अरिंदम चौधरी के क्रूर प्रबंधन की मार खाए मीडियाकर्मियों ने काटजू से लगाई गुहार

खुद को बहुत बड़ा प्रबंधन गुरु बताने वाले अरिंदम चौधरी की कलई खुल गई है. वह प्रबंधन गुरु नहीं बल्कि क्रूर प्रबंधक है, जो अपने यहां काम करने वालों का हक-हिस्सा मार लेता है. अरिंदम चौधरी ने जिस प्लानमैन मीडिया नामक बैनर तले द संडे इंडियन मैग्जीन का प्रकाशन किया, उसके दर्जन भर से ज्यादा कर्मचारियों ने अपने नाम, अपनी मेल आईडी और अपने मोबाइल नंबर के साथ एक संयुक्त पत्र लिखा है. यह पत्र जस्टिस काटजू के नाम है जो प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन हैं.

अरिंदम चौधरी के हाथों सताए हुए इन मीडियाकर्मीयों ने जस्टिस काटजू को अपनी पीड़ा विस्तार से बताई है. कैसे उन लोगों को बिना वजह बर्खास्त कर दिया गया, उनका बकाया नहीं दिया जा रहा, बार-बार मांग करने के बावजूद सेलरी नहीं दी जा रही है, इस बारे में पत्र में गहराई से वर्णन किया गया है. इन कर्मियों ने अपने हक, अपने बकाया के लिए हर तरफ से प्रयास कर लिया, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. अरिंदम चौधरी और उनके खास लोग अपने अपने कान में तेल डाल कर मस्त हैं. अरिंदम चौधरी और उनके खास चमचे, जिनमें प्लानमैन मीडिया में कार्यरत संपादक लोग भी शामिल हैं, खुद शाही जिंदगी जी रही हैं, लक्जरी कार से चल रहे हैं, लेकिन अपने यहां के कर्मियों को वेतन नहीं दे रहे हैं. थक-हार कर ये लोग अब काटजू से गुहार कर रहे हैं ताकि पैसे न होने से मुश्किल हालात से जूझ रहे प्लानमैन मीडिया के मीडियाकर्मियों का परिवार नष्ट होने से बचाया जा सके. पूरा पत्र ये है…

आप सभी मीडियाकर्मियों से अनुरोध है कि इस प्रकरण को और इस पत्र को हर तरफ शेयर करें, सबको फारवर्ड करें ताकि दुनिया को कथित मैनेजमेंट गुरु के फ्राड का पता चल सके. उल्लेखनीय है कि प्लानमैन मीडिया की मैग्जीन द संडे इंडियन में कार्यरत रहे वरिष्ठ व मशहूर फोटोग्राफर प्रमोद पुष्करणा ने अपना बकाया पाने के लिए निजी स्तर पर काफी पत्रचारा अरिंदम चौधरी और उनके लोगों से किया लेकिन उन्हें कहीं से कोई रिस्पांस नहीं मिला. तब उन्होंने अपने पत्रों व अपनी समस्या को फेसबुक पर प्रकाशित करना शुरू किया. प्रमोद पुष्करणा के पत्रों को भड़ास पर प्रमुखता से प्रकाशित किया गया. फिर भी अरिंदम चौधरी पर कोई असर नहीं पड़ा. अब अरिंदम चौधरी से पीड़ित सभी पत्रकारों ने एकजुट होकर अपने हक के लिए आवाज उठाई है और काटजू को पत्र भेजा है. भड़ास इन सभी पत्रकार साथियों के दुख और आंदोलन में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है. अगर पीड़ित मीडियाकर्मी अपने हक के लिए एकजुट नहीं होंगे तो ये नालायक प्रबंधन के लोग अपनी चालों और अपनी हरकतों से पत्रकारों व पत्रकारिता की गरिमा को तार-तार कर के रख देंगे.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


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भड़ास पर अरिंदम चौधरी

मीडिया बढ़ा रहा भारत और पाकिस्‍तान के बीच तल्‍खी : सलमान

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच मीडिया तल्खी बढ़ा रहा है. मीडिया चाहे तो यह तल्‍खी समाप्त हो सकती है. विदेश मंत्री खुर्शीद ने फर्रूखाबाद में मुहम्मदाबाद क्षेत्र के निसाई गांव में एक दूध डेयरी के उद्घाटन के बाद कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच मीडिया के कवरेज के चलते तल्खी बढ़ रही हैं. अगर मीडिया इस तल्खी को न बढ़ाना चाहे तो यह समाप्त हो जायेगी.

श्रीलंका में तमिलों के साथ हो रही घटनाओं के संबंध में उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार इन घटनाओं का विरोध कर रही हैं पर इस मामले को वह कोई राजनीतिक रंग नहीं देना चाहती. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के निजी दौरे पर दिये गये भोज के मामले में खुर्शीद ने कहा कि यह राह भाजपा ने खड़ी की है. जब अटलजी ने आगरा में परवेज मुशर्रफ को बिरयानी खिलायी थी और हम उसी राह पर आगे बढ रहे हैं. उन्होंने पाक प्रधानमंत्री को लेकर भाजपा की ओर से की जा रही आलोचना को बेवजह बताते हुए कहा कि उनका काम तो सरकार का विरोध करना हैं चाहे सही हो या गलत.

टाइम्‍स के इंटरनेशनल संपादक बने बॉबी घोष

वाशिंगटन : प्रसिद्ध पत्रकार बॉबी घोष को टाइम्स इंटरनेशनल का सम्पादक नियुक्त किया गया है। घोष भारतीय नागरिक हैं। टाइम इंक के प्रधान सम्पादक मार्था नेलसन और टाइम के प्रबंध सम्पादक रिक स्टेंजल ने अपने कर्मचारियों के लिए शुक्रवार को की गई घोषणा में कहा, `बॉबी एक तेजस्वी पत्रकार हैं। उन्होंने इतने उच्चस्तर का काम किया है, जिससे कोई व्यक्ति हमारे पेशे को करने की इच्छा रख सकता है।` घोष, फिलहाल टाइम्स के डिप्टी इंटरनेशनल एडिटर हैं, जो अब जिम फ्रेडरिक का स्थान लेंगे।

कम्पनी द्वारा जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, उनकी रुचि की विशालता और दक्षता की गहराई उनके हालिया अंतर्राष्ट्रीय खबरों में दिखी है चाहे वो फुटबॉल खिलाड़ी लियो मेसी पर बनाई खबर हो या बॉलीवुड नायक आमिर खान या फिर मिस्र के राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी के व्यक्तित्व को प्रदर्शित करना हो।

टाइम्स के लगभग 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई गैर-अमेरिकी वर्ल्ड एडिटर के पद पर नियुक्त हो रहा है। घोष ने अपने करियर की शुरुआत विशाखापट्नम में डेक्कन क्रॉनिकल से की थी। इसके बाद वह कोलकाता स्थित बिजनेस स्टैंडर्ड और मुम्बई एवं दिल्ली में बिजनेस वर्ल्ड के साथ काम कर चुके हैं। (एजेंसी)

सीबीआई को मिली बड़ी कामयाबी, जियाउल हक का रिवाल्‍वर बरामद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में पिछले दिनों हुए बहुचर्चित सीओ हत्याकांड में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को बड़ी सफलता हाथ लगी है। सीबीआई ने शहीद पुलिस अधिकारी जियाउल हक की सर्विस रिवॉल्वर को बरामद कर लिया है। रिवाल्‍वर बलीपुर गांव के पास स्थित एक तालाब के पास से बरामद की गई है। मुख्य आरोपी कामता पाल के सीबीआई के सामने आत्मसमर्पण करने के कुछ घंटे बाद ही बड़ी सफलता उस समय हाथ लगी जब पाल से कड़ी पूछताछ की गई। पाल की निशानदेही पर ही सीबीआई की टीम ने गांव के आसपास गहन तलाशी अभियान चलाया। हक की रिवॉल्वर और गोलियों को बरामद कर सीबीआई ने उसे अपने कब्जे में ले लिया।

इससे पूर्व हत्याकांड के मुख्य आरोपी कामता पाल ने कुंडा में स्थित सीबीआई के कैंप कार्यालय में शनिवार को करीब 12 बजे के आसपास आत्मसमर्पण कर दिया। अब सीबीआई कामता पाल से पूछताछ कर रही है। ऐसा माना जा रहा है कि पाल के आत्मसमर्पण करने के बाद बहुत सारे तथ्य सामने आ सकते हैं। सीबीआई कामता पाल से हत्याकांड के दिन हुए पूरे घटनाक्रम की जानकारी ले रही है। उससे यह जानने की कोशिश की जा रही है कि हत्याकांड के दिन क्या-क्या हुआ और उसमें कौन-कौन लोग शामिल थे। क्‍या घटना सोची समझी रणनीति थी या फिर हादसा था।

सीबीआई की टीम पिछले कई दिनों से कुंडा में ही कैंप किए हुए है। कामता पाल की गिरफ्तारी के लिए कई जगहों पर छापेमारी की जा रही थी। कुंडा के बलीपुर गांव में पिछले दिनों हुए तिहरे हत्याकांड में पुलिस अधिकारी जियाउल हक समेत ग्राम प्रधान नन्‍हें यादव एवं उसके भाई सुरेश यादव की भी हत्‍या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में प्रतापगढ़ के बाहुबली नेता और पूर्व मंत्री राजा भैया का भी नाम सामने आया, जिसके बाद उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। सीबीआई ने राजा भैया के खिलाफ भी हत्‍या का मामला दर्ज किया है।

मुंबई बैठकर दीपक चौरसिया ने मचाई खलबली, एक दिन में 17000 एसएमएस

दीपक चौरसिया के आने के बाद से ही इंडिया न्यूज की टीआरपी लगातार बढ़ रही है और अब यह अपने चौथे हफ्ते में ही टॉप 5 की रेस में एंट्री मारने की तैयारी में दिख रहा है. चैनल के एडिटर इन चीफ और तेजतर्रार टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया ने टीआरपी के बड़े सेंटर मुंबई में गुरुवार की रात से शुक्रवार की रात तक लगातार 6 शो करके खलबली मचा दी है.

शुक्रवार को प्रसारित टुनाइट विद दीपक कार्यक्रम पर 17000 से ज्यादा एसएमएस आए, जिससे पता चलता है कि दीपक के मुंबई से प्रसारित बहसों ने न सिर्फ मुंबई बल्कि देश के दूसरे हिस्से के दर्शकों पर भी गहरी छाप छोड़ी है. गुरुवार को दीपक ने रात 8 बजे टुनाइट विद दीपक में जहां महाराष्ट्र के सूखे पर गंभीर बहस की वहीं रात 9 बजे दाऊद इब्राहिम पर खुलासे हुए. शुक्रवार की सुबह 10 बजे से ही दीपक मुंबई में जुहू बीच के किनारे बहस पर बैठ गए.

शुक्रवार को पहली बहस मुंबई में महिलाओं की सुरक्षा पर सुबह 10 बजे से शुरू हुई और एक घंटे तक चली. इस बहस का मसल मुंबई में महिलाओं की सुरक्षा था और चिंता इस बात पर भी जताई गई कि शहर के कई थानों में महिला कर्मचारी है ही नहीं.

शुक्रवार को दूसरी बहस दोपहर 1 बजे मुंबई में मकान के लगातार बढ़ते दाम और नेता-बिल्डरों की सांठ-गांठ पर हुई. इस बहस के बाद शाम 4 बजे दीपक फिर बैठे और इस बार बीएमसी के स्कूलों के निजीकरण पर लोगों की राय टटोली. दीपक का नियमित शो टुनाइट विद दीपक जब रात 8 बजे शुरू हुआ तो उसे आधा घंटा बढ़ाकर डेढ़ घंटे करना पड़ा. मुद्दा था- क्या पाकिस्तान को सबक सिखाने का वक्त आ गया है. मेहमानों का बहुत बड़ा पैनल दिल्ली, मुंबई और इस्लामाबाद से जुड़ा हुआ था. बहस बेहद तीखी हो गई और दर्शकों के एसएमएस की बाढ़ आ गई. आलम ये रहा कि दर्शकों की मांग पर इस शो को दो बार रिपीट करना पड़ा.

मुंबई से एक लाइव डिबेट का वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=LWs6WY8ifbM

हिंदुस्‍तान की मालकिन शोभना भरतिया के नाम दिनेश चंद्र का खुला पत्र

परम आदरणीय, चेयरपर्सन हिंदुस्तान मीडिया वन्चर्स, नई दिल्ली। महोदया, आपके संज्ञान में यह लाना बेहद जरूरी है कि उत्तराखंड से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। नए सम्पादक गिरीश गुरूरानी के तानाशाह फैसलों के कारण अखबार की छवि लगातार धूमिल होती जा रही है। प्रदेश में अमर उजाला समाचार पत्र का विकल्प बने हिंदुस्तान हिंदी को लोगों ने हाथों हाथ ले लिया था। वर्तमान में संस्थान से उन सभी पुराने लोगों को, जो कि स्वर्गीय केके बिडला साहब के समय से अखबार से जुड़े हुए थे, उनको एक-एक कर हटाया जा रहा है।

देहरादून के इस संस्थान में कुछ लोगों का एक समूह अखबार के जरिये अपने निजी हित सध रहा है, जिसका विपरीत असर अखबार की नींव पर पड़ रहा है। न्यूज़ एडिटर पूरण बिष्ट द्वारा की गई एक गलती से समाचार पत्र की दस हज़ार प्रतियाँ वापस लेनी पड़ी थी। बिष्ट द्वारा खबर में इतनी लापरवाही बरती गयी थी कि पांच करोड़ के स्थान पर पांच सौ करोड़ छप गया था। खबर का मजमून यह था कि राज्य सरकार ने गैरसेन मैं एक दिन की कैबिनेट मीटिंग पर पांच सौ करोड़ रुपया खर्च कर दिया था। जबकि मूल में पांच करोड़ रुपया खर्च किया गया था।

इसके आलावा पूरण बिष्ट द्वारा अपने लिखे हुए एक समाचार में यह लिख दिया था कि टीएचडीसी भागीरथी को टिहरी डैम से छह इंच मोटे पाइप से छोड़ा जा रहा है, इस खबर के तुरंत बाद ही टीएचडीसी के अधिकारियों ने हिंदुस्तान का विज्ञापन बंद कर दिया था। बाद में तत्कालीन ब्यूरो चीफ़ अविकल थपलियाल द्वारा यह मामला सुलझाया गया था, लेकिन प्रबंधन ने पूरण बिष्ट के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की और उल्टा गुरूरानी के आने के बाद अविकल पर गैर जरूरी दबाव बनाकर हिंदुस्तान छोड़ने के लिए विवश कर दिया गया। इससे पहले भी कई ऐसे पत्रकार जो उत्तराखंड संस्करण की स्थापना से अखबार से जुड़े थे, पर नए संपादक ने कई तरह के दबाव डालने शुरू कर दिए, नतीजतन हिंदुस्तान में ही रहकर वर्षों अपना अमूल्य समय देने वाले पत्रकारों की जगह संपादक गुरूरानी ने अनुभवहीन चहेतों को अखबार में बड़ी जिमेदारियां सौंप दी, जिससे अखबार का स्टार तो गिर ही रहा है बरसों से जुड़े पत्रकार भी अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं।

अभी हाल में ही गुरूरानी ने चार साल की पत्रकारिता का अनुभव रखने वाले विमल पुरवाल, जो की तहसील स्तर से रिपोर्टिंग करते थे, को वरिष्ठ रिपोर्टर बना कर अपने प्रमोशन का इंतज़ार कर रहे रिपोर्टरों को निराश किया है। इस निराशा का असर समाचार पत्र की ख़बरों से साफ़ पता लगता है। अपने इस कृत्य को सही ठहराने के लिए गुरूरानी ने विभिन्न शहरों के रिपोर्टरों पर यह दबाव बनाया कि विमल पुरवाल के प्रमोशन लिए उन्हें बधाई पत्र भेजे जायें। इन पत्रों का प्रयोग गुरूरानी द्वारा हिंदुस्तान के आला अधिकारियों को भेजकर यह साबित करने की कोशिश की गयी कि विमल पुरवाल के समकक्ष कोई और नहीं ठहरता। इस बात से देहरादून में ही वर्षों से काम कर रहे भास्कर उप्रेती, उषा रावत, मनीष भट्ट, दिनेश जोशी सहित अनेकों ने जब सम्पादकीय बैठकों में जब विमल की ख़बरों पर उँगलियाँ उठाई तो सम्पादक अपनी पूरी टीम पर बुरी तरह बिफर गए और यहाँ तक कह दिया कि तुम मेरे आदमी को फेल करने पर तुले हो, जबकि विमल की पत्रकारिता का स्टार है, श्रीनगर का कोई भी बुद्धिजीवी पाठक बता सकता है। विमल के साथ काम करने वाला तेज़ तर्रार युवा मनमोहन सिन्ध्वाल की ख़बरों पर अपना नाम लिखकर भेज करता था।   

इन्हीं सम्पादक महोदय के कारण रूड़की जैसे बड़े सेण्टर से सीमा श्रीवास्तव ने त्यागपत्र दे दिया था। रूडकी में गुरूरानी ने अपने हिमाचल के साथी अनिल डोभाल को बिठा दिया। जिन्होंने वहां के विधायक प्रदीप बत्रा को ब्लैकमेल करने की कोशिश की थी। इतना ही नहीं पौड़ी जो की मंडल मुख्यालय भी है, में पिछले छबबीस वर्षों से तैनात अनिल बहुगुणा को भी पहले तो महीने भर तक प्रताड़ित किया गया और बाद में उन्हें अखबार में क्या रखा है, कहकर जाने का मौखिक इशारा कर दिया गया। इस पूरी कार्रवाई के पीछे कोई वजह भी नहीं बताई गई। ऐसे में वर्षों से संस्थान को बढ़ा रहे रिपोर्टर भी मायूस हैं। आप मामले की गम्भीता को देख हिंदुस्तान की छवि और पुराना मुकाम लौटाने में तत्काल कार्यवाही करेंगी ऐसी हम उम्मीद कर रहे हैं।

सादर

दिनेश चन्द्र

देहरादून

आगरा में पीएचडी की छात्रा की हत्‍या, रेप की आशंका

आगरा : उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के कानून-व्यवस्था के दावे खोखले साबित होते नजर आ रहे हैं। सत्ता में एक साल पूरे करने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में हत्या, बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। ताजा मामला आगरा का है जहां एक पीएचडी छात्रा की हत्या कर दी गई है। इस हत्या से सनसनी फैल गई है। हत्‍या के विरोध में पूरा आगरा खड़ा हो गया है।

पुलिस सूत्रों ने बताया कि आगरा के दयाल बाल इंस्टीटयूट में पीएचडी छात्रा की हत्या सर्जिकल हथियार से की गई है। छात्रा की हत्या से पहले रेप की आशंका भी जताई जा रही है। जानकारी के अनुसार कातिलों ने लड़की की हत्या के बाद उसका स्केच भी बनाया। पुलिस मामले की जांच में जुटी है। छात्रा दिल्ली की रहने वाली है जो वहां पढ़ाई करने गई हुई थी।

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (17) : दिव्‍य संदेश ने खोला जगदीश नारायण शुक्‍ल के खिलाफ मोर्चा, बताया 420 पत्रकार

लखनऊ। ये दो कहावतें 'कौवा चला हंस की चाल' और 'नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली' निष्पक्ष प्रतिदिन के तथाकथित सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल पर सटीक साबित होती है। तमाम नेताओं और अफसरों के खिलाफ अनर्गल खबरें छपवाकर अपने काले कारनामों से मीडिया को शार्मिंदा करने वाले यह सफेदपोश 420 पत्रकार करोड़ों रुपए की चल-अचल का मालिक बन गया है। पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह का करीबी होने के कारण इस 420 पत्रकार के खिलाफ ब्लैकमेलिंग और घपलों की तमाम शिकायतों के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

मालूम हो कि जिस तरह पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह ने अपनी पूरी नौकरी बगैर कागजातों के करने का कारनामा अंजाम दिया। मौजूदा समय न तो नियुक्ति विभाग और न ही नागरिक उड्डयन विभाग के पास पूर्व कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के सेवा अभिलेख मौजूद हैं। ठीक वैसे ही 420 पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल ने पग-पग पर सरकार को गुमराह करके ठगी की।
बसपा के सदस्य डा. धर्मपाल सिंह द्वारा 11 अप्रैल 2012 को शुरू हुए विधान सभा के प्रथम सत्र में पहले सोमवार को पूछे गए सवाल के लिखित जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि लखनऊ और सीतापुर से प्रकाशित दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन पूर्णतया अनियमित एवं अवैध है।

मुख्यमंत्री अपने लिखित उत्तर में यह भी अवगत कराया है कि सहकारी समिति के संयुक्त निदेशक दिनेश कुमार शुक्ल ने 23 मार्च 2005 को दि लखनऊ सहकारी प्रेस लिमिटेड 289 चंद्रलोक कालोनी का निबंधन रद्द कर दिया था। 28 फरवरी 2012 को कार्रवाई के लिए संयुक्त निदेशक ने जिलाधिकारी लखनऊ को पत्र लिखा था। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि हिन्दी दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र 2007 से अस्तित्व में नहीं है। इस समाचार पत्र के प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने सरकार को गुमराह करते हुए वर्ष 2007 से लेकर अप्रैल 2011 तक सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के विज्ञापन मद से 30,50,844,15 लाख रुपए प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त श्री शुक्ला ने प्रदेश और भारत सरकार के अन्य विभागों रेलवे, डीएवीपी, पॉवर कारपोरेशन, आवास विकास, विकास प्राधिकरण व अन्य विज्ञापन मदों में धनराशि प्राप्त कर शासकीय धन की क्षति पहुंचाई है।

विज्ञापन के माध्यम से अवैध ढंग से प्राप्त की गई धनराशि की वसूली के लिए 14 मार्च 2012 को पावर कारपोरेशन, राजकीय निर्माण निगम, आयुक्त नगर विकास, पर्यटन विभाग, महाप्रंधक राष्ट्रीय राजमार्ग, लखनऊ विकास प्राधिकरण, मण्डी परिषद के अधिकारियों को पत्र लिखा गया है। हिन्दी दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन के कथित प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने शासन को गुमराह कर धोखाधड़ी और जालसाजी करते हुए भ्रामक सूचनाओं एवं झूठे अभिलेखों के आधार पर विज्ञापन प्राप्त करने और शासन को राजस्व की हानि पहुंचाने के आरोप पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक लखनऊ से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर 16 मार्च 2012 को हजरतगंज थाने में मु0अ0सं096/12 धारा 419/420/467/468 भादवि बनाम जगदीश नारायण शुक्ल के खिलाफ पंजीकृत कराया गया था। इसके अलावा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने लिखित जवाब में कहा है कि अवध प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड का भवन कमलाबाद, बढ़ौली छठवां मील सीतापुर रोड के बारे में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने 14 मार्च 2012 को लखनऊ के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर 6 बिन्दुओं पर एक जांच रिपोर्ट मांगी थी।

इसके साथ ही 23 मार्च 2005 से निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र बंदी के दौरान 420 पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल ने डीएवीपी से 14 लाख 74 हजार 50 रुपए का विज्ञापन लेकर धोखाधड़ी की है। इसके अलावा विज्ञापन लेने के लिए समाचार पत्र के प्रचार संख्या में भी हेरा-फेरी की है। नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह ने 420 पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल को करोड़ों रुपए का विज्ञापन और अन्य जरियों से काली कमाई करवाई। मौजूदा समय इस 420 पत्रकार की लखनऊ, इलाहाबाद, वारणासी, दिल्ली और उत्तराखण्ड में लगभग 50 करोड़ रुपए की चल-अचल सम्पत्ति है। उन्होंने कहा कि पूर्व कैबिनेट सचिव का खास होने के कारण न तो जिलाधिकारी अनुराग यादव और न ही सूचना निदेशक प्रभात मित्तल कोई कार्रवाई कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस 420 पत्रकार ने निष्पक्ष प्रतिदिन में कई अफसरों के खिलाफ फर्जी खबरें प्रकाशित करवाई हैं। जिनमें पूर्व पासपोर्ट अधिकारी जहूर जैदी, आईपीएस नवनीत सिकेरा, पूर्व आईएएस जय शंकर मिश्र, पूर्व मुख्य सचिव अनूप मिश्र, संजय अग्रवाल, नेतराम आदि तमाम अफसर हैं। इस इस 420 पत्रकार ने तमाम अफसरों, नेताओं, इंजीनियरों को ब्लैकमेल किया है। इनमें से कई अफसरों ने फर्जी खबरों को लेकर मानहानि का दावा भी ठोंक रखा है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

मनी लांड्रिंग के आरोपों के बाद बैंकों में हरकत, शुरू हुई जांच

नई दिल्ली : मनी लांड्रिंग गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोपों के बीच निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक और एचडीएफसी बैंक हरकत में आए हैं और उन्होंने अपने स्तर पर आरोपों की जांच शुरू कर दी है। निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक आईसीआईसीआई बैंक ने जांच पूरी होने तक कल ही अपने 18 अधिकारियों को निलंबित कर दिया। एक्सिस बैंक ने भी शनिवार को अपने 16 अधिकारियों को जांच पूरी होने तक प्रशासनिक कार्यालयों को रिपोर्ट करने को कहा है।

उधर, एचडीएफसी बैंक ने इन आरोपों के बाद जांच के लिये अलग अलग समितियां गठित की हैं। एक्सिस बैंक सूत्रों ने बताया, ‘बैंक ने एक आंतरिक जांच शुरु की है। जब तक जांच पूरी नहीं होती, हमने 16 संबंधित कर्मचारियों को बैंक के प्रशासनिक कार्यालयों को रिपोर्ट करने को कहा है।’ निजी क्षेत्र के इन तीनों प्रमुख बैंकों-आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक पर अंदर और बाहर दोनों तरह से मनी लांड्रिंग गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप लगे हैं। एक ऑनलाइन पोर्टल कोबरापोस्ट ने दावा किया है कि उसके स्टिंग आपरेशन में मनी लांड्रिंग घोटाले का खुलासा हुआ है। (एजेंसी)

परीक्षा में चिट पुर्जा देते रंगे हाथ पकड़ाया दैनिक जागरण का पत्रकार

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित मैट्रिक (हाईस्‍कूल) की परीक्षा में नकल पहुंचाते दैनिक जागरण के पत्रकार को पकड़ा गया. पत्रकार कक्ष निरीक्षक के रूप में काम कर रहा था. इसके बाद उसे हटा दिया गया है, साथ ही कॉलेज के केंद अधीक्षक को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है.

बिहार के औरंगाबाद के ओबरा प्रखंड मुख्यालय के तीन स्कूलों में मैट्रिक परीक्षा का केंद्र बनाया गया है. रफीगंज प्रखंड के लुका स्कूल में अध्‍यापक के रूप में कार्यरत है सुरेन्द्र वैद्य. स्कूल के शिक्षक होने के अलावे वे पेशे से दैनिक जागरण के पत्रकार भी हैं. श्री वैद्य ओबरा कन्या उच्च विद्यालय में मैट्रिक परीक्षा में कक्ष निरीक्षक के रूप में तैनात थे. इस दौरान वे छात्रों को जमकर चिट पुर्जा पहुंचा रहे थे.

यह काम पिछले दो दिनों से चल रहा था. अचानक जांच के लिए पहुंचे प्रशिक्षु आईएससह प्रखंड विकास पदाधिकारी पंकज दीक्षित ने उन्‍हें चिट पुर्जा पहुंचाते रंगे हाथ पकड़ लिया. पकड़े जाने पर उन्हें कक्ष निरीक्षण के कार्य से हटा दिया गया. साथ ही साथ केन्द्राधीक्षक जगतधारी प्रसाद को इस मामले पर कारण बताओ नोटिस भी थमा दिया गया है. बेशर्मी की हद तो यह है ..इतना कुछ हो जाने के बाद भी अख़बार के बड़े हाकिम चुप्पी साधे बैठे हैं.

बुखारी ने सपा से नाता तोड़ा

लखनऊ। दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी ने समाजवादी पार्टी से अपने सारे रिश्ते तोड़ लिए हैं। उन्होंने शनिवार को अपने दामाद विधान परिषद सदस्य उमर अली खां और नागरिक सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष वसीम अहमद खां के इस्तीफों को मुलायम सिंह यादव को भेज दिया। बुखारी ने समाजवादी पार्टी के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में एसपी सरकार का एक साल पूरा हो चुका है और मुसलमानों के कल्याण के लिए कुछ नहीं किया गया है।

मौलाना ने कहा कि विधानसभा चुनावों से पहले मुलायम ने उनका समर्थन मांगा था। उन्होंने तब मुसलमानों को 18 पर्सेंट आरक्षण दिए जाने के साथ साथ कई मांगें रखी थीं, जिसको पूरा करने का वादा भी मुलायम सिंह यादव ने किया था। इनमें से कुछ नहीं किया गया और सरकार मुसलमानों के हकों की भी रक्षा नहीं कर पाई।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश में एक साल के समाजवादी पार्टी के शासनकाल में 113 सांप्रदायिक घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें 13 जगह कर्फ्यू लगा और सबसे ज्यादा नुकसान भी मुसलमानों का हुआ। प्रशासनिक पदों पर भी मुसलमानों को वाजिब हिस्सेदारी नहीं दी गई। बुखारी ने कहा कि शुक्रवार को समाजवादी सरकार एक साल पूरे होने पर नाकामियों का जश्न मना रही थी, जो बेहद शर्मनाक है।

यह पूछे जाने पर कि अब आगे की रणनीति क्या होगी, उन्होंने कहा, 'आगे-आगे देखिए होता है क्या।' उन्होंने साथ ही साथ यह भी जोड़ा कि समाजवादी पार्टी केंद्र का ख्वाब न देखे, क्योंकि जब तक उत्तर प्रदेश का मुसलमान साथ नहीं देगा, तब तक यह संभव नहीं है।

जामिम शाह के मरने के बाद आईएसआई ने फर्जी नोट के धंधे का सरगना युनूस अंसारी को बना दिया

: भारतीय जाली नोटों का अड्डा बना नेपाल (पार्ट वन) : मित्र राष्ट्र नेपाल हमारे देश भारत की अर्थव्यवस्था तोड़ने वाले जाली नोटों का अड्डा बन गया है। इसके लिये नेपाल सरकार थोड़ा भी चिन्तित नहीं दिख रही है। उसका एकमात्र कारण है कि उन आतंकवादियों या भारत विरोधी रणनीतिकारों को नेपाल सरकार खुला संरक्षण दे रही है। यही नहीं जाली नोटों के बड़े तस्कर एवं आईएसआई का प्रतिनिधि मिर्जा दिलशाद बेग नेपाल में मंत्री भी रह चुका था। नेपाल के काठमाण्डू में स्थित चक्रपथ महराजगंज में पकिस्तानी दूतावास स्थित है। वहां पर भारत विरोधी नितियों को अंजाम दिया जाता है।

इतना नहीं नेपाल के प्रमुख धनाड्य और जाली नोटों के सौदागर मिर्जा दिलशाद बेग, सौकत बेग, युनुस अंसारी, फैजान अहमद, मजीद मनिहार ये कोई छोटे व्यक्ति नहीं बल्कि नेपाल के राज्यमंत्री के समान दर्जा प्राप्त व्यक्ति थे, जो नेपाल में फर्जी नोटों को पाकिस्तान से मंगाकर भारत भेजा करते थे। धीरे-धीरे नेपाल की सत्ता तक पहुंचने में आईएसआई कामयाब हो गई। धीरे-धीरे नेपाल के नेताओं को आर्थिक मदद कर सत्ता परिवर्तन कराना प्रारम्भ कर दिये। हद तो तब हो गई जब आईएसआई ने जामिम शाह नामक व्यक्ति ने स्पेस टाइम्स नामक पत्रिका एवं टीवी चैनल चलाकर भारत विरोधी अभियान प्रारम्भ कर दिया। प्रत्येक दिन भारतीय लोग नेपाल के सीमा का अतिक्रमण कर रहे हैं तथा भारत में नेपाली के साथ अत्याचार होता है। यही समाचार दिखाया जाने लगा। भारतीयों के प्रति नेपाली आक्रोश बढ़ने लगा। संबन्ध खराब होने लगे परन्तु इसी बीच आपसी विवाद में जामिम शाह मारा गया, जिससे भारत को थोड़ी राहत मिली। जामिम शाह के मरने के बाद आईएसआई ने फर्जी नोटों का नेतृत्व युनुस अंसारी को दे दिया जो इस समय नेपाल के सेन्ट्रल जेल में कैद है।

जाली नोटों के विषय में भारत सरकार ने कई बार अपनी पक्ष रखी परन्तु नेपाल सरकार द्वारा नेपाल में ऐसी गतिविधि होने से सदैव इनकार करता रहा है। नेपाल के पुलिस मुख्यालय के अनुसार 07.12.11 से 09.12.12 तक 1 करोड़ 90 लाख जाली भारतीय रुपया नेपाल सरकार ने जब्त किया है तथा दिसंबर से इधर 40 लाख नकली भारतीय करेन्सी जब्त किया गया है, जिसमें 39 नेपाली, 6 भारतीय, 42 पकिस्तानी पकडे़ गये हैं, जिसमें 50 मुसलमान रहे हैं। नेपाल के पुलिस मुख्यालय के अनुसार अब तक 8 वर्षों में 40 करोड़ रुपया प्राप्त किया है तथा 103 पकिस्तानी लोग अभी भी जेल में बंद हैं। भारत ने वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव 1390, 1445 तथा 1526 में नेपाल में भारत विरोधी संलग्‍नता को उठाया था। तथा इस पत्र में भारत ने यह भी बताया था कि दाउद इब्राहिम आईसवर्ग बिल्डिंग पुतली सड़क काठमाण्डू में उपस्थित है तथा नेशनल सेन्ट्रल ब्‍यूरो ने जामिम शाह को दक्षिण अफ्रिका और पाकिस्तान में दाउद से मिलने तथा भारतीय जाली नोट को खेप भारत भेजने का शंका जाहिर किया था। परन्तु नेपाल सरकार ने इसे खारिज कर दिया। भारत में जो भी नोट आते हैं वह नेपाल ट्रान्जिट से ही भारत में प्रवेश करते हैं। अगर नेपाल सरकार थोड़ी गंभीर हो जाय तो शायद भारत में जाली नोट न आ सकें।

कौन था मिर्जा दिलसाद बेग? : नेपाल में एक कहावत थी कि ’’सौ गिरजा न एक मिर्जा’’ गिरजा मतलब नेपाल के पूर्व प्रधान मंत्री गिरजा प्रसाद कोईराला। मिर्जा इतना शक्तिशाली हो गया था कि प्रधान मंत्री भी उसके ऑख नहीं लगते थे, वह कहता था सौ गिरजा यानि सौ प्रधान मंत्री भी आ जाय तो मिर्जा का कुछ भी नही बिगाड़ सकते। नेपाल की राजनीति में पाकिस्तान की खुफिया ऐजेन्सी आईएसआई ने मिर्जा दिलसाद बेग को अपना प्रतिनिधि बनाकर नेपाल के अंदर भारत के खिलाफ रणनीति करने के लिये खड़ा कर दिया था।

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जन्मे मिर्जा 14 वर्ष के उम्र में जीप बनाने का काम करने लगा था। पुनः किसी के कहने पर वह बंम्बई चला गया। वहां पर भी 6 वर्ष व्यतीत करने के बाद एक जमींदार से मुलाकात हुई। उस जमींदार ने अपने क्षेत्र ले जाने का निश्चय किया। वह क्षेत्र था कृष्णा नगर जो नेपाल के कपिलवस्तु जिले में स्थित है तथा उत्तर प्रदेश का सिद्धार्थ नगर जिले का सीमा पड़ता है तथा बार्डर बढ़नी के समीप होने के कारण तस्करी ज्यादा होती है। जमींदार के घर भी ज्यादा दिन वह टिक न सका। केवल 2 महीने में उनका घर छोड़ छोटी-मोटी तस्करी करने लगा। उसकी महत्वकांक्षा उसको परेशान करती थी। पुनः वह अनवर नामक तस्कर के समीप आया। वही से उसकी जिंदगी छलांग लगा दी। वह विदेशी सामान, सोने, चरस का तस्करी करने लगा मिस्त्री होने के कारण गाड़ियों के पुर्जे को इधर से उधर करने लगा।

सन् 1990 में नेपाली पुलिस ने उसके घर से 11 किलो चरस बरामद किया था। उसके उपर जिला अदालत कपिलवस्तु से 5 हजार जुर्माना पर वह रिहा हुआ। प्रथम मुकदमा यहीं पर दर्ज हुआ। उसके बाद नेपाल के अंदर लगभग 48 मुकदमे उसके उपर दर्ज हुये और दिन दो गुना रात चौगुना उसकी स्थिति बढ़ती गयी। अब वह भारत से फरार बदमाश को अपने वहां संरक्षण देने लगा तथा भारतीय गाड़ियों को चुराकर नेपाल में बेचवाने लगा। इस तरह उसने नेपाल के कृष्ण नगर में 2 मंजिला घर तथा 10 एकड़ जमीन खरीद लिया। पुनः उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के उर्दू बाजार में एक व्यापारी के वहां डकैती डाल करोड़ों का गहना लूट लिया। वहीं पर उसको बिहार का खूंखार अपराधी मल्लू सिंह ने अपनी गिरोह में शामिल कर लिया तथा गामा सिंह को भी अपने गिरोह में शामिल कर लिया। पुनः मिर्जा अपने गुरु अनवर खॉं तथा शकुर कसाई की हत्या कराकर तस्करी के बाजार में अपने आप को खड़ा कर दिया। सन् 1993 में गोरखपुर के मेनका टाकीज में विस्फोट करवा सबको हैरत में डाल दिया। तथा अपने छुपने का अड्डा कृष्णा नगर को अपने गढ़ के रूप में मजबूत कर लिया। यही से उसकी दोस्ती दाउद इब्राहिम से हो गयी। और पुनः वह अपने जिंदगी में कभी पीछे नहीं देखा।

दाउद इब्राहिम के कहने पर वह आरडीएक्स तथा स्टनेगन का सप्लाई करने लगा। इसी बीच भारतीय नम्‍बर की गाड़ी एमएच 04 ए 3664 की मारूति वैन में 2 स्टेटगन सहित नेपालगंज के जमुनाहा चौकी में पकड़ा गया। 6 महीने जेल में बिताने के बाद पुनः अपराध जगत में आ गया। पुनः उसने 1995 में 24 मार्च एलडी अरोरा नामक भारतीय भंसार अधिकारी को इलाहाबाद के सर्कुलर रोड में उनके घर के आगे गोली मार हत्या कर दिया। जिला और सत्र न्यायालय कानपुर 1998 मार्च में जज डेजिग्नेटेड अन्डर टाडा ऐक्ट के अन्तर्गत नेशनल ब्‍यूरो आफ इनवेस्टिगेशन और नेशनल सेन्ट्रल ब्‍यूरो आफ इण्डिया (इन्टरपोल) नई दिल्ली ने नेपाल सरकार को पत्र लिख भारत सौपने का आग्रह किया था तथा उत्तर प्रदेश सरकार ने 50 हजार का इनाम भी उसके उपर रखा था। 1995 में वह नेपाल के राजनीति में उतरा और वह जिला सभापति का चुनाव जीता। उसके बाद कृष्णा नगर से सांसद का चुनाव लड़ने लगा तथा वह जीतकर मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व कर लोकेन्द्र बहादुर चन्द्र के सरकार में सहायक मंत्री बन गया। सूर्य बहादुर थापा के सरकार में वह राज्य मंत्री बन गया। पुनः वह नेपाल में विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा वाणिज्य तथा आवास और भौतिक योजना मंत्री बना और पाकिस्तान की यात्रा करने लगा।

इसी बीच वह जाली नोट अपने गाड़ी में रख बिहार सीमा के रक्सौल में पाकिस्तानी राजदूत के साथ 3 करोड़ लेकर पहुंचा। पैसा भारत में पहुंचते ही पकड़ लिया गया। पकड़े गये व्यक्ति ने बताया कि स्वयं मिर्जा पैसे को लिये भारतीय क्षेत्र में बार्डर पार करवाया था। काफी अपराध करने के बाद वह परिवार सहित हज करने मक्का मदीना गया। वहीं से वह सुधरना चाहता था तथा कोई भी गैर कानूनी काम करना बंद कर दिया था। अब वह दाउद इब्राहिम तथा आईएसआई के ऑखों का किरकिरी हो गया था। आईएसआई की बात भी वह नकार देता था। आईएसआई ने उसे मौत के घाट सुलाने के लिये दाउद को लगाया। दाउद ने सन् 2002 में उसकी हत्या करा नेपाल में आईएसआई की कमान मजीद मनीहार को सौंप दी।

कौन है मजीद मनीहार? यह अगले अंक में. 

नेपाल से लौट कर ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

एचएसबीसी बैंक के खिलाफ आरबीआई ने की जांच, अब होगी कार्रवाई

एचएसबीसी बैंक के खिलाफ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर के स्तर पर 'आप' कन्वेनर अरविन्द केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों के सन्दर्भ में प्रेषित शिकायतों की रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बैंकिंग पर्यवेक्षण विभाग द्वारा जांच की गयी है. यह जांच एचएसबीसी के वार्षिक वित्तीय निरीक्षण (एएफआई)- 2012 के दौरान की गयी. रिजर्व बैंक के मुख्य निरीक्षण अधिकारी द्वारा दी गयी टिप्पणियों के आधार पर ही बैंक के खिलाफ अग्रिम कार्यवाही की जायेगी.

आरबीआई ने यह जानकारी आरटीआई के तहत दी है यद्यपि उन्होंने एचएसबीसी बैंक के वित्तीय हित में एएफआई के परिणाम से अवगत कराने से इनकार कर दिया है. केजरीवाल के आरोपों में एचएसबीसी द्वारा स्विस बैंकों में काला धन जमा करने में मदद करना, देश में हवाला रैकेट चला कर टैक्स चोरी कराना शामिल हैं. इन आरोपों के आधार पर अमिताभ और नूतन ने आरबीआई को इनकी जांच कर सत्यता पाए जाने पर बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम 1949 की धारा  22(4) के अंतर्गत लाइसेंस निरस्त करने का अनुरोध किया था. इस पर बैंक की मुख्य नोडल अधिकारी सीमा मेहता ने 20 दिसंबर 2012 के अपने पत्र में कहा कि बैंक बहुत गंभीरता से सभी कानूनों का पालन करता है.

यूपी के सभी अखबार अखिलेश सरकार की एक साल की उपलब्धियों के विज्ञापन से भरे हुए थे

15 मार्च 2013 की सुबह सभी प्रमुख समाचार पत्रों को देखा तो ऐसा लगा कि उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने सभी अखबारों को खरीद लिया है. सभी अखबार अखिलेश सरकार की एक साल की उपलब्धियों के विज्ञापन से भरे हुए थे. कन्या विद्या धन योजना, बेरोजगारी भत्ता, वूमेन पॉवर लाइन, समाजवादी एम्बुलेन्स सेवा, लैपटॉप वितरण योजना और अवस्थापना एवं औद्यौगिक विकास के शीर्षक से सरकार की उपलब्धियों को खूब बखान किया गया था. उत्तर प्रदेश का नक्शे अखबार में देखकर ऐसा लगा मानो एक साल में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की काया पलट दी हो.

उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की बढ़िया सी स्माईल करती फोटो के साथ लिखा था- उत्तर प्रदेश में 20 करोड़ जिंदगियों में परिवर्तन के 365 सुनहरे दिन (15 मार्च 2012 से 15 मार्च 2013)। अखिलेश और मुलायम सिंह की स्माईल करती तस्वीर को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे पूरा उत्तर प्रदेश मुस्कुरा रहा हो और उत्तर प्रदेश में किसी को कोई दुख तकलीफ  नहीं रही.

अखबार में विज्ञापन रूपी समृद्ध और भयमुक्त उत्तर प्रदेश की छवि देखकर दिल को बड़ा सकून मिला. लगा वाकई में सपा सरकार ने कमाल कर दिया और पता भी नहीं चला. लेकिन अखबार के अंदर के पन्नों पर लूट, चोरी डकैती की खबरों पर नजर गयी तो पता चला कि अखबार के पहले पन्ने पर तो विज्ञापन रूपी ये वही भ्रमजाल है जो चुनाव से ठीक पहले वोटरों को अपने पक्ष में रिझाने के लिए रचा जाता है लेकिन इस बार सरकार की नाकामियों को ढ़कने के लिए रचा गया है.

दिमाग पर ज्यादा जोर डाले बिना अखिलेश सरकार के एक साल के कार्यकाल में 27 सांप्रदायिक दंगों की याद भी ताजा हो गई जिनमें मथुरा, आगरा और फैजाबाद के दंगे भुलाए नहीं भूलते. आए दिन पुलिस की पिटाई और सपा कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी की खबरें अभी जेहन में ताजा ही थी. कुंडा सीओ जिया उल हक की हत्या की ख़बर की याद भी अभी धुंधली नहीं पड़ी थी. लेकिन अखिलेश यादव के हिसाब से उत्तर प्रदेश के 20 करोड़ जिंदगियां सुकून से रह रही हैं. एक भी व्यक्ति परेशान नहीं है. किसी को किसी का भय नहीं है. न किसी बेरोजगार युवा को अपने भविष्य की चिंता है और न ही किसी भूखे को अपना पेट भरने की चिंता..! एक साल में प्रदेश में हुए 27 सांप्रदायिक दंगों से किसी को भी कोई शिकायत नहीं है…न ही किसी को अपनों को खोने की पीड़ा है..

अखिलेश सरकार का एक साल पूरा होने पर तो अखिलेश सरकार द्वारा रचा विज्ञापनों का भ्रमजाल तो कम से कम यही  कहानी कह रहा है कि उत्तर  प्रदेश देश का सबसे समृद्ध और भयमुक्त शासन वाला राज्य  है..! सरकार के एक साल के भ्रमजाल में प्रदेश की 20 करोड़ जनता को फंसाने के लिए अखिलेश सरकार को ज्यागा मशक्कत नहीं करनी पड़ी..! विज्ञापन के रूप में करोड़ों रूपए उड़ा देने भर से ये भ्रमजाल तैयार हो गया और अखिलेश यादव और उनकी सरकार के साथ ही मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के नेता अखबारों पर नजर घुमा-घुमाकर इस आत्मसंतुष्टि में हैं कि सपा सरकार ने 365 दिनों में उत्तर प्रदेश की 20 करोड़ जनता की तकदीर बदल दी..! अखिलेश जी हमारी तरफ से भी सरकार का एक साल पूरा करने पर बधाईयां स्वीकार किजिए लेकिन माफ किजिएगा हमारा चश्मा विज्ञापन के इस भ्रमजाल के अंदर की तस्वीर भी बयां कर रहा है जो शायद आपके लिए तकलीफदेह होगी।

दीपक तिवारी का विश्लेषण. संपर्क: deepaktiwari555@gmail.com

नेशनल दुनिया से विनोद अग्निहोत्री एवं अनिल जैन का इस्‍तीफा

नेशनल दुनिया से खबर है कि विनोद अग्निहोत्री ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अखबार के साथ राजनीतिक संपादक के रूप में जुड़े हुए थे. विनोद अग्निहोत्री की गिनती आलोक मेहता के खास लोगों में होती थी. वे नईदुनिया के दौर से आलोक मेहता के साथ जुड़े हुए थे. वे नईदुनिया में भी राजनीतिक संपादक के पद पर काम कर रहे थे.

विनोद अग्निहोत्री के अलावा अनिल जैन ने भी नेशनल दुनिया से इस्‍तीफा दे दिया है. वे नेशनल दुनिया में सीनियर एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत थे. इन्‍हें भी आलोक मेहता का नजदीकी माना जाता था.

सूत्रों का कहना है कि आलोक मेहतना के दौर में अखबार में बड़े बड़े पदों पर बड़ी सैलरी लेकर बैठाए गए लोग काम की बजाय केवल टाइम पास करते थे. जब नए प्रबंधन ने इस लोगों से काम लेना शुरू किया तो आलोक मेहता की सारी कंपनी धीरे धीरे इस्‍तीफा देकर दूसरे ठिकानों की तरफ निकल पड़ी.

‘राष्ट्रीय झंडा’ को लूट लिया आम आदमी पार्टी ने!

आम आदमी पार्टी। अरविंद केजरीवाल ने इसी नाम से पार्टी का रजिस्ट्रेशन चुनाव आयोग में कराया है और अपनी नवगठित पार्टी का नाम रखा- आम आदमी पार्टी। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में एक जन संगठन के संचालक के रूप में उन्होंने जमकर राष्ट्रीय झंडे का इस्तेमाल किया। उस आंदोलन को राष्ट्रवाद का पर्याय भी माना गया था। लेकिन एक पार्टी के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका अभियान अब पार्टी की नीति का हिस्सा है और उसे पार्टी का कार्यक्रम माना जाएगा। ऐसे में किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा राजनीति कार्यक्रमों में राष्ट्रीय झंडा का इस्तेमाल राष्ट्रीय झंडे का अपमान है।

आज यही काम अरविंद केजरीवाल की पार्टी कर रही है और आंदोलन के नाम पर राष्ट्रीय झंडे का दुरुपयोग कर रही है। आम आदमी पार्टी द्वारा पटना में 13 से 15 मार्च तक आयोजित धरना में पार्टी के बैनर और राष्ट्रीय झंडे का साथ-साथ इस्तेमाल किया गया। इस कार्यक्रम में 15 मार्च को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य राकेश कुमार सिन्हा भी उपस्थित थे और उन्होंने धरना को संबोधित भी किया। क्या अरविंद केजरीवाल यह बतायेंगे कि पार्टी कार्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय झंडे का इस्तेमाल किस हैसियत से कर रहे हैं या उन्हें वह झंडा आंवटित कर दिया गया है। लगता है कि पार्टी के गठित होते ही वह भी शुद्ध पोलिटिशियन बन गये और राष्ट्रीय झंडे का सम्मान और उसकी महत्ता भी भूल गए।

पटना से बीरेंद्र कुमार यादव की टिप्पणी.

