कौन कहता है सत्यमेव जयते?

सरकारी दफ्तरों के भीतर दीवार पर धूल फांकते सत्यमेव जयते को क्या कभी आपने देखा है? मकड़ी के जाले के नीचे दम घुटते इस शब्द की व्यथा-वेदना को क्या आपने कभी महसूस किया है? यही नहीं लाठी लेकर पगडंडियों पर चलने वाले एक बुजुर्ग के दृश्य को आपने कभी गौर से देखा है। अगर नहीं तो मैं आप को अंधा नहीं कहूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि देखने के लिए सिर्फ आंखों की जरूरत नहीं होती। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि सत्य एवं अहिंसा के महान पुजारी महात्मा गांधी को राजघाट पर कभी सिसकते हुए सुना है? राष्ट्रपिता को किसी गांधी प्रतिष्ठान में आपने दुःखी महसूस किया है। अगर नहीं तो आप आंखों वाले अंधे हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से मेरे आरोप भले ही मिथ्या साबित हो जायें मानवीय दृष्टि से मैं सही साबित होउंगा। खैर, मेरा मूल बिंदु यह है कि सत्यमेव जयते के इस ध्येय वाक्य से आप परिचित हैं? आप इस शब्द को महसूस करते हैं? कि सत्य की विजय होती है। आप इस सवाल पर भावुक न हों। जरा सोचिए। समझिए एवं समझाइये, हमें भी बताइये कि सत्यमेव जयते का क्या करें। चटनी एवं मुरब्बा समझ कर खायें या किसी पत्र-पत्रिका का प्रेस जैसा स्टीकर समझकर अपनी गाड़ी पर (अगर है तो) चिपका लें। सत्यमेव जयते को महान गीता समझ लें या फिर टीवी पर प्रवचन करने वाले संत-महात्माओं का शब्द संबल। क्या करूं इस सत्यमेव जयते का?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं सत्य की विजय होती है। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम भी यही बताते रहे हैं लेकिन हम क्या करें। मान लें कि सत्य की ही विजय होती है। पिछले दिनों अपने अभिन्न मित्र एवं सहपाठी से यही सवाल कर बैठा। चाय के कप से उड़ते भांप के बीच बुदबुदाते हुए उन्हें देखकर मैं समझ गया कि वे क्या सोचते हैं लेकिन किसी बे-शर्म, बे-हया इन्सान की तरह जब दोबारा यही सवाल पूछा तो वे तिलमिला उठे। असहज हुए मेरे मित्र ने चाय का कप अपने बगल में कुछ पटकते हुए कहा कि बेकार की बातों के लिए यहां मत आया करो। मैंने हिम्मत नहीं हारी। पूछ बैठा- महज सवाल ही तो किया है इस पर आप आवेश क्यों प्रकट करते हैं।

हमारे संवाद को मित्र की धर्मपत्नी भी सुन रही थीं। दरवाजे से कमरे में लगभग घुस कर तुनकते हुए बोलीं- 7 साल की अपनी बीमार बच्ची को लेकर सरकारी अस्पताल गए थे हम! डॉक्टर के सिर के ठीक उपर दीवार पर लिखा था सत्यमेव जयते। हम अपनी बच्ची के इलाज के लिए डॉ. से मिन्नते करते रहे लेकिन उसने हमारी एक नहीं सुनी। गोल्फ खेलने चला गया। हम रोते रहे, बिलखते रहे, घिघियाते रहे लेकिन वह हमें रौंदता हुआ चला गया। उसी रात हमारी बेटी इस दुनिया से विदा हो गई।

मैं मौके की गंभीरता समझ कर धीरे से निकल लिया। मैं अपने आप से सवाल करता रहा। आपसे भी करता हूं कि एक दम्‍पति का अस्पताल जाना, एक डॉक्टर का इलाज नहीं करना एवं गोल्फ खेलने चले जाना, उसकी कुर्सी के उपर दीवार पर सत्यमेव जयते लिखा होना, बीमार बच्ची के माता-पिता का हृदय-विदारक चीत्कार एवं उस मासूम बच्ची का मौत को गले लगा लेने से सत्यमेव जयते का क्या सम्बन्ध है? मैं यह भी जानना चाहता हूं कि उस डॉक्टर की गलती क्या थी वह भी तब जब उसकी ड्यूटी का समय पूरा हो चुका था। क्या डॉक्टर रुक जाता तो सत्य की विजय होती, क्या बच्ची बच जाती तो सत्यमेव जयते हो जाता? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सत्य है क्या? कहीं बच्ची का मर जाना तो नहीं?

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जनपद में रह रहे एक परिवार के 6 सदस्यों ने मौत को गले लगा लिया। लोग कहते हैं कि एक दबंग ने पहले इस परिवार की जमीन पर कब्जा किया एवं बाद में सौदा करने के नाम पर बहू-बेटियों पर गंदी निगाह रखने लगा। परिवार शासन-प्रशासन से गुहार लगाकर थक गया। बाद में थक हार कर सामूहिक रूप से इस जहां से विदा हो गये। बिहार में भ्रष्टाचार से लड़ रहे इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे को यही यकीन था कि अंत में सत्य की विजय होती है लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि एक ईमानदार अफसर को सत्य की लड़ाई लड़ने के लिए ईनाम में मौत मिली, मौत। उनके परिजनों का आरोप है कि हत्यारे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। इस सत्य के आप मायने तलाशेंगे तो निराशा हाथ लगेगी लेकिन इस डर से क्या हम ऐसा करना छोड़ दें। सत्येन्द्र दुबे की कुर्बानी चीख-चीख कर सवाल कर रही है कि क्या सच में सत्यमेव जयते है? हम सवालों को नजरअंदाज करते हैं, बहरे-गूंगे एवं अंधे बन जाते हैं क्योंकि ऐसे मामलों से डरते हैं। सत्यमेव जयते सवालों के घेरे में है, संदेह के दायरे में है, असमंजस के जाल में है। जरा सोचिए!

युवा आईपीएस नरेन्द्र कुमार मुरैना मध्य प्रदेश में अवैध खनन रोकने के लिए निकलते हैं। एक अभियान चलाते हैं, सत्य के लिए तत्पर रहते हैं लेकिन हश्र ऐसा कि रूह कांप जाये। खनन माफिया उन पर ट्रैक्टर चढ़ाकर मार डालता है। कुछ लोग कहते सुने गये कि सत्य मारा गया। आईपीएस ने अपने आप को मातृभूमि की बलिवेदी पर न्यौछावर कर दिया क्योंकि वे सत्यमेव जयते में यकीन रखते थे। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को नक्सलियों ने अगवा किया एवं अपनी शर्तें मनवाने के बाद रिहा कर दिया। इस प्रकरण में यह तय करना मुश्किल है कि सत्य के साथ माओवादी थे अथवा राज्य सरकार। लेकिन एलेक्स पॉल अपना कर्तव्य निभा रहे थे यही सोचकर कि सत्य की विजय होती है। सत्य की विजय हुई या नहीं आप तय करें।

एक सवाल रह रह कर मन को कचोटता है कि सरकारी कार्यालयों में ही क्यों सत्यमेव जयते होता है। कहीं सत्यमेव जयते को किसी दायरे में तो नहीं ला दिया गया वैसे ही जैसे जन लोकपाल विधेयक को लोकपाल विधेयक के दायरे में बांध दिया गया। सरकारी दपतरों में सत्यमेव जयते कहीं इस लिए तो नहीं लिखा होता कि सरकार जो करती है वही सत्य होता है और उसी की विजय होती है। समझ में आ रहा है कि इस वाक्य को भी चश्मे में उतार लिया गया है। शायद यही वजह है कि बड़े-बड़े घोटालों की खबर उन्हीं के मन्त्रालयों से आती है जहां बड़े-बड़े अक्षरों में सत्यमेव जयते अंकित होता है। यहां से संदेह का दायरा बढ़ता जाता है, तस्वीर धुंधली होती जाती है, महात्मा गांधी के दुःखी होने का एहसास होता है, शर्म आती है एवं बोध होता है कि सत्यमेव जयते एक वाक्य मात्रा है, अक्षर मात्र है और कुछ नहीं। ठीक वैसा ही जैसे शरीर और आत्मा। आत्मा नहीं तो शरीर का क्या मतलब।

6 मई से एक निजी टेलीविजन चैनल पर महान अभिनेता आमिर खान सत्यमेव जयते को फिर से परिभाषित करने का प्रयास कर रहे हैं। देखते हैं क्या होता है। जो लोग आमिर खान को जानते हैं उनको पता है कि उनके कार्यक्रम से उम्मीद की रोशनी की किरण (उनकी पत्नी नहीं) आ सकती हैं। वे आग लगायेंगे तो धुंआ उठेगा जरूर। जब चुभेगी बात तो बनेगी बात के तर्ज पर आमिर के इस शो से इतनी उम्मीद है कि धूल फांकते सत्यमेव जयते से कुछ गंदी परतें जरूर साफ होंगी। मकड़ी के जाले जरूर हटेंगे। हम सोचेंगे जरूर- सत्यमेव जयते।  

लेखक देवनाथ अमर भारती समाचार पत्र के मुख्‍य समाचार संपादक हैं.

जागरण : प्रतीक्षा, दुर्गेश एवं अमित ने किया अपने-अपने ग्रुप में टॉप

दैनिक जागरण में प्रोन्‍नति एवं इंक्रीमेंट में भाई-भतीजावाद के खात्‍मे के दौर में मात्र एक दर्जन पत्रकार ही 75 फीसदी अंक के आंकड़े को पार कर पाए हैं. दूसरी तरफ लगभग सात दर्जन पत्रकार 30 फीसदी के आंकड़े को भी नहीं छू पाए हैं. सीनियर सब-सीनियर रिपोर्टर ग्रुप में नोएडा की प्रतीक्षा सक्‍सेना ने टॉप किया है तो सब एडिटर एवं रिपोर्टर की परीक्षा में रांची के दुर्गेश कुमार अव्‍वल आए हैं. जूनियर सब एवं जूनियर रिपोर्टर में नोएडा के अमित कुमार सिंह ने अपनी डंका बजाई है.

जागरण ने इस बाद लगभग 960 लोगों की प्रोन्‍नति एवं इंक्रीमेंट की परीक्षा ली थी. इनमें 350 के आसपास पत्रकारों ने परीक्षा दी थी, जिसमें प्रतीक्षा सक्‍सेना 79 अंक पाकर टॉप किया. मेरठ के अनुज शर्मा 78 अंक, मेरठ के ही संजीव जैन 77 अंक, नोएडा के अ‍मरीश कुमार त्रिवेदी 77 अंक एवं लखनऊ की रोली खन्‍ना 76 अंक पाकर डिक्‍टेंशन पाने वालों की श्रेणी में शामिल रहे. वहीं 21 सीनियर सब व सीनियर रिपोर्टर 30 अंकों की लकीर भी नहीं पार कर सके.

सब एडिटर के लिए भी लगभग 360 के लगभग पत्रकारों ने परीक्षा दी थी. रांची के दुर्गेश कुमार 78 अंकों के साथ टॉप पर रहे. इसके बाद पटना की शुभ्रा कुमारी 77, रांची के रितेश कुमार 77 एवं रांची के ही रामानुग्रह मिश्रा 76 अंक के साथ 75 फीसदी का आंकड़ा पार करने में सफल रहे. सबसे ज्‍यादा लोग फेल भी सब एडिटर ग्रुप में ही हुए. 39 सब एडिटर एवं रिपोर्टर न्‍यूनतम 30 अंकों का बैरियर भी पार नहीं कर सके.

इस परीक्षा में 160 के आसपास जूनियर सब एडिटर एवं रिपोर्टर शामिल हुए. नोएडा के अमित कुमार सिंह ने 79 अंकों के साथ सबसे अव्‍वल आए. इसके बाद वाराणसी के विजय सिंह जूनियर 76 एवं वाराणसी के ही प्रमोद कुमार 76 अंक लेकर 75 फीसदी अंकों का आंकड़ा पार करने वालों में शामिल रहे. इस में भी 17 पत्रकार 30 फीसदी का न्‍यूनतम आंकड़ा पार नहीं कर सके. इसके अलावा ट्रेनी पद के लिए भी लगभग 90 लोगों ने परीक्षा दी थी. तीन लोग 69 अंक पाकर टॉप किया था, हालांकि कोई भी ट्रेनी 75 फीसदी का आंकड़ा नहीं छू पाया. वहीं चार ट्रेनी 30 अंक लाने में असफल रहे.

दैनिक जागरण में 75 हुए प्रोन्‍नत, 100 किए जाएंगे बाहर

दैनिक जागरण समूह में नियुक्तियों को लेकर मारामारी और ऊंचे दर्जे पर भाई-भतीजावाद की परम्‍परा अब इतिहास में सिमटने जा रही है। यहां बरसों से खट रहे सम्‍पादकीय विभाग के करीब 75 लोगों कर अब प्रोन्‍नत कर दिया गया है। समूह में प्रतिभाओं की पहचान के लिए केंद्रीय स्‍तर पर आयोजित परीक्षा के नतीजे आ चुके हैं। खबर यह भी है कि इस केंद्रीय परीक्षा में शामिल में लोगों में ज्‍यादातर में उत्‍तीर्ण कर दिया गया है। इसके साथ ही एक बुरी खबर भी। वह यह कि इस परीक्षा में तय किये गये मानदंडों पर सफल न हो पाये लोगों को समूह के दरवाजों से बंद कर दिया जाए। इसके पहले इस समूह में पत्रकारों की नियुक्ति, प्रोन्‍नति और बर्खास्‍त करने के लिए केवल ऊंचे सम्‍पर्क की मर्जी की चलती रहती होती थी।

आज इस परीक्षा का नतीजा कर दिया गया। परीक्षा के चार ग्रुप बनाये गये जो ट्रेनी, उप सम्‍पादक-रिपोर्टर, सीनियर रिपोर्टर और सीनियर उप सम्‍पादक के पद पर काम कर रहे हैं। समूह प्रबंधन ने पहले से ही तय कर लिया था कि इस परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले पत्रकारों को प्रोन्‍नत कर जाएगा लेकिन 30 प्रतिशत से भी कम अंक हासिल करने वालों को बाहर का दरवाजा दिखाया जाएगा। यह भी तय किया गया था कि ट्रेनी पत्रकारों को उप सम्‍पादक-रिपोर्टर के पद पर रेगुलर किया जाएगा।

सफल घोषित नतीजों के मुताबिक खारिज कर दिये गये करीब एक सौ पत्रकारों को समूह से बाहर किया जा सकता है। इनमें सीनियर उप सम्‍पादक- सीनियर रिपोर्टर पर काम कर रहे 21, उप सम्‍पादक-रिपोर्टर पद पर काम कर रहे 40 पत्रकार और जूनियर उप सम्‍पादक-जूनियर रिपोर्टर पद पर काम कर रहे 17 पत्रकार शामिल हो सकते हैं। यह सभी पत्रकार इस परीक्षा में पास होने के लिए न्‍यूनतम 30 फीसदी अंक तक की सीमा तक नहीं छू सके।

सांसद का कार्टून बनाने की सजा : 25 कोड़े

ईरान के खेल जगत में गैरवाजिब हस्तक्षेप करने वाले सांसद का कार्टून बनाना कार्टूनिस्ट महमूद शौकराई को उस समय महंगा पड़ गया जब उन्हें इसके लिए 25 कोडे मारे जाने की सजा सुनाई गई। मरकाजी में मीडिया से जुडे मामलों की एक अदालत ने शौकराई को सांसद अहमद लुत्फी अशथियानी का अपमानजनक कार्टून बनाने का दोषी पाया और उन्हें यह सजा सुनाई गई।

इस कार्टून में अशथियानी को फुटबाल खिलाडियों की वेशभूषा में सफेद निकर और लाल टी शर्ट पहने दिखाया गया है। अपने एक हाथ में फरमानी कागज पकडे अशथियानी का पैर जमीन पर पड़ी फुटबाल पर है जो उनके वजन से पिचकी जा रही है। अशथियानी समेत कई राजनेता अकसर देश के खेल जगत में बेवजह का हस्तक्षेप करने के लिए आलोचना का शिकार होते रहे हैं। शौकराई को 25 कोडे की सजा सुनाए जाने का कार्टूनिस्ट जगत ने गहरा विरोध व्यक्त किया है।

कार्टूनिस्टों ने अदालत के फेसले के विरोध स्वरूप सांसदों के नए कार्टून बनाने का आह्वान किया है। ईरान के नेटीजनों ने माइक्रो ब्लागिंग वेबसाइट टिवटर और सोशल नेटव�कग वेबसाइट फेसबुक पर इस पुेसले के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। ईरान के कट्टरपंथी राजनेता इस तुगलकी फरमान के समर्थन में उतर आए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा पर संसदीय समिति के सदस्य इस्माइल कुवसारी ने कहा है कि हर अपराध की कोई न कोई सजा होती है जिसमें कोड़े मारे जाना, जेल में डालना और जुर्माना लगाना शामिल है। साभार : पत्रिका

टाइम ने अपने कवर पर छापी स्‍तनपान की तस्‍वीर, बवाल मचा

मशहूर अमेरिकी पत्रिका टाइम के कवर पेज पर प्रकाशित स्‍तनपान की तस्‍वीर को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. पाठकों का एक तबका इस तस्‍वीर का खुलकर विरोध कर रहा है तो कुछ लोग इस तस्‍वीर का पक्ष लेते हुए इस की तारीफ भी कर रहे हैं. अक्‍सर अपने खबरों को लेकर चर्चा में रहने वाली टाइम मैगजीन इस तस्‍वीर के चलते पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है. इसके पहले भी कवर पेज पर प्रकाशित तस्‍वीर को लेकर टाइम मैगजीन विवादों में घिर चुकी है.

टाइम के कवर पर प्रकाशित इस तस्‍वीर में एक महिला द्वारा आने तीन साल से बड़े बच्‍चों को स्‍तनपान कराते हुए दिखाया गया है. इंटरनेट पर भी इस तस्‍वीर को लेकर चर्चा छिड़ी हुई है. वहीं दूसरी तरफ इस तस्‍वीर में मौजूद महिला का कहना है कि बिना वजह इसको विवाद का रूप दिया जा रहा है. लोगों को समझना चाहिए कि यह जैविक रूप से एक सामान्‍य बात है. हर मां अपने बच्‍चे को स्‍तनपान कराती है. दूसरी तरफ विरोध करने वालों का कहना है कि स्‍तनपान दिखावे नहीं बल्कि मां के प्‍यार का प्रतीक होता है, जिसका इस तस्‍वीर के जरिए अपमान किया जा रहा है.

साले मद्रासी फिर जीत गए (इंडियन एक्सप्रेस की भाषा)

जी हां. आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि इंडियन एक्सप्रेस जैसा अंग्रेजी अखबार इतनी घटिया हिंदी भला क्यों लिखेगा. लेकिन यह उलटबांसी हुई है. इस अखबार की वेबसाइट पर चेन्नई सुपर किंग्स के हाथों राजस्थान रायल्स की हार की जो खबर अंग्रेजी में लगी है, उस खबर को ढोने वाला कंधा यानि यूआरएल यानि डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डाट इंडियनएक्सप्रेस डाट काम के बाद जो कुछ कड़ियां आती हैं, उसमें अंग्रेजी में ही यह लिखा गया है- saale-madrasi-phir-jeet-gaye. इंडियन एक्सप्रेस की तरफ से यह सब जानबूझ कर किया गया है या किसी इंप्लाई ने बदमाशी की है, यह तो नहीं पता चला लेकिन फेसबुक पर इस मसले पर चर्चा शुरू हो गई है.

इस ब्लंडर की तरफ सबसे पहले ध्यान दिलाया द हिंदू अखबार के प्रिंसिपल न्यूज फोटोग्राफर अखिलेश कुमार ने. अखिलेश द्वारा ध्यान आकर्षित किए जाने के बाद बनारस के छात्र नेता रहे और वर्तमान में जनपक्षधर राजनीति के सक्रिय स्तंभ अफलातून देसाई ने इस मुद्दे पर अपनी टिप्पणी लिखकर बाकी लोगों को इस बारे में बताया. अफलातून ने फेसबुक पर लिखा- ''इंडियन एक्सप्रेस में चेन्नै सुपर किंग्स के हाथों राजस्थान रॉयल्स की हार की खबर की URL पर गौर कीजिए! मारवाडी गोयन्का का मुख्यालय चेन्नै था। क्या,यह रामनाथ गोयन्का की परम्परा है? क्या उन्हें यह बेहूदा URL कबूल होता?? (साभारः Akhilesh Kumar) http://www.indianexpress.com/news/saale-madrasi-phir-jeet-gaye/947835/''

नीचे स्क्रीन शाट दिए गए हैं. पहला स्क्रीनशाट इंडियन एक्सप्रेस डाट काम की वेबसाइट का है, जिसमें अब भी यूआरएल में भद्दी गाली दर्ज है. उसके बाद अखिलेश कुमार और फिर अफलातून द्वारा ध्यानाकर्षण का स्क्रीनशाट.

असीम त्रिवेदी को मिलेगा ‘करेज इन कार्टूनिंग अवार्ड’

: मशहूर कार्टूनिस्‍ट अली फरजत के साथ साझा करेंगे पुरस्‍कार : इंडियन कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को कार्टूनिस्ट के अधिकारों के लिये लड़ने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘कार्टूनिस्ट राइट्स नेटवर्क इंटरनेशनल’ की ओर से 2012 का ‘करेज इन कार्टूनिंग अवार्ड’ दिया जाएगा. वे यह अवार्ड सीरिया के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अली फरजत के साथ साझा करेंगे. अली फरजत दुनिया के जाने माने कार्टूनिस्ट हैं और टाइम मैगजीन की 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में शुमार हैं. उन्हें यह अवार्ड 15 सितम्बर को जार्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी, वाशिंगटन में दिया जाएगा.

असीम एक पालिटिकल कार्टूनिस्ट हैं और उनके भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बनाए गए कार्टूनों पर देश में काफी बवाल हुआ है. उनकी वेबसाइट को जहां मुम्बई पुलिस द्वारा बन्द करवा दिया गया वहीं महाराष्ट्र की ही बीड अदालत में उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया. अमीम को ढेरों धमकियां भी मिलीं पर इस सबसे न डरते हुए उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर सेंसरशिप के खिलाफ देशभर में सेव योर वाइस नाम से एक मुहिम छेड़ दी. असीम और उनके साथियों की पहल रंग लाई और इंटरनेट सेंसरशिप पर देश भर में विरोध प्रदर्शन और डिबेट्स शुरू हो गईं. इन सबके बाद राज्यसभा सांसद पी राजीव आईटी एक्ट 2011 को हटाने के लिये एनलमेंट मोशन भी लेकर आए.

कार्टूनिस्ट राइट्स इंटरनेशनल दुनिया भर के कार्टूनिस्ट के हितों की रक्षा करने वाला अकेला सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय संगठन है. यह संगठन हर साल दुनिया भर के उन कार्टूनिस्ट को सहायता प्रदान करता है, जो समाज की बुराइयों पर चोट करते हुए कार्टून बनाते हैं और फिर सोशल सेंसरशिप का शिकार बनते हैं. 2011 का करेज इन कार्टूनिंग अवार्ड मलेशिया के कार्टूनिस्ट जुल्फिक्ली अनवर उल हक को दिया गया था.

अमर उजाला से अजय एवं साधना भक्ति से संजीव का इस्‍तीफा

अमर उजाला, गोरखपुर से खबर है कि अजय पाण्‍डेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सब एडिटर थे. अजय के इस्‍तीफा देने के कारणों के बारे में पता नहीं चल पाया है, परन्‍तु समझा जा रहा है कि उन्‍हें किसी संस्‍थान से बढि़या ऑफर मिला है, जिसके चलते उन्‍होंने अमर उजाला को बाय कर दिया है. अजय ने करियर की शुरुआत प्रभात खबर, धनबाद से की थी. उसके बाद वे अमर उजाला के साथ गोरखपुर में जुड़ गए थे. वे पिछले पांच सालों से अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. 

साधना भक्ति चैनल से खबर है कि संजीव झा ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी चैनल वन के साथ शुरू की है. उन्‍हें टेक्निकल इंचार्ज बनाया गया है. संजीव इसके अलावा भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

उत्‍तराखंड से प्रकाशित होगा ‘दिल्‍ली आजकल’, लखनऊ से लांच होगा ‘कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस’

दिल्‍ली से प्रकाशित होने वाला साप्‍ताहिक अखबार 'दिल्‍ली अबतक' अपने विस्‍तार की रणनीति पर काम कर रहा है. प्रबंधन इसका विस्‍तार अब दिल्‍ली से बाहर उत्‍तराखंड में करने जा रहा है. जल्‍द ही अखबार का प्रकाशन देहरादून से होने लगेगा. देहरादून में क्षेत्रीय कार्यालय स्‍थापित किया जा रहा है. पिछले लगभग डेढ़ दशक से इस अखबार का प्रकाशन दिल्‍ली से किया जा रहा है. 12 पेज के इस पूर्ण रूप से रंगीन साप्‍ताहिक का विस्‍तार उत्‍तराखंड के बाद अन्‍य हिंदी भाषी राज्‍यों में भी किया जाएगा.

आगरा समेत कई शहरों से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार कल्‍पतरु एक्सप्रेस की लांचिंग जल्‍द ही लखनऊ से किए जाने की तैयारी चल रही है. लखनऊ के अलावा इस अखबार को दिल्‍ली भोपाल और जयपुर से भी प्रकाशित किए जाने की योजना है. इन शहरों में भी अखबार के लांचिंग की तैयारियां चल रही हैं. हालांकि अखबार के लांचिंग की शुरुआत लखनऊ से की जाएगी, इसके बाद ही इसे दूसरे शहरों में लांच किया जाएगा. अखबार का मूल्‍य दो रुपये निर्धारित किया गया है. अखबार का प्रकाशन सोलह पेज में किया जाएगा साथ ही पाठकों को कुछ सप्‍लीमेंट भी उपलब्‍ध कराए जाएंगे.

दैनिक जागरण, बरेली से आशीष का इस्‍तीफा

दैनिक जागरण, बरेली से खबर है कि आशीष सक्‍सेना ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सब एडिटर थे. आशीष कुछ दिन पहले ही अमर उजाला छोड़ने के बाद जागरण से जुड़े थे, परन्‍तु उन्‍हें जागरण का अंदरूनी माहौल रास नहीं आया. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने संपादक को अपने इस्‍तीफे की बात से अवगत करा दिया है. जल्‍द ही वे लिखित रूप में भी अपना इस्‍तीफा प्रबंधन को सौंप देंगे.

आशीष इसके पहले भी दैनिक जागरण के साथ काम कर चुके थे. जागरण के साथ यह उनकी दूसरी पारी थी. वे जनमोर्चा, हिंदुस्‍तान एवं अमर उजाला को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. फिलहाल उन्‍होंने कहीं ज्‍वाइन नहीं किया है, परन्‍तु बताया जा रहा है कि अब वे स्‍वतंत्र पत्रकारिता करने की तैयारी कर रहे हैं.

रुद्रपुर के तीन पत्रकारों के खिलाफ पुलिस ने कई धाराओं में दो मामले दर्ज किए

पिछले दिनों उत्‍तराखंड के रूद्रपुर में पत्रकारों के दो पक्षों के बीच हुए विवाद में दोनों पक्षों की तरफ से मुकदमा दर्ज कराया गया था. अब खबर है कि पूरन सिंह रावत पर मुकदमा होने के बाद रावत एवं एक अन्‍य पत्रकार ने तीन पत्रकारों आकाश आहूजा, गौरव कपूर एवं राजीव चावला के खिलाफ अलग-अलग मुकदमा दर्ज कराया है. बताया जा रहा है कि पूरन सिंह एवं उनके साथी पर हमले की घटना को एक पूर्व विधायक की शह पर अंजाम दिया गया.

तीनों पत्रकारों पर आरोप है कि इन लोगों ने एक सांध्‍य दैनिक के पत्रकार प्रदीप बोरा को मारपीटकर घायल कर दिया था. प्रदीप को देखने अस्‍पताल पहुंचे ईटीवी के पत्रकार पूरन सिंह रावत के साथ भी इन तीनों पत्रकारों ने मारपीट के असफल प्रयास के बाद उनकी मोबाइल लूट ली थी. पुलिस ने दोनों लोगों की तहरीर पर पुलिस एक मामले में आईपीसी की धारा 323, 392, 352 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया है. जबकि दूसरे मामले में आईपीसी की धारा 147, 149 व 323 के तहत मामला दर्ज किया है.

दैनिक जागरण, कानपुर में प्रवीण सिटी चीफ एवं विनोद डेस्‍क इंचार्ज बनाए गए

दैनिक जागरण, कानपुर से खबर है कि संस्‍थान में कुछ आंतरिक बदलाव किए गए हैं. सिटी इंचार्ज अंजनी निगम को हटा दिया गया है. उनकी जगह क्राइम इंचार्ज प्रवीण शर्मा को नया सिटी चीफ बनाया गया है. अंजनी निगम को उनका सहयोगी बना दिया गया है. डेस्‍क इंचार्ज उमेश शुक्‍ला को खेल पेज पर भेज दिया गया है. उनकी जगह खेल पेज की जिम्‍मेदारी संभाल रहे विनोद कुमार को नया डेस्‍क इंचार्ज बना दिया गया है. संभावना जताई जा रही है कि अखबार को मजबूत करने के लिए कुछ और बदलाव किए जा सकते हैं. सभी लोगों ने अपनी-अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है.  

एचआईवी पाजिटिव होने के कारण प्रबंधन ने नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया

ज्‍यादातर बुराइयां और पिछड़ापन पढ़े-लिखे तबकों में ही देखने को मिलती हैं. आमिर खान ने इस बात को अपने कार्यक्रम सत्‍यमेव जयते में भी प्रूव किया कि लड़की भ्रूण हत्‍या बड़े शहरों तथा कथित रूप से सांभ्रांत लोगों में ही ज्‍यादा होता है. इसी तरह की एक बेवकूफी भरा फैसला सामने आया है पुणे में. यहां की एक कंपनी सीनटेल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में काम करने वाले रोहित कुमार (बदला हुआ नाम) को कंपनी से इसलिए निकाल दिया गया और उनसे जबरदस्‍ती इस्‍तीफा ले लिया गया कि वे एचआईवी पॉजिटिव हैं. 

रोहित, जिनका कर्मचारी आईडी कोड 30320 है, को कंपनी प्रबंधन ने इन्‍हें कार्यालय के अंदर घुसने तक पर रोक लगा दी. इनसे लगभग जबरदस्‍ती करते हुए इस्‍तीफा मांग लिया गया, जबकि एनालिस्‍ट प्रोग्रामर के रूप में रोहित के काम से कंपनी को कोई शिकायत नहीं थी (हालांकि कंपनी ने इस्‍तीफा मांगने का कारण रोहित की अनुपस्थिति को बताया है) इस तरह के परेशानी के दौर में किसी को सबसे ज्‍यादा सामाजिक एवं सांस्‍थानिक सहयोग की जरूरत होती है, उस स्‍िथति में एक कर्मचारी के साथ इस तरह का व्‍यवहार कहां तक जायज कहा जा सकता है.

सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदेश तथा राज्‍य सरकारें तमाम माध्‍यमों से लोगों को इस बात की जानकारी बार-बार देती रहती हैं कि एचआईवी किसी के साथ खाने-पीने, सोने-उठने-बैठने या साथ रहने से नहीं फैलती है, बल्कि एचआईवी किसी पीडि़त व्‍यक्ति का खून किसी भी माध्‍यम से दूसरे व्‍यक्ति के खून में मिलने के बाद होती है. इसके बाद भी सीनटेल प्रबंधन का यह रवैया अत्‍यन्‍त ही निंदनीय है. इसका हर स्‍तर पर विरोध किया जाना चाहिए.

यशवंतजी, आप जैसों की न कोई सरहद होती है न कोई उम्र

यशवंतजी, भड़ास के चार साल पूरे होने पर बधाई. यशवंत भाई वास्‍तव में आप जैसे इंसान कभी नहीं मरते हैं. आप जैसे विप्‍लवी प्राणियों की न कोई सरहद होती है और न कोई उम्र. आपके पोर्टल को पढ़े बिना नींद नहीं आती. उन पत्रकारों ने आपको समझा, पहचाना जो स्‍वयं मीडिया की संस्‍था बन चुके हैं. हमारे मुल्‍क की माताओं ने ऐसे हजारों वीरों को जन्‍म दिया है, जिन्‍हें हम प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्‍च शिक्षा की किताबों में पढ़ते आए हैं.

आपको पढ़कर महसूस हो रहा है. मैं आपकी दैवीय शक्ति वाली मां को बहुत आदर के साथ नमन के साथ सलाम करता हूं.

प्रेम नाथ

premnath205@gmail.com


संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट- b4m 4 year

केटीएन चैनल के पत्रकार औरंगजेब की गोली मारकर हत्‍या

: भाई और दोस्‍त भी मारे गए : इस्लामाबाद। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बंदूकधारी बदमाशों ने समाचार चैनल में काम करने वाले एक रिपोर्टर सहित तीन लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी। मारे गए लोगों में पत्रकार के अलावा उस के भाई एवं दोस्त शामिल हैं। समाचार पत्र 'डॉन' के अनुसार सिंधी न्यूज चैनल केटीएन के पत्रकार औरंगजेब तूनियो की ललूरौंक कस्बे में गुरुवार देर रात उसके भाई एवं दोस्त के साथ गोली मार कर हत्या कर दी गई।

अखबार के अनुसार घटना के वक्‍त अपने कार्यालय में अपने भाई तथा दोस्‍त के साथ बैठे हुए थे, तभी 20 बंदूकधारियों का समूह वहां पहुंचा तथा अंधाधुंध गोली चलाकर औरंगजेब, उनके भाई रूस्‍तम तूनियो एवं दोस्‍त दीदार खासखेली की हत्‍या कर दी। पुलिस अभी तक इस मामले में किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं कर पाई है। समझा जा रहा है कि इस हत्‍या के पीछे आपसी रंजिश हो सकती है। फिलहाल पुलिस सभी बिंदुओं को ध्‍यान में रखकर जांच कर रही है।

विवादित बयान देने वाले सहारनपुर के डीआईजी समेत 21 आईपीएस बदले गए

लखनऊ : यूपी में अधिकारियों को इधर उधर करने का क्रम अभी तक थमा नहीं है। 20 आईपीएस अधिकारियों को सरकार ने तबादला किया है तो सहारनपुर मंडल के पुलिस उपमहानिरीक्षक एसके माथुर को उनके विवादास्‍पद बयान के बाद हटा कर लखनऊ में पुलिस महानिदेशक कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया है। डीआईजी माथुर के बयान की चारो तरफ निंदा हुई थी तथा सीएम अखिलेश यादव ने भी इसे गंभीरता से लेते हुए पहले ही कार्रवाई के संकेत दे दिए थे। इस तरह कुल 21 पुलिस अधिकारी हेरफेर के जद में आए हैं। 

सहारनपुर डीआईजी एसके माथुर के अलावा जिन लोगों का तबादला हुआ है, उनमें उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद में तैनात डीआईजी भोलानाथ सिंह को सहारनपुर परिक्षेत्र का नया डीआईजी बनाया गया है। 34वीं वाहिनी पीएसी, वाराणसी में सेनानायक के पद पर तैनात आरपी चतुर्वेदी को पुलिस अधीक्षक संतकबीरनगर, संतकबीरनगर के पुलिस अधीक्षक धर्मेन्द्र सिंह को सेनानायक 30वीं वाहिनी पीएसी गोंडा, दीपक कुमार पुलिस अधीक्षक रायबरेली को पुलिस अधीक्षक सीतापुर, श्रीमती अपर्णा एच.एस. पुलिस अधीक्षक सीतापुर को पुलिस अधीक्षक फिरोजाबाद, एल.आर. कुमार पुलिस अधीक्षक फिरोजाबाद को पुलिस अधीक्षक अभिसूचना मुख्यालय लखनऊ, किरण एस. सहायक पुलिस अधीक्षक प्रभारी जनपद पंचशीलनगर को पुलिस अधीक्षक रायबरेली, अब्दुल हमीद पुलिस अधीक्षक औरेया को पुलिस अधीक्षक पंचशीलनगर, अतुल शर्मा सहायक पुलिस अधीक्षक बरेली को सहायक पुलिस अधीक्षक अभिसूचना मुख्यालय लखनऊ, कृपा शंकर सिंह सेनानायक 6ठवीं वाहिनी पीएसी, मेरठ को पुलिस अधीक्षक गोंडा, संजय कक्कड पुलिस अधीक्षक सीबीसीआईडी लखनऊ को पुलिस अधीक्षक औरैया, नितिन तिवारी पुलिस अधीक्षक मैनपुरी को पुलिस अधीक्षक बिजनौर, दलवीर सिंह  यादव पुलिस अधीक्षक बिजनौर को पुलिस अधीक्षक मैनपुरी बनाया गया है।

इसी प्रकार कृष्ण मोहन सेनानायक चतुर्थ वाहिनी पीएसी इलाहाबाद को पुलिस अधीक्षक सतर्कता अधिष्ठान लखनऊ, ब्रजराज मीना पुलिस अधीक्षक अभिसूचना मुख्यालय से सेनानायक 12वीं वाहिनी पीएसी फतेहपुर के पद पर स्थानान्तरणाधीन को सेनानायक चतुर्थ वाहिनी पीएसी इलाहाबाद के पद पर तैनात किया गया है। रवि कुमार लोक्कू पुलिस उपमहानिरीक्षक स्थापना उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद से पुलिस उपमहानिरीक्षक अभियोजन निदेशालय लखनऊ, राजेश कुमार राय पुलिस उपमहानिरीक्षक लोक शिकायत मुख्यालय पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश लखनऊ से पुलिस उपमहानिरीक्षक स्थापना उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद, जय नारायण सिंह पुलिस उपमहानिरीक्षक तकनीकी सेवाएं उत्तर प्रदेश लखनऊ से पुलिस उपमहानिरीक्षक लोकशिकायत मुख्यालय पुलिस महानिदेशक लखनऊ के पद पर तैनात किये गये हैं। अजय कुमार मिश्रा पुलिस अधीक्षक कानून व्यवस्था मुख्यालय पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश लखनऊ से पुलिस अधीक्षक/सहायक निदेशक उत्तर प्रदेश पुलिस, राम शंकर पुलिस अधीक्षक पुलिस महानिदेशक मुख्यालय में सम्बद्ध से सेनानायक 26वीं वाहिनी पीएसी गोरखपुर व सभाराज अपर पुलिस अधीक्षक ग्रामीण लखनऊ का अपर पुलिस अधीक्षक अभिसूचना मुख्यालय लखनऊ पूर्व हुआ स्थानान्तरण निरस्त कर दिया गया है।

ग्रेनो के जीएम समेत कई अधिकारियों एवं बिल्‍डरों के यहां आयकर विभाग का छापा

इनकम टैक्‍स की टीम ने शुक्रवार को नोएडा एवं ग्रेटर नॉएडा में अथारिटी के अधिकारियों तथा कई बिल्डरों के ठिकानों पर छापे मारे. तमाम अधिकारियों और ठेकेदारों के घरों तथा ऑफिस में एक साथ डाले गए छापे से हड़कम्‍प मचा हुआ है. आयकर विभाग की टीम ने ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के कार्यालय और यहां के जीएम रविंद्र सिंह समेत ललित विक्रम और एमएस रिजवी के घरों में छापेमारी की. इसके अलावा कसाना बिल्‍डर्स और डीआर बिल्‍डर्स के भी कई ठिकानों पर छापे मारे गए हैं. खबर देने तक छापेमारी की कार्रवाई जारी है.

बताया जा रहा है कि इन लोगों पर मायावती सरकार के कार्यकाल के दौरान जमीन आबंटन में भारी घोटाला किए जाने का आरोप है. हालांकि अभी कोई आईटी का कोई अधिकारी अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं है, लेकिन खबर है कि टीम को कई ठिकानों से महत्‍वपूर्ण कागजात हाथ लगे हैं. इन सभी लोगों के कम्‍प्‍यूटर एवं अन्‍य कागजातों को खंगाला जा रहा है.

चार साल माने चार सौ साल पिछले और अगले

भड़ास4मीडिया के चार वर्ष पूरे हो गए। कम नहीं होते चार वर्ष। यह बात आज ही एक युवा पत्रकार ने मुझसे कही। दरअसल, चार साल कम होते हैं या पर्याप्त यह बहुत महत्वपूर्ण तो है, लेकिन आज से चार साल पहले तक यह कम से कम मुझे तो नहीं लगता था कि कोई एक ऐसी वेबसाइट जो अखबार-चैनलों से भी कहीं ज्यादा लोकप्रिय हो जायेगी। सूचनाओं-जानकारियों जिज्ञासा की दिशा को नया मोड़ दे देगी। खबर वालों की खबरें बनेंगी फिर उनकी खबरें सब पढ़ेंगे। कम्प्यूटर खोलते ही मीडिया जगत के लोग सब से पहले क्या पढ़ना पसंद करेंगे? यह सोचा तो जा रहा था। करने की कोशिश भी की जा रही थी। लेकिन भड़ास ने तो कर दिखाया।

वास्तव में स्वयंभू चौथा खंभा अपने आप में काफी रहस्यमय था। प्रबंधन से जुड़ी सारी जानकारियों को अंधेरे में रखा जाता था। तमाम अखबारों से निकाल गए और छोड़ चुके लोग कई महीनों तक यह बताए रखने में सफल रहते थे कि वह अभी भी उसी संस्थान में कार्यरत हैं। कोई जान ही नहीं पाता था कि ये महाशय काफी दिनों से पैदल हैं। कहीं काम ही नहीं कर रहे हैं। यह एक बड़ी समस्या थी। मैं अपना खुद का एक अनुभव बताता हूं। वर्ष 1999 में मैं अमर उजाला की तरफ से एक जनपद का ब्यूरो प्रमुख बनाकर भेजा गया। मैं ज्वाइन करने के एक घंटे बाद ऑफिस से निकलकर सड़क की तरफ आया और एक जगह पर खड़ा हो गया। वहीं पर एक सज्जन पहले से खड़े थे। मैं खड़ा हुआ ही था कि उन सज्जन के पास एक व्यक्ति आया और बोला कि आप तो अमर उजाला में रिपोर्टर हैं ना। उन सज्जन ने उस व्यक्ति से कहा कि हां-हां बिल्कुल, बताइये क्या बात है? वो बोला कि एक समाचार छपवाना है। और एक कागज निकालकर उन सज्जन को दे दिया। कागज लेकर वह दोनों ही सामने एक रेस्टोरेन्ट में चले गए।

मैं आफिस आ गया और काम-काज निपटाया। दूसरे दिन वही व्यक्ति आया और बोला भाई साहब कल मैंने अमर उजाला के पत्रकार जी को एक समाचार दिया था। आज छपा ही नहीं है। वाकई में मेरा तब तक अपने सभी स्टाफ से परिचय भी नहीं हो पाया था। किस्सा यह कि वह सज्जन जो खुद को अमर उजाला का पत्रकार बताकर बकायदा अपने को मेंटेन किए हुए थे, उनको अमर उजाला छोड़े हुए छह महीने हो गए थे। खैर, बाद में जो हुआ कोई बात नहीं है। भड़ास ने आज सामान्य आदमी को अखबारी दुनिया या मीडिया जगत की उन सभी सूचनाओं से वाकिफ करा दिया है, जो सूचनाएं हमेशा गोपनीय रह जाती थीं, क्यों न जाने लोग आखिर इस स्वयंभू चौथे खंभे की बुनियाद से लेकर शिखर तक होने वाली हलचलों को। और ऐसी-ऐसी बातों को जो कभी-कभी बड़ी आश्‍चर्यजनक लगती हैं। जैसे कि डिस्कवरी चैनल ने बता दी नेचर की असलियत। छिपे रहस्य और ऐसे ऐसे तिलिस्म जिन्हें अब तक लोग न जानते थे, न सोच सकते थे। वही काम कर रहा है भड़ास। मीडिया संसार के इन तिलिस्मों को सार्वजनिक कर देने का काम चल रहा है।

अब भड़ास कैसे काम कर रहा है। भड़ास के अन्दर भी कोई तिलिस्म है, कोई रहस्य है क्या। कुछ ऐसा है क्या, जिसे उन सब लोगों को जानना चाहिए जिनके बारे में भड़ास जानकारी देता है, कोई दूसरा इसकी जानकारी दे, उसके पहले खुद भड़ास को यह काम कर देना चाहिए, अगर ऐसी कोई बात हो तो। भड़ास एक देशज शब्द है। किसी विशेष अर्थ में ही प्रयोग होता आ रहा है। इस शब्द की सार्थकता साबित होती है और अर्थ भी बदलता है, जब भड़ास मीडिया दर्शन, चिन्तन, चिन्ता, तार्किकता, इनफरमेशन, नालेज का मंच बन जाता है। स्वर बन जाता है। बात तारीफ की नहीं है। बात सच्चाई की यह है कि भड़ास वेबसाइट में बहुत चीजों के मायने बदल कर रख दिए हैं। अब अगर जंगल में किसी शेर के पैर में कांटा चुभ जाता है या भैंसों का झुंड जंगल के राजा शेरों के झुंडों को खदेडता हुआ लाइव डिस्कवरी में या अन्य चैनल में दिखने लगा है तो फिर भडास में भी उसके समान परिस्थिति ही उजागर हो रही है।

बात चार सालों की नहीं है। चार साल अगर कम नहीं होते तो ज्यादा भी नहीं होते क्योंकि नेचर जल्दी और देरी दोनों का संतुलन बनाए हुए है। भड़ास के चार साल पिछले और अगले चार सौ सालों के बराबर लगने चाहिए। लगे रहिये। उन वेजुबानों को जबान मिल गई है, जो बाहर तो सींग लगाकर धरती धमकाते चलते थे और अपनी कंपनी के भीतर यस सर, जी सर, जी भाई साहब की दुम हिलाकर जीवन यापन कर रहे थे। बाहर जो जबान कैंची की तरह चलती थी वह अंदर म्यान में घुसी रहती थी। अब कम से कम भड़ास के जरिये ऐसा कोई भी बंदा नहीं बच रहा, जिसके अंदर की दुम और बाहर के सींग भड़ास के पाठकों से छिपे रह जाये।

पीयूष त्रिपाठी

लखनऊ


संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट- b4m 4 year

मोक्ष का अर्थ है- समूची आसक्तियों से मुक्ति, कोई भी आसक्ति न हो

मोक्ष के बारे में भगवत गीता का उल्लेख जरूरी है। अर्जुन भगवान कृष्ण से प्रश्न करते हैं- स्थितप्रज्ञस्य का भाषा, समाधिस्थ केशव/ स्थितिधिः किम प्रभाषेत, किम आसीत, व्रजेत किम।। यानी हे प्रभु, स्थितप्रज्ञ यानी सुख-दुख, लाभ-हानि और तमाम द्वैतों से परे व्यक्ति कैसे बोलता है? और समाधि प्राप्त व्यक्ति कैसे बोलता है? जो व्यक्ति सांसारिक द्वंद्वों से मुक्त है- यानी स्थिर है वह कैसे बोलता है, कैसे चलता है और कैसे आसन ग्रहण करता है? भगवान कृष्ण उत्तर देते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इंद्रियातीत होता है। वह इंद्रियों के वश में नहीं रहता। वह सुख में खुश या दुख में दुखी नहीं होता। वह सदा मधुर वचन बोलता है और संसार की विपरीत या अनुकूल स्थितियां उसे व्यापती नहीं हैं। वह सदा मुक्त रहता है।

अब जरा कबीर की ओर मुड़े। कबीर ने कहा है- जस की तस धर दीनीं चदरिया। यानी ईश्वर ने जिस तरह पवित्र आत्मा के साथ पृथ्वी पर भेजा था, ठीक उसी तरह उन्हें दे देना। बिना किसी दाग के। यह तभी संभव है जब व्यक्ति अपने लिए नहीं भगवान के लिए काम करता हो। भगवान के लिए ही उसका मन, उसकी इंद्रियां, उसका दिमाग और उसकी आत्मा तड़पे। जस की तस धर दीन्हीं चदरिया।

मोक्ष का अर्थ है सारी सांसारिक इच्छाओं से मुक्त हो जाना। यानी ईश्वर में लय। भोजन मिले या न मिले, कोई बात नहीं। वस्त्र मिले या न मिले कोई बात नहीं। शास्त्रों में लिखा है कि मोक्ष प्राप्त व्यक्ति ज्यादा दिन संसार में नहीं रहता। उसका शरीर जल्दी ही छूट जाता है। संसार ही नहीं उसे अपना शरीर भी कारागार लगता है। वह शरीर की सीमा में नहीं बंधा रहना चाहता। वह विराट का अंश हो जाता है। परमहंस योगानंद जी ने कहा है- मनुष्य का इसलिए जन्मता है ताकि वह उस ईश्वर को खोज सके जो उसके भीतर ही मौजूद हैं। परमहंस योगानंद की लिखी विश्व विख्यात पुस्तक पुस्तक- योगी कथामृत (आटोबायोग्राफी आफ अ योगी) पढ़ने से मोक्ष की विस्तारित व्याख्या समझ में आती है। मोक्ष यानी ईश्वर में लय। तब व्यक्ति अपने लिए कुछ नहीं करता। वह सारे सद्कार्य ईश्वर के लिए ही करता है। वह ईश्वरमय हो जाता है। प्रत्येक जीव, प्रत्येक वस्तु में वह ईश्वर का ही प्रतिबिंब देखता है। परमहंस योगानंद के मुताबिक योगी कहता है- हमारी उत्पत्ति ईश्वर से हुई है, हम ईश्वर में ही रहते हैं और एक दिन ईश्वर के दिव्य आनंद में ही हमारा लय हो जाएगा।

अब जरा रामकृष्ण परमहंस की तरफ मुड़े। रामकृष्ण परमहंस कहते थे ईश्वर में ही सब है। उनमें लय हो जाने का अर्थ है- मोक्ष। अपना तो कुछ होश ही नहीं रहता। वेदांत भी यही कहता है। नेति, नेति। यानी मैं शरीर नहीं हूं, मैं मन नहीं हूं। मैं बुद्धि नहीं हूं। तो मैं क्या हूं? शुद्ध सच्चिदानंद आत्मा हूं। भगवत गीता कहती है- शरीर से सूक्ष्म मन है, मन से सूक्ष्म बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है वह आत्मा है। रमण महर्षि कहते थे- सब कुछ ईश्वर ही है। मनुष्य माया के जाल में जकड़ कर समझता है यह शरीर और इंद्रियां ही सब कुछ हैं। इसीलिए वे कहते थे- खुद से पूछो कि मैं कौन हूं?

लेखक विनय बिहारी सिंह कोलकाता के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.


संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट- b4m 4 year

  भड़ास पर विनय बिहारी सिंह के अन्‍य लेख के लिए क्लिक करें – विनय बिहारी सिंह

दैनिक जागरण की एक खबर का कमाल, हो गए मालामाल

महराजगंज के जागरण ब्यूरो प्रभारी महेंद्र त्रिपाठी की एक खबर ने एक परिवार में खुशियों की बरसात कर दी. 13 अप्रैल को ग्यारहवीं की छात्रा प्रियंका परतावल ब्लाक अन्तर्गत विशुनपुर खुर्द गांव निवासी अमरजीत की पत्‍‌नी के रूप में पहली बार अपने ससुराल पहुंची तो घर में शौचालय ना पाकर उसने इसकी मांग की. व्यवस्था न होने पर चार दिन बाद इस घोषणा के साथ वह अपने मायके लौट गई कि जब तक शौचालय नहीं बनेगा, वापस नहीं आएगी. इस खबर को दैनिक जागरण ने मुद्दा बनाया. पहले तो प्रियंका और उसके ससुरालियों को बात नागवार लगी, लेकिन अब जागरण की गाथा गाते नहीं थकते हैं.

शौचालय न होने पर ससुराल छोड़ मायके चली जाने वाली प्रियंका के साहस की प्रशंसा करते हुए सुलभ इंटर नेशनल ने उसे दो लाख रुपये के पुरस्कार के साथ-साथ अत्याधुनिक शौचालय का तोहफा देने की घोषणा की है. संस्था की तरफ से जारी सूचना में कहा गया है कि इससे दूसरे लोग प्रेरणा लेंगे. प्रियंका के साहसिक निर्णय की जानकारी दैनिक जागरण से प्राप्त कर सुलभ इंटर नेशनल के चेयरमैन डा. बिन्देश्‍वरी पाठक ने गुरुवार को दिल्ली में उसे दो लाख रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की. डा.पाठक के पीआरओ मदन झा ने बताया कि यह पुरस्कार प्रियंका को दिल्ली में दिया जायेगा. उसके दिल्ली आने-जाने के लिए इंतजाम किया जाएगा. उसके ससुराल विशुनपुर में अत्याधुनिक शौचालय का निर्माण कराया जाएगा. इस पर सप्ताह भीतर काम शुरू हो जाएगा. डीएम महराजगंज शौम्या अग्रवाल ने प्रियंका को ब्रांड अम्बेसडर बनाने की घोषणा कर दी. अब लोग कह रहे हैं – यह है एक छोटी सी खबर का कमाल.

