अमर उजाला, मैनपुरी से बलराम शर्मा की विदाई

अमर उजाला, मैनपुरी खबर है कि बलराम शर्मा को बाहर कर दिया गया है. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि उन्‍होंने खुद इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. बलराम आगरा से मैनपुरी भेजे गए थे. इसके पहले शरद शंखदार मैनपुरी के ब्‍यूरोचीफ थे, जिन्‍हें कुछ शिकायतों के बाद हटाकर बलराम को भेजा गया था. अब बलराम की जगह सेकेंड मैन के रूप में काम देखने वाले प्रदीप चौहान को मैनपुरी का प्रभार दे दिया गया है.

प्रसार भारती में अब एसएससी करेगा भर्तियां

नई दिल्ली। प्रसार भारती में तकनीकी सहायकों, इंजीनियर्स, प्रोडक्शन असिस्टेंट सहित कई पदों की भर्ती अब कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) करेगा। दूरदर्शन एवं आकाशवाणी में लंबे समय से भर्ती नहीं होने से हर विभाग में कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी हो गई है।

दूरदर्शन एवं आकाशवाणी में अभी तक पदों की भर्ती विभागीय परीक्षाओं अथवा संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से होती रही है। गृह मंत्रालय की ओर से विज्ञप्ति होने वाले एसआई, सिपाही के पदों और एफसीआई में सहायक के पदों पर भर्ती की शुरूआत के बाद अब प्रसार भारती से जुडे पदों को भी भरने की जिम्मेदारी एसएससी को मिली है।

एसएससी की ओर से इसी महीने प्रसार भारती में एक हजार इंजीनियरिंग सहायकों के साथ 300 तकनीकी सहायकों के पदों पर भर्ती की घोषणा होगी। आयोग की ओर से इन पदों के लिए बीटेक इलेक्ट्रानिक्स के साथ बीएससी इलेक्ट्रानिक्स, बीटेक आईटी शैक्षिक योग्यता होगी। इन पदों की भर्ती के साथ ही प्रसार भारती में अधिशासी, ट्रांशमिशन अधिशासी एवं प्रोडक्शन अधिशासी के पदों पर भर्ती होगी। इन पदों की घोषणा मार्च में की जाएगी। [kk]

‘लोकसत्य’ बंद होने की खबर सही नहीं : राहुल शर्मा सरस

सेवा में, संपादक भड़ास 4 मीडिया डॉट कॉम, आपकी वेबसाइट पर एक खबर की सूचना मिली है जिसमें लोक्सत्य अखबार बंद होने की बात कही गई है। जो की बिलकुल निराधार और अतार्किक है। आपको जिन किन्ही सूत्रों द्वारा भी यह झूठी खबर मिली है वह बेबुनियाद है। लोक्सत्य में किसी भी कर्मचारी का न तो पिछला वेतन बकाया है और न ही अखबार बंद होने जैसी कोई खबर भी है।

आपने बिना किसी सत्यता की जाँच के अनाप शनाप मुझ पर और मेरे सहयोगी अनूप प्रसाद राय पर पैसा बनाने का जो आरोप लगाया गया है उससे पत्रकारिता की छवि को आघात पहुंचा है। कृपया आप अपने सूत्रों से यह भी पता लगवाकर बताएं की हमने कहाँ कहाँ कितना पैसा दबा रखा है। मैं पूर्णतया इस खबर का खंडन करता हूँ और आपसे आग्रह करता हूँ कि लोकसत्य अखबार बंद होने की खबर को भड़ास  4 मीडिया डॉट कॉम से तुरंत हटाने का कष्ट करें।

संपादक
राहुल शर्मा सरस
लोकसत्य
dainikloksatya@gmail.com

निलंबित पुलिस अधीक्षक राजेश मीणा का अस्पताल जाना जेल से बचने का पैंतरा तो नहीं?

राजस्थान में अजमेर शहर के निलम्बित पुलिस अधीक्षक राजेश मीणा की प्रारंभिक मेडिकल जांच रिपोर्ट से लगता है कि वो जेल जाने से बचने के लिए जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक मीणा की सीटी स्केन, एमआरआई, किडनी, हार्ट, लीवर, खून, ईएसआर (संक्रमण) लगभग सभी जांचें सामान्य हैं। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अधिकारी रिपोर्ट के इंतजार में हैं कि मेडिकल बोर्ड मीणा की बीमारी को लेकर कब क्लीनचिट देगा। जिससे मीणा को वापस जेल भेजा जा सके।

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो सूत्रों का कहना है कि मीणा के सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती होने से प्रकरण की जांच ठीक से नहीं हो पा रही है। अस्पताल के ट्रोमा वार्ड में भर्ती मीणा को मीडिया या अन्य लोगों से मिलने नहीं दिया जा रहा। लेकिन चर्चा है कि पुलिस सेवा के कुछ बड़े अधिकारी मीणा से आमजन की तरह बिना सुरक्षा गार्डो के मिल रहे है। जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के प्रवक्ता डॉ.राजेश शर्मा ने बताया कि बोर्ड ने रिपोर्ट के लिए दो दिन का समय मांगा था जिसकी अवधि आज गुरूवार को पूरी हो गयी। बोर्ड की रिपोर्ट में मीणा को कोई ऐसी बिमारी नहीं मिली है जिसका अजमेर में उपचार न हो सके।

पुलिस थानों से बंधी वसूलने के मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो अब राजस्थान लोक सेवा आयोग की भी नब्ज टटोलेगी। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने राजस्थान लोक सेवा आयोग के एक आला अधिकारी को भी अनुसंधान के दायरे में ले लिया है। एक टीम जल्द ही उनके बयान दर्ज करेगी। भ्रष्टाचार के मामले में इस आयोग अधिकारी का नाम भी सामने आया है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के शिकंजे में फंसने से पहले दलाल रामदेव 2 जनवरी को आयोग के इस आला अधिकारी के बंगले में बैग लेकर गया था। करीब पौन घंटे बाद रामदेव बंगले से खाली हाथ बाहर निकला था। दलाल रामदेव आयोग अधिकारी के घर में जो बैग लेकर घुसा उसमें क्या था? वह उसे बंगले में क्यों छोड़कर आया? अधिकारी और दलाल के क्या संबंध हैं? अधिकारी के बयान दर्ज करके भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो इनके जवाब मांगेगा।

रमेश सर्राफ की रिपोर्ट.

नोएडा से जल्‍द लांच होगा नेशनल चैनल ‘न्‍यूज प्‍लस’

मीडियाकर्मियों के लिए बड़ी खबर है. एंजल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड एक नेशनल न्‍यूज चैनल लांच करने जा रहा है. 'न्‍यूज प्‍लस' के नाम से लांच होने जा रहे इस चैनल में सारी तैयारियां लगभग अंतिम चरण में हैं. पत्रकारों तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों की भर्ती भी शुरू हो चुकी है. नोएडा के सेक्‍टर 110 में इस चैनल का ऑफिस तैयार हो रहा है. संभावना है कि मार्च में इस चैनल की लांचिंग कर दी जाएगी. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन बड़े पत्रकारों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है.

एंजल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के मालिक बृजेश कुमार हैं. मूल रूप से गाजीपुर के रहने वाले बृजेश कुमार का रियल एस्‍टेट का व्‍यवसाय है. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन चैनलों की भेड़चाल में शामिल होने की बजाय कंटेंट के माध्‍यम से अपनी एक अलग पहचान बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है.

साक्षी जोशी उर्फ साक्षी कापड़ी अभी तक आईबीएन7 में कार्यरत हैं?

साक्षी जोशी उर्फ साक्षी कापड़ी के आईबीएन7 से कार्यमुक्त हुए कई महीने हो गए पर ये खुद नहीं मानतीं कि वे आईबीएन7 में नहीं हैं. इन्होंने फेसबुक और ट्विटर पर अपने एकाउंट पर लिख रखा है कि अभी भी वे आईबीएन7 में कार्यरत हैं. खुद के बारे में गलत सूचना फेसबुक और ट्विटर जैसे माध्यमों पर डालना भले ही कोई कानूनी अपराध न हो लेकिन यह सोशल मीडिया यूजर्स के साथ धोखा तो है ही.

उम्मीद है साक्षी अपने दोनों एकाउंट को अपडेट करेंगी और अगर अनुचित न लगे तो अपने फालाअर्स-फ्रेंड्स को बताएंगी कि वे आईबीएन7 से हटने के बाद क्या कर रही हैं. मजेदार ये है कि अगस्त महीने में आईबीएन7 से हटीं साक्षी अपने फेसबुक और ट्विटर एकाउंट को लगातार अपडेट कर रही हैं, कवर फोटो बदल रही हैं, खुद की सुंदर सुंदर तस्वीरें डाल रही हैं पर यह सूचना नहीं अपडेट कर रही हैं कि वे अब आईबीएन7 में वर्तमान नहीं बल्कि भूतपूर्व हो चुकी हैं.

नीचे साक्षी के ट्विटर व फेसबुक एकाउंट के कुछ स्क्रीनशाट्स इस बात के गवाह हैं. आईबीएन7 से जुड़े वरिष्ठ लोगों ने इस बात की तस्दीक की कि साक्षी जोशी का कई महीने पहले इस चैनल से नाता टूट चुका हैं. भड़ास4मीडिया ने जब आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष से पूछा कि क्या साक्षी जोशी को दुबारा आईबीएन7 में रख लिया गया है तो उन्होंने इस बात से इनकार किया.

मतलब साफ है. साक्षी जोशी अपने बारे में सही जानकारी छुपा रही हैं. या संभव है, वह फेसबुक ट्विटर पर अपनी नौकरी की वर्तमान स्थिति के बारे में अपडेट देने की बात भूल जा रही हैं.  उम्मीद है भड़ास4मीडिया द्वारा ध्यान दिलाए जाने के बाद वे ट्विटर व फेसबुक दोनों एकाउंट पर अपने से संबंधित गलत सूचना को ठीक कर लेंगी और एक पत्रकार के बतौर खुद की स्थिति/स्टेटस के बारे में दुनिया सच-सच बता देंगी. साथ ही, अगर चाहें तो इस गंभीर गल्ती /  त्रुटि / चूक / भूल… जो भी हो, की तरफ ध्यान दिलाने पर वह भड़ास के प्रति आभार जता सकती हैं. 


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सबसे तेज : प्रधानमंत्री अर्जुन मुंडा का इस्‍तीफा!

काम का दबाव हो या जानकारी का अभाव पत्रकारों के लेखन में शाब्दिक नहीं बल्कि तथ्‍यात्‍मक गलतियां दिखने लगी है. पाठक भी अब उतना ही तेज और समझदार हो गया है. एक पाठक ने हिंदुस्‍तान की गलती को इंगित किया तो दूसरे पाठक ने आजतक के पोर्टल पर तथ्‍यात्‍मक त्रुटि को भेजा है. झारखंड के मुख्‍यमंत्री अर्जुन मुंडा ने इस्‍तीफा दिया इस खबर में अर्जुन मुंडा को प्रधानमंत्री लिखा गया है. अब इस खबर में सबसे बड़ी गड़बड़ी जानकारी की दिखती है. क्‍योंकि आज देश को पता है कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं. और ये बात इसलिए नहीं पता है कि उन्‍होंने जनता के लिए कोई अलग या अच्‍छा काम कर दिया है बल्कि इसलिए पता है कि अमेरिका से जुड़े मामले को छोड़कर किसी भी मामले पर चुप रहने वाला आदमी ही प्रधानमंत्री है.

मीडिया पर वैसे भी आरोप लगते रहते हैं कि वह अब आंदोलन को बढ़ाने-घटाने की हैसियत रखने लगा है. वो आंदोलन करवाने लगा है. इसके लेकर ही तमाम एडवायजरी जारी हो रही है. अगर सरकार को यह पता चल गया कि मीडिया अब अपने पसंद के लोगों को पीएम और सीएम बनवाने लगा है तब तो मुसीबत और बढ़ जाएगी. खैर आप भी देखिए प्रधानमंत्री अर्जुन मुंडा का इस्‍तीफा!

इंदौर के पत्रकारों को कल बंटेगी बीमा पॉलिसी

इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब सदस्यों के लिए लागू की गई दुर्घटना बीमा योजना पॉलिसी का वितरण एवं स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का आयोजन रविवार १३ जनवरी को प्रात: १०.३० बजे इंदौर प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर सभागृह में किया गया है। इस अवसर पर स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया, अपेक्स बैंक के अध्यक्ष भंवरसिंह शेखावत, संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवाएं डॉ. शरद पंडित एवं संयुक्त संचालक जनसंपर्क अशोक कुमार मिश्रा प्रमुख रूप से उपस्थित रहेंगे।

इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल एवं महासचिव अरविंद तिवारी ने बताया कि इंदौर प्रेस क्लब में अपने सदस्यों के लिए दो-दो लाख रुपए धनराशि का दुर्घटना एवं मृत्यु बीमा कराया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान एवं जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने इंदौर प्रेस क्लब की इस अभिनव पहल का स्वागत किया है। उन्होंने बताया कि हर्बल लाइफ के सहयोग से सदस्यों का स्वास्थ्य परीक्षण शिविर भी आयोजित किया गया है। शिविर प्रात: ०९ बजे से शाम ०५ बजे तक जारी रहेगा। इंदौर प्रेस क्लब ने अपने सदस्यों के लिए शहर के चुनिंदा मेडिकल स्टोर्स से एवं होटल्स से भी रियायत का अनुबंध किया है।

कुछ अलग : 1969 में पैदा हुए थे गांधी जी, मुरादाबाद में हिंदुस्‍तान की खोज

अखबार और लेखन की दुनिया में छोटी-मोटी गलतियां होती रहती हैं, जिसे स्लिप ऑफ पेन कहा जाता है. ये अक्‍सर सभी से हो जाती है. हमसे तो रोज ही होती है, जिस पर संपादक जी डांटते-फटकारते रहते हैं. बहुत कम पत्रकार होते हैं जो स्लिप ऑफ पेन की गलतियों से बच पाएं होंगे. पर कुछ स्लिप ऑफ पेन खबरों को तो हास्‍यास्‍पद बनाते ही हैं, इतिहास भी बदल देते हैं. साथ लिखने वाले के सामान्‍य ज्ञान की भी जानकारी देते हैं. ऐसा ही एक वाकया घटित हुआ है हिंदुस्‍तान, मुरादाबाद में. हिंदुस्‍तान में एक खबर फ्रंट पेज पर प्रकाशित हुई है. जिसे लिखा है सिटी इंचार्ज आशीष त्रिपाठी ने.

त्रिपाठी जी ने लाल बहादुर शास्‍त्री एवं गांधी जी बीच के संयोग पर खबर तो ठीक ठाक लिखी है. 'कुछ अलग' कॉलम में लिखी गई इस खबर में कुछ अलग करने के लिए उन्‍हें गांधी जी की जन्‍म साल ही बदल दिया है. अमूमन किताबों में गांधी जी का जन्‍म 2 अक्‍टूबर 1869 में हुआ बताया जाता है. मैं तब पैदा नहीं हुआ था इसलिए विश्‍वास के साथ नहीं कह सकता कि ये ही जन्‍म साल गांधी जी का रहा होगा. पर किताबों पर थोड़ा भरोसा कर सकते हैं इसलिए मैं भी इस पर भरोसा कर लेता हूं.

पर आशीष त्रिपाठी ने सचमुच कुछ अलग कर दिखाया है. उन्‍हें इन किताबों पर कतई भरोसा नहीं है. उन्‍होंने गांधी जी के सौ साल बाद पैदा होने की जानकारी दी है. उन्‍होंने खबर में गांधी जी के जन्‍म का साल 1969 लिखा है. अगर ये एक बार लिखा होता तो माना जा सकता था कि ये गलती होगी, पर ये दो जगहों पर लिखा गया है, इसलिए मैं भरोसा कर सकता हूं कि उन्‍होंने काफी खोज के बाद ही गांधी जी के जन्‍म के साल को लिखा होगा. मैं उनके इस खोज के लिए बधाई भी देना चाहूंगा. आप भी बधाई दें आशीष भाई को इस नई खोज के लिए.    

अमर उजाला, ग़ाज़ियाबाद को छठा झटका, भारत भास्‍कर गए

अमर उजाला, ग़ाज़ियाबाद से खबर आ रही है कि यहाँ के वैशाली ब्यूरो में तैनात जूनियर रिपोर्टर भारत सिंह ने प्रबंधन को अपना इस्तीफ़ा सौंपकर भास्कर समूह का दामन थाम लिया है. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक अभी प्रबंधन ने भारत का इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया है और उनकी मान-मन्नौवल में लगा है. वे अमर उजाला के बरेली और नोएडा संस्करणों को भी अपनी सेवाएँ दे चुके हैं. बताया जाता है कि वे कुछ महीनों पहले नोएडा मेन आफिस से ट्रांसफर होकर यहाँ भेजे गए थे. वे अपने तबादले से खुश नहीं थे.

यह भी कहा जा रहा कि वैशाली ब्यूरो में काम को दरकिनार कर सिर्फ एक जूनियर रिपोर्टर को प्रमोशन देने से कुछ और लोग भी अमर उजाला को छोड़ सकते हैं. दो रिपोर्टर की तो अन्य संस्थानों से बातचीत भी चल रही है. गाजियाबाद अमर उजाला में विनीत सक्सेना के संपादक बनने के बाद से यह आठवां और हाल की उठापटक के बाद अमर उजाला का छठा विकेट गिरा है. जानकारी यह भी मिली है की प्रबंधन ने गाजियाबाद यूनिट को छोड़ कर जा रहे लोगों पर संपादक को नोएडा तलब कर स्पष्टीकरण भी माँगा है.

NHRC ने इम्फाल में पत्रकार की मौत पर रिपोर्ट मांगी

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने अधिकारियों से पिछले माह मणिपुर में पुलिस फायरिंग में हुई एक पत्रकार की मौत पर स्वतंत्र जांच रिपोर्ट की मांग की है। एनएचआरसी के एक कार्यकर्ता ने शनिवार को यह जानकारी दी। एनएचआरसी ने मणिपुर के पुलिस महानिदेशक, जिलाधिकारी और इम्फाल के पुलिस अधीक्षक को निर्देश देकर दिशा-निर्देशों के तहत मामले की जांच के लिए उचित कार्रवाई किए जाने की बात कही है।

आयोग ने नई दिल्ली के मानवाधिकार कार्यकर्ता आर.एच. बंसल और भुवनेश्वर के कार्यकर्ता अखंड द्वारा दी गई दो याचिकाओं के आधार पर यह कदम उठाया है। ओडिशा की मानवाधिकार संस्था 'इंडिया मीडिया सेंटर' के प्रबंधन ट्रस्टी अखंड ने आईएएनएस को बताया, ''आयोग ने दोनों याचिकाओं का समायोजन कर यह कदम उठाया है।'' उन्होंने कहा कि आयोग ने अधिकृत जांच की रिपोर्ट, तहकीकात की रिपोर्ट, अंत:परीक्षण रिपोर्ट और स्वतंत्र जांच रिपोर्ट की मांग की है।

थांगमेईबंद क्षेत्र में गुवाहाटी के एक टीवी चैनल के पत्रकार थंगजम नानाओ सिंह पिछले साल 22 दिसम्बर को हुई पुलिस गोलीबारी में मारे गए थे। मणिपुर फिल्म फोरम के सर्मथकों ने एक पुलिसवाहन में आग लगा दी जिसके  बाद पुलिस की ओर से भीड़ को तितर-बितर करने के उद्देश्य से गोलीबारी की गई थी। (एजेंसी)

जाने माने कवि विनोद कुमार शुक्‍ल को परिवार अवार्ड

मुंबई में शुक्रवार 4 जनवरी 2013 को आयोजित एक साहित्य संगम में जाने माने कवि विनोद कुमार शुक्ल को साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'परिवार' द्वारा परिवार पुरस्कार -2012 से नवाज़ा गया। इस समारोह के ज़रिए साहित्य जगत की दो मूर्धन्य हस्तियों को एक साथ एक मंच पर देखने का सुअवसर भी मिला। शुक्ल को यह पुरस्कार समारोह अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कवि विष्णु खरे के हाथों प्रदान किया गया। पुरस्कार स्वरूप शुक्ल को शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह के साथ एक लाख रुपए की धनराशि भेंट की गई।

वैसे तो इस समारोह में कई जाने माने साहित्यकार उपस्थित थे परंतु एक ही मंच पर साहित्य क्षेत्र की दो महान हस्ती विष्णु खरे और शुक्ल को एक साथ देखना वाकई एक सुखद अनुभव था। इस अवसर पर अपने विचार प्रकट करते हुए विष्णु खरे ने शुक्ल की रचनाओं को निम्न मध्यम वर्ग की त्रासदी, दुःख, यातना और हास्य बोध को अर्थपूर्ण तरीके से अभिव्यक्त करने का ज़रिया बताया। प्रारंभ में निर्णायक मंडल के प्रतिनिधि के तौर पर नंदलाल पाठक ने शुक्ल को कविता के माध्यम से व्यक्ति की स्वतंत्रता और महत्ता को रेखांकित करने वाला कुशल कवि बताया। वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव ने शुक्ल को सादगी से गहरी बात कहने वाला कवि बताया। समारोह में वरिष्ठ पत्रकार एवं कथाकार धीरेंद्र अस्थाना विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे।

कवि विनोद कुमार शुक्ल ने इस सम्मान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और अपनी चुनिंदा कविताएं सुना कर दर्शकों को भाव विभोर कर दिया। इस अवसर पर संस्था के महामंत्री सुरेश चंद्र शर्मा के संपादन में प्रकाशित परिवार काव्य स्मारिका का भी विमोचन किया गया। प्रारम्भ में समारोह के संचालक कवि देवमणि पांडेय ने विनोद कुमार शुक्ल की साहित्यिक उपलाब्धियों का ब्यौरा पेश किया। कवि एवं पत्रकार हरि मृदुल ने शुक्ल के कृतृत्व पर आलेख प्रस्तुत किया।

परिवार के संस्थापक अध्यक्ष रामस्वरूप गाडि़या ने आभार व्यक्त किया। सोमा बैनर्जी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत की गई। निर्मल झुनझनूवाला, सुरेंद्र गाडि़या, राकेश मुरारका, अशोक अग्रवाल, राजेंद्र शाह और राजीव नौटियाल ने अतिथियों का स्वागत किया। समारोह में मुंबई महानगर के प्रमुख लेखक, कवि, पत्रकार और कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

दूसरी ओ मुंबई की कला, साहित्य और संस्कृति की प्रतिनिधि संस्था परिवार की ओर से शनिवार 5 जनवरी 2013 को काव्य उत्सव का आयोजन किया गया। बिरला मातुश्री सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में कवियों ने विविधतापूर्ण रचनाएं पेश की। इनके माध्यम से समाज में व्याप्त दिक्कतों पर हमला किया गया। हरिओम पंवार (मेरठ), तेजनारायण शर्मा बेचैन (मुरैना), देवमणि पाण्डेय (मुंबई) और डॉ. अनु सपन (भोपाल) ने गीत-ग़ज़ल, हास्य-व्यंग्य और समसामयिक कविताओं का पाठ किया। श्रोताओं ने देर रात तक इस कवि सम्मलेन का लुत्फ़ उठाया। काव्य उत्सव का संचालन देवमणि पाण्डेय ने किया।

15 फरवरी के बाद आजतक के कर्मियों की सुरक्षा सरकार के हवाले!

: फिर बंद हो जाएगा मार्निंग पिकअप : दिल्‍ली गैंगरेप के मामले को लेकर दिल्‍ली में महिलाओं की सुरक्षा के मामले को आजतक ने बड़ा जोरदार तरीके से उठाया था. अपने एंकरों को रात के अंधेरों में भेजा, पर यह शोर उस समय ढकोसला लगा जब कटौती के नाम पर मार्निंग पिकअप बंद कर दिया गया था. टीवी टुडे प्रबंधन अपने स्‍टाफ को भगवान भरोसे छोड़ दिया था. शिफ्ट को सात से बढ़ाकर साढ़े सात कर दिया गया था, परन्‍तु जिन लोगों को बाहरी दिल्‍ली या जनकपुरी, उत्‍तमनगर या पूर्वी दिल्‍ली के इलाकों से नोएडा पहुंचना था, उन्‍हें घंटों पहले निकलना पड़ता था.

सर्दी में पांच-छह बजे कितना अंधेरा रहता है इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. खासकर महिला कर्मचारियों के सामने बड़ी समस्‍या थी. सुबह सुबह सुरक्षित ऑफिस पहुंचना. सूत्रों का कहना है कि भड़ास पर खबर आने के बाद टीवी टुडे प्रबंधन ने फिर से मार्निंग पिकअप की व्‍यवस्‍था लागू कर दी है. पर इस से कर्मचारियों को ज्‍यादा इतराने की जरूरत भी नहीं है क्‍योंकि टीवी टुडे सिर्फ 15 फरवरी तक ही अपने कर्मचारियों की सुरक्षा का बोझ उठा पाएगा. यानी मार्निंग पिकअप की व्‍यवस्‍था को 15 फरवरी के बाद बंद कर दिया जाएगा.

सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन की सोच है कि 15 फरवरी के बाद मौसम में सुधार हो जाएगा. छह बजे तक उजाला हो जाया करेगा, फिर खुद नौकरी करने वाले आ जाएंगे. यानी टीवी टुडे अपने कर्मचारियों खासकर महिला कर्मियों की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी 15 फरवरी के बाद सरकार-पुलिस के भरोसे छोड़ देगा. हालांकि ये सारा मसला कुछ महीनों पहले तब से शुरू हुआ है जब से नए हेड ऑफ ऑपरेशंस राहुल कुलश्रेष्ठ ने ज्वाइन किया है. उन्होंने अपनी मोटी तनख्वाह को जस्टिफाई करने के लिये स्टाफ पर होने वाले खर्चे को ही कम करने का फैसला किया है.

महुआ न्यूज़ लाइन में काम करने वालों की राणा यशवंत से गुहार

राणा साहब, इंडिया न्यूज़ जाने से पहले दिलवा दीजिए महुआ न्यूज़ लाइन के स्ट्रिंगरों का हक… भड़ास4मीडिया के माध्यम से मेरा आदरणीय राणा यशवंत जी (ग्रुप एडिटर महुआ मीडिया) से निवेदन है कि कृपया इंडिया न्यूज़ जाने से पहले महुआ न्यूज़ लाइन उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के स्ट्रिंगरों का पिछले एक वर्ष से भी अधिक समय के मानदेय को दिलवा दीजिए जो अभी तक नहीं मिला है.

स्ट्रिंगर किसी भी चैनल का दिल होता है, रीढ़ है,  उसी की वजह से चैनल आगे बढ़ता है लेकिन महुआ ग्रुप ने पिछले एक वर्ष से भी अधिक समय से किसी भी स्ट्रिंगर का भुगतान नहीं किया है. आदरणीय राणा यशवंत जी, हम सब स्ट्रिंगर आपसे निवेदन करते हैं कि कृपया जाने से पहले हम सबका जितना भी खबरों का बकाया है उसका भुगतान करवा दीजिये…. हम सब आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं… हमे यकीन है कि आप एक मीडिया मैन हैं और हम सबका दर्द समझ सकते हैं…

आपका

Kunwar Brijraj Singh

kunwarbrijrajsingh@yahoo.in

कलम के धनी वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश आर्य का निधन

हल्द्वानी : वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश आर्य नहीं रहे. उनका आज निधन हो गया. हल्द्वानी से 'खबर संसार' नामक अख़बार वे निकालते थे. वे दैनिक हिंदुस्तान के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे. उन्होंने ढेर सारे पत्रकारों को ट्रेनिंग दी जो अब बड़े बड़े पदों पर हैं. आर्य पिछले काफी समय से अस्वस्थ थे. परिवार की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी. उनके पुत्र प्रदीप ने उनके द्वारा स्थापित अख़बार को किसी तरह जिंदा रखा. चलने, फिरने, लिखने और बोलने तक से लाचार हो गए थे वे.

इतने भावुक हो जाते थे कि वे अपना अख़बार देख कर रोने लगते थे. नब्बे वर्ष के आसपास आयु होते हुए भी सामाजिक सराकारों से नाता उन्होंने तोड़ा नहीं था. स्वयं लिख नहीं पाते थे तो काफी समय तक अपने बेटे, मित्रों और शिष्यों से लिखवाते रहे. अपनी सोच से वे हमेशा जनवादी रहे. आर्य जी ने सिद्धांतों से समझौता कभी नहीं किया.

अख़बार के दम पर किसी से कोई उपहार तो उन्हें कभी स्वीकार था ही नहीं. कलम के धनी थे. धाराप्रवाह लिखते थे. भाषा उनकी सुसंस्कृत थी और किसी तरह का कोई भय उनके करीब से हो नहीं गुज़रा था. उनके लिए सम्मान इसी से पैदा हुआ. खासकर पहाड़ के लिए तो वे जैसे पत्रकारिता के भीष्म पितामह हो गए थे. उनके निधन की सूचना पाकर तमाम पत्रकार हल्द्वानी स्थित उनके निवास पर पंहुचे. उनका अंतिम संस्कार कल होगा.

इनपुट- जर्नलिस्टकम्युनिटी डाट काम

बहुत जरुरी है भारत पाकिस्तान युद्ध​!

विश्वव्यवस्था कायम रखने के लिए बहुत जरूरी है भारत पाकिस्तान युद्ध​! हम यह कोई पहली बार बोल या लिख नहीं रहे हैं। पहले खाड़ी युद्ध के तुरंत बाद लिखे अपने धारावाहिक उपन्यास `अमेरिका से सावधान' में ​​लगातार इस पर लिखा है। तेल युद्ध के समय से सोवियत अवसान के बाद खासकर वैश्विक व्यवस्था के स्थायित्व के लिए युद्धस्थल इस ​​उपमहादेश में, हिंद महासागर के शांति क्षेत्र में स्थानातंरित होता रहा। मुक्त बाजार की अर्थ व्यवस्था दरअसल विकासशील और ​​अविकसित देशों के प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की व्यवस्था है, जो बाकायदा बहिष्कार और रंगभेद के साथ साथ जलसंहार संस्कृति और मस्तिष्क नियंत्रण के बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है।

अबाध पूंजी निवेश के अर्थशास्त्र के मातहत सत्तावर्ग के क्रयसंपन्न अति ​​अल्पसंख्यक तबके के शिकंजे में फंसे राष्ट्र ने तब से बहुसंख्यक जनता के खिलाफ युद्ध जरी रखा है। इस अभ्यंतरीन युद्ध को वैधता देने के​​ लिए सीमा पर युद्ध भी जरूरी है। साठ के दशक को याद करें, जब हरित क्रांति के माध्यम से पूंजी की घुसपैठ होने ही वाली थी और भारतीय अर्थ व्यवस्था का आधार कृषि परंपरागत तौर पर बहुसंख्यक जनता की आजीविका बनी हुई थी! तब हम बचपन में थे। टीवी, कंप्यूटर, शेयर बाजार और तकनीक से सर्वथा अनजान। तब बलात्कार परिदृश्य क्या किसी को याद है? तब अनाज और तेल के भाव क्या थे?

महंगाई के लिए अक्सर १९७१ की लड़ाई और शरणार्थी समस्या को मुख्य कारक बताने का रिवाज है। पर दरअसल १९६२ और १९६५ की ​​लड़ाई के बाद से ही अर्थ व्यवस्था चरमराने लगी थी। हरित क्रांति के बाद से प्राथमिकताएं बदलने लगी थीं। हिंदुत्व राजनीति का खुला खेल शुरू हो गया था। इसी हिंदु राष्ट्रवाद का चरमोत्कर्ष बांग्लादेश युद्ध में देखने को मिला, जब इंदिरा गांधी को मां दुर्गा का अवतार बना दिया गया और ​​भारतीय राजनीति संघ परिवार के सिद्धांतों के मुताबिक चलने लगी। रक्षा सौदों का सिलसिला चल पड़ा और नवधनाढ्य वर्ग के कारण ईंधन की खपत बढ़ने लगी। पर आज भी अर्थ व्यवस्था की बदहाली के प्रसंग में रक्षा व्यय और राष्ट्र के सैन्यीकरण की चर्चा नहीं होती। १९७१ में याद करें कि कैसे भारतीय सेना बांगालादेश को मुक्त कराने में लगी थी एक ओर तो दूसरी ओर मुख्यतः भूमि सुधार की मांग लेकर शुरू हुए कृषक विद्रोह को कुचलने के लिए देश में सेना का इस्तेमाल हो रहा था।

दरअसल १९७१ का युद्ध ही विलंबित इसलिए हुआ कि तब पश्चिम बंगाल में ईस्टर्न कमान नक्सलियों से निपटने में लगी हुई थी। यहीं नहीं, अस्सी के दशक में आपरेशन ब्लू स्टार और सिख निधन के लिए सिख उग्रवाद को जो जिम्मेवार बताया जाता है, उसके पीछे भी पंजाब में हरित क्रांति की वजह से कृषि उत्पादन लागत अचानक बढ़ जाने और देहात में बेरोजगारी की पृष्ठ भूमि है, जिसे धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की राजनीति ने हिंदुत्व के पुनरुत्थान के वास्ते बखूब इस्तेमाल किया। १९९१ में डा. मनमोहन सिंह के अवतार से पहले तेलयुद्ध में बुरी तरह फंस गयी थी अमेरिकी युद्धक अर्थ व्यवस्था, जिस वजह से २००८ में मंदी आयी और अब फिर फिस्कल क्लिफ है।

भारत के कायाकल्प के लिए नहीं बल्कि अमेरिकी युद्धक अर्थ व्यवस्था की जमानत के लिए विश्वबैंक और अंतरराट्रीय मुद्राकोष के चाकरों ने ग्लोबल हिंदुत्व और जायनवादी ​​ग्लोबल आर्थिक ताकतों की मदद से भारत को मुक्त बाजार में बदलना शुरु किया। इससे पहले इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने सूचना माध्यमों में न केवल कब्जा किया, बल्कि छद्म समाजवादी नारों के साथ अर्थ व्यवस्था की प्रथमिकताएं ही सर्विस और तकनीक को बनाकर भारतीय कृषि और देहात को पलीता लगाना शुरु कर दिया था। इसकी सबसे ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया कृषि प्रधान पंजाबी संस्कृति में हुई। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि नवउदारवादी अर्थ व्यवस्था के प्रस्थानबिंदु और आरक्षणविरोधी आंदोलन व रामजन्मभूमि आदोलन के तार कैसे जुड़े हुए थे। भारत के खुला बाजार बन जाने के बाद बाबरी विध्वंस, भोपाल गैस त्रासदी और गुजरात नरसंहार जैसी घटनाएं हिंदुत्व के ग्लोबीकरण की ही तार्किक परिणति रहीं। अब यह महज संयोग नहीं कि गुजरात नरसंहार के इंद्रदेव इस वक्त मनमोहन का कार्यभार अपने हाथों में लें, इसके लिए बाजार, कारपोरेट​ ​मीडिया, अर्थ शास्त्रियों और अमेरिका, इजराइल व ब्रिटेन में उन्हें विकास पुरुष और उदित भारत के भाग्य विधाता बतौर पेश करने की​  होड़ मची हुई है।​
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​भूमि सुधार का मुद्दा जस का तस है। इसे संबोधित किये बिना कारपोरेट हित में एक मुश्त भूमि अधिग्रहण बिल, खनन अधिनियम, वन ​​अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम जैसे तमाम कानून बदलकर प्राकृतिक संसाधनों पर कारपोरेट कब्जा कायम करने के लिए बहुसंख्यक जनता को जल जंगल जमीन और आजीविका से बेदखल किया जा रहा है। अगर संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूचियों के तहत आदिवासियों और भूमिपुत्रों को सारे अधिकार मिल जायें, अगर भूमि सुधार ईमानदारी से पूरे देश में लागू हो जाये तो इस देश मे नक्सलवादी माओवादी आंदोलन के लिए ​​कोई जमीन ही नहीं बचती और न सलवा जुड़ुमम और तरह तरह के रंग बिरंगे अभियानों के तहत आंतरिक सुरक्षा सीआईए और मोसाद के हवाले करने की जुगत लगानी होगी और न सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून और आतंकनिरोधक कानून की कोई प्रासंगिकता रह जायेगी। इसके उलट भारत अमेरिकी परमाणु समझौते के तहत न केवल भारत देश को परमामु भट्टी में बदल दिया गया, बल्कि हमेशा के लिए इस देश को अमेरिकी युद्धक व्यवस्था से नत्थी कर दिया गया।

अमेरिका के आतंकविरोधी युद्ध में शामिल होकर भारतीय राजनय ऐसी हो गयी कि भारत अब इस महाद्वीप में एक अकेला द्वीप है और अपने पड़ोसियों से सीमा विवाद के अलावा उसके कोई संबंध ही नहीं है। बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों को तिलांजलि देकर वर्चस्ववादी उग्रतम कारपोरेट हिंदू राष्ट्रवाद के युद्धोन्मादी आत्मघाती इंतजामात के बीच हम हमेशा के लिए अमन चैन को अलविदा कह चुके है! इस प्रसंग में यह भी याद रखने लायक है कि अमेरिका और इजराइल के साथ सैन्य गठबंधन हो या फिर भारत अमेरिका परमाणु संधि, पहल संघ परिवार ने ही की। जैसे आर्थिक सुधारों के लिए जरूरी तमाम काम को अंजाम देने में संघी पहल निर्णायक साबित होती रही। खुदरा में विदेशी​​ निवेश का विरोध कर रही भाजपा ने अपनी केंद्र सरकार में बाकायदा विनिवेश मंत्रालय खोल रखा था। तब विनिवेश का जो रोडमैप बनाया ​​गया था, आज भी उसी पर अमल हो रहा है। यही नहीं, जल जंगल जमीन और नागरिक मानव अधिकारों से बेदखली के लिए नागरिकता संशोधन कानून और असंवैधानिक आधार कार्ड योजना के तहत डिजिटल बायोमैट्रिक नागरिकता के जरिये एथनिक क्लींजिंग की शुरुआत भी संघ परिवार ने ​​ही की।

अब भी केंद्र सरकार एक से बढ़कर एक जनविरोधी नीति अमल में लाने का दुस्साहस सिर्फ इसलिे कर रही है क्योंकि संसद में मुख्य प्रतिपक्ष संघ परिवार है और जो सीधे अमेरिका और इजराइल के हितों से जुड़ा हुआ है। क्योंकि इसी पर ग्लोबल हिंदुत्व और उग्रतम हिंदू राष्ट्रवाद का वर्तमान और भविष्य निर्भर है। जैसे एक के बाद एक फर्जी मुद्दे और आंदोलन गढ़कर कारपोरेट मीडिया के खुले सहयोग से हिंदुत्ववादियों ने अल्पमत सरकारों को पिछले दो दशक से विश्व व्यवस्था के हित में संसद, संविधान और लोकतंत्र की हत्या में पूरी मदद की, उसके बिना न आर्थिक सुधार संभव थे और न वैश्विक कारपोरेट व्यवस्था के हित सध सकते थे।

किसी भी धर्म राष्ट्रवाद के उत्थान के पीछे विधर्मियों के खिलाफ निरंतर घृणा अभियान अनिवार्य शर्त है। मनुस्मृति व्यवस्था में जाति के तहत बंटे हुए हिंदू सामाज के एकीकरण के लिए सबसे बड़ी पूंजी यह घृणा है। जो समय समय पर तमाम अल्पसंख्यकों, भाषायी और धार्मिक के विरुद्ध देश के कोने कोने में अभिव्यक्त होती रही है। महाराष्ट्र और असम में संघ परिवार के निशाने पर भाषाई अल्पसंख्यक हैं, देश भर में अनुसूचित शरणार्थी हैं और तमाम तरह के धार्मिक अल्पसंख्यक। उग्रतम हिंदू राष्ट्रवाद से न मुसलमान बचे और न ईसाई, हिंदुत्व से निकले सिख और बौद्ध भी नहीं। इस घृणा के सबसे बड़े प्रतीक हैं बांग्लादेश और पाकिस्तान। हर बंगाली को बंगाल से बाहर और हर शरणार्थी को दशभर में बांग्लादेशी बताकर उनके खिलाफ​ आंदोलन चलाने का संघ परिवार का लंबा इतिहास रहा है। कम से कम सिखों को तो याद होना ही चाहिए कि कैसे अस्सी के दशक में हर ​​सिख को आतंकवादी कहा जाता था। भारत पाक तनाव के परिवेश में तमाम मुसलमानों को पाक समर्थक या आतंकवादी करार देना बांए हाथ का खेल है, जैसे हर आदिवासी इस देश में या तो नक्सली है या फिर माओवादी। हर वामपंथी रूस या चीन का दलाल।

संघ परिवार के लिए हिंदू राष्ट्र के एजेंडा को अंजाम तक पहुंचाना जिस तरह अनिवार्य है, उतना ही अनिवार्य है विधर्मियों के विरूद्ध घृणा अभियान, जिससे अनुसूचित, आदिवासी और पिछड़े अंध देशभक्ति से निष्मात गुजरात की तर्ज पर पूरे देश में हिंदुत्व की पैदल सेना में शामिल हो​​ जायें और समता व सामाजिक न्याय की मांगें भूल जायें, आर्थिक सशक्तीकरण का सपना न देखें और लोकतंत्र का सर्वनाश करते हुए मनुस्मृति व्यवस्था का गुलाम हो जायें हजारों साल के लिए और इसके अलावा भारत अमेरिका परमाणु संधि का जो मुख्य मकसद है, अमेरिकी कंपनियों का भारतीय प्रतिरक्षा आंतरिक सुरक्षा बाजार में एकाधिकार का, वह भारत पाकिस्तान या भारत चीन युद्ध के मार्फत ही पूरा हो सकता है। ​​अमेरिकी पिट्ठू चो चीन के खिलाफ अरसे से छायायुद्ध चला रहे हैं, पर चीनी प्राथमिकताओं में इस गैर जरूरी युद्ध के लिए कोई गुंजाइश ​​नहीं है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी सत्तावर्ग भी अंध धर्म राष्ट्रवाद की शरण में हैं। वह भी अमेरिकी गुलाम है। वहां आंतरिक समस्याएं और​ ​ संगीन हैं। इसी समीकरण पर कारगिल युद्ध संपन्न हो ही गया। अब चूंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिस्कल क्लिफ के जरिये फिर मंदी के ​​चंगुल में है, भारत और पाकिस्तान दोनों देशों पर काबिज धर्म राष्ट्रवाद के लिए वैश्विक व्यवस्था के प्रति अमोघ प्रतिबद्धता साबित करने ​​और घरेलू संकट, आर्थिक सुधारों के एजंडे को अमल में लाने के लिए भारत पाकिस्तान युद्ध से बेहतर कोई विकल्प है ही नहीं।

अब ग्लोबल हिंदुत्व और वैश्विक कारपोरेट मनुस्मृति व्यवस्था के इस फौरी एजंडे को अंजाम देने में लगा है कारपोरेट मीडिया। ​इलेक्ट्रानिक मीडिया तो बड़ी बेशर्मी से धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का रश्मीरथी बना ही हुआ है, सोशल माडिया भी हिंदुत्ववादियों के कब्जे में हैं। ​जनपक्षधधर अभिव्यक्ति के लिए कहीं कोई स्पेस नहीं बचा तो कोई क्या कर लेगा सबसे बड़ी शर्म की बात तो यह है कि वे श्रमजीवी​ ​​ बहुसंख्य पत्रकार जिन्हें न बाजार तरह तरह के उपहार और पुरस्कारों से नवाजता है और न वे बड़े ओहदों पर हैं, जिन्हें हिंदुत्ववादी सत्तावर्ग​​ ने वाजिब वेतन और तमाम सुविधाओं से ही नहीं, मनुष्योचित जीवन यापन से भी वंचित कर रखा है, जिनका वेतन बोर्ड सर्वदलीय सहमति से वर्षों से लटका हुआ है, वे भी सुधार और हिंदुराष्ट्रवाद के एजेंडा को लागू करने के लिए निष्ठापूर्वक युद्धोन्माद भड़काने का पवित्र कर्म कर रहे हैं।

लेखक पलाश विश्‍वास वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

ढाई हजार रुपये लेकर रिपोर्टर बना रहे हैं सीन्यूज वाले (सुनें टेप)

यूपी के गाजीपुर जिले के पत्रकार कृपा कृष्णा उर्फ केके के मोबाइल फोन 9415280945 पर 8726778184 नंबर से एक एसएमएस आया. इस मैसेज में लिखा था कि सी न्‍यूज को पत्रकारों की आवश्‍यकता है. मैसेज पढ़ने के बाद केके ने सी न्यूज में पत्रकार भर्ती का तरीका जानने के लिए मैसेज में दिए गए एक अन्य नंबर 8090077004 पर बात की. उनकी बात सी न्यूज के लखनऊ आफिस में कार्यरत किन्हीं मैडम से हुई जिन्होंने उन्हें समझाया कि ढाई हजार रुपये जमा करिए और पत्रकार बनिए.

केके ने बातचीत पूरी करने के बाद फोन रखा तो तुरंत उनके नंबर पर 9795297129 नंबर से नई काल आई. इस नंबर से बोलने वाला शख्‍स खुद को गाजीपुर सी न्‍यूज ब्‍यूरो चीफ सामू चौ‍रसिया बता रहा था. उसने भी 2500 रुपये की मांग की. केके को समझाया गया कि ढाई हजार रुपये जमा करा लिए जाएंगे और फिर जो आप विज्ञापन देंगे, उसमें एडजस्ट कर लिया जाएगा. दोनों बातचीत को केके ने रिकार्ड कर भड़ास के पास भेजा है, जिसे आपको सुनाया जा रहा है. नीचे जो पहला टेप है, वह केके की लखनऊ में किन्हीं मैडम से बातचीत है. दूसरे टेप में केके की गाजीपुर के शख्स से बातचीत है. सुनिए…

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(सुनें)


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गाजीपुर के पत्रकार केके का भी पत्रकारिता से मोहभंग

सिनेमा देखने निकली युवती के साथ बलात्‍कार होना बाजार के लिए खतरनाक है!

: बलात्कार, बाजार और मीडिया : दिल्ली गैंग रेप को लेकर हुयी अविवादी प्रतिक्रिया में बाजार और बजारू मीडिया की भूमिका को भी समझा जाना चाहिये। एक दलित, गरीब या मजदूरी करने को मजबूर महिला के साथ होने वाला बलात्कार एवं भयानक उत्पीड़न युवा पीढ़ी, मीडिया एवं ​अभिजात वर्ग को क्यों परेशान नहीं करता है। यह समझने की जरूरत है। दिल्ली गैंग रेप पर हुयी प्रतिक्रिया का चरित्र अगर समझ लें तो बाजार का खेल समझ आ जाता है।

एक लड़की अपने प्रेमी के साथ सिनेमा देख कर निकलती है और उसके साथ बलात्कार हो जाता है और उसके साथ ऐसी भयानक बर्बरता होती है। किसी समाज में ऐसी किसी भी हाल में नहीं होनी चाहिये। इसका विरोध होना चाहिये, लेकिन उसी तरह से और उसी जोरदार तरीके से उस बर्बरता का भी विरोध होना चाहिये जो गांवों में, शहरों में अन्य श्रमजीवी, गरीब और दलित महिलाओं के साथ होता है। लेकिन मीडिया, बाजार एवं गुमराह होने वाली युवा पीढ़ी को इन महिलाओं के साथ होने वाली बर्बरता से परेशानी नहीं होती। आखिर क्यों। क्योंकि अपने ब्याय फ्रेंड के साथ डेटिंग पर निकली या अपने दोस्त के साथ रात में सिनेमा देखने निकली युवती के साथ बलात्कार होना बाजार के लिये खतरनाक है।

उस बाजार के लिये जिसमें प्यार—रोमांस और सेक्स से भरपूर फिल्में, विज्ञापन, फ्रेंडशिप कार्ड, ​वेलेनटाइन कार्ड, फैशन के पोशाक, लड़कों एवं लड़कियों को लुभाने के तमाम साजो..समान, मोबाइल फोन, इत्या​दि…इत्यादि शामिल है। अगर ऐसी घटनायें और हो गयी तो प्रेम और सौंदर्य का अरबों..खरबों रुपयों का विशाल बाजार सिमट जायेगा। अगर लडके..लड़कियों का पार्कों में, सिनेमा घरों में, माल्स में, हुक्का बारों में, डांस क्लबों में आना बंद हो गया…डेटिंग बंद हो गयी, वेलेंटाइन डे मनाना बंद हो गया तो फिर इस बाजार का क्या होगा।

मेरा कहने का आशय कतई नहीं कि लड़कियों और लडकों का हाथ में हाथ डाल कर घूमना बंद होना चाहिये या उनके साथ किसी तरह का कोई हादसा होनी चाहिये….लेकिन यह सवाल अवश्य है कि महिलाओं के साथ होने वाले उन अपराधों पर चुप्पी क्यों पसर जाती है जिनमें दलित, गरीब, महेनतकश महिलायें शिकार बनती हैं। क्योंकि उनके साथ कोई अपराध होने से प्रेम, रोमांस और सौंदर्य का वह बाजार प्रभावित नहीं होता जिससे मीडिया भी संचालित होता है और इस बाजार को बचाये रखना मीडिया के हित में है।

लेखक विनोद विप्‍लव वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा पीटीआई से जुड़े हुए हैं.