भड़ास पर खबर छपते ही फोटोग्राफर को पैसा मिल गया

इलाहाबाद के फोटोग्राफर प्रभात कुमार वर्मा की पीड़ा भड़ास पर ज्यों प्रकाशित हुई, तुरंत एक्शन शुरू हो गया. भास्कर वालों ने आनन-फानन में प्रभात के एकाउंट में पैसा जमा करा दिया. प्रभात ने भड़ास को सूचित किया है कि उन्हें उनका पैसा मिल गया है. अब उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है.

प्रभात ने भड़ास का आभार जताया है कि भड़ास पर उनकी खबर आने के बाद उन्हें उनका पैसा मिल गया. उन्होंने बताया कि भड़ास पर खबर छपने के बाद उन्हें भास्कर की तरफ से फोन किया गया कि उनके एकाउंट में पैसा जमा करा दिया गया है. साथ ही यह भी कहा गया कि वे भड़ास पर से खबर हटवा दें. प्रभात ने भड़ास से अपील की है कि पैसे मिल जाने के बाद अब भास्कर के खिलाफ चल रही खबर को हटा दिया जाए.

अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन घटा, आनलाइन व रेडिया में बढ़ा, देखें ग्राफ

विज्ञापन के लिहाज से कहा जाए तो आनलाइन माध्यमों और रेडियो के उत्थान के दिन हैं. और, विज्ञापन के लिहाज से अखबारों और मैग्जीनों के बुरे दिन शुरू हो चुके हैं. एक ताजा सर्वे बताता है कि अखबारों व पत्रिकाओं का विज्ञापन आनलाइन माध्यम व रेडियो की तरफ शिफ्ट हो रहा है. इससे पता चलते है कि आनलाइन वालों के लिए उजले दिन आगे है और अखबारों के बुरे दिन भी सामने खड़ा है.

अमेरिका समेत कई विकसित देशों का इतिहास बताता है कि वहां ढेर सारे पुराने व बड़े अखबारों को बंद होना पड़ रहा है क्योंकि विज्ञापन कम होते जाने के कारण वे घाटे में चलने लगे. इस कारण उनका आनलाइन एडिशन प्रकाशित किया जा रहा है लेकिन प्रिंट एडिशन बंद कर दिया गया है. आगे भारत में भी यही कहानी दुहराई जाएगी. उपर देखिए एक ग्राफ, जिससे पता चलता है कि सन 2005 में किस मीडिया माध्यम को टोटल विज्ञापन में कितने प्रतिशत हिस्सेदारी थी और अब सन 2012 में किसका कितना प्रतिशत हिस्सा घटा-बढ़ा है.

सरकारी चैनलों डीडी न्यूज, लोकसभा टीवी, राज्यसभा टीवी पर खूब पैसा फूंक रही है सरकार

जनता का पैसा है, खूब उड़ाओ. यही फंडा रहता है सरकारों का. प्रदेश सरकारें हों या केंद्र सरकार, अखबारों व चैनलों पर विज्ञापन के मद में अरबों रुपये रुपये उड़ा दिए जाते हैं और ये पैसे धंधेबाज मालिकों के पाकेट में जाते हैं. वे मालिक जिनका सरोकार पत्रकारिता नहीं बल्कि कंपनी का टर्नओवर हर साल बढ़ाते रहना होता है. इन दिनों केंद्र सरकार अपने सरकारी चैनलों पर खूब मेहरबान है. इन चैनलों के बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित कराए जाते हैं.

डीडी न्यूज और संजीव श्रीवास्तव को इस कदर प्रमोट किया जा रहा है कि रेल बजट व आम बजट के समय तो रोजाना इनका विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित किया जाता था. बताया जाता है कि आम चुनाव करीब देखकर केंद्र सरकार अपनी ब्रांडिंग के लिए अपने सरकारी चैनल को चमका रही है. इसीलिए खूब विज्ञापन किया जा रहा है. इसी तरह राज्यसभा टीवी की भी खूब ब्रांडिंग की जा रही है. महिला दिवस के मौके पर इस चैनल का पेज भर का विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित कराया गया जिसमें चैनल से जुली महिला एंकरों व कर्मियों की तस्वीर छाप कर महिला सशक्तीकरण की बात कही गई.

इन शोशेबाजी से किसी का सशक्तीकरण हो या न हो लेकिन अखबार मालिकों की सशक्तीकरण खूब हो रहा है. उन्हें जमकर विज्ञापन मिल रहा है. आम चुनाव नजदीक आते देख अखबार मालिकों ने फिर से पेड न्यूज और पैकेज की प्रणाली को अंदरखाने अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है. अब तो कई बड़े अखबार नेताओं से उनकी मार्केटिंग का बाकायदा ठेका तक ले रहे हैं. इस काम में पत्रकारों को आगे किया जा रहा है. यानि जिनका काम आम जन का दुख दर्द उजागर करना था वे विशुद्ध दलाली पर उतर आए हैं.

वी आर द बेस्ट ब्लाग में सरकारी चैनलों को लेकर विज्ञापनबाजी किए जाने के प्रकरण पर एक कमेंट है, जो इस प्रकार है– ''To predict the meteorological weather, you have Mausam Bhavan. To predict the political weather, you have Doordarshan. Before every general election, the government happily dips into the pockets of taxpayers and pumps in crores of rupees to revamp the supposedly “autonomous” broadcast behemoth. And so it is in the year of the lord, 2013. Under the new information and broadcasting minister Manish Tiwari, new appointments have been made to DD News, just as Ravi Shankar Prasad had in the NDA regime before the the 2004 elections. There are expensive advertisements in the newspapers announcing its shows; there is even a Twitter account.''

Indian TV is like nautanki, a real-life soap opera

मालविका सिंह टेलीग्राफ में MALA FIDE नाम से एक कालम लिखती है. उसमें अबकी SCREAM AND CHATTER शीर्षक से उन्होंने इलेक्ट्रानिक मीडिया की खबर ली है.

SCREAM AND CHATTER

Malvika Singh

The Indian electronic media have their candidate for the post of the next prime minister all tied up in ribbons and bows regardless of the internal politics of the Bharatiya Janata Party. They are not delving, even superficially, into how this many-layered, diverse and pluralistic democracy may choose to vote when the time comes. Characteristically, Narendra Modi declaims from any rostrum he is allowed to speak from, insults the opponents whom he despises with personal, base remarks, and then hammers the Congress, spewing pent-up venom instead of throwing a real political challenge. Our neighbourhood, and the world beyond our immediate borders, listen to the diatribes, which say nothing at all of import and mock us for having reduced ourselves to rather simplistic and wretched beings.

Till recently, we were seen as a strong emergent power in the region as well as in the world. And with the largest human resource anchored in the sub-continent, we are also a market of consequence. Why do we blow it all to smithereens with ridiculous political narratives devoid of any new idea and intelligent formulation? Television has given average politicians a 24×7 platform for free from where sound-bites such as the ‘great development model’ and other such slogans are trotted out. No ‘great’ development model can be based on giving unimaginable subsidies to rich corporate giants in the garb of land and cheap power. What is required is a rewriting of the laws and regulations that govern free enterprise to make growth inclusive and spread all over the entire landmass that is India.

Comic relief

An intellectually lazy press corps that controls and operates the electronic media in India, drowning us all in its short bites and screams, virtually taking on the garb of the politician on the soap box, has dumbed down the discourse. It has no idea of how to divide reporting from analysis as it allows the two to merge seamlessly into a stream of confusion and one-sided chatter. The other example of that laziness can be found in the guests who appear on all the channels — about the same 40 people who are tossed about as in a caesar salad. No fresh views, no new voices.

Television was meant to be a tool that would access far-flung views and voices in an effort to expand the real news from the ground as well as the dialogue. Instead, each channel is predictable in its reactions to political happenings and one can clearly ascertain the personal political preferences of the owners and the anchors in the construct of their programmes. Indian television is like a nautanki, a soap opera, watched for the ‘live’ entertainment it provides as it shows real life leaders of India prancing about abusing one another, thereby demeaning themselves in full public view.

For the viewer it has become apparent that the ‘leaders’ on television have no time or energy to ‘lead’ the country. They are mukhautas of their respective parties, sent to the studio each evening to batter one another with some silly innuendoes and often frontal abuse. The teenagers who are compelled to witness this visual and verbal horror, day in and day out, can only be driven away from everything that has to do with politics and public life. All dignity and integrity have dissolved into nothingness and no one will take any of this seriously. It is mere comic relief after a day of hard work.

The Indian people are looking for some kind of sensible change in the political narrative. Silence is far better than the ‘heckling’ that has suffocated us via the small screen. Committed leaders refrain from appearing on the box since it dumbs down everything, disallows argument and takes inflexible positions rather than ask for real responses. Television needs to grow up.

माई लार्ड, निवेशकों का पैसा हड़पने वाले सु्ब्रत राय को गिरफ्तार करने और उसका पासपोर्ट जब्त करने का आदेश दें

: सेबी ने सुप्रीम कोर्ट से किया अनुरोध : सहारा परिवार के प्रमुख सुब्रत राय पर निवेशकों के पैसे हड़पने को लेकर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी ने सहारा प्रमुख सुब्रत राय की गिरफ्तारी के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है जिस पर सुनवाई इसी माह होने की संभावना है. सेबी सहारा समूह के दो निदेशकों समेत सुब्रत राय के पासपोर्ट को भी जब्त करना चाहता है.

सेबी ने सहारा प्रमुख को उनकी दो कंपनियों के शेयरधारकों के 24 हजार करोड़ रुपये लौटाने के लिए कहा था. सेबी ने पिछले महीने सहारा समूह की दो कंपनियों और सुब्रत राय सहित कुछ शीर्ष अधिकारियों के बैंक खाते सील करने और उनकी कुल संपत्ति जब्त करने के लिए कहा था. उसने ऐसा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मद्देनजर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि यदि सहारा समूह की कंपनियां निवेशकों का पैसा लौटाने के लिए धनराशि जमा नहीं करती हैं तो नियामक संस्था सेबी उनकी संपत्तियों को जब्त कर सकती है और उनके खातों के लेनदेन पर भी रोक लगा सकती है. 

सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड और सहारा इंडिया रियल स्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड के खिलाफ दो अलग-अलग आदेश पारित किया था. आदेश में सेबी ने कहा था कि दोनों कंपनियों ने निवेशकों से क्रमशः 6,380 करोड़ रुपये और 19,400 करोड़ रुपये उठाने के लिए अनेक अनियमितताएं बरती हैं.

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सुब्रत राय और सहारा की कथाएं

”मीडिया कप” नाम बड़े और दर्शन बहुत ही छोटे!

मीडिया कप दरभंगा प्रमंडल के मीडिया कर्मियों के आपस में मेल-मिलाप का मंच हुआ करता था. बहुत अफसोस है कि अब ये गंदी राजनीति का शिकार होकर अपने उद्देश्य से भटक गया है. पत्रकार इससे दूर होते जा रहे हैं और ग़ैर पत्रकार इस पर कब्ज़ा करते जा रहे हैं. ये आयोजन ऐसे लोगों के लिये नहीं था जो मीडिया कप खेलने के लिये पत्रकार बनकर आते हैं. ये तो उनके लिये था जो क्रिकेट का क ख ग भले ही ना जाने लेकिन पत्रकारिता करते हैं.

शुरुआती पहले-दूसरे सालों में मैदान में जब ऐसे पत्रकार बल्ला भांजते थे, गेंद के पीछे भागते थे तो उनकी बॉडी लैंग्वेज देखकर कितना आनंद आता था. पर चंद घटिया सोच रखने वाले और चाटुकार पत्रकारों की ओछी हरकतें पत्रकारिता के लिए शर्मनाक बन जाती है. गैर मीडियाकर्मियों के खेलने की जानकारी आयोजक मीडिया स्पोर्ट क्लब दरभंगा को भी है, परन्‍तु उनके भी कुछ लोग अपने चंद निजी फायदे के लिए इसे नजर अंदाज कर रहे हैं. जब एक बार किसी टीम पर पेशेवर खिलाड़ी लाने का आरोप लगा है तो फिर दुबारा उस टीम के सभी खिलाडियों के नाम और पेशे की जांच क्यूँ नही की गयी?

जिस शख्स को पिछली बार मीडिया स्पोर्ट क्लब ने काली सूची में डाला था, फिर इस बार उसे कैसे खेलने दिया गया? दूसरे सेमीफाइनल में मधुबनी, समस्तीपुर दोनों टीमों के बीच `कांटे की टक्कर` होने की उम्मीद थी, मैच से पहले समस्तीपुर प्रेस एकादश के कप्तान कृष्ण कुमार ने मधुबनी के चार खिलाडियों उमेश कुमार, विनोद कुमार, श्रवण कुमार और शिव कुमार के बारे में लिखित आवेदन दिया. चूं‍कि इनमें से एक नियोजित शिक्षक है, दूसरा बिज़नेसमैन, और दो पेशेवर खिलाडी हैं. ताजुब की बात है कि मधुबनी के कप्तान ने, जो इन खिलाडियो का आवेदन दिया है, उनमें से कई पर किस मीडिया से जुड़े हैं तक का नाम अंकित नहीं किया है. एक का नाम जैन टीवी डाला है शायद उन्हें मालूम नहीं कि बिहार में अभी जैन टीवी ऑन नहीं है और एक का नाम लोकल पेपर में डाला है. इससे साफ़ जाहिर होता है कि मधुबनी के कप्तान संजय कुमार झा (प्रभात खबर) जान बुझकर कर पत्रकार बिरादरी के बाहर के पत्रकार को खेला कर इस मीडिया कप को बदनाम कर रहे हैं. 

समस्तीपुर एकादश ने तो मैच में मधुबनी को वाकओवर दे कर मैच छोड़ने की बात कर रखी थी, लेकिन प्रवीण बबलू के आग्रह और मीडिया कप के सम्मान के लिए फील्ड में उतरी. अब देखना है कि मीडिया कप की गरिमा को बनाय रखने के लिए मधुबनी पर क्या कारवाई होती है. पिछले छह वर्षों से मीडिया स्पोर्ट्स क्लब द्वारा क्रिकेट का सफल आयोजन किया जाना हर्ष की बात है. पर आज ये आयोजन आपसी मनमुटाव, भेदभाव, गाली गलौज का अड्डा बन गया है.

प्रकाश कुमार ओझा

prakash94302@gmail.com

चैनल वन पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया एक लाख का जुर्माना

सहारा के खिलाफ चैनल वन वालों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इस याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया है और साथ ही एक लाख रुपये का फाइन भी लगाया है. चैनल वन की याचिका सहारा द्वारा 2जी जांच को प्रभावित करने संबंधी मामले में थी. याचिका के साथ चैनल वन वालों ने एक सीडी भी पेश की जिसमें उपेंद्र राय और सुब्रत राय के बीच बातचीत है और दावा किया गया कि यह बातचीत 2जी स्कैम की जांच को प्रभावित करने से संबंधित है. इसलिए सीडी की जांच कराई जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, पूरा मामला क्या है, इस बारे में समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया ने 12 मार्च को लंबी-चौड़ी खबर जारी की, जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

SC dismisses TV channel's plea against Sahara, slaps Rs 1L cost

New Delhi, Mar 12 (PTI) : The Supreme Court today dismissed a plea by a private TV channel seeking probe into contents of a CD allegedly having conversation between Sahara Group Chief Subrata Roy and an erstwhile scribe in his company by imposing a cost of Rs one lakh. The apex court termed the plea of Mohd Arif, Managing Director of Channel One, as "ex-facie frivolous and vexatious" which deserves dismissal with exemplary cost.

The channel had filed an intervention application in the ongoing hearing of the case in which the apex court had in May 2011 initiated suo motu contempt proceedings against Roy for allegedly interfering with the probe in the 2G spectrum case.

"The applicant is not at all connected with the main case of 2G licences or allotment of spectrum or contempt petition filed on behalf of Rajeshwar Singh, Deputy Director of Enforcement Directorate. The CD on which reliance has been shown has not been verified or authenticated from the laboratory about the conversation," a bench comprising justices G S Singhvi and K S Radhakrishnan said and added that "this court cannot enlarge the scope of the contempt matter.

"Application is dismissed. The hearing on the application has resulted in the loss of time of the court," the bench said while imposing a cost of Rs one lakh on the channel which will be deposited with the Supreme Court Legal Services Committee (SCLSC) and in case of failure, the amount would be recovered from arrears of land revenue of the channel.

Meanwhile, senior advocate Ram Jethmalani, appearing for Roy raised preliminary objections on maintainability of suo motu contempt proceeding against him saying the apex court rule was not correctly followed in issuing notice and the petition was filed without the approval or knowledge of the Attorney General or the Solicitor General which is mandatory.

Identical argument was put forward by senior advocate Rajiv Dhavan, who was appearing for Upendra Rai, a scribe associated with Sahara India News Network and facing the contempt proceedings. Along with Roy and Sahara, another journalist Subodh Jain, who was then associated with the company, is also facing contempt proceedings.

The apex court had issued contempt notices to them on May 6, 2011 saying there was a prima facie case against them.  The bench had taken serious note of the fact that after summons were issued to the CMD of Sahara group under the Prevention of Money Laundering Act, "crude methods" were adopted to terrorise, intimidate and blackmail Enforcement Directorate's Assistant Director Rajeshwar Singh, who is the investigating officer in the 2G spectrum case.

The bench had also banned Sahara India News Network and its sister concerns from publishing and broadcasting any story or programme relating to Singh. The probe against Roy was launched by ED in connection with the investment made by the Sahara in the Chennai-based telecom company S-Tel which had come under the scanner of CBI on the issue of national security. Singh had filed the petition in his personal capacity.

PTI

स्विस महिला के साथ मध्‍य प्रदेश में गैंगरेप

भोपाल : एक बार फिर गैंगरेप की घटना से देश शर्मसार हुआ है. घटना मध्‍य प्रदेश के दतिया जिले की है. यहां  सात लोगों ने एक स्विस महिला के साथ गैंगरेप किया है. यह रिपोर्ट शनिवार को मिली. रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित महिला अपने पति के साथ साइकिल से मध्य प्रदेश से आगरा जा रही थी. पति-पत्‍नी दोनों दतिया के झाडिया गांव के पास कंपेनिंग कर रहे थे.

खबर है कि इसी दौरान साल लोग आए और इनसे लूटपाट की. इसके बाद महिला के साथ सामूहिक बलात्‍कार किया. एमपी पुलिस ने सात अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. पीडित विदेशी महिला को ग्‍वालियर के अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है. आरोपी अभी पुलिस की पकड़ से दूर हैं.

भाजपा को अनाथ कर देते हैं राजनाथ!

भाजपा में राजनाथ सिंह जैसे कम नेता ही भाग्यशाली हैं, जिन्हे बिना किसी ठोस प्रयास के मुंह मांगी मुराद मिल जाती है। इसे हल्दी लगे न फिटकरी और रंग चोखा भी कह सकते हैं। अगर लोक भाषा में बात करें तो 'पूड़ा ना पापड़ी, पटाक बहू आ पड़ी' उक्ति भी राजनाथ सिंह पर चरितार्थ होती है। एक कहावत है बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, यह कहावत भी राजनाथ सिंह पर एक दम फिट बैठती है। राजनाथ सिंह पर जितनी कहावतें और लोकोक्तियां चरितार्थ होती हैं उतनी भाजपा ही नहीं अन्य किसी दल के नेता पर भी चरितार्थ नही होतीं।

आडवाणी जी द्वारा पाकिस्तान में जिन्ना के मजार पर जा कर जिन्ना को सेकुलर बताना आडवाणी जी को इतना भारी पड़ा कि उन्हें भाजपा अध्यक्ष पद से ही हटना पड़ गया। बस यहीं राजनाथ सिंह की लाटरी खुल गई गौर उन्हें आडवाणी जी के शेष कार्यकाल के लिए भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया। उसके बाद इन्हें पूरे कार्यकाल के लिए दोबारा अध्यक्ष चुन दिया गया। और अब तीसरी बार तो इन पर सारी कहावतें और लोकोक्तियां चरितार्थ हो गईं। सारी बाधाओं को पार करते हुए नितिन गडकरी का दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनना तय हो गया था, बस चुनाव की औपचारिकता भर रह गई थी कि ऐन चुनाव से एक दिन पहले उनके प्रतिष्ठानों पर आय कर के छापों की खबर आ गई तो नितिन गडकरी को मैदान छोड़ना पड़ गया।

संघ की भी मजबूरी हो गई। आडवाणी खेमा पहले ही गडकरी से खार खाए बैठा था, मगर इस बीच राजनाथ सिंह का नाम कहीं भी नहीं था। गडकरी के मैदान से हटते ही संघ ने राजनाथ सिंह का नाम आगे कर दिया और इस प्रकार तीसरी बार राजनाथ सिंह बिना हल्दी फिटकरी लगे भाजपा के अध्यक्ष बन गए। यह तो बाद में पता चला कि जिसे गडकरी के प्रतिष्ठानों पर छापा बताया गया था, वह तो सामान्य आयकर सर्वेक्षण था, मगर अब पछताने से क्या हो सकता था, राजनाथ सिंह के नाम की घोषणा हो चुकी थी। बाद में उनके नाम पर दल की कार्यकारिणी की मुहर भी लग गई। राजनाथ सिंह अध्यक्ष बन गए और जो भी नेता इस पद पर आंख लगाए थे सब टापते रह गए।

इस प्रकार अपने भाग्य के भरोसे राजनाथ सिंह उत्‍तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और दल के अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान होते रहे हैं, मगर उनका यह भाग्य भाजपा के लिए कभी भी शुभ नहीं रहा। 2002 के चुनाव में राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे। यह सरकार बसपा से दल बदल कर बनाई गई थी, जिसके चलते बसपा से आए सभी विधायकों को मंत्री बनाया गया था। मुख्यमंत्री को यह अधिकार नहीं दिया गया था कि वह किसी मंत्री को हटा दें या उसका विभाग बदल दें। इस हालत में भाजपा की काफी किरकिरी हुई, मगर मजबूरी थी, इसी मजबूरी के चलते यूपी में विधान सभा चुनाव हुए और भाजपा सत्ता से बेदखल हो गई। उसकी सीटों की संख्या 176 से घट कर 88 पर सिमट कर रह गई। राजनाथ सिंह ने अपने इस कार्यकाल में भाजपा का वोट बैंक बढाने के लिए दलितों में अति दलित और पिछड़ों में अति पिछड़े का कार्ड भी खेला था, मगर दलितों और पिछड़ों को भाजपा की ओर आकर्षित करने का राजनाथ सिंह का यह दांव भी काम न आ सका और भाजपा सत्ता से बाहर हुई तो फिर सत्ता के निकट भी न आ सकी।

इस के बाद राजनाथ सिंह के अध्यक्ष के रूप में पहले कार्यकाल 2007 में उ. प्र. विधान सभा के फिर चुनाव हुए तो इस बार भाजपा 88 से घट कर मात्र 51 सीटों पर सिमट कर रह गई। इस प्रकार भाजपा के लिए न उनका मुख्यमंत्री बनना शुभ रहा और न ही दल का अध्यक्ष बनना। अध्यक्ष के रुप में भी राजनाथ सिंह भाजपा में कोई नई जान फूंकने में भी सफल न हो सके, इसके विपरीत भाजपा में कलह निरंतर बढती ही रही। दरअसल भाजपा की ब्राह्मण और पंजाबी लाबी को राजनाथ सिंह का अध्यक्ष बनना रास नहीं आता।

राजनाथ सिंह के दूसरे फुल टर्म कार्यकाल पर जब नजर डालते हैं तो यहां भी निराशा ही हाथ लगती है। 2009 में भाजपा ने राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव लड़ा था। इस से पहले 2004 के चुनाव में भाजपा को 138 सीटों पर विजय मिली थी, मगर राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में यह संख्या 116 पर सिमट कर रह गई। यही नही 2004 के मुकाबले भाजपा मत प्रतिशत 22.16 से घट कर 18.80 प्रतिशत पर आ गया। इस प्रकार भाजपा के लिए राजनाथ सिंह का यह कार्यकाल भी शुभ नहीं रहा। अब 2014 का लोकसभा चुनाव भी राजनाथ सिंह के नेतृत्व में ही लड़ा जाना है इस की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा मगर पिछले अनुभव को नकारा भी नहीं जा सकता।

राजनाथ सिंह के इस कार्यकाल के आरंभ में एक नई बात यह हुई है कि जो भाजपा कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाती रही है, वह भी अब इस आरोप के दायरे में कम से कम उत्तर प्रदेश में तो आ ही गई है। लंबी प्रतीक्षा के बाद उ. प्र. की नवगठित कार्यकारिणी में तीन नेता पुत्रों एवं एक पुत्री को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। राजवीर सिंह पुत्र कल्याण सिंह और गोपाल टंडन पुत्र लालजी टंडन को उपाध्यक्ष और पंकज सिंह पुत्र राजनाथ सिंह को महामंत्री बनाया गया है। वरिष्ठ भाजपा नेता प्रेम लता कटियार की पुत्री नीलिमा कटियार को मंत्री बनाया गया है। इस प्रकार अब भाजपा में भी परिवारवाद की परंपरा का आरंभ हो गया है।

राजनाथ सिंह यूपी में मंत्री और मुख्यमंत्री रह चुके हैं। केन्द्र में भी वह मंत्री रह चुके हैं और भाजपा अध्यक्ष तो अब हैं ही, मगर इतना सब होने पर भी भाजपा का एक वर्ग उन्हें राष्‍ट्रीय नेता नहीं मानता। इस वर्ग के अनुसार वह केवल राज्य स्तरीय एवं ठाकुरों के ही नेता हैं। यही कारण है कि यह वर्ग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता। उदाहरण स्वरूप बार बार राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री के लिए किसी का नाम न उछाला जाए, मगर उनकी इस अपील या आदेश पर ध्यान न दे कर प्रतिदिन कोई न कोई भाजपा नेता प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का नाम उछाल ही देता है और अध्यक्ष महोदय अपना मन मसोस कर रह जाते हैं। इस से क्या यह सिद्ध नहीं होता कि दल पर उनका नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। इस सब के चलत वह भाजपा की आंतरिक गुटबाजी समाप्त करने में कितने सफल हो पाएंगे यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता।

लेखक महर उद्दीन खां वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

धोखेबाज निकले भास्‍कर वाले, काम कराया पैसा नहीं दिया

पिछले कई दिनों से मीडिया में काम कर रहा था. शुरुआत की एक लोकल चैनल के कैमरामैन के रूप में. उसके बाद मेहनत करने के बाद उसी में वीडियो एडिटर हो गया. एक दौर ऐसा आया कि सभी लोकल चैनल बंद हो गए. मैं भुखमरी की कगार पर पहुँच गया. फिर याद आया कि फोटोग्राफी का डिप्लोमा किस दिन काम आएगा. शुरू कर दी फोटोग्राफी. इधर उधर काम ढूंढता रहा लेकिन कहीं कोई भी काम देने को तैयार नहीं.

फिर आया महाकुम्भ. एक ऐसा इवेंट जहां छायाकारों की कमी पड़ गयी. देश-विदेश से छायाकार आये. भास्कर जैसे बैनर को भी छायाकार की जरूरत पड़ी. शुरुआत में राहुल और पंकज दो छायाकारों ने ज्वाइन किया, लेकिन दस दिन बाद हो वो गायब हो गए. फिर आया मैं, भास्कर ज्वाइन किया. एक बड़े सपने के साथ कि कुछ सिखने को मिलेगा और करने को भी. पूरे कुम्भ जी लगा कर भास्‍कर के लिए काम किया, लेकिन बड़े-बड़े दावे करने वाले लोग काम खत्म होते ही ठेंगा दिखा कर भाग खड़े हुए.

मुकेश, जो कि आउटपुट हेड थे, उन्होंने फोन ही करना बंद कर दिया. अनुराग जी, जो ब्यूरो चीफ थे, ने भास्कर ही छोड़ दिया. अंत में बचे आशीष जी, रोज़ फ़ोन करते हैं देखो पैसा आया, लेकिन आएगा कहां से जब कहीं पैसा डिपॉजिट ही नहीं किया गया. रोज़-रोज़ की आफत, पैसा आया कि नहीं आया. पूरे कुम्भ उधार लेकर काम किया. नतीजा ये रहा कि खुद का कैमरा तक बेच डाला उधार चुकाने के लिए, लेकिन सैलरी की बात तो दूर लोगों ने बात तक करना बंद कर दिया.

नंगी फोटो डाली खुद और बदनाम किया हमें. हम भी मजबूर थे कि काम नहीं करेंगे तो पैसा नहीं मिलेगा. अंततः उब कर काम छोड़ दिया १५ फरवरी को, उम्मीद थी कि पैसा मिलेगा लेकिन अब तक फूटी कौड़ी भी भास्‍कर की तरफ से नहीं मिली. फिलहाल एक आखिरी कोशिश है कि कम से कम मैं जिस चीज़ का शिकार हूँ, उसका शिकार और कोइ भाई न हो, इसीलिए ये पत्र लिख रहा हूँ. हो सके तो प्रकाशित करने की कृपा करें.

प्रभात कुमार वर्मा
छायाकार
इलाहाबाद
मो. ९३३६०५५०५२

दैनिक जागरण वालों को संसद और नगरपालिका बोर्ड में अंतर नहीं पता!

: दैनिक जागरण की करतूत : देवरिया। विश्व में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबार का दावा करने वाले दैनिक जागरण के लोगों को संसद और नगरपालिका बोर्ड का अंतर ही नहीं समझ में आता। 15 मार्च 2013 को दैनिक जागरण के देवरिया एडिशन की खबर और शीर्षक से तो ऐसा ही लगता है। महिमामंडित करने के चक्‍कर में दैनिक जागरण और उसके पत्रकार संसदीय सर्वोच्‍चता का भी मजाक उड़ाते नजर आ रहे हैं।

संसद विधायिका का सर्वोच्च सदन है। संसद के कुछ विशेषाधिकार भी है, जिसे संसदीय विशेष अधिकार के रूप में संविधान के अनुच्छेद 105 में बताया गया है। इसके तहत जो विशेष अधिकार दिये गये है उसमें यह भी उल्लिखित है कि सांसदों को कुछ और भी विशेषाधिकार होंगे, जिसका उल्लेख संविधान में नहीं किया गया है। स्थानीय निकायों को इस तरह का कोई विशेषाधिकार नहीं है। असली बात तो यह है कि इस खबर में नगरपालिका अध्यक्ष और सदस्यों के बोर्ड बैठक को संसद बताकर यह अखबार क्या कहना चाहता है?

भारतीय संसद का गठन संविधान के अनुच्छेद 79 में परिभाषित है कि संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्‍ट्रपति और दो सदनों से मिल कर बनेगी, जिनके नाम राज्य सभा और लोक सभा होंगे। भारतीय संविधान में नगर पालिकाओं को भी परिभाषित किया गया है जो कि किसी लघुतर नगरीय क्षेत्र के लिए नगर पालिका परिषद का गठन करने के लिए है। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि दैनिक जागरण में किस तरह के पत्रकार, उपसंपादक, संपादक आदि पदों पर लोग बैठे हैं, जो खबर का शीर्षक बनाने में तो नगरपालिका बोर्ड को संसद लिखते ही हैं, ख़बर के अन्दर भी कई बार संसद शब्द लिखते हैं।

यह खबर का एक नया चलन है, जिसमें तथ्यों को भी बदल दिया गया है। एैसा लगता है कि इस तरह की खबरें प्रकाशित करने में भाषा लालित्य और सार्वजनिक हितों की सुरक्षा के जगह पर यह अखबार अपने विज्ञापन हितों के लिए कुछ लोगों का झूठा महिमामंडन करने का कार्य कर रहा है। मार्च का महीना है सरकारी फंड को खपाने में नगरपालिका के लोग लगे हैं। ऐसे समय में अखबार अगर नगरपालिका को संसद बताए तो मतलब निकालने वाले निकाल ही लेंगे। यह पत्रकाररिता और समाज के लिए अच्छी चीज नहीं है। क्यों कि जनमत बनाने के लिए इस तरह की खबरें प्रकाशित किया जायेगा तो पाठकों के साथ कैसे न्याय होगा।

लेखक शमीम इकबाल स्‍वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

मुख्‍यमंत्री के पुत्र साकेत बहुगुणा पर 111 करोड़ रुपये की हेराफेरी का आरोप

उत्‍तराखण्‍ड की बहुगुणा सरकार इस समय 3 संगीन आरोपों से घिरती जा रही है, जिससे राज्‍य सरकार की साख पर जहां प्रतिकूल असर पड़ रहा है वहीं इन संगीन आरोपों के मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित होने पर मुख्‍यमंत्री का मीडिया मैनेजमेन्‍ट असफल माना जा रहा है। पहला, मुख्‍यमंत्री के एक पुत्र साकेत बहुगुणा पर 111 करोड़ रुपये की हेराफेरी का समाचार प्रकाशित हुआ है, द्वितीय भू-कानूनों में संशोधनों की खबर पर भी सरकार की साख पर बहुत गलत असर पड़ रहा है। तीसरा, सिडकुल की जमीन में किए गए एक हजार करोड़ रुपये का घोटाला प्रमुखता से उठा है।

भाजपा नेता प्रकाश सुमन ध्‍यानी ने स्‍पष्‍ट आरोप लगाया है कि टिहरी बॉध विस्‍थापितों को प्‍लाट आवंटन में मुख्‍यमंत्री के पुत्र साकेत बहुगुणा और कुछ कांग्रेस विधायकों ने प्रति प्‍लाट एक करोड़ के हिसाब से 111 करोड़ रूपए की हेराफेरी की। वहीं विजय बहुगुणा सरकार पर भू-माफियाओं और बिल्डरों के साथ प्रदेश की कई एकड़ जमीन खुर्द-बुर्द करने का आरोप लग रहा है।  ज्ञात हो कि 2007 में तत्कालीन भुवन चंद्र खंडूड़ी सरकार ने सत्ता में आते ही भू-कानून में फिर संशोधन किया, जिसके बाद जमीनों की अंधाधुंध खरीद-फरोख्त पर काफी हद तक अंकुश लगा।

गौरतलब है कि भू-कानून में प्रस्तावित संशोधन की खबर मीडिया में जो खबरें प्रकाशित हुई थी, इसे भूमाफिया के अनुकूल संशोधन किये जाने का संदेश गया, संदेश गलत जाते ही चौकन्‍ने हुए मुख्‍यमंत्री ने 13 मार्च को आनन फानन में दूसरी बार प्रेस वार्ता सिर्फ इसलिए बुलायी कि भू-कानून में संशोधन न करने का समाचार प्रमुखता से जाये। वार्ता में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि सरकार राज्य में भूमि खरीदने-बेचने के कानून में कोई परिवर्तन नहीं करने जा रही है। वहीं उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया कि कैबिनेट में इस पर चर्चा हुई लेकिन फैसला नहीं।  राज्य में भूमि खरीद-बिक्री के कानून में संशोधन प्रस्तावों पर कैबिनेट में चर्चा होने, लेकिन उसे मंजूरी मिलने से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के इन्कार के बावजूद मंत्रियों का रुख सीएम से अलग रहा है, उन्‍होंने ही मीडिया में यह खबर लीक की थी कि भू कानून में संशोधन कर दिया गया है।

पुत्र साकेत बहुगुणा के साथ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा
पुत्र साकेत बहुगुणा के साथ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने यह स्वीकार किया था कि राज्य में भूमि खरीदने और बेचने के कानूनों में संशोधन प्रस्तावित किए गए। इन प्रस्तावों पर बाकायदा चर्चा भी हुई, लेकिन इन्हें मंजूरी मिलने से मुख्यमंत्री ने साफ तौर पर इन्कार किया। मुख्‍यमंत्री द्वारा कभी इन्कार और कभी इकरार को लेकर कैबिनेट के वरिष्ठ सहयोगियों में मतभेद थे। वरिष्ठ मंत्रियों ने कुछ मीडिया कर्मियों को उक्त अध्यादेश में संशोधन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने की बात स्वीकार की। वहीं इसके बाद मुख्यमंत्री के साफ इन्कार से मंत्री भी हैरत में पड गये कि यह क्‍या है, कैबिनेट में चर्चा हो रही है, बाहर मना किया जा रहा है, कैबिनेट के कई सहयोगियों ने दबी जुबान में संशोधनों को हरी झंडी मिलने की बात स्वीकार की। परन्‍तु मुख्यमंत्री का डुलमुल रुख सामने आने के बाद जहां सरकार की विश्‍वसनीयता पर सवाल उठने लगें वहीं अनेक सवाल उठे, जिन्‍हें विपक्ष ने लपक लिया और विजय बहुगुणा सरकार के खिलाफ आमजन को जागरूक किया।

इसके अलावा भाजपा ने सिडकुल की जमीन में किए गए एक हजार करोड़ रुपये के घोटाले को भी आमजन के समक्ष रखा। बजट सत्र के पहले दिन सरकार के खिलाफ हमलावर रुख अपनाकर व आमजन को लामबंद कर बहुगुणा सरकार को हैरत में डाल दिया। भूमि घोटाला और भूमि कानून में संशोधन के अलावा भाजपा ने अपने तरकश में अनेकों लक्ष्‍यभेदी तीर होने की बात कही। भाजपा ने चुनौती दी कि यदि सरकार पाक साफ है तो वह इस मामले की सीबीआइ जांच कराए। भू कानून में संशोधन विधेयक प्रवर समिति में होने के बावजूद कैबिनेट में इसकी चर्चा करने के अलावा एक कैबिनेट मंत्री का विदेश यात्रा में बिना अनुमति महिलाओं को ले जाने और बिना मुख्यमंत्री के सूचना के एक अन्य मंत्री द्वारा विभागीय अधिकारी को सेवा विस्तार देने आदि के मुद्दे पर भी भाजपा ने सरकार से जवाब मांगा है।

प्रकाश सुमन ध्‍यानी द्वारा कहा  गया है कि 2012-13 में टिहरी बॉध विस्‍थापितो के नाम पर 59 खेती और 52 आवासीय भूखण्‍ड आवटित किये गये, आमबाग पशुलोक ऋषिकेश तथा देहरादून स्‍थित देहराखास स्‍थित आवासीय भूमि खेती भूमि दिखाकर आवटित कर दी गयी, यह जमीनें भू माफियाओं को आवंटित कर दी गयी, इसके अलावा हरिद्वार के शिवालिक नगर में 85 एकड की जगह 120 एकड जमीन आवंटित कर दी गयी, यह जमीन पुनर्वास निदेशालय के नाम पर भी नहीं थी। इस हेराफेरी में टिहरी के जिलाधिकारी जो पुनर्वास निदेशक भी है की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किये गये है।

देहरादून से चन्‍द्रशेखर जोशी की रिपोर्ट.

श्री न्‍यूज से विवेक का इस्‍तीफा, शैलेश पी7 न्‍यूज पहुंचे

श्री न्‍यूज, आगरा से खबर है कि विवेक जैन ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर ब्‍यूरोचीफ की भूमिका निभा रहे थे. प्रबंधन ने आगरा ब्‍यूरो भी बंद कर दिया है. अब स्ट्रिंगर के रूप में ब्रज भूषण से काम लिया जा रहा है. आगरा में चर्चा है कि जल्‍द ही श्री न्‍यूज जनसंदेश के ढर्रे पर चलने की तैयारी कर रहा है. कास्‍ट कटिंग के चक्‍कर में कई ब्‍यूरो बंद किए जा रहे हैं.

महुआ न्‍यूज से इस्‍तीफा देने वाले शैलेश सिंह ने अपनी नई पारी पी7 न्‍यूज के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर एसोसिएट प्रोड्यूसर बनाया गया है. शैलेश ने अपने करियर की शुरुआत जागरण समूह के चैनल7 के साथ की थी. महुआ के अलावा भी वे कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

GUARDIAN EDITOR ALAN RUSBRIDGER AT THE PRESS CLUB

The Press Club, Mumbai, takes great pleasure in inviting you to a special presentation by Alan Rusbridger, editor-in-chief of the well-known and widely-read British newspaper and website ‘The Guardian’.

The presentation – ‘THE FUTURE OF JOURNALISM IN A DIGITAL AGE’ – by Mr Rusbridger will cover a wide gamut of issues looking at how journalism in the 21st Century has undergone a fundamental change from how it would be understood to a 19th or even 20th Century audience. Mr Rusbridger will describe the centrality of a two-way relationship between journalists and their readers in the digital age and how the idea of Open Journalism has shaped the Guardian's editorial strategy.

The event will be hosted at the Press Club on TUESDAY, MARCH 19th at 5.15 PM and will be followed by a Q & A session. Seating will be on a first-come-first-served basis and reporters and local editors are welcome to cover the event.
 
Alan Rusbridger has been editor of the Guardian since 1995. Rusbridger's career began on the Cambridge Evening News, where he trained as a reporter before first joining the Guardian in 1979. He worked as a general reporter, feature writer and diary columnist before leaving to succeed Clive James and Julian Barnes as the Observer's TV critic.

In 1987 he worked as the Washington correspondent of the London Daily News before returning to the Guardian as a feature writer. He moved from writing to editing the following year, launching Guardian Weekend magazine and the paper's G2 section. He was made deputy editor in 1994, when he first started working on the paper's
initial forays into digital publishing.

He became editor of the Guardian in 1995 and oversaw the integration of the paper and digital operations. The Guardian is now the third largest newspaper website in the world and now attracts 78 million unique browsers a month.

The Guardian won the Newspaper of the Year Award at the 2011 Press Awards and Campaign magazine named the Guardian as Medium of the Year, 2011. Rusbridger was awarded the Goldsmith Career Award for Excellence in Journalism by Harvard's Joan Shorenstein Centre and recently received the Burton Benjamin Memorial Award for lifetime achievement in the cause of press freedom from the Committee to Protect Journalists.

During his editorship the paper has fought a number of high-profile battles over libel and press freedom, including cases involving Neil Hamilton, Jonathan Aitken, the Police Federation, Trafigura, freedom of information and Wikileaks.

The paper was nominated newspaper of the year five times between 1996 and 2006. Rusbridger has been named editor of the year three times. Rusbridger and reporter Nick Davies received the UK's Media Society Award for their revelations and coverage of the phone hacking story in the Guardian.

Born in Zambia, he graduated from Cambridge University with a degree in English in 1976. He is a visiting fellow at Nuffield College, Oxford and a visiting professor of history at Queen Mary's College, London. He has honorary doctorates from Lincoln and Kingston Universities.

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ में भी सैलरी नहीं मिलने से कर्मचारी परेशान

जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ से भी खबर है‍ कि यहां कर्मचारियों को सैलरी के लाने पड़े हुए हैं. पिछले लगभग दो महीने से एडिटोरियल छोड़कर अन्‍य विभागों के लोगों को सैलरी नहीं मिली है. कर्मचारी परेशान हैं क्‍योंकि होली सिर पर है और पैसों का कोई अता-पता नहीं है. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन कुछ स्‍पष्‍ट नहीं बता रहा है कि कब वो कर्मचारियों का बकाया सैलरी उपलब्‍ध कराएगा. एडिटोरियल को छोड़कर सभी विभागों के कर्मचारी मुश्किल में हैं.

कर्मचारियों को सबसे ज्‍यादा परेशानी इस बात से हो रही है कि कोई यह स्‍पष्‍ट करने को तैयार नहीं है कि उनकी सैलरी कब और किस तिथि को दी जाएगी. पिछले कुछ महीनों में जनसंदेश टाइम्‍स के लखनऊ ऑफिस से कई लोगों की छंटनी हुई, कई लोगों ने खुद इस्‍तीफा दे दिया, कई लोग दूसरे संस्‍थानों में ज्‍वाइन कर लिया. इसके बाद भी यहां की आर्थिक संकट दूर नहीं हो पाई. बताया जा रहा है कि अपर लेबल पर आंतरिक तनाव के चलते भी कर्मचारियों को सैलरी मिलने में दिक्‍कत हो रही है.

लखनऊ में भी ज्‍यादातर कर्मचारी दूसरे संस्‍थानों में नौकरी की तलाश कर रहे हैं. पहले भी जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ तमाम विवादों के चलते चर्चा में रहा है. चाहे बिजली कटने का मामला हो या फिर संपादक पर पर किसी पत्रकार के न रहने का मामला. यह अखबार बस जैसे तैसे चल रहा है. सूत्रों का कहना है कि अगर कर्मचारियों को होली से पहले सैलरी नहीं मिली तो विरोध स्‍वरूप काम ठप कर सकते हैं. इसके पहले बनारस में भी कई पेजीनेटर ऐसे हालात पैदा कर चुके हैं.

शहीद डीएसपी के परिजनों में धनराशि को लेकर अंतर्कलह

देवरिया। शहीद डीएसपी जियाऊल हक के परिवारवालों के बीच सरकार द्वारा दिए जा रहे सरकारी एवं अन्य अहेतुक धनराशि की आपसी बंटवारे को लेकर अर्न्तकलह शुरू हो गया है। एक तरफ जहां पत्नी परवीन आजाद सम्पूर्ण धनराशि पर अपना हक जता रहीं हैं वहीं दूसरी तरफ शहीद के पिता शमशुल हक का कहना है कि जियाऊल उनका बेटा था, इसलिए बराबर का हिस्सा उनको भी मिलना चाहिए।

हांलाकि इस सम्बन्ध में किसी ने भी कोई शिकायत किसी अधिकारी के यहां नहीं की है। इसके पूर्व भी परिवार के सदस्यों को सरकारी नौकरी दिए जाने के बाबत भी जिलाधिकारी देवरिया के यहां शहीद के पिता ने बहू पर मनमानी करने का आरोप लगाए था।

ज्ञातव्य है कि प्रतापगढ़ जिले के कुण्डा के तत्कालीन डीएसपी जियाऊल हक की मौत के बाद शहीद की पत्नी एवं शहीद के पिता को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अलग-अलग पच्चीस-पच्चीस लाख रुपए की आर्थिक सहायता तात्कालिक रूप से दी थी। इसके अतिरिक्त बहराईच जिले से भी वहां की जिलाधिकारी की तरफ से राज्य सरकार के कर्मचारियों ने एक दिन का वेतन मदद के रूप में शहीद की विधवा को अपर जिलाधिकारी नेबू लाल के माध्यम से भिजवा दिया था।

बताया जाता है कि कई अन्य राजनीतिक दल के लोगों ने भी शहीद की विधवा का सहायता के रूप में नकद राशि गोपनीय तरीके से उपलब्ध कराई है। जिसके बंटवारे को लेकर परिवार में विरोध के स्वर उभरने शुरू हो गए हैं। लेकिन परिवार के सदस्य इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने से बच रहे हैं।

शायद इन्हीं कारणों से काफी दुःखी नजर आ रहे शहीद के भाई शोहराब ने भी पहले किसी तरह की टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया लेकिन बाद में कहा कि यह परिवार का अत्यन्त निजी मामला है। इसमें मीडिया के लोगों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

राहुल, थोड़े से गांधी बनें

भोपाल : मैंने चार-पांच साल पहले ‘भास्कर’ में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था, ‘राहुल जैसा कोई और नहीं’ लेकिन इस दौरान मेरी सारी आशाओं पर धीरे-धीरे पानी फिरता गया। उ.प्र. और बिहार के चुनावों ने कांग्रेस के इस उदीयमान नक्षत्र को प्रभाहीन कर दिया और प्रचंड जन-आंदोलनों तथा निर्भया-कांड के वक्त राहुल के मौन ने सारे देश को हतप्रभ कर दिया। लेकिन अब राहुल के मुखारविंद से कुछ ऐसी बातें अचानक फूट निकली हैं कि यदि वे उनका शतांश भी करके दिखा दें तो मैं ही नहीं, सारा देश मानने लगेगा कि सचमुच राहुल जैसा कोई और नहीं है।

राहुल ने कहा है कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। उनकी इस बात पर देश भरोसा कर सकता है, क्योंकि गत मास ही उन्होंने जयपुर में कहा था कि सत्ता तो विष है। जहर का प्याला है। उनकी दादी और पिता ने वह प्याला पिया है। उस प्याले में उन्हें भूत दिखाई दे, यह स्वाभाविक है लेकिन फिर प्रश्न यह है कि वे कांग्रेस के महामंत्री और उपाध्यक्ष क्यों बने? क्या वह सत्ता का प्याला नहीं है? यह तो महासत्ता है। यह सत्ता का प्याला नहीं, भगोना है। आज सरकार पर पार्टी भारी है, जैसा कि कम्युनिस्ट तानाशाहियों में हुआ करता था। प्रधानमंत्री पर पार्टी-अध्यक्ष और मंत्रियों पर महामंत्री भारी है। किसी भी लोकतंत्र के लिए पार्टी तानाशाही से भी ज्यादा खतरनाक पारिवारिक तानाशाही होती है।

राहुल को सारा देश सचमुच का बड़ा नेता मानना शुरू कर देता, अगर वे पार्टी का कोई भी पद नहीं लेते। पार्टी में पद योग्यतापूर्वक नहीं कृपापूर्वक बांटे जाते हैं। पद न लेकर वह यह सिद्ध करते कि वे किसी की कृपा के आकांक्षी नहीं हैं, बल्कि अपने बूते पर देश की सेवा करना चाहते हैं। चार-पांच साल पहले जैसे वे गांव-गांव घूमते थे, गरीबों के घरों में खाते और सोते थे और अपनी आंखों से देश को पहचानना चाहते थे तो लोगों को लगा था कि यह नौजवान भारतीय राजनीति को एक नया मुहावरा देने के लिए निकल पड़ा है। दशकों से बंधी-बंधाई राजनीति करनेवाले सभी दलों के खुर्राट नेताओं के पसीने छूटने लगे थे लेकिन ज्यादा दिन नहीं गुजरे कि लोगों को समझ पड़ गया कि खाने के दांत और हैं और दिखाने के और!

