तीन फोटो पत्रकारों को मिला एमएफआई अवार्ड

 

मुंबई : पीटीआई के फोटो पत्रकार मानवेंद्र वशिष्ठ को एमएफआई..यस बैंक राष्ट्रीय प्रेस फोटो प्रतियोगिता, 2012 में पुरस्कार से नवाजा गया। मीडिया फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एमएफआई) द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में वशिष्ठ को खेल श्रेणी में तीसरा पुरस्कार मिला। त्रिकाया के छायाकार सेंथिल कुमारन को पहला और टाइम्स ऑफ इंडिया के सुदीप्तो दास को दूसरा पुरस्कार मिला। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने यह पुरस्कार दिया। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर विभिन्न फोटो पत्रकारों के कार्य की सराहना भी की। (भाषा) 

कार्यक्रम प्रस्‍तुत करते एंकर को पेट्रोल छिड़ककर जलाया

दक्षिण अमरीका के देश बोलिविया में एक रेडियो प्रस्तोता को कुछ अज्ञात हमलावरों ने प्रोग्राम प्रस्तुत करते वक्त उन्हें आग लगा दिया. बोलिविया के दक्षिणी शहर याकुबा के रेडियो स्टेशन 'रेडियो पॉप्युलर' के प्रस्तोता फ़र्नान्डो विडाल पर चार लोगों ने पेट्रोल छिड़क कर आग के हवाले कर दिया. रेडियो स्टेशन के कर्मचारियों ने बताया कि विडाल एक रेडियो शो कर रहे थे जब स्टूडियों में हमलावर घुस आए. इस हमले में विडाल के साथ स्टूडियों में तकनीक पक्ष संभालने वाला एक कर्मचारी भी घायल हुआ है. दोनों पर आग से झुलसने का इलाज किया जा रहा है.

 
तस्करी का विरोध : विडाल के संबंधियों ने बताया कि वो सीमा से सटे इलाक़ों में तस्करी पर रिपोर्ट कर रहे थे जब उन पर ये हमला हुआ. विडाल के दामाद एस्तेबेदान फ़रहान ने बताया कि विडाल का चेहरा, बांहे और सीना आग में झुलस गए हैं. फ़रहान ने कहा कि विडाल स्थानीय सरकार के घोर आलोचक रहे हैं और उन्होंने कई बार अपने प्रोग्राम में भी सरकार के कार्यों की निंदा की है. उन्होंने कहा कि उन्हें शक है कि इस हमले का कारण राजनीतिक है लेकिन पुलिस ने हमले का कारणों पर अभी कुछ नहीं कहा है. हमले में शामिल होने की आशंका पर तीन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. याकूबा शहर अर्जेंटीना की सीमा से सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी पर है. सीमा पार से तस्करी में हाल के दिनों में काफी बढ़ोतरी हुई है, खासकर एलपीजी की तस्करी काफी बढ़ी है. विडाल जैसे पत्रकार इसका विरोध करते आए हैं. (बीबीसी)

सरकार के दबाव में जी न्‍यूज : नहीं किया केजरीवाल की प्रेस कांफ्रेंस का लाइव कवरेज

 

: सिर्फ हंगामे की खबर प्रसारित की : रोहतक। अरविंद केजरीवाल का नया खुलासा हो और कोई चैनल उसे महत्व ही न दे तो फिर आसानी से समझ में आ सकता है कि मामला गड़बड़ है। बुधवार को केजरीवाल ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में प्रेस कांफ्रेंस की। जिसमें रिलांयस को लेकर बड़ा खुलासा किया गया। देश के सभी चैनल्स ने इस कांफ्रेंस की लाइव कवरेज की लेकिन जी न्यूज में उस समय कहीं उसका जिक्र तक नहीं था। वह उस समय चक्रवात की खबर दिखा रहा था। ऐसे में जी न्यूज पर सवाल उठना लाजिमी है। 
 
यह चैनल नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपए मांगने की खबरों के चलते पहले से ही सवालों में है। लगता है इसी मामले को लेकर चैनल पर पूरी तरह से सरकार का दबाव है कि केजरीवाल को ज्यादा महत्व न दिया जाए। तभी तो जिस चैनल ने लाइव कवरेज नहीं दिखाई वह चैनल तब उस समय लाइव कवरेज दिखाने लगा जब कांफ्रेंस में हंगामा हो गया। चैनल ने टिक्कर में भी सिर्फ यह दिखाया गया कि केजरीवाल ने वाजयेपी के दामाद और राडिया की एक टेप जारी की है। हालांकि एक और प्रमुख न्यूज चैनल न्यूज24 ने केजरीवाल को महत्व नहीं दिया लेकिन वह चैनल केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला का है। यह बात तो समझ में आती है जो व्यक्ति केंद्र सरकार में मंत्री हो, उसका चैनल उसी की सरकार के खिलाफ होने वाली प्रेस कांफ्रेंस नहीं दिखाएगा लेकिन जी न्यूज की ऐसी क्या मजबूरी रही?
 
इंडिया अंगेस्ट क्रप्शन की ओर से एक दिन पहले ही घोषणा कर दी गई थी कि 31 अक्टूबर की शाम को एक और खुलासा होगा। ऐसे में सभी न्यूज चैनल वाले समय से पहले ही अपनी ओवी वैन लेकर पहुंच गए थे। निर्धारित समय 4 बजे अरविंद केजरीवाल की कांफ्रेंस भी शुरू हो गई और सभी चैनल्स ने लाइव कवरेज शुरू कर दी। सभी चैनल्स सिलसिलेवार आरोपों को दिखा रहे थे। लेकिन जी न्यूज चैनल तो भारत में नीलम नामक प्राकृतिक आपदा खबर ही दिखाता रहा। 
 
आधे घंटे बाद जी न्यूज ने ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर सिर्फ यह खबर दिखानी शुरू की कि आईएसी ने आडियो टेप जारी किया और उसमें अटल बिहारी वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य और नीरा राडिया का नाम आया है। अरविंद केजरीवाल की प्रेस कांफ्रेंस में जब पौने पांच बजे हंगामा हुआ तब एकाएक जी न्यूज ने उसकी लाइव कवरेज शुरू कर दी कि केजरीवाल से सवाल पूछने पर हंगामा। यानी रिलायंस के बारे में खुलासे की कवरेज नहीं की और हंगामे की तुरंत कर दी। यह कैसी पत्रकारिता है कोई भी आसानी से समझ सकता है। ऐसा लगता है कि जिंदल से विवाद के बाद जी न्यूज सरकार के दबाव में है। अपने पर आरोप लगने के बाद लगातार दिन-रात चिल्लाने वाले सुधीर चौधरी आज कहीं नजर नहीं आ रहे थे।
 
दीपक खोखर की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09991680040 के जरिए किया जा सकता है. 

 

‘ग्‍लोबल इंडिया’ के प्रसारण के लिए बीबीसी ने मिलाया ईटीवी से हाथ

 

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस और भारत के ईटीवी नेटवर्क ने बीबीसी हिंदी टीवी कार्यक्रम ‘ग्लोबल इंडिया’ के प्रसारण की घोषणा की है. यह शो देशभर के हिंदीभाषी राज्यों में भारत के प्रमुख क्षेत्रीय नेटवर्क ईटीवी के पाँच चैनलों पर प्रसारित किया जाएगा. दो नवंबर, शुक्रवार, से हर सप्ताह बीबीसी हिंदी का नया टीवी कार्यक्रम ईटीवी बिहार- झारखंड, ईटीवी उत्तर-प्रदेश-उत्तराखंड, ईटीवी राजस्थान, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ और ईटीवी उर्दू पर प्रमुख समय पर प्रसारित होगा.
 
बीबीसी हिंदी की रूपा झा इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करेंगी. आधे घंटे का साप्ताहिक कार्यक्रम ‘ग्लोबल इंडिया’ दुनिया भर में बीबीसी पत्रकारिता के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को सामने लाएगा. इसकी खास पहचान होगी दुनिया की उन खबरों को भारतीय दर्शकों तक लाना जिसका गहरा सरोकार उनकी जिंदगी से है.
 
दर्शकों से जुड़ाव : ईटीवी चैनलों की व्यापक पहुँच के जरिए इस शो का उद्देश्य समसामायिक खबरों को लेकर संस्कृति, तकनीक, स्वास्थ्य, कला-जगत औऱ आम लोगों से जु़ड़े विषयों के साथ लाखों हिंदी भाषी दर्शकों से जुड़ना है. रूपा झा के मुताबिक, “हमारे नए टीवी कार्यक्रम को प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी से मैं बहुत रोमांचित हूँ. ‘ग्लोबल इंडिया’ बीबीसी की उन खबरों को भारतीय दर्शकों तक लाएगा जो पूरी दुनिया में फैले बीबीसी पत्रकार हर पल जीते हैं. लंबे अरसे तक बीबीसी रेडियो औऱ ऑनलाइन से जु़ड़े होने के बाद टीवी के जरिए बीबीसी से चाहनेवालों से जुड़ने का अनुभव काफी अनोखा होगा.”
 
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की हेड ऑफ जर्नलिज्म प्रमुख निक्की क्लार्क ने कहा कि भारत में बीबीसी के लिए यह एक अहम् पड़ाव है. और इस नए टीवी कार्यक्रम के साथ बीबीसी हिंदी भारत में अपनी पहचान मजबूत करेगा. ‘ग्लोबल इंडिया’ हर शुक्रवार ईटीवी नेटवर्क के पाँच चैनलों पर प्रसारित किया जाएगा. बीबीसी 

केजरीवाल ने जो टेप सुनाए, उसे यहां पूरा सुनिए (रंजन भट्टाचार्या – नीरा राडिया संवाद)

जब अटल बिहारी वाजपेयी पीएम हुआ करते थे तो उनके दामाद रंजन भट्टाचार्या बड़े पावरफुल हुआ करते थे. नीरा राडिया देश की टाप लाबिस्ट हैं, जो टाटा समेत कई कंपनियों के लिए काम करती थीं, ताकि उन कंपनियों की हितों की रक्षा के लिए सरकार व नीतियों को प्रभावित किया जा सके. रंजन भट्टाचार्या से नीरा राडिया की बातचीत के दो टेप हैं, जिन्हें यहां अपलोड किया जा रहा है, साथ ही उनके बीच बातचीत का लिखित ब्योरा (ट्रांसक्रिप्ट) भी प्रकाशित किया जा रहा है. अरविंद केजरीवाल ने आज इन्हीं रंजन भट्टाचार्या का यह टेप प्रेस कांफ्रेंस में सुनाकर बताया कि किस तरह मुकेश अंबानी और उनके लोग कांग्रेस को अपनी दुकान मानते हैं और इन्हीं मुकेश अंबानी के हितों की रक्षा के लिए भाजपा शासनकाल में भी खूब पक्षधर नीतियां बनती थीं. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


टेप नंबर एक

Ranjan Bhattacharya: (Coughs) Hi!

Niira Radia: You’re not well?

Ranjan Bhattacharya: I have a cough.

Niira Radia: Oh, dear me.

Ranjan Bhattacharya: (Coughs)

Niira Radia: Your friend Sunil Mittal…

Ranjan Bhattacharya: Hmmm…

Niira Radia: He’s lobbying against Raja.

Ranjan Bhattacharya: He’s lobbying against Raja?!

Niira Radia: And he’s pushing Maran.

Ranjan Bhattacharya: Sunil to just arrived last night.

Niira Radia: Nahii, he was working in the background.

Ranjan Bhattacharya: Achha, because he called me yesterday… day before… he actually was in London, he just met my daughter, he asked me are you also there? I said, don’t be silly yaar. Achcha. So he’s lobbying against Raja for Maran?

Niira Radia: He’s making a mistake because woh Cabinet mein Telecom to siraf Raja ke paas jayega. [In this Cabinet, Telecom is only going to go to Raja]

Ranjan Bhattacharya: But tell me – ah, how is the PM reacting? Because till this morning…

Niira Radia: PM has said nothing on this – it's just Navika Kumar who has gone overboard on the say-so of Virat Bhatia, vis a vis Maran and Sunil Mittal (inaudible).

Ranjan Bhattacharya: No no, say it again, sorry?

Niira Radia: You see Navika in Times Now is working on the DL for Virat Bhatia.

Ranjan Bhattacharya: Who is Virat Bhatia?

Niira Radia: Viraj Bhatia is an AT&T guy, and also he used to be the pointman for Maran in Delhi.

Ranjan Bhattacharya: Oh that tall boy?

Niira Radia: Tall boy.

Ranjan Bhattacharya: Ah.

Niira Radia: So he’s always been Maran’s PR machinery when Maran was candidate, (inaudible)

Ranjan Bhattacharya: I see, no but…

Niira Radia: He introduced him to all his relationships to the Telecom journalists.

Ranjan Bhattacharya: But tell me… He’s the… not the old man… the final authority on…?

Niira Radia: He is, but the Old Man’s got stuck. I'll tell you what he did. He’s sent five names to Congress on Monday, which was Railways for Maran, Power for Baalu, Telecom for Raja, Surface for Azhagiri…

Ranjan Bhattacharya: For what? Who?

Niira Radia: Surface for Azhagiri, his son…

Ranjan Bhattacharya: Ah, Azhagiri…

Niira Radia: And Health for Kanni, and he’d indicated that Kanni can be Health or Environment and Forests in the independent capacity.

Ranjan Bhattacharya: MoS, huh?

Niira Radia: MoS. He knew that Railways would never get accepted and he knew that Power would not get accepted.

Ranjan Bhattacharya: Okay.

Niira Radia: He’d also given the indication that he was under pressure from his family.

Ranjan Bhattacharya: (chuckles)

Niira Radia: So one is committing suicide in one house, another is committing suicide in another house. And I would have thought that the Congress would have been a bit more smarter, by not pushing Maran’s case all by themselves.

Ranjan Bhattacharya: Right.

Niira Radia: So all this media blitz that they didn’t do anything about from day one, they made this case for Raja and Baalu.

Ranjan Bhattacharya: Hm…

Niira Radia: But as far Karunanidhi was concerned he cannot say no to Raja, because Raja is a Dalit.

Ranjan Bhattacharya: Yeah, yeah

Niira Radia: He needs to bring him into the Cabinet.

Ranjan Bhattacharya: No, and plus everyone else will say saale khaalii apne parivar ko de diya aur kisii kaa kuchh kiyaa nahii… [Everyone will say you took your share, gave it to your family and as for everyone else…]

Niira Radia: Hanh, and Raja uskaa aadmi hain. [Yes, and Raja is his man] All the sons like him, everybody likes him, amenable hain to the party and most trusted aadmii hai. Usko kaun nikalenge? [Who will remove him?]

Ranjan Bhattacharya: Right.

Niira Radia: Woh jyo bhi karle, Sunil Mittal jo bhii kar le, usko koi nahi nikalenge. [Let him do anything. Nobody will remove him.] To which Karunanidhi told Ghulam Nabi Azad, Raja will be my Telecom IT Minister, Prime Minister said I have no problem with that.

Ranjan Bhattacharya: Mmhmm.

Niira Radia: When all the blitz was going on, yesterday I spoke to Karunanidhi, I said why are you doing this?

Ranjan Bhattacharya: Mmm.

Niira Radia: Sunil ka naam tho aa hi gaya. [Sunil’s name came up]

Ranjan Bhattacharya: Mmhmm.

Niira Radia: A lot of people don’t want him, and all that, this that and the other. Then I made Barkha call up Congress, and get a statement from Congress whether the Prime Minister had actually said he doesn’t want Baalu and…

Ranjan Bhattacharya: Yeah, yeah.

Niira Radia: She carried that he had never said it.

Ranjan Bhattacharya: Yes, I read that.

Niira Radia: Now the Congress has issued another statement saying that they’re not talking, they never really talked about people.

Ranjan Bhattacharya: Mm mm.

Niira Radia: The problem is that Azhagiri is a pretty large, big leader from the South.

Ranjan Bhattacharya: Yeah.

Niira Radia: You know he himself carries a lot of weight in the party.

Ranjan Bhattacharya: Yeah. Yeah. Yeah.

Niira Radia: (inaudible) Baalu aur Raja ko keh raha thaa that if Baalu and Raja get Cabinet, I have no problem getting MoS.

Ranjan Bhattacharya: Who – this is Azhagiri?

Niira Radia: Azhagiri. And Kanni and I can both be MoS. I have no problem, provided it is not Maran.

Ranjan Bhattacharya: It is not Maran. Right.

Niira Radia: If Maran becomes Cabinet, then I must get Cabinet, that is why you got four.

Ranjan Bhattacharya: Mm, mm.

Niira Radia: And the problem is that. (pause) But Congress is stupid – they should have just given a message very very clearly…. it’s Karunanidhi’s fault. That –

Ranjan Bhattacharya: Niira, just hang on, you’re breaking up, I’m going through this area, one minute. (pause) Hanh, can you hear me?

Niira Radia: Ha, I can hear you.

Ranjan Bhattacharya: Ruko, TuuT rahaa hai… ek minute ruko, ek minute ruko.

(Recording ends)


टेप नंबर दो–

Ranjan Bhattacharya: Oh okay, so let me understand what you are saying… the family guys are okay to get MoS, more or less.

Niira Radia: Both the…

Ranjan Bhattacharya: Provided, provided this Maran boy does not get cabinet… right?

Niira Radia: Correct, correct.

Ranjan Bhattacharya: And they are best, there are people outside the family and outside the Congress who are pushing for Maran, right?

Niira Radia: And Sunil Mittal’s name is one of them.

Ranjan Bhattacharya: Listen I, I mean talking to Sunil is no point because obviously he has got this thing. Between you and me, I have a great line to Ghulam Nabi, for whatever he counts.

Niira Radia: I have been sending him a message since morning, I told Mukesh also to speak to him and tell him to speak to Kani, because Kani will take him directly to her father. They really spoiled it for themselves because they could have got away with two cabinet berths.

Ranjan Bhattacharya: Ab unke tiin dene paRenge

Niira Radia: Ab tiin dene paRenge. Yeh Baalu ko bhi drop karvaa sakte thhe kyuunki unhe keh sakte thhe Thiik hai, now they have to go through the whole process of three. They will have to be… again this whole argument that will happen, ke tiin mein kaun include ho. Raja include hogaa, Azhagiri include hogaa, Maran ko include karenge, toh baki tumhaare Tamil leaders jo is baari elections jiit ke aayenge voh kahenge hamara kya hogaa?

Ranjan Bhattacharya: I mean exactly aur yeh toh biich mein bhag gayaa thha

Niira Radia: Maran was the big challenge, and not because I do not like the guy, but genuinely that was a big problem. Maran kept on saying that both Ghulam Nabi Azad and Ahmed Patel have said to him that he, they want him to be in the Cabinet and that he is the only who is an acceptable face.

Ranjan Bhattacharya: I do not think. How can a Congress guy, I mean if somebody had told me PM has said it or Sonia said it… How can a Ghulam Nabi Azad or Ahmed Patel insist on [it]? It is like saying aapke ghar mein main tai karun

Niira Radia: Unhone insist nahiiN kiyaa hai, unhone kahaa hai humko Congress ko kya acceptable hai woh hai Dayanidhi Maran, so Karunanidhi got awfully confused. The second thing that came up with Congress… said well but Karunanidhi took Maran with him to the UPA meeting, that is because Kani had disappeared somewhere else, visited somewhere else, and he does not consider woh toh Chennai mein kissi ko bhi apne saath le jaata hai

Ranjan Bhattacharya: Exactly, aisaa kyaa hai, usse koi angrezi, ungrezi samajhne waala bhi chahiye

Niira Radia: Toh usko isliye le ke gayaa thha kyuunki Baalu nahin thha. Kani was not available. Well, he had not, and no one person has been appointed to negotiate, Maran is not the point person to negotiate.

Ranjan Bhattacharya: Achcha aisa hai, yeh toh abhi jaa raha hai apni swearing-in pe, meri abhi kisi se baat hui toh Ghulam, GNA, is being sworn in, naa [It is like this, he is going for his swearing-in, I just spoke to someone, Ghulam, GNA is being sworn in, no].

Niira Radia: What is he getting?

Ranjan Bhattacharya: Bhai, they are not admitting it, mil toh raha hai aur usko liya bhi iss liye jaa raha hai, he is getting Parliamentary Affairs basically. Being a senior guy, he will be basically Parliamentary Affairs Minister… only has job for three months, nau mahiine kya karegaa. So he is lobbying for something, but abhii tak inhone tai toh nahin kiya

Niira Radia: Tell them to give him aviation, Praful ko baahar rakho

Ranjan Bhattacharya: Nahin, Praful ne toh raat ko itna drama kiyaa; apparently, they toh at midnight jaa ke Praful ko aviation bolaa hai, par Praful ki aaj swearing-in nahin hai

Niira Radia: Yeah, I know that.

Ranjan Bhattacharya: Inki sabki Tuesday ki hai.

Niira Radia: MoS hai.

Ranjan Bhattacharya: MoS hai, independent.

Ranjan Bhattacharya: Aur mujhko Ramesh Sharma called up bahut achcha hai hamare Anand Sharma ho rahein hain, my information is Anand Sharma nahin hain

Niira Radia: Anand Sharma hai isme

Ranjan Bhattacharya: Nahin hai, yeh sab media ne…

Niira Radia: Mujhe Mukesh ne bola

Ranjan Bhattacharya: Chalo dekhte hain, mere ko nahiiN lagtaa hai

Niira Radia: Elevated to Cabinet.

Ranjan Bhattacharya: Nahin, Cabinet, par abhii aaj uskaa abhii media chalaa rahaa hai at least tiin ghante pehle tak naa usko chithhi aai thhi, naa Mukul Wasnik ko chithhi aai thhi

Niira Radia: Achcha

Ranjan Bhattacharya: But I don’t know.

Niira Radia: …

Ranjan Bhattacharya: So is Mukesh happy with…?

Niira Radia: Very happy.

Ranjan Bhattacharya: (Laughs) You know what he told me.

Niira Radia: What?

Ranjan Bhattacharya: He tells me, he says, you know, he is in his usual style, kya kyo, I told him ‘Mera chhodo, kya kyo, aapko kya hai

Niira Radia: Hmm

Ranjan Bhattacharya: He says, Sir, theek hai. I said, Mukesh, once in a while show some bloody emotion. Aapka to sab kaam ho gaya (all your work’s been done).

Niira Radia: Hmm.

Ranjan Bhattacharya: Motu nahin aaya, yeh nahin hua (fatty didn’t make it). He replied, ‘Haan yaar, you know Ranjan, you’re right, ab to Congress apni dukaan hai (now the Congress is our shop).’

Niira Radia: (Laughs) Why has Bhardwaj not come in?

Ranjan Bhattacharya: Who?

Niira Radia: Bhardwaj?

Ranjan Bhattacharya: Who is not coming, sorry?

Niira Radia: Bhardwaj, Bhardwaj

Ranjan Bhattacharya: I cannot understand, sorry.

Niira Radia: Bhardwaj, law minister.

Ranjan Bhattacharya: Bharadwaj! Oh yeah, he has done such a lot of kabaaRaa, and especially in those two cases now where CBI then botched it up in both the DA ke assets. These are all under law ministries' instructions, so they are pretty pissed off with him. I think they are also now getting in the core guys and then the youngsters, but now I wonder who will get law; will Kapil get it, I dunno?

Niira Radia: I wonder, I wonder, maybe Kapil only.

Ranjan Bhattacharya: Um, hmm?

Niira Radia: Maybe.

Ranjan Bhattacharya: But lawyer toh wohi hai par

Niira Radia: Oh yes. No, Ranjan, when you speak to Ghulam, you should tell him that they really messed it up, haan?

Ranjan Bhattacharya: No, so now basically you want me to convey ki aap Kanimozhi ke through jaa ke buddhe ko seedha milo, yai hai na.

Niira Radia: Agar tum log jo list tumhe bheji thhi uspe agar Baalu or Maran ko mana kar dete toh tumhaaraa problem solve ho jaataa

Ranjan Bhattacharya: Bhai, ab toh woh nahin hua toh ab kya karna hai

Niira Radia: Abhi unko Kanimozhi ke paas they have to call her and go directly and meet Karunanidhi. They have to relay two things, they do not want to give infrastructure to Baalu or Maran.

Niira Radia: They have no issue where Raja is concerned, kyuunki unhe pataa hi hai even if they have an issue, the old man is going to bring Raja; he is very clear about that. So don’t antagonise him, because he has got Dalit as now they will have to give Azhagiri one, Raja one and one maybe they will give to another leader from Tamil Nadu, or they will, just so that they keep this whole controversy out, they will give it to Baalu only, and then drop Maran altogether and give Kani an independent charge.

Ranjan Bhattacharya: So Azhagiri independent charge or Cabinet, they are okay with it.

Niira Radia: Azhagiri in Cabinet because tiin ho gayaa toh Azhagiri ko denaa hi paRegaa

Ranjan Bhattacharya: Okay, but this will happen only late, it will only happen late night.

Niira Radia: Yeah, but if they keep Maran out, maybe they will be able to still get away with two.

Ranjan Bhattacharya: Oh, okay.

Niira Radia: Which will then make this guy come out quite well … Karunanidhi, saying, ‘Forget about what the channels are saying about me, or Jayalalitha is saying, both my children are taking MoS independent and I am bringing Baalu and Raja to be the cabinet ministers, they are not my family.’

Ranjan Bhattacharya: Okay, now listen, I mean GNA channel is there, if I send word straight to SG, is that better?

Niira Radia: SG is… kaun?

Ranjan Bhattacharya: (Laughs) SG is SG boss.

Niira Radia: Oh, beg your pardon, sorry I didn’t get, haan yeah, yeah, bhijwaa doh

Ranjan Bhattacharya: Because that then I can achieve in the morning. I am meeting somebody.

Niira Radia: Par tum isko GNA ko bhi bol doh [you tell this to GNA as well], he is handling Tamil Nadu.

Ranjan Bhattacharya: I know, Thiik hai

Niira Radia: Tell him they are being misled by this guy Maran.

Ranjan Bhattacharya: Okay.
 


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(सुनें)

केजरीवाल का आज का धमाका- मुकेश अंबानी की दुकान हैं कांग्रेस और भाजपा

नई दिल्ली। नेता अरविंद केजरीवाल सही रास्ते पर जा रहे हैं और वे सच में किसी तीसरे बड़े दल को खड़ा करने का रास्ता प्रशस्त कर रहे हैं. वह दल वह पार्टी खुद अरविंद केजरीवाल की होगी जिसमें नौजवान होंगे और भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध लोग होंगे. कांग्रेस और भाजपा की साझी दुकानदारी को बार-बार नंगा करके अरविंद केजरीवाल ने नए लोगों को राजनीति में आने और संसद में पहुंचकर नए सिरे से चिंतन मनन करने का रास्ता तेजी से बनाना शुरू कर दिया है. आज अरविंद केजरीवाल ने काफी बड़ा काम किया. उन्होंने कांग्रेस और भाजपा को रिलायंस की चेला पार्टी साबित कर दिया.

सामाजिक कार्यकर्ता से नेता बने आईएसी के सदस्य अरविंद केजरीवाल बुधवार को जब प्रेस के सामने आए तो एक बार फिर चौंकाया और निशाने पर लिया देश के सबसे बड़े बिजनेसमैन मुकेश अंबानी को. केजरीवाल ने अंबानी की कंपनी रिलायंस को मिले केजी बेसिन के ठेके और उसमें हुई कथित गड़बड़ियों का मामला उठाया और सरकार के कंपनी के सामने नतमस्तक होने का आरोप मढ़ा.

संवाददाता सम्मेलन में केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने सबसे पहले नीरा राडिया टेप के कुछ हिस्से सुनाए. इसमें राडिया और देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य के बीच बातचीत थी. टेप में रंजन भट्टाचार्य कहते सुने गए कि कांग्रेस तो अपनी दुकान है.


टेप सुनने के लिए यहां क्लिक करें-

रंजन भट्टाचार्य और नीरा राडिया संवाद


इससे बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि रिलायंस को एनडीए सरकार ने केजी बेसिन का ठेका दिया था ताकि वह गैस निकालकर देश की जरूरतें पूरी कर सके. ये गैस रिलायंस को साल 2017 तक सवा दो डॉलर प्रति यूनिट बेचनी थी लेकिन 2006 में ही इसके लिए कंपनी ने सवा चार डॉलर प्रति यूनिट मांगे. तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर इसके लिए राजी नहीं थे इसलिए हटा दिए गए और रिलायंस के आदमी माने जाने वाले मुरली देवड़ा को ये मंत्रालय मिला.

इसके बाद वर्ष 2007 में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह ने रिलायंस के दबाव के आगे झुकते हुए 2014 तक 4.25 डॉलर प्रति यूनिट के हिसाब से अनुमति दे दी. आज रिलायंस सरकार से इसके लिए सवा 14 डॉलर प्रति यूनिट मांग रही है. रिलायंस की इसी मांग का विरोध करने के चलते पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को हटाकर वीरप्पा मोइली को मंत्री बनाया गया है.

केजरीवाल ने कहा कि अगर मोइली ने रिलायंस की सवा 14 डॉलर प्रति यूनिट गैस की मांग मान ली तो इस देश में बिजली सात रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से मिलेगी. देश को करीब 43 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा. अगर जनता को ये मंजूर है तो ठीक है लेकिन अगर नहीं है तो वो इसके खिलाफ खड़ी हो ताकि सरकार मजबूर होकर रिलायंस की मांग ठुकरा दे.

केजरीवाल ने कहा कि केजी बेसिन का ठेका रिलायंस को मिला लेकिन रिलायंस ने जुलाई 2011 में इसका एक हिस्सा ब्रिटिश पेट्रोलियम को 35 हजार करोड़ रुपये में बेच दिया. लेकिन किसी ने सवाल नहीं उठाए और सरकार देखती रही. रिलायंस गैस की जमाखोरी कर रही है ताकि जब सरकार दाम बढ़ा दे तब वो उसे बेचे और फायदा कमाए.

रिलायंस को सरकार को 8 हजार करोड़ यूनिट गैस देनी थी लेकिन उसने दी महज 2 हजार करोड़ यूनिट. रिलायंस ने गैस प्रोडक्शन जानबूझकर घटा दी. उसने 2009 से गैस का उत्पादन तय सीमा से एक तिहाई कर दिया. केजरीवाल ने कहा कि इसकी वजह से गैस आधारित बिजली घरों को बंद करना पड़ा. केजरीवाल ने कहा कि जब जयपाल रेड्डी ने रिलायंस की कारगुजारियों के खिलाफ आवाज उठाई और 7000 करोड़ रुपये के जुर्माने का नोटिस भेजा तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. मुकेश अंबानी के दबाव में रेड्डी को मंत्रालय से हटा दिया गया.

 

कहिए- ”दैनिक जागरण को बंद करा देगा भड़ास”

एक मित्र ने फोन किया और गिरफ्तारी व जेल जीवन के बाबत पूछने लगे. मैंने उन्हें बताया. साथ में ये भी बताया कि जागरण प्रबंधन ने नोएडा में फर्जी मुकदमा लिखाकर मेरे जेल जाने के महीने भर बाद कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को भी गिरफ्तार करा दिया और जेल भिजवा दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि जागरण के गोरखधंधों को भड़ास लगातार उजागर करता रहा है और कर रहा है, सो दैनिक जागरण के मालिक चिढ़े हुए हैं और अपने गुर्गा टाइप मैनेजरों के जरिए जितने कुकर्म भड़ास के खिलाफ कर सकते हैं, कर रहे हैं. इनकी पूरी कोशिश थी कि मैं जेल से न निकलूं और भड़ास को बंद करा दिया जाए.

तब उस मित्र ने कहा- ''यार, जागरण वाले भड़ास क्या बंद कराएंगे, भड़ास वाले जरूर एक दिन जागरण बंद करा देंगे.''

मैं उनका डायलाड सुनकर चौंका. पूछा- ''ये कैसे भला?

उन्होंने फरमाया- ''देखो, भड़ास के पास क्या है? कुछ नहीं है. सिर्फ एक वेबसाइट है जिसका सारा डाटाबेस अलग जगह पर आप लोगों ने सेफ कर रखा है. उसके अलावा जो है वह सिर्फ आप लोगों का साहस और ईमानदारी. ईमानदारी का खात्मा करने के लिए इन लोगों ने रंगदारी और ब्लैकमेलिंग वगैरह की धाराएं लगवाईं व इसे छाप-छाप कर प्रचारित किया ताकि भड़ास व यशवंत की छवि बदनाम हो जाए, पर वे ये लोग नहीं कर पाए, उल्टे भड़ास व यशवंत को इन लोगों ने 'मान्यता' देकर पूरे देश में स्थापित कर दिया. साहस को खत्म करने के लिए इन लोगों ने थाने भिजवाया, जेल भिजवाया, जमानत होने में रोड़ा अटकाया. पर उससे क्या हुआ. सारे कष्टों को सूफियाना आनंद में तब्दील करते हुए यशवंत और भड़ास फिर पहले जैसे हो गए. देखो, जो साहसी व ईमानदार होता है वह मौत से तो डरता नहीं, इसीलिए हर पल वह बेखौफ व बेबाक रहता है. वह उत्पीड़न का हद तो पहले ही जान जी चुका होता है, तभी ऐसी बेबाकी भरा काम कर पाता है…''

उन दोस्त का प्रवचन जारी रहा. मैंने फिर सवाल पूछा- ''ये बताइए कि भड़ास कैसे जागरण को बंद करा देगा?''

उन्होंने फिर समझाना शुरू किया- ''वहीं आ रहा था मैं. असल में अगर भड़ास बंद भी हो गया तो कुछ बंद नहीं हुआ क्योंकि नए नाम से नए ब्लाग व वेबसाइट फिर शुरू हो जाएंगी. लेकिन भड़ास ने जो अलख जगा दी है उससे जागरण के गोरखधंधे दिन प्रतिदिन बाहर आ रहे हैं और जनमानस व शासन-प्रशासन में जागरण की कमजोरी पता चल रही है. एक दिन ऐसा होगा कि कभी शासन के शीर्ष स्तर पर जागरण का कोई अंतरविरोध हुआ तो, जिसकी पूरी संभावना बनती जा रही है, यही सरकार जागरण को उलाट कर रख देगी और सब कुछ इनका खत्म होने की ओर बढ़ जाएगा. देखते ही देखते अरबों खरबों का इनका कारोबार जमीन पर आ जाएगा. सो, आप यह न कहिए कि जागरण वाले भड़ास को बंद करा देंगे, यह कहिए कि भड़ास वाले जरूर एक दिन जागरण को बंद करा देंगे.''

मैंने मन ही मन सोचा कि बंदा तो गजब फिलासफी समझा रहा है. और, फिलासफी में दम भी दिक्खे है. छोटी लड़ाइयां कब बड़े क्रांति का रूप ले लेती हैं, पता ही नहीं चलता. छोटे आंदोलन कब देशव्यापी होकर तख्त उलाटने और ताज उछालने वाली आंधियों में तब्दील हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता. यह सच है कि आज दैनिक जागरण जैसा महादैत्याकार समूह जो चाहे वह इस देश में कर करा सकता है, लेकिन इस महादैत्याकार समूह ने पंगा अगर किसी से माना तो एक अदने से भड़ास जैसे पोर्टल से माना, सड़क छाप यशवंत से माना. तो, जागरण ने एक तरह से भड़ास व यशवंत को ये मौका दे दिया, मान्यता दे दिया कि अब जागरण को पूरी तरह से टारगेट करो, इसके खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दो क्योंकि जागरण वाले तुम्हें महान मानने लगे हैं, तुमसे डरने-घबराने लगे हैं. सो, जागरण खुद अपने नाश की बुनियाद रख चुका है. जिस तरह कभी रावण ने अपने घमंड में चूर होकर ऐसे-ऐसे कृत्य किए कि अपने दुश्मनों को खुद अपने पास बुला बैठा. तब रावण चक्रवर्ती था, धन-संपदा और सिंहासन का शेर था. और राम थे कि जंगल में टहल रहे थे. रो रहे थे. कलप रहे थे. घूम रहे थे. और बाद में क्या हुआ, सब जानते हैं.

जागरण ने जो कुछ भड़ास के साथ किया, इसका मैसेज तो हर जगह पहुंच रहा है. भड़ास पिछले साढ़े चार साल से क्या कर रहा है, यह भी पूरा देश जान रहा है. जागरण द्वारा पत्रकारिता की जगह भ्रष्टाचारिता के अपनाए गए रास्ते के बारे में सबको पता चल रहा है, पहले धीरे धीरे पता लगता था, और कुछ एक सर्किल में ही पता लग पाता था, अब तेजी से और देशव्यापी पता लग रहा है. जागरण की उगाही पत्रकारिता की चर्चा जिले-जिले में है. कुछ दिनों में ब्राडबैंड के गांवों में पहुंचे के साथ गांव गांव में होने लगेगी. तब तक भड़ास के साहस से सिंचे भड़ास जैसे सैकड़ों मंच खड़ा हो चुके होंगे. फिर, जागरण जहां छपा करेगा, उसी में तैनात कर्मचारी उसे पढ़ा करेंगे, उसके बाहर निकलने की स्थिति ही नहीं आएगी.  ऐसा इसिलए की जागरण सबसे फ्राड अखबार का दर्जा पा चुका होगा और जन-मानस इसे देखते ही चोर अखबार बोलना शुरू कर देंगे.

तब, एक दिन ऐसा आएगा जब जागरण की ब्रांड वैल्यू विश्वसनीयता के पैमाने पर जीरो हो जाएगी, तब इनके पास अखबार बंद करके प्रापर्टी डीलिंग करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा और प्रापर्टी डीलिंग भी ये चैन से कर पाएंगे, इसमें संदेह है क्योंकि इनके सताए हुए नेताओं अफसरों पत्रकारों आम लोगों की इतनी लंबी फौज है कि कोई न कोई इनका हालचाल लेता ही रहेगा. बड़ा ब्रांड किस क्षण पतन के रास्ते पर चल पड़ता है और कुछ ही वर्षों में खत्म हो जाता है, यह जानने बताने के लिए आज अखबार और नई दुनिया अखबार का उदाहरण काफी है. नई दुनिया का मालिक जागरण हो चुका है, यह आज का सच है. कल का सच न जागरण को पता और न जमाने को, पर ब्रह्मांड के संचालित होने का ट्रेंड बताता है कि सब कुछ घूमता बदलता रहता है, सो बदलेगा, नीचे वाले उपर आएंगे और उपर वाले बिलकुल उपर चले जाएंगे. इतिहास के पन्ने तो यही ट्रेंड समझाते हैं. वर्तमान का कहानियां भी इन्हीं पगडंडियों से जाती हैं. अर्श से फर्श और फर्श से अर्श के मुहावरे कहानियां घटनाएं इसी दुनिया की हैं. सो, हो सकता है. बिलकुल हो सकता है. यह जरूर है कि तब हम हों न हों. भड़ास हो न हो. पर इतिहास के रास्ते पर कहीं नाम जरूर लिखा मिलेगा. क्रांति के राह पर जरूर कहीं इसकी चर्चा चस्पा होगी.

खैर, अपन लोग किसी के प्रति बुरा भाव मन में नहीं रखते. जो अपना दायित्व है, वह ईमानदारी से पूरी करते हैं. पत्रकारिता आप तभी कर सकते हैं जब आप पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हों. जो खबर सामने आए, छापिए, वो चाहे खुद आपके खिलाफ हो या फिर उपर वाले के. इसके बदले में आपको कैसा और किस रूप में प्रसाद मिलता है, उसकी चिंता नहीं करें क्योंकि हम लोगों ने कलम को हथियार बनाया है, पत्रकारिता को मिशन के तौर पर माना है,  पत्रकारिता के माध्यम से सच बोलने का जो बीड़ा उठाया है तो इसमें बाइडिफाल्ट संघर्ष, मुकदमा, धमकी, जेल, थाना, पुलिस, परेशानी, उत्पीड़न… सब निहित है और यही एक तरह से हम लोगों के लिए पुरस्कार भी है. 

लोकतंत्र में चौथा स्तंभ बना ही इसलिए कि आप जनता के साथ खड़े रह कर बाकी के तीन स्तंभों के पतन, खराबी, जनता से दूरी के बारे में उन्हें लगातार आगाह करते रहेंगे, समझाते रहेंगे, लाइन पर लाते रहेंगे. लेकिन चौथे खंभे वाले अब बाकी तीन खंभों वाले के साथ मिलकर जनता से उतने ही दूर खड़े हो गए हैं जितने दूर बाकी तीन खंभे वाले हैं.

सो, जनता के साथ खड़े होकर जो पत्रकारिता करेगा तो उसे वही सब झेलना पड़ेगा जो एक आम आदमी को इस सिस्टम में झेलना पड़ता है. आप को अगर जनता की तरह, आम आदमी की तरह जीना अच्छा लगता है, मजा आता है, संगीतमय सा लगता है तो आप इस संघर्ष को इंज्वाय करेंगे अन्यथा आपकी भी फट जाएगी और चुपचाप जनता के बीच से निकलकर कोई कोना पकड़कर 'बच गए बच गए' टाइप की मुद्रा में बाकी जीवन डर डर कर मर मर कर गुजारेंगे.

पत्रकार सिर्फ एक बार मरता है, जब मौत आती है. भ्रष्ट लोग बार बार मरते रहते हैं क्योंकि असल में वो जिंदगी ही दूसरों के कंधों पर पैर रखकर, दूसरों को अपनी बैसाखी बनाकर गुजारते हैं. तो उन्हें डर लगा रहता है कि कहीं बैसाखी न हट जाए, कहीं कंधे न दूर चले जाएं. वे दूसरों को दुखी करके अपनी खुशी के लिए राह बनाते हैं सो जाहिर है कि उनकी खुशी निष्कंटक नहीं रह सकती, वह तमाम तरह के भयों से संक्रमित होती रहेगी.

सो, हे जागरण वालों, हे संजय गुप्ता, हे महेंद्र मोहन गुप्ता, हे निशिकांत ठाकुर और… हे सो मेनी गुप्ताज एंड मनी मैनेजर्स…. तुम लोग कर दो भड़ास की सांस बंद, कोई फर्क नहीं. लेकिन भड़ास ने जो अलख जगा दी है तो उससे तुम लोगों की लठैती कब तक चलेगी, उसे जरूर सोच लेना… याद रखना. भड़ास कोई संस्थान, समूह और कंपनी नहीं है कि बंद होने से अरबों खरबों का कारोबार चौपट हो जाएगा. भड़ास सिर्फ एक जिद और जुनून है. भड़ास सिर्फ एक अलख है. भड़ास सिर्फ एक रास्ता है. भड़ास सिर्फ एक सिंबल है. भड़ास सिर्फ एक ट्रेंड है.

भड़ास सिर्फ यह संदेश देने के लिए है, यह बताने के लिए है कि हालात चाहें जितने बुरे हों, कुछ ऐसा है जो उम्मीद जगाए है कि वो सुबह कभी तो आएगी, जब चीजें ठीक होंगी… भड़ास सिर्फ यह बताने के लिए है कि हर मुश्किल उठाकर भी सच कहने वाले हर दौर में जिंदा रहते हैं. और भड़ास ने ये काम कर दिया है. भड़ास ने बहुतों को इंस्पायर कर दिया है. भड़ास ने बहुतों को राह दिखा दी है. भड़ास ने बहुतों के सोचने का तरीका बदला है. भड़ास ने बहुतों को कूपमंडूक पत्रकारिता से अलग कुछ नया करने का रास्ता समझाया है. और, यही एक पत्रकार के नाते मेरी यही सफलता है. हे जागरण के मालिकों एंड मनी मेकर मैनेजर्स, उम्मीद करता हूं, अगर आप लोगों के खून में थोड़ी भी पत्रकारिता दौड़ रही होगी तो आप समझ पाएंगे कि एक पत्रकार से बात बरास्ते पुलिस और अदालत नहीं की जाती, कलम के जरिए की जाती है. और, कलम आप लोग जाने कब के गिरवी रख चुके हैं, सो आप लोग समझ भी नहीं सकते. इसलिए यही कहूंगा कि ….तुम सितम और करो टूटा नहीं दिल ये अभी…. 

यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया

09999330099

yashwant@bhadas4media.com


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सोनिया गांधी के खिलाफ अश्लील पत्र छापने के बाद स्थानीय संपादक ने कांग्रेस से मांगी माफी

दैनिक जागरण में कुछ भी संभव है. यह एक ऐसा अखबार है जो कुछ भी कर करा सकता है. मायावती के खिलाफ बेहद घटिया और जातिसूचक हेडिंग लगाने के कारण मायावती के कोप के शिकार होने के बावजूद जागरण के गुप्ताज को अकल नहीं आई. इनके यहां अब सोनिया गांधी के खिलाफ बेहद अश्लील मैटर प्रकाशित हो गया है.

कांग्रेस के लोगों का पारा गरम है. पटना एडिशन में हुए इस कुकृत्य के खिलाफ कांग्रेसियों ने प्रदर्शन भी किया जिसका नेतृत्व आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सचिव और बिहार प्रभारी गुलचैन सिंह चारक ने किया. जागरण प्रबंधन ने गल्ती मानते हुए स्थानीय संपादक की तरफ से एक माफीनामा पहले पन्ने पर प्रकाशित करा दिया.

कायदे से सोनिया गांधी और उनके पुत्र व पुत्री के खिलाफ अश्लील पत्र दैनिक जागरण में प्रकाशित होने के बाद जागरण प्रबंधन को अपने स्थानीय संपादक को बर्खास्त करना चाहिए. पर दिखावे के लिए और लीपापोती करने के लिए प्रबंधन ने दो पत्रकारों और दो गैर पत्रकारों को बर्खास्त कर दिया है, ऐसी चर्चा है, जो जागरण प्रबंधन का एक और रावणोचित कदम है. दैनिक जागरण, पटना के जिन पत्रकारों को बर्खास्त किये जाने की चर्चा है, उनके नाम हैं- प्रादेशिक इंचार्ज रवींद्र पांडेय और चीफ सब एडिटर अमित आलोक. जिन दो गैर पत्रकारों को बर्खास्त किए जाने की चर्चा है, उनके नाम हैं- फोरमैन शैलेंद्र कुमार और आपरेटर शैलेंद्र. अगर वाकई इन चारों लोगों की बर्खास्तगी हुई है तो इन्हें कोर्ट में जाकर यह मांग करनी चाहिए कि बर्खास्तगी की कार्रवाई स्थानीय संपादक के भी खिलाफ भी की जाए या फिर उन्हें भी बर्खास्तगी से मुक्त रखा जाए. सिर्फ उन्हें क्यों बलि का बकरा बनाया जा रहा है. दैनिक जागरण, पटना में पहले पन्ने पर जो मोटे अक्षरों में माफीनामा प्रकाशित किया गया है, उसे आप भी पढ़ लें…


हमें खेद है

संपादकीय चूक से पाठकनामा स्तंभ में 29 अक्टूबर को मधुबनी से आया एक पत्र जिसकी भाषा अमर्यादित थी, प्रकाशित हो गया। पत्र में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक पंक्तियां थीं। गहन जांच के बाद इस गलती के लिए जिम्मेदार पाए गए लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई है। ‘दैनिक जागरण’ इस तरह की भारी चूक से स्तब्ध है और खेद प्रकट करता है।

-स्थानीय संपादक


पर खबर है कि इस कवायद से भी कांग्रेस नेतृत्व खुश नहीं है. सूचना ये भी है कि जागरण समूह के सारे ठिकानों और धंधों का आकलन कांग्रेस नेतृत्व ने केंद्रीय एजेंसियों से कराना शुरू कर दिया है और इनके यहां कभी भी छापेमारी शुरू हो सकती है. बेहद कम दाम में पत्रकारों से काम कराने वाले और कर्मियों का तरह तरह से शोषण करने वाले गुप्ताज को ये श्रेय जाता है कि इन्होंने हिंदी में खबरों को बेचने का धंधा शुरू करके पत्रकारिता को पूरी तरह से गुप्ता जनरल स्टोर में तब्दील कर दिया.

पेड न्यूज के अपराधी गुप्ताज अपने गुर्गा टाइप मैनेजरों के सहयोग से उन पत्रकारों को प्रताड़ित करने से नहीं चूकते जो जागरण के गोरखधंधे के खिलाफ आवाज उठाते हैं. इसी कारण पिछले दिनों भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह और कंटेंट एडिटर अनिल सिंह के खिलाफ जागरण प्रबंधन ने फर्जी मुकदमे लिखाए और भरसक कोशिश की कि भड़ास का संचालन बंद हो जाए. इसके लिए भड़ास से जुड़े ठिकानों पर पुलिस से छापेमारी कराई गई, लैपटाप व कंप्यूटरों से हार्ड डिस्क गायब करा दिए गए और भड़ास को सर्वर प्रोवाइड करने वाली कंपनी से भड़ास का डाटा रिमूव करने को दबाव बनाया गया.

बावजूद इसके भड़ास जिंदा है और जागरण के काले धंधों और काले कारनामों के खिलाफ बेखौफ होकर आवाज उठा रहा है. हालांकि यूपी में सपा की सरकार आ जाने के बाद जागरण वाले यूपी पुलिस को अपने लठैत की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन यही यूपी पुलिस है जिसने मायावती सरकार के जमाने में जागरण के गुप्ताज को सड़क पर गिरा गिरा कर मारा था क्योंकि इन लोगों ने मायावती के खिलाफ जातिसूचक गालियों का इस्तेमाल किया था. सूत्रों का कहना है कि जागरण के दिन अब इसलिए पूरे होते दिख रहे हैं क्योंकि इनके खिलाफ अब कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह गंभीर हो चुका है और इनके कुंडली तैयार कराई जा रही है.  दूसरी ओर, कई लोगों ने जागरण के मालिकों और बड़े मैनेजरों की काली कमाई और अघोषित संपत्ति का लेखा जोखा तैयार कराना शुरू कर दिया है. 


और ये है वो पत्र, जिसमें सोनिया, राहुल व प्रियंका के लिए अश्लील लिखा हुआ है…


मूल खबर पढ़ें–

दैनिक जागरण ने ये क्या छाप दिया सोनिया गांधी और उनके परिवार के लिए??


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ई-संसार ने किया पहली ही किताब को रीलिज होने से पहले हिट

नई दिल्ली । तकनीक के ई-संसार ने हिन्दी भाषा के लिए चिंता की जगह संभावनाओं के द्वार खोले हैं। रेगिस्तान के दूर दराज क्षेत्र के किसी लेखक के काम और पहचान का दुनिया भर में चर्चा और स्वागत का विषय होना आश्चर्यजनक लग सकता है किन्तु आधुनिक डिजिटल-ऐज़ में इसी के जरिये किशोर चौधरी की पहली किताब 'चौराहे पर सीढ़ियाँ' रीलिज होने से पहले ही हिट हो गई है।

यह हिंदी में पहली बार हुआ है कि हिंदी की किताब को ऑनलाइन बेचने वाली वेबसाइटों पर प्री-बुकिंग पर रखा गया है और यह अंग्रेजी किताबों से होड़ ले रही है। जबकि कहा जा रहा है कि हिंदी किताबों को खरीदकर पढ़ने का प्रचलन लगभग खत्म हो गया है। ब्लॉग पर लिखी गयी कहानियों के इस संकलन 'चौराहे पर सीढ़ियाँ' ने प्री बुकिंग से बेहतर साहित्य के भविष्य को आशान्वित किया है। इन दिनों ऑनलाइन शॉपिंग के ज़रिए किताब खरीदने का भी प्रचलन बढ़ा है, लेकिन हिंदी किताबों की बिक्री बहुत कम है। ऐसे में ये किताब हिंदी प्रकाशन तंत्र की नयी उम्मीद है।

'चौराहे पर सीढ़ियाँ' किशोर चौधरी की 14 कहानियों का संग्रह है जो नवम्बर के दूसरे सप्ताह में प्रकाशित होने वाला है। किशोर चौधरी हिंदी के ऐसे युवा कथाकार हैं जो मुद्रित दुनिया से पूरी तरह से दूर रहे हैं। किशोर ने कभी भी खुद को पत्र-पत्रिकाओं को छपाने का प्रयास नहीं किया। किशोर चौधरी ने पिछले कुछ सालों से ब्लॉग बनाकर उसपर अपनी कहानियों को प्रकाशित करना शुरू किया है। बहुत कम समय में इनके ब्लॉग पर प्रकाशित कहानियों को हजारों बार पढ़ा गया। इंटरनेट पर किशोर की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि किशोर की पहली पुस्तक के लिए ऑनलाइन मेगा स्टोर फ्लिपकार्ट ने बाज़ार में आने से पहले एक पेज बनाया है। इस पेज को पसंद करने वालों की संख्या कुछ ही दिनों में हज़ार के पार हो गयी है। इन दिनों हिन्दी भाषा की किताब के लिए ऐसा समर्थन देखा जाना एक बड़ी बात है। इस किताब की प्री बुकिंग करने वाले ऑनलाइन स्टोर इंफीबीम के पेज को 500 से अधिक लोगों ने फेसबुक पर शेयर किया है। गौरतलब है कि फेसबुक पर किसी वेबपेज को लाइक या शेयर से उस विशेष प्रयोक्ता के समस्त मित्र परिवार में वह पेज साझा हो जाता है। इसे वायरल प्रभाव भी कहा जाता है।

इंफीबीम स्टोर पर तां त्वान एंग, जेफ्री ओर्चर, कार्बन एडिसन और मेगेन हर्ट जैसे लेखकों की किताबों आने वाली किताबों के बीच हिन्दी भाषा की इस पुस्तक को सर्वाधिक लाइक्स मिले हैं। यह उन सब किताबों में इकलौती किताब है जो हिन्दी भाषा में है। अंग्रेज़ी के बढ़ते हुये दवाब के बीच इस तरह से हिन्दी कहानियों का पसंद किया जाना, हिन्दी भाषा के लिए के सुखद है।

'चौराहे पर सीढ़ियाँ' को हिंद युग्म प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। हिन्द युग्म के शैलेश भारतवासी का कहना है कि महंगाई के इस दौर में पाठक किताबों से दूर न हों और उन तक स्तरीय साहित्य कम मूल्य में पहुँच सके इसलिए किताब का मूल्य पचानवे रुपये रखा गया है। इसी किताब को प्री बुकिंग में विशेष ऑफर के साथ स्टोर्स एक सौ एक रुपये में पाठक के घर तक डिलीवर कर रहे हैं। भारतवासी ने विश्वास जताया है कि अब पाठक अच्छे साहित्य तक आसानी से पहुँच सकेगा और भौगोलिक सीमाएं कोई बाधा न बनेगी। किशोर चौधरी की इस किताब को देश भर के छोटे बड़े कस्बों और शहरों से सैकड़ों ऑर्डर मिले हैं। इस प्रकार से हिन्दी किताबों की दुनिया सिमटने की जगह अपना नया रास्ता बना कर हर ओर फैल रही है।

रिलायंस वालों ने टाइम्स आफ इंडिया से कहा- तुम लोग तो पेड न्यूज की बात करते हो बंधु

जी हां. जिंदल – जी प्रकरण के बाद कारपोरेट घरानों ने मीडिया को उसका चरित्र बताने का काम जोरशोर से शुरू कर दिया है. एक सेमिनार में टीओआई ग्रुप के सीईओ रवि धारीवाल अपने ब्रांड की महानता का बखान कर रहे थे तो अनिल अंबानी वाले रिलायंस एंटरटेनमेंट की तरफ से अमित खन्ना ने यह कहकर नहले पर दहला जड़ दिया कि जब आप लोगों से फिल्म फेस्टिवल कवर करने को कहा गया तो आप लोगों ने पेड न्यूज की बात शुरू कर दी.

इतना सुनते ही रवि धारीवाल का मुंह टका सा रह गया. उल्लेखनीय है कि टीओआई वाले पेड न्यूज के लिए बाकायदा एक अलग कंपनी बनाकर व्यवस्थित रूप से काम करते हैं. इस पेड न्यूज वाली कंपनी का नाम मीडियानेट है. इस कंपनी के सौजन्य से दिल्ली टाइम्स और बांबे टाइम्स जैसे पेड न्यूज वाले परिशिष्ट निकलते हैं. रवि धारीवाल को औकात में लाने वाले अमित खन्ना के बयान के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में खबर प्रकाशित हुई है जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है… साथ ही इस प्रकरण पर एक ब्लाग sans serif पर भी कुछ टिप्पणी दी गई है, उसे भी दिया जा रहा है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया



The Ambani brothers, TOI, Medianet & paid news

The “reverse-swing” done on Zee News by Jindal Steel is one of the most intriguing media stories in recent memory.

The steel company says it is suing the Subhash Chandra-owned network for Rs 200 crore for the demand of Rs 100 crore in lieu of advertisements allegedly made by its editors, Sudhir Chaudhary and Sameer Ahluwalia, to not telecast shows in relation to the coal allocation scandal.

In turn, Zee says it will sue Jindal Steel for Rs 150 crore for defaming the network by holding a press conference, releasing a CD containing video evidence of the reverse-sting, and making allegations of extortion against it and its editorial staff.

Meanwhile, The Times of India group, whose business paper The Economic Times and its advertorial supplements like Bombay Times and Delhi Times, were happily mentioned in passing by Chaudhary and Ahluwalia as indulging in “paid news” in the Jindal “reverse-sting” says Zee will hear from them.

Not surprisingly, Times CEO Ravi Dhariwal was on the mat at a CII event on Monday, with Amit Khanna of Anil Ambani-owned Reliance Entertainment saying his company had been asked to approach Medianet by TOI for coverage of an film festival.