काटजू ने गुजरात चुनाव में पेड न्‍यूज पर जारी की रिपोर्ट

जबलपुर : भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने गुजरात चुनावों पर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें दावा किया गया है कि हाल ही में राज्य में हुए चुनावों में बड़े स्तर पर पेड न्यूज संबंधी धांधलियां हुईं। काटजू ने यहां मीडिया के सामने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि टीम को गुजरात विधानसभा चुनावों में पैसे देकर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में खबरें प्रकाशित कराने के मामले बड़े स्तर पर मिले हैं। पीसीआई अध्यक्ष यहां जानेमाने वकील विवेक तनखा द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में भाग लेने पहुंचे। (एजेंसी)

ओवैसी समर्थकों ने फिर किया हमला, मीडियाकर्मी घायल

अपने कथित नफरत भरे भड़काने वाले भाषण के लिए विधायक अकबरूद्दीन ओवैसी की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे संदिग्ध एमआईएम समर्थकों ने पुलिस पर पथराव किया। इसमें पांच पुलिसकर्मी और कुछ मीडियाकर्मी घायल हो गए। घटना के बाद ऐतिहासिक चारमीनार के आसपास के इलाकों में तनाव व्याप्त है। पुलिस ने कहा कि चारमीनार के करीब मक्का मस्जिद में शुक्रवार की नमाज के बाद प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया, जिसके बाद पुलिस को भीड़ को तितरबितर करने के लिए आंसूगैस के गोले छोड़ने पड़े।

हैदराबाद के पुलिस आयुक्त अनुराग शर्मा ने संवाददाताओं को बताया कि प्रदर्शनकारियों को तितरबितर कर दिया गया है। स्थिति पर नियंत्रण कर लिया गया है और अब यहां शांति है। पुलिस पथराव की घटना के सिलसिले में मामला दर्ज करने की प्रक्रिया में है। शर्मा ने कहा कि पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। उन्होंने कहा कि पथराव करने वाले लोगों के खिलाफ पुलिस निश्चय ही कार्रवाई करेगी। पुलिस के एक अधिकारी ने कहा कि ऐहतियातन पुराने शहर के सभी संवेदनशील इलाकों में गश्त सघन कर दी गई है। (एजेंसी)

बदायूं में दलालों की बांछें खिली, ओमी को टेस्ट के लिए बुलाया

बदायूं के दैनिक जागरण कार्यालय से अमित सक्सेना के इस्तीफा देकर अमर उजाला चले जाने के कारण पूरे दिन पत्रकारिता के नाम पर माफियागीरी और दलाली करने वाले कथित पत्रकार दैनिक जागरण ज्वाइन करने का सपना देखने लगे हैं. वहीं कोई और रिपोर्टर छोड़ कर न भागे, इसके जागरण ने प्रयास भी शुरू कर दिए हैं.

वर्षों से जागरण को सेवायें दे रहे ओमप्रकाश ओमी को सीनियर ग्रेड देने का आज तक किसी को ख्याल तक नहीं आया, लेकिन आज अचानक उन्हें सीनियर ग्रेड देने का प्रलोभन देते हुए टेस्ट के लिए बरेली बुला लिया गया. दोहरे व्यवहार के चलते ही वह एक बार जागरण छोड़ कर हिन्दुस्तान भी चले गये थे. शांत स्वभाव के वरिष्ठ रिपोर्टर ओमी सिर्फ काम से ही मतलब रखते हैं. चापलूसी न करने के कारण उनके प्रमोशन पर आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया, जबकि उनके जूनियर कमलेश शर्मा को सीनियर ग्रेड देते हुए नियमित भी कर दिया गया है.

उधर, लखनऊ, दिल्ली और बरेली से प्रकाशित होने वाले तमाम अखबारों की दस-दस प्रतियों की एजेंसी लेकर दलाली करने वाले तथा-कथित पत्रकारों की बदायूं में फ़ौज खड़ी हो गई है. जागरण में जगह खाली होने के कारण दलाली करने वाले पत्रकारों ने जागरण के ब्यूरो चीफ की परिक्रमा शुरू कर दी है. सूत्रों का कहना है कि ऐसे एक स्वजातीय पत्रकार का ब्यूरो चीफ ने बरेली संपादक के पास बायोडाटा भी भेज दिया है. वहीं मीडिया से जुड़े लोग कहने लगे हैं कि किसी दलाल टाइप व्यक्ति को जागरण ने पत्रकार बना दिया, तो जागरण और भी गर्त में चला जाएगा.

ये देखिए.. गिफ्ट के लिए लगी पत्रकारों की लाइन

नदीम अख्तर : ''मुख्यमंत्री आवास में गिफ्ट लेने के लिए पत्रकारों की लाइन लग गयी। आज शुक्रवार (11 जनवरी 2013) को अर्जुन मुंडा ने अपने सरकारी आवास में पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बुलाया था। वहां खाने-पीने के साथ ही पत्रकारों के लिए गिफ्ट का भी इंतेजाम था। गिफ्ट एक मारूति वैन में लाया गया, तो पत्रकार उस वैन पर टूट पड़े। यह तमाशा देखकर वहां के व्यवस्थापकों ने कहा कि आप लोग लाइन लगा के लीजिए। इस पर पत्रकार मान गये और लाइन में खड़े होकर गिफ्ट लिया।''

नदीम अख्‍तर के फेसबुक वॉल से साभार.

अमित मिश्रा सीधे कांग्रेसी नेता अहमद पटेल द्वारा भास्‍कर में रखवाए गए थे!

: दैनिक भास्‍कर इकलौता अखबार रहा जिसने इस घोटाले से जुड़ी एक भी खबर नहीं छापी : सुधीर चौधरी को लक्ष्‍मी गोयल के कोयला खादान बचाने की मंशा से जी न्‍यूज में लाया गया था : पिछले साल 7 दिसंबर को 'द इंडियन एक्‍सप्रेस' ने छत्‍तीसगढ़ सरकार के बारे में पहले पन्‍ने पर एक विस्‍फोटक रिपोर्ट छापी थी। आशुतोष भारद्वाज की लिखी इस रिपोर्ट की शुरुआत हिंदी टीवी समाचार चैनल सहारा समय द्वारा मई 2010 में राज्‍य सरकार को दिए गए पांच सूत्रीय एक कारोबारी प्रस्‍ताव से होती है, जिसके मुताबिक समाचार बुलेटिन से लेकर टीवी स्‍क्रीन के अलग-अलग हिस्‍सों में छत्‍तीसगढ़ सरकार की योजनाओं, मुख्‍यमंत्री रमण सिंह की रैलियों और सरकार समर्थक खबरों को प्रस्‍तुत करने के लिए एक निश्चित रकम मांगी गई थी। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। तीन साल से इस किस्‍म का परस्‍पर समझौता टीवी चैनलों और राज्‍य सरकार के जनसंपर्क विभाग के बीच चला आ रहा था, लिहाजा इस प्रस्‍ताव का स्‍वीकृत होना तय था।

इंडियन एक्‍सप्रेस का दावा है कि उसके पास टीवी चैनलों के संपादकों और राज्‍य सरकार के जनसंपर्क विभाग के बीच हुए पत्राचार और समझौतों संबंधी ऐसे 200 पृष्‍ठ के दस्‍तावेज मौजूद हैं जो कारोबार और पत्रकारिता के बीच अनैतिक रिश्‍ते को उजागर करते हैं। जिस समय यह रिपोर्ट छपी, ज़ी न्‍यूज़ द्वारा नवीन जिंदल से कोयला घोटाले में उनका नाम छुपाने के लिए 100 करोड़ की रिश्‍वत मांगे जाने और उसके रिवर्स स्टिंग की चर्चा गरम थी। इसके बावजूद एक्‍सप्रेस की इस बेहद प्रासंगिक रिपोर्ट पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई, बल्कि इसके उलट रमण सिंह की सरकार ने रिपोर्ट को कपोल कल्पित और भ्रामक करार देते हुए अखबार पर आरोप लगा दिया कि अंग्रेजी दैनिक ने उसके विशेषांक निकालने का प्रस्ताव नहीं माने जाने पर चिढ़ के कारण ये आरोप लगाये हैं। राज्‍य सरकार ने कहा कि वह पेड न्यूज़ को कतई बढावा नहीं देती और उक्त अंग्रेजी दैनिक को भी उसी नीति से विज्ञापन मिलते हैं जिसके आधार पर अन्य मीडिया संस्थानों को दिये जाते हैं।

राज्‍य सरकार ने रायपुर में जारी एक बयान में कहा, ''… समय-समय पर छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उसे अल्प अवधि में ही 54.50 लाख के विज्ञापन स्वीकृत किए गए हैं। इसके अलावा जनसम्पर्क विभाग ने वर्ष 2011 एवं 2012-13 में निविदा सूचना पर आधारित लगभग 42 लाख रुपए तथा छत्तीसगढ़ संवाद के माध्यम से विभिन्न निगम मंडलों के तकरीबन 4 लाख 44 हजार रुपए के विज्ञापन दिए तथा लगभग 40 लाख रुपए के वर्गीकृत विज्ञापन जारी किए हैं।'' बयान में आरोप लगाया गया है कि उक्त अंग्रेजी दैनिक का प्रबंधन कपोल कल्पित समाचार प्रकाशित कर यह भ्रामक संदेश देना चाहता है कि छत्तीसगढ़ शासन मीडिया को विज्ञापन देकर उसे अपने प्रभाव में रखना चाहता है जबकि स्वयं वह अखबार भी ऐसे विज्ञापन इस प्रकार की पहल कर हासिल करता रहा है।

सवाल उठता है कि आखिर इस तरह के कारोबारी समझौतों की हकीकत क्‍या है? ध्‍यान रहे कि ज़ी न्‍यूज़ और जिंदल के बीच जो टकराव हुआ और जिसके परिणामस्‍वरूप चैनल के दो संपादक सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया जेल भी गए, उसकी पृष्‍ठभूमि में भी छत्‍तीसगढ़ ही है जहां के रायगढ़ जिले में लंबे समय से जिंदल के स्‍टील संयंत्र के खिलाफ आंदोलन चल रहा है। टीवी चैनलों द्वारा सरकार समर्थक खबर दिखाने के लिए पैसा वसूलने और राज्‍य सरकारों व नेताओं द्वारा उनके कारोबारी प्रस्‍तावों को मंजूरी देने के बीच न सिर्फ घोटालों में संलिप्‍तता को छुपाने की मंशा है (जैसा कि नवीन जिंदल के मामले में बात है) बल्कि इस कवायद के गहरे तार विस्‍थापन विरोधी जल, जंगल और ज़मीन के आंदोलन से भी जुड़े हैं।

पिछले साल 25 अक्‍टूबर को जब नवीन जिंदल ने ज़ी न्‍यूज़ के संपादकों के रिवर्स स्टिंग की सीडी दिल्‍ली की एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में जारी की थी, वहां एक ऐसे शख्‍स की असामान्‍य मौजूदगी थी जिसके बारे में मीडिया में पिछले दो साल से खबरें रुक-रुक कर आती रही थीं। यह सज्‍जन रायगढ़ में रहने वाले 56 साल के आरटीआई कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल थे। याद करें कि उनकी एक दिल दहला देने वाली तस्‍वीर जून 2011 में अखबारों में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्‍हें अस्‍पताल के बिस्‍तर से सिक्‍कड़ से बंधा हुआ दिखाया गया था। उनके ऊपर कुछ बदमाशों ने सरेराह गोली चलाई थी, जिसके बारे में अग्रवाल का आरोप था कि गोली जिंदल ने चलवाई है क्‍योंकि वे लंबे समय से उनके संयंत्र का विरोध कर रहे हैं। ठीक यही बात रमेश अग्रवाल ने 25 अक्‍टूबर को व्‍हील चेयर से जिंदल की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में पहुंच कर मीडिया के सामने उछाल दी जिसके चलते पिछले दरवाज़े से नवीन जिंदल को मुंह छुपा कर भागना पड़ा। प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में हंगामे की यह खबर कई जगह आई थी, लेकिन ज़ी न्‍यूज़ की वेबसाइट पर इसे रायगढ़ और ज़ी न्‍यूज़ ब्‍यूरो की डेटलाइन से छापा गया जबकि अग्रवाल दिल्‍ली में थे (देखें http://zeenews.india.com/news/nation/naveen-jindal-hired-contract-killers-to-murder-me-rti-activist-agrawal_806524.html)।

इन घटनाओं को ज़रा एक साथ रख कर देखिए : दो लाख करोड़ के घोटाले में फंसा एक कारोबारी जो सांसद भी है, एक न्‍यूज़ चैनल जिसका मालिक और संपादक दोनों उसी के संसदीय क्षेत्र से आते हैं, एक आरटीआई कार्यकर्ता जो एक साल बाद अचानक दिल्‍ली पहुंच कर दावा करता है कि उस पर गोली चलवाई गई थी और बाद में एक अखबारी रिपोर्ट जो सारे मीडिया को कठघरे में खड़ा कर देती है- इनके आपसी संबंध को कैसे समझा जाए? मीडिया और सत्‍ता की इस आंखमिचौली में समझने के लिए और भी कई चीज़ें हैं, मसलन कोयला घोटाले के पूरे अध्‍याय में दैनिक भास्‍कर इकलौता अखबार रहा जिसने किसी भी संस्‍करण में इस घोटाले से जुड़ी एक भी खबर नहीं छापी। जिस दौरान सारे अखबारों के पहले पन्‍ने पर और टीवी चैनलों की पहली हेडलाइन में कोयला घोटाला छाया हुआ था, भास्‍कर समूह अपने कॉल सेंटरों के माध्‍यम से हरियाणा के अपार्टमेंट बेचने के लिए पत्रकारों को फोन करवा रहा था। कुछ और पत्रकारों के अलावा एक फोन इस लेखक के पास भी 30 अक्‍टूबर को आया था, जिसमें गुड़गांव और हिसार में दैनिक भास्‍कर समूह के बनाए अपार्टमेंट खरीदने का प्रस्‍ताव दिया गया था।

बताते चलें कि कोयला घोटाले से भास्‍कर समूह के हित गहरे जुड़े हैं क्‍योंकि छत्‍तीसगढ़ के ही धरमजयगढ़ में उसे एक कोयला खदान मिला हुआ है जिस पर स्‍थानीय लोगों के विरोध के बाद काम रुका पड़ा है। भास्‍कर समूह को डर था कि कहीं उसका प्रोजेक्‍ट भी सीबीआई के फंदे में न फंस जाए। ज़ी न्‍यूज़ के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि ठीक यही डर ज़ी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा को भी था, क्‍योंकि इसी समूह के एक और मालिकान लक्ष्‍मी गोयल की पत्‍नी के नाम पर कोई कोयला खदान आवंटित हुआ था और कोयला घोटालेबाज़ों की सूची में उसका भी नाम था। अब ज़रा विस्‍तार से देखिए कि दोनों मीडिया समूहों ने कैसे इस मामले से निपटने की रणनीति बनाई और राज्‍य समेत आंदोलन की ताकत का भी इस्‍तेमाल कैसे किया।

ज़ी के सूत्र बताते हैं कि सुधीर चौधरी को ज़ी न्‍यूज़ में बिज़नेस प्रमुख और संपादक बनाकर लाए जाने के पीछे दरअसल लक्ष्‍मी गोयल के कोयला खदान को बचा ले जाने की मंशा थी, क्‍योंकि सुधीर चौधरी के कांग्रेस की किचेन कैबिनेट के कुछ सदस्‍यों से तथाकथित अच्‍छे संबंध हैं। ठीक यही काम भास्‍कर समूह ने अमित मिश्रा को डिप्‍टी एडिटर के पद पर लाकर किया। भास्‍कर समूह के कुछ अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक अमित मिश्रा सीधे कांग्रेसी नेता अहमद पटेल द्वारा भास्‍कर में रखवाए गए थे, ताकि कोयला घोटाले की खबरों को मैनेज किया जा सके और बदले में भास्‍कर का धरमजयगढ़ प्रोजेक्‍ट बच जाए। संयोग देखिए कि अमित मिश्रा का करियर रिकॉर्ड भी ज़ी न्‍यूज़ तक जाता है। वे कुछ साल पहले ज़ी में काम कर चुके हैं। यह बात अलग है कि कि उनके बारे में मीडिया में कहीं कोई चर्चा नहीं हुई, सिवाय भास्‍कर की आलोचना के कि उसने कोयला घोटाले को क्‍यों अपने यहां दबा दिया। दैनिक भास्‍कर में चूंकि मिश्रा सीधे अहमद पटेल के नॉमिनी थे, इसलिए लेन-देन से जुड़ा कोई मामला सामने नहीं आया। यहां डीलिंग सीधे सरकार के साथ थी।

ज़ी न्‍यूज़ ने गलती यह कर दी कि अपने बिज़नेस प्रमुख को नवीन जिंदल के पास भेज दिया। नवीन जिंदल शुरुआत में 25 करोड़ पर अपने खिलाफ खबरें रुकवाने पर राज़ी हो गए थे, लेकिन शायद चंद्रा-चौधरी-अहलूवालिया की मति मारी गई थी कि उन्‍होंने अगली मीटिंग में 100 करोड़ की मांग कर दी और उलटे जिंदल के स्टिंग में फंस गए। जब 25 अक्‍टूबर को जिंदल दिल्‍ली की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में रिवर्स स्टिंग की सीडी जारी कर रहे थे, रमेश अग्रवाल को अचानक वहां पहुंचा देख कर कई पत्रकारों को आश्‍चर्य हुआ, जो उनकी कहानी से वाकि़फ़ हैं। यह बात ज़ी न्‍यूज़ के भीतर के कई लोगों को भी पता नहीं थी कि ऐसा होने वाला है। अग्रवाल के हल्‍ला मचाने के बावजूद ज़ी के अलावा और किसी मीडिया ने उन्‍हें तवज्‍जो नहीं दी। अगले दिन यानी 26 अक्‍टूबर की सुबह रमेश अग्रवाल को इस लेखक ने फोन किया तो फोन उनके बेटे ने उठाया। परिचय पूछने के बाद उन्‍होंने अग्रवाल को फोन दिया। अग्रवाल के मुताबिक वे दिल्‍ली के राकलैंड अस्‍पताल में अपना इलाज करवने आए हुए थे और 25 तारीख को जिंदल के बंगले पर एक ज्ञापन देने गए थे, जहां अचानक उन्‍होंने पाया कि जिंदल प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर रहे हैं और वे सीधे वहीं चले गए। एक बात समझ में नहीं आती कि जिंदल यदि अग्रवाल पर जानलेवा हमला साल भर पहले करवा चुका थे, जैसा कि अग्रवाल का दावा है, तो उनका ऐसे शख्‍स के पास ज्ञापन देने जाना कितना व्‍यावहारिक जान पड़ता है? रमेश अग्रवाल की उस दिन प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में मौजूदगी अब भी रहस्‍य बनी हुई है, हालांकि इसका प्रत्‍यक्ष लाभ अगर किसी को भी मिलता दिखता है तो वह ज़ी न्‍यूज ही है। जैसा कि शुरुआत में हमने कहा, सत्‍ता और मीडिया के बीच रिश्‍वतखोरी और दलाली का मामला इतना सीधा नहीं है बल्कि इसमें आंदोलनों का भी एक पेंच है, और इसे समझा जाना कहीं ज्‍यादा ज़रूरी है।

दरअसल, सन 2006 में मुख्‍यमंत्रियों के एक सम्‍मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बड़े काम की एक बात कही थी और ऐसे सारे प्रसंगों को समझने की कुंजी वहीं है। मनमोहन सिंह ने मुख्यमंत्रियों को ''मीडिया को कोऑप्‍ट' करने की रणनीति पर काम करने को कहा था। कोऑप्‍ट करना यानी अपने पाले में ले लेना। अब पाले में लेने के लिए क्‍या तरीके अपनाए जाएं, इसे प्रधानमंत्री ने राज्‍य सरकारों की स्‍वेच्‍छा पर छोड़ दिया था। आशुतोष भारद्वाज ने 7 दिसंबर की एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट में जो दावा किया है कि उनके पास 2007 से 2012 के बीच जनसंपर्क विभाग द्वारा बनाई गई मीडिया नीति से संबंधित पांच साल के दस्‍तावेज़ मौजूद हैं, यह अनायास नहीं है। मीडिया को कोऑप्‍ट करने की सरकारों द्वारा सक्रिय कोशिश 2007 से ही संस्‍थागत तरीके से शुरू हुई है, खासकर छत्‍तीसगढ़ के मामले में तो ऐसे साक्ष्‍य हैं ही। सारे प्रसंगों के केंद्र में छत्‍तीसगढ़ के होने की भी एक बड़ी वजह है। वहां 2005 के बाद से जिस तरह आदिवासियों की जीवन स्थिति बिगड़ी है, जिस तरह दोनों प्रमुख पार्टियों की सहमति से सलवा जुड़ुम नाम की कत्‍लोगारत मचाई गई, ग्रीन हंट के नाम पर चुन-चुन कर आदिवासियों को माओवादी बता कर बंद किया गया।

मामला सिर्फ राज्‍य सरकारों को केंद्र द्वारा मीडिया को वश में करने के लिए दिए गए नुस्‍खों तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्रालय समय-समय पर पुलिस विभागों को भी इस संबंध में निर्देश जारी करता है। यदि 2010-11 की गृह मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट पर नज़र डालें, तो अध्‍याय 5 और अध्‍याय 12 में मीडिया के साथ काम करने के संबंध में कुछ काम की बातें दिखती हैं। रिपोर्ट के अध्‍याय 12 के पृष्‍ठ 226 पर एक उपशीर्षक है ''एडवायज़री ऑन मीडिया पॉलिसी ऑफ पुलिस'' जिसके तहत 15 बिंदु दर्ज हैं। 1 अप्रैल 2010 को जारी इस एडवायज़री में पुलिस को साफ निर्देश हैं कि संवेदनशील मुद्दों पर मीडिया के साथ कैसा बरताव किया जाना है। एक तरफ प्रधानमंत्री द्वारा मीडिया को 'कोऑप्‍ट' करने और दूसरी तरफ गृह मंत्रालय द्वारा मीडिया पर दबाव बनाने की सलाह वाली दोहरी रणनीति दरअसल पुरानी 'कैरट एंड स्टिक' नीति का ही नया संस्‍करण है। 'कैरट' के नाम पर मीडिया को विज्ञापन और पेड न्यूज़ दिया जाता है और 'स्टिक' के नाम पर जहां कहीं मीडिया सरकारी हदों को लांघने की कोशिश करे, वहां उसे काबू में रखा जाता है। ऐसी नीति खासकर जम्‍मू और कश्‍मीर, पूर्वोत्‍तर और नक्‍सल प्रभावित राज्‍यों में ज्‍यादा स्‍पष्‍टता से लागू की जाती है जहां सरकारों के प्रति जनता में आक्रोश है। मीडिया भी इस नीति का लाभ किन्‍हीं मामलों में अपने पक्ष में उठाता है, जैसा कि हमने ज़ी न्‍यूज़-जिंदल प्रकरण में पाया है।

इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट पर एक बार फिर लौटते हैं और याद करते हैं कि कैसे छत्‍तीसगढ़ सरकार ने माओवाद संबंधी खबरों का प्रसारण अनुकूलित करने के लिए मीडिया को खरीदने का काम किया। रिपोर्ट के मुताबिक ज़ी न्‍यूज़ के फ्रैंचाइज़ी ज़ी 24, सहारा समय, ईटीवी और साधना न्‍यूज़ समेत कुछ और छोटे क्षेत्रीय व स्‍थानीय चैनल इस कारोबार में लिप्‍त रहे हैं। छत्‍तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग आयुक्‍त एन. बैजेंद्र कुमार का यह बयान 2006 में प्रधानमंत्री द्वारा जारी एडवायज़री की ही पुष्टि करता है, ''नक्‍सलियों का शहरी नेटवर्क मीडिया का इस्‍तेमाल अपनी विचारधारा के समर्थन में करने में सक्षम है, जिसके चलते सरकारी अफसरों के प्रयास और नक्‍सली हिंसा से जुड़ी मानवीय खबरें मीडिया में नहीं आ पाती हैं। इसीलिए इन्‍हें प्रसारित करवाने का काम हम करते हैं।'' ज़ी 24 के संपादक अभय किशोर का भी बयान देखिए, ''हम उनके समक्ष समर्पण नहीं कर रहे, बल्कि विकास संबंधी खबरों के लिए उन्‍हें अपने मंच का बस इस्‍तेमाल करने दे रहे हैं। अगर हम पेड न्‍यूज़ दिखाते, तो तीन साल से यहां पहले स्‍थान पर नहीं बने रहते। हमने सरकार के खिलाफ कई खबरें चलाई हैं।''

अभय किशोर का यह बयान अपने आप में विरोधाभासी है कि बिना पेड न्‍यूज़ दिखाए वे तीन साल से पहले स्‍थान पर बने हुए हैं। बहरहाल, छत्‍तीसगढ़ के मामले में टीवी चैनलों ने वास्‍तव में सरेंडर कर दिया है और इस बात का साक्ष्‍य 2011 की वह घटना है जब ईटीवी छत्‍तीसगढ़/मध्‍यप्रदेश ने रमण सिंह की आलोचना करते हुए एक खबर चलाई थी, जिसकी प्रतिक्रिया में सरकार ने ईटीवी का प्रसारण राज्‍य के अधिकतर हिस्‍सों में रुकवा दिया था। उस वक्‍त ईटीवी सरकार के खिलाफ कोर्ट में भी गया था, लेकिन फिलहाल तो उस पर प्रायोजित खबरों के लिए सरकार से पैसे लेने का आरोप लग चुका है। इस सिलसिले की शुरुआत अनौपचारिक रूप से तो तभी हो गई थी जब सन 2000 में मध्‍यप्रदेश को काट कर छत्‍तीसगढ़ का गठन किया गया था। इसके बाद ही केंद्रीय पर्यावरण राज्‍य मंत्री दिलीप सिंह जूदेव कैमरे पर पैसे लेते पकड़े गए थे। एक ऑस्‍ट्रेलियाई कंपनी को खनन की मंजूरी देने के एवज में उन्‍होंने रिश्‍वत ली थी। इसके बाद राजनांदगांव के एक सांसद प्रदीप गांधी को लोकसभा में सवाल पूछने के एवज में पैसे लेते एक स्टिंग में पकड़ा गया। ये वही नेता हैं जिन्‍होंने 2004 में विधायक के पद से इसलिए इस्‍तीफा दे दिया था ताकि रमण सिंह विधानसभा में जा सकें। इसका पुरस्‍कार भी उन्‍हें मिला और 2008 में पार्टी में उन्‍हें वापस ले लिया गया। ऐसे मामलों की फेहरिस्‍त लंबी है। हाल ही में कनाडा की एक कंपनी ने राज्‍य में नंबर दो पीडब्‍लूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल पर 44 मिलियन डॉलर का ठेका देने के बदले 1 मिलियन डॉलर की रिश्‍वत मांगने का आरोप लगाया था। अग्रवाल तो मुकर गए, लेकिन कंपनी ने अपने दूतावास के माध्‍यम से शिकायत दर्ज करवा दी। ऐसी घटनाएं साफ करती हैं कि प्राकृतिक संपदा की लूट और संघर्ष वाले क्षेत्रों में किस तरह निजी कंपनियों, सरकारों और मीडिया का पूरा नेटवर्क आपसी हितों के लिए काम करता है और सूचना के पूरे कारोबार पर कैसे पूंजी और राष्‍ट्रीय सुरक्षा नीति का दबाव है।

कंपनियों के हित, सरकारों की नीति, मीडिया के लालच और पत्रकारों की दलाली का एक और अहम आयाम है मीडिया के स्‍वामित्‍व का चरित्र। यह बात अलग है कि एनडीटीवी जैसा सबसे साफ-सुथरा दिखने वाला चैनल भी जिंदल को अपना 26 फीसदी बेच चुका है और बदलाव की पत्रकारिता करने का दावा करने वाले एक्‍सप्रेस पर भी रमण सिंह के आरोप हैं, लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से मीडिया में छोटे-छोटे समूह कुकुरमुत्‍ते की तरह उग आए हैं, उन पर बात किए बगैर पेड न्‍यूज़ और कंटेंट-राजस्‍व के समीकरण को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। हाल के दिनों में मीडिया में तीन तरह के लोगों ने उद्यम शुरू किया है- रियल एस्‍टेट, चिटफंड और नेता व उनके सगे-संबंधी। आज तीन सौ से ज्‍यादा चैनल बाज़ार में हैं और अधिकांश घाटे में चल रहे हैं। सत्‍ता समीकरण में अपनी जगह बनाने के लिए कुछ करोड़ की संपत्ति वाले उद्यमी भी इस धंधे में उतर जा रहे हैं, लेकिन चैनलों को टिका नहीं पा रहे। इस संबंध में तहलका ने 15 सितंबर के अपने अंक में एक आवरण कथा ''मीडिया मजूरी'' के नाम से की थी।

इसके लेखक अतुल चौरसिया लिखते हैं, ''चैनलों का अस्तित्व में आना और उनका मुनाफे में तब्दील होना दो अलग स्थितियां हैं। महज कुछ महीनों पहले तक हर वह व्यक्ति न्यूज चैनल का लाइसेंस पा सकता था जिसकी जेब में तीन करोड़ रुपये और एक पीआईबी कार्डधारक पत्रकार हो। अक्टूबर, 2011 में जाकर सरकार ने न्यूज चैनल के लाइसेंस के लिए नेट वर्थ क्राइटेरिया तीन से बढ़ाकर 20 करोड़ किया है, हालांकि सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों की मानें तो अब भी लाइसेंस की इच्छा रखने वालों की कतार छोटी नहीं हुई है… समस्या सरकारी नीति के स्तर पर है। इसने थोक के भाव में लाइसेंस बांट दिए हैं।’'

इस मामले का एक अच्‍छा उदाहरण सन 2011 के नवंबर में शुरू हुआ एक क्षेत्रीय चैनल 'खबर भारती' है जिसका प्रसारण क्षेत्र मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ़ और राजस्‍थान है। इस तरह के कई चैनलों की शुरुआत 2011 में सिर्फ इसी तथ्‍य को ध्‍यान में रख कर हुई थी कि 2013 में मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ और राजस्थान के विधनसभा चुनाव आसन्‍न हैं। चैनल की शुरुआत करने की मंशा ही जब चुनाव के दौरान मिलने वाली पेड न्‍यूज़ और विज्ञापन पर टिकी हो, तो इनका भविष्‍य समझना मुश्किल नहीं है। खबर भारती शुरू करने वाला साई प्रकाश समूह चिटफंड कंपनियां चलाता है। इसके समानांतर खुलने वाले कुछ चैनलों में राष्‍ट्रीय चैनल न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस का नाम ले सकते हैं। इसे चलाने वाला समूह साई प्रसाद नाम का है। इसका काम भी चिटफंड कारोबार ही है और इसका मालिक हत्‍या के एक मामले में मकोका में फंसा है। जीएनएन, एचबीसी, बंसल आदि नाम से कुछ चैनल भी इसी साल खुले और सब के सब बंद होने के कगार पर हैं या भारी घाटे में चल रहे हैं। बहरहाल, ऐसा नहीं है कि सिर्फ सरकारी दबाव और कोऑप्‍ट करने की रणनीति से ही चैनल और पत्रकार बिकने को मजबूर होते हैं।

खबर भारती में संवाददाताओं और ब्‍यूरो प्रमुखों की नियुक्ति ही इस मंशा से की गई थी कि वे मूल कंपनी के चिटफंड कारोबार को संरक्षण दे सकें। इसी का नतीजा था कि अधिकतर ब्‍यूरो प्रमुख कंपनी के चिटफंड कारोबार पर आने वाली दिक्‍कतों को दूर करने और लायज़निंग करने में अपना ज्‍यादा समय बिताते और खबरें देने का काम नहीं करते थे। इसके परिणामस्‍वरूप दस महीने भी नहीं बीते थे कि चैनल खबरों के अभाव में बंद होने के कगार पर आ गया। दिसंबर के आखिरी महीनों में इस चैनल को छत्‍तीसगढ़ सरकार की ओर से 25 लाख का एक विज्ञापन मिला जिसमें दिन में कई बार सरकारी योजनाओं के प्रचार वाली सीडी को चलाने का करार शामिल था। चैनल चलाने वाली मूल कंपनी ने अपनी आर्थिक हालत ठीक करने के लिए मध्‍यप्रदेश के एक मंत्री का सहारा लेकर ऊर्जा के क्षेत्र में सरकार के साथ कुछ करोड़ के एक एमओयू पर दस्‍तखत भी किए हैं। चैनलों की इस तरह की आर्थिकी का ही नतीजा है कि पिछले दो साल के दौरान कई नयूज़रूम आंदोलन का भी गवाह बने हैं। छोटे और मध्‍यम दर्जे के पत्रकार कर्मचारियों ने वेतन और अधिकारों के मुद्दे पर न सिर्फ खबर भारती, बल्कि इंडिया न्‍यूज़ और महुआ चैनल में आंदोलन चलाया है। आइए देखते हैं कि चैनलों के मालिकाने का चरित्र भारत में कैसा है।

ऊपर दी गई सूची में चैनल शुरू करने वाली कोई भी मूल कंपनी मीडिया से संबद्ध नहीं रही है। यह एक बड़ी वजह है कि केंद्र और राज्‍य सरकारों के मीडिया को अपने पाले में करने के रुख और रणनीति के समानांतर मीडिया के खुद बिक जाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। इंडियन एक्‍सप्रेस की 7 दिसंबर और तहलका की 15 सितंबर की रिपोर्ट इस लिहाज़ से आंख खोलने वाली है।

सत्‍ता, मीडिया और निजी पूंजी के इस घालमेल का सबसे बड़ा असर जनता के असल मुद्दों और अधिकारों पर पड़ा है। मुख्‍यधारा का मीडिया, जिसका काम जनता की समस्‍याओं और अधिकारों के दमन को सामने लाना था, वह पूरी तरह सत्‍ता और पूंजी के हितों के आगे बिक चुका है। अगर बीबीसी की एक हालिया रिपोर्ट पर इस संदर्भ में गौर करें, तो आने वाली भयावह स्थिति का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं होगा। बीबीसी ने 'राइट्स एंड रिसोर्सेज इनीशिएटिव' और 'सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ वेस्टलैंड डेवलपमेंट' के हवाले से यह चेतावनी दी है कि आने वाले 15 सालों में बड़ी परियोजनाओं के चलते भारत में संघर्ष और अशांति की आशंका है। देश के कुल 130 जिलों में जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए ऐसे ही आंदोलन चल रहे हैं, हमारा व्यापक समाज और राजनीतिक तंत्र जिनकी उपेक्षा कर रहा है। अगर आम लोगों की आकांक्षाओं और राष्ट्रीय नीतियों के बीच संवाद स्थापित न किया गया और इन मुद्दों का लोकतांत्रिक तरीके से हल न निकाला गया तो जल्दी ही विस्फोटक स्थिति सामने आ सकती है।

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सरोकार और तेवर वाले पत्रकार माने जाते हैं. नियमित लेखन करते हैं, वह चाहे ब्लाग पर हो या अखबार में छपे. उपरोक्त पोस्ट उन्होंने अपने ब्लाग जनपथ पर प्रकाशित किया है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. जनपथ पर टहलने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं– www.junputh.com

देश को नहीं बल्कि खुद को बदलिए सुभाष चंद्रा जी!

: टैगलाइन बदलकर पाप छुपाने की कोशिश : नवीन जिंदल की कंपनी के खिलाफ खबरें दिखाने के नाम पर ब्‍लैकमेल करने का आरोपी जी समूह खुद की रीब्रांडिंग कर रहा है. खुद ब्‍लैकमेंलिंग के आरोपी लोग अब 'सोच बदलो देश बदलो' टैगलाइन के बहाने दूसरों की सोच बदलने और देश बदलने की बात कर रहे हैं. क्‍या सोच बदलकर आम लोग भी ब्‍लैकमेलिंग करने में जुट जाएं. सबसे बड़ी बात है कि जी न्‍यूज खुद ब्‍लैकमेलिंग करने की अपनी सोच में बदलाव लाए. टैग लाइन बदल जाने से जी के मालिकान की सोच बदल जाएगी, ऐसा लगता तो नहीं है. या फिर किसी डील के बाद जी के 'जज्‍बा सोच का' खतम हो गया है.

पिछले दिनों जिस तरह जी न्‍यूज की बनी बनाई या फिर कहें ढंकी छुपी साख सरे बाजार नीलाम हुई उस स्थिति में जी न्‍यूज को अपनी टीम को ही बदलने की जरूरत है. पर यह शायद संभव नहीं है क्‍योंकि जिस तरह के रिकार्ड पुलिस के पास हैं, उसमें लगता है कि पूरी ब्‍लैकमेलिंग की योजना सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका के जानकारी में हुई. सबसे बड़ा सवाल है कि एफआईआर में सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका का नाम दर्ज होने के बाद भी इन लोगों की गिरफ्तारी क्‍यों नहीं हुई. क्‍यों दोनों संपादकों को ही गिरफ्तार किया गया. सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका को इतना मौका दिया गया कि वे कानून के सहारे अपने बचाव का मौका तलाश लें.  

आखिर पुलिस ने उन्‍हें इसलिए अरेस्‍ट नहीं किया कि वे बड़े लोग हैं, मालिक हैं, पैसा वाले लोग हैं, सत्‍ता में इनकी सीधी पकड़ है? यह तो बहुत बड़ा अन्‍याय है. जब दोनों संपादक अपने मालिकों की सह‍मति से ही नवीन जिंदल को ब्‍लैकमेल कर रहे थे तो फिर इन्‍हें गिरफ्तार क्‍यों नहीं किया गया, क्‍यों इन्‍हें बख्‍श दिया गया? क्‍यों इन्‍हें बचने का भरपूर मौका दिया गया? शायद यही अपने देश का कानून और न्‍याय है? आप कमजोर हैं तो आपके साथ ये कानून कुछ भी कर सकता है? और आप पैसे वाले, रसूख वाले हैं तो कानून को अपने तरीके से इस्‍तेमाल कर सकते हैं. जिन लोगों को सलाखों के पीछे जाना चाहिए था वे लोग अब देश बदल रहे हैं.

जी के ब्‍लैकमेलिंग के किस्‍से अब भारत के ज्‍यादातर घरों में पहुंच चुके हैं. अब कितना भी सोच बदले जी न्‍यूज देश उसके प्रति अपना नजरिया नहीं बदल सकता. सोच बदलने की सबसे ज्‍यादा जरूरत तो खुद जी न्यूज के प्रबधंन और बड़े पत्रकारों को है. जेल-अदालत का चक्‍कर काटने के बाद शायद जी न्‍यूज का सोच बदल गया है. पर टैगलाइन बदलने से चरित्र नहीं बदला करता. गधे को कितना भी रंग पोत दें वो रेंकना नहीं छोड़ सकता है. भाई अब और क्‍या क्‍या बदलोगे? 

दिल्‍ली गैंगरेप : रिपोर्टिंग के मामले पर हाई कोर्ट पहुंचे पत्रकार

दिल्ली गैंग रेप मामले में एक स्थानीय अदालत में चल रही सुनवाई की मीडिया में रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध के खिलाफ कुछ पत्रकारों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर कार्यवाही के प्रकाशन की अनुमति मांगी है. सामूहिक बलात्कार के इस मामले में सुनवाई से पहले और सुनवाई के दौरान कार्यवाही की मीडिया में रिपोर्टिंग को लेकर दायर याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार और पुलिस से जवाब मांगा है. इस लड़की की सिंगापुर के अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी.

न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने इस मामले की सुनवाई की तारीख 13 फरवरी तय की है जिससें मीडिया के अधिकार और बलात्कार मामले की सुनवाई में संतुलन बनाने की संभावना पर विचार किया जायेगा. मजिस्ट्रेट की अदालत के सात जनवरी के फैसले के मद्देनजर यह याचिका दायर की गई है. अदालत ने मामले की बंद कमरे में सुनवाई और मीडिया को इसकी रिपोर्टिंग से रोकने का आदेश दिया था. मजिस्ट्रेट के आदेश को बाद में नौ जनवरी को जिला अदालत ने बरकरार रखा था.

पत्रकारों की याचिका को वकील मीनाक्षी लेखी ने मुख्य न्यायाधीश डी. मुरुगेशन की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष कल रखा जिन्होंने निर्देश दिया कि इसे एकल न्यायाधीश के समक्ष ले जाएं. लेखी ने मीडिया को रोकने संबंधी आदेश पर कुछ पत्रकारों की तरफ से याचिका दायर की. उन्होंने कहा, ‘‘पूरा देश मामले की कार्यवाही के बारे में जानना चाहता है और जिम्मेदारीपूर्वक काम करने वाली मीडिया को इससे नहीं रोका जाना चाहिए.’’ (सहारा)

समाचार प्‍लस का विस्‍तार, शीघ्र लांच होगा राजस्‍थान चैनल

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में लोकप्रियता के शिखर पर स्थापित होने के बाद, अब 'समाचार प्लस' चैनल का विस्तार होने जा रहा है। इस नेटवर्क का दूसरा चैनल 'समाचार प्लस-राजस्थान' लॉन्च होने की दहलीज़ पर है। इसके लिए सभी तैयारियां लगभग पूरी की जा चुकी हैं। लुक एंड फील रेडी हो चुका है, न्यूज़रूम, स्टूडियो, पीसीआर-एमसीआर तैयार है और मशीनों का इंस्टालेशन चल रहा है।

मातृ संस्थान 'बेस्ट न्यूज़ कंपनी प्राइवेट लिमिटेड' के स्वामित्व वाले समाचार प्लस न्यूज़ नेटवर्क का ये दूसरा चैनल होगा। पहला चैनल उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के लिए 15 जून 2012 को लॉन्च हुआ था, जो खासा पसंद किया जा रहा है। इस चैनल की कई ख़बरों का बड़ा असर भी हुआ है। एक्जीक्यूटिव एडिटर अतुल अग्रवाल के द्वारा एंकर किया जाने वाला, रात 8 से 9 बजे के बीच प्रसारित होने वाला प्राइम टाइम डिबेट शो 'बिग बुलेटिन' इसका फ्लैग-शिप शो है। इसमें जनता के प्रवक्ता की भूमिका निभाने वाले अमिताभ अग्निहोत्री की तीखी टिप्पणियों को भारी जन-समर्थन हासिल है और राजनीतिक गलियारों में खासी धमक भी है।

वैसे भी प्राइम टाइम न्यूज़ एंकर अतुल अग्रवाल के तीखे तेवरों को राजस्थान के लोग अच्छी तरह से पहचानते हैं क्योंकि वो 'वॉयस ऑफ इंडिया' के राजस्थान चैनल के हैड रह चुके हैं और तब वो चैनल लगातार नंबर वन बना हुआ था। अब उम्मीद की जा रही है कि राजस्थान के दर्शकों के लिए आ रहा ये चैनल 'समाचार प्लस-राजस्थान' भी दर्शकों को काफी पसंद आएगा। इसके लिए आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इच्छुक एवं योग्य कैंडीडेट्स samacharplusrajasthan@gmail.com पर अपना CV और फोटोग्राफ ई-मेल कर सकते हैं।

जागरण से इस्‍तीफा देकर अमित अमर उजाला से जुड़े

बदायूं की पत्रकारिता में अमित सक्सेना की एक अलग पहचान है. राजनीति, गुटबाजी और छिछोरी हरकतों से बिल्कुल दूर रह कर काम करने वाले अमित सक्सेना ने दैनिक जागरण को बॉय-बॉय बोल दिया. उन्‍होंने आज ही बदायूं में अमर उजाला ज्वाइन कर लिया. अमर उजाला के शीर्ष अधिकारियों ने उन्हें आकर्षक वेतन के साथ सम्मानजनक दायित्व देने का वादा किया है. अमित के जाने से दैनिक जागरण की गुणवत्ता में गिरावट आने की संभावना है. असलियत में जागरण के बदायूं कार्यालय में जब से लोकेश प्रताप सिंह ब्यूरो चीफ बन कर आये हैं, तब सभी रिपोर्टर परेशान हैं. उन्होंने पूरे जिले के रिपोर्टर्स की बायलाइन खबर छापनी बंद कर दी है, साथ ही अपने नाम की खबर प्रतिदिन छापते हैं.

वेतन के साथ रिपोर्टर सम्मान भी चाहता है, जिस पर अकेले लोकेश का ही अधिकार हो गया है. वहीं अमित लंबे समय से क्राइम बीत देख रहे थे, लेकिन लोकेश ने क्राइम बीट फोटोग्राफर गिरीश को दे दी. अमित क्राइम बीट से हटने से दुखी नहीं थे, लेकिन उनकी जगह फोटोग्राफर को बीट देने से वह आहत थे, जबकि गिरीश सही से हिन्दी तक लिखना नहीं जानते. सूत्रों का कहना है कि गिरीश के नाम बीट देकर लोकेश स्वयं क्राइम की ख़बरें लिखते हैं, कारण चाहे जो हो, पर मीडियाकर्मियों में यह चर्चा आम हो चुकी है कि आबकारी विभाग क्राइम बीट में आता है, इसलिए क्राइम अहम बीट है.

नशेड़ी इंस्‍पेक्‍टर की बेकाबू कार ने ईटीवी के कैमरामैन की जान ली, छह अन्‍य को रौंदा

: चार की हालत गंभीर : रायपुर में नशे की हालत में तेजरफ्तार गाड़ियां मौत की सबब बनती जा रही हैं…जिससे आए दिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में हादसे होते रहते हैं..एक ऐसे ही हादसे में गुरुवार रात ईटीवी के कैमरामैन संजय दास को अपनी जान गंवानी पड़ी है..राजधानी के तेलीबांधा के एक पोल्ट्री फॉर्म के पास गुरुवार की रात 11 बजे एक तेज रफ्तार कार ने संजय दास सहित सात लोगों को कुचल दिया.. इसमें ईटीवी के कैमरामैन संजय दास की मौके पर ही मौत हो गई..कार आरपीएफ का इंस्पेक्टर राजेश वर्मा चला रहा था.. घायलों में चार की हालत गंभीर है.

दुर्घटना के बाद भीड़ ने पीछा कर इंस्पेक्टर को कार समेत पकड़ लिया और पुलिस को सौंप दिया.. आरपीएफ इंस्पेक्टर नशे में धुत था.. दुर्घटना के बाद संजय दास कार समेत 100 मीटर तक घसीटते चले गए.. इंस्पेक्टर ने यदि मौके पर ही कार रोक दी होती तो शायद संजय की जान बच जाती.. संजय का शव काफी देर तक घटनास्थल पर पड़ा था.. बाद में एंबुलेंस से शव को अंबेडकर अस्पताल भेज दिया गया.. पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया है.. देर रात तक घटना को लेकर गहमागहमी होती रही.

कैमरामैन संजय दास की मौत की खबर मिलने पर अबेडकर अस्पताल पहुंचे कई मीडियाकर्मी रो पड़े.. संजय का अन्य लोगों से अच्छा परिचय था..उसने एक-दो दिन पहले ही फेसबुक में अपना एकाउंट खोला था.. यातायात पुलिस इन दिनों राजधानी में सड़क सुरक्षा सप्ताह मना रही है.. ऐसे में राजधानी में लगातार दो दिन में तेज रफ्तार के कारण दो हादसों ने पुलिस की सुरक्षा सप्ताह की पोल खोल दी है.. घटनाओं से साफ है कि रात में तेज रफ्तार वाहन बेखौफ दौड़ रहे हैं.. खास मौके पर तो यातायात पुलिस देर रात तक तेज रफ्तार वाहनों पर कार्रवाई करती है, लेकिन इन दिनों देर रात तक न तो यातायात पुलिस सड़कों पर नजर आ रही है और न ही उनका इंटरसेप्टर वाहन..ऐसे में संजय की मौत से रायपुर के मीडियाकर्मी काफी आहत हैं.

आरके गांधी की रिपोर्ट.

भ्रष्‍टाचार के आरोपी अधिकारी राजीव कुमार के खिलाफ पत्रकार संजय शर्मा ने पीआईएल दाखिल किया

उत्तर प्रदेश में खुद को बड़े से बड़ा अखबार होने का दावा करने वाले संस्‍थान जहां अखिलेश सरकार की परिक्रमा में लगे रहते हैं। तो दूसरी ओर कुछ ऐसे अखबार भी हैं जो अपनी निष्पक्षता के चलते आम आदमी के मन में जगह तो बना ही रहे हैं साथ ही सरकार को यह आईना भी दिखा रहे हैं कि उसके गलत कृत्यों के खिलाफ बोलने का साहस भी अभी बचा है। कुछ ऐसा ही शुक्रवार को वीकएंड टाइम्स ने फिर करके दिखा दिया।

वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा ने आज उच्च न्यायालय में याचिका दायर करके प्रमुख सचिव नियुक्ति को निलंबित करने संबंधी पीआईएल दाखिल कर दी। इस याचिका पर बुधवार को सुनवाई होनी है। मगर याचिका दायर होते ही सरकार में हडकंप मच गया है। राजीव कुमार सरकार के दुलारे अफसरों में माने जाते हैं। उल्लेखनीय है नोयडा में भूमि घोटाले में नीरा यादव के साथ राजीव कुमार को तीन साल की सजा हुई थी तथा एक लाख रुपये जुर्माना लगाया गया था। इस सजा के होने के समय राजीव कुमार प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर तैनात थे। इस सजा के बाद राजीव कुमार को उनके पद से हटा दिया गया था। सजा के बाद राजीव कुमार ने हाईकोर्ट की शरण ली थी जहां उन्हें स्टे मिला। इसके तुरंत बाद सरकार नें राजीव कुमार को फिर प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर तैनात कर दिया।

सरकार बनते ही जब राजीव कुमार को इस पद पर तैनात किया गया तो केवल वीकएंड टाइम्स ने ही खबर छापी थी कि किसी दागी व्यक्ति को इस पद पर तैनात नहीं किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट के स्टे के बाद जब सरकार ने दुबारा यह तैनाती की तो वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर करके कहा कि राजीव कुमार की सजा को उच्च न्यायालय ने समाप्त नहीं किया है बल्कि उन्हें स्टे दिया है। प्रमुख सचिव नियुक्ति सबसे महत्वपूर्ण पद होता है और वह ही प्रदेश के सभी पीसीएस और आईएएस अफसरों की तैनाती का प्रस्ताव तैयार करता है। ऐसे पद पर किसी दागी अफसर की तैनाती उचित नहीं है।

याचिका में कहा गया है कि जब दो साल की सजा होने पर विधायकों, सांसदों को चुनाव लडने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है तो फिर किसी आईएएस अफसर को तीन साल की सजा होने पर नौकरी करने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है। उन्होंने याचिका में राजीव कुमार को नौकरी से बर्खास्त करने की मांग की है। वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा की इस साहसिक कार्रवाई को कई सामाजिक संगठनों ने सराहा है।

लोकसत्‍य से एनई अजीत का इस्‍तीफा, हिंदुस्‍तान छोड़ेंगे वेद प्रकाश

दिल्ली से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र में शुरुआत से बतौर समाचार संपादक अपनी सेवाएं देने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजीत कुमार पाण्डेय ने इस्तीफ़ा दे दिया है। ज्ञात रहे कि अजीत कुमार पाण्डेय की तुलना यूपी के तेज तर्रार पत्रकारों में की जाती है। विगत कई वर्षों से वह दिल्ली में जमे हुए थे। इसके पहले वे दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिन्दुस्तान में भी अपनी सेवायें दे चुके हैं। खबर है अखबार की अंदरूनी किसी बात से नाराज़ होकर अजीत पाण्डेय ने संस्थान को छोड़ा है। हालाँकि सूत्रों का कहना है कि अखबार की हालत खराब हो जाने के चलते श्री पाण्डेय ने इस्‍तीफा दिया है। दूसरी तरफ उनके कहीं और ज्‍वाइन करने की भी चर्चा हो रही है।

हिंदुस्‍तान, गोरखपुर से खबर है कि सीनियर रिपोर्टर वेद प्रकाश पाठक संस्‍थान से इस्‍तीफा देने वाले हैं। उन्‍होंने संस्‍थान को नोटिस दे दिया है। सूत्रों का कहना है कि वे अपने वरिष्‍ठों के रवैये से नाराज चल रहे थे। वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है।

ये है राजदीप की प्रतिबद्ध पत्रकारिता!!

