खबर रोकने के लिए जी के संपादकों द्वारा पचास करोड़ रुपये मांगने की खबर इंडियन एक्सप्रेस और ईटी की वेबसाइट पर भी

धीरे धीरे अन्य मीडिया हाउस भी ब्लैकमेलिंग कांड की खबर प्रकाशित करने लगे हैं, लेकिन अभी अंग्रेजी वाले ही कर रहे हैं. हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया के बाद इंडियन एक्सप्रेस और इकानामिक टाइम्स की वेबसाइट पर भी इससे संबंधित खबर प्रकाशित की गई है. दोनों ही जगहों पर खबर अंग्रेजी समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई) के हवाले से प्रकाशित की गई है. खबर में जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी का पक्ष भी शामिल किया गया है जिसमें उन्होंने आरोपों को निराधार बताया है. इंडियन एक्सप्रेस और इकानामिक टाइम्स में प्रकाशित खबर इस प्रकार है……..

इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर……..

Jindal files FIR against Zee Business

Press Trust of India : New Delhi

Naveen Jindal’s company has filed an FIR against Zee Business channel for allegedly demanding Rs 50 crore for not doing a news story on coal scam.

Delhi Police’s Crime Branch registered a case of extortion based on the complaint by the company, police sources said on Sunday.

Sudhir Chaudhary, the head of Zee Business, rubbished the allegations as “fabrication” and described it as “pressure tactics” to stop doing stories. “We have done a series of stories on coal scam based on official papers. This is a retaliation to our relentless campaign against corruption,” Chaudhary said.

इकानामिक टाइम्स की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर……….

Naveen Jindal files FIR against Zee Business

NEW DELHI: Naveen Jindal's company has filed an FIR against Zee Business channel for allegedly demanding Rs 50 crore for not doing a news story on coal scam. Delhi Police's Crime Branch registered a case of extortion based on the complaint by the company, police sources said today.

Sudhir Chaudhary, the head of Zee Business, rubbished the allegations as "fabrication" and described it as "pressure tactics" to stop doing stories. "We have done a series of stories on coal scam based on official papers. PTI


इस प्रकरण के बारे में सबसे पहले खबर भड़ास ने प्रकाशित की, जिसे पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें..

http://bhadas4media.com/edhar-udhar/6050-2012-10-06-09-52-05.html

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क्या सचमुच फंस पाएंगे ज़ी न्यूज़ के ब्लैकमेलर संपादक?

ज़ी न्यूज़ के एडीटरों पर ब्लैकमेलिंग के आरोप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि दूसरों को सच्चाई और सफाई का पाठ पढ़ाने वाले स्वनामधन्य मेनस्ट्रीम मीडिया का अपना चरित्र कितना झूठा और मैला है। कोयला आवंटन की दलाली की खबरों पर व्यापार घरानों, मंत्रालयों, दलालों और मंत्रियों के दामन पर कालिख पोतने वाली मीडिया का खुद का चेहरा कितना काला है ये भी साफ दिख गया। 

 
जिंदल एक ऐसा व्यापार घराना है जिसके संबंध कभी ज़ी न्यूज़ के मालिकों से बेहद करीबी थे, लेकिन उसी के नौकरों की क्या बिसात थी जो वे अपने मालिक के दोस्तों को ब्लैकमेल करने पहुंच गये। ऐसा तो नहीं हो सकता कि वर्षों से इसी जोड़-तोड़ में रह चुके सुधीर चौधरी और  को इस बात का पता नहीं हो। तो क्या ये सबकुछ मालिकों की जानकारी के बगैर हुआ? अगर ऐसा होता तो अबतक दोनों मीडियाकर्मियों की विदाई हो चुकी होती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ये साफ साबित करता है कि चैनल मालिक और पत्रकार चाय और चीनी की तरह घुले-मिले हैं।  
 
बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि पत्रकारों की संस्था एडीटर्स गिल्ड के आला पदाधिकारी टिप्पणी से क्यों बच रहे हैं? इस एफआईआर की खबर पिछले तीन दिनों से हरेक चैनल के न्यूज़रुम और उनके मालिकों के ड्राइंगरुम में चर्चा का विषय बनी हुई है। देश के चोटी के संपादकों की संस्था एडीटर्स गिल्ड, जो पत्रकारिता के मूल्यों और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करता है, अपने कोषाध्यक्ष के खिलाफ़ कुछ भी कहने से क्यों हिंचक रहा है? गिल्ड अगर अपने पदाधिकारी के ख़िलाफ नहीं बोल सकता तो कम से कम बचाव में भी तो उतरे। आखिर ऐसी क्या मज़बूरी है जो उसे अपना रुख तक साफ नहीं करने दे रही है?
 
क्या जिंदल ग्रुप ने जो सुबूत पेश किये हैं वो इतने पुख्ता हैं कि एडीटरों पर आरोप साबित हो जाएंगे? होटल के सीसीटीवी कैमरे में ज़ाहिर तौर पर ऑडियो रिकॉर्डिंग स्टिंग कैमरे की तरह साफ नहीं होती। इसे साबित करने के लिए जिंदल के अधिकारियों ने फोन की रिकॉर्डिंग और कॉल रिकॉर्डों का सहारा लिया है। दोनों ही पत्रकारों ने अगर खुद फोन पर बात की होगी तो यकीनन कॉल के दौरान पैसे मांगने की कोशिश नहीं की होगी। ऐसे में आरोपों को कानूनी तौर पर साबित करना मुश्किल हो सकता है। चैनल के पत्रकार ये भी कह कर बच सकते हैं कि उन्होंने ऑफिशियल वर्जन यानि आधिकारिक बयान लेने के लिए अधिकारियों से बात-मुलाक़ात की होगी। लेकिन क्या सुधीर चौधरी, समीर आहलूवालिया और ज़ी न्यूज़ प्रबंधन कभी इस सवाल का जवाब देने की स्थिति में है कि जिंदल के अधिकारियों से मिलने (या फिर रिपोर्ट पर ऑफिशियल बाइट लेने) के लिए चैनल हेड को क्यों जाना पड़ा जबकि उनके रिपोर्टरों पर कथित तौर पर ग्रुप के अधिकारी पहले ही हमला कर चुके हैं? 
 

क्या कोई भी बड़ा पत्रकार इसलिये कुछ कहने से बच रहा है कि उसके साथ भी कभी ऐसी ही स्थिति आ सकती है? सारी तस्वीर साफ होने

धीरज भारद्वाज
धीरज भारद्वाज
और एफआईआर दर्ज होने के बाद आखिर ये बड़े चेहरे खामोश क्यों है। देश का सबसे पुराना चैनल अभी भी अपने एडीटर के साथ क्यों खड़ा है। ये वो सवाल हैं जो पत्रकारिता से जुड़ा हर आदमी पूछता है लेकिन उससे बड़ा सवाल है कि आखिर इनका जवाब देगा कौन?

लेखक धीरज भारद्वाज कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. न्यू मीडिया के सक्रिय जर्नलिस्ट हैं. कई न्यूज वेबसाइटों में संपादक का दायित्व निभाते हुए कई बड़ी खबरें इन्होंने ब्रेक की हैं. इनसे संपर्क dhiraj.hamar@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


जी-जिंदल ब्लैकमेलिंग प्रकरण का खुलासा भड़ास ने किया, और खुलासे वाली वह खबर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें..

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सुभाष चंद्रा के लिए नवीन जिंदल से पैसे मांगे थे जी के एडिटरों ने!

जी न्यूज और जी बिजनेस के एडिटर द्वय सुधीर चौधरी व समीर अहलूवालिया ने नवीन जिंदल से अगर पैसे की मांग की थी तो अपने लिए नहीं की, अपने आका सुभाष चंद्रा के लिए की जो जी ग्रुप के मालिक हैं. सुभाष चंद्रा भी हरियाणा के हैं और नवीन जिंदल भी. इनमें आपस में बिजनेस राइवलरी है. मौका मिला तो सुभाष चंद्रा ने नवीन जिंदल को निपटाने व दूहने की ठानी. इसके लिए अपने दोनों एडिटरों को लगा दिया. ब्लैकमेलिंग व उगाही के पुराने धंधे की पोल इस बार खुल जाएगी, ये सुभाष चंद्रा को भी अंदाजा नहीं था. नए जमाने की तकनीक जानने वाले नवीन जिंदल ने नहले पर दहला दे मारा और दोनों संपादकों का स्टिंग करा लिया. बस, इससे बाजी पलट गई.

खबर रोकने के लिए पचास करोड़ रुपये मांगने से संबंधित एफआईआर नवीन जिंदल के आदमियों द्वारा दर्ज कराने के बाद भी यह एफआईआर मीडिया में खबर न बन सकी क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई वाला सिद्धांत यहां काम कर रहा था. आखिरकार फिर न्यू मीडिया ने यहां पहलकदमी की और भड़ास ने पूरे प्रकरण की रिपोर्ट छापकर मीडिया जगत में सनसनी फैला दी. हर कोई एक दूसरे से इस खबर के बारे में पता करने लगा, पूछने लगा और भड़ास का हवाला देने लगा. पर कोई जुबां खोलने को तैयार नहीं. आखिरकार जब पानी सिर के उपर गुजरने लगा तो समाचार एजेंसी पीटीआई ने खबर रिलीज की, तब जाकर अंग्रेजी अखबारों की नींद टूटी और उन्होंने खबरें प्रकाशित की.

पर हिंदी अखबार और न्यूज चैनल अब भी चुप हैं. कहां गया इनका सबसे पहले खबर ब्रेक करने का कंपटीशन. इतने बड़े घटनाक्रम पर ये चुप्पी क्यों साधे हैं. छोटी मोटी बातों को लेकर तूफान मचा देने वाले न्यूज चैनल आखिर अपनी बिरादरी के दो न्यूज चैनलों व उनके संपादकों की करतूत पर मौन क्यों हैं. और कहां हैं हिंदी अखबार जो भड़ास के यशवंत सिंह को खलनायक बनाने के लिए बड़ी बड़ी खबरें व तस्वीरें प्रकाशित कर रहे थे लेकिन अबकी वे पूरी तरह मौन साधे हैं. यशवंत सिंह खलनायक इसलिए बनाए गए क्योंकि वे मीडिया इंडस्ट्री के स्याह सफेद का बिना डरे खुलासा करते हैं और उन्हें गलत आरोपों व फर्जी मुकदमों में फंसाकर तुरत-फुरत जेल भिजवा दिया गया. लेकिन जिन संपादकों के खिलाफ आडियो-वीडियो सुबूत तक है उनसे पुलिस ने अब तक पूछताछ तक नहीं की है, कहीं किसी न्यूज चैनल पर खबर नहीं है, किसी हिंदी अखबार ने इसे खबर लायक नहीं माना.

यही है कारपोरेट मीडिया का खेल. पूंजी के मारे ये बिचारे जब अपने ही बनाए गेम में फंस जाते हैं तो ऐसी चुप्पी साध लेते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो, लेकिन जब कोई इनके करप्शन की तरफ उंगली दिखा दे तो ये उसे खलनायक की तरह पेश करने लगते हैं. इस प्रकरण पर यशवंत ने परसों ही फेसबुक पर एक टिप्पणी डाली, जिस पर कई लोगों के कमेंट आए. क्या इस प्रकरण को संपादक जी लोग अपने अपने फेसबुक वॉल पर लिखकर कोई बहस चलाना चाहेंगे? फेसबुक पर यशवंत द्वारा परसों जो स्टेटस अपडेट किया गया, वह इस प्रकार है…  


Yashwant Singh : जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के एडिटर समीर अहलूवालिया पर कई करोड़ रुपये मांगने के खिलाफ नवीन जिंदल ने दिल्ली में रिपोर्ट दर्ज कराई है.. मैंने कई बड़े मीडिया वालों से पूछ पता कर लिया, सब चुप्पी साधे हैं.. .लेकिन रिपोर्ट तो दर्ज हुई है… लोग कह रहे हैं कि आडियो वीडियो सुबूत के साथ… आखिर इतनी चुप्पी क्यों है?

    Tarun Kumar : Tarun sab loot rahe hain lootne dijie, hum janata hain, sir pitne dijie.
 
    Vinod Rajput : aakhir mausere bhai jo hain
 
    Vinod Rajput : maine apko ek msg kiya tha kuch din pahle,plz check
   
    Tarun Kumar Tarun : Gone are the days of editor, now all are ediator!
    
    Veerendra Bansal : acha
     
    Amit Kumar : sudhir choudhary or samir ka original face samne aa gaya hai or unka kala pathar FIR me darj hai
     
    Shashi Kant Gupta : khelme khel chal raha hi
     
    पद्मसंभव श्रीवास्तव : यशवंत भाई, जब ऐसी ही दुखद घटना आपके साथ घटी थी , तो एकाध ही के जुबाँ खुली थी. आपके विशाल मित्रमंडली के सदस्य तो चुप्पी साधे दूसरे सदस्यों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे थे.ऐसे कई मगरमच्छों का बसेरा वसुंधरा, वैशाली और दक्षिणी दिल्ली के आसपास है, जिनकी जीवन शैली देख अच्छे-अच्छे व्यवसायी भी शर्मा जायें. अभी तो एक मामला सामने आया है…न जाने कितने तो पुलिस के थानों में ही निपटा दिये गये हैं…! विश्वास न हो , तो नये ' समाचारपत्रों/ न्यूज़ चैनलों के प्रबंधकों से पता करे.
     
    Dinker Srivastava : इतना सन्नाटा क्यों है भाई…?
     
    Padampati Sharma : Sudhir Apane purane channel me Maha pap kar chuke hain. Jindal ne Jo kukarm kiye 5 companies ek din me bana kar is hisab Se agar Zee Ke Malikon ki bhumika Rahi ho to kya kahenge… Hazaron karod koyle Se kamae to kuchh karod media….!
     
    Padampati Sharma : Beti ki umra wali Se bush karne wale ne Tim per jab case kiya tha tab Maine kya tweet kiya tha dekhne ….
     
    Padampati Sharma : Bush nahi Bhai Byah padho
    
    Piyush Rathi : Lagta hai barf padne wali hai…lol
     
    Shravan Kumar Shukla : सच भी हो सकती है……..!
     
    Sanjaya Kumar Singh : मुझे नहीं लगता कि जिन्दल बगैर सबूत के यह सब करेंगे। अगर एफआईआर है तो सच ही होगा भले अदालत में साबित न हो या अदालत के बाहर समझौता हो जाए। चुप्पी इसलिए कि हमाम में सब नंगे हैं। इसलिए, भौंचक्क हैं कि अब क्या होगा।
     
    Ankit Singhal sab patrakar ek jaise hain aur inke gake par hath daalo to kehte hain ki hamari abhivayakti ka hanan kar rahe hain
     
    Shravan Kumar Shukla : SKS..bilkul sahi kaha.. ankit… jiske status pe ho uske bare me kya IDEA hai?..!
     
    Ankit Singhal : wo bhi isi biradri ke hain to wae bhi aise hi hain abhi inki gardan bhi dabai thi police ne
     
    Ujalacity Lucknow : media ko to badnam karke chhoda hai in channels ne
     
    Abhishek Sharma : is baat pe itnee khamoshi kyu hai bhai….
     
    Ankit Singhal : dusro se paisa aithna jante hain bus jab salary badhane ya appointment k time salary ki baat aati hai to ye kehte hain ki 5.000 lelo 5000 me aaj k zamane me kiska ghar chalta hai
     
    Piyush Tripathi : sach kabtak chhipega
     
    Nirbhay Saxena : moon varat kyon
     
    Yashwant Singh : ताजी सूचना ये आई है कि एसीपी राजेश बक्शी को जिंदल द्वारा जी के खिलाफ दर्ज कराई गई एफआईआर का जांच अधिकारी बनाया गया है. आरोप है कि जी के संपादकों ने दिल्ली के हयात होटल में नवीन जिंदल से मुलाकात कर खबर रोकने के लिए पैसे मांगे. जिंदल ने बातचीत को रिकार्ड कर लिया. ये सूचना मीडिया के एक वरिष्ठ साथी ने मुझे एसएमएस किया है. सूचना में कितनी सच्चाई है, ये तो नहीं पता लेकिन मीडिया के ढेर सारे दिग्गजों को फोन कर लिया, कोई कनफर्म नहीं कर रहा कि क्या हुआ है… आखिर इतनी चुप्पी ?
     
    Abhishek Sharma : shshssssssssssssssss!
     
    Harsh Upadhyay : koi kuch nahi kahegaaa……
     
    Deepak Yadav : जनाब… कोयले की कालिख औऱ धुंआ बड़ी दूर तक जाता है ….
     
    Mohit Sharma : dhuaa agar dikh raha bhai to kahi na kahi aag bhi zaroor laga hua hai………


सुभाष चंद्रा को यह बताना होगा कि क्या उनके निर्देश पर उनके संपादक लोग सांसद नवीन जिंदल से खबर रोकने के लिए पैसा मांगने गए थे या फिर उन लोगों ने खुद के लिए पैसा मांगने का इरादा बनाया था? लोगों का कहना है कि जी न्यूज और जी बिजनेस के दो संपादक अगर पैसे मांगने हयात होटल गए तो जरूर इसमें मालिक सुभाष चंद्रा की सहमति रही होगी. बिना उनकी मर्जी के इतने बड़े मीडिया हाउस के दो एडिटर एक साथ ऐसी डील किसी के साथ नहीं कर सकते थे. उधर, सूत्रों का कहना है कि कोल ब्लाक के प्रकरण में चपेटे में आई कुछ और कंपनियां कुछ मीडिया हाउसों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी कर रही हैं. उनके पास भी ब्लैकमेलिंग से जुड़े कई प्रमाण हैं. पूरे प्रकरण पर भड़ास की नजर है. जिंदल जी ब्लैकमेलिंग प्रकरण का सबसे पहले खुलासा भड़ास ने किया और जो पहली खबर भड़ास ने प्रकाशित किया, उसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/edhar-udhar/6050-2012-10-06-09-52-05.html

महुआ न्यूज़ से भी विदाई हुई भूपेंद्र नारायण भुप्पी की

खबर है कि भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी की महुआ ग्रुप से विदाई हो गयी है। भुप्पी ने पिछले साल अप्रैल में महुआ ग्रुप में बतौर ऑपरेशन हेड ज्वाइन किया था। वे सीधे मालिक पीके तिवारी को रिपोर्ट कर रहे थे और ग्रुप के लायजनिंग के सभी काम देख रहे थे। इसकी ऐवज़ में उन्हें मोटी तनख्वाह भी मिल रही थी लेकिन इसके बावजूद वे तिवारी के जेल जाने और फ्रॉड संबंधित मामलों को निपटाने में कुछ खास नहीं कर पाए।

आजतक में कई राज्यों के ब्यूरोचीफ रह चुके भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और पीके तिवारी, दोनों एक ही गाजीपुर जिले के निवासी हैं और इनके बीच पहले से अच्छे संबंध रहे थे। बताया जाता है कि महुआ चैनल की शुरुआत के वक्त पीके तिवारी ने भुप्पी को ज्वाइन करने का ऑफर दिया था लेकिन तब भुप्पी ने टीवी टुडे जैसे बड़े ग्रुप में कार्य कर रहे होने के कारण ज्वाइन करने से मना कर दिया।
 
सूत्रों के मुताबिक तब भुप्पी ने अंशुमान तिवारी को रिकमेंड किया और पीके तिवारी ने अंशुमान को नियुक्त भी कर दिया था। बाद में उन्हें भी हटा दिया गया। उधर भुप्पी पर हिमाचल के कद्दावर नेता प्रेम कुमार धूमल को ब्लैकमेल करने का आरोप लगा और कथित तौर पर उनके स्टिंग ऑपरेशन की सीडी भी अरुण पुरी के पास पहुंचा दी गयी।
 
कई विवादों के बीच आजतक से निकाले जाने के बाद कमर्शियल पायलट की डिग्री रखे भुप्पी ने हवाई जहाज भी उड़ाया, लेकिन जल्दी ही जमीन पर आना पड़ गया और नौकरी छूट गयी। बेरोजगार होने पर पीके तिवारी के हिलते-डुलते साम्राज्य को बचाने के लिए ऐसे लोगों की जरूरत थी जो शीर्ष स्तर पर दांवपेंच लगा सकें और कंपनी के हर कमजोर मोर्चे को मजबूत बना सकें। पंजाब के एक बड़े पुलिस अधिकारी के परिवार की पुत्री से शादी होने के कारण भुप्पी का कई प्रदेशों के शीर्ष लोगों से अच्छा खासा परिचय रहा है, लेकिन लगता है उनके तमाम दांव-पेच नाकारा साबित हुए।

कई अखबारों में छपे हैं ज़ी न्यूज़ के एडीटरों के ‘ब्लैकमेलिंग’ के किस्से

ज़ी न्यूज़ के एडीटरों पर ब्लैकमेलिंग के आरोप लगने की ख़बर सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स में ही प्रकाशित नहीं हुई है, बल्कि इसे देश की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी पीटीआई ने भी प्रसारित की है। टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और बिजनेस स्टैंडर्ड समेत कई अखबारों ने इसे प्रमुखता से छापा है।

हालांकि ये खबर भड़ास4मीडिया पर 6 अक्टूबर को ही प्रकाशित हो गयी थी, लेकिन तब हर किसी ने इसे कंफर्म करने से इंकार कर दिया था। ग़ौरतलब है कि भड़ास4मीडिया पर एफआईआऱ नंबर और दिल्ली पुलिस के विभाग का नाम भी प्रकाशित था, लेकिन किसी भी पक्ष ने टीका-टिप्पणी से इंकार कर दिया था।

सवाल ये भी उठता है कि अब जबकि खबर छप गयी है तब भी ज़ी न्यूज़ प्रबंधन से लेकर एडीटर्स गिल्ड के तमाम तथाकथित बड़े पत्रकारों की जुबान खामोश क्यों है?
 
टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर इस प्रकार है:
 
Jindal group alleges Rs 100cr extortion bid by Zee staff
 
NEW DELHI: The crime branch of Delhi Police has registered an FIR against two journalists with the Zee group, as well as a few others, for allegedly trying to extort Rs 100 crore from Congress MP Naveen Jindal's mining company.
 
According to a crime branch officer, the FIR, lodged under sections pertaining to extortion, comes after the HR head of the Jindal company gave a written complaint to the police against Sudhir Chaudhry, business head and editor of the Zee group, and Sameer Ahluwalia, of Zee business, as well as others, alleging they were trying to extort money from the Jindal company through advertisements in lieu of dropping certain stories regarding coal mine allocations.
 
The senior officer confirmed the FIR under appropriate sections of IPC to TOI. DCP, crime branch, however, refused to comment.
 
As per the FIR, the HR head of the Jindal company has alleged that Chaudhry and Ahluwalia met officials of the Jindal group and told them that they had stories against them which could be dropped if a certain amount of money was paid.
 
The official alleged that when the company refused to pay, the channel ran a series of malicious news items targeting the Jindals. Reacting to the charge, Sudhir Chaudhry told TOI, "These allegations are baseless, false and fabricated. The Jindals were the biggest beneficiaries in the coal block allocation scam and we had exposed them. If they are targeting us, they are targeting investigative journalism. It's an attempt to malign us and seems a result of their frustration after being exposed."
 
Chaudhry further said, "All our stories were based on proper documentation and investigations. Every media group ran the stories. Does this mean that all of them were trying to extort money from them? "
 
(एक पत्रकार द्वारा भेजे गये मेल पर आधारित)
 
इस प्रकरण का खुलासा करने वाली भड़ास की खबर को पढ़ने के लिए क्लिक करें… 
 

सही साबित हुई सुधीर चौधरी पर ब्लैकमेलिंग के आरोप वाली खबर

आखिर ज़ी न्यूज़ के एडीटरों के खिलाफ एफआईआर की ख़बर सच साबित हो ही गयी। भड़ास4मीडिया.कॉम ने इस मामले में निर्भीक पत्रकारिता का उदाहरण पेश करते हुए सबसे पहले ये ख़बर छापी थी। आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक ब्लैकमेलिंग और जबरन वसूली के आरोप में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने ज़ी न्यूज़ के एडीटर सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के समीर आहलूवालिया के खिलाफ़ जिंदल ग्रुप के एक अधिकारी की तरफ़ से एफआईआर दर्ज करवाई गयी है। 

 
खबर ये भी है कि इस एफआईआर के साथ पुलिस को फोन की रिकार्डिंग और खुफिया कैमरे में दर्ज वीडियो की सीडी भी दी गयी है जिसमें सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के अधिकारी (समीर आहलूवालिया) को घूस मांगने के लिए एक फाइव स्टार होटल में आते हुए और मीटिंग करते हुए बताया गया है। एफआईआर में कहा गया है कि कोयला कांड में जिंदल ग्रुप के खिलाफ स्टोरी ना चलाने के लिए मोटी रकम (50 से 100 करोड़ रुपए) की मांग की गई थी। ये एफआईआर जिंदल ग्रुप की तरफ से करवाई गई है। 
 
खबर के मुताबिक पुलिस सूत्रों ने सिर्फ यही कहा है कि अभी जांच चल रही है क्योंकि वे सिर्फ शिकायतकर्ता के सुबूतों पर भरोसा नहीं कर सकते। उधर सुधीर चौधरी ने ऐसे किसी एफआईआर की जानकारी होने से इंकार किया है। सुधीर चौधरी ने कहा है कि उनसे अभी तक किसी भी पुलिस अधिकारी ने संपर्क नहीं किया है। हालांकि उन्होंने ये माना है कि कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़े घपले को 'बेनकाब' करने के लिये उनके चैनल ने जिंदल ग्रुप के खिलाफ कई रिपोर्ट चलाई थीं और हो सकता है कि उन्हें रुकवाने में नाकाम रहने पर ये एफआईआर दर्ज़ करवाई गयी हो।
 
पुलिस के पास दर्ज़ रिपोर्ट में कहा गया है कि सुधीर चौधरी ने जिंदल ग्रुप से संपर्क साध कर कहा था कि उनके पास ग्रुप के खिलाफ पुख्ता सुबूत हैं। पुलिस के मुताबिक सुधीर चौधरी पर आरोप है कि उन्होंने जिंदल ग्रुप से खबर न चलाने के लिये मोटी रकम मांगी थी।
 
ये है हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर:
 
Extortion charge against senior TV journalists
 
New Delhi, October 07, 2012
 
A top executive of a company owned by Congress MP Naveen Jindal has filed an FIR against Sudhir Chaudhary, editor of Zee News and another top executive of Zee Business. Sources in Delhi Police’s crime branch said investigation of the case has been given to the Inter-State Cell (ISC).
 
“The complaint of extortion against two top journalists of Zee News for not running the news on Coal blocks allocation was received from a representative of Jindal. After examining the complaint, a case has been registered and we will now be calling both the parties,” said a senior police officer, requesting anonymity.
 
When asked about the extortion amount, the officer refused to quote the exact amount but said it is over R50 crore. “The complaint is supported by call records details and video recording at a hotel, where Jindal had called these two for a meeting. We are examining the evidence,” the officer added.
 
Police said the meeting had taken place at a five-star hotel in New Delhi and apart from the evidence provided by the complainant, they have also contacted hotel authorities for CCTV footage. “We cannot rely on the evidence given by the complainant. The allegation is that Chaudhary contacted them and claimed that he had strong evidence against Jindal’s company in connection with coal scam. He demanded money for not running the story,” the officer added.
 
However, Zee News later ran the story. Sudhir Chaudhary told Hindustan Times that he has no idea about any such complaint as no one from the crime branch has contacted him so far. “We had done a series on coal scam and Jindal’s company’s name was also mentioned. This is nothing but retaliation as they couldn’t stop the stories,” he said. “The allegations are false and fabricated and the intention is just to gag the media,” he added. A spokesperson for Jindal Steel, however, said he is not aware of any such complaint.
 
इस प्रकरण से संबंधित खबर जो सबसे पहले भड़ास पर प्रकाशित हुई, पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….
 
 

 

नहीं रहे मेघालय के वरिष्ठ पत्रकार प्रसाद गुप्ता

पीटीआई से मिली ख़बर के मुताबिक मेघालय के एक वरिष्ठ पत्रकार प्रसाद गुप्ता का शनिवार को गुवाहाटी में दिल का दौरा पड़ने से निधन से हो गया। गुप्ता के परिजन और मित्रों ने उनके निधन की जानकारी दी। 

55 वर्षीय गुप्ता के परिवार में उनकी पत्नी और तीन बेटे हैं। 

गुप्ता पत्रकार समुदाय और आम लोगों में काफी लोकप्रिय थे और उन्हें उनकी ईमानदारी और मुखर रवैये के लिए जाना जाता था। 

उन्होंने कई मीडिया संगठनों के लिए काम किया। इनमें प्रिंट और ब्रॉडकास्ट मीडिया दोनों शामिल हैं।

दस हजार में प्रेस कार्ड बेचने वाले भूत का 18 से अधिक बैंकों में है खाता

दिल्ली से प्रकाशित पुलिस पब्लिक प्रेस के सर्वेसर्वा (मालिक संपादक) पवन कुमार भूत द्वारा 10,000 रुपए में प्रेस कार्ड दिए जा रहे हैं। यूं तो पवन कुमार भूत अपनी पत्रिका के माध्यम से भारत में बढ़ रहे अपराध के ग्राफ को कम करने व पुलिस व पब्लिक के बीच सामंजस्य स्थापित करने लिए एक पहल बताता है। पर सच्चाई इससे अलग है। पवन भूत अपनी मासिक पत्रिका (जो कि कभी कभार ही छपती है) के रिपोर्टर बनाने के नाम पर लोगों से 10,000 रुपए लेकर प्रेस कार्ड दे रहा है। दो नंबर का धंधा करने वाला हो या गाड़ी चलाने वाला ड्राइवर हो या हो कोई किराणे का व्यापारी सभी को 10 हजार लेकर प्रेस कार्ड बांटे जा रहे है।

इस धोखाधड़ी के बिजनेस में पवन भूत ने किरण बेदी के नाम का उपयोग किया है। किरण बेदी को अपनी कंपनी का पार्टनर बताकर लोगों को विश्वास में लेता रहा है। जानने में आया है कि किरण बेदी द्वारा पुलिस पब्लिक प्रेस का विमोचन करवाया गया था तथा कई सेमीनारों में मुख्यवक्ता के रूप में 

पवन कुमार भूत

बुलाया गया था। विमोचन व सेमीनारों में किरण बेदी के साथ खिंचवाई गई फोटो को पवन भूत पेम्पलेट, अखबारों आदि में प्रकाशित करवाता है ताकि लोग ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ पर विश्वास करे और उससे जुड़े।

यही नहीं पवन भूत ने नेशनल टॉल फ्री नंबर 1800-11-5100 का आरंभ भी किरण बेदी के हाथों करवाया। हालांकि यह नंबर दिखावा मात्र है। पवन भूत का कहना था कि पुलिस अगर किसी की जायज शिकायत पर कार्यवाही नहीं करती है तो वो हमारे टोल फ्री नंबर पर कॉल कर सकता है, तब पुलिस पब्लिक प्रेस द्वारा उसकी मदद की जाएगी। यह लोगों को आकर्षित करने का तरीका महज है। पवन भूत ने अपनी वेबसाइट, अपनी मैगजीन व विभिन्न अखबारों इत्यादि में दिए गए विज्ञापन में किरण बेदी का फोटों लगावाकर किरण बेदी के नाम को खूब भूनाया है। जबकि किरण बेदी का कहना है कि ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के साथ उनका कोई वास्ता नहीं है। पवन भूत के खिलाफ ठगी की कई शिकायतों के बावजूद किरण बेदी का महज यह कह देना कि मैं उसके साथ नहीं हूं . . क्या पर्याप्त है ? क्या किरण बेदी को पवन भूत के खिलाफ कार्यवाही की मांग नहीं करनी चाहिए ? ऐसे ही कई सवाल है पुलिस पब्लिक प्रेस के सदस्य बनकर ठगे गए लोगों के मन में।

18 से अधिक बैंकों में खाते

कई राज्यों के लोगों को मूर्ख बनाकर अब तक करोड़ो रुपए ऐंठ चुके पवन कुमार भूत के देशभर के 18 से भी अधिक बैंकों में खाते है। सारे नियमों व सिद्धान्तों को ताक में रख कर व कानून के सिपाहियों की नाक के नीचे पवन कुमार भूत देश की जनता को ठग रहा है। जनता को भी प्रेस कार्ड का ऐसा चस्का लगा है कि बिना सोचे समझे रुपए देकर प्रेस कार्ड बनवा रहे है। जानकारी के अनुसार पवन कुमार भूत ने 2006 में ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ नाम की मासिक पत्रिका आरंभ की थी। शुरू में वह 1000 रुपए लेकर अपनी मासिक पत्रिका के रिपोर्टर नियुक्त करता था तथा रिपोर्टर के माध्यम से लोगों से 200 रुपए लेकर पत्रिका के द्विवार्षिक सदस्य बनाता था। आजकल वो राशि कई गुना बढ़ गई है। इतने बैंकों में खाते खुलवाने के पीछे पवन भूत का मकसद है कि जिस रिपोर्टर के क्षेत्र जो भी बैंक हो उस बैंक में वो सदस्यता शुल्क तुरन्त जमा करवा सके।

ना तो बीमा करवाता है और ना ही भेजता है मैगजीन

3 साल पहले पवन भूत ने रिपोर्टर फीस बढ़ाकर 1000 रुपए से 2500 रुपए कर दी तथा पत्रिका के सदस्य बनाने के लिए भी दो प्लान बनाए। अब वह प्लान के अनुसार रिपोर्टरों से पत्रिका के सदस्य बनाने लगा। 400 रुपए में द्विवार्षिक सदस्यता व 3000 रुपए में आजीवन सदस्यता दी जाने लगी। द्विवार्षिक सदस्य को 1 वर्ष की अवधि के लिए 1 लाख रुपए का दुर्घटना मृत्यु बीमा देने, पुलिस पब्लिक प्रेस का सदस्यता कार्ड व पुलिस पब्लिक प्रेस के 24 अंक डाक द्वारा भिजवाने का एवं आजीवन सदस्य को 1 वर्ष की अवधि के लिए 2 लाख रुपए का दुर्घटना मृत्यु बीमा देने का वादा किया जाता है।

अब तक रिपोर्टर बने सैंकड़ों लोगों द्वारा बनाए गए सदस्यों को महज ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के सदस्यता कार्ड के अलावा कुछ नहीं मिला है। प्रेस कार्ड व सदस्यता कार्ड की मार्केट में जबरदस्त मांग के चलते अब पवन भूत ने पुलिस पब्लिक प्रेस की सदस्यता राशि और बढ़ा दी है, अब वार्षिक सदस्यता शुल्क 400 रुपए, द्विवार्षिक सदस्यता शुल्क 1000 रुपए व आजीवन सदस्यता शुल्क 3000 रुपए कर दिया है। एसोसिएट रिपोर्टर की फीस 10,000 रुपए कर दी है। जिसे आजीवन सदस्यता मुफ्त दी जा रही है।

एक ही शहर में सैकडों रिपोर्टर

एक शहर में किसी अखबार या पत्रिका के 1, 2, 3 या 4 संवाददाता होते है, जो अलग-अलग मुद्दों पर काम करते है। लेकिन ’’पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के एक ही शहर में सैकड़ों-सैंकड़ों रिपोर्टर है। गुजरात के सूरत, बड़ोदा, गांधीनगर, महाराष्ट्र के मुम्बई, कोलकत्ता, दिल्ली, फिरोजाबाद, रांची, धनबाद में 100-100 से अधिक कार्डधारी संवाददाता है।

ऐसे की जाती है ठगी

पवन भूत विभिन्न माध्यमों से ‘‘संवाददाताओं की आवश्यकता’’ के आशय का विज्ञापन प्रकाशित करवाता है। जरूरतमंद लोग विज्ञापन में दिए पते पर सम्पर्क करते है। जहां उनसे रिपोर्टर फीस के नाम पर रुपए वसूल कर संवाददाता का फार्म भरवाया जाता है और मैगजीन के सदस्य बनाने का काम सौंपा जाता है।

रुपए देकर रिपोर्टर बना व्यक्ति मैगजीन के सदस्य बनाना शुरू करता है। उसे सदस्यता राशि का 25 प्रतिशत दिया जाता है। 1 वर्ष, 2 वर्ष और आजीवन सदस्यता के नाम पर लोगों से रुपए लिए जाते है और वादा किया जाता है कि उनकी सदस्यता अवधि तक उन्हें डाक द्वारा मैगजीन भेजी जाएगी और दुर्घटना बीमा करवाया जाएगा। लेकिन हालात जुदा है ना तो मैगजीन भेजी जाती है और ना ही किसी प्रकार का दुर्घटना बीमा करवाया जाता है। सदस्य बने लोगों को दिया जाता है तो महज सदस्यता कार्ड।

पीड़ितों ने की प्रधानमंत्री से शिकायत

कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम व प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया की सेक्रेटरी विभा भार्गव को शिकायत पत्र भेजकर ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। धोखाधड़ी के शिकार हुए देश भर के कई लोगों ने विभिन्न पुलिस थानों में एफआईआर भी दर्ज करवाई है। फरीदाबाद, कोलकत्ता के थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है। लेकिन नतीजा सिफर रहा है। अभी तक पवन भूत के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इससे ऐसा लगता है कि पवन भूत पुलिस व पब्लिक के बीच में भले ही सामंजस्य स्थापित ना करवा पाया हो, लेकिन पुलिस व प्रेस में सामंजस्य जरूर स्थापित किया है।

पवन भूत जिसकी वाकपटुता का ही कमाल है कि उसने देश की जनता से करोड़ों रुपए ठग लिए हैं। वह ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ नाम की भिजवाने का वादा कर लोगों से सदस्यता राशि के नाम पर रुपए लेता है। लेकिन पत्रिका भिजवाता नहीं है। लोग पत्रिका की मांग करते हैं या ठगी का आरोप लगाते हैं तो सफाई से कहता है ‘‘यही मेरी कमजोर नस है’’ कि मैं पत्रिका नहीं भिजवा पाता हूं।

क्या हजारों लोगों से मैगजीन के नाम से लाखों रुपए लेकर महज इतना कह देना कि किन्हीं कारणों से मैं मैगजीन नहीं भिजवा पा रहा हूं पर्याप्त है ? 5000 रुपए प्रतिमाह का झांसा देकर बेरोजगार युवाओं से हजारों रुपए लेकर उन्हें रिपोर्टर कार्ड प्रदान करने वाले पवन भूत के खिलाफ पुलिस कोई कार्यवाही करेगी या देश के लोगों को यूं ही लुटने देगी ?

अकेले भीलवाड़ा जिले में हजार से अधिक लोग ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के मार्फत ठगे गए है। उन को ना तो मैगजीन भेजी गई है और ना ही किसी किस्म का बीमा करवाया गया।

पुलिस पब्लिक प्रेस से जुड़कर पत्रकारिता में अपना भविष्य संवारने निकले ठगी के शिकार हुए युवाओं को कहना कि पुलिस पब्लिक प्रेस के मालिक पवन भूत के बहुत ही बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों से सम्पर्क है तथा कई मंत्रियों से भी मिलीभगत है जिसके चलते उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नही हो पाती है।


‘‘मैं अकेला क्या कर सकता हूं, हर तरफ भ्रष्टाचार फैला हुआ है, मैंनें भी ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के कई सदस्य जोड़े लेकिन पवन भूत ने उन सदस्यों को मैगजीन नहीं भेजी। चूंकि लोगों से सदस्यता राशि लेकर मैंनें पवन भूत को भिजवाई थी इसलिए लोगों ने मैगजीन के मुझ पर दबाव बनाया। अंत में मुझे अपनी जेब से पैसे वापस लौटाने पड़े।’’ दिनेश-ज्ञानगढ़।


सदस्यों की मैगजीन न मिलने की शिकायतों से परेशान होकर रिपोर्टर के रवि व्यास को अपना क्षेत्र छोड़कर अन्यत्र जाकर रहना पड़ रहा है। अकेले भीलवाड़ा शहर में सैकड़ों लोगों को पुलिस पब्लिक प्रेस की सदस्यता दिलवा चुके युवा रवि व्यास का कहना है कि सदस्यता फार्म में लिखा होता है कि डाक द्वारा मैगजीन भेजी जाएगी और दुर्घटना बीमा करवाया जाएगा। लेकिन जब मैगजीन नहीं आती है और बीमा नहीं करवाया जाता है तो लोग सदस्यता फार्म भरने वाले को पकड़ते है ना कि मैगजीन के मालिक और सम्पादक को।

गुजरात के हिम्मतनगर जिले के विपुल भाई पटेल का कहना है कि वो बड़े जुनून के साथ पत्रकारिता क्षेत्र में उतरे। उन्होंने एक माह में सैकड़ों लोगों को ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ की सदस्यता दे दी। लेकिन उनके पांव से जमीन तब खिसक गई जब उन्हें पवन भूत की असलियत का पता चला।


जब मैंने ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ को दखा और उसमें जगह जगह पवन भूत के साथ किरण बेदी के फोटो देखे तो इस मैगजीन से जुड़ने का ख्याल आया। मैंने पूवन भूत से बात की। उन्होनें मुझे बताया कि किरण बेदी ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के साथ है तथा हर समय पीडि़त लोगों की मदद के लिए तत्पर रहती है। तब मैं भी इस मैगजीन में पत्रकार के रूप में जुड़ा था। कई पत्रकार साथियों को भी इससे जोड़ा तथा सैकड़ो सदस्य बनाए। इससे जुड़ने के दो माह बाद ही मुझे पता चल गया कि ना तो किरण बेदी उसके साथ है और ना ही वो मैगजीन को नियमित छपवाता है। सदस्यता कार्ड पर छपे हुए केवल एक वादे को वो पूरा करता है, सदस्यता और रिपोर्टर कार्ड समय पर भिजवा देता है।

पवन भूत के बारे में मैंने किरण बेदी से भी बात की। उन्होने कई दिनों तक तो ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ और पवन भूत के बारे में कुछ बोलने पर चुप्पी साधे रखी। उन्होनें बताया कि वो पवन भूत द्वारा 

लखन सालवीआयोजित कार्यक्रमों में जाती रही है।  जब मैंनें उन्हें पूवन भूत द्वारा की जा रही ठगी के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि ‘‘आई एम नोट विथ हिम देट्स आल’’.  किरण बेदी द्वारा पवन भूत के खिलाफ कोई कार्यवाही करने की बजाए क्या महज यह कह देना पर्याप्त है?

लेखक लखन सालवी युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. 

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के पिता का निधन

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के पिता सुखदेव नारायण का निधन हो गया. उनकी उम्र 95 वर्ष थी. आखिरी दिनों में वे गिरने के चलते घायल हो गए थे. उनका निधन 29 सितंबर को बिहार के सुपौल जिले के बीरभूमि गांव में हुआ. वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं. उनके चार बेटे व एक बेटी हैं. तेरवहीं की रस्म 12 अक्टूबर को गांव में ही होगी.

पूरे जीवन सुखदेव नारायण ने कभी कोई एलौपैथिक दवा नहीं खाई और अंत तक उन्हें कोई रोग नहीं हुआ. आखिरी दिनों में डाक्टर ने जब एलोपैथिक दवा देने की कोशिश की तो उन्होंने आयुर्वेदिक दवा की मांग करते हुए एलोपैथिक दवा खाने से इनकार कर दिया था. पिता के निधन पर कई लोगों ने अजय को फोन कर अपनी शोक संवेदना व्यक्त की.
 

राबर्ट वढेरा पर आरोपों वाली खबर दैनिक भास्कर में नहीं छपी, हिंदुस्तान ने अंडरप्ले किया, जी में वढेरा की जय-जय

मीडिया विश्लेषक पुष्कर पुष्प अपने फेसबुक प्रोफाइल पर कुछ जानकारियां लगातार अपडेट कर रहे हैं… जैसे ये कि– ''दैनिक भास्कर अखबार से रोबर्ट वढेरा की खबर लगातार गायब है. अच्छा – बुरा कुछ नहीं छप रहा.'' ''जी न्यूज़ ने रॉबर्ट वढेरा की इतनी तारीफ़ की कल से उबकाई आ रही है. फिटनेस, डोले-शोले से लेकर…….''. जालंधर से एक सज्जन ने भड़ास को फोन कर सूचित किया कि- ''वढेरा की खबर तो दैनिक भास्कर से पूरी तरह गायब है, आप चाहें तो आनलाइन एडिशन पर ईपेपर चेक कर लें.''

इन सूचनाओं का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि दैनिक भास्कर समूह का दस जनपथ से बहुत करीबी है और भास्कर को कोल ब्लाक समेत कई तरह के गैर-अखबारी प्रोजेक्ट्स में भरपूर फायदा केंद्र सरकार ने दिया है. इस कारण यह अखबार कृतज्ञ मुद्रा में आकर कर्ज का फर्ज अदा कर रहा है और इसी कारण वढेरा पर आरोपों वाली खबर नहीं छाप रहा है. हिंदुस्तान अखबार जिन बिड़ला परिवार के शोभना भरतिया का है, वे कांग्रेस से राज्यसभा सांसद हैं और उनके कांग्रेस नेताओं से अच्छे रिश्ते पहले से ही रहे हैं. इसलिए वहां भी दस जनपथ के दामाद पर आरोपों की खबर अंडरप्ले होनी ही थी. अंडरप्ले होकर छप गई, यह भी गनीमत है.

जी ग्रुप वाले भी दस जनपथ के बेहद करीब हैं. इसलिए वे भी खबर दिखाने के साथ साथ वढेरा की जय जय करके उनकी इमेज बिल्डिंग का काम कर रहे हैं और आरोपों को अंडरप्ले कर रहे हैं. मीडिया में जब पूंजी का खेल शुरू हो जाता है और पूरा मकसद सालाना टर्नओवर बढ़ाने और गैर मीडिया कंपनियों को आगे बढ़ाने का हो जाता है तब मीडिया मालिक यही सब करते हैं और कर रहे हैं. ऐसे में न्यू मीडिया का रोल सबसे प्रमुख हो जाता है. न्यू मीडिया के लोगों को चाहिए कि वे फेसबुक, ट्विटर, ब्लाग, वेब, मोबाइल आदि के जरिए इन दैत्याकार मीडिया घरानों की पोलखोल लगातार जारी रखें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इनकी करतूत पहुंच सके.

अरिंदम चौधरी ने सवा सौ मीडियाकर्मियों को सड़क पर ला पटका

आईआईपीएम फेम अरिंदम चौधरी ने करीब सवा सौ मीडियाकर्मियों को बेरोजगार कर दिया है. जो बचे हैं, वे लगभग भुखमरी के शिकार हैं. इस ग्रुप की मीडिया कंपनी प्लानमैन मीडिया नाम से जानी जाती है. इस कंपनी के कई डिपार्टमेंट्स को बंद कर दिया गया है. द संडे इंडियन नाम से निकलने वाली मैग्जीन के 13 क्षेत्रीय भाषाओं के संस्करण बंद किए जा चुके हैं. सिर्फ अंग्रेजी, तमिल, भोजपुरी और हिंदी के एडिशन निकल रहे हैं.

तेरह भाषाओं के एडिशन बंद किए जाने, अन्य एडिशनों में छंटनी, कई डिपार्टमेंट बंद करने से बहुत सारे लोग बेरोजगार हुए हैं. स्पोर्ट्स वाच, फिल्म वाच, मीडिया वाच जैसी कई वाच टाइप मैग्जीनें भी यह ग्रुप प्रकाशित करता था. इन्हें भी बंद कर दिया गया है. इनके लोग भी सड़क पर आ चुके हैं. सूत्रों का कहना है कि कुल मिलाकर करीब सवा सौ लोगों की नौकरी जा चुकी है.

चुपके से हुई इस बड़ी छंटनी के खिलाफ कहीं कोई आवाज नहीं है. कलम के सिपाही कहे जाने वाले जिन लोगों को हटाया गया है, वे भी चुपचाप हट गए हैं, बिना किसी हो-हल्ला के. जो लोग वहां बने हुए हैं, उन्हें पांच से लेकर छह महीने तक की सेलरी नहीं मिली है. इसके कारण इनकी हालत किंगफिशर के कर्मचारियों जैसी हो गई है. कई लोगों के यहां तो हालात भुखमरी के हैं. सुतनू गुरु और उनके खास अनिल पांडेय पूरे ठसक के साथ कंपनी में बने हुए हैं क्योंकि ये लोग प्रबंधन के पार्ट हैं और बंदी-छंटनी के सारे फैसले ये लोग ही लागू कराते हैं.

सूत्रों के मुताबिक अरिंदम चौधरी का मूल धंधा, जो आईआईपीएम वाला है, आजकल बुरे दौर से चल रहा है. इसके दर्जन भर से ज्यादा सेंटर में कुल कुछ सौ एडमिशन ही हो पाए हैं. कभी इन सेंटरों में सब मिलाकर दसियों हजार छात्र पढ़ते थे, फ्री लैपटाप और अमेरिका घूमने के आफर के नाम पर. पर यूजीसी की सख्त हिदायत व आईआईपीएम के पास रिकगनिशन न होने के कारण छात्रों ने इस संस्थान से मुंह फेर लिया है. नए बच्चे आईआईपीएम में कम आ रहे हैं. इस कारण अचानक धंधा मंदा हो गया. इसकी गाज अरिंदम चौधरी ने मीडिया कंपनी के प्रोजेक्टस पर गिरा दी. जिन कुछ खास लोगों को प्लानमैन मीडिया से हटाया गया है उनमें ओंकारेश्वर पांडेय और विजय सोनी भी हैं. अन्य कई नामों के बारे में पता नहीं चल पाया है.

उपरोक्त खबर प्लानमैन मीडिया में कार्यरत कुछ कर्मियों द्वारा दी गई जानकारी व भेजी गई मेल पर आधारित हैं. संभव है कुछ तथ्य अधूरे व गलत हों, इसलिए आईआईपीएम और प्लानमैन मीडिया के प्रबंधकों से अनुरोध है कि वे अपना पक्ष नीचे कमेंट बाक्स में डाल दें या bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें ताकि उसे भी प्रकाशित कराया जा सके.

जिन पत्रकार पुष्प शर्मा पर रामदेव ने मढ़ा आरोप, उन पुष्प ने क्या खिलाए गुल… पढ़ें संपूर्ण स्टिंग रिपोर्ट

पत्रकार पुष्प शर्मा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेस करके बाबा रामदेव ने उन पर ब्लैकमेलिंग समेत कई आरोप लगाए थे. उन पुष्प शर्मा ने अपने खुफिया कैमरे से जो तहकीकात की, उसका विवरण आईबीएन७ और आउटलुक ने प्रकाशित किया है. पुष्प ने मेल के जरिए पूरी स्टोरी को भड़ास के पास भी भेजा है, जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

रामदेव के गुरु आखिर गायब कहां हो गए?

नई दिल्ली। बाबा रामदेव के गुरु 80 साल के स्वामी शंकरदेव 2007 में हरिद्वार के कनखल आश्रम से रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। आज तक उनका कोई पता नहीं चल सका है। पुलिस में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की ओर से गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई मगर जांच बेनतीजा रही और वो फाइल आखिर बंद कर दी गई। लेकिन क्या वाकई में पुलिसवालों ने स्वामी शंकरदेव की तलाश गंभीरता से की? आईबीएन7 और आउटलुक के लिए रिपोर्टर पुष्प शर्मा ने खुफिया कैमरे का सहारा लेकर पड़ताल की तो कई चौंकाने वाली बातें पता चलीं। इस केस से जुड़े 8 खाकी वर्दी वाले खुफिया कैमरे पर कैद हुए और लगभग सभी ने माना कि जांच में ढिलाई हुई।

स्वामी शंकरदेव ही उस दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के मालिक थे जिसके सर्वेसर्वा आज बाबा रामदेव हैं। जिस वक्त दिल्ली में बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजा रहे थे उत्तराखंड में पुलिस उनके गुरु स्वामी शंकरदेव की गुमशुदगी के केस में फाइनल रिपोर्ट लगा रही थी। स्वामी शंकरदेव अपनी कर्मभूमि हरिद्वार से 16 जुलाई 2007 को अचानक अदृश्य हो गए। हमने उनके बारे में पड़ताल की तो खुफिया कैमरे की पहली मुठभेड़ हई SOG के SI आरबी चमोला से। चमोला को ही बाबा रामदेव के गुरु को ढूंढने का जिम्मा सौंपा गया था। फिलहाल चमोला SI, आर्म्स ट्रेनिंग स्कूल, हरिद्वार हैं।

चमोला कहते हैं- बिल्कुल आया था ये केस…मैं आपको शायद बताऊं कि हमें शायद वैसे तो ऑन-पेपर ही ये कहा होगा क्योंकि इसमें कभी भी बहुत ज्यादा फोर्स नहीं किया गया कि इस केस में आप करो या इसको ओवर-काउंट करो या फिर SOG के दिए जाते हैं न स्पेशल केस।

रिपोर्टर- जो बहुत स्पेशल केस आते हैं क्योंकि SOG को तो हम क्राइम ब्रांच और STF उस लेवल पर नापते हैं।

चमोला- वो बेसिस जिस तरीके से दिए जाते हैं..उसके बाद फिर हमें डेली बेसिस से हमसे..

रिपोर्टर- अपडेट लिए जाते हैं..