खाने के कुछ दांत जयपुर में दिखे। ज्यों ही राहुल ने अपनी माँ का आशीर्वाद लिया और महामंत्री से उठकर उपाध्यक्ष की सीढ़ी चढ़ी, दरबारियों ने देश गुंजा दिया। भावी प्रधानमंत्री के नारे लगने लगे। लेकिन राहुल कहते हैं कि मुझे तो प्रधानमंत्री बनना ही नहीं है। अब ये दरबारी क्या करेंगे? सच्चा राजभक्त दरबारी वही होता है, जो राजा की हर बात में हाँ मिलाए। वे अब और ज्यादा खुश होंगे। अब कुछेक की कोशिश होगी कि हम राहुल के मनमोहन कैसे बनें? क्या राहुल स्वयं सोनिया गांधी बन सकेंगे? सोनिया का सोनिया बनना उनकी मजबूरी थी लेकिन राहुल तो गांधी बनना चाहते हैं। राजीव, इंदिराजी और नेहरुजी से भी आगे निकलना चाहते हैं। गांधी याने क्या? फिरोज गांधी या राजीव गांधी नहीं, महात्मा गांधी। असली गांधी! यह उन्होंने खुद कहा है कि उनके मॉडल महात्मा गांधी हैं। वे वास्तव में चले थे, उसी रास्ते पर लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि अब उससे छोटा ‘मॉडल’ (प्रधानमंत्री का) भी उन्हें बेकार लगने लगा है। यदि वे गांधी को अपना आदर्श मानते हैं तो कांग्रेस उपाध्यक्ष पद से एवं सांसद पद से भी क्यों चिपके रहें? हो सकता है कि साल भर बाद इन पदों की कोई कीमत ही न रह जाए लेकिन राहुल अगर गांधी बन सकें और उस गांधी के रास्ते पर थोड़ा भी चल सकें तो यह देश उन्हें कई प्रधानमंत्रियों से भी ज्यादा याद करेगा और उनका आभारी रहेगा। वैसे भी प्रधानमंत्री का पद अब इस लायक कहां रह गया है कि कोई सच्चा लोक-नेता उसे पाने की इच्छा रखे? राहुल ने अनिच्छा प्रकट की, यह ठीक ही किया।

लेकिन उन्होंने ऐसा गंभीरतापूर्वक सोच-समझकर किया या पत्रकारों के सामने उनकी जुबान फिसल गई? शायद जुबान ही फिसल गई। वरना वे यह क्यों कहते कि वे शादी इसलिए नहीं करेंगे कि उनके बाल बच्चे होंगे तो वे भी वंशवादी राजनीति करने लगेंगे। वे भी उनके लिए सत्ता और पत्ता जुटाने लगेंगे। शादी होने पर बच्चे हो हीं, यह जरूरी नहीं है। और जिनके बच्चे हुए हैं, वे सब नेता भ्रष्ट ही रहे हो, ऐसा भी नहीं है। खुद गांधीजी के चार बच्चे थे। जिन राजनीतिज्ञों के बच्चे नहीं हैं या जिनकी शादी नहीं हुई है, उनका आचरण आदर्श है, ऐसा भी नहीं है। हमारे देश में अनेक अविवाहित और नि:संतान नेताओं ने भ्रष्ट आचरण के निकृष्टतम उदाहरण उपस्थित किए हैं। यदि राहुल गृहस्थी के झंझट से इसलिए बचना चाहते हैं कि वे देश की सेवा करना चाहते हैं तो कौन उनका स्वागत नहीं करेगा लेकिन अगर इस भाव के पीछे कोई और कारण है तो उनकी इस गुत्थी को कोई सिंगमंड फ्रायड या एडलर या जुंग जैसा मनोविश्लेषक ही सुलझा सकता है।

राहुल कांग्रेस की सत्ता के ढांचे को भी बदलना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि पार्टी की नीतियों के निर्माता 10-20 नहीं, 500 लोग हों याने आंतरिक लोकतंत्र आए! यह अद्रभुत विचार है। यह विचार अगर साकार हो जाए तो भारत की सभी पार्टियां सुधर जाएं। लगभग सभी पार्टियां कांग्रेस की नकल करती हैं। क्षेत्रीय पार्टियां तो प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन ही गई हैं, अखिल भारतीय पार्टियां भी मुट्ठीभर नेताओं की मुट्ठियों में कैद हैं। यदि हमारी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र कायम हो जाए तो वास्तव में भारत दुनिया का सबसे बड़ा और प्रामाणिक लोकतंत्र कहलाएगा। इन सद्रविचारों को अमली जामा पहनाने की सामर्थ्य उन लोगों में नहीं होती जो अपने सिर पर ताज और कंधे पर तलवार रखने के शौकीन होते हैं। इस तरह के क्रांतिकारी काम वे ही करते हैं जो सिर पर कफन बांधकर निकलते हैं और तलवार की धार पर चलने का हौसला रखते हैं, जैसा कि कभी गांधी ने किया था। यथास्थितिवाद के किले की सीढि़यां चढ़ते हुए व्यवस्था-परिवर्तन की बीन बजाना आसान है लेकिन यह व्यवस्था-परिवर्तन असंभव भी नहीं है बशर्ते कि कोई राहुल कभी गांधी बनकर दिखाए।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार एवं स्‍तंभकार हैं.

दैनिक जागरण का ब्‍यूरोचीफ निकला हत्‍यारोपी का मददगार

दैनिक जागरण समूह केवल फर्जी मुकदमे ही नहीं कराता है बल्कि वह ऐसे-ऐसे लोगों को अपना पत्रकार भी बनाता है जो अपराधियों की मदद करते हैं या मदद करने के नाम पर लाखों वसूलते हैं. मामला मध्‍य प्रदेश के छतरपुर का है. पुलिस की गिरफ्त में आए पांच हजार के इनामी हत्‍यारोपी ने ग्‍वालियर-झांसी से प्रकाशित दैनिक जागरण के पत्रकार देवेंद्रदीप सिंह उर्फ राजू सरदार पर मदद के नाम पर एक लाख से ज्‍यादा रुपए वसूलने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दिया.  

प्रेस वार्ता में हत्‍यारोपी महिपाल सिंह का कहना था कि हत्‍या के मामले से उसका नाम हटवाने के लिए दैनिक जागरण के पत्रकार राजू सरदार ने उससे एक लाख रुपये से ज्‍यादा वसूल लिए. उसने बताया कि मार्च 2012 में घटना के समय छतरपुर एसपी प्रेमसिंह विष्ट थे, जो वर्तमान में सतना में पदस्थ हैं. राजू सरदार ने उनसे सेटिंग हो जाने के नाम पर कुछ राशि ली. इसके बाद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुनील तिवारी से मामला सुलटाने के नाम पर पत्रकार ने उससे वसूली की.

आरोपी महिपाल के अनुसार एसपी का तबादला होने पर पत्रकार ने उसकी मदद के नाम पर अन्य तरीकों से राशि वसूली. उसका फर्जी मेडिकल झांसी से पत्रकार राजू सरदार ने बनवाया, जिस आधार पर उसकी अग्रिम जमानत हो जाये. यह मेडिकल वर्तमान में हाईकोर्ट जबलपुर के अधिवक्ता मनीष दत्त के पास रखा है. राजू सरदार वर्तमान में जागरण का ब्यूरो चीफ होने के साथ भारतीय जनता पार्टी की जिला कार्यसमिति का सदस्य भी हैं. उन्‍हें यह कहते सुना जाता है कि प्रभारी मंत्री हरिशंकर खटीक सहित कई मंत्रियों से उनके अच्छे संबध हैं. राजू सरदार पूर्व में भी हत्या के प्रयास के मामले में जिला जेल छतरपुर में बंद रहा है.  नगर पुलिस अधीक्षक ने बयान दिया है कि राजू सरदार के खिलाफ भी अपराध दर्ज किया जायेगा.

इस संदर्भ में राजू सरदार का कहना है कि यह पूरी तरह से साजिश है. 15 दिन पहले मुझे पत्र से धमकी मिली थी कि पत्रकारों के एक गुट में शामिल हो जाओ नहीं तो जेल पहुंचा दिए जाओगे. मैंने इस बात की जानकारी अतिरिक्‍त पुलिस अधीक्षक को दी थी. इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, अब मुझे फंसाने की कोशिश की जा रही है. राजू सरदार का कहना था कि आरोपी का प्रेस कांफ्रेंस भी मात्र तीन पत्रकारों के सामने किया गया, जबकि अन्‍य प्रेस कांफ्रेंस में सभी मीडियाकर्मियों को बुलाया जाता है. उन्‍होंने कहा कि अगर ऐसे आरोप थे तो हम दोनों को आमने-सामने कराकर पूछताछ करते. जांच के लिए हमारी कॉल डिटेल निकाली जाती, पर ऐसा कुछ नहीं किया गया. यह साजिश है मुझे बदनाम करने के लिए. अगर इसमें सच्‍चाई है तो जांच कराकर मेरे ऊपर मुकदमा कायम किया जाए.

पत्रकार पर तेजाबी हमला के विरोध में 16 मार्च को रैली

महाराष्ट्र में पिछले चार दिन में सतारा और परभणी जिले के पूर्णा में पत्रकारों के उपर जो हमले हुए है, उसके विरोध में महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति की और से 16 मार्च को परभणी में डेमॉस्टेशन, रैली का आयोजन किया गया है. इस आंदोलन में मराठवाड़ा के एक हजार से ज्‍यादा पत्रकार हिस्सा लेके पत्रकार के प्रति असंवेदशील बने सरकार के विरोध में अपना क्रोध प्रकट करेंगे. पत्रकार हमला विरोधी ऍक्शन कमिटी के चेयरमैन, वरिष्ठ पत्रकार एसएम देशमुख इस आंदोलन का नेतृत्व करेंगे.

सतारा में पत्रकार विशाल कदम के उपर हुये हमले को पुलिस अभी भी गंभीरता से नहीं ले रही है. अभी तक पुलिस ने हमलावरों के हिरासत में नहीं लिया. पूर्णा के चार हमलावरों को हिरासत में तो ले गया है, लेकिन इस हमले का मास्टर मांइड शहर कांग्रेस के मुखिया आौर गुटका किंग को पुलिस अभी तक हिरासत में नहीं ले सकी है. पुलिस का कहना है वह लापता है. पुलिस और राज्‍य सरकार के इस रवैये से महाराष्ट्र के पत्रकारों में काफी गुस्सा है. वह परभणी में प्रकट हो रहा है. महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर बढ़ते हमले को लेकर प्रदेश में पत्रकार प्रोटेक्शन कानून की मांग पत्रकार पिछले चार साल से कर रहे हैं, लेकिन सरकार इस मांग की अनदेखी कर रही है.

इस रैली से पत्रकार सरकार, माफ़िया और हमलावारों को चेतावनी देना चाहते हैं कि कोई भी दहशत या गुंडागर्दी उन्‍हें उनके काम से विचलित नहीं कर सकती. हमले से वे डरते नहीं. इसके आगे भी हम भ्रष्टाचार और गैरकानूनी काम करनेवालों के विरोध में हम हमारा अभियान चालू रखेंगे. कल रात एसएम देशमुख ने प्रदेश के होम मिनिस्टर आरआर पाटील से बात की, उन्होंने बताया कि पत्रकार के ऊपर हमला करनेवालों से पुलिस सख्‍ती से निपटेगी.

इन्‍होंने भैरोसिंह शेखावत को राजस्‍थान में बेगाना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी

इश्क, व्यापार और राजनीति में जो होता है, वह सब जायज माना जाता है। लेकिन राजनीति जब खोई हुई सत्ता पाने की हो रही हो, तब तो फिर, जो हो रहा है, उसे आंख मूंदकर जायज मानने के अलावा और किसी के पास और कोई चारा ही नहीं होता। सो, राजस्थान में श्रीमती वसुंधरा राजे जो कुछ भी कर रही है, वह जायज ही है, यह मानने में बुराई क्या है।

बात इश्क, व्यापार और राजनीति के ताल मेल की थी। अपन नहीं जानते कि श्रीमती वसुंधरा राजे को अपने जीवन में कभी इश्क करने की फुरसत मिली या नहीं। अपन यह भी नहीं जानते कि उन्होंने कभी कोई व्यापार भी किया या नहीं। मगर जितना अपन उनको जानते हैं, उसके हिसाब से इतना जरूर जानते हैं कि श्रीमती राजे ने इश्क किया तो वह भी सिर्फ राजनीति से किया, और व्यापार किया तो वह भी राजनीति का ही। मतलब साफ है कि अपने इस राजनीतिक इश्क को सफलता के मुकाम पर पहुंचाने के लिए राजनीति भी व्यापार की ही की। इश्क, व्यापार और राजनीति का यह अगड़म – बगड़म क्या आपसी समझ में आया? नहीं आया ना। आएगा भी कैसे। यह अजब का तालमेल और गजब का घालमेल जब अपनी समझ में भी आसानी नहीं आया, राजनीति के बड़े बड़े पंडितों के भी पल्ले नहीं पड़ा, तो आपकी समझ में कैसे आएगा। लेकिन राजस्थान में चुनाव जैसे जैसे नजदीक आने लगे हैं, राजनीति के इस घालमेल को श्रीमती वसुंधरा राजे ज्यादा गजब से निभाने लगी है।

खंडहर महल लगने लगे हैं और राजस्थान बीजेपी के परिदृश्य में इसीलिए परिवर्तन दिख रहा है। श्रीमती राजे अब उन सबको गले लगाने को बेताब हैं, जिनको कभी वह फूटी आंख भी देखना नहीं चाहती थी। पिछले दिनों श्रीमती राजे स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत की पत्नी श्रीमती सूरज कंवर के घर गई। श्रीमती राजे ने सूरज कंवर से बहुत सारी बातें की और हालचाल पूछा। सर झुकाकर प्रणाम करते हुए आशीर्वाद भी लिया। यह वही वसुंधरा राजे हैं, जिन्होंने राजस्थान के सिंह कहलाने वाले भैरोंसिंह शेखावत को अपने प्रदेश में ही बेगाना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

स्वर्गीय शेखावत राजस्थान में विपक्ष के नेता की अपनी गद्दी वसुंधरा राजे को सौंपकर दिल्ली गए थे। लेकिन वसुंधरा राजे ने राज शिष्टाचार की वह व्यावहारिक परंपरा भी नहीं निभाई, जिसमें देश के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को पूरे कार्यकाल में अधिकारिक रूप से हर प्रदेश में कमसे कम एक बार तो आमंत्रित किया ही जाता है। अपन शेखावत के उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में लंबे वक्त तक उनके साथ रहे हैं। सो, इतना तो जानते ही हैं कि श्रीमती राजे यह नहीं चाहतीं थीं कि उपराष्ट्रपति के पद से रिटायर होने के बाद शेखावत फिर से राजस्थान में अपनी राजनीतिक पकड़ गहरी करें। जो लोग थोड़ी बहुत राजनीति समझते हैं, उनको यह भी अच्छी तरह से पता है कि वसुंधरा राजे अपने कार्यकाल में इतनी आक्रामक हो गई थीं कि बीजेपी के बहुत सारे लोग शेखावत की परछाई से भी परहेज करने लगे थे। वजह यही थी कहीं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे नाराज न हो जाएं।

वैसे, शेखावत ही नहीं, बीजेपी के और भी ऐसे कई नेता हैं, जो वरिष्ठ हैं, पर उनको श्रीमती राजे ने खंडहर तक कहा और ठिकाने लगाने की सारी कोशिशों कीं। मगर अब जब चुनाव सर पर हैं। बीजेपी में बहुत सारी बुरी बातों के बुलबुले बवाल बनकर बरसने को तैयार हैं, तो श्रीमती वसुंधरा राजे बहुत ही विनम्र भाव से उन्हीं खंडहरों में अपनी जीत की उम्मीदों का आशियाना तलाश रही है। पिछले दिनों वे इसी सिलसिले में बीजेपी के पूर्व उपमुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा और वरिष्ठ नेता ललित किशोर चतुर्वेदी जैसे दिग्गजों की देखभाल करने भी गईं। वैसे, श्रीमती राजे खंडहरों की उस अलग किस्म की मजबूरी को भी अच्छी तरह से जानती हैं कि खंडहर भी तो अपनी भूली बिसरी प्रतिष्ठा को फिर से पाने की आस में बैठे होते हैं। राजनीति के इश्क में डूबी श्रीमती राजे इसीलिए खंडहरों को महलों जैसा सम्मान देने का व्यापार करने में जुटी हैं।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

मीडिया पर शिकंजा कसने की तैयारी : रुकेंगे विज्ञापन और पत्रकार-संपादक की मान्‍यता होगी रद्द

नई दिल्ली : राज्यसभा में विभिन्न दलों के सदस्यों द्वारा मीडिया के नियमन के लिए एक प्राधिकार बनाए जाने की जरूरत पर बल दिए जाने के बीच सरकार ने कहा कि वह भारतीय प्रेस परिषद कानून में संशोधन पर विचार कर रही है ताकि इस संस्था को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।

सरकार ने कहा कि संशोधन में प्रेस परिषद को किसी प्रकाशन का पंजीकरण तथा किसी संपादक या पत्रकार की मान्यता निलंबित करने का अधिकार दिए जाने के प्रावधान भी विचाराधीन हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने तेदेपा के वाई एस चौधरी द्वारा लाए गए एक निजी संकल्प पर हुई चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि देश में कई ऐसे कानून हैं जिनसे मीडिया का प्रभावी ढंग से नियमन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि देश में मीडिया की अभिव्यक्ति के अधिकार और उसके नियमन के बीच का संतुलन बना रहे।

उन्होंने कहा कि विभिन्न सरकारों ने मीडिया के नियमन के लिए तमाम कानून बनाये हैं लेकिन उनको संतोषजनक ढंग से लागू किये जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मीडिया के क्षेत्र के मुद्दों से निबटने के लिए भारतीय प्रेस परिषद के पास पर्याप्त अधिकार हैं।

तिवारी ने कहा कि प्रेस परिषद को प्रभावी बनाने के लिए सरकार संबंधित कानून में संशोधन पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सभी पक्षों के साथ विचार विमर्श कर सहमति बनाने का प्रयास किया जायेगा। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित संशोधनों में मीडिया को मिलने वाले सरकारी विज्ञापनों पर छह माह तक रोक लगाने का भी प्रस्ताव विचाराधीन है। साथ ही पत्रकार या संपादक की मान्यता तीन माह तक रद्द करने जैसे प्रस्ताव भी किए गए हैं। उन्होंने कहा कि वह अपने अनुभव से कह सकते हैं कि मीडिया भी अब एक उद्योग बन गया है। (एजेंसी)

US journalist charged with hacking conspiracy

Washington : A Reuters journalist in the US has been charged of conspiring with the infamous hacker group “Anonymous” to deface the website of the Los Angeles Times in 2010. Matthew Keys, 26, currently deputy media editor for Reuters, was yesterday charged by the US Justice Department of conspiring with hackers.

At that time Keys worked for a Sacramento-based TV station KTXL FOX 40’s, owned by the Tribune Company, where he was web producer until October, 2010, when he was terminated from his job.

The three-count indictment alleges that in December, 2010, Keys provided members of the hacker group “Anonymous” with log-in credentials for a computer server belonging to KTXL FOX 40’s corporate parent, the Tribune Company. Tribune also owns the Los Angeles Times.

According to the indictment, Keys identified himself on an internet chat forum as a former Tribune Company employee and provided members of Anonymous with a login and password to the Tribune Company server. After providing log-in credentials, Keys allegedly encouraged the Anonymous members to disrupt the website.

According to the indictment, at least one of the computer hackers used the credentials provided by Keys to log into the Tribune Company server, and ultimately that hacker made changes to the web version of a Los Angeles Times news feature. The indictment further alleges that Keys had a conversation with the hacker who claimed credit for the defacement of the Los Angeles Times website.

The hacker allegedly told Keys that Tribune Company system administrators had thwarted his efforts and locked him out. Keys attempted to regain access for that hacker, and when he learned that the hacker had made changes to a Los Angeles Times page, he responded by saying, “nice”, according to the indictment. If convicted, Keys faces up to 10 years in prison, three years of supervised release and a fine of $ 250,000 for each count. (बीएल)

पढि़ए सुब्रत रॉय के जीवन के बारे में दस रोचक तथ्‍य

बिहार में जन्मे और बंगाली मूल के सहारा प्रमुख सुब्रत ऱॉय खुद को सहारा श्री कहलाना पसंद करते हैं। 1978 में 2000 रुपये से शुरू किया गया उनका बिजनेस आज हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। उनके पुराने जानने वाले बताते हैं कि उन्होंने एक स्कूटर के साथ अपना सफर शुरू किया था। तब दिन में 100 रुपये कमाने वाले लोग उनके पास 20 रुपये जमा कर जाते थे। चमकदार सफर में सुब्रत रॉय कई बार विवादों में भी आए।

सुब्रत ईश्वर और किस्मत में गहरी आस्था रखते हैं। वे अपनी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत के अलावा ईश्वर के चमत्कार और अपनी अच्छी किस्मत को भी देते हैं। वह अपने आप को आशावादी भी मानते हैं। जानिए उनके जीवन से जुड़े दस रोचक तथ्य :

– कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले उन्होंने अपने नाम से विज्ञापन देकर देश की इज्जत का हवाला देकर इसकी जांच टालने की अपील की थी। सहारा परिवार ने पिछले साल 10 मई को विज्ञापन देकर सुब्रत रॉय के सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के नोटिस वाली खबर पर भी हैरानी जताई थी।

– सहारा श्री अक्सर नामी हस्तियों के साथ देख जा सकते हैं। लेकिन वह इसके अलावा उन लोगों से मिलना भी पसंद करते हैं जो अपनी जिंदगी में मेहनत के दम से आगे बढ़ें हों। भले ही उन्हें उनकी मेहनत और कामयाबी के लायक प्रसिद्धि न मिली हो।

– सुब्रत के मुताबिक जो आदमी सिर्फ अपने भले के लिए काम करेगा वह आगे नहीं बढ़ सकता है जब तक उसकी दूसरों को देने की इच्छा नहीं होगा। अपने साथ ही दूसरों का भी भला करने की चाहत ही लोगों को आगे बढ़ाती है।

– सहारा प्रमुख अपने बचपन में सेना में जाना चाहते थे। वह सेना की भर्ती में भी गए थे, बस भर्ती नहीं हुए। सेना की वर्दी से उन्हें इतना लगाव है कि स्कूली दिनों में वह एनसीसी कैडेट भी रहे हैं।

– पढ़ने लिखने में कमजोर रहे सहारा प्रमुख ने स्वप्ना रॉय से प्रेम विवाह किया है। यूनिवर्सिटी टॉपर पर उनका दिल आ गया था। दोनों का अफेयर करीब छह साल तक चला था। उन की पत्नी ने उनकी अंग्रेजी सुधारने में भी मदद की है।

– सुब्रत रॉय हिंदी फिल्मों के शौकीन हैं। उन्हें कई पुराने गीत पसंद हैं। एक जमाने में उन्हें वहीदा रहमान बहुत अच्छी लगती थी लेकिन जब तक वह उनसे मिले तो वहीदा के बाल सफेद हो चुके थे। इसके बावजूद रॉय ने उन्हें अपने दिल की बात बताई थी।

– देवानंद उनके पसंदीदा अभिनेता रहे हैं। उन्होंने देवानंद की फिल्म गाइड कम से कम 11 बार देखी है। वह खुद को रोमांटिक भी मानते हैं और कहते हैं कि उनका अपने काम से भी रोमांस है।

– सहारा प्रमुख दोस्तों के दोस्त भी हैं। बॉलीवुड स्टार अमिताभ बच्चन से उनकी दोस्ती अमिताभ के बुरे समय में ही हुई थी, तब उन्होंने बिग बी की मदद भी की थी। वह कहते हैं कि उन्हें अपने पिता से ऐसी शिक्षा मिली है।

– सुब्रत रॉय के साथ उनके स्कूल, कॉलेज टाइम के करीब 100 दोस्त भी काम करते हैं। रॉय कहते हैं कि उन्होंने इन सभी को बड़ी मुश्किल से खोज कर निकाला और अपने साथ काम करने का मौका दिया।

– टाइम मैगजीन ने सहारा को भारतीय रेलवे के बाद दूसरी सबसे ज्यादा नौकरी देने वाली संस्था बताया था। इंडिया टुडे ने उनका नाम देश के 10 सबसे ताकतवर लोगों में शामिल किया था। (डीबी)

डीएलए के अखिलेश सिंह को मिला मीडिया रत्‍न सम्‍मान

नई दिल्‍ली में मंडी हाउस स्थित श्रीराम आडिटोरियम में आयोजित नौवें विश्‍वामित्र परिवार सम्‍मान समारोह में पत्रकार अखिलेश सिंह एवं पल्‍लवी मिश्रा को क्रमश: मीडिया रत्‍न एवं विशेष महिला रत्‍न से सम्‍मानित किया गया. अखिलेश सिंह इस समय डीएलए, नोएडा में क्राइम रिपोर्टर की भूमिका निभा रहे हैं. उन्‍हें बेहतरीन क्राइम रिपोर्टिंग के लिए यह सम्‍मान दिया गया है. अखिलेश को इससे पहले 2005 में लखनऊ में सिम्‍बोसिस इंस्‍टीट्यूट ने सम्‍मानित किया था.

स्‍वतंत्र चेतना, लखनऊ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अखिलेश पंजाब केसरी, साधना न्‍यूज, सुदर्शन न्‍यूज, न्‍यूज आपतक, टीवी100 को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इसके बाद वे डीएलए को अपनी सेवा दे रहे हैं. अखिलेश के अलावा मीडिया व समाज सेवा के क्षेत्र में महिला रत्न का विशेष सम्मान पल्लवी मिश्रा को दिया गया. इस अवसर पर संस्था ने पर्यावरण संरक्षण के लिए देश भर में 11 करोड़ वृक्ष लगाने का आह्वान किया.

नेशनल दुनिया की एडिटर डिजाइन बनी अनीता सिंह

अमर उजाला, नोएडा से पिछले दिनों इस्‍तीफा देने वाली एडिटर डिजाइन अनीता सिंह ने अपनी नई पारी नेशनल दुनिया के साथ शुरू की है. उन्‍हें नेशनल दुनिया में भी एडिटर डिजाइन बनाया गया है. अनीता सिंह को प्रिंट मीडिया को तेजतर्रार डिजाइनर माना जाता है. वे लंबे समय से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रही थीं. कुछ दिन पहले ही उन्‍होंने अमर उजाला को बाय कर दिया था. तभी से उनके किसी दूसरे संस्‍थान से जुड़ने के कयास लगाए जा रहे थे. अमर उजाला से पहले वे हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के साथ काम कर चुकी हैं.

सुब्रत रॉय की मुश्किल बढ़ी, हिरासत में लिए जाने के लिए सेबी की याचिका

बाजार नियामक सेबी ने सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय को हिरासत में लिए जाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है जिसमें उन्होंने अपील की है कि सुब्रत रॉय को भारत से बाहर जाने की इजाज़त न दी जाए. सेबी का ये क़दम निवेशकों के 24 हज़ार करोड़ रुपए लौटाने से जुड़ा है, जिस पर अमल नहीं हुआ. सेबी ने ये मामला जस्टिस केएस राधाकृष्णन की बेंच के सामने रखा, जिसके बाद बेंच ने अप्रैल के पहले हफ्ते में मामले की सुनवाई की बात कही.

सेबी ने कोर्ट से अपील की है कि मामले की अगली सुनवाई तक वो सहारा के प्रमुख सुब्रत रॉय और सहारा के दो अन्य निदेशकों को हिरासत में लिए जाने के लिए क़दम उठाए. सेबी ने कोर्ट से अपील की है कि उनके पासपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट में रखवा लिए जाएं. सहारा ग्रुप और सेबी के बीच 24,000 करोड़ रुपए की वसूली को लेकर क़ानूनी लड़ाई चल रही है.

सहारा हाउसिंग इवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसएचआईसीएल) और सहारा इंडिया रियल स्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसआईआरईसीएल) के ख़िलाफ़ अपने दो अलग-अलग आदेशों में सेबी ने कहा है कि इन दोनों कंपनियों ने बॉन्ड धारकों से 6,380 करोड़ और 19,400 करोड़ रुपए की राशि जुटाई और इसमें 'विभिन्न अनियमितताएं' बरती गईं. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अगस्त में सहारा ग्रुप को आदेश दिया था कि वो निवेशकों को 15 प्रतिशत ब्याज के साथ उनका पैसा लौटाए और सेबी से इस काम को सुगम बनाने को कहा था.

इससे पहले सहारा ग्रुप ने कोशिश की थी कि कोर्ट उन्हें ये पैसा चुकाने के लिए कुछ और समय दे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस याचिका को ख़ारिज कर दिया और साथ ही उन्हें फटकार भी लगाई. सहारा समूह का दावा है कि सेबी का आदेश ‘पुराने तथ्यों’ पर आधारित है और शेयर बाज़ार नियामक का किसी व्यक्ति की संपत्ति की कुर्की का आदेश देना ठीक नहीं है. सहारा के अनुसार सेबी के आदेश जनवरी 2012 के तथ्यों पर आधारित हैं और तब से अब तक चीज़ें बदल चुकी हैं. प्रवक्ता ने कहा कि पैसे कंपनियों को लौटाने हैं, ऐसे में व्यक्तिगत संपत्तियों की कुर्की के आदेश उचित नहीं हैं. (बीबीसी)

अफजल गुरु पर प्रस्‍ताव पास करने के चलते भारत-पाकिस्‍तान हॉकी सीरीज रद्द

नई दिल्ली। अफजल गुरु को फांसी पर लटकाए जाने पर पाकिस्तानी नेशनल असेंबली में निंदा प्रस्ताव पारित किए जाने से देश की सियासत गर्म हो गई है। सरकार ने जहां पाकिस्तान को अपने हद में रहने की नसीहत दी है, वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी ने इसे मुद्दा बना लिया है। लोकसभा में जोरदार हंगामे के बाद पाकिस्तान के खिलाफ प्रस्ताव लाने का फैसला किया गया है। इसके अलावा अप्रैल में होने वाली भारत-पाक हॉकी सीरीज रद्द कर दी गई है। इस सीरीज के आधे-आधे मैच दोनों देशों में होने थे।

इससे पहले, बीजेपी ने कड़ा रख अपनाते हुए पाकिस्तानी संसद के निंदा प्रस्ताव पर दोनों सदनों में चर्चा की मांग की। लोकसभा में यशवंत सिन्हा और राज्यसभा में प्रकाश जावडेकर ने प्रश्नकाल स्थगित कर इस मुद्दे पर चर्चा कराने का नोटिस दिया। यशवंत सिन्हा का नोटिस स्वीकार न किए जाने पर जोरदार हंगामा हुआ। इसकी वजह से लोकसभा की कार्यवाही पहले आधे घंटे के लिए और फिर 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। यशवंत सिन्हा का कहना है कि पाकिस्तान ने अफजल गुरु के मामले पर अपनी संसद में जो प्रस्ताव जारी किया है, वह हमें किसी भी सूरत में मंजूर नहीं होगा और इस मामले पर संसद में चर्चा की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान के खिलाफ हमारी संसद से प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा कि पाकिस्तान सारी हदें पार कर दी हैं। जेटली ने कहा कि अब आधिकारिक तौर पर यह पुष्ट हो गया है कि पाकिस्तान क्या चाहता है। भारत सरकार को कड़ा फैसला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान से बातचीत का कोई फायदा नहीं है। इस तरह के प्रस्ताव पास करने से दोनों देशों के बीच शांति नहीं बहाल हो सकती है। उन्होंने कहा कि इटली से लेकर इस्लामाबाद तक के मुद्दे पर विदेश नीति को लेकर चर्चा करनी चाहिए। इसके बाद दोनों देशों के बीच होने वाली हाकी सीरीज रद्द करने का फैसला ले लिया गया।

दहेज ने ले ली उड़ीसा के कानून मंत्री की कुर्सी

भुवनेश्वर : ओडिशा के आवास एवं शहरी विकास, कानून एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री राहुनाथ मोहंती ने उनकी बहू द्वारा उन पर दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाए जाने के बाद शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को इस्तीफा सौंपने के बाद मोहंती ने कहा, 'मैंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया है ताकि पुलिस स्वतंत्र जांच कर सके. इस आरोप में कोई सच्चाई नहीं है.'

उनकी बहू वर्षा स्वोनी चौधरी ने गुरुवार को बालासोर के जिला मुख्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी. उन्होंने अपनी शिकायत में लिखा था कि मंत्री और उनका परिवार उनसे दहेज में 25 लाख रुपये और एक वाहन की मांग कर रहा है. दर्ज शिकायत के मुताबिक मंत्री के बेटे राजाश्री मोहंती के साथ जून 2012 में हुई शादी के बाद से उसका मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न किया जा रहा था.

उसका कहना है कि उसके पिता ने मांग के अनुरूप 10 लाख रुपये दहेज के रूप में दिए थे लेकिन ससुर और उनका पूरा परिवार इससे नाखुश था और 25 लाख रुपये और एक वाहन की मांग कर रहे थे. कैबिनेट मंत्री ने हालांकि, इन आरोपों को असत्य ठहराया है. मोहंती ने कहा, 'आरोप झूठे हैं और हर कोई जानता है कि हम ऐसा नहीं करेंगे. सच जल्द सामने आएगी और कानून अपने तरीके से काम करेगा.' (एबीपी)

श्री न्‍यूज से जुड़े निहाल, अमर उजाला में रीतेश को हटाया गया

: दीपक त्रिपाठी बने विधि संवाददाता : श्री न्‍यूज से खबर है कि निहाल अख्‍तर ने यहां से नई पारी शुरू की है. उन्‍हें डेस्‍क पर लाया गया है. इससे पहले वे जनता टीवी में आउटपुट डेस्‍क पर काम कर रहे थे. इसके अलावा इन्‍होंने बतौर रिपोर्टर हिुदी दैनिक हमारा समाज के साथ भी काम कर चुके हैं.

देवरिया से खबर है कि अमर उजाला, प्रबंधन ने रीतेश मोहन श्रीवास्‍तव को हटा दिया है. रीतेश लंबे समय से अमर उजाला से जुड़े हुए थे तथा विधि संवाददाता के रूप में काम कर रहे थे. उनकी जगह दीपक त्रिपाठी को विधि संवाददाता बना दिया गया है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन को रीतेश के खिलाफ कुछ शिकायतें मिली थीं, जिसके बाद यह कार्रवाई की गई है.

इलाहाबाद में सपा विधायक के समर्थकों का तांडव, बसपा नेता का घर फूंका

इलाहाबाद। सूबे में कानून व्यवस्था की धज्जियां अपने ही उड़ा रहे हैं। मंत्री और विधायक पर अगुंली उठती है पर सरकार इसे कम नहीं कर पा रही है। आए दिन कभी कुंडा कांड, कभी कैबिनेट मंत्री का अमेठी की महिला डीएम की खूबसूरती पर सार्वजनिक टिप्पणी… क्या कहा जाए।

सपा सरकार के ‘टीपू सुल्तान’ कहे जाने वाले अखिलेश यादव को सत्ता की गद्दी संभाले एक साल हो गए हैं इसके बावजूद चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। सामान्य आदमी से लेकर पुलिस अफसर तक की हत्या की जा रही है। सपाई और प्रशासन की कुर्सी पर बैठे सीनियर अफसर हो सकता है न मानें पर आमजन तो इसे जंगलराज से भी बदतर मान रही है। 14 मार्च को इलाहाबाद जिले के नवाबगंज थाना क्षेत्र स्थित मुबारकपुर गांव में सपा विधायक अंसार अहमद के समर्थकों ने दबंगई का जमकर नंगा नाच खेला। कई घंटे तक हुए तांडव में इलाहाबाद की ‘बहादुर-पुलिस’ बैकफुट पर रही।

मुबारकपुर में दबंगों ने रईस धोबी नामक दलित का दिनहाड़े मकान फूंक दिया। घर में मौजूद बूढ़ी मां, बहन समेत तीन महिलाओं ने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई। दिनदहाड़े हुई इस घटना से गांव में दहशत है। गांव के ही तीन लोगों के खिलाफ नामजद तहरीर दी गई है। पुलिस ने घटना की पुष्टि तो की है पर अभी तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की है। रईस अहमद बसपा का पुराना स्थानीय नेता है। मौजूदा समय में रईस अहमद मुस्लिम भाईचारा कमेटी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है। गांव के कुछ लोगों से रंजिश चल रही है।

बसपा के पूर्व विधायक गुरुप्रसाद मौर्य के कार्यकाल में करीब दो साल पहले रईस अहमद को विधायक निधि से इंडिया मार्का टू हैंडपंप दिया गया था। इस हैंडपंप को रईस अहमद ने अपने दरवाजे के सामने लगाया। रईस अहमद की मां के मुताबिक बुधवार को पड़ोसियों ने उसके हैंडपंप का हत्था जबरन निकाल लिया था। इसकी शिकायत नवाबगंज थाने में की गई। पुलिस ने मामले को हल्के में लिया। कोई कार्रवाई न होने पर भुक्तभोगी ने बसपा नेता व पूर्व विधायक गुरुप्रसाद मौर्य से शिकायत की। बताया जा रहा है कि गुरुप्रसाद मौर्य ने नवाबगंज पुलिस से बात की।

गुरुवार को भोर में मनबढ़ पड़ोसियों ने रईस अहमद के मकान में आग लगा दी। देखते ही देखते दलित रईस अहमद का घर धू-धू कर जल गया। आरोपियों के दबंगई को देखते हुए गांव के लोग आग बुझाने की मदद तक नहीं कर सके। थाने पहुंचकर रईस अहमद की मॉ ने गांव के ही तीन लोगों के खिलाफ नामजद तहरीर दी है। अभी तक पुलिस ने मामले में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं किया है। उधर, पूर्व विधायक गुरुप्रसाद मौर्य ने लखनऊ से फोन पर बातचीत करते हुए बताया कि मामले को पार्टी गंभीरता से लेगी। नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य को घटना से अवगत कराया जाएगा। जरूरत पड़ने पर विधानसभा में भी इस मामले को उठाया जाएगा। 

सत्ता बदलते ही हुआ था जानलेवा हमला : विधानसभा चुनाव के बाद बसपा सरकार के जाते ही रईस अहमद पर जानलेवा हमला हुआ था। हमलावरों ने इसका हाथ पैर तोड़कर उसे मरणासन्न हालत में छोड़ा था। उसी समय रईस अहमद ने स्थानीय पुलिस से सुरक्षा मांगी थी। उस समय भी कोई कार्रवाई न होने पर रईस अहमद को स्थानीय पुलिस चौकी डांडी में रहकर वक्त काटने को मजबूर होना पड़ा था। इस घटना के बाद से ही रईस अहमद भयवश घर छोड़कर बाहर रह रहा है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

महुआ न्‍यूज से मेनका, सुनील, प्रियव्रत एवं शैलेश का इस्‍तीफा

महुआ न्‍यूज से खबर है कि चार लोगों ने यहां से इस्‍तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि नए प्रबंधन के आने के बाद ये लोग परेशान थे. माना जा रहा है कि जल्‍द ही कुछ और लोग इस्‍तीफा दे सकते हैं. जिन लोगों ने इस्‍तीफा दिया है, उनमें मेनका चौधरी, सुनील पाण्‍डेय, प्रियव्रत त्रिपाठी एवं शैलेश सिंह शामिल हैं.

मेनका चौधरी ने अपनी नई पारी न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल के साथ शुरू की है. सुनील पाण्‍डेय महुआ छोड़कर जी न्‍यूज पहुंचे हैं. प्रियव्रत चतुर्वेदी श्रीएस7 के साथ जुड़ गए हैं. शैलेश के बारे में अभी पता नहीं चल पाया है कि वे कहां ज्‍वाइन करने वाले हैं. बताया जा रहा है कि कुछ और लोग इस्‍तीफा दे सकते हैं. काफी समय से खराब स्थिति से गुजर रहे महुआ में स्थिति और बदतर हो गई है. इसलिए लोग नए ठिकानों की तलाश शुरू कर चुके हैं.

जयनारायण बने देवघर प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष, राकेश कर्महे महामंत्री

देवघर प्रेस क्‍लब का चुनाव संपन्न हो गया. जिसमें अध्यक्ष के रूप में जयनारायण राय (दैनिक जागरण) का मनोनयन हुआ. जबकि महासचिव राकेश कर्महे (दैनिक हिंदुस्तान) को महासचिव पद पर पुनः मनोनीत किया गया. देवघर प्रेस क्‍लब भवन में आहूत बैठक में सभी पदों के लिय सहमती ली गयी. सर्वप्रथम निवर्तमान अध्यक्ष रामनंदन सिंह ने नए अध्यक्ष के रूप में जय नारायण राय का नाम प्रस्तावित किया. जिस पर सबने अपनी सहमति दे दी.

इसके अलावे सचिव के रूप में चन्द्र विजय प्रसाद चन्दन (दैनिक रांची एक्सप्रेस) और संजीत मंडल (दैनिक प्रभात खबर) का मनोनयन हुआ. जबकि उपाध्यक्ष पद के लिए बीएस वाजपेयी (सहारा समय), आशीष कुंदन (दैनिक प्रभात खबर), जीतेन्द्र कुमार सिंह (न्यूज़ ११) और आरसी सिन्हा (दैनिक जागरण) का मनोनयन किया गया. साथ ही कोषाध्यक्ष के पद दैनिक जागरण के कंचन सौरभ मिश्रा और अंकेक्षण के लिए प्रशांत सिंह (दैनिक हिंदुस्तान) का चयन किया गया.

चुनाव प्रक्रिया में नई कार्यकारिणी का भी गठन किया गया. जिसमें सदस्य के रूप में धनंजय भारती (सहारा समय), बैद्यनाथ वर्मा ( छायाकार दैनिक जागरण), विकास कुमार (साधना न्यूज़), प्रदीप कुमार सिंह (दैनिक जागरण), अंग्रेज दास (छायाकार दैनिक प्रभात खबर), अजय संतोषी (छायाकार दैनिक हिंदुस्तान) और नितिन चौधरी (प्रभात खबर) को रखा गया. क्लब के लिय संपन्न इस चुनाव में संरक्षक के रूप में प्रभात खबर के स्थानीय संपादक सुशील भारती, रामनंदन सिंह, अशोक कुमार बरनवाल, राम प्रसाद भारती और केबी सहाय का मनोनयन किया गया.

चीफ जस्टिस खिलराज रेगमी बने नेपाल के पीएम

काठमांडू : नेपाल के चीफ जस्टिस खिल राज रेगमी ने गुरुवार को नेपाल के नए प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली। वह अंतरिम सरकार के मुखिया होंगे, जिसे नेपाल में 21 जून को चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभानी है। उनके शपथ लेने के साथ नेपाल में लंबे अर्से से चल रहा राजनीतिक और संवैधानिक संकट खत्म हो गया है। 63 साल के रेगमी का चयन नेपाल की तीन पार्टियों के अलावा युनाइटेड डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट (यूडीएमएफ) ने मिलकर किया है।

राष्ट्रपति रामबरन यादव ने रेगमी को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई। इसके बाद रेगमी ने दो मंत्रियों माधव घिमिरे और हरि प्रसाद नौपाने को शपथ दिलाई। इससे पहले कल चारों पार्टियों में चार अहम मुद्दों पर सहमति बनी। जिसके तहत एक आयोग बना है जो माओवादियों और अन्य लोगों पर दर्ज मामलों की जांच करेगा, नेपाली सेना में एक कर्नल और दो लेफ्टिनेंट कर्नल की पोस्ट माओवादी लड़ाकों को मिलेगी, वोटर लिस्ट चुनाव से पहले अपडेट होगी, नागरिकता प्रमाणपत्र के वितरण से जुड़े मुद्दों को सुलझाया जाएगा। (पीटीआई)

अफजल गुरु पर पाक संसद में प्रस्‍ताव, भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

नई दिल्ली। आतंकवाद के खिलाफ जंग पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले पाकिस्तान ने एक बार फिर अपना असल रंग दिखाया है। पाकिस्तानी संसद के निचले सदन में भारतीय संसद पर हमले के गुनहगार आतंकी अफजल गुरु की फांसी के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया। ये प्रस्ताव जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान ने पेश किया। भारत ने पाकिस्‍तान के इस हिमायत पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए कहा है कि पाकिस्‍तान भारत के आंतरिक मामलों में हस्‍तक्षेप न करे।

पाकिस्‍तानी संसद में पारित प्रस्ताव में अफजल का शव उसके परिजनों को सौंपने की मांग की गई है। जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को कश्मीर समस्या हल करने में मदद करनी चाहिए। प्रस्ताव के मुताबिक कश्मीर मुद्दा हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव लागू होने चाहिए। प्रस्ताव में कश्मीर घाटी के सभी शहरों से सेना हटाने की भी बात कही गई है। साथ ही प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार किए गए सभी कैदियों को रिहा करने की भी मांग की गई।

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि पाकिस्तान को कोई हक नहीं है कि वो भारतीय कानून के तहत किसी दोषी को फांसी दिए जाने का विरोध कर इस तरह का प्रस्ताव पास करे। उन्‍होंने कहा कि पाकिस्तान संसद का प्रस्ताव भारत के घरेलू मामलों में बेवजह दिलचस्पी है। अच्छा होगा पाकिस्तान अपने घर के मामलों तक ही अपने को सीमित रखे। खुर्शीद ने कहा कि ये मामला भारतीय कानून के तहत है। पाकिस्तान को अपनी संसद में अपने देश के मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए और हमें हमारे मामले संभालने देना चाहिए। वहीं केंद्र में मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि पाकिस्तान को भारत के अंदरूनी मामले में बोलने का कोई हक नहीं।

बीजेपी ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया जताई है। पाकिस्तान के तेवर पर सख्त आपत्ति जताते हुए बीजेपी ने सरकार से मांग की है कि इस मामले में पाकिस्तान के राजदूत को बुलाकर फटकार लगाई जाए। बीजेपी नेता राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा कि पाकिस्तान को कोई अधिकार नहीं है कि वो भारत के फैसले और कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। हमें अपने कानून और संविधान पर पूरा विश्वास है। बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि पाकिस्तान के राजदूत को बुलाकार तीखा विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए। भारत सरकार को पकिस्तान को सख्त संदेश देना चाहिए। पाकिस्तान को ऐसा रेसोल्यूशन पास करने का कोई अधिकार नहीं है।

दूसरी तरफ, पाकिस्‍तान अपनी गलती मानने की बजाय उल्टा भारत को ही नसीहत देने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार का कहना है कि भारत को अपने पड़ोसी मुल्क पर भरोसा रखना चाहिए। भारत के राजनीतिक गलियारों में भी इसे लेकर माहौल गर्म है। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दम तोड़ रहा है। इसीलिए पाकिस्तान ने इस मुद्दे को फिर से हवा देने के लिए एक कदम उठाया है।

काजल रेप व हत्‍याकांड : आरोपी को 9 दिन की सुनवाई में मौत की सजा

भोपाल। बहुचर्चित काजल हत्याकांड में 9 दिनों की सुनवाई में ही भोपाल की स्थानीय अदालत ने न्याय कर दिया। 8 साल की बच्ची को किडनैप करके रेप और हत्या करने वाले दरिंदे नंदकिशोर बाल्मिकी को अदालत ने सजा-ए-मौत की सजा सुनाई। काजल की लाश इसी साल 4 फरवरी को मध्य प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता के घर के पास मिली थी। इस हत्याकांड से शहर में सनसनी फैल गई थी और विरोधी पार्टी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राज्य में कानून व्यवस्था को लेकर प्रदर्शन किया था।

डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज सुषमा खोसला ने महज नौ दिनों की सुनवाई के बाद गुरुवार को खचाखच भरी अदालत नंदकिशोर को फांसी का फैसला सुनाया। जज ने फैसले में लिखा है, 'नंदकिशोर का अपराध अमानवीय है। मामले में आई गवाही से साबित हुआ है कि उसने मासूम से दुष्कर्म करने के बाद कन्नी से गला रेतकर उसकी हत्या की है। साथ ही पहचान छुपाने के लिए उसके सिर को पत्थर से कुचला है। नंदकिशोर के अमानवीय कृत्य के लिए मृत्युदंड से भी बड़ी सजा कम है। समाज में सुरक्षा, अपराधियों में भय, फरियादी, पीड़ित की अपेक्षाओ को ध्यान में रखकर अदालतों को फैसला सुनाना चाहिए। नंदकिशोर को तब तक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उसका प्राणांत न हो।'

अदालत ने फैसले की पुष्टि के लिए हाई कोर्ट को भेजने के निर्देश भी दिए हैं। काजल के अपहरण के आरोप में सात साल, दुष्कर्म के आरोप में उम्रकैद, लैंगिक अपराधों में बच्चों का संरक्षण अधिनियम के आरोप में उम्र कैद और साढ़े तीन हजार रुपये जुर्माने की सजा भी सुनाई है। सरकारी वकील राजेंद्र गिरि ने बताया कि यह प्रदेश में पहला मामला है जब 9 दिनों की सुनवाई में फैसला हो गया है।

क्या थी घटना? : 3 फरवरी की काजल अपने छह साल के भाई चुन्नू के साथ भोपाल उत्सव मेला घूमने गई थी। जब दोनों वापस घर आ रहे थे तब नंदकिशरों ने दोनों को रोका और काजल को ऑटो में बैठाकर ले गया था। उसके बाद काजल से झाड़ियों में ले जाकर ज्यादती की और कन्नी से गला रेतकर हत्या कर उसके एक पैर को काटा था। पहचान छुपाने के लिए उसके सिर को पत्थर से कुचल दिया था। माता-पिता ने थाना टीटी नगर में काजल की गुमशुदगी कि रिपोर्ट लिखाई थी। मेला ग्राउंड में किताब की दुकान लगाने वाले अनूप मौर्य ने 4 फरवरी को कुत्ते को एक बच्ची का पैर ले जाते हुए देखा था। उसके बाद मौर्य ने झाड़ियों में जाकर देखा तो बच्ची का सिर कटा शव मिला था। पुलिस ने आरोपी नंद किशोर को 5 फरवरी को कलारी की दुकान से गिरफ्तार किया था।

जज सुषमा खोसला की अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए नियमित रूप से गवाही का सिलसिला जारी रखा। लगातार पांच दिन तक चली गवाही में प्रॉसिक्यूशन ने 33 गवाहों की गवाही कराई थी। खास बात यह रही है कि गुरुवार को अदालत ने 15 मिनट की सुनवाई के बाद ही फैसला सुना दिया।

फैसले के दौरान जज ने नंदकिशोर से पूछा कि तुम्हें अपहरण, बलात्कार, हत्या और साक्ष्य छुपाने के आरोप में दोषी पाया है। तुम्हे कुछ कहना है? नंदकिशोर ने अदालत को बताया कि उसने कोई अपराध नहीं किया है, पुलिस उसे फंसा रही है। जज ने इसके बाद पूछा, 'तुमने अपनी सफाई में यह बात क्यों नहीं कही?' इसके जवाब में नंदकिशोर कुछ भी नहीं बोला। अदालत ने नंदकिशोर को धारा 363 के तहत 7 साल, धारा 366 के तहत में 10 साल, धारा 376 (दो) (एच) 201 के तहत 5 साल, धारा 302 के तहत फांसी और धारा 5(1) लैगिंक अपराधों बालको का संरक्षण अधिनियम 2012 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई है। नंदकिशोर ने कहा कि वह फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील करेगा। (एनबीटी)

पत्रिका, बिलासपुर में इदरीस अंसारी का तबादला

बिलासपुर। पत्रिका में काम करने वाले रिपोर्टर संतोष सिंह, विकास चौबे, मधु शर्मा, लक्ष्मी नारायण, शैलेन्द्र पाण्डेय, योगेश के बाद अब इदरीस अंसारी का ट्रांसफर बीजापुर के लिए कर दिया गया है। गौरतलब है कि संपादक के रूप में अनिल कैले के आने के बाद से अब तक कई तबादले हो चुके हैं। नौ पत्रकारों को नौकरी से हाथ भी धोना पड़ा है। माना जा रहा है कि यह सारी कार्रवाई मजीठिया वेज बोर्ड को देखते हुए पत्रिका प्रबंधन के निर्देश में किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार पत्रिका के जिस संस्करण में रिपोर्टरों की सफाई करनी होती है वहां अनिल कैले को भेजा जाता है। जिनके दबाव एवं फटकार सुनने के बाद अच्‍छे-अच्‍छे रिपोर्टर थम जाते हैं, जो रिपोर्टर नहीं भागते उन्हे स्थानांतरण कर रवाना कर दिया जाता है। पत्रिका से दो रिपोर्टरों शैलेन्द्र और इदरीस का स्थानांतरण इस बार पत्रिका को भारी पडऩे वाला है। कार्य में दक्ष और कर्मठ पत्रकारों को स्थानांतरण कर अपने रास्ते हटाने की इस योजना के बाद अब बिलासपुर से पत्रिका का ही सुपड़ा साफ होने की स्थित आ गई है। अब यहां कोई कर्मचारी काम करने का इच्‍छुक नहीं दिख रहा है। सभी नए मौकों की तलाश में जुटे हुए हैं।

जागरण, मेरठ में कई बदलाव, योगेश चौहान बने मुजफ्फरनगर के ब्‍यूरोचीफ

दैनिक जागरण, मेरठ से खबर आ रही है कि यहां पर संपादकीय में कई बड़े फेरबल किए गए हैं. कंटेंट और व्‍यवस्‍था को चुस्‍त दुरुस्‍त करने के लिए संपादकीय प्रभारी मनोज झा ने कई लोगों को इधर से उधर किया है. माना जा रहा है कि यह बड़ा फेरबदल इसलिए किया गया है ताकि अन्‍य प्रतिद्वंद्वी अखबारों को और पीछे छोड़ा जा सके. लगभग एक दर्जन लोगों को इधर से उधर करके उनकी जिम्‍मेदारी बदली गई हैं.

