखा कर रहा है उसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की कवरेज में देखा जा सकता है। विधानसभा चुनाव के पहले इस अखबार ने आओ राजनीति करें नाम से एक बड़े कैम्पेन की शुरुआत की। अखबार ने पहले पेज पर एक संकल्प छापा कि वह चुनाव को निष्पक्ष तरीके से कवरेज करेगा। लेकिन इस संकल्प की कैसे ऐसी-तैसी हो रही है पाठकों को जरूर जानन चाहिए।

अखबार में एक तरफ यह संकल्प छापा गया तो दूसरी तरफ विज्ञापन विभाग ने उम्मीदवारों से विज्ञापन का पैसा वसूलने की नई तरकीब निकाली। उसने सवा लाख, सवा दो लाख, पांच लाख और छह लाख का एक पैकेज तैयार किया। इसके अनुसार जो उम्मीदवार यह पैकेज स्वीकार कर लेगा उसके विज्ञापन तो क्रमशः छपेंगे ही, नामांकन, जनसम्पर्क आदि में उसकी खबरों को वरीयता दी जाएगी। साथ ही उसका इंटरव्यू छपेगा और अखबार में इन्सर्ट कर उसके पक्ष में पांच हजार पर्चे बांटे जाएंगे। प्रत्याशियों पर इस पैकेज को स्वीकार करने के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से प्रत्याशियों और उनकी खबरें सेंसर की जाने लगीं। जनसम्पर्क, नुक्कड़ सभाएं आदि की खबरें पूरी तरह सेंसर कर दी गई या इस तरह दी जाने लगीं कि उसका कोई मतलब ही न हो। केवल बड़े नेताओं के कवरेज की गई। प्रत्याशियों को विज्ञापन देने पर यह सुविधा भी दी गई कि उनसे भले 90 रुपए प्रति सेंटीमीटर कालम का दर लिया जाएगा लेकिन उसकी रसीद दस रुपया प्रति सेंटीमीटर कालम दिया जाएगा ताकि वह चुनावी खर्च में कम धन का खर्च होना दिखा सकें। इसके अलावा स्ट्रिंगरों को यह लालच दिया गया कि प्रत्याशियों से पैकेज दिलाने में सफल होने पर उन्हें तयशुदा 15 प्रतिशत कमीशन के अलावा अतिरिक्त कमीशन तुरन्त प्रदान किया जाएगा।

इतनी कोशिश के बावजूद प्रत्याशियों ने बहुत कम विज्ञापन हिन्दुस्तान को दिए। पैकेज तो इक्का-दुक्का लोगों ने ही स्वीकार किए। इसके पीछे कारण यह था कि प्रत्याशी चुनाव आयोग के डंडे से बहुत डरे हुए हैं। एक दूसरा कारण यह भी है कि उन्हें अखबार में विज्ञापन छपने से कुछ ज्यादा फायदा न होने की बात ठीक से मालूम हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखा है कि लाखों रुपए खर्च कर रोज विज्ञापन देने वाले प्रत्याशियों को भी बहुत कम वोट मिले और जिनके बारे में अखबारों में न खबर छपी न विज्ञापन वे बहुत वोट पाए और कई तो चुनाव भी जीत गए। चुनाव में करोडों की वसूली का सपना देखने वाले हिन्दुस्तान का मंसूबा जब पूरी तरह ध्वस्त हो गया तो उसने एक हैरतअंगेज काम कर डाला। शनिवार के अंक में उसने एक खबर प्रमुखता से प्रकाशित की। यह खबर कथित सर्वे के आधार पर थी। इसमें कहा गया था कि 35 फीसदी मतदाता अपने प्रत्याशियों को नहीं जानते। यह पूरी तरह अखबार द्वारा प्रायोजित खबर थी। एक जिले में 200 लोगों को फोन कर यह सर्वे कर लिया गया। अब आप ही अंदाजा लगाइए कि अमूमन एक विधानसभा क्षेत्र में तीन लाख से अधिक वोटर होते हैं। ऐसे में कथित रूप से 200 लोगों से फोन पर बात कर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि वोटर अपने प्रत्याशियों को नहीं जानते कितना उचित है। लेकिन हिन्दुस्तान अखबार ने ऐसा किया। इसके पीछे उसका मकसद प्रत्याशियों में यह संदेश देना था कि उनके बारे में मतदाताओं को पता नहीं है इसलिए उन्हें खूब विज्ञापन देना चाहिए।