The last bit of news, published in the gossip column of the Indian Express on Tuesday, has been happily reproduced by First Post, whose parent organisation TV 18 is now part of the Mukesh Ambani group, as evidence of the “media-corporate war”.

आईटीवी समूह करेगा अंग्रेजी अखबार द संडे गार्जियन का विस्‍तार

 

आईटीवी समूह अपने अंग्रेजी अखबार द संडे गार्जियन के विस्‍तार की तैयारी कर रहा है. कुछ दिन पहले ही चंडीगढ़ से धूमधाम से अखबार की लांचिंग हुई थी. समूह अब अखबार को चंडीगढ़ के बाद दूसरे राज्‍यों की राजधानियों से प्रकाशित करने की योजना बना रहा है. सूत्रों का कहना है कि इसका विस्‍तार लखनऊ, कोलकाता, भोपाल और मुंबई में करने की तैयारी हो रही है. 
 
इस अखबार के प्रधान संपादक एमजे अकबर हैं. एमजे अकबर भी टीवी टुडे समूह से अलग हो गए हैं. इसके बाद वे इस अखबार को पूरा समय दे पाएंगे. इसलिए चर्चा और तेज हो गई है कि आईटीवी समूह एमजे के नेतृत्‍व में अखबार का विस्‍तार करना चाह रहा है. एमजे भी पूरी एनर्जी के साथ इस अखबार की विस्‍तार की रणनीति बना पाएंगे. 
 
उल्‍लेखनीय है कि आईटीवी हिंदी चैनल इंडिया टीवी, अंग्रेजी चैनल न्‍यूज एक्‍स, हिंदी अखबार आज समाज तथा अंग्रेजी अखबार द संडे गार्जियन का प्रकाशन करता है. रवीन ठुकराल के कनाडा जाने के बाद समूह अजय शुक्‍ला के नेतृत्‍व में समूह तेजी से प्रगति कर रहा है. हाल ही में अजय शुक्‍ला को रवीन के स्‍थान पर जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. उनका नाम भी आज समाज के समूह संपादक के रूप में जाने लगा है.   

ब्यूरो चीफ के खिलाफ राजुल माहेश्वरी और यशवंत व्यास को पत्र भेजा

पत्रकार बीपी गौतम ने चिदर्पिता प्रकरण में गलत रिपोर्टिंग का आरोप लगाते हुए अमर उजाला के मालिक राजुल माहेश्वरी और संपादक यशवंत व्यास को एक पत्र भेजा है. पूरा पत्र और उसके साथ अटैच एफआईआर की कापी का प्रकाशन नीचे किया जा रहा है…


श्री राजुल माहेश्वरी

निदेशक, अमर उजाला

श्री यशवंत व्यास

संपादक, अमर उजाला

नोएडा

 

नमस्कार सर

सानुरोध पुनः अवगत कराना है आज अमर उजाला के प्रथम पेज पर प्रकाशित खबर से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संबंधित रिपोर्टर को मुकदमा ख़त्म न होने का दुःख है, क्योंकि पीड़ित साध्वी चिदर्पिता के बयान की जगह चिन्मयानन्द के वकील का बयान प्रमुखता से छापा है. पुलिस को साक्ष्य न मिलने की खुशी सी जाहिर की गई है, जबकि पुलिस की लापरवाही के विंदु उजागर होने चाहिए थे.

महोदय, मैं पहले भी आपत्ति दर्ज करा चुका हूँ, आज पुनः सच बताते हुए न्याय की उम्मीद कर रहा हूँ. चिन्मयानन्द के कालेज के प्राचार्य अवनीश मिश्र और अरुण पाराशरी प्रतिदिन शाम को वर्षों से एक साथ पीते आ रहे हैं. साथ ही पाराशरी कमेटी में भी पदाधिकारी हैं. पिछले सप्ताह अरुण पाराशरी और अवनीश मिश्र बदायूं के कस्बा बिसौली आये थे. यहाँ बिसौली के रिपोर्टर सुधाकर शर्मा ने इन दोनों की विवेचक/सीओ से मुलाक़ात कराई थी. सेटिंग के चलते ही चार्जशीट से अवनीश मिश्र का नाम गायब है. एसपी बदायूं और डीआईजी बरेली ईमानदार न होते तो यह पाराशरी पूरा मुकदमा ही ख़त्म करा देते. दुःख पाराशरी के साथ देने का नहीं, बल्कि अमर उजाला की शक्ति का दुरुपयोग करने का है.

इस प्रकरण से कई जिंदगियां प्रभावित हुई हैं. यह जिन्दगी मैंने जानबूझ कर चुनी है, इसलिए कोई और दोषी नहीं है, पर मानवता के नाते कम से कम खुल कर धूर्त का साथ तो नहीं देना चाहिए. मुझे पाराशरी से कोई ईर्ष्या नहीं है. आप उन्हें किसी दूसरी यूनिट का संपादक बना दें या बरेली के बदायूं और शाहजहांपुर को छोड़ कर किसी और जिले का प्रभारी बना दें, तो मैं प्रभावित होना बंद हो जाऊंगा.

अमर उजाला ने पुलिस की एक वर्ष की लापरवाही पर आज तक कुछ नहीं छापा और आज छापा भी तो ख़ुशी छापी. एफआईआर पढ़ लें एक बार और चार्ज शीट से मिलान कर लें, क्योंकि एफआईआर या तो पूरी सच हो सकती है या पूरी झूठी, आधी सच और आधी झूठ का विकल्प ही नहीं है. मैं एफआईआर भी भेज रहा हूँ, उचित लगे और संभव हो तो समीक्षा प्रकाशित कराने का कष्ट करें,

बी.पी. गौतम
08979019871

सेवा में
श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय
शाहजहांपुर।

विषय:- शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक शोषण कर जीवन बर्बाद करने वाले स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत कर कार्रवाई करबाने के संबंध में।

महोदय, निवेदन है कि प्रार्थिनी साध्वी चिदर्पिता गौतम हाल निवासिनी एफ-14, फेस-2 श्रीराम नगर कालोनी बदायूं उत्तर प्रदेश, दिल्ली की मूल निवासिनी है। पारिवारिक पृष्ठ भूमि व व्यक्तिगत रुचि आध्यात्मिक और राजनैतिक होने के कारण परिवार में आते-जाते रहने वाले स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती निवासी मुमुक्षु आश्रम जनपद शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश राजनैतिक व आध्यात्मिक ज्ञान लेने को प्रेरित करने लगे। उनके उत्कृष्ट विचारों का प्रार्थिनी के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वर्ष 2००1 से उनके संपर्क में आने के बाद उनके दिल्ली स्थित सांसद निवास में रह कर राजनैतिक व आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने लगी। इस दौरान उनके साथ कई कमेटी दौरे और धार्मिक स्थलों की यात्रा पर गई, जिससे प्रार्थिनी को वास्तव में एक अलग अनुभव व ज्ञान मिला।

वर्ष 2००4 तक वह गुरु की ही तरह प्रार्थिनी को सिखाते रहे और प्रार्थिनी भी उन्हें संरक्षक मानते हुए शिष्या की ही तरह सीखती रही, उन पर प्रार्थिनी को भाई या पिता से भी अधिक विश्वास हो गया, तभी वर्ष 2००4 में वह प्रार्थिनी को जप-तप और धार्मिक अनुष्ठान कराने के लिए पे्ररित कर हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम में ले आये। यहां उन्होंने ज्ञान बर्धक बातें सिखाई भीं, लेकिन अचानक प्रार्थिनी को उनकी नियत में परिवर्तन दिखने लगा, जिससे प्रार्थिनी किसी तरह से निकलकर भागने की मन ही मन युक्ति सोच ही रही थी कि तभी वह वर्ष 2००5 में अपने व्यक्तिगत अंगरक्षकों के बल पर अपनी गाड़ी में कैद कर शाहजहाँपुर स्थित मुमुक्षु आश्रम ले आये और आश्रम के अंदर बने दिव्य धाम के नाम से बुलाए जाने वाले अपने निवास में लाकर बंद कर दिया। यहाँ कई दिनों तक प्रार्थिनी पर शारीरिक सम्बन्ध बनाने का दबाव बनाया गया, जिसका प्रार्थिनी ने विरोध किया, तो उन्होंने अज्ञात असलाहधारी लोगों की निगरानी में दिव्य धाम में ही कैद कर दिया, पर प्रार्थिनी शारीरिक सम्बन्ध बनाने को किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थी, लेकिन अपने रसोईये के साथ साजिश कर खाने में किसी तरह का पदार्थ मिलबा कर उन्होंने प्रार्थिनी को ग्रहण करा दिया, जिससे प्रार्थिनी शक्तिहीन हो गयी।

उसी रात शराब के नशे में धुत्त स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती प्रार्थिनी पर टूट पड़े। विरोध करने के बावजूद वह प्रार्थिनी के साथ बलात्कार करने में कामयाब हो गये, लेकिन उनके दिव्य धाम स्थित निवास में कैद होने के कारण प्रार्थिनी कुछ नहीं कर पायी। बलात्कार करते समय उन्होंने वीडियो फिल्म बना ली थी, जिसे दिखा कर बदनाम करने व जान से मारने की धमकी भी दी, तभी दहशत के चलते उनके कुकृत्य की किसी से चर्चा तक नहीं कर पाई। उस एक दिन के बाद वह जब मन में आता, तब प्रार्थिनी का शारीरिक व मानसिक शोषण करते। यह सिलसिला अनवरत सालों-साल चलता रहा और प्रार्थिनी नरक से भी बदतर वह जिंदगी मजबूरी में इसलिए जीती रही क्योंकि चौबीस घंटे उनके द्वारा छोड़े गये असलाहधारी लोगों की निगरानी में रहती थी। इस बीच दिव्य धाम से बाहर भी गयी तो उनके लोग साथ ही जाते थे, जिन्हें उनका स्पष्ट निर्देश रहता था कि किसी से बात तक नहीं करने देनी है और न ही कहीं प्रार्थिनी की इच्छानुसार ले जाना है। शहर में रहते हुए लंबे समय बाद प्रार्थिनी को लगने लगा कि अब उसकी जिंदगी यही है तो स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती को मन से पति रूप में स्वीकार करते हुए प्रार्थिनी भी उसी जिंदगी में खुश रहने का प्रयास करने लगी। महोदय इसी बीच प्रार्थिनी दो बार गर्भवती भी हुई।

प्रार्थिनी बच्चे को जन्म देना चाहती थी, लेकिन स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती ने प्रार्थिनी की इच्छा यह कहते हुए ख़ारिज कर दी कि उन्हें संत समाज बहिष्कृत कर देगा, जिससे सार्वजनिक तौर पर मृत्यु ही हो जायेगी। ऐसा होने से पहले या तो वह आत्म हत्या कर लेंगे या फिर प्रार्थिनी को मार देंगे। इतने पर भी प्रार्थिनी गर्भपात कराने को तैयार नहीं हुई तो उन्होंने अपने ऊँचे राजनैतिक कद का दुरुपयोग करते हुए पहले बरेली स्थित अज्ञात अस्पताल में और दूसरी बार लखनऊ स्थित अज्ञात अस्पताल में जबरन गर्भपात करा दिया, जिससे दोनों बार प्रार्थिनी को बेहद शारीरिक और मानसिक कष्ट हुआ और महीनों बिस्तर पर पड़ी रही। उस समय प्रार्थिनी की देखभाल करने वाला तक कोई नहीं था। स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती प्रार्थिनी को अपने लोगों की निगरानी में छोडक़र हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम में जाकर रहने लगे।

प्रार्थिनी कुछ समय बाद स्वत: ही स्वस्थ हो गयी और स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के वापस आने पर दोनों बार प्रार्थिनी ने जबरन कराये गये गर्भपात का जवाब माँगा तो उन्होंने प्रार्थिनी को दोनों बार बुरी तरह लात-घूंसों से मारा-पीटा ही नहीं, बल्कि एक दिन गले में रस्सी का फंदा डाल कर जान से मारने का भी प्रयास किया और यह चेतावनी देकर जान बख्शी कि जीवन में पुन: किसी बात को लेकर सवाल-जवाब किया तो लाश का भी पता नहीं चलने देंगे, तो दहशत में प्रार्थिनी मौन हो गयी और डर के कारण उसी गुलामी की जिंदगी को पुन: जीने का प्रयास करने लगी। इसी तरह उनके अन्य दर्जनों बालिग, नाबालिग व विवाहित महिलाओं से नाजायज संबंध हैं।

प्रार्थिनी को सामान्य देखकर स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती ने प्रार्थिनी को कुछ समय पश्चात मुमुक्षु आश्रम के साथ दैवी सम्पद संस्कृत महाविद्यालय का प्रबंधक व एसएस विधि महाविद्यालय में उपाध्यक्ष बनवा दिया और पुन: प्रार्थिनी का भरपूर दुरुपयोग करने लगे, क्योंकि वह प्रार्थिनी से एक बार में लगभग सौ-डेढ़ सौ कोरे कागजों पर जबरन हस्ताक्षर करवाते और उनका अपनी इच्छानुसार प्रयोग करते, जिस पर प्रार्थिनी को आशंका है कि उन्होंने हस्ताक्षरों का भी दुरुपयोग किया होगा, लेकिन प्रार्थिनी ने सभी दायित्वों का निष्ठा से निर्वहन किया। इसके साथ ही स्वयं को व्यस्त रखने व मानसिक संतुलन बनाये रखने के लिये प्रार्थिनी ने आगे की शिक्षा भी ग्रहण की। प्रार्थिनी को हालात से समझौता करते देख वर्ष 2०1० में श्री शंकर मुमुक्षु विद्यापीठ का प्रधानाचार्य भी नियुक्त कर दिया गया। प्रार्थिनी मन से दायित्व का निर्वहन करने लगी थी तो अब उनके असलाहधारी लोगों की निगरानी पहले की तुलना में कम हो गयी और प्रार्थिनी मोबाईल आदि पर इच्छानुसार व्यक्तियों से बात करने लगी। इस बीच बदायूं निवासी पत्रकार बीपी गौतम और प्रार्थिनी के बीच संपर्क स्थापित हुआ। प्रकृति व व्यवहार मिलने के कारण विवाह कर लिया, जिससे स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती बेहद आक्रोशित हैं, जिसके चलते वह प्रार्थिनी को धमका रहे हैं और उसका बकाया वेतन भी नहीं दे रहे हैं।

प्रार्थिनी ने जब उनसे मोबाईल पर वेतन देने की बात कही तो काफी दिनों तक वह आश्वासन देते रहे, लेकिन बाद में स्पष्ट मना करते हुए धमकी भी देने लगे कि वह उसकी जिंदगी बर्बाद कर देंगे और पति को सब कुछ बताकर वैवाहिक जीवन तहस-नहस करा देंगे, साथ ही चेतावनी दी कि किसी से उनके बारे में चर्चा तक की तो चाहे तुम धरती के किसी कोने में जाकर छिप जाना, छोडेंगे नहीं। महोदय स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती के पास आपराधिक प्रवृति के लोगों का भी आना-जाना है, जिससे प्रार्थिनी उनकी धमकी से बेहद डरी-सहमी है, क्योंकि वह कभी भी कुछ भी करा सकते है, इसलिए प्रार्थिनी को सुरक्षा मुहैया कराते हुए उनके विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत कर कड़ी कानूनी कार्रवाई करबाने की कृपा करें।

प्रार्थिनी
साध्वी चिदर्पिता गौतम
पत्नी श्री बीपी गौतम
निवासी-एफ-14, फेस-2
श्रीराम नगर कालोनी
बदायूं।


ये है अमर उजाला में प्रकाशित खबर…

यूपी पुलिस को ‘बकरा’ बना गई बंगाल की बाला

मेरठ। सहारनपुर पुलिस ने मंगलवार को वाहवाही लूटने के लिए जो कारनामा कर दिखाया वो हैरान करने वाला है। इस कारनामे के बाद यूपी पुलिस की जमकर फजीहत हुई। दरअसल एक निजी टीवी चैनल के सीरियल की एक लड़की को लापता कहकर प्रचारित किया जा रहा था। ये महज एक विज्ञापन था।

आरोप है कि इसी विज्ञापन को देखकर एक लड़की ने प्लान बनाया और खुद को ही लापता किरदार घोषित कर दिया। उसने पुलिस को कहानी बताई कि उसे लंदन से दिल्ली आने के बाद अगवा कर लिया गया। साथ ही बलात्कार की भी फर्जी कहानी बताई। पुलिस ने भी बगैर जांच किए आरोप को न सिर्फ सच मान लिया बल्कि मीडिया के सामने लड़की को ले आए और प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कर डाली। अब जब मामला खुला तो प्रशासन के होश उड़ गए हैं।

दरअसल न तो ये लड़की एनआरआई है न ही इसका नाम गौरी भोंसले है। ये लंदन से भी नहीं आई बल्कि ये पश्चिम बंगाल की रहने वाली है। इस सारे ड्रामे का आइडिया एक निजी टीवी चैनल पर जल्द ही आने वाले शो के प्रोमो से उसे मिला। उसे इसने सच समझ लिया और एक साजिश का तानाबाना बुन लिया।

यूपी पुलिस को इस लड़की ने यहां तक यकीन दिला दिया कि ये वही लड़की है जिसके बारे में सीरियल के प्रोमो में दिखाया जा रहा है। यूपी पुलिस को एक लड़की बेवकूफ बनाती रही और वो बनती भी रही। वाहवाही बटोरने के चक्कर में सहारनपुर के रुरल एसपी ने तो हद ही कर दी। 30 अक्टूबर की शाम पत्रकारों को बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस का निमंत्रण तक दे दिया गया। इसके बाद एसपी साहब ने पत्रकारों को अपनी कामयाबी ऐसे सुनाई मानों बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। न तो लड़की का मेडिकल कराया गया। न ही उसके दावे की छानबीन की गई। यहां तक कि लड़की को खुले चेहरे के साथ पत्रकारों के सामने पेश कर दिया गया। जबकि बलात्कार का मामला होने पर लड़की की पहचान जाहिर नहीं करनी चाहिए।

खैर प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पुलिस को जांच की सूझी। लड़की के चेहरे का मिलान सीरियल के प्रोमो में दिख रही लड़की से किया गया, लेकिन चेहरा असली हो तब तो मैच करे। इसके बाद पुलिस अफसरों के हाथ के तोते ही उड़ गए। उन्हें समझ में आ गया कि एक लड़की ने पूरे डिपार्टमेंट को बेवकूफ बना दिया है।

लड़की ने अब बयान दिया है कि ये आइडिया उसे एक बीएसएफ जवान ने दिया था। लड़की के मुताबिक वो पश्चिम बंगाल की रहने वाली है। उसे सहारनपुर के कुछ लोगों को 70 हजार रुपये में बेच दिया गया था। उनके चंगुल से छूटने के लिए लड़की ने खुद को सीरियल के प्रोमो में दिखाई जा रही एक्ट्रेस घोषित कर दिया। लेकिन अभी भी लड़की सच बोल रही है या नहीं इस पर आला अफसरों को यकीन नहीं। लिहाजा वो अब बयान भी बच-बचाकर दे रहे हैं ताकि किसी अफसर की गर्दन मामले में न फंसे। साभार- आईबीएन7

लुधियाना से लांच हुआ पंजाब की शक्ति

 

पिछले काफी दिनों से लांचिंग की तिथियां टाल रहे पंजाब की शक्ति आखिरकार लुधियाना से लांच हो गया. प्रबंधन ने कुछ समय पहले हिमाचल संस्‍करण की शुरुआत की थी. लुधियाना से अखबार की लांचिंग की कई तिथियां तय की गई थीं, परन्‍तु परेशानियों के चलते लांचिंग टलती चली गई. इसके पहले 22 अक्‍टूबर को भी अखबार की लांचिंग होनी थी. पूजा के साथ अखबार की लांचिंग की गई. 
 
इस मौके पर एमडी राजेश शर्मा, समूह संपादक नवीन गुप्‍ता, सीनियर रिपोर्टर अरुण सरीन समेत पूरी टीम के लोग मौजूद रहे. 18 पेज के अखबार के साथ चार पेज का पुल आउट भी होगा. अखबार पूरे पंजाब को कवर कर रहा है. स्‍थानीय खबरों को विशेष महत्‍व दिया जाएगा. प्रबंधन इसके बाद जम्‍मू कश्‍मीर से भी नया एडिशन लांच करने की योजना बना रहा है. अखबार के संपादक नवीन गुप्‍ता ने बताया कि हम लोग एक तय योजना के साथ काम कर रहे हैं, जिसके परिणाम जल्‍द दिखने लगेगा.     

बिना सेट टॉप बॉक्स आज से बंद हो आपका जाएगा टीवी!

 

नई दिल्ली: अगर आप दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या चेन्नई में रहते हैं और आपने अब तक अपने घर में सेट टॉप बॉक्स नहीं लगवाया तो आज ज़रूर लगवा लें. क्योंकि बगैर सेट टॉप बॉक्स के आप कल से टीवी नहीं देख पाएंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि आज रात 12 बजे के बाद चार महानगरों में टीवी के एनालॉग सिग्नल का प्रसारण नहीं होगा. सिर्फ डिजिटल सिग्नल का प्रसारण होगा और डिजिटल प्रसारण देखने के लिए सेट टॉप बॉक्स जरूरी है.
 
सूचना और प्रसारण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक देश के चारों मेट्रो शहरों में 93 फीसदी डिजिटाइजेशन का काम पूरा हो चुका है. आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में 92 फीसदी तक डिजिटाइजेशन का काम हो चुका है जबकि मुंबई में सौ फीसदी, कोलकाता में 82 फीसदी और चेन्नई में 62 फीसदी और डीटीएच समेत 86 फीसदी डिजिटाइजेशन हो चुका है. डिजिटाइजेशन के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप अपने केबल ऑपरेटर या डीटीएच ऑपरेटर से बात कर सकते हैं. एबीपी

फ्रांस ने गूगल पर किया एक अरब यूरो का दावा

 

मीडिया वेबसाइटों द्वारा की जा रही क्षतिपूर्ति की मांग के मुद्दे पर समझौता करने का दबाव बनाते हुए फ्रांस के कर अधिकारियों ने गूगल पर एक अरब यूरो (1.3 अरब डॉलर) कर बकाये का दावा किया है। फ्रांसीसी सप्ताहिक अखबार कनार्ड एनचिएन में लिखा गया है कि कर दावे से गूगल की आयरलैंड स्थित कंपनी और फ्रांसीसी इकाई के बीच स्रोत बताए बगैर चार साल के लिए कीमतों के हस्तांतरण पर बनी सहमति खटायी में पड़ सकती है।
       
फ्रांस के कर अधिकारियों ने कहा कि वे कर जमाकर्ता की निजता की वजह से इस तरह के मामले पर टिप्पणी नहीं करते हैं। गूगल ने इस पर तत्काल कोई बयान नहीं दिया है। अखबार में कहा गया है कि सोमवार को फ्रांस के राष्ट्रपति फांस्वा ओलांद और गूगल के मुखिया एरिक स्मिथ की बीच हुई बैठक के दौरान इस कर दावे के मामले को उठाया गया। ओलांद ने कहा कि फ्रांस की सरकार फ्रांसीसी मीडिया वेबसाइटों के साथ विवाद के निपटारे के लिए जरूरत पड़ने पर कानून बना सकती है। फ्रांसीसी मीडिया गूगल को उनके वेबसाइटों के इस्तेमाल से होने वाली विज्ञापन आय में हिस्सेदारी की मांग कर रही हैं। एजेंसी

वरिष्ठ पत्रकार पृथ्वीस चक्रवर्ती और चित्रकार विनायक साखलकर का निधन

दिल्ली : वरिष्ठ पत्रकार पृथ्वीस चक्रवर्ती के निधन की खबर है. हिंदुस्तान टाइम्स में बड़े पदों पर रहे पृथ्वीस नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (एनयूजे) के प्रेसीडेंट भी रहे हैं. उनके निधन की सूचना मिलने पर उनके परिचित और शुभचिंतक उनके घर पहुंचने लगे हैं. पृथ्वीस की उम्र काफी हो चली थी और उम्र जनित कई बीमारियां भी थीं.

उधर, वयोवृद्ध लेखक, साहित्यकार, कला शिक्षक एवं चित्रकार रत्नाकर विनायक साखलकर का कल शाम अजमेर में निधन हो गया. वे 95 वर्ष के थे और वृद्धावस्था की कमजोरी के साथ लंबे अर्से से बीमार चल रहे थे. 15 अक्‍टूबर, 2012 को राजस्‍थान हिंदी ग्रंथ अकादमी ने उन्‍हें अजमेर जाकर 'प्रज्ञा पुरस्‍कार' से सम्‍मानित किया. साखलकर जी की 'आधुनिक चित्रकला का इतिहास' हिंदी में अपने किस्‍म की सबसे बेहतरीन किताब है.

शेखर जोशी को मिले श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी

गालिब के बाबत बहुत सारे किस्से सुनने और पढ़ने को मिलते हैं। कुछ खट्टे, कुछ मीठे। पर एक किस्सा अभी याद आ रहा है। उन दिनों वह बेरोजगार थे। काम की तलाश थी। किसी जुगाड़ से कि किसी की सिफ़ारिश से उन्हें दिल्ली में ही फ़ारसी पढ़ाने का काम मिल गया। पहुंचे वह पढा़ने के लिए। बाकायदा पालकी में सवार हो कर। स्कूल पहुंच कर वह बड़ी देर तक पालकी में बैठे रहे। यह सोच कर कि जो भी कोई स्कूल का कर्ता-धर्ता होगा आ कर उन का स्वागत करेगा। स्वागत के साथ उन्हें स्कूल परिसर में ले जाएगा। वगैरह-वगैरह। 

 
पर जब कोई नहीं आया बड़ी देर तक तो किसी ने उन से आ कर पूछा कि आप पालकी में कब तक बैठे रहेंगे? पालकी से उतर कर स्कूल के भीतर क्यों नहीं जा रहे? तो वह बोले कि भाई कोई लेने तो आए मुझे? कोई खैर-मकदम को तो आए! तो उन्हें बताया गया कि यह तो मुश्किल है। क्यों कि यहां का प्रिंसिपल अंगरेज है। वह आएगा नहीं। उलटे आप को जा कर उस को सलाम बजाना पड़ेगा। तो गालिब मुस्कुराए। पालकी वाले से बोले कि चलो भाई मुझे यहां से वापस ले चलो। मैं तो समझा था कि नौकरी करने से सम्मान और रुतबा बढ़ेगा। पर यहां तो उलटा है। जिस काम में सम्मान नहीं, अपमान मिलता हो, वह मुझे नहीं करना। और गालिब वहां से चले गए। सोचिए कि यह सब तब है जब गालिब पर शराबी, औरतबाज़, जुआरी, अंगरेजों के पिट्ठू आदि होने के भी आरोप खूब लगे हैं। तब भी वह अपमान और सम्मान का मतलब देखने की हिमाकत तो करते ही थे। पर अब?
 
अब हालात बहुत बदल गए हैं। अब तो लोग सम्मान का जुगाड़ करते हैं, सम्मान खरीदते हैं, लाबीइंग करते हैं। आदि-आदि, करते हैं। वगैरह-वगैरह करते हैं। राजनीतिक, उद्योगपति, फ़िल्म आदि के लोग तो यह सब अब खुल्लमा-खुल्ला करने लगे हैं। हमारे साहित्यकार आदि भी इसी चूहा दौड़ में खुल्लम-खुल्ला दौड़ लगाने लगे हैं। प्रायोजित-नियोजित आदि सब कुछ करने लगे हैं। कुछ लोग तो अब यह सब नहीं हो पाने पर खुद ही पुरस्कार आदि भी शुरु कर लेते हैं और ले भी लेते हैं। खुद ही संस्था गठित कर लेंगे। या पत्रिका निकाल लेंगे। या मित्रवत कह कर यह सब प्रायोजित करवा लेंगे। बाकायदा खर्चा-वर्चा दे कर। तो तकलीफ़ तो होती ही है। पर यह सब तो अलग बात है। अब सब लोग जानते ही हैं कि कौन क्या कर रहा है या क्यों कर रहा है। क्या नया, क्या पुराना, क्या युवा, क्या बुजुर्ग हर कोई इस अंधी दौड़ में बेतहाशा हांफ़ रहा है। इस लिए भी कि लोगों को लगता है कि इस के बिना उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं है। आप के पास पाठक हैं कि नहीं, रचना है कि नहीं इस की कोई परवाह नहीं है। हां, पुरस्कार और सम्मान बहुत ज़रुरी है। 
 
जैसे कोई स्त्री चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, कितनी भी आधुनिक और अमीर मनाती हो पर उस की एक पुत्र पाने की लिप्सा भी उतनी ही प्रबल होती है जितनी किसी अनपढ़, गंवार और गरीब स्त्री की होती है। यह सन कांपलेक्स उसे खा डालता है। जो पैसे वाली नहीं है और कि ईश्वर से डरती है तो वह लिंग परीक्षण से भी डरती है और बेटी पर बेटी पैदा करती जाती है। पढ़ी लिखी है, पैसे वाली है तो लिंग परीक्षण करवा-करवा कर अबार्शन पर अबार्शन करवाती जाती है। पर चाहिए उसे हर हाल में बेटा ही। लगभग यही हाल हमारी लेखक बिरादरी का भी हो गया है। कि उसे बेटा मतलब पुरस्कार चाहिए ही चाहिए। भले किसी की पिछाडी़ के आगे-पीछे, होना, धोना, सोना या रोना पड़े। जैसे कार्पोरेट सेक्टर की नौकरी में लोग आत्मा गिरवी रख कर हर कीमत पर प्रमोशन और इनक्रीमेंट पा लेना चाहते हैं। उन के लिए नैतिक-अनैतिक कुछ नहीं होता। वैसे ही अपनी लेखक बिरादरी में सिद्धांत स्तर पर तो नैतिक-अनैतिक तो मौखिक भाव में रहता है। पर वहीं तक जहां तक इन सब कामों में कोई बाधा नहीं पड़ती हो। ज़रा सी भी कोई बाधा आते ही यह सब मौखिक भी नहीं रह जाता। सब कुछ विसर्जित हो जाता है। मल-मूत्र की तरह। यह बडी़ दुविधा है। तब और जब लेखक नाम का प्राणी हर दूसरे को नैतिक-अनैतिक के खाने में तौलता ही रहता है। 
 
दिक्कत यहीं से शुरु होती है और बतर्ज़ धूमिल जिस की पूंछ उठाया, मादा ही पाया की स्थिति आ जाती है। यहां मादा से लैंगिक भेद या कुछ और का आशय हर्गिज़ नहीं है। इस लिए भी कि अब तो महिलाएं भी वह सारे दंद-फ़ंद करने लगी हैं, बल्कि कहीं ज़्यादा। और कि किसी हद तक महिलाएं सफल भी बहुत हैं। अपनी पूरी तुनक मिजाजी और अहंकार में तर होने के बावजूद। पुरुष उन के आगे कई बार हारने से भी लगे हैं। उन की स्त्री शक्ति कहिए या यौन शक्ति कहिए उन के बहुत काम आने लगी है। और कि खुल कर। इस शक्ति के आगे बड़े-बड़े पानी भरने लगे हैं। बहरहाल अभी यहां मुझे इस विषय पर बहुत बात नहीं करनी है, इस विष पर फिर कभी विस्तार से बात होगी।
 
अभी तो यहां बात करनी है कि सम्मान कार्यक्रमों में क्या आयोजकों द्वारा लेखक का अपमान करना ज़रुरी है? और कि क्या सम्मानित होने वाले लेखक को भी इस का ध्यान नहीं रखना चाहिए? उसे ऐसे समारोहों में जाने से इंकार नहीं कर देना चाहिए। लेखकीय अस्मिता की इतनी तलब तो बनती ही है। ऐसा कुछ एक्का-दुक्का मौकों पर लेखकों ने किया भी है। खैर। बीते दिनों प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी को लखनऊ में क्रमश: दो सम्मान दिए गए। और दोनों ही सम्मान कार्यक्रमों में मुझे लगा कि उन का अपमान ही हुआ। जाने उन्हें कैसा लगा। पर मेरे जैसे उन के प्रशंसकों को तो यह सब कुछ अपमानजनक ही लगा। हालां कि इस में शेखर जोशी बिचारे भला कर भी क्या सकते थे। पर सम्मान के बहाने उन्हें लगातार दो-दो बार अपमानित होते देख कर तकलीफ़ बहुत हुई। यह ठीक है कि इस अपमान से बचना बहुत उन के वश में नहीं था। पर वह इस का प्रतिकार तो कर ही सकते थे। बच भी सकते थे। उन के पास बचने के बहाने भी थे। पर उन का बड़प्पन, उन की विनम्रता और सरलता या और जो भी हो उन्हें अपमान की इस नदी में बहा ले गई। 
 
लखनऊ के संत गाडगे सभागार में शेखर जोशी को श्रीलाल शुक्ल स्मृति सम्मान, २०१२ देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव। साथ में हैं लखनऊ के मेयर डॉ दिनेश शर्मा और उदयशंकर अवस्थी
 
लखनऊ में ही बीते महीने उन्हें राही मासूम रज़ा सम्मान से सम्मानित किया गया। राही मासूम रज़ा अकादमी की तरफ से। शेखर जोशी इस सम्मान को लेने के लिए इलाहाबाद से चल कर आए थे। पर एक दिक्कत यह हुई कि उसी दिन उन की पत्नी बीमार हो गईं। बीमार पत्नी को छोड़ कर वह आयोजन में पहुंचे किसी तरह। नमिता सिंह अलीगढ़ से इस सम्मान समारोह में शरीक होने आईं। पर दिक्कत यह रही कि आयोजकों ने हिंदी और उर्दू के तमाम लोगों को बुलाया तो था पर शेखर जोशी की कहानियों या उन के व्यक्तित्व पर बोलने के लिए एक भी वक्ता तय नहीं किया था। नतीज़ा यह हुआ कि सम्मान तो शेखर जोशी का हो रहा था पर बात राही मासूम रज़ा की होती रही। लगभग सभी वक्ता राही मासूम रज़ा, उन के आधा गांव, महाभारत और उन के फ़िल्मी जीवन पर बोलते रहे। लखनऊ के आलोचक वीरेंद्र यादव को शेखर जोशी पर बोलने के लिए बुलाया गया। वह माइक संभालते ही बोले कि मुझ से तो बोलने के लिए पहले कहा ही नहीं गया था। खैर वह शेखर जोशी पर बोलना शुरु किए पर दो मिनट में ही वह राही मासूम रज़ा पर आ गए। और फिर वह राही मासूम रज़ा पर ही बोलते रह गए। उस के बाद जो भी वक्ता आते शेखर जोशी को बधाई देते और राही मासूम रज़ा पर शुरु हो जाते। शेखर जोशी यह सब देख कर ऊबे। 
 
शकील सिद्दीकी भी बैठे थे। कभी उन्हों ने शेखर जोशी की कहानियों पर कोई लेख लिखा था। तो जोशी जी को यह याद आया और उन्हों ने आयोजकों को सलाह दी कि शकील सिद्दीकी से भी भाषण करवा दिया जाए। जाहिर है यह गुपचुप सलाह थी। पर कार्यक्रम संचालक इतने बड़े फ़न्ने खां थे कि उन्हों ने बाकायदा घोषणा की कि शेखर जोशी की विशेष फ़र्माइश है कि उन की कहानियों पर शकील सिद्दीकी साहब बोलें। खैर शकील सिद्दीकी आए। पर वह भी दो मिनट शेखर जोशी पर औपचारिक ढंग से बोल कर राही मासूम रज़ा पर आ गए। उर्दू के साथी तो आते ही राही मासूम रज़ा पर निसार हो जाते रहे। शेखर जोशी ज़्यादातर को याद ही नहीं रहे। एक मोहतरमा तो जो लखनऊ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा पढा़ती हैं, बाकायदा लिखित परचा लाई थीं राही मासूम रज़ा पर और बिस्मिल्ला-ए-रहीम कह कर अपनी बात भी शुरु की पर शेखर जोशी को बधाई देने की भी औपचारिकता भूल गईं। अच्छा ऐसा भी नहीं था कि आयोजक कोई नए लोग थे। तब भी वह लोग ऐसा कर गए। इस के पहले यह आयोजक लोग अपनी बिस्मिल्ला भी ऐसे ही कर चुके थे। 
 
इस एकेडमी ने पहले यह राही मासूम रज़ा एवार्ड उर्दू के मशहूर लेखक काज़ी अब्दुल सत्तार को दिया था। अब बताइए कि सत्तार साहब खुद एक मकबूल कथाकार हैं। न सिर्फ़ इतना उन्हों ने राही मासूम रज़ा को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ाया भी है। इस लिहाज़ से राही मासूम रज़ा सत्तार साहब के शिष्य हुए। पर शागिर्द के नाम का एवार्ड आयोजकों ने उस्ताद को दे दिया। और मज़ा यह कि वह आ कर ले भी गए। खैर इस पूरे आयोजन में राही मासूम रज़ा पर अच्छी चर्चा हुई। उन की कई रचनाओं का ज़िक्र लोगों ने बड़े मन से किया। उन की कई गज़लें तरन्नुम से पढ़ी गईं। नज़्में भी लोगों ने पढीं। उन के व्यक्तित्व पर भी चर्चा हुई। यह बात भी हुई कि आधा गांव तो उन्हों ने उर्दू में लिखा था पर उर्दू में वह छपा नहीं। क्यों कि उर्दू के कठमुल्लों को उस से खतरा था। पाकिस्तान बंटवारे की खिलाफ़त थी उस में। आदि-आदि। अच्छी बात हुई कुल मिला कर राही मासूम रज़ा पर। लेकिन चर्चा तो शेखर जोशी पर भी होनी चाहिए थी। जो कि नहीं हुई। यह अफ़सोसनाक था।
 
अफ़सोसनाक ही था श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह भी। बीते साल यह सम्मान विद्यासागर नौटियाल को यह दिया गया था शरद पवार के हाथ। यह नैटियाल जी का भी अपमान था। और श्रीलाल शुक्ल का भी। इस लिए भी कि नौटियाल जी जैसा एक ईमानदार और सरल आदमी राजनीति और समाज के महाभ्रष्ट आदमी के हाथ से कोई सम्मान स्वीकार करे। पर नौटियाल जी जिस व्यवस्था और तंत्र के खिलाफ़ जीवन कुर्बान किए बैठे थे, उसी व्यवस्था और तंत्र के प्रतिनिधि से वह श्रीलाल शुक्ल सम्मान लेने को अभिशप्त हुए। पांच साढे़-पांच लाख के इस सम्मान के आगे उन के सारे जीवन मूल्य और सिद्धांत तिरोहित हो गए। पर तब यह सब बातें भी तिरोहित हो गई थीं शरद पवार को पड़े थप्पड़ की गूंज में। ज़िक्र ज़रुरी है कि उन्हीं दिनों अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मुहिम नया-नया शुरु हुआ था। और उन के निशाने पर शरद पवार भी थे। एक सिख युवक ने इफ़्को द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का लाभ लिया और शरद पवार को खींच कर थप्पड़ मार दिया। यह ऐसी घटना थी कि अन्ना जैसा आदमी भी पहली प्रतिक्रिया में लड़खड़ा गया और बोल पड़ा कि, बस एक ही थप्पड़ मारा? अन्ना की इस प्रतिक्रिया की भी खूब निंदा हुई थी तब। बाद में अन्ना ने अपने इस बयान पर पानी डाला इस बयान को संशोधित कर के और इस घटना की निंदा कर के। खैर बाद में नौटियाल जी भी दुनिया से विदा हो गए।
 
अब की इफ़्को द्वारा श्रीलाल शुक्ल सम्मान फिर उत्तराखंड में ही जन्मे शेखर जोशी को दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार के भ्रष्टतम मंत्री शिवपाल सिंह यादव के हाथ से। इस बार भी जोशी जी के साथ एक त्रासदी गुज़री, उन की पत्नी का इसी हफ़्ते निधन हो गया। तो भी वह सम्मान समारोह में आए। उन्हें सम्मानित करने के लिए आना तो था मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को। अखबारों में इफ़्को की तरफ़ से छपे विज्ञापन में इस की घोषणा भी थी, निमंत्रण पत्र में भी। लेकिन एक दिन पहले एक पांच सितारा होटल में इफ़्को द्वारा आयोजित डिनर में ही मुख्यमंत्री ने शिरकत कर के शेखर जोशी को शाल उढ़ा कर सम्मानित कर दिया। ऐसा बताया गया। व्यक्तिगत बातचीत में। आयोजन में सार्वजनिक रुप से ऐसा कुछ भी बताने की ज़रुरत नहीं समझी गई कि आखिर मुख्यमंत्री मुख्य कार्यक्रम में क्यों नहीं आए। जंगल में मोर नाचा किस ने देखा वाली बात हो गई। बाद में चर्चा हुई कि वह नोएडा में आयोजित किसी कार्यक्रम में चले गए। अब जाने क्या हुआ। पर यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए न हो कर इफ़्को के एक कार्यक्रम में तब्दील था जिस में इफ़्को-जन की ही भीड़ और औपचारिकता थी। 
 
खचाखच भरे हाल में लग रहा था जैसे यह सारा कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए नहीं शिवपाल सिंह यादव के ईगो मसाज़ और सम्मान के लिए आयोजित था। या फिर श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए। शेखर जोशी के लिए तो हरगिज़ नहीं। समूचे कार्यक्रम में इफ़्को के प्रबंध निदेशक उदयशंकर अवस्थी जिस तरह मंच पर सरे आम शिवपाल सिंह की मिजाजपुर्सी में लगे रहे, वह बहुत अश्लील था। वक्ता बोल रहे हैं और उन का मुंह शिवपाल के कान में। दोनों लोग इस तरह हंस बतिया रहे थे कि लग रहा था गोया यह लोग किसी कार्यक्रम में नहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठे गपिया रहे हों। हंसी ठिठोली कर रहे हों। ज़िक्र ज़रुरी है कि उदयशंकर अवस्थी न सिर्फ़ इफ़्को के प्रबंध निदेशक हैं बल्कि श्रीलाल शुक्ल के दामाद भी हैं। और कि आलोचक देवीशंकर अवस्थी के अनुज भी। आलोचना के लिए एक देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार भी वह चलाते हैं। खैर, श्रीलाल जी एक बड़े लेखक ही नहीं एक सुसंस्कृत व्यक्ति भी थे। उन के दामाद ने उन की याद में भी सम्मान शुरु किया सरकारी पैसे से सही, यह अच्छी बात थी। 
 
पर क्या ही अच्छा होता कि उदयशंकर अवस्थी इस श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह को शालीन और सुसंस्कृत भी बने रहने देते। साथ ही इसे कभी शरद पवार तो कभी शिवपाल सिंह यादव जैसे भ्रष्टजनों से दूर रखते और कि इसे इफ़्को का औपचारिक कार्यक्रम बनाने की बजाय एक लेखक का सम्मान समारोह ही बने रहने देते। जिस लेखक का सम्मान हो रहा हो उसी की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित व्याख्यान या फिर उसी लेखक की रचनाओं पर आधारित नाट्य कार्यक्रम आदि भी रखते तो उस लेखक का वह सचमुच सम्मान करते। इफ़्को के पैसे से श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए वह और भी कई मौके ढूंढ सकते हैं। उन की जयंती पर, उन की पुण्यतिथि पर। और फिर श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखक को याद करने के और भी कई तौर-तरीके हो सकते हैं। वह बड़े लेखक हैं। उन को रोज याद कीजिए, कोई हर्ज़ नहीं है अवस्थी जी। पर इस तरह किसी लेखक को अपमानित कर सम्मानित करने का यह तरीका ठीक नहीं है। सम्मान सहित अपमानित करने का मुहावरा शायद ऐसे ही बना होगा। फ़िराक गोरखपुरी ने शायद ऐसे ही किसी मौके से गुज़र कर यह शेर लिखा होगा कि , 'जो कामयाब हैं दुनिया में, उन की क्या कहिए/ है इस से बढ़ कर भले आदमी की क्या तौहीन !' संयोग से उसी इलाहाबाद में शेखर जोशी भी रहते हैं जहां फ़िराक साहब रहते थे। तो इस बात की तासीर और चुभन वह भी समझते और भुगतते होंगे। क्या पता?
 
इस समारोह में अश्लीलता और अपमान की तफ़सील इतनी भर ही नहीं थी। बताइए कि सम्मान समिति के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र यादव अस्वस्थ होने के बावजूद दिल्ली से आए थे और मंच पर उपस्थित थे। बावजूद इस के शेखर जोशी के सम्मान के समय आयोजकों में से किसी भी को इस की सुधि नहीं आई कि राजेंद्र यादव को भी इस में शरीक किया जाए। उन का नाम तो पुकारा गया पर अपनी अस्वस्थता के नाते वह खुद उठ कर आ नहीं सके और दूसरे किसी को फ़ुर्सत नहीं थी कि उन्हें पकड़ कर वहां तक ले आता। इस लिए भी कि सारा मंच और आयोजन तो शिवपालमय था। राजेंद्र यादव उपेक्षित से अकले मंच पर बैठे टुकुर-टुकुर ताकते रह गए और शिवपाल के भ्रष्ट हाथों से शेखर जोशी का सम्मान कहिए, अपमान कहिए हो गया। यह मंज़र देख कर देवेंद्र आर्य का एक शेर याद आ गया : 'गरियाता हूं जिन्हें उन्हीं के हाथों से/ पुरस्कार लेता हूं इस का क्या मतलब!'
 
सच मानिए कि यह अपमान सिर्फ़ शेखर जोशी का ही नहीं, श्रीलाल शुक्ल का भी अपमान है और समूची लेखक बिरादरी का भी। इस पर गौर किया जाना चाहिए। उदयशंकर अवस्थी ने अपने भाषण में कहा कि इफ़्को की तरफ़ से यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान हर साल हिंदी के किसी ऐसे लेखक को दिया जाएगा और कि दिया जा रहा है कि जो किसानों और गांव की समस्या पर कहानी लिखता हो। तो दिक्कत यह है कि इफ़्को की किसानों वाली जो भी बाध्यता या मजबूरी हो पर सच यह है कि न तो श्रीलाल शुक्ल किसानों के बारे में कोई कहानी-उपन्यास लिख गए हैं न ही विद्यासागर नौटियाल लिख गए हैं न ही शेखर जोशी ने किसानों पर कोई कहानी-उपन्यास लिखा है। यह तीनों ही शहरी मध्यवर्ग के कहानीकार हैं। हां, नौटियाल जी और शेखर जोशी ने मज़दूरों पर ज़रुर लिखा है। पर किसानों पर तो बिलकुल नहीं। यह भ्रम भी टूटना चाहिए। इतना ही नहीं निर्णायक मंडल में बैठे लोग भी किसानों या गांव पर लिखने वाले लोग नहीं थे। खैर निर्णायक मंडल के लिए यह बाध्यता होती भी नहीं। पर इस सम्मान समारोह का जो सुर था वह पूरी तरह अश्लीलल और गैर लेखकीय था। किसी लेखक को अपमानित करने वाला। बताइए कि सम्मान समारोह शेखर जोशी का था और सम्मानित शिवपाल सिंह यादव हो रहे थे। सारे बुके, स्मृति चिन्ह और शाल शिवपाल सिंह यादव के हवाले थी और सारी चर्चा श्रीलाल शुक्ल पर हो रही थी। क्या शेखर जोशी इतने बौने लेखक हैं? कि एक औपचारिक प्रशस्तिवाचन छोड़ कर उन के नाम पर कुछ और भी नहीं हो सकता था? गनीमत यही रही कि यह शिवपाल जो कभी मुलायम राज में नोएडा में घटित निठारी जैसे कांड के लिए कहते थे कि बडे़-बडे़ शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं घटती रहती हैं तो अब अखिलेश राज में अफ़सरों से अभी कहा था कि मेहनत कर के चोरी करो। फिर इलाहाबाद में महाकुंभ की तैयारियों का जायजा लेने के बाद कहा कि कमीशन में कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। ऐसी भ्रष्ट बयानबाज़ी और बेलगाम लंठई के ट्रैक पर वह इस समारोह में नहीं आए।
 
हां, लखनऊ में इंदिरा नगर की एक सड़क का नाम श्रीलाल शुक्ल के नाम पर करने की घोषणा ज़रुर की। इस के पहले राजेंद्र यादव ने अपने संबोधन में सम्मान राशि साढ़े पांच लाख रुपए को कम बताते हुए इसे साढ़े ग्यारह लाख रुपए करने की बात कही थी साथ ही यह इच्छा भी जताई कि काश हिंदी में भी कोई सम्मान राशि पचास लाख रुपए की हो जाए। तो शिवपाल ने भी सम्मान राशि को पुरस्कार राशि बताते हुए दोगुना करने की बात कही। लेकिन उदय शंकर अवस्थी इस पर चुप रहे। शिवपाल के भाषण के बाद उदघोषक ने अचानक कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी। फिर तुरंत ही कहा कि अभी श्रीलाल शुक्ल पर वीरेंद्र यादव अपना वक्तव्य देंगे। महफ़िल उखड़ चुकी थी। पूरा महौल अफ़रा-तफ़री में आ गया। शिवपाल गए, भीड़ भी चली गई। पर हाल जो खाली हुआ था फिर भर गया। यह दुबारा आए लोग नाट्य संस्था दर्पण के लोग थे। जो अपने नाटक को कभी दर्शकों की कमी नहीं महसूस होने देते। श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं पर तैयार एक नाट्य कोलाज दर्पण को तुरंत प्रस्तुत करना था। पर बोलने आए वीरेंद्र यादव। श्रीलाल शुक्ल पर। अफ़रा-तफ़री के बीच अभी वह बोल ही रहे थे कि कार्यक्रम संचालक की पर्ची आ गई। नाट्य दल के लोग भी उतावले दिख रहे थे। वीरेंद्र यादव पांच -सात मिनट ही बोले होंगे कि संचालक उन के बगल में खड़े हो गए। वक्तव्य समाप्त हो गया। कोलाज शुरु हुआ। उर्मिल थपलियाल के निर्देशन में। जैसे भारी भीड़ के बावजूद कार्यक्रम बिखरा-बिखरा था, यह कोलाज भी वैसे ही बिखरा-बिखरा था। जल्दबाज़ी में तैयार किया हुआ। दो या तीन दृष्य छोड़ कर सब बेजान। लफ़्फ़ाज़ी से ओत-प्रोत।
 
जल्दी ही कोलाज खत्म हो गया। बाहर बने पांडाल में नाश्ते के लिए भगदड़ थी। गोया किसी राजनीतिक पार्टी के दफ़्तर में रोजा अफ़्तार की भगदड़। लेखक लोग असहाय और भौंचक इधर-उधर। यह इफ़्को की जनता थी। यह एक नया कोलाज था। एक लेखक की अपमान कथा पूरी हो चुकी थी। सम्मान राशि चाहे जो हो पर सम्मान तो कम से कम हो ही, लेखक का अपमान कम से कम फिर से न हो, आगे से उदय शंकर अवस्थी और इफ़्को इस बात का खयाल रखें तो क्या ही अच्छा हो। श्रीलाल शुक्ल का दामाद और देवीशंकर अवस्थी का अनुज होने के बावजूद जो लेखकीय सम्मान और लेखकीय गरिमा से उन का फिर भी परिचय न हो तो इसी लखनऊ में ही हर साल संपन्न होने वाले कथाक्रम समारोह या लमही समारोह को आ कर देख लें, जायजा और जायका ले लें। सब कुछ समझ में आ जाएगा। 
 
कथाक्रम की ओर से बीते पंद्रह बरस से आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान समारोह प्रति वर्ष आयोजित होता है। अब की साल ३ और ४ नवंबर, २०१२ को सोलहवां समारोह प्रस्तावित है। इस समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखक शिरकत करते हैं। दो दिन का जमावड़ा होता है। जिस लेखक को सम्मानित किया जाता है, उस की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित पूरा एक सत्र होता है। कोई बुजुर्ग लेखक ही सम्मानित करता है। और वो जो कहते हैं न कि न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे की तर्ज़ पर जो कहें कि इस समारोह में लेखक का सम्मान होता है और होता हुआ दिखाई भी देता है। बाकी दो या तीन सत्र में किसी एक विषय पर बहस-मुबाहिसा होता है। जैसा कि लाजिम है आपसी राजनीति, उखाड़-पछाड़ आदि भी इस समारोह का अनिवार्य हिस्सा होती ही है। इस आयोजन के संयोजक शैलेंद्र सागर भी यह सम्मान समारोह अपने पिता आनंद सागर की स्मृति में ही देते हैं। तो इस गरिमामय आयोजन से आनंद सागर की बिना कोई चरण-वंदना के आनंद सागर का भी सम्मान स्वयमेव होता ही है, सम्मानित होने वाले लेखक का भी सम्मान होता है, शैलेंद्र सागर और उपस्थित लेखकों का भी सम्मान होता है। यह सम्मान लाखों रुपए के बजाय कुछ हज़ार रुपए का ही भले होता है पर इस का पूरे देश में सम्मान होता है। प्रतिष्ठा मिलती है।
 
यही हाल, दो साल से शुरु हुए लमही सम्मान का भी है। स्पष्ट है कि यह प्रेमचंद की स्मृति में होता है, बिना प्रेमचंद की चरण-वंदना किए। लमही के संपादक विजय राय भी प्रेमचंद के परिवार के हैं। इन दोनों मौकों पर इन समारोहों के संयोजक-संपादक शैलेंद्र सागर और विजय राय की विनम्रता और सरलता भी देखते बनती है। सम्मान राशि प्रतीकात्मक होने के बावजूद लेखकीय गरिमा और उस की अस्मिता की तलब जगाते इस सम्मान समारोह में सचमुच लेखक का सम्मान होता है, उस की रचनाधर्मिता का सम्मान होता है। कुछ राजनीति-वाजनीति के बावजूद। उदय शंकर अवस्थी को इन या ऐसे और आयोजनों से सीख लेनी चाहिए। नहीं इस तरह तो वह सम्मानित होने वाले लेखक को तो हर साल अपमानित करेंगे ही, श्रीलाल शुक्ल के नाम की गरिमा को भी डुबो देंगे। वह अपने इर्द-गिर्द घूमने वाले चाटुकार लेखकों से भी बचें, तभी यह कर भी पाएंगे। 
 
अब इस प्रसंग का अंत भी गालिब से ही करने को मन हो रहा है। यह किस्सा अभी कुछ समय पहले कथादेश में विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी दर्ज किया था। अब्दुल हलीम शरर जिन्हों ने गालिब की जीवनी लिखी है, उन्हीं के हवाले से। क्या था कि गालिब के निंदक उन के समय में भी खूब थे। कई बार उन के निंदक उन्हें गालियों से भी नवाज़ते थे। चिट्ठियां लिख–लिख कर गरियाते थे। एक दिन शरर गालिब के साथ बैठे थे कि तभी एक चिट्ठी आ गई। चिट्ठी देख कर गालिब उदास हो गए। बोले कि फिर किसी ने गाली लिख भेजी होगी। चिट्ठी खोली पढ़ी और बताया शरर को कि इस को तो गाली भी देने नहीं आती। अब बताइए कि मुझे बहन की गाली दे 
दयानंद पांडेय
रहा है। इतना भी नहीं जानता कि बूढे़ आदमी को बेटी की गाली दी जाती है। बहन की गाली तो नौजवान को दी जाती है। और बच्चे को मां की गाली। तो बताइए कि अपने उस्ताद लोग तो गाली भी सही ढंग से कबूल करते थे और कि उस की तफ़सील बता गाली देने का सलीका भी बताते थे। फिर इफ़्को और उदय शंकर अवस्थी को जानना चाहिए कि वह तो गाली नहीं सम्मान दे रहे हैं और इस तरह अपमानित कर के? इस से तो श्रीलाल शुक्ल की आत्मा भी कलप जाएगी!
 
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है. दयानंद की बेबाक लेखनी का स्वाद लेने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- भड़ास पर दनपा

‘सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत हुए शायर जयगोपाल ‘अश्क’ अमृतसरी

 

चंडीगढ़ : अखिल भारतीय साहित्य परिषद, दिल्ली की ओर से पिछले दिनों भोपाल (मध्यप्रदेश) आयोजित एक भव्य राष्ट्रीय कार्यक्रम में अलग-अलग प्रान्तों के चौदह भाषाओं के चौदह कवियों व साहित्यकारों को सम्मानित किया गया, जिनमें सिंधी, कन्नड, उडिया, हिन्दी, संस्कृत, बंगाली, पंजाबी, मलयालम, असमी, गुजराती, तमिल इत्यादि भाषाओं के साहित्यकार व कविगण शामिल थे। 
 
मोहाली, पंजाब से सुप्रसिद्ध शायर व साहित्यकार जनाब जय गोपाल कोछड़ ‘अश्क’ अमृतसरी को पंजाबी भाषा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना व भारतीय संस्कृति और पंजाबी सभ्याचार की नुमाइन्दा कविता के लिए ‘सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत किया गया। सन् 1930 में पंजाब में जन्में ट्राइसिटी के वयोवृद्ध कवि व साहित्यकार जनाब ‘अश्क’ के नाम पंजाबी भाषा में काव्य संग्रह, उपन्यास, भगवत गीता का पंजाबी में काव्यानुवाद है तो इसके अतिरिक्त उन्होंने अनके ग्रन्थों का पंजाबी में अनुवाद एवं सम्पादन किया है। यह सम्मान उन्हें मध्य प्रदेश के सांस्कृतिक मंत्री माननीय श्री कृष्णकांत, सरसंघ चालक माननीय मोहन भागवत तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्राचार्य डॉ0 जानी द्वारा प्रदान किया गया।

पत्रकार सूजा की गोली मारकर हत्‍या, बाइक और लैपटॉप भी ले गए

 

: अब तक 10 पत्रकारों की हो चुकी है हत्‍या : ब्राजील रेडियो के एक पत्रकार की गोली मार कर हत्या कर दी गई है। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर ने कहा है कि इस साल अब तक 10 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। सेरजीपे राज्य के इटाबाइआना में 28 अक्टूबर की रात चालीस वर्षीय एड़विल्सन डी सूजा की गोली मार कर हत्या कर दी गयी। पुलिस ने बताया कि मामले की जांच की जाच की जा रही है। अभी तक हत्या को लेकर किसी वजह का पता नहीं चल पाया है।
     
पेरिस स्थित रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर (आरएसएफ) ने कल बताया कि अभी यह नहीं पता चला है कि क्या पत्रकार होने के कारण डी सूजा को अपनी जान गंवानी पड़ी। उनकी बाइक और लैपटाप भी चुरा लिए गए। ब्राजील में पत्रकारों के खिलाफ अपराध के बारे में गैर सरकारी समूहों का कहना है कि 2012 के स्थानीय चुनावों की वजह से हिंसा और सेंसरशिप के मामले बढ़ गए हैं। आरएसएफ ने कहा कि हमारा मानना है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए संघीय स्तर पर समन्वय की आवश्यकता है।

…और इस तरह पूरा हुआ आजतक का ऑपरेशन धृतराष्‍ट्र!

