Fraud Nirmal Baba (26) : निर्मल बाबा के खिलाफ लखनऊ के दो बच्‍चों ने दर्ज कराई शिकायत

: पुलिस ने कहा जांच के बाद दर्ज होगा एफआईआर : निर्मल बाबा द्वारा तमाम लुभावने वादों से आम आदमी को ललचाने और फंसाने की घटनाओं के मद्देनज़र लखनऊ के दो बच्चों ने उनके खिलाफ गोमतीनगर थाने में एफआईआर दर्ज करने के लिए शिकायत दी है. पुलिस दोनों बच्‍चों के प्रार्थना पत्र पर शिकायत दर्ज कर ली है. पुलिस ने कहा है कि निर्मल बाबा पर एफआईआर जांच के बाद दर्ज की जाएगी. पुलिस निर्मल बाबा के साथ मीडिया की भूमिका की भी जांच करेगी.

उल्‍लेखनीय है कि लखनऊ निवासी सोलह वर्षीय तनया ठाकुर और तेरह वर्षीय आदित्य ठाकुर यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकत्री एवं पत्रकार डॉ. नूतन ठाकुर की संतान हैं. इन दोनों ने निर्मल बाबा के तमाम कुकृत्यों को सामने रखते हुए एक शिकायती पत्र को तैयार किया और मंगलवार को गोमतीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराने पहुंच गए. लेकिन थानाध्‍यक्ष ने एफआईआर लेने से इनकार कर दिया था. बुधवार को बच्‍चे दुबारा थाने पहुंचे, जिसके बाद पुलिस ने शिकायत दर्ज करके मामले की जांच की बात कही है.


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अमर उजाला, जम्‍मू : राजनीति से तंग होकर कई लोग दे चुके हैं इस्‍तीफा

 

अमर उजाला, जम्‍मू में राजनीति का जोर चल रहा है। रवेन्‍द्र श्रीवास्तव के आने के बाद कार्यालय में दो गुट बन गए। आज तक इस कार्यालय में कभी राजनीति हाबी नहीं हुई थी। लेकिन अब तो जोर से चल रही है। कार्यालय में दो गुट बन गए है। जो एक दूसरे की टांगों को खींच रहे है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान संस्थान को हो रहा है। क्योंकि अनुभवी लोग संस्थान को छोड़ कर जा रहे है। पिछले तीन सालों में एक दर्जन से अधिक लोग संस्थान को छोड़ चुके है। यह सभी लोग पुराने ओर अनुभवी है। आने वाले दिनों में एक डीएनई भी जाने वाले है। क्योंकि उन्हें भी तंग किया जा रहा है। खबर है कि वह किसी स्थानीय अखबार में संपादक के तौर पर ज्वाइन करने वाले हैं।
 
इसकी शुरुआत गोविंद चौहान से हुई। उन्‍हें राजनीति का शिकार बनाकर भेजा गया। वह अकेले क्राइम जैसी बड़ी बीट पर काम करते थे। उनके बाद चार लोगों को संस्थान ने क्राइम बीट पर लगाया। उन्हें बाहर भेजने में भरपूर राजनीति की गई। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वह कार्यालय के दूसरे गुट के साथ थे। इसके लिए उन्होंने प्रबंधन से बात भी की थी। जिसके बद उन्हें चंडीगढ़ में तबादला करके भेजा गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने दैनिक भास्कर जम्‍मू में सीनियर रिपोर्ट के रुप में ज्वाइन कर लिया।
 
उनके अलावा संजय पाठक जो कि संस्थान में शुरु से जुड़े हुए थे। लाचिंग के समय से संस्थान में नौकरी कर रहे थे। राजनीति के चलते उनका तबादला किया गया। श्रीवास्तव का मकसद उन्हें किसी तरह बाहर का रास्ता दिखाना था। तबादला होने के बाद पाठक ने नई जगह पर ज्वाइन नहीं किया। उन्होंने संस्थान को छोड़ कर एक स्थानीय अंग्रेजी समाचार पत्र में ब्यूरो चीफ पद पर ज्वाइन कर लिया। उन्होंने भी इस राजनीति की शिकायत प्रबंधन से की थी। बताया जा रहा है कि उन्होंने इसके लिए कोर्ट में भी अर्जी दी है।
 
योगेश शर्मा जो कि डीएनई थे। उन्हें भी तंग किया जाता था। उन्हें बिना किसी कारण गलत जगहों पर लगाया जाता था। क्योंकि संपादक का मकसद सिर्फ उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना था। उन्होंने भी राजनीति से तंग आकर पिछले साल लुधियाना में भास्कर को ज्वाइन कर लिया। अपने साथ वह डेस्क के भवेश मिश्रा को भी ले गए। दोनों की तंग होकर गए थे। उसके बाद हीरानगर के रिपोर्टर गोपाल शर्मा ने संस्थान को छोड़ा। उसके पीछे कारण भी यही था कि उन्हें तंग किया जा रहा था। उन्‍होंने संस्थान के प्रबंधन को पत्र लिखा और संस्थान को छोड़ दिया था।

प्रताड़ना से तंग अमर उजाला, कश्मीर के ब्यूरो चीफ ने की आत्महत्या

अमर उजाला, कश्मीर के ब्यूरो चीफ अशोक राजदान ने स्‍थानीय अखबार प्रबंधन के व्‍यवहार से तंग आकर आत्महत्या कर ली। वह पिछले चार सालों से कश्मीर में तैनात था। उसका शव बुधवार सुबह अपने कमरे में मिला। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरु कर दी है। आरोप लगाया जा रहा है कि वह पिछले छह माह से अपने पारवारिक कारणों के चलते वापस उधमपुर में ट्रांसफर मांग रहा था। लेकिन उसे नहीं किया जा रहा था। इसके लिए उसे तंग किया जा रहा था। जिस कारण उसने आत्महत्या का कदम उठाया।

 
राजदान मूल रुप से उधमपुर जिले का रहने वाला है। वह अमर उजाजा संस्थान में पिछले कई वर्ष से काम कर रहा था। करीब चार साल पहले जब रवेन्द्र श्रीवास्तव को जम्‍मू कश्मीर का संपादक बनाया गया था। तो उस समय आते ही श्रीवास्तव ने अशोक राजदान को उधमपुर से कश्मीर में भेज दिया था। उस समय कहा गया था कि सिर्फ दो सालों के लिए उसे कश्मीर में जाना है। उसे वायदा किया गया था कि प्रमोशन देकर भेजा जाएगा। लेकिन उसकी प्रमोशन ट्रांसफर के करीब एक साल बाद हुई। प्रमोशन के लिए उसने कई पत्र नोयडा में लिखे थे। उसके बाद कंपनी ने उसे सीनियर सब बनाया था।
 
अब तीन साल से ज्यादा समय होने के बाद वह छह माह से अपनी ट्रांसफर मांग रहा था। उसके परिवार में वह अकेला वही कमाने वाला है। पिछले चार सालों से वह परिवार से दूर था। इसलिए वह अपनी वापसी को लेकर संपादक तथा नोयडा में कई पत्र लिख चुका था। जिसमें उसने कहा था कि इन दिनों उधमपुर में जगह खाली है। क्योंकि उधमपुर में तैनात ओम पाल संबयाल का तबादला कुछ माह पहले कठुआ में कर दिया गया है। जिससे जगह खाली थी। लेकिन फिर भी उसकी अर्जी पर कोई गौर नहीं किया जा रहा था।
 
बता दे कि राजदान कई बार जबरदस्ती छुट्टी पर घर आ चुका है। जब जब उसे ज्यादा तंग किया जाता था। तो वह घर आ जाता था। इसके लिए उसे सजा भी कई बार मिल चुकी है। जब सुमेश ठाकुर को कश्मीर में भेजा गया था। तो तब भी वह कई बार तंग आकर जम्‍मू कार्यालय में आकर अपना दुखडा रो चुका था। लेकिन किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। इसलिए उसने इन सब कारणों से तंग आकर आत्महत्या का कदम उठा लिया। बताया जा रहा है कि उसने आत्महत्या के लिए एक पत्र भी लिखा है। इस मामले पर जानकारी लेने के लिए तथा मामले को रफा दफा करवाने के लिए आत्महत्या की खबर मिलते ही जम्‍मू कार्यालय से एक अनुभवी अधिकारी को कश्मीर के लिए रवाना कर दिया गया है।
 
इस संदर्भ में अमर उजाला, जम्‍मू के स्‍थानीय संपादक रवेन्‍द्र श्रीवास्‍तव से बात की गई तो उन्‍होंने अशोक राजदान के आत्‍महत्‍या की पुष्टि की तथा प्रबंधन के परेशान करने तथा प्रताड़ना के चलते आत्‍महत्‍या की खबर को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्‍होंने कहा कि यह अभी जांच का विषय है कि अशोक ने किन कारणों से आत्‍महत्‍या की है, सीधा प्रबंधन और संस्‍थान पर आरोप लगाना उचित नहीं है। 

राजेश उपाध्‍याय होंगे दैनिक भास्‍कर, दिल्‍ली के संपादक

 

दैनिक भास्‍कर, दिल्‍ली संस्‍करण के संपादक का नाम तय हो गया है. आईएमसीएल में वेब संपादक राजेश उपाध्‍याय को प्रबंधन ने दिल्‍ली भास्‍कर का नया संपादक बनाया है. राजेश पहले भी फरीदाबाद से निकलने वाले दिल्‍ली संस्‍करण के संपादक रह चुके हैं. हालांकि वह एडिशन कुछ सालों पहले बंद कर दिया गया था. राजेश आईएमसीएल से पहले दैनिक भास्‍कर, भोपाल के स्‍थानीय संपादक थे. हालांकि उनके जाने की अटकलें तभी से शुरू हो गई थीं जब प्रबंधन ने आईएमसीएल में निधीश त्‍यागी को बतौर संपादक नियुक्‍त किया था. 

नोएडा में सड़क हादसे में अमर उजाला के वरिष्ठ प्रबंधक की मौत

नोएडा। अमर उजाला के एक वरिष्ठ प्रबंधक की मंगलवार शाम एक सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई। अखबार के नोएडा कार्यालय में जनरल मैनेजर (मैग्जीन) संतोष चौरसिया शाम 7 बजे के करीब सेक्टर 62 स्थित गुप्ता चौराहा पार कर रहे थे, जब एक सांड ने उन्हें टक्कर मारकर सड़क के बीचो-बीच गिरा दिया, जिससे वे सामने से आती एक कार से कुचले गए। यह हादसा सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल के पास हुआ।

हादसे के वक्त संतोष अपने दो सहकर्मियों के साथ सड़क पार कर रहे थे।  तभी सड़क किनारे आपस में लड़ रहे दो सांडों में से एक ने भागने के दौरान संतोष को धक्का मार दिया। इस धक्के से संतोष लड़खड़ा कर गिर पड़े। इसी समय सामने से आ रही तेज रफ्तार नैनो कार (नंबर-यूपी-14 बीएम 1622) ने उन्हें चपेट में ले लिया। गंभीर हालत में उन्हें फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।

सेक्टर 58 थाना पुलिस ने पंचनामे के बाद शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है। संस्थान के सूत्रों के मुताबिक, दिवंगत चौरसिया के शव को उनके गृहनगर मुज्जफरपुर भेजा जाएगा। वे मूल रूप से मुजफ्फरपुर के चकाबासु रमणा के रहनेवाले थे। संतोष फिलहाल गाजियाबाद के भौपुरा में रह रहे थे। उनकी दो साल पहले ही शादी हुई थी और वे यहां अपनी पत्नी और सात माह के बच्चे के साथ रह रहे थे। हादसे की सूचना मिलते ही अमर उजाला के कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे। उनकी मृत्यु से अमर उजाला परिवार शोकाकुल है।

हिंदुस्तान, पटना के संपादक अक्कू श्रीवास्तव पर गिरी गाज, केके उपाध्याय बने स्टेट हेड

हिंदी दैनिक हिंदुस्तान से कुछ बड़े उलटफेर की चर्चाएं भड़ास के पास आई हैं. सूचना के मुताबिक पटना के एडिटर अक्कू श्रीवास्तव का तबादला दिल्ली किया जा रहा है. उनकी जगह संपादक और स्टेट हेड बनाकर हिंदुस्तान, आगरा के संपादक केके उपाध्याय को भेजा जा रहा है. आगरा में नया एडिटर पुष्पेंद्र शर्मा को बनाए जाने की सूचना है. पुष्पेंद्र अभी तक हिंदुस्तान, मेरठ के संपादक थे. अब मेरठ के संपादक अमर उजाला से इस्तीफा देकर आए सूर्यकांत द्विवेदी हो गए हैं.

इन बदलावों की आधिकारिक स्तर पर पुष्टि नहीं हो पाई है. पर कुछ विश्वस्त सूत्र कहते हैं कि निर्णय हो चुका है, केवल आदेश जारी होना बाकी है. पटना में अक्कू श्रीवास्तव को लेकर काफी दिनों से आंतरिक राजनीति तेज थी. नीतीश सरकार से रिश्ते को लेकर भी अक्कू श्रीवास्तव निशाने पर थे. बताया जा रहा है कि मीडिया मैनेज करने के मास्टर नीतीश कुमार किन्हीं कारणों से अक्कू श्रीवास्तव से खफा थे और अपनी नाराजगी हिंदुस्तान प्रबंधन तक पहुंचा दी थी.

Fraud Nirmal Baba (25) : टीम अन्ना के सदस्य कुमार विश्वास की प्रतिक्रिया…

: निर्मल बाबा के चमत्कारिक इलाज और कथित कृपा के बारे में टीम अन्ना के सदस्य कुमार विश्वास की प्रतिक्रिया… : भारत में श्रद्धा बहुत महत्वपूर्ण विषय है. लेकिन श्रद्धा का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए. हम बार बार कहते रहे हैं कि गंगा में नहाने से पापों का क्षरण हो जाता है, गंगा में नहाने से आदमी के जितने भी कलमश हैं वो घुल जाते हैं, लेकिन अगर कोई व्यक्ति हत्या कर दे और सोचे कि मैं गंगा में नहाऊं और गंगा मुक्ति दे देगी तो ये बिलकुल गलत है. गंगा पवित्र हैं, गंगा मुक्तिदायिनी हैं, हमारी धार्मिक आस्थाओं की मां हैं गंगा, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप पाप कर्म करते रहें मनुष्य जीवन में और उसके बाद आप गंगा में स्नान कर लें….

बाबा शब्द या साधु संत बड़े महत्वपूर्ण शब्द हैं इनकी भी प्रासंगिकताओं का अब निष्कर्ष निकलना बहुत आवश्यक है, कसौटी की, किसको कहा जाए किसको ना कहा जाए, तो जो भी लोग चैनल पर ऐसा कर रहे हैं पहली बात तो उन चैनलों की सेल्फ मॉनिटरिंग होना चाहिए… वे संजय की दृष्टि इस्तेमाल करें… आप नीचे एक डिसक्लेमर डालकर नहीं बच सकते कि हम इस प्रोग्राम से अलग हैं आप कुछ भी नहीं दिखा सकते….. फिर तो आप कुछ ऐसी चीजें भी दिखाएंगे जो राष्ट्र के हित या अहित में भी जा सकती है…. पहली बात तो ये, चैनलों के विवेक पर ये काम छोड़ा जाना चाहिए…. और जनता को भी इस निर्णय में आना चाहिए कि वो ऐसे प्रोग्राम को नहीं देखेगी तो उनकी टीआरपी अपने आप गिरेगी और ऐसे बाबा जो इस तरह का दावा करते हैं कैंसर ठीक कर देंगे अपने आर्शीवाद अपनी कृपाओं से उन्हें बाकायदा अदालतों में जाकर जो समाजसेवी संगठन हैं और जो मीडिया विमर्श के लोग हैं, उन्हें चुनौती देनी चाहिए कि आइए हम आपको चार कैंसर पेसेंट देते हैं और यहीं कृपा करिए, यहीं बैठिए 24 घंटे, लाइव कृपा करके लाइव कैंसर ठीक करिए।


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Fraud Nirmal Baba (24) : मुख्य चुनाव आयुक्त वाईएस कुरैशी की प्रतिक्रिया…

: निर्मल बाबा के चमत्कारिक इलाज और कथित कृपा के बारे में मुख्य चुनाव आयुक्त वाईएस कुरैशी की प्रतिक्रिया… : कॉस्टीट्यूशन में हमारे तो है कि अंध विश्वास को दूर करना है…  और अंधविश्वास फैलाने वाले हर प्रोग्राम और हर ऐसी चीज को डिस्करेज किया जाना चाहिए…लेकिन, इसके ऊपर थोड़ा समाज को भी विचार करना चाहिए…और इस पर नैशनल डिबेट होनी चाहिए कि क्या ये बढ़ता ही जा रहा है, घटने के बजाय…

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Fraud Nirmal Baba (23) : चंडीगढ़ से जूना अखाड़े के महंत स्वामी अर्जुन पुरी की प्रतिक्रिया…

: निर्मल बाबा के चमत्कारिक इलाज और कथित कृपा के बारे में चंडीगढ़ से जूना अखाड़े के महंत स्वामी अर्जुन पुरी की प्रतिक्रिया… : बीमारी है तो औषधि लीजिए आप लोग, किसी के पास इतनी शक्ति कहां है कि वो ताक दे और काम हो जाए…आशीर्वाद बोलें और इतने में बीमारी दूर हो जए….ये तो समय का बहाव है…दिग्भ्रमित हैं लोग…भीड़ जुटाने के लिए तो कुछ भी शुरू कर दो, आपको मानने वाले लोग मिल जाएंगे….पाकेटमारी का कर दो..चोरी का कर दो…सत्संग कर दो…सबके फालोवर मिल जाते हैं….

किसके कितने फॉलोवर हैं ये कोई बड़ी बात नहीं…सोचनीय है कि वो अपने धर्म और संस्कृति से जुड़े हुए हैं या विमुख हैं…अगर आपके इष्ट…हनुमान जी…राम जी…दुर्गा माता…इन सबसे आपकी विपत्ति दूर नहीं हुई तो यकीन मानों हम संतो से आपका भला नहीं होने वाला..


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निर्मल बाबा की तरफ से आए लीगल नोटिस का भड़ास ने भेजा जवाब

श्री कार्निका सेठ, एडवोकेट, सेठ एसोसिएट्स, विषय- आप द्वारा निर्मल बाबा की तरफ से मुझको भेजे गए लीगल नोटिस के संदर्भ में नोटिस का क्रमवार जवाब…. 1- Our client is highly revered spiritual guide, renowned worldwide for his spiritual discourses as “Nirmal Baba” and has lacs of followers in India and abroad. जवाब- आध्यात्मिक गुरु पैसे लेकर प्रवचन नहीं देता. वो स्वेच्छा से मिलने वाले दान पर जीवन यापन करता है या फिर घूम घूम कर अपने खाने भर मांग लेता है. यह रही है अपने देश में परंपरा. पैसे लेकर प्रवचन सुनाने वाला या कथित कृपा करने वाला व्यवसायी है और ऐसा व्यवसाय जिसमें असत्य बातें बोली जाएं, ढोंग और अंधविश्वास की श्रेणी में आता है. लाखों फालोअर होने से कोई आदमी महान या आध्यात्मिक गुरु नहीं साबित किया जा सकता. दुनिया भर में कई आतंकवादी संगठन ऐसे हैं जिनके लाखों समर्थक या प्रशंसक हैं, पर उन्हें दुनिया के नियम-कानून वैध नहीं ठहराते.

2-Our client recently learnt that you have posted extremely defamatory and illegal contents/articles against our client on your own website of Bhadas4Media.com titled “Fraud Nirmal Baba” at the following links –
http://bhadas4media.com/article-comment/3127-fraud-nirmal-baba3.html,
http://bhadas4media.com/print/3611-fraud-nirmal-baba9.html,
http://bhadas4media.com/print/3665-fraud-nirmal-baba-15.html,
and various other defamatory links related to our client.

जवाब- अगर कोई व्यक्ति पैसे देकर न्यूज चैनलों पर विज्ञापन की तरह प्रोग्राम दिखवाता है और उस प्रोग्राम के जरिए असत्य बातों का प्रचार करता है, झूठी बातें के सहारे लोगों को भ्रमित करता है, कथित चमत्कार और कथित कृपा की बल पर गंभीर बीमारियों का इलाज करता है तो उस प्रोग्राम और उस व्यक्ति के बारे में बहस करना, लिखना और प्रचारित करना कैसे असत्य और मानहानि कारक हो सकता है. किसी की निजता वहीं तक निजी है जहां तक वह दूसरों के जीवन को प्रभावित नहीं करता. इस तरह अभिव्यकित की स्वतंत्रता के तहत हम ऐसे किसी प्रकरण पर अपनी बात रख कह सकते हैं.

3- The content in these articles published on your website  is grossly defamatory, false, without prejudice, and offensive in nature. Please note that publishing such defamatory content or statements about any person is a criminal offence in India and attracts both civil and criminal liabilities under Section 66A of the Information Technology Act, 2000 as well as under Section 499 of the Indian Penal Code.
जवाब- आप के क्लाइंट कथित निर्मल बाबा जब अवैज्ञानिक और अप्राकृतिक बातों के जरिए लोगों को भ्रमित कर उनमें अंधविश्वास फैलाते हैं तो वह कानूनी रूप से कई तरह की धाराओं के योग्य दंडनीय हो जाते हैं. फिलहाल यह कार्य नहीं हो रहा है तो हम ब्लाग और वेबसाइट के लोगों का फर्ज बन जाता है कि बाबा के बारे में ज्यादा से ज्यादा बातें कर, बहस कर, सामने आ रही बातों का खुलासा कर दूसरे पक्ष को जनता तक ले जाएं ताकि जनता यह तय कर सके कि क्या गलत है और क्या सही. आपने आईडी एक्ट और आईपीसी की जिन धाराओं का उल्लेख किया है, उसके तहत हम लोग मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हैं और माननीय न्यायालय द्वारा जो भी दंड दिया जाएगा, उसे भुगतने को भी तैयार हैं, लेकिन उससे पहले हम कोर्ट तक अपनी बात पहुंचाएंगे और यह बताने की कोशिश करेंगे कि निर्मल बाबा अवैज्ञानिक और अंधविश्वास पूर्ण बातों के जरिए लोगों से पैसे उगाहता है और वैज्ञानिक चेतना के विकास को बाधा पहुंचाता है, साथ ही चमत्कारिक इलाज के माध्यम से गैरकानूनी कृत्य करता है.
 
4-Please note that on 30th March, 2012 an exparte ad interim restraint order against Hubpages was passed by the Hon’ble High Court of Delhi restraining the hubpages.com from publishing defamatory articles against our client in CS(OS) 871/2012 (Order Attached).
जवाब- आपने जिस प्रकरण का उल्लेख किया है, उस प्रकरण में ऐसा प्रतीत होता है कि माननीय अदालत तक निर्मल बाबा के बारे में सही जानकारियां नहीं पहुंचाई गईं. हम लोग चाहते हैं कि एक बार फिर इस प्रकरण पर कोर्ट में बातचीत हो और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित करने वाले कदम की पुनर्समीक्षा हो. साथ ही, गलत कृत्य के जरिए समाज में अंधविश्वास फैलाने वाले शख्स के खिलाफ अपराध दर्ज कर न्याय की प्रक्रिया शुरू हो.
 
5-We hereby call upon you to cease and desist from publishing the defamatory content published by you on the website Bhadas4Media.com within 36 hours of receipt of this notice in compliance with the IT (Intermediaries Guidelines) Rules, 2011 and Section 79 of the IT Act, 2000, failing which my client will be constrained to take legal action against you for which you will be solely liable responsible for all acts and consequences following there from.

जवाब- हम लोग फिलहाल किसी भी खबर, रिपोर्ट या प्रकरण को वेबसाइट से नहीं हटाने जा रहे हैं. आप अपनी तरफ से कानूनी कार्यवाही करने कराने के लिए स्वतंत्र हैं.

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


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Fraud Nirmal Baba (22) : निर्मल बाबा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने पहुंचे लखनऊ के दो बच्चे

निर्मल बाबा द्वारा तमाम लुभावने वादों से आम आदमी को ललचाने और फंसाने की तमाम घटनाओं के मद्देनज़र दो बच्चों ने उनके खिलाफ कार्यवाही करने की ठान ली है. ये बच्चे हैं लखनऊ निवासी तनया ठाकुर और आदित्य ठाकुर. ये बच्चे यूपी में एक आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार डॉ नूतन ठाकुर की संतान हैं. तनया की उम्र सोलह साल और आदित्य की उम्र तेरह साल है. इन दोनों के निर्मल बाबा के तमाम कृत्यों को सामने रखते हुए आज एक प्रार्थनापत्र थाना गोमतीनगर, लखनऊ में दिया.

प्रार्थनापत्र इन बच्चों ने स्वयं ले जा कर थाने पर दिया. पर उन्हें उस समय बड़ा झटका लगा जब थाने के थानाध्यक्ष ने इन बच्चों के प्रार्थनापत्र पर एफआईआर करने से मना कर दिया. थानाध्यक्ष ने यह कह दिया कि चूँकि मामला बाहर का है इसीलिए यहाँ मुक़दमा दर्ज नहीं हो सकता. तनया और आदित्य ने यह कहा कि आपकी बात गलत है क्योंकि एक तो कोई भी एफआईआर पूरे हिंदुस्तान में कही भी दर्ज हो सकता है, दूसरे यह मामला तो खुद लखनऊ का है क्योंकि टीवी पर आने के नाते इसका घटनास्थल लखनऊ स्थित उनका घर है जहाँ वे टीवी पर निर्मल बाबा का दरबार रोज दिखाया जाता है.

इस पर थाने के थानाध्यक्ष ने उनसे यह कह दिया कि मैं एफआईआर दर्ज नहीं करूँगा, आपको जाना है तो आप पीआईएल कीजिये. जब बच्चों ने यह कहा कि आप कम से कम इस प्रार्थनापत्र को रिसीव कीजिये. इस पर थानाध्यक्ष ने प्रार्थनापत्र को रिसीव करने से भी मन कर दिया. अब इन बच्चों ने यह तय किया है कि वे निर्मल बाबा के आपराधिक कृत्य के खिलाफ एफआईआर हर कीमत पर दर्ज करायेंगे और भोले-भाले लोगों को इनसे बचाने की पूरी कोशिश करेंगे. दोनों बच्चे अब कल 12 अप्रैल 2012 को 11.00 बजे थाना गोमतीनगर जायेंगे और पुनः एफआईआर दर्ज कराने का काम करेंगे.

यह है थाने पर दी गयी एफआईआर की कॉपी-

सेवा में,
थाना अध्यक्ष,
थाना गोमतीनगर,
जनपद- लखनऊ
विषय- श्री निर्मल बाबा के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने हेतु
महोदय,

हम तनया ठाकुर और आदित्य ठाकुर निवासी 5/426, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ संपर्क नंबर 94155-34525 हैं. हमारे पिता श्री अमिताभ ठाकुर यूपी में एक आईपीएस अधिकारी हैं और माँ डॉ नूतन ठाकुर एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. हम दोनों यद्यपि युवा हैं किन्तु अपनी क्षमता के अनुसार सामाजिक कार्यों में संलग्न रहते हैं. हम अन्य कार्यों के अलावा समाज में अन्धविश्वास दूर भगाने और लोगों को धार्मिक भावनाओं के आधार पर ठगने की स्थिति के विरुद्ध भी कार्य करते हैं.

हम आपके समक्ष एक ऐसा प्रकरण ले कर उपस्थित हो रहे हैं जिसमे एक व्यक्ति द्वारा सीधे-सीधे देश के लाखों लोगों को धर्म का भय दिखा कर, अपनी झूठी महत्ता दिखा कर और लोगों को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा किया जा रहा है. इस प्रकार की हरकतों से अंधविश्वास को भारी बढ़ावा मिल रहा है, प्रगतिशील विचारों को पीछे ढकेला जा रहा है और पूरी तरह से ठगी की जा रही है.

श्री निर्मल बाबा नाम के इन कथित साधू का दरबार दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जैसे कई बड़े शहरों में लगातार लगता रहता है. इन सभी दरबार के प्रोग्राम विभिन्न टीवी चैनलों के माध्यम से लखनऊ से ले कर पूरे देश में कई बार प्रसारित किये जाते हैं. हम दोनों ने स्वयं भी इन कार्यक्रमों को अपने विराम खंड, गोमती स्थित आवास पर देखा है.

हमने इन कार्यक्रमों में यह देखा है कि श्री निर्मल बाबा नाम से जाने जाने वाले ये व्यक्ति निरंतर अपना दरबार या समागम लगाते हैं जिनमे सैकड़ों की संख्या में लोग उपस्थित होते हैं. इन दरबार में कई लोग अपनी अलग-अलग तरह की समस्याएं ले कर आते हैं. श्री निर्मल बाबा इन सभी समस्यायों के बहुत ही सरल, अविश्वसनीय और भ्रामक किस्म के उपाय बताते हैं. उदाहरण के लिए जब एक भक्त ने श्री निर्मल बाबा से अपनी एक समस्या कही तो उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि तुम अपनी कमीज की बटन जल्दी-जल्दी खोलते हो या धीरे-धीरे. जब भक्त ने कहा कि कभी जल्दी और कभी धीरे, तो निर्मल बाबा ने उन्हें कहा कि बटन आराम से खोला करो, सब समस्या का हल को जाएगा.

इसी प्रकार से एक दूसरे मामले में समस्या से घिरे व्यक्ति से श्री निर्मल बाबा ने पूछा कि बाल कहाँ कटवाते हो. भक्त ने कहा कि नाई से. इस पर श्री निर्मल बबा ने कहा कि पार्लर में बाल कटवाना शुरू काटो, कृपा आनी शुरू हो जायेगी. गंभीर समस्याओं से घिरी बिहार की एक गरीब महिला को श्री निर्मल बाबा ने कहा कि तुम छठ पूजा करती हो. उस महिला के हाँ कहने पर पूछा कि कितने रुपये का सूप चढाती हो. महिला ने कहा कि बारह रुपये का. इस पर श्री निर्मल बाबा ने कहा कि यदि तुम तीस रुपये का सूप चढाने लगोगी तो समस्याएं स्वयं ठीक हो जायेंगी. इसी तरह एक दूसरी महिला से उन्होंने पूछा कि कितने रुपये का चढावा मंदिर में चढाती हो. महिला ने कहा कि दस रुपये का. श्री निर्मल बाबा ने हँसते हुए कहा कि दस रुपये में कहाँ से कृपा आएगी. चालीस रुपये का चढावा डालने लगो, कृपा स्वयं ही आनी शुरू हो जायेगी.

श्री निर्मल बाबा इसी प्रकार की अत्यंत सरलीकृत बातें और समाधान प्रस्तुत कर पूरे देश की गरीब, अनपढ़ जनता को ठग रहे हैं और उनके प्रति चीटिंग कर रहे हैं जो भारतीय दंड विधान की धारा 415 तथा 416 में परिभाषित हैं जिनके सम्बन्ध में आईपीसी की धारा  417, 419 के 420 के तहत दंड के प्रावधान दिये गए हैं. श्री निर्मल बाबा का यह कृत्य ठगने का अपराध इसीलिए है क्योंकि वे समागम/दरबार में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से दो हज़ार रुपये की फीस लेते हैं. यह फीस इन लोगों को दरबार में आने से पहले जमा करना होता है. यह फीस दो साल से ऊपर आयु के प्रत्येक व्यक्ति पर लगता है. इसके साथ ही ये अपने आप को तीसरी आँख वाला ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त विशिष्ठ व्यक्ति बताते हैं. साथ ही वे 508 आईपीसी के भी अभियुक्त हैं क्योंकि वे ईश्वरीय नाराजगी का भय दिखा कर भी लोगों को गलत सही समाधान देते हैं और इसके बदले पैसे ऐंठ रहे हैं.

श्री निर्मल बाबा की ठगी इस बात से भी साबित हो जाती है कि मीडिया की खबरों के मुताबिक़ स्वयं श्री निर्मल बाबा का सवा करोड रुपये का बैंक को दिये चेक की हूबहू कॉपी बना कर एक व्यक्ति ने लुधियाना में उनके बैंक अकाउंट से सवा करोड रुपये निकाल लिए. यह इस बात को सिद्ध करता है कि जो व्यक्ति अपने एकाउंट की रक्षा नहीं कर सकता, उसके बताए इन सरल उपायों से भला किसका लाभ हो सकता है.

मीडिया की खबरों के अनुसार श्री निर्मल बाबा का असल नाम श्री निर्मलजीत सिंह नरूला पुत्र श्री एस एस नरूला है. ये झारखण्ड के वरिष्ठ राजनेता और लोक सभा सांसद श्री इन्दर सिंह नामधारी के सगे साले बताए जा रहे हैं. यह भी बताया जा रहा है कि श्री निर्मल बाबा पूर्व में चूना पत्थर, ठेकेदारी जैसे कई काम कर चुके हैं और उनमे असफल रहे. तब जा कर उन्होंने यह कार्य शुरू कर दिया. स्वयं श्री इन्दर सिंह नामधारी का मीडिया में यह कथन आया है कि वे खुद कई बार श्री निर्मल को यह सलाह दे चुके हैं कि वे लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करें पर श्री निर्मल इन सलाहों को नहीं मानते हैं. इन खबरों के अनुसार श्री नामधारी तक श्री निर्मल के इन कथित चमत्कारों से इत्तेफाक नहीं करते और उन्हें ढोंग बताते हैं.

मीडिया में तो यहाँ तक खबर आई है कि सुश्री निधि नामक एक जूनियर आर्टिस्ट, जो कई सारे टीवी सीरियल में काम कर चुकी है, ने यह कहा है कि अपने प्रारंभिक दिनों में ठगी का धंधा चमकाने के लिए श्री निर्मल बाबा नोयडा फिल्मसिटी स्थित स्टूडियो में अपने प्रोग्राम की शूटिंग कराते थे. उस वक्त उनके सामने जो लोग अपनी समस्या ले कर उपस्थित दिखाए जाते थे वे असल लोग नहीं हो कर जूनियर आर्टिस्ट हुआ करते थे. सुश्री निधि के अनुसार वे स्वयं इन प्रोग्राम में दस हज़ार रुपये रोज के हिसाब से काम कर चुकी हैं. उनका यह कहना है कि शुरू में श्री निर्मल बाबा अपने लोगों और जूनियर आर्टिस्ट से ही प्रश्न पुछवाया करते थे.

श्री निर्मल बाबा के सारे कार्यक्रम, जो लखनऊ में हमारे आवास पर भी टीवी के माध्यम से प्रदर्शित होते हैं, में उनके द्वारा बहुत सरल, मूर्खतापूर्ण तरीके से बहुत ही गंभीर समस्याओं का समाधान बताया जाता है. उनके द्वारा यह दावा किया जाता है कि उनके पास एक तीसरी आँख है और उन्हें ईश्वरीय आशीर्वाद है. वे इस नाम पर तमाम गंभीर बीमारियों तक का बहुत ही सरल उपाय बताते रहते हैं जो सीधे तौर पर धोखाधड़ी है. इस तरह ईश्वर का नाम ले कर लोगों को ठगना एक गंभीर अपराध है. मैंने जो जानकारी हासिल की है उसके अनुसार यह सब धारा  417, 419, 420, 508 आईपीसी में अपराध है.

अतः हम आपसे अनुरोध करते हैं कि इस प्रार्थना पत्र के अनुसार उपयुक्त धाराओं में नियमानुसार आपराधिक मुक़दमा पंजीकृत कर विवेचना करने की कृपा करें.
भवदीय,

तनया ठाकुर
आदित्य ठाकुर

दिनांक- 10/04/2012                                                

प्रतिलिपि- वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/ पुलिस उपमहानिरीक्षक, जनपद लखनऊ, लखनऊ को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु


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राष्ट्रीय सहारा, बेगूसराय के पत्रकार और ब्लागर मनीष राज के पिता का निधन

बेगूसराय से सूचना मिली है कि आज सुबह राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार व ब्लागर मनीष राज के पिता रविंद्र प्रसाद सिंह का शव कुरहा बाजार में पड़ा मिला. इलाकाई साहबपुर कमाल थाने के थानाध्यक्ष ने जब आसपास के लोगों से शव की पहचान कराई तो पता चला कि ये मनीष राज के पिताजी हैं. आनन फानन में घरवालों को सूचना दी गई. 45 वर्षीय रविंद्र प्रताप सिंह मानसिक रूप से इन दिनों अस्वस्थ चल रहे थे.

कई बार वे बिना बताए घर से निकल जाते थे. परिवार के लोग उन्हें खोजकर ले आते थे. इसी क्रम में मृत्यु होने की आशंका व्यक्त की जा रही है. उन्हें मानसिक दिक्कत के अलावा अन्य कोई बीमारी नहीं थी. 45 वर्ष के कम उम्र में निधन से घर वालों पर आफत का पहाड़ टूट पड़ा है. आज शाम परिजनों व परिचितों ने अंत्येष्टि कर दी. परिवार में दो बेटे और एक बहन हैं. मनीष राज सबसे बड़े हैं. वे भड़ास ब्लाग के शुरुआती सदस्यों में से रहे हैं. बाद में वे कोचिंग पढ़ाने फिर अखबार में पत्रकार के रूप में काम करने में जुट गए.
 

भड़ास को निर्मल बाबा ने लीगल नोटिस भेजा Nirmal Baba sends legal notice to Bhadas ‎

: legal notice for posting of defamatory content : 10 April 2012, To, Mr. Yashwant Singh, CEO and Editor, Bhadas4Media.com, New Delhi. Sub: Legal Notice for cease and desist from publishing of defamatory articles or blogs about Sh. Nirmaljit Singh Narula on Bhadas4Media.com, Sir, Under the instructions of my client, Sh. Nirmaljit Singh Narula, S/o Sh. S.S. Narula, resident of E – 66, Greater Kailash – 1, New Delhi(hereinafter referred to as “our client”); I thereby shall serve upon you the following legal notice-

Our client is highly revered spiritual guide, renowned worldwide for his spiritual discourses as “Nirmal Baba” and has lacs of followers in India and abroad. Our client recently learnt that you have posted extremely defamatory and illegal contents/articles against our client on your own website of Bhadas4Media.com titled “Fraud Nirmal Baba” at the following links –

—-
http://bhadas4media.com/article-comment/3127-fraud-nirmal-baba3.html

http://bhadas4media.com/print/3611-fraud-nirmal-baba9.html

http://bhadas4media.com/print/3665-fraud-nirmal-baba-15.html
—-

and various other defamatory links related to our client. The content in these articles published on your website  is grossly defamatory, false, without prejudice, and offensive in nature. Please note that publishing such defamatory content or statements about any person is a criminal offence in India and attracts both civil and criminal liabilities under Section 66A of the Information Technology Act, 2000 as well as under Section 499 of the Indian Penal Code.

Please note that on 30th March, 2012 an exparte ad interim restraint order against Hubpages was passed by the Hon’ble High Court of Delhi restraining the hubpages.com from publishing defamatory articles against our client in CS(OS) 871/2012 (Order Attached).

We hereby call upon you to cease and desist from publishing the defamatory content published by you on the website Bhadas4Media.com within 36 hours of receipt of this notice in compliance with the IT (Intermediaries Guidelines) Rules, 2011 and Section 79 of the IT Act, 2000, failing which my client will be constrained to take legal action against you for which you will be solely liable responsible for all acts and consequences following there from.

For any correspondence on this matter, please contact the undersigned.

Yours truly,

Karnika Seth

Advocate
Seth Associates
e-mail – karnika@sethassociates.com


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हाई कोर्ट का आदेश- मीडिया में सेना की मूवमेंट की खबर न आए

डॉ नूतन ठाकुर (कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरम) द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में दायर पीआइएल संख्या 2685/2012 (एम/बी) में जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस वी के दीक्षित ने आदेश दिया कि प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सेना के मूवमेंट की खबर नहीं आनी चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि वे मीडिया की स्वतंत्रता को रोक नहीं रहे हैं और यह भी देख रहे हैं कि पूर्व में ही सेना की मूवमेंट को लेकर तमाम खबरें मीडिया में आ चुकी हैं अतः अब यह आवश्यक हो गया है कि इस तरह से सेना के मूवमेंट की खबरों पर रोक लगे.

कोर्ट ने यह कहा कि सेना की टुकड़ियों के मूवमेंट का मामला अत्यंत संवेदनशील और गोपनीय होता है. अतः इसे अधिक चर्चा में ला कर देश की सुरक्षा और सेना की गोपनीयता के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि याची डॉ ठाकुर, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता और फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं, ने मीडिया की इस प्रकार की रिपोर्टिंग पर चिंता व्यक्त की थी.

कोर्ट ने सचिव, गृह मंत्रालय एवं सचिव, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार एवं प्रमुख सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश को इस आदेश का आज से ही
अनुपालन कराने का आदेश दिया है. इसके लिए इस आदेश की प्रति अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल तथा मुख्य स्थायी अधिवक्ता को दिये जाने के भी आदेश दिये गए. डॉ ठाकुर ने उच्च न्यायालय से यह प्रार्थना की थी कि ये दोनों मामले बहुत ही गंभीर हैं और अतः इन दोनों मामलों की तुरंत उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की जानी चाहिए. उन्होंने इसमें प्रधान मंत्री कार्यालय को प्रतिवादी बनाया था.

ये है कोर्ट का आदेश  

Court No. – 1
Case :- MISC. BENCH No. – 2685 of 2012
Petitioner :- Dr.Nutan Thakur [P.I.L. Civil]
Respondent :- Union Of India Through Principal Secy.P.M.O.Office New Delhi
Petitioner Counsel :- Dr.Nutan Thakur (Inperson)
Respondent Counsel :- A.S.G.
Hon'ble Uma Nath Singh,J.
Hon'ble Virendra Kumar Dixit,J.
Order (Oral)
We have heard petitioner in person and learned Assistant Solicitor General of India, Sri I.H. Farooqi, for Union of India. The issue of movement of Army troops is not a matter of the kind which should require public discussion at the cost of defence official secrecy and the security of country. Petitioner, a social activist and freelance journalist, in her submissions expressed her grave concern over the media reportings on this subject which, if permitted to continue, may seriously interfere with the handling of security matters by Army, particularly the movements of troops from the strategic point of view in the field as well as peace areas. Thus, without interfering with the independence of media and keeping in view the fact that the news items relating to movements of troops have already engaged the attention at the highest level in the defence as well as in the Government, we think it appropriate to direct the Secretary, Home Affairs, and the Secretary, Information & Broadcasting, Government of India and the Principal Secretary (Home), Government of U.P., to ensure that there is no reporting/release of any news item by the Print as well as Electronic Media relating to the subject matter, namely, the movement of troops as contained in the accompanying annexures.

Writ petition is dismissed at this stage with aforesaid directions.
Let a copy of this order issue today to the officials concerned as well as to learned Additional Solicitor General of India/Assistant Solicitor General of India and learned Chief Standing Counsel for immediate compliance.

Order Date :- 10.4.2012

जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर में शैलेंद्र मणि ने ली सात की बलि

गोरखपुर से नए लांच हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स से सात लोगों की अचानक छंटनी कर दी गई है. इन सभी को न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही कोई सेलरी. संपादक शैलेंद्र मणि के निर्देश पर सुशील वर्मा, अरुण गोरखपुरी, देवेंद्र नाथ दुबे, शाहीन्दा अब्बासी, दीपिका वर्मा, राधा शर्मा, फोटोग्राफर घनश्याम चतुर्वेदी को संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. ये लोग कई महीनों से काम कर रहे थे. एचआर के लोगों ने इन्हें फोन कर कर के कहा कि अब आपको आफिस नहीं आना है. इन्हें आफर लेटर दिया था, लेकिन ज्वायनिंग लेटर आज तक नहीं दिया गया था.

निकाले गए लोगों का कहना है कि जब निकालना ही था तो नियुक्ति क्यों की. उधर, अखबार में वो लोग पड़े हुए हैं जिनको कंपोजिंग तक नहीं आती और वे अच्छी खासी सेलरी उठा रहे हैं. इसके पहले भी तेरह लोगों को अखबार से निकाला जा चुका है. डा. गायत्री त्रिपाठी, मार्केंडेय त्रिपाठी के अलावा चार चार अन्य नए पत्रकारों को निकाल दिया गया था. इस छंटनी से बाकी बचे लोगों में दहशत का माहौल है. बताया जा रहा है कि यहां नियुक्ति 75 लोगों की होनी थी लेकिन शैलेंद्र मणि ने रख लिया 125 लोग. अब उन पर खर्चे घटाने का दबाव पड़ रहा है तो एक एक करके लगभग दो दर्जन लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. निकाले गए लोगों का कहना है कि देर सबेर इसकी आह शैलेंद्र मणि को भी लगेगी.

सरबजीत सिंह की रिहाई के लिए काटजू ने जरदारी को ख़त लिखा

To, H.E. The President of Pakistan, Mr. Asif Zardari, Through H.E. the Pakistan High Commissioner to India- Mr. Shahid Malik, New Delhi, 10.04.2012, Your Excellency, Re: Release of Sarabjit Singh, Your Excellency’s recent visit to India and Ajmer Sharif has created a climate for good relations between our two countries.

Your Excellency was very kind to honour the appeal made by the bench of the Indian Supreme Court (consisting of Justice Gyan Sudha Mishra and myself) for release of one Gopal Das, an Indian who had been undergoing a life sentence in Pakistan, and had spent 27 years in Pakistani jails. In our judgment we had quoted the famous Urdu poet Faiz Ahmed Faiz: “Qafas udaas hai yaaron saba se kuch to kaho, Kaheen to behar-e-khuda aaj zikr-e-yaar chale”

On Your Excellency’s order Gopal Das was released and was sent back to India. I am very grateful for Your Excellency’s kind gesture. Now through this letter I am praying to you for similar generosity in the case of one Sarabjit Singh, an Indian national, who has been on death row in a Pakistani jail for over 20 years. I am appealing to you to order release of Sarabjit Singh and his return to India as a humanitarian gesture, exercising your power of pardon as the Pakistan President. By doing so you will add to the excellent impression among Indians created by your recent visit to Delhi and Ajmer Sharif, and improve ties between our two countries.

You would be knowing that the Indian Supreme Court recently granted bail to Dr. Khalil Chishty, for whose release I have been campaigning for a long time. Release of Sarabjit Singh and sending him back to India will add to the friendly atmosphere which has been created.

I will conclude by quoting Portia’s speech in Shakespeare’s ‘Merchant of Venice’- “The quality of mercy is not strained, It droppeth as the gentle rain from heaven, Upon the place beneath. It is twice blest; It blesseth him that gives and him that takes, If is enthroned in the hearts of kings; It is an attribute of God himself; And earthly power doth then show like God’s, When mercy seasons justice”

With kind regards,
Yours sincerely,
Justice Markandey Katju
Former Judge, Supreme Court of India, and
Presently Chairman, Press Council of India

मेरा-तेरा नहीं बल्कि ऐश्वर्या-युवराज का मीडिया

घर लौटा युवराज, कैंसर बाउंड्री पार!- जैसी शीर्षकों से आज का मीडिया अटा पड़ा है। खुशी की बात है। हो भी क्यों नहीं एक व्यक्ति स्वस्थ होकर आया है। फिर खेलेगा भारत की और से। मीडिया ने पलक पांवड़े बिछा दिए। तब भी हल्ला मचाया था, जब उसकी बीमारी की खबर सामने आई थी। पलक पांवड़े बिछाकर आखिर क्या संदेश देना चाहती है मीडिया? कि कैंसर एक बड़ी ही गंभीर बीमारी है, या यह कि इसका इलाज अपने देश में बेहतर संभव नहीं? या फिर यह कि यह एक मामूली बीमारी है और इसका इलाज संभव है।

तो फिर मेरी पड़ोसन का क्या जो आज नहीं, आज से दस साल पहले अपने स्तन कैंसर का इलाज करवा कर स्वस्थ हो चुकी है और आज अपने पति- बच्चों के संग सानंद जिंदगी बिता रही है। वो भी किसी अमेरिका नहीं, बल्कि भारत में ही इलाज से यह संभव हुआ हो चुका है। और फिर मेरे आफिस के चपरासी के बच्चे का क्या जो आज भी रक्त कैंसर से जूझ रहा है और अमेरिका और मुंबई तो छोड़ो पटना में भी इलाज करवाने में असमर्थ है। आज भी हमारे आस-पास मेरी पड़ोसन और इस बच्चे जैसे हजारों लोग हैं। देश में आज भी लोग कैंसर से उतना ही खौफ खाते है, कितने ही मौत के शिकार होते है और ढेरों उचित इलाज होने पर स्वस्थ भी होते है। आखिर मीडिया हमेशा से सिर्फ और सिर्फ किसी सेलेब्रेटी को भुनाने का ही काम तो करती रहती है। यहां भी बात बस वहीं आकर रुक जाती है कि मीडिया किसी जग्गू, जगिया, फेंकनी, बुधनी का नहीं, बल्कि ऐश्वर्या, युवराज का ही है।

लेखिक लीना मीडियामोरचा की संपादक हैं.

श्रवण गर्ग नईदुनिया अखबार के प्रधान संपादक बने

एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग को नई दुनिया अखबार का प्रधान संपादक बना दिया गया है. अभी तक दैनिक भास्कर के समूह संपादक रहे श्रवण गर्ग ने इसी पहली अप्रैल को भास्कर को अलविदा कहा था. तबसे कयास लगाया जा रहा था कि श्रवण गर्ग किसी दूसरे ग्रुप के साथ नई पारी शुरू करेंगे या फिर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपनी नई पारी खेलेंगे. नई दुनिया को जागरण समूह द्वारा खरीदे जाने के बाद श्रवण गर्ग को इस अखबार का प्रधान संपादक बनाया जाना बताता है कि श्रवण गर्ग की नियुक्ति दैनिक जागरण के मालिकों की सहमति से ही की गई होगी.

इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि मध्य प्रदेश के रहने वाले श्रवण गर्ग ने पत्रकारिता की लंबी पारी इसी प्रदेश में रहकर खेली और भास्कर के कई एडिशन लांच कराकर उसे सफल बनाने में भूमिका निभाई. वे पुराने अनुभवों का लाभ उठाकर नई दुनिया को नए सिरे से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में स्थापित करने के लिए भास्कर से लोहा लेंगे. इससे पहले नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता हुआ करते थे, जिन्होंने नई दुनिया के जागरण के हाथों बिक जाने के बाद नेशनल दुनिया नाम से नई दुनिया से मिलता जुलता डुप्लीकेट अखबार दिल्ली एनसीआर में लांच करके अपनी दुकान अलग जमा ली है. नई दुनिया अखबार में श्रवण गर्ग के संपादक बनाए जाने से संबंधित खबर प्रकाशित हुई है जो इस प्रकार है….

मिस कंडक्ट के आरोप में सहारा, आगरा के मनोज यादव सस्पेंड

सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन की तरफ से एक पत्र जारी किया गया है. यह पत्र मनोज कुमार यादव, रिपोर्टर / सीनियर आफिस वर्कर, रिपोर्टिंग डिपार्टमेंट, सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन, आगरा को संबोधित है. इस सस्पेंसन आर्डर में कहा गया है कि आपकी सर्विस इमीडिएट इफेक्ट से सस्पेंड की जाती है. वजह बताया गया है मिसकंडक्ट. मनोज को एसआईएमसी, नोएडा के साथ अटैच कर दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि मनोज यादव पर कई तरह के आरोप हैं. वे कई तरह के धंधों में संलिप्त रहे हैं और उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज है.

दो साल पहले रमेश अवस्थी जब ब्यूरो चीफ हुआ करते थे तो उनके आशीर्वाद से मनोज यादव को प्रमोशन मिला. देखते ही देखते मनोज काफी लंबी लंबी डील करने लगे. स्वतंत्र मिश्रा आए तो मनोज ने पाला बदला और उनके साथ हो लिए. बताया जाता है कि बारह से पंद्रह हजार रुपये की सेलरी पाना वाला यह शख्स चार चार कारें मेंटेन करता है. एटा निवासी मनोज यादव को लोग अब करोड़पति कहते हैं. अपना खुद का मकान बनवा लिया, एक इंटर कालेज भी संचालित करते हैं ये जनाब. मनोज की कई शिकायतें सहारा मुख्यालय तक पहुंचीं तो जांच बैठ गई. विज्ञापन का पैसा दबाने की भी शिकायत थी. अपने कई रिश्तेदारों को भी सहारा में नौकरियां दिलवा दी हैं. फिलहाल कई लोग मनोज के लिए लाबिंग कर रहे हैं कि वे फिर से आगरा जाकर काम संभाल लें, वहीं उनसे पीड़ित लोग मनोज को पूरी तरह सहारा से बाहर कराने की फिराक में हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

Times of India वालों की इंगलिश Off हो गई है क्या? पढ़िए यह न्यूज

टाइम्स आफ इंडिया अखबार में ऐसी अंग्रेजी. पढ़ने वाले सिर पीट रहे हैं. छह अप्रैल को टाइम्स आफ इंडिया की वेबसाइट पर एक खबर प्रकाशित हुई. संभव है यह न्यूज अखबार में छपी हो, संबंधित एडिशन में. इस खबर में अंग्रेजी की इतनी ग्रामेटिकल मिस्टेक हैं कि पाठकों ने अपनी प्रतिक्रिया भी खूब दी है. किसी ने एडिटर की मांकानाका की है तो किसी ने लेखक की. सबने टाइम्स आफ इंडिया वालों को कोसा है कि प्लीज, एडिटिंग और ग्रामर पर ध्यान दिया करें. ये है न्यूज और उसके ठीक नीचे पाठकों के कमेंट.

