युवा पत्रकार सुनील पाठक के निधन पर फैजाबाद में शोकसभा का आयोजन

फैजाबाद के युवा पत्रकार सुनील पाठक के असामयिक देहांत पर दैनिक समाचार पत्र ''स्पष्ट आवाज़'' के ब्यूरो कार्यालय में पत्रकारों व समाज सेवियों ने एक शोक सभा का आयोजन किया. इसमें दिवंगत पत्रकार की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखा गया. बैठक की अध्यक्षता ब्यूरो चीफ कुंवर समीर शाही ने की. उन्होंने कहा कि श्री पाठक के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. उन्होंने अपनी कम उम्र में भी ये साबित कर दिया कि अगर ज़ज्बा हो तो कुछ भी असम्भव नही हैं. उन्होंने जीवन भर गरीब वंचितों के हितों की लड़ाई लड़ी.

पत्रकार प्रमोद कुमार पाण्डेय ने कहा कि श्री पाठक की कमी जीवन भर महसूस होती रहेगी. पत्रकार विवेकानंद पाण्डेय ने कहा कि उन्होंने आधुनिक पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है. समाधान सोशल डेवलपमेंट सोसायटी की अध्यक्षा कामिनी सिंह ने कहा कि स्थानीय पत्रकारिता व सामाजिक मुद्दों को लेकर श्री पाठक बहुत सजग रहे. आने वाली पीढ़ी को उनसे सीख लेने की जरूरत है. जीसस क्राइस्ट एजुकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष राकेश यादव ने कहा कि श्री पाठक ने पत्रकारिता को एक नई दिशा देने का काम किया है. बैठक में पीयूष कुमार सिंह, राजन दादा, सुरजीत वर्मा, अभिषेक शुक्ल, संजय श्रीवास्तव, धीरज श्रीवास्तव, आदित्य मोहन अग्रहरी, विकाश कसौधन, सत्य प्रकाश मिश्र, राम प्रकाश मिश्र, दुर्गेश कुमार, बिरेन्द्र सिंह आदि लोग शामिल रहे.

फैजाबाद से कुंवर समीर शाही की रिपोर्ट.

इस चुनाव में मायावी गुरूर ही नहीं, कई मिथक भी टूटे

देश की लोकतांत्रिक राजनीति में व्यक्ति से लेकर जाति और धर्म तक के कई मिथक पहले चुनाव से ही गढ़ लिये गये थे और वे थोड़े बहुत रद्दो-बदल के साथ हर चुनाव में अपना असर दिखाते रहे लेकिन संतोष की बात है कि उत्तर प्रदेश में सम्पन्न हुआ विधानसभा का यह चुनाव छोटे-बड़े कई मिथक तोड़ गया है। जिन्हें यह घमंड था कि वे किसी जाति विशेष के लिए खुदा का दर्जा रखते हैं, उनकी खुदाई टूट गयी और जिन्हें यह भ्रम था कि वे खुदा को गढ़ने का हुनर जानते हैं, वे अपने लिए रास्ता तक नहीं तलाश पा रहे हैं।

कई राजपुरुष जो इस मुगालते में थे कि वे तो मतदाताओं के सपनों में तैरते रहते  हैं, उन्हें अब जाकर इल्हाम हुआ कि वे सपने दिखा नहीं रहे थे बल्कि खुद ही देख रहे थे। शायद यही कारण है कि चुनाव नतीजे आने के बाद प्रदेश के मतदाता वह सुकून महसूस कर रहे हैं जो कीचड़ में फॅंसी गाड़ी को जी-जान से ढ़केलकर बाहर निकाल लेने के बाद गाड़ीवान को महसूस होता है। यह चुनाव नतीजा सबक है कि लोकतंत्र में राजनीतिक भूमिका अदा करने वाला महज धूल सरीखा होता है जो सर पर भी जा सकती है और वक्त आने पर वापस जमीन पर भी।

बसपा प्रमुख सुश्री मायावती का यह गुरुर टूटा कि उनकी इच्छा ही जनमत है। स्व. कांशीराम ने जब बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था तो उस वक्त उनके कई साथी-सहयोगी थे जिनके राय-मशविरे की कद्र वे किया करते थे और वे सबके सब दलित या पिछड़े वर्ग से ही थे। बसपा का जो दिन दूना, रात चैगुना विस्तार हुआ, वह कांशीराम की सनक या तानाशाही के चलते नही बल्कि उन कार्यकर्ताओं की वजह से हुआ जो प्राण-प्रण से संगठन के साथ लगे हुए थे।

कांशीराम पर काबू पाने के बाद सुश्री मायावती ने बड़े ही सुनियोजित और लक्षित ढ़ॅंग से एक-एक कर इन समर्पित दलित नेताओं-चिंतकों को निकाल बाहर करना शुरु किया। सर्वश्री राजबहादुर, रामसमुझ, बलिहारी बाबू, रामाधीन, आर.के. चैधरी, जंगबहादुर पटेल, राशिद अल्वी, मेवालाल बागी, राम खेलावन पासी, कालीचरण सोनकर आदि ऐसे जाने कितने नाम हैं जिन्हें सुश्री मायावती ने इसलिए पार्टी से निकाल दिया कि इन दलित नेताओं का कद इतना ऊॅचा न हो जाय कि वे उनके लिए चैलेन्ज बन जॉंय! जानिये कि बसपा का प्रदेश अध्यक्ष तक दलित नहीं है!

यह अनायास नहीं है कि आज मायावती के इर्द-गिर्द रहने वाले तथा उनके दाहिने-बॉये हाथ के तौर पर जो भी हैं उनमें से कोई भी दलित नहीं है। हम सतीशचंद्र मिश्र का नाम जानते हैं, नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम जानते हैं, स्वामीनाथ मौर्य का नाम जानते हैं, बाबूसिंह कुशवाहा को कौन नहीं जानता लेकिन इन्हीं के टक्कर के किसी भी दलित नेता का नाम हम नहीं जानते।

आज सुश्री मायावती यह आरोप लगा रही हैं कि भाजपा और कॉग्रेस के ठीक से न लड़ने का लाभ सपा को मिला लेकिन तब क्या यही तर्क 2007 के विधानसभा चुनाव के लिये नहीं दिया जाना चाहिए जब उन्हें (यानी बसपा को) ऐसी ही सफलता मिल गयी थी। आज सपा को अगर प्रतिक्रियात्मक वोटों का लाभ मिला बताया जा रहा है तो क्या तब इसी तरह का लाभ बसपा को मिला हुआ नहीं माना जाना चाहिए? काहे का सर्वजन समाज? दलित आज भी निःसंदेह बसपा के साथ हैं लेकिन यह उनकी मजबूरी है, बहन मायावती की खुदाई नहीं। उन्हें जानना चाहिए कि आसमान के सभी सितारे अगर मर जायेंगें, तो चॉद भी नहीं बचेगा।

भाजपा के नेताओं को इल्हाम हो गया था कि वे खुदा गढ़ने की कला जानते हैं। अपने बगलबच्चे विहिप की अयोध्या, वाराणसी और जयपुर में मंदिर के पत्थर तराशने की कार्यशालाओं की बदौलत उन्हें लगता था कि जब वे काशी-मथुरा और बनारस में भगवान को पुनर्जन्म देने का हुनर जानते हैं तो भगवान को मानने वाले मतदाता उन्हें छोड़कर कैसे जा सकते हैं! अपने भगवान को भी कोई छोड़ सकता है भला! उन्हें आज भी यह यकीन नहीं आ रहा है कि सन् 1984 से उन्होंने अयोध्या के नाम पर कोई आंदोलन नहीं बल्कि एक मेला बटोरना शुरु किया था जो 1991 में जब अपने उरुज पर आया तो उ.प्र. विधानसभा की 221 सीटों की शक्ल में बदल गया था। मेले कुछ समय बाद छॅंट जाते हैं। यह मेला भी लगातार छॅटता जा रहा है। आगे जाकर यह कहॉ पर थमेगा, इसे भाजपा के नेता ही बेहतर जानते होंगें। आखिर देश में बहुत सी राजनीतिक पार्टियॉ खत्म भी हो चुकी हैं।

शीर्ष स्तर पर इस पार्टी में कैसा दिग्भ्रम है इसकी बानगी देखिये कि विधानसभा क्षेत्र अयोध्या की अपनी चुनावी सभा में श्री लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि अयोध्या में मंदिर निर्माण उनके जीवन का लक्ष्य है लेकिन उसी के अगले दिन बलिया की अपनी चुनावी सभा में श्री गड़करी ने कहा कि मंदिर निर्माण उनके एजंडे में ही नहीं है! इनकी आत्म-मुग्धता देखिए कि ये अपनी अच्छाइयों की बदौलत नहीं, सत्तारुढ़ बसपा की बुराइयों के फलस्वरुप सत्ता पाने का ख्चाब देख रहे थे मानों सत्ता पाने के लिए कोई लाइन लगी हो कि इस बार तो मेरा नम्बर है ही!

वर्ष 1991 में भाजपा ने अयोध्या सीट जीती थी। तब से लगातार वह इस पर काबिज थी। इस दौरान वह वहॉ की संसदीय सीट जीती और हारी भी लेकिन विधानसभा सीट पर बरकरार रही। इस बार सपा वह सीट भी ले गई! अयोध्या सीट को भाजपा हिन्दुत्व और मंदिर आंदोलन की आन-बान-शान का प्रतीक बताती रही है। यह मिथक भी टूटा। राजधानी लखनऊ की सीटों को भाजपा श्री अटल बिहारी बाजपेयी की जागीर बताते थकती नहीं थी। वहॉ श्री कलराज मिश्र किसी तरह अपनी सीट निकाल ले गये हैं, बाकी सब गया। बाजपेयी के स्वयंभू वारिस लालजी टंडन अपने बड़बोले बेटे तक को नही जिता सके।

सोनिया गॉधी की निजी स्टार प्रचारक प्रियंका गॉधी जब उनके संसदीय इलाके रायबरेली में अपने जलवे बिखेर रही थीं तो भाजपा के एक नेता ने उन्हें बरसाती मेढ़क कहा जिस पर सुश्री प्रियंका ने गर्वोक्ति करते हुए कहा था कि हॉ वे हैं बरसाती मेंढक। विपक्षियों के वार को जिस अहिंसक अदा से उन्होंने झटक दिया था वो देव-दुलर्भ था। ‘विपस्यना’ की साधिका प्रियंका के मन में यह आत्मविश्वास संभवतः कहीं गहरे और जन्मजात बैठा हुआ था कि देवी-देवता रोज कहॉ दर्शन देते हैं लेकिन जब देते हैं तो भक्त सुध-बुध खो बैठते हैं। यह घटना आने वाले दिनों में शोध का विषय होनी चाहिए कि सुश्री के दर्शन की ताब कम हो गयी या भक्त ही बे-मुरौव्वत हो चले। शायद ऐसी ही जमीन पर ‘फैज’ कभी लिखे रहे होंगें -‘‘…तेरे दस्ते-सितम का इज़्ज़ नहीं, दिल ही काफ़िर था जिसने आह न की।’’

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कॉग्रेस को 22 सीटें मिल गई थीं। उस आधार पर राजनीतिक प्रेक्षकों का अनुमान था कि इन सीटों के तहत आने वाली विधान सभा सीटें भी कॉग्रेस को मिल ही जाऐगीं। उधर कॉग्रेस के नीति-नियंता भी आरक्षण के नाम पर एक को खाली बन्दूक तो दूसरे को कारतूस पकड़ाकर यह सोच रहे थे कि चलो कुछ न कुछ तो सबको दे ही दिया। असल में किसी के चतुर होने में कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तब होती है जब वह बाकी सबको मूर्ख समझने लगे। जिन सीटों पर कॉग्रेसी सांसद जीते थे, जरा उनकी पड़ताल कर ली गई होती कि किन चुनावी समीकरणों के चलते वे जीत गये थे तो शायद 100 सीट पाने की कॉग्रेसी आकांक्षा जरा थम गयी होती और इतना सदमा न लगता।

लेखक सुनील अमर लखनऊ में रहते हैं. लगभग 20 साल तक कई पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी करने के बाद पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. कृषि, शिक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा महिला सशक्तिकरण व राजनीतिक विश्लेषण जैसे विषयों से इन्हें लगाव है. देश के सभी प्रमुख हिंदी अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं व दो फीचर एजेंसियों में नियमित लेखन करते हैं. इनका लिखा उर्दू व मराठी में अनुदित होकर भी छपता है. पत्रकारिता के ही सिलसिले में ये अन्य राज्यों का भी भ्रमण करते रहते हैं. सुनील अमर से संपर्क 09235728753 के जरिए किया जा सकता है. सुनील के लिखे अन्य आलेख इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं… भड़ास पर सुनील अमर

जटा का काला सच (एक) : अज्ञात स्रोतों से मिले धन से चल रहा अखबार!

एचआरएचएम घोटाले के आरोपी पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के वरदहस्त व सौरभ जैन (फ़िलहाल दोनों जेल में) के स्वामित्व से उत्पन्न जनसंदेश टाइम्स हिंदी दैनिक का खर्च आज भी अज्ञात स्रोतों से प्राप्त धन से ही चल रहा है. जनसंदेश टाइम्स के वर्तमान एमड़ी अनुज पोद्दार तो केवल बाबू सिंह कुशवाहा के प्यादे मात्र हैं. इसीलिए आज भी अख़बार का खर्च अज्ञात स्रोतों (बाबू सिंह कुशवाहा से प्राप्त धन) से चल रहा है. इस स्रोत को लीगल जामा पहनाने के लिए लखनऊ में तीस हजार कापी की एक फर्जी एजेंसी चलाई जा रही है. इस फर्जी प्रसार एजेंसी से प्राप्त धन से अख़बार के खर्चे चलाए जा रहे हैं जबकि इस एजेंसी का कहीं कोई वजूद नहीं है.

लखनऊ की वास्तविक सेल दो हजार से भी कम है जो शुक्ला न्यूज़ एजेंसी (महेश शुक्ला) द्वारा संचालित होती है. इसका पूरा लेखा-जोखा महेश शुक्ला से प्राप्त किया जा सकता है परन्तु तीस हजार कापी की इस फर्जी एजेंसी का कोई भी रिकार्ड कहीं भी उपलब्ध नहीं है. वैसे इस एजेंसी का नाम भी शुक्ला न्यूज़ एजेंसी (U.P.C.) है. इन्ही सब घालमेल के कारण लखनऊ शहर की एजेंसी भी बदली गई थी. पुराने एजेंट राकेश सिंह की जमानत धनराशि भी केवल इसलिए वापस नहीं की जा रही है जिससे उसकी पूंछ दबी होने से वह कोई राज न उजागर कर दे.

जनसंदेश टाइम्स लखनऊ की शुरुआत 8 फरवरी 2011 को हुई थी. तब इसके संपादक सुभाष राय व एमड़ी सौरभ जैन हुआ करते थे परन्तु CBI के फंदे में फंसने पर सौरभ जैन के स्थान पर अनुज पोद्दार को एम.ड़ी. बना दिया गया जिसने फरवरी से दिसम्बर 2011 तक का सारा हिसाब-किताब आफिस के कम्प्यूटरों से हटवा दिया है. यहाँ तक कि किसी भी प्रसार एजेंसी का कोई भी रिकार्ड  उपलब्ध नहीं है. एजेंटो द्वारा जमा की गई जमानत राशि का भी कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है. जमानत राशि वापस मांगने वाले एजेंटों को लगातार टरकाया जा रहा है.
 
जब बाबू सिंह कुशवाहा बसपा में थे तब यह अख़बार मायावती व उनकी सरकार का भोंपू हुआ करता था परन्तु कुशवाहा के बसपा से हटते ही इसका टार्गेट नसीमुद्दीन सिद्दीकी हो गए क्योंकि कुशवाहा गुट का मानना है कि मायावती और बाबू सिंह कुशवाहा के बीच जो कुछ भी हुआ उसका कारण केवल नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही थे. चुनाव से ऐन पहले प्रिंट लाइन में संपादक सुभाष राय के स्थान पर पूर्व सूचना आयुक्त ज्ञानेंद्र शर्मा व प्रिंटर / पब्लिशर सौरभ जैन के स्थान पर अनुज पोद्दार का नाम जाना भी एक रणनीति का हिस्सा था. क्योंकि चुनाव बाद समाजवादी पार्टी की सरकार बनने की आहट के कारण ही ज्ञानेंद्र शर्मा को संपादक बनाने के लिए सुभाष राय को हटने के लिए मजबूर किया गया था. अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने वाले सुभाष राय ने एम. ड़ी. अनुज पोद्दार के हाथ की कठपुतली बनने से इंकार कर दिया था, जबकि ज्ञानेंद्र शर्मा और समाजवादी पार्टी के मुखिया के सम्बन्ध जगजाहिर हैं.

पिछले एक वर्ष तक समाजवादी पार्टी को पानी पी-पीकर कोसने वाला जनसंदेश टाइम्स अब गिरगिट की तरह अपना रंग बदलता हुआ समाजवादी पार्टी का गुणगान करने में जुट गया है. एक चालाक व्यापारी की तरह अनुज पोद्दार भी अपनी एक उंगली कटा कर शहीदों में अपना नाम लिखाना चाहते हैं. इसीलिए समाजवादी पार्टी को साधने के लिए संपादक ज्ञानेंद्र शर्मा से लेकर सहायक विज्ञापन प्रबंधक सुश्री प्रज्ञा सिंह को लगा दिया है. गोरखपुर के स्थानीय संपादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी को भी इस मुहिम में जोड़ा गया है. यह भी निश्चित है कि यदि समाजवादी पार्टी की सरकार को साधने में ये लोग विफल रहते हैं तो जल्द ही इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जायगा.

समाजवादी पार्टी की सरकार को साधने का प्रमुख कारण सरकारी विज्ञापन दरों को बढवाने के साथ अनुज पोद्दार को अपने व्यक्तिगत व्यवसाय के लिए अन्य सुविधाएँ प्राप्त करना है. घोटालों की कोख से उत्पन्न जनसंदेश टाइम्स का भविष्य बाबू सिंह कुशवाहा के साथ-साथ प्रदेश सरकार के रुख से भी जुडा हुआ है. बाबू सिंह कुशवाहा के प्यादे एम. ड़ी. अनुज पोद्दार क्या गुल खिला पाते हैं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा परन्तु पत्रकारिता के आड़ में चल रहा जनसंदेश टाइम्स का यह खेल चौथे स्तम्भ की गरिमा को कितना नीचे गिरा रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

भड़ास4मीडिया को मिले एक पत्र और पत्र में दिए गए तथ्यों की तफ्तीश पर आधारित. अगर किसी को उपरोक्त बातों में कमी बेसी नजर आए तो वह नीचे दिए गए कमेंट बाक्स या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल करके प्रतिवाद कर सकता है.

उदय सिन्हा की चैनल वन में वापसी, जाह्नवी समंत को मिडडे में नई जिम्मेदारी

खबर है कि चैनल वन में मैनेजिंग एडिटर के रूप में वरिष्ठ पत्रकार उदय सिन्हा ने वापसी कर ली है. उनके साथ उनकी पूरी टीम भी लौट आई है. बताया जाता है कि प्रबंधन से अनबन के बाद उदय सिन्हा ने आफिस आना बंद कर दिया था. उनके जाने के बाद कई अन्य लोगों ने संस्थान छोड़ दिया. फिर रहमतुल्लाह और विपिन धूलिया ने ज्वाइन किया. अब सूचना मिली है कि प्रबंधन ने उदय सिन्हा से बातचीत कर मतभेदों को खत्म कर लिया और उन्हें वापस आकर काम संभालने का अनुरोध किया. उदय सिन्हा ने अपनी टीम के साथ वापसी कर ली है. अब चैनल वन फिर से नए फार्म में सक्रिय होगा, ऐसा बताया जा रहा है. रहमतुल्लाह और विपिन धूलिया भी चैनल के साथ बने हुए हैं.

एक अन्य जानकारी के मुताबिक मिडडे अखबार में जाह्नवी समंत को इंटरटेनमेंट एडिटर की जिम्मेदारी दी गई है. वे मिडडे में हिटलिस्ट सेक्शन की प्रभारी होंगी. वे सीधे सचिन कालबाग को रिपोर्ट करेंगी. जाह्नवी से पहले यह काम शुभा शैट्टी सहा देख रही थीं. जाह्नवी ने मिडडे में ट्रेनी के रूप में बारह साल पहले करियर शुरू किया था. बीच में वे बांबे टाइम्स और एचटी में रहीं, फिर मिडडे लौट आईं.

अगर रिहा नहीं किए गए काजमी तो 26 मार्च को घेर लिया जाएगा संसद

बाराबंकी। पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की इजरायल खुफिया एजेन्सी से मिली भगत का दावा कर दिल्ली पुलिस द्वारा की गयी गिरफ्तारी का गुस्सा देश के कोने-कोने में फैल रहा है। आज जिले में लेखक, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और हक पसन्दों की गुलाम असकरी हाल में आयोजित हगामी जनसभा इमाम-ए-जुमा मौलाना रजा जैदपुरी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इस अवसर पर वक्ताओं ने दिल्ली पुलिस की कड़े शब्दों में निन्दा कर तत्काल पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की रिहाई की मांग की।

देवां रोड स्थित असकरी नगर के गुलाम असकरी हाल में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में हर धर्म के लोगों ने शिरकत कर अपने विरोध का इजहार किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इमामे जुमा और गुलाम असकरी हाल मस्जिद के पेश इमाम मौलाना रजा जैदपुरी ने कहा कि हिन्दुस्तानी कोई भी दहशतगर्द नहीं हो सकता और न ही दहशत गर्द का साथ देने वाला। अपने हक के लिए आवाज उठाने वाले मुसलमानों के हालात व हक के लिए कलम से लड़ने वाला दहशतगर्द नहीं है। पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी को इजरायल की खुफिया एजेन्सी मोसाद से मिलकर दिल्ली पुलिस ने साजिशन गिरफ्तार किया है। इसकी जितनी भी निन्दा की जाय कम है। उन्होंने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप कर पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की तत्काल रिहाई की मांग की है, उन्‍होंने चेतावनी दी कि ऐसा ना होने पर सड़क पर जुलूस और 26 मार्च को संसद का घेराव भी किया जाएगा।

रेलवे स्टेशन मस्जिद के पेश इमाम और गरीबों के लिए हक की लड़ाई लड़ने वाले सूफी उबैदुर्रहमान ने कहा कि पत्रकार अपने कलम से इजहारे हक करते हैं। मैं समझता हूं यह जुर्म नहीं है। अगर ये ऐसा न करे तो आवाम इस बात को नहीं समझ सकती। हक बात करने वालों को बेकसूर मुजरिम ठहरा दिया जाता है। इसमें भी हमारा कसूर है कि हम एक नहीं है। देश का दुश्‍मन अल्लाह का दुश्‍मन है। जरूरत इस बात की है कि हम सब एक हों, यही वक्त की जरूरत है।

समाजसेवी तहजीब असकरी ने लोगों से अपील की हमारी एकता ही पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की रिहाई का सबने बनेगी। हम एकजुट होकर आने वाले कार्यक्रमों में शिरकत कर मजलूम को बचाने के लिए प्रयास करें। प्रसिद्ध शायर कशिश संडीलवी ने कहा कि मजलूम कभी जुल्म की बैअत नहीं करते हैं। हक परस्त पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी को तुरन्त रिहा करे सरकार। नेता फिरोज हैदर ने कहा कि पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की रिहाई की जंग 26 मार्च को जम्मतुल ओलमा हिन्द, मौलाना अहमद बुखारी, मौलाना कल्बे जव्वाद की आवाज पर संसद भवन के घेराव के लिए बाराबंकी सरजमी से हजारों लोग दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे।

कार्यक्रम संचालन कर रहे सैयद मोहम्मद कौनेन ने लोगों से आगह किया कि पत्रकार की गिरफ्तारी की निन्दा और रिहाई के लिए प्रधानमंत्री, दिल्ली सरकार, गृहमंत्री को हर बच्चा-बच्चा जो हक को पसन्द करता है ई-मेल व पत्र भेजकर विरोध प्रकट करें। 12 मार्च को दिल्ली इण्डिया गेट पर कैन्डिल मार्च की तर्ज पर छाया चौराहे पर पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी की रिहाई के लिए कैन्डिल लगाकर विरोध प्रदर्शन करें। कार्यक्रम के संयोजक जहीर अब्बास कैफी व इमरान शकील ने ऐलान किया क जल्द ही प्रशासन से अनुमति लेकर एक विरोध मार्च का आयोजन जिले में जल्द किया जायेगा। एक ज्ञापन जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार व प्रधानमंत्री भारत सरकार भेजा जायेगा।

कार्यक्रम में डा. इफ्तेदार हुसैन, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य अल्हाज तकीउल हसन जैदी, डा. हैदर, बाकर रजा, कायम रजा जैदपुरी, हसन रजा, जमीर हुसैन, इमरान रिजवी, अयाज हैदर, हसन सज्जाद, कमर इमाम, मुजफ्फर इमाम, जफर इमाम, मजाहिर हुसैन एडवोकेट, मनाजिर हुसैन, मजहर आब्दी, आबिद काजमी, शुजा हैदर, हैदर मेहंदी, मोहम्मद कौनेन, अली अब्बास, अली रिजवी, शकील अहमद, मो. अब्दुल रहमान, सादिक हुसैन सभासद, शहवेज समेत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

उन्‍नाव में दैनिक जागरण के पत्रकार को सपा विधायक के भाई ने पीटा, बंधक बनाया

: एक लाइन की खबर भी नहीं छपी अखबार में : मुलायम सिंह यादव एवं अखिलेश यादव ने भले ही कहा हो कि यूपी में अब सपा सरकार में गुंडाराज नहीं रहेगा, पर अब तक जिस तरह की घटनाएं सामने आई हैं, उससे कहीं भी नहीं लग रहा है कि इस गुंडाराज पर रोक लग पाएगी. मतगणना वाले दिन सपाइयों ने झांसी में पत्रकारों से मारपीट की तो अगले दिन उन्‍नाव में सपा विधायक के दबंग भाई ने दैनिक जागरण के एक पत्रकार पर अपने साथियों के साथ हमला किया तथा घंटों बंधक बनाए रखा.

घटना सात फरवरी की है. दैनिक जागरण के पत्रकार अमित मिश्रा एसपी ऑफिस के बाद स्थित कैंटीन के पास खड़े थे. इस बीच भगवंत नगर क्षेत्र के सपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का भाई मनोज सिंह सेंगर उर्फ रावण आया तथा अमित को देखते ही उलूल-जुलूल बकने लगा. उसने गाली-ग्‍लौज भी दी. बताया जा रहा है कि वो जागरण में प्रकाशित कुछ खबरों के चलते अमित से खफा था. अमित ने जब इस तरह से बात करने का विरोध किया तो मनोज अपने साथियों के साथ मिलकर अमित पर हमला कर दिया. अमित से ना सिर्फ मारपीट की गई बल्कि उन्‍हें दो घंटे तक बंधक भी बनाए रखा गया.

इसकी सूचना कुछ लोगों ने दैनिक जागरण के पत्रकारों को दी. जागरण के ब्‍यूरोचीफ राजेश शुक्‍ल और क्राइम रिपोर्टर अनिल अवस्‍थी अपने साथी को छुड़ाने वहां पहुंचे पर दबंग रावण ने उन्‍हें भी धमका कर भगा दिया. इस बीच किसी पत्रकार ने हिंदुस्‍तान के स्ट्रिंगर ज्ञानेंद्र सिंह सेंगर, जो सपा विधायक के करीबी बताए जाते हैं, को मामले की जानकारी दी. ज्ञानेंद्र तत्‍काल मौके पर पहुंचकर बंधक बनाए गए जागरण के रिपोर्टर अमित मिश्रा को छुड़वाया. अमित ने अपने साथ हुए इस पूरे वाकये की जानकारी कानपुर में अपने वरिष्‍ठ लोगों को दी. परन्‍तु वहां से भी कोई कार्रवाई नहीं की गई.

सबसे शर्मनाक बात तो यह रही कि अमित के साथ हुई मारपीट की घटना का एक लाइन तक जागरण ने अपने अ‍खबार में नहीं छापा और ना ही एफआईआर दर्ज करवाया गया. इस मामले में उन्‍नाव के मीडियाकर्मियों की चुप्‍पी भी काफी दुर्भाग्‍यपूर्ण रही. दल्‍ले टाइप पत्रकारों का घर माना जाने वाला जागरण तो पहले से ही अपने पत्रकारों का साथ न देने के लिए कुख्‍यात रहा है. अगर किसी पत्रकार की खबर पर किसी ने अंगुली उठाई नहीं कि जागरण अपने पत्रकार के पक्ष में खड़ा होने की बजाय उसे दूध की मक्‍खी की तरह निकाल फेंकता है. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.

अखबार प्रबंधन को पूरे मामले की जानकारी होने के बाद भी उनकी तरफ से कोई भी कदम नहीं उठाया गया, अमित को अपनी लड़ाई खुद लड़ने या इस बेइज्‍जती के साथ जीने के लिए छोड़ दिया गया. सबसे बुरी स्थिति तो उन्‍नाव के मीडियाकर्मियों की रही, जो अपने साथी के साथ हुई मारपीट की घटना के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा सके. उन्‍होंने इस पर ध्‍यान नहीं दिया कि जो घटना आज अमित के साथ हुई, विरोध न होने पर कल वही घटना उन लोगों के साथ भी दुहराई जा सकती है. 

मेरठ से आज लांच होगा सुभारती ग्रुप का चैनल

पिछले दो सालों से अपने नान न्‍यूज राष्‍ट्रीय चैनल की लांचिंग की तैयारियों में लगा सुभारती ग्रुप सोमवार को इसे मूर्त रूप देने जा रहा है. आज अपराह्न दो बजे मेरठ के सुभारतीपुरम में स्थित सरदार पटेल ऑडिटोरियम में चैनल की विधिवत लांचिंग की जाएगी. यह चैनल काफी समय से टेस्‍ट सिग्‍नल पर चल रहा था. चैनल के हेड वरिष्‍ठ पत्रकार आरपी सिंह हैं. इनके नेतृत्‍व में ही चैनल की लांचिंग की जा रही है.

चैनल की लांचिंग के संदर्भ में हेड आरपी सिंह ने बताया कि चैनल की सारी तैयारियां काफी पहले से ही पूरी कर ली गई हैं. आज चैनल का शुभारंभ स्‍वामी विवेकानंद सरस्‍वती के कर कमलों द्वारा की जाएगी. उल्‍लेखनीय है कि सुभारती ग्रुप को चैनल का लाइसेंस काफी पहले मिल गया था, पर किन्‍हीं कारणों से चैनल की लांचिंग टल गई थी.

संजीव को लाने से नहीं धुलेंगे विभूति के दामन के दाग

वर्धा स्थिति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में राइटर-इन-रेजीडेंस के रूप में प्रसिद्ध कथाकार संजीव को जोड़ कर कुलपति विभूति नारायण राय ने निश्चय ही सराहनीय कार्य किया है। लेकिन विभूति के इस पुण्यकर्म से उनके दामन में लगे दाग नहीं धुल पाएंगे। जो लोग संजीव के राइटर इन रेजीडेंस बनने से हर्ष जता रहे हैं, वे इसके पीछे की हकीकत से वाकिफ नहीं है। यह विभूति के छद्म चरित्र का एक अंश भर है।

जिस दिन संजीव की नियुक्ति हुई, उसके ठीक दो दिन पहले विश्वविद्यालय ने हाल में हुए विभिन्न पदों के साक्षात्कार के परिणाम घोषित किये। इनमें से कई नाम तो ऐसे थे जो परिणाम आने से पहले ही तय हो चुके थे। इन नामों को लेकर विश्वविद्यालय में चर्चा भी थी। कुल नौ पदों के साक्षात्कार में कम से कम चार लोगों की नियुक्ति में कुलपति ने प्रतिभाओं को दरकिनार करके जाने-अनजाने में बहुत बड़ी आफत मोल ली है। भले ही इसका आभास विभूति को नहीं हो, लेकिन उनके इस कदम ने कम से कम एक दर्जन बागी को जन्म दे दिया है। ये ऐसे ही बागी हैं, जो जिस तरह पीपी नाम का एक चरित्र उनके उपन्यास किस्सा लोकतंत्र में जन्म लेकर व्यवस्था के लिए नासूर बन जाता है।

पिछली कुछ नियुक्तियों और विवादों से विभूति के छवि को गहरा धक्का लगा था। लिहाजा, विभूति ने अपनी छवि सुधारने के लिए चार फर्जीवाड़े के साथ एक अच्छा काम करने के एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया है। इसी के सहारे वे या तो अपना कुलपति का एक कार्यकाल और लेने के फिराक में हैं या फिर किसी राज्य के राज्यपाल बनने के। लेकिन विवाद ज्यादा होने के कारण विभूति को यह बात समझ में आ चुकी है कि राज्यपाल बनने का राह आसान नहीं है। इसलिए विभूति कुलपति की एक और पारी खेलने की तैयारी में हैं। इसलिए अपनी छवि सुधारने के क्रम में संजीव को राइटर इन रेजीडेंस के रूप में लाए। लेकिन अब दाल नहीं गलने वाली है। (हाल में हुई विश्वविद्यालय की नियुक्तियों में किस पर विभूति ने कैसे धांधली किया, इसकी कथा अलग क्रम में)।

पीपी
एक कर्मचारी
महात्मा गांधी अंतरराट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
navkalpana@gmail.com

भड़ास4मीडिया को मिले एक पत्र पर आधारित.

वेब सेंसरशिप के खिलाफ केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर

: वेब सेंसरशिप के खिलाफ सेव योव वॉयस की टीम दक्षिण भारत में : उज्जैन, मेरठ और रोहतक के बाद सेव योर वायस की टीम अब दक्षिण भारत के दौरे पर है. इस क्रम में सेव योर वॉयस के प्रतिनिधि सबसे पहले कोच्चि पहुंचे और वहाँ लोकल ब्लॉगर्स और वेबसाइट ऑनर्स से वेब सेंसरशिप पर डिस्कशन किया. कोच्चि की लोकल वेबसाईट कोच्चि वाइब्स के प्रवीण और सिद्धार्थ ने भी माना कि वो खुद भी सेंसरशिप के खिलाफ कोच्चि में मुहिम छेड़ना चाहते थे और अब सेव योर वॉयस टीम के साथ जुडकर इस दिशा में कोच्चि के लोगों को जागरूक करेंगे.

सेव योर वॉयस टीम ने कई स्थानीय कलाकारों और लेखकों से भी मुलाक़ात की और फ्री वॉयस के महत्व पर चर्चा की. चित्रकार बाल कृष्ण माल्या और दिनेश शिनॉय ने भी इन्टरनेट सेंसरशिप के खिलाफ इस अभियान से सहमति जताई और आश्वासन दिलाया कि वो केरल की आर्टिस्ट कम्युनिटी को साथ लेकर सेंसरशिप के खिलाफ इस लड़ाई में सहयोग करेंगे.

केरल हाई कोर्ट में सेंसरशिप के खिलाफ पेटीशन दायर की : सेव योर वॉयस टीम से जुड़े केरल हाई कोर्ट के वकील शोजन जैकब ने सेंसरशिप के बेतुके नियमों के खिलाफ केरल हाई कोर्ट में एक मुकदमा भी दायर किया. शोजन जैकब पिछले काफी समय से इंटरनेट सेंसरशिप के मुद्दे पर काम कर रहे हैं और इस कानून की बारीकियों को अच्छी तरह समझते हैं. शोजन सेव योर वॉयस की ओर से कानूनी जिम्मेदारियां सम्हालेंगे. इस पेटिशन में भारत के आईटी कानून को चुनौती दी गयी है और सेंसरशिप कानून के अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक पहलुओं पर सरकार से जवाब मांगा गया है. भारत सरकार को आठ हफ़्तों के भीतर इस पेटीशन का जवाब देना है.

और अब बैंगलूर मांग रहा है अभिव्यक्ति की आज़ादी : कोच्चि के बाद सेव योर वॉयस टीम अब बैंगलूर में है और स्थानीय ब्लॉगर्स, राइटर्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर सेंसरशिप के खिलाफ लोगों में जागरूकता और एकजुटता फैला रही है. बंगलूर में सेव योर वॉयस टीम ने सीनिअर जर्नलिस्ट और एक्टिविस्ट अशोक सामन्ना से मिलकर सेंसरशिप के मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की. सामन्ना जी ने कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में कम्प्यूटर एजुकेशन के लिए काफी प्रयास किये हैं. सेव योर वॉयस टीम ने बैंगलूर के जाने माने आरटीआई एक्टिविस्ट आनंद जी से भी मुलाक़ात की और इस बारे में चर्चा की कि कैसे आईटी एक्ट के रूल १६ का हवाला दे कर हमें आरटीआई के माध्यम से सेंसरशिप के मामलों में जानकारी देने से बचा जाता हैं.

आनंदजी ने बताया कि वो पोलिटिकल डेमोक्रेसी के खिलाफ हैं और इकोनोमिकल डेमोक्रेसी के समर्थक हैं और उसे ही भारत की समस्याओं का परमानेंट सल्यूशन मानते हैं, आनंद जी ने आरटीआई के लिए छेड़े गए अरविन्द केजरीवाल के अभियान में बैंगलूर से सक्रिय योगदान दिया था. सेव योर वॉयस टीम ने एन. विजयशंकर जी के साथ भी एक मीटिंग की. विजयशंकर जी साइबर मामलों के एक्सपर्ट हैं और www.naavi.org नाम की वेब साईट चलाते हैं और सेंसरशिप के अलोकतांत्रिक तरीकों का सख्त विरोध करते हैं. इस क्रम में सेव योर वॉयस के प्रतिनिधियों नें बैंगलूर के लेखक और पत्रकार एडविन जॉन से भी सेंसरशिप के नियमों पर चर्चा की और एडविन ने खुद और अपने मित्रों के साथ मिलकर अभिव्यक्ति की आज़ादी की इस लड़ाई में पूरा साथ देने का भरोसा दिलाया.

सेव योर वॉयस टीम ने बैंगलूर के एन्वायरमेंट जर्नलिस्ट नागेश हेगडे से भी सेंसरशिप के मुद्दे पर चर्चा की और उनके समर्थन के लिय अपील की. डीएनए के सीनिअर करेस्पोंडैंट हेमंत गैरोला ने अपनी और सेव योर वॉयस को हर संभव मदद देने का आश्वासन दिया. बिजनेस जर्नलिस्ट कार्तिक शर्मा से मुलाक़ात करके सेव योर वॉयस टीम ने जाना कि कैसे सेंसरशिप बिजनेस कम्युनिटी को प्रभावित कर रही है. बैंगलूर के चर्चित एनजीओ जनाग्रह के वीडियो इंचार्ज रेसिन जॉर्ज ने वीडियो के माध्यम से सेव योर वॉयस अभियान में योगदान देने का आश्वासन दिया.

इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म एंड न्यू मीडिया (आईआईजेएनएम) में सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आजादी पर पैनल डिस्कशन : इस क्रम में सेव योर वॉयस टीम ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म एंड न्यू मीडिया में फ्री स्पीच पर आयोजित डिबेट में हिस्सा लिया जिसमे इमरान कुरैशी (साउथ इंडिया, टीवी टुडे नेटवर्क), के सुब्रमण्यम (एसोसिएट एडिटर, डेक्कन हेराल्ड), आदित्य सोंधी (सीनिअर लॉयर, कर्णाटक हाई कोर्ट), जेनेट रोड्रिग्स (ब्लूमबर्ग न्यूज़,  मुंबई) और के. दक्षिन्मूर्ती (एडिटोरियल कंसल्टेंट, द हिन्दू) आदि ने सेंसरशिप पर अपने विचार रखे. इस डिस्कशन में सेव योर वॉयस की ओर से आलोक दीक्षित ने सेंसरशिप के खिलाफ एक सशक्त अभियान की आवश्यकता बताते हुए सभी से इस लड़ाई में शामिल होकर सरकार के मंसूबों पर पानी फेरने की अपील की. पैनल डिस्कशन में लगभग सभी लोग इस बात से सहमत दिखे कि इंटरनेट भारत में अभी अपने शुरुआती दौर में है और इसीलिये सरकार सेंसरशिप के कठोर नियम बनाकर इसकी शक्ति को नियंत्रित करना चाहती है.

बैंगलूर की कम्यूनिटी मैग्जीन बैंगल्यूर्ड का समर्थन : बैंगलोर की कम्युनिटी मैगजीन बैंगल्यूर्ड के एडिटर प्रवीण नारायण, जिन्होंने अन्ना मूवमेंट में बैंगलूर में भ्रष्ट्राचार को अंगूठा नाम का अभियान चलाया था, खुलकर सेव योर वॉयस अभियान के साथ आ गए हैं. उन्होंने भरोसा दिलाया है कि बैंग्ल्यूर्ड मैग्जीन की पूरी टीम एकजुट होकर सेव योर वॉयस अभियान को आगे बढ़ाने में मदद करेगी और शहर के युवा पत्रकारों को सेंसरशिप के खिलाफ इस अभियान से जोड़ने की कवायद को जारी रखेगी. बैंग्ल्यूर्ड का अगला अंक भी फ्रीडम ऑफ स्पीच पर केंद्रित होगा और सेव योर वॉयस अभियान से स्थानीय जनता को जोड़ने का प्रयास करेगा.

फ्रंटलाइन के दिल्‍ली ब्‍यूरो चीफ के घर स्‍मैक की सूचना पर पहुंची पुलिस

नई दिल्ली। दिल्ली में अफवाह भरे फोन से रविवार को पुलिस स्मैक की तलाश में एक पत्रकार के घर पहुंच गई। पुलिस को वहां से कुछ भी बरामद नहीं हुआ। पुलिस के मुताबिक पीसीआर को एक फोन आया। फोन करने वाले ने कहा कि दक्षिणी दिल्ली के नेब सराय इलाके में अनुपम अपार्टमेंट के मकान नंबर 107 में स्मैक रखी है। सूचना पाकर पुलिस इस पते पर पहुंची। यह घर ‘फंटलाइन’ पत्रिका के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख जॉन चेरियन का है। पुलिस को घर से कुछ भी नहीं मिला। दिल्ली पत्रकार संघ ने पत्रकार के घर की तलाशी पर चिंता जताई है। (एजेंसी)

ठगी करने वाले मीडिया कॉलेजों पर नकेल कसने की तैयारी

नई दिल्ली। मीडिया कालेजों को पारदर्शी नियमों के दायरे में लाने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय जल्द ही ठोस फैसला लेने की तैयारी में है। इसके तहत राज्यों के तकनीकी विश्‍वविद्यालयों को दिशा निर्देश जारी किए जाएंगे। इस तरह के तमाम मीडिया कालेजों की शिकायतें मिलीं है जो एक एक कमरे में चल रहे हैं। इन कालेजों को तकनीकी विश्‍वविद्यालयों ने मान्यता भी दे रखी है। इनसे निकलने वाले छात्रों को मीडिया में उस स्तर का रोजगार नहीं मिल पा रहा है, जो सपना लेकर उन्होंने मीडिया कालेजों में दाखिला लिया था।

मंत्रालय का कहना है कि जिन मीडिया कालेजों की शिकायतें मिली है, वे ज्यादातर निजी क्षेत्र के हैं। मंत्रालय का कहना है कि इन कालेजों में बिना किसी प्रवेश परीक्षा के बारहवीं पास छात्रों को दाखिला दे दिया जाता है। ऐसे छात्रों से लंबी फीस भी ली जाती है। तमाम आकषर्णों के चलते छात्र दाखिला तो ले लेते हैं मगर धीरे-धीरे उन्हें इस तरह के संस्थानों की असलियत का जब पता चलता है तो वे अपने आप को ठगा सा महसूस करते हैं। प्लेसमेंट का प्रलोभन देकर उनके आक्रोश को शांत कर दिया जाता है पर कालेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद ये संस्थान अपने पूर्व छात्रों से मुंह मोड़ लेते हैं। फिर उनके पास सिवाय दर-दर भटकने के कोई दूसरा जरिया नहीं रह जाता। इस तरह के मीडिया कालेजों की वजह से वे मानक के अनुरूप चल रहे मीडिया कालेज भी बदनाम हो रहे हैं।

मंत्रालय ने मीडिया कालेजों का स्तर और उनकी गुणवत्ता सुधारने के लिए बिल्कुल उसी तरह का फैसला लेने का मन बनाया है, जिस तरह से निजी इंजीनियरिंग कालेजों के मामलों में किया जा रहा है। इस संबंध में तकनीकी विश्‍वविद्यालयों, डीम्ड विश्‍वविद्यालयों, सूचना प्रसारण मंत्रालय एवं कुछ बड़े शैक्षिक संस्थानों का भी सहयोग लिया जा रहा है। सरकार का इरादा यह है कि एक मीडिया कालेजों के लिए एक ऐसा माडल तैयार करके पेश किया जाए, जिसे मीडिया हाउसों को भी स्वीकार्य हो और इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को भी मंजूर हो। माडल को अंतिम रूप देने से पहले मीडिया हाउसों की राय लेकर यह पता लगाना कि किस तरह के छात्रों को रोजगार मिल सकता है।

राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित ज्ञानेंद्र सिंह की रिपोर्ट.

कौन भरोसा करता है एक्जिट पोल पर?

‘‘ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल मनोरंजन चैनलों के लिए सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं।’’ मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का ट्विट। तो क्या सचमुच एक्जिट पोल मनोरंजन के ही पात्र हैं। अब तक के अनुभव तो यही कहते हैं। याद कीजिए उत्तर प्रदेश के 2007 के एक्जिट पोल को… लेकिन जब ईवीएम मशीनों का पिटारा खुला तो उनमें से जो आंकड़े बाहर निकले, वे हकीकत से काफी दूर थे।

सिर्फ उत्तर प्रदेश के ही 2007 के एक्जिट पोल के आंकड़ों को याद करें। तब टाइम्स नाऊ ने बहुजन समाज पार्टी को 116 से 126 सीटें दी थीं। उसके एक्जिट पोल में समाजवादी पार्टी को 100 से 110 सीटें मिली थीं। जबकि बीजेपी को 114 से 124 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था। कांग्रेस को टाइम्स नाऊ ने 25 से 35 सीटें दी थीं। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। इसी तरह स्टार न्यूज ने बहुजन समाज पार्टी को 137, समाजवादी पार्टी को 96, बीजेपी को 108 और कांग्रेस को 27 सीटें दी थीं। स्टार न्यूज की तरफ से सिर्फ दो पार्टियों – समाजवादी पार्टी और कांग्रेस – को लेकर किए गए अनुमान हकीकत वाले नतीजों के करीब रहे।

इसी तरह हिंदी के सबसे गंभीर माने जाने वाले और भारत में चुनाव विश्लेषण की शुरुआत करने वाले प्रणय राय के चैनल एनडीटीवी के भी एक्जिट पोल के आंकड़े कहां तक सटीक बैठते, हकीकत के करीब भी नहीं पहुंचे। एनडीटीवी ने बीएसपी को 117 से 127 सीटें दी थीं। जबकि समाजवादी पार्टी को 113 से 123 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था। उसकी भी नजर में बीजेपी का आंकड़ा 108 से 118 तक पहुंच रहा था। जबकि कांग्रेस को 35 से 45 सीटें मिलती नजर आ रही थीं। सीएनएन-आईबीएन के आंकड़ों पर भी गौर फरमा लेना चाहिए। उसने अपने एक्जिट पोल में 152 से 168 सीटें दी थीं। जबकि समाजवादी पार्टी को उसकी नजर में 99 से 110 सीटें मिल रही थीं। यह एक्जिट पोल बीजेपी को 80 से 90 सीटें दे रहा था। जबकि कांग्रेस को उसके आकलन के मुताबिक सिर्फ 22 सीटें मिल रही थीं। ये अनुमान भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के असल नतीजों के कुछ नजदीक थे। बाकी सबकुछ फेल ही नजर आया।

इन एक्जिट पोल के नतीजों के बरक्स हकीकत के आंकड़ों पर नजर डालनी चाहिए। हकीकत में बीएसपी को 206 सीटें हासिल हुईं, जबकि समाजवादी पार्टी को 97 सीटों से संतोष करना पड़ा। बीजेपी की ताकत सारे एक्जिट पोल के अनुमानों से कहीं ज्यादा आधी रह गई और उसे महज 51 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। जबकि कांग्रेस के खाते में 22 सीटें ही आईं। पिछले विधानसभा चुनाव के सारे एक्जिट पोल में एक तथ्य समान था। सबने बीएसपी को कमतर करके आंका था और बीजेपी उनकी नजर में उतनी कमजोर भी नहीं थी। लेकिन असल में क्या हुआ।

अब एक नजर मौजूदा चुनाव के बाद हुए एक्जिट पोल पर दें तो यह हकीकत खुलकर सामने आ जाएगी। सिर्फ उत्तर प्रदेश को ही उदाहरण के तौर पर लें। सातवें दौर का चुनाव खत्म होते ही तमाम न्यूज चैनलों ने एक्जिट पोल के नाम पर अपने दावे करने शुरू कर दिए। ज्यादातर एक्जिट पोल के मुताबिक उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनती हुई नजर आई। स्टार न्यूज के एक्जिट पोल ने समाजवादी पार्टी को 183 सीटें दिया तो बीएसपी को सिर्फ 83 सीटें देने का अनुमान लगाया।

इसी तरह इस सर्वे ने बीजेपी को 71 और कांग्रेस-राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन को 62 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था। इसी तरह चैनल न्यूज 24 ने जो सर्वे जारी किया, उसमें उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को 185, बहुजन समाजपार्टी को 85 तथा कांग्रेस और भाजपा 55-55 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था। एक्जिट पोल की इस दुनिया में इंडिया टीवी-सीवोटर का भी सर्वे आया। इस सर्वे के मुताबिक समाजवादी पार्टी को 141 सीटें हासिल हो रही थीं, जबकि बहुजन समाज पार्टी को 126 सीटें मिल रही थीं। इसी सर्वे के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी को 83 और कांग्रेस गठबंधन को 36 सीटें मिलती नजर आईं।

अब उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे आ चुके हैं। इनमें से शायद ही कोई एक्जिट पोल सही साबित हो पाया है। सारे नतीजे गलत साबित हो चुके हैं। अगर एक-दो सही साबित भी हुए हैं तो इसलिए नहीं, कि वे सही हुए हैं। बल्कि वे महज तुक्का भर हैं। दरअसल एक्जिट पोल के भारत में सही साबित ना होने की दो वजहें हैं। एक वजह तो यह है कि एक्जिट पोल करने में अधिकतर वैज्ञानिक तरीकों का ध्यान नहीं रखा जाता। दूसरा तथ्य यह है कि जैसे-जैसे न्यूज चैनलों की संख्या बढ़ती गई है, वैसे-वैसे सर्वे करने वाली कंपनियों की बाढ़ आ गई है। एक-एक कमरे में बैठकर दो-चार फोन करके सर्वे करने वाली कंपनियां भी हैं। एक सर्वे कंपनी तो ऐसी है, जिसके दफ्तर में महज चार-छह लोग काम करते हैं। लेकिन वह भी सटीक सर्वे करने का दावा करती है। एक सर्वे कंपनी के दफ्तर के लोग बाहर जाने की बजाय दफ्तर की फोन लाइन से सौ-पचास लोगों से बात कर लेते हैं और उनकी इतिश्री हो जाती है।

दूसरी वजह है भारतीय समाज की बहुलता और बहुलवादी संस्कृति। यह बहुलवादी संस्कृति अब भी लोगों के सामने मतदान केंद्र के भीतर की हकीकत को बाहर असल में जाहिर करने से रोकती है। इसकी तस्दीक दिल्ली के अनुसंधान एवं विकास पहल के संस्थापक देवेंद्र कुमार भी करते हैं। देवेंद्र कुमार के मुताबिक, 'भारतीय समाज और राजनीति की बहुलता के संदर्भ में एग्जिट-ओपेनियन पोल हमरे लिए अनुपयुक्त है। भले ही एग्जिट-ओपेनियन पोल एक विज्ञान है, लेकिन भारत में इसकी अलग प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी। करोड़ों की जनसंख्या में से हजार लोगों के रुझान को लेकर सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।'

भारतीय लोकतंत्र कम से कम अभी तक अमेरिका जितना विकसित नहीं हो पाया है। जहां लोग खुलकर अपने रिपब्लिकन या डेमोक्रेट होने को जाहिर करने में कोई बुराई नहीं देखते। भारत में अब भी वैसी स्थिति नहीं आई है। भारत में लोग अब भी वोट किसी और को देते हैं और बाहर आकर बताता कुछ और है। भारतीय मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो भारतीय जनता पार्टी को पसंद करता है। भारतीय जनता पार्टी को जिस तरह सांप्रदायिक राजनीति के साथ पैबंद कर दिया है, उससे भी मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भारतीय जनता पार्टी को वोट देने के बाद भी बाहर जाहिर नहीं करना चाहता। क्योंकि उसे डर सताता रहता है कि प्रगतिशीलता बहुल समाज में उसका यह कदम उसे सांप्रदायिक ठहरा सकता है। ऐसे में लिहाजा भारतीय जनता पार्टी को वोट देने वाला वोटर बाहर आने के बाद भी झूठ बोलता है।

एक हद तक वामपंथी मतदाताओं के साथ भी ऐसा है। स्थानीय सामाजिक दबाव किसी खास पार्टी को वोट देने के लिए दबाव बनाते हैं। लेकिन वह मतदाता अपने अंतर्मन के दबाव में वोट किसी और को देता है। लेकिन बाहर निकलते ही वह सामाजिक दबाव में उस दल या उम्मीदवार का नाम ले लेता है, जिसे वोट देने का सामाजिक दबाव होता है। एक तथ्य और है। स्थानीयता के दबाव में दुश्मनी से बचने के लिए भी लोग झूठ का सहारा लेते हैं। चुनाव भविष्यवाणी करने वाले जानकार भी मानते हैं कि अपने देश में चुनाव कई स्थानीय मसलों से भी प्रभावित होते हैं। मसलन जाति-धर्म, राजनीतिक गठजोड़, चुनावी रुझान आदि।

यहां मतदान के एक दिन पहले तक हुई कोई घटना या तथ्य मतदाता को प्रभावित कर सकता है और करता भी है। फिर जातियों और धर्मों के खांचो के साथ ही तमाम दूसरे बंधनों और बेड़ियों में जकड़े समाज में आज भी मतदान की बड़ी वजहें ये बंधन और बेड़ियां ही हैं। शायद यही वजह है कि भारत में मतदान के आंकड़े हर बार गड़बड़ होते हैं। इसलिए बेहतर तो यह है कि पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के निदेशक सीवी मधुकर की बात मान ली जाय। उनका कहना है कि  एक्जिट पोल हमें सिर्फ नतीजों के संकेत

उमेश चतुर्वेदी
देते हैं। ये वास्तविक नहीं होते, लिहाजा इसे और वैज्ञानिकता के साथ करने की जरूरत है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम एक्जिट या ओपीनियन पोल को इसी अंदाज में लेने को तैयार हैं। 

लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों व चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों महुआ न्यूज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग विचार मीमांसा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

Holi-eve ad sop for Bihar newspapers

Patna : Several dailies of Bihar, especially of Hindi, carried two identical advertisments on the same day on March 8, that is, on the eve of Holi. Newspapers were closed for two subsequent days on account of Holi in Bihar.