 

जुलाई का दूसरा और तीसरा सप्‍ताह- आजतक स्‍पेशल इंवेस्‍टीगेशन टीम के एडीटर दीपक शर्मा को उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार के सामाजिक न्‍याय और आधिकारिता मंत्रालय के बीच एनजीओ डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्‍ट के सरकारी फंड में हुई अनियमितताओं को लेकर पत्राचार की जानकारी मिली.
 
जुलाई 31- दीपक शर्मा ने अपने वरिष्‍ठ अधिकारियों की अनुमति लेकर उत्तर प्रदेश का दौरा किया और एनजीओ की जांच के लिए अपने साथ एक स्‍पाई कैमरा लेकर गए.
 
अगस्‍त 5- दीपक शर्मा और उनके साथी अरुण सिंह दोबारा उत्तर प्रदेश के दौरे पर गए और सूत्रों से मिलने के लिए सबसे पहले अलीगढ़ पहुंचे. 
 
अगस्‍त 6- एटा जिला विकलांग कल्‍याण विभाग के दौरे में एक चपरासी के जरिए विकलांग लाभार्थियों को जाली हस्‍ताक्षर से उपकरण बांटने की बात सामने आई. रिपोर्ट चपरासी को लौटा दिया गया और उन कागजों की फोटोकॉपी निकाल ली गई. मैनपुरी के जिला अधिकारियों ने स्‍पाई कैमरे पर अनियमिताओं की बात स्‍वीकार की. 
 
अगस्‍त 7- फर्रुखाबाद में रिपोर्टर पहुंचे. स्‍पाई कैमरे में अधिकारियों ने कहा कि उन्‍हें कैंप के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी. 
 
अगस्‍त 8- लखनऊ में जिला कल्‍याण निदेशालय के उप निदेशक अखिलेंद्र कुमार ने स्‍पाईकैम में जाली हस्‍ताक्षरों की शिकायतों पर बातचीत की जो कि ट्रस्‍ट की प्रोजेक्‍ट निदेशक लुईस खुर्शीद द्वारा सामाजिक न्‍याय और आधिकारिकता मंत्रालय को सौंपी गई थी. उन्‍होंने भारत सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश में इन जाली हस्‍ताक्षरों की जांच के बारे में बताया. उत्तर प्रदेश के विकलांग कल्‍याण के निदेशक द्वारा राज्‍य सरकार के विशेष सचिव को 12 जनवरी 2012 को एक पत्र लिखा गया जिसमें जाली हस्‍ताक्षरों का आरोप लगाया गया था. उस पत्र में लिखा गया था कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 17 जिलों के चेकलिस्‍ट में हस्‍ताक्षरों का सत्‍यापन किया जिनमें से 10 जिलों की चेकलिस्‍ट पर हस्‍ताक्षरों को जाली पाया. इस पत्र ने ट्रस्‍ट की ओर से किए जा रहे कार्यों पर संदेह खड़ा कर दिया. 
 
अगस्‍त 9- रिपोर्टर कयामगंज में लाभार्थियों को खोजने के लिए पहुंचे जिन्‍हें कि उपकरण बांटे गए थे. उस चेकलिस्‍ट में एक रंगी मिस्‍त्री था जिसकी क्रम संख्‍या 29 थी. यह पितुआरा गांव से था. रंगी मिस्‍त्री ने कहा कि उसे कान की कोई मशीन मिली ही नहीं. जबकि चेकलिस्‍ट में उस व्‍यक्ति का नाम था और लिस्‍ट के मुताबिक उसे उपकरण दिया गया था. रिपोर्टर ऐसे ही अन्‍य लाभार्थियों की तलाश करने गांव गया लेकिन गांव वालों ने बताया कि उन नामों में गांव में कोई है ही नहीं. 
 
रिपोर्टर फिर एटा जिले में पहुंचे और पाया क्रम संख्‍या 1 में 36 वर्षीय राम गोपाल नाम का व्‍यक्ति दरअसल एक स्‍कूल जाने वाला बच्‍चा है. उस बच्‍चे ने बताया कि उसे कोई व्‍हीलचेयर मिली ही नहीं है लेकिन उस चेकलिस्‍ट के मुताबिक रामगोपाल को व्‍हीलचेयर दी गई है. श्‍याम सिंह सहित ऐसे कई लाभार्थी इस जिले में मिले जिन्‍हें कोई उपकरण या व्‍हीलचेयर मिला ही नहीं था लेकिन उस लिस्‍ट में उनका नाम था. 
 
अगस्‍त 14- इस स्‍पाईकैम ऑपरेशन में सामाजिक न्‍याय और आधिकारिकता मंत्रालय के अंडरसेक्रेट्री आर.पी पुरी ने कहा कि डॉ जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्‍ट को ब्‍लैकलिस्‍ट कर देना चाहिए. यह कोई छोटा एनजीओ होता तो बात समझ में आती लेकिन यह प्रभावशाली राजनीतिज्ञों की एनजीओ है. इन अनियमितताओं के बारे में पता चलने पर सरकार की ओर से अनुदान बंद कर दिया गया. मंत्री के संज्ञान में पूरा मामला था अब यह उनपर निर्भर करता है वह एनजीओ को ब्‍लैकलिस्‍ट करना चाहते हैं या नहीं. 
 
अगस्‍त का दूसरा और तीसरा सप्‍ताह- इस रिपोर्ट को तैयार किया गया और इसका संपादन किया गया. 
 
सितंबर 8- जब पूरी रिपोर्ट को तैयार कर लिया गया तो ट्रस्‍ट के अध्‍यक्ष के रूप में सलमान खुर्शीद को एक प्रश्‍नावली भेजी गई: 
 
*ट्रस्‍ट को वर्ष 2009-10 में 71,50,000 रुपयों का अनुदान एडीआईपी स्‍कीम के लिए दिया गया. रिपोर्ट को तैयार करते हुए ट्रस्‍ट ने जाली हस्‍ताक्षर किए. 
 
*चेकलिस्‍ट में उन लाभार्थियों के नाम है जो कि काल्‍पनिक है और कुछ को सहायता मिली ही नहीं. 
 
*वर्ष 2009-2010 के इस धांधली के बाद दोबारा 68,00,000 रुपयों का अनुदान दिया गया था. (आजतक)

मलाला यूसुफजई पर हमले के लिए बीबीसी उर्दू जिम्‍मेदार!

 

नई दिल्ली। पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई पर हमले के लिए क्या बीबीसी की उर्दू सेवा जिम्मेदार है? यह सवाल इन दिनों पाकिस्तान में बहस का मुद्दा बना हुआ है। दरअसल, बीबीसी की उर्दू सेवा के लिए डायरी लिखने को मलाला पर हमले का प्रमुख कारण माना जा रहा है। लड़कियों की शिक्षा की वकालत करती यह डायरी उसने 2009 में लिखी थी जब स्वात घाटी तालिबान के नियंत्रण में थी। 
 
उस समय मलाला कक्षा चार की छात्रा थी और उसने गुल मकाई के नाम से तालिबान के शासन में जिंदगी को लेकर डायरी लिखना शुरू किया था। उस समय तालिबान ने लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया था। मलाला से डायरी लिखवाने के फैसले पर कहा जा रहा है कि बीबीसी ने जानबूझ कर मलाला, उसके परिजनों और स्कूल जाने वाली कई लड़कियों की जान को जोखिम में डाला। बीबीसी से पूछा जा रहा है कि उसने पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन के खिलाफ डायरी लिखवाने के लिए एक बच्ची को क्यों चुना? क्या बीबीसी का यह फैसला पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों के अनुरूप था? क्या उसने बच्ची से डायरी लिखवाने के लिए उसके माता-पिता से इजाजत ली थी? क्या बीबीसी ने उसका नाम सार्वजनिक न करने का आश्वासन दिया था? 
 
संभव है कि उस समय 12 साल की मलाला ने डायरी लिखने की बात अपनी सहेलियों के साथ साझा की हो। क्या बीबीसी ने इस ओर ध्यान दिया था? ब्लॉग लिखवाने के लिए बीबीसी ने किसी वयस्क टीचर से संपर्क क्यों नहीं किया? बीबीसी ने मलाला पर हमले के बाद उसकी लिखी डायरियों को उसके वास्तविक नाम से क्यों प्रकाशित किया? इन जैसे ढेरों सवाल इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए है। वहीं मलाला को मीडिया में मिल रहे कवरेज के बाद तालिबान ने मीडिया कर्मियों को निशाना बनाने की धमकी दी है। इसमें पाकिस्तान में कार्यरत बीबीसी के कर्मचारी मुख्य रूप से निशाने पर होंगे। इस धमकी से पाकिस्तानी पत्रकारों में डर व्याप्त है। पाकिस्तान में पिछले एक दशक में 80 पत्रकार मारे जा चुके हैं। (जागरण)

चंडीगढ़ में पत्रकार वार्ता में महिला ने रिपोर्टर को थप्पड़ मारा

: Reporter slapped at Press meet : Chandigarh : High drama prevailed in a Press conference organised by a lady, resident of Ludhiana, when she slapped a Punjabi newspaper correspondent on Monday afternoon in the premises of Press Club, Chandigarh. Jagjit Kaur, a resident of Ludhiana, had organised a Press conference claiming that she would provide evidence to the media about her sexual harassment by a high ranking police official of UT police. She told mediapersons that she has enough video recording against the official.

When reporters questioned her about the evidence and her petition in the Supreme Court which was dismissed by the court, she failed to provide any clue against the same in the conference. Kaur lost her temper when a correspondent of a Punjabi newspaper insisted that she show the evidence to the media. She slapped the correspondent in the Press meet at the conference hall and also misbehaved with other mediapersons.

The correspondent called the police and informed them about the incident. “The police team on the complaint of the newspaper journalist has registered a case against the Jagjit Kaur and further investigation in this case is in progress,” said Anok Singh, SHO posted at PS-26.

Meanwhile, an official spokesman of Punjab police has informed that CPO has ordered ADGP/Crime to club all the complaints of petitioner Jagjit Kaur and get them probed thoroughly through an IG rank officer of Crime Wing within four weeks time.

साभार- द पायनियर

नेताओं ने सभा के दौरान दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ पर कई आरोप लगाते हुए अपशब्द कहे

यूपी के गाजीपुर जिले से खबर है कि एक नेता ने सभा के दौरान दैनिक जागरण गाजीपुर के जिला ब्‍यूरो चीफ पर पैसा लेकर गलत खबर छापने का आरोप लगाया और साथ ही ब्यूरो चीफ को अपशब्द भी कहे। इस नेता का कहना है कि गलत खबर से हम लोगों का लाखों का नुकसान हो रहा है। नेता ईंट भट्ठा संगठन के हैं। उन्होंने कहा कि हम लोग इस अखबार का जिले भर में बहिष्कार करेंगे। नेता महोदय ने दैनिक जागरण के जिला संवाददाता को भद्दी भद्दी गालियां दी और तमाम अपशब्द भी कहे। यह कारनामा करने वाले ईंट भट्ठा संगठन के नेताओं के नाम हैं रजनीकांत राय और लल्लन सिंह। रजनीकांत संगठन के जिला अध्यक्ष हैं जबकि लल्लन सिंह महामंत्री पद पर आसीन हैं।

 
गाजीपुर जिला मुख्यालय पर स्थित सरजू पाण्डेय पार्क में ईंट भट्ठा संगठन की ओर से खनन पर रोक लगाए जाने के विरोध में प्रदर्शन आयोजित था। कार्यक्रम समापन के समय ही अचानक जिलाध्यक्ष रजनीकांत राय दैनिक जागरण के जिला संवाददाता राजकमल राय को अपशब्द कहने लगे और आरोप लगाने लगे कि पिछले 20 दिनों से संगठन को लेकर दैनिक जागरण में आ रही भ्रामक खबरों से ईंट भट्ठा संचालक बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और उनका लाखों का नुकसान हुआ है।

महामंत्री लल्लन सिंह ने आरोप लगाया कि राजकमल राय दैनिक जागरण अखबार को मोहरा बनाकर संगठन के विवादों में पार्टी बन रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि जिले भर में दैनिक जागरण का बहिष्कार किया जाएगा। इस सभा के दौरान दैनिक जागरण का कोई कर्मी मौके पर नहीं था। संगठन के पदाधिकारियों ने पूरे प्रकरण की जानकारी दैनिक जागरण के वाराणसी कार्यालय में उंचे पदों पर बैठे लोगों को भी दी है। बताया जाता है कि वहां से उन्हें जांच का आश्वासन भी मिला है। समूचा मामला अब जागरण वाराणसी के पाले में है। भट्ठा संगठन का कहना है कि वह परिणाम के बगैर नहीं मानेगा। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

गाजीपुर में पुलिस के निशाने पर हैं क्षेत्रीय पत्रकार

यूपी के गाजीपुर जनपद में इन दिनों खाकी वर्दी खिसियानी बिल्ली की तर्ज पर चौथे स्तम्भ पर पंजा मारने में लगी है। कई पत्रकार अपने साथ हुए हादसों-घटनाओं की जानकारी जब थानों पर देते हैं, तो पुलिस उनसे अपराधियों सा सुलूक करने पर आमादा हो जाती है। तीन माह में यहां के तकरीबन 3-4 पत्रकारों पर पुलिस मुकदमा दर्ज कर चुकी है, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि आजकल पुलिस का खौफ पत्रकारों पर अधिक, अपराधियों पर कम है। 

ज्ञात हो कि कासिमाबाद पुलिस, करीमुद्दीनपुर पुलिस, सुहवल पुलिस तथा मरदह पुलिस ने अपने अपने क्षेत्र के एक-एक संवाददाओं पर मुकदमा दर्ज कर दिया है। हर मामले में संवाददाताओं के साथ अन्याय हुआ। मामला जनपद के पुलिस कप्तान विजय गर्ग के सामने गया। जनपद में मौजूद पत्रकार संगठनों का प्रतिनिधिमंडल एसपी से कई चक्र वार्ता कर चुका है। लेकिन किसी थानाध्यक्ष के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अखबारों में संवाददाताओं के साथ हुए दुर्व्‍यवहार की खबरें प्रकाशित हो चुकी है। बावजूद इसके अफसरों का संज्ञान न लेना इस बात को प्रदर्शित करता है कि पुलिस जनपद में ''पत्रकार मिटाओ अभियान'' चला रही है। 
 
हद तो यह है कि भांग के ठेकों से महीना लेने वाली, पशु तस्‍करी के धंधे में सहयोगी की भूमिका में रही पुलिस के निशाने पर यहां के पत्रकार इसलिए हैं कि इन्ही इलाकों से, गांजा व हेरोइन के साथ साथ पशुओं के व्यापारियों का आना जाना है। अखबारों में खबरें प्रकाशित होने से पुलिस का लाखों रुपये डूब जाता है। पीडित पत्रकार दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा से जुड़े हैं और पत्रकारों के उत्पीड़न का जवाब भी देने के लिए यहां के पत्रकार संगठन योजनारत है। 
 
उ.प्र. इलेक्टानिक मीडिया एसोसिएशन के स्थानीय शाखा की बैठक में मंगलवार को जनपद में क्षेत्रीय संवाददाताओं पर कई थानाओं की पुलिस द्वारा मुकदमें दर्ज किए जाने की निन्दा की गई और उच्च अधिकारियों से मामलों पर गंभीरता से ध्यान देने की अपील की गई। दो मामलों में सीओ कासिमाबाद को जांच का निर्देश एसपी ने दिया था। एसोसिएशन ने सभी दागी थानाध्यक्षों का क्षेत्र बदलने की मांग की है। बैठक में संगठन के राकेश कुमार, मनीष मिश्रा, सूर्यवीर सिंह, कृपा कृष्ण, आशीष तिवारी, राजेश खरवार आदि इलेक्ट्रानिक मीडिया के कैमरामैन, प्रतिनिधि शामिल थे।

30 भड़ासी चुटकुले

30-

डैड- ज्योतिषी जी, मुझे कैसे पता चल सकता है कि मेरा बेटा फ्यूचर में क्या बनेगा?

ज्योतिषी- आप उसके टेबल पर सिगरेट, बीयर, रुपये की गड्डी और बुक्स रख दें. उनमें से जो वो उठाएगा, वही बनेगा.

डैड- ओके.

अगले दिन बेटा आया. टेबल देखी. रुपयों की गड्डी उठाकर जेब में रखी. सिगरेट पी. बीयर छुपा ली और किताबें हाथ में लेकर घर से चला गया.

डैड- नालायक ने सब कुछ ले लिया.

ज्योतिषी-  मुबारक हो. आपका बेटा पत्रकार बनेगा.


29-

एक बार एक रिटायर हो चुके पत्रकार पिता ने अपने युवा पत्रकार बेटे की तलाशी ली तो उसकी जेब से सिगरेट, पान मसाला और लड़कियों की तस्वीरें निकलीं.

बुजुर्ग पत्रकार पिता ने अपने युवा पत्रकार बेटे को खूब मारा और पूछा: कब से कर रहा है यह सब?

बेटा (रोते हुए): पापा! पर मैंने तो आपकी जैकेट पहनी हुई थी.


28-

करियर ग्रोथ मीटर- चेक ह्वेयर यू स्टैंड! : यह भी एक तस्वीर की कहानी है. मेल के जरिए आए दिन दिलचस्प तस्वीरें इधर-उधर बलखाती टहलती रहती हैं. उसी में एक तस्वीर यह भी है. कहानी सिंपल है. गरीब आदमी का पेट नहीं निकलता क्योंकि वह खटने में ज्यादा वक्त गंवाता है, ठीक से खाने-पीने में कम. और बड़े पद पर बैठे साहब सुब्बा लोग खा-पी कर डकार मारते हुए कुर्सी तोड़ते रहते हैं सो उनका लाद (पेट) निकल जाता है.

देखिए, आप इस तस्वीर के पैमाने पर कहां ठहरते हैं. हालांकि मेरे कई लखनवी और अन्य शहरों के मित्रों के लाद इसलिए निकल गए हैं कि वे गरीबी में भी पर्याप्त मदिरा-मांस का सेवन करते रहते हैं, यह सोचकर कि निकले हुए को अंदर करने की मुहिम कभी शुरू कर दी जाएगी लेकिन जो निकल जाता है वो अंदर कहां आता है भला. मैं भी आजकल इसी चिंतन प्रक्रिया से गुजर रहा हूं कि जो निकला है उसे कैसे समाया जाए 🙂 -यशवंत, भड़ास4मीडिया


27-

बात बहुत पुरानी है। एक संपादक के दो चमचे थे। सुविधा के लिए एक का नाम गधा और दूसरे का नाम कुत्ता मान लेते हैं। एक रात जब सारी दुनिया सो रही थी तो संपादक के घर चोर घुस आया। संपादक जी सो रहे थे पर दोनों चमचे जाग रहे थे। कुत्ता इन दिनों संपादक से नाराज चल रहा ता सो उसने तय किया कि चोर को चोरी करने दिया जाए। संपादक को उनके किए की सजा मिल रही है। पर गधे से नहीं रहा गया।

उसने कुत्ते को काफी समझाया बुझाया पर कुत्ते ने एक न मानी। आखिरकार गधे ने तय किया कि वही कुछ करेगा और जोर जोर से रेंकने लगा ताकि संपादक की नींद खुल जाए। गधे की आवाज सुनकर चोर भाग गया। संपादक ने आधी रात बिलावजह रेंकने के लिए गधे की पिटाई कर दी।

कहानी की सीख : आदमी को अपना काम करना चाहिए। दूसरे का नहीं।

काफी समय बाद स्थितियां बदलीं संपादक बदले चमचे बदले …

इस बार के संपादक कॉरपोरेट संपादक थे। सुना है किसी मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट से आए थे पर बताते नहीं थे। वे चीजों को बड़े फलक पर देखते थे और विज्ञापन से ही नहीं खबरों से भी कमाने की सोचते थे। इस बार चमचों के वही नाम हैं। आधी रात में गधे के रेंकने की आवाज आई तो संपादक को पूरा यकीन था कि आधी रात में गधे के रेंकने की कोई तो वजह होगी। लगे वजह तलाशने। सारे फंडे लगा दिए। और समझ गए कि कोई चोर आया था और निकम्मा कुत्ता सो रहा था। और गधे ने अतिरिक्त श्रम करके अच्छा काम किया है। इस अतिरिक्त प्रयास के मद्देनजर गधे को ढेर सारे ईनाम मिले और वह उनका पसंदीदा चमचा हो गया।

कुत्ते को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। हुआ सिर्फ यह कि गधा अब कुत्ते का काम करने के लिए भी तत्पर रहता था। जल्दी ही कुत्ते को समझ आ गया कि गधा उसके कामों का भी ख्याल रखता है और वह मजे कर सकता है। अब वह सोने और आलस में रहने लगा। दूसरी ओर गधे का काम बढ़ गया और उसे अपने प्रदर्शन का स्तर बनाए रखने के लिए काफी काम करना पड़ता था। वह हमेशा दबाव में रहता है और इसलिए नई नौकरी ढूंढ़ रहा है।


26-

अलग अलग लड़कों की गर्ल फ्रेंड अपने बॉय फ्रेंड से इस प्रकार लड़ रही थीं:-

पायलट की गर्ल फ्रेंड:- ज्यादा उड़ मत, समझा!!!

टीचर की गर्ल फ्रेंड:- मुझे सिखाने की कोशिश मत करो!!!

डेंटिस्ट की गर्ल फ्रेंड:- तुम्हारा जबड़ा तोड़ दूंगी!!!

सीए की गर्ल फ्रेंड:- तुम ज़रा हिसाब में रहना सीख लो!!!

पत्रकार की गर्ल फ्रेंड:- पहले नौकरी तो ढूंढ ले फिर बात करना!!!


25-

ये चुटकुला मीडिया पर नहीं है, मीडिया से संबंधित नहीं है. ''भड़ासी चुटकुला'' में अब तक मीडिया से संबंधित चुटकुले ही शामिल किए जाते रहे हैं, लेकिन आज एक नान-मीडिया जोक पब्लिश किया जा रहा है. यह चुटकुला एक मित्र ने मुझे एसएमएस किया. इतना सटीक लगा और पसंद आया कि इसे मैंने फेसबुक पर डाल दिया. चुटकुले ने लोगों के दिल-दिमाग पर असर किया और दनादन टिप्पणियां आने लगीं. रिस्पांस गजब का रहा. ये है चुटकुला और उन पर आई प्रतिक्रियाएं…. -यशवंत, भड़ास4मीडिया

सोनिया के सपने में एक दिन महात्मा गांधी आए. उन्होंने मरते वक्त कांग्रेस को सौंपी गई अपनी लाठी, चश्मा, टोपी के वर्तमान स्टेटस के बारे में पूछा तो सोनिया ने बताया- टोपी राहुल गांधी के पास है, चश्मा को मनमोहन सिंह की आंख पर चढ़वा दिया है. और, रही बात लाठी की तो उसे हमने पब्लिक की गांड़ में दे रखा है!!

Syed Mazhar Husain-Journalist : bahut Sachchi baat kahi aapne

Yogesh Kumar Sheetal : फाड़ के बोलना कोई आपसे सीखे…

Bhupendra Singh katu : satya

Vishal Sharma : baat ekdam khari hai…lekin delhi-belly film se inspired hai

Santosh Tripathi : Kadwa sach hai Yashwant Bhai…

Syed Mazhar Husain-Journalist : Aapki Himmat ko Salaam Yashwant bhai

Vishal Sharma : ANNA INHI KI MEIN DENE KO TAYYAR HAIN…..SUPPORT HIM

Jitendra Singh Yadav : hahaha, very good

Ashish Awasthi : Sahi kaha Yashwant bhai !!!!!

Syed Faizur Rahman : Ek baaar phir jhut bol diya sonia ne nahi bataya gandhi ji ko yeh sab nilami ko tyaar hain ..

Shravan Kumar Shukla : क्या बात है जनाब…. हाहाहा..वास्तव में सही कहा.. अब देखिये.. वो मोहतरमा तो अमेरिका खिसक गई… कोई वरिष्ठ न मिला… जिसमे कांग्रेस पर कब्ज़े का भय हो .. इसीलिए अपने बेटे को बिरासत सौप कर गई है ……ताकि कांग्रेस जैसी भी रहे.. उसके घर में ही रहे …

Rohit Kashyap : ha ha ha kya baat kahi hai. kahin na kahin aapne sahi kaha hai.

Vivek Choudhary : आच्छी बात है यशवंत जी, आपकी इस बात में जो आक्रोश है …वोही आक्रोश हिन्दुस्तान के यदि ८०% युवाओं में आ जाये तो हिन्दुस्तान की तस्वीर रातों रात बदल सकती

Sandeep Mishra : apke g….d ka kaya haal hai…

Piyush Mishra : josh to bahut aati haio par kuych ho nhi sakta

Updesh Saxena : सार्वजनिक मंच पर एस तरह की भावाभिव्यक्ति उचित नहीं है दोस्त…

Awesh Tiwari : उपदेश

Awesh Tiwari : ‎Yashwant Singh shat pratishat sahmat

Updesh Saxena : Yes @Awesh………Updesh.

Rahul Singh : super duper updesh………… hai

Awesh Tiwari : ‎@updesh गांड पर कैसा उपदेश, डंडा सभी के है भले वो राजा हो या फकीर. गांड में डंडा भावाभियक्ति नहीं है, ये हार चुके आदमी की कराह है.

Yashwant Singh : मेरे पास ये एसएमएस आया था… मुझे लगा कि ठीक ही लिखा है. इसीलिए इसको आप लोगों तक पहुंचा दिया.

Updesh Saxena : आपकी परिभाषा कुछ भी हो सकती है….मुझे जो अच्छा नहीं लगा सो कह दिया….वैसे भी मेरे शब्द इतने तीखे नहीं थे कि किसी को उनसे मिर्च का अहसास हो….

Ritesh Verma : હા હા હા હા હા. બઢ઼િયા વ્યંગ્ય હૈ ભાઈ સાહબ.

Awesh Tiwari : उपदेश भाई अन्यथा न ले, किसी को डंडा हो जाने का एहसास हो और उस एक वक्त आप उसे ये कहें कि सार्वजनिक मंच पर ऐसी भावाभियक्ति उचित नहीं है तो मिर्च तो लगेगी ही. यहाँ सार्वजनिक मंच पर जाति,धर्म और नया विषयों में जो अतिवादिता अपनाई जा रही है वो सही मायनो में सार्वजनिकता के खिलाफ है. आपकी बातें केवल उपदेश हैं, मैडम आपरेशन कराने विदेश गयी हैं और ये बता कर गयी हैं कि हिंदुस्तान के डाक्टर चूतिया हैं और यहाँ के अस्पताल बूचडखाना. देश में हर साल बुनियादी स्वास्थय सेवाओं के अभाव में लाखों महिलाओं की जान चली जाती है, हम इसे गांड में डंडा ही कहेंगे.

Awesh Tiwari : ‎Yashwant Singh जो लिखा है वो सही मायनों में बुद्धिजीवी है उसे हमारी तरफ से बधाई भिजवा दीजिए

Anil Yadav : बहुत जानदार….

Pujit Sha : Great Yash….Great!

Vineet Mishra : kya baat hai….wah wah

Shailesh Mishra : Absolutly Right Sir Ji……………

Kundan Kumar : this is called portal kranti…..nirbhik aur satik…

Shravan Kumar Shukla : क्या बात है जनाब…. हाहाहा..वास्तव में सही कहा.. अब देखिये.. वो मोहतरमा तो अमेरिका खिसक गई… कोई वरिष्ठ न मिला… जिसमे कांग्रेस पर कब्ज़े का भय हो .. इसीलिए अपने बेटे को बिरासत सौप कर गई है ……ताकि कांग्रेस जैसी भी रहे.. उसके घर में ही रहे ..

Prem Arora : gajab yashu bhai..

Amit Upadhyay : Bhaut khoob kha sir ji….

Ashok Bansal : भाई जी ,मित्रों के बीच कहे जाने वाला चुटकुला आपने जनता के बीच कह दिया.बस यही कसूर है आपका.राही मासूम रज़ा ने आधा गाँव उपन्यास में यही अपराध किया था.

Kumar Gaurav : ये डंडा कैसे निकलेगा? थोडा प्रकाश डालें …….

Kamal Kashyap : aap ko ese sabad sarvjanik roop se shoba nahi dete yashwant ji


24-

एक बड़े भाई तुल्य मित्र ने यह कहते हुए इस चुटकुले को भेजा है कि– ''इसका हिन्दी अनुवाद अश्लील हो जाएगा। इसलिए अंग्रेजी में ही भेज रहा हूं। अगर उपयोग कर सकें।'' दो-तीन बार चुटकुला पढ़ा. सिर्फ एक शब्द का खेल है. उस एक शब्द का अर्थ गदहा भी होता है और वह भी होता है जो पिछवाड़े कपड़ों में ढका छिपा होता है. जो ढका-छिपा होता है, वह उत्सुकता पैदा करता है, कौतुक व रहस्य पैदा करता है. और, जहां कौतुक, रहस्य, उत्सुकता है वहां तरह-तरह की कानाफूसियां भी हैं.  संभव है, बहुत सारे श्लील लोग इस चुटकुले पर नाक-भौं सिकोड़े लेकिन मुझे इसमें कोई अश्लीलता या आपत्तिजनक जैसा नजर नहीं आ रहा. आनंददायक चुटकुला है. आनंद लेंगे तो ठीक रहेगा, बाल नोचेंगे तो बीपी बढ़ेगा. -यशवंत

A servant enrolled his donkey in a race & won.

The local paper read:'SERVANT's ASS WON'

The MINISTER was so upset with this kind of publicity that he ordered the servant not to enter the donkey in another race.

Next day the local paper headline read:'MINISTER SCRATCHES SERVANT's ASS'.

This was too much for the Minister, he ordered the servant to get rid of the donkey. He gave the donkey to his wife .

The local paper heading the news: "Ministers WIFE HAS THE BEST ASS IN TOWN".

The Minister fainted.

WIFE sold the donkey to a farmer for Rs 1500:00

Next day paper read:"WIFE SELLS ASS FOR Rs 1500:00''

This was too much, minister ordered his wife to buy back the donkey & lead it to jungle.

The next day Headlines:"ministers Wife ANNOUNCES HER ASS IS WILD & FREE"

The Minister was buried next day!

This is called …Power of media.. :"-)


23-

एक संपादक जी को गर्म हवा के गुब्बारे में घूमने का शौक चढ़ा। भाई साब ने नीचे वालों से बंदोबस्त करने के लिए कहा। हो गया। और एक दिन भाई साब गुब्बारे में निकल लिए। कुछ समय बाद उन्हें अहसास हुआ कि वे खो गए हैं। उन्होंने उंचाई थोड़ी कम की और नीचे एक व्यक्ति को देखा। वे कुछ और नीचे आए तथा चीख कर कहा, “मैं भटक गया हूं। क्या आप मेरी सहायता कर सकते हैं। मुझे घंटे भर पहले ही एक मीटिंग में पहुंचना था। पर मुझे यह भी नहीं समझ में आ रहा है कि मैं कहां हूं।“

नीचे वाले व्यक्ति ने जवाब दिया, "आप गर्म हवा के गुब्बारे में हैं, जमीन से करीब 30 फीट की उंचाई पर हैं। आप 40 व 41 डिग्री नॉर्थ लैटीट्यूड तथा 59 और 60 डिग्री वेस्ट लैटीट्यूड के बीच हैं। गुब्बारे में लटके संपादक जी ने मन ही मन नीचे खड़े व्यक्ति को भर पेट गरियाया और कहा, “साला इंजीनियर कहीं का। अपनी काबिलियत दिखा रहा है।“ पर उस व्यक्ति से कहा, जरूर आप इंजीनियर हैं। नीचे वाले व्यक्ति ने कहा, “जी हां, पर आपको कैसे पता चला?”

संपादक जी ने कहा, “आपने जो कुछ मुझे कहा वह तकनीकी तौर पर सही है। पर आपकी यह सूचना मेरे किसी काम की नहीं है। और तथ्य यह है कि मैं अभी भी खोया हुआ हूं। सच कहूं तो आपसे मुझे कोई सहायता नहीं मिली। उल्टे आपने मेरा समय खराब किया।“

नीचे वाले इंजीनियर ने पूछा, “आप संपादक हैं क्या?”

“हां मैं संपादक ही हूं। पर आपको कैसे पता चला?”  गुब्बारे में लटके संपादक ने पूछा।

इंजीनियर ने कहा, "आपको पता नहीं है कि आप कहां हैं या कहां जा रहे हैं। आपको मीटिंग में जाना था पर गुब्बारे में घूमने निकल गए। आपको कुछ पता नहीं है कि मीटिंग में पहुंचने के लिए क्या करना है और आप अपने नीचे वाले से उम्मीद कर रहे हैं कि आपको इस संकट से निकाल दे।''


22-

CHILD- MOM, who is this man who comes every night & disapears in morning.

MOM- Thanks GOD! U saw him. he is ur father. Working in ''PRESS''


21-

आज दोपहर कटवारिया सराय के एक चौधरी ने दूजे से कही, 'नूं सुन रहा है.'

तो दूजे ने हुक्के से मुंह काढ के बोला- हाँ, के बात सै.'

पहले ने कहा, रेडियो  वाली छोरी कहे सै – 'हथियार खरीद में भारत दुनिया का बादशाह बण गया.'

पहले की बात सुन दूजा चौधरी बोला – 'अच्छा ही हुआ जी…चलो अब तो कम से कम हमारी सरकार ने भुखमरी, आत्महत्या, बेकारी, अपराध, भ्रष्टाचार और महंगाई से निपटने में दिक्कत ना आवेगी. सब तसल्ली बख्श हो जावेगा.


20-

अपने मनमोहन सिंह ने जिस ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया, अपनी मजबूरी का रोना रोने के लिए, वह प्रेस कांफ्रेंस ही मनमोहन के गले की फांस बनने लगी है. उस पीसी के जरिए मनमोहन ने खुद को सबसे मजबूर आदमी के रूप में पेश कर दिया है. मनमोहन की उसी पेशकश पर कुछ चुटकुले तैयार होकर आजकल यहां वहां विचरण कर रहे हैं. अपने बेचारे पीएम मनमोहन को लेकर बने दो नए चुटकुले या कमेंट्स, जो कह लीजिए आपके सामने पेश हैं.

1.) कम से कम महात्मा गांधी को छुट्टी तो मिली, अब "मजबूरी का नाम मनमोहन सिंह" हो गया है…

2.) ''दबंग'' फ़िल्म का सीक्वल बनेगा, इसमें हीरो होंगे मनमोहन सिंह… और फ़िल्म का नाम रहेगा- "अपंग"…


19-

— गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण — 1. सादा जीवन, उच्च विचार: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था. पुराने और मैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ों पर खानाबदोश जीवन. जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो. जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतना समर्पित कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल की भी फुर्सत नहीं. और विचारों में उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया, सो मर गया' जैसे संवादों से उसने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.

२. दयालु प्रवृत्ति: ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था. इसलिए उसने ठाकुर के सिर्फ हाथों को सज़ा दी. अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था. पर उसके ममतापूर्ण और करुणामय ह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.

3. नृत्य-संगीत का शौकीन: 'महबूबा ओये महबूबा' गीत के समय उसके कलाकार ह्रदय का परिचय मिलता है. अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदय शुष्क नहीं था. वह जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझता था. बसन्ती को पकड़ने के बाद उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जाग उठा था. उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को एक पल में पहचान लिया था. गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.

4. अनुशासनप्रिय नायक: जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्ट से नाकाम होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती. अनुशासन के प्रति अपने अगाध समर्पण को दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.

5. हास्य-रस का प्रेमी: उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था. कालिया और उसके दो दोस्तों को मारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था. ताकि वो हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें. वह आधुनिक यु का 'लाफिंग बुद्धा' था.

6. नारी के प्रति सम्मान: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरण करने के बाद उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया. आज-कल का खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.

7. भिक्षुक जीवन: उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुद्ध द्वारा दिखाए गए भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था. रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जो भी सूखा-कच्चा अनाज मिलता था, वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था. सोना, चांदी, बिरयानी या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहीं की.

8. सामाजिक कार्य: डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों को सुलाने का भी काम करता था. सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सो जाएं. सरकार ने उसपर 50,000 रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था. उस युग में 'कौन बनेगा करोड़पति' ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रात अमीर बनाने का गब्बर का यह सच्चा प्रयास था.

9. महानायकों का निर्माता: अगर गब्बर नहीं होता तो जय और व??रू जैसे लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते. पर यह गब्बर के व्यक्तित्व का प्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.


18-

My dog sleeps about 20 hours a day. He has his food prepared for him. He can eat whenever he wants, 24/7/365. His meals are provided at no cost to him. He visits the Dr. once a year for his checkup, and again during the year if any medical needs arise. For this he pays nothing, and nothing is required of him.

He lives in a nice neighborhood in a house that is much larger than he needs, but he is not required to do any upkeep. If he makes a mess, someone else cleans it up. He has his choice of luxurious places to sleep. He receives these accommodations absolutely free. He is living like a King, and has absolutely no expenses whatsoever. All of his costs are picked up by others who go out and earn a living every day. I was just thinking about all this, and suddenly it hit me like a brick in the head…….

Is my dog is a POLITICIAN?


17-

देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है. मानवता की महायात्रा के दौरान ये मोड़ पहली दफे आया है. मजबूरी, जरूरत और विलासिता जैसे शब्दे एक रेट पर बिक रहे हैं. यकीन नहीं हो रहा है न. लेकिन सच्चाई बिलकुल यही है.

प्याज 65 रुपये किलो

पेट्रोल 65 रुपये लीटर

और

बीयर 65 रुपये बोतल.

धीरे धीरे ही सही, पर समाजवाद आ ही गया. गोरख पाण्डेय जी का कहा सच हुआ. अब कुछ यूं गाओ… समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आईल… घोड़ा पर आईल, हाथी पर आईल, मनमोहन महारथी के राजकाज में आईल… सोनिया महारानी की किरपा से आईल… समाजवाद बबुआ धीरे धीरे….


16-

मुन्नी से साक्षात्कार के दौरान एक पत्रकार ने पूछा- "आपकी जन्मतिथि क्या है?"

मुन्नी ने कहा-"पहली अगस्त "

पत्रकार ने दूसरा सवाल किया- "और वर्ष?"

मुन्नी ने कहा- "प्रत्येक वर्ष"


15-

नया भर्ती पत्रकार अपने संपादक की रोज-रोज की नुक्ताचीनी से आजिज था। संपादक हर बार और हर खबर में एक ही नसीहत देता- ‘‘बरखुरदार, गागर में सागर भरना सीखिये। केवल पन्ने भरने से काम नहीं चलेगा। खबरें छोटी लिखा करें।’’

एक दिन तो हद ही हो गयी। संपादक ने उसकी खबर को चार बार छोटा करने के लिये लौटाया। इस बात से पत्रकार बड़े गुस्से में था। अगले दिन उस रिपोर्टर ने ठान लिया कि वह बेहद छोटी खबर लिखा करेगा। अगले दिन वह पहली और महत्वपूर्ण खबर लिखने के बाद उसे दिखाने संपादक के पास गया। रिपोर्टर द्वारा गागर में सागर के अंदाज में लिखी गई खबर इस प्रकार थी-

''एक आदमी ने अंधेरे में तेल के कुंए के भीतर की स्थिति जानने के लिये माचिस की तीली जलाई। उम्र 28 वर्ष।''


14-

स्वर्ग के द्वार पर तीन लोग खड़े थे. तीनों ही अंदर घुसना चाहते थे. लेकिन अंदर जाना था किसी एक को. ऐसे में भगवान को सामने आकर इन तीनों से कहना पड़ा…

भगवान : आप में से केवल एक ही अन्दर जा सकता है.

पहला : भगवान मैं एक पुजारी हूँ, सारी उम्र आपकी सेवा की है, स्वर्ग पर मेरा ही हक़ है.

भगवान शांत रहे.

दूसरा : भगवान मैं एक डॉक्टर हूँ, सारी उम्र दूसरों की सेवा की है, स्वर्ग पर तो मेरा ही हक़ है.

भगवान फिर शांत रहे.

तीसरा : भगवान मैं एक पत्रकार हूँ, और….

इतना सुनते ही भगवान से रहा न गया.

भगवान : बस बस… कुछ मत बोल मेरे बच्चे.. अब रुला भी देगा क्या? मुझे पता है, सारी जवानी तू नर्क में रहा है, नारकीय माहौल में काम भी किया है… स्वर्ग पर तो केवल तेरा ही हक़ है.


13-

भारत में प्रेम विवाह, उसके विरोध, खाप के फैसलों और उसकी मांग तथा इस मांग के विरोध को गंभीरता से फॉलो कर रहे एक पत्रकार को अमेरिका जाने का मौका मिला। मूल काम से मुक्त होने के बाद उसे इस मामले में उदार कहे जाने वाले पश्चिमी समाज के विचार और स्थिति जानने की इच्छा हुई। वहां उसने नए मित्र बने एक अमेरिकी पत्रकार से इस बारे में चर्चा करने का फैसला किया। दोनों ने बार में मिलना तय किया और पेग पर पेग लगाते हुए काफी बातें हुईं।

बातचीत के दौरान भारतीय पत्रकार ने बताया कि उसके अभिभावक उसकी शादी गांव की एक तथाकथित सुंदर, सुशील और घरेलू लड़की से करना चाहते हैं जिससे वह मिला भी नहीं है। अमेरिकी पत्रकार को बात अजीब लगी। भारतीय पत्रकार ने बताया कि हमारे यहां शादियां ऐसे ही होती हैं मां-बाप परिवार-रिश्तेदारी में उपयुक्त वर या वधू की तलाश करते हैं और कई मायने में उपयुक्त पाए जाने पर कुंडली मिलाई जाती है। कुंडली मिल जाए तो शादी कर दी जाती है। इसे हमारे यहां अरेन्ज मैरिज कहा जाता है। मैं ऐसी लड़की से शादी नहीं करना चाहता जिसे मैं प्यार नहीं करता। मैंने यह बात उन्हें साफ बता दी है और इस कारण मेरे परिवार में काफी परेशानी है। तरह-तरह की पारिवारिक समस्याएं खड़ी हो गई हैं।

इस पर अमेरिकी ने प्रेम विवाह के बारे में बताना शुरू किया और इसी क्रम में उसने अपनी कहानी बताई – मैंने एक विधवा से शादी की जिससे मैं बेहद प्रेम करता था। हमारा प्रेम तीन साल तक चला। आखिरकार शादी हो गई। कुछ साल बाद मेरे पिताजी का मेरी सौतेली बेटी से प्रेम हो गया। और लाख समझाने के बावजूद उन्होंने उससे शादी कर ली। उन्होंने वही दलीलें दीं जो मैं देता था और मैं उन्हें रोक नहीं पाया। इस तरह मेरे पिता अब मेरे दामाद बन गए और मैं उनका ससुर हो गया। कानूनन अब मेरी बेटी मेरी मां है और मेरी पत्नी मेरी नानी। मुझे जब बेटा हुआ तो और भी समस्याएं सामने आईं। मेरा बेटा मेरे पिता की सास का बेटा है इसलिए उनका साला हुआ और इस हिसाब से मेरा मामा भी है। स्थिति और खराब हो गई जब मेरे पिता को बेटा हुआ। अब मेरे पिता का बेटा मेरा भाई तो है ही मेरा नाती भी है।

अमेरिकी पत्रकार तो मामा को अंकल और नाना / दादा को ग्रैंड फादर ही कह रहा था लेकिन भारतीय पत्रकार को इसका हिसाब लगाने में चक्कर आ गया है।

अमेरिकी पत्रकार कहां मानने वाला था – उसने पूछा अब बताओ किसकी पारिवारिक समस्या गंभीर है?


12-

मंदी का दौर चल रहा था. एक पत्रकार की शादी तय हो गयी. पत्रकार ने दस दिन की छुट्टी का आवेदन संपादक की टेबल पर रखा. निमंत्रण पत्र सौंपते हुए बोला- सर मंदी का दौर है, सोच रहा हूं इस मंदी में एक मंदी-सी बीवी ले आऊं. संपादक जी पत्रकारिता के पुराने चावल थे. उन्होंने पत्रकार को समझाया- बेटा मंदी के दौर में तू शादी करने जा रहा है, यहां नौकरी के वैसे ही बांदे है. पत्रकार बोला- महोदय मंदी में जब सब मंदा है तो शादी भी सस्ते में निपट जायेगी.

संपादक जी बोले- बेटा इस मंदी में शादी तो सस्ते में निपट जायेगी. लेकिन जब तू दस दिन के बाद आयेगा तो बीवी तो घर में होगी पर नौकरी चली जायेगी. पत्रकार ने कुछ सोचा और सोच कर बोला- संपादक जी मंदी तो आप लोगों ने मचा रखी है, फील्ड में एक आदमी से चार आदमियों का काम ले रहो हो, और छुट्टी देने की बजाय आप मुझे मंदी की हूल दे रहे हो. आज तक मंदी के नाम पर घर उजडे़ थे, अब हम घर बसा कर ही दम लेंगे. संपादक यह सब सुनकर अवाक रह गए. उन्हें लगा, बहुत पाप किया है, एक पुण्य भी कर लेते हैं. सो, उन्होंने शादी के लिए उतावले पत्रकार की अर्जी पर दस्तखत कर दिए.


11-

अखबारों और चैनलों की दुनिया हुई अजीब, देने को पैसा नहीं रोज लगाए तरकीब

मजदूरों से भी बदहाल हुआ आज का पत्रकार, रोज सोचे क्या पता भगवन कर दें आज कोई चमत्कार

कहत कमलवा सुन रे बंधु रोज हो तेरी रुसवाई, डर मत प्यारे दिन बहुरेंगे आज खबर है आई

खबर पे मत जाइयो प्यारे कल होगा इसका खंडन, कर्मी के लिए पैसा नहीं पर मालिक घूमे लंदन


10-

तनख्वाह कभी तो मिलेगी…. और जब मिलेगी एक साथ कई महीनो की मिलेगी…. इसी उधेड़बुन में "कचौड़िया पत्रकार" चला जा रहा था. सामने से किसी ने बताया कि निकट ही कहीं जमीन के विवाद में दो गुटों में लट्ठ बज रहे है और पत्थरबाजी हो रही है. पत्रकार महोदय अपना कैमरा संभालते हुए दौड़ पड़े. वहां सच में बड़े जोरों से विवाद हो रहा था.

विवाद में शामिल एक व्यक्ति ने सोचा कि दूसरे पक्ष ने किसी फोटोग्राफर को बुला लिया है तो उसने एक लट्ठ दे मारा उस पत्रकार के सिर पर और दूसरा बजा दिया उसके कैमरे पर. पत्रकारजी को जब होश आया तो अस्पताल में थे.

जब हमलावर पक्ष को पता चला कि घायल शख्स पत्रकार है तो उनके हाथ-पांव फूल गए. माफ़ी मांगने के लिए आक्रमणकारी पक्ष अस्पताल पहुंचा. पत्रकार महोदय की शरण में जाकर क्षमायाचना करने लगा. पत्रकारजी ने केवल तीन लाख रुपये में उसे माफ़ कर दिया. ये सोचते हुए कि चलो, सिर खुला तो भाग्य भी खुल गया. इतना तो अपनी पूरी पत्रकारिता की जिंदगी में नहीं कमा पाए.

अब वे गाहे-बगाहे कहते हैं काश एक "विवाद" और हो जाए इसी तरह का…


9-

एक गरीब पत्रकार ने कई महीनों से सेलरी न मिलने के कारण कटिया लेकर क्षेत्रीय नहर-तालाब में मछली मारने और उसे पकाकर खाने का काम शुरू किया. एक दिन उसने कई मछलियां पकड़ीं और अपनी पत्नी को सौंप दिया.

पत्नी ने मछलियों को पकाने से इनकार कर दिया.

पत्रकार ने अपनी पत्नी से वजह पूछा तो पत्नी ने गुस्से से हाथ पटकते हुए बताया- ''एक तो सेलरी न आई, उपर से ऐसी महंगाई. आटा-दाल तो पहले ही खत्म हो चुका. उसकी जगह तालाब-नहर से फ्री में पकड़कर लाई गई मछली से काम चल रहा था. लेकिन अब तो घर में पकाने के लिए न तो तेल बचा है, न गैस बची है, न ही मसाले रह गए हैं. ऐसे में कुछ नहीं हो सकता.''

उदास पत्रकार ने मछलियों को फिर से तालाब में छोड़ दिया.

मछलियां पानी में पहुंचते ही पत्रकार की तरफ देखकर जोर से चिल्लाईं– ''कांग्रेस जिंदाबाद! कांग्रेस जिंदाबाद!!''


8-

काम करते कमर बेकार और पेट हुआ बाहर, इन्क्रीमेंट के मौके पर बॉस करें निरादर. बॉस निकालें नुक्स ब्रांड खोजे बहाना, सच ही कहते लोग भुलावे में नहीं आना.

इन्क्रीमेंट के ठीक बाद बॉस का इम्प्रूवमेंट डोज़, सबको भरोसा अगली बार काम करने वालों की होगी मौज. अगली बार फिर वही कहानी, न अलग हुआ दूध न ही पानी.

संतुष्टि सबसे बड़ा धन दिल को दे तसल्ली, पेपर या टीवी में लगे रह तू पत्रकार अर्दली. कभी तो दिन बहुरेंगे सोच रहा कबीरा, कोई तो मिलेगा जौहरी जो परखेगा हीरा.


7-

डीएम से मिलने उनके बंगले पर एक पत्रकार पहुंचा. गेट से अंदर दाखिल होते ही संतरी चिल्लाया- ''कहां घुसे जा रहे हो? रुको, इधर आओ.'' उसके आवेश को नजरअंदाज करते हुए पत्रकार ने कहा- ''मैं पत्रकार हूं. आपके साहब से मिलने का समय लेकर आया हूं.''

संतरी ने पत्रकार को घूरते हुए धीरे से कहा- अच्छा तो आप भी पत्रकार हैं.

पत्रकार ने सिर हिलाने के साथ ही सवाल किया- 'आप भी' का क्या मतलब?

उसने कहा- बुरा मत मानिएगा. ना पत्र है, ना कार है. ऐसे में पहचानने में गलती तो हो ही जाएगी ना.


6-

यह चुटकुला है तो पुराना जो मीडियाकर्मियों के बीच एसएमएस के रूप में काफी दिनों से सरकुलेट हो रहा है लेकिन संभव है कि अब भी इसे ढेर सारे मीडियाकर्मी पढ़ न पाए हों.

10 reason why I joined media

  1. I hate to sleep.

  2. I have enjoyed my life in childhood.

  3. I can not live without tension.

  4. I want disturb my family life.

  5. I believe in GEETA "KARM KARO FAL KI ICHCHHA MAT KARO".

  6. I do not want to spend time with my family.

  7. I want to take revenge from myself.

  8. I desperately need break up from my dearest and nearest.

  9. I want social boycott.

  10. I LOVE TO WORK ON HOLIDAYS.


5-

समंदर जितना न्यूजपेपर

नदी जितनी रिपोर्टिंग

तालाब जितना आफिस वर्क

बाल्टी जितनी सेलरी

लोटे जितना इनक्रीमेंट

ऐसे में क्या खाक होगा एचीवमेंट!


4-

एक व्यक्ति पशुओं के डॉक्टर के पास पहुंचा और कहा कि तबियत ठीक नहीं लग रही है, दिखाना है। डॉक्टर ने कहा कि कृपया मेरे सामने वाले क्लीनिक में जाएं, मैं तो जानवरों का डॉक्टर हूं। वहां देखिए, लिखा हुआ है।

रोगी– नहीं डॉक्टर साब मुझे आप ही को दिखाना है।

डॉक्टर– अरे यार, मैं पशुओं का डॉक्टर हूं। मनुष्यों का इलाज नहीं करता।

रोगी– डॉक्टर साब मैं जानता हूं और इसीलिए आपके पास आया हूं।

इस पर डॉक्टर साब चौंक गए। जानते हो? फिर मेरे पास क्यों आए।

रोगी- मेरी तकलीफ सुनेंगे तो जान जाएंगे।

डॉक्टर- अच्छा बताओ।

रोगी– सारी रात काम के बोझ से दबा रहता हूं।

सोता हूं तो कुत्ते की तरह सोता हूं।

चौबीसों घंटे चौकस रहता हूं।

सुबह उठकर घोड़े की तरह भागता हूं।

रफ्तार मेरी हिरण जैसी होती है।

गधे की तरह सारे दिन काम करता हूं।

मैं बिना छुट्टी की परवाह किए पूरे साल बैल की तरह लगा रहता हूं।

फिर भी बॉस को देखकर कुत्ते की तरह दुम हिलाने लगता हूं।

अगर कभी, समय मिला तो अपने बच्चों के साथ बंदर की तरह खेलता हूं।

बीवी के सामने खरगोश की तरह डरपोक रहता हूं।

डॉक्टर ने पूछा – पत्रकार हो क्या?

रोगी- जी

डॉक्टर- इतनी लंबी कहानी क्या बता रहे थे। पहले ही बता देते। वाकई, तुम्हारा इलाज मुझसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। इधर आओ। मुंह खोलो.. आ करो… जीभ दिखाओ….


3-

डाक्टर के पास एक मरीज आया और बोला- मुझे  दिशा-मैदान गए बहुत दिन हो गए. जाता हूं तो उतरता ही नहीं. दवा दीजिये जिससे मेरा पेट साफ हो जाये.

डाक्टर ने दवा दे दी और उसे घर भेज दिया.

दूसरे दिन वह आदमी फिर डाक्टर के पास आया. बोला- डाक्टर साहब, दवा से कोई फायदा नहीं हुआ.

डाक्टर ने दवा बदल दी और नई दवा देकर उसे भेज दिया.

ऐसा कई रोज हुआ तो एक दिन डाक्टर ने पूछ ही लिया.

डाक्टर- तुम काम क्या करते हो?

मरीज- जी, मीडिया में हूँ.

डाक्टर- कौन से?

मरीज- अखबार में.

डाक्टर- कौन से अख़बार में?

मरीज- %^७%५$%^७५६८* नामक हिंदी दैनिक में.

डाक्टर- तो ये बात है. यह लो 100 रुपये. पहले भर पेट खाना खाओ, सुबह खुल कर आएगा.


2-

जिन्न- हुक्म करो मेरे आका.

आदमी- मेरे घर से दुबई तक रोड बनाओ.

जिन्न- मुश्किल काम है मेरे आका. कोई और काम बताओ.

आदमी- मैंने जर्नलिज्म की डिग्री ली है. किसी न्यूज चैनल में नौकरी का जुगाड़ कर दो.

जिन्न- ओह…!!! अच्छा, पहला वाला काम हो जाएगा. चलो ये बता दो कि दुबई तक रोड सिंगल बनानी है या डबल.


1-

एक संपादक ने किसी पत्रकार की नौकरी ले ली. संपादक नया आया था, सो उसे पहले काम कर रहे कई लोगों को निकालना था ताकि वह अपने चेले-चमचों-भक्तों को फिट कर सके. संपादक ने जिस पत्रकार की नौकरी ली, वो संपादक से भी परम हरामी निकला. वह रोज बिलकुल तड़के संपादक के घर पर पहुंच जाता. घंटी नहीं दबाता और न ही अंदर छलांग लगाता. वो संपादक जी को बिलकुल डिस्टर्ब नहीं करता. वह केवल एक काम करता. वह संपादक के घर के सामने धुंधलके के दौरान मल त्याग कर देता. संपादक रोज मार्निंग वाक पर निकलते तो मल-मूत्र देख हिल जाते. उन्होंने अपने चौकीदार को एक दिन हड़का लिया. उन्होंने घरेलू चौकीदार को अपने आफिस के किसी सब एडिटर / प्रोड्यूसर की भांति जोर से डांट कर हड़काते हुए पूछा-

''ये बताओ… तुम साले सोते रहते हो या ड्यूटी देते हो… अगर तुम जगे रहते हो तो यहां ये मल-मूत्र त्याग करके कौन चला जाता है… मुफ्त में तनख्वाह लेने की आदत पड़ गई है तुम्हें…''

चौकीदार चुपचाप सुनता रहा. जवाब दे देता तो उसकी भी नौकरी सब एडिटरों / प्रोड्यूसरों की तरह चली जाती.