Girl arrested for killing parents
Falguni Banerjee, TNN Apr 6, 2012

CHINSURAH: Police on Wednesday night arrested Mousumi Sarkar, 22, was arrested on Wednesday night for having plotted the murder of her parents along with her fiance. in connection with the murder of her parents. The girl had plotted with her fiance Rippon to kill her parents as they had opposed to their marriage. her desire to marry for killing her parents as they opposed her wish to marry her fiance.

Mousumi was produced in a Chinsurah court on Thursday and sent to her to jail for 14 days of jail custody. The court had earlier turned down her bail plea.

Mousumi was her parents' only child. She wanted to marry Sk Moidul Alam alias Rippon, her classmate at Burdwan Raj College. Her parents did not approve of their relationship. An angry Mousumi thus told Rippon to "teach her parents a lesson".

The youth allegedly hired four goons from Howrah and promised to pay them Rs 30,000 if they killed Mousumi's parents. On the night of March 18, the goons murdered Mousumi's father Mohit Sarkar a retired Army officer and her mother Lata.

Though police immediately arrested Rippon and Rajesh Verma, – an extortionist at the Howrah's Mullickbazar market – they chose not to arrest Mousumi then. They did so only last night.

Special IGP (Burdwan Range) Basab Talukdar said, "Why are you reading so much into one arrest? The objective is to gather evidence so it can stand the test of law in the courts. The aim is to get conviction for all those who are guilty; not who is arrested and who are not . The case is gruesome and is being investigated thoroughly."

Mousumi has given a confessional statement under 164 CrPC to a judicial magistrate. She claimed to have she had merely asked Rippon to teach her parents a lesson and wasn't aware that they would be murdered. However, police say, when her parents were being chopped to death, Mousumi was on the floor above in the same house and did not bother to rescue them.

EI (USA)
06 Apr, 2012 03:12 AM
Atrocious editing! Just read the first paragraph- it is written like a pre-schooler. Then it continues in the same vein.

abc (Blore) replies to EI
06 Apr, 2012 05:27 AM
Abe Shakespeare ki aulad , is this what you do for timepass? read all articles and comment on the quality and grammatical mistakes rather than the actual story

R9 (USA)
06 Apr, 2012 03:24 AM
Who wrote this article??…a toddler?

Sid (Fremont, U.S) replies to R9
06 Apr, 2012 08:33 AM
Why do you insult toddlers? It was written by a Chimpanzee after Five Large pegs!

Dude (Mumbai) replies to R9
06 Apr, 2012 07:26 AM
The copy-paste apparently got distorted.

Yogesh-Suratwala (Auckland) replies to R9
06 Apr, 2012 05:20 AM
Definitely not your toddler, as your toddler is being looked after by Government agencies. As you and your family are not FIT to raise children.

Praveen (Chennai) replies to Yogesh-Suratwala
06 Apr, 2012 08:43 AM
Dumbo… What she meant by a toddler was because of the grammatical errors. You being in an English speaking country count not identify this??? I pity you!

Yogesh-Suratwala replies to Praveen
06 Apr, 2012 03:15 PM
Listen you C–nt, I know what he mean, it is just that BLACK CATS don't understand.

Sumit (France)
06 Apr, 2012 03:40 AM
I think the editor was shocked!!! 😀 It's a pity that the article is in featuring in this newspaper. Although off-late the newspaper itself has lost its rapport that it used to have!!!

Mohan (Patiala)
06 Apr, 2012 05:33 AM
I can explain the first para. The journalist was typing various sentences and phrases to see which one was better. When he/she finished the article, it was sent off, along with all the other stuff in the first para. ToI editors obviously did not catch the mistake…after all, there is much more masala news to check nowadays.

Forced to Read TOI (Somewhere)
06 Apr, 2012 07:26 AM
Dear TOI, What happen to quality control, this story has so many grammatical errors that even my 10 year old son wouldn't make. Do you actually proof read this document or just print it? "Mousumi was produced in a Chinsurah court on Thursday and sent??? to her to??? jail for 14 days of jail custody."….. This is even bigger joke sounds like someone is adding stuff cooked up in their own brains rather than facts. Police on Wednesday night arrested Mousumi Sarkar, 22, was arrested on Wednesday night for having plotted the murder of her parents along with her fiance. in connection with the murder of her parents. The girl had plotted with her fiance Rippon to kill her parents as they had opposed to their marriage. her desire to marry for killing her parents as they opposed her wish to marry her fiance.

Prakash (Mumbai (India))
06 Apr, 2012 07:56 AM
What's wrong with TOI????? This article seems to have been compiled by a two year old and proof reading done by a one year old! Surprised at TOI's fall in standards

chetan (bangalore)
06 Apr, 2012 08:13 AM
Am i blind or insane or is there something seriously wrong with the first paragraph. Please clarify. I am shocked.

Ramesh (Bangalore) replies to chetan
06 Apr, 2012 08:55 AM
Editor was in shock when he heard the news, it took him some time to come into senses

Gayathri Devi (Kochi)
06 Apr, 2012 09:00 AM
"Police on Wednesday night arrested Mousumi Sarkar, 22, was arrested on Wednesday night for having plotted the murder of her parents along with her fiance. in connection with the murder of her parents. The girl had plotted with her fiance Rippon to kill her parents as they had opposed to their marriage. her desire to marry for killing her parents as they opposed her wish to marry her fiance."…. next time such events happened inside TOI, at least I won't be surprised.

Ajit (Pune)
06 Apr, 2012 09:05 AM
what a joke of an article..TOI , your quality has dipped rock bottom…can't believe my eyes that you are publishing such a poorly written article.

InstantGenius (Bangalore)
06 Apr, 2012 09:19 AM
TOI editor needs some essay practice. Poorly articulated

Praveen Gupta (Jhumritilaiya) replies to InstantGenius
06 Apr, 2012 10:00 AM
The first paragraph is done by a fourth grader.

jack (Mumbai)
06 Apr, 2012 09:28 AM
I think TOI is outsourcing its job to some freelance/housewife writers..!!

ME (Chennai)
06 Apr, 2012 10:04 AM
What rubbish english!!!! Whats happening to your standard TOI…

Santosh (Mumbai)
06 Apr, 2012 10:11 AM
to all the english experts, teachers and professors, look at the gruesome murder that has taken place, the parents only daughter, with much pride they got her in to this world, they spent sleepless nights to raise her, the poor father who taught her darling daughter to stand and then walk, the mother who held her to her chest and fed her, did they ever know that their darling daughter would gift them a horrible death, guys feel the pain, to hell with the grammatical mistakes, all children who oppose their parents take a break and look back

BSGuruprakash (Bangalore) replies to Santosh
06 Apr, 2012 04:38 PM
All this is because Just for LUST…Lust…And Lust…. In Lust one will be Confused. lust Brings tension. In lust one wants to grasp and posses. Lust demands. Lust says, " All I want you to have is want I want ". In Lust there is cunningness and manipulation. Lust brings violence. And finally Lust imprisons and destroys.- Sri sri Guruji. All this is because one is Lack of Knowledge about, " why did we only got this Human life with Knowledge ".

amar (Mumbai) replies to Santosh
06 Apr, 2012 10:39 AM
This article was already posted 2 days back..under a different headline..we had enough discussion about that 2 days back..

Santosh replies to amar
06 Apr, 2012 10:56 AM
good, so you feel that this article since it was posted two days back and you posted your comments and read a few, no one else should discuss about it, you are equally or more insensitive than the english language slaves who have voiced their opinions for the language and not for the gruesome act, get some life dude or are you made of plastic?

real (Kolkata)
06 Apr, 2012 10:34 AM
first, this is aweful english! second, why did they have to kill the poor parents??!!!! this wench could have eloped with her lover and got married and in the court…she wouldn't have had to see her parents again anyway 'cause her parents themselves would have loved not to see her face again!…why go for such gruesome options!

rahul (mumbai)
06 Apr, 2012 10:41 AM
why to ready frustrating news in morning.see funny side of news at site satiresofindia

literate (21st century India)
06 Apr, 2012 06:31 PM
TOI, please do a proof reading before publishing the news. Even the very first sentence is not framed correctly. Sad, you are just busy in maximising the volume of news articles and no effort spent on improving the quality of the article.

डेली न्यूज एक्टिविस्ट के आलेख को चुराकर सी एक्सप्रेस में संपादकीय के रूप में छापा

लखनऊ से प्रकाशित डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट के पेज नंबर 9 पर 'आम आदमी की सुरक्षा पर हावी वीआईपी सुरक्षा' शीर्षक से सिद्धार्थ शंकर गौतम का आलेख प्रकाशित हुआ. अगले दिन 4 अप्रैल को यही आलेख बिना एक शब्द परिवर्तित किये आगरा से प्रकाशित अखबार सी एक्सप्रेस में ''वीआईपी सुरक्षा आम आदमी पर हावी'' शीर्षक से सम्पादकीय लेख के रूप में प्रकाशित कर दिया गया. सी एक्सप्रेस ने पूरे आर्टिकल को चुराकर अपना संपादकीय बना दिया.

इतनी बड़ी गलती हो जाने के बाद भी सी एक्सप्रेस वाले चुप हैं. डीएनए के एडिटर इन चीफ सुभाष राय ने सी एक्सप्रेस के नीरज जैन को एक मेल लिखकर चोरी की इस घटना पर आपत्ति जताई है. डीएनए में प्रकाशित आलेख के लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम ने भी सीएक्सप्रेस द्वारा उनका आलेख चोरी कर संपादकीय बना दिए जाने पर नाराजगी जाहिर की है.

 

ललितपुर प्रेस क्लब अध्यक्ष वीरेन्द्र शर्मा की माता जी का निधन

ललितपुर प्रेस क्लब अध्यक्ष वीरेन्द्र शर्मा की माता जी विमला देवी शर्मा का बीमारी के चलते निधन हो गया है. उनके निधन की खबर सुनते ही जिले के सभी पत्रकारों में शोक की लहर छा गयी. विमला देवी शर्मा माता जी का अंतिम संस्कार नगर के खिर्कापुरा स्थित मुक्तिधाम में वैदिक रीती रिवाज के अनुसार किया गया. इस अंतिम यात्रा में शहर के गणमान्य नागरिकों सहित सभी पत्रकार सम्लित रहे. पत्रकारों ने मां के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त की.

प्रेस क्लब के महामंत्री रवि चुंगी ने बताया कि संस्था के अध्यक्ष वीरेन्द्र शर्मा की माता जी के निधन पर पत्रकार भवन मे 11 अप्रैल को दोपहर 12 बजे शोक सभा आयोजित की गयी है. उन्होंने सभी पत्रकारों से अनुरोध किया है कि वह शोक सभा मे सम्लित होकर स्व. विमला शर्मा जी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करें.

दीपक लांबा का ब्लूमबर्ग यूटीवी से इस्तीफा, हरेश चावला की नई पारी

अंग्रेजी बिजनेस न्यूज़ चैनल ब्लूमबर्ग यूटीवी के बिजनेस हेड दीपक लांबा ने इस्तीफा देकर नई पारी कुछ नया करने का ऐलान किया है. वे 2010 की शुरुआत से इस चैनल में कार्यरत थे. उनका कहना है कि वे जल्द ही एक मीडिया समूह में कुछ नया करने जा रहा हूं. लांबा ने करियर की शुरुआत ‘हंगामा’ चैनल से की. वे वायकॉम ब्रांड सोल्यूशन और एमटीवी इंडिया में भी रहे.

उधर, एक अन्य सूचना के मुताबिक प्राइवेट इक्विटी फंड ‘इंडिया वैल्यू फंड एडवाइजर्स’ (आईवीएफए) में हरेश चावला की नियुक्ति भारत में पार्टनर के बतौर की गई है. चावला इससे पहले नेटवर्क18 समूह में सीईओ थे.

300 करोड़ रुपये देकर टीवी टुडे ग्रुप का 26 फीसदी शेयर खरीदेगा आदित्य बिरला ग्रुप!

: आजतक न्यूज चैनल की मूल कंपनी में पैसा लगा कर मीडिया क्षेत्र में पांव पसारेगा आदित्य बिरला समूह : बड़े कहे जाने वाले चैनलों और अखबारों में कारपोरेट घरानों का पैसा लगने का क्रम तेज हो गया है. नेटवर्क18 और ईटीवी में मुकेश अंबानी ने कब्जा जमा लिया तो अब ताजी सूचना ये है कि आदित्य बिरला ग्रुप आजतक समेत कई चैनल चलाने वाली कंपनी टीवी टुडे ग्रुप में अपना पैसा लगाने जा रहा है. मीडिया इंडस्ट्री में चर्चा है कि आदित्य बिरला समूह की कोशिश है कि वह टीवी टुडे नेटवर्क में पैसा लगाकर मीडिया में अपना हाथ-पांव फैलाए.

आदित्य बिरला समूह के पास अभी तक मीडिया का कोई काम नहीं है. टीवी टुडे ग्रुप में निवेश की चर्चाओं के कारण इस ग्रुप के शेयर के दाम काफी बढ़ गए हैं. सूत्रों पर भरोसा करें तो टीवी टुडे ग्रुप का 26 फीसदी शेयर आदित्य बिरला समूह खरीद सकता है. यह डील करीब 300 करोड़ रुपये में होने की संभावना है. इस डील में अंबित कैपिटल शामिल है. बताया जा रहा है कि टीवी टुडे नेटवर्क पूंजी निवेश के लिए कई अन्य कंपनियों से भी बातचीत कर रही है.

टीवीटुडे नेटवर्क समूह के कई चैनल हैं. आजतक, हेडलाइंस टुडे, दिल्ली आजतक और तेज़ न्यूज़ चैनल का संचानल यह कंपनी करती है. टीवीटुडे नेटवर्क में अरुण पुरी वाली कंपनी लीविंग मीडिया का करीब 57 प्रतिशत शेयर है और इसी के पास मालिकाना हक है. लिविंग मीडिया का काम प्रिंट मीडिया के अलावा थॉमसन प्रेस का संचालन है.

पत्रिका, रायपुर में पलायन का दौर शुरू

पत्रिका, रायपुर को बड़ी संख्या में लोग छोड़कर जा रहे हैं। पिछले एक महीने में पांच लोगों ने संपादक गिरिराज शर्मा का साथ छोड़ दिया। इसमें चार लोगों ने भास्कर ज्वाइन किया है। फोटोग्राफर नरेंद्र बंगाले, जस्ट रिपोर्टर मनीष पांडेय, जस्ट के डेस्क से तन्मय अग्रवाल ने छोड़ दिया। तन्मय जस्ट रायपुर की रीढ़ माने जाते थे। देवेश तिवारी ने भी पत्रिका को छोड़ दिया। उन्होंने साधना न्यूज ज्वाइन किया है।

इससे पहले पिछले महीने पत्रिका के मालिक निहार कोठारी ने संपादक को टीम छोटी करने का निर्देश दिया था। अब लोग नौकरी से निकाले जाने से पहले ही छोड़कर भाग रहे हैं। हालांकि इससे संपादक की टेंशन बढ गई है। अभी संपादक ने कई फेरबदल किया था। कुछ दिन पहले गोविंद ठाकरे को सिटी में सेकेंड इंचार्ज बनाकर भेजा था। उन्हें दोबारा वापस ब्यूरो में भेज दिया गया। संपादक ने सिटी में भी कई बदलाव किए हैं। प्रमोद साहू को सिटी में क्राइम बीट दी गई है।
 

गुजरात के गांधीनगर में जीएनएस संवाददाता गौतम पुरोहित पर हमला

गुजरात समाचार के आनलाइन एडिशन ग्लोबल न्यूज सर्विस (जीएनएस) के संवाददाता गौतम पुरोहित पर आज सुबह पांच- छह बजे के बीच गांधीनगर में कुछ लोगों ने हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया है. पुरोहित इस वक्त आइसीयू में भर्ती हैं. खबर के अनुसार गुजरात विधानसभा सत्र के दौरान जो पोर्नकांड प्रकाश में आया था, उसको ध्यान में रखकर यह हमला करवाया गया है.

गौतम जीएनएस के पहले दिव्य भास्कर के लिए काम करते थे. ऐसी भी चर्चा है कि गुजरात विधानसभा सत्र के दौरान पोर्नकांड से हरकत में आने वाले मंत्री ने हमला करवाया है. गौतम पर हमले की खबर को सुनते ही गुजरात के पत्रकार मित्रों, मीडिया के लोग गांधीनगर पहुंच गये हैं.

अमर उजाला, बनारस में कई जिला प्रभारियों का तबादला

 

अमर उजाला, बनारस में कई आंतरिक बदलाव किए गए हैं. कई जिले के प्रभारियों की जिम्‍मेदारी में फेरबदल किया गया है. सोनभद्र के ब्‍यूरोचीफ के रूप में कार्यरत सीनियर सब एडिटर पवन तिवारी का तबदला बनारस यूनिट में कर दिया गया है. वे पिछले पांच सालों से सोनभद्र के ब्‍यूरोचीफ के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. उनकी जगह आजमगढ़ के ब्‍यूरोचीफ प्रवीर शर्मा को सोनभद्र का नया प्रभारी बनाया गया है.
प्रवीर की जगह भारतेंदु मिश्रा को आजमगढ़ का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. भारतेंदु मऊ में जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. बनारस में तैनात पुष्‍पेंद्र को मऊ का नया प्रभारी बनाया गया है. भदोही के ब्‍यूरोचीफ शैलेंद्र को बनारस बुला लिया गया है. उनकी जगह बनारस से पंकज चौबे को भदोही का ब्‍यूरोचीफ बनाकर भेजा गया है.  

विवादित आईपीएस अधिकारी रवि कुमार लोकू Ravi Kumar Lokku पर गिरी गाज, दर्जनों IPS officer भी हुए इधर-उधर

महिलाओं को बिना अपराध थाने में बंद कराने के आरोपी यूपी कैडर के IPS officer Ravi Kumar Lokku उर्फ L. Ravi Kumar पर गाज गिर गई है. उन्हें डीआईजी इलाहाबाद के पद से हटा दिया गया है. आंध्र प्रदेश निवासी इस आईपीएस अधिकारी रवि कुमार लोकू (बैच- आरआर-95) को फील्ड की महत्वपूर्ण पोस्टिंग से हटाकर स्थापना पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद में पुलिस उपमहानिरीक्षक के पद पर भेज दिया गया है. लोकू को हाल में ही जब इलाहाबाद का डीआईजी बनाया गया तो इससे संबंधित खबर का भड़ास पर प्रकाशन किया गया, उसे पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें- ''मां को अपमानित करने वाले आईपीएस रवि कुमार लोकू को प्रमोशन''

लोकू के अलावा कई दर्जन अन्य आईपीएस अफसरों को इधर-उधर किया गया है. दिनांक 09.04.12 को भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के स्थानान्तरण का जो प्रेस नोट जारी हुआ है, उसके मुताबिक के.एल.मीना को अपर पुलिस महानिदेशक, कारागार प्रशासन एवं सुधार विभाग, लखनऊ से हटाकर अपर पुलिस महानिदेशक, प्रशिक्षण निदेशालय, लखनऊ बनाया गया है. आर.आर.भटनागर, अपर पुलिस महानिदेशक, सीबीसीआईडी, लखनऊ को वर्तमान पद के साथ-साथ एसआईटी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. गोपाल लाल मीना, पुलिस महानिरीक्षक, इलाहाबाद जोन, इलाहाबाद को पुलिस महानिरीक्षक, भवन एवं कल्याण, पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद बनाया गया है.

अन्य अफसरों के नाम, पुराना काम व नई जिम्मेदारी क्रमश: इस प्रकार है…

आलोक शर्मा
पुलिस महानिरीक्षक, उत्तराखण्ड राज्य की प्रतिनियुक्ति से वापस।
पुलिस महानिरीक्षक, इलाहाबाद जोन, इलाहाबाद।

तनुजा श्रीवास्तव
पुलिस महानिरीक्षक, लोक शिकायत, डीजीपी हेडक्वार्टर, उ0प्र0, लखनऊ।
पुलिस महानिरीक्षक, कार्मिक, डीजीपी मुख्यालय, लखनऊं

सदीप सालुन्के
पुलिस महानिरीक्षक, अभिसूचना मुख्यालय, लखनऊ।
पुलिस महानिरीक्षक, स्थापना, डीजीपी मुख्यालय, लखनऊ।

ए0के0डी0 द्विवेदी
पुलिस महानिरीक्षक, स्थापना, मुख्यालय पुलिस महानिदेशक, लखनऊ।
पुलिस महानिरीक्षक, रेलवे, लखनऊ।

तिलोत्तमा वर्मा
पुलिस महानिरीक्षक, (सी0आई0) अभिसूचना मुख्यालय, लखनऊ।
पुलिस महानिरीक्षक, अभिसूचना, उ0प्र0, लखनऊ।

विश्वजीत महापात्रा
पुलिस महानिरीक्षक, विशेष जांच लखनऊ।
पुलिस महानिरीक्षक, सीआई, अभिसूचना मुख्यालय, लखनऊ।
बद्री प्रसाद सिंह
पुलिस महानिरीक्षक, सीबीसीआईडी,  मुख्यालय, लखनऊ।
पुलिस महानिरीक्षक, कानून व्यवस्था डीजीपी मुख्यालय, लखनऊ।

राजेन्द्र पाल सिंह,
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, प्रो0 एवं बजट, मुख्यालय, इलाहाबाद।

राजेश प्रताप सिंह
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, कारागार, लखनऊ।

डी0एल0 रत्नम
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, सीबीसीआईडी, लखनऊ।

बी0 पी0 जोगदण्ड
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, पुलिस महानिदेशक के सहायक।

प्रभात कुमार
पुलिस महानिरीक्षक/ डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, अग्निशमन सेवायें, उ0प्र0 लखनऊ।

श्रीधर पाठक
पुलिस महानिरीक्षक पीटीएस, गोरखपुर।
पुलिस महानिरीक्षक, आर्थिक अपराध संगठन, लखनऊ।

मनमोहन कुमार बशाल
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध
पुलिस महानिरीक्षक, पीटीएस, सीतापुर।

राजीव कृष्ण
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, पीएसी पश्चिमी जोन, मुरादाबाद।

पी.के. तिवारी
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, पीएसी मध्य जोन, लखनऊं

चन्द्र प्रकाश-।
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, नियम एवं ग्रन्थ लखनऊं

विजय कुमार
पुलिस महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस महानिरीक्षक, अभियोजन मुख्यालय, लखनऊ।

लाल जी शुक्ला
पुलिस उप महानिरीक्षक, स्थापना,  उ.प्र. पुलिस मुख्यालय,इलाहाबाद।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, रेलवे, इलाहाबाबद।

डा. एन.रविन्द्र
पुलिस उपमहानिरीक्षक, झांसी परिक्षेत्र, झांसी।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद।

सूर्य नाथ सिंह, सुलतानपुर
पुलिस उप महानिरीक्षक/पुलिस अधीक्षक, प्रशिक्षण निदेशालय, लखनऊ।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, झांसी परिक्षेत्र, झांसी।

राजेश कुमार राय
पुलिस उपमहानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्व।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, लोक शिकायत डीजीपी मुख्यालय, लखनऊ।

प्रेम प्रकाश,
पुलिस उप महानिरीक्षक/अपर आयुक्त, फूड एवं ड्रग्स प्रशासन, लखनऊ
पुलिस उपमहानिरीक्षक, नियम एवं ग्रन्थ, उ0प्र0 लखनऊं

हरि राम शर्मा,
पुलिस उप महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, रेलवे, लखनऊ।

ज्योति नारायण,
पुलिस उपमहानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, सुरक्षा, लखनऊ।

जसवीर सिंह
पुलिस उप महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, पीटीएस, गोरखपुर।

असीम कुमार अरूण
पुलिस उप महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, पीएसी सेक्टर आगरा।

जय नारायण सिंह
पुलिस उप महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, तकनीकी सेवायें, लखनऊ।

राजकुमार
पुलिस उप महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, सीबीसीआईडी, लखनऊ।

ज्ञान सिंह,
पुलिस उप महानिरीक्षक, रेलवे, लखनऊ।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, होमगार्ड मुख्यालय, लखनऊ।

विजय प्रकाश,
पुलिस उपमहानिरीक्षक/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, एसटीएफ, लखनऊ।
पुलिस उपमहानिरीक्षक पीएसी मुख्यालय, लखनऊ।

प्रमोद कुमार मिश्रा
पुलिस उप महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, उ0प्र0 पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड, लखनऊ।

एस0आर0एस0 आदित्य
पुलिस उप महानिरीक्षक/सेनानायक, 25वीं वाहिनी पीएसी, रायबरेली।
पुलिस उपमहानिरीक्षक, पीटीएस, गोरखपुर।

आनन्द स्वरूप,
पुलिस उप महानिरीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस उपमहानिरीक्षक,एसीओ, लखनऊ।

प्रशान्त कुमार-।।
पुलिस अधीक्षक, सीतापुर।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, गाजियाबाद।

रघुवीर लाल,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, गाजियाबाद।
सेनानायक, 20वीं वाहिनी पीएसी, आजमगढ़।

अपर्णा एच0एस0
सेनानायक, 26वीं वाहिनी पीएसी, गोरखपुर।
पुलिस अधीक्षक, सीतापुर।

भगवान स्वरूप श्रीवास्तव
पुलिस अधीक्षक, आजमगढ़।
सेनानायक, 32वीं वाहिनी पीएसी, लखनऊ।

ज्ञानेश्वर तिवारी
पुलिस अधीक्षक, रेलवे, लखनऊ।
पुलिस अधीक्षक, बांदा।

विजय सिंह मीणा
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, आजमगढ़।

दीपक रतन,
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
सेनानायक, 33वीं वाहिनी पीएसी झांसी।

सत्येन्द्रवीर सिंह,
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, एसटीएफ, लखनऊ।

संजय कक्क्ड़
सेनानायक, आरटीसी, चुनार, मिर्जापुर
पुलिस अधीक्षक, सीबीसीआईडी, लखनऊ।

अमित चन्द्रा,
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
सेनानायक, 38वीं वाहिनी पीएसी, अलीगढ़।

प्रेम नारायण
पुलिस अधीक्षक, रेलवे, मुरादाबाद।
सेनानायक, 45वीं वाहिनी पीएसी, अलीगढ़।

अखिलेश कुमार
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, रेलवे, आगरा।

महेश कुमार मिश्रा
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, रेलवे, इलाहाबाद।

चन्द्र प्रकाश-।।
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
सेनानायक, 35वीं वाहिनी पीएसी, लखनऊ।

ओ0पी0सागर
पुलिस अधीक्षक, रेलवे, इलाहाबाद
पुलिस अधीक्षक, एससीआरबी, लखनऊ।

विनोद कुमार दोहरे
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
सेनानायक, 10वी वाहिनी पीएसी बाराबंकी।

राम भरोसे
एटा पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, सीबीसीआईडी, लखनऊ।

उदय प्रताप
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, डा0 बी0आर0 अम्बेडकर पुलिस अकादमी, मुरादाबाद।

प्रतिभा अम्बेडकर
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, रेलवे, मुरादाबाद।

मंजिल सैनी
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
सेनानायक, 30वीं वाहिनी पीएसी, गोण्डा।

प्रेम कुमार गौतम
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध।
सेनानायक, 47वीं वाहिनी पीएसी, गाजियाबाद।

आर0के0एस0 राठौर
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, प्रशिक्षण एवं सुरक्षा लखनऊ।

मनोज कुमार
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, रेलवे, लखनऊ।

राम स्वरूप
कानपुर देहात
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, सतर्कता अधिष्ठान, लखनऊ।

अजय मोहन शर्मा
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध।
सेनानायक, 2वीं वाहिनी पीएसी, सीतापुर।

ब्रजराज
पुलिस अधीक्षक, अभिसूचना मुख्यालय, लखनऊ।
सेनानायक, 12वीं वाहिनी पीएसी फतेहपुर।

मोहित अग्रवाल
पुलिस अधीक्षक, कुम्भ मेला, इलाहाबाद।
वर्तमान पद के साथ-साथ सेनानायक, 42वीं वाहिनी पीएसी इलाहाबाद का अतिरिक्त प्रभार।

प्रकाश त्रिपाठी
पुलिस अधीक्षक, सीबीसीआईडी, लखनऊ सम्प्रति पुलिस अधीक्षक, बांदा के पद पर स्थानान्तरणाधीन
पुलिस अधीक्षक, बांदा के लिए हुआ स्थानान्तरण निरस्त।

उपेन्द्र कुमार अग्रवाल
पुलिस अधीक्षक, डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध।
पुलिस अधीक्षक, सीबीसीआईडी, लखनऊ।

अशोक कुमार टण्डन
पुलिस अधीक्षक, ईओडब्लू, लखनऊ।
सेनानायक, 24वीं वाहिनी पीएसी मुरादाबाद।

Fraud Nirmal Baba (21) : क्या टैम पर भी हो गई है बाबा के नोटों की बारिश!

इस बात का कोई सुबुत तो नहीं है लेकिन शत प्रतिशत ऐसा ही है क्योंकि तीसरी आंख वाले बाबा का ढोंग बकौल न्यूज़ चैनल्स एक विज्ञापन के तौर पर प्रसारित किया जा रहा है लेकिन सवाल ये है कि आखिर एक विज्ञापन को टीआरपी में क्यों गिना जा रहा है। हर हफ्ते टैम की ओर से जारी होने वाली रिपोर्ट में वो आधे घंटे टीआरपी में क्यों गिने जा रहे हैं। न्यूज़ चैनलों के संपादक शायद अपने साथियों की मेहनत को मिट्टी में मिलाने में तुले हैं लेकिन क्या टैम वालों पर भी तीसरी आंख की कृपा हो गई है? क्या टैम वालों ने भी घर में कढ़ी चावल बनाने शुरू कर दिये हैं? सवाल लाख टके का ये भी है।

देशभर के जिन शहरों में टीआरपी सैंटर हैं उन शहरों में ऐसा तो है नहीं कि 100 फीसदी अनपढ़ लोग ही बसे हैं। वहां एक पढ़ा लिखा और जागरूक तबका भी मौजूद है और ऐसा भी नहीं है कि टामियों की टीआरपी के मापदंड तय करने वाली मशीनें समाज के ऐसे तबके के घरों में लगे हैं जिन्हें आस्था और अंधविश्वास के बीच का फर्क नहीं मालूम। इसलिए आखिर तीसरी आंख वाले बाबा के इस कार्यक्रम की टीआरपी ऐसे उछाल पर क्यों है, इससे ज्यादा बेहतर और कहीं ना कहीं मनोरंजन करने वाले विज्ञापन भी करीब करीब हर न्यूज़ चैनल पर प्रसारित किये जा रहे हैं लेकिन उनकी टीआरपी क्यों नहीं आ रही?

खास बात ये है कि अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले इस तरह के कई विज्ञापन पहले भी कई न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित किये जाते रहे हैं लेकिन आज से पहले कभी उन विज्ञापनों को टीआरपी में नहीं गिना गया, इससे तो यही ज़ाहिर होता है कि तीसरी आंख वाले बाबा जी के दरबार में पड़ने वाली लाखों रुपयों की बारिश की कुछ छींटे टैम के ऊपर भी पड़ी हैं जिसकी बदौलत बाबा जी रातों रात शोहरत बटोरने में कामयाब हो गये हैं, और अगर ये बात कहीं ना कहीं सच साबित होती है तो वाकई उन तमाम मीडियाकर्मियों के लिए सोचने का विषय है जो 20-20 हज़ार रुपये या फिर उससे भी कम मानदेय पर न्यूज़ चैनलों के तमाम स्पेशल प्रोग्राम बनाते हैं और उनके बदले की टीआरपी ले जाती है तीसरी आंख।

हैरानी की बात तो ये है कि आखिर इस तरह की बकवास पर कोई इस कदर आंख मूंद कर भरोसा कैसे कर सकता है। सवाल तो न्यूज़ चैनल चला रहे संपादकों और मालिकों से भी है कि अगर तीसरी आंख की कृपा से ही टीआरपी आ रही है तो फिर तमाम कार्यक्रम बनाने की क्या ज़रूरत है? इस बारे में वक्त रहते अगर न्यूज़ चैनलों में काम कर रहे पत्रकारों की आंखें नहीं खुली और एकजुट होकर उन्होंने थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा नामक भ्रांति का विरोध नहीं किया तो वो दिन दूर नहीं जब न्यूज़ चैनलों के मालिकों के लिए सोने की मुर्गी साबित हो रहे निर्मल बाबा जैसे लोग ही न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित किये जाएंगे और वहां काम करने वाले लोगों की न्यूज़ चैनलों के मालिकों को रत्तीभर भी ज़रूरत नहीं रहेगी।

एक और बात ये कि दुनिया टैलेंट के मामले में हिंदुस्तान का लोहा मानती है यानी हमारे देश में जिस तरीके से नकल होती है उसी तरीके से लोगों के पास अपने भी आईडिया मौजूद है इसलिए आने वाले दिनों में कुछ लोग तीसरी आंख वाले बाबा जी की नकल तो कर ही सकते हैं साथ ही अपनी प्रतिभा दिखाकर कुछ इसी तरीके के अंधविश्वास और फर्जी चमत्कारों से लबरेज़ नये कार्यक्रम भी न्यूज़ चैनलों की झोली में डाल सकते हैं। इसलिए सावधान हो जाओ मेरे साथी मीडियाकर्मियों। अगर ऐसे ही चलता रहा तो पत्रकार जैसे शब्दों का कोई मतलब इस देश में नहीं रह जाएगा। पत्रकार भी आज़ाद हिंद सेना के सिपाहियों की तरह बनकर रह जाएंगे, जिनके बारे में कुछ खास जानकारी इस दुनिया में मौजूद नहीं है। ये बात सिर्फ गरीब पत्रकारों के लिए ही चिंता का विषय नहीं है बल्कि उन संपादकों के लिए भी सोचने की बात है जो फिलहाल तो निर्मल बाबा जैसी सोने की मुर्गी अपने मालिकों को भेंट कर उन्हें खुश करने में लगे हैं लेकिन ये मुर्गी जब सोने के अंडे देने लगेगी तो उनकी भी कोई खास ज़रूरत मालिकों की नज़रों में नहीं रह जाएगी…..ज़रा सोचिये…. 

लेखक शगुन त्‍यागी सहारा समय चैनल के साथ लम्‍बे समय तक जुड़े रहे हैं. वे इन दिनों नॉर्थ ईस्‍ट बिजनेस रिपोर्टर मैग्‍जीन के दिल्‍ली-एनसीआर ब्‍यूरोचीफ के तौर पर जुड़े हुए हैं. सगुन से संपर्क मोबाइल नम्‍बर 07838246333 के जरिए किया जा सकता है.

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समाचारों में सनसनी के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ज्यादा जिम्मेदार : आडवाणी

इंदौर। समाचारों के सनसनीखेज प्रस्तुतिकरण के चलन पर चिंता जताते हुए पूर्व उप प्रधानमंत्री और भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि पत्रकारिता जगत की इस ‘विकृति’ के लिये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदार है। इंदौर प्रेस क्लब के स्वर्ण जयंती महोत्सव के दौरान ‘आज की पत्रकारिता’ के विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में हिस्सा लेते वक्त आडवाणी ने यह मत व्यक्त किया। उन्होंने कहा, ‘यह माना जा रहा है कि अगर समाचार में सनसनी नहीं है तो लोग इसे पढेंगे या देखेंगे नहीं। इसलिये समाचारों को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे सनसनी पैदा हो।’ 

आडवाणी ने कहा, ‘मैं मानता हूं कि यह काम टेलीविजन के जरिये ज्यादा होता है। समाचारों को सनसनीखेज तरीके से परोसने की विकृति के लिये प्रिंट मीडिया से ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिम्मेदार है।’ शीर्ष भाजपा नेता ने पेड न्यूज पर भी चिंता जतायी। उन्होंने कहा, ‘किसी समाचार में पेड न्यूज का लक्षण स्पष्ट दिखायी देता है। किसी अखबार में छपता है कि फलां उम्मीदवार की चुनावी सभा में लाखों लोग थे तो किसी उम्मीदवार के बारे में लिखा जाता है कि उसकी सभा में केवल दो..चार लोग थे।’  

उन्होंने मीडिया जगत में पेड न्यूज के चलन पर कटाक्ष करते हुए कहा, ‘पहले हम सोचते थे कि हमारे यहां (राजनीतिक बिरादरी) ही भ्रष्टाचार होता है।’    आडवाणी ने हालांकि कहा, ‘पिछले कुछ बरसों में मीडिया में पेड न्यूज की विकृति सामने आयी है। लेकिन मेरा मानना है कि पत्रकार समाज के भले के लिये अब भी बहुत कुछ कर सकते हैं।’  

इसके अलावा, उन्होंने इच्छा जतायी कि हिन्दी पट्टी के प्रमुख राज्यों में शामिल मध्यप्रदेश में फिल्म सिटी स्थापित होनी चाहिये। आडवाणी ने कार्यक्रम में मौजूद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से कहा कि वह इस दिशा में प्रयास करें।  चौहान ने परिसंवाद में कहा, ‘मीडिया जगत और सियासत में गिरावट जरूर आयी है। लेकिन दोनों क्षेत्रों में फिलहाल सबकुछ खत्म नहीं हुआ है।’  उन्होंने पूंजीपतियों के मीडिया क्षेत्र में धड़ल्ले से उतरने के मकसद पर सवाल उठाये और किसी का नाम लिये बगैर कहा कि कारोबारी हितों की हिफाजत के लिये समाचार चैनल शुरू किये जा रहे हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा, ‘महज 100..200 प्रतियों की प्रसार संख्या वाली पत्रिकाओं के दम पर धन ऐंठने (ब्लैकमेलिंग) की कोशिश भी की जाती है।’

गोंडा के अदम गोंडवी के जाने के बाद अब ब्रजभूषण लाल चले गए

वामपंथी संस्कृतिकर्मी व राजनीतिक कार्यकर्ता ब्रजभूषण लाल नहीं रहे। बीते रविवार 8 अप्रैल 2012 को लखनऊ में उनका निधन हो गया। वे पिछले काफी अरसे से हृदय रोग से पीड़ित थे। इलाज के लिए उन्हें गोण्डा से लखनऊ लाया गया था। पिछले साल दिसम्बर में गोण्डा से अदम गोण्डवी को बीमारी की गंभीर हालत में लखनऊ लाया गया था। उन्हें भी नहीं बचाया जा सका और अन्त में उनके पार्थिव शरीर को नम आंखों से लखनऊ से गोण्डा के लिए विदा किया गया। ब्रजभूषण लाल के साथ भी यही कहानी दोहराई गई।

यह संयोग हो सकता है लेकिन ब्रजभूषण लाल और अदम की समानता कोई संयोग नहीं है। ये एक ही धारा के संस्कृतिकर्मी रहे हैं। ये दोनों गोण्डा में और देश में बगावत व बदलाव के आंदोलन के सांस्कृतिक नायक थे और ये दोनों ‘पहचान’ के संस्थापकों में थे जिनका उद्देश्य एक बेहतर व बराबरी के समाज का निर्माण करना था। इन्होंने अपना जीवन और संस्कृतिकर्म इसी को समर्पित किया था।

ब्रजभूषण लाल गोण्डा के लालापुरवा, मसैली, भोकलपुर के रहने वाले थे। निधन के समय उनकी उम्र 72 साल थी। ब्रजभूषण लाल हम साथयों के बीच ‘लाल साहब’ के नाम से मशहूर थे। छात्र जीवन से ही वामपंथी आंदोलन से उनका गहरा रिश्ता बन गया था जो समय के साथ और प्रगाढ़ होता गया। जीवन के अन्तिम दिनों तक उन्होंने वामपंथ की क्रान्तिकारी धारा के परचम को बुलन्द रखा। वे गोण्डा में सी पी आई ;एमएलद्ध तथा इंडियन पीपुल्स फ्रंट के संस्थापकों में थे। उनके लिए संस्कृतिकर्म राजनीतिक काम का अभिन्न हिस्सा था।

लाल साहब ने हिन्दी साहित्य में एम ए किया। हिन्दी साहित्य में शोध भी किया। वे गोण्डा के शास्त्री महाविद्यालय से अध्यापन कार्य शुरू किया और यहीं से वे सेवा मुक्त भी हुए। उन्होंने अदम गोण्डवी, नारायणजी शुक्ल, श्याम अंकुरम, कृष्णकांत, एस पी मिश्र, प्रकाश श्रीवास्तव, चन्द्रप्रकाश, जमाल अहमद, रमाऔतार आदि को संगठित करते हुए गोण्डा में ‘पहचान’ सांस्कृतिक संगठन का गठन किया। उनकी खूबी थी कि वे अपने नाम को हमेशा पीछे रखते थे और अदम जैसे रचनाकार को हमेशा आगे।

वामपंथी राजनीति व विचार को जनता तक पहुँचाने तथा जन चेतना के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से लालसाहब ने ‘कामधेनु’ नुक्कड़ नाटक के करीब 500 से अधिक मंचन किये। राजनीतिक सच का पर्दाफाश करता 1980 के दशक में यह अत्यन्त चर्चित नाटकों में था। इस नाटक में लाल साहब की प्रभावशाली भूमिका तथा उनका ‘दरोगा’ के अभिनय को लोग आज भी याद करते हैं। इस नाटक में उनका अभिनय उनके अन्दर की कला क्षमता को सामने लाता है। इसी क्षमता का दर्शन अवधी तथा हिन्दी में लिखी उनकी कविताओं में भी हमें देखने को मिलता है। ‘जन संस्कृति’ में छपी उनकी कविता अस्सी के दशक में गायन मंडलियों द्वारा गाई जाती थी – ‘अइसन देसवा भवा है आजाद सजनी/जैसे फुरिया में भर गवा मवाद सजनी’।

लाल साहब के लिए भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारी आदर्श थे। क्रान्तिकारियों की परम्परा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से गोण्डा में 1981 में भगत सिंह के पचासवें शहादत दिवस पर जो समारोह हुआ, लालसाहब उसके मुख्य कर्ताधर्ता थे। शहीदों को केन्द्र करके उन्होंने कविता लिखी – ‘जिन्हें शहादत प्यारी थी/मौत भी जिनसे हारी थी/उनको मेरा लाल सलाम/सौ सौ बार लाल सलाम’। लाल साहब ने राजनीति, कविता, नाटक व शिक्षा के साथ साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काम किया। लखनऊ से जब ‘नवभारत टाइम्स’ का प्रकाशन शुरू हुआ तो वे गोण्डा जनपद के नभाटा के संवाददाता के रूप में काम किया। उनके द्वारा नभाटा में लिखी टिप्पणियां, रिपोर्ट आदि जनपक्षधर पत्रकारिता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। अपने ऐसे महत्वपूर्ण साथी, रचनाकार व राजनीतिक कार्यकर्ता का निधन जनता के सांस्कृतिक व राजनीतिक आंदोलन की बड़ी क्षति है। जन संस्कृति मंच अपने ऐसे साथी को क्रान्तिकारी सलाम पेश करता है।

लेखक कौशल किशोर जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक हैं.

जरदारी के चरणों में लोट गया भारतीय टीवी मीडिया

खुद पत्रकारिता से जुड़ा होने के बावजूद ये कहने को मजबूर हो गया हूं, आसिफ अली ज़रदारी भारत क्या आये, मानो भारतीय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को 24 घंटे का मसाला मिल गया. दुखद है ज़रदारी का प्लेन लैंड हुआ, ज़रदारी गाड़ी में बैठकर निकल गये, ज़रदारी का काफिला यहां पहुंचा, ज़रदारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के यहां लंच के लिए पहुंच गये, मानो देश की धरती पर कोई चमत्कार हो गया हो, आखिर मीडिया ये कैसे भूल गया कि ज़रदारी आने से पहले ही सबसे अहम मुद्दे पर प्रधानमंत्री से बातचीत करने के लिए मना कर चुके हैं.

26/11 के मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान सरकार का रवैया पूरे देश की जनता ने देखा किस तरीके से एक एक सुबूत ये चीख चीखकर कहते रहे कि पाकिस्तान की सरज़मी पर बैठकर आईएसआई की रणनीति के तहत हाफिज़ सईद ने मुंबई हमले की साज़िश रची लेकिन पाकिस्तान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, और आज करीब साढ़े तीन साल बात उसी पाकिस्तान के सरपरस्त भारत की सरज़मी पर आए तो मीडिया ने उसे एक चमत्कार बना दिया. किसी ने भी डंके की चोट पर ये बात नहीं उठाई कि आखिर उस देश के राष्ट्रपति की आवभगत में क्यों लगी है भारत सरकार, जिसने हमारे देश में हुए कत्लेआम के ज़िम्मेदार को पनाह दे रखी है.

हां बैलेंस बनाए रखने के लिए बीच बीच में टिकर पर या स्क्रॉल पर ये बात ज़रुर फ्लैश की जाती रही, लेकिन उसके साथ ही बिलावल भुट्टो ज़रदारी और राहुल गांधी ने किस देश की कौन सी यूनिवर्सिटी में तालीम ली है, ये बात भी बार-बार न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित होती रही. कुछ चैनलों ने तो राहुल गांधी को भारत का युवराज और बिलावल भुट्टो को पाकिस्तान का युवराज तक घोषित कर दिया. सबसे बड़ी समझ की बात तो यही कि ना तो राहुल गांधी भारत के युवराज हैं और ना ही बिलावल भुट्टो पाकिस्तान के युवराज हैं. ज़रदारी की खबर को लेकर न्यूज़ चैनल इस कदर बौरा गये कि ये तक भूल बैठे कि भारत और पाकिस्तान में राजतंत्र नहीं है लोकतंत्र है. और लोकतंत्र में देश में ना राजा होता है और ना युवराज.

एक टीवी चैनल पर तो पाकिस्तान के मशहूर टीवी चैनल के संपादक लाइव थे और माननीय हाफिज़ सईद साहब की शान में कल्में पढ़े जा रहे थे, “हाफिज़ सईद साहब सिस्टम के खिलाफ हैं हाफिज़ सईद साहब ये हैं हाफिज़ सईद साहब वो हैं”, उस पर भारत के दो-तीन तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार उनसे ज्ञान लेने देने में जुटे थे. अरे सौ बातों की एक बात हाफिज़ सईद मुंबई हमलों का दोषी है, उसको एक भारतीय चैनल पर जिस तरीके से इज़्जत बख्शी जा रही थी उसे देखकर तो ऐसा लग रहा था कि मानो हाफिज़ सईद आतंकवादी ना हो, एक समाजसेवी हो. पाकिस्तान के सम्मानित पत्रकार ने तो हाफिज़ सईद की शान में यहां तक कह डाला कि आपके यहां भी तो कर्नल पुरोहित जैसे लोग हैं.

अरे, कर्नल पुरोहित ने जो किया वो गलत था उसे कतई स्वाकारा नहीं जा सकता और उसकी बदौलत वो आज सलाखों के पीछे है, लेकिन माननीय हाफिज़ सईद साहब (बकौल पाकिस्तानी पत्रकार) खुलेआम पाकिस्तान में रैलियां कर रहा है, लोगों की भीड़ उसकी रैलियों में जुट रही हैं और पाकिस्तान की पुलिस उसकी रैलियों में बंदोबस्त में जुटी रहती है. उधर अमेरिका कहता है कि हाफिज़ सईद पर 51 करोड़ का ईनाम. ये सब ड्रामा नहीं तो और क्या है? भारत देश का सच्चा और भोला भाला नागरिक इन तमाम कूटनीतियों को नहीं समझता, वो तो बस ये चाहता है कि भारत का गुनाहगार भारत में ही सलाखों के पीछे हो, वो भी जल्द से जल्द, लेकिन देश के जिस तबके से उसे सबसे ज्यादा उम्मीदें हैं वो तबका तो कुछ और ही रोल अदा कर रहा है.

लेखक शगुन त्‍यागी सहारा समय चैनल के साथ लम्‍बे समय तक जुड़े रहे हैं. वे इन दिनों नॉर्थ ईस्‍ट बिजनेस रिपोर्टर मैग्‍जीन के दिल्‍ली-एनसीआर ब्‍यूरोचीफ के तौर पर जुड़े हुए हैं. सगुन से संपर्क मोबाइल नम्‍बर 07838246333 के जरिए किया जा सकता है.

Fraud Nirmal Baba (20) : Shame Shame DJ, निर्मल बाबा के खिलाफ ब्लाग पर प्रकाशित सारी पोस्ट डिलीट

दैनिक जागरण वालों ने जागरण जंक्शन डाट काम नाम से एक ब्लाग पोर्टल बनाया है जिस पर कोई भी जाकर अपना ब्लाग बनाकर अपने मन की बात लिख सकता है. लेकिन यहां अगर आपने वाकई अपने मन की बात लिख दी तो आपका ब्लाग और आपकी पोस्ट बिना आपके बताए डिलीट की जा सकती है. पिंकी खन्ना नामक ब्लाग लेखिका ने जागरण वालों के ब्लाग मंच जागरण जंक्शन पर poghal नाम से अपना ब्लाग बनाया था और निर्मल बाबा के खिलाफ हाल में उन्होंने कई पोस्टें लिखकर प्रकाशित की. इन पोस्ट के शीर्षक ये हैं-

1 निर्मल बाबा के पाप का घड़ा भर चुका है. अब उलटी गिनती शुरू !!

2 निर्मल बाबा के गोरखधंधे पर लगाम लगाना ज़रूरी हो गया है

3 निर्मल बाबा उर्फ़ ढोंगी मदारी कैसे करता है चमत्कार ??

4 निर्मल बाबा का मीडिया द्वारा प्रचार करना एक राष्ट्रीय अपराध !!

5 निर्मल बाबा उर्फ़ ढोंगी बाबा का संक्षिप्त परिचय

6 निर्मल बाबा : मीडिया रूपी वैश्या की नाजायज़ औलाद !!

7 निर्मल बाबा का अस्तित्व यानि भारत का दुर्भाग्य !!
8 निर्मल बाबा की अब गुंडागर्दी भी शुरू हो चुकी है !!
9 निर्मल बाबा देश की मूर्ख जनता को लॉलीपॉप खिला कर ऐश कर रहे हैं.
10 निर्मल (क्रिमिनल) बाबा का लूट तंत्र बदस्तूर जारी है !
11 निर्मल बाबा बनाम माफिया डान (दोनों में फर्क कितना??)