Prakash Hindustani : वाह राजदीप! वाह!! आज के भास्कर में ओवैसी पर राजदीप सरदेसाई का लेख पढ़ा. सिर चकरा गया! राजदीप ने तो ओवैसी के बारे कुछ भी अच्‍छा नहीं लिखा. उसके सांसद भाई के यहाँ दिल्ली में बोटी-रोटी का ज़िक्र भी. परंपरानुसार तोगड़िया भी आया. अचरज ! घोर अचरज!!!…लेकिन आख़िरी पैरे में आकर राजदीप ने अपना ओवैसी प्रेम भी जाहिर कर ही दिया…..इसे कहते हैं प्रतिबद्ध पत्रकारिता!!!

वाह राजदीप! वाह!! आज के भास्कर में ओवैसी पर राजदीप सरदेसाई का लेख पढ़ा. सिर चकरा गया! राजदीप ने तो ओवैसी के बारे कुछ भी अच्‍छा नहीं लिखा. उसके सांसद भाई के यहाँ दिल्ली में बोटी-रोटी का ज़िक्र भी. परंपरानुसार तोगड़िया भी आया. अचरज ! घोर अचरज!!!…लेकिन आख़िरी पैरे में आकर राजदीप ने अपना ओवैसी प्रेम भी जाहिर कर ही दिया…..इसे कहते हैं प्रतिबद्ध पत्रकारिता!!!

Ramesh Mishra Chanchal : वाह राजदीप! वाह!!

Shishir Shukla : हमने तो कहा था बड़े पत्रकारों की बात पर भरोसा मत करना

K Lal Hindustani : Such people are stooges of certain vested interests

Pushpendra Dubey : bada patrakar vahee hai jo dhol ko dono taraf se acchaa bajanaa jaantaa ho.

K Lal Hindustani : badaa desh drohee

Sandip Naik : अगर यह है प्रतिबद्ध पत्रकारिता, तो पीत क्या है और असली क्या है……..और आगे का सवाल कि किस पर भरोसा करें…………???

Gyanesh Upadhyay : prakash ji, main aapse purntah sahmat hun

बी.पी. गौतम : यूं ही बड़े नहीं हो गये सर

वरिष्‍ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्‍तानी के फेसबुक वॉल से साभार.

तीन महीने से सैलरी नहीं मिली नेशनल दुनिया के कर्मचारियों को, संपादक जी गुजरात गए

आलोक मेहता के संपादकत्‍व में निकलने वाले नेशनल दुनिया से खबर है कि यहां काम करने वाले लोगों को तीन महीने से सैलरी नहीं मिली है. कर्मचारी बहुत परेशान हैं. मकर संक्रांति के बाद स्‍कूल खुलने वाले हैं और बच्‍चों के तीन महीने के फीस जमा करने हैं, लिहाजा बाल बच्‍चों वाले सभी पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारी परेशान हैं. उनके सब्र का बांध टूटता जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि तीन महीने बाद भी सैलरी न मिलने से परेशान डिजाइनिंग, ग्राफिक्‍स तथा मेट्रो एडिशन से जुड़े कम से कम पचास कर्मचारी गुरुवार को संपादक आलोक मेहता के केबिन में पहुंचे तथा पूछा कि उनकी सैलरी कब मिलेगी.

जाहिर है कि कर्मचारियों ने कोई बवाल या लड़ाई झगड़े जैसी बात नहीं की, पर एक समूह के साथ जाकर उन्‍होंने आंशिक रूप से घेराव तो कर ही डाला. क्‍योंकि वे पूरे समूह के साथ संपादक जी की केबिन में घुसे थे और संपादक जी से जवाब चाहते थे. संपादक जी ने स्‍पष्‍ट कुछ नहीं कहा कि कब उनकी सैलरी मिलेगी, पर यह आश्‍वासन जरूर दिया कि बात करके कल बताता हूं. पर ताजा सूचना है कि संपादक जी अपने कर्मचारियों की परेशानियों में शामिल होने या सैलरी मिलने की तिथि बताने के बजाय गुजरात बाइब्रेंट के लिए निकल गए हैं. अमूमन इसमें ज्‍यादातर रिपोर्टर ही जाते हैं, पर परेशानियों से बचने के लिए संपादक जी खुद चले गए.

इधर, खबर है कि संपादक आलोक मेहता के इस रवैये से तमाम कर्मचारी बहुत नाराज हैं. उनका मानना है कि अपनी जिम्‍मेदारी निभाने के बजाय संपादक जी इस मुश्किल से बचना चाहते हैं. सूत्रों का कहना है कि नाराज कर्मचारी अब अखबार में हड़ताल करने की भी योजना तैयार कर रहे हैं. अब तक तो किसी तरह उन्‍होंने इधर-उधर से मांग कर अपना काम चलाया है, पर अब वे देनदारियां तथा बच्‍चों के स्‍कूल की फीस ने इन्‍हें काफी परेशान कर दिया है.

आईबी मिनिस्‍ट्री ने कहा दिल्‍ली गैंगरेप की घटना का नाट्य रुपांतरण न दिखाएं चैनल

नई दिल्ली। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सोनी टीवी को सलाह दी है कि वह अपने शो क्राइम पेट्रोल-दस्तक में दिल्ली में गैंग रेप की घटना का नाट्य रूपांतरण न दिखाएं। मंत्रालय ने सभी टीवी चैनलों को भी इस तरह की एडवाइजरी जारी की है। मंत्रालय ने टीवी चैनलों से कहा है कि वे जमीनी हकीकत की संवेदनशीलता को समझें। गौरतलब है कि क्राइम पेट्रोल-दस्तक में दिल्ली गैंग रेप की घटना का नाट्य रूपांतरण दिखाया जाना था। चैनल का कहना था कि तीन कडियों में गैंग रेप की घटना का नाट्य रूपांतरण दिखाया जाएगा। क्राइम पेट्रोल-दस्तक मशहूर टीवी धारावाहिक है।

इसमें क्राइम की घटनाओं का नाट्य रूपांतरण दिखाया जाता है। कार्यक्रम के प्रस्तोता अनूप सोनी हैं। शो के जरिए उन्होंने भी खूब वाहवाही बटोरी है। दिल्ली में 16 दिसंबर को चलती बस में एक युवती से सामूहिक बलात्कार हुआ था। इस घटना को लेकर देश भर में जमकर विरोध प्रदर्शन हुए थे। गैंग रेप की शिकार युवती का सिंगापुर में निधन हो गया था। साभार : पत्रिका

पराड़करजी की पुण्‍यतिथि पर बनारस में जुटेंगे दिग्‍गज पत्रकार

सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर की पुण्य तिथि 12 जनवरी पर उनकी जन्म और कर्मस्थली वाराणसी में साहित्यकारों और पत्रकारों का जमावड़ा होने जा रहा है। सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर स्मृति न्यास ने पराड़कर स्मृति भवन में स्मृति समारोह का आयोजन किया है, जिसमें 'हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य की जरुरत' विषय पर चर्चा होगी। अपराह्न 3 बजे से होने वाले इस आयोजन की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार काशीनाथ सिंह करेंगे, जबकि मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि और आलोचना के सम्पादक अरुण कमल होंगे।

संयोजक एवं पराड़कर जी के पौत्र आलोक पराड़कर के अनुसार, संगोष्ठी  में प्रसिद्ध साहित्यकार और तद्भव के सम्पादक अखिलेश, वरिष्ठ पत्रकार और समकालीन सरोकार के प्रधान संपादक सुभाष राय, समकालीन सरोकार के संपादक एवं युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय, सोच विचार के प्रधान संपादक जितेन्द्र नाथ मिश्र, काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष कृष्णदेव नारायण राय, युवा कोरियाई विद्वान मो किम विचार सहित कई साहित्यकार, पत्रकार, विचारक विचार व्यक्त करेंगे। 

नईदुनिया खरीद मामले में जागरण को इलाहाबाद हाई कोर्ट से हरी झंडी

: इंदौर हाई कोर्ट में मामला पेंडिंग : नईदुनिया को खरीदने वाले जागरण प्रकाशन लिमिटेड ने बांबे स्‍टाक एक्‍सचेंज यानी बीएसई को जानकारी दी है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नईदुनिया एवं उनके शेयरहोल्‍डर एवं ऋणदाताओं को कंपनी एक्‍ट 1956 के सेक्‍शन 391 से 394 के तहत विचार करते हुए इस सौदे को स्‍वीकृति दे दी है. जबकि मध्‍य प्रदेश में हाई कोर्ट के इंदौर बेंच में यह मामला अभी पेंडिंग है. नीचे इससे जुड़ी खबर. 

Jagran Prakashan – Updates on Scheme of Arrangement

Jagran Prakashan Ltd has informed BSE that the Hon''ble High Court of Judicature at Allahabad has considered and approved the Scheme of arrangement between Naidunia Media Ltd and Company and their respective shareholders and creditors under sections 391 to 394 read with section 78, 100 to 104 of the Companies Act, 1956 ("Scheme"). The Scheme is pending for approval from High Court of Judicature at Madhya Pradesh (Indore bench).

The Scheme shall be effective from the date of filing of certified / authenticated copies of Orders of the High Court with the Registrar of Companies at Uttar Pradesh and Registrar of Companies at Madhya Pradesh, as applicable. (मनी कंट्रोल)

पत्रकारों को बताएंगे कैसे करें सुरक्षा मामलों की रिपोर्टिंग

मद्रास बेस्‍ड प्रेस इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया (पीआईआई) पत्रकारों को राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मामलों में रिपोर्टिंग के बारे में जानकारी देने के लिए दो दिवसीय वर्कशाप आयोजित कर रही है. इस वर्कशाप में सुरक्षा मामलों में किस तरह से रिपोर्टिंग करनी चाहिए इस पर जानकारी दी जाएगी. पीआईआई यह वर्कशाप बंगलोर बेस्‍ड इंस्‍टीट्यूट और कंटेमपोरेरी स्‍टडडीज के सहयोग से कर रहा है. यह वर्कशाप बंगलोर स्थित क्राइस्‍ट यूनिवर्सिटी में 30 और 31 जनवरी को आयोजित किया जाएगा. इस वर्कशाप में रजिस्‍ट्रेशन कराने की फीस साढ़े तीन हजार रुपये हैं.

ईटीवी के संतोष को मिला भिखारी ठाकुर सम्‍मान

भिखारी ठाकुर सांस्कृतिक महोत्सव में बेगूसराय के युवा पत्रकार संतोष कुमार गुप्ता को पत्रकारिता के क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिए "भिखारी ठाकुर सम्मान" से सम्मानित किया गया. यह सम्मान भिखारी ठाकुर के गाँव कुतुबपुर दियारा में आयोजित जयंती समारोह के दौरान प्रदान किया गया. संतोष फिलहाल बेगूसराय में ई टीवी के जिला संवाददाता हैं और गंभीर विषयों पर रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं.

छपरा जिले के रहने वाले संतोष ने अपने करियर की शुरुआत आर्यवर्त अखबार से की थी. बाद में संतोष ने छपरा में ही आज, प्रभात खबर और दैनिक जागरण को सेवा देने के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर अपना रूख किया. डीडी न्यूज़, जी न्यूज़ में काम करने के बाद अब बेगूसराय में ई टीवी को जिला संवाददाता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. संतोष भोजपुरिया समाज को प्रतिष्ठा दिलाने की हर संभव कोशिश करते हैं. संतोष को मिले इस सम्मान से बेगूसराय और छपरा के कई पत्रकारों ने बधाई दी है.

बिना टैम बक्‍सा वाले छत्तीसगढ़ में रेप का मामला भी कोई खबर है क्या?

ये आप भी कहां-कहां की बात सामने ले आते हैं छत्तीसगढ़ वालों..? आपके पूरे राज्य में टैम का एक भी बक्सा नहीं है.. किस मुंह से आप हाई टीआरपी वाले दिल्ली मुंबई की बराबरी करने चले आए..? आप भ्रष्टाचारियों, बलात्कारियों के बीच रह रहे हैं तो इसमें टीवी चैनलों का क्या कुसूर..?

आपके राज्य में इतनी बड़ी नक्सली समस्या है ही.. हमारे चैनलों के सूरमा स्ट्रिंगरों से फुटेज मंगवा कर आपके जंगलों का आंखों देखा हाल दिखा ही देते हैं.. नक्सलवाद ऐसा मुद्दा है जिसमें करोड़ों-अरबों की फंडिंग है.. पब्लिक नहीं तो मिनिस्टर साहब खुश हो ही जाते हैं.. कुछ सरकारी विज्ञापन भी मिल जाते हैं.. महानगरों की पब्लिक के लिये भी जंगल में मंगल टाइप शो हो जाता है.

अब भला आप बताएंगे कि ये 4-5 या 10-12 या फिर 40-42, जैसा भी आप कहें, गरीब आदिवासी बच्चियों के शोषण और बलात्कार की खबर पर कौन ध्यान देगा..? वो भी सरकारी खर्चे पर चलने वाले आश्रम में पलने वाली बच्चियां..? पूरा देश वैसे ही देश के दिल यानी दिलवालों की दिल्ली में हुए हाई टीआरपी वाले बलात्कार मामले को मुद्दा बनाए हुए है.. अब अगर उन्हीं एक्सपर्ट से ऐसी ही दूसरी खबर पर बहस करवाएंगे तो पब्लिक ही मुद्दा रिपीट करने का आरोप लगाएगी या नहीं..? कोई हमारा शो सो कर भी नहीं देखेगा.. सब बोलेंगे ये मखमल में टाट का पैबंद लगा रहे हैं..

अब इसी सबजेक्ट से जुड़ा कोई नया ऐंगिल लाते, कोई हाई प्रोफाइल खबर होती.. मसलन किसी मिनिस्टर की बेटी का पर्स छिना.. किसी बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट की बीवी पर किसी पिकनिक स्पॉट में किसी ने फब्ती कस दी हो.. या फिर किसी महिला आईएएस या आईपीएस को किसी एमपी या एमएलए ने घूर कर देखा हो, तो भी खबर बन जाती.. आपके यहां न फिल्मस्टार हैं, न फैशन डिज़ाइनर और न मॉडल.. ऐसे में किसकी फुटेज दिखाएं, किस पर खबर बनाएं जो कोई देखे.. कुछ तो बताइए..?

वरिष्‍ठ पत्रकार धीरज भारद्वाज के फेसबुक वॉल से साभार.

पत्रकारिता का पेशा आपको बोर नहीं होने देता

Shambhunath Shukla : पत्रकारिता का पेशा आपको बोर नहीं होने देता। कुछ न कुछ करने को हर समय रहता है। भले आप डेस्क पर हो या फील्ड में। रोज नया कुछ करने को है, यह सोच-सोच कर आपके अंदर उत्साह बना ही रहता है। इतना कुछ घूमना है और इतना कुछ जानना है कि एक जीवन कम पड़ जाता है। मैंने १९७२ में बीएससी पार्ट वन करने के बाद ही घर छोड़ दिया था। मुझे लगता था कि घर में रहा तो मैं कुछ भी नया नहीं कर पाऊंगा। या तो परिवार के तमाम लोगों की तरह हल चलाऊंगा या फिर कहीं किसी जगह आढ़त खोलकर बैठ जाऊंगा और यही चिढ़ मुझे एक ऐसे पेशे में ले गई जहां अनंत संभावनाएं थीं और हर जगह के रास्ते खुले थे।

मैं घर से भाग गया और कलकत्ता चला गया लेकिन मेरा दुर्भाग्य कि उस समय वहां नक्सलवाद के नाम पर युवाओं को सरेआम भूना जा रहा था। सिद्धार्थशंकर राय की सरकार थी और अजय मुखर्जी उनके गृह मंत्री। श्याम बाजार, शोभा बाजार, बेंटिक रोड, बहूबाजार, कालेज रोड और बड़ा बाजार में बंगाली छोकरों को पुलिस पकड़कर मार देती। लालबाजार पुलिस हेडक्वार्टर में पुलिस कम एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बैठते थे जिन्हें छोकरों को मार देने में मजा आता था। भाकपा तो खैर सरकार को मदद कर रही ही थी माकपा भी इस मामले में पुलिसिया ज्यादतियों को मूक समर्थन दे रही थी।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ला के फेसबुक वॉल से साभार.

अब नेताओं को भी भाने लगा सोशल मीडिया

इंटरनेट की ताकत और उसके व्यापक प्रभाव को मद्देनजर रखते हुए राजनीतिक दलों और मंत्रियों के बीच विशेष सोशल मीडिया टीम रखने का चलन जोर पकड़ रहा है। दरअसल राजनीतिक दल और उनके नेता सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर चल रही चर्चाओं पर नजर रख रहे हैं, साथ ही अपनी लोकप्रियता का पारा भी देखना चाहते हैं। पूरी कवायद इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।

इस कड़ी में नया नाम जुड़ा है तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चित बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का। खबरों के अनुसार वह एक निजी एजेंसी की सेवा लेंगी जो मीडिया के ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों प्लेटफॉर्म पर नजर रखेगी। वैसे बनर्जी से पहले दूसरे लोग भी ऐसी पहल कर चुके हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ाने और अपने दल और उसके नेताओं पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हो रही टीका-टिप्पणी का जायजा लेने के लिए ऑनलाइन मीडिया टीम की सेवा ले रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेता सोशल मीडिया पर न केवल सक्रिय हैं बल्कि उन्होंने लोग भी नियुक्त कर रखे हैं जो उनकी सामाजिक स्थिति पर नजर रखते हैं। निर्दलीय सांसद राजीव चंद्रशेयर के माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर 1 लाख से अधिक फॉलोअर हैं। अपने अकाउंट के प्रबंधन के लिए उन्होंने छह लोगों की एक टीम तैयार कर रखी है जो जनता के मूड और राजनीतिक हवा का जायजा लेती है। आम तौर पर राजनीतिक दल परंपरागत मीडिया में उठ रहे मुद्दों पर नजर रखते आए हैं।

राज्य सभा में बेंगलूर और कर्नाटक का प्रतिनिधित्व करने वाले चंद्रशेखर कहते हैं, 'परंपरागत और सोशल मीडिया के बीच यह अंतर है कि  सोशल मीडिया पर आपको तत्काल प्रतिक्रिया मिलती है। दूसरी बात यह कि मीडिया का यह एकमात्र ऐसा रूप है जहां विभिन्न मुद्दों और नीतियों पर दोनों तरफ से सूचनाओं के आदान-प्रदान की संभावना होती है।' लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और समय-समय पर राजनीतिक मुद्दों और नीतियों पर ट्विटर के जरिये अपनी प्रतिक्रिया देती रहती हैं। मिसाल के तौर पर हाल में ही उन्होंने ट्विटर के माध्यम से बलात्कार नियमों में संशोधन के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की थी।

लोक नीति, सुरक्षा और राजनीति पर सलाहकार सेवा देने वाली कंपनी ऑर्कश सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड के अनुसार सोशल मीडिया पर उठ रहे मुद्दों पर निगरानी रखना जरूरी है। ऑर्कश सर्विसेस में सलाहकार शैलेश लोहिया कहते हैं, 'सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है और यूजर्स की संख्या लगतार बढ़ रही है। यहां पर जो विचार सामने आते हैं उन पर गौर करना जरूरी है क्योंकि इससे लोगों की नब्ज पकडऩे में मदद मिलती है। राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों को इससे बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिल सकती है। इसे भांपते हुए राजनीतिक दलों और नेताओं ने ऑनलाइन मीडिया पर निगाहें रखनी शुरू कर दी हैं।'

देश में इंटरनेट यूजर्स की तादाद 10 करोड़ है और ऐसे में मीडिया के सभी खंडों पर नजर रखना लाजिमी हो जाता है। लीडटेक मैनेजमेंट कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक विवेक सिंह बागड़ी कहते हैं, 'राजनीतिक दलों को निष्पक्ष आंकड़े और प्रतिक्रियाओं की जरूरत होती है। अधिक से अधिक राजनीतिज्ञ अब अपने चुनाव क्षेत्र के सटीक आंकड़े और रिपोर्ट चाहते हैं ताकि वे बेहतर तरीके से अपना राजनीतिक प्रचार कर पाएं। सोशल मीडिया एक हिस्सा है लेकिन हरेक नेटवर्क में क्या कहा और लिखा जा रहा है वह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। मानवीय तरीके से ऐसा करना संभव नहीं है। मीडिया के सभी रूपों पर नजर रखने के लिए राजनीतिक दलों को विशेष एजेंसियों की जरूरत होती है।'

एक राजनीतिज्ञ ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, 'सोशल मीडिया पर ज्यादातर गतिविधियां राजनीतिक दलों की युवा शाखा चलाती है क्योंकि अगर नेता केवल सोशल मीडिया पर ही ध्यान केंद्रित करें तो उनके चुनाव क्षेत्र में लोगों के एक बड़े हिस्से की छूटने की आशंका पैदा हो जाती है। वजह साफ है क्योंकि कुछ ही लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच है।' (बीएस)

सुब्रत राय को फिर झटका : पुणे स्‍टेडियम से नाम हटेगा

पुणे स्थित अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम अब ‘सुब्रत राय सहारा स्टेडियम’ के नाम से नहीं जाना जाएगा, क्योंकि सहारा ग्रुप ने महाराष्ट्र क्रिकेट संघ (एमसीए) के साथ विवाद के चलते नाम हटाने का फैसला किया है। सहारा ने स्टेडियम से संबंधित कुछ समझौतों के उल्लंघन के कारण एमसीए के खिलाफ मंगलवार को बंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उसे स्टेडियम का नाम काले कपड़े से ढंकने के एमसीए के फैसले के खिलाफ अंतरिम राहत भी मिली थी।

सहारा के सूत्रों ने कहा, सहारा ने आगे इस स्टेडियम के लिए सुब्रत राय सहारा स्टेडियम नाम का उपयोग नहीं करने का फैसला किया है और वह दोनों पक्षों के बीच नामकरण अधिकार संबंधी करार के शर्तों के अनुसार नए वैकल्पिक नाम का प्रस्ताव करेगा। एमसीए ने पुणे एक्सप्रेस वे के करीब बनाए गए स्टेडियम के अधिग्रहण, नामकरण और कुछ अधीनस्थ अधिकारों के लिए प्रस्ताव मंगाए थे। इनमें निर्माण का अधिकार और स्टेडियम के करीब स्थित जमीन पर क्लब का स्वामित्व भी शामिल था। सहारा ने स्टेडियम और क्लब से संबंधित इन अधिकारों में दिलचस्पी दिखाई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ।

नामकरण अधिकार करार भी किया गया, जिसमें एमसीए ने सहारा को स्टेडियम का नाम रखने का विशेष अधिकार दिया, जिसने इसका नाम सुब्रत राय सहारा स्टेडियम रखा, लेकिन पिछले साल आईपीएल के पहले मैच के बाद सहारा को एमसीए से पत्र मिला, जिसमें उसने समझौता रद्द करने की इच्छा जताई थी। सहारा के सूत्रों ने कहा कि मैच से पहले के समारोह में एमसीए को श्रेय नहीं दिए जाने के कारण उन्होंने यह पत्र भेजा था। (भाषा)

सुधीर चौधरी ने नवीन जिंदल के खिलाफ कोर्ट में बयान दर्ज कराया

जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी द्वारा नवीन जिंदल पर किए गए मानहानि के मामले में कोर्ट में बयान दर्ज किया गया. अपने बयान में सुधीर ने कहा कि नवीन जिंदल और उनकी कंपनी के 16 अन्य अधिकारियों ने उनकी छवि धूमिल करने के लिए उनके खिलाफ गलत आरोप लगाए हैं. उन्होंने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जय थरेजा को बताया कि जिंदल एवं अन्य ने सौ करोड़ रुपये की कथित फिरौती मामले में उनके खिलाफ गलत मामला दर्ज कराया था और एक संवाददाता सम्मेलन में उनके खिलाफ आरोप लगाकर उनको बदनाम किया. उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया गया.

चौधरी ने अदालत से कहा कि अगस्‍त 2012 में मेरे खिलाफ प्रतिवादियों ने गलत मामला दर्ज कराया गया और उन्होंने मुझे बदनाम किया जिसके लिए मैंने यह शिकायत दर्ज कराई है. इन गलत आरोपों के चलते उनकी व्‍यापक मानहानि हुई है. गौरतलब है कि सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया को जिंदल कंपनी की शिकायत पर 27 नवम्बर 2012 को गिरफ्तार किया गया था तथा जी न्‍यूज के चेयरमैन सुभाष चंद्रा एवं उनके पुत्र पुनीत गोयनका से पूछताछ की गई थी. बाद में कोर्ट ने दोनों संपादकों को 17 दिसम्‍बर को जमानत दे दी. कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख 15 जनवरी तय की है.


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zee jindal

सरकार करेगी गूगल से समझौता, स्‍मार्ट फोन पर दिखेगा डीडी न्‍यूज बुलेटिन

जनता के बीच निजी टीवी न्यूज चैनलों के एकाधिकार को खत्म करने और अपना नजरिया युवाओं के बीच लाने की दिशा में सरकार ने कदम बढ़ा दिया है। इस क्रम में सरकार ने अब युवाओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए मोबाइल फोन और सोशल मीडिया वेबसाइटों पर प्रचार अभियान और तेज कर दिया है। फेसबुक, टि्वटर, यू-ट्यूब के बाद अब मंत्रालय ने मोबाइल फोन पर दस्तक दी है।

अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए सरकार दुनिया के सबसे बडे सर्च इंजन गूगल के साथ समझौता करने जा रही है। इसके जरिए गूगल एंड्रायड मोबाइल फोन पर डीडी न्यूज के समाचार बुलेटिन बेहद आसानी और उम्दा क्वालिटी के साथ देखे जा सकते हैं। इसमें सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं के प्रचार के साथ ही मंत्रालय की हर गतिविधि और कार्ययोजनाओं के बारे में पारदर्शिता को लेकर मंत्रालय ने जोर दिया है।

इस योजना के तहत एक एंड्रायड मोबाइल एप्लीकेशन बनाई गई है। इसमें यू-ट्यूब में उपलब्ध मंत्रालय के चैनल को एप्लीकेशन में शामिल किया है। इसके जरिए ग्राहक वृत्त चित्र, सरदार पटेल, महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे महापुरूषों के लोकप्रिय भाषण सुन सकते हैं। साथ ही डीडी न्यूज के नियमित दो से तीन मिनट के समाचार बुलेटिन भी देख और सुन सकते हैं। इस चैनल में ऑल इंडिया रेडियो के क्लासिकल म्यूजिक का मजा भी लिया जा सकेगा। इसके अलावा इसमें सरकार के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण भी देखा जा सकता है।

सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने युवाओं के बीच जगह बनाने के मकसद से इस योजना के लिए मंत्रालय के उच्चाधिकारियों को निर्देश दिए थे। मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि तिवारी की पहल के बाद यह योजना साकार हो पाई है। मंत्रालय के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जैसे बडे समारोहों का सीधा प्रसारण भी इस सेवा में उपलब्ध रहेगा। ग्राहकों को गूगल के एंड्रायड ऑपरेटिंग सिस्टम आधारित स्मार्टफोन के जरिए गूगल प्ले में क्लिक कर वहां एमआइबी यूट्यूब टाइप करना है। इस चैनल को फ्री डाउनलोड करने के बाद ग्राहक इसका आनंद उठा सकते है। गूगल फोन के अलावा एप्‍पल और ब्लैकबेरी फोन पर यह सेवा कुछ दिनों में उपलब्ध हो जाएगी। (खाख)

सजायाफ्ता अफसर तक प्रमोशन पा लेते हैं, लेकिन अमिताभ ठाकुर नहीं

यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को सत्ता और अफसरों से पंगा लेने का सजा यूं दिया जा रहा है कि उनका जो ड्यू प्रमोशन है, वह नहीं दिया जा रहा है. उनके बैच के लोगों को प्रमोट कर दिया गया पर उन्हें नहीं. अमिताभ ठाकुर का गुनाह ये है कि वे सत्ता में बैठे नेताओं और उनकी चमचागिरी करने वाले बड़े अफसरों की करतूतों को गाहे-बगाहे सबके संज्ञान में लाते रहते हैं, कोर्ट में चुनौती देते रहते हैं. इसी कारण नेता और अफसर की भ्रष्ट सांठगांठ उन्हें प्रताड़ित कर रही है, प्रमोशन न देकर, अच्छी पोस्टिंग न देकर. अमिताभ ने अपनी पीड़ा फेसबुक पर बयान की है, जिसे हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है.

Amitabh Thakur : कई बार मुझे इस बात की बेहद खुशी होती है कि मुझे प्रोमोशन के लायक नहीं समझा जाता क्योंकि मैं पाता हूँ कि जेल जाने से ले कर सजायाफ्ता हुए अधिकारी तक नियमित प्रोमोशन पा लेते हैं. पुलिस विभाग में यदि कोई अधीनस्थ अधिकारी अपने ऊपर के अधिकारी के खिलाफ उसके गुनाह पर कार्यवाही करने की मांग करता है तो समझिए वह स्वयं भारी गुनाह कर रहा है. मुझे इस बात की खुशी है कि मैं लगातार यह गुनाह कर रहा हूँ और इसकी सजा भुगत रहा हूँ.

Deepak Tewari sir promotion ke liye ya to kisi neta ki rishtedaari ho ya fir aap koi high profile currupt ho yahi yogyata hai promotion ki … afsoos aap aise nahi ho… lekin hum jaise aam logon ke liye ye khushi ki bhi baat hai…
 
Rai Sanjay kyon ki aap chaploos or chor nahin hain sachye hain… naman hai aap ko
 
Gireesh Chandra bilkul sahi sir aaj k parivesh me chaplusi jab tak bade afsar ya bade neta ki nahi karenge tab tak promotion nahi milne wala….waise bhi sir aapko promotion ki koi aawshyakata nahi hai kyoki aap chaplus nahi …………
 
Raghvendra Singh Sir janta aapko salute kr rahi hai system ko aap se behtar kaun jan sakta hai per janta aap jaise officer se hi ummid karti hai aap jaise sher bahut kam hi rah gaye hai jai hind
   
Sudhir Pradhan badhai honest ips ko
    
Rajesh Kumar Ojha प्रमोशन तो जरूर मिल जाता आपको लेकिन खुद्दारी बेचनी पड़ती, खुशी ये है कि आपने खुद्दारी नहीं बेंची
     
Sachin Singh Amitabh ji its happens with all honest people I have changed 5 jobs in my 7 yrs career due to only I am not doing YES SIR in wrong or bad decesion…
     
Sumit Bhatnagar Very well said
     
Subodh Yadav सर प्रणाम। आपके बैचमेट भले ही I.G. हो गये लेकिन आपकी ईमानदारी के सामने वो पासंग के बराबर भी नहीं। इस प्रदेश का बेड़ा गर्क है। पाप का घडा भरने बाला है। आपके लिऐ / परिवार के लिए जो लोगोँ के दिलोँ मेँ सम्मान है उसको भी तो देखिए। भ्रष्टोँ को कर्मचारी-जनता गाली-बददुआ भी तो देती है।
 
Deepak Tewari sir aap hero ho… vibhaag aapke saath ho ya na ho…. public aapke saath hai ,…….
 
Preetam Thakur किये जाओ लेकिन पहले पुख्ता सबूत काबू कर लो! इंसानों पर नहीं material evidence पर ज्यादा ध्यान दो ! God bless you !
 
Vivek Srivastava 100 % deepak ji
 
Kaushalendra Pandey Its Tough To Follow The Path Of Truth…… We Don't expect from Cheap and Opportunistic people… Its Great Sir…
 
Kamal Sharma sir maine bhi aise gunah kiye aur lambe samay se mujhe uske inaam bhi mil rhe hai……..
 
Arjun Singh इस गुनाह से आप खुद और समाज की नजरो मे एक नये मुकाम को हासिल करेगे
 
Gireesh Chandra 100% SAHI
 
Ganesh Ji Verma bhai sahab age me aap hamse bade hain. yadi aap hi is tarah haosle ko kamjor karenge to fir ek child kaise sawch bharat banane me apni bhumika ada kar payega
 
Ganesh Ji Verma hame naz hain aap per. jab bhi kahi jindgi ladkhati hain to ham jaise log aaphi jaise logo se perna lete hain
 
Ziaul Haq Scriber Bahut umda, waise aapke baad poore journalism carrier me koi nhi milaa jo aisa IPS officer ho .. waakai kaabiliyat per koi shaq nhi
 
Syed Ali Nawaz Zaidi good job keep it up dear our best wishes r always with u.


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पत्रकार शशि मल्‍होत्रा का निधन, शरीर मेडिकल कॉलेज को दान

अंबाला शहर के पत्रकार शशि मल्होत्रा का बृहस्पतिवार सुबह हृदय गति रूकने से निधन हो गया। वे 47 वर्ष के थे। मल्‍होत्रा के परिजनों ने उनकी इच्‍छा के अनुसार उनका र्पा‍थिव शरीर महर्षि मारकंडेश्वर मेडिकल कॉलेज को दान कर कर दिया। मल्‍होत्रा ने अपने जीते जी देहदान का संकल्‍प लिया था। वे अविवाहित थे।

मल्होत्रा के निधन पर मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा, प्रदेश काग्रेस के अध्यक्ष फूलचंद मुलाना, विधायक विनोद शर्मा, मुख्य संसदीय सचिव राम किशन, जिला ग्रामीण काग्रेस कमेटी के अध्यक्ष निर्मल सिंह, पूर्व मीडिया कोआर्डिनेटर दलीप चावला बिट्टू, मीडिया सेल के पूर्व प्रदेश महासचिव लखविंद्र लक्खा, शहरी अध्यक्ष हरीश सासन आदि ने शोक प्रकट किया। बड़ी संख्या में उपस्थित शहरवासियों ने स्वर्गीय मल्होत्रा को अंतिम विदाई दी। मल्होत्रा जीवन भर लेखन और पाठन से जुड़े रहे। वह राष्ट्रीय देश की मुख्य समस्याओं पर कविताएं भी लिखते थे।

लखनऊ में ग्रीन सिटी टाउनशिप निर्माण पर कोर्ट ने लगा दी रोक

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फैजाबाद रोड स्थित विराज कांस्ट्रक्शन द्वारा ग्रीन सिटी के नाम से इंटीग्रेटेड टाउनशिप विकसित करने के लिए किसानों से ली गई जमीन पर निर्माण किए जाने के बाबत रोक लगा दी है। अदालत ने कहा है कि इस भूमि पर यथास्थिति बरकरार रहेगी और कोई निर्माण कार्य नहीं किया जाएगा। इस आदेश से ग्रीन सिटी का काम खटाई में पड़ गया है।

याचिकाकर्ता सच्चिदानंद गुप्ता व नीलम सिंह सहित अन्य की ओर से अधिवक्ता डॉ. एलपी मिश्रा व अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह व वीके दीक्षित की पीठ ने सुनवाई के बाद यह आदेश दिए। याचिकाएं दायर कर 29 सितंबर 2011 व 31 अक्टूबर 2012 के आदेशों को चुनौती देते हुए कहा गया कि सैकड़ों किसानों की जमीनें सरकार व एलडीए ने अधिग्रहीत कर लीं। 29 सितंबर 2011 के आदेश से लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा मेसर्स विराज कांस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित टाउनशिप के लिए ग्राम सराय शेख सेमरा, शाहपुर में जमीन अधिग्रहीत की गई। अधिग्रहण के विरुद्ध किसानों की आपत्तिायों को दरकिनार करते हुए विधि विरुद्ध तरीके से कब्जा लिया गया।

याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि यदि कंपनी के नाम से अधिग्रहण किया जाता है तो यह केंद्र सरकार की नियमावली के तहत होता है। एक साथ कंपनी व जनहित में अधिग्रहण की कार्रवाई काननू के विपरीत है। 11 जुलाई 2008 को एलडीए ने स्वयं विराज कंपनी की हैसियत का कम मूल्यांकन किया था। फिर भी बाद में विराज कांस्ट्रक्शन के लिए सैकड़ों किसानों की जमीनों को गैरकानूनी तरीके से अधिग्रहीत किया गया। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता डॉ. एलपी मिश्रा ने पीठ को बताया कि ग्रीन सिटी के निर्माण के लिए पर्यावरण विभाग सहित अन्य जरूरी विभागों से अनापत्तिप्राप्त नहीं की गई। मामले में अगली सुनवाई 11 फरवरी को होगी। ज्ञात हो कि बाबू बनारसी दास ग्रीन सिटी उर्फ बीबीडी ग्रीन सिटी के मालिक उद्यमी और नेता अखिलेश दास गुप्ता हैं।

कुंभ कवरेज करने आ रहे एनडीटीवी के दो कर्मचारी इलाहाबाद में लुटे

प्रयाग कुंभ मेला कवरेज करने आ रहे एनडीटीवी न्यूज चैनल के दो कर्मचारियों अजय पांडेय और मुनेश्‍वर मिश्रा को इलाहाबाद की सीमा पर लूट लिया गया। दोनों कर्मचारी चैनल की वैन लेकर दिल्ली से इलाहाबाद (प्रयाग) आ रहे थे। नेशनल हाइवे के रास्ते अजय पांडेय और मुनेश्‍वर मिश्रा इलाहाबाद जिले की सीमा पटना उपरहार के सामने पहुंचे। रातभर सफर करने के बाद सुबह दोनों ने श्रृंग्वेरपुर के पास रहने वाले अपने रिश्‍तेदार के घर रूककर दैनिक क्रियाओं से निपटने और थोड़ी देर आराम करने का निश्‍चय किया।

नेशनल हाइवे से वैन लेकर दोनों श्रृंग्वेरपुर के पास पहुंचे। उसी समय बोलेरो सवार बदमाश वहां आ धमके। बदमाशों ने तमंचा सटाकर दोनों को जान से मारने धमकी दी। भयभीत अजय, मुनेश्‍वर जब तक संभल पाते तब बदमाश उनके पास से बारह हजार रुपए और दो मोबाइल लेकर फरार हो गए। लुटे कर्मचारियों ने नवाबगंज थाने की पुलिस को घटना की सूचना दी। उसके बाद पुलिसिया खेल शुरू हो गया। काफी देर तक नवाबगंज पुलिस घटनास्थल को दूसरे थाना क्षेत्र में पड़ने का बहाना बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने से इनकार करती रही। आखिरकार, दोनों कर्मचारी यहां से मायूस होकर लौट गए। ऐसे में अभी तक किसी लुटेरे को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। सीओ राहुल मिश्रा ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि इस मामले में एसओ आदित्य कुमार सिंह का कहना है कि घटना प्रतापगढ़ जिले के कुंडा क्षेत्र में हुई है, इसलिए रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पाण्‍डेय की रिपोर्ट.

‘सोनारगांव’ की कहानी मैं टीवी पर नहीं कह सकता था : नीलेंदु सेन

मेरे उपन्यास 'सोनारगाँव' को आए अभी मुश्किल से एक महीने हुए हैं लेकिन जिस तरह उसे हाथो-हाथ लिया जा रहा है, उससे मैं बेहद उत्साहित हुआ हूँ। इस उपन्यास में जो विषय मैंने लिया है, वह विवादास्पद भी है और चुनौती भरा भी। इसीलिए अभी तक मिली प्रतिक्रियाओं को अच्छी-बुरी कहने के बजाय कहूँगा कि वे उत्तेजना से भरी रही हैं। बहुत से लोगों ने ये सवाल पूछा है कि मैंने रेड लाइट एरिया और यौनकर्मियों के बीच एड्स संबंधी जागरूकता अभियान को ही विषय क्यों बनाया। लिहाज़ा, मैं चाहता हूँ कि इस उपन्यास को लिखने के बारे में अपने विचार अपनी बिरादरी से साझा करूँ।

दरअसल, टेलीविज़न  की दुनिया में काम करते हुए और चैनलों के लिए कहानियाँ ढूँढ़ते-कहते  कई बार ऐसी घटनाओं से सामना हुआ जो  दिलचस्प और हैरत में डाल  देने वाली थीं। लेकिन टेलिविज़न की अपनी मजबूरियाँ हैं, सीमाएं भी हैं। लिहाज़ा उन्हें सुनाना या दिखाना मुमकिन नहीं हुआ। खास तौर से वे कहानियां जो सेक्सुअलिटी और यौन कर्मियों से जुड़े सब्जेक्ट पर हों।

ऐसी ही एक कहानी थी सोनार  गाँव की। टेलीविज़न के लिए उसका कोई उपयोग नहीं हो सका, लेकिन सोनार गाँव  की भ्रूण हत्या नहीं हुई । वह मेरे ज़हन में बस गई और मेरी सोचने की शक्ति को बेसाख्ता अपनी खुराक बनाकर  बढ़ती रही। धीरे धीरे उसके दिल की धड़कनें सुनायी देने लगीं, फिर एक शरीर सा उभरा, नाक नक्श भी दिखने लगे। उसे जन्म देना एक मजबूरी सी हो गई थी। जीने मरने का सवाल था, भला  क्या करता !

सोनार गाँव  की कहानी का बीज कुछ उस वक़्त मेरे ज़हन में आया जब मैं दुर्बार महिला समन्वय कमिटी के कुछ सदस्यों से मिला। इनमें समाज सेवक, डाक्टर, समाज शास्त्री, और यौन कर्मी शामिल थे। ये छोटी सी मुलाक़ात  लगभग दस साल पहले हुई थी। तभी से मेरे दिमाग में तरह तरह के चरित्र, पात्र और अजीबोगरीब मंज़र उभरने लगे थे। सामजिक चेतना, स्थापित नैतिकता (मोरालिटी) और अपनी ही सेक्सुअलिटी से  दिमाग के अंदर मची अंतरकलह से किरदार और मंज़र बनते चले गए। और फिर किसी भी टीवी कर्मी या पत्रकार या फिल्म मेकर की तरह इस कहानी को कहने की लालसा ज़ोर पकड़ती चली गयी।

टीवी के लिए कंटेंट बनाना एक सामूहिक कोशिश होती है। भले ही पिछले कुछ सालों में कंटेंट बदला है और चैनलों की तादाद भी अनगिनत हो चली है। फिर भी एकल या निजी सोच के लिए इसमें जगह नहीं है। प्रगतिशील कंटेंट को भी बाज़ार की सच्चाई से कदम मिलाना पड़ता है। हालाँकि यह बात कमर्शियल प्रसारण पर भी लागू होती है फिर भी मुझे लगा की पाठक दर्शकों से ज्यादा धीरज रखते हैं। लिहाज़ा लिख डाली। लिखने का तजुर्बा  खुद को मथने जैसा था। अपने अन्दर के सबसे अँधेरे और डरावने कोनों में घुसकर कहानी को बाहर लाना था। लिखने का तरीका भी टीवी की शैली से अलग होना था। और चूँकि उपन्यास यौनता, यौनकर्मियों और HIV AIDS के विषय में है तो इसे अध्यात्मिक थीसिस ना बनाकर पठनीय बनाने की चुनौती भी थी।

इंसान की यौनता या सेक्सुअलिटी मुझे हैरत में डाल देती है। ये बहुत दिलचस्प सब्जेक्ट है। सेक्सुअलिटी हमें सृजनशीलता के चरम पर भी ले जाती है और बर्बरता की गहराई भी नपवाती  है। हालाँकि हमारे ऐतिहासिक साहित्य और कलाकृतियों में इसको बेहद ख़ूबसूरती से उकेरा गया है। फिर भी आज के समाज में इसकी चर्चा दबे-छुपे अंदाज़ में ही होती है। इस मामले में हमारा समाज बुरी तरह कन्फ्यूज्ड है। कई सामाजिक समस्याओं जैसे वेश्यावृत्ति, बलात्कार, समलैंगिकता और एड्स जैसी समस्याओं को समझने के लिए कहीं ना कहीं सेक्सुअलिटी की गुत्थियों  को समझना होगा।   
लेकिन सोनार गाँव लिखने की सबसे ज्यादा प्रेरणा मुझे इस उपन्यास के पात्रों से ही मिली। ये काल्पनिक हैं, लेकिन मेरे गहरे दोस्त हैं। मैंने महीनों इनके साथ गुज़ारे हैं — मैं हैरत से इनको खुद पर ज़ाहिर होते महसूस करता रहा। कभी ये मुझसे मज़ाक करते, मेरी बेबसी पर हँसते और कभी खुद ब खुद मुझे आज़ाद करके एक कहानी के रूप में ढलते जाते। 

आह वो आज़ादी जो टीवी में नहीं है, हो भी नहीं सकती और जिसकी तलाश में मैं डाक्टरों की भाषा में उत्कंठा का मरीज़  हूँ। मेरा उपन्यास सोनारगाँव  अँग्रेजी में है। मेरे हिसाब से यदि इसका हिंदी  अनुवाद असंभव नहीं तो, मुश्किल  ज़रूर होगा, क्योंकि सेक्चुअलिटी  को बयान करने के लिए जिस  भाषा का इस्तेमाल मैंने किया है, मुझे डर है कि वह हिंदी  में जाते ही अश्लील न करार दी जाए। इसलिए मैं हिंदी  के पाठकों से गुज़ारिश करूँगा कि वे इसे ज़रूर पढ़ें, उनकी प्रतिक्रिया जानकर मुझे बहुत खुशी भी होगी।

नीलेंदु सेन  टेलीविज़न की दुनिया की जानी-मानी हस्ती हैं।  वे आज तक और आईबीएन-7 के प्रोग्रामिंग हेड  रह चुके हैं। वे दूरदर्शन  और देश-विदेश के कई बड़े  चैनलों के लिए विश्व स्तरीय डॉक्यूमेंट्री  एवं कार्यक्रमों का निर्देशन  कर चुके हैं।

आनंद ने एनबीटी और विजय ने नवभारत छोड़ा, दोनों एशियन एज पहुंचे

मुंबई में हिंदी मीडिया की खस्ताहालत को देखते हुए हिंदी के पत्रकार तेजी से अंग्रेजी मीडिया की ओर आकर्षित हो रहे हैं. नवभारत टाईम्स (एनबीटी) के प्रमुख संवाददाता आनंद मिश्र व नवभारत (मुंबई) के अपराध संवाददाता विजय यादव ने अपने-अपने संस्थानों से इस्तीफा दे दिया है. दोनों ने अंग्रेजी अखबार एशियन एज ज्वाइन किया है.

आनंद मिश्र एनबीटी के प्रतिभाशाली पत्रकारों में से एक थे. रेलवे, इंफ्रास्ट्रक्चर व आरटीआई बीट कवर करने वाले आनंद मिश्र ने कई स्टोरी ब्रेक की है जबकि युवा पत्रकार विजय यादव क्राईम बीट के उभरते हुए पत्रकार हैं.

रमेश चंद्र अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, गिरीश अग्रवाल टैक्स चोर हैं!

दैनिक भास्कर को संचालित करने वाली कंपनी डीबी कार्प के निदेशकगण रमेश चंद्र अग्रवाल, उनके पुत्र सुधीर अग्रवाल, गिरीश अग्रवाल इत्यादि के खिलाफ करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी का एक बड़ा मामला सामने आया है. उत्पादन शुल्क की चोरी के मामले में सीमा शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सेवा कर विभाग ने 58.97 करोड़ रुपये की रिकवरी निकालते हुए शिवपुरी जिले की शारदा साल्वेंट प्राइवेट लिमिटेड को कारण बताओ नोटिस थमाया है. दैनिक भास्कर समूह की इस कंपनी के डायरेक्टर रमेश चंद्र अग्रवाल, उनके पुत्र सुधीर अग्रवाल, गिरीश अग्रवाल हैं.

टैक्स चोरी का खुलासा इंदौर से प्रकाशित दबंग दुनिया अखबार ने किया है. नीचे अखबार की कटिंग है, पढ़ने के लिए उसी पर क्लिक कर दीजिए….

दबंग दुनिया में भास्कर वालों की टैक्स चोरी की खबर को ब्रेक किया है विनोद शर्मा ने. उन्हें भड़ास की तरफ से बधाई. उम्मीद करते हैं कि ये छोटे और नए अखबार अपने पन्नों पर पुराने और चोर अखबारों की इसी तरह कलई खोलते रहेंगे.

केजरीवाल के आरोपों के आधार पर खबर दिखाने वाले चैनलों को मुकेश अंबानी ने भेजा नोटिस

रिलायंस समूह के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने कई न्यूज चैनलों को नोटिस भेजा है. मुकेश अंबानी तमाम न्‍यूज चैनलों द्वारा एक्टिविस्‍ट अरविंद केजरीवाल एवं एडवोकेट प्रशांत भूषण के प्रेस कांफ्रेंस के आधार पर रिलायंस समूह पर आरोप लगाए जाने से खासे नाराज हैं. अरविंद केजरीवाल ने बीते वर्ष अक्‍टूबर तथा नवम्‍बर में प्रेस कांफ्रेंस करके रिलायंस समूह पर कई आरोप लगाए थे, जिसे कई हिंदी तथा अंग्रेजी चैनलों ने लाइव प्रसारित किया था.

मुकेश अ‍रविंद एवं प्रशांत के आरोपों के आधार पर इन चैनलों द्वारा रिलायंस कंपनी को कटघरे में खड़ा किए जाने से गुस्‍सा हैं. इन दोनों ने आरोप लगाया था कि रिलायंस ने केजी बेसिन में गड़बड़ी की है. जबकि अपने दूसरे प्रेस कांफ्रेंस में इन्‍होंने आरोप लगाया था कि मुकेश अंबानी एवं अनिल अंबानी का स्विस बैंक में काला धन जमा है. रिलायंस समूह की ओर से एएस दयाल एंड एसोसिएटस ने नोटिस भेजा है. सात पेज के इस नोटिस को दिसम्‍बर के मध्‍य कई चैनलों को भेजा गया है.

हालांकि अभी स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया है कि क्‍या मुकेश अंबानी उन अखबारों को भी नोटिस भेजेंगे, जिनमें इस आधार पर रिलायंस के खिलाफ खबरें प्रकाशित हुई हैं. चैनलों को भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि वे अरविंद केजरीवाल के आरोपों के आधार पर लाइव दिखाने के लिए बिना शर्त माफी मांगे तथा इस बारे में स्थिति स्‍पष्‍ट करें. नोटिस में कहा गया है कि चैनलों द्वारा बिना किसी जांच पड़ताल के इन खबरों को दिखाए जाने से उनकी काफी मानहानि हुई है.