अगले दिन चौकीदार सोया नहीं. वह नौकरी खोने के लिए बिलकुल तैयार नहीं था. वह पूरी रात एलर्ट रहा. बिलकुल चौकन्ना खड़ा रहा. कई बार साइड में छिप कर अपराधी के आने का इंतजार करता रहा. सुबह शुरू होने से ठीक पहले ज्योंही संपादक के हाथों बेरोजगार हुआ पत्रकार मल-मूत्र त्याग करने आया, चौकीदार ने उसे कूदकर पकड़ लिया. चौकीदार ने जोर से पूछा-

''रोज यहां अंडबंड काम क्यों कर जाता है बे, मेरी नौकरिया खायेगा का क्या तू?''

बेरोजगार पत्रकार प्यार से बोला-

''हरामी संपादकजी के सीधे-साधे चौकीदार जी, ये मैं इसलिए करता हूं ताकि हमारे आफिसियल और आपके घरेलू संपादक जी को यह पता चल जाए कि उनके द्वारा मेरी नौकरी ले लिए जाने के बाद भी मैं भूखों नहीं मरा. मेरे पेट में पहले की ही तरह अन्न और जल पर्याप्त मात्रा में प्रवेश कर रहे हैं. उसी का सबूत देना आता रहता हूं मैं.''

चौकीदार कुछ न बोला. बात उसके भी समझ में आ गई थी. उसने पत्रकार को मल-मूत्र त्याग करने की अनुमति दी और खुद संपादक को चार गालियां देते हुए पास में ही स्थित अपने गांव की ओर निकल गया.


उपरोक्त चुटकुले पिछले कई वर्षों से अलग-अलग प्रकाशित किए गए भड़ासी चुटकुलों का संग्रह है. हो सकता है कुछ चुटकुले तत्कालीन हालात के उपर बनाए गए हों जो अब प्रासंगिक नहीं रह गए हों. इसलिए कृपया पढ़ते हुए दिल के साथ अपने दिमाग का भी जरूर उपयोग करें 🙂


मीडिया के वर्तमान हालात पर अगर आपके पास भी कोई चुटकुला हो तो हमें भेजिए. 'भड़ासी चुटकुला' कालम जारी रखने की जरूरत है. ताकि, निराशा झेल रहे हमारे कई पत्रकार साथियों में जिजीविषा कायम रहे. चुटकुला आप मेल या एसएमएस के जरिए भेज सकते हैं bhadas4media@gmail.com या फिर 09999330099 पर.

दैनिक जागरण ने ये क्‍या छाप दिया सोनिया गांधी और उनके परिवार के लिए?

: क्‍या अब गुप्‍ताज ऐसे ही करेंगे पत्रकारिता : अखबार के खिलाफ एफआईआर होने की खबर :  सोमवार 29 अक्टूबर को दैनिक जागरण, पटना में गांधी परिवार और मनमोहन सिंह पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां छपी। रोजाना के कॉलम ''पाठकनामा'' में  ''सोनिया गांधी और बेवकूफ जनता'' शीर्षक से एक पाठक का पत्र छपा है। इस पत्र में राहुल को शैतान, प्रियंका को सूर्पनखा और मनमोहन को कुत्ता लिखने के साथ ही यह भी लिखा गया है कि गांधी परिवार वाले कांग्रेस नेताओं को अपनी बेटी सौंप देते हैं सहवास के लिए। भारी दबाव बनने पर पत्र पास करने से संबंधित चार पत्रकारों के हटाए जाने की खबर आ रही है। एफआईआर तक होने की खबर मिली है।

पत्र यह है-


सोनिया गांधी और बेवकूफ जनता

एक कहावत है कुत्ता जब हड़्डी चूसता है तो मुंह के खून को देखकर और मजे से चबाना शुरू करता है। यही भारतीय लोगों पर चरितार्थ होता है। राष्ट्र को दो जून की रोटी नसीब नहीं किंतु सोनिया उसका कंस पुत्र, सूर्पनखा बेटी और कुत्ता दामाद कुछ भारतीय जेहन में अपना जूठा खिलाकर सारे राष्ट्र के खिलाफ जहर उगल रहा है। इसके बदले कुछ कुत्तों जैसे दिग्विजय, सिब्बल, खुर्शीद, रावत, बंसल, जायसवाल, द्विवेदी तिवारी को अपने बेटी सौंप देते हैं। शारीरिक सहवास हेतु। इसके लिए अपने ही मां-बहन, भाई-बाप को भूखे मारते हैं। सोनिया का दिल काला है, राहुल के अंदर तो शैतान है औप पगड़ी भारी हाशमी मनमोहन तो धराह कुत्ता है। यहां के लोगों में बेवकूफी की सनातन आदत है। जनता बार-बार इन्हें सत्ता में पहुंचा रही है जिसका केवल अनुचित लाभ ये ले रहे हैं। इन्हें शून्य पर आउट कर हमेशा के लिए इस दानव को समाप्त कर देना चाहिए। हे राम!

सुभाष कुमार गांधी, जयनगर, मधुबनी.


ये है अखबार की कटिंग 


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रेडियो जर्नलिस्‍ट की गोली मारकर हत्‍या

 

मोगादिशू (सोमालिया)। अल कायदा से संबंध रखने वाले शेहबाब विद्रोहियों पर मजाकिया अंदाज में निशाना साधने वाले मशहूर रेडियो पत्रकार, कामेडियन और म्यूजिशियन की हत्या कर दी गई है। सोमालिया की राजधानी मोगादिशू में मशहूर कम्पोजर वारसेम शिरे अवाले पर सोमवार देर रात दो बंदूकधारियों ने हमला किया। इसके बाद उन्हें वहीं वाबेरी जिले के ही अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई। 
 
मंगलवार को स्थानीय पुलिस ने यह जानकारी दी। अवाले पूर्व में सोमालिया नैशनल आर्मी के बैंड में भी काम कर चुके थे। इसके बाद वह रेडियो कुलमिए के साथ बतौर ड्रामा प्रड्यूसर और कमीडियन के रूप में काम कर रहे थे। पुलिस चीफ अहमद हसन मालीन ने बताया कि बंदूकधारियों ने उनकी हत्या कर दी है और मामले की जांच की जा रही है। मालीन ने कहा कि हम न्याय तक पहुंचेंगे। 
 
रेडियो कुलमिए में कमीडियन अवाले के साथी रह चुके अब्दी मोहम्मद हाजी ने बताया कि दो बंदूकधारियों ने अवाले पर उनके घर के पास ही पिस्टल से हमला किया। वारसेम शिरे अवाले की मौत को सोमालिया में मीडिया कर्मियों पर हो रहे हमले की कड़ी से ही जोड़कर देखा जा रहा है। बीते अगस्त महीने में ही रेडियो कुल्मिए में काम करने वाले कॉमेडियन अब्दी जेलानी मलाक मार्शल की भी हत्या कर दी गई थी। 
 
युद्ध से प्रभावित सोमालिया में साल 2009 में 9 पत्रकारों की हत्या की गई थी जबकि इस साल 17 रिपोर्टर्स मारे जा चुके हैं। प्रेस अधिकारों के लिए काम करने वाले संस्था ने साल 2012 को ' डेडलिएस्ट ईयर ' कहा है। पत्रकारों की कुछ मौत के पीछे शेहबाब विद्रोहियों का हाथ होना बताया जा रहा है लेकिन ऐसा भी माना जा रहा है कि देश में शक्ति संचालन के विभिन्न गुटों का भी हाथ इसमें हो सकता है। (एजेंसी)

महज़ 40 साल की उम्र में कैंसर ने छीना खेल पत्रकार सिद्धार्थ मिश्र को

 

न्यू इंडियन एक्सप्रेस के खेल संपादक सिद्धार्थ मिश्रा का महज़ 40 साल की उम्र में चेन्नई में निधन हो गया। वो पिछले कुछ महीनों से कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उन्होंने खेल पत्रकारिता को नया आयाम दिया था।
 
 
टाइम्स स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म के तेज-तर्रार प्रोडक्ट रहे सिद्धार्थ ने 2008 ओलिंपिक्स के दौरान अपने अखबार के खेल पृष्ठ को स्टेडियम का रूप दिया था, जिसकी खूब चर्चा हुई थी। उन्होंने 1997 में दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया ज्वाइन किया था। विभिन्न डेस्कों पर रहने के बाद वे वहां दिल्ली टाइम्स के डेस्क इंचार्ज़ बनाए गए थे।
 
2006 में उन्हें टाइम्स के स्पोर्ट्स विभाग में सहायक संपादक बनाया गया था। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम फिल की डिग्री प्राप्त मिश्रा ने 2008 में कुछ महीने न्यूज एक्स चैनल में भी काम किया, लेकिन जल्दी ही उन्हें न्यू इंडियन एक्सप्रेस से ऑफर आ गया।
 
हालांकि क्रिकेट पर उनकी कमाल की पकड़ थी, लेकिन उन्होंने दूसरे खेलों के लिए जोरदार काम किया था। उनके शोकाकुल परिवार में उनकी पत्नी, एक पुत्री तथा एक पुत्र है।

ओलंपिक पदकवीरों को 14 किलो सोना बांटेगा सहारा समूह

 

लखनऊ। सहारा इंडिया परिवार अपनी घोषणाओं के मुताबिक लंदन ओलंपिक विजेताओं को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बुधवार को होने वाले एक समारोह में सम्मानित करेगा। विजेताओं के बीच 14 किलो सोना बांटेगा। खिलाड़ियों के सम्मान समारोह में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव तथा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मौजूद रहेंगे। 
 
सहारा इंडिया परिवार ने लंदन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले को पांच किलो, रजत जीतने वाले को तीन किलो तथा कांस्य जीतने वाले को दो किलो सोना ईनाम में देने की घोषणा की थी। लंदन ओलंपिक में कुश्ती में सुशील कुमार तथा निशानेबाजी में विजय कुमार ने रजत पदक जीता है। जबकि बैडमिंटन में सायना नेहवाल, महिला मुक्केबाजी में मैरीकॉम, कुश्ती में योगेश्वर दत्त तथा निशानेबाजी में गगन नारंग ने कांस्य जीता था। (एजेंसी)

कोर्ट ने कहा – खुर्शीद के ट्रस्‍ट मामले में आजतक ढाई महीने में दस्‍तावेज पेश करे

 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद से सम्बन्धित डाक्टर जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट में कथित फर्जीवाड़ा मामले में अगली सुनवाई 16 जनवरी को करेगी। कोर्ट ने जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा कथित धांधली के मामले में आजतक न्यूज चैनल को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए ढाई माह का समय दिया है।  
 
सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने जनहित याचिका में न्यायालय से इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने के बाद जांच के निर्देश राज्य सरकार को देने का आग्रह किया है। न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह और न्यायमूर्ति सतीश चन्द्र की खंडपीठ ने यह आदेश आज सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर की याचिका पर दिया। इसके पूर्व, गत 18 अक्तूबर को अदालत ने इस मामले में आजतक समाचार चैनल के सम्पादक को नोटिस जारी कर उनसे ट्रस्ट के कथित फर्जीवाड़े सम्बन्धी स्टिंग आपरेशन में लगाये गये आरोपों से जुड़ा पूरा ब्यौरा तथा दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया था। 
 
याचिका पर आज सुनवाई के दौरान आजतक चैनल की तरफ से न्यायालय को बताया गया कि खुर्शीद की पत्नी लुईस ने भी दिल्ली में मामले से सम्बन्धित दावा दायर किया है, जिसमें आरोपों से सम्बन्धित मूल दस्तावेज पेश किए गए हैं। लिहाजा यहां उच्च न्यायालय में दस्तावेज और ब्यौरा पेश करने के लिए समय देने का अनुरोध किया। अदालत ने चैनल के इस आग्रह के मद्देनजर उसे समय देते हुए सुनवाई 16 जनवरी के लिए स्थगित कर दी। 
 
याचिका में गृह विभाग के प्रमुख सचिव के मार्फत राज्य सरकार, आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू), सामाजिक अधिकारिता मंत्रालय, उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव, डाक्टर जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट तथा समाचार चैनल आज तक को पक्षकार बनाया गया है। जनहित याचिका में कहा गया है कि पूर्व केन्द्रीय कानून तथा अब विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद व उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद द्वारा संचालित जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट विकलांगों के लिए दिये जाने वाले उपकरण की कथित धांधली की जांच करायी जाए। यह भी कहा गया कि हिन्दी न्यूज चैनल द्वारा दिखाए गए समाचार और ऑपरेशन धृतराष्ट्र के आधार पर जनहित याचिका दायर की गई है।

निलंबित डिप्टी एसपी को न्याय दिलाने के लिए सक्रिय हुए आईपीएस अमिताभ ठाकुर

: पत्र लिखकर इस मामले की जांच पुलिस विभाग से अलग किसी अन्य विभाग से कराने की मांग की  :  विजय कुमार शर्मा, पुलिस उपाधीक्षक, 38 वीं वाहिनी, पीएसी, अलीगढ के निलंबित किये जाने से सम्बंधित समाचारों के सन्दर्भ में आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने कुछ प्रमुख समाचारपत्रों की प्रतियां संलग्न करते हुए अपनी व्यक्तिगत हैसियत में प्रमुख सचिव गृह तथा मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को एक पत्र लिखा है. उन्होंने इस पत्र में यह निवेदन किया है कि उन्होंने इस समाचार के बाद विजय शर्मा से फोन पर बातचीत कर पूरे तथ्य जानने की कोशिश की जिसमें विजय ने बार-बार स्थानांतरण, वरिष्ठ अधिकारियों पर गंभीर आरोप, आईजी कानपुर परिक्षेत्र के साथ मीटिंग के दौरान कथित अभद्रता आदि समस्त मुद्दों पर विस्तार से अवगत कराया.

अमिताभ ठाकुर ने पत्र में यह निवेदन किया है कि चूँकि शर्मा ने अपने स्तर पर स्वयं पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश के खिलाफ भ्रष्टाचार सम्बंधित अत्यंत गंभीर आरोप लगाया है, अतः रतनलाल शर्मा बनाम मैनेजिंग कमिटी, 1993 (4 एससीसी) 727 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुक्रम में उनके द्वारा दहेज हत्या में राजनैतिक दबाव, बार-बार स्थानान्तरण, उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार, आईजी कानपुर द्वारा उनके साथ किये गए कथित अभद्रता आदि समस्त आरोपों की जांच पुलिस विभाग से अलग शासन के किसी अन्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा कराई जाए ताकि यह सन्देश जाए कि न्याय सिर्फ हो नहीं रहा, न्याय होता हुआ दिख भी रहा है.

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की इस पहल के बाद पुलिस विभाग के ज्यादातर ईमानदार अधिकारी कहने लगे हैं कि अब अफसरों कर्मचारियों को भी अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए और बात रखने पर कोई विभागीय कार्यवाही नहीं किया जाना चाहिए. वजह ये है कि ईमानदार अफसरों व कर्मियों को उत्पीड़न और प्रताड़ना के जरिए गलत काम करने पर मजबूर किया जाता है और जो गलत काम नहीं करता उसका देर तक व दूर तक उत्पीड़न किया जाता है. अगर वह उत्पीड़ित अधिकारी अपनी बात जनता के सामने और मीडिया के सामने रख दे तो उसे ही अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित कर दिया जाता है.

डीजीपी तथा एसएसपी पर पैसे लेने का आरोप लगाने वाले डीएसपी वीके शर्मा सस्‍पेंड

 

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के डीजीपी समेत कई पुलिस अधिकारियों पर ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए पैसा वसूलने के आरोप लगाने वाले डीएसपी वीके शर्मा को सरकार ने सस्पेंड कर दिया है. रविवार को वीके शर्मा ने एटा के एसएसपी और डीजीपी पर पैसे लेकर तबादला करने तथा पैसे ना देने पर प्रताडि़त करने के आरोप लगाए थे. वीके शर्मा के आरोपों को खारिज करते हुए आईजी बीपी सिंह ने संकेत दे दिए थे कि उनके खिलाफ पुलिस महकमा कोई सख्त कदम उठा सकता है.
 
इससे पहले डीएसपी वीके शर्मा ने आरोप लगाया था कि महकमे के आला अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते हैं. पैसे लेकर तबादले करते हैं. पैसा नहीं देने पर तबादला करके प्रताडि़त करते हैं. पैसे नहीं देने पर ही ग्‍यारह महीने में उनका पांच बार तबादला किया गया. उनकी तीन महीने की सैलरी रोकी गई. दूसरी तरफ यूपी के आईजी लॉ एंड ऑर्डर बीपी सिंह के कहा कि वीके शर्मा का एटा से अलीगढ़ पीएसी में तबादला नियमों के तहत हुआ है.
 
आईजी बीपी सिंह की मानें तो ये कोई पहला मौका नहीं है जब वीके शर्मा ने अनुशासन तोड़ा हो. बी पी सिंह भले ही वी के शर्मा के तबादले को लेकर कितनी ही सफाई दें लेकिन वी के शर्मा के पिछले ग्यारह महीने में पांच बार तबादला होने से यूपी पुलिस के आला अफसरों के कामकाज के तरीके पर सवाल तो उठते ही हैं. साथ ही इस मामले में जांच की बजाय वीके शर्मा को ही सस्‍पेंड किए जाने से इन आरोपों को और बल मिला है. 

चलो चलें , क्योंकि समय बहुत कम है और हत्यायें बेहिसाब करनी हैं… (राणा यशवंत की दो कविताएं)

राणा यशवंत आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर रहे हैं. इन दिनों महुआ के ग्रुप एडिटर हैं. समय समय पर वे कविताएं, गीत, ग़ज़ल लिखा करते हैं. पेश है उनकी दो ताजी कविताएं…

1- मैं हत्यारा बनना चाहता हूं

मैं चाहता हूं भरे चौराहे पर उस दरिंदे को गोली मार दूं

जिसने स्कूल से आती

तीन साल की मासूम का बलात्कार किया है.

 

मैं उस बाग वाले की बांह काटना चाहता हूं

जिसने अमरूद की चोरी के लिये

एक टूअर-टापर बच्चे को

पीट पीटकर मार डाला है .

 

मैं उस जुलूसवाले को जिंदा जलाना चाहता हूं

जिसने भूख से लड़ते लोगों की खेप खरीदी

उन्हें उकसाया-भड़काया

और अब उनकी लाश पर अपनी गोटियां सेंक रहा है.

 

मैं उस मिलावटखोर की खाल उधेड़ना चाहता हूं

जिसने दूध को भी ज़हरीला बना दिया

गोद की गोद सूनी हो गई

और उसके फॉर्म हाउस पर रातभर दावत जमी रही.

 

मैं उस खादीवाले का ख़ून करना चाहता हूं

जिसने किसानों की खून-पसीने की मेहनत को

मंडी में कौड़ियों के मोल कर दिया

और दलालों-कारोबारियों से सोने की जूतियां ले गया.

 

मैं उस पुलिसवाले को बम से उड़ा देना चाहता हूं

जिसने एक बेकसूर की रिहाई के लिए

उसकी बेटी की चीख-सनी बोटियां रातभर नोचीं  

खबर छपी- गरीबी से आजिज परिवार ने नहर में कूदकर जान दी.

 

मैं उस हुज़ूर माई-बाप को बचे रहने देना नहीं चाहता

जिसने इंसाफ का बड़ी सफाई से ख़ून कर दिया

आस में उठी आंखें पथरा गईं

और गुनाह के घर में ठ़हाकों से भर गए.

 

हां मैं हत्यारा बनना चाहता हूं

मैं किसी को छोड़ना नहीं चाहता

अगर तुम्हें मेरा इरादा ठीक लगता है तो साथ आओ

हाथ मिलाओ, हथियार उठाओ और चल पड़ो

चल पड़ो क्योंकि हत्यायें ज्यादा करनी होंगी.

दुनिया में ये अपनी तरह की पहली क्रांति होगी

जिसमें हत्यारों से हज़ारगुना ज्यादा मरनेवाले होंगे .

इससे पहले कि हमारे इरादे की उन्हें खबर लगे

इससे पहले कि हमारे चारों ओर सायरन बजे

इससे पहले कि सलाखों के पीछे हमपर बूटें चलें

इससे पहले कि हमपर देशद्रोह का इल्ज़ाम लगे

चल पड़ो – कि आज कुछ कर गुज़रते हैं

सबसे पहले नामर्दी की हत्या करते हैं

भीड़ की मुर्दागीरी को मारते हैं

नपुंसक नारों, गद्दार इश्तहारों को मारते हैं

अपाहिज अवतारों, स्खलित विचारों को मारते हैं

चलो चलें , क्योंकि समय बहुत कम है

और हत्यायें बेहिसाब करनी हैं.


2- फेसबुक

सफेद चोटियों पर अभी अभी सुनहरी धूप गिरी है

टेबल पर रखे प्याले से भाप उठ रही है

बगल की कुर्सी पर एक दोस्त चौड़ा पड़ा है

तस्वीर के नीचे लिखा है- स्विटजरलैंड की वादियों में सुबह की कॉफी

मार्निंग इन पैराडाइज़ !!

रंगीन पत्तियों से लदे पौधों की लंबी कतार है

पीछे की हरी पहाड़ियों पर गहरा धुआं है

बीच की पगडंडी से पति संग इठलाती आती साहिबा हैं

पूछा है – ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है

एक मित्र का मोबाइल गुम हो गया है

सारे नंबर चले जाने पर बेचारा बड़ा रोया है

कई दोस्तों ने तरह तरह का मोबाइल-दर्द सुनाया है

लगे हाथ अपना नंबर भी बताया है

मसूरी में अभी अभी बारिश हुई है

दिल्ली से गये एक भाई की लॉटरी निकल आई है

आलू-प्याज के पकौड़ों संग ग्लास भर चाय की तस्वीर चिपकाई है

किसी महिला मित्र ने लिखा है- यार दिस इज़ नॉट फ़ेयर

कोई आधे सफर में है, कोई नये शहर में है

कोई अर्से बाद गांव पहुंचा है, कोई सगाई करके शहर लौटा है

एक ने हाथों की मेंहदी दिखाई है, दूसरे ने दिल की पीर सुनाई है

कुछ ने बड़े सवाल पर खुली बहस छेड़ी है, कईयों के बीच मेरी तेरी हुई पड़ी है

किसी ने पूछा है इस देश में नेताओं औऱ बाबाओं का क्या किया जाए ?

जवाब आया है – जहाज़ पर चढाकर हिंद महासागर में डुबो दिया जाए

भ्रष्टाचार पर हंगामा खत्म करने का कुछ ने रखा है अनोखा नुस्खा

भई क्या कुछ ले-देकर ये नहीं निपट सकता ?  

एक मित्र ने सालों पुरानी ग्रुप फोटो लगाई है

सालों बाद उन लम्हों की याद आई है

प्राइमरी स्कूल के मेरे मास्टर साहेब कितने बूढ़े हो गये हैं

वो और उनका पोता दोनों मेरे फ्रैंड हो गये हैं

जो छूट गये थे कहीं वो फिर मिल गये हैं

जिनसे मिले नहीं कभी वो भी जुड़ गये हैं

पूछना नहीं है, पता सब रहता है

देखा नहीं लेकिन पहचाना रहता है

हाल और चेहरों का सिलसिला सा चलता है

जगह और रास्तों पर मशविरा सा चलता है

जीत औऱ जश्न की खुशियां यहां साझा हैं

तरक्की और तमगों पर बधाइयां ज्यादा हैं

जिंदगी का हर रंग लिए पल पल बदलता संसार है

फेसबुक, जाने-अनजाने चेहरों, नाम-अनाम रिश्तों का अंतहीन विस्तार है.


राणा यशवंत से संपर्क yashwant71@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


इन्हें भी पढ़ें-

ऐसी खबरों के लिए माफ कीजिए, दिल्ली से अभी खबर बाकी है

कभी यार, कभी फरिश्ता, कभी खुदा लगता है…

भारत में चैनल शुरू करेगी यूरोपीय कंपनी आरटीएल

 

यूरोप की प्रमुख मनोरंजन नेटवर्क कंपनी आरटीएल ग्रुप अगले सप्‍ताह भारत के टेलीविजन बाजार में उतर रही है. कंपनी का पहला टीवी चैनल अगले सप्‍ताह से शुरू हो जाएगा. जर्मन अखबार हांडेलसबलाट ने सोमवार को खबर दी है कि यह चैनल 'बिग आरटीएल थ्रिल' मुंबई से शुरू हो रहा है. यह चैनल आरटीएल ग्रुप तथा रिलायंस ब्राडकास्‍ट नेटवर्क का संयुक्‍त उद्यम है. रिलायंस ब्राडकास्‍ट नेटवर्क अनिल अंबानी की अगुवाई वाले रिलायंत ग्रुप की मनोरंजन कंपनी है. 
 
रिपोर्ट के अनुसार नए चैनल को उन 70 लाख घरों को ध्‍यान में रखते हुए शुरू किया जा रहा है जहां हिंदी बोली जाती है. चैनल 5 नवंबर से शुरू हो रहा है और इसे केबल या सैटेलाइट के जरिए देखा जा सकेगा. (भाषा)   

वो इश्क जो हमसे रुठ गया… और …आम आदमी की जेब हो गई है सफाचट… (सुनें)

चक्रव्यूह फिल्म देखने लायक है. खासकर उन लोगों के लिए जो पूछते रहते हैं कि ये नक्सलवाद क्या होता है. ऐसे लोगों को बुनियादी रूप से यह समझ में आ जाएगा नक्सली किन हालात में बनते हैं और किन हालात में जीते हैं. चक्रव्यूह बनाकर प्रकाश झा ने अपने सरोकारी सिनेमा के मिशन को आगे बढ़ाया है. हां, यह अलग बात है कि इसी मिशन के माध्यम से वह पैसे भी ठीकठाक कमा लेते हैं. और यह बिलकुल सही है. आपका जो पैशन हो, उसे आप जीते हुए, उसे मिशन के रूप में चलाते हुए, पैसे भी कमा लेते हैं तो यह बड़ी बात है.

मतलब ये कि प्रकाश झा ने साबित किया है कि सिनेमा को सरोकार के साथ जीते हुए भी आप खूब पैसे कमा सकते हैं, कमाने के लिए जरूर नहीं कि आप चड्ढी खोल और माइंडलेस फिल्म ही बनाएं. इस चक्रव्यूह फिल्म के कुछ गाने बेहद अच्छे हैं. दो गाने नीचे दिए जा रहे हैं. एक अन्य गाना फरीदा खानम का है. वो इश्क जो हमसे रुठ गया, अब उसका हाल बताएं क्या… सुनिए और आनंद लीजिए. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Chheen Ke Lenge apna haq… (Sukhwinder Singh)


aam aadmi ki jeb ho gayi hai safaachat… (कैलाश खेर)


wo ishq jo humse rooth gaya, ab uska hal bataayen kya… (फरीदा खानम)


इन्हें भी सुन सकते हैं…

हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है…. आवाज जगजीत और गुलाम अली की (सुनें)

दोस्त की गाड़ी का चालान कटा तो रिपोर्टर को एसआई पर गुस्सा आया (सुनें)
 
हमारी मय्यत पर तुम जो आना तो चार आंसू बहा के जाना… (सुनें)
 
थोड़ी सी पी शराब, थोड़ी उछाल दी… कुछ इस तरह से हमने जवानी निकाल दी…(सुनें)
 
1 से 10 तक तो मेहंदी हसन हैं, 11वें पर जिसे रखना है रख दें
 
झगड़े की शुरुआत हेमंत तिवारी और उनके लोगों ने की : दुर्गेश चौरसिया (सुनें टेप)
 
मीडियाकर्मी ने मुझसे छह लाख रुपये की मांग की थी : अमजद सलीम (सुनें टेप)
 
बरेली में दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों व मैनेजरों को जमकर पीटा गया
 
गाजीपुर के एसओजी प्रभारी पर लूट का आरोप, सुनिए आडियो टेप
 
मेहंदी हसन : शहंशाह-ए-गजल का यूं जाना… (कुछ गीत ग़ज़ल सुनें)
 
मैं परेशान परेशान परेशान परेशान…. हीरोइन बहुत परेशान है बेचारी (सुनें तीन गाने)
 
कोल्ड ड्रिंक पी-पी कर अंतड़िया सड़ा ली हैं अमिताभ बच्चन ने!
 
इस महिला आईपीएस ने मीडिया को 'असंवैधानिक', 'नौटंकी' और 'दो कौड़ी का' बताया… सुनें टेप
 
पत्रकार दिनेश चंद्र मिश्र ने टिकटार्थी बनकर एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का किया स्टिंग
 
हसन साहब ने आंदोलन नामक नया सुर बताया जो हारमोनियम की पटरियों में नहीं मिलते
 
मेहंदी हसन के गाए कुछ गीत-ग़ज़ल सुनें : आज ही आज का मुसाफिर हूं….
 
इस कमबख्त गायक के कोई बड़े अरमान नहीं हैं
 
पंद्रह हजार रुपये दो वरना निकाल दूंगा… सुनिए यह टेप
 
'महाबहस' और 'पोस्टमार्टम' : गूगल फेसबुक ट्विटर ब्लाग यूजर इसे जरूर देखें-सुनें
 
अबे, जे हैं अदम गोंडवी…!
 
सुनिए टेप, अवैध शराब बिक्री में अमर उजाला का पत्रकार फंसा! 

श्रीन्यूज़ वालों, यह पत्रकारिता नहीं बल्कि चाटुकारिता संवाद लग रहा है

उत्तर प्रदेश में राजधानी लखनऊ के करीब एक जिला है बहराइच. यह जिला प्रदेश के तमाम शैक्षणिक और विकास पायदानों पर जितना नीचे है उतना ही पत्रकारिता को लेकर तेजतर्रार है. अब इस तेज़ी का मतलब सच्चे अर्थों वाली पत्रकारिता से ना लगा लीजियेगा. यहाँ पत्रकारिता का वही रूप अपने पूरे शबाब है जिसके लिए आजकल पत्रकारिता जानी जाती है. यहाँ के पत्रकार बनने की इच्छा रखने वाले निवेशक राजधानी का रुख जेब में पैसे रखकर करते हैं कि किसी भी उचित (दाम देकर मिलने वाली पत्रकारिता क्या उचित होगी खैर) मूल्य पर उन्हें पत्रकार बनने का लाइसेंस मिल जाए. जिसका प्रमाणपत्र माइक आईडी या अखबार की एजेंसी के रूप में मिल जाए. हाँ इसके बाद असली वाली पत्रकारिता मतलब सरकारी अधिकारियों थानों और मुख्य रूप से डीएम कुर्सी के सामने जितनी बड़ी पहचान बना ली जाए, वहां से शुरू होती है. डीएम अगर पहचान ले और पत्रकार उसे जिले का मालिक कहकर भरी मीटिंग में प्रचारित करे, यह बहराइच की पत्रकारिता की खास पहचान है.

अब आते हैं मुख्य बात पर. इसी जिले में 30 अक्टूबर को यानि आज श्री न्यूज़ ग्रुप जिसमें अखबार और न्यूज़ चैनल शामिल हैं, के द्वारा एक पत्रकारिता संवाद सम्मलेन का आयोजन किया जा रहा है. शहर के डायमंड पैलेस में होने वाले इस कार्यक्रम के बड़े बड़े होर्डिंग जगह जगह लगे हैं. इन होर्डिंग पर बड़े बड़े लोगों के नाम दर्ज हैं जिसमें मुख्य अथिति श्रम मंत्री डॉ वक़ार से लेकर जनपद के सारे विधायक तक और अतिथियों में जिलाधिकारी किंजल सिंह से लेकर हर बड़े अधिकारी तक दर्ज हैं. लेकिन इस पूरे शवाब पर लगे होर्डिंग में कहीं भी पत्रकारिता या इसका पर्याय माने जाने वाले बौद्धिक वर्ग के किसी भी अतिथि का नाम नहीं होना बड़ी गड़बड़ी लगता है. इस पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा पढकर यह समझना ही मुश्किल हो जाता है कि यह किसी समाचार समूह के पत्रकारिता पर आधारित कार्यक्रम का बैनर है या किसी सरकारी आयोजन का.

जिलों में ध्वस्त होती पत्रकारिता का प्रमुख कारण मुख्य अधिकारियों की चमचागिरी या चापलूसी करते हुए किसी तरह अपनी दलाली की दुकान चलाना होता है. ऐसे में इन्हें बौद्धिक लोगों या पत्रकारों से ज्यादा जरूरत अधिकारियों और जनपद के प्रमुख नेताओं की हो जाती है. श्री ग्रुप के इस कार्यक्रम में अधिकारियों के आगमन का महिमा मंडन करना पत्रकारिता की गिरावट को बखूबी दर्शाता है. अधिकारियों मंत्रियों और विधायकों के इस महिमामंडित कार्यक्रम को देखकर इस पूरे समूह के पत्रकारों की चापलूसी और चाटुकारिता का तत्व दिखने लगता है. शायद लोगों को याद हो कि इसी ग्रुप के न्यूज़ चैनल लांचिंग के समय लखनऊ के एक बड़े होटल में जमकर मार पीट हुई थी. अगर पत्रकारिता के संवाद आयोजन में केवल अधिकारी और नेता अपने भाषण झाड़ेंगे तो इसमें आलोचनात्मक पत्रकारिता की जगह चरणों में बिछी पत्रकारिता का संवाद बन जायेगा. ऐसे में श्री ग्रुप का यह सारा कार्यक्रम पत्रकारिता नहीं चाटुकारिता का संवाद लग रहा है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

धीरेन्द्र अस्थाना पर केन्द्रित ‘इरावती’ के अंक का मुंबई में हुआ विमोचन

मुखातिब और मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, विले पार्ले मुंबई के तत्वावधान में हुए साहित्यिक कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार सूर्यबाला ने कहा कि साहित्य जीवन से और जीवन साहित्य से उर्जा प्राप्त करते हैं और दोनों एक दुसरे के पूरक हैं. हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘इरावती’ के वरिष्ठ कथाकार धीरेन्द्र अस्थाना पर केन्द्रित अंक का विमोचन करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. हर्षदा राठोड़ ने कहा कि  साहित्य मनुष्य को जीवन जीने की दृष्टि देता है और मनुष्यता में विश्वास पैदा करता है. डॉ. राठोड़ ने इरावती के सम्पादक श्री राजेन्द्र राजन जी को मुंबई में इरावती पत्रिका के विमोचन के लिए साधुवाद दिया। उन्होंने श्री धीरेन्द्र अस्थाना को भी शुभकामनाएं दीं।

इस अवसर पर वक्तव्य  देते हुए श्री आलोक भट्टाचार्य ने कहा कि धीरेन्द्र अस्थाना  अपनी कहानियों में विचारधारा को हमेशा तरजीह देते हैं लेकिन वह एक दबाव कि तरह नहीं बल्कि कहानियों में रची बसी आती है. वरिष्ठ पत्रकार हरि मृदुल ने कहा कि धीरेन्द्र के कहानियां लिखने का अंदाज़ बिलकुल अलग है और वह एक रवानगी में कहानियां लिखते हैं. अनूप सेठी ने आपने वक्तव्य में कहा कि धीरेन्द्र धैर्य वाले किस्सागो हैं और उनकी कहानियों का समग्र मूल्यांकन होना चाहिए. युवा कथाकार दुर्गेश सिंह ने कहा कि धीरेन्द्र जी की कहानियों में मदिरा, महिलाएं और मुंबई बहुत सहज और खूबसूरत ढंग से आती हैं.

धीरेन्द्र जी की पत्नी  श्रीमती ललिता अस्थाना  ने इस अवसर पर कहा कि अक्सर  लेखक के लेखन और जीवन में एक फांक देखी जाती है जो नहीं होनी चाहिए. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही वरिष्ठ कथाकार सूर्यबाला ने कहा कि धीरेन्द्र अपनी कहानियों में बहुत सहज हैं और उनकी कहानियों में पिछड़ती जा रही औरतें और पिछड़ते जा रहे लोग बहुत सहजता से आते हैं.

मुख्य अतिथि और इरावती के संपादक राजेंद्र राजन जी ने मुंबई में इतनी संख्या में उपस्थित श्रोताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि उनकी पत्रिका नयी प्रतिभाओं में मौका देने में हमेशा अव्वल है. उन्होंने कहा कि सिर्फ कहानी और कविता ही साहित्य नहीं बल्कि साहित्य के सरोकार बहुत बड़े होते हैं. कार्यक्रम में वरिष्ठ कहानीकार सूरज प्रकाश, संपादक हृदयेश मयंक, गीतकार देवमणि पाण्डेय, और सुधि श्रोता उपस्थित थे. अतिथियों का परिचय और कार्यक्रम का सञ्चालन रविन्द्र कात्यायन और धन्यवाद ज्ञापन विमल चन्द्र पाण्डेय ने किया.

वकील की हत्‍या के मामले में राष्‍ट्रीय सहारा एवं आई नेक्‍स्‍ट से जुड़े पिता-पुत्र समेत कई गिरफ्तार

: प्रापर्टी विवाद से जुड़ा हुआ है मामला : कानपुर में अधिवक्‍ता रामेन्द्र नारायण मिश्रा की हत्या से नाराज कानपुर के वकीलों ने मंगलवार से हड़ताल शुरू कर दी है. दूसरी तरफ वकील की हत्या के मामले में एक फोटो जर्नलिस्‍ट समेत आठ नामजद एवं दो अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है. मिश्रा के भाई अखिल मिश्रा की तहरीर पर नजीराबाद पुलिस ने मामला दर्ज किया है. इसमें फोटो जर्नलिस्‍ट का बेटा भी शामिल है. वह भी फोटो पत्रकार है. 
 
अस्सी फिट रोड निवासी वकील रामेन्द्र नारायण मिश्रा (47) शनिवार रात अपने घर के पास से लापता थे कल सुबह वकील मिश्रा का शव नजीराबाद में प्रभु आशा अपार्टमेंट परिसर के सीवर सेक्‍शन में पड़ा मिला था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मिश्रा के शव पर 16 चोटों के निशान पाये गये थे. उनकी बुरी तरह से पिटाई की गयी थी तथा बाद में धारदार हथियार से उनके चेहरे और सिर पर भी वार किये गये थे. पुलिस के अनुसार यह हत्या एक प्लाट को लेकर हुये विवाद को लेकर हुई थी. 
     
इस मामले में कानपुर प्रेस क्‍लब के महामंत्री एवं राष्‍ट्रीय सहारा के फोटो जर्नलिस्‍ट कृष्‍ण कुमार त्रिपाठी, उनका पुत्र तथा आई नेक्‍स्‍ट का पत्रकार राहुल त्रिपाठी, 
छायाकार नीरू मिश्रा, कांग्रेसी नेता अर्चना चौहान, राजीव गुलानी, गोविंद अवस्‍थी, चौकीदार समेत कुल दस लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है। इस घटना के बाद से कल से ही शहर के वकील काफी गुस्से में है और उन्होंने कल भी जमकर हंगामा किया था और तोड़फोड़ भी की थी। इसके बाद आज सुबह से वकील हड़ताल पर चले गये हैं। कानपुर बार एसोसिएशन ने आज से शहर की सभी अदालतों में अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर दी है। 
 
मामले में चूंकि पत्रकार एवं फोटो पत्रकारों की संलिप्‍तता सामने आने से वकीलों में पत्रकारों के खिलाफ भी गुस्‍सा है। नाराज वकीलों ने पत्रकारों के खिलाफ भी प्रदर्शन किया। कानपुर परिक्षेत्र के डीआईजी अमिताभ यश का कहना है कि वकील मिश्रा की हत्या एक प्लाट को लेकर हुये विवाद के चलते हुई है। वकील मिश्रा के भाई अखिलेश मिश्रा ने इस मामले में आठ नामजद लोगो के अतिरिक्त दो अज्ञात लोगों के खिलाफ नजीराबाद पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया है। इसमें एक फोटो पत्रकार, उनका बेटा, उनकी पत्नी, वकील मिश्रा की महिला मित्र शामिल है। इसमें फोटोग्राफर पत्रकार, उनका पुत्र, वकील की महिला मित्र तथा तीन अन्य लोगो को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, जबकि अन्य नामजद लोगों की तलाश पुलिस कर रही है। 
 
डीआईजी ने कहा कि इस मामले में सभी अभियुक्तों को जल्द गिरफ्तार करने के लिये पुलिस की एक स्पेशल टीम बनाई है। आरोपियों की गिरफ्तारी के अलावा मामले का पूरी तरह से खुलासा कर दिया जाएगा। वकील पत्रकारों ने काफी नाराज हैं लिहाजा प्रेस क्‍लब के बाहर भी भारी संख्‍या में पुलिस बल तैनात किया गया है। कोर्ट में भी पुलिस की पर्याप्‍त व्‍यवस्‍था की गई थी ताकि आरोपियों पर हमला न हो सके। 

जनता को मूर्ख बनाने के लिए साधना ग्रुप का एक और प्रयास…. ‘ईश्वर चैनल’

पैसा उगाहने और बनाने की मची होड़ के बीच साधना ग्रुप ने एक और चैनल लांच कर दिया है. 'ईश्वर' चैनल. यह ज्योतिष चैनल है. अभी तक आप सभी ने ज्योतिषियों को न्यूज चैनलों पर बैठकर भविष्य बांचते देखा होगा. ये ज्योतिषी खुद पैसे देकर चैनलों से टाइम स्लाट लेते हैं और जनता को उल्लू बनाकर उनसे पैसे ऐंठते हैं. धार्मिक चैनल चलाकर बाबाओं से पैसे ऐंठने का उस्ताद साधना ग्रुप अब इसी काम को और आगे बढ़ाते हुए चौबीस घंटे का ज्योतिष चैनल लांच कर चुका है, 'ईश्वर' नाम से. नाम और काम से ही जाहिर है कि यह चैनल पाखंड और अंधविश्वास फैलाकर जनता का धार्मिक भयादोहन करेगा. कुछ उसी तरह जैसे निर्मल बाबा नामक फ्राड किया करता था.

निर्मल बाबा की दुकान तो इसलिए उठ गई क्योंकि वह एक व्यक्ति था, और मीडिया हाउसों को भी उससे पैसे ऐंठने के काफी बाद समझ में आया कि अब इनकी दुकान उखाड़ देनी चाही. लेकिन साधना ग्रुप अगर यही काम ईश्वर नामक चैनल के जरिए करेगा तो इसके खिलाफ कौन आवाज उठाएगा. प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस काटजू भले ही लाख कहें कि ज्योतिष और भविष्यवाणी जैसे पाखंड का प्रसारण न्यूज चैनलों को नहीं करना चाहिए लेकिन जब न्यूज चैनल वाले ज्योतिष और भविष्यवाणी पर केंद्रित चैनल ही खड़ा कर देंगे तो भला उन्हें कौन रोकेगा. लोगों का कहना है कि प्रभातम समूह के काम करने का तरीका सिर्फ एक है, धंधा चाहे जो हो. वह हर हाल में लाभ और सिर्फ लाभ पाने के लिए तेजी से हाथ पांव मार रहा है. इसके लिए उसने धार्मिक चैनल, न्यूज चैनल और ज्योतिष चैनल को लगाने के साथ ही साथ इनके जरिए अपने दूसरे प्रोडक्ट्स-प्रोजेक्ट्स को लाभ दिलवाने में लगा है.

मजेदार यह देखना होगा कि ईश्वर चैनल का लाइसेंस किस कैटगरी में लिया गया है. अगर इसे एंटरटेनमेंट कैटगरी में लिया गया है तो सच में यह चैनल निर्मल बाबा का दूसरा रूप साबित होगा और एक न एक दिन इस चैनल के खिलाफ आवाज उठाने का काम हर एक को करना पड़ेगा. ज्योतिष चैनल ईश्वर के बारे में साधना ग्रुप के शिशु किस्म के डायरेक्टर गौरव गुप्ता ने भविष्यवाणी की है कि इस ज्योतिष चैनल को अन्य हिंदी भाषी राज्यों में लांच किया जाएगा. गौरव गुप्ता इस बात पर फूले नहीं समा रहे हैं कि ईश्वर चैनल भारत का इकलौता ज्योतिष चैनल है, जिसे देश ही नही विदेश में बैठें दर्शक भी आनलाइन देख सकते हैं.

गौरव का कहना है कि वर्तमान समय में भारतीय मीडिया में ज्योतिष को 24 घंटे के विभिन्न चैनलों पर केवल आधे से एक घंटे का समय मिल रहा है. ऐसे में साधना समूह द्वारा लांच किये गये देश के पहले ज्योतिष चैनल को दर्शकों द्वारा खूब पसन्द किया जा रहा है.  फिलहाल दर्शक ईश्वर चैनल को इंटरनेट के माध्यम से www.ishwar.tv पर देख सकते हैं. गौरव गुप्ता के बातों और इरादों से जाहिर है कि वे लोग भारत की जनता में व्याप्त अंधविश्वास और पाखंड को खत्म करने के लिए कोई शिक्षा चैनल लाने की बजाय, और ज्यादा मूर्खता फैलाने हेतु ईश्वर टीवी को बड़े पैमाने पर और जोरशोर से चलाएंगे.

इस मुद्दे पर आप क्या सोचते हैं, जरूर अपनी राय लिखकर दीजिएगा ताकि इस बहस को आगे बढ़ाया जा सके.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

कोटेदार से अवैध धन उगाही करते तीन पत्रकार फंसे, जेल भेजे गए

 

कासगंज। ढोलना क्षेत्र के ग्राम वाहिदपुर में राशन विक्रेता को धमकाकर पांच हजार रुपए की रकम वसूलने वाले तीन पत्रकारों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। इनसे अवैध वसूली की रकम भी बरामद की है। तीनों ही पत्रकार आगरा से प्रकाशित प्रमुख समाचार पत्रों से जुडे हुए है। एसपी महेश चंद्र मिश्रा के निर्देश पर एसओ सहसवीर सिंह यादव ने आरोपी पत्रकारों को गंभीर धाराओं में जेल भेजा हैं। 
 
मंगलवार को पत्रकारों की न्यायालय में पेशी हुई है। बताया जाता है कि आगरा से प्रकाशित समाचार पत्र डीएलए का जिला इंचार्ज नीरज कौशिक पुत्र रामप्रकाश कौशिक, कल्पतरू एक्सप्रेस समाचार पत्र से जुडा धीरेंद्र यादव उर्फ मीतू यादव पुत्र अब्बल सिंह यादव एवं एवं कल्‍पतरू से ही जुड़ा सीतू उर्फ सिंटू ग्राम वाहिदपुर में राशन विक्रता कमल सिंह के यहां सोमवार को पहुंचे। उनलोगों ने राशन विक्रेता से बीस हजार रुपये की मांग की। राशन विक्रेता को डराया-धमकाया भी। किसी तरह ग्राम प्रधान के बीच में आने से बात पांच हजार रुपये पर तय हुई। राशन विक्रेता ने इन लोगों को अगले दिन पैसे देने के लिए बुलाया। 
 
इसके पहले राशन विक्रेता ने इसकी सूचना पुलिस को भी दे दी। पत्रकार राशन विक्रेता से पांच हजार रूपए ऐंठने के बाद जब चलने को हुए तभी ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया, पहले तो जमकर मारपीट की, इसके बाद फोन कर मौके पर पुलिस बुला ली, आरोपियों को पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने जामा तलाशी में पांच हजार की नगदी पत्रकारों से बरामद की। इन पर आईपीसी की धारा 420, 384, 411 के अन्तर्गत मामला पंजीकृत किया है। पुलिस के मुताबिक डीएलए के पत्रकार नीरज कौशिक पर धोखाधडी कर चेक बाउंस के मामले में 138 एनआई एक्ट का मुकदमा अपर मुख्य न्यायिक मजिस्‍ट्रेट के यहां लंबित है। जबकि कल्पतरू एक्सप्रेस का पत्रकार अंतर्राज्‍यीय वाहन चोर गिरोह में सम्मलित रहा है। पुलिस को काफी दिनों से इनकी तलाश थी। आरोपी पत्रकारों की पैरवी के लिए पहुंचे पत्रकारों को एसपी महेश चंद्र मिश्रा ने खास तवज्जो नहीं दिया, जबकि अवैध उगाही जैसे गंभीर मामलों में संलिप्त पत्रकारों को भी चेतावनी दी।

प्रिंट मीडिया को अलविदा कर अब न्‍यूज पोर्टल संचालित करेंगे अमरपाल सिंह एवं मदन अरोड़ा

 

करीब ढाई दशक तक जुड़े रहने के बाद राजस्थान पत्रिका को अलविदा कहने वाले वरिष्ठ पत्रकार अमरपाल सिंह वर्मा अपने गृह जिले हनुमानगढ़ में इंटरनेट पत्रकारिता में कदम रखने जा रहे हैं। अमरपाल सिंह अपने गुरु जाने-माने पत्रकार मदन अरोड़ा के साथ मिलकर न्यूज पोर्टल शुरू कर रहे हैं। संभवत: दीपावली तक उनका पोर्टल www.hanumangarhlive.com शुरू हो जाएगा। वर्मा का कहना है कि उनके पोर्टल पर पत्रकारिता के कई तेवर होंगे। रूटीन की खबरें तो होंगी ही, साथ में उन महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पेशल कवरेज होगा, जिन्हें प्रिंट मीडिया में उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। 
 
न्यूज पोर्टल में ऐसे मुद्दे उठाए जाएंगे, जिनकी व्यापक चर्चा हो और उन पर जनमत जागृत हो। न्यूज पोर्टल इलाके के प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए भूमिका निभाएगा। समाचार एजेंसी हिंदुस्तान समाचार, नवभारत टाइम्स, जागरण और दैनिक भास्कर में पत्रकारिता का चालीस साल का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मदन अरोड़ा क्षेत्र के वरिष्ठतम पत्रकार हैं। प्रिंट मीडिया में भारत-पाक सीमा क्षेत्र की कवरेज, आतंकवाद, ग्रामीण विकास, सामाजिक समस्याओं तथा राजनीतिक मुद्दों पर कलम चलाते रहे मदन अरोड़ा का इंटरनेट पत्रकारिता से जुडऩा इस इलाके में एक नई पहल साबित होगा। 

कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस से आशुतोष प्रताप की विदाई

आगरा से प्रकाशित कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस से खबर है कि वरिष्‍ठ समाचार संपादक आशुतोष प्रताप सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. कुछ महीने पहले ही वे आज समाज से इस्‍तीफा देकर कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस पहुंचे थे. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन उन्‍हें आश्‍वासन दिया था कि लखनऊ एडिशन लांच होने पर उन्‍हें महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी सौंपी जाएगी, पर प्रबंधन वादा पूरा नहीं कर पाया, इससे नाराज आशुतोष ने इस्‍तीफा दे दिया.

दूसरी तरफ ये खबर भी आ रही है कि उनके स्‍थानीय संपादक अनिल गुप्‍ता से मतभेद हो गए थे जिसके बाद उन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया. प्रबंधन भी उनसे नाराज चल रहा था. मौका मिलते ही बाहर का रास्‍ता दिखा दिया. 

फर्स्‍ट एस्‍टेट की हैसियत हासिल कर चुका है मीडिया

 

भारतीय मीडिया इस समय खुद को सरकार और अदालतों दोनों की ओर से घिरा हुआ महसूस कर रहा है। इसे यह आभास हो रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं जानकारी प्राप्त करने के नागरिकों के अधिकार को तत्काल खतरा दरपेश है। यह कुछ हद तक वास्तविकता को बढ़ा-चढ़ा कर देखने वाला दृष्टिकोण है। वास्तविकता यह है कि तेजी से प्रगति कर रही सूचना टैक्नोलॉजी के बूते मीडिया ‘फोर्थ एस्टेट’ (चौथे पाए) की बजाय ‘फर्स्‍ट एस्टेट’ (प्रथम पाए) वाली हैसियत हासिल कर चुका है। तमाम क्षेत्राधिकारों में सेंध लगाती हुई इसकी ग्लोबल पहुंच ने इसे ऐसी प्रहारक क्षमता से लैस कर दिया है जो सरकारों व अदालतों को भी नसीब नहीं।
 
अब तो स्थिति ऐसी है कि अफसरी ज्यादतियों एवं न्यायालयों द्वारा अधिकारों के सीमोल्लंघन के साथ ही अब मीडिया की स्वच्छंदता को भी शुमार करना होगा। अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने व परिणामस्वरूप कमाई में वृद्धि करने को ध्यान में रखते हुए मीडिया ने लोक-लुभावन स्वायत्तता (नागरिकों के कुछ भी जानकारी हासिल करने के निर्बाध एवं सर्वशक्तिमान अधिकार) के नाम पर न केवल गवर्नैंस बल्कि सामाजिक समरसता को भी अस्त-व्यस्त कर दिया  है। यहां तक कि इससे संस्थानों की विश्वसनीयता को चुनौती खड़ी हो गई है और अराजकता का खतरा पैदा हो गया है।
 
व्यक्ति की प्राइवेसी उसका अनमोल अधिकार है। हालांकि यह भी इसके समकक्ष ही स्वीकार्य एवं सुस्थापित है कि सार्वजनिक व्यक्तियों के निजी मामले हमेशा और पूरी तरह इस पर्दे के पीछे नहीं छिपाए जा सकते। इसी प्रकार प्रतिष्ठा भी व्यक्ति का एक अन्य अनमोल अधिकार है और यह किसी व्यक्ति विशेष अथवा संस्थान विशेष के बारे में लोगों की जानकारी पर आधारित होती है। अत: इसी कारण यह हर हालत में न केवल असंदिग्ध होनी चाहिए बल्कि देखने वालों को भी इस बात का आभास होना चाहिए।
 
यही कारण है कि संस्थागत प्राइवेसी एवं प्रतिष्ठाएं ऐसी चीज हैं कि यदि इन पर बिना सोचे-समझे तथा प्रासंगिक कानूनी प्रक्रियाएं अपनाए बिना मीडिया द्वारा सार्वजनिक रूप में दोषारोपण किया जाता है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसलिए यह अनुमति कदापि नहीं दी जा सकती कि मीडिया जिस रास्ते पर आगे बढ़ रहा है उसकी परिणति किसी उत्कंठा, पूर्वाग्रह या अनियंत्रित भीड़ द्वारा कानून के  हाथ में लेने के रूप में हो।
 
चूंकि बुद्धिमत्तापूर्ण एवं संतुलित रिपोटिंग एवं टिप्पणियों की मर्यादाओं का मीडिया के कुछ अंगों द्वारा उल्लंघन लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए किसी प्रकार के नियमन की आवाजें उठना कदाचित आश्चर्यजनक नहीं। स्व-नियंत्रण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए लेकिन केवल इसी से ही काम नहीं चलेगा। यह अवधारणा भी पूरी तरह मनगढ़ंत है और समकालीन विश्व की वास्तविकताओं के प्रति किसी हद तक अज्ञानता की सूचक है।
 
लोकतांत्रिक समाजों में मीडिया का नियमन सर्वथा गैर-हाजिर है। नियंत्रण स्थापित करने के यदा-कदा दुर्भाग्यपूर्ण प्रयासों के बावजूद भारतीय मीडिया काफी हद तक विश्व के स्वतंत्रतम मीडिया में से एक है और ऐसी स्वच्छंदता हासिल कर चुका है जो चिंताजनक  है। मंत्रिमंडल के कागजात, फाइलों पर की गई टिप्पणियां, आयोगों की रिपोर्टें, कैग की जांच रिपोर्टें और प्रारंभिक आपराधिक जांच में हुई  प्रगति के समाचार अक्सर समय से पूर्व ही लीक कर दिए जाते हैं। अत: बिना सोचे-समझे इनका खुलासा किया जाता है।
 
इनमें से अधिकतर करतूतें स्पष्ट तौर पर हताश तत्वों या निहित स्वार्थों द्वारा किसी मुद्दे से ध्यान भटकाने, एजैंडे नए सिरे से तय करने,  बनावटी खतरों का ढोल पीटने और निर्दोष व भोले-भाले लोगों की कीमत पर लोकराय को रास्ते से भटकाने के लिए अंजाम दी जाती हैं। इसके बावजूद ‘व्हिसल ब्लोअर्स’ और विशेष परिस्थितियों में सचमुच के ‘सटिंग आप्रेटर्स’ को जनहित में सरंक्षण दिया जाना चाहिए।
 
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार प्रतिपादित किया है कि यदि ट्रायल कोर्ट के मैजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोप तय करने की प्रक्रिया खतरे में है तो वह न्याय के हित में उच्च अदालत को मुकद्दमे की संबंधित कार्रवाई मीडिया में जारी किए जाने पर रोक लगाने के लिए आवेदन कर सकता है। ऐसी बातें रोज-रोज तो देखने में आती नहीं हैं और ऐसा भी नहीं है कि वरिष्ठ अदालत आंखें मूंद कर निचली अदालत की प्रत्येक मांग स्वीकार कर लेगी। अदालतें मीडिया की स्वतंत्रता की प्रबल पक्षधर रही हैं और उन्होंने ही इसके दायरे एवं क्षेत्राधिकार को विस्तार दिया है। इसलिए अदालतों पर किसी दुर्भावना का आरोप लगाना बहुत ही बेहूदा एवं  बचकाना होगा।
 
इसकी तुलना में सुप्रीम कोर्ट का यह दिशा-निर्देश कहीं अधिक विवादास्पद है कि आर.टी.आई. आयोग की अदालती पीठों में न्यायिक  पृष्ठभूमि वाले लोगों को शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि कानून एवं कानूनी व्याख्या के मामले अक्सर दरपेश आते हैं लेकिन आदेश भी अकारण जारी नहीं किया गया था। इस तरह के दिशा-निर्देशों का मकसद आर.टी.आई. आयोग की शक्तियां हड़पना नहीं बल्कि प्रक्रियाओं को युक्तिसंगत एवं सक्षम बनाना है।
 
इस बात का भी निपटारा होना चाहिए कि चयन समितियों का गठन कैसे किया जाएगा। इन मुद्दों पर चर्चा तो की जा सकती है लेकिन इन्हें सिरे से रद्द करना गलत है। नौकरशाह लम्बे-चौड़े एवं महान अनुभव वाले प्रशंसनीय व्यक्ति होते हैं लेकिन  बुद्धिमत्ता का पट्टा कोई उन अकेलों ने नहीं उठा रखा है।
 
प्रधानमंत्री के इस कथन पर भी कई एतराज उठे हैं कि आर.टी.आई. को प्राइवेसी के अधिकार पर हावी नहीं होने देना चाहिए और इस परेशान करने वाले प्रश्र पूछने और ‘मछलियों को फंसाने’ के अभियान हेतु प्रयुक्त नहीं किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी भी आधारहीन नहीं है। इसके अलावा उनकी यह टिप्पणी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि जनहित में सरकारी-निजी भागीदारी को भी किसी न किसी प्रकार के संरक्षण की जरूरत है ताकि सार्वजनिक हितों को आघात न पहुंचे हालांकि बिल्कुल ही आर.टी.आई.  के  दायरे  से बाहर  किए  जाने  पर नौकरशाह किसी बात के लिए जिम्मेदार ही नहीं ठहराए जा सकेंगे।
 
न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अध्यक्षता वाले प्राइवेसी अधिकार विशेषज्ञ समूह ने कहा है कि व्यक्ति के निजता के अधिकार के उल्लंघन को माफ किया जा सकता है। यदि यह ‘पत्रकारिता के उद्देश्यों’ के व नागरिकों के जानकारी प्राप्त करने की भावना से किया गया हो।  हालांकि इस समिति ने यह तय करने की जिम्मेदारी प्रैस कौंसिल व भारतीय प्रसारण मानक संघों पर छोड़ दी है कि ‘सार्वजनिक उद्देश्य से’ उनका क्या अभिप्राय है। धीरे-धीरे इस प्रक्रिया की परिणीति एक स्पष्ट आचार संहिता के रूप में होगी लेकिन स्वतंत्र प्रैस और निष्पक्ष मुकद्दमे की प्रक्रिया को सूक्ष्मता से संतुलित करना होगा।
 
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा की धांधलियों को ‘अनैतिक तो है लेकिन अवैध नहीं’ करार दिया। वहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सोनिया के दामाद राबर्ट वाड्रा का यह कह कर बचाव किया कि वह अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद और अडवानी की बेटी के ‘काले कारनामों’ के  बारे में जानते हैं लेकिन अपने प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध सार्वजनिक दूषणबाजी नहीं करेंगे। गडकरी और दिग्विजय दोनों का ही व्यवहार शर्मनाक है। क्या हम ऐसे व्यवहार को ही अपने सार्वजनिक जीवन की मर्यादा बनाएंगे?
 