ये सारी पोस्टें जागरण वालों के ब्लाग से डिलीट हो चुकी हैं. हालांकि जागरण वाले प्रत्येक ब्लाग के ब्लाग पोस्ट के नीचे ये बात लिखते हैं- ''Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.'' लेकिन इतने से भी जागरण का मन नहीं भरा. नोटों के जरिए मीडिया हाउसों को खरीदने वाला निर्मल बाबा से जाने क्यों जागरण डर गया और सारी पोस्टें डिलीट कर दीं. अगर जागरण वालों को यही सब करना था तो उन्होंने ब्लागिंग का प्लेटफार्म बनाया क्यों, सिर्फ छायावदी कविताएं लिखने और अमूर्त प्यार-घृणा के लालित्यपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए? फिलहाल यहां जागरण को शेम शेम कहते हुए भड़ास4मीडिया कोशिश कर रहा है कि लेखिका की लिखी पोस्ट को तकनीकी हुनर के जरिए खोज निकालकर आप सभी के सामने परोसा जा सके. शुरुआत एक ब्लाग पोस्ट से कर रहे हैं…

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Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
निर्मल बाबा बनाम माफिया डान (दोनों में फर्क कितना??)
पोस्टेड ओन: 7 Apr, 2012 जनरल डब्बा में
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लोगों को प्रीपेड कृपा रूपी अदृश्य चीज़ बेचने वाले निर्मल बाबा पर अब चारों तरफ से हमले होने शुरू हो गए हैं. सब से ज्यादा हमले सोशल नेटवर्क के ज़रिये होने लगे हैं. देर आये दुरुस्त आये, लोगों की आँखें खुलनी शुरू हो गयी हैं. कई भुक्तभोगी जो अपनी आप बीती सुना चुके है कि किस तरह बाबा ने उन पर कृपा करने का वायदा कर के उन से पैसे ऐंठ लिए मगर ऐसा कुछ फर्क उन की जिंदगी में नहीं पड़ा अलबत्ता उन की माली हालत और बिगड़ ज़रूर गयी . अपने साथ हुए धोखे से क्रुद्ध लोगों ने अब बाबा के खिलाफ आवाज़ उठाने शुरू कर दिए हैं. जिस समागम में भाग लेने के लिए पीड़ित को प्रीपेड शुल्क दो हज़ार रूपी प्रति व्यक्ति के हिसाब से चुकाना पड़ता है जो कि महीने में करीब 17 बार आयोजित किये जाते हैं और हर बार कम से कम 2500 लोग भाग लेते हैं. समागम में बाबा एक विशाल AC वाले हाल में या स्टेडियम में लोगो के दुःख दूर करने का काम करने लगते हैं. वहां पर बाबा के मंझे हुए चेले उर्फ़ कलाकार बड़े ही मार्मिक ढंग से अपनी आपबीती सुनाना शुरू कर देते हैं , मसलन किसी की शादी नहीं हो रही है तो उसे बाबा जी लड्डू खाने का उपाय सुझाते हैं , किसी का बच्चा नहीं हो रहा तो उसे गोलगप्पे खाने की सलाह देते नज़र आते हैं. इस तरह कुछ ही घंटों का समागम का वक्त बाबा के ही चेले ड्रामा करते हुए बिता देते हैं और जो दो- दो हज़ार की पर्चियां काट कर दूर से सफ़र कर के आये हुए दुःख से पीड़ित लोगों को अपना दुखड़ा तक सुनाने का अवसर नहीं मिल पाता. दरअसल यह सब निश्चित प्लानिंग के तहत होता है ताकि कोई बाहरी भक्त फालतू के सवाल खड़ा न कर दे. ऐसे में बाबा के चरणों में अपना धन और समय अर्पित करने वाला भक्त अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगता है. चलो देर से ही सही मगर ठोकर खाने के बाद असलियत समझ में आने लगता है. मैं ऐसे कई भक्तों को जानती हूँ जिन्हों ने अपना समय और धन खर्च कर के बाबा जी से कृपा लेने चल दिए थे मगर बाबा जी ने उन की तरफ ध्यान तक नहीं दिया. चलो यह तो थी कल तक की बात लेकिन जब से असंतुष्टों ने आवाज़ उठाना शुरू कर दिया तब से बाबा को अपनी गद्दी डोलती हुई दिखने लगी. उस ने तुरंत अदालत और वकीलों कि सेवाएं लेनी शुरू कर दी. पुलिस को भी अपनी सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया. आज बाबा जी के पास अथाह धन दौलत जमा है जिस का प्रयोग करते हुए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं. कल अगर कोई उनके खिलाफ आवाज़ उठाना चाहता है तो उन्हें वो बड़ी आसानी से रास्ते से हटा सकता है. उन के पास धन का बल तो है ही , बाहूबलियों कि सेवा भी वो किसी भी वक्त ले सकते हैं. मीडिया पर तो वो पहले ही कब्ज़ा जमाये बैठे हैं , मीडिया भी जिस तरह बाबा की हाँ में हाँ मिलाते हुए इस घिनौने धंधे में अपना भरपूर योगदान दे रही है उसे देखते हुए तो देश का भविष्य भी अंधकार पूर्वक दिखाई पड़ता है. धीरे धीरे बाबा का साम्राज्य इतना फ़ैल जायेगा कि इस देश कि पुलिस, कानून और प्रशासन को भी अपनी मनमानी पूरी करने के लिए इस्तेमाल करते नज़र आ जायेंगे ! बाबा फिर बाबा न हो कर एक माफिया डान बन जायेंगे , तब देश के नेता और अधिकारी उस के तलवे चाटते नज़र आयेंगे. अब इस बात पर गौर कीजिये , बाबा को आम आदमी से एक खतरनाक डान किस ने बनाया ?? इस देश कि मुर्ख , अशिक्षित , अंधी और लालची जनता ने , अपने तुच्छ मनोकामनाओ को पूरा करने की चाह में अपने ही खून से सींच – सींच कर एक भस्मासुर तैयार कर लेते हैं. इस देश को गुलाम बनाने का श्रेय आखिर किस को जाता है ? देश के उन महान ( मूर्ख ) नागरिकों को जो हमेशा परिश्रम करने से जी चुराते हैं और किसी चमत्कार की आस में ऐसे चंगुल में फंस जाते हैं जहाँ से बहार निकल पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है.

JAI HIND !

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उपरोक्त पोस्ट का प्रकाशन जागरण के ब्लाग पर इस लिंक से किया गया था, जो अब नदारद है. http://poghal.jagranjunction.com/2012/04/07/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A1-2/

अब अगर आप इस लिंक पर क्लिक करेंगे तो लिखा आएगा– This blog has been archived or suspended.

मूल ब्लाग पोस्ट का स्क्रीनशाट यूं है…

पढ़ने के लिए उपरोक्त पोस्ट के उपर क्लिक कर दें.

अजमेर हंस रहा था जरदारी के इस ‘लाइव कवरेज’ पर

पत्रकारिता के सर्वमान्य सिद्धांतों में यह भी आता है कि जब आप किसी खबर को कवर करने जा रहे हों तो कम से कम वहां की सामान्य जानकारी तो आप कर ही लें, परंतु लगता है हिन्दी न्यूज चैनल ‘हम नहीं सुधरेंगे’ के अपने अड़ियल सिद्धांत पर कायम रहने की कसम खा चुके हैं। इतवार को भी ऐसा ही हुआ। पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और उनके बेटे बिलावल की अजमेर यात्रा को लेकर न्यूज चैनल जो ‘लाइव कवरेज’ कर रहे थे, उसे लेकर अजमेर की जनता हंस रही थी। पत्रकारों को कितना सामान्य ज्ञान होता है, यह भी नजर आ रहा था।

जरदारी का काफिला नई दिल्ली से पाक विमानों के जरिए जयपुर के सांगानेर एयरपोर्ट और उसके बाद भारतीय वायु सेना के हैलीकॉप्टरों के जरिए अजमेर के हैलीपैड पर पहुंचा। वहां से कारों के जरिए गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पहुंचा। यह कार्यक्रम सभी को पता था। अजमेर के स्थानीय अखबार जरदारी की इस यात्रा का मिनट-दर-मिनट कार्यक्रम दो-तीन दिन पहले से छाप रहे थे। तीन दिन से हैलीपैड से लेकर दरगाह तक रिहर्सल चल रही थी। जो मार्ग था उससे शहर दो भागों में बंट चुका था। लोगों को दो-दो घंटे सड़क पार करने का इंतजार करना पड़ रहा था। सारा देश गुड फ्राइडे, शनिवार और रविवार की छुट्टी मना रहा था, जबकि अजमेर के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की छुट्टी रद्द कर दी गई थी। और ‘आईबीएन 7’ पता नहीं किस कीमत पर खबर दे रहा था कि जरदारी की इस यात्रा के लिए खासतौर पर घूघरा हैलीपैड बनाया गया है। अजमेर में आई इस चैनल की संवाददाता जिसे कभी ‘इप्शिता’ संबोधन दिया जा रहा था और कभी ‘इप्सिता’, उसका सामान्य ज्ञान यह था कि वह घूघरा को घूंघरा कह रही थी। अपने कैमरे में दिखाए जा रहे साइनबोर्ड पर भी वह सही नाम ना तो हिन्दी में पढ़ पाई थी ना ही अंग्रेजी में। चैनल भी घूघरा को घुघरा लिख रहा था।

हद तब हो गई जब एंकर ने अपनी इस संवाददाता से पूछा कि घूघरा के लोग तो बड़े ही असमंजस में होंगे? उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा होगा कि आज यहां क्या हो रहा है जो इतनी गाड़िया आई हैं? इतनी भीड़ जुटी हुई है। वे सोच रहे होंगे आखिर कौन वीआईपी आ रहा है? संवाददाता भी एंकर की हां में हां मिलाने लग गई। ‘जी न्यूज’ और ‘आईबीएन 7’ दोनों को यह पता नहीं था कि घूघरा हैलीपैड आज नहीं बना है। यह कई साल पुराना है। जरदारी बेनजीर भुट्टो के साथ यहां पहले भी आ चुके हैं। पिछले दिनों ही राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील भी यहां आकर गई हैं। परवेज मुशर्रफ भी राष्ट्रपति की हैसियत से यहां आए थे। आए दिन कोई ना कोई वीआईपी यहां आता रहता है और कभी कम तो कभी ज्यादा वक्त के लिए अजमेर की जनता को रास्तों पर आवागमन रोक दिए जाने की पीड़ा को भुगतना पड़ता है। और न्यूज चैनल कह रहे थे कि हैलीपैड खास इस यात्रा के लिए ही बनाया गया है।

घूघरा अजमेर नगर निगम की सीमा पर स्थित एक गांव जरूर है परंतु यह कभी का अजमेर का हिस्सा बन चुका है। हालत यह है कि अजमेर का जिला परिवहन कार्यालय और राजस्थान रोडवेज का अजमेर डिपो कारखाना भी घूघरा हैलीपैड के पहले है और ‘स्टार न्यूज’ का हाल यह था कि उसे लिखना पड़ रहा था, ‘जरदारी घूघरा से अजमेर रवाना’ यह ऐसा ही था जैसे लिखा जाता ‘जरदारी पालम से दिल्ली रवाना।’ स्टार न्यूज बार-बार खबर दे रहा था। ‘जरदारी दरगाह पर चादर चढ़ाएंगे’ दरगाह एक लम्बा चौड़ा परिसर है। चादर उस पर नहीं बल्कि ख्वाजा साहब की मजार पर चढ़ाई जाती है। चैनल कहे जा रहे थे। ’जरदारी 20 मिनट दरगाह में रहे’ जबकि हकीकत यह थी कि वे दरगाह में नहीं ‘आस्ताना शरीफ’ में बीस मिनट रहे। आस्ताना वह जगह है जहां गरीब नवाज की मजार है। वहां दुआ की जाती है। चादर चढ़ाई जाती है। गलतियां कहां नहीं हुई? दिल्ली-अहमदाबाद हाइवे पर ठीक उस समय वाहन गुजरते कैमरा दिखा रहा था, जब रिपोर्टर कह रहा था आप देख सकते हैं यातायात बिल्कुल रोक दिया गया है। एक चैनल हैलीकॉप्टरों की संख्या चार-पांच बता रहा था तो दूसरा तीन जबकि कैमरा दो दिखा रहा था।

दिल्ली या जयपुर से कथित बडे़ और विद्वान पत्रकारों को भेजने से तो बेहतर होता कि वे यह काम अजमेर के अपने स्ट्रिंगरों के भरोसे छोड़ देते। उनकी मेहरबानी पर टिके वे ‘निरीह, ’नाकाबिल‘, ’बेचारे‘ स्ट्रिंगर कम से कम ऐसी गलतियां तो नहीं करते। न्यूज चैनलों की भद्द भी पिटने से बच जाती। पत्रकारिता का एक सिद्धांत यह भी है कि गलती या भूल होने यहां तक कि जबान फिसल जाने पर भी उसे स्वीकार कर गलती सुधारी जाती है। कुछ समाचार पत्र गलती स्वीकार करते हैं और सही खबर छापते हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन इस गरिमा को आज भी कायम किए हुए हैं परंतु निजी व्यावसायिक न्यूज चैनल तो गलती होने पर भी गलती स्वीकार नहीं करते। यह तो बेशर्मी की हद है।

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

सी समूह के चैनल और अखबार की हालत खराब

आगरा के सी समूह की हालत गंभीर हो गयी है. हाल में ही लांच किया गया चैनल सी उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड तो लगभग हर मोर्चे पर फ़ेल हो गया है. चैनल को विज्ञापन मिल नहीं रहा है. कंटेंट में दम नहीं है. स्ट्रिंगरों का चैनल लांच होने के बाद से ही भुगतान नहीं किया गया हैं. सी यूपी चैनल देखने में बिलकुल थर्ड क्लास क्‍लास का लगता हैं. यूपी के ज्‍यादातर जिलों में तो चैनल दिख ही नहीं रहा है. प्रबंधन इसमें सुधार लाने की कोई कोशिश भी नहीं कर रहा है. सब भगवान भरोसे चलता दिख रहा है.

उधर, इस ग्रुप का अखबार भी हर मोर्चे पर असफल नज़र आ रहा है. अखबार में छंटनी का दौर लगातार जारी है. आधे से ज्यादा लोग हाल ही में शुरू होने जा रहे पुष्पांजलि समूह के अख़बार पुष्प सवेरा में जा चुके हैं. मार्केट में अफवाह हैं कि कभी भी यह अखबार बंद हो सकता है. वहीं दूसर ओर सी समूह का शेयर भी लगातार गिरता जा रहा है, जिसको चलते लोग जल्द ही कम्पनी के दिवालिया होने की बातें करने लगे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

Fraud Nirmal Baba (19) : ढोंगी निर्मल बाबा को ही संपादक बना देना चाहिए, टीआरपी-पैसा दोनों मिलेगा

टीवी-अखबारों में हर रोज चमकने-छपने वाले, नेताओं-मंत्रियों की नैतिकता पर उंगली उठाने वाले, भ्रष्‍टाचार को लेकर चीखते-चिल्‍लाते-अपनी आवाज बुलंद करने वाले वरिष्‍ठ पत्रकार, जिनके चेहरों को देखकर-प्रवचन रूपी लेखनी को पढ़कर तमाम युवा इनको रोल मॉडल मानकर जर्नलिस्‍ट बनने का सपना पालते हैं, पर बाहर से चमकने वाले ये चेहरे अंदर से कहीं भयावह व डरावने हैं. आम आदमी के हितों की बात करने तथा सरकार को आईना दिखाने का दंभ भरने वाले ये कथित वरिष्‍ठ पत्रकारों में हिम्‍मत से कस्‍बाई पत्रकारों से भी कम हैं. बाजार को पत्रकारिता के लिए अभिशाप मानने वाले वास्‍तव में बाजार के बहुत बड़े दलाल हैं. बाजार से इनको बहुत डर लगता हैं. इनमें पत्रकारिता के सिद्धांतों के एक किनारे पर भी खड़े रहने का आत्‍मबल नहीं है.

मैं व्‍यक्तिगत तौर पर इनके नाम खुलासा नहीं करना चाहता ताकि लाखों युवाओं के मन में बनी इनकी छवि पर कालिख न पुत जाए. गोष्ठियों और आयोजनों में लम्‍बे प्रवचन देने वाले, मीडिया को बराबर आईना दिखाने वाले काटजू पर भौंकने वाले पत्रकार ढोंगी निर्मल बाबा के बारे में एक शब्‍द भी कहने से घबरा जाते हैं. अगर इस मामले में इनका पक्ष जानने के लिए फोन किया जाता है तो कोई बाहर होता है, किसी को बात सुनाई ही नहीं देता है, तो कोई एक बार सवाल सुनने के बाद थोड़ी देर में बात करने की बात कहकर दुबारा फोन नहीं उठाता है, किसी को एंकरिंग की जल्‍दी होती है. यानी टीवी पर प्रवचन देने वाले चेहरों के पास तमाम तरह के काम निकल आते हैं, पर उनके चैनल पर ढोंगी निर्मल बाबा का विज्ञापन चलने के मामले में जवाब देने का समय नहीं है.

इन महान पत्रकारों के पास जवाब देने का समय इसलिए नहीं है कि इन्‍हें अपने मालिकों से डर लगता है. हर महीनों इन न्‍यूज चैनलों को करोड़ों का विज्ञापन और टीआरपी देने वाले निर्मल बाबा मालिकों के लिए दुधारू गाय हैं. इस दुधारू गाय के खिलाफ बयान दिए जाने से इनके आका लोग नाराज हो सकते हैं. इनकी नौकरियों पर बन सकती है, लिहाजा निर्मल बाबा के बारे में बोलने के लिए इनके पास टाइम नहीं है. शाम को न्‍यूज चैनलों पर होने वाले प्रवचनों में ये चेहरे जनप्रतिनिधियों पर, मंत्रियों पर नैतिकता और आम आदमी के हित को लेकर सवाल उठाते हैं. पर जब खुद जवाब देने की बारी आती है तो इनके पास समय नहीं होता है. फिर तो ये माना ही जा सकता है कि नैतिकता की दुहाई देने वाले इन पत्रकारों से नेता ही ज्‍यादा अच्‍छे हैं जो कम से कम किसी मुद्दे पर जवाब तो देते हैं. ये पत्रकार तो कथित तौर पर पतित कहे जाने वाले नेताओं से भी ज्‍यादा पतित हैं.

जस्टिस काटजू बार-बार दोहराते हैं कि देश इस समय बहुत बड़े बदलाव यानी ट्रांजीशन के फेज से गुजर रहा है, जहां एक तरफ पुरानी परम्‍पराएं-रूढि़यां हैं तो दूसरी तरफ मार्डन समाज की तरफ बढ़ते कदम यानी देश अपनी पुरानी केंचुल उतारने के दौर से गुजर रहा है और इसमें तकलीफें बढ़ जाती हैं. ऐसे हालात जब यूरोप में आए तो वहां बहुत उपद्रव हुए, भारत भी इसी दौर में है. इसमें मीडिया की भूमिका बढ़ जाती है, उसकी जिम्‍मेदारियां बढ़ जाती हैं. पर अपने देश का मीडिया है कि बाजार की गुलाम बन चुकी है और संपादक बाजार के बहुत बड़े दलाल. बाजार इन संपादकों को जिस तरीके से नचा रहा है वो उस तरीके कत्‍थक और भाड़ डांस कर रहे हैं. भूत-प्रेत से निकलकर बुलेट और एक्‍सप्रेस खबरें बनने के दौर में आम आदमी खबरों और मीडिया से दूर होता जा रहा है. निर्मल बाबा जैसे ढोंगी लोग, जिनका पोल खोलने का दायित्‍व इन संस्‍थानों और संपादकों पर है, चैनलों के हॉट केक बनते जा रहे हैं.

इतना ही नहीं बाबा के पोल खोलती खबरें भी बड़े-बड़े समाचार संस्‍थानों के पोर्टल से गायब चुकी हैं. कुछ ब्‍लॉग भी सस्‍पेंड कर दिए गए हैं. जागरण के ब्‍लॉग जागरणजंक्‍शन पर निर्मल बाबा का पोल खोलने वाले ब्‍लॉग को ही सस्‍पेंड कर दिया गया है. poghal.jagranjunction.com नामक ब्‍लॉग पर कई खबरें 'निर्मल बाबा उर्फ ढोंगी बाबा का सच जानिए', 'निर्मल बाबा : मीडिया रूपी वैश्‍या की नाजायज..', 'निर्मल बाबा के गोरखधंधे पर लगाम लगाना ज़रूरी हो ..' तथा 'निर्मल बाबा का अस्तित्व यानि भारत का दुर्भाग्य …' शीर्षक की खबरों को ना सिर्फ ब्‍लाक कर दिया गया है बल्कि इस ब्‍लॉग को ही सस्‍पेंड कर दिया गया है. खैर, जागरण जैसे संस्‍थान से इससे ज्‍यादा की उम्‍मीद भी नहीं की जा सकती है. पर एनडीटीवी के बारे में क्‍या कहें, जिसने अपने सोशल साइट पर र‍वीश कुमार की निर्मल बाबा पर लिखे कमेंट को भी ब्‍लॉक कर दिया है.

रवीश के ब्‍लॉग  http://social.ndtv.com/ravishkumar/permalink/79144 पर जितना दिख रहा है उसमें उन्‍होंने लिखा है कि 'निर्मल बाबा न्यूज़ चैनलों के टाप फ़ाइव में पहुँच गया है। निर्मल बाबा को ही संपादक बना देना चाहिए। निर्मल इज़ न्यूज़, निर्मल इज़ नार्मल।' पर इस लिंक को खोलने पर लिख कर आ रहा है कि 'उप्‍स देयर वाज ए प्रॉब्‍लम'. आज के मार्केटियर हो चुके पत्रकारिता के दौर में जब तमाम संपादक खाने के और दिखाने के और दांत रखते हैं, रवीश से थोड़ी उम्‍मीद जगाते दिखते हैं. लेकिन इसके उलट जिन जिन संपादकों में मुझे थोड़ी उम्‍मीद दिखती थी, उनको देखने समझने से लगता था कि आज के बाजारू पत्रकारिता के दौर में ये औरों से अलग हैं, पर इस घटना के बाद ये सारे प्रतिमान रेत के महल की तरह धराशायी हो चुके हैं. अब ये लाख टीवी पर प्रवचन दें या फिर अखबारों में कलम घसीटे कम से कम उसमें सच्‍चाई तो बिल्‍कुल नहीं दिखेगी. हालांकि लाखों की सेलरी लेने वाले इन संपादकों पर इससे कोई

फर्क नहीं पड़ेगा. पर मुझे सकुन मिलेगा कि कम से कम छोटे शहरों और कस्‍बों के पत्रकार इनसे कहीं ज्‍यादा इमानदार और कर्तव्‍यनिष्‍ठ हैं.

लेखक अनिल सिंह भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर हैं. वे दैनिक जागरण समेत कई अखबारों और चैनलों में काम कर चुके हैं.

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नब्बे परसेंट भारतीय मूर्ख हैं- जस्टिस काटजू

Someone told me “Justice Katju, you say you wish to keep away from controversies, but why it that controversies keep chasing you ?” I replied that while it is true that I wish to be uncontroversial, but at the same time I have a great defect, and that is this: I cannot remain silent when I am seeing my country going downhill. Even if others are deaf and dumb I am not. So I will speak out. As Faiz said: “Bol ki lab azad hain tere, Bol zubaan ab tak teri hai”. In our Shastras it is written: “Satyam bruyat, priyam bruyat, na bruyat satyam apriyam” Which means “Speak the truth, speak the pleasant, but do not speak the unpleasant truth”

I wish to rectify this. The country’s situation today requires that we should say “Bruyat satyam apriyam” i.e. “Speak the unpleasant truth”. When I said that 90% Indians are fools I said an unpleasant truth. The truth is that the minds of 90% Indians are full of casteism, communalism, and superstitions. Consider the following:

1. When our people go to vote in elections, 90% vote on the basis of caste or community, not the merits of the candidate. That is why Phulan Devi, a known dacoit-cum-murderer was elected to Parliament merely because she belonged to a backward caste which had a large number of voters in that constituency. Vote banks in India are on caste and community basis, which are manipulated by some unscrupulous politicians and others.

2. 90% Indians believe in astrology, which is pure superstition and humbug. Even a little commonsense tells us that the movements of stars and planets has nothing to do with our lives. Yet T.V. channels showing astrology have high T.R.P. ratings.

3. Cricket has been made into a religion by our corporatized media, and most people lap it up like opium. The real problems facing 80% people are socio-economic —- poverty, massive unemployment, malnourishment, price rise, health care, education, housing etc. But the media sidelines or minimizes these real issues, and gives the impression that the real issues are lives of film stars, fashion, cricket, etc. When Rahul Dravid retired the media depicted it as a great misfortune for the country, whereas when Sachin Tendulkar scored his 100th century it was depicted as a great achievement for India. Day after day the media kept harping on this, whereas the issues of a quarter million farmers suicides, and 47% Indian children being malnourished, was sidelined.

4. I had criticized the media hype of Dev Anand’s death at a time when 47 farmers in India were committing suicide on an average every day for the last 15 years. A section of the media attacked me for doing so, but I reiterate that I see no justification for the high publicity given by the media to this event for several days. In my opinion, Dev Anand’s films transported the minds of poor people to a world of make believe, e.g. a hill station where Dev Anand was romancing some girl. This gave temporary relief for a couple of hours to the viewers from their lives of drudgery. Such films, to my mind, serve no social purpose, but act instead like a drug or alcohol to send the viewer temporarily from his miserable existence to a beautiful world of tinsel.

5. In the recent Anna Hazare agitation in Delhi the media hyped the event as a solution to the problem of corruption. In reality it was, as Shakespeare said in Macbeth:

“A tale, told by an idiot

Full of sound and fury, signifying nothing”  

At that time if anyone had raised some logical questions he would have been denounced as a ‘gaddaar’ or ‘deshdrohi’. The people who collected at Jantar Mantar or the Ramlila ground displayed the mob mentality, which has been accurately described by Shakespeare in ‘Julius Caesar’.

After Caesar’s murder Mark Antony stirred up the Roman mob, which went around seeking revenge from the conspirators. One of the conspirators was named Cinna. The mob caught hold of another man, also named Cinna, who protested that he was Cinna the poet and not Cinna the conspirator. Despite his protest the mob said “Hang him for his bad verses” and lynched him.

The Janlokpal Bill, 2011 (whose full text is available online) defines an act of corruption as an act punishable under Chapter IX of the Indian Penal Code or under the Prevention of Corruption Act vide section 2(e). Section 6(a) of the Bill says that the Lokpal will exercise superintendence over investigation of acts of corruption, and section 6(c) empowers the Lokpal to punish for acts of corruption after giving a hearing. Section 6(e) authorizes the Lokpal to initiate prosecution and section 6(f) authorizes him to ensure proper prosecution. Section 6(i)(j) authorize him to receive complaints.

Section 2 (c) of the Prevention of Corruption Act define a public servant very widely. It includes not only government servants but also a host of other categories e.g. an employee of a local body, Government Corporation, judge, certain office bearers of some co-operative societies, officials of Service Commission or Boards, Vice Chancellors and teachers in the University, etc.

As pointed out by me in my article” Recreating Frankenstein’s Monster” published in “Indian Express” on 31.3.2012 there are about 55 lac, (5.5 million) government employees in India (13 lac in Railways alone), and there would be several lac persons of other categories coming within the definition of public servant in the P.C Act. Obviously one person cannot supervise and decide the lacs of complaints against them which would pour in. Hence thousands of Lokpals, maybe 50,000 or more, will have to be appointed to deal with them. They will have to be given salaries, housing, offices, staff, etc. And considering the low level of morality prevailing in India, we can be fairly certain that most of them will become blackmailers. It will be creating a parallel bureaucracy, which at one stroke will double the corruption in the country. And who will guard these Praetorian guards? A body of Super Lokpals ?

All this was not rationally analyzed and instead the hysterical mob that gathered in Jantar Mantar or Ramlila ground in Delhi thought that corruption will be ended by shouting “Bharat Mata ki Jai” and “Inquilab Zindabad”.

   It is time that Indians woke up to all this. When I call 90% of them fools my intention was not to harm them, rather it was just the contrary. I want to see Indians prosper, I want poverty and unemployment abolished, I want the standard of living of the 80% poor Indians to rise so that they get decent lives.

But this is possible when their mindset changes, when their minds are rid of casteism, communalism, and superstitions, and instead they become scientific and modern.

By being modern I do not mean wearing a nice suit or beautiful sari or skirt. Being modern means having a modern mind, which means a rational mind, a logical mind a questioning mind, a scientific mind. At one time India was leading the whole world in science and technology (see my article ‘Sanskrit as a language of Science’ on the website kgfindia.com). That was because our scientific ancestors like Aryabhatta, Brahmagupta, Sushrut, Charak, etc questioned everything. However, we subsequently took to the unscientific path of superstitions and empty rituals, which has led us to disaster. Today we are far behind the West in Science and Technology.

The worst thing in life is poverty, and 80% of our people are poor. To abolish poverty we need to spread the scientific outlook to every nook and corner of our country. It is only then that India will shine. And until that happens the vast masses of our people will continue to be taken for a ride.   

लेखक Justice Markandey Katju भारतीय प्रेस काउंसिल के चेयरमैन हैं.

बाजारू बन गए हैं आज के दौर के पत्रकार

: 9 अप्रैल – राजेन्द्र माथुर की पुण्यतिथि पर विशेष : जब राज्य सत्ता ने संसदीय राजनीति के जरिए लोकतंत्र की परिभाषा को बदल दिया। जब संसदीय राजनीति ने सत्ता के लिये आम आदमी से अपने सरोकार को बदल दिया। जब संविधान के जरिए संसद की व्याख्या के बदले संसद के जरिए संविधान हो ही संवारा जाने लगा। तो इस बदलते दौर में मीडिया क्‍यों अपने को नहीं बदल सका। बीते साठ बरस में हर राजनीतिक प्रयोग के साथ साथ मीडिया या कहें पत्रकारिता ने भी नायाब प्रयोग किये। लेकिन आर्थिक सुधार की हवा में जब बाजार और मुनाफा ही राजनीति के मापदंड तय करने लगे तब मीडिया भी अपने मापदंड बाजार से क्‍यों आंकने लगीं। और संसदीय राजनीति के भीतर समाया लोकतंत्र ही जब कारपोरेट और निजी कंपनियों की हथेलियों में समा गया तो फिर मीडिया ने झटके में खुद को कारपोरेट या निजी हथेली में तब्‍दील करना शुरू क्‍यों कर दिया। जाहिर है यह सवाल राजेन्द्र माथुर के दौर के नहीं हैं।

लेकिन संयोग से राजेन्द्र माथुर जी का निधन उसी बरस हुआ जिस बरस से राजनीति सत्ता ने बाजार के लिये रास्ता खोलना शुरू किया या कहें आर्थिक सुधार की लकीर खींचनी शुरू की। 9 अप्रैल 1991 को राजेन्द्र माथुर का निधन हुआ और 1991 के बाद से मीडिया बदला। पत्रकारिता बदली। या कहे देश के मुद्दे ही बदलते चले गये और मीडिया एक ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ जब राष्ट्रवाद का मतलब दुनिया के बाजार में खुद को बेचने के लिये तैयार करना हो गया। राजनीतिक सत्ता का मतलब उपभोक्ताओं के लिये नीतियों को बनाना हो गया। सरोकार का मतलब हाशिये पर पड़े तबकों को और दरिद्र बनाते हुये सत्ता के आर्थिक पैकेज पर निर्भर करना हो गया।

जाहिर है राजेन्द्र माथुर जी की पत्रकारीय लेखन के दौर में [1955-1991] मुद्दे चाहे कई रहे लेकिन मीडिया के भीतर हर मुद्दा सामाजिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक तौर पर राष्ट्रवादी समझ लिये ही उभरा। इसलिये चीन से लेकर पाकिस्तान के साथ युद्ध की बात हो या फिर इमरजेन्सी से लेकर स्वर्ण मंदिर में सेना के घुसने का सवाल या मंडल-कंमडल की सियासी समझ। मीडिया का रुख कमोवेश हर मुद्दे के साथ देश को बनाने। फिर बचाने। और आखिर सत्ता के लिये सियासी संकीर्णता से ही टकराता रहा। राजेन्द्र माथुर ने अपने लेखन से इन तमाम मुद्दो को पैनापन भी दिया और राज्य सत्ता के सामने एक दृष्टि भी रखी। यानी नेहरु की सोशलिस्ट समझ से वीपी सिंह के सामाजिक न्याय के नारे और महात्मा गांधी की हत्या से लेकर हिंदुत्व में प्राण प्रतिष्ठा करने के अयोध्या मंत्र तले यह तथ्य कभी नहीं उभरा कि देश को खंडित किया जा रहा है या फिर देश बेचा जा रहा है। तो पत्रकारीय समझ भी देश के होने और उसे संवारने का एहसास ही कराती रही।

अगर राजेन्द्र माथुर जी के लेखन को ही परखे तो हर मुद्दे की ओट में उन्होंने भारत को एक रखने या कहे राष्ट्रीयता की समझ तले परिस्थियों को समझा। देश में आपातकाल लगा तो राजेन्द्र माथुर यह लिखने से नहीं हिचके इंदिरा गांधी देश की जड़ों में ही मठ्ठा डालने की भूल कर रही हैं। और जब स्वर्ण मंदिर में सेना घुसी तो नवभारत टाइम्स के मास्टहेड को नीचे कर सबसे उपर हेंडिंग "भारत का भारतावतार" लिखा। लेकिन 1991 के बाद से जो नये सवाल संसद से लेकर सड़क तक पर उठे, या कहें उठ रहे है और जिस तरह लोकतंत्र का पिरामिड बीते दो दशकों में पूरी तरह उलट गया उसमें क्या किसी भी मुद्दे को लेकर कोई संपादक "भारतावतार "लिख सकता है। बारीकी से परखे तो बच्चों की शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवा और पीने के पानी से लेकर जीने के तरीके तक पर उस लोकतंत्र का हक नहीं रहा जिसे संसदीय राजनीति के जरिए आम वोटर मानता-समझता रहा। दरअसल संसदीय राजनीति के दायरे में लोकतंत्र की नयी परिभाषा जब पूंजी, मुनाफे और बाजार तले देश की सीमा को तोड़ रही है। कारपोरेट विकास की परिभाषा को कानून का जामा पहनाया जा रहा है।

राष्ट्रद्रोह का मतलब हाशिये पर पड़े किसान, आदिवासी और ग्रामीणों के सवालों को उठाना हो चुका है। संसदीय राजनीति का मतलब राजनीतिक रोजगार से लेकर मुनाफे का एक पूरा अर्थशास्त्र नेता, पार्टी और सत्ता के अनुकूल बनाते हुये विशेषाधिकार पाने या फिर खुद को कानून से उपर बैठाने का हो चला हो तो फिर पत्रकारीय समझ या मीडिया की भूमिका कौन का रास्ता चुनेगी। जाहिर है मीडिया को लेकर पहली बार यहीं से कुछ नये सवाल खड़े होते हैं क्‍योंकि मीडिया को अगर परिस्थियों का शिकार संस्थान या फिर सत्ता के अनुरुप बदलने का धंधा मान ले तो जाहिर है वह सारे सवाल वैसे ही खड़े होंगे जैसे संसदीय राजनीति के भीतर राजनीतिक दलों के सामने सवाल है। एक तरफ सत्ता का रोना है कि उदारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाते-अपनाते वह इतना आगे निकल चुकी है कि लौटे कैसे उसे नहीं पता।

दूसरी तरफ राजनीतिक दलों के सामने सवाल है कि सत्ता के बगैर उनका योगदान शून्य है तो और सत्ता में आने के लिये पूंजी बनाने, कारपोरेट के मुनाफे में सहयोग और लूट के लिये बाजार खोलने के रास्ते के अलावा कोई थ्योरी है नहीं क्‍योंकि विकास का आधुनिक मतलब यही है। तो फिर मीडिया भी किसी अलग ग्रह से तो टपकी नहीं तो वह भी मुनाफे के आसरे ही प्रचार-प्रसार कर जीवित रह सकती है। इसलिये उसे सत्ता से विज्ञापन का सहयोग भी चाहिये। कारपोरेट की पूंजी का गठजोड़ भी चाहिये। और प्रचार प्रसार के लिये राजनीतिक दलालों से लेकर मध्यस्थतों का सहयोग भी चाहिये। जिनके पास बाजार में पैठ जमाने का मंत्र है। यानी राजनीति का अर्थशास्त्र बीते 20 बरस में बदल गया और सरोकार की राजनीति खत्म कर उपभोग के साधन को न्यूनतम जरूरत में बदलते हुये देश का पर्यावरण, खेती, पानी और खनिज संसाधन सब कुछ बेचकर उसे नष्ट करने की दिशा में देश बढ़ा, लेकिन मीडिया का अर्थशास्त्र नहीं बदला। पत्रकारीय समझ और मीडिया संस्थानों का विकास भी सत्ता के अर्थशास्त्र पर ही टिका रहा।

अगर बारीकी से अब के दौर में संसदीय चुनाव से लेकर संसद की कार्यवाही और केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों की नीतियों को परखें तो दो सवाल सीधे उठते हैं। पहला बिना बजट [पूंजी] कोई नीति नीति नहीं है। और बिना नीति भी मुनाफा का रास्ता नीतियों को बना देता है। यानी पूंजी हर मर्ज की दवा उस देश में बना दी गई है जहां 80 करोड़ लोगों से कोई सीधा वास्ता पूंजी, मुनाफा या बाजार का अभी तक है ही नहीं। देश उस मुहाने पर आ खड़ा है जहा खेती के 80 फीसदी किसानों को सरकार कोई इन्फ्रस्ट्रक्चर नहीं दे पाती। लेकिन खाद और बीज के लिये कारपोरेट पर निर्भर जरुर कर देती है। और किसान चाह कर भी इस देश में राजनीतिक विकल्‍प तो दूर राजनीतिक मुद्दा भी नहीं बन पाता। ध्यान दें तो यही हालात मीडिया के भी हैं। सत्ता यहां भी पत्रकार के हाथ में मीडिया की डोर थमाना चाहती नहीं है लेकिन मीडिया के जरिए पत्रकार का बाजारू रास्ता जरूर खोलती है। यहां पत्रकार भी अपने लिये कोई वैकल्पिक अर्थशास्त्र खड़ा नहीं कर पाता जो मीडिया को चला सके और मीडिया को मुनाफे में तब्‍दील करने के सारे रास्ते सत्ता के उसी अर्थशास्त्र पर जा टिकते हैं जहां पत्रकारीय समझ दम तोड दें।

सवाल है राजेन्द्र माथुर की पत्रकारीय समझ का आंकलन इस नयी परिस्थिति में कैसे करें। कैसे मीडिया के दायरे में राष्ट्रीय सवालों के जरिए संसदीय राजनीति को पत्रकार मठ्ठा डालने से रोके और कैसे सत्ता के कार्य में भारतावतार की कल्पना करें जब सत्ता की कीमत चुनावी तंत्र के पीछे खड़े कारपोरेट लगा रहे हों। जब सांसद और विधायक के लिये सत्ता में आने के बाद पहली प्राथमिकता उनकी जीत के पीछे लगे पूंजी को मुनाफे के साथ लौटाने का हो। और चुनावी जीत हार में खबर की कीमत भी लगने लगी हो। क्या खबरों की खरीद-फरोख्त के जरिए पत्रकारीय मूल्य देश के किसी मुद्दे पर बहस की गुंजाईश भी पैदा करते है। फिर संपादक से आगे मीडिया हाउस चलाने या अखबार निकालने वाले ही जब खुद को पहले पत्रकार माने और फिर पत्रकार की सफलता का मतलब उसका मालिक बनना हो जाये तो क्या पत्रकारीय मूल्यों पर बहस की गुंजाईश बचती है। जो गुंजाईश होती भी है तो वह राजसत्ता के अर्थशास्त्र तले नतमस्तक होने पर आमादा रहती है।

राजेन्द्र माथुर के दौर में न्यूज चैनल नहीं थे लेकिन राजेन्द्र माथुर जो पत्रकारीय चितंन 1965 में नई दुनिया के अपने कालम "पिछला सप्ताह" के जरिए पाठकों को पढ़ने के लिये ठहराया वह ठहराव हर क्षण बदलते खबरों की भागमदौड़ में भी न्यूज चैनल दर्शकों को ठहरा नहीं पाते हैं। लेकिन 1991 के बाद से आर्थिक सुधार ने जिस तरह सामाजिक सरोकार को भी लाभ-घाटे में तौला और जिस तरह मीडिया की सत्ता पर निगरानी की जगह मीडिया पर निगरानी के लिये एक स्वतंत्र सस्था का सवाल 2012 में उठने लगा, उसमें कैसे राजेन्द्र माथुर के दौर की पत्रकारिता को अब के हालात से जोड़े। चीन और पाकिस्तान पर लिखते वक्त अक्सर राजेन्द्र माथुर उनसे जुड़े हर हालात की व्याख्या करने से नहीं चूके। लेकिन अब की समझ अगर व्यापार और विकास के लिये सीमाओं पर सेना के बदले बीजिंग और इस्लामाबाद से आर्थिक संबंध पर जा टिके तो फिर देश का मतलब पत्रकारीय समझ के जरिए क्या लगाया जाये। यह उल्टे हो चुके राजनीतिक आर्थिक पिरामिड को सीधा किये बगैर समझना वाकई नामुमकिन है।

1955 से लेकर 1991 तक जब तक राजेन्द्र माथुर की कलम चलती रही तब तक देश में देश की एकजुटता के साथ मीडिया को लड़ने के लिये राजेन्द्र माथुर सरीखा पत्रकार चाहिये था, लेकिन 2012 में तो देश बेचने के लिये निकले बहुराष्ट्रीय कारपोरेट के चंगुल में फंसते जा रहे मीडिया से लड़ने वाला पत्रकार चाहिये। जिसके खिलाफ सत्ता बाद में खड़ी होती है पहले मीडिया ही सत्ता बनकर मठ्ठा डाल देती है। और सत्ता भारत में विकास के भारतावतार होने का जश्न मनाती है। तो क्या मालवा से निकल कर देश को पत्रकारीय दृष्टि से राह दिखाने वाले राजेन्द्र माथुर को अब याद करने का कोई मतलब नहीं है या फिर राजेन्द्र माथुर से आगे की लकीर खींचने की जरूरत अब आ चुकी है।

लेखक पुण्‍य प्रसून बाजपेयी पत्रकार हैं. कई संस्‍थानों में काम करने के बाद इन दिनों जी न्‍यूज से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग से साभार लिया गया है.

एमपी सरकार ने ‘देवपुत्र’ मैग्जीन की खरीद के लिए तेरह करोड़ का भुगतान किया

Jayprakash Manas : किसी पत्रिका की ख़रीदी लाखों में सुनी थी, करोड़ों में कभी नहीं । यह सौभाग्य मिला है – मध्यप्रदेश के 'देवपुत्र' को । इतना ही नहीं, विद्याभारती की इस पत्रिका को अगले 15 साल तक खरीदने के लिए करीब 13 करोड़ रुपए का अग्रिम भुगतान भी मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कर दिया गया है । और यह राशि केन्द्र सरकार की है । है ना ना सुखद और दुखद दोनों ही !

Manoj Abodh सुखद इसलिए कि यह पत्रिका के लिए है और दुखद इसलिए कि सिर्फ देवपुत्र ही क्‍यों, हंस क्‍यों नहीं,पाखी क्‍यों नहीं, बया क्‍यों नहीं और दूसरी सैकड़ों अच्‍छी पत्रिकाएं क्‍यों नहीं….

Bhupi Sood unki marji…. prashna wahan bhi uthne chahiye jahan sirf vampanthi sahitya hi kharida jata hai aur wah bhi uski utkrishta ke aadhar par balki isliye ki wah sirf ek varg vishesh ke lekhak dwara likha gaya hai,

Raghavendra Mishra Koi nai bat nahin hai, ye kam to university, college aur small organization tak karte hain…….political magazines ko aur newspapers ko jis rate per advertisement ka paytment hota hai woh bhi samne aana chahiye

Jayprakash Manas राघवेन्द्र जी, लाइये ना सामने…… फेसबुक पर….

Mahesh Dewedy Yadyapi Madhya Pradesh shasan ka aisa adesh defencible nahi hai, parantu Vampanth to 'proletariat' ki dictatorship me vishwas karta hai- wahan kisi prashn ki gunjaish hi kahan?

Sangeeta Kumari सच

Durgaprasad Agrawal मध्यप्रदेश सरकार और विद्याभारती…. जो हो जाए कम है भाई!

Narayan Nande YEH SAB ANDAR KI BAAT HAI, Manas ji, Aam adami ki samajh me nahi aayega. Ho sakta hai kuchh mahino baad iski pratiya kudedan me mile, ya phir iske panno se liptie huye moongphalli ke daane aur bhel-purri bikte mile…. ( Hamare desh me Gh….. ke kai kai nayab tariqe hai )

Hemant Kumar Adarniya,Manas ji ye patrika kabhi stalon par to dikhi nahin…aisi kya khas bat hai isme jo sarkar itani meharaban hai isa par…kahin yah bhi to oparation black board..jaisi kisi kharid me ja rahi ho?

Zakir Ali 'Rajnish' देवपुत्र आरएसएस समर्थित संस्‍था की पत्रिका है। चूंकि मध्‍य प्रदेश में भाजपा की सरकार है, इसलिए इस पत्रिका को यह सोभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है। वैसे इससे पहले भी इस पत्रिका की प्रसार संख्‍या लाख में थी, शिशु भारती के सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य सदस्‍यता के द्वारा।

जय प्रकाश मानस के फेसबुक वॉल से साभार.

इंदौर प्रेस क्‍लब के पूर्व महासचिव अन्‍ना दुरई की याचिका हाई कोर्ट ने खारिज की

इंदौर प्रेस क्‍लब के पूर्व महासचिव अन्‍ना दुरई की दो याचिकाएं हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है. कोर्ट ने रजिस्‍ट्रार को निर्देश दिया है कि वे इस मामले का निपटारा अपने स्‍तर से एक सप्‍ताह के अंदर करें. अन्‍ना ने प्रेस क्‍लब के बाइलाज में संशोधन तथा अपनी सदस्‍यता समाप्‍त किए जाने के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की थी तथा इन निर्णय पर स्‍थगन आदेश देने की मांग की थी. मामले को सुनने के बाद जस्टिस केके लोहाटी ने स्‍थगन आदेश देने से इनकार करते हुए रजिस्‍ट्रार को सुनवाई करने का आदेश दिया.

उल्‍लेखनीय है कि इंदौर प्रेस क्‍लब की मैनेजिंग कमेटी ने संस्‍था की गरिमा गिराने तथा अनुशासनहीनता के मामले में क्‍लब के महासचिव अन्‍नादुराई की प्राथमिक सदस्‍यता को पिछले साल मई में समाप्‍त कर दी थी. मैनेजिंग कमेटी ने अन्‍ना दुरई पर कार्रवाई करने से पहले उन्‍हें बीते साल 27 अप्रैल को कारण बताओ नोटिस जारी करके जवाब देने के लिए पन्‍द्रह दिन की समय सीमा निर्धारित की थी, परन्‍तु अन्‍ना दुरई ने अपना पक्ष किसी भी तरीके से नहीं रखा, जिसके बाद उन्‍हें 13 मई को महासचिव पद से हटाते हुए सदस्‍यता समाप्‍त कर दी गई थी. 

अन्‍ना दुरई को हटाने के बाद बाइलाज के अनुसार कमेटी ने खाली पड़े महासचिव पद पर तपेंद्र सुगंधे की नियुक्ति कार्यवाहक महासचिव के रूप में कर दी थी. सुगंधे का कार्यकाल इस साल मई में समाप्‍त होगा. मैनेजिंग कमेटी ने प्रेस क्‍लब के बाइलाज में भी संसोधन किया था, जिससे अन्‍ना दुरई नाराज थे. इन्‍हीं दोनों मामलों को लेकर अन्‍ना दुरई पहले रजिस्‍ट्रार के पास पहुंचे थे, परन्‍तु रजिस्‍ट्रार ने उनका अध्‍यावेदन सुनने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद वे कोर्ट चले गए. 

सीहोर में एसपी के आदेश से प्रेस पर सेंसरशिप लगा

: बिना एसपी के अनुमोदन के अधीनस्‍थ नहीं देंगे पत्रकारों को जानकारी : मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर में मीडिया पर पाबंदी लगाने की कुत्सित कोशिशें शुरू कर दी गई हैं. यहां के पत्रकारों तथा पत्रकारिता पर नौकरशाही हावी होकर सेंसर लगाने का प्रयास शुरू कर दिया गया है. इसी महीने कई थाना कोतवालियों में पुलिस ने अनुभागीय अधिकारी योगेश्‍वर शर्मा के हस्‍ताक्षर वाला पत्र चस्‍पा कर दिया है, जिसमें लिखा गया है कि पुलिस कप्‍तान के अनुमोदन के बाद ही पत्रकारों को कोई जानकारी दी जाए.

यह घटना बताता है कि प्रशासन और पत्रकारों के बीच संबंध किस स्‍तर तक पहुंच चुके हैं. राज्‍य के संवेदनशील जिले में शुमार सीहोर में इंटेलीजेंट पत्रकारों की कमी नहीं है, लेकिन दोयम दर्जे का काम करके दिन रात पुलिस को सैल्‍यूट करने वाले कुछ पत्रकारों के चलते पूरी बिरादरी पर पुलिस ने सेंसरशिप लागू कर दी है. यह पत्रकारों के साथ इस तरह के व्‍यवहार का पहला उदाहरण नहीं है. इसके पहले भी एक पत्रकार का संस्‍थान पुलिस-प्रशासन के निशाने पर आ चुका है. एक जिलाबदर के मामले में प्रशासन ने अवमानना का नोटिस थमा दिया था.

यहां की पत्रकारिता की अपनी अलग पहचान थी, पर कुछ नए पत्रकारों तथा हल्‍के पत्रकारों की इंट्री ने पूरे माहौल को खराब कर दिया है. हालांकि रिजर्व तरीके से बात करने वाले पत्रकारों की इमेज प्रशासन में अब भी अचछी है, लेकिन पुलिस-प्रशासन से लगातार मिल रही दुत्‍कार के बाद प्रेस कब तक अकेला चलकर अपना सयंम काम रख सकेगा. साथ ही अभी यह भी देखना है कि सीहोर में प्रेस को नीचा दिखाने का सिलसिला अधिकारी कब तक जारी रखते हैं. तथा कब तक योगेश्‍वर शर्मा जैसे अधिकारी प्रेस की स्‍वतंत्रता को चुनौती देते हैं.

 

संध्‍या प्रकाश

सीहोर

जी में चीफ कंटेंट एवं क्रिएटिव आफिसर बने भरत रंगा

जी समूह ने भरत रंगा को प्रमोट करके चीफ कंटेंट एवं क्रिएटिव ऑफिसर बना दिया है. रंगा जी इंटरटेनमेंट इंटरप्राइजेज में इंटरनेशनल ऑपरेशन में एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर के पद पर कार्यरत थे. भरत जी ग्रुप के एमडी कम सीईओ पुनीत गोयनका को रिपोर्ट करेंगे. वे 1998 से ही जी के साथ जुड़े हुए हैं. इन्‍होंने जी सिनेमा, प्रीमियर, एक्‍शन, क्‍लासिक सिनेमा के बिजनेस हेड के रूप में भी काम किया है.

Fraud Nirmal Baba (18) : हर महीने 40 लाख पाने वाले चैनलों में दम नहीं है कि बाबा की भद्द करें

Pankaj Jha : करीब दस से पन्द्रह अखबार रोज पलटता-पढता हूं. लेकिन आज तक कहीं भी निर्मल (नरूला) बाबा के गोरखधंधे के बारे में कुछ भी नही पढ़ा जबकि वेब मीडिया ने बखिया उधेर दी इस चोट्टे की. यानी नया मीडिया अपनी भूमिका निभाना शुरू कर चुका है. हम निर्मल के अंत के साथ-साथ बाजारू मीडिया के अंत की भी कामना करते हैं.

Alka Bhartiya : ham bhi aise hi kamna karte hain

Närëndrä Löwãñshî : kripa aani suru ho rhi hai..

Avinash Das : नया मीडिया को अभी विज्ञापन मिलना शुरू नहीं हुआ है… होने दीजिए, फिर देखिएगा।

Girish Pankaj : ज्यादा नहीं चले छल बाबा / ध्यान रखो ऐ निर्मल बाबा
        पोल हमेशा खुल जाती है / आज नहीं तो फिर कल बाबा

Rajendra Singh : बहुत बदिया .

Dhananjay Ind : Ameen!!!

Ashish Kumar 'Anshu' : jeet ho…

Shishir Soni : u should have send us several links to go through…

विनीत एक भारतीय : यहाँ हम में से बहुत से लोग मुसलमानों और क्रिश्चियनो के खिलाफ बिगुल फूंकने की बात करते रहे हैं…..देशी और विदेशी की बात करते रहे हैं…..क्युंकी अगर हम देखे तो ये फेसबुक भी विदेशी और एक क्रिस्चियन का ही है…..इस लिए मैंने आगे बढ़ कर एक स्टेप ले लिया है और हमारे हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता और भारतीय संस्कृति को नजदीक से जानने के लिए उस पर चर्चा करने के लिए WWW.GEETAGYAN.COM नाम की एक धार्मिक वेबसाइट बनायीं है हम सभी के लिए…..अब मैंने ये स्टेप ले लिया है बाकि आपके हाथ में है.

Neeraj Kumar Mishra : साहब एक भी इलेक्ट्रोनिक चैनल दिखा दीजिये जहां की बाबा का प्रोग्राम न आता हो क्षमाप्रार्थी बाबा का सत्संग न चल रहा हो…….और बाबा इसके एवज में चैनल वालों को कम से कम ४० लाख रुपये मासिक देते हैं……. है किसी चैनल वालों में दम की इतनी मोटी रकम छोड़कर वो बाबा की भद्दी करने का दुस्साहस करे ……हाँ जिस दिन बाबा द्वारा ये प्रायोजित कार्यक्रम बंद कर दिया जायेगा उस दिन इस चैनल वालों की नौटंकी देखना …….एक सजा संवरा सा तथाकथित रिपोर्टर कम हीरो कैमरे के आगे आएगा और कहते हुए पाया जायेगा "ये देखिये एक ठग कैसे बना बाबा ये पहले निरुला के नाम से जाना जाता था बाद में ये निर्मल बाबा बनकर लोगों को ठगने का काम करना शुरू किया | ऐसे नकाबपोश को पहचान लें आदि आदि डायलोग बोलते पाए जायेंगे …….लेकिन जनता को हकीकत पता नहीं चल रही है की सही में नकाबपोश कौन है ठग को ४० लाख मासिक के लोभ में बाबा बनाकर यही चैनल वालों ने ही स्थापित किया है…..