मुकेश सबसे ज्‍यादा नाराज इस बात को लेकर हैं, जिसमें कहा गया है कि देश की दो बड़ी पार्टियां कांग्रेस एवं बीजेपी उनके पॉकेट में हैं. नोटिस में कहा गया है कि अगर चैनल नोटिस का जवाब नहीं देते हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी. गौरतलब है कि रिलायंस समूह का सीएनएन-आईबीएन तथा आईबीएन7 में स्‍टेक हैं. ईटीवी की खरीद में भी रिलायंस समूह की बड़ी हिस्‍सेदारी है.

रिलांयस समूह के अधिवक्‍ता द्वारा भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि –  

– प्रेस कांफ्रेंस में जो आरोप लगाए गए उसके लिए आपके टीवी चैनल ने एक बड़ा प्‍लेटफार्म उपलब्‍ध कराया, जिससे एक बड़े वर्ग में रिलायंस के प्रति गलत और मानहानिकारक संदेश गया.    

– प्रेस कांफ्रेंस के लाइव टेलीकास्‍ट ने अखबारों के लिए बड़ी मात्रा में मानहानिकारक सामग्री उपलब्‍ध कराई.  

– दोनों मौकों पर हुए लाइव टेलीकास्‍ट को सही तथ्‍यों की जांच-पड़ताल किए बिना प्रसारित किया गया, इन बयानों की सत्‍यता भी जांची-परखी नहीं गई.

 – इन प्रेस कांफ्रेंस को लाइव दिखाने के बाद, प्रेस कांफ्रेंस में लगाए गए आरोपों के आधार पर आपके चैनल ने कई खबरें तथा बहस अपने यहां प्रसारित किया, इसके कई मानहानिकारक अंश (फुटेज) भी प्रसारित किए गए.

टाइम्स नाऊ और अरनब को लेकर वीर सांघवी ने कारवां मैग्जीन को स्पष्टीकरण भेजा

जनवरी 2013 के कारवां मैग्जीन के अंक में हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक वीर सांघवी का एक पत्र छपा है. इसमें उन्होंने कारवां के दिसंबर 2012 के अंक में प्रकाशित एक स्टोरी में खुद के बारे में उल्लखित किए जाने को लेकर अपनी सफाई दी है. उस स्टोरी में टाइम्स नाऊ और अरनब गोस्वामी के बारे में जिक्र है और किन्हीं संदर्भों में वीर सांघवी की भी चर्चा है. क्या संदर्भ है, क्या सफाई दी है सांघवी ने, यह उनके पत्र से समझा जा सकता है, जो कारवां मैग्जीन में प्रकाशित है… ये है वो पत्र….

    An error seems to have crept into Rahul Bhatia‘s otherwise well-researched story about Times Now.

    I am quoted as having told a Times Now employee in 2006 that the Jains had offered me a job to head their television channels. I do not know who this unnamed employee is but she or he is clearly mistaken or has misremembered our conversation.

    I made no such remark.

    Considering that the story quotes me in inverted commas, I wish Caravan would have mailed or phoned me to double-check the quote. That way, I could have clarified this before the story appeared, rather than right now, after publication.

    For the record, I have watched Arnab‘s progress from his days at The Telegraph, through his stint at NDTV and now, as editor in chief of Times Now. Though it is ages since we last spoke or met, I have always liked him and respect his considerable achievements.

    Certainly, I will never diss him to a member of his staff. I have been in this business long enough not to do something that crass.

    Vir Sanghvi

सहारा मीडिया में स्वतंत्र मिश्रा के दिन फिरे, राव बीरेंद्र सिंह के पावर में इजाफा

सहारा मीडिया में उलटफेर हुआ है. उपेंद्र राय फिर बुरी तरह ठिकाने लगा दिए गए हैं. उनके विरोधियों को सहारा मीडिया में पावरफुल किया जा रहा है. यह काम खुद संदीप वाधवा कर रहे हैं, जो इन दिनों सहारा मीडिया और सहारा इंटरटेनमेंट के हेड हुआ करते हैं. उन्होंने आज एक सरकुलर जारी कर स्वतंत्र मिश्रा को यूपी उत्तराखंड चैनल का चार्ज सौंप दिया. साथ ही इन राज्यों में प्रिंट का काम भी स्वतंत्र मिश्रा देखेंगे.

अभी तक यूपी उत्तराखंड चैनल के हेड राव वीरेंद्र सिंह हुआ करते थे. वाधवा ने राव वीरेंद्र सिंह को अपने सेक्रेट्रियट में रख लिया है और मीडिया के दिन प्रतिदिन के काम को देखने को कह दिया है. मतलब ये हुआ कि राव वीरेंद्र सिंह ही अघोषित तौर पर मीडिया का सारा काम वाधवा के बिहाफ पर देखेंगे. आज सहारा में जारी मेल व सरकुलर इस प्रकार है…

Respected Sir / Madam, Please find attached a Circular Dated 10.01.13 issued from kind desk of Respected Shri Sandeep Wadhwa ji, Head – Media & Entertainment,  which is self explanatory..

Thank you,
Regards & Sahara Pranam,

Human Resources Department
Sahara India Media, Noida

PS.: All Units Heads/ Bureau Chief / Bureau Incharge are requested to kindly instruct the concerned to display the attached Circular on Notice Board, Please.

टाइम्स नाऊ वाले शबनम हाशमी के पीछे पड़ गए हैं…

: दुखी शबनम हाशमी ने जारी किया बयान : A Public Statement by Shabnam Hashmi : I was in Gujarat for over six months and returned to Delhi two weeks ago. While in Gujarat I was asked to appear on different television channels constantly. On one such talk show on Times Now I felt that I was especially being pushed into a corner and it was an absolutely unbalanced panel, I told the Times Now guest coordinator that I will not come on the channel any longer.

It continued for about a week or so. Then a representative came from Mumbai and met me in Gujarat office and ensured that it will not happen in future and requested me to come for the Talk Shows. I agreed and went again whenever I was called.

On December 28, 2012 I released a public statement in Delhi regarding the Gujarat Verdict 2012 and resigned from various UPA committees that I was part of. On the same day I was invited to Times Now and I found the same attitude of being highly aggressive towards me.

January 2, 2013 -I filed a police complaint against Mr Akbaruddin Owaisi in Parliament Street Police Station against the hate speech which he made in Andhra Pradesh. I was called on Times Now and met the same uncivilized and aggressive behavior.

On January 4, 2013 I put the status on my facebook ‘TIMES NOW- MY STATUS- NOT AVAILABLE-GOODBYE MR ARNAB GOSWAMI- SORRY FOR DENYING YOU THE PLEASURE OF BEING THE 'CONSCIENCE KEEPER'.

All hell seems to have broken out since then. I have been receiving calls after calls from various Times Now reporters. They have barged into Anhad several times, threatening to do stories against Anhad and me.

Anhad has been running from 23, Canning Lane’s Garage for 5 years now. There have been over 30-40 press conferences big and small at Anhad itself attended by all media fraternity including reporters from Times Now. Times Now reporters have come and taken my interviews in this office tens of times, they have attended press conferences, sent their ob vans and pick up cars for Talk Show.

They have suddenly come up with the new evidence Now that Anhad runs from 23, Canning Lane, New Delhi which is Dr Syeda Hamid’s garage.

Despite being informed by my colleagues that the garage was provided to us free, they have asked me the same question four times-How much money you pay?

Anhad has been a space where scores of journalists and media friends have come and visited. We have always respected the media and continue to do so and Anhad has received tremendous support from the media fraternity across India and we greatly value and respect that.

Yes, Anhad runs out of 23, Canning lane, New Delhi-110001, Yes we have FCRA, we raise resources through funding agencies both foreign and Indian, from friends and corporates, Yes we have taken on fundamentalists of all hues.

This is the first time that we are faced with a situation where I personally in 32 years of my grass root activism and Anhad as an organisation in its 10 yrs of work feel being harassed, stalked, and blackmailed.

Shabnam Hashmi

January 10, 2012

10am

सड़क हादसे में जालौन के पी7 न्यूज संवाददाता अनुज घायल

ग्वालियर। ग्वालियर में हुये सड़क हादसे में जालौन के पी7 न्यूज के संवाददाता अनुज कौशिक घायल हो गये। यह हादसा उस बक्त हुआ जब वह अपनी सिस्टर के घर जा रहे थे। बता दें कि अनुज कौशिक बुधवार को ग्वालियर के दीनदयाल नगर अपनी सिस्टर के घर दोपहर के वक्त बाइक से जा रहे थे, जब वह ग्वालियर भिण्ड रोड पर पहुंचे तभी एक आटो ने उनको टक्कर मार दी, जिससे वह घायल हो गये। इस हादसे को देख आटो चालक मौके से भाग गया। अनुज के हाथ और पैर मे चोट आयी है।

न्यूज चैनल पर दस मिनट तक चला पोर्न वीडियो

स्वीडन में एक टीवी चैनल पर समाचारों के प्रसारण के दौरान दस मिनट तक पोर्न वीडियो चलने का मामला सामना आया है. टीवी4 चैनल के न्यूज बुलेटिन के बीच में अचानक एंकर के पीछे लगी एक स्क्रीन पर ये वीडियो प्रसारित होने लगा और न्यूज एंकर को इस बात का पता भी नहीं चला. ग्लोबल पोस्ट अखबार के अनुसार एंकर के बैठने वाली जगह के पीछे कई स्क्रीनें लगी हुई थी और उसे पता ही नहीं चला कि पीछे स्क्रीन पर क्या चल रहा है. 24 घंटे के इस खबरिया चैनल के सुबह दस बजे के बुलेटिन में दर्शकों को 10 मिनट तक हार्डकोर पोर्न वीडियो दिखता रहा.

जब एक स्क्रीन पर ये पोर्न वीडियो दिखाई दे रहा था तो चैनल पर सीरिया के संकट के बारे में खबर चल रही थी. ख़बरों के अनुसार ये क्लिप उस वक्त चलनी शुरू हुई जब चैनल की रूस संवाददाता के साथ टेलीफोन पर इंटरव्यू चल रहा था. टीवी4 ने इस मामले के लिए तकनीकी खामी को जिम्मेदार बताया है. टीवी4 की मूल कंपनी सी मोर एंटरटेनमेंट कई ऐसे चैनलों की मालिक भी है जो देर रात को वयस्क फिल्में दिखाते हैं. ऐसे में न्यूजरूम की स्क्रीन गलती से किसी अन्य कंप्यूटर से जुड़ गई.

स्वीडन के एक अखबार अफ्टॉनब्लाडेट ने एक दर्शक के हवाले से लिखा है, “पहले मुझे लगा कि मुझसे कोई गलती हो गई है, लेकिन जब उन्होंने इसे हटा दिया तो मुझे लगा कि गलती उनसे हुई है. हैरानी इस बात की है कि इस पर उनकी नजर इतनी देर से क्यों पड़ी.” वहीं दक्षिणी स्वीडन में एक 23 वर्षीय छात्र ने कहा, “पहले मुझे लगा कि मैं एक नग्न औरत को देख रहा हूं लेकिन फिर वो सेक्स करती हुई दिखाई दी. स्क्रीन पर कैमरे का फोकस न होने की वजह से वीडियो साफ नहीं दिख रहा था, मगर ये समझना मुश्किल नहीं था कि क्या हो रहा है.” (बीबीसी)

सांसद के कार्यक्रम में जागरण के फोटोग्राफर व पहरेदार के इंचार्ज में झड़प

पंजाब के बठिंडा शहर से खबर है कि वीरवार को सांसद हरसिमरत कौर बादल के कार्यक्रम में दैनिक जागरण बठिंडा कार्यालय के सीनियर फोटोग्राफर रणधीर बॉबी व पंजाबी समाचार पत्र पहरेदार के इंचार्ज अनिल वर्मा में किसी बात को लेकर झड़प हो गई। मामला उस समय बढ़ गया जब दैनिक जागरण के फोटोग्राफर ने अनिल वर्मा के गिरेबान में हाथ डाल दिया। यहीं नहीं फोटोग्राफर ने तो घूंसे तक जड़ दिए। मौके पर एएसपी साहब व पत्रकारों ने बीच-बचाव करते हुए मामले को शांत किया।

जानकारी के अनुसार वीरवार को सांसद हरसिमरत कौर बादल का कार्यक्रम हनुमान चौक के पास था। इस दौरान सारा मीडिया कवरेज के लिए आया हुआ था। सांसद के जाने के बाद हिंदुस्तान टाइम्स के फोटोग्राफर कुलवीर वीरा, जो दैनिक जागरण के फोटोग्राफर रणधीर बॉबी के बड़े भाई हैं, को अनिल वर्मा इंचार्ज पंजाब पहरेदार ने किसी बात पर कमेंट कर दिया। जो वीरा को सहन नहीं हुआ। वीरा व वर्मा में बहस अभी शुरू हुई थी कि दैनिक जागरण के फोटोग्राफर रणधीर बॉबी ने अनिल वर्मा को गले से पकड़ लिया और घूंसा जड़ दिया। इससे पहले की झगड़ा और बढ़ता। मौके पर तैनात पुलिस अधिकारियों व पत्रकारों ने बीच-बचाव करते हुए झगड़े को शांत कर दिया। कुछ भी हो यह मामला वीरवार को शहर में चर्चा का विषय बना रहा।

दैनिक जागरण का कुंभ स्‍पेशल लांच, कर्मचारियों का साप्‍ताहिक अवकाश निरस्‍त

दैनिक जागरण ने इलाहाबाद में अपना कुंभ स्‍पेशल एडिशन लांच कर दिया है. इसकी लांचिंग 9 जनवरी को की गई. इसकी लांचिंग के लिए नोएडा से विष्‍णु त्रिपाठी एवं लखनऊ से राजीव मिश्रा समेत कई लोग पिछले दो-तीन दिनों से इलाहाबाद में डेरा जमाए हुए थे. आठ पेज का यह एडिशन पूर्ण रूप से फीचर पर आधारित है. कुंभ चलने तक इस विशेष एडिशन का प्रकाशन किया जाता रहेगा. इसमें कुंभ से जुड़ी खबरों के अलावा फीचर भी होंगे.

इस अखबार के लिए कई यूनिटों से आठ से दस लोगों को इलाहाबाद बुलाया गया है. ये लोग ही इस अखबार का संपादन करेंगे. लोकल टीम इन लोगों की मदद करेगी. इसके साथ एक खबर यह भी है इलाहाबद के सभी कर्मचारियों की साप्‍ताहिक छुट्टी को भी निरस्‍त कर दिया गया है. प्रबंधन कर्मचारियों की संख्‍या बढ़ाने की बजाय कुंभ के नाम पर अपने कर्मचारियों की साप्‍ताहिक छुट्टी निरस्‍त करके उनका शोषण करना शुरू कर दिया है.

सैफई के रास रंग में पूरी सरकार वहां होती है.. शहीद के लिए किसी को फुर्सत नहीं

Amitabh Agnihotri : मथुरा के शेर नगर गाँव में कल रात शहीद हेमराज का अंतिम संस्कार किया गया …. लेकिन भारत के इस वीर सपूत को नमन करने के लिए यहाँ तक आने की फुर्सत न तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को मिली और न उनके किसी मंत्री को …. यहाँ तक की सांसद और विधायक को भी नहीं … सैफई महोत्सव में रास-रंग हो तो पूरी सरकार वहां होती है …. आज़म खां के बेटे का निकाह हो तो पूरी सरकार रामपुर में होती है … लेकिन शहीद का सिर कटा शव आये तो उसे सम्मान देने कोई नहीं आता …. मुख्यमंत्री जी के लिए रेसलिंग टूर्नामेंट में मौजूद रहना ज़रूरी है … लेकिन शहीद की चिता तक जाना नहीं ….

वरिष्‍ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री के एफबी वॉल से साभार.

पाकिस्‍तान के टीवी-अखबारों में उसकी ज्‍यादा चर्चा नहीं थी

Om Thanvi : लाहौर से लौट कर दिल्ली में कड़ी धूप मिली है। सुबह से टैरेस पर बैठा हूँ। पाकिस्तान कोहरे की गिरफ्त में है। तीन दिन लगातार धूप की राहत और चमक देखने को न मिली। गए तब यहाँ भी यही हाल था। धूप में बैठे बार-बार सरहद पर हुई वहशी वारदात के बारे में सोचता हूँ। पाकिस्तान के टीवी-अखबारों में उसकी ज्यादा चर्चा नहीं थी। पर रविवार को जो पाकिस्तान का जवान भारतीय गोलीबारी में मारा गया, उसे लेकर काफी कवरेज था। घर-परिवार तक टीवी दल सक्रिय थे।

रंजिश का माहौल बन जाए तो अपना शहीद ही शहीद लगता है, पार का नहीं। जबकि शहादत तो दोनों तरफ है। परन्तु क्या सचमुच? वह अकाल मृत्यु है। जिसके जिम्मेवार सेना के वे अधिकारी हैं, जिन्होंने कोई दशक पुरानी सीमा-रेखा संधि का धीमे-धीमे गला घोंट दिया। आज 'द हिन्दू' में लीड है कि सीमा-रेखा पर किसी तरह के निर्माण पर बंदिश थी; भारत ने एक बैरेक घुसपैठ पर नजर रखने के लिए बनाई। पाकिस्तान ने उस पर लाउड स्पीकर इस्तेमाल कर एतराज जताया; फिर उस पर गोले बरसाए। भारत की जवाबी कारवाई में उनका जवान मार गया। उनकी वहशी घात में हमारे जवान मारे गए।

एक फौजी अधिकारी के हवाले से 'हिन्दू' ने लिखा है कि पिछ्ले साल कश्मीर सीमा पर पहले पाकिस्तान के सैनिकों ने दो भारतीय जवानों के सर कलम कर दिए। जवाब में हमारे सैनिकों ने भी दो पाकिस्तानी जवानों के सर कलम किए। अधिकारी का कहना रहा कि सीमा पर हिंसक झड़पें होती रहती हैं, बस इस दफा मीडिया में चर्चा ज्यादा हो गयी। … सवाल चर्चा होने न होने का नहीं है। जब-जब दोनों देशों में राजनितिक सम्बन्ध सुधरते हैं, फौजी झड़पें वापस वहीँ क्यों पहुंचा देती हैं? क्या राजनीति पर सेना हावी है या राजनेताओं की इच्छाशक्ति क्षीण है? … पाकिस्तान में तो चुनाव भी सर पर हैं और कयानी जैसे सेनाध्यक्ष से बच रहने की परीक्षा भी।

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.

अवैध खनन का कवरेज कर रहे पायनियर के पत्रकार को जागरण के पत्रकार ने दी धमकी

सोनभद्र में एक फिर अवैध खनन में पत्रकारों के संलिप्‍त होने की बात सामने आई है. ओबरा में पायनियर अखबार के लिए काम करने वाले जितेंद्र कुमार गुप्‍ता को अवैध खनन का कवरेज करने के दौरान देख लिए जाने की धमकी दी गई. अभद्रता, दुर्व्‍यवहार और गाली ग्‍लौज भी की गई. धमकी देना वाला कोई और नहीं बल्कि खुद को जागरण का पत्रकार कहने वाला व्‍यक्ति निकला. जितेंद्र ने डाला में दैनिक जागरण के लिए काम करने वाले एबी सिंह के खिलाफ ओबरा थाने में अपनी शिकायत दी है.

पायनियर के पत्रकार को सूचना मिली थी कि बिल्‍ली चढ़ाई स्थित एक खदान में अवैध रूप से खनन करके एक दो ट्रैक्‍टरों से परिवहन किया जा रहा है. शासन द्वारा रोक लगाए जाने के बावजूद खनन और परिवहन होने की सूचना मिली तो जितेंद्र मौके पर पहुंचे तथा वहां फोटोग्राफी करने लगे. तभी खदान पर मौजूद लोगों ने उन्‍हें पकड़ लिया. गाली ग्‍लौज करने के साथ बदतमीजी करने लगे. वे लोग जितेंद्र को जबरदस्‍ती उठाकर अपने कार्यालय ले गए. वहां उनसे फोटो डिलिट करने का दबाव बनाया जाने लगा.

कार्यालय में उस खान के कथित मालिक तथा दैनिक जागरण के डाला संवाददाता एबी सिंह से बात कराई. जितेंद्र का आरोप है कि एबी सिंह ने उनसे गाली ग्‍लौज करने के साथ खुद को दैनिक जागरण का पत्रकार बताया तथा कहा कि तुम्‍हारी औकात तुम्‍हें दिखा देंगे. इस घटना से डरे सहमे जितेंद्र ओबरा थाने पहुंचे तथा एबी सिंह समेत कुछ लोगों के खिलाफ थाने में अपनी शिकायत दी. पुलिस ने जितेंद्र को शिकायत किए जाने की पर्ची तो पकड़ा दी है, परन्‍तु अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया है.

अभी जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार पुलिस इस मामले में कोई कार्रवाई करने की बजाय मामले को सलटा देने की कोशिश में लगी हुई है. पुलिस अवैध रूप से खनन के मामले में कार्रवाई की बात तो दूर जितेंद्र के साथ हुई घटना को भी दर्ज करने से बचना चाह रही है. संभव है कि दैनिक जागरण तथा खनन में लगे अन्‍य पत्रकारों के दबाव में ओबरा पुलिस मामला दर्ज भी न करे. पर इस घटना से स्‍पष्‍ट हो गया कि पत्रकारिता के नाम पर पत्रकार खुद अवैध खनन की घटनाओं में संलिप्‍त हैं.

संजय तिवारी बने श्री न्‍यूज में एडिटर को-आर्डिनेशन

श्री टाइम्‍स से खबर है कि प्रबंधन ने संजय तिवारी को प्रमोट करके समूह में उनकी जिम्‍मेदारी बढ़ा दी है. संजय तिवारी वर्तमान में वरिष्‍ठ समाचार संपादक के रूप में अखबार को अपनी सेवा रहे हैं. प्रबंधन ने अब उन्‍हें एडिटर को-आर्डिनेशन बनाकर समूह के न्‍यूज चैनल श्री न्‍यूज की जिम्‍मेदारी सौंप दी है. संजय तिवारी को चैनल को पहचान दिलाने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है क्‍योंकि काफी समय पहले लांच हुआ यह चैनल अब तक यूपी में अपनी पहचान स्‍थापित नहीं कर पाया है.

बताया जा रहा है कि समूह संपादक अजय उपाध्‍याय ने संजय तिवारी पर विश्‍वास करते हुए यह जिम्‍मेदारी उन्‍हें सौंपी है. संजय पर यूपी में चैनल को पहचान दिलाने के साथ बिहार में भी इसके विस्‍तार की योजना तैयार करने की जिम्‍मेदारी भी होगी. लखनऊ में एक बड़ा स्‍टूडियो भी तैयार किया जा रहा है. इसके बाद पूर्वी भारत में इसका विस्‍तार होगा. संजय तिवारी पिछले ढाई दशक से नोएडा, लखनऊ व गोरखपुर की पत्रकारिता में सक्रिय रहे हैं.

मालिक्‍यूलर वैज्ञानिक के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले संजय प्रतिभाशाली पत्रकार रहे हैं. उनका चयन सीडीएस के लिए भी हुआ पर उनका मन नहीं रमा. वहां से इस्‍तीफा देकर इन्‍होंने नोएडा में राष्‍ट्रीय सहारा ज्‍वाइन कर लिया था. इन्‍होंने लखनऊ तथा गोरखपुर में राष्‍ट्रीय सहारा की लांचिंग में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई. राष्‍ट्रीय सहारा से इस्‍तीफा देने के बाद वे दैनिक जागरण, गोरखपुर से जुड़ गए. सात साल काम करने के बाद यहां से इस्‍तीफा दे दिया तथा अमर उजाला से जुड़ गए. अमर उजाला के साथ गोरखपुर एवं बरेली में काम करने के बाद ये जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़े. फिर वहां से इस्‍तीफा देने के बाद श्री टाइम्‍स ज्‍वाइन कर लिया था.

सी टीवी में डाइरेक्‍टर बने राहुल, अमर उजाला ने नीरज को जम्‍मू भेजा

सी टीवी नेटवर्क से खबर है कि राहुल मित्‍तल को चैनल में एडिटोरियल एडवाइजरी बोर्ड का डाइरेक्‍टर बना दिया गया है. उन्‍होंने अपना कार्यभार संभाल लिया है. राहुल को चैनल को पहचान देने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. चैनल 14 जनवरी को अपने ग्रुप क्षेत्रीय कार्यालय का शुभारंभ भी जय प्‍लाजा, अबूलेन में करने जा रहा है. चैनल का प्रसारण भी डीटूएच पर होने लगा है.

अमर उजाला, गाजियाबाद से खबर है कि ब्‍यूरो आफिस में कार्यरत नीरज का तबादला जम्‍मू के लिए कर दिया गया है. प्रबंधन ने यह निर्णय नीरज पर लगे कुछ आरोपों की जांच के बाद लिया है. प्रबंधन ने इस जांच में नीरज को दोषी पाया था, जिसके बाद उन्‍हें जम्‍मू भेज दिया गया. 

समीर की याचिका पर कोर्ट ने नवीन जिंदल के खिलाफ मानहानि के मामले में संज्ञान लिया

: 8 मार्च को होगी अगली सुनवाई : नई दिल्‍ली : पिछले दिनों चर्चा में जी-जिंदल विवाद में कोर्ट ने एक और मामले को संज्ञान में लिया है. जी बिजनेस के हेड समीर आहलूवालिया द्वारा कांग्रेस सासद नवीन जिंदल व अन्य 16 लोगों के खिलाफ दायर मानहानि की शिकायत पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने संज्ञान ले लिया है. अदालत ने समीर की याचिका की सुनवाई करते कहा कि इस मामले को भारतीय दंड संहिता की धारा 499 यानी मानहानि के तहत संज्ञान लिया जाता है. महानगर दंडाधिकारी नवीता कुमार बग्गा ने इस मामले की सुनवाई के लिए 8 मार्च की तारीख तय की है.

उल्‍लेखनीय है कि जिंदल की कंपनी ने समीर आहलूवालिया और सुधीर चौधरी के खिलाफ ब्‍लैकमेलिंग का मामला दर्ज कराया था, जिसके बाद इन दोनों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. इस मामले में जी न्‍यूज के मालिक सुभाष चंद्रा तथा उनके पुत्र पुनीत गोयनका से भी पूछताछ की गई थी. इसी मामले में समीर ने कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल तथा उनकी कंपनी के 16 अधिकारियों के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया था. समीर ने अपनी याचिका में कहा है कि अधिकारियों ने उनके खिलाफ झूठे बयान दिए हैं, जिससे उनकी मानहानि हुई है.

खबर छपने से नाराज सपा जिलाध्‍यक्ष बलराम यादव ने दी पत्रकारों को धमकी

अभी यूपी में सरकार बने एक साल भी नहीं बीता कि सपाई अपने खोल से बाहर निकल कर सड़क पर गुंडई करने लगे हैं. आम लोगों के साथ अब पत्रकारों को भी देख लेने की धमकी दी जाने लगी है. मामला चंदौली जिले के सैयदराजा का है. बताया जा रहा है कि 29 दिसम्‍बर 2012 को चंदौली के सपा जिलाध्‍यक्ष बलराम यादव एक सफारी गाड़ी यूजीजेड -4809 से सैफई महोत्‍सव से वापस लौटे थे. सैयदराजा बाजार में उनकी गाड़ी एक ट्रक, जिसका नम्‍बर यूपी 22 – 3635 था, से गलत पास लेने के चक्‍कर में पीछे से थोड़ी टकरा गई.

प्रत्‍यक्षर्दियों के अनुसार इस टक्‍कर में पूरी गलती सफारी चालक की थी. इसके बावजूद सफारी में बैठे जिलाध्‍यक्ष के गुर्गे उतरे और ट्रक को रोककर उसके चालक की जमकर पिटाई की. सड़क पर ही उसे बुरी तरह से मारापीटा और गंभीर रूप से घायल कर दिया. इसके बाद सत्‍ता की हनक दिखाने के लिए थाने में फोन कर दिया. इस समय सपा के रहमोकरम चल रहा पुलिस महकमा बिना देर किए मौके पर पहुंच गया तथा मय ट्रक चालक को थाने पकड़ कर लाए. यहां भी चालक को थोड़ा बहुत पीटा गया. हालांकि बाद में पुलिस उस समय सांप-छुछुंदर वाली स्थिति में आ गई, जब पता चला कि यह ट्रक रामपुर वाले मंत्री जी के किसी नजदीकी का है.

असली बात तक हुई जब कई अखबारों ने इस घटना को प्रकाशित किया. बताया जा रहा है कि ज्‍यादातर अखबारों ने खबर लिखी. अब ये अलग बात है कि अमर उजाला ने उल्‍टी खबर छापते हुए जिलाध्‍यक्ष को ही ट्रक की चपेट में आने से बाल बाल बचा दिया. यहां अमर उजाला एवं हिंदुस्‍तान की पत्रकारिता ऐसे ही चलती है. खैर. अन्‍य अखबारों ने भी बच बचाकर खबर लिखी, क्‍योंकि मामला सपा के जिलाध्‍यक्ष का था, पर जनसंदेश टाइम्‍स, समाचार ज्‍योति व जागरण ने खबरें थोड़ी बड़ी और सही लिख दी.

बस क्‍या था अगले दिन जिलाध्‍यक्ष सैयदराजा में स्थित जनसंदेश प्रतिनिधि बशर खान के कार्यालय पहुंचे. वहां अन्‍य अखबारों के प्रतिनिधि बैठे हुए थे. लगभग सभी को धमकाते हुए कहा कि बहुत खबर छाप रहे हो तुम लोग भविष्‍य में भुगतना पड़ेगा. इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. बताया जा रहा है कि धमकी देने बाद बलराम यादव अपने पैड पर एक पत्र लिखकर जनसंदेश टाइम्‍स के स्‍थानीय प्रतिनिधि को हटाने का आदेश-आवेदन-निवेदन, जो भी कह लें, वाराणसी कार्यालय भेजा है.

जिलाध्‍यक्ष के धमकी से तमाम पत्रकारों में नाराजगी है, लेकिन यहां चम्‍मचागिरी करने वाले पत्रकारों के चलते इस तरह की धमकियों का कभी विरोध नहीं हो पाता है. इसलिए अक्‍सर लोग पत्रकारों को धमकाते हैं और निकल जाते हैं. चम्‍मचागिरी करने वाले पत्रकारों को डर रहता है कि उनके कई गलत काम नहीं हो पाएंगे और विज्ञापन भी नहीं मिलेगा. बार्डर होने के चलते ज्‍यादातर पत्रकार अवैध वसूलियों में लगे हुए हैं. जिसके चलते वे अपने साथ घटने वाली घटनाओं का विरोध नहीं कर पाते हैं और एकजुट नहीं हो पाते हैं. जल्‍द ही वसूली में लगे पत्रकारों की पोल खोले जाने की योजना भी तैयार की जा रही है. साथ ही बार्डर से कितने सपाइयों के सौजन्‍य से ट्रकें पास हो रही हैं इसका भी खुलासा किया जाएगा.

चीन में प्रकाशित होता रहेगा विवादित अखबार

सरकारी सेंसरशिप के कारण पिछले दिनों सुर्खियों में आया चीनी साप्ताहिक गुरुवार को हर हफ्ते की तरह छपेगा. खबर है कि अधिकारियों और पत्रकारों के बीच समझौता हो गया है. गुआंगझू शहर से हफ्ते में एक बार छपने वाले लोकप्रिय उदारवादी समाचारपत्र के एक कर्मचारी ने नाम बताए बिना कहा है, "अखबार गुरुवार को सामान्य रूप से छपेगा." विवाद तब भड़क उठा जब साप्ताहिक साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से संबंधित लेख की जगह सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की तारीफ वाला लेख प्रकाशित कर दिया गया. इसके खिलाफ पत्रकार सड़कों पर उतर आए.

मूल लेख में अधिकारियों से संविधान को लागू करने की मांग की गई, जिसमें बोलने और सभा करने की आजादी की गारंटी है. प्रेस स्वतंत्रता पर खुले आम प्रदर्शन चीन में बिरले ही होते हैं. इस मामले को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नए नेतृत्व के लिए टेस्ट समझा जा रहा है. शी जिनपिंग को हाल ही में पार्टी का नया महासचिव चुना गया है. कुछ ही महीनों में वह देश के नए राष्ट्रपति बनेंगे.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने कहा है कि गुआंगदोंग प्रांत के पार्टी प्रमुख हू चुनहुआ ने विवाद में मध्यस्थता की है. वे इस समय पार्टी के उभरते सितारे हैं. डाऊ जोंस समाचार एजेंसी ने साप्ताहिक के संपादक के हवाले से लिखा है, "मौखिक समझौता हुआ है. हालात फिर से सामान्य हो गए हैं, लेकिन हमें देखना होगा कि भविष्य में दोनों पक्ष एक दूसरे के प्रति कैसा बर्ताव करते हैं." समझौते के तहत प्रदर्शन में शामिल पत्रकारों को सजा नहीं दी जाएगी और प्रोपैगेंडा अधिकारी प्रकाशन से पहले विषय वस्तु में सीधे हस्तक्षेप नहीं करेंगे.

हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी में चीनी मीडिया के रिसर्चर डेविड बांदुर्स्की समझौते को पत्रकारों और सेंसर अधिकारियों के बीच काफी समय से चल रहे विवाद में छोटी जीत बताते हैं, "ये ठोस मायने में जीत है. यह रोजमर्रा के सेंसरशिप से वापसी है, जिसकी पत्रकारों को आदत लग गई थी." उनका कहना है कि इस हाई प्रोफाइल विवाद के बाद अधिकारी सेंसरशिप को और कड़ा न करने की सीख ले सकते हैं.

बुधवार को भी कुछ लोगों ने अखबार के दफ्तरों के सामने बैनर लेकर प्रदर्शन किए, जिनमें से एक में "डेमोक्रैटिक चीन" लिखा था. उनकी सरकारी समर्थक विरोधियों से हाथापाई भी हुई जो देशभक्ति वाले गाने गा रहे थे. विरोध प्रदर्शनों का चरम सोमवार को रहा जब जिसमें सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया. उन्हें सोशल मीडिया पर जबरदस्त समर्थन मिला.

राजधानी बीजिंग में प्रोपैगेंडा विभाग ने इस मामले में संपादकीय पेज पर एक लेख छापने के निर्देश के बाद बीजिंग न्यूज के प्रकाशक के इस्तीफे के बाद विवाद के भड़कने की खबरों का खंडन किया है. मॉर्निंग पोस्ट में विवाद शुरू होने के बाद सत्ताधारी पार्टी के साथ जुड़े ग्लोबल टाइम्स ने यह लेख छापी. इसमें कहा गया कि देश में पूरी तरह से आजाद मीडिया की संभावना नहीं है. साथ ही लिखा गया कि "मीडिया सुधार चीन की राजनीति के अनुरूप होना चाहिए."

मीडिया और ऑनलाइन पर आ रही रिपोर्टों के अनुसार बीजिंग न्यूज के दाई जीगेंग ने कमेंटरी न छापने पर अखबार को बंद किए जाने की धमकी मिलने के बाद प्रोपैगेंडा अधिकारियों से कहा है कि वे इस्तीफा दे रहे हैं. इस कमेंटरी का सारांश ग्लोबल टाइम्स के हवाले से बुधवार के अंक में पेज 20 पर छपा है. लेकिन बीजिंग में प्रोपैगेंडा दफ्तर के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी एएफफी को बताया कि दाई जीगेंग अभी भी हमेशा की तरह काम पर हैं. खुली अवज्ञा दिखाते हुए बीजिंग न्यूज ने वेबसाइट पर दक्षिण दलिया के नाम से एक लेख छापा है जो मंडारिन में सुनने में दक्षिणी साप्ताहिक जैसा लगता है.

चीन में सभी मीडिया संगठनों को सरकारी प्रोपैगेंडा विभाग से निर्देश मिलते हैं जिसका काम कम्युनिस्ट पार्टी को नकारात्मक लगने वाली खबरों को दबाना है. लेकिन दक्षिणी साप्ताहिक के मामले में अधिकारियों ने असामान्य रूप से खुला हस्तक्षेप किया. अखबार की खोजी रिपोर्टों ने इसे चीन में सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में एक बना दिया है. 2009 में इसके संपादक को इसलिए पदावनत कर दिया गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अखबार को एक्सक्लुसिव इंटरव्यू दिया था. चीन प्रेस स्वतंत्रता के मामले में 179 देशों में 174वें स्थान पर है. (डीडब्‍ल्‍यू)

सहारा को झटका : सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज की

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपए लौटाने के फैसले पर सहारा समूह की पुनर्विचार याचिका खारिज की। न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की खंडपीठ ने सहारा समूह की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका पर बुधवार को चैंबर में विचार करने के बाद उसे खारिज कर दिया। इसी पीठ ने गत 31 अगस्त को सहारा समूह को निवेशकों का धन वापस करने का आदेश दिया था।

न्यायाधीशों ने अपने आदेश में कहा, ‘‘हमारे सामने पेश सारे रिकॉर्ड पर सावधानी से गौर किया गया है। इन पुनर्विचार याचिकाओं पर विचार नहीं किया जा रहा है और इसलिए इन्हें खारिज किया जा रहा है।’’ न्यायालय ने कहा कि कंपनियों द्वारा पेश सभी दलीलों पर पहले फैसले के समय ही विचार किया जा चुका था। इन पर फिर से गौर करने की कोई आवश्यकता नहीं है। न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘इस मामले में हम दोनों द्वारा व्यक्त राय में किसी प्रकार का विचलन नहीं है। इसके विपरीत, आवेदक द्वारा कानूनी और तथ्यात्मक रुप से प्रस्तुत सभी दलीलों पर हर संभव पहलू और दृष्टिकोण से गौर किया गया, और उनका निस्तारण किया गया और जवाब दिया गया।’’ सहारा की पुनर्विचार याचिका खारिज किया जाना इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इन कंपनियों ने निवेशकों का पैसा लौटाने के लिए और समय दिए जाने की एक नई अर्जी भी पेश कर रखी है।

न्यायमूर्ति राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति खेहड की खंडपीठ ने 31 अगस्त को फैसला सुनाया था लेकिन 5 दिसंबर को प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस फैसले में सुधार करते हुए सहारा समूह की कंपनियों को निवेशकों का धन लौटाने के लिए नौ सप्ताह का और समय दे दिया था। न्यायमूर्ति कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने सेबी और निवेशकों के संगठन के विरोध के बावजूद सहारा समूह को यह मोहलत दे दी थी। सेबी ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि किसी अन्य पीठ के निर्णय में इस तरह से सुधार करना उचित नहीं है और सहारा समूह की अर्जी पर न्यायमूर्ति राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति खेहड़ की पीठ को ही विचार करना चाहिए।

सहारा समूह ने मंगलवार को भी प्रधान न्यायाधीश के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया था। न्यायमूर्ति राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति खेहड़ की खंडपीठ ने 31 अगस्त के निर्णय में सहारा समूह की इन कंपनियों द्वारा निवेशकों से धन जुटाने के लिए नियम कानूनों का उल्लंघन करने के कारण उसके खिलाफ तीखी टिप्पणियां की थीं। न्यायालय ने कहा था कि इस तरह के आर्थिक अपराधों से सख्ती से निबटना चाहिए। न्यायालय ने कहा था कि यदि सहारा इंडिया रियल इस्टेट कार्पोरेशन और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेन्ट कार्पोरेशन निवेशकों का धन लौटाने में विफल रही है तो सेबी उसकी संपत्तियों को कुर्क करने के साथ ही बैंक खाते भी जब्त कर सकती है।

न्यायालय ने सेबी की कार्रवाई की निगरानी के लिए शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीएन अग्रवाल को नियुक्त किया था। सहारा इंडिया रियल इस्टेट कापरेरेशन ने 8 मार्च 2008 तक 19,400.87 करोड़ और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेन्ट कापरेरेशन 6380.50 करोड़ रुपए जुटाए थे लेकिन 31 अगस्त तक इस मद में 24,029.73 करोड़ रुपये कुल राशि थी। सहारा समूह को अब 24,029.73 करोड़ मूल धन और करीब 14 हजार करोड़ रुपये के ब्याज की रकम के साथ करीब 38 हजार करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है। (एनडीटीवी)

sebi sahara

सपा सरकार पत्रकारों को हर संभव सहायता और सुविधाएं मुहैया कराएगी

प्रदेश की सपा सरकार पत्रकारों को हर संभव सहायता व सुविधाएं मुहैया कराने के लिए प्रयत्नशील है। पत्रकारों की समस्याओं को लेकर गठित कमेटी में विचार विमर्श हो चुका है बस इसको असलीजामा पहनाना बाकी है। उक्त बातें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे सपा के राष्‍ट्रीय महासचिव रामआसरे कुशवाहा द्वारा लखनऊ के राय उमानाथ वली प्रेक्षा गृह में प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्‍ट्रीय सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में कही।

उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार पत्रकारों की समस्याओं को लेकर गंभीर है और इसका निदान भी किया जायेगा। सम्मेलन में पहुंचे प्रदेश के श्रम एवं सेवायोजन मंत्री डा. वकार अहमद शाह ने कहा कि सपा सरकार में पत्रकारों को जो सम्मान मिलता है वह अन्य किसी सरकार में नहीं मिला। समाज की वास्तविक स्थिति सहित अन्य जनहित समस्याओं को कलमकार अपनी लेखनी द्वारा सामने लाता है और काफी हद तक इससे समस्यायें उजागर होती हैं व निराकरण भी आसानी से हो जाता है। उन्होंने कहा कि तमाम ऐसी घटनायें जो आम तौर पर सामने नहीं आती मीडिया द्वारा ही प्रमुखता से उठायी जाती हैं। ऐसे में समाज में मीडिया की भूमिका सराहनीय है।

कार्यक्रम में नेपाल, पाकिस्तान सहित देश के तमाम प्रांतों के पत्रकारों ने शिरकत की। एसोसिएशन के राष्‍ट्रीय अध्यक्ष गिरीश चन्द्र कुशवाहा द्वारा पत्रकारों की समस्यायें व उनके निराकरण के लिए 17 सूत्रीय मांग पत्र मुख्यमंत्री को सम्बोधित उनके प्रतिनिधि को सौंपा गया। सम्मेलन में पत्रकारों को प्रेरणा सम्मान देकर सम्मानित किया गया। वहीं विशिष्ट सेवाओं के लिए बांके नेपाल के पुलिस अधीक्षक विक्रम सिंह थापा व बहराइच के मोतीपुर थानाध्यक्ष कैलाश यादव को भी श्रम मंत्री डा. वकार अहमद शाह द्वारा प्रेरणा सम्मान देकर सम्मानित किया गया।

सम्मानित होने वालों में नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार पूर्णलाल चूके, माधवराम वर्मा, पवन जायसवाल, बहराइच जिलाध्यक्ष कुंवर दिवाकर सिंह, डा.एम.एस.परिहार, अजीम मिर्जा, हनुमान गुप्ता, अनिल कुशवाहा, रेशम सिंह, प्रदीप मिश्र, शेर सिंह कसौधन, रजीम अहमद, शकील अंसारी, अतहर अली अज्जन, सलीम अंसारी, शैलेन्द्र कुमार, आर.ए.हाशमी, पंकज मिश्र, फुरकान, इरफान, संजय जायसवाल, दानिश, संजय श्रीवास्तव, सत्यप्रकाश गुप्ता, संतोष वर्मा, राहुल सिंह, शकील अहमद, दुर्गेश कुशवाहा, सहित जिले के अन्य प्रतिनिधि शामिल रहे। कार्यक्रम में राष्‍ट्रीय महासचिव सपा डा. अशोक बाजपेयी, राज्य सूचना आयुक्त बी.पी. मौर्या, पूर्व न्यायाधीश मोतीलाल तिलहरी, पी. कुमार, डा. सहदेव चौधरी, रजा रिजवी, ए.पी. दीवान सहित अन्य पत्रकार व राजनैतिक शामिल रहे।

भास्‍कर में कल्‍पेश याज्ञनिक बने समूह संपादक, कमलेश सिंह नेशनल एडिटर!

दैनिक भास्‍कर से खबर है कि नेशनल एडिटर कल्‍पेश याज्ञनिक को ग्रुप एडिटर के रूप में प्रमोट कर दिया गया है. श्रवण गर्ग के नईदुनिया चले जाने के बाद ये इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की गई थी. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने कल्‍पेश को ही ग्रुप एडिटर यानी समूह संपादक के रूप में धीरे से प्रमोट कर दिया है. वहीं दूसरी तरफ अब तक नार्थ हेड के रूप में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल की जिम्‍मेदारी देख रहे कमलेश सिंह को भी प्रमोट किए जाने की खबर है.

सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने पिछले दिनों कमलेश सिंह को भोपाल बुला लिया था. उन्‍हें भी नेशनल एडिटर बनाए जाने की खबर है. कमलेश को कल्‍पेश की जगह लाया गया है. कमलेश भी लम्‍बे समय से भास्‍कर से जुड़े हुए हैं. उनकी कार्यक्षमता को देखते हुए प्रबंधन ने यह निर्णय लिया है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन जल्‍द ही इस आशय की आधिकारिक घोषणा कर सकता है.

आजतक नम्‍बर वन, जी न्‍यूज को बढ़त, इंडिया टीवी लुढ़का

दो महीने की शांति के बाद एक बार फिर टीआरपी की हलचल शुरू हो गई है. टैम द्वारा नए साल में पहली बार जारी किए गए आंकड़े में आजतक नम्‍बर एक के पायदान पर काबिज है. वहीं पिछले दिनों की घटनाओं का जी न्‍यूज को जबर्दस्‍त फायदा हुआ है. एबीपी न्‍यूज भी अपनी बढ़त बरकरार रखने में सफलता पाई है. सबसे ज्‍यादा नुकसान इंडिया टीवी को हुआ है. ये चैनल जी न्‍यूज एवं एबीपी न्‍यूज से पिछड़ गया है. टीजी सीएस 15 प्‍लस श्रेणी में आजतक पहले नम्‍बर बना हुआ है. एबीपी दूसरे, जी न्‍यूज तीसरे तथा इंडिया टीवी चौथे पायदान पर है.

इसी तरह टीजी सीएस 25 एबीसी श्रेणी में भी आजतक ने सभी चैनलों से बाजी मारते हुए पहले पायदान पर अपना कब्‍जा बरकरार रखा है. सुप्रीय प्रसाद के आने के बाद से चैनल लगातार नम्‍बर वन बना हुआ है. टीआरपी मास्‍टर माने जाने वाले सुप्रीय ने इसे चैनल को दोनों श्रेणियों में नंबर वन पर लाकर इसे साबित भी किया है. इस श्रेणी में जी न्‍यूज दूसरे तथा एबीपी न्‍यूज और इंडिया टीवी संयुक्‍त रूप से तीसरे स्‍थान पर हैं. दोनों श्रेणियों में सबसे ज्‍यादा नुकसान इंडिया टीवी को हुआ है. टैम का दबाव हटने के बाद भूत प्रेत, स्‍वर्ग नरक से हटकर खबर दिखाने की कोशिश में लगा यह चैनल पिछड़ गया है. वहीं अन्‍य चैनल लगभग अपने अपने स्‍थान पर बने हुए हैं. नीचे दोनों श्रेणियों की टीआरपी रेटिंग.

टीजी- सीएस 15प्लस

आजतक – 18.1, एबीपी न्यूज़ – 16.5, ज़ी न्यूज़ – 15.7, इंडिया टीवी – 14.3, आईबीएन7 – 8.6, न्यूज़ 24 – 7.8, एनडीटीवी इंडिया – 7.2, तेज – 4.2,  डीडी न्यूज़ – 3.0, समय – 2.2, लाइव इंडिया- 1.4

टीजी – सीएस 25एबीसी 

आजतक – 18.5, ज़ी न्यूज़ – 16.5, एबीपी न्यूज़ – 14.7, इंडिया टीवी – 14.7, आईबीएन7 – 9.7, एनडीटीवी इंडिया – 8.3, न्यूज़ 24 – 7.3, समय – 1.8, तेज – 4.1,  डीडी न्यूज़ – 2.9, लाइव इंडिया- .8, इंडिया न्‍यूज – .8

भ्रष्टाचार के आरोप में दैनिक भास्कर, रायगढ़ यूनिट के एडिटोरियल हेड अजय तिवारी और रिपोर्टर अखिलेश पुरोहित बर्खास्त

फोन रिकार्डिंग और अन्य दस्तावेजों के आधार पर एडिटोरियल हेड महोदय का भ्रष्टाचार साबित हुआ और उन्हें तुरंत सजा सुना दी गई. जी हां. दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याज्ञनिक ने दैनिक भास्कर, रायगढ़ यूनिट के एडिटोरियल हेड अजय तिवारी को बर्खास्त करने की सजा सुना दी है. रिपोर्टर अखिलेश पुरोहित को भी नौकरी से निकाल दिया गया है. इस बाबत कल्पेश याज्ञनिक ने एक आंतरिक मेल भी जारी कर दिया है. यह मेल भड़ास4मीडिया के पास भी है, जिसे हम यहां पूरा का पूरा प्रकाशित कर रहे हैं.

Dear friends

Ajay Tiwari, editorial head of Raigarh unit in Chhatisgarh, has been dismissed with immediate effect. He was found guilty of corruption in an open-and-shut case. Though the speaking evidence like recordings and documents were more than present, still a thorough investigation was held to provide ample opportunity to all the parties concerned, including Tiwari. That further proved his guilt.

Dainik Bhaskar, as an organisation, has strongest possible ethics and defined values for each and everyone covering top to bottom. Any corrupt practice is therefore, beyond tolerance. Specially in journalism, entire life, and not only career, is based on one single value 'INTEGRITY'. If anyone is found weak on this, he/she ceases to be a journalist and also cannot continue in Dainik Bhaskar Group.

Alongwith Tiwari, a Raigarh reporter, Akhilesh Purohit, has also been sacked.

(Rajeevji, please follow remaining formalities with HR and other departments concerned at your end. Alternative arrangements are being made. Meanwhile, make it loud and clear to all and sundry —  that such an act is NOT tolerated in our organisation at all, come what may.)

– Kalpesh

आधार से ही बन जायेगा पासपोर्ट

नयी दिल्ली: अब पासपोर्ट बनवाने के लिए आपको ढेर सारे कागजात जमा नहीं करवाने होंगे. अगर आपके पास आधार नंबर है, तो इसे ही आपका एड्रेस प्रूफ और फोटो पहचान पत्र मान कर पासपोर्ट जारी किया जायेगा. विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट जारी करनेवाली सभी अथॉरिटीज को इस संबंध में जरूरी निर्देश जारी कर दिये हैं. इसमें आधार कार्ड को अहम बनाया गया है.