The advertisements are on Right to Service Act with a big photo of the chief minister Nitish Kumar and a small one of the deputy chief minister, Sushil Kumar Modi. What bemused an average reader is not just the advertisement, but the way it was given almost at the end of the financial year.

It remained a mystery as to what prompted the state government to give two identical advertisements–– one a full page and another a quarter page––on the same day. Incidentally, March 8 was the International Women’s Day but the ads were not on the empowerment of the women.

Two identical adverstiments on the same day to the same newspapers confirmed Press Council of India Chairman, Justice Markandey Katju’s stand that print media in Bihar is being pampered for obvious reasons. After all it was the sheer wastage of tax-payers money, commented a political observer. Courtesy : Bihar Times

उत्पीड़न की घटनाओं पर न लड़ना है, न धरना-प्रदर्शन करना है : मायावती

सत्ता से बाहर आते ही मायावती ने अपने लोगों को फार्मूला दे दिया है. उन्होंने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से कह दिया है कि कहीं भी सरकार से लडऩा नहीं है, उत्पीडऩ की घटनाओं पर पार्टी पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को धरना प्रदर्शन भी नहीं करना है. सिर्फ पार्टी के नेताओं को जानकारी देनी है. नेता लोग राज्यपाल को ज्ञापन देंगे या विधानसभा में मामला उठाएंगे. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद मायावती 'छवि सुधारो अभियान' के तहत बसपा विधायक दल की बैठक में नसीहत दे रही थीं.

मायावती ने कहा कि अपने विधायकों और सांसदों से कहा है कि वे विधायक या सांसद निधि स्कूलों को देने के बजाए दलित व गरीब क्षेत्रों के विकास पर खर्च करें. उन्होंने कहा कि ज्यादा पैसे कमा लोगे तो मरने के बाद तुम्हारे बच्चे बदनाम होंगे. उप्र विधानसभा चुनाव में 80 सीटों पर सिमटने के बाद मायावती ने पहली बार विधायकों के साथ बैठक की. पार्टी कार्यालय पर हुई बैठक में बसपा अध्यक्ष ने कहा, भगवान जो करता है अच्छा करता है शायद भगवान चाहता है कि दिल्ली (लोकसभा चुनाव) के लिए मेहनत करूं, अब मैं दिल्ली के लिए मेहनत करूंगी.

विधानसभा चुनाव में हारने वाली बसपा ने यूपी में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव सहित निर्वाचन आयोग और केन्द्रीय बलों की देख-रेख में नहीं होने वाले किसी भी चुनाव में नहीं लड़ने का ऐलान किया है. बसपा अध्यक्ष मायावती ने विधानसभा चुनाव में हार के कारणों तथा कुछ अन्य विषयों की समीक्षा के लिये राजधानी में आयोजित पार्टी के ‘अखिल भारतीय कार्यकर्ता सम्मेलन’ में कहा कि प्रदेश में सपा की सरकार के लौटते ही ‘गुण्डाराज’ की भी वापसी हो गयी है.

मायावती ने कहा कि बसपा को कुछ सख्त फैसले लेने पड़े हैं. स्थानीय निकाय चुनाव केन्द्रीय बलों की निगरानी में नहीं होते हैं इसलिये अपने कार्यकर्ताओं की जान-माल की रक्षा के लिये बसपा सूबे में निकट भविष्य में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव नहीं लड़ेगी. मायावती ने कहा कि अगर कोई पार्टी कार्यकर्ता या पदाधिकारी स्थानीय निकाय चुनाव लड़ता है तो उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया जाएगा.

उन्होंने कहा कि चुनाव नतीजों की घोषणा के फौरन बाद शुरू हुई गुण्डागर्दी बसपा के लिये ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि इसका निशाना जानबूझकर इसी पार्टी के कार्यकर्ताओं को बनाया जा रहा है ताकि स्थानीय निकाय चुनाव में सपा को इसका लाभ दिलाया जा सके. विधानसभा चुनाव के नतीजों पर बसपा प्रमुख ने कहा कि वे चुनाव परिणाम सीटों के हिसाब से पार्टी की उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहे.

उन्होंने कहा कि इससे भाजपा के सत्ता में आने की आशंका से घबराए मुसलमानों का करीब 70 प्रतिशत वोट सपा के पास चला गया और बसपा को शिकस्त सहन करनी पड़ी. मायावती ने कहा कि प्रदेश में दलितों को छोड़कर ज्यादातर हिन्दू समाज में से खासतौर से अगड़ी जातियों का वोट कई पार्टियों में बंट जाने के कारण इसका सीधा लाभ सपा के उम्मीदवारों को मिला. उन्होंने कहा कि हालांकि बसपा का वोट प्रतिशत काफी अच्छा रहा और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जी-जान से काम करके पार्टी का जनाधार बढ़ाया लेकिन साढ़े 24 लाख वोट के अंतर से सपा बसपा के मुकाबले अप्रत्याशित रूप से 144 सीटें ज्यादा जीत गयी.

बसपा प्रमुख ने चुनाव में पराजय के बाद प्रदेश में पार्टी के संगठन में व्यापक बदलाव का ऐलान भी किया. देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों के मद्देनजर उत्पन्न राजनीतिक स्थिति की विस्तार से चर्चा करते हुए मायावती ने कहा कि इसका सीधा प्रभाव केन्द्र की राजनीति पर जरूर पड़ेगा और अब देश में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव होने की सम्भावना प्रबल हो गयी है. उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि अगला लोकसभा चुनाव वर्ष 2014 से पहले ही हो जाएगा जिसके लिये बसपा कार्यकर्ताओं को तन, मन, धन से तैयार हो जाना चाहिये. इस बीच, खबर है कि बसपा प्रमुख ने आज हुए कार्यकर्ता सम्मेलन में दल की विभिन्न समितियां भंग कर दीं.

इंटरनेट माध्यम पर कुल विज्ञापन का चार फीसदी खर्च

: मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री 729 अरब रुपये का हुआ : बीते बरस (वर्ष 2011) देश के मीडिया व एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की ग्रोथ रेट 12 परसेंट रही और यह 729 अरब रुपये का हो गया है. यह आंकड़ा फेडरेशन आफ चैंबर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) और केपीएमजी का संयुक्त रूप से है. रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वर्षों में इस उद्योग का विकास 15 फीसदी चक्रवृद्धि दर से होगा और 2015 तक यह उद्योग 1457 अरब रुपये का हो जाएगा.

रिपोर्ट में कहा गया कि स्मार्ट फोन, टैबलेट, पीसी और अन्य उपकरणों का टीवी, फिल्म, समाचार, रेडियो, संगीत सभी कारोबारों पर व्यापक असर पड़ रहा है. इसके कारण कुल विज्ञापन का चार फीसदी खर्च इंटरनेट माध्यम पर होने लगा है. रिपोर्ट के मुताबिक दूसरी श्रेणी के शहरों में तेज विकास, क्षेत्रीय मीडिया के विकास व नए मीडिया कारोबार के तेजी से हो रहे प्रसार के कारण मीडिया और मनोरंजन उद्योग में यह विकास दर्ज किया गया. यह रिपोर्ट फिक्की के मनोरंजन और उद्योग सम्मेलन (फिक्की फ्रेम्स 2012) में औपचारिक रूप से जारी की जाएगी. सम्मेलन मुंबई में बुधवार से शुरू होगा. रिपोर्ट के मुताबिक प्रिंट माध्यम उद्योग 8.4 फीसदी विकास के साथ 209 अरब रुपये का हो गया, जो उम्मीद से कम रहा, क्योंकि इस उद्योग को विज्ञापन खर्च में कटौती का सामना करना पड़ा.

टेलीविजन उद्योग के 2011 में 329 अरब रुपये का होने का अनुमान है. वर्ष 2016 तक इस उद्योग के 17 फीसदी सलाना चक्रवृद्धि विकास दर के साथ 735 अरब रुपये का हो जाने का अनुमान है. इंटरनेट के बढ़ते उपयोग और नए उपकरणों के प्रसार के कारण नए मीडिया कारोबार में तेजी से विकास हो रहा है. रिपोर्ट में कहा गया कि स्मार्ट फोन, टैबलेट, पीसी और अन्य उपकरणों का टीवी, फिल्म, समाचार, रेडियो, संगीत सभी कारोबारों पर व्यापक असर पड़ रहा है. इसके कारण कुल विज्ञापन का चार फीसदी खर्च इंटरनेट माध्यम पर होने लगा है. रिपोर्ट के मुताबिक एनीमेशन, वीएफएक्स और पोस्ट प्रोडक्शन उद्योग में 2010 के बाद 31 फसदी की दर से विकास हुआ और यह उद्योग 2011 में 31 अरब रुपये का हो गया. रेडियो उद्योग का विकास 15 फीसदी की दर से हुआ और यह 11.5 अरब रुपये का हो गया.

बस्ती में मीडियाकर्मियों को पुलिस ने कवरेज करने से रोका

यूपी के बस्ती जिले से खबर है कि मंडलीय कारागार में फायरिंग की खबर मिलने के बाद मौके पर पहुंचे मीडियाकर्मियों को पुलिस ने कवरेज करने से रोक दिया. फायरिंग की खबर के तत्काल बाद दर्जनों की संख्या में मीडिया कर्मी मंडलीय कारागार के गेट पर पहुंचे. कारागार गेट पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी और पुलिस के जवानों ने सख्ती बरतते हुए मीडियाकर्मियों को मौके पर जाने से रोक दिया. घंटा भर बाद मीडिया वालों को जेल से सौ मीटर तक जाने की अनुमति मिली.

करीब पौने छह बजे जैसे ही फायरिंग की खबर मिली, मीडियाकर्मी जेल की ओर दौड़ पड़े मगर यहां हाई सिक्यूरिटी की व्यवस्था थी. पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी अंदर थे. वहां से गोलियों की आवाज सुनाई पड़ रही थी. मगर मीडियाकर्मियों को मौके पर जाने से पुलिस के जवानों ने सख्ती से रोक दिया. जेल के भीतर से गोलियों की तड़तड़ाहट की आवाज आने से सनसनी मची हुई थी लेकिन कवरेज करने को लेकर सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर मीडियाकर्मियों के हाथ बंधे हुए थे. मीडिया वालों के दबाव के बाद पुलिस के जवान मीडिया कर्मियों से गरमाने लगे. करीब घंटे भर की नोंकझोंक के बाद मीडिया कर्मियों को जाने का मौका मिला.

The Hindu forges ahead again as South India’s No.1 English Daily

The Hindu has registered a big increase in its readership, Indian Readership Survey (IRS) data for the 4th quarter of 2011 show. The Hindu has gained 71,000 readers, a growth of 3.3 per cent in national readership from the previous quarter. One of the biggest gainers amongst English dailies this quarter, The Hindu has seen a cumulative addition of 1.45 lakh readers over the past one year. The publication's current Average Issue Readership (AIR) is 22.4 lakh readers. Once again, The Hindu retains its position as the most-read English daily in South India and the 3rd largest English newspaper nationally.

In South India, The Hindu has reinforced its undisputed dominance in terms of readership: its average issue readership has grown by 2.7 per cent. The newspaper has added 50,000 readers in South India in the fourth quarter and stands out as the No. 1 English language daily in the region. In Chennai, where it all began 133 years ago, The Hindu has a readership of 5.43 lakh readers, more than the combined readership of all other English dailies collectively, reiterating its dominance.

In Coimbatore, The Hindu registered a huge increase of 11.2% growth, taking its readership to 99,000, more than the combined readership of all other English dailies put together and four times the readership of The Times of India. The newspaper's readership has grown by a hefty 10.1% in Karnataka and by 9.2% in Kerala. The overall growth in Andhra Pradesh has been 2.3 %. There has been very significant growth in Delhi as well, with The Hindu's readership increasing by 13.4% in the fourth quarter of 2011.

The Hindu's integrity, credibility, independent editorial stand, and reliable and balanced presentation of news, analysis, and comment have, over the years, won for it the serious attention and regard of a variety of readers, including policymakers in every sphere of life and those who shape trends in society. We would like to take this opportunity to thank readers for their constant support and the great trust they place in us.

IRS 2011 Q4 further reveals that English weekly and fortnightly magazines as a category have shown growth over the previous quarter. Sportstar and Frontline, from The Hindu Group of publications, have registered an impressive readership growth of 9.7% and 5.6% respectively. This again expresses the trust readers place in the magazines' integrity, credibility and independence, and the value they get from our publications.

साभार : द हिंदू

Delhi, NCR votes Hindustan Times No.1 again

Here's a piece of news you've heard before: Hindustan Times is the undisputed No. 1 newspaper in Delhi-NCR. In the latest round (2011 Q4) of the Indian Readership Survey (IRS) released by the Media Research Users' Council on Monday, HT has once again been declared the leading newspaper of Delhi, and of the National Capital Region (NCR) — for the eighth consecutive time. With a daily readership (Average Issue Readership, or AIR) of 22.25 lakh, HT has 58,000 more daily readers than its closest competitor, The Times of India (TOI). What's more, HT has reaffirmed its position as the newspaper of choice among the more affluent and educated households, with 1.55 lakh higher daily readership in SEC-A than TOI.

Over the last year, HT has been the first to report on several local, national and international stories. As the leading paper of Delhi NCR, HT has also brought you its path-breaking initiatives of Delhi First, Gurgaon First and Noida First, where it has taken up your problems with the powers that be. HT has also rolled out initiatives like Delhi100, celebrating the city's centenary as the national capital and sought a roadmap for a better future. Nationally, HT is the fastest growing English daily, having added 1.99 lakh readers in the last one year.

In Mumbai, with 7.81 lakh readers, HT continues to be the No. 2 broadsheet daily for the sixth time in a row and the only one to have grown in 13 out of the last 14 IRS rounds. In fact, HT grew 27% during the last year, while the readership for TOI remained broadly flat in the same period. With this, HT Mumbai now reaches more than 5 lakh exclusive readers who do not read TOI.

Mint, HT Media's business newspaper, has further consolidated its No. 2 position with 2.58 lakh daily readers, while Economic Times has registered a drop of 22,000 readers. Mint's growth has been on the back of its rising readership in Mumbai, as also in Delhi-NCR, its stronghold. It also continues to have the best reader profile among all business dailies, both in terms of metro skew (95% from top metros) as well as SEC A proportion (71% SEC A)

Hindustan, the Group's Hindi daily, strengthened its No 2 position among all newspapers in India with a huge 3.81 crore Total Readership, which represents an addition of nearly 30 lakh readers in the past year, driven by the launch of several new editions in UP/ Uttarakhand. The paper continues to be the dominant No. 1 in Bihar and Jharkhand and is the fastest-growing Hindi daily in Uttar Pradesh. It also continues to be the second largest Hindi daily in Delhi-NCR, with a 23.99 lakh Total Readership.

साभार – हिंदुस्तान टाइम्स

TOI adds 1.49 lakh readers, widens lead

This is one result where there's absolutely no doubt about the winner. The Times of India, India's (and the world's) largest-selling English newspaper by an enormous margin, widened its lead over other papers in the fourth quarter (October-December) of 2011, according to the latest round of the Indian Readership Survey (IRS). Propelled by a huge increase of 61,000 readers in Mumbai, TOI added 1.49 lakh readers across India – way more than the growth in readership (1.1 lakh) of its five nearest rivals put together. TOI's all-India readership is more than two times that of the No 2 paper (HT) and almost three and a half times that of the No 3 paper (The Hindu).

TOI's Nagpur edition, which completed five years on November 15 last year and came out with a 72-page bonanza spread over eight days, added 8,000 new readers to show a 9% growth. From 86,000 in the third quarter, TOI Nagpur is now read by 94,000 people. In comparison, The Hitavada lost 13,000 readers.

TOI's impressive showing in Mumbai saw its readership surge to 15.96 lakh, almost double the size of the No. 2 English daily – our sister publication, Mumbai Mirror, which itself attracted 42,000 fresh readers to rise to 7.96 lakh readers. The Times Group thus strengthened its already formidable dominance in India's financial capital.

TOI also posted impressive growth in other major cities, including The paper added 16,000 new readers in Delhi compared with 11,000 by Hindustan Times. According to the survey, TOI now has 19.04 lakh readers in the national capital.

In Chennai, TOI was the only newspaper among the top three to gain readers during the quarter. While The Hindu lost 5,000 readers and No. 3-placed Deccan Chronicle lost 16,000, TOI continued its growth story in the city, acquiring as many as 10,000 new readers. The paper now has more than 2 lakh regular readers in Chennai.

TOI also consolidated its leadership position in Bangalore, growing by 4% in the city. This translates to 23,000 new readers for the paper, taking the total figure to 5.42 lakh, well above double that of its nearest rival, Deccan Herald (2.14 lakh).

TOI also posted impressive growth in Kolkata. In an environment where two of the top four newspapers in the city lost 9,000 readers, TOI gained 5,000. In comparison, The Telegraph added 1,000 readers.

It grew 6% in Ahmedabad to 1.31 lakh compared to its sister publication Ahmedabad Mirror's 68,000 and DNA's 18,000.

In Pune, it grew 4% to 200,000 compared to DNA's 36,000.

The paper grew in Lucknow too, adding an impressive 10% to take its overall readership to 1.18 lakh, almost four times HT's 32,000.

IRS, conducted by the Media Research Users Council, estimates the readership base of publications in the country. According to the latest survey, eight of the top 10 dailies in the country registered growth during the quarter.

साभार : टाइम्स आफ इंडिया

जिन शशांक शेखर के कारण मायावती हारीं, उन्हें देंगी इनाम

: राज्यसभा में जाकर अब सेंटर की राजनीति करेंगे मायावती और शशांक शेखर : लखनऊ से खबर है कि करारी हार का सामना करने वाली मायावती और उनके खास सिपहसालार शशांक शेखर सिंह अगले महीने से उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सदस्य होंगे. मायावती ने पार्टी के एमएलए, एमपी और कोआर्डिनेटरों के साथ एक बैठक में सभी को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटने को कहा है. बताया जा रहा है कि राज्यसभा की रिक्त होने वाली सीटों पर भी बसपा की तरफ से नाम तय कर लिए गए हैं और मायावती को अधिकार दिया गया है कि वे इस मामले में अंतिम फैसला लें.

सूत्रों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी अध्यक्ष मायावती राज्यसभा चली जायेंगी. उनकी सरकार के कैबिनेट सचिव रहे कैप्टन शशांक शेखर सिंह को भी बसपा के टिकट पर राज्य सभा भेजा जाएगा. हालांकि शशांक शेखर को रास भेजे जाने को लेकर अंदरुनी विरोध है पर मायावती के आगे कोई मुंह नहीं खोलेगा. शशांक शेखर सिंह ने अपने व्यवहार से पूरी नौकरशाही को नाराज कर रखा था. राज्यसभा चुनाव की अधिसूचना आज जारी हो जायेगी. नयी विधान सभा मे बहुजन समाज पार्टी के 80 सदस्य हैं. इतने सदस्यों में केवल दो सदस्य ही आसानी से चुने जा सकेंगे.

मायावती पिछली बार भी मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद संसद चली गयी थीं. इसलिए पार्टी में इनके राज्य सभा जाने पर कोई संशय नही है. लेकिन पार्टी के भीतर शशांक शेखर को राज्यसभा उम्मीदवार बनाने को लेकर काफी मतभेद है. ढेर सारे बसपाई शशांक शेखर को ही विधान सभा चुनाव में हार के लिए जिम्मेदार मानते हैं. कहने वाले यहां तक कहते हैं कि शशांक शेखर ने ही कार्यवाहक मुख्यमंत्री की तरह काम किया और पार्टी के विधायकों, सांसदों यहां तक मंत्रियों को भी मुख्यमंत्री के पास तक पहुंचने नही दिया.

ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद मायावती के खास रहे कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने सरकारी सेवा से समय से पहले रिटायर होने का फैसला कर लिया. उन्हें 31 मार्च को रिटायर होना था, पर वे नौ मार्च को ही रिटायर हो गए. प्रदेश में नौकरशाही के सर्वोच्च पद पर विराजमान शशांक शेखर की कार्यशैली मायावती सरकार में विवादित रही. सरकारी निर्णयों के साथ वह बसपा के निर्णयों की घोषणा भी मुख्यमंत्री की तरफ से करते थे. इसी के चलते उन्हें पद से हटवाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया.

शशांक शेखर की सेवानिवृत्ति मई, 2010 में हो गई थी. लेकिन मायावती सरकार ने उन्हें दो साल का सेवा विस्तार दिया, यह सेवा विस्तार आगामी 31 मार्च को पूरा हो रहा था. चर्चा है कि मायावती और शशांक शेखर के राज्यसभा जाने के बाद यूपी में बसपा की बागडोर नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्य के हाथ में दे दी जाएगी. इसी के तहत विधान परिषद में नसीमुद्दीन सिद्दीकी और विधानसभा में स्वामी प्रसाद मौर्या को बीएसपी की कमान सौंपी गई है. दोनों नेता लोकायुक्त जांच के दायरे में हैं.

कोल्ड ड्रिंक पी-पी कर अंतड़िया सड़ा ली हैं अमिताभ बच्चन ने!

बड़ी आंत की अंतड़ियां सड़ चुकी हैं अमिताभ बच्चन की. सड़ी अंतड़ियों को काट काट कर उसे जीवनदान दिया गया. ये अंतड़िया कोल्ड ड्रिंक पी पी कर अमिताभ ने सड़ा ली. वो न शराब पीता है, न गुटका खाता है, न सूअर खाता है. कोल्ड ड्रिंक प्रेम ने अमिताभ को बीमार कर दिया. उसे पेट का आपरेशन कराना पड़ा. उसके डाक्टर ने बताया कि अगर सड़ी अंतड़ियां न काटी जाती तो उसकी जान न बच पाती.

यह खुलासा किया था स्व. राजीव दीक्षित ने. उन्होंने बताया कि अमिताभ इसलिए कोल्ड ड्रिंक पीने से अतड़िया सड़ने वाली बात दुनिया से छुपाता है

स्व. राजीव दीक्षित
स्व. राजीव दीक्षित
क्योंकि उसने एक कोल्ड ड्रिंक कंपनी से सौ करोड़ रुपये लेकर एग्रीमेंट कर रखा है. हां, इतना जरूर हुआ कि बीमारी के बाद अमिताभ ने कोल्ड ड्रिंक का प्रचार करना छोड़ दिया.

राजीव दीक्षित ने कई और आंखें खोलने वाली बातें बताई हैं. आप सभी इस टेप को जरूर सुनें और अपने दोस्तों तक फारवर्ड करें ताकि वो भी सच्चाई जान सकें. विदेशी चीजों के पीछे पगलाए हुए हम लोगों को जानना चाहिए कि उनकी हकीकत क्या है… स्व. राजीव दीक्षित ने स्वामी रामदेव के साथ मिलकर लंबे समय तक स्वदेशी का अभियान चलाया. नीचे दिया गया टेप राजीव के एक भाषण का अंश है. दिए गए आडियो प्लेयर को प्ले करें, साउंड फुल कर लें….

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‘पत्रकारिता को कलंकित होते देख वेबसाइट शुरू की है’

आदरणीय यशवंतजी, मैं, ओमप्रकाश सिंह, मुंबई से सटे भाईंदर क्षेत्र में रहता हूँ. पिछले कई वर्षों से सतत पत्रकारिता से जुड़ा रहने के बाद मैंने अपना साप्ताहिक अखबार 'आपका शहर' गत तीन वर्षों से प्राकाशित कर रहा हूँ.  भाईंदर क्षेत्र में अनेकानेक ऐसे लोगों ने पत्रकारिता आरंभ कर दी है जिनका पत्रकारिता जैसे गरिमामय क्षेत्र से दूर-दूर तक लेना देना नहीं था. दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो तब पैदा हो गई जब कई वर्षों से इस क्षेत्र में पत्रकारिता कर रहे सम्मानित पत्रकरों ने ऐसे लोगों की चाटुकारिता शुरू कर दी. महज कुछ पैसे की लालच में पत्रकारिता को कलंकित होता देख मेरे मन में खेद उत्पन्न हुआ.

इसकी गरिमा को बनाये रखने के उद्देश्य से स्वच्छ पत्रकारिता की एक मुहिम छेड़ने का निश्चय करते हुए मैंने मिरा रोड से लेकर दहाणू-पालघर के समाचार संकलित करते हुए एक वेबसाइट www.aapkashahar.com आरंभ किया है. मैं, आपके माध्यम से ऐसे पत्रकार बंधुओं से सहयोग की अपेक्षा रखता हूँ जो पत्रकारिता की गरिमा को बनाये रखने में विश्वास रखते हों और मेरे कवरेज क्षेत्र में रहते हों. मेरा विनम्र निवेदन है कि मिरा रोड, भाईंदर, वसई, विरार, पालघर, बोइसर, डहाणू इलाकों में घटित होनेवाली छोटी-बड़ी सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक घटनाओं के समाचार हमें इमेल द्वारा भेजें ताकि हम उन्हें वेबसाइट पर स्थान दे सकें. आशा है कि आप bhadas4media.com पर मेरे अनुरोध को स्थान देकर इस संदेश को स्वस्थ पत्रकारों तक अवश्य पहुँचायेंगे.

धन्यवाद
आपका विश्वासु
ओमप्रकाश सिंह
संपादक – आपका शहर
8268031123 / 9320915026

देहरादून में युवा पत्रकारों के संगठन ने महिला दिवस पर गोष्ठी का आयोजन किया

देहरादून : उत्तराखंड राज्य में पहली बार ऐसा हुआ जब पत्रकारों की पहल पर महिला दिवस को आधार बनाकर महिला मुद्दों पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। महिला दिवस के दिन होली और इससे पहले छह मार्च को मतगणना होने के कारण चार मार्च को आयोजित हुए इस कार्यक्रम में 27 युवा पत्रकारों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। राजधानी के हिन्दी साहित्य समिति भवन में युवा पत्रकारों के नवजात संगठन इंडियन यूनियन आफ प्रोगेसिव जर्नलिस्ट ने इस गोष्ठी का आयोजन किया। महिला मुद्दे और मीडिया विषय पर आयोजित गोष्ठी में बतौर अतिथि और वक्ता महिला समाख्या की राज्य निदेशक गीता गैरोला और समाजसेवी डा. डीएस पुन्डीर ने अपनी बात रखी।

गोष्ठी में बतौर प्रथम वक्ता प्रवीन कुमार भट्ट ने कहा कि महिलाओं के मूलभूत मुद्दों का विधानसभा चुनावों में राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे में जगह नहीं बना पाना गंभीर सवाल है। राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे में महिला मुद्दे हासिए में होने से साफ है महिलाओं के प्रति राजनीतिक पार्टियां कितनी संवेदनहीन हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया ने भी महिला मुद्दों को राजनीतिक दलों द्वारा उपेक्षित किए जाने को कभी सवाल नहीं बनाया। एक स्वतंत्र इकाई के रूप में महिला के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सवालों को मीडिया ने अलग से जगह देने की पहल करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक ओर तो राजनीतिक दल इस बात की खुशी बना रहे हैं कि राज्य में 50 फीसदी पंचायतों में स्थान महिलाओं के लिए सुरक्षित किए गए हैं लेकिन दूसरी ओर इसी व्यवस्था ने राज्य में प्रधान पति जैसा एक मजबूत वर्ग भी पैदा कर दिया है। अगर सरकार वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करना चाहती हैं तो पंचायतों में चुनकर आ रही महिलाओं को रानजीतिक रूप से सशक्त बनाने का काम क्यों शुरू नहीं हो पाया। उन्होंने मीडिया संस्थानों के भीतर महिलाओं की स्थिति पर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को दोयम समझे जाने से मीडिया भी आज तक खुद को अलग नहीं कर पाया है।

डा. डीएस पुण्डीर ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि महिला मुद्दों पर हर स्तर पर काम किए जाने की जरूरत है। क्योंकि महिलाओं के साथ उनकी पैदाईश के पहले से ही भेदभाव किया जाना शुरू हो जाता है। महिला भ्रूण की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। इस क्षेत्र में ही जितना कुछ काम किया जाना चाहिए वह मीडिया में नहीं हो पा रहा है। इसी तरह जन्म के बाद महिला शिशु की परवरिश के सवाल पर तथा उसके बाद वयस्कों के शारीरिक, मानसिक बदलावों के बारे में फिर महिलाओं के विवाह के सवाल पर हर जगह नए विचारों के साथ बहुत काम किया जाना चाहिए। डा. पुन्डीर ने मीडियाकर्मियों से कहा कि वे लिखने से पहले अगर मुद्दे की ठीक से पड़ताल कर लेंगे तो लेखन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

गीता गैरोला ने कहा कि आज चाहे बच्चे के जन्म का उत्सव हो या फिर शादी हर छोटे-बड़े आयोजन को बाजार तय कर रहा है। बाजार का यह दखल और नियंत्रण अवाम के व्यवहार में शामिल हो चुका है। लड़कियों तथा महिला पत्रकारों को बाजार के इन प्रभावों को पहचानने की प्रक्रिया में निरंतर प्रयास करना होगा। जनकवि चंदन सिंह नेगी ने कहा कि पुरूषों को भी महिला मुद्दों पर संवेदनशील हो कर सोचना होगा। इस विचार गोष्ठी का संचालन सुनीता ने किया। अपनी बात रखते हुए कमल भट्ट ने कहा कि महिलाओं की मुकम्मल आजादी के लिए जरूरी है कि किचन के काम और बच्चों को पालने के काम को जिसे अनुत्पादक श्रम माना जाता है, इसका सार्वजनिकीकरण किया जाए। बच्चों की देखरेख के लिए सार्वजनिक क्रैच, सामुदायिक भोजनालय तथा बड़ी-बड़ी लांड्रियां स्थापित की जानी चाहिए।

दिल्ली से आए पत्रकार रोहित जोशी ने कहा कि महिलाओं को सामाजिक उत्पादन की मुख्यधारा में लाना होगा। इसका उदाहरण हमारे ही समाज में मौजूद भी है। महिला पत्रकारों की स्थितियों को लेकर रोहित ने कहा कि महिला पत्रकारों या पत्रकारों की स्थितियां पूरे देश में ही एक जैसी हैं। लेकिन साथ ही उन्होंने वैकल्पिक मीडिया को महिला मुद्दों के लिए उचित मंच बताया और सुझाया कि बुनियादी सवालों के लिए बाजार आधारित मीडिया के बजाय वैकल्पिक माध्यम बेहतर विकल्प बन सकते हैं। इस विचार गोष्ठी में अंषुल डांगी, नलिनी गुसाई, रजनी सुयाल, ऊषा रावत, सैलिना, जावेद अख्तर, सबा रहमान, प्रेम पंचोली, सुप्रिया रतूड़ी, हरदीप शर्मा, मनोज, ललित, मीना नेगी, विवेक, कनिका, अमित, ममता सिंह, शालिनी, अमरनाथ सिंह, इंद्र सिंह नेगी, रोहित और मनमीत सहित अनेक युवा पत्रकारों ने विचार साझा किए तथा भागीदारी की।  

महिला मुद्दे और मीडिया विषय पर आयोजित चर्चा के एकत्रित हुए सभी युवा पत्रकारों का मानना था कि समाज के बौद्धिक तबके से ताल्लुक रखने वाली पत्रकार बिरादरी के बीच मुद्दा आधारित बहसों का माहौल बनाए जाने की सख्त आवश्यकता है। राजधानी की पत्रकार बिरादरी और खास तौर से युवा पत्रकारों के विकास में यह बहुत सार्थक भूमिका निभाएगा।

प्रवीन कुमार भट्ट की रिपोर्ट.

वर्धा विवि में कुछ बेहतर दे पाऊं तो आना सार्थक हो जाए : संजीव

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में ‘राइटर-इन-रेजीडेंस’ के रूप में जुड़ने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकार संजीव तकरीबन सवा सौ कहानियां, उपन्‍यास और विविध किस्म के लेखन कर चुके हैं. साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में कार्यकारी संपादक के रूप में ख्‍यातिलब्‍ध संजीव ने समाज के झंझावातों से जूझने के लिए कलम को हथियार बनाया. ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पांव तले की दूब’, ‘जंगल जहां शुरू होता है’, ‘सूत्रधार’, ‘रानी की सराय’, ‘आकाश चम्‍पा’, ‘रह गई दिशाएं इसी पार’ जैसे उपन्‍यास रचने वाले संजीव, आज साहित्‍य जगत की एक अज़ीम शख़्शियत हैं क्योंकि उनके लेखन का सरोकार संसार के सबसे कमजोर तबके के साथ जुड़ता है; साथ ही, उनके साहित्य में भारतीय समाज एवं आदिवासी संस्कृति का यथार्थ चित्र परिलक्षित होता है.

उन्‍होंने ‘तीस साल का सफरनामा’, ‘आप यहां हैं’, ‘भूमिका और अन्‍य कहानियां’, ‘प्रेतमुक्ति’, ‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’, ‘ब्‍लैक होल’, ‘खोज’, ‘गति का पहला सिद्धांत’, ‘गुफा का आदमी’, ‘दस कहानियां’, ‘गली के मोड़ पर सूना-सा कोई दरवाजा’, ‘संजीव की कथायात्रा-पड़ाव-1,2,3’, ‘झूठी है तेतरी की दादी’ जैसे कथा संग्रह हिंदी जगत के पाठकों को दी हैं. उनकी कृतियों पर जीटीवी ने ‘काला हीरा’ टेली फिल्‍म तथा दूरदर्शन ने ‘अपराध’ जैसी फिल्‍म का निर्माण किया है. इतना ही नहीं, श्‍याम बेनेगल निर्देशित फिल्‍म ‘वेलडन अब्‍बा’ भी उनकी कहानी ‘फुलवा का पुल’ पर अंशत: आधारित है.

‘इन्‍दु शर्मा स्‍मृति अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मान’, ‘भिखारी ठाकुर लोक सम्‍मान’, ‘पहल सम्‍मान’, ‘सुधा स्‍मृति सम्‍मान’ ‘कथाक्रम सम्‍मान’ आदि से सम्‍मानित संजीव की रचनाधर्मिता पर टिप्‍पणी करते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार व विवि के नाट्य एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के प्रो. सुरेश शर्मा ने कहा कि संजीव नए दौर के उन कथाकारों में हैं जिन्‍होंने आज के समय को अपनी कहानियों में गहरी संवेदनात्‍मकता के साथ उजागर किया है. उनकी कहानियों के चरित्र हमें आज के यथार्थ की दुनिया के वास्‍तविक स्‍वरूप को सामने लाते हैं. उनकी भाषा में ऐन्द्रिकता और भाव प्रवणता है. इन्‍होंने ‘हंस’ के संपादन में सहयोग करके साहित्यिक प‍त्रकारिता के नए मानदंड स्‍थापित किए हैं.

विवि के अहिंसा एवं शांति अध्‍ययन विभाग के असिस्‍टेंट प्रोफेसर व युवा कहानीकार राकेश मिश्र कहते हैं कि कथाकार संजीव के आने से निश्चित ही कैम्‍पस को नई ऊंचाईयां प्राप्‍त होंगी. संजीव न सिर्फ एक बेहतरीन कहानीकार हैं बल्कि उनकी उपस्थिति उनके परवर्ती रचनाकारों के लिए हमेशा प्रेरणास्‍त्रोत की तरह रही है. नब्‍बे के दशक के अधिकांश कहानीकार जैसे- सृंजय, नरेन, गौतम सान्‍याल, जयनंदन, अवधेश प्रीत आदि कहीं न कहीं संजीव से प्रेरित कहानीकार रहे हैं. ‘हंस’ के संपादन सहयोग करने से पहले भी उन्‍होंने ‘वागर्थ’ के नई पीढ़ी अंक का चयन कर इस नए रचनात्‍मकता को पहचानने में अपनी महती भूमिका निभाई थी.

एक सजग प्रतिबद्ध और मेहनती कथाकार के कैंपस में रहने से यहां के विद्यार्थी और रचनाधर्मी लोगों को बड़ा लाभ मिल सकेगा. ‘अपराध’, ‘लिटरेचर’, ‘आरोहण’, ‘सागर सीमांत’, ‘पूत-पूत, पूत-पूत’ जैसी उनकी कहानियां जन पक्षधरता की लाजवाब मिसाल है. उनकी कहानियां साहित्‍य और विचारधारा के अदभुत सामंजस्‍य के साथ लिखी गई कहानियां हैं जिससे साहित्‍य का जनप्रतिनिधि का स्‍वरूप निर्मित होता है. राहुल सांस्‍कृत्‍यायन के बाद शोधपरक लेखन की परंपरा को संजीव ने आगे बढ़ाया है और वर्जित क्षेत्रों का अवगाहन किया है. संजीव की पहचान शोध करके लिखने वाले लेखकों की रही है. ‘जंगल जहां शुरू होता है’ और ‘सूत्रधार’ जैसे उपन्‍यास उनके दीर्घ शोध का ही नतीजा है. अभी सद्य प्रकाशित उनका उपन्‍यास ‘रह गई दिशाएं इसी पार’, विज्ञान की समस्‍त संभावनाओं और फंतासियों का ऐसा वास्‍तविक निरूपण करती है जो समकालीन हिंदी साहित्‍य ही नहीं बल्कि किसी भी भारतीय भाषा के साहित्‍य में एक अविरल उपस्थिति है.

कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा विश्‍वविद्यालय में राइटर-इन-रेजीडेंस पद पर नियुक्ति किए जाने पर खुशी जाहिर करते हुए संजीव ने कहा कि मैंने लेखनकार्य को ही अपना साथी समझा है, यहां आकर मैं दवाबों से मुक्‍त होकर समाज के लिए कुछ बेहतर दे पाऊं तो आना सार्थक हो जाएगा. विवि की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि यह विवि अपने मिशन और विजन में नई बुलंदियों को छू रहा है. साथ ही यह अपने नाम के अनुरूप पूरी तरह से अंतरराष्‍ट्रीय बन रहा है. जिस तरह प्राचीन काल में नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला अंतरराष्‍ट्रीय विवि था, जहां पर विश्‍व के अनेक देशों से छात्र-अध्‍यापक अध्‍ययन-अध्‍यापन करने के लिए आते थे, उसी प्रकार यह विवि भी अपनी पहचान बना पाएगा. अब यहां विदेशी विद्यार्थियों, अध्‍यापकों व विशेषज्ञों को बुलाया जा रहा है.

हिंदी विश्‍वविद्यालय में परंपरागत पाठ्यक्रमों से इतर मानविकी, समाजविज्ञान, प्रबंधन, आई.टी., फिल्‍म व नाटक अध्‍ययन जैसे विषयों में हिंदी माध्‍यम से उच्‍च स्‍तर पर अनुसंधान कार्य कराए जाने के संबंध में उन्‍होंने कहा कि इससे हिंदी का भूमंडलीकरण होगा. उन्‍होंने बताया कि महत्‍वपूर्ण उपन्‍यासकार के रूप में प्रसिद्ध हो चुके कुलपति विभूति नारायण राय हिंदी को आधुनिक तकनीक से जोड़ने में महारत हासिल है. यही कारण है कि वे हिंदी के संपूर्ण महत्‍वपूर्ण साहित्‍य को इंटरनेट पर उपलब्‍ध करा रहे हैं. विवि के त्‍वरित विकास की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि कुलपति ने न सिर्फ प्रशासनिक कुशलता व दूरदर्शिता से इसे एक नया मुकाम दिया है बल्कि अकादमिक गुणवत्‍ता के मामले में भी उन्‍होंने बेहतर सुविधाएं उपलब्‍ध कराई हैं. उन्‍होंने आशा जताई कि, यहां के विद्यार्थी एक बेहतर समाज के निर्माण में अपना अमूल्‍य योगदान दे सकेंगे. कथाकार संजीव की नियुक्ति पर विश्‍व‍विद्यालय के अधिकारी, अध्‍यापक, कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थियों ने बधाई दी है.

राजेंद्र यादव के ठीक पीछे ब्लू शर्ट में दिख रहे हैं कथाकार संजीव
राजेंद्र यादव के ठीक पीछे ब्लू शर्ट में दिख रहे हैं कथाकार संजीव

एमडी से शिकायत- इंचार्ज हम लोगों से वसूली कर रहा है!

गोरखपुर। जनसंदेश का तिलिस्म दो माह के अन्दर ही टूटने लगा। स्थानीय डेस्क इंचार्ज के उत्पीड़न और भ्रष्ट प्रवृत्तियों के कारण अब यहां के पत्रकारों का मोहभंग होने लगा है. हालत यह है कि सम्पादक डा. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी के दिखाये गये झूठे सब्जबाग से उबकर अब ईमानदार व तेज तर्रार पत्रकार इस संस्थान को अलविदा कहने लगे हैं. इसकी शुरुआत किया है आई-नेकस्ट छोड़ कर जनसंदेश ज्वाइन किये अनुराग तिवारी ने. उन्होंने स्थानीय डेस्क इंचार्ज राजीव रंजन तिवारी के मूर्खतापूर्ण निर्णयों और पहले माह में ही किश्तों में वेतन वितरण से क्षुब्ध हो इस्तीफा देकर लखनऊ चले गये.

लखनऊ में ज्वाइन करने के बाद अनुराग तिवारी ने डा. शैलेन्द्र मणि को एक लम्बा चौड़ा ईमेल भेज कर जनसंदेश में चल रहे कुचक्रों और प्रतिभावान पत्रकारों को हतोत्साहित करने वाले स्थानीय डेस्क प्रभारी के कार्यां की विस्तृत जानकारी दी. मगर डा. शैलेन्द्र मणि इसके बाद भी मौन रहे. ताजी सूचना है कि होली के चार दिन पूर्व स्थानीय डेस्क के रिपोर्टरों से होली गिफ्ट के रूप में किसी से खोवा, किसी से शराब, किसी से ड्राईफ्रूट, साड़ी कपड़ा आदि लाकर देने को कहा गया. बताते हैं कि खोवा मनीष शुक्ला ने दिया, शिव सिंह ने दो बोतल शराब लाकर दिया, नीरज श्रीवास्तव ने साड़ी कपड़ा बच्चों की पिचकारियां आदि लाकर दिया. उत्कर्ष श्रीवास्तव से ड्राईफ्रूट लाकर देने को कहा गया. इन्हीं में से किसी ने इस वसूली की शिकायत कंपनी के एमडी अनुज पोद्दार तक कर दी.

यह पूरी कहानी पिछले कई दिनों से गोरखपुर के मीडिया जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है. उल्लेखनीय है कि अभी कुछ माह पूर्व ही सपा नेता लाल अमीन द्वारा एक प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद पत्रकारों को पांच पांच सौ रुपये नकद देने का शिव सिंह ने कड़ा विरोध किया था और शिव सिंह की इस ईमानदारी पर गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने उन्हें सम्मानित भी किया था. मगर आज यही ईमानदार अपनी नौकरी बचाने एवं वेतन बढ़वाने के लिए अपने इंचार्ज के नाजायज मांगों के आगे झुकने को मजबूर हो गया. आश्चर्य यह है कि सारी कहानी सार्वजनिक हो जाने के बाद भी डा. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी मौन हैं. देखना यह है कि कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर अनुज पोद्दार कोई कड़ा कदम उठाते हुए ईमानदार पत्रकारों की हौसला अफजाई करते हैं या मौन साध कर जनसंदेश गोरखपुर में लूट की खुली छूट को प्रोत्साहित करेंगे.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पत्रकार काजमी को ईरान के साथ काम करने की ऐसी सजा न दें : सईद नकवी

: काजमी के बारे में जानकारी छुपा रही भारत सरकार : दिल्ली : इस्राइली दूतावास की कार पर हमले मामले में गिरफ्तार सैयद अहमद काजमी दूरदर्शन में ऊर्दू न्यूज रीडर भी है। यह बात अब पता चली है लेकिन सरकार इस बात को छिपा रही है। यह दावा एक इस्राइली अखबार ने किया है। काजमी के समर्थन में संसद के पास स्थित प्रेस क्लब में शुक्रवार को आयोजित प्रेसवार्ता में लोगों ने मोहम्मद काजमी को निर्दोष बताया। इस दौरान मोहम्मद काजमी का बेटा भी मौजूद था। लोगों ने मामले की पारदर्शिता पूर्ण और सही तरीके से जांच कराने की मांग की है।

दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (डीयूजे) द्वारा आयोजित प्रेसवार्ता में मोहम्मद काजमी के बेटे शौजब ने कहा कि मेरे पिता निर्दोष हैं। उन्होंने देश के लिए इराक युद्ध कवर किया। शौजब ने आरोप लगाया कि पुलिस पिता को मानसिक रुप से प्रताड़ित कर रही है। रिश्तेदारों को भी पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है। गिरफ्तारी मेमो पर पिता के जबरदस्ती हस्ताक्षर करवाए गए हैं। पिता का 25 साल से पीआईबी से एक्रीडिएशन है। घर में कभी कोई ईरानी नहीं ठहरा। जिस स्कूटी को पुलिस ने जब्त किया है वह दो साल से घर में खड़ी थी। मेरठ के रहने वाले उसके चाचा स्कूटी को एम्स जाने के लिए प्रयोग करते थे।

वहीं, काजमी के दोस्त सईद नकवी ने कहा कि काजमी बहुत ही ईमानदार है। उसे ईरान और पश्चिमी एशिया के साथ काम करने की सजा ऐसे नहीं देनी चाहिए। काजमी हाल ही में डेलीगेशन के साथ सीरिया गया था। काजमी को इंडिया इस्लामिक सेंटर के बाहर से गिरफ्तार किया गया। जबकि घर उसे रात में ले जाया गया। प्रेसवार्ता के दौरान कुछ संदिग्धों को घूमते देखा गया। इस पर पत्रकारों ने नारेबाजी और हंगामा किया। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि संदिग्ध आईबी के लोग थे, जिन्हें पत्रकार पुलिसकर्मी समझ बैठे। हंगामा और नारेबाजी काफी देर तक होती रही। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हुआ।

ईरानी समाचार एजेंसी के लिए काम कर रहे पत्रकार सैयद अहमद काजमी की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता और इस मामले की जांच कर रहे डीसीपी अशोक चांद व एसीपी संजीव यादव ने गृहसचिव आरके सिंह के मुलाकात कर इस मामले का ब्यौरा दिया। इस सवाल पर कि इतनी बड़ी वारदात के बाद इमिग्रेशन में ईरानी नागरिकों पर सख्त नजर क्यों नहीं रखी गई, गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इमिग्रेशन पर नजर रखने के आदेश बैंकाक में हुए आतंकी हमले के बाद दिए गए थे।

उस हमले के बाद ही भारतीय एजेंसी को लगा कि दिल्ली की घटना के अंतरराष्ट्रीय तार जुड़े हैं। मुमकिन है कि इसी देरी की वजह का फायदा इन चार ईरानी नागरिकों ने उठाया। मालूम हो कि दिल्ली में हमले के चंद घंटे बाद ही इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वारदात में ईरानी के लोगों के शामिल होने की बाद कही थी। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने उस वक्त यह जरूरी नहीं समझा कि देश से बाहर जाने वाले ईरानी नागरिकों की जांच की जाए।

वरिष्ठ पत्रकार इफ्तिखार गिलानी जैसा है पत्रकार काजमी का प्रकरण

: दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल को भंग करने की मांग : राजधानी दिल्ली में शनिवार को नागरिक समाज से जुड़े अलग-अलग समूहों ने इसराइली दूतावास की कार पर हुए हमले के मामले में पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ्तारी के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की. 'हम लड़ेंगे साथ उदास मौसम के खिलाफ' के नारे के साथ नागरिक समाज के इन लोगों ने दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को भंग करने की मांग की. उनका कहना था कि काजमी पर उसी तरह से ही झूठे आरोप लगाए गए है और गिरफ्तार किया गया है जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार इफ़्तिखार गिलानी के साथ वर्षों पहले किया गया था.