लगता नहीं कि हिन्दुस्तान की इस गंदी हरकत के प्रभाव में कोई प्रत्याशी आने वाला है। पूरे चुनाव में हिन्दुस्तान ने ऐसी कई प्रायोजित खबरें छापीं जिनका मकसद प्रत्याशियों को विज्ञापन और पेड न्यूज के लिए उकसाना था। बसपा और मायावती के दो पेज के दो बड़े खबरनुमा विज्ञापन छापना एक तरह का पेड न्यूज ही तो था। इस दो पेज के कथित विज्ञापन में कहीं नहीं लिखा था कि यह किसके द्वारा जारी किया गया है। इसके उपर दाहिने कोने पर मीडिया मार्केटिंग इनिशिएटिव लिखा गया था। शशि शेखर और उनकी मंडली से इस बारे में सवाल है कि क्या हिन्दी अखबार का पाठक इतना सचेत और जागरूक हैं जो उनके इस खबरनुमा विज्ञापन को विज्ञापन ही समझेगा?

एक सवाल और- पूरे चुनावी कवरेज में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सभाओं की फोटो एक खास एंगिल से क्यों खींची गई और इसे ही क्यों छापा गया जिससे दोनों की सभाओं में अपार भीड़ दिखाई देती है। कोई भी पाठक हिन्दुस्तान के किसी भी एडिशन के अंक में यह कलाबाजी देख सकता है। क्या यह पेड न्यूज नहीं है? सवाल और भी हैं। आओ राजनीति करे के पीछे के सच क्या है, जल्द ही इसका भी पर्दाफाश होगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सार्क देशों में भी अपने चैनल लांच करेगा आरबीएनएल

नई दिल्ली : रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क (आरबीएनएल) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की योजना के तहत शुरुआत में सार्क क्षेत्र में विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर रही है। यहां वह अमेरिकी सीबीएस स्टूडियोज के साथ अपने संयुक्त उद्यम के जरिए तीन चैनलों का प्रसारण शुरू करेगी। यह संयुक्त उद्यम बिग सीबीएस नेटव‌र्क्स पहले ही श्रीलंका में कदम रख चुका है जहां तीन चैनल बिग सीबीएस प्राइम, बिग सीबीएस लव और बिग सीबीएस स्पार्क लांच किए गए हैं।

बिग सीबीएस नेटव‌र्क्स के कारोबार प्रमुख विशाल रैली ने कहा कि हम पूरे सार्क क्षेत्र में सभी प्लेटफार्म लांच करने के लिए समझौता करने के करीब हैं। इनमें नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। श्रीलंका में तीन चैनलों का वितरण वहां के सबसे बड़े केबल ऑपरेटर लंका ब्रॉडकास्ट नेटवर्क द्वारा किया जा रहा है। रैली ने कहा कि बिग सीबीएस चैनलों को एक फिक्स्ड लाइसेंस शुल्क मॉडल पर लांच किया जाएगा जिससे बाजार से नियमित आय की प्राप्ति सुनिश्चित हो सकेगी।

काटजू से सीखें बरखा, प्रभु, सागरिका, पंकज और राजदीप

वाईके शीतल उर्फ योगेश कुमार शीतल इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्यूनिकेशन (आईआईएमसी) जैसे संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़कर जब सक्रिय मीडिया जीवन में कूदे तो इन्हें जो दिखाई पड़ा और उसको लेकर जो स्वाभाविक रिएक्शन दिया, उसके बाद वे सफल संपादक बनने की जगह मीडिया एक्टिविस्ट बनने की तरफ खुद ब खुद बढ़ चले. गलत के खिलाफ बेबाकी से बोलने व लिखने की अपनी आदत के चलते यह युवा पत्रकार कई स्वनामधन्य संपादकों की आंखों की किरकिरी बन गया. बरखा दत्त जब करप्शन के मुद्दे पर इंडिया गेट पर प्रोग्राम कर रहीं थीं तो इस युवा पत्रकार ने उनसे उनके नीरा राडिया के संबंधों के बारे में पूछकर उनके खुद के भ्रष्टाचार पर सवाल उठा दिया. उसके बाद तो बवाल मच गया.