प्रसार भारती के पास सैलरी और ऑपरेशंस के भी पैसे नहीं होंगे!

नई दिल्ली : पब्लिक ब्रॉडकास्टर प्रसार भारती के पास पैसे खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। आशंका है कि दो महीने में प्रसार भारती के पास सैलरी पेमेंट और ऑपरेशंस के लिए पैसे नहीं होंगे। कॉरपोरेशन के एकाउंटिंग पर चले रहे विवाद से प्रशासन दुविधा में है। ऐसे में सरकार इसे मिलने वाले ग्रांट को रोक सकती है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने प्रसार भारती से कहा है कि फाइनेंशियल ईयर 2009-10 से संस्था ने ऑडिटेड एकाउंट्स नहीं सौंपे हैं, लिहाजा वह साल 2012-13 के लिए नए फंड नहीं जारी करेगा। अमूमन प्रसार भारती के सालाना बजट का दो तिहाई हिस्सा सरकारी ग्रांट से मिलता है। प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सिरकर ने बताया, 'इस मसले को सुलझाने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है।'

जवाहर 1975 बैच के आईएएस ऑफिसर हैं। उन्होंने इस साल फरवरी में प्रसार भारती के सीईओ का कार्यभार संभाला था। उनके प्रसार भारती में आने से पहले फाइनेंशियल ईयर 2009-10 की बैलेंसशीट को लेकर दो सीनियर एग्जिक्यूविट के बीच मतभेद हो गया था। इस वजह से प्रसार भारत के एकाउंटिंग का मसला अदालत तक पहुंच गया। इसमें भ्रष्टाचार और वित्तीय धोखाधड़ी तक के आरोप लगाए गए। प्रसार भारती के सीनियर एग्जिक्यूटिव और बोर्ड मेंबर ने भी इस संस्था के एकाउंट्स में गड़बड़ी की ओर इशारा किया।

प्रसार भारती बोर्ड ने साल 2009-10 की बैलेंसशीट की मंजूरी को वापस ले लिया था। बोर्ड के फैसले के बाद संस्था के वैधानिक ऑडिटर कैग ने भी इस मंजूरी को वापस ले लिया था। हालांकि, ऑडिट के दौरान कैग को किसी तरह की दिक्कत नजर नहीं आई थी। इस लड़ाई के दौरान बोर्ड ने कोई कार्रवाई नहीं की और इसके कुछ फैसले को अदालत में चुनौती दी गई। साथ ही, फाइनेंशियल ईयर 2010-11 के लिए भी एकाउंट्स तैयार नहीं किया जा सका।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय को हर साल के अंत में प्रसार भारती के एकाउंट्स को पेश करना होता है। इस संस्था को संसद में कानून बनाकर स्थापित किया गया है। साल 2009-10 के लिए ऑडिट किए गए खातों को 31 दिसंबर 2010 तक पेश किया जाना था और 2010-11 के लिए अगले साल उसी तारीख को एकाउंट्स को पेश किया जाना था। दोनों तारीखें गुजर चुकी हैं।

पिछले साल जहां सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने कुछ मोहलत दी थी, वहीं इस बार वह ऐसा नहीं करना चाहती है। मंत्रालय को डर है कि अगर इस बार भी ऐसा किया गया तो संसद में इस पर सवाल पूछे जा सकते हैं। प्रसार भारती को ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के नाम से भी जाना जाता है। इसके जरिए ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन का संचालन किया जाता है। दोनों संस्थानों में 50,000 से भी ज्यादा लोग काम करते हैं। (साभार : ईटी)

एक हजार करोड़ के काले धन की केबल इंडस्‍ट्री पर लग पाएगा लगाम?

हर बरस एक हजार करोड़ से ज्यादा ऑफिशियल कालाधन केबल इंडस्ट्री में जाता है। हर महीने सौ करोड रुपये केबल इंडस्ट्री में अपनी धाक जमाने के लिये अंडरवर्ल्ड से लेकर राज्यों के कद्दावर नेता अपने गुर्गों पर खर्च करते हैं। हर दिन करीब एक करोड रुपये केबल-वार में तमंचों और केबल वायर पर खर्च होता है, जिनके आसरे गुंडा तत्व अपने मालिकों को अपनी धाक से खुश रखते हैं कि उनके इलाके में केबल उन्हीं के इशारे पर चलता है और बंद हो सकता है। इन्ही केबलों के आसरे बनने वाली टीआरपी किसी भी न्यूज या मनोरंजन चैनल की धाक विज्ञापन बाजार से लेकर सरकार तक पर डालती है, जो चैनल की साख चैनल को देखने वाले की टीआरपी तादाद से तय करते हैं।

तो खबर यही से शुरु होती है। करोड़ों का कालाधन और कहीं से नहीं चैनल चलाने वाले देते हैं। चाहे खबरिया चैनल हों या मनोरंजन चैनल उसकी प्रतिस्पर्धा चैनलों के आपसी कंटेंट में पैसा लगाने से कही ज्यादा केबल पर दिखायी देने में खर्च होते हैं। और टीवी पर केबल के माध्यम से सिर्फ 60-70 चैनल ही एक वक्त दिखाये जा सकते है तो फिर बाकी चैनल खुद को स्क्रीन तक पहुंचाने में कितना रुपया फूंक सकते हैं और रुपया फूंकना ही जब टीआरपी के खेल से जुड़ जाये तो फिर करोड़ों कैसे मायने नहीं रखते यह सीबीडीटी की रिपोर्ट देखने से पता चलता है।

सरकार इसी केबल इंडस्ट्री पर ताला लगाने की पूरी तैयारी कर रही है। सूचना प्रसारण मंत्रालय की फाईल नं. 9/6/2004- बीपी एंड एल [वाल्यूम छह] में 78 पेज की रिपीर्ट में केबल सिस्टम को डिजिटल में बदलते हुये उसके प्रसार और कानूनी ढांचे को सरकारी हद में लाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। कैबिनेट के सामने रखे जाने वाले इस प्रस्ताव को जानने से पहले जरा चैनलों और केबल के खेल को समझना जरुरी है। क्योंकि एक तरफ सीबीडीटी की रिपोर्ट बताती है कि देश के जिन टॉप पांच टैक्स चोरों पर उसकी नजर है, उसमें रियल स्टेट, बिल्डर लाबी, चिटफंड, ट्रांसपोर्टर के अलावा केबल इंडस्ट्री है। और केबल वालों के कालेधन का नंबर तीन है। वहीं सरकार ने बीते पांच बरस में जिन-जिन कंपनियों को चैनलों के लाइसेंस बांटे उसमें सबसे ज्यादा रियल स्टेट, बिल्डर, चिट-फंड चलाने वालों के ही ज्यादातर नाम हैं। यानी एकतरफ केबल इंडस्ट्री के काले धंधे पर सीबीडीटी नकेल कसने के लिये फाइल तैयार कर रही है तो दूसरी तरफ कालेधंधे करने वालों को सरकार चैनलों के लाइसेंस बांट रही है।

यह भ्रष्टाचार का सरकारी लोकतांत्रिकरण है। जिसका असर यह हुआ है कि किसी भी खबरिया चैनल को राष्ट्रीय स्तर पर दिखने के लिये सालाना 35 से 40 करोड़ कालाधन बांटना ही पड़ेगा। जो केबल वालों की फीस है। मगर इसकी कोई रसीद नहीं होती। इस कैश को देने के लिये हर कोई राजी है, क्योंकि बिना केबल पर दिखे विज्ञापन के लिये तैयार होने वाले टैम रिपोर्ट से चैनल का नाम गायब होगा। और देश में फिलहाल जब साढे़ छह सौ चैनल हों और केबल टीवी पर एक वक्त में 60 से 70 चैनल ही दिखाये जा सकते हों तो फिर बाकी चैनल चलाने वाले क्या करेंगे। जाहिर है वह खुद को दिखाने के लिये रुपया लुटायेंगे। क्योंकि क्षेत्रवार भी हर राज्य में औसतन 145 चैनल चलाने वाले चाहते हैं कि केबल के जरिए उनके चैनल को दिखाया जाये। एक तरफ यह धंधा सालाना 900 करोड़ से ज्यादा का है तो इसके सामानांतर कालेधन की दूसरी प्रतिस्पर्धा केबल के जरिए टीवी पर पहले 15 चैनलों के नंबर में आने के लिये होता है। इसमें हर महीने 60 से 90 करोड़ रुपया बांटा जाता है। यानी हर कोई रुपया लुटाने को तैयार हो तो फिर चैनलों के पास काला धन कितना है या कहें कालाधन बांटकर विज्ञापन और साख बनाने को खेलने की कैसी मजबूरी बना दी गई है, यह चैनलों की मार-काट का पहला हिस्सा है।

दूसरा हिस्सा कहीं ज्यादा खतरनाक हो चला है। क्योंकि नये दौर में जब धंधेबाजों को ही चैनलों का लाइसेंस क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर दिया गया तो चैनलों में सबसे बड़ा हुनरमंद टीआरपी मैनेज करने वाला बन गया। चैनलों में सबसे ज्यादा वेतन उसी शख्स को मिलता है जो टीआरपी मैनेज करने का भरोसा देता है और करके भी दिखा देता है। लेकिन इस खेल का दवाब संपादकों पर भी पड़ा है। टीआरपी मैनेज कर खुद को बड़ा हुनर मंद बनाने का ही चक्कर है कि दो राष्ट्रीय नयूज चैनलों के संपादकों से इनकम टैक्स वाले लगतार पूछताछ भी कर रहे हैं और इनकी टीआरपी भी हाल के दौर में आश्चर्यजनक तरीके से तमाशे के जरिए कुलांचे भी मार रही है। असल में करोड़ों के इस खेल में कितना दम है और इस खेल के महारथियों को रोकने के लिये सरकार की नीयत कितनी साफ है इसके एसिड-टेस्ट का वक्त अब आ गया है। क्योंकि कैबिनेट के लिये तैयार सूचना प्रसारण मंत्रालय की सीक्रेट रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस एनॉलाग सिस्टम पर केबल के जरीये टीवी तक चैनल दिखाये जाते है, उससे अगले तीन बरस में पूरी तरह डिजिटल में बदलना जरुरी है। इसके लिये बकायदा समय सीमा भी तय की गयी है। सबसे पहले 31 मार्च 2012 तक चार महानगर दिल्ली, मुंबई, कोलकत्ता और चेन्नई में समूचा सिस्टम डिजिटल हो जायेगा। यानी केबल सिस्टम खत्म होगा। उसके बाद दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहरों में 31 मार्च 2013 तक केबल सिस्टम की जगह डिजिटल सिस्टम शुरु होगा और तीसरे फेज में सितंबर 2014 तक सभी शहर और आखिरी दौर यानी चौथे फेज में दिसबंर 2014 तक समूचे देश में केबल का एनालाग सिस्टम खत्म कर डिजिटल सिस्टम ले आया जायेगा। जिसके बाद डीटीएच सिस्टम ही चलेगा। रिपोर्ट में इन सबके लिये कुल खर्चा 40 से 60 हजार करोड़ का बताया गया है।

जाहिर है सूचना-प्रसारण मंत्रालय की 78 पेज की इस रिपोर्ट को सिर्फ कैबिनेट की हरी झंडी मिलने का इंतजार है। जिसके बाद यह कहा जा सकता है खबरों के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, उसकी उम्र सिर्फ आठ महीने है। क्योंकि चार महानगर भी केबल के जरीये टीआरपी के गोरखधंधे पर खासा वजन रखते हैं और अगर वाकई 31 मार्च 2012 तक सिस्टम डिजिटल हो गया तो खबरों के क्षेत्र में क्रांति हो जायेगी। लेकिन जिस सरकार की नीयत में दागियों को चैनल का लाइसेंस देना हो और उसी सरकार के दूसरे विभाग इन दागियों को पकड़ने के लिये जाल बिछाता दिखे, तो ऐसे में यह क्यों नहीं कहा जा सकता है कि सरकार की हर पहल के पीछे पहले सत्ताधारियों का लाभ जुड़ा होता है और वह मुनाफा काला-सफेद नहीं देखता। यहां यह बात उठनी इसलिये जरुरी है क्योंकि केबल इंडस्ट्री पर कब्जा सत्ताधारियो का ही है। पंजाब में बादल परिवार की हुकूमत केबल पर चलती है तो तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार की। कोई राज्य ऐसा नहीं है जहां राजनेताओं की सीधी पकड़ केबल पर नहीं है। और यही पकड़ उन्हें मीडिया के चंगुल से बचाये रखती है क्योंकि किसी भी सीएम या सत्ताधारी के खिलाफ खबर करने पर अगर उस चैनल को केबल ही दिखाना बंद कर दें तो फिर खबर का मतलब होगा क्या।

एक वक्त छत्तीसगढ के कांग्रेसी सीएम रहे अजित जोगी ने अपनी ठसक इसी केबल धंधे के बल पर बेटे के कब्जे से बनायी। तो आंध्रप्रदेश में वाएसआर के मौत पर जिस न्यूज या मनोरंजन चैनल ने वाएसआर की तस्वीर दिखाकर वायएसआर का गुणगान नहीं किया उस चैनल का उस वक्त आन्ध्र प्रदेश में ब्लैक-आउट कर दिया गया। मुंबई में तो केबल वार अंडरवर्ल्‍ड की सत्ता का भी प्रतीक है। इसलिये मुंबई का हिस्सा केबल के जरिए दाउद और छोटा राजन में आज भी बंटा हुआ है। और देश में सबसे ज्यादा सालाना वसूली भी मुंबई में ही चैनलों से होती है क्योंकि टैम के सबसे ज्यादा डिब्बे यानी पीपुल्स मीटर भी मुंबई में ही लगे हैं। किसी भी राष्ट्रीय न्यूज चैनल को यहां सालाना आठ करोड़ रुपये देना ही पड़ता है। और क्षेत्रीय चैनल को पांच करोड़। करीब बीस हजार लड़के केबल पर कब्जा रखने के लिये काम करते हैं। और देश भर में इस केबल इंडस्ट्री ने करीब सात लाख से ज्यादा लड़कों को रोजगार दे रखा है। खुद सूचना प्रसारण मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि देश में 60 हजार लोकल केबल ऑपरेटर हैं। जबकि सात हजार स्वतंत्र केबल आपरेटर। और हर केबल आपरेटर के अंदर कम से कम पांच से 20 लड़के तक काम करते हैं। फिर टैम रिपोर्ट जुगाड़ करने वाले दस हजार लड़कों से ज्यादा की तादाद और टैम के लड़कों से सैटिंग करने वाले बड़े बिचौलियों की तादाद जो चैनलों से मोटी रकम वसूल टीआरपी के खेल को अंजाम देते हैं।

इस पूरे कॉकस को क्या सरकारी डिजिटल सिस्टम तोड़ देगा और वाकई अपने मंत्रालय की जिस सीक्रेट रिपोर्ट पर अंबिका सोनी बैठी हैं क्या कैबिनेट की हरी झंडी मिलने के बाद वाकई केबल-टीआरपी की माफियागिरी पर ताला लग जायेगा। फिलहाल तो यह सपना सरीखा लगता है क्योंकि अब के दौर में चैनल का मतलब सिर्फ खबर नहीं है बल्कि सत्ता से सौदेबाजी भी है और केबल पर कब्जे का मतलब सत्ताधारी होना भी है। और इस सौदेबाजी या सत्ता के लिये सीबीडीटी की वह रिपोर्ट कोई मायने नहीं रखती, जो हजारों करोड़ के काले धंधे को पकड़ने के लिये उसी सरकार की नौकरी को कर रही है, जो सरकार चैनल का लाइसेंस देने के लिये धंधे के दाग नहीं लाइसेंस की एवज में धंधे की रकम देखती है। लेकिन सरकार की यह कवायद न्यूज चैनलों पर नकेल कस सरकारी तानाशाही होने वाली स्थिति भी दिखाती है। क्योंकि देशहित के नाम पर किसी भी जिलाधिकारी का एक आदेश चैनल का दिखाना बंद करवा सकता है।

उत्‍तम लुधियानवी

पंजाब

09988901256

09463320000

साक्षी समूह के अखबार व चैनल में सरकारी विज्ञापन के प्रसारण पर रोक

: बीस हजार पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों का भविष्‍य खतरे में : हैदराबाद। सीबीआई द्वारा साक्षी समूह के बैंक खातों के लेन-देन पर रोक लगाने के बाद आंध्र प्रदेश सरकार ने दिवंगत मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे और वाईएसआर कांग्रेस अध्यक्ष वाईएस जगनमोहन रेड्डी की आर्थिक मोर्चे पर और नाकेबंदी कर दी। सरकार ने साक्षी समाचार पत्र व टेलीविजन चैनल पर अपने सभी विज्ञापनों के प्रसारण पर रोक लगा दी है। जगन साक्षी समाचार पत्र व चैनल के मालिक हैं।

सरकार ने सभी विभागों, एजेंसियों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, कारपोरेशनों और संगठनों को साक्षी के लिए विज्ञापन जारी न करने के लिए कहा है। साक्षी को भी अधिसूचना जारी की गई है। सीबीआई ने मीडिया हाउस साक्षी के खिलाफ एक आरोप पत्र दाखिल किया है, जिसे ध्यान में रखते हुए यह रोक लगाई गई है। इससे दो दिन पूर्व सीबीआई ने तेलुगू दैनिक साक्षी निकालने वाले जगती प्रकाशन, 24 घंटे का समाचार चैनल चलाने वाले इंदिरा टेलीविजन व जननी इंफ्रास्ट्रक्चर फर्म के बैंक खाते सील कर दिए थे।

सीबीआई ने जगन के पास कथित अवैध संपत्ति होने की जांच के तहत इन कंपनियों के 11 वर्तमान खातों और 103 करोड़ रुपये के फिक्स्ड डिपाजिट सील किए हैं। कंपनियों के 11 खातों में कुल 10.31 करोड़ रुपये की राशि है। कडप्पा सांसद जगन की कंपनियों ने सीबीआई की इस कार्रवाई को चुनौती दी है। कंपनियों का आरोप है कि खाते सील कर देने से दैनिक व टीवी चैनल प्रभावित हुए हैं और इससे इनके 20,000 कर्मचारियों का भविष्य खतरे में पड़ गया है।

राजशेखर रेड्डी के मुख्यमंत्रित्व काल में वर्ष 2008 में इस समाचार पत्र व चैनल को शुरू किया गया था। इसके बाद 24 अप्रैल 2008 को एक सरकारी आदेश जारी हुआ, जिसमें कुछ शर्तो में ढील देकर सूचना एवं जनसंचार आयुक्त को साक्षी के लिए विज्ञापन जारी करने की अनुमति दी गई थी।

जगन पहले ही सीबीआई की इस कार्रवाई को खुद को खिलाफ षड्यंत्र व प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बता चुके हैं। साक्षी प्रबंधन का कहना है कि बैंक खाते सील होने से उनका काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। सीबीआई ने राज्य हाई कोर्ट के निर्देश पर पिछले साल जगनमोहन व 72 अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया था। जगन, उनकी कंपनियों, नजदीकी सहयोगियों व उनकी कंपनियों में पैसा लगाने वालों के खिलाफ तीन आरोपपत्र दाखिल किए। (जागरण)

Shazi Zama is indeed a sunni fundamentalist and india hater

yashwant ji, shazi zama is a fundamentalist sunni muslim. there is no doubt about it. those who have worked with him call him zinna because he is a blatant and open sympathiser of pakistan. when he was with aajtak, he banned foreign policy expert and former high commissioner to pakistan mr parthasarthy because he criticised pakistan in the harshest words.  he hates hinduism and hindus to the hilt. if you support india in front of him he will kick you out of his office. he has spoiled career of several nationalist journalists and is still doing so. it is really pity that he is at such a good position. we demand that he should be sacked immediately and an inquiry should be constituted to probe his pakistani links and the money that he gets from isi.

had there been sufficient sunni fundamentalist journalists in hindi media, he would have kicked out all hindus or hindu and india supporting journalists from his news organisation. people in star news know very well….if you want to spoil some body's career or take a revenge from some body in the organisation, simply tell shazi that so and so is from rss or bjp or staunch hindu supporter and then shazi will settle the score with that unfortunate person sooner or latter. it is sad but true that with the rise in his career, his intolerance against hindus has also increased manifold.
 
pradeep kumar has never worked with shazi. he may be enamoured by the outer persona of shazi who claims to be a great secularist. but fact remains that he is a hardcore hindu baiter and india hater. pradeep kumar is praising him because he may be expecting some personal favour from shazi or his media organisation. for allah sake please stop this "naked sychophancy" pradeep kumar. it is not only stupid but atrocious to compare shazi's father with manto or rahi masoom raza. only mean and sycophants like pradeep kumar only can do this.
 
we sincerely hope that on the day of qayamat allah will punish shazi for his sins against hindus and his treason with his mother land. insha allah, he will be punished in his lifetime only as we say in hindi – paap ka ghada ek na ek din to phutata hi hai  
 
pradeep kumar, please mind your words. you may believe that you are a senior jouranlist but you way of writing suggests that you are only fourth pass.

rajesh kumar

rajeshkumar1948@yahoo.com


Related News-

शाजी जमां को कट्टर सुन्नी बताने वाली मानसिकता ने भारत का विभाजन करवाया   

फेसबुक पर शाजी जमां के खिलाफ कुत्सित मुहिम

यूपी में सिर्फ एक प्रदीप शुक्ला नहीं, ऐसे दर्जनों भ्रष्ट आईएएस हैं, नाम सब जानते हैं पर कौन डालेगा इन पर हाथ!

ये वो कार्रवाई थी जो एक साल पहले हो जानी चाहिए थी। यूपी के आईएएस अफसर प्रदीप शुक्ला को गुमान था कि उनके आधा दर्जन आईएएस रिश्तेदार, प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात उनके आईएएस संबंधी और कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल की नातेदारी के चलते सीबीआई अफसर उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। यह बात हकीकत भी लग रही थी क्योंकि तमाम लोगों की राष्ट्रीय स्वाथ्य मिशन में गिरफ्तारी के बावजूद एक साल से प्रदीप शुक्ला पर हाथ डालने की हिम्मत कोई नही जुटा पा रहा था। प्रदीप शुक्ला की गिरफ्तारी के बाद कई बड़े लोगों के भी इस घोटाले में फंसने की उम्मीद बढ़ गयी है। यह बात दीगर है कि यूपी में प्रदीप शुक्ला की तरह अभी भी दर्जनों ऐसे आईएएस अफसर मौजूद हैं जिनकी भ्रष्टाचार की गाथायें सबको मालूम हैं मगर उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा।

दरअसल प्रदीप शुक्ला ने सारा ताना-बाना बहुत दिमाग से बुना था। सभी लोग जानते हैं कि प्रदीप शुक्ला अपने बैच के टॉपर हैं लिहाजा बुद्धि की उनके पास कोई कमी नहीं। मगर इस बुद्धि को कुबुद्धि में बदलने में प्रदीप शुक्ला ने कोई देरी नहीं लगाई। अपने हुनर के चलते वह पहले मुलायम दरबार के सबसे प्रमुख कारिंदे हुआ करते थे और बाद में मायावती के भी सबसे करीबी लोगों में उनका नाम शुमार किया जाने लगा।

पिछली सरकार में प्रदीप शुक्ला प्रमुख सचिव स्वास्थ्य थे। प्रदेश की स्वास्थ्य की सभी योजनाओं की जिम्मेदारी उनकी ही थी मगर इस जिम्मेदारी को सही ढंग से निभाने की जगह वह भ्रष्टाचार के खेल में शामिल हो गये। दरअसल माया सरकार में सब कुछ ‘मायामय’ हो गया था। चाहे अफसर हों या नेता सभी के सामने एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाये जा सकें। स्वास्थ्य विभाग पैसे की ऐसी ही मशीन बनकर रह गया था जहां पर पैसा और सिर्फ पैसा कमाना ही उद्देश्य बन गया था। इस पैसे से अफसरों और नेताओं के महल बन रहे थे। यह बात दीगर है कि यह महल गरीबों की लाश पर खड़े हो रहे थे।

इस खेल की पहली शुरुआत तब हुई जब स्वास्थ्य विभाग को दो हिस्सों में बांट दिया गया। परिवार कल्याण के नाम से बनाया गया महकमा दरअसल परिवार कल्याण न होकर सिर्फ अफसरों और नेताओं के कल्याण के काम आने लगा। इस योजना में धन केन्द्र सरकार से आता है और यह धन बेहद गरीब और जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दिया जाता है। इसी धन से अंधता निवारण कार्यक्रम और जननी सुरक्षा योजना जैसे कार्यक्रम चलते हैं। इसी योजना से गांवों में गरीब, बेसहारा लोगों के इलाज के लिए दवाई से लेकर चश्मे तक बांटे जाते हैं और गर्भवती महिलाओं को उनके इलाज के लिए पैसा दिया जाता है, साथ ही इलाज के लिए आपरेशन थियेटर और चिकित्सा में काम आने वाले उपकरण भी खरीदे जाते हैं।

मगर प्रदीप शुक्ला और बाबूसिंह कुशवाहा की जोड़ी ने भ्रष्टाचार की नई-नई गाथाएं लिख दीं। फर्जी कंपनियों को हजारो करोड़ रुपये के फर्जी भुगतान कर दिये गये और यह पैसा अफसरों और नेताओं ने आपस में बांट लिया। इसी बंदरबांट में जिस सीएमओ ने इसका विरोध करना चाहा उसकी हत्या कर दी गयी। यह भ्रष्टाचार कभी नहीं खुलता अगर डाक्टरों की इस तरह हत्या नहीं होती। यह मामला तूल तब पकड़ा जब लखनऊ के दो सीएमओ की हत्या में आरोपी बनाये गये डिप्टी सीएम सचान की जेल में हत्या कर दी गई। इसके बाद हाईकोर्ट ने सीबीआई के जांच के आदेश कर दिये।

इस जांच के आदेश के बाद सभी को लग रहा था कि बाबू सिंह कुशवाहा, अंनत मिश्रा अंटू और प्रदीप शुक्ला का जेल जाना तय है। प्रदीप शुक्ला को शुरुआती दौर में कई बार पूछताछ के लिए बुलवाया भी गया। मगर इसके बाद प्रदीप शुक्ला ने अपने संबंधों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। सूत्रों का कहना है कि प्रदीप शुक्ला के एक संबंधी प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात हैं और वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं। उन्होंने इस मामले को रफा दफा करवाने में खासी रुचि दिखाई। इसके अलावा प्रदीप शुक्ला के आधा दर्जन रिश्तेदार भी आईएएस हैं। उनकी पत्नी आराधना शुक्ला लखनऊ की जिलाधिकारी रह चुकी हैं और अखिलेश सरकार में पिछले एक महीने से उनके पैरोकार दिन रात एक कर रहे हैं कि उन्हें लखनऊ का मंडलायुक्त बना दिया जाय।

कांग्रेस के बड़े नेता विद्याचरण शुक्ला भी प्रदीप शुक्ला की रिश्तेदारी में आते है और उन्होंने भी प्रदीप शुक्ला को बचाने के लिए खासी पैरवी की ऐसा माना जाता है। यह प्रभाव सबके सामने देखने को भी आ गया। पिछले एक साल से सीबीआई प्रदीप शुक्ला की गिरफ्तारी नहीं कर सकी जबकि तमाम छोटे अफसर और डाक्टर सीबीआई ने हिरासत में ले लिये। एक पीसीएस अफसर अभय बाजपेई की  बेटी ने तो सार्वजनिक रूप से आरोप भी लगाया कि प्रदीप शुक्ला को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा रहा। अप्रत्याशित रूप से इलेक्ट्रानिक चैनलों ने भी पिछले कई महीनों से इस बात को नही उठाया कि प्रदीप शुक्ला गिरफ्तार क्यों नही किये जा रहे हैं।

मगर पिछले दिनों समाजसेवी नूतन ठाकुर और अधिवक्ता प्रिंस लेनिन ने हाईकोर्ट में सीबीआई के उपर आरोप लगाया कि वह प्रभावशाली लोगों को बचा रही है। नूतन ठाकुर ने तो प्रदीप शुक्ला के खिलाफ छपे कई विवरणों को भी उच्च न्यायालय के समक्ष रखा। सीबीआई को जब लगा कि उच्च न्यायालय अब खुद इस केस की मानीटरिंग शुरू करने वाला है तो उसके पास इस बात के अलावा कोई चारा नहीं बचा था कि वह प्रदीप शुक्ला को गिरफ्तार करे। अब सबका मानना है कि यह गिरफ्तारी भी औपचारिकता भरी होगी और प्रदीप शुक्ला के खिलाफ आरोप पत्र ऐसा तय किया जायेगा जिससे उनकी जमानत जल्दी हो सके और भविष्य में उन पर आरोपों का निर्धारण न हो सके।

यूपी सरकार भी इस बदनाम अफसर पर कम मेहरबान नही रही। पिछली सरकार ने आईएएस प्रोमिला शंकर को इसलिए निलंबित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने सरकार से बिना अनुमति लिये विदेश यात्रा की थी। जबकि प्रदीप शुक्ला ने बिना अनुमति लिये दर्जनों विदेश यात्रायें कर डाली। कई महीनों से इसकी जानकारी सरकार को है साथ ही प्रवर्तन निदेशालय को शक है कि प्रदीप शुक्ला ने विदेशों में भी बड़ा पैसा जमा किया है। उसकी जांच भी लंबित है मगर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद आज तक प्रदीप शुक्ला को निलंबित नही किया गया।

प्रदीप शुक्ला ही नहीं प्रदेश में दर्जनों आईएएस अफसर ऐसे हैं जिन पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले लंबित हैं मगर उनके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई नही हो पायी। सीबीआई ने नेहरू युवा केन्द्र के जिला समन्यवयक डीके सिंह को गिरफ्तार किया था। डीके सिंह की संस्तुति पर सैकडों करोड़ के ठेके दिये गये थे। लखनऊ का बच्चा बच्चा जानता है कि डीके सिंह आईएएस अफसर नवनीत सहगल के सबसे करीबी थे। डीके सिंह ने पूछताछ में सीबीआई को नवनीत सहगल की जायदाद के विषय संजय शर्मामें बड़ी जानकारी दी थी मगर लगता है सीबीआई की लिस्ट से आईएएस अफसर दूर ही रहते हैं। इसके अलावा भी अगर सीबीआई उन पर कार्रवाई करने की अनुमति प्रदेश सरकार से मांगती है तो यह अनुमति नहीं दी जाती। मतलब साफ है कि आप हजारों करोड़ के घोटाले करो या इन घोटालों के कारण लोगों की हत्यायें हो जाएं। अगर आप आईएएस अफसर हैं तो सीबीआई आप पर हाथ डालने से पहले हजार बार सोचेगी।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं.

भास्‍कर से एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर हरिमोहन शर्मा का इस्‍तीफा, अमर उजाला जाने की चर्चा

दैनिक भास्‍कर, पानीपत से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार हरिमोहन शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर के रूप में कार्यरत थे. डेढ़ पहले उन्‍होंने ग्‍वालियर से पानीपत में ज्‍वाइन किया था. बताया जा रहा है कि हरिमोहन शर्मा अपनी नई पारी अमर उजाला से शुरू करने वाले हैं. संभावना जताई जा रही है कि इन्‍हें बनारस का स्‍थानीय संपादक बनाया जाएगा. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है.

सूत्रों का कहना है कि बनारस में संपादक डा. तीर विजय सिंह का तबादला बरेली किए जाने के बाद से इस पद पर अभी किसी की नियुक्ति नहीं हुई है और अस्‍थाई रूप से डा. तीर विजय ही बनारस का दायित्‍व संभाले हुए हैं. इसलिए हरिमोहन शर्मा को बनारस का ही आरई बनाया जाएगा. इस संदर्भ जानकारी के लिए हरिमोहन शर्मा से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु उनका मोबाइल स्‍वीच ऑफ बताता रहा. 

इंडिया टीवी छोड़कर पी7 न्‍यूज पहुंचे मृत्‍युंजय

इंडिया टीवी से खबर है कि मुंबई ब्‍यूरो से मृत्‍युंजय सिंह चंदेल ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे रिपोर्टर के रूप में कार्यरत थे. मृत्‍युंजय ने अपनी नई पारी पी7 न्‍यूज से शुरू करने जा रहे हैं. वे पिछले ढाई साल से इंडिया टीवी को अपनी सेवाएं दे रहे थे. उन्‍हें पी7 न्‍यूज में सीनियर रिपोर्टर बनाया गया है तथा उन्‍हें क्राइम बीट की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. मृत्‍युंजय इसके अलावा भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

जगन के मीडिया समूह पर कार्रवाई से नाराज पत्रकार सड़कों पर उतरे

: भविष्‍य को लेकर चिंतित हैं पत्रकार : केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से लोकसभा सदस्य और वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगनमोहन रेड्डी के समाचार पत्र और टीवी चैनल के बैंक खातों को ज़ब्त करने से आंध्र प्रदेश में बवाल खड़ा हो गया है. कुछ लोग इसे राजनैतिक उद्देशों से प्रेरित कदम के रूप में देख रहे हैं तो कुछ पत्रकारिता की आज़ादी पर हमले के रूप में. सीबीआई ने समाचार पत्र साक्षी और उसी नाम से टीवी चैनल चलाने वाली तीन कंपनियों- जगती पब्लिकेशंस, इंदिरा टेलीविज़न और जननी इन्फ्रास्ट्रक्चर के ऐसे दस बैंक खातों को ज़ब्त किया है, जिनमें 113 करोड़ रुपए जमा हैं.

जगनमोहन रेड्डी पर आमदनी से ज्यादा संपत्ति रखने और कथित तौर पर भ्रष्ट तरीके से दौलत जमा करने की जांच कर रही सीबीआई ने दावा किया है कि बैंक खातों में आपराधिक गतिविधियों द्वारा मिला पैसा रखा गया है. इन कंपनियों ने सीबीआई की इस कारवाई को अदालत में चुनौती दी है और बैंक खातों को बहाल करने की मांग की है. दूसरी तरफ जगनमोहन रेड्डी ने आरोप लगाया है कि राजनैतिक स्तर पर सामना करने में असफल कांग्रेस पार्टी उन्हें कुचलने के लिए सीबीआई का दुरूपयोग कर रही है.

जगनमोहन रेड्डी और कांग्रेस के बीच टकराव उस समय से चल रहा है जब 2009 में उनके पिता और तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. पिता की जगह मुख्यमंत्री न बनाए जाने से नाराज़ जगन ने कांग्रेस से निकलकर अपनी अलग पार्टी बना ली. उसी समय से सीबीआई जगनमोहन रेड्डी की संपत्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि और उनकी कंपनियों में कई सौ करोड़ रुपये की पूँजी निवेश की जांच कर रही है. जबकि दूसरी ओर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है.

सीबीआई अब तक जगन मोहन रेड्डी और उनकी कंपनियों के विरुद्ध तीन आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है जिसमें उन पर भ्रष्ट तरीके से संपत्ति जमा करने का आरोप लगाती है. सीबीआई का कहना है कि जगन की कंपनियों में उन्हीं लोगों ने पैसा लगाया है जिन्हें जगन के पिता की सरकार के फैसलों से लाभ पहुंचा था. आरोप के अनुसार जिन कंपनियों में इस तरह का पैसा लगा है उनमें जगती पब्लिकेसंस भी शामिल है.

लेकिन अब मामला पत्रकारों से जुड़ गया है इसलिए अब ये मामले पत्रकारों और सरकार के बीच टकराव का रूप धारण करता दिखाई दे रहा है. आंध्र प्रदेश यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स और इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन (इजेयू) के आह्वान पर आज हैदराबाद और राज्य के अनेक नगरों में सैंकड़ों पत्रकारों ने जुलूस निकाले और सीबीआई की निंदा की. हैदराबाद में यूनियन के नेताओं ने राज्यपाल इएसएल नरसिम्हन को एक ज्ञापन दिया जिसमें बैंक खातों को बहाल करने की मांग की गई. इजेयू के पूर्व महासचिव श्रीनिवास रेड्डी ने कहा कि सीबीआई की कार्रवाई जायज नहीं है, क्योंकि अब तक यह आरोप सिद्ध नहीं हुआ है कि इन कम्पनियों के खाते में जो पैसा है, वो अवैध स्रोत से आया है.

"फिर सवाल यह भी है कि जगन की कई कंपनियों में से केवल समाचार पत्र और टीवी चैनल को ही निशाना क्यों बनाया गया. हमें संदेह है की यह करवाई राजनैतिक कारणों से की गई है". अभी बैंक खातों के ज़ब्त होने के धक्के से यह कम्पनियाँ संभली भी नहीं थीं कि राज्य सरकार ने साक्षी समाचार पत्र और टीवी चैनल को सरकारी विज्ञापन देने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया है. इस संबंध में गुरुवार को एक सरकारी आदेश जारी किया गया. सूचना विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सीबीआई की ओर से बैंक खाते ज़ब्त किए जाने, अभियोग पत्र अदालत में दाखिल पेश करने के आरोप के मद्देनजर ही विज्ञापन बंद करने का फैसला किया गया है.

साक्षी समाचार पत्र और चैनल में लगभग 20 हजार लोग काम करते हैं. साक्षी अखबार का दावा है कि उसका सर्कुलेशन 14 लाख से भी ज्यादा है. बैंक खातों के ज़ब्त होने के बाद इन दोनों संस्थानों में एक अनिश्चितता का माहौल पैदा हो गया है. लेकिन साक्षी के अधिकारियों को विश्वास है कि वे इस संकट के बावजूद दैनिक और टीवी चैनल को जिंदा रखेंगे. अब सबका ध्यान अदालत की ओर लगा है कि वह बैंक खातों की ज़ब्ती पर क्या आदेश देती है. साभार : बीबीसी

फिल्‍मी पत्रिका ‘रूपतारा’ ने प्रकाशित किया थ्री डी एडिशन

थ्रीडी फिल्‍मों के माहौल में कन्‍नड़ फिल्‍मी पत्रिका 'रूपतारा' ने अपना थ्रीडी एडिशन लांच किया है. मनीपाल मीडिया नेटवर्क द्वारा प्रकाशित इस मासिक फिल्‍मी पत्रिका इस बार 98 पेज का स्‍पेशल थ्री डी इश्‍यू लांच किया है. इस पत्रिका के साथ पाठकों को थ्री डी चश्‍मा भी दिया जा रहा है, जिससे पाठक इस मैगजीन में प्रकाशित 40 फिल्‍मी सितारों का थ्री डी फोटो का आनंद उठा सकें. पत्रिका के कवर के ऊपर अभिनेत्री राधिका कुमारस्‍वामी का फोटो प्रकाशित किया गया है.

अमर उजाला ने युवान का प्रकाशन सभी यूनिटों से शुरू किया

अमर उजाला द्वारा लगभग दो साल पहले युवाओं को लक्ष्‍य में रखकर लांच किये गये युवान की सफलता से खुश प्रबंधन ने अब इसका प्रकाशन समूह के सभी केंद्रों से शुरू कर दिया है. अमर उजाला का यह साप्‍ताहिक अखबार यूपी, उत्‍तराखंड, पंजाब, हिमाचल, जम्‍मू कश्‍मीर समेत सभी यूनिटों से प्रकाशित किया जा रहा है. इस अखबार की शुरुआत कानपुर से की गई थी. जिसे शुरुआत में लोगों का मन मिजाज टोहने की कोशिश की गई थी, पर इसकी सफलता के बाद प्रबंधन ने इसे हर यूनिट से प्रकाशित करने का निर्णय ले लिया.

24 पेज का यह रंगीन साप्‍ताहिक युवाओं, छात्रों, शिक्षकों एवं अभिभावकों को खूब भा रहा है. अखबार नए-नए क्षेत्रों करियर बनाने के संदर्भ में जानकारियां तो उपलब्‍ध करा ही रहा है. साथ ही छात्रों में बेहतर समझ विकसित करने के लिए काफी कुछ सामग्री भी दे रहा है. प्रबंधन ने युवान के लिए स्‍पेशली हर यूनिट में दो से तीन रिपोर्टर भी नियुक्त किए हैं.

नकारा चौथे खंभे से अलग दुनिया बनाकर भड़ास ने जो काम किया है, प्रशंसनीय है

इस रंग बदलती दुनिया में हर इंसान की नीयत पर शक होता है। दूसरों को आईना दिखाने वाला चौथा खंभा इन दिनों सामाजिक कसौटी पर बिल्कुल नकारा साबित हो रहा है। इन नकारों  से इतर अपनी अलग दुनिया बनाकर भड़ास4मीडिया ने जो काम किया है, वह प्रशंसनीय है। यशवंत जी आपकी इस साइट के चार साल होने को हैं, किन्तु आपने जिन लोगों को जोड़ा है या जो लोग आपसे वाकई शब्दों से जुड़े हैं, उनको आपने अपने व्यवहार से खरीद लिया है। इस समयचक्र में जहां आदमी चरम पर पहुँचने के बाद किसी को पहचानता तक नहीं है, वहीं आप ने मेरे बच्चे के देहावसान के समय तुरंत कालबैक करके जो बातें कहीं थी, वाकई में उस सहानुभूति ने उस समय में मर्म पर मरहम का काम किया।

हां ये बात अलग है कि वह चोट बहुत गहरी है। किन्तु आप ने जो उसे छुआ कुछ तो जरूर आराम मिला। कोई किसी का दर्द हर नहीं सकता, किन्तु ''रहिमन विपदा हू भली जो थोड़े दिन होय, हित अनहित या जगत में जान परत सब कोय'' के शब्दों को बिल्कुल आत्मसात करते हुए आपने जो मेरा मर्म सहलाया उससे आपकी महानता का पता चलता है। निश्चय ही आप चार साल तो क्या चार युगों तक यूं ही चार स्तम्भ पर भारी रहने की योग्यता रखते हैं। क्योंकि किसी को आप यूं ही नहीं, दिल से खरीदने का माद्दा रखते हैं। ना-ना आप इसे तेल मत समझियेगा, यह मेरी आत्मानुभूति है, क्योंकि इस समय मैं गहरी संवेदना में निमग्न हूँ। आंसुओं की एकाध धार अब भी बह जाती है। किन्तु आप जैसे हृदेच्छु के होते तो उन धारों को कम तो किया ही जा सकता है।

जीवन के जिन क्षणों का बखान आपने अपनी सुखदुख बांटने में किया है। बिल्कुल देश-काल-परिस्थिति को जीवन्त कर दिया है। भूतकाल की उन परिस्थितियों को मैं वर्तमान में जी रहा हूँ समय से तो संघर्ष कर ही रहा था, इस संघर्ष के दौरान हमने अपने शरीर का एक अंग भी खो दिया। किन्तु जिसके साथ आप जैसे लोग हों वह दुखी कैसे रह सकता है। मेरा आयुष अब समाप्‍त हो चला है किन्तु अमन की अभिलाषा रखते हुए मैं आपके चार साल बीतने पर अपने विदीर्ण हृदय से शुभकामनाओं के कुछ शब्दों से अभिनन्दित करता हूँ धन्यवाद, प्रणाम।

सम्पूर्णा नन्द दुबे

मऊ

9415795000


संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट-  b4m 4 year

भड़ास ही मीडिया की दबी आवाज को जगा सकता है

यशवंत सिंह जी, आपके द्वारा भड़ास4मीडिया के नाम से शुरु किया गया पोर्टल बहुत अच्छा लगता है और मैं रोजाना दिन में कई बार इसे पढ़ता हूँ. मैं आपके द्वारा शुरू किये गए भड़ास4मीडिया से जुड़ना चाहता हूँ. कृपया मुझे बताएं मैं आपके साथ कैसे जुड़ सकता हूँ. मैं पंजाब के जिला फतेहगढ़ साहिब के छोटे से शहर, जिसे एशिया की सबसे बड़ी लोहा नगरी मण्डी गोबिंदगढ़ के नाम से भी जाना जाता है, का निवासी हूँ और पिछले 8 साल से मीडिया जगत से जुडा हुआ हूँ, पर मीडिया के साथ जुड़ कर भी पूरी तरह से खुल कर कुछ नहीं लिख पा रहा हूं, क्योंकि पंजाब में सरकार का मीडिया पर पूरा कब्ज़ा है. 

इलेक्ट्रानिक मीडिया पूरी तरह से पंजाब सरकार के हाथ में है तो प्रिंट मीडिया को भी वो अपने साथ मिलाये हुए हैं. हम आजाद हो कर लिखना चाहते हैं और ऐसे ही किसी निष्‍पक्ष और तेवरदार आधार से जुड़ना चहते थे, जो पूरी तरह से आजाद हो और मेरी कलम से लिखे शब्दों को समझ कर लिख सके, छाप सके. मुझे ऐसा लगता है कि आप ही मीडिया की दबी आवाज को जगा सकते हो. मुझे भी अपनी टीम का एक अंग बनाने की कृपा करें और बतायें कि मैं आपके इस पोर्टल से कैसे जुड़ सकता हूं.

राजेश पंडित

99155-66876    

मण्डी गोबिंदगढ़

  पंजाब  


संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट-  b4m 4 year

अमर उजाला से नेहा एवं देशबंधु से सूरज का इस्‍तीफा

अमर उजाला, गाजियाबाद से खबर है कि नेहा धुसा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी संभाल रही थीं. नेहा का तबादला कुछ समय पहले पंजाब से गाजियाबाद के लिए किया गया था. यह जानकारी नहीं मिल पाई है कि नेहा अपनी नई पारी किस संस्‍थान से शुरू करने जा रही हैं.

देशबंधु से खबर है कि राष्‍ट्रीय संस्‍करण में सब एडिटर कम रिपोर्टर के रूप में कार्यरत सूरज सिंह सोलंकी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी डीएलए से शुरू की है. उन्‍हें यहां पर सब एडिटर बनाया गया है. उन्‍हें अखबार में डेस्‍क की जिम्‍मेदारी दी गई है. सूरज इसके पहले टीवी100, आखों देखी जैसे संस्‍थानों में भी काम कर चुके हैं.

यशवंत के पास दलाल संपादकों की तरह अर्जित की गई अकूत सम्‍पत्ति नहीं है

आज भड़ास के चार साल पूरे हो चुके हैं लेकिन जितने अल्प समय में भड़ास4मीडिया ने नाम कमाया हैं, मैं समझता हूँ किसी भी पोर्न वेबसाइट के द्वारा उतना नाम नहीं कमाया जा सकता. चूंकि एक पुरानी कहावत हैं कि दाग तो चाँद में भी हैं. हम तो केवल इंसान हैं उसी तर्ज पर कुछ यशवंत सिंह भी हैं. कहते हैं कि आरोप तो कृष्ण पर भी लगे हैं. वह तो भगवान थे तो फिर यशवंत तो सिर्फ एक इंसान हैं, सो आरोप लगना लाजिमी है. आज हम बात करते हैं जेल की. जेल को समाज घृणित नज़रों से देखता हैं, लेकिन हम शायद यह नहीं सोचते कि जेल में हमारे इष्ट कृष्ण ने जन्म पाया हैं तो फिर जेल गलत कहाँ हैं. इसी तरह से बात शराब की तो अब तक शराब मुस्लिम समाज में हराम थी लेकिन उपयोग मुस्लिमों में सबसे ज्यादा है.

भारत के अन्दर एक समाचार पत्र समूह हैं. जिसका नाम इंडियन एक्सप्रेस हैं. बताते हैं कि अभी इंडियन एक्सप्रेस ऐसा समूह था जो कि सरकारें खा जाया करता था लेकिन हाल में ही सेना के एक मामले में इस समाचार पत्र समूह की भी जमकर किरकिरी हुयी. दांत निपोरकर घिघियाई हंसी हंसने वाले प्रभु चावला विश्‍वसनीय पत्रकारों में गिने जाते थे, इसलिए वह आजतक में सीधी बात चलाते थे, लेकिन टूजी स्कैम घोटाला उन्हें खा गया और शायद अब उन्हें पूछने वाला और सही मायने में कहा जाये तो सूंघने वाला कहीं नज़र नहीं आ रहा हैं.

बरखा दत्त की विश्वसनीयता भी ख़तम हो चुकी हैं. इसका जीता जागता उदाहरण यह है कि मीडिया का ही एक छात्र बरखा दत्त के खिलाफ एक कार्यक्रम में खुलकर हमला बोल चुका हैं. टूजी स्कैम की खबर भड़ास से ही साभार लेकर चौथी दुनिया ने 'बड़े पत्रकार बड़े दलाल' के नाम से प्रकाशित की थी. और अगर देखा जाये तो आज मीडिया उस वेश्या की तरह बिक चुका है, जिसमें कुछ पल के लिए वह अपना सर्वस्व अपने साथ हम बिस्तर होने वाले को दे देती है. आज जब मीडिया २४ घंटे बिकने के लिए तैयार हैं. तो ऐसे दौर में यशवंत पर आरोप लगाना मेरे हिसाब से जायज नहीं होगा क्योंकि एक वेबसाइट को आज के महंगाई के दौर में चलाना आसान नहीं हैं. यही कारण है कि यशवंत मेरी नज़र में उसी तरह से बेदाग़ हैं जिस तरह से चाँद में दाग होने के बाद भी वह बेदाग़ दिखकर अपनी चाँदनी बिखेरता नज़र आता हैं.

चूंकि एक वेबसाइट को चलाने में तमाम तरह की समस्याएं आती हैं और धन का इंतजामात करना पड़ता हैं, उस हिसाब से यशवंत बेदाग़ नज़र आ रहे हैं. आज पत्रकारिता इस कदर सस्‍ती हो चुकी है कि वह यूपी की पुलिस की तरह एक शराब के क्वार्टर में बिकने के लिए तैयार है. उस दौर में चार साल बड़े-बड़े संपादकों से पंगा लेकर भड़ास को चलाना वाकई काबिले तारीफ़ हैं. आज यशवंत जी ने इस भड़ास के माध्यम से जितने दोस्त बनाये हैं मैं समझता हूँ उस से कहीं अधिक दुश्मन भी उन्होंने बनाये हैं. कोई उन्हें अमर उजाला का भगोड़ा कहता हैं तो कोई कुछ और, लेकिन जब किसी की खबर लग जाती हैं, तब वह इसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाकर यह कह डालता है कि भड़ास तो भड़ास हैं इसका कोई सरोकार नहीं हैं. लेकिन मेरे मायने में भड़ास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक उचित माध्यम हैं, जो कि मजदूरों से भी कम वेतन पर काम करने वाले पत्रकारों के शोषण की आवाज को उठाने का एक बेहतरीन मंच है. हाँ एक बात तो मैं यह कहना भूल गया कि अगर देखा जाये तो इन सब बड़े पत्रकार रुपी दलालों से यशवंत भाई महान हैं, जबकि उनके पास इन संपादकों की तरह अर्जित की गयी अकूत संपत्ति नहीं हैं.

लेखक अभिषेक सिंह आगरा के निवासी हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. 


संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट-  b4m 4 year

जब सुनवाई के रास्‍ते बंद दिखे, भड़ास ने मंच दिया, साथ दिया

भड़ास4मीडिया न्यूज पोर्टल ने चार साल पूरा कर लिया। खुशी की बात है। हमारी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं। पोर्टल ने अपनी साख बनाई। इसकी बुलंदी दिनोंदिन प्रखर और तेज हुई। निश्चितरूप से यह यशवंत सिंह, उनकी टीम जिसमें अनिल भाई समेत कई काबिल लोग शामिल हैं, उन सबकी लगन-मेहनत का परिणाम है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भड़ास4मीडिया न्यूज पोर्टल देश-विदेश में लाखों-करोड़ों लोगों में मजबूत आवाज बन चुका है। जानकारी का खजाना है। यह सब लिखना इसलिए जरूरी लगा जब भड़ास4मीडिया न्यूज पोर्टल के चार साल पूरा करने पर कई लोगों की भांति-भांति की टिप्पणी देखी।

यह बिल्कुल सच है कि ‘कबिरा इस संसार में भांति-भांति के लोग… पर क्या करिएगा भाई, पूरी आजादी है। देश आजाद है बोलने की पूरी छूट है। सो, लिखिए-बोलिए, जो भी मन में आए कह डालिए। यशवंत सिंह ऐसे हैं, यशवंत सिंह वैसे हैं, करते रहिए छिद्रान्वेषण। यह सोचने-जानने की कोई जरूरत नहीं कि एक आदमी किस तरह एक जज्बा लेकर मैदान में उतरता है अकेला, और दिन रात एक कर अनेकों झंझावात झेलता हुआ मिशन में सफल हो जाता है। निश्चितरूप से यह बड़ा काम है। उस जज्बे को सलाम।

यशवंत सिंह से जिसे रिश्‍तेदारी-नातेदारी करनी हो, वह उनका गोत्र देखे, कुंडली दिखवाए। यशवंत सिंह के पर्सनल बिहैव से क्या लेना-लादना। अपन तो इतना जानते हैं कि बंदे ने बड़ा काम ठान लिया है। आज की तारीख में यह न्यूज पोर्टल आम आदमी से लेकर बड़े-बड़े उन तोपचियों की भी आवाज साबित हो चुका है, जो रिपोर्टर फील्ड में तो बड़का तोप बन कर घूमते हैं, और मालिक-संपादकों के सामने जमूरा की भूमिका में होते हैं। नौकरी बचाने के लिए साहूकारों के एक इशारे पर सादे कागज पर दस्तखत कर देते हैं। किसी की नौकरी की बलि लेकर उसे बेरोजगार तक बना देते हैं।

अरे साहब, अपनी इन आंखों से हमने कई ‘जीएम, मैनेजर साहबों’ को डायरेक्टरों की अंडर-वीयर धोते और पांव चांपते देखा है। खुद को विश्‍व के नंबर वन प्रचारित कर अपनी पीठ ठोंकने वाले एक अखबार के तथाकथित कवि और उदारमना का बोर्ड पीठ पर लगाकर घूमने वाले एक ‘मोहनजी’ तो जब भी कानपुर से इलाहाबाद आते यहां के मैनेजर साहब उनकी ऐसी टहलुवाई करते कि उसका जिक्र नहीं किया जा सकता। ऐसे ही कितनी महान आत्माओं और उन मीडिया हाउसों की अमानवीय मनमानी को भड़ास ने ही नंगा किया। इतना ही नहीं, शासन-प्रशासन, तमाम मीडिया हाउस, देश के भाग्य विधाता बने इन नेताओं की मनमानी को लेकर जब सुनवाई के सारे रास्ते बंद दिखे तब भड़ास ने मंच का ही काम नहीं किया बल्कि पूरी शिद्दत से साथ भी खड़ा हुआ। कई उदाहरण सामने हैं।

हां, कुछ ऐसे लोगों को यशवंत सिंह के नाम से एलर्जी जरूर हो सकती है, जिसे उनके पोर्टल ने सरेआम नंगा कर दिया या जिनके लेख आदि न छप पाते हों। जब छपने लायक नहीं रहेंगे तो कोई काहे को छापेगा। कानपुर में अमर उजाला में नौकरी के दौरान रूम पार्टनर संतोष सिंह, विवेक तिवारी और देव कुमार के बीच एक लैपटॉप था। जहां तक याद है, शायद देवभाई लैपटॉप खरीद लाए थे। पत्रकारों की उस ‘घुड़साल’ में आई एक नई चीज ने तब राहत दिया था। वहीं पहली बार भड़ास देखा। ठीक-ठाक लगा। ऐसा महसूस हुआ कि अब पढ़ने की बेहतर खुराक मिला करेगी। दूसरे-तीसरे दिन आधी रात ऑफिस से रेलवे स्टेशन व्हीलर बुकस्टाल पर जाकर, पूरी रात वहां मैगजीन, अखबार देखने पलटने में परेशानी का झंझट खत्म।

हालांकि वहां अपने छाबड़ा अंकल और बाबाजी मामा पूरा ख्याल रखते, फिर भी मेहनत मजे की हो जाती। दिनरात की थकान से शरीर चूर-चूर हो जाता। उधर, आधी रात कानपुर सेंट्रल स्टेशन जाने को लेकर दफ्तर के यार-दोस्तों अनिल बिज, राकेश भाई, दिनेशजी, अपने दरोगाजी यानि बड़े भाई शुक्लाजी, बलिया वाले बाबू साहब आदि के बीच हंसी-ठट्ठा होता। बाबू साहब दो हाथ और आगे। बलिया वाला टोन-‘तब पांडेयजी, ई आधी-आधी रात को टेशन में का खोजने जाते हैं, सुधर जाइए नाहीं घर शिकायत पहुंची तो अपने आप बुझा जाएगा सब। बाप रे बाप, कैरेक्टर तक पर शक-सुबहा…। ऐसा कर्रा मजाक। हंसी के ठहाकों के बीच कई मलाल, तनाव फुर्र हो जाते।

सच, यह सभी लोग अच्छे इंसान थे। दोस्ती निभाना जानते थे। इन सबकी नीयत और नीति केवल चुहलबाजी होती। खुशनुमा माहौल पूरी तरह लोकतांत्रिक। फलों की पहचान, कनपुरिया स्टाइल, आंख मूंद पचास तक की गिनती, पतिव्रता स्त्री, गांधी बाबा, शहर के पार्क सरीखे एक से बढ़कर एक आयटम। बात-बात पे लेटेस्ट आयटम बन जाता। अनिल बिज में गजब की प्रतिभा। कभी-कभी कोफ्त होती कि राजू श्रीवास्तव कॉमेडियन के शहर में ऐसी प्रतिभा यहां काहे को झक मार रहा है ये? खैर, यह फिर कभी। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि भड़ास ने इस कदर प्रभावित किया कि आर्थिक तंगी के दौर में लैपटॉप खरीद भड़ास देखने का शौक पूरा किया। देश-विदेश के लाखों लोगों की तरह अब तो यह हमारा भी नशा बन चुका है। यह उन लोगों की आवाज बन चुका है, जिसे अखबार छापना नहीं चाहता, चैनल दिखाने में गुरेज करता है। कहीं सुनवाई नहीं होती। मनमानी करने वाले मनबढ़ हो जाते हैं।

यशवंतजी, आलोचक, नहीं-नहीं, … (इन्हें गंड़जरा कहना ज्यादा उचित होगा)। सच जानों साहब, यह हर जगह पाए जाते हैं। ये आरा मशीन की वो ब्लेड है जिनका काम ही होता है सामने आ गए लकड़ी को काटना। भाई, इनकी परवाह छोड़ मिशन में जमे रहिए। आप कितना बड़ा काम कर रहे हैं, यह इन चूतियों को क्या मालूम। इस पुनीत कार्य में हम सब पूरी तरह आपके साथ हैं।

इलाहाबादी शिवाशंकर पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, हिंदुस्‍तान, अमर उजाला जैसे अखबारों में काम करने के बाद सक्रिय रूप से स्‍वतंत्र पत्रकारिता में जमे हुए हैं. इनसे संपर्क 09565694757 के जरिए किया जा सकता है.


संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट-  b4m 4 year

साधना समूह जून में लांच करेगा जम्‍मू कश्‍मीर न्‍यूज चैनल

साधना ग्रुप अब एक कदम और आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है. ग्रुप अपने क्षेत्रीय चैनलों की पहुंच को विस्‍तारित करते हुए जून में जम्‍मू कश्‍मीर से चैनल लांच करने जा रहा है. चैनल जम्‍मू कश्‍मीर के साथ हिमाचल प्रदेश को भी फोकस करेगा. फिलहाल हिमाचल प्रदेश की खबरें यूपी-उत्‍तराखंड चैनल पर प्रसारित की जाती रहती हैं. लांचिंग के बाद यह जम्‍मू कश्‍मीर का पहला सेटेलाइट न्‍यूज चैनल बन जाएगा. अब तक एक भी सेटेलाइट न्‍यूज चैनल जम्‍मू कश्‍मीर से प्रसारित नहीं हो रहा है.

इस संदर्भ में साधना मीडिया के समूह संपादक एवं वरिष्‍ठ पत्रकार एनके सिंह ने बताया कि चैनल को जून के आखिर तक लांच कर दिया जाएगा. इसके लिए सारी तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं. चैनल के लिए टीम के गठन की तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं. इस चैनल का संचालन भी साधना के अन्‍य क्षेत्रीय चैनलों की तरह नोएडा से किया जाएगा. गौरतलब है कि साधना समूह साधना टीवी, साधना एमपी-सीजी, साधना यूपी-उत्‍तराखंड-हिमाचल, साधना बिहार-झारखंड का प्रसारण करता है.    

प्रेस क्लब चुनाव में भी आचार संहिता!

इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब के त्रिवार्षिक चुनाव को लेकर इस मर्तबा एक आचार संहिता तैयार की गई है। इंदौर प्रेस क्लब की साधारण सभा ने २७ मई २०१२ को होने वाले चुनाव में आचार संहिता के लिए पूर्व अध्यक्ष शशीन्द्र जलधारी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय आचार संहिता समिति गठित की गई। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिन्दुस्तानी, ओमी खंडेलवाल, मनोहर लिम्बोदिया एवं जीवन साहू इस समिति के सदस्य हैं।

दैनिक जागरण की खबर से जितेंद्र को मिली नई जिन्दगी

अखबार वाले तो रोज खबर लिखते हैं, लोग पढ़ते भी हैं. कुछ का असर होता हैं कुछ से किसी का प्रचार. लेकिन आजमगढ़ के दैनिक जागरण की एक खबर से एक मासूम की जिंदगी में फिर से खुशियां आ गई हैं. 27 अप्रैल के अंक में जागरण द्वारा गरीब जितेंद्र के ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित होने की खबर प्रकाशित की गई. खबर का असर ये हुआ कि लाइफ लाइन अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ. अनूप कुमार सिंह यादव ने गरीब जितेन्द्र के मुफ्त इलाज का फैसला किया और दैनिक जागरण अखबार के दफ्तर फोन कर जितेन्द्र को हास्पिटल लाने को कहा.

दैनिक जागरण के आजमगढ़ ब्यूरो प्रमुख हरीशरण पन्त ने जितेन्द्र के परिवार वालों को यह खुशखबरी दी. कल तक जो इलाज के लिए थक चुका था, यह सुनते ही ख़ुशी का ठिकाना ना रहा. जितेन्द्र के परिवार की माली हालत ठीक नहीं है. उसके पिता कपडे़ सिलने का काम करते हैं. वह पहले ही हजारों रुपए इधर-उधर फूंक चुका था. ऐसे में एक खबर ने सब कुछ बदल दिया. डॉ. अनूप सिंह इस तरह के कई गरीबों का उपचार पहले भी मुफ्त में कर चुके हैं.

डॉ. अनूप ने बताया कि जितेन्द्र (13 वर्ष) के सिर के दाहिने हिस्से में टयूमर था और उसके आँखों की रोशनी भी जाने लगी थी. एक दिन सुबह अखबार में जब खबर पढ़ा तो रहा नहीं गया. अखबार वालों को फ़ोन कर बच्चे को लाने के लिए कहा था. जितेन्द्र के ४ घंटे के ऑपरेशन के बाद उसका टयूमर निकाल दिया गया और उसकी आँखों की रोशनी भी अब ठीक होने लगी है. जितेंद्र के पिता अनिल ने कहा कि आज के समय में ऐसा भी होता हैं सोचा ना था, इतना कहते ही उसकी आँखें भर गई. बुधवार की दोपहर बाद डॉ. अनूप ने जितेंद्र को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया.

शाजी जमां को कट्टर सुन्नी बताने वाली मानसिकता ने भारत का विभाजन करवाया

प्रिय यशवंत, शाजी जमां के पक्ष में तुमने बहुत ज़ोरदार लिखा. मैं भी उसमें शामिल हो रहा हूं. लेकिन तुमने अपनी टिपिकल शैली में वार नहीं किया. शाजी पर ''कट्टर सुन्नी'' लिख कर जिस व्यक्ति ने हमला किया, उसका संबंध यक़ीनन जाहिलों की उस जमात से होगा, जिसका पढ़ाई-लिखाई से कभी कोई वास्ता नहीं रहा है.  शाजी जमां की एक बड़ी लियाकत यह है कि वह बदीउज्जमां के सुपुत्र हैं. हर हिंदी वाले को उन पर गर्व होना चाहिए. बदीउज्जमां का उपन्यास ''छाको की वापसी'' उन्हें राही मासूम रज़ा और मंटो की कतार में पहुंचाता है. ''सभा पर्व'' पूरा करने से पहले उनका इंतकाल हो गया. उसे पूरा किया शाजी ने.

शाजी हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के अच्छे जानकर, काबिल और संतुलित पत्रकार एवं निहायत सेकुलर व्यक्ति हैं. लेकिन दुखी नहीं होना चाहिए. शाजी को कट्टर सुन्नी बताने वाली मानसिकता ने भारत का विभाजन करवाया और बाद में राष्ट्रपिता की हत्या भी. देशविरोधी, हत्यारी मानसिकता से किसी अच्छे काम की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए. हिंदू-मुस्लिम चश्मे से चीजों को देखने वालों का भारत माता पर कोई दावा नहीं हो सकता. साम्प्रदायिकता भारतीय राष्ट्र-राज्य का नकार है. 

लेखक प्रदीप कुमार अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण समेत कई बड़े अखबारों में शीर्ष पदों पर रहे. इन दिनों स्तंभकार और विश्लेषक के रूप में कई मैग्जीनों-अखबारों से जुड़े हुए हैं. हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में पत्रकारिता की. विदेशी मामलों के एक्सपर्ट जर्नलिस्ट के रूप में ख्याति. प्रदीप जी से संपर्क pkumar.vedu@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


संबंधित खबर- फेसबुक पर शाजी जमां के खिलाफ कुत्सित मुहिम

बिच्छू डाट काम का कई राज्यों में होगा विस्तार, अशोक वानखेड़े को नया काम

मध्यप्रदेश के भोपाल से प्रकाशित एवं प्रसारित प्रादेशिक पाक्षिक बिच्छू डॉट कॉम ने मई माह से राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया है। शुरुआत में इसका प्रसार क्षेत्र मध्य प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ रहेगा। जून माह से राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी प्रसारित होगा। कई बड़े अखबारों में समूह संपादक की भूमिका निभा चुके वरिष्ठ पत्रकार अवधेश बजाज का यह अखबार मध्य प्रदेश के राजनीतिक, प्रशासनिक एवं मीडिया के गलियारों में अपनी विशेष पहचान बना चुका है। पिछले साल ही बिच्छू डॉट कॉम पाक्षिक अखबार ने चार साल पूरे किए हैं। इसी नाम से वेबसाइट पांच साल पूरे कर चुकी है।

वहीं दूसरी तरफ वरिष्‍ठ पत्रकार अशोक वानखेड़े अब बिच्छू डॉट कॉम से जुड़ गए हैं। यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले। फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये। करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है। इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो वीडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया। 

अब अशोक वानखेड़े को बिच्छू डॉट कॉम के राष्ट्रीय संस्करण की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वह कार्यकारी संपादक की भूमिका निभाएंगे। जिस समय हिंदुस्तान में इलेक्ट्रानिक मीडिया की शुरुआत भी नहीं हुई थी उस समय अशोक वानखेड़े एक न्यूज वीडियो कैसेट्स चलाया करते थे। एसपी सिंह और मधु त्रेहन मिलकर न्यूज ट्रैक निकाला करते थे। उस समय अशोक वानखेड़े अकेले थर्ड आई संचालित करते थे। कई टीवी चैनलों पर वे महाराष्ट्र मामलों के विशेषज्ञ के रूप में पैनल डिस्कशन में शामिल होते रहे हैं।

दुनिया में सबके बाप मरते हैं, तुम्हारे बाप भी मरेंगे, इसमें नया क्या है, छुट्टी नहीं मिलेगी

यशवंत सर, सादर प्रणाम. भड़ास पर प्रकाशित करने के लिए प्रेषित कर रहा हूँ. यदि कोई सम्पादक काम कराने के बाद पैसा न दे तो क्या करना चाहिए? मेरे पास भी एक-दो सम्पादक ऐसे हैं, जिन्होंने काम करा लिया है, लेकिन पैसा देने में आना-कानी कर रहे हैं. मजे की बात देखिये कि जिस सम्पादक की बात मैं कर रहा हूँ, वह खुद को प्रतिष्टित संस्थानों में काम करने की बात कहकर लोगों को इम्प्रेस करते हैं. बुजुर्ग हैं. बुजुर्ग होने के नाते दुनिया उनका सम्मान करती है, लेकिन वह बुजुर्गियत की आड़ में लोगों का शोषण करने से भी बाज नहीं आते हैं.

टेस्ट और ट्रायल के नाम पर आपसे पांच से दस दिन तक काम करायेंगे. तनख्वाह हमेशा दस दिन लेट देंगे. आप पर झूठे रौब दिखाकर दबाव बनाने की कोशिश भी करेंगे और यदि आपने उनके शोषण से उकताकर काम छोड़ दिया तो वह बेचारे अपने सिद्धांत का हवाला देकर आपके काम के पैसे भी नहीं देंगे. कहेंगे हमारे एथिक्स में पैसा देना नहीं शामिल है. प्यारे दोस्तों, अग्रजों और गुरुजनों, आप ही बताइये ऐसे सम्पादक महोदय का क्या करना चाहिए. पहले आप उपाय बताइये मैं आप सबको उनका नाम भी बताऊँगा. फिलहाल इतना बता दूँ कि इस समय वह महाशय किसी हिंदी मैगज़ीन के सम्पादक हैं. 

इन सम्पादक महोदय की एक और खूबी बता दूँ कि फरवरी महीने में मेरे एक दोस्त सुभाष चन्द्र के पंचानबे वर्षीय पिताजी की हालत नाजुक थी. मुझे इस सम्पादक महोदय से उसी बेचारे ने जोड़ा था. सुभाष के बड़े भाई ने फ़ोन करके उसे गाँव बुलाया. सुभाष ने इस सम्पादक महोदय को वस्तुस्थिति बताकर छुट्टी देने की गुजारिश की. पता है इसके जवाब में सम्पादक महोदय ने क्या कहा? "दुनिया में सबके बाप मरते हैं, तुम्हारे बाप भी मरेंगे. इसमे नया क्या है. छुट्टी नहीं मिलेगी." बेचारा सुभाष नौकरी छोड़कर अपने पिताजी को देखने गाँव गया. संयोग देखिये कि उसके गाँव पहुँचने के दिन ही उसके पिताजी उस दुनिया से चल बसे.

यह सम्पादक हैं श्रीकांत त्रिपाठी इतवार के सम्पादक. यह सम्पादक कर्मचारियों से चौबीस से अडतालीस घंटे तक रेगुलर काम लेते हैं. कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं. बिना गलती के जलील करना इनकी आदत है. मैं भी काम के दबाव के कारण सात दिनों तक बीमार रहा. मेरे दो बेटों के कान में संक्रमण हो जाने से मैं अब तक परेशान हूँ. उन दोनों के इलाज में अब तक करीब दस हज़ार से ऊपर खर्च हो गए, लेकिन यह सम्पादक महोदय मेरे काम के पैसे देने में आना-कानी कर रहे है. आपसे अनुरोध है कि आप इसे प्रकाशित कर हमें अनुग्रहीत करने की कृपा करें.
आपका

विश्‍वत सेन

vishwat.sen@gmail.com


इन आरोपों के सदंर्भ में जब इतवार के संपादक श्रीकांत त्रिपाठी से बात की गई तो उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा कि आप जहां भी काम करते हैं वहां के कुछ नार्म्‍स होते हैं. आप कहीं जा रहे हैं, कार्यालय नहीं आ रहे हैं तो आप अपने इमिडिएट बॉस को सूचित करेंगे. क्‍योंकि बात जिम्‍मेदारी की होती है. लेकिन विश्‍वत सेन बिना सूचना दिए चले गए. अच्‍छी बात है कि जिसको जहां बेहतर अवसर मिलेगा जाएगा, पर कम से कम उसकी इतनी जिम्‍मेदारी तो बनती है कि इस बात की सूचना दे. परन्‍तु विश्‍वत ने इस तरह की कोई सूचना नहीं दी बल्कि कहें तो धोखा देकर चले गए. इतना बड़ा रकम बकाया नहीं है कि कंपनी उन्‍हें पैसे नहीं देगी, परन्‍तु उनका तरीका ठीक नहीं था.

हिमाचल प्रदेश से जून में लांच होगा दैनिक ‘एनकाउंटर’, संपादक की तलाश

‘हिमाचल दस्तक’ के बाद अब हिमाचल प्रदेश में एक और दैनिक अखबार ‘एनकाउंटर’ का पर्दापण होने वाला है। जालंधर (पंजाब) से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'एनकाउंटर’ के हिमाचल प्रदेश संस्करण की लाँचिंग जून में हो जाएगी। राजधानी शिमला में ‘एनकाउंटर’ का कार्यालय खुल गया है और लगभग सभी जिला मुख्यालयों में कार्यालय खोलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

'एनकाउंटर’’ के मुख्य संपादक कमल अग्रवाल ने बताया कि प्रदेश भर में संवाददाताओं की नियुक्तियां की जा रही हैं। मई के अंतिम सप्ताह तक सभी जिला मुख्यालयों में ब्यूरो प्रमुख और सभी उपमण्डलों में संवाददाताओं की नियुक्तियों को अमलीजामा पहना दिया जाएगा। प्रदेश में कुछ जिलों में ब्यूरो प्रमुखों की तैनाती कर दी गई है।

बता दें कि ‘एनकाउंटर’ की पिछले साल अप्रैल माह में हिमाचल प्रदेश में लाँचिंग की योजना थी, लेकिन प्रबंधन ने पहले अपना प्रिंटिंग प्रेस स्थापित करने का निर्णय लिया। लगभग डेढ़ करोड़ का प्रिंटिग प्रेस स्थापित करने का निर्णय लिया। प्रेस अब स्थापित हो चुका है, जिस पर ‘एनकाउंटर’ का पंजाब संस्करण प्रकाशित हो रहा है। फिलहाल ‘एनकाउंटर’ के हिमाचल प्रदेश संस्करण के लिए अनुभवी संपादक की तलाश की जा रही है, जो हिमाचल प्रदेश से ही ताल्लुक रखता हो।

वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु, विजय पुरी, सुशील कुमार और राजीव पत्थरिया के नामों की चर्चा संपादक पद के लिए है। पहली पसंद कृष्ण भानु की बताई जा रही है, लेकिन वे इन दिनों एक न्यूज चैनल ‘हिमाचल आजकल’ में प्रधान संपादक के पद पर हैं। चैनल प्रदेश में चल निकला है और आधा-आधा घण्टे के पांच स्लॉट प्रदेश की खबरों के चल रहे हैं। चैनल कम समय में बहुत तेजी के साथ लोकप्रिय होने लगा है। इसलिए उम्मीद नहीं है कि वे चैनल छोड़कर फिर से कोई अखबार ज्वाइन करेंगे। अब देखना यह है कि बाकी बचे तीन धुरंधर पत्रकारों में से कौन ‘एनकाउंटर’ की बागडोर सम्भालता है।

संडे इंडियन में हालात बेकाबू, कई ने दिया इस्‍तीफा

अरिंदम चौधरी के संडे इंडियन मैगजीन के हालात खराब चल रहे हैं. पत्रिका के बंद होने के कयास तो पहले से ही लगाए जा रहे थे, अब खबर है कि अंदर की राजनीति और कार्यालय में काम का माहौल न होने के चलते लोग इस समूह को छोड़कर भाग रहे हैं. पिछले दिनों भी काफी लोगों ने इस्‍तीफा दिया था. इस बार भी कई लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. प्रबंधन कुछ लोगों को परेशान करने की नीयत से चार महीने का नोटिस मांग रहा है. इतने दिनों की सैलरी जमा करने पर भी प्रबंधन उनका इस्‍तीफा मानने को तैयार नहीं है.

बताया जा रहा है कि संडे इंडियन से आनंद श्रीवास्‍तव, प्रियंका, हाशिम, आनंदो भक्‍तो, रीना पाण्‍डे, प्रिया कानूनगो, सुगंधा, चित्रा समेत कई अन्‍य लोगों ने इस्‍तीफा दिया है. हालांकि यह पता नहीं चल पाया है कि ये लोग अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं. पर बताया जा रहा है कि यहां के खराब माहौल के चलते ही इन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है. इस संदर्भ में जानकारी के लिए जब संडे इंडियन में वरिष्‍ठ पद पर कार्यरत ओंकारेश्‍वर पाण्‍डेय से बात करने की कोशिश की गई लेकिन बात नहीं हो पाई.

अमर उजाला : हरिश्‍चंद्र सिंह ने कानपुर एवं कुमार अभिमन्‍यु ने बनारस में कार्यभार संभाला

अमर उजाला, कानपुर से खबर है कि यूनिट के नए संपादक बनाए गए हरिश्‍चंद्र सिंह ने ज्‍वाइन कर लिया है. हालांकि ज्‍वाइन करने के बाद वे उदयपुर गए हैं जहां उन्‍हें कुछ आवश्‍यक कार्रवाई पूरी करनी है. जल्‍द ही वे कानपुर में पूर्ण रूप से अखबार की जिम्‍मेदारी संभाल लेंगे. फिलहाल अभी अखबार में संपादक के रूप में पूर्व संपादक दिनेश जुयाल का नाम जा रहा है, जिन्‍होंने नोएडा में ज्‍वाइन कर लिया है.

बनारस से खबर है कि अमर उजाला, गाजियाबाद के संपादकीय प्रभारी रहे कुमार अभिमन्‍यु ने बनारस में अपना पद भार ग्रहण कर लिया है. वे वहां पर समाचार संपादक बनाकर भेजा गया है. कुमार अभिमन्‍यु की गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. फिलहाल बरेली भेजे गए स्‍थानीय संपादक डा. तीरविजय सिंह भी बनारस में ही हैं. बरेली के स्‍थानीय संपादक प्रभात सिंह ने भी गोरखपुर में अपना कार्यभार ग्रहण नहीं किया है. इन दोनों लोगों के अलावा अन्‍य सभी यूनिटों में भेजे गए लोगों ने अपना कार्यभार संभाल लिया है.

उन्‍नाव में पत्रकार पर हमला, एक आरोपी जेल भेजा गया

: सपाई बनाते रहे हमलावर से समझौते का दबाव : उन्‍नाव में इलेक्‍ट्रानिक चैनल के पत्रकार विजय सिंह से मारपीट करने एवं उनका कैमरा व चेन छीनने के मामले ने तूल पकड़ लिया है. मंगलवार को अवैध बालू खनन की कवरेज करने पहुंचे विजय पर खनन माफियाओं ने हमला कर दिया था तथा उनसे जमकर मारपीट की गई. हमलावरों ने उनका कैमरा तथा चेन भी छीन लिया था. पत्रकार ने अपने साथ हुई घटना की जानकारी स्‍थानीय पुलिस को दी, परन्‍तु गंगाघाट पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.

नाराज पत्रकारों ने इस मामले की जानकारी वरिष्‍ठ अधिकारियों को दी, जिसके बाद स्‍थानीय पुलिस हरकत में आई तथा आरोपी युवक को गिरफ्तार कर जेल भेजने की कार्रवाई की. इस मामले में सपा के दर्जनों मठाधीश आरोपी युवक को छुड़ाने के लिए पहले तो पुलिस पर दबाव बनाते रहे, लेकिन मामले की जानकारी वरिष्‍ठ अधिकारियों को होने के चलते स्‍थानीय पुलिस ने सहयोग करने से इनकार कर दिया. इसके बाद कुछ सपाई पत्रकार से भी समझौते का दबाव बनाते रहे, लेकिन बात नहीं बनी. दुबारा पैसा देकर भी समझौता कराने का प्रयास किया गया परन्‍तु पत्रकार ने किसी भी प्रकार से समझौता करने से इनकार कर दिया.

जब किसी प्रकार समझौते की बात नहीं बनी तो कुछ तथाकथित पत्रकारों के उकसाने पर चंपापुरवा व राजीव नगर इलाके के सैकड़ों लोगों को थाने बुलाकर आरोपी को छुड़ाने के लिये पुलिस पर फिर से दबाव बनाने की कोशिश की गयी. परन्‍तु मामला उच्‍च स्‍तर पर पहुंच जाने के चलते स्‍थानीय पुलिस समझौता कराने का साहस नहीं जुटा सकी. मजबूरी में गंगाघाट पुलिस को आरोपी महेश निषाद को जेल भेजना पड़ा. जेल भेजने से पहले पुलिस ने उसका राजधानी मार्ग स्थित सरकारी अस्पताल में मेडिकल परीक्षण कराया. पुलिस हिरासत में होने के बाद भी महेश पत्रकारों को छूट कर आने के बाद देख लेने की धमकी दे रहा था. पुलिस ने इस हमले के दूसरे आरोपी सुनील गुप्‍ता उर्फ बउआ को अब तक गिरफ्तार नहीं कर सकी है, जबकि वो खुले आम घूम रहा है.

अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर हिंट के आरई बने दिनकर गुप्‍ता

अमर उजाला, गाजियाबाद से खबर है कि दिनकर गुप्‍ता ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर डीएनई थे. प्रबंधन ने उनका तबादला बरेली के लिए कर दिया था. खबर है कि उन्‍होंने हिंट न्‍यूज पेपर ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें स्‍थानीय संपादक बनाया गया है. दिनकर लम्‍बे समय से अमर उजाला से जुड़े हुए थे. फिलहाल वे मेडिकल लीव पर चल रहे थे. उल्‍लेखनीय है कि गाजियाबाद से संपादकीय प्रभारी कुमार अभिमन्‍यु समेत कई लोगों का तबादला पिछले दिनों प्रबंधन ने रूटीन के तहत किया था.

दिनकर ने अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण के साथ लगभग सोलह साल पहले साहिबाबाद संवाददाता के रूप में की थी. वे नौ सालों तक जागरण के साथ जुड़े रहे. वे अमर उजाला को भी लगभग साढ़े सात सालों से अपनी सेवाएं दे रहे थे. दिनकर की गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. उनका पूरा पत्रकारीय करियर गाजियाबाद में ही बीता है.

एनआरएचएम घोटाले में पूर्व डाइरेक्‍टर प्रदीप शुक्‍ला गिरफ्तार

लखनऊ। यूपी मेडिकल घोटाले में एक और बड़े अफसर पर शिकंजा कसा है। एनआरएचएम (नेशनल रूरल हेल्थ मिशन) के पूर्व मिशन डायरेक्टर और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के पूर्व प्रमुख सचिव प्रदीप शुक्ला को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है। यूपी मेडिकल घोटाले में इस गिरफ्तारी को अब तक की सबसे बड़ी गिरफ्तारी माना जा रहा है। लखनऊ के चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट से प्रदीप शुक्ला को सीबीआई ने आज सुबह हिरासत में लिया था। यूपी मेडिकल घोटाले में ये पहली गिरफ्तारी है जिसमें किसी आईएएस अफसर पर सीबीआई ने हाथ डाला है। प्रदीप शुक्‍ला की गिरफ्तारी के बाद कुछ और लोगों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है।

आईएएस प्रदीप शुक्ला मायावती सरकार के दौरान यूपी के प्रमुख स्वास्थ्य सचिव थे। शुक्ला को मायावती का करीबी माना जाता रहा है। शुक्ला पर यूपी मेडिकल घोटाले में शामिल होने के आरोप पहले से लगते रहे हैं। इन्हीं आरोपों की वजह से सीबीआई प्रदीप शुक्ला से कई बार पूछताछ कर चुकी है। समझा जा रहा है कि इस बार सीबीआई इनसे लंबी पूछताछ करने वाली हैं। बसपा सरकार के समय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के प्रमुख सचिव होने के दौरान वो यूपी में एनआरएचएम के भी मिशन डायरेक्टर हुआ करते थे। प्रदीप शुक्ला को घोटाले की सबसे बड़ी मछली माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि एनआरएचएम में सबसे ज्यादा फैसले शुक्ला के दस्तखत से लिए गए। बिना इनके इशारे के विभाग में एक पत्‍ता तक नहीं हिलता था। यहां तक कि विभाग के मंत्री से भी ज्यादा उनकी चलती थी।

प्रदीप शुक्ला ने कई बार विदेश यात्राएं भी कीं जिन्हें उन्होंने सरकार से छुपाया तथा उसे अंधेरे में रखा। माया सरकार में प्रदीप शुक्‍ला चार साल तक स्वास्थ्य विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर रहे। शुक्ला के शासन में ही घोटाला हुआ। खबर है कि दोपहर तक सीबीआई उन्हें कोर्ट में पेश कर सकती है। इससे पहले सीबीआई ने सोमवार को पूर्व सीएमओ डॉक्टर एके शुक्ला को गिरफ्तार किया था। वे इस समय जेल में बंद हैं। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की सरकार में परिवार कल्याण मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा इसी घोटाले के चलते जेल में हैं। करीब 2,000 करोड़ रुपये के इस घोटाले की वजह से 27 अक्टूबर 2010 को लखनऊ के सीएमओ डॉ. विनोद आर्या की हत्या कर दी गई, जबकि 2 अप्रैल 2011 को लखनऊ के ही सीएमओ डॉ. बीपी सिंह की हत्या कर दी गई।

इन दोनों की हत्या में लखनऊ के ही डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईएस सचान को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 22 जून 2011 को लखनऊ जेल में उनका शव शौचालय में बनी खिड़की की ग्रिल से लटकता मिला। सचान की संदिग्ध मौत का राज अब तक नहीं खुल सका है। एनआरएचएम के प्रोजेक्ट मैनेजर सुनील वर्मा ने इसी साल 23 जनवरी को खुदकुशी कर ली, जबकि लखीमपुर खीरी में स्वास्थ्य विभाग के क्लर्क महेंद्र शर्मा की संदिग्ध मौत हो गई। वाराणसी के डिप्टी सीएमओ शैलेश यादव की इसी साल 15 फरवरी को सड़क दुर्घटना में हुई मौत को भी एनआरएचएम घोटाले से जोड़कर देखा जा रहा है। सीबीआई इस घोटाले में दो चार्जशीट दाखिल कर चुकी है, जिसमें बाबू सिंह कुशवाहा समेत करीब दर्जन भर लोग आरोपी बनाए गए हैं।

पत्रकारों के लिए इंसान की जान से ज्‍यादा जरूरी खबर होती है!

: एक तस्वीर ने रातों-रात चर्चित कर दिया चीनी पत्रकार को : अगर कोई पत्रकार किसी संवेदनशील मामले की रिपोर्टिंग कर रहा हो, तो उसकी पहली जिम्मेदारी क्या बनती है? घटना को कवर करना या मौका-ए-वारदात पर जरूरतमंद की मदद करना? ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब हर इंसान की नज़र में अलग-अलग हो सकता है। एक ऐसा ही वाकया 23 वर्षीय चीनी पत्रकार काओ आइवेन की ज़िंदगी में घटित हुआ, जिसने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया।

चीन के हेनान टीवी में पत्रकार काओ आइवेन को 10 जुलाई 2006 को फोन के जरिए येलो नदीं में एक लड़की के डूबने की सूचना मिली। लड़की खेलते हुए नदी में गिर गई थी। काओ इस उम्मीद के साथ घटनास्थल पर पहुंच गई कि उसे एक अच्छी स्टोरी मिले सकेगी। घटनास्थल पर पहुंची काओ ने देखा कि प्रत्यक्षदर्शियों ने लड़की को नदी से बाहर निकाल लिया है और वे उसकी जान बचाने के लिए फेफड़ों में से पानी निकालने की कोशिश कर रहे हैं। चूंकि काओ के माता-पिता डॉक्टर थे, इसलिए उसे प्राथमिक चिकित्सा की थोड़ी बहुत जानकारी थी। काओ ने मेडिकल सर्विस को बुलाने के लिए 120 नंबर पर फोन कर दिया।

हालांकि लोग लड़की के फेफड़ों से पानी बाहर निकालने की कोशिश तो कर रहे थे, लेकिन कोई भी उसे मुंह से सांस नहीं दे रहा था। काओ ने यह देखा और लड़की को तब तक मुंह से सांस देने की कोशिश की, जब तक ऐंबुलेंस नहीं आ गई। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और लड़की की मौत हो गई। यह देखकर काओ वहीं रोने लगी। चीनी मीडिया में रोती हुई काओ की तस्वीर प्रकाशित की गई और कई इंटरनेट वेबसाइट्स पर इस मामले को लेकर बहस भी छिड़ी। काओ की तस्वीर सबसे पहले प्रकाशित करने वाली चीनी वेबसाइट www.hnby.com.cn पर सभी टिप्पणियां काओ के समर्थन में आई। सिवाय एक कमेंट के, जिसमें लिखा था "अधिकतर पत्रकारों के लिए इंसान की जान से ज्यादा खबर ज़रूरी होती है। काओ सम्मान की अधिकारी होती, अगर वो बच्ची की जान बचा पाती।"

हालांकि काओ इस घटना में कोई भी स्टोरी नहीं ला पाई थी, लेकिन फिर भी उसकी समाचार एजेंसी द्वारा प्रोत्साहन के तौर पर 1,000 युआन का पुरस्कार दिया गया। पक्ष और विपक्ष में मिली कई टिप्पणियों के बावजूद काओ के दिमाग में ज़िंदगी बचाने वाली टिप्पणी ही घूम रही थी। बाद में काओ ने यह कहा भी कि उसे खबर का केंद्र नहीं बनाना चाहिए था, जबकि किसी इंसान की जान जा चुकी थी। इस मामले में काओ ने कहा "मुझे लड़की की जान न बचा पाने का बेहद अफसोस है, लेकिन मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी। अब मैं प्राथमिक चिकित्सा के बारे में पूरी जानकारी ले रही हूं। शायद मैं प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी का इस्तेमाल उस वक़्त अच्छी तरह कर सकूं, जब मेरी ज़िंदगी ख़तरे में हो।" साभार : भास्‍कर

झूठे ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ को नंगा कर डाला ‘द हिंदू’ ने

: पेड न्‍यूज को खबर बनाकर किया गया प्रकाशित : अंग्रेजी के विश्‍वसनीय एवं तेजतर्रार अखबार 'द हिंदू' ने सरोकार की हत्‍या कर देने वाले 'टाइम्‍स ऑफ इंडिया' की पोल खोल कर रख दी है. पी साईनाथ द्वारा लिखी गई इस स्‍टोरी में विस्‍तार से बताया गया है कि 'टाइम्‍स ऑफ इंडिया' ने पैसे के लिए सच को भी गिरवी रख दिया. पत्रकारिता के सारे मापदंड को ताख पर रखते हुए ना केवल अपने पेशे से दगाबाजी की बल्कि पीडि़त किसानों को ठेस पहुंचाई. डिस्‍क्‍लेमेयर में अपने को 'टाइम्‍स ऑफ इंडिया' का प्रतिद्वंद्वी बताते हुए 'द हिंदू' ने लिखा है कि इस अखबार ने बीटी कॉटन से परेशान किसानों के बारे में बिल्‍कुल झूठी खबर प्रकाशित की.

पेड न्‍यूज के रूप में छापी गई इस खबर में 'टाइम्‍स ऑफ इंडिया' ने बताया कि नागपुर के दो गांवों में बीटी कॉटन से किसानों को बहुत लाभ हुआ है. भामब्रज और अंतरगांव का एक भी किसान ने बीटी कॉटन की खेती के चलते सन 2002 के बाद आत्‍महत्‍या नहीं की है. 'टीओआई' ने पहली बार इस खबर को सन 2008 में बाइलाइन प्रकाशित किया, जबकि दूसरी बार हू-ब-हू खबर को 28 अगस्‍त 2011 में एक विज्ञापन के रूप में प्रकाशित किया. साईनाथ ने लिखा है कि सच यह है कि 2003 से 2009 के बीच नौ किसानों ने बीटी कॉटन के चलते हुए नुकसान के चलते आत्‍महत्‍या कर ली. वे ये भी लिखते हैं कि स्‍थानीय लोग चौदह किसानों के आत्‍महत्‍या करने की बात कहते हैं.

'द हिंदू' लिखता है कि 'टीओआई' में जिस नंदू राउत को आधार बनाते हुए इस स्‍टोरी को लिखा गया है, वो केवल किसान ही नहीं बल्कि एलआईसी का एजेंट भी है. जबकि 'टीओआई' ने लिखा था कि नंदू को बीटी कॉटन की खेती से दो लाख रुपये का फायदा हुआ था. पी साईनाथ अपनी स्‍टोरी में बता रहे हैं कि नंदू किसान होने के एलआईसी का एजेंट भी है, जिसने पॉलिसी बेचकर एक लाख साठ हजार से ज्‍यादा रुपये कमाए थे, जबकि अखबार ने सारे पैसे बीटी कॉटन की खेती से हुआ बताया है. 'द हिंदू' ने 'टाइम्‍स ऑफ इंडिया' के झूठ को पूरी तरह से नंगा कर दिया है. आप भी पढि़ये अखबार में प्रकाशित पी साईनाथ की रिपोर्ट.


Reaping gold through cotton, and newsprint

: The same full page appeared twice in three years, the first time as news, the second time as an advertisement : “Not a single person from the two villages has committed suicide.” : Three and a half years ago, at a time when the controversy over the use of genetically modified seeds was raging across India, a newspaper story painted a heartening picture of the technology's success. “There are no suicides here and people are prospering on agriculture. The switchover from the conventional cotton to Bollgard or Bt Cotton here has led to a social and economic transformation in the villages [of Bhambraja and Antargaon] in the past three-four years.” (Times of India, October 31, 2008).

So heartening was this account that nine months ago, the same story was run again in the same newspaper, word for word. (Times of India, August 28, 2011). Never mind that the villagers themselves had a different story to tell.

“There have been 14 suicides in our village,” a crowd of agitated farmers in Bhambraja told shocked members of the Parliamentary Standing Committee on Agriculture in March this year. “Most of them after Bt came here.” The Hindu was able to verify nine that had occurred between 2003 and 2009. Activist groups count five more since then. All after 2002, the year the TOI story says farmers here switched to Bt. Prospering on agriculture? The villagers told the visibly shaken MPs: “Sir, lots of land is lying fallow. Many have lost faith in farming.” Some have shifted to soybean where “at least the losses are less.”

Over a hundred people, including landed farmers, have migrated from this ‘model farming village' showcasing Mahyco-Monsanto Biotech's Bt Cotton. “Many more will leave because agriculture is dying,” Suresh Ramdas Bhondre had predicted during our first visit to Bhambraja last September.

The 2008 full-page panegyric in the TOI on Monsanto's Bt Cotton rose from the dead soon after the government failed to introduce the Biotech Regulatory Authority of India (BRAI) Bill in Parliament in August 2011. The failure to table the Bill — crucial to the future profits of the agri-biotech industry — sparked frenzied lobbying to have it brought in soon. The full-page, titled Reaping Gold through Bt Cotton on August 28 was followed by a flurry of advertisements from Mahyco-Monsanto Biotech (India) Ltd., in the TOI (and some other papers), starting the very next day. These appeared on August 29, 30, 31, September 1 and 3. The Bill finally wasn't introduced either in the monsoon or winter session — though listed for business in both — with Parliament bogged down in other issues. Somebody did reap gold, though, with newsprint if not with Bt Cotton.

The Parliamentary Standing Committee on Agriculture appeared unimpressed by the ad barrage, which also seemed timed for the committee's deliberations on allowing genetically modified food crops. Disturbed by reports of mounting farm suicides and acute distress in Vidarbha, committee members, who belong to different parties, decided to visit the region.

Bhambraja, touted as a model for Mahyco-Monsanto's miracle Bt, was an obvious destination for the committee headed by veteran parliamentarian Basudeb Acharia. Another was Maregaon-Soneburdi. But the MPs struck no gold in either village. Only distress arising from the miracle's collapse and a raft of other, government failures.

The issues (and the claims made by the TOI in its stories) have come alive yet again with the debate sparked off by the completion of 10 years of Bt cotton in India in 2012. The “Reaping Gold through Bt Cotton” that appeared on August 28 last year, presented itself as “A consumer connect initiative.” In other words, a paid-for advertisement. The bylines, however, were those of professional reporters and photographers of the Times of India. More oddly, the story-turned-ad had already appeared, word-for-word, in the Times of India, Nagpur on October 31, 2008. The repetition was noticed and ridiculed by critics. The August 28, 2011 version itself acknowledged this unedited ‘reprint' lightly. What appeared in 2008, though, was not marked as an advertisement. What both versions do acknowledge is: “The trip to Yavatmal was arranged by Mahyco-Monsanto Biotech.”

The company refers to the 2008 feature as “a full-page news report” filed by the TOI. “The 2008 coverage was a result of the media visit and was based on the editorial discretion of the journalists involved. We only arranged transport to-and-from the fields,” a Mahyco Monsanto Biotech India spokesperson told The Hindu last week. “The 2011 report was an unedited reprint of the 2008 coverage as a marketing feature.” The 2008 “full-page news report” appeared in the Nagpur edition. The 2011 “marketing feature” appeared in multiple editions (which you can click to online under ‘special reports') but not in Nagpur, where it would surely have caused astonishment.

So the same full-page appeared twice in three years, the first time as news, the second time as an advertisement. The first time done by the staff reporter and photographer of a newspaper. The second time exhumed by the advertising department. The first time as a story trip ‘arranged by Mahyco-Monsanto.' The second time as an advertisement arranged by Mahyco-Monsanto. The first time as tragedy, the second time as farce.

The company spokesperson claimed high standards of transparency in that “…we insisted that the publication add the source and dateline as follows: ‘This is a reprint of a story from the Times of India, Nagpur edition, October 31, 2008.' But the spokesperson's e-mail reply to The Hindu's questions is silent on the timing of the advertisements. “In 2011, we conducted a communications initiative for a limited duration aimed at raising awareness on the role of cotton seeds and plant biotechnologies in agriculture.” Though The Hindu raised the query, there is no mention of why the ads were run during the Parliament session when the BRAI Bill was to have come up, but didn't.

But there's more. Some of the glowing photographs accompanying the TOI coverage of the Bt miracle were not taken in Bhambraja or Antargaon, villagers allege. “This picture is not from Bhambraja, though the people in it are” says farmer Babanrao Gawande from that village.

Phantom miracle

The Times of India story had a champion educated farmer in Nandu Raut who is also an LIC agent. His earnings shot up with the Bt miracle. “I made about Rs.2 lakhs the previous year,” Nandu Raut told me last September. “About Rs.1.6 lakh came from the LIC policies I sold.” In short, he earned from selling LIC policies four times what he earned from farming. He has seven and a half acres and a four-member family.

But the TOI story has him earning “Rs.20,000 more per acre (emphasis added) due to savings in pesticide.” Since he grew cotton on four acres, that was a “saving” of Rs. 80,000 “on pesticide.” Quite a feat. As many in Bhambraja say angrily: “Show us one farmer here earning Rs.20,000 per acre at all, let alone that much more per acre.” A data sheet from a village-wide survey signed by Mr. Raut (in The Hindu's possession) also tells a very different story on his earnings.

The ridicule that Bhambraja and Maregaon farmers pour on the Bt ‘miracle' gains credence from the Union Agriculture Minister's figures. “Vidarbha produces about 1.2 quintals [cotton lint] per hectare on average,” Sharad Pawar told Parliament on December 19, 2011. That is a shockingly low figure. Twice that figure would still be low. The farmer sells his crop as raw cotton. One-hundred kg of raw cotton gives 35 kg of lint and 65 kg of cotton seed (of which up to two kg is lost in ginning). And Mr. Pawar's figure translates to just 3.5 quintals of raw cotton per hectare. Or merely 1.4 quintals per acre. Mr. Pawar also assumed farmers were getting a high price of Rs.4,200 per quintal. He conceded that this was close to “the cost of cultivation… and that is why I think such a serious situation is developing there.” If Mr. Pawar's figure was right, it means Nandu Raut's gross income could not have exceeded Rs.5,900 per acre. Deduct his input costs — of which 1.5 packets of seed alone accounts for around Rs.1,400 — and he's left with almost nothing. Yet, the TOI has him earning “Rs.20,000 more per acre.”

Asked if they stood by these extraordinary claims, the Mahyco-Monsanto spokesperson said, “We stand by the quotes of our MMB India colleague, as published in the news report.” Ironically, that single-paragraph quote, in the full-page-news story-turned-ad, makes no mention of the Rs.20,000-plus per acre earnings or any other figure. It merely speaks of Bt creating “increased income of cotton growers…” and of growth in Bt acreage. It does not mention per acre yields. And says nothing about zero suicides in the two villages. So the company carefully avoids direct endorsement of the TOI's claims, but uses them in a marketing feature where they are the main points.

The MMB spokesperson's position on these claims is that “the journalists spoke directly with farmers on their personal experiences during the visits, resulting in various news reports, including the farmer quotes.”

The born-again story-turned-ad also has Nandu Raut reaping yields of “about 20 quintals per acre with Bollgard II,” nearly 14 times the Agriculture Minister's average of 1.4 quintals per acre. Mr. Pawar felt that Vidarbha's rainfed irrigation led to low yields, as cotton needs “two to three waterings.” He was silent on why Maharashtra, ruled by an NCP-Congress alliance, promotes Bt Cotton in almost entirely rainfed regions. The Maharashtra State Seed Corporation (Mahabeej) distributes the very seeds the State's Agriculture Commissioner found to be unsuited for rainfed regions seven years ago. Going by the TOI, Nandu is rolling in cash. Going by the Minister, he barely stays afloat.

Mahyco-Monsanto Biotech's ad barrage the same week in 2011 drew other fire. Following a complaint, one of the ads (also appearing in another Delhi newspaper) claiming huge monetary benefits to Indian farmers landed before the Advertising Standards Council of India. ASCI “concluded that the claims made in the advertisement and cited in the complaint, were not substantiated.” The MMB spokesperson said the company “took cognizance of the points made by ASCI and revised the advertisement promptly…. ASCI has, on record, acknowledged MMB India's modification of the advertisement…”

We met Nandu again as the Standing Committee MPs left his village in March. “If you ask me today,” he said, “I would say don't use Bt here, in unirrigated places like this. Things are now bad.” He had not raised a word during the meeting with the MPs, saying he had arrived too late to do so.

“We have thrown away the moneylender. No one needs him anymore,” The Times of India news report-turned-ad quotes farmer Mangoo Chavan as saying. That's in Antargaon, the other village the newspaper found to be basking in Bt-induced prosperity. A study of the 365 farm households in Bhambraja and the nearly 150 in Antargaon by the Vidarbha Jan Andolan Samiti (VJAS) shows otherwise. “Almost all farmers with bank accounts are in critical default and 60 per cent of farmers are also in debt to private moneylenders,” says VJAS chief Kishor Tiwari.

The Maharashtra government tried hard to divert the MPs away from the ‘model village' of Bhambraja (and Maregaon) to places where the government felt in control. However, Committee Chairperson Basudeb Acharia and his colleagues stood firm. Encouraged by the MPs visit, people in both places spoke their minds and hearts. Maharashtra's record of over 50,000 farm suicides between 1995 and 2010 is the worst in the country as the data of the National Crime Records Bureau show. And Vidarbha has long led the State in such deaths. Yet, the farmers also spoke of vast, policy-linked issues driving agrarian distress here.

None of the farmers reduced the issue of the suicides or the crisis to being only the outcome of Bt Cotton. But they punctured many myths about its miracles, costs and ‘savings.' Some of their comments came as news to the MPs. And not as paid news or a marketing feature, either.

(Disclosure: The Hindu and The Times of India are competitors in several regions of India.)

हाई कोर्ट ने कहा गूगल, याहू आदि नियुक्‍त करें शिकायत अधिकारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने आज आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और उनकी पत्नी सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में दायर रिट याचिका संख्या 3489/2012 में आदेश देते हुए कहा है कि आज का युग इंटरनेट का युग है, अतः इंटरनेट सम्बंधित नियमों को पूरी सख्ती से पालन किया जाए. अमिताभ और नूतन ने अपना पक्ष कोर्ट में स्वयं रखा जबकि भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अशोक निगम ने रिट याचिका का इस आधार पर विरोध किया कि याचीगण ने याहू, गूगल आदि को प्रतिवादी नहीं बनाया है.

जस्टिस देवी प्रसाद सिंह और जस्टिस सईद उज-जमा सिद्दीकी के बेंच ने शाशकीय अधिवक्ता की बात को उचित नहीं मानते हुए अपने आदेश में कहा कि यदि भारत सरकार ने कोई नियम बनाया है तो उसे इसका पूरा पालन भी कराया जाना चाहिए. उन्होंने यह कहा कि इस मामले में याचीगण ने कई बार सचिव, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार को इन नियमों का पालन कराये जाने हेतु प्रत्यावेदन दिया पर उस स्तर से कोई कार्यवाही नहीं की गयी. अतः उन्होंने कहा कि चूँकि यह मामला जनहित का है अतः सचिव, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय यह सुनिश्चित करें कि तीन माह में याहू, गूगल, फेसबुक, माई स्पेस जैसे सभी इंटरमिडीययरी इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी (इंटरमिडीएरी गाइडलाइन्स) नियम 2011 के नियम 11 के अनुसार शिकायत अधिकारी के नाम और उनके संपर्क पते प्रकाशित करें. उन्होंने सचिव, सूचना प्रौद्योगिकी को यह भी आदेश दिये कि याचीगण द्वारा प्रेषित प्रत्यावेदन पर कृत कार्यवाही से उन्हें भी अवगत कराएं.

