जागरण में बंपर छंटनी (35) : दिल्‍ली-एनसीआर से आधा दर्जन लोग बाहर

नोएडा में छंटनी के क्रम में दिल्‍ली-एनसीआर से आधा दर्जन लोगों को बाहर कर दिया गया है. दो दर्जन से ज्‍यादा लोगों की छंटनी किए जाने के बाद भी यह क्रम लगातार जारी है. पिछले कुछ दिनों के अंदर जिन लोगों को बाहर किया गया है उनमें गाजियाबाद से रवींद्र कुमार, साहिबाबाद से पंकज सिंह, सोनीपत से ब्रजेश तिवारी, दिल्‍ली से विभूति रस्‍तोगी, दिल्‍ली से ही पुरुषोत्‍तम शर्मा और फरीदाबाद से रमेश ठाकुर शामिल हैं.

प्रबंधन ने इन सभी लोगों से इस्‍तीफा मांग लिया है. इनके कुछ लोग साल-दो साल से जुड़े थे तो कुछ लम्‍बे समय से जागरण को अपनी सेवा दे रहे थे. विभूति रस्‍तोगी तो जागरण के वरिष्‍ठ पत्रकारों में शामिल हैं. कहा जा रहा है कि सारा लिस्‍ट सीजीएम निशिकांत ठाकुर के निर्देश पर तैयार करवाया गया है. जो लोग उन्‍हें रास नहीं आ रहे थे उन्‍हें संस्‍थान से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया.


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मीडिया में धाक जमाने के बाद राजनीति में चमक बिखेरने को तैयार गणेश तिवारी

: कानपुर से लड़ रहे हैं मेयर का चुनाव : बह रही है बदलाव की बयार : राजनीतिक दलों से उबे लोगों के लिए गणेश उम्‍मीद की किरण बने : कानपुर में दैनिक जागरण, अमर उजाला तथा हिंदुस्‍तान में वरिष्‍ठ पदों पर रहे गणेश तिवारी अ‍ब राजनीति में कदम रखने जा रहे हैं. पिछले कई वर्षों से परिवर्तन संस्‍था के सहयोग से कानपुर के लोगों की सेवा करने वाले वरिष्‍ठ मीडिया पर्सनालिटी गणेश तिवारी का राजनीति में कदम रखने की तैयारी करना चर्चा का विषय बना हुआ है. पिछले चार वर्षों वे जिस तरीके से निस्‍वार्थ भाव से जनसेवा में जुटे हुए हैं, उसको देखते हुए माना जा रहा है कि वे जीत सकने की स्थिति में पहुंच सकते हैं. गणेश तिवारी कानपुर से मेयर का चुनाव लड़ रहे हैं. उनका राजनीति में कदम रखने से कानपुर का बुद्धिजीवी तबका पूरी तरह से उत्‍साहित है.

गणेश तिवारी का मेयर पद के लिए चुनाव लड़ना बदलाव का सिम्‍बल माना जा रहा है. पिछले काफी समय से राजनीति में आई गंदगी और अच्‍छे लोगों का राजनीति से दूर होने का परिणाम जनता लम्‍बे समय से भुगत रही है. पढ़े-लिखे तथा मीडिया संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रहते हुए अच्‍छा खासा जीवन शैली जीने वाले गणेश तिवारी का राजनीति में आने का हर तरफ स्‍वागत हो रहा है. इसे अब एक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. उन्‍होंने कानपुर में परिवर्तन संस्‍था के सहारे एक मुहिम चलाई जो कानपुर में कई बदलावों में सहायक सिद्ध हुआ. वे अन्‍ना के आंदोलनों को भी कानपुर में लम्‍बे अरसे से चलाते रहे हैं. कानपुर में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है. 

बीस हजार सदस्‍यों वाली संस्‍था परिवर्तन के बैनर की शुरुआत चार साल पहले हुई थी. मन में सेवा भाव रखने वाले गणेश तिवारी

गणेश तिवारी
ने अपने साथियों के साथ कानपुर के गंदे इलाकों में गए. किसी से कोई शिकवा-शिकायत किए बिना खुद अपनी टीम के साथ कूड़े उठाना शुरू किया. इसका परिणाम रहा कि स्‍थानीय लोगों में जागरूकता तो आई ही साथ ही नगर निगम के सुस्‍त पड़े अधिकारी भी शर्म के मारे सक्रिय हुए और नगर की सफाई व्‍यवस्‍था में एक बड़ा बदलाव आया. इसके बाद इन लोगों पार्कों से गंदगियां हटाईं. पेड़ लगाए. जगह-जगह प्‍याउ लगवाए. जो काम जनहित में जरूरी था तथा बिना किसी बड़ी सरकारी सहायता लिए संभव था, वे सारे काम इन्‍होंने परिवर्तन संस्‍था के बैनर तले किया.

गणेश तिवारी अपने सहयोगियों के दबाव के बाद मेयर का चुनाव लड़ने को तैयार हुए. सहयोगियों ने दबाव दिया कि जब आप सिस्‍टम में ना रहते हुए भी कानपुर में इतने बदलावों को अंजाम दिया तो आप सिस्‍टम में रहकर तो और भी अच्‍छा कर सकते हैं. अपने परिवर्तन संस्‍था से जुड़े बीस हजार सहयोगियों के दबाव एवं हर संभव मदद के आश्‍वासन के बाद गणेश तिवारी अब मेयर के चुनाव में कूद पड़े हैं. माना जा रहा है इनका निस्‍वार्थ भाव से काम करना इनके लिए सोने पर सुहागा साबित हो रहा है. ज्‍यादातर लोग इनके समर्थन में आगे आ रहे हैं. स्‍थानीय लोग कह भी रहे हैं कि अगर इस तरह के ईमानदार तथा कर्मठ लोग राजनीति में आगे आएं तो बदलाव तो खुद ब खुद होने लगेगा.

आइए अब जानते हैं गणेश तिवारी के बारे में. गणेश तिवारी दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली में नेशनल हेड (इवेंट) के पद से इस्‍तीफा देकर इन दिनों समाज सेवा तथा शिक्षा से जुड़े हुए हैं. पिछले 24 सालों से मीडिया में सक्रिय गणेश तिवारी ने अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण, कानपुर से की थी. बाद में वे स्वतंत्र भारत, कानपुर, द पायनियर, कानपुर, हिंदुस्तान, कानपुर में रहे. बीच में उन्होंने आठ माह के लिए दैनिक भास्कर के साथ उदयपुर में जनरल मैनेजर के रूप में काम किया. कानपुर में घर में बूढ़ी मां की देखरेख के चलते उन्हें उदयपुर छोड़ दिया. तब उन्होंने जनरल मैनेजर की तुलना में छोटे पद सीनियर मैनेजर को स्वीकारा और अमर उजाला, कानपुर में ज्वाइन किया. वे अपने काम के बल पर अमर उजाला, कानपुर में हेड के पद पर पहुंचे. इसके बाद कानपुर में हिंदुस्‍तान के जीएम बने. फिर दिल्‍ली में इवेंट के नेशनल हेड बना दिए गए. 

जागरण में बंपर छंटनी (34) : धोखा देने वाले इस अखबार का सत्‍यानाश हो जाए

दैनिक जागरण, गोरखपुर में अच्‍छे लोगों को ही निकाल रहा है या उनको निकाल रहा है, जो किसी गुट के नहीं हैं और जागरण को ऊचांइयों पर पहुंचाने में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है. गोरखपुर यूनिट में मनोज तिवारी पिछले कई वर्षों से अखबार के पहले पन्‍ने को अपने खून-पसीने से सींचा है, वह गोल गिरोह से दूर रहने वालों में से हैं. उन्‍हें अखबार ने तब शिकार बनाया, जब उन्‍हें इसकी ज्‍यादा जरूरत थी. पहले उन्‍हें मुजफ्फरपुर जाने को कहा गया, बाद में कार्यालय बुलाकर इस्‍तीफा देने को मजबूर किया गया.

योगेश श्रीवास्‍तव संत सरीखे लोगों में हैं. अखबारी जगत में यदि कुछ लोगों पर विश्‍वास किया जा सकता है कि वह सबके हित में सोचता होगा और किसी की बुराई नहीं करता है तो वह श्रीवास्‍तव जी ही हैं. पर अखबार के अंदर के चंद दलालों ने इन्‍हें भी साजिश का शिकार बना दिया. पहले उनका तबादला जम्‍मू के लिए किया गया, जब उन्‍होंने अपनी परेशानी प्रबंधन को बताई तो प्रबंधन ने टका सा जवाब दे दिया कि इस्‍तीफा दे दो. वह अपने बीमार पिता की हालत को देखते हुए इस्‍तीफा देने को मजबूर हुए.

वीरेंद्र मिश्र दीपक और धर्मेंद्र पाण्‍डेय को अखबार के सौदागरों ने ऐसे दौर में आउट किया, जब उन्‍हें इसकी सबसे ज्‍यादा जरूरत थी. लाख मनुहार के बाद भी प्रबंधन कुछ सुनने का तैयार नहीं था, दोनों का तबादला दूसरे राज्‍यों में कर दिया गया. रुद्रपुर कार्यालय के प्रभारी एवं वरिष्‍ठ पत्रकार राज नारायण मिश्र के साथ भी ऐसा ही किया गया. राज नारायण को तत्‍कालीन संपादक शैलेंद्र मणि त्रिपाठी एवं प्रबंधक ओम प्रकाश जोशी ने यह कह कर भेजा था कि आप वहां अखबार स्‍थापित कर दो. मिश्र ने अखबार को स्‍थापित ही नहीं‍ किया बल्कि राजस्‍व व सर्कुलेशन भी बढ़ाया.

अखबार को जहां से दो लाख रुपये का विज्ञापन सालाना मिलता था वहां से बारह लाख रुपये सालाना राजस्‍व दिया. राजनारायण का जाना देवरिया के जिला प्रभारी की देन बताई जा रही है. तमाम शिकायतों के बाद भी जिला प्रभारी अखबार के दलालों के चहेते बने हुए हैं. बालमनी त्रिपाठी, जितेंद्र शुक्‍ल, डा. आरडी दीक्षित का जाना भी पत्रकारों को बहुत खल रहा है. दूसरे अखबारों के लोग भी दैनिक जागरण में अपने भाइयों के साथ हो रहे अन्‍याय से दुखी हैं. चाहकर भी कोई कुछ नहीं कर पा रहा है. अभी कई और लोग ठिकाने लगाए जाएंगे. सबके मन से जागरण के लिए यही बददुआ निकल रही है कि इस अखबार का सत्‍यानाश हो जाए.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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जागरण, मेरठ में आंतरिक बदलाव, रमेश विश्‍वकर्मा बने सिटी इंचार्ज

दैनिक जागरण, मेरठ में कुछ आंतरिक बदलाव किए गए हैं. सिटी डेस्‍क की जिम्‍मेदारी संभाल रहे राजकुमार शर्मा को इनपुट प्रभारी बना दिया गया है. उनकी जगह आउटपुट हेड की जिम्‍मेदारी संभाल रहे रमेश विश्‍वकर्मा को सिटी डेस्‍क का इंचार्ज बनाया गया है. यूपी डेस्‍क पर तैनात सुशील मिश्रा को आउटपुट इंचार्ज बना दिया गया है. इनपुट हेड की जिम्‍मेदारी संभाल रहे महेश रस्‍तोगी को प्रादेशिक प्रभारी बनाया गया है. प्रादेशिक प्रभारी के रूप में काम कर रहे सौरभ शर्मा को फीचर में डाल दिया गया है. वे वीरेंद्र जी के सहयोगी की भूमिका निभाएंगे. फीचर डेस्‍क के प्रभारी देवेश त्‍यागी को प्रादेशिक डेस्‍क पर भेज दिया गया है. 

हिंदुस्‍तान, लखनऊ में दीप का डिमोशन, आलोक बने लोकल के चीफ

हिंदुस्‍तान, लखनऊ से खबर है कि दीप सिंह का डिमोशन कर दिया गया है. ये निर्णय क्‍यों लिया गया है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. बताया जा रहा है कि अब तक लोकल डेस्‍क पर चीफ की जिम्‍मेदारी निभा रहे दीप सिंह को लोकल का डिप्‍टी चीफ बना दिया गया है. उनकी जगह डिप्‍टी चीफ की जिम्‍मेदारी निभा रहे आलोक उपाध्‍याय को प्रमोट करके लोकल का चीफ बना दिया गया है.

उल्‍लेखनीय है कि कुछ महीने पहले परवेज लोकल डेस्‍क के चीफ हुआ करते थे तथा दीप उनके डिप्‍टी थे. परवेज को जब ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया तो दीप को लोकल के चीफ की जिम्‍मेदारी सौंपी गई तथा आलोक उपाध्‍याय को डिप्‍टी चीफ बनाया गया. अब मामला उल्‍टा हो गया है. अब दीप को अपने ही डिप्‍टी के अंडर में काम करना पड़ रहा है.

जागरण, देहरादून को डीएनई ओंकार सिंह ने बाय किया

दैनिक जागरण, देहरादून से खबर है कि ओंकार सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे फिलहाल नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं. ओंकार डीएनई के पोस्‍ट पर कार्यरत थे. समझा जा रहा है कि वे जल्‍द ही अपनी नई पारी किसी दूसरे संस्‍थान से शुरू कर सकते हैं. ओंकार ने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला, बनारस से की थी. इसके बाद वे अमर उजाला के साथ बरेली और मेरठ में भी रहे. बारह साल अमर उजाला में काम करने के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया तथा अलीगढ़ में दैनिक जागरण ज्‍वाइन कर लिया. इसके बाद वे मेरठ आ गए. वे पिछले दो सालों से दैनिक जागरण को देहरादून में अपनी सेवाएं दे रहे थे.  

पल्‍लवी का आजतक से इस्‍तीफा, समाचार प्‍लस ज्‍वाइन किया

आजतक से खबर है कि पल्‍लवी त्‍यागी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एसोसिएट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थीं. पल्‍लवी ने अपनी नई पारी समाचार प्‍लस के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर सीनियर प्रोड्यूसर बनाया गया है. पल्‍लवी आजतक से पहले बीएजी, चैनल7 को भी अपनी सेवांए दे चुकी हैं. वे पिछले एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनके ज्‍वाइन करने की पुष्टि समाचार प्‍लस के डाइरेक्‍टर उमेश कुमार ने की.

अब 15 जून को लांच होगा न्‍यूज चैनल समाचार प्‍लस

रीजनल खबरिया चैनल समाचार प्‍लस अब 15 जून को लांच होगा. पहले इस चैनल की लांचिंग 1 जून को तय की गई थी, परन्‍तु कुछ कारणों के चलते इसकी लांचिंग डेट बढ़ाकर 15 जून कर दी गई है. प्रबंधन इस चैनल की लांचिंग से पहले कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहता, लिहाजा हर तैयारी फूल प्रूफ की जा रही है ताकि अंतिम समय में कोई परेशानी सामने नहीं आए. इसके चलते इस चैनल की लांचिंग डेट कुछ दिन के लिए आगे बढ़ा दी गई.

चैनल को लांच करने की तैयारियां लगभग अंतिम दौर में हैं. पीसीआर-एमसीआर पूरी तरह तैयार हो चुका है. चैनल ड्राई रन पर चल रहा है. इनपुट, आउटपुट, एसाइनमेंट एवं सभी टेक्निकल विभागों में भर्तियां पूरी कर ली गई हैं. प्रबंधन ने एक मजबूत टीम तैयार कर लिया है, जिसमें आजतक, आईबीएन7, स्‍टार न्‍यूज, इंडिया टीवी, इंडिया न्‍यूज, सहारा, ईटीवी जैसे बड़े चैनलों में काम करने वाले लोग भी अपने संस्‍थानों से इस्‍तीफा देकर 'समाचार प्‍लस' के साथ जुड़ रहे हैं. प्रबंधन ने बहुत ही मजबूत टीम तैयार करने की कोशिश की है. 

‘समाचार प्लस’. पैरेंटल कंपनी "बेस्ट न्यूज कंपनी प्राइवेट लिमिटेड" के बैनर तले "समाचार प्लस" ब्रांड की लॉन्चिग की जा रही है. इसके तहत 6 रीज़नल चैनल खोले जाएंगे. सबसे पहला चैनल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के दर्शकों के लिए होगा. इसके बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, फिर बिहार-झारखंड के लिए अलग-अलग चैनल्स लाए जाएंगे. सेकेन्ड फेज़ में पंजाब-हिमाचल-हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के दर्शकों के लिए क्षेत्रीय चैनल खोले जाएंगे. "समाचार प्लस" का हेड ऑफिस एच -174, सेक्टर-63, नोएडा में स्‍थापित है.

"बेस्ट न्यूज कंपनी प्राइवेट लिमिटेड" के डायरेक्टर हैं उमेश कुमार, जो न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया (NNI) के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं. उमेश जी 'समाचार प्लस' के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ का कार्यभार भी संभाल रहे हैं. टोटल टीवी के हेड रह चुके वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ने मैनेजिंग एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. टीवी की दुनिया का बड़ा नाम श्वेता रंजन और तेज़-तर्रार टीवी एंकर अतुल अग्रवाल एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर के तौर पर अपनी जिम्‍मेदारी संभाल रहे हैं. स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव टीम को हेड करने की जिम्‍मेदारी प्रवीण साहनी को सौंपी गई है. प्रवीण ग्रुप के वेब पोर्टलों समेत दूसरी परियोजनाओं को भी लीड करेंगे.

'समाचार प्‍लस' काफी समय पहले से ही अपने ब्रांडिंग का अभियान शुरू कर रखा है. इसी का परिणाम है कि चैनल अपने लांचिंग से पहले ही लोगों की जुबान पर चढ़ गया है. तमाम जगहों पर होर्डिंग भी लगाए गए हैं. चैनल के प्रमोशनल पब्लिसिटी कंटेंट में चैनल प्रमुख उमेश कुमार सबसे प्रमुखता के साथ दिखाए गए हैं, और बिलकुल बीच में हैं. उनके दाएं बाएं अमिताभ अग्निहोत्री, अतुल अग्रवाल, प्रवीण साहनी, गगनदीप कौर हैं. यह प्रचार अभियान लम्‍बे समय से चलाया जा रहा है. चैनल के लांचिंग के संबंध में ग्रुप के डाइरेक्‍टर उमेश कुमार ने बताया कि चैनल के लिए सारी तैयारियां पूरी हैं. मुहूर्त के कारणों से चैनल की लांचिंग 15 जून को कर दी गई है.

साधना टैक्‍नोलॉजीज को एपी में मिला सबसे बड़ा वेबकास्टिंग का कार्य

साधना टैक्नोलॉजीज ने उत्तर प्रदेश में पिछले विधान सभा चुनावों में अपने सफलतापूर्वक वेबकास्टिंग कार्य को करके चर्चित होने के बाद अब एक और बड़े कदम को आगे बढ़ाया है। इस कदम के तहत साधना टैक्नोलॉजीज आंध्रप्रदेश में आगामी 12 जून, 2012 को आयोजित होने वाले विधान सभा चुनावों के लिए 18 विधान सभा सीटों व एक संसदीय सीट के लिए 12 जिलों में सिर्फ एक दिन में 3000 पॉलिंग स्टेशनों में सबसे बड़े वेबकास्टिंग कार्य को संपन्न करेंगे।

उत्तर प्रदेश चुनावों में सफल अभियान के बाद ही आंध्र प्रदेश चुनाव अधिकारियों ने स्वयं अपने जिलों में वेबकास्टिंग कार्य करने के लिए साधना टैक्नोलॉजिज को आर्डर दिया था। अधिकारियों ने बताया कि इससे चुनाव अधिकारियों, पुलिसकर्मियों, डीएम, एडीएम, संचालन अधिकारियों इत्यादि को काफी मदद मिलेगी। इस पूरे कार्य के बारे में चेयरमैन राकेश गुप्ता ने बताया कि ‘‘हम चुनाव वेबकास्टिंग कार्य के मामले में अग्रणी हैं और 1500 पॉंलिंग स्टेशनों के जरिये यूपी चुनावों में बहुत बड़ा किया। हम जानते थे कि यह हमारे कार्य का अंत नहीं है और हमने भारतीय इतिहास के सबसे बड़े वेबकास्टिंग आर्डर (3000 पॉलिंग स्टेशनों का) को पाया। हमने इसके लिए आंध्र प्रदेश के प्रत्येक जिले में तकनीकी व्यक्तियों की टीम बनाई है।’’

पहले भी साधना ग्रुप ने कई चुनौतियों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। गुप्ता ने आगे बताया कि ‘‘यूपी की तरह ही हम आंध्र प्रदेश के संवेदनशील इलाकों में भी साफ-स्वच्छ चुनाव पूरे करेंगे। यह भारत में चुनाव-प्रक्रिया की अबतक सबसे बड़ा लाइव वेबकास्टिंग कार्य है। यूपी चुनाव में मॉडल एजेंसी के अलावा पूर्व में भी डीएसएनजी, वीएसएटी व वेबकास्टिंग के जरिये भारत के विभिन्न स्थानों पर लाइव इवेन्टों की कवरेज कर कर चुका है।’’ प्रेस रिलीज

सिटी भास्‍कर, इंदौर में हालत बेकाबू, कई ने इस्‍तीफा दिया

सिटी भास्कर, इंदौर से एक और विकेट गिर गया है। करीब छह साल से वहां सीनियर रिपोर्टर के रूप में सेवाएं दे रही रचना सिंह ने सोमवार को सिटी भास्कर से इस्‍तीफा दे दिया। इसके पहले मंदीप कौर भाटिया, अनुराग शर्मा और दक्षा वेदकर सिटी भास्कर को अलविदा कह चुके है। इन सब लोगों ने सिटी भास्कर की प्रभारी सलोनी भोला के व्‍यवहार से खफा होकर सिटी भास्कर छोड़ा है। सलोनी को दो महीने पहले ही प्रभारी बना गया और तभी से सिटी भास्कर छोडऩे वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। अगले कुछ दिनों में दो और संपादकीय साथी सिटी भास्कर को अलविदा कहने वाले हैं।

भास्कर के नेशनल हेड कल्पेश याज्ञनिक की खासमखास मानी जाने वाली सोलनी ने सिटी भास्कर की कमान संभालने के बाद ही सिटी भास्‍कर से जाने वालों की संख्‍या बढ़ती जा रही है। रिपोर्टरों ने उनके खिलाफ कई शिकायतें स्टेट हेड एन रघुरमन तथा स्थानीय संपादक आनंद पांडे से कीं, परन्‍तु कोई सुनवाई नहीं होने के बाद इन लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया। सिटी भास्कर को अलविदा कहने वाली मंदीप हेल्थ व एजुकेशन, अनुराग आईआईएम और रचना सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरों की सिद्धहस्त मानी जाती थीं। मंदीप ने तो एक महीने पहले आनंद पांडे की मौजूदगी में हुई बैठक में सलोनी की करतूतों का सबके सामने खुलासा किया और यह बताया कि किस तरह वे संपादक के नाम का दुरुपयोग कर रिपोर्टर्स की खबरों से खिलवाड़ कर रही है। मंदीप ने सलोनी की धंधेबाजी के कई किस्से भी वहां उजागर किये और ये कहते हुए सिटी भास्कर छोडऩे की पेशकश कर दी की मैं यहां काम करके अपना करियर खत्म नहीं करना चाहती हूं। उन्होंने सिटी भास्कर से दूसरे किसी सेक्शन में ट्रांसफर लेने के संपादक के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया।

सोमवार को भास्कर को अलविदा कहने वाली रचना सिंह महीने भर पहले तक सलोनी की की खासमखास मानी जाती थी। पर अब महीने भर बाद ही ऐसी स्थिति बनी की रचना भी सलोनी का साथ छोड़ चली गई। सलोनी को लेकर कई गंभीर शिकायतें भास्कर प्रबंधन तक पहुंची हैं। सूत्रों का कहना है कि स्थानीय संपादक आनंद पांडे भी इन शिकायतों के आधार पर प्रबंधन तक एक रिपोर्ट पहुंचा चुके हैं। बताया जा रहा है कि कुछ समय पहले सलोनी को पूरी टीम ने मिलकर हटवा दिया था। पर दुबारा ता‍कत के साथ वापस आते ही सलोनी ने ऐसा माहौल बना दिया है कि सब लोग छोड़कर जा रहे हैं। अब सिटी भास्‍कर में तीन लोग पीयूष, गजेंद्र और अमरीन बचे रहे गए हैं, जिनमें संभावना जताई जा रही है कि पीयूष और गजेंद्र भी अलविदा कह देंगे। गजेंद्र के छुट्टी पर भी जाने की खबर आ रही है। 

सिटी भास्कर में सलोनी के इस मनमाने व्यवहार के पीछे उसे नेशनल एडिटर का संरक्षण होने की बात सामने आ रही है। पिछले दिनों सिटी भास्कर टीम की बैठक में कल्पेश ने जिस तरह टीम के सदस्यों को फटकारा और संपादक आनंद पांडे की मौजूदगी में सलोनी की पैरवी की उसी से स्पष्ट हो गया था कि जब तक कल्पेश नेशनल हेड हैं सलोनी की मनमानी पर अंकुश लगाना संपादक के बुते की बात नहीं है। इस संदर्भ में सलोनी का पक्ष जानने के लिए कई बार फोन किया गया परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया, जिससे उनके पक्ष के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई।

वरिष्‍ठ पत्रकार अजय कुमार का हिंदुस्‍तान से नाता टूटा

हिंदुस्‍तान, पटना से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार अजय कुमार का नाता टूट गया है. प्रबंधन ने उनका कांट्रैक्‍ट रिन्‍यूवल नहीं किया. तीन साल पहले अजय कुमार दुबारा हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया था. 31 मई हिंदुस्‍तान में उनका आखिरी कार्य दिवस साबित हुआ. अजय कुमार ने अपने करियर की शुरुआत 1990 में प्रभात खबर, पटना के साथ की थी. एक दशक तक वे इस अखबार से जुड़े रहे. सन 2000 में हिंदुस्‍तान में सीनियर रिपोर्टर बनकर गए. प्रबंधन ने इसके बाद उन्‍हें हिंदुस्‍तान, रांची का ब्‍यूरोचीफ बना दिया.

वे सन 2005 में प्रभात खबर वापस लौट आए. उन्‍हें पटना का स्‍थानीय संपादक बनाया गया. इसके बाद ये एक बार फिर तीन साल के कांट्रैक्‍ट पर 2009 में हिंदुस्‍तान चले गए. इन्‍हें हिंदुस्‍तान, जमशेदपुर का स्‍थानीय संपादक बनाया गया. हालांकि यहां पर इनके साथ कुछ विवाद भी जुड़े. 2010 में प्रबंधन ने इन्‍हें वापस पटना बुला लिया. तब से ये पटना में ही अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. अजय कुमार हिंदुस्‍तान के कई महत्‍वपूर्ण प्रोजेक्‍टों को पूरा किया, जिसमें बिहार के सौ साल का संकल्‍प भी शामिल है. इन्‍हें 2003 में पटना पुस्‍तक मेला में वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने एसपी सिंह पत्रकारिता पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया था.

मनोज पमार होंगे हिंदुस्‍तान, बरेली के नए आरई!

: कानाफूसी : हिंदुस्‍तान में कुछ बदलाव होने की सूचना है. हालांकि सूत्रों का कहना है कि ये सारे बदलाव निकाय चुनाव के बाद किए जाएंगे. प्रबंधन ने इसकी तैयारी कर ली है. बस इस पर इम्‍पलीमेंट करना बाकी रह गया है. बरेली के स्‍थानीय संपादक आशीष व्‍यास को प्रबंधन दिल्‍ली बुलाने जा रहा है. उन्‍हें कादंबिनी में लाया जाएगा. आशीष की जगह मनोज पमार को बरेली का स्‍थानीय संपादक बनाया जाएगा. खबर है कि मनोज को पिछले दिनों ही प्रमोट किया गया है और प्रबंधन उनके कार्य से खुश है.

मनोज की जगह दो नामों को इस सेटेलाइट यूनिट का संपादकीय प्रभारी बनाए जाने की चर्चा हो रही है. सूत्र बता रहे हैं कि यहां अलीगढ़ में ही तैनात रामकुमार शर्मा को संपादकीय प्रभारी बनाया जा सकता है. वहीं कुछ लोग बरेली में तैनात एनई योगेंद्र सिंह रावत के नाम की भी चर्चा कर रहे हैं. पर सूत्रों का कहना है कि रामकुमार शर्मा का दावा भारी लग रहा है. संभव है कि उनको ही जिम्‍मेदारी सौंपी जाए. हालांकि ये सारे बदलावों को निकाय चुनाव खतम होने के बाद अंजाम दिया जाएगा.

इन बदलावों के पीछे कारण बताया जा रहा है कि आशीष व्‍यास के पहले हिंदुस्‍तान जिस स्थिति में था, वह स्थिति अब अखबार की नहीं रही. सर्कुलेशन घटकर काफी नीचे आ चुका है. इससे प्रबंधन खुश नहीं है. अनिल भास्‍कर और केके उपाध्‍याय के समय में अखबार सर्कुलेशन के जिस स्‍तर तक पहुंचा था, अब वह स्थिति नहीं है. दूसरी तरफ अलीगढ़, मुरादाबाद जैसे यूनिट लांचिंग के बाद से ही अपनी पकड़ कंटेंट और बिजनेस दोनों में बनाकर रखे हैं. माना जा रहा है कि यह बदलाव परफार्मेंस के आधार पर तय किए गए हैं. 

पत्रिका वालों! चोरी की खबर में एकाध शब्‍द तो बदल देते

प्रिंट मीडिया में किस प्रकार कॉपी-पेस्‍ट सिस्‍टम हावी होता जा रहा है, इसका अंदाजा पत्रिका के इंदौर संस्‍करण को देखकर लगाया जा सकता है. इस संस्‍करण में चोरी करके खबरें छप रही हैं. नई बानगी है पांच जून को प्रकाशित इंदौर संस्‍कर के सप्‍लीमेंट जस्‍ट इंदौर में प्रकाशित एक खबर. इस खबर ने चोरी करने की बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं. जस्‍ट इंदौर में पेज नम्‍बर 19 पर प्रकाशित खबर 'बार+बीच की दीवानी दिल्‍ली' को नवभारत टाइम्‍स से उठाया गया है.

यह खबर नवभारत टाइम्‍स के वेबसाइट पर कई दिन पहले ही प्रकाशित हो चुकी है. इसमें सबसे बुरी बात यह है कि चोरी की गई खबर में एकाध शब्‍द बदलने की भी कोशिश नहीं की गई है. पूरी खबर शब्‍दश: प्रकाशित कर दी गई है. अब पत्रिका ने चोरी की है तो डंके की चोट पर की है, पर मेरी गुजारिश है कि चोरी किया तो किया पर कुछ तो संपादित कर लेते पत्रिका वालों ताकि लगता कि यह खबर तुम्‍हारी है. यहां तक हेडिंग बदलने की भी जरूरत नहीं समझी गई. वाह रे पत्रिका वालों. चोरी हो तो ऐसी. 

नवभारत टाइम्‍स
पत्रिका

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नवभारत टाइम्‍स की खबर

पत्रिका की खबर

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

जागरण में बंपर छंटनी (33) : देवरिया से राज नारायण मिश्र को आउट किया

दैनिक जागरण, गोरखपुर में छंटनी का सिलसिला अभी थमा नहीं है. खबर है कि राज नारायण मिश्र को जागरण बाहर का रास्‍ता दिखा दिया है.  राज नारायण मिश्र देवरिया जिला के रुद्रपुर तहसील के प्रभारी थे. उनपर रुद्रपुर में ही जागरण के पत्रकार रमेश शुक्ला से मारपीट के आरोप भी लगे थे, जिसमें प्रबंधन ने रमेश को ही बाहर का रास्‍ता दिखा दिया था. खबर यह भी है कि देवरिया में अभी भी कम से कम चार लोगों को छंटनी का शिकार बनाया जाना है.

इसके लिए प्रबंधन देवरिया में कार्यरत चार लोगों के पुरानी पत्रावली पलट रहा है ताकि इस बहाने से ही सही इन लोगों को संस्‍थान के बाहर का रास्‍ता दिखाया जा सके. संभावना है कि कई और लोगों को प्रबंधन को अभी बाहर का रास्‍ता दिखा सकता है. एक और छंटनी की लिस्‍ट तैयार किए जाने की सूचना है. इसके चलते कर्मचारियों में दहशत बनी हुई है. इसका असर काम पर भी पड़ रहा है.  


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नईदुनिया का ‘जश्‍ने मालवा’ बन गया ‘जश्‍ने माल ला’

पत्रकारिता के संस्कारों का आचमन कर जहाँ से श्रेष्ठ पत्रकारिता का तिलक लगाएँ देशभर में हिन्दी पत्रकारिता की ध्वजा को थामे संपादकों ने हिन्दी पत्रकारिता को उँचाइयों पर पहुँचाया, उस पत्रकारिता के विद्यालय 'नईदुनिया' को ऐसे दिन भी देखने पडेंगे इसकी किसी ने भी कल्पना नहीं की थी। 'नईदुनिया' का बिक जाना अपने आप में हिन्दी पत्रकारिता की सबसे बड़ी खबर थी और आज भी है। संस्कारित और शुद्ध पत्रकारिता का बाजारवाद के सामने नतमस्तक हो जाना हिन्दी के खाटी पत्रकारों के दिल पर ऐसी चोट कर गया, जिसका दर्द जन्मभर सालता रहेगा। अखबार को उत्पाद बने दस साल से ज्यादा समय हो गया पर इन दिनों में भी 'नईदुनिया' ने अपने संस्कारों और लेखनी के बल पर अपना अलग स्थान बनाया था।

'नईदुनिया' का जागरण के हाथों बिकना और उसके स्वरुप में जिस प्रकार का परिवर्तन हुआ, वह ऐसा है जैसे किसी शाकाहरी व्यक्ति का एकाएक माँसाहारी हो जाना! 'नईदुनिया' को खरीदे ६५ दिन भी नहीं हुए और जागरण प्रबंधन ने इसे अपने तरीके से चलाना आरंभ कर दिया। मकान खाली करवाने के लिए जैसे निचले स्तर के प्रयत्न किए जाते है ठीक उसी तर्ज पर सभी स्तर से दबाव बनाया गया। बिना किसी संवाद के कर्मचारियों को परेशान करने की नीति अपनाई गई। पर कुछ ही दिनों में कुछ हिम्मती कर्मचारियों के कारण दबाव की नीति नई चल पाई। पर इन कुछ दिनों में ही नईदुनिया की प्रसार संख्या घट गई, क्योंकि नईदुनिया से पुराने कर्मचारियों का मोह भंग हो चुका था। जागरण प्रबंधन तक जब तक यह बात पहुँचती तब तक बात बहुत दूर तक जा चुकी थी।

नईदुनिया का स्थापना दिवस ५ जून को आता है और जागरण प्रबंधन ने इस मौके को भुनाने की कोशिश की। 'नईदुनिया' की अच्छाइयों को भुनाने की योजना बनी, क्योंकि बाजार में 'नईदुनिया' को लेकर नकारात्मक बातें फैल चुकी थी। 'नईदुनिया' का जागरण बनना मालवा क्षेत्र के लोगों को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। शहरी क्षेत्र में जरुर इस बात को लेकर नाराजगी है कि 'नईदुनिया' का स्वरुप बदल गया। जबकि, ग्रामीण क्षेत्र का पाठक अब भी नईदुनिया के जागरण के हाथों बिकने की खबर से लगभग अनभिज्ञ हैं। जहां पर इस प्रकार की बातें पहुँच रही है, वहाँ से प्रसार संख्या घट रही है। इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखकर इंदौर संस्करण को ५ जून को यादगार बनाने का जिम्मा सौंपा गया। परंतु इंदौर संस्करण में पुराने अखबारों के संदर्भ के अलावा पुराने लोग ही नहीं बचे थे, लिहाजा पूरे मामले को आउटसोर्स किया गया। प्रभु जोशी, सरोज कुमार जैसे लोगों ने आउटसोर्सिंग का यह ठेका अपने नाम कर लिया और अपनी दुकान सजा ली। इस दुकान का नाम 'जश्ने मालवा' दिया गया। जैसे दुकानदार वैसा माल बेचने के लिए लाया गया। पाँच दिवसीय इस आयोजन के दौरान नईदुनिया के पचास व साठ के दशकों की कहानी को अखबार में प्रस्तुत करना था। प्रभु जोशी और 'नईदुनिया' में उनके खास रवीन्द्र व्यास ने पाँच दिनों की ऐसी योजना बनाई जिसमें सरोज कुमार का भी हित साधा गया। दोनों ही चित्रकारी से जुड़े हैं, लिहाजा उसे भी शामिल करना जरुरी था।

जागरण वाले 'नईदुनिया' में असल नईदुनिया के बारे में जो जानकारी प्रकाशित की गई वह असल नईदुनिया के ६० वर्ष पूर्ण होने पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी। उसी को नए कलेवर में प्रभु जोशी एवं उनकी टीम ने पाठकों को परोस दिया। उस पर से प्रभु जोशी की ठसक ऐसी की उन्हें रोजाना 'नईदुनिया' की कार घर पर लेने जाती थी और छोड़ने भी जाती थी। खबर है कि प्रभु जोशी एंड कंपनी ने इस आउटसोर्सिंग के लिए ५ लाख रुपए जागरण वालों से वसूल लिए। वैसे 'जश्ने मालवा' के ३ करोड़ के बजट में यह काफी छोटी राशि थी। इन पाँच दिनों में 'नईदुनिया' में प्रति दिन चार पेज का विशिष्ट परिशिष्ट प्रकाशित किया गया जो गलतियों से भरा था।

गलतियाँ इतनी ज्यादा की गई कि भूल सुधार तक प्रकाशित करना पड़ा। इंदौर के राजा का फोटो ही गलत प्रकाशित कर दिया गया। यह उन प्रभु जोशी और सरोज कुमार का कारनामा था जो की अपने आपको स्वंभू इंदौर की शान कहलाते फिरते हैं। प्रभु जोशी एक समय नईदुनिया और उसके पुराने प्रबंधन को गालियाँ देने में अपनी शान समझते थे। 'नईदुनिया' को वे अखबार ही नहीं मानते थे और यह इस कारण था क्योंकि उनकी खबरें और लेख नईदुनिया में प्रकाशित नहीं होते थे। प्रभु जोशी पर नईदुनिया के पुराने प्रबंधन ने संदर्भ चोरी का आरोप लगाया था तथा कहा था कि चुराए गए संदर्भ से ही प्रभु जोशी अन्य अखबारों में लेख लिखते रहे।

'जश्ने मालवा' में किस तरह से माल बनाया गया है उसकी बानगी देखिए। मोहन जोदड़ो जैसे घटिया नाटक को राजवाड़ा में प्रस्तुत किया गया। जबकि, उसी दिन नईदुनिया नायिका का कार्यक्रम एक होटल में आयोजित किया गया। नाटक की प्रस्तुति का आयोजन क्यों रखा गया इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं बस प्रभु जोशी की इच्छा थी, इस कारण नाटक रखा गया। इसके लिए भी अच्छा खासा पैसा खर्च किया गया। नाटक देखने के लिए दर्शकों को इकठ्ठा किया गया। वहीं दूसरी और नईदुनिया नायिका अवार्ड के कार्यक्रम के लिए नईदुनिया के मालिक जागरण वालों को अच्छा मुख्य अतिथि भी नहीं मिल पाया। 'जश्ने माल-ला' के दूसरे दिन सरोज कुमार एंड पार्टी ने कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। उसमें भी हास्य कवियों की भरमार थी। सरोज कुमार ने इसमें अच्छा माल बना लिया। 'जश्ने माल-ला' में ऊषा उत्थुप जैसे कलाकार को क्यों बुलाया गया? नईदुनिया ने अब तक जितने भी आयोजन किए उसमें संस्कारों और इंदौर के पाठकों की पसंद को ध्यान में रखा गया पर यहाँ पर भी प्रभु ने अपनी माया दिखाई। प्रभु जोशी को उषा उत्थुप का गाना पसंद है इस कारण उन्हें बुलाया गया। कार्यक्रम के अंत में संचालन भी अंग्रेजी में किया गया जो की समझ से परे है।

इन ५ दिनों के दौरान प्रभु जोशी के नेतृत्व में जिस प्रकार परिशिष्टों का प्रकाशन किया गया वे सभी फोटो कापी नुमा थे। नईदुनिया के ही प्रकाशन 'अपना इंदौर' नामक किताबों में से फोटो लिए गए। प्रभु जोशी के साथ काम करने वाले नईदुनिया के युवा व अन्य साथी अनमने ढँग से काम कर रहे थे, इस कारण किसी ने भी गलतियों को सामने नहीं लाया। बल्कि जो काम बताया गया वे उसे मन मारकर करते रहे। ड्रमर शिवमणि को प्रत्येक आईपीएल मैच में चौकों और छक्कों पर बाउंड्री के पास चीयर लीडर्स के साथ ड्रम बजाते सभी ने देखा है। ऐसे में उन्हें नईदुनिया के स्थापना दिवस पर क्यों बुलाया गया? दरअसल यह पसंद रवीन्द्र व्यास की थी। उन्होंने अपने गुरु प्रभु जोशी को इसके लिए मनाया और चेले की बात पर प्रभु ने अपनी मुहर लगा दी। इस बीच एक दिन इंदौर के चित्रकारों को इकठ्ठा कर उनसे चित्र बनावाएँ गए और इनमें कई वरिष्ठ चित्रकार भी थे। प्रभु जोशी ने यहाँ भी भाँजी मारी और स्वयं को सम्मानित करने वाला चित्र 'नईदुनिया' में प्रकाशित करवा लिया यानी शहर की चित्रकारों की बिरादरी में यह संदेश चला गया कि अगर नईदुनिया में चित्रकारों को समाचार प्रकाशित करवाना हो तो  प्रभु जोशी से संपर्क करें या फिर रवीन्द्र व्यास से संपर्क करे। इसके अलावा डबल डेकर बस का तमाशा इंदौर में किया गया जैसे इंदौर कोई गांवडा हो शहर नहीं। इंदौर वालों ने जैसे कभी बस ही नहीं देखी हो। इसका नतीजा यह हुआ कि निःशुल्क इंदौर घुमाने वाली इस बस में बैठने वाले ही कोई नहीं थे। जबरन लोगों को पकड़कर बस में बैठाया गया। तीन करोड़ लुटाकर भी जागरण प्रबंधन अब प्रसार बढ़ाने के लिए नई योजना पर काम कर रहा है जिसका मतलब की 'नईदुनिया' की बैलेंस शीट पर और बोझ।

गत छह महीनों से मानसिक संत्रास झेल रहे नईदुनिया के कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है, इतना भी नहीं कि उन्हें पांच दिनों के कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाए। नईदुनिया ने ५ दिन का उत्सव भले मनाया हो, पर स्टाफ को मिठाई का एक टुकड़ा भी नहीं मिला। नईदुनिया में काम कर रहे कर्मचारियों की मानसिक दशा इतनी खराब हो चुकी है कि उनका काम में मन नहीं लग रहा और वे हर वक्त नौकरी जाने के डर से काम भी नहीं कर पा रहे है। प्रतिदिन डर भरे माहौल में काम करने के कारण कई साथी अवसाद जैसी स्थिति में आ गए है। कई कर्मचारी इस्तीफा देने का मन बना चुके है और जैसे ही उचित अवसर मिलेगा वे नईदुनिया को छोड़ देंगे। वही जागरण के अन्य संस्करणों में काम करने वाले कर्मचारियों को नईदुनिया पर तीन करोड़ रुपए खर्च करने की जानकारी मिलने के बाद असंतोष उभर रहा है। जागरण एक तरफ कर्मचारियों की छँटनी कर रहा है वही दूसरी और नईदुनिया पर तीन करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। इस संपूर्ण मामले में प्रभु जोशी, सरोज कुमार और रवीन्द्र व्यास जैसे लोगों ने माल बना लिया और नईदुनिया के पुराने और कर्मठ कर्मचारियों का उपयोग कर लिया।

आखिर मीडिया क्षेत्र में क्‍यों दांव लगा रहे हैं कारपोरेट दिग्‍गज?

पिछले महीने आदित्य बिड़ला समूह ने इंडिया टुडे समूह में 27.5 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी। हालांकि सौदे की रकम का खुलासा नहीं किया गया। इस साल जनवरी में मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इनाडु के नेटवर्क 18 के साथ एक जटिल सौदे के तहत किए गए विलय को वित्तीय मदद मुहैया कराई। पिछले साल दिसंबर में अभय ओसवाल की ओसवाल ग्रीन टेक ने एनडीटीवी में 24.24 करोड़ रुपये के निवेश से 14.2 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी।

ऐसा भी नहीं है कि दिग्गज भारतीय कंपनियों ने हाल में ही मीडिया एवं मनोरंजन (एमऐंडई) क्षेत्र में निवेश करना शुरू किया है। भारती एयरटेल डीटीएच, मीडिया आउटसोर्सिंग और संगीत के कारोबार में सक्रिय है। देश की सबसे बड़ी डीटीएच फर्म टाटा स्काई में टाटा समूह की बहुलांश हिस्सेदारी है। कुछ साल पहले इसने फिल्म निर्माण में भी हाथ आजमाए थे। आदित्य बिड़ला समूह भी टेलीविजन और फिल्मों से जुड़ा रहा। महिंद्रा समूह भी प्रकाशन उद्योग के अलावा मुंबई मंत्र के जरिये फिल्म निर्माण में भी लगा है। राजन रहेजा की हैथवे इन्वेस्टमेंट आउटलुक, हैथवे केबल और डाटाकॉम का मालिकाना हक रखती है। लेकिन फिलहाल हम इस उद्योग में जिस तरह अधिग्रहणों की आंधी देख रहे हैं, वैसा सिलसिला पहले कभी नहीं दिखा। आखिर भारतीय उद्योग जगत के तमाम दिग्गज उस क्षेत्र पर क्यों दांव लगा रहे हैं जिसे मुश्किल समझा जाता है?