पंकज झा के फेसबुक वॉल से साभार.

दैनिक भास्‍कर, रोहतक के संपादक बने हेमंत अत्री

दैनिक भास्‍कर, रोहतक से खबर है कि हेमंत अत्री को यहां का स्‍थानी संपादक बनाया गया है. रोहतक में पहली बार किसी को संपादक पद पर नियुक्ति दी गई है. अब तक यहां पर न्‍यूज एडिटर ही संपादकीय प्रभारी का दायित्‍व संभालता था. हेमंत से पहले एनई अमित गुप्‍ता यहां की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. बताया जा रहा है कि प्रबंधन उनके कामों से खुश नहीं था, लिहाजा उनका तबादला अमृतसर कर दिया गया.

हेमंत इसके पहले दिल्‍ली में दैनिक भास्‍कर के स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट के पद पर कार्यरत थे. उन्‍हें प्रमोट करके रोहतक में नेक्‍स्‍ट टू एडिटर बना दिया गया है. वे हरियाणा के स्‍टेट हेड व पानीपत के संपादक शिव कुमार विवेक को रिपोर्ट करेंगे. रोहतक यूनिट की लांचिंग भी शिव कुमार विवेक के नेतृत्‍व में ही हुई थी. बताया जा रहा है कि हरियाणा की हिसार, पानीपत, भिवानी समेत राज्‍य की सारी यूनिटें शिव कुमार विवेक को रिपोर्ट करेंगी. 

Fraud Nirmal Baba (17) : जूनियर टीवी आर्टिस्ट निधि का खुलासा- मुझे पैसे देकर सवाल पुछवाता रहा बाबा

नीचे एक लड़की की तस्वीर है. इस लड़की को आपने कहीं देखा है? ये कई टीवी सीरियल में काम कर चुकी जूनियर आर्टिस्ट निधि है. अपने आरंभिक दिनों में ठगी का धंधा चमकाने के लिए ठग निर्मल बाबा नोएडा के फिल्मसिटी में स्थित एक स्टूडियो में अपने प्रोग्राम की शूटिंग करवाता था.  उस वक्त बाबा के सामने जो लोग अपनी समस्या के हल होने का दावा करते थे, वे लोग असली न होकर जूनियर आर्टिस्ट हुआ करते थे? सुबूत ये निधि नामक लड़की है.

ये कई टीवी सीरियल में काम कर चुकी है. जूनियर आर्टिस्ट है. इसे 10 हज़ार रुपये बाबा देता था सवाल पूछने के लिए. बाबा की पोल खोलते हुए निधि कहती हैं कि शुरू के दो महीने तक निर्मल बाबा ने अपने ही आदमियों और जूनियर आर्टिस्टों से प्रश्न पुछवाया. निधि के इस खुलासे के बाद निर्मल बाबा की पोल पूरी तरह खुलने लगी है.

बाबा से संबंधित खबरें, आलेख व खुलासे पढ़ने के लिए क्लिक करें- Fraud Nirmal Baba

बाबा की ''महिमा'' जानने के लिए यहां भी जाएं-

समस्या-हल : एक

समस्या-हल : दो

समस्या-हल : तीन

समस्या-हल : चार

ज्यादा से ज्यादा लोगों को फ्राड बाबा के ढोंग के प्रति जागरूक करने के लिए इस पोस्ट को बिलकुल नीचे दिए गए फेसबुक लाइक आप्शन के जरिए लाइक कर अपने वॉल पर पोस्ट करें और दूसरों तक पहुंचाएं.

हादसे में अमर उजाला के पत्रकार सुरेश मेहरा के पुत्र का निधन

अमर उजाला, भिवानी के ब्‍यूरोचीफ सुरेश मेहरा के बारह वर्षीय पुत्र पुनीत मेहरा का रविवार को सड़क हादसे में निधन हो गया. पुनीत कल शाम को साइकिल से किसी काम से जा रहा था. चिडि़याघर मोड़ के पास रोडवेज बस ने उसकी साइकिल में धक्‍का मार दिया, जिससे पु‍नीत सड़क पर गिर गया और बस के नीचे आ गया. हादसे के बाद चालक व कंडक्‍टर बस छोड़कर भाग निकले. घटना के बाद स्‍थानीय लोगों ने रोडवेज बस में जमकर तोड़फोड़ की.

सूचना मिलने पर पुनीत के परिजन तथा पुलिस टीम घटना स्‍थल पर पहुंची. पुलिस ने शव को कब्‍जे में लेकर पोस्‍टमार्टम के लिए भेज दिया. पुनीत का अंतिम संस्‍कार सोमवार को उसके पैतृक गांव बेरला में किया गया. मुखाग्नि पुनीत के बड़े भाई ने दी. सुरेश मेहरा को दो ही पुत्र थे. पुनीत के अंतिम संस्‍कार के दौरान राज्‍य के मंत्री सतपाल सांगवान,‍ विधायक घनश्‍याम सर्राफ, कांग्रेसी नेता संदीप खड़किया, पत्रकार नरेंद्र वत्‍स, पवन शर्मा, अजय मल्‍होत्रा, विजय तंवर, मनोज जांगड़ा, धर्मेन्‍द्र यादव समेत अनेक गणमान्‍य लोग मौजूद रहे.

छह सालों में विज्ञापन पर एक अरब से ज्‍यादा खर्च डाला नीतीश सरकार ने

मित्रों, इसे हम अपनी सुविधानुसार भारतीय प्रजातंत्र की विशेषता कहें या विडम्बना; आजादी के बाद से ही सामूहिक नेतृत्व के स्थान पर इसकी प्रीति व्यक्तिपूजा के प्रति कुछ नहीं बल्कि बहुत ज्यादा रही है. जैसा कि आप सब भी जानते हैं कि व्यक्तिपूजक व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिस भौतिक-अभौतिक चीज की कीमत होती है वह होती है उस व्यक्ति की छवि. यह छवि लाजवंती से भी कहीं ज्यादा संवेदनशील और कांच से भी कहीं बढ़कर भंगुर होती है. उस पर यह ऐसी शह होती है जिसको बनाने में तो वर्षों लग जाते हैं और खंडित होने में एक क्षण भी नहीं लगता. शायद इसलिए हमारे राजनेता अपनी छवि चमकाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते. यह छवि ही थी जिसने प्रधानमंत्री नेहरु को चाचा नेहरु भी बना डाला वरना बच्चे किस राजनेता को प्रिय नहीं थे- गाँधी को, राजेंद्र प्रसाद को, सरदार पटेल या सुभाष या तिलक इत्यादि किसको नहीं?

 मित्रों, बिहार में जब घोटाला-दर-घोटाला करने के बाद लालू की गरीबों के मसीहा वाली छवि चूर-चूर हो गयी तब उनके पूर्व राजनीतिक सहयोगी नीतीश कुमार नए मुख्यमंत्री के रूप में सिंहासन पर विराजमान हुए. उन्होंने सत्ता में आते ही सुशासन का नारा दिया और इस शब्द का इतनी फिजूलखर्ची से प्रयोग किया कि उनका नाम ही सुशासन बाबू पड़ गया. परन्तु नारा लगाने और नारों को हकीकत का (पै)जामा पहनाने में हमेशा बड़ा भारी फर्क रहा है. कागज पर और आंकड़ों में तो सुशासन को जबरन ला दिया गया लेकिन जमीनी स्तर पर जनता कहीं पहले से भी ज्यादा बेहाल हो उठी. राज्य का विकास हुआ भी परन्तु उससे कहीं ज्यादा तेज गति से विकास हुआ राज्य में भ्रष्टाचार का. राज्य सरकार ने सामाजिक योजनाओं की राशि में वृद्धि की तो सरकारी बाबुओं और हाकिमों ने और भी अधिक अनुपात में रिश्वत की दर और परिमाण को बढ़ा दिया.

जाहिर है जनता जब परेशान होगी तो आक्रोशित भी होगी और अपने आक्रोश को धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन, बयानबाजी आदि के द्वारा अभिव्यक्त भी करेगी और उनकी अभिव्यक्ति को शब्द और शक्ति प्रदान करने का दायित्व होता है मीडिया पर. बिहार चूंकि देश का सबसे पिछड़ा प्रदेश है इसलिए स्वाभाविक तौर पर इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अख़बारों की हो जाती है. नीतीश ठहरे चतुर सुजान, चाणक्यावतार सो उन्होंने जनता को खुश करने के बजे मीडिया को ही साध लिया. ऐसा करना अपेक्षाकृत आसान भी था. वो कहते हैं न कि एकहि साधे सब सधै. अब करते रहिए धरना, प्रदर्शन, देते रहिए सरकारी कुनीतियों के विरुद्ध बयान; जब अख़बार उनको और उनसे सम्बंधित ख़बरों को छापेंगे ही नहीं तो सिवाय खून के घूँट पीकर रह जाने के आप कुछ कर ही नहीं पाएंगे.

मित्रों, पहले किसी लालच के पुतले को वश में वश में करने के लिए चांदी की खनक सुनानी पड़ती थी अब गाँधी बाबा का दर्शन करवाना पड़ता है. पहले जब मीडिया विकेन्द्रित था तब उसे मैनेज करना खासा मुश्किल अथवा असंभव-सा था परन्तु अब मीडिया का मतलब दो-चार कॉरपोरेट हाउस के आलावा और कुछ नहीं रह गया है. उदाहरण के लिए अगर बिहार में मीडिया को मैनेज करना है तो सिर्फ दैनिक जागरण, हिंदुस्तान टाइम्स, हिंदुस्तान, प्रभात खबर, आज, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और राष्ट्रीय सहारा को मैनेज कर लीजिए फिर जनता के समक्ष सावन के अंधे की तरह शासन-प्रशासन में सिवाय हरियाली को देखने के कोई विकल्प ही नहीं रह जाएगा. जब नीतीश सत्ता में आए तो मीडिया सज-धज कर बिकने को तैयार बैठी थी और नीतीश सरकार खरीदने को आतुर हुई जा रही थी. देखते-देखते लोकतंत्र का वाच डॉग सचमुच के दुम हिलानेवाले कुत्ते की तरह व्यवहार करने लगा. फिर क्या था बिहार में अभिव्यक्ति के क्षेत्र में अघोषित आपातकाल की स्थिति पैदा हो गयी. सरकार ने जिन्हें झुकने को कहा एकदम से बैठ गए, जिन मीडिया संस्थाओं को बैठने को कहा गया घुटनों पर आ टिके और जिन्हें घुटनों के बल रेंगने का आदेश मिला एकदम से आपत्तिजनक अवस्था में लेट ही गए.

मित्रों, सरकारी खजाने में जमा हुई रकम किसी मंत्री-मुख्यमंत्री के बाप की कमाई हुई नहीं होती कि जिसको वे जब चाहें, जहाँ चाहें, जैसे चाहें और जिस पर चाहें उड़ा डालें. सरकार को विज्ञापन जारी करना चाहिए लेकिन सिर्फ जनजागरूकता के लिए न कि मीडिया-घरानों को उपकृत कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए. जब आप आर.टी.आई. कार्यकर्ता शिवप्रकाश राय, राम प्रवेश सिंह यादव और विनय शर्मा जी के संयुक्त प्रयास से प्राप्त सरकारी आंकड़ों पर स्थूल दृष्टिपात भर करेंगे तो आपकी समझ में आसानी से यह बात आ जाएगी कि प्रिंट मीडिया में क्यों लगातार सरकार की वाहवाही और जयजयकार हो रही है? क्यों जनता द्वारा कानून को अपने हाथ में लेकर लगातार होली और होली के बाद वाले दिन दो स्थानों पर पीट-पीटकर दो अपराधियों को पुलिस की मौजूदगी में सरेआम मृत्युदंड देने और पुलिस के मूकदर्शक बने रहने की खबर भी अख़बारों में स्थान नहीं बना पाती है?

बिहार सरकार ने वर्ष २००५ से मई २०११ के बीच मीडिया पर १ अरब, १० करोड़ से भी ज्यादा रुपये न्योछावर कर दिए. वित्तीय वर्ष २००५-०६ से लगातार यह राशि बढती गयी. इस लूट का सबसे ज्यादा फायदा मिला हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, आज और प्रभात खबर को. कुल राशि की लगभग आधी इन चारों के ही हाथ लगी. इनमें भी कुल विज्ञापन व्यय का लगभग एक तिहाई बिहार के सबसे बड़े अख़बार हिंदुस्तान को खुश करने के लिए फूंक दिया गया. कई बार तो एक ही विज्ञापन दो-दो पृष्ठों पर छापे गए. उदाहरण के लिए १६ जुलाई, २०११ को हिंदुस्तान में एक ही विज्ञापन दो पृष्ठों पृष्ठ संख्या ९ और १० पर क्रमशः सादा और रंगीन रूपों में दे दिया गया. इस तरह जब पानी की तरह पैसा बहाया जाएगा तो इस धनयुग में कौन ऐसा मूर्ख सत्यनिष्ठ होगा जो फिसल और मचल नहीं जाएगा और हुक्मफरमानी करने की सोंचेगा भी. ई.टी.वी. के प्रवीण बागी ने की और टीम सहित बाहर कर दिए गए, सुभाष पाण्डे ने की और जागरण परिवार ने उनका तबादला कर दिया. ऐसे अनेकों उदाहरण उपलब्ध हैं जो यह बताते हैं कि बिहार की मीडिया पर किस कदर नीतीश कुमार का प्रभाव कायम हो चुका है.

लेकिन सावधान, हे दुश्शासन (सुशासन)!! झूठ के हाथ भले ही हजार होते हों पाँव आज भी नहीं होते. हर चीज की एक हद होती है तो सच को छिपाने की भी होती होगी. पब्लिक को कब तक बरगलाईयेगा; वो तो खुद ही भुक्तभोगी भी है और द्रष्टा भी? दुनियावालों से भले ही इस तिकड़म से सच्चाई छिप भी जाए परन्तु बिहार के गाँव-गाँव, शहर-शहर में रहनेवाली जनता तो सब कुछ जानती है. इसलिए सरकार के लिए श्रेयस्कर यही रहेगा कि बिहार अभिव्यक्तिक आपातकाल को तीन दशक बाद फिर से जीवन्त करने के बजाए अपने प्रदर्शन में सुधार करे. अपनी सोंच, नीति और नीयत में बदलाव करे. आईने को डराने-धमकाने और ललचाने से किसी को कुछ हासिल न तो हुआ है और न ही भविष्य में कभी होनेवाला ही है; बेहतर यही होगा कि अपनी सूरत को ही संवारने की भरपूर कोशिश की जाए. अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब जनता झूठ बोलनेवाले दर्पण को तो तोड़ डालेगी ही झूठी बाइस्कोपी सरकार को भी अपदस्थ कर देगी.

शायद बहुत जल्द राज्य सरकार और राज्य के प्रेस पर काटजू साहब और भारतीय प्रेस परिषद् का डंडा भी चले और सड़े हुए प्याज की शल्कों की तरह वीभत्स सच्चाई की परतें नजर आने लगे. सरकार को समझना चाहिए कि बिहार की जनता ने उसे अभूतपूर्व बहुमत देकर एक अमूल्य अवसर दिया है राज्य और राज्यवासियो का यथार्थपरक विकास करने के लिए न कि जबरदस्ती सबकुछ ठीक-ठाक है का झूठा अहसास करवाने के लिए. मीडिया को भी अपने कर्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए अन्यथा सरकार की छवि तो उसके सुधारने से सुधरेगी नहीं खुद मीडिया की छवि भी विकृत हो जाएगी और तब शायद फिर से उसे बनाने में सदियों का समय लग जाए. अंत में मैं एक बार फिर नीतीश जी को सावधान करना चाहूँगा कि वक़्त रहते संभल जाईए, नहीं संभले तो हो सकता है कि अगले विधानसभा चुनाव के बाद आपको मुख्यमंत्री की ड्राइविंग सीट के बदले विपक्ष के नेता की कुर्सी पर यानि बैकसीट पर बैठना पड़े या फिर मायावती जी की तरह दिल्ली का रूख करना पड़े और ऐसा आप पहले कर भी चुके हैं. याद कीजिए, याद आ जाएगा.    

लेखक ब्रजमोहन सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. उनका लेख उनके ब्‍लॉग से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

Fraud Nirmal Baba (16) : एनके सिंह, आशुतोष, अजीत अंजुम, शाजी जमां की चुप्पी का मतलब

भड़ास4मीडिया की तरफ से स्टार न्यूज के शाजी जमां, न्यूज24 के अजीत अंजुम, आईबीएन7 के आशुतोष, साधना के एनके सिंह आदि को एक मेल भेजा गया जिसमें उनसे निर्मल बाबा पर अपना पक्ष रखने का अनुरोध किया गया था. लेकिन इन सारे संपादकों ने मेल को पी लिया. कोई जवाब नहीं दिया. सबकी बोलती बंद है. लगता है कि निर्मल बाबा के पैसे ने इन सबकी बोलती बंद कर दी है. निर्मल बाबा के पैसे के प्रति प्रतिबद्ध इन संपादकों ने अपनी इस करतूत के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से देश में अंधविश्वास को बढ़ावा देने का पाप किया है. मीडिया का काम कहां अंधविश्वास और पोंगापंथ के खिलाफ जनता को जागरूक कर ढोंगियों का पर्दाफाश करना था तो अब इसके उलट रहा है. मीडिया और इसके महान संपादक ढोंगी बाबाओं की मार्केट अपग्रेड अपडेट करने में लगे हैं.

निर्मल बाबा साक्षात उदाहरण है. कैसे एक शख्स ने मीडिया को पैसे के बल पर खरीद लिया और संपादकों की बोलती बंद कर दी. विभिन्न मंचों से भाषण देने वाले ये तमाम महान संपादक अब चुप हैं. अब जरूरत इन संपादकों को घेरने और कोसने की है. मंचों पर तरह तरह से चिचियाने वाले इन संपादकों की फिलहाल बोलती बंद क्यों है, इसे आम पत्रकार और मीडिया के लोग खूब समझ रहे हैं. कायदे से इन संपादकों को आगे से नैतिकता आदि पर लेक्चर नहीं देना चाहिए. इन संपादकों के दांत खाने के और, दिखाने के और हैं, यह सब समझने लगे हैं. कारपोरेट घरानों की तरह मीडिया हाउस भी कारपोरेट हो गए हैं जिनका एक मात्र मकसद मुनाफा कमाना है. और, संपादकों की औकात मुनाफा कमाने के टूल वाले मार्केटिंग मैनेजरों से ज्यादा की नहीं रह गई है. उधर, टीवी न्यूज़ चैनलों की पैदाइश निर्मल बाबा को लेकर फेसबुक, ट्विटर, ब्लाग, वेब पर चर्चा तो खूब हो रही है, बाबा के ढोंग का पर्दाफाश किया जाने लगा है लेकिन ये महान संपादक अब तक चुप्पी साधे हुए हैं. चैनलों में सिर्फ एक न्यूज चैनल है, न्यूज एक्सप्रेस जिसने साहस दिखाते हुए निर्मल बाबा के खिलाफ प्रोग्राम शुरू कर दिया है. इसके लिए मुकेश कुमार बधाई के पात्र हैं. मुकेश कुमार ने भड़ास4मीडिया के भेजे मेल के जवाब में निर्मल बाबा पर न सिर्फ अपना पक्ष लिखकर भेजा बल्कि आश्वस्त भी किया कि उनका चैनल निर्मल बाबा के पाखंड के खिलाफ वेब मीडिया के अभियान में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देगा.

संपादकों को भेजा गया पत्र यूं था…


विषय- न्यूज चैनलों पर निर्मल बाबा का साया और निर्मल बाबा पर चैनलों की माया…. आपकी राय चाहिए..

महोदय

निर्मल बाबा का जो फर्जी कार्यक्रम न्यूज चैनलों पर दिखाया जाता है, वह न्यूज चैनलों के टाप 50 कार्यक्रमों में शुमार हो रहा है. मतलब कि यह कार्यक्रम खूब टीआरपी बटोर रहा है. साथ ही यह प्रायोजित कार्यक्रम होने की वजह से पैसा भी दे रहा है. क्या न्यूज चैनलों को निर्मल बाबा की असलियत पर बहस कराने की जगह उनसे पैसे लेकर उन्हें महिमामंडित करने वाले कार्यक्रम दिखाने चाहिए? निर्मल बाबा पर चैनलों की माया और चैनलों पर निर्मल बाबा का साया… इस मुद्दे पर आपकी और बीईए की राय चाहिए. कृपया अपनी राय मेल के जरिए bhadas4media@gmail.com पर भिजवा दें ताकि उसका प्रकाशन भड़ास4मीडिया पर कराया जा सके. इस मुद्दे पर भड़ास पर हम लोग एक सीरिज प्रकाशित कर रहे हैं जिसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

http://bhadas4media.com/component/search/?searchword=fraud+nirmal+baba&ordering=oldest&searchphrase=all&limit=20

आभार
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया


yashwant

www.bhadas4media.com
No.1 Indian Media News Portal
+91 9999330099


इस पत्र को फेसबुक पर भी प्रकाशित किया गया जिस पर कई टिप्पणियां आईं. इन टिप्पणियों को नीचे पढ़ सकते हैं….

Ravindra Chaudhary News chennelo ko to note kamane se matlab janta jaye bhad me

Zafar Irshad But isse kisi ki dharmik bhawnao ko dukh hua to…unke bahut fallowers hai bhai…

Haresh Kumar निर्मल बाबा जैसे लोगों को पील खोलना भी हमारे कर्तव्यों में शामिल है। ऐसे लोगों को चौराहे पर लाकर उनकी असलियत लोगों को बतानी चाहिए। ये चैनल वाले पैसे के लालच में कुछ भी दिखाने को तैयर होते हैं जिसकी टीआरपी मिले।।

Punit Bhargava Ek taraf sri-sri ki statement aur dusri taraf nirmal baba… desh me ek bar fir dharm sudhar andolan ki zarurat hai.

Ravindra Chaudhary Koi bhi dharm kisi ko lutne ki chhut nahi deta

Mayank Saxena पूरी तरह सहमत…बीईए को इसका संज्ञान भी लेना चाहिए…और सम्पादकों को इस पर अपना मत खुल कर बोलना चाहिए…

Manish Chandra Mishra सराहनिए कदम

Mayank Saxena इस पर रायशुमारी कराइए पत्रकारों के बीच…औक जस्टिज काटजू का भी मत जानिए…कुछ बड़े पत्रकारों का भी…लकिन हां इसके बाद अखबारों में छपने वाले ऐसे विज्ञापनों पर भी चर्चा हो…केवल टीवी पर ही निशाना न हो…

Vivek Dutt Mathuria सराहनिए कदम..स्वागत है आपकी पहल का और सहयोग भी

Vivek Dutt Mathuria सभी भक्त अपना- अपना दिमाग खोल लें , आपका दिमाग काले रंग का होना चाहिए…..ज्ञान की कृपा बरसाउंगा…
@फोर्थ आई ऑफ़ विवेक बाबा
अगला समागम टिम्बकटू में…

Yashwant Singh फालोवर इसीलिए ज्यादा हैं उनके क्योंकि हम मीडिया वालों ने अपना काम नहीं किया.

Vikram Adetay निर्मल बाबा ही क्यूँ , अन्ना , बाबा रामदेव और अरविन्द केजरीवाल का चैनलों पर आना , ये सब किस का कमल हैं , इसे सब जानते है पर सब चुप है क्यूंकि ज़बान पर ताला लगा दिया गया है , फिर भी अगर आप की कोशिशें रंग ला सके तो अच्छा है .

Mohan Mishra iske liye bhi sayad aapko black color ki purse leni pade aur 10 rs ka kadkadia note

Vinod Tiwari Ye pehel sarahni hai…. Mujhe lagta hai news channels ko apne fyde ke kiye janta ko gumrah nahi kerna chahiye kyo wo pura programm scripted aur planned hai jiske karan janta bhramin hoti hai aur ek aur gulami ke taraf kadam badta ja raha hai. Aise programm ko impotance dena band kerna chahiye…..

Jai Prakash isse koi fark nahi padega….kynki ye sab paise ka khel hai……….hamari apki kaun sunega……

Vinod Tiwari Jai sahab yaswant ji ki pehal jarur rang layegi

Michal Chandan निर्मल बाबा से पैसा वसूलने का नायाब तरीका है जनाब…लगे रहिए..सफलता जरूर म‌िलेगी

Sudhir Dandotiya विज्ञापन की एक सीमा तय कर देनी चाहिए पेड़ कार्यक्रम के बहाने एक एक घंटे तक दर्शको को बेबकूफ बनाना ठीक नहीं है ! बाबाओ के लिए भक्ति चेनल है वंहा प्रवचन दे …..

Sumit Gaur channels doing promotions for nirmal baba . may be they can achieve their target thru dis !

Nitin Mathur निर्मल बाबा के कार्यक्रम को रोकने का कानूनी पहलू क्या हो सकता है। या इस कार्यक्रम को रोकने का कोई भी पहलू क्या हो सकता है यह स्पष्ट होना चाहिए। निर्मल बाबा पैसे कमा रहा है इस बात पर यह कार्यक्रम कतई नहीं रुक सकता। यह लोगों को बेवकूफ बना रहा है, यह भी मुद्दा नहीं बन सकता क्यूंकि बाजार में हजारों प्रॉडक्टस और सेवाएं हैं जिनका काम ही लोगों को सपने दिखाना है। बाबा पैसे कमा रहा है, चैनल पैसे कमा रहा है और लोग पैसे दे कर तसल्ली पा रहे हैं। इसमें ज्वलंत मीडिया का रोल क्या और क्यों होना चाहिए।

Pankaj Jha बिल्कुल….अभियान चलाया जाना चाहिए ऐसे ठगों-लुटेरों के विरुद्ध.

Mayank Saxena बिल्कुल…इसका कानूनी पहलू है…आपको शायद न पता हो पर न केवल संचार माध्यमों से जुड़ी आचार संहिता बल्कि कानून भी अंधविश्वास फैलाने के बारे में बना हुआ है…साथ ही धोखाधड़ी और उसमें मदद के खिलाफ भी कानून हैं…अगर ऐसा न होता तो तमाम और बाबाओं को पुलिस तक भी इन्ही चैनलों ने पहुंचाया है…

Satish Shukla · Friends with Kamal Khan and 63 others
mai puri tarah se sahmat hoon par kya khalii NIRMALBABA HI HAII IS BUSINESS MEE … AJJ KALL BADEE BADEE THAGGGG KITABB BECH KAR YAA ASHRAMM CHALA KARR YAA PRAVACHWAN DEE KARR LOOT RAHEE HAIII … WOOO KIO NAHII ATTEE HAMARE NISHANE PARR …. iskaa matlab ye na smghaa jayee ki i m in favour of BABA … just globalize is ki kitnee FRAUD ???? BY THIS TOPIC ……

Govind Goyal ye naye dour kee patrkarita hai bhai sahab..

Nitin Mathur Fair & Lovely या काले को गोरा करने की कोई भी क्रीम भी इसी दायरे में नहीं आता। बाबा तो फिर भी कह देगा की लोगों को फायदा नहीं होता तो न आयें (किसी को तो फायदा होता ही होगा) whitener creams के तो ad में ही गोरी लड़की/लड़के को पहले काला कर के दिखाया जाता है। इस में तो रंगभेद का एंगल भी है।

Pramod Shrivastava आज व्यवसायिकता के दौर में चैनलों को सिर्फ माया से मतलब है…वे क्या दिखाते हैं…क्या बताते हैं…जो कुछ चल रहा है…उससे विश्वास की ज्योत जग रही है…या अंध विश्वास फैल रहा है…इससे उन्हैं कोई मतलब नहीं…न्यूज चैनलों पर निर्मल बाबा का साया तो है ही…लेकिन निर्मल बाबा को चैनलों के माध्यम से प्रचार और साथ ही जो माया मिल रही है…उसका भी तो अच्छा खासा परसेंट चैनल मालिकों की जैब में जा रहा है…तो फिर क्या है…कुछ भी दिखाओ…बस दिखाते जाओ…

Bhupendra Singh टीआरपी बढाने के लिए अन्‍य काम भी होने लगे हैं। न्‍यूज कम आ रहीं हैं।

    Prabhu Heda मै तो बाबा लोगो के शो कोमेडी शो जैसे सोच के देख लेता हु
    बड़ी दया और हसी आती है जब लोग बाबा के दरबार में रोते है उनकी महिमा गाते है !
    बाकि कुछ हो बाबा होते बड़े चमत्कारी है, जन कल्याण हो न हो उनका खुद का कल्याण होना चमत्कार से कम कहा है ?
    बैठे बैठे पैसे कमाने का कोई और जरिया बताओ जिससे बिना मेहनत के अरबो खरबों कमाए जाते हो ?

    Ashish Kumar 'Anshu' आप जैसे लोगों की वजह से बाबा की टी आर पी बढ़ रही है….हा हा ह अ

    Arun Sagar मित्रों!पैसों की दुनिया से आगे जाकर शोचने वाले बहुत कम हैं.और ये बाबा लोग तो शायद बिलकुल ही नहीं सोचते.लेकिन ऐसे कार्यक्रमों में जाने वाले लोगों के बारे में क्या कहा जाय.

    Ashish Kumar 'Anshu' जाने वालों का अपना गणित है, वर्ना यह देश अब तक अन्धविश्वास न पडा रहता ….

    पवन कुमार जैन आशीष कुमार जी तीर्थंकर महावीर के जन्मदिवस की शुभकामनाएँ।

    Ashish Kumar 'Anshu' sir aapako bhee…

    Ravish Kumar kya ka scope kaha se agaya ashish…paise le rahe hain..maze mil rahe hain. kya unko ye pata nahi ki vo kya bech rahe hain…kya aapko ab bhi lagta hai ki unhe bataane kee zarurat hai…vo khushi khushi kar rahe hain aur ye band nahee karenge.

    Ashish Kumar 'Anshu' प्रेष परिषद् को एक ऐसा बेबाक अध्यक्ष मिला और खुले आम चल रहे हैं इस पेड़ न्यूज़ पर वह भी चुप है….उन्हें भी इन्तजार होगा कि कोई तमाम सबूतों, गवाहों के साथ उनके सामने उपस्थित हो, उसके बाद वे कार्यवाई करें. क्या कहें , शर्म हमको मगर नहीं आती…

    Ashish Kumar 'Anshu' एक अनुमान के मुताबिक़ निर्मल बाबा हर महीने करीब दस करोड़ रूपए टी वी चैनलों को कार्यक्रम चलाने के लिए देते हैं

    Ashutosh Kumar Singh आशीष भाई शर्म की एवज में हम बड़ी रकम जो ले रहे हैं, वैसे भी शर्म बेचने की ही चीज होती है…क्या ख्याल है…

    Ashish Kumar 'Anshu' हमहूँ बेचीं, तुहो बेच,
    बेचे के आजादी बा,
    सबसे जियादा उ बेचीं,
    जे चॅनलधारी बा….

    Ashutosh Kumar Singh बेचने की होड़ लगी है…मंडी सजी है…कोई उसको बेच रहा है…कोई खुद को बेच रहा है…बेचो बेचो खुब बेचो…एक दिन आयेगा जब बेचने वाले को लगेगा कि उसी को किसी ने बेच दिया है…तब क्या होगा कालिया …

    Udayan Supkar achchha ho bura ho jaise bhe eho mak kamaao yahee adarsh vakya hai desh ka aur media ka..

    Rupchandra Upadhayay अब जब लोगो को इतने टॉप क्लास की कामेडी देखने को मिलेगी तो टी आर पी भी मिलेगी ,जय हो कोमल बाबा की ………..

    Rajeev Ranjan Prasad आशीष भाई यह ही संतोष की बात है कि वेब मीडिया पर निर्मल बाबा की असलियत पर अच्छी और सार्थक बहस चल पडी है। विजुअल मीडिया तो पैसे का पेड खडा करने में यकीन रखता है। नीरज नें कहा है – अंग्रेजों नें 200 सालों में भारत का जितना नुकसान नहीं किया उससे अधिक दो सालों में टीवी मीडिया नें किया है।

    Dhiraj Kumar Jha Desh ke Nirmal Baba jaise log atyant aavashyak hain. kaise? Are bhai Jab TRP badhega.. >>Jyada Income Jyada Tex Desh ke khazane me Betahasa vriddhi———– ——-> so Lage rahen Baba

    Ishika Richa Singh Sengar media ko aajkal paise se jyada matlab warna wo apne channel par jyotish aur pravchan ke programe nhi dikhate shayd wo bhul gaye ki un par jimmedari hai samaj ki sachayi samne lane ki

    Dhiraj Kumar Jha Richaji kyun bechare jyotishon ke pet par laat mar rahi hain, Jab Media sex padosta hai to log kahte hain ki hum dekhna chahte hain, par ismamle me….. Ha ha ha….Haan kuchh cheejen jo media dikhati hai bain hona chahiye jaise babalogon ka Shani grah se darana, adi.. Aap dekhiye Jab koi Jyotish samasya batate hain(NEWS channel par) to samadhan bhi batate hain jo kafi saral aur sasta hota hai, jaise ki — ye Mantr 5 baar japen, gareebon ko roti daan de. Agar Ramayan aur Geeta kori gapp bhi hain to bhi uske rachaita vidwan the jisne gareebon ke liye daan aur addhyayan karne walon ke liye Dakshina ki vayavastha kar di. "NIRMAL BABA IS THUG and PEOPLE following him are INNOCENT" SAUNA BELT ??? SANDHI SHUDHA ??? ENGLISH GURU ???

Fraud Nirmal Baba (15) : अब न्यूज एक्सप्रेस देखिए, निर्मल बाबा के ढोंग पर प्रोग्राम शुरू

एक नए न्यूज चैनल ने पुराने और तेज-बेबाक-तुरंत-फटाफट आदि तमगे से नवाजे जाने वाले स्थापित न्यूज चैनलों को आइना दिखाया है. मुकेश कुमार के नेतृत्व वाले चैनल 'न्यूज एक्सप्रेस' पर निर्मल बाबा के खिलाफ प्रोग्राम शुरू हो चुका है. बाबा के ढोंग पर चोट करने का काम प्रारंभ कर दिया गया है. अंधा युग नामक प्रोग्राम में बाबा, अंधविश्वास आदि पर बहस हो रही है. इस कार्यक्रम में पत्रकार धीरज भारद्वाज भी गेस्ट के बतौर मौजूद हैं. इस कार्यक्रम का प्रसारण लगातार जारी रहेगा.

निर्मल बाबा के मुद्दे पर एक तरफ जहां दूसरे न्यूज चैनलों ने पैसे व टीआरपी के लालच में घनघोर चुप्पी साध रखी है, वहीं न्यूज एक्सप्रेस ने न्यूज चैनल होने का कर्तव्य निभाने हुए बाबा की असलियत का खुलासा शुरू कर दिया है. न्यूज एक्सप्रेस ने निर्बल बाबा नाम से एक एक मिनट का फिलर व्यंग्य प्रोग्राम पहले से ही दिखाना शुरू कर दिया था जिसको लोग काफी पसंद कर रहे हैं.

सेलरी नहीं चाहिए तो सुदर्शन न्यूज़ में आपका स्वागत है

आज के युग में पत्रकारों की कोई अहमियत नहीं रह गयी है. पत्रकारिता की ताकत को देख हर युवा लोग पत्रकारिता से जुड़ना चाहते हैं किन्तु कुछ न्यूज़ चैनल ऐसे भी हैं जो जीविका के नाम पर भीख भी नहीं दे रहे हैं. इसका जीता जागता उदाहरण सुदर्शन न्यूज़ चैनल है जो तनख्वाह के नाम पर रोते दिखाई दे रहा है. यहां वही लोग जुड़ सकते हैं जो अपना घर फूंकना जानते हों और पत्रकारिता को अपना शौक समझते हों,  ना कि जीने का सहारा.

सुदर्शन में तो अधिकतर लोग मुफ्त में काम करते हैं और जिनको तनख्वाह मिलती है वे उस तनख्वाह से तो महीने भर चाय पकौड़ी पेट्रोल का खर्च तक नहीं वहन कर सकते.  चाय वाला भी सुदर्शन का पत्रकार होने के नाते उधार नहीं देता. सुदर्शन न्यूज के पत्रकारों से अच्छा वेतन तो मजदूर लोग पा लेते हैं. महोदय आपसे निवेदन है कि इसे भड़ास में जरूर शामिल करें और पत्रकारों का छोटे चैनलों द्वारा किए जा रहे शोषण पर अंकुश लगवाएं. मेरा परिचय गुप्त रखा जाए.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

खबर चुराए जाने से नाराज पीटीआई की तरफ से आईएएनएस को नोटिस

ये दोनों न्यूज एजेंसिया हैं. पीटीआई बोले तो प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया अंग्रेजी की जानी-मानी न्यूज एजेंसी है. आईएएनएस यानि इंडो एशियन न्यूज सर्विस भी चर्चित न्यूज एजेंसी है. लेकिन कई बार आईएएनएस वाले पीटीआई की खबर चोरी कर अपने नाम से चला देते हैं. इस बार तो आईएएनएस ने पीटीआई की पूरी खबर को ही उड़ा दिया. नेपाल में जनरल वीके सिंह ने पीटीआई से एक्सक्लूसिव बातचीत में जो कुछ कहा था, उसे आईएएनएस वालों ने चुराकर आईएएनएस की क्रेडिट लाइन देकर चला दिया.

इसे देख पीटीआई वालों ने सिर पकड़ लिया. मेहनत कोई और करे और क्रेडिट कोई और ले जाए. पीटीआई की तरफ से आईएएनएस को मेल भेजकर इस हरकत का विरोध किया गया और आगे से ध्यान रखने की नसीहत भी दी गई. देखना है कि आईएएनएस वाले आगे भी चोरी जारी रखते हैं या सुधर जाते हैं.

आई-नेक्स्ट के हेड आलोक सांवल अस्पताल में भर्ती

जागरण ग्रुप के बच्चा अखबार आई-नेक्स्ट के सर्वेसर्वा आलोक सांवल कानपुर में एक अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें पेट में अल्सर है, जिसका इलाज चल रहा है. पिछले हफ्ते भर से अस्पताल में भर्ती आलोक सांवल को मिलने देखने काफी मीडियाकर्मी अस्पताल पहुंचे और उनकी कुशल क्षेम ली. बताया जाता है कि आलोक सांवल पेट दर्द से परेशान थे. चेक कराया तो अल्सर निकला.

दवा से रोग ठीक न होने और दर्द काफी बढ़ जाने के कारण उन्हें अस्पताल में एडमिट कराना पड़ा. अब उनके स्वास्थ्य में सुधार है.

आनंद बाजार पत्रिका तथा स्‍टार के संबंध टूटने की खबरों से कर्मचारी परेशान

: प्रबंधन ने आईआईएमसी कैम्‍पस सलेक्‍शन में पास छात्रों को नहीं बुलाया इंटरव्‍यू के लिए : आनंद बाजार पत्रिका और स्‍टार समूह के मतभेद गहराने तथा संबंधों के टूटने का असर स्‍टार न्‍यूज के कार्यालय में भी देखने को मिल रहा है. यहां इस खबर को लेकर कर्मचारियों में असमंजस की स्थिति है. सन 2003 तीन से चले आ रहे इस संबंध को लेकर मार्केट में कई तरह की चर्चा है. खबर है कि कुछ आंतरिक मतभेदों के बाद आनंद बाजार पत्रिका समूह ने रुपर्ट मर्डोक के नियंत्रण वाले स्‍टार समूह के शेयर खरीदकर उसे बाहर करने की तैयारी कर ली है.

इस खबर के बाद से स्‍टार न्‍यूज में निचले स्‍तर पर भर्तियां भी रूकी पड़ी हैं. सूत्रों का कहना है कि एबीपी समूह तथा स्‍टार के बीच मतभेद गहराने वाले खबरों के आने के पहले स्‍टार न्‍यूज ने आईआईएससी के छात्रों का कैम्‍पस सलेक्‍शन करने की योजना बनाई थी. इस योजना के अनुसार 70 छात्रों का रिटेन परीक्षा लिया गया, जिसमें 26 छात्रों ने परीक्षा पास कर ली. बाद में इन्‍हें जल्‍द ही इंटरव्‍यू के लिए बुलाए जाने का आश्‍वासन दिया गया. पर इस बीच खबर आ गई की दोनों समूहों के बीच रिश्‍तेदारी खतम हो रही है. इसके बाद से ही प्रबंधन ने इन छात्रों के इंटरव्‍यू का कार्यक्रम टाल दिया है.

सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन खुद असमंजस में है कि पता नहीं कंपनी क्‍या कदम उठाने वाली है. इसलिए इन छात्रों को इंटरव्‍यू के बारे में अभी तक कोई सूचना नहीं दी गई है. एबीपी समूह ने भारत में स्‍टार की पूरी हिस्‍सेदारी खरीदने की तैयारी कर ली है. गौरतलब है कि नौ साल पहले दोनों समूहों ने मिलकर मीडिया कंटेंट एंड कम्‍युनिकेशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (एमसीसीएस) का गठन किया था. इस कंपनी के स्‍वामित्‍व में स्‍टार न्‍यूज और दूसरे चैनल संचालित किए जा रहे थे. बताया जा रहा है कि दोनों कंपनियों के बीच संपादकीय और अन्‍य रणनीतिक मसलों को लेकर मतभेद हो गया है. जिसके बाद संयुक्‍त कंपनी के प्रबंधन एक दूसरे से अलग होने की तैयारी में हैं.

एमसीसीएस में आनंद बाजार पत्रिका की 74 फीसदी हिस्‍सेदारी है जबकि शेष 24 फीसदी पर रुपर्ट मर्डोक के स्‍टार न्‍यूज ब्राडकास्टिंग लिमिटेड का नियंत्रण है. ‍एमसीसीएस 24 घंटे के तीन समाचार चैनलों – स्‍टार न्‍यूज, स्‍टार आनंद और स्‍टार माझा का संचालन तथा प्रसारण करती है. सूत्र बताते हैं कि दोनों कंपनियां इस सौदे को अंतिम रूप देने की तैयारी में जुटी हुई हैं. संभावना है कि जल्‍द ही इसकी आधिकारिक घोषणा की जा सकती है. सौदे के शर्तों तथा मूल्‍यांकन की जानकारी अभी सामने नहीं आई है. पर स्‍टार न्‍यूज के पत्रकार ब्रांड नेम को लेकर परेशान हैं.

चैनल में कार्यरत कर्मचारी बताते हैं कि आनंद बाजार पत्रिका समूह तथा स्‍टार के अलग होने की खबरों से पत्रकार परेशान हैं. ब्रांड बन चुके स्‍टार का अलग होने की सूचना सभी को कचोट रही है. कहा जा रहा है कि सौदा पक्‍का हो जाने के बाद एबीपी अपने बांग्‍ला चैनल को आनंद और मराठी को माझा टीवी का नाम दे सकती है. वहीं स्‍टार न्‍यूज को आनंद बाजार टीवी नाम दिए जाने के कयास लगाए जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि एबीपी ग्रुप इस सौदे में गैर प्रतिस्‍पर्धी शर्त लगा सकती है, जिसके चलते स्‍टार एक से डेढ़ साल तक कोई चैनल भारत में लांच नहीं कर सकेंगे या किसी से साझेदारी नहीं कर सकेंगे.

Fraud Nirmal Baba (14) : ढोंग का होने लगा पर्दाफाश, कई तथ्य सामने आए

निर्मल बाबा की पोल खुलने लगी हैं. उसके बारे में कई तथ्य सामने आए हैं. पता चला है कि निर्मलजीत सिंह नरुला उर्फ निर्मल बाबा झारखंड के वरिष्ठ राजनेता इंदर सिंह नामधारी का सगा साला है. इस साले को नामधारी ने मंत्री रहते हुए ठेकेदारी के मैदान में जमाने की काफी कोशिश की लेकिन यह जम नहीं पाया. टीवी पर दिखने वाला निर्मल सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा असल में ठग है जो पैसे के बदले कृपा बांटने का ढोंग करता है. इस ढोंगी बाबा का ससुराल झारखंड में है और ये दस वर्ष से अधिक समय तक वहां गुजार चुका है. ये झारखंड के सांसद इंदर सिंह नामधारी का सगा साला है.

ढोंगी बाबा विवाह के बाद करीब 1974-75 के दौरान झारखंड में आया था और लाईम स्टोन का व्यवसाय शुरू किया. मगर उसमें सफल नहीं हुआ. इसके बाद गढ़वा में कपड़े का व्यवसाय शुरू किया, लेकिन वहां भी सफल नहीं हो सका. एक वक्त ऐसा भी था कि ये निर्मल बाबा काफी परेशानियों से जूझ रहा था. तब बिहार में मंत्री रहे इंदर सिंह नामधारी ने माइनिंग का एक बड़ा काम इसे दिलवाया था. तब यह ठेकेदारी का काम करता था. उसी कार्य के दौरान इस पाखंडी बाबा को ‘ज्ञान’ की प्राप्ति हुई, इसके रिश्तेदारों ने ऐसी अफवाह फैलाई. 1984 के दंगे के दौराज जब ये रांची में था, तो किसी तरह से ये अपनी जान बचाकर वहां से भागा था. गोमो में निर्मल नरूला का साढ़ू भाई सरदार नरेन्द्र सिंह नारंग हैं. इनका विवाह भी दिलीप सिंह बग्गा की बड़ी बेटी के साथ हुआ था. जाहिर है इस ढोंगी ने अपने राजनैतिक रिश्तों के चलते ही सभी विद्रोहियों को बढ़ने का मौका नहीं दिया.  टीवी पर अपना ढोंग दिखा-दिखा कर लोगों को अपने भगवान होने का अहसास करवाने वाले बाबा का खुद का कोई कारोबार नहीं है.

झारखंड के वरिष्ठ राजनेता इंदर सिंह नामधारी वैसे तो निर्मल बाबा के करीबी रिश्तेदार हैं लेकिन उनके कारनामों से जरा भी इत्तेफाक नहीं रखते. एक बातचीत में नामधारी ने साफ कहा कि वे निजी तौर पर कई बार उन्हें जनता की भावनाओं से न खेलने की सलाह दे चुके हैं. नामधारी ने स्वीकार किया कि निर्मल बाबा उनके सगे साले हैं. उन्होंने यह भी माना कि वे शुरुआती दिनों में निर्मल को अपना करियर संवारने में खासी मदद कर चुके हैं. उन्होंने बताया कि उनके ससुर यानि निर्मल के पिता एसएस नरूला का काफी पहले देहांत हो चुका है और वे बेसहारा हुए निर्मल की मदद करने के लिए उसे अपने पास ले आए थे. निर्मल को कई छोटे-बड़े धंधों में सफलता नहीं मिली तो वह बाबा बन गया.

निर्मल बाबा के विचारों और चमत्कारों के बारे में उन्होंने साफ कहा कि वे इससे जरा भी इत्तेफाक़ नहीं रखते. उन्होंने कहा कि वे विज्ञान के छात्र रहे हैं तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी कर चुके हैं इसलिए ऐसे किसी भी चमत्कार पर भरोसा नहीं करते. इसके अलावा उनका धर्म भी इस तरह की बातें मानने का पक्षधर नहीं है. ''सिख धर्म के धर्मग्रथों में तो साफ कहा गया है कि करामात कहर का नाम है. इसका मतलब हुआ कि जो भी करामात कर अपनी शक्तियां दिखाने की कोशिश करता है वो धर्म के खिलाफ़ काम कर रहा है. निर्मल को मैंने कई दफ़ा ये बात समझाने की कोशिश भी की, लेकिन उसका लक्ष्य कुछ और ही है. मैं क्या कर सकता हूं?” नामधारी ने बताया.  उन्होंने माना कि निर्मल अपने तथाकथित चमत्कारों के जरिए जनता से पैसे वसूलने के ‘गलत खेल’ में लगे हुए हैं जो विज्ञान और धर्म किसी भी कसौटी पर जायज़ नही ठहराया जा सकता.

पत्रकार धीरज भारद्वाज की रिपोर्ट.

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समस्या-हल : चार

इतिहास के विरुद्ध युद्ध घोषणा : क्या ममता का ही अपराध है? बाकी जो युद्ध अपराधी हैं, उनका क्या?

बंगाल और देशभर में इन दिनों इतिहास से छेड़छाड़ को लेकर बवंडर मचा हुआ है। बंगाल में ममता बनर्जी ने पाठ्यपुस्तकों से लेनिन मार्कस और सोवियत क्रांति को विदा कर दिया तो एनसीआरटी की ग्यारहवीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पुस्तक में संविधान रचना को लेकर बाबा साहेब डा भीमराव अंबेडकर की खिंचाई शंकर के एक पुराने कार्टून के मार्फत किया गया, जिसमें दिखाया गया है कि बाबा साहब शंख पर बैठे हैं और पंडित नेहरु हांका लगा रहे हैं। देश को खुला बाजार में तब्दील करने के बाद सत्तावर्ग के रास्ते में अड़चन बनी दो प्रणुख विचारधाराओं पर यह हमला अकस्मात नहीं है। पर इतिहास के विरुद्ध युद्धघोषणा की लंबी पृष्ठभूमि को समझे बगैर विकृत इतिहास बोध के वर्चस्व को समझा नहीं जा सकता। जिसने आदमी की पहचान ही खत्म कर दी और लगातार सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विषमता के पोषण का मुख्य हथियार बतौर इस्तेमाल हो रहा है।

मसलन बंगाल में तीन फीसद ब्राह्मणों को छोड़कर बारी आबादी अनार्य मूल से हैं और उनमें से अधिकांश शूद्र है। वैश्यों को छोड़कर। बंगाल में आज भी राजपूत और क्षत्रिय जातियां नहीं है। पर इतिहासबोध से वंचित होने के कारण बंगाल में लोग न सिर्फ अपने को सवर्ण और दूसरों को अछूत​  समझते हैं, बल्कि तीन पासद ब्राह्मणों का वर्चस्व जीवन के हर क्षेत्र में खुशी खुशी मान ले रहे हैं। ममता की कार्रवाइयों का यकीन मानिये, जनमानस पर उतना असर नहीं है, जितना अखबारों में दीखता है। उसीतरह बात बेबात अंबेडकर के अपमान को लेकर बवंडर मचाने वालों को न​  अंबेडकर, न उनकी विचारधारा और न ही उनके रचे संविधान से कुछ लेना देना है। नौकरी और आजीविका के मामले में कुला बाजार और निजीकरण के दौर में आरक्षण गैर प्रासंगिक हो गया है। लोग राजनीतिक आरक्षण बढ़ाने के पीछे पड़े हैं। जबकि आरक्षित वर्ग को अपने लोगों और समाज से कोई सरोकार ही नहीं है। वे सीधे सत्तावर्ग में शामिल हो जाते हैं। सत्ता में हिस्सेदारी से मलाईदार तबके की सेहत सुधरी जरूर है, पर बाकी लोगों​ का क्या?