इस्पात उद्योगपति जिंदल बनाम टी.वी. प्रकरण से यह सिद्ध हो गया है कि ‘सदा बहार शॄमदगी’ के तौर पर मीडिया में ‘पेड-न्यूज’ व प्राइवेट संधियों का बोलबाला है। हिमाचल में चुनाव शीघ्र होने वाले हैं और वहां उम्मीदवारों द्वारा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति के खुलासे किए गए हैं। कई मामलों में सम्पत्ति  में  दोहरी-तिहरी  वृद्धि  दिखाई  गई  है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस मामले में एक-दूसरे से आगे हैं। ये सम्पत्ति राजनीतिज्ञों ने कैसे जमा की है? क्या हिमाचल के सेब के पेड़ों पर पैसा लगता है? चुनाव के इस मौसम में ऐसा लगता है कि सेब भी सोना उगल रहे हैं।         
 
लेखक बीजी वर्गीज वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. पंजाब केसरी से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.  

पत्रकार को जान से मरवाने की धमकी देने के मामले में एसओ के खिलाफ जांच करायेंगे एसपी

 

गाजीपुर में दैनिक जागरण के पत्रकार नरेंद्र नाथ पाण्‍डेय को एसओ द्वारा जान से मारने की धमकी मामले में मंगलवार को गाजीपुर पत्रकार एसोसिएशन के अध्‍यक्ष राजेश दूबे के नेतृत्‍व में पत्रकारों का प्रतिनिधि मंडल ने एसपी विजय गर्ग से मुलाकात की। इस दौरान सुहवल थाना के एसओ राम स्‍वरूप वर्मा द्वारा पत्रकार नरेंद्र नाथ पाण्‍डेय को जान से मरवाने की धमकी तथा मारपीट व लूटपाट के आरोपी संत कुमार राय से मिले होने की शिकायत की गई। एसपी विजय गर्ग ने आरोपी संत कुमार राय को छोड़े जाने पर हैरानी जताई। 
 
एसपी ने कहा कि आरोपी के ऊपर जो धाराएं लगाई गई हैं, उसके तहत बिना जमानत सुहवल एसओ ने कैसे छोड़ दिया। एसपी विजय गर्ग ने एसपीओ जमानियां कमल किशोर को जांच अधिकारी नियुक्‍त किया। कमल किशोर सुहवल थाना के एसओ की संदिग्‍ध भूमिका तथा घटना की जांच करेंगे। एसपी विजय गर्ग ने पत्रकार नरेंद्र नाथ को भरोसा दिलाया कि पूरे मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई की जाएगी। जिले में सुहवल एसओ के खिलाफ पत्रकारों में जबर्दस्‍त रोष है। 

दूसरी तिमाही में जागरण प्रकाशन को 335 करोड़ की आय

 

जागरण प्रकाशन लिमिटेड (जेपीएल) ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 335.38 करोड़ रुपये का कुल राजस्व अर्जित किया है। इसमें बीते साल की इसी तिमाही के मुकाबले 8.41 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। कंपनी के एकल नतीजों के मुताबिक, राजस्व में हुई वृद्धि की वजह विज्ञापन से होने वाली आय में बढ़ोतरी रही। इसके चलते कंपनी का ऑपरेटिंग रेवेन्यू दूसरी तिमाही में 322.10 करोड़ रुपये रहा। 
 
नतीजों पर टिप्पणी करते हुए जेपीएल के सीएमडी महेंद्र मोहन गुप्त ने कहा कि कंपनी का यह प्रदर्शन उम्मीद से कहीं अधिक संतोषजनक रहा है। कंपनी ने न सिर्फ विज्ञापन से होने वाली आय में बढ़ोतरी की है, बल्कि रेवेन्यू के अन्य स्रोतों में भी वृद्धि हुई है। नई दुनिया और मिड-डे का प्रदर्शन भी उम्मीद से बेहतर रहा है। इतना ही नहीं, कंपनी के आउटडोर बिजनेस में भी तेज वृद्धि हुई है। पहली छमाही के एकल नतीजों के मुताबिक कंपनी का ऑपरेटिंग रेवेन्यू 4.85 प्रतिशत बढ़कर 639.63 करोड़ रुपये रहा। पाठकों के लिहाज से दैनिक जागरण प्रीमियम ए वर्ग में सबसे आगे रहा है। आइ नेक्स्ट और सिटी प्लस का प्रदर्शन भी संतोषजनक रहा है। (जागरण)

टाइम्‍स ग्रुप को पछाड़कर जी बना देश का सबसे बड़ा मीडिया समूह

 

मुंबई : हफ्ते भर से गलत वजहों से सुर्खियों में रहे मीडिया समूह ज़ी के पास खुश होने की वजह भी आ गई है। अरसे से अव्वल नंबर पर काबिज टाइम्स समूह को पछाड़कर अब ज़ी देश का सबसे बड़ा मीडिया समूह बन गया है। इतना ही नहीं अगले वित्त वर्ष के आखिर तक स्टार इंडिया भी ज़ी के साथ इस सिंहासन पर बैठ सकता है। बिजनेस स्टैंडर्ड ने देश के सबसे बड़े मीडिया समूहों की जो फेहरिस्त जारी की है, उसमें नेटवर्क 18 और सोनी तथा भाषायी अखबारों की जबरदस्त तरक्की भी अचरज में डालने वाली है।
 
सूची बनाना काफी मुश्किल था क्योंकि 80,000 करोड़ रुपये के भारतीय मीडिया और मनोरंजन (एमऐंडई) कारोबार में शामिल कई दिगगज कंपनियां सूचीबद्घ नहीं हैं। लेकिन कई स्रोतों और कंपनियों के भीतर से मिली जानकारी के आधार पर यह सूची तैयार की गई है। इसमें मीडिया पार्टनर्स एशिया के अनुमान, क्रिसिल की क्रेडिट रेटिंग और कैपिटालाइन की मदद मिली है।
 
आंकड़े पूरे नहीं हैं और एबीपी जैसे कुछ समूह इसमें नहीं हैं। कई जगह आंशिक आंकड़े इस्तेमाल किए गए हैं, मसलन रिलायंस के मीडिया कारोबार से केवल 2 कंपनियां सूचीबद्ध हैं। सभी कंपनियों के परिचालन लाभ के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए उनका इस्तेमाल नहीं किया गया। फिर भी कीमत के लिहाज से आधे मीडिया और मनोरंज उद्योग को समेटे यह सूची प्रमुख रुझानों का अच्छा संकेत देती है। इसमें 3 खास रुझान पता चलते हैं:
 
पहला रुझान: टेलीविजन का बढ़ता दबदबा। मीडिया-मनोरंजन कारोबार का आधा हिस्सा टीवी के पास है और इसका असर दिख रहा है। स्टार जैसे ही ईएसपीएन-स्टार स्पोर्टस का अधिग्रहण पूरा करेगा, 6,000 करोड़ रुपये की कमाई के साथ उसे जी के संग नंबर 1 की कुर्सी साझा करनी चाहिए। टीवी में टीवी सिग्नल वितरित करने वाली कंपनियों (टाटा स्काई और डिश टीवी) को भी शामिल किया गया है। पांच शीर्ष कंपनियों में टाइम्स अकेली प्रिंट मीडिया कंपनी है। 
 
दूसरा रुझान: भारती एयरटेल अकेली दूरसंचार कंपनी है जो मीडिया कंपनियों को कड़ी टक्कर दे पाई है। बाकी दूरसंचार कंपनियां मीडिया क्षेत्र में दखल नहीं दे पाईं और उन्होंने अलग हटकर मूल्य वद्र्घित सेवाएं ही उपलब्ध कराई हैं। हालांकि कुछ ऐसे बड़े समूह हैं जिनके पोर्टफोलियो में दूरसंचार और मीडिया दोनों ही है जैसे कि टाटा और रिलायंस। मगर इनमें दूरसंचार का दबदबा अधिक और मीडिया का कम रहा है। मुकेश अंबानी ने नेटवर्क 18 और इनाडु के अधिग्रहण में पूंजी लगाई थी जिससे नेटवर्क 18 इस सूची में पहले 10 में शामिल हो गया। एवी बिड़ला समूह ने इंडिया टुडे समूह में अल्पांश हिस्सेदारी खरीदी थी।
 
तीसरा रुझान: भाषायी अखबारों का विकास। पिछले साल टीवी में कदम रखने वाले प्रमुख हिंदी अखबारों और मलयाला मनोरमा के आंकड़े देखिए। मंदी से बेअसर इनका प्रदर्शन लाजवाब है। (बीएस)

नोएडा में समाचार संपादक से चाकू के बल पर लूट

 

नोएडा : सेक्टर-57 में बदमाशों ने एक स्थानीय अखबार के समाचार संपादक के साथ लूटपाट की. बदमाश चाकू के बल पर उनसे पर्स व मोबाइल फोन लूटकर ले गए. उन्होंने घटना की शिकायत सेक्टर-58 कोतवाली में की है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. जानकारी के अनुसार हापुड़ निवासी विनम्र वृत्‍त त्‍यागी सेक्‍टर 57 में स्थित एक अखबार में समाचार संपादक के रूप में काम करते हैं. 
 
रविवार की रात साढ़े दस बजे भी वह अपना काम निपटाकर कार्यालय से घर जाने के लिए निकले थे. अभी वे कार्यालय से कुछ दूर ही पहुंचे थे कि पीछे से आए तीन बदमाशों ने उन्हें घेर लिया तथा उनसे लूट शुरू कर दी. लूट का विरोध करने पर बदमाशों ने चाकू निकाल लिया तथा जान से मारने की धमकी दी.  इसके बाद बदमाश उनका पर्स और दो मोबाइल फोन लूटकर सेक्टर के सी ब्लॉक की ओर भाग निकले. 
 
श्री त्‍यागी के पर्स में पंद्रह सौ रुपये व एटीएम कार्ड था. उन्होंने घटना की सूचना अपने कार्यालय और कोतवाली सेक्टर-58 पुलिस को दी. रात में पुलिस ने बदमाशों की खोजबीन की, लेकिन कुछ पता नहीं चला. श्री त्‍यागी ने अपने साथ हुई लूट की घटना की लिखित शिकायत की है. हालांकि पुलिस को अभी तक 
लूट करने वालों का कोई सुराग नहीं मिला है. 

पत्रकार नवकांत के घर से हजारों की चोरी

 

बंगा क्षेत्र के गांव भरोमजारा में पत्रकार नवकांत भरोमजारा के घर से चोरों ने लगभग पांच हजार रुपये की नकद राशि व एक घड़ी चुरा ली. जब चोरी की वारताद हुई उस समय घर पर कोई मौजूद नहीं था. रविवार रात गांव में महामाई का जागरण चल रहा था. पत्रकार नवकांत तथा उनका परिवार जागरण में गया हुआ था. इसी बीच रात्रि करीब 12 बजे चोर घर के पिछवाड़े से अंदर घुस गए. 
 
 चोर स्टोर में पड़े अटैची में से 4200 रुपये से ज्‍यादा नकद राशि व एक हाथ की घड़ी चुरा ले गए. उन्‍होंने और सामान खोजने की कोशिश की पर सफल नहीं हुए. जब नवकांत और उनके परिवार के सदस्‍य वापस आए तो चोरी की जानकारी हुई. पत्रकार ने इसकी सूचना थाना सदर के एसएचओ अवतार सिंह को दी. जिस पर उन्‍होंने एक एएसआई सुरिंदर सिंह को भेजकर मौका मुयायना कराया. पुलिस चोरों की तलाश कर रही है. 

खतरों से जूझने वाले 250 पत्रकारों को मानवाधिकार पुरस्‍कार

 

जर्मन संस्थान फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन अपने मानवाधिकार पुरस्कार के जरिए उन संगठनों को बढ़ावा देना चाहता है जो पाकिस्तान के कबायली इलाकों में खतरे से जूझते पत्रकारों का सहयोग करती है. ट्राइबल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स टीयूजे में शामिल 250 पत्रकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सरहदों से अपनी जान पर खेलकर खबरें लिखते हैं, अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया के लिए. फ्रीडरिश एबर्ट फाउंडेशन के कॉन्स्टांटीन बावाल्ट कहते हैं, "टीयूजे के पत्रकारों ने अपनी जान पर खेलकर हिम्मत दिखाई है और विश्व को अफगान पाकिस्तान सरहद के 'काले कुएं' के बारे में जानकारी देने में मदद की है."
 
पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर में फाटा प्रांत कबायली इलाका है. माना जाता है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान से तालिबान और अल कायदा के लड़ाके यहां छिपे हुए हैं. अमेरिका का मानना है कि यह लड़ाके अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय सैनिकों पर हमला करते हैं और इन इलाकों में अकसर आम जनता पर भी घातक हमले होते हैं. कुछ ही दिनों पहले खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में 14 साल की मलाला यूसुफजई पर घातक हमला हुआ था. यूसुफजई ने बीबीसी के लिए एक डायरी लिखी जिसमें उसने तालिबान के नियंत्रण में अपने शहर और वहां के जीवन के बारे में जानकारी दी थी. मानवाधिकार संगठन एम्नेस्टी इंटरनेशनल के विशेषज्ञ मुस्तफा कादरी के मुताबिक इस हमले से पता चलता है कि पश्चिमोत्तर पाकिस्तान मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए कितना खतरनाक है. पत्रकारों को भी हमेशा तालिबान और लड़ाकू गुटों से खतरा रहता है.
 
स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसलिए कुछ ही पत्रकारों पर भरोसा रखती हैं जो अपनी जान को खतरे में डालकर उन तक खबरे पहुंचाते हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में जीयो टीवी के नसीर तूफैल कहते हैं, "ज्यादातर पत्रकारों को कबायली इलाकों में जाने की इजाजत ही नहीं है." इसलिए तालिबान और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के बारे में सही जानकारी पाना इतना आसान नहीं है.
 
पाकिस्तान के कानून के मुताबिक अब भी फाटा इलाके में कोई भी स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टिंग नहीं कर सकता है. इसलिए इलाके में काम कर रहे पत्रकारों को और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. टीयूजे के वरिष्ठ अधिकारी सफदर हयात दावर ने सरकार से मांग की है कि इलाके से निष्पक्ष जानकारी को बढ़ावा देने के लिए वहां कानूनों में बदलाव किए जाएं, "मैं उम्मीद करता हूं कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने के बाद कबायली इलाकों में पत्रकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए हालात बेहतर हों."
 
दावर कहते हैं कि फ्रीडरिष एबर्ट जैसी संस्थाएं इस बात को स्वीकार करती हैं कि विश्व के सबसे खतरनाक इलाकों से जानकारी भेजने की क्या अहमियत है लेकिन पाकिस्तान सरकार अभी तक इस बात को अनदेखा कर रही है. दावर अपने संगठन के जरिए पत्रकारों के लिए काम का बेहतर माहौल और इलाके में तैनात जानकारों के लिए जीवन बीमा की मांग करते हैं, लेकिन इस्लामाबाद में सरकार ने इन मांगों को खारिज कर दिया है. कबायली इलाकों में काम कर रहे डीडब्ल्यू के रिपोर्टर फरीदुल्लाह खान कहते हैं कि वहां तैनात पत्रकारों को कम पैसे मिलते हैं और उन्हें सुरक्षा भी नहीं मिलती. इसके बावजूद वे इलाकों से जानकारी पूरी दुनिया तक पहुंचाते हैं. इसलिए फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन की तरफ से इनाम उनके लिए बहुत मायने रखता है.
 
संयुक्त राष्ट्र सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने इस साल पाकिस्तान को दुनिया में पत्रकारों के लिए मेक्सिको के बाद पाकिस्तान को दूसरा सबसे खतरनाक देश बताया है. दक्षिण एशियाई पत्रकारों के संगठन सैफमा के मुताबिक इस साल दक्षिण एशिया में 17 पत्रकार मारे गए जिनमें से 12 ने पाकिस्तान में अपनी जान खोई. सैफमा के महासचिव इम्तियाज आलम कहते हैं कि आतंकवाद और इस्लामी कट्टरपंथियों पर खबरें लिखना पाकिस्तानी पत्रकारों को खतरे के घेरे में ले आता है. और पत्रकार की मौत के लिए कभी भी किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया. 1994 से अब तक हर साल फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन संगठनों या व्यक्तियों को मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित कर रहा है. 31 अक्टूबर को बर्लिन में टीयूजे को औपचारिक तौर पर सम्मानित किया जाएगा. (डीडब्‍ल्‍यू)

अब स्‍वामी मार्तण्‍डपुरी के नाम से जाने जाएंगे वरिष्‍ठ पत्रकार माधवकांत मिश्र

 

: हरिद्वार में संन्‍यास ग्रहण किया : प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार और धार्मिक चैनलों के संस्थापक व पत्रकारिता जगत के शिखर पुरुष माधवकांत मिश्र अब स्वामी मार्तण्डपुरी के नाम से जाने जाएंगे। उन्होंने धर्मनगरी हरिद्वार में महानिर्वाणी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विश्वदेवानंद महाराज से संन्यास की दीक्षा ग्रहण कर ली है। संतजनों ने कहा कि मिश्र को स्वसंन्यास के तहत दीक्षा दी गई है।
 
सनातन धर्म को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से देश के कोने-कोने में पहुंचाने वाले वरिष्ठ पत्रकार माधवकांत मिश्र ने शुक्रवार को गृहस्थ आश्रम छोड़कर संन्यास आश्रम में प्रवेश किया। 66 वर्षीय श्री मिश्र को महानिर्वाणी अखाड़े के संत के रूप में दीक्षा देने के बाद स्वामी विश्वदेवानंद महाराज ने मार्तण्डपुरी नाम दिया। कनखल स्थित श्री यंत्र मंदिर परिसर में आयोजित संन्यास समारोह में महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव ने स्वामी मार्तण्डपुरी का अभिनंदन करते हुए कहा कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को ईश्वर की कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है। शिवयोगी रघुवंश पुरी ने श्री मिश्र की ओर से चलाए जा रहे रुद्राक्ष के पौधों को रोपण करने के अभियान की प्रशंसा की। इसके अलावा वहां मौजूद अन्य संतगणों ने भी श्री मिश्र के पूर्व में किए कार्यो को सराहा और उन्हें संन्यासी जीवन के लिए शुभकामनाएं दी।
 
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार कमलकांत बुतकर ने मिश्र को एक शिशु संन्यासी बताया और कहा कि अब महानिर्वाणी अखाड़े में ही इनका लालन-पोषण होगा और यहां के संतगणों के उपदेश रुपी वचन ही उनका शिशुपान होगा। अंत में पत्रकार से संन्यासी बने श्री मिश्र ने कहा कि उन्होंने प्रभु की आज्ञा और परिवार के सहयोग से ही यह कदम उठाया है। इस अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी शिवप्रेमानंद, ऋषि रामकृष्ण, महंत ललता गिरी, महंत बिल्केश्वरगिरी, महंत महेंद्र सिंह, महंत मोहन सिंह, महंत कमलदास समेत कई संतगण मौजूद रहे। (जागरण)

राजस्थान में शीघ्र लांच होगा ‘लोकयात्रा’ नामक पाक्षिक अखबार

राजस्थान में जल्दी ही एक नया पाक्षिक अख़बार लोकयात्रा लांच होने जा रहा है…खोजी पत्रकारिता पर आधारित यह अख़बार प्रदेश के दूरदराज इलाकों में जाकर उन ख़बरों को मुद्दा बनाएगा जो दैनिक अख़बारों से अछूती रह जाती है…यह राजनीतिक गलियारों में सतह के नीचे चल रही हलचल को उभारकर आम आवाम तक पहुंचाएगा…वहीं सामाजिक ताने-बाने की मुख्य धारा से जुड़कर समाज में जड़ बन चुकी कुरीतियों पर समाज का नए सिरे से ध्यानाकर्षित करेगा…

लोकयात्रा उन तमाम ख़बरों और मसलों की तह में जाकर उन्हें प्रमुखता से उठाने की कोशिश करेगा जिन्हें संक्रमित मीडिया ने अनदेखी कर कूड़ेदान का पात्र बना दिया…साथ ही राजस्थान के गाँव-गलियारों में जाकर देहातियों से लोकतंत्र और लोकसंस्कृति के मसलों पर बात करेगा… अख़बार के संपादक कमलेश केशोट के अनुसार लोकयात्रा राजस्थान में खोजी पत्रकारिता में नए आयाम स्थापित करने के हरसंभव प्रयास करेगा…वहीं आम ख़बरों पर पैनी नज़र रखकर सूबे के सिपहसालारों से खरी-खोटी करेगा…लोकयात्रा राजस्थान में ख़बरों की एक अनोखी यात्रा होगी जो लोगों के बीच जाकर उनसे उन्हीं के मुद्दों पर खरी-खरी बात करेगी…केशोट के मुताबिक तीखे तेवर और नए कलेवर में ख़बरों की यात्रा का यह नया अंदाज प्रदेशवासियों को बेहद पसंद आएगा…

दलित और स्त्री विरोधी है दैनिक जागरण (चंचल-सोनम तेजाब प्रकरण)

बिहार में राजधानी पटना से सटे मनेर थाने के छितनावां गांव के दबंगों ने क्रूरता की हद पार करते हुए रविवार 21 अक्टूबर की देर रात घर में घुस कर दो दलित बहनों चंचल और सोनम को तेजाब डालकर बुरी तरह जला दिया। कारण वही सामंतवादी पुरुष ऐंठन। वही सामंतवादी सोच कि गरीब, दलित और स्त्री होकर ये सामंतवादी पुरुष के शोषण का विरोध कैसे कर सकती हैं? कैसे नहीं तैयार होगी शोषित होने को स्त्री? मीडिया में भी खबरें आयी हैं कि प्रेम और शादी से इनकार करने पर दोनों दलित बहनों पर मनचलों ने तेजाब डाला है। बात साफ है कि यह वही पुरानी सामंतवादी सोच काम कर रही है कि स्त्री और वो भी गरीब और दलित कैसे पुरुष को अस्वीकार करने की हिम्मत जुटा रही है। तेजाब की शिकार चंचल को दबंग लगातार छेड़ते रहते थे। बाजार या पढ़ने आते-जाते वे लगातार उसे परेशान कर रहे थे। दबंगों के डर से वह चुप रह परिजनों को बताने से बचती रही, लेकिन दबंगों के सामने घुटने भी नहीं टेके। वे लगातार उसे बुरे परिणाम भुगतने की धमकी भी देते रहे। पर चंचल झुकी नहीं।

हाल ये हुआ कि इन सामंतवादी पुरुषों के अहम को ठेस लगी और इन्होंने चंचल को अपनी क्रूरता का शिकार बना डाला। देर रात घर में घुस कर छत पर सो रही चंचल और उसकी छोटी बहन सोनम पर तेजाब डाल कर जला दिया। दलितों और महिलाओं के विरोध को कुचलने के लिए ही सामंतवादी ताकतें इतनी क्रूरता पर उतर आयी हैं। बिहार में आये दिन दलितों के खिलाफ हो रही हिंसा इसी सामंतवादी सोच को जाहिर कर रहे हैं। इससे पहले भी वैशाली में एक दलित छात्रा को दबंग परेशान करते रहे और विरोध करने पर उन्होंने उसके साथ बालात्कार कर के उसे कुएं में मार कर फेंक दिया था।

दबंगों की क्रूरता का शिकार हुई इंटर में पढ़ी रही चंचल बैंक में नौकरी करना चाहती थी। उसका यही सपना था ताकि गरीब मां-बाप को बेहतर जिंदगी दे सके। इसके लिए वह खूब मन लगा कर पढ़ाई भी कर रही थी। अपने सपनों को उड़ान देने के लिए उसने मनेर से दूर दानापुर में एक निजी संस्थान से कंप्यूटर के डीसीए कोर्स में भी दाखिला ले लिया था। वह रोज ऑटो से पढ़ने आया जाया करती थी। वहीं इसकी छोटी बहन सोनम सातवीं में पढ़ रही थी। सोनम की एक आंख पहले से ही खराब थी, इस हमले के बाद वह और सकते में है। वह भी पढ़-लिख कर मां-बाप की गरीबी दूर करना चाहती थी। लेकिन दबंगों ने तेजाब से न केवल इनके शरीर और आंखों को जलाया है बल्कि इनके सपनों को भी चकनाचूर कर दिया है।

चंचल का चेहरा पूरी तरह से झुलस चुका है। छाती, गला, पीठ और पैर भी तेजाब से जले हुए हैं। शरीर का कुल 28% भाग जल चुका है। वहीं छोटी बहन सोनम का 20% भाग, हाथ और पीठ-पैर झुलसा है। चंचल की दशा इतनी बुरी है कि वह बोल भी नहीं पा रही है। बड़ी मुश्किल से कराहते हुए वह कहती है “बैंक में नौकरी पा कर मां-बात की गरीबी दूर करना चाहती थी। अब क्या होगा समझ में नहीं आ रहा। जिंदगी बर्बाद हो गयी है”। ये बताते हुए उसको रोते हुए साफ महसूस किया जा सकता है, लेकिन हालत ऐसी है कि उसके आंसू भी पता नहीं चलते। बस सुनाई पड़ती है तो सिसकियां और दर्द भरी कराह।

चंचल के पिता शैलेश पासवान के लिए बेटियां ही सब कुछ थीं। ऐसे वक्त में जब बेटियों की चाह कोई नहीं रखता, इन्हें हमेशा बेटियों की ही चाह थी। दो बेटियां होने के बाद इन्होंने और कोई औलाद नहीं चाही। वे फफकते हुए कह पड़ते हैं, “चाहते थे कि बेटियां अपने पैरों पर खड़ा होकर नाम रोशन करेगी। हमारी गरीबी भी दूर होगी। इसलिए बेटियों को पढ़ा भी रहे थे। लेकिन अब बेटियों के इस हाल के बाद भविष्य अंधकारमय हो गया है”।

पीड़ित दलित परिवार बेहद गरीब है। परिवार इंदिरा आवास से उपलब्ध घर में ही रहता है। कमरों का अभाव होने के कारण ही ठंड शुरू हो जाने के बावजूद भी बहनों को छत पर सोना पड़ रहा था। मां-बाप मेहनत मजदूरी करके गुजारा करते हैं। बड़ी मुश्किल से बेटियों की पढ़ाई हो रही थी। सोनम गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर पा रही थी। चंचल जैसे-तैसे कंप्यूटर कोर्स कर रही थी। वहीं अब इस घटना के बाद परिवार को कुछ सूझ नहीं रहा है। चंचल और सोनम के इलाज में भी पैसे लगेंगे। फिलहाल तो पटना के पीएमसीएच में मुफ्त में इलाज चल रहा है, लेकिन दवाएं बाहर से भी खरीदनी पड़ रही हैं। चंचल की हालत इतनी नाजुक है कि इलाज लंबा चलेगा। पूरी तरह से ठीक होने में लंबा वक्त लगेगा। चेहरा इतना झुलसा है कि कैसे ठीक होगी, कहना मुश्किल है। बेहतर सर्जरी के लिए अच्छे अस्पताल और इलाज खर्च की जरूरत है। जबकि परिजन इसमें सक्षम नहीं हैं। फिलहाल पीएमसीएच में इलाज चल रहा है लेकिन ऐसे हाल में जब बिना काम किये परिजनों का गुजारा मुश्किल है, इलाज कैसे चलता रहेगा कहना मुश्किल है। बार-बार पत्रकारों और संगठनों की पूछताछ से खीज चुकी चचंल की मां सुनैना देवी गुस्से में कहती हैं, “कुछो तो नहीं हो रहा है खबर छपे के। कउनो फायदा नहीं हो रहा। रोजे अखबार में छपइत है लेकिन अभी तक कोई मुआवजे न मिलल”।

पटना में दैनिक जागरण महिलाओं के मामले में जिस तरह रिपोर्टिंग कर रहा है, उससे इसकी सामंतवादी सोच का पता चलता है। पिछले दिनों पटना में गैंग रेप की शिकार लड़की को जहां बेबुनियादी तर्कों के आधार पर वह कठघरे में खड़ा कर रहा था, वहीं इस मामले में भी कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है। 26 अक्टूबर को अखबार लिखता है कि चंचल के फर्द बयान पर उसका अंगूठा क्यों लगा, जबकि वह इंटर की छात्रा है, हस्ताक्षर होना चाहिए था। इससे काफी कुछ पता चलता है कि गड़बड़ है। अब यह अखबार केवल इस बात से दबंगों पर आरोप को संदिग्ध बता रहा है। जबकि चंचल की हालत बिल्कुल नाजुक थी। वह निस्‍तेज पड़ी रहती थी। बोल पाने में असक्षम थी। ऐसे नाजुक हाल में हस्ताक्षर के बजाय अंगूठा ले लिया गया होगा। दैनिक जागरण आगे लिखता है कि अपराधियों को घर में किसी ने नहीं देखा। देर रात सारे लोग सोये थे। सोयी अवस्था में तेजाब डाल अपराधी भाग खड़े हुए। ऐसे हाल में अपराधियों को कैसे पहचाना जा सकता था। दैनिक जागरण की रिपोर्ट से साफ है कि वह पीड़ित परिवार को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।

इस सुशासन में अपराधियों के मनोबल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मीडिया में इसकी खबर प्रकाशित होने और तीन गिरफ्तारियों होने के बावजूद दबंगों का हौसला कम नहीं हुआ है। दबंग लगातार परिजनों को धमकी देते फिर रहे हैं। चंचल के चाचा मिथिलेश पासवान बताते हैं, “26 अक्टूबर की रात को दबंगों ने दुबारा घर पर हमला बोला। रात में दरवाजे पर धक्का देते रहे, जंजीर खटखटाते रहे और दरवाजा न खोलने पर घर उड़ा देने की धमकी दी। वहीं 27 अक्टूबर को कुछ संदिग्ध युवक पीएमसीएच तक पहुंच कर छात्राओं के बारे में पूछते पाए गये”। ऊपर से पुलिस का वही पुराना रटा-रटाया जवाब मिल रहा है कि धड़-पकड़ जारी है। ऐसे हाल में परिजन भय में जी रहे हैं और सुशासन कान में तेल डाल कर सो रही है।

पीड़ित परिवार जहां बेहद गरीब है, वहीं इनकी मदद को कोई सामने नहीं आ रहा है। एपवा और एक-दो दलित संगठनों ने पीड़ितों से मुलाकात के बाद सरकार से मुआवजे और अपराधियों की गिरफ्तारी की मांग जरूर की है। भाकपा माले ने भी विरोध प्रदर्शन भी किया है। लेकिन इनका दायरा केवल सरकार से मांग तक सीमित होने के कारण कोई तात्कालिक सहायता नहीं पहुंची है। बिहार राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने मुआवजे की बात कही है लेकिन अभी तक कोई सहायता राशि परिजनों को नहीं मिली है। कोई सामाजिक संगठन या एनजीओ ने भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ली है, जबकि पीड़ित परिवार बेहद गरीब है। बहरहाल चंचल और सोनम के सपने टूट चुके हैं और इनको मदद की जरूरत है।

ऐसे हाल में जब महिलाओं के खिलाफ लगातार हिंसा सामने आ रही है, राजधानी में पटना में पिछले दिनों कई गैंग रेप के मामले सामने आये हैं, दलित छात्राओं के रेप और हत्या के मामले सामने आये हैं, कुछ ही किलोमीटर दूर मनेर में दबंग इतने हौसले में हैं कि तेजाब से जलाने और गिरफ्तारी के बाद भी दबंगई से बाज नहीं आ रहे हैं… ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अधिकार यात्रा के आयोजन में व्यस्त हैं। अपराधियों का हौसला यों ही नहीं बढ़ा हुआ है। बल्कि इस सुशासन में इन्हीं लोगों की सहभागिता है। चार नवंबबर को होने वाले अधिकार सम्मेलन को लेकर बाहुबली अनंत सिंह से लेकर सुनील पांडेय और हुलास पांडेय जैसों के विशालकाय होर्डिंग से पटना की सड़कें पटी पड़ी हैं। और तो और, अधिकार सम्मेलन के लिए भारी रंगदारी वसूली जा रही है। 28 अक्टूबर को जदयू के पूर्व सासंद पर अधिकार रैली के लिए सात करोड़ रुपये रंगदारी मांगने का आरोप लगा है। हाजीपुर के एक निजी शैक्षणिक ग्रुप डायरेक्टर ने यह आरोप लगाया है। साफ है कि सरकार में कौन लोग हैं। ऐसे लोग ही सत्ता में शामिल हैं और अधिकार की मांग कर रहे हैं। जहां हाशिये के लोगों के अधिकार छीने जा रहे हैं, शोषण किया जा रहा है। आखिर सुशासन बाबू किनके अधिकारों की बात कर रहे हैं? अपराधियों की ही न! हाशिये के लोगों के अधिकारों की तो न सुशासन बाबू को फिक्र है न प्रशासन को, फिर सत्ता में सामंतवादी और अपराधी ही तो शामिल हैं। तो क्यों न अपराधियों और सामंतवादियों का मनोबल बढ़े?

एक व्यक्तिगत अपील : पीड़ित दलित परिवार बेहद गरीब है। मजदूरी से ही खर्चा चलता है। ऐसे हाल में तेजाब से बुरी तरह झुलसी छात्राओं का पूरी तरह ठीक होना कैसे संभव है, कह नहीं सकता। सरकारी पीएमसीएच अस्पताल में मुफ्त इलाज के सिवा और कोई मदद अभी तक सामने नहीं आयी है। इलाज और सर्जरी वगैरह में लाखों रुपये खर्च हो सकते हैं। संस्थाओं या व्यक्तियों से अनुरोध है कि हो सके तो पीड़ित परिवार की मदद करें।

पटना से सरोज कुमार की रिपोर्ट. सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से करने के बाद अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम कर रहे हैं. इनसे krsaroj989@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

श्री न्यूज़ के न्यूज़ रुम में जूतम पैज़ार, ठुक्कम-ठुकाई

हाल ही में श्री एस 7 से श्री न्यूज़ बने चैनल में आज न्यूज़रुम ही खबर का केंद्र बन गया। आरपीएम के नाम से मशहूर एक्जीक्यूटिव एडीटर राजेन्द्र प्रसाद मिश्रा ने अपने ख़ास-म-खास गुर्गे सैफुल्लाह उस्मान ने  एक गेस्ट कोऑर्डिनेटर के साथ न्यूज़रुम में जम कर मारपीट की और उसे धमकी भी दी कि अगर जुबान खोली तो नौकरी से भी जाओगे।

चैनल इन दिनों पढ़े-लिखे पत्रकारों की बजाय मारपीट और गाली-गलौच का अड्डा बनता जा रहा है। ये उस्मान पहले भी चैनल में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है। करीब डेढ़ दो महीने पहले उसने एक गरीब ड्राइवर को जमकर पीटा क्योंकि उसने रात में खास लोगों को मिलने वाली ड्रॉपिंग में बेवज़ह इधर उधर घूमने से मना कर दिया था। ड्राइवर के मुंह से खून तक फूट पड़ा था।

दिलचस्प बात ये है कि आरपीएम अपने गुर्गों को रोकने की बज़ाय उन्हें शह दे रहे हैं। उन्होंने आज चैनल में हुई इस मारपीट की घटना के बाद पागलों की तरह चीखना-चिल्लाना शुरु कर दिया। कहने लगे, "अब मैं यहां काम नहीं कर सकता… यहां काम करने का माहौल नहीं रह गया।" ये अलग बात है कि उसके पांच-दस मिनट बाद ही आरपीएम कैंटीन में इस 'पिटाई' के जश्न में शामिल हुए और उस्मान समेत पांच-छह लोगों के साथ खूब हंसी ठिठोली हुई।

बताया जाता है कि आरपीएम के इस ड्रामे से चैनल प्रबंधन भी नाराज़ है लेकिन उसे खुल कर हटाने की हिम्मत किसी की नहीं हो रही है। दरअसल आरपीएम चैनल के मालिकों की करीबी माने जानी वाली महिला के खास हैं। चैनल का माहौल इस क़दर खराब हो रहा है कि कुछ ही महीने पहले वरिष्ठ पत्रकारों की पूरी टीम छोड़ कर जा चुकी है।

हाल ही में चैनल की कायापलट के लिए लाए गए अजय उपाध्याय पिछले 15 दिनों से ऑफिस नहीं आ रहे हैं। उनकी टीम के अरविंद नाथ झा और अरविंद मोहन आदि भी पिछले चार-पांच दिनों से आना बंद कर चुके हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजी गयी ख़बर पर आधारित.

डीएसपी ने लगाया आरोप- यूपी का डीजीपी भ्रष्ट है, बिना पैसे काम नहीं करता

उत्तर प्रदेश के एक डिप्टी एसपी ने यूपी के डीजीपी पर आरोप लगाया है कि वे ट्रांसफर के लिए पैसे लेते हैं. बीके शर्मा नामक डिप्टी एसपी ने मीडियावालों से बातचीत में कहा कि वह खुद पैसे नहीं दे पाया इसलिए उसे प्रताड़ित किया जा रहा है और कुछ ही दिनों में पांच बार यहां से वहां तबादला कर दिया गया. डिप्टी एसपी बीके शर्मा ने साफ तौर पर कहा कि यूपी के पुलिस महानिदेशक एसी शर्मा अपने अधीनस्थ पुलिस अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग के खेल के जरिए करोड़ों अरबों रुपये बना रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में क्षेत्राधिकारी (सीओ सदर) के पद पर तैनात वी.के. शर्मा द्वारा सूबे के पुलिस महानिदेशक अम्बरीश चंद्र शर्मा पर पैसे लेकर काम करने का गंभीर आरोप लगाने के बाद पुलिस महकमें में सनसनी है. वीके शर्मा ने कहा कि यहां सिर्फ आला अधिकारियों का राज चलता है, छोटे अधिकारियों की सुनवाई नहीं होती. एटा जिले में क्षेत्राधिकारी के पद पर तैनात वी.के. शर्मा बुलंदशहर के रहने वाले हैं।

मीडियाकर्मियों से बातचीत के दौरान शर्मा ने कहा कि सूबे में प्रदेश के पुलिस विभाग का मुखिया ही भ्रष्ट है. वह बिना पैसे लिए कोई काम नहीं करते हैं. जिले के बड़े अधिकारी हमेशा अपनी बात मनवाने का प्रयास करते हैं. अपनी आपबीती सुनाते हुए शर्मा ने कहा, ‘‘मुझे तरह तरह से प्रताडि़त किया जा रहा है. मेरा वेतन तीन महीने से रोक दिया गया है.’’

शर्मा ने कहा कि अपनी समस्याओं को लेकर वह कई आला अधिकारियों को पत्र लिख चुके हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई तब जाकर उन्हें मीडिया के सामने आना पड़ा. शर्मा ने एटा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) पर सपा के स्थानीय नेताओं के दबाव में काम करने का आरोप लगाया.  उन्होंने साफतौर पर कहा कि जिले के एसएसपी गैरकानूनी तरीके से सपा नेताओं को बचाने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे. शर्मा ने कहा कि एसएसपी का काम करने से मना करने पर ही उन्हें तरह-तरह से प्रताडि़त करने का काम शुरू किया गया.

एमजे अकबर इंडिया टुडे ग्रुप से विदा हो गए

वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टुडे ग्रुप के प्रधान संपादक एमजे अकबर के बारे में खबर आ रही है कि वे अब इस ग्रुप से हट चुके हैं. सूत्रों का कहना है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. हालांकि कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि उनका कांट्रैक्ट खत्म हो गया था, इसलिए स्वतः वे अलग हो गए. एमजे अकबर दी संडे गार्जियन अखबार के कर्ताधर्ता भी हुआ करते थे जिसे पिछले दिनों उन्होंने विनोद शर्मा वाले मीडिया समूह को बेच दिया. हालांकि वे दी संडे गार्जियन के एडिटर इन चीफ बने हुए हैं.

एमजे अकबर देश में पत्रकारिता जगत के जाने माने नाम हैं. इस्तीफे की चर्चाओं को कनफर्म करने के लिहाज से भड़ास4मीडिया की तरफ से जब दोपहर के वक्त एमजे अकबर को फोन किया गया तो उन्होंने मीटिंग में होने की बात कहकर ज्यादा कुछ बताने से इनकार कर दिया. हालांकि इंडिया टुडे से जुड़े कई लोग इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि एमजे अकबर की विदाई हो चुकी है. मीडिया जगत व राजनीतिक हलकों में एमजे अकबर की इंडिया टुडे ग्रुप से विदाई के अलग अर्थ भी निकाले जा रहे हैं.

दो टीवी चैनल और एक राष्ट्रीय अखबार मेरे खिलाफ अभियान चला रहे हैं : गडकरी

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने चेतावनी दी कि कांग्रेस द्वारा रची गयी साजिश के तहत उन्हें बदनाम कर रहे मीडिया घरानों के खिलाफ वह दीवानी और फौजदारी मामले दर्ज कराएंगे। गडकरी ने दिल्ली से वापसी के बाद अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ मीडिया समूह कांग्रेस पार्टी के दलाल के तौर पर काम कर रहे हैं। अंग्रेजी के दो टीवी चैनल और अंग्रेजी का एक राष्ट्रीय अखबार मेरे खिलाफ अभियान चला रहे हैं और कांग्रेस के हाथों में खेल रहे हैं। नागपुर लौटने पर भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं ने गडकरी का गर्मजोशी से स्वागत किया। गडकरी ने कहा कि उन्हें बदनाम करने के अभियान में शामिल लोगों को वह सबक सिखाएंगे।

उन्होंने मीडिया संस्थान का नाम लिए बिना कहा कि एक बड़े मीडिया समूह ने मॉरीशस के रास्ते लंदन में काला धन जमा कर रखा है और 10-10 रुपये के शेयरों को 38-38 हजार रुपये में बेचकर हेरफेर की। उन्होंने इस बाबत दस्तावेज अपने पास होने का दावा भी किया। गडकरी ने कहा कि न तो मैंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद मांगा था और ना ही मैं इस पर रहने की मांग करूंगा। उनके इस बयान के कई मतलब निकाले जा सकते हैं। गौरतलब है कि भाजपा ने संघ की इच्छा के अनुरूप हाल ही में सूरजकुंड में संपन्न अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी के विधान में संशोधन किया था जिसके अनुसार पार्टी अध्यक्ष, जिला और राज्य इकाई प्रमुख दूसरे कार्यकाल के लिए चुने जा सकते हैं।

पार्टी विधान में उक्त संशोधन को मंजूरी मिलने से गडकरी को एक और कार्यकाल के लिए पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने का रास्ता साफ हो गया था। उनका मौजूदा कार्यकाल दिसंबर में समाप्त हो रहा है। कांग्रेस पर हमला बोलते हुए गडकरी ने कहा कि सत्तारूढ़ पार्टी कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला और 2जी मामले समेत 4.38 लाख करोड़ रुपये के बड़े भ्रष्टाचार में शामिल है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा भी हरियाणा में जमीन सौदों के मामले में 400 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार से घिरे हैं।

गडकरी को हवाई अड्डे से यहां उनके घर तक करीब 15 कारों और अनेक दुपहिया वाहनों के काफिले के साथ लाया गया। उन्होंने कहा कि वह बिना किसी डर के आखिर तक संघर्ष करेंगे। उन्होंने आरोपों से घिरी कंपनी पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड में किसी उच्च पद पर होने की बात से इनकार करते हुए कहा कि उनके पास केवल एक लाख रुपये के शेयर हैं। गडकरी ने कहा कि वह सामाजिक सेवा कर रहे हैं और 64 करोड़ रुपये के घाटे में चल रही इस कंपनी में क्षेत्र के 12 हजार किसान शेयरधारक हैं। कांग्रेस पर अपनी कंपनियों में आयकर छापे मारने का आदेश देने का आरोप लगाते हुए भाजपा अध्यक्ष ने हल्के फुल्के अंदाज में कहा कि मैंने आयकर अधिकारियों से कहा कि जब मेरी कोई आय नहीं है तो ये छापे क्यों। उन्होंने कहा कि वह जनता की अदालत में मुकदमे का सामना करने सरकार द्वारा किसी भी जांच के लिए तैयार हैं।
 
गडकरी ने कहा कि मुझ पर महाराष्ट्र में लोक निर्माण विभाग मंत्री रहते मेरे कार्यकाल के दौरान ठेकेदारों और निर्माण कंपनियों का पक्ष लेने का आरोप है लेकिन मैंने किसी पद का दुरुपयोग नहीं किया। उन्होंने कहा कि मंत्री बतौर मेरे कार्यकाल में मैंने 3600 करोड़ रुपये के ठेके (मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे परियोजना के लिए) निरस्त कर दिए थे जहां पीडब्ल्यूडी ने 1800 करोड़ रुपये में काम किया और इस तरह राजकोष के 2000 करोड़ रुपये बचा लिए गए। गडकरी ने कहा कि दूसरी तरफ हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी को दी गई बांद्रा-वरली सी लिंक परियोजना की लागत 420 करोड़ रुपये थी जो बढ़ते बढ़ते 1800 करोड़ रुपये पर पहुंच गई।

समाचार एजेंसियों द्वारा जारी खबर

मीडियावालों, गडकरी पर पिल जाओ ताकि वाड्रा पर शांति छा जाए

वीरेंद्र कपूर का दी संडे गार्जियन अखबार में एक आर्टिकल छपा है. इसमें उस राज का खुलासा किया गया है जिसके कारण सोनिया के दामाद वाड्रा अखबारों के फ्रंट पेज से और चैनलो के प्राइम टाइम से गायब हो गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि केंद्रीय सरकार के मंत्रियों ने मीडिया हाउसों के मालिकों को समझा दिया कि अगर वाड्रा पर ड्रामा करेंगे तो बॉस को बुरा लगेगा. और, उन्हें यह समझाया गया कि गडकरी पर तूल दीजिए ताकि मुद्दा भी आप लोगों के पास बना रहे और वाड्रा भी बच जाएं…. इस उलटबांसी को समझने के लिए वीरेंद्र कपूर के लिखे को पढ़िए, जिसे नीचे दिया जा रहा है….

Hammer Gadkari to save Vadra and other scamsters

Ministers have reached media houses, suggesting that further interest in Vadra’s business activities would be unwelcome :

-VIRENDRA KAPOOR-

You can be forgiven if you believe that Nitin Gadkari's is the only scam in town. Saturation coverage by television channels in the past couple of days should have ordinarily left no one in doubt that he is at the centre of the biggest scam of our times. Even newspapers which have virtually become an extension of the ruling establishment seemed to have suddenly discovered merit in Gadkari's financial shenanigans, splashing as front-page lead the alleged wrongdoing by his companies while being completely oblivious to the humongous misdeeds of the leading lights of UPA.

Admittedly, it is hard to take on the incumbent powers. Editors simultaneously charged with the responsibility of keeping a close watch on the bottom-line, theirs and the paper's, have to necessarily suck up to the corporate and political bosses — never mind the pretence in social and professional gatherings. But what of the cash-rich media houses straddling huge print and television empires?

Apparently, a strong word was conveyed that they should leave Sonia Gandhi's son-in-law well alone. Ministers, including I&B boss Ambika Soni, are said to have reached out to the media houses, gently suggesting that further interest in the doings of Robert Vadra and his multifarious business activities would be most unwelcome.

Now, when you treat journalism at par with selling soap cakes it is not hard to fall in line with the political establishment, is it? So, the switch, instead, to Nitin Gadkari's private companies. These were, notably, established in his private capacity and not when he was a minister in the Mahrashtra government. Nor can it be anyone's case that he did something that was out of the ordinary in managing those companies. Yes, he conducted his business affairs like a typical businessman, creating a web of subsidiaries and front companies in order to get round various provisions of the company law.

Of course, when you combine in your person the twin roles of a ranking political leader and a prosperous businessman, there is bound to be a clash of mutually incompatible cultures. Being a businessman in this country means at the very least cutting moral and legal corners. However, as a senior politician heading a major national party you are expected to be above-board both in your private and public dealings. Gadkari would have merrily continued to run his Purti group of companies very much as he pleased had he not come to head the principal Opposition party.

After all, almost anyone with a little toehold in Maharashtra politics has his own cooperative empire of sugar mills, educational trusts, power plants, et al. And that would include the family of the recently-retired President Pratibha Patil whose (mis)use of money and muscle power in Jalgaon is the stuff of many a lurid and violent tale.

Lest it be assumed that Gadkari donning a businessman's hat did what was kosher under the law, we have our reservations. We are persuaded that he too like a majority of businessmen of his ilk tried to get round the legal provisions by resorting to usual subterfuges and plain fudges. Pry open the vast network of such cooperatives in Maharashtra and elsewhere and you will discover that the laudable objective of widely- spread collective ownership of businesses and industries has in effect come to be abused to further the interests of a select few who play a lead role in establishing them. Small wonder the cooperative movement, and/or even Mahatma Gandhi's idea of trusteeship of the means of production, has not aroused much interest in the country. We tend to turn everything into a tool for individual greed, don't we?

However, while Gadkari the business tycoon can look after himself, it is Gadkari the politician that is of great public interest. And it is here that we believe that he is set to become history. After the inspired spotlight on his business affairs, Gadkari the politician will have to bow out of the limelight. His continuance as the head of the BJP has become untenable. The longer he continues as the president of the principal Opposition party, the more harm he would inflict on its public image. He can forget a second three-year term at the helm of the BJP.

Indeed, it would be in the fitness of things if he disarmed his critics, and wiped off the smirk on the faces of the Congress megaphones on the nightly television, by voluntarily bowing out a couple of weeks ahead of the end of his current term due later this year. As a self-avowed swayamsevak, the onus to do the entire Sangh Parivar a good turn is on Gadkari. He should end the daily misery of the BJP by unilaterally announcing that he is not seeking a second term and that he is determined to clear his name through a fair and independent probe into his business affairs.

Should he take that honourable course, the demand that Robert Vadra's mother-in-law too should follow suit and face an independent probe into the rise and rise of the small-time brassware dealer from Moradabad would gain traction. There cannot be different standards to suit the convenience of Sonia Gandhi, even if her loyal sycophants believe that she and her family are pure as driven snow.

Having said that, it is left to the BJP to bolster its claim of being "a party with a difference" by adhering to minimum standards of political morality. Given the long series of multi-billion-rupee scams of the UPA, the principal Opposition party would undermine its anti-corruption campaign by persisting with Gadkari as its president. Like Caesar's wife, the challenger to the corrupt Congress ought to be seen to be untainted. Gadkari, whether he likes it or not, is now tainted with the financial skullduggery of his Purti empire.

But, regardless of the fortunes of the BJP, there is a far more important reason why the party should clean up its act. Disgusted with the all-pervasive corruption, misgovernance and consumer price-inflation, ordinary people are desperately looking for an alternative. If the principal Opposition party too comes to be bracketed with the ruling party, the ubiquitous aam aadmi would lose faith in the democratic system; he would feel helpless in a system which had been corrupted to its core by its practitioners. Such hopelessness will only generate cynicism and cause an alienation which our much-abused democracy can ill-afford. People need to repose their faith in a viable alternative to the ruling coalition. Therefore, for God's sake, Gadkari must quit. Here and now. And go back to managing the Purti group of businesses, leaving the stewardship of the BJP, hopefully, in clean and competent hands.

Meanwhile, we find it rather curious that L.K. Advani should seek to make light of the accusations against Gadkari since he himself had lost no time in voluntarily opting out of electoral politics once his name had surfaced in the hawala diaries. Why should Advani believe that only he can set himself stringent standards of accountability while Gadkari is permitted the benefit of the doubt? This is unacceptable.

48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला (भाग तीन)

ये जानना दिलचस्प होगा कि कैसे इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया, फिर भी बरसों तक चुप्पी बनी रही. किसी को कोई खबर तक नहीं लगी. कहानी बड़ी है. थोडा पीछे चलते हैं. भारत में 1960 के दशक में जब थोरियम के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा तो देश के तटवर्ती भागों में पाए जाने वाली रेत जो न केवल थोरियम बल्कि कई और दुर्लभ मृदा तत्वों (rare earth metals) जैसे TITANIUM और SILLIMANITE जैसे अयस्कों से लैस थी, के पूरे प्रबंधन की जिम्मेवारी एक सरकारी उपक्रम IREL के हाथों में दे दी गयी ताकि निर्यात-प्रतिबन्ध प्रभावी तरीके से लागू रह सके और इन संवेदनशील तत्वों पर पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण रहे.

ये व्यवस्था पूरी मुस्तैदी के साथ करीबन 40 सालों तक बनी रही. IRELको इस बात के लिए विशेष रूप से अधिकृत किया गया कि थोरियम सम्बंधित समस्त प्रक्रियाएं सिर्फ और सिर्फ इसी के जरिये हो. 2005 तक ये व्यवस्था भी बड़ी मुस्तैदी के साथ चलती रही. इतने वर्षों तक भारत के पूरे तटवर्ती भाग में समस्त खनन क्रियाएं DAE (Department of Atomic Energy) की अनुमति और संज्ञान में इसी IREL के द्वारा ही हुई.

IRELअपना व्यवसाय रेत में उपलब्ध दूसरे दुर्लभ मृदा तत्वों एवं अयस्को (rare earth metals and ores) जैसे LEUCOXENE, GARNET, RUTILE इत्यादि को निर्यात कर चलाता था जबकि इस प्रक्रिया में निकले थोरियम को DAE (Department of Atomic Energy) या उससे जुडी एजेंसियों को बेच देता था जो कुछ समय तक तो भविष्य के लिए संरक्षित की जाती रही, फिर देश में थोरियम रिएक्टर बनने के बाद उसमे आपूर्ति कि जाने लगी.ये व्यवस्था सालों तक कायम रही.

सन 2005 तक परिस्थितियाँ बदलने लगीं. सबसे पहले भारत सरकार ने एक अधिसूचना (SO 61-E dated 20 Jan,  2005) जारी कर थ्रोरियम-बहुल मृदा को परमाणु उर्जा अधिनियम 1962 के उस "Prescribed Elements" की सूची से बाहर कर दिया जिसमें रखकर थोरियम के निर्यात को बंद करना सुनिश्चित किया जा सका था.