तकरीबन 80,000 करोड़ रुपये के मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग ने वित्तीय और रणनीतिक दोनों तरह के निवेशकों को निराश किया है। मोटे तौर पर निवेशक इस क्षेत्र से बहुत ज्यादा मुनाफा नहीं बना पाए हैं। मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग की 13 सूचीबद्घ कंपनियों (जी को छोड़कर) के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की कीमत के 31 मई तक के रुझान से यह साबित हो जाता है। इनमें से केवल छह कंपनियों के शेयरों में सकारात्मक रुख देखा गया जिनकी सालाना चक्रवृद्घि दर (सीएजीआर) ने मुनाफा दर्शाया जबकि शेष में नकारात्मक रुख देखा गया। इन छह कंपनियों में से केवल यूटीवी का सीएजीआर ही दहाई अंकों में रहा जबकि शेष का दायरा एक से नौ फीसदी के बीच में ही रहा। भारत में मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग में निवेशक मुनाफा नहीं बना पा रहे हैं यह समझने के लिए आपको इस विश्लेषण की जरूरत नहीं है।

सौदों का प्रवाह कहानी खुद बयां करता है। वीसीसीऐज डाटा के अनुसार वर्ष 2007 में इस क्षेत्र में जहां 55.3 करोड़ डॉलर का निवेश हुआ था वहीं वर्ष 2012 के पहले पांच महीनों में यह आंकड़ा सिमटकर 9.4 करोड़ डॉलर पर आ गया। निवेशक भारत में मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग को खास तरजीह नहीं दे रहे हैं। क्रय शक्ति वाले 35 करोड़ उपभोक्ताओं वाले बाजार में विज्ञापनों में दहाई की वृद्घि और मीडिया का बढ़ता दखल कहता है कि यह तस्वीर बदली हुई होनी चाहिए। क्या ऐसा नहीं है। जरा डीटीएच प्रसारण पर गौर करिए। करीब छह कंपनियों ने पिछले नौ वर्षों में इस बाजार में 4 अरब डॉलर (22,000 करोड़ रुपये) झोंक दिए। अभी तक इनमें से केवल एक ही कंपनी परिचालन मुनाफा बना रही है। एक ओर जहां डीटीएच से इस उद्योग में पारदर्शिता बढ़ी है और यह प्रसारकों के लिए कमाई बेहतर कर रहा है वहीं कीमत नियमन, अधिक कर और बाधित नीतियों की वजह से उनके लिए कमाई मुश्किल हो रही है। पूरे मीडिया और मनोरंजन उद्योग की यही व्यथा-कथा है। औचक नियमन, अत्यधिक बिखराव और कई मामलों में मुनाफा कमाने के लिए जरूरी ढांचा बनाने में नाकाम कंपनियों की अक्षमता कारोबारी योजनाओं को हकीकत का रूप नहीं लेने देती। लगभग 60,000 से अधिक केबल ऑपरेटर, दर्जनों छोटे अखबार, टीवी कंपनियों को अपनी जागीरें बहुत प्रिय हैं, एकीकरण और दायरा बढ़ाने से मुनाफा मुश्किल जो हो जाता है।

1,789 करोड़ रुपये की हैसियत वाला नेटवर्क18 समूह बड़े पैमाने पर क्षमता विस्तार कर रहा है, कंपनियों के अधिग्रहण में व्यस्त है और किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार है। लेकिन आखिरकार क्या हुआ कि पिछले साल इसका कर्ज कंपनी की कमाई के बराबर हो गया। 1,500 करोड़ रुपये के इंडिया टुडे समूह के बारे में कहा जा रहा है कि उसे अपने दैनिक मेल टुडे की वजह से नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि दोनों ही कंपनियों की झोली में कुछ ऐसे नगीने हैं जो निवेशकों के लिहाज से बढिय़ा परिसंपत्तियां हैं। नेटवर्क18 के पास सीएनबीसी, कलर्स, फोब्र्स, मनीकंट्रोलडॉटकॉम सहित जैसे माध्यम हैं तो वहीं इंडिया टुडे के पास उसका पत्रिका प्रभाग और टीवी कंपनी है जो आज तक सहित कई चैनलों का मालिकाना हक रखती है।

इस तरह से इन कंपनियों में निवेश की जरूरत तो रही है। चूंकि वित्तीय निवेशक और वृद्घि के वित्तपोषण के लिए तैयार नहीं हैं, ऐसे में भीमकाय मीडिया कंपनियां बतौर रणनीतिक निवेशक, सबसे बेहतर दांव साबित होंगी। हालांकि भारतीय मीडिया कंपनियां इस तरह के अधिग्रहणों को करने के लिहाज से उतनी बड़ी नहीं हैं, ऐसे में नजर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर जाकर ठहरती है। लेकिन अधिकांश विदेशी मीडिया कंपनियां अपने घरेलू बाजार में आई मंदी सेे जूझ रही हैं। ऐसे में वे भारत जैसे जटिल बाजार में जोखिम लेने में दिलचस्पी नहीं रखतीं। इसके बाद एक ही श्रेणी बचती है और वह है दिग्गज भारतीय कंपनियां।

हो सकता है कि उनकी नजर मुनाफे से परे हो। मसलन प्रभाव या रुआब। लेकिन आप दूसरों की तरह यह तर्क भी दे सकते हैं कि प्रभाव के लिए उन्हें मीडिया कंपनी के सहारे की जरूरत नहीं। यह भी जरूरी नहीं कि मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार में सक्रिय किसी कंपनी को मुश्किलें नहीं झेलनी पड़तीं। यहां आउटलुक मामले में हैथवे इन्वेस्टमेंट पर कर विभाग की सख्ती एक उम्दा मिसाल है। दूसरी और अधिक संभावित वजह यही लगती है कि दिग्गज भारतीय कारोबारी मीडिया कारोबार को समझना चाहते हैं। इसके लिए वे कुछ मुनाफे का त्याग करने को भी तैयार हैं। वित्तीय निवेशकों के लिए सब्र थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन कारोबारी दिग्गज ऐसा कर सकते हैं। यह भारतीय मीडिया मालिकों के लिए भी सुकून देने वाला है। देखिए और इंतजार करिए कि यह नया तरीके कैसे रंग लाता है। साभार : बीएस

हरिभूमि, जबलपुर के संपादक चैतन्‍य भट्ट के पिता का निधन

मध्‍य प्रदेश के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा हरिभूमि जबलपुर के संपादक चैतन्‍य भट्ट के पिता दुर्गाशंकर भट्ट का सोमवार को निधन हो गया. वे 82 साल के थे तथा पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. उनका इलाज जबलपुर के ही मेट्रो हास्‍पीटल में चल रहा था. यहीं पर उन्‍होंने आखिरी सांस लिया. वे देहरादून के एक संस्‍थान में हिंदी अधिकारी के पद से रिटायर हुए थे. वे अच्‍छे लेखक और कवि भी थे. उनके लेख एवं कविताएं कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती थीं.

वे अपने पीछे पत्‍नी तथा दो बच्‍चों का भरा पूरा परिवार छोड़कर गए हैं. चैतन्‍य भट्ट के छोटे भाई भी सेंट्रल बैंक में राजभाषा अधिकारी हैं. दुर्गाशंकर जी का अंतिम संस्‍कार जबलपुर के रानीताल मुक्तिधाम श्‍मशान घाट पर किया गया. इस दौरान काफी संख्‍या में परिवार के शुभचिंतक, पत्रकार एवं गणमान्‍य लोग शामिल रहे. पत्रकारों ने चैतन्‍य भट्ट के पिता के निधन पर शोक व्‍यक्‍त किया है.

दूरदर्शन के पूर्व कैमरामैन ने गोली मारकर खुदकुशी की

नई दिल्ली : दूरदर्शन के लिए कई शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बना चुके वरिष्ठ कैमरामैन अमरजीत सिंह ने सिद्धार्थ एंक्लेव स्थित अपने कार्यालय में खुदकुशी कर ली। सिंह ने अपने लाइसेंसी रिवॉल्वर से कनपटी में गोली मार ली। मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। आत्‍महत्‍या के कारणों का भी अभी पता नहीं चल पाया है। पुलिस ने उनका शव पोस्‍टमार्टम के लिए भेज दिया। दक्षिण-पूर्वी जिले के एडिशनल पुलिस कमिश्नर अजय चौधरी के मुताबिक कार्यालय से कोई सामान गायब नहीं है, लिहाजा यह लूट या चोरी जैसी किसी वारदात में हुई हत्‍या नहीं है। 

जानकारी के अनुसार अमरजीत सिंह (70 वर्ष) सनलाइट कालोनी थाना क्षेत्र में स्थित सिद्धार्थ एंक्लेव में रहते थे। यहां उनके चार फ्लैट हैं, जिनमें तीन नंबर फ्लैट को उन्होंने आफिस बनाया हुआ था। इनके परिवार में पत्नी, चार बेटे व एक बेटी है। चार बेटों में दो मुंबई व दो विदेश में रहते हैं। फिलहाल वह सिद्धार्थ एंक्लेव में अकेले रह रहे थे। उनकी पत्नी बेटे के पास मुंबई गई हुई थी। अमरजीत सिंह ने दूरदर्शन से सेवानिवृत्त होने के बाद सीने इंडिया प्रोडक्शन हाउस खोला था। वह किराए पर शूटिंग का सामान देते थे। अभी वे राज्यसभा चैनल से भी जुड़े हुए थे।

पुलिस के मुताबिक इन्होंने सोमवार को लक्ष्मीनगर स्थित हथियारों के डीलर से 10 कारतूस लिए थे। मंगलवार की सुबह करीब पौने आठ बजे वह आफिस पहुंचे और उन्होंने खुद को गोली मार ली। एक गोली चलने के बाद वह जमीन पर गिर पड़े। आवाज सुनने के बाद परिजनों ने कमरे में जाकर देखा तो खून से लथपथ पडे़ थे। मौके से पुलिस को तलाशी के दौरान कोई सुइसाइड नोट नहीं मिला है। इसलिए फिलहाल खुदकुशी के कारणों की गुत्थी उलझी हुई है। पुलिस परिजनों से पूछताछ में जुटी है। बताया जाता है कि अमरजीत सिंह कई हिंदी फिल्मों में बतौर कैमरामैन रह चुके हैं।

निरुपमा के पत्रकार प्रेमी प्रियभांशु ने किया सरेंडर, भेजा गया जेल

कोडरमा। दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार की महिला पत्रकार निरुपमा पाठक को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले के आरोपी और उसके प्रेमी पत्रकार प्रियभांशु रंजन ने आज झारखंड के कोडरमा की एक अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में 14 दिन के लिए जेल भेज दिया गया। दिल्ली में समाचार एजेंसी भाषा में पत्रकार बिहार के दरभंगा निवासी प्रियभांशु ने अंतरिम जमानत और अन्य राहतों के लिए उच्चतम न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया था।

लेकिन न्यायालय ने उसकी अर्जी खारिज करते हुए उसे निचली अदालत में पेश होने का आदेश दिया था। उसने सुबह साढ़े नौ बजे अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (एसीजेएम) आर के सिंह की अदालत में आत्मसमर्पण किया। सिंह ने उसकी जमानत अर्जी खारिज करते हुए 14 दिन की न्यायिक हिरासत में उसे जेल भेज दिया। अदालत ने इस मामले में पहले भी पत्रकार के खिलाफ वारंट जारी किया था।

मालूम हो कि अर्थ जगत से जुडे़ एक मशहूर अंग्रेजी दैनिक के दिल्ली कार्यालय में कार्यरत निरुपमा (22) का शव यहां झुमरी तिलैया के चित्रगुप्त नगर स्थित उसके पैतृक आवास में 29 अप्रैल 2010 को मिला था। परिजनों ने इसे आत्महत्या करार दिया था जबकि प्रियभांशु ने इसको सम्मान के लिए हत्या करार देते हुए मृतका के परिजनों को दोषी ठहराया था। पुलिस ने स्थानीय डॉक्टरों की टीम की रिपोर्ट पर हत्या का मामला दर्ज करके मृतका की मां सुधा को गिरफ्तार कर लिया था। मार्च 2011 में कोलकाता की एक फोरेंसिक प्रयोगशाला में सुसाइड नोट पर निरुपमा के हस्ताक्षर की पुष्टि होने के बाद इस मामले को हत्या की बजाय भारतीय दंड संहिता की धारा (306) आत्महत्या के लिए उकसाने में तब्दील करके इसमें मृतका के पिता-माता और उसके इकलौते भाई तथा प्रेमी प्रियभांशु को आरोपी बनाया गया था।

मृतका के पिता धर्मेंद्र पाठक (बैंक मैनेजर) और भाई समरेंद्र पाठक मुंबई में आयकर विभाग में कार्यरत को इस मामले में गिरफ्तारी से उच्चतम न्यायालय ने फिलहाल राहत दी हुई है। सुधा पाठक कई महीने जेल में रहने के बाद अब जमानत पर हैं। पोस्टमार्टम के दौरान निरुपमा के गभर्वती होने की भी पुष्टि हुई थी। दिल्ली प्रवास के दौरान निरुपमा और प्रियभांशु की दोस्ती हुई थी जो बाद में प्रेम में बदल गई। प्रियभांशु ने आरोप लगाया था कि निरुपमा के परिजनों ने दूसरी जाति के व्यक्ति का होने के कारण विवाह के विरोध में निरुपमा की हत्या कर दी है। बाद में पुलिस ने दोनों पक्षों को निरुपमा पर मानसिक दबाव बनाकर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया था। उधर, मई 2010 में सुधा पाठक ने प्रियभांशु के खिलाफ उसकी बेटी से बलात्कार करने, उसे आत्महत्या के लिए उकसाने और धमकाने तथा धोखाधड़ी का एक अलग मामला दर्ज किया था। उसकी सुनवाई अलग से चल रही है। साभार : आईबीएन 

सहारा के पत्रकार खुश, उन्‍हें मजीठिया वेज बोर्ड की जरूरत नहीं

बनारस के सभी बड़े अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की न तो कोई जल्‍दी है और ना ही कोई जरूरत है. सबने अपने अपने कारण डिप्‍टी लेबर कमिश्‍नर को बता दिए हैं. इसके बाद डीएलसी ने अंतिम सुनवाई के लिए 18 जून की तिथि निर्धारित की है. इसमें सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि सहारा के कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप वेतनमान नहीं चाहिए. वे वर्तमान में मिल रहे वेतन भत्‍तों से संतुष्‍ट हैं. वहीं जागरण की तरफ से अब तक इस मामले में कोई आश्‍वासन नहीं दिया गया है. बनारस के पत्रकारों की लड़ाई काशी पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष योगेश गुप्‍ता पप्‍पू और पत्रकार कर्मचारी महासंघ के मंत्री अजय मुखर्जी दादा लड़ रहे हैं. 

ये लोग बनारस के बड़े अखबारों में अं‍तरिम लागू करने से लेकर मजीठिया वेज लागू करवाने की मांग को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं. दोनों पत्रकार नेता मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने को लेकर भी लगातार लेबर ऑफिस का चक्‍कर लगा रहे हैं. मंगलवार को भी इस मामले की सुनवाई थी, लेकिन इन दोनों लोगों के अलावा बनारस के बड़े अखबारों का कोई भी प्रतिनिधि सुनवाई के दौरान नहीं पहुंचा. सभी बड़े अखबारों ने इस मामले में अपनी-अपनी बात डीएलसी के सामने रख दी है. कर्मचारियों की छंटनी में लगा जागरण तथा आज ने अब तक अपना पक्ष प्रस्‍तुत नहीं किया है.

इस साल फरवरी में बनारस के डिप्‍टी लेबर कमिश्‍नर एके राय ने केंद्रीय सचिव डा. मृत्‍युंजय सारंगी के पत्र का हवाला देते हुए 20 मार्च तक बनारस के सभी बड़े अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के संबंध में की कई कार्रवाई का रिपोर्ट देने को कहा था. पिछली कुछ सुनवाइयों के दौरान अमर उजाला, हिंदुस्‍तान, आज, राष्‍ट्रीय सहारा तथा दैनिक जागरण के लोग पहुंचे थे. सबसे अपनी-अपनी बात रखी थी. पर किसी ने बीस तक लिखित में अपनी बात नहीं रखी थी, जबकि दैनिक जागरण, कानपुर से आए मनोज दुबे ने दोनों पत्रकार संगठनों के औचित्‍य पर ही सवाल उठा दिया था. उन्‍होंने योगेश गुप्‍ता पप्‍पू तथा अजय मुखर्जी दादा को लेकर आपत्ति लगाई थी, जिसके बाद डीएलसी ने दोनों लोगों से अथारिटी मांगी थी.

जागरण के आपत्ति के बाद दोनों पत्रकार नेता ने डीएलसी को अथॉरिटी दे दी थी. इस बीच अमर उजाला तथा हिंदुस्‍तान ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में चलने का हवाला देते हुए इसके बाद लागू करने की बात कही. जबकि सहारा समय ने स्‍पष्‍ट रूप से डीएलसी को लिखकर दे दिया कि उसके कर्मचारी संतुष्‍ट हैं. उनको मजीठिया वेज बोर्ड की कोई दरकार नहीं है. उन्‍हें जो पैसे मिल रहे हैं वे पर्याप्‍त हैं. जबकि जागरण और आज ने अब तक इस मामले में लिखित रूप में कुछ भी उपलब्‍ध नहीं कराया है. जागरण के मनोज दुबे ने डीएलसी को फोन करके बीमारी का बहाना बनाया तथा बाद में अपना पक्ष रखने की बात कही.

एके राय ने सभी पक्षों को अंतिम सुनवाई के लिए 18 जून का समय दिया है. उन्‍होंने स्‍पष्‍ट आदेश दिया है कि 18 जून को सभी पक्ष उपस्थित हों ताकि सुनवाई की जा सके. अब देखना है कि मंगलवार को ही डीएलसी के आदेश की धज्जियां उड़ाने वाले अखबारों के प्रबंधन 18 जून को कौन सी रणनीति अपनाते हैं. वैसे भी अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ पाने वाले पत्रकारों के लिए आखिर योगेश गुप्‍त पप्‍पू और अजय मुखर्जी दादा कब तक लड़ाई लड़ेंगे. कभी पराडकरजी, खाडिलकरजी, गर्देजी, इश्‍वरचंद्र सिन्‍हा, पंडित गंगासागर मिश्र, कमलापति त्रिपाठी जैसे निर्भीक पत्रकारों की धरती अब डरपोक और कायर पत्रकारों की धरती बनती जा रही है. वे अपने उत्‍पीड़न के खिलाफ ही आवाज उठाने में डर रहे हैं.  


इस मामले में और अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं – बनारस में मजीठिया
 

पुलिस अधिकारी ने कहा – शराब का धंधा चलेगा, जो उखाड़ना हो उखाड़ लो

कोलकाता के अभय बंग पत्रिका टीम और अभय टीवी की पहल से कोलकाता के चितपुर थाने के एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी मनीष गुप्ता का पर्दाफाश किया है. खबर में दिखया गया है कि किस प्रकार से पुलिस अधिकारी एक युवक से अश्लीलता से पेश आते हुए बदतमीजी से बातें कर रहा है व युवक को डरा धमका रहा है. युवक का सिर्फ इतना ही कसूर है कि उसने अवैध रूप से चल रहे शराब के ठेके को बंद करवाने के लिए शिकायत की थी. इस पर भ्रष्ट व बिकाऊ पुलिस अधिकारी उक्त युवक को उल्टा छेड़खानी व बलात्कार की कोशिश के मामले में फंसा देने की बात कह रहा है.

युवक के लाख कहने पर भी पुलिस अधिकारी मानने को तैयार नहीं. वो कहता है कि शराब का धंधा चलेगा तुम्हें जो उखाड़ना है उखाड़ लो. यहां तक कहता है कि अगर तुम रंडी की बस्‍ती में रहोगे तो क्या रंडी की धंधे को बंद करवा लोगे. पूरा वाक्य सुनने व देखने के लिए आप इस लिंक http://www.atvabhay.in/index.html पर क्लिक कर सकते हैं. खबर है कि आरोपी पुलिस अधिकारी खबर के ऑन एयर के बाद युवक से माफ़ी मांगने व आपसी समझौते की बात कर रहा है. इस खबर के चलने के बाद पूरी कोलकाता पुलिस में चर्चा व भय देखा जा रहा है. आगे भी ऐसी कई आम समस्याओं को ए टीवी उजागर करने के लिए तैयार है.

शंकर यादव

स्‍वतंत्र पत्रकार

8860941633  

गुजरात के तीस पत्रकारों को किसने दिया लाखों का कीमती फ्लैट?

: कानाफूसी : यशवंतजी नमस्कार, गुजरात के पत्रकारों की मानो लॉटरी लग गई है. गौतम अदानी की चापलूसी करनेवाले पत्रकारों की चर्चा पूरे गुजरात के मीडिया में सबसे हॉट खबर बनी हुई है. अपने आपको पत्रकारिता के महारथी बताने वाले वरिष्‍ठ पत्रकारों को अदानी की चापलूसी का फल मिला है. मोदी और अदानी के लिए पत्रकार से दलाल बने ३० पत्रकारों को अदानी ने अपनी सेवा से खुश होकर २५ से ७० लाख रुपए की कीमत के फ्लैट की सौगात दी है.

वैसे ये कोई एक घटना नहीं है. देशभर में काले धन की बात को आवाज़ देने वाले गुजरात के कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों की ही जाँच कराई जाये तो करोड़ों की काली कमाई तो इन्हीं के पास से निकल आएगी. इन लोगों ने अपने कर्तव्य को भुला कर सरकार और उद्योगपतियों के बीच की दलाली कर काली कमाई इकट्ठा की है. रातोंरात "कीन्स-विले" में करोड़ों के प्लाट और लग्‍जरियस फ्लैट्स और कीमती जमीन किधर से आई? इसका उत्‍तर किसी के पास नहीं है, क्‍योंकि अपने आपको वरिष्‍ठ और रसूखदार बताने वाले ये पत्रकार चोर का भाई घंटी चोर यानी की तेरी भी चुप और मेरी भी चुप करके चांदी काट रहे हैं. अगर इनकी जांच कराई जाए तो दूध का दूध व पानी का पानी सामने आ जाएगा.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अब मुजफ्फरपुर और मुंगेर में पत्रकारों की शिकायत सुनेगी पीसीआई की तीन सदस्‍यीय कमेटी

बिहार में मीडिया पर दवाब की जाँच के लिए गठित प्रेस काउंसिल की तीन सदस्यीय टीम अपने जाँच के दूसरे चरण में ११ जून को मुजफ्फरपुर और १२ को मुंगेर पहुँच कर स्थानीय पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं एवं अन्य स्टेक-होल्डर्स से बातें करेगी. मुजफ्फरपुर में तिरहुत, दरभंगा और सारण प्रमंडलों के विभिन्न जिलों के लोगों की शिकायत सुनने की व्यवस्था की गई है. बेगुसराय जिला जो वस्तुतः मुंगेर प्रमंडल में पड़ता है, वहां के लोग अपनी सुविधा के मुताबिक मुजफ्फरपुर और मुंगेर दोनों ही जगहों पर अपनी बात रख सकते हैं. मुंगेर और बेगुसराय के बीच गंगा नदी पड़ने की वजह से भौगोलिक अवरोध की वजह से यह विशेष व्यवस्था बेगुसराय के स्टेक होल्डर्स के लिए रखी गई है.

बेगुसराय के कुछ इलाकों के लिए मुंगेर सुगमता से पहुँचने की सुविधा है और कुछ इलाकों से मुजफ्फरपुर पहुँचने की सुविधा ज्यादा है. इसे देखते हुए बेगुसराय के लोगों के लिए यह व्यवस्था रखी गई है. टीम के सदस्य अरुण कुमार के मुताबिक टीम सभी लोगों की बातों को सुनेगी किन्तु समय सीमा के मद्दे नजर टीम अपेक्षा करती है कि जो लोग किसी तरह की शिकायत टीम के सामने रखना चाहते हैं, वे स्पष्‍ट रूप से अपना बयान लिखित रूप में लायें और उसके साथ यदि कोई प्रमाण हो तो वह भी अपनी शिकायत की चिट्ठी के साथ संलग्न करें.

टीम ने भागलपुर, सहरसा, पूर्णिया और मुंगेर प्रमंडलों के विभिन्न जिलों के शिकायतकर्ताओं की बातों को सुनने की नीयत से उनके लिए निकटवर्ती जगह के तौर पर मुंगेर का चयन किया है. जहाँ यह टीम १२ जून को पहुंचेगी. जिन शिकायतकर्ताओं को सुनवाई के स्थल और समय की जानकारी चाहिए वे १२ जून की सुबह से टीम के सदस्य अरुण कुमार के मोबाइल नम्बर ९४३०६१९५०८ पर सम्पर्क कर सकते हैं.

जागरण में बंपर छंटनी (32) : नोएडा में फेल हुए ब्राह्मणों को बचाने के लिए गैर ब्राह्मणों की बलि

दैनिक जागरण, नोएडा में जातिवाद का जमकर बोलबाला हैं. छंटनी में जमकर भेदभाव किया जा रहा है. अगर आप गैरब्राह्मण हैं और पास हैं तब भी आपकी नौकरी नहीं बचने वाली, परन्‍तु आप आंतरिक परीक्षा में फेल हैं लेकिन ब्राह्मण हैं तो आपके नौकरी पर कोई खतरा नहीं. यह कोई आरोप नहीं है बल्कि सच्‍चाई है, जिसकी चर्चा हर किसी के जुबान पर है. लोग इसके उदाहरण भी दे रहे हैं. छंटनी के शिकार कर्मचारी आरोप लगा रहे हैं कि अगर आप ब्राह्मण हैं तो आपकी नौकरी यहां पक्‍की है.

आरोप है कि प्रबंधन में शामिल उच्‍च पदस्‍थ ब्राह्मण अपने जाति के फेल हुए लोगों को बचा लिया है. छंटनी के शिकार कर्मचारियों ने जो सूचना दी है उसके अनुसार सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत वी. सुदामा, जिनका क्रमांक जेडी 0737 है, इन्‍होंने 100 नम्‍बर की परीक्षा में मात्र 22 अंक प्राप्‍त किए हैं इसके बाद भी इनकी नौकरी सुरक्षित है. इसी प्रकार जेडी0238 क्रमांक वाले विजय नारायण तिवारी 26 अंक, जेडी0161 अरविंद विश्राम 26 अंक, जेडी0443 विश्‍वनाथ झा 29 अंक, जेडी2405 रमेश ठाकुर, जेडी0499 राधेश्‍याम तिवारी 30 नम्‍बर, जेडी2269 ब्रिजेश कुमार तिवारी 29 नम्‍बर तथा जूनियर सब वाईएन झा 24 अंक प्राप्‍त किए हैं, जो जागरण की परीक्षा के निर्धारित अंक के अनुसार फेल हैं. इसके बाद भी इन लोगों की नौकरी बची हुई है.

जबकि इन लोगों से ज्‍यादा नम्‍बर पाने वाले कई गैर ब्राह्मणों को छंटनी के नाम पर बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया ताकि इन लोगों को बचाया जा सके. जनरल डेस्‍क पर कार्यरत धर्मेंद्र सिंह तथा जेपी यादव पचास से ज्‍यादा नम्‍बर पाकर पास थे, परन्‍तु प्रबंधन ने उन लोगों को नकल करने के आरोप में लटका दिया. इस इसलिए किया गया कि इन दोनों की जगह ब्राह्मण लॉबी को बचाया जा सके. खबर है कि रिपोर्टिंग करने वाली गैर ब्राह्मण कल्‍पना बिष्‍ट से भी प्रबंधन ने इस्‍तीफा ले लिया है. गैर ब्राह्मणों से धमकी देकर या जबरदस्‍ती करके इस्‍तीफा लिया जा रहा है. जबकि अपने लोगों को बचाया जा रहा है. खबर है कि इसमें निशिकांत ठाकुर, किशोर झा, विष्‍णु त्रिपाठी की लॉबी पूरी तरह से सक्रिय है. मालिक पैसे के आगे धृत्‍राष्‍ट्र बने हुए हैं. उनके कुछ भी गलत सही नहीं दिख रहा है.


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इस सेक्‍स सीडी में राजस्‍थान का कौन सा नेता है?

राजस्थान सहित देश भर में नेताओं का चरित्र सामने आने लगा है. कुछ रोज पूर्व भंवरी सीडी काण्ड ने राजनीति में भूचाल ला दिया था. इस बार इंडिया टुडे ने अपने ताज़ातरीन अंक में बाड़मेर जिले के एक विधायक की सीडी होने का राज खोला है. उच्च पदस्थ सूत्रों की माने तो इंडिया टुडे ने जो खुलासा किया है, उसकी सुई राजस्थान सरकार के दो मंत्रियों की तरफ घूम रही है. सूत्रों के अनुसार बाड़मेर जिले के विधायक के इसमें शामिल होने की खबरों के बाद बाड़मेर सहित राजस्थान भर में नेता के नाम का कयास लगाया जा रहा है.

बाड़मेर में नेता मीडियाकर्मियों से नाम के बारे में धडाधड पूछ रहे हैं. इस सीडी से एक बार फिर से राजस्‍थान की राजनीति में भूचाल आ गया है. सब जानना चाह रहे हैं कि आखिर इस सीडी में किस विधायक की रंगरेलियां कैद हैं. आखिर दूसरी भंवरी का सच क्या है? इस बात का खुलासा तो नहीं हुआ, मगर मीडिया जगत से जुड़े़ लोगों की जबान पर राजस्थान सरकार के दो मंत्रियों के नाम होने का दावा किया जा रहा है. बाड़मेर में हुए इस सनसनीखेज सीडी कांड की अफवाहों को समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों के द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित और प्रसारित करने के बाद अब नेता एक दूसरे को यह पूछ रहे हैं कि कही इस सीडी में वो तो नहीं हैं?

हे धनंजय! क्‍लब के हजारों रुपये कौन खा गया?

शिमला प्रेस क्लब इन दिनों विवादों में है। सालाना चुनाव 13 अक्तूबर 2009 को हुए थे। कायदे से 13 अक्तूबर 2010 से पहले सालाना चुनाव हो जाने चाहिए थे, जो ढाई साल बीत जाने के बाद भी नहीं कराए जा रहे हैं। प्रेस क्लब शिमला के पांच बार अध्यक्ष एवं तीन बार मुख्य महासचिव रह चुके शिमला के वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु ने इस सिलसिले में क्लब के मौजूदा अध्यक्ष धनंजय शर्मा को 31 मई 2012 को लम्बा पत्र लिखकर कई गंभीर आरोप लगाए और जल्द इस्तीफा देकर चुनाव करवाने को कहा।

इसका असर हुआ और धनंजय शर्मा ने क्लब की संचालन परिषद की बैठक बुलाकर 27 जून 2012 को साधारण अधिवेशन बुलाने का फैसला लिया। लेकिन इसी बीच क्लब में हजारों रुपयों के गबन की पुख्ता सूचना पूर्व अध्यक्ष कृष्णभानु को मिली। इस बारे में उन्होंने फिर धनंजय को पत्र लिखकर असलियत बताने की मांग की। कृष्णभानु ने इसके लिए मौजूदा अध्यक्ष को 15 जून तक का समय दिया है। उसके बाद थाना सदर शिमला में गबन की एफआईआर दर्ज कराने की चेतावनी दी है। नीचे प्रस्तुत है, कृष्णभानु द्वारा धनंजय शर्मा को 5 मई 2012 को लिखा पत्र।


श्री धनंजय शर्मा
अध्यक्ष (?)
प्रेस क्लब ऑफ शिमला
पदमदेव कॉम्पलैक्स (धरातल मंजिल)
दि रिज, शिमला (हि.प्र.)

विषय : प्रेस क्लब में हजारों रुपयों का गबन (एक)।

महादेय,

आपके नेतृत्व में प्रेस क्लब शिमला में हजारों रुपयों के गबन की पहली पुख्ता सूचना प्राप्त हुई है। 13 अक्तूबर 2009 को प्रेस क्लब शिमला की संचालन परिषद के लिए चुनाव हुए। निर्वाचन अधिकारी वरिष्ठ पत्रकार श्री सुशील कुमार शर्मा और सहायक निर्वाचन अधिकारी दैनिक भास्कर के श्री साहिल शर्मा थे। नामांकन पत्रों के लिए निर्धारित शुल्क तय था। चुनाव लड़ने के इच्छुकों ने निर्वाचन अधिकारियों से निर्धारित शुल्क जमा कराने के पश्चात नामांकन पत्र खरीदे, भरे और चुनाव लड़ा। नामांकन पत्र शुल्क के जरिए हजारों रुपए निर्वाचन अधिकारियों के पास एकत्रित हुए, जो चुनाव सम्पन्न होने के बाद आपको सौंप दिए गए, लेकिन यह भारी भरकम धनराशि आज तक क्लब के बहीखातों में कहीं दर्ज नहीं है। फलस्वरूप निम्नलिखित प्रश्न उत्पन्न हो गए हैं :-

1.    निर्वाचन अधिकारियों ने क्लब के किस पदाधिकारी के पास यह धनराशि जमा कराने के लिए सौंपी?

2.    यदि यह धनराशि अध्यक्ष को नहीं सौंपी गई तो अध्यक्ष होने के नाते धनंजय शर्मा ने मामला संचालन परिषद की बैठकों में क्यों नहीं उठाया। ढाई साल पहले क्लब के हजारों रुपए आखिर कौन खा गया?

3.    हे धनंजय! क्या आप बताएंगे कि उपरोक्त हजारों रुपए आप नहीं तो कौन डकार गया? कृपया बताएं कि यह हजारों रुपए प्रेस क्लब के किस बही खाते में और किस तारीख को जमा कराए गए?

4.    अध्यक्ष होने के नाते मैं इस गबन के लिए आपको व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार मानता हूँ। अतः आपसे कहा जाता है कि 13 अक्तूबर 2009 से अब तक 18 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज के साथ गबन की गई हजारों रुपयों की धनराशि क्लब के खाते में जमा कराएं। साथ ही इस गबन की जिम्मेदारी लेते हुए क्लब के साधारण अधिवेशन में क्षमा याचना करें।

5.    आपको 15 जून 2012 का समय दिया जाता है। समस्त जानकारी उपलब्ध कराएं, अन्यथा 15 जून के बाद कभी भी थाना सदर में व्यक्तिगत तौर पर आपके विरूद्ध गबन का मामला दर्ज किया जा सकता है।

मैं याद दिला दूं कि मैं इस क्लब का लगातार पांच बार अध्यक्ष रह चुका हूँ। इस संस्था को मैंने और मेरे मित्रों ने लहू से सींचा है। अतः आपके नेतृत्व में इसे कदापि बरबाद नहीं होेने देंगे। धन्यवाद।

भवदीय

(कृष्णभानु)

पूर्व अध्यक्ष

प्रेस क्लब ऑफ शिमला

प्रतिलिपिः-

1.    पंजीयक सोसायटीज़ जिला शिमला, शिमला(हि.प्र.)।
2.    मुख्य महासचिव प्रेस क्लब ऑफ शिमला (हि.प्र.)।
3.    प्रबंध कमेटी के सभी माननीय सदस्य।
4.    सभी दैनिक समाचार पत्रों के शिमला स्थित संपादक अथवा ब्यूरो प्रभारियों के ध्यानार्थ। उनसे अनुरोध है कि यह सब हालांकि प्रकाशन हेतु नहीं है तथापि आप इस बारे में अपने विवेकानुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
5.    क्लब के सभी वरिष्ठतम् एवम् संस्थापक सदस्यों को सूचनार्थ।


इस मामले में अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें –

पत्र भेजकर कृष्‍णभानु ने कहा – धनंजय इस्‍तीफा दें या कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें

राहुल पहुंचे हेडलाइंस टुडे, देश दीपक कलश से जुड़े

अंग्रेजी चैनल न्‍यूज एक्‍स से खबर है कि राहुल शिवशंकर ने इस्‍तीफा दे दिया है. राहुल अपनी नई पारी हेडलाइंस टुडे से शुरू करने जा रहे हैं. हेडलाइंस के साथ उनकी यह दूसरी पारी है. इसके पहले भी वो इस चैनल को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. हेडलाइंव में वे प्राइम टाइम एंकर होंगे. हेडलाइंव टुडे से इस्‍तीफा देने के बाद राहुल टाइम्‍स नाउ ज्‍वाइन कर लिया था. वहां से इस्‍तीफा देकर न्‍यूज एक्‍स पहुंचे थे.

कलश टीवी से खबर है कि देश दीपक मिश्र ने ज्‍वाइन किया है. वे मार्केटिंग की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. देश दीपक इसके पहले सत्‍य टीवी से जुड़े हुए थे. वे बिहार आंखों देखी, न्‍यूज वन इंडिया और साधना टीवी जैसे संस्‍थानों के साथ भी वे काम कर चुके हैं. चैनल के हेड विनीत श्रीवास्‍तव हैं. उल्‍लेखनीय है कि इस भक्ति चैनल का विस्‍तार किया जा रहा है.

वाह रे राष्‍ट्रीय सहारा! दारू भट्ठी के मुंशी को बना दिया पत्रकार

गोरखपुर : कहते हैं राष्ट्रीय सहारा में कुछ भी संभव है. अब देखिये दूसरे संस्थानों में छंटनी का दौर चल रहा है, तमाम अच्‍छे पत्रकार खाली हो रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय सहारा को योग्य पत्रकार ढूंढे नहीं मिल रहे हैं. महाराजगंज के ब्यूरो आफिस में अम्बरीश पाण्डेय को बतौर पत्रकार रखा गया है. और यह खबर सुनने वाला हर कोई आश्चर्य कर रहा है. अम्बरीश पाण्डेय मूल रूप से अजय श्रीवास्तव के दारू की भट्ठी के मुंशी हैं. वह अजय श्रीवास्तव के यहाँ ही रहते हैं. जबसे राष्ट्रीय सहारा में पत्रकारिता करने लगे भट्ठी पर न बैठ कर अजय बाबू के घर पर ही शराब की बिक्री का हिसाब किताब करते हैं. सहारा के दफ्तर में कभी जाते हैं तो कभी नहीं भी जाते है. ब्यूरो प्रभारी की कृपा से नौकरी चल रही है.

बुराई ये भी नहीं है कि वे दारू के भट्टी के मुंशी हैं तो पत्रकार नहीं हो सकते. पर पत्रकार बनने के बाद भी ये काम जारी रखना लोगों को खटक रहा है. महाराजगंज के नागरिक जबसे यह सुने हैं कि अम्बरीश पाण्डेय पत्रकार हो गए, तो चटखारे लेकर कहते हैं कि देशी के साथ खबर का तड़का मजेदार होता होगा. अन्य अखबारों में योग्य पत्रकारों के चलते ही उनका अखबार निरंतर आगे बढ़ रहा है. दैनिक जागरण के महेंद्र तिवारी, अमर उजाला के धीरज पाण्डेय, हिंदुस्तान के अजयजी की टीम के सामने मुंशीजी कितना टिकेंगे, यह तो वक्त बताएगा. लेकिन जिन लोगों ने उन्हें पत्रकारिता का तमगा दिया उन लोगों को तो जाँच परख करनी ही चाहिए थी. इस संदर्भ में जब अम्‍बरीश पाण्‍डेय से बात की गई तो उन्‍होंने राष्‍ट्रीय सहारा ज्‍वाइन करने की पुष्टि की साथ ही अजय श्रीवास्‍तव के यहां मुंशी का काम जारी रखने की बात भी कही.

एक जुलाई को लांच होगा मैगजीन ‘समाचार वार्ता’

ऑनलाइन न्‍यूज सर्विस 'समाचार वार्ता' अब मैगजीन लांच करने जा रहा है. 'समाचार वार्ता' के ब्रांड नाम से ही प्रकाशित होने जा रहे इस मैगजीन की लांचिंग 1 जुलाई को होगी. समाचार वार्ता की संपादक सुषमा राजीव ने बताया कि हमलोग अभी तीन साल से ऑनलाइन न्‍यूज सर्विस उपलब्‍ध करा रहे थे. अब हम इसके साथ प्रिंट में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं. इसी को देखते हुए हमने मैगजीन लांच करने की योजना बनाई है. 48 पेज के मैगजीन की कीमत 15 रुपये रखी गई है.

कंटेंट के बारे में सुषमा राजीव ने बताया कि हम लोग इस मैगजीन में राजनीति, खेल और क्राइम से जुड़ा कंटेंट देंगे. तीन साल में ऑनलाइन को मिले पाठकों की प्रतिक्रिया के बारे में संपादक का कहना है कि हम लोगों को ऑन लाइन में अच्‍छा रिस्‍पांस मिला है. आशा करते हैं हमारी पत्रिका भी पाठकों को खासा पंसद आएगी.

अंबानियों के पैसे से हो रही है सत्‍य की जय

: मीडिया और रंगकर्म’ उर्फ ‘हमें उनसे है वफा की उम्मीद’ : थियेटर को राज्याश्रयी नहीं लोकाश्रयी होना चाहिये – वामन केन्द्रे : ‘खुदाया! जज्बा -ए-दिल की मगर तासीर उलटी है’ की तर्ज पर मीडिया की चाहे जितनी भी आलोचना क्यों न की जाये, उसका सम्मोहन उतना ही अपनी ओर खींचता चला जाता है। यही वजह है कि थियेटर जो अपने आप में एक मीडिया है, यह चाहता है कि ‘स्थापित’ मीडिया के गलियारों में उसकी भी पूछ-परख बढ़े, अखबारों में ढंग की समीक्षायें छपें और चैनलों में नाटकों की चर्चा हो।

खबरफरोशी के इस दौर में जब सत्य की जय अंबानियों के पैसों से हो रही है, जब संपादक नाम की संस्था को धता बताकर पत्रकारिता के मापदण्ड अगरवाल तय कर रहे हों  और जब प्रति वर्ग सेमी  व प्रति सेकंड की दर से स्पेस और स्लॉट बेचे जा रहे हों और खरीदे हुए स्पेस में जब स्वयं के महिमा- मंडन का सिलसिला दूसरों की चरित्र हत्या तक जा पहुंचा हो तब रंगकर्मियों की यह ख्वाहिश ‘ हमें उनसे है वफा की उम्मीद’ की तरह बेहद मासूम है।

इसी मासूम ख्वाहिश के साथ कि मीडिया व रंगकर्म के अंतरसंबंध क्या हैं और दरअसल इन्हें क्या होना चाहिये, रायपुर के प्रेस -क्लब में मीडिया व रंगकर्म के कुछ स्थापित व चर्चित लोगों को बुलाया गया, जिनमें सुविख्यात मराठी निर्देशक वामन केन्द्रे (मुंबई), फिल्म अभिनेता व रंगकर्मी पियूष मिश्रा(मुंबई), नाट्य समीक्षक रवीन्द्र त्रिवाठी (दिल्ली) तथा रंगकर्मी व पत्रकार अरूण पाण्डेय (जबलपुर)  के नाम शामिल हैं। मौका था सुविख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर की तीसरी बरसी पर आयोजित नाट्य समारोह के दौरान एक गोष्ठी का। चर्चा की शुरूआत रायपुर इप्टा के संयोजक सुभाष मिश्र ने की। कहा कि हम पर यह आरोप लगता है कि हम केवल रंगकर्म करते हैं, विमर्श नहीं करते। यहां तक कि अपने लेखकों से भी किनारा किये हुए रहते हैं। इसलिए नाटकों के साथ -साथ बहस-मुबाहिसे की शुरूआत भी हम कर रहे हैं और इस बार की बहस का मुद्दा मीडिया व रंगकर्म के अंतरसंबंध हैं। संयोग से बड़ी पूंजी दोनों ही क्षेत्रों में आ रही है। बड़ी पूंजी के आगमन के साथ मीडिया के सरोकार व प्राथमिकतायें बदली हैं और क्या रंगकर्म भी यही रास्ता चुन रहा है?

फिल्म जगत में पीयूष मिश्रा की पहचान ‘मकबूल’ व ‘गुलाल’ जैसी फिल्मों से है। पीयूष ने वक्तव्य या भाषण जैसा कुछ नहीं रखा। अपनी रौ में बोले या यह कहना ज्यादा उचित होगा की उन्होंने अपनी भड़ास जैसी निकाली। थियेटर को लेकर स्वरों में कुछ तल्खी भी थी। वैसी ही तल्खी जैसी व्यायसायिक सिनेमा में जाने के बाद समांतर सिनेमा को लेकर नसीरूद्दीन शाह के बयानों में झलकती थी। कहा कि मैं 1983 में एन.एस.डी. से जुड़ा और 2003 में फिल्मों से। कोई 20 सालों तक जमकर थियेटर किया। अपनी मर्जी से किया। इसमें रोमांच भी था और रोमांस भी। सरकारी पैसा या ग्रांट नहीं ली। ठसन से किया। बहुत सारे ऐबों के साथ किया। खराब पुत्र, खराब पति और खराब पिता बनकर किया। (बधाई! बकौल राजेन्द्र यादव अच्छा पति, अच्छा पिता या अच्छा पुत्र कभी भी महान कलाकार या लेखक नहीं बन सकता!) फिर जब लगा कि इससे परिवार नहीं चल सकता तो पैसे कमाने के लिये फिल्मों चला गया। अच्छा या बुरा करने नहीं गया। मेरा भाग्य अच्छा था कि मुझे विशाल भारद्वाज व अनुराग कश्यप जैसे अच्छे और हमख्याल लोग मिल गये तो कुछ अच्छी फिल्में कर सका। नहीं मिलते तो बुरी फिल्में भी करता क्योंकि पैसे कमाने गया था।

पीयूष ने कहा कि उसे इस थियेटर के साथ कोई सहानुभूति नहीं है जो पेशेवर नहीं हो सकता। यहां प्रोड्यूसर का कोई कांसेप्ट ही नहीं है जो नाटकों पर खर्च करता है और फिर उसे वसूलने की उतनी ही चिंता भी। यहां थियेटर करने का मतलब है पार्ट टाइम थियेटर करना। लोग ताने मारते हैं कि ‘अच्छा! थियेटर तो करते हो पर ये बताओ कि काम क्या करते हो?’ जब तक यह थियेटर पेशेवर नहीं होता, उसका कोई भविष्य नहीं है।

इससे पूर्व गोष्ठी के प्रथम वक्ता, रंगकर्मी व पत्रकार अरूण पाण्डेय ने अपनी बात रंगकर्मियों की कुछ मांगों के संदर्भ में मीडिया द्वारा दबाव बनाये जाने के आग्रह के साथ रखी। उन्होंने कहा कि जिस तरह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तर्ज पर भोपाल में मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय खोला गया, कुछ इसी तरह का काम छत्तीसगढ़ में भी होना चाहिये। उन्होंने याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ का एक हिस्सा हिंसा से प्रभावित है। पूर्वोत्तर में नाटकों व सांस्कृतिक गतिविधियों में केंद्र सरकार ने काफी पैसे खर्च किये हैं व वहां के युवाओं ने रंगकर्म से रोजगार हासिल किया है। यह काम छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि हबीब साहब कलाकर्म की जिन ऊंचाइयों पर पहुँचे वह आज के भौतिकवादी युग में किसी भी अन्य कलाकार के लिये संभव नहीं है। हबीब तनवीर की स्मृति में एक अत्याधुनिक प्रेक्षागृह या स्मारक बनाया जाना चाहिये और इसके लिये मीडिया द्वारा वैसा ही दबाव बनाया जाना चाहिये जैसे पुल, सड़क या दूसरी चीजों के लिये बनाया जाता है।

संचालन करते हुए इंदिरा कला व संगीत विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग से संबंद्ध डॉ. योगेन्द चौबे ने नाटकों में प्रयोग, मल्टीमीडिया का प्रयोग व खासतौर पर बड़े बजट के प्रयोगों के औचित्य पर सवाल उठाया। जाने-माने समीक्षक रवीन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि प्रयोगों में बुरा कुछ भी नहीं, बशर्ते यह देखा जाये प्रयोग के पीछे की मंशा क्या है? जैसे समाज के दीगर क्षेत्रों में ईमानदारी व बेईमानी पैमाने के पैमाने हैं, वही पैमाने यहाँ भी लागू होते हैं। यह जरूरी नहीं कि हर नया प्रयोग अच्छी ही हो या खराब ही हो। उन्होंने यह भी कहा कि ‘यह जरूरी नहीं कि किसी संस्था के बनने से ही रंगकर्म सही दिशा में चला जायेगा। संस्थाओं पर अलग तरह के दबाव व प्रपंच होते हैं और हमें यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिये कि हबीब साहब इस तरह कि किसी संस्था के बगैर भी रंगकर्म को इतनी ऊंचाइयों तक ले जा सके।’

मुख्य वक्ता वामन केन्द्रे ने छोटे-छोटे जमीनी उदाहरणों के साथ बहुत स्पष्टता से अपनी बातें रखीं। उन्होंने कहा कि मीडिया का आकार अब इतना वृहद हो चुका है कि उसके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। ये एक ‘ड्रेगन इमेज’ है लेकिन पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है। उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र ने कोई 20 हजार बच्चों के बीच एक शोध किया और उस शोध का नतीजा यह था कि आज बच्चा जो भी ‘विजुअलाइज’ करता है वह जीवन, या प्रकृति या परिवेश से नहीं बल्कि टेलीविजन के माध्यम से। और विडंबना यह है कि पिछले 20 सालों में जो लोग रंगकर्म में या फिल्मों में अच्छा नहीं कर सके उन्हीं लोगों ने टीवी में हल्ला बोल दिया, जिनकी अपनी कोई दृष्टि नहीं है। उन्होंने कहा कि खासतौर पर अंग्रेजी मीडिया में क्षेत्रीय भाषाओं में जो कुछ भी होता है उसे दोयम दर्जे का माना जाता है और अंग्रेजी नाटकों पर आधे-आधे पन्ने खर्च किये जाते हैं जबकि न तो इनका कोई थियेटर है न कोई दर्शक वर्ग। इसी मीडिया में सामान्य लोग महान बन रहे हैं जबकि अच्छे लोग उपेक्षित हो रहे हैं और शायद पीयूष की वेदना यही है।

लेकिन यह समस्या हिंदी पट्टी की है, भाषाई थियेटर की नहीं और इसका कारण यह है कि महाराष्ट्र या बंगाल के लोग अपनी परंपरा को बेहद प्यार करते हैं। परंपराओं को खण्डित करने का काम हिंदी पट्टी में ज्यादा हुआ है। नाटकों की ही बात करें तो हिंदी के नाटककार प्रयोग की धुन में नये प्रयोगों को तो अपनाते हैं पर पिछले को भूल जाते हैं। इस तरह एक कड़ी टूटती है और कड़ियों के टूटने से परंपरा खण्डित होती है। नाटकों को लेकर मराठी समाज बेहद सतर्क है। मीडिया वालों के लिये नाटकों की चर्चा मजबूरी है क्योंकि वहाँ के लोग इतने सतर्क हैं कि जो अखबार नाटकों पर न लिखे उनका बहिष्कार कर देते हैं। यही बात थियेटर के पेशेवर होने को लेकर है। उन्होंने कहा कि आज महाराष्ट्र में उनके जैसे कम से कम 5000 लोग है जो थियेटर के सहारे ही गुजारा करते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि यही लोग फिल्मों में व टीवी में भी हैं। श्रीराम लागू का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘मैं थियेटर अपनी शर्तों पर करता हूं और फिल्में उनकी शर्तों पर।

वामन ने कहा कि यही उदाहरण बंगाल का भी दिया जा सकता है। वहां के लोग थियेटर के प्रभाव पर इतने सजग हैं कि आज भी यदि महज पाँच रूपये टिकिट बढ़ानी हो तो उस साल पर चर्चा करते हैं। अखबारों में पत्र लिखे जाते हैं। नाटक करने वालों के बीच चर्चा की जाती है और तब कहीं टिकिट के दाम बढ़ते हैं व उसी अनुपात में अन्य लोगों के पारिश्रमिक। इसलिये हिंदी थियेटर को पेशेवर होना है तो इसकी शुरूआत भी हिंदी पट्टी से ही होनी है और हबीब तनवीर ने यह करके दिखाया है। थियेटर को पेशेवर बनाने के लिये क्रियेटिव मार्केटिंग की जरूरत है। क्रियेटिव मार्केटिंग के साथ-साथ क्वालिटी थियेटर की भी आवश्यकता है। नाटकों की गुणवत्ता के लिये आपको सजग रहना है व यह भी ध्यान रखना है कि थियेटर राज्याश्रयी नहीं बल्कि लोकाश्रयी हो।

रहा सवाल मीडिया का तो वह केवल इंवेट की कवरेज करता है। नाटकों में अगर-अगर एक-एक करोड़ रूपये लग रहे हैं तो यह इसी का नतीजा है कि उसे भी एक इवेंट बनाया जाये। या इसमें विवाद उत्पन्न किया जाये, मेनुपलेशन किया जाये। आप अपने नाटक को पापुलर करना चाहते हैं तो अपने ही नाटक का विरोध करवा दें, देखें कि मीडिया के लोग कैसे टूट पड़ते हैं। राखी सावंत वगैरह के नाम इन्हीं संदर्भों में लिये जा सकते हैं। अंग्रेजी मीडिया और दिल्ली के संस्थानों की तवज्जो भारत के नहीं बल्कि इंडिया के थियेटर पर है। एक ऐसा थियेटर जो अपनी मिट्टी, अपनी बू, अपने टैक्सचर से कटा हुआ है और नाट्य संस्थानों का काम थियेटर करने वालों को अपनी जमीन से जोड़ने का नहीं बल्कि काटने का रह गया है। इसलिये नये नाट्य संस्थान न हीं खुलें तो अच्छा है, बल्कि जो हैं उन्हें ही बचा लिया जाये।

हिंदी में नाट्य-लेखन के अभाव पर वामन ने दो बाते कहीं। पहली तो यह कि ‘‘ यह समस्या अब सिर्फ लेखकों की नहीं रह गयी है। हर वो व्यक्ति जो विचार करता है या सृजन करता है, चाहे वह लेखक हो, कवि हो या चित्रकार हो इस समस्या से पीड़ित है कि मीडिया के  विस्तार ने उसकी कल्पनाशीलता के सारे आयाम अवरूद्ध कर दिये हैं। प्रिंस की घटना का उदाहरण लें। मीडिया ने इसके हर प्रसंग को, हर पहलू को इतने एंगल के साथ दिखाया कि किसी कवि या लेखक के लिये कल्पना की कोई गुंजाइश बचती ही कहाँ है? दूसरी बात यह कि नाट्य लेखन तभी होगा जब थियेटर पेशेवर होगा। जैसे नाटक मंडली में निर्देशक होते हैं, अभिनेता होते हैं, कलाकार होते हैं वैसे ही नाटक मंडली के साथ लेखक को भी रहना होगा। विजय तेंदुलकर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वे इतने प्रोफेशनल थे कि जैसे एक बाबू अपने काम के लिये दस बजे अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है, वैसे ही वे भी नाटक लिखने के लिये दस बजे अपनी कुर्सी पर बैठ जाते थे और एक ही नाटक की कथा कई -कई बार लिखते थे।

गोष्ठी के अंत में कुछ सवाल-जवाब भी हुए। एक श्रोता ने अपने ही सवाल को ऊल-जलूल करार देते हुए पूछा कि क्या आई.पी.एल. की तर्ज पर फिल्मी कलाकार थियेटर को स्पांसर नहीं कर सकते? वामन व पीयूष इस सवाल पर केवल मुस्कुराकर रह गये।

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क  iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग इप्‍टानामा से साभार लिया गया है.