अभी तक पासपोर्ट बनवाने के लिए 14 तरह के दस्तवेजों की जरूरत होती थी, जिसमें मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तवेज शामिल थे. लेकिन, आधार नंबर को मान्यता मिलने के बाद अब आपको पासपोर्ट ऑफिस में इनमें से कई दस्तावेज नहीं जमा कराने होंगे. गौरतलब है कि आधार कार्ड 12 अंकों का एक नागरिक पहचान नंबर है, जिसे कार्ड की शक्ल में दिया जाता है. सरकारी सब्सिडी का पैसा भी अब आधार कार्ड के जरिये लोगों के बैंक खातों में जाने लगा है.

सोशल मीडिया के एक्‍सटेंशन बन गए हैं न्‍यूज चैनल

: इंटरनेट की धड़कन से टीवी चल रहा है न कि संपादक पत्रकार की हरकतों से : पल्प फिक्शन से पल्प टेलीविज़न तक : न्यूज़ चैनल अपने आस पास के माध्यमों के दबाव में काम करने वाले माध्यम के रूप में नज़र आने लगे हैं। इनका अपना कोई चरित्र नहीं रहा है। गैंग रेप मामले में ही न्यूज़ चैनलों में अभियान का भाव तब आया जब अठारह दिसंबर की सुबह अखबारों में इस खबर को प्रमुखता से छापा गया। उसके पहले हिन्दी चैनलों में यह खबर प्रमुखता से थी मगर अभियान के शक्ल में नहीं। यह ज़रूर है कि एक चैनल ने सत्रह की रात अपनी सारी महिला पत्रकारों को रात वाली सड़क पर भेज दिया कि वे सुरक्षित महसूस करती हैं या नहीं लेकिन इस बार टीवी को आंदोलित करने में प्रिंट की भूमिका को भी देखा जाना चाहिए। उसके बाद या उसके साथ साथ सोशल मीडिया आ गया और फिर सोशल मीडिया से सारी बातें घूम कर टीवी में पहुंचने लगीं। एक सर्किल बन गया बल्कि आज कल ऐसे मुद्दों पर इस तरह का सर्किल जल्दी बन जाता है।

कुछ अखबार हैं जो बचे हुए हैं पर ज्यादातर अखबार भी सोशल से लेकर वोकल मीडिया की भूमिका में आने लगे हैं। टीवी के कई संपादक सोशल मीडिया के दबाव को स्वीकार करते हुए मिल जायेंगे। जैसे ही सचिन तेंदुलकर ने रिटायरमेंट की घोषणा की वैसे ही एक बड़े संपादक ने ट्विट किया कि गैंगरेप की खबरें पहले चलेंगी और सचिन की बाद में। इसी क्रम में इसी सोशल मीडिया पर मौजूद दक्षिणपंथी टीवी की आलोचना करने लगे कि ओवैसी की खबर सिकुलर मीडिया जानबूझ कर नहीं दिखा रहा है। चौबीस दिसंबर का भाषण अभी तक नहीं दिखाया जबकि सबको मालूम है कि उस दिन टीवी दिल्ली गैंगरेप के मामले में डूबा हुआ था, लेकिन दक्षिणपंथी सोशल मीडिया के दबाव में कई चैनल जल्दी आ गए और गैंगरेप की ख़बरें छोड़ ओवैसी के पीछे पड़ गए। वैसे यह खबर भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी, चर्चा करनी ही चाहिए थी लेकिन तब सिर्फ यही खबर क्यों। सचिन तेंदुलकर वाली खबर क्यों नहीं। वो किस मामले में कम महत्वपूर्ण था। अलग अलग सामाजिक समूहों के दबाव में टेलीविज़न दायें बायें होने लगा है। इसी बहाने कुछ मुद्दे पर सरकार को भी चेतना पड़ा। ज़ाहिर है टेलीविजन का इकलौता प्रभुत्व और प्रभाव खत्म हो गया है। ख़ैर।

गैंगरेप मामले मे रिपोर्टिंग कैसी हुई इस पर आने से पहले कुछ बात कहना चाहता हूं। जैसे पल्प फिक्शन होता है वैसे ही पल्प टेलीविजन होता है। भारत में ये पल्प टेलीविज़न का दौर है। पहले आप यह बात हिन्दी न्यूज़ चैनलों के बारे में यह बात कह सकते थे लेकिन अब इंग्लिश चैनल भी यही हो गए हैं। भाषा, प्रस्तुति और प्रोग्राम के मामले में हिन्दी इंगलिस चैनलों का अंतर पहले से कहीं ज्यादा कम हो गया है। हिन्दी और इंग्लिश चैनलों पर ज़्यादतर बहसिया फार्मेट के ही कार्यक्रम चल रहे हैं। पल्प को हिन्दी में लुग्दी कहते हैं। बहुत लोग मुझसे पूछते हैं कि आप चैनल को लैनल क्यों कहते हैं तो मैं लुग्दी से लैनल बनाकर लैनल बोलता हूं। इसका मतलब यह नहीं कि जो पल्प है वो खराब ही है या उसकी लोकप्रियता कम है। बस उसके पेश करने की शैली का मूल्यांकन या विश्लेषण मीडिया के पारंपरिक मानकों से नहीं किया जा सकता।

चैनलों की भाषा, संगीत और तस्वीर पर बालीवुड की भाषा और बहुत हद तक हिन्दी डिपार्टमेंट की दी हुई ललित निबंधीय हिन्दी का बहुत प्रभाव है, मगर लुग्दी टच होने के कारण मैं चैनलों की हिन्दी को लिन्दी बोलता हूं। तो लिन्दी लैनल और इंग्लिश वाले इन्दी लैनल। क्योंकि अब इंग्लिश बोलने का टोन भी हिन्दी जैसा हो गया है। इसका मतलब यह नहीं कि टीवी पर अच्छी पत्रकारिता नहीं होती है, वो भी होती है और वो कभी कभी पल्प टेलिविजन के दायरे में भी होती है। गैंग रेप मामले में भी बहुत कुछ अच्छा भी हो गया। अंदाज़ी टक्कर में। शैलियों पर बालीवुड और हिन्दी डिपार्टमेंट की हिन्दी के अलावा एक और प्रभाव है टीवी पर। वो है मेरठ माइंडसेट का। हर कहानी को रहस्य और रोमांच में लपेट कर मनोहरकथा की तरह पेश करना। जैसे जाग गया देश, मां कसम बदलेगा हिन्दुस्तान, चीख नहीं जाएगी बेकार, मैं लड़की हूं। इस तरह के शीर्षक और वायस ओवर आपको सुनाई देंगे। सिर्फ गैंग रेप ही नहीं ऐसे किसी भी मामले में जिसे लेकर सोशल मीडिया से भरम फैलता है कि पब्लिक यही सोचती है तो उसकी सोच में बड़े पैमाने पर गाजे बाजे के साथ घुस चला जाए। लैनलों में जो संगीत का इस्तमाल होता है उसका अलग से अध्ययन किया जाना चाहिए। इसका ज्ञान मुझे कम है। सरसरी तौर पर लगता है कि रेप और डार्क सीन या रेघाने वाली आ आ की ध्वनियों का असर दिखता है। अब यह अलग सवाल है कि इसे व्यक्त करने का दूसरा बेहतर फार्मेट क्या हो सकता था, तो जो नहीं है और जो नहीं हुआ उस पर क्यों बात करें, जो हो रहा है उसकी कमेंटरी तो कर ही सकते हैं।

लैनलों ने जो अभिव्यक्ति के लिए जो फार्मेट गढ़े थे उसका त्याग कर दिया है। स्टोरी टेलिंग की जगह स्टेटस अपटेडिंग हो गई है। लैनल सोशल मीडिया का एक्सटेंशन हो गया है। इसकी समस्या यह है कि अखबार की तुलना में स्पीड की दावेदारी सोशल मीडिया ने खत्म कर दी है। ऐसे मौकों पर न्यूज रूम ध्वस्त हो जाते हैं। न्यूज रूम का पूरा ढांचा ध्वस्त हो जाता है। अमिताभ बच्चन कबीर बेदी, किरण बेदी और राहुल बोस जैसों के ट्विट से शुरू होता है और लैनलों पर घटना को लेकर पूरा माहौल बन जाता है। टीवी अपनी खोजी और गढ़ी हुई खबरों की अनुकृति कम करता है। कुल मिलाकर चैनलों का ट्विटराइजेशन यानी ट्वीटरीकरण हो गया है। स्क्रीन पर चौबीस घंटे बक्से बने होते हैं उसमें लोग बोल रहे होते हैं। ट्विटर या फेसबुक की तरह। आयें बायें सायं। गैंगरेप की घटना के बाद टीवी भी सोशल मीडिया का एक्सटेंशन बन गया। आप कह सकते हैं कि रायसीना हिल्स का विस्तार बन गया। जिस तरह सोशल मीडिया में बातें होती हैं उसी तरह से टीवी में होने लगी।

एक टीवी पर एक लड़की को बास्टर्ड बोलते सुना। खुद मेरे शो में कुछ लोग अनाप शनाप शब्दों का इस्तमाल कर गए। स्मृति ईरानी और संजय निरुपम का प्रसंग को ट्वीटरीकरण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। यह टीवी की नहीं, सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति है। ट्वीटर और फेसबुक अकाउंट से ओपिनियन और सवाल लिये जाने लगे। खाताधारियों को बुलाया जाने लगा। आप ध्यान से देखिये, लैनल सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति के माध्यम बन गए हैं। कम से कम ऐसे मौकों पर तो बन ही जाते हैं। स्क्रीन पर बगल में तस्वीर चल रही है लेकिन सब अपने अपने दिमाग के हिसाब से बोलते जा रहे हैं। कोई परंपरा की बात कर रहा है, भारतीय मूल्यों की बात कर रहा है तो कोई पाश्चात्य मूल्यों को दोष दे रहा है। अनियंत्रित गुस्सा, गाली सब प्रसारित हो रहा है। इससे क्या हुआ कि मेन स्ट्रीम मीडिया का जो अंग था टीवी उसका मार्जिनलाइजेशन होने लगा। वैसे तो सारे मीडिया अब सोशल मीडिया पर है इसलिए सोशल मीडिया ही मेनस्ट्रीम मीडिया है।

एंकर लिंक से लेकर पीटूसी तक सब सोशल मीडिया के रिफ्लेशक्शन लगते हैं। इसमें आप हिन्दी और इंगलिस चैनलों में अंतर नहीं कर सकते हैं। जनमत के नाम पर हर तरह के मत हैं। बस हंगामे की शक्ल होनी चाहिए। इस काम में कई ऐसे मुद्दे ज़रूर आए जिनसे सरकार की शिथिलता टूटी है। यह भी देखना चाहिए। टीवी के सोशल मीडिया में बदलने से, उसके रायसीना में बदलने से बहुत फर्क आ रहा है। यह एक तरह का एक्टिविज्म है जर्नलिज्म नहीं है। उसमें भी खास तरह का एक्टिविज़्म है। इंटरनेट की धड़कन से टेलीविज़न चल रहा है न कि संपादक पत्रकार की हरकतों से।

तो हम दिल्ली गैंगरेप मामले में सिर्फ रिपोर्ट नहीं कर रहे थे। हम बहाव में बह रहे थे। चैनल जल्दी ही अपनी बनाई हुई कैटगरी से आज़ाद हो गए। तभी ल्यूटियन ज़ोन के कई बड़े पत्रकार इस बात से हैरान थे कि ये रायसीना तक कैसे जा सकते हैं, कैसे प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से मिलने की बात कर सकते हैं, हमें तो इंटरव्यू मिलता नहीं, इन्हें प्रक्रिया प्रोटोकोल नहीं मालूम है। पीएम सिर्फ विदेश यात्रा से लौटते वक्त अपने प्लेन में मीडिया से बात करते हैं। वो या तो ऐसी बातें कह रहे थे या फिर इन बातों की पृष्ठभूमि में भीड़ की आलोचना करने लगे। उन्हें लगा कि ल्युटियन ज़ोन तो प्रोटेक्टेड जोन है यहां कैसे लोग आ सकते हैं वो भी बिना नेता के, वो भी बिना गरीब हुए, किसान हुए। अभिजित मुखर्जी ने तो बाद में डेंटेट पेंटेड की बात कही लेकिन इस भीड़ को कमोबेश इन्हीं शब्दों में पहले से भी खारिज किया जा रहा था। हो सकता है कि ये आलोचनाएं सही हो मगर ल्युटियन कंफर्ट ज़ोन में सिस्टम का पार्ट बन चुके या सिस्टम की आदतों को आत्मसात यानी इंटरनलाइज कर चुके कई बड़े पत्रकारों ने संदेह की नज़र से देखा। यह भी एक कारण तो था ही।

अब इस बहस में अखबार की रिपोर्टिंग को भी लाना चाहिए लेकिन वो मेरा विषय नहीं है। उनकी भाषा और प्रस्तुति पर भी बात होनी चाहिए जो हम नहीं करते हैं। लैनलों की रिपोर्टिंग नीयत में सही थी। वो आजकल चालाक नेता की तरह जनभावना भांप लेते हैं और बयान देने की तर्ज पर अभियान चलाने लगते हैं।  वो तो इसी भाव में रिपोर्ट कर रहे थे कि जैसे आंदोलन के साथ हैं। इस जनाक्रोश के साथ हैं लेकिन जो रिपोर्टिंग हो रही थी और जिस शैली में हो रही थी वो अपने आप में समस्याग्रस्त (प्रोब्लेमेटिक) है। आप उस टीवी से अचानक नारीवादी होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जो चार महीने पहले करवां चौथ के मौके पर अपने डिबेट के एक बक्से में चांद को लाइव काट कर रखे हुए था। महिला एंकर तक करवां चौथिया लिबास या भाव में डूबी हुईं थीं। बता रही थीं कि करवां चौथ कैसे करें । टीवी तो भारतीय पंरपरा में नारी के गुण कर्तव्य और अवधारणाओं को इन त्योहारों के कवरेज से गढ़ता चलता है। कभी तो उसने सवाल नहीं किया कि देवी रूप का क्या मतलब है। तो वो रायसीना या जंतर मंतर से अपनी रिपोर्टिंग में देवी के रूप की कैसे आलोचना कर सकता है। बल्कि एंकर से लेकर रिपोर्टर तक की बातों में इस तरह की पंक्तियां आ रही थीं। जिस देश में देवी को पूजा जाता है उस देश में कैसे हो गया। ये भाव था। वही मानव संसाधन जो साल भर घोर पारंपरिक या कई मामलों में स्त्री विरोधी छवियों को गढ़ता है उसी को आप चार दिनों में नारीवादी मूल्यों के प्रति सचेत कैसे बना देंगे। यह ज्यादती होगी।

तो टीवी के पास कोई अपनी भाषा तो नहीं थी। उसके पास अपनी कोई छवि नहीं है। इतनी आलोचना होने के बाद सभी लैनलों पर एक शर्मसार बैठी हुई, सिसकती हुई नारी के ही ग्राफिक्स चल रहे हैं। सिलुएट के अंधेरे में गुम नारी की तस्वीर है। जैसे ही तीन मंत्रियों ने तीन बेटी होने की बात की एक चैनल पर स्टोरी ने क्लास वार के रूप में टर्न ले लिया। आपकी तीन बेटिया हर वक्त सलामी के पहरे में रहती होंगी, क्या वो ऐसे सुनसान बस स्टैंड पर जाती होंगी, बिना जाने कि उनकी क्या स्थिति है,लेकिन रिपोर्टर उनकी विशिष्टता को चुनौती देने लगा। थोड़ी देर के लिए वर्ग युद्ध छिड़ गया। बाद में यह बात भी आई कि बेटी का पिता होने से संवेदनशीलता विशिष्ठ हो जाए यह ज़रूरी नहीं है। दूसरी तरफ मैं लड़की हूं टाइप मेरठ फ्रेम की आत्मकथाएं चलने लगी। फर्स्ट पर्सन अकाउंट में। टीवी भी सोशल मीडिया की तरह फैला हुआ था।

हालांकि इसी बीच वो एडवोकेसी भी कर रहा था लेकिन उसकी भाषा स्लोगन और छंदों में इतनी फंसी हुई लगी कि ऊब और आक्रोश के अलावा समझ की गुजाइश कम नज़र आ रही थी। हिंसा को ही एक्शन मान कर दिखाया गया। शर्म की ढलती शाम के ढांचे टूट रहे हैं, सहमी हुई सांसे बोल रही हैं, दुबके परिंदों की पांखें बोल रही हैं, अब कौन कहे कि दुबके परिंदे का मतलब क्या है। क्या अभी तक आप उन लड़कियों को दुबके परिंदे बोल रहे थे। आप ही जब ऐसा समझ रहे थे तो सरकार और सिस्टम और समाज की क्या बात करें। हालांकि टीवी इस मामले में अपनी भूमिका को सकारात्मक तरीके से देखेगा और कई मामलों में हुआ भी,उसके चाहते हुए और न चाहते हुए दोनों। लेकिन वही बात है जैसे कई लड़के जो खुद को अच्छा समझते हैं या जिन्हें लड़कियां भी अच्छा समझते हैं वो पूरी तरह से अच्छे नहीं होते कम से कम नारीवादी संदर्भ में। सबकुछ नाटकीय क्यों लगने लगता है ये समझ नहीं आता। कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे ही लगता है। यह लेख तमाम लैनलों को ध्यान में रखकर लिखा गया है।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग कस्‍बा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

दिल्‍ली गैंगरेप : मीडिया नहीं कर पाएगा कवरेज, रोक बरकरार

नई दिल्ली : राष्ट्रीय राजधानी में 16 दिसंबर को 23 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार के मामले में बंद कमरे में सुनवाई करने और मीडिया को इसकी रिपोर्टिंग से दूर रखने के मजिस्ट्रिीय अदालत के फैसले को दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को बरकरार रखा। जिला एवं सत्र न्यायाधीश आर के गाबा ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सात जनवरी के आदेश में कुछ भी ‘अवैध’ या ‘अनुचित’ नहीं था।

न्यायाधीश ने कहा कि मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट न केवल अपने अधिकारों की सीमा में थी बल्कि बलात्कार और इससे जुड़े मामलों की कार्यवाही के लिए कार्यवाही में अपराधिक दंड संहिता की धारा 327 (2) के प्रावधानों को लागू करने के लिए बाध्य थीं। न्यायाधीश ने कहा कि हकीकत तो यह है कि उनके अदालत कक्ष में बड़ी संख्या में भीड़ थी जिसके कारण विचाराधीन कैदियों को भी लाने की जगह नहीं बची थी जिस वजह से अदालत को यह आदेश देना पड़ा।

सत्र अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 327 (2) के तहत पीठासीन अधिकारी के लिए बलात्कार और संबंधित अपराधों के मामलों में बंद कमरे में सुनवाई करना अनिवार्य होता है। बहस के दौरान, लोक अभियोजक राजीव मोहन ने याचिका का विरोध किया और कहा कि चूंकि इसमें मांगी गईं राहत अपराध प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के खिलाफ हैं, इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए। (एजेंसी)

सेंसरशिप के खिलाफ सड़कों पर उतर आए चीनी पत्रकार

बीजिंग। मीडिया पर सेंसरशिप के खिलाफ चीनी पत्रकार सड़कों पर उतर आए हैं। एक साप्ताहिक के पत्रकारों का यह दुर्लभ प्रदर्शन दो दिनों से जारी है, लेकिन सरकार ने साफ कर दिया है कि मीडिया पर सरकारी नियंत्रण बना रहेगा। प्रदर्शनों को दूसरे मीडिया समूहों का भी समर्थन मिल रहा है। हालांकि न्यूज वेबसाइट्स पर सरकारी संपादकीय ही चला, जिसमें पत्रकारों की आलोचना की गई है, लेकिन उन्होंने अस्वीकृति भी लगाई कि इसमें अभिव्यक्त विचारों का यह मतलब नहीं है कि वे खुद इससे सहमत हैं।

सरकार ने सभी मीडिया समूहों को सर्कुलर जारी किया है कि आधिकारिक मीडिया पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में ही रहेगा। यह मूलभूत सिद्धांत है, जिसे बदला नहीं जा सकता। इसमें सभी अखबारों को ग्लोबल टाइम्स का संपादकीय प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया है। इस बीच, विदेश मंत्रालय ने इन पत्रकारों को मिले अमेरिका के समर्थन की निंदा की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने होंग लेई ने कहा, 'चीन अपने आंतरिक मामलों में किसी भी देश व व्यक्ति के दखल का विरोध करता है।' उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया नुलैंड के बयान पर यह प्रतिक्रिया दी। नुलैंड ने कहा था कि अमेरिका चीनी और वहां काम कर रहे विदेशी पत्रकारों के अधिकारों के लिए हमेशा से समर्थन में रहा है। (प्रेनो)

क्‍यों इंटरव्‍यू दिखाने की हिम्‍मत उसी संपादक ने दिखाई जो खुद कटघरे में है?

: स्‍व नियमन की आड़ में सत्‍तानुकुल बन गया है बीईए : अगर ब्राडकास्ट एडिटर एसोशियसेशन [बीईए] की चलती तो बलात्कार की त्रासदी का वह सच सामने आ ही नहीं पाता जो लड़की के दोस्त ने अपने इंटरव्यू में बता दिया। दिल्ली की लड़की के बलात्कार के बाद जिस तरह का आक्रोश दिल्ली ही नहीं समूचे देश की सड़को़ पर दिखायी दिया उसे दिखाने वाले राष्ट्रीय न्यूज चैनलों ने ही स्वयं नियमन की ऐसी लक्ष्मण रेखा अपने टीवी स्क्रिन से लेकर पत्रकारिता को लेकर खिंची कि झटके में पत्रकारिता हाशिये पर चली गई और चैनलों के कैमरे ही संपादक की भूमिका में आ गये। यानी कैमरा जो देखे वही पत्रकारिता और कैमरे की तस्वीरों को बड़ा बताना या कुछ छुपाना ही बीईए की पत्रकारिता।

जरा सिलसिलेवार तरीके से न्यूज चैनलों की पत्रकारिता के सच को बलात्कार के बाद देश में उपजे आक्रोश तले स्वय नियमन को परखे। लड़की का वह दोस्त जो एक न्यूज चैनल के इंटरव्यू में प्रगट हुआ और पुलिस से लेकर दिल्ली की सड़कों पर संवेदनहीन भागते दौड़ते लोगों के सच को बताकर आक्रोश के तौर तरीकों को ही कटघरे में खड़ा कर गया। वह पहले भी सामने आ सकता था।

पुलिस जब राजपथ से लेकर जनपथ और इंडिया गेट से लेकर जंतर-मंतर पर आक्रोश में नारे लगाते युवाओं पर पानी की बौछार और आंसू गैस से लेकर डंडे बरसा रही थी, अगर उस वक्त यह सच सामने आ चुका होता कि दिल्ली पुलिस तो बलात्कार की भुक्तभोगी को किस थाने और किस अस्पताल में ले जाये, इसे लेकर आधे घंटे तक भिडी रही तो क्या राजपथ से लेकर जंतर मंतर पर सरकार में यह नैतिक साहस रहता कि उसी पुलिस के आसरे युवाओं के आक्रोश को थामने के लिये डंडा, आंसू गैस या पानी की बौछार चलवा पाती। या फिर जलती हुई मोमबत्तियों के आसरे अपने दुख और लंपट चकाचौंध में खोती व्यवस्था पर अंगुली उठाने वाले लोगों का यह सच पहले सामने आ जाता कि सड़क पर लड़की और लड़का नग्न अवस्था में पडे़ रहे और कोई रुका नहीं। जो रुका वह खुद को असहाय समझ कर बस खड़ा ही रहा।

अगर यह इंटरव्यू पहले आ गया होता तो न्यूज चैनलों पर दस दिनों तक लगातार चलती बहस में हर आम आदमी को यह शर्म तो महसूस होती ही कि वह भी कहीं ना कही इस व्यवस्था में गुनहगार हो गया है या बना दिया गया है। लेकिन इंटरव्यू पुलिस की चार्जशीट दाखिल होने के बाद आया। यानी जो पुलिस डर और खौफ का पर्याय अपने आप में समाज के भीतर बन चुकी है उसे ही जांच की कार्रवाई करनी है। सवाल यही से खड़ा होता है कि आखिर जो संविधान हमारी संसदीय व्यवस्था या सत्ता को लेकर चैक एंड बैलेस की परिस्थियां पैदा करना चाहता है, उसके ठीक उलट सत्ता और व्यवस्था ही सहमति का राग लोकतंत्र के आधार पर बनाने में क्यों लग चुकी है और मीडिया इसमें अहम भूमिका निभाने लगा है।

यह सवाल इसलिये क्योंकि मीडिया की भूमिका मौजूदा दौर में सबसे व्यापक और किसी भी मुद्दे को विस्तार देने वाली हो चुकी है। इसलिये किसी भी मुद्दे पर विरोध के स्वर हो या जनआंदोलन सरकार सबसे पहले मीडिया की नब्ज को ही दबाती है। मुश्किल सिर्फ सरकार की एडवाइजरी का नहीं है सवाल इस दौर में मीडिया के रुख का भी है जो पत्रकारिता को सत्ता के पिलर पर खड़ा कर परिभाषित करने लगी है। बलात्कार के खिलाफ जब युवा रायसीना हिल्स के सीने पर चढ़े तो पत्रकारिता को सरकार की धारा 144 में कानून उल्लंघन दिखायी देने लगा। लोगों का आक्रोश जब दिल्ली की हर सड़क पर उमड़ने लगा तो मेट्रो  की आवाजाही रोक दी गई, लेकिन पत्रकारिता ने सरकार के रुख पर अंगुली नहीं उठायी बल्कि मेट्रो के दर्जनों स्टेशनों के बंद को सुरक्षा से जोड़ दिया। जब इंडिया-गेट की तरफ जाने वाली हर सड़क को बैरिकेट से खाकी वर्दी ने कस दिया तो न्यूज चैनलों की पत्रकारिता ने सरकार की चाक-चौबंद व्यवस्था के कसीदे ही गढे़।

न्यूज चैनलों की स्वयं नियमन की पत्रकारीय समझ ने न्यूज चैनलों में काम करने वाले हर रिपोर्टर को यह सीख दे दी की सत्ता बरकार रहे। सरकार पर आंच ना आये। और सड़क का विरोध प्रदर्शन हदों में चलता रहे यही दिखाना बतानी है, और लोकतंत्र यही कहता है। इसलिये सरकार की एडवाइजरी से एक कदम आगे बीईए की गाईंडलाइन्स आ गई। सिंगापुर से ताबूत में बंद लडकी दिल्ली कैसे रात में पहुंची और सुबह सवेरे कैसे लड़की का अंतिम सस्कार कर दिया गया। यह सब न्यूज चैनलों से गायब हो गया क्योंकि बीईए की स्वयंनियमन पत्रकारिता को लगा कि इससे देश की भावनाओ में उबाल आ सकता है या फिर बलात्कार की त्रासदी के साथ भावनात्मक खेल हो सकता है। किसी न्यूज चैनल की ओबी वैन और कैमरे की भीड़ ने उस रात दिल्ली के घुप्प अंधेरे को चीरने की कोशिश नहीं की जिस घुप्प अंघेरे में राजनीतिक उजियारा लिये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और दिल्ली की सीएम से लेकर विपक्ष के दमदार नेता एकजुट होकर आंसू बहाकर ताबूत में बंद लड़की की आखरी विदाई में शरीक हुये।

अगर न्यूज चैनल पत्रकारिता कर रहे होते तो 28 दिसबंर की रात जब लड़की को इलाज के लिये सिंगापुर ले जाया जा रहा था, उससे पहले सफदरजंग अस्पताल में लड़की के परिवार वाले और लड़की का साथी किस अवस्था में में रो रो कर लड़की का मातम मना रहे थे, यह सब तब सामने ना आ जाता जो सिंगापुर में 48 घंटे के भीतर लड़की की मौत को लेकर दिल्ली में 31 दिसबंर को सवाल उठने लगे। आखिर क्यों कोई न्यूज चैनल उस दौर में लड़की के परिवार के किसी सदस्य या उसके साथी लड़के की बात को नहीं दिखा रहा था। जबकि लड़का और उसका मामा तो हर वक्त मीडिया के लिये उपलब्ध था। परिवार के सदस्य हो या लड़की का साथी। आखिर सभी को अस्पताल में दिल्ली पुलिस ने ही कह रखा था कि मीडिया के सामने ना जाये। मीडिया से बातचीत ना करें। केस बिगड़ सकता है।

वहीं जिस तरह बलात्कार को लेकर सड़क पर सरकार-पुलिस और व्यवस्था को लेकर आक्रोश उमड़ा उसने ना सिर्फ न्यूज चैनलों के संपादकों को बल्कि संपादकों ने अपने स्‍वयं नियमन के लिये मिलकर बनायी ब्राडकास्ट एडिटर एसोसियेशन यानी बीईए के जरिये पत्राकरिता को ताक पर रख सरकारनुकुल नियमावली बनाकर काम करना शुरू कर दिया। मसलन नंबर वन चैनल पर लड़के के मामा का इंटरव्यू चला तो उसका चेहरा भी ब्लर कर दिया गया। एक चैनल पर लड़की के पिता का इंटरव्यू चला तो चैनल का एंकर पांच मिनट तक यही बताता रहा कि उसने क्यों लड़की के पिता का नाम, चेहरे, जगह यानी सबकुछ गुप्त रखा है। जबकि इन दोनों के इंटरव्यू लड़की की मौत के बाद लिये गये थे। यानी हर स्तर पर न्यूज चैनल की पत्रकारिता सत्तानुकुल एक ऐसी लकीर खिंचती रही या सत्तानुकुल होकर ही पत्रकारिता करनी चाहिये यह बताती रही। यानी ध्यान दें तो बीईए बना इसलिये था कि सरकार चैनलों पर नकेल ना कस लें। और जिस वक्त सरकार न्यूज चैनलों पर नकेल कसने की बात कर रही थी तब न्यूज चैनलों का ध्यान खबरों पर नहीं बल्कि तमाशे पर ज्यादा था।

इसिलिये स्वयं नियमन का सवाल उठाकर न्यूज चैनलों के खुद को एकजुट किया और बीईए बनाया। लेकिन धीरे धीरे यही बीईए कैसे जड़वत होता गया संयोग से बलात्कार की कवरेज के दौरान लड़की के दोस्त के उस इंटरव्यू ने बता दिया जो ले कोई भी सकता था, लेकिन दिखाने और लेने की हिम्मत उसी संपादक ने दिखायी जो खुद कटघरे में है और बीईए ने उसे खुद से बेदखल कर दिया है। इसलिये अब सवाल कहीं बड़ा है कि न्यूज चैनलों को स्वयं नियमन का ऐलान बीईए के जरिये करना है या फिर पत्रकारिता का मतलब ही स्वयं नियमन होता है, जो सत्ता और सरकार से डर कर संपादकों का कोई संगठन बना कर पत्रकारिता नहीं करते। बल्कि किसी रिपोर्टर की रिपोर्ट भी कभी कभी संपादक में पैनापन ला देती है। संयोग से न्यूज चैनलों की पत्रकारिता संपादकों के स्वंय नियमन पर टिक गयी है, इसलिये किसी चैनल का कोई रिपोर्टर यह खड़ा होकर भी नहीं कह पाया कि जब लड़की को इलाज के लिये सिंगापुर ले जाया जा रहा था, उसी वक्त उसके परिजनों और इंटरव्यू देने वाले साथी लड़के ने मौत के गम को जी लिया था।

वरिष्‍ठ पत्रकार पुण्‍य प्रसून बाजपेयी के ब्‍लॉग से साभार.

दैनिक जागरण में प्रमोशन एवं इंक्रीमेंट के लिए परीक्षा आज से

दैनिक जागरण में एक बार फिर प्रमोशन एवं इंक्रीमेंट के लिए ऑन लाइन परीक्षा शुरू हो चुकी है. खबर है कि पिछली बार की तरह इस बार भी तीन दिनों तक ये परीक्षाएं चलेंगी. इस बार भी 35 प्रतिशत से कम नम्‍बर पाने वालों को संस्‍थान से बाहर का रास्‍ता दिखाया जाएगा. तीन घंटे की इस परीक्षा में 100 नम्‍बर के सवाल पूछे जाएंगे. बुधवार को सीनियर सब एडिटर, सीनियर रिपोर्टर एवं ट्रेनी की परीक्षा हो रही है. परीक्षा एक बजे से लेकर चार बजे तक आयोजित की गई हैं.

10 जनवरी को सब एडिटर एवं रिपोर्टरों के साथ ट्रेनियों की परीक्षा होगी. वहीं 11 जनवरी को जूनियर सब एडिटर व जूनियर रिपोर्टरों के साथ ट्रेनी भी परीक्षा में शामिल होंगे. जागरण के सभी यूनिटों में एक साथ ऑन लाइन परीक्षाएं चलेंगी. बताया जा रहा है कि परीक्षा में सामान्‍य ज्ञान के अतिरिक्‍त हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद भी शामिल किया जाएगा. सूत्रों का कहना है कि 75 फीसदी से ज्‍यादा नम्‍बर पाने वालों को प्रबंधन प्रमोट करेगा. हालांकि पिछली बार भी ऐसी ही घोषणा की गई थी, परन्‍तु प्रबंधन ने अपने मनमर्जी से लोगों का प्रमोशन एवं इंक्रीमेंट किया था.

इंडिया न्‍यूज में वीपी सेल्‍स बनीं आरती अरोड़ा

इंडिया न्‍यूज से खबर है कि आरती अरोड़ा ने ज्‍वाइन किया है. वे बीएजी समूह के चैनल न्‍यूज24 एवं ई24 से इस्‍तीफा देकर यहां पहुंची हैं. वे बीएजी के नार्थ सेल्‍स हेड के रूप में जुड़ी हुई थीं. आरती को इंडिया न्‍यूज में वाइस प्रेसिडेंट सेल्‍स के पद पर लाया गया है. वे पूरे समूह का एडवरटाइजिंग एवं सेल्‍स का काम संभालेंगी. उनकी रिपोर्ट आईटीवी के सीईओ आरके अरोड़ा को होगी.

पिछले 12 सालों से मीडिया में सक्रिय आरती ने अपने करियर की शुरुआत इंडायाडाटा बेस के साथ की थी. उसके बाद वे हैथवे केबल, डॉटाकॉम के साथ जुड़ीं. इसके बाद वे इंडियन एक्‍सप्रेस में असिस्‍टेंट मैनेजर के रूप में काम किया. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे स्‍टार इंडिया तथा जी न्‍यूज को अपनी सेवाएं दीं. जी से इस्‍तीफा देने के बाद वे डेढ़ साल पहले बीएजी से जुड़ी थीं.

जनसंदेश टाइम्‍स का जनरेटर खराब, चोरी की बिजली से चल रहा है काम

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ में मुश्किलों से जूझ रहा है. नैतिकता का लबादा ओढ़ने वाला मीडिया किस तरीके से अनैतिक हो रहा है, जनसंदेश टाइम्‍स उसका उदाहरण बन गया है. सूत्रों का कहना है कि जनसंदेश टाइम्‍स अब चोरी की बिजली से काम चला रहा है. यह काम पिछले तीन दिनों से चल रहा है. जनसंदेश टाइम्‍स पर बिजली विभाग का तेइस लाख रुपये से ज्‍यादा बकाया है. लिहाजा कई महीने पहले लेसा ने बकाया बिल जमा नहीं किए जाने पर बिजली काट दी थी. बिजली बिल का बकाया जनसंदेश टाइम्‍स के कसमांडा स्थित कार्यालय एवं सरोजनीनगर स्थि‍त प्रिंटिंग यूनिट दोनों पर था, इसलिए दोनों जगहों की बिजली काटी गई थी.

बिजली कटने के बाद प्रबंधन बकाया बिल जमा करने की बजाय कसमांडा तथा सरोजनी नगर में जनरेटर के माध्‍यम से काम चला रहा था. सरोजनी नगर में तो बस काम के समय जनरेटर चलता था, परन्‍तु कसमांडा स्थित कार्यालय में शाम छह बजे जनरेटर चलाया जाता था. दिन में किसी तरीके से कम खपत में काम चल रहा था. सूत्रों का कहना है कि अचानक तीन दिन पहले कसमांडा स्थित कार्यालय का जनरेटर खराब हो गया, जिससे प्रबंधन के हाथ पांव फूल गए. जनरेटर की उसी समय व्‍यवस्‍था संभव नहीं थी और बिजली कटी हुई थी.

बताया जा रहा है कि तत्‍काल कोई व्‍यवस्‍था ना होते देख प्रबंधन ने बिजली चोरी करने का उपाय सोच लिया. आनन-फानन में लाइन मैन से मिलकर चुपके से कटिया लगा दिया गया. पहले दिन कर्मचारियों ने किसी तरह काम निपटा लिया, पर दूसरे दिन जब लगातार बिजली मिली तो उनका माथा ठनका कि आखिर प्रबंधन इतना मेहरबान कैसे हो गया. इसके बाद जब खोजबीन शुरू हुई तो पता चला कि ये चोरी के बिजली की महिमा है. आज बिजली चोरी का तीसरा दिन है. अब कब तक प्रबंधन यह सुविधा उठाएगा कहा नहीं जा सकता है.

वैसे भी अखबार के ज्‍यादातर कर्मचारियों को सितम्‍बर माह के बाद से सैलरी नहीं मिला है. बेचारे कर्मचारियों का बड़ा दिन और नया साल बुरा गुजरा अब उन्‍हें लगने लगा है कि उनकी मकर संक्रांति भी ठीक से नहीं बीतने वाली. कर्मचारी परेशान हैं कि जो प्रबंधन बिल भरकर कनेक्‍शन चालू करवाने की बजाय बिजली चोरी करने पर उतारू है वो उनका पैसा क्‍या इतनी आसानी से दे देगा. सूत्रों का कहना है कि गोरखपुर में भी ऐसी स्थिति है. कर्मचारियों को वहां भी अनियमित सैलरी ने परेशान कर रखा है.  

वरिष्‍ठ पत्रकार शीतल सिंह की मां प्रभावती देवी का निधन

दिल्‍ली के वरिष्‍ठ पत्रकार एवं व्‍यवसायी शीतल सिंह की माता प्रभावती देवी का मंगलवार की रात निधन हो गया. वे 79 वर्ष की थीं तथा कुछ समय से बीमार चल रही थीं. उनका इलाज सुल्‍तानपुर में चल रहा था, वहीं पर उन्‍होंने आखिरी सांस ली. उनका अंतिम संस्‍कार बुधवार को सुल्‍तानपुर में होगा. मूल रूप से सुल्‍तानपुर जिले के कादीपुर के रहने वाले शीतल सिंह इंडिया टुडे समेत कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं. प्रभावती देवी अपने पीछे पति लालता प्रसाद सिंह समेत भरापूरा परिवार छोड़ गई हैं. शीलत सिंह के मां के निधन की जानकारी होने पर उनके जानने वाले तमाम पत्रकारों में शोक व्‍याप्‍त हो गया है.

ओवैसी समर्थकों का आईबीएन7 एवं आजतक की ओवी वैन पर हमला

हैदराबाद। आंध्र प्रदेश के अदिलाबाद में एमआईएम समर्थकों ने आईबीएन7 और आजतक की ओबी वैन पर हमला किया है। एमआईएम के समर्थक विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी के भड़काऊ भाषण के बाद हुई गिरफ्तारी से बिफरे हैं। उन्होंने निर्मल हेडक्वार्टर कोर्ट के बाहर खड़ी दोनों चैनलों के ओबी वैन पर हमला किया। इस हमले में किसी को चोट नहीं पहुंची है। हालांकि ओबी वैन को नुकसान पहुंचा है। ओवैसी समर्थक मीडिया कवरेज से नाराज थे। उल्‍लेखनीय है कि ओवैसी के भड़काऊ भाषण से लेकर उसकी गिरफ्तारी तक के मामले की गतिविधियों पर मीडिया रिपोर्ट दे रहा था।

बुधवार को ही निर्मल हेडक्‍वार्टर कोर्ट में ओवैसी के भड़काऊ भाषण के मामले में सुनवाई होनी है। इसके लिए ही आईबीएन7 की टीम अपनी ओवी वैन के साथ मौके पर मौजूद थी। किसी भी स्थिति से निपटने के लिए क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दी गई है। इसके बावजूद ओवैसी समर्थक मौके पर पहुंच गए तथा मीडिया पर हमला किया। आईबीएन7 के साथ आजतक के ओवी वैन पर भी ओवैसी समर्थकों ने हमला किया। सूचना के बाद भी पुलिस मौके पर नहीं पहुंची है। गौरतलब है कि ओवैसी को मंगलवार की रात गिरफ्तार करके 14 दिन की न्‍यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।

आज जारी होंगे टैम के आंकड़े

दो महीने तक मा‍नसिक चिंता से मुक्‍त रहे न्‍यूज चैनलों के कर्ताधर्ता बुधवार से फिर तनाव में दिखेंगे. टेलीविजन के दर्शकों के संख्‍या की निगरानी करने वाली एकमात्र भारतीय एजेंसी टैम मीडिया समाचार चैनलों के व्‍यूअरशिप के आंकड़े आज जारी करेगी. टैम की मारामारी के चलते तमाम चैनलों पर आरोप लगते रहते हैं कि वे खबरों को सनसनी बनाकर प्रस्‍तुत करते हैं. इसके पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में भी टैम को व्‍यूअरशिप के आंकड़े जारी करने से मना किया था. 

आज के बाद अब हर बुधवार को टैम आंकड़े जारी करेगा. हालांकि टैम के आंकड़ों को लेकर हमेशा से विवाद रहा है. लोग इस पर उंगलियां भी उठाते रहे हैं. इसके बावजूद मार्केट का फंडा इन्हीं टैम आंकड़ों के आसपास घूमता रहा है, लिहाजा टीआरपी पाने के लिए चैनल भूत प्रेत से लेकर स्‍वर्ग नरक तक पहुंचते रहते हैं. एजेंसी इससे पहले 7 अक्‍टूबर 2012 के बाद के सभी प्रकार के कार्यक्रमों के आंकड़े जारी करने वाली थी. न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन पहले से ही लंबित अवधि के लिए व्यक्तिगत तौर पर चैनलों के व्यूअरशिप आंकड़ों को जारी किए जाने के मामले में अपनी सहमति दे चुकी है.

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्‍क बने भारत दर्पण के कार्यकारी संपादक

दैनिक हिंदुस्‍तान में धनबाद के स्‍थानीय संपादक रहे वरिष्‍ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्‍क ने इस्‍तीफा दे  दिया है. वे अब अपनी नई पारी कोलकाता एवं दुर्गापुर से प्रकाशित अखबार पूर्वांचल भारत दर्पण के साथ शुरू कर रहे हैं. प्रबंधन ने उन्‍हें कार्यकारी संपादक नियुक्त किया है. कोलाकाता से अश्‍क की पुरानी जान पहचान है. लगभग 36 साल पहले इन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत ही कोलकाता से की थी. वे लम्‍बे समय तक जनसत्‍ता के साथ जुड़े रहे. जनसत्‍ता छोड़ने के बाद यहीं से उन्‍होंने बिजनेस साप्‍ताहिक कारोबार खबर लांच किया.

ओम प्रकाश अश्‍क के ही नेतृत्‍व में प्रभात खबर ने अपने कोलकाता एवं सिल्‍लीगुड़ी एडिशन की लांचिंग की. इन दोनों जगहों पर प्रभात खबर को जमाने से खुश प्रभात खबर प्रबंधन ने इनको प्रमोट करके रांची बुला लिया था. लम्‍बे समय तक इन्‍होंने प्रभात खबर को कार्यकारी संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दीं. प्रभात खबर से इस्‍तीफा देने के बाद वे हिंदुस्‍तान के साथ जुड़ गए थे. धनबाद में इन्‍होंने हिंदुस्‍तान को अलग पहचान दी, परन्‍तु आंतरिक राजनीति के चलते रांची तबादला होने के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया.

प्रबंधन अब इस अखबार का विस्‍तार पूर्वी भारत में करना चाहता है. सूत्रों का कहना है कि इसके विस्‍तार के अगले चरण में झारखंड तथा असम में अखबार को लांच करने की योजना है. बताया जा रहा है कि इसके चलते ही प्रबंधन ने अश्‍क को अपने साथ जोड़ा है ताकि कई अखबारों की लांचिंग करा चुके अश्‍य के अनुभव का फायदा उठा सके. भड़ास ने जब ओम प्रकाश अश्‍क से संपर्क किया तो उन्‍होंने हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देने और भारत दर्पण ज्‍वाइन करने की पुष्टि की. 

तीन दिन की छुट्टी देकर बलराम शर्मा की नौकरी बचा ली थी शील ने

दैनिक जागरण में अमूमन सभी जगहों की यही स्थिति होती है कि कुछ खास मौकों की खबरों में थोड़ा हेरफेर करके इनके पत्रकार लिख देते हैं. अक्‍सर ऐसे मामले पकड़ में नहीं आ पाते हैं, क्‍योंकि लोग पढ़कर भूल जाते हैं. पर कुछ पाठक ऐसे भी होते हैं, जो हर खबर को गंभीरता से पढ़ते हैं. खबर दैनिक जागरण के हिसार संस्‍करण के भिवानी से है.

2012 में 2 अक्‍टूबर को दैनिक जागरण में दो खबरें प्रकाशित हुई थीं. मुख्‍य संवाददाता बलराम शर्मा के नाम से. सेम खबर 2011 में भी प्रकाशित हो चुकी थी, लिहाजा किसी पाठक ने इसकी शिकायत नोएडा कर दी. नोएडा से विष्‍णु ने कठोर कार्रवाई के निर्देश भी दिए थे, परन्‍तु शील जी ने कुछ दिनों की छुट्टी काटकर बलराम शर्मा को जीवन दान दे दिया था. आप भी देखिए उस दौरान हुई पत्रबाजी.



शील जी,
सादर प्रणाम,

कृपया अटैचमेंट्स का अवलोकन करें। किसी पाठक ने पत्र के द्वारा इन्हें प्रेषित किया है। पाठक की आपत्ति कतई दुरुस्त है। गांधी जयंती के अवसर पर विगत वर्ष दो अक्टूबर, 2011 को भिवानी डेटलाइन से हिसार संस्करण में दो आइटम प्रकाशित हुए थे। इस वर्ष दो अक्टूबर के अंक में गत वर्ष प्रकाशित दोनों आइटमों को एक ही बाक्स में ज्यों का त्यों शब्दशः प्रकाशित कर दिया गया है।

-ये कृत्य तो घोर अपराध की श्रेणी में आता है। जिन पाठकों की नजर से ये कृत्य गुजरा होगा, उनके जेहन में अपने अखबार की साख क्या रही-बची होगी? साख बनाने में बरसों लगते हैं और इस तरह के कृत्य कुछ क्षणों में उसे धूमिल कर देते हैं। जिन संपादकीय सहकर्मियों के जानकारी में ये ये कृत्य संपन्न किया गया होगा, उनमें किस तरह की कार्य संस्कृति का स्थापन किया गया होगा?