चमोला- अपडेट लिए जाते हैं, लेकिन इस केस में कभी कोई अपडेट नहीं लिया गया।

रिपोर्टर- जी, तो मतलब किसका समय चल रहा था आप…अजय जोशी जी आपके साथ थे उस कोऑर्डिनेशन में।

चमोला- अजय जोशी उस समय एसपी सिटी साहब थे..

साफ है कि खुफिया कैमरे पर इस पुलिसवाले ने कबूला कि न तो उनके सीनियर अफसरों ने जांच में तेजी के लिए जोर डाला। न कभी उनसे जांच रिपोर्ट ही तलब की गई। यही नहीं, खुद बाबा रामदेव या उनके आश्रम ने भी कभी पूछा तक नहीं।

चमोला- मतलब इन लोगों की तरफ से इन तीन महीनों में कभी भी पलट के नहीं पूछा गया कि जी हमारे केस में क्या चल रहा है। हम ही लोग जाते थे।

चमोला वो अफसर हैं जिन्होंने फूलन देवी की हत्या के आरोपी राणा को तिहाड़ से भागने के दो साल बाद कोलकाता में ढूंढ निकाला था और ताज्जुब ये कि वो स्वामी शंकरदेव को नहीं ढूंढ सके। तो क्या कोई ऐसी ताकत हरिद्वार में थी जो नहीं चाहती थी कि ये अफसर ये पहेली सुलझा ले। चमोला ने योग मंदिर ट्रस्ट की ओर ही उंगली उठा दी।

चमोला- आज भी आप हरिद्वार में जाओगे.. तो काफी सारे लोग यही कहेंगे कि ये सब इन्हीं का किया हुआ काम है। वहां के लोग कहते हैं साफ बात।

रिपोर्टर- मतलब रामदेव वाली फैमली..

चमोला- हां, यस-यस.. नो डाउट.. आप इनके शायद उनसे गुरुभाई से कभी मिले हैं कर्मवीर से..

रिपोर्टर- मैं मिला हूं.. वो साफ बोला है..

चमोला- वो साफ बोलता है..

चमोला ने दावा किया कि आश्रम में कई बार अपराध की वारदात हुई हैं। बाबा रामदेव के शिष्य बालकृष्ण का नाम भी निकल पड़ा।

चमोला- 100% और इनके कई तरह के केसेज हुए थे..एक केस मुझे और याद है बालकृष्ण जी का हुआ था..

रिपोर्टर- जी..

चमोला- कोई शायद पेशेंट को देखते हुए छेड़ने-वेड़ने का कोई मामला आया था..

चमोला- इस तरह के कई केसेज हुए.. डॉक्टर यहां से जॉब छोड़कर गई, वो बनारस में थी..

रिपोर्टर- अच्छा..

चमोला- उसने आरोप लगाया था कि मेरा यौन शोषण किया गया फिर इन्होंने उसको पता नहीं कुछ पैसे-वैसे दे दिए हों…

चमोला- मैं कोशिश करूंगा अगर मुझे उसका एड्रेस या कुछ मिल पाया तो..

रिपोर्टर- सर प्लीज क्योंकि मैं..

चमोला- वो कहीं कनखल में किराए के मकान में रहती थी..

रिपोर्टर- ओके..

चमोला- और..मेरे पास एक..पता नहीं कोई लेकर के आया था उसको कि सर मेरा वहां पे बड़ा शोषण हो रहा है..

चमोला ने खुफिया कैमरे पर एक और राज खोला कि गुरु के लापता होने के बाद कनखल आश्रम में कई लोगों को हटाया गया…कई के मुंह बंद कर दिए गए…और इसके लिए बाकायदा बाउंसर्स का इस्तेमाल हुआ।

चमोला- हां, बाउंसर्स इन्होंने रखे हुए हैं…बाकायदा अप्वाइंट किया है और मेरे ख्याल से अभी इन्होंने 2-3 साल से.. जब से वो घटनाएं 2-3 हुई हैं पतंजलि में उसके बाद से इन्होंने..

रिपोर्टर – और वो 100 के करीब एक टीम है पूरी

चमोला – बाउंसर्स अप्वाइंट किए हैं

रिपोर्टर – बाउंसर्स अप्वाइंट किए हैं..तो एक बाबा के पास बाउंसर्स का क्या लेना-देना चमोला साहब वो..

चमोला – एक बाउंसर्स तो वही है रामभारत

अब अगर चमोला सच बोल रहे हैं तो स्वामी शंकरदेव के गायब होने से खुद उनके हितैषियों का नाता जुड़ता दिख रहा था। पुलिस खुद मानती रही कि दाल में कुछ काला जरूर है। लेकिन चमोला के स्वर में भी झलका कि जैसे इस केस में उत्तराखंड पुलिस के हाथ बंधे हुए थे। लेकिन क्यों और किससे कहने पर। तलाश जारी थी।

चमोला के बाद खुफिया कैमरा मिला इस केस में फाइनल रिपोर्ट लगाने वाले पुलिस अफसर से। इस अफसर ने साफ संकेत दिए कि वो एक जूनियर अफसर था फिर भी उसे इतना संवेदनशील केस जांच के लिए दिया गया और जब उसने इसपर ऐतराज जताया तो उसकी नौकरी छीनने तक की धमकी दे दी गई।

नाम है सुरेंद्र बिष्ट। जांच के समय SI, कनखल, हरिद्वार थे जबकि अभी SI, पुलिस लाइन, हरिद्वार हैं। सुरेंद्र बिष्ट खुफिया कैमरे पर अपने महकमे के आला अफसरों को कठघरे में खड़ा करते दिख रहे हैं।

रिपोर्टर- अक्टूबर तक जांच हुई 2007 में 3 महीने तक

बिष्ट- अरे साहब, उसके बाद तो बीच में 2 साल ये फाइल दबी रही

रिपोर्टर- हूं

बिष्ट- 2 साल फाइल दबी रही है

रिपोर्टर- क्यों

बिष्ट- सीओ सिटी के यहां

रिपोर्टर- वो क्यों

बिष्ट- अब पता नहीं क्यों..क्या बीच में..हमें तो बहुत बाद में मिली है..

रिपोर्टर- सीओ सिटी मणिकांत मिश्र

बिष्ट- जो भी रहे हों..दबी रही वहां पे फाइल उनकी लापरवाही..जो भी मतलब थे।

बिष्ट की मानें तो सीओ सिटी के दफ्तर में स्वामी शंकरदेव केस ने दम तोड़ा। लेकिन आखिर ऐसा हुआ क्यों, इसका जवाब उसके पास नहीं था।

रिपोर्टर- 4 साल बीत चुके थे..

बिष्ट- हां, सही बात है..

रिपोर्टर- ठीक है तो, लेकिन आप पुलिस अधिकारी मानते हैं कि इसमें साजिश का भी एंगल देखा जाना चाहिए न..

बिष्ट- हां, देखा जाना चाहिए था साजिश का भी..बिल्कुल-बिल्कुल क्योंकि उन्हें कोई बॉडी कहीं नहीं मिली, ऐसा कुछ नहीं हुआ…
सवाल है कि जब अगर उत्तराखंड पुलिस मानती है कि बाबा रामदेव के गुरु के गायब होने के पीछे साजिश हो सकती थी तो उसने इस लिहाज से जांच क्यों नहीं की।

रिपोर्टर- वो शर्तें कुछ क्लियर हैं कि बाबा शंकरदेव के न रहने से फायदा किसको होना था

बिष्ट- फायदा तो ये इन्हीं को फायदा

रिपोर्टर- किसको

बिष्ट- इन्हीं को फायदा..फायदा

रिपोर्टर- इन्हीं को किसको

बिष्ट- वो यह लोग हैं सब और क्या

रिपोर्टर- कौन-कौन

बिष्ट- रामदेव प्लस जो भी हैं

रिपोर्टर- उनकी पार्टी

बिष्ट- उनकी पार्टी और क्या

याद रहे, ये बात स्वामी शंकरदेव केस में फाइनल रिपोर्ट लगाने वाला पुलिस अधिकारी कह रहा है यानि वो अफसर जिसने ये केस बंद किया। आखिर इतने सनसनीखेज कांड की जांच एक जूनियर अफसरों को क्यों दी गई थी – खुफिया कैमरे पर दर्ज बयान चौंकाने वाला था।
बिष्ट- हां, वो आदेश करा, जबकि मैंने विरोध भी किया और फिर ये जोशी साहब आए थे उस टाइम पर..बाद में मैंने कहा सर, SO लेवल का है, इसको जो है आप किसी सीनियर अधिकारी से करवाओ.. क्यों नौकरी नहीं करनी है…मैंने कहा ठीक है साहब..

रिपोर्टर- जोशी साहब ने बोला

बिष्ट- जोशी साहब ने बोला

रिपोर्टर- मतलब फाइनल रिपोर्ट भी आपको जिद करके लगवाई..पूरी करवाई

बिष्ट- हां, खत्म करो जल्दी जल्दी

रिपोर्टर- खत्म करो जल्दी से

बिष्ट- खत्म करो इसको बहुत टाइम हो गया है..ये है और उस समय मेरे पास बिलकुल टाइम नहीं था..15-16 इन्वेस्टिगेशन थे..फिर भी प्रयास किया हमने जो भी न..

साफ है ये पुलिसवाला कह रहा है कि इस केस को किसी भी तरह निपटाने का खासा दबाव था। सवाल ये कि ये दबाव आखिर किस का था। आखिर पुलिस अफसर अपने ही महकमे के लोगों को क्यों डरा-धमका रहे थे?

आईबीएन7 और आउटलुक के लिए पत्रकार पुष्प शर्मा की तहकीकात अब एक ऐसे मुकाम पर थी जहां बाबा शंकरदेव के करीबी शक के घेरे में आए। पुलिस अफसरों ने खुलासा किया कि खुद 80 बरस के बाबा शंकरदेव ने भले ही आश्रम का अधिकार बाबा रामदेव को दे दिया था लेकिन वीटो पॉवर यानि अंतिम फैसला लेने का हक उन्होंने अपने ही पास रखा था। क्या पुलिसवाले यहां कोई साजिश सूंघ रहे थे, अगर उन्हें साजिश की भनक लगी थी तो उन्होंने जांच क्यों नहीं की। एसएस सावंत उस समय हरिद्वार के कनखल के एसएचओ थे। आज वे रुड़की भगवानपुर में एसएचओ हैं।

रिपोर्टर- सर, जो आश्रम के अंदर के लोग थे, उनका ये कहना था कि इन्हें एक तरीके से नेगलेक्ट..

सावंत- वो तो मैं भी देखता था न नेगलेक्ट

रिपोर्टर- उनका कुछ था नहीं

सावंत- वहीं बैठे रहते थे बाहर

रिपोर्टर- बाहर मतलब रोज के मामलों में उनका कोई दखल नहीं

सावंत- कुछ नहीं, उनका उन चीजों में कोई दखल नहीं हुआ करता था.. लेकिन वो उसके पास गए थे..कहीं किसी के बयान में मैंने लिया है
रिपोर्टर- हूं

सावंत- कि वो जब कर्मवीर आता था..आता था, तब वो उनसे मिलने जाते थे

रिपोर्टर- बिल्कुल-बिल्कुल..

सावंत- जिससे इन लोगों को ऐतराज था

ट्रस्ट की डीड के मुताबिक वीटो पावर उन्हीं के हाथ में थी.. यानी वो जब चाहें आश्रम के बारे में कोई भी बड़ा फैसला ले सकते थे..सवाल है कि क्या इसी वीटो पावर की वजह से वो गायब हुए? मणिकांत मिश्रा उस समय सीओ सिटी थे। आज वे देहरादून में सीओ सिटी हैं।
मणिकांत- बाबा रामदेव के लिए वो लीस्ट बॉदर्ड पर्सन हो गए होंगे..बाबा रामदेव उनकी चिंता भी नहीं करते होंगे..मरे चाहे जिए, मुझे उनसे कोई मतलब नहीं है..

रिपोर्टर- हूं

मणिकांत- लेकिन कोई साजिश थी उनको मारने में मुझे नहीं लगता.. हां, बाकी ये है कि रामदेव के लिए उसकी अब जरूरत नहीं थी शंकरदेव की..

रिपोर्टर- उनके कंधों पर पैर रखकर जितना चढ़ना था, चढ़ चुके..

मणिकांत- जितना चढ़ना था, चढ़ चुके

आखिर क्यों पुलिसवाला कह रहा था कि बाबा रामदेव के लिए उनके गुरु की अहमियत खत्म हो चुकी थी। तो क्या इसीलिए सालों साल स्वामी शंकरदेव का केस कछुए की रफ्तार से चलता रहा। प्रदीप चौहान 2011 में कनखल के एसएचओ थे आज वे एसएसआई, थाना वसंतविहार देहरादून में हैं।

प्रदीप- देखो उस समय तो राइजिंग पोजीशन पे था सही बताऊं तो रामदेव

रिपोर्टर- हूं

प्रदीप- हो सकता है सभी लोग उसके प्रभाव में शासन-प्रशासन जो रहा होगा मैं एक अपना एक आयडिया बता रहा हूं…
रिपोर्टर- हूं

प्रदीप- क्योंकि 2007 में कोई विवाद था नहीं कि जी योगगुरु था..योगगुरु था

रिपोर्टर- राइट

प्रदीप- हर कोई उसके..

रिपोर्टर- फॉलो कर रहा था

प्रदीप- फॉलो कर रहे थे या उसकी इज्जत थी

रिपोर्टर- राइट-राइट

प्रदीप- प्रशासन भी कहीं न कहीं.. शासन भी उसको वो शासन भी अब 2011 की बात आई, तो रामदेव बहुत बड़ा नाम हो चुका था वो विवाद में पड़ चुके थे..

यानि बाबा रामदेव का जलवा जलाल इतना था कि उनके गुरु के गायब होने के केस में उन पर या उनके आश्रम पर निगाहें तरेरने का साहस वर्दीवालों को भी नहीं था। हाल तो ये है कि केस के इंचार्ज रहे IPS अजय जोशी को भी इस केस में कभी साजिश की बू नहीं आई। अजय जोशी 2007 में हरिद्वार के एसपी सिटी थे

अजय- और मुझे नहीं लगता कि कोई इनको बहुत बड़ा वो मानता था

रिपोर्टर- तो खुद को अनदेखा फील किया उसकी वजह से शायद ये हुआ

अजय- नेग्लेक्टेड फील ये एक फैक्टर होता है, पर उसकी वजह से हुआ हो ये कहना

रिपोर्टर- ये जरूरी नहीं है

अजय- हां कहना बड़ा मुश्किल है

आखिर अजय जोशी क्या कहना चाह रहे हैं, क्या वो ये कह रहे हैं कि स्वामी शंकरदेव अपनी अनदेखी की वजह से ही कहीं चले गए। क्या वो ये कहना भी चाह रहे हैं कि उदासी, मायूसी से घिरे शंकरदेव का मन उचाट हो गया था और इसीलिए उस गुमशुदगी के पीछे किसी साजिश को सूंघना ठीक नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी दबाव के आगे पुलिस ने घुटने टेक दिए और बाबा रामदेव के गुरुदेव के रहस्यमय तरीके से गायब होने की फाइल कागज के पुलिंदों में दफन हो गई। ऐसा तो नहीं कि इंसाफ के पहरुओं ने तय कर लिया था कि स्वामी शंकरदेव की गुत्थी सुलझानी ही नहीं है।

बाबा शंकरदेव के गुमशुदा होने के बाद आश्रम की तरफ से कहा गया था कि वो दर्द से परेशान थे और अपनी जिंदगी से आजिज आ चुके थे इसलिए एक दिन अचानक सबकुछ छोड़कर गायब हो गए। ये तर्क उस डॉक्टर के गले बिल्कुल नहीं उतरा, जिसने बाबा शंकरदेव का आखिरी दिन तक इलाज किया था।

डॉक्टर गंभीर- और ही वाज क्वाइट फाइन, ही रिकवर्ड अ लॉट..

रिपोर्टर- हूं

डॉक्टर गंभीर – ढाई साल जब हो गया तो फिर मैंने कहा, अब आप दवाई अपनी बंद कर दो..

रिपोर्टर- हूं..

डॉक्टर गंभीर – जनरली हम लोग एक साल का ट्रीटमेंट देते हैं..

रिपोर्टर- जी..

डॉक्टर गंभीर – और स्पाइनल ट्यूबरकुलोसिस में इसको डेढ़ साल तक बढ़ा देते हैं..मतलब 6 महीने और बढ़ा देते हैं..

रिपोर्टर- हूं

डॉक्टर गंभीर – तो उतना हो चुका था..

यानि स्वामी शंकरदेव ने जल्दबाजी में कोई फैसला लिया हो, इसकी आशंका कम है.. इसीलिए उस खत पर भी सवाल खड़े हुए जो शंकरदेव के कमरे से पुलिस को मिला था.. ये खत बाबा रामदेव के जीजा यशदेव शास्त्री के नाम था, जिसमें उन देनदारों से माफी मांगी गई थी, जिसके पैसे लौटाने में शंकरदेव नाकाम रहे थे.. जांच में पता चला कि खत के साथ छेड़छाड़ हुई थी..11 जुलाई 2007 की तारीख काटकर 14 जुलाई 2007 लिखी गई..तारीख बदलने के लिए इस्तेमाल हुई स्याही अलग थी..खत जल्दी में लिखा गया था..जो आखिरी खत लिखने वालों की शैली से उलट बात थी..।

खत से शंकरदेव की गुमशुदगी का राज और गहरा गया.. ऐसे में आखिरी लेकिन अहम सवाल ये कि क्या अपने ट्रस्ट में कानूनी अहमियत ही शंकरदेव की उनकी जान की दुश्मन बन गई.. लेकिन हैरत है कि पुलिस ने जांच का ये पहलू कभी नहीं छुआ।

”मुझे सांसद नरेश अग्रवाल और उनके लोग उत्पीड़ित कर रहे ”

: रोज-रोज अपने पुजारी के इशारे पर पुलिस को फोन करके करवाता है उत्पीड़न : पत्रकार संतोष ने की सीएम और पीएम से गुहार, उत्पीड़नन रूका तो आत्मदाह को तैयार : सेवा में, श्रीमान सम्पादक महोदय, भड़ास, नई दिल्ली। महोदय, मुझे अपने बयान में यह बताना है कि 16 मई 2006 में मुझे थाना प्रभारी असन्द्रा ने एक हीरोहाण्डा एक अनुबन्ध पत्र के बाद सुपुर्दगी में दी थी, जिसको उन्होंने वाहन मालिक का पता चल जाने के बाद 27 मई की सुबह ले ली थी। इसके गवाह के रूप में सपा के पूर्व सांसद राम सागर रावत और वहां के कुछ स्थानीय लोग थे। थाना प्रभारी ने इस गाड़ी के वापसी का तसकरा भी दर्ज कर दिया। वह गाड़ी राम सुमिरन यादव पुत्र उत्तरी निवासी ग्राम अहिरनपुरवा थाना असन्द्रा की थी, जिसका साक्ष्य थाने में जमा है।

महोदय मुझे तीन माह बाद सितम्बर माह में जहांगीराबाद थाने पर एक पुरानी हीरोहाण्डा को थाना प्रभारी ने अनुबन्ध पत्र के बाद दी थी। उक्त गाड़ी यह कहकर दी गयी थी कि जब पुलिस द्वारा या कोर्ट द्वारा गाड़ी मांगी जायेगी तो हाजिर करनी पड़ेगी। 13 नवम्बर 2007 को मेरी यह गाड़ी तहसील हैदरगढ़ परिसर से चोरी हो गयी। मैंने इसकी नामजद तहरीर कोतवाली हैदरगढ़ में दी लेकिन कोतवाली प्रभारी ने मेरा मुकदमा नहीं दर्ज किया क्योंकि मैंने जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत की थी वह बसपा का नेता था। उसका बड़ा लड़का हरदोई के तत्कालीन राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल के यहां मंदिर पर काम करता था। उनके कहने पर और स्थानीय नेताओं के दबाव के कारण मेरा मुकदमा नहीं लिखा गया। कई समाचार पत्रों में मोटर साइकिल चोरी की खबर भी छापी गयी। आखिरकार 19 नवम्बर 2007 को कोतवाली प्रभारी ने मुझे थाने में बुलाकर यह कहा कि तुम्हारा मुकदमा लिख लूंगा लेकिन जो मैं लिखवा रहा हूं उस तरह से लिखकर दो। उन्होंने उसी समय मुझे बोलकर तहरीर खिलवायी और एक कापी दफ्तर में जमा कर ली और दूसरी कापी मुझे मोहर एवं हस्ताक्षर युक्त दे दी। यह कहा कि अभी दबाव ज्यादा है, तुम्हारा मुकदमा बाद में लिख लूंगा, वैसे मैं तुम्हारी गाड़ी तलाश रहा हूं।

महोदय चूंकि मेरी रंजिश दीनानाथ मिश्रा पुत्र केदारनाथ निवासी ग्राम-शेषपुर जाहिद अली थाना असन्द्रा से चल रही है। इसी रंजिश के तहत उन्होंने एक माह पूर्व पुलिस अधीक्षक को गाड़ी के मामले में झूठी बातें लिख करके शिकायत की थी। जिस पर क्षेत्राधिकारी रामसनेहीघाट सहित अन्य अधिकारियों ने भी जांच की थी और उनकी शिकायत को झूठा पाया। महोदय यह सारा खेल मुझे बदनाम करने की खातिर और फर्जी मुकदमे में फसाने के लिए हरदोई के राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल और उनके लड़के जो वर्तमान में सपा के विधायक हैं, नितिन अग्रवाल के इशारे पर किया जा रहा है। वह लोग पुलिस अधीक्षक पर दबाव डाल करके यह सारा षडयन्त्र रच रहे हैं। मैं बेगुनाह हूं मेरा कोई कसूर नहीं है, यह सारा खेल दीनानाथ के बड़े लड़के मैथिलीशरण मिश्रा जो वहां पर उनके मंदिर में रहते है, उन्हीं के इशारे पर किया जा रहा है। कृपया यह मेरी सारी बात भी लिखी जाये और मुझे न्याय दिलवाया जाये।

प्रार्थी

सन्तोष कुमार शुक्ला

ब्यूरो चीफ

‘तरूण मित्र’ हिन्दी दैनिक

बाराबंकी

पता-ग्राम रनापुर, कोतवाली हैदरगढ,

तहसील हैदरगढ़, बाराबंकी


मूल खबर के लिए यहां क्लिक करें- पत्रकार को थानेदार ने दिया चोरी की बाइक उपहार

अखबारों में गजेंद्र की गिरफ्तारी की खबर छपी लेकिन एकतरफा

दैनिक जागरण द्वारा भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह और संपादक अनिल सिंह के खिलाफ लिखाए गए फर्जी मुकदमे और इनकी गिरफ्तारी को लेकर उस समय कई अखबारों ने एकतरफा खबरें प्रकाशित की, उसी तरह दैनिक जागरण द्वारा गजेंद्र सिंह के खिलाफ दर्ज कराए गए फर्जी मुकदमें को लेकर अखबारों ने एकतरफा खबर का प्रकाशन किया है. नीचे टाइम्स आफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर को दिया जा रहा है. इन खबरों में ये कहीं नहीं लिखा है कि मुकदमा दैनिक जागरण वालों की एक कंपनी की तरफ से कराया गया और किस तरह दैनिक जागरण वालों की कंपनी के घटिया काम के कारण उनकी रकम काटने को मजबूर हुए गजेंद्र सिंह. अखबारों ने सिर्फ एकतरफा रिपोर्टिंग की और गजेंद्र सिंह को ही कटघरे में खड़ा करते हुए फ्राड करने का आरोपी बता दिया. नीचे हैं टीओआई व इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबरें… ये घटना पांच अक्टूबर की है…

टाइम्स आफ इंडिया की खबर………

TV Producer Gajendra Singh arrested for fraud

Thursday night proved to be very costly for TV producer Gajendra Singh, as he was arrested by the Mumbai police on charges of fraud filed against him in Kanpur. According to reports, Gajendra Singh was arrested on charges of not attending a Kanpur court hearing for a case of cheating filed against him last year. Singh had been accused of cheating a man in Kanpur of money and non-payment, who had filed a case against Gajendra in the Kanpur court. Following the complaint the court had been issuing Singh repeated summons which he failed to attend. The court took cognisance of it and issued a non-bailable warrant against Singh following which he was arrested by the Versova Police in Mumbai late last night. The Versova police arrested Singh with the help of Kanpur Police under IPC section 420.

The constable on duty at the Versova police station confirmed Singh's detention and told us, "Yes, we have arrested him on Thursday night and investigations are going on. He is in our custody but apart from this, we can't give you any other information." On Friday Singh was taken to Andheri Court, Mumbai to obtain the transit remand. He will be brought to Kanpur on Saturday and shall be produced in the Kanpur Court (Holiday Court) or on Monday for custody.

Meanwhile DIG Kanpur Amitabh Yash, told us, "Although I haven't heard about this, but I will definitely find out the details of this. Sometimes it so happens, especially in cases like these, that the court itself takes action and arrests the accused. It's only later when they are brought on remand that we get involved." Gajendra was once touted as the originator of music talent hunt and reality shows. He has produced and directed shows like Antakshari, Zee Sa Re Ga Ma Pa, Music ka Maha Muqabala, Voice of India I & II, Chotte Ustaad among others. The on-air Indo-Pak reality show Surkshetra is also produced and directed by Singh. However, when contacted Saaibaba Telefilms, Singh's TV production house, refused to comment on the matter. In the past also Singh had been arrested in 2010, for a complaint filed by singer Rahul Vaidya for non-payment.

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर……..

'Sur-Kshetra' fame, Saibaba Telefilms' MD Gajendra Singh held

Saibaba Telefilms' Managing Director Gajendra Singh, touted as the man behind music reality shows in India, has been arrested here after he failed to attend a Kanpur court hearing in a cheating case filed against him, the police said today. Singh (35) is behind the the Indo-Pak reality singing show 'Sur-Kshetra' being aired on on Colors TV and Sahara One TV channel.

He was produced before a local court here today which gave a transit remand, so that he could be produced before a Kanpur court. He was accused of allegedly cheating a man in Kanpur and failing to appear before a Kanpur court despite repeated summons, the police said.

The Kanpur court then issued a non-bailable warrant against him and its order reached the Mumbai police, which took action accordingly. Singh forayed into music reality shows with Close-Up Antakshari (92-93) and was instrumental in creating shows like SaReGaMa, Music ka Maha Muqabala, Voice of India I & II, as well as Chotte Ustaad amongst others.


यहां तक की समाचार एजेंसियों ने अपनी खबर में गजेंद्र की कंपनी का कोई वर्जन देने की जहमत नहीं उठाई. ये है अपने देश की मीडिया जो जिसे चाहे खलनायक बना दे और किसी भी चोर को हीरो बना दे.

gajendra singh arrested

दैनिक जागरण वालों ने सारेगामा के निर्माता गजेंद्र सिंह को हवालात की हवा खिला दी

: दैनिक जागरण के चलते गजेंद्र सिंह को दिल का दौरा : मुम्‍बई से पुलिस ने किया गिरफ्तार गजेंद्र को : सोमवार को कानपुर की अदालत में पुलिस पेश करेगी गजेंद्र को : छोटे पर्दे के महशूर निर्माता निर्देशक गजेंद्र सिंह की यह गत बनाने से फिल्‍मकारों में रोष : मुम्‍बई: भड़ास4मीडिया डाट काम वेबसाइट के संस्थापक यशवंत सिंह और संपादक अनिल सिंह पर फर्जी मुकदमें दर्ज कराकर जेल की हवा खिलवाने वाले दैनिक जागरण समूह ने अब यूपी पुलिस का फिर बेजा इस्तेमाल करते हुए छोटे पर्दे से जुड़े नामचीन शख्स गजेंद्र सिंह को गिरफ्तार करा दिया है।  दैनिक जागरण ने 30 लाख रुपये के लेनदेन के एक मामले में छोटे पर्दे के मशहूर इवेंटकार गजेंद्र सिंह को हवालात की हवा खिला दी।

दैनिक जागरण के इस मामले में गजेंद्र सिंह को यूपी पुलिस ने मुम्‍बई में जाकर पकड़ा। छोटे पर्दे पर मनोरंजन के इस बेताज बादशाह गजेंद्र सिंह की गिरफ्तारी के फौरन बाद ही गजेंद्र सिंह को दिल का दौरा पड़ गया। खबर है कि गजेंद्र फिलहाल अस्‍पताल में हैं। पुलिस कस्‍टडी में घिरे गजेंद्र सिंह की घटना सुनकर मुम्‍बई में छोटे पर्दे की दुनिया समेत समेत फिल्‍मकारों में भारी रोष व्‍याप्‍त हो गया है। बड़ी संख्‍या में फिल्‍म और टीवी दुनिया से जुड़े लोग गजेंद्र सिंह की कुशल-क्षेम जानने के लिए बेहाल हैं। यह भी है कि गजेंद्र को यूपी पुलिस कानपुर की अदालत में पेश करेगी।

मूलत: आजमगढ के रहने वाले गजेंद्र सिंह ने दो दशक पहले मुम्‍बई से अपने करियर की शुरुआत की थी। मशहूर सरेगामा कार्यक्रम को बनाने के बाद वे ऊंचाइयों तक पहुंचे। बाद में उन्‍होंने साईंबाबा टेलीफिल्‍म्स नामक अपनी खुद की कम्‍पनी शुरू की। फिलहाल वे सहारा और कलर्स चैनल में चल रहे सुर क्षेत्र कार्यक्रम के माध्‍यम से पाकिस्‍तान और भारत के बीच आत्‍मीयता और विश्‍वास जमाने में जुटे हैं। साथ ही इसी तर्ज पर शुरू वायस आफ इंडिया कार्यक्रम भी चला रहे हैं। वायस आफ इंडिया के लिए गजेंद्र सिंह ने दैनिक जागरण समूह की इवेंट कंपनी  जागरण सोल्‍यूशंस के साथ करार कर रखा है जिसमें वे कार्यक्रम आयोजित करने सम्‍बन्‍धी सभी इंवेंट प्रबंधन का काम कर रहे हैं। वायस आफ इंडिया कार्यक्रम आयोजित करने के लिए इं‍वेंट आदि का ठेका गजेंद्र सिंह ने जागरण सोल्‍यूशंस को दे रखा है।

खबर है कि इस इवेंट की गड़बडि़यों को लेकर गजेंद्र सिंह की साईंबाबा टेलीफिल्‍म्‍स प्रबंधकों की तनातनी जागरण सोल्‍यूशंस के साथ शुरू हो गयी थी। साईंबाबा टेलीफिल्‍म्‍स प्रबंधकों ने पाया था कि इवेंट का आयोजन करार के मुताबिक नहीं था। इतना ही नहीं, इस करार के बीच जो शर्तें थीं, उन पर भी जागरण सोल्‍यूशंस खरा नहीं उतर पाया। साईंबाबा प्रबंधकों का कहना है कि इस पूरे दौरान जागरण सोल्‍यूशंस ने एक करार को तरीके से पूरा नहीं किया। पूरे दौरान अराजकता का माहौल रहा और आपाधापी बनी रही।

साईंबाबा सूत्रों के मुताबिक जागरण सोल्‍यूशंस को लगातार जानकारियां दी गयीं और बाद में चेतावनी भी दी गयी कि अगर जागरण सोल्‍यूशंस ने करार को तरीके से पूरा नहीं किया तो उनके भुगतान में दिक्‍कत आ सकती है क्‍योंकि इस करार का उल्‍लंघन होने पर यह आयोजन पूरा कराने के लिए बाहर से प्रबंधकों की सेवाएं लेने पर मजबूर होंगे। लेकिन जागरण सोल्‍यूशंस ने हर बार केवल आश्‍वासन ही दिया और बाद में जब मामला गड़बड़ हो गया तो वे लोग साईंबाबा टेलीफिल्‍मस प्रबंधकों को धमकी देने लगे कि हम बड़े ग्रुप हैं और जब भी चाहें, कुछ भी करा देंगे।

बताते हैं कि ऐसी धमकियों से बेधड़क साईंबाबा प्रबंधकों ने जब जागरण सोल्‍यूशंस का काम घटिया पाया तो उन्‍होंने 30 लाख रूपये की कटौती जागरण सोल्‍यूशंस के बिल से करा दी। बताते हैं कि इससे जागरण सोल्‍यूशंस के प्रबंधक भड़क गये। साईंबाबा टेलीफिल्म्स को नोटिस भेजी गयी और आखिरकार कानपुर की अदालत से सीधे गजेंद्र सिंह की गिरफ्तारी का आदेश जारी करा के यूपी पुलिस का एक दस्‍ता मुम्‍बई पहुंच गया जहां उन्‍हें दबोच लिया गया। खबर है कि गजेंद्र सिंह को कल सोमवार को कानपुर की अदालत में पेश किया जाएगा। गजेंद्र सिंह की लोकप्रियता को देखते हुए कानपुर में कड़ी सुरक्षा बंदोबस्‍त किये जाने के लिए भी तैयारी चल रही हैं।

gajendra singh arrested

जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के खिलाफ जिंदल ने दर्ज करा दी रिपोर्ट!

एक अपुष्ट खबर पता चली है कि जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के एडिटर समीर अहलूवालिया के खिलाफ कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के तरफ से एक एफआईआर दर्ज करा दिया गया है. सूत्रों द्वारा मिली जानकारी पर भरोसा करें तो दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की इंटर स्टेट सेल में एफआईआर नंबर 240 है जिसमें अभियुक्त सुधीर चौधरी और जी बिजनेस को बनाया गया है. इन दोनों पर नवीन जिंदल की तरफ से आरोप लगाया गया है कि इन लोगों ने कोल ब्लाक आवंटन से जुड़ी खबरें न दिखाने को लेकर उन्हें ब्लैकमेल किया और रंगदारी मांगी.

सूत्रों के मुताबिक खबर न दिखाने के लिए मांगी गई रकम पांच करोड़ से पचास करोड़ के बीच है. चर्चा है कि नवीन जिंदल ने पूरे एविडेंस के साथ एफआईआर दर्ज कराई है जिसमें काल रिकार्डिंग से लेकर वीडियो रिकार्डिंग तक शामिल है. यह भी कहा जा रहा है कि एक होटल में मीटिंग के लिए जिंदल ने संपादकों को बुलाया था, वहां की वीडियो रिकार्डिंग भी है.  यह तो सबको पता है कि जी न्यूज और जी बिजनेस पर कोल ब्लाक आवंटन के मामले को लेकर नवीन जिंदल के खिलाफ जोरशोर से खबरें चलाई गई थी. नवीन जिंदल पर जी के रिपोर्टर से बदतमीजी करने का भी आरोप लगा था. अब नया डेवलपमेंट पता चला है.

हालांकि अभी कोई एफआईआर होने की बात को कनफर्म नहीं कर रहा है. खुद जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी कह रहे हैं कि उन्हें नहीं पता कि ऐसा कुछ हुआ है क्योंकि उनके पास किसी प्रकार का ऐसा कोई फोन नहीं आया जिससे पता चले कि कोई एफआईआर दर्ज हुई है. सुधीर चौधरी आशंक जरूर व्यक्त कर रहे थे कि उन लोगों ने जिस तरीके से कोल ब्लाक आवंटन मसले पर स्टैंड लिया और नवीन जिंदल सहित तमाम लपेटे में आए लोगों के खिलाफ खबरें दिखाईं, उससे वे लोग बौखलाए हुए हैं और किसी भी हद तक उतर सकते हैं. सुधीर चौधरी ने ब्लैकमेलिंग और रंगदारी जैसे आरोपों से इनकार किया और कहा कि अगर ऐसा आरोप लगाया गया है तो यह खबर दिखाने की प्रतिक्रिया स्वरूप और बदला लेने की भावना के तहत है.

अगर आपको इस प्रकरण के बारे में कुछ मालूम है तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें. आपका नाम पता पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

स्ट्रिंगर के एकाउंट में 5500 रुपये की जगह 60000 का पेमेंट हो गया!

ऐसा कम ही होता है लेकिन इस बार हो गया. और, स्ट्रिंगर ने साबित किया कि वह आज भी ईमानदार है, उनके मीडिया मालिक बेइमान. भूखे मरेंगे….. लेकिन दाग नहीं लगने देंगे…… मामला बहराइच के अजय शर्मा से जुड़ाहै ….इनके नाम से  5,500/- की जगह पर 60,000 /- का चेक आ गया…और वो चेक स्ट्रिंगर के अकाउंट में क्लिअर भी हो गया …..जब कुछ समय बाद क्लियरेंस की रुटीन में आने वाली मेल से जानकारी आफिस को मिली और हिसाब मिलाया गया तो हड़कंप मच गया….

उस समय स्ट्रिंगर यूपी से बाहर अपने ससुराल गया था और मोबाइल आफ था… इस बीच अकाउंट हेड की ऊपर से खूब मारी जा चुकी थी …वापस आने पर आफिस का घबराया अकाउंट हेड घिघियाने लगा… स्ट्रिंगर ने पूरी जानकारी लेने के बाद उस रकम से 5,500/- काट कर आफिस के अकाउंट में 54,500/- रूपये वापस डाल दिया…. अब उसी कम्पनी के बारे में एक और किस्सा सुन लें. कुछ दिनों पहले गाजीपुर के एक स्ट्रिंगर ने अपने पुराने बिलों के बारे में अकाउंट सेक्सन में कॉल किया तो फोन उठाने वाले व्यक्ति ने तपाक से कहा- 500/- की जगह  300/- के हिसाब से बिल बना कर भेज दो तो पेमेंट हो जायगा…. ये है कम शब्दों में मीडिया हाउसों की कहानी…. कुछ तो खबर भी ले लेते है पेमेंट तक नहीं करते…

नोएडा के एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

नीलेश मिश्र शुरू कर रहे हैं अखबार “गाँव कनेक्शन”, दिसंबर में होगा लांच

लखनऊ : शहरी और ग्रामीण पत्रकारों का मिला जुला प्रयास, भारत का अपनी तरह का पहला ग्रामीण अख़बार "गाँव कनेक्शन" दिसंबर से उत्तर प्रदेश में प्रकाशन प्रारंभ करेगा और इसका संचालन आम लोग करेंगे, न कि कोई उद्योगपति समूह. ''गाँव कनेक्शन'' बारह पन्ने का साप्ताहिक ब्रौडशीट अख़बार होगा जो लखनऊ में छपेगा. इसकी कीमत पांच रुपये होगी. यह एक कंपनी द्वारा बिना फायदे के व्यवसाय की तरह चलाया जाएगा और अगर मुनाफा होगा तो उसे कंपनी के डायरेक्टर नहीं स्वीकार करेंगे, बल्कि वापस गाँव कनेक्शन की बढ़ोत्तरी में उसका प्रयोग करेंगे. उत्तर प्रदेश में एक वर्ष तक प्रकाशन के बाद ही इसे किसी और हिंदी भाषी राज्य में ले जाया जाएगा. भविष्य में इसे अन्य भाषाओँ में भी छापने की योजना है.

अख़बार के सह-संस्थापक और सम्पादकीय निदेशक नीलेश मिश्र ने बताया- "गाँव कनेक्शन का जन्म इस ज़िद के साथ हुआ है कि भारत के आम नागरिक भी अपना समाचार पत्र चला सकते हैं — एक ऐसा समाचार पत्र जिसमें पत्रकारिता के साथ समझौता न हो, और जो उस सत्तर प्रतिशत भारत की अच्छी-बुरी बातें बताये जो अधिकतर अख़बार के पन्नों में देखने को नहीं मिलतीं,"  नीलेश हिंदुस्तान टाइम्स के भूतपूर्व डिप्युटी एक्सिक्यूटिव एडिटर हैं, जो रेडियो पर `याद शहर' नाम के एक काल्पनिक शहर की कहानियां सुनाने के अलावा हिंदी फिल्मों में पटकथा व गीत, और पुस्तकें लिखते हैं. नीलेश मिश्रा पत्रकारिता में रामनाथ गोयनका अवार्ड और कुलिश अवार्ड समेत कई पुरस्कार पा चुके हैं. उत्तर प्रदेश के हर ज़िले में आजकल गाँव कनेक्शन की टीम यात्राकर स्ट्रिंगर (पार्ट टाइम पत्रकार) और "कनेक्शन सेंटर" नाम से वितरकों को जोड़ रही है. इच्छुक साथी gaonconnection@gmail.com या 09335519100 पर संपर्क कर सकते हैं. इन स्ट्रिंगर्स को प्रशिक्षण और फिर प्रमाण पत्र दिया जायेगा.

प्रेस विज्ञप्ति

दैनिक जागरण लखनऊ से छह विज्ञापन वालों का तबादला : विजयन्त, मदन और संदीप की नई पारी

लखनऊ से खबर है कि दैनिक जागरण के विज्ञापन विभाग में कार्यरत छह कर्मियों का तबादला दूसरी यूनिटों में कर दिया गया है. प्रशांत भंडारी, जो कि रिटेल विज्ञापन देखते थे और वरिष्ठ पद पर थे, उनका तबादला भागलपुर यूनिट में कर दिया गया है. अन्य पांच लोगों का नाम और कहां तबादला हुआ है, यह पता नहीं चल पाया है. 

उत्तर प्रदेश में अपना पांव फैला रहे जालंधर वाले पंजाब केसरी के ब्यूरो कार्यालय के साथ जनवाणी को बाय बोल कर रिपोर्टर विजयंत सैनी और मानव समाज को बाय बोलकर फोटोग्राफर मदन सिंह ने ज्वाइन किया है।

पिछले एक साल से पंजाब केसरी दिल्ली के अलीगढ़ ब्Žयूरो कार्यालय को संभाल रहे संदीप गुप्ता ने अलीगढ Žब्यूरो चीफ द्वारा कार्यालय में बरती जा रही भारी अनियमितताओं के चलते अंत में पंजाब केसरी को बाय बाय कह दिया। पंजाब केसरी में सब एडिटर के पद पर कार्यरत संदीप ने अब सी न्यूज ग्रुप के आगरा से प्रकाशित नए हिंदी समाचार पत्र सी एक्सप्रेस को ज्वाइन किया है। संदीप इससे पहले आँखों देखी , मून टीवी, सुदर्शन टीवी, कल्पतरू एक्सप्रैस में कार्य कर चुके हैं।

प्रभात किरण के संपादक प्रकाश पुरोहित का गिरफ्तारी वारंट जारी

इंदौर : भोपाल के गोविंदपुरा के रिटायर्ड सीएसपी के खिलाफ कथित रूप से मानहानिकारक खबर छापने पर स्थानीय सांध्य दैनिक ‘प्रभात किरण’ के संपादक प्रकाश पुरोहित का गैरजमानत गिरफ्तारी वारंट यहां की प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी सुमन श्रीवास्तव ने जारी किया है। बताया जाता है कि इंदौर में टीआई के रूप में पदस्थ रहते गुरू सेंट्रल कोतवाली थाने में टीआई थे तभी हीरानगर थाना क्षेत्र में एक दलित युवक घनश्याम मंडलोई को थाना परिसर में पेड़ से बांधकर पीटने पर कुध्द भीड़ ने थाने पर पथराव कर आगजनी की घटना की थी।

तब वहां टीआई डीपी अहिरवार थे, बाद में मंडलोई की मौत होने पर उन्हें निलंबित भी कर दिया गया था। लेकिन थाने पर गैरहाजिर रहने के बावजूद गुरू का नाम ‘प्रभातकिरण’ ने प्रकाशित करते हुए उनके खिलाफ खबर छापी थी। इसे मुद्दा बनाते हुए मानहानि दावा लगाया गया था जिस पर उनका गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था।  5 अक्टूबर को अखबार के संपादक प्रकाश पुरोहित को कोर्ट में पेश होना था किंतु कोर्ट को जानकारी दी गई कि वे मैच कवरेज के लिए श्रीलंका गए हुए है इस पर कोर्ट द्वारा पुन: उनका गैरजमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। मामले में अगली सुनवाई 29 नवंबर को होगी।

ईशान टाइम्स के संपादक संजय राय की इंडिका कार चोरी

पंचकुला । ईशान टाइम्स अखबार के संपादक संजय राय ने पुलिस को दी शिकायत में कहा है कि उन्होंने अपनी इंडिका कार गुरुवार 4 अक्टूबर की रात्रि करीब 10.30 बजे अपने घर के  सामने खड़ी कर थी और कार को ठीक से बंद भी किया था, मगर जब उन्होंने शुक्रवार की सुबह देखा, तो वहां पर गाड़ी नहीं थी। गाड़ी न मिलने पर उन्होंने पड़ोसियों से पूछताछ की, मगर किसी को भी गाड़ी के बारे में कुछ भी नहीं पता था। उसके बाद संजय राय ने पुलिस के कंट्रोल रूम में गाड़ी चोरी होने की सूचना दी। सूचना पाकर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

संजय राय की गाड़ी का नम्बर H.R.26AJ9176, CHASIS NO. 605121BS2 P31317, Engine No. 4751DT15BSZP28267, Owner Name: Koutions Retail India Ltd., Plot no. 274, 275 udyog Vihar, Phase-6, Gurgaon हैं। चूंकि यह गाड़ी निलामी के तहत बिकी हुई थी, इसलिए इस गाड़ी में सेल लैटर भी रखा हुआ था। अब इस कार के मौजूदा मालिक ईशान टाइम्स अखबार के संपादक है और उन्होंने इस कार को हाल ही में Koution Retail India Ltd. से खरीदी है और गाड़ी के कागजात N.O.C लेने हेतु भेजे गए है। उन्होंने बताया कि उन्होंने पुलिस को गाड़ी चोरी की सूचना इसलिए भी दी है कि गाड़ी पर प्रैस का स्टीकर लगाया हुआ है और अपराधी इसका इस्तेमाल किसी अन्य अपराध में न कर सके।
 

प्रेस काउन्सिल आफ इण्डिया के सदस्य शीतला सिंह समेत छह लोगों ने किया देहदान

रूदौली। प्रेस काउन्सिल आफ इण्डिया के सदस्य शीतला सिंह समेत आधा दर्जन से अधिक लोगों ने महात्मा गांधी की जयन्ती पर आयोजित कार्यक्रम में देहदान देकर एक इतिहास रचा है। इस अवसर पर मुख्य अतिथि मण्डलायुक्त मधुसूदन रायजादा ने कहा कि सुपुर्देखाक और सुपुर्देआग से महान है देहदान। फैजाबाद के जिलाधिकारी दीपक अग्रवाल ने देहदानियों से सीख लेने की सलाह दी। कार्यक्रम के आयोजक डा. निहाल रजा ने कहा कि रूदौली सेवा कार्यों की तीर्थस्थली बनेगी जहां दूसरे नगरों से आकर लोग सेवा कार्यों का अंग बनेंगे।

वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह ने भावनात्मक सम्बोधन किया। आयोजन में जनपद के आधा दर्जन देहदानी प्रेस कौन्सिल आफ इण्डिया के सदस्य शीतला सिंह, डा. वीपी पाण्डेय, बाबा सीताराम दास, मुचकुन्द दुबे, राजितराम तथा श्रीमती शिवकला को शाल, प्रशस्ति-पत्र एवं गीता भेंट कर सम्मानित किया गया।
 

”4 रियल न्यूज का एक ब्यूरो चीफ पूरे दिन लड़कियों के पीछे पड़ा रहता है”

4रियल न्यूज के एक ब्यूरो चीफ के खिलाफ भड़ास के पास एक महिला पत्रकार ने अपने नाम पहचान के साथ मेल भेजा है. इसमें आरोप लगाया गया है कि ये ब्यूरो चीफ महोदय लड़कियों को स्टिंग ऑपरेशन का झांसा देकर अपने यहां ज्वाइन करवाता है फिर उन्हें इस्तेमाल करने की कोशिश करता है. तंग आकर जब लड़कियां नौकरी छोड़ देती हैं तो उन्हें बदनाम करता है, साथ ही उनके पैसे भी नहीं लौटाता. वह ब्यूरो चीफ दिन रात शराब के नशे में डूबा रहता है.

जब उसका मालिक आता है तो बिलकुल सीधा साधा बन जाता है.. वह हर वक्त मीडिया के नाम पर लड़कियों को इस्तेमाल करने की कोशिश मे हमेशा लगा रहता है. अब ताजी स्थिति ये है कि ब्यूरो चीफ की हरकत सामने आने पर वहां के एक-दो कर्मचारी वहां आने वाली लड़कियों को वास्तविकता का ज्ञान करा कर भगाने की कोशिश करते हैं लेकिन ये स्थायी समाधान नहीं है, क्योंकि कोई एक लाता है, दूसरा भगाता है.. कुछ लोगों ने तो घपला करके लाखों का चूना लगाकर खुद को किनारे कर लिया है. ये जो ब्यूरोचीफ है, अपने मालिक को लूट रहा है. कर्मचारियों के नाम पर पैसे मंगवाता है और सारा पैसा खुद के ऐश में खर्च कर देता है.

यह ब्यूरो चीफ उत्तर भारत के एक हिंदी राज्य का हेड है. अगर इसने लड़कियों को परेशान करने वाली अपनी हरकत बंद नहीं की तो भड़ास जल्द ही इनके नाम-पहचान के साथ पूरे घटनाक्रम का विस्तार से खुलासा करेगा.

पत्रकार को थानेदार ने चोरी की मोटरसाइकिल बतौर उपहार दे दिया

बाराबंकी। जिले में वर्ष 2006 में एक पत्रकार को एक थानेदार ने चोरी की मोटरसाइकिल को बतौर उपहार दे दिया। काले रंग की यूपी41सी4898 रजिस्‍ट्रेशन वाली सुपर स्‍प्‍लेंडर को अंसदरा थाने के भूतपूर्व एसओ आरके सक्‍सेना ने पत्रकार संतोष कुमार शुक्‍ला को दे दिया था। इस बात की शिकायत दीनानाथ मिश्र शेखपुर निवासी ने एक प्रार्थनापत्र के जरिए बाराबंकी में एसपी को की। इस मामले की जांच 25 सितंबर 2012 को शुरु की गई। जांच अधिकारी बनाए गए हैं इंद्रजीत सिंह।

इंद्रजीत सिंह ने भडास4मीडिया से बात करते हुए कहा कि इसमें पत्रकार महोदय का बयान दर्ज कर लिया गया है लेकिन कुछ लोगों के मेडिकल पर चलने के कारण इसमें देरी हो रही है। उन्‍होंने भड़ास को आश्‍वस्‍त करते हुए कहा कि मामले की जांच पूरी होते ही इसकी जानकारी वह हमसे साझा करेंगे।  इस मामले में जब हमारे भड़ास प्रतिनिधि ने आरोपी रिपोर्टर महोदय से उनकी राय जानने के लिए 9839835408 पर संपर्क किया तो उन्‍होंने अपना पक्ष लिखकर भेजने की बात कही।

संतोष का पक्ष जानने के लिए यहां क्लिक करें- ''नरेश अग्रवाल और उनके लोग मुझे परेशान कर रहे''

उमेश त्रिवेदी, अजय बोकिल और पंकज शुक्ला के बाद कुछ और बड़े पत्रकार ‘प्रदेश टुडे’ से जुड़ने के मूड में

अजय बोकिल और पंकज शुक्ला ने नवदुनिया (नईदुनिया का भोपाल संस्करण) छोड़कर करीब ३ सप्ताह पहले 'प्रदेश टुडे' ज्वाइन कर लिया है. उमेश त्रिवेदी के 'प्रदेश टुडे' में एडिटोरिअल डायरेक्टर बनने के बाद इन दोनों पत्रकारों का 'प्रदेश टुडे' ज्वाइन करना एक बड़ी खबर माना जा रहा है. अभी तक 'प्रदेश टुडे' को गंभीर अखबार नहीं माना जाता था, पर बदले हालात और कुछ बड़े नामों के जुड़ने से 'प्रदेश टुडे' चर्चा में आ रहा है. अजय बोकिल और पंकज शुक्ला इसी श्रंखला की कड़ी हैं.

इस कड़ी का पहला नाम है उमेश त्रिवेदी जिन्हें मध्यप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता में एक स्थापित नाम माना जाता है. ३८ साल तक 'नईदुनिया' में रहे श्री त्रिवेदी ने राजधानी भोपाल की राजनीतिक पत्रकारिता को काफी करीब से देखा है और 'नईदुनिया' की विकास यात्रा में उन्हें मील का पत्थर माना जाता है. उमेश त्रिवेदी 'नईदुनिया' से ग्रुप एडिटर पद से २०११ में रिटायर हुए थे. प्रबंधन के अनुरोध पर उन्होंने एक साल और 'नईदुनिया' को अपनी सेवा दी. लेकिन, नईदुनिया की कमान जागरण प्रबंधन के हाथ में आने की खबरों के बीच उन्होंने नईदुनिया छोड़ दी थी.

श्री त्रिवेदी के 'प्रदेश टुडे' से जुड़ने से इस अखबार की साख बढ़ी है. भोपाल के बाद जबलपुर से भी 'प्रदेश टुडे' का प्रकाशन शुरू हुआ है. इसके अलावा कटनी, शहडोल, सतना, रीवा और छिंदवाडा से आंचलिक संस्करणों का प्रकाशन शुरू हुआ है. जल्द ही इसका ग्वालियर और रायपुर संस्करण निकाले जाने की तैयारी है. 'प्रदेश टुडे' ने अपना दायरा इंदौर तक बढ़ाने की योजना बनाई है. खबर ये भी है कि उमेश त्रिवेदी, अजय बोकिल और पंकज शुक्ला के बाद कुछ और बड़े पत्रकार 'प्रदेश टुडे' से जुड़ने के मूड में हैं.