मुजफ्फरनगर के ब्‍यूरोचीफ अनुज शर्मा को मेरठ बुला लिया गया है. उन्‍हें मुख्‍यालय से अटैच कर दिया गया है. अनुज के खिलाफ कुछ शिकायतें आने के बाद प्रबंधन ने यह निर्णय लिया है. अनुज की जगह बागपत के ब्‍यूरोचीफ योगेश चौहान को मुजफ्फरनगर का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. बागपत का नया ब्‍यूरोचीफ रामानुज को बना दिया गया है, जो बागपत के नजीबाबाद तहसील के प्रभारी थे. नजीबाबाद में राजनारायण कौशिक को भेजा जा रहा है, जो अभी तक बिजनौर में अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे थे.

बुलंदशहर के धामपुर तहसील के प्रभारी अश्‍वनी त्रिपाठी को खुर्जा तहसील का प्रभारी बना दिया गया है. जबकि खुर्जा के प्रभारी योगेशराज को धामपुर भेज दिया गया है. सहारनपुर से रिपोर्टर सुशील कुमार को मुजफ्फरनगर भेज दिया गया है. सिटी टीम में तैनात रिपोर्टर ओम बाजपेयी को सरधना तहसील का प्रभारी बना दिया गया है. बड़ौत के रिपोर्टर देवेंद्र राठी को शामली भेजा जा रहा है. चांदपुर तहसील के प्रभारी विनोद भारती को बिजनौर भेजा गया है. सूत्रों का कहना है कि अभी कुछ और बदलाव किए जा सकते हैं. संभावना है कि होली बाद कुछ और पत्‍ते इधर से उधर फेंटे जाएंगे.

आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर ‘पंगा’ बरकरार!

लंबी जद्दोजहद के बाद आखिर आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर कैबिनेट की मुहर लग गई है। इस विधेयक के कई मसौदों पर मंत्रिमंडल के बीच मतभेद चले आ रहे थे। इसी के चलते विधेयक के मसौदे पर कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिल पा रही थी। मंगलवार को कैबिनेट की विशेष बैठक बुलाई गई थी। लेकिन, इसमें भी मतभेद बरकरार रहे थे।

ऐसे में, सहमति बनाने के लिए मंत्रिसमूह (जीओएम) का गठन किया गया था। इस मंत्रिसमूह ने विवादित मुद्दों पर बुधवार को फैसला कर लिया था। इसकी रिपोर्ट को ही कैबिनेट ने मंजूर कर लिया है। हालांकि, इस विधेयक के कई प्रावधानों पर सपा, बसपा और भाजपा जैसे दलों को घोर आपत्तियां हैं। ये दल इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक पंगा करने के लिए तैयार समझे जाते हैं।

इस विधेयक से जुड़े विवादित मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। यह बैठक सोमवार को होने जा रही है। सरकार की कोशिश है कि इसी बैठक में सर्वदलीय सहमति किसी न किसी तरह बनवा ली जाए। ताकि, इस विधेयक को मंगलवार को ही संसद में चर्चा के लिए रख दिया जाए। तैयारी चल रही है कि 20 मार्च तक इस विधेयक को संसद में पास करा लिया जाए।

लेकिन, भाजपा नेतृत्व प्रस्तावित विधेयक के एक-दो प्रावधानों को लेकर सहमत नहीं है। सपा नेतृत्व ने भी कह दिया है कि इस प्रस्तावित कानून के कई प्रावधानों का भारी दुरुपयोग हो सकता है। ऐसे में, यह कानून समाज में एक नए तरह की जटिलता पैदा कर देगा। इस खतरे को देखते हुए सपा दबाव बनाएगी कि कुछ प्रस्तावित प्रावधानों को बदला जाए। यदि सरकार ने उनके सुझाव को दरकिनार किया, तो इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बन सकती है। भाजपा नेतृत्व को खास तौर पर सहमति से सेक्स के नए प्रावधान पर गहरी आपत्ति है। कैबिनेट ने जिस प्रस्ताव को कल मंजूर कर लिया है, उसमें सहमति से सेक्स के लिए उम्र-सीमा 18 से घटाकर 16 कर दी गई है।

कई महिला संगठनों ने भी इस नए प्रावधान को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। भाजपा को भी उम्र के प्रावधान का बदलाव रास नहीं आया। पार्टी की सांसद स्मृति ईरानी ने कहा है कि पूरा देश महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन-अपराधों के मामले में कड़े कानून बनाएगी। लेकिन, सरकार ने तो सहमति से सेक्स के मुद्दे पर उम्र घटाने का ही खेल कर दिया है। भला, इससे बलात्कारों की बाढ़ में कैसे रोक लगेगी?

भाजपा सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे पर पार्टी का नेतृत्व सर्वदलीय बैठक में अपनी आपत्तियां दर्ज कराएगा। जबकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने लोगों से यही कहा है कि प्रस्तावित कानून में जिस तरह से महिलाओं को घूरने और उनका पीछा करने के मामलों को भी गैर-जमानती बना दिया गया है, इसका भारी दुरुपयोग होने की आशंका है। इस नए कानून के सहारे गांव में फर्जी मुकदमेबाजी का सिलसिला बढ़ जाएगा। क्योंकि, किसी के लिए यह आरोप लगाना आसान हो जाएगा कि फलां शख्स, फलां महिला को बुरी नजर से घूर रहा था। पुलिस तंत्र भी इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग कर सकता है।

सूत्रों के अनुसार, इस प्रावधान को लेकर बसपा का नेतृत्व भी चिंतित है। उसे आशंका है कि इस प्रावधान के जरिए उत्तर प्रदेश में बसपा कार्यकर्ताओं को फर्जी मामलों में फंसाया जा सकता है। इसीलिए सर्वदलीय बैठक में बसपा भी इन प्रावधानों पर सवाल उठाएगी। उल्लेखनीय है कि पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में एक पैरा मेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में गैंगरेप हुआ था। इस घटना को लेकर देशव्यापी गुस्सा फूट पड़ा था। लोगों की व्यापक नाराजगी को देखकर केंद्र सरकार ने संकल्प लिया था कि बलात्कार जैसे मामलों में और कड़ी सजा का प्रावधान किया जाएगा।

गैंगरेप के मामले से उमड़े गुस्से को शांत कराने के लिए केंद्र सरकार ने आपराधिक कानून संशोधन संबंधी एक अध्यादेश भी 2 फरवरी को जारी कर दिया था। इसके तहत रेप जैसे जघन्य मामलों में दोषियों को आजीवन कारावास से लेकर मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया है। दरअसल, दिल्ली गैंगरेप हादसे के बाद सरकार ने यौन-अपराधों के लिए कड़े प्रावधान के तहत एक न्यायिक समिति बना दी थी। यह समिति सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा के नेतृत्व में बनी थी। इसने एक महीने के अंदर ही अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी थी। वर्मा समिति ने सिफारिश की थी कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में कमी के लिए कड़े कानूनी प्रावधान बहुत जरूरी हैं। सरकार ने वर्मा समिति की रिपोर्ट मंजूर कर ली थी।

केंद्र सरकार की कोशिश रही है कि 22 मार्च के पहले आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लगवा ली जाए। क्योंकि, इसी के बाद संसद सत्र में लंबा अवकाश हो जाएगा। जबकि, 4 अप्रैल तक ही यह आपराधिक संशोधन कानून अध्यादेश वैध है। यदि तय समय-सीमा में विधेयक पास नहीं हो पाया, तो अध्यादेश अपने आप निरस्त हो जाएगा। ऐसी किसी स्थिति में सरकार की ज्यादा किरकिरी हो सकती है। इस राजनीतिक जोखिम को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व कोशिश कर रहा है कि प्रस्तावित विधेयक पर सर्वदलीय सहमति बन जाए। ताकि, संसद के दोनों सदनों में दो दिन के अंदर ही विधेयक पास हो जाए।

बलात्कार विरोधी नए प्रस्तावित कानून के कई प्रावधानों पर गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बीच गंभीर मतभेद रहे हैं। कानून मंत्री अश्विनी कुमार पहले यही तर्क देते रहे हैं कि यदि सहमति से सेक्स के लिए उम्र-सीमा 18 से कम नहीं की गई, तो बलात्कार के फर्जी मामलों की बाढ़ आने का खतरा है। कानून मंत्रालय इस बात पर डटा था कि बलात्कार शब्द की जगह यौन हिंसा शब्द का प्रयोग किया जाए। लेकिन, महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ यही तर्क देती रहीं कि बलात्कार की जगह यौन हिंसा करार करने से अपराध की गंभीरता कम होने का खतरा है।

कृष्णा तीरथ सहमति से सेक्स के मुद्दे पर भी कानून मंत्रालय के तर्कों को खारिज करती आई थीं। वे यही कहती रहीं कि 18 की जगह 16 की उम्र कर देने से बाल यौन शोषण का खतरा और बढ़ सकता है। गृह मंत्रालय को भी कई प्रावधानों पर ऐतराज रहा था। इसी के चलते कैबिनेट में यह मामला तय नहीं हो पा रहा था। यहां तक कि यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी की फटकार के बाद भी कैबिनेट में पंगा बना रहा था। मंगलवार को इसी मुद्दे पर कैबिनेट की विशेष बैठक बुला भी ली गई थी। लेकिन, कृष्णा तीरथ और अश्विनी कुमार के बीच तीखे मतभेदों के चलते बात नहीं बन पाई थी।

बाद में, विवादित मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की अध्यक्षता में एक जीओएम का गठन कर दिया गया था। बुधवार को इस जीओएम की बैठक हुई। करीब दो घंटे चली मंत्रणा के बाद विवादित मुद्दों पर सहमति बन पाई। इसके बाद ही जीओएम की रिपोर्ट के आधार पर कल कैबिनेट की मुहर लग गई। पहले यह प्रस्तावित किया गया था कि यौन अपराध के मामले में फर्जी शिकायत करने वाली महिला के खिलाफ दो साल की जेल तक का प्रावधान रहे। लेकिन, इस मामले में कृष्णा तीरथ ने जोरदार विरोध दर्ज कराया था। उन्होंने यही कहा था कि ऐसा करने से पीड़ित महिलाएं डरकर चुप्पी साध सकती हैं।

कई महिला संगठनों ने भी इस प्रावधान पर सख्त ऐतराज जाहिर किया था। इसे देखते हुए जीओएम ने फैसला किया कि इस तरह के कानूनी प्रावधान की जरूरत नहीं है। गृह मंत्रालय चाहता था कि किसी महिला को बुरी नजर से घूरने और पीछा करने जैसे मामलों को गैर-जमानती न बनाया जाए। लेकिन, बाल विकास मंत्रालय इसके लिए अड़ गया था। जीओएम ने इन अपराधों को गैर-जमानती श्रेणी में ही रखने का सुझाव दिया था। जिस पर कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब सर्वदलीय बैठक में इन विवादित मुद्दों पर सरकार के रणनीतिकार कैसे सपा जैसे दलों को मना पाते हैं? ये देखने लायक जरूर होगा।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

क्‍या काटजू साहब मीडिया में रिक्रूटमेंट का प्रॉपर मैकेनिज्‍म भी लागू करवाएंगे?

भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू वैसे तो विवादों में रहते हैं… पर कभी कभी अच्छा काम भी करते हैं… उचित योग्यता के अभाव की वजह से देश में खबरों की गुणवत्ता प्रभावित होने की बात कहते हुए काटजू ने पत्रकार बनने के लिए जरूरी न्यूनतम योग्यता की सिफारिश की है.. इसके लिए उन्होंने एक समिति गठित की है। पीसीआई के सदस्य श्रवण गर्ग और राजीव सबादे के अलावा पुणे विश्वविद्यालय के संचार एवं पत्रकारिता विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उज्ज्वला बर्वे को समिति में शामिल किया गया है।

पत्रकार बनने के लिए योग्यता की बात तो ठीक है पर क्या जो मीडिया संस्थान छात्रों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर एंकर और रिपोर्टर बनाने का दावा करते हैं…उनकी क्षमता का भी ईमानदारी से आकलन होगा? आज की तारीख में हर बड़े शहर की गली गली में खुले मॉस कॉम के इंस्टीट्यूट (जो सिर्फ कागजों पर) शत प्रतिशत प्लेसमेंट के झूठे दावे करते हैं… उन पर लगाम कौन लगाएगा…. जिस तरह से बीएड के लिए एनसीटीई, इंजीनियरिंग के लिए एआईसीटीई, मेडिकल काउंसिल और बार काउंसिल जैसी संस्थाएं हैं… वैसे ही मीडिया एजुकेशन के लिए भी तो कोई रिगुलेटरी एथॉरिटी बननी चाहिए जो देश भर के मीडिया स्कूलों की मान्यता, पत्रकारिता के पाठ्यक्रम की समानता और मीडिया फैकल्टीज के लिए अनुभव और योग्यता के मानक स्थापित करे और उनकी निगरानी करे…पर बड़ा सवाल क्या सरकार ऐसा कुछ करेगी… क्योंकि सूचना प्रसारण मंत्रालय तो चैनलों पर लगाम लगाने वाले बिल की तैयारी में जुटा है।

काटजू साहब को इतने दिन बाद ऐसा लगा है कि पत्रकारों के लिए भी योग्यता तय होनी चाहिए.. जो काम उन्हें बहुत पहले करना चाहिए.. वे अब कर रहे हैं… खैर देर आए दुरुस्त आए… पर क्या न्यूनतम योग्यता तय होने भर से ही मीडिया में करियर बनाने वाले छात्रों को नौकरी मिल जाएगी… यहां तक कि आईआईएमसी औऱ जामिया से पढ़कर आए सभी छात्रों को भी आसानी से मीडिया में नौकरी नहीं मिलती… तो फिर प्राइवेट मीडिया इंस्टीट्यूट्स के छात्रों को जॉब कैसे मिलेगी… हकीकत ये है कि किसी भी न्यूज चैनल में रिक्रूटमेंट का कोई प्रॉपर मैकेनिज्म ही नहीं है… सिर्फ जुगाड़ टेक्नोलॉजी से ही जॉब मिलती है… न्यूज 24, एनडीटीवी, आज तक जैसे ज्यादातर चैनलों के अपने इंस्टीट्यूट्स हैं जो लाखों की फीस लेकर अपने छात्रों को नौकरी देने का आश्वासन देते हैं, पर सच ये है कि यहां से पढ़े हुए हर छात्र को भी नौकरी नसीब नहीं होती।

दरअसल टीवी के ग्लैमर से प्रभावित होकर हजारों छात्र मीडिया में अपना करियर बनाना चाहते हैं… इसके लिए छात्र लाखों रुपए खर्च करके मीडिया का कोर्स करते हैं लेकिन जब उन्हें नौकरी नहीं मिलती तो वे हताश और निराश होते हैं… ऐसे में छात्रों के सामने टेंशन ही टेंशन होती है… पहले तो अच्छे मीडिया स्कूल में एडमिशन की टेंशन, फिर जॉब मिलने की टेंशन और अगर जॉब मिल भी गई तो उसे बचाए रखने की टेंशन.. नौकरी की असुरक्षा की भावना ऐसे नए जोशीले और कुछ कर दिखाने की तमन्ना रखने वाले छात्रों का मीडिया से मोह भंग कर देती है… ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रिक्रूटमेंट का फ्री एंड फेयर प्रॉपर मैकेनिज्म सिस्टम डिवलप किया जाय… पर क्या काटजू जी इस मैकेनिज्म को डिवलप करवा पाएंगे?

लेखक अरुणेश कुमार द्विवेदी ई टीवी न्यूज, साधना न्यूज, सीएनईबी न्यूज़, ज़ी न्यूज़ और आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग में काम कर चुके हैं. वर्तमान में मंगलायतन विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रवक्ता हैं.

हरियाणा न्‍यूज के मालिक कांडा की मांग को कोर्ट ने किया खारिज

नई दिल्ली। गीतिका शर्मा स्यूसाइड केस में अदालत ने आरोपी एवं हरियाणा न्‍यूज के मालिक गोपाल गोयल कांडा और अरुणा चड्ढा की उस मांग को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने जांच एजेंसी द्वारा जब्त किए गए दस्तावेज की कॉपी देने को कहा था। डिस्ट्रिक्ट जज एसके सरवरिया की अदालत ने कहा कि आरोपियों ने निचली अदालत से भी उन इलेक्ट्रॉनिक डेटा और दस्तावेज की कॉपी की मांग की थी, जिन पर अभियोजन पक्ष ने भरोसा किया था। पुलिस ने तब लिखित आश्वासन दिया था कि फॉरेंसिक लैब से ये डेटा और दस्तावेज मिलने के बाद वह उनकी कॉपी देगी।

अदालत ने कहा कि फॉरेंसिक साइंस लैबरटरी (एफएसएल) के रिजल्ट और इलेक्ट्रॉनिक इस्ट्रूमेंट (हार्ड डिस्क और मोबाइल फोन) की कॉपी एफएसएल के पास ही है। अभियोजन पक्ष ने उन्हें सप्लिमेंटरी चालान के साथ पेश करने का लिखित आश्वासन दिया है, ऐसे में आरोपियों का इस अदालत से हार्ड डिस्क वगैरह की कॉपी दिलवाने की मांग करना ठीक नहीं है। अदालत ने कांडा और अरुणा की यह डिमांड भी खारिज कर दी कि मोबाइल कंपनी को आठ मोबाइल फोनों की कॉल डिटेल रेकॉर्ड (सीडीआर) सेफ रखने का निर्देश दिया जाए। अदालत ने कहा कि सीडीआर तो पहले ही आरोपी को दिए गए हैं और इसकी मूल कॉपी पेश करने की जरूरत नहीं है। दूसरी ओर, इस मांग में यह बताया ही नहीं गया कि किस अवधि की सीडीआर सेफ रखी जाए।

कांडा और अरुणा पर गीतिका को सुसाइड के लिए मजबूर करने का आरोप है। पूर्व एयर होस्टेस गीतिका ने 5 अगस्त 2012 को अशोक विहार स्थित अपने फ्लैट में पंखे से फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली थी। पुलिस को मौके से जो सुसाइड नोट बरामद हुआ, उसमें कांडा और अरुणा के परेशान करने की बात कही गई थी। अदालत ने आदेश में कहा कि पहले ही ट्रायल कोर्ट गीतिका का अबॉर्शन करने वाली डॉ. विशाखा मंजूल की जब्त डायरी की कॉपी आरोपियों को देने का निर्देश दे चुका है। उन्हें डायरी की कॉपी, गीतिका के पासपोर्ट की कॉपी वगैरह दिए जा चुके हैं। आरोपियों की यह भी डिमांड थी कि उन्हें जरूरी दस्तावेज के साथ-साथ आरोप पत्र की कॉपी भी दी जाए, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। (एनबीटी)

पत्रकार पर तेजाबी हमले की जांच करेगी पीसीआई

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के परभणी जिले में गुटखे की अवैध बिक्री के खिलाफ रिपोर्टिंग करने वाले स्थानीय पत्रकार दिनेश चौधरी और उनके परिवार पर तेजाब हमले की जांच के लिए भारतीय प्रेस परिषद ने एक सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह समिति पूरे मामले की जांच करेगी। इस हमले में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता का नाम भी सामने आया है। प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने परिषद के सदस्य अनिल अग्रवाल को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें जल्द से जल्‍द रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। 

पीसीआई अध्‍यक्ष जस्टिस काटजू ने महाराष्ट्र के सीएम पृथ्वीराज चव्हाण और मुख्य सचिव से भी इस मामले में रिपोर्ट सौंपने का आग्रह किया है। दैनिक सोलापुर तरुण भारत के रिपोर्टर दिनेश चौधरी और उनकी पत्नी व बेटी पर मंगलवार रात पांच लोगों ने उनके घर में घुसकर तेजाब फेंक दिया था, जिसमें ये लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। महाराष्‍ट्र में पत्रकारों पर हमले लगातार जारी हैं।

मेरी मर्सिडीज कार का लोगो वापस कर दें पत्रकार : अमिताभ

मुंबई। हॉलीवुड के महान फिल्मकार स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ डिनर की कीमत अमिताभ बच्चन को अपनी मर्सिडीज कार के लोगो के रूप में चुकानी पड़ी और अब वह अपनी कार का लोगो वापस चाहते हैं। अपने ट्विटर खाते पर अमिताभ ने लिखा, "स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ डिनर के बाद मेरी कार पर टूटने वाले पत्रकारों का धन्यवाद। कृपया मुझे मेरी मर्सिडीज कार का लोगो वापस कर दें, इसे आपने ही तोड़ा है..दोबारा।"

भारतीय व्यवसायी अनिल अंबानी तथा उनकी पत्नी टीना अंबानी द्वारा मंगलवार की रात फिल्म निर्माताओं के सम्मान में आयोजित एक पार्टी में अमिताभ बच्चन हॉलीवुड फिल्मकार स्पीलबर्ग के साथ मशरूफ दिखे।

भ्रामक विज्ञापनों पर शिकंजा कसेगी सरकार

भ्रामक विज्ञापनों पर कड़ा रुख अपनाते हुए उपभोक्ता मामलों के मंत्री केवी थामस ने गुरुवार को कहा कि इस मामले से सही ढंग से निपटा जाना चाहिए ताकि यह सही संदेश जाए कि सरकार सिर्फ भ्रामक विज्ञापनों पर नियंत्रण चाहती है और मीडिया पर नियंत्रण करने का प्रयास नहीं कर रही।

विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस पर थामस ने एक सम्मेलन में कहा कि मैं भ्रामक विज्ञापनों तक पहुंचना चाहता हूं। यह प्रिंट और टेलीविजन मीडिया के लिए आमदनी का एक बड़ा जरिया है। हमें इससे सावधानी से निपटना होगा ताकि यह संदेश न जाए कि सरकार विज्ञापनों पर नियंत्रण करके मीडिया पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने बताया कि भ्रामक विज्ञापन के मामले को देखने के लिए मीडिया और अन्य संगठनों के सदस्यों को मिलाकर एक समिति का गठन किया गया, जिसकी रिपोर्ट आ गई है। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि यह एक महत्वपूर्ण मामला है क्योंकि हमें देश में प्रेस की आजादी का सम्मान करना है, लेकिन इसके साथ ही मीडिया को देश की जनता को गुमराह करने के लिए इस्तेमाल भी नहीं किया जाना चाहिए।

लुधियाना के संपादक को भास्‍कर प्रबंधन दे रहा है ट्रेनिंग!

दैनिक भास्कर, लुधियाना के नए संपादक शमशेर चंदेल ने भोपाल में ज्वाइन करने की औपचारिकता तीन मार्च को ही कर ली, मगर अभी तक उनका लुधियाना टीम से परिचय नहीं हुआ है. बताया जा रहा है कि नए संपादक को भास्कर प्रबंधन अभी भास्कर की कार्यशैली के बारे में ट्रेनिंग दे रहा है. पहले उन्हें कुछ दिन भोपाल यूनिट में फिर इंदौर यूनिट में कामकाज के बारे में ट्रेनिंग दी गयी. अब तीन दिन से वह भास्कर के जयपुर यूनिट में ट्रेनिंग ले रहे हैं.

नए संपादक की ट्रेनिंग पर भास्कर, लुधियाना में खूब चटखारे लेकर चर्चा की जा रही है. लुधियाना भास्कर में रोज़ यही चर्चा हो रही है कि नए संपादक कब आयेंगे. कोई कहता है अभी तो नए साहब काम सीख रहे हैं तो कोई कहता है साहब अभी मास्टर की ट्रेनिंग ले रहे है फिर यहाँ आकर सबको काम सिखायेंगे. उधर काफी जूनियर और कम अनुभवी को लुधियाना भास्कर का संपादक बनाए जाने से कुछ लोगों में असंतोष भी है. बठिंडा भास्कर के एडिटर ने तो प्रबंधन से नाराज़गी जताते हुए अपना ट्रांसफर करने की सिफारिश की है.

यूँ तो कहा जा रहा है कि वह अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश लौटना चाहते हैं, मगर अंदरखाने चर्चा के मुताबिक़ बठिंडा भास्कर संपादक को यह खल रहा है कि उनसे जूनियर और प्रिंट मीडिया के कम अनुभवी को लुधियाना जैसे यूनिट का संपादक बना दिया गया, जबकि उनकी वरिष्ठता की अनदेखी करते हुए उन्हें दो साल से बठिंडा का संपादक बनाया गया है, जहाँ से सिर्फ चार सिटी बठिंडा, फिरोजपुर, मोगा और संगरूर का पुल आउट बनता है.

सौरभ द्विवेदी जाएंगे नवभारत टाइम्‍स, लुधियाना में भास्‍कर के हेड बनेंगे नीरज मेनरा

दैनिक भास्कर, लुधियाना से खबर है कि यहाँ भास्कर पुल आउट हेड सौरभ द्विवेदी नवभारत टाइम्स, लखनऊ का हिस्सा बनने जा रहे हैं. उन्हें वहां न्यूज़ एडिटर बनाया जा रहा है. जानकारी के अनुसार उन्होंने संस्थान को नोटिस भी दे दिया है. वहीँ दैनिक सवेरा के नीरज मेनरा को लुधियाना भास्कर का हेड बनाया जा रहा है. नीरज पहले भी दैनिक भास्कर में काम कर चुके हैं और पंजाब में भास्कर की लांचिंग टीम के सदस्य रहे हैं.

दीपक धीमान के स्टेट हेड बनने के बाद यह पहला बड़ा परिवर्तन है. जल्‍द ही कुछ और बदलाव जल्‍द ही देखने को मिलेंगे.

सेक्स उम्र 16 साल किया जाना सेक्स लोलुप पुरुषों के लिए वैध रास्ता बनाना है

Shambhunath Shukla : क्या दसवीं में पढऩे वाली सोलह साल की एक लड़की इतनी परिपक्व होती है कि कानून उसे यौन संबंध बनाने की अनुमति दे। अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे होंगे जब शारदा एक्ट बना था और लड़कियों के लिए विवाह की उम्र 19 साल तय की गई थी। अब अचानक खुद सरकार बच्चियों को यौन संबंध बनाने के लिए उकसाने में जुटी है।

इससे बलात्कारियों, कच्ची उम्र की लड़कियों को बहला-फुसलाकर यौन संबंध बनाने वालों के वारे न्यारे हो जाएंगे। इससे तो अच्छा है कि कम उम्र की लड़कियों की शादी रचा देने वाले राजस्थानी समाज की जय-जयकार की जाए। कम से कम शादी के बाद एक भरोसा तो रहता है कि लड़की को कोई बरगला नहीं पाएगा। यह एक तरह सेक्स लोलुप पुरुषों के लिए बनाया जाने वाला वैध रास्ता होगा।

वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

‘आजतक’ ने ‘इंडिया टीवी’ को और ‘इंडिया न्यूज’ ने ‘तेज’ को पीछे किया

दसवें हफ्ते की टीआरपी में दो बड़े उलटफेर हुए हैं. इंडिया टीवी फिर से नंबर दो पर जा चुका है. पिछले हफ्ते यह चैनल आजतक को पीछे कर नंबर एक बन गया था. लेकिन इस बार कुल 4.6 अंक नीचे गिरकर नंबर दो पर आ गया है. चर्चा है कि आजतक प्रबंधन ने टीआरपी जारी करने वाली संस्था टैम की शिकायत की है कि यह भेदभावपूर्ण तरीके से डाटा इकट्ठा करता है और इंडिया टीवी को फायदा पहुंचाता है. हालांकि इस सूचना की अभी आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है.

दसवें हफ्ते में दीपक चौरसिया के नेतृत्व वाले इंडिया न्यूज लगातार उठान की कथा को विस्तार देते हुए टीवी टुडे ग्रुप के तेज चैनल को पछाड़ दिया है. इंडिया न्यूज अब एनडीटीवी के ठीक नीचे है. शीर्ष बारह नेशनल न्यूज चैनलों में इंडिया न्यूज आठवें पोजीशन पर है. दसवें हफ्ते का डाटा इस प्रकार है….

WK 10 2013, (0600-2400)

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Tg CS M 25+ABC

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ब्रिटेन में टेलीफोन टेपिंग में चार पत्रकार गिरफ़्तार

ब्रिटेन में फिर से पत्रकारों द्वारा ग़ैरकानूनी रूप से दूसरों के टेलिफ़ोन सुनने पर हंगामा हो रहा है। लन्दन में 'मिरर ग्रुप' के चार पत्रकारों को गिरफ़्तार कर लिया गया है। इनमें दो पूर्व पत्रकार भी शामिल हैं। पुलिस ने बताया है कि तीन पुरूषों और एक महिला को गिरफ़्तार किया गया है और उनसे पूछताछ की जा रही है।

इन लोगों ने सन् 2003-2004 में गुप्त रूप से लोगों के टेलीफोन सुने थे। 'न्यूज ऑफ़ वर्ल्ड' के पत्रकार तो कई साल तक राजनीतिज्ञों, शो बिजनेस के सितारों और दूसरे प्रसिद्ध ब्रितानियाई नागरिकों के टेलिफ़ोन सुनते रहे।

हिंदुस्तान, लखनऊ के संपादक नवीन जोशी ने अखिलेश यादव की तारीफ की

Harishankar Singh : आज हिंदुस्तान अखबार में एक लेख पढा, जिसमें लिखा था कि कैसे अखिलेश यादव ने लखनउ में 10 हजार लैपटॉप बांटकर युवाओं को सूचना प्रौद्योगिकी की दिशा में एक नया आयाम दिया है। लेख को पढने के बाद ऐसा लगा कि माननीय स्थानीय संपादक जी ने अखिलेश की तारीफ में पक्षपातपूर्ण कसीदें पढी हों। हो सकता है कि इसका कुछ लाभ वो यूपी सरकार से लेना चाहते हों। लेकिन लैपटाप को गावों तक बांटने के प्रभाव की हकीकत का श्वेत पहलू कम और श्याम पहलू ज्यादा है। वो ऐसे कि कोई भी विद्युत चलित य़ंत्र बिना बिजली के बेकार है और यूपी के सूदूर गावों में बिजली की हा़ल किसी से भी नहीं छिपा है।

दूसरा बिंदु है तकनीकी के बारे में कुशल प्रशिक्षण जिसके बिना कोई भी यंत्र एक डब्बे से ज्यादा कुछ नहीं है। इसमें तीसरी बात है कि आईटी की जहां आवश्यकता नहीं है वहां इसका केवल दुरुपयोग है। इसमें तमाम अश्लील प्रतिबंधित वीडियो और फोटो शामिल हैं जो दिमाग में सबसे तेजी से घर कर जाते हैं और उसका लत लगते समय नहीं लगता। गौर करें कि कैसे सेलफोन बायरल होने से पहले ब्लैकमेलिंग औश्र अश्लील एमएमएस का कांसेप्ट नगण्य था, आज कोई भी शत्रुता निकालने के लिए यह हथियार अपनाने में संकोच नहीं करता। इन तमान श्याम बिंदुओं के बीच एक श्वेत बिंदु है वो है कि लैपटाप के तकनीकी प्रयोग का फोबिया कम हो जाएगा, लेकिन प्रश्न यह है कि किसी के हाथ में परमाणु बम देकर हम कैसे यह मान लें कि वह उसका उपयोग उर्जा के लिए ही करेगा, विध्वंस के लिए नहीं। अपने वोट बैंक को बढाने के लिए माननीय सीएम जी ने जो खिलौना मासूमों के हाथ में समय से पहले पकडा दिया है, देखिए वह क्या रंग लाता है। एक तरफ तो उनकी सरकार में विद्यार्थियों को नकल कराकर अच्छे अंकों के साथ डका दिया जाता है तो दूसरी ओर मार्डन बनाने के लिए लैपटाप पकड़ा दिया जाता है। कितनी अजीब विडंबना है ना।

हरिशंकर सिंह के फेसबुक वॉल से.

मौर्या टीवी का पत्रकार हो गया पुलिस का दलाल, इससे पीड़ित एक परिवार का हर सदस्य रो रहा

बिहार के कटिहार में इन दिनों पुलिस और पत्रकार गठजोड़ अपना कहर बरपाने में लगा है. कटिहार के कई पत्रकार इस जिले के पुलिस कप्तान के तलवे इसलिए चाटते हैं कि उन्हें पुलिसिया मामले में दलाली करने का मौका मिल जाये. कटिहार के एक पत्रकार माहिर हैं एसपी साहिबा की दलाली में. ये वादी या परिवादी से मिल कर अपनी दलाली चमकाने में भिड़े हैं. ताजा मामला कटिहार शहर का है जहा 26 साल का एक लड़का और 22 की एक लड़की प्रेम प्रसंग में फरार बताये जा रहे हैं.

इसी दलाल पत्रकार ने लड़की को रिकवर कराने का ठेका लड़की के घर वालों से लिया. फिर लड़का के घरवालों पर पुलिस के सहयोग से कहर बरपाने लगा. यह पत्रकार कानून का उल्लंघन करते हुए दिन-रात लड़के के घरवालों को परेशान कर रहा है. अपनी पत्रकारिता का धौंस और पुलिस गठजोड़ की ताकत दिखाते हुए ये पत्रकार खुद लड़के के घर पहुंच गए और घरवालों को बर्बाद कर देने की धमकी भी दे डाली. पुलिस इन महोदय का पूरा सपोर्ट कर रही है. पूरे परिवार के लोग परेशान हैं. ये पत्रकार मौर्या टीवी का है. नाम है सुब्रतो गुहा.

लड़के के घरवालों का गुनाह बस ये है कि उनके बेटे ने प्रेम किया और प्रेमिका के साथ घर छोड़कर फरार है. इसी बात की सजा लड़के के पूरे परिवार को दी जा रही है. कटिहार पुलिस ने लड़के के पिता को नगर थाने में बिठा रखा है. वो शख्स फुट-फुट कर रो रहा है. लड़के की बहन अपने घर में फूट फूट कर रो रही है क्योंकि उसके पिता व अन्य पुरुष थाने में बिठा दिए गए हैं.

पुलिस-पत्रकार उत्पीड़न की तस्वीर : थाने के हवालात में रोता पिता और घर में रोती बहन
पुलिस-पत्रकार उत्पीड़न की तस्वीर : थाने के हवालात में रोता पिता और घर में रोती बहन

दरअसल लड़की के पिता कटिहार के दौलतमंद इंसान हैं. लिहाजा अपने रसूख में पुलिस व पत्रकार को सेट कर, अपनी लड़की के प्रेमी के पिता को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे डलवा दिया. यह अरेस्टिंग बिना किसी एफआईआर के की गई है. प्रेमी के घर के सभी पुरुष मेंबर पिछले 24 घंटे से थाने के हवालात में बंद हैं. घर में सिर्फ महिलाये बची हैं. पुलिस वाले घर की महिलाओं को रात भर परेशान करते रहे. धमकाते रहे. जब हम लोग इस खबर को कवर करने पहुंचे तो वहां पुलिस रात की तरह पहुंच गई. बिना महिला पुलिस पहुंची कटिहार नगर थाना पुलिस से जब सर्च वारंट के बारे में पूछा गया तो वे कैमरे से भागने लगे.

कटिहार के एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र व वीडियो पर आधारित.

अनिरुद्ध बहल ने वो काम कर दिया, जो कोई खबरिया चैनल नहीं कर सकता था

Nadim S. Akhter : तो कोबरा पोस्ट वाले अनिरुद्ध बहल ने देश को बता दिया कि ब्लैक मनी देश से बाहर नहीं जा रहा है…ये हमारे सिस्टम के अंदर ही घुसा हुआ है और जिसे देश के बड़े बैंक बहुत आसानी से white money में convert कर रहे हैं…एक वाकया बताता हूं…एक अखबार में काम के दौरान एक रिपोर्टर ने बताया कि सरकारी महकमों के आला अधिकारी कितना पैसा देकर पोस्टिंग कराते हैं…जो मौजूदा साहब हैं…इन्होंने इतना पैसा देकर अपनी पोस्टिंग कराई होगी क्योंकि उनकी कमाई ** करोड़ होगी महीने की…और ये कि पूरा माफिया और साहब लोग मिलकर किस तरह मीडिया को मैनेज करते हैं…मीडिया हाउस की हैसियत के मुताबिक पत्रकारों के लिए भी महीने के पैसे बंधे हुए हैं ताकि कोई पोल ना खोल दे…इस बंदरबांट में सब शामिल हैं…

खैर, जब मैंने पूछा कि अगर करोड़ों में ये साहब कमाते हैं, तो फिर पैसा कहां रखते होंगे…जाहिर है, सरकारी अधिकारी हैं, आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में पकड़े जाने का डर होगा…घर में तो नहीं ही रखेंगे..फिर बैंकों में कैसे रखेंगे…वहां रखेंगे तो भी पकड़े जाने का डर रहेगा…तो दो रिपोर्टर हंसते हुए बोले कि सर, ये सब स्विस बैंक में ही रखते होंगे…ऊपर (नेता लोग) से नीचे तक कनेक्शन है…ऊपर वाले जहां रखते होंगे, इन लोगों ने भी अपना खाता वहीं खुलवा लिया होगा…

अब जाकर पता चला कि देश के भ्रष्ट अफसर, माफिया और नेता किसी स्विस बैंक में नहीं जाते…वे देश के बड़े बैंकों में ही अपना पैसा Black से White कर लेते हैं…बड़ी आसानी से…कोबरा पोस्ट के स्टिंग आपरेशन में जो दिखाया गया है, वो देश के वित्तीय हालात और इसकी मॉनिटरिंग को हास्यास्पद करार देने के लिए काफी है…कुछ बानगी देखिए…

बैंक का मैनेजर सामने वाले की पहचान को जाने बगैर बड़े आराम से बताता है कि आप अगर इतना लाख-करोड़ पैसा हमारे बैंक में लगाओगे तो हम आपके लिए personal private banking सुविधा देंगे…इसमें बैंक का भी कोई कर्मचारी सिस्टम में आपके account no. को डालकर ये पता नहीं लगा सकता कि आपके account में कितने पैसे हैं…वहां मेरा employee code आएगा और ये मैसेज आएगा कि आपके account के बारे में जानकारी सिर्फ मुझे है…मैं ही बता सकता हूं कि आपके अकाउंट में कितने करोड़ जमा हैं…

प्राइवेट बैंक ये भी बताता है कि किस तरह आपकी black money वो विदेश भेज सकते हैं…और वो भी आपका पैसा बैंकिंग सिस्टम के अंदर डालकर…आप हमारे बैंक की फलां योजनाओं में निवेश कर दीजिए…बाकी हम समझ लेंगे…वगैरह-वगैरह…

मतलब साफ है…आप करोड़ों रुपये का काला धन लेकर जाइए और बैंक को बताइए कि मुझे इसे सफेद करना है…बैंक आपको रास्ता बता देगा…लेकिन हमारे-आपके लिए सबसे ज्यादा डरने की वजह ये है कि इन सारी प्रक्रियाओं में बैंक अपने दूसरे कस्टमर्स के अकाउंट का भी उपयोग कर रहे हैं और वह भी बिना आपकी जानकारी के…मसलन काले धन की एक बड़ी रकम आपके एकाउंट से होकर गुजर गई और आपको पता भी नहीं चला…और मेरे ख्याल से इस संबंध में कोई स्पष्ट कानून भी नहीं है…अब तक तो चोर-लुटेरे-डाकू आपके क्रेडिट कार्ड-डेबिट कार्ड की क्लोनिंग करके, अकाउंट हैक करके, पिन नम्बर चुराकर आपके साथ फर्जीवाड़ा करते थे लेकिन अब तो खुद बैंक आपके साथ फर्जीवाड़ा कर रहे हैं…आपकी जानकारी के बगैर आपके एकाउंट नम्बर का उपयोग करके….

बहरहाल देश को ये सचाई बताने के लिए अनिरुद्ध बहल और उनकी पूरी टीम को बधाई…ये भी सोच रहा हूं कि तड़क-भड़क के साथ हिन्दी-अंग्रेजी के इतने ज्यादा बिजनेस चैनल चल रहे हैं, उनमें से किसी ने ऐसा स्टिंग क्यों नहीं किया…उनके पत्रकारों-संपादक को क्या ऐसी भनक नहीं थी…और अगर थी, तो इसे उजागर क्यों नहीं किया…क्या उनका काम सिर्फ मार्केट में उतार-चढ़ाव, निवेश और टैक्स बचत बताना है?!!

Neeraj Karan Singh : पत्रकारिता के इतिहास में कोबरा पोस्ट ने वो कर डाला जो कोई खबरिया चैनल नहीं कर सकता था। काले नोटों की सब बात करते थे लेकिन कोबरा ने दिखा दिया कि कौन लोग हैं जो इन्हीं काले नोटों को सफेद कर डालते हैं। इसे कहते हैं पत्रकारिता।

Dilnawaz Pasha : कोबरा पोस्ट के रेड स्पाइडर के बाद अब सरकार की बारी है हिट मारने की… लेकिन देखना यह है कि सरकार रेड स्पाइडर पर हिट मारती है या असली नागों पर…

फेसबुक से.


संबंधित खबर- तीन निजी बैंक कर रहे हैं काले धन को सफेद

सीओ और कोतवाल ने पत्रकार से कहा- मुकदमा फर्जी है (सुनें टेप)

समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान यूपी में आम आदमियों की कौन कहे, पत्रकारों का बेहद बुरा हाल है. अगर आप थोड़े रसूख वाले हैं तो अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए आप किसी पर भी फर्जी मुकदमा लिखा सकते हैं, किसी को भी जेल भिजवा सकते हैं. ताजा मामला यूपी के संत कबीर नगर जिले का है. यहां पी7न्यूज के पत्रकार उमेश भट्ट समेत चार पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लूट का मुकदमा लिख दिया है. लूट के साथ मारपीट, गाली-गलौज समेत कई अन्य धाराएं भी लगाई गई हैं.

इस बारे में जब खुद पत्रकार उमेश भट्ट ने पुलिस के स्थानीय अफसरों सीओ और कोतवाल को फोन किया तो इन लोगों ने माना कि मुकदमा फर्जी है लेकिन उन लोगों ने मजबूरी भी बताई कि उपर के दबाव के कारण फर्जी मुकदमा लिखना पड़ा. कोतवाल ने तो यहां तक कह दिया कि पुलिस मुकदमा कहां लिखना चाहती है, वो तो दबाव होता है जिसके कारण मुकदमें लिखने पड़ते हैं.

पत्रकार उमेश भट्ट ने सीओ खलीलाबाद आरके शर्मा और कोतवाली प्रभारी खलीलाबाद विजय शंकर यादव से फोन पर बातचीत को रिकार्ड कर लिया. नीचे रिकार्डिंग दी जा रही है. आप भी सुनें और देखें कि किस तरह का जंगलराज चल रहा है यूपी में. पहला टेप सीओ से बातचीत का है. दूसरा वाला टेप कोतवाल से बातचीत का है.

सीओ आरके शर्मा से बातचीत का टेप…

कोतवाल विजय शंकर यादव से बातचीत का टेप…


इस मामले से संबंधित मूल खबर ये है, क्लिक करें-

सपा नेता के दबाव में यूपी पुलिस ने पी7न्यूज के पत्रकार उमेश भट्ट के खिलाफ लूट का फर्जी मुकदमा दर्ज किया

बदमाशों ने पत्रकार के मुंह में रिवाल्‍वर घुसाकर धमकी दी, दो अरेस्‍ट

सहारनपुर से खबर है कि एक पत्रकार को बदमाशों रिवाल्‍वर सटाकर जान से मारने की धमकी दी. पत्रकार की सूचना पर पुलिस ने पत्रकार को धमकाने वाले बदमाशों को गिरफ्तार किया है. जानकारी के अनुसार पत्रकार बृज मोहन कश्‍यप को बीती रात कुछ बदमाशों ने मुंह में रिवाल्‍वर डाल दिया तथा जान से मारने की धमकी दी. बदमाश किसी बात को लेकर बृजमोहन से नाराज थे. उनके साथ बदमाशों ने हाथापाई और गाली ग्‍लौज भी की.

किसी तरह अपनी जान बचाकर आए बृजमोहन ने इसकी शिकायत पुलिस से की. पुलिस ने उनकी शिकायत पर दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. उनके पूछताछ की जा रही है. इस घटना से बृजमोहन तथा उनका परिवार डरा-सहमा हुआ है. घटना के कारणों का अभी पता नहीं चल पाया है.

