सारदा घोटाले पर बन रही है बांग्ला फिल्म ‘कागजोर नौका’

कोलकाता : सारदा चिटफंड घोटाले पर एक युवा बांग्ला निर्देशक फिल्म बना रहे हैं। निर्देशक पार्थसारथी जोरदार की इस फिल्म का नाम है 'कागजोर नौका'। फिल्म के कथानक में बताया गया है कि किस तरह आम आदमी वित्तीय असुरक्षा में घिरा रहता है और जालसाजी करने वाले लोग उसकी सरलता का फायदा उठा कर अपना लाभ कमाते हैं। साथ ही मुंबई में 26 नवंबर को हुए आतंकवदी हमले के दौरान जो असुरक्षा का माहौल व्याप्त था उसकी झलक भी फिल्म में दिखाई जाएगी।

वरिष्ठ कलाकार सौमित्र चटर्जी फिल्म में चिटफंड कंपनी के मालिक बने हैं जो भोलेभाले ग्रामीणों को धोखाधड़ी का शिकार बनाता है और उनकी खून पसीने की कमाई से अपना मुनाफा निकालते हैं। पार्थसारथी ने कहा, 'मेरी फिल्म में बताया गया है कि देश का पूरा सुरक्षा तंत्र किस तरह दांव पर लगा है चाहे वह सड़कों पर चलने, यात्रा करने के दौरान सुरक्षा हो या फिर वित्तीय सुरक्षा हो।' फिल्म में विक्टर बनर्जी भी हैं जो इस समस्या के हल की कोशिश करते नजर आते हैं। एजेंसी

पत्रकारिता की सबसे बड़ी भूल- ‘हिटलर की जाली डायरी’

अप्रैल, 1983 को जर्मन पत्रिका स्टर्न ने दुनिया के सबसे बड़े सनसनीखेज खुलासे का दावा किया था. पत्रिका का कहना था कि उसके पास एडोल्फ़ हिटलर की लिखी हुई डायरी है. वह डायरी जो हिटलर ने द्वितीय विश्वयुद्ध के तनावभरे दिनों के दौरान लिखी थी. लेकिन जिसे सबसे बड़ा खुलासा कहा जा रहा था वह पत्रकारिता की दुनिया का सबसे बड़ा धोखा साबित हुआ.

स्टर्न के संपादक पीटर कॉख को पूरी तरह भरोसा था कि यह हिटलर की ही लिखावट है. उन्होंने कहा, “हमने इसे कई विशेषज्ञों को दिखाया. इतिहासकारों को, हैंडराइटिंग विशेषज्ञों को और उन्हें पूरा यकीन था कि यह सही है, शक की कोई गुंजाइश नहीं.” लेकिन कुछ लोगों को संदेह था. फ़िलिप नाइटले ने संडे टाइम्स की खोजी पत्रकारों की टीम में 20 साल काम किया था. वह कहते हैं कि उनके संपादक फ्रैंक चाइल्स ने बताया कि टाइम्स के मालिक रूपर्ट मर्डोक ने क्लिक करें हिटलर की डायरी को खरीद लिया है ताकि अख़बार में सिलसिलेवार छापा जा सके.

इस पर फ़िलिप ने डायरी की प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठाए. अप्रैल ख़त्म होते-होते यह दुनिया की सबसे बड़ी सनसनी बन चुकी थी. डायरी 62 छोटे हस्तलिखित खंडों में थी. इसे उस जहाज़ के अवशेषों से हासिल किया गया था जो युद्ध के अंत में हिटलर का निजी सामान लेकर जाते हुए ईस्ट जर्मनी के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. द टाइम्स के संपादक चार्ल्स डगलस ह्यूम्स को विश्वास दिलाने में हिटलर की अन्य निजी चीज़ों ने भी मुख्य भूमिका निभाई. वह कहते हैं, “वहां सिर्फ़ हिटलर की हैंडराइटिंग में 60 डायरियां ही नहीं थीं, उनके साथ उसकी हाथ से बनाई पेंटिंग्स, चित्र, पार्टी कार्ड भी थे.”

उधर फ़िलिप नाइटले अपने संपादक को यह समझाने में लगे हुए थे कि यह डायरी भी मुसोलिनी की डायरी की तरह नकली हो सकती है. डायरियों की असलियत जानने के लिए उन्हें 62 में से एक डायरी हासिल कर उसकी जांच करवानी थी. बार-बार आग्रहों के बाद भी स्टर्न ने एक भी डायरी देने से इनकार कर दिया.

टाइम्स अख़बार में यह डायरी सोमवार से छपने वाली थी. संडे टाइम्स के संपादक फ्रैंक चाइल्स ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उनके पास अगले रविवार तक इसके बारे में फिर से जांच करने का मौका होगा. लेकिन मर्डोक ने इरादा बदल दिया. उन्होंने दैनिक अख़बार में इसे सिलसिलेवार छापने के बजाय संडे टाइम्स में छापने का मन बनाया. संडे टाइम्स को इसे 24 अप्रैल को छापना था. जब संडे टाइम्स छपना शुरू हो गया तो संपादक फ्रैंक चाइल्स ने कुछ पुख़्ता करने के लिए नाज़ी-इतिहासकार ह्यू-ट्रेरेरोपा को फ़ोन किया. और अचानक सब-कुछ बदल गया. ह्यू ट्रेरेरोपा अपनी राय पर पुनर्विचार कर रहे थे, और उन्होंने अपनी पहले की राय से उलट फ़ैसला कर लिया था. फ्रंट पेज पर “वर्ल्ड एक्सक्लूसिव हिटलर डायरी” वाले अख़बार की छपाई जारी थी.

संपादक ने रूपर्ट मर्डोक को फ़ोन किया क्योंकि उन्हीं के पास छपाई को रोकने और अख़बार में बदलाव करने का अधिकार था. फ़िलिप कहते हैं, “हम “वर्ल्ड एक्सक्लूसिव हिटलर डायरी” के बजाय “वर्ल्ड एक्सक्लूसिव हिटलर डायरी?” छाप सकते थे.” लेकिन मर्डोक ने इसके ख़िलाफ़ फ़ैसला किया और संडे टाइम्स वैसे ही छपा जैसे पहले तय किया गया था.

अगले दिन बवाल हो गया. डायरियों की तीसरी किस्त छापने के लिए स्टर्न ने हैम्बर्ग में एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी. इसमें पहले तो एक विद्वान ने डायरी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और फिर खुद ह्यू ट्रेरेरोपा ने कहा कि वह अपनी राय पर पुनर्विचार कर रहे हैं. ट्रेरेरोपा ने कहा, “एक इतिहासकार होने के नाते मुझे खेद है कि ऐतिहासिक वस्तु को प्रमाणित करने के लिए ज़रूरी तरीकों को एक पत्रकारीय सनसनी के लिए कुछ हद तक ताक पर रख दिया गया.”

तभी एक और विद्वान ने प्रेस कांफ्रेंस में एक नकली डायरी दिखाई और कहा कि यह भी उसी व्यक्ति से हासिल की गई है- जिससे हिटलर की डायरी मिली. इस सनसनीखेज ख़बर के लिए स्टर्न ने 90 लाख मार्क का भुगतान किया था और मर्डोक ने उसे दस लाख डॉलर में ख़रीदा था. वर्ष 1983 में यह बहुत बड़ी रकम थी. वह ख़बर अब बहुत तेजी से राख में बदल रही थी. उधर लंदन में फ़िलिप नाइटले को स्टर्न से हिटलर की कथित डायरियों में से एक मिल गई थी. इसे रासायनिक जांच के लिए भेजा गया और कुछ ही दिन में पता चल गया कि यह नकली थीं.

अगले हफ़्ते संडे टाइम्स ने पहले पन्ने पर माफ़ीनामा प्रकाशित किया.डायरियां स्टुटगार्ड के एक छोटे से आर्ट डीलर कोनराड कुजाओ ने बनाई थीं. उन्हें और डायरी ख़रीदने वाले स्टर्न की रिपोर्टर को साढ़े चार साल जेल में काटने पड़े.इस मामले के बाद संडे टाइम्स तो धीरे-धीरे वापस अपनी स्थिति में कायम हो गया लेकिन ह्यू ट्रेरेरोटा अपनी खोई साख हासिल नहीं कर पाए. (बीबीसी)

डीयू में पत्रकारिता कोर्स में प्रवेश परीक्षा की जरूरत नहीं

दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी पत्रकारिता कोर्स में दाखिले के लिए अब कोई प्रवेश परीक्षा नहीं होगी. दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के अंग्रेजी पत्रकारिता डिग्री कोर्स में दाखिले के लिए विद्यार्थियों को चार साल के नये स्नातक पाठ्यक्रम के तहत इस साल से प्रवेश परीक्षा नहीं देनी होगी, लेकिन हिंदी पत्रकारिता परीक्षा के लिए पिछले वर्षों की भांति प्रवेश परीक्षा जारी रहेगी. चार साल के नये पैटर्न के मुताबिक अंग्रेजी पत्रकारिता स्नातक (प्रतिष्ठा) पाठ्यक्रम का नाम पत्रकारिता एवं जनसंचार स्नातक पाठ्यक्रम कर दिया गया.

छात्र कल्याण डीन जे एम खुराना ने कहा कि इस बार पत्रकारिता (प्रतिष्ठा) पाठ्यक्रम का नाम पत्रकारिता एवं जनसंचार कर दिया गया है और उसके पाठ्यक्रम को भी नया रूप दे दिया गया है. पहले अंग्रेजी पत्रकारिता में स्नातक (प्रतिष्ठा) प्रदान करने वाले पांच कॉलेज साझा प्रवेश परीक्षा आयोजित करते थे जबकि बैचलर ऑफ मास मीडिया एंड मास कम्युनिकेशंस का अनोखा कोर्स पढ़ाने वाला इंद्रपस्थ महिला कॉलेज अलग से परीक्षा आयोजित करता था. खुराना ने कहा कि अब आईपी कॉलेज, जो अकेले बीएमएमएमसी कोर्स उपलब्ध कराता था, अब अन्य कॉलेजों की भांति पत्रकारिता एवं जनसंचार का वही डिग्री कोर्स उपलब्ध कराएगा. पत्रकारिता में दाखिला विभिन्न कॉलेजों के कट ऑफ लिस्ट पर आधारित होगा.
     
आईपी कॉलेज की प्राचार्या बबली मोइत्रा ने कहा कि बीएमएमएमसी और पत्रकारिता को मिला दिया गया है लेकिन दोनों को पिछले पाठ्यक्रमों का घटक बनाए रखा गया है और नये पाठ्यक्रम में दोनों एक दूसरे के पूरक है. हालांकि उसका सिलेबस अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. शीघ्र ही उसे विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर डाल दिया जाएगा. नया पाठ्यक्रम पेशेवर अंदाज का होगा और वह पत्रकारिता में उभरते क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करेगा. कुछ शिक्षकों ने प्रवेश परीक्षा खत्म करने पर चिंता जतायी है और कहा है कि छात्रों की गुणवत्ता प्रभावित होगी क्योंकि परीक्षा से पाठ्यक्रम के लिए छात्रों के चयन में मदद मिलती है. प्रोफेसरों ने कहा कि उन्हें प्रवेश परीक्षा खत्म करने के पीछे का तर्क गले के नीचे नहीं उतरा. उधर, इस फैसले से संतुष्ट शिक्षकों ने कहा है कि प्रवेश परीक्षा का मतलब है कि काफी सीटें खासकर आरक्षित श्रेणी की सीटें खाली रह जाना.

अखबार के आफिस में घुसकर तीन मीडियाकर्मियों की चाकुओं से हत्या

अगरतला। त्रिपुरा की राजधानी में रविवार को भरी दोपहर में दो हमलावरों ने स्थानीय बंगाली समाचार पत्र 'दैनिक गणदूत' के कार्यालय में घुसकर तीन लोगों की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी। मरने वालों में मैनेजर के अलावा एक प्रूफ रीडर और चालक शामिल है। पुलिस के अनुसार, मोटरसाइकिल सवार अज्ञात हमलावर दोपहर करीब तीन बजे पैलेस कंपाउंड स्थित 'दैनिक गणदूत' के कार्यालय में घुस गए और भूतल पर मौजूद प्रूफ रीडर और चालक के शरीर पर कई बार चाकू से वार किए। इसके बाद वे प्रथम तल पर पहुंचे जहां उन्होंने प्रबंधक को भी चाकुओं से गोद डाला। तीनों को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

पुलिस ने बताया कि मृतकों की पहचान प्रूफ रीडर सुजीत भंट्टाचार्य (32), चालक बलराम घोष (40) और प्रबंधक रंजीत चौधरी (60) के रूप में हुई है। अखबार परिसर में रहने वाले चालक की छह वर्षीय बेटी पापिया के अनुसार उसने पिता और भंट्टाचार्य को चाकुओं से गोदने वाले दोनों हमलावरों को देखा है। पुलिस का कहना है कि हमलावरों की अभी पहचान की जा रही है और उन्हें पकड़ने की तलाश जारी है। अखबार के संपादक और मालिक सुशील चौधरी ने कहा कि संभवत: गलत पहचान के कारण तीनों की हत्या हुई है। (जागरण)

इलाज कराने आई पांचवी की छात्रा से डाक्टर ने की छेड़छाड़, जेल गया

भोपाल। ''डॉक्टर गंदा है मौसी, मैं उसके पास दोबारा नहीं जाऊंगी…'' यह कहना था उस बच्ची का जो इलाज कराने के डाक्टर के पास गई थी और छेड़छाड़ की शिकार होकर लौटी थी। राजधानी भोपाल में चेकअप के दौरान 40 वर्षीय एक डॉक्टर ने पांचवी की छात्रा से अश्लील हरकत की। इसका खुलासा मासूम ने दूसरे दिन मौसी के सामने किया। पुलिस ने आरोपी डॉक्टर को गिरफ्तार कर न्यायालय के आदेश पर उसे जेल भेज दिया है।

एएसपी जोन-2 प्रशिक्षु आईपीएस आशुतोष प्रताप सिंह के मुताबिक पिपलानी इलाके में पांचवीं की छात्रा गर्मियों की छुट्टी में अपनी मौसी के यहां आई हुई है। 11 वर्षीय मासूम ने यूरिन जाते समय जलन होने की शिकायत अपनी मौसी से की थी। बुधवार रात करीब आठ बजे बच्ची को लेकर मौसी इंद्रपुरी में डॉक्टर मनोज शर्मा (40) के विकास क्लीनिक पहुंची। मनोज ने बेसिक मेडिकल प्रेक्टिशनर (बीएमपी) का डिप्लोमा किया है।

चेकअप के बाद मौसी उसे लेकर घर आ गई। सुबह उन्होंने उससे पूछा कि डॉक्टर ने उसे जांच के लिए दोबारा कब बुलाया है, तो बच्ची घबरा गई। उसने दबे स्वर में बोला कि वह उस डॉक्टर के पास नहीं जाएगी। डॉक्टर गंदा है। उसने चेकअप के दौरान छेड़छाड़ की थी। बच्ची की शिकायत सुनते ही मौसी उसे लेकर पिपलानी पुलिस थाने पहुंच गई। पुलिस ने महिला की शिकायत पर डॉक्टर मनोज के खिलाफ बच्चों के लिए बनाया गए नए अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर उसे तत्काल गिरफ्तार कर लिया। कुछ घंटों की पूछताछ के बाद ही पुलिस ने गुरुवार को ही कोर्ट में पेश कर दिया, जहां से आरोपी को न्याययिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।

मनोज ने पुलिस को बताया कि वह बेसिक मेडिकल प्रैक्टिशनर (बीएमपी) का कोर्स करके डॉक्टर बना है। जेपी अस्पताल के आरएमओ डॉ. अंजनी चौहान के मुताबिक मेडिकल के क्षेत्र में ऎसा कोई कोर्स, डिप्लोमा या डिग्री नहीं होती। पुलिस अब उसके मेडिकल के दास्तों की भी जांच करेगी।

आमिर खान की रिपोर्ट

b4m 5thbday : …उस भड़ास4मीडिया से सम्मान पाना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है : प्रयाग पांडेय

: मुझे बुलंदियों की हवस नहीं है, भड़ास4मीडिया ने जो दिया है मेरे लिए वही बहुत है : लोकप्रिय हिंदी न्यूज पोर्टल  "भड़ास फॉर मीडिया" का पांचवें जन्मवार के सुअवसर पर शुक्रवार १७ मई २०१३ को राजेन्द्र भवन नई दिल्ली में स्व. प्रभाष जोशी एवं स्व. आलोक तोमर जी की स्मृति को समर्पित "व्याख्यान, संगीत और सम्मान समारोह"  मेरे तकरीबन तीस साल के पत्रकारीय विद्यार्थी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और यादगार रहा।

वह इसलिए कि समाजोन्मुख जनपक्षीय पत्रकारिता के लिए सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से कतई प्रतिबद्ध देश की मुख्यधारा के चोटी के संपादक / पत्रकार सर्वश्री अनिरुद्ध बहल, शम्भुनाथ शुक्ल, राम बहादुर राय, निशीथ राय, आनंद प्रधान समेत दर्जनों वरिष्ठ संपादक और पत्रकारों व देश एवं समाज की बेहतरी तथा अभिव्यक्ति की आजादी के लिए अपने-अपने तौर-तरीकों से लड़-भिड़ रहे विचारवान लोगों और  पत्रकारीय कर्म और धर्म के प्रति सर्वस्व दांव पर लगा देने के जज्बे से लैस स्पष्ट दृष्टि वाले सैकड़ों युवा पत्रकारों, रचनाकर्मियों व मीडिया जगत की कई हस्तियों की मौजूदगी में सर्वश्री असीम त्रिवेदी, दयानंद पांडे, मयंक सक्सेना, आलोक कुमार, संजय शर्मा, मुकेश भारतीय और सुजीत सिंह "प्रिंस" जैसे पत्रकार और रचनाधर्मियों के साथ मुझ जैसे आजन्म "अंशकालिक" पत्रकार को भी "भड़ास विशिष्ट सम्मान 2013" पाने का सुअवसर मिला। पत्रकारिता के विद्यार्थी के रूप में यह मेरा पहला पुरस्कार / सम्मान था। हालाँकि मैंने किसी सम्मान / पुरस्कार पाने की कभी   कल्पना भी नहीं की थी। संभव है कि यह सम्मान / पुरस्कार पहला और आखिरी हो।

सवाल पुरस्कार / सम्मान का नहीं है। सवाल मंच का है और उस मंच में मौजूद लोगों का। भड़ास4मीडिया जैसे लड़ाकू तेवरों वाले न्यूज पोर्टल के मंच से समाजोन्मुख जनपक्षीय पत्रकारिता के लिए सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध देश की मुख्यधारा के चोटी के संपादक / पत्रकारों के मध्य सम्मान पाना मेरे जैसे श्रमजीवी पत्रकार के लिए बेहद गर्व की बात है। इस सम्मान का मूल्य इसलिए भी बहुत ज्यादा है कि आज जबकि अल सुबह से देर शाम तक पुलिस चौकी / थाने से लेकर आला सरकारी अफसरानों, विभिन्न सियासी पार्टियों के छोटे-बड़े नेताओं और विभिन्न स्रोतों से प्राप्त प्रेस विज्ञप्तियों के आधार पर अख़बारों के सफ़ेद कागजों को काले करने में जी-जान से जुटे और खुद को मुख्यधारा का पत्रकार मानने और समझने वाले साथी भी सक्रिय पत्रकार मानने को राजी न हों। पत्रकारिता का मतलब अफसरों, नेताओं और समाज के दबाव ग्रुपों के झूठे-सच्चे बयान और प्रेस विज्ञप्तियां छापना हो गया हो। ऐसे परिवेश में मेरे लिए "भड़ास विशिष्ट  सम्मान 2013" के मायने हैं। निहितार्थ हैं कि पत्रकारिता का मतलब झूठे-सच्चे बयान और प्रेस विज्ञप्तियां छापना तक ही सीमित नहीं है। गहन अध्ययन और शोध के बद हफ्ते-पन्द्रह दिनों में ही सही, समाज के असल सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर फीचर / रिपोर्ताज और आलेख लिखने वाले भी पत्रकारों की श्रेणी में आते हैं।

अब वह जमाना गया जब जन संचार माध्यम समाज और देश हित में जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। जन संचार माध्यम एक बेहतर समाज का राष्ट्रीय एजेंडा तैयार करने के लिए लोक शिक्षक का अहम रोल अदा करते थे। अपनी असंदिग्ध जन पक्षधरता के चलते जन संचार माध्यमों ने दुनिया के कितने दमनकारी और जन विरोधी तानाशाहों के तख्त पलटे और अनगिनत जन विरोधी सरकारों को बदला। भारत के जन संचार माध्यमों और पत्रकारों ने न केवल दमनकारी ब्रितानी हुकूमत से जमकर लोहा लिया बल्कि भारत की स्वतन्त्रता की खातिर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया। जन संचार माध्यमों और पत्रकारों द्वारा न्याय संगत राज व्यवस्था और बेहतर समाज के निर्माण में अतीत में दिए गए अति महत्वपूर्ण योगदान और समाज हित में किए गए त्याग के उदाहरणों से विश्व और भारत का इतिहास भरा हुआ है। लेकिन नई सूचना तकनीक के वजूद में आने के बाद जब जन संचार माध्यम " मीडिया " हो गए।  पत्रकारिता "मिशन" से ग्लेमर बन गई, तब से जन संचार माध्यमों के सरोकार बदल गए। नतीजन "साख" में भी बट्टा लग गया।

असल में पत्रकारिता की साख और सरोकारों में आ रही इस गिरावट के लिए वही लोग सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं जो आज समाचार संस्थानों में उच्च पदों पर बैठे हैं। ये लोग पत्रकारिता को लेकर बात भले ही जितनी ऊँची हांक लें पर वे खुद मालिकों की चाकरी कर रहे हैं। उनकी तिजोरी भर रहे हैं। बदले में मोटी तनख्वाह पा रहे हैं। देश में पूंजीवाद, बाजारवाद और उपभोक्तावाद को बढ़ाने में अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं। इस घुप अँधेरे में उजाले की मंद किरण अभी बची है। अनेक खामियों / गिरावटों के वावजूद विश्व के तमाम लोकतान्त्रिक मुल्कों में आज भी आधुनिक "मीडिया" ही मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा रहा है। खासकर भारत में। भड़ास फॉर मीडिया इसका जीता-जागता सबूत है। उस भड़ास4मीडिया से सम्मान पाना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।  

भड़ास विशिष्ट सम्मान ने अंशकालिक पत्रकार और मुख्यधारा के पत्रकार की गहरी खाई को कम किया है। मुझे जीवन के बचे-खुचे वक्त में और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित किया है। या यूँ कहूँ कि एक अंशकालिक पत्रकारिता का भावी एजेंडा / लक्ष्य तय कर दिया है। मुझे समाजोन्मुख जनपक्षीय पत्रकारिता के असल मायने समझा दिए हैं।  लिहाजा अब मुझे बुलंदियों की हवस नहीं है,  भड़ास फॉर मीडिया ने जो दिया है, मेरे लिए वही बहुत है। धन्यवाद श्री यशवंत भाई। धन्यवाद भड़ास फॉर मीडिया।  भड़ास फॉर मीडिया के पांचवें जन्मवार की शोभा बढ़ाने वाले मीडिया जगत की सभी हस्तियों का धन्यवाद।

लेखक प्रयाग पांडेय उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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न्याय से वंचित होने पर क्या करें?

भारत में उच्च स्तरीय न्यायाधीशों के लिए स्वयं न्यायपालिका ही नियुक्ति का कार्य देखती है और उस पर किसी बाहरी नियंत्रण का नितांत अभाव है|फलत: जनता को अक्सर शिकायत रहती है कि उसे न्याय नहीं मिला और उतरोतर अपीलों का लंबा सफर करने बावजूद आम नागरिक वास्तविक न्याय से वंचित ही रह जाता है| दूसरी ओर सरकारें कहती हैं कि न्यायपालिका स्वतंत्र है अतः वह उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती है| स्वतंत्र होने का अर्थ स्वच्छंद होना नहीं है और लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गयी सरकारें न्यायपालिका सहित अपने  प्रत्येक अंग के स्वस्थ संचालन के लिए जिम्मेदार हैं | आखिर न्यायाधीश भी लोक सेवक हैं और वे भी अपने कृत्यों के लिए जवाबदेय हैं|

किसी प्रकरण में बहुत सी अपीलें दायर करने के बाद भी पीड़ित पक्ष के दृष्टिकोण से न्याय नहीं मिलता है, उसे प्रक्रिया के गढ्ढों में इस प्रकार डाल दिया जाता है कि पीड़ित व्यक्ति न्याय की आशा ही छोड़ देता है| सम्पति सम्बन्धी विवादों में आपराधिक मुकदमे दर्ज होना इसी की परिणति है| फिर किसी प्रकरण विशेष में यदि न्याय मिल जाये तो यह अपवाद और सौभाग्य ही समझा जा सकता है| महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इतने कानूनी दृष्टान्तों, निर्णयों के बावजूद जनता को संतोषजनक निर्णय नहीं मिल रहे हैं और न्याय से वंचित करने वाले निर्णय दिए जाने की मनोवृति व प्रवृति  पर कोई अंकुश नहीं लगा है| यद्यपि पीड़ित पक्ष के लिए असंतोषप्रद निर्णय के विरुद्ध अपील ही एक मात्र रास्ता है किन्तु इससे अनुचित निर्णय देने वाले न्यायाधीशों के आचरण और कार्यशैली पर कोई प्रभाव नहीं पडता है|

भारत में न्यायालय अवमान अधिनियम के भय से आम व्यक्ति न्यायालय के निर्णयों पर किसी प्रकार की टिपण्णी करने से परहेज करता है| अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति, व उनके आचरण पर  नियंत्रण के लिए अलग से न्यायिक आयोग/कमेटियां कार्यरत हैं| न्यायालयों के निर्णयों की समीक्षा के लिए वहाँ मंच उपलब्ध है और न्यायिक निर्णयों की समीक्षा के लिए वहाँ एक नियमित पत्रिका निकाली जाती है जिसमें न्यायिक निर्णयों पर जनता के विचार प्रकाशित किये जाते हैं| इसी प्रकार के आयोग इंग्लॅण्ड में भी कार्यरत हैं| इंग्लॅण्ड में न्यायिक समीक्षा आयोग अलग से कार्यरत है जो किसी (विचाराधीन अथवा निर्णित)भी मामले की किसी भी चरण पर समीक्षा कर सकता है और जिस व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ हो उसे उचित क्षतिपूर्ति दे सकता है| यह भी उल्लेखनीय है उक्त समीक्षा की व्यवस्था के बावजूद इंग्लॅण्ड की न्यायिक प्रणाली भारतीय न्यायिक निकाय से किसी प्रकार कमजोर प्रतीत नहीं होती है| भारत में तो न्यायपालिका को सर्वोच्च माना जाता है और उसके निर्णयों की किसी अन्य निकाय द्वारा समीक्षा नहीं हो सकती| जनतंत्र में जनता और उसके विचार ही सर्वोपरि हैं व कम्बोडिया के संविधान के अनुसार तो नागरिक ही लोकतंत्र के स्वामी हैं, और न्यायाधीश तो इस लोकतंत्र के सेवक मात्र हैं|

भारत में भी न्यायालय अवमान अधिनियम की धारा 5 में यह प्रावधान है कि किसी निर्णित मामले के गुणावगुण पर उचित टिप्पणियां करना अवमान नहीं माना जायेगा| इसी प्रकार वर्ष 2006 में धारा 13 ख जोड़कर यह प्रावधान किया गया है कि यदि न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो कि सत्यता को बचाव अनुमत करना जन हित में है और ऐसे बचाव की प्रार्थना सद्भाविक है तो न्यायालय सत्यता को किसी अवमान कार्यवाही में बचाव के रूप में अनुमत कर सकता है| अतः न्यायालयों के निर्णयों की सद्भाविक और तथ्यों पर आधारित समालोचना भारत में भी अवमान के दायरे में नहीं आती है|

हमारे पवित्र संविधान के अनुच्छेद 51क (एच )में नागरिकों का यह मूल कर्तव्य बताया गया है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानव वाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे| इसी प्रकार अनुच्छेद 51 क (जे ) में कहा गया है कि नागरिक व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले| उक्त प्रावधान हमें प्रेरित करते हैं कि हम न्यायिक क्षेत्र सहित उतरोतर सुधार की ओर अग्रसर हों ताकि राष्ट्र प्रगति करता रहे| लोकतंत्र में जनता को यह भी अधिकार है कि न्यायपालिका में उपयुक्त सुधारों हेतु अपने विचार निर्भय होकर व्यक्त करे और न्यायपालिका से ऐसे विचारों पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा है| अब समय आ गया है कि न्यायपलिका की कमियों पर  आम नागरिक को स्वर उठाना होगा| उक्त सम्पूर्ण विवेचन के सन्दर्भ में नागरिकों को चाहिए कि जहां किसी भी न्यायिक या अर्ध न्यायिक अधिकारी  के निर्णय से यह आभास हो कि ऐसा निर्णय वास्तविक न्याय, न्याय के सुस्थापित सिद्धांतों अथवा रिकार्ड पर उपलब्ध सामग्री से विपरीत है और वह पूर्ण न्याय की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो ऐसे निर्णय के सन्दर्भ में निर्णायक न्यायाधीश को एक सार्वजनिक और खुले पत्र द्वारा नम्रतापूर्वक फीडबैक दे सकते हैं कि उनके निर्णय में पत्र के अनुसार कमियां हैं ताकि वे भविष्य में ध्यान रखें| अच्छा रहेगा यदि ऐसे पत्र की एक प्रति मुख्य न्यायाधीश महोदय को भी आवश्यकीय कार्यवाही हेतु भेज दी जाय| मीडिया को भी इस सन्दर्भ में अपनी स्वतंत्रता और निर्भीकता का परिचय देकर अपना धर्म निभाना चाहिए|

Mani Ram Sharma

maniramsharma@gmail.com

BRUTAL LATHICHARGE ON PROTESTING MARUTI SUZUKI WORKERS AND THEIR FAMILIES IN KAITHAL!

: APPEAL ISSUED BY BIGUL MAZDOOR DASTA : A few minutes ago, Haryana Police brutally lathi charged thousands of Maruti Suzuki workers and their families in Kaithal. Tear gas and water canons also were used against the protesters; there was a considerable number of women among them and reportedly a number of women have been seriously injured in this shameful act of oppression by the Haryana government.

These workers and their families had been protesting peacefully against the unlawful arrest of 96 workers from the dharna site in Kaithal last night. This dharna of workers had been going on in Kaithal for last 57 days. Today Haryana government came out in open support of the Maruti Suzuki Management and the forces of capital.

WE CALL UPON ALL WORKERS', STUDENTS' AND DEMOCRATIC RIGHTS ORGANIZATIONS TO JOIN IN LARGE NUMBERS IN A PROTEST DEMONSTRATION AGAINST THIS COLD-BLOODED ACT OF OPPRESSION AGAINST THE STRUGGLING MARUTI SUZUKI WORKERS. A MEMORANDUM AND A CHARTER OF DEMANDS WILL BE SUBMITTED TO THE PRIME MINISTER AFTER THE DEMONSTRATION.

PROTEST AGAINST THE BRUTAL LATHI-CHARGE ON MARUTI SUZUKI WORKERS AND THEIR FAMILIES.

11 AM, MAY 20, 2013.

JANTAR-MANTAR, NEW DELHI.

PR

ट्रेन के गार्ड अनिल कुमार को इनाम देने की बजाए डीआरएम ने सस्पेंड कर दिया

Tahira Hasan : आर्मी के जवान जिनको हम अनुशासन की मिसाल समझ्ते है उन्होंने कल वैशाली एक्सप्रेस के महिला आरक्षित डिब्बे में घुस कर महिलाओं और बच्चो को बाहर करके उसपर कब्जा कर लिया. बहुत मान मनव्वल के बाद भी अपनी जिद पर अड़े रहे.. लखनऊ पहुँच कर जब ट्रेन के गार्ड ने उनके अधिकारियों को सूचित किया तो इन जवानों ने अपने अधिकारी की बात भी मानने से इनकार कर दिया.

थक हार कर गार्ड ने गाड़ी आगे ले जाने से इनकार कर दिया और फौज के अधिकारियों ने हालत बेकाबू होते देख् इन अवैध कब्जा किए जवानों की वीदिओ ग्राफी करवानी शुरू की उसके बाद ही इन उत्पातियों ने डिब्बा खाली किया और महिलाओं को ट्रेन में जगह मिल सकी … हैरत की बात यह है की हिम्मत दिखा कर इन जवानों के खिलाफ आवाज़ उठाने और महिलाओं को उनका अधिकार दिलवाने वाले ट्रेन के गार्ड अनिल कुमार को इनाम देने की बजाए डीआरएम ने सस्पेंड कर दिया .. महिला उत्पीड़न तो जग जाहिर है लेकिन उनकी आवाज़ उठाने वाले पुरुष भी बच नहीं सकते …रेल कर्मचारी अपने साथी पर हुए अन्याय के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन करेंगे …aipwa इस संघर्ष में पूरी तरह उनके साथ है..

ताहिरा हसन के फेसबुक वॉल से.

श्रीशांत ने मनमोहन सरकार को उबारा, सीपी की नौकरी बचा ली और टीवी की टीआरपी भी

Shambhunath Shukla : तोता, पट्टू और पाकिस्तान की नई सरकार… सब कुछ भूल गए। अरे भाई श्रीशांत, तुम बधाई के पात्र हो जिसने मनमोहन सरकार को उबार लिया और दिल्ली के सीपी नीरज कुमार की नौकरी भी बचा ली तथा टीवी की टीआरपी भी।

    Acharya Sushil Gangwar kya kahe kaise kahe ye to duniya daari hai .. fixing bhi india ki badi beemari hai ..
 
    Pankaj Arya ha ha sach kaha Sir
 
    Jitendra Narayan Upadhyay bilkul sahi farmaya sir ………..
   
    Ramesh Dubey ha ha ha ha hhh
    
    Koushal Mishra sahi hai prabhu.
     
    Ashish Shandilya sir Delhi Police Commissioner ko to kisi bhi halat mein jana chahiye .unhone koi tir nahin maar liya hai match fixing ko samne lakar…
     
    Shiwani Singh kya bat……….kya bat:) I m also thinking about this sir, yahi hai our Loktantra jahan chizon ko one by one incident k bad bhula diya jata hai
     
    Ashish Shandilya jab Delhi mein rape hota hai to janab bhingi billi bankar dubke rahte hain aur abhi hain sina tankar.aise officers ko sharm aani chahiye…
     
    Shriniwas Rai Shankar धोनी की जय हो।
     
    Jitendra Dixit सही कहा सर। पट्टू, पिंजरा और पवन को भूल गए। नीरज कुमार छा गए स्क्रीन पर।
     
    Dinesh Singh समाचार चैनल भी सास बहू के सीरियल हो गये हैँ।
     
    Sukhdev Bhardwaj Babu g bhaut ache aaj kal to yahi sabb chal raha hai
     
    Avdhesh Vajpayee हम सब आई पी एल खिलाड़ी रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, कब कौन आउट होगा या कितने रन बना पायेगा यह केवल डी कंपनी का बाॅस ही बता पायेगा ।
     
    Arvind Singh The equilibrium of corruption broke down. Two minister were under fire.It was necesary for CBI TO TAKE Action. Otherwise match fixing is a known fact and all are involved in it and take benefit of it
     
    Sandeep Verma न्यूस में फिक्सिंग की चर्चा कोई क्यों नहीं करता , क्या पेड़ न्यूस कह देने से अपराध कम हो जाता है . न्यूस में धोखा-धडी भी तो करोडो पाठको के साथ धोखाधड़ी है .
     
    CK Anand Shuklaji-if you feel you can send me a friends request.
     
    Pawan Sood police commissioner is styling like james bond…..
     
    Brijendra Shukla upa gov.bahut khushkismat hai,jab jab kisi scam ki charcha hoti hai,koi na koi nayi breaking news aakar public ka attention divert kar deti hai,they must be thankful to delhi police & CBI.
 
    Sanjay Pathak Kya khoob kahaa
 
    Drdhirendrakumar Srivastava Jis tarah cricket khelkar va fixing karke khilaadi paisa kamaate hai hain aur ham MURKH use dekh kar farzi khush hote hain…vaise hi media ghatnaao ki khabaron ko aur sansanikhej banakar hamare dekhne laayak banaata hai aur ham un khabaron ko dekh kar emotional hote hain, gaali dene lagte hain..aur ye sab karke media bhi apne hisse ka paisa aakhirkaar kama hi leta hai..kisi bhi tarah se ho, CHHALE ham hi jate hain..
 
    Anubhav Kant Adarsh ha ha ha …bilkul sahi sir…
   
    Chander Mani Chauhan सब कलियुगी मायाजाल है
    
    Avtar Singh Pahwa सरकार और मीडिया देश के लोगों को धर्म, जाति, क्रिकेट, और फिल्मो में उलझाय रखना चाहते हैं. जिससे लोग गरीबी, भुखमरी,शासन सब भूल कर आईपीएल की गोली चूसते रहें|
     
    Bharat Shaah ये खबरों की रेल में रेलमंत्री पीछे ही छुट गयें
     
    Sunil Sharma Bahut khub
     
    Siddharth Dubey Manu Sahi Kaha Mama Ji! Shrishant ne to sach me sarkaar ko bacha liya.

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

हरियाणा के एक और विधायक मीडिया कारोबार में उतरे, लांच करेंगे चैनल

रोहतक। हरियाणा के नेताओं को लगता है मीडिया का ज्यादा ही चस्का लग गया है। तभी तो वे एक-एक कर मीडिया कारोबार में उतर रहे हैं। ऐसे नेताओं की कतार में अब एक और नेता का नाम जुड़ गया हैं। यह नेताजी पहले चरण में न्यूज चैनल शुरू करने जा रहे हैं। फिर अखबार और एफएम चैनल भी शुरू होगा। यह नेताजी मौजूदा समय में कांग्रेस के विधायक हैं और हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं। इनकी गिनती मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के करीबी विधायकों में होती है और एक समय ये नेता हुड्डा के आंदोलन के साथी रहे हैं।

यह पहला मौका नहीं है जब कोई विधायक मीडिया कारोबार में उतर रहा हो, इससे पहले हरियाणा के दो विधायकों के क्षेत्रीय न्यूज चैनल चल रहे हैं। अब एक और इस जमात में शामिल हो गया है। हरियाणा के जो नेता अब मीडिया कारोबार में उतर रहे हैं, वे हैं रघुबीर सिंह कादियान। वे झज्जर जिला के बेरी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक हैं और हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। इस चैनल का नाम होगा लैंडमार्क न्यूज चैनल। इस चैनल की कंपनी पहले से ही रियल एस्टेट के कारोबार में है। हालांकि इस कंपनी के चेयरमैन कादियान के दामाद संदीप छिल्लर हैं। यह कंपनी सोलर एनर्जी और डेयरी के बिजनेस में भी है। अब यह मीडिया में भी आने की तैयारी कर चुकी है।

शुरुआती चरण में लैंडमार्क चैनल की लांचिंग होगी और फिर अखबार और एफएम चैनल भी आएगा। इस चैनल का मुख्यालय गुड़गांव में है। चैनल के लिए फिलहाल शीर्ष स्तर पर नियुक्तियां शुरू हो चुकी हैं और चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला ने अपनी फेसबुक वाल पर अपनी नियुक्ति के बारे में बता दिया है। हालांकि उन्होंने लैंडमार्क चैनल के नाम पर खुलासा नहीं किया है लेकिन उनकी नियुक्ति तय हो चुकी है। वे लिखते हैं एक चैनल, एक अखबार, एक एफएम चैनल और बड़ी जिम्मेदारी। इसके अलावा कुछ और वरिष्ठ पत्रकारों की नियुक्ति भी लगभग फाइनल हो चुकी है। आने वाले दिनों कुछ और वरिष्ठ साथी जुड़ेंगे।

दरअसल अगले साल लोकसभा और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं। और हो सकता है नेताजी इस चैनल का फायदा चुनाव में उठाना चाहते हों। पहले से ही नेताओं के चल रहे हैं चैनल हरियाणा के दो नेताओं के पहले से ही चैनल चल रहे हैं। अंबाला से कांग्रेस विधायक विनोद शर्मा का चैनल इंडिया न्यूज है। इस चैनल ने कुछ समय पहले ही दीपक चौरासिया के नेतृत्व में जोर-शोर से चैनल की रीलांचिंग की है। हरियाणा के पूर्व गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा का क्षेत्रीय न्यूज चैनल हरियाणा न्यूज चैनल भी चल रहा है। कांडा ने इस चैनल को जेके जैन से खरीदा था। कांडा इस समय गीतिका शर्मा आत्महत्या मामले में तिहाड़ जेल में हैं।

लेखक दीपक खोखर पिछले 16 साल से मीडिया के क्षेत्र में हैं और फिलहाल रोहतक में डीडी न्यूज व आकाशवाणी के संवाददाता हैं।

एनबीटी से दीपक आहूजा तथा चैनल वन से इसरार अहमद का इस्‍तीफा

नवभारत टाइम्स के गुड़गांव कार्यालय में इस समय आयाराम-गयाराम जैसी स्थिति बनी हुई है। इसी कड़ी एनबीटी की जिस टीम ने गुड़गांव में अखबार को रूतबा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, धीरे धीरे अखबार से निकल चुकी है। करीब चार माह पूर्व स्पोर्टस व हेल्थ रिपोर्टर अनिल भारद्वाज ने समाचार पत्र को किन्हीं कारणों से छोड़ दिया था। इसके बाद अब समाचार पत्र के तेजतर्रार रिपोर्टर दीपक आहूजा ने भी समाचार पत्र को बाय कह दिया है।

बताया जा रहा है कि दीपक आहूजा न्यूज चैनल खबरें अभी तक में ज्वाइन करने जा रहे हैं। अब टीम की संख्या पूरी करने के लिए एनबीटी अधिकारी अन्य समाचार पत्रों के रिपोर्टरों पर डोरे डाल रहे हैं लेकिन कामयाबी नहीं मिल रही! बताया जा रहा है कि अधिकारी रिपोर्टरों को लाने के लिए अपने जानकारों से दबाव बनवा रहे हैं। सुनने में आ रहा है कि एनबीटी के नाम पर गुड़गांव से कोई भी रिपोर्टर ज्वॉइन करने को तैयार नहीं है।

खबर है कि उत्‍तर पूर्वी दिल्‍ली से चैनल वन के लिए रिपोर्टिंग करने वाले इसरार अहमद ने इस्‍तीफा दे दिया है। उन्‍होंने अपनी नई पारी दैनिक अमर भारती अखबार के साथ शुरू की है। वे चैनल वन के साथ पिछले चार सालों से जुड़े हुए थे। वे अमर भारती में क्राइम रिपोर्टर की भूमिका निभाएंगे।

कछाड़ के भाषा शहीदों को श्रद्धांजलि देने का अवकाश कहां?