इस रिट याचिका में अमिताभ और नूतन ने यह मांग की थी कि इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी एक्ट 2000 की धारा 79 के अनुसार याहू, गूगल, फेसबुक, माई स्पेस जैसे भी इंटरमिडीययारी किसी तृतीय पार्टी द्वारा दी जा रही सूचना के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे, यदि वे अपने कर्तव्य पालन में अपेक्षित सावधानी बरतेंगे. इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी (इंटरमिडीएरी गाइडलाइन्स) नियम 2011 के अनुसार इंटरमिडीएरी से यह अपेक्षा की जाती है कि वे यह स्पष्ट रूप से अंकित करेंगे कि किस प्रकार की सूचनाएँ वेबसाइट पर नहीं रखी जा सकती हैं. यह भी अपेक्षित है कि किसी प्रभावित व्यक्ति द्वारा सूचना दिये जाने पर छत्तीस घंटे में उसका निराकरण किया जाएगा. नियम 11 के अनुसार इंटरमिडीएरी अपने वेबसाइट पर शिकायत अधिकारी के नाम और उनके संपर्क पते प्रकाशित करेगा. वर्तमान में याहू, गूगल, फेसबुक, माई स्पेस जैसे सभी इंटरमिडीययारी इन सभी नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं. अमिताभ और नूतन ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय  द्वारा इन्ही नियमों के पालन हेतु रिट याचिका की थी.

Fraud Nirmal Baba (84) : कोर्ट ने दिया निर्मल बाबा के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने का आदेश

: तनया एवं आदित्‍य की याचिका पर सुनाया फैसला : सीजेएम, लखनऊ राजेश उपाध्याय ने गोमतीनगर थाने को आदेशित किया है कि दिल्ली स्थित कथित धार्मिक गुरु निर्मल बाबा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसकी विवेचना करें. सीजेएम ने बुधवार को यह आदेश तनया ठाकुर (कक्षा बारह की छात्रा) और आदित्य ठाकुर (कक्षा दस के छात्र) द्वारा धारा 156(3) सीआरपीसी के अंतर्गत प्रस्तुत याचिका पर दिया. तनया और आदित्य आईपीएस अधिकारी अमिताभ और सामाजिक कार्यकर्ता डा. नूतन के बच्चे हैं. रोहित त्रिपाठी और नीरज कुमार याचीगण के वकील थे. 

सीजेएम उपाध्याय ने कहा कि तनया और आदित्य द्वारा प्रस्तुत आवेदन पर संज्ञेय अपराध बनता है और पर्याप्त आधार है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय श्री भगवन समर्ध बनाम आंध्र प्रदेश सरकार का भी उल्लेख किया, जिसमें इसी प्रकार से एक कथित धार्मिक व्यक्ति द्वारा बच्ची के इलाज़ में ठगी की जा रही थी. तनया और आदित्य ने आवेदन किया था कि निर्मल बाबा द्वारा तमाम लुभावने वादों से आम आदमी को ललचाने और फंसाने तथा अत्यंत सरलीकृत समाधान प्रस्तुत कर लोगों को ठगते का काम किया जाता है. यह धारा  417, 419, 420 आईपीसी के तहत चीटिंग और धारा 508 में ईश्वरीय नाराजगी का भय दिखा कर गलत लाभ लेना है. अतः मामले में एफआईआर दर्ज की जाए.

तनया एवं आदित्‍य ने 10 अप्रैल 2012 को थाना गोमतीनगर, लखनऊ में एफआईआर के लिए प्रार्थना पत्र दिया था और डीआईजी लखनऊ एवं एडीजी, ला ऑर्डर के स्तर पर एफआईआर दर्ज नहीं होने पर कोर्ट में धारा 156(3) सीआरपीसी के अंतर्गत याचिका दायर किया गया था. इसके विपरीत थानाध्यक्ष, गोमतीनगर के 24 अप्रैल की आख्या में यह कहा गया था कि तनया और आदित्य इस मामले से व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं हैं. यह भी कहा था कि उनके द्वारा ठगी और धोखाधड़ी के बारे में कोई साक्ष्य एवं साक्षी नहीं दिया जा सका है, अतः कोई पुष्ट एवं स्पष्ट साक्ष्य नहीं होने के फलस्वरूप थाना स्थानीय पर अभियोग पंजीकृत नहीं किया जा सकता.


सीरिज की अन्य खबरें, आलेख व खुलासे पढ़ने के लिए क्लिक करें – Fraud Nirmal Baba

पत्रकार ने बिल्‍डर से मांगे दो लाख रुपये

लखनऊ में फर्जी एसएमएस के माध्यम से इंजीनियरों और बिल्डरों से धन उगाही करने वाला गिरोह सक्रिय है। मंगलवार को ऐसी ही एक शिकायत पुलिस को मिली है। पुराने लखनऊ के एक बिल्डर ने डीआईजी शिकायत प्रकोष्ठ में एक कथित पत्रकार द्वारा दो लाख रुपए मांगने की लिखित शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। हालांकि इस मामले में अभी किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई है।

जानकारी के अनुसार नगर के चौक निवासी बिल्डर मो. असलम का कहना है कि कैसरबाग, निरालानगर, गोमतीनगर समेत अन्य स्थानों पर बिल्‍िडंग निर्माण तथा अन्य सरकारी विभागों में उनका ठेके का काम चल रहा है। पिछले कुछ दिनों से कुछ लोग निर्माण कार्य को लेकर एसएमएस के माध्यम से इंजीनियर पर कार्रवाई का दबाव बनाते हैं। निर्माण कार्य में घटिया सामग्री के इस्‍तेमाल की बात कहीं जाती है। उसके बाद इंजीनियर ठेकेदार पर मामला निपटारा करने का दबाव बनाता है।

इसी तरह उक्त गिरोह ने बिल्डर से धन उगाही के लिए एसएमएस के जरिए घटिया सामग्री इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर न्यूज ब्रेक की। एसएमएस के बारे में संबंधित अधिकारी पूछताछ कर ही रहे थे कि इंजीनियर और बिल्डर के मोबाइल फोन बजने लगे। एसएमएस भेजने वाले व्यक्ति ने खुद को पत्रकार बताते हुए मिलने की बात कही। दोनों लोगों द्वारा मना करने पर उसने अफसरों से शिकायत करने की धमकी देते हुए दो लाख रुपये की मांग की। बिल्डर का कहना है कि इस गिरोह के सदस्यों से व्यवसायी दहशत में हैं। जालसाज ने फेक आईडी से एलएम न्यूज बना रखा है और एसएमएस भी इसी नाम से आते हैं। पुलिस का कहना है कि यह कृत्य साइबर क्राइम में आता है। इसकी जांच की जा रही है। जल्‍द ही मामले में कार्रवाई की जाएगी। 

कोर्ट ने कहा दैनिक भास्‍कर के पांच मालिक होना गैर कानूनी

ग्वालियर। सिविल कोर्ट ने एक अहम फैसले में दैनिक भास्कर के 5 मालिक होना गैर कानूनी बताया है। भास्कर पब्लिकेशन एंड एलाइड इंडस्ट्रीज दैनिक भास्कर पर मालिकाना हक की पुष्टि के लिए दस्तावेज कोर्ट में पेश नहीं कर सकी है। कोर्ट ने कहा कि एक टाइटल के एक से अधिक मालिक नहीं हो सकते। कोर्ट ने प्रतिवादी संजीव जैन को झूठे आवेदन के लिए दंडित किए जाने का आवेदन रद्द कर दिया है।

मामला यह है कि 29 सितंबर-11 को संजीव जैन द्वारा कोर्ट में कथन किया गया था कि वादी भास्कर पब्लिकेशन ने 26 सितंबर-11 को कोर्ट में भास्कर के मालिकाना हक की पुष्टि के लिए जो घोषणा पत्र दिया है, वह डीएम को हक संबंधी झूठी जानकारी देकर लिया है। साभार : पत्रिका 

राष्‍ट्रीय सहारा, कानपुर के सर्कुलेशन ऑफिसर दिलीप सिंह सस्‍पेंड

राष्‍ट्रीय सहारा, कानपुर से खबर है कि सर्कुलेशन ऑफिसर दिलीप कुमार सिंह को सस्‍पेंड कर दिया गया है. दिलीप पर अनुशासनहीनता के कुछ आरोप लगे थे, जिसके बाद कंपनी ने उन्‍हें सस्‍पेंड कर दिया है. दिलीप को आदेश दिया गया है कि वे उच्‍च अधिकारियों को सूचना दिए बिना कानपुर न छोड़े. साथ ही यह भी कहा गया है कि उन्‍हें कंपनी के नियमानुसार सस्‍पेंशन पीरियड का भत्‍ता एवं अन्‍य भुगतान किए जाएंगे.

पूर्व कांग्रेसी विधायक के भतीजे ने पत्रकार से की धक्‍का-मुक्‍की

: पत्रकार संगठनों में रोष, आरोपियों के गिरफ्तारी की मांग : सर्व शिक्षा अभियान के तहत आयोजित एक कार्यक्रम में धांधली किए जाने की खबर लिखने की तैयारी करने वाले पत्रिका के पत्रकार से पूर्व कांग्रेसी विधायक का भतीजा ने धक्‍का-मुक्‍की किया तथा जान से मारने की धमकी दी. मामला मध्‍य प्रदेश के  नरसिंहपुर जिले की है. पत्रिका के पत्रकार राजेंद्र शर्मा सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत चल रहे एक कार्यक्रम में धांधली पकड़ा तथा इस कार्यक्रम की संयोजक शालिनी प्रजापति से उनका पक्ष लेने पहुंचे तो उन्‍होंने कहा कि आपको पांच बजे के बाद अपने हिसाब से खबर भेज देंगे.

इसके बाद कांग्रेस के पूर्व विधायक एनपी प्रजापति का भतीजा अमित उर्फ अम्‍मू प्रजापति, जो शालीनी का रिश्‍तेदार बताया जाता है, अपने दो साथियों के साथ पत्रिका के कार्यालय पहुंचा तथा राजेंद्र शर्मा को धमकी दी कि और कहा कि तू बड़ा पत्रकार बनता है ना, खबर छाप फिर तूझे बताता हूं. इसके बाद इन लोगों ने पत्रकार के साथ धक्‍का-मु‍क्‍की की तथा जान से मारने की धमकी देकर चले आए. पत्रकार की शिकायत पर पुलिस अमित, आनंद चौरसिया तथा सचिन शुक्‍ला के खिलाफ आईपीसी की धारा 294, 323, 506 एवं 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

इधर, पत्रकार से धक्‍का-मुक्‍की किए जाने और धमकी दिए जाने से पत्रकार संगठन तथा सामाजिक संगठनों में जबर्दस्‍त नाराजगी है. पत्रकारों के कई संगठनों से प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन देकर आरोपियों की गिरफ्तार तथा उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. भाजपा समेत कई राजनीतिक दलों ने भी इस घटना की निंदा की है.

फेसबुक पर शाजी जमां के खिलाफ कुत्सित मुहिम

इंटरनेटी ब्रह्मांड में आजादी सबके लिए है. जाहिर है, बुरे लोगों को भी ये आजादी मयस्सर है. कुछ ऐसे बुरे लोग हैं जो गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को हीरो के रूप में पेश करके हत्यारे की मार्केटिंग करते हैं और गांधी जी को बुरा-भला कह घटिया आदमी बताते हुए कोसते रहते हैं. ऐसे लोगों की दिमागी स्थिति को क्या कहा जाए. इन्हीं में से कुछ लोग शाजी जमां के पीछे पड़ गए हैं. शाजी जमां को शरीफ, संवेदनशील और पढ़ा-लिखा संपादक माना जाता है. लो-प्रोफाइल में रहने वाले शाजी जमां आमतौर पर रिएक्ट नहीं करते, वे चुपचाप अपना काम करते हैं.

शाजी जमां की उच्चस्तरीय शिक्षा-दीक्षा और उनके परिवार का साहित्यिक बैकग्राउंड उन्हें चेतना के स्तर पर प्रगतिशील और अन्य संपादकों से अलग व खास बनाता है. अपनी इसी जनपक्षधर सोच-समझ के कारण उन्होंने स्टार न्यूज के कंटेंट को भरसक डेमोक्रेटिक बनाए रखने की कोशिश की. स्टार न्यूज ने कई जोरदार प्रोग्राम दिखाए हैं. बड़े न्यूज चैनलों में स्टार न्यूज ही है जिसने निर्मल बाबा के पाखंड का पर्दाफाश करना शुरू किया. रामदेव, अन्ना आदि के अच्छे आंदोलनों की दूसरी तस्वीरें भी दिखाई, जो उचित है.

हम डेमोक्रेटिक कंट्री में रहते हैं और मीडिया का यह कर्तव्य है कि वह किसी भी मुद्दे के प्रत्येक एंगल को जनता के सामने रखे. पर कुछ अंधभक्त, कट्टरपंथी यह बर्दाश्त नहीं कर पाते कि उनके चहेते लोगों की किसी भी प्रकार से आलोचना की जाए. ऐसे ही मूर्ख, अलोकतांत्रिक, कट्टरपंथी और चिरकुट किस्म के लोग इन दिनों फेसबुक पर शाजी जमां के खिलाफ कुत्सित मुहिम छेड़े हुए हैं. पढ़ने लिखने से कोसों दूर रहने वाले इन छोकरों के घृणित अभियान की भड़ास4मीडिया निंदा करता है और उनसे अपील करता है कि वे अपनी बात तर्कों-तथ्यों के आधार पर करें न कि किसी व्यक्ति के मुस्लिम या हिंदू होने के आधार पर.

नीचे वह पोस्ट दिया जा रहा है जिसे किन्हीं Ravi Shanker Yadav ने फेसबुक पर अपलोड किया हुआ है और दर्जनों लोगों के साथ शेयर किया है. रवि शंकर यादव के प्रोफाइल पर उसके बारे में बताया गया है कि वह इंडिया अगेंस्ट कांग्रेस का सोशल वर्कर है. खुद को फैजाबाद निवासी बताता है. इस रवि शंकर यादव से अपील है कि वह किसी पर बिना जाने समझे परसनल और बिलो द बेल्ट अटैक न करे. सबको गरियाइए और गरियाते ही रहिए दिन भर, शौक से, लेकिन कमर के नीचे वार न करें. शाजी जमां चेतना, समझ और इमानदारी के स्तर पर आपसे बहुत काबिल और संवेदनशील हैं. आप या तो जानबूझ कर बदमाशी कर रहे हैं या फिर अनजाने में किसी के हाथों के मोहरे बन गए हैं.

आपके लिखे से समझ में आ रहा है कि आप उसी रामदेव के अंधभक्त हैं जो इन दिनों कालेधन के खिलाफ अभियान चलाए हुए हैं. आपकी तरह मैं भी रामदेव का प्रशंसक हूं, उनके कालेधन विरोधी और कांग्रेस विरोधी पोलिटिकल कंपेन का समर्थक हूं. लेकिन आप जैसे अंधभक्तों के कारण मैं थोड़ा भयभीत हो जाता हूं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अगर रामदेव का राज आएगा तो इस देश में फासिज्म लागू हो जाएगा, किसी के बारे में कोई बात करना कहना मुश्किल हो जाएगा. रामदेव के ढेर सारे समर्थक उनके ऐसे अंधभक्त हैं जो रामदेव की बुराई सुनना ही नहीं चाहते. लेकिन ऐसा करने से रामदेव के काले कारनामें छिप नहीं जाएंगे. बाबा रामदेव ने काफी पैसा नियम के खिलाफ इधर उधर किया है और तहलका समेत कई जगहों पर इसकी रिपोर्ट छप चुकी है. करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी की है. किसानों से जबरन जमीनें लिखवाई हैं. और भी बहुत कुछ किया है.

इन सब बुराइयों के बावजूद बबवा के कालेधन आंदोलन के प्रति मैं समर्थन रखता हूं लेकिन रवि शंकर यादव जैसे अंधभक्तों के कारण शक होने लगता है कि रामदेव लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं या बर्बाद करना चाहते हैं. उन्हें अपने समर्थकों में लोकतांत्रिक सोच-समझ और सीख पैदा करनी चाहिए, वरना सोच-समझ-चेतना के स्तर पर संघियों और बाबा समर्थकों में कोई फर्क नहीं रह जाएगा, जैसा कि कई लोग कहते भी हैं, और रवि शंकर जैसों की करनी ऐसे तथ्यों की पुष्टि करते हुए रामदेव के संघी होने की चुगली भी करती है. रामदेव कोई भगवान नहीं, कोई खुदा नहीं. वह शून्य से उठा हुआ हमारे आप जैसा ही आदमी है. वह अति महत्वाकांक्षी हैं और राजनीतिक रूप से सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं. ऐसी इच्छा रखना गलत नहीं पर गलत ये है कि आप अपनी तनिक भी आलोचना बर्दाश्त नहीं करते. जो आप पर किसी तरह का सवाल खड़ा करे या आपको लेकर एनालिटिकल हो जाए तो आप उसे खारिज करने लगते हैं, उसकी जाति धर्म आदि के आधार पर उसे उसकी औकात बताने लगते हैं.  रामदेव और उनके समर्थकों की यह आदत ठीक नहीं. जन समर्थन पाने के कारण दिमाग नहीं खराब होना चाहिए बल्कि दिमाग ठीक हो जाना चाहिए, विनम्रता बढ़ जानी चाहिए, वरना कांग्रेसियों और रामदेव समर्थकों में फर्क क्या रह जाएगा. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Ravi Shanker Yadav :  क्या कुत्ते का नाम बदलकर कुछ और कर दे तो उसका चरित्र बदल जायेगा? भारत मे स्टार न्यूज़ स्टार ग्रुप और कलकत्ता की आनंद बाज़ार पत्रिका ग्रुप का एक साझा चैनल था. लेकिन भारत मे स्टार न्यूज़ की सबसे बड़ी कमाई एडवरटाइजिंग से नही आती थी बल्कि स्टार न्यूज़ की सबसे बड़ी कमाई कांग्रेस की दलाली करने से होती थी. ये चैनेल घोषित रूप से अपने आपको एक कांग्रेसी चैनल में बदल दिया था और हिंदुत्व का घोर विरोधी चैनल था .. इस चैनल का भारत मे मुख्य कर्ता-धर्ता एक कट्टर सुन्नी मुस्लिम शाजी जमां था, जिसने अपने सभी एंकरों को आदेश दिया था कि वो बाबा रामदेव के आगे बाबा या स्वामी न लगाये बल्कि सिर्फ रामदेव बोले. इस चैनल की काली कमाई करीब हर महीने दो सौ करोड़ तक पहुंच चुकी थी .. इसका सबसे बड़ा धंधा सुपारी लेकर किसी के खिलाफ खबर बनाकर दिखाने का हो गया था. स्टार ग्रुप तो वैसे भी पूरे विश्व का सबसे बदनाम मीडिया हॉउस है.. इसने ब्रिटेन में सिर्फ सनसनी मचाने के लिए एक ऐसी लड़की का फोन हैक कर झूठी खबरें दिखाता रहा जो एक साल पहले ही मर चुकी थी. इस घृणित कार्य के लिए ब्रिटेन में स्टार ग्रुप पर रोक लगा दी गयी और खुद रूपर्ट मर्डोक को ब्रिटेन की अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. मित्रों, जैसे दो कुत्ते भूखे बैठे हों और कोई मालकिन बोटी फेके तो क्या होगा? दोनों कुत्ते बोटी के लिए आपस मे छीनाझपटी शुरू कर देंगे.. ठीक वही भारत में स्टार ग्रुप और आनंद बाज़ार पत्रिका ग्रुप में होता था.. इन दोनों के बीच 10 जनपथ से फेकी जा रहे बोटी को चबाने को लेकर खूब झगड़ा शुरू हो गया. इसलिए अब दोनों अलग होकर धंधा करेंगे..

Shyam Arya Thanks for nice & valuable information
 
Prasoon Singh That's right
 
Shreekant Sharan it is 100% right..
 
Gaurav Mangla तुम गलत हो।
 
Kishor Bankoti that's right …par Aapke Akle chelne kya hoga…..?
 
Manoj Nair Kadammanitta Sahi baath
 
Nitish Tiwari ये पागल कुतो को गोली मारना चाहिए , जब तक यहा रहेगेँ नाम बदलकर गंदगी फैलाए गये
 
Annu Kumar I did'nt knw dat thanx for awaring about dis cheap chanel.
 
Jitender Rathor aap bhi sath do
 
Rahul Gupta rght
 
Jeet Sharma en kutoo ko desh se nikal dena chahiye
 
Sandeep Mishra bhikhari chor media…..
 
Mahesh Sharma gaurav ji shhi kiya hai
 
Sanjay Singh Rawat Star news dekna band. thank you for that information………
 
Surendra Parihar star news dekhna band kariyega

झगड़ा दो महिला आईपीएस अधिकारियों का

Gyaneshwar Vatsyayan : महिलाओं का वहम लाइलाज होता है,यह बहुत लोग कहते हैं। लेकिन मंगलवार को एक महिला आईपीएस अधिकारी ने जिसे तरीके से दूसरे महिला आईपीएस अधिकारी के कक्ष में घुसकर बवाल काटा,वह देखकर हाजिर रहे सभी अधीनस्‍थ पुलिसवाले अवाक थे। लेकिन बुधवार के समाचार-पत्रों में संबंधित खबर को स्‍थान न मिला। ईटीवी भी लाइनर तक ही रहा।

किम पटना की एसपी (सिटी) हैं। तेज-तर्रार पुलिस अधिकारी। ड्यूटी में कोई पीछे नहीं छोड़ सकता। जहां रहीं, ताव से रहीं। दूसरी महिला आईपीएस अधिकारी हैं, केएस अनुपम, भागलपुर की एसएसपी। अनुपम की इमेज भी कड़क अधिकारी की ही रही है। दोनों अब तक किसी विवाद में भी नहीं रहीं। लेकिन कल जो कुछ हुआ, उसकी उम्‍मीद तो कोई कर ही नहीं सकता था। केएस अनुपम के पति अमृतराज पटना के एसएसपी हैं। बहुत ही साफ-सुथरी छवि वाले आईपीएस अधिकारी। अंडरवर्ल्‍ड में खौफ भी है।

अब चर्चा कल की घटना की। एसपी (सिटी) किम अपने दफ्तर में थीं। तभी अचानक केएस अनुपम पहुचतीं हैं। किम मैडम अनुपम को सैल्‍यूट करतीं हैं। लेकिन यह क्‍या, मैडम अनुपम तो गुस्‍से से लाल-पीली हैं। वह शुरू हो जातीं हैं। मैडम अनुपम को गुस्‍सा है कि किम टेलीफोन पर उनके पति एसएसपी अमृतराज से इतना बात क्‍यों करतीं हैं। अब इसका जवाब किम क्‍या दे सकतीं थीं, मैडम जिस गुस्‍से में थीं, उसमें यह समझा पाना भी मुश्किल था कि जब अमृतराज साहब एसएसपी हैं, तो एसपी (सिटी) की भूमिका में उन्‍हें बात तो करनी ही होगी। खैर, मैडम अनुपम कुछ भी समझने को तैयार नहीं थीं, सो गुस्‍से में ही वापस भी गईं।

        Navneet Ranjan Reflects on the general decline of quality of manpower in Indian bureaucracy
 
        Rahul Pandey sak ka koi elaj nahi hai
 
        Ranjit Kumar झगड़ा दो महिला का….
   
        Rajesh Paswan harishankar parsai ka ek vyangya hai 'ram ka dukh aur mera'
    
        Yashendra Prasad Striyo ka swabhav hi esa hota h…… 🙂
     
        Rashmee Singh ये सच भी है, या मातहत मजे ले रहे हैं……????
      
        Kayam Sabri ek bb ka apne pati se piyar darsata hai……..
       
        Praveen Kumar lady singham
        
        Priyarag Verma prem aur jung mein sab jayaj hai
         
        Gyaneshwar Vatsyayan प्‍लीज…….कोई भी अमर्यादित टिप्‍पणी न करें………..शब्‍दों का ख्‍याल करें ।
         
        Vijay Kumar Bhaiya, yah IPS officer ke bich nahi balki do mahilao ki ladai thi.
         
        Vibhu Garg bahut hi ghatiya harkat kahi jayegi anupam ki…agar unhe bat hi karni thi to akele b mil sakti thi..media ko bite dene ka kya matlab ha?
         
        Yashendra Prasad Tisri Kasam fil ka wo gana yad aa raha h :" Kahe piya pardes base h… Sautan ke bharmaaye.." 🙂
         
        Manoj Pathak नितीश जी भी कह चुके हैं प्यार पर पहरा नही लगेगा !!!!!!
         
        Raj K P Sinha hhhhhhhhhhhh
         
        Anjani Kumar ye to swabhik bat hai.pati agar sundar ho to patni aur shankalu ho jati hai.
         
        Sujit Kumar Acharya ha ha ha ha Ab Nitish ji ko iska Nidan karna parega, Akhir Home minister ke bhi Charge main hai…………
         
        Vishal Mishra sak ka koi ilaj nhi hai
         
        Brij Bhushan Sharma baal ki khaal naa nikaale. mangadanth baate hai ye sab.
         
        Uma Shankar Sinha I THINK KIM DOINING HER RIGHT JOB, LET HER DO, BEST OF LUCK KIM
         
        Dipendra Kumar उछला चोर की दाढ़ी मे और मौजूद भीड़ ने उसे पूरा किया तिनका ?
         
        Vibhu Garg Brij Sharma ji…kuch b mangadanth nhi ha..wo log b hamare jaise hi ensaan hain aur aisa sambhav hai..filhal kisi k vyaktigat mamle se kya lena dena…par aisa bhi kya ha ki anupam apne power ka galat use karke kim ko dhamka gyi…kim ko bhi es par kathor kadam uthana chahiye
         
        Pawan Kumar Chahe jo bhi ho aakhir vo dono aurat he hai to aurato jaisa hi vavahar to karengi vo swabhavik hai
    
        Rakesh Ranjan Bibi chahe hamari/aapki ho ya SP ki ya khud SP ho. Hai to aurat hi na .gun dharam to ek hi hoga.
     
        Pawan Kumar sahi kaha
      
        Shashishekhar Samrat sujeetji k.s anupam or amritraj mai aksar jhagra hota rahta hai.saharsa mai jb k.s anupam s.p thi tb madhepura ka s.p amrit raj tha.saharsa or madhepura ka sp ka driver or bordigard un dono sai paraisan tha rat ko 1 2 baje v jhagra suru ho jata tha.
       
        Ghanshyam Tiwari hai to aakhir bharatiya naari he na?
        
        Ashish Jha हाहाहा, मामला ''लॉ'' एंड ''ऑडर'' का है। हाहाहा
         
        Bal Krishna Choudhary Mantu Ek bibi ka—–pati se piyar——
         
        Gyaneshwar Vatsyayan फिर से आग्रह……..शब्‍दों के इस्‍तेमाल में संयम बरतें………शालीनता आवश्‍यक है ।
         
        Shashi Shekhar No news as such any where in Media….Thanks to FB platform….
         
        Remi Singh Kim ne kya reply diya????
         
        Satyendra Singh i love ur /…………./
         
        Dhananjay Kumar I think Kim is doing her job well in Patna.So don't move in any prvate matter ,if have. Let us pray that she should continue in action.
         
        Rajeev Kamal चटपटी मसालेदार खबर…
         
        Nadeem Akhtar ये हुई औरतों वाली जलन। वैसे औरतें अपनी असली इमेज से बाज नहीं आ सकतीं, चाहे जहां पहुंच जायें।
         
        Ashish Jha नदीम भाई, आप महिलाओं का अपमान कर रहे हैं।
        
        Nadeem Akhtar अपमान कैसे हुआ आशीष जी। जो गुण-विशेषता है, उसे स्वीकारना कहां से अपमान करना हुआ।
         
        Gautam Sarkar Perhaps ab news papaers bhi IAS logo ko Nitish Kumar Jaisa treatmnet dey raha hai- favour mai bada-bada chapna & birodh mai kuch nehi likhna!
         
        Abhinav Kumar Akela sambhal ke rahiye sir kuchh bate har jagah comman hoti hai…………..
         
        Rajeev Mishra hahahahahah
         
        Dilip Kumar Jha No comments as matter pertains to Home affairs
         
        Rajesh K Thakur kanha hua boss?
         
        Sweeta Singh nari ka antarman hi aisa hai sir ji
         
        Yogendra Rai like
         
        Prabhakar Verma कुछ काम मज़बूरी में लोग करते हैं…. लेकिन दूसरे लोग उस मज़बूरी को शौक के रूप में देखने लगते हैं… जी हां… ये किम मैडम की मज़बूरी है कि उन्हें अपने वरिष्ठ से बात तो करनी ही है… लेकिन दूसरों को ऐसा लग रहा है… मानों उसकी मज़बूरी नहीं… शौक़ हो……
         
        Anil Paul Annu JLAN AURAT KI SWABHAWIK PRAKIRYA HA (I P S ) HA TO KYA
         
        Pritam Gupta अरे इतना सब हो गया और मुझा पता भी नहीं..लगता है ये इश्क सर चढ़ कर बोलगा..
         
        Anoop Naraian Singh yaha do ips nahi do mahilao ka mamla hai……………
         
        Satyendra Narayan Is se yeh sabit hota hai ki media ko kaisa khabar chahiye

Gyaneshwar Vatsyayan के फेसबुक वॉल से साभार.

श्री टाइम्‍स से श्‍याम बिहारी का इस्‍तीफा

श्री टाइम्‍स, लखनऊ से खबर है कि श्‍याम बिहारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे मैनेजर मार्केटिंग के पद पर कार्यरत थे. श्‍याम बिहारी ने अपनी नई पारी लखनऊ में ही पायनियर के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर भी वही जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. श्‍याम अखबार की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. श्‍याम बिहारी के स्‍थान पर नीरज को नया जीएम बना बना दिया गया है. नीरज को श्री टाइम्‍स समूह के जीएम का नजदीकी माना जाता है.

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : सरकारी विभाग को डिक्‍टेट करता आ रहा है अखबार

मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज 200 करोड़ रुपये के दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में आरक्षी उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर की पर्यवेक्षण रिपोर्ट में नामजद अभियुक्त मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष और एडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भरतीया, मुद्रक एवं प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और स्थानीय संपादक विनोद बंधु के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8 (बी), 14 और 15 के तहत लगाए गए सभी अभियोगों को प्रथम दृष्टया सत्य पाए जाने की घटना में बिहार सरकार के वित्त (अंकेक्षण) विभाग, पटना, बिहार की वित्त रिपोर्ट -195/2005 की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इस रिपोर्ट को मैं विश्व के इन्टरनेट पाठकों के समक्ष किस्तों में हू-ब-हू प्रकाशित करता आ रहा हूं। इस रिपोर्ट के आधार पर ही मुंगेर के न्यायालय ने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर जांच रिपोर्ट न्यायालय को पेश करने का ऐतिहासिक आदेश दिया था। इसी रिपोर्ट को आधार मानकर पुलिस उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर ने पर्यवेक्षण रिपोर्ट में अभियुक्तों के विरुद्ध लगाए गए अभियोगों को प्रथम दृष्टया सत्य घोषित किया है।

इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि दैनिक हिन्दुस्तान किस प्रकार जालसाजों का जालसाज है और यह अखबार सरकारी राजस्व को लूटने के लिए किस हद तक दादागिरी करता है? किस तरह बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की विभागीय संचिकाओं को नाच नचाता आ रहा है? इसके पूर्व मैंने अपनी रिपोर्ट में बिहार सरकार की वित्त अंकेक्षण रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या -0001056 प्रकाशित की थी। अंकेक्षक दल ने खुलासा किया था कि दैनिक हिन्दुस्तान पटना से एक निबंधन संख्या प्राप्त कर राज्य में क्षेत्रवार कुल ग्यारह संस्करण का प्रकाशन कर रहा है। परन्तु, हिन्दुस्तान के ग्यारहों संस्करणों के लिए एक ही पंजीयन संख्या-44348/1986 (पटना) छाप रहा है। मुजफ्फरपुर और भागलपुर के लिए दैनिक हिन्दुस्तान में कोई अलग ‘प्रिंट-लाइन‘ नहीं है।

जबतक किसी मुद्रण-केन्द्र का अलग ‘पंजीयन‘ और अलग ‘प्रिंट लाइन‘ नहीं होता है, तब तक उसे स्वतंत्र प्रकाशन नहीं समझा जा सकता है। हिन्दुस्तान, पटना के अतिरिक्त मुजफ्फरपुर और भागलपुर डेट लाइन से कोई प्रकाशन नहीं होता है। इस बात की पुष्टि दैनिक हिन्दुस्तान के प्रतिनिधियों ने अंकेक्षक दल के समक्ष की है।

जालसाजी की हद : कभी स्वतंत्र तो कभी संयुक्त प्रकाशन का दावा : वित्त अंकेक्षण प्रतिवेदन-195/2005 की पृष्ठ संख्या-0001057 में अंकेक्षण दल ने खुलासा किया है कि दैनिक हिन्दुस्तान किस प्रकार कभी भागलपुर और मुजफफरपुर को स्वतंत्र प्रकाशन बताता था, और कभी इससे मुकर भी जाता था।

विज्ञापन लौटाया, सरकार पर दवाब डाला : दैनिक हिन्दुस्तान के मुजफ्फरपुर और भागलपुर संस्करणों को स्वतंत्र प्रकाशन मानकर जब सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना ने अलग विज्ञापन दैनिक हिन्दुस्तान को जारी किया तो अखबार ने उन सरकारी विज्ञापनों को लौटा दिया और छापने से इनकार कर दिया। इस प्रकार अखबार ने सरकार के इस विभाग पर दवाब बनाया और सरकार को पटना, भागलपुर और मुजफ्फरपुर (तीनों संस्करणों) के लिए ‘संयुक्त विज्ञापन दर‘ देने को मजबूर कर दिया जो पूर्णतः ‘अवैध‘ और ‘अनियमित‘ था। अब देश और विदेश के इन्टरनेट पाठक फैसला करें कि बिहार में मीडिया हाउस को सरकार नचा रही है या मीडिया हाउस सरकार को नचा रहा है?

विभागीय परिपत्र का उल्लंघन : संयुक्त विज्ञापन दर देने से विभागीय परिपत्र -328/03-07-1981 के प्रावधानों का उल्लंघन होता है और सरकार को सरकारी राजकोष से नियमित रूप से एक करोड़ 32 हजार 272 रुपया 16 पैसा का भुगतान हिन्दुस्तान को करना पड़ा।

डीएवीपी को अंधकार में रखा, विज्ञापन-दर प्राप्त किया : दैनिक हिन्दुस्तान ने बिहार के मुजफ्फरपुर और भागलपुर के मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र और अलग बताकर ‘डीएवीपी विज्ञापन दर‘ प्राप्त कर लिया। इसमें अखबार ने डीएवीपी को भी अंधकार में रखा। परन्तु, सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना, बिहार इस बात की पुष्टि और सत्यापन करने में असमर्थ है। यह भी घोर आश्चर्य की बात है।

अंकेक्षण प्रेतिवेदन का यह हिस्सा प्रमाणित करता है कि जालसाजों के जालसाज दैनिक हिन्दुस्तान की पकड़ और दबदबा सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना, बिहार पर किस हद तक है? किस ढंग से दैनिक हिन्दुस्तान की इच्छा और मर्जी से सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना की विभागीय विज्ञापन संचिकाएं लिखी जाती हैं? किस प्रकार विभाग के वरीय अधिकारी, कुछ को छोड़कर, अखबार के प्रबंधन और संपादकीय विभाग के डिक्टेशन के आगे ‘बौना‘ और ‘लाचार‘ बने हुए हैं। इसे पढ़कर कौन कहेगा कि सरकार बिहार में मीडिया हाउस को नचा रही है? स्थिति तो ठीक उलटी है। जालसाजी और धोखाधड़ी में लिप्त बिहार के मीडिया हाउस सरकार के सरकारी विभाग को डिक्टेट कर रहे हैं और जमकर सरकारी विज्ञापन मद में लूट मचा रखा है।

कानूनी बाध्यता : ज्यों हि कोई मुद्रण-केन्द्र अलग स्वतंत्र इकाई के रूप में काम करना प्रारंभ करता है, त्यों हि प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 के तहत प्रकाशन पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष घोषण करना और भारत सरकार के प्रेस रजिस्‍ट्रार, नई दिल्ली से पंजीयन कराना अनिवार्य है। कंपनी रजिस्ट्रार से पूर्व अनुमति प्राप्त करना भी अनिवार्य था, जो नहीं किया गया। मुद्रण केन्द्र मुजफ्फरपुर में 28-03-2001 से प्रारंभ हुआ और भागलपुर में 03-08-2001 से प्रारंभ हुआ। परन्तु घोषणा-पत्र क्रमशः मुजफ्फरपुर में जिलाधिकारी के समक्ष 29-11-2003 और भागलपुर में 11-12-2003 को समर्पित किया गया, जो प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 के प्रावधानों के प्रतिकूल है।

शेष अगले अंग में।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट। इनसे संपर्क मोबाइल नं.- 09470400813 के जरिए किया जा सकता है।


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं –

हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

जब मंत्री ने पत्रकार से कहा – बाइट नहीं दूंगा, तुम्‍हारे मालिक ब्‍लैकमेल करते हैं

आगरा में अब सी एक्सप्रेस समूह व परिवहन मंत्री राजा अरिदमन सिंह के बीच कांटे की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है. इसकी झलक आज सुबह परिवहन मंत्री की प्रेस वार्ता में देखने को मिली, जब सी उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के लिए सी समूह का एक पत्रकार परिवहन मंत्री राजा अरिदमन सिंह के इंटरव्‍यू के लिए गया तब परिवहन मंत्री ने स्पष्ट तौर पर पत्रकार से कह दिया कि मैं तुम्‍हें बाइट नहीं दूंगा, क्योंकि तुम्हारे मालिक ब्लैक मेल करते हैं. इसके साथ-साथ परिवहन मंत्री ने स्पष्‍ट तौर पर कहा कि मेरी तुम से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है. तुम कभी भी मेरे घर पर आ जाना.

बताया गया है कि सी एक्सप्रेस के मालिकान अब राजा अरिदमन सिंह के सामने घुटने टेक चुके हैं और किसी भी तरह राजा अरिदमन सिंह को मनाने की तैयारी चल रही है, जिससे कैसे भी अरिदमन सिंह के कोप से बचा जा सके. इसके लिए बार-बार ठाकुर पत्रकारों को भेजा जा रहा है, जिससे सजातीय होने के नाते महाराज से बचा जा सके. गौरतलब है कि अभी हाल में ही सी एक्सप्रेस समूह के मालिकन पर बिजली चोरी के मामले में हुई कार्रवाई में परिवहन मंत्री का नाम सामने आया था, जिसमें सी समूह के मालिकान जेल जाते-जाते बचे थे.

इस घटना के साथ-साथ अब जी समूह पर भी प्रश्‍न चिन्‍ह लगता जा रहा हैं क्योंकि अभी तक सी समूह से जी समूह ने अपना काम वापिस नहीं लिया है, जबकि यह बात जी समूह के मालिकान तक पहुँच गयी है. बताया जा रहा है कि चूंकि वाशिन्‍द्र मिश्र के आगरा आगमन पर जैन बंधु उनकी बेहतरीन सेवा करते हैं, इसलिए जी समूह का काम अभी सी समूह से नहीं लिया गया है. बरहाल उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री का गुस्सा अभी ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा हैं और सी समूह के मालिकन कैसे भी इस जुगत में हैं कि कैसे भी साम-दाम-दंड-भेद से महाराज अरिदमन को शांत किया जा सके, परन्तु महाराज अरिदमन अब खुलकर सी एक्सप्रेस समूह के मालिकान को चोर व ब्लैकमेलर की संज्ञा देते नज़र आ रहे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

पंचम तल पर बैठकर सोनभद्र जिला चला रहे हैं पंधारी यादव!

: एक माह से खाली पड़ा है जिलाधिकारी का पद : जेपी ग्रुप के हितपोषक जिलाधिकारी की तलाश : सोनभद्र में एक माह से जिलाधिकारी का पद रिक्त है। जिलाधिकारी की तैनाती न होना अपने आप में इस महत्वपूर्ण जिले के लिए आश्चर्यजनक है। चर्चा है कि जिले को राजधानी के पंचम तल पर बैठे मुख्यमंत्री के विषेश सचिव व सोनभद्र के पूर्व जिलाधिकारी पंधारी यादव की सलाह पर चलाया जा रहा है। वर्तमान में मुख्य विकास अधिकारी शफाकत कमाल प्रभारी जिलाधिकारी का काम देख रहे हैं, लेकिन वह कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रहे हैं। इसके चलते तमाम काम बाधित हैं। घोटालों के बेताज बादशाह के रूप में यह जिला देश में मशहूर हो चुका है।

जिले में मनरेगा में तीन सौ करोड़ का घोटाला तब हुआ जब यहाँ पंधारी यादव जिलाधिकारी थे। छात्र शक्ति कन्ट्रकशन कम्पनी ने अरबों रुपये की सड़कों में तब जमकर घोटाला किया जब यहाँ पंधारी यादव जिलाधिकारी थे। तमाम गावों की सड़कें बनी ही नहीं थीं लेकिन बसपा सरकार के कुछ मंत्रियों को खुश रखने के लिए यादव सड़कों के पूर्ण हो जाने की रिपोर्ट शासन को भेजते रहे ताकि भुगतान होता रहे। आज भी वह सड़कें जिले में मौजूद हैं, जिन पर ६ माह बाद ही चलना मुश्किल हो गया। बसपा सुप्रीमो मायावती के चहेते जेपी को जब वन बंदोबस्त अधिकारी विजय कुमार ने कार्य क्षेत्र से बाहर जाकर हजारों एकड़ वन भूमि सौंप दी तब जिलाधिकारी पंधारी यादव थे। खनन क्षेत्र से जब एमएम ११ का शुल्क २२ हजार की जगह एक लाख पार कर गया तो उस समय भी जिलाधिकारी के रूप में जिले में पंधारी यादव ही मौजूद थे।

घोरावल, राबर्ट्सगंज, तहसीलों में जब सूखा राहत राशि में लाखों का घोटाला हुआ तब जिलाधिकारी के रूप में यहाँ पंधारी यादव मौजूद थे। एक माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अभी तक किसी जिलाधिकारी की सोनभद्र में तैनाती न होने से चर्चाओं का बाजार गर्म होता जा रहा है। विजय विश्‍वास पन्त ने जिस तरीके से जिला चलाया उसे लोग भूल नहीं पा रहे हैं। २७ फरवरी को ओबरा के पास हुए खदान हादसे के दोषियों को सजा दिलाने के लिए पन्त ने जो तेवर अपनाया था, उससे सिर्फ खनन माफिया ही नहीं बल्कि कुछ पूर्ववर्ती आला अधिकारी   भी अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे थे, जिस खदान में हादसा हुआ उसमें लगभग पिछले चार वर्षों से धड़ल्ले से खनन का काम हो रहा था। इस अवैध खनन में पुलिस, कुछ पत्रकार जिला प्रशासन समेत तमाम लोग सक्रिय थे। इसे बढ़ावा देने में पूर्व जिलाधिकारी पंधारी यादव की भूमिका महत्वपूर्ण कही जा रही है।

भाजपा के कार्यवाहक जिलाध्यक्ष धर्मबीर तिवारी का कहना है कि सोनभद्र में जितने भी घोटाले हुए उसमें यादव की प्रमुख भूमिका रही। अब जब घोटालों को लेकर सोनभद्र में माहौल गर्म है तब यहाँ अपने पूर्व के कारनामों को छुपाने की जुगत में वह सभी लोग लग गए हैं जो कहीं न कहीं इसमे शरीक थे। मनरेगा में हुए घोटाले को लेकर केंद्र सरकार के तेवर तीखे हैं, वह सीबीआई जाँच के बहाने बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती को घेरना चाहती है। लेकिन सोनभद्र में जब जाँच शुरु होगी तो सबसे पहले पंधारी यादव उसके लपेटे में होगें, क्योंकि उनके ही देख रेख में मनरेगा का काम चल रहा था। अब कुछ लोग जेपी के खिलाफ अपनी कमर कस कर लड़ने को तैयार हो चुके हैं। वहीं अवैध खनन हादसे को लेकर कुछ जन संगठन सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने की तैयारी में जुटे हैं। ऐसे में इस जिले में किसे जिलाधिकारी के रूप में भेजा जाय, जो पूर्व के तमाम कुकृत्यों पर पर्दा डाल सके, उसकी तलाश की जा रही है। सोना उगलने वाले जिले में किसी ऐसे जिलाधिकारी की तैनाती पंचम तल पर बैठे यादव नहीं चाहते, जो भ्रष्टाचार को उजागर करने में सक्रिय हो।

एक माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जिलाधिकारी की तैनाती न होना अपने आप में सरकार व उसके सलाहकारों की मंशा को साफ जाहिर कर रही है। कांग्रेस के राजेश दुबे का कहना है कि पंचम तल पर बैठे विशेष सचिव पंधारी यादव जैसे लोग न तो सपा के हैं और न बसपा के, ऐसे लोग जेपी जैसे पूंजीपतियों के होते हैं, जो किसी की भी सरकार बने उसमें घुसकर पूंजीपति को लाभ पहुंचाना उनका मुख्य लक्ष्य होता है। ऐसे में जेपी पंचम तल पर बैठे कुछ लोगों की मदद से अपने लिए काम करने वाला जिलाधिकारी लाना चाहता है। महिला जन संगठनों का रुख भी इस मुद्दे पर मुखर है। राष्‍ट्रीय वन जन श्रम जीवी मंच की संयोजक रोमा का कहना है कि सोनभद्र में आदिवासियों का सर्वाधिक उत्पीड़न भी पंधारी यादव के कार्यकाल में हुआ। वनाधिकार कानून की आड़ में वनवासियों का शोषण किया गया। अधिकार पत्र देने में काफी अनियमितताएं की गई। रोमा का कहना है कि मुख्यमंत्री को सोनभद्र में    शीघ्र एक जिलाधिकारी की तैनाती करनी चाहिए नहीं तो सोनभद्र की महिलाएं उस कुर्सी पर काबिज होकर जिला चलाने की मुहीम शुरु करेंगीं।

विजय विनीत

पत्रकार

सोनभद्र, यूपी

इलेक्ट्रानिक मीडिया को प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के दायरे में लाने का प्रस्ताव

केंद्र सरकार ने मंगलवार को लोकसभा में कहा कि भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) ने इलेक्ट्रानिक मीडिया को परिषद के दायरे में लाने का प्रस्ताव किया है. सूचना व प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने सी. राजेंद्रन और खगन दास के सवाल के जवाब में कहा कि भारतीय प्रेस परिषद का दायित्व प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण करने के साथ अखबारों और समाचार एजेंसियों की गुणवत्ता और मानक को बेहतर बनाना है. परिषद इस बारे में शिकायतों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करती है. उन्होंने कहा कि पीसीआई के अध्यक्ष ने इलेक्ट्रानिक मीडिया को परिषद के दायरे में लाने का प्रस्ताव किया है.

इसके अलावा उन्होंने परिषद को और अधिकार दिए जाने की भी वकालत की है, जिसमें जुर्माना लगाने का प्रावधान शामिल है. सोनी ने कहा कि परिषद के अध्यक्ष के प्रस्ताव को पेड न्यूज मामले पर गठित मंत्रियों के समूह को भेजा गया है. मंत्री ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया से संबंधित मामले केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमन कानून, 1995 के तहत आते हैं. रंजन प्रसाद यादव के सवाल के जवाब में सोनी ने कहा कि पीसीआई ने पिछले करीब तीन वर्षों में प्रिंट मीडिया में पत्रकारिता आचार संहिता का उल्लंघन करने से संबंधित 1544 मामलों का निपटारा किया.

पत्रकार पुत्र ने सिपाही को थप्‍पड़ मारा, मामला दर्ज

देवरिया। एक इलेक्‍ट्रानिक चैनल के पत्रकार के पुत्र द्वारा पुलिस वाहन चेकिंग के दौरान सिपाही को थप्पड़ मार दिया गया। पत्रकार का बेटा इस गुमान में था कि उसका बाप इलेक्ट्रानिक चैनल में है तो पुलिस उसका कुछ नहीं कर पाएगी, लेकिन पासा उलटा पड़ गया। इस घटना की जानकारी होने के बाद पुलिस अधीक्षक शचि घिल्डियाल के निर्देश पर पत्रकार पुत्र के खिलाफ कोतवाली थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है, जिससे पत्रकारों में हड़कम्प मचा हुआ है।

जानकारी के अनुसार सोमवार की शाम को परशुराम चौराहे पर पुलिस अधीक्षक के आदेश पर वाहनों की रूटीन चेकिंग चल रही थी। पुलिस घेराबंदी कर बाइक सवारों को रोक उनके कागजात चेक कर रही थी। इसी दौरान बाइक सवार सौरभ मणि त्रिपाठी को एक सिपाही ने हाथ देकर रोका। इस पर सौरभ मणि त्रिपाठी बौखला गया और उसने सिपाही को थप्पड़ जड़ दिया। इससे अन्य पुलिस कर्मी भी आक्रोशित हो उठे। सौरभ मणि त्रिपाठी ने खुद को मीडिया कर्मी व इंडिया टीवी के पत्रकार अवनीश मणि त्रिपाठी का पुत्र बताते हुए हंगामा खड़ा कर दिया। देखते ही देखते मौके पर पत्रकारों के साथ ही भारी भीड़ जुट गई। सौरभ दिल्‍ली में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। 

उधर सूचना पाकर शहर कोतवाल सारनाथ सिंह भी दलबल के साथ मौके पर पहुंच गए। उन्होंने मामले की जानकारी ली। पुलिस ने बाइक का चालान कर दिया था। कोतवाल ने मौके की नजाकत को भांपते हुए जुर्माना भरने के बाद बाइक छोड़ दी। घटना के संदर्भ में पुलिस अधीक्षक शचि घिल्डियाल ने बताया कि सोमवार को सायंकाल थाना कोतवाली देवरिया में नियुक्त आरक्षी राम सकल यादव ने तहरीर दिया है कि वह उप निरीक्षक राम मूरत यादव, चौकी प्रभारी भुजौली व कान्सटेबिल रितेश राय के साथ शहर के भुजौली कालोनी स्थित परशुराम मणि चौराहे पर वाहन चेकिंग में था कि बिना नम्बर की एक बजाज प्लेटिना मोटर साइकिल आते दिखायी दी, जिसे रोक कर कागजात मॉगे जाने पर मोटर साइकिल चालक नाराज होकर अपने को चैनल के पत्रकार अवनीश मणि त्रिपाठी का पुत्र सौरभ मणि त्रिपाठी, निवासी बरपार, थाना रामपुर कारखाना बताते हुए उनकी नेम प्लेट नोंचने लगा। विरोध करने पर उसने थप्पड़ से मारा और गाली-ग्‍लौज देते हुए देख लेने की भी धमकी दी।

पुलिस अधीक्षक ने कहा कि कानून सबके लिए बराबर है चाहे वह कितना ही प्रभावशाली व्यक्ति क्यों न हो। उन्होंने बताया कि सिपाही के तहरीर के आधार पर थाना कोतवाली देवरिया में मु0अ0सं0-920/2012 धारा 332/353/323/504/506 भा0द0वि0 पंजीकृत कराकर विवेचना उप निरीक्षक श्री राणा देवेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा की जा रही है। दूसरी तरफ पत्रकारों में पुलिस द्वारा की गई इस तरह की कार्रवाई से रोष व्याप्त है। पत्रकारों का आरोप है कि पुलिस वाहन चेकिंग के नाम वसूली करती है और नहीं मिलने पर फर्जी तरीके से लोगों का उत्पीड़न करती है। इस मामले में भी पुलिस ने इसी तरह की कार्रवाई की है।

आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाइजर’ की पीआईबी मान्यता रद्द

सूचना प्रसारण मंत्रालय ने आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाइजर की पीआईबी मान्यता रद्द कर दी है. आर्गनाइजर के संपादक आर. बालाशंकर ने बताया कि हाल ही में उन्हें एक पत्र मिला है जिसमें कहा गया है कि अनिवार्य शर्तें पूरी न कर पाने के कारण उनकी मान्यता रद्द की जाती है. बालाशंकर ने सरकार के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जिन कारणों से उनकी मान्यता रद्द करने की बात कही गई है, वे बेबुनियाद हैं. संपादक ने कहा कि सरकार के मुताबिक अखबार की बिक्री पचास हजार या उससे ज्यादा होनी चाहिए.

बालाशंकर का दावा है कि पीआईबी ने इससे कम बिक्री वाले पत्रों को भी मान्यता दे रखी है. इसके साथ ही, दस साल तक नियमित छपने की शर्त के उल्लंघन की बात कही गई है. संपादक के मुताबिक मंत्रालय की वेबसाइट पर साफ लिखा है कि पांच साल तक नियमित छपना काफी है. अगर दस साल की शर्त को आधार माना जाए तो भी आर्गनाइजर को हर हफ्ते छपते कई दशक हो चुके हैं. अखबार ने पीआईबी के फैसले को चुनौती देने की बात कही है. सूत्रों ने मामले को राजनीतिक स्तर पर उठाने की संभावना से इनकार नहीं किया.