सपा नेता के दबाव में यूपी पुलिस ने पी7 न्यूज़ के पत्रकार उमेश भट्ट के खिलाफ लूट का फर्जी मुकदमा दर्ज किया

यूपी के संत कबीर नगर जिले में पी7 न्यूज़ के पत्रकार उमेश भट्ट के खिलाफ पुलिस ने फर्जी मुकदमा लिख दिया है. उमेश भट्ट की इमानदारी ही उनके गले की हड्डी बन गई है. जिले के मगहर कसबे में स्थित कल्पना गैस सर्विस पर जारी कालाबाजारी के सन्दर्भ में आरटीआई कानून के तहत पत्रकार उमेश भट्ट द्वारा मांगी गई जानकारी के बाद जहां उक्त गैस एजेंसी में व्याप्त अनियमितता का पर्दाफाश हुआ.

इससे खार खाए कल्पना गैस एजेंसी के संचालक एवं सपा नेता राम अवध राय और उनके भतीजे संजय राय द्वारा पहले तो

पत्रकार उमेश भट्ट
पत्रकार उमेश भट्ट
पत्रकार उमेश भट्ट को मैनेज करने की कोशिश की जाती है. लेकिन जब श्री भट्ट उन दोनों के प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं तब कल्पना गैस एजेंसी के संचालक और उनके भतीजे द्वारा पत्रकार उमेश भट्ट को जान से मारने की धमकी दी जाती है. इसके बाद पत्रकार उमेश भट्ट द्वारा अपने जानमाल की सुरक्षा की गुहार जिले के एसपी से की जाती है. पुलिस द्वारा उन्हें कोई राहत नहीं पहुंचाई जाती है और पूरे मामले को टाल दिया जाता है.

पुलिस को पत्रकार उमेश भट्ट के साथ खड़े होना चाहिए था.  पर हुआ उलटा. सीओ खलीलाबाद आरके शर्मा ने एजेंसी संचालक राम अवध राय और उनके भतीजे संजय राय के प्रभाव में आकर इनके दलित नौकर की तहरीर पर पी7 न्यूज़ के पत्रकार उमेश भट्ट सहित उनके तीन सहयोगियों जिनमें जिले के वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद शरीफ खां, कुलदीप मिश्र और आरटीआई कार्यकर्ता धर्मात्मा प्रसाद मिश्र के ऊपर मारपीट, गाली, लूट और दलित उत्पीड़न का मुकदमा आईपीसी की धारा 323 ,504,506, 392 एवम 3(1)10 एससी / एसटी एक्ट के तहत दर्ज कर दिया जाता है.

पूरे मामले पर जब पत्रकार उमेश भट्ट ने सीओ खलीलाबाद आरके शर्मा और कोतवाली प्रभारी खलीलाबाद विजय शंकर यादव से फोन पर बात की तो दोनों ही कानून के रहनुमा अपनी गलती को साफ़ तौर पर स्वीकार करते हैं. ये दोनों पत्रकार उमेश भट्ट को आश्वासन देते हैं कि आप घबराइये नहीं, आपके ऊपर दर्ज मामला पूरी तरह से फर्जी है, जिसे जांच के बाद स्पंज कर दिया जाएगा. इस पूरी वार्तालाप की रिकार्डिंग पत्रकार उमेश भट्ट ने अपने मोबाईल में कैद कर ली है.

अब सवाल ये उठता है कि जब इन पुलिस वालों को ये बात पता थी कि घटना फर्जी है, तो मुकदमा दर्ज करने की नौबत क्यों आई? उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ला एंड आर्डर ठीक करने की बात कर रहे हैं पर दिनोंदिन पत्रकारों का उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि सपा से जुड़े लोगों के दबाव में शासन-प्रशासन के लोग आम आदमियों के साथ कैसा सलूक करते होंगे.

सीओ और कोतवाल से पत्रकार उमेश भट्ट की बातचीत का टेप सुनने के लिए यहां क्लिक करें-

सीओ और कोतवाल ने पत्रकार से कहा- मुकदमा फर्जी है (सुनें टेप)


संत कबीर नगर से पत्रकार अजय कुमार श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

आखिर कुंभ से किसको क्‍या मिला?

समापन के साथ ही धरती के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन की लोकग्राही उपयोगिता को लेकर कुछ विचारणीय बिंदु भी खडे हो रहे हैं। यह किन बातों के लिए जाना जाएगा? क्‍या हमारे धर्मगुरु कोई ऐसा समवेत संदेश दे पाये हैं, जिससे देश-समाज की स्थिति में सुधार हो? आखिर, 12 कुंभों पर 144 साल बाद आये इस महाकुंभ से हासिल क्‍या हुआ?

बीस वर्ग किमी क्षेत्र में कुंभ नगरी बनाने-बसाने की लम्‍बी कवायद के बाद और 11-12 सौ करोड़ रुपये खर्च होने का फलितार्थ क्‍या रहा? संगमतीरे परलोक सुधारने की कामना के केवल ‘आस्‍था की डुबकी’ अगर यही पुण्‍य लाभ ही इसका प्रापक है तो यह धार्मिक मेला कैसे? धर्म के तो सभी रास्‍ते लोक से ही होकर जाते हैं। वह तो संसार संवारने की भित्ति पर ही खड़ा होता है।

वैसे तो हर माघ में साधु-संतों और सनातन धर्मावलम्बियों के प्रयाग पहुंचने की पुरानी परंपरा है- माघ मकरगत रवि जब होई, तीरथपतिह आव सब कोई। इस अवसर का उपयोग ज्ञान-विज्ञान पर चर्चा, सामाजिक समस्‍याओं-मुद्दों पर विचार-विनिमय, आत्‍मशुद्धि तथा सदभाव, संयम व सह अस्तित्‍व जैसे भारत के शास्‍वत मूल्‍यों के संर्वधन में होता था। यानी लोक-परलोक दोनों को सुधारने का समागम। इसी लिए जन भागेदारी बढ़ाने को इसे धार्मिक महत्‍ता से जोड़ा गया होगा। कुंभ, अर्धकुंभ और महाकुंभ में यह महत्‍ता उत्‍तरोत्‍तर विशेषरूप से बढ़ जाती है। ऐसे अनूठे आयोजन भाषा, संस्‍कृति और शासक सत्‍ता वगैरह की विभिन्‍नताओं वाले देश को एक सूत्र में बांधे रखने में प्रमुख भूमिका निभाते थे और विश्‍वगुरु के रूप में भारत का डंका बजता था।

लेकिन 2013 का महाकुंभ आया और यूं ही चला गया। वैसे बहुत कुछ हुआ। दो ढाई महीने के दौरान देश – दुनिया से कई करोड़ लोग जुटे। विशाल प्रवचन पांडाल बने। धर्म-अध्‍यात्‍म की बड़ी बड़ी बातें हुई। संन्‍यासियों- वैरागियों के मंहगी कारों के काफिले दौड़े। लाखों की लागत वाले उनके लिए सु‍विधा सम्‍पन्‍न कक्ष व बाथरूम बने। मुरारी बापू, आशाराम बापू, बाबा रामदेव, स्‍वामी अवधेशानंद गिरि, चिदानंद मुनि महराज लगायत प्राय: सभी आचार्य, महामंडलेश्‍वर और पीठाधीश्‍वरों ने अपने अपने ढंग से उपिस्‍थित दर्ज करायी। दद्दा के कैम्‍प में हजारों नर नारी कामधाम छोड़ कर मिट्टी के सवा करोड़ शिव‍लिंग बनाने में लगे रहे। अखाड़ों-महंतों की शाही सवारियां निकलीं और शाही स्‍नान हुए। पदवियां बंटी। दक्षिण के विवादित स्‍वामी नित्‍यानंद ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिये। महामंडलेश्‍वर बन गये। पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे लगे कि हमारे अधिकांश धर्मगुरु देश के बदलते चेहरे व चरित्र को लेकर वाकई  चिंतित- गंभीर हैं। ऐसी आवाज नहीं निकली जो जनता की आवाज बनती और सकारात्‍मक बदलाव की अपेक्षित भावभूमि बनाती। जैसे सब को रस्‍म अदायगी, मीडिया केन्द्रित प्रचार प्रियता और अपनी मान-प्रतिष्‍ठा व शान-शौकत बनाने-दिखाने की ही पड़ी हो।

केन्‍द्र सरकार, उत्‍तर प्रदेश सरकार और उसके प्रभारी मंत्री मो. आजम खां के लिए तो महाकुंभ महज एक बड़ा मेला भर था। इससे ज्‍यादा किसे फुरसत है। ऐसा न होता तो इलाहाबाद रेलवे स्‍टेशन और मेला क्षेत्र में 45- 50 लोग कुचल कर न मारे जाते। मौनी अमावस्‍या पर व्‍यवस्‍था चरमरा न जाती। हादसे के 20 घंटे बाद भी लाखों धर्मभीरु कलपते-कराहते फंसे न रहते। बारिश होने पर कीचड़ बनीं सडकें, गिरे टेंट, कटी बिजली और भूख से बिलबिलाते हजारों कल्‍पवासी व्रत अधूरा छोड़ कर वापस लौटने को विवश न होते। आम स्‍नानार्थियों को भूखे-प्‍यासे घंटों मीलों पैदल न चलना पड़ता। हाई कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाता कोई नवनीत सिकेरा लाव लश्‍कर के साथ धड़धड़ाते घाट न पहुंचता।

महंतों-मठाधीशों के वैभव की सारी चमक भक्‍तों के पैसे पर ही टिकी है। समाज की दिशा- दशा बदलने वाली अन्‍य शक्तियों- साहित्‍यकारों और राजनेताओं से भी अधिक उनका असर है। इस लिए उनसे अपेक्षायें भी ज्‍यादा हैं। कहा जाता है मार्ग वही है जिस पर महपुरुष चलते हैं – महाजनो येन गत: स पंथान:। भगवान श्रीकृष्‍ण गीता में गाते हैं- यद्यदाचरति श्रेष्‍ठस्‍तत्‍तदेवेतरो जन:, स यत्‍प्रमाणं कुरुते लोकस्‍तदनुवर्तते। श्रेष्‍ठ मनुष्‍य जो जो आचरण करता है, दूसरे लोग वैसा वैसा ही करते हैं, वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, दूसरे मनुष्‍य उसी के अनुसार चलने लगते हैं। इस कसौटी पर देखें तो निराशा ही हाथ लगती है। प्रदूषण, पर्यावरण, जलसंरक्षण, लैंगिक समानता-सम्‍मान, सामाजिक सदभाव जैसे बड़े मुद्दे प्राय: अछूते ही रह गये। नरेन्‍द्र मोदी पर तो दिलचस्पियां ली जाती रहीं पर आटा, दाल, चावल से लेकर दूध, सब्‍जी, दवाई तक में जहरीली मिलावट की बढ़ती प्रवृत्तिचिंता का बिषय नहीं बनी। जगह और डुबकी लगाने क्रम व समय को लेकर तो आवाजें उठीं लेकिन विश्‍वसनीयता के संकट को दूर करने को आगे आने की आवश्‍यकता नहीं समझी गयी।

देश की आन बान, शान और पहचान गंगा – यमुना शहरों के शौच-सीवर का नाला बन गयीं हैं और शंकराचार्य चतुष्‍पथ की जगह के नाम पर रूठते-ऐंठते रह गये। कोई नवनीत हृदय नदियों के दुख से द्रवित नहीं हुआ। शहरों में तालाब पट गये हैं और गांवों के सूख गये हैं। बाग के बाग विकास की भेंट चढ चुके हैं लेकिन इनके बजाय राधे मां, नित्‍या नंद आशाराम बापू और रामदेव को बयान-विवाद होते रहे। बाबा रामदेव को महाकुंभ में महाक्रांति के लक्षण दिखे। उन्‍हों ने इस वर्ष के अंत तक देश में बहुत बड़े बदलाव की उम्‍मीद जतायी। तो दूसरी ओर उन्‍हें एक अखाडे द्वारा शाही स्‍नान के लिए चांदी के सिंहासन पर बैठाये जाने को लेकर विरोध-विवाद हो गया। विरोधी का कहना था कि वे बाबा राम देव को संत ही नहीं मानते। बाबा किसी अखाडे या साधु समाज से नहीं जुड़े हैं, इसलिए संत नहीं हैं। दूसरे उन्‍होंने धर्म को व्‍यवसाय बना रखा है। दिल्‍ली में बलात्‍कार पीडिता के बारे में विवादित बयान देने की वजह से लोगों का कोपभाजन बने आशाराम बापू को सफाई देने से ही फुरसत नहीं मिली। धर्मसंसदों ने इस पर विचार नहीं किया कि महज पांच साल में महामंडलेश्‍वर 125 से बढ़ कर 327 कैसे हो गये। इस पर भी विचार नहीं किया गया धार्मिक समागमों में तो जयकारे सनातन धर्म के लगते हैं, लेकिन लोक व्‍यवहार में सनातन धर्म के बजाय ‘हिंदू धर्म’ शब्‍द क्‍यों चलता है। एकरूपता क्‍यों नहीं है?

लेखक शंभू दयाल वाजपेयी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ये लंबे समय तक दैनिक जागरण में वरिष्‍ठ पद पर रहे हैं. इनसे संपर्क मो. 9927003000 के जरिए किया जा सकता है.

बंसल न्यूज से इस्तीफों का दौर जारी, तीन गए, राज में कई और जाएंगे

बंसल न्यूज से इस्तीफों का दौर जारी है. बुधवार को दो और एडिटरो ने इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा देने वालों में चंद्रमोहन और राजदीप शामिल हैं. .ये लोग चैनल की लॉन्चिंग से चैनल के साथ थे. इसके साथ ही एक और एडिटर राजेश के साथ प्रोग्रामिंग टीम ने भी चैनल में आना बंद कर दिया है. खबर है कि ये भी जल्दी इस्तीफा दे सकते हैं. पिछले दो महीने में बंसल न्यूज से करीब दो दर्जन लोग इस्तीफा दे चुके हैं.

बंसल न्यूज को लॉन्च कराने वाली टीम के सभी लोग एक एक करके चैनल को छोड़ रहे हैं जिसके भी मुख्य कारण गिने चुने लोगों का पैसा बढ़ना है. इसके साथ ही चैनल में चाटुकारिता चरम सीमा पर है. यहां व्यक्ति विशेष के रिश्तेदार मलाई खा रहे हैं. चैनल के संपादक के सगे साले नीलम तिवारी को इनपुट हेड बना दिया गया है. जबकि दूसरे रिश्तेदार रक्षित मिश्रा आउटपुट हैड हैं. इतना ही नहीं, चैनल में सैलरी बढ़ाने के नाम पर हर बार झुनझुना पकड़ा दिया जाता है. पहले कहा कि दीपावली पर पैसा बढ़ेगा, फिर बोले मार्च में बढ़ा देंगे. लेकिन कुछ नहीं हुआ. इसके साथ ही न तो कर्मचारियों को आफर लेटर दिया जाता है न ही ज्वायनिंग लेटर. हर महीने की सैलरी लाइन में लगकर कर्मचारियों को लेनी होती है. बंसल न्यूज के लिए खतरे की घंटे राज इंडिया है. अगले महीने भोपाल से राज एक्सप्रेस का न्यूज चैनल राज इंडिया आने वाला है. अभी तक लोगों के पास विकल्प नहीं था, पर अब राज इंडिया के आने से बंसल न्यूज का प्रबंधन सकते है. खबर है कि बंसल न्यूज के 27 लोगों का चयन राज इंडिया में हो गया है. ये लोग बस 18 तारीख को मिलने वाली सैलरी का इंतजार कर रहे हैं इसके बाद इस्तीफा दे देंगे.

क्या महिला पत्रकारों को नहीं पढ़ना चाहिए बलात्कार की खबर?

बलात्कार कानून को लेकर देश भर में बहस चल रही है। इसके स्वरूप और सजा के प्रावधान पर भी चर्चा हो रही है। महिलाओं के समक्ष यौन उत्तेजना से जुड़े शब्दों के इस्तेमाल को भी बलात्कार की श्रेणी में रखने की बात कही जा रही है। तो अब सवाल यह है कि खबरों के धंधों से जुड़ी महिलाओं का क्या होगा? क्या उन्हें बलात्कार की खबर पढ़ने या कवर करने से रोका जायेगा? या फिर बलात्कार से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए उन्हें विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि दर्शक खूबसूरत एंकर की मीठी आवाज का आनंद लेते हुए बलात्कार के दोषी या आरोपित के संबंध में चटखारे लेकर बात करे और चैनल का टीआरपी भी बढ़े।

क्या एक महिला द्वारा बलात्कार शब्द का बार-बार इस्तेमाल करना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता है? जब बलात्कार की घटनाओं की चासनी को महिला एंकरों द्वारा पेश करवाना क्या उनके साथ बलात्कार जैसी घटना नहीं है। बलात्कार से जुड़े कानून को बनाते समय सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए, विज्ञापनों में महिला देह का प्रदर्शन क्या बलात्कार नहीं है? प्रेस काउंसिल आफ इंडिया को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए कि मीडिया के धंधे में टीआरपी के लिए महिला एंकरों का इस्तेमाल बलात्कार की श्रेणी में आता है कि नहीं? क्या मीडिया से जुड़ी महिलाएं पेशे गत बलात्कार जैसी घटनाओं के विरोध में आगे आएंगे या टीआरपी के बाजार स्वयं को सामान के रूप में प्रस्तुत करती रहेंगी।

वीरेंद्र यादव

संपादक

आह्वान,

पटना

उपेंद्र द्विवेदी को चौथी बार बेस्‍ट परफारमेंस का पुरस्‍कार, संजीव गंभीर काम पर लौटे

हिंदुस्‍तान, बरेली से दो खबर हैं. पहली खबर है कि हिंदुस्‍तान, बदायूं के ब्‍यूरोचीफ उपेंद्र द्विवेदी को लगातार चौथी बार बेस्‍ट परफारमेंस का पुरस्‍कार मिला है. उन्‍हें शुक्रवार को बरेली में यह पुरस्‍कार प्रदान किया जाएगा. उपेंद्र को यह पुरस्‍कार संपादक अनिल भास्‍कर, केके उपाध्‍याय, आशीष व्‍यास और अब कुमार अभिमन्‍यु के कार्यकाल में चौथी बार दिया जा रहा है. पिछले दिनों बदायूं में एक भी रिपोर्टर नहीं था, तब भी उपेंद्र ने अखबार को कंपटीशन से बाहर नहीं होने दिया.

दूसरी खबर है कि लंबे समय से छुट्टी पर चल रहे सीनियर रिपोर्टर संजीव गंभीर ने अखबार में काम दुबारा संभाल लिया है. संजीव पिछले काफी समय से स्‍वास्‍थ्‍य एवं कई कारणों से छुट्टी पर चल रहे थे. खबर है कि उन्‍हें सोमवार से ज्‍वाइन करा दिया गया है. हालांकि अभी उन्‍हें कौन सा बीट सौंपा गया है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. संजीव ने पिछले दिनों प्रबंधन से अपने तबादले की मांग की थी. बीच में उनको बर्खास्‍त किए जाने की खबर भी आई थी, परन्‍तु वो निराधार साबित हुई.

दसवें सप्‍ताह भी स्‍टार प्‍लस नम्‍बर वन, जी टीवी दूसरे नम्‍बर पर

इंडियन एंटरटेनमेंट टेलीविजन के दसवें सप्‍ताह की रेटिंग आ गई है। इस बार की रेटिंग में कोई बदलाव नहीं हुआ है। स्‍टार प्‍लस की रेटिंग प्‍वाइंट में लगातार दूसरे सप्‍ताह भी वृद्धि दर्ज हुई है। स्‍टार प्‍लस लगातार पहले नम्‍बर पर बना हुआ है, जबकि जी टीवी एक प्‍वाइंट के अंतर से अपना दूसरा स्‍थान बचाने में सफल रहा है। आठवें सप्‍ताह में कलर्स ने जी टीवी को पछाड़ दिया था, लेकिन नौंवे सप्‍ताह में जी न्‍यूज दूसरे स्‍थान पर वापसी कर ली थी। 

आइए जानें टैम रेटिंग के दसवें सप्ताह में छोटे परदे पर क्या कुछ बदला और क्या नहीं। स्टार प्लस चैनल पिछले सप्ताह 265 जीआरपी रेटिंग के साथ नंबर वन पर था। जबकि इस बार इसकी रेटिंग 271 प्‍वाइंट हो गई है। यह चैनल लगातार नम्‍बवर वन बना हुआ है। जी टीवी को इस सप्‍ताह जीआरपी रेटिंग का नुकसान हुआ है इसके बावजूद यह दूसरे नंबर पर अपना कब्‍जा बरकरार रखे हुए है। पिछले सप्‍ताह जी टीवी की रेटिंग 226 थी, जो इस सप्‍ताह 215 पर पहुंच गई है।

214 जीआरपी रेटिंग के साथ कलर्स तीसरे स्‍थान पर बना हुआ है। पिछले सप्‍ताह कलर्स की जीआरपी 220 प्‍वाइंट थी, जो इस बार घट गई है। सोनी ने टीवी पिछले कई सप्ताह से नंबर 4 की पोजीशन बरकरार रखा है। इस सप्ताह सोनी टीवी की रेटिंग में जबर्दस्‍त कमी आई है। जी हां, इस सप्ताह सोनी टीवी 170 जीआरपी से घटकर 155 जीआरपी तक पहुंच गया है। पिछले 18 महीने में सोनी का यह सबसे खराब प्रदर्शन है।

सब टीवी रेटिंग के नुकसान के बावजूद इस सप्‍ताह पांचवें स्‍थान पर अपना कब्‍जा बरकारार रखा है। आठवें सप्‍ताह में लाइफ ओके ने सब को छठे नम्‍बर पर ढकेल दिया था, परन्‍तु सब ने वापसी करते हुए नौंवे सप्‍ताह में पांचवां पोजिशन हासिल कर लिया था और इस बार भी उसे 135 जीआरपी रेटिंग के साथ बरकरार रखे हुए हैं। पिछले सप्‍ताह सब टीवी की जीआरपी 138 जीआरपी थी। इसके बाद लाइफ ओके है। लाइफ ओके 126 जीआरपी के साथ छठवें स्‍थान पर है, पिछले सप्‍ताह चैनल की जीआरपी 132 थी। इसके बाद स्‍टार उत्‍सव का नम्‍बर है, जिसने एक जीआरपी अंक के नुकसान से सातवें स्‍थान पर है। स्‍टार उत्‍सव के 55 जीआरपी प्‍वाइंट हैं, जो पिछले सप्‍ताह 56 जीआरपी थे। सहारा वन आठवें नम्‍बर पर है।

अनिल बहुगुणा का हिंदुस्‍तान एवं डीके का जनसंदेश टाइम्‍स से नाता टूटा

हिंदुस्‍तान से खबर है कि पौड़ी से अनिल बहुगुणा को हटा दिया गया है. वे लंबे समय से हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए थे. सूत्रों का कहना है कि अनिल पर वित्‍तीय अनियमितता का आरोप लगा है, जिसके बाद प्रबंधन ने यह कदम उठाया है. खबरों को लेकर भी उनकी कुछ शिकायतें थीं, जिसके बाद प्रबंधन ने उन्‍हें हटाने का फैसला किया है.

अनिल अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. अनिल को अविकल थपलियाल का नजदीकी माना जाता था. वैसे कुछ लोगों का कहना है‍ कि अनिल ने खुद ही इस्‍तीफा दिया है क्‍योंकि वो लंबे समय से प्रमोशन और इंक्रीमेंट ना होने से नाराज थे.

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस से खबर है कि डीके सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर ऑपरेटर के पद पर कार्यरत थे. वे अखबार की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. माना जा रहा है कि सैलरी की अनियमिता से नाराज होकर डीके ने इस्‍तीफा दिया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने वाले हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

पत्रकारों को फर्जी फंसाए जाने के विरोध में सड़क पर उतरे मीडियाकर्मी

सिरोंज। सिरोंज पुलिस के मनमाने रवैये के विरोध में शहर के पत्रकारों का आक्रोश मंगलवार को एक बार फिर सड़कों पर उतर आया। शाम को सभी पत्रकारों ने सामूहिक रूप से वाहन रैली निकालकर विरोध प्रदर्शन किया तथा थाना प्रभारी के विरुद्ध जबरदस्त नारेबाजी की। इसके पहले पत्रकार भवन में हुई सामूहिक बैठक में हुए निर्णय में पत्रकारों पर दर्ज किए झूठे मुकदमा वापस लेने तथा सिरोंज थाना प्रभारी को निलंबित करने की मांग प्रभावी ढंग से उठाई गई।

ज्ञात हो कि सिरोंज में थाना प्रभारी राजेन्द्र प्रसाद मिश्रा को आये लगभग तीन वर्ष बीतने वाले और उनके संरक्षण में यहां चल रहा जुआ-सट्टा-आडा का कारोबार भी काफी फल फूल रहा है। यहां तक कि वह नई नई चार पहिया वाहन भी खरीदकर पीली बत्ती लगाकर घूम रहे हैं। यदि कोई पत्रकार उनके द्धारा किये जा रहे अस्माजिक तत्वों से प्यार व नगर के असमाजिक तत्वों की खबरे छापते हैं तो उनपर झूठा प्रकरण दर्ज कर लिया जाता है, जिसका उदाहरण नगर वासियों के सामने है, परंतु हैरत की बात तो यह है कि यह सारा माजरा जनसम्पर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के गृह नगर का है। जिस ओर वह ध्यान नहीं दे रहे हैं बल्कि थाना प्रभारी को और ढील दे रहे हैं। उन्हीं के विभाग की मीडिया को धरने पर बैठने पर मजबूर कर रहे हैं।

पूर्व में भी कई पत्रकारों के साथ ऐसे हादसे हो चुके हैं, जिसको लेकर मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा से मिला गया, परंतु आज तक उस मिलने का कोई फायदा नहीं रहा है। इस तरह थाना प्रभारी पर कार्रवाई न करके माननीय मंत्री महोदय भी यह सिद्ध कर रहे हैं कि उनके ही संरक्षण से आज उनके गृह नगर की मीडिया अपने हक के लिये और झूठे मुकदमे वापस लेने के लिये सड़कों पर बैठ रही है, जो कि उनके लिये शर्म की बात है। इसी क्रम में शहर के एक वकील पर पुलिस द्वारा दर्ज किए गए छेडछाड़ का प्रकरण की खबर मीडिया में आने से नाराज एक वकील ने अपने साथी वकीलों के साथ पुलिस पर दबाव बनाकर सोमवार को शहर के दो पत्रकारों के विरुद्ध झूठी रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी। पुलिस द्वारा बिना कोई जांच किए पत्रकारों पर दर्ज किए गए प्रकरणों का सिरोंज के सभी पत्रकारों द्वारा सोमवार देर रात तक थाने के सामने प्रभावी विरोध किया गया था।

पत्रकारों ने थाने के सामने करीब दो घंटे तक धरना देकर पुलिस की मनमानी के विरोध में जबरदस्त नारेबाजी की थी। जानकारी मिलने पर सिरोंज आए बासौदा एसडीओपी से मिले आश्‍वासन के बाद पत्रकारों ने अपना यह धरना प्रदर्शन समाप्त किया था। इसके बाद पत्रकारों के विरोध प्रदर्शन का क्रम मंगलवार को भी दिनभर चलता रहा। दोपहर में नया बस स्टैण्ड स्थित बाल कृष्ण विद्यार्थी भवन में सभी पत्रकारों की बैठक का आयोजन भी किया गया। करीब तीन घंटे तक चली मैराथन इस बैठक में पत्रकारों को लेकर सिरोंज पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा के रवैये की तीखी निंदा की गई। वरिष्ठ पत्रकार सुबुर खान का कहना था कि सभी पत्रकार पूरी निष्पक्षता के साथ अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे है। ऐसी स्थिति में कुछ लोगों द्वारा मनगढंत कहानियां बनाकर पत्रकारों के विरूद्ध झूठा प्रकरण दर्ज करना एक तरह से प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रहार है।

पत्रकार राजीव जैन का कहना था कि पुलिस द्वारा इस तरह बिना जांच किए पत्रकारों पर प्रकरण कायम करना प्रेस की स्वतंत्रता का हनन है। जिसका हर स्तर पर जाकर विरोध किया जाएगा। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार रोहिताश्‍व शर्मा, लक्ष्मण सिंह कटियार, मनोज साईंनाथ तथा राजेश सहेले ने भी अपने विचार रखे। बैठक में पत्रकारों पर दर्ज झूठे मुकदमों के वापस न होने तथा सिरोंज थाना प्रभारी के निलंबन न होने तक आंदोलन का क्रम लगातार जारी रखने का निर्णय लिया गया है।

शहर में निकाली वाहन रैली : दोपहर एक बजे से शाम चार बजे तक चली इस मैराथन बैठक के बाद पत्रकारों ने पुलिस की मनमानी के विरोध में सामूहिक रूप से वाहन रैली भी निकाली। वाहन रैली में शामिल सभी पत्रकार हाथों पर काली पट्टी बांधे हुए थे तथा सिरोंज थाना प्रभारी एवं प्रशासन के मनमाने रवैये के विरोध में जोरदार नारेबाजी कर रहे थे। मण्डी बायपास, बासौदा नाका, लिंक रोड, छतरी चौराहा, कष्टम पथ, कठाली बाजार, सर्राफा बाजार, कपड़ा बाजार, चांदनी चौक, कोर्ट गेट, राज बाजार तथा पुराना बस स्टेण्ड, थाना परिसर होते हुए तहसील परिसर में पहुंचकर जोरदार नारेबाजी के बाद समाप्त हुई।

नहीं बंटे अखबार : पत्रकारों पर दर्ज हुए मुकदमे के विरोध में मंगलवार को शहर में किसी भी अखबार का वितरण नहीं हुआ। सोमवार को सुबह सभी पत्रकार नया बस स्टैण्ड पर एकत्रित हुए तथा अखबारों का वितरण नहीं करने का निर्णय लिया। सभी हाकरों ने भी पत्रकारों के इस निर्णय का समर्थन करते हुए बस स्टैण्ड पर अखबारों के बंडल रखकर जोरदार नारेबाजी की। वहीं स्थानीय पत्रकारों ने थाना परिसर के सामने अपना विरोध दर्ज कराया साथ ही पुलिस प्रशासन व थाना प्रभारी राजेन्द्र प्रसाद मिश्रा के खिलाफ भी नारेबाजी की गई।

गौरतलब हो कि पिछले तीन वर्षों से नगर में असमाजिक तत्वों का अड्डा सिरोंज बनता जा रहा था। जहां जुआ सट्टा आड के साथ ही अन्य गैर कानूनी कार्य भी किये जा रहे हैं। इन सब चीजों को स्थानीय पत्रकारों द्धारा अपने समाचार पत्रों में छापने पर उनपर दबाव बनाया जाता था। वहीं थाने मे बुलाकर धमकी तक दी जाती थी। इसके साथ ही पत्रकारों को निष्पक्ष लिखने से रोकने के लिये उनकी गाडि़यां भी रोक कर न्यायालय के चालान काटा गया, जिसके बाद अब एक बार फिर निष्पक्ष लिखने वाले दो पत्रकारों के खिलाफ षडयंत्रपूर्वक प्रकरण कायम किया गया। पहले भी पत्रकारों पर झूठे प्रकरण की कार्रवाई की जा चुकी है, जिसका सिलसिला अभी लगातार जारी है। 

भोपाल से आमिर खान की रिपोर्ट.

भोपाल वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन का चुनाव 14 अप्रैल को

भोपाल। एम.पी. वर्किग जर्निलस्ट यूनियन आई.एफ.डब्ल्यू.जे. की भोपाल इकाई का निर्वाचन कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है। निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार आगामी 5 अप्रैल 2013 को नामांकन पत्र प्रस्तुत किये जा सकेगेँ। जिनकी छानबीन 7 अप्रैल 2013 को होगी। नाम वापसी की तिथि 9 अप्रैल 2013 होगी और यदि आवश्यक हुआ तो 14 अप्रैल को विधिवत चुनाव सम्पन्न कराये जाएंगे।

निर्वाचन अधिकारी प्रेम नारायण प्रेमी तथा अवधेश भार्गव ने बताया है कि निर्वाचन कार्यक्रम की सूचना पत्रकार भवन के सूचना पटल पर भी चस्पा कर दी गई है। निर्वाचन अधिकारियों ने यह भी बताया है कि 10 मार्च 2013 तक की सूची के आधार पर ही निर्वाचन संपन्न होंगे।

इटली के राजदूत के भारत छोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

नई दिल्ली : भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी इटली के दो नौसैनिकों को भारत को सौंपने से इटली द्वारा इनकार किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इटालियन राजदूत डेनियल मेनचिनी के भारत छोड़ने पर रोक लगा दी है। उच्‍चतम न्‍यायालय ने इटालियन सरकार से भी भारत में मुकदमे के लिए दोनों इटालियन नौसैनिकों को वापस भेजने के वादे से मुकरने के लिए स्पष्टीकरण भी मांगा है।

इटालियन राजदूत और दोनों नौसैनिकों को नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नौसैनिकों की 22 मार्च तक वापसी का लिखित आश्वासन देने वाले राजदूत डेनियल मेनचिनी 18 मार्च तक अपना जवाब दाखिल करें। सुप्रीम कोर्ट इटली के रवैये पर बहुत नाराजगी जताई है। अटॉर्नी जनरल ने इस मुद्दे को शीर्ष अदालत के संज्ञान में लाते हुए बताया था कि सरकार भी इस बारे में बहुत चिंतित है।

गौरतलब है कि इसी सप्ताह की शुरुआत में इटली ने भारत को सूचित किया था कि वह अपनी गारंटी के बावजूद दोनों नौसैनिकों को वापस नहीं भेजेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नौसैनिकों को परिवार के साथ ईस्टर मनाने और राष्ट्रीय चुनाव में वोट डालने के लिए चार सप्ताह के लिए इटली जाने की इजाज़त दी गई थी। इस मामले में पीएम डा. मनमोहन सिंह ने कड़ा लहजा अपनाते हुए इसे बर्दाश्‍त करने से बाहर की बात बताया था।

दूसरी तरफ इटालियन सरकार ने कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक विवाद का समाधान करने के लिए तैयार है, क्योंकि उसके नौसैनिक रोम की एक अदालत में सुनवाई का सामना कर रहे हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इटली के राजदूत को भारत छोड़ने पर रोक लगा दी है। समझा जा रहा है कि इटली के रवैये से विवाद काफी बढ़ सकता है।

क्‍या पत्रकारिता के साथ देश चलाने वालों की भी शैक्षणिक योग्‍यता तय नहीं होनी चाहिए?

खबर है कि भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्‍त) मार्कण्डेय काटजू ने पत्रकार बनने के लिए जरूरी न्यूनतम योग्यता की सिफारिश करने के लिए एक समिति गठित की है। पीसीआई के सदस्य श्रवण गर्ग और राजीव सबादे के अलावा पुणे विश्वविद्यालय के संचार एवं पत्रकारिता विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उज्ज्वला बर्वे को समिति में शामिल किया गया है।

काटजू ने कहा, वकालत के पेशे में एलएलबी की डिग्री के साथ बार काउंसिल में पंजीकरण जरूरी होता है। इसी तरह मेडिकल पेशे में एमबीबीएस होना जरूरी योग्यता है और साथ में मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण भी कराना होता है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि शिक्षक बनने के लिए भी शैक्षणिक प्रशिक्षण प्रमाण पत्र या डिग्री जरूरी होती है। बाकी पेशे में भी कुछ ऐसा ही होता है, लेकिन पत्रकारिता के पेशे में प्रवेश के लिए कोई योग्यता तय नहीं है। उनका तर्क है कि पत्रकारिता में बहुत कम या अपर्याप्त प्रशिक्षण के कारण अप्रशिक्षित लोग पत्रकारिता के उच्च मानदंडों को बरकरार नहीं रखते। लिहाजा, पत्रकारिता के पेशे में आने के लिए कानूनी तौर पर कोई योग्यता निर्धारित हो।

प्रथम दृष्टि में तो यह पहल अच्छी लगती है। पत्रकारिता के पेशे में प्रवेश के लिए कोई योग्यता तय होनी चाहिए। इस बात पर शायद ही किसी को कोई आपत्ति हो। लेकिन भारतीय प्रेस परिषद  की इस पहल से स्वाभाविक तौर कुछ अहम सवाल भी खड़े होते हैं। पहला सवाल – खुद भारतीय प्रेस परिषद पर ही है। क्या भारतीय प्रेस परिषद का गठन जिस मन्तब्य से हुआ था, परिषद उसमें खरा उतरा है। सबसे पहले तो भारतीय प्रेस परिषद को उसकी तय भूमिका में खड़े होना चाहिए।

रहा सवाल पत्रकारिता के पेशे में प्रवेश के लिए कोई योग्यता तय होने का। क्या भारतीय प्रेस परिषद पत्रकारिता को विशुद्ध पेशा मानता है। अब पत्रकारिता के क्षेत्र में संवेदनाओं और जन सरोकारों का कोई स्थान नहीं रह गया है? जनपक्षीय सरोकारों की पत्रकारिता की पहली शर्त – आम आवाम की दुःख – तकलीफों को लेकर संजीदा होना है। संवेदनाएँ बाजार में नहीं बिकती। संवेदनशील होने के लिए डिग्री भी जरुरी नहीं है। अगर पत्रकारिता में डिग्री का होना जरूरी मान भी लिया जाय तो आज पत्रकारिता में डिग्री देने वाले कालेज अथवा विश्वविद्यालय कितने और कहां हैं? अगर हैं भी तो इनमें से ज्यादातर संस्थानों, यहाँ तक कि विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता का कोर्स पढ़ाने वालों में से कितनों के पास कौन सी डिग्रियां हैं?

भारत में कितने ऐसे संस्थान हैं जहां पत्रकारिता की व्यावहारिक अथवा सैद्धांतिक शिक्षा दी जा रही है। महत्वपूर्ण सवाल यह कि पत्रकारिता में डिग्रीधारियों को कितने समाचार संस्थान नौकरी पर रखने को तैयार हैं? क्या पत्रकारिता में प्रवेश करने वालों के साथ ही देश चलाने वालों की भी शैक्षिक योग्यता तय नहीं चाहिए? आखिरी सवाल यह कि अगर पत्रकारिता के पेशे में प्रवेश के लिए कोई योग्यता तय कर भी दी जाय, तो भारतीय संविधान में भारत के हरेक नागरिक को समान रूप से हासिल अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का क्या होगा?

लेखक प्रयाग पाण्‍डे उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा नैतीताल में रहते हैं.

बहुगुणा के आगे बिछ गई मीडिया, सड़क बनने तक की ब्रेकिंग चली

मौका था उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार का एक साल पूरा होने का। एक साल कब बीत गया किसी को पता नहीं चला। कइयों को तो ये सुनकर हैरत भी हुई कि बहुगुणा सरकार का एक वर्ष पूरा हो गया है। कांग्रेस के मुखिया विजय बहुगुणा समेत उनकी टीम प्रदेश में विकास के दावे के साथ दिनभर जश्न में डूबी रही। इस जश्न का हिस्सा मीडिया के लोग भी रहे। जश्न में शामिल हो भी क्यों ना, आखिरकार उन्हें भी मलाई खाने की आदत सी जो हो गई है।

कांग्रेस का एक साल का कार्यकाल पूरा होने पर उत्तराखंड के लिए प्रसारित होने वाले तमाम रीजनल न्यूज चैनलों और अखबारों ने सीएम बहुगुणा के काम की जो तारीफ की वो यकीकन इनकी सीएम भक्ति का परिचय दे रहा है। उत्तराखंड में इस वक्त कई रीजनल न्यूज चैनल चल रहे हैं। शायद ही कोई ऐसा चैनल बचा हो जिसने विजय बहुगुणा के एक साल के कार्यकाल को बढ़ा चढ़ाकर ना बताया हो। आलम ये था कि सीएम से जुड़ी कोई भी खबर ब्रेकिंग बनाकर चलाई जा रही थी। एक चैनल ने ये ये न्यूज तक ब्रकिंग में चला डाली कि सीएम की घोषणा के मुताबिक सितारगंज में सड़क के निर्माण का काम शुरू हो गया है। कोई इस चैनल से पूछे भाई इसमें ब्रेकिंग जैसा है क्या।

आगे सुनिए, एक चैनल ने ये ब्रकिंग बना दी कि बहुगुणा सरकार का एक साल पूरा होने पर देहरादून में कांग्रेस जश्न मना रही है। आपको क्या लगता है इसमें ब्रेकिंग जैसा क्या है भाई। 13 मार्च को उत्तराखंड के तमाम रीजनल चैनलों में सीएम विजय बहुगुणा के फेवर में खबर चलाने की होड़ सी लगी रही। बहुगुणा को खुश करने के लिए उनसे जुड़ी हर खबर को ब्रेकिंग के रूप में चलाया जा रहा था। लेकिन सवाल ये है कि आखिरकार मीडिया बहुगुणा जी पर इतना मेहरबान क्यों हो गया? आखिरकार बहुगुणा जी ने मीडिया को ऐसा क्या खिला दिया कि हर किसी ने उनका गुणगान करना शुरू कर दिया।

आपको बता दें दरअसल ये पूरा खेल विज्ञापनों से जुड़ा हुआ है। सालभर बहुगुणा सरकार की तरफ से न्यूज चैनलों और अखबरों को विज्ञापन के रूप में मोटा पैसा दिया जाता है। इस पैसे की बदौलत ही कई चिरकुट चैनल अपना काम चला रहे हैं। भला ऐसे में किसी ही हिम्मत है कि कोई बहुगुणा जी के एक साल के कामकाज पर उंगली उठा पाता। ये सारा विज्ञापन का ही खेल था कि सालभर जिन मंत्रियों ने दिल्ली दौड़ लगाई, विदेश के दौरे किए, फाइव स्टार में पार्टियां की, उन्हें विकास पुरूष बना दिया गया। भाई पैसा चीज़ ही ऐसी है, अच्छे अच्छों की बोलती बंद कर देता है। तमाम चैनलों ने दिखाया कि बहुगुणा सरकार ने एक साल में बहुत कुछ कर दिखाया। लेकिन मीडिया के ज़रिए गुणगान करवा देने से ये नहीं माना जा सकता है कि वास्तव में विकास का काम हुआ है।

असल मायने में बहुगुणा सरकार ने पिछले एक साल में किया ही क्या है। विजय बहुगुणा सीएम बनने से पहले टिहरी से सांसद थे। सीएम बने रहने के लिए उन्हें विधानसभा का चुनाव जीतना था। पहले तो सितारगंज से बीजेपी के विधायक किरण मंडल को लालच देकर सीट खाली कराई गई। इस साल के चार महीने तो बहुगुणा को जोड़ तोड़ की राजनीति करने में ही गुजर गए। बहुगुणा जी विधानसभा का चुनाव जीते तो अब उन्हें टिहरी के सांसद पद से इस्तीफा देना पड़ा। टिहरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में सीएम ने अपने बेटे साकेत बहुगुणा को उतार दिया। अपने बेटे साकेत को चुनाव जीताने के लिए बहुगुणा ने पूरा एक महीना खर्च कर दिया। इस दौरान सरकारी मशीनरी का भी जमकर इस्तेमाल किया गया। इससे जनता को कुछ हासिल नहीं हुआ।

कुछ मिलाकर 6 महीने तो ऐसे ही निकल गए। बचे उनके एक साल के कार्यकाल के 6 महीने, इन 6 महीनों में से 3 महीने तो उन्होंने देहरादून से दिल्ली की दौड़ में बिता दिए। अब जो तीन महीने बचे उनमें बहुगुणा जी ने कभी शिलान्यास, कभी समीक्षा बैठक तो कभी कैबिनेट मीटिंग में बिता दिए। घोषणाएं तो खूब की गई लेकिन धरातल पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। सड़कें बनाने की बात कही गई, लेकिन उत्तराखंड में एक भी सड़क नहीं बनी है। पानी की समस्या दूर करने की बात कही गई लेकिन लोग अभी भी प्यासे हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती का वायदा किया गया, लेकिन सरकारी अस्पताल में अभी डॉक्टरों का टोटा है। रोजगार मुहैया कराने की वायदा किया गया, हर कोई जानता है कि रोजगार कितनों को मिला है। कानून व्यवस्था सुधारने की बात की गई, लेकिन कानून व्यवस्था सुधरी ही कहां है। कांग्रेस सरकार ने गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक कर ये जता दिया कि वो राज्य को विकास की पटरी पर आगे ले जाएगी लेकिन धरातल पर विकास हुआ ही कहां है। ऐसे में अगर मीडिया बहुगुणा सरकार के एक साल के कामकाज की तारीफ करता है तो भैया दाल में कुछ तो काला जरूर है।

आत्‍महत्‍या करने के एक दिन पूर्व अभिषेक को दी गई थी वसूली की धमकी!

जागरण समूह के अखबार नवदुनिया के कर्ममचारी अभिषेक गुप्‍ता के आत्‍महत्‍या के मामले में सामने आ रहा है कि उसके ऊपर प्रबंधन ने जबर्दस्‍त दबाव बना रखा था, जिसके बाद उसने यह कदम उठाया. पुलिस इस मामले की जांच कर रही है परन्‍तु माना जा रहा है कि अखबार के दबाव में मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा. अब तक नवदुनिया में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन जागरण समूह के हाथों में आते ही इस अखबार की सूरत और सीरत दोनों बदल चुकी है.

अपने कर्मचारियों के शोषण के लिए कुख्‍यात जागरण समूह ने जब से नईदुनिया का अधिग्रहण किया है तबसे इस अखबार के कर्मचारियों का भी हाल बुरा है. यह संस्‍थान अपने तमाम कर्मचारियों को किसी ना किसी माध्‍यम से प्रताडि़त करता रहता है. अभिषेक के आत्‍महत्‍या के मामले में सामने आ रहा है कि उसकी मौत से एक दिन पहले यानी आठ मार्च को कार्यालय में किसी वरिष्‍ठ ने उसके साथ बहुत बदतमीजी की थी.

सूत्रों का कहना है कि उसे धमकी दी गई थी कि सर्कुलेशन के फंसे पैसे की रिकवरी उसके पास से की जाएगी, जिससे वह बुरी तरह डर और सहम गया था. संस्‍थान द्वारा पैदा किए गए इसी डर और दहशत ने उसे आत्‍महत्‍या करने को मजबूर कर दिया. नवदुनिया प्रबंधन की असंवेदनशीलता ने एक बाप, एक मां का सपना पल भर में चकनाचूर कर दिया. अभिषेक का कुछ समय बाद ही शादी होने वाली थी. सबसे दुखद बात तो यह रही कि अभिषेक की अंत्‍येष्टि में भी प्रबंधन की तरफ से शामिल होने कोई नहीं गया.

सूत्रों का कहना है कि अभिषेक ने अपने सुसाइड नोट में भी इस बात का जिक्र किया है, लेकिन सवाल यह है कि क्‍या पुलिस अभिषेक को आत्‍महत्‍या करने के लिए उकसाने वाले किसी भी व्‍यक्ति या अखबार के मालिकों के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगी. अभिषेक के आत्‍महत्‍या की घटना के बाद से निचले स्‍तर के कर्मचारी बहुत दुखी हैं. हालांकि वे खुल कर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं, पर सवाल यही है कि क्‍या किसी संस्‍थान के लिए पैसा उसके अपने कर्मचारियों के जीवन से भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है.

मूल खबर – नईदुनिया प्रबंधन की प्रताड़ना से तंग आकर अभिषेक ने की आत्महत्या!

कोबरा पोस्‍ट का दावा : 3 निजी बैंक कर रहे हैं काले धन को सफेद, देखें 15 आरोप

नई दिल्ली। कोबरा पोस्ट डॉट कॉम ने देश के कई निजी बैंकों से जुड़े कई सनसनीखेज दावे किए हैं। कोबरा पोस्ट ने दावा किया है कि देश के कई बड़े निजी बैंक काले धन को सफेद करने में मदद कर रहे हैं। कोबरा पोस्ट के मुताबिक देश के कुछ बड़े बैंक कालाधन नकद लेते हैं और उसे बीमा और सोने में निवेश करते हैं।

कोबरा पोस्ट ने देश के बड़े बैंक एडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई और एक्सिस बैंक पर आरोप लगाया है कि वो अपनी शाखाओं में कालेधन को अपनी निवेश योजनाओं में खपाते हैं और इसके लिए वो बाकायदा अकाउंट खोलते हैं। कोबरा पोस्ट का आरोप है कि काले धन को सफेद करने वालों के लिए ये अकाउंट बिना पैन कार्ड के खुल जाता है और इसमें रिजर्व बैंक की सारी धज्जियां उड़ाई जाती हैं।

कोबरा पोस्ट के मुताबिक बैंक बहुत ही शातिर तरीके से काले धन को सफेद करते हैं। आरोप है कि ग्राहक के कालेधन को छोटे टुकड़ों में बांट कर बैंक में जमा किया जाता है। कोबरा पोस्ट का आरोप है कि बैंक कालेधन को सफेद में बदलने के लिए बेनामी अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं, आरोप ये भी है कि कालेधन को खपाने के लिए दूसरे ग्राहकों के अकाउंट का इस्तेमाल होता है।

कोबरा पोस्ट का आरोप है कि कालेधन को सफेद बनाने के लिए बैंक बनाते हैं। आज कोबरा पोस्ट ने देश के बड़े और प्रतिष्ठित निजी बैंकों पर लगाए हैं। क्या हैं आरोप आप भी पढ़िए-

पहला आरोप –

1. नकद कालाधन लेकर इंश्योरेंश और सोने में निवेश

दूसरा आरोप –

2. कालेधन को बैंकों की निवेश योजनाओं में खपाने के लिए खोलते हैं अकाउंट

तीसरा आरोप –

3. बिना पैन कार्ड के खुल जाता हैं काले धन वालों का अकाउंट

चौथा आरोप –

4. आरबीआई के नियमों की उड़ाई जाती हैं धज्जियां

पांचवा आरोप –

5. ग्राहक के कालेधन को छोटे हिस्सों में बांट कर जमा करते हैं बैंक

छठा आरोप –

6. बैंक कालेधन को सफेद में बदलने के लिए बेनानी अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं

सातवां आरोप –

7. कालेधन को खपाने के लिए दूसरे ग्राहकों के अकाउंट का इस्तेमाल

आठवां आरोप –

8. कालेधन को सफेद बनाने के लिए बैंक बनाते हैं ड्राफ्ट जिसका जिक्र ग्राहक के अकाउंट में नहीं होता

नौवां आरोप –

9. कालाधन देने वाले ग्राहकों की पहचान बैंक गोपनीय रखते हैं

दसवां आरोप –

10. किसी ग्राहक का कालाधन खपाने के लिए कई अकाउंट खोले और जरूरत के हिसाब से बंद किए जाते हैं

ग्यारहवां आरोप –

11. कालेधन को खपाने के लिए कई योजनाओं में अलग-अलग नामों से निवेश, फर्जी नामों का इस्तेमाल

बारहवां आरोप –

12. अवैध नगदी रखने के लिए लॉकर दिए जाते हैं, करोड़ों की नगदी रखने के लिए बड़े लॉकर का भी इस्तेमाल

तेरहवां आरोप –

13. डील करने और कालाधन ले जाने के लिए बैंक के लोग खुद ग्राहक के घर आते हैं, नोट गिनने की मशीन भी लाते हैं

चौदहवां आरोप –

14. कालेधन को निवेश करने के लिए फॉर्म 60 का होता है इस्तेमाल

पंद्रहवां आरोप –

15. कालेधन को विदेश भेजने में भी बैंक करता है मदद (आईबीएन)

ग्रामीण अभियंत्रण निदेशक उमाशंकर के आयु गड़बड़ी मामले में परिवाद दर्ज

ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के निदेशक उमा शंकर की जन्मतिथि में हुई तमाम अनियमितताओं के सम्बन्ध में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ राजेश उपाध्याय ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र को स्वीकार कर लिया. अपने आदेश में सीजेएम ने कहा कि प्रार्थिनी का प्रार्थनापत्र परिवाद के रूप में दर्ज किये जाने योग्य है. अतः उन्होंने ठाकुर का प्रार्थनापत्र स्वीकार करते हुए आदेश किया कि मामला परिवाद के रूप में दर्ज हो.