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Fraud Nirmal Baba (92) : गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए निर्मल बाबा हाईकोर्ट पहुंचे

सीजेएम, लखनऊ के आदेश पर गोमतीनगर थाने में दर्ज एफआईआर के खिलाफ निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह नरूला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में रिट याचिका संख्या 4473/201 दायर किया है. गोमतीनगर थाने में यह एफआईआर संख्या 165/2012 धारा 417, 419, 420 आईपीसी आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता नूतन के बच्चों तनया और आदित्य के प्रार्थनापत्र के आधार पर लिखी गयी थी. गोमतीनगर थाने द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं करने पर ये बच्चे  सीजेएम कोर्ट गए थे, जहाँ सीजेएम कोर्ट ने कहा था कि प्रस्तुत आवेदन पर संज्ञेय अपराध बनता है और एफआईआर दर्ज करने के पर्याप्त आधार है.

अब निर्मल बाबा की ओर से दायर रिट याचिका में कहा गया है कि वे एक प्रख्यात धार्मिक व्यक्ति हैं और इस मामले में पूर्णतया निर्दोष हैं. उन्होंने सीजेएम के आदेश को गलत बताते हुए इस एफआईआर को निरस्त करने और इस दौरान गिरफ़्तारी रोकने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि 16 मई 2012 को इस अभियोग के विवेचक राजेश कुमार सिंह ने 160 सीआरपीसी में कई बिंदुओं पर उन्हें 24 मई तक अपना बयान दर्ज कराने को नोटिस भेजा था. निर्मल बाबा की ओर से नीरज जैन और तनया और आदित्य की ओर से नीरज कुमार और त्रिपुरेश त्रिपाठी अधिवक्ता हैं. मामले की सुनवाई कल जस्टिस अश्वनी कुमार सिंह और जस्टिस सईद उज्ज़मा  सिद्दीकी के समक्ष होगी.


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भोपाल में खुल रहा ‘नेशनल दुनिया’ का ब्यूरो!

अभी तक जिस बात का नईदुनिया को भय था, वो बात होने जा रही है. नईदुनिया के नए प्रबंधन (जागरण समूह) से चोट खाये 'नेशनल दुनिया' ने गढ़ में सेंध लगाने का फैसला कर लिया है। ताजा खबर ये है कि भोपाल से 'नेशनल दुनिया' की तैयारी आकार लेने लगी है। हॉल ही में 'नेशनल दुनिया' का ब्यूरो खोलने के लिए ऑफिस देख लिया गया है। महाराणा प्रताप नगर के प्रेस काम्प्लेक्स मे जागरण के ही पुराने ऑफिस को 'नेशनल दुनिया' के लिए तय किया गया है।

नईदुनिया प्रबंधन के लिए दुःख की बात ये है कि 'नेशनल दुनिया' के लिए ये सारे काम भी नईदुनिया के भोपाल संस्करण के संपादक स्तर के एक सीनियर और उनके एक साथी कर रहे हैं। 'नेशनल दुनिया' और नईदुनिया के प्रबंधन के बीच तलवारें तभी से खिची हैं, जब जागरण समूह ने 'नईदुनिया' खरीदने के तत्काल बाद नईदुनिया का दिल्ली संस्करण बंद कर दिया था। संपादक आलोक मेहता ने इस मुसीबत का सामना करते हुए रातों-रात 'नेशनल दुनिया' निकाल दिया और नईदुनिया के प्रसार को समेट लिया। हिंदी पत्रकारिता जगत कि ये एक अनोखी घटना थी। यही कारण है कि 'नेशनल दुनिया' और जागरण समूह में तकरार है और इसे अखबारी मुकाबला बनाने के लिए 'नेशनल दुनिया' का ब्यूरो भोपाल में खोला जा रहा है, जो भोपाल संस्करण की नींव भी रखेगा।

इस पूरे प्रसंग में मुद्दे की बात ये है कि नईदुनिया को निपटाने के लिए घर में ही बारूद बिछाया गया है। नईदुनिया के भोपाल संस्करण में आलोक मेहता का चहेता कौन है, ये किसी से छुपा नहीं है। लेकिन, नेशनल दुनिया के लिए जाजम बिछाने के लिए इस बार इंदौर के संपादक जयदीप कर्णिक और मार्केटिंग हेड मनीष शर्मा भी सक्रिय लग रहे हैं। क्योंकि, दोनों को इस बात के संकेत मिलने लगे है कि दोनों अब ज्यादा दिन जागरण के साथ नहीं चल सकते।

चालान से बौखलाए विधायक ने मीडिया वालों की क्‍लास ली

पश्चमी दिल्ली के जनकपुरी में शनिवार शाम सुल्तानपुरी के कांग्रेसी विधायक जय किशन आये तो थे हमले में घायल विधायक भारत सिंह को देखने, लेकिन कट गया उनका चालान। विधायक की गाड़ी पर लाल बत्ती लगी थी, साथ नंबर भी गलत तरीके से लिखे थे और ऊपर से काले शीशे, बस फिर क्या था ट्रैफिक पुलिस ने विधायक जी का चालान काट दिया। यह देखकर वहाँ मौजूद मीडियावालों ने कवरेज शुरू कर दी और इस बारे में जब विधायक से सवाल किया तो वे उल्टा बरस पड़े मीडिया वालों पर और उल्टा मीडिया वालों को नसीहत दे डाली।

सुल्तानपुरी के कांग्रेसी विधायक जय किशन ने बड़े-बड़े तुर्रम खान टीवी रिपोर्टरों को धमकी भरे अंदाज़ में खूब खरी-खोटी सुनाई पर किसी तुर्रम खान रिपोर्टर ने विधायक को रोक पाने की हिम्‍मत नहीं दिखाई। मौके पर लगभग सभी चैनल के रिपोर्टर मौजूद थे। विधायक ने जजों तक को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि कोर्ट ने अभियान चलाया चलाये, पर कोर्ट क्या हरेक काम अच्छे ही करती है? आप देखो ना कोर्ट के कितने जज पकडे जा रहे हैं। करोड़ों रुपये उनसे मिल रहे हैं। मै काले शीशे नहीं हटाऊंगा। जानकारी के मुताबिक विधायक हर महीने खासी रकम पत्रकारों के ऊपर खर्च करते हैं और कई चमचे टाइप पत्रकार इनकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। शायद यही वजह है कि भीड़ में मौजूद एक पत्रकार के अलावा कोई भी विधायक के आगे मुंह खोलने का साहस नहीं कर पाया।

खबर छपने से नाराज होकर पत्रकार पर गोली चलाई

दनकौर : दनकौर कोतवाली के नवादा गांव में भाइयों के बीच जमीनी विवाद की खबर छापने से नाराज एक व्यक्ति ने पत्रकार पर उस समय जानलेवा हमला बोल दिया, जब वह सुबह की सैर करने खेतों पर गया था। पत्रकार के शोर मचाने पर हमलावर भाग निकले। पत्रकार पर हमले की खबर मिलते ही लोग कोतवाली में जमा हो गए और कोतवाली प्रभारी अश्विनी कुमार से मिलकर हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

नवादा गांव निवासी विवेक नागर ने तहरीर दी कि सोमवार की सुबह साढ़े पांच बजे वह अपने खेतों पर घूमने गया था। तभी गांव का जयकिशन उसके पास आया और जान से मारने की धमकी देने लगा। इसी दौरान जयकिशन ने तमंचे से गोली चला दी, जिसमें वह बाल-बाल बच गया। उसने वहां से गांव की तरफ भागकर अपनी जान बचाई। भागते समय उसने शोर मचाया तो आसपास के ग्रामीण उधर दौड़ पड़े। लोगों को अपनी तरफ आता देख हमलावर भाग निकला। विवेक ने बताया कि जयकिशन का अपने भाई से जमीनी विवाद था, जिसकी एक सप्ताह पहले थाने में रिपोर्ट दर्ज हुई थी। भाइयों में जमीनी विवाद की खबर छपने पर जयकिशन ने रंजिशन उस पर हमला किया। साभार : जागरण

अलीगढ़ : हॉकरों का हड़ताल खतम, आज बंटे अखबार

अलीगढ़ से सूचना है कि सोमवार को हॉकरों ने अपना हड़ताल समाप्‍त कर दिया. आज सभी अखबारों का वितरण हुआ. रविवार को अमर उजाला कार्यालय हॉकरों तथा तीनों बड़े अखबारों के मैनेजरों के साथ हुई बातचीत में यह निर्णय लिया गया. हालांकि मैनेजरों ने चालाकी दिखाते हुए हॉकरों के कमीशन में कोई बढ़ोत्‍तरी नहीं की बल्कि उस पर ध्‍यान देने का आश्‍वासन देकर मामला फिलहाल सुलटा लिया है.

पिछले तीन दिनों तक हॉकरों ने हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण को नहीं बंटा. इन अखबारों के प्रसार विभाग के लोगों ने खुद स्टाल लगाना पड़ा. गौरतलब है कि जब हिंदुस्तान अखबार अलीगढ़ में लांच हो रहा था तब प्रति अखबार हाकरों को कमीशन 75 पैसे मिलते थे. हिंदुस्तान ने लांचिंग के बाद कमीशन प्रति अखबार एक रुपये कर दिया. यह देख अन्य अखबारों ने भी कमीशन प्रति कापी एक रुपये कर दिया. अब सारे अखबारों ने मिलकर कमीशन को अचानक घटाकर 75 पैसे कर दिया है. बढ़ती महंगाई में इस तरह का छल किए जाने से अखबार वितरक नाराज हो गए और अखबार न बांटने की घोषणा कर दी थी.

अपना बिहार के संपादक को मिली धमकी

दोस्तों, ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद अपना बिहार द्वारा किये गये रिपोर्टिंग के संदर्भ में अनेक प्रतिक्रियायें प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिक्रियाओं में कुछ ऐसी प्रतिक्रियायें भी शामिल हैं, जिनमें सच्चाई के प्रति अपना बिहार के दृढ निश्चय को सराहा गया है। अनेक प्रतिक्रियायें नकारात्मक भी थीं। 3 पाठकों ने धमकी भरा पत्र और एक व्यक्ति ने फ़ोन पर धमकी दी। बहरहाल, अपना बिहार हर हाल में आपतक सच पहुंचाने के लिए कृत संकल्पित है।

सच को सच कहना और लिखना ही हमारे लिये पत्रकारिता है। हम भविष्य में भी अपना कर्म करेंगे। धमकी देने वाले मित्रों से सिर्फ़ इतना ही कि आप हर खबर को सिर्फ़ खबर के रुप में लें और अपने विचार भेजें। यदि आपके विचार बहुजन हित में होंगे, तो हम उन्हें पूरे सम्मान के साथ प्रकाशित करेंगे।

नवल किशोर कुमार

संपादक, अपना बिहार

सोनीपत में आज समाज के पत्रकार के पिता की हत्‍या

सोनीपत जिले के  राई गांव में रविवार को देर रात हमलावरों ने प्लाट में सो रहे स्थानीय पत्रकार के पिता की धारदार हथियार से हत्या कर दी। जान बचाकर भाग रहे नौकर को भी घटना स्थल से दो सौ मीटर दूर धारदार हथियार से गोद दिया। उसे रोहतक पीजीआइ में भर्ती कराया गया है और वह खबर लिखे जाने तक बयान देने की स्थिति में नहीं था। सूचना के बाद डीएसपी मुख्यालय रणधीर सैनी, राई के एसएचओ सुलतान सिंह व साइबर क्राइम सेल प्रभारी विवेक कुंडू भी मौके पर पहुंचे और तफ्तीश की। पुलिस ने मौके पर एफएसएल की टीम को बुलवाकर फिंगर प्रिंट लिए हैं।

आज समाज में पत्रकार ललित कौशिक के पिता तथा राई गांव निवासी ईश्वर सिंह कौशिक (60 वर्ष) पुत्र चंद्रभान गांव के राजकीय स्कूल के पास कबाड़ी का कार्य करते थे। वह रविवार देर शाम खाना खाने के बाद अपने घर से स्कूल के पास स्थित प्लाट में चले गये थे। प्लाट में ही वह कबाड़ी का काम करते थे। प्लाट में उसके साथ उसका नौकर उत्तर प्रदेश के फैजाबाद का निवासी इरफान भी रहा रहा था। दोनों लोग रात को वहां पर सो गए। सोमवार को तड़के जब ग्रामीण स्कूल के पीछे एचएसआईआईडीसी में घूमने के लिए गए, तो वहां उन्हें इरफान का खून से सना शव दिखाई दिया।

ग्रामीणों ने सूचना ईश्वर के परिजनों को दी। जब परिजन प्लाट में पहुंचे, तो वहां के हालात देखकर सन्‍न रह गए। वहां ईश्‍वर का शव चारपाई पर पड़ा था। चेहरे और सीने पर धारदार हथियार से एक दर्जन वार किए गए थे। परिजनों ने सूचना राई पुलिस को दी और इरफान को सामान्य अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने उसे रोहतक पीजीआइ रेफर कर दिया। राई के एसएचओ सुलतान सिंह व एसआइ जिले सिंह मौके पर पहुंच गए। पुलिस ने ग्रामीणों से बातचीत के बाद शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया। पुलिस ने ईश्वर के पुत्र विरेंद्र की शिकायत पर अज्ञात हमलावरों के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है। ईश्वर का एक पुत्र ललित कौशिक पत्रकार है। (इनपुट : जागरण)

जागरण में बंपर छंटनी (31) : देहरादून में आदेश के बाद भी इस्‍तीफा नहीं, कोर्ट जाने की तैयारी

दैनिक जागरण, देहरादून यूनिट में कर्मचारियों की छंटनी का सिलसिला थमा नहीं है। वीरेंद्र गैरोला, मनप्रीत, संदीप दुबे और कमलेश मिश्रा को निकाले जाने का फरमान सुनाने के बाद अब सुजीत  को इस्तीफा देने को कहा गया है। हालांकि इनमें अभी सिर्फ वीरेंद्र गैरोला ने ही इस्तीफा दिया है। बताते हैं कि ये सभी लोग कोर्ट में जागरण प्रबंधन को सबक सिखाने जा रहे हैं। इनकी उत्तराखंड उच्च न्यायालय के एक वकील से इस संबंध में बातचीत भी हो चुकी है। ये सभी लोग संकल्प ले चुके हैं कि चाहे कर्ज लेकर मुकदमा लड़ना पड़े, लेकिन जागरण जैसे धोखेबाज प्रबंधन को छोड़ेंगे नहीं, ताकि अन्य किसी निर्दोष कर्मचारी के साथ ऐसा न होने पाए।

उधर, इतने कर्मचारियों को इस्तीफा देने के लिए कहने के बावजूद एक द्वारा ही इसका पालन किए जाने के बाद जागरण प्रबंधन सकते में है। सू़त्रों ने बताया कि वीरेंद्र गैरोला को छोड़कर उक्त सभी कर्मचारियों की इस मसले पर प्रबंधक अनुराग गुप्ता से तू-तू, मैं-मैं हुई। प्रबंधक ने सुरक्षा कर्मियों को तो यहां तक आदेश दे दिया कि मलकीथ को संस्थान के परिसर में न आने दिया जाए। संस्थान को अब निदेशक मंडल का डर सता रहा है कि इन लोगों से इस्तीफे क्यों नहीं लिखवाए गए। अगर ये लोग कोर्ट जाते हैं तो जागरण प्रबंधन के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी, क्योंकि उक्त कर्मियों में से एक कमलेश मिश्रा पहले एक मसले पर जागरण के खिलाफ कोर्ट गए थे, जिस पर दैनिक जागरण को मजबूरी में उन्हें पुनः नियुक्ति देनी पड़ी। बताते हैं कि इन लोगों ने वृहद स्तर पर रणनीति बनाकर कोर्ट जाने की ठानी है।

बताते हैं कि देहरादून दैनिक जागरण में इन दिनों सभी कर्मचारी दहशत में और आशंकित हैं। इन सभी की हालत बूचड़खाने में मारने के लिए लाए गए उन जीवित बकरों की जैसी है, जिन्हें यह पता नहीं रहता कि उनका कत्ल कब किया जाए, अपने साथी को मारने के लिए ले जाते वक्त वे ही सोचते हैं कि देर-सवेर हमारे साथ भी यही होना है। कर्मचारियों में डर का आलम यह है कि जैसे किसी के मोबाइल पर आफिस के नंबर से किसी भी कार्य के लिए फोन आता है या चपरासी अपनी ओर आता दिखता है तो उनकी रूह कांप जाती है कि कहीं यह इस्तीफा देने का फरमान तो नहीं सुनाया जा रहा! इस दहशत के आवरण में अब कर्मचारी अपनी सालाना बढ़ोतरी और प्रमोशन को भी भूल चुके हैं। हालांकि कुछ आशावादी वरिष्ठ लोग यह भी दिलासा दिलाते हैं कि जीत हमारी होगी, अच्छे दिन जरूर लौटेंगे।


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बसंत निगम बनेंगे टाइम मीडिया प्रोडक्‍शन के सीईओ

उत्‍तराखंड से संचालित टाइम मीडिया प्रोडक्‍शन ने रीजनल चैनलों के लिए कंटेंट प्रोवाइडिंग करेगी. टाइम मीडिया का सीईओ बसंत निगम को बनाया जा रहा है, जो नेटवर्क10 के सीईओ की जिम्‍मेदारी निभा चुके हैं. बसंत निगम की टीम में सीएनईबी के पूर्व ब्‍यूरोचीफ विक्रम श्रीवास्‍तव, सी न्‍यूज के आउटपुट हेड रहे श्रीनिवास पंत, नेटवर्क10 के इनपुट हेड रहे विनय शर्मा, जनसंदेश से जुड़े रहे विनय पांडेय, नेहा शर्मा शामिल हैं. टाइम मीडिया के मालिक प्रदीप भट्ट हैं.

टाइम मीडिया का तीन चैनलों के साथ करार हुआ है. टाइम मीडिया रीजनल चैनल टाइम टीवी और खोज इंडिया को कंटेंट उपलब्‍ध कराएगी, जबकि महुआ न्‍यूज लाइन के लिए इंटरव्‍यू और स्‍पेशल प्रोग्राम बनाएगी. इसके साथ ही इन तीनों चैनलों का मार्केटिंग राइट भी उत्‍तराखंड में टाइम मीडिया प्रोडक्‍शन के पास रहेगा. टाइम मीडिया तीनों चैनलों को उत्‍तराखंड में बाजार उपलब्‍ध कराएगी.  

आई नेक्‍स्‍ट : गिरीनाथ का इस्‍तीफा, सत्‍येंद्र का तबादला

आई नेक्‍स्‍ट, कानपुर से खबर है कि गिरीनाथ झा ने इस्‍तीफा दे दिया है. गिरीनाथ आई नेक्‍स्‍ट लाइव में वेब कोआर्डिनेशन की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. गिरीनाथ के इस्‍तीफा के बाद खाली पद पर आई नेक्‍स्‍ट, बनारस से सत्‍येंद्र सिंह को भेजा गया है. वेब कोआर्डिनेशन की जिम्‍मेदारी अब सत्‍येंद्र संभालेंगे. सत्‍येंद्र बनारस में डेस्‍क पर अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. उन्‍होंने कानपुर में अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है. सत्‍येंद्र की जगह अभी किसी को बनारस नहीं भेजा गया है.

बहराइच में दैनिक जागरण के पत्रकार और उसके भाई के खिलाफ हत्‍या का मामला दर्ज

बहराइच में एक बहुत ही शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है. दैनिक जागरण के पत्रकार तथा उसके भाई पर पुलिस ने हत्‍या का मुकदमा दर्ज किया है. इन दोनों पर पूर्व ब्‍लाक प्रमुख के भाई को जहरीला पदार्थ देकर जान से मारने का आरोप है. पुलिस ने मृतक द्वारा लिखे गए पत्र के आधार पर मामला दर्ज किया है. दोनों आरोपी फरार हैं. पुलिस दोनों आरोपियों की तलाश कर रही है.

जानकारी के अनुसार बाबागंज के रहने वाले चंद्रशेखर त्रिपाठी एवं हरीश वर्मा के परिवारों के बीच पुरानी रंजिश थी. चंद्रशेखर पूर्व ब्‍लाक प्रमुख के भाई होने के साथ ही श्रावस्‍ती जिले के नानपारा में किसान सहकारी चीनी मिल लिमिटेड में कैशियर के पद पर तैनात थे. बीच में दोनों परिवारों ने आपस में सुलह कर लिया था. दैनिक जागरण के पत्रकार हरीश वर्मा बाबागंज के ग्राम प्रधान भी हैं. हरीश वर्मा ने चंद्रशेखर त्रिपाठी को खाने पर बुलाया था. खाने के बाद चंद्रशेखर त्रिपाठी को उलझने होने लगी. इसके बाद उन्‍हें खून की उल्‍टी हुई.

इस पूरे मामले की जानकारी अपने परिजनों को मोबाइल से देने के बाद चंद्रशेखर त्रिपाठी ने एक पत्र भी लिखा, जिसमें उनकी मौत होने की स्थिति में दैनिक जागरण के पत्रकार ह‍रीश वर्मा तथा उनके भाई को इसका जिम्‍मेदार ठहराने की बात कही. हालत ज्‍यादा बिगड़ने पर कुछ लोग उन्‍हें अस्‍पताल ले गए तब तक काफी देर हो चुकी थी. चंद्रशेखर की मौत हो गई. इसके बाद पुलिस ने मृतक के हाथ से लिखे गए पत्र के आधार पर पत्रकार हरीश वर्मा एवं उनके भाई के खिलाफ रुपैइडीहा थाने में आईपीसी की धारा 302 एवं 328 के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

इस संदर्भ में जब रुपैइडीहा थानाध्‍यक्ष वकील अहमद के मोबाइल पर फोन किया गया, परन्‍तु उनकी जगह सब इंस्‍पेक्‍टर सुभाष यादव ने फोन उठाया तथा उन्‍होंने पत्रकार तथा उसके भाई के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट दर्ज किए जाने की पुष्टि की. दूसरी तरफ बहराइच के एडिशनल एसपी का कहना है कि नामजद मामला दर्ज हो चुका है, दोनों आरोपियों की तलाश की जा रही है. पुलिस जल्‍द ही दोनों को गिरफ्तार करके जेल भेजेगी. हालांकि इस पूरे घटनाक्रम से जिले के पत्रकार अपने को शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं तथा दैनिक जागरण की भी थू-थू हो रही है, जो किसी को भी पत्रकार बना देता है. 

मुखिया समर्थकों ने दो पत्रकारों को मारा-पीटा और मोबाइल भी छीन लिया

पटना की सड़कों पर रणबीर सेना के संस्‍थापक ब्रह्मेश्‍वर मुखिया के समर्थकों ने अराजकता का माहौल पैदा कर दिया था. चारो तरफ आतंक का माहौल बन गया था. मुखिया समर्थकों ने पत्रकारों को मारने-पीटने से नहीं चूके. पटना में पत्रकार जितेंद्र चौबे और उनके साथी शशि सागर से भी मुखिया समर्थकों ने मारपीट की. उनके मोबाइल छीन लिए. यह घटना उस समय हुई जब मुखिया के शव को अंतिम संस्‍कार के लिए गंगा किनारे स्थित बांसा घाट श्‍मशान घाट ले जाया जा रहा था. जितेंद्र किसी तरह ऊंची दीवार से कूद कर अपनी जान बचा पाए. अपने इस बुरे अ‍नुभव को जितेंद्र ने गूगल प्‍लस पर भी शेयर किया है. नीचे जितेंद्र द्वारा लिखा गया पोस्‍ट…

jitendra choubey : I was beaten up by Brahmeshwar mukhiya supporter along with my journalist friend Shashi sagar at Bans ghat. My mobile was snatched away after a slap and three sticks. when I begged

जितेंद्र चौबे
for my mobile then a man ran towards me, with murderous mood by picking a heavy bamboo parts, i jumped off other side of 10 feet high wall……the supporters were waving weapons (countrymade pistol), abusing Nitish kumar and Modi……no woman was in this journey…..put whole city for ransom…..police are being provoked but they all keep restrain…..a group of women being molested when they were watching this rally just outside their door. they ran inside and bolt their door……a rein of terror on can feel at this point of time on the road……I felt such mood once during Laloo yadav's rally 'lathi challawan tel pilawan rally'………shame on this govt!!!!! shame!!!!!!

भास्कर जन्मदिन मनाए और प्रदेश का सीएम बधाई गीत गाए

यशवंत भाई व भड़ास के पाठकों आज दैनिक भास्कर हरियाणा में बर्थ डे ब्वाय (मानवीकरण) है। हरियाणा में इस अखबार ने 12 साल पूरे किए हैं। लेकिन आप हम जैसे साधरण लोग भास्कर को जन्मदिन की बधाई नहीं दे सकते। इस अखबार के जन्मदिन की बधाई गाने का का सौभागय हरियाणा के सीएम को मिला है। जी हां, प्रथम पन्ने पर भास्कर ने सीएम का इंटरव्यू प्रकाशित किया है, जिसमें उन्होंने अखबार की हरियाणा में बुलंदियों की तारीफ में कसीदे गढ़े हैं। या फिर बधाई उनकी स्वीकार की गई है, जिन्होंने जेब से से पैसे खर्च करके विज्ञापन के रूप में बधाई दी।

श्री रमेशचंद्र अग्रवाल ने यूं तो पहले पन्ने पर हरियाणा में कामयाबी का भरपूर श्रेय आम पाठक को दिया, लेकिन आज के जन्मदिन विशेष संस्करण में आम पाठक की तो छाया भी नजर नहीं आती। जन्मदिन के नाम पर भारत की इस तेज गति से बढ़ते अखबार ने खूब पैसे कमाए। हर कस्‍बाई स्ट्रिंगर की मजबूरी थी कि उसे कम से कम दस से पंद्रह हजार का विज्ञापन भास्कर को बधाई देने के नाम पर लेना है। यही नहीं आप आज के भास्कर के हरियाणा के लोकल पुल आउट देखें तो स्ट्रिंगर को भी चाहे रोते या हंसते खुद भी विज्ञापन कालम में भास्कर को बधाई देनी पड़ी।

अब दोबारा बधाई गायक की भूमिका निभा रहे प्रदेश के सीएम की तरफ लौटते हैं। सीएम का बधाई देने वाला इंटरव्यू ऐसे ही नहीं छप गया। ये इंटरव्यू भास्कर के खास माने जाने वाले पत्रकारों श्री हेमंत अत्रि साहिब और वरिष्ठ संवाददाता श्री प्रमोद वशिष्ठ साहिब के विशुद्ध जुगाड़ से हुआ है। दोनों ही पत्रकार सीएम के बहुत करीबी माने जाते हैं, जिनमें हेमंत जी तो खुद सीएम के शहर के हैं, निवास स्थान के हिसाब से उनके पड़ोसी भी हैं। गुस्ताखी माफ उक्त दोनों पत्रकार चंडीगढ के मीडिया गलियारों में सरकार के सबसे बड़े चमचे के रूप में नाम लेकर पुकारे जाते हैं। वैसे इन दोनों जनाब की खबरें इस बात का जीता जागता उदाहरण भी है। अगर दोनों की पिछले आठ साल की खबरें उठाकर देखी जाएं तो हर खबर सरकार की गलत बात को सही बताते हुए छपी है।

लेकिन हरियाणा का सरकारी जनसंपर्क विभाग इतना सीधा नहीं है और सरकार भी इतनी बावली नहीं कि सीएम के मुंह से ऐसे ही भास्कर का जन्मदिन बधाई गीत गवा दिया। इसके पीछे सीधे-सीधे एक सौदा हुआ। सरकार ने भी इस मौके पर विज्ञापन के जरिए कही जाने वाली बात को न्यूज के माध्यम से कहलवाया। जैसे कि पहले पन्ने पर सीएम का बधाई गीत वाला इंटरव्यू है, तो अगले ही पन्ने पर हरियाणा सरकार की उपलब्धियों को बताने वाला एक गीत भास्कर ने समाचार के माध्यम से गाया है। इस बधाई गीत पर श्री प्रमोद वशिष्ठ ने बाई लाइन ली है। और अंत में जन्मदिन के काले उल्लास में कई पत्रकारों को विज्ञापन देने के नाम पर प्रताडि़त किया गया है। कई पत्रकारों ने इस लेखक को बताया कि भाई साहब लोगों ने कहा कि क्यूं विज्ञापन दें। जन्मदिन भास्कर का और पैसे देकर बधाई दें। ऐसे में फिर उन लोगों की गर्दन पकड़ी गई, जिनको भास्कर से गर्ज है। तो भाइयों यूं मना रमेश जी की बड़ी दुकान का इंटरव्यू।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

रविकांत एवं बसंत ने हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा दिया

हिंदुस्‍तान, गोरखपुर से खबर है कि रविकांत उपाध्‍याय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अखबार को देवरिया में सेवाएं दे रहे थे. बताया जा रहा है कि गोरखपुर के कुछ लोगों को रविकांत रास नहीं आ रहे थे. रविकांत ने अपनी नई पारी गोरखपुर से ही प्रकाशित अखबार स्‍वतंत्र चेतना के साथ की है. उन्‍हें बरहज में रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. रवि सात सालों से हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे रहे थे. इसके पहले भी वे कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं.

हिंदुस्‍तान से ही खबर है कि भाटपार से रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी संभाल रहे बसंत बागी ने भी हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू कर रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. बसंत भी लम्‍बे समय से हिंदुस्‍तान को भाटपार से अपनी सेवा दे रहे थे.

राज हरितवाल, दुष्‍यंत सिंह एवं अमित रावत ने समाचार प्‍लस ज्‍वाइन किया

नोएडा : नया नवेला चैनल 'समाचार प्लस' आजकल दूसरे चैनलों को एक के बाद एक ज़ोर के झटके दे रहा है। ईटीवी, आईबीएन7 और स्टार न्यूज़ छोड़ कर कल ही कई लोग समाचार प्लस के साथ जुड़े थे और आज इसी कड़ी में इंडिया न्यूज़ तथा न्यूज़ एक्सप्रेस का नाम भी जुड़ गया है। इंडिया न्यूज़ बिहार-झारखंड में सीनियर पोज़ीशन पर कार्यरत राज हरितवाल और दुष्यंत सिंह ने संस्थान को टाटा-बाय-बाय बोल दिया। दोनों ने समाचार प्लस के साथ नई पारी शुरू की है। इन्हे न्यूज़ ऑपरेशन्स की महती ज़िम्मेदारी दी गई है। राज और दुष्यंत पिछले 10 वर्षों से ज्यादा वक्त से मीडिया में सक्रिय हैं और इसके पहले ईटीवी, वीओआई में काम कर चुके हैं।

न्यूज़ एक्सप्रेस से भी एक बड़ा नाम समाचार प्लस के साथ जुड़ा है। ये हैं एंकर-प्रोड्यूसर अमित रावत। मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी के रहने वाले अमित रावत ईटीवी में लगातार 6 वर्षों तक दमदार एंकरिंग करने के बाद न्यूज़ एक्सप्रेस आए थे। मगर ज्वानिंग के बाद उन्हें बताया गया कि इन्हे एंकरिंग नहीं दी जाएगी। इसके चलते अमित रावत बेहद नाराज़ चल रहे थे और इसीलिए इन्होंने खुद को समाचार प्लस के साथ जोड़ लिया। अमित रावत अब समाचार प्लस की स्क्रीन पर दमदार एंकरिंग करते नज़र आएंगे और आउटपुट में सुबह की शिफ्ट की ज़िम्मेदारी भी संभालेंगे। कुल मिलाकर, समाचार प्लस इन दिनों हॉट-केक बना हुआ है। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में ये चैनल रीज़नल मार्केट में अपनी असरदार उपस्थिति दर्ज़ करवाने में कामयाब होगा।

राज
अमित
दुष्‍यंत

इंडिया न्‍यूज ने लांच किया एमपी-सीजी चैनल

इंडिया न्‍यूज समूह की मूल कंपनी आईटीवी नेटवर्क हिंदी भाषी राज्‍यों में अपने विस्‍तार के कदम को आगे बढ़ाते हुए एमपी-सीजी चैनल लांच कर दिया है. यह इंडिया न्‍यूज समूह का छठा चैनल है. एमपी-सीजी की लांचिंग के साथ ही दो और हिंदी प्रदेशों पर इस समूह की पकड़ मजबूत हो गई है. इसके बाद ग्रुप अब हिमाचल चैनल लांच करने की तैयारी में जुट गया है. एमपी-सीजी के अलावा अब तक इंडिया न्‍यूज नेशनल, इंडिया न्‍यूज राजस्‍थान, इंडिया न्‍यूज हरियाणा, इंडिया न्‍यूज बिहार-झारखंड एवं इंडिया न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड चैनल की लांचिंग प्रबंधन कर चुका है. 

इस चैनल को मई में ही लांच किए जाने की योजना थी, परन्‍तु कुछ दिक्‍कतों के चलते यह जून में लांच किया जा सका. हिमाचल के अलावा यह समूह पंजाब चैनल को भी लांच करने की योजना काफी लम्‍बे समय से बना रखा है. पंजाब चैनल काफी समय से पाइप लाइन में पड़ा हुआ है. ग्रुप की योजना देश के सभी हिंदी भाषी राज्‍यों में अपना रिजनल चैनल नेटवर्क स्‍थापित करने की है. इस समूह का बिहार तथा यूपी चैनल लगातार दूसरे चैनलों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं.

एक जुलाई को लांच होगा चौथी दुनिया का अंग्रेजी संस्‍करण

वरिष्‍ठ पत्रकार संतोष भारतीय के नेतृत्‍व में प्रकाशित हो रहा चौथी दुनिया अब हिंदी और उर्दू के बाद अंग्रेजी संस्‍करण भी प्रकाशित करने जा रहा है. अंग्रेजी संस्‍करण की लांचिंग 1 जुलाई को होगी. इस अखबार का फोकस पहले दौर में बड़े महानगरों पर होगा. अंग्रेजी संस्‍करण की डमी भी प्रकाशित की जा रही है, जिसको बाजार में बढियां रिस्‍पांस मिल रहा है. प्रबंधन इससे काफी उत्‍साहित है. इसके लिए व्‍यापक पैमाने पर हिंदी तथा उर्दू अखबारों में प्रमोशन भी किया जा रहा है.

अंग्रेजी संस्‍करण का मूल्‍य भी हिंदी संस्‍करण की तरह पांच रुपये रखा गया है. 16 पेज का यह अखबार चौथी दुनिया के तेवर का ही होगा. इसमें राजनीतिक खबरों के अलावा अन्‍य खबरों का टेस्‍ट भी होगा, परन्‍तु कलेवर शुद्ध रूप से पालिटिकल होगा. अंग्रेजी संस्‍करण में राष्‍ट्रीय लेबल के कंटेंट को प्रमुखता दी जाएगी. देश के कुछ चुने हुए पत्रकारों में शुमार तथा खुद लोकसभा सांसद रह चुके संतोष भारतीय से उम्‍मीद की जा रही है‍ कि वे अंग्रेजी के पाठकों को पॉलिटिकल टेस्‍ट का एक बेहतरीन अंग्रेजी साप्‍ताहिक उपलब्‍ध कराएंगे, जिसकी फिलवक्‍त कमी महसूस की जा रही है.

अंग्रेजी संस्‍करण को प्रबंधन 80000 कापियों के साथ लांच करेगा. यह अखबार प्रत्‍येक रविवार को प्रकाशित किया जाएगा. चौथी दुनिया समूह के प्रधान संपादक संतोष भारतीय कहते हैं कि हम पहले फेज में दिल्‍ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्‍नई और बंगलुरू को टार्गेट करके अंग्रेजी संस्‍करण को लांच करेंगे. अंग्रेजी के डमी को बाजार में काफी सराहना मिली है. हम समझते हैं कि अंग्रेजी साप्‍ताहिक भी हिंदी व उर्दू की तरह सफलता के झंडे गाड़ने में सफल होगा.

इंडिया टीवी के रिपोर्टर से बदतमीजी करने वाले पुलिसकर्मियों ने मांगी माफी

इंडिया टीवी के रिपोर्टर मनीष प्रसाद से पिछले दिनों सरिता विहार थाने में तैनात एक दरोगा तथा एक कांस्‍टेबल ने बदसलूकी और बदतमीजी की. मनीष के साथ मारपीट करने की भी कोशिश की गई. मनीष ने इसकी जानकारी वरिष्‍ठ अधिकारियों को दी, जिसके बाद दोनों उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगी. दोनों के उम्र का लिहाज करते हुए मनीष ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कराने की बजाय माफ कर दिया. मनीष के साथ सरिता विहार थाने पर तैनात एसआई सूरज सिंह और कांस्‍टेबल सुरेश ने बदतमीजी की थी. हालांकि दोनों ने अपनी गलती मानते हुए मनीष से माफी मांग जिसके बाद उन्‍होंने इन दोनों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराया.

आजतक से शशिभूषण मैथानी एवं मौर्य टीवी से वेशाल आजम का इस्‍तीफा

आजतक, देहरादून से खबर है कि शशिभूषण नैथानी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे रिपोर्टिंग से जुड़े हुए थे. शशि ने अपनी नई पारी देहरादून में ही 'यूथ आईकान' से शुरू की है. उन्‍हें एडिटर इन चीफ बनाया गया है. शशि पिछले बारह सालों से आजतक को अपनी सेवाएं दे रहे थे. उन्‍होंने आजतक के लिए कई कठिन प्रोजेक्‍ट पूरे किए. इनकी गिनती उत्‍तराखंड के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. इन्‍होंने आजतक से विदा लेने की सूचना अपने फेसबुक वाल पर भी डाली है.

मौर्य टीवी से खबर है कि वेशाल आजम ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एंकर थे. वेशाल ने अपनी नई पारी एनडीटीवी से शुरू की है. उन्‍होंने रांची में ज्‍वाइन किया है. संभावना जताई जा रही है कि प्रबंधन वेशाल को चैनल के बजाय दूसरी नई जिम्‍मेदारी सौंपेगा. रांची में एनडीटीवी प्रबंधन ने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की है. माना जा रहा है कि वेशाल को इसमें शिक्षक की भूमिका सौंपी जाएगी.

बीबीसी से हिंदी प्रमुख अमित बरुआ का इस्‍तीफा

बीबीसी से खबर है कि अमित बरुआ ने इस्‍तीफा दे दिया है. इसकी जानकारी उन्‍होंने अपने साथियों को दे दी है. अमित बीबीसी हिंदी सेवा के चीफ के रूप में काम कर रहे थे. उनका कार्यकाल विवादों से भरा रहा. समझा जा रहा है कि इन्‍हीं विवादों के चलते अमित ने बीबीसी को बाय किया है. अमित पर कई तरह के आरोप भी लगे थे. ब्रिटेन में भी हिंदी के दो पत्रकारों ने अमित पर मुकदमा कर रखा है. अमित 2009 में बीबीसी के साथ जुड़े थे.

अंग्रेजी अखबार हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के विदेश संपादक रहे अमित को अंतरराष्‍ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ पत्रकार माना जाता है. उनके पास अंतरराष्‍ट्रीय मामलों की रिपोर्टिंग का ढाई दशक से ज्‍यादा का अनुभव है. वह कई देशों में संवाददाता भी नियुक्‍त रहे. वे एचटी के अलावा द हिंदू, फ्रंटलाइन जैसे अखबारों को भी अपनी सेवाएं दीं. उन्‍होंने डेटलाइन इस्‍लामाबाद नाम की किताब भी लिखी है. 

चैनल नियो क्रिकेट अब हो गया नियो प्राइम

नियो स्पोर्ट्स को अपने एक्सक्लूसिव क्रिकेट चैनल को छोड़कर सभी खेलों का चैनल बनाने को बाध्य होना पड़ा है. अब वह नियो क्रिकेट चैनल की जगह नियो प्राइम के नाम से जाना जाएगा. इसके पीछे सबसे अहम वजह भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) के टीम इंडिया के घरेलू मैचों का प्रसारण करार अधिकार रद्द होना बताया जा रहा है. प्रसारणकर्ता ने नियो क्रिकेट चैनल का नाम बदलकर नियो प्राइम कर दिया है. जिससे कि अन्य खेलों का प्रसारण भी इस चैनल पर किया जा सके.