गौरतलब है कि वर्ष 2002 में जम्मू से प्रकाशित होने वाले अखबार 'कश्मीर टाइम्स' के उस समय दिल्ली के ब्यूरो चीफ रहे इफ़्तिखार गिलानी को सरकारी गोपनीयता कानून के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें सात महीनों तक जमानत नहीं मिली और आखिरकार जब पुलिस को कोई सबूत नहीं मिल सका तो इफ़्तिखार गिलानी जनवरी 2003 में रिहा हुए. शनिवार को सैयद मोहम्मद काजमी के समर्थन में जमा हुए लोगों का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय लॉबी को खुश करने के लिए काजमी को बलि का बकरा बनाया जा रहा है.

उधर दिल्ली पुलिस प्रवक्ता राजन भगत ने इस मामले में कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया. नागरिक समाज के समूह में पत्रकार, शिक्षक, समाजसेवी, लेखक और दूसरे कार्यकर्ता शामिल हैं. वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी का कहना था कि वो काजमी को साल 2003 से करीब से जानते हैं. नकवी ने कहा, ''काजमी ईरान के मामलों के जानकार है. उन्हें ऊर्दू, फारसी, पश्तो और अरबी भाषा आती है और इराक युद्ध के दौरान कवरेज के लिए उन्होंने पत्रकारों की काफी मदद भी की थी.''

इस मौके पर काजमी के छोटे बेटे तुराब अली काजमी भी मौजूद थे. उन्होंने पत्रकारों से उनके पिता और परिवार की मदद करने के लिए कहा. तुराब का कहना था, ''मेरे पिताजी बेकसूर है. वो 20-25 साल से मध्यपूर्व की रिपोर्टिंग करते रहे हैं और वो इराक युद्ध की कवरेज भी कर चुके हैं. उनके खिलाफ साजिश रची गई है. मेरी दो दिन पहले अपने पिता से मुलाकात हुई थी, उनका चेहरा उतरा हुआ था और उन्हें मानसिक यातना भी दी गई थी. मेरी उनसे ज्यादा बात नहीं हो पाई.'' तुराब ने ये भी कहा कि पुलिस उनके परिवार वालों को भी उनके पिता से नही मिलने दे रही है.

दिल्ली में गत 13 फरवरी को इसराइली दूतावास की गाड़ी पर हुए हमले के लिए पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ़्तारी के बाद अदालत ने उन्हें 20 दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया है. काजमी की गिरफ्तारी पर दुख जताते हुए गैर सरकारी संगठन अनहद की शबनम हाशमी ने कहा, ''उत्तर प्रदेश में साल 2007 में सिलसिलेवार बम धमाके हुए, 2008 में जयपुर, बैंगलोर और दिल्ली में बम धमाके हुए और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया लेकिन चरमपंथ के मामलों के जानकार इंडियन मुजाहिद्दीन के बारे में कुछ बता नहीं पाए है कि वो है क्या. आज तक एक भी मामले में जुर्म साबित नहीं हुआ है. अगर जुर्म साबित हुआ है तो केवल समझौता धमाके में और इस बारे में हमारी गलती रही है कि हम चुप रहे हैं."

पत्रकार सीमा मुस्तफा ने पत्रकारों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि पत्रकार पुलिस सुत्रों या सरकारी एजेंसी से खबरें लेकर छाप रहे है. पत्रकार काजमी के परिवार या उनके परिवारवालों से मिलकर स्वतंत्र रिपोर्टिंग क्यों नहीं कर रहे हैं? सीमा मुस्तफा ने तो दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को भंग करने की मांग की. उन्होंने कहा, ''दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के खिलाफ एनकाउंटर, बलात्कार और हत्या करने के कई मामले है जिसकी जांच होनी चाहिए. इसे भंग किया जाना चाहिए. अगर ये नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे पा रहा है बल्कि उसे छीन रहा है तो उसको खत्म कर देना चाहिए.''

स्पेशल सेल के खिलाफ आने वाले मामलों को अपने हाथ में लेने वाले वकील एनडी पांचौली का कहना था, ''स्पेशल सेल का तजुर्बा अच्छा नहीं रहा है. कई मामलों में हमने पाया कि उन्होंने बेगुनाह लोगों को पकड़ा और ज्यादातर मामलों में बनावटी सबूत दिए हैं. स्पेशल सेल और उसमें शामिल कई लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले भी पाए गए है और अदालत ने भी इन पर कई बार कड़ी टिप्पणी की है, तो ऐसे स्पेशल सेल को ये मामला देकर सरकार ने ठीक नहीं किया है.''

वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी का कहना था कि उन्होंने काजमी की रिहाई को लेकर शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्केडय काटजू, सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान के अलावा दूसरे कई लोगों से बात की थी. सईद नकवी के अनुसार सबों ने उन्हें इस बारे में कुछ करने का यकीन दिलाया है. उनका कहना था कि सरकार तो चुनाव के नतीजों के बाद से ही चुप है लेकिन सरकार को इस पर वक्तव्य देना चाहिए.

बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह की रिपोर्ट. साभार – बीबीसी

अब भी विश्‍वास नहीं हो रहा सुनील पाठक चला गया

कल यानी शुक्रवार की शाम मैं अपने ऑफिस में न्यूज़ फाइल करने की तैयारी कर रहा था कि अचानक मेरे सेल फ़ोन की घंटी बजती है.. देखा तो एक पुराने परचित का फ़ोन था… उन्होंने घबराहट भरे आवाज में मुझसे पूछा कि कुछ पता चला… मैं ने कहा- नहीं तो… तब उन्होंने बड़े ही दर्द भरे आवाज और अंदाज से कहा कि सुनील अब इस दुनिया में नहीं.. वह हमलोगों को छोड़कर चला गया…  तो ऐसा लगा जैसे कानों में कोई पिघलता हुआ शीशा डाल दिया हो… दिमाग में बम जैसा फूटने लगा…क्‍योंकि अभी तीन दिन पहले ही सुनील से मेरी बात हुई थी.. सब कुछ ठीक था.

मैंने इस बातचीत के दौरान सुनील को चाय पर भी बुलाया था लेकिन वो नहीं आया… मैंने भी सोचा कि काम का दबाव ज्‍यादा हो.. इसलिए ज्‍यादा कोशिश नहीं किया.. क्‍योंकि अक्‍सर ऐसा होता था कि उसे शाम में समय बहुत कम मिल पाता था… सहसा मुझे इस खबर पर विश्‍वास नहीं हुआ… मैंने सच्‍चाई जानने के लिए उससे मोबाइल पर रिंग किया तो फोन उसके भाई ने उठाया और कहा कि सही बात है.. सुनील हमलोगों को छोड़कर चला गया… उसके भाई का रुदन मुझे अंदर तक झकझोर गया… ऐसा लगा जैसे मेरा होश ही कहीं खो गया… सुनील के साथ बिताया हर पल.. हर लम्‍हा… आंखों के सामने घूमने लगा.

बात साल 2001 की है… जब 20-21 साल का नौजवान दैनिक जिम्‍मेदार के ऑफिस में पत्रकार बनने की इच्‍छा लेकर आया था… उस दौरान मैं भी वहीं पर काम कर रहा था… उससे बातचीत किया तो पता चला कि उसने बीकॉम कर लिया है और एमकॉम की पढ़ाई कर रहा है… उसके बातचीत के अंदाज ने मुझे प्रभावित किया… धीरे-धीरे हम एक दूसरे के करीब आते चले गए… हम दोनों लोगों के बीच अच्‍छी समझ और दोस्‍ती हो गई… फिर क्‍या था समय का पहिला घूमता रहा… चीजें अपनी वेग से चलती रहीं.. इसी बीच न्‍यूज पेपर बंद हो गया… और यहां काम करने वाले हम सब लोग बेरोजगार हो गए.

मैंने एक नए अखबार में नौकरी शुरू कर दी… सुनील भी कई अखबारों के दफ्तरों का चक्‍कर लगाया पर बात नहीं बनी… फिर भी उसने हार नहीं मानी और अपने हार ना मानने वाले स्‍वभाव के अनुसार कोशिश लगातार जारी रखी… कई रोज जब वह तमाम अखबार के कार्यालयों से मिल जुलकर शाम को वापस आता तो निराश दिखता… पर हर बार हम उसका हौसला बढ़ाते और कहते कि सुनील कोशिश जारी रखो सफलता जरूर मिलेगी… वह फिर से चार्ज हो जाता… एक सप्‍ताह बाद उसने आकर खुद बताया कि भाई दैनिक जागरण में काम मिल गया है… पर मिलेगा कुछ नहीं.. फिर भी अभी वहीं काम करूंगा.. कभी न कभी तो कुछ जरूर मिलेगा.

इसके कुछ दिन बाद वो फिर एक बार मुझसे मिला और बताया कि भाई अब जागरण उसे 300 रुपये देने लगा है… फिर समय बीतता रहा… कुछ समय बाद उसने खबर दिया कि अब उसकी सेलरी बढ़कर 7000 रुपये हो गई है… हम सब बहुत खुश थे… कुछ दिनों के बाद उसके नाम से भी खबर छपने लगी थी… फिर क्‍या बस मेरे दोस्‍त ने इतनी महारत हासिल कर ली कि हर सप्‍ताह दो-चार खबरें सुनील पाठक के नाम से लगने लगीं..प्रशासनिक खबरों के मामले में तो कहना ही क्‍या… उसका कोई जोड़ नहीं था… अपनी धुन का इतना पक्‍का की खबर सूंघकर पता लगा लेता था… पूरे विकास भवन में सुनील की तूती बोलती थी… मैं जब भी उसके साथ जाता तो उसकी तेजी ही देखता रह जाता.

मैं सुनील को अपने छोटे भाई जैसा प्‍यार करता था… कोई भी खबर होती सुनील पाठक को फोन लगाता काम हो जाता था… अब सोचता हूं कि अब जब कि वो नहीं है… हम किससे इतने अधिकार से बात करेंगे… कोई भी मुसीबत होती और उसे कॉल करता तो बस एक बात ही कहता… ठाकुर साहब आपने जो फैसला ले लिया हम आपके साथ हैं… हमें आपकी दोस्‍ती प्‍यारी है… हम किसी की परवाह नहीं करते… अब सोचता हूं कौन मुझसे ये सब कहेगा… कौन मेरे फैसले के साथ खड़ा होगा… पर इन सब बातों के बीच मुझे एक बात अब भी कचोट रही है… कष्‍ट दे रही है कि वो सुनील जो इतना साहसी था… उसने फांसी क्‍यों लगाई?

ये सवाल अब भी मुझे खाए जा रहा है कि मेरा साहसी दोस्‍त ऐसा कैसे कर सकता है… जबकि उसकी पत्‍नी और दो मासूम बेटे भी हैं…. सुनील फैजाबाद के अश्‍वनीपुरम कालोनी में अपने बड़े भाई के साथ रहते थे…. सोचा जा रहा था कि बीएड कर लिए हैं… जल्‍द ही सरकारी नौकरी मिल जाएगी और पत्रकारिता भी अच्‍छे से चलती रहेगी….लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था… सुनील हम सब को छोड़कर चला गया… फिर भी उस दोस्‍त की यादें हम सभी दोस्‍तों के जेहन में हमेशा ताजा रहेंगी… हम ईश्‍वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्‍मा को शांति मिले.. और परिवारवालों को हिम्‍मत.. प्रिय भाई सुनील को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि.. जय हिंद!!!

कुंवर समीर साही

पत्रकार

अयोध्‍या, फैजाबाद

अकाली दल की जीत में पीटीसी न्‍यूज भी श्रेय का हकदार

पंजाब का जाने पहचाने चैनल पीटीसी न्‍यूज पर चुनाव के दौरान आरोप लग रहे थे कि उसने अकाली एवं भाजपा गंठबंधन की सरकार को फायदा पहुंचाने के लिए करार कर रखा है. अकाली दल के पक्ष में खबरें दिखाई जा रही हैं, परन्‍तु पीटीसी प्रबंधन ने हर बार इससे इनकार किया तथा किसी भी दल से इस तरह का एलायंस होने की बात को खारिज कर दिया. पर अकाली-बीजेपी गंठबंधन की पंजाब में जीत के बाद पीटीसी ग्रुप के अध्‍यक्ष रबींद्र नारायण का मेल इन सारी बातों को गलत साबित कर रहा है.

अध्‍यक्ष ने अपने सहयोगियों को बधाई देते हुए भेजा गया मेल खुद सारी कहानी कह रहा है. इस मेल से साबित हो रहा है कि पीटीसी न्‍यूज ने पत्रकारिता के मानकों से हटकर अकाली दल एवं भाजपा को फायदा पहुंचाने का काम किया था. नीचे रबींद्र नारायण द्वारा भेजा गया ई-मेल-


Subject: Congrats

I was flooded with compliments through out the day. Everyone had one opinion. PTC has a lot of credit in Akali victory today. People lifted me in exuberation and I felt proud for all of us. They were not lifting me in air…. It was all of us being lifted in air. It was PTC. Wish YOU were there to see the respect and awe in the eyes of people for PTC.

All through the last five years, each one of you at PTC worked against odds, amidst criticism and faced threats and rebukes. In recent times, our reporters were pushed, shoved, publicly insulted and humiliated. But creditably none of us retaliated to pressures put on us by Congress and its leaders. We maintained our dignity and stature.

PTC chose to stay quiet and let its work speak. Its voice became the voice of Punjab. Those who boycotted PTC, today stand boycotted by Punjab. And all this became possible due to the untiring efforts of each of the PTC team member. Well done. Keep it up.

The challenge now is to set new standards of excellence. Let us celebrate the spirit of PTC and rededicate ourselves into building a strong, dignified, authentic and the best regional television network with strong values. In the meanwhile, bask in glory. I am proud to be a part of TEAM PTC.

P.S.: indra to please distribute this mail to everyone as i dont have all email addresses

RABINDRA NARAYAN
President
PTC NEWS, PTC PUNJABI & PTC CHAK DE


 

जार के जिलाध्‍यक्ष के साथ मारपीट एवं अपहरण की कोशिश

करौली के राजस्थान पत्रकार संघ के जिलाध्यक्ष तरुण सैनी के साथ 9 मार्च को मारपीट के बाद अपहरण का प्रयास किया गया था. परन्‍तु कुछ साथी पत्रकारों के पहुंच जाने के चलते वे असमाजिक तत्‍व अपने काम को अंजाम देने में सफल नहीं हो सके. तरुण के साथ हुई इस घटना पर सवाई माधोपुर के पत्रकार और राजस्थान पत्रकार संघ (जार) ने आक्रोश व्यक्त किया है. उन्‍होंने आरोपियों को तत्‍काल गिरफ्तार करने की मांग की है.

धुलंडी के दूसरे दिन शाम को तरुण सैनी का कुछ असामाजिक तत्वों ने अपहरण की कोशिश की, पर साथियों पहुंच जाने से वे बच गए. उन्होंने तुरंत ही प्रदेश कार्यालय में इस बात की सूचना दी. इसकी सूचना पुलिस को भी दी गई परन्‍तु बताया जा रहा है कि स्थानीय पुलिस इस मामले में अपहरणकर्ताओं का पक्ष लेते हुए मामले को दबाने का प्रयास कर रही है. सूत्रों का कहना है कि इस मारपीट तथा अपहरण की घटना में उन लोगों का हाथ हो सकता है, जो तरुण सैनी से पहले जार की कार्यकारिणी में वर्षों से कब्‍जा जमाए बैठे थे.

बताया जा रहा है कि पूर्व के पदाधिकारी ना सिर्फ जार पर कब्‍जा जमाए बैठे थे बल्कि जार के नाम पर जमकर चन्दा उगाही भी कर रहे थे. नई कार्यकारिणी बन जाने के बाद इनकी अवैध कमाई पर कुठाराघात सहन नहीं कर पाए. इस मामले में जार के प्रदेश स्‍तर के बर्खास्‍त पदाधिकारियों की गुप्‍त शह की बात भी सामने आ रही है. वर्तमान में प्रदेश अध्‍यक्ष उमेंद्र दाधीच और महासचिव डा. सुरेंद्र शर्मा ने इस मामले को गृहमंत्री तक ले जाने की बात कही है और दोषियों को सजा दिलाने का आह्वान किया है. उन्‍होंने सभी पत्रकारों से अपील की है कि वे तुरंत अपनी सहमति दें और एकजुट हो जाएं कि फिर किसी पत्रकार के साथ ऐसा ना हो.

मनोज व्‍यास को दैनिक भास्‍कर का उत्‍कृष्‍ट पत्रकारिता पुरस्‍कार

दैनिक भास्कर के संवाददाता मनोज व्यास को उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया। मनोज का चयन स्टेट एडिटर, राजस्थान नवनीत गुर्जर द्वारा किया गया। उन्‍हें यह सम्मान दैनिक भास्कर के उदयपुर कार्यालय में कार्यकारी संपादक हरिशचन्द्र सिंह और अशोक सोनी ने प्रदान किया। इस अवसर पर संपादकीय विभाग में कार्यरत उपसंपादकों द्वारा मनोज को बधाई दी गई तथा उनके उज्जवल भविष्य की कामना की गई।

इधर राजस्थान पत्रकार परिषद के सराडा और सलुम्बर के पत्रकारों ने स्टेट एडिटर द्वारा सम्मानित होने पर चावण्ड में महाराणा प्रताप की आराध्य देवी मॉ चामुण्डा के दरबार में मनोज के लिए सम्मान समारोह रखा, जिसमें मनोज व्यास को तिलक, श्रीफल, शॉल और मेवाडी शान पगड़ी पहनाकर स्वागत किया गया। इस दौरान संघ के कन्हैया लाल सोनी, यशवंत सिंह पंवार, भूपेन्द्र चास्टा सहित एक दर्जन पत्रकार मौजूद थे।

उल्लेखनीय है कि भास्कर संवाददाता मनोज व्यास ने जनवरी माह में स्वाभिमान और स्वतंत्रता के पर्याय महाराणा प्रताप की ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण पर कई आर्टिकल लिखे थे, जो पाठकों की पहली पंसद थे। 10 जनवरी को महामहिम के आगमन से पूर्व और महाराणा प्रताप की पुण्यतिथी पर महामहिम के यहां से पुष्पांजलि करने के महज नौ दिन बाद की बदहाल स्थिति सहित प्रताप समाधि स्थल पर बिजली कनेक्शन काटने के मामले प्रमुखता से प्रकाशित किए थे।

Story of Kahaani inspires Vidhya Balan for motherhood

: I am evolving spiritually : Waiting to work with Khan trio : New Delhi : Bollywood diva Vidhya Balan does not mind being labeled as replica of Aamir Khan as she also goes all out to market her films as she did in the case of Dirty Picture, Ishqiya, and now Kahaani. “ While I do not know Aamir Khan personally, I know that he uses different strategies to promote his films. Admittedly, I am inspired by him,” confesses Vidhya Balan in an exclusive interview with Ms. Anurradha Prasad, Editor-in-Chief of News 24 channel, for her weekly show ‘ Aamne-Samne’.

Vidhya Balan was recently promoting ‘ Kahaani ’ in which she is doing the role of a lady who is on her family way. “ The story of Kahaani is really scary as a lady on her family way is searching her missing husband. The very thought of this scenario is frightening. That is the time in the life of every lady when she becomes like Durga.”

‘Are you consciously following the footsteps of Amir Khan ?‘ Riding on the stunning success of her recent hit film ‘Dirty Picture’, Vidhya Balan said, “ It is honour that my name is clubbed with Aamir Khan. I also give hundred per cent in my movies. Later, I promote my films very vigorously. ”

‘Did you hear the rumors that even the famous Khan trio of Bollywood is feeling scared of your growing stature …?’ “ While it may sound very flattering, but Khan trio have achieved so much that I can not think of being clubbed in their big league,” Vidhya Balan told us in all the humility.

Replying to another question, Vidhya Balan expressed her deep desire to work with Shahrukh, Salman and Aamir, adding “ Who would not like to work with them. It is an honour. Hopefully, we will find some good powerful script sooner rather than later.”

‘What is your thoughts on motherhood given the fact that the story of Kaahani is all about a pregnant lady…?’ With her stunning smile, Vidhya reveals that she is waiting to become mother of her own kids though she is not ready to marry for one or two years.

A thinking and very intense Vidhya Balan is deeply religious though she is no longer visit temples very often. “ Well, I do not visit temples very often now as I know that God is everywhere. I think as I am evolving spiritually I am thinking this way,” Vidhya Balan, who loves do different roles in films.

You can watch Aamne-Samne with Vidhya Balan at 8.26 pm on both Saturday (March 10) and Sunday (March11) on News24 channel.
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अँग्रेज़ी-हिंदी मासिक पत्रिका तथा वेबसाइट के लिए ग्राफ़िक डिज़ाइनर की आवश्‍यकता

एक स्थापित पत्रिका को आवश्यकता है एक अनुभवी डिज़ाइनर की जो पत्रिका के क्वॉर्क एक्सप्रेस के लेआउट टेंपलेट्स पर हर महीने काम कर सके। फ्रीलांस आधार पर काम करने वाले को प्राथमिकता दी जाएगी। डिज़ाइनर के पास क्वार्क एक्सप्रेस और इनडिज़ाइन के साथ साथ अडोबी डिज़ाइन स्वीट में काम करने का अनुभव होना चाहिए। हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों भाषाओं में काम करने की क्षमता हो।

फ़ोन तथा ईमेल के द्वारा निर्देश स्वीकार कर पाए। समयबद्ध रूप से प्रेस रेडी डिज़ाइन दे पाए (पीडीएफ़ तथा पीएस)। आदर्श रूप से, डिज़ाइनर हर महीने कुछ प्रिंट क्वालिटी की तस्वीरें उपलब्ध करवा पाए। बेव डिज़ाइन में अनुभव वांछित लेकिन अनिवार्य नहीं। सीवी/रिज़्यूमे (तथा ऑनलाइन पोर्टफ़ोलियो लिंक) के साथ आवेदन aspire.prakashan@gmail.com को भेजें, Subject में Graphic Designer लिखें। प्रेस रिलीज

एमके तनेजा फोकस और हमार टीवी के एवीपी बने

चैनल वन से खबर है कि एमके तनेजा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर जीएम मार्केटिंग के पद पर कार्यरत थे. तनेजा अब पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के चैनल हमार टीवी और फोकस टीवी से जुड़ गए हैं. उन्‍हें यहां पर एसोसिएट वीपी बनाया गया है. उनके पास दोनों चैनलों की नेटवर्किंग और मार्केटिंग की जिम्‍मेदारी है. वे पिछले आठ सालों से मीडिया के फील्‍ड में सक्रिय हैं.   तनेजा वॉयस ऑफ नेशन, ए2जेड और कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस जैसे संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं.

तनेजा के जिम्‍मे आर्थिक दुश्‍वारियों एवं बैंक के कर्ज से जूझ रहे दोनों को निकालने की होगी. उल्‍लेखनीय है कि पॉजिटिव ग्रुप के पुरबिया चैनल हमार टीवी पर इंडियन ओवरसीज बैंक का 52 करोड़ से ज्‍यादा का कर्ज है. समझा जा रहा है कि मार्केटिंग में बढि़या पकड़ रखने वाले तनेजा को इसी लिए ग्रुप के साथ जोड़ा गया है.

शराब पीकर स्‍थानीय लोगों से भिड़ना भारी पड़ा, पिट गए यूपी न्‍यूज के दो पत्रकार

एसटीवी ग्रुप के यूपी न्‍यूज के पत्रकारों का दारू पीकर आम लोगों से भिड़ना महंगा पड़ गया. पहले तो नागरिकों ने इन लोगों की सरेआम लात-जूते-घूंसों से नागरिक अभिनंदन किया तथा पुलिस को सौंप दिया, परन्‍तु मामला पत्रकारों का होने के चलते पुलिस ने इन पत्रकारों को समझाकर जाने दिया. खबर है कि एक पत्रकार को तो इतनी चोट आई है कि वे कार्यालय नहीं आए हैं. बताया जा रहा है कि इस घटना से नाराज प्रबंधन अनुशासनात्‍मक कार्रवाई करने का मूड में है.

मामला साउथ एक्‍सटेंशन पार्ट टू का है. मस्जिद मोठ 268 में एसटीवी ग्रुप का ऑफिस है. बताया जा रहा है कि इस ग्रुप के एक चैनल के हेड, एसाइनमेंट हेड महेश नौटियाल तथा इनपुट हेड हरिकेश कुमार अक्‍सर रात में साढ़े दस बजे के बाद ऑफिस की पार्किंग को मयखाना में तब्‍दील कर देते थे. गाडि़यों में बैठकर शराब पीते थे. यह इनकी रोजमर्रा की आदत हो गई थी.  हालांकि पार्किंग में बैठकर शराब पीना कोई अपराध नहीं है, पर शुक्रवार की रात पार्किंग के मयखाना में शराब पीकर आम लोगों से उलझ जाना जरूर इन लोगों को महंगा पड़ा गया.

बताया जा रहा है कि हेड महोदय तो शराब पीने के बाद वहां से निकल लिए, पर इन दोनों पत्रकारों पर शराब का सुरूर थोड़ा ज्‍यादा ही चढ़ गया. ये लोग जब घर के लिए निकले तो कुछ स्‍थानीय लोगों से भिड़ गए. इन लोगों ने स्‍थानीय निवासियों से गाली-ग्‍लौज भी कर डाली. खबर तो यहां तक है कि इन्‍होंने किसी के ऊपर हाथ भी छोड़ दिया. बस इसी व्‍यवहार से नाराज तमाम लोकल लाठी-डंडों से लैस होकर मौके पर जुट गए तथा नशे में धुत दोनों पत्रकारों को जमकर धुना. लात-घूंसों-लाठी-डंडों से इन लोगों पर हमला कर दिया. 

किसी ने इस पूरे मामले की सूचना पुलिस को दे दी. जब तक पुलिस टीम मौके पर पहुंचती तब तक दोनों लोगों की अच्‍छी धुनाई हो चुकी थी. बताया जा रहा है कि इन लोगों को बचाने के बाद स्‍थानीय लोगों के दबाव में पुलिस इन्‍हें थाने भी ले आई तथा जांच कराने की तैयारी करने लगी. लेकिन सूचना मिलने पर चैनल के कुछ रिपोर्टर भी थाने पहुंच गए तथा अपने संपर्कों तथा दबावों का इस्‍तेमाल कर मामला दर्ज होने से रोकवा दिया. इसके बाद पुलिस ने इन लोगों को हिदायत देते हुए जाने दिया. 

बताया जा रहा है कि इस घटना की जानकारी मिलने के बाद प्रबंधन इन लोगों के खिलाफ अनुशासनात्‍मक कार्रवाई की तैयारी कर रहा है. खबर है कि नौटियाल आज ऑफिस नहीं पहुंचे हैं, उन्‍हें ज्‍यादा चोटें आई हैं. वहीं हरिकेश कार्यालय पहुंच गए हैं. बताया जा रहा है कि इन पत्रकारों के पार्किंग में मयखाने वाली आदतों से चैनल के पत्रकार भी नाराज चल रहे थे. ये लोग शराब पीने के बाद काम करने वाले पत्रकारों से भी बदतमीजियों के साथ बात करते थे. जूनियर लोग सब कुछ सह जाते थे परन्‍तु स्‍थानीय लोग भारी पड़ गए.

इस्राइल को खुश करने के लिए भारतीय पत्रकार की गिरफ्तारी : भाकपा

: पत्रकार की गिरफ्तारी की निंदा : नयी दिल्ली : इस्राइली राजनयिक की गाड़ी पर बम से किये गए हमले के सिलसिले में एक पत्रकार की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा ने आरोप लगाया कि इस तरह के गंभीर आरोप में पत्रकार की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तारी आधारहीन है और यह कदम केवल इस्राइल को खुश करने के लिए उठाया गया है.

बम हमले के सिलसिले में सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ्तारी के तौर तरीकों पर सवाल उठाते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ए. बी. बर्धन ने कहा, ‘‘बिना उचित जांच के सरकार ने इस गिरफ्तारी को अंजाम दिया है. यह पत्रकार इस्राइल और फ़लस्तीन मुद्दे को देखता था, इसमें हर्ज क्या है. यह इस्राइल को प्रसन्न करने के लिए सरकार द्वारा किया गया प्रयास है.’’

इस गिरफ्तारी की निंदा करते हुए पार्टी के सचिव अतुल कुमार अजान ने कहा कि काजमी एक सम्मानीय पत्रकार हैं. उन्हें पत्र सूचना कार्यालय की मान्यता प्राप्त है. पत्रकारिता का उनका 25 साल का करियर है. किसी पत्रकार की पृष्ठभूमि की जांच करने के बाद सरकार उसे पत्र सूचना कार्यालय की मान्यता देती है.’’

नई भाषा ने नई पीढ़ी को साहित्य से दूर कर दिया है : हरिवंश

: खत्म होती भाषा : तकनीक ने दुनिया को कहां पहुंचा दिया है? भोग की दुनिया में डूबे लोग अब इस धरती को स्वर्ग मानने लगे हैं. नयी-नयी टेक्नोलॉजी ने जीवन को अत्यंत आरामदेह बना दिया है. पैसा है, तो इंद्रलोक यहीं है. विशेषज्ञ मानते हैं, आज दुनिया जिस खुशहाली या बेहतर स्थिति में है, मानव इतिहास में इससे पहले कभी नहीं रही. पर टेक्नोलॉजी हमेशा मूल्य निरपेक्ष (वैल्यू न्यूट्रल) होती है. इसका उपयोग हम किस तौर-तरीके से करते हैं, इसी पर भविष्य निर्भर है. अनेक समझदार लोग और भाषा की समझ रखनेवाले विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि एसएमएस, टिंगलिश, हिंगलिश और फ़ेसबुक के इस दौर में युवाओं के बीच एक नयी भाषा विकसित हो रही है. यह भाषा शुद्ध रूप से व्यापार, लेन-देन या कामकाज की भाषा है. इसमें आकर्षण, रोमांस और भाव नहीं है.

आधुनिक बच्चों में भाषा का संस्कार विकसित नहीं हो रहा है. कंप्यूटर और एसएमएस ने एक नयी शब्दावली गढ़ दी है. बच्चे अपने नये विचारों के लिए नये कोडवर्ड लगातार विकसित कर रहे हैं. घर के अभिभावक तो इन शब्दों को समझ भी नहीं पाते. टेक्नोलॉजी में महारत हासिल कर चुके और टीवी की दुनिया में डूबे युवाओं-बच्चों की पीढ़ी ने एक नया शब्द भंडार बना लिया है. इस शब्द भंडार का भाषा विज्ञान से कोई सरोकार नहीं है. संवेदना, मनोविज्ञान और भाव से भी नहीं. ये शुद्ध लेन-देन, कामकाज की नीरस भाषा है. समाजशास्त्री इसका असर बाद में देखेंगे. पर पहला असर तो दिखता है कि इसने साहित्य (उपन्यास, गद्य, कविता, कहानी वगैरह) से लोगों को दूर कर दिया है.

: सोना – चीन नंबर वन : सोना अजीब चीज है. भारत जैसे गरीब मुल्क में, दुनिया के मुकाबले सबसे अधिक सोने की खपत थी. भारत, कभी सोने की चिड़िया रहा होगा. पर दुनिया के विकसित देशों के मुकाबले भारत गरीब मुल्क है. पर यहां सोने की सबसे अधिक खपत थी. शायद सोने का संबंध आर्थिक सुरक्षा से हो. यह रीति-रिवाज भी से जुड़ा है. दक्षिण में सोने का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. गरीब या धनी सब करते हैं. संकट या कठिन दिनों में, सोने में ही सुरक्षा तलाशने का मानस रहा है. 1991 में भारत जब कंगाल होने की स्थिति में पहुंंच गया, तो भारत को अपना सोना गिरवी रख कर अपनी साख बचानी पड़ी थी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह मामूली निर्णय नहीं था. क्योंकि देश 1991 के पांच-सात वर्ष पहले से ही कंगाली के किनारे था. पर, किसी प्रधानमंत्री ने इसे बचाने का साहस नहीं किया.

मुल्क को आर्थिक कंगाल बनाने का काम भी इसी दौर की सरकारों ने किया था. इस साहसिक निर्णय की कीमत क्या होगी? यह तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को पता था. तब उन्होंने कहा, देश की साख लुट जायेगी, तो सोना रख कर क्या होगा? सोना गिरवी रख कर हम कर्ज लेंगे. विदेशी बाजार में अपनी साख बचायेंगे. कमा कर इसे छुड़ायेंगे. उन्होंने कहा, गांव की महिलाएं सोना सुहाग के लिए रखती हैं. दुर्दिन में बंधक रख कर आर्थिक कठिनाइयों से परिवार को उबारने के लिए भी. हम फ़िर समृद्ध बनेंगे. वही हुआ. सोना गिरवी रखने के साहसिक निर्णय ने भारत की किस्मत पलट दी. पर चंद्रशेखर को इसकी कीमत चुकानी पड़ी. राजनीतिक तौर पर.इस तरह भारत, दुनिया में सोने का सबसे बड़ा क्रेता रहा है. पर वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, 2012 में भारत को पीछे छोड़ कर साम्यवादी चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोने का उपभोग करनेवाला (भोक्ता) देश होगा. उल्लेखनीय है, चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोना उत्पादक देश भी है. चीन में 2011 में सोने की मांग बीस फ़ीसदी बढ़ी. कुल 769.8 मीट्रिक टन. पर भारत में सात फ़ीसदी मांग घटी है. इसी अवधि में.

इस तरह विशेषज्ञों का अनुमान है कि पहली बार 2012 में सबसे बड़ा सोने का भोक्ता देश, चीन बनेगा. भारत को पछाड़ कर. अगर ताजा तिमाही को ही आधार मान लें, तो चीन, भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल चुका है. चीन ने गुजरे तिमाही में 199.9 टन सोने की खरीद की. इसी अवधि में भारत ने 173 टन सोने की खरीद की.सोना जैसे परिवार या इंसान को मानसिक सुरक्षा देता है, उसी तरह मुल्क को भी देता है. चीन अब महाशक्ति है. अमेरिका को पीछे छोड़ता देश. आर्थिक महाशक्ति. सैन्य महाशक्‍ति की हैसियत में पहुंचता देश. अब सोने का सबसे बड़ा भोक्ता देश भी. साफ़ है कि महाशक्ति और महासमृद्ध देश बनने के जो-जो मापदंड हो सकते हैं, उसमें चीन, भारत समेत दुनिया को पीछे छोड़ रहा है. क्या कभी भारतीय राजनीति में ऐसे सवाल गूंजते हैं? या उठते हैं? पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं. क्या राजनीति में ऐसे मुद्दे उठे हैं कि हमारी स्थिति ऐसी क्यों है? हममें क्या कमी है? हमारी व्यवस्था में क्या त्रुटि है? हमारा गवर्नेस क्यों इतना खराब है? हमारे यहां क्यों इतना भ्रष्टाचार है?

: रक्षा मंत्रालय – नक्सली-आईएसआई संबंध : एक राष्ट्रीय अंगरेजी अखबार की (26.02.12) खबर है. इस सूचना के अनुसार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का संबंध पाकिस्तान की खुफ़िया सेवा इंटरनेशनल सर्विसेस इंटेलीजेंस (आइएसआइ) से है. यह रिपोर्ट सेंटर फ़ार लैंडवार फ़ेयर स्टडीज (क्लाफ़स) ने तैयार की है. रक्षा मंत्रालय ने इसे अध्ययन का काम सौंपा था. इस अध्ययन के अनुसार आइएसआइ ने भारतीय माओवादियों का संबंध, पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-जिहाद अल-इसलामी से कराया है. भारत में इंडियन मुजाहिदीन और सिमी (स्टूडेंट इसलामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया) से भी नक्सलियों का तालमेल कराया है. इस अध्ययन के अनुसार आइएसआइ के‘कराची प्रोजेक्ट’का मकसद है, भारत को आर्थिक और सैनिक रूप से तबाह करना. इसी लक्ष्य के तहत आइएसआइ ने माओवादियों और भारत विरोधी आतंकवादी गिरोहों के बीच तालमेल कराया है. इससे पहले सरकारी स्‍त्रोतों से बांग्लादेश के उग्रवादियों, बर्मा और उत्तर-पूर्व के आतंकवादियों तथा भारत से मुक्ति चाहनेवाले तत्वों से भी नक्सलियों के जुड़े होने की खबरें आती रही हैं. कश्मीर के आतंकवादियों से मिल कर काम करने से संबंधित तथ्य भी चर्चित रहे. चीन के भरपूर सहयोग की चर्चा अलग है.इन सूचनाओं की तह में जाना एक सामान्य नागरिक के लिए कठिन है. पर रक्षा मंत्रालय या गृह मंत्रालय या सरकार के ओधकरिक प्रवक्ताओं के स्‍त्रोतों से जब ऐसी खबरें आती हैं, तो इनसे बड़े सवाल खड़े होते हैं. दुनिया में कम्युनिस्टों ने जिन भी देशों में क्रांति की. वे देश भक्त भी रहे, फ़िर अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व की बात की. जो भारत को तोड़ना चाहते हैं या खंडित करना चाहते हैं, ऐसी ताकतों से नक्सलियों के सांठ-गांठ के ओधकारिक बयान पर नक्सलियों का पक्ष स्पष्ट होना जरूरी है. उनके हित में.

: पैसे से वोट : बृहनमुंबई म्युनिशिपल कारपोरेशन (बीएमसी) के चुनाव हुए. 16 फ़रवरी को. इस चुनाव में कौन जीता या हारा (बीजेपी-शिवसेना को 227 में से 106 सीटें मिलीं), यह महत्वपूर्ण नहीं है. इस निगम का बजट चार बिलियन डॉलर है (तकरीबन 20,000 करोड़ रुपये). भ्रष्टाचार इस संस्था की रग-रग में है. यह पढ़े-लिखे लोगों का शहर है. संपन्न और जागरूक लोगों का महानगर. पर महज 46 फ़ीसदी लोग वोट देने निकले. ये खबरें खूब आयीं कि मतदान के लिए पैसे दिये गये. रात में पैसे बांटे जाते थे. खबरों पर यकीन करें, तो मतदाता पैसा मांगता था. प्रति मत पच्चीस सौ से चार हजार रुपये की बोली लगने की सूचना मिली. जहां मत देनेवाले मत की कीमत मांगें? जहां सिर्फ़ पैसेवाले चुनाव लड़ पायेंगे? जहां पढ़े-लिखे लोग वोट नहीं देंगे? क्या यही लोकतंत्र है? ये खबरें कारोबार और व्यापार के महानगर से आ रही हैं कि मतदाता भी अपने वोट का मोलभाव करने लगे हैं. फ़िर लोकतंत्र जीवित कहां है?

हरिवंश बिहार झारखंड में नंबर वन हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

Television as Political Theatre

: …and the splendid isolation of talking heads doing election analysis in TV studios : BY Hartosh Singh Bal, Mihir Srivastava : Digvijaya Singh is speaking to us on Times Now, lit up in the dark at his home, as figures shuffle furtively in the background. It is late in the evening of 6 March, well after the results—which are disastrous for the Congress—have come in. Arnab Goswami, who seems to be the only one with any energy left, which is remarkable since he has been doing almost all the talking, turns to Digvijaya and asks if he would stay on for more questions after a two-minute break. Digvijaya looks up and smiles: “I have all the time tonight.”

It is a rare moment of candour in the television studio where I have been offering occasional comments as one of 14 talking heads who have been part of Times Nows’ ‘100 hours’ of election coverage.

It had started on the evening of 4 March, after the exit polls had come in. An hour or two into the coverage, we had all trooped out for a break, looking at each other in amazement. I was not alone in feeling that most of us had, with little or no prodding, ended up offering comments that were speculative at best and foolish in general.

At the end of day one, I realised that I was not the only one perplexed. Outside the studio, sitting in a conference, Arnab told us, “I’m not sure even I know what we are doing, but people are watching us.”

The wisdom of my own contribution at the time seems obvious in hindsight. On Punjab, I predicted the Congress would win thanks to the decimation of the BJP in urban areas, and on UP, I had offered the insight that pollsters always underestimate the BSP and as a result the SP numbers would fall well short of a majority. The pollsters, while not accurate, were at least closer to the truth—they’d predicted a closer contest in Punjab than I had, and were far more accurate on the BSP’s debacle than I was.

I had, like most politicians and journalists, been caught up in the reality that a TV studio creates. And whether we like it or not, it is a reality that then seeps into our political life.

Sometimes, it is a matter of circumstances. As the trends were pouring in on the morning of the 6th, Kamal Farooqui of the Samajwadi Party was speaking to Arnab Goswami, who was clearly feeding off the moment, rocking back on his heels before leaning forward, arm raised, thumb cocked and index finger pointing out each time he shot a question.

Kamal Farooqui: “When the final tally comes in, SP may not need the support of the Congress. There are other parties, there are independents. We may be able to cross 203 without the support of the Congress. Ajit Singhji and SP have a long history…”

Arnab Goswami: “What if Ajit Singh says the price for RLD support is that Jayant Chaudhury [Ajit Singh’s son] should become Deputy Chief Minister?”

Kamal Farooqui: “Please give me the right to stay silent sometimes.”

For a brief spell, the experts believed that Ajit Singh’s Rashtriya Lok Dal (RLD) would provide support to the SP, with Jayant Chaudhary as Deputy Chief Minister of UP. In the end, the SP had no need of the RLD.

This truth is not completely under anyone’s control, though some people do have more influence than others. We, the talking heads, are no better than performers at a circus, doing our turn when called upon to do so by Arnab the Ringmaster. Years of professional experience are reduced to a scramble to be heard among other contending voices seeking to make a point, willing to opine with equal ease on the possibility of President’s Rule in UP or the reason for ‘brand Rahul’ failing to make an impact. It doesn’t seem to matter that you have been through the grind often enough in the past to be aware of the pitfalls.

Within the first half hour of trends appearing on the screen, Sudheendra Kulkarni of the BJP was gleefully telling us: “TV reporters who were given the BJP beat told us they were being given a ‘marginal’ beat, but now we seem to be the prime beat.” On NDTV, the affable Dorab Sopariwala, who had been through this enough times to know better, termed it an ‘Uma Bharati victory.’ Within the next half hour, it was clear that the BJP was set for its worst performance in UP in two decades.

The ease with which these words appear and disappear, the ease with which all of us appearing on TV can revise our opinions and sometimes even our facts within the hour makes such acts possible. Clearly, the medium has a logic of its own that often exceeds any individual’s ability to craft it to his or her end. Rahul Gandhi’s act of taking responsibility for his party’s dismal showing was a case in point. Many thought it was brave of him to come out and own up his role in the party’s defeat, but once again, the appearance lacked the sort of interactivity with the media that could convey a sense of equality between the viewer and the speaker. Instead, it was just another gesture from a high ground, entirely different from the ease and affability with which Akhilesh Yadav speaks to us or answers our questions.

Whoever crafted that televised moment, Rahul or his advisors, will have to live with the realisation that whether they like it or not, the image that will live on will be of Rahul walking away with Priyanka’s arm on his shoulder, an older brother leaning on a younger sister for support—another reason for those already so inclined to clamour for her entry into active politics.

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While I was comfortably—if sometime irritably— ensconced in the TV studio for over three days, my colleague at Open, Mihir Srivastava was wandering through Banaras as the results came in. He was there to see how people who were not talking heads were reacting to the verdict.

The Pappu Tea Shop near Assi Ghat is one of the places in this town where local party leaders and workers, apart from traders, teachers, scholars and journalists, gather to chat over tea and samosas. On the day the results are being announced, a small portable TV set mounted on a wall at the far end of a small rectangular room displays the latest tally, the voice set on mute to take care of the talking heads. A few comments add up to all that the studios will expound on over the day and newspapers over the week.

CORRUPTION

Dr Saroj Yadav, a poet and writer, refers to Rahul Gandhi as he recites: “Aapke apney daat gandey they, magar chaurahe par manjan bechne nikal pade” (your own teeth were dirty and yet you set out to sell toothpaste ).

CRIME

Even Mayawati’s opponents credit her with ending the so-called Goonda Raj. The joke (even if not everyone considers it one) is that UP under Mayawati had only one mafia leader, and that was she herself. Apprehensions about the SP’s past are voiced, but now many hope things will be different with Akhilesh Yadav talking tough on law and order. The party’s single gesture of refusing a ticket to gangster DP Yadav, despite the misgivings of senior party leaders, has done more than a hundred assertions at election rallies could.

THE MUSLIM FACTOR

“In the last election, Muslims were angry with the SP not because of the eviction of Azam Khan (the Muslim leader who was shunted out of the party on account of his differences with the then party general secretary Amar Singh), but because of the inclusion of Kalyan Singh (former BJP Chief Minister who presided over the Babri Masjid demolition),” says Shamsul Rfin, a sari trader in his fifties. People in his neighbourhood are not dismissive of Mayawati and many acknowledge that some good development work took place under her. The reason for her debacle, say many Muslims, is that her attention was diverted to setting up parks and erecting statues, particularly in the latter part of her tenure. Had she spent the same money and energy on housing and welfare initiatives for the downtrodden, she would have done better. “Only certain Brahmins made large sums of money in her tenure, not Dalits,” says Rfin.

THE CONGRESS

Pramod Maji has four boats and is an ardent supporter of the Congress. He dabbled with the SP before he joined the Congress party. It was a mistake, he now feels. According to him, it is important to have political affiliations. It brings little benefit, but saves one from harassment at the hands of government functionaries.

THE YADAV VOTE

Laksham Yadav is a 65-years-old government contractor who comes to bathe in the Ganga every morning. He did not get many contracts during Mayawati’s regime, but things are likely to change now. “I have no political affiliations,” he clarifies, but the ‘Yadav’ surname always helps when the SP is in power.

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This is no less, and perhaps more than what we managed to discuss in the TV studio over 100 hours. Often, the hours are filled with nothing, which is perhaps why most political parties have spokespersons, and Times Now had 14 of us in the studio. It says something about our polity that almost all these spokespersons are lawyers, their task largely to defend mistakes committed by their respective parties or leaders. In an atmosphere fostered by Arnab Goswami, where everything is combative, every statement is to be challenged, and everyone’s view confronted, they have reduced their approach to a simple strategy. Any question directed at a Congress spokesperson is reduced to the ‘communal approach of the BJP’, and questions asked of the BJP spokesperson are converted into comments on the ‘inability of Rahul Gandhi to garner votes’.

As soon as the spokespersons make an appearance, I switch off in the studio, and only the fear of being caught napping on camera keeps me upright. Only on two occasions did I actually listen to what was being said: both, for whatever reason, were when Manu Abhishek Singhvi was speaking for the Congress.

Once was when he stopped Arnab in his tracks: “This is a serious debate. At least give me minute to make my point.” The other was when he was candid, which is rare for a spokesperson: “The Punjab results have left me baffled.”

Television then is theatre, where the best moments have little to do with substance.

Derek O’ Brien’s irritation with Arnab is more than evident in his new role as Trinamool Congress spokesperson. He stumbles a little each time he refers to Mamatadi, but stops Arnab in the middle of a question referring to the Trinamool’s arrogance.

Derek: “I would prefer if you do not use emotive words such as ‘arrogance’, I would rather talk on facts.”

Arnab: “What would you prefer? Obdurate, imperious, obstreperous?”

In such an atmosphere, the best bet for some sense rather than entertainment on news TV remain people who have a long-term association with the area where the election has taken place, but they are the least likely to find place in a Delhi studio. In our 100 hours on air, perhaps the man who made most sense to me among the 14 experts seated in the studio, ranging from academics and well-known political commentators, was Shesh Narain Singh, political editor of Deshbandhu. The day we first sat down, he said the SP will get 220 seats and gave us cogent reasons for it. I didn’t believe him then, but he didn’t have to say ‘I told you so’ once the results were out.

ओपेन मैग्जीन से साभार. इस लिखे पर कमेंट देने के लिए मूल राइटअप के इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं..

http://www.openthemagazine.com/article/nation/television-as-political-theatre

कथाकार संजीव वर्धा विवि में राईटर्स इन रेजीडेंस बने

कथाकार एवं चार साल तक 'हंस' के कार्यकारी संपादक रहे संजीव आज राईटर्स इन रेज़ीडेन्स होकर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के लिए रवाना हो गए। इस बीच संजीव जी के साथ जो समय बीता बहुत अच्छा रहा, कई यादें मन में हमेशा रहेंगी। दिल्ली उन्हें बहुत रास नहीं आई। वे कहते हैं दिल्ली लेखन के लिए बहुत अच्छी जगह साबित नहीं हुई, उनके लिए, फिर भी यहाँ रहकर उन्होंने अपने दो उपन्यास- 'आकाश चम्पा' और 'रह गई दिशाएं इसी पार' लिखी। दिल्ली उन्हें याद करती रहेगी। शुभकामनाओं सहित-  विवेक मिश्र

उम्मीदों और रचनात्मकता का दिया यूँ ही रोशन होता रहेगा. संजीव सर जैसा इंसान तो परमात्मा अब बनाना ही भूल गया है. वो इस युग के महानतम कथाकारों में से एक हैं. दिल्ली में उनका होना किसी वटवृक्ष जैसा था. उनकी ये छाँव अब वर्धा को मिलेगी.. हमारी भावभीनी शुभकामनाये.. -ध्यानेंद्र मणि त्रिपाठी

फेसबुक से साभार

शिशु राहुल गांधी को कांग्रेसी सीएम का नमस्ते उर्फ चापलूसी की हद, देखें तस्वीर

यह 27 मई 1973 की फोटू है. जिस बच्चे को सिद्धार्थ शंकर रे (उस वक्त के बंगाल के सीएम) नमस्ते टाइप कुछ कर रहे हैं, वह राहुल गांधी हैं. वैसे तो आज दिन अखिलेश यादव का है. उत्तर प्रदेश की कमान 'नेताजी-पिताजी' ने उन्हें सौंप दी है लेकिन मैं फोटो कांग्रेस नेता राहुल गांधी का पोस्ट कर रहा हूं क्योंकि फोटू सन 1973 की है और उसी साल अखिलेश यादव का जन्म हुआ था, अब वे युवा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं.

Girindranath Jha के फेसबुक वॉल से साभार

फोर्स लीव पर भेजे गए आलोक की भी वापसी, अनिल मिश्रा और रतन सिंह का वनवास जारी

हिंदुस्‍तान, बनारस में तूफान आने से पहले वाली शांति छाई हुई है. कर्मचारी कम और तनाव ज्‍यादा है. माफिया डॉन बृजेश सिंह की खबर के बाद फोर्स लीव पर भेजे गए दो लोगों की वापसी हो गई है, पर दो लोग अब भी फोर्स लीव पर है. अब तक इस खबर के लिए फोर्स लीव पर भेजे गए जेएनई अनिल मिश्रा और सिटी इंचार्ज रतन सिंह की वापसी नहीं हो पाई है. कई दूसरे पत्रकारों के जनसंदेश टाइम्‍स चले जाने से स्थिति और भी खराब हो गई है.