जनसंदेश टाइम्‍स, देवरिया के ब्‍यूरोचीफ सिद्धार्थमणि ने गोरखपुर में ज्‍वाइन किया

जनसंदेश टाइम्‍स, देवरिया से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ सिद्धार्थमणि त्रिपाठी, जिनका तबादला गोरखपुर किया गया था, ने ज्‍वाइन कर लिया है. शुरू में उन पर गबन के आरोप लगाए गए थे, जो सही नहीं थे. इन्‍हीं आरोपों के चलते उन्‍होंने प्रबंधन को इस्‍तीफा सौंप दिया था. सिद्धार्थ को कंपनी ने देवरिया कार्यालय के लिए सामान उपलब्‍ध नहीं कराया था, लिहाजा उन्‍होंने प्रबंधन के आदेश पर ही विज्ञापन के पैसों से कार्यालय के लिए सामान खरीद लिया था, जिस पर कुछ लोगों ने गबन का आरोप मढ़ दिया था. खबर है कि प्रबंधन से बातचीत के बाद उन्‍होंने गोरखपुर ज्‍वाइन कर लिया है.

हालांकि देवरिया से दूसरी खबर यह है कि मकान मालिक ने ब्‍यूरो कार्यालय खाली करा लिया है. मकान मालिक का कहना था कि उन्‍होंने अपने भवन में जनंसदेश टाइम्‍स का कार्यालय बनाने के लिए जगह सिद्धार्थमणि के व्‍यवहार को देखते हुए दिया था, जब वे ही यहां नहीं हैं तो अब मैं कार्यालय किराए पर नहीं देना चाहता हूं. यहां से निकाले जाने के बाद प्रबंधन ने दूसरी जगह कार्यालय शिफ्ट कर लिया है. उल्‍लेखनीय है कि सिद्धार्थ मणि का तबादला होने के बाद देवरिया कार्यालय पर ताला जड़ दिया गया था.

”मुझ पर हमला करने वाले को ही प्रतिनिधि बना दिया ‘दाता संदेश’ ने”

हमारा समाज पत्रकार से यह अपेक्षा करता है कि विकृतियों को उजागर कर इंसाफ के बुझते चिराग को जलाये रखेंगे। तमाम बाधाओं से संघर्ष करते पत्रकार ऐसा करने में जरा भी नहीं हिचकते। लेकिन खामियाजा के तौर पर उन्हें बड़ी कीमत चुकानी होती है। उन पर जान लेवा हमले होते हैं। लेकिन वह कानून की लड़ाई में विश्वास रखते अपराधियों से जूझता है। मीडिया संस्थान भी अपने प्रतिनिधि की लड़ाई में साथ देता है। अन्तोगत्वा अपराधियों को मुंह की खानी होती है। और वे पुनः मीड़िया कर्मी पर वार करने से कतराते हैं। लेकिन आज आर्थिक लाभ का दौर चल पड़ा है। कुछ मीड़िया संस्थान भी इससें अछूते नहीं हैं। वे अपने लाभ के लिए अपने प्रतिनिधि को जमींदोज करने से जरा भी परहेज नहीं रखते।

मामला मुझसे जुड़ा हुआ है। मैं संजीव दुबे सिरसागंज का निवासी हूं। आगरा से प्रकाशित दैनिक दाता संदेश का सिरसागंज में स्थानीय प्रतिनिधि था। मुझ पर बीते 18 मार्च को कुछ नामजद लोगों ने हमला किया। मेरे साथ मारपीट कर कैमरा आदि छीन ले गये। मेरी शिकायत पर पुलिस ने रवि गुप्ता, प्रवेश गुप्ता, राघवेश एवं 4-5 अन्य के खिलाफ लूट और जानलेवा हमले की धाराओं में मामला दर्ज भी किया था। लेकिन ये सभी अपराधी राजनैतिक एवं आर्थिक रूप से काफी मजबूत हैं। इस प्रभाव के चलते पुलिस ने काफी समय तक कार्रवाई नहीं की। जब मेरे साथी पत्रकारों ने इसकी शिकायत अधिकारियों से की तो पुलिस ने खानापूर्ति करते हुए 22 अप्रैल को प्रवेश के खिलाफ मामूली सी धारा 151 के तहत कार्रवाई करके मामले की इतिश्री कर दी।

इससे भी कई कदम आगे बढ़ाते हुए समाचार पत्र के संपादकीय विभाग ने ऐसा कार्य किया जिस पर जितनी थू-थू की जाय कम ही है। जिस दिन मुझ पर हमला हुआ था, उसी दिन मेरे संस्‍थान ने एक आरोपी राघवेश को अपने अखबार का प्रतिनिधि बना दिया। और मुझे बिना कारण बताये अपने संस्थान से हटा दिया। निश्चित ही सब कुछ मीडिया संस्थान ने आर्थिक लाभ के लिये किया होगा। यह मीडिया के लिये गलत संदेश है, जो पत्रकार अपनी जान पर खेल कर अपने संस्थान को नम्बर बन पर लाने के लिए विषम परिस्थितियों से जूझते खबर जुटाता है। यह जानते हुये भी कि आहत पक्ष उसके और उसके परिवार के साथ अनहोनी कर सकता है। उसके साथ उसका ही संस्‍थान ऐसी हरकत करेगा, फिर तो पत्रकार किसी के खिलाफ कभी खबर भी नहीं लिखना चाहेगा। तब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का क्या मतलब। मीडिया की निष्पक्षता पर कौन विश्वास करेगा।

संजीव दुबे

पूर्व संवाददाता
दाता संदेश
सिरसागंज, फिरोजाबाद
मो0-09457730821

मीडियाकर्मियों से मारपीट करने वाला शिक्षक निलंबित

मुरादाबाद के ठाकुरद्वारा क्षेत्र में बोर्ड परीक्षा के दौरान मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट के आरोपी शिक्षक को निलंबित कर दिया गया है। उल्‍लेखनीय है कि 29 मार्च 2012 को सहसपुरी के एक इंटर कालेज में कुछ पत्रकार कवरेज के लिए पहुंचे थे। पत्रकारों को इस कालेज में नकल की शिकायत मिली थी। मीडियाकर्मी जब इसकी कवरेज कर रहे थे तो कॉलेज के कई शिक्षक मीडियाकर्मियों पर टूट पड़े। इस हमले में कई पत्रकार घायल हो गए थे।

हमलावर शिक्षकों ने मीडियाकर्मियों के कैमरे भी तोड़ दिए थे। पत्रकारों ने इस मामले में डिलारी थाने में शिकायत की थी, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया था। पुलिस ने इस मामले में आरोपियों को गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश किया था, जहां कोर्ट ने इन्‍हें जेल भेज दिया था। इस मामले ने शिक्षा विभाग का माहौल भी गर्म कर दिया था। जिला विद्यालय निरीक्षक के आदेश पर कॉलेज के प्रबंधक अनूप सिंह यादव ने किसान शिक्षा निकेतन इंटर कालेज सहसपुरी के सहायक अध्यापक धर्मेद्र सिंह को निलंबित कर दिया है।

मीनाक्षी नटराजन के मीडिया का गला घोंटने के अति उत्‍साह से कांग्रेस में असमंजस

बतौर सांसद मीनाक्षी नटराजन की ओर से तैयार किए गए निजी बिल के मामले में संदेशवाहक भी संदेश जितनी ही अहमियत रखता है. पहली बार संसद सदस्य बनीं नटराजन इतनी सीधी-साधी भी नहीं हैं. वे राहुल गांधी के ब्रिगेड की अहम सदस्य हैं. इसलिए जब उन्होंने मीडिया का गला घोंटने की पर्याप्त क्षमता वाले प्रिंट ऐंड इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्टैंडर्ड्स ऐंड रेग्युलेशन बिल का मसौदा तैयार किया तो खुद उनके संगी-साथी भी चकरा गए.

क्या यह उनकी अपनी पहल थी या उन्होंने अपने नेता के आदेश पर ऐसा किया? मसौदे की भाषा किसी मंजे हुए कानूनी जानकार की है और नटराजन संविधान की विशेषज्ञ वकील नहीं हैं. नटराजन इस बिल को 30 अप्रैल को संसद में पेश करने वाली थीं लेकिन उस दिन वे वहां नहीं पहुंचीं और उनका बिल भी पेश नहीं हो सका. बिल के मसौदे में एक मीडिया रेग्युलेटरी अथॉरिटी के गठन का प्रस्ताव है, जिसके पास ऐसी किसी भी घटना के कवरेज को प्रतिबंधित या स्थगित करने का अधिकार है, जो ''किसी विदेशी या आंतरिक स्त्रोत से देश के लिए खतरा'' पैदा कर सकती है.

तीन सदस्यों वाली इस अथॉरिटी का चयन सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा सरकार के अन्य नामित लोग करेंगे ताकि सरकार के पास पूर्ण नियंत्रण और सेंसरशिप अधिकार रहें. प्रस्तावित बिल में दोषी पाए जाने पर 50 लाख रु. के जुर्माने का प्रावधान है. यह बिल किसी मीडिया संगठन के कामकाज को 11 महीने तक के लिए रोकने और उसका लाइसेंस रद्द करने जैसे कठोर कदम उठाने की भी सिफारिश करता है. यह प्रस्तावित अथॉरिटी को आरटीआइ के दायरे से बाहर रखकर यूपीए सरकार की उन शानदार उपलब्धियों का भी सफाया कर देता है, जो सूचना के अधिकार कानून लागू करने के जरिए इसे हासिल हुई हैं.

कांग्रेस असमंजस में है कि वह इस पहल पर क्या प्रतिक्रिया दे. राहुल गांधी से उनकी नजदीकी के कारण कांग्रेस के नेता यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि यह नटराजन का अपना अति-उत्साह है या उनके नाम पर फुलाया गया परीक्षण गुब्बारा है. एक कांग्रेसी सांसद के मुताबिक, ''मीडिया के प्रति उनके बॉस की बेरुखी चिर-परिचित है. अपने नंबर बढ़ाने के लिए शायद उन्होंने बंदूक थाम ली होगी.'' वे इस संभावना से इनकार नहीं करते कि नटराजन ने इस काम में कांग्रेस के किसी वकील सांसद की मदद ली हो. भारतीय जनता पार्टी ने संदेशवाहक नटराजन पर दमदार हमला करने में जरा भी देरी नहीं दिखाई. भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी बोले, ''चूंकि वे राहुल गांधी की करीबी हैं, अच्छा होगा इस मामले में अब राहुल ही सफाई दें.''

विवाद में एक बार राहुल गांधी का नाम आ जाने के बाद कांग्रेस के पास नटराजन और उनके बिल से पल्ला झड़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा. कांग्रेस महासचिव और पार्टी की मीडिया सेल के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी बोले, ''यह राहुल गांधी का नजरिया नहीं है. न ही नटराजन के बिल पर उन्होंने अपनी सहमति दी थी.'' सबसे पहले द्विवेदी की ओर से कांग्रेस की प्रतिक्रिया आना महत्वपूर्ण है. दरअसल, वे बता रहे थे कि इस मामले में पार्टी की ओर से क्या कहा जाना चाहिए. नुकसान की भरपाई के लिए संसदीय मामलों के राज्‍यमंत्री राजीव शुक्ला भी मैदान में कूद पड़े. उन्होंने कहा, ''यह नटराजन की अपनी पहल थी. किसी भी सांसद को निजी बिल पेश करने का अधिकार है. यह कोई सरकारी बिल तो है नहीं.''

दो दिन की खामोशी के बाद आखिरकार नटराजन ने 2 मई की शाम मीडिया के सामने अपना मुंह खोला. उन्होंने कहा कि इस बिल से राहुल गांधी का कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा, ''बिल पेश ही नहीं हुआ तो इसके बारे में बातचीत का अब कोई औचित्य नहीं रह जाता. ये मेरे निजी विचार हैं.'' इंडिया टुडे की ओर से बार-बार कोशिश किए जाने के बावजूद 38 वर्षीया नटराजन इस मामले में कुछ और कहने के लिए उपलब्ध नहीं थीं. राहुल के कार्यालय में सेक्रेटरी के तौर पर नियुक्त नटराजन का पार्टी में उत्थान असाधारण है. हालांकि वे मूलतः तमिल हैं, मगर मौजूदा संसद में वे मध्य प्रदेश के मंदसौर से चुन कर आई हैं. कांग्रेस के एक युवा नेता बताते हैं, ''राहुल युवा कांग्रेस के शिविरों में जो कुछ बोलते हैं, नटराजन उसी को दोहराती हैं.

संरक्षण या खानदान नहीं बल्कि कठिन परिश्रम आपको जीत दिलाता है, राहुल जब भी इस बात को कहते हैं, वे उदाहरण के तौर पर नटराजन का नाम लेते हैं. ''चश्मा चढ़ा गंभीर चेहरा लेकर और 'ऑटो वालों' की शिकायत में बड़बड़ाते हुए पार्टी बैठकों में पहुंचने की नटराजन की अदा ने भी उन्हें उनके मेंटर राहुल की नजरों में ग्रासरूट कार्यकर्ता के रूप में चढ़ाया है. लेकिन नटराजन के संसदीय क्षेत्र मंदसौर के कांग्रेसी सहयोगी उनके बारे में इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते. पार्टी का स्थानीय नेतृत्व क्षेत्र को पर्याप्त समय नहीं देने के कारण उनसे नाराज है. 2011 में राहुल जब भोपाल पहुंचे तो मंदसौर के एक कांग्रेस नेता ने उन्हें नटराजन पर तैयार किया गया एक चिट्ठा थमाते हुए कहा, ''कार से अगली रैली तक पहुंचने में आपको 15 मिनट लगेंगे. इस दौरान कृपया इसे पढ़ें और हमारी संसद सदस्य के बारे में और कुछ जानें.''

बुराड़ी में 2010 में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में जब नटराजन बोलने के लिए मंच पर आईं तो राहुल और सोनिया गांधी ने बड़े ध्यान से उन्हें सुना. गांधी नेतृत्व के बारे में चापलूसी भरे स्तुतिगान के अलावा उनके पास कहने को खास कुछ था भी नहीं. कुछ हटकर सोच पाने में उनकी स्पष्ट अक्षमता के बावजूद, इस बात में शायद ही कोई संदेह है कि वे गांधी परिवार की पसंदीदा हैं. स्वयंसेवी संगठन कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के वेंकटेश नाइक कहते हैं, ''सरकार कई तरह से मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश करती रही है. यूपीए-2 सरकार ने खास तौर पर टीवी मीडिया को काबू करने के लिए गाइडलाइन तैयार करने की योजना बनाई थी लेकिन तीखे प्रतिरोध को देखते हुए उसने कदम पीछे खींच लिए. यह लोगों का मन भांपने का एक प्रयास है.''

मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिशें पहले भी हुई हैं. 1988 में राजीव गांधी सरकार लोकसभा में कुख्यात डिफव्मेशन बिल लेकर आई थी. लेकिन सरकार के इस प्रस्तावित बिल के खिलाफ देशभर में इतना जबरदस्त आंदोलन खड़ा हुआ कि 46 महीने के अपने समूचे कार्यकाल में राजीव गांधी को उन्हें मिले सबसे बड़े झ्टकों में से एक से रू-ब-रू होना पड़ा. मजबूरन उन्हें राज्‍यसभा में न सिर्फ इस बिल को दफनाने की घोषणा करनी पड़ी बल्कि अपने बचाव में यहां तक कहना पड़ा कि वे मीडिया की स्वतंत्रता के लिए कृतसंकल्प हैं. इसे विडंबना माना जाए कि मौजूदा गृह मंत्री पी. चिदंबरम और मीडिया पर मंत्रिमंडलीय समूह के नेता ने ही 1988 में डिफेमेशन बिल पर बहस की शुरुआत की थी. चिदंबरम ने तब कहा था, ''जो तलवार उठाते हैं उन्हें तलवार के वार से मरने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.'' यहां नटराजन और उनके मेंटर राहुल गांधी के लिए एक संदेश है. कानून बनाना बड़े पचड़े का काम साबित हो सकता है. (साभार: इंडिया टुडे)

पुलिस ने फर्जी पत्रकार को पकड़ा, कैमरामैन भाग निकला

लखनऊ। काकोरी थाने की पुलिस ने पुलिसकर्मियों पर रौब जमाने वाले एक फर्जी पत्रकार को गिरफ्तार किया, जबकि कैमरामैन मौके का फायदा उठाकर भाग खड़ा हुआ. पुलिस ने पकड़े गए युवक के पास से चैनल की आईडी बरामद की है. चैनल के ब्यूरो चीफ की शिकायत पर पुलिस ने  दोनों फर्जी पत्रकारों के खिलाफ जालसाजी का मामला दर्ज कर लिया है. पुलिस दूसरे युवक की भी तलाश कर रही है.

पुलिस ने बताया कि जमीन संबंधित विवाद में दोनों पक्षों को चौकी पर बुलाया गया था. इसी बीची चौक के अकबरी गेट स्थित हमाम वाली गली निवासी मोइन खान व सआदतगंज की तंबाकू मंडी निवासी शकील भी चौकी पर पहुंच गए. मोइन ने खुद को एक न्यूज चैनल का पत्रकार और शकील ने कैमरामैन बताते हुए पुलिसकर्मियों को रौब दिखाना शुरू किया और एक पक्ष की तरफदारी करने लगे. जब इनलोगों ने पुलिस पर दबाव बनाने की कोशिश की तो एक दारोगा ने चैनल के ब्यूरो चीफ अचल सक्सेना को फोन करके दोनों कथित पत्रकारों के बारे में जानकारी मांगी. अचल ने ऐसे किसी भी पत्रकार के चैनल से जुड़े होने की बात से इनकार कर दिया. भांडा फूटते देख शकील कैमरा लेकर भाग निकला, जबकि मोइन को पुलिस ने आईडी समेत कस्टडी में ले लिया. थोड़ी देर बाद थाने पहुंचे अचल सक्सेना ने दोनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने मोइन को गिरफ्तार करके शकील की तलाश शुरू की है.

चीन ने अल जरीरा के पत्रकार को देश से बाहर निकाला, चैनल का ब्‍यूरो बंद

अल जजीरा ने कहा है कि चीन की सरकार ने उसकी अंग्रेजी भाषा की पत्रकार को बीजिंग छोड़ने पर विवश किया है और इस कारण से उसे वहाँ अपना अंग्रेजी भाषा का ब्यूरो बंद करना पड़ रहा है. चीन की सरकार ने रिपोर्टर मीलिसा चान के वीजा की अवधि नहीं बढ़ाई है और इस कारण से उन्हें देश छोड़ना होगा. चीनी विदेश मंत्रालय ने चान की जगह किसी अन्य पत्रकार को वीजा देने से भी इनकार किया है.  वर्ष 2007 से चीन में अल जजीरा की पत्रकार हैं. चीनी विदेश मंत्रालय ने इस कदम का कोई कारण नहीं बताया है.

बीजिंग में बीबीसी के मार्टिन पेशेंस का कहना है कि 15 साल में पहली बार किसी विदेशी पत्रकार को देश छोड़ने पर विवश किया गया है. अल जजीरा के बयान में कहा गया है कि उसे इस कदम से निराशा हुई है लेकिन इससे उसके चीन से अरबी भाषा के चैनल के कामकाज पर असर नहीं पड़ेगा. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली ने बार-बार पूछे जाने पर कहा, "हम जोर देकर बताना चाहते हैं कि हर किसी को चीनी कानून और नियम का पालन करना होगा और व्यावसायिक नैतिकता के आधार पर काम करना होगा." एक बयान में बीजिंग स्थित फॉरन कोरेसपॉंडेंट्स क्लब ऑफ चाइना ने कहा – "चीनी अधिकारियों ने चैनल पर पिछले साल नवंबर में प्रसारित एक डॉक्यूमेंटरी पर गुस्सा जताया था. हालाँकि मिलिसा चान ने उसमें भाग भी नहीं लिया था.

चीन के एफसीसी के बयान में कहा गया है कि चीनी सरकार ने अल जजीरा अंग्रेजी पर प्रसारित खबरों और संपादकीय पर नाराजगी जताई थी और चान पर आरोप लगाया था कि वे नियमों का उल्लंघन कर रही है, चाहे इनका को विवरण नहीं दिया गया था." पिछले तीन महीनों से चान को एक-एक महीने का वीजा जारी किया जा रहा था, चीन के एफसीसी के बयान में कहा गया है – "ये वीजा को सेंसर के रूप में पत्रकार के खिलाफ इस्तेमाल करने का सबसे कड़ा उदाहरण है. ये चीन में विदेशी पत्रकारों को भयभीत करने की कार्रवाई है." गौरतलब है कि ये मामला तब उठा है जब चीन दस साल में एक बार होने वाले नेतृत्व परिवर्तन के लिए तैयारी कर रहा है और ये चीन की राजनीति में नाजुक दौर है. साभार : बीबीसी

इंटरनेट की आजादी बचाए रखने के लिए लड़ रहे असीम और आलोक को मदद दें

Aseem Trivedi के आंदोलन Save Your Voice के तहत असीम और आलोक पिछले 7 दिन से अनशन पर हैं… और इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आज़ादी को रोकने की सरकारी साज़िश और आईटी एक्ट 2011 के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं… असीम और आलोक संसद में आने वाले संशोधन के खिलाफ प्रस्ताव के समर्थन और इस कानून के ज़रिए अभिव्यक्ति के आखिरी बचे ताकतवर माध्यम को भी सेंसर कर देने की कोशिशों के खिलाफ 7 दिन से भूखे हैं…

अब 10 मई यानी कि परसों असीम और आलोक जंतर मंतर पर एक अनोखा शो करना चाहते हैं… लेकिन लगातार अपनी जेब से खर्च करने के बाद अब दोनों फंड की कमी से जूझ रहे हैं… क्या हममें से कुछ दोस्त हैं जो इन दोनों युवाओं की आर्थिक सहायता के लिए अंशदान कर सकते हैं… साथियों, कुछ भी अंशदान हो, उसका स्वागत है… सामाजिक लड़ाई, सामुदायिक अंशदान से ही हो, ये पुराना और विश्वसनीय सिद्धांत है… समाज की लड़ाई को समाज समर्थन दे… असीम और आलोक की मदद के लिए सम्पर्क करें– 09336505530 और 09310797184.

Mayank Saxena के फेसबुक वॉल से साभार.

जनसत्ता चंडीगढ़ की रजत जयंती पर पुनर्मिलन समारोह (देखें तस्वीरें)

छह मई, 1987 को चंडीगढ़ से जनसत्ता अखबार निकला और छह मई, 2012 को पूरे पच्चीस साल हो गए। जाहिर है यह दिन अखबार के लिए विशेष था। शुरू के बहुत वर्षों तक इस दिन विशेष आयोजन भी होता रहा लेकिन सिलसिला टूटा तो टूट ही गया। हर साल यह दिन आता है लेकिन आयोजन नहीं होता। वक्त-वक्त की बात है। अखबार से जुड़े रहे कुछ लोग, जिनके मन में आज भी जनसत्ता के प्रति वही  आदर-सम्मान है और उनका दिल इसके लिए अब भी वैसे ही धड़कता है जैसा यहां काम करने के दौरान धड़कता था।

ऐसे कुछ लोगों के प्रयास से इस बार आयोजन हुआ तो सभी इसके कायल हुए बिना नहीं रह सके। इन लोगों में कुछ अच्छे राजनीतिक मुकाम पर हैं या मीडिया में सम्मानित पदों पर हैं। छह मई, रविवार को स्थानीय प्रेस क्लब चंडीगढ़ में रजत जयंती समारोह का आयोजन किया गया। इसका मकसद अखबार में रहे उन लोगों को एक जगह एकत्रित करना था जो कभी न कभी चंडीगढ़ संस्करण में काम कर चुके थे और अब किसी दूसरे शहर, विदेश या मीडिया से इतर अन्य क्षेत्र में है।

यह बेहद मुश्किल काम था लेकिन जज्बा था कुछ नायाब करने का, सब लोगों को एक दिन एक साथ एक मंच पर लाने का तो सब मुश्किलें दूर हुई। ऐसा शानदार आयोजन हुआ कि किसी ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। बाहर से आने वालों के लिए कमरे तक आरक्षित रखे गए थे। आमंत्रित लोगों को सपरिवार बुलाया गया था। प्रेस क्लब में रजत जयंती समारोह ने माहौल जैसे जनसत्तामय बना दिया। साठ से ज्यादा लोग आए, एक दूसरे से मिले, पुराने दिनों की याद ताजा की।
ठीक उसी तरह जैसे स्कूल-कालेज या विश्वविद्यालय में बरसों बाद कोई पुनर्मिलन समारोह हुआ करता है लेकिन मीडिया क्षेत्र में ऐसा अक्सर नहीं सुना जाता। फिर पच्चीस साल, बहुत लंबा सफर है। याद नहीं आता कि किसी समाचार पत्र में ऐसा आयोजन हुआ होगा। एक मायने में जनसत्ता ने फिर अलग मिसाल कायम की जैसा कि इसने अपने नाम, स्थापना और उद्देश्य से की।

आयोजन में साठ से ज्यादा लोग ही पहुंच सके जबकि सौ से ज्यादा लोगों को आमंत्रित किया गया था। इनमें कुछ ने आने की सहमति भी दी थी लेकिन ऐन मौके पर किसी अपरिहार्य कारण से नहीं आ सके तो न पहुंच पाने के लिए खेद जताया। यहां किसी को सम्मानित नहीं किया जाना था, यहां विशेष पार्टी भी नहीं थी बावजूद इसके जितने भी लोगों से संपर्क किया वे आने को सहर्ष तैयार हुए।

पच्चीस साल पूरे होने पर आयोजन का विचार चंडीगढ़ जनसत्ता में ही वरिष्ठ संवाददाता रहे और अब हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के मीडिया एडवाइजर रामसिंह बराड़़ का था। इसे मूर्त रूप देने में वरिष्ठ संवाददाता रहे और अब आज समाज अखबार के एडीटर (न्यूज) बलवंत तक्षक, मुख्य उपसंपादक रहे और वर्तमान में प्रथम इंपेक्ट पत्रिका में प्रबंध संपादक रोशनलाल शर्मा, जनसत्ता चंडीगढ़ के स्थानीय संपादक  मुकेश भारद्वाज, डिप्टी न्यूज एडीटर वंदना शर्मा और मुख्य उपसंपादक राकेश राकी और अन्य लोगों का था। 

कार्यक्रम में जनसत्ता के कार्यकारी संपादक श्री ओम थानवी और इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय सपादक श्री विपिन पब्बी प्रमुख थे। इसके अलावा ईशमधु तलवार, राजीव मित्तल, अजय सेतिया, प्रदीप पंडित, सुरेंद्र अवस्थी, विनय भागर्व, जगविंदर पटियाल और मुकेश अग्निहोत्री समेत साठ से ज्यादा लोग थे जिनमें से कुछेक को छोड़ बाकी किसी न किसी रूप में मीडिया से ही जु़ड़े हैं।

कार्यक्रम के शुरू में जनसत्ता के दिवंगत साथियों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया। इनमें जनसत्ता के संस्थापक और प्रधान संपादक श्री प्रभाष जोशी, चंडीगढ़ में मुख्य संवाददाता रहे श्री विद्यासा्गर, वरिष्ठ संवाददाता श्री राकेश कोहरवाल, वरिष्ठ उपसंपादक रहे श्री केशवानंद ममगाई, मुख्य उपसंपादक रहे श्री हरीश पंत, वरिष्ठ उपसंपादक रहे, वरिष्ठ संवाददाता रहे ओमप्रकाश तपस, संवाददाता अजित दलाल, लुधियाना के संवाददाता रहे राकेश सिंघी और अन्य लोग थे। ये लोग चंडीगढ़ संस्करण से जुड़े रहे है, इसके अलावा उन सभी लोगों को याद किया गया जो जनसत्ता टीम में रहे। 

आयोजन में सबसे पहले शिमला, फिर दिल्ली में संवाददाता रहे और अब हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के विधायक मुकेश अग्निहोत्री ने जनसत्ता को सलाम करते हुए हुए कहा कि आज वे जिस मुकाम पर है वहां तक ले जाने में जनसत्ता की प्रमुख भूमिका रही। इस अखबार ने उनको पहचान दी, अगर इस अखबार से जुड़े न होते तो शायद यह मुकाम नहीं मिलता। वजह अखबार की प्रमाणिकता और काम करने वालो की जबरदस्त साख। कहा कि दस साल से ज्यादा हो गया जनसत्ता से अलग हुए लेकिन आज भी उन्हें यह अखबार ही सबसे प्रिय और अपना लगता है। वे तन, मन और धन से आज भी इसी से जुड़े हुए है और हमेशा जुड़े रहेंगे। मुख्य उपसंपादक रहे और अब उत्तराखंड में चाइल्ड राइट प्रोटेक्शन कमीशन के चेयरमैन अजय सेतिया ने अपने पत्रकारिता करियर की पंजाब केसरी से टीवी चैनल तक के सफर के बारे में बताया लेकिन जनसत्ता पर अटक गए और खूब बताया कि किस तरह यह अखबार सबसे अलग था।

डिप्टी न्यूज एडीटर रहे विनय भार्गव ने अपने विचार साझे किए। कहा कि अगर उनके करियर की शुरुआत जनसत्ता से ही होती तो वे अपने को धन्य समझते क्योंकि यहां सीखने को बहुत कुछ है। बलवंत तक्षक ने कहा कि उन्होंने छोटे से अखबार से करियर की शुरुआत की, कुछ और अखबारों में काम किया लेकिन काम की स्वतंत्रता का जौ माहौल जनसत्ता में मिला कहीं नहीं मिला और शायद मिलेगा भी नहीं। सच को सच और झूठ को झूठ कहने की आजादी केवल इसी अखबार में है, वे अब इस अखबार के हिस्सा नहीं है लेकिन आज भी उनके मन में इसके प्रति वही सम्मान है जैसा काम करने के दौरान हुआ करता था।

जनसत्ता में संवाददाता रहे सुरेंद्र अवस्थी अब पंजाब में सूचना आयुक्त हैं, उन्होंने अमृतसर रहते दौरान जनसत्ता से जुड़े कई अनुभव बताए। उन्होंने यह कहकर सभी को हैरान कर दिया कि जनसत्ता की प्रमाणिकता को आतंकवादी भी स्वीकार करते थे। एक बार छोटी सी खबर पर एक हथियारबंद आतंकवादी ने उनसे कुछ पूछा तो लगा वाकई जनसत्ता का असर है। जनसत्ता में काम कर चुके और अब दैनिक हिदुस्तान में कार्यरत वर्ष्ठि पत्रकार हरजिंदर ने भी अपने खट्ठे मीठे अनुभव लोगों को बताए।

चंडीगढ़ संस्करण में शुरू से संवाददाता और फोटोग्राफर के तौर पर जुड़े और अब तक कायम बीरबल शर्मा भावुक हो गए और बताया कि किस तरह से जनसत्ता उनके खून में समा गया है। वे इस अखबार के अलावा कहीं और काम नहीं कर सकते। जनसत्ता स्थगित होने के बाद उन्होंने और जगह काम किया लेकिन वैसा माहौल नहीं मिला। जो पहचान जनसत्ता से मिली उसकी बदौलत आज देश प्रदेश में उनका नाम है। एक दौर में जनसत्ता हिमाचल का सिरमौर अखबार हुआ करता था, प्रसार संख्या में चाहे कुछ अखबार आगे हो लेकिन इस समाचार पत्र को जो रुतबा और साख हासिल हुई वह किसी को नहीं थी। जनसत्ता में हिमसत्ता के नाम का परिशिष्ट ने एक नई ऊंचाई छुई उसके बाद से हिम रखकर आगे अपने समाचार पत्र के नाम जोड़ने का सिलसिला चल निकला। उन्होंने कहा कि इस अखबार में बिना पैसे भी काम करने को तैयार हैं क्योंकि इससे अलग होने की वे सोच नहीं सकते।

कई चैनलों और समाचार पत्रों में काम कर चुके मुख्य उपसंपादक रहे राजीव मित्तल ने भी कहा कि जो माहौल जनसत्ता में था वैसा कहीं नही मिला। स्टार न्यूज के हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़ प्रमुख जगविंदर पटियाल ने भी यहां संवाददाता के तौर पर काम किया। बाद में वे दूसरे अखबार में चले गए। कहा कि जनसत्ता में काम करने का जो अनुभव उन्हें हुआ वह अब तक काम आ रहा है। अन्य वक्ताओं मनमोहन सिंह, धर्मेंद्र जोशी, गुरमीत सिंह, दीपक धीमान ने भी अपने अनुभव साझे किए। जनसत्ता छोड़कर गए लोगों को बाहर मीडिया में अच्छी जगह मिली इसकी एक वजह यह भी रही कि वे जनसत्ता से आए थे इसलिए उन्हें ज्यादा महत्व मिला।

इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक श्री विपिन पब्बी ने भी कहा कि वे शुरू से समूह में रहे हैं। जनसत्ता किस तरह से शुरु हुआ कैसे इसकी योजना बनी सब उनके जेहन में है। जनसत्ता की अलग छवि और रुतबा बना तो इसके लिए कड़ी मेहनत थी जिसकी बदौलत यह हिंदी पत्रकारिता में मिसाल बना सका। जनसत्ता के कार्यकारी संपादक श्री ओम थानवी ने श्री प्रभाष जोशी को नमन करते हुए कहा कि हिंदी पत्रकारिता के उस पुरोधा के काम को हम आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। यहां लिखने और काम करने की जो आजादी है वैसी शायद अन्य कहीं नहीं।

उन्होंने कहा वह ऐसे दौर में यहां आए जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था। पंजाब में मीडिया लगभग उनके दबाव में था. बावजूद इसके जनसत्ता कभी नहीं आया। इसकी मिसाल देते हुए बताया कि तब आतंकवादियों ने क्षेत्र के सभी अखबारों को अपनी बनाई एक आचार संहिता भेजी जिसके मुताबिक समाचार पत्रों में क्या छपे और क्या न छपे तय था। इसके लिए एक सप्ताह का अल्टीमेटम भी दिया गया था। सभी अखबारों ने उस आचार संहिता को प्रमुखता से छापा लेकिन जनसत्ता ने ऐसा नहीं किया और एक बडी चुनौती स्वीकार की। संपादक होने के नाते उन्होंने अपने और स्टाफ के लोगों की एक मायने में ंिजदगी दांव पर लगा दी थी। सब कुछ ठीक निपट गया, बाद में उन्हें लगा कि उन्होंने जो कुछ किया वह ठीक ही था। यह बात प्रेस कौंसिल आफ इंडिया के दस्तावेज में आज भी दर्ज है कि जनसत्ता केवल मात्र अखबार था जिसने आतंकवादियों की उस आचार संहित को नहीं छापा था। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता में जनसत्ता का अलग नाम है, इसका नाम ही पर्याप्त है। जिस तरह एम्स से निकले डाक्टर की पहचान है वैसी ही हिंदी पत्रकारिता में जनसत्ता की है।

कार्यक्रम में शामिल न हो पाने वालों में जनसत्ता चंडीगढ़ के पूर्व संपादक श्री जितेंद्र बजाज, सुधांशू भूषण मिश्र (अमेरिका), अमित प्रकाश सिंह, अशोक पांडेय, अमरनाथ, अवधेश कुमार श्रीवास्तव (अकु श्रीवास्तव), अजय श्रीवास्तव, अरुण बोथरा, नीलम शर्मा, प्रसून लतांत, विमल जैन, हरिंदर राणावत, हयात सिंह नेगी, अशोक महाजन, महादेव चौहान, रमेश व्यास, जगमोहन फुटेला, अनिल शर्मा, अमर चंद छाबड़ा, सर्वदमन सांगवान, प्रमोद कौंसवाल, भूपेंद्र नागपाल, धर्मेंद्र सक्सेना, सायदा नियाजी, विजय गुप्ता आदि दर्जनों ऐसे रहे जिनका नाता जनसत्ता से रहा या अब भी है। इनके अलावा भी ऐसे काफी लोग है जिनसे संपर्क नहीं हो सका, उनकी कमी सभी को खली। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने चंडीगढ़ जनसत्ता छोड़ने के बाद कभी संपर्क भी नहीं किया।

सबके चेहरे साफ-साफ देखने के लिए तस्वीर के उपर ही क्लिक कर दें.


कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों में नरेंद्र विद्यालंकार, प्रमोद द्विवेदी, नंद कौशिक ऋतुराज, रामकृष्ण उपाध्याय, शशि भूषण शर्मा, यशवीर कादियान, कपिल चड्ढा, नाथू सिंह महरा, नत्थू राम शर्मा, ध्यान सिंह, भूपेंद्र प्रतिबद्ध, सुमन भटनागर, सुरेंद्र सांगवान, संजीव शर्मा, अजय शर्मा, हरिशंकर वर्मा, रतिराम जोगी, शिवलाल, बलवीर कुमार, दिनेश गोयल, हृदयपाल सिंह, शिशु पटियाल, कुलदीप चंदेल, रामकिशोर द्विवेदी, अश्विनी वर्मा, आशा अर्पित सैनी, अमरजीत सिंह और गुरकृपालसिंह अश्क, आदि थे।

हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ में जनसत्ता का पूरा नेटवर्क था और सैकड़ों लोग थे। जाहिर है काफी लोग समारोह मे बुलाए नहीं जा सके। आयोजकों ने अपनी तरफ से हर उस शख्स को बुलाने का प्रयास किया जो जनसत्ता से जुड़ा रहा और किसी न किसी रूप में इसका हिस्सा रहा। लगभग साढ़े ग्यारह बजे शुरू हुआ कार्यक्रम तीन बजे तक चला तो समय का पता ही नहीं चला। अगली बार कब और कहां एक साथ इतने लोग होंगे कौन जाने ? क्या पता फिर कोई ऐसा ही कार्यक्रम बन जाए। आमीन।

लेखक महेंद्र सिंह राठौड़ जनसत्ता में उपसंपादक हैं.

यशवंत भाई, क्रांतिकारी विचारधारा और स्पष्ट नज़रिया आपसे ही मिला… दिल से धन्यवाद

दोस्तों, भड़ास4मीडिया से पिछले 3 वर्षों से नियमित तौर पर जुड़ा हूँ लेकिन रूटीन ख़बरों के अलावा भड़ास के लिए कभी कुछ नहीं लिखा. आज जबकि यशवंत भाई की लगनशीलता… जज़्बे… साहस और मेहनत के चलते भड़ास4मीडिया ने सफलतम 4 वर्ष पूरे कर लिए हैं… ख़ुशी के ऐसे मौके पर मैं यशवंत भाई के बारे में खुद को लिखने से रोक नहीं पाया. आज के समय में स्पष्टवादी नजरिया रखने वाले लोग बिरले ही मिलेंगे…. और अगर मिलेंगे भी तो अक्सर दोहरा चेहरा लेकर या दोहरी बातें करते हुए मिलेंगे.

हो सकता है आज की इन परिवर्तनशील परिस्थितियों में किसी एक फैसले पर अडिग रह पाना और ऐसा कर पाना सबके बस में है भी नहीं. लेकिन जहाँ तक और जितना मैं स्वयं भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह को जानता हूँ या जान पाया हूँ, मुझे वो हमेशा स्पष्ट और साफगोई में यकीन रखने वाले ही लगे हैं. फिर चाहे स्वयं का व्यक्तित्व हो… आरोप-प्रत्यारोप हो… कोई परेशानी हो या फिर किसी ख़ुशी का इज़हार हो… उन्होंने हर बात, हर विचार बड़ी बेबाकी के साथ पाठकों, मित्रों, शुभचिंतकों और प्रतिद्वंदियों के साथ साझा किये हैं. इतना स्पष्टवादी नजरिया मैंने कहीं और नहीं देखा.

आज के दौर में जब भारतीय मीडिया की स्थिति, हालात और कार्यप्रणाली से एक आम मीडियाकर्मी के साथ ही नॉन मीडियाकर्मी (पढ़ा-लिखा वर्ग) भी वाकिफ है. इसका बहुत बड़ा श्रेय यशवंत सिंह और भड़ास4मीडिया को भी जाता है. मीडिया के क्षेत्र में आने वाली नई पौध को मीडिया की कड़वी सच्चाई से वाकिफ कराने से लेकर आईना दिखाने तक का काम भड़ास4मीडिया ने ही किया है. भड़ास4मीडिया को आज भारतीय न्यू मीडिया का बादशाह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए.

यशवंत सिंह के स्पष्टवादी नजरिये के साथ ही उनके क्रांतिकारी विचार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. उनका दर्शन और सोचने, समझने, कहने व करने का नजरिया बेहद ही क्रांतिकारी है. मुझे उम्मीद है की अगर ये नजरिया इसी तरह बरकरार रहा और यशवंतजी को बेहतर सहयोग मिलता रहा तो बड़ी बात नहीं की आने वाले समय में न्यू मीडिया के माध्यम से ही लोकतंत्र मैं अनेक सकारात्मक क्रांतिकारी बदलाव लिखने को मिले.

यशवंत भाई, आपसे मुलाकात भी हुई और हमने बहुत बातें भी की पर उस समय भी बहुत कुछ कहना बाकी ही रह गया था. आज सार्वजानिक रूप से कह रहा हूँ की मीडिया मैं 10 वर्षों तक काम करने, सीखने, समझने के दौरान मेरे मन में हमेशा से कुछ नया और अलग करने का विचार था. सुकून इस बात का है की जिस संस्थान में भी रहा कहीं से निकाला नहीं गया… हर संस्थान से मैंने खुद ही रिज़ाइन किया. पर उस नए और अलग करने के विचार के साथ ही अपना स्वयं का काम शुरू करने का साहस और जज़्बा यशवंत भाई मुझे आपसे ही मिला है. मैंने क्रांतिकारी विचारधारा और स्पष्टता आपसे ही सीखी है… इसके लिए दिल से धन्यवाद.

हालांकि अभी तक किसी ने सामने से आलोचना नहीं की है लेकिन भविष्य में कभी आलोचना सहूंगा तो उससे लड़ने-जूझने का साहस अब आ गया है. आज आपसे ये लिखते, कहते हुए मैं जितना खुश हूँ उतना ही दुखी भी. खुश इसलिए हूँ की आपकी विचारधारा ने न सिर्फ मेरे जैसे एक आम पत्रकार की विचारधारा बदली है. बल्कि उससे मेरे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन भी आया है वहीं दुखी इसलिए हूँ की आपकी विपरीत परिस्थितियों मैं कभी चाहकर भी आपकी मदद नहीं कर पाया क्योंकि शायद मेरी परिस्थितियां भी कभी आपसे जुदा नहीं रही. भविष्य मैं मौका मिला तो ज़रूर कुछ करूँगा.

अंत में, भड़ास4मीडिया के सफलतम 4 वर्ष पूर्ण होने पर यशवंतजी और भड़ास के लिए ढेर सारी मंगलकामनाएं… भड़ास इसी तरह शोषित मीडियाकर्मी की आवाज़ बुलंद करता रहे.

जय हिंद

सत्यनारायण वर्मा

एडिटर

स्वर्णिम न्यूज़ नेटवर्क, भोपाल

09039462699

संबंधित अन्य खबरें / रिपोर्ट-  b4m 4 year

स्वतंत्र मिश्रा, अनिल राय, राजेश कौशिक, रजनीकांत सिंह के दायित्व में फेरबदल

सहारा मीडिया से सूचना है कि कई लोगों के कामकाज में बदलाव किया गया है. स्वतंत्र मिश्रा को राष्ट्रीय सहारा अखबार के सेल्स और मार्केटिंग का हेड बना दिया गया है. वे मीडिया हेड हुआ करते थे लेकिन उपेंद्र राय को मीडिया हेड समेत कई बड़ी जिम्मेदारियां दे दिए जाने के बाद स्वतंत्र मिश्रा लगभग शंटिंग में चले गए थे. अब उनके कर्तव्य को पुनर्परिभाषित कर दिया गया है. वे सहारा मीडिया के प्रिंट डिवीजन (जिसमें अखबार, मैग्जीन आदि सभी हैं) के सेल्स-मार्केटिंग के हेड के तौर पर काम देखेंगे.

अनिल राय को सहारा समय, यूपी-उत्तराखंड न्यूज चैनल का प्रभारी बनाया गया है. राजेश कौशिक को एनसीआर न्यूज चैनल की जिम्मेदारी दी गई है. मुंबई चैनल को अब नोएडा से संचालित करने का फैसला किया गया है. अभी तक सहारा समय, मुंबई के सुब्रत राय के बेटे व वधू चलाते थे और इसका सारा कामधाम मुंबई में ही होता था. पर अब इसका संचालन नोएडा की ही टीम से कराने का फैसला लिया गया है. इस कारण मुंबई चैनल का सारा कामकाज नोएडा शिफ्ट किया जा रहा है. चैनल की शिफ्टिंग के काम का प्रभारी रजनीकांत सिंह को बनाया गया है. कुछ अन्य बदलावों की भी चर्चा है लेकिन उसकी जानकारी नहीं मिल सकी है.

उत्साही एवं जुझारू पत्रकार दुर्गा प्रसाद पांडे का आकस्मिक निधन

सिनेमा एवं कला-संस्कति की रिपोर्टिंग करने वाले अत्यंत जुझारू पत्रकार दुर्गा प्रसाद पांडे का अचानक निधन हो गया। वह पिछले काफी दिनों से दिख नहीं रहे थे। मैंने सोचा कि कहीं बाहर गये हैं, लेकिन पत्रकार सुशमा कुमारी ने आज रात ही उनके निधन की खबर दी जिसे सुनकर मैं सन्न रह गया। पहले उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया था, लेकिन बाद में उन्हें सफदरजंग अस्पताल स्थानांतरित कर दिया गया।

स्व. दुर्गा
स्व. दुर्गा
वह पिछले करीब एक माह से अस्वस्थ चल रहे थे। वह सफदरजंग में हो रहे इलाज से संतुष्ट नहीं थे और दो-तीन पूर्व ही अपने निकट के पत्रकार मित्रों से एम्स में भर्ती कराने के लिये कोशिश करने का अनुरोध किया था, लेकिन वह एम्स में भर्ती हो पाते, इससे पहले ही अचानक वह कोमा में चले गये और कल हमसे हमेशा के लिये बिछड़ गये। वह महामेधा दैनिक अखबार में वर्ष 2004 से फीचर विभाग में सम्पादकीय कार्यभार संभालते थे। श्री पांडेय अपने पीछे दो बेटियां और एक बेटा को छोड़ गए हैं। वह महामेधा अखबार के आरंभ से ही फीचर विभाग देख रहे थे। वह अत्यंत उत्साही और कर्मठ थे। फिल्म से संबंधित लगभग हर कार्यक्रम में अपनी खास मुस्कुराहट के साथ मौजूद होते थे और अपने सवालों से सबकी नजरों में रहते थे। उनके प्रिय विषय फिल्म, धर्म, पर्यटन एवं खेत-खलिहान थे।

यूएनआई के वरिष्ठ पत्रकार विनोद विप्लव की रिपोर्ट.

इमानदार पत्रकारों की अनकही पीड़ा के लिए सशक्त मंच बना भड़ास

किसी कवि की ये पंक्तियां  भारतीय पत्रकारिता में भड़ास की भूमिका और उसकी सार्थकता पर सटीक बैठती है कि 'बड़ा महीन है ये अखबार का मुलाजिम भी, खुद में खबर है,मगर दूसरों की छापता है।' भड़ास के चार साल पूरे होन पर यशवंत जी सहित सभी भड़ासियों को बधाई। ‘भड़ास' यानि क्षोभ, आक्रोश और पत्रकारिता के चाल, चरित्र और चेहरे से पर्दा उठाने का नाम. मीडिया जगत के अन्दर क्या घट रहा है? इसकी जानकारी का कोई मजबूत जरिया पत्रकार बिरादरी के पास नहीं था। यह काम यशवंत जी ने भड़ास के माध्यम से किया जो अपने में एक क्रांतिकारी काम है।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला भारतीय मीडिया खुद अपने प्रबंधन के अलोकतांत्रिक विरोधाभास में फसा कशमशा रहा था। मीडिया संस्थानों में पत्रकारों के साथ होने वाली होनी और अनहोनी दीपक तले अंधेरे वाली बात की तरह थी। जिन लोगों को पत्रकारिता के सरोकार और उसके दायित्व निर्वहन की वेदना अंदर ही अंदर सालती रहती थी, उनके लिए भड़ास एक सहयोगी मित्र के रूप में आया। अखबारों और न्यूज चैनलों में संपादक के रूप में लाइजनर बने बैठे खबरों के ठेकेदार अपने निजी हितों के आलोक में खबर के औचित्य और सरोकार को कथा व्यासों की तरह व्याख्यित करने की हठधर्मिता का परिचय देते थे। एक सच्चे पत्रकार के लिए यह सब बड़ा ही पीड़ादायी होता। भड़ास उस सरोकार से जुड़ी पीड़ा की अभिव्यक्ति का एक सशक्त मंच बन कर उभरा। यही भड़ास की स्थापना का अपना मकसद रहा है और वो पूरी तरह सुफल है। पत्रकारिता के सरोकार का यह मिशन यू ही चलता रहे यही कामना करता हूं।

विवेक दत्त मथुरिया

पत्रकार और लेखक

tag- b4m 4 year

महुआ न्यूज लाइन में एसोसिएट प्रोड्यूसर बने अमिताभ भूषण

टेलीविजन पत्रकार अमिताभ भूषण ने महुआ न्यूज लाइन में अपनी नई पारी की शुरुआत की है. महुआ न्यूज लाइन में अमिताभ बतौर एसोसिएट प्रोड्यूसर शामिल हुए हैं. इससे पहले अमिताभ भूषण सौभाग्य मिथिला चैनल में एंकर, रिपोर्टर, प्रोड्यूसर तीनों काम एक साथ सँभालते थे. प्रभात खबर मुजफ्फरपुर से अपनी पत्रकारिता की यात्रा शुरू करने वाले अमिताभ मीडिया के सभी माध्यमों में काम कर चुके हैं. हाल के दिनों में न्यू मीडिया पर काम कर रहे थे. अमिताभ के बारे में खास बात है इनकी सोशल नेटवर्किंग. सामाजिक-राजनीतिक और मीडिया के लोगों में अच्छी पकड़ रखते हैं.

आवाजाही, पुरस्कार, किताब आदि से संबंधित खबरें bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें. मेल भेजने वाले का नाम-पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

यशवंत जी, मोक्ष वह नहीं जो आप समझ-लिख रहे, खुद को दुरुस्त करें

आपने भड़ास फार मीडिया के चार साल पूरे होने पर जो लेख लिखा है उसमें बार-बार मोक्ष शब्द का इस्तेमाल किया है। मोक्ष के बारे में भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने जो कहा है, उससे आप परिचित ही होंगे। इसके अलावा सारे उपनिषद भी विस्तार से इसे बताते हैं। मुझे लगता है कि मोक्ष यह नहीं है कि बहुत हो गया, मन भर गया, या मन अघा गया या मन ऊब गया या सब कुछ व्यर्थ है, इसलिए हम मोक्ष की ओर चले गए। मोक्ष का बड़ा व्यापक और गहरा अर्थ है। यह मैं आपका विरोध नहीं कर रहा हूं। बस मन में विचार आए, उसे व्यक्त कर रहा हूं। आपका चार साल का संस्मरण अच्छा तो लगा लेकिन मोक्ष शब्द का बार-बार इस्तेमाल खटका, इसलिए विनम्रतापूर्वक इसका उल्लेख कर रहा हूं। इसे आप कतई तीखी प्रतिक्रिया न मानें। यदि आप इस टिप्पणी को इग्नोर करना चाहें तो मुझे बुरा नहीं लगेगा।

भड़ास फार मीडिया के माध्यम से आपने एक नया प्रयोग किया और वह हिट हो गया, इसलिए मैं आपका आदर करता हूं। यह आपकी सनक हो या आपकी प्रतिभा, लेकिन मीडिया की वे खबरें जो छुपी रहती थीं क्योंकि उनके लिए कोई प्लेटफार्म नहीं था, आपने उन्हें हेडलाइन बना दिया। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं, आदर के पात्र हैं। आपने लिखा है कि संघर्ष के दिन थे और आज भी हैं। हां, यह सच है। कोई भी नया प्रयोग करने वाला, अकेले संघर्ष करने वाला, इन कठिनाइयों से गुजरता है। दुख उठाता है। उसका परिवार भी उस आंच से अछूता नहीं रहता। संघर्ष सिर्फ साढ़े तीन अक्षर का कोरा शब्द नहीं है। यह एक कठिन दौर का प्रतीक है। लेकिन हां, यह मनुष्य को खांटी सोना भी बना देता है। जब आपका संघर्ष जेनुइन होता है तो लोग भी जुड़ते जाते हैं। लाइक माइंडेड लोग आपकी मदद के लिए तैयार होने लगते हैं। एक नई मंडली तैयार हो जाती है। आप संघर्ष जारी रखिए। लाइक माइंडेड लोग आपके साथ हैं। बस लक्ष्य अच्छा हो। भाई मैंने कहीं प्रवचन टाइप बातें तो नहीं लिख गया। अगर ऐसा है तो क्षमा करेंगे।

विनय बिहारी सिंह

वरिष्ठ पत्रकार

कोलकाता

vinaybiharisingh@gmail.com

tag- b4m 4 year

भ्रष्टाचार के महीन रूप उर्फ मीडिया को लेकर भड़ास ने हम जैसों को जागरूक किया

यश जी प्रणाम, मैंने पढ़ा, भड़ास को चार वर्ष हो रहे है. बधाई. भड़ास4मीडिया, मीडिया का वाच डॉग तो है ही, मेरे जैसे सामान्य प्रज्ञा के व्यक्तियों को जागरूक करने में भड़ास के बहुत बड़ा योगदान है. लोकनीति ने State of the Nation Survey August 2011 कराया था. उसके आंकड़ों को देखिये महज़ दो फीसदी लोगों का मानना है के एन.जी.ओ और मीडिया भ्रष्ट हैं. (क्लिक करें- www.lokniti.org) ये आंकड़े यही बताते हैं के लोगों की नज़र और समझ अभी इतनी तेज़ नहीं हुई के भ्रष्टाचार के महीन रूपों को देख सके.