शीतल को तरह तरह से प्रताड़ित करने की कोशिश की गई. शीतल इन दिनों फेसबुक व ट्विटर के जरिए मीडिया के डेमोक्रेटाइजेशन की मुहिम चला रहे हैं. उन्होंने जस्टिस मार्कंडेय काटजू को ट्विटर पर आने को प्रेरित किया. शीतल ने चुनाव आयोग को ट्विटर-फेसबुक पर आने के लिए अभियान चला रखा है ताकि लोग चुनाव में मीडिया के पेड न्यूज के खिलाफ चुनाव आयोग से सीधे शिकायत कर सकें. डेमोक्रेसी और मीडिया के भले के लिए काम कर रहे इस युवा पत्रकार व एक्टिविस्ट को इन दिनों एक बड़ी कड़वी सच्चाई से रुबरु होना पड़ रहा है. कई महान संपादकों ने शीतल को ट्विटर पर उन्हें फालो करने से रोक दिया है. ब्लाक कर दिया है.

जाहिर है, शीतल के कड़वे सवालों से ये संपादक रुबरु नहीं होना चाहते होंगे इसलिए अच्छा समझा कि वे सामने वाले को ब्लाक कर दें ताकि उसकी बात उन्हें सुनाई ही नहीं पड़े. न्यू मीडिया ने ब्लाक करने की सुविधा दी है, और ये संपादक लोग इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं. तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए. ये सवाल सही है. लेकिन जरा सोचिए जो लोग अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं, इसी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्थापित मीडिया के पक्ष में लिखते बोलते दिखते रहते हैं, वे ही लोग किसी दूसरे की आवाज खुद तक आने को इसलिए ब्लाक कर देते हैं इसलिए रोक देते हैं क्योंकि इससे उन्हें असुविधा होती है, इससे उन्हें सवालों के घेरे में आना पड़ता है. कम से कम इन संपादकों में स्वस्थ आलोचना करने वालों को बर्दाश्त करने का धैर्य होना ही चाहिए. अगर नहीं है तो ये लोग थोड़ा जस्टिस मार्कंडेय काटजू से सबक लें.

काटजू साहब अभी कुछ ही दिनों पहले ट्विटर पर आए और उन्होंने खुला ऐलान कर दिया कि लोग आएं और उनकी आलोचना करें, उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं. उन्होंने बाकायदा ऐसा ट्विट किया है. जस्टिस काटजू कोई संपादक नहीं है. कोई पत्रकार नहीं रहे हैं. लेकिन वे अभिव्यक्ति की आजादी के पुरजोर पक्षधर हैं और इसीलिए अपनी आलोचना करने वालों से घबराते नहीं बल्कि उनसे तार्किक तरीके से बात बहस करते हैं. ट्विटर पर जस्टिस काटजू ने कई पत्रकारों को उनके लिखे पर अपना जवाब लिखकर सोचने को मजबूर कर दिया. राजदीप सरदेसाई को तो बाकायदे माफी मांगनी पड़ गई. पर क्या ये राजदीप सरदेसाई, पंकज पचौरी, प्रभु चावला, बरखा दत्त, सागरिक जैसे लोग काटजू से सबक सीख सकते हैं जो ट्विटर पर सभी को आने व उनकी आलोचना करने को आमंत्रित करते हैं पर दूसरी तरफ ये महान संपादक शीतल जैसे मीडिया एक्टिविस्ट की आवाज सुनना नहीं पसंद करते हैं इसलिए उसे फालो करने से रोक देते हैं, ब्लाक कर देते हैं. इस उलटबांसी के निहितार्थ अगर समझ सकें तो समझ लेंगे कि इस देश में मीडिया में डेमोक्रेसी का आलम क्या है.

जस्टिस मार्कंडेय काटजू से मीडिया के ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बात रखते युवा पत्रकार वाईके शीतल.

वाईके शीतल इस पूरे मसले पर किस तरह सोचते हैं, उसे आप उनके ब्लाग के एक पोस्ट के जरिए जान सकते हैं जिसमें उन्होंने लिखा कुछ नहीं है, सिर्फ ट्विटर के स्क्रीनशाट डाले हैं और तस्वीरें डाली हैं. Fact of Article 19(A) नामक शीर्षक वाली यह पोस्ट बहुतों को आइना दिखाने और उन्हें शर्मसार करने के लिए काफी है, बशर्ते उनकी देह में अब भी शर्म और आंखों में पानी बाकी हो. चलो, मान लेते हैं कि कारपोरेट बनते मीडिया हाउसों में नौकरी करने की ढेरों मजबूरियां होती हैं, लेकिन किस मालिक ने अपने संपादक को निर्देश दिया है कि वाईके शीतल को ट्विटर पर फालो किए जाने से रोक दिया जाए. है किसी के पास कोई जवाब? 