आप राज्य से बाहर स्थानांतरित हो जाये तो आपको आरक्षण नहीं मिलेगा। भिन्न भिन्न राज्य में आरक्षण के अलग अलग मानदंड। यहां​ ​तक कि संथालों , मुंडा और भील समुदायों के लोगों को कई राज्यों में आरक्षम नहीं मिला। निनानब्वे फीसद शूद्र और अलग अलग राज्यों में बसाये गये बंगाली सरणार्थियों को असम और ओडीशा के अलावा आरक्षण नहीं मिला। ओबीसी को आरक्षण पर राजनीति होती है, पर उन्हें आरक्षण नहीं मिलता। उनकी न गिनती हुई और न पहचान। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे जनजाति बहुल राज्यों में अनेक जनजातियां है, जिन्हें ​ ​आरक्षण नहीं मिला। बंजारों की हालत और बुरी है। विस्थापितों की हालत और बुरी। सबसे बुरी है गंदी बस्तियों में रहने वाले बिना चेहरे के ​​लोगों की। विचारधारा का परचम लहराने वाले लोग उनके लिए क्या करते हैं, इसका सबूत तमाम आदिवासी इलाकों में राजनीतिक दलों की अनुपस्थिति और उनका अलगाव है। आदिवासी क्योंकि किसीको कुछ दे नहीं सकता, इसलिए उसके मरने जीने से ऱाजनीति का कोई​ ​ सरोकार नहीं।​
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​ऐसे में पाठ्य पुस्तकों में क्या है या नहीं है, इससे वंचितों को क्या फर्क पड़ता है? इस ज्ञान कारोबार के सिब्बल जमाने में?अस्मिता की राजनीति से विचारधारा की एटीएम मशीन हासिल करने वालों का मकसद सिर्फ हंगामा कड़ा करना है। न कोई सर्वहारा का ​​अधिनायकत्व चाहता है और न किसी को जाति के उन्मूलन में कोई दिलचस्पी है। सर्वहारा के साथ वाम जमाने में क्या हुआ, यह हमने ​​देखा है। सिर्फ ब्राह्मणों को महासचिव से लेकर लोकल कमिची तक बनाने वाले लोग इतिहास के साथ क्या सलूक करते हैं, इसका अभी आकलन नहीं हुआ। उसीतरह अंबेडकर विचारधारा के नाम पर अस्मिता, स्वाभिमान और सत्ता में बागेदारी की राजनीति ने जाति को पहले से ज्यादा मजबूत ही किया है। गढ़े हुए, खत्म किये हुए इतिहास के पुनर्निर्माण के बिना यह असंभव है।​
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​हम शरणार्थी लोग तो इतिहास और भूगोल से खदेड़े हुए लोग हैं। हमारी कोई अस्मिता नहीं है। पहचान नहीं है और न मातृभाषा है और न​ ​ नागरिकता। हमारे विघटन का वर्तमान ही भारत का इतिहास है , जिसे बार बार दोहराया गया। पर इसपर न पुरातत्व के अफसरान और न इतिहास के धुरंधरों की दृष्टि जाती है। सारे के सारे वर्ग हित से जुड़े है और इतिहास बोध जाति वर्चस्व के नीचे दबा हुआ है। अभी पिछले साल हम कच्छ​
​ की हड़प्पा नगरी धौलावीरा हो आये हैं।गौड़ भी घूमा हुआ है। कहीं भी पुरातत्व विभाग का काम पूरा नहीं हुआ। सिंधु घाटी की सभ्यता अभी परदे के पीछे है।एक अफसर एक नगर खोजता है और तालियां बटोरता है तो उस काम को आगे बढ़ाने के बजाये अगला अफसर अन्यत्र खुदाई में​ ​ जुट जाता है, जहां से उसकी विदाई होते ही , फिर अगला अफसर अन्य नगर की खोज में जुट जाता है।

बंगाल में इतिहास विकृति का सबसे व्यापक असर हुआ है। भारत में बौद्ध धर्म का प्रचलन सबसे ज्यादा वक्त तक बंगाल में रहा। पाल वंश​ ​ का शासनकाल भारत के गौरवशाली इतिहास का अंग है। बंगाल से पंजाब तक विस्तृत था पाल साम्राज्य।पाल राजाओं के साथ महाराष्ट्र के जादव शासकों का भी अच्छा संबंध रहा।ग्यारहवीं सदी तब आर्यावर्त से बाहर विंध्य और अरावली पहाड़ों के पार समूचे भारत में अनार्यों का राज ही था। तेरहवीं सदी तक भारत का भूगोल अनार्य था। राजस्थान में  की में राजपूतों और असम में अहमिया शासकों का कब्जा ग्यारवीं सदी में हुआ। ग्यरहवीं सदी में ही बंगाल पर सेन वंश का सासन कायम हुआ। तब तक ब्राह्ममों के लिए बंगभूमि व्रात्य और अंत्यज थी।सेन वंस के राजा बल्लाल सेन ने​​ कन्नौज से ब्राह्ममों को बुलाकर बंगाल में ब्राह्मण धर्म का प्रचलन करके सख्ती से मनुस्मृति लागू की और बड़े पैमाने पर बौद्धमत के​ ​ अनुयायियों को हिंदू बनाकर उन्हें अछूत घोषित कर दिया। बौद्धों का यह उत्पीड़न सेन वंश के अवसान के बाद इस्लामी शासनकाल में​ ​ भी जारी रहा। क्योंकि तब तक बंगाल के समाज पर ब्राह्मणों का कब्जा हो गया था। बंगाल में मुसलमानों को नेड़े कहते हैं। यानी जिनका ​​सिर मुंडा हो। मुसलमानों के सर मुड़े हुए नहीं होते। सर तो बौद्ध भिक्षुओं के ही मुड़े हुए होते हैं। इसका साफ मतलब है कि हिंदुत्व से नहीं, बल्कि हिंदुत्व के उत्पीड़न के मारे बौद्धमत के अनुयायियों ने बड़े पैमाने पर इस्लाम अपनाया।बंगाल और बाकी देश में आठवीं सदी से लेकर ग्यारहवीं सदी के कालखंड को अंधयुग बताते हैं। जबकि तब देशभर में अनार्य शासकों का राज था और उसी दौरान भारतीय भाषाओं और संस्कृति का ​​विकास हुआ। जिसमें अछूत जाति के कवियों और बौद्ध बिहारों का भारी योगदान था।जिस काल में भाषा और साहित्य का विकास हुआ हो,​ ​ उसे अंधा युग कैसे कहा जा सकता है?

सत्रहवीं सदी तक महाराष्ट्र से लेकर पूर्वी बंगाल तक जिन अनार्यों का राज रहा,जिन्होंने अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मरते दम तक लोहा लिया,​​ उनका कोई इतिहास नहीं है। लालगढ़ के लोधाशूली में २१ लोधा लोगों को अंग्रेजों ने सूली पर चढ़ाया था और कोयलांचल में अनेक आदिवासियों को पांसी पर चढा़या गया था, यह इतिहास कहां है?चुआड़ विद्रोह का इतिहास कहां है? सन्यासी विद्रोह और नील विद्रोह, मतुआ आंदोलन और छंडाल आंदोलन  का इतिहास कहां है? बंगाल की आखिरी शासक रानी रासमणि ने अंग्रेजों से लोहा लिया था। मछुआरे की इस बेटी ने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर की स्थापना की ​​और रामकृष्ण परमहंस को वहां स्थापित किया। इन रामकृष्ण को आज अवतार बताया जाता है, पर उनके तिरोधान पर आड़ियादह ​​श्मशान घाट पर उनकी अंत्येष्टि नहीं करने दी सवर्णों ने। क्योंकि वह अछूत की पुरोहित थे। श्वामी विवेकानंद उन्हीं के शिष्य थे। पर रामकृष्ण मिशन में रानी रासमणि की एक तस्वीर तक नहीं मिलेगी?रवींद्र संगीत बजाया जा रहा है बंगाल के हर चौराहे पर। रवींद्र की डेढ़ सौवीं जयंती की धूम है। पर जिस लालन फकीर के कारण रवींद्र की​ ​ रचना दृष्टि बनी, उन पर कोई चर्चा नहीं होती। चर्चा नहीं होती रवींद्र के दलित विमर्श की। एक बार हिंदी के विख्यात कवि केदारनाथ सिंह ने मुझसे तगादा देकर एक पांडुलिपि तैयार करवायी, जो उन्होंने हरिश्चंद्र पांदेय को  दे दी। पिछले करीब पांच साल से उस पांडुलिपि का अता पता​ ​ नहीं है। हिंदी में बांग्ला से बेहतर क्या हाल है?

विवेकानंद को सनातन धर्म के आइकन के रुप में प्रचारित किया जाता है, पर उन्होंने अंबेडकर से काफी पहले कह दिया था कि ागे शूद्रों का युग आयेगा। वे कायस्थ थे और मनुस्मृति के मुताबिक कायस्थ शूद्र होते हैं। इसीतरह ऩेताजी भी शूद्र थे और इसका खामियाजा कांग्रेस की राजनीति में उन्होंने और बाकी देश को भुगतना पड़ा। क्या क्या बतायें?

ईशा ने कहा था कि पहला पत्थर वहीं मारें जो अपराधी नहीं है, अब ममता को कठघरे में खड़ा करने वाले लोग भी अपने गिरेबां में झांके तो बेहतर!

लेखक पलाश विश्वास पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकर्मी हैं. अमर उजाला समेत कई अखबारों में काम करने के बाद इन दिनों जनसत्ता, कोलकाता में कार्यरत हैं. अंग्रेजी के ब्लॉगर भी हैं. उन्होंने 'अमेरिका से सावधान' उपन्यास लिखा है.

कब मिलेगी हमार टीवी के कर्मचारियों को सैलरी?

सैलरी एक ऐसी जरूरी चीज है, जिसके बलबूते कर्मचारी अपना घर चलाते हैं लेकिन ये समय पर न मिले तो सोचो कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कुछ ऐसी ही दयनीय स्थिति बनी है हमार टीवी में। यहां के कर्मचारियों को एक तो पहले ही एक महीने की सैलरी रोक कर मिल रही थी लेकिन हालात अब ये हैं कि जो रोक कर मिल रही थी वो भी नहीं दी जा रही है। सारे कर्मचारी बेहद परेशानी में है लेकिन इससे मालिक को कोई फर्क नहीं पड़ता।

कई कर्मचारी ऐसे हैं जो कि किराए के मकान में रहते हैं, कुछ बेहद दूर से आते हैं। सभी को परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। खाना-पीना, आना-जाना, बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्चे, आखिर इस महंगाई के जमाने में कैसे जी पाएंगे हमार टीवी में काम करने वाले कर्मचारी। ऑफिस न आओ तो मुसीबत, घर पर फोन पहुंच जाता है क्यों नहीं आए..? अब इस कंपनी को क्या इतना भी ज्ञान नहीं है कि कर्मचारियों के पास ऑफिस आने-जाने के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं। अगर कर्मचारियों को सैलरी मुहैया नहीं करा सकते थे तो कंपनी खोली ही क्यों..?

काम तो करवा लिया जाता है और सेलरी के नाम पर ठेंगा दिखा दिया जाता है जैसे कि दूसरे इंसान का कोई महत्व ही नहीं, उसके समय और धैर्य का कोई मूल्य ही नहीं। कंपनी के मालिक को इस पर संज्ञान लेना बेहद आवश्यक है। नहीं तो अंजाम बुरा भी हो सकता है। कृप्या मेरा नाम और ई-मेल आईडी न छापी जाए। आपकी अति कृपा होगी। क्योंकि ये लेख कर्मचारियों के भले के लिए लिखा गया है। शायद इस लेख से कुछ भला हो जाए। धन्यवाद।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सूर्यकांत द्विवेदी ने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया

जैसी की सूचना थी वरिष्‍ठ पत्रकार तथा अमर उजाला, मेरठ के संपादक रह चुके सूर्यकांत द्विवेदी ने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍होंने दिल्‍ली में ज्‍वाइन किया है. सूर्यकांत ने पिछले दिनों ही अमर उजाला, नोएडा से इस्‍तीफा दिया था, तभी से उनके हिंदुस्‍तान में जाने के कयास लगाए जा रहे थे.

सूत्रों का कहना है कि जल्‍द ही उन्‍हें मेरठ में हिंदुस्‍तान का संपादक बना दिया जाएगा. प्रबंधन मेरठ में पुष्‍पेंद्र शर्मा के कार्यों से संतुष्‍ट है, लिहाजा उन्‍हें आगरा या बरेली यूनिट में संपादक बनाकर भेजा जा सकता है.

अशोक एवं अखिलेश का तबादला, सुशील कार्यमुक्‍त, मनोज की नई पारी

अमर उजाला, सोलन से खबर है कि अशोक केडियाल का तबादला नाहन के लिए कर दिया गया है. वे कई सालों से ब्‍यूरोचीफ के पद पर कार्यरत थे. नाहन में भी उन्‍हें ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है.उनकी जगह अखिलेश महाजन को सोलन का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया जा रहा है. अखिलेश शिमला में अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे 10 अप्रैल को सोलन में ज्‍वाइन करेंगे.

हिंदुस्‍तान, अरवल से खबर है कि सुशील सिंह को कार्यमुक्‍त कर दिया गया है. संपादक अकु श्रीवास्‍तव के निर्देश पर सुशील को कार्यमुक्‍त किया गया है. सुशील पिछले चौहद सालों से हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बताया जा रहा है कि सुशील को बिना कोई कारण बताए हटाया गया है. इससे कई अन्‍य पत्रकारों में भी नाराजगी है. सुशील अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

दैनिक जागरण, मुगलसराय से कप्‍यूटर ऑपरेटर मनोज कुमार ने इस्‍तीफा देकर हिंदुस्‍तान के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. वे पिछले कई सालों से जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे. 

सुरेंद्र शर्मा बने अध्‍यक्ष, मुख्‍तार अंसारी महासचिव चुने गए

: रुहेलखंड मीडिया वर्कर एसोसिएशन का गठन : बरेली के पत्रकारों की बैठक में रुहेलखंड मीडिया वर्कर एसोसिएशन का गठन किया गया. बैठक के मुख्‍य अतिथि यूपी के लघु उद्योग एवं निर्यात प्रोत्‍साहन मंत्री भगवत शरण गंगवार रहे. इस दौरान पदाधिकारियों का भी सर्वसम्‍मति से चयन किया गया. अध्‍यक्ष पद पर सुरेंद्र शर्मा चुने गए तो महांमंत्री मुख्‍तार अंसारी बने. इन लोगों को अपनी पूरी कार्यकारिणी गठित करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. नीचे प्रेस विज्ञप्ति।

रिपोर्टर ने फेसबुक के जरिए भेजा इस्‍तीफा, संपादक ने फेसबुक पर ही स्‍वीकारा

: खुशहाल ने शुरू की हिमाचल आजकल से नई पारी : हिमाचल आजकल न्यूज चैनल से चीफ रिपोर्टर रमेश सिंगटा ने विदाई ले ली है और उनके स्थान पर खुशहाल सिंह ने हिमाचल आजकल ज्वाइन कर लिया है। हिमाचल आजकल से रमेश सिंगटा की विदाई बड़ी दिलचस्प ढंग से हुई। चैनल के प्रधान संपादक कृष्ण भानु और रमेश सिंगटा संयोग से एक साथ अपने-अपने फेसबुक एकाउंट पर ऑनलाइन पर थे। अचानक सिंगटा ने संपर्क कर फेसबुक पर लिखा कि वह एक नया अखबार ज्वाइन करना चाहते हैं, क्या अनुमित है।

प्रधान संपादक ने लिखा ‘सोच लो’ सिंगटा ने जवाब दिया ‘सोच लिया है’ और कृष्ण भानु ने फेसबुक पर ही सिंगटा को पदमुक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि नियमानुसार एक महीने का नोटिस देने की भी जरूरत नहीं है उन्हें पूरा वेतन दे दिया जाएगा। फेसबुक पर पद छोड़ने व फेसबुक पर ही पदमुक्त करने का पत्रकारिता जगत में यह संभवतः पहला मामला है।

पंजाब केसरी शिमला के वरिष्ठ संवाददाता खुशहाल सिंह ने हिमाचल न्यूज चैनल में आज से ही नई पारी शुरू कर दी है। खुशहाल पंजाब केसरी से पहले अजीत समाचार, आपका फैसला और दैनिक जागरण में काम कर चुके हैं। उन्हें हिमाचल आजकल न्यूज चैनल में चीफ रिपोर्टर बनाया गया है।

जरदारी के ‘अंडरवियर’ या ‘लंगोट’ का रंग पता नहीं कर पाए न्‍यूज चैनल

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी मय लाव-लश्कर के 8 अप्रैल 2012 को भारत पहुंच गये। जिन जरदारी और उनके देश को हम पानी पी-पीकर सौ-सौ गालियां एक सांस में देते हैं, उनके लिए देश के “हुक्मरान” पलक-पांवड़े बिछाये राहों में खड़े थे। उन जरदारी साहब के लिए हमारे हुक्मरानों ने, वो सब शाही व्यंजन (56 भोग) खास-खानसामाओं की फौज से तैयार करवा लिये, जिनकी सेना ने कारगिल में भारत की उन तमाम नव-विवाहिताओं के सिंदूर पोंछ दिये थे, जिनके हाथों की मेंहदी का रंग अभी फीका भी नहीं पड़ा था।

उन बहनों के हाथों की कलाईयां हमेशा के लिए सूनी कर दीं, जिनका इकलौता भाई भारतीय फौज में ट्रेनिंग के बाद पहली पोस्टिंग पर ही कारगिल की लड़ाई में झोंक दिया गया। और वो जरदारी की (पाकिस्तानी) सेना के हाथों बे-मौत मारा गया। जरदारी के “बे-हया वेलकम” के कड़वे सच को देख-सुनकर देश के उन सपूतों की मां दिल्ली से दूर गांव में पुराने बरगद, पाकड़ और पीपल के पेड़ों के नीचे, गांव के कुएं पर बैठी आंसू बहा रही थीं, 8 अप्रैल 2012 को, जिनके लाल कारगिल में बे-मौत देश के हुक्मरानों ने शहीद करा दिये। जिन “लालों” की बेबाओं का पुरसाहाल लेने वाला आज कोई हुक्मरान नहीं है। कोई बड़ी बात नहीं, कि कारगिल के कुछ शहीदों के बच्चों को आज सरकारी स्कूल की फीस भी नसीब न हो रही हो। ऐसे जरदारी की सेवा में गर्दन झुकाये खड़े थे…हमारे देश के वजीर-ए-आजम मन मोहन सिंह के हुक्म पर मंत्री पवन बंसल। बिलख पड़ीं होंगी कारगिल में शहीद हुए युवा लड़ाकों की मां, पत्नी और मासूम बच्चे। न्यूज चैनलों पर ये सब देखकर।

रही-सही कसर पूरी कर दी, देश के उन न्यूज चैनलों ने, जो कारगिल युद्ध के बाद आज तक कभी नहीं पहुंचे होंगे उस गांव में, जिसका “लाल” हंसते-हंसते कारगिल में शहीद हो गया। आज किस हाल में ज़िंदगी बसर कर रहा है, उस शहीद सैनिक का परिवार। उस परिवार की बदहाल ह़कीकत को चैनल पर बार-बार ब्रेकिंग दिखाने के लिए। कभी किसी न्यूज चैनल ने नहीं किया होगा, उस गांव का रुख। जरदारी के पीछे-पीछे देश के हुक्मरान “घिसट” रहे थे। ये कोई नई या हैरंतगेज जानकारी नहीं है। हमारे देश के सत्ता के गलियारों की ये पुरानी परिपाटी है…कि देश में आने पर दुश्मन को घी पिलाओ। ताकि अपनी सर-ज़मीं पर जाकर वो आंख तरेर कर हमें ही हमारे घी की ताकत का अहसास करा सके। और हम उसे दुनिया भर की नज़र में “अपना दुश्मन” साबित करने के लिए अरबों रुपया खर्च करें। वो रुपया जिसे आम-आदमी के नमक, मिट्टी के तेल, दाल-चावल पर टैक्स लगाकर “कमाया” गया है।

देश के न्यूज चैनल भी कदम-ताल मिलाकर जरदारी के पीछे-पीछे ऐसे घिसट रहे थे, मानो कलियुग में भगवान राम स-शरीर धरती पर उतर आये हों। उनकी एक झलक दिखाने के लिए चैनल के स्टेट-ब्यूर चीफ ने एक सप्ताह पहले ही बजट और प्लान बनाकर दिल्ली, नोएडा में मौजूद अपने “सर” को भेज दिया। ताकि जरदारी के तलबों से उड़ने वाली धूल की कवरेज (वीजुअल) भी लाइव ऑन-एअर करवाई जा सके। इतना भर होता तो झेल लेते। हद तो तब हो गयी, जब नींद के मारे सरकारी हुक्मरानों से हमारे न्यूज चैनल “ब्रेकिंग” के फेर में इस हद तक “ब्रेक”(टूट) हो गये, कि जरदारी के कपड़ों के भीतर तक जा पहुंचे। मसलन जयपुर पहुंचने पर जरदारी ने सूट उतारकर, ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर जाने के लिए कुरता-पाजामा पहन लिया। कुरता-पाजामा प्रेस करने के लिए बाकायदा अलग से एक प्रेस करने वाला बुलाया गया।

मैं दण्डवत हूं देश की सत्ता को नाकों चने चबबाने का कथित दावा करने वाले उन निजी न्यूज चैनल और उनके कथित कर्ता-धर्ताओं का, जिन्होंने जरदारी का कुछ भी दिखाने में कोताही नहीं बरती। फिर भी इतना करते-धरते चूक हो ही गयी। ब्रेकिंग के बादशाह कुछ कथित न्यूज चैनलों से। और वो चूक थी…जरदारी के “अंडरवियर” या “लंगोट” का रंग पता न कर पाने की। अगर कुरता-पाजामा के साथ साथ जरदारी के “लंगोट” के भी वीजुअल मिल जाते, तो शायद एक्सक्लूसिव वीजुअल की दुनिया में ये कलंक तो न लगता भारतीय

न्यूज चैनलों के माथे पर…कि जरदारी के लंगोट का वीजुअल नहीं मिल पाया…।

लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इन दिनों न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में एडिटर (क्राइम) के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क patrakar1111@gmail.com  के जरिए किया जा सकता है.

जीएनएन में स्ट्रिंगर बनाने के लिए वसूले जा रहे हैं पैसे!

कुछ करोड़ लगाकर आए दिन खुलने वाले चैनल ना तो जनता का दुख दर्द बांट पा रहे हैं और ना ही ये रूट लेबल के पत्रकारों का कुछ भला कर पा रहे हैं. इन्‍हें ऐनकेन प्रकारेण बस पैसा कमाने की चिंता रहती है, चाहे वो स्ट्रिंगर किसी को ब्‍लैकमेल करके दे या ये लोग निर्मल बाबा जैसों का विज्ञापन चलाकर मिले. मझोले स्‍तर के चैनल में पत्रकारों का हाल कितना बुरा है ये उनसे बात करके ही पता लगाया जा सकता है. निम्‍नतम सेलरी, लेटलतीफ सेलरी, काम की अधिकता, तनाव-दबाव, नौकरी की अस्थिरता के बीच पत्रकारिता करने की मजबूरी है इन पत्रकारों के सामने.

चिटफंड या उल्‍टे-सीधे काम करने वाली कंपनियों के इस फील्‍ड में आने से स्थिति और बदतर हो गई है. ऐसे ही एक चिटफंड कंपनी जीएन ग्रुप के चैनल जीएनएन का यूपी में हाल है. चिटफंडिया ग्रुप ने चैनल को फ्रेंचाइजी दे दी है. पर कंपनी ने फ्रेंचाइजी देने से पहले चैनल के लिए काम करने वाले स्ट्रिंगरों का पैसा चुकता नहीं किया. अब बताया जा रहा है कि यूपी में चैनल की फ्रेंचाइजी लेने वाले जितेंद्र गुप्‍ता अपने हिसाब से लोगों को रख रहे हैं. जाहिर है पुराने स्ट्रिंगरों से उनका कोई सीधा लेना-देना भी नहीं है.

कुछ स्ट्रिंगरों का कहना है कि जितेंद्र जिसे भी स्ट्रिंगर रख रहे हैं उससे लेटर और आईडी के नाम पर पांच से दस हजार रुपये की वसूली कर रहे हैं. जबकि पुराने स्ट्रिंगरों को अब तक ना तो पैसा दिया गया है ना ही उनसे इस संदर्भ में कोई बात की जा रही है. उत्‍तराखंड में यही काम उनके लिए चन्‍ना नाम के शख्‍स कर रहे हैं. हालांकि इन आरोपों को जितेंद्र गुप्‍ता पूरी तरह नकारते हैं. जितेंद्र का कहना है कि लेटर या आईडी के नाम पर किसी से एक पैसा नहीं लिया जा रहा है. हम जिन लोगों को रख रहे हैं उनके उपर रिपोर्टिंग और बिजनेस दोनों की जिम्‍मेदारी दी जा रही है. जो पैसे लिए जा रहे हैं वो विज्ञापन के मद में हैं. हम अपने स्ट्रिंगरों से एग्रीमेंट भी करा रहे हैं, उन्‍हें प्रति खबर तीन सौ दिया जाएगा.

कुरुक्षेत्र फिल्‍म महोत्‍सव में जमकर परोसी गई अश्‍लीलता, जांच के आदेश

यशवंत भाई, नमस्कार। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में आयोजित किए गए कथित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल में की गई दलाली और उसके स्तर के बारे में पिछले कई दिनों से सुना जा रहा था। अजीत राय नाम के जो शख्स इस धंधे में लिप्त हैं उनके पत्रकारिता कैरियर के बारे में तो मैं नहीं जानता, लेकिन पंजाब केसरी में जो समाचार छपा है अगर वह सही है तो यह बड़ी ही चिंता का विषय है।

वैसे विभाग के अध्यक्ष राजबीर सिंह पर जनसंपर्क विभाग में रहते हुए एक-दो विवादित मामले अभी भी लंबित है। उनके बारे में भी आपको शीघ्र ही जानकारी भेजूंगा। उनकी नियुक्ति भी पूरी तरह से विवादों से दूर नहीं है। फिलहाल यह समाचार शेयर कर रहा हूं, इसे स्थान देने की कृपा करें। नीचे पंजाब केसरी में प्रकाशित खबर। खबर को ठीक से पढ़ने के लिए नीचे अखबार के फोटो पर क्लिक करें।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

मीडिया का अराजक व्‍यवहार देश को तोड़ देगा

: समय से संवाद : चर्चिल ने भविष्यवाणी की थी. आजादी की पीढ़ी के नेताओं को गुजर जाने दीजिए, आने वाले नेता शासक या राज्यों के सूबेदार भारत को छिन्न-भिन्न कर देंगे. तबाह कर देंगे. हम इसी रास्ते हैं. अब सेना जैसे संगठन की छवि ध्वस्त करने में हम जी-जान से लग गये हैं. मैं मीडिया का आदमी हूं. लगातार अपनी गलतियों के बावजूद खुद को जिम्मेदार मीडियाकर्मी मानता हूं. पर मेरा निष्कर्ष है कि मीडिया का मौजूदा अराजक व्यवहार देश को तोड़ देगा. पहले सेनाध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री को लिखी चिट्ठी लीक होती है, फिर सेना के रूटीन अभ्यास को विद्रोह की शक्ल देकर पेश किया जाता है. पहले अखबारों में यह खबर छपती है, फिर दिन भर चैनलों पर इसकी व्याख्या-विश्लेषण होता है. क्या हम एक -एक कर संस्थाओं को तोड़ देने पर तुले हैं?

पहले राजनीतिज्ञों से भरोसा उठा, फिर नौकरशाही की लूट-भयानक कामों ने उसे अविश्वसनीय बनाया. विधायिका संशय के घेरे में है. छोटी-निचली अदालतों की साख पर भी सवाल उठते हैं. सरकारें भ्रष्टाचार की प्रतिमूर्ति लगती हैं. राजनीतिक दल निजी परिवारों की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गये हैं. अब कौन-सी संस्था बची है, जिसमें अखिल भारतीय बिंब (छवि) या सूरत झलकती हो? एक भारतीय सेना है, उसे भी गुटबाजी, कलह, आरोप-प्रत्यारोप के घेरे में लाकर हम कमजोर करने पर आमादा हैं.

हमारा शासक वर्ग, स्वभाव से अराजक और अनुशासनहीन है. भ्रष्ट और अक्षम ऊपर से. अब इसी संस्कृति या रास्ते हम सेना से डील करना चाहते हैं, तो ध्यान रखिए, जिस दिन भारतीय सेना से अनुशासन हटा, भारत सातवीं सदी में चला जायेगा. खंड-खंड होकर. हर कमी के बावजूद हमारी सेना ने गुजरे 60 वर्षो में दुनिया में भारत का मान-सम्मान बढ़ाया है. युद्ध में, आचरण व अनुशासन से भी. यह फख्र करने लायक संगठन है. भारत की एकता का सबसे सशक्त पाया.

दरअसल, जब ताकतवर केंद्र कमजोर पड़ता है, या कद्दावर नेता देश में नहीं रहते, तो व्यवस्थापिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका पर असर दिखता है. मीडिया भी इसी कारण निरंकुश और स्वच्छंद हो गया है. कई बार लगता है कि मीडिया की कुछेक ताकतें किसी विदेशी इशारे पर काम कर रही हैं. भारत को कमजोर करने के लिए. फर्ज करिए, लोकतंत्र और प्रेस की आजादी के जन्मदाता देशों में भी प्रेस क्या अपनी सेना के बारे में ऐसे लिखता है? वहां भी राष्ट्रीय हित सबसे पहले है. अगर भारतीय सेना में कमी भी है, तो वह राष्ट्रीय बहस का विषय नहीं है. वैसे भी इंग्लैंड, अमेरिका वगैरह में प्रेस-मीडिया भारत की तरह स्वछंद और अराजक नहीं है. कुछ भी करने-कहने के लिए स्वतंत्र. क्या मौजूदा मीडिया के लोग इस असीमित आजादी के हकदार हैं? इनकी क्या जवाबदेही है, समाज, देश, शासन के प्रति? खुद मीडिया के अंदर जो सड़ांध है, उसका जिम्मेदार कौन है?

चिट्ठी लीक- पिछले महीने थल सेनाध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा पत्र छपने से भूचाल-सा आ गया. थल सेनाध्यक्ष को बर्खास्त करने की मांग संसद में गूंजी. सरकार ने तुरंत आदेश दिया, पत्र लीक की जांच का. आइबी को जिम्मा सौंपा. अब खबर आ गयी है कि यह खबर-पत्र सेनाध्यक्ष के यहां से लीक नहीं हुआ. फिर बचे कौन? उसकी जांच क्यों नहीं हो रही है? अब संसद या राजनेता चुप क्यों हैं? यह जांच भारत की एकता-अखंडता से जुड़ी है. राजनीति (संसद), सरकार-नौकरशाही ने हर चीज को अगंभीर और मजाक बना दिया है. क्यों नहीं समय के तहत स्पष्ट जानकारी देश को मिलती है कि लीक का यह देशद्रोह किसने किया? इसकी जांच कर दोषी को सजा के अंतिम मुकाम तक हम नहीं पहुंचायेंगे, तो भारत एक कैसे रहेगा? चर्चा है कि ईमानदार सेनाध्यक्ष और ईमानदार रक्षा मंत्री के कार्यकाल में हथियार दलालों की लॉबी ने यह काम कर सेनाध्यक्ष को बदनाम करने की कोशिश की है. देश का ध्यान हथियार दलालों के भ्रष्टाचार से भटक जाये, इसलिए यह काम हुआ है. जहां दलाल, भ्रष्ट, देश के लुटेरे (हथियारों की सौदेबाजी से भारत को लूटनेवाले), यह ताकत रखते हों कि सेनाध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे अतिगोपनीय पत्र को लीक करा दे, तो फिर क्या बचा?

अब यह चिट्ठी लीक हो ही गयी है, तो उसमें उठे सवालों पर मौन क्यों? उस चिट्ठी में भारत की सेना के पास गोला-बारूद, हथियार न होने की स्थिति पर संसद या राजनीति मौन क्यों है? इस स्थिति के लिए जबावदेह कौन है? सत्ता गलियारों में यह चर्चा भी है कि हथियारों के दलालों ने अपने कारनामों के भंडाफोड़ के भय से चिट्ठी लीक करायी और अब इसी लॉबी के सौजन्य से एक और मामला उछला है कि सेना की दो डिवीजनें, जनवरी में दिल्ली की ओर कूच कर रही थीं, बिना सूचना या पूर्व अनुमति के. हालांकि यह रूटीन अभ्यास था. इस रूटीन अभ्यास को विद्रोह के रूप में पेश करने की कोशिश हो रही है.

भारत की राजनीति के लिए सबसे अहं सवाल क्या है? आज भारत हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है. तीन-चार दशकों पहले चीन भी ऐसी ही स्थिति में था. आज चीन हथियार निर्माण में आत्मनिर्भर है और निर्यातक भी बन गया है. भारत क्यों नहीं हथियार आयातक से हथियार उत्पादक देश बना? चीन की तरह. इसे रोकने का काम किस लॉबी ने किया? क्या चीन के पैसे हथियार दलाली की कटौती के रूप में स्विस बैंक पहुंचते हैं? उन लोगों ने भारत को चीन की तरह हथियार उत्पादक -निर्यातक देश नहीं बनने दिया? मूल सवाल यह है, जिस पर संसद मौन है.

सूबेदारों से सवाल- ममता बनर्जी, जयललिता से लेकर नरेंद्र मोदी तक ने एनसीटीसी (आतंकवादियों को रोकने का केंद्र का नया संघीय कानून) के खिलाफ जेहाद कर दिया. अब मई में मुख्यमंत्रियों के साथ इस पर अलग बैठक -बातचीत होगी. याद रखिए, जब-जब आतंकी हमला (बाहरी हमले का नया रूप) होता है, तो सभी दल के नेता केंद्र को ही कोसते हैं. पर, भारत के नये छत्रप-सूबेदारों से एक सवाल, क्या कभी भारत को आतंकवादियों से बचाने के मुद्दे पर चर्चा के लिए भी केंद्र सरकार को विवश किया है? जनता की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठे, इसके लिए केंद्र को घेरा है? क्या ऐसे सवालों के लिए मुख्यमंत्रियों का विशेष सम्मेलन हुआ है? 26/11 को भारत में आतंकवादी हमले में मारे गये निदरेष लोगों के गुनहगारों को दंडित करने के लिए अब तक क्या हुआ? इसके लिए सभी केंद्र सरकारों को इन मुख्यमंत्रियों ने विवश किया कि वह विशेष सम्मेलन बुलाये.

भारत को तबाह करने और 26/11 प्रकरण का संकल्प लेने वाला असली मुजरिम आतंकी हाफिज मुहम्मद सईद खुलेआम रावलपिंडी, कराची, लाहौर में भारत विरोधी रैली करता है. पाकिस्तान की संसद के सामने प्रदर्शन करता है? पर भारत क्या कर रहा है? क्या हमारे नये छत्रप-सूबेदार केंद्र से कभी यह सवाल भी करते हैं? क्या यह छत्रप इस देश की बेगुनाह जनता के प्रति भी प्रतिबद्ध हैं?

अपनी सामर्थ्य, संकल्प, प्रतिबद्धता और ताकत आंक लीजिए. अमेरिका ने आतंकी हाफिज सईद पर 51 करोड़ का इनाम घोषित किया, तो हम इतरा रहे हैं. गृहमंत्री प्रेस कान्फ्रेंस कर रहे हैं कि अब भारत भी दबाव बनायेगा. यह देश के साथ मजाक लगता है. अपनी अकर्मण्यता, मजबूरी और कमजोरी का इजहार. अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है, तब वजूद बचता है. अपने पुरुषार्थ, क्षमता और संकल्प को बोल कर बताना नहीं पड़ता. काम करके साबित करना होता है. 1993 में मुंबई विस्फोट का मुजरिम, भारत का घोषित शत्रु नंबर वन, दाउद इब्राहिम सुरक्षित और मौज में है. मसूद अजहर, सईद सलाउद्दीन, इलियास कश्मीरी, जकी-उर-रहमान लखवी, छोटा शकील वगैरह पिछले कई दशकों से भारत को तोड़ने-तबाह करने में लगे हैं. खुलेआम. ये भारत के अंदर आतंकी हमलों से तबाह करने में जुटे हैं. उनका खुला एलान है, भारत को तोड़ देना. इस पर भारत सरकार क्या कर रही है, यह चिंता भी किसी सूबेदार के दिल में है?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी का नया बयान आया है. चार दिनों पहले. “चीन का दुश्मन, पाकिस्तान का दुश्मन ”. क्या भारत के नये छत्रप इसका अर्थ नहीं समझ रहे या समझ कर भी नासमझ बने हुए है. चीन पहले ही हर तरफ से भारत को घेर चुका है. अब चीन के सवाल पर भारत की संसद भी बहस नहीं करती. उधर, सेनाध्यक्ष के पत्र से भारतीय सेना के बंदूक, गोला, बारूद, वगैरह की असलियत भी खुल गयी है. भारत मुश्किल में है. क्या कभी आपने सुना है कि भारत के अस्तित्व से जुड़े ऐसे सवालों पर नये सूबेदार केंद्र को बाध्य-विवश करते हों कि इन सवालों पर भी देश को बताया जाये?

भ्रष्टाचार का नया तमगा- अन्ना हजारे, बाबा रामदेव या देश के कोने-कोने में भ्रष्टाचार के संगीन मामले उठानेवाले लोग झूठे-गलत हो सकते हैं. पर भारत के पुनर्निर्माण-विकास में सहयोग करनेवाले साझेदार विश्व बैंक ने भारत की शिकायत केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से की है? वल्र्ड बैंक की इंस्टीट्यूशनल इंटीग्रिटी रिपोर्ट संस्था ने अपनी रिपोर्ट 2012 में भारत की राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण परियोजनाओं में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की पुख्ता शिकायत की है. सप्रमाण. यह महज सामान्य या चलताऊ आरोप नहीं है. इसमें तीन परियोजनाओं का उल्लेख है. लखनऊ-मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय राजमार्ग, द ग्रैंड ट्रंक रोड सुधार परियोजना और राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना. इन परियोजनाओं में विश्व बैंक ने पैसे लगाये हैं. केवल एक परियोजना में 26 करोड़ जालसाजी की बात सामने आयी है. इसने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अफसरों को भी करोड़ों रुपये घूस देने का उल्लेख है. ठेकेदारों की लूट का अलग ब्योरा है. हथियारों की खरीद में लूट, सड़क बनाने में लूट, खेल में लूट, टेलीफोन (2जी) में लूट . . जहां हाथ डालिए, वहां यही हाल. कहां पहुंच गया है, देश?

एक तरफ विश्व बैंक सड़क लूट की जानकारी सरकार को दे रहा है, तो दूसरी तरफ ग्लोबल इंटीग्रिटी रिपोर्ट 2011 जारी हुई. रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारतीय राजनीति में धन का खेल नहीं रुकनेवाला. रिपोर्ट के

अनुसार भारत के नेता नितांत गैर जिम्मेदार हैं. ये चार प्रसंग है. देश के हालात को जानने-समझने के लिए. राजनीति का असली चेहरा पहचानने के लिए.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

कानपुर में इनपुट इंचार्ज बनेंगे राघवेंद्र चड्ढा

दैनिक जागरण, व़ाराणसी के न्‍यूज एडिटर राघवेंद्र चड्ढा का ट्रांसफर कानपुर किया था। खबर है कि उन्‍हें कानपुर में इनपुट इंचार्ज बनाया गया है। बनारस में संपादकीय प्रभारी के पद पर कार्यरत थे। जागरण प्रबंधन इस वक्‍त जोर शोर से लोगों को इधर से उधर करने पर तुला है, जिसकी मुख्‍य वजह एक जगह पर वर्षों से टिके पत्रकारों का वर्चस्‍व को तोड़ना है। इसी क्रम में कानपुर और लखनऊ में भी कई पत्रकारों को इधर-उधर किया गया है।

जागरण प्रबंधन उन्‍हें यह बताना चाहता है कि मार्केट में उनकी पहचान जागरण की वजह से है ना कि उनके अपने संबंधों की वजह से, जिसे लेकर जागरण के वरिष्‍ठ पत्रकारों में काफी रोष है और वह जल्‍द ही कोई कठोर फैसला लेने के मूड में हैं। जागरण की साख दिन पर दिन उनके कर्मचारियों और पत्रकारों में गिरती जा रही है और यही कारण है कि कोई भी नया पत्रकार इनसे जुड़ने में रुचि नहीं दिखा रहा है, लेकिन जागरण प्रबंधन को यह बात समझ नहीं आ रही।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पीपुल्‍स समाचार, ग्‍वालियर से संपादक मनोज वर्मा समेत 36 लोगों का ट्रांसफर

पीपुल्स समाचार, ग्वालियर की उल्‍टी गिनती शुरू हो गई है। संपादक मनोज वर्मा का तबादला कर दिया गया है। वे ग्वालियर से रिलीव होकर चले गए हैं। उनके बारे में कहा जा रहा कि वे भोपाल में ज्वाइन करने के बजाय घर बैठना ज्यादा पसंद करेंगे। क्योंकि ग्वालियर में वे स्थानीय संपादक थे और भोपाल में उन्हें स्थानीय संपादक के अधीन रखा गया है। वहीं पीपुल्स समाचार, ग्वालियर में काम करने वालों को छंटनी का फरमान भी मालकिन रुचि विजयवर्गीय के दूत हरीश मरवाह ने सुना दिया है।

जो नया सेट अप रखा गया है कि उसके अनुसार ग्वालियर में अब कोई संपादक नहीं रहेगा। सिर्फ दो पेज ग्वालियर में तैयार होंगे। एक शहर का और दूसरा संभाग का। शेष सभी पेज भोपाल से तैयार होकर आएंगे। इसके लिए सिर्फ पांच लोग संपादकीय में रहेंगे। शेष सभी बाहर। इसी तरह कंप्यूटर ऑपरेटर और मार्केटिंग की टीम की छंटनी की जा रही है। बाहर करने का तरीका भी अनूठा तलाश किया है पीपुल्स समाचार के मालिकों ने। स्टॉफ से कहा जा रहा है कि आप एक हाथ में सेलरी लो और दूसरे हाथ में तबादला आदेश। तबादला आदेश पीपुल्स समाचार, रायपुर के लिए दिया जा रहा है, जहां से पीपुल्स समाचार प्रकाशित ही नहीं हो पाया है। कहा यह जा रहा है कि पीपुल्स ने वहां किराए का भवन ले रखा है जिसकी देखरेख के लिए अभी सिर्फ चपरासी और चौकीदार तैनात हैं। यानी ग्वालियर से जिन लोगों का रायपुर तबादला किया जा रहा है वे चपरासी या चौकीदार को रिपोर्ट करेंगे। यह लोग रायपुर जाकर काम क्या करेंगे अभी साफ नहीं है।

शनिवार को 35 लोगों को सेलरी के साथ रायपुर तबादले का आदेश यह कहते हुए दिया गया है कि हम जल्द ही रायपुर से भी पीपुल्स लांच करने वाले हैं। पीपुल्स समाचार, ग्वालियर में वेतन के भी लाले हैं। दो माह में एक बार वेतन मिल रहा है। जो लोग पीपुल्स समाचार ग्वालियर में छंटनी के दायरे में नहीं आए हैं उनकी हालत तो और भी खराब है। उन्हें मालिक की ओर से टारगेट दिया गया है हर माह दस लाख रुपए कमाने और डूब चुकी विज्ञापन की राशि को वसूलने का। मालिक का साफ कहना है कि आप लोगों को अपनी सेलरी खुद निकालना होगा और अखबार को छापने में खर्च होने वाला धन भी जुटाना होगा। कभी पीपुल्स समाचार सोलह प्लस चार पेज का निकलता था, जिसे अब कुल जमा 12 पेज का कर दिया गया है। कुल मिलाकर ग्वालियर में इन दिनों पत्रकारों के दिन ठीक नहीं चल रहे हैं। चिटफंडियों द्वारा शुरू किए गए अखबारों पर ताले लटक चुके हैं। यह चिटफंडिए गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए हैं। इनके अखबारों में काम करने वाले लोग बेरोजगार बैठे हैं कि जागरण द्वारा नईदुनिया खरीदे जाने के बाद नईदुनिया, ग्वालियर से अभी तक छोटे स्तर के 23 लोगों को बाहर का दरवाजा दिखाया जा चुका है और अब संस्थान के लिए सफेद हाथी बन चुके लोगों को बाहर करने की तैयारी है। कुल मिलाकर दो सैकड़ा के आसपास मीडियाकर्मी एक साल में बेरोजगार हो चुके हैं।

रतन सिंह जनसंदेश टाइम्‍स पहुंचे, शैलेंद्र एवं मनोज का तबादला

हिंदुस्‍तान, बनारस से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार रतन सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. रतन सिंह बिना गलती फोर्स लीव पर भेजे जाने से नाराज थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी जनसंदेश टाइम्‍स के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर चीफ सब एडिटर बनाया गया है. रतन सिंह पिछले दो दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. इनकी गिनती अच्‍छे खेल पत्रकारों में होती रही है. वे हिंदुस्‍तान के अलावा दैनिक जागरण तथा अमर उजाला को भी कई शहरों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

अमर उजाला, वाराणसी से खबर है कि दो लोगों का तबादला दूसरी यूनिटों के लिए कर दिया गया है. सब एडिटर शैलेंद्र श्रीवास्‍तव को लखनऊ भेजा जा रहा है. वहीं दूसरे सब एडिटर मनोज सिंह का तबादला प्रबंधन ने कानपुर के लिए कर दिया है. ये दोनों लोग लम्‍बे समय से अमर उजाला को बनारस में अपनी सेवाएं दे रहे थे. समझा जा रहा है कि अभी कुछ और बदलाव किए जा सकते हैं.

हिंदुस्‍तान के कई संपादकों के जिम्‍मेदारियों में बदलाव की चर्चा

हिंदुस्‍तान में कई संपादकों के बदलाव की बड़ी सूचनाएं मिल रही हैं. हालांकि सूत्र अभी इन्‍हें आधिकारिक रूप से पुष्‍ट नहीं कर रहे हैं, पर इन बदलावों को तय माना जा रहा है. जो चर्चाएं हैं उसके अनुसार हिंदुस्‍तान, मेरठ के संपादक पुष्‍पेंद्र शर्मा को आगरा भेजा जाने वाला है. पुष्‍पेंद्र की जगह अमर उजाला, मेरठ के संपादक रह चुके वरिष्‍ठ पत्रकार सूर्यकांत द्विवेदी को उनकी जगह नया संपादक बनाए जाने की चर्चा है. वहीं आगरा के संपादक तथा वरिष्‍ठ पत्रकार केके उपाध्‍याय के बारे में कहा जा रहा है कि प्रबंधन उनके कामों से खुश हैं. उनके निर्देशन में पश्चिमी यूपी की कई यूनिटें लांच की गई हैं.

केके उपाध्‍याय के बारे में दो तरह की चर्चाएं हैं. पहला यह कि उनके काम को देखते हुए उन्‍हें पूरे पश्चिमी यू‍पी का हेड बनाया जा सकता है. उनको लेकर दूसरी चर्चा यह है कि उन्‍हें बिहार का स्‍टेट हेड बनाया जाने वाला है. अब तक बिहार में स्‍टेट हेड की जिम्‍मेदारी निभा रहे अकु श्रीवास्‍तव को दिल्‍ली बुलाया जा सकता है. हालांकि हिंदुस्‍तान के वरिष्‍ठ लोग इन सूचनाओं को सही तो मान रहे हैं पर आधिकारिक रूप से कहने से बच रहे हैं. बताया जा रहा है कि अकु श्रीवास्‍तव और बिहार सरकार की ट्यूनिंग खराब हो गई है, जिसके चलते उन्‍हें दिल्‍ली बुलाए जाने की संभावना है. उम्‍मीद है कि अगले एक-दो दिनों में चीजें साफ हो जाएंगी. 

भास्‍कर में रोहतक के संपादक अमित गुप्‍ता समेत कई का तबादला

इन दिनों सभी बड़े अखबारों में तबादलों और जिम्‍मेदारियों के बदलाव का दौर चल रहा है. इस क्रम में भास्‍कर के पंजाब-‍हरियाणा के यूनिटों में भी तबादलों का दौर जारी है. दैनिक भास्‍कर, रोहतक के एनई अमित गुप्‍ता को अमृतसर भेजा जा रहा है. लुधियाना में तैनात डीएनई जितेंद्र श्रीवास्‍तव को रोहतक भेजा जा रहा है. रोहतक में स्‍थानीय संपादक के पद पर अभी किसी को नहीं भेजा गया है.

दूसरी तरफ लुधियाना कारपोरेट ऑफिस में तैनात डिप्‍टी एडिटर अमरजीत सिंह और समाचार संपादक सुरजीत सैनी का तबादला प्रबंधन ने चंडीगढ़ के लिए किया है. हालांकि इन लोगों के बदले जाने की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, परन्‍तु इनका जाना तय है. भास्‍कर के उच्‍च पदस्‍थ सूत्र बताते हैं कि जल्‍द ही इन लोगों को तबादला लेटर सौंप दिए जाएंगे. बताया जाता है कि कुछ और यूनिटों में जल्‍द ही बदलाव किए जाने वाले हैं.

अमर उजाला के तीन सीनियर सब हिमाचल दस्‍तक पहुंचे

हिमाचल प्रदेश से जल्‍द ही प्रकाशित होने जा रहे दैनिक हिमाचल दस्‍तक दस्‍तक ने दैनिक भास्‍कर के बाद अमर उजाला में भी सेंध लगा दी है. खबर है कि अमर उजाला, शिमला और जम्‍मू से तीन सीनियर सब एडिटरों ने इस्‍तीफा देकर हिमाचल दस्‍तक ज्‍वाइन कर लिया है. इसमें अंकित सोनी, धीरज गुरंग और राजीव थापा शामिल हैं. बताया जा रहा है कि अमर उजाला, हिमाचल से गिरीश गुरनानी के इस्‍तीफा देकर हिंदुस्‍तान जाने के बाद अमर उजाला में उठा-पटक जारी है, जिसके चलते लोग मौका मिलते ही दूसरे अखबारों में जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि कुछ और लोग भी आने वाले दिनों में अमर उजाला छोड़ सकते हैं.

मिशन बदला के तहत लांच किया जा रहा ‘हिमाचल दस्तक’!

: कानाफूसी : हिमाचल प्रदेश से सम्भवतः मई में शुरू होने जा रहा है अखबार ‘हिमाचल दस्तक’। वैसे तो इसका शुभारंभ जनवरी 2012 में होना था लेकिन टलते-टलते अप्रैल 2012 तक पहुंच गया है। अब कहा जा रहा है कि मई में तो अखबार लांच हो ही जाएगा। प्रारंभ में चर्चा थी कि 32 पेज का होगा, लेकिन अब 12 पेजी अखबार की चर्चा चल रही है। हिमाचल दस्तक का संपादक लंबी खोजबीन के बाद हेमंत कुमार को बनाया गया है। हेमंत कुमार दैनिक भास्कर में चण्डीगढ़ में रहे हैं और यह उनका पहला और अब तक का अंतिम अखबार है। कई तरह की चर्चाएं है। कहा जा रहा है कि संपादक के लिए कोई बड़ा नाम प्रबंधन को मिला नहीं, इसीलिए हेमंत ही सही। हेमंत कुमार के सगे साढू इस अखबार के स्टेट ब्यूरो चीफ तैनात किए गए हैं।

बताया जा रहा है कि अखबार के चेयरमैन के.पी. भारद्वाज एक ‘मिशन’ लेकर इस अखबार को शुरू करना चाह रहे है और वह है ‘मिशन बदला’। के.पी. भारद्वाज दैनिक अखबार ‘दिव्य हिमाचल’ के चेयरमैन भानु धमीजा से कोई पुराना हिसाब चुकता करना चाहते हैं। ‘दिव्य हिमाचल’ में के.पी. भारद्वाज एमडी रह चुके हैं। बाद में भानु धमीजा से अनबन हुई तो अखबार छोड़ दिया। इसी बीच एक करोड़ रुपये के फेर में उलझ गए। तिब्बतियों को जमीन बेची। एक करोड़ रुपये नगद लेकर दिल्ली से धर्मशाला जा रहे थे। ऊना में पकड़े गए और कई दिन जेल की हवा खानी पड़ी। मामला अदालत में है। शायद इस कारण भी ‘मिशन बदला’ कुछ समय के लिए लंबित रहा।

बहरहाल ‘मिशन बदला’ के तहत इस अजन्मे अखबार में ‘दिव्य हिमाचल’ की मार्केटिंग टीम ज्वाइन कर चुकी है। डेस्क और फील्ड में ‘दिव्य हिमाचल’ के उप संपादकों और संवाददाताओं को प्रलोभन दिए जा रहे हैं। प्राथमिक ‘दिव्य हिमाचल’ के कर्मचारियों को दी जा रही है। फलस्वरूप प्रदेश में अच्छे खासे पैर जमा चुके दिव्य हिमाचल में भी खलबली मची हुई है।

धर्मशाला से एक पत्रकार द्वारा भेजी गई रपट पर आधारित.

सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया के लिए दिशानिर्देश तय करने के संबंध में चार और मामले जोड़े

नई दिल्ली। मीडिया के लिए अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग के मकसद से दिशानिर्देश तय करने के प्रयास में लगे उच्चतम न्यायालय ने इस संबंध में दलीलों का दायरा बढ़ाने के लिए आरूषि हत्याकांड सहित चार और मामले जोड़े हैं। मीडिया को कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज लीक होने के बीच सहारा समूह और सेबी के बीच विवाद से संबंधित मामले में आवेदन जमा होने के बाद प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिया की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मामले पर सुनवाई की।

सुनवाई शुरू करते हुए पीठ ने कहा था कि कोई भी पक्ष इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए शिकायत दायर कर सकता है। हालांकि सुनवाई के दौरान द एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने शिकायत की थी कि केवल एक मामले को ध्यान में रखकर जिरह चल रही है और पर्याप्त तथ्यों के अभाव में में दलीलें तैयार करने में मुश्किल हो रही है।

एचटी, भोपाल के जर्नलिस्ट रंजन के पिता राजेश्वर का निधन

इलाहाबाद के एचटी के ब्यूरो चीफ रहे, इलाहाबाद न्यूज रिपोटर्स क्लब के सचिव रहे और वर्तमान में हिंदुस्तान टाइम्स, भोपाल के चीफ रंजन श्रीवास्तव के पिता राजेश्वर लाल श्रीवास्तव का शनिवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। मूलत: कुशीनगर के निवासी राजेश्वर लाल श्रीवास्तव सहकारिता विभाग की सेवा से निवृत्त हुए थे। 72 वर्षीय राजेश्वर लाल अपने पीछे दो पुत्र, चार पुत्रियों का भरा पूरा परिवार छोड़ गए।

श्रीवास्तव का शनिवार 7 अप्रैल दोहपर भदभदा शमशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव सहित पत्रकार, राजनेता, जनसंपर्क विभाग के अधिकारी-कर्मचारी शामिल हुए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने श्रीवास्तव के निधन शोक व्यक्त किया है। इसके अलावा जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता, नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर, भाजपा के नेताओं ने शोक व्यक्त किया है।

तूल पकड़ने लगा एनसीआरटी के पाठ्य पुस्तक में अंबेडकर के अपमान का मामला

सत्तावर्ग भारतीय संविधान के निर्माता बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के अपमान का कोई मौका नहीं चूकती। हालांकि अछूतों के वोटबैंक की​ ​खातिर सभी दलों की मजबूरी है कि बाबा साहेब का गुणगान किया जाये। अन्ना ब्रिगेड बाकायदा संविधान बदलने की मांग करता है तो खुद नेहरु ने संविधान की समीक्षा के लिए कमिटी बनायी। इंदिरा गांधी ने भी स्वर्म सिंह कमिटी बनायी। अब संविधान समीक्षा की बात नहीं होती। ​​आर्थिक सुधार के बहाने सारे कानून बदले जा रहे हैं। बाबा साहेब का रचा मूल संविधान तो वजूद में ही नहीं है। नागरिकता संविधान ​​संशोधन विधेयक तो संविधान में शरणार्थियों को पुनर्वास और नागरिकता दिये जाने के प्रावधान को बदले बगैर पास हो गया।

अंबेडकरवादी दलों ने कभी इसका विरोध नहीं किया। कोटा और आरक्षण के जरिए एमएलए, एमपी, मंत्री और मुख्यमंत्री बनने वालों का न बाबा साहेब से कोई सरोकार रहा और न उनके बनाये संविधान से। लेकिन अछूतों की भावनाओं की एटीएस मशीन से वोट निकालने खातिर जब तब बाबा साहेब के अपमान का मुद्दा जरूर उठता है।ताजा विवाद एनसीआरटी की गायरहवीं कक्षा में पाठ्य राजनीति विज्ञान की पुसत्क में प्रकाशित संकर के कार्टून को लेकर​ ​ है, जिसमें बाबासाहेब को शंख पर सवार और उन्हें हांकते हुए जवाहरलाल नेहरु दिखाये गये हैं। 1947 में देश को आजादी मिली. एक स्वतंत्र नये देश को चलाने के लिए एक नये संविधान की आवश्यकता महसूस की गई। नया संविधान बनाने के लिए प्रतिभावान कानूनविद, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, दार्शनिक के तौर पर गांधी जी और पंडित नेहरू को देश में डॉ अम्बेडकर के समतुल्य कोई योग्य व्यक्ति नजर नही आ रहा था। मजबूरन उन्होने डॉ अम्बेडकर को भारत का प्रथम कानून मंत्री बनाया तथा संविधान बनाने कि जिम्मेदारी दी।

महाराष्ट्र में भीम शक्ति शिव शक्ति महायुति के नेता रामदास अठावले जो बाबा साहेब की बनायी पार्टी रिपब्लिकन के एक धड़े के नेता हैं, इसपर सख्त एतराज जताया है। इससे यह मामला ​​तूल पकड़ने लगा है। लेकिन लगता है कि उत्तर भारत में यह खबर अभी फैली नहीं, इसलिए फिलहाल वहां से प्रितक्रिया, जैसी कि ऐसे मामलों में अमूमन दीखती है, की खबर नहीं है। आरपीआई (ए) के अध्यक्ष रामदास अठावले ने भगवा ब्रिगेड का दामन थाम लिया है। महाराष्ट्र में अछूतों के अलावा दूसरे समुदायों में भी भारी संख्या में दूसरे समुदायों के लोग हैं, जिनमें इसे लेकर तीव्र प्रतिक्रिया हो रही है। इसके मद्देनजर नालेज इकानामी वाले मानव संसाधन मंत्रालय अब हरकत में आया है और लीपापोती में लग ​​गया है।

मंत्रालय अब एनसीआरटी से इस प्रकरण की समीक्षा के लिए कहेगी। कहा नहीं है। इस पर तुर्रा यह कि सफाई यह दी जा रही है कि ​अंबेडकर कच्छप चाल से संविधान लिख रहे थे। उनके लेखन में गति लाने के लिए पंडित नेहरु हांका लगा रहे थे।यानी सरकार इस कार्टून में कोई बुराई नहीं देखती। वैसे भी यह कार्टून कोई नया नहीं है। यह सरकारी संस्था नेशनल बुकट्रस्ट की संपत्ति है, जिसका एनसीआरटी ने इस्तेमाल किया है।प्रकाशित कार्टून को सरकारी सफाई के नजरिये से देखें तो संविधान रचने के लिए पूरे तीन साल लगाने के दोषी थे बाबा साहेब। बहरहाल एनसीआरटी को इसका पछतावा नहीं है और इससे जुड़े अफसरान इसे निहायत अकादमिक मामला बताते हुए  अपनी गरदन​ ​ बचा रहे हैं। लेकिन महाराष्ट्र में हो रहे हंगामे से लगता नहीं कि मामला इतनी जल्दी शांत होनेवाला है।

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

दैनिक भास्कर से चार पत्रकारों ने इस्तीफा देकर ‘हिमाचल दस्तक’ का दामन थामा

पहले से ही संपादकीय कर्मियों की कमी से जूझ रही दैनिक भास्कर, लुधियाना यूनिट को फिर झटका लगा है. दैनिक भास्कर, जम्मू से हाल में ही ट्रांसफर होकर दैनिक भास्कर, लुधियाना आए तीन सीनियर सब एडिटरों ने इस्तीफा दे दिया है. इनके नाम हैं नीलकांत, रवि कुमार और शशि गुलेरिया. सूत्रों का कहना है कि इनके इस्तीफे का कारण डेस्क पर क्षेत्रवाद की राजनीति है.

उधर, दैनिक भास्कर, पटियाला से खबर आ रही है कि पुलआउट के इंचार्ज सौरभ सूद कुछ वजहों से दुखी चल रहे हैं. उन्होंने भी पहली अप्रैल को अपना इस्तीफा न्यूज एडिटर रमन मीर को दे दिया है. ये चारों हिमाचल से प्रकाशित होने जा रहे डेली न्यूजपेपर 'हिमाचल दस्तक' से जुड़ रहे हैं.

इंडियन वोमेन्स प्रेस क्लब चुनाव : रितु-मन्निका-स्मिता के पैनल ने दिखाया रंग

इंडियन वोमेन्स प्रेस कार्प के चुनाव के नतीजे आ गए हैं. प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट के पद पर निर्विरोध निर्वाचन हो गया था. टीके राजलक्ष्मी प्रेसीडेंट हैं. दो वाइस प्रेसीडेंट्स के नाम हैं- शोभना जैन और अरुणा सिंह. पर प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट एक ही पैनल की हैं. इस पैनल के अन्य उम्मीदवार चुनाव हार गए. रितु सरीन, मन्निका चोपड़ा और स्मिता मिश्रा के पैनल ने जीत हासिल की. मन्निका चोपड़ा जनरल सेक्रट्री बनी हैं. उन्होंने अन्नपूर्णा झा को हराया. ट्रेजरार के पद पर रितु सरीन निर्वाचित घोषित की गई हैं. उन्होंने सोनल कैलाग को हराया. ज्वाइंट सेक्रेट्री के पद पर स्मिता मिश्रा ने विजयश्री हासिल की है.

स्मिता ने नीलम जीना को परास्त किया. मैनेजमेंट कमेटी के लिए 21 महिला पत्रकार निर्वाचित हुई हैं जिनके नाम पता नहीं लग सके हैं. सूत्रों का कहना है कि रितु-मन्निका-स्मिता पैनल का जीत वोमेन्स प्रेस क्लब में एक नए दौर की शुरुआत है. आमतौर पर वोमेन्स प्रेस क्लब में वामपंथी महिला पत्रकारों का ग्रुप हावी रहा है. ये लोग आम सहमति से पदाधिकारी तय कर देते हैं और चुनाव की नौबत नहीं आती. लेकिन इस बार इन्हें चुनौती रितु-मन्निका-स्मिता पैनल ने दिया और आश्चर्यजनक रूप से तीनों ने जीत हासिल कर ली. कुल 196 वोट पड़े जो अब तक की हाइयेस्ट पोलिंग है. वोमेन्स प्रेस क्लब की टोटल स्ट्रेंथ छह सौ है. वाइस प्रेसीडेंट के पद पर कुछ लोगों ने नामांकन दाखिल किया था लेकिन उन्होंने विथ ड्रा कर लिया जिससे वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव भी निर्विरोध हो गया.
 

दैनिक भास्‍कर, फरीदकोट के प्रभारी बने दिलबाग

दैनिक जागरण, बठिंडा के कार्यालय में क्राइम रिपोर्टर दिलबाग दानिश ने संस्थान को इस्तीफा देकर अपनी नई पारी दैनिक भास्कर, फरीदकोट से शुरू की है। दिलबाग ने फरीदकोट के इंचार्ज के रूप में कार्यभार संभाला है। फरीदकोट में भास्कर का आफिस नहीं था और उन्हें एक अच्‍छे रिपोर्टर की जरूरत भी थी, इसलिए उन्‍होंने दिलबाग को अपने साथ जोड़ा है। क्राइम में बीट पर अच्‍छी पकड़ रखने वाले दिलबाग फरीदकोट जिले के शहर कोटकपूरा के मूल निवासी हैं। वह काफी समय से दैनिक जागरण प्रबंधन से अपने ट्रांसफर की बात कह रहे थे लेकिन बात सिरे न चढऩे पर उन्होंने अखबार से इस्‍तीफा देकर भास्‍कर का दामन थाम लिया।

हिंदुस्‍तान ने कथा शुरू होने से पहले ही छाप डाला बाबा का प्रवचन

: मामला चंदौली जिले का : आज की भागती दुनिया में लोग एक दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए हर संभव उपाय कर रहे हैं. कोई शार्ट कट ले रहा है तो कोई दूसरा रास्‍ता अख्तियार कर रहा है. मीडिया जगत में तो एक दूसरे को पीछे छोड़ने तथा एक दूसरे आगे निकलने की होड़ लम्‍बे समय से रही है. पर ऐसा कम देखने को मिलता है कि बुलेट और एक्‍सप्रेस की रफ्तार से टीवी पर भागती खबरों के दौर में कोई अखबार एक दिन आगे होने वाले कार्यक्रम की खबर को पहले ही प्रकाशित कर दे, वो भी महाभारत के संजय स्‍टाइल में वर्णन करते हुए. अब इसे एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ कहें या फिर लापरवाही पर चंदौली जिले में हिंदुस्‍तान अखबार में ऐसा ही हुआ है.

चंदौली जिले के धानापुर में आठ दिवसीय कथा का कार्यक्रम पांच अप्रैल से शुरू होने वाला था. सभी अखबारों ने इसकी सूचना भी प्रकाशित की थी, पर खराब मौसम के चलते यह कार्यक्रम एक दिन आगे टल गया. यानी कथा पांच अप्रैल की बजाय छह अप्रैल से शुरू करने की योजना बना ली गई. पर हिंदुस्‍तान के स्‍थानीय पत्रकार ने कथा पांच अप्रैल को शुरू नहीं होने के बावजूद इसकी खबर प्रकाशित कर दी. बिल्‍कुल महाभारत के ''संजय'' स्‍टाइल में बाबा जी के भावी कथा को देखते हुए उनसे प्रवचन भी करवा दिया. अब यह उसकी लापरवाही है या गैरजिम्‍मेदाराना रवैया यह तो प्रबंधन ही तय करें.

पर, अगले दिन अखबार में जब बाबा के प्रवचन की खबर प्रकाशित हुई तो दूसरे अखबार वाले सन्‍न हो गए. उनके कार्यालयों से भी खबर छूटने की पड़ताल की जाने लगी तथा हिंदुस्‍तान के पत्रकार की तेजी की सराहना. पर जब भेद खुला तो हर कोई भौचक्‍क रह गया, मालूम करने पर पचा चला कि भागवत कथा तो आज से शुरू होगा, हिंदुस्‍तान ने तो गलत खबर प्रकाशित कर दी है. अब हिंदुस्‍तान के छीछालेदर होने की बारी थी और छीछालेदर हुआ भी. लोगों ने सवाल खड़े किए कि कैसे स्‍थानीय प्रतिनिधि ने बिना मौके पर गए, बिना कथा शुरू होने के तथ्‍यों के बारे में पता लगाए खबर प्रकाशित कर दी. अखबार तथा पत्रकार की विश्‍वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए.

हिंदुस्‍तान में छह अप्रैल को प्रकाशित कथा की खबर
दैनिक जागरण में सात अप्रैल को प्रकाशित कथा की खबर

भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर पंजाब केसरी पहुंचे अजीत धनखड़

दैनिक भास्कर, बठिंडा यूनिट के डेस्क में सीनियर सब-एडिटर के पद पर तैनात अजीत धनखड़ ने भास्कर को अलविदा कह दिया है। वे चंडीगढ़ से पंजाब केसरी के साथ इसी पद से अपनी नई पारी शुरू कर दी है। बताया जाता है कि अजीत का बठिंडा यूनिट को अलविदा कहना यहां काम के ज्‍यादा प्रेशर व राजनीति बताया गया है। गौरतलब है कि दो माह पहले ही भास्कर से संपादकीय साथी चंदन ठाकुर, नितिन सिंगला, फोटोग्राफर संजीव कुमार इस्तीफा दे चुके हैं। वहीं इनसे पहले मनीष शर्मा, राजेश नेगी, लता मिश्रा, शशिंकात शर्मा भी इस्तीफा दे चुके हैं।

सूत्रों का कहना है कि जब से बठिंडा भास्कर के पूर्व ब्‍यूरो चीफ ऋतेश श्रीवास्तव ने प्रबंधन को इस्तीफा दिया था, तब से ही भास्कर के बुरे दिन शुरू हो गए। खबर यह भी मिली है कि बठिंडा यूनिट पिछले एक साल से घाटे में चल रहा है। इन दिनों बठिंडा यूनिट में संपादकीय साथियों की बेहद कमी के चलते काम कर रहे कर्मियों पर भी दोहरा बोझ बढ़ गया है। आशंका जताई जा रही है कि आने वाले कुछ दिनों में और भी संपादकीय साथी भास्कर को अलविदा कह सकते हैं।

हिंदुस्‍तान के पूर्व ब्‍यूरोचीफ आनंद सिंह का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान, चंदौली से खबर है कि पूर्व ब्‍यूरोचीफ आनंद सिंह ने इस्तीफा दे दिया है. हालांकि प्रबंधन ने उनके इस्‍तीफे पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया है, परन्‍तु वे ऑफिस नहीं जा रहे हैं. आनंद हिंदुस्‍तान को चंदौली जिले में एक दशक से ज्‍यादा समय से ब्‍यूरोचीफ के रूप में सेवा दे रहे थे. वे अखबार की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. कुछ महीने पहले बदलाव के क्रम में अनूप कर्णवाल को चंदौली का नया ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया तथा ब्‍यूरो कार्यालय मुगलसराय में बना दिया गया.

इसके बाद भी जिले की खबरें बनारस आफिस दो मोडम सेंटरों से जा रही थीं. जिले की ज्‍यादातर खबरें मुगलसराय ब्‍यूरो कार्यालय से बनारस भेजी जाती थीं, जबकि आनंद सिंह के सेवा और वरिष्‍ठता को देखते हुए उनकी खबरें सीधे चंदौली से बनारस भेजे जाने का आदेश था. अब नये फरमान के तहत प्रबधंन ने आनंद सिंह को भी अपनी खबरें सीधे बनारस भेजने की बजाय वाया मुगलसराय भेजने का आदेश दिया गया, जो उनको को नागवार गुजारा. उन्‍होंने प्रबंधन के सामने अपनी बात स्‍पष्‍ट की परन्‍तु प्रबंधन के ना मानने पर उन्‍होंने काम करने से इनकार कर दिया.

बताया जा रहा है कि वे खबरों को मुगलसराय भेजने के बजाय इस्‍तीफा देना ही बेहतर समझा. सूत्र बताते हैं कि अभी प्रबंधन ने उनका इस्‍तीफा मंजूर नहीं किया है. आनंद सिंह की गिनती जिले के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय आनंद सिंह ने जिले में हिंदुस्‍तान को एक अलग पहचान दिलाई. उनके खबरों के तेवर का मुरीद तमाम लोग है. उन्‍होंने कंटेंट और बिजनेस दोनों में अखबार को अग्रणी रखा. वे बरेली में भी आज अखबार को लम्‍बे समय तक अपनी को सेवाएं दे चुके हैं. वे अब अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. आनंद का इस्‍तीफा हिंदुस्‍तान अखबार के लिए झटका माना जा रहा है.

Fraud Nirmal Baba (13) : पुदीने वाले गोलगप्पे खाओ-खिलाओ, टिकट मिल जाएगा….

पैसे व टीआरपी के लालच के कारण निर्मल बाबा के फ्राड पर चुप्पी साधे बैठे देश के महान संपादकों से अलग हटने का इरादा कर लिया है वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने. बतौर चैनल हेड, उन्होंने न्यूज एक्सप्रेस के पत्रकारों को निर्देश दिया है कि वे निर्मल बाबा की असलियत का पता लगाएं और इनकी तीसरी आंख के अंधविश्वास का भंडाफोड़ करें. इसके बाद न्यूज एक्सप्रेस की टीम ने निर्मल बाबा को निशाने पर ले लिया है. इस कड़ी में पहला काम ये किया है कि एक एक मिनट के कुछ फिलर तैयार कराए गए हैं जो विज्ञापन के रूप में बीच बीच में दिखाए जाते रहेंगे. 

 
इस फिलर में निर्मल बाबा का नाम निर्बल बाबा रखा गया है. एक भक्त उनसे चुनाव में टिकट न मिलने की समस्या उठाता है तो बाबा जवाब देते हैं कि गोलगप्पे खाओ, कृपा हो जाएगी. जो लोग निर्मल बाबा के प्रोग्राम को देखते हैं उनका कहना है कि यह फ्राड बाबा ऐसी बातें कहता है. किसी से कहता है कि फ्रिज में कोल्ड ड्रिंक रख दो, कृपा हो जाएगी तो किसी से कहता है कि काले कपड़े आलमारी में रख दो कृपा हो जाएगी.
 
फेसबुक पर एक यूजर एसपी सिंह लिखते हैं- ''समोसा खा लो , कृपा हो जाएगी ! लाल चटनी खा लो कृपा हो जाएगी ! पेट्रोल की टंकी फुल करवा दो कृपा हो जाएगी… हाथो को लाल, पीले रंग से रंग दो कृपा हो जाएगी ! गुरुवार के दिन लाल कपडे का शर्ट पहने , कृपा हो जाएगी… सफ़ेद चोकलेट खा लो , कृपा हो जाएगी… मेरे बैंक में 10 हजार डाल दो कृपा हो जाएगी…. अगर मनुष्य का उद्धार इतनी आसानी से होता तो गीता में इतना विस्तार से समझाने की आवश्यकता क्या थी भगवन श्री कृष्ण को ? हमारे हिन्दू समाज को ऐसे ही स्वार्थी ढोंगी पाखंडियों ने अधिक नुकसान पहुँचाया है.''
 
फिलहाल न्यूज एक्सप्रेस की टीम इस बात के लिए बधाई की पात्र है कि उसने निर्मल बाबा की धोखाधड़ी से जनता को सचेत करने का काम शुरू कर दिया है. न्यूज एक्सप्रेस पर चल रहे फिलर को देखने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक करें…. बाबा के गोलगप्पे
 
फ्राड निर्मल बाबा सीरिज की अन्य खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें… Fraud Nirmal Baba

 

 

 
 

 

अंदरूनी मनमुटाव से गोरखपुर में जनसंदेश टाइम्‍स की हालत खराब

गोरखपुर में जन्संदेश टाइम्स को लांच हुए अभी चंद महीने ही हुए कि अंदरुनी बगावत के स्वर बुलंद होकर बाहर आने लगे हैं. हालात यहाँ तक पहुंच गए हैं कि कभी शैलेन्द्र मणि के इशारे पर पूरब-पश्चिम एक करने का दम भरने वाले पत्रकार उनसे तकझक करने में कहीं भी संकोच नहीं कर रहे हैं. क्षेत्रीय सूत्रों की माने तो जन्संदेश टाइम्‍स अपने बदहाली के निम्न स्तर तक पहुंचने लगा है और आपसी गाली-ग्‍लौज आम होती जा रही है. अखबार प्रबंधन द्वारा क्षेत्रीय ब्यूरो को बिजली-पानी और बुनियादी जरूरतों के लिए तक धन उपलब्ध कराने की बजाय ठेंगा दिखाया जा रहा है.

देवरिया ब्यूरो में बिजली का बिल अखबार प्रबंधन द्वारा नहीं भरे जाने को लेकर बीते दिनों ब्यूरो प्रमुख और अखबार प्रबंधन के बीच अंदरूनी मनमुटाव की बाते सामने आई हैं. अगर क्षेत्रीय लोगों की माने तो दैनिक जागरण से शैलेन्द्र मणि के बहकावे में आकर जन्संदेश में गए तमाम पत्रकार आज खुद को ऐसे दोराहे पर खड़ा महसूस कर रहे हैं, जिस पर एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खायी है. जन्संदेश टाइम्‍स के ही एक मित्र ने बताया कि सभी ब्यूरो प्रमुख, जो शैलेन्द्र मणि के कहने पर जन्संदेश टाइम्‍स में आये आज कहीं न कहीं खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, जिनमें देवरिया से सिद्धार्थ मणि, बस्ती से आशुतोष मिश्रा, ब्रजेश मणि, राजकुमार आदि प्रमुख हैं.

वेतन खाता तो दूर की बात है अभी तक किसी को नियुक्ति पत्र के नाम पर एक चिट तक नहीं दिया गया है और प्रबंधन नीति को लेकर शैलेन्द्र मणि और अनुज पौद्दार के बीच ही विवाद की स्थिति बनी हुई है. हालांकि अगर जल्द ही यह खबर सुनने को मिले कि शैलेन्द्र मणि ने जन्संदेश टाइम्‍स छोड़ दिया तो बिल्‍कुल आश्चर्य नहीं होना चाहिए लेकिन आज जन्संदेश टाइम्‍स का हर पत्रकार यही कह रहा है कि शैलेन्द्र मणि के पास हर दृष्टिकोण से कैरियर के तमाम विकल्प हैं, जबकि उनके साथ भेड़चाल में चले पत्रकार कहाँ जायेंगे? ऐसे लोगों को तो दूसरा कोई रास्‍ता ही नहीं सूझ रहा है.

एक ब्यूरो प्रमुख ने यहाँ तक कहा कि शैलेन्द्र मणि ने एक सौ पचास लोगों का कैरियर खराब किया है. आज हालात इतने बदतर हो गए हैं कि कई लोगों की छंटनी तक हो चुकी है और एकाउंटेंट नौकरी छोड़ चुका है. मार्च का वेतन भगवान भरोसे है. अन्‍य बाकी खर्चे भी भगवान भरोसे ही चल रहे हैं. शैलेन्द्र जी ने कहा कि कमाओ और उसी से अपना वेतन ले लो जबकि मालिक पौद्दार ने इसे नकार दिया. इस तरह कुप्रबंधन के शिकार इस अखबार के लक्षण तो यही कह रहे हैं कि ये कहीं बंद न हो जाए. उस पत्रकार कहा कहना है कि डर इस बात का भी है कि बंद होने के पहले इस अखबार में कोई अनापेक्षित घटना ना हो जाए, क्योंकि इस अखबार में असंतुष्टों की फौज खड़ी हो गयी है.

शिवानंद द्विवेदी 'सहर'  की रिपोर्ट. 

इंडियन एक्‍सप्रेस एवं द संडे गार्जियन की खबरों की सच्‍चाई की जांच के लिए पीआईएल

डॉ. नूतन ठाकुर, कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरम द्वारा दो समाचार पत्रों (इंडियन एक्सप्रेस तथा द संडे गार्जियन) में प्रकाशित भारतीय सेना के बिना बताए दिल्ली कूच करने तथा यह खबर केन्द्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा साजिशन छपवाए जाने सम्बंधित अलग-अलग समाचारों के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय जांच कराये जाने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर किया गया है. इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित समाचार में विवादास्पद खबर छपी थी. इसे तत्काल ही प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने पूरी तरह गलत बताया था. सेनाध्यक्ष ने इसे एक सोची समझी साजिश करार दिया था.

द संडे गार्जियन के वेबसाइट पर इससे जुड़ी एक खबर प्रकाशित हुई. इस खबर में यह कहा गया था कि इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर एक केंद्रीय मंत्री के इशारे पर लिखी गई थी क्योंकि इस वरिष्ठ मंत्री के परिवार के लोग रक्षा सौदे की दलाली में संलिप्त हैं. खबर के मुताबिक़ मंत्री को यह विश्वास था कि इस खबर के कारण सेनाध्यक्ष को उनके पद से हटा दिया जाएगा और उनके परिवार वालों की दलाली का काम सुगम हो जाएगा. ठाकुर ने उच्च न्यायालय से यह प्रार्थना की है कि ये दोनों मामले बहुत ही गंभीर हैं और अतः इन दोनों मामलों की तुरंत उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की जानी चाहिए.

उन्होंने इसमें प्रमुख सचिव, प्रधान मंत्री कार्यालय को प्रतिवादी बनाया है. उन्होंने यह कहा है कि चूँकि सेना की कूच से सम्बंधित खबर देश की अखंडता और एकता से सम्बंधित है, अतः यदि उच्च न्यायालय चाहे तो इस जांच की रिपोर्ट को गोपनीय रखे जाने का आदेश दे सकती है. लेकिन यदि यह बात सामने आती है कि सेना के कूच की बात बेबुनियाद थी तो खबर का खंडन करना मात्र पर्याप्त नहीं होगा बल्कि उस अखबार के खिलाफ इस तरह के अतिसंवेदनशील मामले पर झूठी खबर प्रकाशित करने के विषय में कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.

इसी तरह से एक केन्द्रीय मंत्री द्वारा रक्षा सौदों में दलाली कर सकने के उद्देश्य से सेनाध्यक्ष को हटाये जाने हेतु खबर प्रकाशित कराने की बात सीधे-सीधे उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है. यदि यह खबर सही है तो उस वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री के विरुद्ध तत्काल कार्यवाही होनी चाहिए और यदि वह खबर गलत है तो सम्बंधित अखबार के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी
चाहिए. मामले में सुनवाई 10 मई 2012 (मंगलवार) को होगी.

Fraud Nirmal Baba (12) : जो बाबा अपने एकाउंट की रक्षा नहीं कर सका वो दूसरों का भला कैसे करेगा

: तीसरी आंख मतलब लाफ्टर शो : भाई साधु संतों से तो मैं भी डरता हूं, इसलिए मैं पहले ही बोल देता हूं निर्मल बाबा के चरणों में मेरा और मेरे परिवार का कोटि कोटि प्रणाम। वैसे मैं जानता हूं कि साधु संत अगर आपको आशीर्वाद दें तो उसका एक बार फायदा आपको हो सकता है, पर वो चाहें कि आपको शाप देकर नष्ट कर दें तो ईश्वर ने अभी उन्हें ऐसी ताकत नहीं दी है। इसलिए ऐसे लोगों से ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन मेरा उद्देश्य सिर्फ लोगों को आगाह भर करना है, मैं किसी की भावना को आहत नहीं करना चाहता। चलिए आपको एक वाकया सुनाता हूं शायद आपकी समझ में खुद ही आ जाए।

पिछले दिनों मुझे लगभग 11 घंटे ट्रेन का सफर करना था, इसके लिए मैं रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म के बुक स्टाल पर खड़ा देख रहा था कि कोई हल्की फुल्की किताब ले लूं, जिससे रास्ता थोड़ा आसान हो जाए। बहुत नजर दौड़ाई तो मेरी निगाह एक किताब पर जा कर टिक गई। किताब का नाम था धन कमाने के 300 तरीके। मैने सोचा इसी किताब को ले लेते हैं इससे कुछ ज्ञान की बातें पता चलेंगी, साथ ही बिजिनेस के तौर तरीके सीखने को मिलेगें और सबसे बड़ी बात कि ट्रेन का सफर आसानी से कट जाएगा। लेकिन दोस्तों सफर आसानी से भले ना कटा हो पर जेब जरूर कट गई। 280 रुपये की इस किताब में माचिस, टूथपेस्ट, पालीथीन पैक, जूते की पालिस, मोमबत्ती, आलू चिप्स, पापड, मसाले के पैकेट तैयार करने जैसी बातें शामिल थीं। पूरी किताब पढ़ने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा धन कमाने का सबसे कारगर तरीका तो इसमें शामिल है ही नहीं, यानि मेरी नजर में धन कमाने के 300 तरीके वाली किताब छाप कर जितनी कमाई की गई है, किताब में शामिल तरीकों को अपना कर उसका आधा भी नहीं कमाया जा सकता।

बस जी भूमिका समझा दिया ना आपको, क्योंकि आजकल कुछ ऐसा ही कहानी चल रही है निर्मल बाबा के समागम यानि टीवी के लाफ्टर शो में। निर्मल बाबा की खास बात ये है कि उनके भक्तों की किसी भी तरह की समस्या हो, ये बाबा हर समस्या का समाधान वो पलक झपकते बता देते हैं। अब देखिए ना हम बीमार होते हैं तो डाक्टर के पास जाते हैं, पढाई लिखाई में कामयाब होने के लिए कोचिंग करते हैं, नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की गंभीरता से तैयारी करते हैं, किसी ने मकान या जमीन पर कब्जा कर लिया तो पुलिस की मदद लेते हैं, दुर्घटना हो जाने पर जल्दी से जल्दी अस्पताल जाने की कोशिश करते हैं, बेटी की शादी तय नहीं होने पर दोस्तों और रिश्तेदारों की मदद लेते हैं, नौकरी में प्रमोशन हो इसके लिए अपने काम को और मन लगाकर करते हैं, व्यापारियों का कहीं पेमेंट फंस जाए तो तगादा और ज्यादा करते हैं, बाल झड़ने लगे तो कुछ दवाएं लेते हैं, सुंदरता बनाए रखने के लिए ब्यूटिशियन की मदद लेते हैं, बुढापे में चलने फिरने में तकलीफ ना हो तो व्यायाम और सुबह टहलने जाते हैं, लेकिन अब आपको ये सब करने की जरूरत नहीं है, बल्कि आप बिना देर किए चले आएं निर्मल बाबा के दरबार में।

बाबा के पास तीसरी आंख है, वो सामने आने वाले भक्त को 100 मीटर दूर से जान जाते हैं कि इसे क्या तकलीफ है और उसका इलाज क्या है। बाबा का मानना कि जीवन में अगर कुछ गड़बड़ होता है तो ईश्वर की कृपा आनी बंद हो जाती है और बाबा तीसरी आंख के जरिए बता देते हैं कि कृपा के रास्ते में कहां रुकावट है और इस रुकावट का इलाज क्या है। हालांकि बाबा कब क्या बोल दें, कोई भरोसा नहीं है। एक ओर तो वो खुद ही लोगों को बताते हैं कि पाखंड से दूर रहें। साधु संतों के ड्रामे में नहीं फंसना चाहिए, खुद पूजा करो, क्योंकि ईश्वर भावना देखते हैं, सच्चे मन से भगवान को याद करें तो कृपा खुद आ जाएगी। ये बात मैं नहीं कह रहा हूं, खुद निर्मल बाबा कहते हैं, फिर मेरी समझ में नहीं आता कि ये बाबा पाखंडी किसे बता रहे हैं। पाखंड की सारी बातें तो उनके समागम में होती हैं और ये ज्ञान की बातें किसे समझा रहे हैं।

अब देखिए दो दिन पहले निर्मल बाबा एक नवजवान भक्त से पूछ रहे थे – तुम अपनी कमीज़ की बटन कैसे खोलते हो जल्दी जल्दी या देर से। सकपकाया भक्त बोला कभी जल्दी तो कभी देर से भी। बाबा बोले आराम-आराम से खोला करो। कृपा आनी शुरू हो जाएगी। अब भला ये भी कोई प्रश्न है? एक भक्त से उन्होंने पूछा बाल कहां कटवाते हो, भक्त बोला नाई से कटवा लेता हूं। बाबा बोले कभी पारर्लर जाने का मन नहीं होता, भक्त संकोच करते हुए बोला होता तो है, तो जाओ पारर्लर में एक बार बाल कटवा लो, कृपा आनी शुरू हो जाएगी। एक गरीब महिला कुछ गंभीर समस्याओं से घिरी हुई थी, उनके सामने आई, वो बाबा से कुछ कहती, उसके पहले बाबा ही बोल पड़े, अरे भाई तुम्हारे सामने से मुझे कढ़ी चावल क्यों दिखाई दे रहा है। वो बोली मैने कल कढ़ी चावल ही खाया था, बाबा क्या बोलते, कहा अकेले ही खाया तुमने। वो बोली नहीं पूरे परिवार ने खाया। हां यही तो गलती है तुमने किसी बाहर के लोगों को नहीं खिलाया, जाओ चार दूसरे लोगों को कढ़ी चावल खिला देना, कृपा आनी शुरू हो जाएगी।

कुछ और वाकये का जिक्र करना जरूरी समझ रहा हूं। बाबा कहते हैं कि पूजा में भावना होनी चाहिए, लेकिन जब बिहार की एक महिला को देखते ही उन्होंने कहाकि तुम छठ पूजा करती हो। वो बोली हां बाबा करती हूं, बाबा ने कहा कितने रुपये का सूप इस्तेमाल करती हो, वो बोली दस बारह रुपये का। बाबा ने कहा बताओ दस बारह रुपये के सूप से भला कृपा कैसे आएगी, तुम 30 रुपये का सूप इस्तेमाल करो। कृपा आनी शुरू हो जाएगी। बात यहीं खत्म नही हुई। एक महिला भक्त को उन्होंने पहले समागम में बताया था कि शिव मंदर में दर्शन करना और कुछ चढ़ावा जरूर चढ़ाना। अब दोबारा समागम में आई उस महिला ने कहा कि मैं मंदिर कई और चढ़ावा भी चढ़ाया, लेकिन मेरी दिक्कत दूर नहीं हुई। बाबा बोले कितना पैसा चढ़ाया, उसने कहा कि 10 रुपये, बाबा ने फिर हंसते हुए कहा कि दस रुपये में कृपा कहां मिलती है, अब की 40 रुपये चढ़ाना देखना कृपा आनी शुरू हो जाएगी।

अब देखिए इस महिला को बाबा ने ज्यादा पैसे चढ़ाने का ज्ञान दिया, जबकि एक दूसरी महिला दिल्ली से उनके पास पहुंची, बाबा उसे देखते ही पहचान गए और पूछा शिव मंदिर में चढ़ावा चढ़ाया या नहीं। बोली हां बाबा चढ़ा दिया। बाबा ने पूछा कितना चढ़ाया, वो बोली आपने 50 रुपये कहा था वो मैने चढ़ा दिया, और मंदिर परिसर में ही जो छोटे छोटे मंदिर थे, वहां दस पांच रुपये मैने चढ़ा दिया। बस बाबा को मौका मिल गया, बोले फिर कैसे कृपा आनी शुरू होगी, 50 कहा तो 50 ही चढ़ाना था ना, दूसरे मंदिर में क्यों चली गई। बस फिर जाओ.. और 50 ही चढ़ाना। क्या मुश्किल है, ज्यादा चढ़ा दो तो भी कृपा रुक जाती है, कम चढ़ाओ तो कृपा शुरू ही नहीं होती है। निर्मल बाबा ऐसा आप ही कर सकते हो, आपके चरणों में पूरे परिवार का कोटि कोटि प्रणाम।

एक भक्त को बाबा ने भैरो बाबा का दर्शन करने को कहा। वो भक्त माता वैष्णों देवी पहुंचा और वहां देवी के दर्शन के बाद और ऊपर चढ़ाई करके बाबा भैरोनाथ का दर्शन कर आया। बाद में फिर बाबा के पास पहुंचा और बताया कि मैंने भैरो बाबा के दर्शन कर लिए, लेकिन कृपा तो फिर भी शुरू नहीं हुई। बाबा ने पूछा कहां दर्शन किए, वो बोला माता वैष्णों देवी वाले भैरो बाबा का। बाबा ने कहा कि यही गड़बड़ है, तुम्हें तो दिल्ली वाले भैरो बाबा का दर्शन करना था। अब बताओ जिस बाबा ने कृपा रोक रखी है, उनके दर्शन ना करके, इधर उधर भटकते रहोगे तो कृपा कैसे चालू होगी। भक्त बेचारा खामोश हो गया।

यहां मुझे एक कहानी याद आ रही है। एक आदमी बीबी से हर बात पर झगड़ा करता था। उसकी बीबी ने नाश्ते में एक दिन उबला अंडा दे दिया, तो पति ने बीबी को खूब गाली दी और कहा कि आमलेट खाने का मन था, और तुमने अंडे को उबाल दिया। अगले दिन बेचारी पत्नी ने अंडे का आमलेट बना दिया, तो फिर गाली सुनी। पति ने कहा आज तो उबला अंडा खाने का मन था। तुमने आमलेट बना दिया। तीसरे दिन बीबी ने सोचा एक अंडे को उबाल देती हूं और एक का आमलेट बना देती हू, इससे वो खुश हो जाएंगे। लेकिन नाश्ते के टेबिल पर बैठी पत्नी को उस दिन भी गाली सुननी पड़ी। पति बोला तुमसे कोई काम नहीं हो सकता, क्योंकि जिस अंडे को उबालना था, उसका तुमने आमलेट बना दिया और जिसका आमलेट बनाना था, उसे उबाल दिया। कहने का मतलब मैं नहीं समझाऊंगा। आप मुझे इतना बेवकूफ समझ रहे हैं क्या, कि निर्मल बाबा से सारे पंगे मैं ही लूंगा, कुछ चीजें आप अपने से भी तो समझ लो।

बहरहाल दोस्तों तीसरी आंखे क्या क्या चीजें देखतीं है, मैं तो ज्यादा नहीं जानता। पर परेशान हाल आदमी से ये पूछा जाए कि आपने मटके का पानी कब पिया, भक्त कहे कि मटका तो बाबा मैंने कब देखा याद ही नहीं, फिर बाबा बोले कि याद करो, भक्त कहता है कि हां कुछ याद आ रहा है कहीं प्याऊ पर रखा देखा था। बाबा कहते है कि हां यही बात मैं याद दिलाना चाहता था, आप प्याऊ पर एक मटका दान दे आओ और उस मटके पानी खुद भी पियो और दूसरों को भी पिलाओ। एक दूसरे भक्त को बाबा कहते हैं कि आप के सामने मुझे सांप क्यों दिखाई दे रहा है। भक्त घबरा गया, बोला बाबा सांप से तो मैं बहुत डरता हूं। बाबा बोले तुमने सांप कब देखा, भक्त ने कहा मुझे याद नहीं कब देखा। बाबा बोले याद करो, बहुत जोर डालने पर उसने कहा एक सपेरे के पास कुछ दिन पहले देखा था। बस बाबा को मिल गया हथियार, बोले कुछ पैसे दिए थे सपेरे को, भक्त ने कहा नहीं पैसे तो नहीं दिए। बस वहीं से कृपा रुक रही है। अगली बार सपेरे को देखो तो पैसे चढ़ा देना, कृपा आनी शुरू हो जाएगी।

वैसे तो बाबा के किस्से खत्म होने वाले ही नहीं है, पर एक आखिरी किस्सा बताता हूं। एक भक्त को उन्होंने कहाकि आपके मन में बड़ी-बड़ी इच्छाएं क्यों पैदा होती हैं? बेचारा भक्त खामोश रहा। बाबा बोले आप कैसे चलते हो, साइकिल, बाइक या कार से। वो बोला बाइक से। इच्छा होती है ना बडी गाड़ी पर चलने की, उसने कहा हां, बस बाबा ने तपाक से कह दिया कि यही गलत इच्छा से कृपा रुकी है। आप बड़ी गाड़ी रास्ते पर देखना ही बंद कर दें। अब बताओ भाई कोई आदमी रास्ते पर है, अब बड़ी गाड़ी आ जाए तो बेचारा क्या करेगा। आंख तो बंद नहीं करेगा ना। इसीलिए कहता हूं कि मुझे तो लगता है कि बाबा के सामने मूर्खों की जमात लगती है । आप अगर उनके प्रश्न और सलाह सुन लें तो हँस-हँस कर लोटपोट हो जाएँ। जय हो इस निर्मूल बाबा की!

चलिए बात खत्म करें, इसके पहले मैं आपको बता दूं कि कुछ लोगों ने अपने निर्मल बाबा की कृपा को ही रोक लिया और उन्हें सवा करोड़ रुपये का चूना लगा दिया। बात लुधियाना की है। बाबा को बैंक ने जो चेक बुक दी है, उसकी हूबहू कापी तैयार करके एक व्यक्ति ने सवा करोड़ रुपये बाबा के एकाउंट से निकाल लिया। हालाकि इस मामले में रिपोर्ट दर्ज हो गई है, पुलिस को फर्जीवाड़ा करने वालों की तलाश है। पर मेरा सवाल है कि जब बाबा के खुद के एंकाउंट में सेंधमारी हो गई और बाबा बेचारे कुछ नहीं कर पा रहे तो वो दूसरों के एकाउंट की रक्षा कैसे कर पाएंगे।

वैसे भी निर्मल बाबा के जीवन या उनकी पृष्ठभूमि के बारे में बहुत कम लोगों को पता है। उनकी आधिकारिक वेबसाइट nirmalbaba.com पर कोई जानकारी नहीं दी गई है। इस वेबसाइट पर उनके कार्यक्रमों, उनके समागम में हिस्सा लेने के तरीकों के बारे में बताया गया है और उनसे जुड़ी प्रचार प्रसार की सामग्री उपलब्ध है। झारखंड के एक अखबार के संपादक ने फेसबुक पर निर्मल बाबा की तस्वीर के साथ यह टिप्पणी की है, ‘ये निर्मल बाबा हैं। पहली बार टीवी पर उन्हें देखा। भक्तों की बात भी सुनी। पता चला..यह विज्ञापन है. आखिर बाबाओं को विज्ञापन देने की जरूरत क्यों पड़ती है? सुनने में आया है…ये बाबा पहले डाल्टनगंज (झारखंड) में ठेकेदारी करते थे?’। मित्रों आप बाबा पर भरोसा करें, मुझे कोई दिक्कत नहीं, पर जरा संभल कर और हां बाबा जी आपकी कृपा बनी रहनी चाहिए, देखिए ज्यादा लंबी लंबी मत छोड़िएगा, क्योंकि ये पब्लिक है, सब जानती है।

लेखक महेंद्र श्रीवास्‍तव पत्रकार हैं. लगभग डेढ़ दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. कई राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में काम करने के बाद एक न्‍यूज चैनल को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग आधा सच से साभार लिया गया है.

जीएनएन न्‍यूज में चार पत्रकारों का होगा प्रमोशन

जीएनएन न्‍यूज से खबर है कि जूनियर स्‍तर के चार पत्रकारों को प्रमोट किया जा रहा है. जल्‍द ही इन लोगों को प्रमोशन तथा इंक्रीमेंट लेटर दे दिया जाएगा. सूत्रों का कहना है कि ये चारों चैनल की लांचिंग के समय से जुड़े हुए हैं. जिन लोगों का प्रमोशन किया जा रहा है उसमें निशार सिद्दीकी, प्रिया अस्‍थाना, बबिता झा तथा रोहित कुमार शामिल हैं. चारों प्रोडक्‍शन ट्रेनी के पद पर तैनात थे, जिन्‍हें प्रमोट करके असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि कुछ और लोगों को प्रमोट किया जा सकता है.

तीन हजार करोड़ में न्यूयॉर्क का द प्लाजा खरीदेंगे सुब्रत राय!

लंदन के मशहूर ग्रॉसवेनर हाउस होटल को खरीदने के 1 साल बाद ही सहारा समूह विदेश में एक और बड़े अधिग्रहण की तैयारी कर रहा है। इस बार सहारा समूह की नजर न्यूयार्क के द प्लाजा पर है। करीब 105 साल पुराने इस होटल को सहारा ग्रुप करीब 3,000 करोड़ रुपये में खरीद सकता है। सूत्रों के मुताबिक सहारा ये सौदा मौरिशस की अपनी सब्सिडियरी कंपनी एंबी वैली मॉरिशस लिमिटेड के जरिए कर सकता है। मालूम हो कि दिसंबर 2010 में सहारा समूह ने ग्रॉसवेनर हाउस होटल को खरीदा था।

मैनहटन की मशहूर इमारतों में शामिल द प्लाजा 20 मंजिलों वाला एक शानदार होटल है। सहारा अगर इस अधिग्रहण को पूरा कर लेता है तो किसी इंडियन कंपनी की विदेशी हॉस्पिटियालिटी सेक्टर में एक बहुत बड़ी पहुंच मानी जाएगी। साभार :  सीएनबीसी

हेमंत बने हिमाचल दस्‍तक के संपादक, विनीत का न्‍यूज11 से इस्‍तीफा

दैनिक भास्‍कर, चंडीगढ़ में कार्यरत हेमंत कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है। वे अब हिमाचल से प्रकाशित होने जा रहे नए अखबार हिमाचल दस्‍तक के साथ अपनी पारी शुरू कर रहे हैं। हेमंत को अखबार का संपादक बनाया गया है। वे लम्‍बे समय से दैनिक भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि अखबार की टीम तैयार करने की जिम्‍मेदारी भी हेमंत को सौंपी गई है। 

न्यूज़11 के रामगढ़ जिला प्रभारी विनीत शर्मा ने प्रबंधन के रवैये से नाखुश होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। बताया जा रहा है कि प्रबंधन चाहता था कि विनीत न्यूज़11 के बिजनेस पार्टनर बन जाएं तथा चैनल के काम से पहले केअर विजन चिट फंड कम्पनी के लिए काम करें। यह बात विनीत शर्मा को नागवार गुजरा, जिसके बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया। उनका कहना था कि वो रिपोर्टर हैं किसी चिटफंड कंपनी के एजेंट नहीं, जो इस तरह का काम करें। विनीत के इस्‍तीफा के बाद प्रबंधन ने एक व्‍यवसायी को चैनल का जिला प्रतिनिधि बनाया है। हरी नारायण सिंह के चैनल छोड़ दिए जाने के बाद चैनल की साख झारखण्ड में गिर रही है। प्रबंधन भी पत्रकारों को चैनल से ज्‍यादा अपने चिट फंड कंपनी का काम करने का दबाव बना रहा है। माना जा रहा है कि इसके चलते कुछ और लोग इस्‍तीफा दे सकते हैं।

दिवंगत फोटो जर्नलिस्‍ट रवि के लिए हवन किया गया

सड़क हादसे में मारे गए सैफई के प्रेस फोटोग्राफर रवि की आत्‍मा की शांति के लिए हवन किया गया. इस दौरान काफी संख्‍या में पत्रकार हवन कर रवि की आत्‍मा की शांति की प्रार्थना की. उल्‍लेखनीय है कि रवि 1 अप्रैल को एक वाहन की टक्‍कर से घायल हो गए थे. जिन्‍हें इलाज के लिए सैफई के मिनी पीजीआई में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान तीन अप्रैल को उनकी मौत हो गई थी.

श्रीकृष्‍ण यादव शास्‍त्री द्वारा विधि विधान से इस शांति हवन को सम्‍पन्‍न कराया गया. शांति हवन में रवि के सैकड़ों दोस्‍त और पत्रकारों ने हवन में आहूति दी तथा श्रद्धासुमन अर्पित किया. हवन प्रमुख रूप से सुभाष त्रिपाठी, शिवराज यादव, सुरेन्द्र यादव पप्पू, हृदेश यादव, सुनील ठाकुर, अवधेश ठेकेदार, राजवीर सिंह ठेकेदार, सुघर सिंह, दिलफूल दिवाकर, नाजिम अल्वी, आशिफ खान, सन्तोष कुमार, रामकिशोर, वीपी सिंह, शीलेन्द्र यादव, वन्टू यादव, दिनेश यादव, वेदव्रत गुप्ता, अश्वनी शुक्ला, शिशुपाल यादव, अनुराग गुप्ता, सूबेदार सिंह, दिनेश यादव, विजय यादव, भूरे सिंह यादव, टिंकू यादव, संतोष यादव, हरिज्ञान यादव, प्रदीप यादव, रामदत्त जेई, संजीव कुमार जेई, मनोज कुमार समेत कई लोग मौजूद रहे.

ट्रेन से कटकर पत्रकार लीलाधर की दुखद मौत

मध्‍य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में एक पत्रकार की ट्रेन से कटकर मौत हो गई. पत्रकार के साथ यह हादसा उस समय हुआ जब वे अपने घर करकबेल जा रहे थे. जानकारी के अनुसार करकबेल के पत्रकार लीलाधर पाटकर अपनी पत्‍नी के साथ किसी काम से नरसिंहपुर गए थे. रात में वे जब पैसेंजर ट्रेन से करकबेल आ रहे थे. ट्रेन जब स्‍टेशन पर रूकी तो वे प्‍लेटफार्म के विपरीत दिशा में उतरने लगे.

सबसे पहले उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को उतारा उसके बाद खुद उतरने लगे इतने में ट्रेन चलने लगी. हड़बड़ी में उनका पैर फिसल गया तथा वो ट्रेन के नीचे आ गए. तत्‍काल उनकी मौत हो गई. जीआरपी ने उनके शव को कब्‍जे में लेकर पोस्‍टमार्टम के लिए भेज दिया. पाटकर लम्‍बे समय से करकबेल में पत्रकारिता कर रहे थे. उनके अचानक हुई मौत से पत्रकारिता जगत में शोक व्‍याप्‍त है.