-मैं ये मानकर चल रहा हूं कि आपकी नजर में ये प्रकरण आ चुका होगा और इस पर सख्त निर्णायक कार्रवाई भी हुई होगी।

-मेरी स्पष्ट धारणा है कि इस तरह के कृत्य के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को दैनिक जागरण संस्थान में एक पल भी नहीं रहने देना चाहिए। वो इस तरह की हरकतों से पहले भी संस्थान-अखबार को नुकसान पहुंचाता रहा होगा और आगे भी ऐसा करता रहेगा।

-कृपया जो भी कार्रवाई की गई हो, उससे अवगत कराने का कष्ट करें।

धन्यवाद,

-विष्णु


सर,

निश्चित तौर पर २०११ व २०१२ को प्रकाशित हुए समाचार में तथ्य लगभग सेम हैं। लेकिन मैने समाचार को संशोधित करके भेजा था। मेरा इरादा  संस्थान व पाठक को धोखा देना बिल्कुल नहीं था। लेकिन यह गलती भूलवश हुई कि की तथ्य सभी सेम हैं। मैं आपको आश्वासन दिलाना चाहूंगा कि भविष्य में इस तरह  की गलती की पुनरावृति कभी नहीं होगी। गांधी जी भिवानी में दो बार ही आए थे और इन्हीं तथ्यों पर आधारित मैने यह समाचार भेजा था। यह मेरी पहली व आखिरी गलती है। यह गलती माफी योग्य तो नहीं है पर फिर भी मेरे अब तक के इमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा से किए गए कार्यों को देखते हुए माफी मिलेगी…।

बलवान शर्मा


श्री बलवान,
आपने अपनी गलती तो मान ली लेकिन इससे निश्चित तौर पर समचारपत्र की छवि को गंभीर आघात पहुंचा है जिसकी भरपाई करना बहुत मुश्किल है। आपकी इस लापरवाही और गंभीर भूल के लिए तीन दिन के लिए अनुपस्थित किया जा रहा है। साथ ही दंड के तौर पर आपके इस माह के सभी साप्‍ताहिक अवकाश भी निरस्‍त किए जा रहे हैं। आपको तीन रेड स्‍टार भी दिए जा रहे हैं। साथ ही आपको यह चेतावनी भी है कि भविष्‍य में ऐसी भूल पर आपकी स्‍वत: सेवा समाप्ति समझी जाएगी।

शील।

राडिया मामला : फोन टैपिंग के रिकार्ड के लिप्‍यंतरण का उच्‍च न्‍यायालय करेगा जांच

नई दिल्ली : सरकार ने आज कारपोरेट घरानों के लिये संपर्क का काम करने वाली नीरा राडिया की राजनीतिकों और टाटा समूह के पूर्व मुखिया रतन टाटा सहित तमाम कारपोरेट प्रमुखों के साथ बातचीत की 5800 टेलीफोन टैपिंग का लिप्यंतरण उच्चतम न्यायालय को सौंप दिया। न्यायालय ने कहा कि इसके विवरण पर गौर करने के बाद अगली कार्रवाई के बारे में निर्णय किया जायेगा। नीरा राडिया के टेलीफोन टैपिंग के अंश मीडिया में लीक होने के बाद देश की राजनीति में उबाल आ गया था। इससे कारपोरेट लॉबींग के स्वरूप और राजनीति पर उसके प्रभाव के तथ्य सामने आये थे।

न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति एस जे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने टैप की गयी समूची बातचीत के लिप्यंतरण को रिकार्ड पर लेने के बाद कहा, ‘‘हम इन लिफाफों : इनमें लिप्यंतरण रखे हैं: पर गौर करके अगली कार्रवाई के बारे में निर्णय करेंगे।’’ ये लिप्यंतरण 38 सीलबंद लिफाफों में हैं जो पहले पेश किये गये 10 सीलबंद लिफाफों के अतिरिक्त हैं। न्यायालय टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष रतन टाटा की याचिका पर इस समय विचार कर रहा है। रतन टाटा ने 29 नवंबर, 2010 को न्यायालय में याचिका दायर कर नीरा राडिया के साथ बातचीत के टैप किये गये अंश लीक करने की घटना में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध किया था। उनका कहना था कि टैप की गयी बातचीत के अंश इस तरह से लीक करने से संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीने के उन मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है जिसमें निजता का अधिकार भी शामिल है।

गैर सरकारी संगठन सेन्टर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटीगेशंस ने विशुद्ध रूप से निजी स्वरूप वाले अंशों के अलावा टेलीफोन टैपिंग का सारा रिकार्ड सार्वजनिक करने का निर्देश देने का अनुरोध न्यायालय से किया है। उसका कहना है कि इस बातचीत में अवैधता या अपराधिता का संकेत देने वाले तथ्यों की गहराई से जांच की जानी चाहिए। टाटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतेगी ने टैप के तथ्यों की जांच किसी स्वतंत्र व्यक्ति या दल से कराने के अनुरोध का विरोध किया। केन्द्रीय जांच ब्यूरो की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल हरेन रावल ने भी इस लिप्यंतरण पर गौर करने के लिये कोई अन्य दल नियुक्त करने के आग्रह का विरोध किया। उनका कहना था कि जांच ब्यूरो के दल को ही यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है जो अपना काम करके न्यायालय को रिपोर्ट देगा।

न्यायाधीशों ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि लिप्यंतरण के अवलोकन के बाद यदि बातचीत में किसी भी व्यक्ति की किसी तरह की अपराधिता का पता चले तो वह मामला जांच ब्यूरो के पास भेजा जा सकता है। टाटा का कहना था कि लिप्यंतरण सौंपने से इसके लीक होने का खतरा बना रहेगा और चूंकि यह याचिका सिर्फ निजता के अधिकार से संबंधित है, इसलिए इसे किसी और को नहीं सौंपा जाना चाहिए। न्यायालय ने सभी पक्षों को सुनने के बाद इस याचिका पर सुनवाई 22 जनवरी के लिये स्थगित कर दी।

वित्त मंत्रालय को 16 नवंबर, 2007 को मिली एक शिकायत के बाद नीरा राडिया की टेलीफोन बातचीत की निगरानी की गयी थी। इस शिकायत में आरेाप लगाया गया था कि नौ साल की अवधि में नीरा राडिया ने तीन सौ करोड़ का कारोबार खड़ा कर लिया है। सरकार ने कुल 180 दिन नीरा राडिया के टेलीफोन की बातचीत रिकार्ड की थी। पहली बार 20 अगस्त, 2008 से 60 दिन और फिर 19 अक्तूबर से अगले 60 दिन के लिये बातचीत रिकार्ड की गयी थी। इसके बाद नये आदेश पर आठ मई, 2009 से 60 दिन के लिये नीरा के टेलीफोन की बातचीत रिकार्ड की गयी थी। (एजेंसी)

आशीष शर्मा एवं अमित अवस्‍थी की नई पारी

अमर उजाला, मुरादाबाद से खबर है कि आशीष शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे सिटी डेस्‍क के इंचार्ज थे. आशीष ने अपनी नई पारी मुरादाबाद में ही हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर चीफ सब एडिटर बनाया गया है. आशीष को यहां भी सिटी डेस्‍क की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. लोकल खबरों पर आशीष की अच्‍छी पकड़ है, लिहाजा प्रबंधन ने उन्‍हें यह जिम्‍मेदारी सौंप कर अखबार को मजबूत करने का दायित्‍व सौंपा है. आशीष इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

दूसरी तरफ हिंदुस्‍तान, मुरादाबाद से इस्‍तीफा देने वाले अमित अवस्‍थी ने बरेली में दैनिक जागरण ज्‍वाइन कर लिया है. वे हिंदुस्‍तान में सिटी डेस्‍क की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. वे जागरण में भी चीफ सब एडिटर के पद पर ज्‍वाइन किया है. अमित कई अन्‍य संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

सहारा के पैंतरेबाजी से सरकारी विभागों के भी पसीने छूटे

नई दिल्‍ली : सहारा ग्रुप की कंपनियों के डिबेंचर में पैसे लगाने वालों को पैसे कब वापस मिलेंगे इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है। क्योंकि सहारा ग्रुप की पैंतरेबाजी से निवेशक ही नहीं बल्कि सरकार और उससे जुड़े विभाग के भी पसीने छूट गए हैं। अब सहारा ने डिबेंचर के कागजात लौटाने के लिए 6 हफ्तों का और समय मांगा है।

सहारा ने सुप्रीम कोर्ट से डिबेंचर मामले में 10,000 करोड़ रुपये की गारंटी देने को कहा है। साथ ही सहारा ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि सभी निवेशकों के पैसे लौटा दिए गए हैं। सहारा ग्रुप की 2 कंपनियों ने डिबेंचर के जरिए रकम जुटाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने रकम निवेशकों को वापस देने को कहा था। (मनी कंट्रोल)

sebi sahara

पाकिस्तान में एनडीटीवी के उमाशंकर सिंह का बैग चोरी

एनडीटीवी इंडिया के पत्रकार उमाशंकर सिंह इन दिनों पाकिस्तान में हैं और पाकिस्तानियों ने उन पर हाथ साफ कर दिया है. उनका बैग चोरी चला गया है. घटना लाहौर में हुई है. लाहौर के रेसकोर्स पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराकर लौटे उमाशंकर ने अपने साथ हुए हादसे का जिक्र फेसबुक पर किया है. Umashankar Singh ने लिखा है- ''just returned from Race Course Police Station in Lahore. lost my bag with some valuable professional things in it. feeling low 🙁 ''

उनके इस स्टेटस पर कुछ साथियों ने कमेंट व सलाह भी दिए हैं, जो इस प्रकार है-

Farhat Abbasi : Oh no, I hope you get it back did u have your Id n there

Yash Sharma : Make a Tie on your handkerchief nd put in your pocket, untill you find your bag.
#DesiTrick It works manytimes

Umashankar Singh : yes farhat, my India and Pakistan both numbers written on it… and my visiting cards' packet also in it
 
Ankit Muttrija पहली दफ़ा आप का स्टेटस लाईक करते करते छोड़ दिया.ह्मम.. ऐसे समय पर स्टेटस लाईक नही करना चाहिए..ह्म..
 
Mayank Saxena वैसे अगर ये ख़बर वहां आम हो जाए तो लाहौर में किसी भी भारतीय का बैग दिलवाने के लिए लोग रात दिन एक कर देंगे…लाहौर में हिंदुस्तानियों के लिए ग़ज़ब लगाव है…

कल तक ‘चैनल हेड’ थे, आज ‘वरिष्ठ सहयोगी’ बना दिए गए

(कानाफूसी) : राशिद हाशमी. इंडिया न्यूज चैनल के हेड हुआ करते थे. कल तक उनके फोनो पर उनके नाम के नीचे चैनल हेड लिखा होता था. आज से वरिष्ठ सहयोगी जाने लगा है. दीपक चौरसिया एंड कंपनी के इंडिया न्यूज आने के बाद इंडिया न्यूज में पहले से काम कर रहे लोगों के अंदर की बेचैनी देखने लायक हैं. सबके सब अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं.

राशिद हाशमी पहले इंडिया न्यूज के यूपी चैनल के हेड हुआ करते थे. दो महीने पहले जब इंडिया न्यूज का नेशनल चैनल रीलांच किया गया तो उन्हें नेशनल का चैनल हेड बना दिया गया और यूपी चैनल का जिम्मा रोहित सांवल को दे दिया गया. राशिद हाशमी काफी समय तक बीमार रहे. फिर से जब वह काम पर आए तो उनका पद वरिष्ठ सहयोगी का कर दिया गया है.

जाहिर है, दीपक चौरसिया और अन्य लोगों के आने के बाद राशिद हाशमी को चैनल हेड के पद से चुपचाप हटा दिया गया. ऐसी ही आशंका रीजनल न्यूज चैनलों के हेड के मन में भी है. इंडिया न्यूज के यूपी चैनल के हेड रोहित सांवल, बिहार झारखंड चैनल के हेड आदर्श झा, हरियाणा के हेड अमित आर्या, राजस्थान के प्रभारी भूपेश श्रोती आदि आशंकित हैं और नई व्यवस्था में अपने अपने संबल तलाशने में जुटे हुए हैं.

सबसे ज्यादा निश्चिंत मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के चैनल हेड राकेश कुमार हैं. मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ चैनल को दीपक चौरसिया की बहन दीप्ति चौरसिया चलाती हैं और वो भोपाल में ब्यूरो चीफ हैं. यहां दिल्ली में चैनल के हेड राकेश कुमार हैं, जो दीपक व दीप्ति की सहमति से बनाए गए हैं. इस कारण वे निश्चिंत हैं क्योंकि उनकी सीधी पहुंच दीपक व उनके अन्य करीबी लोगों तक है. मुश्किल में वे लोग हैं जो दीपक चौरसिया व उनके लोगों से परिचित नहीं हैं, करीबी नहीं हैं. ऐसे लोग दीपक तक पहुंच के लिए लिंक खोज रहे हैं, दीपक के परिचितों को तलाश रहे हैं.

मजीठिया वेज बोर्ड पर अब 5 फरवरी को होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए न्यायमूर्ति मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ दायर याचिका पर मंगलवार को भी कोई निर्णय नहीं हो सका. सुप्रीम कोर्ट में आज फैसला सुनाया जाना था, परन्‍तु एबीपी के अधिवक्‍ताओं ने इस मामले में कोर्ट से कुछ समय की मांग की. कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुनवाई की अगली तारीख 5 फरवरी तय की है. संभावना जताई जा रही है कि बहुप्र‍तीक्षित मजीठिया वेज बोर्ड पर कोर्ट इस दिन अपना फैसला सुना सकता है.

 उल्‍लेखनीय है कि बीते साल 21 सितंबर को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने आठ जनवरी की तिथि तय की थी. कोर्ट ने प्रबंधन को कर्मचारियों को अंतरिम व्यवस्था के रूप में अतिरिक्त भुगतान करने पर विचार का सुझाव भी दिया था. परन्‍तु प्रबंधकों ने ऐसा नहीं किया. सरकार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बारे में 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचना जारी की थी. जिसके बाद एबीपी समूह, राजस्‍थान पत्रिका समेत कई संस्‍थानों ने इन सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है.

अमर उजाला, फैजाबाद के ब्‍यूरोचीफ रामा शरण अवस्‍थी लखनऊ अटैच

: राजेंद्र पांडेय संभाल रहे हैं जिम्‍मेदारी : अमर उजाला, फैजाबाद से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ रामशरण अवस्‍थी को लखनऊ अटैच कर दिया गया है. हालांकि उनके अचानक लखनऊ अटैच किए जाने के कारण का तो पता नहीं चल पाया है, पर चर्चा है कि कुछ खबरें छूट जाने तथा उनके व्‍यवहार को लेकर की गई शिकायतों के चलते उन्‍हें लखनऊ बुला लिया गया है. रामा शरण के आने के बाद फैजाबाद की जिम्‍मेदारी सेकेंड पर्सन रहे राजेंद्र पाण्‍डेय देख रहे हैं. राजेंद्र की गिनती फैजाबाद के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. रामा शरण अवस्‍थी दैनिक जागरण में कार्यरत संत शरण अवस्‍थी एवं सदगुरु शरण अवस्‍थी के भाई हैं.

गौरतलब है कि कुछ समय पहले ही बाराबंकी में भी बदलाव किया गया था. ब्‍यूरोचीफ केपी तिवारी को लखनऊ बुला लिया गया था और उनकी जगह इंदू भूषण को बाराबंकी का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया गया था.

पुष्पांजलि बिल्डर के अय्याश निदेशक के गुर्गों ने मौके पर मीडियाकर्मियों के साथ अभद्रता की थी

मामला सिर्फ इतना नहीं है कि आगरा शहर के सबसे बड़े बिल्डर्स पुष्पांजलि कंस्ट्रक्शंस का निदेशक पुनीत अग्रवाल रंगरेलियां मनाते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया। बिल्डर के लोगों ने मौके पर कवरेज के लिए पहुंचे मीडियाकर्मियों से मारपीट और अभद्रता भी की थी, जिसके कारण मीडिया के लोगों का पारा गरम हुआ और बिल्डर की करतूत का अखबारों में खुलकर प्रकाशन हुआ। पनीत अग्रवाल के लिए रविवार को रंगरेलियों की महफिल शहर के सबसे प्रमुख बाजार संजय प्लेस स्थित विज्ञापन एजेंसी के दफ्तर में सजाई गयी थी।

व्यवधान न हो इसके लिए ऑफिस का ताला बाहर से बंद कर दिया गया। रंगरेलियों की सूचना पर पुलिस ने डेरा डाल लिया। बिल्डर समूह के निदेशक और युवती को पकड़कर थाने ले जाया गया, वहां कई घंटे तक हंगामा चलता रहा। बिल्डर ग्रुप के कर्मियों ने मीडिया वालों से हाथापाई की। रविवार दोपहर लगभग तीन बजे हरीपर्वत पुलिस को सूचना मिली कि संजय प्लेस स्थित अवध बैंकट हॉल के पीछे एलेक्स एड एजेंसी के आफिस में अय्याशी के लिए एक लड़की लाई गयी है। कोबरा मोबाइल के जवान पहुंचे तो बाहर से ताला पड़ा था। यह देखकर पुलिस लौट आई।

इस बीच सूचना मिली कि आफिस में बाहर से ताला जानबूझकर डाला गया है। इसके बाद सीओ हरीपर्वत समीर सौरभ थाने के फोर्स के साथ पहुंच गए। एड एजेंसी के शटर में कान लगाकर आहट सुनी तो अंदर से युवक-युवती की आवाजें आ रही थीं। इसके बाद दुकान मालिक के बारे में जानकारी कर उसे बुलाया गया, मगर वह नहीं पहुंचा। आखिर मामले की जानकारी एसएसपी को दी गई। इसके बाद ऑफिस का ताला तोड़ा गया।

शटर खुलते ही पर्दा उठा तो नजारा कुछ अलग ही था। अंदर युवती के साथ पुष्पांजलि कंस्ट्रक्शन का निदेशक पुनीत अग्रवाल पुत्र बीडी अग्रवाल और युवती आपत्तिजनक हालत में मिले। पुलिस कार्रवाई पूरी कर संजय प्लेस से निकल भी न सकी थी कि रंगरेलियां मनाते हुए पुनीत के पकड़े जाने की खबर पूरे शहर में फैल गई। इसके बाद सिफारिश के फोन घनघनाने शुरू हो गए।

एसएसपी के आदेश के बाद दोनों को हरीपर्वत थाने ले जाया गया। वहां से युवती को महिला थाने भेज दिया गया। इस दौरान बिल्डर समूह के अधिकारी और कर्मचारी पहुंच गए। पुनीत के फोटो खींचे जाने को लेकर बिल्डर के कर्मचारियों ने मीडियाकर्मियोंके साथ अभद्रता की। एसएसपी एससी दुबे ने बताया कि पुनीत के खिलाफ धारा 294 के तहत कार्रवाई की गई है। युवती को परिजनों के हवाले कर दिया गया है। एड एजेंसी आफिस के संबंध में जांच कराई जा रही है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


पूरे मामले को समझने और संबंधित अन्य खबरों के लिए यहां क्लिक करें- पुनीत अग्रवाल

एनसीआर से निकलने वाला ‘लोकसत्य’ अखबार बंद, कर्मियों को दो माह से वेतन नहीं

दिल्ली-एनसीआर से लगभग दो तीन बरस से निकल रहे हिंदी दैनिक लोकसत्य का प्रकाशन आज से बंद हो जाने की सूचना मिली है. दो महीने से यहां के कर्मियों को तनख्वाह नहीं मिली है. इस अखबार के मालिक राहुल शर्मा सरस और अनूप राय प्रसाद हैं. सूत्रों का कहना है कि अखबार के जरिए मालिकों ने तो अच्छा खासा पैसा बना लिया है लेकिन स्टाफ को सेलरी देने में इन्हें कष्ट होता है. दो महीने से तनख्वाह न मिलने से नाराज कर्मियों ने आज काम बंद करने का ऐलान किया. इस पर मैनेजमेंट ने अखबार ही बंद कर देने की घोषणा कर दी.

यहां काम करने वाले इस बात से परेशान हैं कि दो महीने से वेतन न मिलने के बाद अब अखबार बंद हो जाने से उनके बकाया पैसा का क्या होगा और उनके जीवन की गाड़ी कैसे चलेगी.  लोकसत्य अखबार डीएवीपी से एप्रूव्ड है. इसकी लांचिंग जोरशोर से की गई थी. पर किन कारणों से मैनेजमेंट ने इसे बंद कर दिया, यह पता नहीं चल पाया है. अगर प्रबंधन के लोग अपना पक्ष भड़ास के पास भेजते हैं तो उसे भी प्रकाशित किया जाएगा. भड़ास के पास कोई भी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाया जा सकता है.

पत्रकार की कार चोरी, तीन दिन बाद भी पुलिस को नहीं मिली सफलता

सहारनपुर। सर्दियों की ठिठुरन में पुलिसकर्मी भले ही सिकुड़ गये हों लेकिन चोरों के हौसलों में कोई कमी नहीं आ रही है। सर्दी में पुलिस सुस्त, चोर मस्त की पंक्ति चरितार्थ हो रही है और हर रोज़ एक नयी घटना सामने आ रही है। शनिवार की रात थाना कोतवाली देहात क्षेत्र के रसूलपुर में रहने वाले पत्रकार रविश अहमद की मारुती कार 800 रजि. संख्या यूपी 14 एच 0036 रोजाना की भांति घर के सामने खड़ी की गई थी। रात में किसी समय अज्ञात चोरों ने उक्त कार पर हाथ साफ कर दिया।

पड़ोसी गुड्डू, जो कि एक डेरी पर कार्य करता है, रात करीब 1 : 30 बजे अपने कमरे पर लौटा तब भी गाडी वहीं खडी थी, जिससे अनुमान यह लगाया जा रहा है कि रात्रि में दो बजे बिजली जाने के बाद बदमाशों द्वारा उक्त घटना को अंजाम दिया गया है। थाने में चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा दी गयी है। पुलिस कार की खोजबीन में तो जुटी है, किन्तु तीन दिनों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अभी तक इस मामले में पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली है। पुलिस की कार्यप्रणाली देखने के बाद नहीं लगता कि उसका हाथ चोरों तक पहुंच पाएगा। आम लोगों का कहना है कि जब एक पत्रकार के साथ हुई घटना में पुलिस का यह रवैया है तो सामान्‍य आदमी के साथ क्‍या रवैया होता होगा।

इंडिया न्‍यूज में मनीष अवस्‍थी बनेंगे पॉलिटिकल एडिटर, प्रशांत भी जुड़ेंगे

सीनियर जर्नलिस्‍ट मनीष अवस्‍थी इंडिया न्‍यूज से जुड़ने जा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि मनीष को इंडिया न्‍यूज में नेशनल पॉलिटिकल एडिटर बनाया जा रहा है. संभावना है कि वे भी 14 जनवरी के बाद चैनल ज्‍वाइन करेंगे. मनीष इसके पहले टीवी टुडे के आजतक चैनल के साथ बतौर डिप्‍टी एडिटर काम कर रहे थे. उनके पास ब्‍यूरोचीफ पद की जिम्‍मेदारी थी. वे आजतक के लिए महाराष्‍ट्र और गोवा को देख रहे थे. वे आजतक के लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. इसके पहले वे जी न्‍यूज के साथ काम कर चुके हैं. वे पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

दूसरी तरफ खबर है कि पी7 न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर प्रशांत मिश्रा ने भी इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन कर रहे हैं. वे भी अगले दो सप्‍ताह के भीतर चैनल ज्‍वाइन कर लेंगे. प्रशांत पी7 न्‍यूज के एसाइनमेंट डेस्‍क पर कार्यरत थे. उन्‍हें इंडिया न्‍यूज में एसाइनमेंट हेड की जिम्‍मेदारी सौंपी जाएगी.

जी न्यूज़ की इतनी बड़ी कर्तव्यनिष्ठा भी दिल्‍ली पुलिस को गैरकानूनी दिखी!

:   संकीर्ण कानून और बदलती सोच के बीच मीडिया की समस्या : कानून और सामाजिक समझ या आकांक्षा में अक्सर सामंजस्य नहीं होता. कई बार कानून काफी आगे की सोच लेकर बनते हैं लिहाजा समाज की तात्कालिक समझ से दूर हो जाते हैं जब कि अनेक ऐसे भी वक़्त आते हैं जब कानून पुरानी दिकियानूसी सोच से बंधा रहता है जबकि समाज की समझ काफी आगे बढ़ चुकी होती है. चूँकि भारतीय समाज संबंधों पर आधारित समाज है ना कि पश्चिमी समाज की तरह संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर आधारित इसलिए लोगों का आचार-विचार या नैतिकता, मूल्य बनाने वाली संस्थाओं से तय होते हैं ना कि औपचारिक कानूनों से, खासकर उन कानूनों से जो पश्चिमी व्यवस्था की नक़ल होते हैं.

लेकिन वर्तमान मामले में ठीक उल्टा हुआ है. कानून समाज की एक कु-परम्परा को ध्यान में रख कर भारतीय दंड संहिता में धारा २२८ अ रखा गया था. अवधारणा यह थी कि अगर बलात्कार पीडिता का नाम उजागर हो गया तो भारतीय कु-परम्परा के तहत उसे और उसके परिवार को ताउम्र बदनामी का दंश झेलना पडे़गा यानी ना तो उस परिवार में शादियाँ होंगी ना हीं उन्हें सामान्य जीवन में अच्छी नज़रों से देखा जाएगा. केरला की एक महिला द्वारा विगत सप्ताह दिया गया इंटरव्यू इस बात की तस्दीक करता है. इस महिला से दस साल पहले सन २००२ में एक अस्पताल कर्मी ने बलात्कार किया था. तब से आज तक उसका कोई भी रिश्तेदार या पड़ोसी उससे मिलने नहीं आते. उसका और उसके परिवार का एक तरह से सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है. लिहाज़ा यह कानून अपने आप में बिलकुल ठीक है और भारतीय कुरीति से बचाने का अच्छा हथियार है.

लेकिन अचानक भारतीय समाज का एक पक्ष –जो उदारवादी है, संकीर्णता से उबार ना चाहता है और जो अपेक्षाकृत पढ़ा-लिखा है—खड़ा होता है और इस बलात्कार पीडिता की छवि को “कलंक” से निकाल कर “वीरांगना” के रूप में प्रतिष्ठापित करता है. लगभग हर वर्ग का शहरी व्यक्ति इसमें शामिल होता है. पीडिता देश की बेटी बनती है और उसे दैवीय-स्वरूप देने के लिये फ्लाईओवर का नाम, स्कूल का नाम या नए कानून का नाम उसके नाम पर होने की मांग भी ना केवल उद्वेलित लोगों द्वारा बल्कि भारत सरकार के एक मंत्री द्वारा भी की जाती है. कहना ना होगा देश की मीडिया की और खासकर २४७ खबरिया चैनलों की अप्रतिम भूमिका रही है. लगभग वैसी ही जैसी की भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन के दौरान थी.

मीडिया या सभ्य-समाज के एक बड़े वर्ग की यह एक सार्थक पहल थी कि समाज उन कुरीतियों से निजात पाए जिनसे वह दो हज़ार साल से अपने उनीदेपन के कारण जूझ रहा है. भ्रष्टाचार और स्त्रियों के प्रति उपभोग का भाव दोनों ही सभी व तार्किक समाज के किये अभिशाप बने हुए हैं और यह अलख जगाये रखना ज़रूरी है. मुद्दा कानूनी सुधार से ज्यादा नैतिक परिवर्तन का है, जिसे कानून देने वाली संस्थाओं द्वारा नहीं बल्कि मूल्य, नैतिकता और आचरण बदलने वाली संस्थाओं के ज़रिये ही बदला जा सकता है और ऐसे बदलाव रातो –रात नहीं होते.

जब पीडिता के निधन की घोषणा आई और पता लगा कि सिंगापुर से पार्थिव शरीर भारत लाया जा रहा है तो भारतीय चैनलों के लिए एक अजीब संकट की घड़ी पैदा हो गयी. एक तरफ मृतक पीडिता को समाज महिमामंडित कर रहा था और सार्थक प्रयास में लगा था कि इस जन-भावना के दबाव को सामाजिक सोच में परिवर्तन, कानून में बदलाव और सरकारी अभिकरणों की संवेदनशीलता बढ़ाने का सबब बने. दूसरी तरफ भारतीय दंड संहिता की धारा २२८ अ आड़े आ रही थी. इस धारा के तहत केवल तीन व्यक्तियों को बलात्कार की चार धाराओं में नाम जाहिर करने या अधिकृत करने का अधिकार है. पहला पीडिता स्वयं, दूसरा थानेदार या जांच अधिकारी वह भी तब जब ऐसा करना उसकी सदाशयता के तहत जांच के लिए ज़रूरी हो और तीसरा पीडिता का सबसे नजदीकी रिश्तेदार –वह भी लिखित रूप से अधिकृत करता हो और केवल उन कल्याणकारी संस्थाओं को जो केंद्र या राज्य की सरकारों द्वारा मान्यता –प्राप्त हों. याने मीडिया या किसी अन्य को किसी भी कीमत पर नाम उजागर करने का अधिकार नहीं है.   

इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनलों के संपादकों की सर्वोच्च संस्था, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के लिए एक बड़े असमंजस की स्थिति थी. पर सभी मेम्बर एडिटरों से व्यापक चर्चा के बाद यह फैसला किया गया कि कानून के अनुरूप ही चलना होगा. लिहाज़ा बीईए ने सामूहिक बलात्कार की शिकार युवती शव –यात्रा ना दिखाने, घर पर ओबी वैन ना लगाने या किसी भी स्थिति में ऐसा कोई इंटरव्यू ना करने, जिससे मृतक पीडिता की पहचान सुनिश्चित होती हो, सम्बन्धी एडवाइजरी जारी की. स्व-नियमन की दिशा में यह एक अच्छा कदम माना गया. यह अलग बात है कि लाल –बुझक्कड़ मीडिया- निंदक (क्र्टिक) को इसमें भी टीआरपी का खेल नज़र आता है जैसा उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरे जनांदोलन के दौराम मीडिया कवरेज को लेकर आया था.

समाज के एक वर्ग तथा अखबारों के कुछ संपादकों की तरफ से इस्नारा फैसले पर नाराजगी दिखाई गयी यह कहते हुए कि मीडिया को कोई अधिकार नहीं है किसी की अभिव्यक्ति को बाधित करने का. यह भी आरोप लगाया गया कि सरकारी दबाव में किया गया फैसला है. कुछ लोगों का मानना था कि जहां सोनिया गाँधी और प्राइममिनिस्टर को शव की अगवानी करने की खबर दिन भर चैनलों पर चलती रही वहीँ अंतिम संस्कार की कवरेज का ब्लैकआउट किया गया.

यहीं यह सोचने की बात है जो मीडिया भरष्टाचार पर इतनी तन कर कड़ी हो जाती है सरकार के लिए जीने-मरने का सवाल बन जाता है, जो मीडिया राहुल गाँधी हो या सलमान, गडकरी हों या अम्बानी किसी को नहीं बख्सती वह सरकार की इतनी पिट्ठू कैसे हो जाएगी. दूसरा जो मीडिया लगातार इंडिया गेट प्रदर्शन को एक क्षण के लिए कैमरे की जद से नहीं निकले दे रही है वह क्या इतनी कमजोर हो सकती है? हमारा खतरा एक अन्य आधार पर था और है. आज जन-भावनाएं पीडिता को महिमामंडित कर देती है लेकिन कल यह भाव ख़त्म हो जाता है और समाज फिर से अपनी दकियानूसी  सोच पर वापस आ जाता है, ऐसे में क्या उस परिवार को कलंकित होने का खतरा नहीं बढ़ जायेगा? दूसरा आज चूँकि वह पीडिता ज़िंदा नहीं है और जनाक्रोश का समाज पर प्रभाव है इसलिए उसके महिमामंडित होने पर खतरे उतने नहीं हैं लेकिन क्या पूरे देश भर की अन्य बलात्कार-पीड़ितों के प्रति भी समाज यही भाव रखता रहेगा अगर नहीं तो क्या यह खतरा नहीं है कि पहचान उजागर होने के बाद उनका भी जीवन वैसा ही हो जाये जैसा केरला की युवती का हो गया है?  

एक अन्य समस्या. अगर किसी एक मात्र हिंसा के शिकार और इस बलात्कार के अकेले गवाह के टीवी इंटरव्यू से यह बात निकल कर आती हो कि बलात्कार पीडिता की जान बचायी जा सकती थी, अगर तीन पीसीआर वैन इस बात पर २९ मिनट ना झगड़ते कि घटना किस थाने की सीमा में है तो क्या कानून के डर से सिस्टम के इस सड़ांध को व्यापक जनहित में ना दिखाया

एनके सिंह
जाये? क्या यह भी ना दिखाया जाये कि कानून के पचड़े में ना पड़ने के लिए राहगीर भी इन दोनों पीड़ितों को भगवान भरोसे छोड़ कर चल देते थे? क्या दिल्ली पुलिस को जी न्यूज़ चैनल की इतनी बड़ी कर्तव्यनिष्ठा भी गैरकानूनी दिखी कि मुक़दमा ठोंक दिया?

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं.

‘समाचार प्लस’ के स्टिंग ऑपरेशन का असर, चित्रकूट के ‘घूसखोर थानेदार’ पर FIR दर्ज

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय न्यूज़ चैनल 'समाचार प्लस' ने किया है एक बड़ा स्टिंग ऑपरेशन। चित्रकूट ज़िले के राजापुर थाने के थानेदार विवेक उपाध्याय का स्टिंग ऑपरेशन। इसमें बालू के ठेकेदार बने अंडर कवर एजेंट ने थानेदार साहब से अवैध बालू से भरे 500 ट्रकों को चित्रकूट क्षेत्र से बेरोकटोक आने-जाने देने के लिए गुज़ारिश की थी। इसके ऐवज़ में थानेदार विवेक उपाध्याय ने 50 हज़ार रुपए की घूस मांगी थी और वो ऐसा करते हुए 'समाचार प्लस' के खुफिया कैमरे पर रंगेहाथों पकड़ लिए गए।

हरे-हरे नोटों के चक्कर में जीभ लपलपाते थानेदार विवेक उपाध्याय ने तो यहां तक कह डाला था कि “भले ही बुंदेलखंड में आतंक का दूसरा नाम बन चुका खूंखार डाकू बलखड़िया बच कर निकल जाए मगर मेरी नज़रों से बालू से लदा कोई भी वाहन नहीं चूकता। चूंकि आजकल महंगाई बहुत ज्यादा है और वक्त भी सही नहीं चल रहा है इसीलिए तुमसे 50 हज़ार रुपए ले रहा हूं वरना इस काम के 80 हज़ार रुपए होते हैं। तुमको 30 हज़ार का डिस्काउंट दे रहा हूं। 50 हज़ार दो और धड़ल्ले से अपना काम करो। कोई तुमको रोकेगा नहीं। मेरी ऊपर तक सेटिंग है।’’ इसके अलावा घूसखोर थानेदार ने कई और भी खुलासे किए।

शनिवार रात 8 बजे ‘समाचार प्लस’ पर इस स्टिंग ऑपरेशन के दिखाए जाने के 15 मिनट के भीतर ही हुआ बड़ा असर। उत्तर प्रदेश के ADG लॉ एंड ऑर्डर अरुण कुमार झा ने समाचार प्लस की ख़बर का संज्ञान लेते हुए, हमसे स्टिंग ऑपरेशन की सीडी मांगी और कहा कि दोषी साबित होने पर थानेदार विवेक उपाध्याय को जेल भेज दिया जाएगा। ADG के आदेश पर चित्रकूट ज़िले के पुलिस अधीक्षक IPS मोहित गुप्ता ने हमें फोन किया और सीडी मांगी। साथ ही उन्होंने थानेदार विवेक उपाध्याय के खिलाफ तुरंत कड़ी कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया। अगले ही दिन चित्रकूट के SP मोहित गुप्ता ने राजापुर के थानेदार विवेक उपाध्याय को पद से हटा दिया और उनके खिलाफ उन्हीं के थाने में FIR दर्ज करने के आदेश दे दिए। मोहित गुप्ता एक ईमानदार युवा अधिकारी हैं। उन्होंने समाचार प्लस से फोन पर बात करते हुए कहा कि वो खुद भी शर्मिंदा हैं कि उनके ज़िले के एक थानेदार ने ऐसा गंदा काम किया है।

इसके पहले भी इस थानेदार विवेक उपाध्याय की कई शिकायतें SP मोहित गुप्ता को मिली थीं जिसके चलते थानेदार का वाराणसी के लिए तबादला कर दिया गया था। मगर ‘समाचार प्लस’ के स्टिंग ऑपरेशन में फंसने के बाद, SP मोहित गुप्ता ने IG वाराणसी को चिट्ठी लिखकर उपाध्याय को सस्पेंड करने की गुज़ारिश की है। कुलमिलाकर ‘समाचार प्लस’ की ख़बर से पुलिस-प्रशासन में खलबली मची हुई है और अफसर बातचीत में खासी सतर्कता बरत रहे हैं।

पूरी ख़बर देखने के लिए यूट्यूब की इन लिंक्स पर क्लिक किया जा सकता है…

http://www.youtube.com/watch?v=k9jt2ZAQw0U

http://www.youtube.com/watch?v=5IyW8w9yn38

प्रेस रिलीज

”मेरे नाम से टीआरपी बढ़ाना चाहता है मीडिया, तो हम क्‍या करें?”

नई दिल्ली। आध्यात्मिक गुरु आसाराम का कहना है कि दिल्ली गैंग रेप पर दिए उनके बयान को मीडिया ने तोड़मरोड़कर दिखाया है। जिससे बदनामी की बू आ रही है। वो ऐसी बदनामी से नही डरते। आसाराम आज सोलापुर जिले के पंढरपुर में सत्संग कर रहे थे। कोई मेरे नाम से टीआरपी बढ़ाना चाहता है तो हम क्या करें? हम बद नही हैं तो बदनाम कैसे होंगे।

इससे पहले आसाराम ने कहा कि पुरुषों के खिलाफ माहौल बन रहा है। महिलाओं की सुरक्षा हो इससे तो हम सहमत हैं। महिलाओं का सम्मान हम जितना बढ़ाना चाहते हैं उतना तो लोग सोच भी नहीं सकते हैं। फिर भी कानून ऐसा न बने कि कोई झूठा-मूठा, एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कोई बाजारू महिलाओं का इस्तेमाल करके कोई कानून का दुरुपयोग न करे।

गौरतलब है कि सोमवार को बयान में आसाराम ने कहा कि अगर पीड़ित लड़की ने आरोपियों के सामने हाथ-पैर जोडे होते, उनसे मिन्नतें की होती तो उसकी आबरू और जान दोनों बच जाती। आसाराम के इस बयान की सियासी पार्टियों से लेकर सामाजिक संगठनों ने निंदा की। वहीं राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने कहा है कि जिस तरह के बयान इन दिनों आ रहे हैं वो ठीक नहीं है और नेताओं को संयम बरतना चाहिए। (आईबीएन)

लाइन नेता देते हैं और हम उस पर कलम भांजकर खुश हो लेते हैं

: पुराने लय में आखिर कब लौटेंगे पत्रकार : पत्रकार होने के नाते मेरे समक्ष सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या हम सब अपने पुराने लय में लौटेंगे या फिर तेज रफ्तार में भागते सतही जानकारियां ही परोसते रहेंगे? एक जमाने में पत्रकार और उसकी पत्रकारिता को किस नजर से देखा जाता था और अब लोगों का क्या नजरिया है, यह किसी से छिपा नहीं है? जरूरत इसकी काट निकालने की है क्योंकि अगर ऐसे ही सतही जानकारियों के पीछे हम सब भागते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हमें यह सुनने को मिलेगा, भई आप किस दल या व्यक्ति के लाइन पर काम कर रहे हो।

जरूरत है अपने पुराने धार को बनाए रखने की और इसके लिए हमें खुद से कई सवाल के जवाब लेने होंगे। मसलन क्या हमारे में वह पुरानी वाली धार नहीं रही जो कभी एक जमाने में हुआ करती थी। याद है वो दिन जब हम नहीं बोलते थे, हमारी कलम बोलती थी और जब कभी कोई गलत बोलता था तो तत्काल उसे अहसास दिलाया जाता था कि आपने अमुक बातें गलत बोली। क्या अब ऐसा हम सब कर पाते हैं? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर क्या आपने, हमने कभी गौर कया है? अगर नहीं तो गौर कर लीजिए, समय हाथ से निकलता जा रहा है और लौट आइए, गंभीर पत्रकारिता के लिए।  

अब यहां यह भी सवाल उठता है कि क्या मौजूदा दौर में जो पत्रकारिता हो रही है, वो सभी क्या बिना तथ्य व आधार के हो रही है? ऐसा बिल्कुल नहीं है बल्कि पुख्ता सबूत के आधार पर ही हो रही है लेकिन यहां यह भी समझना होगा और खुद-ब-खुद से सवाल करना होगा कि क्या हम सही मायने में पत्रकारिता धर्म का पालन कर रहे हैं? यह सवाल आपको, हमें अटपटा जरूर लगेगा लेकिन हकीकत में यह सवाल आज की तारीख में एग्जिस्ट करता है। पत्रकारिता का एक दौर था जब हमारी कलम से नेता डरते थे कि पता नहीं कौन सी लाइन लेकर पत्रकार भाई अपनी कलम भांज दें लेकिन आज क्या हो रहा है, लाइन नेता देते हैं और हम उस लाइन पर कलम भांजकर अपनी पीठ थप-थपावाकर खुश हो लेते हैं।

कभी इस पर हम सबों ने गौर कया है कि जो हमारा पीठ थपथपा रहे हैं, वो कौन लोग हैं और इसके पीछे उनका क्या मकसद है। सबके अपने मकसद हैं और आरोप भी लगने लगे हैं कि हम उनके कठपुतली बनकर रह गए हैं। इसमें दो राय नहीं कि इसकी कई वजहें हैं लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि अगर तात्कालिक कारणों के पीछे हम भागे तो फिर हमें तात्कालिक राहत तो मिल जाएगा पर इसका दूरगामी प्रभाव कभी भी हमारे हक में नहीं होगा। हमें समझना होगा कि जब तक आपकी कलम में धार रहेगी, तभी तक आपकी पूछ बनी रहेगी, नहीं तो आप भी मेले की भीड़ का हिस्सा होकर रह जाओगे। प्राथमिकता तय करनी होगी और शॉटकर्ट रास्ता अख्तियार करना बंद करना होगा।

अब आप कहेंगे, इतनी भूमिका बांध दी पर मामला तो बताएं। तो फिर मैं आपको बता दूं कि मामला बताने से कुछ नहीं होगा बल्कि महसूस करने से होगा और इसका अहसास दूसरा नहीं दिला सकता। रोज की दिनचर्या में अगर पत्रकारिता धर्म की गांठ बांध ली जाए तो फिर हमारी और आपकी लेखनी को पहले वाली लय में लौटने से कोई नहीं रोक सकता। यहां हाल-फिलहाल अखबारों व टीवी चैनलों की सुर्खियां बनी नेताओं की बोल का जिक्र करना चाहूंगा। इस मामले में क्या कुछ हो रहा है। अटपटी बातें कहने वालों की होड़ सी लग गई है और सच कहें तो ऐसे लोगों की दुकानदारी भी खूब चल रही है। क्या आपको, हमें इस बात की जानकारी नहीं है और अगर है तो फिर आखिर क्यों हम अपनी जड़ खोदने पर उतारू हैं।  

राष्ट्रीय स्वयं सेवक प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान की ही बात करें तो क्या यह हमारा धर्म नहीं बनता था कि जब उन्होंने विवादास्पद बयान दिया तो उन्हें उसी समय टोककर स्पष्टीकरण मांगनी चाहिए? ऐसा नहीं किया तब ही तो संघ की तरफ से बयान आया कि मीडिया ने तोड़-मरोड़कर चीजें परोसी हैं। इस बात के बाद आपकी, हमारी क्या इज्जत रह गई? एक तरह से हमारी क्रिएडिविलिटी पर सवाल खड़ा कर दिया गया और हम अपनी पीठ थपथपा रहे कि हमारे पास सबूत है, उन्होंने कहा है, हमें क्यों डरना, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने जो कुछ कहा उसका संदर्भ क्या था और आशय क्या था। इस मामले में संघ का भी यही कहना है कि संघ प्रमुख की पूरी बात दिखाई जाए तो उन्होंने चिंता व्यक्त की है मौजूदा माहौल पर और पाश्चात्य संसकृति को अपनाने को गलत ठहराया है।

भारत में नहीं इंडिया में होते हैं दुष्कर्म और शादी के एक सौदा बनकर रह गया है, ये दोनों बयान उनके मौजूदा व्यवस्था पर कुठाराघात था लेकिन हमने, आपने क्या किया और किस तरह इन बातों को परोसा, यह किसी से छिपा नहीं है। उनका शुरुआती भाषण सुने तो साफ हो जाएगा कि उनका आशय क्या था। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत ही इस बात से की थी कि नेता, नारा, नीति, पार्टी और सरकार की ओर मत देखो। किसी अवतार की प्रार्थना से भी काम नहीं बनने वाला है। संघ को भी ठेका मत दो उद्धार का। सीता का अपहरण रावण ने किया पर लड़ना सभी को पड़ा था। यह प्रभु राम की पत्नी के अपहरण का बदला

कुमार समीर
नहीं था। सवाल था देश में संस्कृति रहेगी या दानवता। उन्होंने अपने उद्भभोदन के दौरान जोर देकर कहा कि आज परिवेश बदलने की जरूरत है और इसके लिए सबको लड़ना होगा।

लेखक कुमार समीर पिछले ढाई दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक में समान पकड़ रखने वाले कुमार समीर सहारा समेत कई बड़े संस्‍थानों के हिस्‍सा रह चुके हैं.

एनबीएसए ने उत्‍पीड़न के मामलों में चैनलों को कवरेज के लिए गाइडलाइन जारी किया

नयी दिल्ली : ‘न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड ऑथरिटी’ (एनबीएसए) ने समाचार चैनलों से यौन उत्पीड़न के मामलों की रिपोर्टिंग करते समय संवेदनशील रहने की अपील करते हुए कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ऐसे दृश्य या ब्योरे नहीं दिखाने चाहिए जो पीडि़तों को दोबारा आहत करते हो या उनकी पहचान का खुलासा करते हो। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में हुई बैठक में एनबीएसए ने आज चैनलों को यौन उत्पीडऩ के मामलों की रिपोर्टिंग करने के लिए दिशानिर्देश जारी किये।

न्यायमूर्ति वर्मा सरकार द्वारा नियुक्त उस समिति का भी नेतृत्व कर रहे हैं जो अब महिलाओं के खिलाफ अपराध से निपटने वाले कानून पर गौर कर रही है। एनबीएसए ने यौन उत्पीडऩ के मामलों की रिपोर्टिंग से जुड़े दिशानिर्देश पर चैनलों को पीडि़त और परिवार की निजता के अधिकार तथा जन हित के बीच संतुलन बनाने को कहा है। एनबीएसए ने यह भी कहा है कि समाचार चैनलों को यह अवश्य ही सुनिश्चित करना चाहिए कि यौन उत्पीडऩ, हिंसा के पीडि़त या इस तरह की किसी घटना के गवाह का किसी खबर या कार्यक्रम में उस व्यक्ति की पहचान छिपाये बगैर जिक्र नहीं हो।

एनबीएसए का दिशानिर्देश खास मायने रखते हैं क्योंकि 23 वर्षीय छात्रा के साथ दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाओं के प्रति मीडिया अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है। दिशा-निर्देश में कहा गया है कि महिलाओं, बच्चों से यौन दुराचार से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग करते समय तस्वीर और अन्य जानकारी प्रसारित नहीं करनी चाहिए जिससे पीडि़त की पहचान जाहिर होती हो तथा उसके परिवार की पहचान का भी खुलासा नहीं हो। एनबीएसए ने कहा है कि पीडि़त के किसी भी दृश्य को अवश्य ही पूरी तरह से कंप्यूटर पर बदला हुआ होना चाहिए।

उधर, दिल्ली गैंग रेप के पीडि़ता के पिता ने एक विदेशी अखबार 'संडे पीपुल' से कहा है कि वह अपनी बहादुर बेटी का नाम का खुलासा करना चाहते हैं और उन्होंने उस अखबार से बेटी के नाम का खुलासा किया भी। उनके मुताबिक गलत काम उन्होंने या उनके बेटी ने नहीं किया है। फिर वह क्यों अपना मुंह छिपायें। मुंह तो उन दरिंदों को छुपाना चाहिए, जिसने उनके बेटी का ऐसा हाल किया। हालांकि कानून के मुताबिक बलात्कार पीडि़ता के मर जाने पर उसके अभिभावक की सहमति से पीडि़ता का नाम उजागर किया जा सकता है। आईपीसी की धारा-228 तो कम से कम यही कह रहा है। (पंजाब केसरी)

नईदुनिया में कृष्‍णपाल सिंह को नई जिम्‍मेदारी

नईदुनिया के इन्दौर संस्करण में लंबे समय से रीजनल डेस्क देख रहे कृष्णपाल सिंह जादौन को कोऑर्डिनेशन डेस्क का इंचार्ज बना दिया गया है। उन्हें नईदुनिया समूह के सभी संस्करणों और ब्यूरो से मिलने वाली महत्वपूर्ण खबरों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही वे जागरण ग्रुप की सेंट्रल डेस्क से भी कोऑर्डिनेट करेंगे। नईदुनिया में इसे जादौन की पदोन्नति के रूप में देखा जा रहा है जो उन्हें प्रधान सम्पादक श्रवण गर्ग का पुराना विश्वासपात्र होने के कारण मिली है, क्योंकि वे गर्ग के साथ पूर्व में दैनिक भास्कर में लंबे समय तक विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं और वहां उनकी गिनती गर्ग के खास लोगों में होती थी।

अब दस हजार की सैलरी पाने वाले मीडियाकर्मी भी होंगे पीएफ दायरे में!

: अब तक यह सीमा 6500 रुपये है : नई दिल्‍ली : केंद्र सरकार भविष्य निधि (पीएफ) के लिए सैलरी सीमा को मौजूदा 6,500 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये करने की तैयारी कर रही है। इससे संगठित क्षेत्र के और ज्यादा कर्मचारियों को पीएफ कवरेज के दायरे में लाया जा सकेगा। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की फैसले लेने वाली शीर्ष संस्था सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टी  (सीबीटी) की आगामी 15 जनवरी को होने वाली बैठक में इस प्रस्ताव को हरी झंडी दी जा सकती है। सीबीटी के एजेंडे में 'वेज सीलिंग' बढ़ाने के प्रस्ताव को लिस्ट किया गया है।

ईपीएफओ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने 'बिजनेस भास्कर' को बताया कि पीएफ सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए यह कदम जरूरी है। कुछ माह पहले इस आशय का प्रस्ताव श्रम मंत्रालय को भेजा गया था। मंत्रालय ने वेज सीलिंग बढ़ाने के प्रस्ताव पर कुछ स्पष्टीकरण मांगे थे। श्रम मंत्रालय ने प्रस्ताव पर सहमति जता दी है, इसलिए इसे आगामी सीबीटी बैठक के एजेंडे में शामिल करने को कहा गया है। अधिकारी के मुताबिक पीएफ के लिए मौजूदा समय में तनख्वाह सीमा 6,500 रुपये है। इससे ज्यादा वेतन वाले कर्मचारियों के लिए पीएफ चुनने या न चुनने का विकल्प होता है। ऐसे में काफी लोग कवरेज से बाहर हो जाते हैं। वेज सीलिंग 10,000 रुपये करने से बड़े पैमाने पर कांट्रैक्ट पर काम कर रहे कर्मचारियों को पीएफ कवरेज का लाभ मिल सकेगा।

मौजूदा नियम के तहत 6,500 रुपये तक या इससे कम बेसिक सैलरी वाले कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से पीएफ कवरेज में शामिल किया जाता है। पीएफ में अपनी सैलरी का 12 फीसदी कर्मचारी देते हैं और 12' योगदान कंपनी का होता है। हाल ही में सेवानिवृत्त हुए पूर्व सेंट्रल पीएफ कमिश्नर आर.सी मिश्रा ने अपने कार्यकाल में पीएफ के सदस्यों की संख्या बढ़ाने के मकसद से वेज सीलिंग बढ़ाने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था। सीबीटी की बैठक में वित्त वर्ष 2012-13 के लिए पीएफ पर दी जाने वाली ब्याज दर तय करने पर भी विचार किया जा सकता है। ट्रेड यूनियनों ने इस बार पीएफ पर 9.5' ब्याज देने की मांग की है। (भास्‍कर)

राणा यशवंत बनेंगे इंडिया न्‍यूज में ग्रुप मैनेजिंग एडिटर

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं महुआ समूह के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत ग्रुप मैनेजिंग एडिटर के पद पर इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन कर रहे हैं. वे यहां पर इंडिया न्‍यूज नेशनल चैनल के साथ समूह के पांच रीजनल चैनल के भी सर्वेसर्वा होंगे. उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि वे 14 जनवरी के बाद अपनी नई जिम्‍मेदारी संभाल लेंगे. राणा यशवंत 1996-97 बैच के आईआईएमसी पास आउट हैं. बनारस के बीएचयू से शिक्षा ग्रहण करने वाले राणा यशवंत पत्रकार होने के साथ-साथ कवि भी हैं.