कुछ स्क्रीनशाट यहां दिए जा रहे हैं जिससे पता चलता है कि वाईके शीतल ने जब इन दिग्गजों को फालो करने की कोशिश की तो इन संपादकों ने उन्हें फालो करने से रोक दिया, जिसके बाद ट्विटर की तरफ से वाईके शीतल को मैसेज दिखाया गया कि आप इन्हें फालो नहीं कर सकते क्योंकि इन्होंने आपको ब्लाक कर दिया है….


और ये है काटजू साहब का ट्विट जिसमें उन्होंने सबको आने, और उन्हें गरियाने का खुला निमंत्रण दिया है….


पल्लवी घोष को कैसा करारा जवाब दिया है जस्टिस काटजू ने, इस स्क्रीनशाट के जरिए देख पढ़ सकते हैं…


जस्टिस काटजू पर एक सज्जन कुछ इस अंदाज में सवाल उठाया, व्यंग्य किया तो जस्टिस काटजू ने उनका भी जवाब दिया, अपने तरीके से…


राजदीप सरदेसाई ने कुछ कहा, लोगों ने काटजू की तरफ ध्यान दिलाया तो काटजू ने शालीनता से जवाब दिया, फिर राजदीप ने माफी मांग ली…


भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट.

आई-नेक्स्ट के सीओओ व एडिटर आलोक सांवल का प्रवचन-गायन सुनें

आलोक सांवल ने बहुत कम समय में राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया में अपनी जगह बनाई है. 39 वर्षीय आलोक सांवल जागरण समूह की ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने देखते ही देखते आई-नेक्स्ट नामक दैनिक जागरण के बच्चा अखबार को राष्ट्रीय स्तर पर न सिर्फ प्रतिष्ठित कर दिया बल्कि हिंदी में टैबलायड और बाइलिंगुवल के प्रयोग को सफलता भी दिला दी. देश के कई प्रदेशों व कई शहरों से प्रकाशित होने वाला आई-नेक्स्ट अब नोएडा में दस्तक देने वाला है. पिछले दिनों इसी अभियान में आलोक सांवल दिल्ली-एनसीआर की यात्रा पर थे.

इसी क्रम में उन्हें वरदान टीवी के मैनेजिंग डायरेक्टर आचार्य रामगोपाल शुक्ला ने अपने चैनल में आकर अध्यात्म को लेकर एक साक्षात्कार देने का अनुरोध किया. वरदान चैनल को लांच कराने वाले आचार्य शुक्ला ने कई नए प्रयोग किए हैं. वे इस चैनल में ऐसे युवाओं का इंटरव्यू बिलकुल निःशुल्क प्रसारित करते हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी में एक मुकाम हासिल किया हो और जो अध्यात्म को लेकर अपना एक खास किस्म का दर्शन रखते हों. शून्य से शिखर और वरदान मंच जैसे कार्यक्रम इसी मकसद के लिए होते हैं. इन्हीं कार्यक्रम के लिए आलोक सांवल का इंटरव्यू रिकार्ड हुआ और आज सुबह आठ बजे प्रसारित भी हुआ जिसे वरदान की वेबसाइट पर भी लाइव देखा गया.

जिन लोगों ने यह इंटरव्यू नहीं देखा, उनके लिए भड़ास पर इंटरव्यू का पूरा वीडियो उपलब्ध कराया जा रहा है. अध्यात्म को लेकर जब कोई बातें कहता है तो एक झटके में वह प्रवचन देते हुए ही लगता है. और, जब प्रवचन हो तो गायन हो ही जाता है. आलोक सांवल की शख्सियत के दूसरे पहलू को आप इस इंटरव्यू के जरिए जान सकते हैं. इन वीडियो लिंक पर क्लिक करें…


इंटरव्यू पार्ट एक

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/572/–interview-a-personality/vardaan-munch-alok-sanwal-part-amp4.html


इंटरव्यू पार्ट दो

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/571/–interview-a-personality/vardaan-munch-alok-sanwal-part-bmp4.html