अधिसूचना के लिए यहां क्लिक करें…

http://www.ipindia.nic.in/ipr/patent/manual/HTML%20AND%20PDF/Manual%20of%20Patent%20Office%20Practice%20and%20Procedure%20-%20html/Other%20Statutes/S%20O%2061(E)%20under%20Atomic%20Energy%20Act,%201963.htm

फिर तुरंत परमाणु आणविक उर्जा विभाग ने भी अपनी निर्यात-नीति (http://www.dae.nic.in/?q=node/147) में उस नवीन सूची के अनुसार ऐसी तब्दीली कर दी जिससे IREL के वो सारे एकाधिकार एक प्रकार से ध्वस्त हो गए. नई निर्यात-नीति के प्रावधानों के अनुसार अब तटवर्त रेत के दोहन में IREL के अलावा अन्य व्यावसायिक उपक्रम भी आ सकते हैं और उन्हें निर्यात भी कर सकते हैं.

लगभग उसी समय भारतीय खनन ब्यूरो ने उन तटवर्ती क्षेत्रों में पाए जाने वाले rare earth metals के दोहन के लिए लाइसेंस देना शुरू किया जो परमाणु आणविक उर्जा विभाग के नए निर्यात-नीति के अनुसार अब संभव था. बड़े आश्चर्यजनक रूप से तक़रीबन सारे मेटल्स के सारे लाइसेंस एक ही कंपनी (वीवी मिनरल्स लिमिटेड) को दे दिए गए. ये कंपनी अपनी वेबसाइट (http://www.vvmineral.com/about.htm) पर इस बात की बड़े गर्व से घोषणा भी करती है कि ये भारत की पहली और एकमात्र कंपनी है जिसे ऐसे लाइसेंस मिले हैं. खनन ब्यूरो ने ऐसा क्यूँ किया, ये एक अलग गाथा है. अब इस कंपनी द्वारा बाकी पदार्थों के दोहन की प्रक्रिया में जो थोरियम निकलेगा उसका क्या होगा, इस बारे में लाइसेंस के प्रावधानों में चुप्पी साध ली गयी.

अब आते हैं इस कंपनी पर. वीवी मिनरल्स लिमिटेड. इस कंपनी का व्यावहारिक मुख्यालय है तिरूनेवेली में. २००६ में पहली बार इसे रेत-दोहन के लाईसेंस मिले. इस आलोक में ये तथ्य बड़ा रोचक है कि उसी वर्ष इस कंपनी ने अपने भारी भरकम और वर्षों से इस व्यवसाय में लगे प्रतिद्वंदी IREL को पीछे छोड़ते हुए बेस्ट एक्सपोर्टर अवार्ड हासिल कर लिया जबकि सालों से ये अवार्ड इससे पहले IREL (http://www.irel.gov.in/scripts/awards.asp)को मिलता रहा था.

ये बड़ा अजीब है कि किसी व्यवसाय में सालों से लगे, सरकारी विश्वसनीयता और एकाधिकार प्राप्त, बरसों के ग्राहक-सम्बन्ध, व्यावसायिक पहचान वाले उपक्रम को एक ऐसा प्रतिद्वंदी महज़ 6 महीनों में पछाड़ दे जो व्यवसाय में बिलकुल अभी आया है और इस कारण अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार पर अभी ग्राहक ढूंढने हो और अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार की बेहद उच्च दर्जे की प्रतिद्वंदिता के बीच अपनी विश्वसनीयता भी कायम करनी हो!!!

ऐसा कैसे संभव है कि कोई कंपनी इतने कम समय में अंतर-राष्ट्रीय बाज़ार में तुरंत अपने ग्राहक खोज ले. साल भर के भीतर इतनी विशाल मात्र में रेत को निर्यात कर दे. ऐसा लगता है कि वीवी मिनरल्स के अंतर-राष्ट्रीय ग्राहक पहले से इनसे रेत खरीदने को तैयार बैठे हों और लाईसेंस मिलने का बस रस्म-अदायगी के तौर पर इंतज़ार कर रहे हों. साथ ही कि इनके रेत में ऐसा क्या था कि अमेरिका, सउदी और यूरोप के लोग इनसे रेत लेने को इतने उतावले हो गए और इतनी बड़ी मात्रा में रेत का ऑर्डर दे डाला.

आरोप ये भी है कि इस कंपनी ने न केवल वहाँ थोरियम को चोरी-छिपे निकाल के बेचा जहाँ इन्हें लाईसेंस मिला है बल्कि वहाँ भी इन्होंने थोरियम के लिए रेत का अवैध खनन किया जो इनके लाईसेंस क्षेत्र के बाहर था. बल्कि इस तरह के अवैध-उत्खनन का क्षेत्र इनके लाईसेंसी क्षेत्र से ज्यादा बड़े हैं. हद तो तब हुई जब ये अपने हनक में चर्चित कदोकदन परमाणु प्लांट के नजदीक में ही इस तरह का अवैध-खनन करने लगे जो न केवल इनके लाईसेंस क्षेत्र से बाहर है बल्कि भारत सरकार द्वारा "प्रतिबंधित-खनन क्षेत्र- No Mines Land" घोषित है. चूंकी मामला परमाणु प्लांट से जुड़ा था और वहाँ उस न्यूक्लेयर प्लांट के प्रचंड विरोध के कारण पूरे देश की मीडिया और एन.जी.ओ. इकट्ठा थे तो ये मामला प्रकाश में आ गया. और अभी दो सप्ताह पहले ही मद्रास हाई कोर्ट के मदुरै बेंच ने इस कंपनी को कड़ी फटकार लगाते हुए वहाँ इनके द्वारा की जा रही माईनिंग का काम रोक दिया है. देखें लिंक…

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-09-28/madurai/34147262_1_kudankulam-nuclear-plant-quarries-idinthakarai

लेकिन अभी भी इनका ऐसा खेल कई सुदूर तट-भागों जैसे तिसैन्यविलाई, नवलादी, कोलाचेल जैसे कई भागों में बेरोक-टोक जारी है. यहाँ से न निकाले गए रेत का, न थोरियम का कोई रिकॉर्ड है.  अब जानते है इस कंपनी के मालिक के बारे में. एस. वैकुण्डराज्नम जयललिता के करीबी माने जाते हैं. जया टीवी में उनकी अच्छी खासी हिस्सेदारी है. करूणानिधि से इनके सम्बन्ध बनते-बिगड़ते रहे हैं. संबंधों के खराब रहने के ऐसे ही एक दौर में तमिलनाडु में करूणानिधि सरकार के समय तमिलनाडु पुलिस ने इसी अवैध-थोरियम-निर्यात मामले में छापेमारी भी की थी. 19 अगस्त, 2007 को ये छापे मारे गए. संबंधित खबर पढ़ें…

http://hindu.com/2007/08/20/stories/2007082057461000.htm

23 अगस्त, 2007 को इन्होने करूणानिधि की तरफ सार्वजनिक रूप से दोस्ती का हाथ बढ़ाया. संबंधित खबर पढ़ें…

http://www.hindu.com/2007/08/23/stories/2007082353620400.htm

उसके बाद तमिलनाडु पुलिस को न उन छापों की याद रही, न उस केस की. तो ये है एस वैकुण्डराज्नम का तमिलनाडु के स्थानीय राजनीति (और शायद देश के केंद्रीय राजनीति में भी) में प्रभाव.

….जारी….


अभिनव शंकर
अभिनव शंकर
इसके पहले के दो पार्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें–

48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला पार्ट दो (11 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित)

48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला पार्ट एक (05 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित)


लेखक अभिनव शंकर प्रोद्योगिकी में स्नातक हैं और फिलहाल एक स्विस बहु-राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं.

साई प्रकाश का सरवर डाउन… खबर भारती चैनल के बंदों की काली होती दीवाली

देश भर में इस समय दशहरे, ईद और दीवाली का मौसम नहीं बल्कि  घपलों और घोटालों का मौसम है। और इसी क्रम में एक और चिट फंड कंपनी के सरवर डाउन होने की घटना की पुष्टि हुई है… खबर के अनुसार एक चिट फंड कंपनी का सरवर 300 लोगों के भविष्य को डुबोने की कगार पर है। कई दिनों से मीडिया में आ रहे समाचारों के अनुसार साईं प्रकाश नामक एक चिट फंड कंपनी ने अपनी साख को बचाने के लिए, दूसरी कंपनियों की देखा-देखी स्वय भी एक मीडिया हाउस खोलने का निर्णय लिया। समूह के अंत्रगत एक चैनल की आधारशिला रखी गई। नाम है खबर भारती। आज इस चैनल का हाल ये है कि खबर लिखने तक अर्थात पूरा महीना खतम होने के बाद भी एक चपरासी तक को वेतन नहीं मिला है।

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार कंपनी डूबने की कगार पर है और इसके पास अपने कर्मचारियों को देने के लिए पैसे भी नहीं हैं। अभी तक चैनल के पदाधिकारियों ने चैनल को जीवित रखने के लिए चंदा जमा करके उन लोगों को बचाने की कोशिश की है जो पगार मिले बगैर इस मंहगे शहर में एक दिन नहीं गुजार सकते। चैनल का एक प्रोड्यूसर पिछले  कई दिनों से डेंगू जैसी घातक बीमारी से जूझ रहा  है। वे कैलाश अस्पताल  में हैं और समाचार लिखने  तक उसके रक्त के लाल अणु 25 हजार के पास अर्थात खतरे के निशान के पास आ गये हैं। कर्मचारी चंदा करके उसके इलाज का प्रबंध कर रहे हैं।

इस समय ऐसे कई किस्से हैं जो खबर भारती में विचरण कर रहे हैं। खबर भारती के कर्मचारियों को लगता है कि आज उनकी हालत उनके ही द्वारा बनाये गये एक कार्यक्रम जैसी है कि “कहां जाएं हम”। सूत्रों के अनुसार साईं प्रकाश चिट फंड कंपनी के कर्ता-धर्ता रीवा निवासी पुष्पेंद्र सिंह बघेल ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के साथ दिल्ली के अनुभवी व पेशेवर पत्रकारों को सच्ची पत्रकारिता का छलावा देकर खबर भारती को 17 नवंबर 2011 को लांच किया था। लेकिन मात्र 11 महीनों में ही हकीकत का पर्दाफाश हो गया।

चैनल से जुड़े एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मुंबई में गोपाल शर्मा और रांची में अनुज सिन्हा की किताब लोकार्पित, देखें तस्वीर

मुंबई के जाने माने फक्कड़ और अक्खड़ पत्रकार गोपाल शर्मा के साठवें जन्म दिवस पर आयोजित एक समारोह में उनकी पुस्तक 'बंबई दर बंबई' का विमोचन किया गया। विमोचन अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी, वागीश सारस्वत, नंद किशोर नौटियाल, जगदंबा प्रसाद दीक्षित, आलोक भट्टाचार्य और प्रेम शुक्ल उपस्थित रहे। नीचे विमोचन समारोह की तस्वीर है जिसमें बीच में श्रीमती प्रेमा शर्मा और गोपाल शर्मा दिखाई दे रहे हैं।


रांची में रविवार को मोरहाबादी स्थित आर्यभट्ट सभागार में वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा लिखित एवं प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'शोषण, संघर्ष और शहादत' का विमोचन किया गया। इस मौके पर मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश समेत कई जाने माने लोग उपस्थित रहे।  मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि राज्य के आंदोलकारियों की जीवनी पाठ्य पुस्तकों में शामिल की जाएगी। राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने कहा, आज का दिन संकल्प लेने का दिन है। हमें सोचना चाहिए कि झारखंड हमारे लिए नहीं, हम झारखंड के लिए बने हैं। उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो ने कहा कि हमें संवेदना के साथ देखना होगा। राज्य निर्माण के लिए संयुक्त प्रयास होना चाहिए। उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आने वाली पीढ़ी के लिए यह पुस्तक एक दस्तावेज है। वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने भी अपने विचार व्यक्त किए। लेखक अनुज कुमार सिन्हा ने पुस्तक के बारे में अपने अनुभव को साझा किया। स्वागत एवं धन्यवाद प्रभात प्रकाशन के पीयूष कुमार ने दिया। राजेश शर्मा ने पुष्प गुच्छ देकर अतिथियों को सम्मानित किया। मौके पर शहीदों के परिजनों एवं आंदोलनकारियों को शॉल देकर सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम से संबंधित तस्वीर नीचे है…

ऐसे में मीडिया क्या करे, क्या तथ्यों को देना बंद कर दे? : एनके सिंह

: “मीडिया ट्रायल” कितना सही, कितना गलत : ट्रायल मुकदमे का होता है, आरोपी का होता है, वह भी जाँच के बाद. ट्रायल अदालत में होता है, वह भी तब जब कि पुलिस या ऐसी कोई अन्य राज्य शक्तियों से निष्ठ संस्था मामला वहां ले जाए या अदालत स्वयं संज्ञान ले जांच कराये. ट्रायल के बाद किसी को सजा मिलती है तो कोई छूट जाता है. बहु-स्तरीय न्याय व्यवस्था होने के कारण कई बार नीचे की अदालतों का फैसला ऊपर की अदालतें ख़ारिज ही नहीं करतीं बल्कि यह कह कर कि निचली अदालत ने कानून की व्याख्या करने में भूल की, उलट भी देती हैं. ऐसा भी होता है कि कई बार सर्वोच्च न्यायलय उच्च न्यायलय के फैसले को ना केवल उलट देता है बल्कि निचली अदालत की समझ की तारीफ भी करता है. तात्पर्य यह कि जहाँ सत्य जानने और जानने के बाद अपराधी को सज़ा दिलाने की इतनी जबरदस्त प्रक्रिया हो वहां क्या मीडिया ट्रायल हो सकता है.

ट्रायल अखबारों या टीवी चैनलों के स्टूडियोज में नहीं होना चाहिए. क्या भारतीय मीडिया अदालतों की इस मूल भूमिका को हड़प रही है? एक उदहारण लें. चुनाव के महज कुछ वक्त पहले सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील एक जिले के मुख्य चौराहे एक बम विस्फोट होता है. एक चैनल के कैमरे में एक दृश्य क़ैद होता है जिसमें दिखाई देता है कि दो लोग एक कार में भाग रहे हैं. मीडिया के रिपोर्टर द्वारा यह भी पता लगाया जाता है कि इस कार का नंबर जिस व्यक्ति का है वह राज्य के प्रभावशाली गृह मंत्री के भतीजे का है. वह मंत्री उस क्षेत्र से चुनाव लड़ रहा है.

क्या सीआरपीसी की धारा ३९ का अनुपालन करते हुए चुप-चाप यह टेप क्षेत्र के पुलिस अधिकारी को देने के बाद मीडिया के दायित्य की इति-श्री हो जाती है? क्या यह खतरा नहीं है कि पूरे मामले को मंत्री महोदय दबा दें? यह संभव है कि जो लोग भाग रहे हों वह निर्दोष दुकानदार हों या फिर अपराधियों ने ही उस कार को हाइजैक कर लिया हो जो बाद की तफ्तीश से पता चले. लेकिन क्या यह उचित नहीं होगा के सारे तथ्य जन संज्ञान में इसलिए लाये जाएँ ताकि कोई सत्ताधारी प्रभाव का इस्तेमाल कर बच ना सके? दोनों खतरों को तौलना होगा. एक तरफ व्यक्ति गरिमा का सवाल है और दूसरी तरफ पूरी कानून-व्यवस्था के रखवाले पर किये जाने वाले जनता के विश्वास पर या यूँ कहें कि संवैधानिक व्यवस्था पर और प्रजातंत्र पर जनता की आस्था पर.

फिर अगर मीडिया की गलत रिपोर्टिंग से किसी का सम्मान आहात हुआ है तो उसके लिए मानहानि का कानून है लेकिन अगर कोई सत्ता में बैठा मंत्री आपराधिक कृत्य के ज़रिये सांप्रदायिक भावना भड़का कर फिर जीत जाता है और फिर मंत्री बनता है उसके लिए बाद में कोई इलाज नहीं है. ऐसे में क्या यह मीडिया का दायित्व नहीं बनता कि तथ्यों को लेकर जनता में जाए और जनमत के दबाव का इस्तेमाल राजनीति में  शुचिता के लिए करे? क्या मीडिया मानहानि के कानून से ऊपर  है.

जब संस्थाओं पर अविश्वास का आलम यह हो कि मंत्री से लेकर संतरी तक हम्माम में नंगे दिखाई दें तो क्या मीडिया महज तथ्यों को भी ना दिखाए? आज हर राजनेता जो भ्रष्टाचार का आरोपी है, एक ही बात कह रहा है – “जाँच करवा लो, मीडिया ट्रायल हो रहा है”. मूल आरोप का जवाब नहीं दिया जा रहा है कि संपत्ति तीन साल में ६०० गुना कैसे हो जाती है या एक ड्राईवर कैसे एक कंपनी का डाईरेक्टर बन जाता है और कैसे वह कंपनी झोपड़पट्टी में ऑफिस का पता दे कर करोड़ का खेल करती है. जाँच करवाने की वकालत करने वाले यह जानते है कि जाँच के मायने अगले कई वर्षों तक के लिए मामले को खटाई में डालना है. अगर आरोपपत्र दाखिल भी हो जाए तो तीन स्तर वाली भारतीय अदालतों में वह कई दशकों तक मामले को घुमाते रह सकता है और कहीं इस बीच उसकी सरकार आ गयी तो सब कुछ बदला जा सकता है.

दरअसल यह सब देखना कि कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं हो रही है, वित्तीय व कानून की संस्थाओं का काम था. जब उन्होंने नहीं किया तब मीडिया को इसे जनता के बीच लाना पड़ा. अगर ये संस्थाएं अपना काम करती तो ना तो किसी की संपत्ति तीन साल में ६०० गुना बढ़ती ना हीं ड्राईवर डायरेक्टर बनता और ना हीं फर्जी कंपनियां किसी नेता की कंपनी में पैसा लगाती.

यहाँ एक बात मीडिया के खिलाफ कहना ज़रूरी है. मीडिया को केवल तथ्यों को या स्थितियों को जनता के समक्ष  लाने की भूमिका में रहना चाहिए. जब स्टूडियो में चर्चा करा कर एंकर खुद ही आरोपी से इस्तीफे की बात करता है तो वह अपनी भूमिका को लांघता है. मीडिया की भूमिका जन-क्षेत्र  में तथ्यों को रखने के साथ  हीं ख़त्म हो जाती है बाकि काम जनता और उसकी समझ का होता है. अगर इसे मीडिया ट्रायल की संज्ञा दी जाती है तो वह सही है. एक अन्य प्रश्न भी है. क्या वजह है कि भ्रष्टाचार के मामलों में सजा की दर आज भी बेहद कम है? और जिन पर आरोप सालों से रहा है वो या तो सरकार में है या सरकार बना-बिगाड़ रहें हैं.

यह सही है कि मीडिया का किसी के मान-सम्मान को ठेस पहुँचना बेहद गलत है. यह भी उतना ही सही है कि अगर किसी पर मीडिया ने ऐसे आरोप लगाये जो बाद में अदालत से निर्दोष साबित हो तो मीडिया कटघरे में होनी चाहिये क्योंकि वह गलत सिद्ध हुई पर अगर यही आरोप ऊपर की अदालत से फिर सही सिद्ध हो जाये तब क्या कहा जाएगा? क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि मीडिया सही साबित हुई? एक और स्थिति लें. अगर इसी मामले में सर्वोच्च न्यायलय फिर से हाई कोर्ट के फैसले को उलट दे तो मीडिया एक बार फिर गलत साबित होगी.

कहने का मतलब यह कि मीडिया सही थी या गलत यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आरोपी का सीढ़ी दर सीढ़ी लड़ने का माद्दा कितना है. याने सत्य उसके सामर्थ्य पर निर्भर करेगा. यही कारण है आज देश में जहाँ तीन अपराध के मामले हैं वही केवल एक सिविल मामला. ठीक इसके उलट उपरी अदालतों में याने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अगर तीन मामले सिविल के होते हैं तो केवल एक अपराध का. कारण साफ़ है, जो समर्थवान है वह किसी स्तर तक अदालतों के दरवाजे खटखटा सकता है, अपराध में सजा पाने वाला अपनी मजबूरी के कारण निचली अद्लातों से सजा पाने के बाद जेल की सलाखों को ही अपनी नियति मान लेता है. उसके लिए सत्य की खोज की सीमा है. ऐसे में मीडिया क्या करे? क्या  तथ्यों को देना बंद कर दे?

लेखक एनके सिंह जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हैं. साधना, ईटीवी समेत कई चैनलों के संपादक रह चुके हैं. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लिखा दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है.  एनके से संपर्क singh.nk1994@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.
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राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के चुनाव में डॉ. हेतु भारद्वाज अध्यक्ष और ओमेन्द्र महासचिव बने

जयपुर। राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के रविवार को हुए प्रान्तीय अधिवेशन में नई कार्यकारिणी के चुनाव कराए गए। इनमें डॉ. हेतु भारद्वाज अध्यक्ष और ओमेन्द्र महासचिव चुने गए। इसके अलावा अध्यक्ष मंडल में ऋतुराज, गोविन्द माथुर, चन्द्र प्रकाश देवल, यशवन्त व्यास, मोहन श्राोत्रिय, हरीराम मीणा, ईशमधु तलवार, डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल और डॉ. बीना शर्मा शामिल किए गए।

इस अवसर पर उपाध्यक्ष पद पर दस लोग चुने गए जिनमें फारूक आफरीदी, मीठेश निर्मोही, प्रेमचन्द गांधी, हरीश करमचंदाणी, सवाई सिंह शेखावत, डॉ. सत्यनारायण, श्रीमती अजंता देव, डा अनन्त भटनागर, डॉ. माधव हाड़ा और राजा राम भादू शामिल है। कोषाध्यक्ष पद पर कैलाश मनहर चुने गए जबकि सचिव मण्डल में रत्न कुमार सामरिया, भरत ओला, शैलेन्द्र चौहान, सुश्री सुनीता चतुर्वेदी, सुश्री मंजु शर्मा, अम्बिका दत्त, विनोद पदरज, डॉ. मनु शर्मा, चरण सिंह पथिक और राजेश चौधरी चुने गए। इनके अलावा राज्य परिषद में 36 साहित्यकार चुने गए। इस अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव अली जावेद भी मौजूद थे, जिन्होंने निर्वाचित कार्यकारिणी का अनुमोदन किया।

 

”पत्रकारिता करो तो अरनव जैसी, वरना न करो…”

Nadim S. Akhter : आज फिर टाइम्स नाऊ पर अरनव गोस्वामी को देखकर ये कहने को मन करता है कि पत्रकारिता करो तो अरनव जैसी, वरना न करो…आज के न्यूज आवर डिबेट में अरनव ने क्या कमाल किया है…वाह…कलेजा चाहिए इतना सब करने के लिए…सोनिया के दामाद राबर्ट वाड्रा को हरियाणा सरकार के तीन-तीन डीसी ने जमीन घपले में जो क्लीन चिट दी थी, उसे टाइम्स नाऊ के स्पेशल इन्वेस्टीगेशन ने बेनकाब कर दिया है…अरनव ने अशोक खेमका को भी डिबेट में शामिल किया…सबकी धज्जियां उड़ा दी और देश के सामने ये सवाल बहुत convincing तरीके से रखा कि आप क्या समझते हैं, हिंदी में एक पेपर जारी करके आप देश को ये बता देंगे कि राबर्ट वड्रा पाक-साफ हैं…??? क्या देश के बाकी लोग अनपढ़ हैं….मान गए अरनव भाई…कमाल है…

अब दूसरा खुलासा देखिए…अरनव ने एक ही शो में कांग्रेस और बीजेपी हाईकमान को एक साथ धो दिया…पर्दाफाश कर दिया….जनता को बता दिया कि सब एक ही हमाम में नहा रहे हैं…सो नंगे हैं… दूसरा खुलासा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर है…टाइम्स नाऊ की स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम ने पता लगाया है कि गडकरी की पहली ही नहीं, एक और कंपनी के पते-डायरेक्टर फर्जी हैं…पहला झटका ही गडकरी नहीं झेल पा रहे थे…अब टाइम्स नाऊ ने उनके ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है…आज ही बीजेपी गडकरी के बचाव में दुबारा खुलकर आ गई थी और गडकरी ने बहुत बेशर्मी से चुनाव प्रचार भी किया…लेकिन टाइम्स नाऊ ने अब दुबारा गडकरी की पोल खोलकर उसे पानी-पानी कर दिया है…बंगारु लक्ष्मण. फिर गडकरी…आखिर अलग चाल-चरित्र-चेहरे के दावा करने वाली पार्टी के लिए इससे बुरे दिन और क्या हो सकते हैं कि उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष पैसों के खेल में रंगे हाथ पकड़े जाते हैं….चुल्लू भर पानी ज्यादा है डूबकर मरने के लिए…

खैर बात अरनव की हो रही थी…तो अगर आप अभी टीवी देख रहे हैं तो TIMES NOW पर न्यूज आवर डिबेट देखिए…..अभिनेता से नेता बनीं स्मृति ईरानी कितनी बेशर्मी से अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के दाग छुपाने में लगी हैं…बीजेपी के बड़े-बड़े वकील टाइप नेता टीवी पर आने से रिफ्यूज कर रहे हैं…सो स्मृति को आगे कर दिया है…POOR GIRL… अरनव की जय!!!! जयकार…दिल से…हिम्मत है अरनव को चैलेंज कर के दिखाओ….

    Padampati Sharma Is shakhs ki IMANDARI ham jaison Ka Seena Chauda karti hai Nadim Bhai… Lekin shareer iski kitani bhari keemat chukka raha hai Arnava Ka ….!!!!
 
    Nadim S. Akhter Thax Ramesh Kumar ji, and Pawan K Shrivastava ji!!!
 
    Pathak Sanjay kash ke aise patrakar aur bhi hote…
   
    Nadim S. Akhter Padampati Sharma bhai….aap sahi baat kar rahe hain bhai jaan….aap news hour debate jaroor dekhiyega ye wala…shayad youtube pe mil jayega…ya timesnow ki website pe…
    aur ye aaj pahla maamla nai hai…Arnav ne ek dafa on air kingfisher ke maalik vijay mallya ko challege kiya tha ki agar aap ye show abi live dekh rahe hain..to aa jaaiye abi …live aur mere sawalon ka jawaab dijiye….Arnav ye puch rahe the ki hum aur aap jab 1 lakh ka v loan lete hain to banks aap ke peeche pad jaate hain paisa chukane ke liye
    lekin Mallya ke liye public sector bank itne meharbaa kyon hain…sarre bank ke chairman vijay mallya ko crores ka loan kyon dena chhahte hain kingfisher airlines ko bachane ke naam par…aur bahut sare sawal…us din ka newshour v dekhne layak tha….
    mai to yehi samaj nai pata hoon ki SAMPAADAK KO GAIR JAROORI kahne wala Times Group Arnav ko itni AZAADI KYON AUR KAISE DE DETA HAI???!!!!
    
    Archana Lizu Liza iska clipping milega kya on youtube?
     
    Nadim S. Akhter @ Archana …gadkari ke new expose wali khabar ka link ye hai
    http://www.istream.com/news/watch/204345/More-dubious-addresses-emerge-from-Gadkaris-web
    newhour debate ka link apko times now ki website se mil jaaye shayad..
    More dubious addresses emerge from Gadkari's web
    www.istream.com
    With revelations tumbling out every day, the troubles are only increasing for BJ…See more
 

    Dharmendra Kumar नदीम भाई… क्या बात है… कल को कहीं अरनव गोस्वामी का स्टिंग आ गया तो… सब नंगे हैं भाई… क्यों फालतू में किसी को चढ़ा रहे हो… 🙂
 
    Dharmendra Kumar टाइम्स नाउ पर ही नवीन जिंदल वाला शो भी देख लेना… ध्यान रहे ईटी नाउ पर जिंदल स्टील के जमके एड आते हैं।
 
    Dharmendra Kumar नवीन जिंदल के उसी स्टिंग में इकॉनॉमिक टाइम्स के बारे में क्या टिप्पणी की गई है… कृपया उसपर भी ध्यान दें…. खासकर तब जब आप स्वयं उस संस्थान का महत्वपूर्ण हिस्सा रह चुके हैं।
   
    Dharmendra Kumar जहां तक मेरा अल्प ज्ञान है तो टाइम्स ग्रुप में संपादक या संपादकीय की कोई हैसियत नहीं है। सबकुछ 'स्ट्रैटजिक' ही होता है।
    
    Padampati Sharma Isliye Nadim ki Arnav Ke bal par hi Times now chal raha hai. Vishwas karo ki kabhi Ilustred Weekly Khushwant aur Dharmyug Dharmveer Bharti Ke naam par bikate the,,, tab Ashok Sameer ne Jo Blunder kiya tha Arnav shayad usi Ka Prayaschit hai.
     
    Nadim S. Akhter धर्मेन्द्र भाई, टाइम्स नाऊ और ईटी नाऊ का एडिटोरियल और मैनेजमेंट बिलकुल अलग है…ईटी नाऊ के बारे में कुछ नहीं कहूंगा….लेकिन टाइम्स नाऊ देखकर, उसके तेवर देखकर और खबरों की धार देखकर कुछ भरोसा जगता है..वो भी ऐसे समय में, जब अधिकांश सत्ता के भय-लालच-माया-…See More
     
    Nadim S. Akhter Thanx Bipin Yadav, Zafar Irshad bhai and Chandrakant Pargir!!!
     
    Tithi Dani arnav or nadim ji dono ki patrakaarita kaabil e taarif… waah

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से साभार.

IIMC की हिंदी वेबसाइट का इतना बुरा हाल…

Nadim S. Akhter : क्या बुरी गत है…जो कम्यूनिकेशन यानि संवाद के धंधे में हैं…यानी इसे सीखने-सिखाने के पेशे में हैं. उनका ही संवाद बेतरतीब, अधकचरा, अधमरा, लचर, बिखरा हुआ, नाकाबिले बर्दाश्त, हास्यास्पद, शर्मनाक और चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक है…IIMC, जहां पत्रकारिता का पाठ पढ़ाया जाता है, कम्युनिकेशन स्किल सिखाई जाती है, इसके गुर बताए जाते हैं, उसी संस्थान की हिंदी वेबसाइट का क्या हाल है, ये आप इस रिपोर्ट में देख सकते हैं…

अब प्लीज, यहां सरकारी तंत्र का रोना मत रोइएगा…IITs & IIMs भी इसी तंत्र में तैरकर अपनी नैया पार लगा रहे हैं…खुद को जीवंत बनाया हुआ है…इनकी वेबसाइट्स निराश नहीं करतीं…लेकिन IIMC??? अफसोसनाक है कि सूचना तंत्र के सबसे सफल प्रयोग यानी इंटरनेट को ये संस्थान अभी तक आत्मसात नहीं कर पाया है…और उन हजारों-लाखों बच्चों को जानकारी देने से महरूम रखा है, जो इस संस्थान में दाखिला लेकर पत्रकारिता में कुछ करना चाहते हैं…बेहद अफसोसनाक…क्या कोई सुन रहा है…या अभी भी कान पर जूं नहीं रेंग रही…कान पर रूई डाले कब तक बैठे रहेंगे आप लोग???!!!!

Hemant Joshi कौन है इसका जिम्मेदार? पता लगाया जाना चाहिए।
 
Vivek Morya नदीम जी, एक मजेदार बात बताता हू आपको, भारत का एक प्रतिष्ठित परीक्षा है "CSIR-UGC NET-JRF, Exam Organized by" जिसमे परीक्षार्थी हिन्दी मे परीक्षा दे सकता है, लेकिन उसके पास एक भी किताब नही मिलेगा जो उसे हिन्दी या अनुवादित रूप मे मिलेगा, ये विडंबना ही है, मैने भी अपने "M.Sc. (Biotechnology)" और पहली बार मे ही 'NET With JRF Qualify' हो गया था, पर मैं सोचता हू ये कैसा मज़ाक है, मेरे समझ से परे है, एक भी किताब नही है मार्केट मे…. है ना मजेदार ….. मेरी व्यासायिक (Professional) भाषा इंग्लीश है, पर मैं अपनी अभिव्यक्ति मैं हिन्दी मे ही करता हू, कभी शर्म नही करता हू, इंग्लीश मे मैं ठीक ठीक लेख लिखता हू गूगले पे "V K Morya" सर्च कर के देखे, पर हिन्दी बोलने और लिखने पे मैने लोगो को ऐसे सर्माते देखा की मई बयान नही कर सकता हू, मजेदार बात है उन्हे भी इंग्लीश मे लेक्चर देते सुनता हू जिनकी इंग्लीश भी लंगड़ा के ही चलती है, मेरा मानना है भाषा कोई भी हो वो आपको समर्थ बनती है| पर ये कैसा ढोंग जो मातृ भाषा को हिन्दी पखवाड़ा मे याद करे पुर साल मज़ाक बनता है….. ये जिन ऑर्गनाइज़ेशन्स का नाम लिया है उनकी साइट के लिए एक बिभाग कम करता है, राजभाषा प्रकोष्ठ, उसमे किसी भी स्टूडेंट, टीचर, कर्मचारी किस सहभागिता नही के बारबड़ होती है| है ना मजेदार……..
 
Nadim S. Akhter Hemant Joshi ji….हां, जिम्मेदार कौन है, ये पता तो लगाया ही जाना चाहिए, आरटीआई भी डालनी चाहिए कि सरकार से फंड मिलने के बावजूद हिंदी की वेबसाइट का भाई लोगों ने बैंड क्यों बजाया हुआ है….
 
Nadim S. Akhter Vivek Morya ji…बहुत धन्यवाद आपके जवाब के लिए…जानकर वाकई हैरानी हुई आपकी बात…. हिंदी में किताब ही नहीं है इसके लिए…बेहद दुखद…अरे अंग्रेजी-हिंदी के झगड़े मे मैं नहीं पड़ता…सभी भाषाओं का सम्मान होना चाहिए…सभी संवाद का काम करती हैं..अलग-अलग मानव समुदायों के लिए….लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि हिंदी भाषी किसी दूसरी भाषा के लिए अपनी ही भाषा का अपमान करें???!!! कल ही डिजिटाइजेशन पर सूचना-प्रसारण मंत्रालय के सचिव की बाइट देख रहा था दूरदर्शन न्यूज पर…खबरें हिंदी में थी और सचिव साब अंग्रेजी में बाइट दिए जा रहे थे….डरपोक रिपोर्टर से ये भी नहीं हुआ कि उनसे हिंदी के लिए अलग से बाइट ले लें…तो जब सचिव ही अंग्रेजी को गाएंगे तब इस मंत्रालय के अधीन आने वाले आईआईएमसी की हिंदी वेबसाइट की क्या गत होगी???? वैसे मैं पूरी तरह SURE हूं कि सचिव साब भगवान से जब कुछ मांगते होंगे या किसी को कोई गाली देते होंगे, तब हिंदी में ही बोलते होंगे…लेकिन अंग्रेजी बोलकर ये सारे चिरकुट खुद को ज्यादा सभ्य और पढ़ा-लिखा साबित करने की कोशिश करते हैं…

फेसबुक पर भी कई मित्र हैं, जिन्होंने हिंदी का परित्याग कर अंग्रेजी अपना ली है…वैसे ये लोग खा हिंदी की ही रहे हैं…हिंदी पत्रिका के ही संपादक हैं…बॉलिवड भी बहुतु बेशर्म है…खाएंगे हिंदी की और गाएंगे अंग्रेजी की…किसी भी बॉलिवुड स्टार से बात कर लीजिए…वो अंग्रेजी में ही बोलेगा….क्या करें…गुलामी अभी गई नहीं है हमारी….मानसिक रूप से हम आज भी अंग्रेजियत के गुलाम हैं….

आप जैसे लोगों ने साबित किया है कि अंग्रेजी को संवाद का माध्यम बनाकर हम भारतीय हर जगह नाम कमा सकते हैं लेकिन हिंदी से हम प्यार करते रहेंगे…अपनी मां की तरह….मेरे एक रिश्तेदार हैं….पिछले 20 वर्षों से अमेरिका में हैं…वहां के नागरिक बन चुके हैं…लेकिन जब भी वे फोन करते हैं…हिंदी में ही बात करते हैं….इसे कहते हैं हक अदा करना…
 
 Muni Shankar jach swtantra agecy se krayi jani chahiye………
 
Vivek Morya Nadim S. Akhter ji…देखिए मैं सभी भाषा का आदर करता हू, लेकिन मेरा मानना है जितना समय हम इंग्लीश सीखने मे व्यर्थ करते है उतने मे विज्ञान कितना सीख सकते है, ये कितना हास्यपाद है की अब गणित भी सीखने के लिए इंग्लीश मे पढ़ना पड़ता है| भाषा सीखने से आप किसी भी समाज के और करीब आते है ये अच्छा भी है, लेकिन हममे से जो साइन्स के स्टूडेंट है कितने है जो भाषा का प्रयोग किसी और समाज को जानने और समझने मे करते है| इंग्लीश हमारी ज़रूरत से ज़्यादा मजबूरी बन गयी है, हम मजबूरी के कायल लोग इस बेड़ी मे बंधे रहने मे ही अपनी खुशी पाते है|
मैं हमेशा के यही सोचता हू काश मेरा हाथ हिन्दी मे तंग ना होता…..

मैं यहा अपनी एक पुरानी पोस्ट दोहराता हू, इससे खुदी समझ जाएँगे यह समस्या कितनी विकट है…..
"कल की एक समाचार मे एक महत्वपूर्ण बात पता चली की, मजबूरी मे वसूलो का कोई महत्व नही रहा जाता है| दुनिया भर मे मानवता का दंभ भरने वालो ने आर्थिक परिस्थितिओ के बाशिभूत श्री नरेंद्र मोदी के कद और महत्व को देखते हुए जो वक्तव गये है, उनसे दो सवाल उठा है| पहला क्या भारतीय न्याय व्यायस्ता पर इन पश्चिमी देशो को भरोसा नही है? जो ज़हर के घूट पीते हुए भी कसाब जैसो को भी पूरी तरह से निष्पक्ष मौका देती है| जिसने अभी श्री मोदी को दोषी नही करार दिया है, तो ये देश कैसे किसी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित बयान दे देते है|मैं मोदी जी का समर्थक नही हू क्योकि उनके बिचरो का मैं समर्थक हो ही नही सकता, परंतु क्या हमे अपने नागरिको के सम्मान के लिए खुल नही बोलना चाहिए| किसी भी देश को ये सोभा नही देता की वो किसी भी देश के नागरिको का सम्मान ना करे, जब तक की आरोप सिद्ध ना हुआ हो| मेरे मश्तिश्क मे जो दूसरा प्रसन ये उठता है कि, क्या श्री मोदी को ब्रिटिश सरकार की इस पहल को ठुकरा नही देना चाहिए? ये शायद कूटनीतिक रूप से बड़ा संदेश होता| आज शायद श्री मोदी ने एक बड़ा मौका गवाया है क| क्या उन देशो को संदेश नही दिया जाए, जिनकी नीतिया इस बात पे बदलती है की आर्थिक स्तिथि क्या कहती है| मैं श्री मोदी साथ देने की बात नही कह रहा हू पर क्या हमे नागरिक सम्मान पे खुल के बात नही करना चाहिए| दुर्भाग्य ये है की श्री मोदी जी एक वक्तव को अपने सम्मान से जोड़ कर देख रहे है, जब की इसका उन्हे विरोध करना चाहिए कि| वस्तुतः ये सब अपने ऩफा और नुकसान की बाते है| हम कुछ भी हो सकते है, पर भारतीय होने के नाते हम भी उतने ही सम्मानीय जितने किसी भी और मुल्क के नागरिक, जब तक की हमरी न्याय व्यस्था किसी को भी अपराधी घोषित नही कर देती है|"

अब बताइए जब हम हर तरीके से विदेशी प्रामाणिकता के प्रति आसक्ति रखते है तो कहा से मौलिकता से प्रेम करसकते है……
 
Nadim S. Akhter Vivek Morya ji…हिन्दी के प्रति आपकी भावनाओं से सहमत लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रति आपके विचार से असहमत….यह ठीक है कि आरोप सिद्ध होने तक आरोपी को पाक-साफ बने रहने का अधिकार है लेकिन दुनिया में कुछ चीजें perception यानी धारणा-अवधारणा पर भी चलती हैं, जो जायज है…नरेंद्र मोदी की गुजरात दंगों में जो भूमिका रही है, जिस तरह उन्होंने अपनी आंखों के सामने हजारों मासूमों को गाजर-मूली की तरह कटने के लिए छोड़ दिया…अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में राजधर्म का पालन नहीं किया…जो बातें-सचाइयां मीडिया में सामने आईं, उसके बाद मोदी को बेकसूर ठहराना न्यायोचित नहीं होगा…भारत में राजनीति-कोर्ट कितनी तीव्रता से और कैसे काम करते हैं, ये तो आप भी जानते होंगे.
जिस नैतिकता की बात आप कह रहे हैं, अगर मोदी में उसे बहुत कम नैतिकता भी होती तो इस कत्लोआम के बाद वो इस्तीफा दे देते…दुनिया अंधी नहीं है….सबको सब कुछ दिख रहा है कि कहां क्या हो रहा है….
 
Vivek Morya आप मे बात को ग़लत समझ गये, मुझे नरेंद्र मोदी और सलमान खुर्शीद, जगदीश…. इन सभी के प्रति कोई सहनभूति नही है ना ही मैं इनको या इनके जैसे किसी को देखना चाहता हू, मेरा आशय ये था की एक प्रदेश जो युरोप के किसी भी भी देश से बड़ा है, उसका CM जब ये बात कटा है तो आप सोच सकते है की ये इंग्लीश या अँग्रेज़ी ठप्पे की कितनी ज़रूरत है इस देश मे| अगर आप को अपने मे ही विश्वास नही है, तो आप क्या करेंगे | रहा सवाल मेरा पोलिटिकल विवेक का तो वो ज़्यादातर कुँमूनीस्ट है, बाकी किसी पार्टी के कम से मैं संतुष्ठ नही कोई भी, कही मौका हो तो देखिएगा मेरे जीतने भी पोस्ट है वो, किसी भी तरह से किसी पार्टी या व्यक्ति विशेस की तरफ़ नही है|


आईआईएमसी टॉप है, लेकिन हिंदी साइट फ्लॉप है…

विजय प्रताप

आईआईएमसी की हिंदी वेबसाइट का एक तस्वीरः ना भी हिंदी में नहीं पढ़ा जा सकता  भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) देश के अग्रणी पत्रकारिता संस्थानों की सूची में हमेशा ऊपर यानि टॉप पर रहता है। यहां से प्रशिक्षित सैकड़ों पत्रकार मीडिया उद्योग में लगे हुए हैं। दिल्ली के लगभग सभी बड़े हिंदी पत्रकारिता संस्थानों में आईआईएमसी से प्रशिक्षित पत्रकार मिल जाएंगे। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अग्रणी संस्थान होने के बावजूद भी संस्थान की हिंदी वेबसाइट घोर उपेक्षा का शिकार है। जनसंचार को समर्पित इस संस्थान की हिंदी वेबसाइट पर कोई नई सूचना नहीं है, यहां तक की वेबसाइट का नाम जिस भी फॉन्ट में लिखा गया है, कम से कम उसे हिंदी पढ़ने वाले नहीं पढ़ सकते।

मीडिया स्टडीज ग्रुप ने अपने नियमित हिंदी वेबसाइट सर्वे में पाया कि आईआईएमसी की हिंदी वेबसाइट का हाल दूसरी सरकारी साइटों से भी बदत्तर है। इससे पहले सरकारी हिंदी वेबसाइटों को लेकर किए गए अपने सर्वे में भी ग्रुप ने पाया था कि सरकारी साइटें घोर उपेक्षा की शिकार हैं। आईआईएमसी की वेबसाइट की मॉनिटरिंग के दौरान यह देखा गया कि इसकी मूल साइट अंग्रेजी में है। वेबसाइट खोलने पर कुछ सूचानाएं/घोषणाएं अंग्रेजी में आती हैं। इनमें आईआईएमसी के लिए एकेडमिक एसोसिएट और अस्सिटेंश की भर्ती, दो निविदाएं और आईआईएमसी के 5 केंद्रों के पते और फोन नंबर की सूचना केवल अंग्रेजी में है। पहले ही पेज पर वेबसाइट को तीन तरह से देखना का विकल्प आता है। अंग्रेजी, हिंदी और आईआईएमसी ग्लोबल नेट। तीसरे विकल्प का पेज खोलने पर वहां कुछ नहीं आता और ‘एरर’ बताता है। बाकी दो साइटें खुलती हैं।

हिंदी साइट : ‘अ’जनसंचार

दोनों साइटों का आपस में कोई मुकाबला ही नहीं है। हिंदी की साइट पर दी गई सामग्री शायद वर्षों से स्थायी रूप से पड़ी है। कई सारी जानकारियां पुरानी पड़ चुकी हैं, जो देखने वालों को भ्रमित करती हैं और गलत सूचनाएं मुहैया कराती है। ट्रेनिंग, रिसर्च, स्टूडेंट गैलरी, न्यूजलेटर, पब्लिकेशन, मैनेजमेंट, इंफ्रास्ट्रकचर जैसे टैब जो अंग्रेजी की साइट के पहले पन्ने पर दिखती हैं वो हिंदी की साइट पर मौजूद नहीं है। इन टैब के अंतर्गत दी गई सारी सूचनाएं केवल अंग्रेजी पढ़ सकने वालों को ही सूचित करती हैं। जबकि हिंदी की वेबसाइट पर जो टैब हैं वो ज्यादातर उसके इतिहास और स्थापना से जुड़ी सूचनाएं देती हैं। मसलन परिचय, नयी मीडिया, शाखा, नागरिक घोषणापत्र और विगत जानकारियों, जैसे टैब केवल हिंदी की साइट पर हैं जिसमें ज्यादातर में इसकी स्थापना और उसकी पृष्टभूमि के बारे में बताया गया है।

नागरिक घोषणापत्र में दी गई जानकारी बरसों पुरानी है। इसमें इसके केवल दो ही केंद्रों की सूचना है जबकि वर्तमान में अंग्रेजी की साइट पांच केंद्रों की जानकारी देती है। अमरावती, आइजोल, कोट्टयम और जम्मू में शुरू किए गए नए केंद्रों की सूचना हिंदी की साइट पर कहीं भी नहीं है। इसी तरह से हिंदी की साइट पर फीस का जो ढ़ांचा दिया गया है वो पुराना है। संस्थान से निकलने वाले दो जर्नल कम्युनिकेटर (अंग्रेजी में) संचार माध्यम (हिंदी में) और अन्य प्रकाशनों की सूचना केवल अंग्रेजी की साइट पर है। यहां होने वाले शोध की सूचना भी केवल अंग्रेजी साइट पर है। यहां रिसर्च डेस्क के अंतगर्त अब तक हुए शोध की सूचनाएं भी दी गई हैं। इसी तरह संस्थान की फैकल्टी के नाम और उनके परिचय और संपर्क की सूचना अंग्रेजी साइट पर है जबकि हिंदी साइट पर पीडीएफ रूप में फैकल्टी के केवल नाम दिए गए हैं।

हालांकि यह कहना गलत होगा कि अंग्रेजी की साइट पूरी तरह से अपडेट है। इसके कई सारे टैब जैसे साइट मैप, ऑन लाइन क्वैरी और चेंज लैंग्वेज ‘जल्द ही सूचना दी जाएगी’ की उद्घोषणा के साथ खाली पड़े हैं। जो टैब बने भी हैं उन्हें अपडेट करने की जहमत नहीं उठाई जाती। अंग्रेजी की साइट पर स्टूडेंट गैलरी का टैब है जहां जाने पर केवल 7 तस्वीरें देखने को मिलती हैं और किसी तरह के गतिविधि की सूचना यहां नहीं है।

उद्देश्यों से दूर

आईआईएमसी की स्थापना देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में जनसंचार के उपयोग को मद्देनजर रखते हुए 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसकी नींव रखी थी। इससे पहले 1962-63 में भारत सरकार ने अमेरिका के गैर सरकारी संगठन फोर्ड फाउंडेशन और यूनेस्को से सलाह मांगी थी। दुनिया में ‘विकास पत्रकारिता’ के शुरुआती पैरोकारों में से एक विल्बर श्रेम की अध्यक्षता में यूनेस्को और भारत के मीडिया विशेषज्ञों के एक दल ने अपनी सिफारिश में कहा था कि, “जनसंचार के क्षेत्र में उच्चतर अध्ययन का एक केंद्र हो, जिसके सलाह, प्रशिक्षण, अनुसंधान और विकास की जिम्मेवारी हो, खासकर देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में जनसंचार के उपयोग के संबंध में…।” इन उद्देश्यों के साथ इसकी स्थापना के बाद से पत्रकारिता और जनसंचार माध्यमों के क्षेत्र में निरंतर बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इसकी दिशा बदल गई है जिसका साफ सा मतलब है कि यह अंग्रेजीदां लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास को समर्पित होकर रह गया है। इसकी एक झलक आईआईएमसी की हिंदी वेबसाइट देखकर मिल जाती है।

लेखक विजय प्रताप मीडिया स्टडीज ग्रुप से जुड़े हुए हैं.


नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से साभार.

पेड न्यूज से आगे का सिलसिला शुरू… : ‘मैं संपादक के साथ बिजनेस हेड भी हूं तो बिजनेस हेड के नाते विज्ञापन मांगने जाऊंगा ही’

जी में पहली बार यह प्रयोग हुआ कि संपादक बिजनेस हेड भी होगा। बीइए की बैठक में जो बातें सामने आई हैं वह यह है कि मैं संपादक के साथ बिजनेस हेड भी हूं तो बिजनेस हेड के नाते विज्ञापन मांगने जाऊंगा ही। बैठक में यह सवाल उठा कि इसका मतलब कि जिस खबर को आप दिखा रहे हो उसमें दिखाए गए पार्टी से आप विज्ञापन मांगने भी चले जाएंगे। अब सवाल यह है कि क्या दोनों पद पर एक ही आदमी रह सकता है? दोनों पदों पर जी ग्रुप ने एक ही आदमी को रखा, यह एक बड़ा सवाल है। कोई संपादक खबर को लेकर निर्णय करे और वही आदमी खबर को लेकर बिजनेस का निर्णय करे तो खबर हावी होगा या बिजनेस? स्पष्ट है बिजनेस के लिए खबर हावी होगा और उस खबर से बिजनेस होगा। जी न्यूज से यही खेल चल पड़ा है और यह खेल पेड न्यूज से आगे का सिलसिला है।

सुधीर चौधरी से पहले भी एक बार सीबीआई और इंफोर्समेंट डायरेक्टोरेट पूछताछ कर चुकी है। इससे पहले सुधीर लाइव इंडिया में उमा खुराना के मामले में भी चर्चा में आए थे। मीडिया में यह खबर है कि सतीश के. सिंह के जमाने में जी न्यूज ने जो साख कायम की थी उसी साख को भुनाने के लिए सुभाष चंद्रा ने जी न्यूज में सुधीर चौधरी लाए, क्योंकि इनकी यही पहचान रही है। इनकी यह पहचान मीडिया और पत्रकारिता के लिहाज से अच्छी नहीं है। फिर भी जी ग्रुप उन्हें संपादक बनाता है। जाहिर है इससे एक समझ तो पैदा होती है कि जी की नीयत ठीक नहीं है।

उपरोक्त बातें प्रख्यात पत्रकार राम बहादुर राय के एक आलेख से ली गई हैं. उस आलेख को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…. सुधीर चौधरी के बहाने मीडिया पर कुछ बातें

टीआरपी के लिए समाचार चैनल को सर्कस बनाना भी तो बिज़नेस लाना ही है

Mayank Saxena : ज़ी न्यूज़ में बिजनेस हेड और सम्पादक के साझा पद को लेकर बवाल मचा रहे तमाम पत्रकार-वरिष्ठ पत्रकार-सेवानिवृत्त पत्रकार-वेटरन पत्रकार-स्वयंभू पत्रकार-पूर्व सम्पादक-वर्तमान 'चम्पादक' इन सब से सिर्फ एक सवाल है… कि आपको एक पद से इतनी समस्या है, जबकि सम्पादक और चम्पादक के पदों पर रहते हुए आपमें से तमाम ने ये ही काम (बिज़नेस लाना-रेवेन्यू मॉडल सोचना-पेड पत्रकारिता करना-राजनैतिक दलों के लिए लॉबीइंग करना-अपने संस्थान-मालिक को फ़ायदा दिलवाना) लगातार किए…ज़ी ने बस उसे औपचारिक मान्यता दे दी…आप ने ऐसा किया चोरी छिपे…ज़ी ने खुलेआम कर मारा…और बता दिया कि दरअसल आज का सम्पादक सिर्फ सम्पादक है ही नहीं…

आप लोग धोखा देते रहे…मैं चाहता हूं..मेरे तमाम साथी युवा पत्रकार चाहते हैं कि सुधीर चौधरी केवल नौकरी से ही नहीं…इस पेशे से भी जाएं…मौका लगे तो जेल भी जाएं…लेकिन सवाल ये कि उनकी आलोचना और इस पद उंगली वो लोग उठाएं, जिन्होंने अनौपचारिक तौर पर कभी इन कामों को अंजाम न दिया हो…टीआरपी के रेवेन्यू मॉडल के लिए, समाचार चैनल को सर्कस बनाना भी तो बिज़नेस लाना ही है…(सर्कस में रात को चलने वाले मर्दाना ताक़त के स्लॉट…कॉमेडी के स्लॉट…निर्मल और दाती के स्लॉट सभी शामिल हैं…)… सभी माननीय आलोचक चम्पादकों-वरिष्ठों के जवाब नहीं मिलेंगे ये जानते हुए बी उनकी प्रतीक्षा है…

टीवी जर्नलिस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से साभार.

आज समाज से इस्तीफा देकर संजय त्यागी नेटवर्क10 चैनल से जुड़े

संजय त्यागी ने आज समाज अखबार को नमस्ते कर नेटवर्क 10 चैनल ज्वाइन कर लिया  है. वह आज समाज में कंटेंट एडिटर थे. नेटवर्क 10 में भी उन्हें बडी जिम्मेदारी दी गई है. उन्हें चंडीगढ रीजन का सीनियर एसोसिएट एडिटर बनाया गया है. इस रीजन में वह चंडीगढ, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और जम्मू कश्मीर राज्यों के प्रभारी होंगे. इन पांचों राज्यों के सभी एडिटोरियल ऑपरेशन इन्हीं की देख रेख में होंगे.

संजय त्यागी इससे पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला, भास्कर और राजस्थान पऋिका में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं. आज समाज के सभी जिलों के एडिशनों को सफलतापूर्वक लांच करने का श्रेय संजय त्यागी को है. उन्होंने इन एडिशनों को नया लुक और तेवर देकर पहचान दी. नेटवर्क 10 का एडिटोरियल नेटवर्क पूरी तरह खड़ा कर लिया गया है. संजय त्यागी ने भड़ास द्वारा संपर्क किए जाने पर आज समाज छोड़ने और नेटवर्क10 ज्वाइन करने की पुष्टि की. उन्होंने आज समाज में अपने कार्यकाल को यादगार बताया. उन्होंने आज समाज के अपने सभी सीनियर-जूनियर साथियों के प्रति आभार जताया.

Hats off to THE HINDU for this video… जरूर देखें…

हर मीडिया हाउस सामाजिक और देश हित का कोई न कोई कंपेन चलाता रहता है.. और कंपेन को आगे बढ़ाने के लिए, कंपेन के मैसेज को जनता के बीच पहुंचाने के लिए वे विज्ञापन का सहारा लेते रहते हैं.. कोई पानी बचाने का अभियान चलाता है तो कोईे  हरियाली बचाने का.. कोई शेर-बाघ बचाने के लिए चिंतित रहता है तो कोई बच्चों को स्कूल भेजने के लिए सक्रिय हो जाता है….. 

द हिंदू ने संसद को मुद्दा बनाया है… इससे संबंधित एक वीडियो जारी किया है. एक मिनट का विज्ञापन. देश और समाज के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए है यह विज्ञापन. इस विज्ञापन में संदेश है. नेताओं के लिए. संसद को क्या बनाया था और अब क्या बना दिया है… एक मिनट में यह वीडियो बहुत कुछ कह जाता है.. नेट पर यह वीडियो खूब पापुलर हो रहा है और लोग खूब शेयर कर रहे हैं.. आप भी देखिए… इस लिंक पर क्लिक करिए…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/639/other-mix/hats-off-the-hindu-for-this-video-a-must-watch.html

The video define how our parliament works. Hats off to THE HINDU for this video…  The Hindu is an English-language Indian daily newspaper founded and continuously published from Chennai since 1878. According to the Indian Readership Survey in 2012 it is the third most widely read English newspaper in India (after the Times of India and Hindustan Times) with a readership of 2.2 million people.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का साहित्यिक चेहरा…

Roshan Premyogi : २७ अक्टूबर को ताज होटल लखनऊ में श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफ्को साहित्य सम्मान की पूर्व संध्या पर साहित्यकारों की पार्टी थी. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समय से पहुँच गए. उन्होंने पहले मंच से भाषण दिया. फिर डिनर के दौरान एक एक टेबल पर जाकर साहित्यकारों से मुलाकात की. वह राजनीति से दूर यह बताना नहीं भूले कि मैं आम आदमी हूँ. 13 साल की सक्रिय पत्रकारिता और साहित्य लेखन में किसी मुख्यमंत्री को इस तरह लेखकों के बीच पहली बार देखा, जहाँ न राजनीति थी, न आपाधापी. प्रख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव का उन्होंने हालचाल पूछा. मेरा बड़ा बेटा उनसे मिलना चाहता था.