आईआईएमसी से पास होने के बाद वे 1997 में जी न्‍यूज से जुड़ गए. पांच सालों तक जी न्‍यूज में काम करने के बाद वे 2002 में आज तक पहुंचे. वहां पर उन्‍होंने बड़े बड़े नामों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई. इनकी काबिलियत को देखते हुए प्रबंधन इनकी जिम्‍मेदारियों में वृद्धि करता गया. राणा यशवंत की क्षमता का पता इसी से लगाया जा सकता है कि जब तक ये वहां पर रहे चैनल कभी नम्‍बर एक की पायदान से नीचे नहीं आया. वे लम्‍बे समय तक आजतक के आउटपुट हेड रहे. 2010 में आजतक छोड़ते ही चैनल इंडिया टीवी से पिछड़ गया. लगभग दो साल से वे महुआ के साथ ग्रुप एडिटोरियल हेड के रूप में जुड़े हुए हैं.

सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने सोच समझकर राणा यशवंत को यह जिम्‍मेदारी सौंपी है. अब तक दोयम दर्जा के चैनलों में शुमार इंडिया न्‍यूज को एक अलग पहचान देने की जिम्‍मेदारी राणा यशवंत की भी होगी. राणा के साथ काम कर चुके दीपक चौरसिया और पुण्‍य प्रसून बाजपेयी को भी राणा की क्षमता की जानकारी है, लिहाजा प्रबंधन ने इन्‍हें सभी चैनलों का मैनेजिंग एडिटर बनाकर इंडिया न्‍यूज को आजतक जैसे चैनल की समकक्ष खड़ा करने की जिम्‍मेदारी सौंपने की योजना तैयार की है. राणा को डाक्‍युमेंट्री बनाने में महारत हासिल है. उनके कार्यकाल में आजतक में जितने भी बेहतरीन डाक्‍युमेंट्री प्रसारित हुईं, उसके सूत्रधार राणा यशवंत ही रहे.

हिंदुस्‍थान समाचार के राष्‍ट्रीय प्रभारी श्रीकांत जोशी का निधन

नई दिल्ली। हिन्दुस्थान समाचार के संरक्षक व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ प्रचारक मा. श्रीकान्त जोशी का मंगलवार सुबह पांच बजे मुम्बई में निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्कार आज सायंकाल मुम्बई में होगा। श्री जोशी के निधन से हिन्दुस्थान समाचार सहित आरएसएस को गहरी छति पहुंची है। उनके निधन पर आरएसएस, भाजपा सहित कई सामाजिक व राजनीतिक संगठनों से शोक व्यक्त किया।

जोशी जी ने अंतिम सांस मुंबई के संघ कार्यालय में ली। वह पिछले कुछ दिनों से सांस की बीमारी से पीड़ित थे। दो दिन पूर्व ही वह दिल्ली प्रवास पर आये थे और संवाद समिति के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आगामी योजनाओं की विचार विमर्श किया था। गत् 22 दिसम्बर को इलाहाबाद में हुए संवाद समिति के केन्द्रीय निदेशक मण्डल बैठक की अध्यक्षता करने पहुंचे जोशी जी की तबियत कुछ ठीक नहीं थी। उसके बाद वह नागपुर में अपना इलाज करा रहे थे।

विदित हो कि श्री जोशी पिछले चार दशक से संघ के प्रचारक रहे। उनका चार भाई और एक बहन का परिवार था। वह मुंबई के गिरिगांव से संघ से जुड़े। बीए कर वह एलआईसी में नौकरी करने लगे। इसी दौरान उनका संपर्क शिवरायजी तेलंग से हुआ और वह 1956 में गृह त्यागकर संघ के प्रचारक बन गये। शुरुआत में वह नांदेड़ में प्रचारक रहे। बाद में विषम परिस्थितियों में 1961 असम गये और कई वर्षों तक असम में प्रांत प्रचारक रहे। इसके बाद वह आपातकाल में संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के सहायक के रुप में रहे और पूरे देश का भ्रमण किया। इसके अलावा वह अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख रहे। इस समय वह महिला समन्वय, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत और हिन्दुस्थान समाचार के संरक्षक थे।

संघ के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार संवाद समिति को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। उनके अथक परिश्रम से गत् एक दशक में इस संवाद समिति ने न केवल अपना विस्तार किया अपितु भारत सहित विदेशों में भी अपनी धाक जमाने में सफल रही। उनकी प्रेरणा से आज भारत सहित मारिशस, नेपाल, त्रिनिनाड, थाईलैण्ड सहित कई देशों में इस संवाद समिति के ब्यूरो कार्यालय सफलता पूर्वक चल रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में सहारा रिफंड मामले की समीक्षा आज

नई दिल्‍ली : उच्चतम न्यायालय की तरफ से 31 अगस्त को सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्ट कॉरपोरेशन के खिलाफ दिए गए फैसले की समीक्षा मंगलवार को हो सकती है। यह समीक्षा याचिका आज न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन के सामने रखी गई। सहारा के वकील ने इस पर हालांकि टिप्पणी से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस केहर के पीठ ने इन दोनों कंपनियों को निवेशकों को 24,029 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया था। यह रकम निवेशकों से ओएफसीडी के जरिए उगाही गई थी।

अदालत ने इस पर 15 फीसदी सालाना ब्याज देने का भी आदेश दिया था। इन फर्मों को रकम के साथ-साथ सभी जरूरी दस्तावेज 10 दिन के भीतर सेबी के पास जमा कराने थे। नियामक को ऐसे रिफंड का काम 30 नवंबर तक पूरा करना था। चूंकि सहारा ने जरूरी दस्तावेज जमा नहीं कराए, लिहाजा सेबी ने उच्चतम न्यायालय में अवमानना की याचिका दायर की। 30 नवंबर को सहारा 5120 करोड़ रुपये जमा कराने को लेकर उच्चतम न्यायालय पहुंच गया। चूंकि सेबी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था क्योंकि यह अदालती आदेश के मुताबिक लौटाई जाने वाली रकम का एक हिस्सा भर था। तब मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाले पीठ ने सेबी को यह रकम स्वीकार करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही सहारा को दो किस्तों में बाकी रकम जमा करने का निर्देश दिया गया था। पहली किस्त 5 जनवरी को दी जानी थी।

सहारा समूह अब दावा कर रहा है कि उसे कुछ और चुकाने की दरकार नहीं है क्योंकि ओएफसीडी निवेशकों के सिर्फ 2620 करोड़ रुपये ही बकाया है। इसका कहना है कि अतिरिक्त 2500 करोड़ रुपये संभावित विवाद या आकलन में होने वाली गड़बड़ी की स्थिति से निपटने के लिए दिए गए थे। बताया जा रहा है कि सहारा ने समीक्षा याचिका के साथ एक शपथपत्र भी दायर किया है, जिसमें आकलन के बाबत विस्तार से जानकारी दी गई है। (बीएस)

sebi sahara

विशाल बने चीफ वीडियो एडिटर, आलोक, प्रियंका, पवन, कादंबिनी, ददन व सागर की नई पारी

हमार टीवी से खबर है कि विशाल पांडेय को चीफ वीडियो एडिटर बना दिया गया है. विशाल हमार टीवी की लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. विशाल की गिनती हमार के सबसे अनुभवी और तेजतर्रार वीडियो एडिटरों में की जाती है. कोलकाता में एबीपी समूह की वीडियो मैगजीन सानंदिता से अपने करियर की शुरुआत करने वाले विशाल कई राजस्‍थानी सिनेमा की एडिटिंग भी की है. वे ईटीवी के यूपी तथा बिहार की लांचिंग की टीम के सदस्‍य भी रहे. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे बाम्‍बे चले गए जहां कई प्रोडक्‍शन हाउसों से जुड़े रहे. मुंबई से आने के बाद वे नोएडा में स्‍टार न्‍यूज के साथ जुड़ गए. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद पांच साल पहले वे हमार टीवी चले आए थे, तब से यहीं पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. 

हमार टीवी से दूसरी खबर है कि आलोक कुमार भी आउटपुट से जुड़ गए हैं. इनके अलावा एसाइनमेंट में प्रियंका एवं पवन जायसवाल ने ज्‍वाइन किया है. प्रोग्रामिंग में कादंबिनी ने ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. वे महुआ से इस्‍तीफा देकर यहां पहुंची हैं. आउटपुट में ददन कुमार ने ज्‍वाइन किया है. जबकि वीडियो ए‍डिटर के रूप में सागर वशिष्‍ठ ने ज्‍वाइन किया है. वे इसके पहले डे नाइट चैनल और टीवी100 को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

किशोर कुमार सिंह बने पॉजीटिव मीडिया के ग्रुप एसाइनमेंट हेड

: पवन मिश्रा भी जुड़े : मतंग सिंह के पॉ‍जीटिव समूह के चैनल फोकस और हमार की रीलांचिंग होने के साथ ही यहां हलचल तेज हो गई है. इसके साथ ही नियुक्तियों का दौर भी शुरू हो गया है. समूह के साथ वरिष्‍ठ पत्रकार किशोर कुमार सिंह भी जुड़ गए हैं. उन्‍हें पॉजीटिव समूह का ग्रुप एसाइनमेंट हेड बनाया गया है. वे पॉजीटिव मीडिया के सभी छह चैनलों की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. किशोर जबलपुर से संचालित नेशनल चैनल एसएमबीवी इनसाइट के इनपुट हेड के पद से इस्‍तीफा देकर यहां पहुंचे हैं.

पटना में आर्यावर्त से अपनी पारी शुरू करने वाले किशोर का प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया दोनों पर अच्‍छी पकड़ है. वे पटना में स्‍टार न्‍यूज के अलावा दूरदर्शन एवं साधना को भी वरिष्‍ठ पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनके आने से का असर भी दिखने लगा है. इन हाउस चैनलों का प्रसारण भी शुरू कर दिया गया है. जल्द ही यह बाहर भी दिखने लगेगा. किशोर के साथ पवन मिश्रा भी हमार टीवी से जुड़ गए हैं. उन्‍होंने सीनियर प्रोड्यूसर के पद पर ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें आउटपुट हेड बनाया गया है.  पवन भी एसएमबीसी से इस्‍तीफा देकर यहां पहुंचे हैं. इसके पहले वे ईटीवी, आजाद न्‍यूज और जीएनएन को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

महिलाएं भी करती हैं बलात्‍कार : वेद प्रताप वैदिक

इंदौर। लोग सोचते हैं कि महिलाएं ही बलात्कार का शिकार होती हैं मगर यह पूरी तरह सही नहीं है। पुरुषों को भी ऐसे अत्याचार झेलने पड़ते हैं। स्त्रियों द्वारा जबरदस्ती करने के मामले भी सामने आए हैं। दरअसल बलात्कार बलशाली द्वारा निर्बल पर की गई गंभीर हिंसा का मामला है। इससे निपटने के लिए पुरुष और महिलाओं को अलग-अलग नजरिए से देखने के बजाय हमें बलशाली द्वारा निर्बलों पर किए जाने वाले अत्याचार समाप्त करने के ठोस प्रयास करने होंगे।

उक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने सोमवार शाम इंदौर प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किए। जाइंट्स इंटरनेशनल और सेवा सौरभ द्वारा 'महिला उत्पीड़न – कारण और निवारण' विषय पर आयोजित परिचर्चा में उन्होंने कहा कि गैंपरेप जैसी घटनाएं रोकने के लिए सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों में बड़े स्तर पर बदलाव के साथ-साथ लोगों की मनःस्थिति बदलने की भी जरूरत है। इसके लिए बच्चों को शुरू से ही नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। नई पीढ़ी को संवेदनशील बनाकर अपराधों में कमी लाई जा सकती है। इसलिए कानून बना देना ही काफी नहीं है। देश में अभी १७ हजार न्यायाधीश, लोकपाल की भूमिका निभा रहे हैं मगर अपराध नहीं रुक रहे हैं। हजार मामलों में से मात्र १०-१२ में ही दोषी को सजा मिल पाती है। देर से मिला न्याय भी अन्याय के बराबर है। इसलिए न्यायिक व्यवस्था में बदलाव जरूरी है। बलात्कार जैसे मामला की सजा तत्काल देकर अपराधियों में भय का माहौल बनाया जा सकता है।

भारत में स्थिति बेहतर—डॉ. वैदिक ने बताया कि अमेरिका में एक लाख पर २८, स्वीडन में ६३ और ब्रिटेन में २४ लोग बलात्कार का शिकार होते हैं मगर भारत में यह आंकड़ा एक के अंक से जरा सा ही ज्यादा है। इस लिहाज से भारत की स्थिति बेहतर है मगर यह कोई संतोष की बात नहीं है। भ्रष्टाचार, कालाधन और गैंगरेप जैसे मुद्दों पर जनता के घर से निकलकर सड़क पर आने को डॉ. वैदिक ने आंदोलन मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह जनोत्थान है जिसके जरिए जनता अपना स्वाभाविक गुस्सा व्यक्त कर रही थी।
 

२४ में से २२ परिचित-आईजी अनुराधा शंकर ने बताया कि नवंबर में इंदौर में सामने आए २४ में से २२ मामलों में ज्यादती किसी परिचित द्वारा ही की गई थी। ५० प्रतिशत मामले १० साल से छोटी बच्चियों के साथ हुए। गांवों में तो स्थिति और भी खराब है। इंदौर जोन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि बलात्कार के ७५ फीसदी मामले शहरों की बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में दर्ज किए गए हैं। सुश्री अनुराधा ने कहा कि जो लोग महिलाओं को जीवन में सीता जैसा आदर्श उतारने की शिक्षा दे रहे हैं उन्हें पुरुषों को भी राम बनने की सीख देनी चाहिए। महिला उत्पीड़न की शुरुआत भ्रूण-हत्या से होती है। मां-बाप को बेटियों के साथ भी बेटों जैसी पहचान जोड़नी पड़ेगी।

प्रारंभ में सेवा सौरभ के अध्यक्ष विष्णु गोयल और जायंट्स इंटरनेशनल के अध्यक्ष अभिभाषक पीके शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल विशेष अतिथि के रूप में मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन मनीषा गौर ने किया। आभार संजय मित्तल ने व्यक्त किया। समारोह में बड़ी संख्या में अभिभाषक, सेवानिवृत्त न्यायधीश,मीडियाकर्मी एवं समाजसेवी उपस्थित थे।

अमर उजाला के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर शंभूनाथ शुक्‍ला नोएडा पहुंचे

वरिष्ठ पत्रकार और अमर उजाला, मेरठ में एक्जीक्यूटिव एडिटर रहे शंभूनाथ शुक्ला ने नोएडा में अखबार ज्‍वाइन कर लिया है. श्री शुक्‍ल का तबादला पिछले दिनों मेरठ से नोएडा के लिए कर दिया गया था. सूत्रों का कहना है कि उनका रिटायरमेंट अगले साल फरवरी में है. इसलिए प्रबंधन ने उन्‍हें नोएडा अटैच किया है. वहीं दूसरी ओर उनके नजदीकियों का कहना है कि पत्रकारिता में कई दशकों से सक्रिय शंभू जी ने खुद अपना तबादला नोएडा मांगा था. उनके अनुरोध पर प्रबंधन ने उन्हें नोएडा बुला लिया.

बताया जा रहा है कि रिटायरमेंट के बाद भी शंभू जी अमर उजाला से जुड़े रहेंगे और प्रबंधन उन्हें नई जिम्मेदारी देगा. शंभूनाथ लंबे समय से अमर उजाला के साथ हैं और कानपुर, मेरठ, नोएडा समेत कई यूनिटों के सर्वेसर्वा रह चुके हैं. इस संदर्भ में उन्‍होंने अपना फेसबुक स्‍टेटस भी अपडेट किया है.

''नोएडा आ गया हूं। पर अपना मन किसी भी बड़े शहर में नहीं लगता। मुझे लगता है कि देश को और लोगों को जानने के लिए दूर इलाके के गांव ज्यादा बेहतर हैं। शहरों से दूर गांवों में आज भी अमीर-गरीब की खाई अधिक गहरी और पीड़ा देने वाली है। ऊपर से जातिवाद वहां और परेशान करता है। इसलिए कुछ करना है तो मेट्रो की बजाय उन गांवों में जाकर मोमबत्ती जलाइए। ठीक है शुरुआत शहर में होती है लेकिन उसकी परिणिति गांवों में ही हो तो बेहतर। उनके पास जाकर उठना-बैठना, खाना-पीना तब आप उनके मन का भेद पा पाएंगे। तब आपको पता चलेगा कि गांवों के भारत की हकीकत क्या है। इसे न तो भागवत जान पाए न वे शहरी कार्यकर्ता जिन्हें बस बड़े शहरों में मोमबत्ती जलाकर विरोध जताना आता है।''

वरिष्‍ठ पत्रकार श्‍याम कौल का निधन

नयी दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार श्याम कौल का आज यहां संक्षिप्त बीमारी के बाद उनके आवास पर निधन हो गया। वह 79 वर्ष के थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी, दो बेटियां और दो बेटे हैं। अपनी पेशेवर क्षमताओं के लिए जाने जाने वाले कौल लंबे समय तक कश्मीर से संबंधित घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग से जुड़े रहे। कश्मीर के जिला गंदेरबल के साफापुरा..मनसाबल क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले कौल कश्मीर में रिपोर्टर के रूप में पहले प्रेस एशिया इंटरनेशनल से जुड़े और बाद में ‘कश्मीर पोस्ट’ से।

इलाहाबाद में आठ पन्‍ने का कुंभ स्‍पेशल एडिशन लांच करेगा जागरण

: नौ जनवरी से शुरू किए जाने की संभावना : दैनिक जागरण, इलाहाबाद में चुपचाप प्रति‍द्वंद्वी अखबारों को हतप्रभ करने की तैयारियों में जुटा हुआ है. सूत्रों का कहना है कि नोएडा से विष्‍णु त्रिपाठी एवं लखनऊ से राजीव मिश्रा समेत कुछ और लोग पिछले दो-तीन दिनों से इलाहाबाद में डेरा जमाए हुए हैं. बताया जा रहा है कि ये लोग कुंभ के दौरान एक स्‍पेशल एडिशन की लांचिंग करने की योजना को अंजाम देने में जुटे हुए हैं. विष्‍णु त्रिपाठी के सुपरविजन में इस स्‍पेशल इशु को तैयार किया जा रहा है.

सूत्रों का कहना है कि जागरण 14 जनवरी से शुरू होने वाले कुंभ को ध्‍यान में रखते हुए आठ पन्‍ने के स्‍पेशल अखबार की लांचिंग कर रहा है. उसकी योजना है कि अचानक प्रतिद्वंद्वी अखबारों को चौंकाते हुए उनसे बढ़त ले ली जाए. कुंभ स्‍पेशल के नाम पर यह आठ पन्‍ने का अखबार अगले डेढ़ महीने तक प्रकाशित किया जाएगा. संभावना है कि प्रबंधन नौ जनवरी को इस अखबार को लांच करेगा. इसके चलते ही विष्‍णु त्रिपाठी समेत तमाम वरिष्‍ठ इलाहाबाद में डेरा डाले हुए हैं. अब देखना है कि जागरण का यह स्‍पेशल इशु कितने लोगों को चौकाता है और कितने लोगों को प्रभावित करता है. यह तो इस अखबार के लांच होने के बाद ही पता चलेगा. 

आज सुप्रीम कोर्ट में होगी मजीठिया वेज बोर्ड की फाइनल सुनवाई

: आनंद बाजार पत्रिका समूह ने दायर किया है पेटीशन : लम्‍बे समय से अपने अपने संस्‍थानों में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों का इंतजार कर रहे पत्रकार तथा गैर पत्रकारों के लिए मंगलवार का दिन महत्‍वपूर्ण है. लम्‍बे समय से टलते आ रहे वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करने के मामले में कल सुप्रीम कोर्ट में फाइनल सुनवाई होनी है. आनंद बाजार पत्रिका बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के बीच चल रहे इस मामले में 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाने जा रहा है. कल पूरे देश के प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों की निगाह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लगी होगी.

जो पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बारे खुद अपडेट होना चाहते हैं, वे ऑन लाइन पूरे फैसले की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं. इसके लिए पत्रकार नीचे दिए गए साइट पर केस नम्‍बर तथा केस टाइप डालकर पूरी जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं. इस वेबसाइट http://courtnic.nic.in/courtnicsc.asp पर क्लिक करने के बाद केस नम्‍बर में 246 डालें, वर्ष के कॉलम में 2011 भरें तथा केस टाइप में रिट पेटीशन (सिविल) का ऑप्‍शन डालें. उसके बाद सबमिट कर दें. इसके बाद इस मामले की सारी जानकारी आपके सामने होगी. नीचे मामले का वर्तमान स्‍टेटस.

SUPREME COURT OF INDIA
Case Status     Status : PENDING
 
Status of : Writ Petition (Civil)    246    OF   2011
 
ABP PVT.LTD.& ANR   .Vs.   UNION OF INDIA & ORS.

 
Pet. Adv. : M/S. KARANJAWALA & CO.   Res. Adv. : MR. PARMANAND PANDEY

 
Subject Category : LABOUR MATTERS – OTHERS

 
Listed 1 times earlier                                                             Next Date of listing is : 08/01/2013
 
Last updated on Jan 7 2013
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पत्रकार विनय डेविड को रिवाल्‍वर से धमकाकर फिरौती मांगी

भोपाल : मध्य प्रदेश की राजधानी में आजकल खुलेआम फिरौती, अड़ीबाजी का खेल चल रहा है। शहर के गुण्डे, बदमाशों ने बिल्डरों के साथ मिलकर अड़ीबाजी का खेल खेल रहे हैं। मामला तब उठा जब गोयल बिल्डर्स ने अपने तयशुदा गुण्डों के साथ विनय डेविड पत्रकार के ‘‘टाइम्स ऑफ क्राइम’’ कार्यालय में घुसकर विनय डेविड को रिवाल्वर अड़ाकर फिरौती के जबरिया 15 लाख रूपये मांगे व नहीं देने पर जान से मार देने की धमकियां दी, लगातार कई बार अपने गुण्डों से रिवाल्वर की नोक पर धमकाया जा रहा है।

आरोपियों की ये सारी हरकते आफिस में लगे विडियो कैमरे में कैद हो गई। रिकार्डिंग सहित शिकायत थाना एम.पी.नगर में की गई जिस पर गम्भीरता से लेते हुए एम.पी.नगर के सी.एस.सी. श्री अरविन्द खरे ने पूरी वीडियो फूटेज देखकर थाने एम.पी. नगर में मामला दर्ज करने के निर्देश दिये। जिस पर पुलिस थाना एम.पी. नगर में धारा 387, 492, 294, 506 एवं 120 बी के तहत प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।

क्या है मामला : 2007 में ओमवती गोयल फर्म गोयल बिल्डर्स से एक फ्लैट खरीदा गया था जिसकी कीमत सात लाख थी, बिल्डर अशोक गोयल को काफी रकम चुकाने के बाद करीब दो लाख रुपये शेष रह गये थे जिसके एवज में अशोक गोयल जबरिया 10 लाख और तय किया गया गुण्डा द्वारा फिरौती 5 लाख रुपये की मांग की गई और यह मांगे बकायदा अशोक गोयल और शाहिद खान के अन्य लोगों द्वारा रिवाल्वर अड़ाकर डरा धमका कर मांगी गई।

पुलिस ने दिखाई तत्परता : थाना एम.पी.नगर में जब 23 दिसम्बर 2012 को जानकारी दी गई तो थाना एम.पी.नगर के प्रभारी ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई को अंजाम दिया और गम्भीर मामले की जांच श्री संतोष द्विवेदी को सौंपी गई। फरार आरोपियों की जानकारी जुटाना शुरू कर दिया और फिरौती अड़ीबाजी के षडय़ंत्र में शामिल चार आरोपियों अंचित गोयल, दिनेश राज, राकेश चदोले, संतोष जादोन को गिरफ्तार कर लिया और 31 दिसम्बर 2012 को भोपाल सी.जी.एम. श्री सोनकर जी की कोर्ट में विभिन्न धाराओं के तहत पेश कर दिया। आरोपियों द्वारा किये गये गंभीर अपराध के खिलाफ पत्रकार विनय डेविड एवं उनके अधिवक्ता यावर खान द्वारा लिखित और मौखिक आपत्ति लगाई गई, परन्तु न्यायालय ने अपराध गंभीरता से ना लेकर इन चारों खूंखार आरोपियों की जमानत दे दी जबकि मुख्य आरोपी खुलेआम रिवाल्वर लिये घूम रहे हैं।

अशोक गोयल की दो बार अग्रिम जमानत खारिज : जबरिया वसूली अड़ीबाजी डराने धमकाने का प्रमुख आरोपी अशोक गोयल लगातार भोपाल पुलिस को चकमा दे रहा है, कभी रायपुर तो कभी भोपाल के कुछ ठिकानों से पुलिस को गुमराह कर रहा है। वहीं मौके का फायदा उठाकर न्यायालय में दो बार अग्रिम जमानत पाने का प्रयास किया, जिस पर पुलिस द्वारा गंभीर अपराध होने और आरोपियों की गिरफ्तारी आवश्यक बताये जाने पर न्यायालय ने दोनों बार अग्रिम जमानत खारिज कर दी।

हाईकोर्ट से जमानत की जुगाड़ में अशोक गोयल : अशोक गोयल पुलिस को बार बार चकमा जरूर दे रहा है परन्तु कानून को ज्यादा देर तक गुमराह नहीं कर पायेगा। पुलिस लगातार उसे तलाश कर रही है। मोबाइल भी गोयल ने बन्द कर रखा है परन्तु वो अभी कुछ खास सरोकारियों से सम्पर्क बनाये हुए है और भोपाल के कुछ ठिकानों से अपना व्यवसाय नियमित चला रहा है। दो बार भोपाल न्यायालय से जमानत नामंजूर होने और चार आरोपियों को जमानत मिल जाने के बाद वो हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत पाने की जुगाड़ में लगा है। अब देखना है कि आखिर किस दांव के सहारे वो जमानत पा सकेगा।

केस वापसी की धमकी : अशोक गोयल और शाहिद खान फरार जरूर हैं परन्तु उनके हौसले आसमान को छू रहे हैं। वो लगातार अपने गुण्डे अपराधी तत्वों द्वारा चमका धमका रहे हैं कि किसी भी तरह से केस वापस हो जाय। केस वापसी के लिये भी 31 दिसम्बर को 11:30 पर विनय डेविड की पत्नी को चार रिवाल्वर धारियों ने घर में घुस कर जान से मारने और बच्चों को उठा लेने की धमकी दी और फरार हो गये, जिसकी शिकायत भी क्षेत्रीय थाने में की गई जिस पर पुलिस ने जांच परखकर अपराध कायम कर लिया है।

1100 रुपये का ईनाम :  मामला 22 दिसम्बर 2012 का है अपराध 23 दिसम्बर 2012 को कायम किया गया। अपराध गंभीर होने के बाद आरोपियों की 15 दिनों बाद भी गिरफ्तारी नहीं होने से प्रदेश कि पत्रकारों में आक्रोश है, क्योंकि विनय डेविड ‘‘ऑल इण्डिया स्मॉल न्यूज पेपर्स ऐशोसिएशन ‘‘आइसना’’ के प्रदेश महासचिव एवं ‘‘टाइम्स ऑफ क्राइम’’ के सम्पादक हैं और यह गंभीर अपराध को इनके कार्यालय के अन्दर ही अंजाम दिया गया। पत्रकारों की आवाज पर श्री अवधेश भार्गव प्रदेशाध्यक्ष ‘‘आइसना’’ ने पत्रकारों और आमजनता से अपील की है कि इन आरोपियों को शीघ्र पकड़ा जाना चाहिये और जिनके पास इन आरोपियों की कोई जानकारी हो हमें बता दे साथ ही जानकारी देने वाले को 1100/- रुपये का नगद ईनाम देने की भी घोषणा की है।

दिल्ली गैंगरेप केस: मीडिया पर रोक के आदेश को चुनौती, पुलिस को नोटिस

 

नयी दिल्ली : दिल्ली की एक अदालत ने 16 दिसंबर को 23 वर्षीय छात्रा से सामूहिक बलात्कार के मामले में सुनवाई की रिपोर्टिंग करने से मीडिया पर पाबंदी के एक मजिस्ट्रेट की अदालत के आदेश के खिलाफ याचिका पर दिल्ली पुलिस से आज जवाब मांगा है।
 
जिला न्यायाधीश आर के गाबा ने सोमवार को पुलिस को नोटिस जारी किया और नौ जनवरी को सुनवाई की तारीख तय की।
 
जिला न्यायाधीश ने कहा,‘इस स्तर पर दिल्ली सरकार के लिए अतिरिक्त सरकारी अभियोजक (एपीपी) संज्ञान लेंगे। एपीपी की दलील है कि उन्हें संबंधित अभियोजक से तथ्यों और सूचना एकत्रित करने की जरूरत है।’
 
वकील डीके मिश्रा और वकील पूनम कौशिक के आवेदन में कार्यवाही बंद कमरे में करने के मजिस्ट्रेटी अदालत के आदेश को रद्द करने की मांग की गई है और आरोप लगाया गया है कि अदालत कक्ष में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद रहे।
 
‘देश के नागरिकों’ की ओर से अपने आवेदन में वकीलों ने कहा, ‘आदेश जारी करते हुए मेट्रेापोलिटन मजिस्ट्रेट ने अनेक आशंकाएं जताई हैं और राष्ट्र के प्रतिनिधियों के तौर पर वहां एकत्रित वकीलों तथा मीडियाकर्मियों पर आरोप लगाए हैं जो आहत हुए हैं।’
 
मजिस्ट्रेट की अदालत ने आज मीडिया को अदालत में मामले की कार्यवाही की रिपेार्टिंग करने और इसका प्रकाशन करने से रोका था। दिल्ली पुलिस ने मामले में बंद कमरे में सुनवाई के लिए आवेदन किया था।
 
अदालत ने इस बात को ध्यान में रखते हुए बंद कमरे में कार्यवाही का आदेश दिया था कि अदालत कक्ष बार सदस्यों और आम जनता से भरा पड़ा था जिनका मामले से कोई लेना देना नहीं था। वे लोग वहां से जाने को तैयार नहीं हुए जिसके चलते आरोपियों को अदालत में पेश नहीं किया जा सका। (एजेंसी)

मीडिया को भी नहीं मिलेगी दिल्ली गैंगरेप की सुनवाई में रिपोर्टिंग की इजाजत

 

दिल्ली गैंगरेप मामले की सुनवाई साकेत कोर्ट में अब दस जनवरी को होगी। सोमवार 7 जनवरी को इस मामले में सभी आरोपियों को चार्जशीट भी उपलब्ध कराई गई। इसके साथ ही इस मामले में नाबालिग आरोपी की जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में भी सुनवाई टल गई जो अब 15 जनवरी को होगी। इन सबके बीच केस अब तक फास्ट ट्रैक कोर्ट को ट्रांसफर नहीं हुआ है।
 
रिपोर्ट के मुताबिक साकेत कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट नम्रता अग्रवाल ने आदेश में कहा कि इस मामले को लेकर पैदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए इसकी जांच और सुनवाई सहित सारी कार्यवाही अदालत के बंद कमरे में होगी। उल्लेखनीय है कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 327 के दूसरे भाग का तीसरे प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए अदालत कक्ष में मौजूद सभी व्यक्तियों को अदालत कक्ष खाली करने का निर्देश दिया जाता है।
 
न्यायाधीश ने कहा कि इस अदालत की अनुमति के बगैर इस मामले से जुड़ी किसी सामग्री को छापना वैध नहीं होगा। गौरतलब है लोक अभियोजक राजीव मोहन ने बंद कमरे में सुनवाई करने की याचिका दायर की थी। इससे दो दिन पहले दिल्ली पुलिस ने एक परामर्श जारी करके कहा था कि इस मामले की सुनवाई की रिपोर्टिंग नहीं की जा सकती, क्योंकि अदालत धारा 302 (हत्या), 376 दो (जी)(सामूहिक बलात्कार) और भारतीय दंड संहिता के अन्य प्रावधानों के तहत दाखिल आरोप पत्र पर पहले ही संज्ञान ले चुकी है।

 
उधर गैंगरेप के पांच आरोपियों राम सिंह, मुकेश, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय ठाकुर की आज साकेत कोर्ट में पेशी हुई। कोर्ट में सुनवाई चली और फिर कोर्ट ने कहा कि दिल्ली गैंगरेप की सुनवाई बंद कमरे में होगी। सुनवाई के वक्त सिर्फ आरोपी और वकील ही कोर्ट रूम में मौजूद थे। वहीं, दिल्ली गैंगरेप मामले में जांच का काम तेजी से चल रहा है। दिल्ली पुलिस ने जांच के लिए कुछ सबूतों को हैदराबाद के सीएफएसएल भेज दिया है।
 
दिल्ली पुलिस के दो अधिकारी सबूतों से भरे दो बक्से लेकर वहां पहुंचे हैं। पुलिस के अधिकारियों ने इन सबूतों को हैदराबाद के सीएफएसएल के अधिकारियों को आज सौंप दिया है। छठे आरोपी के स्कूल सर्टिफिकेट के मुताबिक नाबालिग बताया जा रहा है। जिसकी तफ्तीश जारी है। नाबालिग आरोपी के स्कूल के प्रिंसिपल को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश होने के लिए बुलाया गया। नाबालिग आरोपी को गिरफ्तारी के बाद से ही बाल सुधार गृह में रखा गया है। उसके मामले में भी जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में 15 जनवरी को सुनवाई होगी।
 
पुलिस सूत्रों के मुताबिक 16 दिसंबर को चलती बस में हुई वारदात में इस नाबालिग आरोपी ने ही सबसे खौफनाक हरकत की थी। उसने दो बार बलात्कर कर लड़की की आंत पर वार किया था। उसे चलती बस से फेंकने की सलाह भी उसी लड़के ने दी थी। इससे पहले रविवार को पेशी के बाद चार आरोपियों की न्यायिक हिरासत 19 जनवरी तक बढ़ा दी गई। 
 
इस केस में दो आरोपियों ने सरकारी गवाह बनने की इच्छा जताई है जबकि दो आरोपियों ने कानूनी सहायता की मांग की है। इसी बीच आज आरोपियों की पेशी से पहले साकेत कोर्ट में वकीलों ने हंगामा शुरू कर दिया। कानूनी मदद मिलने के खिलाफ वकीलों ने हंगामा किया है। मालूम हो कि साकेत कोर्ट बार एसोसिएशन ने पहले ही घोषणा कर दी थी की वो आरोपियों का केस नहीं लड़ेंगे। वकील कोर्ट से आरोपियों को वकील देने का विरोध कर रहे हैं। हंगामा इतना ज्यादा बढ़ किया कि महानगर दंडाधिकारी को कुर्सी छोड़कर अपने चेंबर में जाना पड़ा। बाद में हंगामा शांत होने पर सुनवाई दोबारा शुरू हुई।
 
रविवार को सामूहिक दुष्कर्म के दो आरोपियों पवन और विनय ने सरकारी गवाह बनने की इच्छा जताई थी। कानून के जानकारों के मुताबिक उन्होंने फांसी जैसी कड़ी सजा से बचने के लिए यह कदम उठाया। वहीं दो आरोपियों राम सिंह और उसके भाई मुकेश ने कानूनी सहायता देने की मांग की थी।
 
इससे पूर्व कड़ी सुरक्षा के बीच पुलिस इस मामले में लिप्त नाबालिग आरोपी को छोड़कर अन्य सभी आरोपियों को लेकर साकेत कोर्ट पहुंची। इस मामले में हो रही सुनवाई पर देशी-विदेशी मीडिया की नजरें टिकी हुई हैं। सरकारी गवाह बनने की बात कहने वाले दोनों आरोपी वे ही हैं, जिन्होंने गिरफ्तारी के बाद अदालत में पेशी के दौरान खुद को फांसी दिए जाने की मांग की थी।
 
कानून के जानकारों का कहना है कि दोनों आरोपियों को सरकारी गवाह बनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि पुलिस के पास पर्याप्त सबूत हैं। सामूहिक दुष्कर्म के चार आरोपियों को न्यायिक हिरासत की अवधि पूरी होने पर रविवार को साकेत कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी ज्योति कलेर के समक्ष पेश किया गया था। अदालत ने चारों को 19 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। हालांकि इनकी सोमवार को संबंधित अदालत में पेशी होगी।
 
पेशी के दौरान इन आरोपियों को सरकार की ओर से वकील मुहैया कराने की पेशकश की गई, लेकिन विनय शर्मा और पवन गुप्ता ने इन्कार कर दिया। उन्होंने सरकारी गवाह बनने की इच्छा जाहिर की। इसके लिए अदालत ने उनसे संबंधित अदालत में अर्जी देने को कहा। वहीं आरोपी राम सिंह और मुकेश ने कानूनी मदद के लिए अदालत से वकील की मांग की। इन्हें वकील मुहैया कराया जाएगा।
 
ग़ौरतलब है कि महानगर दंडाधिकारी नम्रता अग्रवाल की अदालत में तीन जनवरी को इन आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने चार्जशीट पेश की थी। कोर्ट ने बीते शनिवार को चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए सात जनवरी तक के लिए पेशी वारंट जारी किया था, लेकिन आरोपियों की 14 दिनों की न्यायिक हिरासत की अवधि पूरी होने पर रविवार को इन्हें अदालत में पेश किया गया। इस दौरान मीडिया रिपोर्टिंग पर किसी तरह का प्रतिबंध लगाने की बात अदालत ने नहीं कही। 
 
वरिष्ठ अधिवक्ता डीबी गोस्वामी के अनुसार किसी आरोपी सरकारी गवाह बनाने का अधिकार सिर्फ जांच एजेंसी का होता है। अदालत सिर्फ यह देखती है कि जांच एजेंसी ने किसी को मजबूर करके तो सरकारी गवाह नहीं बनाया है। वहीं, जांच एजेंसी तब सरकारी गवाह बनाती है जब उनका केस कमजोर होता है। इस मामले में ऐसा कुछ नहीं है। 
 
गौरतलब है कि वसंत विहार में पिछले 16 दिसंबर को चलती बस में फिजियोथेरेपिस्ट युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। बुरी तरह से जख्मी युवती को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में 29 दिसंबर को सिंगापुर के अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी।

अगले वित्‍तीय वर्ष में लांच होगा श्रीटाइम्‍स का दिल्‍ली-एनसीआर एडिशन

श्री मीडिया समूह अब अपने प्रकाशनों के विस्‍तार की योजना को अंजाम देने की तैयारी कर रहा है. इस समूह ने प्रिंट, इलेक्‍ट्रानिक एवं वेबसाइट तीनों माध्‍यमों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. इस समूह का अखबार श्री टाइम्‍स का प्रकाशन लखनऊ से किया जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि अब इस अखबार के दूसरे यूनिट को नोएडा से लांच करने की तैयारी की जा रही है. इस यूनिट से दिल्‍ली-एनसीआर समेत आसपास के कई जिलों के एडिशन प्रकाशित किए जाएंगे.

सूत्रों का कहना है कि अभी इसकी प्‍लानिंग चल रही है. यूनिट की लांचिंग अगले वित्‍तीय वर्ष यानी अप्रैल के बाद की जाएगी. फिलहाल अन्‍य औपचारिकताएं पूरी किए जाने की तैयारी चल रही है. उल्‍लेखनीय है कि अभी इस अखबार का ए‍डिशन लखनऊ के अलावा रायबरेली, फैजाबाद, सीतापुर से हो रहा है. अजय उपाध्‍याय के इस समूह से जुड़ने के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि विस्‍तार के साथ ही यह मीडिया समूह अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रहेगा. 

एबीसी ने दैनिक भास्‍कर, जालंधर का मेंबरशिप टर्मिनेट किया

एबीसी यानी ऑडिट ब्‍यूरो ऑफ सर्कुलेशन ने दैनिक भास्‍कर का मेंबरशिप टर्मिनेट कर दिया है. एबीसी ने जालंधर यूनिट को एबीसी के आर्टिकल 5ए के तहत अपने मेंबरशिप से टर्मिनेट कर दिया है. हिंदी में केवल दैनिक भास्‍कर के जालंधर यूनिट को टर्मिनेट किया गया है. वहीं उडिया भाषा के चार तथा मराठी के एक प्रकाशन को एबीसी ने टर्मिनेट किया है. उडिया में भुवनेश्‍वर से प्रकाशित वीकली 'द साप्‍ताहिक समय', दैनिक 'धरितरी', दैनिक 'ओडिसा भास्‍कर' एवं दैनिक 'द दिनलिपी' शामिल हैं. जबकि मराठी में जलगांव से प्रकाशित दैनिक 'गांवकरी' का मेंबरशिप टर्मिनेट किया गया है.  

मुकेश कुमार की कविताएं (साभार- शुक्रवार)

शुक्रवार पत्रिका में वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की कई कविताएं प्रकाशित हुई हैं. कई चैनलों के संपादक रह चुके मुकेश कुमार हंस मैग्जीन में नियमित रूप से लिखते हैं. उन्होंने किताबें भी लिखी हैं. मुकेश कुमार इन दिनों मुख्य धारा की पत्रकारिता से दूर रहते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी करने में जुटे हुए हैं. लीजिए, मुकेश कुमार की कविताओं को पढ़िए…

हिमयुग

आज भी हिमयुग में  जमी हुई है पृथ्वी

तापहीन सूर्य असमर्थ है पिघला पाने में बर्फ

जाने कब जीवित होंगे  समय के जीवाश्म

विकास के कितने चरणों  को पार करके जीवन लेगा मानव रूप

सभ्यताएं कब पहुँचेंगी  उस मोड़ पर

जहाँ खिलते हैं  सूरज निरभ्र आकाश में

मुझसे सहा नहीं जाता ये विलंबित शीतकाल

अनगिनत अणु विस्फोटों  के ताप से प्रज्ज्वलित  मेरी देह

भस्म हो रही है

संचित हो जाएगी एक दिन हिमशिलाओं के नीचे

ज्वालामुखी बनकर

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सृष्टि

मरुभूमि की रेत की तरह

फैली हैं मेरी कामनाएं

एक किशोर तोड़ता है पेड़ पर चढ़कर कच्चे अमरूद

शीशे के सामने खड़ा एक अधेड़ रंग रहा है अपने बाल

यौवन की मिथ्या अनुभूति  लिए

 
धरती पूछती है सूर्य  से मुखातिब होकर

दोनों के होने का औचित्य

खिलखिला पड़ता है सौरमंडल

ग्रह, उपग्रह तारे सब जिज्ञासु हो उठते हैं

नथुने फड़क उठते हैं हवाओं  के

दौड़ पड़ती है वह दोगुने उत्साह के साथ

 
कहीं एक स्त्री सँभालते  हुए अपने वस्त्र

उठती है शैय्या से संपूर्ण  तुष्टि के साथ।

xxxxx

 

पत्थर

जिन्हें पूजा
हो गए पत्थर

पूजते-पूजते पत्थर
लोग भी हो गए पत्थर

देवता भी पत्थर
भक्त भी पत्थर

सब पत्थर
बस पत्थर ही पत्थर

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मुट्ठी

तितलियों से लेकर जंगल पहाड़ों  तक
परियों से लेकर चाँद तारों  तक
सब कुछ था नन्हीं सी बंद  मुट्ठी में

फिर जाने क्या पकड़ने दौड़े
कि फिसल गई दुनिया मुट्ठी से
रह गई उम्मीदों और सपनों  की रेत
चिपचिपाते पसीने के साथ

खुली हुई हथेली पर।

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तारीफ़

बहुत घातक होती है प्रशंसा
मीठे ज़हर की तरह
फैल जाती है नसों में
मदहोशी  के साथ

डाल देती है एक खुशनुमा आवरण दृष्टि पर
ओझल हो जाता है सच

आत्ममुग्धता में लीन मन
हमेशा खोजता  रहता है प्रशंसा के बोल

तारीफ़
तालियाँ
वाहवाही

रम जाता है इन्हीं में
उलटता रहता है अपनी उपलब्धियों के एलबम

बढ़ती जाती है आत्मप्रचार की भूख
कान तरसते  रहते हैं अपने बारे में  सुनने को

आँखें ढूँढ़ती  हैं पत्र-पत्रिकाओं, चैनलों में अपनी छवियाँ
मस्तिष्क  तलाश में रहता है प्रशंसा  लूटने के अवसर

बोलता रहता है अपने बारे में वह निरंतर, नि:संकोच
प्रत्यक्ष में, परोक्ष में
हर जगह  होता है वह खुद
उसकी उपस्थिति मारती है

मुर्दाघरों  जैसी सड़ाँध
सो जाती है आत्मा

बर्दाश्त  नहीं होती मामूली सी आलोचना
हर प्रतिकूल बात में दिखती है

साज़िश, पूर्वाग्रह और ईर्ष्या
इससे ख़तरनाक़ नहीं है कोई भी मौत
आप मर जाते हैं और आपको पता भी नहीं होता
ढोते रहते हैं एक मुर्दा व्यक्तित्व
मरे हुए  बच्चे को सीने से चिपटाए
बंदरिया की तरह।


मुकेश कुमार से संपर्क mukeshkabir@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

नोएडा गैंगरेप : छोटों को शिकार बनाने के बजाय बड़े अधिकारियों पर क्‍यों नहीं हो रही कार्रवाई?

दिल्‍ली रेप कांड को लेकर पूरा देश उबल रहा है. हर किसी के आंखों में गुस्‍सा है. इसके बाद भी नोएडा पुलिस कानों में तेल डाले हुए अपने पुराने अंदाज में काम कर रही है. इतनी बड़ी घटना के बाद  भी नोएडा पुलिस ने एक लड़की के गायब होने की घटना को गंभीरता से नहीं लिया, जिसका परिणा गैंगरेप और उसकी हत्‍या की शक्‍ल में आया. दिल्‍ली गैंगरेप की शिकार युवती की मदद करने की घोषणा करने वाले यूपी के सीएम अखिलेश यादव के कानों तक भी नोएडा में हुए गैंगरेप की आवाज नहीं पहुंची. जबकि मायावती के शासनकाल में इन्‍हीं गैंगरेपों की घटनाओं पर पैर रखकर वे सत्‍ता तक पहुंचने में सफल रहे.

नोएडा में पिछले कुछ दिनों में गैंगरेप की दो घटनाएं हो चुकी हैं. एक में पीडित परिवार पुलिस के चलते गांव छोड़ने को मजबूर हुआ तो दूसरे में पुलिस की लापरवाही से युवती की जान चली गई. इसके बाद भी शासन स्‍तर से किसी भी बड़े अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई. अब तो ऐसा लगने लगा है कि पूरा यूपी पांच साल के लिए एक परिवार का बंधुआ बन चुका है. यहां वही होगा जो ये लोग चाहेंगे. समाजवाद बुरी तरह परिवारवाद में तब्‍दील हो गया है. अगर अब भी अखिलेश यादव नहीं चेतते हैं तो 2014 में उन्‍हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

क्‍योंकि इन्‍हीं अधिकारियों ने मायावती को सत्‍ता से दूर कर दिया था. अब ऐसा लग रहा है कि अखिलेश भी इससे सबक लेने को तैयार नहीं हैं. नौकरशाही एवं पुलिसिया तंत्र उनकी बनी बनाई छवि पर बट्टा लगा रही है. लोग युवा सीएम के बारे में भी ठीक वैसे ही सोचने लगे हैं जैसा वे राहुल गांधी के बारे में सोचते हैं कि वे बड़े मुद्दों पर चुप्‍पी साध जाते हैं और ड्रामा करने में आगे रहते हैं. इससे मीडिया कवरेज तो मिल सकता है, पर वोट नहीं मिल सकता. ये साबित भी हो चुका है. यूपी की जनता को अब राहुल के कदमों पर चलते दिख रहे हैं अखिलेश यादव.

रायबरेली में पत्रकारों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. पत्रकार धरना प्रदर्शन करते रहे. लेकिन शासन स्‍तर से कोई सुनवाई नहीं हुई, किसी ने भी इस मामले को संज्ञान में नहीं लिया. इससे लगने लगा है कि एक बार फिर यूपी की सत्‍ता गूंगे-बहरे लोगों के हाथों में चली गई है. अभी सत्‍ता मद में भले ही ये बातें दिखती नहीं हों, लेकिन वे दिन दूर नहीं जब सपा का हश्र भी 2014 में मायावती सरकार जैसा हो. आखिर मायावती की जनता से दूरी और अखिलेश की कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर ही तो जनता ने उन्‍हें पहली बार पूर्ण बहुमत दिया था. अब अखिलेश भी उन्‍हीं राहों पर चलते दिख रहे हैं.

नोएडा रेप कांड को लेकर लोगों में उबाल है, पर सपा सरकार आंख-कान बंद किए हुए हैं. कार्रवाई के नाम पर छोटे कर्मचारियों को शिकार बना दिया गया, जबकि बड़े स्‍तर के किसी भी अधिकारी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की गई. नीचे नोएडा रेप कांड पर एबीपी न्‍यूज एवं आईबीएन7 ने भी पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल उठाया है.


नोएडा रेपकेस : कार्रवाई के नाम पर लीपापोती

नोएडा : दिल्‍ली से सटे नोएडा में एक लड़की के साथ बलात्कार और फिर हत्या के केस की जांच कर रही पुलिस पर लापरवाही के आरोप लगे हैं. लेकिन इन शिकायतों के बाद कार्रवाई के नाम पर सिर्फ लीपापोती की जा रही है. चार सिपाहियों को सस्पेंड किया गया है और एक चौकी इंचार्ज को लाइन हाजिर किया गया है, जबकि किसी बड़े अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है. पुलिस ने इस मामले में दो लोगो को गिरफ्तार किया है.

नोएडा में एक लड़की के साथ बलात्कार और फिर हत्या के केस में भी लोगों के अंदर गुस्सा है. शुक्रवार की रात नोएडा में दफ्तर से घर लौट रही लड़की की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी. शव अगले दिन सुबह झाड़ियों में मिला. परिजनों ने इस मामले में नोएडा पुलिस पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए. कहा गया कि पुलिस ने वक्त रहते कार्रवाई नहीं की और लड़की के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद उसे घरवालों की मर्जी के बगैर जलाने की कोशिश की.