उल्‍लेखनीय है कि चंदौली जिले के सैयदराजा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले माफिया डॉन बृजेश सिंह उर्फ अरुण कुमार सिंह की एक खबर को लेकर हिंदुस्‍तान में बवाल मच गया था. यह खबर कैसे प्‍लांट की गई या कराई गई अब तक इसकी जांच नहीं हो पाई है. कौन लोग इसमें शामिल थे अब तक प्रबंधन इसकी जांच नहीं कर पाया है. इस खबर के प्रकाशित होने के बाद चंदौली के ब्‍यूरोचीफ अनूप कर्णवाल एवं चंदौली पेज देखने वाले आलोक राय, ज्‍वाइंट न्‍यूज एडिटर अनिल मिश्रा तथा सिटी इंचार्ज रतन सिंह को फोर्स लीव पर भेजा गया था.

हालांकि इस मामले में रतन सिंह को फोर्स लीव पर भेजे जाने की बात को शुरू से गलत माना गया था क्‍योंकि उसमें उनकी किसी भी प्रकार की जिम्‍मेदारी नहीं बनती थी. वैसे भी प्रबंधन इस खबर की जड़ में जाने की बजाय शाखाओं को ही काटकर अपने काम को इतिश्री करने की जुगत में लगा हुआ है. प्रबंधन ने अब तक यह जानने की कोशिश नहीं की है कि आखिर स्‍थानीय स्‍तर पर किसने इस समाचार को लिखा और ब्‍यूरो कार्यालय भेजा था. किसके आदेश पर ऐसा किया गया था. अगर प्रबंधन इन बातों का पता लगाता तो शायद पूरी सच्‍चाई सामने आ जाती, पर किसी को बचाने के लिए सिर्फ शाखाओं को ही काटने की रणनीति अपना रहा है.

संपादक अनिल भास्‍कर ने इस खबर को लेकर फोर्स लीव पर भेजे गए अनूप कर्णवाल के बाद आलोक राय की भी वापसी करा दी है, पर रतन सिंह और अनिल मिश्रा अब भी फोर्स लीव पर हैं. इन दोनों के ऊपर अब भी तलवार लटक रहा है. पर कार्यालय के बीच से जो बातें छनकर आ रही हैं उससे यही लग रहा है कि चुनाव के दौरान खेल करने की तैयारी पहले ही कर ली गई थी. इसमें ज्‍वाइंट न्‍यूज एडिटर के साथ संपादक की भी सहमति होने की बात सामने आ रही है. बताया जा रहा है कि इस मामले में बुरी तरह फंस चुके अनिल मिश्रा को बचाने के लिए ही रतन सिंह को लटकाए रखा गया है ताकि आखिरी बलि उनकी ही चढ़े.

सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ समय से डाक एवं अन्‍य जिम्‍मेदारियों को देखने वाले न्‍यूज एडिटर रजनीश त्रिपाठी से संपादक अनिल भास्‍कर ने जिम्‍मेदारी लेकर 16 जनवरी को ही ज्‍वाइंट न्‍यूज एडिटर अनिल मिश्रा को सौंप दी थी. बताया जा रहा है कि अनिल मिश्रा इसके पहले भी विधान सभा तथा लोकसभा चुनावों में अपने संपादकों को खुश कर चुके थे. लिहाजा एक बार फिर यह जिम्‍मेदारी रजनीश त्रिपाठी जैसे ईमानदार व्‍यक्ति से लेकर अनिल मिश्रा को सौंप दी गई थी. इसके बाद से ही खेल शुरू हो गया. अंदरुनी तौर पर कई तरह से गुणा-गणित लगाकर छोटी-मोटी खबरें छापी गईं, पर बृजेश सिंह की खबर ने सब किए धरे पर पानी फेर दिया.

माफिया डॉन से जुड़ी इस खबर की गूंज दिल्‍ली तथा लखनऊ पहुंच जाने के चलते संपादक अनिल भास्‍कर को इन लोगों के खिलाफ फोर्स लीव पर भेजे जाने की कार्रवाई करनी पड़ी, पर इसमें लोचा त‍ब आ गया जब डाक एवं चंदौली पेज की जिम्‍मेदारी से दूर रतन सिंह को भी फांस लिया गया. पहले संभावना थी कि चंदौली पेज देखने वाले आलोक राय को बलि का बकरा बनाया जाएगा, पर पेज पर अनिल मिश्रा के हस्‍ताक्षर होने के चलते आलोक राय बच निकले. बताया जा रहा है कि जौनपुर पेज की जिम्‍मेदारी देखने वाले रतन को इसलिए फांस लिया गया ताकि एक तीर से दो शिकार किया जा सके.

अनिल मिश्रा और रतन सिंह के बीच कार्यालय में कहासुनी हो चुकी है. इसके बाद रतन सिंह को लखनऊ भेज दिया गया था, पर राजकुमार सिंह के कार्यकाल में रतन सिंह की वापसी हुई थी. इसके बाद से ही अनिल मिश्रा और उनकी शीतयुद्ध की चर्चा हिंदुस्‍तान कार्यालय में चलती रहती है. अनिल मिश्रा की खासियत है कि वे सभी संपादकों के चहेते बन जाते हैं. अब वे कौन सी घुट्टी पिलाते हैं वही जाने पर रिकार्ड यही कहता है. अब बताया जा रहा है कि स्‍थानीय संपादक अपने चहेते ज्‍वाइंट एनई को बचाने के लिए रतन सिंह का शिकार करने की तैयारी पूरी कर चुके हैं. अब देखना है कि अनिल मिश्रा और रतन सिंह कितने दिनों तक फोर्स लीव पर रहते हैं और इनके भविष्‍य का क्‍या निर्णय होता है.

Raghav Bahl firm to handle Reliance trust

Latter to hold significant interest in Network18 Group, as disclosure statements reveal complex web between the groups Independent Media Trust (IMT), created by Reliance Industries (RIL) to hold its interests in the Network18 Group, will be managed by an entity owned by Raghav Bahl, the latter’s promoter.

Nilrab Media Pvt Ltd, the trustee, is owned jointly by Bahl and his wife, Ritu Kapur. IMT will hold considerable economic interest in the Network18 Group after the acquisition of Eenadu, according to regulatory filings by Network18 Media and TV18 today. The two companies filed offer documents with the market regulator to raise Rs 2,700 crore each through rights issues.

The move to appoint a private company as the trustee of IMT is slightly different from what had been announced earlier. In January, RIL had said the “independent trust will have eminent individuals as Trustees, thus preserving the management, operational and editorial independence of these media companies”.

In a three-way deal, IMT will fund the promoters of Network18 and TV18 to subscribe to rights issues. The companies will, in turn, use these proceeds to complete the ETV acquisition.

Of the Rs 2,700 crore raised through the rights issue, Network18 will use Rs 1,384 crore to subscribe to the rights issue of TV18 Broadcast, so as to keep its stake above 50 per cent. Of the rest, it will use Rs 1,182 crore to repay loans. TV18 will use Rs 1,925 crore to complete the ETV acquisition. It will use Rs 421 crore to repay loans in its books, the companies said in their offer documents.

TV18 will buy out a firm called Equator, which in turn owns a firm called Panorama, which controls ETV’s news channels business. Equator also has 50 per cent in Prism, the company that owns ETV’s entertainment channels and 24.5 per cent in the third entity, Eenadu, which owns the Telugu news channels.

“TV18 proposes to undertake the ETV Acquisition which will be entirely funded from the proceeds of the rights issue of TV18. In connection with ETV Acquisition, we (Network 18) and TV18 have entered into a share purchase agreement with Equator, Altitude and Kavindra,” Network18 said in its offer document.

Altitude and Kavindra, which together own Equator, are to sell their holdings to TV18, for an aggregate consideration of Rs 1,925 crore, the document said.

Explaining the structure of the three way deal, the offer document said IMT would subscribe to zero coupon optionally convertible debentures (ZOCDs) issued by the promoter entities. The money raised is to be used to subscribe to the respective entitlements in the rights issues and any shortfall thereof. The investment agreements for issue of these bonds were signed on February 27.

“In terms of the ZOCD Investment Agreement, IMT shall subscribe to such number of ZOCDs of face value Rs 100 each,” went the offer document. The ZOCDs will have a tenure of 10 years.

The offer document also hinted that the Network18 group may not continue using the trademark of ETV. “We may not be able to continue to use the ETV trademark and ETV brand names. Pursuant to the trademark licence agreement, Eenadu has granted an irrevocable, exclusive and royalty-free licence on a worldwide basis to use the ETV trademarks and ETV brand names in relation to the ETV news channels and ETV non-Telugu channels, respectively, up to February 28, 2015,” it said. Courtesy : Business Standard

इस साल का चमेली देवी पुरस्‍कार तहलका की तुषा मित्‍तल को

वर्ष 2012 के प्रतिष्ठित चमेली देवी जैन पत्रकारिता पुरस्‍कार की घोषणा कर दी गई है. इस बार यह पुरस्‍कार तहलका मैगजीन के कोलकाता ब्‍यूरो में कार्यरत महिला पत्रकार तुषा मित्‍तल को दिया जाएगा. तुषा को यह पुरस्‍कार बंगाल, उड़ीसा और छत्‍तीसगढ़ के नक्‍सल प्रभावित इंटिरीयर में मुश्किलों के बीच गुजरती आम लोगों की जिंदगी का बेहतरीन खाका खींचने के लिए दिया जा रहा है.

इस पुरस्‍कार के चयन समिति की जूरी मेंबर में दैनिक भास्‍कर समूह के संपादक श्रवण गर्ग, कॉलमिस्‍ट एवं सेंटर फार पॉलिसी एनालसिस की डाइरेक्‍टर सीमा मुस्‍तफा तथा वीमेन्‍स फीचर सर्विस की डाइरेक्‍टर पमेला फिलिप्‍स शामिल थीं. तुषा को यह पुरस्‍कार आगामी 13 मार्च को नई दिल्‍ली में आयोजित एक समारोह में दिया जाएगा. गौरतलब है कि यह प्रतिष्ठित पुरस्‍कार प्रतिवर्ष मीडिया फांउडेशन की तरफ से महिला पत्रकारों को प्रदान किया जाता है.  नीचे द हिंदू में प्रकाशित खबर –

Tusha Mittal of Tehelka's Kolkata News Bureau has been chosen for the Chameli Devi Jain Award, 2012. Ms. Mittal has been chosen as the Outstanding Woman Mediaperson for her “sterling reportage of life in the raw at the margins in deep interior Bengal, Orissa and Chhattisgarh, in areas affected by bloody civil strife, Naxal and vigilante violence and dangerous living along the Bangladesh border, where cattle smuggling is rife.”

The jury that chose her comprised Shravan Garg, group editor, Bhaskar; Seema Mustafa, columnist and director of Centre for Policy Analysis; and Pamela Philipose, director of the Women's Feature Service.

The award, instituted by the Media Foundation, will be presented on March 13 in New Delhi. This will be followed by a release of a book of essays by previous Chameli laureates, titled “Making News, Breaking News, Her Way” published by Tranquebar and a panel discussion on “What Has Changed for or Because of Women in the Media.”

आईपीएस की हत्‍या पर पर्दा डालना चाहती है शिवराज सरकार

: नरेन्द्र कुमार की स्मृति में शोकसभा : शुक्रवार की सायं करीब छह बजे पारदर्शिता के क्षेत्र में कार्यरत सिविल सोसायटी नेशनल आरटीआई फोरम के गोमतीनगर स्थित कार्यालय पर मध्य प्रदेश में दिवंगत हुए 2009 बैच के आईपीएस अफसर नरेन्द्र कुमार की स्मृति में एक शोकसभा का आयोजन किया गया. शोकसभा में शहीद नरेन्द्र कुमार की कर्तव्यनिष्ठा और बहादुरी की चर्चा करते हुए उनकी शहादत पर श्रद्धांजलि दी गयी. उनकी पत्नी आईएएस अधिकारी मधुमिता तेवतिया, जो एक-दो दिनों में एक संतान को जन्म देने वाली हैं, पिता केशव देव एवं समस्त शोकाकुल परिवार के प्रति संतावना व्यक्त किया गया.

शोक सभा में आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने कहा कि समाचार पत्रों के अनुसार नरेन्द्र कुमार ने कई बार अवैध खनन के सम्बन्ध में स्थानीय थाने और उच्चाधिकारियों को पत्र लिख कर अवगत कराया था पर किसी भी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी. यह एक गंभीर प्रकरण है. फोरम की कन्वेनर डॉ. नूतन ठाकुर ने कहा कि जब उस युवा आईपीएस अधिकारी के पिता केशव देव अपने पुत्र की हत्या एक सुनियोजित साजिश कहते हैं तो फिर मध्यप्रदेश की सरकार इतनी जल्दी उसे एक व्यक्ति द्वारा की गयी हत्या कह कर मामले पर पर्दा क्यों डालना चाहती है.

अधिवक्ता अभय कुमार सिंह ने इस घटना की घोर निंदा की, वरिष्ठ पत्रकार राजा रिजवी ने ऐसे मामलों में सख्त से सख्त कदम उठाने की बात रखी और सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम पाण्डेय ने घटने को एक गहरी साजिश बताया. फोरम ने यह मांग रखी कि ना सिर्फ पूरे मामले की तह तक पहुंचा जाए बल्कि जिस किसी भी सरकारी अधिकारी ने नरेन्द्र कुमार के अभियान में बाधा डाली, उन पर कठोर कार्रवाई हो. फोरम ने इस सम्बन्ध में शीघ्र कार्रवाई नहीं होने पर विरोध प्रदर्शन करने की बात कही है.

अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री होंगे अखिलेश

 : आज चुने जाएंगे विधायक दल के नेता, 12 मार्च को 30वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण : लखनऊ। अब यह लगभग तय हो गया है कि उत्‍तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की ऐतिहासिक जीत के नायक, युवाओं के प्रिय नेता और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव सूबे के नए मुख्यमंत्री होंगे। आज शनिवार को हो रही विधायक दल की बैठक में उन्हें प्रदेश सपा विधायक दल का नेता चुना जाएगा और 12 मार्च को वे 30वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे। साइकिल, लाल टोपी और समाजवाद के आधुनिक स्वरूप को अपनी कड़ी मेहनत, दो टूक बात करने की शैली, त्वरित निर्णय की क्षमता और विरोधियों के वार को ध्वस्त करने की नई और सक्षम शैली के जरिए बहुसंख्य जनता के दिलों में उतारने का श्रेय युवा नेता अखिलेश को ही जाता है। अखिलेश यादव अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री होंगे।

इस बार के विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती की तरह थे। इस चुनौती को पूरी गंभीरता से लिया समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने। पर इसे तेवर और गति दी युवा राजनेता अखिलेश यादव ने। जब अन्य राजनीतिक दलों के तमाम अनुभवी व दिग्गज नेता अपनी-अपनी पार्टियों को सत्‍ता के शिखर तक ले जाने के लिए जी-जान से जुटे हुए थे, तब अखिलेश यादव ने अपनी आक्रामक और धारदार वक्तृता से न केवल मायावती के भ्रष्टाचार व लूटपाट की पोल खोली बल्कि कांग्रेस व भाजपा के दिग्गजों के अंतरविरोधों और चालों की बखिया उधेड़कर सपा के पक्ष में चल रही हवा को एक सुनामी में बदलने का अप्रत्याशित काम कर दिखाया।

स्वयं मुलायम सिंह यादव ने भी इस ऐतिहासिक जीत का श्रेय अखिलेश यादव को देने में तनिक संकोच नहीं किया। पिछले दो दिनों से यह सवाल तमाम लोगों के जेहन में कौंध रहा था कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। पिता या पुत्र? संसदीय दल द्वारा नेता चुने जाने के बावजूद मुलायम सिंह यादव ने राज्यपाल से मुलाकात में सरकार बनाने का दावा न करके लोगों को इस सवाल पर माथापच्ची का मौका दे दिया था। पर पार्टी के भीतर जमीनी कार्यकर्ताओं से लेकर संगठन में शीर्ष स्तर तक, लगभग सभी लोग चाहते थे कि पार्टी को एक नए शिखर तक ले जाने का श्रेय अखिलेश यादव को है, इसलिए प्रदेश सरकार के नेतृत्व का मौका भी उन्हें ही दिया जाना चाहिए।

संघर्ष और राजनीति मिली विरासत में : मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव का जन्म सैफई (इटावा) में एक मई 1973 को हुआ। उन्होंने मैसूर यूनिवर्सिटी (कर्नाटक) से बीई और एमई की तकनीकी शिक्षा ग्रहण की। पहली बार वे तेरहवीं लोकसभा के लिए 2000 में हुए उप चुनाव में चुने गए। वे खाद्य, नागरिक आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण पर संसदीय समिति के सदस्य रहे। 2000 से 2004 तक वे विज्ञान, पर्यावरण आदि से सम्बंधित समितियों के सदस्य रहे। 2004 में वे फिर से 14 वीं लोकसभा के सदस्य के रूप में चुने गए। इस बार भी उन्होंने संसद की विभिन्न समितियों में सदस्य के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन किया। 2009 में वे तीसरी बार 15 वीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए। उनका चुनाव क्षेत्र कन्नौज रहा।

समाजवादी राजनीति में अपनी सशक्त पहचान रखने वाले नेता, तीन बार मुख्यमंत्री के रूप में प्रतिष्ठित, केन्द्र सरकार में रक्षा मंत्रालय समेत कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले योग्य पिता मुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव को राजनीति विरासत में मिली। छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र सहित अनेक समाजवादी चिंतकों से जनता के हितों की राजनीति सीखने का अवसर पाकर वे खुद को निखारते गए। उनका विवाह 24 नवंबर 1999 को डिंपल यादव के साथ हुआ। संघर्ष की लपटों में खरे उतरने के बाद समाजवादी पार्टी ने उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी देने का फैसला किया। आशा है कि वे अपने कथन को अपने कर्म में उतारते हुए प्रदेश की जनता की उम्मीदों पर भी खरे उतरेंगे।

यह लेख लखनऊ-इलाहाबाद से प्रकाशित डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में छप चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.

अखिलेश की ताजपोशी तय! मान गए आजम-शिवपाल

लखनऊ। यूपी का अगला सीएम कौन होगा यह लगभग तय हो चुका है. सूत्र बता रहे हैं कि राज्‍य के अगले सीएम युवा सांसद व प्रदेश अध्‍यक्ष अखिलेश यादव होंगे. सपा सुप्रीमो ने किसी वरिष्‍ठ को सीएम बनाए जाने की मांग कर रहे वरिष्‍ठ नेता आजम खान और शिवपाल सिंह यादव को मना लिया है. सूत्रों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव के घर हुई इन नेताओं की बैठक में एक फार्मूले के आधार पर अखिलेश के नाम पर सहमति बन गई है. 

इस फार्मूले के अनुसार आजम खान को स्‍पीकर बनाया जाएगा, वहीं शिवपाल सिंह यादव महत्‍वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री और सरकार के दूसरे सबसे प्रमुख व्‍यक्ति होंगे. बताया जा रहा है कि आज होने वाली समाजवादी पार्टी के विधायक दल की बैठक में इस पर औपचारिक रूप से मुहर लग जाएगी. सूत्रों के अनुसार इस बैठक में आजम खान ही अखिलेश को सीएम बनाने जाने का प्रस्‍ताव रखेंगे तथा शिवपाल उसका अनुमोदन करेंगे. पहले यही दोनों नेता मुलायम सिंह को मुख्‍मंत्री बनाए जाने की बात कर रहे थे. चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह की आजम खान के साथ यह पहली मुलाकात थी.

उल्‍लेखनीय है कि इसके बाद अखिलेश के सुर भी बदले नजर आए. अब तक 'नेताजी' के मुख्‍यमंत्री होने की बात कहने वाले अखिलेश अब यह बात कहने से बच रहे हैं. पत्रकारों से बातचीत में अखिलेश ने कहा कि जल्‍द ही आपको पता चल जाएगा कि कौन मुख्‍यमंत्री बनेगा. गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी के विधायक दल की शनिवार बैठक होने वाली है. इस बैठक में सपा के निर्वाचित सभी 224 विधायक शामिल होंगे. बताया जा रहा है कि मुलायम सिंह आगे की रणनीति को देखते हुए अखिलेश को सीएम बनाना चाहते हैं. बहुमत की सरकार में सीएम पद की जिम्‍मेदारी संभालना अखिलेश के लिए भी मुश्किल नहीं होगा.

कभी मायावती, कभी अखिलेश हूं, अभी न सुधरुंगा, उत्तर प्रदेश हूं

: नाम मुलायम है, गुंडई कायम है : मायावती के जाने और मुलायम के आने के मायने : कभी धूमिल ने लिखा था कि भाषा में भदेस हूं/ इतना कायर हूं कि/ उत्तर प्रदेश हूं। अब धूमिल नहीं हैं। होते तो आज क्या लिखते भला? गुंडा प्रदेश? या भ्रष्ट प्रदेश? अभी तो सूर्य कुमार पांडेय बता रहे हैं कि धूमिल होते तो क्या लिखते पता नहीं, पर हम तो कह रहे हैं कि, कभी मायावती हूं, कभी अखिलेश हूं/ अभी न सुधरुंगा, मैं उत्तर प्रदेश हूं! तो सवाल एक यह भी है कि जैसे अभी सड़कों और शहरों में बसपा वर्सेज सपा का उत्पात चल रहा है, गुंडई चल रही है, क्या सरकारी आफ़िसों में भी यह उत्पात विस्तार लेगा? क्यों कि है तो यह वास्तविकता कि दलित अफ़सरों ने अन्य लोगों के साथ अति तो खैर छोटा शब्द है, आग बहुत मूती है। उत्‍तर प्रदेश सचिवालय और शक्ति भवन जैसी जगहों पर तो जैसे सेनाएं आमने-सामने हों, दलित और सवर्ण अफ़सर ऐसे ही थे मायावती राज में।

सचमुच आने वाले दिन बहुत कठिन हैं उत्तर प्रदेश के लिए। क्यों कि मुलायम एंड कंपनी का यह हल्ला बोल फ़िलहाल बहुत आसानी से रुकने वाला है नहीं। बहरहाल मायावती के उत्तर प्रदेश की सत्ता से विदा होने और मुलायम के आने के मायने तलाशने में कोई बहुत मशक्कत करने की ज़रुरत नहीं है। मायावती और मुलायम दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ठीक वैसे ही जैसे तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि। मान लिया गया है कि अब उत्तर प्रदेश का भी तमिलनाडुकरण हो गया है। खैर बात यहां माया और मुलायम की हो रही है। मयावती की माया और मुलायम की माया में कुछ बहुत फ़र्क नहीं है। दोनों ही मायावी हैं। जातीय राजनीति में आकंठ धंसे, भ्रष्टाचार में सिर से पांव तक सने और तानाशाही का मुकुट पहने अहंकार के समुद्र में लेटे दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। उत्तर प्रदेश की जनता यह भली भांति जानती है कि एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ। पर चूंकि उस के पास विकल्प भी कुछ और नहीं है तो ऐसे में जनता करे भी तो क्या। रही बात भाजपा और कांग्रेस की तो वह दोनों भी कुछ दूसरी विशेषताओं के साथ ही सही नागनाथ और सांपनाथ की ही भूमिका में भारतीय राजनीति में उपस्थित हैं। सो हैरान-परेशान जनता करे तो आखिर क्या करे?

क्यों कि सच तो यह है कि इन में से किसी भी एक दल का लोकतंत्र या लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन एक पैसे का भी नहीं रहा। सभी प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों मे तब्दील हैं। बल्कि करपोरेट कल्चर में लथ-पथ। सब के सब जनता के दम पर जनता पर राज करने की फ़िराक में रहते हैं। सेवा-सुशासन आदि इन के लिए पुरातात्विक महत्व की बातें हो चली हैं। पर यह मसला अंतहीन बहस का है। सो इसे ज़रा मुल्तवी कर हम ज़रा ठहर कर मायावती के विदा गीत या कहें विदा बयान पर गौर करें तो बेहतर। मायावती ने साफ कहा है कि भाजपा के डर से ७० प्रतिशत मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी में शिफ़्ट हो गए। चलिए मान लिया मोहतरमा कि आप ठीक कह रही हैं। लेकिन मुस्लिम मतदाताओं को ऐसा करने के लिए पहली बीन बजाई किसने? याद है आप को?

बहुत पुरानी मान्यता है और हकीकत भी कि जब दिया बुझने को होता है तो बहुत ज़ोर से भभकता है। तो अपने राज के आखिरी दिनों में जब मायावती राज बुझने की राह पर चला तो भभकने लगा। मनुवादी मीडिया से इस की शुरुआत हुई। पांच करोड़ रुपए रोज के विज्ञापन के रुप में जो चैनलों पर माया सरकार के यशोगान में लस्त-पस्त थे। यह वही मायावती थीं जो कभी कहते अघाती नहीं थीं कि मीडिया मनुवादी है और कि फ़ुल बेशर्मी से कहती थीं उन का वोटर न अखबार पढ़ता है न चैनल देखता है। कभी बीते ज़माने में यही डायलाग मुलायम सिंह यादव भी बडे़ नाज़-अदा-अंदाज़ से मतलब फ़ुल लंठई और अभिमान में डूब कर दिया करते थे। लेकिन बाद के दिनों में वह मीडिया को कुत्ता बना कर अपने तलुए चाटने में लगा बैठे। और सत्ता से अंतत: बेदखल हो बैठे। बावजूद इस के उन का यह शौक; मीडिया से तलवे चटवाने का गया नहीं। चालू रहा। मायावती भी अपनी कुछ हेकडीबाज़ी के साथ मीडिया से तलवे चटवाने की शौकीन हो गईं। और प्रेस कांफ़्रेंस में लिखित बयान पढ़ने भर से जी नहीं भरा तो रोज प्राइम टाइम पर अपना यशोगान गवाने लगीं चैनलों पर। करोड़ों रुपए रोज खर्च कर के।

सोचिए कि आरटीआई कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने चैनलों पर चल रहे विज्ञापन के बारे में सूचना मांगी तो पता चला कि २० सितंबर, २०१० से २० सितंबर, २०११ के बीच सिर्फ़ एक साल में साढे़ अठारह करोड़ रुपए का विज्ञापन दिया गया था। अगले चरण में वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, दलित, मुस्लिम आदि रैलियों के आयोजन पर आ गईं। इस सब से भी पेट नहीं भरा तो उत्तर प्रदेश के बंटवारे की बीन बजा कर चिट्ठी लिख कर कांग्रेस को घेरने लगीं। बताने लगीं कि कांग्रेस का युवराज तो दलितों के घर ठहरता ज़रुर है पर खाना बाहर से मंगा कर खाता है। आदि-आदि। इस से भी जी नहीं भरा तो गरीब सवर्णों खास कर ब्राह्मणों को भी आरक्षण देने की चिट्ठी केंद्र को लिख बैठीं। इन चिट्ठियों को ले कर कांग्रेस मुस्‍कुराती रही चैनलों पर। इस के पहले भी कागजी राजकुमार को वह भट्ठा-परसौल में नकली हीरो बनवा कर सपा और भाजपा को मुंह चिढ़ाती रही थीं। कुछ-कुछ ऐसा स्वांग भरती रही थीं कि उन की लड़ाई सपा या भाजपा से नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ कांग्रेस से ही है।

और यह लीजिए कांग्रेस ने भी दिन में सपने देखने शुरु कर दिए। उत्तर प्रदेश में जहां उस के पांव के नीचे ज़मीन तक नहीं थी बहुमत की सरकार बनाने के कागजी जहाज उड़ाने लगी। गोया सरकार नहीं बनानी हो, नागपंचमी या रक्षाबंधन के दिन पतंग उड़ानी हो। खैर माया थीं कि भभकती जा रही थीं। अब उन्हों ने एक आखिरी ब्रह्मास्त्र छोडा। मुस्लिम आरक्षण का। राष्ट्रीय राजनीति का दम भरने वाली कांग्रेस भी इस लपेटे में आ गई। और अगर मगर करते न करते चुनावी अधिसूचना के बावजूद मुसलमानों को साढे़ चार परसेंट आरक्षण का मालपुआ खा बैठी। यह नहीं सोचा कांग्रेस ने कि वह यह मालपुआ नहीं जमालगोटा खा बैठी है। राहुल ने दावों, आदर्शों आदि की जो अफ़ीमी खेती की थी उत्तर प्रदेश में इस एक मुस्लिम आरक्षण के जमालगोटे ने उन की सारी चूनावी चूनर का गोटा उतार कर बेरंग कर देगा। और तो और मायावती के लिए यह जमालगोटा डबल डोज बन गया। और जो बेगम अख्तर गा गई हैं न कि उलटी पड़ गईं सब तदवीरें, कुछ न दवा ने काम किया। भाजपा की सांप्रदायिक अफ़ीम की खेती पहले ही सूख चुकी थी, बाबू सिंह कुशवाहा ने उसे और सुखा दिया। इतना कि देखिए न कि अटल बिहारी वाजपेयी के गढ़ लखनऊ तक में भाजपा लगभग पूरी तरह न सही बुरी तरह साफ हो गई। भाजपा अयोध्या तक नहीं बचा पाई। राम को तो खैर वह नहीं ही बचा पाई। और भाजपा के डर ने मुलायम की ताजपोशी करवा दी। इस कदर बहुमत मिला कि इतना तो मुलायम और उन के लोगों को सपने में भी उम्मीद नहीं थी।

अपने देश में राजा का बाजा बजाने की पुरानी परंपरा है। अब मुलायम का, अखिलेश का गुणगान शुरु है। तो क्या मुलायम पर भ्रष्टाचार के आरोप उन के शासनकाल में उन पर नहीं लगे? लखनऊ में यही लोहिया पथ एक किलोमीटर तब पांच करोड़ में बना था। क्या लोग भूल गए हैं? लोग भूल गए हैं क्या कि लोहिया पार्क में लगाए गए एक-एक पौधे दो-दो हज़ार में खरीदे गए थे? कि लोग भूल गए हैं कि ब्राह्मणों को खुश करने के लिए परशुराम जयंती पर सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा जाते-जाते तब मुलायम सिंह ने ही की थी? क्या लोग भूल गए हैं कि इसी लखनऊ में दो युवकों ने एक सीओ रैंक के पुलिस अफ़सर को जीप के बोनट पर बांध कर दो घंटे तक सड़कों पर घुमाते रहे थे। और उन की हिम्मत देखिए कि जीप पर सीओ को बांधे वह सीधे एसएसपी के घर में घुस गए थे। क्या तो वह लोहिया के परिवार के हैं। वह तो जनेश्वर मिश्र तब जीवित थे। खुल कर सामने आए। कहा कि वह लोहिया के परिवार के नहीं हैं।

मुलायम राज में उत्तर प्रदेश में तब अपहरण भी एक उद्योग बन चला था, लोग क्या भूल गए हैं? आज़मगढ में कैसे रमाकांत यादव ने लोगों को बस से खींच कर गोली मार दी थी, यह भी लोगों को याद होगा ही। अखंड प्रताप सिंह और नीरा यादव जैसे महाभ्रष्ट अफ़सरों को मुख्य सचिव की कुर्सी भी बारी-बारी थमाने वाले भी मुलायम ही थे। मुलायम ने तो तरकीब लगा कर अपने खिलाफ़ चल रहे आय से अधिक आय के मुकदमे की सर्वोच्च न्यायलय में सुनवाई भी नहीं होने देते, मायावती भी यही कर रही हैं। बल्कि मुलायम मामले की सुनवाई करने वाले एक जज तो रिटायर भी हो गए। सो अब तक हुई सभी सुनवाई पानी में गई। अब सारी प्रक्रिया फिर से शुरु होगी। मतलब साफ है कि अब तक कुछ नहीं हुआ तो आगे भी खैर क्या होगा? पर यह दोनों अफ़सर जिन्हें मुलायम ने मुख्य सचिव बनाया था, जेल भी हो आए।

अब की बार भी मुख्यमंत्री चाहे मुलायम बनें, चाहे अखिलेश यह अलग बात है। पर यह तो अभी से तय है कि मुख्यमंत्री सचिवालय में अनीता सिंह बैठेंगी ही। क्या पता मुलायम तमाम वरिष्ठ अफ़सरों को किनारे लगा कर मुख्य सचिव ही न बना दें। शैलेष कृष्ण तो बैठेंगे ही। एक पूरी सूची है ऐसे अफ़सरों की। पर अब क्या होगा फतेह बहादुर सिंह और बृजलाल जैसे अफ़सरों का? क्या यह लोग भी निलंबित होंगे? जैसे कि मायावती ने मुलायम के खास अफ़सरों को किया था? मुलायम सिंह से अभी यह सब पूछना जल्दबाज़ी होगी। वैसे भी अभी वह एक साथ दो सपने देख रहे हैं। आज़म खां या शिवपाल सिंह आदि जैसे बैरियर हटा कर अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का। दूसरे, तीसरा मोर्चा या चौथा मौर्चा बना कर खुद प्रधानमंत्री बनने का। याद कीजिए अभी बीते लोकसभा चुनाव में मायावती ने भी प्रधानमंत्री बनने का सपना बुना था और कि वाम मोर्चे ने तो उन्हें भावी प्रधानमंत्री घोषित भी किया था। अब मुलायम की फिर से बारी है। एक बार तो लालू ने उन का पैर घसीट लिया था, गुजराल बन गए थे। अब क्या होता है देखना बाकी है।

अभी तो हम एनआरएचएम जैसे तमाम-तमाम भ्रष्टाचार के असीम आरोपों और पत्थरों के किले से घिरी मायावती के उस विदा बयान कहिए, विदा गीत कहिए को गुन रहे हैं जिस के एक अंतरे में उन्हों ने कहा था कि प्रदेश की जनता जल्दी ही हमारे सुशासन की याद करेगी। फ़िलहाल तो अभी नई सरकार ने शपथ नहीं ली है पर संदेश हर जगह पहुंच गया है। और जगह जगह से मिल रही खबरों के चलते बदस्तूर एक नया नारा आ गया है कि नाम मुलायम है, गुंडई कायम है! सोचिए कि जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो जिस कठोरता से अंग्रेजी हटा कर हिंदी को लागू किया था तब कहा गया था कि नाम मुलायम, काम कठोर! तब मुलायम पर लोहिया की छाप भी थोड़ी बहुत थी। बाद में वह आज़म खां के फेरे में आए और फिर जल्दी ही अमर सिंह की जहाज पर सवार हो गए। और सारे समाजवादी साथियों को पैराशूट थमा-थमा कर पार्टी के जहाज से उतारते गए। फ़िल्मी लोगों और कारपोरेट या उद्योगपतियों को प्राथमिकता में रखने लगे। एक से एक बेनी, एक से एक मधुकर दीघे किनारे होते गए। और यह देखिए कि जाने क्या हुआ कि अमर सिंह भी इस जहाज से उतार दिए गए। मोहन सिंह भी किनारे कर दिए गए। अब पूरा परिवार और चहेते लोग ही हैं।

खैर यह सब बहुत विस्तार की बातें हैं। अभी तो जाने किस अधिकार से अखिलेश लगातार ज़िलाधिकारियों को निर्देश देने लगे हैं। मुलायम लगातार कार्यकर्ताओं को अनुशासन में रहने की बात कह रहे हैं। और देखिए कि अभी मुलायम ने डीजीपी को बुला कर कडे़ निर्देश दे दिए हैं। किस अधिकार से भाई? लेकिन गुंडई है कि फिर भी सर चढ़ कर बोल रही है। जाने अभी उत्तर प्रदेश को कितने और कैसे दंश देखने हैं और झेलने हैं। सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश और देश में भी किसी अखबार या किसी चैनल में न मायावती के खिलाफ़ न मुलायम के खिलाफ़ कुछ कहने या लिखने की हैसियत रह गई है। जो भी कोई मायावती या मुलायम या उन के अधिकारियों या परिजनों के खिलाफ़ लिखेगा या कहेगा वह हर हाल में मारा जाएगा। हल्ला बोल का दौर फिर लौट ही आया है। एक समय जब वह मुख्यमंत्री थे तब अखबारों से नाराज हो कर भोर में बिचारे हाकरों पर ही हल्ला बोल गए थे। लोग भूल गए हैं क्या?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

मरते-मरते बचे वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण भानु

: यमराज से दो घंटे तक साक्षात्कार की कहानी, पीड़ित पत्रकार की जुबानी : कल होली के दिन यमराज से मेरा लगातार दो घंटे तक आमना-सामना हुआ. सोचा नहीं था, कभी साक्षात् यमराज से सामना होगा और लगातार दो घंटे की मुठभेड़ के बाद भी मैं जीवित रह सकूँगा. पर अनहोनी हुई और आज मैं आपके सामने हूं. होली के दिन सुबह ६ बजे के करीब हमेशा की तरह सैर पर निकला और कच्ची घाटी (शिमला) से नए बन रहे जिला कोर्ट की तरफ जा रही कच्ची सड़क पर चल पड़ा. सामने ऊँची पहाड़ी दिखी तो मन में विचार आया कि क्या मैं अब भी ऐसी खतरनाक ढांक पर चढ़ सकता हूँ. पहाड़ी गाँव में जन्मा बड़ा हुआ हूँ, इसलिए ऐसी घाटियों को अनेक बार फतह कर चुका हूँ.

पुराना वक्त याद करके मैंने अचानक ढांक पर चढने का निर्णय ले लिया. पाँव में चप्पल और हौसले आसमान पर! ढांक पर चढ़ तो गया, लेकिन जब पीछे मुड़कर देखा तो पाँव के नीचे से ज़मीन खिसकने लगी. तब अचानक याद आया कि अब १८-२० साल का जवान नहीं हूँ. १० फरवरी को ही तो ५५ का हुआ हूँ. उम्र याद आते ही खून सूख गया और कदम लड़खड़ाने लगे. पीछे मुड़ा तो 85 किलो शरीर जवाब दे गया. पांव के नीचे का पत्थर हिलने लगा तो प्राण गले में आकर अटक गए. अचानक पत्थर लुढ़क गया और साथ ही मैं भी.

कुछ नीचे चीड़ का पेड़ था. वहीँ अटक गया तो ऐसा लगा कि डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो. जेब से मोबाईल छिटककर दूर पड़ा था और घंटी भी बजने लगी थी. सोचा, पत्नी जानना चाहती होगी कि आज मार्निंग वाक में देरी क्यूँ? पर मोबाईल पहुँच से बाहर था. थोड़ा भी हिलता तो मौत निश्चित थी. मैं पांव से निकली हुई चप्पलों को एकटक देख रहा था जो बहुत नीचे सड़क तक जा पहुंची थी. लगा, इतनी दूर तक लुढकने से चप्पलें मर गयी होंगी. जहाँ मैं फंसा था वह एक सूनसान कच्ची सड़क है.

सुबह के वक्त तो शायद ही इस ओर कोई आता हो. मैं पत्थर हो गया, क्यूंकि जानता था कि थोड़ा सा हिलने पर चप्पलों की तरह मारा जाऊंगा. लगभग दो घंटे यमराज सामने बैठे मुस्कराते से दिखते रहे. अचानक तभी दूर मोड़ पर लाल बैग हाथ में उठाए एक व्यक्ति ऊपर की ओर आता हुआ दिखा. कुछ जान में जान आई. पास आने पर उसे पुकारा तो उसने चौंक कर ऊपर देखा. पूछने लगा कि मैं वहां पहुँच कैसे गया! मैंने कहा, पहले उतारो फिर सब बता दूंगा. कुल मिलाकर लम्बी रस्सी का इंतजाम कर एक गोरखा किसी तरह ऊपर पहुंचा, रस्सी उसी पेड़ से बांधी और उसके सहारे किसी तरह मैं नीचे उतरा.

चप्पलें जिन्दा थीं. पहनी और थके क़दमों से घर की ओर चल दिया. आज शुक्रवार, 9 मार्च की सुबह मैं फिर उसी सड़क पर निकला और देर तक उस ढांक को घूरता रहा. मुझे लगा कि ढांक भी मुझे घूर रही है. वह कल हार गयी थी और हार किसे पसंद है? हार मुझे भी पसंद नहीं है. मैंने भी तय कर लिया कि इस ढांक पर जल्दी ही पूरी तैयारी के साथ फिर हमला करूँगा और फतह भी हासिल करूँगा. आखिर मेरे मित्र यूँ ही मुझे अकडू और सनकी पत्रकार नहीं कहते!

कृष्ण भानु हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय तक जनसत्ता अखबार में रहे. इन दिनों हिमाचल आजकल नामक न्यूज चैनल के हेड के रूप में कार्यरत हैं. ये भी पढ़ सकते हैं- सनकी और अकड़ू नहीं होता तो पंद्रह साल पहले इस पद पर पहुंच जाता

: इंटरव्यू – शैलेष : मीडिया को कोई भी कंट्रोल नहीं कर सकता

कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे शैलेष इन दिनों एक नए न्यूज चैनल को लांच कराने का बीड़ा उठाए हुए हैं. अल्फा ग्रुप के बैनर तले चैनल की लांचिंग होनी है और शैलेष कंपनी के सीईओ हैं. मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यून से लेकर न्यूज कंटेंट तक का काम शैलेष ही देख रहे. कम बोलने और चर्चा में कम रहने वाले शैलेष ने हमेशा बेस्ट देने की कोशिश की. नए प्रयोगों को स्वीकारा और आगे बढ़ाया. बीएचयू से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले शैलेष ने पत्रकारिता में बिना किसी गाडफादर के शून्य से शिखर तक की यात्रा की है. उनसे भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने कई मुद्दों पर बातचीत की. पेश है साक्षात्कार के कुछ अंश…

-अपने बारे में शुरुआत से कुछ बताइए. बचपन. पढ़ाई-लिखाई. पत्रकारिता में आना…

–बिहार के छपरा जिले में थाना मल्हौरा के नगरा बाजार गांव में मेरा जन्म हुआ था. मेरे पिता भागलपुर में नौकरी करते थे तो पढ़ाई लिखाई वहीं भागलपुर में हुई. ग्रेजुएशन तक वहीं पढ़ने के बाद जर्नलिज्म की पढ़ाई करने 1979 में बीएचयू चला गया. उन दिनों देश में दो-तीन जगहों पर ही बीजे का कोर्स था उनमें से एक बीएचयू भी था. उस वहां समय प्रो. बनर्जी, प्रो. काजमी साहब और प्रो. बीआर गुप्ता जैसे लोग पढ़ाते थे. बीजे की पढ़ाई के दौरान ही दैनिक जागरण, वाराणसी में काम करने लगा था. मैं बीएचयू में पढ़ते हुए ही रिपोर्टिंग करने लगा. बनारस दैनिक जागरण का नया संस्करण था. वह तब इलाहाबाद से छपता था. पढ़ाई खत्म होने के बाद अमृत प्रभात लखनऊ आ गया. लखनऊ में ही 1983 में नवभारत टाइम्स ज्वाइन किया और 84 में प्रिंसिपल करेस्पांडेंट बनकर रविवार में चला गया. दो साल बाद 86-87 में पुनः नवभारत टाइम्स आ गया. उसी में 89 में चीफ रिपोर्टर बन कर दिल्ली आ गया. नवभारत टाइम्स में काम के दौरान मैं बीहड़ इलाके का कवरेज करता था. उन दिनों बीहड़ में डकैतों का आतंक था. फूलन देवी भी उन दिनों बीहड़ में ही थीं. मैंने बीहड़ में जाकर उस समय आतंक का पर्याय बन चुकीं डकैत फूलन देवी को कवर किया था.

-शुरुआती दिनों में किन किन लोगों से विशेष सपोर्ट या प्रेरणा मिली?

–उस प्रकार की किसी मदद की जरूरत नहीं पड़ी. मैं साहित्यिक बैकग्राउंड का था. चूकि साहित्य में मेरी दिलचस्पी थी, कुछ-कुछ कविताएं और कहानियां लिखने की कोशिश करता था. इसलिए मेरी भाषा अच्छी थी, खबर की समझ अच्छी थी. पहली बार मुझे जब अमृत प्रभात में ब्रेक मिला तो वह एक रिटेन टेस्ट के द्वारा हुआ था. उसके बाद जो छपा हुआ होता था वही सबसे बड़ी मदद बन गया. वही सारी चीजें लेकर मैं नवभारत टाइम्स में इंटरव्यू के लिए गया. उन दिनों उसके प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर थे और नवभारत के लखनऊ एडिशन की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने छपा हुआ सब देखा और लखनऊ के लिए मुझे रख लिया. तो मदद की कोई बात नहीं है लेकिन निश्चित तौर से मैं जिन दो प्रमुख लोगों से प्रभावित रहा हूं, वे हैं राजेन्द्र माथुर और एसपी सिंह.

-एसपी सिंह ने आजतक शुरू किया था, तब आप भी उस टीम में थे?

–आजतक शुरू होने के एक महीने बाद मैंने ज्वाइन कर लिया था. बाद में मैं जी न्यूज चला गया. सात साल वहां संपादक रहते हुए अलग-अलग कई विंग को संभाला. मैंने उसके रीजनल चैनलों बांग्ला, मराठी, पंजाबी, गुजराती व तेलगू भाषाओं के चैनलों को शुरू कराया. उन दिनों जी अल्फा नाम से आधे घंटे के लिए बुलेटिन चलाए जाते थे. उसके बाद मैंने कंसलटेंट के तौर पर घर से ही काम करने का मन बनाया और डिस्कवरी चैनल से जुड़कर इस चैनल के लिए भाषा सुधार हेतु काम करने लगा. डिस्कवरी में भाषा को लेकर बड़ी कठिनाई थी. उनके अनुवादकों के साथ काम करके वहां मैंने बोलचाल की भाषा को ठीक कराया. इस बीच फिर मुझे आजतक से आफर मिला तो मैंने ज्वाइन कर लिया. वहां फिर साढ़े छह-सात साल रहा.

-आजतक को इंडिया टीवी जैसे न्यूज चैनल ने नंबर दो पर आने को मजबूर कर दिया था. कम संसाधनों वाले इंडिया टीवी की भारी भरकम संसाधनों वाले आजतक को पछाड़ने के पीछे क्या वजह मानते हैं?

–ये करीब तीन चार साल पहले की बात है. जब टेलीविजन का विस्तार बहुत तेजी से हुआ. दूसरी तरफ छोटे और डिजिटल कैमरे बाजार में आ गये. मोबाइल में भी कैमरे आ गये. इसमें विजुअल ब्राडकास्ट की क्वालिटी थी. नतीजा लोगों ने छोटी चीजों को भी शूट करके भेजना शुरू किया. चूकि हमारे देश में यह बिलकुल नई चीज थी तो दर्शकों ने उसे पसंद भी किया. जहां भी अजीबो-गरीब चीज दिखाई जाती थी दर्शक भी उधर ही जाने लगा. लेकिन 2012 में मैं कह सकता हूं कि न्यूज की तरफ वापसी होने लगी है और नान न्यूज, ड्रामा, फैब्रिकेटेड या क्रिएटेड न्यूज अब दर्शक नहीं देखना चाहता. अब वह उब गया है. दरअसल अजब गजब मसाले की एक सीमा होती है. पिछले छह महीनों में मैंने महसूस किया कि सारे न्यूज चैनल इस पर ध्यान दे रहे हैं.

-शुरू में आजतक हमेशा नंबर वन रहा पर आप लोगों के दौर में ही वह पिटने लगा. उस वक्त कहा जाने लगा कि जो लोग वहां हैं उन्हें टीवी की समझ नहीं है, पुराने लोग हैं. ये सब बातें आप तक पहुंचती थीं या नहीं?

–देखिए चैनल के नीचे गिरने पर आलोचनाएं तो होती ही हैं. मैं अब आजतक में नहीं हूं तो कोई कमेंट नहीं करूंगा. लेकिन टेलीविजन मीडिया में जो भी प्रयोग हुआ या हो रहा है वह कमोवेश सबने किया. चार घंटे तक दो ज्योतिषी बात करते, और चंद्रग्रहण, सूर्य ग्रहण पर चर्चा होती थी. स्वर्ग का रास्ता और नर्क का दरवाजा जैसी खबरें बनाईं गईं जिसे आम परिभाषा में खबरें नहीं कहा जा सकता. ये जो प्रोग्राम का प्रपोर्शन था वह ठीक नहीं था. उससे दशर्क तो कटा ही बाजार और एडवरटाइजर का भी दबाव बढ़ गया. वह आपको एस्ट्रोलाजी और अजूबे के लिए पैसे नहीं देता. उसे भी पता है कि न्यूज क्या है.  

-खबर आई थी कि आप इंडिया टुडे का हिन्दी अखबार लांच कराने वाले थे इसीलिए आजतक से हटाकर वहां शिफ्ट किया गया. यह भी चर्चा थी कि अखबार तो निकलना ही नहीं था इसलिए आप को वहां डंप कर दिया गया था. क्या ऐसा ही था?

–मैं कहना चाहूंगा कि एक बड़ा ग्रुप किसी को डंप करने के लिए इतने पैसे खर्च नहीं करेगा.

-वैसे, कहा यह भी जाता है कि डंप करने के लिए इतना पैसा कोई बड़ा ग्रुप ही खर्च कर सकता है?

–उसकी जरूरत ही नहीं है. आजकल न्यूज चैनलों में किसी को हटाना होता है तो बस बुलाकर बता दिया जाता है और वह चला जाता है. ये सच है कि वे हिन्दी अखबार लाना चाहते हैं. जब मैं वहां था तब उसकी प्लानिंग चल रही थी. प्रारम्भिक तौर पर उसके पेज कंटेंट और डिजाइन पर भी काफी काम हुआ था. केवल किसी को संपादक बना देने से अखबार नहीं शुरू हो जाता. उसका पूरा बिजनेस प्लान होता है. मेरी जानकारी में उस प्रोजेक्ट को टाला नहीं गया. मैंने ही नया चैलेंज लेने के अपने स्वभाव को जारी रखते हुए यहां आ गया.

-फिलहाल आप जिस चैनल में हैं उसके बारे में कुछ बताएं.

–यह एक बड़ा ग्रुप है जिसमें कई लोग हैं. जिनका पहले से मीडिया में बैकअप है. मुख्य रूप से श्याम टेलीकाम है और दूसरे भी लोग हैं. उनकी कोशिश है कि एक ऐसा न्यूज चैनल लाएं जिसकी तुलना दुनिया के बड़े न्यूज चैनलों में की जा सके और न्यूज चैनल का जो दायित्व है उसे पूरा कर सके. खुद इसके संचालक लोग उसमें किसी तरह की सेंसेशनल मिलावट नहीं चाहते. वह केवल न्यूज चैनल चाहते हैं जिसकी हिन्दी में आज बहुत कमी है. मुझे भी यह एक्साइटिंग लगा. पुराने चैनल को बदलना कठिन है लेकिन नये को नई विचारधारा के साथ लाना आसान है.