16वें स्‍थापना दिवस पर सम्‍मानित किए गए भास्‍कर के कई कर्मचारी

अजमेर : भास्कर का 16वां स्थापना दिवस शुक्रवार को भास्कर परिसर में आतिशबाजी के साथ धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम में भास्कर परिवार के सदस्यों सहित आमंत्रित अतिथियों ने भाग लिया। भास्कर एचआर स्टेट हैड अमिताव नरेश, स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल तथा यूनिट हैड जीके पांडे की उपस्थिति में भास्कर परिवार के सदस्यों तथा बच्चों ने केक काटकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में महिलाओं और बच्चों के लिए कई प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। प्रतियोगिता में 10 साल से कम उम्र के बच्चों की आयोजित चेयर रेस में हर्षित खंडेलवाल ने प्रथम, नकुल गुप्ता ने दूसरा और पंकज शर्मा ने तीसरा स्थान प्राप्त कर पुरस्कार जीते।

12 साल से बड़े बच्चों की रेस में कुलदीप शर्मा प्रथम, रजत दूसरे और हार्दिक खंडेलवाल ने तीसरा स्थान प्राप्त किया। वहीं महिलाओं की प्रतियोगिता में अर्पणा पांडे प्रथम, मधु माथुर दूसरे और संगीता खंडेलवाल तीसरे स्थान पर रहीं। कार्यक्रम के दौरान भास्कर परिवार के सदस्य ओम प्रकाश मलूका ने बांसुरी वादन की शानदार प्रस्तुति दी। इस अवसर पर एचआर स्टेट हैड अमिताव नरेश ने भास्कर परिवार के सदस्यों को सफलता के साथ 15 वर्ष पूरे करने पर बधाई दी।

इस मौके पर कार्यकारी संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल ने कहा कि सभी विभागों के साथियों की मेहनत के बलबूते भास्कर लोगों की आशाओं पर खरा उतरा है। कार्यक्रम में यूनिट हैड जीके पांडे, एसएमडी हैड धीरेंद्र प्रताप सिंह, मार्केटिंग मैनेजर संदीप माथुर, विज्ञापन मैनेजर अनिल स्वर्णकार, मैनेजर फाइनेंस अजय शर्मा सहित समस्त संपादकीय और एडमिनिस्ट्रेशन स्टाफ मौजूद था। संचालन डीएनई संतोष गुप्ता ने किया।

आतिशबाजी से गूंजा परिसर : बच्चों के द्वारा केक काटने के साथ ही भास्कर परिसर में जोरदार आतिशबाजी कर 1६वें स्थापना दिवस समारोह का आगाज किया गया। इस दौरान एक से बढ़कर एक रंग बिरंगी रोशनी छोड़ने वाले पटाखे चलाए गए। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने रोशनी का लुत्फ उठाया।

कर्मचारी हुए सम्मानित : भास्कर में पिछले 15 सालों से निर्बाध सेवाएं देने वाले एचआर स्टेट हैड अमिताव नरेश ने संपादकीय टीम के डॉ. रमेश अग्रवाल, प्रताप सनकत, सुरेश कासलीवाल, बृजेश शर्मा, अरविंद गर्ग, हिम्मत सिंह चौहान, मुकेश परिहार, लक्ष्मीकांत देहरू, अनिल दुबे, एसएमडी टीम के महेंद्र सिंह चौहान, हेमंत राज, प्रोडक्शन टीम के सुशील कुमार शर्मा और रामधन शर्मा सहित जितेंद्र सिंह राठौड़, अरुण कुमार खारोल तथा अरुणा शर्मा को सम्मानित किया गया।

एड एजेंसियां भी सम्मानित : कार्यक्रम के दौरान भास्कर के साथ जुड़ी विज्ञापन एंजेसियों को भी सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में राज एड एजेंसी से राजकुमार जोशी, सिद्धि एड एजेंसी से कमल वाधवा. गुप्ता एजेंसी से अनिल गुप्ता, इंडियन मार्केटिंग से वासुदेव वाधवानी, विकास एजेंसी से घनश्याम गुप्ता, गंगवाल पब्लिसिटी से सुशील गंगवाल, नीरज मोबाइल एड एजेंसी से नीरज नंदा, माहेश्वरी एजेंसी से सुधीर माहेश्वरी और गौरव पब्लिसिटी से गोपाल चौधरी को सम्मानित किया गया।

इनके अलावा किशनगढ़ से सिद्धि विनायक एजेंसी से विमल गौड़, केकड़ी से तिलक माथुर, सूरजपुरा से बालमुकुंद वैष्णव, सावर की शायरी एड एजेंसी से दरियाव नाथ योगी औैर ब्यावर की कृष्णा एड पॉइंट से नरेंद्र जेसवानी को सम्मानित किया गया। भास्कर कार्यालय में कार्यरत सहायक कर्मचारियों को उनकी सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले कर्मचारियों में हिम्मत सिंह रावत, अशोक कुमार खींची, भींमसिंह पंवार, सुरेश सिंह शेखावत तथा राजकुमार थे। साभार : भास्‍कर

क्‍या बंद हो जाएगा जनसंदेश से बदलकर न्‍यूज टाइम बना चैनल?

जनसंदेश चैनल नाम सुनते ही बसपा का नजदीकी चैनल होने की बात लोगों के जेहन में आ जाती थी. बसपा शासनकाल में यह चैनल बढि़या चला. छोटे सेटअप के बावजूद सब कुछ ठीक ठाक रहा. हालांकि इसके मालिकान को लेकर भी कई तरह की बातें होती रहीं. कभी इसे बसपा के कद्दावर नेता रहे बाबू लाल कुशवाहा का चैनल बताया गया तो कभी उनके खास सहयोगी रहे रामचंद्र प्रधान का. इन सब के बावजूद यह चैनल पिछले तीन सालों से अच्‍छा चल रहा था.

परन्‍तु बाबूलाल कुशवाहा एंड कंपनी के एनआरएचएम घोटाले के चपेट में आते ही जनसंदेश चैनल की मुश्किलें बढ़ गईं. सरकार जाने के बाद तो इसके हालात और खराब हो गए हैं. चैनल का नाम भी बदला गया परन्‍तु मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. आर्थिक दुश्‍वारियों ने इस चैनल को अंदर तक हिलाकर रख दिया है. पहले इस चैनल का नाम जनसंदेश से जनसंदेश प्‍लस किया गया, फिर भी इसकी नियति नहीं बदली. फिर इसका नाम बदलकर न्‍यूज टाइम कर दिया गया, इसके बाद भी चैनल की परेशानियां कम नहीं हुई हैं.

बताया जा रहा है कि अब यह चैनल बंद होने के कगार पर पहुंच चुका है. बाबूलाल कुशवाहा और उनके नजदीकी सौरभ जैन के अंदर जाने के बाद चैनल की आर्थिक दिक्‍कतें और अधिक खराब हो गई हैं. पैसा का जुगाड़ कर पाना प्रबंधन के टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. चैनल के जल्‍द ही बंद होने की चर्चाएं और गॉसिप भी शुरू हो चुकी हैं. फेसबुक पर भी इस चैनल को लेकर कई तरह की बातें चल रही हैं. पिछले कुछ दिनों दो दर्जन लोगों का चैनल से जाना इस बात को और अधिक बल देता है.

हालांकि इस संदर्भ में जब चैनल हेड सैयदेन जैदी से बात की गई तो उनका साफ कहना है कि यह सब अफवाह है. चैनल के नाम बदले जाने को भी वो एक सामान्‍य प्रक्रिया बताते हैं. जब उनसे पूछा गया कि कई कर्मचारियों को क्‍यों हटाया गया तो उन्‍होंने कहा कि किसी को चैनल से हटाया नहीं गया है. जिनका जहां मौका मिल रहा है जा रहा है. हम किसी को रोक नहीं रहे हैं. पर दूसरे तरफ सवाल उठाने वालों का कहना है कि यह संभव ही नहीं है कि डेढ़ से दो दर्जन लोगों को एक साथ कहीं मौका मिल जाए.

फेसबुक पर तो भास्‍कर के पत्रकार दिलनवाज पाशा ने चैनल को लेकर एक पोस्‍ट लिखा है – क्या मीडिया में भी दो नंबर का पैसा लगा होता है? टीवी चैनल जन संदेश के बंद होने की खबरों से तो ऐसा ही लगता है। यूपी में मायावती की सरकार थी तो चैनल खूब चल रहा था। कर्मचारियों को सैलरी भी मिल रही थी…। लेकिन अब खबर है कि चैनल से कर्मचारियों को निकाला जा रहा है। और जल्द है यह चैनल बंद भी हो सकता है।

लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह है कि दो नंबर के पैसे से चलने वाला मीडिया क्या कभी सच कह पाएगा….।। मायावती के शासन के दौरान उत्तर प्रदेश में वसूली संगठित अपराध हो गई। हर सरकारी काम के रेट फिक्स कर दिए गए। इसका बडा़ हिस्सा सरकार के पास पहुंचता था…. वसूली का पैसा आ रहा था तो धंधे भी चल रहे थे। अब सत्ता गई तो पैसा का रूख दूसरी पार्टी की ओर हो गया….फिर चैनल कैसे चले? (यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि राज्य में वसूली रुक गई है। कल जब ऑफिस आ रहा था तो अपनी आंखों से देखा नोयडा पुलिस की पीसीआर को ठेले वालों से सौ-सौ पांच-पांच सौ लेते हुए)

दिल्ली चुनाव में पंजाब केसरी के पेड न्यूज के कुछ प्रमाण

हाल ही में सम्‍पन्‍न हुए पांच राज्‍यों के विधानसभा चुनाव में पेड न्‍यूज न मिलने से तमाम बड़े अखबार कसमसा कर रहे गए. अब वे दूसरे तरीकों से अपने इस घाटे की भरपाई करने पर तुले हुए हैं. जागरण ने जहां देहरादून में पेड न्‍यूज छापा वहीं पंजाब केसरी दिल्‍ली चुनावों में जमकर पेड न्‍यूज छाप रहा है. इन खबरों में कहीं भी विज्ञापन नहीं लिख जा रहा है. जनता को मूर्ख बनाने के लिए प्रतिनिधियों के हवाले से खबर लिखा जा रहा है. जबकि पहली ही नजर में दिख रहा है कि यह पेड न्‍यूज है. आप भी देखिए पंजाब केसरी के पेड न्‍यूज की कुछ तस्‍वीरें.

लखीमपुर में ईटीवी के पत्रकार को सहारा के पत्रकार ने किया अपमानित

: एसपी से की गई लिखित शिकायत : चार मार्च को लखीमपुर खीरी में उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव का शारदा बैराज पर दौरा था. अखिलेश के कार्यक्रम को कवर करने के लिए ईटीवी के पत्रकार जय गुप्‍ता समेत तमाम चैनलों के पत्रकार वहां पहुंचे हुए थे. लखीमपुर सदर के कोतवाल पी‍के मिश्रा अपने सभी चहेते पत्रकारों को कवरेज करने के लिए आगे कर रहे थे जबकि दूसरे पत्रकारों को वे टरका रहे थे. इसी बात को लेकर जय गुप्‍ता ने कोतवाल से शिकायत की तथा कहा कि आप सिर्फ चहेते पत्रकारों को आगे कर रहे हैं.

इस बात को लेकर जय गुप्‍ता और कोतवाल में बहस हो गई. इतने में वहां मौजूद सहारा समय यूपी-उत्‍तराखंड के पत्रकार श्‍यामजी भड़क गए. उन्‍होंने जय गुप्‍ता को अपशब्‍द कहते हुए मारने के लिए हाथ उठा लिया. यह सारी घटना कोतवाल के सामने घटित हुई परन्‍तु वो बीच बताव करने की बजाय दर्शक बनकर श्‍यामजी के गाली देने का नजारा देखते रहे. कुछ पत्रकारों ने बीच बचाव कर मामले को बढ़ने से बचा लिया. इस घटना से आहत जय गुप्‍ता ने इसकी लिखित शिकायत लखीमपुर खीरी के कप्‍तान से की है. कप्‍तान ने मामले की जांच सीओ सिटी एएन सिंह को सौंपी है. इस संदर्भ में पूछे जाने पर जय गुप्‍ता ने इस घटना की पुष्टि की वहीं श्‍यामजी का फोन नहीं लग पाने से उनका पक्ष नहीं जाना जा सका.

ब्‍लैकमेलिंग करने के आरोप में एक पत्रकार गिरफ्तार

मुंबई की वाकोला पुलिस ने शाहिदा खान नाम के एक पत्रकार को हफ्ता वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया है. पत्रकार पर आरोप है कि उसने मोहम्‍मद शकील खामकर को ब्‍लैकमेल करके पैसा वसूली की थी. खामकर की शिकायत पर ही पुलिस ने कार्रवाई की है. पुलिस को दी गई शिकायत में खामकर ने बताया है कि वो अपने एक दोस्‍त के साथ मिलकर एक चाल बना रहे हैं. शाहिदा खान के जरिए उसे पुलिस और बीएमसी में शिकायत करने की धमकी देकर ब्‍लैकमेल किया जा रहा था.

खामकर ने कहा है कि पत्रकार ने उसके चाल के निर्माण को रुकवाने की भी धमकी दे रहा था. पत्रकार ने ब्‍लैकमेल करके खामकर से 70 हजार रुपये भी वसूल लिए थे. शिकायत के बाद पुलिस ने शाहिदा के खिलाफ कई धाराओं में मामला दर्ज किया है.

Fraud Nirmal Baba (11) : मुझे कुछ रुपये दो और मैं एक महीने में इससे भी तगड़ा बाबा पैदा कर दूं

ये बहुत दुखद है साथ ही चिंता का विषय भी है. एक तरफ तमाम न्यूज़ चैनल ये सिखाते हैं कि 21 वीं सदी में तंत्र मंत्र, भूत प्रेत जैसी किसी भी रुढ़ीवादी दकियानूसी बातों का विरोध करना चाहिए, लेकिन दूसरी तरफ जब न्यूज़ चैनल इस तरह के बाबाओं को रातों रात इस मुकाम पर पहुंचा देते हैं कि क्या बच्चे क्या बूढ़े सबकी जुबान पर इस तरह के बाबाओं का नाम रट जाता है. अब इसे हमारे देश की विडंबना ना कहें तो और क्या कहें, भारत की परंपरा साधु संन्यासियों में आस्था रखती आई है और शायद भविष्य में भी ये आस्था बरकरार रहे, लेकिन किसी इंसान को रातों रात भगवान बना देना ना भारतीय संस्कृति है और ना ही परंपरा, ये सिर्फ और सिर्फ चंद रुपयों की खातिर खेला जा रहा खेल है.

मैं ये नहीं कहता कि हर साधु-संत रुपयों और विलासिता पूर्ण ज़िंदगी के पीछे भागता है, लेकिन परेशानी ये है कि सच्चे साधु-संतों को इस देश में कोई पहचानता नहीं है. इसके पीछे की वजह भी मजबूत है क्योंकि परमात्मा के सच्चे दूत जिन्हें साधु-संतों की संज्ञा दी जाती है उनके पास ना तो तमाम लावलश्कर है और ना ही ज़िंदगी की सबसे बड़ी ताकत ‘दौलत’ है. उनके पास सिर्फ सच्ची भक्ति और सच्चाई का मार्ग है, इसलिए वो इस देश की पावन धरती पर जन्म तो लेते है लेकिन बगैर किसी का भला करे दुनिया से चले भी जाते हैं, जिसका किसी को पता भी नहीं चल पाता है. इस देश के तमाम मीडिया घराने भी इस बात को बखूबी जानते हैं लेकिन चूंकि सच्चे साधु-संतों से न्यूज़ चैनलों को कोई लाभ मिलने की उम्मीद नहीं होती इसलिए उनकी पहचान छुपी रह जाती है.

दुर्भाग्य ये भी है कि क्योंकि जब जब निर्मल बाबा जैसी मीडिया की पैदाइश लोगों के बीच टेलीविज़न के माध्यम से पहुंचती है, तब-तब हर टीवी चैनल खुद को इन धोखेबाज़ों से ये कहकर अलग करने की कोशिश करता है कि ये सिर्फ एक विज्ञापन है और चैनल का इससे किसी भी प्रकार से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन कोई भी चैनल आखिर ये कैसे भूल जाता है कि इन फर्ज़ी लोगों को टीवी पर दिखाने से पहले चैनल अपनी जेब भर चुका है. उनसे मोटी रकम स्लॉट बेचने की एवज में ले चुका है. ज़ाहिर सी बात है इसमें जहां तक न्यूज़ चैनल ज़िम्मेदार है वहीं कहीं ना कहीं हमारे देश का कानून भी ज़िम्मेदार है. कोई भी न्यूज़ चैनल या फिर इंटरटेनमेंट चैनल सरकार से ये कहकर लाइसेंस लेता है कि या तो खबरें दिखाएगा या फिर मनोरंजन करेगा, लेकिन निर्मल बाबा की तीसरी आंख ना तो किसी तरह की खबर है और ना ही मनोरंजन, महज़ एक विज्ञापन है. और एक ऐसा विज्ञापन जो आधे आधे घंटे प्रसारित होता है और जिसके ज़रिये तीन खाते नंबर देकर खुले आम पैसे मांगे जाते हैं.

अरे एक बात सोचिये क्या किसी साधू संत को लोगों का भला करने के लिए किसी प्रकार का लालच होता है. लालच और संत का कोई नाता ही नहीं होता. सच्चे संत तो एक पेड़ की छांव में बैठकर लोगों का भला कर सकते हैं तो फिर निर्मल बाबा की तीसरी आंख शहंशाहों वाली कुर्सी पर वातानुकूलित माहौल में बैठकर ही क्यों खुलती है. बाबा सिर्फ दो लाइन बोलने के हज़ारों रुपये ऐंठ लेता है. बाबा ने करेंट एकाउंट खुलवा रखे हैं तो बाबा फिर बाबा कैसे हो गया. बाबा विलासिता पूर्ण ज़िंदगी बसर कर रहा है और दुखी मजलूमों की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाकर उनसे रुपये ऐंठ रहा है. न्यूज़ चैनल बंद कमरों में बैठकर तंत्र मंत्र करने वाले लोगों को ढोंगी कहते हैं, लेकिन खुले आम उनके चैनल पर बैठकर ढोंग करने वालों के लिए न्यूज़ चैनलों की डिक्शनरी में कोई शब्द नहीं है बल्कि उनके ढोंग को प्रसारित कर उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं.

बाबा की तीसरी आंख देखने के लिए दरबार में तमाम लोग हाजिरी लगा रहे हैं. उनमें कोई कहता है बाबा मैं बीमार था या थी, लेकिन आपके चमत्कार से मेरी बीमारी ठीक हो गई. क्या कोई ऐसे लोगों से ये पूछता है कि कैंसर जैसी बीमारी का इलाज क्या सिर्फ बाबा के चमत्कार से हो गया. इस बीच दवा खानी बंद कर दी थी क्या, लेकिन नहीं इस तरह के सवाल ना तो बाबा पूछता है और ना ही बाबा के दरबार में आये लोग ही एक दूसरे से पूछते हैं. लोग कहते हैं कि कई महीनों से दवा खा रहे थे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन आपके चमत्कार ने बीमारी ठीक कर दी. भला कोई पूछे कि उस चमत्कार के दौरान दवा खानी बंद कर दी थी क्या, कई बार तो गुस्से के साथ-साथ हंसी भी आती है कि आखिर कोई व्यक्ति अपनी आंख पर इस कदर पट्टी कैसे बांध सकता है. मैं खुद ये दावा करता हूं कि मुझे कुछ रुपये दो और मैं एक महीने के बीतर इस बाबा से भी तगड़ा बाबा पैदा कर सकता हूं. बस कुछ लोग, एक अच्छी स्क्रिप्ट, एक पंडाल और कैमरे चाहिए. एक और तीसरी आंख वाला बाबा इस देश में पैदा हो सकता है महज़ एक महीने के भीतर.

मगर ना तो टेलीविज़न चैनलों की टीआरपी बढ़ाने वाले दर्शकों को ये बात समझ आ रही है और ना इस तरह के ढोंग को प्रसारित करने वाले चैनलों को. न्यूज़ चैनलों की ज़िम्मेदारी है कि इस कलियुग में विज्ञान से जुड़ी जानकारियां लोगों तक पहुंचाए, मेडिकल साइंस की तरक्की को लोगों के बीच पहुंचाएं, देश के किसी हिस्से में गरीबी है तो उसकी बात को लोगों तक पहुंचाएं, ना कि इस तरह के ढोंग का प्रसारण करें. आस्था, परंपरा, संस्कृति इन तीनों शब्दों पर न्यूज़ चैनलों की बदौलत ढोंग शब्द भारी पड़ रहा है. इसे रोकना बेहद ज़रुरी है. अगर ऐसे ही चलता रहा तो भविष्य में ऐसे कई और बाबा पैदा हो जाएंगे, क्योंकि मैंने बताया कि एक बाबा

बनाने के लिए क्या ज़रुरी होता है. कुछ एक लाख रुपये और एक बेकार इंसान जिसके पास दौलत तो है लेकिन उस दौलत का सही इस्तेमाल नहीं कर पाया है. सिर्फ ये दो चीज़े मिलकर बनाती हैं तीसरी आंख वाला बाबा।

लेखक शगुन त्‍यागी सहारा समय चैनल के साथ लम्‍बे समय तक जुड़े रहे हैं. वे इन दिनों नॉर्थ ईस्‍ट बिजनेस रिपोर्टर मैग्‍जीन के दिल्‍ली-एनसीआर ब्‍यूरोचीफ के तौर पर जुड़े हुए हैं. सगुन से संपर्क मोबाइल नम्‍बर 07838246333 के जरिए किया जा सकता है.

अंतरराष्‍ट्रीय फिल्म महोत्सव की धोखाधड़ी

यशवंत भाई नमस्‍कार. कुरुक्षेत्र की धरती पर कुरुक्षेत्र विश्‍वविद्यालय के पत्रकारिता संस्‍थान के तत्‍वावधान में इन दिनों अंतराराष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव चल रहा है. बड़े दुख की बात है कि इस उत्‍सव को इतना बड़ा नाम देकर पत्रकार तैयार करने वाला संस्‍थान जनता को धोखा दे रहा है. अंतरराष्‍ट्रीय की बात तो बहुत दूर है, इसमें राष्‍ट्रीय स्‍तर की भी कोई जानी-मानी हस्‍ती नहीं पहुंची है. पांच दिन चलने वाले इस समारोह का समापन शनिवार को होगा.

जो कार्यक्रम के आयोजक और कर्ताधर्ता बन रहे हैं वो महाशय विश्‍वविद्यालय का कोई अध्‍यापक या कर्मचारी नहीं बल्कि खुद को फिल्‍म जगत का बड़ा समीक्षक बताते हैं. हकीकत ये है कि वो शख्‍स सिर्फ और सिर्फ कई साल तक एक हिंदी अखबार के पत्रकार रहे हैं, इससे ज्‍यादा कुछ नहीं. ये वही महाशय हैं जो विश्‍वविद्यालय से पैसा लेकर फिल्‍मी दुनिया के लोगों को कार्यक्रम में बुलाने में मध्‍यस्‍थ का काम करनते हैं. चंद बहुत कम जाने हुए फिल्‍म निर्देशक, जिन्‍होंने टेली फिल्‍म से आगे काम नहीं किया है, को बुलाकर पत्रकारिता के विद्यार्थियों को ठगने का काम कर रहे हैं.

मैं भी कार्यक्रम में भाग लेने वाला एक विद्यार्थी रहा हूं. जब देखा कि इतने बड़े स्‍तर पर धोखा हो रहा है तो सोचा कि आपके भड़ास के माध्‍यम से अपनी बात रखता हूं. बहुत बड़ा सवाल है कि कुछ लोग फिल्‍म महोत्‍सव करने के नाम पर पूरे देश को धोखा दे रहे हैं. और यहां अमिताभ बच्‍चन जैसे बड़े कलाकारों को भी नकली समी‍क्षक बेकार कलाकार बता रहे हैं. कोई पूछने वाला नहीं है. एक बात और कार्यक्रम के नाम पर दलाली करने वाले शख्‍स ने तो पिछले दिनों हरियाणा के यमुनानगर जैसे शहर में भी इसी स्‍तर के फिल्‍म महोत्‍सव का धोखा भरा आयोजन किया है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

नईदुनिया के बिक जाने पर रो पड़े पत्रकार जवाहरलाल राठौड़ (वीडियो)

जवाहर लाल राठौड़ : 65 साल का नाता रहा है नईदुनिया से. कहा कि ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी कि इतना पुराना अखबार बेच देना पड़ा. उन्‍होंने बताया कि यह नईदुनिया की दूसरी बिक्री है, पहले कृष्ण चन्द्र मुग्‍दल इसके प्रकाशक थे और कृष्णकांत व्यास इसके संपादक थे. ३० सितम्बर १९४७ को बिक गया था. पांच जून १९४७ को ही यह अखबार शुरू हुआ था. इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है, इतना बड़ा इम्पायर ढह गया. पाठकों का विश्वास क्यों नहीं लिया गया?

अब नईदुनिया का विस्‍तार जागरण करेगा? अब तक तो नईदुनिया ही सबका विस्तार करता था. नईदुनिया हमेशा अग्रणी रहता था. स्वामित्व का परिवर्तन कितने करोड़ या अरब में हुआ इसकी कोई जानकारी पाठकों को नहीं दी गयी. नईदुनिया ने पाठकों का विश्वास तोडा था. इन्होंने व्यापारी जैसा बेचा, उन्‍होंने व्यापारी जैसा खरीद लिया है. मेरी शिकायत नईदुनिया के अभय छजलानी से है, वे अपनी समस्या बताते तो शायद जनता खुद आगे आती क्योंकि नईदुनिया तो जनता की धरोहर है. इसकी गुडविल बनाने के लिए असंख्य पत्रकारों ने कड़ी मेहनत की.

उमेश त्रिवेदी (पूर्व ग्रुप एडिटर, नईदुनिया) : यह बात गले नहीं उतर रही है. एक विरासत, जिसे हमने दशकों तक जिया, उस विरासत के कारण हम कई काम कर पाए. उस विरासत के भविष्य के बारे में सोचकर ही दर लगता है. राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते जैसे संपादकों ने खून पसीना बहाकर नईदुनिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म कहलाने वाले नईदुनिया की स्थापना की थी. इसके पत्रकारों ने आकाश को छुआ, हिंदी पत्रकारिता को यह सम्मान नईदुनिया ने ही दिया. इस सौदे में हमसे कोई राय नहीं ली गयी. यह मैनेजमेंट का फैसला था. हमारी राय तो यही है कि हम इसे चला सकते थे. हमें इस बारे में कभी नहीं बताया गया, यह सब परदे के पीछे हुआ. हमें अभी भी कुछ नहीं बताया गया. यही कहा गया कि नईदुनिया के हित में ही काम होगा.

प्रो. सरोज कुमार (कवि, नईदुनिया के पूर्व साहित्य संपादक) : अगर यह खबर ३० साल पहले आती तो भूकंप आ जाता, १५ साल पहले आती तो हडकंप मच जाता, लेकिन आज तो ठेस लग रही है, पर आज वो प्रभाव नहीं है, क्योंकि धीरे-धीरे पत्रकारिता में जो व्यावसायिकता आयी, उसके सब ख़त्म हो गया. अब खबर के प्रति नजरिया बदल गया है. जागरण का एक ग्रुप यहाँ आकर फ्लाप हो चुका है. विरासत का इस तरह का हस्तांतरण ठेस पहुंचाने वाला है. नईदुनिया ने एक इतिहास बनाया है. यहाँ खेलों के लिए बहुत काम किया है.

प्रवीण खारीवाल (अध्यक्ष, इंदौर प्रेस क्लब) : मौत ने घर देख लिया है. नईदुनिया ने रिलायंस से धन ले रखा था तो लौटना तो था ही, अब जिन लोगों को हटाया जा रहा है, इसकी जगह उन लोगों को हटाया जाना था, जिनके कारण यह अखबार बिकने की नौबत आई.

जीवन साहू (वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व अध्यक्ष, इंदौर प्रेस क्लब) : नईदुनिया का बिकना हमारी पीढ़ी के लोगों को अच्छा नहीं लगा… नईदुनिया के प्रकाशक नरेन्द्र तिवारी कहते थे कि इस अखबार के असली मालिक इसके पाठक हैं. अब नईदुनिया की आत्मा ही ख़त्म हो गई अब यह केवल खोखा रह गया.

कॉमरेड मनोहर लिम्बोदिया (वरिष्ठ पत्रकार) : 1960, 1970 और 1980 का दशक नईदुनिया का ही दशक था. और उस दौरान उसने इस शहर को चलाया, बड़ी दादागीरी से चलाया था, किसी की नहीं चलने दी थी, पर जब भास्कर आया तब नई सोच सामने आयी. पहले कोई भी मुख्यमंत्री बनता था तो सबसे पहले नईदुनिया को धोक देने (चरण वंदना के लिए जाता था और वे इतनी सी बात पर इतराते थे. जबकि यह छोटी सी बात थी. अब जो यह अखबार बिका है, इसके लिए ज़िम्मेदार बाद की पीढ़ी के विनय छाजनाली ही है.) जाता था.

भानु चौबे (पूर्व संयुक्त संपादक, नईदुनिया) : नईदुनिया एक सोच थी, एक विचार था, सच को सच कहने की ताकत थी. एक प्रवाह था. घोड़ा कितना भी अच्छी नस्ल का हो, मज़बूत हो, उसे एक अच्छे घुड़सवार की ज़रूरत हमेशा रहती है.

सुरजीत सिंह (पूर्व एडी. डीजीपी और लाभचंद छजनाली के मित्र) : गरीब लोगों के बच्चे बेचने की खबरें ज़रूर सुनी हैं लेकिन यहाँ तो लोगों ने अपने बाप दादा को ही बेच डाला. ये लोग (दारू) नहीं पीते, (मांस मच्‍छी) नहीं खाते, फिर क्या ज़रुरत पड़ी? पाठकों को असलियत बताते तो वे ही कोई अभियान चलाकर मदद कर डालते. हम पाठकों को बताते तो इनको चंदा करके दे देते. ये तो इन्होंने कोई अक्लमंदी नहीं की.

नईदुनिया के बिक जाने की खबर को लेकर डीजी न्‍यूज ने प्रोग्राम चलाया, जिसे इन लिंकों पर क्लिक करके देखा जा सकता है.

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/583/media-world/pakage-naidunia-02-3april-mpg.html

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/584/media-world/naidunia-mpg.html

क्या मनोज मनु ओजस्वी पत्रकार हैं जिन्हें ‘पत्रकारिता-साहित्य सम्मान’ दिया जाना चाहिए?

मेरठ में हरी जोशी और ऋचा जोशी पति-पत्नी हैं और दोनों पत्रकार भी हैं. ऋचा जोशी उत्तर प्रदेशीय महिला मंच नामक संगठन चलाती हैं. ये लोग इस मंच के बैनर तले स्‍व. वेद अग्रवाल की स्‍मृति में हर साल 'पत्रकारिता-साहित्‍य सम्‍मान' देते हैं. पिछले साल रवीश कुमार को दिया गया. उसके पहले आलोक श्रीवास्तव को दिया गया. एनडीटीवी वाले रवीश वाकई सम्मान देने लायक हैं. कवि और पत्रकार आलोक श्रीवास्तव भी सम्मान देने लायक हैं. पर इस बार ऋचा जोशी व हरी जोशी ने गड़बड़ कर दिया है.

इन लोगों ने मनोज मनु को पुरस्कार देने की घोषणा कर दी है. मनोज मनु सहारा में हैं. उनकी जाने किस प्रतिभा से जोशी दंपति इतने प्रभावित हुए हैं कि उन्हें महान पत्रकार घोषित कर एवार्ड देने की घोषणा कर दी है. चलिए, जोशी दंपति ने मनोज मनु को महान कहा है तो हम सब भी महान मान लेते हैं. ये रही जोशी दंपति की तरफ से भेजी गई प्रेस रिलीज….


    स्‍व0 वेद अग्रवाल स्‍मृति 'साहित्‍य-पत्रकारिता सम्‍मान-2012 मनोज मनु को

मेरठ। उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच ने अपने संस्‍थापक स्‍व. वेद अग्रवाल की स्‍मृति में प्रतिवर्ष दिए जाने वाले 'पत्रकारिता-साहित्‍य सम्‍मान-2012' देश के जाने-माने युवा पत्रकार मनोज मनु को देने की घोषणा की है। हिंदी की इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता में मनोज मनु बड़ी तेजी से अपनी जगह बना चुका नाम है। आजकल सहारा न्यूज के प्राइम टाइम की एंकरिंग के साथ ही वो सहारा समय

नेशनल और सहारा समय मध्‍य प्रदेश/छत्‍तीसगढ़ के चैनल हेड हैं। उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के लिए वह सहारा समय उत्‍तर प्रदेश के सलाहकार रहे हैं।

मनोज मनु ने अपनी शुरुआत ग्वालियर से एक कार्टूनिस्ट के तौर पर की। लेकिन धीरे-धीरे उनको शब्दों की दुनिया रास आने लगी और रिपोर्टिंग में उतर गये। लंबे अरसे से सहारा समूह के साथ हैं और पत्रकारिता के हर क्षेत्र में अपनी उपयोगिता और काबिलियत को साबित कर रहे हैं। ओजस्‍वी पत्रकार रहे स्‍व. वेद अग्रवाल की स्‍मृति में दिए जाने वाला 'पत्रकारिता-साहित्‍य सम्‍मान' पिछले वर्ष एनडीटीवी के रवीश कुमार को दिया गया था। सम्‍मान समिति के निर्णय के बाद मंच की अध्‍यक्ष डा. अर्चना जैन और महासचिव ऋचा जोशी ने इस सम्‍मान की आधिकारिक घोषणा की। उन्‍होंने सम्‍मान समिति का आभार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि मंच के 27वें स्‍थापना दिवस समारोह में ये सम्‍मान प्रदान किया जाएगा।

प्रशांत झा पहुंचे हिंदुस्‍तान, आशीष अमर भारती से जुड़े

: चंद्रकांत देंगे इस्‍तीफा : दैनिक भास्‍कर, दिल्‍ली से खबर है कि प्रशांत झा ने इस्‍तीफा दे दिया है. प्रशांत सीनियर कॉपी एडिटर थे तथा जनरल डेस्‍क पर तैनात थे. प्रशांत ने अपनी नई पारी दिल्‍ली में ही दैनिक हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. प्रशांत लम्‍बे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

गोरखपुर से खबर है कि आशीष श्रीवास्‍तव को गोरखपुर में हिंदी दैनिक अमर भारती का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. आशीष इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पूरे जिले की जिम्‍मेदारी आशीष के पास रहेगी.

हिंदी दैनिक महामेधा से खबर है कि चंद्रकांत गुप्‍ता अखबार से इस्‍तीफा दे देंगे. वे पिछले साथ सालों से इस अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे अपनी दूसरी पारी किसी नए संस्‍थान से शुरू करने जा रहे हैं.

दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर में कई लोग यहां से वहां किए गए

पटना के बाद अब दैनिक जागरण प्रबंधन ने मुजफ्फरपुर यूनिट में भी बदलाव किया है. वरिष्‍ठ पत्रकार एम. एखलाक को प्रादेशिक डेस्‍क से हटाकर कोआर्डिनेशन में भेज दिया गया है. अब तक कोआर्डिनेशन की जिम्‍मेदारी संभाल रहे राजीव रंजन झा को प्रादेशिक डेस्‍क पर भेज दिया गया है. उन्‍हें जिम्‍मे अपना प्रदेश रहेगा तथा वे प्रादेशिक इंचार्ज राजीव शर्मा के सहयोगी के रूप में काम करेंगे. लोकल डेस्‍क पर तैनात सीनियर रिपोर्टर अमरेंद्र तिवारी को हटा दिया गया है. अमरेंद्र को इनपुट व आउटपुट के अलावा नवगठित डेस्‍क एसटीएफ पर भेज दिया गया है. 

सिटी में रिपोर्टर अजय रत्‍न को भी वहां से हटाकर एसटीएफ में भेजा गया है. आउटपुट डेस्‍क पर तैनात रतन झा को भी एसटीएफ डेस्‍क पर भेजा गया है. इसके अलावा आउटपुट डेस्‍क पर तैनात वरिष्‍ठ पत्रकार कमल किशोर सक्‍सेना तथा फीचर डेस्‍क पर तैनात सब एडिटर अ‍मृता सुमन को भी एसटीएफ पर लाया गया है. प्रादेशिक से हटाकर मृत्‍युंजय भारद्वाज को सिटी रिपोर्टिंग में लगाया गया है. प्रादेशिक डेस्‍क पर ही तैनात ओम प्रकाश दीपक को भी सिटी रिपोर्टिंग सौंपी गई है.

स्‍टेट डेस्‍क पर तैनात अमरनाथ झा को इनपुट में भेज दिया गया है. उन्‍हें इनपुट हेड रविकांत का सहयोगी बनाया गया है. प्रादेशिक डेस्‍क पर कार्यरत राजेश श्रीवास्‍तव को समस्‍तीपुर का ब्‍यूरोचीफ बनाकर भेजा गया है. सुरेंद्र त्रिपाठी को भी यहां से बगहा भेजा जा रहा है. उन्‍हें बगहा का इंचार्ज बनाया गया है. समझा जा रहा है कि कुछ और बदलाव जल्‍द ही किए जाएंगे. उल्‍लेखनीय है कि जागरण ने बेतिया की पूरी टीम को सस्‍पेंड कर दिया है.

Fraud Nirmal Baba (10) : कोई भी बाबा भविष्य के बारे में सच नहीं जान सकता : सुभाष राय

कोई भी बाबा या भविष्यवक्ता भविष्य के बारे में सच नहीं जान सकता. वह चाहे जितने भी दावे करे. प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि सभी गतिशील हों, सभी संघर्ष में रहें. अगर भविष्य सच में पता हो तो कोई भी कुछ भी क्यों करेगा, चुपचाप बैठा रहेगा. इसीलिये प्रकृति ने भविष्य के सारे दरवाजे, सारी खिड़कियाँ बंद कर रखीं हैं. बाहर से कुंडी भी लगा दी है. केवल वर्तमान की कुंजी ही इसे खोल सकती है. भविष्य और कुछ नहीं है बल्कि अतीत और वर्तमान का संश्लिस्ट स्वरुप है. अगर आप वर्तमान को ठीक से जी रहे हैं तो भविष्य अपने आप ठीक होगा. असल में लोग वर्तमान को छोड़कर भविष्य  की चिंता  में जुट गये हैं. उन्हें अपने काम पर, अपनी मेहनत पर भरोसा  नहीं रह गया है. बस इसी वजह से इन बाबाओं की पौ बारह है. ये स्वयं अपना भविष्य नहीं जानते.

एक राजा था. वह एक बार बाहरी सेना से घिर गया. वह लड़ने निकलता तो संकट था, नहीं लड़ने निकलता  तो भी संकट था. उसने अपने राज ज्योतिषी को बुलाया, उससे पूछा, क्या करना चाहिए. ज्योतिषी ने कहा, महाराज, ग्रह अच्छे नहीं हैं, न निकलिए तो ज्यादा बेहतर रहेगा. राजा ने सोचा तो उसे लगा कि नहीं निकले तो राजमहल में ही मारे जायेंगे, उसने निश्चय किया कि निकलना है. सेना सज गयी. उसने फिर अपने ज्योतिषी को बुलाया, पूछा, मैं कितना जीऊंगा. ज्योतिषी बहुत उदास होकर बोला, महाराज आप पर ग्रह संकट है, आप की जान खतरे में पड़ सकती है. आप युद्ध के लिए न जाइये. राजा निश्चय कर चुका था, उसने ज्योतिषी से पूछा, अच्छा तुम्हारी उम्र कितनी है. ज्योतिषी ने कहा, बहुत लम्बी , ९० साल. राजा ने सेनापति से तलवार  मांगी और ज्योतिषी का सर कलम कर दिया. सेनाएं दुश्मन से लड़ने के लिए बढ़ गयी और उन्हें अपनी सीमाओं से खदेड़ कर बाहर कर दिया.

भविष्य बताने वालों के बारे में उन सभी लोगों को इसी तरह सोचना चाहिए, जो कर्म, संकल्प और वर्तमान में भरोसा करते हैं. बाबाओं ने देश का बहुत कबाड़ा किया है, मीडिया को उनके फरेब से लोगों को बचाने का काम करना चाहिए, न कि उनके हाथों बिक जाना चाहिए. यह टी आर पी का बेहूदा खेल भी बंद होना चाहिए. इसकी वजह से ही हिन्दुस्तानी मीडिया मदारियों जैसे करतब दिखाने में जुटा रहता है. खास तौर से हिन्दी मीडिया. अंग्रेजी मीडिया तो फिर भी कुछ गंभीर बातें करता दिखाई पड़ता है लेकिन हिंदी चैनलों पर अत्यंत कारुणिक और मार्मिक प्रसंगों पर भी वीर रस में बोलने वाले एंकरों ने तो तबाही मचा रखी है. यही लोग हैं, जो घटिया दर्जे के बाबाओं से लेकर भूत-प्रेत की कहानियों और प्रलय की अंतर्कथाओं को पेश करके टी आर पी बढाने में जुटे रहते हैं. देश के ज्वलंत मुद्दों पर बात करने की जगह फूहड़ लाफ्टर कार्यक्रमों को दिखाने से लेकर न जाने क्या-क्या दिखाते रहते हैं. अब समय आ गया है जब नया मीडिया और सही समझ रखने वाले लोग  इन मुद्दों में ठोस दखल दे.

लेखक सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट के प्रधान संपादक हैं.

अनिरुद्ध सिंह बने सहारा समय यूपी के ब्‍यूरो प्रभारी

सहारा समय न्यूज चैनल से खबर है कि कानपुर ब्यूरो प्रभारी के रूप में काम कर रहे अनिरुद्ध सिंह को तरक्की देकर बड़ी जिम्मेदारी के तौर पर उत्तर प्रदेश का ब्यूरो प्रमुख बना दिया गया है। अचानक अनिरुद्ध को उत्तर प्रदेश का ब्यूरो प्रमुख बनाकर के बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। पत्रकारिता के मानदंडों के प्रति हमेशा से सजग रहने वाले अनिरुद्ध सिंह 2005 में सहारा समय न्यूज चैनल में आये थे। कानपुर में काम करने के दौरान अनिरुद्ध को कानपुर से देहरादून रिपोर्टर के तौर पर भेजा गया था, उसके बाद तरक्की देकर कानपुर का ब्यूरो प्रमुख बनाया गया।

प्रबंधन ने उनकी काबिलियत को उन्‍हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया है। अभी तक ब्यूरो की जिम्मेदारी संभाल रहे आलोक गुप्ता को एसएनबी कोर्डीनेटर बनाया गया है। इस तरह के परिवर्तन के बाद सहारा मे एकाएक नई हलचल पैदा हो गई है क्यों कि उपेंद्र राय के आने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि कई लोगों पर गाज गिर सकती है या फिर उनको साइड लाइन किया जा सकता है, लेकिन इस बदलाव के बाद एक चर्चा यह भी शुरू हो गई है कि मेहनती और कामकाजी लोगों को भी तरजीह जरूर मिलेगी।

अनिरुद्ध ने अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण, कानपुर से की थी। यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे अमर उजाला से जुड़ गए। तेज तर्रार पत्रकार माने जाने वाले अनिरुद्ध को अमर उजाला ने मुरादाबाद में सिटी इंचार्ज बनाया। यहां से इस्‍तीफा देने के बाद 2005 में सहारा समय ज्‍वाइन कर लिया था, तब से देहरादून, लखनऊ और कानपुर में सहारा को अपनी सेवाएं दे रहे थे।

Fraud Nirmal Baba (9) : इन बाबाओं के पास अथाह पैसा है और न्यूज़ चैनल बिकने के लिए तैयार बैठे हैं : मुकेश कुमार

ये बहुत दुखद है कि एक ओर जहाँ कोशिशें  हो रही हैं कि न्यूज़ चैनलों के कंटेंट को कैसे ज़्यादा  से ज़्यादा विश्वसनीय बनाया  जाए और पत्रकारिता के उच्चतर मानदंडों से उसे जोड़ा जाए वहीं थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा जैसे पेड प्रोग्राम ने प्रदूषण को एकदम से बढ़ा दिया है। ये उन लोगों के लिए निश्चय ही चिंता का विषय होना चाहिए जो मानते हैं कि न्यूज़ चैनलों का काम केवल धंधेबाज़ी नहीं है बल्कि एक सामाजिक ज़िम्मेदारी से भी वो बँधे हुए है। उन्हें इस बात का खयाल तो रखना ही होगा कि वे जो कुछ दिखा रहे हैं उसका समाज और देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा। अगर वे ऐसा नहीं करते तो पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं।

ये कोई  नई प्रवृत्ति नहीं है। हर दो-चार साल में कोई  न कोई बाबा अवतरित होता है और इसी तरह लोगों को गुमराह करता हुआ लोकप्रियता और धन बटोरता है। मीडिया इसके लिए एक बहुत ही आसान उपकरण  बनकर रह गया है। इन बाबाओं के पास अथाह पैसा है और न्यूज़ चैनल बिकने के लिए तैयार  बैठे हैं, इसलिए उनका काम  बहुत आसान हो जाता है। जब एक साथ कई चैनलों में बाबा दिखने लगते हैं तो एक किस्म  का मास हिस्टीरिया पैदा होने लगता है और पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। वही हो रहा है। ध्यान  रहे चैनल इन पेड प्रोग्राम  पर विज्ञापन भी नहीं लिख रहे हैं।

अब आलम  ये हो गया है कि देश भर के न्यूज़ चैनलों में सर्वाधिक दस लोकप्रिय कार्यक्रमों  में से छह निर्मल बाबा के हैं और उनका न्यूज़ से कोई  लेना देना नहीं है। कई चैनलों की टीआरपी निर्मल बाबा की कृपा से उछाल पर है। न्यूज़ का कंटेंट तीसरे दर्ज़े का है मगर उनके पास निर्मल बाबा हैं और बस वही हैं। अगर  निर्मल बाबा की टीआरपी को हटाकर  देखें तो शायद वे कंगाल  हो जाएंगे। हाँ, नुकसान हो रहा है तो उनका जो खुद को न्यूज़ चैनल बनाए रखने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।

निर्मल  बाबा के कार्यक्रमों से टीआरपी और धन कमाने वाले चैनलों पर कुछ कहने से पहले इस पर विचार  करना ज़रूरी है कि निर्मल बाबा क्या हैं और अपने कार्यक्रमों  के ज़रिए किसका भला या बुरा कर रहे हैं। ऐसा इसलिए  कि जो चैनल इस पेड कार्यक्रम  के ज़रिए लाभ कमा रहे  हैं उन्होंने ज़रूर अपने फैसले के पक्ष में तर्क तैयार कर रखे होंगे। उनका पहला तर्क तो हमेशा की तरह यही होगा कि ये आस्था का मामला है, इसमें अंध विश्वास जैसा कुछ नहीं है। यानी आस्था की आड़ लेकर वे जिस तरह अंध विश्वास के दूसरे कार्यक्रम चला रहे हैं वैसे ही निर्मल बाबा को दिखाना भी उनकी नज़र में सही है।

उनका दूसरा  तर्क दर्शकों की पसंद का होगा।  इसके मुताबिक अगर दर्शक  देखना चाहते हैं तो हम क्यों न दिखाएं। ये एक तरह की ढिठाई है, मगर बहुत सारे संपादकों ने दर्शकों  की पसंद को भी अपनी ढाल बना  रखा है। उनका तीसरा  तर्क होगा कि जब दूसरे चैनल इस तरह का कंटेंट दिखाकर दर्शकों का हरण करने लगते हैं तो हमें अपने बचाव में इसी तरह के उपाय करने पड़ते हैं। यानी अगर सब प्रतिज्ञा कर लें कि वे घटिया चीज़ें नहीं दिखाएंगे तो हम भी नहीं दिखाएंगे। उनका अंतिम  तर्क यही है कि उन्हें भी सरवाइव करना है। अगर रेवेन्यू और टीआरपी साथ-साथ मिलती  है तो हमें बाज़ार के दबाव में  इसे स्वीकार करना ही पड़ता  है और हम यही कर रहे हैं। अगर हम ये नहीं करेंगे तो चैनल चलेगा कैसे( जैसे चैनल चलाकर वे देश पर एहसान कर रहे हों)।

अब अगर  इन दलीलों को रोशनी में आपने निर्मल बाबा के कार्यक्रमों  को देखने की कोशिश की तो भ्रम में पड़ जाएंगे कि क्या कहें, किसे दोष दें। बाबा को, मीडिया को या बाज़ार को या फिर तीनों सामूहिक  रूप से ज़िम्मेदार हैं। बाबा खुले आम धोखाधड़ी कर रहे हैं  मगर उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है, न प्रशासन, न पुलिस न कानून। कुछ  चैनल मौके को भुनाने में लगे  हुए हैं और बाज़ार तो खैर  ऐसा करने के लिए उन पर दबाव भी बना रहा है और उन्हें प्रेरित भी कर रहा है। सबकी आपस में साठ गाँठ है और इसके विरूद्ध आवाज़ चाहे जितनी उठाई जाए होता कुछ नहीं। पिछले एक दशक में चैनलों को विभिन्न मंचों पर जितना कोसा गया है उसके बाद तो उनका विवेक जाग ही जाना चाहिए था और चैनलों को सुधर ही जाना चाहिए था मगर ऐसा हुआ नहीं है। इसका मतलब है कि बीमारी गंभीर है और इलाज कठिन होगा और लंबा भी चलेगा। ये भी तय है कि इसे आत्मनियमन और संपादकों के विवेक भर पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि ये दोनों ही चीज़ें लगभग काम नहीं कर रही हैं। ऐसे में जो लोग निर्मल बाबा के विरोध में लामबंद हो रहे हैं उन्हें लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए।

लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज एक्सप्रेस न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं.

अन्‍य अखबारों में वेज बोर्ड को लेकर बातचीत जारी, जागरण को यूनियन से दिक्‍कत

बनारस के सभी बड़े अखबार मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने की प्रक्रिया में आगे बढ़ रहे हैं, बातचीत जारी रहने की बात कर रहे हैं वहीं जागरण को आपत्ति है कि हम मजीठिया वेज बोर्ड लागू करें या न करें इसमें यूनियन का क्‍या काम है. ये किस हक से अखबार के खिलाफ कम्‍पलेन कर रहे हैं, जबकि हमारे अखबार का एक भी पत्रकार इस संगठन का सदस्‍य नहीं है. जागरण के आब्‍जेक्‍शन पर डिप्‍टी लेबर कमिश्‍नर ने कई अखबारों के पत्रकारों को अं‍तरिम तथा वेज बोर्ड दिलाने के लिए लड़ाई लड़ रहे काशी पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष योगेश गुप्‍ता पप्‍पू तथा कर्मचारी यूनियन के महामंत्री अजय मुखर्जी दादा से कैफियत पूछी है.

उल्‍लेखनीय है कि पिछले माह बनारस के डिप्‍टी लेबर कमिश्‍नर एके राय ने केंद्रीय सचिव डा. मृत्‍युंजय सारंगी के पत्र का हवाला देते हुए 20 मार्च तक बनारस के सभी बड़े अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के संबंध में की कई कार्रवाई का रिपोर्ट देने को कहा था. इस सुनवाई में अमर उजाला, हिंदुस्‍तान, आज, राष्‍ट्रीय सहारा तथा दैनिक जागरण के लोग पहुंचे थे. अन्‍य अखबार के लोगों ने डिप्‍टी लेबर कमिश्‍नर को जानकारी दी कि संस्‍थान में बातचीत चल रही है. सारी चीजें प्रक्रिया में हैं. इसको लागू करने को लेकर प्रबंधन रणनीति बना रहा है.

पर दैनिक जागरण, कानपुर से पहुंचे एचआरडी मैनेजर मनोज दुबे ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की रिपोर्ट जमा करने की बजाय यूनियन के हस्‍तक्षेप पर ही सवाल उठा दिया. उन्‍होंने कहा कि हमारे अखबार का एक भी पत्रकार इन संगठनों का सदस्‍य नहीं है फिर किस आधार पर ये संगठन दैनिक जागरण में मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की लड़ाई लड़ रहे हैं. आखिर इनका रोल क्‍या है. मनोज दुबे ने रिट की कॉपी के साथ आब्‍जेक्‍शन भी लगाया है. जब सुप्रीम कोर्ट से कोई आदेश नहीं है तो फिर ये लोग क्‍यों मजीठिया वेज बोर्ड के लिए लड़ रहे हैं.

दैनिक जागरण के एचआरडी मैनेजर के आब्‍जेक्‍शन के बाद एके राय ने योगेश गुप्‍ता पप्‍पू तथा अजय मुखर्जी दादा से कैफियत पूछी कि वो किसी आधार पर यह लड़ाई लड़ रहे हैं. इसके लिए आगामी 12 अप्रैल की तिथि निर्धारित की गई है. इस दिन सभी पक्षों की सुनवाई होगी. उल्‍लेखनीय है कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने कर्मचारियों के लिए तीस प्रतिशत अंतरिम लागू करने की लड़ाई के दौरान ही अपने पत्रकारों से काशी पत्रकार संघ की सदस्‍यता से इस्‍तीफा दिलावा दिया था.

इस मामले में और अधिक जानकारी के लिए इन लिंकों पर क्लिक कर सकते हैं

बनारस में हस्‍ताक्षर का मामला अपर श्रमायुक्‍त के पास पहुंचा, हड़कम्‍प

जागरण, बनारस : चीफ सब एडिटर करेंगे जिले में नौकरी, राजाराम का हस्‍ताक्षर से इनकार

श्रम विभाग का नोटिस-नोटिस का खेल जारी, अबकी भी जागरण से नहीं पहुंचा कोई

जागरण प्रबंधन बोला- हम तो स्वेच्छा से हस्ताक्षर करा रहे हैं, जबरदस्ती नहीं

मजीठिया लागू न करने की शिकायत पर अखबारों को नोटिस

बनारस के अखबारों को 20 मार्च तक जमा करना होगा मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की रिपोर्ट

पीपुल्‍स समाचार की आर्थिक हालत खराब, मनोज एवं आदेश का इस्‍तीफा

मध्‍य प्रदेश के बहुसंस्‍करणों वाले अखबार पीपुल्‍स समाचार के हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं. इस अखबार के मैगजीन के पेज घटा दिए गए हैं. माई लेडी, एजुकेशन करियर जैसे अतरिक्‍तांक संडे में मर्ज कर दिए गए हैं. मैगजीन के भी तीस से ज्‍यादा पेज कम कर दिए गए हैं. अखबार की आर्थिक स्थिति भी दयनीय हो चुकी है. पिछले काफी समय से पत्रकारों को समय से सेलरी नहीं मिल रही है. पीपुल्‍स समाचार के लगभग सभी यूनिटों का यही हाल है.