आरोपों से घिरने के बाद कार्रवाई के नाम पर एक चौकी इंचार्ज को लाइऩ हाजिर और चार सिपाहियों को निलंबित किया गया है. लेकिन इस मामले मे आला अधिकारी अभी भी बचे हुए हैं. परिजनों के मुताबिक पुलिस ने उन्हें अभी तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं सौंपी है ताकि उन्हें मौत की वजह पता चल सके. हालांकि पुलिस का दावा है कि हर पहलू से जांच की जा रही है और जल्द ही पूरी साजिश का खुलासा होगा. इस बीच पुलिस पर लगे आरोपों को महिला आयोग ने भी संज्ञान में लिया है. महिला आयोग का दल आज पीड़ित लड़की के परिजनों से मुलाकात करेगा. (एबीपी न्‍यूज)


नोएडा रेप केस में पुलिस के रवैये पर सवाल

नोएडा। 21 साल की लड़की से रेप और मर्डर के मामले में नोएडा की एक अदालत ने दो आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। दोनों आरोपी 14 दिन तक जेल में रहेंगे। गौरतलब है कि नोएडा पुलिस ने रविवार को दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। जिन्हें आज कोर्ट में पेश किया गया। हालांकि इस केस में नोएडा पुलिस के रवैये पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पीड़ित घरवालों का आरोप है कि पुलिस ने उन पर अंतिम संस्कार जल्दी करने का दबाव डाला। साथ ही लड़की की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी अब तक उन्हें नहीं दी। इस केस में 5 कॉन्सटेबलों को सस्पेंड कर चौकी इंचार्ज को लाइन हाजिर कर दिया गया।

बीपीओ में काम करने वाली 21 साल की लड़की की लाश शनिवार सुबह सेक्टर 63 की झाड़ियों से मिली थी। लड़की की हालत देख आशंका जताई गई कि रेप के बाद उसकी हत्या की गई है, हालांकि पुलिसवालों ने लड़की की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट घरवालों को नहीं दी है लेकिन इस केस में रेप और हत्या का मामला दर्ज हुआ है। घरवालों का कहना है कि लड़की जब घर नहीं पहुंची तो उन्होंने उसे पूरी रात तलाशा और सुबह नोएडा सेक्टर 63 की पुलिस चौकी पर पहुंचे, लेकिन सेक्टर 63 चौकी पर मौजूद पुलिसवालों ने उन्हें वहां से लौटा दिया। इसके बाद लड़की के परिवार वाले सेक्टर 62 की चौकी पर गए। वहां तो किसी पुलिस वाले ने उनसे बात तक नहीं की।

पुलिस वालों ने लड़की के परिजनों को ये कहकर रफादफा कर दिया कि उनकी बेटी जवान है किसी के साथ चली गई होगी। ऐसे में सवाल ये कि क्या नोएडा पुलिस इस केस को दबा देना चाहती थी? राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी नोएडा पुलिस के रवैये पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले की जांच की बात कही है। वरिष्ठ अफसरों ने छोटे स्तर के 5 पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया है। इनमें दो कॉन्सटेबल पीसीआर वैन में तैनात थे, जबकि तीन चौकी पर तैनात थे। इसके अलावा मॉडल टाउन पुलिस चौकी के इंचार्ज को सिर्फ लाइन हाजिर किया गया है।

ध्यान देने वाली बात ये भी है कि पीसीआर वैन में तैनात जिन दो कॉन्सटेबलों को सस्पेंड किया गया है वो वही हैं जिन्होंने शनिवार को पुलिसवालों पर लड़की के अंतिम संस्कार के लिए दबाव बनाया था। ये पुलिसवाले लड़की के पोस्टमॉर्टम के बाद शव को नोएडा के घर ले गए और घरवालों पर दबाव बनाकर सिर्फ 10 मिनट में शव को शमशान घाट तक ले आए। उस वक्त की तस्वीरें गवाह हैं कि कैसे पुलिस की जिप्सी में अर्थी ले जाई गई। ये पुलिसवाले लगातार घरवालों पर रात में लड़की का अंतिम संस्कार करने का दबाव बना रहे थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। (आईबीएन7)

क्या सारी कालिख एक बार में उतर सकती है?

कहीं पढ़ी हुई एक लाइन याद आती है “भूख हड़ताल से शरीर को तो कष्ट होता है लेकिन आत्मा एकदम झकाझक ड्राइक्लीन हो जाती है”. यह वाक्य विभिन्न धर्मों में मौजूद व्रत उपवासों के संदर्भ में कहीं गई थी. जिसमें सारे पाप या बुरे कर्मों को कोई उपरवाला केवल इसलिए माफ कर देता है, क्योंकि उसने एक दिन उसके नाम से “भूखा” रह लिया. यानी कुछ भी करने के बाद केवल एक बार हल्का सा प्रयास करने मात्र से ही सारे आरोपों से बरी हो जाते हैं. इस व्यवस्था पर सोचने के बाद मन में सवाल उठने ही लगता है क्या इस तरह के फलसफे को अच्छा और सच्चा तरीका माना जाए. जो भी हो मन और उसके तर्क इस तरीके को मानने से बगावत कर देते हैं.

इन्हीं तर्कों से ही पिछले  कुछ दिन से जो तारीफ़ एक न्यूज़ चैनल और उसके इंटरव्यू वाले संपादक की हो रही है, उन सबकों सवालों के घेरे में खड़ा करने का मन होता है. चैनल के प्राइम टाइम स्लाट पर दिल्ली बलात्कार कांड की पीड़ित “दामिनी” के पुरुष मित्र और उस घटना के वक्त उसके साथ बस में सवार लड़के का पहला साक्षात्कार दिखाया जाता है. जाहिर सी बात है कि जिसे मुद्दे को लेकर दिल्ली और देश के (खास तौर पर हिंदी पट्टी) गांवों कस्बों में प्रदर्शन हो रहे हों, उस पर लोगों की निगाहें लगेंगी ही और हुआ भी वही. लड़के द्वारा उस घटना के विवरण जिसमें उस सड़क पर चल रहे लोगों और पुलिस द्वारा मदद ना करने की बातें मुख्य रूप से शामिल थीं. जो आलीशान ड्राइंगरूम से लेकर कस्बे की चौपाल तक में बैठे लोगों की भावनाओं को हिला दे रही थी. लेकिन इन बातों ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके बारे में आम लोग रोज़ सामना ना करते हों. किसी भी दुर्घटना या हादसे में ऐसी ही बातों का अनुभव हर किसी को कभी ना कभी होता ही है.

इस एक इंटरव्यू ने जहाँ सोशल मीडिया और वेब जर्नलिज्म में लहर फैला दी कि यह पत्रकारिता का एक महान कर्म है. जिसमें एक चैनल और उसके संपादक ने पुलिस और समाज को उघाड़कर रख दिया. आज के टीआरपी की खातिर जिस्म से लेकर रूह तक परोसने को बेचैन रहती इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौर में भी चलिए अगर इस एक इंटरव्यू को बहुत अच्छा भी मान लिया जाए तो क्या इससे जुड़े लोगों के स्याह पक्ष देखे जाने बंद कर देने चाहिए या उससे नज़रें फेर लेनी चाहिए.

अभी बहुत ज्यादा महीने नहीं बीते होंगे जब इसी दिल्ली में जहाँ महिला अधिकारों और यौन हिंसा को लेकर आजकल तूफ़ान मचा हुआ है वहीँ उसी दिल्ली की एक महिला अध्यापिका को एक चैनल द्वारा स्टिंग करके शिक्षण कार्य की आड़ में देह व्यापार चलाने वाला बताया गया था. और चैनल के ही उकसावे में जैसे इस समय इंटरव्यू को देखकर लोग भावुक हुए जा रहे हैं, ऐसे ही भावुक होकर उस महिला की बिना सच्चाई परखे बुरी तरह पिटाई और कपडे़ तक फाड़ देने वाली भींड जुट गई थी. बाद में जांच में पता चला कि यह सारा मामला झूठा था और उस चैनल के “पत्रकार” ने जानबूझकर फंसाने के लिए यह सारा ड्रामा रचा था. इलेक्ट्रानिक मीडिया में जहाँ हमेशा नेशनल का रोना रोया जाता है और जहाँ “स्लाट” कम होने का बहाना किया जाता है और जिसकी हर खबर पर संपादकीय जिम्मेदारी तय होती है. वहां के संपादक को कैसे इस पूरे कांड में बरी मान लिया जाए. इस चैनल के तत्कालीन संपादक वही रहे जो आज चर्चा में हैं. उक्त चैनल तो बंद हो गया लेकिन यह कई जगहों को पार करते हुए दूसरी जगह पहुँच गये.

अब उन्होंने एक इंटरव्यू लेकर अपने आप को महिला यौन उत्पीड़न की लड़ाई से जोड़ लिया और कुछ बतकहियों को माने तो इन्होंने हिम्मत वाली पत्रकारिता भी कर डाली है. यह भी एक अलग बात है कि जिस चैनल पर “पत्रकारिता” हुई उसी चैनल और इन संपादक का नाम एक बड़े नेता से वसूली करने के आरोप में फंसा हुआ है. इस मामलें में बकायदा वीडियो फुटेज बनी और पुलिस केस भी हो चुका है. इस मामलें को अगर एकबारगी के लिए अगर अपवाद भी मान लिया जाए तो दिल्ली में ही महिला शिक्षिका वाले मामले को तो महिला के साथ अपराध की श्रेणी में रखा ही जाना होगा. और इस मामले में असंवेदनशील व्यक्ति को कैसे पत्रकार और वह भी महिला उत्पीड़न के मामलें में बहादुरी वाली पत्रकारिता करने का तमगा दिया जा सकता है.

आज की पत्रकारिता को अगर पैमाना मापकर तौला मापा जाए तो यह सारी कवायद टीआरपी और स्वयं रक्षा से ज्यादा नहीं दिखती है. कई सारे आरोपों का सामना करने वाले चैनल व संपादक को यह मुद्दा टीआरपी और उनकी बदनामी के रक्षा कवच सरीखा लगा. जिसका पूरा उपयोग यह लोग करेंगे ही. शायद याद हो कि जब चैनल पर घूसकांड का मामला उछला था तब लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला वगैरह इनकी ओर से बताने की कोशिश की गई थी. जिसका कड़ा विरोध पत्रकारों की ओर से हुआ था. लेकिन अब इस एक इंटरव्यू के दौर में इन पर उठी एक ऊँगली भी बड़ी आसानी के साथ “हमला” सिद्ध की जा सकती है. इस पूरे मामले को जिस  तरह से चाहे देखने के लिए  हर कोई स्वतंत्र है.लेकिन  इससे एक सवाल तो उठता ही है कि क्या एक ही बार सारी कालिख  उतर सकती है.

लेखक हरिशंकर शाही युवा पत्रकार हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियां करते रहते हैं.

”ब्रिटिश अखबार को बेटी की पहचान उजागर करने की इजाजत नहीं दी थी”

नई दिल्ली : दिल्ली गैंगरेप मामले में मृत पीड़िता के पिता ने कहा है कि उन्होंने ब्रिटिश अखबार को बेटी का पहचान उजागर करने की इजाजत नहीं दी थी। डेली मिरर के रविवार के संस्करण दी संडे पीपल ने पीड़िता के पिता के हवाले से लिखा कि हम चाहते हैं कि दुनिया लड़की का नाम जाने। उन्होंने कहा कि मेरी बेटी ने कुछ गलत नहीं किया, अपना बचाव करते हुए उसकी मौत हुई और मुझे उस पर गर्व है। ब्रिटिश अखबार ने अपनी वेबसाइट पर पीड़िता का नाम एवं परिवार की फोटो प्रकाशित की। अखबार ने पीड़िता के पिता से उनके बलिया स्थित पैतृक गांव में बातचीत की।

हालांकि इस हादसे की रिपोर्टिंग में भारतीय मीडिया ने पीड़िता का नाम नहीं उजागर किया। वहीं एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार पीड़िता के पिता ने कहा कि उन्होंने इतना कहा था कि अगर महिलाओं के खिलाफ अपराध के संबंध में मौजूदा कानून के जगह पर नया कानून उनकी बेटी के नाम से बनाया जाता है तो उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। गौरतलब है कि बीते साल 16 दिसंबर को पारा मेडिकल स्टूडेंट के साथ दिल्ली में चलती बस में छह लोगों ने सामूहिक गैंगरेप किया था। पीडिता को उन्होंने काफी मारा-पीटा भी था तथा चलती बस से फेंक दिया था। इसके बाद 29 दिसंबर को इलाज के दौरान उसका सिंगापुर के अस्पताल में निधन हो गया था। (जी)

सहारा समय में फर्जी मार्कशीट से बन गया गंजबसोदा काका संवाददाता

क्या आप सोच सकते हैं कि सहारा समय जैसे संस्थान में कोई फर्जी मार्कशीट के सहारे पत्रकार बन सकता है। लेकिन सच्चाई है यह। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के गंजबासोदा में जफर मोहम्मद कुरेशी ने बीकाम थ्री की फर्जी मार्क शीट के सहारे संवाददाता बनने में सफलता हासिल कर ली। जफर लगभग 8 वर्षों से गंजबासोदा में संवाददाता हैं। अब पत्रकारिता के नाम पर इनका काम भी सुन लीजिये। ये जनाब गंजबासोदा में सरकारी उचित मूल्य की दुकानें संचालित करते हैं ओर खाद्यान की काला बाजारी करते हैं। सहारा समय न्यूज़ चैनल इनकी रक्षा का शस्त्र है पत्रकारिता का नहीं।

इसकी पुष्टि विदिशा जिला प्रशासन के खाद्य विभाग और गंजबासोदा की पीड़ित गरीब जनता से की जा सकती है। सहारा समय की वजह से प्रशासन भी इनसे कुछ बोल नहीं पाता है। इनके दो सगे भाई रायसेन जिले में पत्रकार हैं। एक जुबेर कुरैशी सहारा समय के पत्रकार हैं (इनकी भी मार्क शीट फर्जी है)। दूसरे अजहर कुरैशी ईटीवी के पत्रकार हैं। इनके भी कारोबार पत्रकारिता की आड़ में सरकारी उचित मूल्य की दुकानें संचालित करने का ही है। और प्रशासन यहाँ भी चैनलों की वजह से इनसे कुछ नहीं कह पाता है।

मार्क शीट की सच्चाई कैसे उजागर हुई? : बासोदा से की गई शिकायत के आधार पर सहारा समय के वकील ने जफर कुरैशी को नोटिस दिया तथा भोपाल बरकतउल्लाह यूनिवर्सिटी से मार्क शीट वेरिफिकेसन करवाया। यूनिवर्सिटी ने मार्क शीट वेरिफिकेशन की लिखित सूचना सहारा समय कोओर्ड़ीनेटर सी2-सी3-सी4 सेक्टर-11 नोयडा को पत्र क्रमांक 1774 दिनांक 06.02.2012 को भेज दी। लेकिन इन पत्रकारों के हितैशी मनोज मनु ने अपने ही स्तर पर मामले को दबा दिया। और ये पत्रकार चैनल की आड़ में ना सिर्फ गरीबों का मिलने वाला खाद्यान कालाबाजारी में बेचकर उनका शोषण कर रहे हैं। प्रशासन पर भी दबाव बनाकर रखते हैं। हालांकि हाल ही में शिकायत के आधार पर कलेक्टर ने इनकी सरकारी उचित मूल्य की दुकानें निरस्त कर दी है। जहां ईटीवी के स्टेट हेड विनोद तिवारी की सिफारिश भी काम नहीं आई। हो सकता है भड़ास में पढ़कर सहारा समय के वारिष्ठ अधिकारी इस पर ध्यान देकर इन पत्रकारों की जांच कराकर इन्हें हटाने की कार्यवाही कर पत्रकारिता को कलंकित होने से बचाएंगे और अपने सहारा समय की शाख को भी। 

अमर उजाला में सिटी इंचार्ज बने अरुण चंद, शैलेश आई नेक्‍स्‍ट से जुड़े

अमर उजाला, गोरखपुर से खबर है कि रिपोर्टर अरुण चंद को सिटी इंचार्ज बना दिया गया है. हालांकि अरुण को सिटी इंचार्ज बनाए जाने से सीनियर पत्रकार अंदर से काफी नाराज हैं. वरिष्‍ठों के इसी तरह के रवैये से नाराज बस्‍ती ब्‍यूरोचीफ पुष्‍कर पांडे ने इस्‍तीफा दे दिया था. बताया जा रहा है कि प्रबंधन में कुछ लोग दुर्गेश त्रिपाठी के खिलाफ माहौल बनाए हुए हैं. इधर, काम्‍पैक्‍ट में स्थिति तनावपूर्ण हो गई है.

आई नेक्‍स्‍ट, गोरखपुर से खबर है कि शैलेश अरोड़ा ने दुबारा इस अखबार के साथ अपनी पारी शुरू की है. शैलेश पिछले दिनों विवादों के बाद आई नेक्‍स्‍ट से इस्‍तीफा दे दिया था. वे शिक्षा समेत कई बीटों को कवर करते थे. बताया जा रहा है कि आई नेक्‍स्‍ट में कर्मियों की कम संख्‍या को देखते हुए आई नेक्‍स्‍ट के संपादकीय प्रभारी विकास वर्मा ने शैलेश को फिर से अपनी टीम के साथ जोड़ लिया है. शैलेश इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

अजय श्रीवास्‍तव आठवीं बार बने महाराजगंज प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष

महाराजगंज में रविवार को प्रेस क्‍लब का चुनाव हुआ, जिसमें अजय श्रीवास्‍तव (प्रभारी स्‍वतंत्र भारत) आठवीं बार निर्विरोध अध्‍यक्ष चुन लिए गए. महामंत्री पद पर जगदीश गुप्‍ता तथा कोषाध्‍यक्ष पद पर संजय पांडेय का चयन किया गया. इनके अतिरिक्‍त सुधेश मोहन श्रीवास्‍तव उपाध्‍यक्ष, विनोद कुमार गुप्‍त संगठन मंत्री तथा शमशुल हुदा आय-व्‍यय निरीक्षक बनाए गए.

सुनील यादव, राकेश प्रजापति, जितेंद्र शाही, मुहम्‍मद सईद, अंकुश श्रीवास्‍तव, सत्‍य प्रकाश गुप्‍ता, अशोक कुमार, अनूप कुमार, अतुल कुमार, ओंकार और राम किशुन कार्यकारिणी के सदस्‍य चुने गए. इस दौरान काफी संख्‍या में पत्रकार मौजूद रहे.

सीएम का पीएस बनकर फोन करने वाला फर्जी पत्रकार गिरफ्तार

: आखिर ऐसे लोगों को कौन बनाता है पत्रकार? : लखनऊ। आखिर ऐसे लोगों को पत्रकार कौन बनाता है? और क्यों ऐसे लोगों को पत्रकारिता जगत में लाया जाता है। जिनका न कोई सामाजिक उद्देश्य होता है और न तो कोई मर्यादाएं। एक तरफ पत्रकारिता जगत में जहां लोग अपनी लेखनी को दबाने पर नौकरी से त्याग पत्र देने का कार्य करते हैं वही इन जैसे लोगों के कारण पत्रकारिता की छवि दिन-प्रतिदिन धूमिल होती जा रही है। दरअसल इनको पत्रकारिता से लेना-देना कुछ नही बस इनको पत्रकार का एक ठप्पा चाहिए जिससे ये अपने व्यक्तिगत कार्य को कराते रहें। पकड़े जाने पर ये पत्रकार का रौब गांठकर बड़े आराम से निकल जाते हैं। लेकिन गौर करें तो चंद अफसरों ने अपने ऊपर रिस्क लेकर इन पत्रकारों को जेल की हवा खिलाने का कार्य किया है जो अपने आप में एक अनूठा कदम है।

सबसे अहम बात ये हैं कि इन जैसे लोगों को आखिर पत्रकार बनाता कौन है। जो सामाजिक क्रिया कलापों और समाज की सेवा को छोड़कर चंद लाभ के लिए पत्रकारिता को बदनाम करने में पीछे नहीं रहते है। उसका उतना नाम हुआ हैं जो जितना बदनाम हुआ है, इश्क में हम बदनाम हुए हैं तेरा भी तो नाम हुआ है। गजल की उक्त पक्तियां उनके ऊपर भी दाग लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है जो इन जैसे लोगों को पत्रकार बनाने में अहम भूमिका अदा करते हैं।

बता दें कि इस तरह के कई मामले हैं जिसमें पकड़े जाने पर वह अपने आप को पत्रकार बताते है। इतना ही नहीं उनके पास संस्थान के परिचय पत्र भी मिलते हैं। जिसे वह बड़े ही अदब से अधिकारियों के सामने पेश करते हुए दिखाई देते हैं। गौर करें तो कुछ मामलों में फर्जी पत्रकारों को भी गिरफ्तार किया जाता है। ताजा मामला हजरतगंज का है। हजरतगंज पुलिस ने 5 जनवरी को फर्रुखाबाद जिले की सरकारी चीनी मिल में प्रभारी सुरक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत पिता को सुरक्षा अधिकारी का पद दिलाने के लिए उžत्‍तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पीएस के रुप में सहकारी चीनी मिल संघ लिमिटेड के प्रबन्ध निदेशक को फोन कर दबाव बनाने वाले बेटे को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार पुत्र ने पिता को प्रोन्नति दिलाने के लिए कई बार फोन किया था।

प्रभारी सुरक्षा अधिकारी के पद पर तैनात रामकुमार शर्मा को सुरक्षा अधिकारी बनाने के लिए पीएस गजेन्द्र सिंह के रूप में फोन कर सहकारी चीनी मिल संघ लिमिटेड के प्रबन्ध निदेशक रवि प्रकाश अरोड़ा पर हिमांशु उपाध्याय दबाव डाल रहा था। जहां 1 जनवरी को रवि प्रकाश अरोड़ा ने सूचना दी कि किसी अंजान व्यक्ति ने उन्हें फोन कर अपने आपको मुख्यमंत्री का पीएस गजेन्द्र सिंह बताते हुए रामकुमार शर्मा को सुरक्षा अधिकारी बनाए जाने के लिए दबाव डाल रहा है। शंका होने पर उन्होंने मुख्यमंत्री के पीएस गजेन्द्र सिंह से वार्ता की तो उन्होंने फोन करने की बात से इंकार किया। हजरतगंज पुलिस ने हिमांशु का लोकेशन ट्रेस कर गिरफ्तार कर लिया गया। हिमांशु के मुताबिक वह एक साप्ताहित पत्रिका में अपराध संवाददाता है। उसके पास से एक साप्ताहिक अखबार के अपराध संवाददाता का फर्जी परिचयपत्र व सेलफोन बरामद हुआ। इतना ही नहीं उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की तो कई राज उजागर हुए।

हिमांशु ने कबूला कि अपने पिता की पदोन्नति के लिए उसने एमडी रविप्रकाश को फोन किया था। कई बार पत्रकारिता की आड़ लेकर मुख्यमंत्री आवास जा चुके हिमांशु को उनके पीएस का नाम मालूम था। अधिकारियों से बातचीत के लहजे को बारीकी से देखा और खुद को पीएस बताकर फोन करने लगा। इससे पहले हिमांशु ने इसी तरह रणवीर सिंह के पास से पैनकुली विभाग का सुरक्षा चार्ज हटवाया था। इसके अलावा उसने चीनी मिल में सिविल इंजीनियर एपी सिंह पर मिल की जमीन बेचने का आरोप लगाकर उनके पास से सुरक्षा अधिकारी का अतिरिक्त चार्ज हटवाया। इसके अलावा वह परिचयपत्र दिखाकर पुलिसकर्मियों पर रौब जमाते हुए टोल टैक्स प्लाजा पर शुल्क भी नहीं देता था। गौर करें तो इससे पूर्व में भी कई फर्जी पत्रकारों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

लेखक गोपाल जी वर्मा दैनिक अवध प्रांत में अपराध संवाददाता हैं.

सहारा ने मॉरीशस के रास्‍ते भेजा लग्‍जरी होटल खरीदने का पैसा

: ईडी कर रहा है जांच : सहारा ग्रुप को विदेशी डील के लिए कैसे फंड मिलते रहे हैं, इसका पता एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) ने लगा लिया है। दिसंबर 2010 में सहारा ने रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (आरबीएस) से 47 करोड़ पाउंड लेकर लंदन में ग्रोसवेनर हाउस खरीदा था। उसकी यह विदेशी डील देशी-विदेशी मीडिया की सुर्खियों में रही थी, जिससे ईडी का ध्यान इसके फाइनेंसिंग सोर्स पर गया। ईडी आरबीआई की मंजूरी बगैर विदेशी डील करने के चलते पहले से ही इस ग्रुप के पीछे लगा था।

सहारा की एक कंपनी का पैसा कुछ इस तरह से दूसरी कंपनी में गया और अंतत: विदेश पहुंच गया। डील की जड़ में सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्प और सहारा इंडिया कमर्शल कॉरपोरेशन थे। सहारा इंडिया रियल एस्टेट सेबी की नजरों में चढ़ गया है और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को इनवेस्टर्स का पैसा फरवरी के पहले हफ्ते तक दो किस्तों में लौटाने का ऑर्डर दिया है। सहारा की इन दो कंपनियों ने लाखों इनवेस्टर्स से कनवर्टिबल डिबेंचर के जरिए लगभग 20,000 करोड़ रुपए जुटाए थे। इसमें 3,620 करोड़ रुपए आईएनजी वैश्य की लखनऊ और एसबीआई की मुंबई खार ब्रांच में जमा किए गए। इसके बाद फंड पीएनबी की लखनऊ की एक ब्रांच में सहारा ग्रुप की कंपनी एम्बी वैली के खाते में डाले गए।

ईडी के अफसरों ने बताया कि पैसा एम्बे वैली को लोन के तौर पर दिया था। इसके बाद सहारा ने अहम फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन किया, जिससे बाकी पैसा विदेश चला गया। एम्बी वैली के अनसिक्योर्ड लोन को इक्विटी में बदला गया। इससे इसकी नेटवर्थ मार्च 2009 के 841.81 करोड़ से बढ़कर 31 मार्च 2010 को 6,058.91 करोड़ रुपए हो गई। नेटवर्थ बढ़ने से एम्बी वैली 'ऑटोमैटिक रूट' (आरबीआई परमिशन की जरूरत नहीं) के जरिए फंड विदेश भेजने में कामयाब रही। फॉरेक्स नियमों के मुताबिक, कंपनियां ऑटोमैटिक रूट के जरिए नेटवर्थ के चार गुना तक विदेश में इनवेस्टमेंट कर सकती हैं।

इस तरह, एम्बी वैली ने अपना फंड फुली ओन्ड सब्सिडियरी एम्बी वैली मॉरीशस को ट्रांसफर कर दिया। मॉरीशस वाली कंपनी ने फंड तुरंत लंदन के लग्जरी होटल की शॉपिंग के लिए भेज दिया। यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि क्या ट्रांजैक्शन, खासतौर पर ऑटोमैटिक रूट से फंड रेमिटेंस से कोई फॉरेक्स नियम टूटा है। ईडी जिन ट्रांजैक्शन की जांच कर रहा है, उन सब पर सहारा के प्रवक्ता से ग्रुप के व्यू पता नहीं चल पाया है। ईडी के सूत्रों के मुताबिक, फंड ट्रांसफर के अंतिम दौर को एक्सिस बैंक ने मैनेज किया। ईडी इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या बैंक ने फंड ट्रांसफर से पहले ड्यू डिलिजेंस किया था। इस बारे में एक्सिस बैंक का कहना है कि ट्रांजैक्शन केवाईसी सहित सभी जरूरी प्रोसेस से गुजरा है। ईडी 2जी स्पेक्ट्रम पाने वाली टेलीकॉम कंपनी एसटेल के साथ सहारा ग्रुप की डीलिंग की भी जांच कर रहा है। (एनबीटी)

sebi sahara

दिल्ली गैंगरेप: युवती का नाम बताया पिता ने, फोटो छिपाने की अपील

 

 
दिल्ली गैंगरेप मामले में इसके चश्मदीद अवींद्र पांडे के मीडिया के सामने आने के बाद अब इस घटना की भेंट चढ़ी युवती के पिता भी दुनिया के सामने आ गए हैं। उन्होंने पहली बार एक अंग्रेजी अखबार से की गई बातचीत में अपनी बेटी और उसके दर्द की सच्चाई को बयां किया है। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी ने अपनी आत्मरक्षा में प्राण गंवाए हैं। वह चाहते हैं कि उनकी बेटी का नाम दुनिया जाने और उन सभी को उससे हिम्मत मिले जो आए दिन इस तरह की घिनौनी हरकतों का सामना करती हैं।
 
एक अंग्रेजी अखबार से की गई बातचीत में उन्होंने युवती के पिता ने बताया कि उन्हें गर्व है कि उनकी बेटी ने बहादुरी से उन दरिंदों का सामना किया। उन्होंने अपनी बेटी का नाम भी बताया है और कहा है कि दुनिया को उसका नाम जानना चाहिए, क्योंकि उनकी बेटी ने कोई गलत काम नहीं किया है। वह अपनी जान की हिफाजत करते हुए मरी है और दुनिया की दूसरी औरतों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन सकती है।
 
इस बातचीत में उन्होंने अपनी बेटी के नाम को उजागर करने की अनुमति देने के साथ उसका फोटो कहीं भी न दिखाए जाने की अपील भी मीडिया से की। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में मौजूदा कानूनों को नाकाफी बताते हुए उनमें बदलाव की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन अपराधों को रोकने वाले कानून को उनकी बेटी का नाम दिए जाने से उन्हें कोई एतराज नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो यह उसके लिए एक सम्मान की बात होगी।
 
अपनी इस बातचीत में उन्होंने उस वक्त का भी जिक्र किया जब वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी। उन्होंने कहा कि बेइंतहा पीड़ा सहने के बाद भी वह जब उसके पास होते थे, तब वह खुश होती थी। उन्होंने कहा कि उस खौफनाक रात को वह और उनकी पत्नी बेटी के ग्यारह बजे तक घर न पहुंचने से परेशान थे। उन्होंने उसके और अवींद्र के मोबाइल पर भी फोन किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। बाद में उन्हें करीब सवा ग्यारह बजे अस्पताल से फोन आया जिसमें बताया गया कि उनकी बेटी के साथ कोई हादसा हुआ है। वह तुरंत वहां गए और बाद में उन्होंने अपनी पत्नी और दोनों बेटों को भी वहां बुला लिया।
 
उन्होंने बताया कि जिस दौरान उनकी बेटी अपने बयान दे रही थी तो उनकी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उसको सुन सकें, लिहाजा वह वहां नहीं रुक पाते थे। बाद में उनकी पत्नी उन्हें इसकी जानकारी देती थी। लेकिन वह इतने खौफनाक थे कि उन्हें यहां पर बयान नहीं किया जा सकता है। इस भारत की बेटी के पिता ने उन खबरों का भी खंडन किया जिसमें युवती के अपने पुरुष मित्र से शादी करने की बात कही जा रही थी। उन्होंने साफ कहा कि यह संभव ही नहीं था क्योंकि वह अलग अलग जाति के थे। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी डाक्टर बन कर अपने परिवार को बेहतर जिंदगी देने की ख्वाहिशमंद थी।
 
गौरतलब है कि 16 दिसंबर की रात को दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप के बाद छह आरोपियों युवती और उसके मित्र को चलती बस से बाहर फेंक दिया था। इसके बाद दोनों को ही दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लेकिन युवती की हालत बेहद खराब होने के बाद उसको सिंगापुर के अस्पताल में बेहतर इलाज के लिए भेजा गया था, जहां उसकी मौत हो गई। इस घटना के सामने आने के बाद से ही इसको लेकर प्रदर्शन का दौर जारी है। (जागरण)

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हर दिन एक न्यूज़ चैनल होता है सूचना और प्रसारण मंत्री की निगरानी में

 

खबर है कि सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी इन दिनों भारत के सभी न्यूज़ चैनलों की निगरानी में जुटे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट पर छपी खबर की मानें तो मंत्री जी हर रोज एक चैनल को अपनी निगरानी में रखते हैं और उसे ही ऑफिस या घर हर जगह देखते रहते हैं।
 
मंत्री महोदय चैनल में प्रसारित होने वाले कंटेंट और चैनल के नज़रिये पर पूरा ध्यान देते हैं। ये अलग बात है कि वे इस निगरानी पर क्या रिपोर्ट बना रहे हैं इस बारे में कुछ भी नहीं बोल रहे। हालांकि वे इतना जरूर मानते हैं कि ज्यादातर न्यूज़ चैनलों पर आधे से ज्यादा समय में न्यूज़ नहीं प्रसारित होता है।

कहते कहते बहुत कुछ कह गए लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार (देखें वीडियो इंटरव्यू)

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने जीवन व पत्रकारिता के हर रंग देखे हैं. भावुक, सरल और सहज किस्म के इंसान अजय कुमार एक जमाने में माया पत्रिका के पर्याय हुआ करते थे. ब्यूरो के चीफ रूप में उन्होंने लंबी पारी माया मैग्जीन के साथ खेली. करियर की शुरुआत उन्होंने स्वतंत्र भारत अखबार से की थी. इन दिनों चौथी दुनिया के लिए काम कर रहे हैं.

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह जब पिछले दिनों लखनऊ गए तो उन्होंने अजय कुमार से मुलाकात की और दो किश्तों में उनका वीडियो इंटरव्यू किया. इस पूरे इंटरव्यू के दौरान अजय कुमार की आंखों से आंसू भी छलके, पत्रकारिता में अपने उत्पीड़न की दास्तां भी बयां की. मीडिया में जातिवाद के बारे में खुलासा किया. पत्रकारिता में आ गए गैर-पत्रकारीय लोगों के बारे में बताया.

विवादों में न पड़ने वाले अजय कुमार ने कई ऐसी तल्ख सच्चाइयों का बयान किया जिससे समझ में आता है कि ये बदला हुआ दौर अपने साथ बहुत सारी बुराइयों को लेकर आया है. इंटरव्यू के पहले पार्ट को आप इस तस्वीर या नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके सुन सकते हैं…

अजय कुमार इंटरव्यू पार्ट वन

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/652/interview-personality/interview-of-senior-journalist-ajay-kumar-part-1.html

आईपीएस राजेश मीणा अफसरों की धड़ेबाजी और सियासी गणित के चक्कर में फंसे!

राजनीतिक हलकों में एक सवाल यह उठ है कि क्या एसपी मीणा के मीणा समाज के प्रमुख नेता किरोड़ी लाल मीणा के साथ कोई कनैक्शन थे? यह सवाल इस वजह से उठा है क्योंकि जैसे ही वे पकड़े गए, मीणा समाज के स्थानीय नेताओं ने मौके पर पहुंच कर किरोड़ी लाल मीणा को जानकारी देने के लिए उनसे संपर्क करने की कोशिश की। क्या यह प्रयास महज समाज के एक बड़े अफसर को राजनीतिक षड्यंत्र में फंसाए जाने के सिलसिले में किया गया? इसी से जुड़ा सवाल ये भी है कि स्थानीय नेताओं ने स्वत:स्फूर्त प्रदर्शन किया अथवा किसी के इशारे पर?

सवाल ये भी है कि स्थानीय नेताओं को यह कैसे पता लगा कि एसपी मीणा तो पूरी तरह से निर्दोष हैं और वे राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं? अव्वल तो उन्हें अपने समाज के अफसर की इस हरकत पर शर्मिंदगी होनी चाहिए थी, लेकिन अगर वे विरोध कर रहे हैं तो उन्हें जरूर यह जानकारी भी होगी कि यह षड्यंत्र किसने और क्यों रचा? इसका उन्हें खुलासा करना चाहिए।

वैसे मीणा पर कार्यवाही पर एक कयास ये भी लगाया जा रहा है कि इसके पीछे जरूर कोई राजनीतिक एजेंडा होगा। वो इस प्रकार की मंथली एक सामान्य सी प्रक्रिया है और मीणा अकेले पहले एसपी नहीं हैं, जिन्होंने ये कृत्य किया हो। अकेले वे ही निशाने पर क्यों लिए गए? सब जानते है कि भले ही एसपी मीणा के पकड़े जाने पर आज पुलिस की थू-थू हो रही है, मगर धरातल का सच ये है कि इस प्रकार की मंथली वसूली का चलन तो पूरे राज्य में है।

मीणा से गलती ये हो गई कि उन्होंने वसूली का घटिया तरीका इस्तेमाल किया। अमूमन इस प्रकार की राशि हवाला के जरिए एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाई जाती है, न कि सीधे थानों से वसूली करके सीधे एसपी तक पहुंचाई जाती है। खैर, अहम बात ये है कि राजेश मीणा पर ही शिकंजा क्यों कसा गया? कयास है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत किरोड़ी लाल मीणा के बढ़ते प्रभाव और उनके प्रभाव में आने वाली आईएएस व आईपीएस लॉबी पर दबाव बनाना चाहते हैं, ताकि वे आगामी चुनाव में ज्यादा परेशान न करें।

सब जानते हैं कि प्रदेश की आईएएस व आईपीएस लॉबी में कई धड़े हैं। मीणा लॉबी का अपना अलग वर्चस्व है। तो सवाल ये उठता है कि कहीं अफसरों की धड़ेबाजी के चक्कर में तो राजेश मीणा नहीं फंस गए? सच जो भी हो, यह तो समझ में आता ही है कि कुछ तो है, जो एसीबी ने मीणा के गिरेबां में हाथ डाला है।

लेखक तेजवानी गिरधर अजमेर के पत्रकार हैं.


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तीन साल पहले जब मेरे साथ गैंगरेप हुआ (सोहेला अब्दुलाली की दास्तान)

तीन साल पहले मेरा गैंगरेप हुआ था, उस वक्त मैं 17 साल की थी. मेरा नाम और मेरी तसवीर इस आलेख के साथ प्रकाशित हुए हैं. 1983 में मानुशी पत्रिका में. मैं बंबई में पैदा हुई और आजकल यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं. मैं बलात्कार पर शोधपत्र लिख रही हूं और दो हफ्ते पहले शोध करने घर आयी हूं. हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है.

मैंने महसूस किया है कि कई महिलाएं इस ग्रंथि के कारण चुप्पी साध लेती हैं, मगर अपने मौन के कारण उन्हें अपार वेदना का सामना करना पड़ता है. पुरुष पीड़ितों को कई वजहों से दोषी ठोहराते हैं और हैरत की बात तो यह है कि कई दफा महिलाएं भी पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं, संभवतः आंतरिक पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण, संभवतः खुद को ऐसी भीषण संभावनाओं से बचाये रखने के लिए.

यह घटना जुलाई की एक गर्म शाम की घटी. उस साल महिलाओं का समूह रेप के खिलाफ कानून में संशोधन की मांग कर रहा था. मैं अपने दोस्त राशिद के साथ थी. हम लोग घूमने निकले थे और बंबई की उपनगरी चेंबूर स्थित अपने घर से करीब डेढ़ मील दूर एक पहाड़ी के पीछे पहुंच गये थे और वहां बैठे थे. हम पर चार लोगों ने हमला किया, वे लोग दरांती से लैस थे. उन्होंने हमारे साथ मारपीट की, पहाड़ी पर चढ़ने के लिए मजबूर किया और वहां हमें दो घंटे तक बिठाये रखा. हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, और जैसे ही अंधेरा गहराया, हमें अलग कर दिया गया और अठ्ठाहस करते हुए उन्होंने राशिद को बंधक बनाकर मेरे साथ रेप किया. हममें से कोई प्रतिरोध करता तो दूसरे को वे चोट पहुंचाते. यह एक प्रभावी तरीका था.

वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे हमारी हत्या करें या नहीं. हमें अपने दम भर वह सब कुछ किया जिससे हम जिंदा बच जायें. मेरा जिंदा बचना था और वह हर चीज से अधिक महत्वपूर्ण था. मैं पहले उन लोगों का शारीरिक रूप से प्रतिरोध किया और जब मुझे गिरा दिया गया तो मैं शब्दों से प्रतिरोध करने लगी. गुस्से और चीखने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, मैं उन्हें प्रेम, करुणा और मानवता के लिए प्रेरित करने लगी, क्योंकि जिस तरह मैं इंसान थी, वे भी तो इंसान ही थे. इसके बाद उनका रवैया नर्म पड़ने लगा, खास तौर पर उनका जो उस वक्त मेरे साथ बलात्कार नहीं कर रहे थे. मैंने उनमें से एक से कहा कि अगर मुझे और राशिद को जिंदा छोड़ दिया गया तो मैं अगले दिन उनसे मिलने आउंगी. हालांकि इन शब्दों के बदले मुझे कहीं अधिक भुगतना पड़ा, मगर दो जिंदगियां दांव पर थीं. यही एकमात्र तरीका था कि मैं वहां से लौट पाती और अगली दफा खुद को रेप से बचा पाती.

जिसे बरसों की पीड़ा कहा जा सकता है उसे झेलने के बाद (मुझे लगता है मेरा 10 बार बलात्कार किया गया और कुछ देर बाद मैं यह समझना भूल गयी कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया. जाते वक्त उन लोगों ने हमें एक नैतिक उपदेश के साथ विदा किया कि मेरा एक लड़के के साथ इस तरह घूमना अनैतिक था. इस बात ने उन्हें सबसे अधिक नाराज किया था. उन्होंने ऐसा मेरे हित में ही किया था, वे मुझे एक पाठ पढ़ाना चाहते थे. यह बड़ी कट्टर किस्म की नैतिकता थी. उन्होंने हमें पहाड़ के नीचे छोड़ दिया और हम लड़खड़ाते हुए अंधेरी सड़क पर चलते रहते, एक-दूसरे पर टगते हुए और धीरे-धीरे चलते हुए. वे कुछ देर तक हमारा पीछा करते रहे, दरांती हिलाते हुए, और वह संभवतः सबसे बुरा पहलू था कि भागना इतना आसान था मगर मौत हमारे उपर टहल रही थी. अंततः हम घर पहुंचे, टूटे हुए, क्षत-विक्षत, चूर-चूर. यह बच कर आने का एक अतुलनीय अनुभव था, अपने जीवन के लिए मोलभाव करना, हर शब्द तोलकर बोलना क्योंकि हम उन्हें नाराज करने की कीमत जानते थे, दरांती का वार कभी भी हमारे जीवन को समाप्त कर सकती थी. हमारी हड्डियों और हमारी आंखों में राहत दौड़ रही थी और हम ऐतिहासिक विलाप के साथ ढेर हो गये.

मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं इस बात को किसी और से नहीं बताउंगी, मगर घर पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपने पिता से कहा कि वे पुलिस को बुलाएं. वे इस बात को सुनकर चिंतित हो गये. मैं परेशान थी कि किसी और को उस अनुभव से नहीं गुजरना पड़े जिससे मुझे गुजरना पड़ा था. पुलिस असंवेदनशील थी, घृणित भी और वह किसी तरह मुझे दोषी साबित करने पर तुली थी. जब मैंने कहा कि मेरे साथ क्या हुआ, तो मैंने सीधे-सीधे कह डाला और इस बात को उन्होंने मुद्दा बना लिया कि अपने साथ हुए इस हादसे को बताने में मैं शर्मा नहीं रही थी. जब उन्होंने कहा कि इस बात का प्रचार हो जायेगा तो मैंने कहा, कोई बात नहीं. मैं इमानदारी से कभी यह सोच नहीं सकी थी कि मुझे या राशिद को दोषी माना जायेगा. जब उन्होंने कहा कि मुझे मेरी सुरक्षा किशोर रिमांड होम भेजा जायेगा. मुझे बलात्कारियों और दलालों के बीच रहना होगा ताकि मुझ पर हमला करने वालों को न्याय के सामने लाया जा सके.

बहुत जल्द मैंने समझ लिया कि इस कानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए न्याय मुमकिन नहीं है. जब उन्होंने पूछा कि हम पहाड़ी के पीछे क्या कर रहे थे तो मैं क्रुद्ध हो गयी. जब उन्होंने राशिद से पूछा कि वह क्यों निष्क्रिय हो गया, तो मैं चीख पड़ी. क्या वे यह नहीं समझते थे कि राशिद का प्रतिरोध मेरे लिए और पीड़ा का कारण बन सकता था. वे ऐसे सवाल क्यों पूछते थे कि मैंने कैसे कपड़े पहने थे, राशिद के शरीर पर कोई चोट का निशान क्यों नहीं है (पेट पर लगातार हमले के कारण उसे इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी), मैं दुख और निराशा में डूबने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें घर से बाहर भगा दिया यह कहते हुए कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं. यह वह सहायता थी जो मुझे पुलिस से मिली. पुलिस ने बयान दर्ज किया कि हम टहलने गये थे और लौटते वक्त देर हो गयी.

उस बात के तीन साल हो गये हैं, मगर ऐसा एक दिन भी नहीं बीता जब मुझे इस बात ने परेशान नहीं किया कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ. असुरक्षा, भय, गुस्सा, निस्सहायपन- मैं उन सब से लड़ती रही. कई दफा, जब मैं सड़क पर चलती थी और अपने पीछे कोई पदचाप सुनायी पड़ती तो मैं पसीने-पसीने होकर पीछे देखती और एक चीख मेरे होठों पर आकर ठहर जाती. मैं दोस्ताना स्पर्श से परेशान हो जाया करती, मैं कस कर बंधे स्कार्फ को बर्दास्त नहीं कर पाती, ऐसा लगता कि मेरे गले को हाथों ने दबा रखा है. मैं पुरुषों की आंखों में एक खास भाव से परेशान हो जाती- और ऐसे भाव अक्सर नजर आ जाते.

इसके बावजूद कई दफा मैं सोचती कि मैं अब मजूबत इंसान हूं. मैं अपने जीवन की सराहना पहले से अधिक करती. हर दिन एक उपहार था. मैंने अपने जीवन के लिए संघर्ष किया था और मैं जीती थी. कोई भी नकारात्मक भाव मुझे यह सोचने से रोकती कि यह सकारात्मक है.

मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती. ऐसा करना सबसे आसान था, और कई पुरुष ऐसे विभिन्न किस्म के दबाव के शिकार थे. मैं जिससे नफरत करती वह पितृसत्ता थी और उस झूठ की विभिन्न परतों से जो कहती कि पुरुष महिलाओं से बेहतर होते हैं, पुरुषों के पास अधिकार हैं जो महिलाओं के पास नहीं, पुरुष हमारे अधिकार संपन्न विजेता हैं. मेरी नारीवादी मित्र सोचतीं कि मैं महिलाओं के मसले पर इसलिए चिंतित हूं क्योंकि मेरा रेप हुआ है. मगर ऐसा नहीं है. रेप उन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसकी वजह से मैं नारीवादी हूं. रेप को किसी खाने में क्यों डाला जाये? ऐसा क्यों सोचा जाये कि रेप ही अकेला अवांछित संभोग है? क्या हर रोज गलियों में गुजरते वक्त हमारा रेप नहीं होता? क्या हमारा रेप तब नहीं होता जब हमें यौन वस्तु के तौर पर देखा जाता है, हमारे अधिकारों से इनकार कर दिया जाता है, कई तरीकों से दबाया जाता है? महिलाओं के दमन को किसी एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए, वर्ग विश्लेषण आवश्यक है, मगर क्यों बहुत सारे बलात्कार अपने ही वर्ग में किये जाते हैं.

जब तक महिलाएं विभिन्न तरीकों से दमित की जाती हैं. सभी महिलाएं लगातार बलात्कार के खतरे में हैं. हमें रेप को पेचीदा बनाने से रोकना पड़ेगा. हमें समझना पड़ेगा कि यह हमारे चारो तरफ अस्तित्व में है, और इसके विभिन्न स्वरूप हैं. हमें इसे गुप्त तौर पर दफन करना बंद कर देना होगा और इसे अपराध के एक रूप के तौर पर देखना होगा- इसे हिंसात्मक अपराध मानना होगा और बलात्कारी को अपराधी के तौर पर देखना होगा. मैं उत्साहपूर्वक जीवन जी रही हूं. बलात्कार का शिकार होना बहुत खौफनाक है, मगर जिंदा रहना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. मगर जब एक औरत को इसे महसूस करने से रोका जाता है, इसे तो हमारे तंत्र की गड़बड़ी माना जाना चाहिये. जब कोई बेवकूफ बनकर जिंदगी के एवज में खुद पर हमले को झेल लेती है तो किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि वह स्वेच्छा से मार खाना चाहती थी. बलात्कार के मामले में एक औरत से पूछा जाता है कि उसने ऐसा क्यों होने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, कहीं उसने इसका मजा तो नहीं लिया.

रेप किसी खास समूह की औरतों के साथ नहीं होता और न ही रेपिस्ट एक खास तरह के पुरुष होते हैं. रेपिस्ट एक क्रूर पागल भी हो सकता है और पड़ोस में रहने वाला लड़का भी या एक दोस्ताना अंकल भी. हमें अब रेप को किसी अन्य महिला की समस्या के तौर पर देखना बंद करना होगा. इसे हमें सार्वभौमिक तरीके से देखना होगा और एक बेहतर समझ की तरफ बढ़ना होगा. जब तक रिश्तों का आधार शक्तियां होंगी, जब तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता रहेगा, हम लगातार अपनी इज्जत गंवाने के खतरे में रहेंगे. मैं बचकर निकली हूं. मैं रेप किये जाने के लिए नहीं कहती और न ही मैंने इसका मजा लिया. यह एक सबसे बुरा किस्म का टार्चर है. मगर यह महिलाओं की गलती नहीं है.

सोहेला अब्दुलाली

लेखिका सोहेला अब्दुलाली के साथ 1983 में गैंगरेप हुआ था. बाद में मानुषी नामक पत्रिका में उन्होंने एक आलेख लिखा जिसमें उन्होंने गैंगरेप के अपने अनुभव और रेप से संबंधित दूसरी बातों के बारे में लिखा. अंग्रेजी में लिखे गये इस आलेख का ये हिंदी अनुवाद पुष्यमित्र ने किया है. सोहेला अब्दुलाली के दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. बच्चों की तीन किताबें और कई छोटी कहानियां, लेख, खबरें, ब्लाग, कॉलम, मैनुअल आदि वे लिख चुकी हैं. उनके लिखित सामग्रियों को उनकी साइट www.sohailaink.com पर देखा जा सकता है.


पुष्यमित्रपुष्यमित्र के ब्लाग ''हजारों ख्वाहिशें ऐसी'' से साभार. सोहेला अब्दुलाली के अनुभवों का हिंदी अनुवाद करने वाले पुष्यमित्र ने अपनी बात भी कही है, अपनी दुविधा भी बयान की है, जिसे आप इस शीर्षक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं- कनफ्यूशियस की सलाह, रेपिस्ट के चंगुल में फंसें तो विरोध करें, वे न मानें तो इंज्वाय करें

कन्फ्यूशियस की सलाह- रेपिस्ट के चंगुल में फंसें तो विरोध करें, वे न मानें तो इंज्वाय करें

प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस बलात्कार के बारे में कहा है कि अगर कोई स्त्री बलात्कारियों के चंगुल में फंस जाये तो पहले तो उसे उन बलात्कारियों का विरोध करना चाहिये. पर जब लगे कि विरोध करने से भी उनके इरादे बदले नहीं जा सकते, तो फिर स्त्री को बलात्कार का मजा लेना चाहिये. निश्चित तौर पर यह एक बहुत क्रूर सलाह है. क्