बिन निज भाषा-ज्ञान के मिटत न हिय को सूल। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने न जाने कब लिखा था। अब भारतेन्दु को पाठ्यक्रम के अलावा कितने लोग पढ़ते होंगे? उनको पढ़कर मोक्षलाभ होने की कोई संभावना तो नहीं है! दरअसल देश को यह सच मालूम ही नहीं है कि आज के दिन असम के बराक उपत्यका में स्वतंत्र भातर में मातृभाषा के अधिकार के लिए एक नहीं, दो नहीं, बल्कि ग्यारह स्त्री पुरुष और बच्चों ने अपनी शहादत दी है। १९ मई को असम के बराक उपत्यका के सिलचर रेलवेस्टेशन पर असम के बंगाली अधिवासियों के मातृभाषा के अधिकार के लिए सत्याग्रह कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोलियां बरसायीं और ग्यारह सत्याग्रही शहीद हो गये।

इससे पहले १० मई को असम विधानसभा में असमिया भाषा को राजभाषा की मान्यता दी गयी। इसी संदर्भ में असम में रहने वाले बंगालियों को भी मातृभाषा के अधिकार दिये जाने की मांग पर सत्याग्रह चल रहा था। कछार में उसदिन मातृभाषा के लिए जो शहीद हो गये, उनमें सोलह साल की छात्रा कमला भट्टाचार्य, १९ वर्षीय छात्र शचींद्र पाल, काठमिस्त्री चंडीचरण और वीरेंद्र सूत्रधर, चाय की दुकान में कर्मचारी कुमुद दास, बेसरकारी नौकरी में लगे सत्येंद्र देव, व्यवसायी सुकोमल पुरकायस्थ, सुनील सरकार और तरणी देवनाथ, रेल कर्मचारी कनाईलाल नियोगी और रिश्तेदार के यहां घूमने आये हितेश विश्वास शामिल थे।

यह राष्ट्रीय गौरव जितना है, उतना ही राष्ट्रीय लज्जा का विषय है क्योंकि आज भी ​​इस स्वतंत्र भारतवर्ष में मातृभाषा का अधिकार बहुसंख्य जनता को नहीं मिला है। अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है। 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को ने इसे स्वीकृति दी। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले। यूनेस्को द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा से बांग्लादेश के भाषा आन्दोलन दिवस को अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिली, जो बांग्लादेश में सन 1952 से मनाया जाता रहा है। बांग्लादेश में इस दिन एक राष्ट्रीय अवकाश होता है। 2008 को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित करते हुए, संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्व को फिर महत्व दिया था।

अब हमें इसकी खबर भी नहीं होती कि मातृभाषा की ठोस जमीन पर बांग्लादेश में मुक्तियुद्ध की चेतना से प्रेरित शहबाग पीढ़ी किस तरह से वहां मुख्य विपक्षी दल खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बीएनपी, हिफाजते इस्लाम और पाकिस्तान समर्थक इस्लामी धर्मोन्मादी तत्वों के राष्ट्रव्यापी तांडव का मुकाबला करते हुए मातृभाषा का झंडा उठाये हुए लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई लड़ रहे हैं! किस तरह बांग्लादेश में अब भी रह गये एक करोड़ से ज्यादा अल्पसंख्यक हिंदुओं पर धर्मोन्माद का कहर बरपा है! सीमावर्ती असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय, बंगाल और बिहार की राज्य सरकारों और भारत सरकार को होश नहीं है। जबकि वहां हालात दिनोंदिन बिगड़ते जा रहे हैं। आये दिन जमायत और हिफाजत समर्थक ढाका समेत पूरे बांग्लादेश को तहस नहस कर रहे हैं।

कल ही नये तांडव के लिए इस्लामी कानून लागू करने​ के लिए बेगम खालिदा जिया ने हसीना सरकार को ४८ घंटे का अल्टीमेटम दिया है। इस पर तुर्रा यह कि बंगाल की ब्राहम्णवादी वर्चस्व के साये में कम से कम बारह संगठन जमायत और हिपाजत के पक्ष में गोलबंद हो गये हैं और वे खुलेाआम मांग कर रहे हैं कि भारत सरकार हसीना की आवामी सरकार से राजनयिक व्यापारिक संबंध तोड़ ले। कोई भी राजनीतिक दल बंगाल में मजबूत अल्पसंख्यक वोट बैंक खोने के डर से बांग्लादेश की लोकतांत्रिक ताकतों के पक्ष में एक शब्द नहीं बोल रहा है। अब हालत तो यह है कि ये संगठन अगर भारत में इस्लामी कायदा लागू करने की मांग भी करें तो भी वोट समीकरण साधने के लिए राजनीति हिंदू राष्ट्र के एजंडे के भीतर ही उसका समर्थन करने को राजनीतिक दल मजबूर हैं। यह इसलिए संभव है कि बांग्ला संस्कृति और भाषा का स्वयंभू दावेदार बंगाल ने अपनी ओर से एतरफा तौर पर बांग्ला व्याकरण और वर्तनी में सुधार तो किया है, लेकिन मातृभाषा के लिए एक बूंद खून नहीं बहाया है। बाकी भारत के लिए भी यही निर्मम ​​सत्य है, भाषा आधारित राज्य के लिए उग्र आंदोलन के इतिहास में मातृभाषा प्रेम के बजाय यहां राजनीतिक जोड़ तोड़ ही हावी रही है।

असम के बराक उपत्यका में मातृभाषा के अधिकार दिये जाने की मांग एक लोकतांत्रिक व संवैधानिक मांग थी, पर उग्रतम क्षेत्रीय अस्मिता ने इससे गोलियों की बरसात के जरिये ही निपटाना चाहा। उसी उग्रतम क्षेत्रीयता का उन्माद धर्मोन्माद में तब्दील करके आज भी समूचे पूर्वोत्तर और सारे भारत को लहूलुहान कर रहा है। जहां अल्पसंख्‍यकों को मातृभाषा का अधिकार देने की कोई गुंजाइश नहीं है। उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्प्रयदेश, महाराष्ट्र, राजधानी नई दिल्ली जैसे अनेक राज्यों में आज भी बांग्लाभाषियों को मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार नहीं है, जिसके लिए वे निरंतर लड़ रहे हैं। असम और कर्नाटक में उन्होंने यह हक लड़कर हासिल किया तो बिहार, झारखंड और​​ उड़ीसा में सामयिक व्यवधान के बावजूद यह अधिकार शुरू से मिला हुआ है। उतराखंड और महाराष्ट्र में पहले बंगालियों को मातृभाषा का अधिकार था जो अब निलंबित है।​

​दरअसल साठ के दशक में नैनीताल में मातृभाषा के अधिकार के लिए शरणार्थी उपनिवेश दिनेशपुर में जबर्दस्त आंदोलन भी हुआ। दिनेशपुर हाई स्कूल में १९७० में में आंदोलन के दौरान मैं कक्षा आठ का छात्र था और आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था। इस स्कूल में कक्षा आठ तक बांग्ला में पढ़ाई तो होती थी पर प्रश्नपत्र देवनागरी लिपि में दिये जा रहे थे। हम बांग्ला लिपि में प्रश्न पत्र की मांग कर रहे थे। स्कूल जिला परिषद की ओर से संचालित था और जिला परिषद के अध्यक्ष थे श्यामलाल वर्मा, जो पिताजी पुलिन बाबू के अभिन्न मित्र थे। हमने हड़ताल कर दी और जुलूस का नेतृत्व भी मैं ही कर रहा था। पिताजी स्कूल के मुख्य प्रबंधकों में थे। उन्होंने सरेआम मेरे गाल पर इस अपराध के लिए तमाचा जड़ दिया। वे हड़ताल के खिलाफ थे। मातृभाषा के नहीं। संघर्ष लंबा चला तो पिताजी ने मुझे त्याज्यपुत्र घोषित कर दिया। बाद में हमारे साथ के तीन सीनियर छात्रों को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। उस डांवांडोल में मेरी मित्र रसगुल्ला फेल हो गयी। मेरा मन विद्रोही हो गया। मैं आठवीं की बोर्ड परीक्षा पास तो हो गया, लेकिन अगले साल नौवीं की परीक्षा जानबूझकर फेल करने की मैंने कोशिश भी की ताकि पढ़ाई छोड़कर मैं पिताजी को सजा दिला सकूं। पर मैं फेल भी न हो सका। मेरे तेवर को देखते हुए पिताजी ने मुझे करीब ३६ मील दूर जंगल से घिरे शक्ति फार्म भेज दिया ताकि नक्सलियों से मेरा संपर्क टूट जाये। उसका जो हुआ सो हुआ रसगुल्ला हमसे हमेशा के लिए बिछुड़ गयी। जिसका आज तक अता पता नहीं है। उससे फिर कभी मुलाकात नहीं हुई। किशोरवय का वह दुःख मातृभाषा प्रसंग सो ओतप्रोत जुड़ा हुआ है। आज रसगुल्ला जीवित है कि मृत, मुझे यह भी नहीं मालूम। इसे लेकर पिताजी से मेरे मतभेद आजीवन बने रहे। पर हम भी कछाड़ के बलिदान के बारे में तब अनजान थे बाकी देशवासियों की तरह।

आज भी सरकारी कामकाज की भाषा विदेशी है। महज उपभोक्ताओं को ललचाने के लिए हिंग्लिश बांग्लिश महाइंग्लिश जैसा काकटेल चालू है। आज भी अच्‍छी नौकरी और ऊंचे पदों के लिए, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए अनिवार्य है अंग्रेजी का ज्ञान। आज भी भारतीय भाषाएं और बोलियां अस्पृश्य हैं बहुसंख्य बहुजनों की तरह। समाज और राष्ट्र में एकदम हाशिये पर। भारतीय संविधान निर्माताओं की आकांक्षा थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत का शासन अपनी भाषाओं में चले ताकि आम जनता शासन से जुड़ी रहे और समाज में एक सामंजस्य स्थापित हो और सबकी प्रगति हो सके। सच मानें तो हमें मातृभाषा दिवस मनाने का कोई अधिकार नहीं है। बांग्लादेश में लाखों अनाम शहीदों की शहादत से न केवल स्वतंत्र बांग्लादेश का जन्म हुआ बल्कि विश्ववासियों के लिए  राष्ट्रीयता की पहचान बतौर धर्म और क्षेत्रीय अस्मिता के मुकाबले सबकों एक सूत्र में पिरोने वाली धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मातृभाषा को प्रतिष्ठा​​ मिली।

यह साबित हुआ कि उग्रतम धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद या क्षेत्रीय अस्मिता नहीं, बल्कि मातृभाषा के लिए शहीद हो जाने की दीवानगी में ही लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के बीज हैं, जो इस लोक गणराज्य भारत में संवैधानिक शपथ वाक्य तक ही सीमित एक उदात्त उद्गार मात्र है और कुल मिलाकर हम एक बेहद संकुचित धर्मोन्मादी नस्लवादी जमात के अलावा कुछ नहीं बन पाये! बेशकीमती आजादी का बोझ सात दशकों तक ढोते रहने के बावजूद। इसलिए, क्योंकि अपनी मां और मातृभाषा के लिए हममें वह शहादती जुनून अनुपस्थित है! हम जांबी संस्कृति में निष्णात अतीतजीवी एक सौ बीस करोड़ भारतीय खुद जांबी में तब्दील हैं और हम एक दूसरे को काटने और उन तक वाइरस संक्रमित करने में ही जीवन यापन करके सूअर बाड़े की आस्था में नरक जी रहे हैं और हमें अपनी सड़ती गलती पिघलती देह की सड़ांध, अपने बिखराव, टूटन का कोई अहसास ही नहीं है। हम कंबंधों में तब्दील हैं और आईने में सौंदर्य प्रसाधन या योगाभ्यास के मार्फत धार्मिक कर्मकांडों के बाजारु आयोजन में अपनी प्रतिद्वंदतामूलक ईष्‍यापरायण खूबसूरती निखारने की कवायद में रोज मर मर कर जी रहे हैं, जबकि बाजार में तब्दील है राष्ट्र और हमारे राष्ट्रनेता देश बेच खा रहे हैं। हम जैविक क्षुधानिर्भर लोग हैं, जिनकी सांस्कृतिक पहचान धार्मिक आस्था और कर्मकांड, नरसंहार, अस्पृश्यता, खूनी संघर्ष, बहिस्कार और नस्ली भेदभाव के अलावा कुछ भी नहीं है।

इक्कीस फरवरी को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की मान्यता दी है। पर उस दिन और सरकार प्रायोजित हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में उछल कूद मचाने के अलावा हमारा मातृभाषा प्रेम सालभर में यदा कदा ही अभिव्यक्त हो पाता है। मातृभाषा से जुड़े वजूद का अहसास हमें होता ​​ही नहीं है। अभी पिछले दिनों कर्नाटक में पुनर्वासित बंगाली शरणार्थियों ने वहां मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार मिल जाने पर मातृभाषा विजय​ ​ दिवस मनाया। यह खबर भी कहीं आयी नहीं। बंगाल में भी नहीं। भारत विभाजन के बाद देश भर में छिडक गये शरणार्थी और प्रवासी बंगालियों के लिए बंगाल के इतिहास से बहिष्कृत होने के बाद भूगोल का स्पर्श से वंचित होने के बाद मातृभाषा के जरिये अपना अस्तित्व और  पहचान बनाये रखने की आकांक्षा की अभिव्यक्ति हुई कर्नाटक में, जहां इस उत्सव में देश भर से उन राज्यों के तमाम प्रतिनिधि हाजिर हुए, जहां उन्हें मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार नहीं है।

संविधान के अनुच्छेद 350 में निर्दिष्ट है कि किसी शिकायत के निवारण के लिए प्रत्येक व्यक्ति संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को संघ में या राज्य में प्रयोग होनेवाली किसी भाषा में प्रतिवेदन देने का अधिकार होगा। 1956 में अनुच्छेद 350 क संविधान में अंतःस्थापित हुआ और यह निर्दिष्ट हुआ कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास किया जाए। संविधान के अनुच्छेद 347 के अंतर्गत किये गए एक प्रावधान के अनुसार "किसी राज्य के जन समुदाय के किसी भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा उस राज्य की राजभाषा होगी।" संविधान के भाग-17 के अध्याय-3 में अनुच्छेद तथा उच्च न्यायालयों में सब कार्यवाहियों में तथा अधिनियमों, विधेयकों और आदेशों, नियमों और विनियमों आदि में प्रयुक्त होने वाली भाषा के संबंध में यह प्रावधान है कि जब तक संसद या राज्यों के विधान मंडल अन्यथा उपबंध न करें, तब तक उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियों में तथा केंद्र और राज्यों के अधिनियमों, विधेयकों, अध्यादेशों, नियमों तथा विनियमों आदि के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी में ही होंगे।

अनुच्छेद 348 के खंड (2) के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य के सरकारी काम काज में प्रयुक्त होने वाली अन्य भाषा के प्रयोग को अथवा हिंदी का प्रयोग उस राज्य में स्थित उच्च न्यायालय की कार्यवाही के लिए प्राधिकृत कर सकता है, लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा दिये जाने वाले निर्णयों, डिक्रियों व आदेशों के लिए अंग्रेजी का ही प्रयोग किया जाता है, तो उसके साथ-साथ अंग्रेजी का अनुवाद भी दिया जायेगा। संविधान के भाग-17 के अध्याय 4 के अनुच्छेद 350 के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि संघ तथा राज्य के किसी पदाधिकारी या प्राधिकारी को संघ में या राज्य में प्रयुक्त होने वाली किसी भाषा में प्रत्यावेदन देने का प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार होगा। बाद में इस अनुच्छेद में 7वें संविधान अधिनियम, 1956 की धारा-21 के द्वारा खंड (क) जोड़कर प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए प्रावधान किया गया कि प्रत्येक राज्य और राज्य के अंदर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी का यह प्रयास होगा कि भाषागत अल्प संख्यक वर्गों के बालकों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था की जाए तथा इस संबंध में किसी राज्य को ऐसी सुविधाएँ सुनिश्चित कराने के लिए आवश्यक निदेश राष्ट्रपति दे सकेगा।

नेहरू के समय में एक और अहम फ़ैसला भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का था। इसके लिए राज्य पुनर्गठन क़ानून (1956) पास किया गया। आज़ादी के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं में हुआ यह सबसे बड़ा बदलाव था। इसके तहत 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना हुई। इसी क़ानून के तहत केरल और बॉम्बे को राज्य का दर्जा मिला। संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया जिसके तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला। इसी वर्ष पॉंडिचेरी, कारिकल, माही और यनम से फ्रांसीसी सत्ता का अंत हुआ। क्षेत्रीय भाषाएं और बोलियां हमारी ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहरें हैं। इन्हें मुख्यधारा में लाने के बहाने इन्हें हम तिल-तिल मारने का काम कर रहे हैं! इस दायरे में आने वाली खासतौर से आदिवासी व अन्य जनजातीय भाषाएं हैं, जो लगातार उपेक्षा का शिकार होने के कारण विलुप्त हो रही हैं। सन् 2100 तक धरती पर बोली जाने वाली ऐसी सात हजार से भी ज्यादा भाषाएं हैं जो विलुप्त हो सकती हैं।

26 जनवरी 2010 के दिन अंडमान द्वीप समूह की 85 वर्षीया बोआ के निधन के साथ एक ग्रेट अंडमानी भाषा 'बो' भी हमेशा के लिए विलुप्त हो गई। इस भाषा को जानने, बोलने और लिखने वाली वे अंतिम इंसान थीं। इसके पूर्व नवंबर 2009 में एक और महिला बोरो की मौत के साथ 'खोरा' भाषा का अस्तित्व समाप्त हो गया। अनेक आदिम भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं। अंडमान द्वीप की भाषाओं पर अनुसंधान करने वाली जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की प्राध्यापक अन्विता अब्बी का मानना है कि अंडमान के आदिवासी को मुख्यधारा में लाने के जो प्रयास किए गए इसके दुष्प्रभाव से अंडमान द्वीप क्षेत्र में 10 भाषाएं प्रचलन में थीं, लेकिन धीरे-धीरे ये सिमट कर 'ग्रेट अंडमानी भाषा' बन गईं। यह चार भाषाओं के समूह के समन्वय से बनीं। भारत सरकार ने उन भाषाओं के आंकड़ों का संग्रह किया है, जिन्हें 10 हजार से अधिक संख्या में लोग बोलते हैं। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ऐसी 122 भाषाएं और 234 मातृभाषाएं हैं। भाषा-गणना की ऐसी बाध्यकारी शर्त के चलते जिन भाषा व बोलियों को बोलने वाले लोगों की संख्या 10 हजार से कम है उन्हें गिनती में शामिल ही नहीं किया गया।

'नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी एंड लिविंग टंग्स इंस्टीट्यूट फॉर एंडेंजर्ड लैंग्वेजज' के अनुसार हरेक पखवाडे एक भाषा की मौत हो रही है। सन् 2100 तक भू-मण्डल में बोली जाने वाली सात हजार से भी अधिक भाषाओं का लोप हो सकता है। इनमें से पूरी दुनिया में सात्ताईस सौ भाषाएं संकटग्रस्त हैं। इन भाषाओं में असम की 17 भाषाएं शामिल हैं। यूनेस्कों द्वारा जारी एक जानकारी के मुताबिक असम की देवरी, मिसिंग, कछारी, बेइटे, तिवा और कोच राजवंशी सबसे संकटग्रस्त भाषाएं हैं। इन भाषा-बोलियों का प्रचलन लगातार कम हो रहा है। नई पीढी क़े सरोकार असमिया, हिन्दी और अंग्रेजी तक सिमट गए हैं। इसके बावजूद 28 हजार लोग देवरी भाषी, मिसिंगभाषी साढ़े पांच लाख और बेइटे भाषी करीब 19 हजार लोग अभी भी हैं। इनके अलावा असम की बोडो, कार्बो, डिमासा, विष्णुप्रिया, मणिपुरी और काकबरक भाषाओं के जानकार भी लगातार सिमटते जा रहे हैं।

पालेश्‍वर शर्मा ने क्या खूब लिखा है : `छत्तीगसगढी मोर मातृभाषा आय। मोला अपन मातृभाषा उपर गर्व है। मैं ये भाषा ल अपन महतारी के दूध संग पिये अउ पचाय हौं। मोर कान म जउन पहली सब्द परिस वो छत्तीहसगढी भाषा के रहिस। जब ले मोर महतारी जीयत रहिस हे तब ले मैं वोखर मुंह ले येही भाषा ल सुनेंव अउ गुनेंव। ये भाषा ल मोर पुरखा मन सैकडन बरिस ले बोलत आवत रहिन हें। मोला अपन पुरखा मन उपर गर्व हे, काबर के वोहू मन छत्‍तीसगढी भाषा ल गर्व के साथ बोलत रहिन हें। जउन भी अपन मातृभाषा म बोलथें वोखर उपर मोला गर्व होथे। जउन अपन मातृभाषा ल बोलब म लजाथे, संकोच करथे या हीन भावना के अनुभव करथे वोहर मातृद्रोही हे ओखर बर समाज म कोनो स्‍थान नई होना चाही। वोखर बहिष्‍कार होना चाही।

महात्‍मा गांधी जी हर लिखे रहिस – ‘मेरी मातृभाषा में कितनी ही खामियां क्‍यों न हो, मैं उससे उसी तरह चिपटा रहूँगा, जिस तरह अपनी मॉं की छाती से। वही मुझे जीवनदायी दूध दे सकती है।’ अपन मातृभाषा के प्रति हमर का दृष्टिकोण होना चाही, ये बात के शिक्षा हमला गांधी जी के कथन से सीखना चाही।'

लेखक पलाश विश्‍वास वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

आईबीएन7 में इस्‍तीफों का दौर जारी, रवि कुमार भी गए

आईबीएन7 के असाइनमेंट डेस्क पर प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत रवि कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है। वे पिछले आठ सालों से आईबीएन7 के साथ जुड़े हुए थे। रवि ने अपनी नई पारी न्‍यूज एक्‍स के साथ शुरू की है। इन्‍हें असाइनमेंट पर सीनियर प्रोड्यूसर कम शिफ्ट इंचार्ज बनाया गया है। महीना भर पहले ही आईबीएन7 असाइनमेंट से चन्दन कुमार और सुजय शुक्ला ने भी इस्तीफ़ा दे दिया था तथा अपनी नई पारी इण्डिया न्यूज़ के साथ शुरू की थी। 

अपने पुराने धुरंधरों के जाने से आईबीएन7 में अचानक तनाव की स्थिति पैदा हो गयी है। आनन फानन में नए चेहरों की तलाश में लगीं असाइनमेंट हेड किरण दीप भाटिया और असाइनमेंट ईपी एमके झा को फिलहाल बिगड़ी व्यवस्था से अपनी ही कुर्सी खतरे में नज़र आने लगी है। पिछले कुछ समय से आईबीएन सेवन में कम तनख्वाह लेकर भी बेहद तनावपूर्ण हालातों में काम कर रहे आउटपुट और इनपुट के लोगों के इस्तीफे हो रहे हैं। पिछले कुछ समय में लगभग आधा आउटपुट इस्तीफ़ा दे चुका है वहीं अब बारी आ गयी है असाइनमेंट डेस्क की, जिसने अपने सबसे मज़बूत लोगों को खो दिया है। इसका सीधा असर चैनल की टीआरपी पर पड़ रहा है।

दुर्घटना की वजह से नहीं जा पा रहा ऑफिस : नवीन

अमर उजाला, लखनऊ में संपादक के रवैये से नाराज होकर ऑफिस नहीं आने की खबर को नवीन घोषाल ने गलत बताया है. नवीन का कहना है कि वो पिछले दिनों एक दुर्घटना में घायल हो गए थे, इसलिए वे कार्यालय नहीं जा पा रहे हैं. डाक्‍टरों की सलाह पर वे आराम कर रहे हैं, इसी को लेकर कुछ लोगों ने बिना सिर पैर की बातें कहनी शुरू कर दी हैं. नवीन का कहना है कि उनकी संपादक से किसी बात की नाराजगी या मनमुटाव नहीं है. यह सब गढ़ी गढ़ाई बातें हैं.

गौरतलब है कि पिछले दिनों भड़ास पर कानाफूसी कटेगरी में एक खबर प्रकाशित हई थी, जिसमें नवीन घोषाल के कार्यालय न आने की सूचना दी गई थी. हालांकि इसमें यह तथ्‍य जोड़ा गया था कि संपादक के रवैये से नवीन नाराज हैं, लेकिन नवीन ने ऐसी किसी भी बात को सिरे से खारिज करते हुए वे चोटिल हैं इसलिए ऑफिस नहीं जा पा रहे हैं. 

दो फिंगर टेस्‍ट रेप पीडि़ता का अपमान है : उच्‍चतम न्‍यायालय

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि बलात्कार पीड़ित का दो उंगली परीक्षण उसकी निजता के अधिकार का हनन करता है। न्यायालय ने सरकार से कहा है कि बलात्कार की पुष्टि के लिये बेहतर मेडिकल प्रक्रिया उपलब्ध करायी जाये। न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति एफएमआई कलीफुल्ला ने अपने फैसले में कहा कि यदि दो उंगली परीक्षण सकारात्मक भी हो तो भी इससे बलात्कार पीड़ित की सहमति का आकलन नहीं किया जा सकता है।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि दो उंगली का परीक्षण और इसकी व्याख्या बलात्कार पीड़ित की निजता के अधिकार, शारीरिक और मानसिक शुद्धता तथा गरिमा का हनन करता है। इसलिए यह परीक्षण चाहें इसकी रिपोर्ट सकारात्मक ही हो, सहमति की संभावना बयां नहीं कर सकती है।’’

दो उंगली का परीक्षण यह निर्धारित करने के लिये होता है कि क्या महिला कुंवारी है या क्या उसने कभी भी यौन संसर्ग नहीं किया है। इस परीक्षण में महिला के हैमेन की जांच की जाती है और यह माना जाता है कि उसका हैमेन सिर्फ यौन संसर्ग के कारण ही फट सकता है। न्यायालय ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकल्पों का जिक्र करते हुये कहा कि बलात्कार पीड़ित ऐसे कानूनी उपायों की हकदार है जो उसकी शारीरिक या मानसिक शुद्धता और गरिमा का हनन नहीं करते हों। (एजेंसी)

संपादक एवं प्रकाशक को कोर्ट ने बरी किया

बरनाला में शिरोमणि साहित्यकार बाबू रजब अली द्वारा लिखित विवादित पुस्तक 'गाथा सूरमियां दी' के संपादक जगजीत सिंह व विश्व भारती प्रकाशन बरनाला के मालिक अमित मित्र को पुस्तक में जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करने के आरोप से अतिरिक्त जिला एवं सेशन जज बीएस संधू की अदालत ने वीरवार को बाइज्जत बरी कर दिया। यह मामला 16 सितंबर 2012 को थाना सिटी बरनाला की पुलिस ने तत्कालीन डीएसपी हरमीक सिंह दयोल की शिकायत पर केस दर्ज किया था।

अदालत में चालान पेश होने के बाद आरोप तय करने के लिए हुई बहस के दौरान बचाव पक्ष के वकील राहुल गुप्ता ने अपनी दलीलों मे बताया कि नामजद आरोपियों ने करीब 50 वर्ष पहले लिखित मूल पुस्तक को संपादित ही किया है। यही नहीं, पुस्तक में लिखी बातें इससे पहले भी कई प्रकाशक प्रकाशित कर चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पुस्तक के संपादक भी अनुसूचित जाति से संबंधित है। अदालत ने उक्त दलीलों से सहमत हो पुलिस द्वारा नामजद दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। (जा)

पत्रकार जीतेंद्र के हत्‍यारे नक्‍सली और पुलिस के बीच मुठभेड़

खूंटी जिले के मुरहू थाना क्षेत्र के बुरूहातु गांव के जंगल में पीएलएफआई उग्रवादी एरिया कमांडर आसिसन पुर्ती उर्फ डकवाल और असिस्टेंड कमांडेंट सनिका के दस्ते से 16 मई की सुबह साढ़े पांच बजे पुलिस की मुठभेड़ हुई। इसी आसिसन के दस्ते ने पत्रकार जीतेंद्र सिंह की हत्या की थी। आसिसन और सनिका जीतेंद्र हत्याकांड के नामजद अभियुक्त हैं। पुलिस की ओर से 43 और उग्रवादियों की ओर से 15-20 राउंड गालियां चलाई गई।

उग्रवादी जिस जंगल की पहाड़ी पर थे उसे पुलिस घेरने की कोशिश कर रही थी। लेकिन पतों की खड़खड़हाट के कारण उग्रवादियों की नजर पुलिस पर पड़ गई। और फायरिंग करते हुए पहाड़ के ढलान में कूदकर भग गए। लेकिन पुलिस ने सर्च अभियान के दौरान उग्रवादियों के छह मोबाईल फोन, सोलर प्लेट, मोबाईल चार्जर, पिठु, उग्रवादी साहित्य, हिसाब-किताब का व्योरा, प्रशिक्षण पुस्तिका सहित कई महत्वपूर्ण सामान बरामद की है। इस पुलिस टीम में पुलिस के 20 जवान शामिल थे। टीम का नेतृत्व एसपी अभियान आरके मिश्रा कर रहे थे, उनके साथ थानेदार प्रवीण झा थे। खूंटी में प्रेस ब्रिफिंग में एसपी डा. एम तमिलवाणन ने कहा है कि जीतेंद्र हत्याकांड में शामिल उग्रवादियों को जल्द पकड़ लिया जाएगा।

अमर उजाला से सौरभ का इस्‍तीफा, नवभारत टाइम्‍स से जुड़ेंगे

अमर उजाला, लखनऊ से खबर है कि सौरभ श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे जनरल डेस्‍क पर कार्यरत थे. सौरभ अपनी नई पारी नवभारत टाइम्‍स से शुरू करने जा रहे हैं. सौरभ लंबे समय से अमर उजाला से जुड़े हुए हैं. चर्चा है कि अमर उजाला से गोविंद पांडेय और ब्‍यूरो से मनीष श्रीवास्‍तव भी नवभारत टाइम्‍स से जुड़ सकते हैं. हालांकि इन दोनों लोगों के नवभारत से जुड़ने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है.

नवभारत से जुड़े सूत्रों का कहना है कि राष्‍ट्रीय सहारा, हिंदुस्‍तान से भी कई लोग प्रबंधन के संपर्क में हैं. जल्‍द ही कई अखबारों से बड़ विकेट गिर सकते हैं.

कचहरी बम ब्‍लास्‍ट के आरोपी की पुलिस कस्‍टडी में मौत

बाराबंकी। पुलिस कस्टडी में फैजाबाद से लखनऊ पेशी से लौटते हुए कचहरी बम ब्लास्ट के मुख्य आरोपी खालिद मुजाहिद की आज संदिग्ध हालात में मौत हो गयी। मौत के बाद जिला पुलिस प्रशासन में हड़कम्प मच गया। पुलिस के आला अधिकारी मौके पर पहुंच गये हैं। वहीं आरोपी आतंकियों के हमदर्दों ने अस्पताल में नारेबाजी करनी शुरू कर दी। देर शाम पुलिस कप्तान सैयद वसीम, जिलाधिकारी मिनिस्ती एस ने मामले की गम्भीरता को देखते हुए जिला अस्पताल का मुआयना किया। सांसद पीएल पुनिया ने पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की।

मालूम हो कि 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी और उत्तर-प्रदेश पुलिस ने बाराबंकी रेलवे स्टेशन से मौलाना तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की आरडीएक्स बरामदगी में एसटीएफ द्वारा गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया था। दोनों लोगों के घर वालों का आरोप था कि पुलिस वाले आलिमें इस्तिमा को गिरफ्तार करके फर्जी बरामदगी दिखा दी है। उक्त गिरफ्तारी से पूर्व आजमगढ़ व अन्य जनपदों में धरना प्रदर्शन भी किया गया। इस पूरे मामले में पिछली सरकार ने आरडी निमेष आयोग का गठन कर मामले की जांच करवायी थी। आयोग ने 21 अगस्त 2012 को उत्तर-प्रदेश सरकार अखिलेश को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी। जिसमें दोनो मौलाना के पास आरडीएक्स बरामदगी को गलत बताया गया।

आयोग की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद भी सपा सरकार ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए इन लोगों पर मुकदमा वापसी की तैयारी कर ली थी। जिसके तहत पूरे मामले की जांच कर मुकदमा वापसी के लिए जिला जज के यहां राज्य सरकार की अर्जी पर विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी कल्पना मिश्रा ने खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला गर्म हो गया था। भाजपा ने और वकीलों ने जमकर खुशी का इजहार किया था। कचहरी श्रंखलाबद्ध बम विस्फोटों के मामले के आरोपी खालिद मुजाहिद को लखनऊ कारागार से शनिवार को पुलिस लाइन के उपनिरीक्षक रामअवध पुलिस बल के साथ फैजाबाद न्यायालय में शनिवार को तारीख पेशी पर लेकर गये हुये थे। वहां से वापस लौटते समय श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट के आरोपी खालिद मुजाहिद की रास्ते में तबियत खराब हो गयी तो एसआई राम अवध उसे बाराबंकी के जिला अस्पताल के आपात कक्ष में शनिवार की शाम पांच बजकर 25 मिनट पर पहुंचे तो आपात कक्ष में तैनात ईएमओ डाक्टर एसके शुक्ला ने उसे मृत घोषित कर दिया तथा नगर कोतवाली पुलिस को सूचना देते हुए उसके शव को मर्चरी में रखवा दिया है।

सनद रहे कि मई 2007 में गोरखपुर जिले के भीड़ भाड़ वाले इलाके बलदेव प्लाजा, गोलघर चौराहा तथा जलकर भवन के पास साइकिल तथा मोटरसाइकिल पर टिफिन में रखे बमों में सिलसिलेवार धमाका हुआ था। इस मामले में छह लोग जख्मी हो गये थे। राज्य पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने हरकतुल जेहाद अल इस्लामी के संदिग्ध आतंकवादी तारिक कासमी तथा खालिद मुजाहिद को बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तार कर उनके कब्जे से आरडीएक्स विस्फोटक तथा डेटोनेटर की बरामदगी की थी। जिसका मुकदमा बाराबंकी फैजाबाद और गोरखपुर में चल रहा है। शनिवार को फैजाबाद ने इस केस की सुनवाई होनी थी इसलिए संदिग्ध आतंकवादी खालिद मुजाहिद को लखनऊ की पुलिस तारीख पेशी पर फैजाबाद लेकर गई हुई थी। जहां वापस आते समय उसकी तबियत खराब हो गयी। बाराबंकी अस्पताल पहुंचते पहुंचते खालिद मुजाहिद की मौत हो गयी। सूचना मिलते ही जिला अस्पताल परिसर पूरी तरह से पुलिस छावनी बन गया। पुलिस के बड़े-बड़े आला अधिकारी मौके पर पहुंच गये। वहीं खालिद मुजाहिद की मौत पीस पार्टी के कार्यकर्ता आक्रोशित व दुःखी दिखाई पड़े। उन्होंने अस्पताल के अंदर जमकर नारेबाजी की और पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की।

सपा ने खालिद मुजाहिद की मौत को कहा अफसोसनाक

बाराबंकी। समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष मौलाना मेराज ने खालिद मुजाहिद की मौत पर कहा कि यह अफसोसनाक है और खास तौर से ऐसे वक्त में यह हादसा हुआ जब हमारी सरकार इन लोगों को छोड़ने के लिए एलान कर चुकी थी। कुछ फिरकापरस्त नाजायज तौर पर उंगली उठा रहे हैं और वह पूरे मामले को उलझाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में यह हादसा होना अफसोस नाक है। खालिद मुजाहिद को बसपा सरकार ने नाहक बंद किया था। इस पर कई बार प्रदर्शन भी हुआ था। लेकिन एसटीएफ और बाराबंकी के डीएम व एसपी ने एक भी न सुनी और कानूनी जाल को मजबूत कर दिया। उन्होंने कहा कि कुछ मुस्लिम तन्जीमे अनावश्यक मामले को उठाकर चुनावी ईशू बनाकर इन बेकसूरों को छुड़ाना नहीं चाहते बल्कि मामले को उलझाना चाहते हैं।

पुनिया और पीस पार्टी ने की सीबीआई जांच की मांग

बाराबंकी। पुलिस कस्टडी में खालिद मुजाहिद की मौत पर सांसद पीएल पुनिया ने जिला अस्पताल पहुंचकर पूरे मामले की सीबीआई जांच कराये जाने की मांग की है। वहीं पीस पार्टी ने दूसरे प्रदेश की डाक्टरों की टीम बुलाकर पोस्टमार्टम कराने की बात कही है। पुलिस कप्तान सैयद वसीम अहमद से मुकदमा दर्ज कराने के लिए कहा है।

पीरबटावन कांड में शामिल लोग भी इस मौके पर सियासत करते नजर आये

बाराबंकी। सन 1987 में हुए पीरबटावन ईदगाह काण्ड में 16 निहत्थे मुसलमानों को गोली के भेंट चढ़ाने वाले एक सूफी साहब आज भी सक्रिय नजर आये। सूफी साहब के बारे में कहा जाता है कि यह हलाला मास्टर हैं और जिले में कई मामलों में मुस्लिमों को शहीद करवाने से नहीं चूकते। आज यह भी काफी सक्रिय नजर आये। पुलिस की इन पर खास नजर है। वहीं दूसरी तरफ इन संदिग्ध आतंकियों की हिमायत करने वाले वकील भी इस मामले को हत्या का रूप बताने में नहीं चूके।

बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

राजीव शुक्ला जैसों की भूमिका पर गौर करने की हिम्मत सिस्टम में है या नहीं?

Alok Kumar : सीधा, सरल लेकिन चुभने वाला सवाल है। राजनीति को आईपीएल की तरह खेलने वाले राजीव शुक्ला जैसों की भूमिका पर गौर करने की हिम्मत सिस्टम में है या नहीं?

Jitendra Narayan राजीव शुक्ला राजनीतिज्ञों के दुलरूआ हैं । किसकी हिम्मत है जो इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करे ?
       
Alok Kumar कार्रवाई तो बाद की बात है। बस गौर करने का आग्रह कर रहा हूं।
      
Jitendra Narayan वो भी नहीं होगा ।
      
Rajat Amarnath nahi…………..
        
Gyanesh Srivastava मीडिया मंडी के अंदरखाने में चल रही लॉबी जब खत्म होगी तभी बहुतेरे पर गौर हो सकता है । गौर करने की श्रृंखला बहुत लंबी है आलोक जी, जब वो दिन आएगा तो आज राजनीति को जिस नजर से देखा जा रहा है उससे भी ज्यादा गंदी नजर अपने मीडिया को लेकर आन पड़ेगी। सिस्टम में किसी एक पर गौर करने या न गौर करने से कुछ नहीं होने वाला है । जब शुरूआत करनी हो तो अभियान चलाया जाए तो बेहतर है। अपने हमाम में ही बहुतेरे नंगे भरे पड़े हैं। उन पर भी गौर फरमाया जाए
      
Pushpendra Kulshrestha siyasi dalal hai
       
Ravish Shukla nahi hai
       
Krishna Kumar Kanhaiya नहीं….

वरिष्‍ठ पत्रकार आलोक कुमार के एफबी वॉल से साभार.  

b4m 5thbday : भड़ास को देखकर मुझे यशवंत भाई से ज्‍यादा खुद पर फख्र है – राहुल

Rising Rahul : वो दि‍न मुझे शायद ही जिंदगी भर भूलें। मैं मेनस्‍ट्रीम मीडि‍या में आने की जद्दोजहद कर रहा था और Yashwant भाई मेनस्‍ट्रीम से बाहर नि‍कलने का जोर लगा रहे थे। उस वक्‍त हमारे पास (हमारे इसलि‍ए क्‍योंकि हिंदी ब्‍लॉगिंग में भड़ास ब्‍लॉग अपनी तरह का पहला प्रयोग था) जो आधार था, वह एकमात्र भड़ास ब्‍लॉग ही था जि‍समें हम सभी पत्रकार अपना सुख-दुख ठीक उसी तरह शेयर करते थे, जैसा अब फेसबुक पर करते हैं।

लगभग रोज शाम को यशवंत भाई नोएडा सेक्‍टर 12 की तंग गली में अपनी लाल कार से आते थे और हम दोनों आधी रात के बहुत बाद तक शराब पीते, भड़ास नि‍कालते। शायद वही वक्‍त था जब भड़ास गर्भस्‍थ हुआ। आज पांच साल के भड़ास को देखकर मुझे यशवंत भाई से ज्‍यादा खुद पर फख्र है कि हिंदी मीडि‍या में अपनी तरह का पहले सफल प्रयोग की शुरुआत में मैं साथ रहा। अभी भड़ास4मीडि‍या.कॉम में अपार संभावनाएं हैं जि‍से लेकर मैं अक्‍सर यशवंत भाई को चि‍कोटी काटता रहता हूं और ये उनकी दि‍लनवाजी है कि वो मानते भी हैं। पांच साल के उतार चढ़ाव के बाद भड़ास अब दौड़ने लगा है, इसके लि‍ए भड़ास की मां यशवंत सिंह को अनगि‍नत बधाइयां। सामने होते तो सशरीर बधाइयां देता.

पत्रकार राहुल के एफबी वॉल से साभार.


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सांई प्रसाद मीडिया में संपादक बनेंगे एसएन विनोद!

वरिष्‍ठ पत्रकार एसएन विनोद ने साधना न्‍यूज से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर ग्रुप एडिटर के पद पर कार्यरत थे. खबर आ रही है कि वे सांई प्रसाद समूह के साथ संपादक (मीडिया कंसलटेंट) महाराष्‍ट्र के रूप में जुड़ने जा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि न्‍यूज एक्‍सप्रेस की जिम्‍मेदारी देखने के अलावा एसएन विनोद महाराष्‍ट्र में समूह का मराठी रीजनल चैनल भी लांच कराएंगे. इसके अलावा इनके नेतृत्‍व में दो मैगजीनों को भी लांचिंग होगी, जिसमें एक हिंदी तथा दूसरा मराठी भाषी होगा.

एसएन विनोद देश के जाने माने पत्रकार हैं. प्रभात खबर के संस्‍थापक संपादक रह चुके विनोद लोकमत समाचार, इंडिया न्‍यूज, दैनिक 1957, राष्‍ट्र खबर, एसवन, साधना न्‍यूज समेत कई मीडिया संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रहे हैं. हालांकि इस बारे में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है.

सचिंद्र, विनोद ने शुरू की नई पारी, आशीष नवभारत टाइम्‍स जाएंगे

जनवाणी, मेरठ से सचिंद्र श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे डेस्‍क पर कार्यरत थे. सचिंद्र ने अपनी नई पारी इंदौर में नईदुनिया के साथ शुरू करने जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि इन्‍हें यहां भी डेस्‍क पर जिम्‍मेदारी सौंपी गई है.

दूसरी तरफ नईदुनिया, इंदौर से खबर है कि विनोद बंदावाला ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे लंबे समय से नईदुनिया को अपनी सेवाएं दे रहे थे. विनोद अपनी नई पारी महाराष्‍ट्र में लोकमत समाचार के साथ करने जा रहे हैं. ये लोकमत के साथ उनकी दूसरी पारी है. वे इसके पहले भी लोकमत समाचार को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

अमर उजाला, चंडीगढ़ से खबर है कि आशीष तिवारी संस्‍थान को बाय करने वाले हैं. वे यहां पर सीनियर रिपोर्टर के पद पर कार्यरत हैं. आशीष अपनी नई पारी नवभारत टाइम्‍स के साथ शुरू करेंगे. उन्‍हें यहां भी सीनियर रिपोर्टर बनाया गया है. आशीष अमर उजाला से पहले दैनिक भास्‍कर को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

एचटी ने दक्षिण अफ्रीकी पत्रकार को बनाया चीफ एडिटोरियल एंड कंटेंट ऑफिसर

हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ने दक्षिण अफ्रीकी पत्रकार निकोलस डेवेस को चीफ एडिटोरियल और कंटेंट ऑफिसर नियुक्‍त किया है. निकोलस दक्षिण अफ्रीका के लीडिंग अखबार मेल एंड गार्जियन के एडिटर इन चीफ के पद पर कार्यरत हैं. उन्‍होंने मेल एंड गार्जियन में अपने सहयोगियों को भेजे गए संदेश में हिंदुस्‍तान टाइम्‍स से जुड़ने की जानकारी देते हुए इसे बेहतर अपार्चुनिटी बताया है. संभावना है कि वे सितम्‍बर में हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ज्‍वाइन करेंगे. इस बारे में द हिंदू ने भी एक खबर प्रकाशित की है. 

HT appoints South African journalist chief editorial officer

Hindustan Times has appointed Nicholas Dawes, editor-in-chief of Mail and Guardian (M&G), a leading South African paper, its new Chief Editorial and Content Officer. In a mail to his colleagues in M&G on Friday, Mr. Dawes said, “I have been offered a remarkable opportunity to help lead a process of change and growth at Hindustan Times.”

Responding to queries on the social media, he tweeted, “The HT role is a compelling challenge in one of the world’s biggest and most important media markets.” He said he would be working with the ‘existing team’ on a range of editorial quality projects.

Political columnist : Mr. Dawes is chairman of the South African National Editors’ Forum. He has been a political columnist, and public policy and economics editor. He has also served as managing director of a digital communications agency, and was a Fulbright Scholar in a graduate school in the U.S. While he has travelled to India, he has not worked in the country.