नियो स्पोर्ट्स के मुख्य संचालन अधिकारी प्रसारण (टीवी आपरेशन) प्रसन्ना कृष्णन ने कहा, ‘सच्‍चाई यह है कि अब हमारे पास बीसीसीआई के अधिकार नहीं हैं. जब तक हमारे पास बीसीसीआई के अधिकार थे. तब हम कुछ हद तक घरेलू मैचों का भी प्रसारण करते थे. इसलिए तब क्रिकेट का एक्सक्सूसिव चैनल खोलना अच्छा फैसला था.’ उन्होंने कहा, ‘लेकिन अब हमने महसूस किया है कि 24 घंटे का क्रिकेट चैनल शायद उपयोगी नहीं हो. इसलिए यह अधिक समझदारी भरा है कि हम इसे इस तरह से पेश करें.’ बीसीसीआई ने भुगतान नहीं करने पर पिछले साल दिसंबर में नियो स्पोर्ट्स के प्रमोटर निम्बस कम्यूनिकेशन का अपने साथ हुआ प्रसारण अधिकार रद्द कर दिया था. इसके साथ ही दो हजार करोड़ रुपए की बैंक गारंटी भी जब्त कर ली थी. साभार : समय

अंबानी-बिड़ला के बाद कई और उद्योगपति मीडिया में निवेश को तैयार

महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के मनोनीत अध्यक्ष आनंद महिंद्रा समय बरबाद करने में बिल्कुल यकीन नहीं रखते हैं। मीडिया में रणनीतिक गठजोड़ों के लिए भारतीय कारोबारी जगत के उत्साह पर महिंद्रा कहते हैं, 'आप बढ़ती अर्थव्यवस्था के बीच मीडिया को दरकिनार नहीं कर सकते हैं।' उनका मानना है कि मीडिया की परिभाषा लगातार बदल रही है और ऐसे में मुनाफा कमाना है तो इस उद्योग की बेहतर समझ के साथ आपको यहां अपनी पकड़ बनानी होगी। उन्होंने कहा, 'हमारी कंपनी मुंबई मंत्रा खास तरह के कंटेंट तैयार करने की संभावनाएं तलाश रही है और ऐसा ढांचे बनाने की कोशिश में है जो मीडिया और जीवनशैली से जुड़ा हो।'

आरपी संजीव गोयनका समूह के अध्यक्ष संजीव गोयनका के पास पहले से ही ओपन पत्रिका है और वह मीडिया क्षेत्र में और आक्रामक निवेश की संभावनाएं तलाश रहे हैं। गोयनका ने तो इस पर कोई टिप्पणी नहीं की मगर सूत्रों ने पुष्टि की है कि उन्हें इंडिया टुडे समूह के लिविंग मीडिया इंडिया में खासी दिलचस्पी थी। हालांकि वह कामयाब नहीं हुए। आदित्य बिड़ला समूह के अध्यक्ष कुमार मंगलम बिड़ला ने यह बोली हासिल की। बिड़ला का मीडिया जगत में कदम रखने का यह दूसरा प्रयास था। दो साल पहले यूटीवी के संस्थापक और प्रवर्तक रॉनी स्क्रूवाला ने उन्हें ब्लूमबर्ग-यूटीवी को खरीदने की पेशकश की थी। लेकिन कीमत और दूसरे मामलों की वजह से यह सौदा अटक गया था और अनिल अंबानी ने इस सौदे को अपनी झोली में डाल लिया। मीडिया क्षेत्र में निवेश के पीछे अपनी रणनीति का जिक्र करते हुए बिड़ला ने कहा, 'निवेश के लिहाज से मीडिया उभरता क्षेत्र है। लिविंग मीडिया ने विकास के लिहाज से श्रेष्ठ मौका उपलब्ध कराया है।' बिड़ला, अंबानी और गोयनका के अलावा सुनील मित्तल, टाटा, विजय माल्या और अभय ओसवाल- सभी की नजर मीडिया पर है। मीडिया पंडितों का मानना है कि देर-सबेर अदाणी समूह भी इस क्षेत्र में आ सकता है।

सूत्रों के मुताबिक पिछले साल कुछ लोगों ने टीवी चैनलों में हिस्सेदारी खरीदने के लिए गौतम अदाणी से संपर्क किया था। इस साल मुंबई के एक औद्योगिक समूह के वरिष्ठ अधिकारियों ने एनडीटीवी के कारोबारी चैनल प्रॉफिट के लिए रणनीतिक इक्विटी साझेदार तलाशने के उद्देश्य से प्रणय रॉय से संपर्क किया था। हालांकि उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा था। टाटा समूह ने भले ही यह साफ किया हो कि वह खबरिया मीडिया में निवेश नहीं करना चाहता है, मगर समूह के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि समूह की मीडिया से जुड़े बुनियादी ढांचें में दिलचस्पी है। निश्चित ही इस साल की सबसे बड़ी खबर मुकेश अंबानी का दांव रहा जिन्होंने इनाडु (ईटीवी) के रामोजी राव और नेटवर्क 18 के राघव बहल के साथ गठजोड़ किया है। साभार : बीएस

अपनी फिल्‍म के प्रमोशन के लिए जागरण कार्यालय पहुंचे इमरान हाशमी

नोएडा : फिल्म शंघाई के लिए सिक्स पैक खत्म किए और निर्देशक दिवाकर के कहने पर नौ-दस किलो वजन भी बढ़ाया। कोशिश कर रहा हूं कि सीरियल किसर की छवि को तोड़कर बाहर निकला जाए, शंघाई फिल्म में कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया है। सिने स्टार इमरान हाशमी ने ये बातें रविवार को दैनिक जागरण व उर्दू दैनिक इंकलाब के सेक्टर-63 स्थित कार्यालय में कहीं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इस फिल्म को जरूर देंखे, क्योंकि इसमें इमरान एक अलग रूप में दिखाई देगा। फिल्म में उन्होंने एक छोटे शहर के पत्रकार का किरदार निभाया है। ऐसे में अखबार की दुनिया को नजदीक से जानने के लिए उन्होंने अखबार की कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से जानकारी ली।

शंघाई के प्रोमोशन के लिए यहां आए इमरान ने कहा कि वह अब तक तो दैनिक जागरण कभी-कभी ही पढ़ते रहे हैं लेकिन अब नियमित रूप से पढ़ना शुरू करेंगे। उन्होंने बताया कि वह हिन्दी खबरों के लिए जागरण डॉट कॉम देखते हैं। उन्होंने बताया कि राजनीति, थ्रिलर और जमीन पर कब्जे की कहानी है शंघाई। फिल्म में दिखाया गया है कि नेता किस तरह से किसी भी छोटे शहर को शंघाई बनाने का दावा कर लोगों को लूटते हैं।

अपने किरदार के बारे में हाशमी ने बताया कि जोगी परमार, एक अजीब किरदार है। जो एक छोटे शहर का पत्रकार है। वह फोटो खींचता है, वीडियो बनाता है और पोर्न फिल्में भी शूट करता है। सात साल में दर्शकों में मेरी इमेज सीरियल किसर की रही है। इसे तोड़ना चाहता हूं। इस फिल्म के जरिए ऐसा करने का प्रयास भी किया गया है। आने वाले फिल्म घनचक्कर के बारे में उन्होंने बताया कि डर्टी पिक्चर के बाद विद्या बालन के साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है। इसमें कॉमेडी है, थ्रिलर है। इस फिल्म में मैं लॉक एक्सपर्ट के किरदार में हूं जो एक बैंक में रॉबरी करता है और इसके बाद किस तरह से उसकी जिंदगी बदलती है। फिल्म में मैं और मरी पत्‍‌नी मध्यमवर्गीय परिवार के रूप में हैं लेकिन दोनों की इच्छा लग्जरी जिंदगी जीने की है। साभार : जागरण

पवन बजाज की पोल खोलने की सजा पा रहे हैं वेब जर्नलिस्‍ट मुकेश भारतीय

भारत में कानून की परिभाषा अब थोड़ी बदल गयी है। शरीफों के लिए कानून डंडा है और दबंगों को लिए सुविधा। 31 मई की रात्रि 12.30 बजे झारखंड की राजधानी राँची में उपर्युक्त परिभाषा चरितार्थ हुई। राजनामा डॉट कॉम के संचालक-संपादक मुकेश भारतीय को राँची शहर से 22 किलोमीटर दूर ओरमाझी स्थित उनके घर से झारखंड पुलिस के गोंदा थाना एवं ओरमाझी थाना के 9 राइफलधारी जवानों ने जिस प्रकार से एक पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार करते हुए धर दबोचा, ऐसा किसी खूंखार आतंकवादी को पकड़ने में किया जाता है।

मुकेश भारतीय के ओरमाझी स्थित उनके घर की दूसरी मंजिल (छत) पर दूसरे के मकान पर चढ़कर धर दबोचा गया, साथ ही उनका लैपटॉप, मोबाइल एवं मोडम भी पुलिस वाले उठाकर ले गये। पुलिस की इस बर्बरतापूर्ण व्यवहार से झारखंड की कानून-व्यवस्था तो शर्मसार हुई ही, मानवाधिकार की धज्जी भी उड़ाई गयी। झारखंड में घटित इस बर्बर पुलिसिया कहर पर यहाँ के स्थानीय प्रिंट मीडिया एवं टीवी चैनलों को कोई फर्क नहीं पड़ा। किसी ने इस बात की सुध लेने की कोशिश नहीं की, जबकि राँची स्थित सभी प्रिंट मीडिया, चैनलों एवं समाचार एंजेसियों को उनकी पत्नी रात भर फोन करके अपना दुखड़ा सुनाती रहीं।

मुकेश को आतंकवादी की तरह धर दबोचने के पीछे की कहानी यह है कि पवन बजाज राँची का एक दबंग बिल्डर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि झारखंड सरकार के मुखिया अर्जुन मुण्डा का खासम-खास आदमी है। उस पर एक कोयला व्यावसायी की हत्या का भी इलजाम है। इससे संबंधित मामला सीबीआई में लंबित है। ( http://raznama.com/?p=12481) राँची में आम चर्चा है कि पवन बजाज ने पायनियर अखबार के राँची संस्करण की फ्रेंचाइजी पायनियर के मालिक चंदन मित्रा से 1 नवम्बर को अपने नाम 80 लाख देकर करा लिया है, जो  31 अक्तूबर 2011 तक विनोद सरवगी के नाम पर था। इस अखबार में जो पैसा लगा है, वह सूबे के मुख्यमंत्री अर्जुन मुण्डा का है। दिखाने के लिए पवन बजाज द्वारा संचालित किया जा रहा है। और सरकार के एक महत्वपूर्ण विभाग के बड़े अधिकारी से लेकर छोटे अधिकारी तक इसमें अपना योगदान दे रहे हैं।

कहा तो यह भी जाता है कि शाम 5 बजे के बाद सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक आलोक कुमार गुप्ता, सहायक निदेशक अजयनाथ झा, सहायक निदेशक एवं अपर सचिव राजीव लोचन बक्शी भी पायनियर के दफ्तर में देखे जाते हैं। यानी सरकारी काम के साथ-साथ पायनियर अखबार को चलाने का जिम्मा भी इन्हीं अधिकारियों को सौंपा गया है। इस में क्या सच्चाई है, मुकेश द्वारा बेव साइट पर प्रकाशित किये गये समाचार के बाद भी किसी ने अभी तक इसका खंडन नहीं किया है।इसी आशय का समाचार मुकेश भारतीय ने अपने वेबसाइट राजनाम डॉट कॉम (http://raznama.com/?p=12443) पर प्रकाशित किया था। इसी समाचार के असलियत से तिलमिलाकर मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अधिकारी के इशारे पर पवन बजाज ने मुकेश भारतीय पर 15 लाख की रंगदारी मांगने के आरोप लगा कर गोंदा थाना में एक एफआईआर दर्ज करवा कर उन्‍हें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 385, 387, 66 ए, 66 बी एवं 67 के तहत 11 बजे राँची स्थित हटवार के बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागार में भेज दिया गया।

इस पुलिसिया वारदात से यह साफ जाहिर होता है कि झारखंड में लोकतंत्र का लोप हो गया है। और व्यवस्था गुंडे मवालियों के हाथों में आ गयी है। मुंडा सरकार में नागरिक सुरक्षा भारी खतरे में है। जंगल राज का द्योतक झारखंड की व्यवस्था हो गयी है, जहाँ किसी की जान-माल की सुरक्षा अनिश्चित है। इसी का परिणाम है कि आये दिनों दिन-दहाड़े बलात्कार, छिनैती, चोरी, अपहरण एवं हत्या आम बात हो गई है। एक बात उल्लेखनीय है कि अर्जुन मुण्डा को हेलीकॉप्टर दुर्घटना बाद से अपने बिस्‍तर पर ही पड़े-पड़े उसी मजबूरी की हालत में राजकाज भी चलना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री की लाचारी का गलत फायदा उठाते हुए मुख्यमंत्री सचिवालय के एक कनीय आईएफएस अधिकारी, दलालों, बिल्डरों और दबंगों के साथ मिल कर अपनी मनमानी चला रहे हैं। इसी मनमानी का एक नमूना है कि एक स्वाभिमानी वेब-पत्रकार मुकेश भारतीय को सुनियोजित रूप से एक साजिश के तहत रंगदार बनाने पर तुले हुए हैं।

यहाँ एक अहम सवाल खड़ा होता है कि मुकेश भारतीय पर पवन बजाज के अखबार पायनियर के काली करतूतों को उजागर करने के बाद ही रंगदारी मांगने का आरोप क्यों लगया गया? यदि मुकेश को रंगदारी ही मांगनी होती तो पहले भी मांग सकता था। इस सवाल से यह साफ जाहिर हो जाता है कि पवन बजाज एवं मुख्यमंत्री सचिवालय के अधिकारियों की कुत्सित मंशा कितनी खतरनाक एवं खौफनाक था। वहीं उन्होंने यह दिखला दिया कि कानून-थाना-पुलिस वे अपने ठेंगे पर जब चाहें रख सकते हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि 24 घंटे के अंदर प्राथमिकी दर्ज कर मुकेश की गिरफ्तार कर ली जाती है और जेल भी भेज दिया जाता है। इस पर अनुसंधान करने की कोई आवश्यकता भी महसूस नहीं की गयी। क्या झारखंड की पुलिस सब के साथ ऐसी ही करती है?

यह भी ज्ञात हो मुकेश भारतीय द्वारा सूचना एवं जन संपर्क विभाग से कुछ सूचनाधिकार के तहत कई बिन्दुओं पर सूचना मांगी थी।  http://raznama.com/?p=12396 उक्त सूचना को समय बीत जाने के बाद भी नहीं देने के बाद, जब मुकेश ने अपनी बात को विभाग के अपर सचिव-सह-प्रथम अपीलीय पदाधिकारी राजीव लोचन बक्शी के सामने रखी तो वे मुकेश को यह आश्वासन दिया कि आपको 5 दिनों के भीतर सूचना दिलवा दी जायेगी, फिर 18 दिनों बाद पुनः इसी बात को उक्त अधिकारी के समक्ष दोहराया तो उक्त अधिकारी ने कल यानि कि 31 मई 2012 को सूचना देने के लिए व्यक्तिगत रूप से अपने कार्यालय में बुलाया था, लेकिन भारत बंद होने के कारण मुकेश सूचना लेने नहीं पहुँचा। और इसी तिथि की आधी रात को उसे पुलिस द्वारा धर दबोचा गया। उक्त घटना के बाद पुलिस की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ गयी है। ऐसी हालात में उक्त पत्रकार को न्याय दिलाने के लिए पवन बजाज एवं संबंधित  अधिकारियों के संदेहात्मक कृत्यों की सीबीआई एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जाँच कराई जाय।

राम प्रकाश तिवारी

संपादक

सर्चटाइम्स (पाक्षिक समाचार पत्र)

रांची

हिसाम और हेमंत की लड़ाई से व्‍यवस्‍थाएं ध्‍वस्‍त, अधिकारी कर रहे मनमानी

लखनऊ : हिसाम सिद्दीकी और हेमंत तिवारी के बीच चल रहे झगड़े ने सचिवालय और विधानसभा की कवरेज कर रहे पत्रकारों के लिए सारी व्‍यवस्‍थाएं ध्‍वस्‍त करा दिया है। झगड़ा दो साल पहले संवाददाता समिति के अध्‍यक्ष पद पर हिसाम के जीतने और हेमंत तिवारी की हार से शुरू हुआ। हेमंत अब इस समिति पर कब्‍जाने की फिराक में हैं, इसलिए समिति की मौजूदा कार्यकारिणी को वे अमान्‍य बताए हुए हैं। मुख्‍यमंत्री से लेकर संतरी तक हेमंत ने दर्जनों खत भेजे हैं कि समिति अब अस्तित्‍व में नहीं है। हेमंत के लोग चाहते हैं कि हिसाम के गुट को तोड़ दिया जाए। लेकिन हेमंत की इस कवायद का खामियाजा समिति के उन सदस्‍यों पर भारी पड़ गया है जिनके दम पर हेमंत अध्‍यक्ष लड़ने की तैयारी में हैं।

ताजा मामला है विधानसभा कार्यवाही के कवरेज का। समिति के खिलाफ पत्र देख कर अफसरों ने मनमानी शुरू कर दी है। व्‍यवस्‍था के चलते मुख्‍यालय पर सूचना विभाग से मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाताओं की सूची विधानसभा और विधानपरिषद सचिवालय को भेजी जाती रही है और उसी सूची पर प्रवेश पास जारी किये जाते रहे हैं। लेकिन ताजा हालातों के चलते अफसरों ने मनमर्जी शुरू कर दी। पास को लेकर अब इन मठाधीशों के चलते के साथ ही साथ नये क्षत्रप और नये तुर्क बन गये हैं, जो अपने लोगों को पास दिलाकर उपकृत कराने में जुटे हैं। पत्रकारों को यह पास हासिल करने के लिए अब प्रचलित व्‍यवस्‍था के बजाय अब गुटों के लोगों की सिफारिशें करानी पड़ रही हैं। एक न्‍यूज एजेंसी के पत्रकार आसिफ अंसारी के साथ नोंकझोंक इसी के चलते हुई। पूछने पर अंसारी कहना है कि विधानसभा सचिव ने जवाब दिया था कि अरविंद सिंह विष्‍ट की सिफारिश होने पर ही उन्‍हें पास मिलेगा। विकल्‍प के तौर पर हेमंत तिवारी की सिफारिश मानी जाएगी।

बताते हैं कि यह करतूत है हेमंत तिवारी की। जानकारी के मुताबिक हेमंत तिवारी ने मंत्री से संतरी तक पास दर्जनों चिट्ठियां भेजी हैं कि चूंकि उप्र मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति की कार्यकारिणी अवैध हो चुकी है, इसलिए इस समिति के पदाधिकारियों की कथित कार्रवाईयां नाजायज हैं। बताते हैं कि गुट की पैरवी के चलते ही अफसरों ने विधानसभा की कार्रवाई पर पास जारी करने की व्‍यवस्‍था को ही बदल दिया और सूचना विभाग द्वारा जारी की गयी पास जारी को ही उलट-पलट कर दिया। अब जिस भी संवाददाता को पास चाहिए उसे सूची के बजाय अफसरों के पास पहुंचना पडे़गा और इसके लिए कथित इन मठाधीशों की सिफारिश चाहिए।

इस बाबत बात करने के लिए हेमंत से जितने बार कोशिश की गई, उतने बार उन्‍होंने फोन ही नहीं उठाया गया। हिसाम सिद्दीकी का कहना है कि जो लोग भी पहुंचे, उन सभी को पास दिलाने की कोशिश करा दी गयी है। हालांकि हिसाम इस बात का जवाब नहीं पा रहे हैं कि पास के लिए अब अफसरों की सिफारिश का क्‍या औचित्‍य है। वैसे हसीम सिद्दीकी का कहना है कि परम्‍परा को हेमंत ने ध्‍वस्‍त कराया है। एक वरिष्‍ठ का कहना है कि हेमंत ने ऐसे से चालीस से ज्‍यादा पत्र लिखे हैं, जिसके बाद से ही अफसरों ने परम्‍परा तोड़ते हुए मनमानी शुरू कर दी। इस बारे में बातचीत के लिए विधानसभा के प्रमुख सचिव से बहुत प्रयासों के बावजूद सम्‍पर्क नहीं हो पाया। पास को चल रहे विवाद पर वरिष्‍ठ पत्रकार योगेश मिश्र मानते हैं कि जो कुछ भी हो रहा है, वह उचित नहीं है। बहरहाल, गुटों में बंट चुकी उप्र मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के स्‍वयंभू नेता समिति की चन्‍दी-चिन्‍दी बिखेरने पर तो आमादा ही हैं।

लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट. कुमार सौवीर यूपी के जाने माने पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर, हिंदुस्तान, महुआ, एसटीवी समेत कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. सौवीर अपने बेबाक बयानों और दमदार लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

हिंदुस्‍तान के कथित पत्रकार ने ब्‍लॉक कर्मचारी पर हाथ उठाया

रायबरेली। ब्लाक आफिस लालगंज में कार्यरत कम्प्यूटर आपरेटर ब्रजेश यादव के साथ एक पत्रकार ने दुर्व्‍यवहार किया। बृजेश अपने साथ हुए दुर्व्‍यवहार की शिकायत प्रभारी खण्ड विकास अधिकारी से करते हुए कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराने हेतु निवेदन किया है। ब्रजेश यादव ने अपने तहरीर में कहा है कि वह गुरुवार को ब्लाक आफिस के कम्प्यूटर कक्ष में कार्य निपटा रहे थे, तभी 11 बजे के लगभग अपने आप को हिन्दुस्तान समाचार पत्र का पत्रकार बताने वाले सुरेश श्रीवास्तव कार्यालय के अंदर आए तथा बीडीओ का हवाला देते हुए जबरन पिछले वित्तीय वर्ष में 50 ग्राम सभाओं के सभी कार्यों के विवरण की छाया प्रति मॉगने लगे।

जब मैंने बिना बीडियो के आदेश के बगैर अभिलेख देने से मना किया तो उसने मुझे जाति सूचक अपमानजनक गालियॉ दीं और हाथ उठा दिया। मेरे चिल्लाने पर कार्यालय में मौजूद स्टाप ने मुझे उसके चंगुल से बचाया। ब्रजेश ने अपने साथ हुए गलत व्यवहार की घटना से अपने आप को बहुत ही आहत बताते हुए मानसिक उत्पीड़न की शिकायत अपने उच्चाधिकारियों से की है। वहीं अधिकारियों का कहना है कि मामला संज्ञान में आया है। बीडियो लालगंज के अवकाश से लौटने पर इस मामले में उचित कार्रवाई की जायेगी।

रायबरेली से मानवेंद्र पाण्‍डेय की रिपोर्ट.

हिंदुस्‍तान, लखनऊ से रंजीत कुमार का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान, लखनऊ से खबर है कि रंजीत कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे हाल ही में हुए इंक्रीमेंट और प्रमोशन से नाराज थे. रंजीत अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. रंजीत लंबे समय से हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे रहे थे. इसके पहले वे दैनिक भास्‍कर, राजस्‍थान पत्रिका जैसे संस्‍थानों के साथ भी काम कर चुके हैं. रंजीत की गिनती हिंदुस्‍तान के तेज तर्रार पत्रकारों में की जाती है. समझा जा रहा है कि इंक्रीमेंट और प्रमोशन से नाराज कई पत्रकार हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा दे सकते हैं. इसके पहले देहरादून से भी एक पत्रकार ने इस्‍तीफा दे दिया था.

पत्रकारिता बचाने के लिए समाज को भी आगे आना पड़ेगा : डॉ. गोविंद सिंह

रुद्रपुर। पत्रकार समाज से आता है इसलिए समाज के लोगों में जो अच्छाइयां-बुराइयां हैं, वे पत्रकारों में आना भी स्वाभाविक हैं, पत्रकारिता में आज जो गिरावट दिख रही है उसे समाज अपने सक्रिय हस्तक्षेप से रोक सकता है। यह विचार उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने व्यक्त किए। वे पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे।

नैनीताल रोड स्थित बीआरसी सभागार में कला, संस्कृति और साहित्य के मंच ‘उजास’ और ‘पीपुल्स फ्रैंड’ अखबार द्वारा ‘सूचना का प्रवाह : मिथक और यथार्थ’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में डॉ. सिंह ने कहा कि अमेरिकी मीडिया द्वारा प्रारंभ नीति के तहत भारतीय मीडिया 18 से 33 वर्ष आयु के लोगों की रुचि के हिसाब से सामग्री परोस रहा है। इसके पीछे संपादकीय में बाजार का बढ़ता दबाव है। उन्होंने कहा कि समाचार का बनना एक सामूहिक प्रक्रिया का परिणाम है। पूरी प्रक्रिया के प्रायः सूचनाओं पर नियंत्रण आसान नहीं होता फिर भी कई तत्व अपने हिसाब से सूचनाओं के प्रवाह को प्रभावित करते हैं। सामाजिक सजगता इस प्रवृत्ति को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, ईमानदार और जुझारू पत्रकारों को समाज सहयोग और सुरक्षा प्रदान करे तो स्थिति और बेहतर हो सकती है। अनेक बार देखने में आता है कि बेहतर कार्य करने वालों को  नौकरशाहों, नेताओं, माफियाओं, नेताओं और पूंजीपतियों के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है, ऐसे में समाज भी उनकी सहायता को आगे नहीं आता। आर्थिक सहयोग न मिलने के कारण ही हिंदी का पहला अखबार ‘उदंत मार्तण्ड’ बंद हुआ था।

पंतनगर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भूपेश कुमार सिंह ने सूचना के प्रवाह और मिथकों के निर्माण की विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि इस दौर में मीडिया पूरे एक उद्योग का रूप ले चुका है जो मौजूदा सांस्कृतिक वर्चस्व का सशक्त जरिया है। एक प्रक्रिया में सचेतन रूप से गढ़े गये मिथक सामाजिक परिघटना की हक़ीकत को शून्य बना देते हैं और लोगों की निष्क्रियता बढ़ाते जा रहे हैं। विशिष्ट अतिथि ‘राजस्थान पत्रिका’ जयपुर के उप समाचार संपादक संजीव माथुर ने कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, यह कहने की प्रवृत्ति गलत है। जो खबरें परोसी जाती हैं, उन्हें नकारने का विकल्प पाठक के पास है। बाजार को समाज ने स्वीकार किया है और मीडिया समाज से बाहर नहीं है। जन उपयोगी सूचनाओं के संरक्षण के लिए समाज को भी बाजार के प्रतिरोध में खड़ा होना होगा। ‘दैनिक भास्कर’ खंडवा (मध्य प्रदेश) में सांस्कृति मामलों के पत्रकार मिथिलेश मिश्र ने आशयपूर्ण और खुद के भ्रम में निर्मित होने वाले मिथकों के बारे में बताया।

संगोष्ठी की शुरुआत सुरेश चंद्र मिश्र के कविता पाठ से हुई। संगोष्ठी के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में सुपरिचित कवि और स.भगत सिंह डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता डॉ. शंभू दत्त पांडे ‘शैलेय’ ने कहा कि लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचें, पत्रकारिता अपने सही स्वरूप में हो इसके लिए निरंतर संवाद की जरूरत है। इस निमित्त सांस्कृतिक मुहिम चलाने की जरूरत है। संगोष्ठी में नबी अहमद मंसूरी ने पत्रकारिता पर अपनी कविता प्रस्तुत की। गोष्ठी का संचालन करते हुए मुकुल ने कहा कि सूचना का प्रवाह जीवित लोगों को वस्तुओं में तब्दील कर दे रहा है और वस्तुएं जीवंत हो जा रही हैं। गोष्ठी में बीसी सिंघल, कस्तूरीलाल तागरा, राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, ललित सती, ललित मोहन आदि ने भी अपने विचार रखे। इससे पूर्व रात्रि में ‘पान सिंह तोमर’ फिल्म का प्रदर्शन किया गया। जिसके बाद डकैत समस्या पर बनीं तमाम फिल्मों की चर्चा करते हुए वक्ताओं ने फिल्मों के विविध पहलुओं पर बात की। कार्यक्रम में नवोदित फिल्म अभिनेता सुवीर गोस्वामी, पीपुल्स फ्रैंड के संपादक अयोध्या प्रसाद खेमकरण सोमन, नरेश, देवेंद्र दीक्षित, अरविंद सिंह आदि मौजूद थे।

अंटू मिश्र, बाबू सिंह कुशवाहा, मानवेंद्र एवं महेंद्र समेत दस के विरुद्ध एफआईआर

लखनऊ। सीबीआई ने एनआरएचएम घोटाला मामले में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार उर्फ अंटू मिश्रा, पूर्व परिवार कल्याण मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा, विधायक रामप्रसाद जायसवाल, प्रमुख सचिव प्रदीप शुक्ला और एमएलसी डाक्टर अशोक कटियार के अलावा महानिदेशक परिवार कल्याण डाक्टर एसपी राम व चार निजी दवा आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ शनिवार को मुकदमा दर्ज किया है। सीबीआई की टीम ने अंटू के कई ठिकानों पर छापेमारी भी की है।

सूत्रों की मानें तो जल्द पूर्व मंत्री व कुछ अन्य आरोपितों को एनआरएचएम घोटाले में गिरफ्तार किया जा सकता है। कार्रवाई की जद में कुछ दागी सीएमओ भी आ सकते हैं। आरोप है कि इन लोगों ने फर्जी दस्तावेज के सहारे एनआरएचएम की धनराशि हड़पने के लिए धोखाधड़ी की है। मुकदमे की जद में 72 जिलों में सीएमओ व जिला परियोजना अधिकारी के पद पर तैनात करीब 100 तत्कालीन अधिकारी भी आ रहे हैं। बनारस में दवा कारोबारी महेंद्र पाण्‍डेय एवं मानवेंद्र चड्ढा, लखनऊ के ठेकेदार राशिद उर्फ गुड्डू खान तथा दिल्‍ली के दवा व्‍यापारी गिरीश मलिक को नामजद किया गया है। इनमें से बाबू सिंह कुशवाहा, आरपी जायसवाल, प्रदीप शुक्ल और एसपी राम एनआरएचएम घोटाले के एक मामले में पहले से ही जेल में हैं, जबकि अंटू मिश्र समेत अन्य को भी सीबीआई जल्द गिरफ्तार कर सकती है। इनमें से एक ठेकेदार मानवेंद्र दैनिक जागरण, वाराणसी के पूर्व संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा के भाई हैं। 

उल्‍लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 15 नवंबर 2011 के आदेश पर एनआरएचएम घोटाले की जांच कर रही सीबीआई को पता चला ने पूर्व मंत्रियों ने निजी आपूर्तिकर्ताओं के साथ साजिश कर दवा, शल्य चिकित्सा उपकरण और अन्य मदों में हेराफेरी की है। अंटू पर आरोप है कि उन्होंने ठेकेदारों और बिचौलियों की मदद से जिलों में सीएमओ की तैनाती में रिश्वत ली। दवा, उपकरण, प्रशिक्षण व निर्माण का आदेश अपने चहेते को दे दिया। मुख्य चिकित्साधिकारियों ने दवा, शल्य चिकित्सा, सर्जिकल आइटम की आपूर्ति का ठेका बिना निविदा कराये उस आपूर्तिकर्ता को दी, जिसने उनकी तैनाती कराने में अहम भूमिका निभाई थी। आपूर्तिकर्ताओं ने बाजार दर से पांच से दस गुना अधिक दर लगाकर आपूर्ति की। विभाग के उच्चाधिकारियों ने इनकी अनदेखी की और वह भी इसमें हिस्सेदार रहे।

सीबीआई टीम शनिवार को सुबह सात बजे पूर्व मंत्री अंटू मिश्रा के राजधानी के गोमतीनगर विपुल खंड स्थित आवास पर पहुंची। भाई मधु मिश्रा से सीबीआई ने तलाशी में सहयोग देने को कहा। इसके बाद पूरे आवास की तलाशी ली। मधु मिश्रा ने अपने मोबाइल से कहीं बात करना चाहा तो एक निरीक्षक उन्हें बाहर लेकर निकले। मोबाइल लेकर करीब दस मिनट तक कुछ जांच परख की। फिर अंदर चले गये। सीबीआई टीम को यह अंदेशा था राज्य स्तरीय क्रय से सम्बंधित फाइलें उनके आवास पर ही मौजूद हैं। टीम को अंटू के घर से कुछ खास हाथ नहीं लगा। तलाशी करीब करीब साढ़े छह घंटे तक चली।

कानपुर में भी सीबीआई की टीम सुबह सवा छह बजे सिविल लाइन में कोषागार के सामने स्थित अंटू मिश्र के आवास पर पहुंची। पांच सदस्यीय टीम के साथ दूरसंचार विभाग के दो अधिकारी भी थे। टीम ने घर के नौकरों को बाहर कर अंदर से दरवाजा बंद कर दिया और छानबीन शुरू की। जांच-पड़ताल में टीम को कई अहम दस्तावेज मिले, जिन्हें कब्जे में ले लिया। सूत्रों के मुताबिक बरामद दस्तावेजों में कई एफडीआर, बैंक खाते, लॉकर व संपत्ति के कागजात भी शामिल हैं। इस बाबत तीन कमरे भी सील करने की सूचना मिली है। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई है। टीम ने घर में मौजूद मंत्री के माता पिता, पत्नी, पुत्र से काफी देर तक पूछताछ की। टीम ने दूरसंचार अधिकारियों की मदद से फोन की कॉल डिटेल का सत्यापन किया। टीम नोएडा में रह रहे मंत्री के वाहन चालक व उसकी पत्नी को भी साथ लेकर आयी थी। छह घंटे सघन-पड़ताल के बाद टीम दोपहर बारह बजे के आस-पास लौट गयी।

पूर्व परिवार कल्याण मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने भी चार ठेकेदारों, प्रदीप शुक्ला, रामप्रसाद जायसवाल, डाक्टर कटियार के साथ एनआरएचएम की धनराशि हड़पने का षड्यंत्र किया। बाबू सिंह ने जिलों में एनआरएचएम धन को खर्च करने के लिए बतौर प्रभारी नियुक्त किये। अधिकारियों को लूट खसोट की खुली छूट भी दे दी। जिला परियोजना अधिकारी परिवार कल्याण के पद पर उन्हीं अधिकारियों की तैनाती की जाती थी, जो मंत्री के इशारे पर उनके चहेतों को ही ठेके आवंटित करते थे। इसके एवज में तत्कालीन विधायक आरपी जायसवाल व एमएलसी डाक्टर अशोक कटियार भी अवैध तरीके से उपकृत होते रहे। आपराधिक षड्यंत्र के तहत स्वास्थ्य विभाग के दो टुकड़े करने का प्रस्ताव किया गया, जिसे केन्द्र सरकार के एनआरएचएम के लिए तय मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए स्वीकृति दी गयी।

सीबीआई सूत्रों के मुताबिक डाक्टरों को सीएमओ बनाने के एवज में पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा, अनंत कुमार मिश्र अंटू, तत्कालीन बसपा विधायक आरपी जायसवाल और एमएलसी अशोक कटियार ने डाक्टरों से करोड़ों रुपये वसूले। इस काम में उनकी मदद पूर्व प्रमुख सचिव स्वास्थ्य प्रदीप शुक्ल और महानिदेशक स्वास्थ्य एसपी राम ने की। घूस की रकम का एक हिस्सा प्रदीप शुक्ल तक भी पहुंचने के सुबूत सीबीआई के हाथ लग चुके हैं। पैसा देकर तैनाती पाये सीएमओ उन्हीं सप्लायर्स को दवाइयों और उपकरणों की सप्लाई, प्रशिक्षण और निर्माण कार्य के ठेके देते थे जो सीएमओ बनने के लिए उनकी मदद करते थे। सीबीआई ने ऐसे चार सप्लायर्स को भी अपनी एफआईआर में नामजद किया है, जिन्होंने मंत्रियों और अधिकारियों के साथ अपने संबंधों का लाभ उठाकर उन तक घूस की रकम पहुंचायी। इसके एवज में मनचाहे डाक्टरों को जिलों में तैनात करवाया।

अहंकार, अपमान और अज्ञान की पीठ!

तहलका ने कुछ समय पहले एक आवरण कथा की थी. शीर्षक था साहित्य के सामंत. यह बताती है कि हिंदी साहित्य से जुड़े कुछ संस्थानों और उनसे जुड़े लेखकों-आलोचकों-प्रकाशकों की इच्छा के बिना अदब की इस दुनिया का एक पत्ता तक हिलना मुश्किल है और कैसे हिंदी साहित्य की एक बड़ी दुनिया ने इसे अपनी नियति मानकर इससे समझौता कर लिया है.

लेकिन साहित्य की इस तिकड़मी और समझौतावादी दुनिया के पिछले दो हफ्ते बेहद हलचल भरे रहे. यह सब तब शुरू हुआ, जब युवा लेखक गौरव सोलंकी ने भारतीय ज्ञानपीठ को एक पत्र लिखकर प्रतिष्ठित नवलेखन पुरस्कार ठुकरा दिया और अपनी दो किताबों, ‘सौ साल फिदा’ और ‘सूरज कितना कम’ के प्रकाशन-अधिकार ज्ञानपीठ से वापस ले लिए. अपने पत्र में गौरव ने ऐसा करने की दो मुख्य वजहें बताईं. पहली, वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा अनुशंसित उनके कहानी संग्रह को ज्ञानपीठ के पदाधिकारियों द्वारा ‘अश्लील’ बताकर छापने से मना करना और दूसरा, इस पर सवाल-जवाब करने पर ज्ञानपीठ के ट्रस्टी और उच्चाधिकारियों द्वारा उन्हें अपमानित करना.

भारतीय ज्ञानपीठ को लिखे गौरव सोलंकी के कई पत्रों (पुरस्कार ठुकराने से पहले भी गौरव ने ज्ञानपीठ को कई पत्र लिखे थे) और उसके बाद से लगातार सामने आ रही जानकारियों से बेहद प्रतिष्ठित माने जाने वाले इस संस्थान के भीतर चल रही राजनीति की जो परतें खुलती हैं वे चौंका देने वाली हैं. प्रसिद्ध कथाकार उदय प्रकाश कहते हैं, 'गौरव सोलंकी ने तो आवाज उठाई, उनकी सोचिए

भारतीय ज्ञानपीठ तो पिछले कुछ वर्षों में इतने आरोपों और विवादों से घिरा रहा है कि हिन्दी के एक वरिष्ठ कहानीकार कहते हैं, ‘ये सुधरने वाले नहीं हैं.’ हताशा से भरे इस बयान पर सीधे विश्वास कर पाना मुश्किल है, इसलिए हमने हिंदी के वरिष्ठ और युवा सहित अनेक साहित्यकारों से बात की. इससे जो कहानी बनी, उसका अंत हिन्दी की किसी भी मार्मिक कहानी से ज्यादा मार्मिक था. लेकिन उस अंत से पहले कहानी की शुरुआत जानते हैं.

भारतीय ज्ञानपीठ की प्रतिष्ठा को पहला बड़ा धक्का तब लगा, जब मई, 2007 में ‘नया ज्ञानोदय' (भारतीय  ज्ञानपीठ की मासिक साहित्यिक पत्रिका) में अजीबोगरीब शैली में लेखक-लेखिकाओं के  परिचय छपे. इससे लेखक समुदाय बौखला गया और उसने ज्ञानपीठ के प्रबंध न्यासी साहू अखिलेश जैन को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया. उस समय लेखकों ने बड़े पैमाने पर पत्र-पत्रिकाओं में इसके खिलाफ लेख लिखे और ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया को बर्खास्त करने की भी मांग की. लेकिन उनकी आवाज नहीं सुनी गई. यह रवीन्द्र कालिया के भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक के रूप में शुरुआती दिन थे.

दूसरा बड़ा हंगामा तब हुआ, जब ‘नया ज्ञानोदय’ के अगस्त, 2010 के अंक में छपे साक्षात्कार में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने लेखिकाओं को ‘छिनाल’ कहा और अपने संपादकीय में रवीन्द्र कालिया ने इस साक्षात्कार को ‘बेबाक’ बताया. इसके बाद फिर से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक विरोध में सड़कों पर उतर आए. लेकिन तब भी उनकी आवाज नहीं सुनी गई.

तीसरा बड़ा विरोध गौरव सोलंकी के पुरस्कार लौटाने के लिए लिखे पत्र के बाद शुरू हुआ है. युवा लेखकों द्वारा फेसबुक पर ‘ज्ञानपीठ के भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत’ नामक एक पेज भी बनाया गया है. ‘छिनाल प्रकरण’ में लेखकों की आवाज नहीं सुने जाने के विरोध में ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तक ‘जानकी पुल’ वापस ले चुके लेखक प्रभात रंजन कहते हैं, 'गौरव के प्रकरण ने भारतीय ज्ञानपीठ के पतन की एक झांकी दिखाई है, कि किस तरह भारतीय ज्ञानपीठ अपने कालिया-काल में साहित्य के एक बड़े प्रहसन में बदलता जा रहा है.'

अश्लीलता के आवरण और सरकारी पैसे का दुरुपयोग

गौरव सोलंकी के पुरस्कार ठुकराने और अपनी पुस्तकें वापस लेने के बाद भारतीय ज्ञानपीठ ने उन्हें एक पत्र भेजा है, जिसमें कहा गया है कि लेखक शैलेन्द्र शैल से पुनर्मूल्यांकन करवाने के बाद गौरव की कहानियों में कुछ ऐसे तत्व पाए गए जिनसे ‘हिंदी के पाठकों के संस्कार आहत हो सकते हैं.’ यह पहला मामला नहीं है, जब वरिष्ठ साहित्यकारों की ज्यूरी के निर्णय से ज्ञानपीठ ने छेड़छाड़ की है. ज्ञानपीठ से जुड़े लेखक बताते हैं कि पहले भी कई बार उनकी पुस्तकों के अंश ‘अश्लीलता’ का हवाला देकर काटे जा चुके हैं.  नवलेखन-पुरस्कार विजेता युवा कथाकार विमलचन्द्र पांडेय कहते हैं कि कुछ साल पहले उन्हें भी अपने पहले कहानी संग्रह ‘डर’ के कुछ हिस्से इसी दबाव में काटने पड़े थे. कवि हरिओम राजोरिया की पुस्तक के साथ भी यही हो चुका है. वे कहते हैं कि ज्ञानपीठ की गड़बड़ियों को लेकर लेखकों और उनके संगठनों को भी सामने आना चाहिए.

अश्लीलता के ये आरोप तब हैं, जब नवलेखन पुरस्कार के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष नामवर सिंह, गौरव सोलंकी की कहानियों के बारे में कहते हैं, ‘हमें उसकी रचनाएं अच्छी लगीं और हमने उसके पक्ष में निर्णय लिया.’ ज्ञानपीठ द्वारा अश्लील बताई जा रही कहानी पर उदय प्रकाश कहते हैं, 'गौरव की यह कहानी हमारी नयी आर्थिक-सामाजिक नीतियों और नए तरह की सामाजिक बनावटों की बहुत रोचक, अपारंपरिक और पठनीय कहानी है. वह हमारे नए यथार्थ को पूरी कलात्मकता के साथ न सिर्फ व्यक्त करती है बल्कि उसे भरपूर युवा नैतिक साहस से आईना दिखाती है, यह बताने के लिए, कि यह चेहरा कितना विद्रूप है. ऐसी कहानियां किसी चालू (प्रचलित) सोच के लेखक-आलोचक के द्वारा आसानी से स्वीकृत नहीं होतीं.'

ज्यूरी के एक और सदस्य तथा प्रसिद्ध कथाकार अखिलेश भी गौरव को ‘प्रतिभाशाली कथाकार’ मानते हैं. वरिष्ठ कवयित्री अनामिका, जिन्होंने बहुत-से और लेखकों की तरह ‘छिनाल प्रकरण’ के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, वर्धा से निकलने वाली पत्रिका ‘बहुवचन’ और भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ में अपनी रचनाएं भेजनी बंद कर दी, कहती हैं, 'गौरव के साथ यह गलत हुआ है. इस तरह की घटनाओं को अंजाम देना एक किस्म की कुंठा है. भारतीय ज्ञानपीठ में बैठे पदाधिकारियों की यह कुंठा बार-बार प्रकट हुई है. ये बूढ़े सुग्गे हैं. मैं नौजवान और तेजस्वी किस्म के लेखकों की ओर बहुत उम्मीद से देखती हूं. इस कीचड़ में छपाछप करने से बेहतर है कि मैं एक सुंदर भविष्य की उम्मीद करूं.' साथ ही 'स्त्रीकाल’ नामक पत्रिका के संपादक संजीव चंदन भारतीय ज्ञानपीठ के अश्लीलता के मानदंडों पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं, ‘क्या नया ज्ञानोदय में लेखिकाओं को छिनाल कहलवाना अश्लील नहीं है? पत्रिका में महिलाओं के परिचय में उनके शरीर सौष्ठव के बारे में लिखना अश्लील नहीं है?’

नया ज्ञानोदय के जिस अंक की बात संजीव कर रहे हैं और जिसका जिक्र हम पहले कर चुके हैं, उसमें लेखक-लेखिकाओं के परिचय कुछ इस तरह से छापे गए थे –‘दुबली-पतली और सुंदर कथाकार/अविवाहित कथाकार,  हर मंगलवार को मंदिर और शनिवार को हंस का कार्यालय/ करीब आधा दर्जन प्रेम और इतनी ही कहानियां.’ ‘नया ज्ञानोदय’ के इस अंक के संपादन सहयोगी कुणाल सिंह थे. वे आज भी वहां सहायक संपादक हैं. ज्ञानपीठ से जुड़े एक युवा कहानीकार का कहना है कि इन परिचयों के लेखक कुणाल सिंह ही थे. ‘नया ज्ञानोदय’ के स्तर पर वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने तब कहा था, 'रवींद्र कालिया मेरे अग्रज रचनाकार हैं, लेकिन उन्होंने यह कहने को बाध्य कर दिया है. लुंपनिज्म और सेंसेशनेलिज्म को साहित्यिक पत्रकारिता का एक मूल्य बना देने से आनेवाले समय में किसी गंभीर विचार विमर्श के लिए कोई गुंजाइश नहीं होगी. सिर्फ सनसनियां, आक्रामकता होगी, उचक्कापन होगा, उजड्डता होगी. और संपादक जैसा चाहेगा, वैसा होगा.'

अगस्त, 2010 में ‘नया ज्ञानोदय’ में छपे वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय के साक्षात्कार के बारे में विस्तार से बात करें तो उसमें राय ने कहा था, ‘लेखिकाओं में होड़ लगी है, यह साबित करने की कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है.’ उन्होंने लेखिकाओं के लिए ‘निम्फोमेनियेक कुतिया’ जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया था. तब भारतीय ज्ञानपीठ के कार्यालय से लेकर शास्त्री भवन, दिल्ली तक लेखक और पत्रकार सड़क पर उतरे थे. उस समय साहित्यकारों ने राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील और मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से भी मुलाकात की थी और वीएन राय और रवीन्द्र कालिया को उनके पदों से हटाने की मांग की थी. वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद्य, गिरिराज किशोर और प्रभात रंजन ने तब विरोधस्वरूप अपनी किताबें ज्ञानपीठ से वापस ले ली थीं. वर्धा के एक न्यायालय ने कालिया, राय आदि को महिलाओं के अपमान के लिए नोटिस भी जारी किया था.

जब यह सब चल रहा था उस समय राय भारतीय ज्ञानपीठ की एक चयन समिति, जो प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए कृतियों का चयन करती है,  के सदस्य भी थे. लेखकों के भारी विरोध की वजह से भारतीय ज्ञानपीठ ने राय को अपनी चयन समिति से बाहर का रास्ता तो दिखाया, लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ. जानकार बताते हैं कि यह एक-दूसरे की पीठ खुजाने जैसा मामला था. आरटीआई कार्यकर्ता पीके शाही के मुताबिक कुलपति राय ने हिंदी विश्वविद्यालय के कार्यालय के लिए दिल्ली में ज्ञानपीठ के एक ट्रस्टी का मकान डेढ़ लाख रुपये प्रति महीना के महंगे किराये पर लिया था. बाद में ज्ञानपीठ से बाहर किए जाने पर राय ने कार्यालय किसी दूसरी जगह पर मात्र 40,000 रुपये महीने के किराये पर ले लिया. उधर ज्ञानपीठ ने राय को अपनी चयन समिति का सदस्य बना दिया था. कुलपति बनने के बाद राय ने रवींद्र कालिया की पत्नी को विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पत्रिका 'हिंदी' का संपादक बना दिया था. इसके एवज में रवींद्र कालिया ने राय का साक्षात्कार छापा और इस मामले में बचाव भी किया.

संजीव चंदन एक-दूसरे को लाभान्वित करने के इस खेल का आधार वीएन राय और रवीन्द्र कालिया की पुराने दिनों की दोस्ती को बताते हैं. संजीव इस व्यक्तिगत विडंबना की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं, ‘राय-कालिया की इस दोस्ती का जिक्र ममता कालिया की पुस्तक ‘कितने शहरों में कितनी बार’ में भी है. नया ज्ञानोदय के विवादास्पद साक्षात्कार में इसकी पैरोडी पेश करते हुए राय एक प्रतिष्ठित लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’ रखने की नसीहत देते हैं.’

ज्ञान का अपमान और ‘मैं जीवन भर तुमसे बदला लूंगा’

लेखकों और लेखिकाओं के पत्रिका द्वारा किए गए सामूहिक अपमानों के बीच में ज्ञानपीठ के पदाधिकारियों द्वारा अपने पद का फायदा उठाकर किए गए अनगिनत व्यक्तिगत अपमान भी हैं, जिनमें से ज्यादातर कभी सामने नहीं आते. गौरव सोलंकी भी अपने पत्र में ज्ञानपीठ के ट्रस्टी आलोक जैन द्वारा किए गए अपमान और दी गई धमकियों का जिक्र करते हैं. इसी सिलसिले में जब जनसत्ता के संवाददाता राकेश तिवारी ने आलोक जैन को उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए फोन किया तो उन्होंने गौरव सोलंकी के लिए कई बार ‘साले’ शब्द का प्रयोग किया. जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के मुताबिक आलोक जैन इससे पहले भी वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राजकिशोर के एक लेख पर कुपित होकर उन्हें गोली मार देने की धमकी दे चुके हैं. तहलका ने जब गौरव प्रकरण के मसले पर आलोक जैन को फोन किया तब कुछ पूछने से पहले ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि 'इस मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है और इस बारे में ज्ञानपीठ के अधिकारियों से बात कीजिए.' युवा कहानीकार श्रीकांत दुबे, जिनका कहानी-संग्रह ‘पूर्वज’ कुछ महीने पहले ही ज्ञानपीठ से छपा है, वे भी ज्ञानपीठ के ‘अतार्किक, ढीले-ढाले और गैरजिम्मेदाराना रवैये’ की बात करते हैं और कहते हैं, 'जब अपने इस अनुभव को मैंने फेसबुक पर लिखा, तो अनेक तरीकों से मुझे भी चेताया गया कि मैं गलती कर रहा हूं.' कई लेखक अपने अनुभव बताते हैं कि कैसे उनकी रचनाओं को महीनों-सालों तक ज्ञानपीठ ने लटकाए रखा और जब उन्होंने अपनी रचनाओं की स्थिति जानने की कोशिश की तो या तो बात ही नहीं की गई या बुरी तरह अपमानित किया गया. इन उदाहरणों को देखा जाए तो पदों का यह अहंकार ज्ञानपीठ के हर स्तर पर मौजूद दिखता है.

हिंदी के कई लेखक ‘नया ज्ञानोदय’ के सहायक संपादक कुणाल सिंह के हाथों भी अपमानित हो चुके हैं. लेकिन वे ऐसे व्यवहार और उसकी लगातार शिकायतों के बाद भी वहां कैसे बने रहे? यह पूछने पर ‘छिनाल प्रकरण’ पर भारतीय ज्ञानपीठ के खिलाफ चले अभियान की अगुवाई करने वाले एक लेखक कहते हैं, ‘रवींद्र कालिया ने अपने फेसबुक अकाउंट में ‘गतिविधियां और रुचि’ वाले विकल्प के आगे सिर्फ कुणाल सिंह का नाम लिखा है. इसी से आप कालिया जी के कुणाल के प्रति व्यक्तिगत स्नेह का अनुमान लगा सकते हैं.’

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता से जुड़े कई कर्मचारी बताते हैं कि कुणाल वहां के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह के साथ भी बेहद अपमानजनक व्यवहार कर चुके हैं. उसके बाद भाषा परिषद की सचिव कुसुम खेमानी ने एक भी साहित्यकार की अनुशंसा के बिना कुणाल को भारतीय भाषा परिषद का युवा पुरस्कार दिया. कर्मचारी बताते हैं कि विजय बहादुर सिंह इस समेत संस्था की कई अनीतियों का विरोध कर रहे थे और इस कारण उन्हें अनुबंध की अवधि पूरी होने से पहले ही पद छोड़ना पड़ा.
कथाकार दुष्यंत भी रवीन्द्र कालिया को लिखा एक पत्र दिखाते हैं जिसमें उन्होंने लिखा है कि अपनी कहानी की स्थिति पूछने पर ही कुणाल ने उनसे अपमानजनक व्यवहार किया. एक युवा लेखिका ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर तहलका को बताया कि कैसे ‘नया ज्ञानोदय’ में उनकी कहानी छापने की बार-बार घोषणा करने के बावजूद भी कई महीनों तक उनकी कहानी प्रकाशित नहीं की गई. इसकी वजह थी कि इस बीच पत्रिका के सहायक संपादक कुणाल सिंह ने एक दिन फोन करके उनसे ‘प्रेम निवेदन’ किया और इस अप्रत्याशित प्रस्ताव पर चौंकी लेखिका ने तुरंत इनकार कर दिया. इसके बाद कुणाल ने उनसे कहा, 'मैं जीवन भर तुमसे बदला लूंगा.' तात्कालिक रूप से यह बदला कहानी न छापने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि जब महीनों बाद लेखिका ने पत्र लिखकर अपनी कहानी वापस ले ली और बाद में वह दूसरी पत्रिका में छपने ही वाली थी, तब बिना उनकी अनुमति के ‘नया ज्ञानोदय’ में वह कहानी छाप दी गई.