सीजेएम ने बयान दर्ज किये जाने हेतु सुनवाई की अगली तिथि 29 मार्च 2013 नियत की है. ठाकुर ने हरि शंकर पाण्डेय, विशेष सचिव, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग द्वारा की गयी जांच रिपोर्ट के आधार पर उमा शंकर के मूल आवेदनपत्र तथा व्यक्तिगत पत्रावली गायब करा कर उनकी जन्मतिथि 25 अक्टूबर 1951 से छह साल घटाकर 25 अक्टूबर 1957 किये जाने के बारे में प्रार्थनापत्र दिया था.

पाण्डेय ने 30 अक्टूबर 2012 को संजीव दूबे, प्रमुख सचिव, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग को प्रस्तुत नौ पृष्ठों की जांच आख्या में लिखा था कि उमा शंकर ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती हेतु छह वर्ष का अनुचित सेवाकाल बढ़ाए जाने हेतु की आपराधिक मंशा से शहजादे लाल, संयुक्त सचिव, हरेन्द्र वीर सिंह, विशेष सचिव आदि के साथ दुरभिसंधि कर यह आपराधिक कृत्य किया. ठाकुर ने इस सम्बन्ध में थाना गोमतीनगर और एसएसपी लखनऊ द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं करने की दशा में सीजेएम कोर्ट में वाद दायर किया था.

जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में सैलरी के लाले, मुश्किल में पत्रकार

जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर में पिछले दो महीने से कई वरिष्‍ठों को तनख्वाह नहीं मिली है। लगभग तीन चौथाई कर्मचारी सैलरी न मिलने से परेशान हैं तथा सैलरी मिलते ही अखबार को अलविदा कहने की तैयारी कर रहे हैं। शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी के नेतृत्व मे गोरखपुर से शुरू यह अख़बार अपने प्रारंभ से ही चर्चा में है। दरअसल प्रबंधन शैलेन्द्र मणि के बड़ी-बड़ी बातों को उनकी प्रबंधन क्षमता मान बैठा और शुरुआत से यह अख़बार बिना किसी ठोस योजना के जैसे तैसे चलता रहा।

अख़बार की संपादकीय विभाग में हालाँकि बहुत से टैलेंटेड लोग हैं, परन्तु समय से वेतन न मिलने और अपनी कम पाठक संख्या के कारण इस अख़बार का भविष्य हमेशा प्रश्नचिन्ह के दायरे में रहता है। इस समय अख़बार के तीन चौथाई कर्मचारियों के जनवरी माह के वेतन तक नहीं मिले है यानि की दो माह का वेतन अभी प्रबंधन को देना है और तीसरा महीना चल रहा है। आये दिन लोग इस्तीफा दे रहे हैं।

कुछ दिन पूर्व स्वाति श्रीवास्तव ने इस्तीफा दिया तो उन्‍हें किसी तरह मनाया गया, फिर प्रभात तिवारी छुट्टी पर चले गए और वो अब वापस आने को तैयार भी नहीं हैं। सुनने में आया है कि जिन कर्मचारियों के वेतन रोके गए हैं वो अच्छी सैलरी पाने वाले लोग हैं। पहले ये लोग प्रबंधन को धमका लेते थे, परन्तु समय के साथ ये लोग भी अब अपनी नौकरी बचाने और हाई-लाईट होने से बचने के लिए अपना मुह बंद कर चुके हैं।

शैलेन्द्र मणि भी कर्मचारियों को किसी तरह बेवकूफ बनाकर शांत करने में लगे हैं। वे अपनी कुर्सी बचाए रखना चाहते हैं ताकि संपादक और यूनिट हेड होने का लाभ  बरकरार रखा जा सके। इस संदर्भ में शैलेंद्र मणि से बात करने के लिए फोन किया गया परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया। 

आत्‍मघाती हमले में शहीद हुआ सीहोर का सपूत, आज होगा अंतिम संस्‍कार

भोपाल/सीहोर : बुधवार को कश्मीर में एक आत्घाती हमले में आंतकवादियों ने बेमिना क्षेत्र में सीआरपीएफ के एक शिविर में हमला कर दिया, जिसमें पाँच जवान शहीद हो गए और सात अन्य घायल हो गए। शहीद हुए जवानों में सीहोर जिले का एक जवान शामिल है, जिसके शहीद होने की खबर से पूरे गांव में सन्नाटे जैसा वातावरण बन गया है। गुरुवार को शहीद सैनिक की पार्थिव देह को गांव लाया जाएगा जहां दोपहर दो बजे पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी।

प्राप्त जानकारी अनुसार कश्मीर के बेमिना क्षेत्र में हुए हमले में सीहोर जिले की तहसील इछावर के ग्राम शाहपुरा जमोनिया फतेहपुर निवासी 30 वर्षीय ओमप्रकाश मुर्रदानिया आंतकवादी हमले में शहीद हो गया। इसकी जानकारी शाम पाँच बजे उसके परिजनों को मिली तो सैनिक की पत्नी सहित परिजनों पर बिजली ही गिर गई पूरे गांव में यह खबर आग से भी अधिक तेजी के साथ फैल गई। देखते ही देखते सारा का सारा गांव ओमप्रकाश के घर पर एकत्रित होने लगा किसी को इस खबर पर भरोसा ही नहीं हो रहा था उनका अपना ओमप्रकाश अब उनके बीच नहीं रहा है। बताया जाता है कि प्रशासनिक अधिकारियों को भी जैसे ही इस बात की जानकारी मिली वैसे ही वहां पर व्यवस्थाओं को अंजाम देना प्रारंभ कर दिया गया।

यहां पर हेलीपेड बनाया जा रहा है जहां पर विशेष विमान से ओमप्रकाश के शव को लाया जाएगा गुरुवार की दोपहर में दो बजे उनके पार्थिव शरीर को पूरे राजकीय सम्‍मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी। इस खबर को सुनकर न केवल इछावर बल्कि आसपास के भी कई गांवों से लोग ग्राम शाहपुरा पहुंच गए। सभी इस खबर को सुनकर दंग रह गए। जिसने भी सुना उसकी आंखें नम हो गई। बताया जाता है कि ओमप्रकाश की शहादात की खबर सुनकर उसकी 25 वर्षीय पत्नी कोमल एकदम अचेत सी हो गई। उसका रो-रोकर बुरा हाल है उसके दोनों बच्चों को समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या हो गया है।

क्या पता था लौटकर नहीं आएगा : शहीद जवान पन्द्रह दिन पहले ही छुट्टी मनाकर वापस कश्मीर गया था, जिस समय वो गांव से जा रहा था तब किसी को इस बात का यकीन नहीं था कि वो अब लौटकर कभी गांव नहीं आएगा। बताया जाता है कि छह माह पहले ओमप्रकाश के पिता गलजी का निधन हो गया था। उनके निधन पर ओमप्रकाश अपने गांव आया था और छुट्टी समाप्त होने पर पन्द्रह दिन पहले ही ड्यूटी ज्वाइन करने के लिए रवाना हुआ था आज कई सारे लोगों की आंखों के सामने उसका चेहरा घूम रहा था।

शहीद जवान ओमप्रकाश ने पांच साल पहले देश की रक्षा का संकल्प लेते हुए सीआरपीएफ ज्वाइन की थी। उसके पांच भाई है जिसमें से एक भाई सीआरपीएफ में पहले से हैं तथा तीन गांव में ही खेती किसानी करते हैं। उसका विवाह आठ साल पहले कोमल के साथ हुआ था, जिससे उसे एक साल का लड़का और एक चार साल की लड़की भी है। उसकी पत्नी शहीद ओमप्रकाश की माता के साथ रहती है। बुधवार की शाम पांच बजे एसडीएम और तहसीलदार द्वारा गांव के सरपंच रामनारायण को खबर दी और कुछ ही देर में बात पूरे गांव में फैल गई और प्रशासनिक हलचल बढ़ जाने के साथ ही मीडिया कर्मी भी वहां पहुंच गए।

कई अधिकारी आएंगे अंतिम विदाई देने : शहीद जवान ओमप्रकाश की पार्थिव देह को विशेष विमान से लाया जा रहा है। जिसके लिए ताबड़तोड़ में हेलीपेड बनाया जा रहा है जिसके लिए इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रशासनिक अधिकारियों का काफिला जुटा हुआ है। ऐसा माना जा रहा है उसके शव के साथ सीआरपीएफ के अधिकारी भी आएंगे और उनकी मौजदूगी में ही ओमप्रकाश को अंतिम विदाई दी जाएगी।

पूरे गांव में सन्नाटा : शहीद जवान ओमप्रकाश के गांव में तूफान के बाद के सन्नाटे जैसा वातावरण बन गया जहां गांव वालों का देश के लिए शहादत करने वाले ओमप्रकाश पर गर्व हो रहा है, वहीं उसके असमय जाने का भी गम सता रहा है। हर कोई ओमप्रकाश की यादों को बांट रहा था करीब सीआरपीएफ में जाने से पहले ओमप्रकाश आदिम जाति कल्याण कांग्रेस का ब्लाक अध्यक्ष भी रह चुका है।

आमिर खान की रिपोर्ट.

हापुड़ से फर्जी राज्‍य सभा सांसद को पुलिस ने अरेस्‍ट किया

हापुड़ : उत्तर प्रदेश के हापुड़ में पुलिस ने एक फर्जी राज्यसभा सांसद को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने इस शख्स के पास से लालबत्ती लगी कार को भी बरामद किया है. इसके अलावा गाड़ी पर लगा सांसद का स्टीकर और सांसद का आईकार्ड. परवेज वारसी नाम के शख्स ने इन चीजों के जरिए सबको ये भरोसा दिलाने की कोशिश की कि वो ऑल इंडिया सिटीजन आजाद पार्टी का राज्यसभा सांसद है.

हापुड़ का रहने वाला परवेज वारसी ने जब अपने इलाके में पहुंच कर सांसद होने का दावा किया तो कई पड़ोसी उसके झांसे में आ गए और उसका स्वागत भी किया. कुछ लोगों को उसके दावों पर यकीन नहीं आया तो उन्होंने पुलिस को खबर दे दी. पुलिस ने परवेज वारसी को गिरफ्तार करके उसकी लालबत्ती लगी कार को जब्त कर लिया है. इस मामले में पुलिस जांच में जुटी हुई है कि कहीं परवेज के राज्‍यसभा सांसद बनने के पीछे कोई और कहानी तो नहीं है.

भारतीय हौंसले की अग्नि परीक्षा!

मामला सीधे तौर पर मुल्क के स्वाभिमान से जुड़ जाए, तो छोटी-सी बात बहुत बड़ी बन जाती है। ऐसा ही कुछ दो इतालवी नौसैनिकों के मामले को लेकर हो रहा है। इटली सरकार भारत के कानून को ठेंगा दिखाने पर उतारू हो गई है। उसने दिल्ली के तमाम राजनीतिक और  कूटनीतिक दबाव के बाद भी अपना रवैया बदलने के संकेत नहीं दिए। जबकि इस मुद्दे को लेकर भारतीय संसद में बड़ा बवेला मच गया है।

सभी दलों की चिंता यही हो गई है कि आखिर इटली जैसे देश जब चाहे अपनी सुविधा को देखते हुए हमें ठेंगा दिखाने की हिम्मत कैसे कर लेते हैं? यूं तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने हुंकार भरी है कि यदि आरोपी नौसैनिकों को भारत वापस नहीं भेजा गया, तो हठधर्मिता का यह रवैया इटली को बहुत महंगा साबित होगा।  

अब अहम सवाल यह बन गया है कि भारत सरकार ने इटली के प्रति जो कड़ा रवैया अपनाया है, वह वाकई में कितना दमदार है? क्योंकि, पहले भी कई मौकों पर यूरोप के इस छोटे से देश ने भारत सरकार की जरूरतों की ज्यादा परवाह नहीं की। इस वजह से कई बार कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों को अपने यहां भारी राजनीतिक किरकिरी झेलनी पड़ी है। ‘इटली कनेक्शन’ की बात करके विपक्षी दल कांग्रेस नेतृत्व के रवैए पर वैसे भी तीखे कटाक्ष करने से बाज नहीं आते। पिछले दिनों वीवीआईपी हेलीकॉप्टर खरीद के सौदे में भारी रिश्वतखोरी का मामला उछला है। इसके भी तार इटली से जुड़े हुए हैं। क्योंकि, इटली की कंपनी फिनमैक्कनिका ने 12 हेलीकॉप्टर आपूर्ति का ठेका लिया था। फरवरी 2010 में यह सौदा किया गया था। आरोप है कि यह टेंडर हासिल करने के लिए इटली की कंपनी ने करीब 362 करोड़ रुपए की रिश्वत भारत भेजी थी।

इस मामले में भी यहां भारी राजनीतिक सरगर्मी शुरू हो गई है। इस प्रकरण की जांच के लिए सीबीआई को लगा दिया गया है। पिछले दिनों सीबीआई की एक जांच टीम इटली भेजी गई थी। लेकिन, वहां पर अदालत और सरकार का रवैया सहयोग का नहीं रहा। तमाम अनुरोध के बावजूद इटली का प्रशासन सीबीआई को घोटाले के प्रमाण दिलवाने में मदद नहीं कर रहा। सीबीआई के आलाधिकारियों ने इटली के रवैए की शिकायत भी की है।

विवाद का ताजा मामला दो इतालवी नौसैनिकों का है। पिछले साल फरवरी में इतालवी पोत ‘एनारिका लैक्सी’ के दो पोत रक्षकों ने केरल के तट पर दो भारतीय मछुआरों को गोली मार दी थी। दोनों की मौत भी हो गई थी। दरअसल, इतालवी नौसैनिकों ने भारतीय मछुआरों को समुद्री डाकू समझ लिया था। इस हादसे के चार दिन बाद इतालवी पोत के उन दो नौसैनिकों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनकी गोलियों से मछुआरे मारे गए थे। इन दोनों पर केरल की एक स्थानीय अदालत में हत्या का मुकदमा शुरु हुआ। इतालवी नौसैनिकों के नाम मैसीमिलयानो लैटोर और शैलवाटोर गिरोन हैं।

गरीब मछुआरों की हत्या को लेकर केरल में बड़ा असंतोष भड़कने लगा था। इसको देखते हुए केरल सरकार ने इटली के नौसैनिकों को कोई रियायत न देने का पक्का आश्वासन दिया था। इसके बाद ही मछुआ समाज का गुस्सा कुछ थमा था। पिछले साल क्रिसमस के मौके पर इटली सरकार ने अनुरोध किया था कि त्यौहार मनाने के लिए इन दोनों को पैरोल पर इटली आने की इजाजत दे दी जाए। केरल हाईकोर्ट के निर्देश के बाद इन दोनों को अपने देश में क्रिसमस मनाने के लिए भेज भी दिया गया था। वायदे के अनुरूप ये लोग इटली से लौट भी आए थे।

इस साल 24-25 फरवरी को इटली में आम चुनाव हो रहे थे। ऐसे में, इटली सरकार ने अनुरोध किया था कि उनके दोनों नौसैनिकों को मतदान में हिस्सा लेने के लिए पैरोल पर आने की इजाजत दी जाए। इटली के दिल्ली स्थित राजदूत डेनिली मेनसिनी ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा भी इस बावत दिया था। इसमें उन्होंने गारंटी ली थी कि चार सप्ताह के अंदर दोनों लोग भारतीय न्यायालय का सामना करने के लिए लौट आएंगे। इस वायदे के अनुरूप उन्हें 23 मार्च तक इटली से लौट आना चाहिए। इसी बीच इटली सरकार ने इस मामले में एकदम पैंतरा बदल डाला। 6 मार्च को भारतीय विदेश मंत्रालय को इटली सरकार ने खबर दी कि अब आरोपी नौसैनिकों को भारत वापस नहीं भेजा जाएगा। क्योंकि, इन लोगों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा में मछुआरों को डाकू समझकर गोली मारी थी। ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र संधि 1982 के तहत इन पर मुकदमा अंतरराष्ट्रीय अदालत में ही चलाया जा सकता है।
   
जबकि, केरल सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि गोली बारी की घटना केरल के पास भारतीय समुद्री सीमा में हुई है। ऐसे में, आपराधिक मामला भारतीय अदालतों के आधीन ही चलेगा। इटली सरकार की तरफ से भारत में इस मुकदमे की पैरवी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे करते आए हैं। साल्वे भी इटली सरकार के हठधर्मी रवैए से हैरान हो गए हैं। उन्होंने कह दिया है कि नौसैनिकों को वापस भेजने से इनकार करके इटली ने सरासर विश्वासघात किया है। जबकि, इस सरकार की ओर से उनके राजदूत ने वापसी गारंटी का हलफनामा दिया था। इससे मुकरना भारत की अदालत का सरासर अपमान जैसा है। उन्होंने नाराजगी में अपने को इस मुकदमे से अलग कर लिया है।

मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने यह मामला दोनों सदनों में उठा दिया है। आरोप लगाया कि इटली सरकार के प्रति भारत इस मामले में दब्बूपन का रवैया दिखा रहा है। इस पर विपक्ष के सभी दलों ने तीखे तेवर अपनाए तो प्रधानमंत्री को भी कड़ा रुख अपनाना पड़ा। उन्होंने ऐलान किया कि इटली का रुख भारत सरकार को मंजूर नहीं है। बुधवार को भी संसद के दोनों सदनों में यह मामला उठा। इस पर प्रधानमंत्री ने यहां तक कह दिया कि यदि इटली वायदे के अनुरूप तय समय सीमा में दोनों आरोपियों को वापस नहीं भेजता, तो इसका उसे बड़ा खामियाजा उठाना पड़ सकता है।

दरअसल, यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी का मायका इटली में है। ऐसे में, आरोप लगता है कि सरकार का रुख इटली के प्रति लचीला रहता है। याद कीजिए, बहुचर्चित बोफोर्स तोप घोटाले में इटली के व्यापारी क्वात्रोची का नाम आया था। सीबीआई ने इस मामले में उनकी मुख्य भूमिका भी मानी थी। लेकिन, भारत सरकार की लापरवाही के चलते क्वात्रोची को भारत से इटली भाग जाने दिया गया। इसको लेकर विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि सोनिया गांधी परिवार से क्वोत्रोची के निजी रिश्तों के चलते उसे जानबूझकर राहत दी गई।

संसद के सत्र में हेलीकॉप्टर घोटाले में भी ‘इटली कनेक्शन’ को लेकर विपक्ष ने कांग्रेस नेतृत्व पर तीखे कटाक्ष किए हैं। नौसैनिकों वाले मामले में शांत स्वभाव वाले प्रधानमंत्री ने जिस तरह से हुंकार लगाई है, वह भी दुर्लभ किस्म की है। अहम सवाल यह है कि क्या मनमोहन सरकार वाकई में इटली सरकार को सबक सिखाने का हौसला दिखा सकती है? क्योंकि, इटली के रवैए में अभी तक किसी बदलाव के संकेत नहीं मिले। भारत की राजनीति ने इस मामले को सीधे तौर पर देश की राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ लिया है। वैसे भी एकदम से भारत को ठेंगा दिखाने की नीति दादागीरी की ही मानी जाएगी।

इस संदर्भ में लोग लतीनी-अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज की दमदारी की याद करते हैं। शावेज का पिछले दिनों ही निधन हुआ है। वे 15 साल तक लगातार अमेरिका जैसे बलशाली देश को ललकारते रहे थे। यही कहते थे कि उनका मुल्क छोटा जरूर है, लेकिन उसका स्वाभिमान अमेरिका से कमतर नहीं है। सवाल है कि क्या भारत का नेतृत्व वाकई में इटली को सबक सिखाने की हिम्मत भी कर पायेगा?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

NDTV to venture into e-commerce now

NDTV (New Delhi television) has said to have invited nine creative agencies to pitch for the creative duties of its e-commerce operations. The process is currently under way in Delhi. After NDTV’s Board approved the entry of NDTV Worldwide, a subsidiary of the company last month, to enter into the e-commerce business, the company is working out the details. The platform would offer Indian ethnic wear and designer as well as other accessible brands.

The agency’s creative mandate would include launching the domain name, logo options and formulate a social media strategy. As reported earlier, e-tailing platform Fashionandyou’s Co-founder Rahul Narvekar joined NDTV to set up its e-commerce operations. Since, then there have been speculations about whether the company is launching an online commerce business or planning a new TV channel on the lines of Star CJ Alive and HomeShop18.

While on one hand the e-commerce marketplace is heating up with many ventures fighting to create a foothold, on the other hand lack of funding options, too many mergers and acquisitions and change in senior level management is putting a question mark on the survival of these websites. Now, it would be interesting to see how the new venture will differentiate itself and be profitable.

जी न्‍यूज के अंदर उथल-पुथल, छंटनी की तैयारी!

खबर है कि फिल्म सिटी से संचालित जी ग्रुप के कई चैनलों में इन दिनों उथल पुथल मची हुई है। जब से जी ग्रुप के दो संपादक जेल से रिहा होकर बाहर आए हैं तब से चैनल के हालात संभल नहीं पा रहे हैं। जी न्यूज नेशनल के बारे में खबर है कि इसमें बी ग्रेड के कर्मचारियों पर छंटनी की तलवार लटक रही है। बी ग्रेड के कई कर्मचारी तो छंटनी के डर से पहले ही चैनल छोड़ चुके हैं, जबकि कुछ को चैनल खुद ही बाय बाय कह सकता है।

इसी तरह का हाल जी ग्रुप के बिजनेस चैनल का भी बताया जा रहा है, इसमें भी गाज बी ग्रेड के कर्मचारियों पर ही गिराए जाने की तैयारी हो रही है। कुछ लोगों ने नौकरी से खुद ही रिजाइन दे दिया है जबकि कुछ दूसरे चैनलों का रूख कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि चैनल हेड को मोटी सैलेरी वाले कर्मचारियों की छंटनी के आदेश दिए गए हैं। ये भी खबर आई कि जी यूपी और उत्तराखंड में संस्थान ने चैनल हेड को 24 लोगों की छंटनी करने को कहा था, लेकिन चैनल हेड की आपति के बाद इन कर्मचारियों की नौकरी किसी तरह से बच पाई है।

इन सबके पीछे वजह बताई जा रही है कि जिंदल मामले में चैनल का नाम आने के बाद चैनल की मार्केटिंग पर काफी फर्क पड़ा है। मार्केटिंग कम होने से चैनल घाटे में ना जाए इसके लिए पहले से ही तैयारी की जा रही है। यही वजह है कि मोटी सैलेरी वाले कर्मचारियों को निकालकर उनके जगह पर कम सैलेरी वाले कर्मचारियों की तैनाती की जा रही है। इसी का असर है कि पिछले दिनों तमाम लोग जी न्‍यूज के चैनलों से इस्‍तीफा देकर दूसरे चैनलों से जुड़ चुके हैं। (कानाफूसी)

आस्‍तीन के सांप अब चेला बनने की राह पर

राजस्थान में विधान सभा चुनाव सर पर हैं। नजदीकी के इस दौर में नेताओं की असलियत भी उजागर होने के साथ साथ राजनीतिक दूरियों के भी नजदीकियों में परिवर्तित होने का दौर शुरू हो गया है। दिल्ली से लेकर राजस्थान और जयपुर से लेकर जिलों तक जब से यह खबर फैली है कि राजस्थान में कांग्रेस में अकेले अशोक गहलोत ही अगले विधानसभा चुनाव का नेतृत्व करेंगे। तब से गहलोत विरोधियों की हवा टाइट हो गई है। कुछ कसमसा रहे हैं, तो कुछ शरणागत भाव से फिर से गहलोत की चरण वंदना के लिए लौटने को बेताब है।

सोनिया गांधी को तो खैर बरसों से पता ही था। पर अब राहुल गांधी को भी पता चल गया है कि राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत ही एकमात्र सक्षम, सबल और समर्थ नेता है, जो अगले चुनाव में भी बीजेपी को छिकाने लगाकर कांग्रेस की नैया पार लगा सकते हैं। इसलिए गहलोत को खुलकर खेलने देने के बारे में निर्णय लेने में रत्ती भर की भी देरी नहीं हुई। जब से यह फैसला हुआ है कि गहलोत ही राजस्थान में सब कुछ देखेंगे। तो, कांग्रेस में आलम यह है कि जो लोग कुछ दिन पहले तक अशोक गहलोत पर खुले आम पार्टी का भट्टा बिठाने का आरोप लगा रहे थे, अब उनका खुद का भट्टा बैठ गया है।

 गहलोत नामक राजनीतिक बरगद के साए में पलकर बहुत सारे जो कांग्रेसी पौधे, पेड़ में तब्दील हो रहे थे, वे अशोक गहलोत की मेहरबानियों से ही पार्टी में पदों पर आए। विधानसभा में छाए और सरकार में सीट पाए। लेकिन जब कुछ बन गए, तो इतराने लगे। एक शेर हैं – ‘वाह बुतो, तरक्की इसको कहते हैं। तराशे नहीं थे, तो पत्थर थे, तराशे गए तो खुदा बन गए।’ खुद को खुदा समझने लगे उन बहुत सारे कांग्रेसी चिरकुटों को लगने लगा कि वे तो चमक के साथ ही जन्मे थे। जुगनू थे और उनके चमकने में रात के अंधेरे का कोई योगदान ही नहीं था। पर, जब दिन हुआ, और चमक जब फुर्र हो गई तो अकल भी ठिकाने आ गई। पद से उतर गए, तो औकात का पता चल गया। वैसे, आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी यही होती है कि वह जब आस्तीन का सांप बन जाता है, तो उसे समझ में नहीं आता कि जिसे डसने की कोशिश कर रहा है, वही तो उसका भाग्य विधाता भी है और नीति नियंता भी।

कांग्रेस में आस्तीन के ऐसे बहुत सांपों को अब समझ में आने लगा है कि जो सीपी जोशी कुछ दिन पहले तक बहुत फां – फूं कर रहे थे, लेकिन उनमें तो कोई दम ही नहीं है। समूचा राजस्थान तो छोड़ दीजिए, सीपी अपने इलाके मेवाड़ में भी वे कमजोर साबित हो रहे हैं। गिरिजा व्यास गरज रही हैं। ताराचंद भगौरा उन पर भारी हैं। और रघुवीर सिंह मीणा मजबूती से डटे हुए हैं। असल बात यह है कि सीपी जोशी ने खुद को ताकतवर साबित करने की कोशिश में राहुल गांधी के खासमखास होने का जो प्रचार किया था, उसका बुलबुला भी बुरी तरह से फट गया है। राहुल गांधी के निजी सचिवालय में जो लोग बैठे हैं, उनमें सबसे मजबूत तो वे हरीश चौधरी हैं, जिनको गहलोत ने वहां बिठाया है। चौधरी बाड़मेर के सांसद हैं। जवान हैं। पढ़े लिखे भी हैं और सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी भी। चौबीस में से अठारह घंटे उनके राहुल गांधी के साथ या राहुल गांधी के लिए बीतते हैं। हरीश चौधरी राजनीति में गहलोत के शिष्य हैं और उनके अलावा भी गहलोत के भेजे हुए कुछ लोग दस जनपथ और राहुल गांधी का सचिवालय संभालते हैं।

अब, यह साबित हो गया है कि गहलोत ही राजस्थान कांग्रेस में एकमात्र ताकतवर नेता है। तो विरोधियों की बोली बदल गई है। वे खुद तो गहलोत की तारीफ कर ही रहे हैं। अपने चंगुओं से भी गहलोत और उनकी सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़वा रहे हैं। लेकिन चोला बदलकर फिर से चेले बनने का स्वांग करने चले चंगुओं पर भरोसा कोई भरोसा नहीं करता, खासकर राजनीति में तो बिल्कुल नहीं।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

दोनों संपादक-एंकरों ने चश्में पहन रखे थे तथा सर्प रज्‍जू भ्रम के शिकार थे

: संपादक-एंकर के उग्र विचार परोसने के खतरे! : विगत सप्ताह एक चैनल द्वारा आयोजित “मीडिया फेस्ट” में देश के दो जाने-माने फायरब्रांड एंकरों ने, जो अपने चैनलों के संपादक भी हैं —एक अंग्रेजी चैनल का और दूसरा हिंदी चैनल का— युवा पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे. युवाओं का प्रश्न था इनके मशहूर कार्यक्रमों (स्टूडियो डिस्कशन्स) में इनके आक्रामक तेवर और मुद्दों पर अपने बेलाग और “यही अंतिम सत्य है” वाले थोपू विचार को लेकर.

कहना न होगा कि दोनों ने अपने धंधे के अनुरूप वाक्-कुशलता के जरिये पूरी शिद्दत से अपने को सही ठहराया. उनके तीन तर्क थे. पहला यह कि वास्तविक पत्रकारिता और गजट-वाचन में अंतर होता है याने पत्रकारिता उस दिन शून्य-उपादेय हो जाएगी जिस दिन महज तथ्य (एक –मरे-दो-घायल टाइप) परोसने का काम करने लगेगी, सरकारी प्रेस-नोट या डी-डी न्यूज़ की मानिंद. दूसरा तर्क था एक सम्पादक-एंकर को भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता उतनी ही है जितनी किसी अन्य को. तीसरा तर्क था एक पत्रकार को मुद्दों के तह में जाने के बाद उसको लेकर एक पैशन (आसक्ति) होना चाहिए क्योंकि पत्रकार मशीन नहीं संवेदनशील आदमी है.

इन दोनों संपादक-एंकरों ने चश्में पहन रखे थे. अगर वे चश्में उतार देते तो उस हॉल का, जिसमें यह संवाद हो रहा था, स्वरुप उनके लिए बदल चुका होता. लोगों ने कैसे कपड़े पहने हैं, दूर तक भीड़ कितनी है, लड़के-लड़कियों का अनुपात क्या है यह सब कुछ वही ना होता जो चश्मे से देखने पर था. यानि महज एक सेकंड के दशांश में ही तथ्य (जिसे इन्होंने सत्य मान लिया था) बदल गए होते. चश्मा लगाने के पहले का सत्य और चश्मा उतारने के बाद का सत्य अलग–अलग होते. अब मान लीजिये रोशनी कम हो जाये तो संपादकों का सत्य एक बार फिर बदल जाएगा और अगर दूर कहीं एक झालर गिर कर हवा में लटक रहा हो और कुछ हीं देर पहले इनको आयोजकों से यह भी पता चला हो कि दो दिन पहले यहाँ एक बड़ा सांप देखा गया था, तो क्या संपादकों का सत्य “झालर नहीं सांप” के रूप में बदल नहीं जाएगा? अद्वैत –वेदान्त का सिद्धांत ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या और खासकर शंकर के मायावाद का “सर्प-रज्जू भ्रम” इसी को उजागर करता है.

ज्ञान-मीमांसा (एपिस्टेमोलोजी) के सिद्धांतों के तहत मानव जिसे सत्य समझता है वह दरअसल उसके पिछले ज्ञान और ज्ञानेन्द्रियों द्वारा हासिल ताज़ा तथ्य का दिमाग में संश्लेषण होता है. एक बच्चे को सांप से डर नहीं लगता लेकिन बड़े को लगता है. चूँकि ज्ञानेन्द्रियों के सीमा है इसलिए कोई भी सत्य अंतिम नहीं होता.  

इन दोनो संपादक-एंकरों की बातों में गंभीर तर्क-शास्त्रीय दोष है. पहला पत्रकारिता और एक्टिविज्म में अंतर है. पत्रकार किसी मुद्दे पर प्रतिस्पर्धी तथ्यों व विचारों का बाज़ार (मार्किट-प्लेस) तैयार करता है और फैसला जनता पर छोड़ देता है. यही वज़ह है कि सामना, पीपुल्स डेली या पांचजन्य के संपादकों के तर्क-वाक्यों की विश्वसनीयता उतनी नहीं होती जितनी किसी स्वतंत्र (या ऐसा माने जाने वाले) चैनल या अखबार के सम्पादक की. दोनों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है पर उनकी विश्वसनीयता जन-धरातल में लोगों द्वारा तय की जाती है. लिहाज़ा सम्पादक विचार तो रख सकता है पर एंकर के रूप में वह उन विचारों की लाइन में अगर संवाद को धकेलना चाहता है तो ना केवल उसकी और संपादक के संस्था की बल्कि उसके चैनल की विश्वसनीयता भी संदिग्ध हो सकती है. क्योंकि चैनल के प्रतिनिधि के रूप में वह संपादक सामान्य नागरिक से कुछ ज्यादा होता है.

एक उदाहरण लें. भारत –पाकिस्तान बॉर्डर पर दो भारतीय सैनिकों की सर कटी लाश बरामद होती है. कुछ हीं घंटों में एक एडिटर-एंकर जो पूरे तथ्य एकत्रित करने का याने तथ्य तक पहुँचाने का दावा करता है अपने स्टूडियो प्रोग्राम में पाकिस्तान सेना को दोषी ठहराते हुए इतनी उर्जा पैदा करता है कि पूरे देश में ड्राइंग-रूम आउटरेज (कमरे में बैठे गुस्सा) का भूचाल आ जाता है. सरकार से अपेक्षा होने लगाती है कि “हमेशा-हमेशा के लिए ये समस्या ख़त्म करो” या “अबकी पाकिस्तान को एक ऐसा सबक सिखाओ कि दोबारा हिम्मत ना करे”. उस दर्शक को यह नहीं बताया जाता कि वैश्विक राजनीतिक, सामाजिक व सामरिक स्थितियां कैसी हैं. क्या दो देशों के संबंधों को वर्तमान विश्वजनीन परिप्रेक्ष्य को देखते हुए एक भावनात्मक आक्रोश के तहत सामरिक आग में झोंका जा सकता है? क्या देश को इस चैनल ने यह बताया कि पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहाँ आतंकवादी, आईएसआई, सेना और राजनीतिक शासक अलग–अलग बगैर एक दूसरे की परवाह किये काम करते हैं और ऐसे में पाकिस्तान को सबक सिखाने का मतलब सीधे युद्ध में जाना ही हो सकता है, वह भी एक ऐसे देश के साथ जिसके पास भारत से ज्यादा परमाणु हथियार हैं और जिसका ना तो स्वरुप तय है ना ही गंतव्य? क्या आज भारत विकास छोड़ कर अपने को परमाणु युद्ध में एक ऐसे देश के साथ भीड़ सकता है जो असफल राष्ट्र है. क्या ऐसे असफल पडोसी को, जो स्वयं ही ख़त्म हो रहा है, कमजोर करने के और उपादान नहीं है?

एक और खतरा देखें. मान लीजिये एक महीने बाद पता चलता है कि दरअसल भारतीय सैनिकों के सर पाक सैनिकों ने नहीं बल्कि कश्मीरी आतंकवादियों ने या अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले तस्करों ने काटे थे तब उस संपादक की विश्वसनीयता की क्या हश्र होगा? एक और उदहारण लें. डीएसपी की हत्या में राजा भैया पर आरोप है और एडिटर-एंकर उसी दिन शाम को अपने प्रोग्राम में सरकार से पुरज़ोर मांग करता है कि आरोपी को गिरफ्तार किया जाये. अब मान लीजिये कि सीबीआई की जाँच के बाद पता चलता है कि राजा भैय्या नहीं बल्कि कोई और गुंडा इस कांड के पीछे है, क्या उसके बाद सम्पादक की संस्था पर आने वाले आक्षेप से बचा जा सकता है?

क्या यह आरोप संपादक पर नहीं लगेगा कि उसने “सभी तथ्यों” के बजाय “कुछ चुनिन्दा तथ्यों के आधार पर अपना “तोड़ दो, फोड़ दो, हमेशा के लिए ख़त्म कर दो” का भाव अपनाया है. जब सीबीआई को महीनों पापड़ बेलने की बाद पूर्ण तथ्यों का टोटा रहता है तो सम्पादक  महोदय को कुछ हीं घंटों में किस अलादीन का चिराग से “सभी तथ्य” मालूम हो जाते हैं?

एक और गलती. तर्क शास्त्र में माना जाता है कि जब तर्क कमजोर होते हैं तो आप्त-वचन का सहारा लिया जाता है यानि यह कहा जाता है कि अमुक बात मैं ही नहीं गाँधी ने या गीता ने या भारत के सीएजी द्वारा भी कही गयी है. इसी क्रम में “नेशन वांट्स तो नो टु नाइट” (देश आज इसी वक्त जानना चाहता है) कहा जाता है. क्या कोई राय-शुमारी संपादक-एंकर ने की है? और अगर मान लीजिये देश की भावना है भी तो क्या पाकिस्तान से युद्ध शुरू किया जा सकता है? इस तरह तो विवादास्पद भूमि पर कब का मंदिर बन जाना चाहिए क्योंकि प्रजातंत्र में राय-शुमारी के तहत बहुसंख्यक मत ही देश का मत होगा?

संपादक-एंकर का उग्र विचार दो खतरे पैदा कर सकता है. एक उसकी, संपादक के संस्था की और उसके चैनल की विश्वसनीयता ख़त्म हो सकती है और दो, दर्शकों को सुविचारित एवं सम्यक विचार (अन्य एक्सपर्ट्स के) से वंचित होना पड़ सकता है और वह अपना स्वतंत्र मत नहीं बना सकता, जो कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है.

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

गाजियाबाद से लांच हुआ हिंदी दैनिक ‘जीत का परचम’

गाजियाबाद से हिंदी दैनिक जीत का परचम लांच हो गया है। अपोज़िशन न्यूज़ ग्रुप के इस नये उपक्रम का संचालन गाजियाबाद के वरिष्ठ पत्रकार रणवीर गौतम करेगें। उनकी टीम में क्राइम रिपोर्टर अली, कमलेश जैन, अशोक मौर्य व मौहमम्द उमर डेस्क, वीटी एडिटर हारून भी शामिल रहेंगे। समाचार पत्र का उद्देश्य है कि स्थानीय और राष्ट्रीय समाचारों के अलावा उन ख़बरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाए जिनका सरोकार आम आदमी से हो।

छोटी समस्याओं को हल करने तक की मुहिम के साथ प्रकाशित करने की सोच लेकर मैदान में उतरे समाचार पत्र में पर्दे के पीछे से कई वरिष्ठ पत्रकारों की टीम भी सक्रिय है। इसके ग्रुप ने देश भर में प्रिंट के अलावा वीडियो पर आधारित समाचारों को भी प्रकाशित करेगी। जिसके लिए अपोजिशन न्यूज डॉट कॉम ने बाकायदा वीडियों पर आधारित समाचारों का संकलन शुरु कर दिया है।

डीएनए से राजेंद के गौतम एवं योगेश नारायण श्रीवास्‍तव का इस्‍तीफा

डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट से खबर है कि राजेंद्र के गौतम ने यहां से इस्‍तीफा दे दिया है. वे लगभग चार सालों से डीएनए को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. इस संदर्भ में राजेंद्र के गौतम का कहना है कि वे अपने व्‍यक्तिगत कारणों से डीएनए से इस्‍तीफा दे रहे हैं. राजेंद्र के साथ विशेष संवाददाता योगेश नारायण श्रीवास्‍तव ने भी संस्‍थान से इस्‍तीफा दे दिया है. इनके बारे में भी कोई विशेष जानकारी नहीं मिल पाई है.

नेशनल दुनिया में एडिटर आपरेशंस बने बलदेव भाई शर्मा, संजीव हिंदुस्‍तान में सीनियर एनई बने

नेशनल दुनिया से खबर है कि बलदेव भाई शर्मा ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें अखबार में एडिटर आपरेशंस बनाया गया है. बलदेव भाई इसके पहले आरएसएस के मुख पत्र पांचजन्‍य को संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. पिछले दिनों उन्‍होंने इस अखबार से अपना नाता तोड़ लिया था. इसके पहले वे लंबे समय तक भास्‍कर के साथ जुड़े हुए थे. पानीपत में भास्‍कर के संपादक की जिम्‍मेदारी संभाल चुके हैं.

अमर उजाला, नोएडा से खबर है संजीव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर स्‍पोर्टस पेज के प्रभारी थे. संजीव ने अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर सीनियर एनई बनाया गया है. माना जा रहा है कि उन्‍हें हिंदुस्‍तान के प्रधान संपादक शशिशेखर ने बुलाया है. संजीव लंबे समय से अमर उजाला से जुड़े हुए थे. संजीव को खेल का तेजतर्रार पत्रकार माना जाता है.

टैम कर रहा है प्रतिस्‍पर्धा नियमों का उल्‍लंघन, जांच जारी

नयी दिल्ली : भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) टैम मीडिया के खिलाफ प्रसार भारती की शिकायत की जांच कर रहा है। सरकारी प्रसारक प्रसार भारती ने टैम मीडिया पर देश में टेलीविजन दर्शकों की संख्या की गणना में अनुचित गतिविधियों का आरोप लगाया है।

आयोग ने प्रथम दृष्टया यह पाया है कि टैम प्रतिस्पर्धा के नियमों का उल्लंघन कर रहा है। उसके बाद ही उसने जांच के आदेश दिए हैं। आयोग ने पांच मार्च को अपनी जांच शाखा के महानिदेशक को शिकायत की जांच का आदेश दिया। (भाषा)

दमोह में एलएन स्‍टार के ऑफिस में छापा, जुआ खेलते सात अरेस्‍ट

दमोह से बड़ी खबर आ रही है. पुलिस ने एक अखबार के कार्यालय पर छापा मारकर सात लोगों को अरेस्‍ट किया है. ये लोग जुआ खेल रहे थे. इनमें कई पत्रकार शामिल है. यह कार्रवाई देर शाम की गई है. बताया जा रहा है कि दमोह में एलएन स्‍टार के ऑफिस में यह कार्रवाई हुई है. पुलिस ने गुप्‍ता सूचना के आधार पर इस अखबार के कार्यालय में छापेमारी की. मौके से सात लोगों को अरेस्‍ट करते हुए 30 हजार रुपये भी पुलिस ने बरामद किए हैं.

सूत्रों का कहना है कि पकड़ गए लोगों में चार पत्रकार भी शामिल हैं. पुलिस मामले की जांच कर रही है. संभावना है कि जांच में किसी बड़े जुआ के रैकेट का खुलासा हो सकता है. पुलिस ने ज्‍यादा कुछ बताने से इनकार कर दिया है.  

आलोक तोमर का भड़ास पर प्रकाशित पहला आर्टिकल ये है

आलोक तोमर के दुनिया से जाने के दो साल होने वाले हैं.  जो उनके करीबी हैं, उनके अपने हैं, उन्हें अब तक यकीन नहीं है कि वे नहीं हैं क्योंकि उनका एहसास हर वक्त होता रहता है. आलोक जी की दूसरी पुण्यतिथि 20 मार्च 2013 को है. गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रोग्राम है शाम पांच बजे से. आप सबको आना है. इसी प्रसंग में, आलोक जी को याद करने के मौके के तौर पर उनके लिखे कुछ आलेख प्रकाशित करने का मन है. शुरुआत भड़ास पर प्रकाशित उनके पहले आर्टिकल से करते हैं. ये उनके अपनों के लिए तो है ही, उनके लिए भी है जो कुछ वर्षों पहले पत्रकारिता में आए हैं. ये नए पत्रकार आलोक तोमर को जान सकें, समझ सकें, इसके लिए जरूरी है कि उनका लेखन फिर से सामने लाया जाए. यह सिलसिला जारी रहेगा. नीचे आलोक तोमर का भड़ास के लिए लिखा गया पहला आर्टिकल प्रकाशित किया जा रहा है. यह 19 अगस्त 2008 को भड़ास पर प्रकाशित हुआ है, दिन में 1.18 बजे. ये आर्टिकल जिस रूप में छपा था, उसी रूप में हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया.

भड़ास पर प्रकाशित आलोक तोमर का पहला आलेख…..


मशहूर पत्रकार आलोक तोमर ने अपनी यह व्यथा-कथा भड़ास4मीडिया के पाठकों के आगे इस उम्मीद में पेश की है कि पूरे देश का हिंदी पत्रकार इसे पढ़कर उन्हें कुछ सुझाएगा। अभी हाल-फिलहाल जब एक अखबार में पैगंबर मुहम्मद की कलमी तस्वीर प्रकाशित होने का मामला फिजूल में गरम हुआ तो आलोक तोमर का पुराना जख्म हरा हो उठा। तब आलोक की पत्रिका में भी पैगंबर का कार्टून प्रकाशित हो गया था और इस ''जुर्म'' के लिए उन्हें तिहाड़ भेज दिया गया था। पुलिस ने उनके साथ ऐसा बर्ताव किसलिए किया? इस व्यथा-कथा से समझ में आता है कि अगर कोई पुलिसवाला किसी को परेशान करने की ठान ले तो उसके लिए लोकतंत्र, संविधान और नियम-कानून के कोई मायने नहीं होते।  -संपादक, भड़ास4मीडिया

हम काठ की तलवार से लड़ें, आप तमाशाई बनें

-आलोक तोमर-

ये मामला है २००६ के फरवरी महीने का, जब एक संपादक पर इल्जाम लगाया गया था कि उसने डेनिश कार्टून के बारे में भारत में लिखकर सांप्रदायिक अशांति फैलाने की कोशिश की थी. लेकिन उसी मामले में जब चार्जशीट लगाने की बात आयी तो पुलिस को 2 साल 6 महीनें और 14 दिन लग गये. वो भी ऐसे मामले में जहां अभियुक्त ने हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने के लिए अर्जी लगाए हुए है लेकिन पुलिस का तर्क है कि अगर अभियुक्त आजाद रहा तो यह न केवल जांच और कानूनी प्रक्रिया में बाधा पहुंचा सकता है बल्कि भारत की सुरक्षा के लिए भी भारी खतरा हो सकता है.

उस समय फरवरी 2006 में जब यह कार्टून मेरी पत्रिका में छपे थे तो पुलिस ने आरोप लगाया कि ये कार्टून किसी खास धार्मिक समुदाय की भावनाओं को भड़काते हैं और जिसने यह कार्टून बनाया वह डैनिश कार्टूनिस्ट भी भूमिगत हुआ पड़ा है. पुलिस को मौका मिला या सचमुच आरोप इतने संगीन थे इसे मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं. मुझे किसी अदालत में प्रस्तुत होने और अपनी बात का मौका दिये बिना सीधे तिहाड़ जेल ले जाया गया. मुझे उच्च सुरक्षा वाले इलाके में रखने का निर्देश हुआ और वहां रखा गया जहां कश्मीरी आतंकवादियों को रखा जाता है. बिना बात 12 दिन उच्च सुरक्षा व्यवस्था के तहत तिहाड़ जेल में रखा गया. 12 दिन बाद जमानत तो हो गयी लेकिन उस दिन से मेरे अपने लिए इस बात की एक लंबी जद्दोजहद शुरू हो गयी कि कब चार्जशीट दाखिल होगी जिसके बाद मुकदमें की प्रक्रिया शुरू हो सके और मैं अपना पक्ष माननीय अदालत के सामने रख सकूं. यह होने में कोई सवा दो साल लग गये.