खैर छोड़िये, मैं तो बस ये कहना चाह रहा था के भड़ास ने मीडिया की आंतरिक कल्लोलों से आम व्यक्ति को परिचित कराया. ये भड़ास का (न्यू मीडिया) एक महती योगदान है. जिस देश को, समाज को क़ानून के राज़ से सरोकार नहीं होता वहां शक्ति बिखर जाती है. फिर उसे कोई भी अपनी क्षमता के अनुसार कब्जा सकता है. अंडरवर्ड हो मीडिया हो कोई भी हो. भड़ास और उसके जैसे प्रयास ज़रूरी इसलिए भी हैं के संतुलन बना रहे. बाकी तो जी दुष्यंत बाबा कह गए हैं के 'इस सड़क पे इस कदर कीचड़ बिछी है, हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है'.
 
भड़ास इसलिए भी प्रिय है के शायद में उन थोड़े लोगों में से हूँ (ऐसा में मानता हूँ) जो भड़ास4मीडिया के सम्पादक की भड़ास को कभी-कभी झेलता हूँ. आत्मिक भड़ास. लाल पानी गटकने के बाद जो बाहर आती है. पुनः बधाई. संभावनाएं अपार हैं. भड़ास जैसा मंच आपके तसव्वुर के आश्रम से अच्छा है. ये बढ़ता रहे सफलता के नए आयामों के छुए, ऐसी मेरी मंगल कामना है. पुनः बधाई. आयोजन होगा तो भेंट अवयश्य होगी. सुना है सूफी नाच गाना होगा. बढ़िया है अपन भी गुरजिएफ वाला डांस कर लेंगे.

पुनः बधाई.

आपका

कुशल, बरेली

kpvipralabdha@gmail.com

tag- b4m 4 year

शराबी और बदजुबान यशवंत की दो बुराइयां

यशवंत से मेरी पहली मुलाक़ात आज से लगभग तीन साल पहले हुई थी जब वे हमारी संस्था आई.आर.डी.एस. द्वारा दिए जाने वाले एस.पी.सिंह पुरस्कार के सिलसिले में लखनऊ आये थे. हमारी संस्था ने पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले एस.पी.सिंह पुरस्कार के लिए उन्हें सर्वाधिक उपयुक्त समझा था, लेकिन इस मुलाक़ात के बहुत पहले से मैं उन्हें और उनके भड़ास के बारे में जानती थी. भड़ास से मेरा साबका कब और कैसे हुआ यह तो मुझे ठीक से याद नहीं लेकिन इतना मैं जरूर जानती हूँ कि जिस दिन मैंने पहली बार भड़ास को पढ़ा था उसी दिन से मैं इसकी प्रशंसक हो गई थी. इसका कारण भी बहुत साफ़ था, भड़ास में वे तमाम बातें बहुत ही साफगोई से लिखी गई थी जो किसी भी पत्रकारिता में कहीं भी दूर-दूर तक देखने कों नहीं मिलती है. 

यशवंत से मेरी लखनऊ में मुलाक़ात के बाद हम लोग कई बार मिले और आज मैं यह कह सकती हूँ कि वे मेरे अपने घर के प्रिय सदस्य की तरह हैं. कई ऎसी बाते हैं जो उन्हें तमाम दूसरे लोगों से अलग करती हैं. सबसे पहले तो मैं उनकी बेबाकी और सत्यप्रियता की कायल हूँ. इसके अलावा उनकी निर्भीकता भी अपने ढंग की निराली है. जिन संपादकों और अखबार मालिकों से अबतक सारे पत्रकार थर-थर कांपा करते थे यशवंत ने उन्हें पहली बार कांपने पर मजबूर कर दिया, यह कोई मामूली बात नहीं थी. क्योंकि जिन अखबार मालिकों और संपादकों के बारे में यशवंत अपने सीमित साधनों से लिख रहे थे वह बहुत ही हिम्मत चाहती थी. इसके अलावा मैं उनकी लेखनी की धार की भी कायल हूँ. मैंने यह अनुभव किया है कि जब वे किसी विषय पर लिखते हैं तो बस लिखते ही चले जाते हैं. जिस कुशलता से वे तमाम बिन्दुओं कों एकीकृत करते हुए एक बिंब विधान प्रस्तुत करते हैं और उसमें अपना एक आक्रामक तेवर प्रदान करते हैं, वह अपने-आप में अत्यंत ही प्रशंसनीय है.

यह सब तो यशवंत की वे बाते हैं जो मुझे काफी पसंद है और जिनकी मैं हमेशा प्रशंसा करती हूँ. लेकिन उनकी कुछ ऐसी बाते भी हैं जो मुझे पसंद नहीं, उन्हें भी मैं यहाँ लिख रही हूँ इस उम्मीद के साथ कि वे इन्हें प्रकाशित करेंगे चाहे वे बातें उन्हें अच्छी लगे या बुरी. सबसे पहली बात जो मैं उन्हें कहना चाहूंगी वह उनकी शराब पीने की आदत से ताल्लुक रखती है. वे यह जानते हैं कि सब जानते हैं कि वे शराब पीते हैं, कई बार जम कर पीते हैं, समय-असमय पीते हैं. वे यह भी जानते हैं कि कई लोग उन्हें शराबी कहते हैं और शराब की दशा में की गई उनकी बदजुबानी से भी डरते हैं. लेकिन मैं यह जानती हूँ कि वे शराबी नहीं हैं और बदजुबान तो कत्तई नहीं.

मैं यह बात दावे से इसलिए कह रही हूँ कि मैंने यह देखा है कि वे जब चाहें शराब पर नियंत्रण कर सकते हैं. मैंने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पाया है जिनमे बहुत अधिक आत्मनियंत्रण है. लेकिन शायद अभी तक उन्हें यह बात ठीक से समझ में नहीं आई है कि शराब पीने के तमाम नुकसान हैं. और मैं यह जानती हूँ कि जिस दिन उन्हें स्वयं इस बात का अहसास हो जायेगा उस दिन के बाद किसी कों भी उन्हें यह बात कहने की जरुरत नहीं रहेगी. और जहाँ तक शराब पीने के बाद बदजुबानी करने की बात है तो मैंने उन्हें कभी भी मुझसे ऐसी बात करते हुए नहीं सुना जिसे किसी भी प्रकार से बदजुबानी कहा जाए. मेरी उनसे विभिन्न समयों पर बातचीत हुई लेकिन एक बार भी मैने ऐसा नहीं देखा कि उनकी भाषा में दूर-दूर तक कोई बदजुबानी हो. मैंने उन्हें हमेशा उतनी ही इज्जत के साथ भाभी कह कर बात करते हुए देखा. यह बात अपने-आप ही यह स्पष्ट कर देती है कि यशवंत यदि कोई बदजुबानी करते हैं तो वे ऐसा जानबूझ कर करते हैं और उन्ही जगहों पर करते हैं जहां वे ऐसा करना चाहते हैं.

इन दोनों बातों को देखते हुए मेरी उनसे गहरी नाराजगी इस बात से है कि जब वे बखूबी समझते हैं कि वे शराब पर नियंत्रण कर सकते हैं. इस बात को भी खूब जानते हैं कि वे बातचीत में स्वयं पर आसानी से नियंत्रण रख सकते हैं तब वे जानबूझ कर ऐसा कुछ क्यों करते हैं जिससे उन्हें और उनके इष्ट-मित्रों को किसी प्रकार से भी उनके लिए कोई भी ऐसे शब्द सुनने पड़े जो उनके व्यक्तित्व के लिए अच्छा नहीं लगता हो. इस बात की नाराजगी मुझे निश्चित रूप से है और मैं इस लेख के माध्यम से भी अपनी बात उन तक रखना चाहती हूँ कि अपने इष्ट-मित्रों के लिए ही सही यदि वे अपनी इन दो कथित कमजोरियों से ऊपर उठ पायेंगे तो वह वास्तव में बहुत अच्छा होगा और मुझे भी बहुत खुशी मिलेगी. वैसे मुझे यह विश्वास है कि समय के साथ उनमे स्वयं ही ये परिवर्तन हो जायेंगे.   

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर सोशल एक्टिविस्ट और जर्नलिस्ट हैं.

tag- b4m 4 year

लखनऊ के दो पत्रकार मित्रों ने मुझे बताया- ठीक आदमी नहीं है यशवंत

: मेरा प्रिय पर पियक्कड़ साथी : “ए भाई, ई कैसा आदमी है. आप भी कैसे-कैसे लोगों के चक्कर में रहते हैं” मुझसे एक सज्जन ने यह बात उस समय कही थी जब मैंने यशवंतानन्द सरस्वती को अपनी संस्था आईआरडीएस की ओर से सम्मानित किया था. यह बात लखनऊ के ही एक पत्रकार ने कही थी और उन्होंने यह बात कुछ इस ढंग से कही थी कि मेरे मुहं का जायका एकदम से बिगड गया था. इस तरह की बात सुन कर मूड ऑफ होना स्वाभाविक भी था क्योंकि अभी एक दिन पहले ही तो मैंने इस आदमी को पुरस्कृत किया था और अब अचानक से यह जान कर कि यह बहुत बेकार आदमी है, पतित है, दलाल है, झूठा है, मक्कार है, फरेबी है और ना जाने क्या-क्या है, मुझे अपने आप में बड़ी ग्लानि सी हुई थी.

मुझे लगा था कि मैं भी शायद इतना ही बेकार आदमी हूँ. बताइये संस्था की तरफ से पत्रकारिता के क्षेत्र में लब्धप्रतिष्ठ युवा हस्ताक्षर को पत्रकारिता के युगपुरुष स्वर्गीय एस पी सिंह के नाम पर स्थापित किये गए पुरस्कार के लिए जब एक आदमी चुनता हूँ तो वह निकलता है “अइसा आदमी” जिसके बारे में मेरा एक साथी कहता है कि मैं किन लोगों के चक्कर में रहता हूँ.

लेकिन उस आदमी ने यह बात कह तो दी थी पर मेरा मन उस बात को पूरी तरह मानने को तैयार नहीं था. हाथ कंगन को आरसी क्या वाले तर्ज पर मैं यह सोच रहा था कि अभी कल जिस आदमी से मैं मिला था वह और कुछ भी हो, बेकार तो नहीं दिखता है. मैंने उस आदमी के साथ कुछ घंटे बिठाये थे- हंसी मजाक हुआ था, भोजन-भजन हुआ था, विचार विमर्श हुए थे, वाद विवाद हुआ था. वह आदमी तो एक बहुत ही सुलझा हुआ, गंभीर, खुशमिजाज, जिंदादिल शख्स के रूप में उभर कर मुझे नज़र आया था, फिर अचानक से यह आदमी इतना बेकार कैसे कहा जा रहा था.

अभी एक साथी से बात हुई नहीं थी कि एक दूसरे पत्रकार मित्र का फोन आ गया था. उसने इस बात पर थोडा और नमक मिर्च लगा कर प्रस्तुत कर दिया. उसकी बातों का भी सार यही था कि यशवंत बाबू परले दर्जे के दलाल हैं, कपटी हैं, धूर्त हैं, ढोंगी हैं, फरेबी हैं, चालक और अविश्वसनीय हैं. जब दो-दो जगहों से एक ही फीडबैक आ गया तो स्वाभाविक रूप से मैं चौंका था. इसी मानसिक अवस्था में मैंने एक ऐसा काम किया था जिसे दुनियावी दृष्टि से किसी भी प्रकार से बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहा जाएगा पर जिसे कर के मैं आज तक अपने आप को पछताया हुआ नहीं मानता हूँ. मैंने यशवंत बाबू को एक ईमेल भेजा जिसमे मैंने संक्षेप में, कुछ मृदु शब्दों में वे बातें लिखीं जो मुझे उनके विराट व्यक्तित्व के विषय में बताई गयी थीं. मैंने उन दोनों सज्जनों का नाम उन्हें नहीं बताया पर उनके द्वारा की गयी टिप्पणियों को सौम्य ढंग से अवश्य प्रस्तुत कर दिया.

इधर मेरी मेल उनको मिली नहीं कि उधर से कुछ ही देर बाद उनका मेल आ गया. मैंने इससे पहले मेल भेज तो दिया था पर उसके बाद मुझे पछतावा हो रहा था कि मुझे ऐसा करने की क्या जरूरत थी. आखिर यशवंत बाबू पर मेरा क्या हक था? वे मेरे भाई थे, घर के थे, पुराने दोस्त, अधीनस्थ थे? कुछ भी तो नहीं. परिचय भी जुमा-जुमा दो-चार दिनों का था. ऐसे में मुझे उन्हें उनके अवगुण गिनाने की क्या जरूरत थी. पर साथ ही मन में यह बात भी बार-बार आती थी कि जिस व्यक्ति से मैं पिछले दो दिनों में कई बार मिला हूँ, यदि यह वही आदमी है जो वह दिखता है तो मैंने कोई गलती नहीं की है क्योंकि यदि वह सच्चा आदमी होगा तो घूम कर मुझे रेस्पोंस जरूर करेगा.

मैंने यशवंतानन्द सरस्वती का ईमेल कुछ धड़कते हुए ह्रदय से खोला. उसमे जो बात उन्होंने लिखी उन बातों को मैं कभी नहीं भूल पाता. उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं कि मैं वास्तव में कैसा हूँ. जरूरी यह है कि आप मुझे कैसा मानते हैं. साथ ही यह भी कहा कि हर व्यक्ति को चाहिए कि किसी अन्य के विषय में आकलन करने और उसके बारे में अपनी धारणा बनाने के लिए दूसरे के मत का सहारा लेने की जगह अपना स्वयं का मत बनाए, अपनी बुद्धि और अपने विवेक के अनुसार बनाए. उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से आपको मेरी “खूबियाँ” गिनाई और बतायी गयी हैं उसी प्रकार से लखनऊ में कुछ जगहों पर आपकी भी तमाम “खूबियाँ” सामने लायी गयी थीं. कुछ लोगों द्वारा आपके बारे में भी हर वैसी बात उन्हें कही गयी गयी थी जो उचित नहीं मानी जायेगी. लेकिन मैंने इन बातों पर विश्वास करने की जगह अपनी आँखों और अपने स्वयं की बुद्धि और विवेक पर भरोसा रखना उचित समझा था. मैंने आपके बारे में अपनी धारणा (अच्छी या बुरी) किसी मिस्टर ए या मिस्टर बी के कहे के अनुसार नहीं, अपने स्वयं की इच्छा के अनुसार बनायी. इसीलिए मैं आपसे यही निवेदन करूँगा कि आप मेरे विषय में जो भी मत स्थिर करना है वह अपनी बुद्धि से कीजिये, किसी के कहे के अनुसार नहीं.

मैंने उसी क्षण हमेशा के लिए यशवंत बाबू के विषय में अपना एक मत सुनिश्चित कर लिया. मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि हम दोनों कई मोडों पर, कई स्थानों पर, कई प्रकार से, कई रूपों में आपस में मिलते रहे, टकराते रहे, साथ रहे. मैं कुछ ही दिनों में भड़ास का नियमित लेखक बन गया था और नियमित पाठक भी. लेकिन इस सब से बढ़ कर जो बात रही वह यह कि मैंने यशवंताननद सरस्वती के रूप में एक ऐसा भाई पा लिया जिसके टक्कर के लोग बहुत कम होते हैं. मैं यह जानता हूँ कि यह सम्बन्ध किसी लालच और लेन-देन पर नहीं टिका हुआ है. मैं यह भी जानता हूँ कि यशवंत बाबू अपने आप में सक्षम हैं, दबंग हैं, होनहार हैं, मेधावी हैं और एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसका भविष्य आम तौर पर बहुत उज्जवल प्रतीत होता है. मैं यह भी जनता हूँ कि मैं ये बातें मात्र उन्हें प्रसन्न करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, यद्यपि वे ये सब पढ़ कर खुश ही होंगे, नाराज़ तो कदापि नहीं.

इनके विपरीत मैं भी जानता हूँ और वे भी जानते हैं कि मैं कुछ मामलों में उनसे बहुत नाराज़ रहता हूँ. मैंने अपनी नाराजगी कई बार, कई प्रकार से उन तक व्यक्त किया है. इसमें नंबर एक पर है उनकी पियक्कडपना. यशवंत बाबू को कहीं ना कहीं से पीने की बीमारी है. मुझे यह भी लगता है कि इस पर उनका नियंत्रण बहुत अधिक नहीं है. मैं ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि उन्होंने मुझे भी कई बार बताया है कि अब वे पियक्कडपने से उबरने वाले हैं पर हर कुछ दिनों बाद वे फिर वही करतूत करते नज़र आते हैं जो पहले कर रहे थे- यानि बैठे-ठाले मदिरा पान. यदि यशवंत बाबू की जगह कोई अन्य सज्जन होते जो यह काम करते तो मैं इसे बुरा नहीं मानता क्योंकि वे आनंद के लिए पीते, कटुता के लिए पीते, कमीनेपन के लिए पीते. फिर उनके पीने से किसी को कोई नुकसान नहीं होता. पर यशवंत महाराज बेवकूफी के लिए पीते हैं, मूर्खता में पीते हैं, जिद में पीते हैं, दस लोगों में अपने को काबिल बनाने के चक्कर में पीते हैं. वे यह भी नहीं जानते कि वे कितने मेधावी हैं, उनमे कितनी क्षमता है. वे यह नहीं समझते कि उनके पियक्कडपने से एक मेधा पर हमेशा खतरों के बादल मंडराते रहते हैं. मैं यशवंत की लेखनी का मुरीद हूँ और मुझे जब भी ऐसा महसूस होता है कि ये बेवकूफ बिना सोचे-समझे अपनी असीम क्षमताओं को इस प्रकार जाया करने में लगा है तो मुझे अंदर तक कोफ़्त होती है, क्षोभ और गुस्सा भी.

मैं नहीं जानता मेरी बातों का उन पर कितना असर होगा पर यह जरूर जानता हूँ कि मेरी बातों को पढ़ और सुन कर कई सारे भले पियक्कड मुझ पर नाराज़ हो जायेंगे. मैं इन सारे अच्छे और भले पियक्कड़ों की नाराजगी खुशी-खुशी झेलने को तैयार हूँ, यदि वे मेरी बात मान कर अपनी आदतों में थोड़ी भी कमी कर सकें. इनमे यशवंत भी शामिल हैं.

लेखक अमिताभ ठाकुर यूपी कैडर के आईपीएस अफसर हैं और लखनऊ में पदस्थ हैं.

tag- b4m 4 year

लेखन की मेरी दूसरी पारी और भड़ास का साथ

: भड़ास ने मुझे लिखने का मौक़ा देकर दोबारा एक लिखने वाले पत्रकार के रूप में मेरी पहचान बनायी : जब मैं दोबारा लिखने पढने की दुनिया में आया, तो मुझे लिखने वाला मानने वाले बहुत कम लोग थे. 1997 के बाद कई साल तक मैंने टीवी न्यूज़ में काम किया. टी वी न्यूज़ और पत्रकारिता शिक्षण की दुनिया से जब मैं बेआबरू होकर निकला तो मुझे नौकरी देने वाला कोई नहीं था. मेरे एक पुराने शुभचिन्तक एक नई पत्रिका निकाल रहे थे. मैं जब उनके पास नौकरी मांगने गया तो उन्होंने कहा कि मित्र आप पहले तो बहुत अच्छा लिखते थे लेकिन दस साल का अंतराल है, कहीं आप लिखना भूल तो नहीं गए होंगे. मैं अपना सा मुंह लेकर लौट आया.

उर्दू सहाफत के हसन शुजा ने भरोसा किया और लिखने का काम दे दिया. उनके यहां लिखे जा रहे सम्पादकीय को थोड़ा झाड़ पोंछ कर सबसे पहले यशवंत ने भड़ास पर छापना शुरू किया. उसके बाद वैकल्पिक मीडिया के कई मंचों ने मुझे फिर से दो रोटी कमाने लायक पत्रकार बनाया. भड़ास के 4 साल पूरे होने के साथ-साथ मेरे फिर से लिख कर रोटी कमाने वाले पत्रकार के रूप में 4 साल पूरे होने वाले हैं. यशवंत और वैकल्पिक मीडिया के अन्य साथी कहते हैं कि मैंने भी उनके मंच के विकास में योगदान दिया है. हो सकता है कि यह बात सच हो लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर भड़ास और उसके समकालीन मंचों ने हाथ न लगाया होता तो मैं आज भी अपने को लिखने वाला पत्रकार साबित करने के लिए संघर्ष कर रहा होता. यशवंत की इस खुशी में आज मैं अपने आप को शामिल करता हूँ और गर्व अनुभव करता हूँ. यशवंत जिंदाबाद.  

शेष नारायण सिंह

वरिष्ठ पत्रकार

दिल्ली

भड़ास बर्थडे से संबंधित अन्य टिप्पणियां, लेख आदि पढ़ने के लिए क्लिक करें- b4m 4 year

कांग्रेस के पोर्न स्टार की कसमसाहट

अभिषेक मनु सिंघवी कसमसा रहे हैं। सिंघवी को कांग्रेस का नया पोर्न स्टार कहा जा सकता है। इस पोर्न स्टार की कसमसाहट यह है कि वह कहीं भी नहीं जा पा रहे हैं। सब जगह से गायब हैं। जिस मीडिया के रोज जम कर मजे लेते थे, वहां से तो बिल्कुल ही फुर्रर। एक सीडी ने सारा मजा किरकिरा कर दिया। बेचारे सिंघवी… गए तो थे सेक्स का मजा लेने। पर, दुनिया अब उनके मजे ले रही है। वैसे, भजन, भोजन और ‘भोग’ का यह कायदा है कि उसे परदे में किया जाए, तो करनेवाले को खूब आनंद आता है। लेकिन जब उसको लोग देख लेते हैं, तो आपका आनंद तो हवा हो ही जाता है, उल्टे लोगों को उसका बहुत मजा आता है।

सिंघवी के मामले में भी यही हुआ। वे राजस्थान से राज्यसभा के सांसद हैं। कुछ दिन पहले तक कांग्रेस के नेता भी थे। रोज टीवी पर दिखते थे। सब जगह जाते थे। संसद में भी खूब उछलते थे। कांग्रेस की तरफ से बहुत बोलते थे। पर, अब बोलती बंद है। आंखों में शर्म है और टीवी की स्क्रीन से भी पूरी तरह से गायब। कहीं नहीं दिखते। ना संसद में, ना कांग्रेस मुख्य़ालय में, और ना ही कहीं किसी समारोह में। सुप्रीम कोर्ट में तो खैर जाएं भी किस मुंह से। वहीं तो अभिषेक मनु सिंघवी को सेक्स करते पूरी दुनिया ने सरेआम देखा, जी भर कर देखा। जिस सुप्रीम कोर्ट में वकालात करके रोजी रोटी चलाने के साथ वे देश के बड़े आदमी बने, उसी सुप्रीम कोर्ट के अहाते में बने अपने ही दफ्तर में सेक्स करते सीड़ी में समा गए। एक घर तो डायन भी टालती है। पर, सिंघवी ने ना तो सुप्रीम कोर्ट को छोड़ा, ना ही साथी महिला वकील को और ना ही अपने दफ्तर को। सबको सेक्स के साए में समेट लिया। बस, उस सीडी में महिला वकील के साथ रंगरेलियां मनाते दिखे, जो दिखे। उसके बाद सब जगह से गायब है।

उनके पिता लक्ष्मी मल्ल सिंघवी देश के बहुत बड़े कानूनविद कहे जाते थे। बहुत बड़ा नाम था। लेकिन बेटे अभिषेक ने उस इतने बड़े नाम को मिट्टी में मिला दिया। कभी अपन भी अभिषेक मनु सिंघवी के जोधपुर से होने की वजह से उन पर गर्व करते थे। पर, अब सिंघवी पर थूकने का भी मन नहीं करता। अभिषेक मनु सिंघवी ने जिंदगी भर कानून की देवी की कसमें खाई। इन्हीं कसमों से बाप बेटे की रोजी रोटी चली और राजनीति भी फलित हुई। पिता लक्ष्मी मल्ल सिंघवी पहले बीजेपी में थे। फिर पाला बदल कर कांग्रेस में आ गए। राजस्थान में पाली से लोकसभा का टिकट भी ले लिया। पर, सन 1989 में हुए इस चुनाव में गुमानमल लोढ़ा से वे हार गए। इससे पहले सरकार ने उनको अमरीका में भारत का हाई कमिश्नर बनाया। जिंदा होते और चुनाव जीते होते, तो देश के कानून मंत्री होते। अभिषेक मनु सिंघवी के अल्लू पल्लू उनमें भी देश का अगला कानून मंत्री देख रहे थे। पर, जिस कानून की पूजा करके सिंघवी ने नाम कमाया, उसी कानून की देवी के मंदिर में एक महिला वकील को जज बनाने का झांसा देकर उससे साथ सैक्स करते देश के भावी कानून मंत्री का यूं कैमरे में कैद हो जाना सिंघवी परिवार के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण साबित हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में सिंघवी के सेक्स की सीडी के दृश्य इतने दमदार थे कि दुनिया भर में पूरी सीड़ी कई कई बार देखी गई। अपन ने भी इंटरनेट पर सिंघवी की सेक्स सीड़ी को देखा। अपने जैसे करोड़ों लोगों ने भले ही सीडी का मजा लिया। लेकिन सिंघवी की सेक्स सीडी से सोनिया गांधी शर्मा गई। फट से सिंघवी को सब जगह से ब्लैक आउट करने के आदेश दे दिए। और अब पूरे देश में सिंघवी को भारतीय राजनीति के नए पोर्न स्टार के रूप में पहचाना जाने लगा हैं।

दुनिया ने सिंघवी के सेक्स और उस पर बनी सीडी का खूब मजा लिया। इससे झल्लाकर अपने सेक्स की सीडी टीवी चैनलों पर नहीं दिखे, इसके लिए अभिषेक मनु सिंघवी ने सारे पुख्ता इंतजाम कर किए। कोर्ट से बैन का आदेश लिया। वेबसाइटों से वीडियो हटवाया। पर, फेसबुक और कई न्यूज कंटेट की वेबसाइट पर बार बार अपलोड़ होते इस वीडियो को खूब देखा गया। सिंघवी का बस चलता, तो वहां भी रोक लगवा लेते, पर पता नहीं किन कारणों से यूट्यूब और बाकी कई प्रसिद्ध और बहुत व्यापक फैलाव वाली इंटरनेट कंपनियों की वेबसाइट को न भारत में प्रतिबंधित किया गया और न इसके खिलाफ वे कोई बहुत प्रभावी कार्रवाई कर पाए। यूट्यूब नाम की यह कंपनी अमेरिका में रजिस्टर्ड है और कुछ ही समय पहले गूगल्स ने बहुत मोटी रकम देकर इसे खरीदा था। निशुल्क वीडियो दिखाने और किसी के भी वीडियो अपनी साईट पर होस्ट करने वाली इस कंपनी के संस्थापकों में जावेद मीर नाम का एक बांग्लादेशी भी है जो 1992 में अपने देश से भाग कर अमेरिका चला गया था। यूट्यूब पर मौजूद वीडियो में सिंघवी के बहुत सारे वीडियो मौजूद हैं। वहां से भी एक हटवाया तो भाई लोगों ने दूसरा अपलोड़ कर दिया। तू डाल डाल में पात पात की तरह मामला चलता रहा।

सिंघवी अब भले ही चुप हैं। सब जगह से गायब है। कहीं नहीं दिखते। पर, सुप्रीम कोर्ट में उनके सेक्स की यह सीडी उनका पीछा नहीं छोड़ रही। सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट ऑन रिकार्ड (एओआर) एसोसिएशन ने सिंघवी को मुकदमे की ब्रीफ न देने का प्रस्ताव पारित किया है। यानी कोर्ट में सिंघवी के पेश होने पर रोक लगाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट में एओआर ही मुकदमा दाखिल करने के लिए अधिकृत है। किसी भी केस में सिंघवी को ब्रीफ नहीं देने संबंधी प्रस्ताव को एओआर एसोसिएशन की जनरल बॉडी ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया था। एसोसिएशन की कार्यकारी समिति ने इसे मंजूरी दे दी। प्रस्ताव की प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश, दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और दिल्ली बार काउंसिल के अध्यक्ष को भी भेजी गई है। इस प्रस्ताव पर एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील कुमार जैन को छोड़कर कार्यकारी समिति के लगभग सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। जैन ने प्रस्ताव का विरोध किया था। जैन के विरोध को समझा जा सकता है। अभिषेक मनु सिंवी भी जैन हैं, और अध्यक्ष सुशील कुमार भी जैन। एक जैन अपने जाति भाई के दर्द में शामिल हो, तो सामाजिक नजरिए से इसको गलत नहीं माना जाना चाहिए। और एओआर एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील कुमार जैन को जातिभाई का धर्म निभाते हुए सिंघवी का साथ देने के लिए माफ कर भी दिया जाए, तो भी अभिषेक मनु सिंघवी का अपराध कम नहीं हो जाता। क्योंकि सेक्स तो सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट यानी सरकारी स्थल के अहाते में किया है।

अभिषेक मनु सिंघवी को केरल के एक पापी का मामला केरल सरकार के खिलाफ ही लड़ने की वजह से कांग्रेस के प्रवक्ता पद से पहले भी एक बार हटा दिया गया था। सिंघवी ने गुनाह ही ऐसा किया था जिसके लिए उन्हें माफ नहीं किया गया। कई दिनों तक पत्रकारों को शेर ओ शायरी, कानून की धाराएं और शुद्व अंग्रेजी और हिंदी सुनने को नहीं मिली। कुछ दिन बाद लोग इस मामले को भूल गए और वे फिर प्रवक्ता के पद पर आ गए। अब एक बार फिर सिंघवी अलग – थलग है। पार्टी में भी दरकिनार है। इसीलिए बहुत ज्यादा कसमसा रहे हैं। वैसे, कुल मिलाकर अभिषेक मनु सिंघवी एक वकील है। कानून से खेलना उनको खूब आता है। कानून की कमजोरियों में जिंदगी को जीने के सामान को फिर से कैसे सजाया जाता है, यह भी वे अच्छी तरह जानते हैं। इसलिए कानूनी रूप से सिंघवी अपनी सारी सेक्सी शरारतों और उसके लिए की गई करतूतों के कलंक को धो देंगे। संसद में तो वैसे भी बने रहेंगे। पर, लोगों को दिलो में फिर जगह बना पाएं, इसकी गुंजाइश कम ही है। पूरी पार्टी को लज्जित कर देने वाले इस अपराध के लिए जैसा कि सिंघवी को भरोसा है, कांग्रेस उनको भले ही आगे जाकर पिछली बार की तरह एक बार फिर माफ कर दे। पर, कांग्रेस के इस पोर्न स्टार की कोर्ट में कलंकित कर देनेवाली करतूत को क्या आप भी भूल जाएंगे ?

लेखक निरंजन परिहार मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं. संबंधित अन्य खबरों के लिए क्लिक करें- Singhvi Sex CD

हलो सर, मुझे फार्मा फील्ड के बारे में अपनी भड़ास निकालनी है…

hello sir, this is deepak singh m.pharm student from bhopal. mujhe pharma field k baare me bhadas niklani hai or me kuch sach batana chahata hoon pharma field k baare me. pharma field ki jobs jo hamari ho kar bhi hamari nahi hai jaise:

1. marketing: marketing me pharmacy se jyada b.sc, b.com k student milte hai toh hum pharmacy k student kaha jaye. job recruitment k add sab farji hote hai logo ko dikhane k liye lekin andar hi andar pehchan wale ki hi job lag jati hai hum agar interview clear bhi kar lete hai toh kaha jata hai i will call you later or phir kabhi woh din nahi aata.

2. industry: industry ne apni recruitment consultancies k through start kar di hai or consultancies apni fees k alawa job dilwane k liye 20-30 thousand demand karte hai yane job k liye bhi pehle paise hi dena padta hai. consultancies k naam par open loot chal rahi hai or koi kuch bhi action nahi leta hai again hum pharmacy k student kaha jaye.

3. college teaching: college wale demand karte hai ki admission laoge toh job mil jayegi, ya toh apki pehchan kisi acchi post (director or principal) se ho toh hi job milegi job recruitment k add sab farji hote hai logo ko dikhane k liye lekin andar hi andar pehchan wale ki hi job lag jati hai.

4. government sector. government toh chor hai kabhi pecche se loot ti hai kabhi aage se. matalab ki pehle lakho logo se form bharwate hai par job usko milti hai jo sabse jayada paise khilata hai.

ab aap hi batao hum pharma student kaha jaye ya hum log bhi busjdilo k saman suiside kare ya berojgar rahe hum log itna paisa laga kar pharmacy karte hai par job preference b.sc walo ko milti hai aisa kyu agar pharma student ki jaroorat hi nahi hai toh yeh course band kar dena chahiye or yeh toh rule hai (as per pharmacy council of India) ki pharma industry me sirf pharmacy student hi work kar sakte hai par yeh follow kyu nahi hota.

agar aap k pass iska answer hai toh please tell me and take some action against thsi farjiwada.

thank you

deepak singh

dj_0681@yahoo.co.in

भड़ास के चार साल होने पर लिखा गया आपका लेख अपने आप में पूरी फिलासफी है

यशवंत भाई …जय हो …भड़ास के 4 साल पूरे होने के मौके पर लिखे आपके इस लेख 'सुख-दुख आपसे साझा कर लूं' ने तो धमाका कर दिया.. इतनी गहरी फिलोसफी में चले गये कि पाठकों को दर्शनशास्त्र, सिस्टम की हकीकत, मीडिया का नंगापन सब कुछ गहरे से समझा दिया. एक बार तो हर पाठक, यहाँ तक कि बड़े बड़े संपादक भी इसे पढकर सोचने पर मजबूर हो जांयगे. बहुत सही कहा आपने  '…काहे का मीडिया जो बस अपने रेवेन्यू के लिए समझौते करता फिरता है, इसके आलावा कुछ नहीं करता है..''

य़े भी बात खूब कही ..''कहां सिस्टम बदला है.. सब पहले के क्रूर राजा महाराजाओं वाला हिसाब है, हां इसको लबादा मिल गया है…'' बात बड़ी फिलोसफिकल में होने के बावजूद बड़े सरल ढंग से पाठक के सामने परोसी गयी है ..इतने बेहतर लेख पर सबसे पहला लिखित कमेन्ट आपको मेल करने वाला बनकर गर्व महसूस करते हुए मै भड़ास के चार साल पूरे होने पर आपको और भड़ास के पाठकों को ढेर सारी बधाई देता हूं… साथ ही इस आन्दोलन को खड़ा करने के लिए आपने गजब का संघर्ष किया; मैं आपको सलाम करता हूं ..मुझे भड़ास का नियमित सहयोगी होने पर बड़ा गर्व है .. लेख पर कमेन्ट पोस्ट करने के साथ आपको अलग से मेल कर रहा हूं..

हमेशा की तरह सहयोग बना रहेगा…

सोनू कुमार

हरियाणा

kumarsonu256@gmail.com

tag- b4m 4 year

भड़ास की सफलता और यशवंत सिंह की मीडिया सरकार

अखबारों, पत्रकारों और इलेक्ट्रानिक न्यूज़ चैनल के गलत और अनुचित कार्यों के खिलाफ आग उगलने वाली प्रसिद्ध वेबसाइट भड़ास4मीडिया अब कुछ ही समय में अपने सफर का चौथा साल भी पूरा करने को आगे बढ़ रही है. आज भड़ास के पढ़ने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 6 करोड़ 90 लाख 30 हजार तक पहुंच चुकी है. भड़ास ने हमेशा सबकी सुनी और किया वही जो किसी ने नहीं सुनी. वहीं भड़ास के घेरे में आये लोगों की फटती रही, चीख पुकार मचती रही लेकिन भड़ासियों के मसीहा कहे जाने वाले यशवंत सिंह ने कभी सच्चाई से मुंह न मोड़ कर उसका सामना किया और प्रकाशित तथ्य को साफ़ छवि देने के लिए लगातर कमेन्ट बॉक्स में भी नजर आते रहे. भड़ास4मीडिया को प्रतिदिन पढ़ने और लिखने वाले 1,91,750 भड़ासियों की सूचनाओं की गोपनीयता बनाने में हर संभव प्रयास करने के साथ सही तथ्यों को जान कर प्रकाशित करने में कभी पीछे नहीं रहे.

जैसे इंसान के हर दिन एक जैसे नहीं होते वैसे भड़ास के दिन भी कभी एक जैसे नहीं रहे. भड़ासियों के इस कोने में खबरों के सहेजने से लेकर इसको जीवित रखने में कभी अपने को असहाय महसूस कर रहे यशवंत सिंह ने कभी कोई शर्म नहीं की और इसको चलाने के लिए लोगों से मदद की अपील भी की है. “भड़ास4मीडिया को अब आप लोग चलाइए, मैं चला चुका” लेख से प्रेरित हो कर बहुत लोगों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाये, कितने लोगों ने इसे भीख का नाम तक दे डाला, तीखी प्रतिक्रिया दी, जिस तरह भड़ास लोगो की पोल खोलता रहा वैसे ही भड़ास की चपेट में आये लोग अपनी भड़ास निकालने के लिए तीखी प्रतिक्रियाएं भी देते रहे जिसे उसी अंदाज में भड़ास पर प्रकाशित भी किया जाता रहा है.

आज शायद ही कोई पत्रकार या मीडिया समूह इसे खोल कर ना देखता हो. कोई कितनी भी इस मीडिया वेबसाइट की बुराई बखानता फिरे लेकिन जबतक इसके दर्शन न कर ले, उसका खाना हजम नहीं होता. हम जहाँ सिर्फ एक कम्प्यूटर पर बैठ कर देश के कोने कोने की मीडिया सम्बंधित खबर को पढ़ कर अपना खाना हजम करते हुए नजर आते है वहीँ भड़ास भी हमें खबरे परोसने में कोई कंजूसी नहीं करता. ये सच है कि ऐसा पत्रकारों के सहयोग से ही मुमकिन है कि हमें मीडिया की अजीबोगरीब और उठापटक जैसे घमासान की जानकारी मिलती रहती है लेकिन इसमें भड़ास4मीडिया के माई-बाप कहे जाने वाले यशवंत सिंह की भूमिका सराहनीय है. उन्होंने हमें एक ऐसा चौराहा दिया, हमें बेबाकी से कहने बोलने के लिए एक ऐसी जगह मुहैय्या कराइ जिसकी कल्पना शायद ही किसी पत्रकार या किसी मीडिया समूह ने की हो.

अखबारों, न्यूज़ चैनल में लोगों की काली करतूतों को जगजाहिर करने में भले ही पत्रकार समाज रात दिन एक करता रहा है लेकिन अखबार की करतूत और उसमें फैले भ्रष्टचार के खिलाफ कौन बोले? अखबार, न्यूज़ चैनल में प्रकाशित, जारी हुई गलत और निराधार खबरों पर कटाक्ष करने के लिए कोई फौरी तौर पर कहाँ जाता? अपने संपादक या वरिष्ठ अधिकारीयों के उत्पीड़न के शिकार पत्रकार, कर्मचारी कहां जाते? लेकिन अपनी भड़ास को निकलने के लिए यशवंत सिंह ने भड़ासियों के लिए एक ऐसी जगह मुकर्रर की जहाँ किसी को भी उसके गलत कामों के लिए नंगा किया जा सकता है और समाज के सामने मीडिया में छिपे घिनौने चेहरे को दुनिया और समाज के सामने ला कर खड़ा किया जा सकता है. भड़ास4मीडिया की तारीफों के पुल बांधते हुए मेरे इस लेख पर लोगो की राय भी गजब की होगी.

लोग सोचते होंगे कि मैंने भड़ास की कोई बुराई क्यों नहीं लिखी? क्यों सिर्फ इसकी और इसके संचालक की तारीफों के पुल बांधे है? लेकिन अगर मेरे स्वयं के शब्द ऐसे हैं तो ज़रूर कहीं न कहीं से मुझे भड़ास से कुछ सीखने को मिला है जिसके लिए मै भड़ास का शुक्रगुज़ार हूँ, जिसने हमें खुल कर बोलने की आजादी दी है. मैं भड़ास पर बहुत से लोगों की आपत्ति पढता आया हूँ कि हमारी खबरों को स्थान नहीं दिया जाता है, सिर्फ उनकी खबरों को स्थान दिया जाता है जो भड़ास की पैसों से मदद करते हैं या फिर भड़ास के चहेते हैं. लेकिन मेरा कहना होगा कि मैंने कभी कोई सहयोग राशि भड़ास को नहीं दी लेकिन मेरी खबरों, रिपोर्ट को प्रकाशित किया जाता रहा है लेकिन बहुत सी खबरें मेरी भी प्रकाशित नहीं हुई जिसके लिए मैंने कभी भड़ास से उसे प्रकाशित करने के लिए कोई आग्रह नहीं किया और आग्रह करूं भी तो क्यों?

रही बात अपने चहेतों की खबर छापने की बात, तो जहाँ तक मुझे याद है कि भड़ास पर जिसकी कभी तारीफ छापी गई हो उसको भी उसके गलत कामों के लिए नंगा किया गया है. भड़ास पर खबर का न लग पाना और लोगों को अपनी नाराजगी ज़ाहिर करना इस बात को साबित करता है कि भड़ास आज किस मुकाम पर है. मेरे द्वारा सर्च की गई कुछ मीडिया वेबसाइट का आंकलन करने पर ये तो साबित हो गया कि आज भड़ास कितना लोकप्रिय है, पाठकों की संख्या में लगातार बढ़त बनाते हुए वेबवर्थ के अनुसार आज भड़ास के पढ़ने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 6 करोड़ 90 लाख 30 हजार तक पहुंच चुकी है. ऐसा देखा गया है कि लोगों ने अपनी भड़ास किसी और पर निकालने के लिए भड़ास पर खबर भेज दी हो जिससे उसका शिकार हुए लोग चीखते चिल्लाते हुए नज़र आये हैं. भड़ास के लिए लिखने वाले असंख्य पत्रकारों को बेबाकी से लिखने के लिए जो अधिकार यशवंत सिंह ने दिया है वो सच में तारीफ के काबिल है.

इस वेबसाइट पर बिना शुल्क दिए अपनी भड़ास लिखने कहने का अधिकार दे कर यशवंत सिंह ने पत्रकारिता जगत और उनके हित के लिए बड़ा काम किया है. और जब यशवंत सिंह ने हमें ये सुविधा निशुल्क प्रदान करने का प्रण ले ही लिया है तो अगर उन्होंने कभी भीतरी संकट के बारे में अपनी परेशानी साझा की है तो क्या गलत है? क्या गलत है कि इस भड़ासीय कोने को जिंदा रखने के लिए चंदा सहयोग माँगा गया हो? आज के इस दौर में मीडिया में काम कर रहे पीड़ित लोगों को उनका अखबार, मीडिया संस्थान नहीं पूछता लेकिन यहाँ इस चौराहे पर आये ऐसे पीड़ित की परेशानी बयान करने से लेकर उनकी परेशानी को एक दूसरे से साझा करने का जो बीड़ा यशवंत सिंह ने उठाया है वो क्या कम है?

इमरान जहीर

मुरादाबाद

tag- b4m 4 year

मुझे लगता था कि इस तेवर के कारण भड़ास ज्यादा दिन नहीं चलेगा

सर्वप्रथम बड़े भाई यशवंत जी के मिशन और भड़ास4मीडिया के चार साल पूरे होने पर ढेर सारी बधाई. आज के चार साल पहले जब भड़ास इन्टरनेट के रास्ते हम तक पहुंचा था तो उसके तेवर कलेवर को देखने के बाद तो लगता ही नहीं था कि ये दो चार महीने भी चल पायेगा. क्योंकि तहलका का हश्र मैंने देखा था कि एक खबर ने तरुण जी को किस हालत में पहुंचा दिया था. जबकि भड़ास तो सैकड़ों तहलका को भी मात देने वाला था, तो इसका क्या होगा. मन में एक अजीब सी दहशत थी कि क्या होगा, चलेगा भी या नहीं. जिस तरह दिन प्रतिदिन सफेदपोश अपराधियों के खिलाफ भड़ास बिना किसी की परवाह किये पंगे ले रहा था, बड़ा ही रोमांचक लगता था.

हर रोज़ यही सोचता कि जिस बहादुरी के साथ भाई यशवंत इसे चला रहे हैं, क्या होगा उनका, आज तो बंद ही हो जायेगा. अगली सुबह होती तो फिर कोई आक्रमण हो जाता, भाई फिर मुस्कुराता हुआ दिखता. बस आत्मा को बड़ी अजीब सी शांति मिलती कि नहीं, मैं ही गलत सोच रहा था, भाई को मात दे पाना आसान नहीं है. भड़ास बढ़ता ही रहा. लोग जुड़ते चले गये और आज भड़ास एक बीज से बड़ा बरगद सा हो गया, वो भी महज चार सालों में. तो निश्चित रूप से इसके पीछे यशवंत भाई का अदम्य साहस, निर्भीकता, सच को सच कहने का ज़ज्बा ही था, वो मानें या न मानें, लेकिन आज भड़ास को जानने वाले जरूर मानते हैं.

अख़बार चैनलों की आड़ में पत्रकारों का शोषण हो रहा और दूसरों के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले पत्रकार खुद ही उसका दंश झेल रहे. उनके आवाज़ उठाने पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था. भड़ास ने उन्हें ऐसी स्थिति में एक बड़ा मंच दिया जहां वो अपना दुःख दर्द लोगों से सिर्फ बाँट ही नहीं सकते बल्कि पूंजी व पहुंच के मद में चूर हो चुके अपने कथित मालिकों तक अपनी आवाज़ पहुंचा सकते हैं. अपनी बात ख़त्म करने से पहले फिर एक बार बड़े भाई यशवंत जी के ज़ज्बे को सलाम. भड़ास व उससे जुड़े सभी सहयोगियों मित्रों शुभचिंतकों को भड़ास की चौथी वर्षगांठ पर हार्दिक बधाई. जय हिंद.

कुंवर समीर शाही

पत्रकार
अयोध्या फैजाबाद
09795503555

tag- b4m 4 year

जग का हाल लिखने वालों के हाल से भड़ास ने बखूबी परिचित कराया

यशवंत जी, भड़ास4मीडिया के सफल चार साल संपन्न होने और पंचम वर्ष में प्रवेश के लिए बधाई. तीन-चार माह के संक्षिप्त प्रवास के बाद सितम्बर 2009 में जब मैं दिल्ली से विदा ले रहा था, तभी पहली बार फ़ोन पर आपसे बात हुई थी. पत्रकार और पत्रकारिता की दशा-दिशा पर पैनी निगाह रखने की भड़ास4मीडिया की पहरेदारी ने अनजाने में ही जो ऐतिहासिक कार्य किया है, उससे मीडिया बिरादरी का सचमुच भला हुआ है. जग का हाल लिखने वालों को अपने और अपनी बिरादरी के हाल से परिचित कराने का काम भड़ास ने बखूबी किया है.

कल ही देवर्षि नारद की जयन्ती थी. जो हमारी सृष्टि के प्रथम पत्रकार भी कहे जाते हैं. आपने अपने आलेख में जिस अनुभव को रखा है….  (…महसूस कर रहा हूं कि इन चार वर्षों में भड़ास ने मुझको अंदर से बिलकुल बदल कर रखा दिया है. कभी कभी लगता है कि मैं अपना जीवन जी चुका हूं. मोक्ष मिल चुका है. कोई सवाल मन में नहीं बचा है…) इस सत्य को पा लेना सबके बूते की बात नहीं होती.

सादर,

तारकेश्वर मिश्रा

Resident Editor (West Bengal)

PRABHAT KHABAR (KOLKATA)

Mobile : 9831918555

tag- b4m 4 year

भड़ास4मीडिया ने शोषित-उत्पीड़ित पत्रकारों का मनोबल बढ़ाया

यशवंत जी नमस्कार, भड़ास4मीडिया के सफल 4 वर्ष पूरे होने पर आपको बधाई। आपकी भड़ास वेबसाईट ने पत्रकार जगत से जुड़े लोगों को अपने मन की पीड़ा व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम दिया है। भड़ास की जितनी प्रशंसा की जाये उसके लिये शब्द कम हैं। मन की भड़ास और सच को सामने लाने के लिये देश में भड़ास फॉर मीडिया एक बेहतर माध्यम बन चुका है। यह आज पत्रकार जगत से जुड़े लोगों की जरूरत बन गया है। सम्पादकों, जनरल मैनेजरों तथा प्रधान सम्पादकों द्वारा किये जाने वाले रिपोर्टरों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का मंच देकर आपने ऐसे शोषित पत्रकारों का मनोबल बढ़ा दिया है।

यशवंत जी मैं यह भी कहना चाहूंगा कि पूरे समाज में शोषण के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार खुद शोषण का शिकार है। समाचार पत्रों एवं मीडिया चैनलों में काम करने वाले स्ट्रिंगरों, रिपोर्टरों एवं अन्य कर्मचारियों के शोषण को रोकने के लिये ठोस योजना इस प्रकार की बनायी जाये कि जिसमें उनके वेतन, भत्ते, सुरक्षा, दुर्घटना, दुर्घटना मृत्यु आदि पर एक सशक्त एक्शन प्लान हो। पत्रकारों को सम्मानजनक वेतन दिये जाने के लिये मीडिया संस्थानों पर कड़ी नजर रखी जाये तथा मानदेय/वेतन इतना देय हो कि उनके परिवार का भरण पोषण आसानी से हो सके। दुनिया भर के शोषण की खबर छापने वाले अखबारों के मालिक, प्रधान संपादक, संपादक स्वयं एक दैनिक मजदूर से भी कम अपने रिपोर्टरों को वेतन देकर उनका शोषण करते हैं। इस पर भी युद्धस्तर पर विचार होना चाहियें ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके।

यशवंत जी भड़ास4मीडिया के जरिये मीडिया इंडस्ट्री के दबे छुपे सच एवं शोषण सामने आने लगे हैं। इससे शोषित पत्रकारों एवं मीडिया कर्मचारियों को न्याय की उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। भड़ास4मीडिया का समस्त परिवार इसके लिये बेहद बधाई का पात्र है। इन्हीं शब्दों के साथ आपको पुनः 4 वर्ष के सफलतम सफर पर हार्दिक शुभकामनायें !

एए तन्हा

प्रसून अग्रवाल

वरिष्ठ पत्रकार

किच्छा, जिला उधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड

tag- b4m 4 year

दो पंक्तिया यशवंत और भड़ास के लिए…

: चार साल होने पर 'भड़ासी' को बधाई : कमाल तो किया है भड़ास ने. हिंदी पत्रकारिता का आईना भी बना. कभी-कभी कुछ झूठी, मगर अधिकाँश सच्ची खबरों घटनाओं को सामने लाकर बहुतों की पोल भी खोली, चेहरे दिखाए, बेनकाब किये. मुझे तो पत्रकारिता पर केन्द्रित अपना व्यंग्य उपन्यास याद आता है ''मिठलबरा की आत्मकथा'', जिसमें 'मिठलबरा' नामक संपादक ही अपनी पत्रकारिता की पोल खोलता है. (जो मीठी-मीठी बात करे मगर 'लबारी' मारे, यानी झूठा हो, शातिर हो. ऐसे लोगों को ''छत्तीसगढ़ी'' भाषा में 'मिठलबरा' कहते हैं) पत्रकारिता के भीतर के सच को भी सामने आना चाहिए.