मैं हमेशा से ही नये प्रोजेक्ट में काम करता रहा हूं. करियर का पहला काम दैनिक जागरण उन दिनों वाराणसी में नया नया आया था. लखनऊ में अमृत प्रभात, नवभारत टाइम्स के साथ भी नई लांचिंग में ही जुड़ा. दिल्ली में टेलीविजन में पहले चैनल बीआई टीवी और आजतक की शुरुआत करने वाली टीम में था. जी न्यूज में गया तो वहां बीस मिनट के न्यूज को चौबीस घंटे में तब्दील करने वाली टीम में रहा. टुडे ग्रुप के तेज और दिल्ली आजतक को शुरू करने वाली टीम में भी था. कंसलटेंट के तौर पर भी मैंने टोटल टीवी और एक-दो चैनल शुरू कराए जो आज भी चल रहे हैं. कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि मैं नया काम करने के लिए ही बना हूं. नये चैलेंज में मुझे कोई दिक्कत नहीं होती. इसलिए मुझे लगा कि इस काम को मैं कर सकता हूं.

-चैनल का नाम क्या है और कब तक लांच करा रहे हैं?

–कुछ कारणों से चैनल का नाम अभी नहीं बता सकता. चैनल की लांचिंग जुलाई अगस्त के बीच होने की संभावना है.

-मुकेश अंबानी ने मीडिया में बड़ी पूंजी लगाकर मीडिया के भी बड़े मालिकों में से एक हो गये हैं. दूसरे बिजनेस कोरपोरेट घराने भी अब मीडिया में पैसा लगा रहे हैं. तो क्या लगता है आपको कि बड़े-बड़े पत्रकार अब अंबानी के नौकर हो गए?

–देखिए, कोई इनवेस्टर अगर यह सोचता है कि वह मीडिया को बदल देगा तो वह संभव नहीं है. आज बहुत टफ कंपटीशन है. पहले भी कोशिशें हुईं. हां, मीडिया बिजनेस बन चुका है, अगर इस पक्ष को हम स्वीकार नहीं करेंगे तो हम मीडिया के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे. बिजनेस भी इसलिए बना क्योंकि इसमें खर्चे बहुत जुड़ गये हैं.

-मीडिया जब बिजनेस बन गया है तो मीडिया का जो असल अर्थ या मकसद था- मीडिया माने विपक्ष, जनता के लिए, जनता की आवाज, सरोकार इत्यादि, वह कितना शेष रह गया है?  

–मैं समझता हूं कि कोई भी मीडिया को कंट्रोल नहीं कर सकता. आज देश में चौदह नेशनल हिन्दी चैनल हैं. हर राज्य में पांच-छह रीजनल चैनल हैं तो किस-किस को रोकेंगे. किसी मंत्री की खबर को सरकार नहीं रोक पाती. कोई भी मीडिया हाउस या कारपोरेट सरकार से ताकतवर तो नहीं हो सकता. दरअसल जो प्रतियोगिता है वही मीडिया की आजादी को बचाकर रखेगा. नये और चैनल आ रहे हैं वह मीडिया के लिए अच्छी खबर है.

-न्यू मीडिया यानि वेब ब्लाग सोशल नेटवर्किंग आदि के बारे में आपका क्या कहना है?

–निश्चित तौर से है न्यू मीडिया का बहुत महत्व है. सोशल मीडिया या न्यू मीडिया का विस्तार बहुत ज्यादा है. न्यू मीडिया का हर शख्स खुद ही दर्शक और रिपोर्टर भी है, अतः उसे अगर खबर की समझ है तो वह बिना कहीं जाए उसे शेयर कर सकता है. यह टू वे कम्यूनिकेशन है. आने वाले समय में भारत सहित पूरी दुनिया में न्यू मीडिया और टेलीविजन का चेहरा बदलने वाला है. जब 4जी का प्रयोग होने लगेगा और जैसे लोग चलते फिरते अखबार पढ़ते हैं वैसे ही अपने टैबलेट और मोबाइल पर ही न्यूज चैनल और वेबसाइट देखने लगेंगे. तब आज की तरह टीवी का फार्मेट नहीं रह जायेगा. टैबलेट और 4जी का दौर चैनलों को बदलकर रख देगा.

-आप पढ़ने-लिखने वाले पत्रकारों-संपादकों में गिने जाते हैं. खासतौर से चैनल की दुनिया में ऐसे लोगों का अभाव है. इधर क्या कुछ लिख-पढ़ रहे हैं आप?  

–मेरे पास एक अच्छी लाइब्रेरी है. मेरे बारे में कहा भी जाता है कि किताबें मेरे लिए ‘स्लिपिंग पिल्स’ हैं. जब तक मैं कोई किताब नहीं पढ़ता, मुझे नींद नहीं आती. पिछले छह महीने से मैं उन पुरानी किताबों को दोबारा पढ़ रहा हूं जो भाषा और शब्दों के लिहाज से उम्दा हैं. अभी जो नया चैनल शुरू कर रहा हूं उसके भाषा के लिए कुछ नया करना चाहता हूं. हाल में रागदरबारी और गुनाहों का देवता को फिर से पढ़ना शुरू किया है.

-लगता है आपके आने वाले चैनल की भाषा में कुछ नया प्रयोग होगा?

–जी हां, हम भाषा पर काम करने जा रहे हैं. मैं किसी पर आरोप नहीं लगा रहा लेकिन आज चैनलों की भाषा बिलकुल बाजारू हो गई है. खुद ही मैं उससे जुड़ा रहा लेकिन अब संयमित लेकिन आक्रामक, संतुलित लेकिन बेबाक, भाषा की जरूरत है. ऐसी, एक समय में जो रविवार की भाषा थी जिसमें किसी तरह की गंदगी न हो. आज बहुत से शब्द व मुहावरे ऐसे प्रयोग हो रहे हैं जो सीधे तौर पर अवमानना हैं. इसलिए नई भाषा की खोज पर काम करना चाहता हूं.

-आप फेसबुक और ट्विटर पर क्यों नहीं हैं और कब तक आ रहे हैं?

–मैं वहां नहीं हूं लेकिन अब जरूरत महसूस कर रहा हूं. दरअसल काम में इतना अधिक इंवाल्वमेंट होता रहा है कि अन्य चीजों के लिए समय नहीं बचता था. लेकिन अब जैसे पढ़ने के लिए समय निकालता हूं वैसे ही मार्च के बाद सोशल और न्यू मीडिया के लिए भी निकालूंगा.

-जीवन, करियर में क्या-क्या करना बाकी रह गया है?

–मैं सोच समझ कर ही पत्रकारिता में आया था. मैं यही करना चाहता था. हां, जो नहीं कर पाया वह यह कि लेखक बनना चाहता था, नहीं बन पाया. कहानियां व कविताएं लिखता था जो छूट गया. इसलिए छूटा कि जो शब्द और चिंतन है उसका इस्तेमाल कहीं एक ही जगह किया जा सकता है. इस मामले में पत्रकार तो रोज ही खाली हो जाता है. मेरे भाई ब्रजमोहन और मैंने मिलकर एक रिपोर्टिंग पर ‘स्मार्ट रिपोर्टर’ नामक किताब लिखी है.

शैलेष से बातचीत के वीडियो को यहां क्लिक करके देख सुन सकते हैं…

शैलेष इंटरव्यू वीडियो

दैनिक जनवाणी से वीरेंद्र आजम एवं दिवाकर झा का इस्‍तीफा

दैनिक जनवाणी, सहारनपुर से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ वीरेंद्र आजम ने इस्‍तीफा दे दिया है. हालांकि कहा जा रहा है कि प्रबंधन ने उनसे इस्‍तीफा मांग लिया था. बताया जा रहा है कि प्रबंधन में रवि शर्मा के बढ़ते दखल के चलते ऐसा हुआ है. इसके पहले रवि शर्मा बिजनौर के चीफ दिवाकर झा को भी हटवा दिया था. आजम ने पांच को अपना इस्‍तीफा प्रबंधन को सौंपा है जबकि दिवाकर चुनाव से पहले ही हटवा दिए गए थे.

कहा जा रहा है कि विज्ञापन विभाग के दखल की वजह से दोनों पत्रकारों को कार्यमुक्‍त किया गया है. इस संदर्भ में वीरेंद्र आजम का पक्ष जानने के लिए फोन किया गया परन्‍तु बात नहीं हो पाई. 

पत्रिका के डिस्‍ट्रीब्‍यूटर का ऑफर : नईदुनिया की प्रतियां घटाने पर हॉकरों को वैष्‍णो देवी की यात्रा

: अखबारी युद्ध में नैतिकता ताक पर : मीडिया के बाजारीकरण ने नैतिकता को ताख पर रख दिया है. नैतिकता के बने बनाए नियम-प्रतिमान रोज टूट रहे हैं. किसी तरह एक दूसरे से आगे निकले की होड़ और भेड़चाल में अखबार और अखबार के लोग किसी भी हद तक जाने और गिरने को तैयार हैं. यहां कोई नियम नहीं है कोई लक्ष्‍मण रेखा नहीं है. मीडिया की स्थिति ऐसी हो गई है कि यह न तो शुद्ध रूप से सरोकार रहा और न ही शुद्ध रूप से प्रोफेशन.

ऐसा ही मामला मध्‍य प्रदेश के इंदौर में देखने को मिला है. नईदुनिया और पत्रिका ने एक दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए हद तक निचले स्‍तर पर पहुंच गए हैं. इंदौर में पत्रिका के डिस्‍ट्रीब्‍यूटर ने हॉकरों को नईदुनिया कम करने और उसकी जगह पत्रिका का सर्कुलेशन बढ़ाने पर ग्रीष्‍म कालीन ऑफर दिया है. वहीं नईदुनिया ने अखबार में इस मामले को छापकर विरोध किया है तथा इसे अपनी लकीर बड़ी करने की बजाय लकीर को मिटाने वाली हरकत करार दिया है.


पत्रिका के डिस्‍ट्रीब्‍यूटर फडसे द्वारा हॉकरों के लिए जारी ग्रीष्‍मकालीन ऑफर

50 प्रतियां बढ़ाने पर बैष्‍णोदेवी यात्रा, आने-जाने का खर्च 4 व्‍यक्तियों के लिए फणसे न्‍यूज पेपर एजेंसी की तरफ से दिया जाएगा. नई दुनिया की 50 प्रतियां पत्रिका में कनवर्ट करने पर पाठकों का नाम, पता देना होगा.

नईदुनिया की जगह पत्रिका की 40 प्रतियां लगाने पर शिर्डी यात्रा का आ ने जाने खर्च 2 व्‍यक्तियों के लिए. फणसे न्‍यूज एजेंसी की तरफ से.

नईदुनिया की जगह पत्रिका की 30 प्रतियां लगाने पर शिवाजी होटल में डिनर 4 व्‍यक्तियों के लिए. फणसे न्‍यूज एजेंसी की तरफ से.

नई दुनिया की जगह पत्रिका की 25 प्रतियां लगाने पर 1 छोटा कूलर फणसे न्‍यूज एजेंसी की तरफ से.

नईदुनिया की जगह पत्रिका की 15 प्रतियां लगाने पर 1 छत पंखा फणसे न्‍यूज एजेंसी की तरफ से.

लागू की गई स्‍कीम सिर्फ खजुरी बाजार के वितरकों के लिए है.

नोट– बढ़ी हुई प्रतियों के ग्राहकों का नाम, पता देना अनिवार्य है.

बढ़ी हुई प्रतियों को को छह माह तक जारी रखना अनिवार्य है.


पत्रिका के डिस्‍ट्रीब्‍यूटर द्वारा हॉकरों को दिया गया ऑफर
नईदुनिया में प्रकाशित विनय छजलानी का लेख

जमीन घोटाले में डीबी गोल्‍ड के एनई प्रसन्‍न भट्ट गिरफ्तार, डेली गुजरात ने खोला मोर्चा

सूरत में मगदल्‍ला और गवियर  के  जैन देरासर जमीन घोटाले में पकड़े गए डीबी गोल्‍ड के न्‍यूज एडिटर प्रसन्‍न भट्ट के खिलाफ भास्‍कर ग्रुप के प्रतिद्वंद्वी अखबार डेली गुजरात ने मोर्चा खोल दिया है. जमीन घोटाला का यह मामला उस समय सुर्खियों में आया ज‍ब एक लैण्‍ड डेवलपर अमित कपासियावाला की हत्‍या हुई. इस हत्‍या की जांच के दौरान ही पुलिस को एक बड़े सिंडिकेट का पता चला. इसमें दैनिक भास्‍कर ग्रुप के अखबार डीबी गोल्‍ड के न्‍यूज एडिटर प्रसन्‍न भट्टा का नाम भी आया, जिसके बाद उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया.

हालांकि इस मामले में नाम आने के बाद से ही भास्‍कर प्रबंधन ने प्रसन्‍न भट्ट को हटा दिया था. इस अखबार को भी मार्निंग एडिशन में मर्ज कर दिया गया था. इस मामले में प्रसन्‍न के साथ अजीत ठक्‍कर एवं एक अधिवक्‍ता शैलेश पटेल को पुलिस ने गिरफ्तार किया था. इस गिरफ्तारी के बाद से ही गुजरात में भास्‍कर के प्रतिद्वंद्वी अखबार समूह डेली गुजरात ने मोर्चा खोल रखा है. इसमें प्रसन्‍न के साथ भास्‍कर को भी जमकर लपेटा जा रहा है. पिछले कुछ समय से कई खबरें इस मामले को लेकर प्रकाशित किया गया है. 

महिला छेड़ना नॉन-बेलेबल, चौथे खंभे पर हमला बेलेबल

दो सप्ताह पहले प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष व सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखकर यह पूछा था कि राज्य में पत्रकारों पर लगातार बढ़ते हमलों को रोकने में विफल राज्य सरकार की बर्खास्तगी का क्यों नहीं राष्ट्रपति से अनुरोध किया जाए? काटजू ने राज्य के मुख्यमंत्री को यह पत्र उनसे खासतौर से महाराष्ट्र से दिल्ली मिलने आए पत्रकार हल्ला विरोधी कृति समिति के सदस्यों के अनुरोध पर लिखा था। इस पत्र पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

कुछ का कहना था कि काटजू ने लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन किया है तो कुछ का कहना था कि काटजू ने सही किया। वैसे इस तरह का पत्र भी काटजू ने इसलिए लिखा, क्योंकि इस विषय में काटजू द्वारा राज्य सरकार को पहले भी लिखे दो पत्रों का कोई जवाब नहीं मिला था। काटजू के पत्र का राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने तुरंत जवाब दिया और काटजू के कार्यालय से इस पर एक विज्ञप्ति जारी हुई। काटजू ने कहा कि उन्हें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पत्र प्राप्त हुआ है और मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह पत्रकारों पर हो रहे हमलों को लेकर जांच करवाएंगे और शीघ्र कार्रवाई करेंगे। इतना ही नहीं, काटजू का यह भी कहना था कि एक जेंटलमैन मुख्यमंत्री ने मेरे पत्र का तुरंत जवाब दिया, इसलिए मैं नोटिस वापस लेता हूं।

महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में पत्रकारों की हालत देश के पिछड़े राज्यों से भी बदतर है। पत्रकार हल्ला विरोधी कृति समिति द्वारा जारी किए गए व्हाइट पेपर के अनुसार १ जुलाई २००९ से १ जुलाई २०११ तक पत्रकारों, अखबार और न्यूज चैनलों के कार्यालयों पर १८५ हमले हुए हैं। विगत कुछ वर्षों में उल्हासनगर के एके नारायण, पुणे के कराडकर, वसई के जितेंद्र कीर, अकोला के किसनलाल निरबाण, रायगढ़ के अनिल चिटनिस, नागपुर के अरुण दिकाते और मुंबई के इकबाल नातिक, सुरेश खनोलकर, ज्योतिर्मय डे आदि राज्य के बड़े व स्थापित पत्रकारों की हत्याएं हुई हैं।

बीड के 'झुंझार नेता' अखबार के कार्यालय पर, मुंबई के आपल महानगर, आउटलुक, नवाकाल, महाराष्ट्र टाइम्स के कार्यालयों पर, लोकमत के धुले और पुणे कार्यालयों पर, लोकसत्ता के अहमदनगर कार्यालय पर, धुले में देशदूत और आपला महाराष्ट्र के कार्यालयों पर, सामना के नांदेड कार्यालय पर, पुण्यनगरी के लातूर कार्यालय पर, कृषिवल के अलीबाग कार्यालय पर हमले हुए हैं। न्यूज चैनलों में आईबीएन-लोकमत, जी २४ तास और स्टार न्यूज के मुंबई कार्यालयों पर भी हमले हुए हैं।

सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार पर खुल कर बोलने व लिखने के लिए निखिल वागले, कुमार केतकर और प्रकाश पोहरे जैसे बड़े संपादकों को भी हमलावरों ने नहीं छोड़ा। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ी चिंता सरकारी दहशतवाद की है। राज्य में ६ दिसंबर २००५ को औरंगाबाद में सात प्रेस फोटोग्राफरों को पुलिस ने बेरहमी से पीटा। आज तक वह पिटे फोटोग्राफर न्याय का इंतजार कर रहे हैं। टीवी जर्नलिस्ट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र आंबेकर को एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बेरहमी से पीटा।

२००५ से आज तक आंबेकर न्याय पाने के लिए इंतजार में हैं। कुछ दिन पहले राज्य के उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने एक रैली में संबोधित करते हुए कहा था कि पत्रकारों को तो डंडों से पीटना चाहिए। ऐसे माहौल में राज्य में पत्रकारिता कैसे स्वतंत्र हो सकती है? व्हाइट पेपर इस बात को रेखांकित करता है कि महाराष्ट्र में आज तक किसी भी मुजरिम को पत्रकारों, अखबार या न्यूज चैनलों के कार्यालयों पर हमले के लिए सजा नहीं मिली है। ज्यादातर मामलों में हमलावर किसी न किसी राजनीतिक दल से संबंधित होने के कारण उस पर कार्रवाई करने में सरकार कोताही करती है।

२५ दिसंबर २००५ को मुंबई में राज्य के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने मराठी पत्रकार परिषद के कार्यक्रम में यह घोषणा की थी कि पत्रकारों को संरक्षण देने के लिए राज्य सरकार एक नया कानून बनाएगी। फिर २०११ में औरंगाबाद में 'दिव्य मराठी' के लोकार्पण समारोह में मुख्यमंत्री ने इस वादे को दोहराया था, लेकिन वादे बातों में ही रह गए। नया कानून तो छोडि़ए पत्रकारों पर हो रहे हमलों के मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने की मांग तक सरकार पूरी नहीं कर पा रही है।

समिति के अध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार एसएम देशमुख ने बताया कि समिति ने सरकार के सामने दो मांगे रखीं। एक, राज्य में पत्रकारों, अखबारों और न्यूज चैनलों के कार्यालयों पर हो रहे हमलों को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा जाए। दूसरा, इन हमलों के मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाए। लेकिन विगत दो वर्षों से राज्य सरकार ने इन मांगों पर चुप्पी साध रखी है। समिति के सदस्य व वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल मारपकवार का कहना था कि हमारी मांगें बहुत साधारण सी हैं। न ही हम बॉडीगार्ड मांग रहे हैं, न ही हथियारों के लाइसेंस। जब किसी महिला को छेडऩे पर नॉन बेलेबल ऑफेंस के तहत केस दायर होता है तो प्रजातंत्र के चौथे खंभे पर हमले पर क्यों नहीं?

काटजू के नोटिस पर मुख्यमंत्री के जवाब से राज्य के पत्रकार हल्ला विरोधी कृति समिति की फाइल में दो और पत्र जुड़ गए। इसका नतीजा क्या निकला? अपनी कलम से अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिलाने वाले स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक जैसे पत्रकारों की भूमि पर आज पत्रकारिता की जड़ें हिल रही हैं।

लेखक अशोक वानखड़े वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स हिंदी दैनिक के दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं. कई अखबारों व चैनलों में सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लिखा दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

भास्कर पर पटवारी का कब्जा!

: कानाफूसी : यह कहानी संभवतः उज्जैन की है. दैनिक भास्कर ने एक ऐसे शख्स को अपने से जोड़ लिया है जो करोड़ों के घोटाले का आरोपी है और नौकरी से बर्खास्त है. दैनिक भास्कर वाले किस नैतिकता के तहत उसे अपने से जोड़े हैं, यह समझ के बाहर है. पर इतना तो समझ में आ रहा है कि जो इन अखबारों को पैसे दिला दे,  अब वही असली प्रतिनिधि. आप करते रहिए पत्रकारिता की बात पर भ्रष्टाचारियों की जमात नोट के बल पर आपसे आगे निकल जाएगी. देखिए, एक साथी ने पत्र लिखकर भड़ास को पूरी कहानी बताई है. आप भी पढ़िए….

अब तेरा क्या होगा अमर सिंह

सपा से अलग होने के बाद अमर सिंह ने इस पार्टी को किसी भी तरह से कोसने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी थी. अमर सिंह का मुलायम से अलग होना और खुले तौर पर विरोध करना सपा के बड़े नुकसान से जोड़ा जा रहा था. पूर्वांचल राज्य के गठन के मुद्दे को लेकर अमर सिंह जनता के बीच पहुंच कर अपनी जमीन तैयार कर रहे थे. इसी बीच लोकमंच पार्टी बना कर विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी भी उतार दिये.

लोकमंच के प्रत्याशियों के प्रचार में पहुंचे अमर सिंह और जयप्रदा की सभाओं ने कई विधानसभा क्षेत्रों में दूसरे दलों के होश उड़ा दिए थे. उम्मीद की रही थी कि अमर सिंह की पार्टी की सीट भले न निकले लेकिन एक बड़ा तबका उनके साथ होगा खास कर राजपूत मतदाता. प्रत्याशियों के चयन में भी फूंक-फूंक कर कदम रखा गया था. अस्वस्थ होने के बाद भी अमर सिंह ने चुनाव प्रचार में काफी मेहनत की थी लेकिन अमर सिंह के गृह जनपद तक में लोगों ने उनको नकार दिया.

आजमगढ़ के दसों विधानसभा सीटों पर अमर सिंह ने लोक मंच के प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से चार सीटों पर तो एक हज़ार मत भी उनके प्रत्याशियों को नहीं मिला. राजपूत मतदाताओं के बाहुल्य वाले क्षेत्र से लोक मंच के सचिव बिजेंद्र सिंह को भी मात्र 2486 मतों से ही संतोष करना पड़ा. सबसे ज्यादा 2569 मत दीदारगंज सीट से अरविन्द को मिले. कुल मिलाकर किसी भी सीट पर जमानत नहीं बच पाई. अब तो समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनने जा रही हैं वह भी बिना अमर के. अमर सिंह का चुनाव के नतीजों के बाद कोई बयान नहीं आया और ना ही कोई नाम. अखिलेश ने जरुर कहा कि वो मेरे अंकल थे, हैं और रहेंगे. अब देखना यह हैं कि अमर और जया प्रदा आगे क्या करते हैं. कोई नई पार्टी ज्वाइन करते हैं या फिर पूर्वांचल गठन के लिए संघर्ष जारी रखते हैं.

दिग्विजय राठौर

आज़मगढ़

बसपाई टीवी पत्रकार ने कराया मीडिया पर हमला!

संपादक, भड़ास4मीडिया, महोदय, 6 मार्च को झाँसी में चुनावी काउंटिंग के दिन सपा कार्यकर्ताओं और मीडिया के साथ हुई मारपीट में एक टीवी पत्रकार का हाथ था. दरअसल वह टीवी पत्रकार बीएसपी से ताल्लुक रखता है. जब उसे लगा कि पूरे प्रदेश में बीएसपी हार रही है तो उसके अवैध खनन के कारोबार बंद हो जायेंगे इस कारण उसने झाँसी में हल्ला कर दिया कि काउंटिंग रूम के अन्दर सपाई घुस गए हैं. जबकि ये गलत खबर थी. उसने ये गलत खबर अपने चैनल पर भी फ्लैश करा दी. इस पर बाहर खड़े कार्यकर्ता आक्रोशित हो गए और मीडिया पर हमला कर दिया.

मतलब यह कि गलती की किसी एक ने और भुगतना पड़ा कइयों को. मीडिया में घुसे इस बसपाई पत्रकार के बारे में सब जानते हैं कि वह खुलकर बीएसपी के लिए काम करता रहा है और अब राजनीति फैला कर मीडिया को बदनाम कर रहा है. ऐसे लोगों पर जांच कर कार्रवाई होनी ही चाहिए. इस पत्रकार के खिलाफ उसके चैनल के प्रबंधन से झांसी के कई पत्रकारों ने शिकायत की है. झाँसी में अवैध वसूली के उसके ऊपर चल रहे मुकदमों की भी जांच चल रही है.. दहेज़ उत्पीड़न का मुकदमा भी जालौन में उसके पर दर्ज है. उरई की एक मुस्लिम महिला को झाँसी में भी ये अवैध रूप से अपने साथ रखे है.

झांसी से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बीजेपी विधायक के इशारे पर आईपीएस अफसर नरेंद्र की हत्या!

मध्य प्रदेश के मुरैना में अवैध खनन माफिया के हाथों मारे गए 32 वर्षीय नौजवान आईपीएस अफसर नरेंद्र कुमार का अंतिम संस्कार आज मथुरा में उनके पैतृक गांव लालपुर में कर दिया गया. मुखाग्नि उनकी पत्नी ने दी. उनकी पत्नी मधुरानी भी आईएएस अधिकारी हैं. वो गर्भवती होने के कारण मैटरनिटी लीव पर चल रही हैं. मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के रहने वाले नरेंद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से पढ़ाई की थी. 2009 बैच के आईपीएस नरेंद्र कुमार, मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एसडीओपी के पद पर तैनात थे. उनकी हत्या मुरैना के बानमौर इलाके में हुई है.

गुरुवार को दोपहर तीन बजे नरेंद्र इस इलाके में अवैध खनन की सूचना मिलने पर निरिक्षण करने पहुंचे थे. उन्होंने एक ट्रैक्टर को अवैध पत्थर ले जाते हुए देखा. नरेंद्र ट्रैक्टर का पीछा करते हुए उसके आगे जाकर खड़े हो गए. अपनी गाड़ी से उतर नरेंद्र ने ट्रैक्टर को रुकने का इशारा किया. लेकिन अवैध पत्थर ले जाने वाला ट्रक ड्राइवर इतना बेखौफ था कि उसने नरेंद्र पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया. नरेंद्र ट्रैक्टर के पहियों के नीचे आ गए.

प्रदेश के गृह मंत्री उमा शंकर गुप्ता ने कहा कि मुरैना के बानमौर के एसडीओपी नरेन्द्र कुमार को सूचना मिली थी कि अवैध खुदाई हो रही है. सूचना पर गये तो ट्रॉली मिली, ट्रैक्टर के ड्राइवर ने कुचल दिया जिससे मौत हो गई. आईपीएस नरेंद्र ट्रैक्टर के पहियों के नीचे आने से इतनी बुरी तरह घायल हो चुके थे कि उनकी मौत ग्वालियर ले जाते वक्त रास्ते में ही हो गई. पुलिस ने ट्रैक्टर ड्राइवर मनोज केशव सिंह को गिरफ्तार कर लिया है. उस पर धारा 302 का केस दर्ज किया गया है.

उधर, नौजवान आईपीएस ऑफिसर नरेंद्र कुमार के पिता ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनके बेटे की हत्या एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि एक सोची समझी साजिश का हिस्सा है.  बेटे ने मुझे बार-बार बताया था कि कैसे वह मुरैना में खनन माफिया के खिलाफ मुहिम चलाए हुए है. उन्होंने कहा कि उसकी हत्या नहीं हुई, बल्कि एक साजिश के तहत उसको मार दिया गया. उन्होंने यह भी शक जताया कि उनकी आईएएस बहू का तबादला भी इसी साजिश के तहत किया गया. नरेंद्र के पिता केशव ने इसके पीछे एक भाजपा विधायक पर शक जताया है. उन्‍होंने कहा कि कुछ समय पहले उस विधायक के दबाव में ही उनकी बहू का तबादला किया गया था.

गृहमंत्री ने बताया कि मामले में मनोज केशव सिंह नाम के आरोपी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. खनन का अवैध कारोबार सिर्फ चम्बल में ही नहीं, हिन्दुस्तान के हर हिस्से में हो रहा है. उसे हर जगह बिना किसी पार्टी भेदभाव के राजनीतिक सरंक्षण प्राप्त है. हर जगह विपक्ष सिर्फ गाल बजाकर विरोध की औपचारिकता मात्र करता है. और यह बात हर किस्म के अवैध कारोबार पर लागू है. शराब, परिवहन, तेल, खनन…. ये सब अरबों-खरबों के टर्नओवर वाले कारोबार हैं. इन्हें भारत में रोक पाना अब भगवान के वश की भी बात नहीं.

उत्तर प्रदेश में तेल माफिया द्वारा की गयी मंजूनाथ की हत्या सबको याद है. उनकी हत्या की वजह उनकी ईमानदारी ही बनी. जो ईमानदारी की बात करता है उसके साथ क्या सलूक होता है ये पिछले दिनों में हम सब देख चुके हैं. राजनेताओं द्वारा अन्ना आन्दोलन की भी इसी तरह ह्त्या की गयी. उस आन्दोलन की चरित्र हत्या करने की कोशिश अभी भी जारी है. इस वाकये से सफेदपोश माफिया ने एक संकेत साफ़ दे दिया है क़ि या तो आप इस "सिस्टम" का हिस्सा बन जाएँ या मूक दर्शक बन जाएँ. लूट को रोकने की कोई भी कोशिश जानलेवा साबित हो सकती है.

चंबल रेंज के पुलिस उप-महानिरीक्षक (डीआईजी) डी.पी.गुप्ता ने बताया कि साल 2009 बैच के आईपीएस नरेंद्र कुमार सिंह मुरैना जिले के बामौर में प्रशिक्षु पुलिस अनुमंडल अधिकारी (एसडीपीओ) के तौर पर तैनात थे. होली के मौके पर आज वह अपने ड्राइवर और गनर के साथ बामौर के दौरे पर थे तभी उन्होंने पत्थरों से भरी एक ट्रैक्टर ट्रॉली देखकर उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन ड्राइवर टैक्टर ट्रॉली लेकर भागने लगा. जब ट्रैक्टर ड्राइवर भाग रहा था तभी सिंह ने उसका पीछा किया. उन्होंने सड़क के बीच खड़े होकर ट्रैक्टर को रोकने की कोशिश की, लेकिन इस बार ड्राइवर ने उन पर ट्रैक्टर ट्रॉली चढ़ा दी. जांबाज आईपीएस अफसर की हत्या के खिलाफ पूरे देश में लोग व्यथित हैं. फेसबुक और ट्विटर जैसे माध्यमों के जरिए लोगों ने आईपीएस के परिजनों को इसाफ दिलाने का अभियान छेड़ दिया है.

आलोक, फिरोज, अमृता, विशाल समेत कई लोग श्रीएस7न्यूज के साथ जुड़े

नए लांच होने वाले न्यूज चैनल श्रीएस7न्यूज में सीईओ के रूप में आलोक अवस्थी काम कर रहे हैं. फिरोज अख्तार चैनल के मार्केटिंग हेड हैं. इस चैनल के लखनऊ ब्यूरो में विशाल रघुवंशी के ज्वाइन करने की सूचना है. कुछ अन्य के भी इस चैनल का हिस्सा बनने की खबर मिली है, जिनके नाम इस प्रकार हैं- अमृता चौरसिया, आलोक राजा, प्रियंका जायसवाल, रेखा कड़ाकोटी और प्रशांत द्विवेदी. ये पांचों चैनल के एंकर हैं. श्रीएस7 न्यूज़ एक बिल्डर की तरफ से लांच किया गया है जिसका नाम मनोज द्विवेदी है. इनकी रियल एस्टेट कंपनी श्री इंफ्राटेक नाम से है. मीडिया में ये श्री मीडिया वेंचर प्राइवेट लिमिटेड के नाम से सक्रिय हुए हैं.

यूपी केंद्रित यह चैनल अभी टेस्ट रन पर चल रहा है. इस चैनल शुरुआत के लिए कुछ हफ्ते पहले दिल्ली के ताज होटल में एक पार्टी का आयोजन किया गया जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रमुख लोगों ने हिस्सा लिया. चैनल का आफिस नोएडा के सेक्टर 63 में दैनिक जागरण की बिल्डिंग के ठीक सामने है. पता है- श्रीएस7न्यूज, श्रीमीडिया वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड, ए-49, सेक्टर-63, नोएडा. फोन नंबर 0120-4387700 है. इस चैनल से जुड़ी वेबसाइट अब भी निर्माणाधीन है. साइट पर जाने पर सिर्फ एक पेज खुलता है जिस पर मनोज द्विवेदी की तस्वीर और कुछ एड्रेस दिए गए हैं. आप भी देखें, www.shris7news.com पर क्लिक करके.

चैनल के सीईओ आलोक अवस्थी और मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज द्विवेदी.

चैनल की ब्रांडिंग के लिए तैयार कराए गए बैनर-पोस्टरों में से एक.

दाखिले का समय आते ही मैग्जीनों-अखबारों ने रैंकिंग का धंधा शुरू किया

यशवंत जी, शुभकामनायें. आपको यह सूचना देनी थी कि दाखिले का समय आते ही मैग्ज़ीनों और अख़बारों ने रैंकिंग का धंधा फिर से शुरू कर दिया है. संस्थानों को प्रलोभन दिया जा रहा कि वो विज्ञापन सुनिश्चित करें तो उन्हे अच्छी रैंकिंग प्रदान की जाएगी.  बेचारे मंदी के मारे संस्थान, जो गुणवत्ता पर तो ध्यान नहीं दे पाते, वो इस ऑफर को स्वीकार करने में अच्छी पब्लिसिटी समझते हैं. लेकिन ये इन पत्रिकाओं के सुधी पाठकों से धोखा है. अगले महीने अमर उजाला में रैंकिंग देने का प्लान है और विज्ञापन के लिए प्रपोज़ल जा चुके हैं.

भड़ास के एक पाठक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. मीडिया के भीतर चलने वाले इस तरह के खेल तमाशों का पर्दाफाश करने के लिए भड़ास आपका आह्वान करता है. आपके नाम व पहचान को गोपनीय रखा जाएगा. bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

संतोष कुमार बने ‘न्‍यूज इंडिया’ के संपादक, अनूपमणि त्रिपाठी एवं फैजान मुसन्‍ना भी जुड़े

मुंबई से प्रकाशित हो रहे साप्‍ताहिक 'न्‍यूज इंडिया' का प्रकाशन जल्‍द ही लखनऊ से भी शुरू होने जा रहा है. लखनऊ में इस साप्‍ताहिक का संपादक संतोष कुमार को बनाया गया है. संतोष कुमार कई पत्र पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं. उनके अलावा पत्रकार एवं स्‍तंभकार अनूपमणि त्रिपाठी ने भी न्‍यूज इंडिया के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें कॉपी एडिटर की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है.

लखनऊ से ही प्रकाशित हो रहे लोकमत के वरिष्‍ठ संवाददाता एवं कार्टूनिस्‍ट संपादक फैजान मुसन्‍ना ने भी वहां से इस्‍तीफा देकर न्‍यूज इंडिया ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें साप्‍ताहिक में समाचार संपादक बनाया गया है. इस साप्‍ताहिक का प्रकाशन न्‍यूज इंडिया प्रिंट्स एंड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा किया जाता है. 

अनुराग भट्टाचार्य टाइम्स नाउ से इस्तीफा देकर फिर पहुंचे ईटीवी

टाइम्स नाउ से खबर है कि सीनियर प्रोड्यूसर अनुराग भट्टाचार्य ने इस्तीफा दे दिया है. वे कुछ समय पहले ही ईटीवी (मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़) से इस्तीफा देकर टाइम्स नाउ पहुंचे थे. अनुराग अब एक बार फिर अपनी पारी ईटीवी के साथ शुरू कर रहे हैं. अनुराग के टाइम्स ग्रुप छोड़ने के कारणों का पता नहीं चल पाया है. लेकिन बताया जा रहा है की कुछ व्यक्तिगत कारणों की वजह से उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है.

धर्मेंद्र यादव ने समाप्त किया डीपी यादव का राजनैतिक करियर

समाजवादी पार्टी के युवा सांसद धर्मेन्द्र यादव की जिद के चलते सपा के एक दुश्मन का राजनैतिक कैरियर पूरी तरह समाप्त हो गया है। बाहुबली और धनबली के रूप में कुख्यात डीपी यादव को पार्टी में न लेने पर धर्मेन्द्र यादव ही अड़े थे, वरना डीपी यादव कभी दोस्त बन कर, तो कभी दुश्मन बन कर समाजवादी पार्टी का हमेशा दुरुपयोग ही करते रहते। अब उनका राजनैतिक करियर ही समाप्त हो गया है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की अंगुली पकड़ कर ही धर्मपाल यादव नाम का व्यक्ति डीपी यादव बना था, लेकिन अति महत्वकांक्षी होने के कारण सपा सुप्रीमो से रिश्ता तोड़ लिया और उनके विरुद्ध ही आग उगलनी शुरू कर दी।

सपा सुप्रीमो के विरुद्ध आग उगलने के कारण भाजपा और बसपा डीपी यादव को सहारा देती रही हैं, इसीलिए डीपी यादव ने राजनैतिक प्रतिद्वंदिता को व्यक्तिगत रंजिश में बदल लिया और वर्ष 1997 में संभल लोकसभा क्षेत्र से सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के विरुद्ध ही ताल ठोंक दी। लेकिन सपा सुप्रीमो के सामने डीपी को जनता ने नकार दिया। इसी तरह वर्ष 2००2 के चुनाव में प्रो. रामगोपाल यादव चुनाव लड़े तो अपना राष्ट्रीय परिवर्तन दल बना कर पुन: उनके सामने चुनौती पेश कर दी, पर जनता ने फिर धूल चटा दी।

इन दोनों चुनाव ने राजनैतिक प्रतिद्वंदिता को व्यक्तिगत रंजिश में बदल दिया, क्योंकि मंच से डीपी यादव ने सपा सुप्रीमो और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में कई बार अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया, लेकिन सपा सुप्रीमो ने कुछ नहीं कहा। इतना ही नहीं, पिछले लोकसभा चुनाव में बदायूं लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लडऩे आये धर्मेन्द्र यादव के सामने भी बसपा से टिकट लेकर जंग छेड़ दी और धर्मेन्द्र यादव के बारे में तमाम तरह के मनगढंत दुष्प्रचार किये, जिससे जनता ने डीपी को पसंद नहीं किया और हरा दिया।

इसके बाद विधान परिषद के चुनाव आये, तो सपा सुप्रीमो के बेहद खास कहे जाने वाले जिलाध्यक्ष व पूर्व राज्यमंत्री बनवारी सिंह यादव के मुकाबले अपने भतीजे जितेन्द्र यादव को खड़ा कर सत्ता के सहारे उन्हें बुरी तरह हरा दिया। डीपी का सिलसिला अभी भी थमा नहीं, क्योंकि जिला पंचायत चुनाव में साले की पत्नी पूनम यादव को उतार कर सपा सुप्रीमो के दूसरे सबसे खास माने जाने वाले नरेशप्रताप सिंह की पत्नी चेतना सिंह को भी हरा कर पदमुक्त करा दिया।

समय ने करवट ली और विधानसभा चुनाव का समय आ गया। अवसरवादी डीपी यादव को बसपा ने टिकट नहीं दिया, तो डीपी यादव के पास सपा के अलावा और विकल्प ही नहीं बचा, क्योंकि भाजपा डीपी यादव को लेकर पहले ही काफी फजीहत झेल चुकी है और कांग्रेस कुख्यात डीपी को लेकर विवादों में आना कभी पसंद नहीं करेगी, ऐसे में मंच पर सपा के विरुद्ध आग उगलने वाले डीपी यादव आजम खां के माध्यम से सपा में ही जाने की खिडक़ी तलाश कर आये, पर यह खबर धर्मेन्द्र यादव को जैसे ही मिली, वैसे ही वह डीपी को सपा में न लेने पर अड़ गये। लखनऊ में हुई समाजवादी पार्टी की बैठक में धर्मेन्द्र यादव ने साफ कह दिया कि डीपी यादव को सपा में लेने के पक्ष में वह बिल्कुल भी नहीं हैं, उनकी जिद के आगे ही पूरे नेतृत्व को झुकना पड़ा और प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ कर दिया कि वह डीपी को पार्टी में नहीं लेंगे।

धर्मेन्द्र यादव की जिद के कारण आजम खां नाराज हो गये और बाद में वरिष्ठ समाजवादी व पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव मोहन सिंह को भी पार्टी से निकालना पड़ा, पर अब चुनाव परिणाम खुद बता रहे हैं कि धर्मेन्द्र यादव की जिद व नेतृत्व का निर्णय एक दम सही था, वरना डीपी यादव अब तक सपा की कुंडली में दुश्मन बन कर बैठे थे और पार्टी में लेने पर दोस्त बन कर बैठे रहते, जिसकी भरपाई किसी न किसी रूप में सपा के आम समर्थकों को ही करनी पड़ती, उस नुकसान से बचाने के कारण ही जनपद बदायूं के मतदाताओं ने धर्मेन्द्र यादव की जिद को सही ठहराते हुए तोहफे में पांच सीटें दी हैं।

स्वतंत्र पत्रकार बी.पी.गौतम की रिपोर्ट.

अमन वर्मा बने एनएआई के जयपुर जिलाध्यक्ष

युवा पत्रकार एवं मेट्रो स्टाइल समाचार पत्र के सम्पादक अमन वर्मा को न्यूजपेपर्स एसोसिएशन ऑफ इण्डिया का जयपुर जिलाध्यक्ष मनोनीत किया गया है। एसोसिएशन की राजस्थान इकाई की कार्यकारिणी की बैठक एमआई रोड पर गणपति प्लाजा के निकट स्थित मोहन क्लासिक रेस्टोरेंट में हुई, जिसमें सर्वसम्मति से अमन वर्मा को जयपुर जिलाध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया। बैठक में शामिल सदस्यों ने प्रस्ताव पर स्वीकारोक्ति कर उन्हें जयपुर जिले में एसोसिएशन के विस्तार की जिम्मेदारी सौंपी।

जिलाध्यक्ष बनाए जाने पर अमन वर्मा ने जिले के पत्रकारों, समाचार पत्र, वेबसाइट और न्यूज चैनलों के सम्पादकों को सदस्यता ग्रहण करवाकर जल्द ही अपनी कार्यकारिणी घोषित किए जाने का आश्वासन दिया। इस मौके पर उपस्थित सदस्यों के बीच होली स्नेहमिलन समारोह आयोजित किए जाने पर भी चर्चा की गई, जिसमें 12 मार्च को जयपुर में राजापार्क के पंचवटी सर्किल स्थित विवाह स्थल में होली स्नेह मिलन समारोह मनाने का निर्णय लिया गया। इस समारोह में एसोसिएशन के सदस्य व उनके परिजन शामिल होकर रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद उठाएंगे। इस मौके पर सहभोज भी होगा।

बैठक में न्यूजपेपर्स एसोसिएशन ऑफ इण्डिया के राजस्थान के महासचिव मनमोहन सिंह, शाइनिंग टाइम्स मैग्जीन के सम्पादक भंवर सिंह राणावत, एशियन यूरेशियन ह्यूमन राइट फोरम के प्रोजेक्ट हैड (राजस्थान) सुधीर रंगरू, महेश कृपा पत्रिका के सम्पादक राजेश गिलड़ा, राजस्थान न्यूज वन के सम्पादक पवन कुमार टेलर, साप्ताहिक संचार दूत के कार्यकारी सम्पादक रामावतार शर्मा, शाइनिंग टाइम्स के नागरिक पत्रकार नवल डांगी व अनिल जलूथरिया व एजाज भाई मौजूद थे।
 

यूपी विधानसभा में लगातार बढ़ रहे मुस्लिम विधायक

उत्तर प्रदेश की विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की तादाद लगातार बढ़ रही है. इस बार 68 मुस्लिम विधायक विधानसभा में नज़र आएंगे. साल 2002 की विधानसभा में जहाँ कुल 43 मुस्लिम विधायक थे तो साल 2007 की विधानसभा में यह तादाद 55 तक पहुँच गई लेकिन इस बार यह रिकॉर्ड फिर टूटा और यह तादाद 68 पहुँच गई है. आइये एक नज़र डालते हैं पार्टीवार पिछले नतीजों पर..

साल २००२ की विधानसभा
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कुल विधायक – ४३

सपा – २१

बसपा – १२

कांग्रेस – ०४

निर्दल – ०२

अपनादल – ०२

रालोल – ०१

रापरिदल – ०१

साल २००७ की विधानसभा
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कुल विधायक – ५५

बसपा – २९

सपा – २०

रालोद – ०३

निर्दल – ०२

यूपीयूदीएफ़ – ०१

साल २०११ की विधानसभा
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कुल विधायक – ६८

सपा – ४३

बसपा – १५

कांग्रेस – ०४

पीपा – ०३

कौएद -०२

इमिकौ -०१

 
LIST OF MUSLIM M.L.A. IN 2012
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 VIDHANSABHA    CANDIDATE     PARTY
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1- ALLAHABAD SOUTH  HAJI PARVEJ AHMAD   SP
2- ALIGARH  ZAFAR ALAM  SP     
3- AMROHA  MAHBOOB ALI  SP
4- BADAUN  ABID RAZA KHAN  SP
5- BAHEDI  ATAURRAHMAN  SP
6- BAHRAICH  DR.WAQAR SHAH  SP
7- BANGARMAU  BADALOO KHAN  SP
8- BARHAPUR  MO.GAZI  BSP
9- BHADOHI  ZAHID BEG  SP
10- BHOJIPURA  SHAHJIL ISLAM  I.M.C                                              
11- BHOJPUR  JAMALUDDIN SIDDIQI  SP
12- BILARI  MO.IRFAN  SP
13- BILSI  MUSARRAT ALI  BSP
14- BUDHANA  NAWAJISH  ALAM  SP
15- BULANDSHAHAR  MO.ALIM KHAN  BSP
16- CHAYAL  MO.ASIF ZAFARI  BSP
17- CHAMRAUA  ALI YUSUF ALI  BSP
18- CHANDPUR  IQBAL  BSP
19- CHARTHAWAL  NOOR SALEEM RANA  BSP
20- DEEDARGANJ  ADIL SHEIKH  SP
21- DOMARIYAGANJ  KAMAL YUSUF MALIK  BSP
22- FATEHPUR  SAIYAD KASIM HASAN  SP
23- GOPALPUR  WASEEM AHMAD  SP
24- HASANPUR  KAMAL AKHTAR  SP
25- HUSAINGANJ  MO.ASIF  BSP
26- ISAULI  ABRAR AHMAD  SP
27- JAUNPUR  NADEEM JAVED  INC
28- KANTH  ANEESURRAHMAN  PEACE PARTY
29- KHALILABAD  DR.MO.AYYUB  PEACE PARTY
30- KITHOR  SHAHID MANZOOR  SP
31- KOIL  JAMEERULLA KHAN  SP
32- KUNDARKI  MO.RIZWAN  SP
33- KURSI  FAREED MAHFOOZ KIDWAI  SP
34- LAHARPUR  MO.JASMEER ANSARI  BSP
35- LONI  ZAKIR ALI   BSP
36- LUCKNOW WEST  MO.REHAN  SP
37- MATERA  YASAR SHAH  SP
38- MAU  MUKHTAR ANSARI  Q.EKTA DAL
39- MEERAPUR  JAMEEL AHMAD QASMI  BSP
40- MEERGANJ  SULTAN BEG  BSP
41- MOHAMMADABAD  SIBAGATULLA ANSARI  Q.E.D.
42- MURADABAD NAGAR  MO.YUSUF ANSARI  SP
43- MURADABAD GRAMIN  SHAMIMUL HAQ  SP
44- MUBARAKPUR  SHAH ALAM BSP
45- MURAD NAGAR  WAHAB  BSP
46- NAJEEBA BAD  TASLEEM  BSP
47- NAUGAWAN SADAT  ASHFAQ ALI  SP
48- NIZAMABAD  ALAM BADI  SP
49- PATHARDEWA  SHAKIR ALI  SP
50- PATIYALI  NAJEEBA KHAN ZEENAT  SP
51- PHAFAMAU  ANSAR AHMAD  SP
52- PHOOLPUR  SAEED AHMAD  SP
53- PILIBHIT  RIYAZ AHMAD  SP
54- RAMPUR  MO. AZAM KHAN  SP
55- RAMPUR KARKHANA  GAZALA LAARI  SP
56- SAMBHAL  IQBAL MAHMOOD  SP
57- SHAHA BAD  BABU KHAN  SP
58- SHRAWASTI  MO. RAMZAN  SP
59- SIKANDAR PUR  ZIAUDDIN RIZWI  SP
60- SISAMAU  HAJI IRFAN SOLANKI  SP
61- SIWAL KHAS  GULAM MOHD SP
62- SUAR  NAWAB KAZIM ALI  INC
63- SYANA  DILNAWAZ  KHAN  INC
64- TANDA  AZIMUL  HAQ  SP
65- TILOI  DR. MO. MUSLIM  INC
66- TULSI PUR  ABDUL MASHHOOD KHAN  SP
67- UTRAULA  ARIF ANWAR HASHMI  SP
68- ZAHOORA BAD  SAIYAD SHADAB FATIMA  SP

ईटीवी न्यूज, सुल्तानपुर के रिपोर्टर अलीम शेख की रिपोर्ट.

होली आई तो याद आए आलोक तोमर

: 20 मार्च को दुनिया छोड़े एक बरस हो जाएंगे पूरे : इस बार होली आई तो पिछले साल की होली की याद आ गई. याद आए आलोक तोमर जी. कैंसर से लड़ते जूझते उनका निधन पिछले साल होली के दिन हुआ था. पिछले साल होली 20 मार्च को थी. इस बार थोड़ी जल्दी आ गई. 20 मार्च को आलोक तोमर को गुजरे साल भर हो जाएंगे. पर कई लोगों को अभी तक यकीन नहीं हो रहा कि आलोक नहीं रहे. इस एक बरस के दौरान बार बार यही लगता रहा कि आलोक हैं. हर छोटे बड़े मौके पर आलोक की याद आती रही. 20 मार्च के दिन आलोक तोमर की स्मृति में क्या कार्यक्रम किया जाना है, यह तय होना बाकी है. जैसे ही कुछ तय होता है, आप सभी को सूचित किया जाएगा. उम्मीद है सुप्रिया भाभी जल्द ही 20 मार्च के आयोजन को लेकर कोई अंतिम निर्देश देंगी. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

Mayank Saxena : पिछले साल होली के ही दिन आप छोड़ गए थे हम को….तात…आप सच में हर रोज़ याद आए…हर रोज़…

तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी-सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा-सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार|

तुम चले जाओगे
पर थोड़ी-सी हँसी
आँखों की थोड़ी-सी चमक
हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी
यहीं रह जाएँगे
प्रेम के इस सुनसान में|

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति,
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास|

तुम चले जाओगे
और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे|
xxxx
(अशोक वाजपेयी)


साल भर पहले होली के दिन आलोक तोमर के निधन की जो सूचना भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हुई और उनसे जुड़ी जो कुछ चीजें भड़ास पर छपीं, उन्हें इन लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

आलोक तोमर का निधन

आलोक तोमर के अंतिम दिनों के दो वीडियो

तुम मेरे आलोक थे

'यादों में आलोक' आयोजन से जुड़ी खबरें और तस्वीरें


इन्हें भी पढ़ सकते हैं….