Asked about the decision, HT group chairperson Shobhana Bhartia told The Hindu to contact the Editor. Editor-in-Chief Sanjoy Narayan said he does not speak to the media on such matters. HT’s CEO Rajiv Verma could not be contacted.

Sources in Hindustan Times said they had not received any internal communication yet, but expect it on Monday. One staffer, who did not wish to be named, said, “There is confusion in the newsroom about his [Mr. Dawes’] precise role, and whom he would be reporting to.” But other informed sources said Mr. Dawes would lead the news operations side of the business, be engaged with both the print and digital platforms, and focus on editorial quality improvement projects. He is expected to join in September.

सड़क हादसे में चतरा के पत्रकार अनिल कुमार मिश्रा की मौत

चतरा : शहर के चतरा-बगरा मुख्य मार्ग पर स्थित नया पेट्रोल पंप के पास शुक्रवार को करीब डेढ़ बजे एक अज्ञात एलपी ट्रक की चपेट में आने से पत्रकार अनिल कुमार मिश्रा की मौत हो गई। वह रांची से प्रकाशित एक दैनिक के लावालौंग प्रखंड से संवाददाता थे। वह मोटरसाइकिल से चतरा से प्रखंड मुख्यालय लावालौंग जा रहे थे। इसी दौरान यह हादसा हो गया। सूचना मिलते ही सदर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और उन्हें जख्मी अवस्था में सदर अस्पताल लाया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

अनिल कुमार मिश्र के निधन की सूचना मिलने के बाद सदर अस्पताल में पत्रकारों, बुद्धिजीवियों एवं शहर के सैकड़ों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। पत्रकार के निधन की जानकारी मिलते ही अनुमंडल पदाधिकारी हैदर अली, सदर थाना प्रभारी रामचंद्र राम सहित अन्य अधिकारी अस्पताल पहुंचकर घटना की जानकारी ली। शव का पोस्टमार्टम करवाने के बाद परिजनों के हवाले कर दिया गया। पत्रकारों ने जिला प्रशासन से मृत पत्रकार के परिजनों को पांच लाख रुपये का मुआवजा एवं परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की भी मांग की है।

डीजीपी कार्यालय में फर्जी संस्था?

यूपी पुलिस की सरकारी टेलीफोन डायरी में पुलिस वेलफेयर संस्था (पता ई-3, विज्ञानपुरी, महानगर) का उल्लेख है जिसमे डीजीपी की पत्नी अध्यक्ष हैं और कई सरकारी कर्मी कार्यरत हैं. इस सम्बन्ध में आरटीआई कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा प्राप्त सूचनाओं से कई गंभीर बातें सामने आई हैं. डीजीपी कार्यालय का कहना है कि यह संस्था पुलिस कर्मचारियों के कल्याणार्थ विभिन्न जनपदों में संचालित कल्याण केन्द्रों के कार्यों के पर्यवेक्षण के लिए डीजीपी कार्यालय का अंग है पर इस संस्था की आधिकारिक और कानूनी स्थिति, मेमोरेंडम, नियमावली आदि उसके पास उपलब्ध नहीं हैं, जो पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद द्वारा बताया जा सकता है.

इसके विपरीत पुलिस मुख्यालय का उत्तर है कि अभिलेखों के अनुसार इस संस्था का पुलिस विभाग से सम्बन्ध नहीं पाया जाता है. अब डॉ. ठाकुर ने प्रमुख सचिव (गृह) को इस प्रकार बिना किसी आधिकारिक मान्यता और बिना शासकीय अभिलेखों के लंबे समय से डीजीपी कार्यालय में इस संस्था का सञ्चालन होने के सम्बन्ध में गहराई से जांच कराने को लिखा है. नीचे डा. ठाकुर द्वारा लिखा गया पत्र…



सेवा में,
प्रमुख सचिव (गृह),
उत्तर प्रदेश शासन,
लखनऊ
विषय- पुलिस वेलफेयर (पुलिस कल्याण) नामक संस्था के विषय में गहराई से जांच कराये जाने विषयक  

महोदय,

कृपया निवेदन है कि उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा प्रकाशित टेलीफोन डायरी के अनुसार उत्तर प्रदेश में एक पुलिस वेलफेयर (पुलिस कल्याण) संस्था है जिसका पता ई-3, विज्ञानपुरी, महानगर है. चूँकि इस संस्था का उल्लेख पुलिस विभाग की सरकारी डायरी में है, अतः यह स्वाभाविक तौर पर अपेक्षित है कि या तो यह एक सरकारी संस्था होगी या इस कार्यालय के पूरे संज्ञान में होगी. अतः मैंने अपने पत्र संख्या- NT/RTI-PW/DG/02 दिनांक-03/01/2012 के माध्यम से पुलिस महानिदेशक कार्यालय से उत्तर प्रदेश पुलिस वेलफेयर से सम्बंधित कतिपय सूचनाएँ दिये जाने का अनुरोध किया था,. इसके सम्बन्ध में मुझे उनके कार्यालय से सूचना प्राप्त हुई.  (छायाप्रति संलग्न).

मुझे अवगत कराया गया कि यह संस्था पुलिस कर्मचारियों के कल्याणार्थ विभिन्न जनपदों तथा ईकाईओं में संचालित कल्याण केन्द्रों के कार्यों के पर्यवेक्षण करती है जो पुलिस महानिदेशक मुख्यालय, उ०प्र० के अधीन एक अनुभाग/शाखा है. पूर्व में यह अनुभाग/शाखा पुलिस महानिदेशक मुख्यालय पर मौजूद था पर यहाँ जगह/कक्ष संकीर्ण होने के कारण अस्थायी रूप से विग्यांपुरी, महानगर व्यवस्थापित कर दिया गया, जिसका राज्कित कार्य संपादन मुख्यालय पर नियुक्त उच्चाधिकारियों के दिशा निर्देश पर ही होता है. साथ ही यह भी सूचना दी गयी कि इस संस्था की आधिकारिक और कानूनी स्थिति, मेमोरेंडम, नियमावली आदि उसके पास उपलब्ध नहीं हैं, जो उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद द्वारा बताया जा सकता है.

मेरे द्वारा बार-बार सूचना मांगे जाने और अंत में मा० राज्य सूचना आयोग के समक्ष वाद सायर करने के बाद मुझे उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय से यह सूचना मिली है कि पुलिस वेलफेयर (पुलिस संस्थान) संस्था का पुलिस विभाग से सम्बन्ध नहीं पाया जाता है.

ऐसी स्थिति में यह प्रकरण स्वयं ही अत्यंत महत्वपूर्ण और गंभीर हो जाता है कि जव इस प्रकार का कोई संगठन पुलिस विभाग का अंग है ही नहीं और इसका पुलिस विभाग से कोई संबंध नहीं है तो फिर यह कथित संस्था किस आधार पर पुलिस महानिदेशक कार्यालय से संचालित किया जा रहा है जबकि यह बिना किसी आधिकारिक मान्यता और बिना शासकीय अभिलेखों के है. यह प्रकरण और भी गम्व्हिर इस लिए हो जाता है कि स्वयं पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश की पत्नी इसकी अध्यक्ष हैं. इसके अतिरिक्त  कई अन्य सरकारी कर्मी भी इसमें कार्यरत हैं. मेरी जानकारी के अनुसार यह बिना आधार और बिना आधिकरिक अस्तित्व वाली संस्था बिना किन्ही आवश्यक अभिलेखों के पूरे प्रदेश में पुलिस विभाग में हस्तक्षेप करती है और संभवतः अनवरत सरकारी धन और सरकारी सुख-सुविधाओं का भी उपयोग करती है जो पूरे प्रदेश के पुलिस कर्मियों से जबरदस्ती कटौती की जाती है. इस प्रकार पुलिस विभाग के उच्च अधिकारियों और उनकी पत्नियों द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर सरकारी और गैर-सरकारी पैसे का विना किसी अधिकार और बिना किसी उत्तरदायित्व के पूर्णतया अपारदर्शी ढंग से प्रयोग किये जाने की यह स्थिति निश्चित रूप से अत्यंत आपत्तिजनक है और इसमें किसी घोटाले या अनियमितता से इनकार नहीं किया जा सकता है.

अतः मैं आपसे निवेदन करती हूँ कि इस कथित संस्था पुलिस वेलफेयर के पुलिस विभाग में अनधकृत रूप से अपारदर्शी ढंग से सञ्चालन के सम्बन्ध में गहराई से जांच कराये जाने की कृपा करें.

पत्र संख्या- NRF/Home/PW/01                                        भवदीय,
दिनांक-18/05/2013
                                                                           (डॉ नूतन ठाकुर )
                                                                         5/426, विराम खंड,
                                                                         गोमती नगर, लखनऊ
                                                                              # 94155-34525

प्रतिलिपि- पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को कृपया आवश्यक कार्यवाही किये जाने हेतु



b4m 5thbday : यशवंत की कामयाबी ये है कि उन्‍हें कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता – विकास मिश्रा

Vikas Mishra : भड़ास 4 मीडिया के पांच साल पूरे हो गए। यशवंत सिंह से हमारे रिश्ते के 10 साल भी पूरे हो गए। मेरठ दैनिक जागरण में हम लोगों की मुठभेड़ हुई थी। मैं सिटी रिपोर्टिंग इंचार्ज और यशवंत सिटी डेस्क इंचार्ज। यशवंत में एक आग थी, क्रियेटिविटी थी, जिसके हम सब कायल थे। साथ ही अक्खड़पन था, बिंदासपन था और जान हथेली पर रखकर चलने का माद्दा भी।

बहरहाल खट्टे-मीठे अनुभवों से भरा रिश्ता आगे बढ़ा और यहां तक पहुंचा। मैं तब भी नौकरी कर रहा था और आज भी कर रहा हूं। यशवंत सिंह ने अलग रास्ता चुना। आज यशवंत जिस मुकाम पर हैं जहां हजारों लोग उनके हौसले, साहस और जज्बे को सलाम करते हैं। हजारों लोग ऐसे भी होंगे, जो यशवंत को नापसंद करते होंगे, लेकिन यशवंत की सबसे बड़ी कामयाबी ये है कि अब उन्हें कोई नज़रअंदाज नहीं कर सकता।

आजतक के वरिष्‍ठ पत्रकार विकास मिश्रा के एफबी वॉल से साभार.


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b4m 5thbday : मनीष चाहें तो मैं उनसे बहस को तैयार हूं – अरविंद सिंह

Arvind K Singh : भड़ास फार मीडिया के पांचवीं वर्षगांठ पर मेरा भी जाना हुआ… शानदार आयोजन जिसमें मुझे तमाम ऐसे साथी मिले जो मेरे प्रेरक रहे हैं और भाई आनंद प्रधान जैसे पुराने मित्र भी मिले… आनंद प्रधान और कई अन्य वक्ताओं के ओजस्वी भाषण मुझे पसंद आए.. इस आयोजन के लिए भाई यशवंत और उऩकी टीम को बहुत बधाई और शुभकामनाएं… लेकिन उसी मौके पर श्री मनीष सिसौदिया ने मीडिया को लेकर बहुत सही गलत बातें कहीं… बहुत नकारात्मक छवि दिखाने की कोशिश की.. उनकी सारी बातें सुनीं..मन मसोस कर रह गया.

मीडिया घरानों का कारपोरेटीकरण केवल उन संस्थाओं की नीतिगत देन नहीं है, उसमें दलाल पत्रकारों का बड़ा योगदान है… लेकिन ऐसे दलालों की संख्या सीमित है.. इनकी करनी को ही पत्रकारिता मान लेना अन्याय है… मनीष जी अब राजनीति में पांव रख चुके हैं और उनकी पत्रकारिता की उम्र भी सीमित रही है.. किसी एक संस्थान के अनुभव के आधार पर पूरी मीडिया पर उंगली उठाना ठीक नहीं… उनको भारत की मीडिया को समझने के लिए पहले पड़ोसी देशों यानि नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान और बंगलादेश की मीडिया की हालत को समझ लेना चाहिए… भारत में आज भी किसी पत्रकार के पास काम करने की गुंजाइश है.. एकतरफा आलोचना ठीक नहीं…आज मीडिया की बदौलत ही आम आदमी पार्टी खड़ी है.

रही बात ऐसे आंदोलनों के जनाधारों की..तो 1987 में मेरठ का किसान आंदोलन कवर करने पूरी दुनिया की मीडिया पहुंचा था… हमें लगता था कि भारत में नयी क्रांति आ रही है किसान उठ खड़ा हुआ है… लेकिन हालत यह हो गयी कि उसी के कुछ साल बाद ही भारत में किसानों की आत्महत्याएं शुरू हो गयीं… पत्रकार राजनेता बनें इसमें बुराई नहीं, लोकतंत्र में राजनीति के लिए सबको खुली छूट है… लेकिन सीमित जानकारी के आधार पर पत्रकारिता की गलत तस्वीर पेश करना एकदम ठीक नहीं है.. इस मसले पर मैं उनसे बहस करने के लिए तैयार हूं… मनीषजी चाहें तो मैं इस मसले पर उनसे बहस को तैयार हूं.. यह जानकारी देने के साथ कि राजनीति में आने के लिए मेरे पास थाली में परोसे मौके आए लेकिन मैंने पत्रकार बने रहना ही पसंद किया.

राज्‍यसभा टीवी के वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के एफबी वॉल से साभार.


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‘सपा ने नहीं, मीडिया वालों ने की वरुण की मदद’

बरेली : भड़काऊ भाषण के मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय महासचिव वरुण गांधी की अदालत से दोषमुक्ति में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मदद किये जाने के आरोपों के बीच सूबे के पंचायत राज मंत्री बलराम सिंह यादव ने मीडिया पर भाजपा नेता की सहायता का ठीकरा फोड़ा।

यादव शुक्रवार शाम यहां संवाददाताओं से बातचीत में उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी (सपा) और वरुण के बीच किसी तरह के तालमेल संबन्धी सवाल पर खफा हो गये और पूछा ‘कौन है वरुण गांधी।’ बाद में यादव ने कहा कि यह सवाल काल्पनिक है। सचाई यह है कि पत्रकारों ने ही मुकदमों से बरी होने में वरुण गांधी की मदद की है। उन्होंने कहा, ‘आप लोग वरुण गांधी जिंदाबाद करते हैं। आपने ही उनको बेवजह नेता बना दिया और अब हम पर उनकी मदद का आरोप लगा रहे हैं।’

गौरतलब है कि वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान पीलीभीत से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले वरुण पर एक समुदाय विशेष के खिलाफ कथित भड़काउ भाषण देने के कुल तीन मुकदमे दर्ज हुए थे। वह उन तीनों ही मामलों में बरी हो चुके हैं। कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सपा सरकार पर मामले के गवाहों को धमकाने तथा बयान बदलने के लिये दबाव डालकर वरुण की मदद करने का आरोप लगा रही है। (एजेंसी)

बड़े आईटी खिलाडियों के सामने केन्द्र सरकार पूरी तरह असहाय?

भारत सरकार याहू, गूगल, फेसबुक, ट्विटर जैसे बड़े आईटी खिलाड़ियों द्वारा नियमों का पालन करा सकने में पूरी तरह असमर्थ जान पड़ता है. सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ और नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में दायर कंटेम्प्ट याचिका में दिये आदेश से ऐसा ही जान पड़ता है.

अमिताभ और नूतन ने सर्विस प्रोवाइडर द्वारा इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी (इंटरमिडीएरी गाइडलाइन्स) नियमावली 2011 का पालन नहीं करने के बारे में दो रिट याचिकाएं की और इनके सम्बन्ध में दो कंटेम्प्ट याचिका भी किये. इसके सम्बन्ध में इलेक्ट्रौनिक और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव जे सत्यनारायण के 17 मई 2013 के आदेश के अनुसार सरकार ने नियमों का पालन कराने के हाई कोर्ट के आदेशों के बारे में 12 जून 2012 को सभी सर्विस प्रोवाइडर को निर्देश भेजे. फिर 02 अगस्त और 29 नवंबर को मंत्री कपिल सिब्बल की अध्यक्षता में हुई बैठक में ये निर्देश दिये गए. मंत्रालय ने
अपने वेबसाईट पर भी हाई कोर्ट के आदेश डाल रखा है.

इन सब प्रयासों के बाद भी सर्विस प्रोवाइडर इस नियमावली के नियम तीन तथा 11 का पालन नहीं कर रहे हैं. नियम तीन में सभी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को अपने वेबसाईट पर यह स्पष्ट करना होता है कि उसके उपभोक्ता किस प्रकार की बातें नहीं प्रसारित कर सकते और नियम 11 के अनुसार उन्हें अपने वेबसाईट पर शिकायत अधिकारियों के नाम और उनके संपर्क पते प्रकाशित करना अनिवार्य है.

b4m 5thbday : ‘भड़ास4मीडिया’ जैसा आईना समाज के साथ-साथ मीडिया की भी शक्ल दिखाता है

नई दिल्ली। मीडिया समाज का आईना कहा जाता है, आईना बड़ा हो या छोटा वह समाज की शक्ल दिखाता है। लेकिन यहां बात कर रहे हैं एक खास आईने की। ‘भड़ास4मीडिया’ जैसे आईने की जो समाज के साथ-साथ मीडिया की शक्ल दिखाता है। ‘भड़ास4 मीडिया’ पिछले 5 वर्षों में एक लम्बा सफ़र तय कर चुका है। मीडिया में इतनी जगह बनाने में कई साल लग जाते हैं, तो वही सफलतापूर्वक भड़ास4 मीडिया के पांच साल पूरे होने के उपलक्ष्य में भड़ास टीम ने राजेन्द्र प्रसाद के हिन्दी भवन में शुक्रवार की रात एक कार्यक्रम का आयोजन किया।

इस कार्यक्रम में मीडिया जगत की कई हस्तियां मैजूद रही, कार्यक्रम में शामिल लोगों की संख्या हॉल की क्षमता से ज्यादा थी। जिससे भड़ास की लोकप्रियता का पता चलता है। भड़ास की पांचवी वर्षगांठ में आईआईएमसी के हेड आनन्द प्रधान ने सम्बोधित करते हुए कहा कि आज के समय में मीडिया का बजारीकरण हो चुका है, समाचार को थाली में खाने की तरह परोसा जा रहा है, लेकिन ‘भड़ास’ मीडिया ने उन समाचारों को दिखाया है जिसकी जानकारी न तो आम-आदमी को थी न मीडिया को उसके बारे में पता था।

कार्यक्रम के अन्त में गायक असीम केमशन ने अपने सूफी-संगीत के माध्यम से मौजूद लोगों का दिल जीत लिया। उन्होंने अपने गाने के साथ-साथ गायक कैलाश खेर गाने गाए, उनके संगीत से हिन्दी भवन तालियों की गड़गड़ाहत से गूंज उठा। कार्यक्रम का संचालन राजीव शर्मा और यशवंत ने किया। (starlive24.in


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संजय दत्‍त के दोस्‍त ने पत्रकार को मारा थप्‍पड़, कपड़े भी फाड़े

मुंबई। मुंबई ब्लास्ट केस में अवैध हथियार रखने के दोषी अभिनेता संजय दत्त जब टाडा कोर्ट में सरेंडर करने जा रहे थे तो उनके एक साथी ने एक पत्रकार के साथ हाथापाई की तथा थप्‍पड़ मार दिया। संजय दत्‍त के साथ सरेंडर करने जाते समय उनकी पत्नी मान्यता दत्त, बहनें प्रिया दत्त एवं नम्रता और फिल्म प्रड्यूसर महेश भट्ट व बंटी वालिया भी शामिल थे। चाक चौबंद सुरक्षा के बीच संजय कोर्ट रवाना हुए उसी दौरान संजय के मित्र बंटी वालिया का एक पत्रकार से विवाद हुआ।

जानकारी के अनुसार संजय दत्त का काफिला ट्रैफिक के कारण वरली नाका पर रुका, तो मीडिया के लोग फोटो खींचने के लिए दत्त की कार के पास आ गए। इससे संजय दत्त के साथ काम में मौजूद बंटी वालिया भड़क गए। उन्होंने मीडिया वालों को वहां से चले जाने को कहा। वो मीडिया वालों से खासे नाराज नजर आ रहे थे। इस बीच एक पत्रकार की गाड़ी के आगे ही वालिया की गाड़ी चल रही थी। पुलिस और कारों का बेड़ा की वजह से करीब-करीब दोनों की कार टकरा गई। फिर क्या था। बंटी वालिया भड़क उठें। अपने बॉडीगार्ड के साथ गाड़ी से उतरें और पत्रकार से उलझ बैठे। थप्पड़ तो जड़ा ही कपड़े तक फाड़ डालें।

पीड़ित पत्रकार ने कहा कि उसकी कार से टक्कर नहीं हुई। ट्रैफिक जाम की वजह से सभी अपनी गाड़ियां पीछे कर रहे थे। यहां तक कि उनकी कार में खरोंच तक नहीं आयी। इसके बावजूद वह अपने गाड़ी से उतरे और मारा इतना ही नहीं कपड़ें तक फाड़ डाले। वालिया की इस हरकत के बाद पत्रकारों में गुस्‍सा है।

b4m 5thbday : आयोजन की कहानी तस्वीरों की जुबानी (2)

तस्वीरों को ज्यादा बड़े साइज में देखने के लिए नीचे दिए गए तस्वीरों के उपर ही क्लिक कर दें..

जाने-माने खोजी पत्रकार अनिरुद्ध बहल, जिन्होंने बैंकों के काले कारोबार का खुलासा करके न सिर्फ कारपोरेट व करप्ट मीडिया को आइना दिखाया जो इन बैंकों से विज्ञापन लेने की एवज में इनके कच्चे चिट्ठे पर पर्दा डाले रहते हैं बल्कि देश के कारपोरेट जगत के लगातार भ्रष्ट व जनविरोधी होते जाने का दस्तावेज देश की जनता के सामने पेश किया. ये अनिरुद्ध बहल भड़ास के पांचवें बर्थडे के आयोजन में जब पहुंचे तो उनका स्वागत भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह ने किया.

अनिरुद्ध बहल से हाथ मिलाते परिचय देते बीएसएफ के साथी जनार्दन यादव और हीरेंद्र झा.

नेशनल दुनिया अखबार के संपादक और साहित्यकार प्रदीप सौरभ की इंट्री….

यशवंत सिंह को बुके देकर भड़ास के पांचवीं सालगिरह की बधाई देते शैलेंद्र झा…

कार्यक्रम की शुरुआत बार्डर सिक्योरिटी फोर्स में कार्यरत अधिकारी जनार्दन यादव के संबोधन से हुई….

मंच का संचालन किया वरिष्ठ पत्रकार राजीव शर्मा ने…

कार्यक्रम में शरीक लोग पूरी तल्लीनता के साथ आयोजन की गतिविधियों, लेक्चर को सुनते देखते रहे…

प्रथम पंक्ति में डेली न्यूज एक्टिविस्ट के चेयरमैन निशीथ राय के साथ बैठे हैं अनिरुद्ध बहल.

भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को जब यह नहीं सूझ रहा था कि क्या बोला जाए तो यशवंत सिंह ने उन्हें भड़ासी टिप्स दिए… 🙂

और फिर शुरू हो गए अनिल सिंह…

जब संबोधन के लिए अनिरुद्ध बहल मंच पर आए तो उन्हें बुके देकर स्वागत किया यशवंत सिंह ने.

अनिरुद्ध बहल ने तहलका के स्टिंग से लेकर कोबरापोस्ट तक के स्टिंग के बारे में विस्तार से बताया … साथ ही कारपोरेट मीडिया के प्रति बढ़ते अविश्वास का जिक्र किया… उनके संबोधन पर कई बार तालियां बजी…


— जारी —

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इसके पहले की तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें…

b4m 5thbday : आयोजन की कहानी तस्वीरों की जुबानी (1)


भड़ास के आयोजन में सूफी सिंगर असीम केमसन के गायन की क्लिप्स देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/711/media-music/ashim-kemson-tera-pyaar-ne-b4m5thbday.html

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/710/media-music/ashim-kemson-yaar-merey-b4m5thbday.html

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/709/media-music/sufi-singer-ashim-kemson-b4m5thbday.html

b4m 5thbday : आयोजन की कहानी तस्वीरों की जुबानी (1)

तस्वीरों को ज्यादा बड़े साइज में देखने के लिए नीचे दिए गए तस्वीरों के उपर ही क्लिक कर दें..

मेहमान आए नहीं, महफिल सजी नहीं, लेकिन दोस्तों के संग मिलकर नई आने वाली किताब ''जानेमन जेल'' का कवर हंसते-मुस्कराते लांच कर दिया गया… बाएं से- यशवंत सिंह के साथ अनिल सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव और अनेहस शाश्वत.

भड़ास का प्रोग्राम हो और हंसी-ठट्ठा ना हो, ये भला कैसे हो सकता है… हंसना जरूरी है…

आयोजन स्थल राजेंद्र भवन का बाहरी द्वार

आने वालों का यूं इस्तकबाल भड़ास की तरफ से कराया गया…

ऐसे आयोजन मिलने-मिलाने और नए-नयों से दोस्ती गांठने का अच्छा मौका होता है… यशवंत सिंह और राकेश डुमरा प्रोग्राम में आए एक साथी से बातचीत करते हुए…

कुछ दूरी पर हैं जनार्दन यादव और हीरेंद्र झा

भड़ास के कार्यक्रम में शामिल होने आए जर्नलिस्ट से नेता बने मनीष सिसोदिया. जी न्यूज के साथ काम कर चुके मनीष इन दिनों देश में बदलाव के वाहक बने हुए हैं और आम आदमी पार्टी के जरिए जन-जन को प्रेरित करने, आंदोलित करने और सिस्टम को बदलने की मुहिम में लगे हैं. उनका स्वागत यशवंत सिंह ने किया.

लखनऊ से संजय शर्मा (एडिटर, वीकएंड टाइम्स) प्रोग्राम में शामिल होने आए. (बिलकुल दाएं) इन्हें भड़ास विशिष्ट सम्मान 2013 के लिए चुना गया और सम्मानित किया गया.

जाने-माने पत्रकारिता शिक्षक, चिंतक, विश्लेषक आनंद प्रधान का स्वागत करते यशवंत सिंह


….जारी…

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भड़ास के आयोजन में सूफी सिंगर असीम केमसन के गायन की क्लिप्स देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/711/media-music/ashim-kemson-tera-pyaar-ne-b4m5thbday.html

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/710/media-music/ashim-kemson-yaar-merey-b4m5thbday.html

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/709/media-music/sufi-singer-ashim-kemson-b4m5thbday.html

गढ़ बचाने खुद लखनऊ पहुंचेगे संजय गुप्ता !

(कानाफूसी) लखनऊ : हालांकि इसकी अभी अधिकृत पुष्टि नहीं हुई है लेकिन जागरण के सूत्र यह खबर दे रहे हैं कि लखनऊ का गढ़ बचाने को दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्ता दो-तीन दिन के अंदर लखनऊ पहुंच रहे हैं। राजनीतिक सम्पादक प्रशांत मिश्र से भी लखनऊ पहुंचने को कहा गया है। एसोसिएट एडीटर पंडित विष्णु प्रकाश त्रिपाठी भी साथ हो सकते हैं।

तमाम कोशिशों के बावजूद नदीम दैनिक जागरण में नहीं रुक रहे हैं, इतना तय हो गया है। उन्होंने प्रबंधन को बता दिया है कि नवभारत टाइम्स के साथ उन्होंने जो कमिटमेंट किया है, उसे उन्हें पूरा करना ही है। नभाटा प्रबंधन ने लखनऊ के रेजीडेंट एडीटर सुधीर मिश्र और असिस्टेंट एडीटर नदीम को दिल्ली बुला लिया है। सोमवार से यह दोनो लोग दिल्ली बैठना शुरू कर देंगे ताकि अखबार निकालने की आगे की प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाया जा सके।
 
लेकिन उधर दैनिक जागरण में संकट कम होने के बजाय बढ़ता दिख रहा है। नदीम के बाद किसे ब्यूरो चीफ बनाया जाय, इस पहेली का हल मिलना जितना मुश्किल हो रहा है, उससे बड़ी चुनौती जागरण प्रबंधन के लिए राज्य ब्यूरो को भर-भरा कर गिरने से बचाने की है। फिलाहाल सिर्फ पांच लोगों के सहारे चल रहे राज्य ब्यूरो के दो सदस्यों के बारे में चर्चा है कि नदीम के हटते ही उन्होंने भी अलग-अलग अखबारों में अपने ठिकाने तलाशने शुरू कर दिए हैं। यह भी चर्चा है कि कम से कम एक और अधिकतम दो लोगों को नदीम नभाटा ले जा सकते हैं। उप्र का राज्य ब्यूरो स्थानीय सम्पादक के अधीन काम करता है। कहा जा रहा है कि दिलीप अवस्थी का राज्य ब्यूरो के साथ आज तक संवाद और विश्वास का रिश्ता कायम ही नहीं हो पाया, ऐसे में उनके लिए राज्य ब्यूरो को बचा पाना मुश्किल ही नहीं मुमकिन हो रहा है। स्टेट एडीटर रामेश्वर पाण्डेय की कोशिशें प्रबंधन के कहने पर तो जारी हैं लेकिन कहा जा रहा है कि दिलीप अवस्थी को एक असफल आरई साबित करने का इससे अच्छा मौका उनके लिए और कोई दूसरा नहीं हो सकता, इसलिए उनकी कोशिशें दिखावे के लिए चल रही हैं।
सूत्रों का कहना है कि इन्हीं सब बातों के दृष्टिगत दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्ता ने खुद लखनऊ पहुंचने का निर्णय किया है। वह राज्य ब्यूरो के सदस्यों के साथ अलग-अलग बात कर उनकी दिल की सुनेंगे। उनकी पहली प्राथमिकता राज्य ब्यूरो को बचाने के साथ ही राज्य ब्यूरो के सदस्यों को ब्यूरो चीफ के किसी नाम के लिए राजी करना भी होगा।

उधर, एक अन्य सूचना के मुताबिक दैनिक जागरण लखनऊ में नदीम के बहाने शुरू हुआ संकट परवेज अहमद को राज्य ब्यूरो से लोकल में शिफ्ट करा सकता है। राज्य ब्यूरो के सदस्यों के बागी तेवर देखते हुए प्रबंधन यह कदम उठा सकता है और दिलीप अवस्थी अपनी कुर्सी बचाने को इसके लिए अपनी रजामंदी दे सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि राज्य ब्यूरो के सदस्य संजय गुप्ता से अपनी मुलाकात में परवेज अहमद की राज्य ब्यूरो में नियुक्ति का मुद्दा जोर-शोर से उठा सकते हैं और इस बात पर अड़ सकते हैं कि इतने जूनियर के साथ उन लोगों के लिए काम करना मुश्किल है। कहा जा रहा है कि राज्य ब्यूरो के सदस्यों को फिलहाल मनाने और नदीम के जागरण छोडऩे से पैदा हुए संकट से निपटने के लिए परवेज अहमद को प्रबंधन को लोकल में शिफ्ट करने में कोई ज्यादा एतराज नहीं है।

सूत्रों की माने तो दिलीप अवस्थी राज्य ब्यूरो के तमाम सदस्यों की वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए तीन हफ़्ते पहले परवेज अहमद को हिन्दुस्तान अखबार से लाकर जागरण के राज्य ब्यूरो में प्रमुख संवाददाता बना दिया। मालिकों से परवेज अहमद के नाम पर मुहर लगवाने से पहले उन्होंने अपने राज्य ब्यूरो के बाकी सदस्यों से भी कोई राय मश्विरा नहीं किया। यहां तक कि स्टेट एडीटर रामेश्वर पांडे को इसकी जानकारी तब हुई जब परवेज की खबर अखबार में छपी। परवेज को समाजवादी पार्टी की बीट देने के लिए स्वदेश कुमार को डाक डेस्क पर भेज दिया गया।
परवेज अहमद की काबिलियत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि दैनिक जागरण में उनकी पहली खबर जिसे दिलीप अवस्थी ने पहले पेज पर लीड जैसे ट्रीटमेंट के साथ जागरण विशेष बनाकर छपवाई, वह छह महीने पहले सभी अखबारों में प्रेस नोट के शक्ल में छप चुकी थी।

परवेज अहमद दूसरा बड़ा एसाइनमेंट आजम खां और शिवपाल यादव के कार्यक्रम की कवरेज का दिया गया। इस कार्यक्रम में आजम खां ने  अपनी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल को जमकर खरी खोटी सुनाई लेकिन परवेज अहमद इसे समझ ही नहीं पाए, इस वजह से उसे कापी का हिस्सा नहीं बनाया। शिवपाल यादव ने अफसरों की सोच को नकारात्मक करार दिया लेकिन परवेज शिवपाल का भाषण लिखना ही भूल गए। शिवपाल यादव के अमेरिका न जाने की घोषणा परवेज सुन ही नहीं पाए,यह हिस्सा जागरण ब्यूरो के एक दूसरे सदस्य ने टीवी से देखकर जुड़वाया। इन दोनो प्रकरणों को दिलीप अवस्थी ने दबवा दिया क्योंकि इससे उनके सलेक्शन पर सवाल उठ सकते थे। सूत्रों का कहना है कि राज्य ब्यूरो के सदस्य अब संजय गुप्ता के सामने इस पूरे प्रकरण को रखेंगे।

कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी सुनाई बातों और चर्चाओं पर आधारित होती हैं. इसलिए इन पर भरोसा करने से पहले तथ्यों की अपने स्तर पर खुद जांच पड़ताल कर लें.

b4m 5thbday : भड़ास के कार्यक्रम में लोगों की उपस्थिति को अगर प्रगति का पैमाना माना जाए तो…

Sanjaya Kumar Singh : bhadas4media.com के कार्यक्रम की खासियत यह होती है कि लोग आते-जाते रहते हैं। यानी कार्यक्रम में शामिल लोगों की संख्या हॉल की क्षमता से ज्यादा होती है। मैं पिछले साल यानी चौथी सालगिरह पर भी मौजूद था और तब अपेक्षाकृत छोटे हॉल में मैंने ऐसा महसूस किया था।

इस बार बड़े हॉल में भी यही स्थिति थी। इस एक साल में भड़ास के कार्यक्रम में लोगों की उपस्थिति को प्रगति का पैमाना माना जाए तो मुझे लगता है कि यह पिछले चार साल की कुल प्रगति से ज्यादा रही है और इसका श्रेय अन्य सभी चीजों के साथ निश्चित रूप से यशवंत और अनिल की गिरफ्तारी को जाता है।

आनंद प्रधान का संबोधन ((तस्वीर अविनाश वाचस्पति के फेसबुक वॉल से))
आनंद प्रधान का संबोधन ((तस्वीर अविनाश वाचस्पति के फेसबुक वॉल से))

आगे के लिए यशवंत को मेरी भी वही सलाह है जो अनिरुद्ध बहल दी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया से अगर कुछ सीखने लायक है तो फिल्टरेशन (सफाई-छंटाई) की उसकी व्यवस्था। इसका उपयोग कायदे से किया जाए तो कई फायदे होंगे। और साख मजबूत करने के लिए मेरे ख्याल से भड़ास को अब इसकी जरूरत भी है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


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देहरादून में गैस एजेंसी संचालकों से वसूली करने वाले दो पत्रकार गिरफ्तार

देहरादून। एक चैनल की तरफ से घटतोली के नाम पर गैस एजेंसी संचालकों को ब्लैकमेल करने वाले दो पत्रकारों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस संबंध में गैस एजेंसी संचालकों की तरफ से पुलिस प्रशासन पर लगातार दबाव भी बनाया जा रहा था। कुछ रोज पहले जेएनएन न्यूज चैनल के पत्रकारों ने अमनदीप गैस एजेंसी के कर्मचारियों का वाहन क्लेमनटाउन में उस समय रोक दिया था जब वह यहां होम डिलिवरी करने आये थे।

आरोप है कि इन पत्रकारों ने कुछ सिलेंडरों को उतारकर उसमें से काफी गैस निकाल दी और गैस एजेंसी संचालकों को घटतोली के नाम पर ब्लैकमेल करने लगे किंतु इस दौरान क्षेत्र के कुछ लोगों द्वारा इनकी वीडियोग्राफी कर ली गई और पुलिस प्रशासन को बाकायदा इसकी शिकायत भी की गई। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। दून एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन ने जिला प्रशासन पर उनकी मांगों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए डिलिवरी ठप्प करने की चेतावनी दी। इसके बाद पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश देने लगी। सोमवार को पुलिस ने एक आरोपी के आजाद कालोनी स्थित ठिकाने पर दबिश दी लेकिन वह फरार हो गया जिसके बाद एक युवक को संदेह के आधर पर हिरासत में लेकर उससे पूछताछ के आधर पर ब्लैकमेलिंग, मारपीट व धमकी देने के आरोपी डा. प्रशांत व मुकेश सैनी को पुलिस ने बुधवार की देर रात गिरफ्तार कर लिया।

घटतौली के नाम पर गैस एजेंसी संचालकों से ब्लैकमेलिंग करने के आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन जब मीडिया इनकी कवरेज करने पटेलनगर थाने पहुंची तो यहां मौजूद एसएसआई विनोद गुसाईं ने इन आरोपियों की फोटो कराने से इंकार कर दिया। जब मामला एसपी सिटी व सीओ सदर के कानों में गूंजा तो उन्होंने थाना पुलिस को जमकर फटकार लगाई। पटेलनगर पुलिस ने इन आरोपियों पर पहले हल्की धराओं में मुकदमा दर्ज किया था जिसको लेकर गैस एजेंसी के संचालकों ने कड़ा ऐतराज भी जताया था।

विक्रम श्रीवास्तव द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

एमके वेणु की नई पारी, विनीत जोशी पंजाब सरकार का मीडिया मैनेज करेंगे

एमके वेणु ने द हिंदू अखबार के साथ बतौर एक्जीक्यूटिव एडिटर नई पारी शुरू की है. वेणु फाइनेनशियल एक्सप्रेस के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं. वे अगले महीने अखबार में ज्वाइन करेंगे और द हिंदू के एडिटर, सिद्धार्थ वर्दराजन को रिपोर्ट करेंगे. फाइनेंशियल एक्सप्रेस से पहले वे इकोनॉमिक्स टाइम्स में चीफ एडिटर के बतौर 12 वर्ष तक काम किया. उनका करियर कुल 30 वर्षों का है. वे हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में भी काम कर चुके हैं.

एक अन्य जानकारी के अनुसार भाजपा नेता विनीत जोशी पंजाब सरकार के असिस्टेंट मीडिया एडवाइजर बनाए गए हैं. विनीत जोशी बीजेपी किसान मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. पिछले 25 वर्षों में वे पार्टी के विभिन्न पदों पर सक्रिय रह चुके हैं. जोशी पंजाब, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी के लिए बतौर मीडिया इंचार्ज सेवाएं दे चुके हैं. 2006 में बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की भारत सुरक्षा रथ यात्रा के दौरान वे नेशनल मीडिया इंचार्ज थे.

b4m 5thbday : मैं 5वीं सालगिरह के मौके पर यशवंतजी को मुबारकवाद देता हूँ : ओम थानवी

जब मैं अमर सिंह के भ्रष्टाचार वाले टेप सुनना चाहता था, फौरन मुझे 'भड़ास4मीडिया' की शरण में जाना पड़ा। ऐसे ही राडिया कांड की रिकॉर्डिंग मुझे आसानी से 'भड़ास' पर मिल गयी। पिछले 5 वर्षों में 'भड़ास' ने लम्बा सफ़र तय कर लिया है। मीडिया में इतनी जगह बनाने में बरस लग जाते हैं, वह भी पर्याप्त साधन झोंकने के बावजूद।  जहाँ तक मुझे जानकारी है, यशवंत सिंह काफी समय तक अकेले ही इस उद्यम को स्थापित करने में जुटे रहे। उनका पोर्टल या वेब पत्रिका, कुछ भी नाम दें, हिंदी के मीडियाकर्मियों में अब अपनी अलग पहचान और जगह बना चुका है।

मेरे पुराने सहयोगी शम्भूनाथ शुक्ल ने बताया कि 'भड़ास' को रोज कोई 5 लाख लोग देखते हैं। यशवंत सिंह का कहना है कि प्रतिदिन नौ लाख से लेकर साढ़े बारह लाख तक हिट्स भड़ास4मीडिया के हिस्से में आती है. यह अपने आपमें एक उपलब्धि भरा आंकड़ा है। मुझे नहीं ख्याल पड़ता कि पहले मीडिया जगत की हलचल और मीडियाकर्मियों की आवाजाही को इतनी तवज्जो कहीं मिला करती होगी। इक्की-दुक्की पत्रिकाएं मीडिया को लेकर निकलती हैं, लेकिन उनमें आम मीडियाकर्मियों की गतिविधियों को कोई जगह नहीं मिल पाती। 'भड़ास' में यह जगह पर्याप्त होती है और निरंतर ये गतिविधियाँ अपडेट होती रहती हैं।

मैं 5वीं सालगिरह के मौके पर यशवंतजी को मुबारकवाद देता हूँ और उनकी  उत्तरोतर सफलता की कामना करता हूँ। यशवंत सिंह अच्छा गाते भी हैं। कितना अच्छा हो 5वीं सालगिरह के मौके पर अपनी बुलंद आवाज में कोई ओजस्वी कविता 'भड़ास' पर पोस्ट कर दें। 5वीं सालगिरह की अनुगूंज शब्दों में ही नहीं, स्वरों में भी दूर-दूर तक पहुंचनी चाहिए।

ओम थानवी

संपादक
जनसत्ता
हिंदी दैनिक


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असगर अली इंजीनियर ने कहा था- कलम का सौदा करने वाला कभी लेखक नहीं हो सकता

बेगूसराय : प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े लेखक व चिंतक असगर अली इंजीनियर के असामयिक निधन से बेगूसराय स्थित गोदरगावां का विप्लवी पुस्तकालय परिवार मर्माहत है। पांच वर्ष पूर्व यहाँ पुस्तकालय के वार्षिकोत्सव सह प्रलेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में वे यहाँ आये थे। इनका कथन ‘मैं पहले भारतीय हूँ तब मुसलमान’ सुनकर लोगों ने इन्हें मुबारकवाद दी थी। आज भी इनके ये शब्द  जनमानस के हृदय में गूंजते हैं उन्होंने कहा था कि ‘कलम का सौदा करने वाला कभी लेखक नहीं हो सकता’।

उन्होंने यहाँ हर्ष व्यक्त किया था कि बिहार के एक छोटे से गांव गोदरगावां में प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन हो रहा है। यह पहला मौका है जब बड़े शहरों में होने वाला अधिवेशन एक गांव में हो रहा है। इसे मैं ऐतिहासिक मानता हूँ। यहां जो लेखक साथी आये हैं गांव की जुबान में अपनी बातें उन तक पहुंचायें। उन्होंने कहा था- अगर लेखक सच न बोले, लेखक मूल्यों से समझौता कर ले तो इससे बढ़कर खतरनाक चीज इस देश के लिए कोई और नहीं हो सकती। मैं उसी को लेखक मानता हूँ जो कभी मूल्यों से समझौता न करे। ये बातें दिवंगत असगर साहब की शोक सभा में बिहार प्रलेस महासचिव राजेन्द्र राजन ने कही।

विप्लव पुस्तकालय के सचिव आनन्द प्र. सिंह ने कहा कि असगर अली इंजीनियर महान विचारक, साम्प्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता के घनघोर विरोधी थे। बोहरा सम्प्रदाय से जुड़कर इन्होंने कट्टरपंथियों के विरूद्ध आजीवन संघर्ष किया। कई बार इनके ऊपर जानलेवा हमले भी हुए। हम इन्हें शत शत नमन करते हैं। विप्लवी पुस्तकालय में आयोजित इस शोक सभा में उपस्थित लोगों ने असगर अली के निधन को अपूरणीय क्षति बताया। इस अवसर पर बिहार प्रलेस के कई कार्यकर्ता व रचनाकर्मी मौजूद थे। इस शोकसभा की अध्यक्षता रमेश प्र. सिंह ने की। मधेपुरा से आये कवि अरविन्द श्रीवास्तव, विप्लवी पुस्तकालय के मीडिया प्रभारी मनोरंजन विप्लवी, पुस्तकाध्यक्ष अगम विप्लवी, प्रवीण कुमार आदि ने भी अपने-अपने विचार रखें। इस अवसर पर बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के रचनाधर्मी मित्रों यथा डा. खगेन्द्र ठाकुर, कर्मेन्दु शिशिर, संतोष दीक्षित, डा. पूनम सिंह, कवि शहंशाह आलम, राजकिशोर राजन, विभूति कुमार आदि ने अपने शोक संवेदना संदेश भेजकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की..