'भड़ास' ने ये काम बखूबी किया है. वाद-विवाद के साथ संवाद भी चलते रहे. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह अपने किस्म की एक ऐसी साईट है, जो दुनिया में निराली है. भारत में पत्रकरिता शुरू करने वाले 'हिकी' ने उस दौर में जो काम किया था, लगभग वही काम यशवंत ने भारत में सायबर पत्रकारिता के उदय के बाद किया. हिम्मत के साथ. बधाई मिलनी ही चाहिए. मैं पत्रकार हूँ मगर कवि-हृदय भी पाया है. दो पंक्तिया यशवंत और भड़ास के लिए…

चलता रहे बिंदास हमारा / ये जो है न भड़ास हमारा
लाख कोई निंदा करता हो / यशवंत है जी खास हमारा

14 मई को कार्यक्रम होता तो शामिल हो जाता, क्योंकि उस दिन दिल्ली में हूँ. साहित्य अकादमी की बैठक है. 15 को वापसी है. मगर मेरी शुभकामना 'भड़ास' और सारे 'भड़ासियों' के साथ है.

शुभकामनाओं के साथ

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज
गिरीश पंकज

tag- b4m 4 year

इसे भी पढ़ सकते हैं- भड़ास4मीडिया के चार साल, कुछ सुख दुख आपसे कर लूं साझा

आईबीएन7 के पत्रकार हरीश बर्णवाल की कहानियों का संग्रह प्रकाशित

टेलीविजन पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल की कहानियों का संग्रह “सच कहता हूं” दिल्ली के वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। हरीश की ये तीसरी किताब है। इसमें 6 लंबी कहानियां और 14 लघु कथाएं हैं। कहानियों में समसामयिक विषयों को भावनात्मक तौर पर बहुत ही अच्छे से उभारा है। हरीश ने कई ऐसे मुद्दों को कहानियों में जगह दी है, जो इससे पहले कभी नहीं आईं। ‘निकाह’, ‘बागबां’ और ‘बाबुल’ जैसी फिल्मों की कहानियां लिखने वाली लेखिका अचला नागर लेखक की कहानियों के बारे में लिखती हैं कि “हरीश की कहानियों में तीन बातें हैं। संवेदनशीलता कूट-कूटकर भरी हुई हैं। दूसरी पैनी दृष्टि और तीसरी ईमानदारी दिखाई देती है। एक तरह से दूध को मथते-मथते ये मक्खन निकला है। तभी उन्होंने 16 सालों में सिर्फ 6 कहानियां लिखी हैं।”

पहली कहानी ‘यही मुंबई है’ अंधे बच्चों पर आधारित है। इस कहानी के बारे में हिंदी के वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव लिखते हैं कि “इस कहानी में एक अंधेरी दुनिया है। एक ऐसी दुनिया जहां हम खुद को सीमित महसूस करते हैं, तन्हा महसूस करते हैं। ये एक बच्चे की कहानी है, बच्चे के प्रति करूणा की, उसकी मजबूरियों कीं… कहानी की खूबसूरती ये है कि ये अपनी सीमाओं के पार चली जाती है… जो कथ्य है, जो कहा गया है, जो कहानी है, उसके पार ले जाती है और इसलिए ये मेटाफर है।”अंधे बच्चों पर इस कहानी को लिखने में हरीश चंद्र बर्णवाल ने कई सालों की मेहनत की है, साथ ही बहुत ही बेहतर तरीक से बच्चों के घूमने के बहाने आधुनिक समाज की विसंगतियों, बड़े शहरों की परेशानियों और मानवीय रिश्तों को शब्दों में पिरोया है। इस कहानी को अखिल भारतीय अमृत लाल नागर पुरस्कार भी मिल चुका है।

दूसरी कहानी ‘चौथा कंधा’ देहाती समाज में चल रही हलचलों को तात्कालिकता के विश्वसनीय बिंबों में प्रस्तुत करती है। कहानी में दिखाया गया है कि कैसे ट्रेन से गाय के कटने में कोहराम मच जाता है जबकि इंसानों के मरने पर कोई हलचल तक पैदा नहीं होती। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी इस कहानी के बारे में लिखते हैं कि “कहानीकार नई फैशनेबल कथा रूढ़ियों का सहारा लिए बिना नए के प्रति गांववालों के कौतुहल, उनकी काइयां, व्यवहारिकता और हमारे दौर में मानव जीवन के अवमूल्यन को रचनात्मक अंतर्गठन के माध्यम से व्यंजित कर सका है।”

तीसरी कहानी का नाम है “तैंतीस करोड़ लुटेरे देवता”। ये कहानी लेखक ने जम्मू के रघुनाथ मंदिर में घूमने के दौरान अपने अनुभवों के आधार पर लिखा है। साथ ही पंडितों के ऊपर कहानी के माध्यम से जमकर प्रहार किया है। चौथी कहानी “अंग्रेज, ब्राह्मण और दलित” के जरिये हिंदू समाज में व्याप्त जातिवाद के जहर को दिखाने की कोशिश की गई है। पांचवीं कहानी “काश मेरे साथ भी बलात्कार होता” एक बहुत ही संवेदनशील कहानी है। कहानी को पढ़कर समझ जाएंगे कि बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दे को कभी इस तरह से आज से पहले नहीं उठाया गया। आखिरी लंबी कहानी है “अंतर्विरोध” इस कहानी में मुंबई के परिवेश और आधुनिक समाज की दिक्कतों को मार्मिक तरीके से उकेरा गया है।

कहानीकार हरीश चंद्र बर्णवाल ने अपनी लघुकथाओं में या तो अस्पताल की दिक्कतों को या फिर मीडिया में व्याप्त परेशानियों  को उठाने की कोशिश की है। इन लघुकथाओं में सिर्फ आखिरी लघुकथा “कब मरेंगे पोप” पढ़कर ही आप इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की त्रासदी को बड़ी ही आसानी से पकड़ सकते हैं।

हरीश चंद्र बर्णवाल को उनकी कहानियों के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। “सच कहता हूं” किताब उनका पहला कहानी संग्रह है। इससे पहले गीतों पर पहली किताब मुंबई के परिदृष्य प्रकाशन से “लहरों की गूंज” प्रकाशित हो चुकी है। दूसरी किताब न्यूज चैनलों की भीषा पर “टेलीविजन की भाषा”, राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इस किताब को लोगों ने हाथों हाथ लिया। इसलिए महज चार महीने में ही किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित किया गया। हरीश की तीसरी किताब “सच कहता हूं” हार्ड बाउंड में प्रकाशित की गई है। किताब 96 पन्ने की है और इसकी कीमत 175 रुपये है। किताब खरीदने के लिए दिल्ली के वाणी प्रकाशन से 011- 23273167 के जरिए या फिर किताब लेखक से hcburnwal@gmail.com के जरिए संपर्क कर सकते हैं।

हिंदुस्तान में राजीव वर्मा और अमर उजाला में अजय उपाध्याय के दिन हुए पूरे?

: कानाफूसी : दो चर्चाएं इन दिनों जोरों पर है. हिंदुस्तान और एचटी में सीईओ के रूप में लंबे समय से काम देख रहे राजीव वर्मा के बारे में पता चला है कि उनके दिन पूरे हो गए हैं और प्रबंधन उनसे पिंड छुड़ाने की तैयारी में है. खासकर हिंदी बिजनेस की दशा-दिशा से प्रबंधन राजीव वर्मा से काफी नाराज है. हिंदुस्तान अखबार की दिन प्रतिदिन गिरती साख और अपेक्षित बिजनेस व प्रसार न मिलने से एचटी मैनेजमेंट किसी ऐसे शख्स की तलाश में है जो पूरे वेंचर को नई उंचाइयों पर ले जाए. राजीव वर्मा कई वर्षों से हिंदुस्तान ग्रुप में हैं. कई संपादक आए गए लेकिन राजीव वर्मा अपने पद पर जमे रहे. पर बताया जाता है कि अब उनकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है.

राजीव वर्मा की उल्टी गिनती शुरू होने के कारण लोग शशि शेखर के भविष्य पर भी अटकले लगा रहे हैं. वैसे भी हिंदुस्तान अखबार में प्रधान संपादक अब तीन साल से ज्यादा नहीं रहा करेंगे, ऐसी अघोषित नीति शोभना भरतिया ने बना दी है. इसके पीछे वजह है अखबार में लगातार इन्नोवेशन करते रहना. कोई भी प्रधान संपादक तीन साल में अपनी पूरी मेधा और विजन का प्रदर्शन कर देता है. इसके बाद उसके पास आइडियाज और विजन के लेवल पर कुछ बचता नहीं. ऐसे में कारपोरेट मीडिया हाउसेज ने यह अघोषित नीति बना ली है कि किसी भी संपादक को तीन साल बैटिंग करने का पूरा मौका देना है और उसे इन तीन वर्षों में हर तरह की छूट देना है ताकि वह अपने विजन को जमीनी स्तर पर एक्जीक्यूट करा सके.

शशि शेखर के आने के बाद से हिंदुस्तान अखबार की क्वालिटी में काफी गिरावट आई है. आफिस के कामकाज का माहौल भी खराब हुआ है. पहले हिंदुस्तान आफिस में एक डेमोक्रेटिक व फ्रेंडली माहौल हुआ करता था जहां लोग बिना डर भय के अपना काम संपादित करते थे. आज के समय में स्थिति ठीक उलट है. हर आदमी आशंकित रहता है कि कहीं उसकी बेइज्जती न कर दी जाए. स्वतंत्र विचार व सोच रखने वालों को अपमानित किया जाता है और बिलो द एवरेज किस्म के लोगों को खूब प्रश्रय दिया जाता है. इस कारण अखबार में क्वालिटी लेवल पर काफी गिरावट आई है. देखना है कि राजीव वर्मा और शशि शेखर की उल्टी गिनती का अंत कब होता है. हालांकि इंडस्ट्री में बड़े पदों पर आसीन लोगों को लेकर किसी न किसी किस्म की अफवाह व कयासबाजी हर समय होती रहती है लेकिन इस बार की चर्चाएं में कुछ दम बताया जा रहा है.

उधर, अमर उजाला से खबर है कि अजय उपाध्याय बनाम यशवंत व्यास की जंग में अजय उपाध्याय का पलड़ा काफी कमजोर हो गया है. प्रबंधन भी अब यशवंत व्यास को ज्यादा अधिकार देने के मूड में है क्योंकि एक्जीक्यूशन को लेकर अजय उपाध्याय के मोर्चे से काफी शिकायतें आ रही हैं. सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ हफ्तों से अमर उजाला के संपादकीय विभाग में शीर्ष स्तर के टकराव का नतीजा निकलता दिख रहा है. अजय उपाध्याय का पराभव शुरू हो चुका है. उनके इलाके में यशवंत व्यास के लोगों की तैनाती की जा चुकी है. अजय उपाध्याय के पास सेंट्रल डेस्क समेत कई तरह के काम थे जिसे अब यशवंत व्यास के करीबियों के जिम्मे कर दिया गया है. पिछले दिनों हुए कई संपादकों के फेरबदल के क्रम में नोएडा में संपादकीय के पावर बैलेंस में भी बदलाव किया गया. यशवंत व्यास को ज्यादा जिम्मेदारियां दी गई और अजय उपाध्याय से काफी कुछ काम ले लिया गया. अभी यह ठीक ठीक नहीं पता चल सका है कि इन दिनों अजय उपाध्याय अमर उजाला में किस भूमिका में हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने उन्हें किनारे करके संकेत दे दिया है कि अगले कुछ महीने में वे स्वयं कहीं कुछ तलाश लें या फिर उपेक्षित रहकर काम करने के लिए तैयार रहें.

कानाफूसी कैटगरी की खबरें चर्चाओं और सुनी सुनाई बातों पर आधारित होती है. कृपया तथ्यों की अपने स्तर पर भी जांच कर लें. अगर आपको उपरोक्त संबंध में कोई नई जानकारी देनी है तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं. आपका नाम पता पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

सहारा ने फोटो छापकर टर्मिनेट किया पत्रकार मनोज यादव को

सहारा आगरा ब्‍यूरो के हेड रहे मनोज यादव को भ्रष्‍टाचार के आरोप में कंपनी से टर्मिनेट कर ‍दिया गया है. सहारा ने यह फैसला लंबी जांच पड़ताल के बाद लिया है. बताया जा रहा है ‍कि सहारा में साल भर पहले हुए सत्‍ता परि‍वर्तन के दौरान मनोज यादव ने रमेश अवस्‍थी का साथ छोड़कर स्‍वतंत्र ‍मिश्र का हाथ थाम लिया था. मनोज यादव को रमेश अवस्‍थी ने ही आगरा का ब्‍यूरो हेड बनवाया था. मनोज यादव का टर्मिनेशन सहारा अखबार में फोटो छापकर किया गया है. इस पब्लिक नोटिस का प्रकाशन राष्ट्रीय सहारा के सभी संस्करणों में किया गया है.

मनोज यादव पर करप्शन के कई आरोप थे जो जांच में सिद्ध हुए. मनोज पर कंपनी के कई लाख रुपये दबाने के भी आरोप हैं. मनोज काफी पहले सस्पेंड कर दिए गए थे जिसकी खबर भड़ास4मीडिया पर भी प्रकाशित की गई थी. मनोज को सस्पेंड करके एसआईएमसी, नोएडा के साथ अटैच कर दिया गया था. उन्हें अब बर्खास्त कर दिया गया है. सहारा में छपी बर्खास्तगी की नोटिस इस प्रकार है…

द पायोनियर, दिल्ली से सिद्धार्थ मिश्र और कंचन गुप्ता का इस्तीफा

अंग्रेजी अख़बार "द पायोनियर" को तगड़ा झटका लगा है. अख़बार के दो सीनियर पत्रकारों सिद्धार्थ मिश्र और कंचन गुप्ता ने इस्तीफा दे दिया है. दोनों अख़बार के एसोसियट एडिटर थे. सिद्धार्थ मिश्र दिल्ली में सिटी रिपोर्टिंग के इंचार्ज थे और साथ में द पायोनियर के चंडीगढ़, देहरादून और रांची एडिशन के प्रभारी थे. कंचन गुप्ता अख़बार के एडिटोरियल पेज के प्रभारी थे. दोनों अख़बार के मालिक-संपादक चन्दन मित्रा के काफी करीब माने जाते थे. सिद्धार्थ मिश्र लगभग 18 सालों से पायोनियर से जुड़े थे जबकि कंचन भी लगभग एक दशक से पायोनियर में काम कर रहे थे. इन दोनों का इस समय जाना पायोनियर के लिया घातक साबित हो सकता है.

अख़बार की माली हालात वाइस प्रेसिडेंट दरबार गांगुली के जाने के बाद से ही ख़राब चल रही है. गांगुली ने अपना नया अख़बार – मिल्लेनियम पोस्ट – इसी महीने लांच किया है और पायोनियर के दिल्ली और लखनऊ कार्यालय से लगभग पूरी मार्केटिंग और सर्कुलेसन टीम उनके साथ जुड़ गई है. ऐसा माना जा रहा है कि सिद्धार्थ मिश्र और कंचन गुप्ता भी जल्द ही गांगुली को ज्वाइन करेंगे. सिद्धार्थ मिश्र के जाने से पायोनियर के चंडीगढ़, देहरादून और रांची एडिशन पर भी संकट के बादल छा गए हैं. माना जा रहा है कि इन जगहों से भी पायोनियर के पत्रकार जल्द ही अख़बार से इस्तीफा देंगे. हाल के दिनों में पायोनियर से लगभग दो दर्जन पत्रकारों ने इस्तीफा दिया है लेकिन इनकी जगह पर नई भर्ती नहीं की गई है. पत्रकारों को इस साल इन्क्रीमेंट भी नहीं दिया गया. पायोनियर अख़बार के साथ साथ ग्रुप द्वारा निकली जाने वाली रेल बंधु समेत अन्य पत्रिकाएं भी भारी घाटे में चल रही हैं. आने वाले दिनों में पायोनियर में और उथल पुथल मचने की संभावना है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

हिंदुस्तान के मेरठ आफिस पर दर्जनों हथियारबंद युवकों का धावा, फायरिंग

बीती रात की खबर है. करीब एक बजे दर्जनों हथियारबंद युवकों ने हिंदुस्तान के मेरठ आफिस पर धावा बोल दिया और जमकर फायरिंग की. ये युवक मेरठ विश्वविद्यालय के बताए जाते हैं. रात एक से चार बजे तक हंगामा चलता रहा. कुछ पत्रकारों के भी घायल होने की सूचना है. बताया जाता है कि कापी एडिटर पारिजात तिवारी की आफिस के नीचे बाइक सवार दो युवकों से किसी बात पर कहासुनी हुई. उसके बाद वे लड़के दुबारा दर्जनों की संख्या में अपने साथियों को लेकर आए जिनके हाथों में तमंचे, डंडे, राड, हाकी, बैट आदि थे. ये लोग हिंदुस्तान आफिस में घुसने लगे.

यह देख पत्रकारों ने आफिस अंदर से बंद कर लिया और सेकेंड फ्लोर की छत से युवकों को भगाने के लिए जो भी सामान मिला उसे फेकने लगे. नीचे खड़े युवकों ने भी जमकर फायरिंग की. ग्राउंड फ्लोर पर एचआर व एकाउंट आफिस में जमकर तोड़फोड़ की. बाद में पुलिस आई तो सभी भागे. इस घटना से मेरठ के मीडियाकर्मियों में हड़कंप है. हिंदुस्तान का आफिस मेरठ विवि के करीब है. बदमाश युवक बाद में विवि की तरफ ही भाग गए. पुलिस की हिम्मत विवि में घुसने की नहीं पड़ी. बड़े अफसर मौके पर पहुंच गए.
 

45 लाख रुपये लेकर भागा टीवी रिपोर्टर

मुंबई : पिछले सप्ताह एल. टी. मार्ग पुलिस स्टेशन में 45 लाख रुपये की चोरी में जो चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई गई है, उसमें एक पूर्व टीवी रिपोर्टर कमलेश सिंह का भी नाम है। क्राइम ब्रांच की यूनिट- दो ने इन चार में से एक आरोपी जितेंद्र चौरसिया को गिरफ्तार कर लिया है। जितेंद्र ने सीनियर इंस्पेक्टर निशिकांत पाटील, भास्कर कदम व हृदय मिश्रा की टीम को बताया कि चोरी का रुपया कमलेश व उसके चचरे भाई लकी के पास है।

क्राइम ब्रांच अधिकारियों के अनुसार, कमलेश ने टीवी चैनल के अलावा किसी छोटे पेपर में भी काम किया हुआ है। वह राकेश सेन की गोल्ड एजेंसी में काम करता था। उसका काम था अपने साथियों के जरिए राकेश सेन द्वारा बेचे गए गोल्ड का रुपया कलेक्ट करना। कमलेश के अंडर में काम करनेवाले लड़के ये रुपये मुंबई में अलग-अलग जगह से इकट्ठा करके कमलेश को देते थे और कमलेश फिर इन्हें राकेश सेन को देता था, लेकिन पिछले सप्ताह कमलेश ने राकेश को ये रुपये दिए नहीं और वह व उसके अन्य साथी भाग गए। (साभार : एनबीटी)

भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर दैनिक सवेरा से जुड़े विजय

दैनिक भास्‍कर, भदौड़ से खबर है कि विजय जिंदल ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे काफी समय से भास्‍कर से जुड़े हुए थे. विजय ने अपनी नई पारी कुछ दिन पहले लांच हुए अखबार दैनिक सवेरा से की है. दूसरी तरफ विजय के इस्‍तीफा देने के बाद खाली हुए स्‍थान पर पटियाला के पत्रकार मखन गोयल को लाया गया है. मखन पर कुछ मामलों में आरोप भी हैं.

प्रो. धूमल के हाथों शिमला से लांच हुआ ‘हिमाचल दस्‍तक’

लम्‍बे इंतजार के बाद आखिरकार शिमला से 'हिमाचल दस्‍तक' की लांचिंग कर दी गई। सोमवार को धूमधाम से राज्‍य के मुख्‍यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने इस अखबार की लांचिंग की। हिमाचल दस्‍तक के मालिक हैं केपी भारद्वाज। केपी लम्‍बे समय तक 'दिव्‍य हिमाचल' अखबार के एमडी रह चुके हैं। वहां से निकलने के बाद ही उन्‍होंने 'हिमाचल दस्‍तक' के लांचिंग की योजना बनाई थी परन्‍तु बीच में कुछ परेशानियों की वजह से इस अखबार की लांचिंग में देर हो गई।

लांचिंग के बाद सीएम प्रो. धूमल ने कहा कि समाज के सभी वर्गों में आज विश्वसनीयता का संकट है। यह समय की आवश्यकता है कि मीडिया से जुड़े व्यक्तियों को इससे उबरने के लिए आगे आना चाहिए क्योंकि मीडिया ने स्वतन्त्रता आंदोलन तथा इसके पश्चात् राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्‍होंने कहा कि समाज के सभी वर्गों में मूल्यों का ह्रास चिंता का विषय है, जिसे समाज एवं राष्ट्रहित में बनाए रखने की आवश्यकता है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में लोग हर क्षण विश्व भर में हो रही घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना करने के इच्छुक रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में लोग चैनलों पर अधिक निर्भर रहते हैं और उन्होंने अपने दर्शकों के साथ विश्वसनीयता स्थापित की है। विभिन्न मीडिया में ‘पेड न्यूज़’ का प्रचलन पत्रकारिता की उच्च परंपराओं एवं मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने वर्ष 2009 में हिन्दी दैनिक जनसत्ता में प्रकाशित विख्यात पत्रकार श्री प्रभाष जोशी द्वारा लिखे लेख ‘जब सिपाही चोर हो गया’ का उदाहरण दिया, जिसमें उन्होंने पत्रकारों की जिम्मेवारियों एवं मूल्यों के बारे में लिखा।

अखबार के संपादक हेमंत शर्मा ने समाचार पत्र के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत जानकारी दी। इस अवसर पर विधायक एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री सतपाल सिंह सत्ती, विधायक श्री सुरेश भारद्वाज और श्री राकेश पठानिया, हिमुडा के उपाध्यक्ष श्री गणेश दत्त, हिमाचल प्रदेश राज्य मीडिया सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष श्री अशोक कपाटिया, पुलिस महानिरीक्षक श्री अशोक शर्मा, समाचार पत्र के अध्यक्ष श्री के.डी. श्रीधर और प्रबंध निदेशक श्री के.पी. भारद्वाज तथा मीडिया से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।


Daily Newspaper 'Himachal Dastak' launched

Prem Kumar Dhumal, Chief Minister said that of late there had been crisis of confidence in all sections of the society and need of the hour was that media persons should take a lead as it had always remained instrumental in the freedom movement and thereafter Nation building.  He was speaking on the occasion of launching of  Hindi daily ‘Himachal Dastak’ unveiling the first edition of the newspaper, here today.

Chief Minister said that deterioration of values in all sections of the societies was a matter of concern, which need to be instilled in the larger interest of the society as well as Nation. Chief Minister said that in the present age of information technology people were keen to keep themselves abreast of the happenings taking place the world over with every passing moment.  He said that in such conditions people rely more on the channels which had build their credibility with the readers and viewers of the channels.  He said that the practice of paid news in different media was also contrary to the high traditions and ethics of journalism.  He cited an example from an article which had been written by renowned journalist Shri Prabhash Joshi and appeared in Hindi daily Jansatta in year 2009 with title ‘Jab Sipahi Chor Ho Gaya’ wherein he had written about the responsibilities of journalists and ethics.

Prof. Dhumal said that regional editions of newspapers had fragmented the information dissemination system and were also depriving readers of the entire happenings elsewhere.  He said that media being fourth pillar of the democracy acts as watchdog over the activities of the other three pillars and bridges the gap between the governors and the governed thereby binding the entire society into a strong bond of unity.  He appreciated the effort of the organization to bring out a complete single edition and hoped that it would come to the expectations of the people.

Shri Hemant Sharma, Editor of the Himachal Dastak apprised the audience of the contents to be included in the newspaper. Shri Satpal Singh Satti, MLA and President, State BJP, Shri Suresh Bhardwaj and Shri Rakesh Pathania, MLAs, Shri Ganesh Datt, Vice Chairman, HIMUDA, Dr. Ashok Kapahtia, Vice Chairman, HP State Media Advisory Committee, Shri Ashok Sharma, Inspector General of Police, Shri K.D.Sridhar, Chairman and Shri K.P.Bhardwaj, Managing Director of the newspaper and other prominent persons were present on the occasion among others.

Both Reports by Bijender Sharma.

ट्राई के आदेश से उलझन में न्‍यूज चैनल

तर्कसंगत और व्यावहारिक सुधारों के उलट काम करने की यूपीए सरकार और इसके ओहदेदारों की आदत बन गई है. 30 अप्रैल को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने एक आदेश जारी किया और इसमें केबल टेलीविजन नेटवर्क्स (नियमन) संशोधन कानून दिसंबर 2011 को लागू करने के तौर-तरीकों का ब्योरा देने को कहा गया. आदेश की एक विवादास्पद धारा ने ब्रॉडकास्टिंग बिजनेस खासतौर से टीवी न्यूज को मुश्किल में डाल दिया है. इससे एक अच्छे कानून या सुधार के बेपटरी होने का खतरा खड़ा हो गया है.

2011 के इस कानून का मुख्य मकसद है कि केबल टेलीविजन नेटवर्क एक तय समय अवधि के भीतर पुरानी एनालॉग टेक्नोलॉजी की बजाय नई डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाएं. देश के चार मेट्रो शहरों के लिए यह समय सीमा जुलाई 2012 है. जबकि पूरे देश में इसे साल 2014 तक लागू करना है. टेक्नोलॉजी बदलने से केबल नेटवर्क्स को क्षमता के लिहाज से राहत मिलेगी, जिसकी वजह से वे फिलहाल सीमित संख्या में चैनल्स प्रसारित कर पा रहे हैं.

एनालॉग सिग्नल सिस्टम में किसी एक चैनल के प्रसारण के लिए 7-8 मेगाहर्ट्ज बैंडविड्थ की जरूरत होती है जबकि डिजिटल सिस्टम में इतनी ही बैंडविड्थ पर 10-15 चैनलों को प्रसारित किया जा सकता है. डिजिटल सिस्टम में दर्शकों के पास देखे जाने वाले चैनलों के मामले में कहीं ज्‍यादा विकल्प होंगे. डिजिटाइजेशन से दर्शकों को बेहतर पिक्चर क्वालिटी और हाई डेफिनीशन जैसी सहूलियत मिलेगी. साथ ही साउंड क्वालिटी भी बेहतर होगी. क्षमता में 10-15 गुना इजाफे से इंडस्ट्री को कारोबार आगे बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है. ऐसी उम्मीद थी कि डिजिटाइजेशन से ब्रॉडकास्टर्स को पुराने सिस्टम के जबरिया फीचर-कैरिज फी से छुटकारा मिल जाएगा. ब्रॉडकास्टर्स को मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (एमएसओ) को भुगतान करना होता है.

मिसाल के तौर पर देश भर में प्रमुख केबल नेटवर्क्स पर मालिकाना हक रखने वाले हैथवे और डिजिकेबल फ्रेंचाइजी के रूप में मोहल्ले के केबल ऑपरेटर्स को सर्विसेज देते हैं और अपने सिग्नल को घरों तक पहुंचाते हैं. चूंकि, एमएसओ की सिग्नल ट्रांसमिट करने की क्षमता सीमित होती है, ऐसे में कैरिज फीस एक तरह की प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया है जो कि इस बात को सुनिश्चित करती है कि ब्रॉडकास्टर का चैनल दर्शकों तक पहुंचे. ट्राई के आदेश की धारा में कैरिज फी हटाने की बजाय इसे बनाए रखने की अनुमति देने की बात कही गई है. कैरिज फीस ब्रॉडकास्टर्स का वित्तीय बोझ बढ़ाने वाली है, खासतौर से न्यूज चैनलों का, जो निःशुल्क अपनी सेवाओं का प्रसारण करते हैं. आदेश की धाराओं के मुताबिक, प्राधिकरण ने फैसला किया है कि हर एमएसओ एक कैरिज फी तय कर सकता है. यह भी कहा गया है कि डिजिटल एड्रेसेएबल केबल टीवी सिस्टम लागू करने में मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों के किए गए बड़े निवेश और चैनलों की कैरिज कास्ट के बोझ को ब्रॉडकास्टर्स भी साझा करें.

इस आदेश को लेकर द न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) खासी नाराज है. एसोसिएशन ने 1 मई को जारी बयान में कहा है कि यह कैरिज फीस ब्रॉडकास्टर्स को गलत तरीके से दंडित करती है और इससे ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है. टाइम ब्रॉडकास्टिंग के सीईओ सुनील लुल्ला का अनुमान है कि हर साल कैरिज फीस करीब 2,500-3,000 करोड़ रु. पड़ती है. उनका कहना है कि इस रकम के आधे हिस्से का भुगतान न्यूज ब्रॉडकास्टर्स करते हैं. एनडीटीवी के एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन और एनबीए के प्रेसिडेंट केवीएल नारायण राव का कहना है कि ''कैरिज फीस किसी न्यूज ब्रॉडकास्टर की कुल लागत के 30 फीसदी के बराबर तक हो सकती है. ऐसे में यह एक बड़ा बोझ है. इस रकम का इस्तेमाल कंटेंट सुधारने में किया जा सकता है.'' दूसरे ब्रॉडकास्टर्स की तरह राव कैरिज फीस को खत्म करने की उम्मीद कर रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि यह एक्ट पूरी तरह से केबल ऑपरेटरों के पक्ष में है.

लेकिन ऑपरेटर इससे सहमत नहीं हैं. एमएसओ अलायंस के प्रेसिडेंट अशोक मनसुखानी का कहना है कि नई टेक्नोलॉजी लागू करने की पूरी लागत भला अकेले ऑपरेटर्स ही कैसे उठा सकते हैं? 10 करोड़ घरों के लिए इसकी लागत करीब 35,000 करोड़ रु. है. उनका तर्क है चूंकि डिजिटाइजेशन का फायदा ब्रॉडकास्टर्स को भी होगा, ऐसे में उन्हें भी इस बोझ को साझा करना चाहिए. उनका कहना है कि ब्रॉडकास्टर्स खासतौर से एनबीए इसका सबसे ज्‍यादा विरोध कर रहा है. लेकिन ज्‍यादा दर्शक और मजबूत सब्सक्रिप्शन बेस से उसे ही इसका सबसे ज्‍यादा फायदा होगा. इन दोनों चीजों का इस्तेमाल ज्‍यादा विज्ञापन आमदनी हासिल करने में किया जा सकता है. इसका इकलौता विकल्प ग्राहकों से ऊंचा शुल्क वसूलना है. लेकिन मनसुखानी बढ़ा हुआ बोझ ग्राहकों पर नहीं डालना चाहते हैं.

ट्राई का आदेश इस तर्क को स्वीकार करते हुए स्पष्ट करता है कि कैरिज फीस नई टेक्नोलॉजी लाने और मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों की क्षमता बढ़ाने पर आने वाले खर्च को वहन करे, ऐसी उसे अपेक्षा है. ट्राई के सचिव राजीव अग्रवाल का कहना है, ''हमने ब्रॉडकास्टर्स पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं डाला है. कैरिज फीस पहले से ली जा रही है.'' हालांकि ट्राई का दावा है कि उसने व्यवस्था को और पारदर्शी बना दिया है. 30 अप्रैल के आदेश में कहा गया है कि हर मल्टी सिस्टम ऑपरेटर एक रेफरेंस इंटरकनेक्ट ऑफर छापेगा. इसमें उसे अपनी कैरिज फीस की जानकारी देनी होगी, जिसको कि एक समान, गैर भेदभावपूर्ण और पारदर्शी तरीके से लागू किया जाना चाहिए. हालांकि, लुल्ला ट्राई के तर्क से असहमत हैं. उनका कहना है कि ''अगर आप किसी खास बिजनेस में हैं तो आपको उसमें निवेश करना पड़ता है. उस निवेश का बोझ भला दूसरों पर क्यों डाला जाना चाहिए?''

अग्रवाल मानते हैं कि जब ब्रॉडकास्टर्स को अपनी हर राय रखने का अधिकार है तो ऐसे में किसी तरह का विवाद नहीं होना चाहिए. उनका तर्क है कि जैसे ही मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों की क्षमता बढ़ेगी कैरिज फीस लेने से जुड़ी उनकी  मोलभाव की क्षमता घटेगी. उनका कहना है, ''मौजूदा समय में वे कैरिज फीस ले सकते हैं क्योंकि अभी उनकी क्षमता बहुत सीमित है. क्षमता बढ़ाने के लिहाज (औसतन 200 से 500 चैनल) से हमने इसे अनिवार्य बना दिया है. उनका कहना है कि क्षमता बढ़ाने के बाद उन्हें चैनल्स के पास जाना होगा और सिग्नल मांगने होंगे. तब मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों की बाजार को प्रभावित करने की ताकत सीमित हो जाएगी.'' लेकिन राव इन बातों से आश्वस्त  नहीं हैं.

लुल्ला का कहना है कि दिशा निर्देश पूरे विवरण के साथ तैयार नहीं किए गए हैं. ऐसे में अगर मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों को कैरिज फीस का भुगतान नहीं किया जाता है तो वे चैनल का प्रसारण करने से मना कर सकते हैं. उनके मुताबिक, ''मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं होती, अगर ट्राई ने यह कहा होता कि 500 चैनलों से ज्‍यादा लेने पर कैरिज फीस ली जा सकती है, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है.''

राव का तर्क है कि प्राधिकरण को इससे जुड़ी उलझनों को लेकर सफाई पेश करनी चाहिए, ताकि किसी भी अनिश्चितता से बचा जा सके. उन्होंने कहा कि 30 अप्रैल के दिशा निर्देश में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि कैरिज फीस क्या होनी चाहिए? राव के मुताबिक, ''ट्राई का यह भी कहना है कि कैरिज फीस के उचित न होने पर ही वह इस मामले में दखल देगा. लेकिन अहम सवाल यह है कि यह कौन बताएगा कि कैरिज फीस कब अनुचित है?''

लुल्ला एक दूसरी समस्या की ओर इशारा करते हैं,''मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों का व्यवहार अनुचित होने की स्थिति में ट्राई में उनके खिलाफ अपील करने की प्रक्रिया में वक्त लगेगा. इसमें एक महीने या इससे कहीं ज्यादा का वक्त लग सकता है. इस बीच की अवधि के दौरान क्या होगा? क्या इस अवधि में चैनल का प्रसारण बंद हो जाएगा? ऐसी स्थिति बनने पर इसका खामियाजा कंज्यूमर और ब्रॉडकास्टर को भुगतना होगा. साथ ही ब्रॉडकास्टर के दर्शकों की संख्या में गिरावट आएगी.''

ट्राई पीछे हटने को तैयार नहीं है. अग्रवाल का कहना है, ''हम अपने सभी आदेशों को अच्छी तरह से विचार करने के बाद जारी करते हैं.'' नियामक संस्था ट्राई का यह आदेश इसके चेयरमैन जे.एस. सरमा के कार्यकाल के तीन साल पूरा करने के महज दो हफ्ते पहले आया है. सरकारी नियम उन्हें दूसरे कार्यकाल की इजाजत नहीं देते हैं. ट्राई के अगले चेयरमैन 15 मई के बाद कार्यभार संभालेंगे, उन्हें अपने पूर्ववर्ती आदेशों के परिणामों को झेलना होगा. सरकार और रेगुलेटर चीजें दुरुस्त करने में नाकाम रहे हैं. इसका कंज्यूमर और बिजनेस पर असर पड़ेगा. हालांकि, नए टेलीकॉम रेगुलेटर के पास सुधार करने का मौका होगा. (साभार : इंडिया टुडे)

ब्‍लॉगर योगेश शीतल ने खोली राजद सांसद के ‘हवा हवाई’ किराए की पोल

: ब्‍लॉग पर प्रकाशित होने के सप्‍ताह भर बाद मुख्‍य धारा की मीडिया में आई खबर : सोशल मीडिया कई जगहों पर मुख्यधारा की मीडिया को ओवरटेक करता हुआ दिख रहा है. निर्मल बाबा, अग्निवेश टेप प्रकरण, राडिया टेप के खुलासे, बरखा दत्त का इंडिया गेट पर से भागने की खबर और अभिषेक मनु सिंघवी की लीला के सार्वजनिक हो जाने के बाद ताजा मामला राजद के संसद द्वारा हवाई अड्डे से घर तक हवाई खर्चे क्लेम करने का है.

सूचना के अधिकार को सूत्र बनाकर हासिल की गई ये खबर बिना किसी मीडिया हाउस की चौखट छुए ही एक बड़ी खबर बनती दिख रही है. 30 अप्रैल को ये खबर योगेश कुमार शीतल के ब्लॉग पर प्रकाशित की गई थी. उसके बाद इस पर ट्वीटर पर बहस शुरू हुई और अब खबर है कि द सन्डे गार्डियन ने इसे प्रकाशित किया है. नीचे संडे गार्डियन में प्रकाशित खबर


RJD MP Umashankar claimed airfare to town without an airport

An RJD MP has claimed from the Lok Sabha Secretariat airfare to visit his place of residence in Bihar's Siwan, a town that does not have an airport. The matter came to light in response to RTI applications filed with the Lok Sabha and the Rajya Sabha to find out how much MPs have spent in the form of travel allowance (TA) and dearness allowance (DA) in a year.

The TA/DA bills of Umashankar Singh, RJD MP from Maharajganj in Bihar show that on 10 June 2009, he travelled from Delhi to Patna by train and from Patna to his residence in Siwan by air. Interestingly, the other details that are required to be furnished in a prescribed form were incomplete when it came to mode of travel. The form was signed by the MP.

Singh had left Siwan on 21 May 2009 by road for Patna and had taken a flight from Patna to Delhi the same day, in order to attend a Parliament session. The discrepancy cropped up in his return journey. On 2 November 2009, the MP visited Delhi to attend a meeting of the parliamentary committee on empowerment of women, and returned after two days, but did not provide other details.

After the discrepancy was found, a letter was sent to Lok Sabha Speaker Meira Kumar, requesting an audit by the CAG to evaluate the claims made by MPs and money paid by the Parliament Secretariat. "The reply received from the Secretariat shows a very casual attitude when it comes to payment for such claims. The discrepancies were attributed to oversight," said B.N.P. Singh, a retired wing commander and a resident of Greater Noida who filed the RTI.

When contacted, Umashankar Singh claimed that he did not take airfare for going to Siwan, but failed to provide evidence in this regard. "The documents are in Siwan," he said. But when his attention was drawn towards the MSA branch documents signed by him, he said, "I don't know what is written in those bills."


योगेश शीतल के ब्‍लॉग पर एक सप्‍ताह पहले प्रकाशित खबर –

हवाईअड्डे से घर तक के लिए सांसद ने क्लेम किया हवाई किराया

सूचना के अधिकार के तहत मिले दस्तावेज से राजद के एक सांसद की कलई खुलने लगी है। महाराजगंज से सांसद उमाशंकर सिंह ने सत्र में भाग लेने के लिये मिलने वाले यात्रा भत्ते को बढाचढा कर दिखाया है। यह आरोप किसी नेता ने नहीं बल्कि लोकसभा सचिवालय से आरटीआई के माध्यम से हासिल किये दस्तावेज लगा रहे हैं। आरटीआई में उमाशंकर सिंह द्वारा 21 मई, 2009, 7 सितंबर 2009, 5 फरवरी 2010 और 4 नवंबर,2009 के यात्रा की जानकारी दी गई है। जब इस ब्लॉगर ने उनके मोबाइल नम्बर 9013180102 पर उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने पहले तो ब्लागर को पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया और जोर देने पर उन्होंने कहा कि आरोप झूठे हैं और मामला कोर्ट में है।

सुदर्शन के स्ट्रिंगर पर रेलवे का पेपर आउट कराने का मामला दर्ज

जोधपुर के गीता भवन के पास स्थित सोहनलाल मनिहार सीनियर सेकेण्डरी बालिका विद्यालय में रेलवे की ग्रुप भर्ती परीक्षा के दौरान रविवार सुबह एक टीवी चैनल का स्ट्रिंगर फर्जी रेलकर्मी बनकर अन्दर घुसा और मोबाइल से ओएमआर (उत्तर पुस्तिका) की फोटो खींच ली। उसने ओएमआर शीट आउट करने की कोशिश की लेकिन कक्ष संचालक ने उसे पकड़ लिया तथा मौजूद रेलवे अधिकारियों को सौंप दिया। विद्यालय के प्राचार्य की शिकायत पर प्रताप नगर पुलिस ने आरोपी स्ट्रिंगर के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।

थाना प्रभारी देरावर सिंह ने बताया कि सोहनलाल मनियार सीनियर सेकेण्‍डरी स्‍कूल में रविवार को रेलवे की भर्ती परीक्षा चल रही थी। इसी दौरान जब्‍बर सिंह नामक व्‍यक्ति स्‍कूल में पहुंचा, परन्‍तु सुरक्षाकर्मियों ने उसे गेट पर ही रोक लिया। बाद में उसने अपना परिचय रेलकर्मी के रूप में दिया, जिसके बाद उसे विद्यालय में प्रवेश दे दिया गया। इसके बाद जब्‍बर एक कक्ष के अंदर पहुंचा, जहां परीक्षार्थियों को ओएमआर शीट वितरित की जा चुकी थी तथा प्रश्‍न पत्र बंटने जा रहा था। जब्‍बर एक परीक्षार्थी की ओएमआर शीट लेकर मोबाइल से उसकी फोटो खींचने लगा।

प्रभारी ने बताया कि उसकी यह हरकत देखते ही कक्ष निरीक्षक ने आपत्ति जताई तथा उसे ऐसा करने से मना किया, परन्‍तु उसके न मानने पर कक्ष निरीक्षक ने उसे पकड़कर रेलवे अधिकारियों को सौंप‍ दिया। जब उसे रेलकर्मी होने का प्रुप दिखाने को कहा गया तो वह खुद को रेलकर्मी साबित करने में असफल रहा। पूछताछ में खुलासा हुआ कि वह सुदर्शन चैनल का स्ट्रिंगर है। दूसरी तरफ विद्यालय की प्राचार्य निहारिका चोपड़ा ने उक्‍त स्ट्रिंगर के खिलाफ परीक्षा केंद्र में अनाधिकृत रूप से प्रवेश करने, परीक्षा अधिनियम तथा पेपर आउट करने का प्रयास करने का मामला दर्ज कराया है। पुलिस ने आरोपी को बुलाकर थाने में पूछताछ की, इसके बाद उसे छोड़ दिया गया। पुलिस का कहना है कि जांच के बाद स्ट्रिंगर के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

अपने तीनों समाचार चैनलों को नए नाम से रिलांच करेगा एमसीसीएस

स्‍टार समूह से अपना नाता तोड़ने वाला एबीपी ग्रुप अपने चैनलों को एक जून से नए नाम से रिलांच करने जा रहा है. पूर्व घोषणा के अनुसार एमसीसीएस ने ऐलान किया है कि अब स्‍टार न्‍यूज एक जून से एबीपी न्‍यूज, स्‍टार बांग्‍ला एबीपी आनंद तथा स्‍टार मांझा एबीपी मांझा के नाम से रिलांच किया जाएगा. ये तीनों समाचार चैनल अब पूर्ण रूप से आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप के स्‍वामित्‍व के अधीन रहेगा. इसकी घोषणा एसीसीएस के सीईओ अशोक वेंकटरमानी ने की है. आप भी देख सकते हैं वेंकटरमानी का पत्र. 

असीम और आलोक को अभी भी आपका इंतजार है

असीम और आलोक दोस्त हैं, ये उनकी आपस में पहचान है लेकिन मेरे लिए असीम और आलोक वो दो युवा हैं, जिनमें हमारे मुस्तकबिल की वो उम्मीदें दिखती हैं, जिनको देखने की हमारी पिछली पीढ़ी में हिम्मत ही नहीं थी, लेकिन हमारी पीढ़ी जिसके सपने देखते बड़ी हुई। पर हमारे लिए हमेशा वो सपना, सपने जैसा ही था, हम हमेशा ये ही सोचते रहते कि आखिर कौन लड़ेगा इस सपने के लिए, क्योंकि हमारे पितृ सत्तात्मक परिवारों ने हमेशा हमें सच के साहस की जगह मिथ्या अहम से ही नवाजा, हम बड़े हुए सिर्फ आवश्यक्ताओं से अधिक सुविधाओं को इकट्ठा करने की जद्दोजहद के बीच और हमें शिक्षा मुहैया कराई गई सिर्फ नौकरी पाने के लिए। साफ था कि हमारी पिछली पीढ़ी हमारे अंदर उसी कायरता और नपुंसकता के बीज बो रही थी, जिसे वो उम्र भर जीती आई थी। लेकिन समय हमेशा उत्परिवर्तन लाता है, और पत्थरों में भी अंकुर फूटना केवल मुहावरा नहीं है, लेकिन फिर भी असीम और आलोक मैं चाहता हूं कि तुम ये लड़ाई छोड़ दो।

मेरी बात का बिल्कुल बुरा मत मानना पर ये समझ लो कि ये लोग इस लायक ही नहीं हैं कि इनके खिलाफ लड़ा जाए। वो लोग जिनके लिए बड़ी गाड़ी, बड़ा घर और विदेशों में छुट्टियों के आगे के लक्ष्य ही न बचते हों, क्यों लड़ा जाए आखिर उनके लिए। क्यों उनके हक की आवाज़ बुलंद की जाए, जो अपने लिए ही लड़ने वालों की कद्र और फिक्र न करते हों। असीम और आलोक तुम दोनों आज अस्पताल में पड़े हो और सूखी पत्तियों से ढंकी हुई तुम्हारी जो दरी जंतर मंतर पर बिछी है, सच बताना कितने तथाकथित सरोकारी लोगों ने उसे बैठ कर मैला करने की हिम्मत दिखाई? ये केवल ढोंगी हैं, ये इंतज़ार करते हैं युवा आंदोलनकारियों के शहीद हो जाने का और उसके बाद अपने एनजीओवादी एजेंडों को उन लाशों पर साधने का। हेमचंद्र के साथ इन्होंने ये ही होने दिया, बिनायक सेन के साथ इनमें से कितने खुल के खड़े हुए और तुम कैसे सोचते हो कि ये तुम्हारे साथ आएंगे?

असीम और आलोक लड़ाई लड़ रहे हैं एक कानून के खिलाफ, आईटी एक्ट 2011 के खिलाफ, उसमें हुए उस संशोधन के खिलाफ जो आपकी अभिव्यक्ति के आखिरी बचे ईमानदार माध्यम य़ानी कि वर्ल्ड वाइड वेब पर भी सरकार की असीमित और अराजक सेंसरशिप को काबिज़ करवा देता है। जो साफ तौर पर संविधान के सारे अभिव्यक्ति की आज़ादी के आर्टिकल्स के साथ साथ संविधान की प्रस्तावना-उसकी आत्मा को भी मारने की साज़िश करता है। लेकिन क्या फर्क पड़ता है आफ लोगों को, आप कौन सा इंटरनेट का इस्तेमाल अभिव्यक्ति के लिए करते हैं, बल्कि अभिव्यक्त करने की ज़रूरत ही क्या है?

हां मैं जानता हूं कि आप में से ज़्यादातर को राजनीति में दिलचस्पी नहीं है, तब भी नहीं जब वो आपका और आपके परिवार का मुस्तकबिल तय करती हो… आप धरने-प्रदर्शन में रुचि नहीं रखते, क्या फ़ायदा फ़र्ज़ी बवाल से… अनशन करना भी क्या बेवकूफी है, क्या होता है उससे? दरअसल ये सारे नियम तब बदलते हैं, जब मंदी लौटती है और आपको आपकी ही बहुराष्ट्रीय कम्पनी बिना नोटिस दिए निकाल फेंकती है… और फिर आप राजनीति को कोसते हैं, आप धरना-प्रदर्शन करना चाहते हैं और आपको विरोध के तरीके समझ में आते हैं। दरअसल हम सब सुविधाभोगी हैं और अपनी सुविधा के अनुसार ही धर्म से लेकर राजनीति तक का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी रखते हैं, ठीक उन्हीं नेताओं की तरह जिन्हें हम क़त्ल कर देना चाहते हैं।

और इसीलिए आप इंतज़ार करते हैं कि आपकी लड़ाई असीम और आलोक जैसे आपकी नज़रों में तथाकथित मूर्ख लड़ते रहें, आप इंतज़ार करते हैं कि वो दिन आए जब आप बिल्कुल पंगु कर दिए जाएं और तब तक आप एक नारा भी बुलंद नहीं करते हैं, जब तक पानी आपकी नाक में न घुसने लगे। औऱ फिर आप चिल्लाते हैं…मदद मांगते हैं…और कोई आपकी मदद के लिए नहीं आता है, क्योंकि आप भी तो ये ही कर रहे थे, वो भी वही कर रहे होते हैं।

असीम और आलोक 5 दिन से एक ऐसे कानून के खिलाफ अनशन पर हैं, जो आगे जाकर देश में आवाज़ की आज़ादी का गला घोंटेगा। पिछले 36 घंटे से इन्होंने पानी भी नहीं पिया है, तबीयत बिगड़ने से दोनों आरएमएल अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन आप मत जाइएगा उनके पास। कहीं गलती से वो आपसे कोई उम्मीद पाल बैठे तो? या फिर कहीं आपको उनको देख खुद पर शर्म आ गई तो? कहां हैं हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट… कहां हैं देश की पहरुआ टीम अन्ना? कहां हैं देश के सर्वहारा के सहारे हमारे कामरेड?

फिलहाल असीम त्रिवेदी और आलोक दीक्षित को भूखे रहने और डीहाइड्रेशन से तबीयत काफी बिगड़ जाने की वजह से जंतर मंतर पर मौजूद पुलिसफोर्स ने ज़बरन राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती करा दिया है। असीम और आलोक आईटी एक्ट 2011 में गुपचुप संशोधन के द्वारा इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलने की सरकारी साज़िश के खिलाफ़ पिछले 5 दिन से जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे थे… और पिछले 24 घंटों से उन्होंने जल भी त्याग दिया था… देखिए ज़रा कि कैसे देश के दो युवा जो सुनहरे करियर को चुन सकते थे… भूख से बीमार हो अस्पताल पहुंच जाते हैं… और सरकारों के कानों पर जूं नहीं रेंगती… सरकार जो जनता के लिए है… जनता के द्वारा है… और जनता की है… संविधान जो कुछ कहता है, अब मज़ाक सा लगने लगा है… अभिव्यक्ति की आज़ादी और नीति निर्देशक तत्वों को सरकारों ने एक बेकार का मज़ाक बना दिया है… संविधान की आत्मा, उसकी प्रस्तावना को ठेंगा दिखाया जाता है… आवाज़ बचाने की ये लड़ाई फिलहाल जारी है… असीम और आलोक अस्पताल से अनशन जारी रखने का एलान कर चुके हैं… लेकिन सवाल आपसे है कि कितने असीम और आलोक कुर्बानी दें कि आप जागेंगे… आपकी चुप्पी और उपेक्षा ने आपके लिए सवाल खड़े किए हैं… कब तक असंवेदनशील रहेंगे… कैसे समाज को बनाएंगे… कैसी दुनिया देकर जाएंगे अपनी आने वाली पीढ़ी को… इंतज़ार रहेगा कि कल को आपके घर भी असीम और आलोक पैदा हों… और तब भी आप ऐसी ही असंवेदनशीलता दिखाने की हिम्मत जुटा पाएं…. असीम और आलोक अभी भी आपकी लड़ाई लड़ रहे हैं… आपका इंतज़ार चिरकाल तक रहेगा… आखिरी सांस रहने तक…।

लेखक मयंक सक्सेना टीवी जर्नलिस्ट हैं. कई चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों न्यूज24 को सेवाएं दे रहे हैं.