भास्कर डॉट कॉम और आई-नेक्स्ट मेरठ के जर्नलिस्टों ने आफिस में खेली होली, देखें तस्वीर

होली से संबंधित मीडिया के साथियों की दो ग्रुप तस्वीरें फेसबुक के माध्यम से मिली हैं. पहली तस्वीर दैनिक भास्कर डॉट कॉम के आफिस का है जिसमें कार्यरत जर्नलिस्टों ने एक दूसरे को रंग गुलाल लगाकर ग्रुप फोटो खिंचाई. दूसरी तस्वीर आई-नेक्स्ट, मेरठ की है जहां आई-नेक्स्ट की टीम के लोग अपने टीम लीडर को घेरकर रंग गुलाल लगा रहे हैं.

दैनिक भास्कर डॉट कॉम में होली

आई-नेक्स्ट, मेरठ में होली


अगर आपके यहां भी आफिस में होली हुई है तो ग्रुप तस्वीर के भड़ास पर प्रकाशन के लिए bhadas4media@gmail.com पर भेज सकते हैं.

अमर उजाला की मेहनत पर फिरा पानी, हार गए डीपी यादव

अमर उजाला की प्रचंड मेहनत के बावजूद बाहुबली व धनबली डीपी यादव सहसवान विधान सभा क्षेत्र में बुरी तरह से हार गये हैं, जिससे अमर उजाला के बारे में तरह-तरह की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। अमर उजाला ने सामान्य तौर पर चुनाव की खबरों को लेकर गुणवत्ता बनाये रखी, लेकिन बरेली मंडल में अमर उजाला की पहले ही दिन से जमकर छीछालेदर हो रही है। शुरू में शाहजहांपुर में अमर उजाला द्वारा छापी जा रही पैड न्यूज की खबरें आ चुकी थीं, लेकिन प्रबंधन ने बरेली मंडल की ओर फिर भी ध्यान नहीं दिया, तभी अन्य ब्यूरो में पैड न्यूज का रोग फैल गया।

चुनाव के दौरान अमर उजाला को जिस डीपी यादव की धज्जियां उड़ानी चाहिए थी, उस अमर उजाला ने डीपी यादव की शान में जमकर कसीदे गढ़े, प्रति दिन एक-दो खबर डीपी यादव के पक्ष में दी, लेकिन आज जब चुनाव परिणाम आये, तो लोग कहने लगे कि अमर उजाला की घोर मेहनत के बाद भी डीपी यादव तीसरे नंबर चले गये। आश्चर्य की बात तो यह है कि बदायूं में सब-एडीटर कैलाश सिंह ब्यूरो चीफ भी थे, लेकिन वह स्वयं डीपी यादव के रंग में ही रंगे नजर आये, क्योंकि उन्होंने डीपी यादव के पक्ष में अपने नाम से इतनी स्टोरी छापी हैं कि रिकार्ड बन चुका है। अंत में जब खबरें कम पड़ गयीं तो उन्होंने डीपी यादव के बेटे कुणाल यादव से बात कर यदु शुगर मिल की शानदार स्टोरी देकर मतदाताओं की सोच परिवर्तित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन जनता ने अमर उजाला की सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया। अमर उजाला की एक तरफा रिपोर्टिंग को लेकर चर्चायें हो रही हैं कि खेल ऊपर तक खेला गया, तभी यह सब संभव हो पाया।  आप भी नीचे देखिए अमर उजाला में प्रकाशित कुछ खबरें –

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

ड्राइवर की आकस्मिक मौत, उससे जुड़े सवाल और दो अखबारों की रिपोर्टिंग

कल का दिन उत्तर प्रदेश में बहुत अधिक चहल-पहल का दिन था पर मेरे लिए यह दिन एक दूसरे ही रूप में आया. सुबह लगभग 08.40 बजे मुझे अचानक मोबाइल पर मेरे कार्यालय के ही एक कर्मी ने सूचित किया कि ओम प्रकाश पाल का शव प्रातः वायरलेस मुख्यालय परिसर में कॉन्फ्रेंस रूम के पीछे स्थित एक पुलिस बैरेक के ठीक सामने मिला है. पाल एक आरक्षी चालक थे जो पुलिस लाइन, लखनऊ में तैनात थे और रूल्स एंड मैनुअल कार्यालय, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के साथ संबद्ध थे.

वे मेरे साथ पिछले लगभग दो माह से संबद्ध थे और मुझे मिला सरकारी एम्बेसेडर कार चलाते थे. स्वाभाविक है कि जिस व्यक्ति ने एक दिन पहले ही शाम को मुझे मेरे घर पर छोड़ा हो, मुझसे छुट्टी ले कर घर जाने की बात कही हो, जिसकी बेटी की शादी अभी महीने भर पहले तय हुई हो, जो काफी हंसमुख और मिलनसार स्वभाव का हो, उसका अचानक से इस प्रकार चला जाना मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. साथ ही इस बात से मुझे काफी धक्का सा भी लगा था. यह खबर सुन कर मैं तत्काल अपने निजी वाहन से घटनास्थल पर पहुंचा.

वहाँ पहले से ही दीपिका गर्ग, पुलिस अधीक्षक, ट्रांसगोमती एवं कई अन्य अधिकारी मौजूद थे. ओम प्रकाश पाल का शव पुलिस बैरेक के ठीक सामने मिले चित्त अवस्था में पड़ा हुआ था. दोनों हाथ फैले हुए से थे. चेहरा आसमान की तरफ था. शरीर पर सरकारी वर्दी और कमर में बेल्ट था. शरीर पर कहीं और चोट के निशान नहीं दिख रहे थे और सिर पर पीछे एक घर सा चोट दिख रहा था. शव जिस अवस्था में और जिस प्रकार से पड़ा हुआ था उससे सीधे-सीधे उनकी हत्‍या किये जाने की आशंका व्यक्त हो रही थी. वह शव जिस बैरेक के सामने पड़ा था, वह पूरी तरह से खाली था. वहाँ रहने वाला एक भी सिपाही नहीं दिख रहा था. यह बात पूरे मामले को और भी रहस्यमय बना रहा था. मैंने इन सारी बातों के दृष्टिगत पाल की मृत्यु से सम्बंधित एफआईआर थाना महानगर, लखनऊ पर बनाम अज्ञात स्वयं दर्ज कराया. मेरी जानकारी में अभी इस मामले में तफ्तीश जारी है.

यह घटना मेरे लिए अत्यंत कष्टप्रद था. वैसे तो पुलिस में रहते हुए मर्डर और डेड बॉडी देखने की आदत हो गयी है, पर जब अपना कोई प्यारा ऐसे मारा जाता है तब मर्डर का असली मतलब समझ में आता है. वही पाल जो कल तक बोलते नहीं थकता था, आज बिलकुल चुपचाप पड़ा हुआ था. जैसे हम सबों से यकायक रूठ गया हो. मेरे मन में यही बात रह-रह कर आ रही थी कि काश मरे हुए लोग फिर से आ कर बोल पाते तो हम कितनी आसानी से यह जान सकते कि कल रात क्या-क्या और कैसे-कैसे हुआ था. पर हम सभी जानते हैं कि ऐसा नहीं हो पाता. इस बार भी ऐसा नहीं हुआ. अब तो महानगर पुलिस पर निर्भर है कि वह इस घटना का रहस्य खोल पाएगी या नहीं.

इसके बाद एक विचित्र बात मैंने कुछ अखबारों में इस सम्बन्ध में छपी खबर में भी देखी. दैनिक जागरण और हिंदुस्तान प्रदेश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में हैं. पर इस घटना को प्रस्तुत करते समय इनके सम्बंधित संवाददाताओं ने बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्यों को जाने-अनजाने गलत ढंग से प्रस्तुत कर दिया. दोनों अखबारों में यह लिख दिया गया कि पाल का शव बैरेक के अंदर उनके बिस्तर पर मिला था, जबकि सत्यता यह है कि उनका शव गेट के बाहर मैदान में पड़ा मिला था. “हिंदुस्तान” में तो सम्बंधित संवाददाता ने यह भी लिख दिया कि पाल का बिस्तर खून से सना हुआ था जबकि संभवतः बिस्तर पर खून का एक भी निशान नहीं था.

आज भी आम लोगों की निगाह में समाचार पत्र अत्यंत सम्मानित होते हैं. इसमें प्रकाशित तथ्य आमजन द्वारा अकाट्य सत्य के रूप में स्वीकार किये जाते हैं तथा कई बार इनका प्रयोग सभी सम्बंधित व्यक्ति आगे चल कर मुकदमों में न्यायालयों आदि में भी कर लिया करते हैं. ऐसे में मेरी दृष्टि में सम्बंधित पत्रकारों को ऐसी गंभीर भूलों की ओर विशेष रूप से जागरूक रहना आवश्यक प्रतीत होता है, क्योंकि इन बातों का गहरा और दूरगामी महत्व है.

अमिताभ ठाकुर

आईपीएस

सभी पदों के लिए शुरू से लेकर अब तक एक ही टेस्‍ट पेपर दे रहा है अल्‍फा न्‍यूज

प्रिय यशवंतजी, मैं आपका ध्यान एक बहुप्रतिक्षित न्यूज़ चैनल अल्फा न्यूज़ की एक बेवकूफी पर खींचना चाहता हूं। अल्फा न्यूज़ जल्द आने वाला है, जिसके लिए भर्तियां की जा रही हैं। चैनल का मौजूदा बेस सीपी स्थित सूर्यकिरण बिल्डिंग में है। कोई भी शख्स alphamediajobs@gmail.com पर सीवी भेज टेस्ट के लिए चैनल के दफ्तर जा सकता है। लेकिन जबसे ये प्रोसेस शुरू हुई है तब से आज तक, चैनल सबसे एक ही टेस्ट ले रहा है। एक ही सवाल पूछ रहा है। चाहे वो प्रोड्यूसर हो या ट्रेनी। ना तो टेस्ट बदला जा रहा है और ना ही सवाल।

मेरे कुछ दोस्तों को मैंने टेस्ट की सभी सवाल बताए और जब वो टेस्ट देने गए तो उनसे भी वही सवाल पूछे गए और उनका टेस्ट भी बढ़िया हुआ। मेरे ख़्याल से या तो चैनल सबको बेवकूफ बना रहा है या मीडिया में जॉब का सपना दिखाकर महज टेस्ट की फॉर्मेलिटी कर रहा है। मैंने एक बार चैनल को दूसरी मेल के माध्यम से इस सच से रूबरू भी करवाया था, लेकिन आज भी बदस्तूर चैनल का प्रबंधन वही टेस्ट ले रहा है, जो मैं 40 दिन पहले देकर आया था।

मैं टेस्ट के सवाल आपको भी मेल कर रहा हूं… आप भी किसी को भेजकर टेस्ट दिलवा सकते हैं। मेरा दावा है कि सवाल यहीं होंगे।

अल्फा न्यूज़ टेस्ट

1.  DMRC NEW HEAD: Mr. Mangu Singh;
   Yuvraj in News for Lungs Tumor
   – मालदीव क्यों सुर्खियों में है।
   – अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपबल्किन पार्टी के उम्मीदवार कौन हैं।
   – हाल ही में गोवा में किस जाने-माने कार्टूनिस्ट का निधन हुआ है।
   – योजना आयोग का अध्यक्ष कौन है।
   – अग्निपथ 2012 का डायरेक्टर कौन है।
   – किन राज्यों में इस महीने चुनाव हुए हैं।
   – 2जी के कितने लाइसेंस रद्द किए गए हैं।

2.  केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने हाल ही में मार्च 2012 तक देश की जीडीपी 6.9 फीसदी का अनुमान जताया है। इसी कॉपी का इंग्लिश से हिंदी में अनुवाद करना था। ये कॉपी नेट पर मिल जाएगी।

3.  क्या भारतीय सिनेमा समाज का आईना है या महज़ इसकी परछाई। या अमेरिकी चुनावों में रिपलब्लकिन उम्मीदवारों पर संक्षिप्त लेख लिखें।

4. आप बतौर रिपोर्टर एक गांव में गए। वहां अलग-अलग घरों में गए। वहां हर घर के बरामदे में पुराने सिक्के गढ़े हैं। पहले घर में गए तो एक 40 साल का शख्स आपको मिला। उसने आपको बताया कि हमारे गांव में खेती ही रोज़गार को स्त्रोत है। उसके बाद उसने अपने पांच साल के पोते को बुलाया और रिपोर्टर यानी आपको कहा कि ये मेरा पोता पूरे गांव में पढ़ाई में अव्वल आता है। फिर आप गांव के आखिरी घर में गए। वहां भी पुराने सिक्के गढ़े थे। उस घर में एक तीस साल की औरत एक बच्ची को खिला रही थी। जैसे ही आप गए तो बच्ची ने कहा, 'दादी कोई आया है।' लेकिन उस औरत ने दरवाज़ा बंद कर लिया। अब आप बताइए, एक रिपोर्टर के नाते आप किस एंगल से रिपोर्ट फाइल करोगे और क्यों?

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

अपडेट : इस संदर्भ में अल्‍फा ग्रुप के सीईओ शैलेष का कहना है कि टेस्‍ट पेपर के कई मॉडल हैं. अगर यह सबको मालूम भी चल जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता. आप जीके तैयार कर सकते हैं, पर जिस सवाल का एनालिटिकल जवाब लिखना है वो आप कैसे तैयार कर सकते हैं. आप उसे एक-दो या तीन दिन में नहीं बदल सकते हैं. किसी का न्‍यूज सेंस नहीं बदल जाएगा. अब तमाम तरीके से परीक्षाएं ली जा रही हैं कॉपी-किताब खोलकर फिर भी सबके नंबर अलग आते हैं. उनका कहना है कि एक सवाल के कई जवाब हो सकते हैं, संभव हो सभी सही हों पर सबके न्‍यूज सेंस और एनॉलिटकल अलग-अलग होंगे हमें इसी आधार पर चयन करना है. हमारे टेस्‍ट का मूल उद्देश्‍य यह देखना है कि आपका न्‍यूज सेंस और एनॉलिसिस कैसा है और यह एक-दो दिन में नहीं बदल सकता है. 

राहुल देव के पी7 न्‍यूज चैनल से जुड़ने की चर्चा

पी7 न्‍यूज से एडिटर इन चीफ सतीश जैकब के जाने के बाद उनके विकल्‍प को लेकर चर्चाएं शुरू हैं. सबसे तेज चर्चा वरिष्‍ठ पत्रकार राहुल देव की आने की है. राहुल देव भी आज समाज से इस्‍तीफा देने के बाद खाली पड़े हुए हैं. बताया जा रहा है कि पी7 न्‍यूज प्रबंधन से उनकी इन संदर्भ में वार्ता चल रही है. समझा जा रहा है कि अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो राहुल देव सतीश जैकब के बाद पी7 न्‍यूज के नए ग्रुप एडिटर बन सकते हैं.

राहुल देव वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. पिछले तीन दशक से वे मुख्‍य धारा की पत्रकारिता में सक्रिय हैं. लखनऊ में पायनियर से करियर शुरू करने वाले राहुल देव करेंट, द इलेस्‍ट्रेड वीकली, द वीक, माया, जनसत्‍ता में भी वरिष्‍ठ पद पर रहे. जनसत्‍ता से इनकी छवि एक सरोकारी पत्रकार की बनी. 1997 में आजतक से टीवी की दुनिया में कदम रखा. उसके बाद दूरदर्शन, डीडी-2, जी न्‍यूज, जनमत से भी जुड़े रहे. सीएनईबी की लांचिंग कराई. उसके बाद वे आज समाज में समूह संपादक बन कर गए थे. पर विनोद शर्मा के अखबार से इन्‍हें बड़ा बेआबरू होकर निकलना पड़ा था.

अब जब सतीश जैकब चौदह महीनों की सेवा के बाद चैनल से विदा हो गए हैं तो माना जा रहा है कि खाली पड़े राहुल देव पी7 न्‍यूज में नया ठिकाना पा सकते हैं. वैसे इस चैनल में भी लम्‍बे समय तक टिकना बहुत मुश्किल है. साल-डेढ़ साल से ज्‍यादा टिकना मुश्किल है. सतीश जैकब से पहले निर्मलेंदु, राकेश शुक्‍ला जैसे वरिष्‍ठ पत्रकार भी यहां के माहौल में ज्‍यादा समय तक नहीं टिक पाए. अब देखना है कि अगर राहुल देव की पारी शुरू होती है तो कितने दिन चलती है. 

…जब पुष्‍पेष पंत ने कहा- आईबीएन7 के इस पत्रकार पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए

यूपी के चुनावों में मिल रही जीत के बाद उत्साही जीते हुए विधायक और चुनाव में हार से निराश उम्मीदवारों की ओर से उन्माद की खबरें आ रही हैं… संभल के विजयी जुलूस में समाजवादी पार्टी के विधायक के जीत की खुशी के बाद हुए फायरिंग में एक बच्चे की मौत हो गई. वहीं झांसी में हारे हुए समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता ने मीडिया के साथ मारपीट की थी.. आईबीएन7 की एंकर स्मिता शर्मा ने जब लखनऊ से मनोज राजन त्रिपाठी से पूरे मामले पर जानकारी लेना चाहा कि एक तरफ तो अखिलेश गुण्डागर्दी को खत्म करने की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर चुनाव नतीजों के सामने आते ही सपा नेताओं का काम शुरू हो गया?

इस सवाल पर मनोज राजन त्रिपाठी ने जो कहा उसे सुनकर सभी चौंक गए… मनोज ने कहा कि ये जीत का उन्माद है… इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए… जिस पत्रकार की पिटाई की गई है… उससे भी कहना चाहूंगा कि वो आज के दिन समाजवादियों का माफ कर दे… इतना सुनते ही स्मिता शर्मा को लाइन से मनोज को हटाना पड़ा.. स्टूडियों में बैठे समाजशास्त्री पुष्पेश पंत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी… उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी और मुलायम सिहं अपने इन उन्मादी कार्यकर्ताओं पर कोई कार्रवाई करते हैं या नहीं ये बाद की बात है लेकिन आईबीएन7 को अपने इस पत्रकार पर इस उन्माद का समर्थन करने पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए… खैर, अब देखना है पत्रकारिता का झंडा लेकर चलने वाले आशुतोष और संदीप मनोज त्रिपाठी पर क्या कार्रवाई करते हैं?

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

पटना से ‘आर्यन संदेश’ का प्रकाशन शुरू

पटना से खबर है कि आर्यन ग्रुप ने अपने सांध्‍य दैनिक 'आर्यन संदेश' की लांचिंग कर दी है. कुछ महीने पहले ही आर्यन ने इस अखबार की लांचिंग की घोषणा की थी. इस अखबार का संपादक वरिष्‍ठ पत्रकार अंजनी कुमार विशाल को बनाया गया था तथा उन्‍हें ही लांचिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई थी. पहले इस अखबार को 26 जनवरी को लांच करने की योजना थी पर किन्‍हीं कारणों के चलते डेट टाल दिया गया था.

अंजनी कुमार विशाल इसके पहले भी सांध्‍य दैनिक जेवीजी 'संध्‍या प्रहरी' के संपादक रह चुके हैं. यह अखबार सोलह पृष्‍ठ का है तथा इसकी कीमत दो रुपये रखी गई है. इस अखबार के साथ आर्यन चैनल के कई पत्रकारों को भी जोड़ा गया है. अखबार का कार्यालय चैनल के ऑफिस में खोला गया है. अखबार फिलहाल दूसरे प्रेस से छपकर आ रहा है.

अब अपने पत्रकारों को होलोग्राम वाला आई कार्ड उपलब्‍ध कराएगा जागरण!

दैनिक जागरण, मैनेजमेंट देर से ही सही अब अपने पत्रकारों को बेहतर और प्‍लास्टिक कोटेड आई कार्ड जारी करने की तैयारी कर रहा है. सूत्र बताते हैं कि इसका फैसला नोएडा में कोर कमेटी द्वारा लिया गया है. इस विशेष आई कार्ड पर जागरण का होलोग्राम भी लगा होगा, जिससे असली और नकली की पहचान में आसानी हो. हालांकि यह पता नहीं चल पाया है कि इसे शुरू में किन-किन यूनिटों में लागू किया जाएगा.

उल्‍लेखनीय है कि जागरण अलग-अलग यूनिटों में स्‍थानीय स्‍तर पर आई कार्ड जारी करने की परम्‍परा है. सभी यूनिटों में अलग-अलग तरह के आई कार्ड जारी होते रहे हैं. पर अब बताया जा रहा है कि प्रबंधन अपने पत्रकारों को एक जैसा आई कार्ड उपलब्‍ध कराने पर विचार कर रही है. इसका फैसला ले लिया गया है. इस आई कार्ड की विशेषता यह होगी कि यह प्‍लास्टिक कोटेड तो होगा ही इस पर जागरण का होलोग्राम भी मौजूद रहेगा. और यह उन पत्रकार कर्मचारियों को ही प्रदान किया जाएगा, जो जागरण के परमानेंट कर्मचारी होंगे.

बताया जा रहा है कि सुपर स्ट्रिंगर या स्ट्रिंगर या संवाद सूत्रों को इस तरह के आई कार्ड नहीं दिए जाएंगे. उन्‍हें पुराने तरीके के आई कार्ड से ही काम चलाना पड़ेगा. वैसे भी जागरण में ज्‍यादातर संवाद सूत्रों और स्ट्रिंगरों को आई कार्ड नहीं दिए जाते हैं. गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही यह बात सामने आई थी कि आगरा में संपादकीय प्रभारी ने पत्रकारों से ही पैसा लेकर उन्‍हें आई कार्ड उपलब्‍ध कराया था. समझा जा रहा है कि इस बात की जानकारी होने के बाद ही कोर कमेटी ने नए तरीके का आई कार्ड जारी करने की योजना बनाई है.

प्रतापगढ़ में मीडियाकर्मियों पर लाठीचार्ज, एक पत्रकार की हालत गंभीर

प्रतापगढ़ : सपा सरकार की सरकार की बनने की संभानाओं के बाद ही राज्‍य में कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति बदलने लगी है. पहले सपाइयों ने झांसी में मीडियाकर्मियों को पीटा तथा बंधक बनाया तो प्रतापगढ़ में मतगणना के दौराना पुलिस के दो दारोगा तथा रंगरूट पत्रकारों पर लाठी लेकर पिल पड़े. इस बर्बर लाठीचार्ज में कई पत्रकार गंभीर रूप से घायल हुए हैं. सबसे निराशाजनक बात तो यह रही कि डीएम के पत्रकार पत्रकार पिटते रहे वे तमाशा देखते रहे, जबकि अपर पुलिस अधीक्षक दिनेशचंद्र ने पुलिसकर्मियों को मना किया फिर भी वे नहीं माने. घायल पत्रकार धीरेंद्र द्विवेदी की गंभीर हालत देखते हुए उन्‍हें इलाहाबाद रेफर कर दिया गया है.

प्रतापगढ़ में विधानसभा चुनाव की मतगणना मंगलवार को महुली स्थित मंडी समिति में हो रही थी. तमाम अखबार और चैनलों के प्रतिनिधि वहां पर कवरेज के लिए जुटे थे. इसी बीच पट्टी के गणना पण्‍डाल में शोर-शराबा होने लगा. कुछ पत्रकार मामला जानने के लिए उस पंडाल की ओर बढ़े तो वहां पर तैनात दारोगा जलोधर यादव और वीरेंद्र मिश्रा ने सभी को रोक दिया. पत्रकारों ने अपना परिचय दिया तथा प्रशासन द्वारा दिया गया पास भी दिखाया, पर दोनों दारोगा नहीं माने तथा वहां से भागने को कहा.

पत्रकारों ने जब इस तरह के व्‍यवहार तथा रवैया का विरोध किया तो वे और उत्‍तेजित हो गए. इसी बीच डीएम एम देवराज भी वहां पहुंच गए. पत्रकारों ने उन्‍हें दोनों दारोगा के दुर्व्‍यवहार की जानकारी दी तो दारोगा और कुपित हो गए और उन दोनों के उकसाने पर पुलिस रुंगरूट लाठी लेकर पत्रकारों पर टूट पड़े. डीएम खड़े होकर तमाशा देखते रहे तथा पुलिसकर्मी लाठी बरसाते रहे. एएसपी दिनेशचंद्र ने पुलिसकर्मियों को आधे-अधूरे मन से रोकने का प्रयास किया परन्‍तु वे नहीं माने. लगातार लाठी चलाते रहे.

पुलिस के लाठीचार्ज में पत्रकार दिनेश सिंह का सिर फट गया, वहीं धीरेंद्र द्विवेदी को पुलिसवालों ने घेर कर मारा. छायाकार विनय पाठक, राजन शुक्‍ला, अमितेंद्र श्रीवास्‍तव, नईम सिद्दीकी, धर्मेंद्र सिंह, सुनील यादव, प्रकाश मिश्रा, ओम सिंह, शिव मोहन, सर्वेश शर्मा, गिरीश त्रिपाठी, बृजेश, हरिकेश मिश्रा, वैभव श्रीवास्‍तव एवं विक्‍कू को गंभीर चोटें आईं. एसपी दीपक कुमार के पहुंचने के बाद दोनों दारोगाओं को पटकार लगाते हुए परिसर से हटने का निर्देश तथा मामले की जांच का आदेश दिया.

इसके बाद सभी घायल पत्रकारों को पुलिस के वाहन से जिला अस्‍पताल ले जाया गया. कई पत्रकारों को वहां भर्ती कराया गया. सबसे ज्‍यादा घायल धीरेंद्र द्विवेदी को प्राथमिक चिकित्‍सा के बाद इलाहाबाद रेफर कर दिया गया. बताया जा रहा है कि धीरेंद्र को गंभीर चोटें आई हैं. तमाम राजनीतिक दल एवं बुद्धिजीवियों ने पुलिस वालों की इस हरकत की निंदा की है तथा उन पर इस तरीके से अकारण हमले को लोकतंत्र पर हमला बताया है.

पी7 न्‍यूज से एडिटर इन चीफ सतीश जैकब का इस्‍तीफा

पी7 न्‍यूज से बड़ी खबर आ रही है. समझा जा रहा है कि यहां पर उठा-पटक का दौर एक बार फिर शुरू हो सकता है. पी7 न्‍यूज के एडिटर इन चीफ और वरिष्‍ठ पत्रकार सतीश जैकब ने इस्‍तीफा दे दिया है. हालांकि इस्‍तीफा का कारण बताया जा रहा है उनका एक साल का कांट्रैक्‍ट, जिसे प्रबंधन ने रिन्‍यूवल नहीं किया, पर अंदर की बात यह है कि वे चैनल के भीतर की राजनीति के शिकार हुए हैं.

सतीश जैकब ने पिछले साल यानी 2011 के जनवरी में पी7 न्‍यूज से जुड़े थे, लिहाजा उनका सालाना कांट्रैक्‍ट जनवरी में ही खतम हो जाना चाहिए था, परन्‍तु अब मार्च में उनके इस्‍तीफे के चलते तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. वरिष्‍ठ पत्रकार सतीश जैकब चार दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. साठ के दशक में उन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत द स्‍टेटमैन के साथ शुरू की थी. उसके बाद द पैट्रियाट और फिर बीबीसी पहुंचे. बीबीसी के साथ 32 सालों से ज्‍यादा समय तक काम किया.

इस दौरान जैकब ने बीबीसी के लिए ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार, भोपाल गैस कांड, संजय गांधी की मौत, इंदिरा गांधी की हत्‍या, बाबरी मस्जिद विध्‍वंस जैसी बड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग की. सतीश जैकब एक मात्र भारतीय पत्रकार थे जिन्होंने 1991 के इराक युद्ध की कवरेज की. उनकी वहां से दी गई रिपोर्ट उन दिनों इंडियन मीडिया में छाई हुई थी. 65 वर्षीय सतीश जैकब ने 2002 में ‘बीबीसी’ से इस्‍तीफा दे दिया था. उस दौरान वे डिप्‍टी ब्‍यूरोचीफ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे.

मायावती ने दिया इस्‍तीफा, कहा – मुसलमान और मीडिया ने हराया

लखनऊ : बसपा प्रमुख एवं सीएम मायावती ने बुधवार को राज्‍यपाल बीएल जोशी को अपना इस्‍तीफा सौंप दिया। इस्‍तीफा देने के लिए वो मीडिया से बचती बचाती पिछले दरवाजे से राजभवन में पहुंची। बाद में उन्‍होंने मीडिया को संबोधित किया और अपना लिखित बयान पढ़ा। उन्‍होंने बसपा के हार के कारणों को तो गिनाया ही साथ ही यह भी कहा कि अब यूपी गलत हाथों में पहुंच गया है। उन्‍होंने कहा कि उनके शासन में जो विकास कार्य हुए हैं वे कई वर्ष पीछे चले जाएंगे। इसके बाद उन्‍होंने शब्‍दश: जो कहा वो नीचे है।

''उत्तर प्रदेश के नतीजे घोषित हो चुके हैं और ये हमारी पार्टी के अनुकूल न आने के कारण आज मैंने विधान सभा भंग करने की सिफारिश करने के साथ-साथ अपने मुख्यमंत्री के पद से भी इस्तीफा महामहिम राज्यपाल को सौंप दिया है। हालांकि मेरी इस सरकार के बारे में वैसे आप लोगों को ये भी मालूम है कि मैंने सन 2007 में हर स्तर पर कितनी ज्यादा खराब हालातों में प्रदेश की सत्ता अपने हाथों में ली थी, जिन्हें सुधारने में मेरी सरकार को काफी ज्यादा मेहनत करनी पड़ी है जबकि इस मामले में मेरी सरकार को सहयोग देने में विरोधी पार्टियों की तरह केंद्र सरकार का भी रवैया ज्यादातर नकारात्मक रहा है। इस सबके बावजूद भी मेरी सरकार ने अपनी पार्टी की सर्वजन-हिताय व सर्वजन-सुखाय की नीति के आधार पर चलकर यहां विकास व कानून व्यवस्था के साथ-साथ सर्व समाज में गरीबों, मजदूरों, छात्राओं, कर्मचारियों आदि के हितों के लिए हर मामले में व हर स्तर पर महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक कार्य किए हैं। प्रदेश में बिजली की खराब स्थिति को सुधारने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं जिनका फायदा 2014 तक प्रदेश की जनता को मिल जाएगा।

दुख की बात यह है कि प्रदेश में अब सत्ता ऐसी पार्टी के हाथों में आ रही है जो सभी विकास कार्यों को ठंडे बस्ते में डालकर एक बार फिर प्रदेश को कई वर्ष पीछे ले जाएगी। इसके लिए हमारी पार्टी बीजेपी और कांग्रेस के गलत स्टैंड को ही जिम्मेदार मानकर चलती है। इस बारे में आप लोगों को यह भी मालूम है कि कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश में विधानसभा आम चुनाव घोषित होने के तुंरत बाद ही अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जब मुस्लिम समाज के पिछड़े हुए लोगों को ओबीसी के कोटे में से आरक्षण देने के बात कही, तब बीजेपी ने उसका काफी डंटकर विरोध किया था। इतना ही नहीं बल्कि इस मुद्दे की आड़ में बीजेपी ने भी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रदेश में अग्रणी समाज के साथ-साथ ओबीसी वोटों को भी अपने ओर खींचने की कोशिश की थी, जिसके बाद प्रदेश के मुस्लिम समाज को यह डर सताने लगा था कि कहीं प्रदेश में फिर बीजेपी की सत्ता न आ जाए। इसी स्थिति में कांग्रेस को कमजोर देखते हुए, आरक्षण के मुद्दे पर बीएसपी से अपर कास्ट समाज व पिछडे़ वोटों को बीजेपी में जाने के डर से मुस्लिम समाज ने सपा को वोट किया। इसी कारण से प्रदेश के मुस्लिम समाज ने कांग्रेस और बसपा को अपना वोट न देकर अपना 70 फीसदी वोट इकतरफा तौर पर सपा को दे दिया। यही कारण है कि सिर्फ मुस्लिम वोटों के कारण ही सपा के ओबीसी, अग्रणी समाज और अन्य समुदायों के लोगों का वोट भी जुड़ जाने के कारण सपा के प्रत्याशी चुनाव जीते। मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर सपा के मुसलमान उम्मीदवार इस बार आसानी से चुनाव जीत गए।

प्रदेश में दलितों के वर्ग को छोड़कर ज्यादातर हिंदू समाज में से खास तौर पर अपर कास्ट समाज का वोट कई पार्टियों में बंट जाने के कारण सपा के उम्मीदवारों को ही मिला। कुछ अपर कास्ट हिंदू वोट बसपा को मिले, कुछ कांग्रेस को और बाकी बीजेपी को मिला। अपर कास्ट समाज का वोट बंटने के बाद सपा के समर्थन में परिणाम आने के बाद से प्रदेश का अग्रणी हिंदू समाज दुखी महसूस कर रहा है। लेकिन फिर भी हमारी पार्टी के लिए इस चुनाव में पहले से भी ज्यादा संतोष की बात यह रही है कि विरोधी पार्टियों के हिंदू-मुस्लिम वोटों के चक्कर में बीएसपी का अपना दलित बेस वोट बिलकुल भी नहीं बंटा है। दलित वर्ग के लोगों ने पूरे प्रदेश में अपना इकतरफा वोट बीएसपी के उम्मीदवारों को दिया है। इसी कारण हमारी पार्टी इस चुनाव में दूसरे नंबर पर बनी रही। वरना हमारी पार्टी बहुत पीछे चली जाती। मैं अपने दलित समाज के लोगों का दिल से धन्यवाद और आभार प्रकट करती हूं। इसके साथ-साथ मैं अपनी पार्टी से जुड़े मुस्लिम समाज व अन्य पिछड़ा वर्ग और अग्रणी जाति समाज के उन लोगों का भी दिल से शुक्रिया अदा करती हूं, जो इस चुनाव में किसी भी लहर में गुमराह नहीं हुए और बहकावे में नहीं आए और हमारी पार्टी से जुड़े रहे। हमारी पार्टी में सर्वसमाज के 80 उम्मीदवार चुनाव जीतकर आए हैं।

इसके साथ ही यहां मैं यह भी कहना चाहती हूं कि अब हमारी पार्टी दलितों की तरह यहां प्रदेश में अन्य सभी समाज के लोगों को भी कैडर के जरिए हिंदू-मुस्लिम मानसिकता से बाहर निकालने की भी पूरी-पूरी कोशिश करेगी ताकि इस बार के चुनाव की तरह आगे अन्य किसी भी चुनाव में हमारी पार्टी को इस तरह का कोई भी नुकसान न पहुंच सके। अंत में मेरा यही कहना है कि अब प्रदेश की जनता बहुत जल्द ही सपा की कार्यशैली से तंग आकर, जिसकी शुरुआत कल से हो चुकी है, बीएसपी के सुशासन को जरूर याद करेगी और मुझे यह पूरा भरोसा है कि अगली बार प्रदेश की जनता फिर से बसपा को पूर्ण बहुमत से सत्ता में लाएगी।

मैं प्रदेश की पुलिस और प्रशासन से जुड़े सभी छोटे-बड़े अधिकारियों का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं, पूरी अवधि में उन्होंने मुझे सरकार चलाने में सहयोग किया और 2009 के लोकसभा चुनाव और प्रदेश में 2012 के आम चुनाव करवाने में सहयोग का भी आभार प्रकट करती हूं। भ्रष्टाचार का मेरे शासन के जाने से कोई लेना देना नहीं है। बसपा को मुस्लिम वोटों के ध्रुविकरण के कारण नुकसान पहुंचा। कांग्रेस और बीजेपी और मीडिया जिम्मेदार हैं। प्रदेश की जनता के साथ अब जो भी होगा उसके लिए जनता कांग्रेस और बीजेपी के साथ-साथ मीडिया को भी कोसेगी।''

इसके बाद पत्रकारों ने उनसे कई सवाल पूछे जिसमें सबको उन्‍होंने लगभग टाल दिया। उत्‍तराखंड में बीएसपी के कदम के बारे में पूछे जाने पर मायावती ने कहा कि अभी इस पर निर्णय नहीं लिया गया है, जैसा भी निर्णय होगा, सभी को प्रेस नोट के जरिए बता दिया जाएगा। एक अन्‍य सवाल के जवाब में उन्‍होंने कहा कि यदि मेरी सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा होता तो मुझे इतनी सीटें भी नहीं मिलतीं या फिर मेरा हाल बिहार में लालू प्रसाद के हाल जैसा हो जाता। पार्टी की हार भ्रष्‍टाचार या जनता की नाराजगी की वजह से नहीं बल्कि मतों के ध्रुवीकरण की वजह से हुई है।

एसपी ने पूछा- ‘हिंदुस्‍तान’ में किन लोगों के संरक्षण में साढ़े दस वर्षों तक चलता रहा विज्ञापन घोटाला?

मुंगेर। ‘‘हिन्दुस्तान घोटाला क्या है, कैसे हुआ और इतने वर्षों तक यह घोटाला किन लोगों के संरक्षण में चलता रहा?'' यह सीधा और सपाट प्रश्न मुंगेर के पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन ने 27 फरवरी, 2012 को अपने कार्यालय कक्ष में एक बार फिर याचिकाकर्ता मन्टू शर्मा और उनके अधिवक्ता काशी प्रसाद और श्रीकृष्ण प्रसाद के समक्ष रखा। उन्होंने चेतावनी भी दी कि प्रश्नों का जवाब साक्ष्य के आधार पर नहीं मिलने पर मुकदमा खारिज कर दिया जाएगा।

वरीय अधिवक्ता काशी प्रसाद ने इस सनसनीखेज और चर्चित हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले के संबंध में पुलिस अधीक्षक के समक्ष साक्ष्य के साथ बिन्दुवार जो जवाब दिया, उस जवाब और प्रश्न को पेश कर रहे हैं अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद। श्रीकृष्ण प्रसाद पूरी बहस के दौरान वरीय अधिवक्ता काशी प्रसाद को सहयोग कर रहे थे। पुलिस अधीक्षक ने चौथी बार सूचक मंटू शर्मा और उनके अधिवक्ता काशी प्रसाद और श्रीकृष्ण प्रसाद को अभियोजन के पक्ष में साक्ष्य को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।

स्मरणीय है कि मुंगेर की कोतवाली पुलिस मुकदमा संख्या -445/2011 में कथित 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले की जांच कर रही है। कोतवाली पुलिस ने थाना में याचिकाकर्ता मंटू शर्मा के फर्दबयान पर मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष सह संपादकीय निदेशक शोभना भरतिया, प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, स्थानीय संपादक अकु श्रीवास्तव और बिनोद बंधु के साथ मुद्रक के विरुद्ध प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एवं बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8 बी, 14 और 15 और भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420, 471 और 476 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। नीचे एपी द्वारा पूछे गए प्रश्‍न एवं उसके उत्‍तर –

एसपी – ‘‘दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला क्या है?‘‘

अधिवक्ता — ‘‘हिन्दुस्तान दिल्ली से मुद्रित, प्रकाशित और वितरित होता है। प्रकाशक अमित चोपड़ा हैं। इस अखबार का रजिस्ट्रेशन नम्बर -509(नई दिल्ली) है ।रजिस्ट्रेशन डेट 23 मार्च, 2011 है। इसी नाम का ’हिन्दुस्तान‘ का संस्करण नए समाचार और बदले हुए स्वरूप में पटना (बिहार) से मुद्रित, प्रकाशित और वितरित होता है। इस हिन्दुस्तान का रजिस्ट्रेशन नम्बर -44348/1986/पटना है।

फिर, इसी नाम का ‘हिन्दुस्तान‘ का ‘मुंगेर संस्करण‘ वर्ष 2001 के 3 अगस्त से भागलपुर से अबतक लगातार मुद्रित और प्रकाशित हो रहा है और मुंगेर जिले के पाठकों के बीच वितरित होता आ रहा है। फिर भी कंपनी ने मुंगेर संस्करण को मुद्रित, प्रकाशित और मुंगेर जिले के पाठकों के बीच वितरित करने के लिए प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एवं बुक्स एक्ट, 1867 के तहत प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली से रजिस्ट्रेशन नम्बर अब तक प्राप्त नहीं किया है और प्रारंभ से अब तक अर्थात पूरे साढ़े दस वर्षों से अवैध ढंग से हिन्दुस्तान के मुंगेर संस्करण का प्रकाशन और वितरण मुंगेर जिला में करता आ रहा है।

हिन्दुस्तान, मुंगेर संस्करण का विज्ञापन घोटाला यह है कि जब हिन्दुस्तान (मुंगेर संस्करण) का 03 अगस्त, 2001 से रजिस्ट्रेशन नहीं रहने के बावजूद कंपनी ने पटना से प्रकाशित एवं मुद्रित हिन्दुस्तान का रजिस्ट्रेशन नम्बर -44348/86 को मुंगेर संस्करण हिन्दुस्तान में जालसाजी, धोखाधड़ी और ठगी की नीयत से लगातार 30 जून, 2011 तक छापता रहा। फर्जी रजिस्‍ट्रेशन नम्बर अखबार पर छापकर हिन्दुस्तान (मुंगेर संस्करण) के सभी नामजद अभियुक्तों ने मुंगेर प्रमंडल के केन्द्र और राज्य सरकार के कार्यालयों से लगभग 200 करोड़ का सरकारी विज्ञापन छल और धोखाधड़ी से प्राप्त किया और सरकारी राजस्व को चूना लगाया।‘‘

अधिवक्ताओं ने आगे बताया कि — ‘‘हिन्दुस्तान (मुंगेर संस्करण) को मुद्रित, प्रकाशित और मुंगेर जिले के ग्राहकों के बीच वितरित करने के पूर्व कंपनी मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, जो पूर्व में मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड और फिर मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड के नाम से हिन्दुस्तान का मुंगेर संस्करण छाप रहा था, को प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एवं बुक्स एक्ट, 1867 के तहत प्रकाशन कार्य प्रारंभ करने के पूर्व जिलाधिकारी (मुंगेर) के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषणा करना, कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना और भारत सरकार के प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली से पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) कराना अनिवार्य था, परन्तु कंपनी (मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड, मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड और अब मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड) ने आज तक नहीं किया।

सभी अभियुक्तगण 03.08.2001 से कंपनी का नाम बदल-बदल कर कानून को ठेंगा दिखाकर हिन्दुस्तान मुंगेर संस्करण छापते रहे और साढ़े दस वर्षों तक बिना निबंधन का हिन्दुस्तान मुंगेर संस्करण छापा और अखबार में हिन्दुस्तान (पटना) संस्करण का रजिस्ट्रेशन नम्बर छापकर केन्द्र और राज्य सरकार को धोखा देकर 200 करोड़ का विज्ञापन हासिल कर राजस्व लूट का विश्वव्यापी मिसाल कायम किया। आज भी कंपनी बिना रजिस्ट्रेशन का राज्य सरकार, केन्द्र सरकार, भारतीय रेल, बिहार लोक सेवा आयोग और अन्य सरकारी संस्थाओं का विज्ञापन हिन्दुस्तान मुंगेर संस्करण में अवैध, गैरकानूनी ढंग से डंका की चोट पर छाप रही है और सरकारी राजस्व को चूना लगा रही है।‘‘

एसपी– ‘‘हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला हुआ और अवैध ढंग से कंपनी ने सरकारी विज्ञापन वसूला और अनैनित लाभ प्राप्त किया, इसका साक्ष्य क्या है?‘‘

अधिवक्ता– ‘‘बिहार सरकार के तत्कलीन मुख्य सचिव प्रेम प्रसाद नैय्यर ने दिनांक 13 जुलाई, 1981 और सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के सचिव राजेश भूषण ने वर्ष 2008में अलग-अलग बिहार सरकार की विज्ञापन नीति प्रकशित की और राज्य सरकार के हर विभाग के विभाग प्रमुखों को दैनिक अखबार में सरकारी विज्ञापन भेजने और प्रकाशित करने की शर्त्तें तय कर दीं। विज्ञापन नीति, 1981 में पृष्ठ 02 पर कंडिका 04 में और बिहार विज्ञापन नीति, 2008 के पृष्ठ -01 पर कंडिका 03 के (ख) में स्पष्ट उल्लेख है कि ‘‘सरकारी विज्ञापन छापने के योग्य वे समाचार पत्र होंगे, जो प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन एवं बुक्स एक्ट, 1867 के अन्तर्गत प्रेस रजिस्ट्रार से निबंधित होंगे।

बिहार सरकार की स्पष्ट विज्ञापन नीतियों के बावजूद अभियुक्तगण ने मुंगेर और भागलपुर में साढ़े दस वर्षों के दौरान पदस्थापित जिला पदाधिकारियों, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के पदाधिकारियों, सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय (पटना) के सचिवों, निदेशकों, उप-निदेशक (विज्ञापन) की मिलीभगत से लगभग 200 करोड़ का सरकारी विज्ञापन साढ़े दस वर्षों में छापा और सरकारी राजस्व की लूट मचाई।‘‘

एसपी– ‘‘साढ़े दस वर्षों से चल रहे हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले के लिए कौन-कौन जिम्मेवार हैं?‘‘

अधिवक्ता– ‘‘अपने कार्यालय से स्पष्ट विज्ञापन नीति 1981 और 2008 का निर्माण कर बिहार के सभी आयुक्त, जिला पदाधिकारी, उप-विकास आयुक्त, निगम अध्यक्ष आदि को भेजनेवाले सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय (पटना) में विज्ञापन से जुड़े सभी छोटे-बड़े अधिकारी, भागलपुर और मुंगेर के साढ़े दस वर्षों तक पदस्थापित रहे सभी जिला पदाधिकारी और सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के उप-निदेशक और जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी, प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय,नई दिल्ली और डीएवीपी, नई दिल्ली के साढ़े दस वर्षों के पदस्थापित सभी अधिकारी पूर्णरूपेण जिम्मेवार और घोटाला के सहभागी हैं। इस विश्वव्यापी हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला में वर्णित विभागों के अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए और उन्हें भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोप में अभियुक्त बनाने की जरूरत हैं।‘‘

एसपी- ‘‘मुंगेर के सरकारी कार्यालय से हिन्दुस्तान ने विज्ञापन वसूला, क्या साक्ष्य है?‘‘

अधिवक्ता– ‘‘द हिन्दुस्तान टाइम्स, भागलपुर संस्करण कार्यालय ने अपने कार्यालय के रेफरेन्स नं0- 57, 138, 117, 85, 125, 62, 139, 143, 215, 69, 74, 46 के जरिए वर्ष 2001/02 में बीएसएनएल, मुंगेर एवं अन्य को प्रकाशित विज्ञापन विपत्र जारी किया था, की छायाप्रति श्रीमान को सुपुर्द की जाती है।‘‘

अधिवक्ता ने एसपी से सभी नामजद अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप-पत्र समर्पित करने और अभियुक्तों की गिरफतारी के लिए पुलिस टीम भागलपुर, पटना और दिल्ली भेजने की मांग की है।

एसपी– ‘‘इस घोटाले में और कितने संपादक संलग्न हैं?‘‘

अधिवक्ता– ‘‘वर्ष 2001 से अब तक हिन्दुस्तान मुंगेर संस्करण में छपनेवाले सभी संपादक क्रमशः सुनील दूबे, महेश खरे, विजय भास्‍कर, विश्वेश्वर कुमार एवं अन्य संपादक भी इस घोटाले के लिए दोषी हैं। उन्हें भी अभियुक्त बनाने की जरूरत है।

एसपी- ‘‘क्या अन्य अखबार भी ऐसा कर रहे हैं?‘‘

अधिवक्ता– ‘‘दैनिक जागरण, प्रभात खबर, दैनिक आज भी जिले-जिले से पूरे बदले हुए स्वरूप में बदले हुए समाचार के साथ खास-खास जिलों के लिए अवैध ढंग से प्रकाशित हो रहे हैं और सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग की मिलीभगत से सरकारी विज्ञापन की लूट मचा रहे हैं।''

अधिवक्ता ने एसपी से इस देशव्यापी मीडिया घोटाले से जुड़े सूचक मंटू शर्मा, वरीय अधिवक्ता काशी प्रसाद, श्रीकृष्ण प्रसाद, अशोक कुमार एवं अन्य को अभियुक्तों से सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध किया है। इस बीच, हिन्दुस्तान अखबार ने मुकदमे से जुड़े सभी व्यक्तियों को मौत का डर दिखाकर आतंकित करने का अभियान तेज कर दिया है।

मुंगेर से एसके प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क -09470400813 के जरिए किया जा सकता है.

खंडूड़ी का हारना उत्‍तराखंड की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं!

मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूड़ी का कोटद्वार से चुनाव हार जाना किसी भी रूप से उत्तराखंड की राजनीति के लिए शुभ नहीं माना जा सकता. खंडूड़ी का फौजी होना जो उनके राजनीति का सबसे बड़ा गुण है वहीँ उनका फौजी अफसर होना उनके लिए नुकसानदायक सिद्ध हो रहा है. उनका आज भी जन प्रतिनिधियों से ज्यादा विश्वास नौकरशाहों पर है, जिस कारण आम आदमी से उनकी स्वाभाविक दूरी बन जाती है, जो उनको व्यक्तिगत रूप से नुकसान दे गया. राज्य व राज्य के बाहर फैले भू-माफियाओं व दलालों ने खंडूड़ी के हारने पर जश्न मनाया जो पहाड़ के लिए खतरे की घंटी है.

वैसे ..खंडूड़ी है.. जरूरी.. के नारे ने भाजपा के पक्ष में कितना काम किया यह शोध का विषय है, पर इस नारे से लैस पूरे पहाड़ में खंडूड़ी के बड़े-बड़े पोस्टर और उसमे कोश्यारी जैसे बड़े नेता का फोटो न लगाने में उनका अहंकार झलकता था, पर इसमें खंडूड़ी का कम, निशंक के जमाने में उत्तर प्रदेश से इम्पोर्ट किये गये एक आईएएस अधिकारी का ज्यादा दोष है, जो सरकार के प्रचार के साथ-साथ खंडूड़ी की चमचागिरी में भी मशगूल था और उसने ही खंडूड़ी के व्यक्तिगत प्रचार में ज्यादा रूचि ली. माल बनाने में माहिर का आरोपी यह अधिकारी, खंडूड़ी के आने पर राज्य में अहम किरदार की भूमिका निभाने की जुगत में थे?

खैर, वैसे खंडूड़ी ने अपनी हार के पीछे भितरघात की ओर इशारा किया लेकिन उन्हें आत्म विश्लेषण भी जरूर करना चाहिए कि उनमें क्या कमी रही है. वैसे भितरघात तब ही असर करता है जब अपने में कुछ कमजोरी होती है. पर यह बात बेहद जरूरी है उत्तराखंड को एक ईमानदार व मिलनसार मुखिया की जरूरत है. इधर, कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी, पार्टी से अपने अपमान का गिन-गिन कर बदला लेने से नहीं चूक रहे हैं, अपने भतीजे तथा आन्ध्र राजभवन में तिवारी की मिट्टी खराब करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले (उनके पीए) किरदार को कांग्रेस की बांह मरोड़कर टिकट दिलाकर पार्टी का नुकसान किया और पार्टी ये दोनों सीटें हार गई.