मोदी के लांच हुए चैनल ”नमो गुजरात” पर चुनाव आयोग ने बैन लगा दिया, प्रसारण बंद

गुजरात में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से भापजा के लिए ‘नमो गुजरात’ नाम से चैनल लांच किया गया. पर यह चैनल सिर्फ एक दिन चल पाया. लांचिंग के अगले दिन ही चुनाव आयोग ने चैनल पर बैन लगा दिया और इसके प्रसारण को रुकवा दिया.

चुनाव आयोग का कहना है कि चुनावी माहौल में इस तरह के चैनल के प्रसारण के लिए चुनाव आयोग से विशेष अनुमति लेने की जरूरत होती है, जो कि मोदी और भाजपा की तरफ से नहीं ली गई है. गांधी जयंती के दिन लांच किए गए नमो गुजरात चैनल पर पहले ही दिन मुख्यमंत्री मोदी का भाषण जमकर प्रसारित किया गया. इसकी शिकायत कई लोगों ने चुनाव आयोग से की. नमो गुजरात के प्रोजेक्ट को टेलीविजन ग्रुप एशियानेट और साधना टीवी तकनीकी सपोर्ट दे रहा है. प्रोजेक्ट इंचार्ज सौरभ दलाल हैं.
 

सहारा में एसएनबी हेड अनिल राय को बना दिया गया

सहारा मीडिया में पहले तय हुआ था कि रमेश अवस्थी एसएनबी हेड बनाए जाएंगे. और अनिल राय को डिप्टी एसएनबी हेड बनाया जाएगा. लेकिन जाने क्या हुआ कि अनिल राय को ही एसएनबी हेड बना दिया गया है. रमेश अवस्थी के पास कानपुर का चार्ज था. संभवतः उन्हें वापस कानपुर में ही पहले वाली जिम्मेदारी में भेज दिया गया है. ऐसा क्यों हुआ, यह पता नहीं चल पाया है.

पिछले दिनों सहारा मीडिया में बदलाव को लेकर जो आदेश जारी हुआ था, उससे संबंधित खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

सहारा मीडिया में कई बड़े बदलाव

मायावती की मूर्ति तोड़ने के आरोपी पत्रकार शगुन त्यागी जेल से रिहा

मायावती की मूर्ति तोड़ने के आरोप में जेल में बंद पत्रकार शगुन त्यागी की जमानत हो गई है. उन्हें लखनऊ जेल से रिहा कर दिया गया. डिस्ट्रिक्ट जज केके शर्मा ने अदालत में जमानत पर सुनवाई के दौरान माना कि घटना में शगुन की संलिप्तता संदिग्ध है. शगुन नई दिल्ली में एक मैग्जीन में बतौर पत्रकार कार्यरत रहे हैं. पुलिस ने दावा किया कि शगुन ने मूर्ति तोड़े जाते समय वीडियो रिकार्डिग करने और पर्चे फेंकने की बात स्वीकार की. शगुन उत्तर प्रदेश नव निर्माण सेना के मीडिया प्रभारी का काम भी देखता है.

पुलिस का कहना है कि लखनऊ के गोमतीनगर थाने में पूछताछ के दौरान शगुन ने स्वीकारा कि 26 जुलाई को डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल के पास पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की मूर्ति तोड़ते समय उसी ने रिकार्डिग की थी और उसे नेट पर डाला था. उसने मीडियाकर्मियों को भी रिकार्डिग मुहैया कराई थी. इसके अलावा उसी ने वहां उत्तर प्रदेश नव निर्माण सेना की मांगों से जुड़े पर्चे भी फेंके थे. उत्तर प्रदेश नव निर्माण सेना का अध्यक्ष अमित जानी लखनऊ जिला जेल में बंद है.  शगुन और पवन जेल में बंद अमित से मिलने गए थे, उसी समय पुलिस ने उन्हें अरेस्ट कर लिया.

सुल्तानपुर में राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार मनोज पांडेय की गोली मारकर हत्या

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में राष्ट्रीय सहारा के एक स्थानीय रिपोर्टर मनोज पाण्डेय की अज्ञात लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी. हत्या उस समय की गयी जब मनोज बाइक से घर वापस लौट रहे थे. उसी दौरान बदमाशों ने उन पर गोलियां चला दी. घटना पुलिस स्टेशन धम्मौर के ग्राम करमचंदपुर इलाके में हुई.

सिर पर गोली लगने से से उनकी मौके पर ही मौत हो गई. मौके पर पुलिस अधीक्षक पहुंच गए. घटना से पत्रकारों में रोष है.

राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार को पीटा, मुंह में रिवाल्वर घुसेड़ा

यूपी के कुशीनगर जिले से खबर है कि मथौली बाजार निवासी पत्रकार प्रदुम्न मद्देशिया को एक गैस एजेंसी के लोगों ने बंधक बना कर बुरी तरह से मारा पीटा और मुंह में रिवाल्वर घुसेड़ दिया़. बहुत अनुनय विनय करने के बाद पत्रकार को किसी प्रकार छुड़ाया जा सका. इस मामले में प्रद्युम्न की तहरीर पर एजेंसी के मालिक अनुपम सिंह, कर्मचारी कन्हैया व विजय के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. बताया जाता है कि गैस एजेंसी पर पत्रकार अपने कनेक्शन का वेरिफिकेसन करने गया था.

पत्रकार द्वारा प्रकाशित की गई खबरों से पहले से खार खाए बैठे एजेंसी मालिक ने अपने कर्मचारियों को ललकारा और मरवाया पिटवाया. इस घटना को लेकर कुशीनगर में पत्रकारों के अलावा आम लोगो में भी रोष है. यह घटना ५ अक्टूबर की है. सबसे शर्मनाक बात यह है कि पुलिस ने केस लिखने में अल्पीकरण कर दिया है. उधर इस मामले में जब एजेंसी वालों से बात की गयी तो उनका कहना है की पत्रकार प्रद्युम्न मद्देशिया शराब पीकर एजेंसी पर गाली गलौच कर रहा था.

गोरखपुर से एक पत्रकार साथी द्वारा भेजी गई जानकारी पर आधारित.

निधन हुआ भाजपा नेता केदारनाथ साहनी का, फोटो छपा कवि केदारनाथ सिंह का

Om Thanvi : कल भाजपा नेता केदारनाथ साहनी के निधन से संबंधित एक खबर के साथ दिल्ली से हाल ही शुरू हुए एक 'नेशनल' हिंदी दैनिक ने प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह का फोटो छाप दिया. ईश्वर कविश्री को लम्बी उम्र दे. उन्हें कोई फ़ोन आया तो उन्होंने कहा कि भूल हुई होगी, वे लोग कल सुधार लेंगे. लेकिन अख़बार में आज भी कोई भूल-सुधार नहीं छपा तो उन्हें हैरानी हुई. सज्जन कवि के साथ यह बर्ताव उचित नहीं. टाइम्स नाउ चैनल ने जस्टिस पीबी सावंत का फ़ोटो किन्हीं जस्टिस सामंत की जगह दिखा दिया तो श्री सावंत ने चैनल पर मुक़दमा कर दिया था और अदालत ने चैनल पर सौ करोड़ रुपये का ज़ुर्माना सुना दिया था. यह ठीक है कि केदारनाथ सिंह जस्टिस सावंत नहीं हैं, पर भूल-चूक अख़बारों पर हो या चैनलों से — जो हो ही सकती है — पर उसका फ़ौरन सखेद सुधार भी कर देना चाहिए.

    Pradeep Vashishtha शीघ्रातिशीघ्र इस तरह की त्रुटियों में सुधार किया जाना चाहिए.
 
    Harsh Vardhan These comments from a senior editor of an esteemed daily deserve applaud.
 
    Danish Azmi thanvi sahab sahi hai ki bhool ho jati hai ,lekin ek sawal uthta hai ki internet ke iss yug me bhayankar galti ,aur aise vyakti ke haath me page bnane kaa kaam dena jisko kuch maloom nhi kisi ko pehchanta nhi …mein samajhta ho ye blunder mistake hai
  
    Vartika Nanda बिल्कुल। दुखद। खेद इस बात का भी है कि हमने खेद व्यक्त करना ही छोड़ दिया है…
   
    अजय राय । दुखद।
    
    Kalpana Pant khedajanak
    
    Vikas Dhulia ji sir, mai ek journalist hoo, to unki taraf se is blunder ke liye xama mangta hoo
    
    Pawan Koundal दरअसर मुसीबत यह है कि इस इंटरनेट ने सबकी आदतें खराब कर दी हैं। लोग गूगल इमेज पर जाकर सर्च तो कर लेते हैं फलां फला नाम पर पुष्टि नहीं करते कि जो उन्‍होंने ढूंढा है वह फलां व्‍यक्ति है भी कि नहीं। ऐसा भी कई बार देखा गया है कि जो भी फोटो किसी एक अखबार में छपा है, दूसरे अखबारों में भी देखा गया है जिसे इंटरनेट के जरिए हूबहू डाउनलोड किया गया है। सहीं में यह खेदजनक तो है ही पर इसके साथ मीडिया संस्‍थानों में काम कर रहे लोगों की ''शार्टकट'' प्रव़त्ति को भी भी यह उजागर करता है।
    
    Masaud Akhtar हो सकता है कि उन्हें अभी तक अपनी भूल का एहसास ही ना हुआ हो
    
    Om Purohit Kagad एक समाचार पत्र के लिए इस से शर्मनाक क्या हो सकता है !
    संवाद संकलन के वक्त सूचना की प्रमाणिकता भी पुष्ट होनी चाहिए ।
    जो भी हुआ है वह क्षम्य तो हरगिज नहीं है !
    
    Gautam Kewaliya Hari Bol…
 
    Jayram Shukla andho ke haatho me tupak ka aisa hi istemal hota hai ..akhbaar ke malik kam ,,,sampadak to satta ki dosti ke chalte mada..ndh hai kya kahiyega.. iswr kedarji ko chirjeevee rakhe

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

अमीर होते जा रहे संपादकों और शोषक मीडिया मालिकों की संपत्ति जब्त करके बेचारे पत्रकारों में बांट दी जाए!

Mayank Saxena : कई न्यूज़ चैनलों में कर्मचारियों की हालत बेहद खराब है…सैलरी बेहद कम है और कई सालों से बढ़ी नहीं है…ऊपर से जानवरों की तरह एक आदमी से कई लोगों का काम कराया जाता है…यही नहीं…सीनियर्स और सम्पादक इनसे बेहद बुरा बर्ताव करते हैं…अपमानित करते हैं…निकाल बाहर करने की धमकी देते हैं… ये पत्रकार साथी बेहद कम आमदनी में मुश्किल से घर चला रहे हैं…माली हालत खराब है तो कर्ज़ भी बढ़ता जाता है…नई नौकरी मिलनी मुश्किल होती है…और सैलरी बढ़ाने की बात पर "तुम्हारी सैलरी में 3 आदमी ले आऊंगा…" जैसे संवाद सुनने को मिलते हैं…कई साथी पत्रकारिता छोड़ना चाह रहे हैं…कई छोड़ गए…

हां,  इस बीच सम्पादकों की सैलरी लगातार बढ़ती रही है…लेकिन सम्पादक महोदय जनवादी बनने का कोई मौका नहीं चूकते हैं…ज़्यादातर साथी परिवार वाले हैं….कुछ स्वभावतः कायर है…कुछ आदतन चापलूस…हां सब चाहते हैं कि ये सामने आए…पर कोई साफ लिखता नहीं… "ऐसे में क्यों न अमीर होते जा रहे सम्पादकों और शोषक मालिकों की सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर के…उसे बेच कर…इन बेचारे पत्रकार साथियों में बांट दी जाए…." (ये स्टेटस किसी की प्रेरणा से है सो साभार….)

Shamim Uddin Ansari आमतौर पर कर्मचारियों और संपादकों की तंख्वाह कितनी होती है?

Mayank Saxena शमीम भाई इश सवाल को सम्पादकों…सीईओस…और मालिकों के लिए छोड़ देते हैं…

Deependra Raja Pandey तनख्‍वाह का अन्‍तर इससे पता चल जाता है कि ये संपादक लोग किसी होटल के PDR की शोभा बढ़ाते हैं और कर्मचारीगण किसी शोभनीय ढाबे की तरह दिखने वाले रेस्‍टोरेन्‍ट मात्र की।

Amit Sen मयंक सर, आखिर एक पत्रकार का दर्द पत्रकार ही समझ सकता है….

Mohammad Anas dost tum aa jao,ek kaam shuru karne wala hun,thodi punji lagao,jyada munafa kamao,jab paisa rahega to sara anand rahega

Syed Mohammad Altamash Jalal नव भारत मैं तोह मुफ्त मैं ही काम करवाया जा रहा है हालत इतनी नाज़ुक है

Yashwant Singh खूब गदर काटै हो भइये… जब्त करने वाली टीम में हमको जरूर रखिहो… रंगदारी वंगदारी का पुराना अनुभव है..

Shilpa Gupta सर, आपके विचार बिल्कुल सही है लेकिन "ऐसे में क्यों न अमीर होते जा रहे सम्पादकों और शोषक मालिकों की सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर के…उसे बेच कर…इन बेचारे पत्रकार साथियों में बांट दी जाए…." यह बस एक डिस्कशन का एक टॉपिक रह गया है…. क्यूकि आज तरीबन सारे मीडिया हाउस एक ऐसी बीमारी से ग्रषित हो चुकें है, जो है "परिवारवाद और पहचानवाद" और इस बीमारी ने एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार कर रखा है जिसे तोड़ने के लिये हम सब को अभिमन्यु का इंतजार करना होगा….जो कम से कम इसे भेद तो सके….

Pankaj Narayan मेरे मन में तत्काल कोई अहिंसक सुझाव आ नहीं रहा…

युवा व प्रखर पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

पैसा लेकर बैकडेट में सरकारी विज्ञापन छाप देता है हिंदी दैनिक न्यायाधीश!

यूपी के सोनभद्र जिले के पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट विजय विनीत ने एक पत्र केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली को लिखकर शिकायत की है कि एक अखबार सरकारी विभागों से मोटी रकम लेकर उनके विभागीय विज्ञापनों का प्रकाशन बैक डेट में कर रहा है. कई विभाग बिना टेंडर निकाले काम करा देते हैं और जब उनसे टेंडर की बाबत पूछताछ की जाती है तो वे बैकडेट में विज्ञापन प्रकाशित करा कर दिखा देते  हैं.

विजय विनीत ने ऐसा करने वाले अखबार का नाम भी लिखा है. यह है दैनिक न्यायाधीश जो इलाहाबाद से प्रकाशित होता है. विजय विनीत का पूरा पत्र पढ़िए, और सोचिए कि सरकारी विभागों के साथ-साथ मीडिया वाले भी कितने तेजी से भ्रष्ट हुए हैं……….

‘दबंग’ पुलिस अफसर ने हंसते-मुस्कराते-इठलाते बंद करा दिया फर्जी न्यूज चैनल

कटिहार से खबर है कि यहां प्रभारी एसपी शिवदीप लांडे ने एक फर्जी न्यूज़ चैनल में छापेमारी कर उसे बंद करवा दिया. न्यूज़ चैनल का नाम KBC न्यूज़ हैं जो नगर थाना क्षेत्र के बनिया टोला में वर्षों से चल रहा था. बिना सूचना और प्रसारण मंत्रालय से निबंधित हुये ये चैनल वर्षों से लोगो को न्यूज़ रहा था. इस न्यूज़ चैनल को ललित अग्रवाल नाम के एक व्यक्ति चलाते थे. इस न्यूज़ चैनल को बंद करने का आदेश वर्ष 2009 में राज्य सूचना विभाग ने कटिहार के डीएम को दिया था लेकिन चैनल चलता रहा.

इस न्यूज़ चैनल के मालिक पर कोई भी प्रशासनिक अधिकारी कार्रवाई कराने से कतराता था. लगभग दस वर्षों से चलाया जा रहा यह न्यूज़ चैनल प्रभारी एसपी शिवदीप लांडे के हाथों बंद कराया गया. लेकिन सबसे मजेदार है कि एसपी साहब ने जब अपनी फोटो खिंचवाई तो आंखों पर ब्लैक चश्मा और चेहरे पर हंसी-मुस्कराहट लाना नहीं भूले, और हाथों में चैनल की माइक-आईडी यूं पकड़ कर दिखा रहे हैं जैसे कितनी मुश्किलों से इन सबको पकड़ा बरामद किया हो. तस्वीर का अंदाज ए बयां देखकर आप भी कहे बिना नहीं मानेंगे कि ये तो सलमान खान टाइप 'दबंग' पुलिस अफसर है…. आप भी देखें तस्वीर…..

कोयला घोटाले में इन तीन मीडिया हाउसों ने भी कमाया ‘मोटा माल’

एक लाख 76 हजार करोड़ के कथित कोयला घोटाले में कई मीडिया हाउस ने ‘हल्दी लगे न फिटकरी, रंग चढ़े चोखा’ मुहावरे को चरितार्थ करते हुए पत्रकारिता की हनक की आड़ में मोटा माल कमाया है। इसमें से एक मीडिया टायकून विजय दर्डा के यहां सीबीआई का छापा पड़ चुका है। वो महाराष्ट्र के बड़े अखबार ‘लोकमत’ समूह के सर्वेसर्वा हैं। उन पर आरोप है कि कोयला खदान हासिल करने में उन्होंने ‘अखबार’ और ‘पत्रकार’ दोनों का जम कर दुरूपयोग किया था। सूत्र बताते हैं कि दो अन्य मीडिया हाउस के मालिकान के यहां कभी भी छापा पड़ सकता है। सीबीआई छापे से पूर्व की औपचारिकता पूरी करने में जुटी हुई है। इस संभावित छापे से बचने के लिए मालिकान को मीडिया के प्रभाव का ही इस्तेमाल कर कार्रवाई कवाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं।

गत 4 सितंबर को सीबीआई ने केस दर्ज कर पांच लोगों के ठिकानों पर छापेमारी की थी। अब सीबीआई इन लोगों से पूछताछ कर कोयला घोटाले के राज उगलवाना चाहती है। इनमें  सबसे अहम नाम कांग्रेस सांसद विजय दर्डा का है जो चर्चित अखबार ‘लोकमत’ के मालिक हैं। वे महाराष्ट्र सरकार में शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा के भाई हैं। इन पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए कोल ब्लॉक आवंटित कराने का आरोप है। सीबीआई विजय दर्डा से संसद सत्र के बाद पूछताछ करेगी। सीबीआई इन लोगो से यह जानना चाहती है कि दर्डा परिवार में से कौन सा शख्स कोयला मंत्रालय के अधिकारियों के संपर्क में था। आरंभिक जांच में पता चला है कि कोल आवंटन कमेटी की बैठकों में अक्सर देवेंद्र दर्डा शामिल होते थे।

दर्ड़ा बंधुओं ने एक भी पैसा लगाए बिना करोड़ों कैसे कमाया, जरा उस पर गौर फरमाइए। सीबीआई ने नागपुर की कंपनी जस इंफ्रास्ट्रक्चर के खिलाफ मामला दर्ज किया है। जांच से जुड़े सूत्रों ने बताया कि यह कंपनी अभिजीत इंफ्रास्ट्रक्चर की सिस्टर कंसर्न है। इस कंपनी में सांसद विजय दर्डा व उनके बेटे देवेंद्र दर्ड़ा की 2 प्रतिशत भागीदारी है। 2010 में दर्डा बंधुओं ने एक नई कंपनी बनाई। इस कंपनी के पास बांका (बिहार) में पावर प्लांट लगाने की जिम्मेदारी थी। इस कंपनी का पूरा मालिकाना हक विजय दर्डा,राजेंद्र दर्डा और उनके दो बेटों के नाम है। इसका उल्लेख 2010 में विजय दर्डा द्वारा राज्यसभा में दिए गए संपत्ति के ब्यौरे में भी किया गया है।

आरोप है कि दर्डा बंधुओं ने दो वित्तीय संस्थाओं से लोन लेने की बात कही और बदले में  वित्तीय संस्थाओं को कंपनी के 25 फीसदी शेयर देने की बात कही, कोल ब्लॉक लेने के लिए जो दस्तावेज पेश किए उसमें कर्ज में ली जाने वाली रकम को भी अपनी हैसियत में जोड़कर दिखा दिया। इतना ही नहीं दर्डा बंधुओं ने कई कागजी कंपनियां बनाई और शेयर की हेराफेरी कर करोड़ों के वारे न्यारे किए। सूत्रों ने बताया कि उनकी अधिकांश कंपिनियों का पता कोलकाता का है। जांच अधिकारियों को संदेह है कि वे कागजी कंपनियां हैं जिसकी जांच की जानी है। सीबीआई ने अभी तक पांच कंपनियों के खिलाफ केस दर्ज किए हैं और कई कंपनियों के खिलाफ आरंभिक जांच चल रही है।

कोल आबंटन घोटाले में एक अन्य नाम ऊषा मार्टिन समूह का भी है। यह समूह ‘प्रभात खबर’ के नाम से बिहार व झारखंड में अखबार प्रकाशित करता है। सूत्र बताते हैं कि ऊषा मार्टिन समूह को दो कोयला ब्लॉक आवंटित हुए हैं। हालांकि ऊषा मार्टिन समूह कौन सा पावर प्रोजेक्ट चलाती है यह तो वह ही जाने पर बताया जा रहा है कि झारखंड में कोयला ब्लॉक लेकर उसने भी करोड़ों के वारे न्यारे किए हैं। मालूम हो कि कोल ब्लॉक आवंटन में अनुचित लाभ से संबंधित कैग की रिपोर्ट में जिन 57 ब्लॉकों की सूची दी गई है उनमें लगभग आधे यानी 27 ब्लॉक झारखंड में हैं। इन कोल ब्लॉकों में करीब 4 अरब 12 करोड़ टन का भूगर्भीय कोयला भंडार है। अनुचित लाभ लेने वालों में कई दिग्गज निजी कंपनियां शामिल हैं। इनमें से कोई भी निर्धारित समय के अंदर कोयला खनन नहीं शुरू कर पाई है।

सबसे अधिक 12 ब्लॉक स्पंज आयरन उद्योग को, नौ पावर प्लांट को एवं छह स्टील प्लांट को आवंटित किए गए। 57 ब्लॉकों में स्पंज आयरन और स्टील उद्योग के लिए देश में 34 ब्लॉक आवंटित हुए। इनमें अकेले झारखंड में 18 जबकि अन्य राज्यों में 16 ब्लॉक हैं। झारखंड में जिन कंपनियों को कोयला ब्लॉक मिले हैं उनमें अभिजीत इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (तीन ब्लॉक), टाटा स्टील लिमिटेड (दो ब्लॉक), टाटा स्टील लिमेटेड एवं आधुनिक थर्मल इनर्जी लि. उषा मार्टिन, इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स (दो ब्लॉक), एस्सार पावर जेनरेशन एवं एस्सार पावर लिमिटेड (दो ब्लॉक),आर्सेलर मित्तल इंडिया लि.एंड जीवीके पावर्स, हिंडाल्को एंड टाटा पावर लिमिटेड, उगंटा माइंस लि, रूंगटा माइंस एंड सनफ्लैग आयरन-स्टील लि, रूंगटा माइंस लि./कोहिनूर स्टील प्रा. लि, नीलांचल आयरन व पावर जेनरेशन एंड बजरंग इस्पात, जेएसपीएल, सीईएससी लि. एंड जेएएस इंफ्रास्ट्राक्चर, जेएसपीएल एंड गगन स्पंज आयरन लि,जेएसडब्ल्यू स्टील- भूषण स्टील एंड पावर-जय बालाजी इंडस्ट्रीज, मुकुंद लि,विनी आयरन एंड स्टील उद्योग लि, जायसवाल निको लि, कारपोरेट इस्पात एंड एलवॉयज लि, डोमको स्मोकलेस फ्यूएल प्रा.लि, भूषण पावर एंड स्टील लि और बहार स्पांज आयरन कंपनी लिमेटेड आदि हैं।

तीसरा मीडिया हाउस ‘दैनिक भास्कर’ समूह है। बताया जा रहा है कि इसने भी कोयला खदान आवंटन में जम कर चांदी काटी है। समूह की कंपनी डीबी पावर को भी कई कोल ब्लॉक आवंटित हुए हैं और इसके लिए ‘पत्र’ और ‘पत्रकार’ का जम कर उपयोग किया गया। कोयला ब्लाक आवंटन पर कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में दुर्गापुर-2 सरिया कोयला ब्लाक का जिक्र किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि डीबी पावर लिमिटेड को यह ब्लाक छह नवंबर, 2007 को आवंटित किया था और इस ब्लाक में 66.921 मीलियन टन कोयला मौजूद है। इस ब्लाक में छह नवंबर 2011 से कोयला का उत्पादन शुरू किया जाना चाहिए था जो आज तक शुरू नहीं हो पाया है।

सूत्रों ने बताया कि कोयला मंत्रालय ने भी डीबी पावर लिमिटेड को नोटिस जारी कर कोयला ब्लाक से उत्पादन शुरू होने में हो रही देरी पर जवाब मांगा है। 30 अप्रैल को भेजे गए कारण बताओ नोटिस में कहा गया कि कंपनी कोयला उत्पादन शुरू करने में होने वाली देरी की वजह बताने में नाकाम रहती है तो दुर्गापुर और सरिया ब्लाक आवंटन रद किया जा सकता है। डीबी पावर लिमिटेड को भेजे गए इस नोटिस में साफ कहा गया है कि अगर कंपनी कोयला मंत्रालय से किए गए वादे को पूरा करने में विफल रहती है तो आवंटन रद करने के लिए जरूरी कार्रवाई की जाएगी। बताया जा रहा है कि कंपनी नोटिस का जवाब मंत्रालय को भेज चुकी है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर नोटिस के जवाब मिलने की पुष्टि करते हुए कहा कि जवाब का अध्ययन किया जा रहा है। इस बारे में अभी कोई फैसला नहीं किया गया है।

उधर कोयला ब्लॉक आवंटन पर कैग की रिपोर्ट पर पैदा हुए बवंडर के बीच प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) खनन शुरू नहीं कर पाने वाली कंपनियों को आवंटित ब्लॉक रद नहीं करने पर कोयला मंत्रालय से खफा है। सूत्र बताते हैं कि कम से कम चार दर्जन कोयला ब्लॉकों के रद होने की स्थिति बनती है। मोटे तौर पर वे सभी कोयला ब्लॉक जहां अभी शुरुआती अनुमति भी नहीं ली गई है उनके आवंटन रद होने के ज्यादा आसार हैं। लेकिन रद्द करना आसान नहीं होगा क्योंकि 58 ब्लॉकों में कंपनियां 40 हजार करोड़ रुपये निवेश कर चुकी हैं। इतना ही नहीं इन ब्लॉकों से संबंधित परियोजनाओं में निवेश के लिए बैंक लगभग एक लाख करोड़ रुपये  तक का कर्ज मुहैया करा चुके हैं। इतिहास बताता है कि पूर्व में जब भी कोयला ब्लॉकों का आवंटन रद करने की बात उठी तो कोयला मंत्रालय में उसका विरोध हुआ है। कोयला मंत्रालय हमेशा कंपनियों को और वक्त देने और उनकी दिक्कतों को आपसी समझ-बूझ से सुलझाने का पक्ष लेता रहा है।

लेखक संदीप ठाकुर दिल्ली के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों साप्‍ताहिक अखबार हमवतन से जुड़े हुए हैं.


भड़ास के पास एक सज्जन ने एक अखबार की कटिंग को मेल किया है जिसमें कोयला घोटाले और भास्कर ग्रुप के बीच संबंधों की चर्चा की गई है. नीचे कटिंग है, उस पर क्लिक कर दें ताकि एनलार्ज होकर पढ़ने लायक हो जाए….

नक्षत्र न्यूज़ से कुमार निशांत और दैनिक हिंदुस्तान से सादिक और धर्मेश का इस्तीफा

कुमार निशांत ने नक्षत्र न्यूज़ से अपना इस्तीफ़ा दे दिया है. कुमार नक्षत्र न्यूज़ में सीनियर प्रोड्यूसर और एंकर के पद पर कार्यरत थे. नक्षत्र न्यूज़ को ऑन एयर हुए अभी छः महीने भी पूरे नहीं हुए कि लोगों ने छोड़ना शुरू कर दिया है. कुमार ने करियर की शुरुआत देश लाईव चैनल से की. कुमार ने नक्षत्र न्यूज़ को अपना इस्तीफ़ा दो महीने से तनख्वाह ना मिलने की वजह से दिया. 

चैनल के सीएमडी संजय सिन्हा ने कई बार कुमार से बात करनी चाही लेकिन कुमार फिर से नक्षत्र में वापसी के लिए तैयार नहीं हुए. कुमार नक्षत्र के तीन कार्यक्रमों आई कैंडी, बौलीवुड कैफे और वेकअप इंडिया के प्रोड्यूसर और एंकर थे. कुमार फिर से एफ़एम रेडियो जगत में वापसी करने का मन बना रहे हैं. नक्षत्र चैनल में कुमार निशांत सहित पंकज प्रसून जैसे अनुभवी और नेशनल चैनलों में अपनी सेवा दे चुके कर्मचारियों के चैनल छोड़ देने से चैनल की छवि और भी खराब होती दिख रही है.

दैनिक हिंदुस्तान, लखीमपुर से ब्यूरो इंचार्ज धर्मेश शुक्ला ने इस्तीफा दे दिया है.  वे अपनी नई पारी की शुरुआत दैनिक जागरण के साथ कर रहे हैं. सिटी में सीनियर रिपोर्ट सादिक अली के बारे में भी खबर है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. एक अन्य जानकारी के मुताबिक हिंदुस्तान, बरेली में सिटी डेस्क से बृजेंद्र निर्मल को हटा दिया गया है. डेस्क की जिम्मेदारी चीफ सब एडिटर सुनील मिश्रा को दी गई है. बरेली में हिंदुस्तान के नए संपादक कुमार अभिमन्यु ने ये बदलाव किए हैं. कुमार अभिमन्यू ने कई लोगों को सुधर जाने की चेतावनी दी है.
 

हिन्दी में रक्षा और सामरिक विषयों पर पत्रिका ‘डिफेंस मॉनिटर’, प्रमोद जोशी मुख्य संपादक

हिन्दी में रक्षा, आंतरिक सुरक्षा, विदेशनीति और नागरिक उड्डयन जैसे विषयों पर केन्द्रित पत्रिका ‘डिफेंस मॉनिटर’ का पहला अंक प्रकाशित होकर सामने आया है। अंग्रेज़ी में निश या विशिष्ट पत्रिकाओं का चलन है। हिन्दी में यह अपने किस्म की पहली पत्रिका है। इसका पहला अंक वायुसेना विशेषांक है। इसमें पूर्व नौसेनाध्यक्ष अरुण प्रकाश, एयर मार्शल (सेनि) एके सिंह, एयर वाइस मार्शल (सेनि) कपिल काक, हर्ष वी पंत, घनश्री जयराम और राजीव रंजन के अलावा मृणाल पांडे का उन्नीसवी सदी के भारतीय फौजियों पर विशेष लेख है।

इसके अलावा सुखोई विमानों में ब्रह्मोस मिसाइल तैनात करने पर एक विशेष आलेख है। हिन्दी सिनेमा और भारतीय सेना पर आलेख है साथ ही एचएएल के चेयरमैन आरके त्यागी और डीआरडीओ के प्रमुख वीके सारस्वत के इंटरव्यू हैं। पत्रिका के प्रबंध सम्पादक सुशील शर्मा ने बताया कि इसी विषय पर केन्द्रित द्विभाषी वैबसाइट ‘भारत डिफेंस कवच’ की सफलता के बाद इसे द्वैमासिक पत्रिका के रूप में शुरू किया गया है। कुछ समय बाद इसकी समयावधि मासिक करने की योजना है। पत्रिका के मुख्य सम्पादक हैं प्रमोद जोशी। 

‘डिफेंस मॉनिटर’ निश पत्रिका है यानी काफी छोटे पाठकवर्ग के लिए है। इसकी कीमत 100 रु रखी गई है क्योंकि प्रोजक्शन कॉस्ट काफी ज्यादा है। यदि यह मॉडल सफल होता है तब 10-15 रु कीमत वाली किफायती पत्रिका भी लांच की जाएगी जो ग्लोबल विषयों की कवरेज करेगी। मैग्जीन से जुड़ी वैबसाइट का पता http://www.bharatdefencekavach.com है। मैग्जीन मंगाने या किसी अन्य जानकारी के लिए यहां संपर्क कर सकते हैं…….

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नईदुनिया के रायपुर संस्करण में ये कौन-सी गाली छप गई!

याद होगा आपको वो किस्सा जिसमें दैनिक जागरण, नोएडा में मायावती को गाली छप गई थी और फिर मायावती ने जागरण वालों का बैंड बजा दिया था. इसी तरह एक बार राष्ट्रीय सहारा, कानपुर में गाली प्रकाशित हो गई थी. अखबारों में गालियों का छपना बताता है कि कम पैसे में काम कराने के आदी हो चुका अखबार मालिकों के खिलाफ किस कदर आम मीडियाकर्मियों में गुस्सा है, जिसके कारण वे अपनी भड़ास इस तरीके से निकालने पर मजबूर हो जाते हैं. एक मामला नई दुनिया, रायपुर का सामने आया है. है तो मामला जुलाई महीने का लेकिन इसका प्रकाशन भड़ास पर नहीं हुआ था, सो आज प्रकाशित कर रहे हैं.

नईदुनिया के रायपुर संस्करण मे १६ जुलाई के अंक मे पेज ५ पर प्रकाशित लोक निर्माण विभाग के अंबिकापुर संभाग के एक विज्ञापन में गाली छप गई है. विज्ञापन के आखिर में शर्तें और जानकारियों के बाद साफ़-साफ़ गाली लिख दी गई है.  इस कारण इस विज्ञापन को १७ जुलाई को फिर से उसी जगह पर प्रकाशित किया गया है. जिस तरह से लिखा गया है, उससे लगता है कि ये एक सोची समझी चाल है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नईदुनिया के हालात काफी खराब है. लोगो में जबरदस्त रोष है पर वो इसे व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं. यही कारण है कि काम करने वाले अपना रोष इस तरह निकाल रहे हैं. विज्ञापन ये रहा… लास्ट में १९ तक तो नियम-शर्तें आदि है. लेकिन २० वें नियम-शर्त में गाली है…. ध्यान से पढ़ें….

यशवंत के बाद अनिल को इसलिए अरेस्ट कराया गया ताकि भड़ास4मीडिया पूरी तरह बंद हो जाए

भड़ास4मीडिया, वो नाम जिसे कमजोर,मजबूर और शोषित पत्रकारों की आवाज कहा जाता था , जोकि पत्रकारों के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता था| लेकिन आज वो भड़ास4मीडिया शांत है क्यूंकि अपने काले कारनामे जगजाहिर होने से घबराये और तिलमिलाए कुछ तथाकथित सफेदपोश मीडिया मालिकों ने भड़ास के खिलाफ उत्तरप्रदेश की कर्तव्यनिष्ठ और जुझारू पुलिस के साथ मिलकर एक ऐसी घिनोनी साजिश रची जिसमे भड़ास4मीडिया के कर्ता-धर्ता यशवंत फंसते ही चले गये|

वो यशवंत जिसके नाम का खौफ तमाम तथाकथित मीडिया हाउसों के मालिकों व मैनेजमेंट में है| और हो भी क्यों न, खुद को कॉर्पोरेट कहने वाली इन दुकानों के अंदर की सच्चाई को यशवंत दुनिया के सामने जो लाते आये हैं| न रुपयों से इन्हें खरीदा जा सका और न ही धमकियों से डराया जा सका| यशवंत तो बस धुन में प्रबंधन के सताए कमजोर पत्रकारों का एक मजबूत सहारा बनकर हमेशा उनके साथ खड़े रहे और मीडिया जगत की काली सच्चाई को उजागर करने में ही लगे रहे और इसी का सिला आज उन्हें मिला|

इन लोगों ने मिलकर यशवंत के खिलाफ ऐसा जाल बुना कि आज यशवंत इस जाल से खुद को निकालने के लिए संघर्षरत हैं| यशवंत को एक दुर्दांत अपराधी साबित करने की कोशिश की गयी, और पुलिस ने भी इन धन्नासेठों का साथ देते हुए यशवंत पर वो धाराएँ लगा दीं जोकि वो एक खतरनाक वांटेड अपराधी पर लगाती है| अब हालत ये हैं कि बहती गंगा में हाथ धोने सभी उतर रहे हैं और यशवंत के खिलाफ ताबड़तोड़ मुक़दमे दर्ज करवाकर अपने मन में भरी भड़ास को निकाल रहे है| बेचारे यशवंत, उन्हें एक मामले में जमानत मिलती है तो दूसरे
मुक़दमे में सुनवाई होने के कारण उन्हें जेल में ही रहना पड़ता है| पहले साक्षी जोशी द्वारा दर्ज करवाए गये मुक़दमे में उन्हें जमानत मिली लेकिन विनोद कापड़ी द्वारा दर्ज करवाए गये मुक़दमे की सुनवाई के कारण महीने भर तक जेल में रहना पड़ा और अब जब कापड़ी द्वारा दर्ज करवाए गये मुक़दमे में भी जमानत मिली तो फिर दैनिक जागरण की ओर से दर्ज करवाए गये मुक़दमे में सुनवाई के कारण उन्हें अब भी जेल में रहना पड़ रहा है|

और तो और यशवंत के अनुपस्थिति में भी भड़ास को चलाने वाले और यशवंत की जमानत के लिए भागदौड करने वाले उनके सहयोगी अनिल को भी अब पुलिस ने जागरण की ओर से दर्ज करवाए गये मुक़दमे में आरोपी बनाकर हिरासत में ले लिया है जिससे भड़ास4मीडिया को बंद करवाया जा सके| ऐसा करने का सीधा सा कारण ये है कि यशवंत ने अब तक बिना दबे-बिना डरे इन समूहों की पोल-पट्टी को सबके सामने उजागर किया है जिससे कई बार इन समूहों में उच्च पदों पर आसीन लोगों की कुर्सियां हिल गयीं और समूह की साख पर भी बट्टा लग गया|

यशवंत को परेशान देख ये मीडिया मालिक शायद सोच रहे हों कि अब यशवंत डर जाएगा-दबने लगेगा, लेकिन यशवंत के व्यक्तित्व को जानने वाला हर इंसान ये जानता है कि ऐसी मुसीबतों का सामना करने की आदत यशवंत को है और वो उनमे से हैं जोकि मुसीबतों के सामने डटकर खड़े होते हैं, अपने घुटने नहीं टेकते| यहाँ एक बात याद आती है और वो ये कि “सच परेशान हो सकता है,थक सकता है लेकिन हार नहीं सकता”| हम सब जानते हैं कि यशवंत जल्द ही खुद को इस मकड़जाल से बाहर निकल लेंगे और अब जब वो वापस लौटेंगे तो एक घायल शेर की भांति जिसका सामना करने की हिम्मत किसी भी झूठ के सौदागर की नहीं होगी |

शिवम भारद्वाज

आगरा

shivambhardwaj1989@gmail.com


(शिवम भारद्वाज ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 13 अगस्त को मेल किया. तत्कालीन आपाधापी और भड़ास के संस्थापक यशवंत व संपादक अनिल के जेल में होने के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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इनसेंटिव का पैसा हड़पना चाहते हैं हिंदुस्तान, बरेली के वरिष्ठ लोग?

: कानाफूसी : यूपी निकाय चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली यूनिट को हिंदुस्तान मैनेजमेंट ने इनसेंटिव भेजा है. मुरादाबाद और बरेली यूनिट के लिए भी करीब अस्सी हजार रुपये आए. मुरादाबाद में पेजीनेटर से लेकर एनई तक में पैसे बांट दिए गए लेकिन बरेली के पैसे पर वरिष्ठों को लालच आ गया. जैसे ही इनसेंटिव से संबंधित मेल आया, पैसा हड़पने का खेल शुरू हो गया. नए संपादक को इस पैसे के असली हकदारों की लिस्ट भेजी गई. इसमें केवल चार नाम थे. एनई, दोनों डीएनई और पुराने संपादक का खास कापी एडिटर.

लोगों को पता चला तो विरोध शुरू हुआ. पहले तर्क ये दिया गया कि चुनाव डेस्क के लिए पैसा आया है. लेकिन यहां वरिष्ठों से एक गल्ती हो गई. निकाय चुनाव में कोई अलग से डेस्क बनी ही नहीं थी. अपना गला फंसता देख अपकंट्री हेड ने कह दिया कि पैसा मीडिया मार्केटिंग का है. अब सवाल ये है कि अगर पैसा मीडिया मार्केटिंग के लिए आया है तो योगेंद्र रावत, मयंक चतुर्वेदी, बृजेंद्र निर्मल और मनोज शर्मा का ही नाम क्यों भेजा गया. अब गेंद संपादक के पाले में है…

आप भी अपने संस्थान की कानाफूसी bhadas4media@gmail.com के जरिए भड़ास तक भेज सकते हैं.

यूपी में सपा की सरकार बनी तो तथाकथित एक पत्रकार ने ढेड़ लाख रूपए से अधिक के लड्डू बांटे

: अब अच्छा लिखने वाला पत्रकार बड़ा पत्रकार नहीं समझा जाता है, बड़ा पत्रकार वह है जो अपने मालिक के लिए लाबिंग कर सके : नब्बे प्रतिशत पत्रकार समाज के प्रति अपने दायित्वों को भूलकर स्वयं के स्वार्थ पूरे करने में लगे हैं : एक जमाना था जब मीडिया को समाज का दपर्ण कहा जाता था। जनता को समाज में हो रहे प्रत्येक छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे बदलाव की जानकारी देना, पत्रकार का मिशन होता था। यह वह दौर था जब पत्रकारिता पैसा कमाने का माध्यम न होकर समाज सेवा का मिशन हुआ करता था। वे लोग ही पत्रकारिता में आते थे जिनमें सत्ता की खामियों को उजागर करने, नौकरशाहों के कारनामों की पोल खोलने और गुंडे-बदमाशों के खिलाफ लिखने और बोलने की ताकत एक जुनून की तरह होती थी। कंधें पर थैला, पैरों में मामूली सी चप्पल, मोटा पहनावा (अक्सर खादी का कुर्ता-पैजामा या फिर छोती-कुर्ता) और पैदल भ्रमण या फिर बहुत हुआ तो साइकिल की सवारी,पत्रकारों की मुफलिसी का दौर कभी खत्म नहीं होने वाला सिलसिला हुआ करता था। वर्षों तक पत्रकारों की यही पहचान रही।

जब कोई नौजवान पत्रकार बनने की चाहत में सम्पादक के पास दस्तक देता तो सम्पादक जी एक ही रटी-रटाई बात ऐसे नौजवानों से कहते थे, पैसा कमाना है तो कई क्षेत्र हैं। पत्रकारिता से तो अक्सर दो जून की रोटी भी नहीं नसीब होती है। वह पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण करने की चाहत रखने वाले युवाओं को तमाम ऐसे नामी-गिरामी पत्रकारों के नाम भी गिना देते थे जिनकी लेखनी में तो गजब की ताकत थी, लेकिन जब वह मरे तो उनके पास से कफन खरीदने लायक पैसे भी नहीं निकले। देश की आजादी में जितना योगदान क्रांतिकारियों और आजादी के मतवालों का था, उतना ही योगदान पत्रकारों का हुआ करता था।

यह वह दौर था जब सम्पादक के कंधों पर मिशन पत्रकारिता को आगे बढ़ाने का जिम्मा होता था। अखबार की दुनिया में संपादक के ऊपर किसी की हैसियत नहीं होती थी, वह अखबारी दुनिया का भगवान होता था। विज्ञापन कर्मी भले ही अखबारों के लिए पैसा कमा कर लाते थे लेकिन आज की तरह उनकी खबरें छपवाने या रूकवाने की हैसियत नहीं होती थी। विज्ञापन कर्मी ही नहीं खबरों के मामले में मालिको तक का हस्तक्षेप नहीं चलता था। सम्पादकीय विभाग को काम करने की पूरी छूट मिली हुई थी। मीडिया का एक चरित्र होता था। यह दौर आजादी के बाद काफी लम्बा तो नही चला फिर भी इस दौर को पत्रकारिता का सुनहरा युग कहा जा सकता है।

अस्सी के दशक के बाद से समाचार पत्र व्यवसाइयों के कब्जे में आ गए, तब से मालिक या तो स्वयं या उनका कोई चहेता संपादक बनने लगा। इससे पहले तक मीडिया के क्षेत्र में उन्हीं लोगों की दखलंदाजी रही जो खालिस पत्रकार थे और पत्रकारिता के लिए ही पैदा हुए थे। इसमें एम चेलापति राव, के रामाराव, सी एन चितरंजन, योगेन्द्रपति त्रिपाठी, अशोक जी, कृष्ण कुमार मिश्रा, भानू प्रताप शुक्ल, बचनेश त्रिपाठी, अखिलेश मिश्र, विद्या भाष्कर, चन्द्र कुमार, इशरत अली सिद्दीकी, लक्ष्मी कांत तिवारी, सुरेन्द्र चतुर्वेदी, विशन कपूर, तरूण कुमार भादुड़ी, एससी काला, सत्यनारायण जायसवाल, ललित रायजादा, सियाराम त्रिपाठी, एसपी निगम, एसके त्रिपाठी, सत्येन्द्र शुक्ला, कुंवर राज शंकर, वीके सुभाष, विद्या सागर जैसे तमाम नाम अपने संपादकीय और बेबाक लेखन के लिए आज भी याद किए जाते हैं। इनमें से कई की मौत हो चुकी है तो बचे लोगों ने उम्र के बढ़ते प्रभाव या अन्य कारणों से अपने को पत्रकारिता से लगभग अलग-थलग कर लिया।

इसके बाद से पत्रकारिता में गिरावट का जो सिलसिला शुरू हुआ वह थमने का नाम नहीं ले पाया। पत्रकारिता पीछे छूटती गई और पत्रकार आगे बढ़ते गए। पत्रकारिता मिशन की जगह व्यवसाय बन गया। बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों ने मीडिया को पैसा कमाने का हथियार बना लिया। खबरें सेंसर होने लगी और सम्पादक की कुर्सी पर कारपोरेट जगत के लोगों का आधिपत्य हो गया। मालिकों की मीडिया के माध्यम से पैसा कमाने की चाहत ने अखबारी दुनिया ही बदल दी। पत्रकारों का ध्यान लिखने-पढ़ने से अधिक इस बात पर रहता है कि कैसे नेताओं और सत्ता से नजदीकियां बढ़ाई जाएं।

हाल की ही घटना है। समाजवादी सरकार बनी तो तथाकथित एक पत्रकार ने ढेड़ लाख रूपए से अधिक के लड्डू बांटे। डिब्बे के ऊपर एक स्टीकर चिपका था, जिस पर लिखा था, ‘प्रदेश में साठ वर्षों बाद सपा की ऐतिहासिक विजय, प्रदेश की बहू माननीय डिंपल यादव पत्नी माननीय अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश की अभूतपूर्व जीत की खुशी में मुबारकबाद।’ सौजन्य से में पत्रकार का नाम और मोबाइल नंबर छपा हुआ था, ऐसी हरकत करने वाले को पत्रकार नहीं दलाल ही कहा जा सकता है। हास्यास्पद बात यह है कि यही पत्रकार विधान सभा चुनाव 2012 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा और कैंट विधान सभा क्षेत्र लखनऊ से चुनाव जीतने वाली रीता बहुगुणा जोशी की जीत के बाद उनकी गाड़ी पर नजर आए थे और तब भी मिठाई बांट का पत्रकारिता को कलंकित किया था।

आज समाज में मीडिया का दोहरा चरित्र साफ दिखाई देता है। मीडिया पर बाजारवाद हावी है। जो खबर बिकती है, मीडिया उसी को परोसना चाहता है। हाई प्रोफाइल खबरों को बेचा जाता है। दलितों, किसानों, गरीबों, असहायों और अकाल मौतों जैसी ही तमाम खबरें दबा दी जाती हैं। कई बड़े अखबार उद्योगपतियों की छत्रछाया में चल रहे हैं। कहने को तो लखनऊ अखबारों का शहर बनता जा रहा है। जहां कभी मुट्ठीभर पत्र-पत्रिकाएं थीं, अब अखबारों की झड़ी लगी हुई है। अच्छे कलेवर के कई अखबार बाजार में आ गये हैं। विज्ञापन के लिए होड़ मची है। पत्रकारिता और विज्ञापन एक-दूसरे के पूरक हो गए हैं। पत्रकारों के पास एक दूसरे का दुखदर्द बंटाने के लिए न तो मौका है, न ही मौका पड़ने पर हजारों की संख्या में धरना प्रदर्शन पर बैठकर सरकार या संस्थान से अपनी मांगे मनवाने की ताकत है। पत्रकार जातियों के साथ-साथ वर्ग और सम्प्रदायों में विभाजित होकर रह गए हैं। सब अपने हित साधने में लगे हैं। कुछ समय पूर्व प्रेस कांउसिल के अध्यक्ष मार्रकंडेय काटजू लखनऊ पधारे। उनके सामने ही दो पत्रकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। बात इतनी आगे निकल गई कि मारपीट की नौबत हो गई। तब एक सम्प्रदाय विशेष के पत्रकारों ने एकजुट होकर अखिलेश सरकार के अपने ही सम्प्रदाय के एक ताकतवर मंत्री का सहारा लेकर तत्कालीन सूचना निदेशक को पद से हटवा दिया।

अब अच्छा लिखने वाला पत्रकार बड़ा पत्रकार नहीं समझा जाता है। बड़ा पत्रकार वह है जो अपने मालिक के लिए लाबिंग कर सके। ऐसे पत्रकारों के पास बढि़या वेतन और बढि़या कार ही नहीं रहने के लिए आलीशान मकान भी होते हैं। असली पत्रकार आज भी तंगहाली में है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद तो स्थिति और भी खराब हो गई है। खबर दिखाने और रोकने के लिए पैसे लिए जाते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के कुछ पथभ्रष्ट पत्रकारो-कैमरामैनों तथा सरकारी कर्मचारियों के गठजोड़ द्वारा लोगों को भयभीत करके उनसे उगाही का धंधा भी कई शहरों में धड़ल्ले से चल रहा है। ऐसे पत्रकारों को कहीं उल्टा-सीधा काम होने की भनक भर लग जाए,वह वहां धमक पड़ते हैं, लेकिन मकसद खबर एकत्र करने से अधिक पैसा कमाना होता है। पत्रकारों और सरकारी कर्मचारियों का गठजोड़ कैसे काम करता है इसको हाल ही की एक घटना से समझा जा सकता है। राजधानी लखनऊ के एक पाश कालोनी में एक जगह निर्माण कार्य चल रहा था,एक कैमरामैन और पत्रकार वहां आ धमके, आनन-फानन में वीडियो फिल्म बनाई और चलते बने। थोड़ी ही देर बाद निर्माण कार्य करा रहे व्यक्ति के पास संबंधित विभाग के सरकारी मुलाजिम का फोन आता है कि आप के अवैध निर्माण कार्य की खबर चैनल पर दिखाई जाने वाली है। निर्माण कार्य कराने वाला व्यक्ति डरकर सैटिंग-गैटिंग में लग जाता है। फिर पत्रकारों और सरकारी मुलाजिमों का गठजोड़ सामने वाले की हैसियत देखकर उसकी जेब ढीली करा लेता है। कई पत्रकार तो गुनाहागारों को शरण देने में भी आगे रहते हैं। आज की तारीख में पत्रकारों का मिशन जलवा जमाना और पैसा कमाना हो गया है। पत्रकारों के लिए बड़ी मुश्किल से योजनाएं बन पाती हैं। उन पर भी कुछ स्वार्थी किस्म के पत्रकार कुंडली मारकर बैठ जाते हैं।

कुछ पुराने पत्रकारों की कर्मठता के चलते ही जर्नलिस्ट वेलफेयर सोसाइटी का गठन कर वृद्धावस्था पेंशन का लाभ दिला दिया है। वे सचमुच साधुवाद के पात्र हैं। उन्हीं के बदौलत पत्रकारपुरम जैसी कालोनियां बसी हैं। वरिष्ठ पत्रकारों की इस सोच को अब आगे बढ़ाने के लिए शायद किसी के पास समय नहीं रह गया है। पत्रकारिता के लिए यह विडंबना ही कही जाएगी, इस क्षेत्र में एक से बढ़कर एक कलमकारों ने अपनी जगह बना रखी है।  जो जहां है, वही अपने को बहुत कुछ समझ रहा है। यह परम्परा पत्रकारों की तरक्की के लिए विष बेल साबित हो रही है। मजदूर संगठनों का फैक्ट्रियों आदि में एकजुटता के कारण ही हर वह सुविधा प्राप्त होती है, जो उनके बुरे समय में उनके काम आती है। लेकिन अखबार नवीसों की दुनिया में अधिकतर लोग ‘हैंड टु माउथ‘ ही बने रह जाते हैं। बीमा राशि पाने के लाले पड़ रहे हैं। पत्रकारों की आपसी अहं के कारण ही बीमा के लिए सरकार से दी जाने वाली राशि को इसलिए नहीं बढ़वा पाते हैं कि उनके अलावा इस कतार में कोई दूसरे न आ जाएं। इसमें उनका क्या नुकसान है। जो दूसरे पत्रकारों को अपनी लाइन में खड़े ही नहीं होने देना चाहते है।

पत्रकारों की खामियों की कि जाए तो कुछ अपवादों को छोड़कर अस्सी या फिर नब्बे प्रतिशत पत्रकार समाज के प्रति अपने दायित्वों को भूलकर स्वयं के स्वार्थ पूरे करने में लगे हैं। कोई सपा के करीब है तो कोई बसपा के या फिर कांग्रेस या भाजपा के। हाथ में कलम या फिर कैमरा आते ही ऐसे पत्रकार लाबिंग और टांसफर-पोस्टिंग जैसे कामों में लग जाते हैं। हकीकत से अलग स्टोरी प्लांट की जाती है। पत्रकारिता एक ऐसा व्यवसाय था जिसमें वर्षो तक गुरू-शिष्य परंपरा का पालन हुआ। वरिष्ठता का ध्यान रखा जाता था, लेकिन आज छोटे-बडे़ का कोई सम्मान नहीं रह गया है। पत्रकारिता में प्रवेश करने वाली नई पौध अपने से अनुभवी पत्रकारों से कुछ सीखना ही नहीं चाहती है, यही वजह है अक्सर नए रिपोर्टर हंसी का कारण बन जाते हैं।

लखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. अजय कुमार के कुछ पुराने आलेखों को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें……..