अरविन्द श्रीवास्तव

(मधेपुरा)

बिहार प्रलेस

मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता

मोबाइल – 9431080862.

नदीम का जाना : संजय गुप्ता के सवाल का जवाब नहीं तलाश पा रहे हैं रामेश्वर पांडे और दिलीप अवस्थी

दोनों सूचनाएं सच साबित हुईं. भड़ास ने बताया कि नदीम तोड़ने जा रहे हैं दैनिक जागरण से 20 साल पुराना अपना नाता. फिर बताया कि नदीम बन गए हैं नभाटा के असिस्‍टेंट एडीटर. दोनों बातें सच साबित हुईं. अब जल्द ही आपको भड़ास बतायेगा कि नदीम के जागरण छोड़ने पर वहां शीर्ष स्‍तर पर किस तरह मची गई जंग? क्‍यों जागरण छोड़ा नदीम ने? संजय गुप्‍ता के इस सवाल का जवाब नहीं तलाश पा रहे हैं रामेश्‍वर पांडे और दिलीप अवस्‍थी। अपनी अपनी कुर्सी बचाने को किस तरह नदीम को दैनिक जागरण में रोकने की हो रही हैं कोशिश? नदीम न रुके तो क्‍या दिलीप अवस्‍थी को हटाया जा सकता है लखनऊ से? दिल्‍ली की एक लाबी जुट गई है इस मुहिम में….

पूरा विश्लेषण जल्द… बस, पढ़ते रहिए भड़ास…. क्योंकि भड़ास की एक-एक मीडिया संस्‍थान पर 24×7 रहती है नजर. जो हम कहते हैं, वही होता है सच. कौन कहता था कि नदीम छोड़ देंगे दैनिक जागरण, लखनऊ. दोनों एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे. दोनों के दरम्‍यान विश्‍वास का हिमालय पर्वत. लेकिन भड़ास ने अगर नदीम के दैनिक जागरण छोड़ने की खबर ब्रेक की तो उसकी वजह बस यही थी कि हम सच्ची बात करते हैं. हम अपनी जिम्‍मेदारी निभाते हैं.  मीडिया जगत पर हमारी रहती है 24×7 नजर. कुछ भी हमसे बच नहीं सकता… इसलिए पढ़ते रहिए भड़ास….
 

हिंदी दैनिक राष्ट्रीय प्रस्तावना से जुड़े वाराणसी के कई पत्रकार

राष्ट्रीय प्रस्तावना से वाराणसी के कुछ पत्रकार जुड़े हैं जिन्हें पूरे पूर्वांचल का जिम्मा दिया गया है। राष्ट्रीय प्रस्तावना हिंदी दैनिक लखनऊ से प्रकशित अखबार है जिसका कार्यालय वाराणसी में खोला गया है। जानकारी के मुताबिक रामसुंदर मिश्र को पूर्वांचल प्रभारी का पद दिया गया है। वहीं कृष्ण कुमार उपाध्याय को पूर्वांचल का ब्यूरो बनाया गया है। विभांशु यादव को वाराणसी का ब्यूरो तथा विजेन्द्र मिश्र को वाराणसी का प्रमुख संवाददाता नियुक्त किया गया है।

मीडिया से जुड़ी सूचनाएं भड़ास तक आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

भाजपा के मीडिया प्रभारी श्रीकांत शर्मा की होगी छुट्टी!

भारतीय जनता पार्टी के अंदर दो प्रकार की मीडिया काम कर रही है। एक संगठन के प्रचार-प्रसार मे लगी है तो दूसरी तरफ कुछ नेतावों के लिए मीडिया सेल का उपयोग हो रहा है। सूत्रों की माने तो पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और संगठन इस गतिविधि से नाराज और परेशान है। उमा भारतीय ने 2006 मे सार्वजनिक रूप से पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराई थी कि पार्टी मे “डी ब्रीफ़िंग” करने वाले नेतावों पर अंकुश लगाया जाए।

2009 लोकसभा चुनाव मे भी मीडिया प्रवंधन पर प्रश्न उठा था। और अब पुनः मीडिया सेल द्वारा खबरे प्रायोजित किया जा रहा है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है मीडिया प्रबंधन पिछले लोकसभा मे पार्टी के हार मे मीडिया भी एक कारण रहा और अब झारखंड ,उतराखंड ,हिमाचल और कर्नाटक से बीजेपी बाहर हो गई । ऐसे मे मीडिया को दोष देकर नेता गण अपनी जीमेद्दारी से बचेंगे । और यदि यह सच है तो मीडिया सेल मे प्रमुख लोगो को हटा कर ऐसे लोगो को लाने की जरूरत है जो पार्टी के लिए काम करे न की कुछ खास नेता की खिदमत मे लगे रहे । वैसे राजनीति मे किसी न किसी को अपना 'गॉड फादर ' बनाने की आज आधुनिक परंपरा बनी है परंतु आज जरूरत है विचारधारा के लिए कम करने की । संघ विचारक एम.जी वैध ने कुछ मास पहले यह कहा था की नितिन गडकरी के खिलाफ पार्टी के अंदर ही षड्यन्र्त्र रचा गया था और यह षड्यंत्र मीडिया सेल के एक प्रमुख व्यक्ति ने खबर प्लांट काया था । सूत्रों के कथना अनुसार जल्द ही राजनाथ सिंह मीडिया सेल की घोषणा करने वाले है और अपने विश्वसनीय लोगों को यह जीमेद्दारी देंगे अनुभवी और मिलनसार हो न की दूसरे नेतावों के खिदमद मे काम करे।

सौरभ मालवीय के फेसबुक वॉल से

राहुल गौतम को मिलेगा ‘कला-साहित्य पत्रकारिता’ सम्मान

जयपुर । ख्यातनाम मरहूम सितार वादक पं. रघुवीरशरण भट्ट की स्मृति में 19 मई, रविवार को शाम 7 बजे अलवर के प्रताप बास स्थित होटल निर्वाणा पैलेस में शास्त्रीय संगीत की सांझ संजोयी जाएगी। जिसमें कला और साहित्य के क्षेत्र में वर्षों से लेखन कर रहे पत्रकार एवं पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राहुल गौतम को कला-साहित्य पत्रकारिता सम्मान से नवाजा जाएगा। कार्यक्रम संयोजक पं. हरिहरशरण भट्ट ने बताया कि 'पं. रघुवीरशरण भट्ट स्मृति संगीत एवं सम्मान समारोह' में भारत रत्न मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के पौत्र उस्ताद फतेहअली खान का शहनाई वादन होगा।

उन्होंने बताया कि इस सुरों से लबरेज संध्या में राजस्थान की शान मांड सम्राट पं. चिरंजीलाल तंवर का गायन, पं. रमेश मेवाल का गायन होगा। कार्यक्रम के सहसंयोजक एवं होटल निर्वाणा पैलेस के मालिक पृथ्वीराज मील ने बताया कि समारोह का आगाज पं. रघुवीरशरण भट्ट के पौत्र गौरव भट्ट के गायन से होगा। इसी शृंखला में बनारस के गायक अरुण कुमार अस्थाना का गायन होगा। जयपुर घराने के लब्ध प्रतिष्ठित नृत्यगुरु पं. गिरधारी महाराज के पुत्र पं. कौशलकांत पंवार के निर्देशन में सौम्या श्रीवास्तव का शुद्ध कथक नृत्य होगा। कथक नृत्य में पढंत नमिता जैन करेंगी। तबले पर पं. महेंद्र शंकर डांगी, पखावज पर अश्विनी पानित्रय संगत करेंगे। सहसंयोजक पं. बृजभूषण भट्ट ने बताया कि इस अवसर पर विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली शख्सियतों को सम्मानित किया जाएगा। जिसमें शहनाई वादन के क्षेत्र में उस्ताद फतेहअली खान, मांड गायन के क्षेत्र में पं. चिरंजीलाल तंवर, कथक के क्षेत्र में पं. कौशलकांत पंवार को भी सम्मानित किया जाएगा।

बुद्धिमानों की सबसे बड़ी सजा यह होती है कि वे बुरे लोगों का शासन झेलें

: कांग्रेस के सेल्फ-गोल का नया नमूना है दिग्विजय-कपिल का न्यायपालिका पर आक्षेप : कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में यूपीए-2 का शासन लगभग अवसान पर है. भ्रष्टाचार, कुशासन और संस्थाओं को तोड़ने-मरोड़ने के आरोपों के बीच इसके दो नेताओं – दिग्विजय सिंह और मंत्री कपिल सिब्बल में सेल्फ-गोल की अदभुत क्षमता है. दोनों ने अबकी बार सुप्रीम कोर्ट को अपने निशाने पर लिया है –कुतर्कों के सहारे.

दिग्विजय का कहना है कि सर्वोच्च न्यायलय ने अपनी टिप्पणियों के ज़रिये (तोता प्रकरण) सीबीआई जैसी संस्था का मनोबल नीचा किया है जबकि सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया है कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास और मजबूत करना होगा. मतलब यह कि फिलवक्त न्यायपालिका में जन-विश्वास अपेक्षित नहीं है. तर्क-शास्त्रीय रूप से इसका मतलब यह भी है कि कार्यपालिका और विधायिका में जनता का अपेक्षित विश्वास ज्यादा है.

क्या दोनों नेताओं का कथन हास्यास्पद नहीं है? सीबीआई का मनोबल तब गिरता है जब कमरे में बुलाकर मजमून बदलवाए जाते हैं और तब भी जब भ्रष्टाचार का आरोप दो-दो मंत्रियों पर ही नहीं परोक्ष रूप से कार्यपालिका के सर्वोच्च पद -प्रधान मंत्री- पर लगता है. सिब्बल ने यह भी कहा कि कानून की प्रक्रिया आर्थिक विकास में बाधक नहीं होनी चाहिए. मतलब कि न्यायपालिका वर्तमान आर्थिक विकास की नीतियों में बाधक है. यानि राजा हो या बंसल, इन्हें खुली छूट होनी चाहिए “आर्थिक विकास” करने देने की.  

कोई ढाई हज़ार साल पहले विख्यात दार्शनिक प्लेटो की ताकीद थी “बुद्धिमानों की सबसे बड़ी सजा यह होती है कि वे बुरे लोगों का शासन झेलें क्योंकि उन्होंने स्वयं शासन में भाग लेने से इनकार किया”. गाँधी ने इसे प्रकारांतर से कहा-  “आप जिस तरह की दुनिया चाहते हैं उसके लिए स्वयं अपने को बदलें”.

इस प्रजातंत्र के मंदिर –लोक सभा– में ५४३ सदस्यों में १६३ आपराधिक मुकदमों में फंसे हैं. ये लोग बन्दूक के बल पर नहीं आ गए हैं. ये जनता द्वारा चुने गए हैं. इनमें १०३ पर गंभीर किस्म के आरोप हैं और इनमे से ७४ पर जघन्य (हीनस) किस्म के. “एथिक्स” शब्द यूनानी मूल शब्द “एथिकोस” से बना है जिस का मतलब होता है “आदत से पैदा हुआ”. शायद हमारी आदत बदल गयी है. अन्यथा ९० वें दशक के पूर्वार्ध में हवाला काण्ड में केंद्र के सात मंत्री और एक नेता विरोधी दल (लोक सभा) एक झटके में इस्तीफा न देते. मामले का नतीजा अदालत में सिफर इसलिए रहा कि सी बी आई ने जांच में “अपेक्षित साक्ष्य” नहीं दिए और जिसके लिए सर्वोच्च न्यायलय ने सन १९९७ में सी बी आई को कड़ी फटकार हीं नहीं लगायी. इसे सीधे केंट्रीय सतर्कता आयोग के अधीन काम करने को कहा और व्यापक दिशा- निर्देश भी दिए.

यह फैसला अपने आप में कानून की ताक़त रखता था. लेकिन चूंकि सत्ता पक्ष की आदत राज्य अभिकरणों को अंगूठे के नीचे रखने की थी इसलिए सर्वोच्च न्यायलय के फैसले को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया. नैतिकता का पैमाना भी इस दौरान बदल गया इसलिए वह क़ानून खोजा जा रहा है जिसके तहत सरकार के कानून मंत्री को हीं नहीं आरोप में घिरे कोयला मंत्रालय और प्रधान मंत्री कार्यालय को भी यह अधिकार हो कि सी बी आई को आदेश दे सके. सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के बावजूद  सी बी आई भी वहीं, संस्थाएं भी वहीं और समूची सरकार भी वहीं और ज़ाहिरन प्रधानमंत्री भी वहीं. बल्कि दोनों मंत्रियों ने सुप्रीम कोर्ट पर हीं आक्षेप लगाने शुरू कर दिए.

“आदत से पैदा हुआ  भ्रष्टाचार” हमरे खून में  शुरूआती दौर के “रिटेल  में भ्रष्टाचार” से बढ़ सिस्टमिक भ्रष्टाचार” बनकर दौड़ता रहा. यह जीवन-पध्यती बन गया. भारत सरकार की २००७ की “शासन में नैतिकता” सम्बन्धी रिपोर्ट में इसे “कोल्युसिव” (मिलजुल कर) भ्रष्टाचार की संज्ञा दी. आज़ादी के प्रारंभ के कुछ दशकों तक यह भ्रष्टाचार “कोएर्सिव” (भयादोहन) के रूप में रहा जिसके तहत कमजोरों या गरीबों से उनके सही काम करने के पैसे लिए जाते थे यह कह कर कि “नहीं करेंगे तो क्या कर लोगे”.

बाद में जब सत्ता के हाथ में “विकास” का कार्य आ गया और बजट के माध्यम से लाखों करोड़ रुपये आने लगे तो अफसर-नेता गठजोड़ को लगा “क्या मिलता है भोली-भाली जनता से चार-चार पैसे लूटने में और फिर हल्ला भी ज्यादा होता ”. और तब जन्म हुआ “कोल्युसिव” (मिल-जुल कर) किस्म के भ्रष्टाचार का. २-जी, सी डब्ल्यू जी, कोयला घोटाला इसी अफसर-नेता कोल्युसिव ज्ञान की उपज हैं. इस किस्म के भ्रष्टाचार में एक कमजोर या गरीब व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा समाज हीं परोक्ष रूप से प्रभावित होता है लेकिन इसमें कोई एक व्यक्ति नहीं शिकार होता. चूंकि नार्थ ब्लाक के कार्यालय में (जहाँ परिंदा भी पर नीहें मार सकता) डीलें होती है इसलिए गवाह नहीं होता. हमारी अपराध न्याय प्रणाली गवाह, व साक्ष्य पर आधारित है और जज सत्य का खोज नहीं बल्कि अंपायर का काम ज्यादा करता है इसलिए भ्रष्टाचारी  मंत्री को मौका मिलता है “दूध का दूध” का जुमला फेंक कर पद बने रहने का.

सुशासन के सिद्धांतों में एक के अनुसार नैतिक मान-दंड अगर संस्थाओं का बल ना मिले तो धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं. चूंकि भारत का भ्रष्टाचार नए स्वरूप — कोल्युसिव – में फलने–फूलने लगा अतः यह ज़रूरी हो गया कि इन संस्थाओं को पंगु बनाया जाये. ये पंगु होंगे तो नैतिक मान-डंडों को सहारा देने वाला कोई नहीं होगा. नतीज़तन जजों को, आई बी और सी बी आई निदेशकों को, “बात-मानने के लिए विश्वसनीय” अफसरों को रिटायरमेंट के बाद पांच साल के लिए घोड़ा-गाडी और लाल-बत्ती के साथ हीं मोटी आय की व्यवस्था की जाने लगी. जब सर्वोच्च अदालत ने हवाला फैसले में “सिंगल डायरेक्टिव” (जिसके तहत सीबीआई संयुक्त सचिव या ऊपर के अधिकारी के खिलाफ जांच के पहले सरकार से अनुमति लेनी होती है) को गैर-कानूनी बताया तो तत्कालीन संसदीय समिति ने फिर से सी वी सी विधेयक में दुबारा इस प्रावधान को ला कर २००३ में कानून बना दिया. सी बी आई फिर दन्त –विहीन संस्था हो गयी. मायावती के खिलाफ जांच के लिए सी बी आई की अपील पर तत्कालीन राज्यपाल ने अनुमति नहीं दी.   

हमने आज़ादी मिलने  के साथ हीं व्यापक तौर  पर ब्रिटेन के प्रजातंत्र व प्रशासनिक व्यवस्था का अनुकरण किया. लेकिन उनके समाज का “एथिक्स” या “आदत से पैदा हुई नैतिकता”  और हमारी  “आदत से पैदा हुई नैतिकता में फर्क था और है. एक उदाहरण लें. कुछ साल पहले टोनी ब्लेयर की सरकार के दो मंत्रियों को महज इस आरोप पर इस्तीफा देना पड़ा कि एक मंत्री के कार्यालय से एक फ़ोन किया गया था जिसमें मंत्री के बच्चे की आया (दाई) को वीसा जल्दी देने की सिफारिश की गयी थी और दूसरे मंत्री के कार्यालय से यह सिफारिश की गयी थी कि एक व्यक्ति को जो सरकार के एक जनोपयोगी कार्यक्रम में चंदा देता था, उसे ब्रिटेन की नागरिकता दे दी जाये. इन मंत्रियों ने ना तो “दूध का दूध , पानी का पानी” होने का या जांच रिपोर्ट का इंतज़ार किया ना हीं “अंतिम अदलत के फैसले का”, ना हीं “मैं स्वयं किसी भी जांच के लिए तैयार हूँ “ का भाव ले कर देश की छाती पर मूंग दलते रहे.

६२ साल पहले नेहरु ने एचजी मुद्गल को ना केवल संसद सदस्यता से निकाला बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि यह इस्तीफ़ा दे कर ना निकलने पाए. मुद्गल पर आरोप इतना ही था कि  उन्होंने पैसे लेकर सर्राफा व्यापारियों के लिए संसद में सवाल पूछा था. इन ६२ सालों में देश का जीडीपी बढ़ता गया, कारें बढती गयीं और आदतों से पैदा हुए नैतिकता का अवसान हुआ, तज्जनित भ्रष्टाचार भी बढ़ता गया. “भारत महान” के कर्णभेदी नारे में गरीब की चीत्कार दबती रही. शासन की गुणवत्ता तिरोहित होती गयी. आज ज़रूरत है कि अच्छे लोग शासन प्रक्रिया से भागें नहीं बल्कि भाग लें ताकि बुरे लोगों को इससे छुटकारा दिलाया जा सके.

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हो चुका है.

हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा- सीआईडी, सतर्कता आदि को सरकार से मुक्ति क्यों नहीं?

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता नूतन द्वारा उत्तर प्रदेश के विभिन्न अन्वेषण एजेंसियों की जांच प्रक्रिया में सरकार के नियंत्रण को समाप्त किये जाने सम्बंधित पीआईएल में आज इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार से आठ सप्ताह में अपना विस्तृत प्रतिशपथ पत्र दायर करने को कहा है.

चीफ जस्टिस शिव कीर्ति सिंह और जस्टिस डी के अरोड़ा की बेंच ने आदेशित किया कि सरकार अपने जवाब में याचिका के उस हिस्से पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करे जिसमे यह प्रार्थना की गयी है कि इन अन्वेषण एजेंसी, जिन्हें याचिका में श्रेष्ठ अन्वेषण एजेंसी कहा गया है, को अपनी जांच समाप्त करने के बाद राज्य सरकार से अनुमति लेने के बजाय सीधे कोर्ट में अपना आरोपपत्र दायर करने का अधिकार मिले.

अमिताभ ने अपने बहस में कहा कि सतर्कता अधिष्ठान, सीबी-सीआईडी, ईओडब्ल्यू एसआईबी को-ऑपरेटिव तथा एसीओ अपराधों का अन्वेषण और जांच दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार करते हैं, जिसमे पूरा दायित्व और अधिकार अन्वेषण अधिकारी और उसके वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को हैं. इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में जांच शासन को सौंपी जाती है और वे ही इन पर अंतिम निर्णय करते हैं.

राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता बुलबुल गोदियाल ने कोर्ट को बताया कि दिसंबर 2012 में डीजी, ईओडब्ल्यू द्वारा विवेचना के बाद अपनी रिपोर्ट सीधे कोर्ट में दाखिल करने की अनुमति मांगी गयी है जिस पर शासन विचार कर रहा है. उन्होंने कहा कि शासन याचीगण द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर सकारात्मक ढंग से विचार करेगा.

In the Hon’ble High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench, Lucknow

Writ petition No- 4055 of 2013 (PIL-Civil)

Amitabh Thakur and another    Petitioners

Versus

State of UP and others     Respondents
                 LIST OF DATES AND EVENTS

S No  Date     Event  

    1860    Police Act promulgated
    1888    Rudimentary form of CBCID
    1965    Vigilance Act promulgated
    1973    CrPC 1973 promulgated
    1970s till date   various Investigative agencies formed

Uttar Pradesh has various premier investigative and anti-corruption agencies which are presently being forced to send the progress report of their investigations and enquiries to the State government which is against the provisions of criminal law and are also against the spirit of professionalism. This also creates a situation where the State government has all the powers with no statutory responsibilities. In similar questions related with Central Bureau of Investigation, the Hon’ble Supreme Court in Vineet Narain vs Union of India and others has very clearly stated that the investigative agency cannot remain under the investigative control of the executive. Based on all these facts and the current situation in UP, there seems to be an immediate need to get these investigative agencies away from the improper and illegal control of the State government as regards its intervention in the investigative process.

Hence this Writ Petition.       

         

Lucknow                                                               Amitabh Thakur
Dated-      13/05/2013                                          Petitioner in Person              # 94155-34526

 

 

In the Hon’ble High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench, Lucknow

Writ petition No- 4055 of 2013 (PIL-Civil)

 

 

 

 

 

 

 

 

    Amitabh Thakur, aged about 45 years, s/o Sri T N Thakur r/o 5/426, Viram Khand, Gomti Nagar, Lucknow
    Dr Nutan Thakur, aged about 40 years, w/o Sri Amitabh Thakur r/o 5/426, Viram Khand, Gomti Nagar, Lucknow——–         Petitioners

Versus

    State of Uttar Pradesh through Principal Secretary, Vigilance, Civil Secretariat, Lucknow
    State of Uttar Pradesh through Principal Secretary, Home and Confidential section (Gopan), Civil Secretariat, Lucknow
    Uttar Pradesh Vigilance Establishment through Director, UP Vigilance Establishment, Gomti Nagar, Lucknow
    Crime Branch-Criminal Investigation Department through Additional Director General, CB-CID, Gomti Nagar, Lucknow
    Economic Offences Wing through Additional Director General, Economic Offences Wing, Indira Bhawan, Lucknow
    Anti Corruption Organization through Additional Director General, Anti Corruption Organization, Indira Bhawan, Lucknow
    Special Investigation Branch, Cooperative  through Additional Director General, SIB, Cooperative, Gomti Nagar, Lucknow
    Director General of Police, Uttar Pradesh, Lucknow ——– Respondents

Writ Petition under Article 226 of the Constitution of India

To,

The Hon’ble Chief Justice and His other Hon’ble companion Judges of the aforesaid Court:

The humble petition of the above named petitioner most respectfully begs to submit as under:

    That by means of this petition, the petitioners are invoking the extra ordinary jurisdiction of this Hon’ble Court vested with it through Article 226 of the Constitution to file this Public Interest Litigation (PIL) with a prayer to kindly issue a writ of mandamus to the Respondents No 3(Uttar Pradesh Vigilance Establishment- Vigilance, for short), 4 (Crime Branch, Criminal Investigation Department-CBCID for short) , 5 (Economic Offences Wing- EOW, for short), 6 (Anti Corruption Organization- ACO, for short) and 7 (Special Investigation Branch, Cooperative- SIB, for short), the various premier anti-corruption and specialized criminal investigating agencies of the State of Uttar Pradesh, directing them in future to ensure complete independence of investigations and criminal enquiries conducted by them solely as per the provisions of criminal laws and the Police Act 1861, specially in the light of the order of the Hon’ble Supreme Court in Vineet Narain & Others vs Union Of India & Another (AIR 1998 SC 889, 1998CriLJ1208, (1998) 1SCC 226) and Writ Petition (Crl.) No(S). 120 of 2012 (Manohar lal Sharma vs Union of India) and others, so as to take all the professional decisions as regards the investigations and enquiries done by them as provided to them under the various provisions of law at their end and thus not to submit their investigation and criminal enquiry reports before their respective administrative departments- Vigilance Department, respondent No 1 (for Vigilance) and Home Department, respondent No 2 (for CBCID, EOW, ACO and SIB) for perusal and approval of their investigations and enquiries as is being done presently. The petitioners accordingly pray to kindly issue a writ of mandamus to Vigilance Department and Home Department of the Uttar Pradesh Government (respondents No 1 and 2) directing them to immediately stop the current practice of calling the investigations and criminal enquiries of Vigilance, CBCID, EOW, ACO and SIB for their perusal and approval and for issuing directions and instructions from time to time as regards the investigation and enquiry process as is being done presently and in the process to kindly summon all such orders/directions/government memorandums/GOs passed by the Uttar Pradesh Government till date through which instructions have been issued by the State Government to these premier criminal and anti-corruption agencies to submit their investigations and criminal enquiries to the State Government for their perusal and final approval, before this Hon’ble Court and to quash them as being against the provisions of law and as being against the interest of justice and wider public/societal interest.

The petitioners declare that they have not filed any other Writ petition before the Hon’ble Supreme Court and this Hon’ble Court either at Allahabad or its Lucknow bench pertaining to the subject matter and/ or for the relief prayed for in the instant writ petition. It is further declared that in respect of the same subject, no caveat notice has been received by the petitioners. They also declare that to the best of their knowledge and their search, there is no other such Writ Petition/PIL as regards the above issues being presented through this Writ Petition pending anywhere either in the Hon’ble Supreme Court or before this Hon’ble Court, as far as the petitioners know.

    That this is a Public Interest Litigation (PIL) being filed to immediately ensure complete independence of the premier criminal investigation and anti-corruption agencies of the State of Uttar Pradesh from various administrative controls as being against the letter and spirit of criminal laws and as being detrimental to the true professionalism of these criminal investigation and anti-corruption agencies. The purpose is also to get these criminal investigation and anti-corruption agencies freed from such administrative controls which have all the power to control and guide investigations and criminal enquiries without any accompanied responsibilities/accountabilities.
    That the PIL is being filed in the wake of the recent happenings at the national level where the famous words of the Hon’ble Supreme Court-“It's a sordid saga that there are many masters and one  parrot” as regards the functioning of the Central Bureau of Investigation is being discussed all over the country while the situation possibly is much much worse in the State of Uttar Pradesh where all the premier investigative agencies of the State seem to be under complete functional control of all the State government as can be seen from the recent newspaper reports of the Vigilance having completed its enquiry/investigation as regards nine ex-ministers of the Uttar Pradesh government and having submitted its reports to the Vigilance Department for its approval and directions. The PIL is also a result of the personal experience of Petitioner No 1 while serving as SP, CBCID, Lucknow in 2000-2001 and recently as SP, EOW, Meerut in 2011.
    That Black's Law Dictionary (6th Edition) defines public interest as: “Something in which the public, the community at large has some pecuniary interest, or some interest by which their legal rights or liabilities are affected. It does not mean anything so narrow as mere curiosity, or as the interests of the particular localities, which may be affected by the matters in question. Interest shared by citizens generally in affairs of local , state or national Government ".
    That similarly, an American journalist Walter Lippman in The Public Philosophy (1955) wrote, "Public interest is generally taken to mean a commonly accepted good. Public interest may be presumed to be what men would choose if they saw clearly, thought rationally, acted disinterestedly and benevolently"
    That it can be easily seen that the issue being presented is associated with compliance of the provisions of law and for better and more professional investigation of serious criminal and corruption related cases in Uttar Pradesh. The matter concerns every person of the State and is also related with the Rule of law.
    That in S.P. Gupta vs President of India and ors. (AIR 1982 SC 149, 1981 Supp (1) SCC 87, 1982 2 SCR 365) the Hon’ble Supreme Court said that-“The view has therefore been taken by the Courts in many decisions that whenever there is a public wrong or public injury caused by an act or omission of the State or a public authority which is contrary to the Constitution or the law, any member of the public acting bona fide and having sufficient interest can maintain an action for redressal of such public wrong or public injury. The strict rule of standing which insists that only a person who has suffered a specific legal injury can maintain an action for judicial redress is relaxed and a broad rule is evolved which gives standing to any member of the public who is not a mere busy-body or a meddlesome interloper but who has sufficient interest in the proceeding. There can be no doubt that the risk of legal action against the State or a public authority by any citizen will induce the State or such public authority to act with greater responsibility and care thereby improving the administration of justice.”
    That the petitioners would beg to state that in the particular matter being presented, there is a public wrong and public injury caused due to the commissions and omissions of the Respondents which is contrary to the Constitution and the law as envisaged in various Statutes, is against the concept of responsibility and accountability and is also against the larger public interest. Hence the petitioners, as a public acting bona fide and having sufficient interest in the matter as public spirited persons and working in the field of transparency and accountability in governance approach this Hon’ble Court in the form of this PIL.
    That they also want to respectfully beg that they are not a mere busy-body or a meddlesome interloper, but citizen of India who work deeply and sincerely in the field of transparency and accountability in Governance and hence they seem to have sufficient interest and genuine rights to approach this Hon’ble Court through this PIL.    
    That in Janata Dal vs H.S. Chowdhary And Ors (AIR 1993 SC 892, 1993 CriLJ 600), the Hon’ble Supreme Court said-“The dominant object of PIL is to ensure observance of the provisions of the Constitution or the law which can be best achieved to advance the cause of community or disadvantaged groups and individuals or public interest by permitting any person, having no personal gain or private motivation or any other oblique consideration but acting bona fide and having sufficient interest in maintaining an action for judicial redress for public injury to put the judicial machinery in motion like actio popularize of Roman Law whereby any citizen could bring such an action in respect of a public delict.”
    That the petition being presented here satisfies all the deliberations presented by the Hon’ble Supreme Court in Janata Dal (supra) because here the sole object is to ensure observance of the provisions of the law and to ensure wider public interest. There obviously is no personal gain or private motivation or any other oblique consideration with the petitioners but acting bona fide and having sufficient interest in maintaining an action for judicial redress for public injury to put the judicial machinery in motion.
    That the petitioners would beg to humbly state that they shall be presenting all the relevant facts related with themselves, their particulars, their past works, their concerns and their credentials. The petitioners make it amply clear that their objective here is not to malign any particular individual or legal entity. The sole purpose is to bring the extremely serious facts before the notice of this Hon’ble Court so that suitable legal action is initiated in this case.
    That this being a PIL, in pursuance of Rule 1, subrule (3A) of Chapter XXII of the Allahabad High Court Rules 1952 the petitioners find it relevant to present some facts regarding their own credibility. Petitioner no 1 is an officer of the Indian Police Service, Uttar Pradesh Cadre though he is filing this Writ Petition in his individual capacity as a concerned citizen of this Nation. He is also concerned with various social issues and has filed WP No 3489 of 2012 (PIL-MB) as regards the role of Intermediaries in the Information Technology Act 2000 and WP No 3153 of 2012 (PIL-MB) as regards the legal and administrative status of the Board of Cricket Control for India (BCCI W P No 7596 of 2012 (PIL- Civil) along with petitioner No 2, his wife. He is also striving for formation of a Unified Police Association for all policemen, right from the Constable to the DGP and filed two Writ Petitions which allege discrimination between superior and subordinate officers in Para Military forces like the PAC, CRPF etc.
    That petitioner No 2 is a social activist and freelance journalist who wants to genuinely and positively contribute to the society in all possible ways. She works primarily in the field of transparency and accountability in governance, Human Rights and assisting in the enforcement of Rule of law. The matter being presented here is primarily related with the enforcement of Rule of law as enshrined in the Constitution of India.  The petitioner has filed a very large number of important Public Interest Litigations which include  WP No 3028 of 2011 (PIL-MB) about exorbitant rise of Airfares during emergency periods, WP No 1361 of 2012 (M/B)  as regards the “Model Code Of Conduct For The Guidance Of Political Parties And Candidates” issued by the Election Commission of India,  WP No 1061 of 2013 (M/B) where she challenged the appointment process of various State Government Commissions etc including the way Sri K C Pandey was made the Vice Chairman of Ganna Sansthan despite being an accused in a very serious case, PIL No 1587 of 2013 for enforcement of the Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 which has been enacted to safeguard the interests of the hapless and helpless children who become victims of sexual abuse etc. She recently filed a PIL No 2717 of 2013 for formation of Child Commission in Uttar Pradesh.
    That in pursuance of the above Rule 1(3A) of the High Court Rules, the petitioners state that the public cause they are seeking to espouse through this Writ Petition is to insure the strict compliance of law whereby the independence of the premier criminal and anti-corruption agencies of the State is ensured and the unwarranted interventions of the State Government, with all powers and no accountability, gets ended.
    That the petitioners put it on oath that they are not filing this PIL nor have they filed any other PIL for any ulterior motive save the stated one nor have they received a single penny through any backdoor activity while filing these PILs. They state on oath that they have no personal or private interest in the matter and as far as they know there is no authoritative pronouncement by the Hon’ble Supreme Court or this Hon’ble High Court on the specific questions raised though the Hon’ble Supreme Court has made many important pronouncements on related issues of the independence of Central Bureau of Investigation. They put it on oath that the result of the Litigation will not lead to any undue gain to them or anyone associated with them or any undue loss to any person, body of persons or to the State.
    That coming to the matter of the PIL, it is respectfully submitted that the words "cognizable offence", "investigation", "offence" and "police report" have been defined in section 2 of the Code of Criminal Procedure 1973 (CrPC, for short)
    That section 41(1)(a) of the CrPC empowers a police to arrest any person who has been concerned in any cognizable offence, or against whom a reasonable complaint has been made, or credible information has been received, or a reasonable suspicion exists, of his having been so concerned
    That possibly the most important Chapter in the CrPC related to police is Chapter XII as regards- “Information to the Police and their powers to investigate”.
    That section 154 us as regards “Information in cognizable cases” while section 156 and 157 are about the power of any officer in charge of a police station or one of his specified subordinate officers to investigate cognizable cases. Section 158 is as regards the report to be submitted to a Magistrate and the powers of the superior officers to give such instructions to the officer in charge of the police station as he thinks fit as regards the investigation.
    That as per 173(2) of the CrPC-“(i) As soon as it is completed, the officer in charge of the police station shall forward to a Magistrate empowered to take cognizance of the offence on a police report, a report in the form prescribed by the State Government” and as per section 173(3)-“Where a superior officer of police has been appointed under section 158, the report shall, in any case in which the State Government by general or special order so directs, be submitted through that officer, and he may, pending the orders of the Magistrate, direct the officer in charge of the police station to make further investigation,
    That all the above legal provisions are as regards criminal investigations of cognizable offences.
    That other than the investigations of cognizable offences duly registered under the provisions of section 154(1), 154(3) or 156(3) of the CrPC, the investigative agencies mentioned in this Writ Petition, viz., Vigilance, CBCID, ACO, EOW, SIB etc also get “enquiries”. These enquiries, by whatever names they are known in the respective investigative agencies, are in a way against the basic provisions of criminal law because as per section 154(1) of CrPC, every information relating to the commission of a cognizable offence, if given orally to an officer in charge of a police station, shall be reduced to writing and hence all in these so-called enquiries where the subject matter is more often than not, an information relating to the commission of a cognizable offence, before proceeding any further, it should have been reduced in writing as the First Information Report (FIR, for short) and then the matter should have been further taken up in accordance with the provisions of Chapter XII of the CrPC.
    That unfortunately a system has developed where despite there being information relating to the commission of a cognizable offence, the police/investigative agencies do not register the FIR immediately and initially they go for these so-called enquiries and only on the basis of such enquiry reports and their proper assessment/evaluation, an FIR is registered and further investigation undertaken.
    That since this is not the issue being agitated here, the petitioners would not dwell over it any further except saying that even though an FIR is not already registered in these enquiries, yet for all practical purposes these enquiries are conducted in almost the same manner as the investigations carried under the provisions of CrPC, where the investigative agencies treat them in almost like manner as criminal investigations.
    That thus the criminal investigations and the so-called enquiries in allegation/information relating to the commission of a cognizable offence where FIR has not been registered become almost similar in nature and content and may be treated akin.
    That hence even these enquiries need to be treated as being quite identical in nature to the criminal investigation and shall follow the same set of laws as are meant for criminal investigation because except an FIR not being registered in these cases, they have all the form, character and nature of criminal investigation
    That there is also another relevant legal provision stated in section 3 of the Police Act of 1861-"Superintendence in the state Government:- The superintendence of the police throughout a general police district shall vest in and shall be exercised by the State government to which such district is subordinate, and except as authorised under the provisions of this Act, no person, officer or court shall be empowered by the State government to supersede or control any police functionary.”
    That another fact that needs to be kindly seen is that among the five investigative agencies mentioned in this Writ Petition, only one- the Uttar Pradesh vigilance Establishment (Vigilance, for short) has a separate and independent statutory backing, being governed by the Uttar Pradesh vigilance Establishment Act 1965 (Vigilance Act, for short) while the rest of these premier investigative agencies- CBCID, EOW, ACO and SIB have not been created through any statute but through various Government orders at different points of time for various purposes.
    That it is also noteworthy to see that while Vigilance has been treated as a police station as per the Vigilance Act where First Information Reports can be registered, other investigative agencies are not treated as police stations and they do not have the powers to register FIRs. In their cases, either FIRs already registered at various police stations are transferred to these agencies for investigation or in case these agencies find it appropriate after any enquiry on their part that an FIR shall be registered, they get the FIRs registered at the concerned police station- usually as per the territorial jurisdictions.
    That the the Uttar Pradesh Vigilance Establishment as per section 3 of the Vigilance Act- “Constitution and powers of the Vigilance Establishment : (1) Not withstanding anything in the police Act 1861, the State Government may constitute a special police force to be called for the investigation of offences notified under the section 3. (2) Subject to any orders which the State Government may make in this behalf members of the said establishment shall have, in relation to the investigation of such offences and arrest of persons concerned in such offences, all the powers , duties, privileges and liabilities which police officers holding corresponding ranks in the ordinary police force of the State have in connection with investigation of offences and shall for purpose of conferment of powers under any law for the time being in force be deemed to be police officers holding corresponding ranks in the ordinary police force of the State. (3)Any member of the said establishment of or above the rank of Sub Inspector may, subject to any orders which the state Government may make in this behalf , exercise, in discharging his functions under sub section(2), any of the powers of the officer in charge of police station in the area in which he is for the time being and when so exercising such powers shall, subject to any such orders as aforesaid, be deemed to be an officer-in-charge of a police station discharging the functions of such an officer within the limits of his station.”
    That superintendence and administration of the Vigilance Establishment is stated in section 4 of the Vigilance Act-“ (1) The superintendence of the Uttar Pradesh Vigilance Establishment shall vest in the State Government. (2) The administration of the said establishment shall vest in an officer to be called the Director of Vigilance , appointed in this behalf by the state Government, who shall exercise, in respect of that establishment , such of the powers exercisable by the Inspector. General of Police in respect of the ordinary police force of the State as the State Government may specify in this behalf. (3) Save as otherwise provided in this Act the provisions of the Police Act, 1861 and of the rules and regulations made thereunder as the apply in relation to members of the ordinary police force of the State shall apply in relation to members of the said establishment , subject to such adaptations, whether by way of modification , addition or omission as may purposes of the Act.”
    That the State Government passed a Notification No. 4294/XXXIX (2)-33(10-3)-76 Dated 03/09/1977 which stated among other things-“2- The Governor is also pleased to order that the Vigilance Establishment shall submit to the Government in the Vigilance department reports of progress of investigation and on the completion of investigation it shall submit its detailed report embodying its conclusions and recommendations and copies of the proposed charge-sheet, if prosecution is recommended.” A copy of the Vigilance Notification dated 03/09/1977 is being attached as Annexure No 1.
    That the CBCID has its origin in the "Special Branch" which on its creation in 1888 acted under the control of a Superintendent of Police (SP, for short). In 1958, CID was bifurcated into Intelligence Department and Investigation Department and the latter was named as Criminal Investigation Department.
    That as per the information provided by CBCID under section 4 of the Right to Information Act (RTI Act for short) on the UP Police website-  “vijk/k 'kk[kk]vijk/k vuqlU/kku foHkkx izns'k dh ,d fof'k"V ,oa 'kh"kZLFk tkap laLFkk gS] ftldks izns'k esa ?kfVr laosnu'khy egRoiw.kZ ,oa cgqpfpZr izdj.kksa dh tkap @foospuk;sa 'kklu }kjk vfHkfn"V dh tkrh gSA bl 'kk[kk dks foospuk;s orZeku esa 'kklu ds x`g foHkkx }kjk lkSih tkrh gSA” (CBCID is the premier highest investigative agency of the State which is given investigation/enquiry of sensitive, important and much talked criminal cases. The investigations are presently allotted by the Home Department of the State Government)
    That similarly the RTI information says-“vij iqfyl egkfuns'kd]vijk/k 'kk[kk]vijk/k vuqlU/kku foHkkx bl laLFkk esa loksZPp vf/kdkjh gS] laLFkk ds lEiw.kZ fdz;kdykiksa dk i;Zos{k.k ,oa ekxZn'kZu muds }kjk fd;k tkrk gSA fdlh Hkh izdj.k dh foospuk@tkap fdlh [k.M dk;kZy;@vf/kdkjh }kjk dh tkuh gS] dk fu.kZ; Hkh vij iqfyl egkfuns'kd }kjk fy;k tkrk gSA foospuk @tkapksa ij izHkkoh fu;a=.k gsrq vij iqfyl egkfuns'kd]iqfyl egkfujh{kd]iqfyl miegkfujh{kd]iqfyl v/kh{kd]vij iqfyl v/kh{kd ,oa iqfyl mik/kh{kd }kjk dzec} rjhds ls dq'kyi;Zos{k.k iznku fd;k tkrk gSA” (ADG, CBCID is the higest officer of this organization. He directs and supervises all its activities. He also decides about which unit/officer shall be conducting a particular enquiry. For effective control over enquiry/investigation the various supervisory layers are- ADG, IG, DIG, SP, Additional SP and the Deputy SP).
    That the RTI information makes it very specific-“ lkekU;r% dk;kZy; lacaf/kr jktdh; dk;ksZ ds fu"iknu esa iqfyl vkfQl eSuqvy] iqfyl jsxqys'ku rFkk le; le; ij 'kklu }kjk fuxZr fd;s x;s fofHkUu 'kklukns'kksa ds vk/kkj ij dk;ksZ dk fuLrkj.k fd;k tkrk gS A blds vfrfjDr tkWpksa@foospukvksa ds fuLrkj.k esa Hkk0na0fo0 rFkk n0iz0l0 ds fu;eksa dk ikyu fd;k tkrk gS” (Generally the office related Government work is conducted as per Police Office Manual, Police Regulation and other Government Orders. In addition, the enquiries/investigations are conducted as per the laws prescribed in the IPC and the CrPC).
    That the Economic Offences Wing (EOW) came into existence on 30/09/1970, as a part of CID. In 1977, it became a separate specialized investigation branch of U.P. Police. As per a Government Order dated 30/10/2006, EOW conducts Investigation and Prosecution of cases of cheating, fraud and misappropriation of government money concerning all State government departments. Government can also entrust this agency with cases concerning private persons, depending upon the ramification of the economic offences committed. EOW is headed by an Additional DG assisted by other police officers.
    That as per the RTI information provided by EOW on the website under section 4 of the RTI Act-“vkfFkZd vijk/k vuqla/kku laxBu esa eq[;r% rhu izdkj dk dk;Z lEikfnr fd;k tkrk gS ¼1½ vUos"k.k ¼2½ tkWp ¼3½ vfHklwpuk ladyu A bl laxBu esa mifujh{kd] fujh{kd rFkk iqfyl mik/kh{kd  Lrj ds vf/kdkjh }kjk mijksDr dk;Z lEikfnr fd;k tkrk gS rFkk vij iqfyl v/kh{kd @ iqfyl v/kh{kd@ iqfyl mi egkfujh{kd rFkk iqfyl egkfujh{kd Lrj ls izR;sd izdj.k dk xgu i;Zos{k.k fd;k tkrk gSA  rnksijkar bu tkWp @ vUos"k.k dk fu"d"kZ vij iqfyl egkfuns'kd }kjk vuqeksfnr gksus  ds mijkar x`g foHkkx 'kklu @ iqfyl egkfuns'kd] m0iz0 dks izsf"kr fd;k tkrk gSA bZ0vks0MCyw0 esa fu;qDr lHkh foospd @ i;Zos{k.k vf/kdkjh ewyr% iqfyl vf/kdkjh gksus ds dkj.k os lh0vkj0ih0lh0 ls vU; vf/kfu;eksa ls iznRr vf/kdkj mUgs Hkh izkIr gSA “ EOW undertakes three kinds of works- investigation, enquiry and intelligence collection. The work is done by Sub Inspectors, Inspectors and Deputy SP and very close and detailed supervision is done at the level of Additional SP/SP/DIG and IG. Then the conclusion of the enquiry and investigation is approved by the ADG and sent to the Home Department or the DGP, UP. All investigating officers and the Supervisory officers in EOW are primarily police officers and hence they have all the powers under the CrPC.
    That as stated earlier, the Anti-Corruption Organisation (ACO for short) was formally created vide U.P. Government Order No- 2049/VII-1-64/76 Grih(Police) Anubhag-1, dated 18/04/1977 to combat corruption etc. in Police Department and non Gazetted  ranks of other Govt. departments. It takes up Enquiry and Investigation as regards corruption etc. The power of ACO extends to the collection of intelligence and laying of trap against the corrupt government servant on its own with regard to non Gazetted officers of police and others Govt. department. For Gazetted officers of all department previous, permissions of Government is required for laying traps. ACO is headed by an officer of the rank of ADG.
    That as per the RTI information provided by ACO on the website of Uttar Pradesh Police website under section 4 of the RTI Act-“ bl laxBu esa fujh{kd rFkk iqfyl mik/kh{kd Lrj ds vf/kdkjh }kjk mijksDr dk;Z lEikfnr fd;k tkrk gS rFkk iqfyl v/kh{kd@vij iqfyl v/kh{kd@iqfyl miegkfujh{kd rFkk iqfyl egkfujh{kd Lrj ls izR;sd izdj.k dk xgu i;Zo{sk.k fd;k tkrk gS rnksijkar bu tkWp@foospuk@vfHklwpuk@VSªi dk fu"d"Z vij iqfyl egkfun'skd }kjk vuqeksfnr gksus ds mijkar x`g foHkkx 'kklu@iqfyl egkfuns'kd]m0i0z dks izsf"kr fd;k tkrk gS Hkz"Vkpkj uokj.k laxBu esa fu;qDr lHkh foospuk@i;Zo{sk.k vf/kdkjh ewyr% iqfyl vf/kdkjh gksus ds dkj.k os lh0vkj0ih0lh0 ls vU; vf/kfu;eksa ls iznRr vf/kdkj mUgs Hkh izkIr gS- blds vfrfjDr 'kklu }kjk le; le; ij tkjh funsZ'kkuqlkj dk;Z fd;k tkrk gS “The work is done by Inspectors and Deputy SP and very close and detailed supervision is done at the level of Additional SP/SP/DIG and IG. Then the conclusion of the enquiry and investigation is approved by the ADG and sent to the Home Department or the DGP, UP. All investigating officers and the Supervisory officers in ACO are primarily police officers and hence they have all the powers under the CrPC. In addition, work is done in accordance with guidelines issued by the State Government from time to time.”
    That the RTI information says- “'kklukns'k }kjk @iqfyl egkfuns'kd }kjk vk[;k vuqeksnu ds mijkar gh tkWp @ foospuk lekIr eku fy;k tkrk gS- “ (The enquiry/investigation is considered to be over after the approval of the enquiry report by the Government order or by the DGP.”
    That the special Investigation Branch Cooperative (SIB, for short) as a part of CBCID was created in the year of 1971 vide Government Order No. Coop(kha) Deptt. No.3019/12C-145/16/69 dated 29/06/1971 to investigate the cases of misappropriation & embezzlement of Government funds in cooperative Department. Later it was separated from CBCID. The supervisory and administrative control of this unit is vested in Additional DG (SIB- Cooperative).
    That from all the above facts it emanates that while each of these investigation agencies have police officers working there who have all the powers of police officers as specified in the CrPC and the Police Act of 1861, they are all also completely controlled by the State Government through their respective Departments (Vigilance Department for Vigilance and Home Department for CBCID, EOW, ACO and SIB) which give the final approval to the enquiry and investigation conducted by these premier specialized agencies.
    That thus while on paper these investigative agencies are completely professional police agencies where officers from the rank of Sub Inspector/Inspector to the Additional DG/DG are placed who work in accordance with the provisions of the CrPC and the Police Act in all these cases and additionally as per the Vigilance Act in the case of Vigilance Establishment, the reality remains that the ultimate and the final control in each of these cases lies with the concerned Government Department.
    That this control of the State Government is made through the prevailing system adopted in each of these investigative agencies where the enquiry/investigation is done generally at the level of the SI/Inspector or at times by the Deputy SP and the supervision is done through supervision reports of the Additional SP/SP/DIG/IG etc which is finally approved at the agency level by the Organizational head (of the rank of Additional DG or DG) but after this approval of the organizational head, the supervision report (known by various names as the DFR- Draft Final Report, LPR- Last Progress Report etc) this LPR/DFR or the supervision report known by any other name is sent by the agency to the concerned Department for Departmental approval.
    That any further action is done as regards the given case only when the concerned State Government Department has given its approval to the investigative agency’s supervision report.
    That as long as the concerned Department does not give its clearance/approval to the agency’s report, the matter remains pending as it is and no further act can be done.
    That this often results in huge delay in investigation and enquiry
    That it also results in seeping in and coming forth of extraneous and unwarranted pressures, factors and influences.
    That it also brings a situation where the concerned State Government Department enjoys all the power and authority to influence any criminal investigation without having any accompanied accountability and responsibility. Thus, whatever good or bad happens in the investigation process is the responsibility of the concerned investigative agency but the State government Department enjoys all the rights to influence the investigation or the enquiry.
    That here it also kindly needs to be noted that this power and authority presently enjoyed by the State government Departments is against the legal provisions provided in CrPC where the sole responsibility as regards investigations and criminal enquiries lies solely in the police officers
    That thus there is a situation where extra-judicial and unlawful power and authority is being used by the State government Departments in the investigation processes without any legal backing and without any accompanied accountability.
    That many of these issues were actually discussed by the Hon’ble Supreme Court in Vineet Narain & Others vs Union Of India & Another (Supra).
    That the Hon’ble Supreme Court said-“This experience revealed to us the need for the insulation of these agencies from any extraneous influence to ensure the continuance of the good work they have commenced. It is this need which has impelled us to examine the structure of these agencies and to consider the necessary steps which would provide permanent insulation to the agencies against extraneous influences to enable them to discharge their duties in the manner required for proper implementation of the rule of law.”
    That the Hon’ble Supreme Court said-“To eliminate any impression of bias and avoid erosion of credibility of the investigations being made by the C.B.I. and any reasonable impression of lack of farness and objectivity therein, it is directed that the C.B.I. would not take any instructions from report to, or furnish any particulars thereof to any authority personally interested in or likely to be affected by the outcome of the investigations into any accusation. This direction applies even in relation to any authority which exercises administrative control over the C.B.I. by virtue of the office he holds, without any exception.”
    That the Hon’ble Supreme Court said-“It is sufficient to say that the Minister's general power to review the working of the agency and to give broad policy directions regarding the functioning of the agencies and to appraise the quality of the work of the Head of the agency and other officers to the executive head is in no way to be diluted. Similarly, the Minister's power to call for information generally regarding the cases being handled by the agencies is not to be taken away. However, all the powers of the Minister are subject to the condition that none of them would extend to permit the Minister to interfere with the course of investigation and prosecution in any individual case and in that respect the concerned officers are to be governed entirely by the mandate of law and the statutory duty cast upon them.”
    That the Hon’ble Supreme Court said-“The agencies concerned must bear in mind and, if needed, be reminded of the caution administered by Lord Denning in this behalf in R. vs Metropolitan Police Commr., 1968 (1) All ER 763/1968 (2) QB 118. Indicating the duty of the Commissioner of Police, Lord Denning stated thus : (All ER p.769) "I have no hesitation, however, in holding that, like every constable in the land, he should be, and is, independent of the executive. He is not subject to the orders of the Secretary of State. I hold it to be the duty of the Commissioner of Policy, as it is of every chief constable, to enforce the law of the land. He must take steps so to post his men that crimes may be detected; and that honest citizens may go about their affaires in peace. He must decide whether or not suspected persons are to be prosecuted; and, if need be, being the prosecution or see that it is brought; but in all these things he is not the servant of anyone, save of the law itself. No Minister of the Crown can tell him that he must, or must not, jeep observation on this place or that; or that he must, or must not prosecute this man or that one. Nor can any policy authority tell him so. The responsibility for law enforcement lies on him. He is answerable to the law and to the law alone."
    That the Hon’ble Supreme Court said-“There can hardly be any doubt that the obligation of the police in our constitutional scheme is no less. According to the Code of Criminal Procedure, 1973 the formation of the opinion as to whether or not here is a case to place the accused for trial is that of the police officer making the investigation and the final step in the investigation is to be taken only by the police and by no other authority, see Abhinandan Jha v. Dinesh Mishra, 1967 (3)SCR 668.”
    That the Hon’ble Supreme Court said-“ There can be no doubt that the overall administration of the said face, i.e. CBI vests in the Central Government, which also includes, by the virtue of Section 3, the power to specify the offences or class of offences which are to be investigated by it. The general superintendence over the functioning of the department and specification of the offences which are to be investigated by the agency is not the same as and would not include within it the control of the initiation and the actual process of investigation, i.e., direction. Once the CBI is empowered to investigate an offence generally by its specification under Section 3, the process of investigation, including its initiation, is to be governed by the statutory provision which provide for the initiation and manner of investigation the offence. This is not an area which can be included within the meaning of "superintendence" in section 4(1). It is, therefore, the notification made by the Central Government under Section 3 which confers and determines the jurisdiction of the CBI to investigate an offence; and once that jurisdiction is attracted by virtue of the notification under Section 3, the actual investigation is to be governed by the statutory provisions under the general law applicable to such investigation.”
    That the Hon’ble Supreme Court said-“Once the Jurisdiction is conferred on the CBI to investigate an offence by virtue of notification under Section 3 of the Act, the powers of investigation are governed by the statuary provisions and they cannot be estopped or curtailed by any executive instruction issued under Section 3(1) thereof. This result follows from the fact that conferment of jurisdiction is under section 3 of the Act and exercise of powers of investigation is by virtue of the statuary provisions covering investigation offences. It is settled that statutory jurisdiction cannot be subject to execute control.”
    That the Hon’ble Court once again reiterated the same thing in Writ Petition (Crl.) No(S). 120 of 2012 where in its order dated 08/05/2013 in the popularly known Coalgate scam it said-“In  Vineet  Narain,   whilst  acknowledging  that  overall control of the CBI and responsibility for its functioning has  to  be in the executive, this Court was of the view that in  the  matter  of investigation, a scheme giving the needed insulation from extraneous influences of the controlling executive was imperative.  This  Court noted that though the Minister who has been given responsibility  for the functioning of the CBI has general power to  review  its  working and give broad policy directions and he has also power  to  call  for information regarding progress of the  cases  being  handled  by  the agency, but none of these powers would extend to permit the concerned Minister  to  interfere  with  the  course   of   investigation   and prosecution in any individual case.”
    That what holds true for the CBI holds equally true for all the specialized investigative/anti-corruption agencies of the State of Uttar Pradesh
    That what this means is that while the general executive control of the Vigilance, CBCID, EOW, ACO, SIB etc does lie with the concerned Department of the State government, as per the provisions of the Criminal Procedure Code, the Police Act of 1861, the Vigilance Act (for Vigilance Establishment) and the Hon’ble Supreme Court order in Vineet Narain and Manohar lal Sharma (Coalgate scam) once an investigation or enquiry gets entrusted to any of these agencies, they become completely independent to undertake the enquiry/investigation to its logical end in a completely legal and professional manner and to take all the statutory measures including making arrests, filing Charge Sheet or Final Report and/or any other measures prescribed in Chapter XII of the CrPC or anywhere else in the interest of justice, without any extraneous influence, approval, sanction, permission or direction from the State Government or any other place.
    That thus no minister or administrative authority have a right to interfere with the course of investigation and prosecution in any individual case and in that respect the concerned officers are to be governed entirely by the mandate of law and the statutory duty cast upon them, so that while the State Government does have complete power and authority as to whether to direct any investigation or enquiry to one of the above mentioned specialized investigative agencies or not but once the Jurisdiction is conferred on any such agency to investigate an offence by virtue of any Government order, the powers of investigation are governed by the statuary provisions and they cannot be estopped or curtailed by any executive instruction issued thereafter. This result follows from the fact that exercise of powers of investigation is by virtue of the statuary provisions covering investigation offences and-“It is settled that statutory jurisdiction cannot be subject to execute control.”
    That the current state of blatant violation of these provisions of the statutory jurisdiction in criminal investigation are resulting in many ifs and buts, many raising of eyebrows, many different parameters being adopted at the level of the State government and many decisions taken by the State government without any statutory backing which often makes it be felt quite apparently that equality before law does not hold true for all and different people have the possibility of getting different treatments for almost same kind of criminal offences
    That thus in the interest of justice, for the sake of equality, for raising people’s faith in the rule of law, for ensuring equality before law, for imbibing true professionalism in the investigative agencies and for ending the present violation of law where administrative and executive authorities are guiding and directing investigations without any locus and without any statutory backing, the two petitioners, in this matter of wide public importance and public concern, approach before this Hon’ble Court, being left with no other option than to approach it with this PIL to ask for certain prayers because of the reasons being stated among the Grounds as enumerated below.
    That the petitioner’s photograph and Identity proof in the form of Passport has been enclosed along with.