पीपुल्‍स समाचार, ग्‍वालियर में भी ऐसा ही हाल है. वहां भी बीच में खबर आई थी कि प्रबंधन ने इस यूनिट से जुड़े सभी ब्‍यूरो को सेलरी मोड से निकालकर कमिशन मोड में ला दिया गया है. प्रबंधन का कहना है कि वो सिर्फ पांच हजार देंगे बाकी का इंतजाम ब्‍यूरो को खुद करना होगा. बताया जा रहा है कि पीपुल्‍स समाचार के सभी यूनिटों की सेलरी लेट लतीफ चल रही है. भोपाल से खबर है कि इन्‍हीं परेशानियों के चलते मनोज राठौर और आदेश प्रताप भदौरिया ने इस्‍तीफा दे दिया है. मनोज जहां ईटीवी पहुंच गए हैं वहीं आदेश ने प्रदेश टुडे ज्‍वाइन कर लिया है. संभावना जताई जा रही है कि जल्‍द ही कुछ और लोग संस्‍थान से विदा हो सकते हैं.

पूर्व विधायक ने महुआ न्‍यूज के पत्रकार से की बदसलूकी

चंदौली जिले के पड़ाव क्षेत्र में सड़क हादसे में एक युवक की मौत के बाद हुए बवाल को कवरेज कर रहे महुआ के पत्रकार के साथ भाजपा के पूर्व विधायक तथा उनके समर्थकों ने बदसलूकी की. पत्रकार से हाथापाई करने तथा कैमरा छीनने का प्रयास भी किया गया. पुलिसकर्मियों ने बीच बचाव कर पत्रकार को सुरक्षित भीड़ से बाहर निकाला. इस घटना के बाद से जिले के पत्रकारों में रोष व्‍याप्‍त है. 

कल सड़क हादसे में भाजपा के पूर्व विधायक छब्‍बू पटेल के गांव के एक युवक की मौत हो गई थी. गुस्‍साए लोगों ने पहले एक सिपाही को पीटा उसकी गाड़ी में आग लगा दी. इसके बाद सड़क पर आने जाने वाले वाहनों में तोड़फोड़ करने लगे. घटना की सूचना मिलने पर वहां पहुंचे महुआ न्‍यूज के पत्रकार महेंद्र प्रजापति ने विजुअल बनाना शुरू कर दिया. वे विजुअल बना ही रहे थे कि पूर्व विधायक ने महेंद्र को कवरेज करने से मना किया तथा भीड़ की तरफ चले गए. महेंद्र पूर्व विधायक की बात को अनसुना करते हुए अपना काम करते रहे.

विधायक जब दुबारा महेंद्र को विजुअल बनाते देखा तो अपने समर्थकों से कहा कि ये मान नहीं रहा है इसका कैमरा छीनों, इसका सारा विजुअल मिटा दो. इतना सुनते ही पूर्व विधायक के समर्थक महेंद्र की तरफ लपके तथा कैमरा छीनने का प्रयास करने लगे. इस दौरान महेंद्र अकेले थे. हो हल्‍ला होते देख पास में मौजूद चौकी इंचार्ज अमित सिंह तथा कुछ पुलिस सहकर्मियों के साथ वहां पहुंचे तथा महेंद्र को छब्‍बू पटेल के समर्थकों से घिरा देखा तो सभी को धमकाकर वहां से हटाया.

इसके बाद विधायक महेंद्र से उलझ गए तथा अपशब्‍द कहने लगे. इसी दौरान लाइव इंडिया के पत्रकार रोहित से भी उनकी कहासुनी हो गई. इस घटना की जानकारी दोनों पत्रकारों ने जिले के मीडिया संगठनों के पदाधिकारियों को दिया. इन लोगों ने जब पूर्व विधायक के व्‍यवहार पर आपत्ति जताई तो उन्‍हों ने अपनी गलती मानते हुए क्षमा मांगने की बात कही, परन्‍तु इस घटना से पत्रकारों में नाराजगी है तथा उन्‍होंने विधायक के इस व्‍यवहार की निंदा की है.

ए2जेड में पत्रकारों का बुरा हाल, पीने को पानी तक नहीं

इस वेब साइट के माध्‍यम से हम चाहेंगे कि हमारा दर्द सबके सामने आए। ए2जेड न्यूज चैनल का हालात खस्ता है। यहां पत्रकारों का जितना शोषण होता है शायद ही कहीं और होता होगा। ऑफिस की एचआर से लेकर आफिस मैनेजमेंट तक यहां कर्मचारियों का खून चूसने में लगे हुए हैं। यहां 10 से 11 घंटे की जबरन शिफ्ट करवाई जाती है। सैलरी इंनक्रीमेंट तो दूर की बात सैलरी ही टाईम पर मिल जाए तो भी बहुत है। अटकलें तो ये भी लगाई जा रही हैं कि चैनल बंद होने की कगार पर है। ऑफिस में पीने को पानी तक नहीं मिलता।

हाल की ही घटना है कि पानी ना होने के कारण नाइट शिफ्ट में काम करने वाले एक कर्मी को चक्कर आ गए और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। नियम कानून के नाम पर रोज यहां पत्रकारों को बेइज्जत किया जा रहा है। ए2जेड में उच्च पदों पर बैठे लोग भी यहां काम करने वालों के लिए कुछ नहीं करते। ना तो उनके हितों के लिए कुछ सोचा जाता है और ना ही उनके भविष्य के बारे में। चैनल में एक साल बाद तो कर्मियों को आई कार्ड मिला है लेकिन उसकी भी वैलिडिटी 6 महीने की रखी गई है। आई कार्ड ना होने के कारण नाइट में काम करने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन यहां की एचआर को इन चीजों की सुध तक नहीं, यहां की एचआर सिर्फ बॉस की लाबिंग करना जानती है। 

बात की जाए यहां के सीईओ वेद शर्मा की, तो वो जनाब भी किसी से कम नहीं। वो हमेशा एक ही प्रयास में लगे रहते हैं कि चैनल को बिना कर्मचारियों और बिना पैसे के मुनाफे में कैसे लाया जाए। लेकिन अगर यहां कोई अपनी प्रतिभा दिखाना चाहे तो साहब का पहला सवाल ये ही होता है कि आप किस की रेफरेंस से आए हैं। क्या टीवी चैनलों में अब पत्रकारिता की जगह रेफरेंस ने ले ली है? यहां एंकर बनने के लिए हुनर नहीं रंग रूप की मांग की जाती है। इतना छोटा चैनल होने के बाबजूद ये राजनीति का अखाड़ा बन गया है। और सही मायने में तो यहां के उच्च अधिकारी ही राजनीति को बढ़ावा देते हैं।

ए2जेड चैनल के एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र. अगर किसी को इस बारे में कुछ कहना है तो वो bhadas4media@gmail का सहारा ले सकता है.

हर तानाशाह आतंकवादी होता है और हर आतंकवादी तानाशाह : कारमान

नई दिल्ली : अरब क्रान्ति की नेता और सबसे कम उम्र में नोबेल शान्ति पुरस्कार जीतने वाली यमन की पत्रकार कारमान तवक्कुल ने आज यहाँ कहा कि हर तानाशाह आतंकवादी होता है और हर आतंकवादी निश्चित रूप से तानाशाह होता है. वे आज यहाँ बाबू जगजीवन राम राष्ट्रीय संस्थान के तत्वावधान में आयोजित पांचवें स्मारक व्यख्यान के आयोजन की मुख्य वक्ता थीं. अरब स्प्रिंग रिवोल्यूशन की नेता और वीमेन जर्नलिस्ट्स विदाउट चेन्स की संयोजक तवक्कुल कार्मान ने अरब दुनिया में परिवर्तन की आंधी ला दी है.

जिन अरब देशों में महिलायें बाहर नहीं निकलती थीं वहीं आज तवक्कुल की प्रेरणा से हज़ारों महिलायें सडकों पर आ कर तानाशाही का विरोध कर रही हैं. वे खुद महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानती हैं और अरब दुनिया में परिवर्तन की बहुत बड़ी समर्थक हैं. वे खुद भी अहिंसक तरीकों से चलाये जा रहे अरब देशों के परिवर्तन के आन्दोलन का नेतृत्व कर रही हैं. बहुत ही लचर तरीके से आयोजित सरकारी कार्यक्रम में कुछ भी ठीक नहीं था. निर्धारित समय से करीब ४५ मिनट बाद तक आयोजक तैयारी में ही लगे रहे. हद तो तब हो गयी जब मुख्य अतिथि के आ जाने के बाद भी सीटों पर आरक्षण की पट्टियां लगाई जाती रहीं. आयोजक और उनका मंत्रालय बिलकुल गाफिल थे क्योंकि सम्बंधित मंत्री ने पंजाब विधानसभा के स्पीकर को पंजाब की लोकसभा का स्पीकर बताया और अपनी गलती को सुधारने तक की परवाह नहीं की.

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की खामियों को लोकसभा की स्पीकर और बाबू जगजीवन राम की बेटी ने अपने स्वागत भाषण में बखूबी लिया. उन्होंने कहा कि वे तवक्कुल कारमान की बेख़ौफ़ पत्रकारिता का सम्मान करती हैं. मीरा कुमार ने इस अवसर पर अपने महान पिता को याद किया और कहा कि वे कहा करते थे कि हमारे देश के लिए लोकतंत्र बहुत ज़रूरी है क्योंकि वह हमें बराबरी का अवसर देती है. वे कहा करते थे कि बराबरी का लक्ष्य हासिल करने के लिए लोकतंत्र ज़रूरी है लेकिन जाति प्रथा इसमें सबसे बड़ी बाधा है. बाबू जगजीवन राम कहा करते थे कि या तो जाति प्रथा रहे या लोकतंत्र. क्योंकि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं. मीरा कुमार ने बताया अपने देश में लोकतंत्र और जातिप्रथा दोनों ही साथ-साथ चल रहे हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि हमारा लोकतंत्र जाति प्रथा को ख़त्म कर देगा और बराबरी उसी रास्ते से आयेगी.

जब तवक्कुल कारमान ने माइक संभाला तो दर्शकों में कोई बहुत उत्साह नहीं था लेकिन जब उन्होंने अपना भाषण ख़त्म किया तो सभी दर्शक खड़े हो कर तालियाँ बजा रहे थे. उन्होंने कहा कि अरब दुनिया में शासक वर्गों ने अजीब तरीके अपना रखे हैं. वे देश की संपत्ति को अपनी खेती समझते हैं और अपने परिवार वालों के साथ मिलकर सारी संपदा को लूट रहे हैं. अरब देशों में हर तरफ तानाशाही का बोलबाला है लेकिन अपने देशों के नाम सभी ने इस तरह के रख छोड़े हैं कि उसमें रिपबलिक कहीं ज़रूर आ जाता है. उनके अपने देश यमन के तानाशाह ने पूरी कोशिश की कि उनके आन्दोलन को इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन करार दे दिया जाए. लेकिन अरब नौजवानों ने तानाशाहों की कोशिश को सफल नहीं होने दिया. नौजवानों ने कुर्बानियां दीं क्योंकि वे अपने भविष्य को तानशाही के हवाले नहीं करना चाहते थे. अपनी कुर्बानियों एक बल पर अरब नौजवानों ने साबित कर दिया कि वे आतंकवादी नहीं है

क्योंकि वे महात्मा गांधी के अहिंसक आन्दोलन को अपने संघर्ष का तरीका बना चुके हैं. इन नौजवानों की ताक़त संघर्ष कर सकने की क्षमता है. अरब देशों के तानाशाह आम लोगों को उनका हक नहीं देना चाहते इसलिए वे उन्हें बदनाम करने के लिए उन पर आतंकवादी का लेबल लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन अब पूरी दुनिया को मालूम है कि अरब दुनिया बहुत बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है और उम्मीद से पहले ही अरब देशों में लोकशाही के स्थापना हो जायेगी.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार और स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, सहारा, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं. इनदिनों हिंदी दैनिक देशबंधु के साथ जुड़े हुए हैं.

संपादक जी को महंगी पड़ सकती है विधायक जी से दोस्‍ती

: कानाफूसी : जदयू विधायक राजीव रंजन के छपास रोग की बीमारी ने एक संपादक को परेशानी में ला खड़ा किया है। खबर है कि राष्ट्रीय सहारा, पटना के संपादक हरीश पाठक को जनता दल युनाइटेड के विधायक राजीव रंजन की दोस्ती ने उन्हें मुसीबत में डाल दिया है। विधायक राजीव रंजन बिहार के नालंदा जिले के इस्लामपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। वैसे तो उनका सभी अखबार के संपादकों और पत्रकारों से अच्‍छा याराना है, पर पाठक जी से उनकी दोस्‍ती कुछ ज्‍यादा ही है।

पाठक जी को भी अपनी दोस्ती का फर्ज तो अदा करना ही था, सो पिछले डेढ़ साल से लगातार विधायकजी की खबर को राष्‍ट्रीय सहारा में प्राथमिकता के साथ प्रकाशित किया। बिहार शरीफ के ब्यूरो को तो साफ निर्देश दे दिया गया था कि विधायक जी चापाकल का भी उद्घाटन करें तो खबर छूटनी नहीं चाहिए। संपादक के इस आदेश को भला कौन टालने वाला था, सो बड़ी से बड़ी खबरें भले ही छूट जाए, विधायक जी की खबर प्राथमिकता से छप रही थी। राष्ट्रीय सहारा का यह रूख स्थानीय नेताओं को नहीं पचा। सो प्रमाण के साथ सहारा श्री को पत्र भेज दिया। पत्र मिलते ही जांच शुरू हो गयी है। जांच के क्रम में पाठक जी ने कम्पनी से मिले स्पष्टीकरण का गोल-मटोल जवाब देकर बचने का प्रयास किया है।

हालांकि सहारा ने इस मामले को गंभीर मसला माना है सो एमसीसी की टीम आने वाली है, बचने के लिए अब पाठक जी अपने आका से मिन्नत करने में जुट गए हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि मुंगेर से निकट रहे एक आईपीएस अधिकारी, भागलपुर के एक कांग्रेसी नेता, पटना के एक राज्य सभा सदस्य और पुस्तक प्रकाशन समूह के दो मालिकों के लिए अखबार को इस्तेमाल किये जाने के मामले पर भी जांच होगी। वैसे इसके पीछे यह भी कहा जा रहा है कि पाठक जी की परेशानी का कारण शायद नीतीश कुमार की नाराजगी भी है, क्‍योंकि नीतीश राजगीर में राजीव रंजन के छपास और बयान रोग की बीमारी के लिए फटकार भी लगा चुके हैं। इनको छापने वाले अखबारों पर भी आपत्ति जताई थी।

Fraud Nirmal Baba (8) : gullible people must be made aware of such fraudster and his ways

Dear Yashwant, Congratulations for having journalistic instinct and courage. I got to know Nirmal Baba after my brother discussed his omnipresence, popularity and  ridiculous solutions for all problems. I then watched his advertisement. I knew instantly that this person was very shrewd. He took success of Ramdev through TV channels to another level, by being present on all channels.

His solutions are so ridiculously simple that a person hardly needs to make any sacrifice to get benefit. I had a feeling that our gullible people must be made aware of such fraudster and his ways. I found a single article on net-on hubpages. Some times later that page was removed. Fortunately i had a copy of the original article. I posted it on my blogpage. Two days later i got a legal notice from Nimal Baba to remove it or be ready to fight it out in the court.

I was compelled to remove the article from my page as i got to know that hubpages had lost the case in Delhi High court. If this Baba can cure all problems why does he need the help of law, lawyers and courts to save his reputation. There exists two facebook pages dedicated to exposing him- http://www.facebook.com/FraudyNirmalBaba and http://www.facebook.com/IsNirmalBabaAFraud. I request you to spread the word about these pages.

Atul Kumar Burnwal

हिंदुस्‍तान में सीनियर सब बने अचलेंद्र कटियार

युवा पत्रकार अचलेंद्र कटियार ने आज समाज, दिल्ली से इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने एक बार फिर हिन्दुस्तान, दिल्‍ली का दामन थामा है. अचलेंद्र का यहां सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. मूलतः कानपुर के रहने वाले अचलेंद्र कटियार ने अपने करियर की शुरुआत डीएलए, मेरठ से की थी, डीएलए छोड़ कर वे हिन्दुस्तान, कानपुर चले गए थे, फिर वहां से आई नेक्स्ट. आई नेक्स्ट में लम्बे समय तक काम करने के बाद वह पिछले एक साल से आज समाज, दिल्ली में जरनल डेस्क पर काम कर रहे थे.

अचलेंद्र ने पत्रकारिता की पढ़ाई जामिया से की है. अचलेंद्र को अपराध, राजनीति और खेल की ख़बरों की अच्छी समझ है. अचलेंद्र ने एक साल पहले आज समाज के नई दिल्ली ऑफिस में  बतौर रिपोर्टर ज्वाइन किया था लेकिन तत्कालीन प्रधान सम्पादक रहे राहुल देव ने अचलेंद्र की काबिलियत को देखते हुए उन्हें जरनल डेस्क की जिम्मेदारी सौंप रखी थी. बताया जा रहा है कि आज समाज के जनरल डेस्‍क को अंबाला भेजे जाने के चलते अचलेंद्र ने अखबार का बाय बोला है.

दैनिक जागरण, देहरादून ने छापा पेड न्‍यूज

पेड न्‍यूज का जन्‍मदाता दैनिक जागरण अपने अखबार में नैतिकता और सा‍माजिक सरोकार का बराबर दुहाई देता रहता है. उसके मालिक तथा लाखों कमाने वाले संपादक भी नैतिकता की बातें करते रहते हैं, पर जब इसको अमल करने की बात आती है तो सारी बातें कूड़े के ढेर में चली जाती हैं. पैसा कमाने तथा नए अधिग्रहणों को अंजाम देने की कोशिश में जागरण पत्रकारिता के सारे सरोकारों को बेच चुका है, अब पत्रकारिता को भी बेचना शुरू कर दिया है.

ताजा मामला दैनिक जागरण के देहरादून एडिशन का है. अखबार ने सिटी एडिशन के चार नम्‍बर पेज पर बैसाखी आई के नाम पर पेड न्‍यूज छापा है. बॉटम में प्रकाशित खबर में तीन ब्रांडों की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया है. खास बात है कि कहीं भी इन खबरों में विज्ञापन शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं किया गया है, जबकि यह खबर पूरी तरह पेड न्‍यूज है. बॉटम में तीन खबरें प्रकाशित की गई हैं. दो खबरें शिक्षा से जुड़े संस्‍थानों का तथा तीसरा प्रॉपर्टी से जुड़ी कंपनी शिवालिक का. ये खबरें पूरी तरह से पेड न्‍यूज हैं लेकिन जागरण ने इसे क्रेडिट लाइन देकर खबर बनाने का कुत्सित प्रयास किया है.

सवाल यह उठता है कि क्‍या जागरण इन संस्‍थानों से पैसा लेकर अपने पाठकों के साथ छल नहीं कर रहा है? पिछले लोक सभा चुनाव में अखबार को धंधा बना देने वाले जागरण की पैसा कमाने की भूख किसी से छिपी नहीं है. पत्रकारिता से ज्‍यादा बनियागिरी करने वाला यह संस्‍थान अपने पत्रकारों को तो जीवन जीने लायक पैसा देना भी गंवारा नहीं करता, पर जब पैसा लेने की बात आती है तो इसके मालिकान पत्रकारिता के सारे नियम-कानून गिरवी रखकर दोनों हाथों से पैसा बटोरने में लग जाते हैं. बीते विधानसभा चुनावों में आयोग की कड़ाई के चलते इस अखबार के मालिकान पैसा नहीं कमा सके तो अब तमाम शिक्षा संस्‍थानों और प्रॉपर्टी का धंधा करने वालों का पेड न्‍यूज छापकर उसकी भरपाई करने में जुट गए हैं.

अपने पत्रकारों का खून तक चूस जाने वाला जागरण अब अपने पाठकों को भी धोखा दे रहा है. वह भी उन पाठकों को जो अखबार की खबरों पर भरोसा करते हैं. इसमें लिखी खबरों को सही मानते हैं. धिक्‍कार है जागरण और इसकी बाजारू पत्रकारिता को. सिर्फ पैसा ही कमाना है तो उसके कई रास्‍ते हैं, कई तरीके हैं, कई व्‍यवसाय हैं पर पत्रकारिता को बेचकर, इसे गिरवी रखकर, अपने पाठकों को धोखा देकर पैसा कमाने की कोशिश को कहीं से भी जायज नहीं कहा जा सकता है.

अखबार लोकार्पण के दौरान ममता की चेतावनी : अपनी हद में रहे मीडिया

कोलकाता : अखबारों पर सरकारी फरमान को लेकर सरकार की हो रही किरकिरी से विचलित मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को चेतावनी भरे स्वर में मीडिया को अपनी हद में रहने की नसीहत दी. उन्होंने अखबारों के लिये एक लक्ष्मण रेखा भी खींच दी. कहा कि मीडिया अपनी सीमा से बाहर न जाये. मजे की बात यह है कि मुख्यमंत्री ने यह चेतावनी नेताजी इंडोर स्टेडियम में आयोजित एक ऐसे कार्यक्रम में दिया जिसमें एक ऐसे समाचार पत्र का लोकार्पण किया गया जिसे प्रकाशित होने से पहले ही सरकारी पुस्तकालयों में रखने का फरमान जारी कर दिया गया था.

समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि उनसे कोई गलती होती है, तो वह जनता के समक्ष माफी मांगने के लिए तैयार हैं. लोकतंत्र में सबसे ऊंचा स्थान जनता का ही है. उन्होंने कहा कि साजिश के तहत मीडिया में गलत बातें प्रचारित की जा रही हैं. मीडिया की भी अपनी सीमाएं हैं. उसे इस दायरे में ही रहना चाहिये. सुश्री बनर्जी ने कहा कि किसे सरकारी सूची में शामिल किया जायेगा और किसे नहीं किया जायेगा, इसका निर्णय सरकार करेगी. आईपीएस दयमंती सेन के तबादले पर कहा कि यह सरकार का अधिकार है कि वह किस अधिकारी को कौन सा दायित्व सौंपे.

क्या है मामला : राज्य सरकार ने पुस्तकालयों में सरकार का समर्थन करने वाले अखबारों को ही रखने का फरमान जारी किया है. पहले पुस्तकालयों में रखने के लिए आठ अखबारों की सूची जारी की गयी. फिर इसका विस्तार कर सूची में पांच और अखबारों को शामिल कर लिया गया. लेकिन अब भी इस सूची से प्रतिष्ठित और व्यापक प्रसार वाले समाचार पत्रों को अलग रखा गया है. इधर, ममता बनर्जी ने कहा है कि पुस्तकालयों में रखे जाने वाले व सरकारी विज्ञापन पाने वाले अखबारों की सूची में अब किसी अन्य को शामिल नहीं किया जायेगा. सरकार फैसले से पीछे नहीं हटेगी. साभार : प्रभात खबर

पत्रकारिता शिक्षा एवं शोध पर एक नई पत्रिका ‘जनसंचार विमर्श’

आज बाजार में मीडिया पर अनेक तरह की पत्रिकाएं उपलब्ध हैं, लेकिन ये शोधपरक लेखों या विचारों से पूर्ण नहीं दिखती हैं। हालांकि बहुत सी ऐसी पत्रिकाएं हैं जो इस पर निरंतर काम कर रही हैं। इसी कड़ी को आगे बढ़ाने का एक और प्रयास है शोधपरक पत्रिका 'जनसंचार विमर्श'। उम्मीद है यह लोगों से जनसंवाद करने में सफल रहेगी। पत्रिका का प्रथम अंक जल्द ही आने ही वाला है। पत्रिका के संपादक युवा पत्रकार एवं सैम हिग्गिनबाट्म इंस्टीटयूट आफ एग्रीकल्चर, टेक्नोलाजी एण्ड साईंसेज़, नैनी, इलाहाबाद के स्कूल आफ फिल्म एण्ड मास कम्युनिकेशन विभाग के अतिथि प्रवक्ता संदीप कुमार श्रीवास्तव हैं।

मीडिया एक ऐसा नाम जिससे शायद आज विश्व का कोई व्यक्ति अपरचित हो। पत्रकारिता का मूल उददेश्य है समाज को सूचना देना शिक्षित करना एवं मनोरंजन। लेकिन आज की पत्रकारिता शिक्षा शायद वह आदर्श स्थापित नहीं कर पा रहा है। इसके कारण आज की पत्रकारिता अपने मिशन से भटकती नजर आ रही है। शायद आजादी के पूर्व पत्रकारिता सिर्फ मिशन के लिए हुआ करती थी। परंतु आज पत्रकारिता किस दिशा की ओर जा रही है इस पर हम सभी लोगों को विचार करना होगा। इस भटकाव को आखिर किस तरह से बौद्धिक स्तर पर रोकने प्रयास किया जाए, इसके लिए जरुरी है शोध परक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। यह तभी संभव है जब इस विषय पर स्तरीय शोध कार्य हों क्या आज पत्रकारिता की शिक्षा इस पर ध्यान दे पा रही है।

आज पत्रकारिता शिक्षा में शोध का बड़ा अकाल देखा जा रहा है। विश्वस्तरीय शोध की आवश्यकता हर विद्यार्थी महसूस कर रहा है। पर वह अपनी बात आखिर किसके माध्यम से लोगों तक पहुंचाए यह आज की शिक्षा की बड़ी समस्या है। इसी पर जनसंवाद कायम करने का एक प्रयास यह शोधपरक पत्रिका करेगी। आज पत्रकारिता के सरोकारों को सही गलत बताने के लिए बाजार में अनेक तरह की पत्रिकायेँ दम भरती नज़र आती हैं। रोज नये-नये आयाम बताकर पत्रकारिता को नयी दिशा देने की बात की जा रही है। लेकिन क्या वाकई पत्रकारिता शिक्षा आज अपने मूल्यों को बचाती नज़र आती है। आज हर आदमी सबसे पहले यह पूछता है? कि आप राडिया से हो या मीडिया से। इसका जवाब आखिर क्यों नहीं मीडिया दे पा रहा है। इसके पीछे एक ही कारण समझ में आता है वह है स्तरीय शोध कार्यों एवं विश्वस्तरीय पत्रिकाओं का अभाव। इसका जवाब हम सभी को मिलकर खोजना होगा। प्रेस रिलीज

सड़क हादसे में प्रेस फोटोग्राफर रवि की मौत, शोक जताया

सैफई के प्रेस फोटोग्राफर रवि की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. रवि बीते एक अप्रैल की शाम अपने गांव नगला सुभान से पैदल सैफई की ओर जा रहा था. तभी एक तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने उसे टक्‍कर मार दिया तथा फरार हो गया. कुछ लोगों ने गंभीर हालत में रवि को सैफई स्थित ग्रामीण आयर्विज्ञान एवं अनुसंधान अस्‍पताल में भर्ती कराया, जहां उसका इलाज चल रहा था.

रवि को मिनी पीजीआई के आईसीयू में भर्ती कराया गया था, जहां चिकित्‍सक डा. एसपी सिंह, डा. वीके सिंह मौर्या और डा. अनुराग के नेतृत्‍व में उसका इलाज चल रहा था. पर सिर में गंभीर चोट होने की वजह से उसे बचाया नहीं जा सका. बीती रात ढाई बजे उसका निधन हो गया. रवि के निधन पर सांसद धर्मेंद्र यादव, ब्‍लाक प्रमुख तेज प्रताप यादव, सुघर सिंह, देवब्रत गुप्‍ता, अश्‍वनी शुक्‍ला, वीपी सिंह यादव, राजनारायण यादव, हृदेश यादव, शिशुपाल सिंह यादव, संतोष यादव, अवधेश ठेकेदार, रामबाबू प्रधान, शिवराज फौजी, गजेंद्र आचार्य, दशरथ यादव, चंदगी राम, एपी यादव, सुरेंद्र यादव पप्‍पू, राकेश यादव, सुनील ठाकुर, राधाकृष्‍ण यादव आदि ने शोक जताया है.

न्‍यूज टाइम चैनल से डेढ़ दर्जन लोगों का इस्‍तीफा

न्‍यूज टाइम चैनल से खबर है कि करीब डेढ़ दर्जन लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. इसमें आधे लोग संपादकीय टीम तथा आधे टेक्निकल टीम के शामिल हैं. बताया जा रहा है कि सेलरी तथा कई अन्‍य दिक्‍कतों की वजह से इन लोगों ने इस्‍तीफा दिया है. जिन लोगों ने इस्‍तीफा दिया है उनमें एंकर नूरी कायनात, एंकर स्‍नेहलता, एसोसिएट प्रोड्यूसर कनष्कि जायसवाल, मुचकुंद मिश्रा, प्रोडक्‍शन एक्‍जीक्‍यूटिव संज्ञा, जहीर तथा एसाइनमेंट डेस्‍क से सौरभ और अश्‍वनी शामिल हैं. इसके अलावा नौ वीडियो एडिटिंग तथा टेक्निकल विभाग के लोग शामिल हैं, जिनका नाम पता नहीं चल पाया है.

उल्‍लेखनीय है कि बसपा सरकार जाने के बाद जनसंदेश चैनल ने अपना नाम और लोगो बदल लिया है. चैनल से जुड़े लोगों के एनएचआरएम मामले के लपेटे में आने के बाद से ही आर्थिक दुश्‍वारियां शुरू हो गई हैं. पहले इस चैनल का नाम जनसंदेश प्‍लस किया गया बाद में इसका नाम बदलकर न्‍यूज टाइम कर दिया गया, परन्‍तु चैनल के अंदर की परिस्थितियां नहीं बदलीं. बताया जा रहा है कि सेलरी की अनियमितता की वजह से कुछ और लोग चैनल छोड़ सकते हैं. इस संदर्भ में चैनल हेड सैयदेन जैदी से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु बात नहीं हो पाई.

क्रांति की जननी तैंतीस वर्षीया तवाकुल कारमान से पत्रकार अशोक वानखड़े की एक मुलाकात

प्लेट में रखा बिस्कुट उसने हाथ में उठा लिया। बातचीत को जारी रखते बिस्कुट को उसने चाय में डुबाया और धीरे से देखा कि बैठे हुए लोगों के चेहरे पर क्या भाव आते हैं। सभी की आंखें एक दूसरे से टकराई। मोहतरमा ने हंसते हुए कहा कि मुझे चाय में डुबोकर बिस्कुट खाना अच्छा लगता है। मैं इस बहाने अपने बचपन की यादें ताजा कर लेती हूं। यूं ही चाय में बिस्कुट को डुबाकर खाने वाली कोई और नहीं, विश्व की सबसे युवा नोबल पुरुस्कार विजेता व यमन की लौह युवती तवाकुल अबदेल सलम कारमान है।

चाय के प्याले में तूफान खड़ा कर यमन के भ्रष्टाचारी और दमनकारी सत्ताधारियों से उनके पद से उखाड़ फेंकने का काम इस 33 साल की युवती, जिसे यमन की जनता ‘क्रांति की जननी' कहते हैं, ने किया है। तवाकुल ने कभी महात्मा गांधी को देखा तो नहीं, लेकिन सही मायने में उन्होंने महात्मा को समझा है। बंदूक का जवाब फूलों से दे कर उसने यमन की धरती पर ‘जास्मीन आंदोलन' को जन्म दिया, जो महात्मा गांधी के अहिंसा के मार्ग पर चला और तवाकुल ने यमन को दमनकारियों से चंगुल से मुक्ति दिलाई।

अवाम ए हिंद से विषेश बातचीत के दैरान तवाकुल ने भारत में पहली बार आने पर कहा ‘मैं अपने पिता के देश में पहली बार आई हू‘। भारत मेरे पिता की भूमि है, क्योंकि मोहनदास करमचंद गांधी जिसे पूरा भारत पिता कहता है, वह हमारे यमन के भी राष्ट्रपिता हैं। हमने यमन में जो भी हासिल किया है, वह बापू के अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही पाया है। हाल ही में यमन पर अमेरिकियों द्वारा किए गए ड्रोन हमले में कई लोग मारे गए। क्या अमेरिकियों का यमन पर बम बरसाना सही है? यह पूछने पर तवाकुल ने कहा कि मैं इस बात को मानती हूं कि बमों और हथियारों से आप अलकायदा को खत्म नहीं कर सकते। यमन की जमीं पर जो भी अलकायदा के लोग सक्रिय हैं, उन्हें यमन की जनता ही खत्म कर सकती है और वह उनका अधिकार भी है। लेकिन आतंकवादियों को मार गिराकर नहीं, उनकी सोच में बदलाव लाकर। आखिर वे भी इंसान हैं। अगर आज हमारे साथ जुडे़ यमन के युवा भ्रष्टाचार को मिटाने और मानव अधिकारों के संरक्षण की बात करते हैं तो वह अलकायदा की सोच को मिटाने का काम भी बड़ी आसानी से कर सकते हैं।

तवाकुल ने यमन के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष अली अबदुल्ला सालेह को यमन की धरती को आतंकवादियों की शरण स्थली बनने के लिए जिम्मेदार ठहराया। तवाकुल ने आरोप लगाए कि सालेह ने आतंकियों से धन लेकर उन्हें यमन मे पनपने दिया तो उन्हीं आतंकियों को ढूंढनेवालों से पैसा ले कर आतंकियों का मार गिरा रहे थे। तवाकुल ने कहा कि अब सालेह की सत्ता खत्म हो गई है, लेकिन देश को सही मार्ग पर आने के लिए थोड़ा समय लगेगा।

इतने कम उम्र में तवाकुल ने क्रांति की मशाल उठाई? इस पर वह बोलीं कि बचपन से ही उन्होने अपने पिता को सच्चाई के लिए और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते देखा। उनके पिता अबदेल सलाम कारमान जाने-माने वकील थे। वह न्यायाधीश और देश के कानून मंत्री भी बने। लेकिन तवाकुल को याद है तो उनका गलत कामों के लिए मना करना और सत्ताधीशो के सामने झुकने की बजाय इस्तीफा दे देना। ऐसे माहौल में तो  क्रांति की जननी ही आकार लेगी। वाणिज्य में स्नातक करने के बाद राजनीतिक विज्ञान में उन्होंने स्नातकोत्तर की पढाई पूरी की। राजनीतिक विषयों पर लेख लिखते-लिखते उन्होंने पत्रकारिता का चोला पहन लिया। और जब देखा कि प्रजातंत्र के इस चैथे खंभे को नष्ट करने के लिए सरकार नए-नए हथखंडे अपना रही है तो साल 2005 में तवाकुल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए महिला पत्रकारों का एक आंदोलन खड़ा किया ‘वुमेन जर्नालिस्ट विदाउट चेन‘। पहले लोगों ने इस आंदोलन का मजाक बनाया, लेकिन धीरे-धीरे लोग इससे जुड़ते चले गए और यह आंदोलन एक ज्वालामुखी बन गया। सरकार ने इसके दमन के लिए कई हथकंडे अपनाए। तवाकुल पर हमले किए गए, उन्हें धमकियां दी गईं, यहां तक कि सरकारी प्रसार माध्यमों से उनके चरित्र पर कीचड़ तक उछाला गया, उनके परिवार को अगुवा कर समाप्त करने की बातें होने लगीं, लेकिन तवाकुल अपने इरादों पर अटल रहीं।

जब तवाकुल से पुछा कि एक महिला होने बावजूद वह इतने संकटों से कैसे जूझ र्पाइं तो तपाक से जवाब आया महिला होने के वजह से ही। उनका महीला होना ही उनकी ताकद था। वह कहती हैं कि महिला को कभी भी अपने आप को समस्या नहीं समझना चाहिए। उसे अपने आप को समस्या का निदान समझाना चाहिए। वह एक पुत्री हैं, पत्नी हैं, मां हैं। तवाकुल ने कहा कि वह इन सभी पात्रों को जब जीती हैं तो अपने आप को अधिक उर्जावान महसूस करती हैं। वह पूरे यमन की बेटी हैं, मा हैं, बहन हैं। जब पूरा देश ही आपका अपना है तो उसके लिए काम करते हुए मौत भी आए तो क्या गम।

जब उनके संघर्ष मे आए कुछ रुकावटों या संकटों पर बात करनी चाही तो उनका जवाब था-‘सही मे मुझे संकटों के बारे मे कुछ भी याद नहीं। मैं हमेशा अपने लक्ष्य को देखती हूं। मूझे कुछ और नजर ही नहीं आता। जब आप की नजर किसी लक्ष्य पर होती है तो आपको भी महसूस होगा कि रुकावटें या संकट तो होते ही नहीं। अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने परिवार को देते हुए तवाकुल ने कहा कि मेरे पिता ने तो मुझे पूरी आजादी दी थी, लेकिन जब मेरी शादी तय हुई तो पति के सामने उन्होंने यह शर्त रखी थी कि मैं सार्वजनिक जीवन में अपना काम जारी रखूंगी और मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे पति मोहम्मद अल महमी, जो गणित के शिक्षक व मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, ने मुझे पूरा साथ दिया। आप नहीं समझ सकते कि यमन जैसे देश में जब एक मुसलमान प्रेस के सामने यह कहता है कि उसके पत्नी का अपहरण हो गया है तो उस पर क्या बीतती है। लेकिन उन्होंने बड़े धैर्य के साथ यह सब किया, मुझे उन पर गर्व है।

तवाकुल खुद नकाब नहीं पहनतीं, लेकिन वह हिजाब पहनती हैं। जब इस पर उनसे सवाल किया गया तो उनका जवाब था कि नकाब के खिलाफ नहीं हैं। हां, लेकिन वह इस बात को भी नहीं मानतीं नकाब या हिजाब ने पहनने से इस्लाम की तौहीन होती है। तवाकुल की राय है कि यह धर्म की नहीं, व्यक्तिगत पसंद की बात है। अगर किसी को नकाब पहनना अच्छा लगता है तो उसे गलत कहने का किसी को अधिकार नहीं और अगर कोई न पहनना चाहता हो तो उसपर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। हजारों साल पहले जब मानव गुफा में रह रहा था, तब तो वह कपड़े ही नहीं पहनता था। समय के साथ मानव ने प्रगति की और कपड़ो का प्रयोग होने लगा। तवाकुल के अनुसार हिजाब पहनना यह उनके लिए प्रगतिशीलता का परिचय है।

धर्म पर बात करते हुए तवाकुल ने कहा कि दुनिया में ऐसा कोइ धर्म नहीं जो हिंसो, मानव अधिकारों के हनन और हैवानियत को बढ़ावा देता हो। सभी धर्म भाईचारा और प्रेम की ही बात करते हैं। लेकिन हर धर्म में कुछ लोग होते हैं, जो धर्म को गलत परिभाषित कर कट्टरता को बढ़ावा देते है। हमें उनकी मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत है। और इसी बात चीज के लिए आज पूरी दुनिया बड़े आदर के साथ भारत की ओर देखता है, क्योंकि इतनी सारी भिन्नता के बावजूद देश एक है। इतने सारे धर्म, भाषाएं और संस्कृतियों के साथ भी भारत की एकता और अखंडता विश्व के लिए रोल माडल है।

33 साल की उम्र में सफल क्रांति कर यमन को पुर्नजीवित किया। शांति के लिए नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। विश्व के कई बडे़ पुरस्कार उनके कार्यालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसके बाद क्या ? क्या वह यमन का नेतृत्व करना चाहेंगी ? तवाकुल ने बडे सादगी से कहा कि यमन के इतिहास में दो रानियों ने जबरदस्त योगदान का जिक्र है, एक थी रानी  बिल्कीस और दूसरी अर्वा। यमन की जनता मुझे इन्हीं रूपों मे देखती है। यमन की जनता तो मुझे इस बार ही सत्ता सौपने को तैयार थी। पूरा यमन चाहता है कि मैं सरकार का हिस्सा बनूं, लेकिन मेरी अपनी व्यक्तिगत राय यह है कि मुझे सरकार के बाहर रह कर ही काम करना है। मेरी लड़ाई यमन तक ही सीमित नहीं है। यमन अब इस वैश्विक गांव का छोटा सा कस्बा है। अब मैं विश्व की नागरिक हूं, पृथ्वी मेरी मातृभूमि है और मानवता मेरा राष्ट्र है।

लेखक अशोक वानखड़े वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं.


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आज बरेली पहुंचेंगे शशि शेखर, पंकज मिश्रा बने सिटी इंचार्ज

हिंदुस्‍तान, बरेली में अखबार की दयनीय स्थिति तथा सिटी इंचार्जी पद को लेकर चले घमासान के बाद प्रधान संपादक शशि शेखर आज शाम बरेली पहुंचने वाले हैं. वेस्‍ट यूपी के हेड केके उपाध्‍याय कल से ही बरेली में डेरा डाले हुए हैं. आज सुबह उन्‍होंने पत्रकारों की मीटिंग ली तथा बृजेंद्र निर्मल के हाथ खड़ा करने के बाद खाली सिटी इंचार्जी की कुर्सी पर पंकज मिश्रा की ताजपोशी कर दी. केके उपाध्‍याय ने मीटिंग में कहा कि पंकज मिश्रा ही सिटी इंचार्ज होंगे बाहर से कोई नहीं आएगा.

उल्‍लेखनीय है कि डीएनई व सिटी इंचार्ज संजीव द्विवेदी के इस्‍तीफे के बाद चुनावों को देखते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार बृजेंद्र निर्मल को सिटी इंचार्ज बनाया गया था. पर इस पद पर मारामारी को देखते हुए बृजेंद्र निर्मल ने अपने हाथ खड़े कर दिए तथा वापस परसाखेड़ा कार्यालय में चले गए. इसके बाद से ही इस पद पर एक दूसरे को सुपरसीड करने की कोशिशें चल रही थीं. संजीव  के समय सेकेंड इंचार्ज रहे पंकज मिश्रा को भी किनारे किए जाने की बात चल रही थी, पर केके उपाध्‍याय ने आज की मीटिंग में यह स्‍पष्‍ट कर दिया कि नए सिटी इंचार्ज पंकज मिश्रा ही होंगे.

अखबार में हिंदुस्‍तान के पुराने पत्रकार तथा अमर उजाला से आए पत्रकारों के बीच काफी समय से रस्‍साकस्‍सी जारी है, जिसके चलते अखबार का सर्कुलेशन लगातार नीचे जा रहा है. इस गुटबाजी का असर अखबार पर भी पड़ रहा था तथा सिटी इंचार्जी जैसा मलाईदार पद पाने के लिए दोनों गुट एक दूसरे को रणनीतिक पटखनी देने की योजना पर काम कर रहे थे. पर केके उपाध्‍याय ने आज की मीटिंग में बता दिया कि अभी उनका पलड़ा भारी है.

केके उपाध्‍याय ने बरेली के पत्रकारों को भी सख्‍त हिदायत दी है कि वे अनुशासनहीनता से बचें. दूसरे की बीट की खबरें न लिखें ताकि किसी तरह का टकराव सामने आए. उन्‍होंने यह भी कहा कि अगर किसी रिपोर्टर की चार खबरें छूटी तो उसे आठ दिन की छुट्टी दे दी जाएगी. इस बीच खबर है कि अखबार के स्थिति का जायजा लेने प्रधान संपादक शशि शेखर भी बरेली पहुंच रहे हैं. यहां वे केके उपाध्‍याय, आशीष व्‍यास तथा सम्राट नायक के साथ मीटिंग करेंगे. 

Fraud Nirmal Baba (7) : संपादकों, पत्रकारों और पाठकों के लिए भड़ास की तरफ से एक पत्र….

: संपादकों, पत्रकारों और आपके लिए एक पत्र….  : विषय- न्यूज चैनलों पर निर्मल बाबा का साया और निर्मल बाबा पर चैनलों की माया…. आपकी राय चाहिए.. महोदय… निर्मल बाबा का जो थर्ड आई वाला फर्जी कार्यक्रम न्यूज चैनलों पर दिखाया जाता है, वह न्यूज चैनलों के लोकप्रिय टाप 50 कार्यक्रमों में शुमार हो रहा है. मतलब कि यह कार्यक्रम खूब टीआरपी बटोर रहा है. साथ ही यह कार्यक्रम निर्मल बाबा की तरफ से पूरी तरह पेड होने की वजह से चैनलों को पैसा भी खूब दे रहा है. क्या न्यूज चैनलों को निर्मल बाबा की असलियत पर बहस कराने की जगह उनसे पैसे लेकर उन्हें महिमामंडित करने वाले कार्यक्रम दिखाने चाहिए?

निर्मल बाबा पर चैनलों की माया और चैनलों पर निर्मल बाबा का साया… इस मुद्दे पर आपकी और ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों और संपादकों व टीवी से जुड़े पत्रकारों की राय चाहिए. आप अगर एक दर्शक या पाठक हैं तो भी आप अपनी राय भेज सकते हैं. कृपया अपनी बात मेल के जरिए bhadas4media@gmail.com पर भिजवा दें ताकि उसका प्रकाशन भड़ास4मीडिया पर कराया जा सके. इस मुद्दे पर भड़ास पर हम लोग fraud nirmal baba नाम से एक सीरिज प्रकाशित कर रहे हैं जिसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

http://bhadas4media.com/component/search/?searchword=fraud+nirmal+baba&ordering=oldest&searchphrase=all&limit=20

आभार

यशवंत

संपादक

भड़ास4मीडिया


yashwant

editor

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mobile: +91 9999330099

mail: yashwant@bhadas4media.com

दैनिक जागरण, पटना में कई लोगों की जिम्‍मेदारियां बदली

दैनिक जागरण के यूनिटों में चल रहे रूटीन बदलाव में यू‍पी के बाद अब बिहार में भी कुछ आंतरिक बदलाव हुए हैं. दैनिक जागरण, पटना से खबर है कि कई लोगों के डेस्‍क तथा डेस्‍टीनेशन बदले गए हैं. इनपुट में सेकेंड इंचार्ज के रूप में काम देख रहे रवींद्र पाण्‍डेय को आउटपुट हेड बनाकर नई जिम्‍मेदारी दी गई है. रवींद्र इलाहाबाद तथा कोलकाता में भी जागरण से जुड़े रहे हैं. कोलकाता से उनका तबादला पटना के लिए कर दिया गया था, तब से इनपुट हेड अनिल तिवारी के सहयोगी के तौर पर काम कर रहे थे. इस बीच कई बार उनकी जिम्‍मेदारियों में बदलाव भी किया गया था.

रिपोर्टिंग में तैनात प्रमोद कुमार सिंह तथा लखन सिंह को भी आउटपुट में लाया गया है. इन लोगों को रवींद्र पाण्‍डेय के सहयोगी बनाया गया है. अब तक आउटपुट की जिम्‍मेदारी संभाल रहे बीबी सिंह को इनपुट में भेज दिया गया है. वे अनिल तिवारी को सहयोग देंगे. जिलों में भी कुछ बदलाव किए गए हैं. डेस्‍क पर तैनात मुकेश कुमार को सीवान जिले का नया प्रभारी बनाया गया है. सीवान के प्रभारी राकेश कुमार सिंह को छपरा भेजा जा रहा है. छपरा के प्रभारी शिवाकांत ओझा वैशाली (हाजीपुर) में अखबार की कमान संभालेंगे. पटना में इनपुट में नगर निगम बीट और प्रशासन देख रहे जितेंद्र कुमार को आउटपुट में भेज दिया गया है. बिहार शरीफ के प्रभारी प्रशांत कुमार सिंह को भी यूनिट में बुला लिया गया है. उन्‍हें आउटपुट में लाया गया है. उनकी जगह अभी किसे भेजा जा रहा है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

Fraud Nirmal Baba (6) : निर्मल बाबा की पोल खोलने वाले पत्रकार धीरज भारद्वाज को लीगल नोटिस

भड़ास4मीडिया पर Fraud Nirmal Baba सीरिज में पत्रकार धीरज भारद्वाज का एक आलेख प्रकाशित किया गया. उस आलेख के कारण निर्मल बाबा के लोग बौखला गए और उन्होंने धीरज भारद्वाज को लीगल नोटिस भेज दिया. धीरज कई न्यूज चैनलों और अखबारों में काम कर चुके हैं. इन दिनों एक वेब साइट मीडियादरबार डाट काम से जुड़े हुए हैं. धीरज ने भड़ास4मीडिया को भेजे एक पत्र में बताया है कि हबपेजेस के खिलाफ़ हाईकोर्ट पहुंचने वाले टीम निर्मल बाबा के हौसले बुलंद हो गए हैं, इन लोगों की तरफ से बुधवार की सुबह खुद को निर्मल दरबार का प्रतिनिधि बताने वाली एक महिला ने लेखक धीरज भारद्वाज को फोन कर धमकाया और कहा कि दो घंटे के भीतर बाबा जी के खिलाफ़ लिखा आलेख हटवा लें वर्ना कानूनी कार्रवाई की जाएगी. जब लेखक ने उनसे आपत्ति की वजह जाननी चाही तो महिला ने कहा कि सब उनका वकील बता देगा.

दोपहर तक एक कानूनी नोटिस भी मेल के जरिए आ गया. नोटिस की भाषा खासी आक्रामक और आदेशात्मक है. नोटिस में लेख के कंटेंट पर आपत्ति जताई गई है. दिल्ली की इस कानूनी फर्म ने ग्रेटर कैलाश में रहने वाले निर्मलजीत नरुला की तरफ से भेजे गए अपने नोटिस के साथ हबपेजेस से पहले से ही हटाए जा चुके एक लेख के खिलाफ़ मिले हाईकोर्ट के आदेश की प्रति भी नत्थी की है. धीरज ने अपने आलेख में बाबाजी के तेजी से फैलते विशाल कारोबार के बारे में बताया गया है जिसकी अधिकतर सामग्री निर्मलबाबा.कॉम से ही ली गई है. आलेख में बाबाजी की लोकप्रियता से संबंधित जो भी आंकड़े दिए गए हैं वो टैम और ऐलेक्सा के शोध पर आधारित हैं.

नोटिस में आईटी ऐक्ट 2000 का हवाला दिया गया है और कहा गया है कि अगर नोटिस मिलने के 36 घंटे तक सामग्रियां नहीं हटाई गईं तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी जिसके लिए लेखक व पोर्टल जिम्मेदार होगा. फिलहाल धीरज ने अपने आलेखों को आरोपों के दायरे से बाहर मानते हुए किसी भी आलेख को न हटाने का फैसला किया है और मामले के विस्तृत अध्ययन के लिए अपने कानूनी सलाहकारों से संपर्क साधा है.

ग़ौरतलब है कि धीरज ने अपने लेख में राजफाश किया था कि निर्मल बाबा किस तरह अपने दरबार का प्रचार टीवी चैनलों के जरिए कर रहे हैं और उसमें आने वाले श्रद्धालुओं से ऐंट्री फीस के तौर पर पैसे लेकर मोटी कमाई कर रहे हैं. अमेरिकी वेबसाइट हबपेजेस पर भी पुराने पेज के हटने के बाद मीडिया दरबार ने एक नई बहस शुरू की है. इस पेज पर सवाल उठाए गए हैं कि आखिर निर्मल बाबा अपने भक्तों का भला करने के लिए पैसे क्यों वसूलते हैं? यह पेज अंग्रेजी में है और देश विदेश से इस पर पाठकों के कई कमेंट आ रहे हैं. भड़ास पर प्रकाशित धीरज के आलेख और अन्य संबंधित लेखों को पढ़ने के लिए क्लिक करें… fraud nirmla baba

सुलेश गोस्‍वामी बने आज समाज में सीनियर मैनेजर

: चंद्रेशखर ब्‍यूरो से हटाए गए : एचटी, चंडीगढ़ से खबर है कि सुलेश गोस्‍वामी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर डिप्‍टी मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. सुलेश ने अपनी नई पारी आज समाज, चंडीगढ़ के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर सीनियर मैनेजर मीडिया मार्केटिंग बनाया गया है. सुलेश पिछले डेढ़ दशक से इस फील्‍ड में सक्रिय रहे हैं. वे एचटी के अलावा इंडियन एक्‍सप्रेस को भी अपनी लम्‍बी सेवा दे चुके हैं. सुलेश ने आज समाज के साथ काम शुरू कर दिया है.

हिंदुस्‍तान, देहरादून से खबर है कि संपादक गिरीश गुरनानी ने ब्‍यूरो में तैनात चंद्रशेखर बुदाकोती को कांग्रेस बीट से हटा दिया है. उनकी जगह दर्शन सिंह रावत को कांग्रेस बीट सौंपी गई है. इसके पहले ब्‍यूरो से रिपोर्टर भास्‍कर को भी हटा दिया गया था. संभावना है कि कुछ और फेरबदल किए जा सकते हैं.

Fraud Nirmal Baba (5) : ये लिस्ट देखिए और खुद सोचिए, निर्मल बाबा ने कितना भ्रष्ट कर रखा है न्यूज चैनलों को

न्यूज चैनलों के लिए निर्मल बाबा हाट केक हैं. वे पैसा भी दे रहे हैं और टीआरपी भी. यकीन न हो तो नीचे दिया गया टाप65 कार्यक्रमों की लिस्ट देखिए जो टैम वालों