जो भी हो, ‘ज्ञानपीठ’ द्वारा ’बदला लेने’ का यह सिलसिला न यहां शुरू हुआ, न खत्म. केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की साहित्यिक पत्रिका ‘गवेषणा’ के सहायक संपादक प्रकाश भी एक चौंका देने वाला अनुभव बताते हैं. प्रकाश ने ज्ञानपीठ के प्रबंध न्यासी साहू अखिलेश जैन को 30 जनवरी, 2009 को एक पत्र लिखकर कुणाल सिंह द्वारा की गई बदसलूकी की शिकायत की थी. प्रकाश ने इस पत्र की प्रति भारतीय ज्ञानपीठ के अन्य न्यासियों और निदेशक रवीन्द्र कालिया को भी भिजवाई थी.  पत्र में वे कहते हैं, ‘तुम हिंदी के दो कौड़ी के लेखकों में हो, और तुम्हारी किताब भी फाड़कर मैं डस्टबिन में डाल दूंगा.’ हालांकि कुणाल सिंह इन आरोपों का खंडन करते हुए कहते हैं, ‘मैं नया ज्ञानोदय में एक अन्य कर्मचारी की तरह हूं. किस हैसियत से मैं ऐसा करूंगा. अगर मैंने किसी को अपमानित किया तो वे आज तक कहां थे?’ ‘अंबेडकर संचयन’ के संपादक रामजी यादव और कहानीकार प्रभात रंजन से इतर ज्ञानपीठ में काम कर चुके या छप चुके कई लेखक कुणाल के अहंकार भरे रवैये के बारे में बात करते हैं.

एक और बड़े बदले की कहानी महेन्द्र राजा जैन की है, लेकिन उनके मुताबिक उनसे बदला लिया निदेशक रवीन्द्र कालिया ने. महेन्द्र राजा जैन को भारतीय ज्ञानपीठ की ओर से तत्कालीन निदेशक प्रभाकर श्रोत्रिय ने 2005 में जैनेन्द्र रचनावली का इंडेक्स तैयार करने का कार्यभार दिया था. गौरतलब है कि बाद में श्रोत्रिय की जगह रवीन्द्र कालिया ने ले ली. लगभग पूरे हो चुके इस काम को बीच में ही कालिया ने बंद करा दिया. बहुत खतो-किताबत करने और अंततः ज्ञानपीठ को कानूनी नोटिस भिजवाने के बाद राजा जैन को इस काम का आधा-अधूरा पारिश्रमिक ही मिल सका.

राजा जैन के साथ भारतीय ज्ञानपीठ का दूसरा प्रसंग तो और भी बुरा रहा है. प्रकाशन के लिए वर्ष 2004 में ही स्वीकृत ‘विराम चिह्न : क्यों और कैसे’ की पांडुलिपि लगभग छह साल बाद उन्हें वापस लौटा दी गई. इस किताब के बारे में महेंद्र राजा जैन को 2 जून, 2008 को लिखे गए एक पत्र में रवींद्र कालिया लिखते हैं, ‘ज्ञानपीठ से अब तक कोई व्याकरण की पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है. प्रयोग के तौर पर प्रथम संस्करण की 300 प्रतियां प्रकाशित करेंगे. अगर पुस्तक बाजार में चल निकली तो उसका अगला संस्करण प्रकाशित किया जा सकता है.’ इस सीधी और अच्छी लगने वाली बात के बाद तीखा मोड़ लेकर यह कहानी एक साथ कई लेखकों की साझी कहानी हो जाती है.

अपनी किताब के प्रकाशन को लेकर जैन ने भारतीय ज्ञानपीठ के अधिकारियों को कुछ महीनों के दौरान कई पत्र लिखे. लेकिन उनके पत्रों का या तो जवाब नहीं दिए गए या फिर उन्हें गोलमोल जवाब दिए गए. यही सब गौरव के साथ हुआ. उनके मुताबिक, वे भी अपनी किताब वापस लेने का आखिरी पत्र लिखने से पहले रवीन्द्र कालिया और आलोक जैन को लगातार खत लिखते रहे थे, जिनके जवाब नहीं दिए गए.

खैर, राजा जैन के मामले में लगभग चार महीने बाद 9 मई, 2009 को रवींद्र कालिया ने उनसे मिलकर ‘विराम चिह्न  क्यों और कैसे’ की पांडुलिपि लौटा दी. जैन अपने साथ हुए इस दुर्व्यवहार की वजह कुछ इस तरह बताते हैं, ‘रवींद्र कालिया जब भारतीय भाषा परिषद की पत्रिका वागर्थ के संपादक थे तब उन्होंने लिखा था कि ‘इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की किसी साहित्यिक कृति का उल्लेख नहीं है. भारतीय भाषा परिषद ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की इस अनदेखी के प्रति एक आंदोलन शुरू किया है.’ मैंने इस गलती की ओर पत्र लिखकर उनका ध्यान दिलाया कि इनसाइक्लोपीडिया में लगभग 150 पन्नों में भारतीय भाषाओं के बारे में छपा हुआ है. लेकिन कालिया जी ने वागर्थ के अगले अंक में फिर से वही सब दोबारा लिख डाला. तब मैंने पाठकों को सही जानकारी देने के लिए ‘समयांतर’ में  लेख लिखा. कालिया जी ने इसे गांठ बांध लिया और उसका बदला मुझसे ज्ञानपीठ में आकर निकाला.’ राजा जैन से जुड़े मसले पर तहलका ने रवींद्र कालिया का पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. गौरव सोलंकी ने भी तहलका में साहित्य के सामंत वाली कवर स्टोरी में मठाधीशी और गुटबाजी के खिलाफ एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘बल्ब बड़ा या सूरज’. इस कवर स्टोरी में रवींद्र कालिया को भी साहित्य के एक सत्ताकेंद्र के रूप में दिखाया गया था.

तो क्या इस लेख का छपना ही गौरव के साथ जो कुछ हुआ उसकी वजह है. 'यह लेख भी एक वजह हो सकती है क्योंकि आलोक जैन और रवीन्द्र कालिया ने कहा भी कि मेरे एटीट्यूड और बेबाकी से उन्हें प्रॉब्लम है. वह लेख अगस्त, 2011 में छपा था. उन्होंने मेरे साथ सब उसके बाद ही किया. मैं तो खुद महीनों से असल वजह जानना चाहता हूं.' गौरव कहते हैं.

ये घटनाएं भले ही प्रकाश, महेन्द्र राजा जैन, गौरव सोलंकी और कई दूसरे लेखकों के साथ घटी हों, लेकिन हिन्दी साहित्य की एक परेशान करने वाली तस्वीर तो बना ही जाती हैं. शायद इसीलिए वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा कहती हैं, 'ज्ञानपीठ के व्यवसाय में भले ही इजाफा हुआ होगा, लेकिन सच तो यह है कि भारतीय ज्ञानपीठ ने अपना गौरव  खोया है, उसके मूल्यों में गिरावट आई है.'
गौरव सोलंकी पर भी पहले रवींद्र कालिया का साथ देने और अब व्यक्तिगत मनमुटाव के चलते पुरस्कार लौटाने के आरोप लग रहे हैं. इसके जवाब में गौरव कहते हैं, 'अगर किसी पत्रिका में कुछ कहानियां छपना दोस्ती है तो इस देश की दर्जन भर पत्रिकाएं और अखबार मेरे दोस्त हैं. मेरा इससे पहले का अनुभव ठीक ही था.  आप इसे व्यक्तिगत कैसे कह सकते हैं? गांधी जी से किसी भी कीमत पर अपनी तुलना नहीं कर रहा हूं लेकिन उन्हें जब काला कहकर अंग्रेजों ने ट्रेन से फेंका तभी उनकी लड़ाई शुरू हुई.'

यह पूछने पर कि अब वे चाहते क्या हैं, गौरव आगे कहते हैं, 'मैं कुछ नहीं चाहता, न कोई ईनाम, न किताब छपवाना, न ये कि वे मुझसे माफी मांगें. बस ये हो कि हिंदी के लेखक ऐसे भ्रष्ट और पूर्वाग्रही सिस्टम से आजाद हों किसी तरह. ये संस्थाएं शायद अपना चरित्र न बदलें लेकिन हमें इनका बहिष्कार करना होगा. और कोई भले ही न करे, लेकिन मैंने तय किया है कि जितना बन पड़ेगा, नया रास्ता खोजूंगा। भले ही सब लिखा हुआ हमेशा के लिए मुझे अपने कमरे में रखना पड़े.'

गौरव सोलंकी प्रकरण का हिंदी साहित्य की दशा पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन युवा कवि और साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतिलिपि’ के संपादक गिरिराज किराड़ू का यह निष्कर्ष ज्यादा उम्मीद नहीं जगाता- 'गौरव प्रकरण ने ज्ञानपीठ  को ही नहीं, हम युवा हिंदी लेखकों को भी एक्सपोज कर दिया है. सचमुच, जॉर्ज बुश से ज्यादा मुश्किल है, अपने बॉस का विरोध करना.' 

तहलका में प्रकाशित स्‍वतंत्र मिश्र की रिपोर्ट.

पत्रकारिता दिवस पर अमरेश मिश्र ने कई पत्रकारों को अपमानित किया

इसे विडंम्बना ही नहीं तो और क्या कहेंगे कि एक ओर जहां 30 मई को समूचे देश में पत्रकारों और इनके विभिन्न संगठनों द्वारा जहां हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाए जाने के साथ इस दिवस की उपयोगिता और पत्रकारों की सार्थकता आदि पर बढ़-चढ़ कर विचार प्रकट किए जा रहे थे। वहीं मीरजापुर जिले में, जिसका पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अहम स्थान माना जाता है, में भी विभिन्न पत्रकार संगठनों द्वारा इस दिवस को मनाए जाने के साथ एकजुटता और सम्मान, सुरक्षा की बात की जा रही थी तो दूसरी तरफ मीरजापुर के ही प्रेस क्लब के कार्यक्रम में कई पत्रकारों को अपने ही आयोजक पत्रकार द्वारा अपमानित होना पड़ा। जिसकी पीड़ा को अपमानित पत्रकार न कह पा रहे हैं और न ही सुना पा रहे हैं।

हुआ यूं कि प्रेस क्लब मीरजापुर के तत्वाधान में नगर के लालडिग्गी स्थित लायंस स्कूल में 30 मई को रात्रि में कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें भोजन की भी व्यवस्था की गई थी। इसके लिए बाकायदा सभी पत्रकारों को आमंत्रित तो किया ही गया था, इस पेशे से दूर के लोगों को भी बुलाया गया था। इस कार्यक्रम में द पायनियर दिल्ली के एसोसिएट एडिटर सिद्धार्थ मिश्र, गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार विनय मिश्र आदि और भी कई पत्रकारों को बुलाया गया था अथिति के रूप में। लिहाजा रात्रि में अखबार के कार्यालय बंद हो जाने के बाद पत्रकारों का जुटना शुरू हो गया था। कार्यक्रम के समापन पर कई लोगों को फाइल दिया गया। इसके बाद भोजन की बारी आयी तो बात बिगड़ उठी जब कार्यक्रम के स्‍वयंभू आयोजक बन बैठे अमरेश मिश्र, जो कि मीरजापुर जनपद से द पायनियर के पत्रकार हैं, ने इसे अपना निजी कार्यक्रम मान कर कुछ पत्रकारों और अखबार के कार्यालयों में काम करने वाले रिर्पोटरों के हाथ से न केवल भोजन की थाली झपट कर छीन ली बल्कि परिचय पूछने लगे कि तुम कौन हो और किसने बुलाया था?

बस फिर क्या था यह देखते ही कार्यक्रम आए हुए काफी लोग अपने को अपमानित और ठगा सा महसूस करते हुए न केवल खाना चाए बगैर वापस लौटने लगे, वरन कुछ लोगों ने तो हाथ में भोजन की थाली लेने के बाद भी थाली रखकर चलते बने। मजे की बात है कि इन्हीं अमरेश मिश्र द्वारा कुछ कलमकारों के हाथों से फाइल भी छिन ली गई। और ऐस लोगों को फाइल दिया गया जो उनको फंड देते हैं। ऐसे में यह कार्यकम पत्रकारों का दिवस न होकर उन्हें अपमानित करने का दिवस बन कर रह गया। बताते चले कि पत्रकारिता दिवस की आड़ में इस संगठन द्वारा न केवल लाखों की रकम बटोर ली गई थी, बल्कि सबकुछ अपने हाथ में लेकर अन्य पत्रकारों को इससे दूर रखा गया था, जिसकी चर्चा पहले से ही थी। बताते चले कि पत्रकारिता के नाम पर दूसरे कई काम किए जाने वाले इस पत्रकार को कई बार सार्वजनिक रूप से अपमानित भी होना पड़ा है।

पत्रकारों की पत्रकारिता दिवस अवसर पर हुई इस गत को लेकर जहां चर्चाओं का बाजार गर्म है वहीं अपमानित पत्रकारों के आंखों में खून के आंसू देखे जा रहे हैं। इस संदर्भ में जब अमरेश मिश्र से बात की गई तो उनका कहना था कि जो सदस्‍य नहीं थे उनको हमने नहीं बुलाया था। हमने सेमिनार के लिए बुलाया था खाने के लिए नहीं, इसके बाद भी ये लोग चले आए। भोजन केवल अतिथियों के लिए था। भोजन के लिए किसी को नहीं बुलाया गया था। कार्यक्रम के बाद गेट बंद कर दिया गया था। इसके बाद अगर किसी को परेशानी हुई है तो अलग बात है। किसी पत्रकार के हाथ से थाली नहीं छीना गया, ये सरासर गलत है।

अलीगढ़ : हॉकरों का हड़ताल जारी, अमर उजाला कार्यालय में दोनों पक्षों की मीटिंग

अलीगढ़ से सूचना है कि यहां पर अखबार वितरकों का हड़ताल तीसरे दिन भी जारी रहा. कोई अखबार नहीं बंट रहा है. हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण जैसे अखबारों के प्रसार विभाग के लोगों ने खुद स्टाल लगाना पड़ा. संभावना है कि आज कोई हल निकल आएगा. तीनों बड़े अखबारों के मैनेजरों की हॉकरों के साथ मीटिंग चल रही है. इस मीटिंग में ही निर्णय होगा कि हॉकरों का हड़ताल जारी रहेगा या खतम हो जाएगा.

बताया जा रहा है कि जब हिंदुस्तान अखबार अलीगढ़ में लांच हो रहा था तब प्रति अखबार हाकरों को कमीशन 75 पैसे मिलते थे. हिंदुस्तान ने लांचिंग के बाद कमीशन प्रति अखबार एक रुपये कर दिया. यह देख अन्य अखबारों ने भी कमीशन प्रति कापी एक रुपये कर दिया. अब सारे अखबारों ने मिलकर कमीशन को अचानक घटाकर 75 पैसे कर दिया है. बढ़ती महंगाई में इस तरह का छल किए जाने से अखबार वितरक नाराज हो गए और अखबार न बांटने की घोषणा कर दी. मजबूरी में प्रबंधन ने तीन दिन में खुद अखबार बेचने की कोशिश कर रहा है. पर अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है. 

हाकरों को मनोबल तोड़ने के लिए अखबार प्रबंधन अपने पत्रकारों व अन्य कर्मियों को सेंटर पर भेज रहा है ताकि पुलिस बल के सहयोग से हाकरों पर दबाव बनाया जा सके. कल रात सेंटरों पर पुलिस बुलवाकर हाकरों को धमकाया गया. अखबार प्रबंधक भी हड़ताल के चलते अखबार की बहुत कम कापियां प्रकाशित कर रहे हैं. आज भी सेंटरों पर तनाव की स्थिति बनी रही. बाद में तीनों अखबारों के मैनेजरों ने इस मामले को लेकर हॉकरों के साथ एक मीटिंग रखी है.

अमर उजाला कार्यालय में बारह बजे से बुलाई गई मीटिंग में हिंदुस्‍तान तथा दैनिक जागरण के सर्कुलेशन मैनेजर भी भाग ले रहे हैं. खबर दिए जाने तक हॉकरों के साथ मीटिंग चल रही थी. हॉकर अपना कमिशन पूर्व की तरह एक रुपये करने की मांग पर डंटे हुए हैं. सूत्रों का कहना है कि मैनेजर उन्‍हें अपनी बात समझाने की कोशिश कर रहे हैं. अब देखना है कि इस मीटिंग के बाद हड़ताल खतम हो जाती है या आगे भी जारी रहती है.

जागरण के बाद दैनिक भास्‍कर भी जुटा छंटनी की तैयारी में, दहशत

दैनिक जागरण ने छंटनी की जो रहा दिखाई है, उस राह पर अब दूसरे बड़े संस्‍थान भी चलने की तैयारी में हैं. खबर आ रही है कि जागरण के बाद अब दैनिक भास्‍कर भी छंटनी की तैयारी कर रहा है. इसके लिए लिस्‍ट बनाए जाने की सूचना आ रही है. सूत्रों का कहना है कि भास्‍कर प्रबंधन ने पहले सभी यूनिटों के पत्रकारों के लिए इंक्रीमेंट तैयार की थी, जिसे कुछ समय के लिए रोक दिया गया है. यह इंक्रीमेंट अब छंटनी के बाद जारी की जाएगी.

हालांकि सीधे बातचीत में प्रबंधन इस तरह की किसी भी संभावना से इनकार कर रहा है, परन्‍तु ऑफ द रिकार्ड वे इस बात को मान रहे हैं कि खराब परफारमेंस वाले कुछ लोग बाहर किए जा सकते हैं. यानी सीधे-सीधे छंटनी ना करके परफारर्मेंस का बहाना बनाकर बाहर किया जाएगा. सबसे ज्‍यादा दैनिक भास्‍कर, दिल्‍ली पर छंटनी की तलवार लटक रही है. यहां पर चार एनई हैं. सूत्रों का कहना है कि इनमें से कम से कम दो लोगों का तबादला किया जाएगा या फिर उन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखाया जाएगा. अन्‍य यूनिटों में भी पांच से दस फीसदी कर्मचारी बाहर किए जाने के संकेत मिल रहे हैं.

छंटनी की खबर आने के बाद दैनिक भास्‍कर के कर्मचारी दहशत में हैं. उनको डर है कि कहीं उनका नम्‍बर ना आ जाए. जिस तरह से जागरण ने छंटनी करके राह बनाई है, देखा देखी अब दूसरे अखबार भी इस राह पर चलने की तैयारी कर चुके हैं. संभावना है कि दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर के बाद कोई और संस्‍थान मंदी एवं अन्‍य परेशानियों का बहाना बनाकर कर्मचारियों को बाहर करना शुरू कर दे. अभी तक जागरण ने जितने लोगों को बेरोजगार किया है, उनके लिए ही बाजार में मुश्किलें हैं, नए छंटनी के बाद से ये परेशानियां और बढ़ जाएंगी.

जागरण में बंपर छंटनी (30) : सुधांशु श्रीवास्‍तव के बाद निर्भय सक्‍सेना का भी तबादला

दैनिक जागरण, बरेली से खबर है कि लगातार सुर्खियों में बने इस यूनिट में एक और कर्मचारी का तबादला कर दिया गया है. वरिष्‍ठ पत्रकार निर्भय सक्‍सेना को प्रबंधन ने जमशेदपुर भेज दिया गया है. उनको तबादला आदेश रजिस्‍टर्ड डाक से भेजा गया है. निर्भय बरेली के उन पांच पत्रकारों में शामिल थे, जिनसे पहले इस्‍तीफे मांग गए तथा इनकार करने पर कार्यालय में आने पर रोक लगा दी गई थी. इन लोगों के लेबर कोर्ट जाने के बाद प्रबंधन ने तबादला नीति अपना लिया है.

इसके पहले प्रबंधन ने सुधांशु श्रीवास्‍तव का तबादला रांची के लिए कर दिया था. समझा जा रहा है कि शेष बचे तीन लोगों का भी तबादला प्रबंधन दूसरे यूनिट करने वाला है. मामला लेबर कोर्ट में जाने के बाद प्रबंधन ने यू टर्न लेते हुए इन लोगों से इस्‍तीफा मांगे जाने तथा कार्यालय में न घुसने देने की बात से इनकार कर दिया था. इसके बाद ही प्रबंधन ने इन लोगों का तबादला करने की रणनीति अपनाई है.

दूसरी तरफ यह खबर भी है कि मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की मांग को लेकर चल रही लड़ाई में दैनिक जागरण प्रबंधन की छह जून को लेबर कोर्ट में पेशी है. बीएलसी ने दैनिक जागरण प्रबंधन को छह जून को उपस्थित रहने का आदेश दिया है तथा पूछा है कि अब तक इन लोगों ने क्‍या कार्रवाई की है. उल्‍लेखनीय है कि मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने की मांग को लेकर रुहेलखंड मीडिया वर्कर एसोसिएशन लेबर कोर्ट में जागरण प्रबंधन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है.


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जागरण में बंपर छंटनी (29) : मुजफ्फरपुर में कई लोग बाहर किए गए

जागरण में चल रहे छंटनी के क्रम में मुजफ्फरपुर से भी लगभग एक दर्जन लोगों को बाहर किए जाने की खबर है. इस छंटनी में एडिटोरियल और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को‍ शिकार बनाया गया है. इसके बाद से यूनिट में तनाव बना हुआ है. निकाले गए कर्मचारी प्रबंधन के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. जिन लोगों को बाहर किया गया है उनमें संजय झा, राजीव रंजन, ओम प्रकाश, मधुर मिश्रा, अजय सिन्‍हा के नाम शामिल हैं.

चार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को भी छंटनी का शिकार बना दिया गया है. इनमें नवल कुमार, रामानंद यादव, अरविंद कुमार और शंकर माझी के नाम शामिल हैं. प्रोडक्‍शन एवं अन्‍य विभागों से भी तीन से चार लोगों को निकाला गया है. उनके नामों की जानकारी नहीं मिल पाई है. संभावना जताई जा रही है कि कुछ और लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखाया जा सकता है. हालांकि यह पुष्टि नहीं हो पाई है कि इन लोगों ने अभी अपना इस्‍तीफा प्रबंधन को सौंपा है या नहीं. यूनिट के अंदर दहशत का माहौल बना हुआ है. सबको डर है कि कहीं अगला नम्‍बर उनका ना आ जाए.   


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Fraud Nirmal Baba (91) : निर्मल बाबा के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी, विज्ञापन पर भी रोक के आदेश

सागर : अपने भ‍क्‍तों को परेशानियों से छुटकारा दिलाने के लिए अजीबो-गरीब उपाय बताने वाले निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा की खुद की परेशानी बढ़ती जा रही है. मध्य प्रदेश के सागर की बीना कोर्ट ने निर्मल बाबा के खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट जारी किया है. कोर्ट ने उन्हें 25 जून को पेश होने का आदेश दिया है. साथ ही कोर्ट ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव को आदेश दिया है कि वो सभी प्राइवेट चैनलों पर निर्मल बाबा के थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा के कार्यक्रमों पर फौरन रोक लगाएं. अगले आदेश तक देश के टीवी चैनल फिलहाल विज्ञापन की कृपा बरसाने वाले निर्मल बाबा के कार्यक्रम प्रसारित नहीं कर पाएंगे.

कृपा का कारोबार करने वाले निर्मल बाबा पर ही कृपा रुकती हुई दिखाई दे रही है. निर्मल बाबा के तथाकथित कृपा के कारोबार पर कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए कहा है कि अगर एक साधारण मामूली व्यक्ति गांव, गली, चौराहे पर भीड़ इकट्ठा करके और हाथ हिलाकर लोगों से समोसे-रसगुल्ले खाकर और काला पर्स रखकर सभी प्रकार की परेशानियों को दूर करने का दावा करता है और लोगों से पैसे भी मांगता है तो शायद उसे वही भीड़ अथवा एक साधारण सिपाही मारपीट कर थाने में बंद कर सकता है और उस पर कानूनी शिकंजा भली-भांती लागू कराया जा सकता है. किंतु उपरोक्त आरोपी बाबा टीवी चैनल के माध्यम से एयरकंडीशन हॉल में बैठकर करोड़ों-अरबों का व्यवसाय करते हुए लोगों को मूर्ख और बेवकूफ बनाकर परिवादी जैसे लोगों के साथ छल करके धोखाधड़ी कर रहा है. तो क्या ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध हमारा अपलब्ध कानून कोई कार्रवाई नहीं कर सकता. यदि ऐसा किया गया तो निश्चित ही देश के आम नागरिक एक दूसरे से सवाल करेंगे कि क्या कानून सिर्फ गरीब और कमजोर व्यक्ति के खिलाफ लागू होने के लिए तैयार किया गया है.

यह याचिका बीना शहर के प्रेम विश्वकर्मा द्वारा दायर किया गया है. निर्मल बाबा के खिलाफ दायर इस मामले की सुनवाई करते हुये प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी आर. के. देवलिया ने कहा है कि बाबा निर्मल 25 जून को अदालत में उपस्थिति हों और अपना पक्ष रखे. इसके अलावा अदालत ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को निर्मल बाबा की पिछले दिनों विभिन्न टीवी चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों के प्रसारण की रिकार्डिग भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. प्रेम विश्वकर्मा का आरोप है कि निर्मल बाबा के टीवी पर प्रसारित कार्यक्रमों में दिए गए निर्देश के अनुसार उसने काला पर्स खरीदा और उसमें अच्छे पैसे भी रखे. लेकिन इसका लाभ होने के बजाये उनका पर्स ही एक दिन नाली में गिर गया. जिससे प्रेम विश्वकर्मा को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा. अदालत ने प्रेम विश्वकर्मा की याचिका के आधार पर माना है कि ऐसे कार्यक्रमों से आवेदक को मानसिक पीड़ा होती है. इसे रोका जाना चाहिये. अदालत ने निर्मल बाबा के खिलाफ औषधियों, चमत्कारिक उपचार, आक्षेपनीय विज्ञापन अधिनियम 1954 की धारा 3, 4, 5 एवं 7 के तहत उक्त निर्देश दिए. निर्मल बाबा के खिलाफ वॉरंट जारी होने पर उनके वकील का कहना है कि ये कुछ लोगों या किसी संस्था की सोची समझी साजिश है जिसके तहत ये कदम उठाया गया है.


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नरेंद्र मोदी ने अपना नैतिक कद काफी छोटा कर लिया है

: छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता :  ‘पार्टी मेरी मां है, मैं पार्टी से बड़ा कैसे हो सकता हूं? गुजरात चुनाव में दुबारा जीत मिलने के बाद बड़े ही भावुक अंदाज़ में नरेंद्र मोदी का तब का यह बयान वास्तव में भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए जीत की खुशी के सोने पर सुहागे जैसा ही था. उस एक बयान से न केवल भाजपाइयों के मन में आशंका के बादल छंटे थे बल्कि खुद मोदी ने भी पार्टी में अपने कद को कई गुना बड़ा कर लिया था. लेकिन प्रभुता का अभिमान कहें या कुछ और, भाजपा की हालिया कार्यसमिति में संजय जोशी को इस्तीफा देने पर मजबूर कर भले मोदी खुद को विजेता समझ रहे हों लेकिन उन्होंने अपना नैतिक कद काफी छोटा कर लिया है.

सवाल बार-बार यही उठ रहे हैं कि आखिर कसूर क्या था संजय जोशी का ? घोषित तौर पर तो ऐसा कोई भी आरोप सामने नहीं आया है जिसके कारण जोशी को इतना अपमानित होना पड़े. समाज के नायकों की तो प्रकृति ही यह होनी चाहिए कि वह अपने निर्णयों में व्यक्तिगत राग-द्वेष को कभी प्रश्रय नहीं दें. अगर वे राजनीति में हो तो सबसे पहले देश, उसके बाद अपनी पार्टी के हित को सर्वोपरि रख कर ही किसी तरह का निर्णय करना वांछनीय होता है. सवाल यह है कि भाजपा कार्यकर्ताओं को कभी मोदी इस बात के लिए संतुष्ट कर पायेंगे कि आखिर कौन सा ऐसा संकट आ गया था जिसके कारण उन्हें ‘तू नहीं या मैं नहीं’ का फतवा देना पड गया.

निश्चित ही इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि नरेंद्र मोदी आज भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं. आगामी गुजरात चुनाव का निर्णय न केवल मोदी के खुद के कद के लिए, बल्कि संपूर्ण भाजपा के लिए लिटमस टेस्ट जैसा होगा. विचाधारा से लेकर पार्टी की शासन पद्धति, विकास को लेकर उनकी सोच आदि सभी चीज़ों का प्रयोग स्थल हो गया है गुजरात. यह भी निर्विवाद सत्य है कि वहां पार्टी को लगातार मिलती जा रही सफलता में सबसे बड़ा योगदान खुद मोदी का ही है. लेकिन इतनी उपलब्धि के कारण ही यह उचित है कि नदी खुद को किनारे से ऊंचा समझने लगे? भाजपा के लिए तो उत्तर प्रदेश के चुनावों में दो महीने तक मोदी का इंतज़ार किया जाना या पिछली कार्यसमिति में सारे मुद्दों पर केवल एक मुद्दे को भारी पड़ना कि मोदी बैठक में आयेंगे या नहीं, ये शर्मनाक ही था.

निश्चित ही लोकतंत्र की आत्मा इसी में सन्निहित है कि यहां कोई एक सबसे बड़ा नहीं होता. भाजपा की तो सबसे बड़ी ताकत (और कमजोरी भी कभी-कभार) यही है कि यहाँ कभी भी व्यक्ति या वंश के आधार पर निष्ठा तय नहीं होता है. आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि समूचे देश में (वामदल और जदयू को छोड़ कर) आज भाजपा के अलावा कोई भी दल ऐसा नहीं बचा जहां एक व्यक्ति या परिवार का वर्चस्व न हो. बस भाजपा इस मामले में ज़रूर अलग है. आज भी यहां दरी बिछाने वाला कार्यकर्ता कल को राष्ट्रीय अध्यक्ष तक बनने का सपना पाल सकता है या वार्ड पार्षद से शुरू कर कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन प्रधानमंत्री बनने का मंसूबा भी संजो सकता है. देखा जाय तो यही ‘लोकतंत्र’ का सौंदर्य भी है.

नरेंद्र मोदी की कई उपलब्धियों के बावजूद यह कहना होगा कि देश में ऐसी सफलता हासिल करने वाले वे कोई इकलौते व्यक्ति नहीं हैं. भाजपा की ही अगर बात करें तब भी पार्टी के अन्य मुख्यमंत्री भी अपनी-अपनी सीमा में रह कर अच्छा काम कर रहे हैं. निश्चित ही गुजरात आज विकास और सुशासन के लिए जाना जाता है लेकिन उसी कार्यसमिति में एक अन्य भाजपा शासित प्रदेश छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का पीडीएस समेत अन्य अच्छे कार्यों के लिए अभिनन्दन होने का सन्देश भी साफ़ ही है. निश्चित ही राष्ट्रवाद की विचारधारा को मोदी रास आते हैं लेकिन ये भी गौर करना होगा कि नक्सल समस्या आज राष्ट्र के लिए मजहबी आतंक से बड़ा संकट है. खुद केन्द्र भी यह मान रहा है कि आंतरिक सुरक्षा को सबसे बड़ी चुनौती माओवाद से है. और इस संकट से दृढ़ता से निपटते हुए भी रमन सिंह का भले मानुष की अपनी छवि बना कर रखना महत्वपूर्ण बात है. कम से कम ऐसा संतुलन मोदी में तो नहीं दिखता. तो इस मुद्दे से भी बेहतर ढंग से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सम्मान की बात हो या फिर बेहतर कार्य निष्पादन के लिए मध्यप्रदेश का बार-बार संघ द्वारा पीठ थपथपाने की बात. भाजपा का सन्देश साफ़ है कि काम बेहतर मोदी ‘भी’ कर रहे हैं लेकिन मोदी ‘ही’ नहीं.

अगर बात केवल मुख्यमंत्री बने रहने की हो तो वास्तव में मोदी अपने प्रदेश में अजेय हो सकते हैं. हालांकि कार्यकर्ताओं में वहां भी पनप रहा आक्रोश गौर करने लायक है और इस आक्रोश को संजय जोशी के अपमान ने बढ़ाया ही है. पर प्रधानमंत्री पद के लिए तो इनकी राहें इतना आसान नहीं है. हाल के इन कुछ अड़ियल रवैये के कारण उन्होंने अपना रास्ता निश्चय ही और भी मुश्किल कर लिया है. अव्वल तो यह कि खुद पार्टी में ही उनकी वैसी स्वीकार्यता नहीं है जैसा कभी अटल-आडवानी का हुआ करता था. उसके बाद एनडीए के कई घटक को भी मोदी फूटी आंख नहीं सुहाते. भाजपा के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगी जदयू के नितीश कुमार के साथ इनके कटु संबंधों पर कोई मलहम लग पाया हो ऐसा देखने में नही आया है. अगर इन्होंने दक्षिण के कुछ दलों को साध भी लिया हो तो ऐसे संबंध हाल के दिनों में अन्य भाजपाई मुख्यंत्रियों ने भी बखूबी किया है भले ही उसका प्रचार उन्होंने इतना न किया हो.

अगर बात संख्या बल की बात हो तो कुल 15 सांसद अभी गुजरात से भाजपा के हैं. इन सभी का समर्थन मोदी के साथ हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. फिर अगले चुनाव के बाद भी इन सीटों को कायम रखना एक चुनौती ही है. जबकि इसके उलट मध्यप्रदेश से भाजपा के 16 सांसद या छत्तीसगढ़ से पार्टी के एकजुट 10 सांसद या फिर बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान आदि से आने वाले सदस्यों में कितने को मोदी स्वीकार्य होंगे यह कहा नही जा सकता. इसी तरह अगर संगठन की बात की जाय तो आज संजय जोशी को बाहर करा कर मोदी ने खुद की तूती भले बुलवा भी लिया हो लेकिन ये वक्त की नजाकत से ज्यादा कुछ नहीं है. ज़ाहिर है भाजपा संगठन कम से कम इतना तो मानता ही है कि सामने उपस्थित गुजरात चुनाव में मोदी अपरिहार्य होंगे. इसके अलावा पार्टी एक साथ ढेर सारे मोर्चे नहीं खोलना चाह रही होगी. अभी-अभी राजस्थान में वसुंधरा के विद्रोह की बात हो या फिर कर्नाटक में येदुरप्पा की इन सबसे जूझते हुए निश्चय ही भाजपा फिलहाल एक और संकट मोल लेना नहीं चाहती थी. खास कर इसलिए भी क्यूंकि खुद नितिन गडकरी के दुबारा अध्यक्ष बनने हेतु पार्टी के संविधान में संशोधन की ज़रूरत थी. तो ज़ाहिर है मोदी की जिद्द पर, आसान शिकार संजय जोशी का इस्तीफा ले लेना ही ठीक लगा. बहरहाल.

लोकतंत्र की आलोचना करने वाले समूह हमेशा हिटलर का उदाहरण देते हुए इस प्रणाली को गलत ठहराने का प्रयास करते रहे हैं. शायद ही यहाँ संयोग हो कि कांग्रेस ने मोदी की तुलना हिटलर के ही प्रचार प्रमुख गोयबल्स से किया है. लेकिन भाजपा को जानने वाले यह समझते हैं कि वहां संगठन ही एक ऐसी नैतिक सत्ता है जो जनादेश पाये किसी नेता को तानाशाह बनने से रोकता है. अभी तक के ढेर सारे उदाहरण इसी बात की गवाही देते हैं कि कम से कम भाजपा में कोई व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता चाहे उसे कैसा भी जनादेश मिला हो. बात चाहे अभूतपूर्व बहुमत के साथ सत्ता में आयी उमा भारती की हो या हिंदू ह्रदय सम्राट कहा चुके कल्याण सिंह की, गुजरात में ही शंकर सिंह बाघेला की हो या झारखंड में बाबूलाल मरांडी की. पार्टी लाइन से निकलने के बाद सभी अंततः बियाबान में जाने को मजबूर हुए थे. भाजपा के झोले में सैकड़ों सीट दिलाने वाली उमा भारती तो खुद की सीट तक नही बचा पायी थी. उमाश्री जैसा जनादेश तो मोदी को मिला भी नही है. कम से कम अभी तक का अनुभव तो यही कहता है कि भाजपा में किसी व्यक्ति का शरद पवार, लालू यादव, नीतिश कुमार आदि बन पाना तो संभव नही है. नरेंद्र मोदी को अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपना ‘मन’ अपने ‘कद’ से बड़ा रखना होगा, उस कद से बड़ा जिसे हालिया प्रकरण ने फिलहाल काफी छोटा कर दिया है.

लेखक पंकज झा भाजपा से जुड़े हुए हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

पंकज झा
पंकज झा

यूसुफ़ अंसारी ने की एक्शन पार्टी की स्थापना

वरिष्ठ पत्रकार से राजनैतिक विश्लेषक और राजनैतिक विश्लेषक से नेता बने यूसुफ़ अंसारी ने एक्शन पार्टी के नाम से एक नये राजनैतिक दल की स्थापना की है. डेढ़ दशक से भी ज्यादा वक्त तक पत्रकारिता में सक्रिय रहने के बाद यूसुफ़ अंसारी ने राजनैतिक में कदम रखे थे और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले पीस पार्टी का दामन थाम लिया था. पीस पार्टी में यूसुफ़ अंसारी को राष्ट्रीय महासचिव पद की ज़िम्मेदारी दी गई थी, लेकिन चुनाव के नतीजे आने के बाद यूसुफ़ अंसारी ने पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर अय्यूब पर परिवारवाद समेत कई आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था. यूसुफ़ अंसारी के साथ पीस पार्टी के कई लोगों ने पार्टी को अलविदा कह दिया था, जिनमें पार्टी के राष्ट्रीय सचिव शमीम अंसारी भी शामिल थे.

अब यूसुफ़ अंसारी ने एक्शन पार्टी के नाम से एक नये दल का गठन किया है, जिसकी पहली बैठक 2 जून को दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन इलाके के ग़ालिब ऐकेडमी सभागार में आयोजित की गई थी, जिसमें पार्टी के करीब 200 सदस्यों ने शिरकत की, बैठक में पीलीभीत, बरेली, सहारनपुर, बिजनौर, लखनऊ, मेरठ, ग़ाज़ियाबाद, मोदीनगर, हापुड़ के पार्टी सदस्य शरीक़ हुए. बैठक में तय किया गया कि पार्टी 2013 में दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी मौजूदगी दर्ज करायेगी और ज़्यादा से ज़्यादा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी, दिल्ली विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए 2014 के लोकसभा चुनावों का ट्रायल होगा, जिसके बाद 2014 में होने वाले आमचुनावों के लिए रणनीति तैयार की जाएगी. यूसुफ़ अंसारी का दावा है कि एक्शन पार्टी से वो बुद्धीजीवी वर्ग जुड़ा है जो देश की दशा और दिशा दोनों बदलने में अहम भूमिका अदा कर सकता है.

युसूफ अंसारी
युसूफ अंसारी

आकाशवाणी त्रिवेन्द्रम के बीजू मैथ्यू को प्रथम पुरस्कार की घोषणा पर हम सब उछल पड़े

: बारहवां अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल और चौथा अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फोरम समारोह : मई का महीना रेडियो से जुड़े विश्व के तमाम प्रसारण कर्मियों के लिए उत्सुकता और उम्मीद भरा वाला होने लगा है। कारण है कि पिछले एक दशक से मई के महीने में इरान की प्रसारण संस्था इस्लामिक रिपब्लिक आफ ईरान ब्राडकास्टिंग (IRIB), ईरान में एक अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल का आयोजन कर रही है। कुछ वर्षो पहले IRIB ने एशिया पैसिफिक ब्राडकास्टिंग यूनियन (ABU) के साथ मिलकर एक अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फोरम की शुरूआत भी की है। पिछले 16-17 मई को ईरान की राजधानी तेहरान से लगभग 400 किमी दूर, उत्तरी ईरान में कैस्पियन सागर के तट पर स्थित जिबाकेनार (Zibakenar) कस्बे में 12 वें अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल और चौथे अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फोरम का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। सौभाग्य से, मैं भी उपरोक्त कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ। मेरा चयन अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फोरम में एक वक्ता के रूप में हुआ था। मुझे वहां सम्पन्न हुये सेमिनार में एक पेपर पढ़ना था। पेपर का विषय था ‘‘वैश्वीकरण की चुनौतियाँ : रेडियो द्वारा प्रसारित होने वाले बोलियों के कार्यक्रमों पर इसका प्रभाव’’।

ईरान में दूसरी बार गया था। पहली बार ईरान 2009 की मई में गया था। उस वर्ष दसवें अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल में मेरा एक रेडियो कार्यक्रम प्रतियोगी वर्ग में चयनित हुआ था। दरअसल IRIB के इन समारोहों के दो पक्ष हैं। पहला पक्ष है कि रेडियो फेस्टिवल हेतु रेडियो ईरान, पूरे विश्व से विभिन्न संवर्गो में रेडियो कार्यक्रम आमंत्रित करता है। यह संवर्ग होते है रेडियो फीचर, रेडियो नाटक, रेडियो उदघोषणायें, क्रियेटिव प्रोग्राम आदि। इन रेडियो कार्यक्रमों का दो स्तर पर चयन होता है। पहले स्तर पर ईरानी रेडियो विशेषज्ञों का पैनल, विश्व भर से आमंत्रित कार्यक्रमों में से स्तरीय कार्यक्रमों का चयन करते हैं। इन कार्यक्रमों के प्रत्येक संवर्ग में प्रतियोगिता हेतु नामांकित किया जाता है। दूसरे स्तर पर विशेषज्ञों का एक अन्तर्राष्ट्रीय पैनल इन नामांकित कार्यक्रमों में से प्रथम और द्वितीय पुरस्कार हेतु कार्यक्रमों का निर्णय देते हैं। जिन रेडियो प्रस्तुतकर्ताओं के कार्यक्रम ईरानी ज्यूरी द्वारा प्रतियोगिता हेतु नामांकित किये जाते हैं, उन्हें रेडियो ईरान अपने यहां भाग लेने हेतु बुलाता है। प्रथम और द्वितीय पुरस्कार प्राप्त कर्ता को क्रमश: 1500 और 1000 अमेरिकन डालर के पुरस्कारों से भी नवाजा जाता है। वर्ष 2009 में मेरी प्रविष्टि ‘‘सपने बन्द आँखों के’’ जो कि नेत्र हीन व्यक्तियों द्वारा देखे जाने वाले सपनों और उस प्रक्रिया पर आधारित रेडियो कार्यक्रम था, को फाइनल में पहुंचने का अवसर मिला था। इस अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल का दूसरा पक्ष ‘रेडियो फोरम’ नाम का कार्यक्रम है। रेडियो फोरम का मुख्य उद्देश्य, दुनिया भर में रेडियो के भीतर हो रहे परिवर्तनों को रेखांकित करना होता है। साथ ही पब्लिक ब्राडकास्टिंग के सामने आ रही चुनौतियों और रेडियो का भविष्य जैसे मुद्दे भी फोरम की बैठकों में प्रभावी तरीके से उठाये जाते हैं।

ईरान रेडियो द्वारा आयोजित यह फेस्टिवल इस मायने में खास है कि सम्पूर्ण एशिया महाद्वीप में यह एकमात्र ऐसा समारोह है जो पिछले एक दशक से नियमित रूप से आयोजित किया जा रहा है और जिसमें पूरे विश्व के रेडियो प्रस्तुतकर्ताओं को खुले आमंत्रण के द्वारा भाग लेने के लिए निमंत्रित किया जाता है। इस वर्ष भी इस फेस्टिवल में जापान, कोरिया, आस्ट्रेलिया, इन्डोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, नेपाल, ग्रेट ब्रिटेन, पोलैन्ड, यूक्रेन, स्लोवाकिया, यमन, लेबनान, ट्यूनीशिया जैसे न जाने कितने देशों के प्रतिनिधि शामिल हुये। इन प्रतिनिधियों में बहुत से ऐसे थे जिनके रेडियो कार्यक्रम प्रतियोगी वर्ग में नामांकित हुये थे और जिन्हें बाद में प्रथम या द्वितीय स्थान भी प्राप्त हुआ। भारतीय दल में हम सात लोग थे और हमारा दल विश्व के अन्य देशों के मुकाबले सबसे बड़ा दल था।

हमारे दल में हमारे चार सहयोगी प्रतियोगी वर्ग में थे। अर्थात उनकी प्रविष्टियों को फाइनल में पहुंचने का अवसर प्राप्त हुआ था। इनमें दो आकाशवाणी जालंधर के हमारे सहयोगी थे सर्व श्री नवदीप सिंह और सोहन लाल और दो आकाशवाणी त्रिवेन्द्रम के सर्व श्री बीजू मैथ्यू एवं श्रीमती लीलिमा। एक साथी आकाशवाणी चेन्नई से थे श्री सुदर्शन रामास्वामी जिन्हें मेरी तरह ही फोरम में अपना पेपर प्रस्तुत करना था। एक अन्य हमारे वरिष्ठ सहयोगी थे श्री ओ.आर. नियाजी जो अब आकाशवाणी से सेवानिवृत्त हो चुके है और जिन्हें रेडियो कार्यक्रमों के पुरस्कारों के निर्णायक के रूप में रेडियो ईरान ने आमंत्रित किया था। 17 मई की रात्रि, जब जिबाकेनार के आलीशान प्रेक्षागार में अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा हो रही थी तो हम सब की खुशी का ठिकाना न रहा, जब हमारे साथी और आकाशवाणी त्रिवेन्द्रम के कार्यक्रम अधिशासी बीजू मैथ्यू को लघु रेडियो फीचर 'अवधि 5 मिनट' हेतु प्रथम पुरस्कार की घोषणा हुयी।

यद्यपि हमारे साथ गये अन्य तीन कार्यक्रम अधिकारियों को कोई पुरस्कार न मिलने का दुख भी हम सबको था। अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल में पिछले कई वर्षों से आकाशवाणी के कार्यक्रम लगातार पुरस्कृत होते रहे हैं। हम लोगों को खुशी थी कि यह परम्परा इस वर्ष भी बरकरार रही। अगर देखा जाये तो मीडिया की दुनिया में रेडियो सबसे लोकतांत्रिक माध्यम है। यह सीधे जन-जन से जुड़ा होता है और अन्य माध्यमों के मुकाबले, रेडियो में आम जनता की भागीदारी सबसे अधिक होती है। ईरान में प्रतिवर्ष सम्पन्न होने वाला अन्तर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल, दुनिया भर में रेडियो की वर्तमान स्थिति को बड़े ही खूबसूरत तरीके से एक मंच पर प्रस्तुत करता है। इससे अगर यह पता चलता है कि कोरिया जैसे देश में विजुअल रेडियो बहुत लोकप्रिय है 'विजुअल रेडियो अर्थात ऐसा रेडियो सेट जिसकी स्क्रीन छोटे टेलिविजन सेट की तरह होती है और जिसपर आप स्टूडियो में चल रही गतिविधियों को बखूबी देख भी सकते है' तो यह भी पता चलता है कि कैसे ब्रिटेन और अन्य विकसित देशों में आज कम्युनिटी रेडियो बड़ी संख्या में अस्तित्व में हैं और कैसे विविध किस्म के रेडियो कार्यक्रम अलग-अलग कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों के मार्फत प्रसारित होते हैं।

इस्लामिक रिपब्लिक आफ ईरान ब्राडकास्टिंग द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित किये जाने वाला रेडियो फेस्टिवल न सिर्फ दुनिया भर के रेडियो कर्मियों के लिए उत्सुकता का विषय होता है, बल्कि खुद ईरान के रेडियो कर्मियों को वर्ष भर इस फेस्टिवल का इंतजार रहता है। कारण, इस फेस्टिवल का एक बड़ा हिस्सा ईरान रेडियो के विभिन्न केंद्रों द्वारा निर्मित किये गये रेडियो कार्यक्रमों को पुरस्कृत करने के लिए तय होता है। जैसे ही ईरान रेडियो के लिए पुरस्कारों की घोषणा होती हैं, पूरा हाल तालियों और सीटियों से भर जाता है। हाल में बैठे ईरान रेडियो के सदस्य, अपने पुरस्कृत प्रोड्यूसर को सिर आँखों पर बैठा लेते हैं। ईरान में रेडियो बहुत लोक प्रिय है। इसका एक कारण सम्भवत: यह है कि ईरान में रेडियो और टेलिविजन पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में हैं और वहां के रेडियो को प्राईवेट चैनलों की प्रतिद्वंद्विता का सामना नहीं करना पड़ता। दूसरा कारण यह भी है कि ईरान सरकार रेडियो के लिए एक बड़ा बजट आवंटित करती है और रेडियो, ईरान सरकार की प्राथमिकताओं में है। हमारे देश के उलट, ईरान में पब्लिक ब्राडकास्टिंग को जितनी इज्जत और प्राथमिकता प्राप्त है, वह अनुकरणीय है। चाहे अन्य किसी क्षेत्र में न हो, लेकिन रेडियो और रेडियो से जुड़े आयोजन को लेकर ईरान आज पूरे एशिया में नई रौशनी का प्रसार कर रहा है, इसके लिए ईरान सरकार और IRIB निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं।    

प्रतुल जोशी की रिपोर्ट.