GROUNDS

        Because the criminal investigations are governed solely by statutory provisions, mostly provided in Chapter XII and elsewhere in the Code of Criminal Procedure
        Because the CrPC gives the sole responsibility of criminal investigation to the police officers.
        Because the CrPC nowhere mentions or assigns any role as regards criminal investigation to the executive or administrative authority
        Because this issue was deliberated at great length by the Hon’ble Supreme Court in Vineet Narain (supra) where the Hon’ble Court made it amply clear that the Executive and the Ministry only have the power of general superintendence over the investigative agency nut the moment the investigation has been assigned to the investigative agency, it can be conducted solely as per the statutory provisions and the executive has no powers to guide and direct these investigations which are the sole prerogative and responsibility of the investigative agency
        Because very recently the Hon’ble Supreme Court once again raised identical issues in Writ Petition (Crl.) No(S). 120 of 2012 (Coalgate scam)
        Because it is settled law that-“ Once the Jurisdiction is conferred on the CBI to investigate an offence by virtue of notification under Section 3 of the Act, the powers of investigation are governed by the statuary provisions and they cannot be estopped or curtailed by any executive instruction issued under Section 3(1) thereof. This result follows from the fact that conferment of jurisdiction is under section 3 of the Act and exercise of powers of investigation is by virtue of the statuary provisions covering investigation offences. It is settled that statutory jurisdiction cannot be subject to execute control.”
        Because any control of the State Government on the various investigative agencies of Uttar Pradesh are completely extra-judicial and without any legal backing
        Because in UP, all the investigative agencies- Vigilance, CBCID, EOW, ACO and SIB and others, are presently working in contradiction to the statutory provisions
        Because while the junior police officers of the investigative agencies undertake the investigations and the senior police officers of various ranks do the supervisory work at various levels, each of these investigative agencies submit their report for approval or sanction by the respective State Government Department and only after such approval/sanction, any further action is taken
        Because this arrangement in prevalence in UP are against the provisions of laws as regards criminal investigation
        Because what holds true for investigations of cases registered under section 154(1), 154(3) or 156(3) of CrPC holds almost true for enquiries as well because except the FIR, rest of the process and procedure in both the cases is almost entirely the same

PRAYER

Wherefore, it is most respectfully prayed that this Hon’ble Court may be pleased to-

    to kindly issue a writ of mandamus to the Respondents No 3(Uttar Pradesh Vigilance Establishment), 4 (Crime Branch, Criminal Investigation Department) , 5 (Economic Offences Wing), 6 (Anti Corruption Organization) and 7 (Special Investigation Branch, Cooperative), the various premier anti-corruption and specialized criminal investigating agencies of the State of Uttar Pradesh, directing them to ensure in future complete independence of investigations and criminal enquiries conducted by them solely as per the provisions of criminal law especially as provided under the Code of Criminal Procedure 1973, in the light of the order of the Hon’ble Supreme Court in Vineet Narain & Others vs Union Of India & Another (AIR 1998 SC 889, 1998CriLJ1208, (1998) 1SCC 226) and Writ Petition (Crl.) No(S). 120 of 2012 (Manohar lal Sharma vs Union of India) and others and thus not to submit their investigation and criminal enquiry reports before their respective administrative departments for perusal and approval of their investigations and enquiries as is being done presently.
    to kindly issue a writ of mandamus to Vigilance Department and Home Department of the Uttar Pradesh Government (respondents No 1 and 2) directing them to immediately stop the current practice of calling the investigations and criminal enquiries of the above-mentioned investigative agencies for their perusal and approval and for issuing directions and instructions from time to time as regards the investigation and enquiry process as is being done presently and also to kindly summon before this Hon’ble Court all such orders/directions/government memorandums/GOs passed by the Uttar Pradesh Government till date (including Notification No. 4294/XXXIX (2)-33(10-3)-76 dated 03/09/1977 passed by the Vigilance Department- Annexure No 1) through which instructions have been issued by the State Government to these premier criminal and anti-corruption agencies to submit their investigations and criminal enquiries to the State Government for their perusal and final approval and to quash them as being against the provisions of law and as being against the interest of justice and wider public/societal interest
    to pass any other order or directions which this Hon’ble Court may deems fit and proper in the facts and circumstance of the present case.

 
Lucknow                                                               Amitabh Thakur
Dated-      13/05/2013                                           Petitioner in Person                 # 94155-34526

 

 

 

 

 

 

In the Hon’ble High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench, Lucknow
Writ petition No-   of 2013 (PIL-Civil)

Amitabh Thakur and another   Petitioners

Versus

Union of India and others    Respondents

AFFIDAVIT

I, Amitabh Thakur, aged about 45 years, s/o Sri T N Thakur r/o 5/426, Viram Khand, Gomti Nagar, Lucknow, religion Hinduism, education- B Tech, profession- Government Service, the deponent, do hereby solemnly affirm and state on oath as under-

    That the deponent is petitioner No 1 in the above noted petition and as such he is fully conversant with the facts and circumstances of the case, deposed to hereunder. He has also been authorized by petitioner No 2 to depose before this Hon’ble Court.
    That the contents of the paragraphs        of the Writ petition are true to my personal knowledge,     based on documents and records and      believed to be true or are based on legal advice.
    That the Annexure No 1 is the true copy of their original.

 

Place Lucknow      (Amitabh Thakur)

Date-          /05/2013       Deponent

 

VERIFICATION

I, the deponent above named, do hereby verify that the contents of paragraphs 1 to 3 above this Affidavit are true and correct to my knowledge and belief. No part of it is false and nothing material has been concealed. So, help me God

 

Signed and verified this the    day of    2013  at Lucknow

Deponent

Identification

I identify the deponent, on the basis of records produced before me, who has signed before me.

Advocate

 

Solemnly affirmed me on    at    am/pm by the deponent Amitabh Thakur, who has been identified by Sri   clerk to Sri            , Advocate, high court, Lucknow Bench, Lucknow

I have satisfied myself by examining the deponent that he understands the contents of this Affidavit which have been read over and explained to him by me

 

 

 

 

 

 

 

 

No. 4294/XXXIX (2)-33(10-3)-76

Dated Lucknow, September 3, 1977

Notification

In exercise of the powers conferred by sub-section (2) and (3) of section 2 of the U.P. Vigilance Establishment Act 1965 (U.P. Act no Vii of 1965) and in partial modification of the previous orders on the subject the Governor is please to order that henceforth the members of the U.P. Vigilance Establishment shall not be required to obtained prior orders of the Government in the following cases, namely:

(i) Where a complaint is made in writing in the Establishment that a non-gazetted government servant or other public servant of similar rank has demanded or agreed to accept any gratification (other than legal remuneration) as motive or reward, such as is mentioned in suction 161 of the Indian Panel Code for laying trap and apprehending red-handed such public servant:

Provided that such action shall be taken only on the prior

orders:-

(a) of the Director of Vigilance and in his absence of the Superintendent of Police (Headquarters), Vigilance Establishment when a complaint is received at the Headquarters of Establishment.

(b) of the Superintendent of Police in charge of the sector office of the Vigilance Establishment, and in his absence of the officer holding charge of the sector, when the complaint is received in

sector office.

(ii) Where no such written complaint is made but a non-gazetted Government Servant or other Public Servant of similar rank is found, in the premises or precincts of the public office, place or

vehicle where such public servant ordinarily discharges his functions or is for the time being detained for duty accepting any gratification (other than legal remuneration) as a motive or

reward such as mentioned in section 161 of the India Panel Code in the presence of an officer of the U.P. Vigilance Establishment not below the rank of Deputy Superintendent of Police, Vigilance Establishment, deputed for the purpose of detecting cases of this nature, for apprehending red-handed such public servant.

2- The Governor is also pleased to order that the Vigilance Establishment shall submit to the Government in the Vigilance department reports of progress of investigation and on the completion of investigation it shall submit its detailed report embodying its conclusions and recommendations and copies of the proposed charge-sheet, if prosecution is recommended.

3- This supersedes notification no, 2598/XXXIX-(2)-33(10-3)-76 dated August 16,1976

By order,

I.M.SAHAI,

Commissioner and Secretary, Vigilance.

सोहराबुद्दीन कोई धर्मात्मा नहीं, बहुत बड़ा अपराधी था

सोहराबुद्दीन को एक दिन इसी तरह मरना था। पुलिस उसे नहीं उड़ाती, तो कोई महात्मा या धर्मात्मा किस्म का सामान्य व्यक्ति उसे गोली से भूनने को मजबूर हो जाता। राजस्थान में विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया के मामले में सबसे ज्यादा गौर करने लायक बात यह है कि सीबीआई नामक सरकारी तोता आखिर किसके लिए उनको अपराधी साबित करने पर तुला हुआ है।

एक दुर्दांत और कमीने किस्म का कुख्यात, अपराधी सोहराबुद्दीन शेख। तो एक तरफ राजनीति में मानवीय  मूल्यों, आदर्श एवं नैतिकता की सर्वश्रेष्ठ मिसाल गुलाब चंद कटारिया। दोनों में कोई तुलना ही नहीं। हमारी कांग्रेस के नेता अकसर अपने भाषणों में मुसलमानों के अपराध को कम साबित करने की कोशिश में अकसर कहते रहते हैं कि अपराधी का कोई धरम नहीं होता। लेकिन होता है। नहीं होता, तो गुलाब चंद कटारिया जैसे निष्पाप, निष्कलंक और निरपराध व्यक्ति को फांसने से पहले सोहराबुद्दीन जैसे दुर्दांत अपराधी के पाप भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

देश भर में इस तरह का माहौल बन गया है जैसे, सोहराबुद्दीन कोई आपकी हमारी तरह सामान्य आदमी था। देश की सरकार ने भले ही छुपाया है, पर आइए, अपन बताते हैं। सोहराबुदीन शेख हमारे देश के बहुत सारे कांग्रेसी नेताओं की याददाश्त में बहुत ही मासूम और एक छोटे मोटे चोर के रूप में दर्ज है। 26 नवंबर 2005 को गुजरात और राजस्थान पुलिस के एक जॉइंट ऑपरेशन में सोहराबुद्दीन को गोलियों से उड़ा दिया गया। उसने राजस्थान और गुजरात के मार्बल व्यवसायियों से बहुत बड़ी बड़ी फिरौती वसूली का धंधा जोर शोर से शुरू कर दिया था। असल में सोहराबुदीन एक आतंकवादी था और जिसके खिलाफ खतरनाक हथियारों की तस्करी व रखने के केस चल रहे थे। उसके अलावा विभिन्न आतंकवादी गतिविधियां चलाने तथा क़त्ल करने तथा करवाने के भी मुक़दमे थे। उस पर कुल 56 मामले दर्ज हैं। इसके अलावा गुजरात के सीएम को मारने की साजिश भी रच रहा था।

सोहराबुदीन मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के एक गाँव का रहने वाला था। वहां वो एक ट्रक ड्राईवर था। इस दौरान वह छोटा दाऊद और बाबू पठान नाम के दो दूसरे ड्राइवरों के संपर्क में आया। ये दोनों अंडरवर्ल्ड डान दाऊद इब्राहीम के लिए हथियारों की तस्करी करते थे। उनके साथ सोहराबुद्दीन ने भी हथियारों की तस्करी शुरू कर दी। और तस्करी का पैमाना इतना बड़ा था कि सोहराबुद्दीन ने अपने गांव में हथियारों का गोदाम बना डाला। उसके इस गोदाम से पुलिस छापे के दौरान दो एके – 56 राइफलें और कुल 24 एके – 47 रायफलें बरामद हुई। मुठभेड़ के बाद सोहराबुद्दीन के कपड़ों से मिले दो सिम कार्ड पाकिस्तान के कराची निकले। दोनों की कॉल डिटेल साबित करती है कि सोहराबुद्दीन उन दोनों का इस्तेमाल काफी लंबे समय से कर रहा था।

इस सिम कार्ड के जरिए सोहराबुद्दीन पाकिस्तान में दाऊद के करीबियों एवं लश्कर के लोगों से बात किया करता था। कॉल डीटेल्स से साबित होता है कि पुलिस से जिस मुठभंड़ में सोहराबुद्दीन मारा गया, उससे कुछ वक्त पहले ही उसकी कई बार कराची बात हुई थी। देश में हुए विभिन्न विस्फोटो तथा आतंकवादी हमलों में इसका हाथ था। 14 फरवरी 1998 को हुए कोयम्बटूर ब्लास्ट में विस्फोटक पहुंचाने में सोहराबुद्दीन की भूमिका जांच में साबित भी हो चुकी है।

पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद जब सोहराबुदीन की लाश उसके गांव पहुंची तो लोगों ने भारत विरोधी नारे लगाये, और पाकिस्तान की भरपूर जय जय कार हुई। लोगों ने सोहराबुद्दीन की लाश का एक जेहादी की तरह स्वागत किया। यही नहीं, हथियारों की स्मगलिंग के दौरान सोहराबुद्दीन ने जो बहुत सारे तोप-तमंचे अपने गांव वालों को तोहफे में दिए थे, उनसे लोगों ने गोलियां भी चलाई। सोहराबुद्दीन की यह असलियत सरकार के साए में छुप गई है। सरकारी तोता हमारे निष्कलंक राजनेताओं को लपेटने की कोशिश में कितनी भी साजिशें रचे। पर, सबसे पहले यह भी जान लेना जरूरी है कि सोहराबुद्दीन शेख कोई धर्मात्मा नहीं था। सोहराबुद्दीन जैसे कमीनों के लिए आदर्श पुरुषों को फंसाने से कोई मतलब नहीं निकलेगा। सोहराबुद्दीन को तो एक दिन इसी तरह मरना था।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं.

समाचार प्‍लस से छह लोगों ने शुरू की अपनी नई पारी

समाचार प्‍लस राजस्‍थान से खबर है कि आधा दर्जन लोगों ने चैनल के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. एसाइनमेंट में चार लोगों ने तथा एमसीआर में दो लोगों ने ज्‍वाइन किया है. एमसीआर में सुरेंद्र सिंह को एक्‍जीक्‍यूटिव बनाया गया है. वे सीएनईबी से इस्‍तीफा देकर यहां पहुंचे हैं. उनके साथ यतीन ने भी एमसीआर एक्‍जीक्‍यूटिव के पद पर ज्‍वाइन किया है. वे इसके पहले कात्‍यायनी में कार्यरत थे.

टाइम्‍स नाऊ से इस्‍तीफा निशांत गोयल ने समाचार प्‍लस राजस्‍थान ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें एसाइनमेंट पर एसोसिएट प्रोड्यूसर बनाया गया है. ओम प्रकाश ने भी अपनी नई पारी समाचार प्‍लस से शुरू की है. वे इंडिया न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर यहां आए हें. उन्‍हें एसाइनमेंट पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. अंबेश श्रीवास्‍तव को भी एसाइनमेंट पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. इनके अलावा संदीप मिश्रा भी समाचार प्‍लस के साथ ट्रेनी के रूप में अपनी नई पारी शुरू की है. इसके पहले वे श्री न्‍यूज से जुड़े हुए थे.

वरिष्‍ठों से नाराज आलोक और नवीन नहीं आ रहे हैं कार्यालय!

अमर उजाला, लखनऊ के कार्यालय में सब कुछ सही नहीं चल रहा है. सूत्रों का कहना है कि चीफ रिपोर्टर राजन परिहार की फटकार के बाद सीनियर रिपोर्टर आलोक पराड़कर पिछले एक महीने से ऑफिस नहीं आ रहे हैं. आलोक राजन के व्‍यवहार से खासे नाराज हैं. आलोक इसके पहले हिंदुस्‍तान में भी कार्य कर चुके हैं. सूत्रों का कहना है कि दूसरी तरफ संपादक के रवैये से नाराज नवीन घोषाल भी अवकाश पर चल रहे हैं.

गौरतलब है कि अमर उजाला, लखनऊ में काम करने की परिस्थितियां बहुत ही खराब हैं. यह यूनिट अक्‍सर विवादों में आता रहता है. अमर उजाला की इंटरनल रेटिंग में भी यह यूनिट सबसे फिसड्डी यूनिट में शामिल रहा है. (कानाफूसी)

अपडेट…

कार्यालय  ना जाने से जुडी खबर पर अमर उजाला के वरिष्ठ संवाददाता आलोक पराड़कर ने इसमे 'फटकार' शब्द के प्रयोग पर आपत्ति जताई है। पराड़कर का कहना है कि राजन परिहार उनसे काफी जूनियर हैं। लोकल प्रभारी के तौर पर  पिछले दिनों राजन ने उन्हें छुट्टी के दौरान  उसे रद्द क्रर वापस आने को कहा था, उस  वक़्त मिर्ज़ापुर में अपने एक रिश्तेदार की तेरही में शामिल होने गये पराड़कर के लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं था। इसी बात को लेकर छुट्टी से लौटने के बाद दोनों में मीटिंग में बहस हुई और जब परिहार ने बेसिर पैर की बातें शुरू की तो अपने काम में शिकायत का मौका ना देने वाले पराड़कर नाराज़ हो गये। उन्होंने कहा कि अपने २ ३ साल के पत्रकारिता के अनुभव के बाद उन्हें ये बताने की जरुरत नहीं है कि गलत और सही क्या है? इसके बाद वे नाराज़ होकर मीटिंग से चले गये और मेडिकल अवकाश पर हैं। अमर उजाला में आलोक पराड़कर के पास साहित्य-संस्कृति की खबरों के साथ ही साप्ताहिक फीचर के पृष्ठ ड्रीम सिटी की भी जिम्मेदारी रही है।

इस जवाबदेही के चलते नम्‍बर एक बनने की तरफ अग्रसर है समाचार प्‍लस

समाचार प्‍लस यूपी-उत्‍तराखंड चैनल अगर कम समय में नम्‍बर एक बनने की तरफ अग्रसर है तो यह केवल खबरें दिखाने से ही संभव नहीं हुआ है, बल्कि इस संस्‍थान ने पत्रकारिता के मानकों का भी पूरा ख्‍याल रखा है. उमेश कुमार के नेतृत्‍व में यह चैनल और इसकी टीम जवाबदेह भी है. अन्‍य संस्‍थानों की तरह कंबल ओढ़ कर घी पीने की बजाय समाचार प्‍लस प्रबंधन पत्रकारिता की पारदर्शिता और सुचिता का भी उतना ही ख्‍याल रखता है. यह सिद्ध हुआ है प्रबंधन की एक त्‍वरित कार्रवाई से.

एक अखबारनुमा कटिंग के आधार पर भड़ास4मीडिया पर समाचार प्‍लस के सुल्‍तानपुर संवाददाता के बारे में एक खबर प्रकाशित की गई थी. भड़ास पर खबर पढ़ते ही प्रबंधन ने तत्‍काल संबंधित रिपोर्टर नितिन श्रीवास्‍तव से पूरा सच जानने के लिए स्‍पष्‍टीकरण मांग लिया. हालांकि जांच के बाद पता चला कि कुछ लोग नितिन और समाचार प्‍लस की तरक्‍की से खुश नहीं हैं, लिहाजा वे लोग साजिशन इस तरह की गतिविधियां चला रहे हैं. भड़ास ने भी पीडित बताए जा रहे शख्‍स से इस बारे में सच्‍चाई जानना चाहा परन्‍तु उन्‍होंने नितिन पर लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद करार दिया.

पीडि़त ने नितिन के पक्ष में एक शपथ पत्र भी प्रबंधन को भेजा. उमेश कुमार के अलावा इनपुट हेड प्रवीण साहनी भी पत्रकारों पर रहने वाले आरोपों को लेकर काफी संजीदा रहते हैं तथा तत्‍काल मामले में निर्णय लेते हैं. प्रवीण ने अपने स्रोतो से भी पूरे मामले की जांच कराई, जिसके बाद प्रबंधन ने नितिन को क्‍लीन चिट दिया. चैनल को आगे ले जाने के साथ पत्रकारिता के मानकों को भी काफी हद तक बचाए रखने के लिए उमेश कुमार और उनकी टीम को बधाई दी जानी चाहिए. नीचे प्रबंधन द्वारा नीतिन से मांगा गया स्‍पष्‍टीकरण… 


सेवा में,
श्री प्रवीण साहनी
 इनपुट हेड
 समाचार प्लस

महोदय,

आज दिनांक पंद्रह मई २०१३ को दोपहर में मुझे नॉएडा आफिस से फ़ोन पर बताया गया की मेरे खिलाफ वेब-पोर्टल भड़ास4मीडिया पर कोई एक खबर प्रकाशित की गयी है जिसपर मुझसे     स्पष्टीकरण माँगा गया है। इस सन्दर्भ में मुझे कुछ बातें आपको अवगत करानी है।जिले में फरवरी माह में एक दैनिक अखबार के फोटोग्राफर को पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में पुलिस कर्मियों द्वारा पीटा गया था जिसे लेकर जिले के लगभग सभी प्रिंट-इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार एसपी के विरोध में चल रहे है।एसपी द्वारा दोषी मातहतो पर किसी तरह की कोई कार्यवाही न किये जाने से उनके विरोध की लडाई लम्बी खिचती जा रही है।जैसा की आप सभी को ज्ञात भी होगा की मै भी इस विरोध में शामिल हूँ। विरोध की लडाई लम्बी खिचती देख जिले के पत्रकारों में  इस बात को लेकर वैचारिक मतभेद उत्पन्न हो गया है,जिसकी वजह से कुछ पत्रकार पुलिस अधीक्षक के पक्ष में आ गए है और कई बार मुझपर भी विरोध ख़त्म करने का दबाव निरंतर बनाया जा रहा है।लिहाजा मुझे लगता है की मुझे किसी साजिश का शिकार बनाया जा रहा है।

             जहाँ तक बात भड़ास4मीडिया में मेरे बारे में छपी खबर की है,मैंने भी इस खबर को आपकी जानकारी देने के बाद पढ़ा है।मैंने इस मामले की अपने स्तर से पूरी तहकीकात भी की है,जिले में या फिर सूचना कार्यालय में मुझे ऐसा कोई अख़बार नहीं मिला जिसमे इस तरह की किसी खबर के बारे में कुछ प्रकाशित हुआ हो।जहाँ तक मेरी बात है मेरा उस हास्पिटल के संचालक/डाक्टर से दूर-दूर तक किसी भी तरह का कोई वास्ता नहीं है,रही बात पीड़ित पक्ष की तो उससे मेरे बारे में आप स्वयं तहकीकात कर सकते है बतौर अपनी सफाई मै उस पीड़ित व्यक्ति द्वारा अपने निर्दोस होने के सम्बन्ध में दिया गया शपथ पत्र के साथ उसका रिकार्डेड बयान और अन्य अखबारों में प्राकशित खबरों की कटिंग भी आपको भेज रहा हूँ,उम्मीद है की आप खुद की तहकीकात के बाद मुझे इस मामले में निर्दोष पायेंगे।जहाँ तक मेरी बात है मैंने जबसे इस संस्थान को ज्वाइन किया है अबतक ऐसा कोई कार्य नहीं किया है जिससे मेरी व्यक्तिगत व मेरे संस्थान की बदनामी हो।

           अतः आपसे विनम्र निवेदन है की मामले की पूरी पड़ताल कर खुद मेरे निर्दोष होने का प्रमाण दे। जिस साफ़ सुथरे छवि के साथ मैने अबतक की पत्रकारिता की है,मै विश्वास दिलाता हूँ की भविष्य में भी मै पत्रकारिता के माप दंड और अपने सम्मान को बनाये रखते हुए संस्थान के प्रति उत्तरदायी रहूँगा और हमेशा संस्थान के हित में कार्य करता रहूँगा ।

मोबाईल नम्बर -9473747557-पीड़ित असरारुल हक़
मोबाईल नंबर -9838786555-डाक्टर सादिक अली

आपका शुभाकांक्षी

नितिन श्रीवास्तव

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त्रिपुरा के वित्तमंत्री ने चिटफंड घोटाले के लिए सरकारी क्षेत्र के बैंकों को दोषी ठहराया!

चिटफंड प्रकरण में घिर गयी है त्रिपुरा की वाम सरकार। वहां के मंत्री भी आरोपों के घेरे में हैं। विधानसभा में भारी हंगामा हो गया। पहले ही राज्‍य सरकार ने सीबीआई जांच के लिए आवेदन किया हुआ है। लेकिन अब इस फर्जीवाड़े से जनरोष जिस तरह से फैल रहा है, तो इस संकट के राजनीतिक मुकाबले के लिए त्रिपुरा सरकार को भी मैदान में उतरना पड़ा है। मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने इस आत्मरक्षा अभियान की कमान बादल चौधरी को सौंपी है, जो वित्तमंत्री हैं और जिनका गृह इलाका बिलोनिया से गोमती और उदयपुर होकर अगरतला तक पूरा इलाका चिटफंड की मार से त्राहि त्राहि कर रहा है। ​त्रिपुरा के वित्तमंत्री ने चिटफंड घोटाले के लिए सरकारी क्षेत्र के बैंकों को दोषी ठहराया है।

बादल चौधरी की शिकायत है कि बाकी देश में जहां बैंकों में जमा के मुकाबले ऋण दिये जाने का अनुपात ७८ प्रतिशत है, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में कहीं भी यह अनुपात ३४ प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। गौरतलब है कि त्रिपुरा में मुख्यमंत्री माणिक सरकार नीत मंत्रिमंडल ने गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के खिलाफ पुलिस में दर्ज 15 मामलों को अब केद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का निर्णय किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में पिछले कुछ महीनों में 27 गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों ने अपना कारोबार बंद कर दिया है जबकि अन्य 90 अभी भी संचालित हैं। उन्होंने सीबीआई को सौंपे जाने वाले 15 संस्थानों के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं बाताया। 90 संचालित संस्थानों में से 68 कंपनी अधिनियम के तहत दर्ज हैं। 4 को भारतीय रिजर्व बैंक से लाइसेंस प्राप्त है। 7 को बीमा नियामक प्राधिकरण और 1 को सेबी से स्वीकृति प्राप्त है। इनके अलावा 10 अन्य को-ऑपरेटिव सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत माइक्रो फाइनेंसिंग संस्थान के रूप में पंजीकृत है।

मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने केंद्र सरकार पर पूरे देश में ऐसे संस्थानों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि विभिन्न राज्यों ने इसके लिए एक समान कानून लागू करने की मांग की थी लेकिन केंद्र ने हालांकि इसे नजरअंदाज करके एक तरह से इन संस्थानों को बढ़ावा दिया। त्रिपुरा में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के कार्यालयों पर छापा मारा गया और कई दस्तावेज और संपत्तियां जब्त की गईं। इस सिलसिले में लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पूरे त्रिपुरा में छापेमारी और जब्ती की कार्रवाई तब तक जारी रहेगी, जब तक कि एनबीएफसी की अवैध गतिविधियां बंद नहीं हो जाती हैं।

बादल चौधरी लेकिन इस संकट से निकलने के लिए राजनीतिक भाषा का प्रयोग करने से बच रहे हैं। उन्होंने सीधे चिटफंड कारोबार में आम लोगों के इतने बड़े पैमाने पर शिकार हो जाने के लिए सरकारी क्षेत्र के बैकों को दोषी ठहरा दिया। उनके मुताबिक ब्याज कम होने के बावजूद जिस पैमाने पर आम लोगों की आस्था अब भी बैंकों में बनी हुई है, बैंकों से उस तुलना में रिटर्न भी नीं मिलता है। जमा राशि की तुलना में बैंकों सेदिये जाने वाला ऋण नाकाफी है। आम लोगों की वित्तीय जरुरतें चूंकि सरकारी बैंकों के जरिये पूरी नहीं हो पाती इसलिए वे बड़ी आसानी से चिटफंड कंपनियों के चंगुल में फंस जाते हैं।

बादल चौधरी ने कहा कि वे इस सिलसिले में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और तमाम सरकारी क्षेत्रों के बैंकों से लगातार संवाद कायम किये हुए हैं, पर राज्य सरकार की मांग के मुताबिक त्रिपुरा की अनुसूचित बहुल जनसंख्या को बैंकिंग के दायरे में शामिल कराने की प्रक्रिया अभी ठीक से शुरू नहीं हो पायी है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक के गवर्नर ने २०११ में त्रिपुरा सरकार से सीडी रेशियो यानी जमा के मुकाबले ऋण का अनुपात बढ़ाने का वायदा किया था। अब २००३ में राज्य में सीडी रेशियो ३३ फीसद तक सीमित है। ​

​​एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

युवराजों का ‘राजतिलक’ : परिवर्तन या परिवारवाद!