इस बीच पत्रकार बिरादरी से अधिकांश लोगों ने अपने-अपने तईं अपील की, चिट्ठियां लिखीं और प्रभाष जोशी से लेकर दिवंगत कमलेश्वर तक सबने कहा कि संपादक का स्वभाव ऐसा नहीं है. खुद जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए मजिस्ट्रेट ने पुलिस के आरोपों की धज्जियां उड़ा दी थीं. लेकिन दिल्ली पुलिस जो सदैव आम आदमी के साथ रहने की दावा करती है मेरे खिलाफ ही खड़ी रही. किसी भी तर्क, चीख-पुकार, प्रमाण का दिल्ली पुलिस पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा था. दो साल के दौरान 17 जांच अधिकारी बदले गये. तीन थानेदार और तीन डीसीपी बदल गये. फिर भी न चार्जशीट प्रस्तुत होना था न हुई. हारकर मैंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि या तो दिल्ली पुलिस मुकदमा चलाने के लिए चार्जशीट दायर करे या फिर एफआईआर ही खारिज करे. हाईकोर्ट के संज्ञान लेने के बाद आखिर पांच जून को पुलिस ने चार्जशीट तैयार कर दी. अब मुकदमें की तैयारी है.

मेरी गिरफ्तारी खबर थी. और कोई एक कालम या फिलर नहीं, हेडलाईन और ब्रेकिंग न्यूज. लेकिन जैसा पत्रकार समाज और घटनाओं के साथ करता है मेरे साथ भी वही हुआ. फ्रण्ट पेज तक सबको चिंता रही लेकिन नेपथ्य की खोज-खबर किसी ने नहीं ली. खबर बनी तो बात बाहर फैली. बात बाहर फैली तो पूरी फैली. घटना और खबर के बीच का फासला इस मामले में भी दिखा. जो खबर गयी वह सपाट थी. उस सपाट नजरिये का रियेक्शन तो देश में होना ही था. वह हुआ भी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी गृहमंत्री से अपील कर रहे थे कि पत्रकार निर्दोष हैं तो उन्हीं की पार्टी के एक नेता झारखण्ड में फतवा जारी करवा रहे थे कि कोई उस पत्रकार का सिर काटकर लाये तो करोड़ों के इनाम दिये जाएंगे.

यहां मैं एक काबिल पुलिस अफसर केके पौल का जिक्र जरूर करूंगा. वे जब तक रहे, जितना बिगाड़ सकते थे उतना बिगाड़ा और परेशान किया. ये आरोप नहीं बल्कि मैंने यह अनुभव किया है. शासन-प्रशासन के किसी शीर्ष व्यक्ति में निजी कुण्ठा और द्वेष जब कुण्डली मारकर बैठ जाता है तो कानून और कानून रक्षक इकाईयों का कैसे दुरूपयोग करता है, मेरे घटना से कम से कम मुझे तो इसका पूरा सबक मिल गया. उन्होंने जैसे चाहा वैसे दिल्ली पुलिस को मेरे खिलाफ उपयोग किया. अब वे संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं और दिल्ली पुलिस के एक इस्पेक्टर से जान का खतरा बताकर जेड केटेगरी की सुरक्षा में सुरक्षित हैं. बेटा वकालत कर रहा है और पत्नी ने समाजसेवा के वशीभूत एक एनजीओ बना लिया है.साथ में विदेश मंत्री के लिए सलाह-मशविरा का भी काम कर रही हैं. काम धड़ल्ले से चल निकला है. डीएलएफ सिटी गुड़गांव में एक करोड़ की लागत से तीन मंजिला कोठी तैयार हो चुकी है और हरियाणा की कांग्रेसी सरकार की मेहरबानी से करोड़ों की जमीन एनजीओ के नाम भी नज्र हो गयी है. लेकिन वे क्या कोठी-महल बनवाते हैं इसमें अपनी कोई दिलचस्पी नहीं है.

लेकिन पौल तरक्की करते रहें और एक पत्रकार लिखना-पढ़ना छोड़कर अदालतों के चक्कर लगाता रहे क्या यह आपको युक्तिसंगत लगता है? नहीं, यह मैं आपसे अपने बारे में नहीं कह रहा. किसी भी पत्रकार या लेखक के बारे में ऐसा सोचिए और निर्णय करिए. मेरा यह सब लिखने का मकसद यह भी नहीं है कि मुझे मुकदमा लड़ने के लिए चंदा चाहिए या फिर आप लोग हमारे झंडा-जुलुस निकालें. अब तो जो होगा वह अदालत के द्वारा होगा. फिर भी मेरा एक सवाल जरूर है कि जब आपके बीच से ही कोई एक साथी काठ की तलवार से ही सही लड़ने का फैसला कर लेता है तो आप सिर्फ तमाशाई क्यों बन जाते हैं?

इस व्यथा-कथा पर आप अपनी बात सीधे आलोक तोमर से aloktomar@hotmail.com पर मेल करके कह सकते हैं


tag- alok tomar

लखनऊ से लांच होगा नवभारत टाइम्‍स, सुधीर मिश्रा बनेंगे संपादक

नवभारत टाइम्‍स से बड़ी खबर है. नवभारत टाइम्‍स जल्‍द ही लखनऊ में अपने नए एडिशन को लांच करने की तैयारी कर रहा है. इसको लांच करने की पूरी योजना बनाई जा चुकी है. लखनऊ में अखबार का संपादक भी चयन भी किया जा चुका है, जो जल्‍द ही अपना कार्यभार संभाल लेंगे. लखनऊ का संपादक तेजतर्रार पत्रकार सुधीर मिश्रा को बनाया जा रहा है. सुधीर फिलहाल दैनिक भास्‍कर के साथ उदयपुर में कार्यकारी संपादक के रूप में जुड़े हुए हैं.

सूत्रों का कहना है कि सुधीर मिश्रा ने दैनिक भास्‍कर से इस्‍तीफा दे दिया है और वे नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं. नोटिस पीरियड खतम होते ही वे नवभारत टाइम्‍स ज्‍वाइन कर लेंगे. सुधीर मिश्रा लगभग दो दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. प्रबंधन ने उनका चयन लखनऊ के लिए बहुत ही सोच समझकर किया है. सुधीर लगभग डेढ़ दशक तक लखनऊ में दैनिक जागरण एवं हिंदुस्‍तान के जरिए अपना लोहा मनवा चुके हैं. पिछले तीन सालों से वे राजस्‍थान में दैनिक भास्‍कर को अपनी सेवा दे रहे हैं.

उल्‍लेखनीय है कि नवभारत टाइम्‍स इसके पहले भी लखनऊ से प्रकाशित हो चुका है, परन्‍तु कुछ कारणों से इसे बंद कर दिया गया था. अब प्रबंधन दुबारा लखनऊ से इसको लांच करने जा रहा है. संभावना है कि सुधीर मिश्रा के ज्‍वाइन करने के बाद टीम बनाने की तैयारी शुरू होगी. 

‘कोबरा पोस्ट’ वाले अनिरुद्ध बहल कल करेंगे मनी लांड्रिंग पर बड़ा खुलासा

कल यानि 14 मार्च को कांस्टीट्यूशन क्लब आफ इंडिया, विट्ठल भाई पटेल हाउस, रफी मार्ग, दिल्ली में कोबरा पोस्ट वाले अनिरुद्ध बहल मनी लांड्रिंग के संबंध में बड़ा खुलासा करने वाले हैं. सभी मीडिया वालों को आमंत्रित किया गया है. समय है सुबह साढ़े नौ बजे. अनिरुद्ध बहल पहले भी कई बड़े खुलासे कर चुके हैं. वे मनी लांड्रिंग को लेकर कई डाक्यूमेंट्स भी पेश करेंगे. मनी लांड्रिंग से संबंधित जो खोजपरक काम अनिरुद्ध बहल की टीम ने किया है, उसका नाम 'आपरेशन रेड स्पाइडर' रखा गया है. समझा जा रहा है कि उनका खुलासा राजनीति में बड़ा धमाका साबित होगा. इस बाबत पत्रकारों को भेजा जा रहा एसएमएस इस प्रकार है…

Dear,

Cobrapost expose on money laundering begins at 9:30 am on morning of March 14, Thursday, at Constitution Club of India, Vithal Bhai Patel House, Rafi Marg. Aniruddha Bahal  will address the press conference. It will follow with the airing of the documentary entitled Operation Red Spider. All journalists are welcome And pls join us And see the news channel.

Best

Cobrapost Team

xx

Desh k itihas me bda khulasha… U r cordily invited in 'OPERATION RED SPIDER' Press Conffrence. Presented by cobrapost

on 14 march 2013.. On 9:30 am,

at constitution club, rafi marg new delhi.

मरने वालों की सूची जारी करने पर चिदंबरम ने मुझे भी धमकाया था

जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी चाहते थे कि 22 मई 1987 को मेरठ के हाशिमपुरा नरसंहार में उस समय के आंतरिक सुरक्षा राज्यमंत्री पी चिदंबरम की भूमिका की जांच होनी चाहिए। उनकी दलील थी कि पीएसी बल ने उन्हीं के इशारे पर हाशिमपुरा नरसंहार अंजाम दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की याचिका ठुकरा दी है। लेकिन इसमें शक नहीं कि मेरठ के 1987 के दंगों में ऐसा कुछ था, जिससे संदेह होता है कि उसमें उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक कि भूमिका थी। हाशिमपुरा नरसंहार के बाद 23 मई 1987 को मलियाना में पीएसी ने मुसलमानों का कत्लेआम किया था।

मलियाना निवासी होने की वजह से मैं उसका चश्मदीद हूं। उस समय मैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के संपर्क में था और मलियाना की अधिकांश खबरें मेरे द्वारा ही पहुंच रही थीं। हमने मीडिया को एक सूची जारी की थी, जिसमें मरने वालों और लापता लोगों के नाम थे, जिनकी संख्या 100 के आसपास थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जबरदस्त आलोचना के बाद पी चिदंबरम मलियाना आए थे और मुझसे मिले थे। उनके हाथ में वह सूची थी, जो हमने जारी की थी। वह इस बात से खफा थे कि इस तरह की सूची क्यों जारी की गई है। उन्होंने ढके-छुपे शब्दों में धमकी भी दी थी कि आगे से ऐसा कुछ न किया जाए, वरना अच्छा नहीं होगा।

दरअसल, सरकार कतई नहीं चाहती थी कि मलियाना की वास्तविक स्थिति दुनिया को पता चले। उससे अगले दिन थाना टीपी नगर के एसओ वीके सिंह ने मुझे एक राहत कैंप में धमकी दी थी कि यदि आपने अपनी गतिविधियां बंद नहीं की तो अच्छा नहीं होगा। उन्होंने रासुका लगाने तक की धमकी दे डाली थी। यह अलग बात है कि जिला प्रशासन में सहमति बनी थी कि यदि दंगा पीड़ितों की मदद करने वालों पर ही कार्रवाई की गई, तो और ज्यादा बदनामी होगी।

प्रशासन चाहता था कि मरने वालों की तादाद कम से कम बताई जाए। यही वजह थी कि जिला प्रशासन, उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय मरने वालों की तादाद अलग-अलग बताता रहा। हालांकि बाद में हमारी दी गई सूची में से कुछ लोग वापस लौट आए थे और मरने वालों का आंकड़ा 73 पर आकर रुका था। सरकार ने भी मरने वालों के परिजनों को 40-40 हजार रुपये का मुआवजा दिया था। शर्त यह थी कि जो लोग लापता हैं, यदि उनमें से कोई लौट आता है तो मुआवजा राशि वापस ले ली जाएगी। लेकिन आज तक कोई वापस लौटकर नहीं आया है।

लेखक सलीम अख्‍तर सिद्दीकी पत्रकार हैं तथा इन दिनों मेरठ से प्रकाशित जनवाणी से जुड़े हुए हैं.

देवघर के सांध्य दैनिक ने सांसद की मक्खनबाजी में ‘सांड़’ तक लिख दिया

झारखंड के देवघर से प्रकाशित एक सांध्य अखबार ने एक नेता की इस कदर मक्खनबाजी (या कह लीजिए कि पेड न्यूज) की है कि पढ़ने वाले हंसते हंसते लोटपोट हो जा रहे हैं. सांध्य अखबार ने स्थानीय सांसद निशिकांत दुबे के पक्ष में ऐसी खबर लिख दी है कि इसके कारण यह अखबार जगहंसाई का पात्र बन गया है.

अखबार ने सांसद निशिकांत दुबे को प्रखर, साहसी और विकास पुरुष की संज्ञा तो दी ही है, साथ में सांसद को सांड़ तक बता दिया है. अगर यह एक बार होता तो इसे मानवीय भूल माना जा सकता था, परन्तु लगातार दो बार सांड़ लिखकर अखबार ने भयानक गलती कर दी. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सांसद दुबे अखबार के इस भूल को किस तरह लेते हैं. बहरहाल देवघर के लोग अखबार से हुई इस गलती को चटकारे लेकर पढ़-सुना और दिखा रहे हैं.

अनंत झा की रिपोर्ट.

गुप्तांग में लोडेड रिवॉल्वर छुपा कर रखने वाली खबर पर एंकर हंस पड़ी (देखें वीडियो)

अमेरिका के ओकलाहोमाना शहर में एक जगह रेव पार्टी में बड़ी मात्रा में ड्रग्स मौजूद होने की खबर पुलिस को मिली. जब पुलिस ने उस जगह छापा मारा तो उसे वाकई ड्रग की बड़ी खेप मिली. पुलिस ने वहां मौजूद सभी लोगों की तलाशी ली. इस दौरान जब उन्होंने एक लड़की की तलाशी ली तो सबके होश उड़ गए. दरअसल तलाशी के दौरान वहां मौजूद एक लड़की ने अपने गुप्तांग में लोडेड रिवॉल्वर छुपा रखा था.

अपने गुप्तांग में रिवाल्वर छिपाने वाली महिला
अपने गुप्तांग में रिवाल्वर छिपाने वाली महिला
‘द सन’ की खबरों के मुताबिक 28 साल की क्रिस्टी डान हैरिस ने रिवॉल्वर अपनी यो‍नि में इस तरह छुपाई थी कि सामान्य  रूप से देखने पर किसी को शक न हो. इस महिला ने लोडेड रिवॉल्वर का अगला सिरा अपने योनिद्वार में डाल रखा था और उसके हैंडल का कुछ हिस्सा बाहर की तरफ लटक रहा था.

महिला पुलिस ऑफिसर ने जब क्रिस्टी की तलाशी लेना शुरू किया तो उसकी अजीब स हरकतों से पुलिस ऑफिसर को शक हुआ. महिला ऑफिसर कैथी अपबेवुस्ट के मुताबिक तलाशी के दौरान उसने कुछ लकड़ी और धातु की चीज इस महिला की योनि में फंसी हुई देखी. जब उसने इसे बाहर निकाला तो वो लोडेड रिवाल्वर थी, जिसमें तीन जिंदा कारतूस मौजूद थे. शुरू में क्रिस्टी ने अपने निजी अंगों की तलाशी देने से ये कहते हुए इंकार कर दिया था कि अभी उसके पीरियड चल रहे हैं, लेकिन लेडी ऑफिसर को दाल में कुछ काला लगा और उन्होंने इस पूरे मामले को उजागर कर दिया.

गुप्तांग में रिवाल्वर छुपाने वाली खबर जब पुरुष एंकर पढ़ रहा था तो उस दौराम महिला एंकर हंसने में जुटी हुई थी.
गुप्तांग में रिवाल्वर छुपाने वाली खबर जब पुरुष एंकर पढ़ रहा था तो उस दौराम महिला एंकर हंसने में जुटी हुई थी.

यह खबर जब एक न्यूज चैनल पर प्रसारित हुई तो वहां मेल और फीमेल दो एंकर न्यूज पढ़ रहे थे. गुप्तांग में रिवाल्वर छुपाने वाली खबर मेल एंकर पढ़ रहा था. इसी दौरान फीमेल एंकर की हंसी छूट गई और वह देर तक हंसती रही, जबकि मेल एंकर उसे नार्मल करने की कोशिश करते हुए आगे की खबर पढ़ने लगा. देखें वीडियो… उपरोक्त तस्वीरों या नीचे दिए गए इस लिंक पर क्लिक करें…

Chicago News Anchor LOSES It Over Gun Hidden In VAGINA Story

आलोक तोमर की दूसरी पुण्यतिथि बीस मार्च के दिन गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचें

जाने-माने पत्रकार आलोक तोमर इसी मार्च महीने में दो साल पहले बीस तारीख को हम सभी को अलविदा कह गए. बेबाक, साहसी और लीक से हटकर चलने वाले आलोक तोमर के जाने की कमी हर किसी को अभी तक महसूस हो रही है क्योंकि इस बीच बहुत कुछ ऐसा प्रकरण, मुद्दा, घटनाक्रम हुआ जिसमें आलोक तोमर की बेबाक लेखनी की कमी सबको महसूस हुई.

पत्रकारिता के पीआर में तब्दील हो जाने के इस दौर में आलोक तोमर की कमी हर ईमानदार पत्रकार और स्वाभिमानी नागरिक महसूस करता है. जनसत्ता अखबार के जरिए पूरे देश में प्रतिष्ठित व चर्चित होने वाले आलोक तोमर ने बाद में न्यू मीडिया यानि वेब-ब्लाग को अपना माध्यम बनाया और मीडिया से लेकर राजनीति तक की अनसुलझी-अबूझ पहेलियों को बेहद आसानी से सुलझाया और पूरा खेल पाठकों तक रख दिया.

जिस सरल, सहज, संवेदनशील, स्वाभिमानी और दबंग भाषा का अविष्कार आलोक तोमर ने किया, उसे पूरे देश के पत्रकारों ने आदर्श माना. यही कारण है कि उनके तेवर और उनकी भाषा के साथ आज कई पत्रकार देश के अलग अलग कोनों में सक्रिय हैं. उन्हीं आलोक तोमर की दूसरी पुण्यतिथि के मौके पर आप सभी निमंत्रित हैं, आमंत्रित हैं, बीस मार्च के दिन, गांधी शांति प्रतिष्ठान में. समय है शाम पांच बजे.

आलोक तोमर की पत्नी सुप्रिया रॉय, जो खुद पत्रकार हैं, ने आलोक तोमर के सभी चाहने वालों से अनुरोध किया है कि वे बीस मार्च के दिन शाम को पांच बजे आलोक को याद करने के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचें. यहां उपर प्रकाशित निमंत्रण को ही न्योता मानें और इसे स्वीकारें. 'यादों में आलोक' सीरिज के तहत 'मीडिया की भाषा' पर विमर्श-व्याख्यान होगा, जिसमें देश के कई जाने-माने पत्रकार-साहित्यकार हिस्सा लेंगे.

हरभजन सिंह को वाकई पंजाब पुलिस में एसएसपी बना दिया गया है!

नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर एक खबर है. शीर्षक है- हरभजन ने संभाली पंजाब पुलिस के एसएसपी की कुर्सी. दिल्ली डेटलाइन से रोशन सेठी की इस बाइलाइन खबर में बताया गया है कि भारतीय टीम के आफ स्पिनर हरभजन सिंह ने आधिकारिक तौर पर पंजाब पुलिस के एसएसपी की कुर्सी संभाल ली है.

हरभजन सिंह बरनाला में पंजाब पुलिस के हेडक्वार्टर में रिपोर्ट करेंगे. भज्जी ने कहा कि इस नए रोल को पाकर वे सम्मानित और रोमांचित महसूस कर रहे हैं. इस लंबी खबर के नीचे जो पाठकों ने कमेंट किए हैं वह यह बताने के लिए काफी है कि जनता हरभजन सिंह को एसएसपी के रूप में नहीं स्वीकार रही. कई लोगों ने इसे झूठी खबर करार दिया है. फिलहाल तो आप भी उपर देखिए, और पढ़िए कि एनबीटी की वेबसाइट पर क्या खबर प्रकाशित हुई है.

जी न्यूज ने ‘जी 24 घंटे छत्तीसगढ़’ से नाता तोड़ा, जी का लोगो हटेगा

इस समय जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के कर्मचारी पशोपेश में हैं. कारण है उनके चैनल से ZEE का नाम हटना.. जैसे स्टार न्यूज अब ABP हो गया वैसे ही अगले महीने से 'ZEE 24 घंटे छत्तीसगढ़' का नाम गोयल ग्रुप के नाम पर 'G 24' घंटे छत्तीसगढ़ हो जाएगा.. दरअसल जी ग्रुप का गोयल ग्रुप से पांच साल का समझौता था जो कि पूरा हो गया. पिछले पांच सालों से 'जी 24 घंटे छत्तीसगढ़' नामक चैनल छत्तीसगढ़ प्रदेश में नंबर वन है. 

इसे देखकर गोयल बंधुओं को लगा कि वो अपने दम पर ही चैनल चला लेंगे. इसके साथ ही ये एग्रीमेंट खत्म हो गया और अब जी का नाम G हो जाएगा. साथ ही गोयल बंधु जुलाई तक मध्यप्रदेश का चैनल लाएंगे क्योंकि ZEE ग्रुप पहले ही मध्यप्रदेश चैनल लांच करने की घोषणा कर चुका है.

ऐसे में गोयल बंधुओं का सीधा मुकाबला जी ग्रुप से होने वाला है. फिलहाल अंदर के कर्मचारियों का बुरा हाल है क्योंकि उन्होंने संस्था को ज्वाइन 'ZEE' के एप्वांटमेंट लेटर पर किया था अगर अब वो संस्था छोड़ते हैं तो रिलीविंग लेटर 'G' मिलेगा. इस फैसले के बाद कई लोग 'जी 24 घंटे छत्तीसगढ़' छोड़ चुके हैं जिसमें शिरीष मिश्रा इनपुट हेड समेत करीब एक दर्जन लोग शामिल हैं. बाकी कई लोग इस जुगाड़ में है कि उनका काम जी के आने वाले एमपी सीजी चैनल में बन जाए.

रामपुर में चलने वाला यह लोकल केबल न्यूज चैनल किसका है?

रामपुर में एक लोकल केबल न्यूज चैनल खूब चलता है. नाम है जौहर न्यूज. उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और मंत्री मो. आजम खां के गृह जनपद में चलने वाले इस केबल न्यूज चैनल पर दिन भर आजम खां की खबरें आदि चलती रहती है. इस चैनल की कमान किन्हीं रानू के जिम्मे है जो आजम खां के करीबी माने जाते हैं. हाईकोर्ट का सख्त आदेश है कि किसी भी जिले में लोकल चैनल का प्रसारण नहीं होगा.

रामपुर में जौहर अली विवि के भवन निर्मण का काम भी जोरशोर से चल रहा है और इसके निर्माण में सभी से योगदान लिया जा रहा है. जौहर न्यूज नामक लोकल केबल चैनल पर मोंटास, क्रोमा और हैडलाइन भी इंटरनेट से लोड कर करके चलाए जा रहे हैं. लोगों का कहना है कि चैनल जिसका भी हो, उसे अगर चैनल चलाने का इतना शौक है तो उसे खुद का अपना रजिस्टर्ड लाइव चैनल खोल लेना चाहिए ताकि पूरे प्रदेश की जनता को फायदा मिले और मीडिया के सैकड़ों बेरोजगारो को रोजगार मिल जाए.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘गलत खबर प्रकाशित करने से साधना टीवी और मेरी मानहानि हुई है’

प्रति, श्री यशवंत जी महोदय, भड़ास फार मीडिया पर एक झूठी और मनगढ़ंत खबर पढ़कर काफी निराशा और क्षोभ हुआ. कैसे इतनी गलत खबर आपने अपने पोर्टल पर प्रकाशित की यह हैरत का विषय है. आपकी जानकारी  के लिए बता दूं कि न तो मैं गोविंदपुरा में वसूली करने गया और न ही वहां मारपीट जैसी कोई घटना हुई. कृपया यह बताने का कष्ट करें कि किसके हवाले से यह खबर आपने प्रकाशित की है.

साथ ही इस घटना से मेरी और कंपनी की जो मानहानि हुई है उससे मैं बहुत व्यथित हूं, शीघ्र इस गलत खबर का खंडन प्रकाशित कीजिए और उस व्यक्ति का नाम भी मु्झे बताएं जिसने गलत खबर आपको दी ताकि उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सके. इसके साथ ही कानूनी नोटिस भी भेज रहा हूं. ताकि पुलिस में दोषियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कराया जा सके. कृपया पूरे मामले को गंभीरता से लें. और मुझे अवगत कराएं

भवदीय

धर्मेश जागीरदार

एडमिनिसट्रेशन हेड

साधना टीवी

‘राइटर-इन-रेजीडेंस’ संजीव की वर्धा हिंदी विवि से विदाई

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के फैकल्‍टी एण्‍ड ऑफीसर्स क्‍लब में आयोजित एक भव्‍य समारोह में कुलपति विभूति नारायण राय ने ‘राइटर-इन-रेजीडेंस’ संजीव को चरखा, प्रतीक चिन्‍ह आदि प्रदान कर विदाई दी। विदाई समारोह में विवि के प्रतिकुलपति प्रो.ए.अरविंदाक्षन, ‘राइटर-इन-रेजीडेंस’ विजय मोहन सिंह मंचस्‍थ थे। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य  में कुलपति विभूति नारायण राय ने संजीव के स्‍वस्‍थ व दीर्घायु होने की कामना करते हुए  कहा कि वह एक ऐसे रचनाकार  हैं, जो अनुसंधानात्‍मक प्रवृति से एक ठोस कार्य करते हैं।

उनकी कथनी और करनी में कहीं भी कोई फांक नहीं दिखता है। उनकी रचनाओं में आम आदमी की पीड़ा और दुख-दर्द परिलक्षित होता है। वे निरन्‍तर समय और समाज के यथार्थ को सामने लाते हैं। उन्‍होंने कहा कि विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापक और विद्यार्थी इनसे लगातार संवाद कर लाभान्वित होते रहे हैं।

विश्‍वविद्यालय में एक वर्ष बिताए पलों को साझा करते हुए संजीव ने कहा कि यहां के वातावरण को देखकर मैं  अभिभूत हूँ। यहां निरंतर विद्वानों  से संवाद करने और किसानों  की आत्‍महत्‍या के कारणों को देख  सका। उन्‍होंने कहा कि अनुसंधान की प्रवृति ने ही मुझे रचनाकार बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी है। उन्‍होंने बताया कि मैं सुबह के उजालों को देखने के लिए रात की गहरे अंधकार में उतरता हूँ और सोचता रहता हूँ कि कैसे यह अंधेरा हमारी जिंदगी से भी छंटता है और उस अंधेरे में अपने पात्रों से रू-ब-रू होता हूँ।

साहित्‍य विद्यापीठ के विभागाध्‍यक्ष प्रो.के.के.सिंह ने स्‍वागत वक्‍तव्‍य में संजीव की रचनाधर्मिता को रेखांकित करते हुए कहा कि वे एक ऐसे कहानीकार हैं, जिन्‍हें भारतीय लोकजीवन से सच्‍ची मोहब्‍बत है। लेखक का सम्‍मान पुरस्‍कार नहीं अपितु उनको पढ़ा जाना है। उन्‍होंने कहा कि ‘अपराध’ ‘सर्कस’, ‘सावधान नीचे आग है’, ‘सूत्रधार’, ‘जंगल जहॉं शुरू होता है’, ‘प्रेरणास्‍त्रोत’, ‘रह गईं दिशाऍं इसी पार’ जैसी रचनाएं हिंदी जगत में पढ़ी जाती हैं। उनकी ‘पॉंव तले की दूब’ उपन्‍यास को पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि इनकी रचनात्‍मकता जमीन से जुड़ी दूब जैसी है।

क्‍लब के सचिव अमरेन्‍द्र कुमार शर्मा  ने कार्यक्रम का संचालन किया।  इस मौके पर राजकिशोर, प्रो.आर.पी.सक्‍सेना, प्रो.हनुमान प्रसाद शुक्‍ल, जय प्रकाश ‘धूमकेतु’, अशोक मिश्र, अनिर्बाण घोष, डॉ. हरीश हुनगुन्‍द, अमित विश्‍वास सहित बड़ी संख्‍या में क्‍लब के सदस्‍य उपस्थित थे।  

प्रेस रिलीज

खुलासे से तिलमिलाए जगदीश नारायण शुक्ला ने निशीथ राय पर निशाना साधा

लखनऊ के निष्पक्ष प्रतिदिन अखबार के मालिक जगदीश नारायण शुक्ला ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी को एक पत्र लिखा है. पत्र की प्रति यूपी के मुख्यमंत्री समेत कई लोगों को भेजा है. इसमें उन्होंने लखनऊ के हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट अखबार के मालिक निशीथ राय पर आरोप लगाया है कि वे निष्पक्ष दिव्य संदेश नामक साप्ताहिक अखबार निकाल कर पत्रकारों को बदनाम कर रहे हैं.

ज्ञात हो कि इसी अखबार में पिछले दिनों शुक्ला जी की संपत्ति व भ्रष्टाचार को लेकर खबर छपी थी.  शुक्ला जी ने अपने पत्र में खुद के बारे में कहा है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबे समय से लड़ रहे हैं और उन्होंने एपी सिंह, बादल चटर्जी, फतेह बहादुर समेत कई भ्रष्ट अफसरों की पोल खोली. अब इन भ्रष्ट अफसरों ने निशीथ राय के साथ सांठ-गांठ करके उनकी छवि खराब करने के लिए अभियान छेड़ दिया है. शुक्ला ने निशीथ राय पर कई तरह के गंभीर आरोप लगाए हैं. जगदीश नारायण शुक्ला का पूरा पत्र इस प्रकार है…


निष्पक्ष प्रतिदिन के मालिक जगदीश नारायण शुक्ला के भ्रष्टाचार के बारे में प्रकाशित खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

निष्पक्ष प्रतिदिन के संपादक के आगे क्यों नतमस्तक है सरकार?

कैलाशनाथ सिंह यादव के अंतिम संस्‍कार में नहीं पहुंचा प्रशासन

चंदौली : पूर्व शिक्षा मंत्री व चंदौली के पूर्व सांसद कैलाशनाथ यादव के निधन पर चंदौली जनपद के लोगों ने शोक व्‍यक्‍त किया है. श्री यादव धानापुर विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे. उस दौरान प्रदेश में शिक्षा मंत्री पद भी रहे. एक बार चंदौली के सांसद भी चुने गए. नेता विरोधी दल भी रहे. गौरतलब है कि कैलाशनाथ सिंह यादव का लंबी बीमारी के बाद वाराणसी में निधन गया. श्री यादव मूल रूप से चंदौली जिले के ढोढिया के रहने वाले थे.

श्री यादव प्रखर वक्‍ता और राजनीतिज्ञ होने के साथ एक कुशल अध्‍यापक भी थे. उन्‍होंने डीएवी कॉलेज में भौतिक विज्ञापन के प्रोफेसर के पद पर लंबे समय तक कार्य किया. उनके अंतिम संस्‍कार में प्रशासन की तरफ से किसी के नहीं पहुंचने पर लोगों में नाराजगी रही. जनता पार्टी से करियर शुरू करने वाले कैलाशनाथ सिंह यादव इन दिनों कांग्रेस से जुड़े हुए थे.

SC stays further proceedings in the Hindustan Advertisement Scandal case

Munger : The world famous 200 crore Dainik Hindustan Advertisement scandal case now reached the Supreme Court.Honourable Mr.Justice H.L.Dattu and Honourable Mr.Justice Dipak Misra, in the Special Leave Petition (Criminal) No.1603/2013,(Shobhana Bhartia Vs State of Bihar & others ) on March 05, ordered to stay further proceedings in the Munger F.I.R No.445/2011,dated 18-11-2011 under sections 8(B)/14/15 of the Press & Registration of Books Act,1867 read with sections 420/471/476 of the Indian Penal Code,1860.

The Supreme Court ordered, "There shall be interim stay of further proceedins in the F.I.R No.445/2011, dated 18/12/2011 under sections 8(B)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 read with sections 420/471 /476 of the Indian Penal Code,1860 and the proceedings emanating thereto, until further orders."

Senior advocates Mr.Mukul Rohtagi, Mr.Aman Lekhi, Mr. Sandeep Kapur, Mr.Shivek Trehan and Mr. Laksh Khanna for M/S Karanjawala & Com. appeared for the petitioner, Shobhana Bhartia in the Supreme Court.

Demand to confiscate the properties of economic offenders : The President of the Watch Dog group and government witness in the sensational 200 crore Dainik Hindustan Advertisement scandal,Kashi Prasad, who is also an R.T.I activist of national level ,senior lawyer and journalist,in a press note today, has urged the Chief Minister of Bihar ,Nitish Kumar and the Director General of Police, Bihar, Abhyanand to confiscate the properties of all the accused persons of the Munger Kotwali Case No.445 of 2011 on the plea that this case relates to the economic offence of serious-nature not in India,but in the world of the media.

The accused persons include the VVIPs of India : The accused persons include Smt. Shobhana Bharatia (the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited, New Delhi), Amit Chopra (the Publisher, M/S Hindustan Media Ventures Limited, New Delhi), Shashi Shekhar (Chief Editor, Dainik Hindustan, New Delhi), Aaku Srivastawa (the Regional Editor, Dainik Hindustan, Patna Edition, Patna) and Binod Bandhu (the Regional Editor, the Bhagalpur and Munger editions of Dainik Hindustan, Bhagalpur). It is worth mentioning that Kashi Prasad has been honoured by Arvind Kejriwal earlier.

The Bihar govt.'s decision hailed : Meanwhile, Mr.Prasad has also hailed the decision of the Bihar government in which the govt. has begun confiscating the properties of arms-smugglers and illicit- liquor manufacturers.Recently, on the directives of the Director General of Police(Bihar,Patna),the Munger police under the leadership of the Police Superintendent,P.Kannan, have confiscated the properties of two arms-smugglers in the Munger district in Bihar.The Munger administratin has sent proposals to the state government to confiscate the properties of twenty more economic offenders.

"If the govt. confiscates the properties of arms-smugglers,the govt. is also free to confiscate the properties of the accused persons in connection with the famous 200 crore Dainik Hindustan Advertisement scandal case," advocates Mr. Prasad.

Demand to expedite the police investigation : In the press -note, Mr.Prasad has also urged the Bihar Chief Minister,Nitish Kumar and the D.G.P(Bihar),Abhyanand to expedite the investigation of this case immediately in the wake of the findings of the supervision-reports of the S.P(Munger) and the Dy.S.P(Munger) .The S.P and the Dy.S.P have found all allegations against the accused persons "prima facie true." It is worth mentioning that the Honourable Justice Anjana Prakash of the Patna High Court has directed the Munger police to complete the police investigaton in this instant case within three months from the date of the receipt of this court order. The High Court order has ,in fact, strengthened the morale of the Bihar police in the investigaton of this world famous case.

Accusations against accused persons under various sections of IPC : All the accused persons namely Shobhana Bharatia,Amit Chopra,Shashi Shekhar,Aaku Srivastawa and Binod Bandhu have been charged with cheating and committing forgery with the Union and the Bihar governments in a bid to get the government advertisements under sections 420/471 and 476 of the Indian Penal Code and sections 8(B)/14 and 15 of The Press & Registration of Books Act,1867.

The charge-sheet awaited : After the submission of the supervision-reports of the Dy.S.P and the S.P,the Munger police are to submit the charge-sheet against them in the court.(EOM)

Report by Shrikrishna Prasad, an R.T.I activist, lawyer and journalist, Munger, Bihar.  Mobile No.09470400813.


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नभाटा, मुंबई के चीफ रिपोर्टर विमल मिश्र को सार्थक पत्रकारिता के लिए मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवार्ड

मुंबई : 'नवभारत टाइम्‍स' के चीफ रिपोर्टर विमल मिश्र को सार्थक पत्रकारिता के लिए 'मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवॉर्ड' प्रदान किया जाएगा. पुरस्‍कारों की घोषणा मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवॉर्डस कमेटी ने कोलकाता में की. पुरस्‍कार समारोह 6 अप्रैल को कोलकाता में होगा.

जीवन के विभिन्‍न क्षेत्रों में, देश और विदेश के कुल 25 उपलब्धिवान लोगों को इस पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जाएगा. विमल मिश्र 'नवभारत टाइम्‍स' में अपने लोकप्रिय स्‍तंभ 'लोग' के लिए जाने जाते हैं. हिंदी अखबारों में पत्रकारिता के लिए उन्‍हें कई नामचीन पुरस्‍कारों से सम्‍मानित किया जा चुका है, जिनमें मुंबई की लोकल ट्रेनों व उपनगरीय ट्रेन प्रणाली पर आधारित भारतीय रेलवे द्वारा प्रकाशित प्रकाशित उनकी कॉफी टेबल बुक 'मुंबई लोकल' के लिए मिला महाराष्‍ट्र हिंदी साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार शामिल है.

रिश्‍वत मांगने के आरोप में संपादक को नौ साल की सजा

बाकू। अजरबैजान मे मानवाधिकारों पर सरकार की आलोचना करने के मामले में एक समाचार-पत्र के सम्पादक को 9 साल के कारावास की सजा सुनाई गई। माचार पत्र 'खुरल' के सम्पादक अवाज जीनैली को वसूली के आरोप में अक्टूबर 2011 में गिरफ्तार किया गया था। सत्तारूढ पार्टी की एक महिला सांसद ने अभियोजकों को बताया था कि जीनैली ने उनसे रिश्वत मांगी थी।

हालांकि बाद में इस सांसद पर भी धोखाधड़ी का आरोप लगा। जीनैली ने सांसद के आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि एक लेख में वरिष्ठ अधिकारियों की आलोचना करने पर सरकार ने बदले की कार्रवाई में उनके खिलाफ मामला बनाया है। न्यायाधीश ने जीनैली के खिलाफ मामले में जैसे ही फैसला सुनाया, अदालत के बाहर मौजूद जीनैली के र्समथकों ने 'आजादी' के नारे लगाने शुरु कर दिए। (वार्ता)

साहित्‍यकार ओम प्रकाश त्रिपाठी किए गए सम्‍मानित

महराजगंज। मंगलवार को नेपाल-भारत मैत्री समाज के अध्यक्ष श्रीचंद गुप्त ने साहित्यकार ओमप्रकाश त्रिपाठी को माल्यार्पण कर सम्मानित किया। भारत-नेपाल देशाटन पर निकले सोनभद्र के साहित्यकार व राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त ओमप्रकाश त्रिपाठी दिन मंगलवार को भारत नेपाल की सीमा पर पहुंचे जहां उनका जोरदार ढंग से स्वागत किया गया। कार्यक्रम के शुरुआत में व्यापार मंडल के अध्यक्ष सुभाष जायसवाल तथा नेपाल-भारत मैत्री समाज के अध्यक्ष श्रीचंद गुप्त ने साहित्यकार ओमप्रकाश त्रिपाठी को माल्यार्पण किया। इसके बाद अंग वस्त्रम व बुद्ध प्रतिमा भेंट कर दोनों देशों के नागरिकों की तरफ से सम्मानित किया।

इस अवसर पर श्री त्रिपाठी ने कहा कि भारत-नेपाल मैत्री पूर्ण संदेश यहां देखने को मिला। यह दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध होने का संकेत हैं। सीमा पर दोनों देशों के बीच नागरिकों में बेहतर तालमेल सांस्कृतिक विरासत को नया आयाम देता है। इस अवसर पर  व्यापार मंडल तहसील अध्यक्ष सुभाष जायसवाल, व्यापार मंडल युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष कृपाशंकर मद्धेशिया, चौकी इंचार्ज रामपाल यादव, रूपेश अग्रवाल, राजेश अग्रवाल, राजन थापा, संजय गुरूंग, धर्मेंद्र अंजाना, रामचंद जायसवाल, मुरली मद्धेशिया, ओंकार नाथ मद्धेशिया, प्रकाश दायी, प्रताप मद्धेशिया, आलोक जोशी, मनोज गुप्त, राजा वर्मा, अतुल जायसवाल, महेंद्र, सुखदेव दिवेदी आदि ने माल्यार्पण कर स्वागत किया।

महराजगंज में ग्राम प्रधान की गोली मारकर हत्‍या, हत्‍यारों का सुराग नहीं

महराजगंज। जंगल बड़हरा के ग्राम प्रधान रविन्द्र यादव उर्फ पप्पू (36) की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 12 मार्च सुबह उनकी लाश कमरे में मिली तो पूरे गाँव में कोहराम मच गया। सूचना मिलते ही एसपी सहित अन्य अधिकारी मौके पर पहुंच गए। मौके पर जांच में 315 बोर का खोखा बरामद हुआ। हत्या किस वजह से हुआ इसका अभी तक सुराग नहीं मिल सका था।

जानकारी के अनुसार ग्रामप्रधान का परिवार वर्तमान समय में गोरखपुर जनपद के पीपीगंज पशु बाजार में स्थित मकान में रहता है। सोमवार की शाम उसी गांव का चालक रामप्रसाद बाइक से ग्राम प्रधान की माता को पहुंचाने के लिए उन्हें पीपीगंज लेकर चला गया। वहां से उनकी माता को पहुंचा कर वह अपने घर चला गया। अगले दिन सुबह चालक जब प्रधान के आवास पर गया तो वहां से ग्रामप्रधान के कमरे के बगल में स्थित दूसरे कमरे में रखी केतली लेकर चौरी चौराहा पर चाय लेने चला गया। चाय लेकर जब ग्रामप्रधान के कमरे में उन्हें जगाने गया तो वहां का दृश्य देख कर भौंचक रह गया। चारपाई पर लाश पड़ी थी, सीने में गोली मारी गई थी। कमरे का सामान बिखरा पड़ा हुआ था। कमरे में ही खोखा पड़ा था।

घटना की जानकारी चालक ने गांव के अन्य लोगों को दी। बताया जाता है कि ग्राम प्रधान यादव सोमवार की देर शाम पिपरा खुर्द गांव निवासी अपने मित्र हरीश शाही के घर दावत खाने गए थे। चालक के न रहने पर वह दावत में अपनी चार पहिया गाड़ी खुद चलाकर गए थे। दावत खाकर देर रात वह अपने गांव जंगल बड़हरा के लिए चले। बताया जाता है चार पहिया वाहन में ग्राम प्रधान अकेले थे। ग्राम प्रधान के परिवार वालों का कहना है कि उनकी किसी से दुश्मनी नहीं थी। ग्राम प्रधान प्रापर्टी डीलिंग का काम करते थे इसके अलावा गांव में एक भट्ठा भी चलाते थे। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्ट मार्टम के लिए भेज दिया। पोस्टमार्टम के बाद प्रधान का अंतिम संस्कार देर शाम रोहिन नदी के भौराभारी घाट पर किया गया। इस दौरान भारी संख्या में पुलिस के अलावा क्षेत्र के लोग उपस्थित रहे। इस संबंध में मृत ग्रामप्रधान के पिता ने स्थानीय थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ तहरीर दी है। इस संबंध में पुलिस अधीक्षक दिलीप कुमार ने बताया कि हत्यारों को शीघ्र गिरफ्तार कर घटना का पर्दाफाश कर दिया जाएगा। हर पहलुओं पर छानबीन की जा रही है।

सामने आ रही है पुलिस की लापरवाही : प्रधान पप्पू की हत्या को लेकर मंगलवार को ब्लॉक परिसर में ब्लॉक ग्राम प्रधान संघ की बैठक हुई। इसमें ग्राम प्रधानों ने कहा कि एसओ पनियरा की लापरवाही के कारण प्रधान की हत्या हुई। वक्ताओं ने कहा कि नवंबर में बदमाशों ने बेचन प्रसाद की दिनदहाड़े हत्या कर दी थी, लेकिन पुलिस अब तक हत्यारोपियों को पकड़ नहीं सकी है। यदि पनियरा पुलिस इस हत्या को गंभीरता से ली होती तो रविन्द्र की हत्या नहीं हुई होती। बैठक से पहले शोक सभा कर मृतक की आत्मा की शांति के लिए भगवान से प्रार्थना की गई। इस दौरान ब्लाक प्रमुख राजेश जायसवाल, ब्लॉक ग्राम प्रधान संघ अध्यक्ष रमाशंकर यादव, लालजी यादव, सतीश सिंह और बीडीओ मोहन यादव रहे।

हत्या की वजह कही पैसा तो नहीं : ग्राम प्रधान की हत्या मामले में पुलिस ने कई बिंदुओं पर जांच शुरू की है। हत्या के तरीके से अनुमान लगाया जा रहा है कि प्लानिंग के तहत गोली मारी गई है। मारने वाला उनका बहुत ही करीबी है, जो उनकी हर गतिविधियों के बारे में जानता था। कमरे में जिस तरह आलमारी का सामान बिखरा पड़ा था, उससे इस आशंका को भी बल मिलता है कि हत्या लूट की नीयत से तो नहीं की गई। पप्पू ने कुछ ही समय में अच्छी-खासी प्रापर्टी खड़ी कर ली थी। क्षेत्र के खजुरिया में उनका ईंट भट्ठा भी है। साथ ही पीपीगंज में मकान और वाराणसी में करीब 80 एकड़ की जमीन नेवासे की है। अनुमान लगाया जा रहा है कि घटना के समय प्रधान के पास चार से पांच लाख रुपये होंगे। इन्हीं रुपयों के लिए उनकी हत्या की गई। लोगों का कहना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में एक व्यक्ति को प्रधान ने चुनाव लड़ने के लिए आठ लाख रुपये उधार दिए थे। पिछले दिनों प्रधान ने उस व्यक्ति से रुपये मांगे। उसी रुपयों को लेकर उस व्यक्ति से कहासुनी भी हो गई थी।

खुलासे को एसओजी लगाई गई : हत्या के जल्द खुलासे के लिए एसपी ने एसओजी के अलावा जिले के कई तेज तर्रार दरोगाओं को लगाया है। हत्या के गुस्से में कोई घटना न हो इसके लिए ग्राम प्रधान के आवास पर एक सेक्शन पीएसी लगाई गई है। इसके अलावा इंस्पेक्टर अश्वनी कुमार सिंह, एसओ श्यामदेउरवां नितेश श्रीवास्तव, एसओ फरेन्दा अनिल कुमार सिंह और एसओ घुघली जितेन्द्र यादव को भी लगाया गया है। बड़हरा के ग्राम प्रधान रविन्द्र यादव उर्फ पप्पू की हत्या की खबर जैसे लोगों के कानों तक पहुंची, हर कोई उनके घर की ओर दौड़ पड़ा। मकान के सामने सैकड़ों की भीड़ जमा हो गई। सभी यही कह रहे थे कि प्रधान बहुत ही मिलनसार थे।

मंगलवार सुबह करीब आठ बजे ग्राम प्रधान की लाश उनके कमरे में मिली। सीने में गोली मारी गई थी। वह जिंदा न बचें, इसलिए बदमाशों ने गोली मारने के बाद सिर पर हथौड़े से प्रहार किया था। हत्या की खबर सुनते ही लोग पहुंच गए। हर एक की जुबान पर यही था कि वह बहुत मिलनसार थे। पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे गांव के लोगों का कहना था कि किसी भी व्यक्ति का काम होता था, वह अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर कराते थे। यही कारण था कि कुछ ही दिनों में वह गांव ही नहीं क्षेत्र के लोगों के लिए प्रिय नेता बन गए थे। घटना के दिन भी गांव के दो लोग उनके दरवाजे पर प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पहुंचे थे। उनके जगने का इंतजार कर रहे थे। लोगों का कहना था कि उन्हें कोई जगाता नहीं था। आठ बजे वह खुद जग जाते थे। मंगलवार को काफी देर हो जाने के चलते ड्राइवर चाय लेकर कमरे में पहुंचा तो हत्या का पता चला।

महाराजगंज से अरुण कुमार वर्मा की रिपोर्ट.

महाराष्‍ट्र के पूर्णा में पत्रकार दिनेश चौधरी पर एसिड हमला

महाराष्ट्र के परभणी जिले के पूर्णा में कल रात कुछ असामाजिक तत्वों ने तरुण भारत के पत्रकार दिनेश चौधरी पर जानलेवा ऍसिड हमला किया. जिसे खुद दिनेश और उनकी पत्नी बुरी तरह से घायल हुई है. उन्हें कल रात ही नांदेड के सरकारी अस्पताल मे भर्ती किया गया है. रात साढ़े ग्‍यारह बजे दिनेश पर यह हमला किया गया. 

महाराष्ट्र में गुटका बेचना कानूनी अपराध है, तो भी पूर्णा में गुटका की बिक्री जोर-शोर से चल रही है. इसकी खबर दिनेश ने तरुण भारत में दी थी. इसी कारण यह हमला हुआ है. इस वारदात की खबर पूर्णा पुलिस को दे दी गइ है. जिले के एसपी आज पूर्णा विजिट कर रहे हैं.

इस हमले की खबर सुबह जब महाराष्ट्र के पत्रकारिता जगत में फ़ैल गयी तो सारा पत्रकार जगत क्रोधित है. इस प्रकार का ऍसिड हमला महाराष्ट्र में किसी पत्रकार पर पहिली बार हुआ है. पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति ने इस हमले की घोर आलोचना करते हुये दोषी व्यक्ति पर कार्रवाई करने की मांग की है. हमले के विरोध मे परभणी के पत्रकार शनिवार को आंदोलन कर रहे हैं. चार दिन पहले ही सतारा में पत्रकार विशाल कदम पर हमला किया गया था. वहां पुलिस ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है.

महाराष्ट्र विधानमंडल का बजट कालीन सत्र मुंबई में शुरू है. इसी दौरान पत्रकारों के उपर होने वाले हमलों में बढ़ोतरी हुई है. महाराष्ट्र मे हर चार दिन में एक पत्रकार पीटा जा रहा है. पत्रकारों पर हमला हो रहा है. पत्रकारों की सुरक्षा राज्‍य में लगातार खतरे में पड़ती जा रही है. महाराष्ट्र के पत्रकार पिछले तीन साल से पत्रकार प्रोटेक्शन कानून की मांग करते हुए आंदोलन कर रहे हैं. सरकार इसकी अनदेखी कर रही है, जिससे पत्रकारों पर हमला करने वालों का मनोबल लगातार बढ़ता जा रहा है.