प्रतुल जोशी
प्रतुल जोशी

जौनपुर पत्रकार संघ ने कांग्रेस के दागी नेता कृपाशंकर सिंह को किया सम्मानित

जौनपुर पत्रकार संघ के अध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह ने 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में कांग्रेस के दागी नेता एवं महाराष्ट्र के पूर्व ग्रह राज्य मन्त्री कृपा शंकर सिंह को विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाकर सम्मानित किया। इन नेता जी पर आय से अधिक सम्पत्ति की सीबीआई जाँच चल रही है और वे स्वयं सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जमानत पर चल रहे हैं। साथ ही इनकी सम्पत्तियों की कुर्की के भी आदेश हो चुके हैं। जौनपुर पत्रकार संघ के अध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह की इस कार्यवाही से पत्रकार स्वयं को मान रहे अपमानित और पत्रकारिता हुई कलुषित। ओम प्रकाश सिंह दैनिक जागरण के जौनपुर संसकरण के ब्यूरो प्रमुख भी हैं। इनकी इस हरकत से जौनपुर के पत्रकार हुये मर्माहत।

जिस भवन (पत्रकार संघ भवन) में यह सम्मान समारोह हुया, उसे इन्हीं अध्यक्ष महोदय ने जौनपुर कलक्ट्रेट परिसर में जबरन कब्जा कर सरकारी समपत्ति को बताया हुया है पत्रकार संघ भवन.  इस बाबत जौनपुर के जिलाधिकारी सूचना के अधिकार के अंतर्गत पूछे जाने पर कर चुके हैं कि वह भवन पत्रकार संघ भवन नहीं, वरन सार्वजनिक सामुदायिक केन्द्र, वाचनालय एवं पुस्तकालय है। इस सरकारी भवन के प्रयोग के लिये जौनपुर पत्रकार संघ न तो कोई शुल्क ही राज्य सरकार को देता हैं और न ही इसका कब्जा सरकार को लौटाया गया है। इसी भवन में दागी नेता कृपा शंकर सिंह ने सम्मान कार्यक्रम के दौरान एयर कण्डीशनर लगवाने की घोषणा की। पूरे घटनाक्रम पर जिला प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी थामे हुये हैं चुप्पी जिससे कि दागी राजनेता के गुर्गे कुछ अवांछित पत्रकारों के साथ मिलकर अवैधानिक कार्यों को खुलेआम अंजाम देते घूम रहे हैं।

इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के राष्ट्रीय सचिव हेमन्त तिवारी उस दिन जौनपुर में मौजूद थे। श्रमजीवी पत्रकार यूनियन भी उस दिन एक अलग कार्यक्रम कर हिन्दी पत्रकारित दिवस मना रही थी। हेमन्त तिवारी अपनी यूनियन के कार्यक्रम में नहीं गये। पर उन्होंने अनैतिक कार्य करने वाली और दागी नेताओं को सम्मानित करने वाले जौनपुर पत्रकार संघ के कार्यक्रम में शिरकत करना ज्यादा उचित समझा जबकि उनकी अपनी यूनियन के साथी पत्रकार उनके आने का आसरा देखते रहे। नीचे दो अटैचमेंट है, पहला है, समाचार पत्रों में प्रकाशित हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर दागी नेता कृपा शंकर सिंह को सम्मानित करने की खबर। दूसरा है जिलाधिकारी जौनपुर का दिनांक 26-12-2006 पत्र जिसमें इस भवन को सामुदायिक भवन बताया है तथा उसमें पुस्तकालय और वाचनालय संचालित होने की बात कहीं है।

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एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

”रणवीर सेना के गुंडों के साथ खड़ी है बिहार की नीतीश सरकार”

Anand Pradhan : पटना की सड़कों पर रणवीर सेना के गुंडों-लफंगों ने जिस तरह से सरकारी संरक्षण में खुलेआम लूटपाट, मारपीट, तोड़फोड़, आगजनी, महिलाओं/लड़कियों के साथ छेड़खानी, आमलोगों और मीडियाकर्मियों पर हमला किया है और अराजकता और उपद्रव के बीच दहशत का माहौल पैदा कर दिया है, इससे नीतिश कुमार के सुशासन की पोल खुल गई है…इस सरकार ने सामंती-अपराधी गुंडों के आगे समर्पण कर दिया है…कल आरा और आज पटना में जो कुछ हुआ है, उससे बिहार में ‘सुशासन’ की सच्चाई सामने आ गई है…लगता है कि बिहार में कानून का राज खत्म हो गया है…बिहार के लिए काला दिन है यह…लेकिन सवाल यह है कि इन सामंती गुंडों को ताकत कहाँ से मिल रही है?

इन सामंती गुंडों-अपराधियों को ताकत मिल रही है, जे.डी-यू, भाजपा, राजद और कांग्रेस जैसी पार्टियों और उनके नेताओं से जो इन अपराधियों के आगे घिघिया रहे हैं…साफ़ है कि बिहार के गरीब-गुरबों को अपने हक-हुकूक और अपनी हिफाजत करने लिए खुद खड़ा होना होगा…क्योंकि नीतिश की सरकार तो इन गुंडों के साथ खड़ी है… लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार में इतिहास के पहिये को पीछे लौटा ले जाने की यह उन्मत्त कोशिश कामयाब हो पाएगी? दिया बुझने से पहले भभकता है…बिहार में भी सामंती ताकतें बुझने से पहले भभक रही हैं…उनका हश्र तय है…उनकी जगह सिर्फ इतिहास के कूड़ेदान में है…बिहार इसका अपवाद नहीं है…

        Yogesh Singh नितीश को शासन को कोई भी नाम दे दे चलेगा गुंडे ,उन्मादी उन्माद फैला रहे हैं ये भी माना पर हत्यारे को छुपा कर इतनी संज्ञा गढ़ देना ये समझ में नहीं आया ……
 
        Kanpur King isko gunda kahan galat hai. mai puri tarah ranbiir sena k sath hu usne jo bhi kiya bilkul thik kiya
 
        Kunal Dutt Feudals aur politicians ke beech mera Bihar pis raha hai..galti us zameen ki to nahi thi lekin bojh use hu uthana hoga apne itihas ke sharmnak adhyayon ka..Nitish ki to pol pehle hi khul gayi thi sir, media ne chupa rakha tha…aaj aagh itni lagi hai ki media ki kali chaadar bhi jal gayi..koi mere Patna/Bihar ko in dharti ke kalnkon se bachaiye..
   
        Prem Kumar Sir maaf kare aap is aag me ghee mat dale please please. Aap jaise tathakathit secularist aise kahenge to ho gaya bera gark
    
        Harsh Mishra bharat me loktantra to thi nahi na hi hai ,(police/prashahn,kanoon/court,leader/party,media sabhi to kamchor hai
     
        Kunal Dutt sir, yehi karan hai ki aaj bhi bihariyon ko apne upar prid enahi hain..bahar jakar apna parichay dene se katrate nhai,,pehchan chupaten hai..akhir jaatiwad ke bhoot se door bhagne ke unke liye wahe ek rasta bachta hai..
      
        Kunal Dutt ‎*pride nahin
       
        Harsh Mishra paisa do kuchh bhi chhap dega mrdia wala ,aapke gaon me criket to 1500 rs.do chhap dega,pooja karo 1000rs.do chhap dega
        
        Kanpur King baat jatiwaad ki nahi hai. baat ranbir srna ki hai aur ranbir sena ne kuch galat nahi kiya aur iswar ki kripa se vo apna kaam jari rakhege
         
        Kanpur King jai mata di
         
        Bhai Kumar yahi hai Bihar aur Bihar ki Samanti mansikta
         
        Devkumar Pukhraj आनंद जी ,जिस तरह भाकपा माले नामधारी उग्रवादियों की एकतरफा गुंडगर्दी के प्रतिक्रिया स्वरुप रणवीर सेना औऱ उसके प्रमुख ब्रह्मेश्वर सिंह पैदा हुए थे,ठीक उसी प्रकार एक इंसान की निर्ममता से हुई हत्या का ये प्रतिक्रिया मात्र है जो आज पटना और कल आरा में देखा गया। इसे सामंतो की गुंडई कहकर उग्रवादियों द्वारा चार दशक से की जा रही अनवरत हत्या औऱ आगजनी की घटनाओं को न्यायोचित मत ठहराइये। हम आपकी वैचारिक धरातल से वाकिफ हैं.
         
        Kanpur King ye haal kewal bihar ka nahi balki pure bharat ka hona chaiye aur iski jimmedar sirf kendra srkar hai
        
        Bhai Kumar is mansikta ko khatma kiye bina bihar ka kabhi vikas nahi ho sakta ha naye naye RAJA ayenge naye tariko se humen murkh banayenge aur jab unki asliyat pata chal jayegi hum kisi naye Raja ki talash me lag jayenge
         
        Shyam Krishna Gupta बथानी टोला नरसंहार में मरने वाले लोगों में अधिकतर भूमिं हीन गरीब परिवारों के लोग थे जिनमें महिलाओं और बच्चों कि संख्या ज्यादा थी .आज एक न्यूज चैनल पर उस नर संहार के पीड़ित नईमुद्दीन बता रहे थे उनके तीन साल कि बेटी को हत्यारों ने गेंद कि तरह उछाल कर गोली मारी थी आज तक किसी हत्यारे को कोई सजा नहीं मिली .पिछले दिनों पटना हाई कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को दोष मुक्त कर दिया .नितीश सरकार इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायलय में नहीं गयी .क्या अब वह दोषमुक्त किये गए सारे आपराधियों को जेड प्लस सुरक्षा प्रदान करेगी ?
        
        Kanpur King ye jatiwadita tab tk khatm nahi ho skti jab tk jati k adhar pr reservation khatm nahi hota
         
        Kanpur King shayam ji aap nitish ki baat kar rahe hai aur soniya ko bhul gaye jisne apne pati k hatyaro ko hi maut ki saza nahi hone di
         
        Kanpur King aur kis media ki bat karte hai aap jo puri tarah se congress ke hantho bik chuka ha ? media wale modi ji k naam pr guj dande to dikhate hai lekin kaarsewako ke bare mi kuch nahi kahte
 
        Vivek Dutt Mathuria ise bhi sushan kahate hai ….
 
        Vivek Dutt Mathuria Sir ise bhi sushan kahte hai …
   
        Deepak Kumar Pandey susasan ke satahi dawe ki pol arajkata ne khol di hai………..jab shasan vargiya sanrakshanwadi ho jata hai to aise hi parinam honge.
    
        Pramod Kumar Sach kaha sir……..sayad inka sushansan yehi ho……….akhir thahre to ram rajya wle……….
     
        Girijeshwar Prasad देवराज जी,गरीबों की हत्या को आप जैसे लोग न्योयोचित ठहराते रहे हैं। ब्रह्मेश्वर के साथ खड़े लोग उसके द्वारा या उसके संरक्षण में हुइ हत्याओँ के समर्थक नहीं है? रणवीर सेना उन्ही लोगों के समर्थन से बनी,चली और सैंकड़ों हत्याएँ की। पटना में ये रणवीर सेना के सदस्य थे,जो पटना में गुंडई कर रहे थे।रही बात वैचारिक धरातल की तो रणवीर सेना के सदस्यों और समरथकों की वैचारिक धरातल सैंकड़ों वरषों से जानी पहचानी है। गरीबों-कमजोरों का शोषण -दमन और लूट।
    
        Alok Anand ‎95% SATISFIED
     
        Amit Kumar aap jaise log hi delhi m baith ke bari bari bate karte hai
      
        Rajeev S Raju रणवीर सेना बनाने वाले भूमिहार,,आपकी जातीय समुदाय से ही हैं,,खैर ये आपका दुर्भाग्य हो सकता है,, लेकिन गुंडे का कोई समुदाय नहीं होता,,गुंडा गुंडा होता है,,चाहे सामंती हो,,या फ़कीर,,जिन संगठनों के विरोध में रणवीर सेना गठित हुयी,,उनका आप लोग डंके की चोट पे समर्थन करते हैं,,खैर हिंसा गलत है,,मै उसका विरोधी हूँ,,   —बिहार विकास में नंबर वन है,,ये भी लोग जानते हैं…गुंडई का विरोध करिए,,सब चीज़ टके शेर मत तौलिये…
 
        Shantanu Kumar Raju bhai , main puri tarah aapse sahmat hun. Desh ka durbhagya yahi hai ki log ek hinsa ko sahi aur pratihinsa ko galat thahra dete hain
   
        Amarendra Kishore Nitish na Bihar ki tasveer badal sakte hain aur na he takdir…………….
    
        Yogesh Kumar Gulati ‎@Rajeev S Raju "शायद आप ही के लिए कबीर दास जी ने सैकड़ों साल पहले कहा था….जात ना पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान! एक शिक्षक को जातिसूचक संबोधन से संबोधित कर आप अपने ज्ञान का परिचय दे रहे हैं! जब तक आप जातिवाद का बीज अपने अन्दर छिपा कर रखेंगे तब तक आप वैचारिक शुद्धि तक नहीं पहुँच पाएंगे. किसी भी समस्या के समाधान के लिए पहले पूर्वाग्रहों का त्याग और वैचारिक शुद्धि की आवश्यकता होती है. केवल ऊपरी तौर पर जातिवाद की खिलाफत करना और अपने अन्दर जातिवाद का बीज छिपा कर रखने से ही आज हालात यहाँ तक आ पहुंचे हैं!"
      
        Shantanu Kumar Har hinsa galat hoti hai. Magar kuch SO CALLED WHITE COLLERs naxalion ke hinsa ka khuleam samarthan karte hain aur police ki karya wahi ko nagrik adikaro ka hanan batate nahi thakte.
        
        विद्या भूषण पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि भारतीय संविधान बेबस है या उसके साये में पलने वाले गुंडे ज्यादा ताकतवर, ये लोकतंत्र कि कमजोरी का प्रमाण है, अगर दोषियों को सजा जल्दी मिले तो ये चोर टाइप के लोग मुंह कभी ना दिखा पाते
         
        Gopal Rathi wo subah kabhi to aayegi
         
        DrPiyush Shukla Rajiv shukla k channel pe apka comment dekh raha hu
         
        Shantanu Kumar Kya sasan ka kartaya nahi hai ki ek apradhi ko nyayochit dand milne tak surakchhit rakhe na ki use khuleaam gundon ki golion ka shikar ban ne de. Lekin aj patna me jo kuch bhi hua us par sabhi 'MANUSYON' Ko milkar mafi mangna chahiye. Ise naxal ya sananti chasme se nahi dekhna chahiye.
         
        Rajeev S Raju ‎@yogesh kumar gulati..तो क्या साधू का ज्ञान ये कहता है की,,pwg,mcc और भाकपा माले की हत्याओं का समर्थन करिए,,और उसकी प्रतिहिंसा का विरोध करिए,,यही है वैचारिक पवित्रता,,बिहार में कितना साधुवाद है,,कितना जातिवाद,रणवीर सेना क्यों बनी,, शायद इसका ज्ञान आपको नहीं है,,नहीं आप ऐसी बात नहीं करते,,गुंडे सामंती कहाँ से हो गए,,गुंडे तो गुंडे होते हैं,,,कथनी करनी में फर्क जहाँ,,धर्म नहीं पाखंड वहां,,मै ज्ञानी नहीं हूँ,,लेकिन इन परिस्थितियों को अच्छे से देखा हूँ,,बस मेरा कहना ये है,,की गुड खाकर गुलगुले से परहेज न किया जाये…ठेस के लिए खेद है..
       
        Anand Pradhan क्या बिहार में कोई सरकार है?…
        
        Yogesh Kumar Gulati ‎Anand Pradhan "वोट-बैंक की राजनीति ने व्यवस्था को अपाहिज बना दिया है. सर्वोपरि होते हुए भी संविधान मूक-बधिर हो गया है. देश के लगभग हर हिस्से का यही हाल है. एक संप्रभु राष्ट्र में किसी भी ताकत का क़ानून और प्रशासन के आगे टिकना नामुकिन है, लेकिन यहाँ तो खुले आम क़ानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और क़ानून मूक दर्शक बना सब कुछ देख रहा होता है. शक्तिशाली क़ानून की बांह मरोड़ रहे हैं और कमज़ोर न्याय के लिए क़ानून के द्वार पर सर पटक रहे हैं. ये स्थिति देश के तमाम राज्यों में है, क़ानून और व्यवस्था की स्थिति राजधानी दिल्ली में ही किसी से छिपी नहीं है. तो फिर अकेले बिहार को ही दोष क्यों दिया जा रहा है?"
        
        Rakesh Kumar Singh sarkar yahi chahti hai. lampaton ke din lad gaye ab. ab na ukhad paayege ye raniviriye …
        
        Anand Pradhan सामंती-अपराधी गिरोह रणवीर सेना के समर्थकों से बहस या बातचीत संभव नहीं है…जो लोग रणवीर सेना की पैदाइश के लिए माले और उसके नेतृत्व में चले दलितों-पिछडों के हक-हुकूक के आंदोलन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि रणवीर सेना क्या है और माले क्या है? साफ़ है कि ये चाहते हैं कि बिहार में गरीब-गुरबे दलित-आदिवासी-पिछड़े-अल्पसंख्यकों को चुपचाप अपराधियों-सामंतों-बाबू साहबों का अत्याचार सहते रहना चाहिए…माफ करिये, ये संभव नहीं है…दर्जनों नरसंहारों के बावजूद अब गरीब-गुरबों की न्याय और सम्मान की इस लड़ाई को दबाना संभव नहीं है…बिहार में जमींदारों-कुलकों की कुंअर सेना, सनलाईट सेना, भूमि सेना, लोरिक सेना, ब्रह्मर्षि सेना जैसी कई निजी सेनाएं इतिहास के कूड़ेदान में जा चुकी हैं…रणवीर सेना की जगह भी वहीं है….
         
        Puja Shukla देश में आजकल अपना दुःख / विरोध जताने का तरीका यही हो चला है, जिसके लिए शासकीय लचरता जिम्मेवार है पर गुंडे आदि अलंकरण की लेखनी करने वाले मनीषियों से ये भी सवाल है की अगर हर विरोध पर सरकारे तिआंनमेंन चौक बनाने लगे तो क्या होगा? ऐसे वक़्त में जब सरकार संकट की स्तिथि से गुजर रही है तब फेसबुक, अखबार टीवी आदि मीडिया पर राजनैतिक हत्या या राजनैतिक घटनाओं का राजनैतिक सोच व् जातीय सुगमता के आधार पर इस तरफ या उस तरफ ब्यानबाजी कोई भी लिखे या सड़को पर गुस्सा कोई भी निकाले पिटती सरकारें ही है. व्यक्तिगत रूप से मेरा इस तरह की भाषा का विरोध है ये हद दर्जे की आत्म्सुगमता है
         
        Awesh Tiwari ब्रह्मेश्वर प्रसाद उर्फ मुखिया जी की मौत पर चर्चा करना भी एक किस्म का चुतियापा है |गनीमत थी कि बिहार में थे ,अगर छत्तीसगढ़ या उड़ीसा में होते तो कब का टीप दिए गए होते |सामंतवाद का जातिवाद से नाता जोड़ना वामपंथी लंठई है |मुखिया ,सीधे -सीधे आम जनता के बीच अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए खौफ और दहशत का माहौल रचकर समूचे बिहार में नंगा नाच कर रहे थे |उनकी हत्या किसी ने भी की हो ,लेकिन उस पर सभ्य समाज की सहमति जरुर है |
         
        Navendu Kumar Sinha jaati ke aage rajniti ke samarpan ki raudra gatha hai ye,jisne "sushasan" ki pol-patti ke chithre uda diye.bihari satta-samaj ke liye sirf itna ki…sangharsh avi samapt nahi hua…ladai avi baaki hai!
         
        Yogesh Kumar Gulati किसी भी सभ्य समाज में हिंसा हर हाल में निन्दनी है. इसलिए जो लोग इस ह्त्या का समर्थन कर रहे हैं उनसे मेरी गुजारिश है कि विवेक का परिचय दें! हथियारों के बल पर मासूमों का खून तो बहाया जा सकता है लेकिन किसी भी समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता".
         
        Niraj Singh आपसे सहमत हूं…जिस ब्रांड की मार्केटिंग में हम लगे थे इस घटना से उसे धक्का लगा है।
         
        Girijeshwar Prasad एक बार फिर साफ हो गया है कि बिहार में सामंतों की सरकार है। रणवीर सेना की सरकार है।
         
        Armendra Amar ‎Anand Pradhan.. सर माफ़ कीजियेगा आज आपसे पहली बार आंख से आंख मिला कर कुछ बोलने की हिम्मत कर रहा हूँ… लेकिन जब इतने बड़े लोग दलित पिछडों का इतना समर्थन करते हैं तो प्लीज़ उनके संरचनात्मक विकास पर ध्यान क्यूँ नहीं देते है….. जमीनी स्तर पर उनकी शिक्षा .. और जीवन स्तर बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए . उन्हें रचनात्मक कार्य में लगाने की बजाये विध्वंसात्मक कार्य में लगाना .. अपहरण.. सार्वजनिक सम्पति को नुकसान .. अर्ध सैनिक बलों की हत्या ..मासूम लोगो की हत्या… बड़े अगडे भुमिपतियों के जमीं पर लाल झंडा गाडना कहाँ तक गलत है….. हद हैं इतने बड़े बड़े लोग हैं समर्थन में फिर भी.. उनकी दशा क्यों नहीं सुधरती .. सच तो यह हैं.. कि..ऐसे बड़े सब लोग उनकी आड़ राजनीती चमकाने का धंधा ढूंढते है…..रही बात रणवीर सेना की तो वह कूडेदान में जरुर जायेगी,,, लेकिन बदलते समय के साथ नयी तस्वीर में आएगी.. मैंने वो दौर भी देखा है..जब गावं में हर दिन लोग मौत के साये में जीते थे.. और फिर युद्ध के बाद शांति का दौर भी देखा… क्या सन २००० के बाद बिहार में कोई बड़ा नरसंहार हुआ क्या..नहीं न..संतुलन के लिए शक्ति आवश्यक है…सर फिर माफ कीजियेगा…मैंने बस अपनी बात रखी है…आपको ठेस पहुचना मेरी मंशा नहीं है…
         
        Surender Sagar bade afsos ki baat ji ki iski hatya kuch logo ne ki jabki iski kanooni hatya bahut pahle honi chahiye thee .. lekin brahmnwaadio ne aisaa nahi kiyaa
         
        Satyendra Pratap Singh पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र ने शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि बरमेश्र्वर मुखिया सामाजिक न्याय व सद्भावना बनाए रखने के पक्षधर थे।
         
        Nadim S. Akhter क्या बात है आनंदजी, जिस तरह आपने बिहार सरकार और रणवीर सेना की बखिया उधेड़ी है, पढ़कर अच्छा लगा. दरअसल हमारे देश में समस्या कोई नहीं है..समस्या सिर्फ राजनीति है..जिस दिन 'जनता के लिए' राजनीति होने लगेगी. उस दिन देश आजाद हो जाएगा. मैं तो इसको अभी भी गुलाम मानता हूं..पहले अंग्रेज थे..अब लोकतंत्र का जामा पहने हमारे छद्म राजनेता हैं.
         
        Amit Kumar हत्या की आलोचना होनी चाहिए।हत्या के खिलाफ हो रहे आँदोलन की नहीँ।
         
        Dinbandhu Shukla yeh 1 swabhwik pratikriya hai.hame maowad & ranveer sena ke gathan ke mool me jana hoga.
         
        Anand Pradhan ‎Puja Shukla: पूजा जी, पटना और आरा में जो मुट्ठी भर लोग सड़कों पर खुलेआम तोड़फोड़, आगजनी, मारपीट, छेड़छाड़-बदतमीजी और दहशत फ़ैलाने में लगे हुए थे, उसे गुंडागर्दी नहीं तो और क्या कहा जाए? क्या यह लोकतान्त्रिक विरोध था? इस गुंडागर्दी की तुलना आप तियेन-मन चौक से कर रही हैं? और आप उस सरकार को क्लीनचिट दे रही हैं जिसने फारबिसगंज में गरीबों पर गोली चलाने और उन्हें पैरों के नीचे बेदर्दी से कुचलने में कोई तकलीफ नहीं हुई थी…आपको क्या लगता है कि नीतिश कुमार की सरकार गरीब-गुरबों के हक-हुकूक के सवालों पर होनेवाले प्रदर्शनों पर भी ऐसा ही “लोकतान्त्रिक” रवैया अख्तियार करेगी, जैसाकि आज पटना में दिखा? समझने की कोशिश कीजिए, ये खाप पंचायतों के बिहारी संस्करण हैं….
         
        Nadim S. Akhter आनंदजी से सहमत.
         
        Rajeev Kumar this is fact but kanun ka raj tha hi kab wo to dande ka raj tha sari midiya hijak kar li gai thi
         
        K Vivekanand Rajesh ‎@puja shukla @anand pradhan : gundo ko gunda kehne me kya sharm honi chahiye bhala?? lagta hai ek naya trend zor pakad raha hai; sarkar ki mukhalafat karne walo ki mukhalafat!! Sarkar apni karni ki wajeh se mushkil sthiti me hain, janta chun ke bhejti hai to kuch ummeedo ko poora karne ke liye, kisi bhi sarkar ko taqlif hai sawalaat se, to shauk se gaddi chhod de aur aaram bahri zindagi jiye, janta to sawal puchegi aur gariyagi bhi, bhasha bhi wahi chunegi…

        P.S. Gazab hai dunia; jaan de do, magar uff ki awaz bhi na karo…
 
        Nitesh Ranjan पटना की सड़कों पर आज जो नजारा दिखा उसके पीछे निश्चित ही नीतीश की एक सोची-समझी रणनीति रही है दरअसल नीतीश की शासन के इन छः सालों में पिछड़े और अतिपिछड़ों की एक जमात भी अंदर-ही-अंदर नीतीश की खिलाफत करने लगी है एसे में अगड़ी जाति के लोगों द्वारा किये जा रहे उपद्रव का भय ही है जो पिछड़े और अतिपिछड़ों की उस जमात को एक बार फिर नीतीश के पक्ष में खड़ा रहने को मजबूर कर सकता है।

भाकपा (माले) से जुड़े और आईआईएमसी में बतौर प्रोफेसर कार्यरत आनंद प्रधान के फेसबुक वॉल से साभार.

जागरण में बंपर छंटनी (28) : बरेली में दो का तबादला, दो ने नोटिस भेजा

दैनिक जागरण, बरेली से दो खबरें हैं. पहली तबादले की और दूसरी लीगल नोटिसों की. बरेली में कार्यरत सुंदर भाटिया का तबादला मुरादाबाद कर दिया गया है. सुंदर काफी समय से बरेली में अपनी सेवाएं दे रहे थे. हालांकि उनके तबादले के पीछे का कारण संपादकीय प्रभारी अवधेश गुप्‍ता से हुए विवाद को बताया जा रहा है. दूसरी तरफ मुरादाबाद में कार्यरत एस राजपूत को बरेली बुला लिया गया है. राजपूत भी लंबे समय से अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

दूसरी तरफ राजीव द्विवेदी से विवाद के बाद कानपुर भेजे गए तेजेंद्र पाल सिंह बावा ने दैनिक जागरण को लीगल नोटिस थमाया है. कहा जा रहा है कि कानपुर प्रबंधन बावा से इस्‍तीफे की मांग कर रहा था, जिसके बाद बावा ने इस्‍तीफा देने से मना कर दिया और बरेली लौट आए. इसके बाद बावा ने कंपनी को कानूनी नोटिस थमा दिया है. इसी क्रम में सर्कुलेशन विभाग में कार्यरत दुर्गा प्रसाद ने भी जागरण प्रबंधन को लीगल नोटिस दिया है. दुर्गा से भी प्रबंधन ने जबरिया इस्‍तीफा ले लिया था. वरिष्‍ठ पत्रकार रमेश चंद्र राय ने भी कंपनी को आर्टिकल चार के तहत नोटिस भेजने का फैसला किया है. श्री राय इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाना चाहते हैं. उनका कहना है कि अगर जो लोग जागरण के खिलाफ लड़ाई लड़ना चाहते हैं वे उनसे 7607468845 पर संपर्क कर सकते हैं.


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दबंग दुनिया इंदौर से खबर है कि मनसुख परमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि अखबार के भीतर की राजनीति से परेशान होकर मनसुख ने इस्‍तीफा दिया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

आजकल पंकज पचौरी कर क्या रहे हैं?

एनडीटीवी छोड़कर पंकज पचौरी पीएम मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइजर बनने गए लेकिन गए तो फिर वे ऐसे खो गए कि कुछ अता पता ही नहीं चल रहा है. हालांकि कहने वाले कहते हैं कि जबसे पंकज पचौरी पीएम के मीडिया एडवाइजर बने हैं, तबसे मीडिया में पीएम की छवि और ज्यादा खराब हुई है. अब कोयला घोटाल का सीधे सीधे आरोप पीएम पर लगने लगा है. घपलों, घोटालों, खराब आर्थिक हालातों, महंगाई आदि की जननी केंद्र की यूपीए सरकार की जैसी किरकिरी इन दिनों मीडिया और उसके पाठकों के बीच हो रही है, वैसी कभी नहीं हुई. पंकज पचौरी सीन से गायब दिख रहे हैं. जहां उन्हें होना चाहिए, वहां भी वे नहीं दिखते. इसी हालत पर इंडिया टुडे मैग्जीन के गासिप सेक्शन में एक खबर पंकच पचौरी पर है, जो इस प्रकार है–

OFF THE AIR

The prime minister’s communications adviser, Pankaj Pachauri, chose to remain, quote inexplicably, incommuncado for the press delegation accompanying Manmohan Singh on his historic trip to Myanmar capital Nay Pyi Taw, the first visit by the Indian prime minister in 25 years.

Pachauri did not intereact with the media on the PM’s special flight. He missed the foreign secretary’s press conference at the conclusion of the prime minister’s talks with his Myanmarese counterpart. He was not even seen in the hotel at which the media was staying.

Little wonder that the Prime Minister’s media image is taking a battering.

हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला : बड़े घराने के अखबार नीतिश सरकार को अंगूठा दिखा रहे हैं

मुंगेर। मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और पुलिस महानिदेशक अभयानन्द की अगुवाई में बिहार में आर्थिक अपराधियों के फन को कुचलने का अभियान जोर-शोर से चल रहा है। दूसरी ओर, सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना की त्रुटिपूर्ण ‘‘बिहार विज्ञापन नीति-2008‘‘ के कारण कारपोरेट मीडिया सरकार की बिहार विज्ञापन नीति-2008 का माखौल उड़ा रहा है और सरकार के मुखिया को चिढ़ा-चिढ़ा का संदेश दे रहा है कि ‘‘नीतिश जी, सरकार बिहार में कारपोरेट मीडिया की है। कारपोरेट मीडिया बिहार में सरकार चल रहा है। ‘‘दैनिक हिन्दुस्तान सरकार की विज्ञापन नीति-2008 को अंगूठा दिखाकर अपनी दादागिरी और धौंस के बलपर खगड़िया नगर परिषद से अनाधिकृत रूप में विज्ञापन उठा लिया है और दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित कर दिया है। अब अखबार उस अवैधढंग से अर्जित विज्ञापन के भुगतान के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहा है।

बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना के सचिव राजेश भूषण ने वर्ष 2008 में ‘‘बिहार विज्ञापन नीति-2008‘‘ जारी की और बिहार सरकार के सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन की कानूनी शर्त्तें तय कीं। बिहार विज्ञापन नीति-2008 में पृष्ठ संख्या-03 पर कंडिका -04 एवं शीर्षक विज्ञापन निर्गम एवं भुगतान की प्रक्रिया में सरकार ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि –‘‘‘बिहार सरकार के समस्त विज्ञापन निर्गम कार्य, बिहार सरकार के स्वामित्व एवं नियंत्रण में पड़नेवाले परिनियत निकाय/निगमों/लोक उपक्रमों/ प्रतिष्ठानों/प्राधिकारों/ समितियों आदि सहित केवल न्यायालय को छोड़कर सूचना सिर्फ सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में केन्द्रीकृत रहेगा एवं समस्त विज्ञापन भुगतान कार्य परिनियत निकाय/ निगमों/ लोक उपक्रमों/प्रतिष्ठानों/ प्राधिकारों/ समितियों एवं न्यायपालिका को छोड़कर सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में केन्द्रीकृत रहेगा।‘‘

भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति माननीय मार्कण्डेय काटजू का यह आरोप बिलकुल झूठा प्रमाणित हो रहा है कि बिहार सरकार के दवाब में बिहार में कारपोरेट मीडिया को काम करना पड़ रहा है बल्कि सच्चाई कुछ और है। सच्चाई यह है कि कारपोरेट मीडिया के ही दवाब और गिरफ्त में बिहार सरकार के कुछ विभाग, खासकर सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय और श्रम विभाग काम कर रहे हैं। बिहार सरकार की देश भर में फजीहत कराने में बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की अहम भूमिका रही है। इसका ताजा दृष्टांत यह है।

बिहार विज्ञापन नीति -2008 के आलोक में राज्य सरकार के स्वामित्व और नियंत्रण में चलनेवाले परिनियत निकाय। निगमों को विभागीय विज्ञापन सीधे अखबार के पास प्रकाशन हेतु नहीं भेजना है। परन्तु कारपोरेट मीडिया के दवाब और आन्य लालच में सरकार की विज्ञापन नीति-2008 को ठेंगा दिखाकर बिहार सरकार के नियंत्रणाधीन अनेक निकाय और निगम दैनिक अखबारों को सीधे विज्ञापन प्रकाशन हेतु भेजते आ रहे हैं और अखबार मनमाना आकार में और मनमाना विज्ञापन दर पर प्रकाशन शुल्क वसूल रहा है। इस प्रकार, निकाय और निगम के अधिकारी मीडिया हाउस को अनुचित लाभ पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

सरकारी सूत्र बताते हैं कि बिहार सरकार की बिहार विज्ञापन नीति-2008 के अक्षरशः पालन नहीं होने के पीछे सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की दिमागी कसरत है। विज्ञापन नीति -2008 में विज्ञापन नीति का उल्लंघन करनेवाले सरकारी पदाधिकारियों के विरूद्ध किसी भी स्तर पर विभागीय कार्रवाई या दोषी पदाधिकारियों के वेतन से अवैध ढंग से प्रकाशित विज्ञापन की राशि की वसूली या निलंवन का कोई प्रावधान ही नहीं है। इसका अनुचित लाभ कोरपोरेट मीडिया और विज्ञापन लूट में शामिल सरकारी पदाधिकारीगण उठा रहे हैं।

सबूत के तौर पर दैनिक हिन्दुस्तान के 30 मई, 2012 के मुंगेर संस्करण में पृष्ठ-06 पर नगर परिषद, खगड़िया का छपा विज्ञापन है। विज्ञापन का शीर्षक है ‘‘कार्यालय नगर परिषद, खगड़िया/ विज्ञापन सूचना।‘‘ इस विज्ञापन में पटना के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय का विज्ञापन रिलीज नम्बर का उल्लेख नहीं है। यह प्रमाणित करता है कि यह विज्ञापन अवैध ढंग से कारपोरेट मीडिया के दवाब में सीधे तौर पर प्रकाशन हेतु अखबार को भेजा गया है। बिहार विज्ञापन नीति के अनुरूप यह विज्ञापन नगर परिषद, खगड़िया से सीधे सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना भेजा जाना था जो यह तय करता कि यह विज्ञापन किस अखबार को किस आकार में प्रकाशन हेतु भेजना है। आश्चर्य यह भी है कि विज्ञापन जारी करनेवाले व्यक्ति का पदनाम भी विज्ञापन में नहीं प्रकाशित किया गया है। बिहार विज्ञापन नीति-2008 को ठेंगा दिखाने में हिन्दुस्तान के साथ-साथ बिहार के अन्य हिन्दी और अंग्रेजी दैनिक अखबार भी शामिल हैं।

मुंगेर से काशी प्रसाद की रिपोर्ट।


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

अगर दस प्रतिशत का भी मान लें तो यूपी में 272 करोड़ का ”टैबलेट घोटाला” तैयार है!

: टैबलेट-दर-टैबलेट- उत्तर प्रदेश में घोटाले की नयी जमीन? : उत्तर प्रदेश में टैबलेट रिवोल्यूशन आने वाला है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पहले बजट में 2721 करोड़ रूपए छात्रों को टैब्लेट और लैपटॉप कंप्यूटर बांटने के लिए आवंटित किए गए है। मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने अब तो प्रदेश के बजट में टैबलेट बाँटने के लिये धन की व्यवस्था भी कर दी है। पर जो ट्रेंड चल रहा है कि आने वाली सरकारें पिछली सरकारों के कामों की बखिया उधेड़ती है और सरकारी खरीदें बिना कमीशन बाजी के हो नहीं सकती उसके हिसाब से प्रदेश में एक बड़ी सरकारी खरीद और उससे जुड़े एक नये घोटाले की जमीन तैयार हो रही है । बी.बी.सी के अनुसार 2721 करोड़ के टैबलेट बटेंगें। अगर दस प्रतिशत का भी मान लें तो 272 करोड़ का घोटाला तैयार है।

मैं टैबलेट पर वारी-वारी क्यों न जाऊँ। अभी-अभी हिन्दुस्तान (हिन्दी दैनिक) ने एक उत्तर प्रदेश के विकास की राह सुझाने के लिये एक ’कानक्लेव’ करायी थी, जिसमें अन्य लोगों के अलावा अखिलेश यादव, डाटाविंड (आकाश नाम से केन्द्र सरकार को टैबलेट देने वाली कम्पनी) के मुखिया और केन्द्र सरकार में आकाश टैबलेट के प्रणेता कपिल सिब्ब्ल एक मंच पर थे। केन्द्र सरकार के घोटालों की रफ्तार किसी से छुपी नहीं है। तो क्या ये मानें की यू.पी.ए. की सहयोगी समाज्वादी पार्टी अब कांग्रेस नीत गटबंधन से काफी तेजी से सीख रही है? इसे संजोग कहें या कुछ और कि इस कानक्लेव के कुछ ही दिनों के बाद टैबलेट के लिये प्रदेश के बजट में जुगाड़ हो गया।

केन्द्र सरकार अभी तक आकाश टैबलेट किसी को दे नहीं पायी है और प्रदेश सरकार पूरे प्रदेश के हर गांव को टैबलेटमय करने के मुगालते में है। आगे-आगे देखिये होता है क्या? वैसे प्रदेश में और भी बड़ी समस्याएं हैं जिन पर लगातार जनता को टैबलेटें (आश्वासन) ही मिल रहें हैं। पर अब जब लाख दुखों और बीमारियों की एक टैबलेट आ गयी है तो इस नामाकूल जनता को अपनी सभी बीमारीयों का अन्त इसी टैबलेट में देखना चाहिये। अब तो प्रदेश को टैबलेट ही राखे !!

सचिन अग्रवाल, भड़ास ब्लाग से.

अलीगढ़ : अखबारों ने हाकरों को छला तो हाकरों ने हड़ताल का दांव चला

अलीगढ़ से सूचना है कि यहां पर अखबार वितरकों ने दो दिन से हड़ताल कर रखा है. कोई अखबार नहीं बंट रहा है. हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण जैसे अखबारों के प्रसार विभाग के लोगों ने खुद स्टाल लगाकर अखबार बेचना शुरू किया लेकिन इस कवायद से सौ पचास कापियां ही बिकीं. बताया जाता है कि जब हिंदुस्तान अखबार अलीगढ़ में लांच हो रहा था तब प्रति अखबार हाकरों को कमीशन 75 पैसे मिलते थे. हिंदुस्तान ने लांचिंग के बाद कमीशन प्रति अखबार एक रुपये कर दिया. यह देख अन्य अखबारों ने भी कमीशन प्रति कापी एक रुपये कर दिया.

अब सारे अखबारों ने मिलकर कमीशन को अचानक घटाकर 75 पैसे कर दिया है. बढ़ती महंगाई में इस तरह का छल किए जाने से अखबार वितरक नाराज हो गए और अखबार न बांटने की घोषणा कर दी. मजबूरी में अखबार वालों को काउंटर सेल की व्यवस्था करनी पड़ी है. टेंपो, आटो आदि पर लाउडस्पीकर बांधकर अखबार बेचा जा रहा है. पर इस सबसे बहुत कम पाठकों तक अखबार पहुंच पा रहा है. हाकरों ने अखबार सेंटरों पर हंगामा करना शुरू कर दिया है. हाकरों को मनोबल तोड़ने के लिए अखबार प्रबंधन अपने पत्रकारों व अन्य कर्मियों को सेंटर पर भेज रहा है ताकि पुलिस बल के सहयोग से हाकरों पर दबाव बनाया जा सके. आज रात सेंटरों पर पुलिस बुलवाकर हाकरों को धमकाया गया. अखबार प्रबंधक भी हड़ताल के चलते अखबार की बहुत कम कापियां प्रकाशित कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि आज रात हाकर एक बैठक करके आगे का रणनीति घोषित करेंगे. माना जा रहा है कि हाकरों को अगले कुछ दिनों में दबाव बनाकर कम कमीशन पर ही अखबार बांटने को मजबूर कर दिया जाएगा.

”रोहित गुप्ता के कृत्यों से पत्रकार समाज शर्मिंदा हो रहा है”

आदरणीय यशवंत जी, आपका यह मंच निश्चय तौर पर पत्रकारों की समस्याओं और मीडिया से जुडी खबरों को प्रमुखता देता है. यह मंच हमेशा पत्रकारों में प्रिय रहा है. किन्तु बिना कोई छानबीन किये एक नितांत झूठी खबर (भदोही में पैसे पर बिका प्रेस क्लब, पत्रकार को पीटने वाले को किया सम्मानित) पढ़कर इस मंच की विश्वनीयता पर संदेह हो रहा है. मैं आपको और सभी पाठकों को सच्चाई से अवगत करना चाहूँगा. आशाराम बापू द्वारा या उनके समर्थकों पर जो आरोप लगाया गया था, उसी के आधार पर प्रेस क्लब ने एकजुटता दिखाई और मुकदमा दर्ज कराया. जब पुलिस अधीक्षक ने कार्यवाही करने का आश्वासन दिया तो आन्दोलन बंद किया गया. आवश्यक धाराओं के अंतर्गत पुलिस ने चार्जशीट लगाया, किन्तु आप भी जानते हैं कि पुलिस कितने वर्ष की सजा के आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर सकती है.

क्या आन्दोलन करने से संत को गिरफ्तार किया जा सकता है. हकीकत से आप भी वाकिफ हैं. दूसरी बात हम आन्दोलन करके न्यायपालिका पर दबाव नहीं बना सकते यदि यह संभव होता तो शायद कितने वर्षों से न्यायालय में पड़े मामले लंबित नहीं होते. आज रोहित गुप्त को ABP न्यूज़ का पत्रकार बताया जा रहा है, उन्हें घटना के बाद महुआ न्यूज़ लाइन अपना पत्रकार बता रहा रहा था.

दूसरी बात घटना के तीन दिन तक महुआ न्यूज़ ने इस मामले को जोरशोर से उठाया और इसके बाद अचानक चुप हो गया, ऐसा क्यों, क्या उसने भी पैसा लिया था. न्यूज़ चैनल लाल बत्ती मामले पर कार्यवाही करने की बात कर रहा था फिर उसने कार्यवाही क्यों नहीं कराई. यही नहीं घटना के तीसरे दिन से रोहित गुप्ता ने खुद ही प्रेस क्लब से संपर्क नहीं किया, यहाँ तक कि उन्होंने फ़ोन करना भी मुनासिब नहीं समझा. जब उनसे  संपर्क करने की कोशिश मैंने की तो उन्होंने व्यस्त रहने का बहाना बनाया, जबकि हमें पता चला कि वे गोपीगंज में जाकर आरोपियों से संपर्क करने में जुटे हैं. लिहाजा उन्हें प्रेस क्लब की सदस्यता से बाहर कर दिया गया. हम किसी पर आरोप नहीं लगाते पर इस तरह की बातें कहीं न कहीं पत्रकार समाज को बदनाम करती हैं. दूसरी तरफ यदि वादी नहीं चाहेगा तो किसी भी आपराधिक मामले में सुलह नहीं हो सकती. और इस मामले के वादी रोहित गुप्ता हैं.

रही ३० मई को आसाराम के साधक को सम्मानित करने की बात तो मैं आपसे यह कहने चाहूँगा की यह आरोप नितांत झूठा है, यह आसमान पर पत्थर मारने के सामान है. पत्रकारिता दिवस पर हमारे जनपद के उन वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित किया गया जो २५ से ४० वर्षों तक पत्रकारिता से जुड़े रहे या फिर जुड़े हैं. उन पत्रकारों में श्री हरीन्द्रनाथ उपाध्याय, हाजी अमजद अली अंसारी, बालगोविन्द यादव, वाजिद अली अंसारी, प्रभुनाथ शुक्ल, मिथिलेश द्विवेदी शामिल है. बेस्ट फोटोग्राफी अवार्ड रविन्द्र पाण्डे व सलीम खान को दिया गया, विशिष्ट पत्रकार का अवार्ड साजिद अंसारी को दिया गया. इसके अलावा किसी को सम्मानित नहीं किया गया.

समारोह में करीब 70 पत्रकारों को स्मृति चिन्ह दिया गया. जिस बालकृष्ण द्विवेदी को संत का साधक बताया जा रहा है, वे मोढ़ से पत्रकार हैं, जो एक हिंदी राष्ट्रिय दैनिक के अलावा हिंदी साप्ताहिक और दो पत्रिकाओं से भी जुड़े हैं. देखा जाय तो जनपद में एक अख़बार के ब्यूरो चीफ के अलावा करीब एक दर्ज़न पत्रकार संत के साधक हैं, उनके घरों में संत की फोटो भी लगी होगी, जनपद में करीब हजारों की संख्या में संत के साधक होंगे, जो किसी न किसी व्यवसाय या सामाजिक कार्य से जुड़े होंगे. क्या एक घटना को लेकर सभी का बहिष्कार कर देना संभव है.. शायद नहीं.. कोई पत्रकार यदि संत से जुड़ा है तो वह उसकी व्यक्तिगत आस्था है. यदि वह पत्रकार है तो उसे बहिष्कृत नहीं किया जा सकता.

समारोह के दौरान रोहित गुप्ता के मामले को जोरदार तरीके से उठाया गया. यहाँ तक निर्णय लिया गया कि यदि रोहित गुप्ता मुकदमा नहीं लड़ सकते तो प्रेस क्लब अपने खर्च पर उन्हें मुकदमा लड़ायेगा, यह निर्णय समारोह के दौरान ही लिया गया. इसकी वीडियो भी हम आपको भेजेंगे. संत के किसी साधक को समारोह के दौरान न तो सम्मानित किया गया और न ही प्रेस क्लब चुप्पी साध कर बैठा है. बल्कि श्री गुप्ता के कृत्यों से पत्रकार समाज भी शर्मिंदा हो रहा है. पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने वाले चंद लोगों के साथ मिलकर प्रेस क्लब को बदनाम कर रहे हैं. जबकि मुकदमा लड़ने के लिए क्लब उन्हें आर्थिक सहायता की पेशकश कर चुका है. पर वे चाहते हैं कि पत्रकार संत की गिरफ्तारी के लिए आन्दोलन करे. जो संभव नहीं है. यदि संभव है तो देश का कोई भी संगठन गिरफ़्तारी के लिए आन्दोलन शुरू करे, दोनों प्रेस क्लब उसके साथ खड़े होंगे. पर ऐसा पहला मामला होगा जो न्यायपालिका के खिलाफ होगा.

यशवंत जी आप एक सुलझे हुए व्यक्ति है फिर एकतरफा समाचार प्रकाशित कर खुद की विश्वनीयता पर अंगुली उठाने को विवश कर रहे हैं. यदि किसी ने यह समाचार भेजा तो आपने यह छानबीन करने के कोशिश क्यों नहीं की कि दूसरे पक्ष का भी बयान लिया जाय जबकि पहले ऐसा ही आप के मंच पर होता रहा है. क्या हम आप की विश्वसनीयता पर यकीन करना छोड़ दें. वैसे भी हम आपको कार्यक्रम की पूरी विडियो भेजेंगे, बिना कुछ एडिट किये. फिर आप स्वयं निर्णय ले क्या सच है क्या झूठ.