आशुतोष की किताब और अन्ना आंदोलन पर कुछ सवाल

इस आलेख को लिखने की शुरुआत में ही यह साफ करना चाहूंगा कि देश के करोड़ों लोगों की तरह मैं भी भ्रष्टाचार (घूसखोरी) खत्म करने के अन्ना ही नहीं बल्कि किसी भी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन का समर्थक हूं। जब-जब अन्ना का दिल्ली के रामलीला मैदान या जंतर-मंतर पर धरना-अनशन हुआ, मैं वहां अन्ना टोपी लगाए एक बार जरूर पहुंचा हूं (इस बात के जोखिम के बावजूद कि हमारे तत्कालीन संपादक अन्ना आंदोलन को अच्छी नजरों से नहीं देखते थे)।

हाल में जब मैंने आशुतोष की किताब ”अन्नाः 13 डेज दैट अवैकेन्ड इंडिया” पढ़कर खत्म की तो पूरा आंदोलन फिर से मेरी यादों में जी उठा, लेकिन इसी के साथ फिर से मेरे मन को उन सवालों ने भी कोंचना शुरू कर दिया जो इस आंदोलन की शुरुआत से ही मुझे परेशान करते रहे हैं। अन्ना टीम का कोई भी व्यक्ति मेरा करीबी नहीं है जिससे मैं इन सवालों पर कुछ तर्क-वितर्क कर सकूं। फेसबुक पर आंदोलन के जो कुछ मेरे समर्थक दोस्त मिलते हैं वे विचारों से इतने क्रांतिकारी हैं कि आंदोलन के विरोध में एक शब्द भी सुनना पसंद नहीं करते और अन्ना आंदोलन का विरोध करने वालों के शाब्दिक नरसंहार तक पर उतर आते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि मैं जब तक इन सवालों को उगल नहीं दूंगा, मुझे चैन नहीं मिलेगा और इस पर अपने दोस्तों की राय से ही मेरे मन की उथल-पुथल शांत होगी।

मुझे पुस्तक समीक्षा लिखने नहीं आती, इसलिए यहां मैं समीक्षा लिखने का प्रयास नहीं कर रहा। पुस्तक समीक्षा का मतलब तो मैं यही समझता हूं कि किसी पुस्तक की अच्छाइयों और कमियों पर प्रकाश डाला जाए। अच्छाइयों एवं कमियों का यह अनुपात कितना हो, यह अक्सर लेखक के साथ समीक्षक के व्यक्तिगत रिश्ते से भी तय होता है। अच्छी बात यह है कि सिवाय फेसबुक पर दोस्त रहने के आशुतोष जी से मेरा कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं है। इसलिए मैं अच्छे से चीर-फाड़ कर सकता हूं। आशुतोष एक जबर्दस्त एंकर और सफल संपादक हैं। उनके नेतृत्व वाले चैनल आईबीएन-7 की आक्रामकता का मैं कायल हूं। इस बार उन्होंने अपना हुनर पुस्तक लेखन में दिखाया है। मेरे हिसाब से पुस्तक लेखन एक कला है जो सबको नहीं आती। मैंने कई पत्रकारों की किताबें पढ़ी हैं उनमें कई काफी बोरिंग, अकादमिक टाइप की होती हैं जो कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा मिलाकर बना कुनबा ही लगता है। लेकिन कला के हिसाब से देखें तो आशुतोष इस विधा में भी सफल रहे हैं। तो सबसे पहले आशुतोष की किताब की कुछ अच्छाइयों की बात करता हूं।

वास्तव में यह पुस्तक अन्ना आंदोलन का एक जीवंत इतिहास है और साथ ही इतनी रोचक शैली में लिखी गई है कि यह इतिहास की अकादमिक पुस्तकों से काफी अलग भी है। आशुतोष इस आंदोलन के एक तरह से एम्बेडेड इतिहासकार जैसे रहे हैं जिसने पूरे आंदोलन को कवर करते हुए उसके बारे में लिखा है। जिस तरह से आज़ादी के बाद के इतिहास के लिए हम विपिन चंद्रा या रामचंद्र गुहा की किताबों पर भरोसा करते हैं उसी तरह अब अन्ना के रामलीला मैदान और जंतर-मंतर के इतिहास के लिए लोग आशुतोष की किताब का हवाला देंगे। हालांकि, यह सिर्फ अकादमिक तौर पर लिखी इतिहास की किताब नहीं है। यह किताब काफी रोचक शैली में लिखी गई है और आशुतोष ने इसमें इतिहास से लेकर वर्तमान तक के कई आख्यानों का हवाला दिया है और बीच-बीच में अपनी निजी जिंदगी के भी कुछ संस्मरण पेश किए हैं। पुस्तक की भाषा (अंग्रेजी) भी ऐसी है कि मेरे जैसे अंग्रेजी विरोधी प्रदेश से आए लोगों को भी समझ में आ जाए और साथ ही उन्होंने चेतन भगत की तरह ग्रामर को बहुत तोड़ने-मरोड़ने की जरूरत भी नहीं समझी है।

अब बात करते हैं इस किताब की कमियों पर। आशुतोष के किताब की सबसे बड़ी कमी भी यही है कि उन्होंने एक तरह से एम्बेडेड इतिहास लिखा है। वे पूरी तरह से खुलकर अन्ना आंदोलन का समर्थन करते रहे हैं और यही एक रिर्पोटिंग और इतिहास का एक कमजोर पहलू साबित होता है। हम लोग तो उस पीढ़ी के पत्रकार हैं जिनको एसपी सिंह एवं राजेंद्र माथुर जैसे लोगों के साथ काम करने का मौका नहीं मिला है, लेकिन उनके साथ के लोगों का काम देखकर ही हम कुछ सीखने या अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं कि बेहतरीन पत्रकारिता कैसे की जा सकती है। मेरे मन में यह जिज्ञासा होती है कि आज अगर एसपी होते तो वे अन्ना आंदोलन पर क्या नजरिया रखते? क्या वे आशुतोष जैसे कई पत्रकारों की तरह खुलकर आंदोलन के सिपाही बन जाते या तटस्थ होकर इस आंदोलन की रिपोर्टिंग करने की कोशिश करते? मेरा व्यक्तिगत तौर पर तो यह मानना है कि जब आप किसी आंदोलन या विचारधारा के समर्थक होते हैं तो आप उसकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष तरीके से नहीं कर सकते। जब आप किसी को भगवान मान लेते हैं तो आपको उसकी तरफ से कोई भी गलती या उसमें कोई कमी नहीं दिखती।

मुझे याद है कि जब मैं गोरखपुर में विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता हुआ करता था तो संघ के आनुषांगिक संगठनों के किसी सम्मेलन की खबर बनाते समय कभी भी भीड़ का सही आकलन नहीं कर पाता था। यदि भाजपा की कोई जनसभा हो तो संघ पृष्ठभूमि वाले पत्रकार जहां इसमें उपस्थित लोगों की संख्या लाखों में दिखाते हैं तो उसी सभा को कम्युनिस्ट पत्रकार कुछ हजार में ही समेट देते हैं। एक ही जनसभा में उपस्थित लोगों के आकलन में इतना अंतर कैसे हो सकता है। विचारधारा और पूर्वाग्रह अवरोध खड़े करते हैं और मेरा यह मानना है कि पत्रकार बनने के बाद किसी व्यक्ति को ऐसे सभी पूर्वाग्रहों से दूर हो जाना चाहिए।

भ्रष्टाचार विरोधी किसी आंदोलन का खुलकर समर्थक हो जाने में कोई बुराई नहीं है, हो सकता है कि कल को आशुतोष भी टीम अन्ना के सदस्य हो जाएं, लेकिन हम पत्रकार तो उनसे यह उम्मीद जरूर करते थे कि वे इस बात का मार्गदर्शन करें कि अन्ना आंदोलन की रिपोर्टिंग किस तरह से की जाए। आंदोलन को कवर करने में अगर कमियां दिखें तो उसका खुलासा किया जाए या नहीं। इस मामले में आशुतोष कमजोर पड़े हैं, अंतिम अध्यायों में उन्होंने टीम अन्ना के कुछ निर्णयों पर सवाल उठाए हैं और उसमें मतभेदों की चर्चा जरूर की है, लेकिन पूरे आंदोलन के दौरान उन्हें किसी तरह का कोई हिप्पोक्रैसी नहीं दिखा है जो मेरे जैसे बहुत से सामान्य लोगों को भी देखने को मिला था।

मेरे ख्याल से अन्ना का आंदोलन घूसखोरी खत्म करने के भ्रष्टाचार के सीमित मसले से ही जुड़ा है और इस सीमित मसले को भी पाने में वर्षों लगने वाले हैं क्योंकि इसमें खुद के सुधार पर नहीं बल्कि दूसरों पर अंकुश लगाने पर ज्यादा जोर है। यह भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने का कोई व्यापक आंदोलन नहीं है। भ्रष्टाचार शब्द भ्रष्ट आचरण या विचार से बना है और घूसखोरी तो उसका एक छोटा हिस्सा ही है। अन्ना के आंदोलन में सिर्फ घूसखोरी खत्म करने पर ही जोर है और उसके लिए भी सरकारी कर्मचारियों एवं नेताओं के छोटे से वर्ग को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह मान लिया गया है कि सरकारी कर्मचारियों एवं नेताओं के घूसखोरी पर अंकुश लगाने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। यह आंदोलन युग निर्माण योजना की तरह व्यक्ति में चारित्रिक बदलाव, ‘हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा‘ जैसे तथ्यों पर जोर नहीं देता। यह लोगों के भ्रष्ट आचरण में सुधार लाने का कोई अभियान नहीं है। यह मानता है कि सरकारी कर्मचारियों, नेताओं के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। जबकि भ्रष्टाचार की असल वजह लालच, असीम महत्वाकांक्षा है जो ज्यादातर लोगों के भीतर है। यह आंदोलन उस आम आदमी के भीतर बदलाव की अपील नहीं करता। ‘हमें सुधरने की जरूरत नहीं है, तुम सुधरो‘ यह है इस आंदोलन का नारा।

जरा सोचिए, क्या देश का आम आदमी कम भ्रष्ट है? अन्ना के आंदोलन में जिस मध्यमवर्गीय ‘आम आदमी‘ की भीड़ दिखती है वह वास्तव में अपने जीवन-आचरण में कितना ईमानदार है? वह आम आदमी जो लाइन में लगकर काम कराने में यकीन नहीं करता, जो सड़क पर जेब्रा क्रॉसिंग और रेड लाइट जंप करने को अपनी आदत में शुमार कर चुका है, जो अपने बच्चे का एडमिशन शहर के टॉप स्कूल में कराना चाहता है चाहे उसका बच्चा इसके योग्य हो या नहीं और इसके लिए चाहे कितनी भी सिफारिश या पैसा क्यों न खर्च करना पड़े। जिन नेताओं को हम भ्रष्टाचार के लिए गाली देते हैं, उनके यहां ऐसे ही आम जनता के कितने सिफारिशी पत्र पड़े रहते हैं। वह आम आदमी जो प्रॉपर्टी आधा ब्लैक और आधा व्हाइट में खरीदता है, टैक्स, बिजली की चोरी करता है, वह आम आदमी जो ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिलने पर टीटीई को 100-200 रुपए पकड़ाकर यात्रा करने की कोशिश करता है, वह आम आदमी जो चाहता है कि विवेकानंद और गांधी दूसरे के घर में पैदा हों, उसके घर में नहीं। इस गैर जिम्मेदार आम आदमी को अन्ना के रूप में फिर एक गांधी मिल गया है। वह जानता है कि भ्रष्टाचार का यह आंदोलन उसके लिए काफी आसान है क्योंकि इसके लिए उसे कोई खास त्याग नहीं करना है, सिर्फ राष्ट्रीय झंडा लिए, गांधी टोपी लगाए जंतर-मंतर या रामलीला मैदान पहुंच जाना है।

आशुतोष अन्ना के आंदोलन में जुटने वाली फेसबुकिया पीढ़ी की भारी भीड़ से आह्लादित दिखते हैं, लेकिन उन्हें इस भीड़ की भी हिप्पोक्रेसी नजर नहीं आती। इस भीड़ में बहुत बड़ा वर्ग ऐसे युवाओं का भी था जो ‘मस्ती‘ करने के लिए लोदी गार्डन, बुद्धा गार्डन, पुराना किला की जगह रामलीला मैदान पहुंच रहा था। ऑफिस से देर रात घर के लिए निकलते वक्त मैंने ऐसी ही एक अन्ना समर्थक को बर्कोज रेस्त्रां से लुढ़कते हुए बाहर निकलते देखा जिसे उसके दो साथी संभालकर ले जा रहे थे। इसमें कोई शक नहीं कि फेसबुकिया पीढ़ी ने ही मध्य एशिया के कई देशों में क्रांति की अलख जगाई है, लेकिन क्या भारत में यह युवा अपने आचरण में कोई बदलाव लाने को तैयार हैं? अन्ना के ‘अनुशासन पर्व‘ में शामिल हुआ यह दिल्ली का वही युवा है जो मेट्रो में जरा सा धक्का लग जाने पर आसमान सिर पे उठा लेता है, यही नहीं सड़क पर चलती उसकी गाड़ी को अगर खरोंच भी लग जाए तो वह दूसरे गाड़ी चालक की हत्या तक कर डालता है। जन लोकपाल बन जाने से क्या युवाओं के इस चरित्र में भी कोई बदलाव आ पाएगा?

अन्ना का आंदोलन इस तरह गांधीजी के स्वतंत्रता संग्राम से काफी पीछे रह जाता है। गांधी जी स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही व्यक्ति निर्माण, चरित्र निर्माण पर भी जोर देते थे। अन्ना अपने समर्थकों के सदाचारी होने की कमजोर सी अपील तो जरूर करते हैं, लेकिन यह कोई अभियान नहीं बन पाता। अन्ना अभियान का सारा जोर जन लोकपाल लाने और उसके द्वारा घूसखोरी पर अंकुश लगाने का है। आपने पढ़ा होगा कि गांधी जी ने किस तरह दंगों के समय अनशन कर एक जिद के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम सौहार्द बनाने में सफलता हासिल की थी। मौजूदा सांप्रदायिकता के लिए तो अन्ना का ऐसा तेवर कहीं भी नहीं दिखता है और दुख की बात यह है कि इस आंदोलन के लोग राजनीतिक नेताओं की तरह टोकनिज्म का सहारा लेते हैं, मंच पर मुस्लिम, दलित बच्चों को बैठा कर। अन्ना का आंदोलन आम आदमी के भ्रष्ट आचरण में बदलाव का आंदोलन नहीं है। अन्ना के आंदोलन से व्यापारियों, उद्योगपतियों, स्वयं सेवी संस्थाओं, निजी क्षेत्र के कर्मचारियों या समाज के अन्य वर्गों को भी कोई डर नहीं है क्योंकि जन लोकपाल से उन पर तो कोई अंकुश लगने वाला है। इस बारे में दो काल्पनिक दृश्य प्रस्तुत कर रहा हूं जिसे आप सच भी मान सकते हैं।

दृश्य एक :  चांदनी चौक के व्यापारी गेंदामल फूड इंस्पेक्टर कीमत राय के भ्रष्टाचार से काफी परेशान हैं। गेंदामल की दुकान में काली मिर्च में पपीते का बीज, धनिया पाउडर में लकड़ी का बुरादा, चावल में कंकड़ और अन्य अन्य वस्तुओं में ना जाने किस-किस चीज की मिलावट होती है, लेकिन यह सब लोकपाल के दायरे में नहीं आता। गेंदामल फूड इंस्पेक्टर कीमत राय की काफी इज्जत करते हैं…हर महीने जब कीमत राय अपना हिस्सा (रिश्वत) लेने पहुंचते हैं तो वह अपने भाई से कहते हैं, ‘आ गया कुत्ता, भाई इसे हड्डी डाल दो।‘ पिछले दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन शुरू होने पर गेंदामल की खुशी को कोई ठिकाना नहीं रहा, उन्हें लगा कि लोकपाल आने पर उन्हें ऐसे भ्रष्ट इंस्पेक्टर से मुक्ति मिल जाएगी। उन्होंने बढ़-चढ़कर इस आंदोलन में हिस्सा लिया। यही नहीं, रामलीला मैदान में आए लोगों को खाना खिलाने पर उन्होंने एक लाख रुपए खर्च कर डाले। अन्ना टीम का जन लोकपाल फूड इंस्पेक्टर कीमत राय के घूस पर तो अंकुश लगाएगा, लेकिन गेंदामल के मिलावट पर नहीं क्योंकि यह कोई चारित्रिक शुद्धि का आंदोलन तो है नहीं।

दृश्य दो : एबीसीडी चैनल के रिपोर्टर कुलजीत सिंह के साथ मैं भी जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ को देखकर आह्लादित हूं। रविवार का दिन है और शाम के 4.30 बज चुके हैं, मुझे अब ऑफिस जाकर डेस्क का काम संभालना है। कुलजीत से बताता हूं तो वह कहता है कि मैं भी चलता हूं तुम्हे रीगल तक छोड़ दूंगा, बस दो-चार ‘आम आदमी‘ की बाइट ले लेता हूं। हम लोग भीड़ से बाहर निकलते हुए पीछे की तरफ जाते हैं। कुलजीत पहले एक पति-पत्नी का बाइट लेता है जो एक साथ एक अनूठा बैनर लिए घंटों से कुछ ‘अलग‘ दिखने की कोशिश करते हुए खड़े हैं। इस बीच टीवी कैमरा देखकर बहुत से लोगों की भीड़ लग जाती है, सब अपना-अपना रिएक्शन देना चाहते हैं। कुलजीत को ऐसे दो-तीन बाइट ही चाहिए थे, लेकिन वह सोचता है चलो बाइट लेने में क्या जाता है और वह लोगों को खुश करने की कोशिश में करीब 20-25 मिनट तक आठ-दस लोगों की बाइट लेता है। इस बीच एक बूढ़े अन्ना समर्थक मेरा हाथ खींच-खींच कर बार-बार अपना बाइट लेने को कहते हैं। मैं कुलजीत को जल्दी खत्म करने को कहता हूं क्योंकि मुझे ऑफिस पहुंचने की जल्दी है। कुलजीत भी खीज गया है, वह जल्दी निकलना चाहता है। वह बाइट लेना बंद करता है, लेकिन इस बीच वह बुजुर्ग सज्जन अपना बाइट देने के लिए झगड़ पड़ते हैं, हम वहां से तेजी से चल पड़ते हैं, लेकिन वह सज्जन हमारे पीछे लग जाते हैं और हम वहां से लगभग दौड़ते हुए गाड़ी तरफ बढ़ते हैं। टीवी पर चेहरा दिखाने के लिए पागल ‘आम आदमी‘।

आशुतोष को अन्ना आंदोलन के ये रंग नहीं दिखाई पड़ते। वह आंदोलन में जुटी भीड़ को देखकर पूरी तरह भावनाओं में बह जाते हैं क्योंकि यह भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए चलने वाला दूसरी आज़ादी का आंदोलन है। लेकिन खुद आशुतोष ने यह लिखा है कि आपातकाल के दौरान जेपी के आंदोलन को लेकर भाव प्रवण रिपोर्टिंग की गई थी, लेकिन बाद में उसके बारे में आकलन काफी बदल गया था। हमने यह देखा है कि वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान किस तरह से देश के युवाओं ने उन्हें ‘राजा नहीं फकीर है‘ के नारे के साथ सिर आंखों पर बिठा लिया था और बाद में इस आंदोलन का क्या हश्र हुआ? पत्रकार को किसी आंदोलन की धारा में न बहते हुए उसकी जमीनी हकीकत से रूबरू कराना चाहिए और इस बात की दूरदर्शिता भी रखनी चाहिए कि आंदोलन कितना आगे बढ़ पाएगा। मैं यहां यह नहीं कह रहा कि अन्ना का वही हश्र होगा जो बाद में जेपी या वीपी सिंह के आंदोलन का हुआ, लेकिन मेरा यह जरूर मानना है कि अगर ऐसे आंदोलन की रिपोर्टिंग किसी खुमारी में न की जाए तो उसकी असली तस्वीर जनता के सामने आती है।

इन सबके बावजूद मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अन्ना का आंदोलन भारत में भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए शुरु हुआ अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन है। मैं आशुतोष की इस बात से सहमत हूं कि सत्ता प्रतिष्ठान इस आंदोलन को तरह-तरह से बदनाम करने की कोशिश कर रहा है। मैं इस सरकारी कोरस का हिस्सा नहीं बनना चाहता, मैं तो एक अलग ही राग अलाप रहा हूं। मेरा तो बस इतना मानना है कि यह आंदोलन व्यापक नहीं है और इससे सैकड़ों साल की अवधि में हम सरकारी विभागों में घूसखोरी पर ही कुछ हद तक अंकुश लगा पाएंगे, समूचे तौर पर भ्रष्टाचार को खत्म करने में तो कई युग लग जाएंगे और अगर आम आदमी अपने आचरण में बदलाव नहीं लाता है तो शायद भ्रष्टाचार कभी खत्म न हो।

लेखक दिनेश अग्रहरि वरिष्ठ पत्रकार हैं और फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं। वह एक दशक से भी ज्यादा समय से राजधानी दिल्ली की पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिसमें से उन्होंने करीब आठ साल तक इकनॉमिक टाइम्स (हिंदी), दैनिक भास्कर, नई दुनिया जैसे प्रमुख संस्थानों में आर्थिक पत्रकारिता की है। उनसे agdinesh@gmail.com और 9891308838 पर संपर्क किया जा सकता है। आप यह आलेख उनके ब्लॉग ‘चिनगारी‘-chingaridinesh.blogspot.in पर भी पढ़ सकते हैं।

Freedom Fast : Fifth day of hunger strike for internet freedom

Fifth day of freedom fast continued at Jantar Mantar- Activists were persuasively admitted to Dr. RML Hospital. Aseem Trivedi and Alok Dixit from Save Your Voice continued with the fifth day of their hunger strike to support the ANNULMENT MOTION against IT Rules-2011in the Rajya Sabha. Their main motive is to draw attention of the law makers and government to this issue as well as request all the political parties, including Congress, to support the motion in the RS. Both of them were in a severe condition today as they had completed almost 21 hours of their fast without drinking water and so were forcefully admitted to Dr. Ram Manohar Lohia Hospital at about 5 pm today.

The IT Act 2011, which completely puts a stop to our Freedom of Expression, is currently pending and under discussion in the Rajya Sabha. To dismiss this act, MP P. Rajeev has brought about an ANNULMENT MOTION, which the members of the Parliament have to vote. During their campaign, they have been trying to convince many of the MPs to vote in favour of the motion, but till now, none of them have agreed to do so. If the motion isn't passed during this session of the Parliament, then it will become extremely difficult to dismiss the IT Act

During the last four days, people from various streams and in favour of this cause have visited the campaigning activists at Jantar Mantar, and helped to keep their motive intact. Yesterday they were visited by Arvind Gaur, Director of Asmita Theatre (New delhi), and a few of his associates, who assured them that he would extend his support for the fight for ‘Freedom of Speech & Expression’ in a full-fledged manner.

एक जून से स्‍टार न्‍यूज़ बन जाएगा एबीपी न्‍यूज़

नई दिल्ली: तीन लोकप्रिय समाचार चैनलों का प्रसारण करने वाली मीडिया कंटेंट ऐंड कम्युनिकेशंस सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड यानी एमसीसीएस ने ऐलान किया है कि अब स्‍टार न्‍यूज़ एक जून से एबीपी न्‍यूज़ बन जाएगा. एमसीसीएस के ऐलान के मुताबिक 24 घंटे के तीनों समाचार चैनल स्टार न्यूज अब एबीपी न्यूज़, स्टार माझा अब एबीपी माझा और स्टार आनंद अब एबीपी आनंद के नाम से जाने जाएंगे.

ग़ौरतलब है कि एमसीसीएस, आनंद बाज़ार पत्रिका और स्टार इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का संयुक्त उद्यम है, जो अब केवल आनंद बाज़ार पत्रिका की सहायक कंपनी के तौर पर काम करेगी. हालांकि, चैनल के दर्शकों, ग्राहकों, वितरकों और कर्मचारियों पर कोई असर नहीं पड़ने जा रहा है. चैनल की रुपरेखा और समाचार परोसने की शैली में कोई परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि नए कलेवर में चैनल की गुणवत्ता पहले से ज्यादा अच्छी ही होगी. यही नहीं एंकर्स, रिपोर्टर्स और प्रोड्यूसर जस के तस बने रहेंगे. यानी न चेहरा बदलेगा और न ही खबरों के पेश करने का तरीका, सब पहले ही जैसा होगा. (साभार : न्‍यूज बुलेट)

पत्रकार रोमियो को रिहा करेगा विद्रोही संगठन फार्क

कोलंबिया के सबसे बड़े विद्रोही संगठन फार्क का कहना है कि वो बंधक बनाए गए फ्रांसीसी पत्रकार को रिहा कर देगा. एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर प्रकाशित बयान में कहा गया है कि रोमियो लैंगलोइस नामक इस पत्रकार को पिछले हफ्ते कोलंबिया सेना के साथ हुई मुठभेड़ के दौरान पकड़ा था. माना जा रहा है कि ये वेबसाइट का ये अकाउंट फार्क के ही किसी सदस्य का है. पिछले शनिवार को जब कोलंबियाई सैनिक कोकीन प्रयोगशालाओं को नष्ट कर रहे थे, लैंगलोइस उस घटना की फिल्म बना रहे थे. (बीबीसी)

भड़ास4मीडिया के चार साल : कुछ सुख-दुख आपसे कर लूं साझा

चार साल पहले जब भड़ास4मीडिया डोमेन नेम बुक कराया था तब मैं अपने एक मित्र की नई शुरू हुई मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट के पद पर था. तीस पैंतीस हजार के आसपास तनख्वाह थी. उसके पहले अमर उजाला, दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट अखबारों में करीब बारह-तेरह साल तक नौकरी कर चुका था, ट्रेनी पद से लेकर एडिटर पद तक की. उसके भी पहले सीपीआईएमल और इसके छात्र संगठन आइसा व कल्चरल फ्रंट जन संस्कृति मंच में करीब पांच साल तक सक्रिय रहा, कभी सपोर्टर के रूप में तो कभी होलटाइमर के रूप में. पत्रकारिता में आने के बाद समाज-देश बदलने के आदर्श और शराबखोरी की शुरुआत से उपज रही सनक का जो काकटेल बना तो इसने रुकने का नाम नहीं लिया. इमानदारी, आदर्श, कठिन मेहनत, दुस्साहस, अराजकता, लफंगई-लंठई… आदि के छोरों-दायरों में घूमता-तैरता एक ऐसा वक्त आया जब मेरे लिए मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह नहीं थी.

रेवेन्यू के फेर में दिन प्रतिदिन पैसेवालों के तलवे चाटती मीडिया में न मैं एडजस्ट करने को तैयार था और न यह मीडिया मेरे जैसे आंदोलन से निकले युवक के सरोकार-आग्रह-दुराग्रह को मानने-अपनाने को राजी. नतीजतन एक दिन ऐसा आया कि मैं दिल्ली में आने के छह सात महीने बाद बिलकुल सड़क पर था. पेट पालने के वास्ते मीडिया से मजबूर मोबाइल कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी में शिफ्ट करना पड़ा. कंटेंट के लिए तलवार उठाकर लड़ने वाला बंदा अचानक एक दिन मार्केटिंग करने निकल पड़ा, इस शहर से उस शहर. छह महीने में मार्केटिंग की शुरुआती एबीसीडी समझ में आ गई तो साथ साथ यह भी समझ में आ गया कि अपन नौकरी चाकरी करने लायक बने ही नहीं हैं. मक्खन मैं भी लगाता था / हूं, लेकिन बहुत देर तक नहीं, कोई मक्खन को मजबूरी समझ बैठे तो सारा मक्खन वापस खींचकर उसे दक्खिन भेजने में देर नहीं लगाया. इस अंतर्विरोधी स्वभाव और अबूझ उद्दंडता के कारण मैं खुद के लिए पहेली बनता गया. पिता, घर, परिवार, परिजन… सब पहले ही मुझे कम्युनिस्ट पार्टी होलटाइमर हो जाने के कारण अपने चित्त से उतार चुके थे, और मैं उनको. सो, किसी तरह का माया मोह भी नहीं पलता. पत्नी-बच्चों की जरूरतें उतनी ही हमेशा रहीं जितनी किसी दरिद्रनारायण के परिवार की होती थीं. उनकी तरफ से कोई अतिरिक्त डिमांड व जिद कभी नहीं हुई, सो ख्वाहिश विहीन परिवार के मुखिया के बतौर मेरे पास दुनियावी लिहाज से जिम्मेदार होने लायक कोई वजह नहीं थी. सो सच-झूठ, युद्ध-शांति, भला-बुरा, धर्म-अधर्म, जीवन-मृत्यु आदि के परंपरागत विवादों से दो-चार होते सीखते एक दिन ऐसा आया कि तय कर लिया, अब नौकरी नहीं, जो मन में है उसे करो, बको, निकालो, जो द्वंद्व है उसे प्रकट करो, सुनाओ, चिल्लाओ… और यह सब खुलकर करो, खुलेआम करो, नाम-पता-पहचान के साथ करो….

भड़ास की पैदाइश यहीं से हुई. भड़ास नाम से कम्युनिटी ब्लाग पहले ही बना चुका था. उस प्रयोग के जितने भी अच्छे बुरे अनुभव मिले, वे भड़ास4मीडिया के लिए मजबूत नींव साबित हुए. वर्ष 2008, मई-जुन-जुलाई में स्कूली गर्मियों की छुट्टियों में पत्नी-बच्चे गांव गए तो इधर मैं सब कुछ छोड़कर एक लैपटाप और एक वेबसाइट के जरिए दिन-रात लिखने-अपलोड करने में जुट गया. भड़ास4मीडिया में पेज दर पेज जुड़ने लगे. हिंदी मीडिया इंडस्ट्री के दबे-छुपे सच सामने आने लगे. और मेरे सामने आने लगी एक नई दुनिया, जो नौकर बनकर कभी नहीं दिखी, और न कभी समझ में आई. एक ऐसी दुनिया जिसमें दो तरह के लोग होते हैं. एक पैसे वाले, अर्थात संसाधनों पर काबिज व इसका उपभोग करते लोग. दूसरे संसाधनों के अभाव में ढेर सारे सिद्धांतों, बातों, वादों, दबावों के जरिए जीते-हंसते-गाते-लड़ते-रोते-बेचैन दिखते लोग.

भड़ास4मीडिया के साथ शुरुआती छह महीने बेहद तकलीफ में गुजरे. आर्थिक विपन्नता के उस दौर में आरोप-प्रत्यारोप और दुर्भाग्य के कुछ ऐसे दौर चले, जिसे जीवन में अब मैं कतई याद नहीं करना चाहता और जिसको लेकर कई तरह के प्रायश्चित मेरे मन में अब भी हैं. रोती हुई पत्नी, सहमे हुए बच्चे, अन्न विहीन किचन, दोस्त विहीन मैं… हर पल यातना और संघर्ष का चरम. पर झुकने-दबने का कतई भाव नहीं. यही करना है और सिर्फ यही करना है, न कर सका तो गांव जाकर बाप से लड़कर अपना हिस्सा लूंगा और बोउंगा-काटूंगा. मतलब, दिल्ली में मेरे लिए हालात कुछ इस तरह थे तब जैसे आपके सिर पर पिस्टल लगा दी गई हो व आपके पास सिवाय प्रतिरोध करके बच जाने या मर जाने के अलावा कोई विकल्प न हो. मैंने अकेले अपना काम जारी रखा. झूठ, छल और भ्रम के हर संभव ताने-बाने बुने, और इससे दो-तीन-पांच-दस हजार रुपये इधर उधर से आए तो पत्नी के हाथ में रखा, अन्न खरीदा, घर-गृहस्थी की गाड़ी सरकी. झूठे-सच्चे बहानों के जरिए कर्ज पर कर्ज लेता रहा. और, अपन के आसपास कोई ऐसा भी नहीं था जो बड़ी रकम उधार दे सके, ज्यादा से ज्यादा पांच हजार या दस हजार देने वाले मिले. देहात से शहर आए आदर्शवादी कम अबूझ उद्दंड-बकलंड नौजवान की और कैसी सर्किल बन सकती है.

खैर, छह महीने की अथाह पीड़ा के उस दौर में हजारों खबरें-तस्वीरें आदि भड़ास4मीडिया पर मैंने अकेले अपलोड कर डाले. भड़ास4मीडिया का असर वैसे ही लोगों के सिर चढ़ने लगा जैसे दारू के शुरुआती दो पैग. बेजुबान पत्रकारों को जैसे आवाज मिल गई. बेइमान मालिक-संपादकों को जैसे सांप सूंघ गया हो. पर मैं, इधर-उधर भागता रहा, जीवन जीने के वास्ते, भड़ास4मीडिया चलाने के वास्ते, कुछ पैसे जुटाने के वास्ते. कुछ एक चमत्कारिक किस्म की मदद मिली. चालीस हजार रुपये प्रति माह के हिसाब से एक सरकारी विज्ञापन छह महीने के लिए मिल गया. लगा, जैसे सारा संकट ही दूर हो गया. उस छह महीने की आर्थिक सुरक्षा ने फिर से जिला दिया. उस पैसे ने मुझे, मेरे परिवार को गांव जाने से रोक लिया. भड़ास4मीडिया को बंद होने से बचा लिया. जिस साथी ने वो मदद दिलाई थी, उनका मैं आज भी दिल से आभारी हूं.

उन दिनों ज़िंदगी-मौत से भी जंग लड़ता रहा. रोज किसी न किसी से दिल्ली में लड़ाई होती. धमकियां आती रहती. दिन भर जिन बातों पर गुस्सा होता, रात में शराब पीकर उन कारण बने लोगों से फोन युद्ध में भिड़ जाता. घर का एड्रेस एसएमएस कर देता कि आ, या तो मैं निपटूं या तू निपट, वैसे ही मरा हुआ हूं, मेरा क्या जाएगा, तू सोच. एक आत्मघाती वेदना, चेतना, मानसिकता के साथ, सुसाइडल एप्रोच के साथ भड़ास, दारू और दंगा, तीन कामों में जुटा रहा.  आलोक तोमर जैसे बड़े भाई किस्म के साथी मिले जिन्होंने हौसला बंधाया, कंधा दिया, ढांढस बंधाया. कई और वरिष्ठ-कनिष्ठ-समकालीन लोग संपर्क में आने लगे. एक नया कारवां तैयार होने लगा. आर्थिक दिक्कतें आज भी हैं. मुश्किलें उतनी ही आज भी हैं. बस, दिक्कतें-मुश्किलें व्यवस्थित हो गई हैं सो ये रूटीन बन गई हैं, और यही सब सहज लगने लगा है.

इस 17 मई को जब चार साल पूरे हो रहे हैं तो महसूस कर रहा हूं कि इन चार वर्षों में भड़ास ने मुझको अंदर से बिलकुल बदल कर रखा दिया है. कभी कभी लगता है कि मैं अपना जीवन जी चुका हूं. मोक्ष मिल चुका है. कोई सवाल मन में नहीं बचा है. पूरा ब्रह्मांड और इसके ग्रह-उपग्रह-सागर-अंतरिक्ष आदि जिस तरह से एक्जिस्ट कर रहा है, वह बनने-नष्ट होने की एक सतत प्रक्रिया के कारण अस्तित्व में है, और बनना-नष्ट होना इसकी नियति है. बनना सुख देता है, नष्ट होना कष्ट देता है. सुख और कष्ट की सतत प्रक्रिया में मनुष्यों का होना-खत्म होना और इसके बीच का शुभ-अशुभ संघर्ष निहित है. तभी तो जब भी मैं चिकन, मटन, फिश खाता हूं तो लगता है कि हम मनुष्य कितने स्वार्थी हैं जो मनुष्यों के दुख के लिए तो दिन रात रोते कलपते आंदोलित होते रहते हैं लेकिन इन बेजुबान जीवों ने हमारा क्या बिगाड़ा था… इन्हें क्यों पूरी दुनिया के मनुष्य हर रोज उत्सवी अंदाज में पकड़ते, काटते, बनाते, पकाते, खाते हैं. भावुक, मिडिल क्लास वाली बेवकूफी भरी इस थिंकिंग का जवाब अगले ही पल आ जाता है मेरे पास- अरे मूर्ख, यही बनना-कटना, जन्मना-नष्ट होना, हिंसा-अहिंसा तो इस पृथ्वी, इस ब्रह्मांड का आनंद है.

जहां जीवन नहीं है, वहां जीवन की संभावना के लिए हम पगलाए हैं. वहां जीवन की संभावना की चल रही प्रक्रिया पर सतत नजर गड़ाए हैं कि अगर धरती का सिस्टम बनने-नष्ट होने की चल रही और चलने वाली प्रक्रिया में किसी एक दिन पलड़ा नष्ट होने की तरफ ज्यादा झुक जाए तो कुछ लोग नई जीवन भरी किसी दूसरी धरती को तलाश कर ब्रह्मांड के उस नए ग्रह-उपग्रह वाली धरती पर पहुंच जाएं और फिर से वहां नई शुरुआत करें. स्टीफन हाकिंग से लेकर ढेर सारे विज्ञानियों, खगोलविदों, शोधार्थियों को पढ़ने-जानने के बाद समझ में आता है कि दरअसल हममें से ज्यादातर की सोच-समझ-भावना बस वहीं तक है जहां तक उसे हमें अपने संस्कार, माहौल, परिवेश, चेतना के स्तर व पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता के आधार पर निर्मित कर पाते हैं. और, इससे उपजे बौद्धिक नतीजे को हम अंतिम सच मानकर दूसरों से सतत संघर्ष करते रहते हैं. यही संघर्ष विनाश और सृजन दोनों का कारण बनता है.

बेहतर समाज और देश बनाने का जो संघर्ष चल रहा है, वह क्रांति अशांति शांति सब कुछ अपने में समाए है. और, जो सिस्टम फिलहाल झटके हिचकोले के साथ चल रहा है, वह अपने आप में क्रूरता और उदाहरता, हिंसा-अहिंसा, विनाश-सृजन दोनों समेटे है… और इस सिस्टम में उदारता, अहिंसा, सृजन की मात्रा दिन ब दिन कम होती जा रही है, इसलिए क्रूरता, हिंसा, विनाश के शिकार लोग हर दिन ज्यादा चीत्कार अलग अलग फार्मेट्स में कर रहे हैं. बढ़ती हुई क्रूरता, हिंसा, विनाश से कुछ लोगों का फायदा हो रहा है, उनका संसाधनों पर कब्जा बढ़ता जा रहा है, या यूं कहें कि क्रूरता, हिंसा, विनाश इसलिए भी बढ़ाव पर है क्योंकि कुछ लोग सब कुछ कब्जाना पाना हथियाना चाहते हैं… बची हुई उदारता के कारण बहुत से लोगों का सिस्टम में भरोसा बचा हुआ है जिसके कारण आगे भी किसी खास समय तक सिस्टम के एक्जिस्ट करने की संभावना बची हुई है. फिर यह सिस्टम कभी नष्ट होगा, नया सिस्टम बनेगा, समय के साथ उसमें भी तनाव, क्रूरता, हिंसा पैदा होने लगेगी… एक लयबद्ध क्रम है, जिसे हम इतिहासबोध की कमी के कारण ठीकठीक समझ नहीं पाते, अपने समय के सच को ही अंतिम सच मानकर उसके इर्द गिर्द डोलते उतराते चिल्लाते रहते हैं…

अभी परसों ही तो था मार्क्स का जन्मदिन. फेसबुक पर मैंने लिखा- ''महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा.''

और इसी स्टेटस पर एक साथी की आई टिप्पणी के जवाब में मैंने लिखा- ''मार्क्स का जो द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है, उसे अगर ध्यान से समझ लीजिए तो आपको जीवन व ब्रह्मांड का सूत्र पकड़ में आ जाएगा. पूरा ब्रह्मांड, प्रकृति, देश, सिस्टम, समाज, मनुष्य, जीव-जंतु… एक सतत संघर्ष के जरिए पैदा हुए, हो रहे, होंगे, नष्ट हुए, हो रहे, होंगे… सुख दुख की तरह, जीवन मौत की तरह, आग पानी की तरह, हिंसा अहिंसा की तरह ही क्रांति शांति भी है, अच्छी शांति के लिए क्रांति जरूरी है, वह होगी, हमारे आपके इसमें शामिल होने न होने से रुकेगी नहीं क्योंकि जब अशांति ज्यादा होगी तो क्रांति के जरिए लंबी शांति आएगी, उसी तरह जैसे हिंसा और अहिंसा के समुच्चय, संतुलन से ब्रह्मांड का अस्तित्व है… तो, मार्क्स को पढ़कर आप दरअसल जीवन विज्ञान को समझ लेते हैं..''

मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि किसी भी व्यक्ति और उसके विचार को कट्टरपंथी तरीके से लेने का मैं कतई पक्षधर नहीं हूं. समय, काल-परिवेश और प्रोजेक्ट के हिसाब से चीजें मोडीफाई की जाती हैं. उसी तरह जैसे जिसने जहाज का अविष्कार किया उसने यह फार्मूला नहीं दिया था कि किस तरह पंद्रह हजार किलोमीटर तक मार करने वाली सटीक मिसाइल बनाई जा सकती है. उसने एक रास्ता दिखाया, उसने एक फार्मला दिया. अब उस रास्ते, विचार, फार्मूले की मूल भावना, सूत्र को समझना पकड़ना व उसका विकास करना हमारा काम है.

बहुत सी चीजें समझाई नहीं जा सकतीं. उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते. शब्द हमारी-आपकी भावनाओं को एक हद तक ही अभिव्यक कर पाते हैं और उसमें एक खतरा भी यह होता है कि उसका अर्थ हर कोई अपने अपने हिसाब से निकाल सकने के लिए स्वतंत्र होता है, तो शायद जो कहने वाला कहना चाहता था, वह ठीक से दूसरों तक कनवे नहीं हो पाता. कुछ कुछ मेरे साथ अब वैसा ही हो रहा है. गद्य-पद्य लिखने का मन नहीं होता. लगता है कि क्या ये बच्चों वाला काम करना. केवल गुनगुनाते घूमते रहने को जी होता है. जैसे, खुद को खुद ही समझा रहा होता हूं कि जब सब कुछ समझ बूझ लिया तो अब काहे को भेड़चाल में चलते हुए मिमियाना हिहियाना गाना-गरियाना चाहते हो बंधु.

मीडिया, पालिटिक्स, ब्यूरोक्रेसी, सिस्टम, जनता…. सब एक बड़े फ्राड का निर्माण लगता है. पहले साफ साफ शोषण था. एक शोषक और दूसरा शोषित. अब यही काम घुमा फिराकर और ढेर सारी किताबों कानूनों के नाम पर सभ्य तरीके से किया जा रहा है. कुछ भी तो नहीं बदला. प्रागैतिहासिक काल से लेकर अब तक हमने कुछ भी नहीं बदला. तकनीक, विज्ञान, विकास आदि के नाम पर जो सामूहिक उन्नति हुई है, उसके बाद भी आज सीन मालिक-नौकर वाली ही बना हुआ है. नौकर कभी दास था, मालिक कभी सामंत था. आज नौकर बुद्धिमान है, मालिक संविधान है. बहुत फर्क नहीं है बॉस. गहरे उतरकर देखिए तो जो लड़ाइयां चलती हुई दिख रही हैं, उन सभी में दांव-घात बस यही है कि जो सिस्टम पर कब्जा जमाए हुए हैं, उनकी जमात में घुसना है, उनमें से कुछ को निकाल फेंकना है. यह काम पहले भी होता था, तलवारों-युद्धों के जरिए. आज थोड़ा साफिस्टिकेटेड तरीके से हो रहा है. हर देश में आंतरिक संघर्ष है. कहीं कम, कहीं गरम. कहीं ज्यादा, कहीं नरम. और, हर देश दूसरे देश को बर्बाद करने के लिए औकता से ज्यादा हथियार, सेना, फौज-फाटा तैयार रखे हुए है, उस स्थिति में भी जब उनके यहां की ढेर सारी जनता भूखों, व कई अन्य कारणों से तड़प तड़प कर मर रही है.

पहले भी यही था. राजा महाराजा ऐश करते थे, युद्ध के साजो सामान बटोरते थे, और, ढेर सारी जनता प्रजा बीमारियों, रोगों, उत्पीड़नों, भूख आदि से मर जाया करती थी. हर समय एक संकट रहा है. और अगर आप इस संकट को संकट के रूप में देखते हैं तो फिर आप संकट में हैं. यह संकट ही इस ब्रह्मांड का उत्सव है. इसी कारण समझदार लोग सबसे बड़े निजी संकट, यानि मृत्यु को उत्सव के रूप में देखते रहे हैं. इससे न डरने की सलाह देते रहे हैं. वे खुद को मानसिक रूप से मृत्यु, जीवन, सुख, दुख, भय, हर्ष से मुक्त कर चुके थे. और यह अवस्था एक लंबे भोग, संघर्ष, हाहाकारी किस्म के सामूहिक जीवन यापन के जरिए आती है. हाहाकारी किस्म का सामूहिक जीवन जरूरी नहीं कि हाहाकार बाहर मचाए, यह हाहाकार अंदर मचता है. कोई बहुत अंतर्मुखी व्यक्ति अपने अंदर हाहाकर समेटे हुए हो सकता है और बाहर उसका प्रकटीकरण बिलकुल भी न हो रहा हो सकता है, या जो प्रकट हो रहा हो सकता है वह हमको आपको सामान्य सहज उदगार लग दिख सकता है. गौतम बुद्ध को क्या हुआ था? ओशो को क्या हुआ था? नानक को क्या हुआ था? कबीर को क्या हुआ था? ढेरों उदाहरण हैं सूफियों संतों बड़े मनुष्यों के जिन्होंने जीवन के एक किसी क्षण में ब्रह्मांड के रहस्य को पहचान लिया था. यह रहस्य और फार्मूला कोई बहुत रहस्यमय नहीं था. उसे एक्सप्लेन करके समझा पाना कठिन है इसलिए नासमझ लोग उसे रहस्य व मोक्ष मान बैठे.

एक खास स्तर की बाहरी आंतरिक परिस्थितियां, जीवनचर्या मनुष्य को मोक्ष की अवस्था में ले जाता है जहां वह समभाव की स्थिति में आ जाता है. अपन कुछ कुछ उसी मोक्ष की ओर अग्रसर हैं. निर्मल बाबाओं और पाल दिनाकरण जैसों की कृपाओं के इस दौर में कोई अगर मोक्ष की बात करे तो उसे सिवाय एक नए फ्राड से ज्यादा कुछ नहीं समझा जा सकता, और ऐसा समझना भी चाहिए क्योंकि मनुष्य की चेतना का कोई सगुण प्रकटीकरण संभव नहीं है और जो प्रकट चेहरा मोहरा शरीर दिखता है उसके जरिए किसी के बारे में बहुत कुछ ज्यादा बताया कहा नहीं जा सकता. इस निर्गुण किस्म के बीतरागी अवस्था में भड़ास4मीडिया का चार साल मनाते हुए यह महसूस कर रहा हूं कि मेरे लिए भड़ास वर्ष 2008 में जितना प्रासंगित था, अब उसी अनुपात में बिलकुल अप्रासंगिक लग रहा है. एक धोखे की तरह है यह जिसको जबरन जी रहा हूं. जाने कब यह चोला भी छूट जाए. फिलहाल तो आइए, इसी बहाने कुछ बतियाते कहते सुनाते हैं. मेरे लिए हो सकता है मुक्ति का रास्ता दिख गया है, लेकिन जानता हूं कि हमारे ढेर सारे जन मुक्त होने के लिए तड़प रहे हैं, लड़ रहे हैं, दिन-रात एक किए हुए हैं.

यह मुक्ति दरअसल और कुछ नहीं, अपने भयों से मुक्ति है, अपने समय और अपने समाज के दबावों-आरोपों से मुक्त होने की मुक्ति है. जब आप मुक्त होकर आगे देखने लगते हैं और थोड़ा ठहरकर धैर्य के साथ देखने लगते हैं तब वाकई दुनिया बच्चों के खेल की तरह नजर आती है… वो ग़ालिब साहब कह भी गए हैं, इसी मुक्ति की अवस्था के दौरान कि… ''बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे''. तो ये जो मेरे जन हैं, जो लड़ रहे हैं, तड़प रहे हैं, उनके साथ हूं, और उनके साथ भी हूं जो रोज कट रहे हैं, पक रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं… और उनके साथ भी हूं जो लुट रहे हैं, रो रहे हैं, उदास हो रहे हैं. कभी भी किसी भी दौर में कोई एक अवस्था नहीं लाई जा सकती, कि सभी खुश रहें, कि कोई उदास न हो. और, कोई भी लड़ाई इसलिए लड़ी भी नहीं जाती कि सभी खुश रह सकें और कोई उदास न रहे. खुशी और उदासी, स्थायी भाव हैं, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व है ही नहीं. इसलिए मार्क्सवादी साथी भी यही कहते हैं कि वे एक बड़े तबके के लिए लड़ रहे हैं, जो फिलहाल उदास है, उसे सुख दिलाना चाहते हैं. संघी साथी भी कहते हैं कि बहुसंख्यक के लिए वे लड़ रहे हैं, जो उनके हिसाब से उदास है, दुखी है. सबके अपने अपने खांचे, सांचे हैं और उसी के हिसाब से दुनिया का ढालना बदलना चाहते हैं.

पर मुश्किल ये है कि दुनिया किसी के बदलने से नहीं बदलती, इसके मूल में ही ऐसा अंतर्विरोध है जो हम सबको खुशी-उदासी, बनने-नष्ट होने की प्रक्रिया में डालकर बदलाव पर चलने को प्रेरित-मजबूर करती रहती है. इसका मतलब कि हम आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, ऐसा भी नहीं. आप चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि ये जो मनुष्य का शरीर, चोला धारण किया है ना, वह घुमाता रहेगा, चक्कर कटवाता रहेगा. कभी इस छोर तो कभी उस छोर. तो हम लड़ेंगे उदास मौसम के खिलाफ, पर यह समझ कर कि मौसम से उदासी कभी न जाएगी क्योंकि उदासी है तो सुख-खुशी का एहसास है और उसके लिए संघर्ष है. भड़ास4मीडिया के चार साल होने पर आप सभी से अनुरोध है कि अपनी बात जरूर शेयर करें, चाहें वह जितना भी अस्पष्ट, अमूर्त और अव्यक्त किस्म का हो. मुझे अपनी तारीफ और गालियां, दोनों सुनने का लंबा अनुभव रहा है और इन दो विरोधों को सुनते साधते भी शायद आज शंकर टाइप का हो रहा होऊं. जो कुछ लिखा, उसमें जो गलत लगे, उसे मजाक के रूप में लें, भले स्माइली न लगा रखा हो उन जगहों पर, और जो ठीक लगे उसे प्रसाद के रूप में लें 🙂 , यहां स्माइली लगा दिया, एहतियातन :). क्योंकि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी….

आखिर में. इस 17 मई को दिल्ली में भड़ास की तरफ से एक आयोजन है. उसका पूरा फार्मेट अभी डिसाइट नहीं है लेकिन इतना जरूर डिसाइड है कि उस आयोजन में इस समय के देश के जाने माने जर्नलिस्ट, जो दिल्ली से दूर अपना ठीहा जमाकर पूरे देश की पत्रकारिता के लिए एक बड़े संबल बने हुए हैं, आदरणीय हरिवंश जी, अपना एकल व्याख्यान देंगे. विषय डिसाइड नहीं है, लेकिन जो कुछ मेरे जेहन में है, वो ये कि ''यह समय, मीडिया, सत्ता और मनुष्य की मुक्ति'' जैसा विषय हरिवंश जी को दिया जाए, जिन पर उन्हें सुनना मुझे निजी तौर पर अच्छा लगेगा. और, यह दावे के साथ कह सकता हूं कि दिल्ली के बेदिल चकाचौंध में फंसे-अटके पत्रकारों, बुद्धिजीवियों के लिए हरिवंश जी को सुनना जरूर किसी अदभुत अनुभव सरीखा होगा. हरिवंश जी को अभी तक जितना मैंने पढ़ा है, उसके आधार पर कह सकता हूं कि उनको पढ़कर लगता है कि आज कुछ ठीकठाक बौद्धिक खुराक मिला. उससे ज्यादा उनसे मिलकर उन्हें सुनकर लगता है कि आज किसी ठीकठाक आदमी से मिला और सुना. इस आयोजन में एक सूफी म्यूजिकल कनसर्ट भी होगा. कबीर को सुनेंगे हम लोग. एक ऐसा आयोजन होगा, जो निजी तौर पर मुझे सुख देगा, और, कह सकता हूं कि भड़ास को चाहने वालों को भी अच्छा लगेगा. तो आप सभी निमंत्रित आमंत्रित हैं. 17 मई का दिन अपने लिए अलग से रिजर्व कर लीजिए, छुट्टियों के लिए अप्लीकेशन दे दीजिए, दिल्ली के लिए टिकट कटा लीजिए. प्रोग्राम कहां और कब होगा, यह अगले एक दो दिन में डिसाइड हो जाएगा और इसकी आधिकारिक सूचना भड़ास4मीडिया पर अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर दी जाएगी.

इतने लंबे भड़ास को आप लोगों ने झेला, इसके लिए दुखी-आभारी दोनों हूं. दुखी इसलिए कि आप शायद दुखी हो गए हों, इसलिए दुख शेयर कर ले रहा हूं, आभारी इसलिए कि आप दुखी नहीं है. भड़ास को लेकर, भड़ास4मीडिया के चार साल होने को लेकर अगर आप कुछ लिखेंगे तो उसे प्रकाशित करने में मुझे खुशी होगी. अपनी बात, बधाई, शुभकामनाएं, गालियां, टिप्पणी… जो भी लिख सकें,  yashwant@bhadas4media.com पर मेल कर दें. आपके सुझावों-आलोचनाओं का आकांक्षी हूं.

जय हो

यशवंत सिंह

यशवंत

एडिटर , भड़ास4मीडिया

 


tag- b4m 4 year

tag- Support B4M

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…