माया के चहेते पोंटी चड्ढा और जेपी गौड़ पर सपा की मेहरबानियां

शशांक शेखर मीडिया मालिकों को साधते हैं, नवनीत सहगल पत्रकारों को सिखाते हैं

राजस्थान पत्रकार और साहित्यकार कल्याण कोष की प्रबन्ध समिति का पुनर्गठन

जयपुर : राजस्थान सरकार ने आदेश जारी कर राजस्थान पत्रकार और साहित्यकार कल्याण कोष के संचालन हेतु दो वर्ष की अवधि के लिए प्रबन्ध समिति का पुनर्गठन किया है। आदेश के अनुसार समिति में सूचना एवं जनसम्पर्क मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह अध्यक्ष एवं प्रमुख शासन सचिव, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को उपाध्यक्ष तथा निदेशक सूचना एवं जनसम्पर्क को सदस्य सचिव बनाया गया है।

इसके अलावा समिति में मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार एम.यासीन, वरिष्ठ पत्रकार सर्वश्री सीताराम झालानी, मेघराज श्रीमाली एवं सत्यनारायण शर्मा, दैनिक भास्कर के त्रिभुवन, राजस्थान पत्रिका के आनन्द जोशी, राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) की श्रीमती जीनत कैफी, पंजाब केसरी के अजय ढढ्ढा तथा ईटीवी राजस्थान के ईशमधु तलवार को सदस्य बनाया गया है।

दिलीप सिंह और मनोज कुमार ने DIGI छोड़ा, WWIL पहुंचे

जयपुर के DIGI Cable से मनोज कुमार और दिलीप सिंह ने इस्तीफा दे दिया है| दोनों अपनी नई पारी जयपुर में हाल ही लॉन्च होने जा रहे नए MSO जिसका नाम WWIL है, के साथ शुरू कर रहे हैं| DIGI में Technical Manager के पद पर काम कर रहे दिलीप सिंह इससे पहले मुंबई में इनकेबल नेट में अपनी सेवाएं दे रहे थे| इसके बाद इन्होंने राजस्थान और मध्यप्रदेश में भास्कर मल्टीनेट के लिए अपनी तकनीकी सेवाएं दीं|

दिलीप मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी वोडाफोन के लिए भी काम कर चुके हैं| DIGI छोड़कर WWIL जाने वाले दूसरे व्यक्ति मनोज कुमार ने DIGI से पहले भास्कर मल्टीनेट के लिए असिस्टेंट कंट्रोल रूम इंचार्ज के तौर पर काम किया| इसके अलावा वे राजस्थान पत्रिका के केबल समूह में भी State Control Room Incharge की ज़िम्मेदारी संभाल चुके हैं| WWIL में मनोज Producer-News and Production के पद पर कार्य करेंगे|

नरेश पारीक, उमंग माथुर और नीरज शर्मा ने भी WWIL के साथ अपनी नई पारी की शुरुआत की है| नरेश और उमंग इससे पहले DIGI और भास्कर मल्टीनेट के लिए अपनी सेवाएं दे चुके हैं| नीरज DIGI के बाद कुछ समय के लिए महुआ टीवी के मुंबई ऑफिस में अपनी सेवाएं दे चुके हैं|  राजस्थान की राजधानी जयपुर में एमएसओ डिजी केबल से छोड़कर जाने वालों की कतार में ऑपरेशन टीम भी जुड़ गई है|

इस बार ऑपरेशन टीम से पांच लोगों के साथ दो कर्मचारी कंट्रोल रूम से भी हैं| इस्तीफा देने सभी लोगो ने सिटी केबल में ज्वाइन किया है| डिजी केबल में असिस्टेंट मैनेजर दीपक शर्मा ने सिटी केबल में मैनेजर ऑपरेशंस के तौर पर ज्वाइन किया है| इनके साथ ऑपरेशन डिपार्टमेंट से प्रमोद शर्मा, अमित शर्मा, जीतेंद्र सैनी और नीलमणि जांगिड़ ने संस्थान को अलविदा कहा है| इनके अलावा कंट्रोल रूम से सुरेन्द्र सिंह रावत और संदीप कुमार भी सिटी केबल पहुँच गए हैं|

जयपुर में DIGI Cable छोड़ कर जाने वालों की लिस्ट के नामों में फिर इजाफा हो गया है| इस बार संयोग जैन और अंजन जैन ने संस्थान को बाय करते हुए WWIL के Siti Cable को ज्वाइन किया है| संयोग इससे पहले भास्कर मल्टीनेट के साथ रिपोर्टर के तौर पर जुड़े रहे| जहां वे क्राइम बीट देख रहे थे| वहीँ अंजन भी भास्कर मल्टीनेट के लिए अपनी सेवाएं दे चुके हैं| ये दोनों ही डिजी केबल के जयपुर में पदार्पण के वक़्त से जुड़े हुए थे| इस बार चार लोगों ने DIGI का दामन छोड़कर WWIL को चुना है| ये हैं नितेश शर्मा, कमल शर्मा, दिनेश मीणा और करणी सिंह| इनमें से कमल, दिनेश और करणी DIGI से पहले भास्कर मल्टीनेट के लिए भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं| पिछले कुछ दिनों से शुरू हुआ ये सिलसिला फिर चल निकला है और माना जा रहा है कि जल्द ही कुछ और नाम DIGI की लिस्ट से कट कर WWIL में शामिल हो जाएंगे|

मालूम हो कि जल्द ही जयपुर में WWIL एक नए MSO के तौर पर अपनी सेवाएं शुरू करने जा रहा है| इससे पहले राजधानी में भास्कर, पत्रिका और DIGI अपना केबल नेटवर्क चला रहे हैं| धीरे-धीरे डिजी केबल से कर्मचारियों के छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ था उसमें अब तेज़ी दिख रही है| इन सबके बीच एक नए MSO के जयपुर में आने से केबल उपभोक्ताओं को नए विकल्प मिलने लगेंगे और इससे एनेलौग से डिजिटल हो रहे केबल व्यवसाय को भी नए आयाम मिलेंगे|

राजस्थान में प्रेस प्रतिनिधि अधिस्वीकरण समिति का पुनर्गठन

जयपुर : राजस्थान सरकार ने आदेश जारी कर प्रेस प्रतिनिधि अधिस्वीकरण नियम के अन्तर्गत समाचार पत्रों/समाचार समितियों/इलेक्ट्रोनिक मीडिया  के प्रतिनिधियों तथा स्वतंत्र पत्रकारों के अधिस्वीकरण के विषय में राज्य सरकार को परामर्श देने के लिए राज्य प्रेस अधिस्वीकरण समिति का पुनर्गठन दो वर्ष की अवधि के लिए किया है।

आदेश के अनुसार समिति में निदेशक, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को अध्यक्ष एवं संयुक्त निदेशक (समाचार) सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को सदस्य सचिव बनाया गया है। समिति में मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार एम.यासीन, यू.एन.आई. के सुरेश पारीक, राष्ट्रीय सहारा के श्याम सुन्दर शर्मा, राजस्थान पत्रिका के आशुतोष शर्मा, हिन्दुस्तान टाइम्स की उर्वशी देवरावल, दैनिक भास्कर के गिरिराज अग्रवाल, एन.डी.टी.वी. के राजन महान, वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश भण्डारी, दैनिक जागरण के नरेन्द्र शर्मा एवं दैनिक नवज्योति के एल.एल. शर्मा को सदस्य बनाया गया है।

तीन सदस्यों प्रदीप शाह कुमाया, जीतेश अवस्थी और नायला किदवई का मनोनयन

लखनऊ : उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की कार्यकारिणी में आज तीन सदस्यों को मनोनीत किया गया है। समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी की अध्यक्षता में विधान भवन प्रेस रूम में हुयी बैठक में कार्यकारिणी ने द पायनियर के छायाकार प्रदीप शाह कुमाया, न्यूज चैनल पी7 के कैमरामैन जीतेश अवस्थी और न्यूज एजेंसी एडीएनआई की नायला किदवई को मनोनयन का निर्णय लिया।

इस आशय का प्रस्ताव समिति के सचिव सिद्धार्थ कलहंस ने रखा जिस पर उपस्थित कार्यकारिणी के सदस्यों ने अपनी सहमति जतायी। समिति की कार्यकारिणी की बैठक प्रत्येक माह के पहले गुरुवार को बुलाये जाने का भी निर्णय लिया गया। प्रदीप शाह, जीतेश अवस्था व नायला किदवई को कार्यसमिति में मनोनयन पर पत्रकारों ने खुशी जाहिर की है।
 

‘सरिता’ और ‘हिंदुस्तान एक्सप्रेस’ में यशवंत व भड़ास

यशवंत की गिरफ्तारी के खिलाफ जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन से संबंधित खबरें देश भर के कई छोटे बड़े अखबारों में प्रकाशित हुई. यह खबर उर्दू अखबार हिंदुस्तान एक्सप्रेस में भी छपी जिसकी कटिंग नीचे प्रकाशित की जा रही है. सरिता मैग्जीन के सरित प्रवाह में इस बार मीडिया के मुद्दे पर चिंतन किया गया है जिसमें यशवंत और भड़ास का भी जिक्र है, उसे भी नीचे दिया जा रहा है. दोनों खबरों को पढ़ने के लिए आपको नीचे दिए गए इनकी कटिंग पर क्लिक करना होगा ताकि ये बड़े साइज में खुल सकें……..


”यशवंतजी, आपका तेवर और आपकी निडरता आपकी पूंजी है”

यह पत्र घनश्याम श्रीवास्तव ने भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह को भेजा है. उन्होंने भड़ास ब्लाग से लेकर भड़ास४मीडिया तक की यात्रा को देखा, आब्जर्व किया है और अब यशवंत के जेल प्रकरण को भी सुन-जान लिया. घनश्याम जी पूरे वाकये पर अपनी तरह से टिप्पणी करते हैं. टिप्पणी के अंत में उनका फोन नंबर और उनकी मेल आईडी भी है. उनकी टिप्पणी को हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है…. कृपया नीचे देखें….


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खबर छपवाने के लिए दैनिक जागरण के दफ्तर में घुसकर धमकाने वाला नेता जेल गया

सुलतानपुर। बीती रात दैनिक जागरण अखबार में घुसकर अपनी खबर प्रकाशित कराने की बात कहने वाले और इसके लिए धमकाने वाले एक दबंग नेता को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. आरोप है कि दबंग नेता ने पत्रकार पर अवैध असलहा तानकर जान से मारने की धमकी दी. मौके पर पहुंचकर नगर कोतवाल ने मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करते हुए मुकदमा पंजीकृत किया था. गुरुवार को उक्त आरोपी को अदालत में पेश किया गया जिसकी जमानत अर्जी को खारिज करते हुए अदालत ने मुख्य आरोपी को जेल भेज दिया है.

मामला बुधवार की देर रात का है. जिला पंचायत वार्ड नं0 23 से सदस्य पद के चुनाव में अपनी खबर प्रकाशित करवाने का दबाव बनवाते हुए एक उम्मीदवार के समर्थक अखिलेश तिवारी अपने पन्द्रह साथियों के साथ सफारी गाड़ी एम0पी0-20 सी0ए0-1105 पर सवार होकर अखबार के दफ्तर में पहुंचते हैं. वहां अपनी खबर प्रकाशित करने के लिए दबाव बनने लगे. पत्रकारों द्वारा इनकार करने पर आरोप है कि वे पत्रकारों को डरवाते धमकाते है. पत्रकारों के ऊपर असलहा तानने का भी आरोप है. इसकी सूचना पत्रकारों ने नगर कोतवाली में दी. पुलिस के पहुंचने से पहले नेता लोग भाग गए. पीड़ित पत्रकार की तहरीर पर नगर कोतवाली में भादवि की धारा 147, 148, 352, 452, 504, 506 व 7 सीएल एक्ट के तहत मुकदमा पंजीकृत कर मुख्य अभियुक्त अखिलेश तिवारी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. 

हद है, ये फुटेला अब यशवंत ही नहीं, तस्लीमा का भी विश्लेषण करेंगे

वेब मीडिया के एक "महारथी" हैं जगमोहन "फुटेला". सिर्फ उनका लिखा ही पढ़ा है. शब्दों पर गजब का कमांड है. आजकल इन महाशय की दसों ऊँगली घी में और सर कड़ाही में है. कारण यशवंत भाई का जेल जाना. तिस पर तुर्रा ये कि महारथी ने तय कर दिया है कि भड़ास बंद हो चुका है. इनके लेखन में ऐसी लाईनें भी मिल जाएँगी "चंडीगढ़ पुलिस से उठवाकर इधर मंगवाऊँ…." (मानो चंडीगढ़ पुलिस प्रमुख वगैरह इनके गेटकीपर हों.)

अक्सर अपने लेखों में बताते फिरते हैं  कि फलां-फलां वेबसाईट (यानि एक से ज्यादा) हमहु चलाते हैं (मानो साईट नहीं सेटेलाईट चला रहे हों). बताने का मकसद खुद को यशवंत से बड़ा दिखाना. बड़ा बनना है तो बड़ी लकीर खींचो न साहब न की बड़ी लकीर को छोटा दिखाने के प्रयास में जुट जाओ. लेखों में ऐसा भी लिखते मिल जायेंगे "मैं पंजाबी हूँ, खुद्दारी कूट-कूट कर भरी है" अच्छी बात है भई, पंजाबियों में खुद्दारी कूट-कूट कर भरी होती है, मैं जानता हूँ. लेकिन गैर-पंजाबी क्या खुद्दारी का कच्छा उतारकर भीख माँगा करते हैं. कुल मिलकर क्षेत्रवादी मानसिकता की भी बू आती है.

हुजूर यशवंत भाई के खिलाफ लिखे गए एक लेख में फरमा रहे हैं  कि बंगलादेश ने वो जो एक बार (लगभग दस साल से ज्यादा पहले) 16 सेना के जवान  काटपीट कर भारत भेज दिए थे (हालाँकि इन्होने 20 लिखा है) वो इसलिए क्युकि भारत ने तसलीमा नसरीन को पनाह दी थी. वाह फुटेला महोदय वाह! अरे शब्दों पर पकड़ का मतलब ज्ञानी होना नहीं होता, समझो इस बात को प्रभु. एक तो आपकी सोच और तिस पर तुर्रा ये कि जब वो दुखद घटना हुई थी तब तसलीमा को भारत में पनाह नहीं मिली थी. 2004 में तसलीमा को भारत में रहने के लिए टेम्परेरी रेजिडेंसियल परमिट दिया गया था. जबकि "फुटेला" महोदय जवानों के मारे जाने की घटना अप्रैल 2001 की है.

जो व्यक्ति इस तरह की लफ्फाजी मात्र यशवंत को नीचा दिखाने के लिए कर सकता है, वो तसलीमा का विश्लेषण करे- हद है यार. महोदय ने एक और शुभ कार्य करने का प्रयास किया है. दयानंद पाण्डेय जी को स्व. प्रभाष की याद दिलाकर यशवंत के खिलाफ भड़काने का बचकाना प्रयास. जाइये फुटेला साहब जाइये, जो सेटेलाईटें सॉरी साईटें आप चला रहे हो चलाओ, यशवंत को समझने के लिए भौतिकवादी मानसिकता को ताख पर रखना होगा जो आपसे संभव नहीं.

चन्दन श्रीवास्तव

महासचिव

प्रेस क्लब अयोध्या-फैजाबाद

chandan2k527@yahoo.co.in


(पत्रकार चन्दन श्रीवास्तव ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 8 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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दो बयान… : यशवंत के साथ है पूर्वांचल प्रेस क्लब…. साजिश के शिकार बने हैं यशवंत भाई

भड़ास ४ मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह ने जिस तरह सफ़ेद लिबास में छिपे काले चेहरों के नकाब उतरने शुरू किये है उससे कई लोग खार खाए हुए हैं, उन्होंने पत्रकारिता को एक नया आयाम देते हुए उन लोगों के बारे में खबरें देनी शुरू की जिन्होंने सिर्फ दूसरों पर अंगुली उठाने का काम किया था.

उन्होंने कभी सच के साथ समझौता नहीं किया यही वजह है कि लोग उनके पीछे पड़े रहते हैं, लेकिन कहावत वही है, कि गिरते है सह्सवार ही मैदाने जंग में, साजिश के तहत यशवंत की गिरफ़्तारी से सारा पत्रकार समाज झुब्ध है, पूर्वांचल प्रेस क्लब के हम सभी पत्रकार यशवंत की गिरफ़्तारी का विरोध करते हैं, हम सभी यशवंत की गिरफ़्तारी की निंदा करते हैं.

हरीश सिंह

अध्यक्ष

पूर्वांचल प्रेस क्लब

editor.bhadohinews@gmail.com


साजिश के शिकार बने है यशवंत भाई

गोरखपुर। भड़ास4मीडिया के संपादक और पत्रकारों के हक की लड़ाई लड़ने वाले यशवंत भाई दलालों के आँख की करकिरी बने थे। यशवंत भाई किसी सजिश के शिकार बने हैं। जेल से छूटने के बाद असलियत सामने आएगी। गोरखपुर के बहुत से पत्रकार यशवंत भाई के साथ हैं, संघर्ष में जेल तो होता है, लेकिन शेर दिल इंसान पर ऐसा घिनौना आरोप हजम नहीं होता।

संजय

पत्रकार

गोरखपुर

sanjay123gkp@gmail.com


(उपरोक्त बयान क्रमशः दो और तीन जुलाई को भड़ास के पास मेल किया गया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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जिस कारपोरेट मीडिया के साथ सत्ता का सहयोग है, उसके लिए यह काम नामुमकिन नहीं

: वेब मीडिया पर मंडराता खतरा : अभी हाल ही में झारखंड के पत्रकार मुकेश भारतीय जो राजनामा डाट काम के संचालक व संपादक हैं, उनकी गिरफ्तारी हुई थी। कारण था पायनियर अखबार के पवन बजाज द्वारा थाने में रंगदारी वसूलने की लिखित शिकायत। इस घटना में सबसे अजीब बात यह रही कि जिस खुलासे के लिए खबर लिखी गई वह खबर पहले ही छप चुकी था, और जब खबर छप चुकी है तो किस बात के लिए रंगदारी मांगने गए थे, क्या खबर नहीं छापने की? पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी रात में की जिससे कई सवाल जन्म लेते है क्या मुकेश भारतीय पत्रकार न होकर कोई बड़ा अपराधी था जो भाग सकता था, इसलिए आनन फानन में उनकी गिरफ्तारी की गई? या कोई ऐसा दबाव प्रशासन के ऊपर बना जिससे उन्हें ऐसा करने के लिए विवश होना पड़ा।

गिरफ्तारी के बाद अखबारों में जो खबर छपी उसे पढकर ऐसा लगता है जैसे वाकई पुलिस को कोई बड़ी सफलता मिली हो एक कुख्यात अपराधी को पकड़ कर। खैर अब वह रिहा हो गए हैं। सच्चाई सबके सामने है। ठीक उसी तरह भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह की गिरफ्तारी हुई। उन पर भी रंगदारी वसूलने का आरोप है। उनकी गिरफ्तारी भी बड़े मीडिया के नामचीन संपादक विनोद कपाड़ी और उनकी पत्नी साक्षी जोशी की शिकायत पर उत्तर प्रदेश की पुलिस नें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इस तरह कि गिरफ्तारियों के पीछे क्या राज है इस बात का खुलासा अगर नहीं होता है तो वेब मीडिया से जुड़े लोगों को भी आम जनता सम्मान की नजर से नहीं देखेगी।

इस घटना के बाद सबसे दुखःद बात यह है कि वेब मीडिया ही आपस में एकजुट नहीं दिख रही जबकि होना यह चाहिए था कि कम से कम साथ न दें तो खिलाफत भी न करें। क्या यशवंत के इस काम को कोई इनकार कर सकता है कि उन्होनें चमक दमक की पत्रकारिता से कहीं ज्यादा उस पत्रकार की आवाज़ बनने की कोशिश की जिन्हें तथाकथित मुख्य धारा के मीडिया केवल विज्ञापन एजेंट के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। आम गरीब जनता के लिए लिखने वाले कलम की योग्यता का आधार जब विज्ञापन बन जाता था और सच का गला घोंट कर पत्रकारिता करने पर मजबूर होते रहे हैं, ऐसे में वेब पत्रकारिता को नए आयाम तक पहुंचा कर दम तोड़ती कलम को आवाज़ देने का काम क्या सराहनीय नहीं है? हां आज यह वेब मीडिया कुछ लोगों के आंख की किरकिरी बना हुआ है। ऐसे में आपसी बिखराव वेब मीडिया के लिए घातक ही होगा। क्योंकि बचपन में मेरे ख्याल से सबने लकड़हारे कि कहानी पढी होगी जिसमें एकता में बल होता है, का संदेश दिया गया था।

अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि क्या वेब पत्रकार, पत्रकारिता को छोड़कर इतने बड़े रंगदार बन गए हैं कि कारपोरेट जगत के मीडिया से जुड़े लोगों से रंगदारी वसूलने का काम करने लगे हैं या यह सब वेब पत्रकारिता के खिलाफ एक सोची समझी साजिश के तहत हो रहा है ताकि जो खुलासे वेब पर हो रहे हैं उस पर अंकुश लगे और वेब पत्रकारिता को बदनाम कर उसके अस्तित्व को अस्तित्वहीन कर दिया जाए। क्योंकि आज वेब मीडिया का मुकाम वहां तक पहुंच चुका है जहां वेब पर छपी खबरों को नकारा नहीं जा सकता है। सच क्या है, सामने आना बेहद जरूरी है, नहीं तो एक के बाद एक वेब पत्रकार शिकार बनेंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। और जिस कारपोरेट मीडिया के साथ सत्ता का सहयोग है उनके लिए यह काम नामुमकिन सा भी नहीं दिखाई पड़ता।

अब्दुल रशीद

पत्रकार

सिंगरौली

मध्य प्रदेश

aabdul_rashid@rediffmail.com


(पत्रकार अब्दुल रशीद ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 3 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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वरना महज शराबी और कबाबी पत्रकार के रूप में ही यशवंत का शुमार होगा

: यशवंत की गिरफ्तारी से उठे चंद सवालात : जॉन स्टुअर्ट मिल स्वतंत्रता की सीमाओं पर रोशनी डालते हुये कहता है, “एक व्यक्ति तभी तक स्वतंत्रत है जबतक कि उसकी स्वतंत्रता किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक न हो।” भड़ास 4 मीडिया के संचालक और संपादक यशवंत सिंह की गिरफ्तारी से कई तरह के संदेह और सवाल उठ रहे हैं, जिन पर गौर फरमाना लाजिमी है। सबसे पहला और अहम सवाल यह है कि क्या यशवंत सिंह को उनकी बैखौफ अभिव्यक्ति या फिर पारंपरिक मीडिया जगत से छुपी हुई घिनौनी खबरों को प्रकाश में लाने के लिए गिरफ्तार किया गया है या फिर वाकई में वह खबरों की आड़ में पूरी बदतमीजी के साथ उगाही करने में लगे हुये थे?

यशवंत के खिलाफ कार्रवाई इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर बिनोद कापड़ी की पत्नी साक्षी जोशी कापड़ी की शिकायत पर हुई है। शिकायत के मुताबिक यशवंत उनसे 20 हजार रुपया मांग रहे थे, जान से मारने की धमकी भी दी, और बिनोद कापड़ी की कार को ओवरटेक करके उन्हें गालियां भी दी। विस्फोट डॉट कॉम पर संजय तिवारी यशवंत सिंह का हवाला देते हुये कहते हैं कि उन्होंने रात में बिनोद कापड़ी को फोन किया था, और जब उन्होंने फोन नहीं उठाया तो यशवंत ने उनकी पत्नी साक्षी का नंबर मिलाया। साक्षी ने इसका विरोध किया, फिर एसएमएस की आवाजाही हुई है। और फिर सुबह में साक्षी को सफाई देते हुये यशवंत ने एक एसएमएस भेजा जिसमें अपने दोस्तों और शुभचिंतकों से नोएडा में बुक किये एक फ्लैट के लिए किश्त भरने हेतु मदद मांग रहे थे। इसी एसएमए में 20 हजार रुपये का जिक्र है।

यदि संजय तिवारी की बातों पर यकीन करें  तो यशवंत सिंह दोस्ताना अंदाज में बिनोद कापड़ी से 20 हजार रुपये हासिल करने की कोशिश कर रहे थे, और इसी दौरान साक्षी के साथ उन्होंने बदतमीजी कर दिया या फिर यशवंत के इस पहल को साक्षी बदतमीजी मान बैठी। अब एक बार फिर सवाल उठता है कि रात में साक्षी को फोन करके कौन सी पत्रकारिता कर रहे थे? रात को किसी की निजी जिंदगी में अतिक्रमण करने की कोशिश करना पत्रकारिता तो नहीं ही हो सकता है। यदि वाकई में यह घटना सही है तो यशवंत सिंह दूसरों के स्वतंत्रता की भी धज्जियां ही उड़ा रहे थे। एक व्यक्ति के रूप में उनका यह रवैया स्वाभाविकतौर पर उन्हें पुलिस के हवाले ही करता है। इतना ही नहीं इस रोशनी में वह एक बेखौफ अपराधी के रुप में नजर आते हैं, जो किसी परिवार के दिल और दिमाग में खौफ पैदा करते हैं। चूंकि बिनोद कापड़ी और उनकी पत्नी साक्षी भी पत्रकारिता से ही जुड़ी हुई हैं, इसलिये यशवंत सिंह का चेहरा कुछ और भयानक हो जाता है। कानून और व्यवस्था में यकीन रखने वाला कोई भी पत्रकार भावावेश में आकर यशवंत सिंह के इस रवैया का समर्थन नहीं कर सकता। एक कदम आगे बढ़कर वह इसकी आलोचना ही करेगा।

यशवंत सिंह हमेशा सरोकारी पत्रकारिता को लेकर क्रूसेड करने का दम भरते रहे हैं, जिसकी वजह  से इनके मित्रों और शत्रुओं  की संख्या में इजाफा होता रहा है। भड़ास 4 मीडिया पर क्रूसेड के अंदाज में बहुत सारी खबरें चली हैं, कई मीडिया घऱानों को आइना दिखाने का काम किया है भड़ास ने, इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यशवंत सिंह को वाकई में इसी क्रूसेडी लहजे की कीमत चुकानी पड़ रही है ? यदि ऐसा है तो यह यशवंत सिंह के खुरदरे चरित्र से भी भयानक है, इसमें कोई दो राय नहीं है। न्यू मीडिया की नुमाइंदगी करने वाले कई अहम लोग मसलन हस्तक्षेप के अमलेन्दू और मोहल्ला के अविनाश यशवंत सिंह के पक्ष में खड़े हैं। हालांकि इसके साथ ही यशवंत सिंह की बदतमीजियों का भी जिक्र करना वे नहीं भूलते हैं। न्यू मीडिया के इन नुमाइंदों को यह भय है कि परंपरागत मीडिया न्यू मीडिया के तेवर से त्रस्त है और हर कीमत पर न्यू मीडिया में उनके खिलाफ उठने वाली आवाजों को कुचलने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं। आज यशवंत सिंह के साथ जो कुछ हुआ है कल किसी और के साथ भी हो सकता है। ये लोग स्पष्टतौर पर न्यू मीडिया और परंपरागत मीडिया के बीच एक लकीर खींचने की कोशिश कर रहे हैं और खुद को यशवंत सिंह के पक्ष में खड़ा पा रहे हैं। इनकी इन कोशिशों की वजह से यशवंत सिंह की गिरफ्तारी समष्टि का रूप धारण कर रही है। यानि की मामला व्यक्ति विशेष का न होकर स्पष्ट रूप से समूह विशेष का हो जा रहा है। एक ओर अपने लंबे अनुभव के साथ परंपरागत मीडिया खड़ा है तो दूसरी ओर अभी-अभी कुलांचे भरने वाला न्यू मीडिया। न्यू मीडिया के इन नुमाइंदों की चिंताओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता है। जिस लहजे में दो प्रतिष्ठित दैनिक अखबारों ने यशवंत की गिरफ्तारी की खबर को प्रकाशित किया है, उससे तो स्पष्टतौर पर यही पता चलता है कि मौका मिलने पर ये लोग न्यू मीडिया को ध्वस्त करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगे। इस लिहाज से यशवंत सिंह को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता है और न ही छोड़ा जाना चाहिये।

लेकिन बात  यहीं खत्म नहीं होती। यशवंत  सिंह को भी पूरी ईमानदारी के साथ एक बार फिर बिना शराब पीये अपने अंदर झांककर देखना  होगा। उन्हें चिंतन करना होगा कि जो कुछ उनके साथ  हो रहा है उसके लिए किस  हद तक वह खुद जिम्मेदार  हैं। पत्रकारिता के काले पक्षों के खिलाफ क्रूसेड का नारा लगा कर उचकई करने का अधिकार वह हासिल नहीं कर सकते हैं और न ही यह अधिकार उन्हें दिया जाना चाहिये। तहजीब की भाषा तो उन्हें सीखनी ही होगी। नहीं तो महज शराबी और कबाबी पत्रकार के रुप में ही उनका शुमार होगा। उनसे उम्मीद की जाती है कि पत्रकारिता की दुनिया में- कम से कम वेब पत्रकारिता की दुनिया में-वह एक लंबी लकीर खीचेंगे। सलाखों के पीछे यशवंत सिंह को अपनी परछाई से बात करने का भरपूर मौका मिल रहा होगा। यदि ईमानदरी से वह खुद की सुनेंगे तो यह उनके लिए और न्यू मीडिया के लिए बेहतर होगा। यशवंत के बहाने न्यू मीडिया को भी अपने चरित्र का अवलोकन करना चाहिये। कहीं ऐसा तो नहीं परंपरागत मीडिया के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला न्यू मीडिया भी उन्हीं विरोधाभाषों में घिरता जा रहा है, जिनसे परंपरागत मीडिया संचालित हो रही है। तो क्या न्यू मीडिया दूसरों के स्वतंत्रता के मोल को समझेगी? या फिर आसुरी शक्ति की तरह पेश आएगी? इस सवाल का जवाब कौन देगा?

आलोक नंदन

पत्रकार

पटना, बिहार

alok.nandan72@gmail.com


(पत्रकार आलोक नंदन ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 3 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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यशवंत की गिरफ्तारी और बाघ वाली ये कहानी

श्री यशवंत जी की गिरफ्तारी  की खबर पढ़ कर बेहद दुःख हुआ और गुस्सा भी| खबर पढ़ते ही मुझे गाँव में एक सहपाठी द्वारा सुनाई गई लोक कहानी याद आ गई| मुझसे उम्र में दोएक साल बड़े हमारे सहपाठी श्री रघुनाथ जी अक्सर लोक मुहावरे और  कहानियां सुनाया करते  थे| इसी क्रम में एक बार उन्होंने किसी गाँव में रहने वाली एक निसंतान विधवा बुजुर्ग महिला की कहानी सुनाई थी| छुटपन में सुनी बाकी सभी कहानियां तो भूल गया| मगर न जाने क्यों अड़तीस-चालीस साल पहले सुनी यह कहानी स्मृति पटल पर मानो छप सी गई|

कहानी यूँ है कि- "एक गाँव में निसंतान विधवा बुजुर्ग महिला अकेले रहा करती थीं| दुनिया में उनके अलावा उनका कोई सगा नहीं था| तब हमारा ग्रामीण समाज जबरदस्त अंध विश्वास का माहौल था| इसी अंध विश्वास के चलते लोगों की मान्यता थी कि निसंतान और विधवा, जिसके आगे-पीछे कोई न हो, की बददुआ नहीं लेनी चाहिए| इसलिए गाँव के सभी लोग इस महिला से एक निश्चित दूरी बना कर रहते थे| वह बुजुर्ग महिला गाँव वालों की मान्यता और अन्धविश्वास से भली भांति वाकिफ थीं|

उन्होंने गाँव के लोगों का मनोविज्ञान पढ़ लिया था| सो गाँव वालों के इस अन्धविश्वास का जबर्दस्त फायदा उठाया| पूरे गाँव में अब इन बुजुर्ग महिला का एकछत्र राज कायम हो गया| वे गाँव में कुछ भी करने को आजाद थीं| समूचा गाँव इन बुजुर्ग महिला के आतंक से त्रस्त था| पर कुछ भी बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी| भय था कि अगर उस बुजुर्ग महिला से कुछ बोल दिया या कोई रोक-टोक की तो वे बददुआ दे देंगी और अनिष्ट हो जायेगा|

चूँकि वह बुजुर्ग महिला अकेले गाँव में बने अपने कच्चे घर में रहती थी, एक रात को गाँव में नरभक्षी बाघ आया और बाघ ने उन बुजुर्ग महिला को अपना निवाला बना लिया| दिन निकलने पर जब गाँव वालों को इस घटना की जानकारी हुई तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा| गाँव वालों ने सोचा चलो हत्या का आरोप भी नहीं लगा और मुसीबत भी टली| अब गाँव वाले चैन से रह पाएंगे| गाँव के लोगों ने बाघ का पेट भर जाने के बाद महिला के शरीर के शेष बचे हिस्से को एकत्र कर शानदार शवयात्रा निकली| गाजे-बाजों के साथ हँसते-गाते शमशान घाट पहुंचे| एक ओर चिता लगाई ओर दूसरी ओर नाच-गाना शुरू किया|

इसी बीच वहां से पास के गाँव के दो-चार समझदार लोग गुजर रहे थे| मानव स्वभाव के मुताबिक उन्होंने पूछा कि भई! क्या बात है? कौन गुजरा? कैसे गुजरा? जो इतना खुश हो रहे हो| गाँव वालों ने उन लोगों को सारा वाकया विस्तार से बताया| तो पडोसी गाँव के ये लोग रोने लगे| गाँव वालों को उन पर बहुत गुस्सा आया| उन्होंने पडोसी गाँव वालों से गुस्से में पूछा- मृतक बुजुर्ग महिला रिश्ते में आपकी क्या लगती थी, जो आप इसके लिए शोक मना रहे हो? या आपकी हमसे कोई पुरानी दुश्मनी है, कि आपसे हमारी ख़ुशी बर्दाश्त नहीं हो रही है| इस पर पडोसी गाँव के उनसे कहा- भाई जी मृतक महिला से हमारी किसी किस्म की कोई नाते-रिश्तेदारी नहीं थी, न हम इन महिला को जानते हैं, और न ही हमारी आप गाँव वालों से कोई दुश्मनी है| इन बुजुर्ग महिला की मौत से गाँव के लोगों की मिली राहत और ख़ुशी में हम भी शामिल हैं| हमें बुजुर्गवार महिला के मरने का कतई दुःख नहीं है| हम तो इस बात से बेहद दुःखी हैं कि उस बाघ ने आपके गाँव का रास्ता देख लिया भाई! क्योंकि बाघ ने उस महिला को इसलिए अपना शिकार नहीं बनाया कि गांव के लोग उनसे दुखी थे या वह महिला बुरी थी| बाघ ने उन्हें सिर्फ मानव समझ कर अपने शिकार के लिए मारा"

यशवंत भाई सिर्फ इसलिए गिरफ्तार नहीं हुए कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा अक्षम्य अपराध किया हो या वे बहुत बड़े अपराधी हों| उनका सबसे बड़ा अपराध यह है कि वे एक निर्भीक और बेबाक पत्रकार हैं| उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन मे कितनों को बेपर्दा किया है| वे इसी बेबाकी और निर्भीकता कि कीमत चुका रहे हैं| लेकिन बाकी स्वनाम धन्य पत्रकारों को उनकी सच्ची-झूठी, जो भी हो, गिरफ्तारी पर ख़ुशी नहीं मनानी चाहिए| भाई- "बाघ ने गाँव का रास्ता जो देख लिया है"|

प्रयाग पांडे

वरिष्ठ पत्रकार

उत्तराखंड

pandeprayag@ymail.com


(वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पांडे ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 3 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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एक संदेश बुरे वक्‍त के नाम : ऐ बुरे वक्‍त, जरा अदब से पेश आ…

मीडिया घराने के मालिकानों की कठपुतली बने एवं बेचारगी के मारे पत्रकारों को अपनी भड़ास निकालने के लिये नया तेवर, नई आवाज, जोश व मजबूत प्‍लेटफार्म देने वाले भाई यशवंत सिंह पर आये अप्रत्‍याशित मुसीबत की घड़ी में हम बागी बलिया के ग्रामीण पत्रकार भी साथ हैं और हर तरह से निपटने के लिये सदैव साथ देने का वादा करते हैं। इस वादे व भरोसे को कोरा या खोखला न समझें। आपसी पैर खिंचाऊ मानसिकता से ग्रसित हम पत्रकार भले ही आपस में कब्‍बड्डी-कब्‍बड्डी खेले किंतु कलमकारों के वजूद को चैलेंज करने वाली ऐसी हरकत पर हम चुप भी नहीं रहने वाले।

यशवंत सिंह ने हर कलमकार को जो आवाज का प्‍लेटफार्म दिया है, वह कलमकारों का अब एक अंतराष्‍ट्रीय जंक्‍शन सा हो गया है. भले ही हमारा बैनर खाकी का ईंट से ईंट बजाने से रोके किंतु लोकतांत्रिक व गांधीवादी तरीके से सड़क पर उतर कर विरोध करने से भी नहीं रोक सकते. ऐसे झंझावातों से कलमकार टूटने, झुकने व रूकने वाले भी नहीं है, बल्कि अब तो और मजबूती, हिम्‍मत व पक्‍के इरादे के साथ रफ्तार बढ़ेगी और बदमिजाजों के लिये एक ही संदेश हो कि ऐ ‘बुरे वक्‍त’ जरा ‘अदब’ से पेश आ, क्‍योंकि ‘वक्‍त’ नहीं लगता ‘वक्‍त’ गुजर जाने में…

धन्‍यवाद

विजय मद्धेशिया

पत्रकार

बलिया

vijaymadhesia83@gmail.com


(पत्रकार विजय मद्धेशिया ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 4 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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आंदोलनकारी आवाज भड़ास4मीडिया के समर्थन से परहेज क्यों?

भड़ास4मीडिया के संपादक य़शवंत जी को जेल पहुंचाने में कॉरपोरेट मीडिया घरानों के मालिक और उनके चापलूस कामयाब हो गए हैं क्योंकि समाज में पत्रकारिता के नाम पर अपना धंधा चलाने वालों की बाढ़ आ गई है। यहां सबसे बड़ी निराशा उन आंदोलनकारी पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गतिविधियों से हुई है जो खुद को जनता का रहनुमा बताते फिरते हैं और देश के प्रतिष्ठित पुरस्कारों के लिए लाइन लगाए खड़े रहते हैं। वैकल्पिक मीडिया के एक माध्यम के बल पर बड़े से बड़े कॉरपोरेट घरानों और उसके चापलूसों की सच्चाई लाने वाला एक आंदोलनकारी आवाज सलाखों के पीछे पहुंच गया, लेकिन जमीनी स्तर पर एक चूं तक नहीं हुई।

आखिर क्यों? इसके पीछे की वजहों पर मंथन करने का समय आ गया है। कॉरपोरेट घरानों और सरकार की छोटी से छोटी बात पर हल्ला मचाने वाले समाज के ठेकेदार आखिर एक आंदोलनकारी आवाज को बचाने के लिए सड़कों पर क्यों नहीं आ रहे हैं?  शायद उन्हें डर है कि उनकी सच्चाई सामने आ जाएगी। लेकिन वे क्यों भूल जाते हैं कि गला-काट इस प्रतियोगिता में कभी वे भी इन कॉरपोरेट घरानों का शिकार होंगे । इतिहास गवाह है कि पूंजी के खेल से कोई भी नहीं बच पाया है। अब तो यह सामान्य बात हो गई है। ऐसे में जनहित में काम करने वाले पत्रकारों को इस बारे में सोचने और उसपर अमल करने का समय आ गया है।

हो सकता है यशवंत जी ने जाने अनजाने में ऐसी किसी वारदात को अंजाम दिया हो जो हमारे विचारों से मेल नहीं खाते हों, लेकिन जनहित में किए गए उनके कार्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। मानता हूं कि उनका जनहित का कार्य समाज के निचले पायदान पर जीने वाले लोगों के लिए प्रत्यक्ष रूप से न हो, लेकिन कॉरपोरेट मीडिया संस्थानों में जिस तरह से जनविरोधी छवि वाले मैनेजरों (स्वयंभू मीडियाकर्मियों) की संख्या बढ़ती जा रही है, उसे समाज के सामने रखने में उन्होंने बड़ा योगदान दिया है जो कहीं न कहीं समाज के निचले पायदान पर जीवन गुजार रहे लोगों से जरूर जुड़ता है।

वैसे भी उन्होंने मीडिया वर्ग में फैले भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और शोषण की तस्वीर जिस तरह से समाज के युवा वर्ग के सामने लाई है, उसकी तुलना में हाल ही में लगाए गए कथित आरोप नगण्य हैं। इन आरोपों की विश्वसनियता भी सवालों के घेरे में है। यशवंत जी ने शोषितों के साथ-साथ मीडिया जगत में प्रवेश करने वाले युवाओं के लिए एक बेहतर विकल्प उपलब्ध कराया, जिसके माध्यम से मीडिया जगत में हो रही हलचलों के बारे में सभी को सूचना हासिल होती है। ऐसे आंदोलनकारी आवाज को बचाने के लिए वैकल्पिक मीडियाकर्मियों के साथ-साथ समाज के बुद्धिजीवियों को सड़क पर उतरने के लिए पहल करनी होगी। क्या आप इसके लिए तैयार हैं? इस बारे में जरूर सोचें।

शिव दास

पत्रकार

shivsarika@gmail.com


(पत्रकार शिव दास ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 5 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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बेबाक पत्रकारिता पर दलाल पत्रकारिता और भ्रष्ट पुलिस तंत्र का हमला तेज़ हुआ

यशवंत सिंह संपादक भड़ास4मिडिया की नोएडा पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी ने यह साबित कर दिया है कि वेब मीडिया की ताकत से दलाल पत्रकारों और भ्रष्ट पुलिस तंत्र के रखवालों के होश उड़ गये हैं. पिछले महीनों से संदुपुर -बाराबंकी, गोरखपुर, लखनऊ के पश्चात् नोएडा और लखीमपुर में जनसरोकार रखने वाले और निर्भीक पत्रकारों के पुलिसिया उत्पीडन से यह साफ हो गया है कि यह एक सुनियोजित साजिश है निर्भीक पत्रकारों की आवाज़ को दबाने की. एक के पश्चात एक घटित हो रही घटना यह सिद्ध करती है कि वेब मीडिया ने दलाल प्रवृति के पोषक और पत्रकारिता की आड़ में अधिकारियों की दलाली करने वाले प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों के काकस को भेद दिया है.

यशवंत सिंह की गिरफ़्तारी प्रकरण के पश्चात् वेब मीडिया की ताकत और भी ज्यादा बढ़ेगी. पत्रकारिता जगत के काले कारनामों को उजागर करने की वजह से ही यशवंत सिंह और भड़ास4मीडिया भ्रष्ट-दलाल लोगों की आँखों की किरकिरी बन गये थे और आज भी बने हैं. शायद इन दलालों को अनुमान रहा हो कि यशवंत सिंह की फर्जी मुकदमों में गिरफ़्तारी के पश्चात् भड़ास का संचालन बंद हो जायेगा. यशवंत अकेले और अलग थलग पड़ जायेंगे, साथी साथ त्याग देंगे. लेकिन उनका अनुमान दुर्भाग्यवश गलत सिद्ध हो चुका है. यशवंत सिंह के साथ आज तमाम वरिष्ठ पत्रकार खड़े हैं. कुमार सौवीर, प्रकाश हिन्दुस्तानी, सुभाष राय, दयानंद पाण्डेय, हरे प्रकाश उपाध्याय, मदन तिवारी, सैयद असदर अली, अविनाश, कृष्णभानु आदि ने इस प्रकरण पर अपने विचार लिख कर निर्भीक पत्रकारिता को उर्जा व ताकत प्रदान की है. दलाली से इतर जनसरोकार व निर्भीक पत्रकारिता, बेबाक लेखन करने वालों को इस तरह की दिकक्तो से रूबरू होते ही रहना पड़ेगा. व्यवस्था को जड़ तक भ्रष्ट कर चुके लोगों को यह कतई नहीं गंवारा होता है कि कोई उनकी जड़ पर प्रहार करे. कमियां उजागर करने वालों को सदैव साजिशों का शिकार होना पड़ता है. बस जिस तरह दलाल पत्रकारों का साथ दलाल दे रहे हैं, उसी तरह अब निर्भीक व बेबाक लेखन का माद्दा रखने वालो कों दलाल पत्रकारिता के खिलाफ उनकी सज़िशों के खिलाफ अब कलमकारों की कलम अनवरत चलती रहनी चाहिए.  

अरविंद विद्रोही

पत्रकार

asvidrohi61@gmail.com


(पत्रकार अरविंद विद्रोही ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास छह जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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नीचे जो पत्र दिया जा रहा है, उसे यूपी के मुख्यमंत्री और बरेली के डीएम के पास छह जुलाई को प्रेषित किया गया….

 

दिनांकः- 06.07.2012

सेवा में,

मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश

लखनऊ।

द्वारा जिलाधिकारी, बरेली।

महोदय,

भड़ास4मीडिया पोर्टल के संचालक श्री यशवंत सिंह को द्वेषवश एक न्यूज चैनल के सम्पादक ने फर्जी ढंग से फंसाया है। पुलिस भी न्यूज चैनल से मिली हुई है और श्री यशवंत सिंह के खिलाफ फर्जी मुकदमें कायम की है। अतः आपसे निवेदन है कि श्री यशवंत सिंह को तत्काल बिना शर्त रिहा किया जाए और उन पर कायम सभी फर्जी मुकदमों को वापस लिया जाए।

मुख्तार अंसारी
महामंत्री

सुरेन्द्र शर्मा
अध्यक्ष

रूहेलखण्ड मीडिया वर्कर्स एसो0 बरेली।

एडवेंचर स्पोर्ट्स फोटो कंपटीशन में इण्डिया न्‍यूज कोटा की संवाददाता ज्‍योति पाठक दूसरे स्थान पर रहीं

मर्सडिज बैंज की ओर से आयोजित अल्टीमेट ट्यूरिंग ट्रैल कांटेस्ट के चंबल एडवेंचर फोटो कंपटिशन में चंबल रेस्‍क्‍यू फोर्स की चेयरपर्सन व इण्डिया न्‍यूज कोटा की संवाददाता ज्‍योति पाठक दूसरे स्‍थान पर रहीं. उन्हें शहर व देशभर के लोगों ने ऑनलाइन वोटिंग कर 27 हजार 556 वोट दिए. इस कांटेस्ट में कोटा की चंबल वैली ने पहचान बनाई है. देश के पांच चुनिंदा प्रतिभागियों में से ज्‍योति और उनकी चंबल वैली फोटो को दूसरा स्‍थान मिला. ज्‍योति को लाइफ टाइम एडवेंचर का विजेता घोषित किया है.

मर्सडिज बैंज की ओर से होने वाली एडवेंचर कार्यक्रम का टीएलसी व डिस्‍कवरी की ओर से प्रसारण किया जाएगा जिसमें ज्‍योति को जाने माने अभिनेता रितेश देशमुख के साथ एडवेंचर कार्यक्रम में भाग लेते हुए देखा जा सकेगा. बचपन से एडवेंचर कार्यक्रमों से जुडी ज्‍योति ने बताया कि उनकी यह जीत शहरवासियों की जीत है जिन्‍होंने एक एक वोट देकर कोटा का नाम रोशन किया है.

उन्‍होंने बताया कि कोटा की चंबल वैली पूरे प्रदेश व देश में महत्‍पूर्ण स्‍थान रखता है. चंबल की पहचान बनने से यहां एडवेंचर टूरिज्म को सबंल मिल सकेगा. देश विदेश से लोग यहां आकर चंबल के नजारे देख सकेंगे.  उन्‍होंने बताया कि चंबल के संरक्षण के लिए भरपूर प्रयास हो, ताकि चंबल की देशभर में एक अनूठी पहचान बन सके, साथ ही यहां जैव विवधिता की कमी नहीं है. यह राजस्‍थान की एक नदी है जो सालभर बहती है. उन्‍होंने बताया कि नेशनल घडियाल सेंचुरी इस नदी में होने से इसकी महत्‍ता बढ गई है.

पत्रकार नारायण परगाई पर कई धाराओं में केस दर्ज

धार्मिक मामले में ग्रुप मैसेज भेजने वाले देहरादून के पत्रकार नारायण परगाईं के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 क (ख) और 7 क़िमिनल ला अमेंडमेंट एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है. नारायण परगाई के साथ-साथ ३५० लोगों के खिलाफ 7 क़िमिनल ला अमेंडमेंट एक्ट में केस दर्ज किया गया है. पूरा मामला क्या है, इस बारे में देहरादून का कोई पत्रकार विस्तार से लिख भजे सके तो उसका प्रकाशन भड़ास पर किया जाएगा. अपनी बात रखने के लिए आप नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का भी सहारा ले सकते हैं.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

”एयरपोर्ट इंडिया” का अजित सिंह ने किया विमोचन

केन्द्रीय वि‍मानन मंत्री अजि‍त सिंह ने 'एयरपोटर्स इंडि‍या' नामक एक मासि‍क पत्रि‍का का वि‍मोचन कि‍या. इस पत्रिका का प्रकाशन भारतीय हवाई अड्डा प्राधि‍करण की तरफ से शुरू किया गया है. जैसे भारतीय रेल की ओर से ''रेलबंधु'' मैग्जीन प्रकाशित की जाती है, उसी तर्ज पर एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने भी अपनी मैगजीव ''एयरपोर्ट इंडिया'' की शुरुआत की है.

लांचिंग समारोह में नागर वि‍मानन सचि‍व के.एन.श्रीवास्त व और भारतीय हवार्इ अड्डा प्राधि‍करण के अध्यक्ष वी.पी.अग्रवाल उपस्थित थे. यह पत्रि‍का हवाई अड्डों पर उड़ान के इंतजार में बैठे यात्रि‍यों को उपलब्ध कराई जाएगी. इस पत्रि‍का की 30 हजार कापियां प्रकाशित की गई है.
 

जागरण में खबर छपने के बाद खुद को जिंदा बताता घूम रहा है रामचंद्र

दैनिक जागरण में झूठी खबर छप जाने के बाद अपने जिन्दा होने का सबूत देता चल रहा है रामचंद्र. देव प्रखंड के बनुआ पंचायत का रहनेवाला रामचंद्र रिकियासन के बारे में कुछ दिन पहले दैनिक जागरण अखबार में एक खबर औरंगाबाद कार्यालय संवाददाता मनीष कुमार के नाम से छापी गई थी. इसके मुताबिक एड्स से हुई मौत के बाद युवक को लोगों ने नहीं दिया कफ़न. खबर में बताया गया है कि औरंगाबाद जिले के सीमा से सटे नावा गांव के रहने वाले रामचंद्र रिकियाशन की मौत एड्स से हो गई और मौत के बाद ग्रामीणों ने कफ़न तक नहीं दिया. तब रामचंद्र की पत्नी कलावती ने अपने आँचल को फाड़कर कफ़न बना दिया और अपने पति के शव को नहीं जलाया और उसे उसी इलाके के पहाड़ों में दफ़न कर दिया.

अखबार ने यहाँ तक लिखा की पंचायत के मुखिया और बीडीओ ने अपने क्षेत्राधिकार का रोना रोया. अखबार में मौत की खबर छपने के बाद रामचंद्र के परिवार वाले उसके घर जब पहुंचे तो उन्होंने पाया कि नावा गांव निवासी रामचंद्र रिकियाशन जीवित है और उन्हें कोई बीमारी नहीं है. इस बाबत पूछे जाने पर पंचायत के मुखिया ने बताया कि दैनिक जागरण अख़बार ने झूठी खबर को प्रकाशित किया है. जिस रामचंद्र की मौत अखबार में छापी गई है वो खबर झूठी है. ना ही उसे एड्स की बीमारी है. इस मामले पर पूछे जाने पर प्रखंड के बीडीओ अभय कुमार सिंह ने बताया कि खबर छप जाने के बाद जांचोपरांत पाया गया कि रामचंद्र रिकियासन जीवित है और आज वो अपने जिन्दा होने का सबूत मीडिया के कार्यालयों में देता चल रहा है.