खैर, उत्तराखंड की महान जनता ने दोनों ही बड़े दलों को चेता दिया है कि वे दोनों ही उनके मापदंडों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं इसलिए उन्हें उत्तराखंड के विकास की सही रणनीति अपनानी होगी. नहीं तो देर सवेर उन्हें अन्य विकल्प तलाशने होंगे.

लेखक विजेंद्र रावत उत्‍ततराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

जीत के बाद सपाइयों की गुंडई शुरू : मीडियाकर्मियों पर हमला किया, कई घायल

: अपडेट : पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया  : कैमरे तोड़े गए और बंधक बनाया गया : जीतने के साथ ही समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं का आतंक शुरू हो गया है। झांसी में सपाइयों ने मीडियाकर्मियों पर हमला कर दिया। कई पत्रकारों को जान बचाने के लिए इधर-उधर छिपना पड़ा। इस हमले में करीब 15 टीवी पत्रकारों को बुरी तरह मारा-पीटा गया। उनके कैमरे भी तोड़ दिए गए। पत्रकारों को अपनी जान बचाने के लिए एक स्कूल में छिपना पड़ा। सपा कार्यकर्ता घंटों पत्रकारों को बंधक बनाए रखा। आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पत्रकार अनशन पर बैठ गए हैं।

यहां बसपा उम्मीदवार के जीत जाने से नाराज सपाइयों ने पहले बसपा प्रत्याशी पर हमला किया, जिसका वहां मौजूद मीडियाकर्मियों कवरेज करने की कोशिश की। इसके बाद ही पत्रकारों पर हमला किया गया। पत्रकारों को अपनी जान बचाने के लिए छिपना पड़ा। बताया जा रहा है कि वहां मौजूद पुलिसकर्मी बिल्कुल खामोश देखे गए। पत्रकारों ने फोन करके डीएम और एसपी से मदद की गुहार की तो उन लोगों ने कहा कि हम खुद असहाय हैं आप लोग हमें बचाओ।

सपाइयों के हमले में इंडिया टीवी के जावेद असलम, एनडीटीवी के विनोद गौतम, सी न्‍यूज के इमरान खान, न्‍यूज एक्‍सप्रेस के प्रमोद गौतम, मुंसिफ टीवी के तारिक इकबाल, जनसंदेश न्‍यूज के शकील अली हाशमी, जी न्‍यूज के अमित वर्मा, आजतक के अभिषेक श्रीवास्‍तव घायल हुए हैं। पत्रकारों ने पुलिस से इस हमले की लिखित शिकायत की परन्‍तु मामला दर्ज नहीं किया गया है। पत्रकार सपाइयों के खिलाफ कार्रवाई की मांग लेकर झांसी में अनशन पर बैठ गए हैं।

पत्रकारों ने कहा है कि अगर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो वे आमरण अनशन पर भी बैठने को तैयार हैं। पत्रकारों से अनशन स्‍थल पर मिलने के लिए केंद्रीय राज्‍यमंत्री एवं कांग्रेसी नेता प्रदीप जैन आदित्‍य, पूर्व विधायक बृजेंद्र व्‍यास एवं नवनिर्वाचित विधायक झांसी सदर रवि शर्मा भी पहुंचे थे। इन लोगों ने पत्रकारों पर हुए हमले की निंदा करते हुए कहा कि वे मीडियाकर्मियों के संघर्ष में उनके साथ हैं।

झांसी में मीडियाकर्मियों पर हुए हमले के बारे में ताजा अपडेट है कि पुलिस ने दो नामजद समेत ढाई सौ अज्ञात सपा समर्थकों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। बताया जा रहा है कि पुलिस ने सपा के पूर्व सांसद एवं राष्‍ट्रीय कोषाध्‍यक्ष चंद्रपाल सिंह यादव, पूर्व ब्‍लाक प्रमुख बबीना पंजाब सिंह और ढाई सौ समर्थकों पर आईपीसी की धारा 147, 148, 323, 395 औ 427 के तहत मामला दर्ज कर लिया है। खबर है कि पत्रकारों ने अपना अनशन खतम कर दिया है। 

दिल्‍ली कार ब्‍लास्‍ट की साजिश में पत्रकार गिरफ्तार

राजधानी दिल्ली में इस्राइली राजनयिक की पत्नि पर हुए हमले के मामले में दिल्ली पुलिस ने एक शख्स को गिरफ्तार किया है। मोहम्मद काजमी नाम के इस शख्स पर हमले की ‌साजिश में शामिल होने का आरोप है। पुलिस आज इस शख्स को कोर्ट में पेश करेगी।

पुलिस के मुताबिक मोहम्मद काजमी ईरान की एक न्यूज एजेंसी में पत्रकार है। काजमी पर आरोप है कि उसने ब्लास्ट के आरोपी को शरण दी थी। पुलिस ने इसे कल दक्षिणी दिल्ली से गिरफ्तार किया था। काजमी से हमले के बारे पूछताछ की जा रही है। इसके अलावा पुलिस उसके साथी की तलाश में भी जुटी है। साभार : अमर उजाला

पत्रकार के हत्‍यारे को सिलीगुडी से रोसड़ा लाया गया

रोसड़ा : पत्रकार विकास रंजन हत्याकांड का अभियुक्त मोहन यादव को पुलिस ने सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) जेल से रोसड़ा लाया। न्यायालय के आदेश पर वहां से लाने के पश्चात उसे न्यायालय में पेश किया गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार लूट एवं आ‌र्म्स एक्ट के मामले में करीब छह माह पूर्व पश्चिम बंगाल पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था। वह बिथान थाने के लरझा घाट निवासी बताया जाता है।

रोसड़ा पुलिस के अनुसार मोहन यादव पत्रकार विकास रंजन हत्या कांड का अप्राथमिक अभियुक्त है। उक्त कांड में पूर्व में गिरफ्तार किए गये अभियुक्त बरकू यादव द्वारा दिये गये बयान के पश्चात पुलिस अनुसंधान में मोहन यादव को भी अभियुक्त बनाया गया था। ज्ञातव्य हो कि 25 नवंबर 2008 की संध्या में पत्रकार विकास रंजन की हत्या गोली मारकर दी गयी थी। मृतक के पिता फूल कांत चौधरी के बयान पर रोसड़ा थाना कांड संख्या 173/08 दर्ज कर 11 को नामजद किया गया था। इस मामले में अब तक कई आरोपी जेल जा चुके हैं। मामला न्यायालय में लंबित है। साभार : जागरण

जानकारी देने में देरी पर भड़के पत्रकार, नारेबाजी की

बठिंडा : मतगणना की जानकारी में देरी से पालीटेक्निक कालेज स्थित मतगणना केंद्र में पत्रकारों ने डिप्टी कमिश्नर के खिलाफ नारेबाजी की। हालांकि बाद में डीसी ने तुरंत जानकारी देने का भरोसा देकर पत्रकारों को शांत करवाया। दरअसल, मतगणना केंद्र में दो राउंड की गिनती होने के बावजूद यहां बनाए मीडिया सेंटर में जानकारी देने में देरी होती रही। बार-बार पूछे जाने के बावजूद किसी तरफ से कोई जानकारी नहीं मिली।

पत्रकारों ने इसका विरोध जताते हुए डिप्टी कमिश्नर और चुनाव आयोग के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी और मीडिया सेंटर छोड़ मतगणना केंद्र के मेन गेट पर धरना लगा दिया। काफी देर तक चले हंगामे के बाद डिप्टी कमिश्नर कमल किशोर यादव और एसएसपी डा. सुखचैन सिंह गिल वहां पहुंचे। वहां डीसी ने भरोसा दिलाया कि मीडिया सेंटर में तुरंत जानकारी भेजी जाएगी। इसके बाद राउंडवाइज जानकारी देनी शुरू कर दी गई। डीसी ने कहा कि गिनती के बाद रिजल्ट में चुनाव आब्जर्वर के हस्ताक्षर करवाने जरूरी होते हैं, इसलिए थोड़ी देरी हो रही थी, लेकिन बाद में इसे ठीक करवा दिया गया।

कार्ड पर उठे सवाल : मतगणना केंद्रों में जाने के लिए चुनाव आयोग की तरफ से मीडिया कर्मियों को दिए कार्डो पर भी सवाल उठे। जब पत्रकारों ने कार्ड के जरिए मतगणना केंद्र में जाना चाहा तो पुलिस कर्मचारियों ने रोक दिया और कार्ड को मानने से इंकार कर दिया।

मीडिया सेंटर बना 'सीआईडी' सेंटर : पालीटेक्निक कालेज स्थित मतगणना केंद्र में मतगणना की जानकारी देने के लिए बने मीडिया सेंटर में पूरी तरह कुप्रबंधन हावी रहा। मीडिया कर्मियों के पहुंचने से पहले ही सीआईडी के कर्मचारी यहां कुर्सियों पर बैठ गए। इस दौरान वहां पब्लिक रिलेशन दफ्तर के कर्मचारियों की ड्यूटी लगी थी लेकिन किसी ने उन्हें उठाने की जहमत नहीं उठाई। साभार : जागरण

इंडिया न्‍यूज के संवाददाता से अधिकारियों ने की मारपीट, पत्रकारों ने ज्ञापन सौंपा

उदयपुर। टोंक में इंडिया न्यूज चैनल के संवाददाता जियाउद्दीन से शनिवार को राजकीय अधिकारियों द्वारा मारपीट करने व हमले के विरोध में राजस्थान पत्रकार परिषद के सदस्य तथा शहर के वरिष्ठ पत्रकारों ने जयप्रकाश माली के नेतृत्व में मंगलवार को उदयपुर कलक्ट्रेट में एडीएम सिटी को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल में शामिल वरिष्ठ पत्रकार शांतिलाल सिरोया, मुनेश अरोड़ा, वीरेंद्र श्रीवास्तव, डॉ. रवि शर्मा, प्रतापसिंह राठौड़, प्रमोद गौड़, अब्बास रिजवी, शांतिलाल जैन, कपिल श्रीमाली, कुलदीप सिंह, प्रकाश मेघवाल, अनिल जैन, घनश्याम सिंह भीण्डर ने बताया कि टोंक में पत्रकार को जान बूझकर निशाना बनाया गया है।

पत्रकारों ने कहा कि उनके खिलाफ राजकार्य में बाधा का झूठा मुकदमा भी दर्ज किया गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हुए इस हमले के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। मीडिया पर बार-बार हो रहे हमलों को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राज्य सरकार के भी ठोस कार्रवाई की दिशा में पहल करनी होगी। प्रतिनिधिमंडल ने कार्रवाई नहीं होने की दशा में धरना व प्रदर्शन की भी चेतावनी दी।

भास्‍कर से प्रफुल हिरानी एवं जनता टीवी से विजय चावला का इस्‍तीफा

दैनिक भास्‍कर समूह से खबर है कि प्रफुल हिरानी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे इस समूह के साथ बड़ोदा में चीफ सब एडिटर के रूप में कार्यरत थे. वे आठ सालों से इस समूह को अपनी सेवाएं दे रहे थे. पिछले तीस साल से पत्रकारिता में सक्रिय प्रफुल अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

जनता टीवी, लखनऊ से खबर है कि विजय चावला ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे कुछ दिन पहले ही जनता टीवी से रिपोर्टस हेड के रूप में जुड़े थे. जनता टीवी के नेटवर्किंग डाइरेक्‍टर सीपी सिंह ने उनकी जगह अब सोनिका पाण्‍डेय को रिपोर्टस हेड बना दिया है. बताया जा रहा है कि अब वे स्‍वतंत्र रूप से पत्रकारिता करेंगे. वे इसके पहले वे पब्लिक पॉवर, दर्पण न्‍यूज चैनल, आजतक, वॉयस ऑफ इंडिया, महुआ, टीवी100, हमार टीवी के लिए भी काम कर चुके हैं.

सपा दफ्तर का नज़ारा… ढिंक चिका की धुन पर पायल किन्नर का नाच

फटा पोस्टर निकला हीरो….. उत्तर प्रदेश चुनावों के नतीजे आ गए है. पूरे सूबे की चुनावी कचहरी में डेढ़ महीने से चल रहा मजमा अब विक्रमादित्य मार्ग तक सिमट गया है, नेवले और साप की लड़ाई या सांडे का तेल बेचने की तर्ज पर दर्शक जुटाने वाले खबरिया चैनलों के मजमे का भी क्लाइमेक्स खत्म हो गया है. उत्तर प्रदेश में सत्ता सुंदरी ने अपना ठिकाना बदल लिया है. ५ कालिदास मार्ग पर सन्नाटा है और ५ विक्रमादित्य मार्ग पर होली का माहौल है. चौराहे से निकलने वाली सड़क पर गाड़ियों का जाम है. पर हार्न के शोर पर ढोल नगाडों की आवाज भरी पड़ रही है.

सड़क पर गुलाल बिखरा है तो समाजवादी पार्टी के कार्यालय के बाहर पार्टी के झंडे बैनर बेचने वाले अग्रवाल बंधु और दो दूसरी दुकानों पर झंडे खरीदने वालों की भीड़. ओवी वैनो की भीड़ ने सड़क के ट्रैफिक को बिगाड़ दिया है. किसी तरह चकार काट के पार्टी आफिस के गेट पर पहुचिये तो नृत्य करते युवाओं की टोली होलियाना माहौल बना रही है. हवा में उड़ता गुलाल और एक दूसरे को गले लगाना आज समाजवादी पार्टी के आफिस का यही माहौल है. इसी बीच पायल किन्नर की टोली आती है और माहौल फिर बदल जाता है. कल तक कांग्रेस में रहने वाली पायल के हाथ में आज समाजवादी झंडा है. वहाँ मौजूद युवा पायल के ताल से ताल मिलाने लगते हैं. खबरनवीसों का कैमरा उधर ही घूम जाता है. ….ढिंक चिका ढिंक चिका…. की धुन बजने लगाती है. समाजवादी मस्त बाकि सब पस्त, एक युवा नारा लगता है. भीड़ साथ देती है.

मीडिया सेल में बहुत भीड़ है पर पिचले चार सालों से मीडिया के साथ ताल मेल बनाने वाले राजेंद्र चौधरी गायब है. पूछने पर पता चलता है…. अंदर मीटिंग चल रही है. कांफिडेंट युवा सांसद धर्मेन्द्र यादव एक कमरे में लगातार बाईट देने में व्यस्त. पाश्चात्य वेशभूषा में युवा महिला टीवी पत्रकार कौतुहल से गंवई समाजवादियों को नृत्य करते देख रही हैं. वो दिल्ली से आई हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति को पहली बार देख रही हैं, अचानक उसके मुंह से निकलता है “दीज गयिज़ गाना मैड” …एक गंवई समाजवादी उसे घूरता है और अखिलेश भैया जिंदाबाद का नारा लगता है. लान में टोलियों में लोग बैठे हैं. सीट वाइज़ विश्लेषण चल रहा है और लगे हाथ मंत्रालयों के बंटवारे पर चर्चा भी. अचानक नेता जी के आने का शोर होता है, कैमरामैन कोठी की तरफ भागते हैं… एक कैमरामन कुछ अलग स्नैप के लिए एंगिल खोज रहा है, सीनियर पत्रकार इंतज़ार में हैं, सवालों को धार देने की कोशिश में होमवर्क चल रहा है.

पर एक बात है, एक अनोखा अनुशासन हर जगह मौजूद है जो अखिलेश यादव के उस वादे की और ध्यान दिला रहा है ….''हमारी पार्टी गुंडों की नहीं है…”

लेखक उत्कर्ष कुमार सिन्हा सोशल एक्टिविस्ट और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

IRS 2011 (Q4)- Top Ten Hindi Magazines शीर्ष दस हिंदी पत्रिकाएं

आईआरएस2011 की चौथी तिमाही में कौन सी हिंदी पत्रिकाएं शीर्ष दस हिंदी पत्रिकाओं में शुमार हैं, इसे जानने के लिए नीचे के ग्राफ को देखें. इसमें तीसरी तिमाही के भी आंकड़ें हैं. साथ ही यह भी बताया गया है कि मैग्जीन मंथली है या वीकली. ग्राफ से जाहिर है कि प्रतियोगिता दर्पण मैग्जीन हिंदी पत्रिकाओं में सबसे उपर है. हालांकि उसकी हालत तीसरी तिमाही के मुकाबले पतली हुई है…

IRS 2011 (Q4)- Top Ten English Dailies शीर्ष दस अंग्रेजी अखबार

आईआरएस2011 की चौथी तिमाही के नतीजे में कौन कौन से अंग्रेजी अखबार टाप टेन अंग्रेजी अखबारों की लिस्ट में हैं, इसे जानने के लिए नीचे का ग्राफ देखिए. सभी आंकड़े में तीन शून्य जोड़ लें, जैसा ग्राफ के आखिर में बताया गया है. ग्राफ में तीसरी तिमाही के भी आंकड़े हैं, जिसके आधार पर तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं….

अखिलेश ने दोहराया- सपा शासन में गुंडागर्दी करने वाले बाहर होंगे

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों में शानदार सफलता हासिल करने के बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा है कि सपा की सरकार बनने पर गुंडागर्दी करने वाले को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा और ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. बसपा की पराजय के बारे में अखिलेश ने कहा, जो लोग हार गए, उनके बारे में क्या कहें, वे लोग तो खुद हार स्वीकार कर रहे हैं. प्रदेश की जनता ने बसपा को सूबे को खुशहाली के रास्ते पर ले जाने का अच्छा मौका दिया था, मगर उसने पत्थर लगवाने पर सारा पैसा लगा दिया और उसके अधिकारियों ने भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके निकाले, जिससे प्रदेश बदहाली के रास्ते पर चला गया. 

खुद के बारे में अखिलेश बोले कि वह मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं और मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री बनेंगे. अखिलेश ने कहा कि उनकी पार्टी को जाति-धर्म से ऊपर उठकर जनता ने चुना है और वह इसके लिए जनता के शुक्रगुजार हैं. उन्होंने कहा, यह सच है कि यूपी की जनता ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर सपा को वोट दिया. हमें यह कामयाबी मिलने की उम्मीद थी. हमारी पूरी पार्टी ने मिलकर संघर्ष किया जिसका नतीजा सबके सामने है.

इस बीच, चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट की मानें तो यूपी में कुल 204 सीटों पर सपा आगे है और 12 सीटों पर जीत हासिल कर चुकी है. इस तरह समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत पाकर उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गयी है. बहुजन समाजवादी पार्टी 88 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है जबकि शुरुआती सर्वेक्षणों में अच्छी स्थिति पाने वाली भाजपा 46 सीटों के साथ तीसरे और कांग्रेस 26 तथा रालोद 12 सीटों के साथ काफी पिछड़ गये हैं.

गाजीपुर सदर सीट से वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद के भतीजे विजय मिश्र 240 मतों से जीते

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की गाजीपुर सदर सीट से पहली बार चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे विजय कुमार मिश्र को विजयश्री मिल गई है. उन्होंने केवल 240 वोटों से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी राजकुमार सिंह को पराजित कर दिया है. विजय कुमार मिश्र समाजवादी पार्टी के टिकट से मैदान में थे. वे वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र के भतीजे हैं. इस सीट पर बसपा, सपा, भाजपा और कौमी एकता दल के उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर थी. भाजपा के अरुण सिंह तीसरे स्थान पर हैं और कौमी एकता दल की ओमकला चौथे.

पिछली बार राजकुमार सिंह बसपा के टिकट पर पहली बार चुनाव लड़े थे और विजयी रहे. इस बार विजय मिश्र सपा के टिकट पर पहली बार चुनाव लड़े और विजयी रहे. अरुण सिंह कई चुनावों से भाजपा के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ रहे हैं पर उन्हें जीतने का मौका एक बार भी नहीं मिला. इस बार अरुण सिंह को जिताने के लिए काफी कवायद उनके समर्थकों ने की लेकिन अंततः विजय मिश्र सब पर भारी पड़े.

IRS 2011 (Q4)- Top Ten Hindi Dailies शीर्ष दस हिंदी अखबार

आईआरएस 2011 की चौथी तिमाही  के नतीजे आ चुके हैं. टाप टेन हिंदी अखबारों का एक ग्राफ यहां दिया जा रहा है. इसमें क्वार्टर थ्री यानि तीसरी तिमाही के भी नतीजे हैं. इनसे तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है. जो फीगर है उसमें तीन शून्य जोड़ लें, जैसा कि ग्राफ के आखिर में बताया गया है…

आईएएस और आईपीएस अफसरों के कारण डूबी मायावती देंगी इस्तीफा

आखिरकार मायावती को जाना पड़ा. यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी करारी हार हुई है. सौ सीट के आसपास मंडरा रही बसपा को डुबोने का काम सिर्फ और सिर्फ सत्ता के करीबी रहे आईएएस और आईपीएस अफसरों ने किया है. पूरे प्रदेश में पांच साल में जिस तरह का कुशासन चला, उसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार ये नौकरशाह ही हैं. नौकरशाहों के भरोसे रहीं मायावती को यह अंदाजा भी नहीं हुआ कि प्रदेश में गरीबों के साथ किस कदर अन्याय हो रहा है.

महिला, दलित, पत्रकार, किसान उत्पीड़न की घटनाएं और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा के कारण पूरे प्रदेश की जनता का बसपा और मायावती से मोहभंग हो गया. इसी का फायदा सपा को मिला है. सपा वाले जानते हैं कि करप्शन रोकना और ला एंड आर्डर मेनटेन करना उनकी पहली प्राथमिकता है. अगर वे ऐसा नहीं कर सके तो उन्हें भी जनता का कोपभाजन बनना पड़ सकता है. माया शासनकाल में भ्रष्ट और जनविरोधी अफसरों के खिलाफ सपा शासनकाल में कार्रवाई संभावित है. उत्तर प्रदेश की आगामी विधानसभा की तस्वीर एग्जिट पोल के दावों के मुताबिक ही सामने आती दिख रही है. यहां समाजवादी करीब 200 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी रही है. वह 202 के जादुई आंकड़े के पास है. मायावती की बीएसपी को झटका लगा है, लेकिन वह मजबूती से दूसरे नंबर पर है. बीजेपी और कांग्रेस तीसरे व चौथे नंबर के लिए संघर्ष कर रही हैं.
 

महुआ हुआ कंगाल : खाते में पैसा नहीं, चेक हुए बाउंस

महुआ ग्रुप के खाते में अब पैसे नहीं हैं. महुआ प्राइवेट लिमिटेड बुरे दौर से गुजर रहा है. कंपनी द्वारा दिए गए चेक बाउंस हो गए हैं. खबर है कि बिहार के महुआ स्ट्रिंगरों की होली बनाने के नाम पर ये चेक बांटे गए थे, पर उनकी होली मनने की बजाय कंपनी का ही दिवाला निकलता दिख रहा है. अभी तक जो सूचना मिली है उसके अनुसार कई स्ट्रिंगरों के चेक बाउंस हुए हैं. कारण बताया गया है कि एकाउंट में पर्याप्‍त पैसा नहीं है.

कंपनी ने अपने बिहार के स्ट्रिंगरों को पिछले चार माह से पैसा नहीं दिया था, जिसके चलते स्ट्रिंगर भी अच्‍छी खबरें भेजने से परहेज कर रहे थे. बताया जा रहा है कि प्रबंधन इन स्ट्रिंगरों का ब‍काया चुकाने का आश्‍वासन पिछले काफी समय से दे रहा था. इस बीच महुआ के आउटपुट हेड रंजीत कुमार 26 फरवरी को पटना पहुंचे तथा बिहार के स्ट्रिंगरों की मीटिंग ली. इसी मीटिंग में उन्‍होंने यह चेक सभी को दिए. इस दौरान कहा गया कि यह आपलोगों की होली को ध्‍यान में रखते हुए दिया जा रहा है.

बताया जाता है कि अपना बकाया मिलने के बाद स्ट्रिंगर काफी खुश थे. स्ट्रिंगरों को ये आश्‍वासन भी दिया गया कि अब से उन्‍हें हर दो महीने बाद ही उनके पैसे मिल जाएंगे. अब दिक्‍कतें खतम हो जाएंगी. बताया जा रहा है कि स्ट्रिंगरों ने अपनी परेशानी तथा दुख-दर्द भी आउटपुट हेड को बताए. नाम ना छापने की शर्त पर महुआ के स्ट्रिंगर बताते हैं कि पहले उन्‍हें जो चेक मिलता था वो मालकिन के हस्‍ताक्षर से मिलता था, पर इस बार उन्‍हें बैंक ऑफ बड़ौदा का सीसी एकाउंट का चेक मिला. इसके बाद भी जब उन्‍होंने चेक बैंक में डिपाजिट किया तो वो बाउंस हो गया.

चेक बाउंस होने का कारण पर्याप्‍त बैलेंस न होने को बताया गया. स्ट्रिंगर बताते हैं कि जब इस संदर्भ में कंपनी के लोगों से बात की गई तो उधर से कहा गया कि कुछ गड़बड़ी थी, दुबारा डालेंगे तो पैसे मिल जाएंगे. बताया जा रहा है कि प्रबंधन की इस धोखेबाजी से स्ट्रिंगर नाराज हैं. उनका कहना है कि ये हमारी होली मनवाने के लिए चेक दिये थे लेकिन लग रहा है कि इनका ही दिवाला निकल गया है. फिलहाल प्रबंधन ने पैसे क्‍लीयर करने की बात अपने स्ट्रिंगरों से कही है.

हम महुआ की तरफ से दिए गए एक चेक की कापी और बैंक द्वारा बताए गए कारण की प्रति प्रकाशित कर रहे हैं. हालांकि भेजे गए स्ट्रिंगर की सुरक्षा को देखते हुए हमने उसका नाम, एमाउंट और चेक की संख्‍या को मिटा दिया है ताकि रिपोर्टर की पहचान स्‍पष्‍ट न हो सके. आप भी देख-सुन सकते हैं महुआ ग्रुप के कंगाल होने की कहानी. वैसे समझा जा रहा है अगर अगले कुछ दिनों में खाते में पैसे नहीं आए तो प्रज्ञा के कर्मचारियों को दिए गए चेक भी बाउंस हो सकते हैं. जिन्‍हें 10 मार्च और 10 अप्रैल की तारीख में चेक दिए गए हैं.

नौवें सिम्‍मी मरवाहा पुरस्‍कार के लिए आवेदन आमंत्रित

चंडीगढ़। सिम्‍मी मरवाहा मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट (पंजीकृत) द्वारा नौवें सिममी मरवाहा युवा पत्रकार सम्‍मान के लिए युवा पत्रकारों से आवेदन मांगे गए है। ट्रस्ट की प्रबंध न्यासी कवयित्री राजिंदर रोज़ी ने बताया कि बीते एक बरस के दौरान जिन पत्रकारों ने समाज की बेहतरी के लिए अपने कलम के जरिए कार्य किया गया है और खोजी पत्रकारिता कर प्रशासन, सरकार की आंखें खोली हों, वह इसके लिए आवेदन कर सकता है।

आवेदन करने का अंतिम दिन २५ मार्च २०१२ है। इस सम्‍मान में इलेक्‍ट्रानिक, प्रिंट और वेब मीडिया के क्षेत्र से जुडे़ पत्रकारों के अलावा पीयू चंडीगढ़ से मॉस कॉम पत्राचार के टॉपर को शुद्ध चांदी का सममान पत्र प्रदान किया जाता है। आयोजन हर बार की तरह इस बार भी ३ अप्रैल, दिन मंगलवार को चंडीगढ़ प्रेस क्‍लब सेकटर २७ डी में आयोजित किया जाएगा। इसके लिए ट्रस्ट के ई मेल आईडी  smctindia5@gmail.com अलावा दूरभाष नंबर ९८७२२-०३४७८ और ०१७२-२२२८६२९ पर भी संपर्क किया जा सकता है। गौरतलब है कि पत्रकार सिम्‍मी मरवाहा की २४ बरस की आयु में चंडीगढ़ में हुए एक सड़क हादसे में ९ बरस पहले २२ मार्च २००३ को निधन हो गया था, जिसके बाद उसके शुभचिंतकों द्वारा यह सम्‍मान दिवस आयोजित करने का सिलसिला उनकी स्मृति में चलाया गया है। प्रेस रिलीज

यूपी के अमीरों का नम्‍बर एक अखबार है अमर उजाला

अमर उजाला ने एक बार फिर अपनी श्रेष्ठता का परचम लहरा दिया है। उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में यह अपने नंबर-1 के स्थान पर काबिज है। आईआरएस-2011 की चौथी तिमाही के लिए जारी कुल पाठक संख्या (टीआर) आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में अमर उजाला के देशभर में पाठकों की संख्या दो करोड़ 97 लाख के ऊपर रही जबकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में इस अवधि में यह आंकड़ा दो करोड़ 70 लाख से ऊपर रहा।

उत्तर प्रदेश में अमर उजाला का प्रदर्शन लगातार शानदार बना रहा। पहली तिमाही की तुलना में तीसरी और चौथी तिमाही में कुल पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी का क्रम लगातार जारी है। साथ ही, औसत पाठक संख्या (एआईआर) आंकड़ों के मुताबिक 60 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक के मासिक आय वर्ग में यह उत्तर प्रदेश में नंबर वन है। अमर उजाला पब्लिकेशन्स के कॉम्पैक्ट अखबार का जलवा उत्तर प्रदेश के पाठकों में बदस्तूर जारी है। अपने खास आकार का अखबार कॉम्पैक्ट आईआरएस-2011 की चौथी तिमाही के लिए जारी कुल पाठक संख्या आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 23 लाख 50 हजार पाठकों के साथ शीर्ष पर काबिज है। साभार : अमर उजाला

बारह माह में सर्वाधिक बढ़े ‘हिंदुस्‍तान’ के पाठक

आईआरएस के नवीनतम दौर (क्यू4) के मुताबिक पिछले 12 महीने (आईआरएस क्यू4-2010 की तुलना में) में हिन्दुस्तान दैनिक के पाठकों की संख्या में 29.66 लाख पाठकों (कुल पाठक संख्या) की वृद्धि दर्ज हुई है। इस वृद्धि के साथ हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड द्वारा प्रकाशित आपके पसंदीदा समाचारपत्र हिन्दुस्तान के कुल 3.81 करोड़ पाठक हो गए हैं और अखबार ने देशभर में सभी अखबारों में दूसरे सबसे बड़े हिन्दी दैनिक के रूप में अपनी स्थिति और भी पुख्ता की है। गौरव की बात है कि पिछले 4 वर्ष में इस सर्वे के हर दौर में अकेले हिन्दुस्तान ने ही वृद्धि दर्ज कराई है।

हिन्दुस्तान की दैनिक रीडरशिप जो आईआरएस में एवरेज इश्यू रीडरशिप के रूप में दर्ज होती है, 1.2 करोड़ हो गई है। यहां यह भी गौर की जाने वाली बात है कि अकेले हिन्दुस्तान के बूते इन 12 महीनों में कुल हिन्दी पाठक संख्या में 40.55 लाख पाठकों (कुल पाठक संख्या) की बढ़ोतरी हुई। इसके साथ ही यह 23.99 लाख पाठक संख्या के साथ दिल्ली-एनसीआर के बाजार में दूसरा सबसे बड़ा हिन्दी दैनिक है। हिन्दुस्तान का सबसे बढ़िया प्रदर्शन उत्तर प्रदेश (12 प्रतिशत) में रहा जहां इसके 1.44 करोड़ कुल पाठक हैं जो उत्तर प्रदेश की कुल पाठक संख्या का 33 प्रतिशत हिस्सा है।

एचएमवीएल के सीईओ अमित चोपड़ा ने कहा कि ‘हम आईआरएस के पिछले दो दौर से निराश थे। हालांकि परिणाम तो ब्रांड की बढ़ोतरी को दर्शा रहे थे लेकिन आईआरएस सर्वे के वृद्धि के आंकड़े जमीनी हकीकत को पूरी तरह से नहीं दिखा पाए। हम यूपी में अपने ब्रांड की पकड़ मजबूत बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उदाहरण के लिए यूपी विधानसभा चुनाव में हिन्दुस्तान के ‘आओ राजनीति करें’ अभियान ने काफी बड़ा असर दिखाया। हमें उम्मीद है कि अगले कुछ दौर में आईआरएस के नतीजों में सुधार होगा और वह ब्रांड की सही स्थिति को दिखाएगा।’ साभार : हिंदुस्‍तान

आईआरएस2011, चौथी तिमाही : दैनिक जागरण, भास्‍कर समेत चार अखबारों को नुकसान

: पत्रिका एवं प्रभात खबर ने एक लाख से ज्‍यादा पाठक जोड़े : आईआरएस2011 की चौथी तिमाही के नतीजे आ गए हैं. हिंदी के टॉप टेन अखबारों में छह ने इस तिमाही में अच्‍छी बढ़त हासिल की है. दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर, राजस्‍थान पत्रिका और नवभारत टाइम्‍स को इस बार भी पाठकों का नुकसान उठाना पड़ा है. पिछली तिमाही में नुकसान उठाने वाले अमर उजाला और पंजाब केसरी ने इस बार बढ़त हासिल की है. वहीं पत्रिका एवं प्रभात खबर ने अपने पाठकों की संख्‍या में अच्‍छी बढ़ोत्‍तरी की है.

अपने पाठकों को खोने के बाद भी दैनिक जागरण पहले पायदान पर मौजूद है. चौथी तिमाही में उसे 48,000 पाठकों का नुकसान हुआ है. उसकी रीडरशिप 1,64,10,000 रह गई है, जो पिछले तिमाही में 1,64,58,000 थी. इस तिमाही में दैनिक भास्‍कर को तगड़ा झटका लगा है. उसने अपने 2.74 हजार पाठक खो दिए हैं. वो 1,46,02,000 पाठक संख्‍या के साथ दूसरे स्‍थान पर मौजूद है. तीसरी तिमाही में भास्‍कर की पाठक संख्‍या 1,48,76,000 थी.

तीसरे स्‍थान पर हिंदुस्‍तान मौजूद है. उसे चौथे तिमाही में 12000 पाठकों की मामूली बढ़त हासिल हुई है. इस तिमाही में उसकी रीडरशिप बढ़कर 1,20,45,000 हो गई है जो इसके पहले वाले तिमाही में 1,20,33,000 थी. हालांकि हिंदुस्‍तान चारों तिमाहियों ने नए पाठक जोड़ें हैं उसे किसी तिमाही में नुकसान नहीं उठाना पड़ा है. चौथे स्‍थन पर मौजूद अमर उजाला ने भी इस बार नए पाठक जोड़े हैं. अमर उजाला की पाठक संख्‍या 88.42 लाख हो गई है, जो पिछली तिमाही में 88.36 लाख थी. उजाला को पिछले तिमाही में नुकसान उठाना पड़ा था.

पांचवें नम्‍बर पर राजस्‍थान पत्रिका मौजूद है. हालांकि उसे इस तिमाही में नुकसान उठाना पड़ा है. राजस्‍थान पत्रिका ने इस तिमाही में अपने 71,000 पाठक खोए हैं. उसके पाठकों की संख्‍या इस तिमाही में 68.47 लाख तक पहुंच गई है, जो पिछले तिमाही में 69.18 थी. राजस्‍थान पत्रिका को सभी तिमाहियों में पाठकों का नुकसान हुआ है. छठे नम्‍बर पर पंजाब केसरी मौजूद है. उसने इस बार अपने पाठक संख्‍या में 4000 की मामूली बढ़त हासिल की है. उसकी पाठक संख्‍या 33.30 लाख तक पहुंच गई है, जो पिछले तिमाही में 33.26 लाख थी. उसे भी पिछले तीनों तिमाही में पाठकों का नुकसान हुआ था.

सातवें नम्‍बर पर मौजूद नवभारत टाइम्‍स ने इस बार फिर अपने पाठक खोए हैं. एनबीटी को इस बार 8000 पाठकों का नुकसान झेलना पड़ा है. उसकी पाठक संख्‍या इस क्‍वार्टर में 25.73 लाख रह गई है, जो पिछले तिमाही में 25.81 लाख थी. एनबीटी को पिछले तिमाही में भी झटका लगा था. इस बार आठवें नम्‍बर पर मौजूद है प्रभात खबर. प्रभात खबर ने इस बार 1.24 लाख पाठक अपने साथ जोड़े हैं. इस क्‍वार्टर में प्रभात खबर की पाठक संख्‍या 21.87 हो गई है, जो पिछले तिमाही में 20.63 लाख थी. प्रभात खबर ने सभी क्‍वार्टर में पाठक जोड़े हैं.

पिछली बार नौवें स्‍थान पर रहले वाला नईदुनिया दसवें स्‍थान पर पहुंच गया है. उसे यह झटका पत्रिका ने दिया है. पत्रिका ने पिछले साल ही टॉप टेन में प्रवेश किया था. पत्रिका ने इस बार अपने साथ 3.57 लाख नए पाठक जोड़े हैं. इस तिमाही में उसके पाठकों की संख्‍या 17.87 लाख पहुंच गई है, जो पिछले क्‍वार्टर में 14.3 लाख थी. इस बार दसवें स्‍थान पर मौजूद नईदुनिया ने 19000 पाठकों की बढ़त हासिल की है. इस तिमाही में उसकी पाठक संख्‍या 16.49 लाख हो गई है, जो इसके पहले 16.30 लाख थी.

आतंरिक परीक्षा की तैयारी में जुटे जागरण के पत्रकार, 12 मार्च से होगी शुरुआत

दैनिक जागरण से खबर है कि अप्रेजल फार्म भरवाने के बाद प्रबंधन अपने कर्मचारियों की कार्यक्षमता और व्‍यवहार कुशलता आंकने जा रहा है. इसके लिए सीनियर से लेकर ट्रेनियों तक ऑन लाइन परीक्षा ली जाएगी. इस परीक्षा के बाद तय होगा कि किसको क्‍या मिलना है. उल्‍लेखनीय है कि जागरण ने यह प्रक्रिया पिछले साल से शुरू की है, जब वह अप्रेजल और प्रमोशन के लिए यूनिट के वरिष्‍ठ अधिकारियों के रिपोर्ट के अलावा ऑन लाइन परीक्षा भी ले रहा है.

सूत्रों का कहना है कि एडिटोरियल के एचआर हेड का मेल सबके पास पहुंच गया है. इसके अनुसार विभिन्‍न ग्रुपों की परीक्षाओं के लिए चार दिन निर्धारित किए गए हैं. सीनियर सब एडिटर एवं सीनियर रिपोर्टरों की परीक्षा 12 मार्च, सब एडिटर एवं रिपोर्टरों की परीक्षा 14 मार्च, जूनियर सब एडिटर एवं जूनियर रिपोर्टरों की परीक्षा 15 मार्च एवं संवाद सूत्र एवं ट्रेनियों की परीक्षा 17 मार्च को होगी. इसके लिए कोई सेंटर नहीं बनाया जाएगा बल्कि सभी को अपने यूनिटों में ऑन लाइन परीक्षा होगी.

इस एक्‍जाम के चलते जागरण को भी फायदा हो रहा है. जागरण वार्षिकी की की खरीद बढ़ गई है. जिन लोगों का परीक्षा देना है वे अन्‍य प्रतियोगी परीक्षा की किताबों के अलावा जागरण वार्षिकी भी जमकर खरीद रहे हैं. बताया जा रहा है कि इन लोगों को उम्‍मीद है कि प्रश्‍न जागरण वार्षिकी के आधार पर पूछे जा सकते हैं.

हिंदुस्‍तान के ब्‍यूरोचीफ पर लगे अवैध वसूली के आरोप, प्रबंधन ने कराया जांच

हिंदुस्‍तान, रामगढ़ के ब्‍यूरोचीफ योगेन्‍द्र सिन्‍हा के खिलाफ अवैध वसूली के आरोपों के मामले में जांच कार्रवाई पूरी हो गई है. उल्‍लेखनीय है कि हिंदुस्‍तान और दैनिक भास्‍कर के ब्‍यूरोचीफों पर आरोप लगा था कि ये लोग ईंट भट्टा एवं कोयला कारोबारियों से वसूली करते हैं. आरोप लगने के बाद दैनिक भास्‍कर ने तो अपने ब्‍यूरोचीफ को हटा दिया था, परन्‍तु हिंदुस्‍तान प्रबंधन ने इस मामले में जांच बैठा दी थी.

जांच की जिम्‍मेदारी वरिष्‍ठ पत्रकार अजय शर्मा को सौंपी गई थी. बताया जा रहा है कि अजय ने सभी बिंदुओं पर जांच करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रबंधन को सौंप दी है. सूत्र बताते हैं कि जांच रिपोर्ट ब्‍यूरोचीफ के खिलाफ है. योगेन्‍द्र के खिलाफ कार्रवाई तय मानी जा रही है. बताया जा रहा है कि यहां के कई अखबारों के पत्रकारों का दो नम्‍बर का माइंस भी है, जिनसे उनकी अवैध खुदाई चलती रहती है. एक बार तो ऐसे ही एक अवैध माइंस की वहज से एनएच33 पूरी तरह धंस गया था. इसमें भी एक अखबार के पत्रकार का नाम आया था.

सड़क हादसे में पत्रकार की पुत्री की मौत

रुद्रपुर : अनियंत्रित ट्रक ने पत्रकार की बेटी को पीछे से टक्कर मार दी। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने चालक को ट्रक समेत दबोच लिया। भदईपुरा निवासी गोपाल की पत्‍‌नी अंजू (25) सोमवार को मोबाइल का रिचार्ज कूपन खरीदने के लिए पैदल बाजार जा रही थी। इंदिरा चौक के पास पीछे से तेज गति से आ रहे ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। इससे वह गंभीर रूप से घायल होकर तड़पने लगी।

राहगीरों ने सूचना देकर एंबुलेंस 108 को बुलाया। मौके पर पहुंची एंबुलेंस ने घायल अंजू को जिला अस्पताल पहुंचाया। वहां चिकित्सक ने उसे मृत घोषित कर दिया। हादसे की खबर सुनते ही परिजन जिला अस्पताल पहुंच गए। बाद में पुलिस ने शव कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम को भेज दिया। पुलिस ने हादसे के आरोपी चालक को ट्रक समेत दबोच लिया। अस्पताल पहुंचे अंजू के पति गोपाल ने बताया कि उनके दो बच्चे हैं। उनके ससुर एक दैनिक समाचार पत्र के पत्रकार हैं और काशीपुर में कार्यरत हैं। अंजू की मौत से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। साभार : जागरण

महिला पत्रकार के साथ सामूहिक दुष्‍कर्म

आगरा : थाना शाहगंज क्षेत्र से खबर है कि तीन युवकों ने एक महिला पत्रकार के साथ फोटो स्टूडियो में कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार किया। महिला पत्रकार ने इसकी जानकारी पुलिस को दी है। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने महिला पत्रकार मेडिकल जांच कराया है। शाहगंज थानाध्‍यक्ष उदयराज सिंह ने बताया कि उक्‍त महिला पत्रकार विज्ञापन के लिए खेरिया मोड़ स्थित कला संगम फोटो स्‍टूडियो गई थी।

पुलिस ने बताया कि वहां पहुंचने पर उसे फोटो स्‍टूडियो के अंदर बुलाया, जहां तीन युवकों ने उसके साथ सामूहिक बलात्‍कार किया। पुलिस ने स्‍टूडियो को सील कर दिया है। दो युवकों सतीश व समीर के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया है, जबकि एक आरोप अज्ञात है। पुलिस तीनों की तलाश कर रही है।

आलोक तिवारी जनसंदेश टाइम्स के ग्रुप बिजनेस एडिटर बने

कानपुर से सूचना है कि आलोक तिवारी ने हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स ज्वाइन कर लिया है. उनका पद ग्रुप बिजनेस एडिटर का है. आलोक पत्रकारिता में शुरुआत से ही बिजनेस बीट पर काम कर रहे हैं. वे करीब 11 साल तक दैनिक जागरण, कानपुर में बिजनेस का पेज देखते रहे. उसके बाद उन्होंने कानपुर में ही हिंदुस्तान अखबार ज्वाइन कर लिया जहां एक साल तक रहे. फिर वे दैनिक भास्कर, भोपाल चले गए. अमर उजाला, बरेली के साथ रहते हुए उन्हें बच्चा अखबार कांपैक्ट का प्रभारी बनाया गया था लेकिन प्रभात सिंह से कहासुनी के बाद आलोक समेत कुल पांच लोगों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया था. चार लोगों ने बरेली में ही दैनिक जागरण ज्वाइन कर लिया. अब आलोक ने जनसंदेश टाइम्स के साथ नई पारी की शुरुआत कर दी है.

लेखक-पत्रकार बिरादरी ने किया राजेंद्र यादव का लोक सम्‍मान (देखें तस्वीरें)

अगर वयोवृद्ध कथाकार कृष्‍णा सोबती के शब्‍दों में कहें तो हिंदी कबीला रविवार को कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव के 'हजूर में हाजिर' था. मौका था यादव के लोक सम्‍मान  का. सोबती और प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने शॉल ओढ़ाकर उन्‍हें सम्‍मानित किया. हिंदी के तमाम दूसरे सम्‍मानों से अलग यह किसी लेखक का अपनी तरह का सम्‍मान इसलिए था क्‍योंकि यह लेखकों और पत्रकारों की ओर से किया गया और शायद पहली बार ऐसा हुआ.

सम्‍मान स्‍वरूप लेखकों की ओर से एकत्र की गई एक लाख रुपये की राशि हंसाक्षर ट्रस्‍ट में जमा की जाएगी. राजेंद्र यादव के स्‍वास्‍थ्‍य को देखते हुए यह सम्‍मान उनके घर के बाहर खुले प्रांगण में किया गया. सोबती ने अपने संबोधन में कहा कि 'हंस' के जरिए राजेंद्र यादव ने बहुत बड़ी दुनिया बनाई है. वह अगले पचास सालों तक चलने वाली है. उन्‍होंने कहा कि राजेंद्र यादव ने हिंदी समाज के लिए जितना किया वह काबिले तारीफ है. वह एक जिंदगी के लिए इतना है कि आप और हम सब गुमान कर सकें. सोबती ने उम्‍मीद जताई कि हंस की विरासत देर तक लोकतंत्र में लोगों को आईना दिखाती रहेगी.

वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है और जिंदादिली राजेंद्र यादव का नाम है. यादव के साथ 1952 में कोलकाता में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्‍मेलन में पहली मुलाकात का उल्‍लेख करते हुए सिंह ने कहा कि उसके बाद उनसे मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा. उन्‍होंने कहा कि उन्‍हें इतना दिनों तक जिंदा रहने की ताकत राजेंद्र यादव से मिली है. ये बिजली का झटका सा देकर उत्‍साह का संचार करते रहते हैं.

हाल में हुए ऑपरेशन के बाद यादव काफी कमजोर लग रहे थे. अपने अभिनंदन जैसे इस समारोह में व्‍हील चेयर पर बैठकर आए यादव ने अपनी दबंग आवाज के उलट क्षीण स्‍वर में कहा कि मैं जीवन भर दो चीजों से बचता रहा- अभिनंदन और दूसरा यह कि मैं किसी पर आश्रित न रहूं. उन्‍होंने बताया कि वे किसी भी तरह की सरकारी सहायता और अनुदान से बचने की कोशिश की. हमेशा यही चाहा कि लेखक की तरह अपनी बात कहूं. जीवन में दोस्‍त भी बनाए और दुश्‍मन भी. कुछ लींके तोड़ी. उन्‍होंने अपने बंधन-विरोधी स्‍वाभाव का जिक्र करते हुए बताया कि बंधन आपको विकसित नहीं होने देते.

कार्यक्रम का संचालन कर रहे कथाकार संजीव ने बताया‍ कि लोक सम्‍मान की यह योजना छह-सात महीने पहले बनी थी. उन्‍होंने कहा कि सम्‍मान राशि लेखकों-पत्रकारों की ओर से एकत्र की गई है. यह एक तरह से मातृ ऋण, पितृ ऋण या गुरु ऋण की तरह है. सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज ने अपनी ओर से 31 हजार रुपये की राशि हंसाक्षर ट्रस्‍ट में जमा करने की घोषणा की. पत्रकार मुकेश कुमार ने सुझाव दिया कि इस परम्‍परा को आगे बढ़ाते हुए हर वर्ष अपने वरिष्‍ठ रचनाकारों का इसी तरह सम्‍मान किया जाना चाहिए. पत्रकार अजीत अंजुम ने युवा लोगों में हिंदी और खास तौर पर साहित्‍य के प्रति रूचि और संस्‍कार जमाने में यादव के योगदान की चर्चा की. साधना अग्रवाल और ज्‍योति कुमारी ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे. और हिंदी कबीला तो वहां मौजूद ही था. (साभार – हिंदी दैनिक जनसत्ता)

राजेंद्र यादव के लोक सम्मान में वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती का वक्तव्य

जनाब राजेंद्र साहिब, हिंदी कबीला आप के हजूर में हाजिर है। यह सिर्फ मुंह मुलाहिजा ही नहीं हिंदी वालों का, हम इकट्ठा हैं आपकी जिंदाबादियां बुलाने को, पूछिये भला क्यों। वह यूं कि आज की तारीख में जितने भी यादव बाहुबली सियासत के मैदान में हैं- आप उन्हें मात देकर सबसे आगे हैं। हमारी लेखक बिरादरी में आप न सिर्फ लेखक हैं- पहुंचे हुए प्रकांड एडिटर भी हैं। इसीलिए ये जिंदाबादियां- आपकी कारस्तानियां, अदबी बदमाशियां (यह शब्द प्यार से इस्तेमाल किया जा रहा है) तिकड़में और दूरंदेशियां। समझ रहे हैं न आप हमारा मतलब। यादव साहिब हंस के जरिए आपने एक बहुत बड़ी दुनिया बनाई है। वह अगले पचास साल तक चलने वाली है।
आपके शागिर्दों की मंडली उसे और पचास साल तक चलाएगी। राजेंद्र साहिब हिंदी समाज के लिए जितना आपने किया लेखक और पाठकों को दिया वह कम नहीं काबिले तारीफ है। एक जिंदगी के लिए इतना है कि आप और हम सब गुमान कर सकें। हंस की विरासत देर तक लोकतंत्र में लोगों को आईना दिखाती रहेगी। यादव साहिब जम्हूरियत में भी जातिवाद पनप रहा है। हम भी इसका सहारा लेकर आप तक पहुंचना चाहते हैं कि आप और आप ही हमारी लेखक जाति की नुमाइंदगी राज्यसभा में करेंगे। आप वहां अकेले नहीं होंगे। आपके साथ होंगे हमारे प्रिय नामवर जी।

राजेंद्र यादव को लेकर फेसबुक पर चर्चा

Yashwant Singh : हर तरफ कड़ी निगरानी रखे जाने के बावजूद राजेंद्र यादव जाने कैसे सिगरेट ले आए और सबके सामने कश खींचकर बताया कि बंदिशों को तोड़ने का आनंद ही कुछ और है… बगल में हंसते नामवर सिंह… इस आदि विद्रोही राजेंद्र यादव को सलाम.