मैं लेकर मुख्यमंत्री के पास गया. उन्होंने उससे क्लास और पढाई की बात की. पहली बार लगा अखिलेश पिता मुलायम जी की राह पर हैं. उनके अन्दर जज्बा है, लगन भी, मुलायम सिंह यादव साहित्यकारों, कलाकारों का न केवल सम्मान करते हैं बल्कि जब भी मुख्यमंत्री बने, भरसक मदद भी की. उनकी पिचली सरकार में मुझे उप्र हिंदी संस्थान से जब २०,००० का पुरस्कार मिला तो एक अधिकारी ने सरकारी आवास के लिए आवेदन माँगा. मैंने कहा, गारंटी ले सकते हैं कि यदि सत्ता परिवर्तन हुआ तो भी मेरा मकान रहेगा, वह पीछे हट गए. …हंस के संपादक राजेंद्र यादव कि ओर से समारोह में एक सवाल उठा कि साहित्यकार बिना नौकरी किये भी साहित्य लिख सके, इसके लिए सरकार को कुछ करना चाहिए. मेरा भी मानना है कि सरकार को कुछ करना चाहिए, लेकिन उससे पहले राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बनानी चाहिए.

    Sudhakar Adeeb … लेकिन उससे पहले साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बनाना चाहिए। बहुत सही कहा रोशन भाई । काश ! प्रबुद्धजन इस पर भी विचार करते।
 
    Sudhakar Adeeb इसे 1936 में घोषित किया था प्रातः स्मरणीय प्रेमचन्द जी ने । श्रीलाल शुक्ल जी जैसे विलक्षण व्यक्तित्वों ने 2011 तक इस मशाल को राजनीति से भरसक आगे रखा । आज 2012 में जो स्थितियाँ हैं वह आपसे छिपी नहीं हैं । … अधिक क्या कहें ?
 
    DrZakir Ali Rajnish जानकर अच्‍छा लगा। शुक्रिया रोशन भाई।
   
    Mahesh Chandra Deva bhai saheb abhi to ye shruwat hai .
    
    Krishna Kumar Yadav hamne bhi akhbaron men khabar padhi..sannata to tuta Roshan Premyogi ji.

रोशन प्रेमयोगी के फेसबुक वॉल से साभार.

गलत सूचना एवं तथ्‍य प्रकाशित कर रहे हैं चंदौली के अखबार

 

चंदौली जिले की पत्रकारिता में लग रहा है कि भांग घुला हुआ है. ऐसा लग रहा है कि पत्रकार इसी के नशे में काम कर रहे हैं. आए दिन सूचनात्‍मक तौर पर गलत खबरों के प्रकाशन से आम लोग परेशान हैं. पहला मामला है हिंदुस्‍तान का. दो-तीन दिन पूर्व एक युवक की संदिग्‍ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. उक्‍त युवक एक अस्‍पताल में काम करता था तथा रेलवे क्‍वार्टर में रहता था. हिंदुस्‍तान ने खबर में तथ्यों का पता किए बिना मृतक को रेलकर्मी बता दिया. 
 
जबकि उसके परिवार का कोई सदस्‍य रेलवे में कार्यरत नहीं है. इस खबर के बाद से रेलवे में काम करने वाले लोग काफी परेशान हुए. उक्‍त युवक के बारे में पता करने के लिए एक दूसरे से पूछते रहे कि किसी विभाग का था, किस पद पर था आदि. बाद में सच्‍चाई पता चलने पर लोग अखबार को कोसते नजर आए. 
 
इसी तरह राष्‍ट्रीय सहारा में भी सूचनात्‍मक रूप से गलत खबर का प्रकाशन हो गया. खैर, चंदौली से खबर सही भेजी गई थी, पर बनारस जाकर चेंज हो गया. चंदौली के सांसद हैं राम किशुन यादव, सपा से जीते हुए हैं. खबर में भाषण उन्‍होंने दिया. आश्‍वासन उन्‍होंने दिया पर बनारस वालों ने आश्‍वासन में पूर्व बसपा सांसद कैलाश सिंह यादव का नाम डाल दिया. अब सपा के लोग परेशान कि आश्‍वासन अपने सांसद जी ने दिया और नाम पुराने सांसद का चला गया. इस तरह की गलतियां आए दिन चंदौली के अखबारों में देखने को मिल रही है और पाठकगण परेशान हैं.  
 
हिंदुस्‍तान
 
राष्‍ट्रीय सहारा

पत्रकार गोपाल शर्मा की गालियां और जिंदगी का साठवां साल

मुंबई के गोपाल शर्मा… वरिष्ठ पत्रकार। जाने माने स्तंभ लेखक और भाषा की जबरदस्त शैली व शिल्प के कारीगर। उम्रदराज होने के बावजूद मन बिल्कुल बच्चों सा। आदत औघड़ सी और जीवन फक्कड़ सा। बहुत लिखा। जमकर लिखा। कभी किसी का सहारा नहीं लिया। फिर भी खुद कईयों का सहारा बने। संपादक से लेकर हर पद पर काम किया। कई संस्थानों में रहे। और जितनी जगहों में काम किया, उनसे ज्यादा को छोड़ दिया। छोड़ा इसलिए क्योंकि उन संस्थानों को उनने अपने योग्य माहौलवाला नहीं माना।

 
पर, इतने भर से गोपाल शर्मा का परिचय पूरा नहीं हो जाता। गोपाल शर्मा का असली तब पूरा होता है, जब उनके बारे में दुनिया को यह बताया जाए कि वे मुंबई के एकमात्र ऐसे पत्रकार हैं, जिनके जो मन में आया बोल दिया। जैसा आया बोल दिया। मुंहफटगिरी में उनका कोई जवाब नहीं। मुंहफटाई भी ऐसी कि जैसे दुनिया में हर एक की सारी मां-बहनों की जनम कुंडली उन्ही के पास हों। कोई भी उनसे बच नहीं पाया। क्या मालिक और क्या संपादक। सारे के सारे एक कतार में। अभी कुछेक साल से पत्रकारिता में आए नए लोगों को छोड़ दिया जाए, तो मुंबई में शायद ही तो कोई पत्रकार हो, जिसके लिए गोपाल शर्मा के श्रीमुख से ‘फूल’ ना झरे हों। उनसे पहला परिचय हो या पहली बातचीत। 
 
गोपाल शर्मा की शुरूआत ही उनके मुंह से झरनेवाले खूबसूरत ‘फूलों’ से होती है। तब भी और अब भी। कुछ भी नहीं बदला। इतने सालों बाद भी वे जस के तस हैं। उनने ताऊम्र व्यक्तिगत उलाहनों से लेकर भरपूर गालियों के प्रयोग करते हुए लोगों से व्यवहार किया। लेकिन फिर भी यह सबसे बड़ा सवाल है कि वे ही लोग आखिर इस शख्स को इतना प्यार क्यों करते हैं। वे लोग, जिनने गोपाल शर्मा की गालियां खाई और पिटाई झेली, वे ही उनसे इतना स्नेह क्यों करते हैं। यह सबसे बड़ा सवाल रहा है। सवाल यही आज भी है और कल भी रहेगा।
 
वे गजब के लेखक हैं। अपनी विशिष्ट मारक भाषा शैली में किसी की भी खाल उधेड़ने में उनका कोई सानी नहीं। तो, उनकी बराबरी का रिपोर्ताज लिखनेवाला कोई आसानी से पैदा नहीं होता, यह भी सबको मानना पड़ेगा। जब लिखते हैं, तो इतना डूबकर लिखते हैं कि पढ़नेवाला चिंतन करने लगता है कि ये गोपाल शर्मा कोई आदमी है या इनसाइक्लोपिडिया। हर पहलू को छानकर अगल – बगल की गहरी पड़ताल के साथ सारी बातों के तकनीकी तथ्यों और संपूर्ण सत्य के साथ पेश करना उनके लेखन की खासियत है। साढे चार सौ से ज्यादा कविताएं लिखीं। एक हजार से भी ज्यादा कहानियां भी लिखी। सारी की सारी देश की नामी गिरामी पत्र पत्रिकाओं में छपी। लेकिन इस सबका गोपाल शर्मा का कोई दर्प नहीं। कभी उन्होंने खुद को साहित्यकार नहीं समझा। 
 
गजब की भाषा शैली और बेहद गहराईवाला लेखन करनेवाले गोपाल शर्मा को एक चलता फिरता ज्ञानकोष कहा जा सकता है। लेकिन बाबा आदम की औलाद की एक जो सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह यही है कि हम किसी के भी सिर्फ एक पहलू को पकड़कर उसी के जरिए किसी का भी चित्रण करते रहते है। गोपाल शर्मा के बारे में ज्यादातर लोग सिर्फ यही जानते हैं कि उनने जितना लेखन को जिया हैं, उसमें ज्यादातर वक्त शराब को दिया है। बहुत सारे लोग शुरू से लेकर अब तक उनके जीवन की रंगीनियों वाले पहलू का परीक्षण करते हुए तब भी और आज भी उन पर मरनेवालियों की लंबी चौड़ी संख्या गिनाकर भी उनके चरित्र का चित्रण करते रहते हैं। पर, इस सबके बावजूद गोपाल  शर्मा कुल मिलाकर एक बेहतरीन लेखक, जानकार पत्रकार और लगातार लेखन करनेवाले जीवट के धनी आदमी हैं, जिनमें आदमियत भी ऊपरवाले ने कूट कूट कर भरी है।   
 
गोपाल शर्मा के बारे में बरसों से खुद से सवाल कर रहे मुंबई के मीडिया जगत ने हिंदी के इस लाडले पत्रकार का 60वां जन्मदिन मनाया रविवार के दिन। 28 अक्टूबर 2012 को। घाटकोपर के रामनिरंजन झुंझुनवाला कॉलेज के सभागार में उस दिन वे सारे चेहरे थे, जो कभी ना कभी गोपाल शर्मा के निशाने पर रहे। ‘वाग्धारा’ द्वारा आयोजित गोपाल शर्मा के साठवें जन्मदिन के आयोजन में वागीश सारस्वत, अनुराग त्रिपाठी, और ओमप्रकाश तिवारी की विशेष भूमिका रही। मंच पर थे दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, जगदंबाप्रसाद दीक्षित और आलोक भट्टाचार्य के अलावा गोपाल शर्मा की पत्नी प्रेमा भाभी। गोपाल शर्मा तो थे ही। कईयों ने गोपाल शर्मा के साथ अपने अनुभव सुनाए तो कुछ ने उनके चरित्र की चीरफाड करके उनके मन के अच्छेपन को सबके सामने पेश किया। बहुत सारे वक्ताओं ने प्रेमा भाभी को उनकी संयम क्षमता, उनके धीरज और उनकी दृढ़ता पर बधाई देते हुए कहा कि मीडिया जगत के बाकी लोग तो सार भर में एकाध बार गोपाल शर्मा को झेलते रहे, पर प्रेमा भाभी ने जिस धैर्य को साथ उनको जिया, वे सचमुच बधाई की पात्र हैं। जो लोग मंच से बोले, वे सारे के सारे गोपाल शर्मा की गालियां खा चुके हैं, फिर भी उनके बारे में अच्छा ही नहीं बहुत अच्छा बोल रहे थे। 
 
गोपाल शर्मा के बारे में अपन भी बोले। उनके शरारती व्यवहार और मोहक अंदाज के अलावा फक्कड़पन पर बोले। सबने उनकी तारीफ की। जो जीवन भर गोपाल शर्मा को गालियां देते रहे, उनने भी गोपालजी कहकर अपनी बात शुरू की। सम्मान दिया। उनके व्यक्तित्व की व्याख्या की। और कृतित्व की तारीफ की। किसी ने उनको फक्कड़ कहा। किसी ने औघड़। किसी ने गजब का आदमी बताया। तो किसी ने उनके भीतर बैठे बच्चों जैसे आदमी को दिखाया। कुल मिलाकर यह आयोजन गोपाल शर्मा के पत्रकारीय कद की एक महत्वपूर्ण बानगी रहा। खचाखच भरा हॉल देखकर अनुराग त्रिपाठी ने कहा कि गोपाल शर्मा ने जीवन भर लोगों के साथ जैसा व्यवहार किया, उसको देखकर शक था कि लोग आएंगे भी या नहीं। पर….., वाह गोपालजी… आपके जन्मदिन पर साबित हो गया कि लोग आपको बहुत स्नेह करते हैं… बहुत प्यार करते हैं। इस मौके पर उनकी पहली किताब ‘बंबई दर बंबई’  का विमोचन भी हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अभिलाष अवस्थी, बृजमोहन पांडे, सुमन सारस्वत, सरोज पांडे, निजामुद्धीन राईन, अनिल गलगली आदि तो थे ही। मुंबई के हिंदी पत्रकारिता जगत के और भी कई नए पुराने नामी लोग हाजिर थे, गोपाल शर्मा का साठवां 
निरंजन परिहार
जन्मदिन मनाने के लिए। किसी को अपनी यब हात अतिश्योक्ति लगे तो अपनी बला से, पर सच्चाई यही है कि मुंबई की हिंदी पत्रकारिता का एक पूरा युग गोपाल शर्मा के कर्मों और सत्कर्मों का तो ऋणी है ही उनके धतकर्मों का भी ऋणी है। उनके जन्म दिन के इस आयोजन में यह भी साबित हो गया। गोपाल शर्मा जैसा दूसरा कोई ना तो हुआ है और ना ही होगा। हो तो बताना।       
 
लेखक निरंजन परिहार मुंबई के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हैं. 

एसओ ने दैनिक जागरण के पत्रकार को जान से मरवाने की धमकी दी

 

: पत्रकार पर हमला करने वाले से समझौते का बना रहा था दबाव : उत्‍तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के दैनिक जागरण के पत्रकार नरेंद्र नाथ पाण्‍डेय पर 26 अक्‍टूबर को जानलेवा हमला हुआ. किसी तरह से जान बचाकर भागने में वह सफल हो सके. आरोपियों ने उनका पीछा करके कैमरा तथा नकदी लूट ली. इस घटना के बाद पत्रकार नरेंद्र नाथ पाण्‍डेय ने आरोपी सुहवल निवासी संत कुमार राय के खिलाफ आईपीसी की धारा कई धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई.
 
पुलिस दबाव में आकर आरोपी संत कुमार राय को आइपीसी की धारा 151 में चालान कर छोड़ दिया. जबकि एफआईआर की उक्‍त धाराओं के अंतर्गत जमानत आनिवार्य है. नई घटनाक्रम में 29 अक्‍टूबर यानि सोमवार को सुहवल एसओ राम स्‍वरूप वर्मा ने पत्रकार नरेंद्र नाथ पाण्‍डेय को जान से मारने की धमकी दी है. एसओ ने पत्रकार पर समझौता करने का दबाव डाला. नरेंद्र ने मना किया तो जान से मरवाने की धमकी दे डाली. 
 
इस संबंध में नरेंद्र नाथ ने बताया कि मेरे साथ मारपीट तथा लूट की घटना हुई. आरोपी को मेरे साथ के कुछ लोगों ने पकड़कर खुद पुलिस के हवाले किया इसके बाद भी पुलिस ने आरोपी का मामूली धारा में चालान करके छोड़ दिया. उन्‍होंने कहा कि इसके बाद मैं जब इस मामले में पुलिस कार्रवाई पर आपत्ति जताई तो मुझे बुरा अंजाम भुगत लेने की धमकी दी गई. जान से मरवाने की बात भी कही गई. 
 
दूसरी तरफ श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की शनिवार को बैठक हुई. पत्रकार नरेंद्र नाथ पांडेय संग मारपीट कर लूट की घटना की निंदा की गई. वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारों पर आए दिन हमले हो रहे हैं. हालिया घटना श्री पांडेय के साथ हुई है. बैठक में चेतावनी दी गई कि अगर 24 घंटे के भीतर अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो धरना-प्रदर्शन होगा. बैठक में डॉ. राणा प्रताप सिंह, दयाशंकर राय, पंकज पांडेय, मृत्युंजय चतुर्वेदी, अभिषेक श्रीवास्तव, इंद्रासन यादव, उपेंद्र सिंह, अखंड प्रताप सिंह, विजय शंकर तिवारी आदि थे. अध्यक्षता पदमाकर पांडेय तथा संचालन विजय मधुरेश ने किया.

हड़बड़ी में बड़ी गलती करने लगी हैं वेबसाइटें

 

आज के दौर में हर क्षेत्र में प्रतिस्‍पर्धा में बढ़ोत्‍तरी हुई है. मार्केट में हर कोई एक दूसरे को पीछे छोड़कर आगे निकलना चाहता है. ऐसी प्रतिस्‍पर्धा तमाम हिंदी अंग्रेजी की वेबसाइटों में भी देखने को मिल रही हैं. काम का दबाव, तेजी और अप्रशिक्षित पत्रकारों के चलते तमाम गलतियां भी होने लगी हैं. तेजी के चक्‍कर में अक्‍सर अर्थ का अनर्थ हो जाता है. 
 
ऐसा ही एक मामला एनबीटी की वेबसाइट पर देखने को मिला. जी न्‍यूज के संपादकों तथा जिंदल ग्रुप के बीच चल रहे आरोप-प्रत्‍यारोप की एक खबर में सौ करोड़ रुपये की जगह सौ रुपये लिख दिया गया है. खबर में नवीन जिंदन ने आरोप लगाया था कि सुधीर चौधरी तथा समीर आहलूवालिया ने उनकी कंपनी से सौ करोड़ रुपये मांगे थे, जबकि वेबसाइट ने इसे सौ रुपये बताया है. आप भी देखिए खबर का स्‍क्रीन शाट. 
 

हरिनारायण सिंह रांची से लांच करेंगे अपना अखबार खबर मंत्र

झारखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा हिंदुस्‍तान तथा प्रभात खबर समेत कई अखबारों तथा चैनलों के संपादक रहे हरिनारायण सिंह अब कुछ सहयोगियों के साथ खुद का अखबार लांच करने की तैयारी में हैं. न्‍यूज11 से इस्‍तीफा देने के बाद सन्‍मार्ग पहुंचे थे, परन्‍तु वहां भी उनके मन मिजाज से काम नहीं होने के चलते उन्‍होंने विदा ले ली. अब अपने अखबार के लांचिंग की तैयारियों में जुटे हुए हैं. रांची से जल्‍द ही हिंदी दैनिक खबर मंत्र का प्रकाशन करने जा रहे हैं.  

 
रांची में कई अखबारों को जमा चुके हरिनारायण सिंह के लिए इस नए वेंचर को जमाना एक चुनौती होगा, लेकिन उनकी पत्रकारीय शैली को देखते हुए माना जा रहा है कि वे इस अखबार को भी पहचान दिलाने में कामयाब होंगे. इस नए नवेले अखबार के लांचिंग की तैयारियां अंतिम चरण में हैं. कार्यालय के लिए भवन बड़ी तेजी से तैयार हो रहा है. हालांकि खबर आ रही है कि इस अखबार में कई लोग पैसा इनवेस्‍ट कर रहे हैं. 
 
हरिनारायण सिंह के कद और तेवर को को समझने वाले दूसरे अखबारों का प्रबंधन परेशान है. रांची के तमाम बड़े अखबारों के कई पत्रकार उनके सीधे संपर्क में हैं. इसे देखते हुए हिंदुस्‍तान, जागरण, प्रभात खबर, सन्‍मार्ग आदि का प्रबंधन खासा चौकन्‍ना है. अपने पत्रकारों पर नजर भी रख रहे हैं. संभावना जताई जा रही है कि अगले साल जनवरी तक इस अखबार की लांचिंग कर दी जाएगी. हालांकि अभी कोई तिथि तय नहीं की गई परन्‍तु तैयारियों को देखते हुए इसके जनवरी में लांच होने की बात कही जा रही है. 

मीडिया पर सरकारी नियमन का इरादा नहीं : मनीष

 

नई दिल्ली : नवनियुक्त सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने आज स्पष्ट किया कि उनका मीडिया पर किसी सरकारी नियमन का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने कहा कि स्वनियमन ही सर्वश्रेष्ठ नियमन है। कांग्रेस प्रवक्ता का पद भी संभाल रहे तिवारी से जब संप्रग-2 की प्रेस द्वारा आलोचना होने तथा उनकी आगे की रणनीति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘कोई एक व्यक्ति राष्ट्रीय संवाद की भाषा को बदल नहीं सकता। मुझे ऐसा कोई भ्रम नहीं है कि मैं अकेले राष्ट्रीय संवाद की प्रकृति को बदलने में सक्षम हूं। सभी संबंधित लोगों को इसके लिए कदम उठाना होगा।’ 
 
मीडिया पर किसी तरह की पाबंदी लगाने से इंकार करते हुए तिवारी ने कहा, ‘मेरा विश्वास है कि स्वनियमन ही सर्वश्रेष्ठ नियमन है।’ केन्द्रीय मंत्री के तौर पर नियुक्त होने के बाद तिवारी कांग्रेस मुख्यालय आए और उन्होंने कांग्रेस महासचिव तथा मीडिया विभाग के प्रभारी जनार्दन द्विवेदी सहित कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। तिवारी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद उनके सामने पहली चुनौती यह होगी कि 31 अक्तूबर तक चार महानगरों में केबल सेवाओं के डिजिटलीकरण का काम पूरा किया जाए। जब तिवारी से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह इस संबंध में पहले निवर्तमान मंत्री अंबिका सोनी से संपर्क करेंगे। उन्होंने कहा, ‘मैंने अब तक इस बारे में सोचा नहीं है। मैं सभी संबंधित लोगों से इस बारे में बात करूंगा। पहले मैं निवर्तमान मंत्री अंबिका सोनी से बात करूंगा। जब मैं स्कूल में था तब अंबिका जी पंजाब में युवक कांग्रेस की अध्यक्ष हुआ करती थीं।’ (एजेंसी) 

चूहामार राजनीति के दिग्‍गज रामअचल राजभर

राजनीति में ऐसा कम ही होता है, जब किसी शख्‍स के व्‍यवहार के दम पर उसका नया नामकरण न केवल हो ही जाए, बल्कि उसकी यह नई पहचान लोगों की जुबान पर चढ़ भी जाए। ऐसा ही अनूठा नया नामकरण हुआ बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्‍यक्ष रामअचल राजभर का। केवल अपने व्‍यवहार के दम पर अब तक चार बार विधायक और तीन बार प्रदेश सरकार में मंत्री का ओहदा सम्‍भाल चुके इस शख्‍स ने अपना यह नया नाम न केवल अपनाया, बल्कि उसे चरितार्थ भी करा दिया।

तो किस्‍सा की शुरूआत होती है अवध क्षेत्र से। दरअसल, किसी की मृत्‍यु पर उसके शोक-संतप्‍त घरवालों के यहां जुटे लोगों को चहकारी कहा जाता है। रामअचल राजभर की खासियत है कि वे किसी के सुख में भले ही न पहुंच सकें, लेकिन शोक के मौके पर वे पहुंचते जरूर हैं। तब भी जब वे मंत्री बने थे। उनके बारे में तो क्षेत्र में ख्‍याति है कि किसी की भैंस की मौत पर भी वे पहुंच जाते हैं। और उनकी इसी खासियत के कारण ही उन्‍हें परिवहन मंत्री के बजाय चहकारी मंत्री की ख्‍याति मिल गयी। अब इस मशहूरी पर लोग भले ही खूब हंसें, मजाक उड़ाएं, लेकिन हकीकत यह है कि अपने क्षेत्र में अपनी पैठ बनाने में बसपा के साथ रामअचल राजभर की इसी खासियत ने जड़ें जमायीं। वरना अदना से एक लाचार और गरीबी में पला-पोसा शख्‍स के लिए केवल बीस बरसों में प्रदेश में बसपा जैसे संगठन में शीर्ष मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। रामअचल के बारे में मशहूर है कि वे जिस से एक बार भी मिलते हैं, हमेशा बाकायदा पहचानते हैं।

उम्र: 55 साल, कद: साढ़े पांच फीट, रंग: साफ गेहुंआ, कपड़ा: सामान्‍य तौर पर सफेद सस्‍ती सादी पैंट-शर्ट, शिक्षा: अंग्रेजी में एमए एलएलबी, वैवाहिक स्थिति: विधुर, रहन-सहन: बेमिसाल, शौक: बोलना, लेकिन पार्टी की बैठकों में ही, सम्‍पत्ति: बेशुमार, दिक्‍कत: गुर्दा और कान की बीमारी, भोजन: खाना से ज्‍यादा दवा-दारू, प्रतिबद्धता: बसपा, बरास्‍ते सुप्रीमो मायावती। सरकारी कागजों में रामअचल राजभर के गांव का नाम भले ही कायमुद्दीनपुर लिखा हो, लेकिन उनका मूल गांव कुर्की गांव ही है, जहां उनके पिता रामअवध राजभर ने हलवाही के बल पर अपना परिवार पाला-पोसा। जाहिर है कि गरीबी की हालत घर के चादर-अंगरखा फाड़े रहती थी। तीन भाइयों में रामअचल सबसे बड़े थे। ऐसे में पिता की मदद के लिए उन्‍होंने गांव के बाहर एक छोटी गुमटी-दूकान खोल दी। आजीविका मजबूत करने के लिए, बकौल वरिष्‍ठ वकील अशोक द्विवेदी, रामअचल सिंह ने अपनी सायकिल के सहारे जिले की साप्‍ताहिक बाजारों और अकबरपुर मार्केट में फेरी लगानी शुरू कर दी। माध्‍यम था प्‍लास्टिक की बेकार पाइप, जिसे भोंपू को लाउडस्‍पीकर की तरह वे अपना सौदा बेचा करते थे। सौदा था चूहामार दवा। अकबरपुर के कई लोगों को याद है जब मूस-मार दवा ले लो, की गुहार लगाते हुए दवा बेचा करते थे। यह सब लम्‍बे समय तक चला। वक्‍त गुजरता चलता रहा और उसी की रफ्तार में रामअचल राजभर विश्‍वेश्‍वरनाथ कैलाश बिहारी स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय में अंग्रेजी में एमए और एलएलबी हो गये।

राजनीति का चस्‍का शायद कालेज में ही पड़ गया था। कालेज छात्रसंघ चुनाव में लड़े, लेकिन औंधे मुंह गिरे। कुछ दिन अदालतों की गलियारों में भी किस्‍मत आजमाई, लेकिन बात बन नहीं पायी। इसी बीच कांशीराम ने बसपा खड़ी की। जिलाध्‍यक्ष बनाये गये बसंता राजभर और उनके जिगरी दोस्‍त थे रामअर्ज राजभर। रामअचल भी अपनी राजनीति के लिए जातीय-जमीन खोज रहे थे। राजभरों के अराध्‍य-देव सुहेलदेव के नाम पर रामअचल ने जयंती मनानी शुरू किया। सायकिल-सवार रामअचल इस जाति के लोगों के घर बीसियों कोसों की दूरी नापा करते थे। स्‍थानीय नवरत्‍न दैनिक प्रेस पर सुहेलदेव जयंती का पर्चा छपवाने में अक्‍सर शैलेंद्र तिवारी से साबका रामअचल राजभर का पड़ता था। आर्थिक दिक्‍कतें तो थी हीं, सो कई बार प्रेस का बिल टुकड़ों में मिलता था, कभी अगली जयंती पर ही। एक प्रेसकर्मी ने बताया कि करीब 7 सौ का बकाया अभी तक अदा नहीं हुआ।

भविष्‍य खोजने के लिए रामअचल ने अकबरपुर ब्‍लाक की प्रमुखी के लिए भिड़े लेकिन 135 सदस्‍यों में से केवल 11 वोट ही उन्‍हें मिल पाये। उधर जातियों के बल पर संगठन खड़ा करने के लिए बसंता ने रामअचल को अपना झंडाबरदार बना दिया। मौका मिला तो परिश्रम के बल पर पहचान भी बनी। सो, 91 के चुनाव में फिर चुनाव लड़े, मगर पवन पांडे ने उनके समेत सभी उम्‍मीदवारों को जबर्दस्‍त करारी शिकस्‍त दे दी। लेकिन इस हार के बावजूद बसपा में रामअचल की आवाज गूंजने लगी। कद हासिल करते ही रामअचल बन गये जिलाध्‍यक्ष और मजबूरन असंतुष्‍ट बसंता और रामअर्ज नेमजबूरन दूसरा ढीहा खोज लिया।

उधर फैजाबाद की अकबरपुर तहसील को नया जिला बनाने के लिए जन-सामान्‍य ने एक जबर्दस्‍त आंदोलन खड़ा कर दिया था जिसके नेता थे अशोक मिश्र और उनके कई करीबी मित्र। आमरण अनशन शुरू हो गया। दो साल तक चले तगड़े आंदोलन की धार बेहद तीखी थी। नतीजतन सरकार में बात शुरू हो गयी कि अकबरपुर को तमसा नदी के नाम पर या लोहिया के जन्‍मक्षेत्र के नाम पर संगठित किया जाए। इसी बीच फिर चुनाव हो गये और रामअचल बसपा से विधायकी पा गये।

खैर। सन-95 में रामअचल फिर विधायक हो गये। बसपा सरकार ने अपने एजेंडे लागू करने के लिए तमसा या लोहिया के बजाय अकबरपुर को अंबेडकरनगर बना दिया। रामअचल ने इस जिले को अपनी निजी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित किया और इस तरह खुद का कद ऊंचा करा लिया। अगली बार उन्‍हें परिवहन विभाग का राज्‍यमंत्री और बाद में शिक्षा राज्‍य मंत्री बना दिया गया तो वे सातवें आसमान पर चढ़ गये। जोश तो था ही, सो अचानक फैजाबाद में पुलिसवालों से मारपीट हो गयी। वरिष्‍ठ पत्रकार अजय सिंह बताते हैं कि पुलिसलाइंस में उस दिन इतना बड़ा बवाल हुआ कि केवल पुलिसकर्मी ही नहीं, बल्कि जनता ने भी उनकी बुरी तरह पिटाई की। जानकार बताते हैं कि इस हादसे में कई दिनों तक रामअचल अस्‍पताल में लिटाये गये थे। गुर्दा और कान बहने की दिक्‍कत उसी के बाद से शुरू हुई। बाद में तो कई और मामले हुए।

राजनीति में भी भूचाल आ गया था रामअचल राजभर के चलते। बहराइच के सालार जंग के धार्मिक स्‍थल को लेकर रामअचल राजभर पर हंगामा हुआ। हुआ यह कि रामअचल बहराइच गये और सुहेलदेव के बारे में बातचीत होते ही वे पार्टी लाइन पार करके ऐसा कुछ बोल गये जो मुस्लिम समुदाय को पसंद नहीं आया। बात भड़की तो रामअचल के साथ ही बसपा के खिलाफ समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी-अपनी लाइनों और अंदाज के हिसाब से हल्‍ला बोल दिया। बाद में पार्टी के बड़े नेताओं ने हस्‍तक्षेप कर यह तूफान शांत कराया। लेकिन इसके बाद से ही बसपा में रामअचल राजभर हीरो ही बन गये।

कुछ भी हो, राजनीतिक हैसियत हासिल करने के बाद से ही सबसे पहले रामअचल ने अपनी गरीबी के ठप्‍पे को फौरन साफ करने का अभियान छेड़ा। अकबरपुर बस अड्डे के लिए प्रशासन द्वारा पहचान की गयी 7 बीघा जमीन को उन्‍होंने हासिल करने अपनी मां भानवती के नाम पर एक पंचतारा सुविधावाला पीजी कालेज बनवा लिया। अब यहां मैनेजमेंट का कोर्स भी शुरू होना है। जमीन उनका शौक बन गया। अब तक एक झोलाछाप डॉक्‍टर से उनकी दोस्‍ती परवान चढ़ी। उसका नाम था दयाराम प्रजा‍पति। वह मंत्री का पीआरओ हो गया।

रही-सही कसर पूरी करा दी बड़े बेटे संजय ने। हालांकि छोटा बेटा अजय उर्फ मुन्‍ना केवल व्‍यवसाय देखता रहा, लेकिन संजय ने दयाराम के साथ मिल कर हर काम में पैसे का अड़ंगा लगाना शुरू कर दिया। सरकार में धमक थी इसीलिए एक रिटायर्ड निकायकर्मी अशोक पांडे की जमीन पर कब्‍जा कर लिया। अशोक बताते हैं कि इस अवैध कब्‍जे की खबर पर कोतवाल अशोक शुक्‍ला पुलिस के साथ मौके पर पहुंचे, लेकिन अचानक ही पांसा बदल गया। पुलिस ने उल्‍टे ही अवैध कब्‍जा करते हुए पांच दूकानें बनवा दीं। प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिये तो वे क्षेत्र के सांसद राकेश पांडे से शिकायत की तो वे यह कह कर सरक गये कि यह मामला मेरे बस का नहीं है। रामअचल के ननिहाल के गांव मरैला में लखनऊ के एक निकायकर्मी की एक बीघा जमीन पर रामअचल परिवार ने कब्‍जा कर रखा है। मगर कोई सुनवाई नहीं। ऐसे एक नहीं, सैकड़ों किस्‍से अंबेडकरनगर की फिजां में हैं।

रामअचल का जमीन के प्रति मोह इस जिले में कहर बन गया और रामअचल, दयाराम और उनके परिजन जमीन से उछाल लगाकर आसमान तक पहुंच गये। एक वरिष्‍ठ पत्रकार का दावा है कि पिछले पांच बरसों में रामअचल ऐंड कम्‍पनी ने 97 से ज्‍यादा जमीनों की रजिस्‍ट्री करायी है। जिधर भी नजर आती है या सवाल उठता है, तो जवाब होता है कि रामअचल राजभर। चाहे वह शहजाद रोड की नई सड़क पर 90 लाख से खरीदी गयी दूकान हो, या तहसील के पास की बेशकीमती दूकान। बसखारी रोड का 7 बीघा जमीन हो या कटेहरी के सुईडीह का 18 बीघा रकबा। रामअवध ट्रस्‍ट और भानवती ट्रस्‍ट जैसे कई ट्रस्‍ट के नाम पर जमीनों की भारी खरीद के आरोप खूब हैं। वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता आनंद द्विवेदी ने तो रामअचल राजभर से जुड़े ऐसे सैकड़ों मामलों को सूत्रबद्ध कर बाकायदा लोकायुक्‍त के पास भेज दिया है। उधर नई जिलाधिकारी निधि केसरवानी की आमद ने रामअचल की नींद उड़ा रखी है। मामला है कि जमीनों की रजिस्‍ट्री में कम मालिकियत दिखाने का। अजय सिंह बताते हैं कि मामला खुल गया तो रामअचल का साम्राज्‍य हिल जाएगा।

लेकिन इसके पहले ही कई मामले हो चुके हैं। एक राजनेता का कहना है कि डेढ़ साल पहले रामअचल के निर्माणाधीन भवन के एक कमरे में एक करोड अस्‍सी लाख की नकदी चोरी हो गयी जो भूसे में छिपा कर रखी गयी थी। रामअचल के एक करीबी रिश्‍तेदार ने यह चोरी कर उससे चार बीघा जमीन खरीद ली थी। मामला खुला तो बताते हैं कि रामअचल ने उस जमीन की रजिस्‍ट्री वापस अपने खाते में करवा दी। करीब 40 लाख की नकदी वापस भी मिली थी, लेकिन बताते हैं कि तब के कोतवाल ने भी 20 लाख अपने फेंटे में लपेट लिया था। यूपी रोडवेज में अनुबंधित वोल्‍वो बसों पर आर ऐंड आर का मतलब अजय सिंह रामअचल राजभर बताते हैं। उत्‍तराखंड और यूपी में आर ऐंड आर की ढाई सौ ज्‍यादा बसें लगी हुई हैं। जेएनएनयूआरएम बसों की खरीद में करोड़ों के घोटाले में रामअचल राजभर के कपड़ों पर छींटें पड़े हैं।

बताते हैं कि अंबेडकर नगर में चल रही ऐसी करतूतों के चलते ही शायद बसपा ने रामअचल राजभर का पिछले टिकट काट दिया था। लेकिन यह दिखने वाले दांत थे, क्‍योंकि उनके बेटे संजय को टिकट देकर रामअचल की रियासत बनाये रखने की कोशिश की गयी थी। संजय को कई महीनों पहले लखनऊ एयरपोर्ट में 20 करतूसों के साथ पुलिस ने पकड़ा था। खैर, पिछले चुनाव में संजय एक निजी स्टिंग में फंसे और नतीजे हार गये। हार से खिसियाये बसपाइयों ने जीते लोगों के जुलूस पर फायरिंग कर दी थी।

गुस्‍सायी जनता भड़क गयी और रामअचल की राइस मिल फूंक डाली दी गयी। मामले में रामअचल के साथ उनके बेटे संजय और अजय नामजद हुए। रामअचल तो किसी तरह अपना नाम कटवाने में सफल रहे, लेकिन अजय और संजय अभी तक फरार हैं। हैरत की बात तो यह है कि इस हंगामे के खिलाफ कोर्ट ने कुर्की का आदेश तो दिया, लेकिन पुलिस ने अब तक कोई कार्रवाई की ही नहीं। उधर रामअचल सिंह को इसकी फिक्र भी नहीं है। बसपा के ही एक स्‍थानीय नेता ने बताया कि रामअचल का ज्‍यादा ध्‍यान अब यूपी के बजाय उत्‍तरांचल पर है, जहां के दिग्‍गज नेतागण रामअचल के चेले हैं। मतलब साफ है कि राजनीति हो या धंधा, रामअचल राजभर अपनी बस की अंधाधुंध स्‍पीड तेज करने में जुटे रहेंगे। आखिरकार वे हरफन-मौला हैं। है कि नहीं।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है. कुमार सौवीर को ज्यादा पढ़ने-जानने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- भड़ास पर कुमार

पत्रकार ने जब वाड्रा जमीन घोटाले का सवाल पूछा तो चुप हो गईं सोनिया गांधी

नई दिल्ली: राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण समारोह के बाद सभी आमंत्रित अतिथि बगल के एक हॉल में गपशप और अल्पाहार के लिए एकत्र हुए। इनमें सभी मंत्री भी शामिल थे लेकिन सबकी नजर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर थी। पत्रकारों ने सोनिया की टिप्पणी लेने के लिए कई चाल चली, लेकिन उन्हें उनकी मुस्कुराहट के अलावा कुछ मिला तो वह कुछ मिठाइयां थी। जब उनसे पार्टी में सुधार के बारे में पूछा गया तो उम्मीद थी कि वह इस पर कुछ बोलेंगी, लेकिन उन्होंने सिर्फ इतना कहा, "पहले इस एक्सरसाइज को खत्म हो जाने दीजिए"

जब एक पत्रकार ने भूमि सौदों में कुछ गड़बड़ियों के आरोपी रहे उनके दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बारे में पूछने का दुस्साहस किया तो हमेशा की तरह वह चुप रहीं। भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखे जा रहे राहुल गांधी बयानबाजी के इस दौर में शायद मौन धारण करना ही बेहतर समझते हैं। सफेद कुर्ता-पाजामा पहने राहुल अपने तथाकथित दोस्तों के साथ बातचीत में मशगूल पाए गए। मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया जोशीले ढंग से वार्तालाप में तल्लीन थे। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा भी अपने बगलगीर के साथ कानाफूसी करते देखे गए।

थोड़ी-थोड़ी देर पर कई कांग्रेस सदस्य राहुल गांधी से हाथ मिलाने आ जाते थे। लेकिन बड़ी संख्या में जुटे पत्रकारों के लिए उनके पास चुप्पी के सिवा कुछ नहीं था। यह पूछने पर कि इस फेरबदल में उनकी क्या भूमिका रही, वह बगलें झांकने लगे। अंतत: उन्होंने पत्रकारों से कह ही दिया, "कृपया मुझे अकेला छोड़ दें।"
 

पाक काउंसलर की चोरी और सीनाजोरी पर हड़काया सीआईडी अफसरों ने

अजमेर। 27 अक्टूबर यानि बकरीद के दिन अजमेर के एक तीन सितारा होटल में जो कुछ हुआ वह सरासर चोरी और सीनाजोरी थी। भारत में स्थित पाक दूतावास के काउंसलर अबरार हाशमी राजस्थान के सीआईडी अधिकारियों को धमका रहे थे, ‘यह कोई तरीका नहीं हुआ। वीजा के नाम पर हमारे पूर्व प्रधानमंत्री को नाश्ता करने से रोका जा रहा है। आप लोगों का व्यवहार ठीक नहीं है।’ सीआईडी टीम पाक के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष शुजात हुसैन चौधरी के साथ आए पाक नेताओं के पासपोर्ट-वीजा की जांच करना चाहती थी। इसी बात को लेकर हाशमी भड़क उठे थे।

मामला राजनीतिक रंग ना ले ले और पूर्व प्रधानमंत्री का नाश्ता कहीं मुद्दा ना बन जाए, इसलिए सीआईडी टीम कुछ समय के लिए खामोश हो गई। नाश्ते के बाद जब सीआईडी टीम ने पासपोर्ट वीजा दिखाने के लिए कहा तो हाशमी फिर उनसे लड़ने-भिड़ने पर उतारू हो गए। तेज-तेज आवाज में बोलने लगे। बेसिर पैर के आरोप लगाने लगे। हाशमी ने यहां तक कह दिया कि पहले सीआईडी अधिकारी उन्हें अपने पहचान पत्र दिखाएं। आखिरकार सीआईडी के एफआरओ श्रवण कुमार मंडा और बीडी शर्मा के सब्र का बांध टूट गया। और उन्होंने हाशमी को आड़े हाथों ले लिया, ‘हमारे देश में आकर हम पर ही हावी हो रहे हो। पासपोर्ट-वीजा तो आपको दिखाने ही पडेंगे।’ उन्होंने एलान कर दिया हम जब तक नहीं कहेंगे पाक नेता यहां से कहीं नहीं जा सकेंगे और ना ही उनके साथ एस्कोर्ट जाएगी।

जुबानी जंग के बाद हारकर पाक अधिकारियों को ई-मेल के जरिए पासपोर्ट-वीजा की प्रतियां मंगानी पड़ी। ये पासपोर्ट-वीजा जयपुर की एक होटल में थे। सीआईडी अधिकारियों को जब तसल्ली हुई, उसके बाद ही पाक नेताओं की रवानगी हो पाई। इस घटनाक्रम में दो घंटे लग गए। जाहिर है तब तक पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी भी होटल की लॉबी में बैठे रहे।

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी के साथ पूर्व शिक्षा मंत्री इमरान मशूद, जावेद चटठा, राजा हामिद, यूसुफ सलाउद्दीन, मोहम्मद इकबाल, काउंसलर हाशमी और अन्य अधिकारी ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में जियारत के लिए सुबह 8 बजे अजमेर पहुंचे थे। दरगाह में ईद-उल-जुहा की नमाज के बाद सभी तीन सितारा होटल मानसिंह पैलेस में नाश्ता करने जा पहुंचे। बताया जाता है कि तय कार्यक्रम में पाक नेताओं का होटल मानसिंह जाने का कोई कार्यक्रम नहीं था। दरगाह में उनके पासपोर्ट और अजमेर आने का वीजा चैक नहीं किए गए थे। इसलिए सीआईडी अधिकारी होटल जा पहुंचे।

अपनी ड्यूटी करते हुए उन्होंने पासपोर्ट वीजा मांगे तो हाशमी भड़क गए। दरअसल पाक के सात लोग अजमेर आने थे। इनमें एक नाम तो सूची में मिटाया हुआ था। बचे छह में से भी तीन ही अजमेर पहंुचे थे। ऐसे में इस बात को लेकर भी बहस हुई कि बाकी तीन कहां हैं? सभी नेता जयपुर में ठहरे थे। इसलिए होटल मानसिंह में उनके लिए कमरे भी बुक नहीं थे। सारा घटनाक्रम होटल की लॉबी में हुआ। हाशमी का तर्क था कि मैं भारत की कई होटलों में खाना खा चुका हूं। कई जगह जा चुका हूं परंतु अजमेर में ही हमसे पासपोर्ट-वीजा मांगा गया और इसके नाम पर नाश्ता करने से रोका गया।

हैरानी की बात यह है कि जिस समय पाक दूतावास के काउंसलर हाशमी सीआईडी के मंडा और शर्मा से उलझ रहे थे, खबर हो जाने के बावजूद जिला प्रशासन या राजस्थान पुलिस के आला अधिकारी घटनास्थल पर नहीं पहुंचे। प्रशासन की ओर से प्रोटोकॉल अधिकारी सुनीता डागा मौजूद थी। संबंधित हलके के थानाधिकारी भी बाद में पहुंचे।

सियासत और हकीकत

ईद की नमाज के तुरंत बाद पत्रकारों से बातचीत में चौधरी ने कहा कि कश्मीर मुद्दा हल करने के लिए पाकिस्तान और भारत को सख्त फैसले लेने होंगे। पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा नहीं करना चाहता परंतु वहां के लोगों को उनके हक दिलाना चाहता है। बाद में बोले, उन्हें अपने हक मिलने चाहिए।

यह हिन्दुस्तान है इसलिए

जिस दिन पाक पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी के साथ आए नेताओं के साथ सीआईडी अधिकारी अपनी पासपोर्ट-वीजा जांच की ड्यूटी निभा रहे थे और पाक काउंसलर हाशमी उनसे भिडे़ जा रहे थे, उसी दिन अमरीका जा रहे पाक की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान को अमरीकी आव्रजन अधिकरियों ने कनाडा के टोरंटो हवाई अड़डे पर उतारकर दो घंटे पूछताछ की। हाशमी या और कोई पाकिस्तानी वहां अजमेर जैसी हिमाकत करके दिखाएं, उन्हें हैसियत पता चल जाएगी।

पहले भी हुई है हिमाकत

अजमेर में पाक की यह पहली हिमाकत नहीं है। कुछ महीने पहले ही पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्री मकदूम अमीन फहीम भारत-पाक के बीच व्यापार बढ़ाने सहित करीब 63 मसलों पर बातचीत करने भारत आए थे। बाद में वे गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जियारत के लिए अजमेर आ गए। पुलिस, प्रशासन और गुप्तचर अधिकारियों को उनके अजमेर हैलीपेड पर उतरने, वहां से सर्किट हाउस और दरगाह जियारत कर वापस लौट जाने की जानकारी थी। इस कार्यक्रम को धता बताते हुए मंत्री फहीम सर्किट हाउस से सीधे आधा किलोमीटर दूर दरगाह के रास्ते में स्थित तीन सितारा होटल मेरवाड़ा स्टेट जा पहुंचे जहां पांच सौ किलोमीटर दूर बाड़मेर, जैसलमेर आदि इलाकों से आए करीब दस हजार लोगों की मीटिंग को उन्होंने संबोधित किया। बगैर तय कार्यक्रम के यह मीटिंग कैसे हुई, इतने लोग कैसे अजमेर आए, महंगा होटल किसने बुक करवाया, पैसे कहां से आए, अनुमति कब, किसने दी, इन सवालों का आज तक जिला प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं है।

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

‘घोटालेबाज’ खुर्शीद को मिला प्रमोशन, सूचना-प्रसारण मंत्रालय का कद घटा

 

एक तरह से मनमोहन सरकार ने साफ कर दिया कि उसे मीडिया की परवाह नहीं है। पिछले कई दिनों से घोटाले के मामले में मीडिया में जम कर बदनाम हुए सलमान खुर्शीद को विदेश मंत्रालय का इनाम दिया गया है, जबकि सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कद छोटा कर दिया गया है। इतना ही नहीं, आईपीएल घोटाले में बदनाम होकर मंत्रीपद छोड़ने वाले शशि थरूर को भी दोबारा राज्यमंत्री बनाया गया है।
 
साल 2014 के आम चुनाव से पहले केंद्रीय कैबिनेट में किए गए सबसे बड़े बदलाव के तहत सात नए कैबिनेट मंत्रियों, दो राज्यमंत्रियों (स्वतंत्र प्रभार) और 13 राज्यमंत्रियों को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शपथ दिलाई। सलमान खुर्शीद नए विदेश मंत्री और अश्वनी कुमार कानूनमंत्री बने हैं। रहमान खान को अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय, अजय माकन आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री बनाए गए हैं।
 
दिनशा पटेल को खान मंत्रालय, पल्लम राजू को मानव संसाधन विकास मंत्री, हरीश रावत को जल संसाधन मंत्री और चंद्रेश कुमारी को संस्कृति मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है।
 
वीरप्पा मोइली को इस फेरबदल में पेट्रोलियम मंत्री, ज्योतिरादित्य सिंधिया को बिजली राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सचिन पायलट निगमित मामलों के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाए गए हैं वहीं, चिरंजीवी को पर्यटन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का प्रभार दिया गया है। तारिक अनवर को कृषि राज्यमंत्री बनाया गया है।
 
मनीष तिवारी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कमान तो सौंपी गयी है लेकिन उन्हें ओहदा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का ही दिया गया है। कैबिनेट के इस फेरबदल में 16 नए चेहरे शामिल किए गए, जबकि 5 को प्रमोशन मिला। सरकार में शशि थरूर की वापसी हुई। 22 में से 6 मंत्री आंध्र प्रदेश, 3 पश्चिम बंगाल, 2 केरल, 2 पंजाब, 2 गुजरात और दिल्ली व उत्तराखंड से 1-1 मंत्री शामिल किए गए। कैबिनेट के इस फेरबदल में 21 मंत्री कांग्रेस, जबकि 1 एनसीपी का शामिल किया गया।
 
ग़ौरतलब है कि नए मंत्रियों का रास्ता साफ़ करने के लिए कई मौजूदा मंत्रियों ने इस्तीफ़ा दे दिया था। ऐसा माना जा रहा है कि इस बदलाव में बड़ी भूमिका राहुल गांधी की है जिन्हें कांग्रेस संगठन में भी आधिकारिक तौर पर नंबर दो की हैसियत मिलने वाली है।उधर, शपथ ग्रहण समारोह के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे कैबिनेट का आखिरी फेरबदल बताया है।
 
शपथ लेने वाले मंत्रियों की सूची इस प्रकार है:-
कैबिनेट :
1. के रहमान खान
2. दिनशा पटेल
3. अजय माकन
4. पल्लम राजू
5. अश्विनी कुमार
6. हरीश रावत
7. चंद्रेश कुमारी कटोच
 
राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
1. मनीष तिवारी
2. चिरंजीवी
 
राज्यमंत्री
1. शशि थरूर
2. केके सुरेश
3. तारिक अनवर
4. जयसूर्या प्रकाश रेड्डी
5. रानी नारा
6. अधीर रंजन चौधरी
7. एएच खान चौधरी
8. एस सत्यनारायण
9. निनोंग इरिंग
10. दीपा दासमुंशी
11. पोरिका बलराम नाइक
12. डॉ (श्रीमति) कृपा रवि किल्ली
13. लालचंद कटारिया
 

ज़ी-जिंदल प्रकरण में उलझा टाइम्स ग्रुप भी, ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ गरियाने का मामला

अपने राजफ़ाश करने वाले प्रेस कॉन्फ्रेंस में नवीन जिंदल बेशक पत्रकारों के साथ सवाल-जवाब सेशन से बचकर निकल लिए हों, टाइम्स नाउ पर अर्णब के कार्यक्रम में खूब जम कर बरसे। टाइम्स नाउ और ग्रुप के सभी अखबारों ने इस मसले को जम कर उछाला। ये वही टाइम्स ग्रुप है जिसकी कुछ ही दिनों पहले दुनिया भर में थुक्का-फ़जीहत हो चुकी है, लेकिन इस बार उसके आक्रामक होने का कारण कुछ और ही है।

दरअसल सुधीर चौधरी, समीर आहलूवालिया और जिंदल के अधिकारियों बीच हुई बातचीत में टाइम्स ग्रुप के तीन-चार वेंचरों का नाम आया है। समीर आहलूवालिया ने जहां इकोनॉमिक टाइम्स के फ्रंट पेज के बिके होने का आरोप लगाया था वहीं सुधीर चौधरी ने उनके मीडिया नेट के इरादों पर सवाल उठाया था।
 
दोनों संपादकों ने न सिर्फ दिल्ली टाइम्स और बॉम्बे टाइम्स के पूरे बिके होने की बात कही वहीं ये भी कहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया भी 'उन्हीं की तरह' ब्लैकमेलिंग के कारोबार में शामिल है।
 
उधर टाइम्स ग्रुप के सीईओ रवि धारीवाल ने अपनी एडीटोरियल पॉलिसी को पाक-साफ बताया है। उनके मुताबिक ज़ी ग्रुप के संपादकों के बयान 'पूरी तरह बेबुनियाद और झूठे' हैं। उन्होंने ये तो माना कि दिल्ली टाइम्स और बॉम्बे टाइम्स में एडवरटोरियल कंटेंट छपते हैं, लेकिन ये भी कहा कि उनका कोई आधार नहीं है।
 
बहरहाल, ज़ी ग्रुप के खिलाफ़ मोर्चा खोले टाइम्स ग्रुप ने बेशक जिंदल को अपनी बातें खुल कर बोलने का मंच दिया हो, लेकिन वो ये भूल रहा है कि एडिट की हुई सीडी में जिंदल ने ही जानबूझ कर टाइम्स ग्रुप वाले कमेंट डलवाए थे जो कि ऑफ द रिकॉर्ड बातों की खुफिया रिकॉर्डिंग थी।
 
किसने क्या कहा?

 
समीर: एक अखबार आप तो रोज़ पढ़ते ही होगे… इकोनॉमिक टाइम्स, इसलिए आपको पता है। ऐट लीस्ट वी आर डूइंग अ प्रॉपर डील विद यू… ऐट लीस्ट वी आर नॉट डूइंग फ्रंट पेज स्टोरी व्हिच इज पेड (हमलोग आपसे कायदे का सौदा कर रहे हैं… हमलोग फ्रंटपेज की खबर नहीं छाप रहे जो बिकी हुई हो) ईटी में तो फ्रंट पेज़ स्टोरी बिक रही हैं आजकल…
 
सुधीर: मुझे आमिर खान बता रहा था एक बार… ये मीडिया नेट वाले आमिर खान के पास पहुंच गए… जब थ्री इडियट्स रिलीज़ हो रही थी… बोला कि आप ये लो मीडिया नेट… हम जब आपकी पिक्चर रिलीज़ होगी तो पूरा सपोर्ट करेंगे… और इसमें हम आपको फोर स्टार दे देंगे…
 
सुधीर चौधरी (इस सवाल पर कि क्या देश भर का मीडिया पूरी तरह बिका हुआ है?): हां, मैं आपको बताता हूं कि रिलेशनशिप कैसे बनता है… अब मान लीजिए कि ये वोडाफोन का ऐड है (इकोनॉमिक टाइम्स में)… नेक्स्ट टाइम समथिंग इज़ हैप्पेनिंग अगेंस्ट वोडाफोन… वोडाफोन इसको बोलता है कि बॉस, वहां मेरा ये आ रहा है और ऐसा नहीं है कि वोडाफोन ने गलत काम नहीं किया… किया होगा… तभी फंसा वो… तो वोडाफोन बोलेगा, यार इसमें प्लीज़ थोड़ा देख लो… मैं तुम्हारा क्लाइंट ही हूं… मैं तुम्हारा.. यू आर… वर्किंग टुगेदर… तो उसमें क्या होता है… न्यूज़पेपर का जो मैनेज़मेंट है… थोड़ा सॉफ्ट हो जाता है…
 
समीर: दिल्ली टाइम्स, बॉम्बे टाइम्स पूरा पेड है… ए-टू-बी
 
समीर: हम क्या कर रहे हैं…? एवरीबडी डज़ इट.. एवरीबडी इज़ इन द सेम बिजनेस… स्टॉप.. इफ यू स्टॉप बिज़नेस विद टाइम्स ऑफ इंडिया.. दे विल स्टार्ट… (हर कोई ये करता है… हर कोई इसी कारोबार में है… अगर आप टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ कारोबार रोक देंगे… तो वो 'शुरु' कर देंगे…)


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आरपीआई के दबाव में बिग बॉस से बाहर किए जाएंगे असीम त्रिवेदी

 

मुंबई : अपने विवादित कार्टूनों से सुर्ख़ियों में आए आईएसी कार्यकर्ता असीम त्रिवेदी को रिऐलिटी शो बिग बॉस के घर से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। यह निर्णय शनिवार को रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (ए) के दबाव में कलर्स चैनल ने किया। आरपीआई अध्यक्ष रामदास आठवले ने असीम को निकाले जाने की मांग की थी। आठवले के मुताबिक असीम को कार्यक्रम से निकालने के फैसले के साथ ही पार्टी ने अपना पूर्व घोषित आंदोलन रद्द कर दिया है।
 
आरपीआई ने शनिवार को प्रस्तावित 'लोणावला बंद' को रद्द कर दिया और 29 अक्टूबर को 'बिग बॉस' के सेट में घुसकर त्रिवेदी को बाहर निकालने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। आठवले और चैनल अधिकारियों की बैठक हुई। बिग बॉस के प्रबंधक अभिषेक रेगे ने असीम को कार्यक्रम से बाहर निकालने का लिखित आश्वासन पार्टी को दिया। कलर्स चैनल के अधिकारी रोमिल रामघारिया का हस्ताक्षरवाला पत्र आठवले को सौंपा गया है। आठवले ने पत्रकारों को बताया कि चैनल ने उनकी मांगें मान ली हैं।
 
असीम को जल्द ही शो से विदाई दे दी जाएगी। आठवले के मुताबिक असीम ने अपने व्यंग्य चित्रों के माध्यम से भारतीय संविधान, संसद  और अशोक स्तंभ का मजाक उड़ाया है। दलित समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले असीम को कार्यक्रम में बने रहने का अधिकार नहीं हैं। असीम को बिग बॉस में शामिल किए जाने से देश में गलत संदेश जा रहा है। इसके पहले आठवले के नेतृत्‍व में मोर्चा निकाला गया था। 
 
बिग बॉस के घर के बाहर सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी की थी। आठवले ने धमकी दी थी कि अगर 29 अक्‍टूबर तक असीम को नहीं निकाला गया तो वे बिग बॉस के घर में घुसकर असीम को बाहर निकाल देंगे। इस मामले में विवाद से बचने के लिए चैनल प्रबंधन ने आठवले को असीम के शो से जल्‍द विदाई का आश्‍वासन दिया।

उन्‍होंने कहा था – यह खेल कौन और कैसे अखबार करते हैं, यह सबको पता है

 

: मीडिया की ताकत : समय से संवाद : आज समाज में विश्वास का संकट है. हर संस्था या इससे जुड़े लोग अपने कामकाज के कारण सार्वजनिक निगाह में हैं. इसलिए मौजूदा धुंध में मीडिया को विश्वसनीय बनने के लिए अभियान चलाना चाहिए. इस दिशा में पहला कदम होगा, ईमानदार मीडिया के लिए नया आर्थिक मॉडल, जिसमें मुनाफा भी हो, शेयरधारकों को पैसा भी मिले, निवेश पर सही रिटर्न भी हो और यह मीडिया व्यवसाय को भी अपने पैरों पर खड़ा कर दे. यह आर्थिक मॉडल असंभव नहीं है. मीडिया की ताकत क्या है? अगर मीडिया के पास कोई शक्ति है, तो उसका स्रोत क्या है? क्यों लगभग एक सदी पहले कहा गया कि जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो? सरकार को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. न्यायपालिका अधिकारों के कारण ही विशिष्ट है. विधायिका की संवैधानिक भूमिका है, उसे संरक्षण भी है. पर संविधान में अखबारों, टीवी चैनलों या मीडिया को अलग से एक भी अधिकार है? फिर मीडिया का यह महत्व क्यों?
 