धन्यवाद सहित

आपका

हरीश सिंह

अध्यक्ष

पूर्वांचल प्रेस क्लब

मो. 7860754250

editor.bhadohinews@gmail.com

लालू की बिटिया का इंटरव्‍यू छापने वाले टाइम्‍स ऑफ इंडिया की किरकिरी

यशवंत भाई, नमस्कार। किसी व्यक्ति के किसी काम पर लोग थू-थू करें और वो उसे अपनी उपलब्धि माने तो उसे नादान से लेकर मूर्ख कहने तक के विकल्प हमारे पास मौजूद है। भारत के सर्वोच्‍च पाठक संख्या वाले अंग्रेजी अखबार ने भी कुछ ऐसी ही नादानी की है, जिसको पाठक कोई भी नाम दे सकते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के चंडीगढ़ संस्करण ने खूब दावे के साथ प्रकाशित किया कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बिटिया धन्‍नू सबकुछ भूलकर हरियाणा में भ्रूण हत्याएं रोकने को मैदान में उतरने वाली हैं। लालू की लाडली हाल ही में हरियाणा में ब्याह कर आई हैं। वे हरियाणा के पावरफुल लीडर अजय यादव के बेटे चिरंजीव के साथ विवाह बंधन में बंधी हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया, चंडीगढ़ ने प्रथम पृष्ठ पर धन्‍नू के इस दावे को प्रकाशित किया कि हरियाणा में आते ही उन्हें तो कुछ याद नहीं सिवाय इसके कि यहां कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ उन्हें जंग लडऩी है। अखबार वालों ने सोचा कि पाठक बड़ा खुश होगा, शाबासी देगा, लेकिन पाठक ने जी भरकर खरी खोटी सुनाई। पाठक पूछ रहे हैं कि भाई ये बात बताकर क्यों बेवकूफ बना रहे हो। पाठक टाइम्स ऑफ इंडिया को कह रहा है कि कुछ नहीं है, सिर्फ पब्लिसिटी स्टंट है। यूं ही ऐसे लोगों को प्रचारित कर रहे हो, जिन्होंने करना धरना कुछ नहीं है। अब ताजुब की बात ये है कि पाठक तो खरी खोटी सुना रहा है, लेकिन टाइम्स वाले इसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं। खबर पर 82 कमेंट आने के कारण खबर लिखने वाले टाइम्स के स्टाफर सुखबीर सिवाच ने तो इसे अपनी चैट लाइन पर ही डाला हुआ है। अब भाई कोई पूछे कि पाठक तो इनको खरी खरी सुना रहा है और ये इसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं।

दरअसल, टाइम्स ऑफ इंडिया, चंडीगढ़ हरियाणा-पंजाब में कन्या भ्रूण हत्या रोकने की खबरें छापते हुए खुद को इस अभियान का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने से नहीं चूकता। न जाने कितने लोगों को कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लडऩे वाले मसीहा के रूप में खबरों में प्रोजेक्ट करते हैं। अपनी इस प्रोजेक्शन में ये भी भूल जाते हैं कि जो लोग अपने शाही बंगलों के एसी के बाहर झांकते भी नहीं, उनको टाइम्स दावे के साथ प्रकाशित करे कि वो समाज सुधार के लिए सड़कों पर आ रहे हैं। पाठक ने अमुक खबर पर चिल्ला चिल्ला कर पूछा है कि लालू प्रसाद यादव की बिटिया को इतना ही समाज सुधार याद था तो बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ मैदान में क्यों नहीं उतर गई। अब ये तो हम भडास के पाठकों पर छोड़ते हैं कि वो टाइम्स आफ इंडिया की इस समझ को क्या नाम देना चाहते हैं। नीचे टाइम्‍स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर


Lalu's daughter to fight female feticide

CHANDIGARH: RJD supremo Lalu Prasad's daughter Dhannu will fight against female feticide in Haryana.

Dhannu, sixth of Lalu's nine children, who was married to Haryana power minister Ajay Singh Yadav's son Chiranjeev Rao on April 24, was recently in Chandigarh for the first time after her marriage. She told TOI that her campaign would empower women and she would be telling them how women have been doing better than their male counterparts in many spheres across the country.

Female feticide has been a major concern for Haryana with the state having a skewed sex ratio of 830 girls to 1000 males in the age group of 0-6 years and 877:1000 in general.

""I will tell the women how Sonia Gandhi is steering her party and helping the Centre function and how Sania Mirza is today a shining star. Even my mother ( Rabri Devi) has been a chief minister,"" said Dhannu, 25. Dhannu also advocates family with two children.

She says that though she has not decided yet, she may join politics if she "gets an opportunity."

Dhannu, who is called Anushka in the family, says she enjoyed having 'churma', a traditional Haryanvi food while 'litti chokha', a traditional dish in Bihar, was her favourite.

"There is some differences in culture and language between Haryana and Bihar. But, I like the simplicity of the Haryanvis," said Dhannu, who is an interior designer.

"Being from a family of politicians, I find similarities between my home and that of my in-laws. Here too I get to interact with a lot of people,"" she added.

Dhannu stays in Gurgaon with her husband, though, she has also visited Chiranjeev's ancestral house in Rewari.


एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

ओम गौड़ जाएंगे राजस्‍थान, कुलदीप व्‍यास होंगे झारखंड के स्‍टेट हेड

: नवनीत गूर्जर बनेंगे एमपी के स्‍टेट हेड : दैनिक भास्‍कर, झारखंड से बड़ी खबर आ रही है. दैनिक भास्‍कर, जोधपुर के संपादक कुलदीप व्‍यास को झारखंड का नया स्‍टेट हेड बनाया गया है. कुलदीप ओम गौड़ की जगह झारखंड की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. प्रबंधन ने इस संदर्भ में मेल जारी कर दिया है. झारखंड के स्‍टेट हेड ओम गौड़ को राजस्‍थान की जिम्‍मेदारी दी जा रही है. ओम गौड़ झारखंड आने से पहले राजस्‍थान में ही भास्‍कर को सेवाएं दे रहे थे. इन दोनों बदलावों की जानकारी सभी पदाधिकारियों को दे दी गई है.

माना जा रहा है कि प्रबंधन उनके कामों से खुश होकर राजस्‍थान जैसे बड़े स्‍टेट का हेड बनाने का निर्णय लिया है. उल्‍लेखनीय है कि झारखंड में दैनिक भास्‍कर के सभी एडिशनों की लांचिंग ओम गौड़ के नेतृत्‍व में हुई. अखबार ने उनके नेतृत्‍व में बेहतर मुकाम भी बनाया है. अब उनके ऊपर राजस्‍थान में भास्‍कर को मजबूती देने की जिम्‍मेदारी होगी. 

वहीं राजस्‍थान के स्‍टेट हेड नवनीत गुर्जर के बारे में खबर है कि उन्‍हें मध्‍य प्रदेश का स्‍टेट हेड बनाया जा रहा है. हालांकि मध्‍य प्रदेश के स्‍टेट हेड एन रघुरमन जी के बारे में जानकारी नहीं मिल पा रही है कि प्रबंधन उन्‍हें कौन सी जिम्‍मेदारी सौंपने जा रहा है. संभावना जताई जा रही है कि इन बड़े बदलावों के बाद कुछ और बदलाव भी भास्‍कर प्रबंधन करेगा. 

पत्रकार को धमकी दिए जाने को हयूज ने लोकतंत्र पर हमला बताया

रेवाड़ी : पंजाब केसरी (दिल्ली) समाचारपत्र के प्रतिनिधि महेंद्र छाबड़ा को पूर्वमंत्री डा. धर्मवीर यादव द्वारा फोन पर जान से मारने की धमकी देने पर हरियाणा यूनियन आफ जर्नलिस्‍ट्स ने कड़े शब्दों में निंदा की है। हरियाणा यूनियन आफ जर्नलिस्‍ट्स के प्रदेश प्रवक्ता धीरज बजाज ने बताया कि इस मसले को लेकर यूनियन के कार्यवाहक प्रदेशाध्यक्ष अजय मल्होत्रा, प्रदेश महासचिव राजेश गुप्ता व अन्य पदाधिकारियों ने बातचीत कर इस घटना को लोकतंत्र पर हमला बताया है।

पदाधिकारियों ने कहा कि कलम के सिपाही की आवाज को दबाने का कुप्रयास करने वालों के मंसूबे कभी कामयाब नही होने दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस प्रकरण को लेकर यूनियन के सभी पदाधिकारियों की बैठक बुलाई जाएगी तथा सारी स्थिति से मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को अवगत करवाया जाएगा। पदाधिकारियों ने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तथा पत्रकार अगर निष्पक्ष व निर्भीक होकर पत्रकारिता दायित्व को वहन नही करेंगे तो सच्चाई उजागर कैसे होगी? उन्होंने कहा कि पत्रकार महेंद्र छाबड़ा को मिली धमकी की रेवाड़ी जिला प्रशासन निष्पक्ष कार्रवाई करें तथा दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दें। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने इस मसले को गंभीरता से नहीं लिया तो हरियाणा यूनियन आफ जर्नलिस्‍ट्स कड़े कदम उठाने के लिए बाध्य होगी।

पत्र भेजकर कृष्‍णभानु ने कहा – धनंजय इस्‍तीफा दें या कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें

शिमला प्रेस क्‍लब में 13 अक्‍टूबर 2009 के बाद से सालाना चुनाव नहीं हुए हैं. प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष धनंजय शर्मा लगभग ढाई सालों से प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष पद पर काबिज हैं. नियमानुसार 13 अक्‍टूबर 2010 से पहले चुनाव करा लिए जाने चाहिए थे, परन्‍तु ऐसा नहीं हो पाया. अब प्रेस क्‍लब में व्‍याप्‍त गड़बड़ी एवं अनियमितता को दूर करने के लिए हिमाचल के वरिष्‍ठ पत्रकार एवं प्रेस क्‍लब के पांच बार अध्‍यक्ष रह चुके कृष्‍णभानु ने धनंजय शर्मा को जल्‍द से जल्‍द चुनाव अधिकारी नियुक्‍त कर इस्‍तीफा देने की मांग की है.

कृष्‍णभानु ने धनंजय शर्मा को चेतावनी भी दी है कि ऐसा नहीं करने की दशा में कानूनी कार्रवाई के लिए भी तैयार रहें. नीचे कृष्‍णभानु द्वारा प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष धनंजय शर्मा को लिखा गया पत्र.


सेवा में,

श्री धनंजय शर्मा
 प्रेस क्लब ऑफ शिमला
पदमदेव कॉम्लेक्स, दि रिज
शिमला (हि.प्र.)

प्रिय धनंजय,

यह सभी जानते हैं कि प्रेस क्लब ऑफ शिमला के सालाना चुनाव 13 अक्तूबर 2009 को विधिवत तौर पर सम्पन्न हुए थे। क्लब की उपविधि के अनुसार यह चुनाव एक वर्ष के लिए कराए गए थे। इस प्रकार नई प्रबंध कमेटी के लिए 13 अक्तूबर 2010 से पूर्व चुनाव कराए जाने चाहिए थे, जो आजतक नहीं कराए गए। यह भी सभी जानते हैं कि अध्यक्ष संस्था का मुखिया होता है और यदि संस्था में किसी भी प्रकार की अनैतिक व गैर संवैधानिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं तो उसकी पूरी जिम्मेदारी अध्यक्ष की ही होती है। संस्था की उप विधि व दि हिमाचल प्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 2006 के उल्लंघन की तमाम जिम्मेदारी भी संस्था के मुखिया की ही होती है। याद दिला दूँ कि प्रेस क्लब ऑफ शिमला इसी एक्ट के तहत पंजीकृत है।

प्रेस क्लब शिमला के अध्यक्ष के तौर पर शिमला के पत्रकारिता जगत में आप पर निम्नलिखित आरोप चर्चित हैं :-

1.    आप प्रेस क्लब के सालाना चुनाव इसलिए नहीं करा रहे हैं, क्योंकि क्लब पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप हैं। यही कारण है कि आप लगभग ढाई साल से प्रेस क्लब पर अवैध कब्जा जमाए बैठे हैं, जबकि प्रबंध कमेटी के चुनाव 13 अक्तूबर 2010 से पहले हो जाने चाहिए थे।

2.    प्रेस क्लब की प्रबंध कमेटी ने कई बार बैठक में क्लब का लाखों का उधार न चुकाने वाले सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्णय लिया, लेकिन आपने इस निर्णय पर अमल नहीं होने दिया, क्योंकि क्लब के कई उधारखोर सदस्य आपके समर्थक व मित्र हैं।

3.    इसका नतीजा यह निकला कि आज इस छोटे से क्लब की उधारी चार लाख रुपए पार करने लगी है। सबसे ज्यादा उधार आपके एक ऐसे मित्र का है, जो क्लब का साधारण सदस्य भी नहीं है।

4.    क्लब की प्रबंध कमेटी के तीन सदस्य भी कई महीनों से क्लब की देनदारियां नहीं चुका रहे हैं और क्लब के हजारों रुपए दबाए बैठे हैं।

5.    आपने अपने ढाई साल के कार्यकाल में कुछ ऐसे सदस्य भी भर्ती कर लिए हैं, जो न तो क्लब की उपविधि के मुताबिक और न ही दि हिमाचल प्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 2006 के मुताबिक ‘नियमानुसार’ हैं।

6.    यही कारण है कि आपने लगभग ढाई साल में एक बार भी प्रेस क्लब का सालाना साधारण अधिवेशन नहीं बुलाया। आप जानते थे कि साधारण अधिवेशन में आप द्वारा नियमों को दरकिनार कर बनाए गए सदस्यों की सदस्यता को मंजूरी नहीं मिलेगी। अतः जब तक साधारण अधिवेशन में आप द्वारा बनाए गए सदस्यों को अप्रूवल नहीं मिलती, वे भावी चुनावों में वोट के हकदार नहीं माने जाएंगे।

7.    दि हिमाचल प्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 2006 के अनुच्छेद (20) के अनुसार प्रत्येक सोसायटी, जो इस एक्ट के तहत पंजीकृत है, को वित्तीय वर्ष में कम से कम एक बार सालाना साधारण अधिवेशन बुलाना आवश्यक है। इस अधिवेशन में सदस्यों को आय और व्यय के बारे में जानकारी देना लाजिमि है।

8.    आप पर आरोप है कि वित्तीय व अन्य अनियमितताओं के कारण आप न तो साधारण अधिवेशन बुला रहे हैं और न ही सालाना चुनाव कराने में कोई दिलचस्पी दिखा रहे हैं। आप ढाई साल से कुंडली मारकर क्लब में बैठे हैं और प्रा. लि. कंपनी की तरह इसे चला रहे हैं।

9.    क्लब में आपका व्यक्तिगत आचरण भी आपत्तिजनक रहा है। आप कभी मुक्का मारकर क्लब के शीशे तोड़ देते हैं तो कभी किसी सदस्य से पी-पाकर उलझ पड़ते हैं। इससे भी प्रतीत होता है कि आप इस संस्था को जेबी संस्था समझ बैठे हैं। आप पीएं……….. पीते रहें…………. गिलास से पिएं या बाल्टी पी जाएं, लेकिन क्लब की सम्पति को नुकसान न पहुंचाएं।

मैं, प्रेस क्लब शिमला का तीन बार मुख्य महासचिव और लगातार पांच बार अध्यक्ष रह चुका हूँ। मैंने अथवा अन्य किसी भी प्रधान ने कभी क्लब पर कब्जा करने का यत्न नहीं किया और समय पर सालाना चुनाव कराता रहा। हमने इस क्लब को खून से सींचा है। इसे आपकी अगुवाई में किसी भी कीमत पर बरबाद नहीं होने देंगे। आपकी समयावधि 13 अक्तूबर 2010 को समाप्त हो गई है। इसके बाद क्लब में जो भी ट्रांजक्शन हो रही है, वह अवैध और गैरकानूनी है। आपने 13 अक्तूबर 2010 के बाद पद पर बने रहने की मंजूरी साधारण अधिवेशन से नहीं ली है, इसलिए निश्चित तारीख के बाद क्लब में आपकी प्रत्येक गतिविधि कानून सम्मत नहीं है। 13 अक्तूबर 2010 के बाद प्रबंध कमेटी की बैठकें भी अवैध ही मानी जाएगी।

अतः आपको कहा जाता है कि चुनाव/निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति के बाद तुरन्त इस्तीफा दें, अन्यथा अपराधिक व कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें। उप विधि व एक्ट में आपको बर्खास्त/पदच्युत करने के स्पष्ट प्रावधान उपलब्ध हैं। जो आरोप आप पर लगाए गए हैं, क्लब की भावी प्रबंध कमेटी उस बारे फैसला लेगी। धन्यवाद।

भवदीय

(कृष्णभानु)

पूर्व अध्यक्ष

प्रेस क्लब ऑफ शिमला

प्रतिलिपिः-

1.    पंजीयक फर्मस एवं सोसायटी जिला शिमला, शिमला-171001।
2.    मुख्य महासचिव प्रेस क्लब ऑफ शिमला (हि.प्र.)।
3.    प्रबंध कमेटी के सभी माननीय सदस्य।
4.    सभी दैनिक समाचार पत्रों के शिमला स्थित संपादक अथवा ब्यूरो प्रभारियों के ध्यानार्थ। उनसे अनुरोध है कि यह सब हालांकि प्रकाशन हेतु नहीं है। आप इस बारे में अपनी विवेकानुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
5.    क्लब के सभी वरिष्ठतम् एवम् संस्थापक सदस्यों को सूचनार्थ।

बात बात पर कपड़े खोलने वाली पूनम पांडे भास्कर के मुंबई आफिस पहुंचीं

Dilnawaz Pasha : पूनम पांडे आज भास्कर के मुंबई ऑफिस आई थी। वीडियो कांफ्रेंस के जरिए उनसे बात हुई। पूनम पांडे की सबसे खास बात यह है कि वो खुलकर जवाब देती है। पूनम से पूछा कि क्रिकेट ने तो आपके कपड़े उतार दिए हैं…अगर देश में मंहगाई कम हो गई…या गरीबी का आंकड़ा कम हो गया…या भुखमरी खत्म हो गई तो क्या वो भारत की संस्कृति का सम्मान करते हुए कपड़े पहन लेंगी…पूनम पांडे ने साफ कहा नहीं…उनके फैंस चाहते हैं कि वो कपड़े उतारे इसलिए वो उतारती हैं…जब फैंस चाहेंगे की वो कपड़े पहने तो पहन लेंगी…पूनम ने तो राहुल गांधी के पीएम बनने या शादी होने पर भी कपड़े पहनने से इंकार कर दिया… पूनम पांडे की आलोचना के हजार कारण हो सकते हैं…लेकिन उन्होंने हम भारतीयों की दोहरी मानसिकता को अच्छी तरह से नंगा किया है…पूनम को कपड़े पहनने का सबक सब देते हैं लेकिन उसे देखना भी नंगा ही चाहते हैं… और पूनम पांडे भी भारतीयों की मानसिकता को अच्छी तरह से समझती है..तभी तो… खैर… एक सवाल आपसे… पूनम पांडे के कपड़े उतरने से फर्क पड़ता है या नेताओं के? और पूनम पांडे के बारे में अब आपकी राय क्या है…(पूनम पांडे ने टीम अन्ना के साथ जुड़ने से भी साफ इंकार कर दिया है…वो फिलहाल स्ट्रिपिंग को ही एंजॉय कर रही हैं….)

   

रजनीश विश्वकर्मा भ्रष्ट नेताओँ के कपड़े उतरे या ना उतरे, इज़्ज़त ज़रूर उतरनी चाहिए..
 
    Soumitra Roy वाह, पूनम पांडे भास्‍कर में आईं तो सवाल सिर्फ कपड़े उतारने तक ही सीमित रहे। जब मीडिया खुद उन्‍हें इसी नजर से देखती और दिखाती है तो सवाल क्‍यों पूछ रहे हो दिलनवाज ? क्‍या मीडिया को नेताओं के कपड़े उतरने पर कोई फर्क पड़ता है ?
 
    Soumitra Roy एक स्‍त्री का नंगापन मीडिया के बगैर बाजार में नहीं बिक सकता। मीडिया ही असल में समाज का आइना है। पूनम जब भी नए अंदाज में कपड़े उतारती हैं, तुम्‍हारे पोर्टल पर उसे पूरे सम्‍मान के साथ होम पेज पर दिखाया जाता है। पर क्‍या राजनीति की नंगई को भी क्‍या भास्‍कर डॉट कॉम उसी बेदर्दी से दिखा पाता है ?
   
    Dilnawaz Pasha बस सच यही है, खबरों तो सब तरह की होती हैं…नेताओं को बारे में तो बहुत ज्यादा…लेकिन लोग पूनम पांडे की खबरें ज्यादा पढ़ते हैं…।
    
    Poonam Kaushal poonam pandey ki har khabar ko bhaskarbadi achi tarha se cover karta hai…. bhaskar ka page dekho toh wo hi nazar aati h…..pata nai yeh chakar kya h???
     
    Soumitra Roy तुम्‍हारा कमेंट ही तुम्‍हारे सवाल का जवाब है दिलनवाज।
     
    रजनीश के झा patrkaarita ka ponam pandey karan bhaskar ka hi to kiya karaya hai 😉
     
    Rachana Soni kapde utarna koi talent nahi hai jise vo bade gurur se karmvirta ki shreni me rakh rahi hai ….wah bhartiy naari pe kalank hai …jo maryada ki misal hai , tyag ki murti hai , jo sneh aur mamta ke liye vishv me jani jati hai …….nangapan koi kala nahi hai …isse bhartiy mahilao ke prati vishv me chhavi khrab hoti hai ….mai khilaf hu iske
     
    Kuldeep Mishra इधर चंडीगढ़ से हमने मोर्चा संभाला हुआ था. आपको मैं पहचान नहीं पाया. वैसे नोएडा से बहुत बोल्ड सवाल आ रहे थे.
     
    Yogesh Garg इसी प्रंसगवश मैने कल ही एक लेख लिखा था , उसके कुछ अंश दिखा रहा हूं ।
    अभी थोड़ा और लिखना बाकी है
    भारतीय समाज में काम (सेक्स) सम्बन्धी मानसिकता
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    मुझे लगता है पहले आदमी के चेहरे पर मुखौटा नही था , जो भी था खु्ले आम स्वीकार्य था,
    स्त्री मोह मे हरण और गंधर्व विवाह की सामाजिक स्वीकृति थी । खजुराहो का स्थापत्य , वात्स्यायन के कामसूत्र और रति कामदेव की संकल्पना अतीत के खुलेपन की गवाही देते है
    समाज शास्त्री दावे करते है सभ्यता निरन्तर प्रगति करती हुई बेहतर समाज और मूल्यो का निर्माण करती है आज सभ्य होने के भरसक चेष्टा के बावजूद आदमी के मन से काम(सेक्स) को लेकर पाशविक प्रवृति नही गई है । फिल्मे , मीडिया और चैनल, और विज्ञापनो का मनोविज्ञान मनुष्य की काम पिपासा से अछूता नही हैं । महिलाओ और बच्चो के प्रति बढते यौन अपराध इसी सत्यता को प्रमाणित करते है ।
    फिल्म "डर्टी पिक्चर" में 'सिल्क स्मिता' के पात्र के माध्यम से इस मानसिकता को उजागर किया गया है , की समाज में सेक्स बिकता है , संस्कृति के नाम पर गाल बजाने वाले खुद मुंह पर कपड़ा लपेटकर दिन ढले रात के अंधरे में 'सी ग्रेड' के सिनेमा घरो में नजर आया करते है ।
    ऐसे लोगो की भी कमी नही है जो दिन के उजाले में चार आदमियो की बीच में बैठकर ' सन्नी लियोन' को बदचलन वेश्या कहते है और रात को उसी के नग्न विडियो और चित्र इंटरनेट पर तलाश कर अपनी काम ' जिज्ञासा युक्त पिपासा शान्त करते पाये जाते है ।
    भारतीय समाज के ये दोगली मानसिकता है । एक और उदाहरण दुंगा
    बालीवुड यानी फिल्मे – संवाद और दृश्य इसी समाज के प्रतिबिम्ब है , आइट्म सांग की नचनियाओं के नाम की बानगी देखिये शीला , मुन्नी, चिकनी चमेली, जलेबी बाई ,आदि क्या ये विशुद्ध कोठे वाली मानसिकता के परिचायक नही है ?
 
    Himanshu Dwivedi पूनम पांडे का नंगापन मीडिया के जरिये जितना बाज़ार में बिका है उससे कहीं अधिक सोशल मीडिया पर (मुफ्त) बँटा है, और बांटा स्वय पूनम पांडे ने है !
 
    Abhishek Kumar Srivastava gud wrk by u all..real wrk
   
    Anik Gupta Its a fake news dat kiranbedi wants her in teamAnna.
    
    Chandra Jain Tetaon ke kapde utarne chahiye.
     
    Monis Khan Ministers inderctly enjoys the show, thats y they never take any forward step
     
    Ankit Mutreja सर मेी जहा तक समझता हू ये हमारे समाज का ही एक नंगा हिस्सा शीशे में से दिखता है और ज़ाहिर सी बात है मीडिया का काम है इसे दिखाना अगर लोगो को इसमे कोई अपति नज़र आती है तो वो ऐसी चीज़ो का बहिष्कार करे .. अरे आँखो आँखो में बलात्कार करने वाले पुरुष है यहा .. कई दफ़ा देखा है मैने इतने तुछ तरीके से आँखे फाड़ देखते है ..अब पूनम कपड़े उतार रही है तो स्वाभिक सी बात है उन्हे उनके मेहरबान कदरदान भी मिल रहे होंगे.
    
    अब्दुल्लाह युसूफ अब तक के सारे status में सबसे घटिया यह वाला है | आपने कहा की लोग इसे कपडे पहनाना चाहते भी है और इसे नंगा देखना भी चाहते है …यह आपकी बोहुत बड़ी गलत फ़हमी है भाई अब लोग इसे भूल चुके है क्युकी जो चीज़ यह लोगो को दिखाने का वादा करती है और फिर नहीं दिखाती उससे ज्यादा गहराई में सन्नी लिओन दिखा रही है | और इसके कपडे पेहेन्ने से या न पेहेन्ने से कोई फरक नहीं पड़ता नेट भरा पडा है इसकी माओ से | यह तो अभी बच्ची है या यूं कहो यह अभी भी पुरानी खयालो की है जो अपने उन अंगो पर पर्दा डाल देती है जो अब कोई बड़ी बात रह नहीं गए है …..इसके बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगा की काम मांगने के लिए किसी लड़की को इतना मजबूर मेने पहली बार देखा है की वो बेचारी हद में भी रहना चाहती है और हद पार भी करना चाहती है लेकिन कुछ कर नहीं पाती …..यह जो कुछ दिखाने का झासा देती है वो आज से १५ २० साल पहले हव्वा हुआ करता था अब तो गूगल में लिख दो इसकी माये यह कारनामा गहराई में करी हुई बेठी है हा हा हा बेचारी कोई इसे काम देदो यार
     
    Rajvir Dhillon hamam me sab nange…
    par jab kuch logo ke liye media hi hamam ban gya hai…wo log apna hamam sab ko dekhana chahte hai iske zariye….
    ye b sach hai ki sab log esi cheeze dekhte hai…
    or poonam ke liye nanga honga ab uska profesn bn gya hai..

भास्कर से जुड़े युवा पत्रकार दिलनवाज पाशा के फेसबुक वॉल से साभार

पचपन साल के कापी एडिटर शुक्ला जी की मजबूरियां

Mohammad Anas : और सिर्फ इन्ही वजहों से मैं फैसला नही कर पाता कि पत्रकार बनू या फिर एक्टिविस्ट, क्योंकि जीना ही मकसद नहीं मेरी ज़िंदगी का… कल देर रात की बात है, जब ज्यादातर अखबार के दफ्तर में पेज बनाने की जल्दी रहती है, कुछ इस भागमभाग में बाहर खाने पीने भी निकलते हैं, रात के ११ बजे हम भी मध्य प्रदेश की राजधानी में बैठे थे, प्रेस काम्प्लेक्स के करीब ही रहता हूँ, हिन्दी का एक पुराना अखबार है स्वदेश, इसमें एक ५५ साल के व्यक्ति कॉपी एडिटर हैं, नाम है रामसेवक शुक्ला, इलाहाबाद विवि से पढ़ाई, सामान्य सी कद काठी, जहाँ एक ओर लकदक और चमकदार कपड़ों में स्वदेश के एडिटर अपनी कुर्सी पर बैठे मिले वहीँ रामसेवक जी दसियों बरस पहले सिलवाए अपने शर्ट और पतलून में मेरे सामने बैठे थे.

चर्चा होने लगी, कहने लगे ४ बेटियां हैं, तीन की किसी तरह शादी कर दी, एक बची है, इस वक्त इतना भी पैसा नहीं मिलता कि किसी को चाय पूछ लूँ पिलाने के लिए, जबकि आज से दस बारह साल पहले लोगों को खाना खिला देता था, मैंने देखा उनकी आँखों में एक तरफ स्वाभिमान था कि लोगों को खाना खिला देते थे तो दूसरी ओर अजीब सी असहायता, बेचैनी और तड़प, इतना बोलते वक्त उनकी आँखों में आंसू थे पर शायद वो आंसुओं से मुझे रूबरू नहीं करवाना चाहते थे इसलिए चुपके से चश्मे के किनारे से टपकते नमकीन बूंदों को साफ़ करने का असफल प्रयास ज़रूर उन्होंने किया, मैंने अपना हाथ उनके हाथ में रखा, और कहा 'बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ' शुक्ला जी ने मुस्कुराते हुए कहा 'कुछ नही बेटा, बस ईमानदार रहना और दूसरों के लिए सीने में तड़प रखना, ताकि इंसान कहलाये जाओ तुम, क्योंकि जानवर भी अपने मरे हुए साथी की सुरक्षा उसे घेर कर करते हैं, कुछ तो उसे घसीट कर किनारे सुरक्षित स्थान पर पंहुचा देते हैं!

        Sarfaraz Hasan ईमानदार रहना और दूसरों के लिए सीने में तड़प रखना ,ताकि इंसान कहलाये जाओ तुम ,क्योकि जानवर भी अपने मरे हुए साथी कि सुरक्षा उसे घेर कर करते हैं ..
        Kash Hum Seekh Payen..
        Vo Reham Karega Aur Ram Ji Ko Zrur Itminan Milega..
        Aapke Paish-e-Andaaz Ko Salaam Maire Aziz…
 
        Lakhan Salvi aajkal activiston ko press club wale patrakar nahi maante hai
 
        Hafeez Kidwai jo naukri bhagdaur kr source sifarish karke pae usse ap kya ummid kr sakte hai
   
        Mahipal Sarswat ek bat kahun…waqt nikal lo… main bi kuch aisi hi uljhan me hoon…. ho skta h tumhare keemati waqt se mera bi kuch bhala ho jaye… bta dena…wait krunga
    
        Mohammad Anas महिपाल ,किस तरह का समय ,बताइए ,मैं तो अक्सर ही कुछ न कुछ करता रहता हूँ ,ये पोस्ट यहाँ डालने का मन नही था,पर सोचा लिख दूँ ,आप सब पढेंगे तो सोचेंगे ज़रूर ,और सोचने के बाद ही कुछ किया जा सकता है !
     
        Hafeez Kidwai anas sb likhne k bad kuch krna bhi chahiye tabhi uska maqsad pura ho sakta hai sirf chav lene k liye likhna parhna sahi nahi hai
      
        Mahipal Sarswat ye daur aksar zindgi me aa hi jata h…mera hal bi kuch aap jaisa hi h., so ok samjhe bhai,
       
        Mohammad Anas किदवई साब ,मैं आपको व्यक्तिगत रूप से नही जानता न तो आप मुझे ,यदि कोई मित्र आपका मुझे जानता हों तो उससे पहले जान ले ,उसके उपरान्त 'चाव' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करे,क्योकि फेस्बुकिया सलाहकारों और टिप्पणीकारों से एक लाठी का फासला लेकर चलता हूँ मैं (सप्रेम लीजियेगा,आपको ठेस पहुचने का कोई मकसद नही इसमें )
        
        Hafeez Kidwai anas sb aap bhi hame nahi jante wrna itna tikha jawab n dete balki gaur garte mera maqsad aap pr swaliya nishan lagana nahi tha balki ek qadam barhane ka tha jo ap nahi samajh pae……..afsos ke sath mafi
         
        Mohammad Anas आपसे असहमत (सम्मान के साथ )
        मुझे पता है आप मुझसे बहुत बड़े हैं ,बात यही खत्म करते हैं ,अन्यथा अभी आपको बहुत सारा अफ़सोस लिखना पड़ सकता है !
         
        Hafeez Kidwai waqai is tarah bat khatm hogi wo bhi ek zinda patrkar se to afsos to bahut hoga hi
         
        Mohammad Anas मुझे पता है ,आप न तो मुझे मन से ठेस पहुचना चाह रहे थे न ही मेरे लिखे को 'दिखावा' करार देना चाहते थे ,पर आपके शब्दों का चुनाव ही कुछ ऐसा था कि मुझे न चाहते हुए आपसे व्यक्तिगत होना पड़ा ,सार्वजानिक मंच पर मैं लोगों से बहस -मुबाहसे से बचता हूँ ,क्योकि इसका कोई दूरगामी प्रभाव नही दिखता अपितु सम्बन्ध ज़रूर खराब हों जाते हैं !
        बताता चालू कि ,यदि आप कभी इस तरह कि परेशानी झेले (खुदा न करे ) तो मुझे 09074777718 पर बताइयेगा ,मैं नंगे पाँव लखनऊ आ जाऊंगा ,और लडूंगा ,तब तक,जब तक आपके साथ न्याय नही होता !(अब कुछ लोग मुझे मुर्ख कहेंगे इस बात पर )
         
        Hafeez Kidwai apki imandari par shak karna mere bas k bat nahi …………..hamko apke status pasand ate hai isliye kuch kah diya…………warna hamara hargiz irada ni tha ….jo mai sochta hu wahi apke post m hoti hai to zahir hai man me apke bhi kafi kuch hoga jaisa hamne likha hai
         
        Mahipal Sarswat bhai manthan kijiye or ho sake to mujhe bi apne manthan me shamil kr lena,.
         
        Mahipal Sarswat आपसे kuch apna sa लगता है… भाई… bas isiliye milne ki iccha h…. sochta hun jab milenge to kafi baten bi ho jayegi…
         
        Mahipal Sarswat baki sab aap jane…
         
        Piyush Pandey Md. anas ji aapko to me nahi janta par ek patrkar k nate aaka fb friend hun. aapki manavta bali baten dil me chot kar rahi hain. kabhi mandla agman ho to darsan jarur dena.

माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से साभार.

बेहूदा संपादक

Pankaj Jha : एक बेहूदे संपादक ने आज अपने अखबार में लिखा कि बंद का आयोजन और पेट्रोल की कीमत बढ़ना दोनों एक ही तरह का अपराध है. कल को अगर ऐसा कोई बड़ा आतंकी हमला हो जाय, कोई नरसंहार हो जाय तो उसके खिलाफ किसी प्रदर्शन के समय भी ये 'गुनीजन' शायद ऐसे ही लिखेंगे कि जितना गलत नरसंहार है उतना ही गलत ये विरोध प्रदर्शन भी. मज़े की बात ये कि ऐसे ही बुद्धिजीवी लोकतांत्रिक अधिकारों की दलाली भी करते मिलेंगे आपको…लानत है इन पर.

        Jaiprakash Rajpurohit सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन और असहयोग आंदोलन भी अपराध होंगे तब तो
 
        Yagnyawalky Vashishth अरे प्रभो महाबंद की सफलता की बधाई आप हम से भी झोरिए ..दोहरी खुशियां है, एक तो महाबंद सफल रहा, और दूसरा राज्‍य सरकार का वेट टैक्‍स भी बढ गया
 
        Pawan Sharma बहुत सही .
   
        Sushil Sadh आन्दोलन जायज है किन्तु हिंसा नहीं हो
    
        Sangeeta Kumari आपका कहना सही है……..
     
        Pankaj Jha ऊपर वाले पोस्ट में थोडा संशोधन है. उसने ज्यादे ही खतरनाक बात कही है. उस संपादक के अनुसार पेट्रोलियम पदार्थ का दाम बढ़ना नहीं बल्कि कम होना वैसा ही अपराध है जैसा आंदोलन करना अपराध है.
      
        Girish Pankaj ha…haa…..moorkhtaa se bhara lekhan…kis mahaan sampadak ka kathan hai…?
       
        Naresh Chandra Gupta Likhanewala UPA ka Agent hai.
        
        Praveen Pathak ‎75 ki bear, 75 ki petrol, jhum le ya ghum le.
         
        Nirmal Sahu shayad na bhi lekhen. par apne pahle socha. chor police se age rahata hai

भाजपा से जुड़े और जर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय पंकज झा के फेसबुक वॉल से साभार.

पंजाब केसरी के गाजियाबाद कार्यालय में पानी के लिए तरस रहे हैं पत्रकार

गाजियाबाद। पंजाब केसरी, दिल्ली संस्करण के गाजियबाद ब्यूरो कार्यालय में कार्यरत पत्रकारों की हालत वर्तमान में काफी दयनीय हो गई है। पिछले चार माह से गाजियाबाद ब्यूरो के किसी भी पत्रकार को वेतन नहीं मिला है। पत्रकारों की हालत काफी पतली  है। गौरतलब है कि कई वर्षों से गाजियाबाद ब्यूरो का कार्यभार संभाल रहे ब्यूरो प्रमुख डा. बी जमा संस्थान से दुखी हो कर अलग हो गये हैं। पिछले दिनों ब्यूरो में आग लगने से इंवर्टर व कंप्यूटर खराब हो गये थे, जिसे अभी तक नहीं बनवाया जा सका है।

वहीं दिल्ली हेडक्वार्टर ने सभी खर्च से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं, जिससे संस्थान में पीने का पानी तक नहीं है। बेचारे पत्रकार दोपहर में काम करके थके हारे आते हैं तो उन्‍हें ऑफिस में पीने का पानी तक नसीब नहीं होता है। पत्रकारों को पानी के लिए दूसरे के कार्यालय की राह लेनी पड़ती है। काम करने वाले पत्रकार बुरी तरह परेशान हैं। अखबार में बड़े-बड़े संपादकीय लिखने वाले अश्‍वनी कुमार को इन सब चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता है।

जनवाणी का खतौली कार्यालय बंद किया गया

जनवाणी, मेरठ से खबर है कि प्रबंधन ने खर्चों में कटौती करना शुरू कर दिया है. इस क्रम में एक जून से खतौली आफिस को बंद कर दिया गया है. वहां पर नियुक्‍त किए गए सभी स्‍टाफों को हटा दिया गया है. अब यहां पर केवल एक पत्रकार की नियुक्ति की गई है, जो यहां की खबरें देगा. समझा जा रहा है कि प्रबंधन आने वाले दिनों में खर्च कटौती करने के लिए कुछ और कठोर निर्णय ले सकता है.

भदोही में पैसे पर बिका प्रेस क्‍लब, पत्रकार को पीटने वाले को किया सम्‍मानित

भदोही। पत्रकार संगठन कितने चालू और ब्‍लैकमेलर हो गए हैं इसकी बानगी भदोही में देखने को मिली। आसाराम बापू के जिन समर्थकों ने पत्रकार रोहित गुप्‍ता पर हमला किया था, उन्‍हीं में से एक को पत्रकारिता दिवस के दिन सम्‍मानित किया गया। आरोप है कि संगठन के लोगों ने पैसे लेकर पूरे मामले को ठण्‍डे बस्‍ते में डाल दिया तथा आसाराम के साधक को सम्‍मानित किया। इस मामले में रोहित को अब तक न्‍याय नहीं मिल पाया है।

उल्‍लखेनीय है कि पिछले दिनों भदोही के गोपीगंज में सत्संग करने आये आसाराम बापू का समाचार कवरेज करने पहुंचे एबीपी न्यूज (स्टार न्यूज) के पत्रकार रोहित गुप्ता की आसाराम बापू के इशारे पर उनके साधकों ने पिटाई कर दी। यह घटना गोपीगंज के आइडियल कार्पेट कंपनी के पास हुई। आसाराम ने भी पत्रकार को गाली और धमकी दी। साधकों ने रोहित की पिटाई करने के साथ गाली गलौज करते हुये कैमरा भी छीन लिया था। रोहित गुप्ता पर आसाराम बापू तब नाराज हो गये थे जब पत्रकार ने बापू के लक्जरी कार में लगे लाल बत्ती का कवरेज कर रहा था।

एक पत्रकार के पिटाई का मामला भदोही में ही नही पूरे प्रदेश में जोर-शोर के साथ उठा। भदोही जनपद में तो पूर्वांचल प्रेस क्लब / भदोही प्रेस क्लब ने जबरदस्त आंदोलन किया। आसाराम बापू के खिलाफ गोपीगंज कोतवाली में मुकदमा भी दर्ज किया गया, लेकिन चंद दिनों बाद पूर्वांचल प्रेस क्लब / भदोही प्रेस क्लब का आंदोलन पूरी तरह शांत पड़ गया। आरोप लगाया गया कि क्‍लब ने ये आंदोलन रोहित को न्‍याय दिलाने के लिए बल्कि आसाराम बापू के साधकों पर दबाव बनाकर वसूली के लिए किया था। इसकी बानगी देखने को मिली 30 मई को पूर्वांचल प्रेस क्लब / भदोही प्रेस क्लब द्वारा आयोजित पत्रकारिता दिवस पर।

भदोही नगर के स्टेशन रोड स्थित एक होटल में पत्रकारिता दिवस के दौरान दर्जनों पत्रकारों व सैकड़ों लोगों के बीच उन्हीं आसाराम बापू के एक साधक बालकृष्‍ण द्विवेदी को सम्मानित किया गया, जो आसाराम बापू आश्रम भदोही से जुड़ा है। पत्रकारिता दिवस पर सम्मानित किये गये इस साधक की चर्चा पत्रकारों में जबरदस्त है। पूर्वांचल प्रेस क्लब / भदोही प्रेस क्लब द्वारा आयोजित इस पत्रकारिता दिवस का संचालन करने वाले पत्रकारों ने ही धन लेकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसमें इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोग शामिल हैं। चर्चा है कि कई पत्रकारों ने आसाराम बापू भदोही आश्रम से धन लेकर पूरे मामले को दबा दिया तथा उसी धन से पत्रकारिता दिवस आयोजित किया गया।

आरोप है कि पत्रकार पिटाई के मामले मे घूस लेन वाले इन कथित पत्रकारों की वजह से ही पत्रकार रोहित गुप्ता को अभी तक न्याय नहीं मिल पाया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद भी आसाराम सहित उनके किसी समर्थक की गिरफ्तारी नहीं हो सकी। जबकि रोहित ने गोपीगंज थाने में आसाराम बापू, कृष्ण कुमार खटाई, बिहारी केशरवानी, दीनदयाल मिश्रा, किशन कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है।

आडवाणी जी, मीडिया की कृपा से राष्‍ट्रीय नेता बनने वालों से देश को बचाने की जरूरत

नई दिल्ली : बीजेपी में बड़े नेताओं के बीच हमेशा से ही मौजूद रहा झगड़ा सामने आ गया है. लाल कृष्ण आडवाणी ने पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष के काम काज के तरीकों पर सवाल उठाया है. कहते हैं कि मीडिया के लोग केंद्र सरकार पर हमला कर रहे हैं लेकिन उनका अपना गठबंधन भी सही काम नहीं कर रहा है. आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर अपनी तकलीफों को कलमबंद किया है और ६० साल की अपनी राजनीतिक यात्रा को याद किया है. उन्होंने लोगों को याद दिलाया है कि वे बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ के संस्थापक सदस्य हैं.

उनको याद है कि १९८४ में उनकी पार्टी लोक सभा चुनावों में बुरी तरह से हार गयी थी. २२९ उम्मीदवार खड़े किये गए थे और केवल दो सीटें ही हाथ आई थीं. उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में पार्टी जीरो पर थी लेकिन कार्यकर्ता कहीं भी हार मानने को तैयार नहीं था, वह अगली लड़ाई के लिए तैयार था और हमने आगे चल कर कुशल रणनीति से चुनावी सफलता हासिल की और सरकारें बनाईं.

इस के बाद लाल कृष्ण आडवानी ने पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी के काम की आलोचना शुरू कर दी. उन्होंने लिखा है कि जिस तरह से उत्तर प्रदेश के एक भ्रष्ट नेता को साथ लिया गया उस से पार्टी को बहुत नुकसान हुआ है. झारखण्ड और कर्नाटक में भी पार्टी ने भारी गलती की. यह सारी गलतियाँ नितिन गडकरी ने ही की हैं. तीनों ही मामलों में भ्रष्ट लोगों को साथ लेकर पार्टी ने यूपीए के भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने का नैतिक अधिकार खो दिया है. इसी लेख में आडवाणी जी ने अरुण जेटली और सुषमा स्वराज के काम को एक्सीलेंट बताया है. ज़ाहिर है कि वे नितिन गडकरी के काम काज से संतुष्ट नहीं हैं और वे उनको दूसरा टर्म देने की बात से खासे नाराज़ हैं.

लाल कृष्ण आडवाणी की नाराज़गी के कारण समझ में आने वाले हैं. लेकिन केवल गडकरी की आलोचना करके आडवाणी जी ने अपने आपको एक गुट का नेता सिद्ध कर दिया है. इस सारे घटनाक्रम से साफ़ नज़र आ रहा है कि वे गडकरी गुट के खिलाफ अपने लोगों की तारीफ़ कर रहे हैं. सच्चाई यह है कि उनकी पार्टी जिसमें कभी ज़मीन से जुड़े नेता राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होते थे लेकिन अब नहीं हैं. अब बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में है जिनका अपनी ज़मीन पर कोई असर नहीं है. १९७५ में यही काम कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी ने शुरू किया था और कांग्रेस जो बहुत बड़ी और मज़बूत पार्टी हुआ करती थी, वह रसातल पहुंच गयी थी. १९७१ के लोक सभा चुनाव के बाद इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को अपने बेटे संजय गांधी के हाथ में थमा दिया था.

संजय गांधी भी ज़मीन से जुड़े हुए नेता नहीं थे. उन्होंने दिल्ली में रहने वाले कुछ अपने साथियों के साथ पार्टी को काबू में कर लिया और उसका नतीजा सबने देखा. कांग्रेस १९७७ में कहीं की नहीं रही, इंदिरा गाँधी और संजय गांधी खुद चुनाव हार गए. १९८० में इंदिरा गाँधी की वापसी हुई लेकिन वह जनता पार्टी की हर ज्यादा थी, कांग्रेस को तो नेगेटिव वोट ने सत्ता दिलवा दी थी. उसके बाद केंद्र के किसी भी नेता को बाहैसियत नहीं बनने दिया गया. वीपी सिंह ने जब कांग्रेस से बगावत की तो जनता ने उन्हें तख़्त सौंप दिया. लेकिन उनके साथ भी वही लोग जुड़ गए जो राजीव गांधी को राजनीतिक रूप से तबाह कर चुके थे. बाद में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का झगड़ा हुआ और बीजेपी को धार्मिक ध्रुवीकरण का चुनावी लाभ मिला और बीजेपी वाले अपने आप को बड़ा नेता मानने लगे.

आज देश का दुर्भाग्य है कि दोनों की बड़ी पार्टियों में ऐसे नेताओं का बोलबाला है जो दिल्ली के लुटेंस बंगलो ज़ोन में ही सक्रिय हैं. कांग्रेस में भी जो लोग पार्टी के भाग्य का फैसला कर रहे हैं उनमें से सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अलावा किसी की हैसियत नहीं है कि वह लोक सभा का चुनाव जीत जाए. प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक उन्हीं लोगों की भरमार है जो राष्ट्रीय नेता हैं लेकिन राज्य सभा के सदस्य हैं. यही हाल बीजेपी का है. अपने राज्य से चुनाव जीत कर आने वाला कोई भी नेता राष्ट्रीय नेता नहीं है. जो लोग खुद ताक़तवर हैं उन्हें दरकिनार कर दिया गया है. कुछ लोग जो लोक सभा में हैं भी वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कृपा से चुनाव जीतकर आये हैं. दोनों ही पार्टियों में राज्य सभा के सदस्य राष्ट्रीय नेता मीडिया प्रबंधन में बहुत ही प्रवीण हैं और मीडिया के ज़रिये राष्ट्रीय नेता बने हुए हैं. जो लोग ज़मीन से जुड़े हैं. लोक सभा का चुनाव जीतकर आये हैं वे टाप नेतृव नहीं हैं.

अगर अपने ब्लॉग में आडवाणी जी ने दोनों की पार्टियों के इस मर्ज़ की तरफ संकेत किया होता तो यह माना जाता कि वे देश की राजनीति में कुछ शुचिता लाने की बात कर रहे हैं. उनकी टिप्पणी से यही लगता है कि वे बीजेपी में अपने गुट के दबदबे के लिए कोशिश कर रहे हैं. मीडिया की कृपा से नेता बने लोगों से जब तक राष्ट्रीय राजनीति को मुक्त नहीं किया जाएगा, आम आदमी राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं होगा.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्‍ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

ईटीवी को बड़ा झटका, पंकज पंवार एवं राहुल शेखावत समाचार प्‍लस से जुड़े

उत्‍तराखंड में ईटीवी को बड़ा झटका लगा है. ईटीवी के उत्‍तराखंड में शुरुआत से जुड़े दो पत्रकारों ने इस्‍तीफा दे दिया है. देहरादून में ईटीवी के स्‍टाफर के रूप में कार्यरत पंकज पंवार ने समाचार प्‍लस ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें उत्‍तराखंड का डिप्‍टी ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. पंकज लंबे समय से ईटीवी को अपनी सेवाएं दे रहे थे. उसके पहले वे प्रिंट मीडिया से जुड़े हुए थे तथा कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

इनके साथ ही नैनीताल में ईटीवी के रिपोर्टर राहुल शेखावत भी समाचार प्‍लस ज्‍वाइन कर लिया है. राहुल भी उत्‍तराखंड में ईटीवी के फाउंडर मेंबर थे. राहुल को चैनल में प्रिंसिपल करेस्‍पांडेंट बनाया गया है. वे अब अपनी सेवाएं देहरादून में देंगे. ईटीवी से पहले राहुल भी प्रिंट मीडिया के हिस्‍सा हुआ करते थे. राहुल की गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है.