        Durga Pandey : yaswant ji kuchh vidro achcha hote hai lekin yah nahi

        Haresh Kumar : पीने वालों को कोई रोक नहीं सकता। शायद राजेंद्र यादव यही कहना चाहते हैं।।

        Yashwant Singh : दुर्गा भाई, ये सिंबोलिक है. ऐसा नहीं कि राजेंद्र यादव नहीं जानते कि उन्हें डाक्टरों ने सिगरेट पीने से क्यों रोका है. पर घर परिवार व चाहने वालों की पीने न देने की कड़ी निगरान के कारण उनका मन इस निगरानी सिस्टम को तोड़ने का कर गया तो उन्होंने कर दिखाया यह काम, सबके सामने…. उनका यह प्रतीकात्मक विद्रोह यह बताने के लिए था कि लीक से हटकर चलने करने जीने में ही आनंद है..

        Manish Chandra Mishra : जीने का नाम राजेंद्र यादव है

        Murar Kandari : ha janab baat to sach hai

        Kunvar Sameer : Sahi rajendr yadav ji jinhe kbhi ek mhila lekhika ne wah sab kaha tha jo ham nhi kah sakte hai yadav ji ne jis sahjta se use hans me parkasit kar uska zbab diya tha wah isi zazbe ka natiza hai

        Rajneesh Kumar Chaturvedi : राजेन्द्र यादव सार्वजनिक तौर पर जूता भी खा चुके हैं,सिगरेट पीना कौन सी बड़ी बात है।

        Yashwant Singh : रजनीश कुमार चतुर्वेदी जी, महान लोगों को छोटी मोटी घटनाएं प्रतिक्रियाएं झेलनी पड़ती हैं, क्योंकि जब आप कुछ लीक से हटकर करेंगे तो ढेर सारे लोग आपके सपोर्टर होंगे और कुछ लोग भयंकर विरोधी बनेंगे. विरोध सिर्फ उनका नहीं होता जो कुछ नहीं करते…

        सौरभ सिंह : सलाम

        Ramhit Nandan : rajendra ji ke chehra dekho…kitne bimar lag rahe hain…..ye koi bagawat karna ya bandish todna nahin….apni sehat kharab karna hai……ye sirf yahi dikhata hai ki rajendra ji ko khud par control nahin raha…..talab lagi hai to lagi hai

Application invited for journalist honour day

Chandigarh, 5 march :  Simmi Marwaha Memorial Charitable Trust (reg) invited applications from young journalist for their fair job in the field of journalism. Trust’s Manging Trustey Poetess Rajinder Rosy said that those young scribes send their performance in the shape of document to trust who done a very well job in this field n give a warm up to society.

The last date for the submission is 25 march 2012. The Honour Day will be orgnise as 9th annual young journalist honour day at Chandigarh press club (sector 27d, chd) on coming 3rd April tuesday 2012. In this regard trust honour young journalist from print, electronic n web media. Apart from this Panjab University, Chd mass com correspondent topper winner will also honour with pure silver mamentos.

For any queary thay can contact on Smctindia5@gmail.com.98722 -03478,0172-2228629. it is known for all that journalist simmi marwaha pasess away nine years ago on 22nd march 2003 in a road accident at Chandigarh. At the time of death she was 24 years old.

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अमर भारती, आगरा में कई लोगों का प्रमोशन व दायित्व में फेरबदल

अमर भारती के आगरा संस्करण में चन्द्र भूषण दीक्षित को कार्यालय प्रभारी का प्रशासनिक उत्तरदायित्व सौंपा गया है. साथ ही संजय पाण्डेय को डेस्क प्रभारी, दाऊ दयाल सिंह को नगर प्रभारी (आगरा), सुमित गुप्ता को विशेष संवाददाता के पद पर पदोन्नत किया गया है. शिवेंद्र प्रताप सिंह, हिमांशु तथा योगेश की नियुक्ति संवाददाता के पद पर की गयी है.

रवींद्र प्रभात के उपन्यास ‘प्रेम न हाट बिकाय’ का लोकार्पण

नई दिल्ली । ….रवीन्द्र प्रभात का दूसरा उपन्यास ''प्रेम न हाट बिकाय'' का लोकार्पण करते हुए मुझे वेहद ख़ुशी हो रही है। उपन्यास के नाम से ही ज़ाहिर है कि इसकी कथा के केन्द्र में प्रेम है। प्रेम ही एक ऐसा भाव है जो व्यक्ति को हर जटिल से जटिल स्थिति से निपटने की ताकत देता है। प्रेम जोड़ता है तो कभी कभी प्रेम तोड़ता भी है। यहाँ प्रेम माँजता है। चाहे प्रशांत हो या स्वाति और चाहे देव हो या गुलाब से नगीना और नगीना से गुलाब की यात्रा करती हुई एक स्त्री –सभी को विपरीत स्थितियों से प्रेम ही बचाता है। मैंने इस पुस्तक को पढ़ा है और पढ़ने के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रवीन्द्र प्रभात ने प्रेम के स्वरूप को देह से निकाल कर अध्यात्म तक पहुँचाने का उपक्रम इस कथा के माध्यम से किया है…. ये बातें उपन्यासकार प्रताप सहगल ने स्थानीय प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में प्रेम न हाट बिकाय के लोकार्पण के दौरान कहीं।

उन्होंने आगे कहा कि प्रेम का आधार जैसे कोई भी हो सकता है वैसे ही अध्यात्म का आधार भी। हरी-भरी दुनिया या सामाजिक नज़रियों से इतर प्रेम अध्यात्म का ही एक रूप है। इन अर्थों में ही इस उपन्यास की कथा को समझा-परखा जा सकता है। रवीन्द्र प्रभात हिन्दी ब्लागिंग की दुनिया में एक चर्चित नाम है और वह अपने पहले उपन्यास ‘ताकि बचा रहे लोकतंत्र’ से साहित्य के क्षेत्र में भी चर्चित लेखकों के दायरे में दाखिल हो चुके हैं। इस उपन्यास की कथा को भी उन्होंने कहीं संवादों तो कहीं सधे हुए वर्णन के सहारे साधने की कोशिश की है।”

विश्व पुस्तक मेला में हिंद युग्म डाट कॉम के तत्वावधान में आयोजित इस आखिरी लोकार्पण समारोह में उपन्यासकार प्रताप सहगल के अलावा वरिष्ठ ब्लॉगर और व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति, वेब पत्रिका साहित्य शिल्पी के संपादक राजीव रंजन प्रसाद, जनसंचार लेखन से जुड़े डा. हरीश अरोड़ा, सुभाष नीरव, सुरेश यादव, बलराम अग्रवाल, जनसत्ता के फज़ल इमाम मालिक, स्त्री विमर्श से जुडी लेखिका गीता पंडित, व्यंग्यकार निर्मल गुप्त, वन्दना, रचना क्रम के संपादक अशोक मिश्र, दैनिक जनवाणी (मेरठ) के फीचर संपादक दिलीप सिंह राणा, सुनील परोहा, उपन्यास के लेखक रवीन्द्र प्रभात और प्रकाशक शैलेश भारतवासी के साथ-साथ काफी संख्या में पाठक, दर्शक और श्रोता उपस्थित थे।

जैसे ही रवीन्द्र प्रभात अपने नवीनतम उपन्यास ‘प्रेम न हाट बिकाय’ के विमोचन के लिए हॉल संख्या-11 स्थित हिंद युग्म के स्टॉल पर पहुँचे, वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव अपनी पत्नी मल्लिका देव के साथ आए। उन्होंने कहा कि “मेरी शुभकामना है कि हिंदी साहित्य जगत में आप उत्कर्ष हासिल करें”। इस अवसर पर व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति ने कहा कि मैं व्यक्तिगत तौर पर रवीन्द्र प्रभात की प्रतिभा से परिचित हूँ और मैंने जो महसूस किया है उसके आधार पर यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि रवीन्द्र में आसमान की उंचाईयां छूने की क्षमता है। वहीँ राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि मेरी कामना है कि रवीन्द्र प्रभात की प्रतिभा को हिंदी जगत ही नहीं पूरा विश्व महसूस करे। प्रखर साहित्यकार सुभाष नीरव ने कहा कि आज इस आयोजन के बहाने साहित्य जगत और ब्लॉग जगत की हस्तियों से मिलकर बहुत ख़ुशी हई। अंत में शैलेश भारतवासी ने आगंतुक अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

Mohinder Walia joins MediaGuru Entertainment as CEO

Mumbai, 5th March, 2012 : MediaGuru, the leading Indian MNC in media business with a diversified group of media companies, announced the joining of Mohinder Walia as the CEO of its new media venture, MediaGuru Entertainment.  Mohinder will be based appropriately out of Mumbai, the entertainment capital of India as MediaGuru enters the entertainment media domain with ambitious plans. He would drive the business in the domestic as well as international markets.

Welcoming Mohinder as the CEO of MediaGuru Entertainment, Sanjay Salil, MD of the MediaGuru Group of Companies said, “I am pleased with Mohinder joining the growing fraternity of MediaGuru family as we move into a newer and exciting area of media growth. I see large possibilities in the entertainment sector as India increasingly expands its horizons beyond its boundaries while attracting international players to its shores.”

Mohinder was confident and raring to go in implementing the business plan for MediaGuru Entertainment which includes production and distribution of Hollywood and Indian films besides producing television shows for International TV networks. In addition, there are also plans to host global media events for increased international collaboration in the media and entertainment sector.  He said, “As India is turning out to be the new hub of revenue generation for global entertainment giants and Indian entertainment receives wider markets outside, our new venture is a timely action and we intend to be a force to reckon with in the near future.”

Mohinder will be reporting in to MediaGuru Group MD, Sanjay Salil. He comes with a vast experience of over two decades with leading national and international media companies, including his last assignment as Managing Director of Fox Television Studios in India. He earlier ran his own venture in Los Angeles which focused on Hollywood-India joint ventures as well as entertainment industry focused Investment Banking.  He brings with him global strategic, creative, and marketing experience which is expected to stand in good stead for MediaGuru Entertainment.

MediaGuru is a group of media companies involved in media consultancy and system integration, having set up more than two dozen TV networks across India and outside, a number of radio stations, newspapers and media schools, while its sister concerns include MediaGuru Broadcast, MediaGuru News, MediaGuru Solutions and MediaGuru Web.

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एक्जिट पोल और मीडिया : कौव्वा कान लेकर भाग रहा… पीछे दौडो!

ईवीएम के अल्ट्रासाउण्ड का कोई तरीका निकल आया हो, तो नहीं कह सकता, वरना कहीं से मुमकिन नहीं कि गिनती किए बिना कोई नतीजे का पूर्वानुमान कर सके। अल्ट्रासाउण्ड का ईजाद नहीं हुआ था, तो बच्चों के पैदाइश को लेकर अन्त तक भ्रम बना रहता था, लिंग निर्धारण किसी के वश में नहीं था। हां, कुछ ज्योतिषी या पारखी दाई सटीक भविष्यवाणी कर पाती थी। टीवी चैनलों पर 'एक्जिट पोल' का जो शोर चल रहा है, बिल्कुल हास्यास्पद लगता है। पिछले ही विधान सभा चुनाव की बात करें, गिनती के अंतिम तक कोई बता पाने की स्थिति में नहीं था कि बसपा बहुमत की सरकार बनाने जा रही है।

मैं वाराणसी में रहता हूँ। लगभग दो दशक की पत्रकारिता में राजनीतिक रिपोर्टिंग ही करता रहा। हवा के रूख से कुछ अनुमान लगाना आसान होता था, पर कौन जीत रहा, दावे के साथ कहना मुश्किल होता रहा। हमने इस चुनाव को करीब से देखा जाना और समझा, पर हमारे जैसा कोई शख्स नहीं कह सकता कि फलां सीट फलां के खाते में जा रही है। फिर सर्वे एजेन्सियों के पास कौन सी मशीन है जो सीटों का निर्धारण तक कर देती हैं।

याद है। एक दफा श्री सुन्दर लाल पटवा (मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री) भाजपा के सम्मेलन में आए थे। चुटीले अंदाज में एक्जिट पोल की पोल खोली। बोलें, नतीजे की पूर्व संध्या पर श्री दिग्विजय सिंह ने हमे मुख्यमंत्री पद की बधाई दी, लेकिन नतीजा आया तो मजबूरन हमें दिग्विजय सिंह को बधाई देनी पड़ी। दरअसल एक्जिट पोल का तमाशा कुछ लोगों के नहाने-खाने का धंधा बन गया है। टीवी चैनलों पर बहस करने वाले विशेषज्ञों को देखता हूँ, इनके स्त्रोत हम जैसे गंवई या छोटे शहरी पत्रकार या चुनाव विशेषज्ञ होते हैं। एक भी विधानसभा की भौगोलिक या सामाजिक जानकारी उन्हें नहीं होती, पर टीवी पर बैठ ऐसा भौकाल देते हैं, जैसे ये घर-घर जाकर एक-एक वोटर से मिल चुके हो। पत्रकारिता का यह रूप देखने को मिलेगा, अफसोस होता है।

पत्रकारिता की विधा को हम लोगों ने पराड़कर जी के आदर्श जीवन से सीखा है। विश्वसनीयता जिसकी पहली शर्त होती रही है। तथ्य परक पत्रकारिता से इंच भर भटकने पर बड़े से बड़े पत्रकार अपनी नौकरी गंवा देते थे। आज की पत्रकारिता, खासकर टीवी पत्रकारिता समाज को किस ओर ले जायेगी भगवान ही मालिक हैं। ऐसा लगता है कि पैसा कमाने की होड़ में समाज का बाकी तंत्र, दुनिया का कोई दंद-फंद करने को तैयार है, उससे कई कदम आगे मीडिया जगत बढ़ चुका है। बेनी बाबू ने यह बोल दिया, आजम ने ऐसे जवाब दिया, जयंत ने यह कह दिया, अखिलेश यादव ने यह बयान दे डाला, अरे भाई! यह सब क्या है? जैसे कौव्वा कान लेकर उड़ गया, बस पीछे दौड़ पड़े। दिल्ली में बैठे पत्रकारिता के भीष्म पितामहों से गुजारिश है कि वह 'चिरहरण' पर खामोश न बैठें।

लेखक धर्मेंद्र सिंह बनारस में पत्रकार रहें हैं. इन दिनों कांग्रेस से जुड़े हुए हैं तथा मीडिया समिति के चेयरमैन हैं.

सिर्फ आईपीएस अफसरों को बढ़ावा देने से कानून व्यवस्था बिगड़ेगी

प्रदेश सरकार द्वारा विचाराधीन उत्‍तर प्रदेश पुलिस एसोसिएशन के संस्‍थापक सुबोध यादव ने कहा है कि राज्‍य में केवल आईपीएस अधिकारियों को बढ़ावा देने से कानून-व्‍यवस्‍था की स्थिति बिगड़ेगी. श्री यादव ने कहा कि अंग्रेजों के जमाने के काननू में बदलाव की जरूरत है. इसी कानून की आड़ लेकर आईपीएस अधिकारी अपने अधीनस्‍थ कर्मचारियों का मानसिक, शारीरिक औरे आर्थिक उत्‍पीड़न किया जा रहा है. पिछले दिनों हुए कई हादसे इसके गवाह हैं.

उल्‍लेखनीय है कि आईपीएस अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्‍थ पुलिसकर्मियों के उत्‍पीड़न के विरोध में उत्‍तर प्रदेश पुलिस एसोसिएशन द्वारा सामूहिक उपवास की अपील की गई थी.

बंदूकधारियों ने गोली मारकर पत्रकार की हत्‍या की

अफ्रीकी देश सोमालिया में कुछ बंदूकधारियों ने एक स्थानीय पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी. इस साल इस तरह की यह तीसरी हत्या है. मारे गए पत्रकार अली अहमद आब्दी के साथियों के मुताबिक नकाबपोश बंदूकधारियों ने उनकी उस वक्त हत्या कर दी जब वे अपने घर की ओर पैदल ही जा रहे थे. प्रेस की स्वतंत्रता के लिए काम कर रहे संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि अफ्रीकी देशों में सोमालिया पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश है. (बीबीसी)

इंडिया टीवी में सीनियर एडिटर बने नवीन पाण्डेय

नोएडा के फिल्म सिटी से जल्द ही लांच होने जा रहे चैनल 4रियल न्यूज को तगड़ा झटका लगा है. खबर है कि चैनल के डिप्टी न्यूज हेड नवीन पाण्डेय ने इस चैनल से नाता तोड़ लिया है। अब वे इंडिया टीवी को सीनियर एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं देंगे। रियल न्यूज का दावा है कि वो पूरी तरह एचडी तकनीक के साथ लांच हो रहा है, इसलिए लांचिंग में ज्यादा वक्त लग रहा है। इस चैनल में शुरू से नवीन पाण्डेय ही न्यूज़ सेक्शन की जिम्मेदारी निभा रहे थे।

प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कई वरिष्ठ पदों पर रह चुके नवीन पाण्डेय ने 1995 में दैनिक जागरण, कानपुर के साथ अपने कैरियर की शुरुआत की थी। उसके बाद वे अमर उजाला, मेरठ होते हुए अमर उजाला जालंधर की लांचिंग टीम का हिस्सा बने और सिटी डेस्क इंचार्ज के तौर पर तीन साल तक काम किया। 2002 में सहारा समय के साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया में आए और 2009 में पी-7 न्यूज़ की लांचिंग टीम में अहम भूमिका निभाई। पी-7 के बाद वे ओमेगा ब्राडकास्टिंग ग्रुप के चैनल 4रियल न्यूज में डिप्टी हेड बनकर आए थे, लेकिन लांचिंग से पहले ही इंडिया टीवी चले गए। रियल न्यूज अब नए सिरे से हेड की तलाश कर रहा है।

बरेली में प्रत्‍याशी ने पत्रकारों को बांटा एलसीडी

चुनावी मौसम है। हर तरफ पत्रकारों को साधने की कोशिश हो रही है। कोई किसी तरह से तो कोई किसी तरह से इन्हें साध रहा है। पर बरेली के कुछ उम्मीदवार कुछ ठोस संसाधनों से इन्हें साधने की कोशिश कर रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि यहां दो उम्मीदवारों ने पत्रकारों पर खूब पैसे लुटाया है। इन्हीं में एक उम्मीदवार ने यहां सभी अखबारों के पत्रकारों की एक लिस्ट बनाई और एक दुकान से 19 एलसीडी खरीदी। उम्मीदवार के एक खास को इन एलसीडियों को देने की जिम्मेदारी सौंपी गई कि इन्हें वह सही हाथों में पहुंचा दे। 

सूत्र बता रहे हैं कि कुछ पत्रकारों को उनके घर पर ही एलसीडी भेज दी गई और कुछ लोग लेने पहुंचने लगे। इसी में शहर में खबर फैल गई सो कुछ पत्रकारों ने इसे लेने से इनकार कर दिया। हालांकि उस उम्मीदवार ने दिवाली में ही कुछ लोगों को एलसीडी पकड़ा दिया था, जिससे पत्रकार उनके एहसानों तले दबे रहे। उम्मीदवार का सोचना था कि पत्रकार हैं खरीद तो सकते नहीं पर देखने को तो मन करता ही होगा सो इसी से साधने की कोशिश की। जिन पत्रकारों के पास एलसीडी पहुंच गई है उनकी संख्या सात है। हालांकि अभी भी कुछ लोग मन बनाए हुए हैं पर तीन को ही चुनाव था इसलिए कुछ लोग एहतियात बरतते रहे।

वैसे लोग चाहें तो अपने पत्रकार मित्रों को देख सकते हैं कि किनके घरों में अभी-अभी एलसीडी लगी है इसी से अनुमान कर सकते हैं मुझे नाम खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी…।।।। हां एक बात तो भूल ही गया एक फोटोग्राफर महोदय भी एलसीडी लेने में कामयाब हुए हैं। वहीं एक उम्मीदवार ने यहां के फोटोग्राफरों औप पत्रकारों पर खूब पैसा खर्च लुटाया है। सभी को दस-दस हजार रुपये नकद बांटा है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अखबार विक्रेता दस रुपये सर्विस टैक्स ले रहे हैं पाठकों से!

मुजफ्फरनगर। इसे आप एंजेसी होल्डरों की धींगामस्ती कहें या फिर हॉकरों की मजबूरी कि ग्राहकों से सर्विस टैक्स के नाम पर प्रतिमाह दस रुपये अतिरिक्त लिये जा रहे हैं। किसी भी एक अखबार की बाजार में एक रुपये से तीन रुपये के बीच कीमत है। अखबार कोई भी हो, एक रुपये वाला हो या फिर तीन रुपये वाला। लेकिन हॉकरों का यह सर्विस टैक्स सभी पर बराबर लगाया जा रहा है। इतना ही नहीं किसी घर में अगर तीन अखबार आ रहे हैं तो उन पर तीन टैक्स यानी दस रुपये के हिसाब से तीस रुपये प्रतिमाह ग्राहक को देना मजबूरी बन गया है।

आलम ये है कि कुछ लोगों ने इसे अवैध उगाही का नाम देते हुए अखबार पढऩा ही छोड़ दिया है। तो किसी ग्राहक को ये दस रुपये न दिए जाने पर हॉकरों द्वारा ही अखबार की सप्लाई बंद कर दी गई है। अखबार वितरकों की दलीले हैं कि हॉकर आंधी-बरसात, सर्दी हो या गर्मी, ग्राहकों को हर मौसम में सुबह-सवेरे अखबार सप्लाई करते हैं, जिसके चलते माह में एक बार दस रुपये देना ग्राहकों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। इस संबंध में एंजेसी होल्डरों और हॉकरों की एक मिटिंग हुई थी, जिसमें ये निर्णय लिया गया। इसके लिए पंफलेट अखबार के अंदर डालकर ग्राहकों से दस रुपये प्रतिमाह देने की गुजारिश की गई। सूत्रों की माने तो हॉकरों ने कम कमीशन दिए जाने पर रोष प्रकट करते हुए एंजेसी होल्डरों के माध्यम से अखबारों से कमीशन बढ़ाए जाने की मांग की थी, लेकिन होल्डरों ने अपने हाथ खड़े कर दिये और इस मीटिंग में 'सर्विस टैक्स' का ये प्रस्ताव पारित किया गया। कुछ हॉकरों का कहना है कि सर्विस टैक्स के रुप में लिए गए इन दस रुपयों में से पांच रुपये एजेंसी होल्डरों को भी देने पड़ते है। कमाल है भई?

…जब खबरनवीस को लौटाने पड़ गए प्रत्‍याशी से लिए पैसे

पुवायॉ (शाहजहांपुर) : विधानसभा चुनावों में खबरनवीसों की बन आई, प्रत्याशियों ने अखबारों में खबरें छपवाने के लिये काफी रकम खर्च की, लेकिन यहॉ पर एक खबरनवीस को यह सौदा काफी महंगा पड़ गया, जब खबर के बदले लिये गये रुपये प्रत्याशी को वापस करने पडे और बेइज्जती हुई सो अलग। इसके बाद से खबरनवीस सबसे मुंह चुराता फिर रहा है।

पुवायॉ विधानसभा सीट है, लेकिन यहॉ पर सभी प्रत्याशियों में अखबारों में खबर छपवाने को लेकर बड़ी होड़ लगी थी। खबर छपवाने को लेकर एक प्रत्याशी के सर्मथकों ने बरेली से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित अखबार में प्रत्याशी के समर्थन में कसीदें वाली खबर छपवाने के लिये अभी नये बनाये गये तहसील प्रभारी से बात की और चार फोटो सहित प्रत्याशी की खबर एक मार्च के अंक मे छापने के लिये पचास हजार रुपये में सौदा तय किया। सौदे की कुछ रकम ऊपर भी पहुंचायी गयी। लेकिन हुआ उल्टा क्योंकि बरेली से वह खबर रोक दी गयी और अन्य सभी प्रत्याशियों की तरह ही सामान्य खबर लगायी गयी।

अगले दिन जब अखबार मार्केट में आया और प्रत्याशी के समर्थकों ने सौदे के मनमुताबिक अखबार में खबर न पाकर खबरनवीस को जमकर लताड़ लगायी। इस पर खबरनवीस गिड़गिड़ाने लगा और अगले दिन की मोहलत मागी, लेकिन खबर अगले दिन वाले अंक मे भी नहीं लगी। इस पर प्रत्याशी के समर्थकों ने खबरनवीस से रुपये लौटाने की बात कही, पर रुपये वापस करने पर खबरनवीस आनाकानी करने लगा। आनाकानी करने पर प्रत्याशी के समर्थकों ने बात ऊपर तक पहुंचायी और बडे़ नेता के जारी फरमान द्वारा खबरनवीस को एक दूसरे नेता के घर बुलाया गया और खबर के बदले दिये गये रुपये लौटाने की बात दुहरायी और उसकी अपने समर्थकों के सामने काफी बेहज्जती की तथा देख लेने की धमकी दी।

इससे घबराए खबरनवीस ने अपने आका से सम्पर्क साधा और आका से अनुमति मिलने के बाद खबरनवीस ने प्रत्याशी के समर्थकों द्वारा दी गयी पचास हजार रुपये की रकम में से पैंतालीस हजार की रकम वापस की। प्रत्याशी समर्थकों ने पैंतालीस हजार ही वापस लेकर सन्तोष कर लिया। खबरनवीस की बेइज्जती होने से वह अपना मुंह चुरता फिर रहा है। यह खबरनवीस पहले भी ऐसे ही प्रकरणों में फंस चुका है।

उत्‍तराखंड में दिख रही कांग्रेस की बढ़त, अपनी सीट पर ही जरूरी नहीं लग रहे बीसी खंडूरी

पांच राज्यों में जनता की राय का खुलासा आगामी 6 मार्च को सार्वजनिक होने जा रहा है। चूंकि उत्तराखण्ड के मतदान और मतगणना के बीच एक महीने से ज्यादा समय रहा है। लिहाजा गश्ती खबरें और गफतल का माहौल होना लाजमी है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के समर्थक दुबारा सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। लेकिन मजेदार बात ये है कि विपक्षी कांग्रेस के नेता खुलकर दावा नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें सरकार बनाने को बहुमत मिलेगा। राज्य में बने अजीबोगरीब माहौल ने मुझे अपनी सामान्य बुद्वि पर जोर डालते हुए एक आंकलन करने को मजबूर किया। बहरहाल, ईवीएम में कैद वोटों की गिनती में चंद घंटे बचे हैं, फिर भी मैं 70 सदस्यीय उत्तराखण्ड विधानसभा के चुनावी नतीजों के अपने आंकलन को आपसे बांट रहा हूं।

वैसे उत्तराखण्ड का अतीत इस बात का गवाह है कि अभी तक यहां कोई भी सत्ताधारी पार्टी चुनाव जीतकर दुबारा सरकार नहीं बना पाई। 9 नबम्बर 2000 को उत्तराखण्ड गठन के वक्त भाजपा के नेतृत्व अंतरिम सरकार बनी थी। जिसके बाद साल 2002 में हुए राज्य में पहले आम चुनावों में कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिला था। उसके बाद जनता ने 2007 में हुए दूसरे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हराकर भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया। मेरे विचार में भाजपा 2012 में बीसी खण्डूरी के नेतृत्व में राज्य में अब तक चले आ रहे पालीटिकल ट्रेंड को बदलने का करिश्मा करने में सफल नहीं हो पा रही है। अलबत्ता, कांग्रेस की कमोबेश सामान्य बहुमत के साथ सत्ता में वापसी हो रही है।

कांग्रेस की संभावित जीत वाली सीटें : चमोली जिले में पार्टी तीनों सीटें जीत सकती है। अगर जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण बहुत ज्यादा भारी पड़े तो कर्णप्रयाग पर कांग्रेस के ही बागी सुरेन्द्र नेगी की संभावना बन सकती हैं। पौड़ी जिले की कुल 6 सीटों में कांग्रेस की आधी सीटों पर जीत सुनिश्चित है। यमकेश्वर और कोटद्वार में उसके भाग्य का छींका टूट सकता है। यमकेश्वर में बागी रेणू जोशी ने जरूर सरोजनी कैंतूरा के रास्ते में मुश्किलें बढ़ाने का काम किया है। टिहरी जिले की कुल 6 सीटों पर जीत नजर आ रही है। साथ ही उसके दो बागी जोत सिंह बिष्ट और मंत्री प्रसाद नैथानी जीत के प्रबल दावेदार हैं। टिहरी सीट पर दिनेश धनै भी उल्टा पुल्टा कर सकते हैं।

देहरादून की कुल 10 सीटों में से आधी पर कांग्रेस का जीतना लगभग तय है। जिले में रायपुर, मसूरी और ऋषिकेश में कांटे का मुकाबला है। पार्टी इन सीटों में भी उम्मीदें नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि यहां कुछ भी सामने आ सकता है। हरिद्वार जिले में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। लिहाजा कुल 11 सीटों में से आठ पर वह मुकाबले में हैं। कांग्रेस को कम से कम 4 सीटें मिलनी चाहिए बाकी गंगा मैया पर छोड़ देना चाहिए। उत्तरकाशी और रूद्रप्रयाग जिलों में कांग्रेस की एक-एक सीट जीत होनी चाहिए।

नैनीताल जिले में कांग्रेस पिछले बार के मुकाबले कहीं बेहतर हालत में है। जिले की कुल 6 सीटों में आधी सीटों पर जीत तय है। पहली बार बनी भीमताल सीट पर कांटें का मुकाबला है। बहुत ज्यादा बुरा हुआ तो लालकुंआ सीट कांग्रेस के बागी हरीश दुर्गापाल को मिल सकती है। उधमसिंह नगर जिले की कुल 9 सीटों में भी कांग्रेस को कम से कम पांच सीटें मिलनी चाहिए। गदरपुर सीट पर बागी जरनैल सिंह कांटे के मुकाबले में हैं। काशीपुर सीट पर कांटे का मुकाबला है कि लेकिन पर्वतीय वोट पार्टी उम्मीदवार मनोज जोशी की संभावना बढ़ाते हैं। वहीं किच्छा और खटीमा में कुछ भी हो सकता है। कांग्रेस प्रत्याशी तिलकराज बेहड़ रूद्रपुर को बसपा प्रत्याशी बेहद कड़ी टक्कर दे रही हैं। लिहाजा यहां कम अंतर से हार जीत होगी।

चम्पावत और बागेश्वर में कांग्रेस को एक एक सीट मिलने कोई दिक्कत नजर नहीं आ रही है। पार्टी को बागेश्वर जिले की कपकोट सीट पर आश्चर्यजनक खुशी की उम्मीद जिंदा रखनी चाहिए। अल्मोड़ा जिला कांग्रेस के लिए चिंता का सबब बन सकता है। पार्टी अल्मोड़ा और जागेश्वर सीटें तो बरकरार रखती नजर आ रही है। लेकिन इस बार सल्ट और रानीखेत में कांटे का मुकाबला है। रानीखेत में बसपा प्रत्याशी पूरन डंगवाल कांग्रेस की उम्मीदों पर ग्रहण लगा सकते हैं। अलबत्ता द्वारहाट सीट पर कांग्रेस को जीत की उम्मीद रखनी चाहिए। कांग्रेस की संभावित जीत वाली सीटें –

1.  गंगोत्री, 2.  बद्रीनाथ, 3.  थराली, 4.  कर्णप्रयाग, 5.  केदारनाथ, 6.  नरेन्द्रनगर, 7.  प्रताप नगर, 8.  टिहरी, 9.  चकराता, 10. विकासनगर, 11. धर्मपुर, 12. राजपुर, 13. मंगलौर, 12. रूड़की, 13. पिरान कलियर, 14. पौड़ी, 15. श्रीनगर, 16. बागेश्वर, 17. चम्पावत, 18. नैनीताल, 19. हल्द्वानी, 20. रामनगर, 21. जसपुर, 22. बाजपुर, 23. रूद्रपुर, 24 नानकमत्ता, 25. अल्मोड़ा, 26 जागेश्वर, 27. पिथौरागढ़, 28. गंगोलीहाट, 29. लालकुंआ, 30. देहरादून कैंट।

भाजपा की संभावित जीत वाली सीटें : चूंकि मेरे आंकलन के मुताबिक कांग्रेस बहुमत की राह पर जा रही है, लिहाजा भाजपा के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। मेरे साथ आपको भी 6 मार्च का हार-जीत के लिए नहीं, बल्कि इस बात के लिए इंतजार करना चाहिए कि कहीं कैबिनेट का हाल साल 2002 वाला तो नहीं होगा। कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत, त्रिवेन्द्र सिंह रावत, विजया बड़थ्वाल और मदन कौशिक की हार जीत सिर्फ मतदाताओं के ही नहीं, बल्कि प्रभु के हाथों दिखाई पड़ रही है। खुद मुख्यमंत्री बीसी खण्डूरी और उनके समर्थकों यह विश्वास नहीं है कि क्या कोटद्वार की जनता ने उन्हें जरूरी माना है। भाजपा ही नहीं बल्कि हरेक की निगाहें रूद्रप्रयाग सीट पर लगी हैं। जहां कैबिनेट मंत्री मातबर सिंह कण्डारी और नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत के बीच मुकाबला है। मेरा आंकलन ये है कि कण्डारी उस सूरत में हार सकते हैं, जबकि अर्जुन गहरवार 4000 से ज्यादा वोट हासिल करें। वरना कण्डारी भाईजी को अपनी सीट बरकरार रखनी चाहिए। आपकों बता दूं कि मातबर कण्डारी और गहरवार पूर्व में एक दूसरे के बेहद करीबी रहे हैं। भाजपा को अल्मोड़ा जिले में कांटे के मुकाबले में कुछ फायदा हाथ लग सकता है। भाजपा द्वारा जीती जा सकने वाली सीटें-

1.  पुरोला, 2.  रूद्रप्रयाग, 3.  घनसाली, 4.  डोईवाला, 5.  सहसपुर, 6.  ज्वालापुर, 7.  हरिद्वार, 8.  डीडीहाट, 9.  कपकोट, 10. सोमेश्वर, 11. लोहाघाट, 12. चौबट्टाखाल, 13. कालाढ़ंगी, 14. सितारगंज।

जिन सीटों पर कांटे का मुकाबला है : 1.  कोटद्वार, 2.  यमकेश्वर, 3.  रानीखेत, 4.  द्वारहाट, 5.  सल्ट, 6.  भीमताल, 7.  काशीपुर, 8.  किच्छा, 9.  खटीमा, 10. मसूरी, 11. रायपुर, 12. हरिद्वार ग्रामीण, 13. खानपुर।

बहुजन समाज पार्टी की जीत वाली संभावित सीटें : इस बार बहुजन समाज पार्टी के लिए अपनी मौजूदा 8 सीटों को बरकरार रख पाना संभव नहीं होगा। मोटे तौर पर पार्टी का मत प्रतिशत तो बढ़ेगा, लेकिन सीटों की संख्या घटेगी। बसपा को हरिद्वार और उधमसिंह नगर दोनों ही जिलों में नुकसान होने जा रहा है। हरिद्वार जिले में पार्टी के 4 मौजूदा विधायक लगातार दो बार चुनाव जीतने के बाद फिर चुनाव लड़े हैं। लिहाजा इस बार हैट्रिक बनाना इतना आसान नहीं होगा

। बहरहाल कुल ग्यारह सीटों में से करीब 8 सीटों में बीएसपी प्रत्याशियों को कांग्रेस से मुकाबला करना है। बमुश्किल एक अन्य सीट पर भाजपा त्रिकोणीय मुकाबला बना सकती है। लेकिन हार-जीत जातिगत एवं राजनैतिक कारणों से कांग्रेस और बसपा के बीच ही होनी है। वैसे मंगलौर में आरएलडी प्रत्याशी गौरव चौधरी कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन और खानपुर में निर्दलीय प्रत्याशी मुफ्ती रियासत कांग्रेस के कुंवर प्रणव चैम्पियन के समीकरण बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं। वहीं, उधमसिंहनगर में बसपा सितारगंज सीट गंवाने जा रही है। अलबत्ता इसे जिले में पार्टी की उम्मीदें रूद्रपुर मे प्रेमानंद महाजन और जसपुर में मोहम्मद उमर पर टिकी हैं। मुझे नहीं लगता कि इन दोनों ही सीटों पर कड़ी टक्कर दे रही बीएसपी जीत पाएगी। जीत वाली संभावित सीटें –

1. भगवानपुर, 2. लक्सर, 3. झबरेड़ा। 

यूकेडी की संभावित जीत वाली सीटें : उत्तराखण्ड क्रांति दल प्रोग्रसिव के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी को पिथौरागढ़ जिले की धारचूला सीट से चुनाव जीतना चाहिए। व्यक्तिगत छवि और राजनैतिक अनुभव इस सीट पर नजर आ रहे त्रिकोणीय मुकाबले में उनकी जीत में मददगार होना चाहिए। उत्तरकाशी जिले की यमुनोत्री सीट पर पूर्व विधायक प्रीतम पंवार को इस बार चुनाव जीतना चाहिए। वहीं, द्वारहाट सीट पर मौजूदा विधायक पुष्पेश त्रिपाठी कांटें के मुकाबले में फंसे हैं। इसकी एक वजह परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी का चुनाव लड़ना है। पुष्पेश त्रिपाठी और पीसी ब्राह्मण हैं, जबकि इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी मदन सिंह बिष्ट ठाकुर हैं। लिहाजा इस बार अपने पिता स्वर्गीय विपिन दा की विरासत के सहारे दो बार चुनाव जीत चुके पुष्पेष त्रिपाठी के लिए जीत की राह बहुत ज्यादा आसान नजर नहीं आ रही।

यूकेडी प्रोग्रेसिव के नेता और कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट देवप्रयाग में जीतने की हालत नहीं हैं। मुझे नहीं लगता की मौजूदा विधायक ओम गोपाल रावत नरेन्द्र नगर में कांग्रेस प्रत्याशी सुबोध उनियाल को इस बार हरा पाएंगे। कुल मिलाकर यूकेडी की उपरोक्त तीन सीटों के अलावा अन्यत्र बेमतलब उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए। इन सीटों पर पाली जा सकती है उम्‍मीद –

1.  धारचूला, 2.  यमुनोत्री, 3.  द्वारहाट

उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा की संभावित जीत वाली सीटें :  चुनावों से पहले वजूद में आए रक्षा मोर्चा कांग्रेस और भाजपा के बागियों की पनाहगाह बना है। मुझे नहीं लगता कि जनता ने इस मोर्चे को बहुत ज्यादा गंभीरता से लिया। मोर्चे को टीपीएस रावत, केदार सिंह फोनिया, अनिल नौटियाल के अलावा किसी अन्य प्रत्याशी से बेमतलब उम्मीद नहीं होनी चाहिए। वैसे रूद्रप्रयाग सीट पर कैबिनेट मंत्री मातबर सिंह कण्डारी के करीबी रहे अर्जुन गहरवार और देहरादून कैंट सीट पर स्पीकर हरबंश कपूर के ओएसडी रहे पंत चुनाव लड़ रहे हैं। अगर मोर्चे के इन दोनों उम्मीदवारों ने 5 हजार से ज्यादा वोट प्राप्त कर लिए तो कण्डारी और कपूर को दिक्कत पेश आना लाजमी है। बहरहाल, मोर्चे की सारी उम्मीदें टीपीएस रावत पर ही टिकी होनी चाहिए, लेकिन जीत रावत के लिए भी एकदम आसान नहीं है। हो सकती है इनकी जीत –

1. लैंसडान          मोर्चा के अध्यक्ष टी पी एस रावत
2. बदरीनाथ         भाजपा के बागी केदार सिंह फोनिया
3. कर्णप्रयाग         भाजपा के बागी अनिल नौटियाल

निर्दलीयों की संभावित जीत वाली सीटें : मुझे लगता है कि बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीतने वालों की संख्या 3 से 5 के बीच रहनी चाहिए। इनमें भी ज्यादातर कांग्रेस के बागी ही नजर आ रहे हैं। उपरोक्त निर्दलीय उम्मीदवार में शुरू के 6 मुख्य मुकाबले में नजर आ रहे हैं। ये जीतने की स्थिति में आ सकते हैं।

1. घनोल्टी          कांग्रेस के बागी जोत सिंह बिष्ट
2. देवप्रयाग         कांग्रेस के बागी मंत्री प्रसाद नैथानी
3. लालकुंआ        कांग्रेस के बागी हरीश दुर्गापाल
4. बीएचईएल        कांग्रेस के बागी अंबरीश कुमार
5. गदरपुर          कांग्रेस के बागी जरनैल काली
6. ऋषिकेश        कांग्रेस के बागी दीप शर्मा

इनके अलावा इन निर्दलीय प्रत्याशियों के जातिगत और क्षेत्रीय कारणों के चलते अपनी-अपनी सीटों पर मुख्य मुकाबले में आने से इंकार नहीं किया जा सकता है।

7. कर्णप्रयाग        कांग्रेस के बागी सुरेन्द्र नेगी
8. टिहरी           कांग्रेस के बागी दिनेश धनै        
9. कालाढूंगी        कांग्रेस के बागी महेश शर्मा

उत्तराखण्ड में संभावित चुनाव परिणाम

कांग्रेस         35 से 40  सीट
बीजेपी         15 से 21  सीट
बसपा          4 से  7  सीट
यूकेडी          2 से  4  सीट
रक्षामोर्चा        1 से  2  सीट
निर्दलीय         3 से  5  सीट

निष्कर्ष : 1.   जनादेश 2012 सियासी पार्टियों के विधान मंडल दल के नेताओं की उम्मीदों पर ग्रहण बन सकता है। रूद्रप्रयाग सीट पर कांग्रेस के हरक सिंह रावत, पिरान कलियर सीट पर बहुजन समाज पार्टी के शहजाद, देवप्रयाग सीट पर यूकेडीडी के दिवाकर भट्ट चुनाव हारने की हालत में हैं। उनके अलावा यूकेडी पीके विधानमंडल दल नेता और विधायक पुष्पेश त्रिपाठी द्वारहाट के चुनावी चक्रव्यूह में बुरी तरह फंसे हैं। खुद मुख्यमंत्री बीसी खण्डूरी की कोटद्वार सीट पर हालत पतली है।

2.     अगर बात कैबिनेट मंत्रियों की करे तो पिथौरागढ़ सीट पर कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत यमकेश्वर में विजया बडथ्वाल जीतने की हालत में नहीं हैं। मुझे लगता है कि अगर किस्मत ही कोई चमत्कार कर दे तो अलग बात है, वरना इन सभी का विधानसभा पहुंचना बेहद मुश्किल हैं। साथ ही, हरिद्वार सीट पर कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक और रायपुर में कैबिनेट मंत्री त्रिवेन्द्र रावत भी कांटे के मुकाबले में फंसे हैं। उनके अलावा स्पीकर हरबंश कपूर के लिए देहरादून कैंट में मुकाबला जीतना एकदम आसान नहीं हैं।

3.     अगर उपरोक्त महानुभाव चुनाव हार जाएं तो बहुत ज्यादा ताज्जुब की बात नहीं होगी। हारने वाले हैविवेट नेताओं को पांच साल का राजनैतिक वनवास भोगना होगा। जनादेश 2012 उत्तराखण्ड की राजनीति को एक नई दिशा देने में सहायक हो सकता है। अगर चुनावी नतीजे मेरे आंकलन के अनुरूप रहते हैं तो आप मान लें कि कोई दो तीन नेता जबरन अपने-अपने दल की सक्रिय राजनीति से हाशिए पर जाने को मजबूर होंगे।

4.     इस बार उतराखण्ड में कमाबेश 70 फीसदी मतदान हुआ था। लिहाजा कांग्रेस भाजपा और बसपा के मत प्रतिशत में बढ़ोत्तरी होगी। अगर कांग्रेस और भाजपा के मतप्रतिशत में 5 फीसदी का अंतर रहता है तो विजयी पार्टी की सीटों का ग्राफ और उपर जा सकता है। बहुजन समाज पार्टी इस बार अपनी मौजूदा सीटों को बरकरार रखने की हालत में नहीं है, मेरे हिसाब से उसे 2 से 3 सीटों का नुकसान होना चाहिए।

लेखक राहुल सिंह शेखावत उत्‍तराखंड में टीवी जर्नलिस्‍ट हैं.

जिस मंत्री पर किताब में तीखे प्रहार, उसी ने किया विमोचन

: पत्रकारिता का अहम हिस्सा हैं कार्टून : करप्शन के खिलाफ आंदोलनों और उस पर सरकार के बचाव के तरीकों के बीच, देश के जाने माने कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग के भ्रष्टाचार पर बनाए गए कार्टून्स पर उनकी किताब 'India for Sale' का विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम का दिलचस्प पहलू ये रहा कि जिस सरकार पर और खास तौर पर सरकार के जिस मंत्री पर इस किताब में बहुत तीखे प्रहार किए गए उन्हीं मंत्री जी ने किताब का विमोचन किया।

India for sale. किसी भी किताब का ये टाइटल चौंकाने वाला हो सकता है। खासकर तब जब इसका विमोचन करने के लिए खुद एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री आए हो। खुद मंत्री जी के खिलाफ इस किताब में बहुत कुछ है लेकिन हंसते मुस्कुराते हुए उन्होने किताब का विमोचन किया। ये भी एक विरला ही मौका होता है जब तीन धुर विरोधी पार्टी के दिग्गज नेता एक साथ एक मंच पर बिना किसी के खिलाफ कुछ बोले हंसते मुस्कुराते दिखे। इन सबको एक मंच पर लाने का श्रेय जाता है देश के जाने माने कार्टूनिस्ट पद्मश्री सुधीर तैलंग को। India for sale तैलंग के corruption पर बनाए गए कार्टून्स की किताब है। तैलंग ने इस किताब के कवर पेज पर अन्ना और बाबा रामदेव को छापने का कारण 62 सालों की छटपटाहट के बाद एक उम्मीद की किरण दिखना बताया।

केन्द्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव रविशंकर प्रसाद और सीपीएम पोलिट ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी एक मंच पर दिखाइ दिए और वो भी बेहद दोस्ताना अंदाज में। संसद में और संसद के बाहर सरकार पर जमकर प्रहार करने वाले रविशंकर प्रसाद ने भी यहां सरकार पर कोई टिप्पणी करने के बजाय कपिल सिब्बल की eye brows को निशाना बनाया। उन्होंने कहा की कार्टूनिस्टों को सिबल साहब की भौंहे बहुत पसंद हैं। इस किताब में सिबल साहब और उनकी सरकार पर भी कई बेहतरीन कार्टून्स बनाए गए हैं, यहां पहुंचते हैं रविशंकर प्रसाद ने फटाफट किताब के पन्नों को पलटा और सिबल और उनकी सरकार पर कुछ कार्टून्स को नोट कर अपने भाषण में सबके सामने भी रखा।

 
अमूमन विपक्ष के किसी भी हमले पर तुरंत रिएक्शन देने वाले कपिल सिब्बल इस मंच पर रविशंकर प्रसाद की इस टिप्पणी पर मुस्कुराते रहे। हालांकि सिब्बल की इस मुस्कुराहट के पीछे का दर्द समझा जा सकता है क्योंकि वो सरकार में हैं और जो भी सरकार में होता है वो कार्टूनिस्टों के ज्यादा निशाने पर होता हैं। इस हंसी के माहौल में गंभीर लहजे में सिब्बल ने इसे लोकतंत्र की खूबसूरती बताया और कहा की यही तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सही मायने हैं। उन्होने ये भी साफ कहा की ये कार्टूनिस्ट के अपने विचार हैं और वो इस किताब के टाइटल से इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि न तो भारत बिकाऊ है और न बिकाऊ होगा।

कार्टून्स के बारे में ये भी कहा जाता है की ये politicians के लिए एक certificate की तरह होते हैं। जिसके जितने ज्यादा कार्टून्स बनते हैं समझिए वो उतना ही बड़ा politician होता है। इस बात को मज़ाकिया अंदाज़ में रखते हुए सीताराम येचूरी ने उन पर बहुत ज्यादा कार्टून्स नहीं छपने पर दुख जताया।  दरअसल इस किताब में 150 कार्टून्स हैं और इनमें कहीं भी सीताराम येचुरी नहीं दिखाई देते हैं। लेकिन ये भी सही है की जो सत्ता में होते हैं या जिनके पास अधिकार होते हैं उन पर कार्टून ज्यादा बनते हैं।

पुरानी कहावत है एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है और नई कहावत ये है कि अगर वो तस्वीर कार्टून हो तो उसकी कीमत लाख शब्दों के बराबर हो जाती है। क्योंकि हंसी हंसी में कार्टून सत्ता और सत्तधारियों पर तीखे प्रहार करता है और कोई उसका बुरा भी नहीं मानता। कार्टून की यही ताकत है जो कार्टूनिस्ट को और पत्रकारों के मुकाबले और कड़े तरीके से अपनी बात कहने का मौका देती है। मूर्तियों से लेकर नेताओं के एक एक बयान

सुधीर तैलंग के साथ डा. प्रवीण तिवारी
सुधीर तैलंग के साथ डा. प्रवीण तिवारी
को बारीकी से सुनने वाले चुनाव आयोग के लिए ये कार्टून क्या मायने रखते हैं और क्या कार्टून के जरिए कही जा रही बात पर भी उनकी नजर रहती है जैसे मसलों पर मुख्य चुनाव आयुक्त का कहना था कि एस. वाय कुरैशी साहब का कहना था कि कई बार उन पर भी कार्टून बनते हैं और वो इन्हें बहुत पंसद भी करते हैं। जहां तक नजर रखने की बात है तो कार्टून्स इस दायरे में नहीं आते। अलबत्ता तैलंग कभी चुनाव लड़ेंगे तो उन पर नजर रखी जाएगी। चुनाव में गंभीर दिखने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त भी हंसी मजाक के इस माहौल में अलग अंदाज में ही दिखे।

सुधीर तैलंग की लिए तीन politician किसी वरदान से कम नहीं रहे जिन पर उन्होंने सबसे ज्यादा कार्टून्स बनाए। पहले पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव दूसरे लालू प्रसाद यादव और तीसरे लालकृष्ण आडवाणी। तैलंग ने अपनी किताब India for Sale के लांच पर ये बात में यहां मौजूद लोगों से साझा की कि इन सभीको उनके कार्टून्स बहुत पसंद आते हैं और आडवाणी ये तो अपने published कार्टून्स की original copy भी उनसे मांगते हैं। इस कार्यक्रम में उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी भी मौजूद थी वो इन कार्टून्स के बारे में क्या सोचती है और क्या कभी कोई कार्टून उन्हे ठेस भी पहुंचाता है जैसे मसलों पर उनसे बात हुई। प्रतिभा का कहना है की उनके पिता इन कार्टून्स को बहुत पसंद करते हैं और कार्टून्स बेहद असरदार भी होते है लेकिन कभी इनका बुरा नहीं लगता। अगर कार्टूनिस्ट करारा कार्टून नहीं बनाएगा तो फिर मजा कैसे आएगा।

बेशक कुछेक ही कार्टूनिस्ट लोगों के जेहन में अपनी छाप छोड़ पाते हैं लेकिन कार्टून्स के जबरदस्त असर को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आर के लक्ष्मण बिना किसी पर सीधी टिप्पणी किए भी अपनी बात को बहुत असरदार तरीके से कह जाते थे। सुध