राजनीति में बढ़ते परिवारवाद को लेकर लंबे समय से बहस रही है। खास खतरा यही है कि बेशर्मी से इस प्रक्रिया के बढ़ते जाने से राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में लगातार बाधा आ रही है। लेकिन, मुश्किल यह है कि एक-एक करके अब प्राय: सभी दलों में यह ‘बीमारी’ तेजी से पैर पसारने लगी है। कुछ साल पहले तक परिवारवाद की राजनीति के लिए खास तौर पर कांग्रेस नेतृत्व को कोसा जाता था। लेकिन, अब तो इस मुद्दे की हवा ही निकलने लगी है। ताजा प्रकरण राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव का है। राजनीति में वे जयप्रकाश आंदोलन की उपज माने जाते हैं।

शुरुआती दौर में लालू, कांग्रेस की परिवारवादी राजनीति के खिलाफ हुंकार भरते रहते थे। लेकिन, बिहार में सत्ता मिली, तो उनके तमाम ‘क्रांतिकारी’ विचार पिघलते गए। यह खुला तथ्य है कि लालू-राबड़ी की सरकारों के दौर में उनके परिजनों का रुतबा बढ़ गया। खास तौर पर साले बंधुओं को जमकर प्रमोट करने में लालू को कभी कोई हिचक नहीं हुई। जब उनसे परिवारवाद के मुद्दे पर सवाल किया जाता, तो वे पलटवार के रूप में कई सवाल खड़े कर देते रहे। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में कल राजद की एक बड़ी रैली संपन्न हुई। इसका नाम ‘परिवर्तन’ रैली दिया गया। राजनीतिक हल्कों में अपने बड़-बोलेपन के लिए खास पहचान बना चुके लालू ने यही दावा किया कि इस रैली के बाद बिहार में ‘परिवर्तन’ की राजनीति की आंधी तेज हो जाएगी।

उपलब्धि के नाम पर इस रैली में बड़ी भीड़ जुटाने में तो वे जरूर सफल रहे। लेकिन, इस रैली की खास उपलब्धि यही मानी गई कि उन्होंने अपने दोनों बेटों, तेज प्रताप और तेजस्वी यादव की इस मंच से भव्य राजनीतिक लॉन्चिंग करा डाली। उम्मीद जताई गई कि राजद के ये ‘युवराज’ खास तौर पर राज्य में युवाओं का दिल जीत लेंगे। तेजस्वी, लालू का छोटा बेटा है। एक दौर में क्रिकेट के लिए उसका जुनून था। अब पिता की राजनीतिक विरासत में हाथ बंटाने के लिए उसने हाथ बढ़ा दिए हैं। राजद के नेता इस ‘उत्सव’ में खूब गदगद नजर आए। नजारा कुछ ऐसा बांधा गया, मानो युवराजों के इस ‘राजतिलक’ से बिहार की तमाम समस्याएं छूं-मंतर हो जाएंगी?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

हॉकर बना टॉपर, पढ़ेगा आईआईएम कोलकाता में

मध्यम गति से चलने वाली दो पहिये की साईकिल में सवार होकर बंगलुरू के अखबार बेचने वाले एन. शिवा कुमार ने खुली आंखों से एक सपना देखा। सपना था कैट की परीक्षा पास कर कामयाबी की उड़ान भरने का। शिवा के लिए ये एक ऐसी उड़ान थी जिसे वो अकेले ही अपनी हिम्मत और काबलियत के दम पर भरना चाहता था।

क्या अखबार बेचने वाले को आईआईएम में एडमिशन मिल सकता है। जी हां अगर मन में विश्वास और दिल में कुछ करने का जज्बा हो तो हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों, कामयाबी एक दिन कदम चूमती ही है। ये साबित किया है 23 साल के न्यूजपेपर हॉकर एन. शिवा कुमार ने। शिवा अब हर सुबह साइकल पर अखबार रख घरों में डालते नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित कोलकाता के बिजनेस स्कूल आईआईएम में एमबीए की पढ़ाई करते नजर आएंगे।

दरअसल शिवा की कामयाबी की यह कहानी दिलचस्प है। शिवा के माता-पिता पढ़े-लिखे नहीं हैं। पिता ट्रक चलाते हैं। चार सदस्यों के उनके परिवार में हमेशा पैसों की तंगी बनी रहती। ऊपर से पिता पर कर्ज का बोझ भी है। घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए शिवा ने छठी क्लास से ही न्यूजपेपर हॉकर का काम शुरू किया। इन मुश्किल हालातों में भी कुछ करने का जज्बा शिवा के दिल में था। उन्होंने कामयाबी की पहली सीढ़ी तब चढ़ी जब बांसवाड़ी के बेंगलुरु इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में उन्हें दाखिला मिला। इसके बाद उन्होंने वो हासिल किया जिसका सपना MBA करने का इच्छुक हर स्टूडेंट देखता है। शिवा ने CAT 2012 में सफलता हासिल कर इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट-कलकत्ता में सीट पक्की की। आगामी 16 जून से शिव कुमार अब इस प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल में पढ़ते नजर आएंगे।

सहारा का न्‍याय : तीन गालियों पर तीन दिन का निलंबन

राष्‍ट्रीय सहारा, लखनऊ से खबर है कि अपने सहयोगी को अपशब्‍द बोलने वाले डिप्‍टी ब्‍यूरो चीफ मनमोहन को तीन दिन के लिए निलंबित कर दिया गया है. यह कार्रवाई नोएडा के आदेश पर हुई है. नोएडा से जुड़े सूत्रों ने बताया कि प्रबंधन ने संपादक के कक्ष में अपशब्‍द कहे जाने को गंभीरता से लेते हुए यह कार्रवाई की है. इस सजा के माध्‍यम से यह भी अल्‍टीमेटम दिया गया है कि प्रबंधन ऐसी किसी भी हरकत को बर्दास्‍त नहीं करेगा. 

उल्‍लेखनीय है कि राष्‍ट्रीय सहारा, लखनऊ के संपादक मनोज तोमर के कक्ष में ही डिप्‍टी ब्‍यूरोचीफ मनमोहन ने कमल दुबे को अपशब्‍द कहा था. उन्‍होंने कमल दुबे को मक्‍कार, कमीना और झूठा आदमी कहा था. कमल दुबे ने अपशब्‍द बोले जाने का विरोध करते हुए उन्‍होंने इसकी शिकायत यूनिट हेड राजेंद्र द्विवेदी तथा ब्‍यूरोचीफ विजय शंकर से की. यूनिट हेड ने इस मामले की जांच पर्सनल हेड ऋषि सहाय से कराई तथा इसकी रिपोर्ट नोएडा भेज दी.

सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट मिलने के बाद प्रबंधन ने इसे गंभीरता से लेते हुए डिप्‍टी ब्‍यूरोचीफ मनमोहन के खिलाफ तीन दिन के निलंबन का आदेश परित किया. इस आदेश के बाद से ही राष्‍ट्रीय सहारा के लखनऊ यूनिट में खलबली है. साथ ही लोग यह भी कह रहे हैं कि प्रबंधन ने अनोखा न्‍याय किया है तीन गाली और तीन दिन का निलंबन.

मूल खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें – सहारा के डिप्‍टी ब्‍यूरोचीफ ने संपादक के सामने रिपोर्टर को अपशब्‍द कहे, जांच जारी

नक्षत्र से सुभाष तथा हिंदुस्‍तान से दुर्गेश व पुरुषोत्‍तम का इस्‍तीफा

नक्षत्र न्‍यूज, रांची से खबर है कि सुभाष शेखर ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे चैनल की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. सुभाष अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. वे इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उल्‍लेखनीय है कि पिछले दिनों नक्षत्र न्‍यूज से एक साथ नौ कर्मचारियों को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया था.

हिंदुस्‍तान, कानपुर से खबर है कि यहां से दो लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. दोनों लोग अपनी नई पारी के न्‍यूज के साथ शुरू करने जा रहे हैं. यहां से सीनियर सब एडिटर दुर्गेश चौहान तथा सब एडिटर पुरुषोत्‍तम द्विवेदी ने इस्‍तीफा दिया है.

स्‍पॉट फिक्सिंग में श्रीसंत, चंदीला एवं अंकित चव्‍हाण अरेस्‍ट

भारतीय तेज गेंदबाज एस श्रीसंत और राजस्थान रॉयल्स के उनके दो अन्य साथियों अजित चंदीला और अंकित चव्हाण को दिल्ली पुलिस ने आईपीएल-6 में स्पॉट फिक्सिंग के आरोपों में गिरफ्तार किया है. दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने श्रीसंत को स्पॉट फिक्सिंग में कथित भूमिका के आरोप में बुधवार रात मुंबई में उनके दोस्त के घर से जबकि दो अन्य क्रिकेटरों को नरीमन प्वाइंट में टीम होटल से अरेस्‍ट किया.

इन तीनों खिलाड़ियों को मुंबई इंडियंस के खिलाफ वानखेड़े स्टेडियम में मैच के बाद टीम होटल लौटने पर गिरफ्तार किया गया. मुंबई ने राजस्थान रॉयल्स को इस मैच में 14 रन से हराया था. दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने बताया कि आईपीएल के पिछले मैचों में स्पॉट फिक्सिंग में भूमिका के लिये इन खिलाड़ियों पर नजर रखी जा रही थी. उन्होंने हालांकि यह नहीं बताया कि किन मैचों पर नजर रखी गयी थी.

पुलिस ने इसके साथ इस मामले में मुंबई में सात और दिल्ली में तीन सट्टेबाजों को गिरफ्तार किया है. पुलिस को दिल्ली के दो अन्य सट्टेबाजों की तलाश है. तीनों खिलाड़ियों आईपीसी की धारा 420 और 120 (B) के तहत गिरफ्तार किया गया था. वहीं राजस्थान रॉयल्स की मालकिन शिल्पा शेट्टी ने कहा, 'हम इस मामले से खुद हैरान हैं. हम पुलिस की जांच में पूरी मदद करेंगे.' तीन क्रिकेटरों की गिरफ्तारी के बाद से क्रिकेट जगत में हलचल मच गई है.

संभावना जताई जा रही है कि इस मामले में कुछ और गिरफ्तारियां भी संभावित हैं. गौरतलब है कि मैच फिक्सिंग के बाद स्‍पॉट फिक्सिंग को लेकर लंबे समय से तमाम क्रिकेटरों पर आरोप लगते रहे हैं.

जानना हो कि सोमवार से शुक्रवार के बीच छह दिन होते हैं, वो जागरण पढ़े

दैनिक जागरण में अक्‍सर अजीबो गरीब हरकत होती रहती है. हर रोज कोई न कोई नया इनवेंशन यहां के पत्रकार करते रहते हैं. अभी तक सभी लोगों को पता था कि सप्‍ताह में सोमवार से शुक्रवार तक पांच दिन होते हैं, लेकिन जागरण के पत्रकारों की एक का दो बनाने की आदत ने सोमवार से शुक्रवार को छह दिन बना दिया है. लखनऊ से एक खबर प्रकाशित हुई है लखनऊ से बनारस के बीच इंटरसिटी ट्रेन के शुभारंभ की.

इस खबर में पत्रकार ने बताया है कि यह ट्रेन सोमवार से शुक्रवार तक छह दिन चलेगी. अब तक लोगों को जो जानकारी थी उसके अनुसार सोमवार से शुक्रवार पांच दिन होता है और सप्‍ताह सात दिन का होता है, लेकिन सोमवार से शुक्रवार के बीच कौन सा एक नया दिन दैनिक जागरण ने अपने सोर्स से बढ़ाया है, लोग इस बात की जानकारी ले रहे हैं. वैसे भी देश का नम्‍बर वन अखबार जागरण इतना ताकतवर है कि कुछ भी कर सकता है तो सप्‍ताह में आठ दिन कर देना इसके लिए कौन सी बड़ी बात होगी.

खैर, आप भी देखिए जागरण की वो खबर, जिसमें उसने सोमवार से शुक्रवार को छह दिना बना दिया है….

जागरण के पत्रकार ने हिंदुस्‍तान के रिपोर्टर अंकित को मारी गोली, हालत गंभीर

अभी तक जागरण से जुड़े लोग ब्‍लैकमेलिंग या पैसे लेकर खबर ना छापने के आरोपों से ही घिरे थे, लेकिन जागरण के पत्रकार गोली भी मारने लगे हैं. घटना रामपुर जिले के शाहाबाद तहसील की है. दैनिक जागरण के स्‍थानीय रिपोर्टर अखिलेश रस्‍तोगी ने किसी बात से नाराज होकर हिंदुस्‍तान के रिपोर्टर अंकित गुप्‍ता को गोली मार दी. गोली अंकित के जबड़े में लगी है. उनकी हालत गंभीर बताई जा रही है. पुलिस ने आरोपी पत्रकार को अरेस्‍ट कर लिया है.

जानकारी के अनुसार दैनिक जागरण के रिपोर्टर अखिलेश रस्‍तोगी तथा हिंदुस्‍तान के रिपोर्टर अंकित गुप्‍ता एक शादी में गए हुए थे. यहीं पर इन लोगों के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया. बताया जा रहा है कि जागरण का पत्रकार अखिलेश इतना उत्‍तेजित हो गया कि उसने अपनी लाइसेंसी पिस्‍टल निकालकर हिंदुस्‍तान के रिपोर्टर अंकित को गोली मार दी. गोली चलते ही मौके पर अफरातफरी मच गई.

आनन फानन में लोगों ने अंकित को स्‍थानीय अस्‍पताल में भर्ती कराया लेकिन डाक्‍टरों ने गंभीर हालत देखते हुए उसे मुरादाबाद के लिए रेफर कर दिया. अंकित को मुरादाबाद के कोठीवाल डेंटल कालेज में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी स्थिति गंभीर बनी हुई है. अस्‍पताल में हिंदुस्‍तान के लोग जमे हुए हैं. बताया जा रहा है कि अंकित के परिजनों की तरफ से दी गई तहरीर पर पुलिस ने जानलेवा हमला का मामला दर्ज करते हुए अखिलेश को अरेस्‍ट कर लिया है.

भारत में परेशान हैं खेल पत्रकार

आईपीएल को छोड़ दिया जाए, तो भारत में खेलों का हाल छिपा नहीं. ओलंपिक समिति ने भारत को बाहर कर दिया है, मुक्केबाजी में भी धब्बा जैसा दिख रहा है. खिलाड़ी परेशान हैं और खेलों के बुरे हाल की वजह से खेल पत्रकार भी परेशान हैं.

पिछले दो तीन साल में खेल पत्रकारों का ज्यादा वक्त मैदान की जगह अधिकारियों के कमरे में बीता, जहां वे खेल की राजनीति पर बातचीत करने के लिए जमा होते हैं. खेल पत्रकार इन दिनों मैचों की रिपोर्टिंग से ज्यादा खेल से जुड़ी राजनीति पर रिपोर्ट कर रहे हैं. भारत के ज्यादातर खेल अधिकारियों पर भ्रष्ट होने के आरोप लगते आए हैं, जिसका खामियाजा खेल को भी भुगतना पड़ता है. लेकिन मौजूदा हालात के लिए खेल मंत्री और खेल मंत्रालय भी कम जिम्मेदार नहीं.

ढाई साल पहले 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों में मंत्री एमएस गिल और खेल संघों के बीच खूब ठनी. मंत्री इन संघों पर लगाम लगाना चाहते थे और संघ अपनी मर्जी से काम करना चाहते थे. गिल ने उम्र का हवाला देते हुए संघों के अधिकारियों को नियंत्रित करना चाहा और कुछ नियम भी बनाए, लेकिन संघों ने इन नियमों को नहीं माना. कई खेल संघ में गिल के साथी नेता ही अधिकारी हैं, लेकिन उन्होंने भी बात नहीं मानी.

गिल के बाद अजय माकन ने भी खेल से जुड़ा बिल पास कराने की कोशिश की, जिसमें नियम कायदों का जिक्र है. लेकिन उनकी लाख कोशिशों के बाद भी यह बिल संसद में पास नहीं हो पाया. सरकार के आला नेता खेल संघों पर कब्जा जमाए हैं और वे गद्दी नहीं छोड़ना चाहते. माकन ने दो साल के अपने कार्यकाल में इस काम को करने की भरपूर कोशिश की लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. हालांकि इस दौरान भारतीय टीम ने लंदन ओलंपिक में ठीक ठाक प्रदर्शन किया. ओलंपिक से लौटते ही माकन से मंत्रालय ले लिया गया.

माकन के बाद जीतेंद्र सिंह ने खेल मंत्रालय की बागडोर संभाली. उन्होंने भी पहले मंत्रियों जैसा ही करना चाहा और खेलों की आचार संहिता के लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया. इसके बाद अदालत ने भारतीय ओलंपिक संघ को सरकार के आदेश के तहत चुनाव कराने को कहा, जिसे अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने नामंजूर कर दिया और भारत की सदस्यता ही खत्म कर दी.

इसके बाद खेल मंत्रालय ने भी ओलंपिक समिति को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. नतीजा हुआ कि भारतीय ओलंपिक संघ दो चक्कों के बीच फंस गई. उसे समझ नहीं आ रहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय समिति की माने या अपनी सरकार की. भारतीय संघ को आज न तो भारत सरकार की ओर से वित्तीय मदद मिल रही है और न ही अंतरराष्ट्रीय समिति से.

कुछ ऐसी ही हालत 1970 के दशक में थी, जब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं. उन्होंने भी खेल संघों को सबक सिखाने की ठानी थी. लेकिन उस वक्त के भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष अश्विनी कुमार ने हाथ जोड़ कर गांधी से कहा था कि वह ऐसा न करें. इंदिरा गांधी ने उनकी बात मान ली.

आज फर्क यह है कि कोई किसी की बात मानने को तैयार नहीं. मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति से मिलना है. अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की अपनी परेशानी है. उसके अध्यक्ष याक रोगे का कार्यकाल जुलाई में खत्म होने वाला है. वह नहीं चाहेंगे कि अंतिम वक्त में किसी पक्ष को नाराज किया जाए और उनके रिटायरमेंट के बाद उनके दामन पर इस बात का दाग लगे. भारत में जिस तरह मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, किसी भी मंत्री के साथ कुछ भी हो सकता है और ऐसे में खिलाड़ियों की कौन पूछे… (डीडब्‍ल्‍यू)

उत्तराखंड में कौन है दस करोड़ का गंजा बंदर!

देहरादून। बंदर का नाम जुबान पर आते ही हर कोई उसकी मारी जाने वाली गुलाटियो को लेकर आश्चर्यचकित रहता है। लेकिन उत्तराखण्ड में गंजा बंदर के नाम से एक व्यक्ति दलाली की पटकथा लिखकर आज दस करोड़ का कारोबारी बन बैठा है। हमेशा से ही राजनेताओ के इशारे पर नाचने वाला यह बंदर अब खुद का अपना साम्राज्य चलाकर शासन से लेकर बड़े अधिकारियों के तबादलों में भी मोटी दलाली कर रहा है। उसकी इस दलाली की भनक सरकार के सबसे बड़े आका के कानो में भी गूंजनी शुरू हो गई है लेकिन आका का विश्वासपात्र होने के कारण उस पर नकेल कसने के बजाए उसे लूट की खुली छूट दे दी गई है।

पिछले कई दिनों से उत्तराखण्ड के आईएएस व पीसीएस अधिकारियों के तबादलो को लेकर मोटी डील इसी गंजे बंदर के इशारे पर अंजाम दी गई और पहाड़ से मैदान में उतारे जाने वाले कई अधिकारियो से मोटी रकम लिए जाने की बातें गोपनीय रूप से सत्ताधारी दल के नेताओं के कानों में भी जा गूंजी। बंदर की गुलाटियों से परेशान राजनेता अब इसकी शिकायत दिल्ली के बड़े दरबार में करने का मन बना रहे हैं और बंदर की इन करतूतों को जगजाहिर करने का खाका भी तैयार कर रहे हैं।

उत्तराखण्ड के किसी भी जनपद में भले ही यह गंजा बंदर अपनी राजनैतिक जमीन चमकाने में नाकामयाब साबित हुआ हो लेकिन बड़े आका को चुनाव लड़वाने से लेकर टिहरी के उपचुनाव में उस व्यक्ति की महत्पूर्ण भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तराखण्ड में जिसे राजनीति का चाणक्य कहा जाता है उसके साथ गंजे बंदर ने मिलकर किला तो किसी तरह फतह कर लिया लेकिन टिहरी के उपचुनाव में इस गंजे बंदर का चाणक्य प्रेम उससे दूर होता चला गया और चाणक्य ने गंजे बंदर का साथ छोड़कर इसकी शिकायत कर डाली जिसका परिणाम यह रहा कि चाणक्य के द्वारा की गई शिकायत को सही मानते हुए अब गंजे बंदर पर नकेल कसने की तैयारी की जा रही है।

चंडीगढ़, दिल्ली व उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर इस गंजे बंदर की अकूत सम्पत्ति होने की खबरें भी अब दिल्ली दरबार तक जा पहुंची है और अब 2014 के चुनाव से पहले प्रदेश के आका भी अपने वजीर के साथ इससे किनारा करने की जुगत में जुटे हुए हैं। राजनैतिक जमीन हासिल करने के लिए इस बंदर द्वारा अपने विधानसभा क्षेत्र में कई बार जनता के बीच जगह बनाने की कोशिश की गई लेकिन जनता ने कभी भी बंदर का साथ नही दिया और एक राजनेता को ठिकाने लगाने में इस बंदर ने जो भूमिका निभाई अब उस भूमिका को वह राजनेता बंदर के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है।

लालबत्ती की आस में लगा वह राजनेता अब प्रदेश के आका से टकटकी लगा देख रहा है लेकिन उसकी राह में बंदर ने अपनी गुलाटियां मारनी शुरू कर दी हैं लेकिन इस राह में अब ऐसी जानकारियां रोड़ा बनती जा रही हैं जो हार का कारण माना जा रहा था। धरातल पर जनता के बीच विश्वास कायम करने के बजाए बंदररूपी दलाल का भरोसा करना आका को भी महंगा साबित हुआ और अपने वजीर को टिहरी का उपचुनाव हरा बैठे। प्रदेश से लेकर दिल्ली दरबार तक हार के चलते राजनैतिक दृष्टिकोण की परीक्षा भी बड़े आका की हो गई और पहली राजनैतिक पारी शुरू करने से पहले ही कारपोरेट वजीर बंदर की गुलाटियों का शिकार हो गया।

सूत्र यह भी बताते हैं कि चकराता रोड के जिस एमडीडीए प्रोजैक्ट को लेकर शासनस्तर पर कार्यवाही चल रही है उसमें बंदर की भी हिस्सेदारी कारपोरेट जगत से है और इस मामले मे रोड़ा बनने वाले एमडीडीए के उपाध्यक्ष को भी अब वहां से बाहर का रास्ता दिखाया जाना तय हो गया है। सत्ता का केन्द्र बिन्दु बनने की ललक गंजे बंदर को तब लगी जब पहली डील की कमाई में राजनेताओ का आर्शीवाद बड़े स्तर पर मिलना शुरू हुआ। इसके बाद चंडीगढ़ में कारोबार की जड़ों को बढ़ाकर बड़े नेताओ से सम्पर्क बढ़ा लिया।

देहरादून से नारायण परगईं की रिपोर्ट.

भड़ास को पढने के बाद तो जैसे मेरी आँखे खुल गयी

: भड़ास ने सोच को दिए शब्द : बात उन दिनों की है, जब अखबार का प्रकाशन पहाड़ खोदने सरीखा होता था. अखबार बोले तो तलवार से तेज़. पैना. धारदार.  एक ही वार में सामने वाले का काम तमाम. हालाँकि ये सच है कि अखबार निकलने के लिए जिगर चाहिए होता था. जिसके पास ऐसा जिगर होता वो न्यूज़ पेपर का पंजीयन करा अपने काम का श्रीगणेश कर देते. सेवा का ज़ज्बा दिखता था. विज्ञापन के लिए इतनी मारा-मारी उन दिनों नहीं होती थी. आज का ब्यूरो उस समय का प्रतिनिधि होता था.

मैंने उस समय के पत्रकारों की शैली को करीब से जाना तो लगा जैसे इससे मुश्किल काम दूसरा नहीं हो सकता. काम बहुत मेहनत का, हालांकि नीचे से लेकर उपर तक काम की गज़ब की इज्ज़त मिलती थी. कलेक्टर की बोलती बंद कर दो, इतना पॉवर. जो लिख दिया उसमे मानो भूचाल आ गया. किसी वजह से भूचाल न भी आये तो सामने वाले की पतलून तो गीली हो जाती थी. इसीलिए कहा जाता था- तलवार से ज्यादा अखबार में ताक़त होती है,

भड़ास को पढने के बाद तो जैसे मेरी आँखे खुल गयी. सोशल मीडिया का ये स्वरूप. वाह! इससे बेहतर शायद ही कुछ और हो. सब कुछ भड़ास में. सुख-दुःख, आवाजाही, साक्षात्कार, सभी ऑनलाइन. चाहे सुदूर गावं में पढ़ लो या फिर देश-विदेश के किसी भी कोने में भड़ास ओपन  कर अपनी भड़ास को शांत कर लो. वो दिन याद आते हैं जब ट्रेडील के जरिये अखबार का प्रकाशन होता था. पत्रकार पूरा दिन न्यूज़ में खपा देता. आधी रात तक अपने मोटे कांच के चश्मे से बारीक़ अक्षर जमाता और तीसरे पहर में शुरू होता अखबार का प्रकाशन.

आज सब कुछ फ़ास्ट, सुपर फ़ास्ट का जमाना है, खबर अपलोड हुई नहीं कि प्रतिक्रिया चालू. आज हम सब की जुबान भड़ास के यशवंतजी की पहल का स्वागत करती है. लगता है जैसे भड़ास न होता तो किसके आगे अपना दुखड़े सुनाते? एक पत्रकार के जीवन का किस्सा बार-बार बयाँ करने से हंसने वालों की तादात भले बढती हो लेकिन लोगों को वास्तविकता का पता चलता है. जिस संसथान में काम करो वहां की कमियाँ कैसे दूर हो? ऐसे कैसे शोसण रुकेगा? इन सबका एक ही जवाब है- भड़ास.

यूं ही कट जायेगा सफ़र साथ चलने में…बस चलते रहिये,,,

शुभकामनायें

दिलीप सिकरवार

dsikarwar71@gmail.com


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नभाटा के असिस्‍टेंट एडीटर बने नदीम, सुधीर संग लखनऊ से नवभारत टाइम्‍स निकालने का जिम्‍मा

लखनऊ : दैनिक जागरण से बीस साल पुराना नाता तोड़ने वाले यूपी स्‍टेट ब्‍यूरो चीफ नदीम नवभारत टाइम्‍स के असिस्‍टेंट एडीटर हो गए हैं। नभाटा प्रबंधन ने उन्‍हें सुधीर मिश्रा के संग लखनऊ से अपना संस्‍करण शुरू करने का जिम्‍मा सौंपा है। सुधीर मिश्र की नियुक्‍ति नभाटा में बतौर स्‍थानीय सम्‍पादक हुई है। वह भी दैनिक जागरण प्रोडेक्‍ट हैं। हालांकि मौजूदा समय वह भास्‍कर में थे, वहीं से नभाटा ने उन्‍हें लिया है। नभाटा का लखनऊ संस्‍करण अगस्‍त महीने से शुरू होने की सम्‍भावना है।

नदीम ने आज सबेरे अपना इस्‍तीफा दैनिक जागरण प्रबंधन का सौंप दिया लेकिन अभी उनका इस्‍तीफा स्‍वीकार नहीं हुआ। प्रबंधन उनसे जानना चाहता है कि वह क्‍यों जागरण छोड़ रहे हैं। जागरण प्रबंधन को इस्‍तीफा सौंपने की पुष्‍टि खुद नदीम ने कर दी है।

इन मुसीबतों से डरकर कभी यशवंत ने अपने कदम पीछे खींचे हो, ऐसा नहीं हुआ…

: भड़ास४मीडिया मतलब पोलखोल अभियान के पाँच साल : मीडिया जगत की काली सच्चाई को उजागर करने के लिए एक जुझारू पत्रकार के द्वारा चलाये जा रहे पोलखोल अभियान का एक और साल पूरा हो गया| वो पत्रकार जिसे खुद को दबंग और रंगबाज कहने-कहलवाने से कोई गुरेज नहीं, जो न किसी से डरता है न दबता है, हर मुसीबत के सामने डटकर खड़ा होना आता है जिसे| बात हो रही है खबरियों की खबर देने वाली प्रमुख वेबसाईट भड़ास४मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह की|

यशवंत सिंह जिसके नाम का खौफ तो तमाम तथाकथित मीडिया हाउसों के मालिकों व मैनेजमेंट में है। और हो भी क्यों न, खुद को कॉरपोरेट कहने वाले इन सफेदपोशों की दुकानों के अंदर की काली सच्चाई को यशवंत दुनिया के सामने जो लाते आये हैं। न रुपयों से इन्हें खरीदा जा सका और न ही धमकियों से डराया जा सका। यशवंत तो बस अपनी ही धुन में प्रबंधन के सताए कमजोर पत्रकारों का एक मजबूत सहारा बनकर हमेशा उनके साथ खड़े रहे | यशवंत को डराने-दबाने की, भड़ास४मीडिया को बंद कराने के न जाने कितने ही प्रयास किये गये लेकिन यह इंसान अपने मजबूत इरादों के साथ आज भी खड़ा हुआ है, न केवल खड़ा है बल्कि प्रसिद्धि की नयी ऊंचाइयों को भी छू रहा है| दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझकर उनकी मदद करने के जज्बे ने यशवंत को कई बार मुसीबतों में भी डाला लेकिन फिर इन मुसीबतों से डरकर कभी यशवंत ने अपने कदम पीछे खींचे हो, ऐसा नहीं हुआ| कानूनी पचड़ों में फँसे, रंगदारी वसूलने के आरोप लगे और इस कारण जेल यात्रा भी करनी पड़ी लेकिन इसके बावजूद न तो इरादे कमजोर पड़े, न हौसला और न ही आत्मविश्वास|

भड़ास४मीडिया के आने से पहले तक विभिन्न मीडियाहाउसों के अंदर चल रही खींचतान-उठापटक की जानकारी कम ही लोगों को हो पाती थी| आंतरिक राजनीति के शिकार बन रहे मीडिया कर्मियों की आवाज कहीं दबकर रह जाती थी लेकिन भड़ास के आने के बाद इन सबका जगजाहिर होना शुरू हुआ| आंतरिक राजनीति, शोषण का शिकार हो रहे मीडियाकर्मियों को एक माध्यम मिला जिससे वह अपनी बात को-अपने दर्द को सबके सामने रख सकें| उन्हें एक ऐसा सशक्त माध्यम मिला जिससे वे भी अपनी ‘भड़ास’ निकाल सकें|

यशवंत ने इमानदारी से लिखते हुए पत्रकारों के हक की आवाज़ तो उठायी ही साथ ही साथ पत्रकारिता पेशे को बदनाम कर रहे पत्रकारों की गलत हरकतों को भी उजागर करने से नहीं चूके| पत्रकारिता जगत में भड़ास की लोकप्रियता के बारे में क्या कहा जाये, पत्रकारिता पेशे से जुड़े देश भर के अधिकाँश लोग भड़ास४मीडिया के नाम से भलीभांति परिचित हैं| शायद यही इकलौती ऐसी वेबसाईट होगी जिसे कई मीडिया संस्थानों ने अपने संस्थान में प्रतिबंधित किया हुआ है और कर्मचारियों को हिदायत मिली हुयी है कि वे संस्थान में इस वेबसाईट को न खोलें| एक सच यह भी है कि विभिन्न मीडिया घरानों के कर्ताधर्ताओं व उच्चप्रबंधन द्वारा भले ही इस वेबसाईट को प्रतिबंधित की श्रेणी में रखा जाता हो लेकिन अपने ही संस्थान में चल रही उठापटक व आंतरिक राजनीति से सम्बंधित ख़बरों को जानने के लिए ये लोग स्वयं भी इसका उपयोग करते हैं, ये एक ऐसा सच है जिसे ये लोग शायद आसानी से कभी स्वीकार नहीं करेंगे| अपनी उपयोगिता के कारण जो लोकप्रियता इन्टरनेट की दुनिया में गूगल ने हासिल की है वही लोकप्रियता भारतीय मीडिया जगत में भड़ास४मीडिया ने| खबरियों की खबर देने वाला भड़ास४मीडिया लोकप्रियता व प्रसिद्धि के नए आयामों को छुए व निष्पक्ष ख़बरों को सामने लाता रहे इन्ही कामनाओं के साथ यशवंत व उनकी टीम को भड़ास४मीडिया की पाँचवी वर्षगाँठ की हार्दिक बधाई एवँ
शुभकामनायें………

शिवम् भारद्वाज

आगरा

shivambhardwaj1989@gmail.com


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कहां स्टार और कहां एबीपी, कोई बराबरी नहीं है…

Sanjaya Kumar Singh : स्टार न्यूज और आनंद बाजार पत्रिका के बीच करार खत्म हुआ तो स्टार न्यूज का नया नाम रखा जाना था और काफी शोर-शराबे व हंगामे के बाद इसका नाम बदलकर एबीपी न्यूज कर दिया दिया गया। कहने को तो कहा गया कि बदला कुछ नहीं सिर्फ नाम है पर नाम जो स्टार न्यूज था वह अब एबीसी (क्षमा कीजिएगा) एबीपी न्यूज हो गया। कहां स्टार और कहां एबीपी (एबीसी का आभास देता है सो अलग) – कोई बराबरी नहीं है।

इन दिनों इस चैनल का विज्ञापन आ रहा है, खरी और सटीक बात करने के लिए देखिए एबीपी न्यूज। जैसे ज्ञानवर्धन के लिए कोई टीवी न्यूज पर ही निर्भर होता है। एबीपी न्यूज देखने वाले की सब सुनते हैं। जैसे सबको सुनाना ही होता है। इस विज्ञापन में जो लोग शिकायत करते हैं कि कोई उनकी सुनता नहीं, सिर्फ उन्हीं लोगों को अपना दर्शक बनाना चाहता है क्या एबीपी न्यूज। नाम के मामले में अगर यह चैनल कुछ खास नहीं कर सका तो विज्ञापन अच्छे बनवाए जाने चाहिए थे पर वहां भी एबीसी। मुझे तो यह किसी अच्छे खबरिया चैनल का विज्ञापन बिल्कुल नहीं लगता है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

पीएम का नामांकन कवर करने की इजाजत नहीं मिलने पर भड़के मीडियाकर्मी

गुवाहाटी। राज्यसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से नामांकन-पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया कवर करने की इजाजत न मिलने पर गुवाहाटी के मीडियाकर्मियों ने विरोध-प्रदर्शन किया। अधिकारियों ने स्थानीय एवं राष्ट्रीय मीडिया के पत्रकारों, टीवी कैमरामैन और फोटोग्राफरों के विधानसभा परिसर में दाखिल होने पर रोक लगा दी। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) ने मीडियाकर्मियों के परिसर में दाखिल होने पर रोक लगायी है।

पत्रकारों ने आरोप लगाया कि असम में असंतोष, रेलवे रिश्वतखोरी मामला, कोयला घोटाले का मामला आदि से जुड़े सवालों का सामना करने से प्रधानमंत्री को बचाया गया और उन्हें उस असम के पत्रकारों से बातचीत करने से रोका गया जिसे वह अपना घर कहते हैं। नाराज पत्रकारों ने दावा किया कि असम की जनता के प्रतिनिधि के तौर पर प्रधानमंत्री की ओर से नामांकन-पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया कवर करने की इजाजत न देकर मीडिया का ‘‘मुंह बंद कराया गया’’।

पत्रकारों ने कहा, ‘‘यह न केवल पत्रकार समुदाय का अपमान है बल्कि यह असम की उस जनता का भी अपमान है जिसकी नुमाइंदगी प्रधानमंत्री राज्यसभा में चार दफा कर चुके हैं।’’ तीन घंटे से ज्यादा चले विरोध-प्रदर्शन के बाद असम सरकार के कई मंत्री, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भुवनेश्वर कलिता और मुख्यमंत्री तरूण गोगोई पत्रकारों को शांत करने के लिए बाहर आए और कहा कि प्रधानमंत्री विधानसभा परिसर में उनसे बातचीत के लिए इंतजार कर रहे हैं। इस पर पत्रकारों ने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री को विधानसभा परिसर से बाहर आकर उनसे बात करनी चाहिए। आखिरकार, प्रधानमंत्री बाहर आए और दिल्ली रवाना होने की खातिर हवाई अड्डा जाने से पहले उन्होंने मीडिया से करीब पांच मिनट बात की। (भाषा)

जेवीजी का सीएमडी विजय शर्मा ठगी के आरोप में अरेस्‍ट

नई दिल्ली : जेवीजी ग्रुप का सीएमडी विजय कुमार शर्मा एक बार फिर पुलिस की गिरफ्त में आ गया है। इस बार उस पर वियान इंफ्रास्ट्रक्चर तथा पीएसजी डेवलपर्स एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड नामक कंपनियों में निवेश पर मोटे ब्याज का झांसा देकर कई सैकड़ों करोड़ रुपये हड़पन कर धोखा देने का आरोप है। दो साल पूर्व विजय को भगोड़ा घोषित कर दिया गया था। विजय की गिरफ्तारी पर दिल्ली पुलिस ने एक लाख रुपये इनाम रखा था।

दिल्‍ली क्राइम ब्रांच की टीम ने उसे भैरों रोड पर उस समय अरेस्‍ट किया जब वो मर्सिडीज कार से कहीं जा रहा था। तलाशी में उसके कब्जे से लाइसेंसी पिस्टल भी बरामद हुई है। इससे पूर्व जेवीजी ठगी मामले में दिल्ली पुलिस ने उसे 1999 में मुंबई से अरेस्‍ट किया था।

अतिरिक्त पुलिस आयुक्त रविंद्र यादव (क्राइम ब्रांच) ने बताया कि 16 माह जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट से विजय शर्मा को जमानत मिल गई थी। जेल से बाहर आने के बाद उसने वर्ष 2005- 2006 में दो अन्य कंपनियों के माध्यम से लोगों से ठगी शुरू कर दी। उसने लोगों को सस्ते भूखंड देने का झांसा देकर करोड़ों रुपये हड़पे और गायब हो गया। विजय के खिलाफ विभिन्न पुलिस थानों में धोखाधड़ी के करीब दस मामले दर्ज हुए। 2 मई, 2011 को एक अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी पर एक लाख का इनाम घोषित किया।

दूसरी तरफ , जेवीजी मामले में शर्मा के अदालत में पेश न होने पर अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी जमानत खारिज कर उसे अदालत के समक्ष सरेंडर करने का आदेश दिया था, लेकिन वह सरेंडर करने की बजाय भूमिगत रह कर अपना काम देख रहा था। विजय शर्मा के पास से बरामद कार उसेह की पत्नी के नाम पर रजिस्टर्ड है। अतिरिक्त आयुक्त रविंद्र यादव के अनुसार, विजय शर्मा पर लाखों निवेशकों से करीब 1000 करोड़ की ठगी का अनुमान है।

हरियाणा में शिक्षक परिवार में जन्मे विजय शर्मा का दिल्ली में 1979 से 1989 तक बिल्डिंग मैटेरियल सप्लायर का काम था। सितंबर 1989 में उसने जेवीजी कंपनी खोलकर रीयल एस्टेट में कदम रखा। उसने इसके बाद दादरी रोड पर जेवीजी एंक्लेव, मेरठ में चौधरी चरण सिंह आवास योजना तथा पटना में जयप्रकाश योजना के तहत कॉलोनी विकसित कर मोटी कमाई की। मेरठ में उसने अप्पू घर भी खरीदा। सीए डीके कपूर के साथ मिलकर विजय शर्मा ने जेवीजी फाइनेंस कंपनी खोलकर आम लोगों को 30 फीसद ब्याज का झांसा देकर कई सौ करोड़ रुपये जुटाए। देखते ही देखते जेवीजी ग्रुप की करीब 3000 फर्म हो गई। समाचार पत्र, डिपार्टमेंटल स्टोर, जेवीजी फूड, पेट्रोकेमिकल्स, होटल आदि क्षेत्रों में उसने पैर पसारे। 1994-95 में उसकी कंपनी का टर्नओवर 102 करोड़ था वहीं 1995-96 में यह बढ़कर 700 करोड़ हो गया। लेकिन 1997 में सेबी और रिजर्व बैंक आफ इंडिया की सख्ती के बाद जेवीजी ग्रुप के शटर धीरे-धीरे बंद हो गए।

प्रभात खबर, दिल्‍ली के संपादक एनपी सिंह का इस्‍तीफा, स्‍टार में वीपी बने

: प्रभात खबर, भागलपुर के पूर्व जीएम ज्‍वाइन करेंगे न्‍यूज11 : प्रभात खबर से सूचना है कि एनपी सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे दिल्‍ली में अखबार के संपादक थे. एनपी सिंह अपनी नई पारी स्‍टार समूह के साथ शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें समूह में वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया है. अच्‍छे एवं तेजतर्रार पत्रकारों में शुमार एनपी सिंह लंबे समय से प्रभात खबर से जुड़े हुए थे.

दूसरी तरफ खबर है कि कुछ महीने पूर्व प्रभात खबर भागलपुर से इस्‍तीफा देने वाले एनपी सिंह भी जल्‍द ही अपनी नई पारी न्‍यूज11 के साथ शुरू करने जा रहे हैं. एनपी सिंह भागलपुर में जीएम के पद पर कार्यरत थे. वे बिहार में न्‍यूज11 की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. 

रेणुकूट में दैनिक जागरण और अमर उजाला के पत्रकारों ने कलम रख दी गिरवी

रेणुकूट : लगातार बहस का मुद्दा बनती जा रही पत्रकारिता की साख के लिए वास्तव में कुछ पत्रकारों की भूमिका को देखते हुए कुछ भी कहना अब बहुत खराब नहीं लगता है। सोनभद्र के रेणुकूट में पत्रकारिता से खिलवाड़ करने वाले दो तथाकथित बड़े कहे जाने वाले अखबारों के पत्रकारों ने तो कम से कम यही साबित किया है। अमर उजाला के पत्रकार रामाश्रय राय एवं दैनिक जागरण के राहुल शर्मा रेणुकूट में द्वेषपूर्ण एवं धनोपार्जन की पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध होते जा रहे हैं।

बीते 9 मई को रेणुकूट के पिपरी स्थित बिजली विभाग के एक जेई सतीश सिंह को रेणुकूट नगर पंचायत अध्यक्ष के भाई बृजेश सिंह ने सरेआम धुन दिया। जेई द्वारा इसकी शिकायत पिपरी थाने में करते हुए तहरीर दी गई। पुलिस ने बृजेश सिंह के ऊपर मुकदमा भी दर्ज कर लिया, खूब बवाल भी मचा। बिजली विभाग के कर्मचारी युनियनों ने आन्दोलन की धमकी तक दे डाली, परन्तु दैनिक जागरण एवं अमर उजाला के पत्रकारों को बडे़-बड़े विज्ञापनों के आगे कुछ भी नहीं दिखा, लिहाजा दोनों बड़े कहलाने वाले अखबारों से यह पूरी खबर ही नदारद रही।

जनमानस की आलोचनाओं के बाद अमर उजाला के पत्रकार ने तो फालोअप के नाम पर दो दिन बाद खबर लिखी, पर नमक हलाली का परिचय देते हुए आरोपी का बचाव भी पूरा किया। मुकदमा दर्ज होने के बाद भी आरोपी के नाम की जगह एक युवक लिख दिया। वहीं दैनिक जागरण के पत्रकार राहुल शर्मा की वफादारी तनिक भी नहीं डगमगाई और खबर ना लगाने की कसम ही खा बैठे। लोगों में इन अखबारों के पत्रकारों के इस रवैये के प्रति काफी रोष है। वैसे इन पत्रकारों के बारे में कहा जाता है कि अगर इनके सामने से कोई कुत्ता भी जोर से दुम हिलाता निकल जाये तो भी ये गुस्ताखी बर्दाश्‍त नहीं करते और लीड खबर बन जाती है।

इतना ही नहीं पुलिस ने आरोपी बृजेश सिंह को अरेस्‍ट भी कर लिया परन्‍तु दैनिक जागरण ने खबर ही नहीं प्रकाशित की, जबकि अमर उजाला ने छोटी सी खबर में निपटा दिया। ऐसे में जनमानस द्वारा पत्रकार एवं पत्रकारिता की भूमिका पर उठाए जाने वाले सवाल कम से कम बेमतलब तो नहीं ही लगते हैं। क्‍या अखबार के आला हुक्मरानों को ऐसे पत्रकारों से तौबा कर लेना चाहिए जो पत्रकारिता के वास्तविक मूल्यों के सृजन से परे अपना धन्धा एवं धनोपार्जन कर पत्रकारिता की साख एवं लोगों के विश्‍वास पर बट्टा लगा रहे हैं। ऐसे ही पत्रकारों की वजह से ही पत्रकारिता के मूल्यों की बात तो दूर अखबारों के परिपेक्ष्य में निष्‍पक्षता, निर्भीकता, सत्यनिष्‍ठा जैसे शब्द व्यावहारिकता में भी नदारत होते जा रहे हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

इंडिया न्‍यूज पर बड़ा खुलासा : वाजपेयी ने क्लिंटन से वायदे के तहत मुशर्रफ को आगरा बुलाया

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे अशोक टंडन ने इंडिया न्यूज के विशेष कार्यक्रम टुनाइट विद दीपक चौरसिया में खुलासा किया है कि पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से किए वायदे के तहत शिखर वार्ता के लिए पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को आगरा बुलाया था. वाजपेयी ने यह वचन क्लिंटन को तब दिया जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने करगिल से सेना हटाने के क्लिंटन के दो टूक संदेश के बदले आग्रह किया कि भारत से कम से कम बातचीत का वचन लिया जाए.