नवल किशोर ने फारवर्ड प्रेस छोड़कर टाइम न्यूज चैनल पकड़ा

अपना बिहार डाट ओआरजी के संपादक नवल किशोर कुमार ने फ़ारवर्ड प्रेस से त्यागपत्र दे दिया है और अब वे पटना से प्रसारित होने वाले टाइम न्यूज चैनल के सीनियर करेस्पांडेंट बनाये गये हैं. मिल रही जानकारी के अनुसार कुमार ने पारिवारिक जिम्मेवारियों के मद्देनजर यह निर्णय लिया है. जानकारी यह भी है कि फ़ारवर्ड प्रेस प्रंबंधन के साथ कुछ खबरों को लेकर अनबन पहले से ही चल रही थी. इस बीच पटना में माता-पिता की अचानक तबीयत खराब हो जाने के बाद कुमार का पटना जाना फ़ारवर्ड प्रेस प्रबंधन को रास नहीं आ रहा था.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाई जा सकती हैं.

बड़ा हो गया ‘आजतक’ पर छोटा हुआ दिल, चैनल के मीडियाकर्मियों में नौकरी जाने की दहशत

: कानाफूसी : कहा जा रहा है कि आजतक न्यूज चैनल बदल रहा है.  बताया जा रहा है कि यहां बदलाव की बयार चल रही है. चर्चा है कि यहां सब कुछ बदल रहा है. नए चैनल हेड के रूप में सुप्रिय प्रसाद चैनल को नेतृत्व दे रहे हैं जिन्हें सरोकार और खबर के लिए कम, टीआरपी देने वाले मीडिया कलाकार के रूप में ज्यादा जाना जाता है. आजतक का आफिस वीडियोकान टावर से हटकर फिल्म सिटी में आ पहुंचा है. फिल्म सिटी वो जगह जहां ज्यादातर न्यूज चैनलों के आफिस हैं. चैनल को एक नया और फ्रेश लुक देने का दावा किया गया है. इन बदलावों में से कई के बारे में बाकायदा चैनल पर दिखाया भी गया.

आजतक के खबरों की तेज रफ्तार और नए अवतार को दर्शकों का प्यार कितना मिलेगा, यह तो वक्त बताएगा लेकिन इतना तो सबको पता है कि ये आजतक गुणवत्ता के मामले में वो नहीं रहा जो एसपी सिंह के जमाने में आधे घंटे के बुलेटिन के दौरान हुआ करता था. आजतक के जरिए प्रबंधन को पैसा खूब मिलता गया, विस्तार खूब होता गया, लेकिन कंटेंट क्वालिटी दिन प्रतिदिन खराब होती गई. आजतक में अब ज्यादातर एवरेज किस्म के लोग घुसते जा रहे हैं जिनका सारा जोर शोबाजी पर होता है. सोचने समझने और लिखने पढ़ने वाले लोगों का आजतक में टोटा पड़ चुका है. न्यूज़ प्रेजेंटेशन की अब तक की सबसे बेमिसाल तकनीक आजतक चैनल के पास जरूर हो सकती है, उसके पास अत्याधुनिक उपकरणों और तकनीक से लैस स्टूडियो हो सकते हैं लेकिन उसके पास नहीं है तो आम जनता की पीड़ा महसूस करने वाला वो दिल जिसकी बुनियाद एसपी सिंह ने रखी थी. जिसे कमर वहीद नकवी और शैलेश के जमाने में भी कम या ज्यादा निभाया गया, लेकिन अब तो आजतक पूरी तरह संवेदनहीन चैनल बन चुका है जिसमें सिर्फ टीआरपी बटोरने की चाहत व जिद है, आम जनता से जुड़े इशूज को दिखाकर पूरे देश का चैनल बने रहने की तड़प व जिद कहीं नहीं है.

और, शायद प्रबंधन यही चाहता भी है. मार्केट इकोनामी में हाशिए पर खड़े लोगों की पूछ कहीं नहीं होती, न तो मीडिया में, न कोर्ट कचहरी में, न थाना पुलिस में और न राजनीति में. मार्केट इकोनामी में सबका जोर भरे पाकेट वालों पर है. क्योंकि इस भरे पाकेट वाले के पास ही पूंजी है जिससे चैनल, थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी, नेता, कारपोरेट सबका फायदा हो सकता है. तो, जब पूरी विचारधारा ही शिफ्ट हो चुकी है तो किसी एक को दोष देना ठीक नहीं. अब तो यह मानकर चलना चाहिए कि जो सफल है वह जरूर बाजार का दलदल है.

आजतक, तेज समेत कई चैनलों का संचालन करने वाली कंपनी टीवी टुडे नेटवर्क से कुछ लोगों ने मेल के जरिए भड़ास को सूचित किया है कि करीब सौ लोगों की छंटनी की लिस्ट बनाई जा रही है. इन लोगों को चैनल से नमस्ते कहा जाएगा. इस लिस्ट में एंकर, एडिटर और बाकी डिपार्टमेंट्स के लोग भी शामिल हैं. छंटनी की चर्चा जोरशोर से पूरे आफिस में फैली हुई है. राहुल कुलश्रेष्ठ को इसीलिए लाया गया है. कुछ लोगों को तो जाने के लिए कह भी दिया गया है. तेज के कुछ लोगों को तो जाने के लिए कह भी दिया गया है. भड़ास के पास उन लोगों के नाम भी हैं जिन्हें चैनल से जाने के लिए कह दिया गया है लेकिन अभी प्रकाशन इसलिए नहीं किया जा रहा है ताकि उन्हें किसी तरह का कोई संकट न झेलना पड़े. छंटनी को लेकर अलग अलग तरीके की मीटिंग चल रही है. फाइनल तस्वीर क्या निकल कर आती है, इसका सबको इंतजार है.

प्रदीप ने आई नेक्‍स्‍ट छोड़ा, हिंदुस्‍तान में अनूप का तबादला, नईदुनिया से रूमनी जुड़ीं, जनसंदेश से विदा हुए बसंत

आई नेक्‍स्‍ट, इलाहाबाद से खबर है कि प्रदीप दुबे ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर फोटोजर्नलिस्‍ट के पद पर कार्यरत थे. पिछले दिनों ही प्रदीप को गोरखपुर से इलाहाबाद भेजा गया था. वे पिछले दो सालों से आई नेक्‍स्‍ट को अपनी सेवाएं दे रहे थे. प्रदीप ने अपने करियर की शुरुआत नोएडा में डीएलए के साथ की थी. प्रदीप ने अपनी मां की बीमारी को इस्‍तीफा देने का कारण बताया है. बताया जा रहा है कि प्रदीप जल्‍द ही एक बार फिर नोएडा से अपनी नई पारी की शुरुआत करने वाले हैं.

हिंदुस्‍तान, चंदौली से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ अनूप कर्णवाल का तबादला बनारस के लिए कर दिया गया है. अनूप पिछले एक साल से चंदौली में ब्‍यूरोचीफ के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. इसके पहले वे अमर उजाला को लम्‍बे समय तक बनारस तथा मुगलसराय में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. अनूप की जगह प्रदीप शर्मा को कार्यवाहक ब्‍यूरोचीफ की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. प्रदीप इसके पहले रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे.

नईदुनिया, इंदौर में सिटी चीफ के पद पर रूमनी घोष ने ज्वाइन किया है. रूमनी महीने भर पहले तक दैनिक भास्कर के साथ थीं. 29 साल तक नईदुनिया के सिटी चीफ रहे दिलीप ठाकुर को उनके मातहत विशेष संवाददाता बना दिया गया है. कारपोरेट संवाददाता मनीष उपाध्याय को भी रवाना कर दिया गया है.

जनसंदेश टाइम्स से सूचना है कि पहली अक्टूबर को एचआर से बसंत पांडेय को विदा कर दिया गया.  श्री पांडेय गोरखपुर अमर उजाला छोड कर आए थे. जिन लोगों को पहले हटाया गया था, उनको आज तक भुगतान नहीं दिया गया. संपादक शैलेन्द्र मणि तो बकाए वाले कर्मचारियों का फोन भी नहीं उठा रहे है.

जागरण कर्मियों और प्रत्याशी के बीच बवाल के पीछे पेड न्यूज तो वजह नहीं!

यूपी के सुल्‍तानपुर जिले से समाचार है कि जिला पंचायत सदस्‍य पद के लिए नामांकन करने वाले एक प्रत्‍याशी ने किसी खबर को लेकर दैनिक जागरण कार्यालय को घेर लिया तथा अपना विरोध दर्ज कराया. आरोप है कि उसने जागरण कर्मचारियों को जान से मारने की धमकी दी. जागरण के कर्मचारियों की तरफ से इस मामले में नगर कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई गई है. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

जागरण कर्मचारियों का आरोप है कि सुल्‍तानपुर के वार्ड नम्‍बर 23 से उपचुनाव के लिए पर्चा दाखिल करने वाले कुड़वार थाना के सोहगौली गांव निवासी देवी प्रसाद तिवारी के पुत्र अखिलेश तिवारी अपने साथियों के साथ दैनिक जागरण कार्यालय पहुंचे तथा कार्यालय में मौजूद पत्रकारों को अपने घेरे में लेते हुए धमकाया कि अगर उनके हिसाब से खबर नहीं प्रकाशित होगी तो ठीक नहीं होगा. जागरणकर्मियों के इनकार करने उन्‍होंने असलहा निकालकर जान से मारने की धमकी दी.

कर्मचारियों का कहना है कि जब उन लोगों ने पु‍लिस को फोन किया तो सभी आरोपी अपने वाहन से भाग खड़े हुए. एसपी अलंकृता सिंह के निर्देश पर कोतवाल जितेंद्र गिरी ने मौके का मुआयना किया. पुलिस आरोपियों की तलाश कर रही है. दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि पूरा मामला पेड न्‍यूज को लेकर था,‍ जिससे दोनों पक्षों में बात बिगड़ गई और जागरण कर्मचारियों ने कोतवाली में मामला दर्ज करा दिया. सूत्रों के मुताबिक जागरण के लोग प्रत्याशी अखिलेश तिवारी से पेड न्यूज हेतु पैकेज की डिमांड कर रहे थे जिससे तिवारी ने इनकार किया. इसके बाद दोनों पक्षों में विवाद बढ़ता गया जिसकी परिणति पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने तक जा पहुंची. 

बिग बॉस-6 का हिस्सा नहीं बनेंगे कुमार विश्वास

जनता और मीडिया के बीच चलने वाली अटकलों को डॉ कुमार विश्वास के इस फैसले ने शांत कर दिया कि वे आने वाले बिग बॉस-6 का हिस्सा नहीं होंगे. सूत्रों के अनुसार  डॉ कुमार विश्वास को बिग बॉस की तरफ से अत्यधिक आकर्षक पारिश्रमिक का ऑफर दिया गया था  तथा बिग बॉस टीम कि ये पुरजोर कोशिश थी कि डॉ कुमार विश्वास बिग बॉस का हिस्सा बनें.

उन्हें एक करोड़ रुपये साइनिंग एमाउंट और पच्चीस लाख रुपये प्रति सप्ताह के हिसाब से पेमेंट मिलना था. डॉ कुमार विश्वास जो कि अन्ना कोर कमेटी के सदस्य हैं,  ने अपनी टीम के प्रति दायित्वों एवं जिम्मेदारियों का प्रवहन  करते हुए जो

निर्णय लिया है उसने उनके प्रशंसकों  एवं  आई .ए. सी . के कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह का वातावरण उत्पन्न कर दिया है.

पूछे जाने पर कि छोटे परदे से ये दूरी क्यों? डॉ कुमार विश्वास का कहना था – मुझे छोटे परदे पर  आने से कोई परहेज़ नहीं है, पर मैं उन कार्यक्रमों  का हिस्सा  बनना चाहता हूँ  जो मनोस्थिति के अनुकूल हो, और जिसको करने में मेरे दिल और दिमाग को तसल्ली मिले.  उल्लेखनीय है कि कुमार विश्वास ने ''सच का सामना'' के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था क्योंकि उन दिनों अन्ना आंदोलन को आगे बढ़ाने में उनकी जरूरत थी.

news in english

To put an end to prolonged speculation among public and Media it is confirmed now that Dr Kumar Vishvas will not be the part of Big Boss session -6. According to Confidential sources revealed that despite a lucrative offer of 1cr as sighing and 25 lacs per week Dr Kumar decided not to be part of Big Boss. Being a core member of Anna team he decided to give his services to team which indeed was appreciated by Annaji, Arvind Kejriwal and other team members.

On being probed further that what makes him reluctant to be a part of small screen . He responded  – I don't have any restriction for small screen , i would love  to be the part of it if it is based on Poetic sense of my celebre. Sources revealed that in past Dr Kumar had rejected few more offers from different channels like Comedy Circus , Such ka samna etc. But His this decision to refrain from Big Boss has been widely welcomed by his Fans and the youth members of IAC( India Against corruption ) who see him as their mentor and Guide.

टीवी एंकर खुर्शीद रब्बानी को नैक्सजेन एक्सीलेन्सी अवॉर्ड

जयपुर। राजस्थान के प्रमुख टेलीविजन चैनल ईटीवी राजस्थान के एंकर व रिपोर्टर खुर्शीद रब्बानी को शहर में हुए एक भव्य समारोह में पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। रुण्डल ग्रुप तथा नैक्सजेन की ओर से होटल क्लार्क्स आमेर में हुए समारोह में उन्हें नैक्सजेन एक्सीलेंट अवॉर्ड से नवाजा गया। इस दौरान उनके पत्रकारिता संबंधी कार्यों पर एक शॉर्ट फिल्म भी प्रदर्शित की गई।

अवॉर्ड के अन्तर्गत रब्बानी को सेना की दक्षिण-पश्चिम कमान के लेफ्टिनेन्ट जनरल ज्ञान भूषण, राज्य के डेयरी एवं खादी-ग्रामोद्योग राज्यमंत्री बाबूलाल नागर तथा रुण्डल ग्रुप के चेयरमैन भवानी सिंह व नेक्सजेन के अरशद हुसैन के हाथों शॉल ओढ़ाकर स्मृति चिन्ह व प्रशस्ति पत्र भेंट किए गए। कार्यक्रम में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष राजीव अरोड़ा, मोरारका फाउण्डेशन के सीईओ मुकेश गुप्ता सहित अनेक जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं। खुर्शीद रब्बानी का पत्रकारिता के लिए अभिनंदन करने पर न्यूजपेपर्स एसोसिएशन के प्रदेश महासचिव मनमोहन सिंह, प्रदेश उपाध्यक्ष भंवर सिंह राणावत, जयपुर जिलाध्यक्ष अमन वर्मा, उपाध्यक्ष आशा जैन, कोषाध्यक्ष पवन टेलर सहित अनेक पत्रकारों ने बधाई दी है।
 

पंजाब केसरी का सहारनपुर में ब्यूरो आफिस खुला

पंजाब केसरी अखबार जालंधर ग्रुप ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जेवी जैन डिग्री कालेज चौक पर अपना ब्यूरो कार्यालय खोला है. कार्यालय का उदघाटन सिद्व किराना पीठ मंदिर किशनपुरा के महामंडलेश्वर बाबा रिजक दास के परम शिष्य बाबा गोपालदास ने वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच नारियल फोड कर किया. इस अवसर पर शहर के तमाम वर्गों के सैकड़ों लोग उपस्थित थे. लोगों द्वारा दिए गए सुझावों को पूरी तरह आत्मसात करने का आश्वासन देते हुए पंजाब केसरी हरियाण के प्रभारी एंव समाचार संपादक रविन्द्र नाथ पांडेय ने कहा कि उनके अखबार को जिस तरह से देश के पांच राज्यों में सिरआंखों में लोगों ने बैठा रख है उसी तरह से सहारनपुर के लोगों के दिलों की धडकन बनने का प्रयास करेगा.

पंजाब केसरी अंबाला शहर की ब्यूरोचीफ रीटा शर्मा और जमुनानगर के ब्यूरोचीफ सरनदीप जी ने भी पंजाब केसरी के संपादक के सकारात्मक सोच से लोगों को अवगत कराया. सहारनपुर के ब्यूरोचीफ चंद्र प्रकाश मणि त्रिपाठी ने आगन्तुकों का स्वागत किया तथा अपने संपादक के सोच को बिना रूकावट के आगे बढाने का संकल्प लिया. पंजाब केसरी का 35 वर्ष जिला प्रतिनिधि रहे वीवी गौतम ने नये ब्यूरोचीफ को बधाई दी तथा समय-समय पर मार्गदर्शन देने का आश्वासन भी दिया. इस अवसर पर पंजाब केसरी के संवाददाता शिवमणि त्यागी, खेमचंद सैनी, सचिन कुमार सिंह, बिजनेस हैड सुधीर कुमार गुप्ता फोटो ग्राफर शब्बर रजा भी मौजूद रहे.    
 

अरुण खोसला की नई पारी, पंजाब केसरी से जुडे मनीष और मोहित

लुधियाना से प्रकाशित होने वाले पंजाब की शक्ति हिंदी समाचार ने कपूरथला जिला प्रभारी के तौर पर कपूरथला से सम्बंधित अरुण खोसला को नियुक्त कर दिया है. अरुण खोसला कई समाचार संस्थानों के साथ फ्री लांसर के तौर पर काम कर रहे हैं. 2001 में जालंधर से प्रकाशित हो रहे संध्या हिंदी एनकाउंटर में खोसला ने अहम कार्य कर उसे एक मुकाम पर पहुंचाया. अरुण खोसला 2005 में दैनिक जागरण के साथ जुड़ गए. 2007 के अंत में उन्होंने जागरण को अलविदा कह दिया. अरुण खोसला ने कपूरथला जिले में अपनी टीम के गठन का काम पूरा कर लिया है.

अमर उजाला के बस्ती ब्यूरो के लांचिग सदस्य मनीष श्रीवास्तव और दैनिक जागरण नोएडा को बाय बोलने वाले मोहित श्रीवास्तव ने पंजाब केसरी के अंबाला यूनिट में बतौर सब एडीटर ज्वाइन किया है. इससे पूर्व गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार सीपीएम त्रिपाठी ने जन संदेश को बाय बोल कर पंजाब केसरी अंबाला में ही बतौर चीफ रिपोर्टर ज्वाइन किया था किन्तु उन्हें बाद में सहारनपुर का ब्यूरोचीफ बना दिया गया.

उज्जवल कुमार ने आई-नेक्स्ट और संधू व आरती ने ‘पंजाब की शक्ति’ से इस्तीफा दिया

आई नेक्स्ट, पटना के डिप्टी चीफ रिपोर्टर उज्जवल कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. वे उच्च शिक्षा के लिए अवकाश पर थे, बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया. उज्जवल करीब साढ़े चार वर्ष तक आई-नेक्स्ट के साथ रहे. उन्होंने आई-नेक्स्ट प्रबंधन से छह माह का स्टडी लीव मांगा था, मास कम्युनिकेशन में एमफिल कंप्लीट करने के लिए. वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से एमफिल कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक प्रबंधन ने पहले तो उन्हें अवकाश दिया लेकिन बाद में आनकानी करने लगा. इस पर उज्जवल ने इस्तीफा दे दिया. इस बारे में जब प्रतिक्रिया के लिए उज्जवल से संपर्क किया गया तो उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

लुधियाना से संबंधित हिंदी समाचार पत्र पंजाब की शक्ति से सर्कुलेशन हेड संधू व स्पेशल करेस्पांडेंट आरती सेठ को भी बाहर रास्ता दिखा दिया गया है. आरती इससे पहले भास्कर ग्रुप के साथ काम कर चुकी हैं. इस मामले में वह कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं. आरती एनई नवीन गुप्ता के साथ भास्कर छोड़ कर पंजाब की शक्ति में आई थीं.

रामनगर में किस बात के लिए लोगों ने जला दिया दैनिक जागरण अखबार?

लोगों की जागरूकता का आलम ये है कि अब वे अखबारों की गल्ती के खिलाफ भी खुलकर बोलने-विरोध करने लगे हैं. इससे उम्मीद बंधती है कि भ्रष्ट और अराजक होती कारपोरेट मीडिया पर यही जनता लगाम लगाएगी. ताजा घटनाक्रम में पता चला है कि उत्तराखंड के रामनगर में लोगों ने दैनिक जागरण अखबार जलाया. एक सज्जन ने भड़ास को अखबार जलाने की तस्वीर मेल करके इतना बताया कि वहां के व्यापारी एक गलत खबर छपने से नाराज थे और इकट्ठा होकर अखबार को जलाते हुए अपना विरोध प्रदर्शित किया. अखबार जलाने की तस्वीर नीचे प्रकाशित है.

अगर आपमें से किसी को पता हो कि यह विरोध प्रदर्शन किस खबर से नाराज होकर किया गया तो कृपया नीचे कमेंट बाक्स में जिक्र करें या फिर भड़ास को bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें. 

राज्यसभा टीवी में अप्लाई कर रहे हैं तो इसे जरूर पढ़ें…

: चैनल में हिंदी वालों के लिए कुछ खास नहीं  : नियुक्तियां ठेके पर होंगी जिन्हें तीन साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है : दिहाड़ी मजदूरों से कुछ बेहतर स्थिति वाली इन अस्थायी नौकरियों के लिए फीस तो ठीक है पर हिन्दी में काम ही कम हैं : राज्यसभा टेलीविजन में 20 पदों पर करीब 60 रिक्तियों के लिए आवेदन आंमंत्रित किए गए हैं। लेकिन हिन्दी में सहायक संपादक की जरूरत राज्य सभा टीवी को नहीं है। 90 हजार रुपए प्रतिमाह की फीस वाली यह नौकरी जाहिर है, संपादकीय गुणवत्ता के लिए है। पर हिन्दी में गुणवत्ता की चिन्ता कौन करता है? तो राज्यसभा टीवी को भी इसकी परवाह नहीं है।

मातृभाषा से अलग कोई भी भाषा, खासकर अंग्रेजी अगर कोई सीखता है तो वह किसी पेशेवर से व्यावसायिक शैली में सीखेगा और उसमें एकरूपता रहेगी। पर हिन्दी जैसी राष्ट्रीय और मातृभाषा अपने देश में लोग ऐसे ही सीख जाते हैं और बोलना शुरू करने के साथ ही हिन्दी बोलने लगते हैं। यह अलग बात है कि जो जैसे माहौल में रहते हैं वैसी ही हिन्दी बोलते हैं। इसलिए हिन्दी पर भोजपुरी, मगही, पंजाबी, बांग्ला, मराठी और दक्षिण भारतीय भाषाओं का प्रभाव साफ दिखता है और इन भाषाओं के प्रभाव में रहने वालों की हिन्दी वैसी ही होती है।

इसलिए हिन्दी में एकरूपता के लिए संपादन बहुत जरूरी है पर हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं  से लेकर चैनलों में भी इस पर खर्च करने के बारे में  नहीं सोचा जाता है। राज्य  सभा टीवी अपवाद नहीं है।  इसलिए यहां भी हिन्दी कॉपी के लिए वरिष्ठ सहायक संपादक की आवश्यकता नहीं है।

इसी तरह 50,000 रुपए प्रति माह की फीस  वाली प्रोड्यूसर / कॉरसपोन्डेंट की नौकरी के लिए राज्य सभा टीवी में अंग्रेजी में एक प्रोड्यूसर की तो जरूरत है तो हिन्दी के प्रोड्यूसर की जरूरत ही नहीं है। कॉरसपोन्डेंट, हिन्दी अंग्रेजी दोनों में बराबर – दो चाहिए। एक लाख रुपए प्रति माह की फीस पर सीनियर ऐंकर हिन्दी और अंग्रेजी – दोनों में एक-एक चाहिए पर 80 हजार रुपए प्रति माह की फीस वाले कंसलटैंट ऐंकर की आवश्यकता हिन्दी में नहीं है। जबकि अंग्रेजी में इस पद पर तीन रिक्तियां हैं। इसी तरह, 40 हजार रुपए प्रति माह की फीस वाले अंग्रेजी के चार जूनियर ऐंकर की आवश्यकता है। पर हिन्दी में एक भी जूनियर ऐंकर की आवश्यकता राज्यसभा टीवी को नहीं है।

राज्य सभा  टीवी को प्रोड्यूसर तो अंग्रेजी और हिन्दी में अलग-अलग चाहिए  पर सीनियर प्रोड्यूसर में  ऐसा कुछ नहीं है। कुल तीन सीनियर प्रोड्यूसर चाहिए पर अंग्रेजी से या हिन्दी से यह नहीं लिखा है। 75 हजार रुपए की फीस वाली इस नौकरी के लिए हो सकता है जान-बूझकर हिन्दी अंग्रेजी का भेद नहीं किया गया हो ताकि नियुक्ति करने वालों के पास लचीलापन रहे और हेराफेरी की जरूरत हो तो की जा सके।

एक लाख रुपए प्रति माह की फीस पर एक कंसलटैंट की आवश्यकता राज्य सभा टीवी को है पर वह अंग्रेजी की पृष्ठभूमि का होना चाहिए या हिन्दी की पृष्ठभूमि से, यह विज्ञापन में नहीं लिखा है। योग्यता शर्तें मोटा-मोटी ऐसी हैं कि हिन्दी पृष्ठभूमि वाला कोई उम्मीदवार इस पद के लिए आवेदन कर ही नहीं सकता है। वैसे भी, चर्चा है कि इन नियुक्तियों के लिए उम्मीदवार पहले से तय हैं और रिक्तियां उसी हिसाब से निकाली गई हैं। अगर ऐसा है तो भी हिन्दी वालों के लिए संभावनाएं अच्छी नहीं हैं।   

कुल मिलाकार, अंग्रेजी वालों के लिए संभावनाएं अच्छी हैं और हिन्दी वालों के लिए राज्य सभा टीवी में भी कुछ खास नहीं है। कहा जा सकता है कि जिन पदों पर रिक्तियां नहीं बताई गई हैं वो खाली नहीं हैं और इनके लिए राज्य सभा टीवी के पास उम्मीदवार पहले से हैं। पर सवाल उठता है कि अंग्रेजी में कोई ऐसा पद क्यों नहीं है। अगर स्थिति यह है कि अंग्रेजी में वरिष्ठ पदों के लिए लोग मिल नहीं रहे हैं और हिन्दी में वरिष्ठ पदों पर लोगों की जरूरत ही नहीं है तो देश में अंग्रेजी-हिन्दी की भिन्न स्थिति का पता चल जाता है। हिन्दी-हिन्दी करने वालों की आंखें इससे खुल जानी चाहिए। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


राज्यसभा टीवी में वैकेंसी वाली मूल खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें– मीडियाकर्मियों के लिए राज्यसभा टीवी में ढेर सारी नौकरियां, अप्लाई करें

”हिंदुस्तान” की इस खबर पर नाराज हुए यादव जाति के लोग, आप भी पढ़िए

बिहार के मधेपुरा में यादव जाति के लोग पिछले दिनों सड़क पर आ गए थे. हिंदुस्तान अखबार की प्रतिया जला डाली. सामूहिक विरोध प्रदर्शन किया. वजह, एक खबर, जिसका प्रकाशन हिंदुस्तान अखबार में हुआ. आरोप है कि इस खबर के जरिए यादव जाति को नीचा दिखाया गया है, नकारात्मक टिप्पणी की गई है, उनकी भावनाओं को हर्ट किया गया है. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इस खबर में ऐसा कुछ नहीं है जिसका बुरा माना जाए. बदलते परिवेश में जब सब कुछ बदल रहा है तो जातियों की मान्यताएं भी बदल रही हैं. इसी का उल्लेख खबर में किया गया है.

नीचे खबर है. आप भी खबर पढ़िए और बताइए कि आपको इसमें कुछ आपत्तिजनक नजर आता है. नीचे जो अखबार की कटिंग प्रकाशित है, उस पर क्लिक कर दें, तब खबर को आराम से पढ़ पाएंगे. सबसे नीचे वो वीडियो है जिसमें यादव जाति के लोगों का सामूहिक विरोध प्रदर्शन दिखाई पड़ रहा है.

और ये है विरोध प्रदर्शन का वीडियो… देखने के लिए क्लिक करें..

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/632/media-world/burning-newspaper-in-madhepura.html

मूल खबर को पढ़ने के लिए क्लिक करें…

यादव जाति के खिलाफ खबर छापने से नाराज जनता ने अखबार को जला डाला

आईएएस शशि भूषण प्रकरण : बड़े आईएएस बच गए, बलि का बकरा बन गए जीआरपी इन्स्पेक्टर अनिल राय!

मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्यरत डॉ नूतन ठाकुर द्वारा मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश को पत्र लिख कर कहा गया है कि शशि भूषण कुमार, आईएएस द्वारा कथित छेड़छाड़ वाली घटना में अनिल राय, इन्स्पेक्टर, जीआरपी को अकारण निलंबित किया गया प्रतीत होता है. उन्होंने कहा है कि जब घटना की सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद जीआरपी के डीआईजी और एसपी थाना जीआरपी पहुँच गए थे तथा इन्स्पेक्टर ने काफी विचार-विमर्श के बाद इन अधिकारियों की मौजूदगी में ये धाराएँ लगायी थी, तो अकेले इन्स्पेक्टर को निलंबित किया जाना उचित नहीं दिखता.

उन्होंने यह भी निवेदन किया है कि मुख्यमंत्री स्तर से इस बात की गहन जांच कराएं कि कौन-कौन से आईएएस अधिकारी आरोपित अधिकारी को बचाने के लिए नीली बत्ती लगी सरकारी वाहन का प्रयोग कर जीआरपी थाने पहुंचे थे और इनमे किन्होंने पुलिस पर गलत दबाव बनाने की कोशिश की थी.  डॉ ठाकुर ने निवेदन किया है कि यदि इन्स्पेक्टर जीआरपी किसी प्रकार से दवाब में आने के दोषी हैं तो कार्यालय समय में सरकारी वाहन का प्रयोग पूर्णतया गैरसरकारी कार्य करने हेतु मौके पर पहुँच कर दबाव बनाने वाले आईएएस अधिकारी भी निश्चित रूप से दण्डित किये जाने चाहिए.

पत्र की प्रति-
सेवा में,
श्री अखिलेश यादव,
मा. मुख्यमंत्री,
उत्तर प्रदेश,

लखनऊ

विषय- श्री शशि भूषण कुमार, आईएएस द्वारा कथित छेड़छाड़ विषयक समाचारों के सम्बन्ध में

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मैं डॉ नूतन ठाकुर, मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्यरत इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डोक्यूमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस), लखनऊ की कन्वेनर हूँ. मैं यह पत्र श्री शशि भूषण कुमार, आईएएस द्वारा कथित छेड़छाड़ विषयक समाचार दिनांक 02/10/2012 के सम्बन्ध में पांच समाचारों की प्रति संलग्न कर प्रेषित कर रही हूँ.  उक्त समाचारों के अनुसार दिनांक 01/10/2012 को श्री कुमार के विरुद्ध थाना जीआरपी, चारबाग, लखनऊ पर धारा 354, 294 आईपीसी के अंतर्गत मुक़दमा पंजीकृत हुआ तथा इसमें बाद में धारा 376/511 आईपीसी जोड़ी गयी. समाचारों के अनुसार इस घटना में एफआईआर दर्ज करने में तीन घंटे से अधिक समय लगा और हलकी धाराओं में मुक़दमा दर्ज हुआ. शाम में आपके आदेशों के बाद धारा 376/511 आईपीसी जोड़ी गयी. इस मामले में श्री अनिल राय, इन्स्पेक्टर, जीआरपी को लापरवाही बरतने के आरोप में पहले स्थानांतरित और बाद में निलंबित कर दिया गया जबकि समाचारों के अनुसार इस घटना की सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद जीआरपी के डीआईजी और एसपी थाना जीआरपी पहुँच गए थे तथा इन्स्पेक्टर ने काफी विचार-विमर्श के बाद इन अधिकारियों की मौजूदगी में ये धाराएँ लगायी थी. समाचारों के अनुसार शाम में धाराएँ बढ़ाई गयी और इन्स्पेक्टर को निलंबित कर दिया गया. समाचारों के अनुसार श्री अनिल राय ने हलकी धाराएँ लगाई थी, इसीलिए उन्हें निलंबित किया गया.

इन्ही समाचारों में यह भी कहा गया कि श्री कुमार, आईएएस के समर्थन में कई अन्य आईएएस अधिकारी भी थाना जीआरपी आये अथवा उन्होंने फोन कर पुलिस अधिकारियों को आदेशित किया. खबरों के अनुसार श्री कुमार के समर्थन में करीब डेढ़ दर्जन आईएएस अफसर सरकारी गाड़ियों से कार्यालय समय में जीआरपी थाने आये. एक समाचार के अनुसार आईएएस अफसर को नहीं बचा पाने की नाराजगी श्री अनिल राय को झ्लेनी पड़ी और उन्हें निलंबित होना पड़ा. श्री राय पर यह आरोप लगाया  गया कि उन्होंने पीडिता का मामला दर्ज कराने में कोताही बरती जबकि पीडिता की माँ सुश्री नीरू सक्सेना ने साफ़ कहा कि श्री राय ने उन पर कोई दवाब नहीं बनाया था. इस खबर के अनुसार पीडिता के जाने के बाद भी तमाम आईएएस अफसर जीआरपी थाने आते रहे और श्री राय पर कई प्रकार से दवाब बनाते रहे.

पीड़िता के साथ घटित यह घटना अत्यंत लोमहर्षक तथा जघन्य है और उस पर कठोरतम कार्यवाही की जानी चाहिए. किन्तु जिस प्रकार से श्री अनिल राय को लापरवाही बरतने के आरोप में पहले स्थानांतरित और बाद में निलंबित कर दिया गया वह किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं दिखता. मैं समाचार पत्रों की खबरों के परिप्रेक्ष्य में आपसे निम्न निवेदन करती हूँ-

1. कृपया अपने स्तर से इस बात की गहर जांच कराने की कृपा करें कि कौन-कौन से आईएएस अधिकारी श्री कुमार को बचाने के लिए नीली बत्ती लगी सरकारी वाहन का प्रयोग कर जीआरपी थाने पहुंचे थे?

2. जो आईएएस अधिकारी उस दिन जीआरपी थाने गए थे उनमे कितने अधिकारियों द्वारा इस मामले में पुलिस पर गलत दवाब बनाए जाने की बात जांच में सामने आती है

3. कृपया यह दिखवाने की कृपा करें कि क्या मुक़दमा पंजीकृत किये जाने की प्रक्रिया के दौरान अथवा/तथा  उस समय थाने पर श्री अनिल राय, इन्स्पेक्टर, जीआरपी के अलावा जीआरपी के डीआईजी तथा एसपी भी मौजूद थे? यदि हाँ तो फिर मात्र श्री राय को निलंबित किये जाने का क्या आधार तथा तर्क था?

4. इसके अतिरिक्त भी कृपया यह दिखवाने की कृपा करें कि श्री अनिल राय को स्थानांतरित और निलंबित किये जाने का क्या कोई कारण तथा आधार था अथवा मात्र मनमर्जी से अधिकारियों द्वारा उन्हें निलंबित कर दिया गया?

5. कृपया यह भी दिखवाने की कृपा करें कि यदि श्री राय किसी प्रकार से दवाब में आने के दोषी हैं तो कार्यालय समय में सरकारी वाहन का प्रयोग पूर्णतया गैरसरकारी कार्य करने हेतु मौके पर पहुँच कर दवाब बनाने वाले आईएएस अधिकारी भी निश्चित रूप से दण्डित किये जाने चाहिए.  

मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस मामले में आप द्वारा न्याय किया जाएगा और ऊपर के अधिकारियों द्वारा अपने आप को बचाने के लिए अकारण अधीनस्थ अधिकारी को दण्डित किये जाने की प्रक्रिया पर विराम लगेगा.

भवदीय,

(डॉ नूतन ठाकुर)

5/426, विराम खण्ड,
गोमती नगर, लखनऊ
094155-34525
पत्रांक- IRDS/IAS/News/01
दिनांक- 03/10/2012                                 

प्रतिलिपि- मा० मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ को कृपया सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु

यादव जाति के खिलाफ खबर छपने से नाराज जनता ने हिन्दुस्तान अखबार जला डाला

हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान में यादव जाति के विरुद्ध छपी टिप्पणी से मधेपुरा में आक्रोश की आग धधकने लगी थी. आक्रोशित लोगों नें 22 अगस्त को हिन्दुस्तान दैनिक के कार्यालय के सामने उग्र प्रदर्शन कर हिन्दुस्तान दैनिक की सैकड़ों प्रतियों को आग के हवाले कर दिया. प्रदर्शनकारियों के तेवर को देख कर “हिन्दुस्तान” कार्यालय के सभी कर्मी भाग खड़े हुए. काफ़ी मशक्कत के बाद मधेपुरा के थाना अध्यक्ष नवीन कुमार सिंह ने हालात को संभाला. लोगों ने “हिन्दुस्तान ” के विरुद्ध नुक्कड़ नाटक और पर्चा वितरण कर अपनी नाराजगी जाहिर करना शुरू कर दिया है. साथ ही न्यायालय में  “हिन्दुस्तान” के कर्ताधर्ता के विरुद्ध मुकदमा भी ठोकने की तैयारी कर रहे हैं.

हिन्दुस्तान दैनिक में 10 अगस्त को कोशी संस्करण में पेज पांच पर एक खबर का प्रकाशन किया गया. “कृष्ण भक्तों के दरवाजे पर गाय नहीं बोलेरो” शीर्षक से छपी खबर में ये जिक्र किया गया था कि मधेपुरा के कृष्ण भक्त अपनी बूढी गायों को दूसरे प्रदेश के बूचणखाने में बेचते हैं. खबर में परोक्ष रूप से यादव जाति के लोगों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की गयी थी. इस खबर से आक्रोशित लोगों ने हिन्दुस्तान दैनिक के मधेपुरा कार्यालय के इंचार्ज अमिताभ से मिलकर अपनी लिखित आपत्ति दर्ज करवाते हुए जिम्मेवार संवाददाता को हटाने और आपत्तिजनक लेख के लिये खेद जताने की मांग की थी. लोगों की आपत्ति के बावजूद ना तो सम्बन्धित संवाददाता के विरुद्ध कार्रवाई की गयी और ना ही खेद व्यक्त किया गया. पुन: स्थानीय लोगों ने उक्त अखबार के भागलपुर कार्यालय में फ़ैक्स भेज कर सम्पादक को अपनी आपत्ति से अवगत कराते हुए कार्रवाई की मांग की. लोगों की आपत्ति को भागलपुर के सम्पादक विशेश्वर कुमार ने भी नजरअंदाज कर दिया. सम्पादक की बेरुखी और अदूरदर्शिता से ये मामला और भी तूल पकड़ लिया.


यादव जाति के लोग जिस खबर पर नाराज हुए, उसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें– मूल खबर 

विरोध प्रदर्शन और आगजनी से संबंधित पूरे घटनाक्रम का वीडियो यहां उपलब्ध है, क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/632/media-world/burning-newspaper-in-madhepura.html

दैनिक जागरण से इस्तीफा देकर मनीष शर्मा ”पंजाब की शक्ति” के ब्यूरो चीफ बने

बठिंडा : दैनिक जागरण, बठिंडा कार्यालय में सीनियर रिपोर्टर के तौर पर सेवाएं दे रहे मनीष शर्मा ने दैनिक जागरण प्रबंधन को अपना इस्तीफा भेज दिया है। मनीष पंजाब में जल्द लांच होने जा रहे ''पंजाब की शक्ति'' के बठिंडा से ब्यूरो चीफ होंगे जबकि इससे पहले दैनिक भास्कर मोगा से चीफ सब के पद से इस्तीफा देने वाले हरिदत्त जोशी पंजाब की शक्ति के मालवा चीफ के तौर पर सेवाएं दे रहे हैं। मनीष शर्मा की अब तक की पारी की बात करें तो उन्होंने इससे पहले पंजाब केसरी, अमर उजाला व दैनिक भास्कर में बखूबी सेवाएं दी हैं।

दैनिक भास्कर में सिटी इंचार्ज नरिंदर शर्मा का व्यवहार उनके साथ ठीक न होने के चलते उन्होंने एक साल पहले भास्कर को अलविदा कह दैनिक जागरण से अपनी पारी शुरू की थी। दैनिक जागरण बठिंडा में मनीष शर्मा बतौर सेकंड इंचार्ज के तौर पर सेवाएं दे रहे थे। ब्यूरो चीफ अरविंद श्रीवास्तव के बाद सारा कार्यभार मनीष शर्मा के हाथ में ही होता था लेकिन शर्मा के जागरण को अलविदा कहने के बाद अब जागरण के नए रिपोर्टर ढूंढने के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। मनीष शर्मा काफी समय से ब्यूरो चीफ की कुर्सी में बैठना चाहते थे क्योंकि उनका मानना है कि उनमें वह सब कुछ है जो एक ब्यूरो चीफ में होता है। गौरतलब है कि बठिंडा में रिपोर्टरों का इस कदर अकाल पड़ा है कि किसी भी समाचार पत्र को ढूंढने से भी पत्रकार नहीं मिल रहे हैं। पंजाब की शक्ति के मालवा चीफ हरिदत्त जोशी आने वाले दिनों में भास्कर के किले में भी सेध लगा सकते हैं।

भड़ास तक अपनी बातें, जानकारियां, सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

कानून बनाने वाली संसद के चैनल में कानून की धज्जियां उड़ी : नौ घंटे तक नौकरी करने का फरमान

राज्यसभा टीवी को चले साल भर से ज्यादा हो गया है लेकिन कर्मचारियों को सुविधा देने की जगह उनका उत्पीड़न बढ़ता ही जा रहा है. सरकारी कामनवेल्थ खेलों का पर्याय बने इस सफ़ेद हाथी में सारे खर्चों के लिए पैसे हैं. अधिकारियों के फर्जी टूर कराये जाते हैं. मगर कर्मचारियों का हाल बड़ा बुरा है. न बोनस न इन्क्रीमेंट, ऊपर से 12-12 घंटे काम. कानून बनाने वालों को नहीं है कानून का ज्ञान. राज्यसभा टीवी में कार्यरत कर्मियों के लिए नया फरमान जारी हुआ है कि कोई भी कर्मी किसी भी हाल में रोजाना 9 घंटे से कम की शिफ्ट नहीं करेगा. इसके लिए पंचिंग मशीन की व्यवस्था की गयी है.

मज़े की बात ये है कि सभी कर्मियों से किये गए कांट्रैक्ट में साफ़ लिखा है कि उन्हें आठ घंटे काम करना है. अब अगर नौ घंटे से ज्यादा प्रतिदिन काम करना होगा तो क्या राज्यसभा टीवी इसके लिए भुगतान करेगा? इस मुद्दे पर सभी अधिकारी चुप हैं. ज़ाहिर है नौ घंटे प्रतिदिन काम का फरमान लेबर एक्ट और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का खुला उल्लंघन है. इसके अलावा राज्यसभा टीवी प्रबंधन कर्मियों के इन्क्रीमेंट से लेकर सर्विस रुल और सुविधाओं के नाम पर मौन है. कानून बनाने वाली संसद के चैनल में जिस तरह कानून की धज्जियाँ उड़ रही हैं उससे साफ़ है कि मीडियाकर्मियों का उत्पीडन करने में कोई पीछे नहीं है. 

राज्यसभा टीवी के एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

महेंद्र मोहन गुप्त, संजय गुप्त समेत जागरण के कई गुप्ताज पर चारसौबीसी और धोखाधड़ी करने का आरोप

: जागरण विज्ञापन फर्जीवाड़ा से जुड़ा परिवाद-पत्र दायर : परिवादी का शपथ पर बयान दर्ज : कंचन शर्मा की गवाही पूर्ण : मुजफफरपुर (बिहार) : दैनिक जागरण के करोड़ों के सरकरी विज्ञापन घोटाले के संबंध में बिहार के मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में रमन कुमार यादव (निवासी-पुस्तक भवन, सफी दाउदी मार्केट, मोती झील, थाना-मुजफफरपुर) ने मेसर्स जागरण प्रकाशन लिमिटेड (जागरण बिलिडंग, 2, सर्वोदयनगर, कानपुर-208005) के चेयरमैन  महेन्द्र मोहन गुप्ता सहित कुल सत्रह  व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120बी, 420, 471, 476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराओं  8बी, 12, 13, 14 और 15 के अन्तर्गत ''परिवाद-पत्र'' दायर किया है.

परिवादी ने न्यायालय से मुकदमा को तजबीज कर संज्ञान लेकर द्वितीय पक्षों के विरूद्ध सम्मन निर्गत करने या पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर देशव्यापी विज्ञापन घोटाले में गहरे अनुसंधान का आदेश देने की प्रार्थना की है. न्यायालय के आदेश पर परिवादी रमण कुमार यादव ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में शपथ पर अपना वयान दर्ज करा दिया है और परिवाद-पत्र में लगाए आरोपों का समर्थन किया है. प्रथम गवाह कंचन शर्मा (मुंगेर निवासी) ने भी न्यायालय में अपने बयान में परिवाद-पत्र में वर्णित आरोपों का समर्थन किया है. दो अन्य गवाह क्रमश: श्रीकृष्ण प्रसाद (अधिवक्ता, मुंगेर) और बिपिन कुमार मंडल (अधिवक्ता, मुंगेर) का बयान कोर्ट में दर्ज होना है.

परिवाद-पत्र में मेसर्स जागरण प्रकाशन लिमिटेड के जिन लोगों के विरूद्ध ''परिवाद-पत्र'' दायर किया गया है, उनमें शामिल हैं–

।1। चेयरमैन सह प्रबंध निदेशक महेन्द्र मोहन गुप्ता

।2।  सीईओ सह संपादक संजय गुप्ता

।3। पूर्णकालीक निदेशक धीरेन्द्र मोहन गुप्ता

।4।  पूर्णकालीक निदेशक सह संपादक सुनील गुप्ता

।5। पूर्णकालीक निदेशक शैलेश गुप्ता

।6। स्वतंत्र निदेशक भारतजी अग्रवाल

।7। स्वतंत्र निदेशक किशोर वियानी

।8। स्वतंत्र निदेशक नरेश मोहन

।9। स्वतंत्र निदेशक आरके झुनझुनवाला

।10। स्वतंत्र निदेशक रशिद मिर्जा

।11। स्वतंत्र निदेशक  शशिधर नारायण सिन्हा

।12। स्वतंत्र निदेशक विजय टंडन

।13। स्वतंत्र निदेशक विक्रम बख्शी

।14। कंपनी सचिव अमित जायसवाल

।15। महाप्रबंधक और मुद्रक आनन्द त्रिपाठी

।16। वर्तमान स्थानीय संपादक (मुजफफरपुर) देवेन्द्र राय और

।17। संपादक शैलेन्द्र दीक्षित ।

मुजफ्फरपुर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.


परिवाद-पत्र की पृष्ठ संख्या-01, 02 और 03 नीचे संलग्न है….


लेखक की अन्य रिपोर्ट-खबरों के लिए यहां क्लिक करें– भड़ास पर श्रीकृष्ण

तातेड़ बने 4रियल न्यूज के राजस्थान ब्यूरो चीफ, नवजीत ए2जेड के यूपी हेड

जोधपुर निवासी प्रमोद तातेड़ हिन्दी न्यूज चैनल 4 रियल न्यूज के राजस्थान के ब्यूरो चीफ बनाये गये हैं. 4 रियल न्यूज चैनल भारत सहित विश्व के प्रमुख 18 देशों में प्रसारित हो रहा है. तातेड़ इससे पूर्व कई न्यूज चैनल और समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अपनी सेवाए दे चुके हैं. तातेड़ को राजस्थान का ब्यूरो चीफ बनाने पर मीडिया जगत की कई हस्तियों ने बधाई और शुभकामनाएं दी हैं. इसमें जनहित भारतीय पत्रकार संघ के प्रदेश अध्यक्ष चेतन कुमार मालवीय, सीनियर पत्रकार दिव्य गौड, एस.एन. विवेक, मनोज अवस्थी, रघुवीर सिंह सहित कई पत्रकारों नें बधाई दी हैं.

ए2जेड न्यूज़ चैनल प्रबंधन ने निकाय 2014 चुनाव की तैयारी के चलते उत्तर प्रदेश हेड की जिम्मेदारी नवजीत सिंह को सौंपी है. पिछले ८ महीनो से ये पद खाली पड़ा हुआ था. नवजीत ए2जेड न्यूज़ से पहले साधना न्यूज़ , जीएनएन न्यूज़ और इंडिया टीवी में अपनी सेवाए दे चुके हैं. ए2जेड में बतौर उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ बनाया जाना उनके लिए पहला मौका है. 

मुजफ्फरपुर के एचआर हेड ने दिया इस्तीफा, बहराइच में पत्रकार की पिटाई

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर ब्रांच के एचआर हेड ने इस्तीफा दे दिया. रांची की तिरछी नज़र में वह सबसे ऊपर थे और उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था. जमशेदपुर के संपादक अनुज सिन्हा के भाई रांची एचआर में सेकेण्ड मैन है इसलिए अभी धनबाद और जमशेदपुर को टच नहीं किया जा रहा है.

बहराइच में बीते माह अपने आप को एक टीवी चैनल का पत्रकार बता रहे एक व्यक्ति की जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान पयागपुर में छात्रों ने जमकर धुनाई कर दी. घटना तब घटी जब वह विद्यालय के एक शिक्षक पर धौंस जमा रहे थे. वहीं एक कथित क्षेत्रीय पत्रकार कोटेदार के यहां गये थे, तभी कोटेदार के परिजनों ने उनकी पिटाई कर दी. जिला चिकित्सालय में एक घटना के बाद खुद को पत्रकार बताते पहुंचे एक व्यक्ति की घटना के मद्देनजर जुटे लोगों ने धुन दिया. इन पिटाई की घटनाओं पर जिले की मीडिया जगत में चर्चाए तेज हैं.

झारखंड सूचना जन संपर्क विभाग में लूट का नया खेल : उर्दू अखबार के पहले अंक में दिया फुल पेज रंगीन विज्ञापन

इन दिनों झारखंड सरकार के सूचना एवं जन-संपर्क विभाग में लूट का आलम है। एक लंबे समय तक पद खाली रहने के बाद जब एक सीसीएलकर्मी को निदेशक बनाया गया तो उम्मीद बनी थी कि इस विभाग के दिन बहुरेंगे और सरकारी विज्ञापनादि में जो गोरखधंधा चल रहे हैं, वे बंद भले न हों, उसमें कमी जरूर आयेगी। दुर्भाग्य कि फिलहाल यहां ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है और भ्रष्टाचार का पानी सिर से उपर बहने लगा है।

कहने को तो इस विभाग में अभी तक बिहार विज्ञापन नियमावली ही लागू है लेकिन, यहां कोई कायदा कानून नजर नहीं आता। यहां सब अधिकारियों के ठेंगे पर चलता है। कुछ दिन पहले एक ऐसा उर्दू साप्ताहिक समाचार पत्र हाथ लगा, जिसके राज काफी चौंकाने वाले हैं। रांची से प्रकाशित ''मुल्क की आंखें'' नामक इस उर्दू अखबार के प्रथम अंक (17 अगस्त से 23 अगस्त) में ही 15 अगस्त के शुभ अवसर पर एक रंगीन फुल पेज का सरकारी विज्ञापन दे दिया गया है। इस अखबार की एक-दो प्रतियां सूचना एवं जन संपर्क विभाग के अधिकारियों की टेबल के अलावे कहीं भी नजर नहीं आती है।

आखिर इस उर्दू अखबार को एक फुल पेज रंगीन पेज का विज्ञापन कैसे दे दिया गया? इसकी पड़ताल करने के संदर्भ में जब झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग के कार्यालय में निदेशक से संपर्क साधा तो उनका जबाब चौंकाने वाला था कि यहां ऐसा हो ही नहीं सकता। जब उन्हें अखबार की प्रतियां दिखाई गई तो उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुये विभाग के एक अधिकारी के सामने दूसरे अधिकारी को बुलवाया और मामले की जानकारी ली। पहले तो उस अधिकारी ने पिछले साल का विज्ञापन होगा-कहकर पीछा छुड़ाने की कोशिश की, और जब उनका ध्यान प्रथम अंक (17 अगस्त से 23 अगस्त)  की ओर दिलाया गया तो बोल उठे कि मौखिक आदेश दिया गया होगा।

इस दौरान मैंने बातचीत के चित्र लिये, लेकिन एक कनीय अधिकारी के एकांत में ले जाकर कहने पर निदेशक ने मेरे कैमरे से वे सारे चित्र जबरन डिलीट कर दिये ताकि इस राज का पर्दाफाश होने से रोका जाये। दरअसल कथित उर्दू अखबार को विज्ञापन जारी करना एक लूट का हिस्सा है, जिसका खेल बेरोक-टोक जारी ही नहीं है बल्कि उसका दायरा दिन व दिन बढ़ता जा रहा है।

सवाल है कि प्रथम अंक (17 अगस्त से 23 अगस्त) में सारे कायदे-कानून को ताक पर रख कर प्रांत के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सरकार संचालन समिति के अध्यक्ष के फोटो समेत फुल पेज का रंगीन विज्ञापन कैसे छप गये। किस अधिकारी ने आम जनता की गाढ़ी कमाई के इस खुली लूट में हिस्सेदारी बंटाई। हालांकि झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा बंदरबांट का यह कोई अकेला मामला नहीं है। इस तरह के अनगिनत मामले हैं। यह एक जांच का विषय है कि फर्जी आकड़ों व कायदे-कानून को ताक पर रख कर इस विभाग में कैसे-कैसे महालूट मची है।

रांची से मुकेश भारतीय की रिपोर्ट.