देब्‍दूलाल बने नेटवर्क18 में चीफ गेस्‍ट कोआर्डिनेटर

देब्‍दूलाल पहाड़ी 'देबू' के बारे में खबर है कि वे नेटवर्क18 के साथ जुड़ गए हैं. उन्‍होंने चीफ गेस्‍ट कोआर्डिनेटर के रूप में ज्‍वाइन किया है. देब्‍बूलाल पिछले 19 सालों से पीआर और गेस्‍ट कोआर्डिनेटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इसके पहले ये सीएनईबी में चीफ गेस्‍ट कोआर्डिनेटर और मैनेजर पब्लिक रिलेशन के पद पर कार्यरत थे. देबू उस दौर से इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में सक्रिय हैं, जब चैनलों की शुरुआत हुई थी.

देबू ने अपने करियर की शुरुआत चैनल जी नेटवर्क से की थी. उस समय इसे एल टीवी के नाम से जाना जाता था. देबू लगभग छह सालों तक जी समूह के साथ जुड़े हुए थे. इसके बाद वे राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़ गए. कई सालों तक यहां सेवा देने के बाद वे इंडिया न्‍यूज के साथ जुड़ गए. वे इंडिया न्‍यूज की लांचिंग टीम के सदस्‍य रहे. इसके बाद ये सीएनईबी से जुड़ गए. देबू नेटवर्क18 के चैनलों आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन समेत कई चैनलों में गेस्‍ट कोआर्डिनेशन करेंगे. देबू को तमाम चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर मौजूद पत्रकारों के साथ काम करने का अनुभव है.       

जागरण में बंपर छंटनी (27) : संजय गुप्‍ता, विष्‍णु त्रिपाठी समेत कई वरिष्‍ठों को कोर्ट में घसीटेंगे बिहारी पत्रकार

जालंधर में दैनिक भास्‍कर के पत्रकार की कोर्ट से पुनर्वापसी से उत्‍साहित दैनिक जागरण, बिहार से निकाले गए कर्मचारी अब कोर्ट की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं. पूरे बिहार से निकाले गए कम से कम 23 पत्रकारों ने प्रबंधन को सबक सिखाने तथा कोर्ट में घसीटने की रणनीति तैयार की है. ये पत्रकार प्रबंधन से तीन मोर्चों पर लड़ाई लड़ेंगे. पत्रकार अपनी योजना का खुलासा सात जून के बाद करेंगे. अंदरखाने प्रबंधन को औकात बताने की पूरी तैयारी की जा चुकी है. साथ ही पत्रकार हिंदुस्‍तान की तर्ज पर प्रबंधन के एक ही आरएनआई पर कई एडिशन निकालने की सच्‍चाई को भी सामने लाने की योजना बना रहे हैं. 

गुरुवार को इन पत्रकारों ने एक जगह बैठक करके निर्णय लिया है कि वे प्रबंधन के खिलाफ मानहानि, आपराधिक कार्रवाई का मामला दर्ज कराएंगे तथा उसे राजनैतिक मोर्चे पर भी घेरेंगे. इनमें वे वरिष्‍ठ पत्रकार भी शामिल हैं, जिनकी कई पार्टियों में तूती बोलती थी. और हाल फिलहाल कुछ महीनों के बाद वे रिटायर होने के कगार पर पहुंच चुके थे. अब इन वरिष्‍ठ पत्रकारों ने तय किया है कि अब उन्‍हें अपने करियर की चिंता नहीं लेकिन इस उम्र में धोखेबाजी करने वाले प्रबंधन को बिना हिचक सबक सिखाया जाए. इसके अलावा ये लोग प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री, प्रेस काउंसिल, चीफ जस्टिस को भी ज्ञापन देकर इन समस्‍याओं को उठाएंगे.

पत्रकार प्रबंधन के खिलाफ कोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे साथ ही उनको निकाले जाने या ऑफिस में नहीं घुसने देने के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का मामला दर्ज कराएंगे. इसके बाद ये लोग राजनीतिक पार्टियों से मिलकर अपनी बात रखेंगे तथा उनसे इस संदर्भ में आवाज उठाने का आग्रह करेंगे. बताया जा रहा है कि इन पत्रकारों में कुछ तो लालू यादव के बहुत ही खास हैं. पत्रकारों ने तय किया है कि इस लड़ाई में धन की कमी आड़े नहीं आए इसके लिए सभी बाहर किए गए पत्रकार अपने अपने हिस्‍से का पांच हजार रुपये एकत्रिक करेंगे ताकि लड़ाई को किसी मोर्चे पर फेल नहीं होने दिया जाए.

सूत्रों का कहना है कि इन पत्रकारों को बाहर से वकील भी हायर नहीं करना होगा. इस्‍तीफा के लिए मजबूर किए गए पत्रकारों में एक पत्रकार अधिवक्‍ता भी हैं. जागरण के सभी कर्मियों की लड़ाई यही पत्रकार लड़ेंगे. बिहारी पत्रकार प्रबंधन को सबक सिखाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहते. सूत्र बताते हैं कि बैठक में निर्णय लिया गया है कि ये लोग संपादक संजय गुप्‍ता, बिहार के संपादक शैलेंद्र दीक्षित, कमलेश त्रिपाठी व विष्‍णु त्रिपाठी समेत जागरण के कई वरिष्‍ठों को पक्षकार बनाएंगे. वेतन का पैसा अभी फंसा हुआ है इसलिए ये पत्रकार सात के बाद ही सामने आने की रणनीति तैयार की है.


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जागरण में बंपर छंटनी (26) : बरेली में सुधांशु का तबादला, बनारस में दो का इस्‍तीफा

दैनिक जागरण में छंटनी और तबादलों का दौर जारी है. बरेली और बनारस से खबर है कि एक पत्रकार का तबादला किया गया है तो दो लोगों से इस्‍तीफे ले लिए गए हैं. पहले खबर बरेली से. बरेली में प्रबंधन ने कर्मचारियों से इस्‍तीफा देने को कहा था. सभी लोगों ने इस्‍तीफा देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद प्रबंधन ने इन लोगों के कार्यालय के भीतर घुसने पर रोक लगा दी थी. सभी कर्मचारी रुहेलखंड मीडिया वर्कर एसोसिएशन के बैनर तले लेबर कमिश्‍नर के पास पहुंचे थे. मामले में कानूनी पेंच घुसते देख प्रबंधन ने यू टर्न ले लिया है.

सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने लेबर कमिश्‍नर के सामने इस बात से साफ इनकार कर दिया कि इन पांच पत्रकारों से इस्‍तीफा मांगा गया है या कार्यालय में आने पर रोक लगाई गई है. इसके बाद कार्यालय पहुंचे सुधांशु श्रीवास्‍तव को प्रबंधन ने तबादले की चिट्ठी थमा दी है. प्रबंधन सुधांशु श्रीवास्‍तव का तबादला रांची के लिए कर दिया है. प्रबंधन ने देखा कि जब सीधी उंगली से घी नहीं निकल रहा है तो उसने तबादला नीति अपना लिया. इसी तरह का गोरखपुर में भी किया गया था, जब एक पत्रकार के आत्‍मदाह की चेतावनी से बौखलाए प्रबंधन चार का तबदला दूसरे यूनिटों के लिए कर दिया था. इनमें से तीन पत्रकार इस्‍तीफा दे दिए. बरेली में भी यही दांव अपनाया गया है. अब देखना है कि पत्रकार इस मसले पर कौन सा रुख अपनाते हैं. 

दूसरी तरफ बनारस यूनिट से खबर है कि यहां पर दो लोगों का इस्‍तीफा ले लिया गया है. जिन लोगों के इस्‍तीफे लिए गए हैं उनमें प्रथम पेज देखने वाले वरिष्‍ठ पत्रकार वेद प्रकाश एवं रेलवे बीट देखने वाले काजल चटर्जी शामिल हैं. ये दोनों लोगों लम्‍बे समय से दैनिक जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे, पर छंटनी की जद में आने से बच नहीं पाए. इसके पहले भी बनारस में प्रबंधन कई वरिष्‍ठों को बाहर का रास्‍ता दिखा चुका है.


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पूर्व मंत्री ने दी पत्रकार को जान से मारने की धमकी, मामला दर्ज

रेवाड़ी : शहर थाना पुलिस ने एक पत्रकार की शिकायत पर हरियाणा जनहित काग्रेस के नेता पूर्व मंत्री डा. धर्मवीर के खिलाफ जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज किया है। पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। पूर्व मंत्री द्वारा धमकी दिए जाने के मामले में शुक्रवार को शहर के पत्रकार एएसपी बलवान सिंह राणा से भी मिले तथा पत्रकार को सुरक्षा देने व दर्ज किए गए मामले में उचित कार्रवाई करने की मांग की।

एक हिंदी अखबार के पत्रकार महेन्द्र छाबड़ा ने पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में बताया है कि एक खबर के संबंध में बृहस्पतिवार सुबह उसे पूर्व मंत्री डा. धर्मबीर का फोन आया। पूर्व मंत्री ने खबर के संदर्भ में बात की तथा उस का खंडन करने को लेकर उससे अभद्रता की। पत्रकार ने जब उनसे उचित ढंग से बात करने को कहा तो उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई। पत्रकार ने पूर्व मंत्री की बातचीत को रिकार्ड भी कर लिया है, जिसमें उसे जान से मारने की बात कही गई है।

हिंदुस्‍तान से संजीव गर्ग एवं गोविंद चंद्र का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान, दिल्‍ली से खबर है कि संजीव गर्ग ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर डीएनई के पद पर कार्यरत थे. संजीव अपनी नई पारी अमर उजाला के साथ शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें यहां पर एनई बनाए जाने की खबर है. संजीव काफी समय से हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए थे. उनकी गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. 

हिंदुस्‍तान,‍ दिल्‍ली से गोविंद चंद्र दास ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे भी अमर उजाला के साथ अपनी नई पारी शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें चीफ सब एडिटर बनाया जा रहा है. इनकी गिनती भी सुलझे हुए पत्रकारों में होती है. ये कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. सूत्रों का कहना है कि कुछ और लोग हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देकर दूसरे संस्‍थानों का रुख कर सकते हैं.

आंसुओं के बीच आजतक से विदा हुए कमर वहीद नकवी

31 मई कई बदलावों का साक्षी बना. स्‍टार न्‍यूज इस दिन आखिरी बार प्रसारित हुआ तो आजतक से न्‍यूज डाइरेक्‍टर कमर वहीद नकवी रिटायर हो गए. न्यूज डायरेक्टर के रूप में लंबे समय से कार्यरत कमर वहीद नकवी वो शख्स हैं जिन्होंने आजतक नाम को जन्म दिया था. वे एसपी सिंह के सहायक हुआ करते थे. नकवी ने आजतक के साथ पहली पारी जून 1995 में शुरू की. एसोसिएट एडिटर उनका डिजीगनेशन था. नंबर टू पोजीशन पर थे. एसपी सिंह संपादक थे.

नकवी ने नवंबर 2000 में आजतक को विदा कह दिया था. तब उनका पद चीफ एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर था. वे इब्राहिम द्वारा लाए जा रहे उर्दू न्यूज चैनल फलक के कर्ताधर्ता बने. लेकिन कई वजहों से यह चैनल लांच नहीं हो सका. फरवरी 2004 में नकवी जी ने आजतक में फिर वापसी की, न्यूज डायरेक्टर के पद पर. नकवी ने करियर की शुरुआत नवभारत टाइम्स, मुंबई से की थी. नकवी जी को उनके साथियों ने विदाई दी.

गुरुवार को आयोजित विदाई समारोह में 'दादा' के प्‍यार की दादागिरी को याद किया गया. कई मौके पर भावनाओं का ज्‍वार बहा. कई मौके मुस्‍कराने के भी आए. कुछ प्‍यारी यादें, कुछ अच्‍छी यादों को ज्‍यादातर लोगों ने साझा किया. टीवी टुडे समूह के साथ कुल तेरह साल का साथ छोड़कर विदा होने इतना आसान नहीं था. कर्मचारियों में प्‍यार से 'दादा' कहे जाने वाले नकवी साहब के आंखों में कभी आंसू के बूंद झलके तो कुछ यादों ने चेहरे पर मुस्‍कान भी खिलाया.

अरुण पुरी ने नकवी साहब के योगदान को याद किया तथा उनके कार्यक्षमता की सराहना की. बहुत लोगों को बोलने का मौका मिला. सुमित अवस्‍थी, आलोक श्रीवास्‍तव, श्‍वेता सिंह, अभिसार सबने प्‍यार भरी 'दादागिरी' को याद किया. पर सुप्रिय प्रसाद कुछ बोल ही नहीं पाए. नम्‍बर एक न्‍यूज चैनल के शीर्ष पर बैठे इस शख्‍स के मन के भीतर छिपा देशज बच्‍चा आखिरकार बाहर निकल आया. मतलब की दिल्‍ली में सुप्रिय प्रसाद शायद दुमका का संस्‍कार नहीं भूल पाए हैं.

यही कारण रहा कि जब दादा विदा हो रहे थे तो सुप्रिय के आंखों से आंसू बह रहे थे. दादा ने खूब समझाया पर सुप्रिय के आंसू बंद नहीं हुए. दादा भी भावुक हो उठे तथा एक दूसरे के गले मिलकर एक दूसरे के कंधों को गिला किया. इस दौरान माहौल बहुत भावुक हो गया था. विदाई के समय देखकर प्रतीत हो रहा था कि एक बेहतर टीम लीडर कैसा होता है. किस तरह से अपनी टीम को लीड करता है. आजतक के साथ अपने कई सालों के साथ को दादा ने भी बढि़या अनुभव बताया.

जीएनएन से फ्रैंकलीन निगम का इस्‍तीफा, चैनल का माहौल गरम

छंटनी के बयार में जीएनएन न्‍यूज में भी मामला गरम है. यहां के कर्मचारियों पर भी लगातार तलवार लटक रही है. पंद्रह हजार से ज्‍यादा सैलरी पाने वाले प्रबंधन के निशाने पर हैं. ताजा सूचना है कि आउटपुट हेड फ्रैंकलीन निगम का इस्‍तीफा हो गया है. फ्रेंकलीन ने क्‍यों इस्‍तीफा दिया है तथा कहां से अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय में यहां से कई लोगों की विदाई की जा चुकी है.

इसके पहले चैनल हेड रहे मारुफ रजा, एडिटिंग से नीतेश, ग्राफिक्‍स से नरेंद्र समेत कई लोगों को बाहर किया जा चुका है. चैनल अब वरिष्‍ठों की बजाय ट्रेनियों से चलवाए जाने की कोशिश की जा रही है. इसका परिणाम है कि खबरों को लेकर नए हेड अनंत मित्‍तल परेशान हैं. कहीं कंटेंट सही नहीं जा रहा है तो कहीं शब्‍द में गलतियां जा रही हैं. सूत्रों का कहना है कि इस तरह के माहौल से अनंत मित्‍तल भी परेशान हैं. हिंदी को लेकर सजग रहने वाले मित्‍तल से कर्मचारी भी परेशान हैं. कनिष्‍ठ कर्मी हिंदी लिखने में अक्‍सर गलती कर रहे हैं, जो अनंत मित्‍तल का पारा गरम कर रहा है.

पर सवाल यह उठता है कि जब सीनियर बाहर होंगे और ट्रेनी व जूनियर अंदर होंगे तो इस तरह की स्थितियों का सामना तो करना ही पड़ेगा. हालांकि दूसरी तरफ कर्मी इसलिए भी परेशान हैं कि अनंत मित्‍तल शुद्ध हिंदी लिखने पर जोर दे रहे हैं जो टीवी की भाषा के लिहाज से उन्‍हें उचित नहीं लग रहा है. सूत्रों का कहना है कि ब्रह्मपुत्र हादसे के बाद भी नदी और नद को लेकर तनाव हुआ था. ज्‍यादातर कर्मचारियों को जानकारी नहीं थी कि ब्रह्मपुत्र नद है लेकिन यह शब्‍द ज्‍यादातर लोगों की समझ से बाहर है. कर्मचारी नदी लिख रहे थे, जो अन्‍य लोगों की भाषा समझ के हिसाब से सही था, परन्‍तु अनंत मित्‍तल इससे खासे नाराज हुए.

हालांकि कर्मचारियों के लिए राहत की बात यह रही कि इस बार उनकी सैलरी समय से आ गई. इसे अनंत मित्‍तल की देन बताया गया. अनंत मित्‍तल ने प्रबंधन को भी साफ कह रखा है कि वे ना तो किसी को लेकर आएंगे और ना ही किसी को बाहर करेंगे, लिहाजा अब तक जितने भी लोग बाहर हुए हैं माना जा रहा है कि उसमें एचआर का सबसे ज्‍यादा हाथ है. चिटफंड कंपनी चलाने वाले मालिक भी अब चैनल में हस्‍तक्षेप करने लगे हैं. और बीस के आसपास की सैलरी पाने वालों को ऐन केन प्रकारेण निकालने की जुगत लगाई जा रही है. एडिटोरियल के अलावा पीसीआर एवं अन्‍य विभागों से भी लगातार कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है.

तमाम लोगों को नोटिस दिया जा रहा है. यहां काम करने वाले तनावपूर्ण शांति में जी रहे हैं. उन्‍हें इसका भी अंदाजा नहीं है कि कब उनकी नौकरी चली जाएगी. अच्‍छे काबिल लोगों को लगातार बाहर का रास्‍ता दिखाया जा रहा है. अब कहा जाने लगा है कि जीएनएन ज्‍वाइन करने की ख्‍वाहिश रखने वाले इस चैनल से जुड़ने से पहले हजार बार सोंचे तब निर्णय लें. उल्‍लेखनीय है कि चिटफ‍ंडियों का यह चैनल लगातार विवादों में रहा है.

बिल्‍डर की गलत खबर चलाने का टीवी9 पर आरोप

टीवी9 न्‍यूज चैनल पर एक बिल्‍डर को ब्‍लैकमेल करने के लिए खबरें चलाने का आरोप लगा है. चैनल का निशाना बना है शहाना कंस्‍ट्रक्‍शन ग्रुप. चैनल पर आरोप है कि जिस मामले से सीधे-सीधे बिल्‍डर का कोई लेना-देना नहीं था, उसमें बिल्‍डर को निशाना बनाया गया. बिल्‍डर ने इस मामले में प्रेस के सामने भी अपनी बात रखी.

मुंबई के शहाना बिल्‍डर के मालिक सुधाकर शेट्टी ने आरोप लगाया है कि जिस मामले से सीधा उसका कोई लेना-देना नहीं है. उसमें टीवी9 ने उन्‍हें तथा उनके कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी को निशाने पर ले लिया. सुधाकर की कंपनी बीएमसी द्वारा खाली कराई गई स्‍लम क्षेत्रों में भवन निर्माण कराकर झुग्गियों में रहने वालों को उपलब्‍ध कराती है. इसके लिए बीएमसी ने उनकी कंपनी के साथ समझौता किया है. फिलहाल इस कंपनी के कंस्‍ट्रक्‍शन का काम मुंबई के शाहिन इलाके में चल रहा है.

बताया जा रहा है कि इसी स्‍लम में एक झुग्‍गी थी, जिसे कोर्ट के आदेश पर बीएमसी की टीम ने तुड़वा दिया. बताया जा रहा है कि इस झुग्‍गी का मालिक बिल्‍डर से लम्‍बी रकम मांग रहा था, पर मामला बीएमसी का होने के चलते बिल्‍डर ने पैसे देने से इनकार कर दिया. इसके बाद वह व्‍यक्ति कोर्ट गया जहां उसे हार का सामना करना पड़ा. कोर्ट के आदेश के बाद बीएमसी ने उक्‍त झुग्‍गी को तुड़वा दिया. इससे बिल्‍डर का कोई लेना देना नहीं था क्‍योंकि कांट्रैक्‍ट की शर्तों में शामिल है कि बिल्‍डर को स्‍लम की जमीन बीएमसी खाली कराकर देगी. इसी खबर को टीवी9 ने बिल्‍डर की दबंगई बताकर चलाई.

काफी देर तक बिल्‍डर तथा उसकी कंपनी को दबंग बताते हुए उनके खिलाफ खबरें चलाई गईं. चैनल पर आरोप लगा कि चैनल  गलत तथ्‍यों पर आधारित खबरें चला रहा है. इसके बाद बिल्‍डर ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर पूरी वस्‍तुस्थिति स्‍पष्‍ट की तथा कहा कि मैं सभी जेन्‍यूइन कागज प्रस्‍तुत करने को तैयार हूं, अगर जिस व्‍यक्ति की झोपड़ी बीएमसी ने तोड़ी है, उससे कागजातों की मांग की जाए.

इस संदर्भ में बिल्‍डर सुधाकर शेट्टी का कहना है कि उक्‍त झोपड़ी से मेरा सीधा कोई लेना देना नहीं था. उक्‍त झुग्‍गी-झोपड़ी को तोड़ने का काम बीएमसी के दस्‍ते ने किया, परन्‍तु चैनल ने उसमें मेरी कंपनी की दादागिरी दिखाई, जो तथ्‍यात्‍मक रूप से बिल्‍कुल गलत था. हम सही काम कर रहे हैं. हम सारे पेपर दिखाने को तैयार हैं. चैनल अगर खबर चलाना चाहता है तो दोनों लोगों के पेपर मांग कर देखे फिर खबर चलाए. परन्‍तु ऐसा नहीं किया गया. इस संदर्भ में चैनल का पक्ष लेने की भी कोशिश की गई परन्‍तु संपर्क नहीं हो पाया.

हेमंत तिवारी ने उठाई आवाज, अखिलेश ने कहा – पत्रकारों के लिए महत्‍वपूर्ण घोषणा जल्‍द

सपा सरकार इसी बजट सत्र में यूपी तथा लखनऊ के पत्रकारों के लिए कुछ नए प्रावधान लागू कर सकती है. अगर ऐसा होता है तो इसका बहुत बड़ा श्रेय लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार हेमंत तिवारी को जाएगा. हेमंत तिवारी ने शुक्रवार को मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों की बात को प्रमुखता से उठाया तथा उनसे आग्रह किया कि जल्‍द से जल्‍द इन मामलों पर निर्णय लिया जाए, जिसके बाद अखिलेश ने कहा कि वे इसी सत्र में पत्रकारों के लिए महत्‍वपूर्ण फैसला लेंगे.

अखिलेश यादव पहली बार पत्रकार से रूबरू थे. बजट पेश करने के बाद के ट्रेडिशनल प्रेस कांफ्रेंस में अखिलेश यादव सैकड़ों पत्रकारों के सामने मौजूद थे. उन्‍होंने कुछ अपनी कही, कुछ पत्रकारों ने पूछी. यहां सीनियर पत्रकार भी मौजूद थे. बजट में पत्रकारों को कुछ नहीं मिलने के बाद भी किसी पत्रकार ने इस मामले को उठाने की हिम्‍मत नहीं दिखाई. परन्‍तु वरिष्‍ठ पत्रकार तथा मान्‍यता प्राप्‍त संवाददाता समिति के पूर्व पदाधिकारी हेमंत तिवारी ने भरी सभा में सबके सामने मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से पत्रकारों के कल्‍याण की मांग उठाई.

हेमंत ने कहा कि मुख्‍यमंत्री जी मैं ने दो बार आपको पत्रकारों की कुछ मांगों को लेकर ज्ञापन दिया है, परन्‍तु अब तक उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है, जिस पर सीएम ने उन्‍हें आश्‍वस्‍त किया कि वे इस बार जरूर पत्रकारों के लिए कुछ करेंगे. हेमंत ने कहा कि हमारी मांग है कि यूपी पत्रकारों की स्थिति बहुत ही दुर्दशाग्रस्‍त है. इनके लिए राजस्‍थान, केरल तथा तमिलनाडू जैसे राज्‍य कई उचित प्रावधान कर रखें हैं. पेंशन व्‍यवस्‍था भी लागू है परन्‍तु यूपी में पत्रकारों के लिए इस तरह की कोई सुविधा सरकार की तरफ से नहीं दी गई है.

उन्‍होंने सीएम से यह भी मांग की कि मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकार तथा उनके परिजनों का संजय गांधी पीजीआई में मुफ्त इलाज की व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए, साथ ही पत्रकारों के लिए सस्‍ते दर पर जमीन भी उपलब्‍ध कराने समेत नई कालोनी का निर्माण किया जाना चाहिए. इस पर सीएम अखिलेश ने मुख्‍य सचिव को मंच से ही कुछ निर्देशित किया. अखिलेश जब उठकर जाने लगे तब भी हेमंत तिवारी उठकर उनके पास जा पहुंचे तथा अपने ज्ञापन की याद दिलाई. जिस पर सीएम ने उन्‍हें आश्‍वस्‍त किया कि उम्‍मीद करिए कि हम बजट सत्र में ही पत्रकारों के लिए महत्‍वपूर्ण घोषणा करेंगे. मुख्‍यमंत्री ने मुख्‍य सचिव को भी हेमंत की मांगों का परीक्षण कराकर रिपोर्ट देने को कहा.

अखिलेश यादव के आश्‍वासन के बाद समझा जा रहा है कि मुख्‍यमंत्री इसी बजट सत्र में राज्‍य तथा लखनऊ के पत्रकारों को तोहफा दे सकते हैं. हेमंत राजस्‍थान, तमिलनाडू तथा केरल में पत्रकारों के लिए किए गए प्रावधान की कापियां जुटाने में लग गए हैं. हालांकि इन दौरान लखनऊ के पत्रकारों के बीच की गुटबाजी भी उभरकर सामने आई जब कुछ वरिष्‍ठ पत्रकार हेमंत तिवारी का विरोध करने का प्रयास किया, परन्‍तु पीछे बैठे पत्रकारों ने हूट करके उन लोगों को सफल नहीं होने दिया.

इंडिया टीवी में प्रेसिडेंट (नेटवर्क डेवलपमेंट) बने राजमोहन नैयर

टीवी टुडे समूह से खबर है कि राजमोहन नैयर ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे इस ग्रुप के साथ वाइस प्रेसिडेंट (डिस्‍ट्रीब्‍यूशन) के रूप में जुड़े हुए थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी इंडिया टीवी के साथ शुरू की है. उन्‍होंने यहां पर प्रेसिडेंट (नेटवर्क डेवलपमेंट) के पद पर ज्‍वाइन किया है. वे एमडी व सीईओ रितु धवन को रिपोर्ट करेंगे. इंडिया टीवी प्रबंधन ने उन्‍हें नेटवर्क डेवलपमेंट और ग्रुप के नए चैनलों की जिम्‍मेदारियां सौंपी है.

राजमोहन पिछले दो दशक से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे पिछले सात सालों से टीवी टुडे ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे. उन्‍होंने पंद्रह साल तो ब्रॉडकास्‍ट डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के फील्‍ड में काम किया है. इंडिया टीवी प्रबंधन का मानना है कि अभी डिजिटलाइजेशन का दौर जारी है इसमें टीवी पर खासा असर पड़ेगा और ऐसे समय में राजमोहन उनके लिए महत्‍वपूर्ण कड़ी साबित हो सकते हैं.

हिंदुस्‍तान से अनिता सिंह एवं न्‍यूज टाइम से पावस का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान, दिल्‍ली से खबर है कि अनिता सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे डिजाइनिंग टीम की हेड थीं. अनिता काफी लम्‍बे समय से हिंदुस्‍तान से जुड़ी हुई थीं. बताया जा रहा है कि अनिता अपनी नई पारी अमर उजाला के साथ शुरू कर रही हैं. यहां पर भी उन्‍हें डिजाइनिंग टीम का हेड बनाये जाने की सूचना है. इस संदर्भ में उनसे संपर्क करने की कोशिश की गई परन्‍तु बात नहीं हो पाई. माना जा रहा है कि अनिता सिंह के आने से अमर उजाला को मजबूती मिलेगी.

न्‍यूज टाइम से खबर है कि पावस उपाध्‍याय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी श्रीएस7 न्‍यूज चैनल से लांच की है. उन्‍हें यहां भी उसी पद पर लाया गया है. पावस चैनल वन को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

अमर उजाला, बनारस के जीएम बने एपी सिंह

वरिष्‍ठ मीडिया पर्सन एपी सिंह ने पीजीवीएस, लखनऊ में डायरेक्टर रिसोर्सेज और सीईओ के पद से इस्‍तीफा दे दिया है. एपी सिंह एक बार फिर अमर उजाला में वापसी कर ली है. उन्‍होंने अमर उजाला, बनारस के जीएम कम यूनिट हेड के पद पर ज्‍वाइन किया है. पीजीवीएस ज्‍वाइन करने से पहले वे अमर उजाला में लखनऊ के जीएम कम यूनिट हेड के रूप में काम कर रहे थे.

वे अमर उजाला के साथ अपनी पहली पारी में लगभग छह सालों तक जुड़े हुए थे. उसके पहले वे लगभग आठ वर्षों तक अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्‍सप्रेस में भी जीएम के पद पर थे. एपी सिंह लगभग दो दशक से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. मृदुभाषी एपी सिंह की गिनती मीडिया के तेजतर्रार मैनेजरों में की जाती है. समझा जा रहा है कि इनके आने के बाद बनारस यूनिट को मजबूती मिलेगी.

सीएनईबी में छंटनी का काम पूरा, चेक लेकर घर गए कर्मचारी

सीएनईबी न्‍यूज चैनल से खबर है कि एक जून को एक महीने का नोटिस पूरा होते ही प्रबंधन ने सभी को कार्यमुक्‍त कर दिया है. लगभग ढाई सौ कर्मचारियों को प्रबंधन ने चेक दे दिया है. इसके साथ ही सीएनईबी से छंटनी का काम खतम हो गया. इस दौरान किसी ने भी विरोध नहीं किया. सभी अपने-अपने हिस्‍से का पैसा लेकर दूसरा ठिकाना ढूंढने निकल पड़े. इसके साथ यह भी साबित हो गया कि यह दौर आगे भी जारी रहने वाला है, क्‍योंकि मीडियाकर्मी पत्रकार हित की लड़ाई लड़ने की बजाय इन मौकों पर चेक लेकर खिसक लेते हैं और मालिकान जब चाहे तब इनकी ऐसी की तैसी करते रहते हैं.

सबसे मुश्किल यह है कि इस कठिन परिस्थितियों में ढाई सौ लोगों का बेरोजगार होना एक बड़ा सवाल है. तमाम छंटनियों के बीच इन लोगों को नया ठिकाना मिलना आसान नहीं होगा. इसके साथ ही सीएनईबी के न्‍यूज चैनल से हटकर इंटरटेनमेंट चैनल बनने का रास्‍ता भी साफ हो गया. पहले ही कयास लगाया जा रहा है कि चैनल को ऐसे मोड पर छोड दिया जाएगा जहां लागत कम हो और आमदनी ज्‍यादा. फिलहाल चैनल पर सुबह शाम गुरुद्वारे का लाइव प्रसारण होता है. लिहाजा इसके धार्मिक चैनल के रूप में भी तब्‍दील किए जाने की संभावनाएं जताई जा रही हैं.

जागरण में बंपर छंटनी (25) : जागरण में चिट्टी बम से सीजीएम एवं बिहारियों पर निशाना

दैनिक जागरण पंजाब व हरियाणा से खबर आई है कि दैनिक जागरण के सीएमडी महेन्द्र मोहन के नाम बेनामी चिट्ठी भेजी गई है। इस चिट्ठी में जागरण के पंजाब व हरियाणा में कार्यरत बिहारियों के बहाने सीजीएम निशिकांत ठाकुर पर गंभीर आरोप लगाकर निशाना साधा गया है। आरोप की लंबी सूची में चीफ रिपोर्टर से लेकर समाचार संपादक तक को कटघरे में खड़ा किया गया है। चिट्ठी में लगाए गए आरोप की जानकारी सबको मिले इसके लिए चिट्ठी की प्रति डाक व कर्मचारियों को बाई हैंड भी कार्यालयों में दी गई है।

इस चिट्ठी में लगाए गए आरोप से बिहारी खेमे में सनाटा है, वहीं विरोधी खेमे में जबरदस्त उत्साह होने की सूचना है, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि चिट्ठी में लगाए गए आरोपों की जांच अगर सीएमडी ने करवा दी तो कई बिहारियों की छुट्टी हो जाएगी और इस मामले में सीजीएम निशिकांत ठाकुर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएंगे। क्योंकि सीजीएम पहले अपने ऊपर लगे आरोपों की सफाई देंगे या अपने रिश्तेदारों को बचाने के लिए सामने खुलकर आएंगे। यहां उल्लेखनीय है कि नोएडा प्रबंधन हाल के कुछ माह में पंजाब से निशिकांत ठाकुर का पर कतरते हुए सीधा हस्तक्षेप कर रहा है। इतना ही नहीं पंजाब के स्थानीय प्रबंधन को खुली छुट भी दे रखी है।

पंजाब में मिली निशिकांत विरोधी गुट अपनी सफलता से उत्‍साहित होकर अब अगला निशाना हरियाणा पर भी साध दिया है। इसके तहत यह बताया जा रहा है कि कौन सा चीफ रिपोर्टर पैसे लेकर संवाददाताओं के तबादले करवा रहा है और कौन सा समाचार संपादक उनके नाम की धौंस सब एडिटर व संवादाताओं पर दिखा रहा है। हरियाणा से हिसार यूनिट के कारनामे ने तो भ्रष्टाचार के सभी हदें पार कर दी हैं। तबादले के नाम पर सिरसा में तैनात वरिष्ठ संवाददाता सुरेन्द्र सोढ़ी से पैसे लेने के आरोपों में घिरे हिसार यूनिट के समाचार संपादक सुनील कुमार झा व चीफ रिपोर्टर मणिकांत मयंक का मामला सामने आने के बावजूद भी प्रबंधन ने कोई कार्रवाई नहीं की है।

स्थानीय प्रबंधन द्वारा कार्रवाई न करने के पीछे यह कारण माना जा रहा है कि यदि कार्रवाई हुई तो संबंधित संवाददाता द्वारा उनके खिलाफ चीफ रिपोर्टर मणिकांत मयंक से लेकर समाचार संपादक सुनील कुमार झा व यूनिट हेड मुदित चतुर्वेदी के भ्रष्टाचार संबंधी कई मामले उजागर होंगे। चिट्ठी में आगे यह भी बताया गया है कि पंजाब में हर जिले में चीफ रिपोर्टर रखने की बजाये 5 बिहारियों के हवाले पंजाब की रिर्पोटिंग टीम कर दी गई है। इनमें अरूण श्रीवास्तव, मनोज त्रिपाठी, श्रीधर राजू प्रमुख हैं। इतना ही नहीं पंजाब ब्‍यूरो में कैलाश की भी तैनाती की गई है।


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जागरण में बंपर छंटनी (24) : गोरखपुर में तीन पत्रकारों ने इस्‍तीफा दिया

दैनिक जागरण, गोरखपुर से खबर है कि छंटनी के क्रम में जिन चार लोगों का तबादला दूसरे यूनिटों के लिए किया गया था, उनमें से तीन लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. इन लोगों के इस्‍तीफे से प्रबंधन की योजना सफल हो गई है. उल्‍लेखनीय है कि स्‍टेट हेड रामेश्‍वर पांडेय ने मेल भेजकर वरिष्‍ठ पत्रकार एवं सीनियर सब एडिटर योगेश लाल श्रीवास्‍तव तथा सीनियर सब एडिटर वीरेंद्र मिश्र 'दीपक' को जम्‍मू, सीनियर सब एडिटर धर्मेंद्र पाण्‍डेय का तबादला छत्‍तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नईदुनिया के लिए तथा सब एडिटर मनोज त्रिपाठी का तबादला मुजफ्फरपुर के लिए कर दिया था.

खबर है कि योगेश लाल श्रीवास्‍तव, वीरेंद्र मिश्र 'दीपक' तथा धर्मेंद्र पाण्‍डेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. मनोज त्रिपाठी ने अभी इस्‍तीफा नहीं दिया है लेकिन असमंजस बना हुआ है कि वे ज्‍वाइन करेंगे या अपने अन्‍य साथियों की तरह इस्‍तीफा देंगे. हालांकि इन लोगों के इस्‍तीफे के बाद से यूनिट में तनाव लगातार बना हुआ है. कर्मचारी दहशत में हैं. इन्‍हें डर है कि कहीं अगला नम्‍बर इनका ही ना आ जाए. उल्‍लेखनीय है कि इस्‍तीफा देने वाले एक सीनियर पत्रकार ने कार्यालय के सामने आत्‍मदाह की धमकी दी थी.


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पत्रकारिता में शौकिया तौर पर काम करने वाले ही तथ्‍यों को सामने लाएंगे : यशवंत

: महिलाओं को आगे आकर पत्रकारिता को धारदार बनाना चाहिए – कोश्‍यारी : हल्द्वानी। पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्य सदस्य भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि बदलावों के बीच पत्रकारिता के मूल्य और आदर्शों को बचाए रखना एक चुनौती है। इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया कर्मियों की है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता समग्रता की ओर जानी चाहिए और इसके लिए महिलाओं को आगे आकर पत्रकारिता को धारदार बनाना होगा। श्री कोश्यारी बुधवार को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के तत्वाधान में आयोजित पत्रकारिता के बदलते आयाम विषयक विचार गोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर हिंदी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। उन्होंने पत्रकारों से बद्रीदत्त पाण्डे, हरगोविन्द पंत और मोहन जोशी विक्टर की परम्पराओं को आगे बढ़ाने का  आह्वान किया।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता भडास4मीडिया सम्पादक यशवंत सिंह ने कहा कि पत्रकारिता संस्थान कारपोरेट हाउस बन गए हैं। कई बड़ी कम्पनियां मीडिया में आ रही हैं। इससे मीडिया की विश्वसनीयता हाशिए पर आ गई है और वैकल्पिक मीडिया ने जन्म लिया है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में कार्यपालिका, विधायिका और पत्रकारिता में जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी और कर्मचारी के इतर लोग शौकिया तौर पर जनमुद्दों को लेकर काम करेंगे। उन्होंने कहा कि खासकर पत्रकारिता में तो शौकिया तौर पर काम करने वाले लोग ही तथ्यों को सामने लाएंगे।

उन्होंने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि नौकरशाह, नेता और मीडिया हाउसों के गठजोड ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। लेकिन इसका दोष निचले स्तर पर काम करने वाले लोगों पर लगाया जाता है। जबकि बड़ी मछलियों को पकडने की कोशिश नहीं की जाती है। इसके लिए वैकल्कि मीडिया जमीन तैयार कर रहा है। इस अवसर पर अगले वक्ता के रुप में उत्तराखण्ड विवि के पत्रकारिता विभागाध्यक्ष डॉ. गोविन्द सिंह ने रेडियो से लेकर इंटरनेट और अब सोशल साइटों की पत्रकारिता के इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन माध्यमों के उभरने से पत्रकारिता के आयाम बदल रहे हैं और सुविधा भी मिल रही है। खासकर वैश्विक जन आंदोलन को भी वैश्विकि स्वरुप इन्हीं माध्यमों ने दिलाया। उन्होंने कहा कि सोशल नेटवर्किंग साइटों से मीडिया जगत में क्रन्तिकारी बदलाव हुये हैं, लेकिन इसके पत्रकारिता के मूल्य और आदर्शों को बचाए रखना भी मुशकिल हो गया है।

कार्यक्रम में बतौर विशिष्ट वक्ता प्रयाग पाण्डेय ने उत्तराखण्‍ड राज्य के गठन से लेकर अब तक की पत्रकारिता को नकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि बारह साल गुजर जाने के बाबजूद राज्य का विकास नहीं हुआ है। इसके विपरीत भ्रष्टाचार तेजी से पनपा है लेकिन इस भ्रष्टाचार में शामिल राजनेता, अधिकारी और ठेकेदारों को मीडिया कठघरे में खड़ा नहीं कर पायी है। एक तरह से मीडिया सरकार की पोषक बनकर रह गयी है। उन्होंने कहा कि जनहित में राज्य के विकास के लिए पत्रकारों को साहस के साथ अपनी कलम पर धार देनी होगी।

कार्यक्रम में उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार एसोसिएशन के नैनीताल इकाई के जिलाध्यक्ष विपिन चन्द्रा ने कहा कि पत्रकारिता को संविधान के चौथे स्तम्भ के रूप में देखा जाता है। पत्रकार के उपर न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका तीनों को देखनें की जिम्मेदारी है लेकिन कई पत्रकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं। बदलते दौर में ऐसी पत्रकारिता पर भी निगाह रखने के लिए न्यू मीडिया ने उसके कारनामों को बाहर निकालने के लिए पोर्टल तैयार किये हैं। कई ऐसे पोर्टल पत्रकारों पर निगाह रखने का कार्य कर रहे हैं जैसे भडास4मीडिया। तो बदलते दौर में वो संविधान के पांचवें स्तम्भ के तौर पर देखा जा रहा है।

इस मौके पर टीवी100 के संपादक कुलीन गुप्ता ने कहा कि पत्रकारों को सिर्फ अपना धर्म निभाते हुये कार्य करना चाहिये। इसीलिए उन्होंने अपने चैनल में कुमायूंनी और गढ़वाली भाषा में भी बुलेटिन की शुरुआत की है। वरिष्ठ पत्रकार तारा चन्द्र गुररानी, यूनियन के राष्ट्रीय पार्षद दिनेश मानसेरा, प्रान्तीय उपाध्यक्ष पंकज वार्ष्‍णेय, सहायक निदेशक सूचना योगेश मिश्रा, गणेश रावत, ध्रव रौतेला, सुमित हृदयेश ने भी पत्रकारिता के बदलते आयाम पर संबोधन किया है। इससे पहले कार्यक्रम की सफलता के लिए अतिथियों ने दीप प्रज्‍ज्‍वलित किया। इस मौके पर  लालकुऑ, कालॉढुगी, रामनगर और नैनीताल इकाई के पदाधिकारियों ने भी अपने विचार रखे, जिसमें नाजिम मिकरानी, गणेश जोशी, रघुवीर सिंह, बीसी भटट, प्रकाश जोशी, जिला उपाध्यक्ष चंचल गोला, जिला कोषाध्यक्ष गौरव गुप्ता, महामंत्री विनोद महरा, ईश्वरी लाल, देवेन्द्र महरा, अजय सिंह, विजेन्द्र श्रीवास्तव, सर्वेश दुबे, मुकेश सक्सेना, ओपी पाण्डेय आदि शामिल रहे। कार्यक्रम में हल्द्वानी नगर इकाई के अध्यक्ष ब्रिजेन्द्र मे हता ने आये हुये सभी अतिथियों का आभार जताया।

 फोटोग्राफी : ईश्‍वरी लाल शर्मा

स्‍टार न्यूज आज से हो गया एबीपी न्‍यूज

नई दिल्ली : मीडिया कंटेंट एंड कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड (एमसीसीएस) के बैनल तले लांच हुआ स्‍टार न्‍यूज आज से एबीपी न्‍यूज हो गया. आनंद बाजार पत्रिका समूह के स्‍टार समूह से अलग होने की सारी प्रक्रिया आज पूरी हो गई. इसी तरह कंपनी के दो अन्‍य न्‍यूज चैनल स्टार आनंद, स्टार माझा का नाम भी एबीपी आनंद तथा एबीपी माझा हो गया. आंनद बाजार पत्रिका ग्रुप तथा स्टार इंडिया प्राइवेट के संयुक्त उद्यम एमसीसीएस ने अप्रैल में घोषणा की थी कि स्टार तथा एबीपी ने ब्रांड समझौते को आगे जारी नहीं रखने का फैसला किया है. इसी फैसले के तहत स्‍टार ने अपना ब्रांड नेम वापस ले लिया था.

हालांकि कंपनी प्रबंधन का कहना है कि चैनल में नाम के अलावा कुछ नहीं बदलेगा, परन्‍तु ब्रांडिंग और मार्केटिंग के दौर में ब्रांड बनना इतना आसान नहीं है. एबीपी समूह और स्‍टार समूह दोनों भले ही अलग हो गए हैं लेकिन स्‍टार एमसीसीएस में शेयरधारक बनी रहेगी. नाम बदलाव को लेकर एमसीसीएल ने काफी महंगा ब्रांडिंग कंपेन की है. अब देखना है कि करोड़ों के इस कंपेन का एबीपी न्‍यूज को कितना फायदा होता है. 

राहुल तिवारी एवं सौरभ श्रीवास्‍तव ने समाचार प्‍लस ज्‍वाइन किया

आईबीएन7, मुंबई से खबर है कि राहुल तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे रिपोर्टर की भूमिका निभा रहे थे. राहुल ने अपनी नई पारी लखनऊ में समाचार प्‍लस न्‍यूज चैनल के साथ शुरू की है. उन्‍हें यूपी का डिप्‍टी ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. राहुल ने करियर की शुरुआत 2006 में वाराणसी में दैनिक जागरण से की थी. इसके बाद वाराणसी में ही ये आईबीएन7 के साथ जुड़ गए. लगभग तीन साल पहले इनका तबादला मुंबई कर दिया गया था, तब से ये वहीं पर कार्यरत थे.

हिंदुस्‍तान, गाजियाबाद से खबर है कि सौरभ श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे क्राइम रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. सौरभ ने अपनी नई पारी समाचार प्‍लस के साथ शुरू की है. इन्‍हें चैनल में सीनियर करेस्‍पांडेंट बनाया गया है. इन्‍होंने असाइनमेंट में ज्‍वाइन किया है. साथ ही ये प्रवीण साहनी के एसआईटी टीम में भी अपनी जिम्‍मेदारी निभाएंगे. सौरभ की क्राइम बीट पर अच्‍छी पकड़ मानी जाती है. वे इसके पहले अमर उजाला और राष्‍ट्रीय सहारा को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

न्यूज पोर्टल संचालक मुकेश भारतीय को रांची पुलिस ने हाजत में किया बंद

मुकेश भारतीय राजनामा डाट काम के संचालक और संपादक हैं. रांची में रहते हैं. उन्होंने पायनियर अखबार के फर्जीवाड़े के खिलाफ अपनी साइट पर लिखा तो इससे खुन्नस खाए पायनियर, रांची के प्रकाशक पवन बजाज ने पुलिस पर दबाव बनाकर मुकेश भारतीय को सोते वक्त घर से उठवा लिया. मुकेश इस वक्त रांची के गोंडा थाने की हाजत में बंद हैं. उन पर पायनियर के प्रकाशक पवन बजाज ने लिखित आरोप लगाया है कि उन्होंने पंद्रह लाख रुपये मांगे थे.

उधर, मुकेश भारतीय के करीबियों का कहना है कि मुकेश भारतीय ने आरटीआई के जरिए दी पायनियर से संबंधित कई जानकारियां मांगी थी और कुछ अन्य तथ्यों का पता लगाया था. इससे दी पायनियर के गोरखधंधे का खुलासा हो रहा था. झारखंड के पब्लिक एंड रिलेशन डिपार्टमेंट का कहना है कि दी पायनियर का सरकुलेशन बावन हजार है, और इसी आंकड़े के आधार पर उसे विज्ञापन दिया जाता है. जबकि मुकेश भारतीय का कहना है कि दी पायनियर जिस सन्मार्ग प्रेस में छपता है उसके आंकड़े बताते हैं कि वहां दी पायनियर सिर्फ पंद्रह सौ कापी प्रकाशित होता है. तो, दी पायनियर अखबार हजारों कापियों के फर्जी आंकड़े दिखाकर विज्ञापन ले रहा है जो गलत है.

इससे संबंधित खबरें मुकेश भारतीय अपने पोर्टल पर प्रकाशित कर चुके थे. झारखंड में अखबारों, चैनलों, पोर्टलों आदि को मिलने वाले विज्ञापन के बारे में भी जानकारी पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट से मांगी थी. इस सबके कारण विभागीय अधिकारी भी उनसे खुन्नस खाते थे. दी पायनियर के प्रकाशक पवन बजाज द्वारा दबाव बनाए जाने के बाद कल रात साढ़े ग्यारह बजे चार जीपों में सवार होकर पुलिस दल मुकेश भारतीय के घर पहुंचा.

उनके पड़ोस के मकान से पुलिस के एक जवान ने रिवाल्वर दिखाकर उन्हें पुकारा और नीचे आने को कहा. इसके बाद उन्हें थाने ले जाया गया. वहां उन्हें बताया गया कि राजनामा डाट काम के खिलाफ लिखित शिकायत आई है जिसमें पंद्रह लाख रुपये मांगे जाने की बात कही गई है. इस आरोप से मुकेश भारतीय ने इनकार किया. फिलहाल मुकेश को गोंडा थाने की हाजत में बंद रखा गया है. पत्रकारों ने जानकारी मिलने के बाद पुलिस वालों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है. किसी पत्रकार को बिना किसी एफआईआर हुए गिरफ्तार करने और हाजत में बंद रखने की लोगों ने निंदा की है.