विरोधों-विवादों एवं दुर्घटनाओं के साथ हो गया महाकुंभ का समापन

महाशिवरात्रि के स्नान के बाद विश्व के सबसे बड़े धार्मिक मेला महाकुंभ का समापन हो गया। पर आखिरी वक्त में कई सवाल भी छोड़ गया। पचपन दिनों तक चले इस महाकुंभ में दस करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं ने पुण्य की डुबकी लगाई। मकर संक्रांति से लेकर महाशिवरात्रि तक चले इक्कीसवीं सदी के इस मानव महामिलन के महापर्व यानि महाकुंभ अब बारह साल बाद आएगा।

धार्मिक आध्यात्मिक संगठनों और धर्मगुरुओं से लेकर लाखों कल्पवासियों के लिए नई ऊर्जा का यह महापर्व धार्मिक श्रेष्‍ठता और भव्यता के दर्शन का भी अवसर बना। नागा से लेकर साधुओं, शास्त्र और शस्त्रों के अलग-अलग दर्शन कराने वाले लोग महाकुंभ से कौन सा अमृत पाते हैं, इसे समझना आसान नहीं है। इसे सिर्फ संगम की रेती पर आकर ही समझा व महसूस किया जा सकता है।

मोक्ष की उम्मीद में प्रयाग महाकुंभ में डुबकी लगाने देश विदेश के कई करोड़ महिला-पुरूश यहां आए। यह सिर्फ धार्मिक मेला ही नहीं था बल्कि नई चेतना, नई उमंग प्रदान करने वाला लोक उत्सव भी साबित हुआ। जन कल्याण के लिए लगातार कई बड़े अनुष्‍ठान हुए। बेटी, गाय, गंगा, यमुना समेत कई अन्य छोटी नदियों के अस्तित्व बचाने के विचार धाराओं के संगम का भी साक्षी बना प्रयाग का महाकुंभ। विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला सकुशल संपन्न कराना भी एक बड़ी चुनौती थी। कई बार व्यवस्था लड़खड़ाई। टेंटों में अग्निकांड की दो बड़ी दुर्घटनाएं हुईं। रेलवे स्टेशन और मेला परिसर में भगदड़ से 52 से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले गए।

शुरू से आखिर तक छाया रहा विवाद : महाकुंभ में मेला प्रशासन ने भूमि आंवटन को लेकर पेंच फंसाया तो असली-नकली शंकराचार्य और चतुष्‍पद का विवाद गहरा गया। बात इतनी ज्यादा बढ़ गई कि कई बड़े संत-महात्माओं को नाराज होकर मेला छोड़ना पड़ा। अनशन पर बैठे लापता स्वामी परिपूर्णानंद का पता नहीं चल सका। कोर्ट का आदेश और पुलिस टीम भी लापता स्वामी को तलाश नहीं पाई। चर्चित संन्यासिन राधे मां सुर्खियों में रहीं तो सेक्स स्कैंडल से कुख्यात हुए स्वामी नित्यानंद यहां आकर महामंडलेश्वर बन गए। कई अखाड़ों के विरोध के बावजूद उन्हें यह महत्वपूर्ण पदवी यहां आकर हासिल हो गई। महामंडलेश्वर की बर्खास्तगी भी चर्चा में रही। लंबी चली कवायदों के बाद भी अखाड़ा परिषद का गठन नहीं हो सका। भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की जमकर ब्रांडिंग हुई। एक बार तो ऐसा लगने लगा कि जैसे महाकुंभ मेला ही प्रधानमंत्री तय कर देगा। धर्म संसद के नाम पर जमकर राजनीति का खेल खेला गया।

बहरहाल, महाकुंभ से लौटते चेहरों में तृप्ति का भाव दिखा। आस्था की डुबकी लगाकर घर लौटने वाले श्रद्धालुओं में अपने साथ गंगाजल ले जाने की उत्सुकता देखने लायक रही। अब बारह साल बाद महाकुंभ का साक्षी बनेगा तीर्थराज प्रयाग।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नंबर 09565694757 के जरिए किया जा सकता है.

एक खुला पत्र दरभंगा के महासचिव भइया और कोषाध्यक्ष साथी के नाम

आदरणीय महासचिव भइया. प्रणाम. सबसे पहले आपको मैं बधाई दे दूं कि आपकी टीम सभी मुक़ाबलों में विजेता रही. आगे भी आपके लिये मेरी बहुत शुभ कामनायें. आप ये मत समझियेगा कि छोटा भाई इस पत्र के माध्यम से आप पर कोई व्यंग्य कर रहा है या आपको नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है. मेरा कभी ऐसा कोई इरादा न तो रहा है और न ही होगा. महासचिव भइया, इन दिनों जो भी घटनायें-दुर्घटनायें घट रही हैं, उसकी सारी जिम्मेवारी-जवाबदेही आप मुझ छोटे भाई पर डालकर मुझे गाली दे रहे हैं. ये ग़लत है भइया.

किसी प्रतियोगिता से मेरी मां-बहन का कभी कोई लेना-देना नहीं रहा, तो उनको गाली क्यों दे रहे हैं. छोटे भाई की मां-बहन क्या बड़े भाई की मां-बहन नहीं हुईं. और भइया मैं तो ये मानता हूं कि मेरी मां-बहन दरभंगा के सभी भाइयों, पत्रकारों की मां-बहन हैं. उसी तरह सभी भाइयों की मां-बहन मेरी मां-बहन हैं. इसलिये भइया इस गाली का मतलब तो बहुत बड़ा हुआ न. तो आगे से आप ध्यान रखेंगे, ऐसी मुझे उम्मीद है. नहीं भी ध्यान रखेंगे तो कुछ फर्क़ नहीं पड़ेगा.

महासचिव भइया, आप भले ही ऊपर से मुझे कोसें, लेकिन आपकी आत्मा जानती है कि पिछले छह साल से जिस व्यक्ति ने आपका इस आयोजन के मामले में सबसे ज्यादा मज़बूती से साथ दिया है वो मैं ही हूं. आपको पिछले साल की मेरी भयंकर बीमारी और गलते जा रहे शरीर की भी याद होगी, जिसके बावजूद ये छोटा भाई आपके साथ चंदा मांगने जाता था. आप ही तो कहते थे कि मेरा आपके साथ रहना बहुत शुभ होता है. साल दर साल शुभ रहने वाले व्यक्ति के लिये आप इतनी जल्दी गाली-गलौज पर उतर आये. महासचिव भइया, मैं मज़ाक में हमेशा एक शब्द का इस्तेमाल करता था कि हम सब लोग उगाही-वसूली करने जा रहे हैं. मेरी आत्मा जानती है कि मैं ये शब्द मज़ाक में इस्तेमाल करता रहा हूं और हमारे ग्रुप का कोई भी व्यक्ति इससे कभी ख़फा नहीं होता था. मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी भी उगाही-वसूली नहीं की है भइया. लेकिन अचानक एक मित्र ने जब इस शब्द के लिये मुझे चेतावनी ज़ारी करते हुए गुस्से का इज़हार किया तो मैं स्तब्ध रह गया. मैंने तत्काल अपने शब्द के लिये सबसे माफी भी मांग ली. आज आप लोगों ने उसको भी मुद्दा बना रखा है. क्या माफी के बाद भी कोई मुद्दा बचता है. खैर, जैसी आप लोगों की मर्ज़ी.

महासचिव भइया, एक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल पर किसी ने ये लिख दिया है कि फंड का बंदरबांट होता है, मैं इस लिखे हुए से सहमत नहीं हूं. मैं उसकी आलोचना करता हूं. और मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि मेरा इस लिखे हुए से कोई संबंध नहीं है. इसका मैं खंडन करता हूं. मैंने इस्तीफा इस वजह से नहीं दिया. महासचिव भइया, मैंने व्यक्तिगत कारणों से इस्तीफा दिया है. दूसरी बात जो मैं लिखने जा रहा हूं, उस पर ध्यान दीजिये. प्रतियोगिता पत्रकारों के लिये है, इसमें ज़बर्दस्ती ग़ैर पत्रकारों और प्रोफेशनल खिलाड़ियों को खेलाकर आप किस तरह का मैसेज समाज को देना चाहते हैं. जिस कप्तान और उसके कुछ खिलाड़ियों को पिछले साल दोषी पाया गया था, आप उन्हीं सब को इस साल भी क्यों खेला रहे हैं. क्या पत्रकारों का उस ज़िले में अकाल पड़ गया है. मैं आपकी मज़बूरी भी समझता हूं. वेरीफिकेशन का समय कमेटी के पास नहीं था. सबकुछ जल्दी-जल्दी में हुआ. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि जल्दीबाज़ी में कुछ दोषी लोगों को फिर मौका दे दिया जाये. अब इस बात का जो कोई भी विरोध करता है, आप उसको अपना विरोधी और दुश्मन नं. वन मान लेते हैं. ये ईगो सही है क्या, ज़रा सोचिये. मैं सरेआम स्वीकार करता हूं कि आप जितनी मेहनत करते हैं उतनी मेहनत करके कोई ये आयोजन नहीं करवा सकता. तो भइया, अपनी इतनी मेहनत को कुछ ग़लत निर्णयों की वजह से सवालों के घेरे में आप खुद क्यों डाल देते हैं.

महासचिव भइया, आप माने या ना माने, इस आयोजन से अच्छे पत्रकार दूर भाग रहे हैं. मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं जिन लोगों ने ईगो की वजह से साथ छोड़ा था. उनको दूर भागने दीजिये. लेकिन आपने अच्छे लोगों को भी खोया है भइया. मैं भी उनमें से एक हूं जो आपके व्यवहार की वजह से आपसे दूर चला गया हूं. इसी शहर में रहते हुए आपके नज़दीक अब नहीं रहा मैं. मैं बहुत व्यथित हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं आपको गाली दूं. मैंने कभी ऐसा नहीं किया. ये मेरे परिवार के संस्कार में नहीं रहा है. मुझे मेरे स्व. पिता ने सिखाया है कि बड़ा भाई पिता तुल्य होता है. और मैं आपको हमेशा से बड़ा भाई मानता आया हूं. अब आप ही बताइये कि आपका-मेरा रिश्ता कैसा है. मैं इमोशनल आदमी हूं. प्यार का भूखा हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप मुझे गाली दें और मैं आपके साथ बना रहूं. मैं अब आपके साथ नहीं हूं भइया. मैं चुपचाप बिना किसी शोर-शराबे के आपसे दूर निकल चुका हूं…बहुत दूर. मैंने अध्यक्ष जी को अपना इस्तीफा सौंपते हुए कहा था कि इसको मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिये. लेकिन आप लोगों ने मुद्दा बना रखा है. आप जितना चाहे बड़ा मुद्दा बना लें, लेकिन मैं अपने सिद्धांतों के साथ समझौता करने वाला नहीं हूं.

महासचिव भइया, आपने मेरे चैनल का नाम लेकर कहा था कि उसके रिपोर्टर को हिंदी लिखने नहीं आता. आपकी जानकारी बिल्कुल ग़लत है भइया. मैं जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा में हिंदी प्रतिष्ठा में वर्ष 2001 का टॉपर रहा हूं. आप चाहें तो इसकी जानकारी छपरा जाकर ले सकते हैं. महासचिव भइया, मैं अपने अध्ययन काल में हर परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण रहा हूं. दरभंगा के मेरे मित्रों, पटना के मेरे मित्रों और प्रभात खबर, पटना के साथियों से आप मेरी हिंदी के बारे में पूछ सकते हैं. महासचिव भइया, प्रभात खबर की मेरी रिपोर्ट को श्रीश्री रविशंकर जैसे व्यक्ति ने अतिथि संपादक रहते हुए सर्वश्रेष्ठ रिपोर्ट लिखा था. ये सब मेरे पास आज भी सुरक्षित है. फिर भी आपको यकीन नहीं होता तो हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या. आप इसी पत्र की भाषा को पढ़कर देख लें कि मेरी हिंदी कैसी है. मैं किसी की आलोचना नहीं करता हूं भइया. मैं भाव को देखता हूं, भाषा को नहीं. और अगर कुछ गलती हो ही जाये, तो आपके जैसा बड़ा भाई तो है न जो मेरी हिंदी सुधार सके. मुझे अपनी हिंदी की चिंता आपके रहते हुए कभी नहीं रही. अब मैं कोषाध्यक्ष साथी को संबोधित करूंगा.

प्रिय कोषाध्यक्ष साथी, मैं जब दरभंगा में आया था तो मेरे पूर्ववर्ती ने सबसे पहले आपसे ही मेरा परिचय करवाया था. उन्होंने आपके बारे में कहा था कि ये अच्छे आदमी हैं. मैं आज भी अपने पूर्ववर्ती की बातों से सहमत हूं. बाद में कई कारणों से आपसे मेरा मतभेद हो गया. लेकिन, यकीन कीजिये कभी मनभेद नहीं रहा आपसे. आप तो गंभीर और संवेदनशील इनसान हैं. आपको ये शोभा नहीं देता कि आप सुनी-सुनाई बातों को लेकर मुझे गाली दें. आखिर मैंने क्या गुनाह किया है. मैंने तो आपको विधि सम्मत तरीके से ये सूचित किया कि पिछले साल के दोषी खिलाड़ी फिर खेल रहे हैं. इसमें मेरी क्या ग़लती है भाई. आयोजन के बिगड़ने के डर से ग़लत का को बढ़ावा देना कहां की मजबूरी है. खैर, जाने दीजिये, आपके शहर में सच कहने की हिम्मत करने वालों को गाली सुनाया जाता है तो मैं ऐसी हज़ार गालियां सुनने के लिये तैयार हूं. लेकिन सच कहना नहीं छोड़ूंगा. साथी, आप ज़रा अकेले में अपनी आत्मा से पूछ कर देखियेगा कि आप का कृत्य कितना सही है.

अंत में मैं महासचिव भइया, कोषाध्यक्ष साथी, अध्यक्ष जी समेत उन तमाम लोगों से माफ़ी मांगता हूं जिनकी भावनायें मेरी वजह से आहत हुई हैं. घबराइये नहीं, मैं आप सब से माफी मांगने को नहीं कहूंगा, हालांकि मेरी भावनायें बहुत आहत हुई हैं. मैं माफी मांगने से छोटा नहीं हो जाउंगा. माफ़ी मांगने के बावजूद मेरे सवाल जस के तस हैं. इनका उत्तर सार्वजनिक रूप से मत दीजिये, बस अपनी अंतरात्मा को दे दीजियेगा, यही आप सबसे मेरी विनती है. अब मैं आप सबके साथ नहीं हूं. इसका मुझे बहुत दुख है, लेकिन मैं शर्मिंदा नहीं हूं.

रोशन कुमार झा

mithlakgaam@gmail.com

विवेक ने पत्रिका एवं आशीष ने हिंदुस्‍तान के साथ नई पारी शुरू की

नईदुनिया, ग्‍वालियर से खबर है कि विवेक श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे रीजनल डेस्‍क पर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. विवेक ने अपनी नई पारी ग्‍वालियर में ही पत्रिका के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी रीजनल डेस्‍क पर लाया गया है. बताया जा रहा है कि विवेक ने संपादक के अनूप शाह के रवैये से परेशान हैं. कर्मचारियों पर काम का जबर्दस्‍त दबाव बनाया जा रहा है. माना जा रहा है कि कुछ और लोग जल्‍द ही इस्‍तीफा दे सकते हैं.

आशीष मिश्रा ने दैनिक प्रभात, नोएडा से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर क्राइम रिपोर्टर के रूप में कार्य कर रहे थे. आशीष ने अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान के साथ नोएडा में ही शुरू की है. उन्‍हें यहां भी रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय से पास आउट आशीष की गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है.

क्‍या गलत है सुल्‍तानपुर के पत्रकारों का आंदोलन?

यशवंत जी नमस्कार। आपके पोर्टल पर "सुल्‍तानपुर में अपना-अपना हित साधने के लिए पत्रकार चला रहे हैं आंदोलन" शीर्षक से खबर पढ़ी। पढ़कर बड़ी तकलीफ व निराशा हुई। यशवंत जी सच तो यह है कि यह लड़ाई अपने निजी स्वार्थों और हितों के लिए नहीं लड़ी जा रही है बल्कि पत्रकारिता जैसे मिशन को मिटाने में लगे पुलिस वालों के खिलाफ लड़ी जा रही है। खबर छपवाने वाले ने शायद आपको पूरे तथ्यों से अवगत नहीं कराया वरना हो सकता है आप उस खबर को अपने इस पोर्टल पर स्थान ना देते। 

एक बात और यशवंत जी आपकी खुद की जो लड़ाई सिस्टम से चल रही है, कम से कम हम उसे निजी स्वार्थों की नहीं मान रहे हैं। अगर आपकी लड़ाई निजी स्वार्थों की है तो इस लड़ाई को भी आप उसी श्रेणी में मान सकते हैं। आइये हम आपको इस लड़ाई के पूरे तथ्यों से अवगत कराते हैं..

मामला कुछ यू हैं। नगर के डिहवा इलाके में सरेशाम हुई एक हत्या के आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर बीते 25 फ़रवरी को नगर के कुछ लोग पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचते हैं। हत्या के कई दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस द्वारा कोई सार्थक कार्रवाई न किये जाने से ये लोग नाराज थे, लिहाजा इन लोगों ने वहां नारेबाजी शुरू कर दी। ज्ञापन देने पहुंचे गुस्साए लोगों ने वहा मौजूद इसौली विधायक अबरार को देखा तो उनसे अपनी बात कही और जब उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया तो और तेज नारेबाजी करने लगे। फिर क्या था पुलिस ने न्याय मांगने आये इन लोगों पर पुलिसिया रंग दिखाया और इन लोगों की पिटाई शुरू कर दी। पुलिस जब इन लोगों को पीट रही थी, उसी समय वहां पर मौजूद मीडियाकर्मियों ने कवरेज शुरू कर दिया। पुलिस को लगा कि उनका ये बर्बर रूप कहीं मीडिया की सुर्खियां न बन जाये लिहाजा पुलिस ने हिन्दुस्तान के छायाकार राज बहादुर यादव को पकड़ लिया और उसे भी पीटने लगे। इतना ही नहीं फोटो डिलीट करने के लिए कैमरा भी छीनने का प्रयास किया।   

जब इस घटना की खबर जिले के तमाम मीडियाकर्मियों को लगी तो वहां जमावड़ा लग गया। पत्रकार राज बहादुर यादव के साथ हुई इस बर्बरता की शिकायत करने पत्रकारों का समूह जब पुलिस अधीक्षक के पास पहुंचा तो एक बार फिर मीडियाकर्मियों को पुलिस अधीक्षक के दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ा। ऐसे में अगर जिले के पत्रकार दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग कर रहे हैं तो भला इसमें कौन सा अपना हित साधना हुआ। यशवंत जी एक बात और कहनी है जिसे आपको सुनकर आश्चर्य होगा। इस आन्दोलन में जिले का कोई नामवर अखबार और नामवर चैनल ऐसा नहीं है, जो बढ़ चढ़ कर हिस्सा न ले रहा हो। यहाँ तक की पत्रकारों की लड़ाई लड़ने वाले जिले के सभी संगठन भी एक राय होकर इस आन्दोलन में शामिल हैं।

सुल्तानपुर से निकलने वाला अखबार हो या बनारस से, जौनपुर से निकलने वाला हो या इलाहाबाद से, राजधानी लखनऊ की बात तो छोडिये, वहां से निकलने वाले सारे अखबारों के पत्रकार तो इस आन्दोलन में हैं ही। दिल्ली से छपने वाले अखबारों के भी जिला संवाददाता इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। एक बात और अगर ये किसी एक व्यक्ति की लड़ाई होती या किसी एकाध पत्रकारों का हित सधता होता तो शायद सारे पत्रकार एक प्लेटफ़ार्म पर नजर ना आते, जो कि इस वक्त हैं। कम से कम मेरा तो यही मानना है कि अगर यह निजी स्वार्थो की लड़ाई होती तो शायद विधानसभा और विधान परिषद् में इसकी गूँज न उठती। ऐसा नहीं है कि इस मामले की खबर पुलिस के उच्चाधिकरियो को नहीं है। छायाकार राजबहादुर यादव के साथ हुए पुलिसिया दुर्व्यवहार की खबर के बाद डीजीपी साहब को सूबे के सभी जिलो में पत्रकारों के साथ शालीन व्यवहार का सर्कुलर तक जारी करना पड़ा। 

ये मान ले कि ज्ञापन देने पहुंचे लोगों ने वहा नारेबाजी करके गलत किया, लेकिन क्या पुलिसिया दुर्व्यवहार और पिटाई की कवरेज करना गलत है। अगर ये गलत है तो फिर आम समाज में सच्चाई कैसे उजागर होगी। अब आप बताइए कि सुल्तानपुर के पत्रकार गलत हैं या सही? क्या उन्हें इस आन्दोलन को छोड़ देना चाहिए या फिर इतना सब सहते हुए भी पुलिसिया हां-हुजूरी करनी चाहिए। दोनों सवालों में आप के जवाब और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। आपका जवाब जो भी हम उसमे आपका पूरा साथ भी चाहेंगे।

राजुल निगम

रिपोर्टर न्‍यूज24
सुल्‍तानपुर
मोबाइल – 9415156182

चीन ने किया भारत पर साइबर हमला

चीनी हैकरों के एक बड़े हमले का खुलासा हुआ है। यह खुलासा हमारे सहयोगी अखबार डीएनए ने किया है। इस हमले के जरिए चीनी हैकरों ने डीआरडीओ यानी भारतीयों रक्षा अनुसंधान संस्थान की कई अहम फाइलें उड़ा ली । यह हमला मार्च के पहले हफ्ते में किया गया।

डीएनए अखबार के मुताबिक चीनी हैकरों ने डीआरडीओ के कई कंप्यूटरों को हैक कर मिसाइल कार्यकर्मों से जुड़े अहम जानकारियों को चुराया। साथ ही हैकरों ने सुरक्षा मामले संबंधी कैबिनेट समिति की सुरक्षा से संबंधित फाइलें भी उड़ा ली। सरकार के नेशनल टेक्निकल रिसर्च ओर्गोनाइजेशन (NTRO) ने प्राइवेट साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट के साथ मिलकर इस साइबर हमले का खुलासा किया है। (जी)

पीटीआई संवाददाता के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल, अदालत से सम्‍मन जारी

जनपद बदायूं में कार्यरत पीटीआई के संवाददाता आशु बंसल पुलिस की विवेचना में आरोपी सिद्ध हो गये हैं। पुलिस ने उनके विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया है। न्यायालय से सम्मन भी जारी हो गया है। उल्लेखनीय है कि बदायूं के न्यूज-24 के रिपोर्टर विकास साहू के विरुद्ध नोयडा स्थित कार्यालय में मेल के द्वारा लगातार मनगढ़ंत शिकायतें पहुँच रही थीं, जिस पर चैनल की ओर से उनसे स्पष्टीकरण माँगा गया, तो ज्ञात हुआ कि जिस नाम और पते से शिकायत की गई है, उस नाम-पते का कोई व्यक्ति ही नहीं है, इस पर चैनल की ओर से विकास साहू को मामले की जांच कराने और कार्रवाई कराने का निर्देश दिया गया।

चैनल के कार्यालय में किये गये मेल के विवरण सहित विकास साहू ने पुलिस में शिकायत कर दी, जिस पर आईटी की टीम ने कैलिफोर्निया स्थित जी-मेल के कार्यालय से मेल का संपूर्ण विवरण मंगाया, तो विकास साहू चौंक गये, क्योंकि रात-दिन साथ रहने वाले पीटीआई के संवाददाता आशु बंसल के कंप्यूटर, डाटाकार्ड वगैरह का पता आया, फिर भी विकास ने सदर कोतवाली में अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा लिखाया, लेकिन विवेचना में पुलिस ने आशु बंसल का नाम खोलते हुए उनके विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है, जिस पर संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है।

सम्मन जारी कर न्यायालय ने आशु को हाजिर होने का आदेश जारी कर दिया है। अगली तारीख 29 मार्च है, जिस पर आशु हाजिर नहीं हुए, तो वारंट भी जारी हो सकता है। आरोप पत्र के अनुसार आशु बंसल की मेल आईडी से उनके बेटे रचित की आईडी बनी है और रचित की आईडी से एक फेक आईडी बनाई गई, जिससे फर्जी मेल किया गया एवं जिस कंप्यूटर और डाटाकार्ड का प्रयोग किया गया, वह भी आशु के नाम पर ही है, लेकिन आशु बंसल का कहना है कि उनके कंप्यूटर पर कई लोग बैठते थे, किसी ने उन्हें फंसाने के लिए षड्यंत्र रचा है, पर उनकी यह दलील पुलिस ने नहीं सुनी। अब देखते हैं कि अदालत मानेगी या नहीं।

नईदुनिया प्रबंधन की प्रताड़ना से तंग आकर अभिषेक ने की आत्महत्या!

नईदुनिया के जागरण प्रबंधन के हाथों जाने के बाद भारी उथल-पुथल हुई है। कई लोगों ने छोड़ दिया और कई को जबरन छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया! लेकिन, ग्रुप के भोपाल एडिशन 'नवदुनिया' के प्रसार विभाग के एक कर्मचारी अभिषेक गुप्ता के आत्महत्या कर लेने से ये सच भी सामने आया है कि ग्रुप के अन्दर कर्मचारियों पर किस हद तक दबाव है। ये घटना है तीन चार दिन पुरानी है, जब एक कर्मचारी अभिषेक गुप्‍ता पुत्र ललित गुप्‍ता ने प्रबंधन के दबाव से त्रस्त होकर फाँसी लगा ली।

अभिषेक की जल्द ही शादी होने वाली थी। अभिषेक एक सुसाइड नोट भी लिखकर गया है, जिसमे उसने ख़ुदकुशी का कारण नईदुनिया प्रबंधन का दबाव और प्रताड़ना बताया है। सूत्रों का कहना है कि इस कर्मचारी के साथ कुछ दिनों पहले दफ्तर में कॉपी बढ़ाने और वसूली को लेकर मारपीट भी हुई थी। इस घटना की रिपोर्ट भोपाल के गोविन्दपुरा थाने में हुई है। बताते हैं कि नईदुनिया प्रबंधन की तरफ से इस मामले को दबाने और आत्महत्या का कारण कुछ और साबित करने की कोशिशें हो रही है। पुलिस पर दबाव बनवाया जा रहा है। पुलिस अभिषेक के घरवालों के बयान लेने की तैयारी कर रही है। पुलिस की तफ्तीश के बाद पूरा सच सामने आ जाएगा। नवदुनिया के सूत्र बताते हैं कि इस तरह का दबाव सिर्फ प्रसार या मार्केटिंग वालों पर ही नहीं सम्पादकीय के लोगों पर भी है।

सासाराम में अस्‍पताल के उपाधिक्षक ने दी पत्रकारों को जेल भेजवाने की धमकी

नवम्बर माह से जननी बाल सुरक्षा योजना का पैसा का वितरण नहीं होने पर समाचार संकलन करने गये पत्रकारों पर सदर अस्पताल के उपाधिक्षक भड़क गये। उन्होंने पहले तो फोटोग्राफरो को तस्वीर लेने से रोका तथा बाद में जेल भेजवाने की धमकी भी डे डाली। वे पत्रकारों से उलझ भी गये। डीजल घोटाला से लेकर दवा खरीद मामले में गडबडी के लिए कुख्यात सासाराम के सदर अस्पताल के अधिकारियों की करतूत तो देखिये। चोरी भी कर रहे हैंऔर सीना जोरी भी।

गड़बड़ी के बावजूद अस्पताल के उपाधिक्षक ने धमकी दे डाली। 5 माह से जननी बाल सुरक्षा योजना के पैसे के लिए दौड़ रही माताओं के खबर को कवरेज करने गये संवाददाताओं को जमकर हड़काया। कहा कि वे पत्रकारों को जेल भिजवाने की कूबत रखते हैं। अब इनके इस ठाठ के पीछे किसका हाँथ हैं ये तो चौबे जी ही जाने। लेकिन इस सुशासन में जिस प्रकार से वास्तविकता दिखाने वाले खबरचियों पर सरकार के लोग अपना दवाब बनाते देखे जा रहे हैं, ये आने वाले कल के लिए घातक हैं। सदर अस्पताल सासाराम में सिविल सर्जन के कार्यालय में पिछले ही माह एक बाबू को निगरानी विभाग ने अपने ही विभागीय कर्मी से घूस लेते धर दबोचा था।

सुशासन की सरकार में नीतीश कुमार के पदाधिकारी निरंकुश हो गये हैं। कहते हैं कि जैसा राजा का चरित्र होता हैं उसके मुलाजिम भी उसी के नक्शे कदम पर चलते हैं। ये सिलसिला सदर अस्पताल सासाराम की ही बानगी नही हैं बल्कि पूरे सूबे की ही ये स्थिति है। पत्रकार किस परिस्थिति में बिहार में काम कर रहे हैं, ये उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। आज समाज उनके तरफ आशा लिये देख रहीं हैं कि वही कुछ कर सकते हैं। लेकिन जिस तरह से सरकार में पदाधिकारी अपनी गलती छुपाने के लिए पत्रकारों को समाचार संकलन से रोकते हैं और जेल भेजवाने की धमकी देते हैं, वो सभ्य समाज के लिए शर्मसार करने वाली बात है।

सवाल यह है कि आखिर इन पदाधिकारियों को कौन इतनी हिम्मत देता है कि गलत करें और उसे उजागर होने पर धमकी भी दें। लालू यादव की सरकार उनके साले की कारनामों से गयी, ठीक उसी तरह इस सुशासन सरकार की दुर्गति इन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामे से होने वाली है। समय रहते नीतीश जी को चेत जाना चाहिए और ऐसे बेलगाम अधिकारियों पर अंकुश लगाना चाहिए। आज समस्त सरकारी व्यवस्था चौपट हो गयी है। एक मात्र आसरा मीडिया बचा है। सरकारी नुमाइंदे इसे भी कुंद कर देने के फिराक में हैं। आज जहाँ हर कोई सक्षम वर्ग लूट लोने के फिराक में हैं, ऐसे में मीडिया ही अपनी जबाबदेही निभा रही है।

नेपाल को आज मिल सकता है नया प्रधानमंत्री : महतो

अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो आज बुधवार को मित्र राष्ट्र नेपाल में नए प्रधानमंत्री के रूप में प्रधानन्यायाधीश खिलराज रेग्मी को शपथ दिलाये जाने की प्रबल संभावना है। नेपाल के स्वास्थ्य तथा जनसंख्या मन्त्री राजेन्द्र महतो ने इस बात की जानकारी देते हुए कहा कि सभी दलों के बीच सहमति बन चुकी है, अगर कोई नया विवाद नहीं आया तो बुधवार की सुबह नेपाल के नए प्रधानमंत्री के रूप में श्री रेग्मी शपथ दिलाये जाने की प्रबल संभावना है।

मंगलवार को दोपहर बाद एक पत्रकार सम्मलेन में सदभावना पार्टी के अध्यक्ष व नेपाल के स्वास्थ्य तथा जनसंख्या मन्त्री राजेन्द्र महतो ने कहा कि बातचीत का दौर करीब करीब समाप्ति की ओर है।  बुधवार की सुबह नेपाल के नए प्रधानमंत्री के रूप में श्री रेग्मी शपथ लेंगे अगर कोई और विवाद सामने नहीं आया तो। उन्होंने आगे कहा कि निर्वाचन एक उत्सव के रूप में होता है जिसे सभी को स्वीकार करना चाहिए इससे डरने की बात ही नहीं है।

श्री महतो ने बताया कि उनकी पार्टी कि स्थापना करीब 22 वर्ष पूर्व हुई थी। आज हमारी स्थिति काफी मजबूत है। कार्यक्रम में मन्त्री महतो ने उपेन्द्र यादव नेतृत्व वाली मधेसी जन अधिकार फोरम नेपाल के भातृसंगठन मधेसी यूवा फोरम नेपाल के अध्यक्ष योगेन्द्र राय यादव, निवर्तमान महासचिव फिरोज मन्सुरी, केन्द्रीय सदस्य धिरेन्द्र प्रसाद यादव, जयप्रकास महतो, पंकज महतो, उपेन्द्र राय, लखिन्द्र यादव, दिनेश यादव, श्याम किशोर यादव, जितेन्द्र कुमार साह, कार्तिकेश झा सहित करिब ३ सौ विभिन्न पार्टी के नेता व कार्यकर्ताओ को सदभावना पार्टी में आने का स्वागत किया।

महाराजगंज से अरुण कुमार वर्मा की रिपोर्ट.

जी24 घंटे को शिरीष एवं मनीष ने अलविदा कहा

जी24 घंटे छत्‍तीसगढ़ से इस्‍तीफा देने वालों की संख्‍या लगातार बढ़ती जा रही है. इस बार दो लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. इस्‍तीफा देने वालों में इनपुट से शिरीष मिश्रा तथा आउटपुट से मनीष शांडिल्‍य का नाम शामिल है. शिरीष की गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है. हालांकि वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

मनीष अपनी नई पारी एक नेशनल न्‍यूज चैनल के साथ शुरू करने वाले हैं. हालांकि उन्‍होंने अभी नाम का खुलासा नहीं किया है. मनीष पिछले पांच सालों से जी24 घंटे के साथ जुड़े हुए थे. मनीष को फास्‍ट न्‍यूज का एक्‍सपर्ट माना जाता है. इसके पहले भी वे कुछ संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

यशवंत सिन्हा की बगावत और बीजेपी की फिर आफत

बीजेपी में नाराजगी का दौर खत्म नहीं हो रहा है। राजस्थान में घनश्याम तिवाड़ी नाराज हैं, तो दिल्ली में यशवंत सिन्हा एक बार फिर से नाराज हो गए हैं। घनश्याम तिवाड़ी की बात कभी और करेंगे। फिलहाल बात सिर्फ यशवंत सिन्हा की। पिछली बार वे नितिन गडकरी को दोबारा बीजेपी अध्यक्ष बनाने के फैसले के खिलाफ बगावत पर उतरे थे। अब झारखंड के नए बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर नाराज हैं। सिन्हा ने धमकी दी है कि कार्यकारिणी की सदस्यता ही नहीं, लोकसभा की सदस्यता भी छोड़ देंगे।

वैसे देखा जाए तो, राजनीति में एक बात को कई कई नजरियों से देखा जाता है। राजनीति में यह ज्यादा सटीक लगती है। लेकिन सिन्हा की राजनीति में बिल्कुल फिट बैठनेवाली कहावत है – कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना। यशवंत सिन्हा की धमकी भी कुछ कुछ इसी तर्ज पर है। सीधे सीधे भले ही यह लग रहा हो कि वे राज्य की राजनीति से जुड़े फैसले से नाराज हैं। असल बात यह है कि मामला राष्ट्रीय स्तर पर चल रही गुटबाजी से जुड़ा हुआ हैं। पार्टी में कई नेता इसे समझ भी रहे हैं। सिन्हा ने सोमवार को सुबह हुई पार्टी के सीनियर नेताओं की बैठक में अपना गुस्सा जाहिर किया था। दिल खोलकर बात की। वे पुराने नेता है। नेता होने से पहले 1960 से लेकर लगातार 24 साल तक आईएएस ऑफिसर थे। समझदार आदमी हैं। हालात की कमजोरी और ताकत दोनों जानते हैं। कहां, कितना, किसके सामने क्या कहना है, और क्या करते हुए कैसे कहना है, यह भी समझते हैं। सो जहां जिस तरह से बोलना था, बोल दिया।

मगर मीडिया के सामने सिन्हा ने कुछ नहीं कहा। जहां बैठक थी, वहां सिन्हा ने पार्टी नेताओं को धमकी दी कि वे कार्यकारिणी छोड़ सकते हैं और लोकसभा की सदस्यता भी। फिर निकलने से पहले लालकृष्ण आडवाणी के पांव भी छुए। सिन्हा को आडवाणी का करीबी माना जाता है। नितिन गडकरी को बीजेपी में जब अध्यक्ष के रूप में दूसरा टर्म देने का फैसला किया जा रहा था, तब भी सिन्हा ने ही बगावत का ऐलान कर दिया था। कहा था कि अगर गड़करी को फिर बनाया तो वे भी अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ेंगे। यह ऐलान करके सिन्हा ने पार्टी को मुसीबत में डालने के साफ संकेत दे दिए थे। उस वक्त भी पार्टी में यही माना जा रहा था कि वह सिन्हा आडवाणी की लाइन पर ही चल रहे हैं। इस बार भी सिन्हा ने जब गड़करी के पांव छूकर निकलने के लिए कदम बढ़ाए, तो सभी जान रहे थे कि राजनीति में इस तरह से नाराजगी जाहिर करने के बाद किसी के प्रति सम्मान व्यक्त करने के मायने भी क्या हुआ करते हैं।

वैसे, झारखंड के प्रदेशाध्यक्ष पद पर नियुक्त रविंद्र राय को अर्जुन मुंडा का नजदीकी माना जाता है। सिन्हा ने इसी को बहाना बनाकर कहा कि प्रदेश अध्यक्ष का फैसला करते वक्त उनकी नहीं सुनी गई। शाहनवाज हुसैन ने भले ही यह कहा कि उन्हें यशवंत सिन्हा की नाराजगी की कोई सूचना नहीं है। लेकिन कौन मानेगा। जब सबको पता चल गया, तो भी शाहनवाज को पता नहीं। इसका मतलब, वे कोई ढक्कन आदमी तो है नहीं कि उन्हें पार्टी के अंदर के मामलों की खबर नहीं हो। हालांकि यह साफ है कि सिन्हा की नाराजगी केंद्रीय नेतृत्व पर निशाना हैं। ऐसे में पार्टी के कई सारे नेता सिन्हा की इस नाराजगी को आडवाणी के हाल के उस बयान से भी जोड़कर देख रहे हैं, तो गलत क्या है जिसमें आडवाणी ने कहा था कि बीजेपी से भी देश का मोह भंग हो चुका है। जानने वाले जान रहे हैं कि बीजेपी में जंग सिर्फ अध्यक्ष पद या फिर पीएम पद की ही नहीं, हर लेवल पर वर्चस्व की है। पर, वर्चस्व की जंग जब स्व से निकलकर स्वाहा की दिशा में बढ़ रही हो तो मामला बहुत खतरनाक हो जाता है। बीजेपी को यह क्यूं समझ में नहीं आता। 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

एबीपी न्‍यूज से रेणु, शीतल, कुणाल एवं राजेंद्र ने इस्‍तीफा दिया

एबीपी न्‍यूज छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है. दीपक चौरसिया के एबीपी न्‍यूज छोड़ने के बाद लगातार कई लोगों को इस्‍तीफे हुए हैं. खबर है कि एबीपी न्‍यूज से रेणु पांडेय ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज के साथ शुरू की है. उनके अलावा शीतल मणि त्रिपाठी ने भी एबीपी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर इंडिया टीवी पहुंचे हैं. वे लंबे समय से एबीपी न्‍यूज को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

कुणाल ने भी एबीपी न्‍यूज से इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने मीडिया को भी बाय कर दिया है. कुणाल ने अपना एनजीओ शुरू किया है. फिलहाल वे इसी की जिम्‍मेदारी संभाल रहे हैं. राजेंद्र भी एबीपी न्‍यूज छोड़कर इंडिया टीवी चले गए हैं. इन सभी लोगों ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है.

प्रतापगढ़ में सीबीआई टीम के वाहन पर हमला, हड़कंप

कुंडा में डीएसपी, ग्राम प्रधान और उसके भाई की हत्या के मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम के वाहन पर मंगलवार रात तकरीबन नौ बजे हमला हो गया। खबर है कि इस हमले में कोई घायल नहीं हुआ है। हमला कुंडा और मानिकपुर के बीच तब हुआ जब वाहन सीबीआई अफसरों को लखनऊ छोड़कर वापस आ रहा था। वाहन में यूपी पुलिस का एक गनर और ड्राइवर ही सवार थे। हमले में वाहन का शीशा चकनाचूर हो गया।

सीओ की हत्या के मामले में पूर्व मंत्री राजा भैया के खिलाफ सीबीआई का घेरा तंग होता जा रहा है। तफ्तीश बेंती की कोठी के इर्द गिर्द घूम रही है। मंगलवार को सीबीआई ने पहली बार बड़े पैमाने पर कार्रवाई की। राजा भैया के तीन सिपहसालारों को बेंती में छापा मारकर पकड़ा गया। इसमें राजा भैया का बेहद खास नन्हे सिंह भी शामिल है। इस कार्रवाई के बाद सीबीआई के बेड़े में शामिल एक बोलेरो एक सीबीआई अफसरों को लेकर लखनऊ चली गई तथा जब वह छोड़कर रात तकरीबन नौ बजे वापस कुंडा लौट रही थी तो कुंडा और मानिकपुर के बीच में वाहन पर पथराव किया गया। उस वक्त बोलेरो में सिर्फ यूपी पुलिस का एक गनर और बोलेरो चालक ही थे। अचानक हमले से वे घबरा गए लेकिन हिम्‍मत दिखाते हुए बोलेरो की रफ्तार बढ़ा दी और बच निकले।

सीबीआई टीम पर हमले की सूचना से पुलिस अफसरों में हड़कंप मच गया। कुंडा कोतवाल बुद्धिराम का कहना है कि बोलेरो के शीशे टूट गए है लेकिन चालक और गनर सुरक्षित हैं। अब तक पुलिसकर्मियों से ही पूछताछ करने वाली सीबीआई ने मंगलवार को राजा भैया के खिलाफ हाथ खोल दिए। सुबह कैंप कार्यालय पहुंचे डीआईजी अनुराग गर्ग के नेतृत्व में एक टीम बेंती की ओर चली। पूरनेमऊ चौराहे पर टीम ने एक दुकान पर बैठे बेंती के नन्हे सिंह, बरगद का पुरवा निवासी राममूरत उर्फ गुंडेबाज और बेंती के ही संतोष उर्फ डेबा को उठा लिया। तीनों को बेंती में राजा भैया की कोठी की ओर ले जाया गया। कोठी के आसपास टीम काफी देर तक रुकी रही। दो अधिकारी गाड़ी से उतरे भी लेकिन वे कोठी की ओर नहीं गए। तीनों को लेकर सीबीआई की टीम कैंप कार्यालय पहुंची। देर शाम तीनों को छोड़ देने की चर्चा है। हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है।

बताया जा रहा है कि तीनों ने सीबीआई को बलीपुर कांड को लेकर अहम सुराग दिए हैं। इसमें सीओ की हत्या भी शामिल है। खासकर मौके पर राजा भैया के कुछ बेहद खास लोगों की मौजूदगी के बारे में भी बताया जाने की खबर आ रही है। चर्चा हो रही है कि सीबीआई तीनों का नाम बलीपुर कांड से जोड़ सकती है। इसके अलावा हथिगवां थाने के एक चर्चित सिपाही को भी हिरासत में लेने की खबरआ रही  है। सादे कपड़ों में घूमने वाले इस सिपाही को सीबीआई ऑफिस के आसपास देखा गया। इस सिपाही के खिलाफ आरोपों का पुलिंदा सीबीआई को मिला है। सीओ हत्याकांड में इसकी भूमिका पर भी उंगली उठ रही है। राजा भैया के इतने समर्थकों को उठाने के पीछे सीबीआई की उनके खिलाफ घेरेबंदी को और कसने की तरह देखा जा रहा है। इसको लेकर राजा भैया के समर्थक खासे नाराज हैं। माना जा रहा है हमला सोची समझी साजिश तथा सीबीआई टीम को डराने का नतीजा है।

सैट से सहारा को नहीं मिली राहत, अगली सुनवाई 23 तक टली

सिक्योरिटीज अपैलेट ट्राइब्यूनल (एसएटी) ने सहारा को अंतरिम राहत देने से इनकार किया है। साथ ही, एसएटी ने सेबी और सहारा मामले की सुनवाई 23 मार्च तक टाल दी है। सहारा ने सुब्रत रॉय सहारा की निजी संपत्ति और बैंक खातों को जब्त करने के सेबी के फैसले को एसएटी में चुनौती दी है। सहारा द्वारा पैसे न चुकाए जाने पर सेबी ने सहारा ग्रुप के बड़े अधिकारियों के साथ ग्रुप कंपनियों के बैंक खाते सील किए है।

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेंट कॉरपोरेशन को निवेशकों से जुटाए गए 24000 करोड़ रुपये लौटाने को कहा है। (मकं)

नार्थ में भास्‍कर की व्‍यापक फेरबदल की सूची तय, असंतोष शुरू

दैनिक भास्कर में पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का दीपक धीमान को नया हेड और लुधियाना समेत जालंधर, अमृतसर में नए संपादक की नियुक्ति के बाद अब भास्कर में पूरे नार्थ में व्यापक फेरबदल की तैयारी कर ली गयी है. इसमें न्यूज़ एडिटर से लेकर सब एडिटर तक प्रभावित होंगे. तबादलों की सूची को अंतिम रूप दिया जा चुका है. बस इन्तजार हो रहा है लुधियाना के नए संपादक शमशेर सिंह चंदेल के भोपाल से आने का.

चंदेल ने भोपाल में ही ज्वाइनिंग की औपचारिकता पूरी की है. उनके १६ मार्च से लुधियाना में बैठने की संभावना है. इसके बाद तबादलों की सूची जारी कर दी जायेगी. सूची के अनुसार लुधियाना के सिटी भास्कर के एडिटर सौरभ द्विवेदी को बठिंडा का संपादक बनाया जा रहा है. वह वहां मालवा क्षेत्र के सभी पुल आउट को देखेंगे. वहीँ बठिंडा के संपादक महेंद्र कुशवाहा को चंडीगढ़ ऑफिस से अटैच किया जा रहा है. लुधियाना में ही जनरल डेस्क प्रभारी न्यूज़ एडिटर योगेश शर्मा अब बठिंडा जायेंगे. वहां से न्यूज़ एडिटर अजय पुरुषोत्तम अब हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला कार्यालय की ज़िम्मेदारी संभालेंगे.

बठिंडा में डीएनई अनिल भारद्वाज को झारखण्ड भेजा जा रहा है. उनकी जगह लुधियाना से मनीष सिंह को बठिंडा भेजा जाएगा. पंजाब को-ऑर्डिनेटर चन्दन स्वप्निल को लुधियाना से भोपाल भेजा जा रहा है. कई सब एडिटर और सीनियर सब एडिटर को भी अलग अलग यूनिट में भेजा जाएगा. इसके पीछे वज़ह नई टीम के साथ नए तेवर से काम करना बताया जा रहा है. वही फेरबदल की सुगबुगाहट से कुछ लोगों में असंतोष भी है. बठिंडा कार्यालय के कुछ वरिष्ठों ने तो तबादले की मेल जारी होते ही बगावत करने की तैयारी भी कर ली है.

इस साल 15 फीसदी बढ़ेगा मीडिया-मनोरंजन का बाजार

बीते वर्ष भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन (एमऐंडई) उद्योग का आकार 72,800 करोड़ रुपये से बढ़कर 82,100 करोड़ रुपये हो गया। मंगलवार को मुंबई में आयोजित हुए सालाना मीडिया और मनोरंजन कॉनक्लेव के 14वें संस्करण के मौके पर पेश की गई रिपोर्ट में यह बात सामने आई।

फिक्की-केपीएमजी द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया कि वर्ष 2012 में उद्योग की सालाना वृद्धि दर 12.6 फीसदी रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने हाल में जो नीतिगत कदम उठाए हैं, उनसे आर्थिक मोर्चे पर सुधार की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल उद्योग का आकार 11.8 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 91,700 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसके पीछे डिजिटलीकरण, क्षेत्रीय मीडिया का लगातार विस्तार, आगामी आम चुनाव, फिल्म बाजार में मजबूती और नए मीडिया का तेजी से हो रहा प्रसार जिम्मेदार है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2017 तक सालाना 15.2 फीसदी की सीएजीआर की वृद्घि के साथ इस क्षेत्र का का आकार बढ़कर 1,66,100 करोड़ रुपये हो जाएगा। केपीएमजी में मीडिया और एंटरटेनमेंट के प्रमुख जेहिल ठक्कर ने कहा, 'बीता साल बेहद चुनौतीपूर्ण था। खासतौर से विज्ञापनों के मामले में। हालांकि नए मीडिया जैसे कई क्षेत्रों में तेजी भी देखने को मिली। इसी साल टीवी वितरण कारोबार में एफडीआई और डिजिटलीकरण जैसे फैसले हुए। इन फैसलों से उद्योग को 15 फीसदी की अनुमानित वृद्घि हासिल करने में मदद मिलेगी।Ó

केपीएमजी ने कहा कि डिजिटल तकनीक, ब्रॉडबैंड और डिजिटल सिनेमा के प्रसार, स्मार्टफोन के बढ़ते चलन और नियामकीय ढांचा कई क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा दे रहा है। इससे विज्ञापनदाताओं, मीडिया और दूरसंचार कंपनियों सभी का फायदा है।

टेलीविजन

टेलीविजन के मामले में केपीएमजी का यही मानना है कि केबल के डिजिटलीकरण से मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (एमएसओ) और चैनलों का ग्राहक राजस्व बढ़ेगा। रिपोर्ट में कहा गया है, 'इससे कैरिज शुल्क का चलन घटने की उम्मीद है, जिससे नए चैनलों को शुरू करने की गुंजाइश बढ़ेगी। दर्शकों की संख्या मापने का पैमाना दुरुस्त होने से शायद चैनलों को मिलने वाले विज्ञापनों की तस्वीर बदल सकती है।'

केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2012 से 2017 के दौरान टेलीविजन बाजार में सालाना 18 फीसदी की बढ़ोतरी होगी और इसका आ