टंडन ने कहा कि करगिल युद्ध के दौरान क्लिंटन ने नवाज शऱीफ और वाजपेयी दोनों से अमेरिका आने का आग्रह किया लेकिन वाजपेयी ने जाने से इनकार कर दिया. वाजपेयी ने क्लिंटन से कहा कि न  तो भारत ने हमला किया है और न ही जवाबी हमला. सारा कसूर पाकिस्तान का है इसलिए आप पाकिस्तान से ही बात करिए. टंडन ने कहा कि क्लिंटन के बुलावे पर नवाज शरीफ अमेरिका गए और उस बैठक में सउदी अरब के क्राउन प्रिंस भी मौजूद थे. नवाज से क्लिंटन ने पाकिस्तानी फौज को करगिल से हटाने को कहा जिस पर नवाज ने क्लिंटन से आग्रह किया कि उन्हें खाली हाथ न लौटने दिया जाए और कम से कम भारत से यह भरोसा लिया जाए कि वो बातचीत का रास्ता खुला रखेगा.

टंडन ने कहा कि वाजपेयी ने क्लिंटन को ये भरोसा दिया कि अगर पाकिस्तानी फौज हटती है तो भारत पाकिस्तान से बातचीत करेगा. एक सरकार के दूसरे सरकार से वायदे के तहत ही मुशर्रफ को बातचीत के लिए आगरा बुलाया गया था. टंडन के मुताबिक चूंकि नवाज का तख्तापलट करके मुशर्रफ राष्ट्रपति बन गए थे, बावजूद इसके मुशर्रफ को ही बुलाया गया क्योंकि मुशर्रफ पाकिस्तान के शासनाध्यक्ष थे. टंडन ने कहा कि उस वक्त मुशर्रफ की जगह पर जो भी राष्ट्राध्यक्ष होता, उसे भारत सरकार बुलाती क्योंकि यह दो देशों के बीच का मामला था.

पाक जायरीन का जत्था नहीं आएगा गरीब नवाज के उर्स में

गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स में इस दफा पाक जायरीन का जत्था नहीं आएगा। भारतीय सैनिकों के सिर काट ले जाने और सरबजीत सिंह की जेल में हत्या को लेकर अजमेर में कुछ हिन्दुवादी संगठनों के विरोध के चलते भारत सरकार ने पाक जायरीन को भारत आने की अनुमति नहीं दी है।

हर उर्स में पाकिस्तान से करीब सौ सवा सौ पुरुष जायरीन भारत सरकार के खास मेहमान बनकर जियारत के लिए अजमेर आते हैं। अटारी से उनके लिए स्पेशल ट्रेन चलती है जो आईबी और विशेष सुरक्षा बलों की निगरानी में दिल्ली होते हुए अजमेर आती है। यहां अमूमन वे तीन-चार दिन ठहरते हैं तब तक ट्रेन विशेष सुरक्षा निगरानी में रहती है। उन्हें एक सरकारी स्कूल में ठहराया जाता है। कलेक्टर समेत राज्य के कई अफसर उनकी तीमारदारी में रहते हैं। यह और बात है कि वे नियम तोड़ने में चूक नहीं करते और जत्थे में से एकाध पाक नागरिक वीजा का उल्लंघन करते हुए कहीं और घूमने चल देता है। अजमेर नगर निगम और नगर विकास न्यास उनके सम्मान में भोज देता है और अभिनंदन करता है।

भारत सरकार इस साल भी उनकी ऐसी ही मेहमान नवाजी के लिए पलक पांवडे़ बिछाए बैठी थी परंतु अजमेर के कुछ हिन्दुवादी संगठनों ने सरबजीत सिंह की हत्या और भारतीय सैनिकों के सिर काट ले जाने के मुद्दे को उठाते हुए पाक जायरीन के आने पर उनके विरोध का ऐलान किया। शहर में जगह-जगह हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। प्रशासन ने एक और तो उनके लिए सारी तैयारियां कर ली दूसरी ओर अपने मंत्रियों-अफसरों के जरिए आंदोलन को खत्म कराने की भी कोशिशें जारी रखी। अंततः सुरक्षा कारणों की आड़ लेकर पाकिस्तान को जायरीन नहीं भेजने का निर्णय सुना दिया।

हालांकि भारत सरकार के इस फैसले को लेकर दरगाह से जुडे़ कुछ लोग और बांग्लादेश से आए जायरीन इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि यह ख्वाजा का दरबार है, यहां आने से किसी को रोका जाना ठीक नहीं है। उनके मुताबिक सियासत को धर्म से अलग रखा जाना चाहिए। उनकी समझ में संभवत: सरबजीत और भारतीय सैनिकों का मुद्दा शहादत नहीं सियासत है।

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. राजेंद्र जी से संपर्क  09549155160 या 09829270160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए कर सकते हैं. राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं.

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सीबीआई ने गुलाब चंद कटारिया पर कसा शिकंजा

चुनावों से कुछ माह पहले राजस्थान विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और पूर्व गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया एक बड़े झमेले में फंस गए हैं। आठ साल पुराने गुजरात के सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ कांड में सीबीआई ने कटारिया को हत्या की साजिश के आरोप में नामजद करते हुए अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है। चार्जशीट में लगाए गए आरोप इतने गंभीर हैं कि कटारिया का जेल जाना लगभग तय है। गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह इस कांड के मुख्य आरोपी हैं और इसी के चलते उनकी कुर्सी गई थी। फिलहाल वे जमानत पर हैं।

सोहराबुद्दीन शेख एक माफिया सरगना था। अक्टूबर-नवंबर 2004 में अजमेर के आरके मार्बल समूह के मालिक और भीलवाड़ा की संगम टैक्सटाइल के मालिकों को फोन पर धमकी देते हुए 24 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगी थी। दोनों समूहों ने तत्कालीन गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया और पुलिस के आला अफसरों से संपर्क किया। कटारिया आदि ने सोहराबुद्दीन को रास्ते से हटाने के लिए गुजरात के गृह राज्य मंत्री अमित शाह से संपर्क किया।

26 नवंबर 2005 को गुजरात और राजस्थान की संयुक्त टीम ने अहमदाबाद के नरोडा के पास एक फर्जी मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन को मार गिराया। कुछ दिनों बाद सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसरबी की भी हत्या कर दी गई। दिसंबर 2006 में इस कांड के चश्मदीद गवाह और सोहराबुद्दीन के साथी तुलसी प्रजापति का उदयपुर जेल से गुजरात ले जाते समय एनकाउंटर कर दिया गया। सन 2007 में इस कांड की गूंज गुजरात विधानसभा में सुनाई दी। राजस्थान और गुजरात पुलिस की जांच के बाद यह मामला सीबीआई के पास चला गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति फर्जी एनकाउंटर मामलों की सुनवाई मुंबई के कालाघोड़ा में विशेष रूप से गठित सीबीआई अदालत में चल रही है।

इस कांड के चलते अमित शाह का इस्तीफा हुआ और नरेंद्र मोदी तथा भाजपा के तत्कालीन गुजरात महामंत्री ओम प्रकाश माथुर के दामन पर भी छींटे लगे थे। राजस्थान और गुजरात के 5 आईपीएस अधिकारियों समेत अब तक इस मामले में 18 के खिलाफ चार्जशीट दायर हो चुकी है। इनमें गुजरात के डीआईजी बंजारा, उदयपुर के एसपी दिनेश एमएन, आंध्र प्रदेश के आईजी एन बालासुब्रहम्ण्यम शामिल हैं। कटारिया के साथ आरके मार्बल के डायरेक्टर विमल पाटनी को भी अभियुक्त बनाया गया है।

कटारिया के दिनमान : उदयपुर के पूर्व सांसद गुलाबचंद कटारिया राज्य में राष्‍ट्रीय स्वयं सेवक संघ लॉबी के नेता हैं। उदयपुर की पूर्व सांसद और भाजपा महिला मोर्चा की राष्‍ट्रीय महामंत्री किरण माहेश्वरी को वे ही राजनीति में लाए थे। वसुंधरा राजे से उनका छत्तीस का आंकड़ा है। भाजपा सत्ता के पांच और विपक्ष के चार सालों तक उनकी कभी वसुंधरा से नहीं बनी। वे आगामी चुनावों के बाद राज्य का मुख्यमंत्री होने की आस जोह रहे थे और इन्हीं तैयारियों के चलते मेवाड़ क्षेत्र में अपनी जनसंपर्क यात्रा निकालना चाहते थे। वसुंधरा की शह पर किरण माहेश्वरी ने इसका जमकर विरोध किया। मामला दिल्ली तक पहुंचा और भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यात्रा पर रोक लगा दी। वसुंधरा अपनी शर्तों पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनीं और नेता प्रतिपक्ष पद छोड़ दिया। कटारिया समेत भाजपा के करीब आठ बड़े नेताओं ने गंगाजल लेकर कसम खाई कि वसुंधरा का साथ नहीं देंगे और मिलकर लड़ाई लडेंगे। कटारिया का वसुंधरा से समझौता हो गया और वे नेता प्रतिपक्ष बन गए। वसुंधरा उन्हें अपनी सुराज संकल्प यात्रा में साथ लेकर चल रही है। कटारिया दोस्तों के बुरे बन चुके हैं। मुख्यमंत्री की उम्मीद तो रही नहीं किसी नई कुर्सी की तलाश में थे। अब चुनाव का क्या होगा, पता नहीं हो सकता है चुनाव के समय वे सींखचों के पीछे नजर आएं।

कांग्रेस का खेल : भाजपा इसे कांग्रेस की साजिश बता रही है और पुराने मामलों में भाजपा नेताओं को सीबीआई के जरिए फंसाने के कुचक्र का आरोप लगा रही है। इससे पहले दारिया फर्जी एनकाउंटर मामले में वसुंधरा के दाएं हाथ माने जाने वाले पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ भी गिरफ्तार हो चुके हैं।

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. राजेंद्र जी से संपर्क  09549155160 या 09829270160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए कर सकते हैं. राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं.

समाचार प्‍लस राजस्‍थान से अभिजीत, शिखा, विवेक एवं कैलाश जुड़े

समाचार प्‍लस राजस्‍थान से खबर है कि चार लोगों ने अपनी नई पारी शुरू की है. यह चैनल अगले सप्‍ताह लांच होने वाला है. जिन लोगों ने समाचार प्‍लस के साथ अपनी नई पारी शुरू की है उनमें अभिजीत शेखर, शिखा जोशी, विवेक कुमार पुंडीर और कैलाश चंद्र जोशी शामिल हैं.

अभिजीत कुमार ने एसोसिएट प्रोड्यूसर के पद पर ज्‍वाइन किया है. शिखा जोशी ने असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर के पद पर ज्‍वाइन किया है. ये दोनों लोग कॉपी की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. विवेक कुमार पुंडीर ने ग्राफिक्‍स डिजाइन के पद पर ज्‍वाइन किया है. जबकि कैलाश चंद्र जोशी को एमसीआर में एक्‍जीक्‍यूटिव बनाया गया है.

लांचिंग के पंद्रह दिन : जय महाराष्‍ट्रा से विदा होने लगे पत्रकार, दो गए

: ईपी प्रीति गुप्‍ता एवं प्रदीप पांडेय ने दिया इस्‍तीफा : कई कतार में : जय महाराष्‍ट्रा चैनल को लांच हुए अभी ठीक से एक महीना भी नहीं हुआ है कि यहां खटपट शुरू हो गई है. जब आगाज ऐसा है तो अंजाम का अंदाजा लगना कोई बहुत मुश्किल बात नहीं है. चर्चित दीपा बार के मालिक सुधाकर शेट्टी के चैनल जय महाराष्‍ट्रा की शुरुआत ही खराब होती दिख रही है. सूत्रों का कहना है कि चैनल लांच हुए एक महीना भी नहीं हुआ, लेकिन यहां से जाने वालों का सिलसिला शुरू हो गया है.

बताया जा रहा है कि चैनल के एडिटर मंदार फंसे के व्‍यवहार से कर्मचारी इतने परेशान हैं कि चैनल के म‍हीना भर होने से पहले ही बाय करने लगे हैं. पहली खबर है कि चैनल की एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर प्रीति गुप्‍ता ने चैनल से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां की परिस्थितियों में खुद को फिट नहीं पा रही थीं. प्रीति ने अपनी नई पारी लाइव इंडिया समूह के चैनल मी मराठी के साथ करने जा रही हैं. इसके अलावा प्रदीप पांडेय ने भी चैनल से इस्‍तीफा दे दिया है. वे भी मंदार के व्‍यवहार से कुपित बताए जा रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि संपादक अक्‍सर लोगों के साथ बदतमीजी से पेश आते हैं, जिसका असर काम पर भी पड़ता है. चूंकि मालिक को पत्रकारिता की एबीसीडी नहीं आती लिहाजा उनके आसपास जुटे चम्‍मचे उन्‍हें उल्‍टी सीधी पट्टी पढ़ाकर अपना उल्‍लू सीधा कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि मंदार को चैनल से ऐसे लोगों ने ही जोड़ा है. मंदार इसके पहले भी एक कैमरा मैन से बदतमीजी से पेश आए थे. लांचिंग से पहले ही उनकी ब्राडकास्टिंग इंजीनियर सुशांत से हाथापाई की नौबत आ गई थी. 

फर्जी आंकड़े दिखाने वाले ब्रॉडकास्‍टरों के लिए टैम ने जारी किए दिशा निर्देश

टैम की मीडिया रेटिंग को लेकर विवाद शुरू से ही रहा है. एनडीटीवी और प्रसार भारती जैसे बड़े ब्रांडकास्‍ट इस संस्‍था के खिलाफ शिकायत भी दर्ज करा चुके हैं. अबकी पलटवाल टैम ने किया है. टैम ने उसके द्वारा उपलब्‍ध कराए गए आंकड़ों की गलत प्रस्‍तुति करते हुए कई मौकों पर तमाम चैनलों द्वारा खुद को नम्‍बर वन कहने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का मुद्दा उठाया है. खासकर बजट एवं चुनाव परिणामों के दौरान तमाम चैनल खुद को नम्‍बर एक बताते हैं. 

टैम ने इस तरह के फर्जी आंकड़ेबाजी जारी करने को गंभीरता से लेते हुए एक स्‍टैंडर्ड मीडिया गाइडलाइन जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि टैम डाटा भारतीय टेलीविजन दर्शकों के व्‍यवहार को अच्‍छी तरह समझता है. पिछले कुछ समय में डाटा और आंकड़े जुटाने के तरीकों में काफी बदलाव आए हैं. ज्‍यादा से ज्‍यादा सैम्‍पल साइज मिल रहे हैं जिसका अधिक ज्‍योग्राफिक विश्‍लेषण किया जा रहा है. लेकिन तमाम चैनल डाटा का दुरुपयोग कर रहे हैं. 

टैम ने चैनलों को गाइडलाइन जारी करते हुए कहा है कि जब भी कोई चैनल अपने पोजिशन का दावा करे तो वह साफ तौर पर समय, दिन और मार्केट का भी जिक्र करे, ताकि लोगों को सही तथ्‍यों की जानकारी मिल सके. टैम का कहना है कि वे पारदर्शिता लाने का प्रयास कर रहे हैं इसलिए इस तरह की गाइड लाइन जरूरी हो जाती है, क्‍योंकि पिछले कुछ समय में भारत टीवी इंडस्‍ट्री में यह प्र‍वृत्ति बढ़ती जा रही है.

टैम ने गठित किया छह सदस्‍यीय ट्रांसपेरेंसी पैनल

टेलीवीजन के दर्शकों का हिसाब किताब रखनेवाली टैम मीडिया रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड पर लंबे समय से गलत आंकड़े देने के आरोप लगते रहे हैं.  ब्राडकास्‍टर्स ही नहीं बल्कि सरकार और प्रसार भारती भी टैम के टेलीविजन रेटिंग प्‍वाइंट सिस्टम पर सवाल खड़ा करती रही है. दूसरी तरफ टैम ने अब ब्रॉडकास्टर्स के द्वारा आंकड़ों का अपने हित में उपयोग करने का मुद्दा उठाया है. संभावना है कि आने वाले दिनों में टैम को लेकर विवाद और गहराएंगे.

अब टैम ने अपने टीआरपी सिस्टम में पारदर्शिता लाने के लिए छह सदस्यीय पैनल का गठन किया है जिसे ट्रांसपेरेंसी पैनल का नाम दिया है. इस ट्रांसपेरेंसी पैनल का हेड रिटायर्ड आईएस अधिकारी डॉ. एम दामोदरन को बनाया गया है जो कि पूर्व में सेबी, आईडीबीआई और यूटीआई के चेयरमैन रह चुके हैं. इसके अलावा इस ट्रांसपेरेसी पैनल में बीएआरसी के पूर्व चेयरमैन चिंतामन राव, मैकडोनाल्ड्स के पूर्व अंतरराष्ट्रीय मीडिया डायरेक्टर जियो फैब्रिस, ब्रिटेन में बीएआरबी के बोर्ड मेम्बर रहे आइवर मिलमैन, प्राक्टर एण्ड गैम्बल, चीन के पूर्व निदेशक प्रवीण त्रिपाठी और डब्लूपीपी की पूर्व निदेशक शीला बायफील्ड को सदस्‍य बनाया गया है.

टैम के सीईओ एलवी कृष्‍णन ने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्‍यम से मीडिया को सूचित किया है कि टैम में ट्रांसपेरेंसी को लेकर यह पहल इसलिए की गई है क्‍योंकि कई आरोप लगने के बावजूद टैम पर टीवी इंडस्‍ट्री का बहुत भरोसा है. छह सदस्‍यीय टीम को थर्ड पाटी बताते हुए कृष्‍णन कहा कि इसमें से कोई टैम का फुल टाइम वर्कर नहीं है. अब यह पैनल टैम को कितना ट्रांसपैरेंट बना पाएगा यह भी एक बहुत बड़ा सवाल है. क्‍योंकि जिस तरह से टैम के आंकड़े मापे जाते हैं उसको लेकर शुरू से विवाद रहा है. अब बिना परेशानी की जड़ में गए पत्तियों की दवा करने से पेड़ को कितना फायदा होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. 

जेल में काला खेल : दो महिला कैदियों से बलात्‍कार करता था जेलर!

फरीदाबाद। जेल, एक ऐसी जगह जहां कैदी पर हर वक्‍त पहरा होता है। मगर जब जेल के पहरेदारों की ही नियत बदल जाये तो क्‍या कहा जा सकता है। जी हां ऐसा ही कुछ हुआ है फरीदाबाद के नीमका जेल में। इस जेल में हत्‍या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रही दो महिलाओं ने जेल अधीक्षक पर छेड़छाड़, मारपीट और जेल उपाधीक्षक पर बलात्‍कार तथा दो महिला वार्डन पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। जेल अधीक्षक और उपाधीक्षक पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और मामले की छानबीन की जा रही है।

प्राप्‍त जानकारी के अनुसार फरीदाबाद के जिला जेल नीमका में एक महिला और उसका पति अपहरण और हत्‍या के मामले में सजा काट रहे हैं। इस महिला के साथ उसी बैरक में एक और महिला हत्‍या के मामले में सजायाफ्ता है। अपहरण और हत्‍या के मामले में बंद महिला से उसका देवर बीते 17 अप्रैल को मिलने आया था। मिलनी के वक्‍त महिला ने अपने देवर को बताया कि जेल में उसका साथ अत्‍याचार हुआ है। महिला ने अपने देवर को बताया कि जेल में उसके साथ बलात्‍कार किया गया है।

यह पता चलते ही महिला के देवर ने जेल महानिदेशक और पुलिस आयुक्त को शिकायत भेजी थी। मामले की जानकारी जिला न्यायाधीश दर्शन सिंह के पास पहुंची। इस बाद जिला न्यायाधीश दर्शन सिंह, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रजनी यादव 11 मई को नीमका जेल में निरीक्षण के लिए पहुंचे। दोनों न्यायिक अधिकारी शिकायतकर्ता महिला कैदी से मिले, जहां उन्हें दोनों महिला कैदियों ने अपने साथ मारपीट, छेड़छाड़ और दुष्कर्म किए जाने की शिकायत की। कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने जेल अधीक्षक, उप अधीक्षक और वार्डन के खिलाफ अलग-अलग धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है अब पुलिस मामले की जांच कर रही है। (oi)

श्री टाइम्‍स से संजय, सुशांत एवं अश्‍वनी का इस्‍तीफा

लखनऊ से प्रकाशित श्री टाइम्स से विकेट गिरने का दौर शुरू हो चुका है। खबर है कि विशेष संवाददाता संजय श्रीवास्तव व डाक प्रभारी कुमार सुशांत ने संस्थान को अलविदा कह दिया है। दोनों जल्द ही लखनऊ से एक पॉलिटिकल मैगजीन (पाक्षिक) लाने की तैयारी में हैं। संबंधित पत्रिका में संजय श्रीवास्तव को प्रबंधन ने संपादक की जिम्मेदारी दी है, वहीं कुमार सुशांत समाचार संपादक होंगे।

संजय श्रीवास्तव का 18 वर्षों का पत्रकारिता का अनुभव है। उन्होंने कई बड़े दैनिक समाचार पत्रों में काम किया है। उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित जनसत्ता एक्सप्रेस, डीएनए व कैनविज टाइम्स के प्रकाशन में अहम भूमिका निभाई थी। कुमार सुशांत ने नई दिल्ली में सीएनईबी, चौथी दुनिया, टोटल टीवी, लखनऊ से प्रकाशित कैनविज टाइम्स जैसे संस्थान में काम किया है।

श्री टाइम्स में कार्यरत अश्वनी श्रीवास्तव ने पत्रिका में बतौर सर्कुलेशन मैनेजर ज्वाइन किया है। वहीं श्री टाइम्स के जिला संवाददाता भूपेंद्र सिंह ने भी श्री टाइम्स को छोड़कर पत्रिका में बतौर जिला-कोऑर्डिनेटर ज्वाइन किया है। खबर है कि कुछ और कर्मचारी श्री टाइम्स को अलविदा कह सकते हैं।

उम्मीदों पर खरा उतरने की नवाज को चुनौती!

पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के प्रमुख नवाज शरीफ तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभालने जा रहे हैं। सत्ता में नवाज की वापसी से भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्तों की उम्मीद बढ़ चली है। चुनावी अभियान के दौर में वे लगातार यह कहते रहे हैं कि भारत से बेहतर रिश्ता बनाना, उनका एक प्रमुख राजनीतिक एजेंडा रहेगा। उन्होंने यह इच्छा भी जताई है कि वे चाहेंगे कि सेना में चुनी हुई सरकार का अंकुश बढ़े। ताकि, वह बार-बार लोकतांत्रिक सरकार का गला घोंटने की स्थिति में न रहे।

शरीफ की वापसी को लेकर भारत सरकार ने भी सकारात्मक उम्मीद जताई है। लंबी राजनीतिक जद्दोजहद के बाद भले शरीफ को बड़ी सफलता मिल गई हो, लेकिन उनकी असली चुनौतियों की अग्नि-परीक्षा तो सत्ता में आने के बाद शुरू होगी। क्योंकि, पाकिस्तान कई बड़ी आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे कट्टरवादी एवं खूंखार तालिबानियों को कैसे काबू में लाएंगे? क्योंकि, तालिबान के प्रति उनका रुख लगातार नरम रहा है। हालांकि, वे यही कहते आए हैं कि सत्ता में आने के बाद वे तालिबान से एक सम्मान जनक समझौता कर लेंगे। ताकि, देश में शांति की बहाली हो जाए।

11 मई को पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के चुनाव हुए थे। तालिबान सहित कई और कट्टर जमातों की धमकियों के बावजूद यहां लोगों ने खुलकर अपने मत का प्रयोग किया। मतदान के दिन भी पूरे देश में जमकर हिंसा हुई। इसमें दो दर्जन से ज्यादा लोग मारे भी गए। 2008 के चुनाव में जहां केवल 43 प्रतिशत मतदान हो पाया था। जबकि, इस बार यह आंकड़ा 60 फीसदी तक पहुंच गया। यहां के 66 सालों के इतिहास में पहली ऐसा हुआ कि एक चुनी हुई सरकार को पांच साल तक अपना कार्यकाल पूरा करने का मौका मिला। पाकिस्तान के मतदाताओं को पहली बार यह नसीब हुआ है कि वह सत्तारूढ़ दल को वोट के जरिए बदल दे और अपनी पसंद की दूसरी सरकार चुन ले। इस मायने में यह चुनाव यहां के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि 66 सालों में आधे से अधिक समय यहां सेना का शासन ही रहा है। सेना के जनरल लगातार यहां चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंक देते रहे हैं। पहली बार सीधे लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हो रहा है। पड़ोसी देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की इस मजबूती के संकेत से भारत को भी नई उम्मीदें बननी लगी हैं।
    
1999 में नवाज शरीफ की चुनी हुई सरकार को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपना शिकार बना लिया था। मुशर्रफ ने उनकी सरकार को बर्खास्त करके शरीफ को गिरफ्तार करा लिया था। उन पर ऐसी आपराधिक धाराएं लगाई गई थीं कि उन्हें अदालत से फांसी की सजा भी मिल जाती। फांसी की बजाए अदालत ने एक मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना भी दी थी। 1999 में ही अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पहल से शरीफ की जान बच पाई थी। क्लिंटन ने जनरल मुशर्रफ से बात करके एक बीच का रास्ता निकलवा दिया था। इसके तहत नवाज को सपरिवार सऊदी अरब में निर्वासित कर दिया गया था। उन पर घोटालों के कई बडेÞ मामले भी लाद दिए गए थे।

अमेरिका और सऊदी अरब की खास कृपा के चलते 2007 में नवाज शरीफ पाकिस्तान लौट पाए थे। 2008 के चुनाव में इनकी पार्टी ने हिस्सा भी लिया था। लेकिन, ज्यादा सफलता नहीं मिल पाई थी। क्योंकि, 2007 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की चर्चित नेता बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी। इससे पीपीपी के प्रति देशभर में सहानुभूति की लहर पैदा हो गई थी। पीपीपी की कमान बेनजीर के बाद उनके पति आसिफ अली जरदारी के पास आ गई थी। हालांकि, देशभर में सहानुभूति का खास लाभ लेने के लिए जरदारी ने अपने बेटे बिलावल भुट्टो को पार्टी का चेयरमैन बना दिया था। लेकिन, इस दौर में बिलावल देश के बाहर अपनी पढ़ाई करने में व्यस्त   थे। चुनाव में भारी सफलता मिलने के बाद जरदारी राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुंचे। अभी भी वे इस पद पर बरकरार हैं।

हालांकि, कुछ महीने बाद ही वहां राष्ट्रपति पद का भी चुनाव होना है। लेकिन, नेशनल असेंबली और सूबाई असेंबलियों के चुनाव में पीपीपी का प्रदर्शन काफी खराब रहा है। चार प्रांतीय विधानसभाओं में उसे केवल सिंध में ही बहुमत मिल पाया है। ऐसे में तय माना जा रहा है कि जरदारी किसी भी तरह से राष्ट्रपति चुनाव की रेस में टिक नहीं पाएंगे। वैसे तो पाकिस्तान में पीपीपी ही सबसे पुरानी पार्टी है। सैद्धांतिक रूप से इसकी छवि एक प्रगृतिशील पार्टी की रही है। लेकिन, नेता के रूप में जरदारी हमेशा से विवादित रहे हैं। बेनजीर भुट्टो की सरकार के दौर में उन्हें ‘मिस्टर 10 परसेंट’ भी कहा जाता था। क्योंकि, उन पर आरोप लगते थे कि वे बड़े सरकारी सौदों में मोटा कमीशन लेने की जुगाड़ कर लेते हैं। पति की इस छवि की कई बार बड़ी राजनीतिक कीमत तेज-तर्रार नेता बेनजीर को देनी पड़ी थी।

बेनजीर के मुकाबले नवाज शरीफ की राजनीतिक छवि निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले नेता की रही है। यूं भी शरीफ का जन्म एक बड़े कारोबारी घराने में ही हुआ था। पंजाब में स्टील का उनका बड़ा कारोबार रहा है। लेकिन, जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार के दौर में बड़े उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की नीति बनी थी। इसी के तहत शरीफ घराने की स्टील फैक्ट्रियां भी सरकार के कब्जे में आ गई थीं। स्टील उद्योग में अपना दबदबा फिर से कायम करने के लक्ष्य से ही शरीफ ने राजनीति की दुनिया में कदम रखा था। जनरल जिया उल हक की सत्ता के दौर में भुट्टो को फांसी की सजा हो गई थी। इसके बाद जिया उल हक की खास कृपा पर 1985 में शरीफ पाकिस्तान के सबसे बडेÞ राज्य पंजाब के मुख्यमंत्री बन बैठे थे। इसके पहले 1981 में वे पंजाब के राज्यपाल के सलाहकार मंडल में शामिल कर लिए गए थे। इससे लालबत्ती वाला उनका राजनीतिक करियर शुरू हो गया था।

जनरल जिया की मौत के बाद 1988 में बेनजीर भुट्टो चुनाव जीतकर सत्ता में आ गई थीं। इस वक्त तक शरीफ पाकिस्तान में राजनीति के बड़े खिलाड़ी बन गए थे। बेनजीर के शासन के दौर में शरीफ विपक्ष के प्रमुख नेता के रूप में उभरे थे। पहली बार 1990 में वे देश के प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे थे। लेकिन, जुलाई 1993 तक वे सत्ता में रह पाए। दूसरी बार वे फरवरी 1997 में प्रधानमंत्री बने और अक्टूबर 1999 तक सत्ता में रहे। इसी वर्ष कारगिल को लेकर भारत-पाक का युद्ध शरीफ के कार्यकाल में ही हुआ था। जबकि, कारगिल प्रकरण के कुछ महीने पहले ही शरीफ ने दोनों देशों के रिश्ते ठीक करने के लिए ऐतिहासिक पहल की शुरुआत की थी। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर भी पहुंचे थे। दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने के कई ऐतिहासिक समझौते भी हुए थे। लेकिन, इसके कुछ महीने बाद ही घुसपैठियों के भेष में पाक के सैनिकों ने कारगिल की पहाड़ियों में नापाक कारनामा कर डाला था।

इसके चलते दोनों देशों के बीच कई दिनों तक युद्ध भी हुआ था। जब भारत ने आक्रामक रुख अपनाया, तो शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति की शरण में जाकर बीच-बचाव की गुहार लगाई थी। इसके बाद ही युद्ध विराम हो पाया था। लेकिन, इस प्रकरण के बाद जनरल मुशर्रफ ने शरीफ सरकार को बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद तो उन्हें जान बचाने के लिए सऊदी अरब में आठ साल कर निर्वासित जीवन जीना पड़ा। यह अलग बात है कि शरीफ लगातार यही सफाई देते रहे हैं कि कारगिल प्रकरण में उन्हें जनरल मुशर्रफ ने एकदम अंधेरे में रखा था। उन्हें भनक ही नहीं लग पाई थी कि सेना यहां क्या गुल खिला रही है? राजनीतिक विश्लेषक, शरीफ की इस सफाई को एक हद तक सही भी मानते हैं। उनका मानना है कि यदि जनरल परवेज ने कारगिल का तमाशा नहीं किया होता, तो वाजपेयी और शरीफ की ऐतिहासिक पहल से दोनों देशों के रिश्ते बहुत अच्छे हो गए होते।

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने उम्मीद जाहिर की है कि चुनाव अभियान के दौरान शरीफ दोनों देशों के रिश्तों को लेकर जो संकल्प जताते रहे हैं, यदि सत्ता में आने के बाद भी उनकी नीति-रीति ऐसी ही रही, तो बहुत अच्छा रहेगा। जिस दौर में चुनाव के नतीजे आ रहे थे, नवाज की पार्टी को निर्णायक बढ़त मिलने लगी थी, उसी समय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बधाई संदेश भेज दिया था। इससे शरीफ खासे गदगद भी हुए। उन्होंने प्रधानमंत्री से कह दिया कि यदि वे उनके शपथ समारोह में शिरकत करें, तो उन्हें बहुत अच्छा लगेगा। मनमोहन सिंह ने शरीफ को भारत आने का न्यौता दे दिया है। जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है।

25, दिसंबर 1949 में नवाज का जन्म लाहौर में हुआ था। उन्होंने लाहौर यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि ली। बाद में, कानून की डिग्री भी ली। 1976 में वे मुस्लिम लीग में सक्रिय हुए थे। कहा तो यही जाता है कि तत्कालीन भुट्टो सरकार के कब्जे में गए पारिवारिक स्टील व्यापार को फिर से पाने का मकसद ही, उन्हें राजनीति में घसीट लाया था। 1980 में पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल गुलाम जिलानी खान की खास कृपा से वे लाहौर में युवा नेता के तौर पर चर्चित हो गए थे। अगले साल ही उन्हें पंजाब सरकार के सलाहकार बोर्ड में शामिल कर लिया गया था। शरीफ के परिवार की पहचान एक बडेÞ   औद्योगिक घराने के रूप में भी है। उनकी शुमार देश के चंद अमीरों में भी होती है। 1990 में जब वे पहले बार प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर की राष्ट्रीयकरण की नीति को पलटने का काम किया। कई बड़े उद्योगों का निजीकरण कर दिया गया। इसके चलते इस दौर में 115 सरकारी उद्योगों का निजीकरण किया गया था। इसमें तमाम बड़े घोटालों के आरोप भी उन पर लगे थे।
       
नेशनल असेंबली की 272 सीटों में से 126 सीटें नवाज की पार्टी को हासिल हो चुकी हैं। ऐसे में, उसे साधारण बहुमत के लिए 11 सीटों की कमी है। शरीफ की पार्टी के प्रवक्ताओं ने तो यही दावा किया है कि वे लोग निर्दलीय उम्मीदवारों की मदद से सरकार बना लेंगे। हालांकि, कयास यह भी चल रहे हैं कि नवाज कुछ छोटी पार्टियों को साथ लेकर गठबंधन की सरकार बना सकते हैं। ताकि, सरकार की मजबूती ज्यादा हो जाए। इस चुनाव में पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई), पीपीपी को पछाड़ते हुए दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है। खैबर तख्तून ख्वाह प्रांत में भी इमरान की पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। पीपीपी का प्रभाव सिंध तक ही सीमित रह गया है। जबकि, पंजाब प्रांत में नवाज शरीफ की पार्टी बड़े बहुमत से चुनाव जीती है। यहां 2008 से ही नवाज के भाई शाहबाज शरीफ सत्ता में रहे हैं। इस बार भी चुनाव में जीत होने की वजह से वे दूसरी पारी भी खेलने के लिए तैयार हो गए हैं।

63 वर्षीय नवाज शरीफ के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। पिछले वर्षों में हिंसक तालिबानियों का प्रभाव लगातार बढ़ा है। इसके साथ ही और कई कट्टर जमातों ने भी अपनी ताकत बढ़ा ली है। तालिबान तो पश्चिमोत्तर के कई हिस्सों में अपनी सामानांतर सरकार तक चलाते हैं। अगले साल पड़ोसी देश अफगानिस्तान से पश्चिम देशों की सेनाएं वापस लौट जाएंगी। ऐसे में, बड़ा खतरा पाकिस्तान के लिए खड़ा होने वाला है। क्योंकि, वहां की तालिबानी ताकतें पाक सरकार के लिए ज्यादा आतंकी मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। शायद, इसी खतरे को देखते हुए शरीफ कह रहे हैं कि वे तालिबानियों से कोई समझौता कर लेंगे। ताकि, मारकाट की स्थिति न रहे। अब देखने वाली बात यह है कि तालिबानियों के प्रति नरम रुख अपनाने वाले शरीफ कैसे एक साथ चरमपंथियों को साधकर भारत से बेहतरीन रिश्ते बनाने की उम्मीद कर सकते हैं? क्योंकि, चरमपंथी ताकतें शरीफ सरकार को शायद ही इजाजत दें कि भारत से दोस्ती के रिश्ते किए जाएं।
ये लोग कश्मीर के मामले में भी पाकिस्तान सरकार को नरम रुख अपनाने की इजाजत शायद ही दें?

पिछले चार सालों में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति काफी खराब हुई है। सकल घरेलू उत्पादन दर में भारी गिरावट दर्ज हुई है। पंजाब प्रांत के कुछ शहरी क्षेत्रों को छोड़कर पूरे देश में बिजली की भारी किल्लत है। 24 घंटे में महज चार से छह घंटे बिजली की आपूर्ति हो पा रही है। चुनावी अभियान के दौर में ड्रोन हमले आदि मुद्दों पर नवाज, अमेरिकी नीति के खिलाफ जमकर बोलते रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या सत्ता में आने के बाद वे अमेरिकी विरोध की नीति पर कायम रह पाएंगे? यदि सेना के खौफ से उन्होंने अमेरिका के प्रति एकदम यू-टर्न लिया तो, कट्टर जमातें शरीफ सरकार के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती हैं। एक खास बात यह है कि पहले भी दो बार प्रधानमंत्री रहने के बाद भी शरीफ की राजनीतिक छवि पंजाब के नेता के तौर पर ही रही है। अब उनके लिए बड़ी चुनौती यह भी है कि वे अपनी छवि पूरे देश के सर्वमान्य नेता के रूप में बनाएं। यदि इसमें वे कामयाब नहीं हुए, तो बलूचिस्तान और फख्तून जैसे प्रांतों में विद्रोह की आग बढ़ने का खतरा माना जा रहा है। यूं तो भारत में शरीफ की सरकार से काफी उम्मीदें पाली जा रही है। लेकिन, प्रधानमंत्री के तौर पर वे रिश्तों में कितनी ‘शराफत’ दिखा पाते हैं, इसका टेस्ट होना तो बाकी है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

सतर्कता, सीबी-सीआईडी, ईओडब्ल्यू- शासन से मुक्त कराने के लिए पीआईएल

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा उत्तर प्रदेश के विभिन्न अन्वेषण एजेंसियों- सतर्कता अधिष्ठान, सीबी-सीआईडी, आर्थिक अपराध अनुसन्धान संगठन (ईओडब्ल्यू), एसआईबी को-ऑपरेटिव तथा भ्रष्टाचार निवारण संगठन (एसीओ) की जांच प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश सरकार के नियंत्रण को समाप्त किये जाने के सम्बन्ध में आज इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर की है.

याचिका में कहा गया है कि अपराधों का अन्वेषण और इनकी जांच दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के अनुसार की जाती है. सीआरपीसी में आपराधिक विवेचना का पूरा दायित्व और पूरे अधिकार अन्वेषण अधिकारी और उसके वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को हैं. जांचकर्ता अधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह विवेचना करके उसके परिणाम से सीधे न्यायालय को अवगत कराएगा. इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में सतर्कता अधिष्ठान शासन के सतर्कता विभाग और सीबी-सीआईडी, ईओडब्ल्यू, एसआईबी तथा एसीओ गृह विभाग को अपनी जांच आख्या सौंपते हैं और वे ही इन पर अंतिम निर्णय करते हैं.

अमिताभ और नूतन के अनुसार यह व्यवस्था दाण्डिक विधि के विरुद्ध है और इससे जांच और विवेचना में बाहरी अवांछनीय दवाब की बहुत अधिक संभावना बढ़ जाती है. याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विनीत नारायण बनाम भारत सरकार और कोलगेट घोटाले में सीबीआई के सम्बन्ध में विस्तार से की गयी टिप्पणियों के आधार पर यह प्रार्थना की गयी है कि इस सभी जांच एजेंसियों- सतर्कता अधिष्ठान, सीबी-सीआईडी, ईओडब्ल्यू, एसआईबी तथा एसीओ को निर्देशित किया जाए कि वे अपनी जांच आख्या अंतिम निर्णय के लिए शासन को नहीं भेज कर इन पर स्वयं अंतिम निर्णय लें ताकि जांच और अन्वेषण पर कथित रूप से पड़ने वाले बाह्य दवाबों से मुक्ति मिल सके.

9 जुलाई को जयपुर से लांच होगा नेशनल दुनिया

नेशनल दुनिया प्रबंधन दिल्‍ली और मेरठ के बाद अब अखबार को जयपुर में लांच करने की तैयारी कर रहा है. खबर है कि प्रबंधन इस अखबार की लांचिंग जुलाई में करने के लिए कमर कस रहा है. अगर सब कुछ प्रबंधन की योजना के अनुसार चला तो नेशनल दुनिया 9 जुलाई को जयपुर से लांच कर दिया जाएगा. प्रबंधन की निगाह आने वाले विधानसभा चुनाव पर है. इसलिए प्रबंधन चुनाव से पहले किसी भी कीमत पर जयपुर से अखबार लांच कर देना चाहता है.