टाप टेन पत्रिकाओं का हाल : सात हिंदी और छह अंग्रेजी मैग्जीन्स के पाठक घटे

इंडियन रीडरशिप सर्व (आईआरपएस) २०१२ के दूसरी तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक टाप 10 में से 7 हिंदी पत्रिकाओं के पाठक घटे हैं. एवरेज इश्यू रीडरशिप के अनुसार दूसरी तिमाही में सरस सलिल, मेरी सहेली, क्रिकेट सम्राट, इंडिया टुडे, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा और चंपक के पाठकों की संख्या में कमी दर्ज की गई है. सरस सलिल के पाठकों की संख्या में 53 हजार की कमी आई है. प्रतियोगिता दर्पण हिंदी पत्रिकाओं के बीच अग्रणी बनी हुई है और इसके पाठकों भी बढ़े हैं. 2012 के पहली तिमाही के पाठकों की संख्या 18 लाख 93 हजार से बढ़कर, एवरेज इश्यू रीडरशिप के मुताबिक दूसरी तिमाही में 19 लाख 18 हजार हो गई है. निरोगधाम के पाठकों की संख्या में 3 हजार की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और दूसरी तिमाही में इसके पाठकों की संख्या 7 लाख 50 हजार हो गई है.

सामान्य ज्ञान दर्पण के पाठकों की संख्या में दूसरी तिमाही में पहली तिमाही की अपेक्षा में 20 हजार की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पहली तिमाही में जहां इसके पाठकों की संख्या एवरेज इश्यू रीडरशिप के अनुसार, 16 लाख 44 हजार थी वहीं अब बढ़कर यह 16 लाख 64 हजार हो गई है. 2012 की पहली तिमाही में सरस सलिल के पाठकों की संख्या 16 लाख 1 हजार थी वहीं दूसरी तिमाही में इसके पाठकों की संख्या घटकर 15 लाख 48 हजार हो गई है.

मेरी सहेली के पाठकों की संख्या में दूसरी तिमाही में 67 हजार की कमी दर्ज की गई है.  पहली तिमाही में जहां इसके पाठकों की संख्या 12 लाख 59 हजार थी वहीं दूसरी तिमाही में इसके पाठकों की संख्या 11 लाख 92 हजार हो गई है. क्रिकेट सम्राट के पाठकों की संख्या पहली तिमाही के पाठकों की संख्या 11 लाख 76 हजार से घटकर 11 लाख 35 हजार रह गई है. इंडिया टुडे के पाठकों की संख्या में भी पहली तिमाही के मुताबिक भारी कमी दर्ज की गई है. पहली तिमाही में इसके पाठकों की संख्या 15 लाख 1 हजार थी जो दूसरी तिमाही में घटकर 10 लाख 1 हजार रह गई है.

गृहलक्ष्मी के पाठकों की संख्या में भी पहली तिमाही के मुताबिक 45 हजार की कमी दर्ज की गई है। पहली तिमाही में गृहलक्ष्मी के पाठकों की संख्या जहां 9 लाख 58 हजार थी वहीं अब यह घटकर 9 लाख 13 हजार रह गई है. गृह शोभा (आठवें) और चंपक (नौंवे) के पाठकों की संख्या में भी कमी दर्ज की गई है. गृहशोभा के पाठकों की संख्या दूसरी तिमाही में 8 लाख 43 हजार और चंपक की पाठक संख्या 7 लाख 62 हजार रह गई है.

अंग्रेजी पत्रिकाओं की बात करें तो 10 में से 6 अंग्रेजी मैगजीन के पाठकों की संख्या में कमी दर्ज की गई है. इंडिया टुडे, अंग्रेजी मैगजीन में अग्रणी बना हुआ है लेकिन इसके पाठकों की एवरेज इश्यू रीडरशिप संख्या में दूसरी तिमाही में कमी दर्ज की गई है. पहली तिमाही में, जहां इसके पाठकों की संख्या 16 लाख 13 हजार थी वहीं अब घटकर यह 15 लाख 54 हजार रह गई है.

दूसरी तिमाही में, जिन अंग्रेजी पत्रिकाओं की संख्या में कमी दर्ज की गई है उनके नाम हैं – रीडर्स डाइजेस्ट, आउटलुक, प्रतियोगिता दर्पण, द वीक और विज़डम. जनरल नॉलेज टुडे, कंपीटीशन सक्सेस रिव्यू, स्टारडस्ट और बिजनेस टुडे के पाठकों की संख्या में 2012 की दूसरी तिमाही में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.  जनरल नॉलेज टुडे 10 लाख 87 हजार पाठकों की संख्या के साथ, अंग्रेजी पत्रिकाओं के बीच दूसरे स्थान पर काबिज है, पहली तिमाही में इसके पाठकों की संख्या 10 लाख 86 हजार थी.

रीडर्स डाइजेस्ट के पाठकों की संख्या में इस तिमाही में 34 हजार की कमी आई है. दूसरी तिमाही में, जहां इसके पाठकों की संख्या 10 लाख 9 हजार है वहीं पहली तिमाही में इसके पाठकों की संख्या 10 लाख 43 हजार थी. इस बीच, कंपीटीशन सक्सेस रिव्यू के पाठकों की संख्या में 14 हजार की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. दूसरी तिमाही में, इसके पाठकों की संख्या 7 लाख 19 हजार है वहीं पहली तिमाही में यह 7 लाख 5 हजार थी.

आउटलुक के पाठकों की संख्या इस तिमाही में 4 लाख 92 हजार से घटकर 4 लाख 83 हजार रह गई है. प्रतियोगिता दर्पण के पाठकों की संख्या में भी इस वर्ष कमी दर्ज की गई है. पहली तिमाही में, जहां इसके पाठकों की संख्या 4 लाख 46 हजार थी वहीं अब घटकर 4 लाख 31 हजार रह गई है.  स्टारडस्ट के पाठकों की संख्या में 5 हजार की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पहली तिमाही में, जहां इसके पाठकों की संख्या 4 लाख 11 हजार थी वहीं अब दूसरी तिमाही में यह संख्या बढ़कर 4 लाख 16 हजार रह गई है. बिजनेस टुडे आठवें स्थान पर और द वीक नौवें स्थान पर है.

बिजनेस टुडे के पाठकों की संख्या में दूसरी तिमाही में 11 हजार की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह 40 लाख 8 हजार हो गई है जबकि द वीक के पाठकों की संख्या में 21 हजार की कमी आई है और यह दूसरी तिमाही के एवरेज इश्यू रीडरशिप के अनुसार, 39 लाख 70 हजार रह गई है. विज़डम के पाठकों की संख्या में भी पहली तिमाही के मुताबिक 6 हजार की कमी दर्ज की गई है. पहली तिमाही में जहां इसके पाठकों की संख्या 35 लाख 9 हजार थी वहीं अब दूसरी तिमाही में यह घटकर 35 लाख 3 हजार रह गई है.


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मिसमैनेजमेंट की मिसाल बनता जा रहा है न्यूज 24!

: कानाफूसी : राजीव शुक्ला और अनुराधा प्रसाद के चैनल न्यूज़24 में इन दिनों काफी कुछ चल रहा है. इंडिया टीवी के सीईओ के आने के बाद इस चैनल में इंडिया टीवी से आए कर्मचारियों की भरमार होती जा रही है. सुनने में आ रहा है कि जो लोग इंडिया टीवी में साधारण पोस्ट पर थे उन्हें ऊँची पोस्ट पर न्यूज़ 24 में लाया गया है और उन्हें ज्यादा सेलरी दी जा रही है. दो सप्ताह पहले दफ्तर में समय से ना आने और शनिवार को दफ्तर से गयाब रहने के कारण कई उच्चाधिकारियों की कंपनी की एमडी अनुराधा प्रसाद ने जमकर क्लास ली थी. न्यूज़24 में अजीत अंजुम समेत पुराने उच्च अधिकारियों की एक लॉबी और इंडिया टीवी से आई टीम की लाबी के बीच ठनी हुयी है.

ऐसे में जो पुराने कर्मचारी हैं वो परेशान हैं. कारण, इतने लम्बे समय से उनकी सेलरी नहीं बढ़ायी गयी है और दूसरे लोग प्रबंधन के नाक तले बड़े बड़े कारनामे कर रहे हैं. इसका फायदा इंडिया टीवी से आई टीम उठा रही है. इन्हीं में से कुछ चमचा टाइप लोग मौज उड़ा रहे हैं, और काम के नाम पर खली घूमते नज़र आते हैं. वे अपने मन से आते हैं, मनमर्ज़ी से जाते हैं, यहाँ तक की रविवार के दिन यदि उनका वर्किंग हो तो दफ्तर आते ही नहीं और अपना आईडी कार्ड अपने चेलों से पंच करवाते हैं.  

न्यूज़24  की इंग्लिश वेबसाइट में इन दिनों एक ऐसा व्यक्ति काम कर रहा है जिसे हिंदी वेबसाइट के लिए चयनित किया गया था. हिंदी बैकग्राउंड का यह व्यक्ति नोएडा के किसी हिंदी लोकल अखबार में काम कर चुका है और इसे अंग्रेजी ठीक से नहीं लिखनी आती. ये बिना अंग्रेजी के कार्य अनुभव के पिछले लगभग २ साल से सीनियर एडिटर की पोस्ट पर कार्यरत हैं.  ऐसे में अंग्रेजी वेबसाइट का क्या हाल होगा, आप समझ सकते हैं. हम यूं ही ये बात नहीं कह रहे, हमारे पास इसके पुख्ता सबूत भी हैं. न्यूज24 के वेब डिवीजन में तो ऐसे लोगों की एंट्री हो रही है जो सिफारिश के दम पर लाये जा रहे हैं. सिफारिश के दम पर ही उन्हें अच्छी सैलरी और पोस्ट दी जा रही है, चाहे एक्सपीरिएंस कम ही क्यों न हो. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि मिसमैनेजमेंट की मिसाल बनता जा रहा है न्यूज़ 24.

न्यूज24 में कार्यरत एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी सुनाई बातों व चर्चाओं पर आधारित होती हैं, इसलिए इस पर भरोसा करने से पहले एक बार खुद के स्तर पर तथ्यों की जांच कर लें.

हिन्दी प्रकाशकों को पाठक बनाने के नए तरीके खोजने होंगे : राजेन्द्र यादव

: पुस्तक श्रृंखला 'मेरी प्रिय कथाएं' का लोकार्पण : नई दिल्ली. हंस के सम्पादक और विख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव ने कहा है कि पारंपरिक तरीकों से पाठकों तक जाना अब पर्याप्त नहीं इसके लिए हिन्दी प्रकाशकों को  नए तरीके खोजने होंगे. वे ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक श्रृंखला 'मेरी प्रिय कथाएं' का लोकार्पण कर रहे थे. हिन्दी भवन में आयोजित इस लोकार्पण समारोह में उन्होंने इस पुस्तक श्रृंखला को भी महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि स्थापित लेखकों की ऐसी पुस्तकें आना तो उचित ही है लेकिन असल चुनौती यह है कि नए लेखकों के लिए भी ऐसी कोई श्रृंखला हो.

उन्होंने लेखन की चुनौतियों का ज़िक्र करते हुए कहा कि लेखक लिख लेने के बाद पाठक और उससे भी अधिक आलोचक से मान्यता चाहता है. यहीं वे लेखक डगमगा जाते हैं जो आलोचकों की चिंता करते हैं, यदि वे पाठकों की चिंता करेंगे तो अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकेंगे. किसी दबाव के बिना लिखने पर ही भीतर का श्रेष्ठ आ सकता है. इससे पहले मंच पर राजेन्द्र यादव के साथ उपस्थित मुख्य अतिथि बी एल गौड़, विशेष अथिति डॉ. राजेंद्र अग्रवाल, आलोचक-कथाकार अर्चना वर्मा, कथाकार संजीव सहित अन्य अथितियों ने इस श्रृंखला के पहले सेट का लोकार्पण किया. इस सेट में विख्यात कथाकार संजीव, स्वयं प्रकाश, सुधा अरोड़ा, हबीब कैफ़ी, विजय और अशोक गुप्ता की पुस्तकें हैं. इन पुस्तकों में अपनी प्रिय कथाओं का चुनाव स्वयं लेखक ने किया है अत; इनका आकर्षण पाठकों में कहीं अधिक है.

लोकार्पण समारोह में पुस्तकों पर हुई चर्चा में सबसे पहले युवा आलोचक संजीव कुमार ने कथाकार संजीव और हबीब कैफ़ी की कहानियों पर टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि संजीव की कहानी 'अपराध' बहुत चर्चित है लेकिन लगभग तीस सालों के बाद भी इसमें जबरदस्त पठनीयता का कारण विषय की गंभीरता और प्रस्तुतिकरण ही है. हबीब कैफ़ी की कहानियों को भी उन्होंने उल्लेखनीय बताते हुए कहा कि उनकी चर्चा कम ही हुई है तथापि उनकी कहानियां प्रभावशाली ढंग से अपनी बात कहने में सक्षम हैं. युवा आलोचक और 'बनास जन' के संपादक पल्लव ने स्वयं प्रकाश की कहानियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनकी ये कहानियाँ सचमुच कथाएं ही हैं जिनमें लेखक उत्तर आधुनिक परिदृश्य में अपनी कहन के लिए नितांत देशज मुहावरा और शैली तलाश करता है.  उन्होंने पुस्तक की कुछ कहानियों से खास अंशों का पाठ करते हुए बाते कि किस तरह ये कहानियाँ पाठकों को महज़ उपभोक्ता हो जाने का प्रत्याख्यान रचतीं हैं. उन्होंने हबीब कैफ़ी की कहानियों की चर्चा में कहा कि राजस्थान के जीवन और मुस्लिम परिवेश के कई दुर्भ चित्र उनकी कहानियों में आये हैं.  कथाकार समीक्षक विपिन कुमार शर्मा ने श्रृंखला के कथाकारों के कृतित्त्व में से किये गए इस चुनाव की प्रासंगिकता दर्शाने वाली कहानियों की चर्चा की. युवा कथाकार  विवेक मिश्र ने चर्चा में सुधा अरोड़ा और विजय के कहानी लेखन पर प्रकाश डाला. कथा चर्चा में

मुख्य अतिथि बी एल गौड़ और विशेष अथिति डॉ. राजेंद्र अग्रवाल ने भी अपने विचार व्यक्त किये. आलोचक-कथाकार अर्चना वर्मा ने कहा कि लेखक के निकट रहने वाली इन कहानियों को चुनना अपने ढंग से सार्थक है. लेखकीय वक्तव्य में कथाकार संजीव ने कहा कि मुझे जितना बोलना था वह कहानी में ही बोल चुका. उन्होंने भारतीय वांग्मय की समृद्धता के समक्ष ऐसी पुस्तकों के बार बार प्रकाशन की उपयोगिता बताई. कथाकार विजय और अशोक गुप्ता ने भी संक्षिप्त लेखकीय वक्तव्य दिए.

अंत में ज्योतिपर्व प्रकाशन की ओर से ज्योति राय ने सभी का आभार माना. संयोजन कर रहे कवि-ब्लागर अरुण राय ने ज्योतिपर्व प्रकाशन की इस पुस्तक श्रृंखला की जानकारी दी और बताया कि शीघ्र ही इस श्रृंखला में पाठक ओम प्रकाश वाल्मीकि. पानू खोलिया, असगर वजाहत, चरण सिंह पथिक सहित अनेक महत्त्वपूर्ण कथाकारों की पुस्तकें पढ़ सकेंगे. आयोजन में कथाकार सुभाष नीरव, कथाकार अजय नावरिया, आलोचक संजीव ठाकुर, राजकमल, वन्दना ग्रोवर, रश्मि, सतीश सक्सेना, मनोज कुमार, राधा रमण सहित बड़ी संख्या में पाठक-पत्रकार उपस्थित थे.

प्रस्तुति-अरुण राय

‘पंजाब की शक्ति’ के मालिक का नकली सीमेंट का ट्रक पकड़ा गया!

पंजाब में नवरात्र के दिनों में लांच होने वाले हिंदी दैनिक ''पंजाब की शक्ति'' की चर्चा लांच होने से पहले ही काफी होने लगी है. पंजाब के मोगा जिले में बीते दिनों एक नकली सीमेंट का ट्रक पकड़ा गया जो कि ''दैनिक सवेरा'' में छपी खबर के अनुसार ''पंजाब की शक्ति'' के मालिक राजेश शर्मा का है. पुलिस ने ट्रक ड्राइवर सहित सभी आरोपियों पर मामला दर्ज कर लिया है. ''दैनिक सवेरा'' ने तो अपनी खबर में ''पंजाब की शक्ति'' के मालिक पर नकली सीमेंट का धंधा करने का भी आरोप लगा दिया है.

खबर की सत्यता जानने के लिए राजेश शर्मा के मोबाइल पर फोन किया गया पर उनसे संपर्क नहीं हो सका. उधर, लोगों का कहना है कि ''पंजाब की शक्ति'' का प्रबंधन मानहानि का दावा पुलिस और खबर प्रकाशित करने वाले अख़बार पर करने जा रहा है. ये है दैनिक सवेरा में प्रकाशित खबर….

प्रभात खबर, पटना के प्रोडक्शन हेड को आफिस में घुसने नहीं दिया गया

: एचआर वालों के पक्ष में बोलने का आरोप : हरिवंश जी से गुहार लगाएंगे प्रभात खबर से पीड़ित एचआर वाले : प्रभात खबर में सभी एचआर वालों को बाहर का रास्ता दिखाने का खेल हो रहा है. उसमे एक नया मोड़ आ गया है. कोर्ट में केस की जाने वाली फाइल में कोलकाता के एचआर का नाम सबूत के तौर पर दिया जा रहा है. इससे प्रभात खबर प्रबंधन परेशान हो गया है.  कोलकाता प्रभात खबर की एचआर हेड पिंकी को नहीं निकालने का फैसला सबके गले नहीं उतर रहा है. प्रभात खबर में अंदरखाते यह चर्चा है कि नवीन सिन्हा से करीबी के कारण उस पर गाज नहीं गिराई जा रही है. लेकिन अब यही फैसला प्रभात खबर पर भरी पड़ रहा है.

मुजफ्फरपुर से इस्तीफा दे चुके एचआर हेड सहित कई ने एक साथ चार जिलों में मुकदमा दायर करने की प्रक्रिया चालू कर दी है, जिसमें गया, भागलपुर, मुजफ्फरपुर और पटना शामिल है. उधर कल पटना में एचआर वालों के समर्थन में बोलने वाले प्रोडेक्शन हेड आरवी सिंह को आज आफिस में अन्दर आने नहीं दिया गया. इससे ऑफिस का पूरा माहौल गड़बड़ हो गया है. सम्पादकीय विभाग वालों को एचआर की दुर्दशा देख कर दुःख हो रहा है.

आज सुबह बेली रोड में वकील के यहाँ एक बैठक हुई, जिसमें मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखने, हरिवंश जी से गुहार लगाने की बात कही गयी. उधर कोलकाता एचआर हेड पिंकी इस मामले में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, जबकि प्रभात खबर के सारे एचआर वालों के झंवर जी के पास जाने की बात पिंकी ने ही कही थी. अब ऐन टाइम पर पिंकी का मुकरना सबके लिए दुखद था, इसलिए सबने मिलकर यह तय किया की पिंकी को कोर्ट में बतौर सबूत व गवाह पेश किया जायेगा. वहीं बताया जा रहा है कि प्रोडेक्शन हेड आरवी सिंह ने भी कोर्ट में जाने की धमकी प्रबंधन को दी है.

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यशवंत की गिरफ्तारी का औचित्य सिद्ध करने में जुट गए थे कुछ अखबार

: यशवंत अपने को अकेला न समझें : भड़ास4मीडिया से मेरा परिचय लगभग दो साल पहले हुआ था  मैं कभी यशवंत से नही मिला हूं मगर आज ऐसा लग रहा है कि यश वंत से काफी पुरानी मुलाकात है क्यांकि भड़ास के माध्यम से उन से रोजाना मुलाकात जो होती रही है। भड़ास से पहली मुलाकात के बाद से ही यह आदत बन गई है कि भले ही एक बार अखबार न देख पाउं मगर भड़ास रोजाना देखने की आदत बन गई है। केवल देखना ही नही बल्कि कुछ खबरों का पढना भी जरूरी हो गया है। कभी मन में आता है तो कमेंट भी लिख देता हूं। आज यशवंत जेल में हैं मैं उन के इस संकट में बराबर का साझीदार हूं। उनकी तथा उनके परिवार और चाहने वालों की पीड़ा को मैं भली भांति समझ सकता हूं क्योंकि 2008 में मैं भी पुलिस और कुछ नेताओं के षडयंत्र और मनमानी का शिकार होकर एक महीना जेल में बिता चुका हूं जबकि मेरे खिलाफ कोई एफ. आई. आर. भी नहीं थी। इसलिए मैं भली भांति जानता हूं कि जेल का जीवन कितना कष्टदायी होता है। आज यशवंत पर जो बीत रही है, उसे मैं अच्छी तरह से महसूस कर रहा हूं।

पहली बार भड़ास देख कर यह लगा था कि मीडिया में खबरों की एक नई शुरुआत हो गई है। पत्रकार दूसरों के शोषण एवं उत्पीड़न के मामले जोरशोर से उठाते रहते हैं मगर अपने शोषण एवं उत्पीड़न के बारे में एक शब्द नहीं लिख पाते। मामला अखबारों में बंपर छंटनी का हो, वेज बोर्ड लागू न होने का हो या पत्रकारों के अन्य किसी प्रकार के उत्पीड़न का, इस बारे में मीडिया प्रिंट हो या इलेक्टानिक, मौन ही रहता है। भड़ास से पहले ऐसा कोई मंच ही नहीं था जो पत्रकारों की आवाज उठा सके। भड़ास ने पत्रकारों को वह मंच दिया और जहां भी उनके साथ अन्याय होता दिखा यशवंत वहां पत्रकारों के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े दिखे। बड़े अखबारी संस्थानों से पंगा लेना बडे़ दिल गुर्दे का काम है जिसे यशवंत ने बखूबी अंजाम दिया।

यही नहीं, यशवंत ने कई उन कथित सेलीब्रिटी पत्रकारों का भी असली चेहरा सब को दिखाया जिन के काले कारनामों के बारे में जानते तो सब थे मगर कहने का साहस कोई नही जुटा पाता था। इस प्रकार यशवंत ने वह किया जो अब तक नही हो पाया था। यही कारण रहा कि भड़ास से न केवल पत्रकार जुड़े बल्कि अन्य पाठक भी निरंतर जुड़ते गए और यह सिलसिला जारी है। पचास साल से अधिक के पत्रकारीय जीवन में मेरे पास भी ऐसी काफी सामग्री थी जिसे अखबार नहीं छाप सकते थे। डरते डरते पत्रकारों, अखबारों और सम्पादकों के बारे में वह सामग्री भड़ास को भेजी और यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि भड़ास ने वह सब अविलंब प्रकाशित कर दिया।

भड़ास ने न केवल अखबारों और पत्रकारों के मामले बल्कि पत्रकारिता से गायब हो रहे सामाजिक सरोकारों को भी अपना विषय बनाया। निर्मल बाबा के फ्राड का पर्दाफाश जिस प्रकार भड़ास ने किया उतना साहस अन्य नहीं जुटा सके। सच तो यह है कि भड़ास पर निर्मल बाबा का फ्राड उजागर होने के बाद ही अन्य अखबारों एवं चैनल्स का ध्यान इधर गया और निर्मल बाबा का किला ध्वस्त होने लगा। नीरा राडिया मामला हो या अमर सिंह के टेप का मामला, बाजी भड़ास के हाथ ही रही ।

अब जिस प्रकार यशवंत को गिरफ्तार किया गया है उसमें भी यह साफ नजर आ रहा है कि यह सारी साजिश उच्च स्तर पर रची गई है तभी तो पुलिस ने पूरे लाव लश्कर के साथ यशवंत को ऐसे गिरफ्तार किया मानो वह कोई बड़ा अपराधी हो। यही नहीं एक ही दम्पति द्वारा दो अलग अलग थानों में मुकदमे दर्ज कराने का मकसद यही लगता है कि यशवंत को लम्बे समय तक जेल में रखा जाए। एक थाने के केस में जमानत मिलते ही दूसरे थाने की पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंच जाएगी और फिर जमानत के लिए वही प्रक्रिया दोहराई जाएगी। शातिर लोग अपने विरोधियों से निपटने के लिए ऐसे ही तरीके अपनाया करते हैं। स्थानीय पुलिस पर दबाव के चलते ही उन पर संगीन धाराएं लगाई गई हैं ताकि जमानत आसानी से न मिल सके मगर अदालतें पुलिस की इस मंशा को भांप ही लेती हैं। जहां तक रंगदारी मांगने का मामला है तो यह मामला रंगदारी का न हो कर उधार मांगने का है इस आशय की एक पोस्ट मीडिया खबर पर मौजूद थी मगर जब देखा कि यह खबर तो सारे प्रकरण को मटियामेट कर देगी तो एक सोची समझी योजना के चलते यह पोस्ट ही डिलीट कर दी गई।

आज यशवंत नामक शेर को पिंजड़े में बंद कर रखा है और मानवाधिकारों के झंडाबरदार अखबार और खबरिया चैनल मौन हैं। यही नहीं, एकाध अखबार तो अपनी पुरानी खुन्नस निकालने के लिए यशवंत की गिरफ्तारी का औचित्य भी सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं, लानत है इन पर। जहां तक अखबारों में काम करने वाले उन पत्रकारों की बात है जिनकी आवाज यशवंत उठाते रहे हैं, उनकी मजबूरी यह है कि अपने संस्थान की नीतियों के चलते वह इस बारे में कुछ नहीं लिख पा रहे हैं मगर कई पत्रकारों से बात करने पर पता चला कि यशवंत की गिरफ्तारी को लेकर वह अंदर ही अंदर कसमसा रहे हैं। फेसबुक पर अनेक लोग इस गिरफ्तारी का जम कर विरोध कर रहे हैं। पत्रकार संगठन तो इस बारे में प्रायः मौन हैं मगर स्थानीय स्तर पर पत्रकार और अन्य प्रबुद्ध जन इस बारे में सामने आने लगे हैं। अब यह लड़ाई धीरे धीरे सड़कों पर आ रही है इसलिए यशवंत भाई अपने को अकेला न समझें।

डा. महर उद्दीन खां

वरिष्ठ पत्रकार

गौमतबुद्ध नगर

maheruddin.khan@gmail.com


(वरिष्ठ पत्रकार डा. महर उद्दीन खां ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास सात जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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उस अखबार के आठ संपादकों को कुल 125 साल की काला पानी सजा हुई

देहरादून : सनसनीपूर्ण ख़बरों को ही समाचार मानने की समाज में पनप रही परंपरा उचित नहीं है। समाचार में सिर्फ रोचकता के लिए सनसनी का होना समाज और पत्रकारिता दोनों के लिए खतरनाक है। सनसनी से बचते हुए राष्ट्र हित वाले समाचारों को प्रमुखता मिलने से समाज में उत्कृष्टता को बढ़ाया जा सकता है। यह कहना है आरएसएस के उत्तरांचल प्रांतकार्यवाह और वरिष्ठ समाजसेवी लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल का।

श्री जायसवाल  रविवार को डाकपत्थर के वीर शहीद केशरीचंद राजकीय महाविद्यालय में साप्ताहिक समाचार पत्र गढ़वैराट द्वारा आयोजित एक दिवसीय पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला के समापन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। उन्होंने स्वतंत्रता काल में इलाहाबाद से निकलने वाले एक समाचार पत्र का जिक्र करते हुए कहा कि उस समाचार पत्र में संपादकीय लिखने वाले संपादक को 10 वर्ष की काला पानी की सजा होती थी। उसमें आठ संपादक हुए जिनको कुल मिलाकर 125 साल की काला पानी सजा हुई। इसमें देहरादून के नन्दगोपाल चोपड़ा का नाम भी शामिल है जिनको अपने पत्रकारीय कार्य के लिए 30 वर्ष की काला पानी की सजा हुई थी। इस तरह आजादी के उस पवित्र यज्ञ में देहरादून की आहुति भी शामिल है जो पूरे उत्तराखंड के गर्व का विषय है।

कार्यक्रम में साहित्यकार रतन सिंह जौनसारी, वरिष्ठ पत्रकार नेमिचंद जैन वरिष्ठ पत्रकार चंदननाम राजगुरू, पत्रकारिता के शिक्षक डा. मनोज श्रीवास्तव, श्रीचंद शर्मा, रणवीर सिंह तोमर, केशर सिंह चौहान, हिन्दुस्थान समाचार के ब्यूरोचीफ धीरेन्द्र प्रताप सिंह आदि लोगों ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन गढ़वैराट साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक भारत चौहान ने किया। कार्यक्रम में क्षेत्र के 15 से अधिक कालेजों के लगभग 90 छात्रों ने सहभागिता की। अन्त में मुख्य अतिथि द्वारा प्रतिभागी छात्रों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में क्षेत्र के प्रबुद्धजन भी उपस्थित रहे।

देहरादून से धीरेन्द्र प्रताप सिंह की रिपोर्ट.

‘सोनिया के खर्च वाली खबर से ‘हिन्दुस्थान समाचार’ का कोई लेना-देना नहीं’

नई दिल्ली । कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेश प्रवास से संबंधित खर्चों पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान में दिये गये स्रोत से ‘हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी’ का कोई लेना-देना नहीं है। यह खबर न ही हिन्दुस्थान समाचार ने जारी की है और न ही इस खबर का स्रोत यह एजेंसी है। यह बातें हिन्दुस्थान समाचार के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अनिरुद्ध शर्मा ने कही है। विदित हो कि भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी ने एक समाचार पत्र का हवाला देते हुए एक जनसभा के दौरान सोनिया पर तीखी टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी में नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि सोनिया गांधी ने अपने विदेश प्रवास के दौरान सरकारी खजाने से 1880 करोड़ रुपए खर्च किये हैं।

मोदी ने अपने भाषण के दौरान गुजराती समाचार पत्र जय हिन्द की प्रति भी दिखाई थी जिसमें यह खबर पिछले 12 जुलाई को छापी गयी थी। इस बीच मोदी के बयान पर मीडिया में मचे बवाल के बाद इस समाचार का स्रोत ‘हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी’ बताया गया, जिसका हिन्दुस्थान समाचार के कार्यकारी अधिकारी अनिरुद्ध शर्मा ने खंडन किया है। वहीं मोदी के इस बयान में एक नया मोड़ उस समय आ गया जब आरटीआई कार्यकर्ता रमेश वर्मा ने खुद कहा है कि मेरे पास 1880 करोड़ रुपए खर्च की कोई रिपोर्ट नहीं है। हालांकि मोदी ने यह भी कहा कि अगर उनकी बातें गलत साबित हुई तो वह सोनिया से माफी मांग लेंगे।

अनिरुद्ध शर्मा ने कहा कि हिन्दुस्थान समाचार देश की सबसे बड़ी बहुभाषी संवाद समिति है। यह बिना साक्ष्यों के कोई खबर जारी नहीं करती। उन्होंने कहा कि यह समाचार गुजरात के राजकोट में हिन्दुस्थान समाचार से मिलते-जुलते नाम से चल रहे किसी समाचार पोर्टल से जारी किया गया है। इतना ही नही इस संदर्भ में दैनिक गुजराती समाचार पत्र जय हिन्द के मालिक यशवंत भाई शाह ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि यह समाचार हिन्दुस्थान समाचार ने नहीं लिया गया है। यशवंत भाई ने बताया कि यह समाचार 2 से 3 महीने पहले का है। उन्होंने इसे भूपत भाई पारेख की न्यूज़ एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार से लिया था। हम उनकी एजेंसी की सेवाएं काफी लंबे अरसे से ले रहे हैं। हालांकि खबर के साथ एजेंसी का नाम नहीं देने की बात पर उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

बनवारी लाल पुरोहित के हाथों ‘नागपुर टुडे डाट इन’ लांच

The nation yesterday celebrated the birth anniversary of Mahatma Gandhi. On this day in 2012, Nagpur Today, Nagpur’s first and only E-newspaper and information website was launched at 11:00 am in Tilak Patrakar Bhavan, Nagpur. Nagpur Today is an E-NEWSPAPER based out of Nagpur. It contains sections viz NEWS TODAY, ENTERTAINMENT, BUSINESS, SPORTS, PAGE 3, EDITOR, NAGPUR CRIME, HEALTH, EDUCATION, FOOD, FINANCE, LIFESTYLE etc.

Nagpur Today is the city’s first e-newspaper. It runs under the aegis of Nishank Web Solutions Pvt. Ltd. The name and business strength that has been earned by the Parent Organization today, is due to the professionally equipped and able staff, who have a varied experience of the Web market and good knowledge of serving the customers to their satisfaction. This is further enhanced by the innovative ideas of the management, who strive from time to time in creating awareness and providing a platform to the voice of Nagpurians, keepings all commercial benefits aside.

The website was launched by Hon. Shri Banwarilal Purohit, ex-MP and Managing Editor – The Hitvada. Mr. Girish Gandhi, Trustee Vanrai and Mr. Dipen Agarwal, President NVCC were the chief Guests. Mr. Pradip Maitra, President – Patrakar Bhavan Trust and Mr. Shirish Borkar, President NUWJ were prominently present on the occasion. Nagpur Today can be accessed at www.nagpurtoday.in. News on Nagpur Today will be updated as it happens in the city. Nagpur Today will bring to you detailed reports and exclusive photographs.

Press Release

रूचिर गर्ग बने नई दुनिया, छत्तीसगढ़ के स्थानीय संपादक

रूचिर गर्ग ने सहारा समय छत्तीसगढ़ न्यूज चैनल के प्रमुख का पद छोड़ कर नई दुनिया, छत्तीसगढ़ के स्थानीय संपादक के रूप में पारी की शुरुआत की है. रूचिर गर्ग को छत्तीसगढ़ में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में पत्रकारिता का ढाई दशक से अधिक का अनुभव है. कार्यभार ग्रहण के मौके पर नई दुनिया के प्रधान संपादक श्रवण गर्ग खासतौर पर उपस्थित थे.

रूचिर गर्ग की ज्वायनिंग की खबर नई दुनिया के छत्तीसगढ़ संस्करण में सिंगल कालम में पहले पन्ने पर प्रकाशित हुई है.

भड़ास पर खबर प्रकाशित करने के लिए सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर भेजें.

तीन तस्वीरों से खुली सीबीआई की पोल : आईबीएन7 और शलभ मणि को बधाई

आईबीएन7 पर पिछले कुछ दिनों से एक बड़ी खबर प्रसारित हो रही है. इस खबर के जरिए फिर साबित हो गया है कि सीबीआई बड़े आकाओं के इशारे पर काम करती है और उनके निर्देश के अनुसार ही अपनी रिपोर्ट तैयार करती है. आईबीएन पर प्रसारित रिपोर्ट को इसके लखनऊ ब्यूरो चीफ शलभ मणि त्रिपाठी ने तैयार किया. सचान की मौत के बाद आईबीएन7 की टीम ने मौके पर जाकर कई तस्वीरें ली थी. उन्हीं तस्वीरों के जरिए आईबीएन टीम ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट कर सवाल खड़ा कर दिया है.

लखनऊ जेल में हुई डा वाईएस सचान की मौत पर सीबीआई ने भले ही क्लोजर रिपोर्ट लगी दी हो पर आईबीएन7 का कहना है कि सीबीआई की जांच सवालों के घेरे में है. सचान की मौत के बाद पहली बार सामने आई कुछ तस्वीरों से साफ है कि सीबीआई की दलीलों और मेडिकल साइंस के तर्कों में जमीन आसमान का फर्क है. तभी तो मेडिकल साइंस के एक्सपर्ट और सचान के परिवार वाले ये मानने को तैयार नहीं कि डा सचान ने खुदकुशी की.  वहीं सीबीआई इस दावे पर कायम है कि सचान ने खुदकुशी ही की.
 
नीचे वो तस्वीरें हैं जिन्हें आईबीएन की टीम ने मौके से जाकर क्लिक किया. ये वो तस्वीरें हैं जो जेल के टायलेट में सचान की लाश मिलने के तुरंत बाद खीची गयीं.  आईबीएन7 के हाथ लगी इन तस्वीरों में सचान की मौत से जुड़े कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब सीबीआई के पास भी नहीं. ये तीन तस्वीरें खड़ी कर रही हैं सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर सवाल.

पहली तस्वीर में सचान की लाश जमीन पर पड़ी नजर आ रही है, गले में बेल्ट कसी हुई है लेकिन सचान का मुंह पूरी तरह बंद है. आमतौर पर जैसा की सीबीआई दावा कर रही है कि सचान ने फांसी लगा कर जान दी, तब उनकी जुबान बाहर आ जानी चाहिए थी. पर ऐसा नहीं हुआ. इस तस्वीर में सचान कमीज और अंडरवियर पहने हुए नजर आ रहे हैं. ये समझना बेहद मुश्किल हैं कि कमीज और अंडरवियर पहने-पहने एक हाफ ब्लेड से कोई खुद को नौ नौ चोटें कैसे पहुंचा सकता है. वो भी तब जबकि कमीज और अंडरवियर पर कटे का कोई निशान तक नहीं दिख रहा. इन अनसुलझे सवालों के चलते ही सचान का परिवार आज भी ये मानने को तैयार नहीं कि ये खुदकुशी का मामला है.

दूसरी तस्वीर में सचान के गले में कसी हुई बेल्ट साफ नजर आ रही है. बेल्ट की लंबाई और उसकी हालत देखकर ये यकीन करना नामुमकिन है कि कोई शख्स कमोड सीट पर बैठकर अपने गले में बेल्ट का फंदा लगाएगा और फिर उसका सिरा बिल्कुल पीछे लगी खिड़की में बांधकर लटक जाएगा.

तीसरी तस्वीर में पूरे टायलेट में खून पसरा हुआ नजर आ रहा है. पर ना तो इस फर्श पर सचान के पांवों के निशान दिख रहे हैं ना ही सचान के पावों में खून. सचान के गले पर लगी नौवीं और सबसे गहरी चोट का सीबीआई के पास कोई माकूल जवाब नहीं. ये चोट सचान की मौत के बाद पहुंची है. सीबीआई का तर्क है कि ये चोट लाश के रगड़ खाने से आई है पर ये चोट ही सीबीआई की रिपोर्ट पर सबसे ज्यादा सवाल खड़े कर रही है.  
 
वाईके सचान के भाई आरके सचान का साफ साफ कहना है कि ये खुदकुशी नहीं है, हत्या की गयी है. एनआरएचएम केस के याचिकाकर्ता प्रिंस लेनिन का कहना है कि पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराए जाने की जरूरत है.  सीबीआई ने सचान की मौत के लिए जवाबदेह आईएएस और आईपीएस अफसरों पर नरमी दिखाई है. अब सीबीआई खुद कटघरे में है. शक की गुंजाइश तब और भी बढ जाती है जबकि एनआरएचएम घोटाले की जांच भी सीबीआई कर रही है और ऐसे में सचान इस मामले के एक बेहद अहम सबूत साबित हो सकते थे.  

डा. सचान की मौत के मामले में न्यायिक जांच की रिपोर्ट में कहा गया है कि सचान का कत्ल किया गया है लेकिन सीबीआई रिपोर्ट में कहा गया है कि सचान ने खुदकुशी की. सचान की मौत जेल के बाथरूम में हुई थी. पहले इस घटना की न्यायिक जांच हुई जिसमें पाया गया कि सचान का कत्ल हुआ. लेकिन सीबीआई इसे मानने को तैयार नहीं. सीजेएम रिपोर्ट कहती है कि कोई व्यक्ति कमोड पर बैठकर अपने हाथ गर्दन और जांघ में चोट नहीं पहुंचा सकता जबकि सीबीआई ने एम्स के डाक्टरों की राय के आधार पर दावा किया कि डा सचान ने पहले घाव किए और खून धीरे बह रहा था. उन्हें लगा कि वो जल्द दम नहीं तोड़ेंगे जिस पर वो कमोड पर बैठ गए. उन्होंने बेल्ट से फंदा लगा लिया. सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक कोई व्यक्ति खुदकुशी के लिये दो तरीके क्यों अख्तियार करेगा. सीबीआई के मुताबिक डा सचान ने पहले तो खुद को काटा लेकिन बाद में उन्होंने फांसी का फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली. सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक अगर दो तरीके होते तो कोई फांसी लगाना ही क्यों नहीं चुनेगा ….. सीबीआई के मुताबिक सचान की मानसिक स्थिति ऐसी ही थी कि वो दर्द के चलते अपने शरीर की महत्वपूर्ण नसें नहीं काट पाए और उन्हे लगा कि वो घावों के चलते जल्दी नहीं मरेंगे, लिहाजा तकलीफ के चलते उन्होंने फांसा लगा ली.
 
सीजेएम की रिपोर्ट के मुताबिक बाथरूम की दीवार पर खून के धब्बे जमीन से साढे तीन फीट ऊपर कैसे मिले.. सीबीआई का मानना है कि सचान बाथरूम में खड़े थे और बार बार पानी की बोतल से पानी पी रहे थे इसलिए दीवार पर खून के धब्बे मिले.. सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक अगर सचान ने कमोड पर बैठकर घाव बनाए तो वाश बेसिन में खून के धब्बे कैसे मिले … सीबीआई ने कहा कि सचान ने खडे होकर चोट पहुंचाई… सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक खून से सना ब्लेड मिलना संदिग्ध था, सीबीआई का दावा कि ब्लेड पर लगा खून डा सचान के डीएनए से मिलता जुलता था … ब्ले़ड पर लगा खून सूख चुका था …. सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक अगर ब्लेड का इस्तेमाल सचान ने खुद को चोट पहुंचाने के लिए किया तो ब्लेंट के दोनों तरफ खून होना चाहिए था .. सीबीआई के मुताबिक ब्लेड खासा चिकना था लिहाजा खून निचली तरफ नहीं लग सका… सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक घाव एक सेमी से ज्यादा गहरे थे इससे साफ है कि किसी धारदार हथियार से घाव किए गए, ब्लेड से नहीं…. सीबीआई ने पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के पैनल पर ही सवाल खड़े कर दिए। सीबीआई के मुताबिक घाव ज्यादा गहरे नहीं थे और डाक्टरों ने इसकी गहराई से पड़ताल नहीं की ……
 
सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टर मौसमी सिंह ने कहा कि घाव ब्लेड से नहीं किए जा सकते, इसके लिये धारदार हथियार का इस्तेमार हुआ.  सीबीआई के मुताबिक एम्स के डाक्टरों ने पाया कि चोट सतही थी. सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक डाक्टर सचान अवसाद से ग्रसित नहीं थे, फिर वो ऐसा क्यों करेंगे. सीबीआई का दावा है कि सचान परेशान थे और उन्होंने खाना भी नहीं खाया था. सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक डा सचान सीधे हाथ से काम करते थे. फिर उन्होंने खुद ही सीधे हाथ पर चोट कैसे पहुंचाई, सीबीआई ने एम्स के डाक्टरों की राय से दावा किया कि सचान ने सारी चोटें खुद पहुंचाईं. सीजेएम रिपोर्ट के मुताबिक सचान के गले में फंदा किसी और लगाया. सीबीआई ने दावा किया कि बेल्ट पर डा सचान के दो बाल पाए गए जो साबित करता है कि बेल्ट से फंदा उन्होंने खुद लगाया. सीबीआई के दावे के उलट यूपी के मेडिको लीगर विभाग के एक्सपर्ट पहले ही पुख्ता तौर पर ये कह चुके हैं कि सचान की मौत हत्या है.

छेड़छाड़ में गिरफ्तार आईएएस शशिभूषण लाल को अखिलेश ने किया सस्पेंड

लखनऊ : चलती ट्रेन में एक युवती के साथ छेड़खानी के आरोप में लखनऊ में सोमवार को गिरफ्तार भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के एक वरिष्ठ अधिकारी को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने निलंबित कर दिया है. उत्तर प्रदेश में विशेष सचिव (तकनीकी शिक्षा) के पद पर तैनात आईएएस शशिभूषण लाल के खिलाफ राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी), लखनऊ ने छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

लाल पर आरोप है कि उन्होंने दिल्ली से लखनऊ के सफर के दौरान देर रात लखनऊ मेल ट्रेन की वातानुकूलित बोगी में युवती के साथ छेड़छाड़ की. ट्रेन के सोमवार सुबह लखनऊ स्टेशन पर पहुंचने के बाद युवती ने तत्काल जीआरपी थाने में जाकर इसकी शिकायत की जिसके बाद लाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया. जीआरपी ने युवती को मीडिया से बात नहीं करने दी. पुलिसकर्मियों के घेरे में उसे गाड़ी में बिठाकर उसके घर भेज दिया गया.

जीआरपी युवती के बारे में कोई जानकारी देने से साफ इन्कार कर रही है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने न सिर्फ आरोपी आईएएस अधिकारी को निलंबित कर दिया बल्कि लखनऊ जीआरपी के प्रभारी अनिल राय को भी हटाने के आदेश दिए. राय पर आरोप है कि उन्होंने पीड़ित युवती पर मामले को आपस में सुलझाने का दबाव बनाया और बाद में बात न बनने पर केवल हल्की धाराओं (छेड़छाड़ और बदसलूकी) में मुकदमा दर्ज किया. मामले में जीआरपी के रवैये पर मुख्यमंत्री द्वारा नाराजगी जताए जाने के बाद अब आरोपी आईएएस के खिलाफ बलात्कार की कोशिश का भी मुकदमा दर्ज किया गया है.

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दैनिक सवेरा अखबार में छपी खबर- ”विजय चोपड़ा पर श्री दुर्ग्याणा कमेटी, अमृतसर ठोकेगी मुकद्दमा”

: पंजाब केसरी को तीसरे झटके की तैयारी : पंजाब के हिन्दू धार्मिक संगठन जिनके प्रति हिंद समाचार ग्रुप यानि पंजाब केसरी अपनी पूरी सुहानुभूति आज तक दिखाता रहा है और प्रदेश में हिंदुत्व की रक्षा का दावा भी गाहे बगाहे करता रहा है, उस पर अमृतसर के मंदिर श्री दुर्ग्याणा के प्रबंधक मुकदमा ठोकने की तैयारी में हैं. इस बात का खुलासा दैनिक सवेरा अख़बार ने एक समाचार के माध्यम से किया है.

इसमें पंजाब केसरी के मालिक पर झूठी व तथ्यविहीन खबरें प्रकाशित करने का आरोप लगाया गया है. इससे पहले भी दो अदालतों के फैसले जो कि पंजाब केसरी के खिलाफ थे, दैनिक सवेरा ने प्रमुखता से प्रकाशित किये थे. वैसे क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि सवेरा के मालिक शीतल विज व पंजाब केसरी के मालिक विजय चोपड़ा के बीच चल रही दुश्मनी के कारण सवेरा इन खबरों को तूल दे रहा है और दूसरी तरफ एक बहुत बड़ा समुदाय जो पंजाब केसरी की मोनोपोली से आहत है और शीतल ग्रुप के साथ है, वह शीतल को बधाई दे रहा है.


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दैनिक भास्कर ने जम्मू संस्करण बंद कर दिया

दैनिक भास्कर ने अपने जम्मू संस्करण को बंद कर दिया है। पहली अक्तूबर से जम्मू कश्मीर के बाजारों से यह नदारद है। हाकरों से मिली जानकारी के मुताबिक, उन्हें इसकी जानकारी सिर्फ एक दिन पहले ही दी गई थी। वे कहते हैं कि जिन पाठकों ने सालभर का सबस्क्रिप्शन लिया हुआ है, वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। करीब तीन माह पहले जम्मू संस्करण की प्रिंटिंग को जम्मू से स्टाप कर कर दिया गया था। फिलहाल पंजाब के कपूरथला से यह छप कर आ रहा था।

जम्मू संस्करण के अधिकतर स्टाफ को पहले ही निकाल बाहर किया गया है और बचे हुए स्टाफ का क्या होगा, अभी उनका भविष्य अधर में नजर आ रहा है क्योंकि उन्हें भी जम्मू संस्करण बंद करने की जानकारी कल सुबह ही उस समय मिल पाई थी जब बाजार में अखबार बिकने को नहीं आया। रोचक बात भस्कर के जम्मू संस्करण की यह कही जा सकती है कि जबसे यह आरंभ हुआ था महीने में दो-चार बार यह बाजार से अक्सर गायब रहा करता था। इतना जरूर है कि भास्कर की साइट पर जम्मू संस्करण अभी नजर आ रहा है पर उसके भीतर जम्मू कश्मीर के पेजों के स्थान पर पंजाब के पृष्ठ भरे गए हैं।
 

देशबंधु का ग्रेटर नोएडा में कार्यालय खुला, कमान भूमेश शर्मा को

ग्रेटर नोएडा। नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक  देशबंधु ने अपने विस्तारीकरण की श्रृंखला में गे्रटर नोएडा में ब्यूरो कार्यालय खोल दिया है। इस कार्यालय की कमान वरिष्ठ पत्रकार भूमेश शर्मा को सौपी गयी है। श्री शर्मा दैनिक प्रभात तथा आंखो देखी जैसे संस्थानो में कार्य कर चुके है। श्री शर्मा के अलावा देवेंद्र शर्मा को सवांददाता के रूप में नियुक्त किया गया है। नीलकंठ अपार्टमेंट में देशबंधु का कार्यालय खोला गया है। यह कार्यालय देशबंधु के गाजियाबाद स्थित प्रादेशिक कार्यालय के नियंत्रण में रहेगा।

इस कार्यालय में पहले से ही प्रादेशिक सम्पादक के रूप में वरिष्ठ पत्रकार अशोक निर्वाण तैनात है। राष्ट्रीय हिंदी दैनिक देशबंधु नई दिल्ली के अलावा रायपुर, बिलासपुर, भोपाल, जबलपुर, तथा सतना से भी प्रकाशित होता है। उधर देशबंधु हापुड़ से खबर है कि हापुड ब्यूरो कार्यालय में जिले वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गोयल को संवाददाता के रूप में जोड़ा गया है। इस कार्यालय में प्रदीप शर्मा पहले से ही ब्यरो प्रमुख के रूप में तैनात है। सोनू को कैमरामैन के रूप में जोड़ा गया है।

कोटा में नौ फोटो जर्नलिस्ट की फोटो प्रदर्शनी ‘इमेजिन’ की धूम

फोटो पत्रकारों के जज्बे और उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती फोटो प्रदर्शनी 'इमेजिन' की शुरुआत पिछले दिनों कोटा के जवाहर कला केन्द्र में हुई। राज्यपाल मार्गेट अल्वा ने इसका उदघाटन किया। जोधपुर, उदयपुर, कोटा और जयपुर के 9 फोटो जर्नलिस्ट द्वारा समय-समय पर विभिन्न घटनाक्रमों और रोचक दृश्यों को दर्शाने वाली यह प्रदर्शनी आमतौर पर लगने वाली प्रदर्शनियों से काफी हटकर है। यहां हर फोटोग्राफर के खींचे गए दो फोटो हैं। इनमें फोटो पत्रकारिता का हर आयाम समाया है।

यहां प्रदर्शित चित्रों में हार्ड कोर जर्नलिज्म की झलक भी है, साथ ही डेली लाइफ और वन्य जीवन की फोटोज भी इनकी काबिलियत को दर्शा रही हैं। सभी 18 फोटोज ट्राई पोर्ट पर डिसप्ले हैं। लोगों को सेलिब्रिटी बनाने वाले फोटोग्राफर खुद भी इनमें हैं। गिनती की फोटोज होने के बाद भी यहां प्रदर्शित चित्रों में फोटो पत्रकारिता के सभी आयाम दिखाई दे रहे हैं। चाहे वो विषम स्थितियों में खींची गई फोटो हो, जैसे युद्ध का मैदान या फिर उग्र प्रदर्शन के दौरान बिगड़े हालात, वन्य जीव और आम आदमी की खास फोटो भी इसके देखने योग्य पक्ष हैं।

फोटो प्रदर्शनी 'इमेजिन' में कोटा के फोटो जर्नलिस्ट सलीम शेरी के फोटो का अवलोकन करती राज्यपाल मार्गेट अल्वा. राज्यपाल ने सलीम शेरी के गुजर्र आन्दोलन कोटा की चम्बल पुल की फोटो की सराना की.

पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी की जयंती के बहाने : दामाद की तरह बुलाए जाने की प्रतीक्षा में मीडिया वाले

एक हिंदी सेवी की याद में कल की मेरी शाम जैसी बीती, वैसी कभी नहीं बीती। लखनऊ के खुर्शेदबाग में कल भैय्या जी यानी पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी को उन्हीं के नाम से बने प्रेक्षागृह में याद किया गया। हिंदी की अस्मिता का जो गान उन्होंने गाया है, उस को याद किया गया। उनकी ११९वीं जयंती पर। हिंदी वांग्मय निधि द्वारा आयोजित भक्ति संगीत से। कोई दिखावा नहीं, कोई औपचारिकता भी नहीं। मतलब प्रचार आदि के टोटकों से कोसों दूर। पर हाल और बाहर लान भी खचाखच भरा था। पर कोई एक प्रेस फ़ोटोग्राफ़र या संवाददाता भी नहीं। किसी अखबार में कोई खबर भी नहीं थी। न कल, न आज। किसी चैनल की तो खैर बात ही क्या। ज़्यादातर लखनऊ के लेखकों में भी लोग लापता थे। पंडित श्रीनारयण चतुर्वेदी खुद भी तमाशा अदि से हमेशा दूर रहने वालों में थे। शायद उन्हीं की इच्छा का मन रखने के लिए उनके परिवारीजन प्रेस आदि के तमाशे आदि से इस कार्यक्रम को दूर रखते हैं।

शैल चतुर्वेदी जी से बात चली तो वह कहने लगे कि हमने तो प्रेस विज्ञप्ति भी कहीं नहीं भेजी। तो भी जिस हिंदी के लिए भैय्या जी ने क्या-क्या नहीं किया उनकी याद में कम से कम हिंदी के अखबार वाले अपने मन ही से सही एक छोटी सी खबर भी नहीं चिपका सकते थे? वैसे भी आज-कल मीडिया जिस तरह साहित्यिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों की कवरेज करती है, भगवान बचाए। पता चला कि विमोचन या कुछ और ऐसा ही बहुत पहले हो गया था पर कुछ फ़ोटोग्राफ़र तब नहीं आ पाए थे, अब आए हैं तो एक शाट फिर से हो जाए! और हद्द यह कि लोग दे भी देते हैं। गोया कार्यक्रम न हो नौटंकी हो। किसी फ़िल्म की शूटिंग हो। कि एक रिटेक फिर से हो जाए।

इतना ही नहीं आयोजक और वक्ता भी अपने संबोधन में मीडिया के लोगों को संबोधित करना नहीं भूलते। और मीडिया के लोग? एक विज्ञप्ति भर की बाट जोहते रहते हैं कुत्ते की मानिंद। कि मिले तो भाग लें। या फिर आयोजक लोग ब्रीफ़ कर दें तो नोट कर लें। और दूसरे दिन अखबार में कहां और कैसे यह सब छपेगा और यह छपना भी कार्यक्रम को कितना सम्मानित करेगा, कितना अपमानित, यह भी कोई नहीं जनता। अजब घालमेल है। मेरा तो मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों में मीडिया और राजनीति के लोगों से अब दूर ही रहना चाहिए। एक बात और। कहा जा सकता है कि जब किसी मीडियाजन को बुलाया ही नहीं गया तो कोई कैसे आता भला? क्या यह कोई सरकारी कार्यक्रम था की किसी का शादी विवाह? मैंने देखा है कि कई ऐसी शादियों तक में या तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों या फ़िल्मी कार्यक्रमों में, और भी कई ऐरे-गैरे कार्यक्रम में भी जाने के लिए पत्रकार कैसे तो नाक रगड़ते हैं। बिना बुलाए पहुंचते भी है, दांत चियारते हुए। लेकिन लेखकों आदि के कार्यक्रमों में वह दामाद की तरह बुलाए जाने की प्रतीक्षा करते हैं।

लखनऊ में तो हालत यह है कि भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर के भी परिवारीजन अगर आयोजन न करें और अखबारों में उसे छपवाने का यत्न न करें तो लोग भूल जाएं। यशपाल को लोग भूल ही जाते हैं। इस लिए कि उन के बेटे और बेटी में आपस में पटती नहीं है। और कि शायद अब लोग लखनऊ में रहते भी नहीं नियमित। तो यशपाल पर आयोजन नहीं होते लखनऊ में। यशपाल की जन्म-शती चुप-चाप निकल गई। इसी तरह मजाज लखनऊ की जन्म-शती भी अहिस्ता से गुज़र गई। पर किसी को पता नहीं चला। इसी तरह श्रीनारायण चतुर्वेदी की भी जन्म-शती चुपके से गुज़र गई। पर अखबार वालों और लेखकों की इन की सुधि कभी नहीं आई।

बहरहाल चतुर्वेदी जी की जयंती तो २८ सितंबर को थी पर उन की याद में आयोजन २९ सितंबर को किया गया। अब आज लोग भले भूल गए हों श्रीनारायण चतुर्वेदी और उन की हिंदी की जय को। पर हिंदी के लिए वह बार-बार जूझते रहे। अंगरेजों से भी। पंडित मदनमोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन और श्रीनारायण चतुर्वेदी का हिंदी का लिए योगदान अविस्मरणीय है। बहुत कम लोग अब जानते हैं कि अदालतों मे पहले हिंदी नहीं थी। इस के लिए मदन मोहन मालवीय ने लंबी अदालती लडा़ई लडी़ फिर कहीं जा कर अदालतों में ब्रिटिश पीरियड में ही हिंदी लागू हुई थी। और काम-काज हिंदी में होने लगा। मदन मोहन मालवीय के पौत्र तो बाद में उच्च न्यायल में न्यायमूर्ति बने। उन्हों ने हमेशा हिंदी में ही आदेश लिखवाए। वैसे ही पहले पाठ्यक्रमों में पहले हिंदी अनिवार्य विषय नहीं थी। कक्षा ३ पढाई अंगरेजी माध्यम से होती थी। मैट्रिक में हिंदी एक वैकल्पिक विषय थी। इस के आगे फिर हिंदी पढा़ई भी नहीं जाती थी। तो शिक्षा विभाग में आने पर उन्हों ने पाठ्यक्रम तैयार करवाया और पाठ्यक्रमों में हिंदी को अनिवार्य विषय करवाया। स्कूलों में हिंदी में अंत्याक्षरी और स्कूलों में कवि सम्मेलन भी श्रीनारायण चतुर्वेदी की देन हैं।

यह सब उन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार के निमित्त किया। कहते हैं कि १९३५-३६ में गोरखपुर में उन के द्वारा आयोजित एक कवि सम्मेलन तो ३ दिन तक चला। जिस के हर सत्र में एक रस की ही कविताएं पढी़ गईं। चतुर्वेदी जी इंगलैंड से पढ़ कर आए ज़रुर थे पर भारतेंदु जी के लिखे- ;निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल/ बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिया को शूल।' का मर्म भी जानते थे। माध्यमिक परीक्षाओं में देवनागरी के अंकों का प्रयोग भी शुरु करवाया। एक समय गवर्नर हैलट के सलाहकार रहे शेरिफ़ ने प्रौढ़ शिक्षा के लिए रोमन लिपि अपनाने का आदेश दिया जिसे चतुर्वेदी जी ने मानने से इंकार कर दिया। ऐसे ही जब-जब हिंदी पर कोई आंच आई उन्हों ने बढ़ कर उसे रोक लिया। चाहे वह ब्रिटिश राज रहा हो या, आज का राज। राजनीतिक कारणों से जब उर्दू को हिंदी पर थोपने का काम हुआ तो वह खुल कर पूरी ताकत से खड़े हो गए। विरोध में हिंदी संस्थान का भारत-भारती पुरस्कार तक ठुकरा दिया। वह दूरदर्शन में भी उप-महानिदेशक रहे और वहां भी हिंदी की सेवा में लगे रहे। बरसों-बरस सरस्वती जैसी पत्रिका के संपादक रहे। दरअसल वह कृतित्व के लिए कम और व्यक्तित्व के लिए ज़्यादा जाने गए। उन की छिटपुट रचनाओं खास-कर हिंदी प्रसंग की कुछ कविताओं और लेखों को छोड़ दें तो उन का व्यक्तित्व उन के कृतित्व पर हमेशा भारी रहा है। वह हमेशा हिंदी के प्रचारक ही बने रहे। साहित्य सेवा से ज़्यादा उन्हों ने हिंदी सेवा की और कई बार हदें लांघ कर, हदें तोड़ कर वह जय हिंदी करते रहे। पंडित विद्यानिवास मिश्र कहते थे कि ‘हम उन के हैं’ यह भाव हमें हिंदी के भाव से भरता है। पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी खुद भी कहते थे ‘हम पल्लव हैं। किंतु न हम हीन हैं, न दीन और दयनीय। बिना हमारे वंदनवार असंभव है…।’ तो यह सिर्फ़ वह अपने लिए ही नहीं, हिंदी की अस्मिता के लिए भी कहते थे। पुरुषोत्तम दास टंडन के वह इलाहाबाद में सिर्फ़ पड़ोसी ही नहीं थे। उन के सहयात्री भी थे। जीवन भर वह हिंदी का परचम ही फहराते रहे।

लेकिन भैय्या जी को इतने साल बाद भी खूब मन से याद करने के लिए सो काल्ड मीडिया और तमाम लेखक लोग भले न रहे हों उस शाम पर उन के परिवारीजन और उन के इष्ट-मित्र बहुत थे। लेखकों में प्रसिद्ध इतिहासकार योगेश प्रवीन न सिर्फ़ उपस्थित थे बल्कि दो उम्दा भजन भी उन्हों ने बाकायदा हारमोनियम बजा कर गाईं। एक मीरा की लिखी भजन, ' जागो वंशी वारे ललना, जागो मेरे प्यारे !' और दूसरी अपनी लिखी हुई भजन, 'सागर के मेघों से नीला अंबर भींग रहा है/ मेरे दृग-जल से प्रभु का पीतांबर भींग रहा है/ अश्रुधार से कोई तेरे चरण पखार रहा है/ गोवर्धन छाया है फिर भी गिरिधर भींग रहा है।' योगेश प्रवीन की लिखी और गाई यह भजन है तो श्रीकृष्ण को संबोधित पर यहां यह भजन मानो पंडित श्रीनारायन चतुर्वेदी पर ही साकार हो गई थी। क्यों कि सभी के सभी पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी की ही याद में भींग रहे थे। सब के दृग-जल से पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी का पीतांबर भींग रहा था। अदभुत था यह।

योगेश प्रवीन कोई पेशेवर गायक नहीं हैं पर वह खूब झूम कर गा रहे थे। उनके इस रूप से मैं पहली बार परिचित हो रहा था। यहां जितने भी लोगों ने भजन गाई कोई पेशेवर गायक नहीं था। प्रारंभ अदित्य नाथ चतुर्वेदी ने सरस्वती वंदना से किया संस्कृत में सस्वर। फिर इस का हिंदी रुपांतरण भी प्रस्तुत किया सस्वर। चतुर्वेदी जी के बेटे अशोक चतुर्वेदी जो पूर्व एयर मार्शल हैं। और रिटायर होने के बाद भातखंडे से बाकायदा गायन सीखा है, ने दो भजन सुनाई। उन के दूसरे बेटे डाक्टर आशुतो्ष चतुर्वेदी जो सर्जन हैं, ने समापन भजन गाई। पर प्रशासनिक अधिकारी अनीता श्रीवास्तव और आकाशवाणी की पैक्स रश्मि चौधरी ने भी बहुत सुंदर भजन प्रस्तुत किए। विजय अग्निहोत्री ने पारंपरिक भजन गाए। तो इलियास ने सूर और तुलसी के पद सुनाए।

चतुर्वेदी जी के पोते अरविंद चतुर्वेदी एसटीएफ़ में डिप्टी एस पी हैं। उन्होंने भी अपने बेटे हेमंग चतुर्वेदी के साथ चतुर्वेदी जी की एक कविता का सस्वर पाठ किया। भाषा संस्थान के पूर्व अध्यक्ष गोपाल चतुर्वेदी भी उपस्थित थे। उन्होंने चतुर्वेदी जी के चित्र पर माल्यार्पण किया, बजरंशरण तिवारी को उत्तरीय ओढा़ कर सम्मानित किया। और साहित्य संगम पत्रिका का विमोचन किया। चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व पर शैलेंद्र कपूर ने वक्तव्य पढ़ा। और कहा कि चतुर्वेदी जी द्वारा लिखे गए संपादकीय पर भी एक किताब होनी चाहिए। उन के और काम पर भी बाकायदा शोध होना चाहिए। सब कुछ इतना सरस और इतना अपनत्व भरा था कि मन निहाल हो गया। वैसे तो पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी हिंदी की सांस-सांस में बसे हैं पर कल की शाम ने उस सांस में सुबास भर दिया। एक टटकापन टांक दिया मन पर। यह टटकापन मन में हमेशा बसा रहे और हिंदी की जय होती रहे, हर समय, हर बरस ऐसे ही सब के दृग-जल से पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी का पीतांबर भींगता रहे। बस और क्या चाहिए भला?

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

अमर उजाला के ”तीन करोड़ अक्लमंद और दूरदर्शी पाठक” वाले विज्ञापन पर विवाद शुरू

देश में तीन करोड़ लोग ही अक्‍लमंद और दूरदर्शी हैं… ऐसा मानन है उमर उजाला का. देश में जो लोग अमर उजाला नहीं पढ़ते हैं, वे मूर्ख और अदूरदर्शी होते हैं. यकीन न हो तो अमर उजाला द्वारा जारी ये विज्ञापन देख लीजिए. इसमें बताया गया है कि उसके तीन करोड़ पाठक हैं जो अक्लमंद और दूरदर्शी हैं. नीचे लिखा है कि आईआरएस की रिपोर्ट के मुताबिक अमर उजाला के पाठकों की संख्या तीन करोड़ से अधिक हो गई है. यानि, अमर उजाला सिर्फ अपने पाठकों को ही अक्लमंद और दूरदर्शी मानता है.

चलिए, इस विज्ञापन से अमर उजाला के पाठक तो खुश होंगे लेकिन दूसरे अखबारों के पाठक अमर उजाला से चिढ़ेंगे कि अमर उजाला न पढ़ने के कारण उन्हें अक्लमंद और दूरदर्शी न मानना कहां का न्याय है. वैसे, विज्ञापनों की दुनिया में माना जाता है कि जिस विज्ञापन पर विवाद नहीं हुआ समझो वो विज्ञापन फ्लाप. इस एंगल से देखा जाए तो अमर उजाला का 'अक्लमंद और दूरदर्शी' वाला विज्ञापन काफी अक्लमंदी और दूरदर्शिता से भरा हुआ है. ये रहा अमर उजाला का विज्ञापन….


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केजरीवाल समर्थकों और मीडियाकर्मियों के बीच झड़प

: केजरीवाल की पार्टी का एजेंडा जारी : कुमार विश्वास राजनीति नहीं करेंगे : अन्ना हजारे से अलग होकर राजनीति में प्रवेश करने वाले अरविंद केजरीवाल के समर्थकों और मीडियाकर्मियों के बीच आज सियासी दल के गठन के मुद्दे पर आयोजित कार्यक्रम में मामूली झडप हो गई जिसके बाद कई मीडियकर्मी मौके से वाकआउट कर गए. दरअसल, आज दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में केजरीवाल और उनके साथियों ने राजनीतिक दल बनाने का आधिकारिक तौर पर ऐलान करने के लिए संवाददाता सम्मेलन बुलाया था. मंच के निकट से कुछ फोटोग्राफर तस्वीरें ले रहे थे और उसी वक्त केजरीवाल के कुछ समर्थकों ने उनके साथ बदसलूकी की. इस दौरान केजरीवाल समर्थकों ने नारेबाजी भी की. इस घटना के तत्काल बाद फोटोग्राफ आयोजन स्थल से चले गए. आयोजन स्थल पर करीब 500 केजरीवाल समर्थक मौजूद थे और उन्होंने ‘मैं हूं आम आदमी’ लिखी टोपियां पहन रखी थीं.

इस बीच, अरविंद केजरीवाल ने अपनी नई पार्टी का राजनैतिक एजेंडा जारी कर दिया है. केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और आनंद कुमार के साथ अपनी पार्टी के राजनैतिक एजेंडे को सार्वजनिक किया. नई पार्टी के नाम का ऐलान 26 नवंबर को किया जाएगा. कॉन्‍सटीट्यूशन क्‍लब में आयोजित कार्यक्रम में केजरीवाल और अन्य लोगों ने जो टोपी पहनी, उस पर लिखा था- ''मैं आम आदमी हूं, मुझे चाहिए जनलोकपाल''. इस बीच, अरविंद के अहम सहयोगी रहे कुमार विश्वास ने भी उनके राजनीतिक दल से खुद को अलग कर लिया है. कुमार विश्वास ने स्पष्ट कर दिया कि वे अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी का हिस्सा नहीं रहेंगे.

कुमार विश्वास ने कहा, 'मैं गैर राजनीतिक आदमी हूं, मूल रूप से कवि हूं और हमेशा सत्य बोलता रहा हूं, राजनीति का कोई भरोसा नहीं है इसलिए राजनीति मेरे लिए नहीं है. नया दल बन रहा है और यदि यह कुछ गलत करता है तो इसके खिलाफ भी जंतर-मंतर पर बैठने के लिए कोई बचना चाहिए.'  कपिल सिब्बल के खिलाफ अरविंद केजरीवाल के चुनाव लडने संबंधी अन्ना हजारे के बयान के एक दिन बाद आज कुमार विश्वास ने कहा कि केंद्रीय मंत्री को कोई भी हरा देगा और इसके लिए केजरीवाल की जरुरत नहीं है. कपिल सिब्‍बल के खिलाफ चुनाव लड़ने पर केजरीवाल के समर्थन में प्रचार करने का ऐलान कर चुके अन्‍ना ने पहले ही कह दिया था कि केजरीवाल उनके नाम और फोटो का इस्‍तेमाल नहीं करें. शायद इसीलिए केजरीवाल ने टोपी पर नया नारा लिखवाया है. मंच पर केजरीवाल के अलावा उनके साथी प्रशांत भूषण, शांति भूषण, योगेंद्र यादव, प्रोफेसर आनंद कुमार, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय और कुमार विश्वास मौजूद थे.
 

राजस्थान में पत्रिका फिर शिखर पर, एमपी में पौन दो लाख पाठक जोड़े

मुम्बई। भारतीय पाठक सर्वेक्षण (आईआरएस) की मुम्बई में जारी ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक पत्रिका समूह की कुल पाठक संख्या एक करोड़ 98 लाख 82 हजार हो गई है। अपनी विश्वसनीय खबरों के लिए देशभर में पहचान रखने वाले राजस्थान पत्रिका को इस रिपोर्ट में एक बार फिर राजस्थान का सिरमौर घोषित किया गया है। मध्यप्रदेश में भी पत्रिका ने करीब 1.75 लाख नए पाठक जोड़े हैं।

पत्रिका समूह ने जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा व बीकानेर समेत शहरी क्षेत्रों में 58.82 लाख कुल पाठकों के साथ अपना शीर्ष स्थान बनाए रखा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पत्रिका ने पहले से ही बढ़त ले रखी है। ऑडिट ब्यूरो आफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट (जुलाई-दिसम्बर 2011) के हिसाब से जयपुर शहर में राजस्थान पत्रिका नम्बर 1 अखबार है। प्रदेश के कुल हिन्दी पाठकों में से लगभग 82 प्रतिशत पत्रिका समूह के अखबार पढ़ते हैं।

राजस्थान के अन्य बड़े शहरों जोधपुर, कोटा और बीकानेर में भी पत्रिका की जबर्दस्त बढ़त है। प्रतिस्पर्घी की औसत पाठक संख्या इन तीनों ही प्रमुख शहरों में कम हुई है। जोधपुर संस्करण में तो प्रतिस्पर्घी से पत्रिका 3.56 लाख औसत पाठक संख्या ज्यादा है। इसी तरह उदयपुर संस्करण में पत्रिका के 1.39 लाख औसत पाठक बढ़े हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार पत्रिका का रेडियो स्टेशन 95 एफएम तड़का जयपुर और कोटा शहरों में नम्बर 1 रेडियो स्टेशन घोषित किया गया है।

मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में तेज रफ्तार
करीब साढ़े 4 वर्ष पहले भोपाल से पहला संस्करण शुरू कर मप्र पर छाए पत्रिका ने 2012 की दूसरी तिमाही में प्रदेश में करीब 1.75 लाख नए पाठक जोड़े हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में 5.88 लाख कुल पाठकों के रूप में धमाकेदार उपस्थिति दी है। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में पाठक संख्या के ये आंशिक आंकड़े ही हैं। मध्यप्रदेश- छत्तीसगढ़ में अल्प समय में ही पत्रिका को पाठकों का जो स्नेह मिला है वह पाठकों का पत्रिका की निर्भीक लेखनी पर भरोसा दर्शाता है। वहां पत्रिका ने हर मुद्दे पर जनता की आवाज उठाई तथा पीडितों को राहत दिलाने का काम किया।

पत्रिका के प्रति पाठकों के रूझान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसी तिमाही में वहां दैनिक जागरण के 43 हजार, नई दुनिया के 1.38 लाख, नवभारत के 1.06 लाख, दैनिक भास्कर के 1.30 लाख तथा राज एक्सप्रेस के 1.21 लाख कुल पाठक संख्या में गिरावट आई है। कुल 5 लाख 38 हजार पाठकों ने इन अखबारों से मुंह मोड़ा है। कलम की पैनी धार और सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ पाठकों के विश्वास से पत्रिका ने यह उपलब्घि हासिल की है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (जुलाई-दिसम्बर 2011)) के आंकड़ों के अनुसार पत्रिका समूह देश के दूसरे सबसे बड़े हिन्दी अखबार समूह के रूप में उभर कर आया है।

एकाघिकार ध्वस्त
आईआरएस के इस सर्वे की विशेष बात यह है कि पत्रिका ने मध्यप्रदेश में अभी तक छाए एकाघिकार को जबर्दस्त तरीके से ध्वस्त कर दिया है। राजधानी भोपाल संस्करण में पत्रिका ने 61 हजार औसत नए पाठक जोड़े हैं वहीं निकटतम प्रतिद्वंद्वी के 38 हजार औसत पाठक कम हुए हैं। ठीक इसी तरह इंदौर सस्करण में निकटतम प्रतिद्वंद्वी के 1.58 लाख कुल पाठक कम हुए हैं जबकि पत्रिका की बढ़त 60 हजार कुल पाठक संख्या की है। सर्वे के अनुसार पत्रिका ने प्रतिद्वंद्वी अखबार का एकाघिकार समाप्त कर दिया है। इसके अलावा जबलपुर संस्करण में 73 हजार व ग्वालियर संस्करण में 36 हजार कुल पाठको की वृद्धि की हैं।

उल्लेखनीय है कि ऑडिट ब्यूरो आफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट (जुलाई-दिसम्बर 2011) के अनुसार पत्रिका भोपाल व इन्दौर जैसे प्रमुख शहरों में नम्बर वन है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि कितनी तेजी से मध्यप्रदेश के पाठक पुराने अखबार से नाता तोड़ कर पत्रिका से जुड़ रहे हैं। पाठकों के स्नेह और विश्वास के दम पर अर्जित यह सफलता हम अपने पाठकों को ही समर्पित करते हैं।

राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित खबर


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आईआरएस 2012 की दूसरी तिमाही : ये हैं टाप टेन अखबार, टाप टेन इंग्लिश डेली, टाप टेन हिंदी दैनिक

इंडियन रीडरशिर सर्वे (आईआरएस) २०१२ की दूसरी तिमाही के आंक़डे जारी कर दिए गए हैं. इन्हें जारी किया है मीडिया रिसर्च यूजर काउंसिल ने. टाप टेन के क्रम में कोई बदलाव नहीं आया है. लेकिन टॉप टेन में से सात अखबारों ने अपने पाठक गंवाए हैं. एवरेज इशू रीडरशिप (एआईआर) के पैमाने पर बात करें तो दैनिक भास्कर, मलयाला मनोरमा, अमर उजाला, द टाइम्स आफ इंडिया, डेली थांती, राजस्थान पत्रिका और मातृभूमि को झटका लगा है. सभी अखबारों में दैनिक जागरण 23वीं बार पहले पायदान पर बना हुआ है. जागरण को एआईआर के लिहाज से इस बार फायदा मिला है. 2012 की पहली तिमाही में जहां जागरण के पाठकों की संख्या 16,412,000 थी वहीं इस बार बढ़कर 16,429,000 हो गई है.

दैनिक भास्कर टॉप टेन की लिस्ट में दूसरे पायदान पर बना हुआ है. पहली तिमाही में एवरेज इश्यू रीडरशिप के आधार पर भास्कर के पास 14,553,000 पाठक थे वहीं इस बार घटकर 14,448,000 पाठक हैं. वहीं तीसरे स्थान पर काबिज हिंदुस्तान ने अपने साथ कुछ नए पाठक जोड़े हैं. एवरेज इश्यू रीडरशिप के आधार पर जहां पिछली तिमाही में हिंदुस्तान की पाठक संख्या12,157,000 थी वह दूसरी तिमाही में बढ़कर 12,205,000 हो गई. टॉप टेन में पिछली तिमाही की तुलना में मलयालम मनोरमा, अमर उजाला के पाठकों में मामूली गिरावट हुई है.  अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया की पाठक संख्या में भी कमी है. मराठी दैनिक लोकमत टॉप टेन में है और नए पाठक जोड़े हैं. टॉप टेन में आठवें पायदान पर मौजूद डेली थांथी के पाठकों की संख्या में कमी हुई है. राजस्थान पत्रिका और मातृभूमि के भी पाठक कम हुए हैं. देश के टाप टेन अखबार अखबार कौन हैं और टाप टेन अंग्रेजी अखबार कौन हैं, इनके आंकड़े नीचे दिए जा रहे हैं. इन आंकड़ों के जरिए जाना जा सकता है कि किसने क्या खोया और क्या पाया…..


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मीडियाकर्मियों के लिए राज्यसभा टीवी में ढेर सारी नौकरियां, अप्लाई करें

राज्यसभा टीवी में बड़े पैमाने पर भर्ती हो रही है. इस बाबत एक आदेश जारी किया गया है. जिन पदों पर राज्यसभा टीवी को योग्य लोग चाहिए, वे हैं… सीनियर असिस्टेंट एडिटर, सीनियर प्रोड्यूसर, सीनियर पैनल प्रोड्यूसर, प्रोड्यूसर / करेस्पांडेंट, पैनल प्रोड्यूसर, एसोसिएट प्रोड्यूसर / सीनियर रिपोर्टर, असिस्टेंट प्रोड्यूसर / रिपोर्टर, जूनियर रिपोर्टर, सीनियर रिसर्चर, रिसर्चर, सीनियर एंकर, कनसल्टेंट एंकर, एंकर, जूनियर एंकर, कंसल्टेंट इनपुट, सीनयिर कैमरापरसन, कैमरा परसन, वीडियो एडिटर, सीनियर ग्राफिक आर्टिस्ट, ग्राफिक आर्टिस्ट आनलाइन एंड आफलाइन, गेस्ट कोआर्डिनेटर, फ्रंट आफिस एक्जीक्यूटिव… 

अप्लाई करने की अंतिम तारीख १२ अक्टूबर २०१२ है. २०० रुपये का डिमांड ड्राफ्ट या कैश रजिस्ट्रेशन फीस के रूप में देना होगा. कौन कौन से पद के लिए क्या क्या अनुभव योग्यता चाहिए और अप्लाई करने की अन्य क्या शर्तें हैं, कितनी तनख्वाह है, इस सब के बारे में यहां क्लिक करके देख सकते हैं…

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आईआरएस 2012 की दूसरी तिमाही : अमर उजाला और दैनिक जागरण ने भी अपनी-अपनी पीठ थपथपाई

नई दिल्ली : अपनी श्रेष्ठता का परचम लहराते हुए अमर उजाला की बढ़त का सिलसिला जारी है। अखबार उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में नंबर वन के स्थान पर बरकरार है। आईआरएस 2012 की दूसरी तिमाही के लिए जारी कुल पाठक संख्या (टीआर) आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में अमर उजाला के पाठकों की संख्या देश भर में तीन करोड़ के पार चली गई है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, आगरा, बरेली, कानपुर, गाजियाबाद, नोएडा आदि शहरों में बढ़त के साथ पूरे प्रदेश में अखबार का शानदार प्रदर्शन जारी है।

खास बात यह है कि यूपी में 60 हजार रुपये से एक लाख रुपये मासिक आय वर्ग में (एआईआर) अमर उजाला प्रथम स्थान पर है। अमर उजाला के कॉम्पैक्ट अखबार को पूरे यूपी में बेहद पसंद किया जा रहा है। अपने खास आकार का यह अखबार अमर उजाला कॉम्पैक्ट आईआरएस 2012 की दूसरी तिमाही में अच्छी बढ़त दर्ज कराते हुए 25 लाख से अधिक पाठकों के साथ प्रदेश में नंबर 1 है।

अमर उजाला में प्रकाशित खबर


दैनिक जागरण लगातार 23वीं बार शिखर पर

नई दिल्ली : दैनिक जागरण लगातार 23वीं बार देश के समाचार पत्रों में पाठक संख्या के लिहाज से अव्वल आया है। 2012 की दूसरी तिमाही में जागरण ने 12 लाख नए पाठक जोड़े। इसे मिलाकर दैनिक जागरण की कुल पाठक संख्या 5.63 करोड़ पर पहुंच गई है। इंडियन रीडरशिप सर्वे 2012 के मुताबिक इस तिमाही में दैनिक जागरण के पाठकों की संख्या अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से 1.8 करोड़ ज्यादा रही है।

दैनिक जागरण समाज के उच्च मध्यम वर्ग में भी सबसे ज्यादा पाठक संख्या वाला समाचार पत्र बना है। इस वर्ग में जागरण के पाठकों की संख्या 1.12 करोड़ रही है। पूरे देश में पाठकों ने इस तिमाही में दैनिक जागरण को हाथों हाथ लिया है। दैनिक जागरण समूह के सभी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या पहली तिमाही में 6.9 करोड़ पहुंच गई है। इतनी विशाल संख्या के साथ दैनिक जागरण समूह देश का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला प्रकाशन समूह बन गया है। दैनिक जागरण को कंज्यूमर सुपरब्रांड तथा बिजनेस सुपरब्रांड का दर्जा भी मिल चुका है। इतना ही नहीं, बीबीसी-रायटर्स के स्वतंत्र सर्वे में इसे प्रिंट मीडिया में समाचारों का सबसे विश्वसनीय स्रोत माना गया। जागरण प्रकाशन ने अन्य क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन किया है।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर


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नवभारत टाइम्‍स को पीछे छोड़ प्रभात खबर सातवें नंबर पर

: आईआरएस 2012 दूसरी तिमाही के नतीजे : रांची : प्रभात खबर औसत इश्यू पाठक संख्या में नवभारत टाइम्स को पछाड़कर देश के शीर्ष दस हिंदी अखबारों में सातवें स्थान पर आ गया है. प्रभात खबर ने आइआरएस 2012 की दूसरी तिमाही के नतीजों में एक बार फिर सबसे ज्यादा बढ़त दर्ज की है. औसत इश्यू पाठक संख्या के लिहाज से पहले तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में प्रभात खबर 7.55 फीसदी की वृद्धि के साथ देश के दस शीर्ष अखबारों में एक पायदान ऊपर चढ़ कर सातवें स्थान पर आ गया है. इस तरह प्रभात खबर की औसत इश्यू पाठक संख्या नवभारत टाइम्स, पत्रिका और नई दुनिया से ज्यादा हो गयी है. प्रभात खबर इस अवधि में 1.84 लाख नये पाठक जोड़े हैं.

रांची और जमशेदपुर में प्रभात खबर मजबूती के साथ पहले नंबर पर बना हुआ है. धनबाद को भी जोड़ लें तो तीनों शहरों में कुल मिलाकर प्रभात खबर औसत इश्यू पाठक संख्या में सबसे आगे है और उसने 1.62 फीसदी की बढ़त भी दर्ज की है, जबकि हिंदुस्तान और दैनिक जागरण की औसत इश्यू पाठक संख्या में कमी आयी है. झारखंड हिल्स में प्रभात खबर ने 12.46 फीसदी की मजबूत वृद्धि दर्ज की है और दूसरी तरफ हिंदुस्तान की पाठक संख्या 4.79 फीसदी कम हुई. बिहार में प्रभात खबर सबसे तेज बढ़नेवाला अखबार रहा.

इसने पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही के औसत इश्यू पाठक संख्या में 18.71 फीसदी की वृद्धि दर्ज की है. जबकि हिंदुस्तान की औसत इश्यू पाठक संख्या एक फीसदी से भी कम बढ़ी और जागरण कोई भी वृद्धि दर्ज नहीं कर पाया. बिहार में क्षेत्रवार देखें तो मिथिला में प्रभात खबर की औसत इश्यू पाठक संख्या में 25 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी जबकि जागरण की औसत इश्यू पाठक संख्या कम हुई है. इसी तरह मगध क्षेत्र में प्रभात खबर ने 26.02 फीसदी की वृद्धि दर्ज की जबकि हिंदुस्तान और दैनिक जागरण की वृद्धिदर तीन फीसदी से भी कम रही.

कुल पाठक संख्या के लिहाज से पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में पटना में प्रभात खबर 6.6 फीसदी वृद्धि दर के साथ सबसे तेज बढ़नेवाला अखबार रहा जबकि हिंदुस्तान और जागरण की वृद्धि दर दो फीसदी से भी कम रही. इसी तरह भोजपुर क्षेत्र में प्रभात खबर की कुल पाठक संख्या 5.78 फीसदी बढ़ी जबकि हिंदुस्तान की कुल पाठक संख्या में कमी आयी और जागरण की कुल पाठक संख्या में वृद्धि एक फीसदी से भी कम रही.

पश्चिम बंगाल में भी प्रभात खबर की औसत इश्यू पाठक संख्या 6.67 फीसदी बढ़ी जबकि सन्मार्ग की औसत इश्यू पाठक संख्या में पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में 4.24 फीसदी की कमी आयी. कोलकाता (एमसी) में प्रभात खबर ने औसत इश्यू पाठक संख्या में बेहतरीन 17.14 फीसदी की बढ़त दर्ज की जबकि सन्मार्ग की औसत इश्यू पाठक संख्या 1.69 फीसदी कम हुई.

झारखंड में आइआरएस 2012 की दूसरी तिमाही में प्रभात खबर का रेडियो धूम की लिसनरशिप (श्रोताओं की संख्या) 9.78 लाख हो गयी है. रांची में रेडियो धूम की लिसनरशिप 2.26 लाख के साथ सबसे आगे है.

झारखंड : धनराज में बढ़त बरकरार
बिहार : 18.71 % पाठक बढ़े
बंगाल : कोलकाता में 17.14% की वृद्धि

प्रभात खबर में प्रकाशित खबर


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दैनिक भास्कर की पाठक संख्या में गिरावट, दूसरे पायदान पर और मजबूत हुआ हिन्दुस्तान

नई दिल्ली : पांच राज्यों में मजबूत पकड़ वाले हिन्दुस्तान ने देश के अन्य अखबारों को पीछे छोड़ते हुए इंडियन रीडरशिप सर्वे (आईआरएस क्यू2 2012) में अपनी दूसरे पायदान की स्थिति को खासा मजबूत कर लिया है। हिन्दुस्तान की कुल पाठक संख्या अब 3.88 करोड़ हो गई है। इस अवधि में हमारे निकटतम प्रतिद्वंद्वी दैनिक भास्कर की पाठक संख्या में गिरावट हुई है। इस समय उसकी कुल पाठक संख्या 3.54 करोड़ रह गई है।

पिछले तीन साल हिन्दुस्तान की सफलता की कहानी बयां करते हैं। आईआरएस के गत 15 दौर में पाठक संख्या में निरंतर वृद्धि दर्ज करने वाला हिन्दुस्तान इकलौता अखबार है और यह देश में तेजी से बढ़ता हुआ अखबार बना हुआ है। दरअसल, हिन्दुस्तान की पाठक संख्या में लगातार हो रहा भारी इजाफा पिछले तीन वर्ष में चलाए गए विस्तार कार्यक्रम का परिणाम है।

यूपी व उत्तराखंड में अब हिन्दुस्तान की कुल पाठक संख्या 1.55 करोड़ तथा औसत अंक पाठक संख्या 45 लाख है। अकेले हिन्दुस्तान ने ही पिछले एक साल में यूपी और उत्तराखंड में वृद्धि दर्ज की है और यहां 35 प्रतिशत से ज्यादा पाठक हिस्सेदारी के साथ इसकी पकड़ मजबूत बनी हुई है। जटिल आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद हिन्दुस्तान ने राज्यों के कई प्रमुख शहरों में वृद्धि दर्ज की है जबकि उसके प्रतियोगियों ने ज्यादातर शहरों में गिरावट देखी है। 

दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर


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जब आईएएस ज्ञानेश्वर पैंट खोल सकते हैं तो आईएएस शशि भूषण छेड़खानी क्यों नहीं कर सकते!

यूपी की नौकरशाही जो गुल न खिला दे, वह कम है। 2001 बैच के आईएएस अफसर शशि भूषण ने जो कारनामा कर दिखाया उसने पूरी आईएएस बिरादरी को कलंकित कर दिया। इस कारनामे के बाद उनको गिरफ्तार करके चौदह दिनों के लिए जेल भेजकर निलंबित कर दिया गया है। प्रदेश में विशेष सचिव प्राविधिक शिक्षा के पद पर तैनात आईएएस महोदय दिल्ली से लखनऊ आने के लिए 'लखनऊ मेल' में बैठे थे।

बताया जाता है कि रात अच्छी बीते, इसलिए उन्होंने रात की 'दवाई' भी ले रखी थी। उन्हीं के कूपे में गूगल की एक्जीक्यूटिव अपनी मां के साथ सफर कर रही थी। पड़ोस में जवान और खूबसूरत महिला को देखकर अफसर महोदय अपनी औकात में आ गए। उन्होंने इस युवती से छेड़छाड़ करना शुरू कर दिया।

शुरुआती दौर में तो यह युवती चुपचाप उनकी हरकत को झेलती रही। मगर पानी सिर से ऊपर तब निकला जब यह टायलेट के लिए उठी। तब अफसर महोदय जवानी के नशे और अपनी अफसरी के गुरूर को कंट्रोल नही कर पाये और उस युवती के साथ कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गये। वे उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश में जुट गये।

शशि भूषण जी यह भूल गये कि यह महिला कोई ऐसी वैसी युवती नहीं थी, लिहाजा लखनऊ पहुंचते ही इस महिला ने लखनऊ जीआरपी में बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाते हुए हंगामा कर दिया। लोगों की भारी भीड़ और इलेक्ट्रानिक मीडिया के पहुंचने के बाद इस बात के अलावा कोई और चारा भी नहीं बचा था कि अफसर महोदय को गिरफ्तार कर उन्हें जेल यात्रा करवाई जाये।

लिहाजा शशि भूषण को गिरफ्तार कर लिया गया। जीआरपी के इंस्पेक्टर ने शुरुआती दौर में इस अफसर के रुतबे को देखकर उन्हें बचाने की कोशिश भी की मगर देश भर में भारी हंगामे के बाद जब लगा कि मामला ज्यादा तूल पकड़ गया तो आनन-फानन में इंस्पेक्टर को ही हटा दिया गया। मगर इससे यह तो सिद्ध हो गया कि रेलवे पुलिस शुरुआती दौर में इस अफसर के प्रभाव में थी। शशि भूषण बुलंदशहर और गाजियाबाद जैसे जिलों के डीएम रहे हैं। उनकी गिरफ्तारी से नौकरशाही में हड़कंप मच गया।

प्रदीप शुक्ला की गिरफ्तारी से पहले से भयभीत आईएएस एसोसिएशन के कुछ सदस्य सक्रिय भी हुए और उन्होंने कहा कि यह संभव नही है कि चलती ट्रेन में कोई अफसर इस तरह की छेड़खानी करे। मगर उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि पढ़ी लिखी नौकरीपेशा युवती आखिर किस कारण से किसी अफसर पर इस तरह के आरोप लगाएगी। जब उनसे कहा गया कि एक आईएएस ज्ञानेश्वर पाटिल को पूरी दुनिया ने देखा कि वह अपने कार्यालय में ही पैंट उतारे, अपने ही एक कर्मचारी से समलैंगिक संबंध बनाने की कोशिश कर रहे थे। उनकी उतरी हुई पैंट पूरी दुनिया ने देखी।

जब एक आईएएस अफसर अपने कार्यालय में ही इस तरह अपनी पैंट उतार सकता है तो दूसरा आईएएस चलती ट्रेन में एक महिला के साथ छेडखानी कैसे नहीं कर सकता। दरअसल आईएएस अफसरों के अंदर एक खतरनाक प्रवृत्ति जन्म ले रही है। उन्हें लगता है कि वह कुछ भी करेंगे उनके रुतबे के आगे कोई कुछ नही बोलेगा। यूपी के ही एक चर्चित अफसर अपने जिले के कार्याकाल में खासे चर्चित रहे हैं। अपने अधीनस्थ महिला कर्मचारी को शुरुआती दौर में मैसेज भेजने और बाद में फोन पर उनसे घंटों प्रेम भरी बातें करने के लिए उनकी ख्याति पूरे प्रदेश भर में रही है।

नोएडा में अपनी तैनाती के दौरान एक महिला से प्रेम प्रसंग के चलते उनके परिवार और महिला के परिवार में भी खासा बवाल हो गया था। आजकल यह प्रदेश में एक महत्वपूर्ण पद पर तैनात हैं। शशि भूषण ने अपने बचाव में कहा है कि युवती के बैग गिर जाने के कारण विवाद हो गया था। जब युवती ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम शशि भूषण लाल बताया तो युवती ने उन्हें जातिसूचक शब्द कहे। शशि भूषण की इस बात में कितना दम है इसका अंदाजा सभी लगा सकते हैं।

यूपी की नौकरशाही लगातार अपने कारनामों से पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। आर्थिक पतन से चारित्रिक पतन तक नई नई गाथायें अफसरों की शान पर बट्टा लगा रही हैं। राजधानी लखनऊ में अफसरों की करोड़ों की कोठियां और फ्लैट यह बताने को काफी हैं कि आखिर इस प्रदेश के नौकरशाह किस रास्ते पर जा रहे हैं। माया सरकार में पैसा कमाने के लिए कुछ अफसरों ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। बड़े से बड़े अफसर केवल दलाल बनकर रह गये थे। दुख की बात यह है कि सत्ता परिवर्तन के बाद कुछ अफसर दलाल फिर दलाली की भूमिका में नजर आने लगे हैं। जो हाशिए पर है वह मुख्यधारा में आने के लिए भरसक कोशिश कर रहे हैं और कोई बड़ी बात नही है कि वह जल्दी ही अपना मुख्यधारा में नजर आयें। जबकि बढिया काम करने वाले कई अफसर अभी भी महत्वहीन पोस्टिंग पर तैनात कर दिए गये है।

यूपी की नौकरशाही को पहला झटका प्रदीप शुक्ला की गिरफ्तारी के साथ लगा। अपने राजनैतिक संबंधों के चलते प्रदीप शुक्ला को यह गुरूर था कि उन पर सीबीआई जैसी संस्था भी कभी हाथ नही डाल सकती। मगर जिस तरह से उनकी गिरफ्तारी हुई उससे यूपी की बेईमान नौकरशाही को एक झटका जरूर लगा।

इस झटके से उबर भी नही पायीं आईएएस बिरादरी शशि भूषण के मामले को लेकर सकते की हालत में है। एसोसियेशन के कुछ लोगों ने इस बात की कोशिश करी कि किसी भी तरह शशिभूषण के निलंबन को टाला जा सके क्योंकि नियमत: 48 घंटे जेल में रहने के बाद स्वत: अफसर निलंबित हो जाता है। यह बात दीगर है कि प्रदीप शुक्ला जैसे अफसरों पर यह नियम नहीं लागू होता। एसोसियेशन शशिभूषण को भी इसी श्रेणी में रखना चाहती थी, मगर कामयाब नहीं हो सकी।

लेखक संजय शर्मा यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वीकएंड टाइम्स के संस्थापक और प्रधान संचालक के रूप में कार्यरत हैं.

चिदर्पिता ने दैनिक जागरण, हरिद्वार के पत्रकारों को बिका हुआ बताया

Sadhvi Chidarpita : आश्रम जाना स्वामी चिन्मयानंद के पास जाना नहीं है। आश्रम ट्रस्ट द्वारा संचालित है और सार्वजनिक संपत्ति है। साल में हजारों ऐसे लोग भी आश्रम जाते हैं जो स्वामी चिन्मयनन्द का नाम तक नहीं जानते। दूसरी बात यह कि जैसे वो अध्यक्ष हैं वैसे ही मैं भी आश्रम की प्रबन्धक हूँ। उनके पूर्वजों ने वो संपत्ति उनके नाम नहीं कर दी थी और मेरे पूर्वजों ने आश्रम की भैंस नहीं खोल ली थी। वो मुफ्त में रहते हैं पर मैंने आश्रम में रहते हुए सदैव अपनी सेवाएँ दी हैं। आश्रम का प्रबंधन देखा है, शिक्षण संस्थाओं में बिना वेतन के पढ़ाया है और गंगा तट पर आरती की है जो पिछले कुछ वर्षों में परमार्थ का सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक प्रकल्प बन गया था।

इस बार रहते हुए मैं ऐसी किसी सेवा से नहीं जुड़ पायी तो आते हुए साधारण यात्रियों की तरह ही रसीद कटाकर आई हूँ। वैसे भी मैं परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में रही हूँ जिसके अध्यक्ष मुनिजी हैं, स्वामी चिन्मयानंद नहीं। आज और आगे भी मैं जब चाहे आश्रम जाने का अधिकार रखती हूँ और किसी की हैसियत नहीं कि मेरे इस अधिकार को चुनौती दे सके। एक अभियुक्त और उसके चमचों की तो कदापि नहीं।

मैंने पति से मनमुटाव होने पर आश्रम का विकल्प ही क्यों चुना, का जवाब यह है कि, मेरे पास और कोई ठिकाना होता तो मैं इतने वर्ष आश्रम में रहती ही क्यों। यही मैंने अपनी एफआईआर और बयान में भी कहा है। वहाँ रहते हुए भी मैंने अपनी लड़ाई जारी रखी और तमाम कोशिशों के बावजूद उससे एक कदम भी पीछे नहीं हटी। न तो अपना बयान बदला और न ही कोर्ट में कोई कागज दिया।

मेरे आश्रम पहुँचने के बारह घंटे के अंदर दैनिक जागरण, नोएडा से फोन पर पूछा गया कि उस केस का क्या होगा, तो मेरा जवाब था कि वो केस कोर्ट में है और उसका निर्णय कोर्ट में ही होगा। शब्दवीर और दैनिक जागरण, हरिद्वार के बिके हुए पत्रकार बताएं कि क्या कोई आश्रित व्यक्ति ऐसे रह सकता है? भंडारे के समय संन्यासियों की तरह भोजन के बाद ग्यारह सौ का लिफाफा लेने वालों को अपनी न सही कम से कम पत्रकारिता की इज्ज़त रखनी चाहिए।

साध्वी चिदर्पिता के फेसबुक वॉल से साभार.

भास्कर के पत्रकार दिलनवाज पाशा से नोएडा में लूट की कोशिश

Dilnawaz Pasha : अभी करीब सात बजे मैं अपने साथी Mukesh Kumar 'Gajendra' के साथ दफ्तर से निकला। नोयडा सैक्टर 63 में हमारा दफ्तर है। आज रविवार होने के कारण बाकी कंपनियों में छुट्टी थी लिहाजा ऑटो या रिक्शा भी नहीं मिला। कुछ दूर पैदल चले..मैं मोबाइल पर ही चैट करता हू जा रहा था… करीब 100 मीटर दूर एक ऑटो मिला जिसे लेकर मुकेश जी गेस्ट हाउस चले गए। मैं अकेला ही मेन रोड की ओर जाने लगा….

अभी कुछ दूर ही चला था.. संडे की वजह से रास्ता सूनसान था लिहाजा मैंने अपना सैमसंग मोबाइल जेब में रख लिया और नोकिया को कान से लगाकर फोन लगा ही रहा था कि एक पल्सर एकदम करीब आकर हल्की हुई, मोबाइल छीनने की कोशिश की, मैंने कसकर फोन पकड़ रखा था इसलिए वो फोन नहीं छीन पाए…बाइक की स्पीड उन्होंने तेज की…मैंने नंबर देखने की कोशिश की और तीन चीजे नोट कर सका

हिंदी के अक्षरों में ऊपर यूपी लिखा था जिसके बाद का नंबर मुझे 96 लगा…पूरा नंबर हिंदी में था जिसे मैं तुरंत पढ़ नहीं पाया, ऊपर और नीचे के नंबरों के बीच लाल रंग से कुछ लिखा था…

मैंने तुरंत 100 नंबर पर कॉल किया, बताया कि मेरा मोबाइल छीनने की कोशिश की गई, काली रंग की पल्सर फोर्टिस की दिशा में भाग रही है…नंबर हिंदी में लिखा है…ऊपर का नंबर ही सही से देख पाया जो कि 96 था… फोन उठाने वाले व्यक्ति ने मेरी पूरी बात सुनी, लोकेशन पूछी और फोन रख दिया…

मैं दोबारा थोड़ा और सतर्क होकर आगे चलने लगा…अब एक-दो लोग और मेरे साथ चलने लगे… करीब 500 मीटर दूर…वाजिदपुर गांव के बाजार के पास (टीसीएस के नजदीक अपोजिट साइड में..) सड़क पर ही एक बाइक खड़ी थी..जो स्टार्ट थी…इंडीकेटर जल रहा था, एक बंदा उस पर बैठा फोन पर किसी से बात कर रहा था…मैंने थोड़ा नजदीक से देखा तो नंबर हिंदी में लिखा था..ऊपर का नंबर और नीचे लाल रंग से कुछ लिखा था (जो करीब से पढ़ने पर अंग्रेजी में Chahalलिखा था)। मुझे 90 प्रतिशत यकीन हुआ कि यह वही बाइक है जिसने करीब दस मिनट पहले मेरा फोन छीनने की कोशिश की थी…

मैंने तुरंत अपने मोबाइल से बाइक का फोटो लिया ताकि अगर वो भागे भी तो नंबर मेरे पास रहे…मैंने दोबारा 100 नंबर पर फोन किया…मेरे फोटो खींचने और पुलिस को फोन करने के दौरान बाइकर वहां से भागा नहीं बल्कि खड़ा रहा..उसने पूछा- क्या हुआ तो मैंने बताया…उसने कहा- मैं नहीं था, मैं तो अभी आया हूं.. (होता भी तो मानता थोड़े ही, मैंने फोटो पहले ही ले लिया था शायद इसलिए वो नहीं भागा..)…

नंबर की हिंदी में लिखावट, पल्सर और बाइक रोड के किनारे इग्नीशन मोड पर रखने के कारण मैं 90 प्रतिशत मुतमईन था कि यह वही हो सकता है, हालांकि शक्ल मैंने नहीं देखी थी.. करीब 5 मिनट बाद पुलिस आई, सेक्टर 63 की चौकी पर हम गए, वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों को पूरी बात बताई…

पुलिस ने उस युवक को बाइक के साथ पूछताछ के लिए थाने में रोक लिया है… अपनी पूरी बात बताकर मैं आ गया हूं, लिखित में शिकायत दो कारणों से नहीं दी… पहला तो फोन छिनने से बाल-बाल बच गया (वैसे प्रयास भी अपराध की श्रेणी में ही आता है, but what can i Do with typical Indian mentality, जब तक असल में कुछ नहीं होता हम अपराथ मानते ही नहीं..)… दूसरा मैं 90 प्रतिशत मुतमइन था कि बाइक वही है, दस प्रतिशत नहीं, क्योंकि मैंने नंबर पूरा नहीं पढ़ा था…

मैं तो वापस दफ्तर आ गया हूं, अब ऑफिस कैब से ही घर के लिए निकलूंगा, लेकिन उस युवक को पूछताछ के लिए पुलिस ने रोक लिया है… पूछताछ जारी है…आते-आते कह आया हूं कि दस प्रतिशत गुंजाइश युवक के बेगुनाह होने की है… और बहुत असंमजस में हूं… कभी-कभी घटनाएं इतनी तेजी से घटती हैं कि हम उन पर नियंत्रण कमजोर कर बैठते हैं… पूरी बात इसलिए शब्द-शब्द दर लिख दी है कि जरूरत पढ़ने पर याद रहे और किसी भी परिस्थिति में मुझे अपना बयान न बदलना पड़े…
 
दिलनवाज पाशा ने अपने फेसबुक एकाउंट पर खुद के साथ हुई घटना को बयान किया है, वहीं से साभार.

जानेमन जेल (चार) : ”भड़ासजी, इस पेज को पढ़ दो, मजा आ जाएगा”

किताबों के साथ लंबे समय तक जीने-बतियाने का वक्त काफी लंबे समय बाद मिला. डासना जेल में 68 दिनों के प्रवास के दौरान दर्जन भर से ज्यादा किताबें पढ़ डाली. पाकिस्तानी लेखिका तहमीना दुर्रानी के आत्म-कथात्मक उपन्यास 'ब्लासफेमी' के हिंदी अनुवाद ''कुफ्र'' को पहली बार पढ़ा. इस किताब के बारे में पहले से सुन रखा था. कई लोगों ने पढ़ने की सलाह दी थी. लेकिन पढ़ने का सौभाग्य डासना जेल में मिला. जब इसे पढ़ना शुरू किया तो मुझे एक नशा-सा हो गया.