जिसके पीछे सत्ता है, जिसे कानूनी अधिकार मिले हैं, सीमित-असीमित, वह तो समाज में सबसे विशिष्ट या महत्वपूर्ण है ही, पर मीडिया के पास तो न संवैधानिक अधिकार है, न संरक्षण. फिर भी उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. क्यों? मीडिया के पास महज एक और एक ही शक्ति स्रोत है. वह है उसकी साख. मीडिया का रामबाण भी और लक्ष्मण रेखा भी. छपे पर लोग यकीन करते हैं. लोकधारणा है कि शब्द, सरस्वती के प्रसाद हैं. सरस्वती देवी, विद्या, ज्ञान की देवी या अधिष्ठात्री हैं. वे सबसे पूज्य, पवित्र और ईश्वरीय हैं. ज्ञान का संबंध जीवन के प्रकाश (सच, तथ्यपूर्ण, हकीकत, यथार्थ वगैरह) से है, अंधेरे (झूठ, छल, प्रपंच, छद्म वगैरह) से नहीं. सरस्वती हमारे मानस में प्रकाश की, ज्ञान की, मनुष्य के अंदर जो भी सर्वश्रेष्ठ-सुंदर है, उसकी प्रतीक हैं. इसलिए छपे शब्द, ज्ञान या प्रकाशपुंज के प्रतिबिंब हैं. इसलिए हमारे यहां माना गया है कि छपे शब्द गलत हो ही नहीं सकते. सरस्वती के शब्दों पर तिजारत नहीं हो सकती. यही और यही एकमात्र मीडिया की ताकत है. शक्ति- स्रोत है. लोग मानते हैं कि जो छपा, वही सही है. टीवी चैनल, रेडियो, इंटरनेट, ब्लाग्स वगैरह सब इसी ‘प्रिंट मीडिया’ (छपे शब्दों) के ‘एक्सटेंशन’ (विस्तार) हैं. इसलिए इनके पास भी वही ताकत या शक्ति-स्रोत है, जो प्रिंट मीडिया के पास थी.
 
इस तरह, मीडिया के पास लोक साख की अपूर्व ताकत है. यह संविधान से भी ऊपर है. इसलिए संविधान के अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ (जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं) भी मीडिया की इस अघोषित साख के सामने झुकते हैं. न चाहते हुए भी उसकी ताकत-महत्व को मानने-पहचानने के लिए बाध्य हैं. पर, मीडिया जगत को महज अपनी असीमित ताकत, भूमिका और महत्व का ही एहसास है, लक्ष्मण रेखा का नहीं. और लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन का बार-बार अवसर नहीं मिलता! यह लोक जीवन का यथार्थ है. मीडिया अपनी एकमात्र पूंजी साख को बार-बार दावं पर लगाने लगे, तो क्या होगा? दावं पर लगाने के लिए फिर कोई दूसरी पूंजी नहीं है. ‘91 के उदारीकरण के दोनों असर हुए, अच्छे व बुरे भी. जीवन-देश के हर क्षेत्र में. मीडिया में भी. 1991 से ही शुरू हुई, पेज-थ्री संस्कृति. यह नयी बहस कि मीडिया का काम मनोरंजन करना है और सूचना देना भर है. इसी दौर में मीडिया में बड़ी पूंजी आयी, नौकरी की शर्तें बेहतर हुईं, पर यह सिद्धांत भी आया कि अब यह शुद्ध व्यवसाय है. विज्ञापन का व्यवसाय. खबरों का धंधा. इसका मकसद भी ‘अधिकतम मुनाफा’ (प्राफिट मैक्सिमाइजेशन) है.
 
1991 के उदारीकरण के बाद नया दर्शन था, हर क्षेत्र में निवेश पर कई गुणा रिटर्न या आमद यानी प्राफिट मैक्सिमाइजेशन. पर, जीवन के यथार्थ कुछ और भी हैं. जैसे रेत से तेल नहीं निकलता. उसी तरह मीडिया व्यवसाय में भी नैतिक ढंग से, वैधानिक ढंग से, स्वस्थ मूल्यों के साथ ‘अधिकतम वैधानिक कमाई’ की सीमा थी. चाहे प्रिंट मीडिया हो या न्यूज चैनल या रेडियो वगैरह.
 
* तब शुरू क्या हुआ?
 
साख से सौदेबाजी. अपनी एकमात्र नैतिक ताकत की नीलामी! हुआ तो बहुत कुछ है, पर इसके पहले बताते चलें कि हो क्या सकता था? ईमानदारी से मीडिया के धुरंधर और बड़े लोग कोशिश करते कि ‘मीडिया का ईमानदार आर्थिक मॉडल’ ढ़ूंढ़ा जाये. इसके रास्ते थे, बड़ी तनख्वाहों पर पाबंदी लगती या कटौती होती. अखबारों की कीमतें बढ़ायी जातीं. समाज को बताया जाता कि ईमानदार मीडिया चाहते हैं, तो अखबार की अधिक कीमत देनी पड़ेगी. मुफ्त अखबार (दो-तीन रुपये में) चाहिए और ईमानदार पत्रकारिता, यह संभव नहीं. पाकिस्तान के अखबार आज भारत के अखबारों से काफी महंगे है, पर वे बिकते हैं. यह उल्लेख करना सही होगा कि पाकिस्तान की मीडिया ने वहां के तानाशाहों के खिलाफ जो साहस दिखाया, वह साहस तो भारत में है ही नहीं. वह भी भारतीय लोकतंत्र के अंदर. फिर भी गरीब पाकिस्तानी अधिक कीमत देकर अपनी ईमानदार मीडिया को बचाये हुए है.
 
गांधी ने जब अपनी पत्रिका ‘इंडियन ओपिनियन’ शुरू की थी, तो उन्हें इस द्वंद्व से गुजरना पड़ा. वगैर विज्ञापन, पत्रिका घाटे का सौदा थी. विज्ञापन से समझौते की शर्तें शुरू होती थीं. साख या मीडिया की एकमात्र नैतिक ताकत से सौदेबाजी, उन्हें पसंद नहीं आयी. इस द्वंद्व पर उन्होंने बहुत सुंदर विवेचन किया है. उदारीकरण के बाद उनका यह विवेचन, भारतीय मीडिया के लिए आदर्श हो सकता था. रोल मॉडल या लाइट हाउस की तरह पथ प्रदर्शक. पर हमने क्या रास्ता चुना? आसान-सुविधाजनक!
 
इसकी शुरुआत भी बड़े लोगों ने की. पहले ‘एडवरटोरियल’ छपने लगे. खबर या रिपोर्ट की शक्ल में विज्ञापन. फिर पार्टियों की तसवीरें छपने लगीं, पैसे लेकर. फिर शेयर बाजार का उफान (‘बूम’) आया. कंपनियों के शेयर लेकर उन्हें प्रमोट करने का काम मीडिया जगत करने लगा. इस प्रक्रिया में हर्षद मेहता, केतन पारिख, यूएस-64 जैसे न जाने कितने लूट या सार्वजनिक डाका प्रकरण हुए. कितने हजार या लाखों करोड़ डूब गये या लूटे गये? मीडिया का तो फर्ज था, इन लोभी ताकतों से देश को आगाह करना. यह सवाल मीडिया उठाता कि रजत गुप्ता जैसे इंसान (जिस आदमी ने उल्लेखनीय बड़े काम किये, इंडियन बिजनेस स्कूल, हैदराबाद की स्थापना के अतिरिक्त अनेक काम) ने भी गलती की, तो अमेरिकी कानून ने दोषी माना. सख्त सजा दी. उस इंसान को जिसका समाज के प्रति बड़ा योगदान रहा है. देश-विदेश के कारपोरेट वर्ल्‍ड में.
 
पर भारत में कितने हर्षद मेहता, केतन पारिख या यूएस-64 के लुटेरे या राजा या कनिमोझी या कलमाड़ी जैसे लोगों को सजा मिली? सार्वजनिक लूट के लिए आज तक भारत में किसी को सजा मिली है? मीडिया का धर्म था यह देखना. मीडिया ने 1991-2010 के बीच यह नहीं देखा. परिणाम आज देश में घोटालों का भूचाल-विस्फोट का दौर आ गया है. पर, मीडिया में भी खबरें बिकने लगीं. ‘पेड न्यूज’ की शुरुआत का दौर. खबर, जिसपर लोग यकीन करते हैं, वही बिकने लगी. एकमात्र साख से सौदेबाजी. फिर 2जी प्रकरण हुआ. मीडिया जगत के बड़े स्तंभ, नाम और घराने इसमें घिरे. अब ताजा प्रकरण जिंदल और जी न्यूज विवाद का है. इसके पहले भी इंडियन एक्सप्रेस में कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री, कुछ अन्य चैनलों के बारे मे कह चुके हैं कि कैसे उनके टॉप लोग आकर धमकी देते हैं. विज्ञापन मांगते हैं! हम नहीं जानते कौन सही है या कौन गलत! हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि मीडिया में होने के कारण, हम सब इसके लिए जिम्मेवार हैं. कुछेक दोषी, कुछेक पाक-साफ, यह कहना या बताना भी हमारा मकसद नहीं.
 
पर, मीडिया अपनी आभा खो रही है. उसका सात्विक तेज खत्म हो रहा है. समाज में उसके प्रति अविश्वास ही नहीं, नफरत भी बढ़ रही है. यह किसी बाहरी सत्ता के कारण या हस्तक्षेप के कारण नहीं, खुद हम मीडिया के लोग कालिदास की भूमिका में हैं. साख की जिस एकमात्र डाल पर बैठे हैं, उसे ही काट रहे हैं. क्या मीडिया के अंदर से यह आवाज नहीं उठनी चाहिए कि हम अपनी एकमात्र पूंजी, साख बचायें? यह सवाल आज बहस का विषय नहीं. एक दूसरे पर दोषारोपण का भी नहीं. हम सही, आप गलत के आरोप-प्रत्यारोप का भी नहीं. हर मीडियाकर्मी अपनी अंतरात्मा से आज यह सवाल करे, तो शायद बात बने!
आज समाज में विश्वास का संकट है. हर संस्था या इससे जुड़े लोग अपने कामकाज के कारण सार्वजनिक निगाह में हैं. इसलिए मौजूदा धुंध में मीडिया को विश्वसनीय बनने के लिए अभियान चलाना चाहिए. इस दिशा में पहला कदम होगा, ईमानदार मीडिया के लिए नया आर्थिक मॉडल, जिसमें मुनाफा भी हो, शेयरधारकों को पैसा भी मिले, निवेश पर सही रिटर्न भी हो और यह मीडिया व्यवसाय को भी अपने पैरों पर खड़ा कर दे. यह आर्थिक मॉडल असंभव नहीं है. इसके लिए बड़े मीडिया घरानों को एक मंच पर बैठना होगा. निजी हितों और पूर्वग्रह से ऊपर उठना होगा. अपने लोभ और असीमित धन कमाने की इच्छा को रोकना होगा. इस प्रयास से मीडिया को अपनी साख पुन: बनाने का अवसर मिलेगा. मीडिया की साख बढ़ेगी, आर्थिक विकास तेज होगा, तो इसका लाभ मीडिया उद्योग जगत को भी मिलेगा.
 
मुद्दा है, संयम से काम करने का, अनुशासन में काम करने का और अचारसंहिता बना कर मीडिया की सही भूमिका में उतरने का. इसके साथ ही मीडिया की पहल पर कोई कारगर संवैधानिक व्यवस्था बने, तो मीडिया में वैल्यूज-इथिक्स (मूल्य-अचारसंहिता) की मानिटरिंग (निगरानी) करे. अगर मीडिया की सहमति से यह सब हो, तो मीडिया सचमुच भारत बदलने की प्रभावी भूमिका में होगी. याद करिए, कुछेक वर्ष पहले चंडीगढ़ प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिजनेस पेपर (पिंक पेपर्स) के बारे में क्या कहा था? बड़े संगीन और गंभीर आरोप लगाये थे. उदाहरण समेत. कहा, कैसे खराब कंपनियों के शेयर भाव अचानक बढ़ाये जाते हैं और अच्छी कंपनियों के भाव गिराये जाते हैं? यह खेल कौन और कैसे अखबार करते हैं, यह सबको पता है.
 
प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर एडीटर्स गिल्ड ने तब कमेटी भी बनायी. इससे अजीत भट्टाचार्जी जैसे पत्रकार भी जुड़े. 

कमेटी की रिपोर्ट आयी. उस रिपोर्ट को मीडिया में लागू करने की बात उठी, पर सबकुछ भुला दिया गया. मीडिया घराने सार्वजनिक क्षेत्र या जीवन से जुड़े हैं. आज के माहौल में जरूरत है कि वे सभी अपने कामकाज को सावजनिक और पारदर्शी बनाये. अंतत: इससे, इनके प्रति आस्था बढ़ेगी. इसी तरह यह काम आज मीडिया के हित में तो है ही, समाज के हित में है और देश के हित में भी.
 
लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

‘पोस्‍ट पेड’ और ‘प्री पेड’ के बाद मीडिया का ‘वसूली दौर’

 

आप अब मीडिया से संबंधित नई खबरों और चर्चाओं को देख-सुनकर चकित तक नहीं हो सकते! ये चमत्कारी खबरें अखबारों और टीवी में आई हैं. खबरें बताती हैं कि किस तरह एक चैनल के दो वरिष्ठ पत्रकार एक कॉरपोरेट घराने से, खबर के बदले वसूली का सौदा करते ‘काउंटर स्टिंग’ में आ गए और नंगे हो गए! अब तक ‘पोस्ट-पेड’ और ‘प्री-पेड’ न्यूज की शिकायतें होती थीं. अब मीडिया का ‘वसूली दौर’ सबके सामने है. पेड न्यूज से आगे न्यूज ‘देने’ या ‘न देने’ के लिए वसूली चाहने, ब्लैकमेल करने के किस्से सामने आ रहे हैं. सारी कहानी एकदम फिल्मी सीनों की तरह पब्लिक डोमेन में दृश्यमान हो रही है. यह ‘तथाकथित’ होते हुए भी, कई अकथित कहानियों का उद्घाटन करती है. कहानी के कई सिरे हैं. इसके पटकथाकार कई हैं और इसके आशय भी कई तरह के हैं.
 
कहानी बताती है कि इन दिनों बड़े मीडिया घराने, उनके वरिष्ठ अधिकारी-पत्रकार किस-किस तरह से औद्योगिक घरानों के साथ कितने बेबाक तरीके से वसूली और ब्लैकमेल में लिप्त होने लगे हैं. यह तो एक कहानी है जो सामने है. कितनी कहानियां बन रही हैं, कौन जाने? कहानी इतना आस्त करती है कि मीडिया की आवारगी पूंजी की आवारगी से जुड़कर जिस परम आजादी की बात करने लगी है वह दावा अब एक संदिग्ध मूल्य है. इस तरह के अपराध पर सत्ता उसे कभी भी नांध सकती है. ‘दोस्त’ (क्रोनी) पूंजीवादी समय में मीडिया बिजनेस के एक ‘दोस्त’ की भूमिका में काम करता है. इसलिए खबरें ‘खबरेतर दोस्ती’ से तय होती हैं. मीडिया, मीडियेतर दोस्ती से तय हो रहा है. कॉरपोरेट का काम ‘कॉरपोरेटेतर दोस्ती’ से चल रहा है. यह दल्ला-दोस्ती या ‘क्रोनीपन’ कुछ नया है. मीडिया ‘क्रोनी’ दौर में आ गया है!
 
मीडिया के समकालीन ‘पोल-खोल-पुराण’ में हर दिन उद्घाटन उत्कटता बनती रहती है. हम उत्तेजित होकर किसी बड़े बंदे की पोल खुलते देख छिपे सच के प्रकट होने का अचरज भरा सुख महसूस करते हैं और एक ऐसी नैतिक दुनिया की कल्पना करते हैं जो एक असंभावना ही होती है. हम पोल का सुख लेते हुए पोले होते जाते हैं. यह नित्य होता नैतिक क्षरण है जो मीडिया ने संभव किया है. ‘आज मीडिया बड़े-बड़ों के गरेबां में हाथ डालकर अब तक की ‘वर्जित सीमा’ का उल्लंघन करके समाज सेवा कर रहा है’; यह सोचकर हम अपने तक पहुंच रहे ‘नैतिक क्षरण’ का अनुभव तक नहीं करते.
 
चालाकियां दंग करती हुई हमें दीक्षित करती रहती हैं. हमारी आलोचना एक खिसियाहट पैदा कर कहती है कि वह इतना बना गया और हम वहीं के वहीं रह गए! यही अनुभव हमें नैतिक बनाने की जगह अवसरानुकूल रहने वाला बनाता है. क्रोनीपन की वैधता एक सामाजिक मूल्य बन जाती है. क्रोनी खबरें और चर्चाएं इसी तरह के संस्कार बनाती रहती हैं. अचानक कोई कहानी हर चैनल पर उत्कट बहस बनती है. कोई निशाना बनने लगता है और फिर अचानक वह कहानी बजनी बंद हो जाती है और उसकी जगह नई कहानी आने लगती है! सत्ता, कॉरपोरेट और मीडिया एक-दूसरे के सगे-सहोदर लगते हैं. अगर तकरार होती भी है तो शाम की पार्टी में जाम पर हुई तकरार की तरह होती है, जो सुबह तक भुला दी जाती है. इन दिनों ‘सच’ के एक से एक विकट दावे हैं, लेकिन ‘सच’ आज जितना संदिग्ध है पहले कभी नहीं था. सच को रोज बनाया जाता है.
 
पोल खोल के खेल में पहले क्षण से आखिरी क्षण तक स्पष्ट नहीं होता कि जो खोजी खबर छाप एक्सपोजर बताया जा रहा है वह किन हाथों से चला, किनके मुख से किनके कान में कू हुआ और फिर ब्रेकिंग उद्घाटन हुआ. जो पहले दिन प्रकटत: सच का दावा करने वाला था, अगले दिन वही विवादित हुआ और तीसरे दिन उसका प्रतिपक्ष आने लगा. प्रतिवादी स्वर आने लगे कि अचानक संपादक के कान में किसी ने फूंक मार दी और सब शांत हो गया. आप हर शाम एक के ‘सच’ को जिद ठान कर दूसरे के ‘सच’ पर झपटते देखते हैं. सच इतना दुष्ट कभी नहीं दिखा. मीडिया इतना छलिया कभी नहीं दिखा. निंदा-प्रतिनिंदा इतनी लोकप्रिय कभी न हुई. इतना संशयवाद कभी नहीं बना.
 
मीडिया की वसूली और ब्लैकमेल का उक्त किस्सा, एक मीडिया घराने के कुछ पत्रकारों के ‘साहस’ की दास्तान है. सीन एकदम फिल्मी हैं. काउंटर-स्टिंग से बनाई गई चौदह मिनट की एक सीडी बजती है. इसे एक उद्योगपति ने तैयार कराया है. उसका कहना है कि एक टीवी चैनल उसके कोलगेट संबंधी समाचार को दबाने हेतु अपने पत्रकारों के जरिए वसूली की कोशिशें करा रहा था. पत्रकार एक होटल में गुप्त कैमरे में बोलते नजर आते हैं कि अगर उद्योगपति सौ करोड़ रुपयों का इंतजाम कर ले, अपने विज्ञापन चैनल को देने के एक एग्रीमेंट के कागजों पर दस्तखत कर दे तो उसके खिलाफ उस चैनल में चल रही ‘कोलगेट’ कहानी धीरे-धीरे उसके पक्ष में मोड़ दी जाएगी. पत्रकार यह भी कहते हैं कि इससे बेहतर ऑफर नहीं हो सकता!
 
स्वयं को ब्लैकमेल किया जाता देख उद्योगपति के बंदों ने पत्रकारों का ‘काउंटर स्टिंग आपरेशन’ कर डाला और सारा फुटेज पत्रकार बिरादरी को दिखाया. उद्योगपति ने पुलिस से इस हरकत की शिकायत की है. प्रेस कांउसिल को लिखा है और उक्त चैनल के खिलाफ एक क्रिमिनल केस भी दायर करने जा रहे हैं. उधर उन स्टिंगित पत्रकारों का कहना है कि वह कॉरपोरेट हाउस उनको ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा था. वे स्वयं उस पर स्टिंग करने गए थे.
इस कहानी का अंत जो हो, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस ‘क्रोनीकाल’ में आरोपित पत्रकार अंतत: फिर कहीं पत्रकार बन जाएंगे. हमारे जैसे कलम घसीट, पूंजी और पत्रकार के बन रहे नए क्रोनीपन पर विचार करते रह जाएंगे और क्रोनीपन अपना चेहरा बदलकर फिर किसी नए रूप में काम कर रहा होगा! फिर कोई पोल-खोल सीन होगा, फिर बहसें होंगी, फिर कुछ मूर्ख पत्रकार पकड़े जाएंगे; लौटकर वे फिर पत्रकार बन जाएंगे!
 
लेखक सुधीश पचौरी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख समय लाइव से साभार लिया गया है. 

पत्रकार से गाली-ग्‍लौज के मामले में विजयकांत के खिलाफ मामला दर्ज

 

चेन्नई : तमिलनाडु विधान सभा में विपक्ष के नेता एवं देसिय मुरपोक्कु द्रविड कषगम डीएमडीके के संस्थापक विजयकांत आज यहां हवाई अड्डे पर पत्रकारों के साथ उलझ पड़े जिसको लेकर  पुलिस में शिकायत दर्ज करायी गयी है। हवाई अड्डा के सूत्रों ने बताया कि श्री विजयकांत पत्नी प्रेमलता और पार्टी विधायक ए.मुरगेशन के साथ जेट एयरवेज के विमान से मदुरै जाने के लिये हवाई अड्डा पहुंचे थे। वह जैसे ही कार से उतरे पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया और उनकी पार्टी के दो असंतुष्ट विधायकों की मुख्यमंत्री जे जयललिता से मुलाकात के संबंध में उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। 
 
इसके बाद एक पत्रकार ने श्री विजकांत का हाथ खींच लिया और प्रतिक्रिया देने को कहा। इस पर श्री विजयकांत तमतमा गये और दोनों पक्षों में नोकझोक हो गयी। इसके बाद बडी मुश्किल से श्री विजयकांत पत्रकारों से बातचीत के लिये तैयार हुये। सूत्रों के अनुसार जब श्री विजयकांत से उनके विधायकों की सुश्री जयललिता से मुलाकात के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इससे कहीं अधिक डेंगू का प्रकोप एवं अघोषित बिजली कटौती समेत राज्य के कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जिनके बारे में चर्चा होनी चाहिये।
 
सूत्रों के अनुसार इसके बाद श्री विजयकांत हवाई अड्डे की तरफ बढ़ने लगे तो उनके साथ वह पत्रकार भी चलने लगा जिसके साथ उनकी झड़प हुयी थी। पत्रकार ने श्री विजयकांत से कहा कि उनके निर्वाचन क्षेत्र रिशिवनधियम में भी अघोषित बिजली कटौती होती है। इस पर श्री विजयकांत खासा नाराज हो गये और उन्होंने कडक स्वर में पूछा कि पत्रकार किस मीडिया का प्रतिनिधित्व करता है। जब पत्रकार ने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने कहा, आप जया के टेलीविजन चैनल से होंगे। 
 
इसके बाद दोनों पक्षों में जोरदार बहस छिड़ गयी और इस बीच श्री मुरगेशन ने पत्रकार को धक्का भी दिया और उसे मारने की कोशिश की। माना जा रहा है कि श्री विजयकांत ने भी पत्रकार के साथ गाली-गलौज की। दोनों पक्षों में तीखी बहस के बीच श्री मुरुगेशन एवं श्री विजकांत ने पत्रप कार को गालियां देने शुर कर दी। किसी प्रकार श्री विजयकांत को लांज की तरफ ले जाया गया और फिरवह मदुरै के लिये रवाना हो गये। इस बीच पत्रकार ने इस संबंध में हवाई अड्डा पुलिस में शिकायत दर्ज करायी। चेन्नई प्रेस क्लब एवं चेन्नई पत्रकार संघ समेत राज्य के मीडियाकर्मियों के विभिन्न समूहों ने इस घटना की निन्‍दा करते हुये श्री विजयकांत और श्री मुरगेशन के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। उन्होंने इसे  प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया। (पंजाब केसरी)

पत्रकारों के दबाव में नोएडा सेक्‍टर 20 प्रभारी लाइन हाजिर

अक्‍सर आश्‍वासन देकर सामने वाले को बेवकूफ बनाने वाली नोएडा एसएसपी प्रवीण कुमार की चालाकी इस बार नहीं चली. कल एनबीटी के फोटोग्राफर से हुई बदतमीजी के मामले में एसएसपी प्रवीण कुमार ने चालाकी दिखाते हुए शनिवार शाम तक प्रभारी अरुण कुमार सिंह को हटाने का आश्‍वासन दिया था. उन्हें उम्‍मीद थी कि मामला ठण्‍डा हो जाने पर पत्रकार इस बात को भूल जाएंगे तथा अरुण कुमार सिंह सेक्‍टर 20 के प्रभारी बने रहेंगे.

 
पर एसएसपी साहब की यह चालाकी इस बार फेल हो गई. शाम तक कोई कार्रवाई ना होने पर नोएडा के पत्रकार एक बार फिर लाम‍बंद हो गए. शाम को दर्जनों की संख्‍या में पत्रकार एसएसपी आवास पहुंच गए तथा कार्रवाई की मांग करने लगे. पत्रकारों की इतनी बड़ी संख्‍या देखकर मजबूरी में प्रवीण कुमार को कार्रवाई करनी पड़ी. इसके बाद उन्होंने अरुण कुमार सिंह को लाइन हाजिर करने की बात पत्रकारों से कही.
 
ग़ौरतलब है कि प्रवीण कुमार मायावती के प्रिय अधिकारियों में से रहे हैं और जहां भी रहे उस जिले में पत्रकारों का उत्‍पीड़न होता रहा है. चंदौली में पोस्टिंग के दौरान ईटीवी के पत्रकार विजय तिवारी सहित कई मीडियाकर्मियों पर एक समाचार कवरेज के दौरान बसपाइयों ने हमला कर दिया था. उस समय बसपा के खास माने जाने वाले प्रवीण कुमार ने पत्रकारों की तहरीर पर मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि अगर पत्रकारों की तरफ से मामला दर्ज होगा तो वे दूसरे पक्ष की तरफ से भी मुकदमा दर्ज करवाएंगे. इसी दबाव के चलते पत्रकार मुकदमा दर्ज कराने से पीछे हट गए थे.
 
इसी तरह मुजफ्फरनगर व बाराबंकी में भी उनकी तैनाती के दौरान पत्रकारों का उत्‍पीड़न होता रहा और कोई भी अखबार मायावती सरकार के कारनामों के खिलाफ लिखने की हिम्मत तक नहीं कर पाता था. लेकिन हैरानी की बात ये है कि निज़ाम बदलने के बाद भी प्रवीण कुमार जुगाड़ बिठाने में भी प्रवीणता हासिल कर ली और प्रदेश के सबसे मलाईदार जिले में अपनी पोस्टिंग पर आंच नहीं आने दी.

 

दैनिक जागरण ने नहीं छापी मीडियाकर्मी से बदसलूकी की खबर

दिल्‍ली-एनसीआर में दैनिक जागरण की घटिया पत्रकारिता से मीडियाकर्मियों में रोष है. अखबार इस कदर कारपोरेट मानसिकता का पोषक तथा पुलिस का चाटुकार हो चुका है कि अब पुलिस के खिलाफ खबरें ही प्रकाशित नहीं कर रहा है. वो भी तब जब पुलिस की गुंडागर्दी का शिकार खुद मीडियाकर्मी बना. इस बात को लेकर पत्रकार इस अखबार के चरित्र पर थू – थू कर रहे हैं. 

 
मामला नोएडा के सेक्‍टर 20 कोतवाली से जुड़ा हुआ है. यहां पर तैनात रहे प्रभारी अरुण कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्‍स के फोटो जर्नलिस्‍ट के साथ बदतमीजी कर दी थी और उनके साथ के दूसरे सिपाही ने फोटो जर्नलिस्ट को थप्‍पड़ मार दिया था. दिल्‍ली-एनसीआर के पत्रकार इस घटना को लेकर एकजुट हो गए तथा एसएसपी के आवास का घेराव कर कार्रवाई की मांग की. इसके बाद एसएसपी ने सिपाही को सस्‍पेंड करने तथा कोतवाली प्रभारी को लाइन हाजिर करने का आश्‍वासन दिया. 
 
नोएडा के लगभग सभी अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया, परन्‍तु दैनिक जागरण ने मीडियाकर्मी के साथ हुई अभद्रता पर एक लाइन भी प्रकाशित करना गंवारा नहीं समझा. खैर, जागरण के लिए पत्रकारिता गई तेल लेने. शुद्ध रूप से अखबार का बिजनेस करने वाला समूह शायद अरुण कुमार और प्रवीण कुमार का कर्ज उतारने के लिए इस खबर को प्रकाशित करना उचित नहीं समझा. हां, पत्रकारिता के वसूलों की हत्‍या करना उसके लिए आसान जरूर रहा. 

पत्रकारों ने डाक्‍टर से वसूले डेढ़ लाख, दबाव के बाद लौटाया

 

पंजाब के मानसा से खबर आ रही है कि जिले के तीन पत्रकारों ने एक निजी डाक्‍टर को उपचार के नाम पर ब्‍लैकमेल करते हुए डेढ़ लाख वसूल लिए. डाक्‍टर ने जब मामला जिले के एसएसपी के पास पहुंचाया तो बदनामी के डर से बचने के लिए उक्‍त पत्रकारों ने डाक्‍टर के घर जाकर गांव के गणमान्‍य पुरुषों के सामने पैसे वापस कर दिए और माफी मांगकर पीछा छुड़ाया. गौरतलब है कि इन पत्रकारों में दैनिक भास्‍कर का पत्रकार, एक नेशनल चैनल तथा एक रीजनल चैनल का पत्रकार शामिल हैं. वहीं गांव का एक पंचायत सदस्‍य भी शामिल है. 

दिनेश शर्मा ने 4रियल न्‍यूज तथा राजेश मिश्रा ने चैनल वन ज्‍वाइन किया

दिनेश शर्मा के बारे में खबर है कि उन्‍होंने 4रियल न्‍यूज चैनल ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें गुजरात का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. दिनेश इसके पहले आजाद न्‍यूज, ए2जेड न्‍यूज समेत कई स्‍थानीय न्‍यूज चैनलों तथा अखबारों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. दिनेश की गिनती गुजरात के जाने माने पत्रकारों में की जाती है. 

 
राजेश मिश्रा के बारे में खबर है उन्होंने हमार टीवी से इस्‍तीफा देकर चैनल वन के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. राजेश लांचिंग के समय से ही हमार टीवी से जुड़े हुए थे. उन्‍हें चैनल वन में एंकर कम प्रोड्यूसर बनाया गया है. राजेश की गिनती अच्‍छे टीवी जर्नलिस्‍टों में की जाती है. पटना में ईटीवी के साथ करियर शुरू करने वाले राजेश कई और संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. कैमरामैन के रूप में टीवी इंडस्‍ट्री में कदम रखने वाले राजेश ने अपनी मेहनत के दम पर रिपोर्टिंग से लेकर एंकरिंग तक में अपना झंडा गाड़ा.

सेबी ने कहा – सहारा समूह के दबाव में न आएं निवेशक

पूंजी बाजार नियामक सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों के निवेशकों को सलाह दी है कि वे सहारा अथवा उसके एजेंटों के किसी प्रकार के दबाव में नहीं आयें। सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कार्प लिमिटेड (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कार्प लिमिटेड (एसएचआईसीएल) के निवेशकों को सलाह दी है कि उनके निवेश को समूह की दूसरी कंपनियों में लगाने के सहारा अथवा उसके एजेंटों के दबाव में नहीं आएं।

उच्चतम न्यायालय ने अगस्त में सहारा समूह की इन दोनों कपंनियों को निवेशकों से जुटाए गए 24,000 करोड़ रुपए की राशि 15 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ तीन महीने के भीतर लौटाने का आदेश दिया था। कंपनियों ने नियमों का उल्लंघन कर पूंजी बाजार से यह धन जुटाया।
 
उच्चतम न्यायालय ने सहारा की कंपनियों को निवेशकों से संबंधित सभी दस्तावेज बाजार नियामक सेबी को सौंपने का भी आदेश दिया था। सेबी ने इस संबंध में जारी एक सार्वजनिक सूचना में कहा है कि उसे निवेशकों से इस तरह की कई शिकायतें मिल रही है कि उन पर सहारा समूह की तरफ से समूह की दूसरी कंपनियों में निवेश बदलने के लिए दबाव डाला जा रहा है। सेबी की सार्वजनिक सूचना में कहा गया है दबाव में नहीं आएं, भ्रमित नहीं हों। सेबी ने निवेशकों से कहा है बांड में किए गए अपने मौजूदा निवेश को किसी अन्य योजना में बदलने के सहारा अथवा उनके एजेंट, किसी भी व्यक्ति के दबाव में नहीं आएं।
 
उच्चतम न्यायालय ने सहारा समूह द्वारा आदेश का पालन नहीं करने पर सेबी को सेबी कानून के तहत कारवाई करने को कहा है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यदि एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल निवेशकों का धन लौटाने में असफल रहती हैं तो सेबी उनकी संपत्तियां कुर्क कर सकता है और कंपनियों के बैंक खातों पर रोक लगा सकता है। सहारा समूह ने माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार निवेश से संबंधित दस्तावेज सेबी को नहीं सौंपे हैं। सेबी को निवेशकों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं, उन पर सहारा की तरफ से उनके एजेंट और अधिकारियों की तरफ से उनके निवेशक को समूह की अन्य कंपनियों जैसे क्यू शॉप यूनिक प्राडक्टस रेंज लि सहारा क्रेडिट कॉआपरेटिव सोसायटी लिमिटेड, जैसी कंपनियों में बदलने को दबाव बनाया जा रहा है।
 
सेबी के नोटिस में कहा गया है कि कुछ निवेशकों ने शिकायत की है कि उनके निवेश को सहारा समूह की दूसरी कंपनियों में बिना उनकी सहमति के ही परिवर्तित कर दिया गया है। उच्चतम न्यायालय ने अगस्त में एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल को यह भी कहा था कि 13 मार्च, 2008 और 10 अक्टूबर, 2009 को जारी दस्तावेज के जरिए उन्होंने जो राशि जुटाई है उसे राशि मिलने के दिन से लेकर लौटाने की तिथि तक सालाना 15 प्रतिशत ब्याज दर के साथ रिफंड करें। ज्ञात रहे कि करीब एक माह पूर्व ही चोरों ने इस कार्यालय के साथ लगते एक स्टोक ब्रोकर के कार्यालय का ताला तोड़कर वहां से कंप्यूटर सैट चोरी कर लिया था। इससे पूर्व भी समाचार पत्रों के स्थानीय कार्यालय भी चोरों के निशाने पर रहे है। (एजेंसी)

 

अखबार के कार्यालय से हजारों की चोरी

 

दादरी नगर की पूर्ण मार्केट में स्थित एक अखबार के कार्यालय में सेंध लगाकर चोर हजारों रुपये के समान पर हाथ साफ कर दिया. पुलिस ने इस संबंध में अज्ञात चोरों के खिलाफ मामला दर्ज कर ली है. पुलिस को दी गई तहरीर में कार्यालय प्रभारी रविंद्र सांगवान ने बताया कि गत रात्रि चोरों ने मार्केट के ऊपरी हिस्से में स्थित कार्यालय का ताला तोड़कर वहां से एक कंप्यूटर सेट, एक कैमरा, इंटरनेट डाटा कार्ड व अन्य सामान चुरा लिया.  उन्होंने बताया कि चोरों ने कार्यालय के गेट का शीशा व दरवाजा भी तोड़ दिया. 
 
तहरीर के अनुसार शनिवार सुबह एक पड़ोसी दुकानदार ने घटना की सूचना रविंद्र को दी. रविंद्र ने इसकी सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने शिकायत के आधार पर मौके का मुआयना कर अज्ञात चोरों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. इसके पहले भी यहां पर चोरों ने कई दुकानों को अपना निशाना बना चुके हैं. 

इजा ने अपने भाई को एक किडनी दान कर दी थी

 

लखनऊ से इस बार खबर आई कि प्रसिद्ध साहित्यकार शेखर जोशी की पत्‍‌नी चंद्रकला जोशी का सोमवार की रात एक बजे एसजीपीजीआइ में इलाज के दौरान निधन हो गया। दुबारा मातृशोक जैसा अहसास हुआ। मेरी मां बसंतीदेवी का निधन मधुमेह की वजह से पांव के जखम के गेंगरीन में बदल जाने से २००६ के जून महीने में हुआ। पिताजी के निधन के ठीक एक साल बाद। १९९० में अपने छह साल के भतीजे विप्लव के आकस्मिक निधन के बाद से कोई भी मौत मुझे स्पर्श नहीं करती। अपने प्रिय चाचा, चाची, ताई, पिताजी और मां के निधन के बाद लगता था कि शोक ताप से ऊपर उठ गया हूं। 
 
​गिरदा जैसे अप्रतिम मित्र और साहित्य पत्रकारिता के अनेक अग्रज साथी एक एक करके चलते बने। हमने मान लिया कि यह जीवन का व्याकरण है, इसे मानना ही होगा।​ ​इजा से मेरी मां का स्वभाव बहुत मिलता है। मेरी मां भी इजा की तरह अड़ोस पड़ोस के लोगों के सुख दुःख में हमेशा शामिल रहती थी। ​इसके विपरीत पिता एकदम यायावर थे। उन्हें अपने मिशन के आगे रोग सोक ताप स्पर्श ही नहीं करता था। शेखरजी के व्यक्तित्व कृतित्व​ के वैज्ञानिक वस्तुवादी पक्ष से परिचित लोगों के लिए इजा का विशुद्ध कुंमायूंनी आत्मीय चेहरा कभी भुलाने लायक नहीं है।
 
77 वर्षीया श्रीमती जोशी ने 1984 में अपने भाई को अपनी एक किडनी दान कर दी थी। वह इलाहाबाद में रह रही थीं। उनके दो पुत्र व एक पुत्री हैं। एक पुत्र संजय फिल्म निर्माण से जुड़े हैं तो दूसरे प्रतुल आकाशवाणी में कार्यरत हैं। अजमेर में पैदा हुई श्रीमती जोशी परास्नातक थीं और गरीबों की मदद में सदैव आगे रहती थीं। पति के साथ जबलपुर में आयोजित सम्मान समारोह से लौटकर आने के बाद वह बीमार हो गई थीं और पिछले कई दिनों से उनका इलाज चल रहा था। मंगलवार को दोपहर में भैसाकुंड में उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस अवसर पर साहित्यजगत से जुड़े कई गणमान्य लोग मौजूद थे।
 
१९७९ में डीएसबी नैनीताल से एमए पास करते ही मैं हिमालय की गोद छोड़कर इलाहाबाद के लिए निकल पड़ा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध करना उद्देश्य था। बटरोही का सुझाव था। जेब में शेखर पाछक के दिये सौ रुपये थे। मैंने घर में खबर तक नहीं दी और बरेली से सहारनपुर इलाहाबाद पैसेंजर ट्रेन पकड़कर एक सुबह इलाहाबाद पहुंच गया। सितंबर का महीना था। बटरोही ने कहा था कि शेलेश मटियानी के वहां रहना है। सुबह सुबह हम मटियानी जी के वहां पहुंचे तो पता चला कि जिस कमरे में बटरोही रहा करते थे, वह खाली नहीं है। सीधे हम शेखर​जी के घर १०० लूकरगंज पहुंच गये और इजा के परिवार में शामिल हो गये।
 
शेखर जी तब कथा साहित्य में हमारे आदर्श थे और मैं उन दिनों कहानियां भी लिखा करता था। पर उनसे सीधे परिचय नहीं था। नैनीताल समाचार और लघुभारत के मार्फत पत्र व्यवहार जरूर था। तब नैनी के फैक्ट्री में नौकरी करते थे शेखरजी। पर उस किराये के मकान में मुझे खपाने में कोई हिचक नहीं हुई उन्हें। बंटी छठीं में और संजू आठवीं में पढ़ते थे​। प्रतुल थोड़ा बड़ा था। शेखरजी का ल्यूना चला लेता था। हमारे वहां रहते हुए तो एकबार उसकी ल्यूना किसी पुलिसवाले से टकरा गयी थी। इजा के भाई सेना में बहुत बड़े अधिकारी थे। पर वे विशुद्ध कुमांयूनी इजा थीं। उनके परिवार में सारा इलाहाबाद था। तब उपेंद्र नाथ अश्क जीवित थे। नीलाभ, मंगलेस डबराल, रामजीराय और वीरेन डंगवाल की चौकड़ी के साथ था मैं। इधर लूकर गंज में रवींद्र कालिया, ममता कालिया से लेकर नरेश मेहता तक का आना जाना था। शेखरजी को अमरकांत. भैरव प्रसाद गुप्त, मार्कंडेय और दूधनाथ सिंह से अलग देखना मुश्किल था। इजा की बदौलत मैं इस विशाल परिवार में शामिल हो गया।​
 
दिसंबर १९८० में जेएनयू के मोह में उर्मिलेश के साथ मैंने इलाहाबाद छोड़ा और दिल्ली चला गया। आगे पढ़ाई तो हो नहीं सकी, १९८० में पत्रकारिता की अंधेरी सुरंग में फंस गये। धनबाद से इलाहाबाद जाना हुआ तो विवाह के बाद जब मेरठ में था मैं तब शेखर जी वहां आकर सविता और नन्हे से टुसु से मिलकर गये। कोलकाता आने के बाद हम उत्तराखंड होकर लूकरगंज पहुंचे तो सविता और टुसु से इजा की पहली और आखिरी मुलाकात​ हो गयी। तब बंटी वाराणसी में थी। संजू दिल्ली में। प्रतुल लखनऊ में जम गया था और इस परिवार में लक्ष्मी का पदार्पण हो गया था। लक्ष्मी को इजा बहुत चाहती थीं। यह संयोग ही है कि लक्ष्मी के सान्निध्य में ही उन्होंने आखिरी सांसें लीं।
​लेखक पलाश विश्‍वास वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. 

लखनऊ के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलाने और गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते योगेश प्रवीन

 

लखनऊ के हुस्न का हाल जानना हो तो योगेश प्रवीन से मिलिए। जैसे रामकथा बहुतों ने लिखी है, वैसे ही लखनऊ और अवध का इतिहास भी बहुतों ने लिखा है। पर अगर रामकथा के लिए लोग तुलसीदास को जानते हैं तो लखनऊ की कथा के लिए हम योगेश प्रवीन को जानते हैं। अब यही योगेश प्रवीन अब की अट्ठाइस अक्टूबर को पचहत्तर वर्ष के हो रहे हैं तो उन की कथा भी बांचने का मन हो रहा है। कभी नवाब वाज़िद अली शाह ने कुल्लियाते अख्तर में लिखा था- 
 
लखनऊ हम पर फ़िदा है हम फ़िदा-ए-लखनऊ
आसमां की क्या हकीकत जो छुड़ाए लखनऊ।
 
तो योगेश प्रवीन भी इस लखनऊ पर इस कदर फ़िदा और जांनिसार हैं कि लोग-बाग अब उन्हें लखनऊ का चलता फिरता इनसाइक्लोपीडिया कहते हैं। आप को लखनऊ के गली-कूचों के बारे में जानना हो या लखनऊ की शायरी या लखनऊ के नवाबों या बेगमातों का हाल जानना हो, ऐतिहासिक इमारतों, लडा़इयों या कि कुछ और भी जानना हो योगेश प्रवीन आप को तुरंत बताएंगे। और पूरी विनम्रता से बताएंगे। पूरी तफ़सील से और पूरी मासूमियत से। ऐसी विलक्षण जानकारी और ऐसी सादगी योगेश प्रवीन को प्रकृति ने दी है जो उन्हें बहुत बड़ा बनाती है। लखनऊ और अवध की धरोहरों को बताते और लिखते हुए वह अब खुद भी एक धरोहर बन चले हैं। उन का उठना-बैठना, चलना-फिरना जैसे सब कुछ लखनऊ ही के लिए होता है। लखनऊ उन को जीता है और वह लखनऊ को। लखनऊ और अवध पर लिखी उन की दर्जनों किताबें अब दुनिया भर में लखनऊ को जानने का सबब बन चुकी हैं। इस के लिए जाने कितने सम्मान भी उन्हें मिल चुके हैं।
 
लखनऊवा नफ़ासत उन के मिजाज और लेखन दोनों ही में छलकती मिलती है। उन्हें मिले दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान भी उन्हें अहंकार के तराजू पर नहीं बिठा पाए। वह उसी मासूमियत और उसी सादगी से सब से मिलते हैं। उन से मिलिए तो लखनऊ जैसे उन में बोलता हुआ मिलता है। गोया वह कह रहे हों कि मैं लखनऊ हूं ! लखनऊ पर शोध करते-करते उन का काम इतना बडा़ हो गया कि लोग अब उन पर भी शोध करने लगे हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय की हेमांशु सेन का योगेश प्रवीन पर शोध यहां कबिले ज़िक्र है। लखनऊ को ले कर योगेश प्रवीन के शोध तो महत्वपूर्ण हैं ही, लखनऊ के मद्देनज़र उन्हों ने कविता, नाटक आदि भी खूब लिखे हैं। लखनऊ से यह उन की मुहब्बत ही है कि वह लिखते हैं :
 
लखनऊ है तो महज़, गुंबदो मीनार नहीं
सिर्फ़ एक शहर नहीं, कूच और बाज़ार नहीं
इस के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलते हैं
इस की गलियों में फ़रिश्तों के पते मिलते हैं
 
जैसे इटली के रोम शहर के बारे में कहा जाता है कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ वैसे ही लखनऊ का निर्माण भी कोई एक-दो दिन में नहीं हुआ। किसी भी शहर का नहीं होता। तमाम लोगों की तरह योगेश प्रवीन भी मानते हैं कि राजा राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने इस नगर को बसाया। इस नगर को लक्ष्मणपुरी से लक्ष्मणावती और लखनावती होते हुए लखनऊ बनने में काफी समय लगा। प्रागैतिहासिक काल के बाद यह क्षेत्र मौर्य,शुंग, कुषाण, गुप्त वंशों और फिर कन्नौज नरेश हर्ष के बाद गुर्जर प्रतिहारों, गहरवालों, भारशिवों तथा रजपसियों के अधीन रहा है। वह मानते हैं कि इन सभी युगों की सामग्री जनपद में अनेक स्थानों से प्राप्त हुई है। लक्ष्मण टीले, गोमती नगर के पास रामआसरे पुरवा, मोहनलालगंज के निकट हुलासखेडा़ एवं कल्ली पश्चिम से प्राप्त अवशेषों ने लखनऊ के इतिहास को ईसा पूर्व लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व तक पीछे बढा़ दिया है। ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच यहां मुसलमानों का आगमन हुआ। इस प्रकार यहां के पूर्व निवासी भर, पासी, कायस्थ तथा ब्राह्मणों के साथ मुसलमानों की भी आबादी हो गई।
 
योगेश प्रवीन ने न सिर्फ़ लखनऊ के बसने का सिलसिलेवार इतिहास लिखा है बल्कि लखनऊ के सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व का भी खूब बखान किया है। कई-कई किताबों में। दास्ताने अवध, ताजेदार अवध, गुलिस्ताने अवध, लखनऊ मान्युमेंट्स, लक्ष्मणपुर की आत्मकथा, हिस्ट्री आफ़ लखनऊ कैंट, पत्थर के स्वप्न,अंक विलास आदि किताबों में उन्हों ने अलग-अलग विषय बना कर अवध के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। जब कि लखनऊनामा, दास्ताने लखनऊ, लखनऊ के मोहल्ले और उन की शान जैसी किताबों में लखनऊ शहर के बारे में विस्तार से बताया है। एक से एक बारीक जानकारियां। जैसे कि आज की पाश कालोनी महानगर या चांदगंज किसी समय मवेशीखाने थे। आज का मेडिकल कालेज कभी मच्छी भवन किला था। कि फ़्रांसीसियों ने कभी यहां घोड़ों और नील का व्यापार भी किया था। कुकरैल नाले के नामकरण से संबंधित जनश्रुति में वफ़ादार कुतिया को दंडित करने और कुतिया के कुएं में कूदने से उत्पन्न सोते का वर्णन करते हुए दास्ताने लखनऊ में योगेश प्रवीन लिखते हैं, ' जिस कुएं में कुतिया ने छलांग लगाई उस कुएं से ही एक स्रोत ऐसा फूट निकला जो दक्षिण की तरफ एक छोटी सी नदी की सूरत में बह चला। इस नदी को कुक्कर+ आलय का नाम दिया गया जो मुख सुख के कारण कुक्करालय हो गया फिर प्रयत्न लाघव में कुकरैल कहा जाने लगा।'
 
वह कैसे तो गुलिस्ताने अवध में बारादरी की आत्मकथा के बहाने लखनऊ का इतिहास लिखते हैं, ' फिर इस मिट्टी से एक तूफ़ान उठा जिस ने नई नवेली विदेशी सत्ता की एक बार जड़ें हिला दीं। इस तूफ़ान का नाम गदर था। बेगम हज़रतमहल ने जी-जान से सन सत्तावन की इस आग को भड़काया था। मैं ने हंस के शमाएं वतन के परवानों को इस आग में जलते देखा है। राजा जिया लाल सिंह को फांसी पर चढ़ते देखा है और मौलवी अहमदुल्ला उर्फ़ नक्कारा शाह की जांबाज़ी के नमूने देखे हैं, मगर मुद्दतों से मराज और मोहताज़ हिंदुस्तानी एक अरसे के लिए गोरों की गिरफ़्त में आ गए।
 
'कैसरबाग लूट लिया गया। करोड़ों की संपदा कौड़ी के मोल बिक रही थी। जिन के पांवों की मेंहदी देखने को दुनिया तरसती थी, वह बेगमात अवध नंगे सिर बिन चादर के महल से निकल रही थीं। जो नवाबज़ादे घोड़ी पर चढ़ कर हवाखोरी करते थे वे फ़िटन हांकने लगे थे।'
 
लक्ष्मणपुर की आत्मकथा में अवध शैली की उत्त्पत्ति के बारे में वह लिखते हैं, ' लखनऊ के स्वाभाविक आचरण के अनुरुप यहां राजपूत तथा मुगल वास्तु-कला शैली के मिले-जुले स्थापत्य वाले भवन बड़ी संख्या में मिलते हैं। भवन निर्माण कला के उसी इंडोसिरेनिक स्टाइल में कुछ कमनीय प्रयोगों द्वारा अवध वास्तुकला का उदय हुआ था।' वह लिखते हैं कि, 'लखौरी ईंटों और चूने की इमारतें जो इंडोसिरेनिक अदा में मुसकरा रही हैं, यहां की सिग्नेचर बिल्डिंग बनी हुई हैं।' वह आगे बताते हैं, ' इन मध्यकालीन इमारतों में गुप्तकालीन हिंदू सभ्यता के नगीने जड़े मिलेंगे। दिल्ली में गुलाम वंश की स्थापना काल से मुगलों की दिल्ली उजड़ने तक शेखों का लखनऊ रहा। इन छ: सदियों में सरज़मींने अवध में आफ़तों की वो आंधियां आईं कि हज़ारों बरस पहले वाली सभ्यता पर झाड़ू फिर गई। नतीज़ा यह हुआ कि वो चकनाचूर हिंदू सभ्यता या तो तत्कालीन मुस्लिम इमारतों में तकसीम हो गई या फिर लक्ष्मण टीला, किला मौहम्मदी नगर और दादूपुर की टेकरी में समाधिस्थ हो कर रह गई और यही कारण है कि लखनऊ तथा उस के आस-पास मंदिरों में खंडित मूर्तियों के ढेर लगे हैं।'
 
यह और ऐसी बेशुमार जानकारियां योगेश प्रवीन की किताबों में समाई मिलती हैं। तो बहारे अवध में लखनऊ के उत्तर-मध्य काल की तहज़ीब, रीति-रिवाज़, जीवन शैली, हिंदू और मुस्लिम-संस्कृति के इतिहास और उस के प्रभाव के बारे में उन्हों ने बड़ी तफ़सील से लिखा है। लखनऊ की शायरी जहान की ज़ुबान पर भी उन की एक बेहतरीन किताब है। लखनऊ से जुड़े तमाम शायरों मीर, हसरत मोहानी से लगायत मजाज, नूर, वाली आसी, मुनव्वर राना और तमाम शायराओं तक की तफ़सील से चर्चा है। और उन की शायरी की खुशबू भी। योगेश प्रवीन की ताजदारे अवध के बारे में अमृतलाल नागर ने लिखा था कि यह सत्यासत्य की दुर्गम पहाड़ियों के बीच कठिन शोध का परिणाम है। ज़िक्र ज़रुरी है कि अमृतलाल नागर की रचनाभूमि भी घूम-फिर कर लखनऊ ही रही है। गुलिस्ताने अवध की चर्चा करते हुए शिवानी ने लिखा है, ' गुलिस्ताने अवध में वहां के नवाबों की चाल-चलन, उन की सनक, उन का विलास-प्रिय स्वभाव, सुंदरी बेगमें, कुटिल राजनीति की असिधार में चमकती वारांगनाएं, अनिवार्य ख्वाजासरा, नवीन धनी इन सब के विषय में योगेश ने परिश्रम से लिखा है।' डूबता अवध के बारे में नैय्यर मसूद ने लिखा है कि किताब का नाम तो डूबता अवध है लेकिन हकीकत यह है कि इस किताब में हम को पुराना अवध फिर एक बार उभरता दिखाई देता है।
 
यह अनायास नहीं है कि जब कोई फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने लखनऊ आता है तो वह पहले योगेश प्रवीन को ढूंढता है फिर शूटिंग शुरु करता है। वह चाहे शतरंज के खिलाड़ी बनाने आए सत्यजीत रे हों या जुनून बनाने आए श्याम बेनेगल हों या फिर उमराव जान बनाने वाले मुजफ़्फ़र अली या और तमाम फ़िल्मकार। योगेश प्रवीन की सलाह के बिना किसी का काम चलता नहीं। ज़िक्र ज़रुरी है कि आशा भोसले, अनूप जलोटा, उदित नारायण, अग्निहोत्री बंधु समेत तमाम गायकों ने योगेश प्रवीन के लिखे भजन, गीत और गज़ल गाए हैं।
 
वैसे तो पेशे से शिक्षक रहे योगेश प्रवीन ने कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता आदि तमाम विधाओं में बहुत कुछ लिखा है। पर जैसे पूरी गज़ल में कोई एक शेर गज़ल का हासिल शेर होता है और कि वही जाना जाता है। ठीक वैसे ही योगेश प्रवीन का कुल हासिल लखनऊ ही है। वह लिखने-बोलने और बताने के लिए लखनऊ ही के लिए जैसे पैदा हुए हैं। लखनऊ, लखनऊ और बस लखनऊ ही उन की पहचान है। उन से मैं ने एक बार पूछा कि आखिर अवध और लखनऊ के बारे में लिखने के लिए उन्हें सूझा कैसे? कि वह इसी के हो कर रह गए? तो वह जैसे फिर से लखनऊ में डूब से गए। कहने लगे कि छोटी सी छोटी चीज़ को भी बड़े औकात का दर्जा देना लखनऊ का मिजाज है, इस लिए। यहां लखौरियों से महल बन जाता है। कच्चे सूत क