दिन भर, रात भर पढ़ता रहता. दो-चार घंटे मजबूरन तब सोता जब आंखें खुद ब खुद बंद होने लगतीं. कहने को तो यह उपन्यास पाकिस्तान में महिलाओं की भयावह स्थिति को दर्शाने वाला है और सच्ची घटनाओं पर आधारित है लेकिन इसे पढ़कर लगा कि यह कहानी भारत की भी है, बांग्लादेश की भी है, श्रीलंका की भी है, हर उस देश की है जहां धर्म, परंपरा, कट्टरपंथ, सामंती मानसिकता जोर जमाए है.

पाकिस्तानी लेखिका ''तहमीना दुर्रानी'' ने अपनी पुस्तक ''ब्लासफेमी'' उर्फ ''कुफ्र'' में पाकिस्तानी जमींदारों – नजूलियों और मुल्लाओं के कुकृत्य का इतना लोमहर्षक वर्णन किया है कि ये जमींदार-मुल्ला किताब में लिखे सत्य को पचा नहीं पाए और तहमीना सजा-ए-मौत के खौफ में जीती रही. ऐसी किताब जिसे पढ़कर खुद पाठक लजा जाएं कि क्या ऐसा भी कोई कर सकता है, क्या ऐसा भी होता है.

तहमीना दुर्रानी की आपबीती 'कुफ्र' में पाकिस्तानी राजनीति और इसके वीभत्स गठजोड़के भयावह चेहरे को भी देखा जा सकता है. इस उपन्यास को खत्म करने के बाद कई दिनों तक मैं इसी उपन्यास के पात्रों व कहानियों के बारे में सोचता रहा. पढ़ने के बाद मुझे लगा कि अगर मैंने इस जीवन में इस उपन्यास को नहीं पढ़ा होता तो मेरा अब तक का सब कुछ पढ़ा हुआ अधूरा रहता.

आप सभी को, खासकर लड़कियों-महिलाओं को सुझाव देना चाहूंगा कि वे तहमीना दुर्रानी लिखित 'कुफ्र' को जरूर पढ़ें. एक महिला को कितना मजबूर किया जाता, उस पर कितना व किस किस तरह का अत्याचार किया जाता है, और, वह महिला फिर भी सपने देखती है, प्यार करने के बारे में, लड़ने के लिए, बदला लेने की सोचती है, रचने की सोचती है, आगे सब कुछ ठीक हो जाने की उम्मीद करती है…. और जब उसका वक्त आया, उसके दिन ठीक होने को आए तो उसके कोख का ही जना उसके खिलाफ नए खलनायक के रूप में खड़ा हो जाता है. एक पति अपनी पत्नी को लेकर कितना विकृत हो सकता है, उसका किस किस तरह दुरुपयोग कर सकता है, खुदा का प्रतिनिधि समझे जाना वाला एक आदमी कितना गिरा हुआ हो सकता है, उसके लिए हर लड़की सिर्फ एक योनि से ज्यादा कुछ नहीं, उसकी दास्तान पढ़कर आपको जिंदगी, सिस्टम, मनुष्यता, परंपरा, धर्म.. सब कुछ के बारे में दुबारा सोचने का मन करेगा.  

अगर जेल न जाता तो इस किताब को न पढ़ पाता, जेल जीवन की उपलब्धि है इस किताब को पढ़ना. इसके लिए डासना जेल की लाइब्रेरी को थैंक्स कहना चाहूंगा. 'ब्लासफेमी' का ''कुफ्र'' नाम से हिंदी अनुवाद विनीता गुप्ता ने किया है और इसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

बैरक में वो किताबें ज्यादा मंगाई जातीं जिसमें सेक्स का वर्णन-जिक्र ज्यादा होता. 'कुफ्र' में भी सेक्स के प्रसंग बार-बार हैं. खुद को खुदा का प्रतिनिधि कहने वाला बड़ा साईं पूरे उपन्यास में दो ही काम करता दिखता है. पब्लिक लाइफ में लोगों को दर्शन व दुवा देना और प्राइवेट लाइफ में छोटी बच्ची से लेकर बड़ी उम्र की महिला के साथ विविध तरीके से सेक्स करना. उसकी पत्नी अपनी बेटी को उसकी हवस से बचाने के लिए मजबूरन दूसरों की लड़कियों को उसके सामने पेश करती रहती है. वह बड़ा साईं बाद में अपनी पत्नी को कोठेवाली बताकर दूसरों के सामने पेश करने लगा. वह अपनी पत्नी के साथ सेक्स करते हुए ब्लू फिल्म बनाने लगा. वह पत्नी के अलावा दो तीन अन्य लड़कियों को सेक्स के लिए बुलाने लगा और सबको शराब पिलाकर नंगा करता, सेक्स करता, फिल्म बनाता… पूरे उपन्यास में एक स्त्री अपनी कहानी बता रही होती है और अपने साथ हुए घटनाओं-हादसों को पेश करती जाती है. पढ़कर सोचने लगा कि क्या किसी एक के जीवन में लगातार इतने दुख व जुल्म हो सकते हैं.

'पियानो टीचर' नामक एक किताब की बंदी खूब चर्चा करते. रूसी उपन्यास का हिंदी अनुवाद है यह. अमृत राय ने अनुवाद किया है. लेकिन इतना घटिया अनुवाद की पढ़ते हुए अपना सिर पीट लेंगे. इस किताब में सेक्स, लिंग, योनि आदि का वर्णन इतने घटिया तरीके से किया गया है कि जैसे लगता है इसका अनुवाद अमृत राय ने नहीं बल्कि मस्तराम ने किया हो. एक बंदी इस किताब को जेल की सबसे 'पठनीय' किताब बताता. साथ ही यह भी कहता कि यह किताब जल्द इशू नहीं होती क्योंकि यह किसी न किसी बैरक में किसी न किसी के पास पढ़ने के लिए गई रहती है.

कौन किताब पढ़ने लायक है और कौन नहीं, बैरक में इसका आकलन उसमें सेक्स की मात्रा के आधार पर किया जाता. और, यह आकलन ज्यादातर वो लोग करते जिनका पढ़ाई-लिखाई से जीवन में बिलकुल नाता नहीं रहा है. मतलब, जो पढ़ना नहीं जानते, वे हम लोगों को बताते कि इसे पढ़ो, मजा आएगा. साथ ही बीच के एकाध पन्ने वे पढ़कर सुना देने का अनुरोध करते. उन्हें कहीं से पेज नंबर तक याद रहता कि इस किताब के फला पेज नंबर पर पढ़ने लायक 'मजेदार आइटम' है. वे वही पेज पढ़कर सुनाने को कहते. मैंने उन्हें एकाध बार सुनाया लेकिन बाद में गला खराब होने का बहाना करके टाल दिया.

एक बार संयोग से 'पियानो टीचर' नामक उपन्यास उस अपढ़ बंदी साथी के हाथ लग गया जो इसकी तारीफ करते न अघाता. वह मुस्कराते हुए मेरे पास किताब लेकर आया. सामने चुपचाप बैठ गया और इस अंदाज में किताब को मेरे सामने पेश किया जैसे कोई बड़ा तोहफा दे रहा हो. उसने धीरे से कहा- ''भड़ासजी, इस किताब के इन पन्नों को सुना दो, मजा आ जाएगा, फिर तुम सब पढ़ लेना, बड़ी मुश्किल से मिली है, इसमें भरपूर मसाला है.'' मैं उस बंदी के मुस्कराते चेहरे व भोलेपन से कही गई बात पर हंस पड़ा. मैंने उसे सामने बिठाया और जिन पेजों का उसने जिक्र किया, उसका पाठ किया. उसे भी निराशा हुई कि इसमें उतना कुछ तो नहीं जितना उसे बताया गया. हां, सेक्स संबंधित कई शब्द घनघोर देसी थे, जिनका उल्लेख मस्तराम मार्का किताबों में ही हो सकता था. इन शब्दों का मेरे श्रीमुख से वाचन किए जाने का सुख उस बंदे ने खूब लिया और हंसता रहा. अड़ोस-पड़ोस वाले बंदियों को वह बताने लगा कि ''देखो, भड़ासजी कैसे कैसे शब्द आराम से बोल रहे हैं…''

''पियानों टीचर'' स्तरीय किताब है, लेकिन इसका हिंदी अनुवाद घटिया है. पर जेल के ज्यादातर बंदियों-कैदियों को स्तरीय और निम्न-स्तरीय से कोई मतलब नहीं था.  वे तो किताब हो या अखबार, सबमें 'सेक्स-स्तरीय' तलाशते. एक कैदी साथी जो कम पढ़े लिखे थे, अंग्रेजी अखबारों के पन्ने बेहद तन्मयता से पलटते, जैसे कितना सीरियसली पढ़ रहे हों, लेकिन वह बस केवल तस्वीर ध्यान से देखते जाते. एक-एक तस्वीर पर अच्छा खासा टाइम देते. टीओआई और एचटी के जो दिल्ली सिटी के पेज आते, जिसमें पेज थ्री पार्टीज की फोटो होती, उसे काफी चाव से बैरक में देखा जाता. महिलाओं-लड़कियों से दूर बसी इस बैरक की दुनिया में नौजवानों की भरमार थी और उनके दिल-ओ-दिमाग में अपोजिट सेक्स की जबरदस्त चाहत-तलाश थी.

बैरक की खूब पढ़ी जाने वाली एक अन्य किताब ''एक बारबाला की आत्मकथा'' की इतनी धूम रही कि यह बैरक से विदा नहीं ले पाती. एक जमा करता तो दूसरा इस किताब को इशू करा लेता. किसी न किसी के फट्टे पर यह किताब पड़ी मिलती. कम पढ़े लिखे लोग इस किताब के सिर्फ वे पन्ने पढ़ने को कहते या पढ़कर सुनाने का आग्रह करते जिसमें सेक्स प्रसंग भरा होता. बाकी उनके लिए किताब से कोई खास मतलब नहीं. लेकिन जब मैंने ''एक बारबाला की आत्मकथा'' को पढ़ना शुरू किया तो चकित रह गया. कोई महिला इस कदर तक इमानदार और साफगो हो सकती है कि वह अपने बाप और बेटे द्वारा खुद के साथ सेक्स करने के प्रयास का पूरे साहस के साथ खुलासा कर सकती है, मुझे यकीन नहीं हो रहा था. लेकिन इस किताब की लेखिक ने गजब का साहस दिखाया है.

गरीब परिवार की एक लड़की जिसका यौन उत्पीड़न सात आठ साल की उम्र से ही शुरू हो गया, पूरे जीवन भर लोगों के लिए सेक्स ट्वाय बनी रही. यह महिला अपने को जिंदा रखने के लिए हर मुसीबत, यातना, प्रलोभन झेलती और खुद को स्थापित करने के लिए लगी रहती. पुस्तक की लेखिका हैं वैशाली हलदनकर जो खुद एक बारबाला रही हैं. यह किताब उनकी आत्मकथा सरीखी है. देश-विदेश के 80 से अधिक बारों में 16 वर्ष तक बार सिंगर की भूमिका निभानेवाली वैशाली हलदनकर संगीतज्ञ माता-पिता की पुत्री हैं. उनके माता-पिता दोनों ही संगीत विशारद रहे हैं. मुंबई में डांस बार बंद होने के लगभग तीन वर्ष बाद यह किताब बाजार में आई. यह पुस्तक डांस बारों के जमाने में मुंबई की नाइट लाइफ को भी बयान करती है.

वैशाली मराठी समाज से आती हैं. उसके जीवन के खट्टे अनुभवों की शुरुआत बचपन में ही एक पड़ोसी द्वारा किए गए दुराचार से होती है. 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया. जल्दी ही दो बच्चे भी हो गए. इस विवाह के बाद उन्हें रहने के लिए मुंबई की झोपड़पट्टी में जाना पड़ा और पेट पालने के लिए बारों का रुख करना पड़ा. बार में ग्राहकों एवं साथियों के साथ बनते-बिगड़ते रिश्तों ने जल्दी ही उनका वैवाहिक जीवन तबाह कर दिया. बार जीवन में एक प्रमुख गैंगस्टर से उनके रिश्ते बने और टूटे. इस घटना ने उनके जीवन में एक और झंझावात पैदा किया.

इस झंझावात से उन्हें शांति मिली पुणे के ओशो आश्रम में. वह ओशो आश्रम की संन्यासी भी बनी और बारों में गाना भी जारी रखा. इस नए रूप से भी उनकी बार वाली पहचान नहीं बदल सकी. उनका शारीरिक शोषण भी जस का तस जारी रहा. दुखों ने जीवन में शराब का हिस्सा बढ़ाया. इसके कारण जवान हो रहे बच्चों से भी रिश्ते टूटने लगे. इसी दौरान वह भारतीय बार ग‌र्ल्स यूनियन की मानद अध्यक्ष वर्षा काले के संपर्क में आईं, जिन्होंने उन्हें जीवन के उतार-चढ़ावों पर पुस्तक लिखने की प्रेरणा दी. किताब को पुणे के मेहता पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है. अपनी आत्मकथा लिखने के दौरान ही वैशाली के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए. वैशाली की आत्मकथा को पढ़ते हुए आप एक मिनट को भी किताब से दूर नहीं जाना चाहेंगे. 'एक बारबाला की आत्मकथा' को पढ़ते हुए मेरी दशा जेल में यह रही कि खाना-पीना तक भूल गया था. साथी लोग बुलाते कि ''भड़ासजी खा लो, किधर खो गए…'' तब जाकर मैं उठता और खाना खाता. खाते ही फिर किताब में जुट जाता.

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ लिखित उपन्यास मुन्नी मोबाइल का पूरा पाठ जेल में कर पाया. इस उपन्यास को पढ़ते हुए प्रदीप सौरभ की संवेदनशीलता के बारे में समझ सका. प्रदीप सौरभ से दिल्ली में कई बार मुलाकात हुई, और मुन्नी मोबाइल के बारे में भड़ास पर कई बार प्रकाशित किया लेकिन दोनों, लेखक व उपन्यास, को नजदीक से कभी पढ़ न सका. मुन्नी मोबाइल पढ़ा तो लगा कि इसे न पढ़कर मैंने एक भूल की थी. मुन्नी मोबाइल में कई कहानियां हैं. अगर प्रदीप सौरभ चाहते तो हर कहानी को एक अलग किताब की शक्ल दे सकते थे. उनकी खुद की जिंदगी और पत्नी से तलाक का प्रकरण एक अलग किताब बन सकता था,

प्रदीप सौरभ अपनी प्रेम कहानी को अलग उपन्यास की शक्ल दे सकते थे. वे पत्रकारिता वाले पार्ट को एक अलग उपन्यास बना सकते थे. पर उन्होंने एक ही उपन्यास में सब कुछ को समेट दिया. इसलिए अगर कोई ये कहे कि मुन्नी मोबाइल सिर्फ मुन्नी मोबाइल नामक एक नौकरानी के लड़की सप्लाई करने वाली डॉन बनने की कहानी है तो गलत है. मुन्नी मोबाइल को हर पत्रकार को पढ़ना चाहिए, हर संवेदनशील इंसान को पढ़ना चाहिए, इस बहाने वह एक पत्रकार के अंदर झांक सकेगा, साथ ही अपने समय समाज के सुखदुख को भी समझ सकेगा. मुन्नी मोबाइल को पढ़ने के बाद मेरा प्रदीप सौरभ के प्रति सम्मान बढ़ गया है.

''प्रमोद'' नामक एक उपन्यास पढ़ा. काफी मोटा है यह. चित्रा सिंह ने लिखा है. लखनऊ की हैं चित्रा. प्रमोद उनके पति का नाम. अपने पति के संघर्ष, प्रेम, शादी, बिजनेस, नौकरी, उदारता, बड़प्पन आदि को केंद्र बनाकर उन्होंने लिखा है. प्रमोद अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन प्रमोद के बारे में लिखकर चित्रा ने वाकई उन्हें अमर कर दिया है. हर युवक जो गरीब परिवार से आता है और संघर्ष करते हुए आगे का रास्ता बनाता है, प्रमोद से प्रेरणा पा सकता है. विपरीत स्थितियों से कैसे लड़ा जाता है, यह प्रमोद से सीखा जा सकता है. प्रमोद-चित्रा की प्रेम कहानी का खूबसूरत वर्णन है. इस उपन्यास में लखनऊ की ढेर सारी घटनाओं का जिक्र है.

'प्रमोद' उपन्यास में पत्रकार प्रदीप सिंह, उदय सिन्हा, अच्युतानंद मिश्र, राहुल देव आदि का जिक्र किया गया है. इनसे जुड़े कई प्रसंग भी दिए गए हैं. पत्रकार प्रदीप सिंह की बहन हैं चित्रा, सो लाजमी है कि इनका बार बार जिक्र होता. चित्रा ने असली अर्द्धांगिनी की तरह प्रमोद का जिस तरह साथ निभाया, वह अदभुत है. भावना प्रधान इस उपन्यास को पढ़ते हुए कई बार आंखें पनीली हो गईं. अपन का स्वभाव ही ऐसा है कि भावना में बह जाते हैं. किताब उपन्यास पढ़ते हुए उसके पात्रों के साथ ऐसा जुड़ बंध जाते हैं कि उन्हीं के साथ जीने मरने हंसने रोने लगते हैं. और, चित्रा ने इस अंदाज में घटनाओं, स्थितियों को पिरोया है कि सब कुछ अपने इर्दगिर्द घटित होता महसूस होता है.

कितना बताऊं कि क्या क्या पढ़ा. बस ये जान लीजिए कि जेल में जाकर पढ़ने लिखने से एक बार फिर जिंदा हो उठा. जो जिंदगी उद्देश्यविहीन लगने लगी थी, उसे जेल में जाकर मकसद मिल गया. कितना कुछ पढ़ना बाकी था, कितना कुछ अभी पढ़ना बाकी है, यह समझ में आया. और, तय किया कि जेल से छूटकर भी रोजाना कुछ न कुछ नया पढ़ने की आदत को जारी रखूंगा. लेकिन बाहर आते ही यह क्रम भी टूट गया.

मुझे जेल में जेल जैसा ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ जिसे याद रख सकूं लेकिन बाहर की दुनिया में आकर मुझे एक अघोषित जेल का एहसास जरूर हर वक्त होने लगा है. इस बाहरी जेल में आप अपने व अपने परिवार की पेट पूजा के लिए जुगाड़ के वास्ते इतना परिश्रम करते हैं कि उसके बाद आप किसी लायक रह नहीं जाते. बोले तो, अपन सब की जिंदगी एक गुलाम सरीखी हो जाती है जिसके तहत हम सब अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त किसी दूसरे की गुलामी करते या पैसे इकट्ठा करने के लिए बेकार सा काम करते हुए गुजार देते हैं और बदले में रुपये पाते हैं, तनख्वाह पाते हैं, जिसके जरिए हम आप रोटी, कपड़ा, मकान टाइप बुनियादी चीजों का जुगाड़ कर पाते हैं.

कल्पना करिए, इतनी सदियां गुजर गईं, कितना वक्त गुजर गया, फिर भी हम मनुष्य अपना जीवन अपनी जवानी उन्हीं आदिम चीजों के जुगाड़ में गुजार देने को अभिशप्त हैं जिन चीजों का जुगाड़ प्रागैतिहासिक काल में आदि मानव किया करते थे, अपनी सुरक्षा, अपने भोजन, अपने शिकार, अपने निवास… का जुगाड़. और, तब से अब की कुल तरक्की का नतीजा यह कि आज भी हम बुनियादी चीजों की जुटान जुगाड़ में जीवन को पूरा खर्च कर बैठते हैं.

कैसा सिस्टम बनाया है हम मनुष्यों ने कि हम खुद को आजाद बताते तो हैं पर अघोषित तौर पर बने हुए हैं पूरे के पूरे गुलाम. हम लोग जेल दूसरों के लिए बनाते हैं पर खुद एक बड़े कैदखाने में सिमटकर जीवन गुजारते हैं. और, मजेदार यह कि हमें पता भी नहीं चलता कि हम कैद हैं, हम बंद हैं, हम गुलाम हैं. हमारे हर पग हमारी हर चाल पहले से तय है. आज के दौर में बाजार ने जिस जेल की रचना कर दी है, जिन बेड़ियों की रचना कर दी है,  उसमें फंसकर हम वह नहीं कर सकते जो हम चाहते हैं, हम वह करते हैं जो बाजार चाहता है. जीवन के लिए बहुत जरूरी है भरपूर नींद लेना. लेकिन प्रतिस्पर्धा ऐसी कि लोगों की जिंदगी से नींद गायब होने लगी है. चैन छिनने लगा है. इससे ढेर सारे संकट पैदा हुए हैं.

हर आदमी हैरान परेशान तूफान बना हुआ है, इस अतिशय दबाव के कारण नींद गायब हो गई है. तनाव दबाव दूर करने के लिए दारू पीने का चलन बढ़ा. लेकिन कम नींद के कारण इससे भी कई प्राब्लम पैदा हो रही है. अच्छी नींद शहरियों के लिए सपने की तरह है. और, जब अच्छी नींद न आए तो समझिए आप कई तरह की दिक्कतों में फंसने जा रहे हैं. अत्यधिक तनाव-दबाव, कम नींद से पैरालिसिस, ब्रेन अटैक, हार्ट अटैक, हाई बीपी, शुगर जैसी कई दिक्कतें हो रही हैं. माने ये कि बाहरी जेल में रहते हुए लोग स्वस्थ नहीं, बीमार होते जा रहे हैं. और, आपको लगता है कि आप आजाद हैं. और जो लोग असली जेलों में हैं, वे ज्यादा सुखी हैं, जड़ों के ज्यादा करीब हैं, बुनियादी चीजों की गारंटी है उनके पास. उन्हें खाना चाय नाश्ता मिल रहा है. उन्हें भरपूर नींद मिल रही है, उन्हें पढ़ने को मिल रहा है, उन्हें खेलने हंसने बोलने बतियाने को मिल रहा है…. और जीने को क्या चाहिए!

खैर, मूल मुद्दे पर आते हैं. बात हम लोग डासना जेल की कर रहे थे जहां 68 दिनों में मैंने काफी वक्त पढ़ने में गुजारा. रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि को पहली बार डासना जेल में पढ़ा. इसकी रचनाओं को गाने की कोशिश की. किताब में कविताओं के अर्थ को भी समझाया गया था. गीतांजलि पढ़ते हुए रवींद्रनाथ टैगोर की उदात्तता को महसूस कर रहा था. कितने उंचे उठ गए थे टैगोर, कितना वृहद व्यक्तित्व था टैगारो का… यह गीतांजलि के जरिए जाना जा सकता है. चरम मनुष्यता, चरम प्रेम, चरम करुणा…. इन भावों को जीते हुए आदमी कब अपने आप से मुक्त होकर आकाश सा उदात्त बन और धरती सा विस्तार पाकर सबका हिस्सा बन जाता है, यह गीतांजलि के जरिए जाना जा सकता है.

तस्लीमा नसरीन की कई किताबें पढ़ गया. 'नष्ट लड़की, नष्ट गद्य' किताब तस्लीमा नसरीन के कमेंट्स, लेखों, विश्लेषणों का संग्रह है. इसे पढ़कर तस्लीमा की चिंतन पद्धति को और ज्यादा समझ सका. तस्लीमा को लोग फायरब्रांड कहते हैं लेकिन मुझे लगता है कि वह एक सहज महिला हैं जो साफ बात को साफ तरीके से कह देती हैं और आज के जमाने में साफ साफ बोलना दरअसल सबसे बड़ा हिम्मत का काम करना है. तस्लीमा का लिखा एक उपन्यास है ''निमंत्रण''. इस उपन्यास को पढ़कर मन उदास हो गया. एक लड़की जिस लड़के को पसंद करती है और उसको लेकर कितने सपने बुनती है, क्या क्या सोचती है, क्या क्या लिखती है, कैसे कैसे सोचती है, लेकिन जब वह लड़का उसे मिलता है तो कैसे वह कुछ मिनटों में लड़की को रौंदकर और अपने दोस्तों के हवाले कर चला जाता है, यह पढ़कर दिल बैठ जाता है.

आज की सच्चाई भी यही है. उस लड़की के लिए प्रेम का मतलब दिल में उतर जाना, आंखों में समा जाना, और उस मर्द के लिए प्रेम का मतलब सिर्फ जबरन सेक्स कर लेना. किसी स्त्री के लिए प्रेम और सेक्स क्या है, इसका अंदाजा पुरुष पाठक इस उपन्यास के जरिए लगा सकते हैं और इस बहाने उन्हें स्त्री मन को समझने जानने का मौका मिलता है. सो, यह किताब अपन लोगों की बैरक में 'मोस्ट रीडेबल' किताब में शुमार रही. तस्लीमा ने इस हरामी दुनिया की नंगी हकीकतों को यूं बयान किया है कि बात दिल तक उतर जाती है. पढ़ते पढ़ते कोफ्त होने लगती है कि इस दुनिया में इतने बदमाश लोग क्यों हैं जो दूसरों की जिंदगी, प्रेमपूर्ण भावनाओं को गोली मार कर कर अपने अहं को तुष्ट कर पाने को तत्पर रहते हैं.

डासना में ही महाश्वेता देवी की कई किताबें, जिनमें एक का नाम 'रिपोर्टर' है, पढ़ गया. अन्य किताबों का नाम अब याद नहीं रहा. दरअसल उन दिनों पढ़ने की धुन सवार थी, सो पढ़ा, खत्म किया और नई किताब तलाशने में जुट गया. जिस किसी फट्टे पर कोई  किताब रखी मिलती, मांग लाता और पढ़कर तुरंत लौटा देता. इस कारण अब मुझे कई किताबों के तो नाम भी याद नहीं हैं. कई ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास, कविता, कहानी की किताब पढ़ता गया. और, इन सबको पढ़ते हुए अब तक के अपने जीवन पर अफसोस करता रहा कि आखिर यह सब पढ़ने का काम मैंने इससे पहले क्यों नहीं किया.

संगठित तरीके से किताबें पढ़ने का काम इसके पहले तीन बार किया है. जब इंटरमीडिएट का एग्जाम दे लिया तो बहुत सारी किताबें, उपन्यास जुटाया और पढ़ता गया. उन्हीं दिनों गांव में एक कामरेड आते थे और वे मुझे पढ़ने के लिए दास कैपिटल समेत ढेर सारा कम्युनिस्ट लिट्रेचर दे जाते. मैं जब पढ़ लेता तो वो मुझसे सवाल पूछने को कहते और सवाल पूछने पर उसका जवाब वे बहुत बड़े फलक पर ले जाकर उदात्तता के साथ देते. तब उनके नजरिए को समझने की कोशिश करते हुए दुनिया में फैली असमानता के असली वजहों को समझ सका. उनका दिया ज्ञान बाद में और परवान चढ़ा और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए वामपंथी आंदोलन से पूरी तरह जुड़ गया.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते वक्त खूब सारी किताबें पढ़ीं. तब ओशो से प्रेम जगा और ओशो का लिखा बहुत सारा पढ़ा. उन्हीं दिनों प्रेमचंद, अज्ञेय से लेकर नए पुराने कई कहानीकारों उपन्यासकारों का लिखा पढ़ डाला. दुनिया के इतिहास से लेकर भारत के इतिहास, दर्शन शास्त्र, हिंदी साहित्य, राजनीति शास्त्र, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन तक बहुत कुछ बांच डाला.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई के साथ-साथ सीपीआई-एमएल लिबरेशन के छात्र संगठन आइसा के होलटाइमर के रूप में काम करता रहा. उन दिनों पत्रकारिता की पढ़ाई चंदे से की थी क्योंकि तब घरवालों ने एक भी पैसा देने से मना कर दिया था क्योंकि उनके हिसाब से मैं वामपंथ का पूर्णकालिक हमराही बनकर अपने लाइफ को बर्बाद कर चुका था और मुझमें उन्हें कोई उम्मीद शेष नहीं दिख रही थी, सो उन लोगों ने पैसा न देने का फरमान सुना दिया था.

बीएचयू के दिनों में जीवन का बहुत सारा समय लोगों से मिलने जुलने, हास्टल-हास्टल बतकही करने, राजनीति समझाने, सुबह-शाम का खाना तलाशने और पार्टी मैग्जीन आदि बांटने में गुजर जाता. पढ़ने का मौका मिलता तो इतना थका होता कि पढ़ने की बजाय सो जाना पसंद करता. बीएचयू से पत्रकारिता का एग्जाम देकर जब लखनऊ भागा तो वहां पत्रकार अनिल यादव के यहां रुका. बीएचयू में आइसा से जुड़े सुनील यादव के भाई हैं अनिल यादव. अनिल के कमरे में किताबों का अच्छा कलेक्शन था, साथ ही वे खुद कई नई किताबें खरीदकर लाते रहते, सो वहां भरपूर पढ़ाई की. पत्रकार अनेहस शाश्वत, जो अब साधु बन चुके हैं, उन दिनों लखनऊ में ढेर सारी किताबें रखते, खरीदते, उनके जरिए भी बहुत कुछ जानने-पढ़ने को मिला.

अनिल ने पत्रकारिता क्षेत्र में नौकरी खोजने-पाने को लेकर हाय हाय न करने की सलाह दे दी थी और खर्चे पानी के लिए हर महीने अपनी सेलरी का एक हिस्सा मुझे दे देते, अनेहस शाश्वत की भी भरपूर कृपा थी मेरे उपर, सो मेरे पास पढ़ने के अलावा कोई काम नहीं था. जो नया काम अनिल से सीखा वह यह कि दारू पीने लगा और लोगों से लड़ने भिड़ने लगा. यह दोनों काम आज भी जारी है, हां, जिन अनिल ने यह सब सिखाया, वह खुद इन दोनों कामों से तौबा कर शरीफ नागरिक बन चुके हैं.

तो कह रहा था कि तीन दफे संगठित तौर पर ढेर सारा पढ़ने का मौका मिला और तीनों ही दौर को याद करता हूं तो लगता है कि कितने अच्छे दिन थे, जब सिवाय पढ़ते जाने के, और कोई चिंता शेष न थी. संगठित तौर पर पढ़ाई करने का यह चौथा दौर डासना जेल में आया. बाहर निकलकर लगता है कि कितने अच्छे जेल के दिन दिन थे कि पढ़ने के नशे में वक्त का ध्यान नहीं रहता.

और, पढ़ पढ़ कर पाया कि दुनिया में दरअसल अच्छे लोग, हीरो लोग, शानदार लोग, प्यार करने लायक लोग वही होते हैं जो सच बोलते हैं, सच लिखते हैं, साहस करते हैं, दूसरों के लिए जीते हैं, अपने को दास्तां से मुक्त करते हैं, दूसरों को राह दिखाकर उन्मुक्त करते हैं… ऐसे लोग हर दौर में कम रहे हैं, ऐसे लोग हर दौर में कम बनते हैं, क्योंकि अपने समय के समाज-सिस्टम के प्रलोभनों-भयों से मुक्त होकर आगे की दृष्टि विकसित कर पाना सबके बूते की बात नहीं होती… और, ज्यादातर लोग जान-बूझकर या अनजाने में ही प्रलोभन और भय के कारण समय-सिस्टम के मुताबिक चलने को अपनी नियति, अपनी चालाकी, अपना उद्देश्य, अपना यथार्थ मान-बना लेते हैं. खुद के और परिवार के लिए जीते रहने वालों की भीड़ हर दौर में बहुमत बहुतायत में रही है और यह भीड़ हमेशा कायर रही है, कांय कांय वाली रही है. भीड़ का कोई व्यक्तित्व नहीं होता, इसलिए आप इनसे आत्म-चिंतन की अपेक्षा भी नहीं कर सकते. भीड़ का काम हमेशा भोंकना, परनिंदा करना होता या फिर अंधविश्वास या फिर भीड़ से अलग खड़े लोगों के गुण-दोष पर बतिया-बतिया कर अपना जीवन व समय काटना होता. भीड़ में भेड़चाल होती है, इसलिए इसमें कथित सुरक्षा भी रहती है कि हम इतने ज्यादा हैं, जो कुछ होगा वो सबका होगा, सो अपन अकेले का टेंशन नहीं करने का. अलग चलने वाले आदमी को अपना रास्ता खुद बनाना होता है, चुनौतियों से खुद भिड़ाना होता है, इसलिए उसे हर समय टेंशन लेना पड़ता है. और, इसी टेंशन को आमंत्रित करने व जीने में उसे आनंद आने लगता है. 

जेल के भीतर रहते हुए एक बात हमेशा नोट किया कि ज्यादातर लोग खुद को भयंकर रूप से खाली महसूस करते थे क्योंकि उनका जो कुछ था वह जेल के बाहर था, इस कारण उनके लिए जेल में करने को कुछ नहीं था, उनका वक्त बहुत मुश्किल से कटता, उन्हें हमेशा चिंता बाहर की लगी रहती, वे अपनी जमानत और अपने केस के बारे में सोचते रहते और बतियाते रहते. मैं खुद को अजीब पाता. जब मैं बाहर था तो अपने को काफी हद तक कैदी-सा महसूस करता और जब अंदर हूं तो उतना ही मुक्त महसूस करता जितना बाहर मुक्त था. बल्कि अंदर आकर जड़ों की ओर लौट गया. आदिम दिनचर्या के साथ जुड़ गया. बाहर सोना भूल गया था, अंदर नींद आने लगी. अंदर सामान्य नींद कब गहरी नींद में तब्दील हो गई और कब सोने का सुख मिलने लगा, पता ही नहीं चला.

बाहर इस गहरी नींद से वंचित था. इस नींद को पाने की भूख थी. छटपटाहट थी. बाहर दारू में चैन मिलता. पर दारू ने नींद को काफी कुछ ठिकाने लगा दिया था. दारू पीकर सोता तो हमेशा एक सतही नींद आती, कुत्ता टाइप नींद जो कभी भी टूट जाती. देर सुबह उठता तो देर तक आलस्य बना रहता, घटिया नींद सोने की सजा के रूप में थकान सी बनी रहती. जेल में रुटीन बदल गया. जड़ों की तरफ लौट गया. मजबूरन ही सही, दारू से मुक्त हो गया.

जेल में अपने गांव सा बचपन वाला रुटीन वापस लौट आया. सुबह शाम नियम से टायलेट जाना. दोनों वक्त दांत साफ करना. दोनों वक्त नहाना. सोने और खाने से पहले हाथ मुंह धो लेना. मन लगाकर खाना. मन लगाकर पढ़ना और मन लगाकर सोना. फिर मन लगाकर दूसरों से बतियाना-गपियाना. इलेक्ट्रानिक और वैचारिक जंजाल से मुक्ति. न टावर, न मोबाइल, न लैपटाप, न डाटाकार्ड, न डोंगल, न मेल, न चिकचिक, न किचकिच, न क्रांति, न आंदोलन, न कांय कांय न भांय भांय. मैं किताबें पढ़ता और किताबों के चरित्रों घटनाओं के हिसाब से प्रेम, घृणा, करुणा, हिंसा, जुगुप्सा, निराशा के भावों में डूबता उतराता रहता. बहुत दिनों बाद ऐसा होना मेरे लिए किसी क्रांति से कम न था.

जेल में किताबों के साथ गुजरे अच्छे दिनों की याद करते करते एक प्रिय 'खलनायक' की भी याद आने लगी है. मैं उनसे चिढ़ता और वे मुझसे. वे जेल की लाइब्रेरी के इंचार्ज हैं. बुजुर्ग और सख्त से दिखने-बोलने वाले कैदी हैं. संभवतः सजायाफ्ता होंगे, सो वे पूर्णकालिक जेल कार्यकर्ता हैं. उन्हें लाइब्रेरी का प्रभार दिया गया है. वे हफ्ते में एक बार किताबें लेकर हम लोगों की बैरक में आया करते. जेल पहुंचने के बाद मैंने पता कर लिया था कि किताब पाने की प्रक्रिया क्या होती है. पहले कैटलाग व सादा कागज एक फट्टे से दूसरे के यहां जाता. सादा कागज धीरे धीरे भरने लगता. कैटलाग में उल्लखित किताबों में जो पसंद हों, उसका नंबर कागज़ पर दर्ज कर दिया जाता और खुद का व पिता का नाम लिख दिया जाता. साथ ही किसी एक अन्य किताब का भी नंबर डाल दिया जाता ताकि अगर पहली किताब न उपलब्ध हो तो उसकी जगह दूसरी किताब दी जा सके. कैटलाग व कागज पूरे बैरक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद इन इंचार्ज महोदय के पास जमा हो जाते. पूरे बैरक द्वारा मांगी गई किताबों को लेकर लाइब्रेरी इंचार्ज बैरक में अगले रोज प्रकट होते और किताबों को किसी परिचित के फट्ठे पर सजाकर बैठ जाते. कैदी-बंदी उनके यहां आते और अपनी मांगी गई किताब दस्तखत करके ले जाते.

सामान्य तौर पर किताब इशू होने के चौथे दिन वापसी की तारीख होती लेकिन जो उनके जान पहचान के होते या उनसे विशेष अनुरोध किया जाता तो वे हफ्ते हफ्ते भर तक किताब छोड़े रहते. आमतौर पर पूरे हफ्ते में केवल एक किताब पढ़ने को मिलती. लेकिन किताब कई और लोग भी मंगाते तो अगर मैंने दो दिन में अपनी मंगाई किताब खत्म कर लिया तो किसी दूसरे द्वारा मंगाई गई किताब लेकर पढ़ने लगा, मेरी मंगाई किताब कोई और लेकर पढ़ने लगता.

एक बार मेरी मंगाई किताब दूसरे-तीसरे-चौथे बंदी के हाथों में आते-जाते जब वापसी के वक्त मेरे पास लौटी तो थोड़ी बहुत फट गई थी. मैं फटी किताब देखकर थोड़ा परेशान हुआ कि लाइब्रेरी इंचार्ज महोदय अगर इस हाल में किताब को देखेंगे तो क्या बोलेंगे. मन ही मन तय किया कि मैं किताब लौटाते हुए खुद ही किताब की हालत खराब होने का जिक्र करते हुए सॉरी बोल दूंगा. ऐसा ही किया. लेकिन सफेद टोपी लगाए और सफेद कुर्ता पाजामा पहने लाइब्रेरी इंचार्ज महोदय का पारा तुरंत हाई हो गया. उन्होंने डपटते हुए कहा- ''ये हाल कर दिया, चलो भंडारे, अब तुम्हें भंडारे जाना होगा…'' उन्होंने बकना – हड़काना जारी रखा और बार-बार भंडारे भेजने की बात कहते रहे.

मैं चुपचाप सुनते हुए वापस लौट आया. मुझे कोफ्त आई उन पर. मैं जब फिर उनकी तरफ गया तो एक ड्रामा करने का तय किया. मैंने उनके पास जाकर हाथ जोड़कर कहा- ''प्लीज, भंडारे मत भेजना, मुझे बहुत डर लगता है.'' वे कुछ नहीं बोले, केवल घूरकर देखते रहे. अगले दिन योगा क्लास के दौरान मिले, क्योंकि योगा व लाइब्रेरी का स्थान एक ही है, मैंने वहां भी बोला- ''प्लीज, भंडारे मत भेजना, मुझे बहुत डर लगता है..'' मैंने उनके सामने यह डायलाग अगले कुछ दिनों में तीन चार बार अलग अलग मौकों पर बोला. वे भी समझने लगे कि मैं चिढ़ा रहा हूं.

एक दिन मैंने उन्हें समझाते हुए कहा- ''सर जी, अगर किताब विताब फट जाए तो जुर्माना लगा दें, किताब की कीमत का एक हिस्सा ले लें, किसी को बेवजह डराना, हड़काना, भंडारे भेजने की धमकी देना ठीक नहीं. जिसको किताब इशू की है, वह फटने से खुद ही परेशान होकर सारी बोल रहा है तो उसकी भी स्थिति समझने की कोशिश करें.''

वह मेरी बात सुनकर भड़क गए और लाइब्रेरी से फटी किताब लाकर अपने बगल में बैठे सिपाही उर्फ चीफ साहब को दिखाने लगे, कि देखिए कितना इसने फाड़ डाला और यह बहस करता है, चिढ़ाता है. मैंने भी कहा कि ये किताब फटने पर भंडारे भेजने की धमकी देते हैं, यह गलत है, आखिर आप भंडारे भेजने की बात कहने वाले कौन से अधिकारी हैं? आप किताब फटने पर किताब की कीमत का कोई प्रतिशत जुंर्माने के रूप में वसूल करें और उसे लाइब्रेरी कोष में जमा कर दें, जिससे नई किताबें मंगाई जा सके. खैर, उस चीफ साहब का मुझसे भला क्या मतलब होता, सो उन्होंने मुझे ही तरेरा और ज्यादा न बोलने की सलाह दी. मैं चुप हो गया.

जेल जाने के दौरान ही मुझे वरिष्ठ पत्रकार साथी चंद्रभूषण की एक लिखित सलाह याद आ गई थी कि जब भी जेल जाओ तो अंदर चुप रहने की, मौन रहने की साधना करो, किसी की बात पर किसी भी तरह रिएक्ट न करो, सुनकर अनसुना कर दो. इससे कई समस्याएं खुद ब खुद हल हो जाती हैं. चंद्रभूषण ने इस बात का उल्लेख ''एक नक्सली की डायरी'' में किया है. तब वह बिहार में नक्सल आंदोलन में सक्रिय थे और उसी दौरान पकड़े गए तो जेल भेजे गए थे. जेल में कुछ कामरेड पहले से थे. उन लोगों ने चंद्रभूषण को जेल में घुसते ही मंत्र दिया कि यहां चुप रहना सबसे बड़ी रणनीति है. मेरे जेहन में यह बात दर्ज थी. सो मैंने भी यही करने की कोशिश की.

कई दिन बीतने के बाद मुझे समझ में आया कि डासना जेल की जिस बैरक में हूं, वहां ज्यादातर शरीफ लोग हैं, जो बदमाश भी हैं, वह यहां के सिस्टम के कारण चुपचाप व शराफत से रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं, ऐसे में हम लोग खुलकर बोल बतिया हंस रो सकते हैं. सो, मैंने हर एक से बतियाना और उनके दुख सुख में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और कुछ ही दिनों में सबसे दुवा सलाम होने लगी. लेकिन लाइब्रेरी इंचार्ज महोदय से शुरुआती दो तीन बार जो सामना हुआ, जो साबका पड़ा तो उनकी ऐंठी हुई आवाज, दबंग मुद्रा, तरेरती आंखों के कारण उनको ठीक आदमी नहीं मानने लगा. हालांकि मेरे जेल के कई मित्र कहते कि यार, ये अच्छा आदमी है, पता नहीं तुम दोनों में क्यों नहीं बन पाती. जेल में जितने दिन रहा, लाइब्रेरी इंचार्ज को देखकर मेरा मन खट्टा हो जाता.

अब बाहर आकर सोचता हूं कि शायद मेरे में ही कमी रही होगी जो उस आदमी को टैकल नहीं कर पाया. हर शख्स का एक इगो होता है, अगर उसे समझ लिया जाए और उसके मुताबिक थोड़ा खुद को मोडीफाई कर लिया जाए तो वह आपके साथ नार्मल या फिर अच्छा व्यवहार करने लगेगा. यह और, जेल तो वो जगह है जहां माना जाता है कि दुनिया भर की बुराइयों को धारण करने वाले लोग आते रहते हैं, लंबे समय से सजा काट रहे लोग रहते हैं. सो, इन लोगों की रसविहीन दुनिया में अगर मीठे दो चार बोल बोल दिए जाएं तो उन्हें भी अच्छा लगता है और खुद को भी. अब मुझे अफसोस है कि मैं लाइब्रेरी इंचार्ज को मन ही मन बुरा आदमी मानता रहा और उनसे चिढ़ता रहा. लेकिन उन्हीं के अधीन लाइब्रेरी की किताबें पढ़ पढ़कर मैं आज खुद को पहले से ज्यादा मेच्योर और पहले से ज्यादा पढ़ा-लिखा महसूस कर रहा हूं. थैंक्यू लाइब्रेरी एंड लाइब्रेरी इंचार्ज.

मेरे जेल जाने के सवा महीने बाद भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को जेल भेजा गया तो उन्हें मैंने किताबों से दोस्ती कर लेने की सलाह दी. अनिल ने किताबों से ऐसा मन लगाया कि इसी दुनिया में खो गए. उन्होंने बताया कि उनने भी आधा दर्जन से ज्यादा किताबें पढ़ डालीं. सच में, अगर इतनी किताबें पढ़ने के लिए जेल भेजे जाने की शर्त हो तो आगे भी जरूर जेल जाना चाहूंगा. काश, हम इस कथित आजाद दुनिया में भी इतनी आसानी से इतनी सारी किताबें और इन्हें पढ़ पाने का वक्त पा पाते!

….जारी….


..इसके पहले के तीन भाग पढ़ने के लिए नीचे दिए गए नंबरों पर क्लिक करें…

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इस धारावाहिक उपन्यास के लेखक यशवंत सिंह 68 दिनों तक जेल में रहकर लौटे हैं. उन्हें जेल यात्रा का सौभाग्य दिलाने में दैनिक जागरण और इंडिया टीवी प्रबंधन का बहुत बड़ा योगदान रहा है क्योंकि ये लोग भड़ास पर प्रकाशित पोलखोल वाली खबरों से लंबे समय से खार खाए थे और फर्जी मामलों में फंसाकर पहले थाने फिर जेल भिजवाया. यशवंत जेल में जाकर टूटने की जगह जेल को समझने बूझने और उसके सकारात्मक पक्ष को आत्मसात करने में लग गये. इसी कारण ''जानेमन जेल'' शीर्षक से उपन्यास लिखने की घोषणा उन्होंने जेल में रहते हुए ही कर दी. आप यशवंत तक अपनी बात yashwant@bhadas4media.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. उनसे संपर्क 09999330099 के जरिए भी किया जा सकता है.

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सात तालों में चैन की नींद

जेल में नई व कौतूहलपूर्ण दुनिया से रूबरू हूं

आ गया 'रंगदार'!


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Yashwant Singh Jail

दौ सौ करोड़ रुपये के विज्ञापन घोटाले को मैनेज करने में जुटा हिंदुस्तान प्रबंधन!

: कोर्ट में सरकारी वकील करने लगा लापरवाही : मैनेज करने की इस कवायद का विरोध शुरू : मुख्यमंत्री और महाधिवक्ता से की गई शिकायत : मुंगेर (बिहार) : दैनिक हिन्दुस्तान अखबार का प्रबंधन दौ सौ करोड़ रुपये के सरकारी विज्ञापन के घोटाले को मैनेज करने में जुट गया है. इस घोटाले में अखबार की मालकिन शोभना भरतिया और प्रधान संपादक शशि शेखर से लेकर दर्जनों लोग फंसे हुए हैं. घोटाले की प्रमुख अभियुक्त मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्षा शोभना भरतिया हैं. इसी कारण इस पूरे मामले को रद करने की गुहार हिंदुस्तान अखबार ने हाईकोर्ट में लगाई है.

घोटाले के इस मामले को क्वैश करने के लिए हिंदुस्तान प्रबंधन की तरफ से पटना हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश की अदालत में चल रही है. पटना उच्च न्यायालय में चल रहे इस मामले का नाम कोर्ट की भाषा में ''क्रिमिनल मिसेलिनियस नं.-2951(2012) है. इसी मामले में चल रही सुनवाई को लेकर याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि याचिकाकर्ता के लिए केस लड़ने को राज्य सरकार की तरफ से मिले सरकारी वकील का रवैया सही नहीं है.  अधिवक्ता है, सही तरीके से केस नहीं लड़ रहा है, इसकी शिकायत याचिकाकर्ताओं ने की है.

मुंगेर के वरीय अधिवक्ता और पत्रकार काशी प्रसाद ने मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, बिहार के महाधिवक्ता रामबालक महतो, मुख्य सचिव, गृह सचिव आदि को लिखित रूप में फैक्स और ई-मेल भेज कर सरकारी वकील की शिकायत की है. काशी प्रसाद ने आरोप लगाया है कि इस घोटाले को लेकर जब हाईकोर्ट में सुनवाई हुई तो सरकारी अधिवक्ता ने आर्थिक अपराध से जुड़े मुकदमे में सरकारी पक्ष को सही ढंग से नहीं प्रस्तुत किया, जिससे न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश के 18 सितंबर, 2012 के आदेश में अभियुक्त शोभना भरतिया के पक्ष में वह कानूनी बातें आ गईं जो भागलपुर के जिलाधिकारी के ऐफिडेविट में लिखा ही नहीं गया था. न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश ने 18 सितंबर 12 के अपने आदेश में पैरा-।। में लिखा है कि आवेदिका (शोभना भरतिया) दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर संस्करण को भागलपुर में मुद्रित करने की अनुमति भागलपुर के जिलाधिकारी से प्राप्त कर चुकी हैं और यह तथ्य जिलाधिकारी के द्वारा न्यायालय में दाखिल ऐफिडेविट से स्पष्ट होता है. ((It has been submitted on behalf of the petitioner(Shobhana Bharatiya) that the grievance of the informant is that her newspaper concern was printing Hindi edition of 'Hindustan' in Munger without permission of the District Magistrate, Munger, whereas fact situation is that even the Munger Hindi edition of 'Hindustan' is being printed in Bhagalpur, for which permission has been obtained by the District Magistrate, Bhagalur as is evident from the counter affidavit filed by him.''

भागलपुर के जिलाधिकारी की ओर से इस मुकदमे में पेश ऐफिडेविट में जिलाधिकारी के द्वारा भागलपुर स्थित प्रिंटिंग प्रेस से दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर संस्करण के मुद्रण की स्वीकृति देने से संबंधित कोई बात कही ही नहीं गई है. अभियुक्त ने जिलाधिकारी भागलपुर के समक्ष केवल घोषणा पत्र जमा किया है. विचारणीय है कि किसी भी अखबार के मुद्रण और प्रकाशन की अनुमति केवल प्रेस रजिस्ट्रार (नई दिल्ली) ही दे सकता है. तभी डीएम या एसडीएम प्रकाशक के द्वारा दायर घोषणा-पत्र को प्रमाणीकृत कर सकते हैं.

मुख्यमंत्री और महाधिवक्ता, बिहार को भेजे ई-मेल में अधिवक्ता काशी प्रसाद ने आगे लिखा है कि- ''यदि 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान के सरकारी विज्ञापन घोटाले जैसे आर्थिक अपराध की प्राथमिकी पटना उच्च न्यायालय में सरकार की लापरवाही, खासकर सरकारी अधिवक्ता की लापरवाही, से रद्द हो जाती है, तो बिहार में मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जो आर्थिक अपराधियों के विरुद्ध युद्ध चलाने की घोषणा की है, उस सरकारी मुहिम को जबर्दस्त धक्का लगेगा और आर्थिक अपराधियों का राज्य में मनोबल बढ़ेगा''

स्मरणीय है कि अभियुक्त शोभना भरतिया ने पटना उच्च न्यायालय में मुंगेर के दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले से जुड़ी पुलिस प्राथमिकी को रद्द करने के लिए रिट दायर किया है जिसका क्रिमिनल मिससेलैनियस नंबर 2951।2012 है.

श्री प्रसाद ने आरोप लगाया कि भागलपुर के जिलाधिकारी की ओर से जो ऐफिडेविट दाखिल किया गया है, उसमें अभियुक्त शोभना भरतिया और अन्य अभियुक्तों को बचाने की कोशिश की गई है. जिलाधिकारी, भागलपुर ने ऐफिडेविट में दैनिक हिन्दुस्तान के सरकारी विज्ञापन घोटाले से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्य जैसे वित्त अंकेक्षण विभाग की रिपोर्ट और साक्ष्यों को कोई जगह नहीं दिया है, जिसकी उच्चस्तरीय जांच की आवश्यकता है.

श्री प्रसाद ने मुख्यमंत्री और महाधिवक्ता से अनुरोध किया है कि चूंकि इस मुकदमे में अंतिम सुनवाई अगले सोमवार के बाद किसी भी दिन पटना उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश के न्यायालय में होगी, मुख्यमंत्री और महाधिवक्ता (बिहार) के कार्यालय से ऐसी व्यवस्था की जाए कि सरकारी अधिवक्ता न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश के न्यायालय में सरकारी पक्ष जैसे मुकदमे में आरक्षी उपाधीक्षक और आरक्षी अधीक्षण की पर्यवेक्षण टिप्पणी और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य को, जो 200 करोड़ के सरकारी विज्ञापन घोटाले को प्रमाणित करते हैं, को न्यायालय के समक्ष जोरदार ढंग से रखें जिससे न्यायालय को सही निर्णय लेने में मदद मिल सके.

श्री प्रसाद ने यह भी मांग की है कि भागलपुर के जिलाधिकारी को निर्देश दें कि वे पुनः रिज्वाइंडर न्यायालय में पेश करें और विज्ञापन घोटाले से संबंधित दस्तावेजी साक्ष्य जैसे अखबार ने किस प्रकार पटना संस्करण की निबंधन संख्या वर्षों वर्ष तक जालसाजी और धोखाधड़ी करके मुंगेर हिन्दुस्तान संस्करण में लिखता रहा और जब जांच शुरू हुई, तो अखबार ने आवेदित लिखना शुरू किया, को पेश करें. श्रीप्रसाद ने मुख्यमंत्री और महाधिवक्ता को न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश के न्यायालय के 18 सितंबर, 2012 के आदेश और जिलाधिकारी, भागलपुर के ऐफिडेविट की प्रतियां भी अवलोकन के लिए भेजी है.

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. श्रीकृष्ण प्रसाद से संपर्क 09470400813 के जरिए किया जा सकता है. इस घोटाले से जुड़ी अन्य खबरें और श्रीकृष्ण प्रसाद के अन्य आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें– भड़ास पर श्रीकृष्ण प्रसाद