उल्‍लेखनीय है कि दिल्‍ली के बाद नेशनल दुनिया का विस्‍तार यूपी में किया गया है. 9 मई को मेरठ से नेशनल दुनिया अखबार को लांच किया गया. हालांकि प्रबंधन ने मेरठ के साथ लखनऊ एडिशन लांच करने की भी तैयारी कर रहा था, परन्‍तु किसी कारण से इस लखनऊ एडिशन को आगे के लिए टाल दिया गया है. अब प्रबंधन की प्राथमिकता राजस्‍थान है, जहां जल्‍द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

केवट की बिटिया की शादी में उमाभारती ने भेजा चांदी का मुकुट

इलाहाबाद। राम केवट संवाद स्थली के रूप में विख्यात श्रृंग्वेरपुरधाम में नाव चलाकर जीवनयापन करने वाले केवट समुदाय के गरीब परिवार पर भाजपा नेता उमाभारती की कृपा बरसी है। यहां के केवट अमृत लाल निषाद की बिटिया की शादी में भाजपा की फायरब्रांड नेता के चांदी का मुकुट बतौर गिफ्ट शामिल होगा।

पिछले साल श्रृंग्वेरपुर से निर्मल गंगा अविरल गंगा शुरू करने आईं भाजपा की राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को अमृतलाल निशाष ने ही अपनी नाव से ले जाकर गंगा विहार (भ्रमण) कराया था। तब नाव से उतरते हुए उमाभारती ने जब अमृतलाल को बतौर पारिश्रमिक उन्हें कुछ रुपए देने चाहे तो अमृतलाल ने अपने दोनों हाथ जोड़ गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस की चौपाई दुहराते हुए कहा था- ‘नाथ न उतराई चहौं।’

अब करीब सालभर बाद अमृतलाल निषाद की बिटिया की शादी पड़ी तो उन्होंने उमाभारती को भी न्यौता भेजा। उधर, सुश्री भारती ने शादी के उपहार में चांदी का मुकुट कोरियर से पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय को भेजते हुए साथ में चिट्ठी भी भेजी है, जिसमें उन्हें अमृतलाल निषाद को गिफ्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। श्री पांडेय ने बताया कि 15 मई को दोपहर ग्यारह बजे पार्टी के स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ अमृतलाल निषाद को श्रृंग्वेरपुर में उमाभारती का भेजा गिफ्ट सौंपा जाएगा।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

दो पत्रकारों की मेहनत रंग लाई, मुंबई में यूपी भवन का उद्घाटन करेंगे अखिलेश

 मुंबई : पिछले कई वर्षों से उद्घाटन की राह देख रहा नवी मुंबई वाशी स्थित पांच सितारा उत्तर प्रदेश भवन का उदघाटन २३ मई को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथों किये जाने की जानकरी सपा के तरफ से दिया गया है। इस भवन के उद्घाटन की तारीख घोषित होते ही नवी मुंबई में कार्यरत नवभारत के राजित यादव और हमारा महानगर के नागमणि पाण्डेय की प्रशंसा नागरिकों द्वारा की जा रहा है।

२१वीं सदी की शहर नवी मुंबई में एशिया का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र ,एशिया का सबसे बड़ा थोक मंडी, शैक्षिणक संस्थाए, जेएनपीटी आदि होने के कारण इस शहर से सभी राज्यों का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। इस के लिए सभी राज्यों के लोग इस शहर में कार्य या उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यार्थी बड़े पैमाने पर नवी मुंबई के तरफ आ रहे हैं। इस को देखते हुए मुंबई के पास नवी मुंबई शहर का निर्माण करने वाली संस्था सिडको के तरफ से सभी राज्यों को अपना खुद का भवन (गेस्ट हॉउस ) बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। जिसे मंजूर करते हुए वाशी रेले स्टेशन के पास सभी राज्यों को भूखंड उपलब्ध करा दिया गया था। इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार को भी वाशी सेक्टर ३० ए में भूखंड उपलब्ध करा कर दिया गया था। जिस में उत्तर प्रदेश भवन के लिए दिए गए भूखंड पर भवन का निर्माण करने के लिए जनवरी २००४ में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायापति के अध्यक्षता में बसपा सुप्रीमो स्व. कांशीराम के हाथों शिलान्याश किया गया था।

इस दौरान आश्वासन दिया गया था कि उत्तर प्रदेश भवन का कार्य वर्ष २०११ में पूरा पूरा हो जायेगा। मात्र राजकीय षडयंत्र का शिकार उत्तर प्रदेश भवन को निर्माण होने में १६ वर्ष पूरे हो गए है। इस के लिए लगभग २० करोड़ रुपये खर्च कर इस भवन का निर्माण किया गया है। इस भवन के निर्माण में हो रही राजकीय षडयंत्र की खबर नवभारत के वरिष्ठ पत्रकार राजित यादव और हमारा महानगर के नागमणि पाण्डेय द्वारा लगातार प्रकाशित कर सामने लाया गया। और इस के निर्माण में हो रही देरी की खबर भी पिछले कई वर्षों से लगातार प्रकाशित किया जा रहा था। यहां तक की बसपा सुप्रीमो मायावती पूरी बहुमत से मुख्यमंत्री बनाने के बाद पहली सभा मुंबई में लिया था, उस दिन हमारा महानगर में नवी मुंबई से नागमणि पाण्डेय ने प्रकाशित किया था। इस खबर का असर ये हुआ कि मायावती मुंबई पहुंचने पर इस की जानकारी बसपा महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष विलास गरुड़ ने मायावती को देते हुए हमारा महानगर की कापी दिखाया था। जिस के बाद मायावती ने तुरंत अपनी एक टीम  भेजकर इस भवन के कार्य का जायजा लिया और शिलान्यास के बाद से इस भवन का निर्माण कार्य शुरू कराया।

इस के साथ ही उत्तर भारतीय महासंघ के नवी मुंबई अध्यक्ष स्व. सुरेन्द्र मिश्रा ने भी कई बार इस की सूचना उत्तर प्रदेश सरकार को देते हुए इस भवन का निर्माण करने की मांग किया था, जिस के बाद अब इस भवन का निर्माण कार्य पूरा हुआ है और अब इस भवन का उद्घाटन उत्तर प्रदेश के मुखमंत्री अखिलेश यादव के हाथों किया जाने वाला है। २३ मई को इस का उद्घाटन समारोह में सपा के मुंबई अध्यक्ष अबू आजमी सहित उत्तर प्रदेश के मंत्री उपस्थित रहने की जानकारी सपा रईस शेख ने दिया है।

एसपी सरकार की मदद से बरी हुए वरुण : बेनी

लखनऊ। केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी (एसपी) प्रमुख मुलायम सिंह यादव पर किए गए ताजा हमले में आज उन पर हमेशा सांप्रदायिक ताकतों का साथ देने का आरोप लगाया और कहा कि बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव वरुण गांधी ही भड़काऊ भाषण के मामलों में उत्तर प्रदेश की एसपी सरकार की मदद से बरी हुए। वर्मा ने यहां अपने आवास पर संवाददाताओं से कहा, ''मुलायम हमेशा से सांप्रदायिक ताकतों के साथी रहे हैं। वह बाबरी ढांचा ढहाने की साजिश में भी शामिल थे।'' उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव वरुण गांधी उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार की मदद से ही भड़काऊ भाषण के मामलों में बरी हुए।

वर्मा ने कहा कि सरकार के दबाव की वजह से मामलों के सभी गवाह साक्ष्य देने नहीं पहुंचे। इसके अलावा सरकार ने पीलीभीत की अदालत द्वारा वरुण के पक्ष में दिये गये फैसले को चुनौती भी नहीं दी। केंद्रीय मंत्री ने यह भी दावा किया कि साल 2002 में गोधरा दंगों के बाद एसपी प्रमुख ने नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्ता में लाने में मदद की थी। बेनी ने कहा, ''वर्ष 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद मोदी के खिलाफ माहौल बना था और वह चुनाव हार भी जाते।…..लेकिन उन्होंने (मुलायम) उस विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े किए और उनके लिए प्रचार भी किया। इससे मुस्लिम वोट बंटा और मोदी जीत गए।''

बाबरी विध्वंस की साजिश में एसपी प्रमुख मुलायम सिंह यादव के शामिल होने का आरोप दोहराते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश के दामन पर दाग रूपी उस वारदात के पीछे एसपी की साजिश बीजेपी से मिलकर चुनाव लड़ने की थी। वर्मा ने कहा कि छह दिसंबर 1992 को ढहाए गए बाबरी ढांचे को 30 अक्तूबर 1990 को मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में ही ध्वस्त किए जाने की साजिश थी और इसके लिए यादव तथा बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी के बीच बाकायदा समझौता हुआ था। उन्होंने दावा किया कि देश में सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने वाली आडवाणी की विवादास्पद रथयात्रा भी मुलायम से तय करने के बाद ही शुरू हुई थी।

केंद्रीय मंत्री ने एक सवाल पर कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच कोई मतभेद नहीं है और दोनों ने मिल-बैठकर रेल मंत्री पवन बंसल और कानून मंत्री अश्वनी कुमार के इस्तीफे लेने का फैसला किया था। उच्चतम न्यायालय द्वारा सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता करार दिए जाने पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की इस अदालत के प्रति तल्ख टिप्पणियों के बारे में पूछे गए एक सवाल पर वर्मा ने कहा कि कि अगर सरकार बेलगाम हो रही हो तो उच्चतम न्यायालय उसे फटकार सकता है।

इंद्र प्रकाश यादव की रिपोर्ट.

हवाला के मार्फत चिटफंड का पैसा पार, बदस्तूर जारी है कारोबार!

प्रवर्तन निदेशालय शारदा फर्जीवाड़े मामले की जांच के सिलसिले में अदालत की शरण में जाना तय किया है। ईडी का आरोप है कि इस चिटफंड ​​कंपनी में जमा आम निवेशकों के सैकड़ों करोड़ रुपये हवाला के मार्फत खाड़ी देशों में स्तानांतरित हो गया है। इसी सिलसिले में तफ्तीश के लिए​​ विधाननगर पुलिस कमिश्नरेट से ईडी ने जरूरी दस्तावेज मांगे, तो उसका आवेदन ठुकरा दिया गया। ईडी अधिकारियों का आरोप है कि राज्य सरकार जांच में कोई सहयोग नहीं कर रही है। जबकि सुदीप्त इस वक्त विधाननगर कमिश्नरेट पुलिस की हिफाजत में है। लिहाजा ईडी अब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटायेगा।

समझा जाता है कि केंद्रीय वित्तमंत्रालय भी इस आर्थिक अपराध के बारे में सिलसिलेवार तरीके से जांच करने का निर्देश ईडी को जारी कर दिया है। प्रवर्तन निदेशालय को मनी लांड्रिंग कानून के तहत इस मामले में जांच करना चाहती है। प्रवर्तन निदेशालय के सूत्रों के अनुसार वह कंपनी के कारोबार और शारदा समूह के अध्यक्ष सुदीप्त सेन ओर उनके करीबी सहायकों द्वारा व्यक्तिगत तौर पर किए गए लेन-देन और विभिन्न निवेश योजनाओं के जरिए समूह द्वारा किए गए कारोबारों की भी जांच करेगा। कंपनी के खिलाफ निदेशालय के गुवाहाटी ऑफिस में मनी लाउंड्रिंग एक्ट के तहत केस दर्ज कराया गया है। इससे पहले शारदा ग्रुप के खिलाफ पश्चिम बंगाल की पुलिस, सेबी, आयकर विभाग और कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय पहले से ही जांच कर रहा है।

मालूम हो कि ईडी की जांच टीम गुवाहाटी से कोलकाता आयी थी। अब संबावना है कि गुवाहाटी से ही सीबीआई टीम आ धमक सकती है किसी भी दिन! अब सीबीआई जांच के मामले में कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार है। लेकिन ईडी की दलील है कि राज्य सरकार की ओर से अभी तक इस मामले में कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं किया गया है और न ही शारदा समूह की कोई संपत्ति जब्त की गयी है, जबकि पुलिस एक हजार करोड़ की संपत्ति का पता लगाने का दावा कर रही है। आज भी सुदीप्त सेन को लेकर पुलिस ने तलाशी अभियान जारी रखा।

सबसे खतरनाक है कि शारदा समूह के भंडाफोड़ के बावजूद, मुख्यमंत्री की चिटफंड में पैसा जमा न करने की सलाह के बावजूद, विभिन्न राज्यों में चिटफंड कार्यालयों को सील करने और गिरफ्तारियों के बावजूद बंगाल में इस वक्त छोटी बड़ी सैकड़ों चिटफंड फर्जी कंपनियों का कारोबार चल रहा है। अकेले मुर्शिदाबाद जिले में इस तरह २४६ कंपनियां सक्रिय हैं और उनपर को अंकुश नहीं है। पोंजी मार्फत रोजाना निवेश का सिलसिला बदस्तूर जारी है और राज्य सरकार ने इसे रोकने के लिए अबीतक कोई कदम नहीं उठाया है। जबकि इस सिलसिले में गठित श्यामल सेन जांच आयोग के सामने लाखों शिकायतें जमा हो गई हैं। दूसरी तरफ रोज आत्महत्या की वारदातें हो रही हैं। चिटफंड कंपनियों से धोखा खाकर एजंटों, निवेशकों के अलावा छोटी कंपनियों के मालिक तक आत्महत्या कर रहे हैं। जनरोष की वजह से कानून और व्यवस्था का संकट खड़ा हुआ है। सरकार लाखों एजेंटों को तो सुरक्षा दे नहीं सकती, लेकिन फौरन फर्जी कंपनियों की ओर से बिना सेबी और रिजर्व बैंक के सर्टिफिकेट महज कंपनी कानून और ट्रेड लाइसंस के सहारे बाजार से धन वसूली का सिलसिला तो रोक सकती है!

ईडी के मुताबिक जिस तरह से हवाला मार्फत निवेशकों का पैसा बाहर जा रहा है, किस किस को मुआवजा देगी सरकार? देश में ना जाने कितनी ऐसी चिटफंड कंपनियां चल रही हैं, जो लोगों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर उनकी मेहनत की कमाई लूट रही हैं । मगर बावजूद इसके इन कम्पनियों के संचालकों के लिए कभी कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जाती है ।गुजरात के सूरत शहर में रहने वाले हजारों लोगों की मेहनत की कमाई एक ऐसी ही चिटफंड कंपनी लेकर रफूचक्कर हो गई है ।ग्रीन इंडिया परिवार नाम की इस कम्पनी का यह सिलसिला वर्ष २०१३ के फरवरी महीने तक चला उसके बाद कम्पनी के ऑफिस में ताला मारकर कर्मचारी रफूचक्कर हो गए। जब तक इस कम्पनी में निवेश करने वाले हजारों लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते तब तक काफी देर हो चुकी थी। अकेले सूरत से लोगों के पिछले ३ सालों में १५ करोड़ स्र्पए की ठगी करके कंपनी के कर्ताधर्ता फरार हो गए।

इसी बीच मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने प्रदेश में फैली चिट फंड कंपनियों की कार्यशैली और आम जनता को बेवकूफ बना कर उनकी गाढ़ी कमाई को लूटने को लेकर की गई तल्ख़ टिप्पणी के बाद भी सरकार और जांच एजेंसियां अभी तक किसी भी ठोस कार्रवाई पर नहीं पहुंची है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने इस मामलें की सीबीआई जांच के आदेश दिए लेकिन सीबीआई अभी तक इस मामले में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी है। आज हालात ये है कि मध्य प्रदेश के साथ ही ये कम्पनियां धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश में भी अपना चार सौ बीसी का धंधा फैला रही है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने अपने एक आदेश में उन 33 कंपनियों के खिलाफ जांच के आदेश दिए है लेकिन राज्यों की सरकारों में अपनी जड़े गहरी जमा चुकी इन कंपनियों और इनके मालिकानो की सेहत पर फिलहाल कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है। हालात ये है की मध्य प्रदेश में सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा भी सरकारे में अपनी जड़े जमाये बैठे इन कंपनियों के मालिकानो और कंपनियों की कार्यशैली की जांच नहीं कर पाई जिसकी वजह समझ से परे है। लगातार शिकायतें मिलने के बाद ग्वालियर हाईकोर्ट ने इन कंपनियों की जांच करने के लिए सीबीआई की दिल्ली मुख्यालय स्थित कार्यालय को लिखा है|

सीबीआई की आर्थिक मामलों की जांच करने वाली शाखा नंबर 3 को स्थानांतरित कर दिया गया| आज हालत ये है कि ये शाखा भी कुछ ख़ास नहीं कर पाई। जांच ना होने की दिशा में कम्पनियां लगातार लोगों को चूना लगा रही हैं। साथ ही हर साल लाखों लोग इन कंपनियों द्वारा ठगे जा रहे है। मध्य प्रदेश से लगायत उत्तर प्रदेश में ऐसी 33 कंपनिया काम कर रही है जिनकी जांच के आदेश हाईकोर्ट ने दिए है, लेकिन सीबीआई के साथ-साथ, लोकल पुलिस, साथ ही पैसे के मामले और लेनदेन पर नज़र रखने वाली RBI, निवेशकों के हित पर नज़र रखने वाली सेबी, आयकर विभाग, वित्त मंत्रालय, प्रवर्तन निदेशालय शायद सहारा और शारदा जैसी कंपनियों में किये गए बड़े घोटाले का इंतज़ार कर रही है।

पत्रकार एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

क्‍या सरकारी शिक्षक किसी राष्‍ट्रीय अखबार का ब्‍यूरोचीफ बन सकता है?

जनपद चंदौली में 'आज' के ब्‍यूरोचीफ के पद को लेकर बवाल मचा हुआ है. प्रबंधन को अखबार से खास मतलब नहीं है, लिहाजा ऊपर में जो किसी वरिष्‍ठ से अपनी सेटिंग कर लेता है, उसे ही ब्‍यूरोचीफ बना दिया जाता है. खबर है कि यहां ब्‍यूरोचीफ के पद को लेकर बृजेश कुमार एवं शिवपूजन तिवारी के बीच घमासान मचा हुआ है. शिवपूजन तिवारी सरकारी विभाग में अध्‍यापक हैं, इसके बाद भी आज अखबार के ब्‍यूरोचीफ बने हुए हैं.

इसी मामले को लेकर पत्रकार अजय कुमार आरटीआई डालकर इस संबंध में कई जानकारियां प्राप्‍त की हैं, जिसे उन्‍होंने भड़ास के पास भी भेजा है. अजय कुमार लिखते हैं कि –


''एक ऐसा भी ब्यूरो चीफ जो सरकारी शिक्षक है, जिसे जनपद चंदौली का प्रशासनिक अमला भी छिपाने का प्रयास कर रहा है। जिले के शिक्षाधिकारी यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि शिवपूजन तिवारी निवासी सरने, सकलडीहा विकास खण्ड के सहरोई प्राथमिक विद्यालय में एक मास्टर हैं और वाराणसी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक 'आज' के जनपद चंदौली के ब्यूरो चीफ है। पत्रकारिता का रौब देकर गांव वालों को व प्रशासनिक लोगों को डराते रहते हैं। जिससे जनता परेशान है लेकिन चंदौली जनपद का कोई प्रशासनिक अमला कार्यवाही शिवपूजन तिवारी पर नहीं कर रहा है। क्या एक सरकारी शिक्षक किसी राष्ट्रीय अखबार का ब्यूरो चीफ बन सकता है?

प्रेषक

अजय कुमार

पत्रकार

साल दर साल कम हो रही सेंसर के कैची की ‘धार’

: बोल्ड व आपत्तिजनक सीन व संवादों पर अब पहले जैसा नहीं रहा एतराज : दिल्ली बलात्कार मामले के बाद ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। दरअसल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड दिन प्रतिदिन फिल्मों के दृश्यों पर कैची चलाने के मामले में उदार होता जा रहा है। पिछले पांच सालों के दौरान सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्मों के दृश्यों पर कैची चलाने में कमी आई है। इस बात का खुलासा सूचना अधिकार कानून (आरटीआई) से मिली जानकारी से हुआ है।

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार साल दर साल सेंसर बोर्ड की परीक्षण समिति की ओर से की जाने वाली काट-छांट में कमी आ रही है। साल 2008 में सेंसर बोर्ड पास आई 1325 फिल्मों में से कुल 521 दृश्यों को काटने की सिफारिश की थी। जबकि 2009 में 1288 फिल्मों के 529 दृश्यों व संवादों पर कैची चलाई गई। 2010 में फिल्म सेंसर बोर्ड ने कुल 1274 फिल्मों का परीक्षण किया, जिसमें 432 दृश्यों को काटने को कहा गया। साल 2011 में सेंसर बोर्ड ने 1255 फिल्मों का परीक्षण कर इनके 444 दृश्यों व संवादों पर कैंची चलाई। जबकि 2012 में सेंसर बोर्ड द्वारा देखी गई 880 फिल्मों में केवल 330 दृश्य व संवाद काटे गए। 2008 में हर 100 फिल्मों पर 152 दृश्य-संवाद काटे गए, जो 2012 में घट कर 21 हो गया। इस जानकारी को हासिल करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता बिहार धुर्वे कहते हैं कि इन आंकड़ों को तो देख कर यहीं लगता है कि सेंसर बोर्ड फिल्म निर्माताओं के दबाव में काम करता है।

सेंसर बोर्ड के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कई बार ऐसा होता है कि सेंसर बोर्ड की एक्जामिन कमेटी जिस फिल्म को 'ए' प्रमाणपत्र देती हैं, उसे बाद में रिवाईजिंग कमेटी के सदस्य 'यूए' (अभिभावकों के साथ बच्चों के देखने लायक फिल्म) प्रमाण पत्र जारी कर देती है। खासकर सेंसर बोर्ड के फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े सदस्यों को बोल्ड दृश्यों पर आपत्ति नहीं होती। हाल ही में आई फिल्म 'एक थी डायन को 'यूए' प्रमाण पत्र जारी किया गया है। जबकि आमतौर पर भूतप्रेत वाली फिल्मों को 'ए' प्रमाणपत्र ही जारी किया जाता है।

सूत्रों के अनुसार सेंसर बोर्ड की एक्जामिन कमेटी ने इस फिल्म को 'ए' प्रमाण पत्र ही दिया था। पर फिल्म की निर्माता एकता कपूर ने सेंसर बोर्ड की एक्जामिन कमेटी के फैसले को नहीं माना और फिल्म को बोर्ड की रिवाईजिंग कमेटी में ले गई, जहां इस फिल्म को 'यूए' प्रमाणपत्र मिल गया। बता दें कि 'ए' प्रमाणपत्र वाली फिल्में टेलिविजन पर नहीं दिखाई जा सकती। जबकि 'यूए' प्रमाणपत्र वाली फिल्मों को बगैर किसी अतिरिक्त काटछांट के टेलिविजन पर प्रसारित किया जा सकता है।

सेंसर बोर्ड के पूर्व अधिकारी नाराज : फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को लेकर आम आदमी तो नाराजगी जताता ही रहता है। पर अभी कुछ महीनों पहले तक सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी (मुंबई) रहे जीतेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी नाराजगी फेसबुक के माध्यम से जाहिर की है। हाल ही में रिलिज हुई फिल्म 'शूटआऊट एट वडाला' के कई दृश्यों व संवादों को न काटने पर श्री सिंह ने आश्चर्य जताया है। फिलहाल प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहे सिंह ने फेसबुक पर टिप्पणी की है, ''अब समय आ गया है कि सेंसर बोर्ड के उस अधिकारी के खिलाफ गिरफ्तारी जैसे सख्त कदम उठाए जाए, जिसनें 'शूटआऊट एट वडाला' में ऐसे दृश्यों को पास किया है।''

सेंसर बोर्ड के पूर्व सदस्य ब्रजमोहन शर्मा कहते हैं कि सेंसर बोर्ड अपनी जिम्मेदारी का सही ढंग से निर्वाह नहीं कर रहा है। टीवी पर ऐसी फिल्मों के प्रसारण की इजाजत दी जा रही है जिसे परिवार के साथ देखा नहीं जा सकता। सेंसर बोर्ड जब किसी फिल्म को 'यूए' प्रमाण पत्र दे देता है तो वह फिल्म थियेटर के साथ-साथ बगैर किसी काटछांट के टीवी पर भी आ जाती है। इस लिए सेंसर बोर्ड को किसी फिल्म को 'यूए' प्रमाण पत्र देते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि ये फिल्म आज नहीं तो कल टीवी पर दिखाई जाएंगी और टीवी की पहुंच घर-घर तक है।

मुंबई के वरिष्‍ठ पत्रकार विजय सिंह की रिपोर्ट.

बीबीसी में मल्‍टी मीडिया प्रोड्यूसर बनेंगे दिलनवाज पाशा

भास्‍कर डॉट कॉम से खबर है कि दिलनवाज पाशा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे भास्‍कर डॉट कॉम में करेस्‍पांडेंट के पद पर कार्यरत थे तथा सीधे संपादक को रिपोर्ट करते थे. दिलनवाज जल्‍द ही बीबीसी से जुड़ने वाले हैं. सूत्रों का कहना है कि वे 1 जून को बीबीसी में मल्‍टी मीडिया प्रोड्यूसर के पद पर ज्‍वाइन कर लेंगे. उन को बीबीसी से एक साल का कांट्रैक्‍ट मिला है. दिलनवाज की गिनती तेज तर्रार पत्रकारों में की जाती है. वे सोशल मीडिया में भी काफी सक्रिय रहते हैं. 

पत्रकारों से बदसलूकी का मामला : एसपी ने कहा जांच के बाद वापस होगा मुकदमा

सिंगरौली/बैढ़न : पत्रकारों के उपर फर्जी पुलिसिया कार्रवाई करने तथा फर्जी मुकदमा पंजीबद्ध करने समेत ताबड़तोड़ कार्रवाई कर पत्रकारों को जेल भेजे जाने के मामले में मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ की जिला इकाई सिंगरौली ने तीव्र आलोचना की है। संघ ने पुलिसिया कार्रवाई का विरोध करते हुए पुलिस अधीक्षक सिंगरौली से पत्रकारों पर लादे गए फर्जी मुकदमे वापस लेने तथा कंपनी के आरोपी सुरक्षा प्रबंधक निर्मित ठाकुर व विकास श्रीवास्तव पर कार्रवाई करने की मांग संबंधित ज्ञापन सौंपा।

एसपी ने पत्रकारों से मिलने के बाद संघ के प्रतिनिधि मंडल को टीवी 24 के देवेन्द्र पाण्डेय पत्रकार व अनिल कुशवाहा कैमरा मैन के उपर दर्ज मुकदमा वापस लेने का आश्‍वासन दिया। मध्‍य प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के जिला अध्यक्ष सुनील सिन्हा के नेतृत्व में संघ के लगभग ढाई दर्जन पत्रकारों ने टीवी 24 के पत्रकार और कैमरा मैन पर अमलोरी स्थित रिलायंस के शासन पावर लिमिटेड कोल ब्लाक अमलोरी मुहेर क्षेत्र में कथित वसूली का आरोप मढ़ दर्ज मुकदमा की भर्त्‍सना की। प्रतिनिधि मंडल पुलिस अधीक्षक जय देवन ए से मिला और कोतवाली पुलिस की कार्रवाई पर रोष जताया।

प्रतिनिधि मण्डल ने एसपी जयदेवन ए को सौंपे ज्ञापन में कहा कि पुलिस ने एक पक्षीय कार्रवाई कर कम्पनी के दवाव में पत्रकारों को जेल भेज दिया। एसपी जयदेवन ए ने कहा कि हमें जो साक्ष्य मिले और हमारी जांच टीम ने जो रिपोर्ट दिया उसके तहत कार्रवाई की। हम इसे गम्भीरता से ले रहे हैं और हमारी जांच रिपेार्ट में खामी है तो हम उसे सुधारेंगे और शुक्रवार की सायं तक पत्रकार देवेन्द्र पाण्डेय, कैमरा मैन अनिल कुशवाहा के उपर लगे प्रकरण की धारा को वापस ले लेंगे। एसपी ने कहा कि कम्पनी के जिम्मेदार लोगों के उपर कार्रवाई होगी। संघ के प्रतिनिधि मण्डल ने दोषी कम्पनी प्रबंधक के उपर भी शीघ्र कार्रवाई की मांग की है। प्रतिनिधि मण्डल में संभागीय उपाध्यक्ष दिनेश पाण्डेय, एनके दीक्षित, शरद ओझा, धनराज गेहानी, अमित द्विवेदी, धीरेन्द्र धर द्विवेदी, आरएन पाण्डेय, संतोष द्विवेदी, विवेक त्रिपाठी, सतीष द्विवेदी, विकास पाण्डेय, देवेन्द्र पाण्डेय, राजेश पाण्डेय, अजय द्विवेदी एवं अन्य पत्रकार शामिल रहे।

समाचार प्‍लस : अभिजीत की नई पारी, नितिन का इस्‍तीफा

साधना न्‍यूज से खबर है कि अभिजीत शेखर झा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी समाचार प्‍लस चैनल के साथ शुरू करने जा रहे हैं. वे साधना न्‍यूज के एमपी-सीजी चैनल से जुड़े हुए थे तथा स्‍पेशल प्रोग्राम बनाते थे.

समाचार प्‍लस से खबर है कि नितिन गुप्‍ता ने इस्‍तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि एक वरिष्‍ठ से खटपट होने के बाद नितिन ने इस्‍तीफा दिया है. नितिन अपनी नई पारी श्री न्‍यूज के साथ शुरू की है.

सुशासन में और निरंकुश हुई पुलिस, दर्ज किया फर्जी एफआईआर

आदरणीय, यशवंत जी, भड़ास मीडिया, नमस्कार। आपका, मुझसे मेरी समस्याओं का पूछना ही डुबते को तिनके का सहारा प्रतीत हुआ, इसके लिए कोटि-कोटि धन्यवाद। मैंने, भूमि अतिक्रमण किये जाने पर, दबंगों की गुण्डागर्दी के खिलाफ माननीय मुख्यमंत्री बिहार, डीजीपी बिहार, एसपी भोजपुर, बिहार एवं नगर थाना आरा को आवेदन दिनांक 23/03/2013 को निबंधित डाक से प्रेषित किया। इसके पश्चात कोई कारवाई होता न देख दिनांक 05/04/13, 06/04/13, 08/04/13, 09/04/13 को भी थाना एवं एसपी भोजपुर को आवेदन प्रेषित किया। इसके बाद मैं 09/04/13 को मैं भुरकुण्डा, झारखण्ड चला आया। मेरे अनुपस्थिति में ही मेरे नाम पर मारपीट के आरोप लगाते हुए नगर थाना आरा में एफ आई आर दर्ज किया गया वह भी बिना जाँचे और समझे।

सुशासन में यह बात मुझे खटक गई कि मेरे 20 दिन पूर्व के आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है और किसी अन्य के आवेदन देने पर Same date and time पर मेरे खिलाफ झूठा एफआईआर दर्ज कर दिया जाता है। चूंकि मेरे 20 दिनों पूर्व के दिये गये आवेदन पर सरकार द्वारा विधिसम्मत कार्रवाई की जाती तो मारपीट की घटना ही न घटती, न ही मुझ पर झूठा एफआईआर होता और न ही माननीय न्यायालयों पर बोझ बढ़ता! यह सरासर कर्तव्यहीनता का परिणाम था, जिसके कारण मैंने सूचनाधिकार अधिनियम के माध्यम से कर्तव्यहीन अधिकारियों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी, जिससे घबराकर भोजपुर पुलिस द्वारा मुझे दोषमुक्त कर दिया गया। यह बात अलग है कि मुझे आजतक सूचनाधिकार अधिनियम के अन्तर्गत किसी प्रकार की सूचना न दी गई।

इस कर्तव्यहीनता के खिलाफ मैंने सरकार से कर्तव्यहीन अधिकारियों के विरूद्ध एफआईआर दर्ज कर जाँच की मांग की है। जब एक आम आदमी पर एफआईआर दर्ज हो सकता है तो कर्तव्यहीन अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज कर जाँच क्यों नहीं की जा सकती! क्या भारतीय कानून समान रूप से कार्य नहीं करेगा?

परिणामस्वरूप आज स्थिति यह है कर्तव्यहीन अधिकारियों के सहयोग से ही मेरे वैध जमीन पर अवैध कब्जा करवाया जा रहा है। इससे संबंधित सारे कागजात डीएम, भोजपुर एवं एसपी, भोजपुर को आवेदन के माध्यम से दिनांक 22/04/13 को ही ई-मेल एवं फैक्स के माध्यम से प्रेषित किये जा चुके थे। भोजपुर पुलिस मेरे द्वारा सूचनाधिकार के उपयोग के कारण बिलकुल ही चिढ़ गई है तथा कभी भी मुझ पर झूठा एफआईआर या जानलेवा हमला करा सकती है। जिसका प्रमाण नगर थाना आरा के एक अधिकारी से फोन पर बात करने के दौरान सामने आया। इस पुलिस अधिकारी द्वारा साफ-साफ कहा गया कि तुम कायर हो और हम तुम्हारे आवेदनों पर कार्य नहीं करेंगे। सामने आओ तब ही कुछ करेंगे।

अतः भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई में आपका सहयोग अपेक्षित है।

धन्यवाद!        

पीड़ित

प्रमोद कुमार सिंह

आर टी आई कार्यकर्ता
गौसगंज, आरा, बिहार

वर्तमान पताः-
भुरकुण्डा, रामगढ़, झारखण्ड।
मो0-09431986774
pks14368@gmail.com

दिनांकः-12/05/2013

टीवी चैनल ”मेरा ग्रह” गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड में शामिल हुआ

रूसी टीवी चैनल "मॉया प्लानेता", यानी "मेरा ग्रह" के कर्मीदल ने एक नया गिनीज़ विश्व रिकार्ड स्थापित किया है। इस चैनल के एक मॉडरेटर और दो कैमरा ऑपरेटरों ने एक ही देश के भीतर सबसे लंबी दूरी की कार यात्रा में भाग लिया है। इस चैनल के बहादुर कर्मियों ने रूस की राजधानी मास्को से रूस के सुदूर-पूर्वी नगर पेत्रोपाव्लोव्स्क-कमचात्स्की तक लगभग 16 हज़ार किलोमीटर की दूरी दो महीने की समयावधि में पूरी की। उन्होंने आधा रास्ता अच्छी भली सड़कों पर और आधा रास्ता कच्चे रास्तों पर कारें चलाते हुए तय किया। यह यात्रा इन लोगों के जीवन की एक सबसे अविस्मरणीय घटना बन गई है।

इन तीन साहसी लोगों ने यूरोप को एशिया से अलग करनेवाले यूराल पर्वतों, साइबेरिया के अलंघ्य घने जंगलों (ताइगा), तेज़ बहाव वाली गहरी नदियों, गहरी झीलों को पार किया है और शानदार राजमार्गों तथा साथ ही ख़स्ताहाल ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर अपनी कारें चलाई हैं। इस अद्वितीय अभियान के प्रतिभागियों ने आर्कटिक वृत्त या उत्तर ध्रुवीय वृत्त (arctic circle) को दो बार पार किया। वे ऐसे कठोर जलवायु वाले इलाके से भी गुज़रे जहाँ हवा का तापमान शून्य से 56 डिग्री नीचे था। लगभग एक महीने तक उनके मोबाइल फोन काम नहीं कर रहे थे और न ही उन्हें जीवन के लिए मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध थीं। उनके पास खाना भी ऐसा था जैसा अंतरिक्ष यात्रियों को दिया जाता है। सब कुछ ट्यूब-बंद और डिब्बे-बंद। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कारों की रफ्तार 15 किलोमीटर प्रति घंटा से ज़्यादा नहीं थी।

इस अभियान के दौरान टीवी चैनल "मॉया प्लानेता" के कर्मीदल ने एक व्यक्ति की जान भी बचाई। रूस के कठोर जलवायु वाले उत्तरी प्रांत यकूतिया में इस व्यक्ति की कार बिगड़ गई थी। वहाँ सैकडों किलोमीटर तक कोई बस्ती नहीं थी। यह व्यक्ति किसी बस्ती की तलाश में दो दिन तक पैदल ही चलता रहा, लेकिन उसे कोई बस्ती दिखाई नहीं दी। उसकी अच्छी किस्मत कि उसे "मॉया प्लानेता" का कर्मीदल मिल गया। उसने इस आदमी को शीतदंश से बचाया और उसके घर तक पहुँचा दिया।

यात्रियों ने अपने रास्ते में अद्वितीय सौंदर्य की अद्भुत प्राकृतिक घटना, उत्तरी लाइट्स देखीं, साइबेरिया में रहती अल्प-संख्यक जातियों के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकातें कीं, उनके रोज़-मर्रा के जीवन पर वीडियो फ़िल्में बनाईं, रूस का एक सुदूर उत्तरी स्कूल देखा और गरम पानी के चश्मों पर खाना बनाने का कौशल भी सीखा।

अपनी इस यात्रा के दौरान कैमरा ऑपरेटरों ने कई दस्तावेज़ी फिल्मों के लिए वीडियो सामग्री तैयार की है जिसके आधार पर बनीं छह दस्तावेज़ी फिल्में जल्द ही टीवी दर्शकों की सेवा में हाज़िर की जाएंगी। प्रकृति का अद्वितीय सौंदर्य, स्थानीय निवासियों के जीवन की अद्भुत कहानियाँ, इस विशाल देश की विविधता और विशिष्टता: सब कुछ दिखाया जाएगा इन दस्तावेज़ी फ़िल्मों में। गिनीज़ बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल की गई इस अनूठी कार-यात्रा के बारे में ये दस्तावेज़ी फ़िल्में चालू साल की गर्मियों और शरद ऋतु में रूसी टीवी चैनल "मॉया प्लानेता", यानी "मेरा ग्रह" के दर्शकों को दिखाई जाएंगी। (रेडिया रूस)

रिश्‍वत लेकर पत्रकार मान्‍यता कार्ड बना रहा है यूपी का सूचना विभाग!

लखनऊ :  उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में पहले से ही भ्रष्टाचार का बोल बाला था, अब सारी सीमाएँ लांघ कर नया कीर्तिमान स्थापित किया जा रहा है. समाचार पत्रों के ग़ैर व्यक्तियों को मुख्यालय की मान्यता दी जा रही है. उर्दू के विभिन समाचार पत्रों के पत्रकारों को मान्यता के स्थान पर मैनेजर मान्यता की दौड़ में आगे हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह मैनेजर सीना ठोंक कर यह घोषणा भी कर रहे हैं कि उन्होंने १०,०००-१०००० रुपए सूचना विभाग की एक डिप्टी डायरेक्टर को देकर अपनी मान्यता कराई है.

अब जिन पत्रकारों की मान्यता नहीं हो सकी है, उनमें रोष व्याप्त है और वो अपने समाचार पत्र के मैनेजमेंट से व्यथा कहते डर रहे हैं. सूचना विभाग पहले से ही इस गोरखधंधे में बुरी तरह लिप्त है. पत्रकारों ने अपना नाम न छपने की शर्त पर बताया कि मैनेजर को मान्यता देकर सूचना विभाग ने इंसाफ नहीं किया है. आक्रोशित पत्रकारों ने उम्मीद जताई है कि मान्यता प्राप्त संवादाता समिति के कर्मठ पत्रकार नेता इस विवाद को उठायेंगे और जिन ग़ैर पत्रकारों की मान्यता दी गयी है, उनको तुरंत कैंसिल कराएंगे. एसके शुक्ल ने एक आपात काल बैठक में कहा कि सूचना विभाग पत्रकारों की जगह अब दलालों को मान्यता दे रहा है. ताकि ये मैनेजर हर समय मंत्रियों और अफसरशाहों से ताल मेल रखकर अपने समाचार पत्र के लिए विज्ञापन का धंधा कर सकें. (कानाफूसी)

जिसका जूता उसकी भैंस है यूपी के स्‍वास्‍थ्‍य विभाग में!

उत्तर प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं बेहद लचर हैं यह बात हम मीडिया के माध्यम से समय समय पर सुनते रहते हैं. दरअसल पूरे सरकारी विभाग में इस तरह का माहौल है, स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर इससे बेहतर नहीं हो सकता. मैंने 2010 में उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी ज्वाइन की. मैं फिरोजाबाद के एक बेहद पिछड़े इलाके में कार्यरत था. वहां के लोकल स्टाफ ने अमर उजाला व हिन्दुस्तान के पत्रकारों के साथ मिल कर मेरे विरुद्ध अखबार में खबरें छपवाई, स्थानीय लोगों को भड़काया. जबकि मैं चौबीस घंटे अस्पताल में उपलब्ध रहता था और ओ.पी.डी रजिस्टर व मेडिको लीगल रजिस्टर इस बात के गवाह हैं कि अस्पताल चलाना मुख्यतः मेरे ही जिम्मे था. 

पत्रकार, लोकल स्टाफ और उसके द्वारा भड़काए गए चंद लोगों की वजह से मेरा जीना दुश्वार हो गया. जून 2011 में मेरा ट्रांसफर टूंडला के एक नवीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर हो गया. यहाँ जब मैं आया था उस वक्त करीब डेढ़-दो सौ मरीज़ महीने में आते थे. एक महीने में ही मैंने करीब पांच-छह सौ मरीजों की ओ.पी.डी पहुंचा दी, लेकिन दो महीने बाद ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र टूंडला ने दवाएं देना ही बंद कर दीं. जब मैं यहाँ आया था उस समय न तो अस्पताल में कोई रजिस्टर था और न अस्पताल में अन्य कोई  सुविधा थी. मैंने अपने पैसे से सामान खरीद कर वहां की व्यवस्था बनाई और वह पैसा मुझे विभाग से कभी नहीं मिल सका.

मैंने RTI के माध्यम से पूछा भी पर विभाग किसी RTI का जवाब नहीं देता है. अप्रैल 2012 में मेरा ट्रांसफर नवीन प्राथमिक स्वास्‍थ्‍य केंद्र से सामुदायक स्वास्थ्य केंद्र टूंडला पर कर दिया. मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय के बाबू मुझसे इसलिए चिढ़ते हैं क्योंकि मैं अपना काम ईमानदारी से करता हूँ और उन्हें चढ़ावा चढ़ाने नहीं जाता. इसलिए इन्होंने पिछले एक साल से बहुत परेशान किया. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक व मुख्य चिकित्साधिकारी का बाबुओं के साथ अलिखित समझौता होता है और बाबू एक तरह से इनके दलाल होते हैं. ये लोग एक वर्ष से निरंतर मेरा उत्पीड़न कर रहे हैं.

मेरे फरवरी -मार्च 2012 माह के वेतन से 937- 937 रु. काट लिए जबकि अगस्त 2011 से अस्पताल की बिजली व्यवस्था ध्वस्त थी और मैंने इसकी लिखित शिकायत अधीक्षक को की थी. जबकि दूसरे चिकित्साधिकारियों के वेतन से बिजली का बिल नहीं काटा गया है. मेरे निरंतर कहने व लिखित में शिकायत करने पर भी मेरा फरवरी 2012 का वेतन बिना किसी कारण के रोके रखा गया. मैंने उन्नीस जुलाई को एक RTI डाला, उसके बाद भी 12 अगस्त को मेरा वेतन एक बैंकर चेक के रूप में दिया. मेरा जुलाई से दिसंबर 2010 तक का महंगाई  भत्ता बार-बार कहने, लिखित में देने और RTI देने के बावजूद नहीं निकाला और न ही RTI का जवाब दिया है. अप्रैल 2012 से अब तक का मकान भत्ता नहीं निकाला है जबकि बाकी चिकित्साधिकारियों को वह मिल रहा है.

जून-जुलाई 2012 का मेरा वेतन रोक दिया गया और कारण यह बताया कि भूल से छूट गया है. मुझे बताया कि दस-बारह दिन में वेतन आ जाएगा. एक माह गुजरने के बाद मुझे क्लर्क ने बताया कि मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में दो हज़ार रुपये मांग रहे हैं. मैंने इसकी लिखित शिकायत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक, मुख्य चिकित्साधिकारी, अतिरिक्त महानिदेशक व स्वास्थ्य सचिव को की परन्तु किसी ने कोई सुनवाई नहीं की. इसके बावजूद मुख्य चिकित्साधिकारी ने मेरा वेतन दो हज़ार रुपये पाने के लिए दो महीने बाद तीस अक्टूबर को निकाला, जबकि मेरे खाते में बिलकुल पैसे नहीं थे और इसी बीच मेरे छोटे भाई को बेहोशी की हालत में हिन्दू राव अस्पताल में भर्ती कराया गया था. मेरे अगस्त, सितम्बर और अक्टूबर के वेतन से एक-एक दिन का वेतन भूल से काट लिया गया है जो अभी तक नहीं निकाला गया है.

मैंने अधीक्षक व मुख्य चिकित्साधिकारी को अपनी इन समस्याओं के बारे में RTI दिए जिनका मुझे कोई जवाब नहीं मिला. बदले में अधीक्षक ने दिसंबर में मेरी तीन तीन दिन लगातार इमरजेंसी ड्यूटी लगा दी और जब मैंने इसका विरोध किया तो उन्होंने कहा कि वे मेरा ट्रान्सफर करवा देंगे. उन्होंने मुख्यचिकित्साधिकारी से कह कर मेरा ट्रान्सफर जनवरी में एक दूर दराज के इलाके में करा दिया है. इन समस्याओं से तंग आकर मैंने उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी छोड़ने का मन बनाया और इक्कीस फरवरी को एक प्रार्थना पत्र work experience certificate के लिए दिया. करीब तीन महीने गुजर जाने के बाद भी क्लर्क का कहना है कि अभी रिकॉर्ड देखा जा रहा है जबकि यह एक घंटे का काम है. मैंने मुख्य सूचना आयुक्त तक अपील की है परन्तु ग्यारह सूचना आयुक्त वाले भारी भरकम आयोग ने पांच महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की है.
         
हम समझ सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में अधिकारी सारे नियम क़ानून ताक पर रख कर किस क़दर निरंकुश हैं. अभी अफजल गुरु को फांसी लगाई गयी तब मेरे मन में बार-बार यह बात आती रही कि जब देश में कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज़ ही नहीं है तो फिर इस देश में संसद और विधान सभाओं की ज़रूरत ही क्या है.

डा. राम प्रकाश अनंत

dr.ramprakashanant@gmail.com

समाचार प्‍लस के साथ चौदह लोगों ने शुरू की अपनी नई पारी

समाचार प्‍लस से खबर है कि राजस्‍थान चैनल के साथ चौदह लोगों ने अपनी नई पारी शुरू की है. यूपी-उत्‍तराखंड में तहलका मचाने के बाद समाचार प्‍लस अब राजस्‍थान में धमाका करने की तैयारी में जुटा हुआ है. राजस्‍थान चैनल के साथ आनंद प्रकाश गौतम ने अपनी नई पारी शुरू की है. वे ए2जेड से इस्‍तीफा देकर समाचार प्‍लस पहुंचे हैं. उन्‍हें रन डाउन की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. आनंद को एसोसिएट प्रोड्यूसर बनाया गया है. बीटीवी, जयपुर से इस्‍तीफा देकर राकेश मिश्रा ने भी समाचार प्‍लस ज्‍वाइन किया है. इन्‍हें भी रनडाउन पर प्रोड्यूसर बनाया गया है.

एमएच1 से इस्‍तीफा देकर नीतू शर्मा भी समाचार प्‍लस पहुंची हैं. इन्‍हें एसोसिएट प्रोड्यूसर बनाया गया है. बृजेश सिंह भी जनसंदेश चैनल से इस्‍तीफा देकर समाचार प्‍लस पहुंचे हैं. इन्‍हें असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. पुनीत कुमार इंडिया न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर समाचार प्‍लस में असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बने हैं. इन तीनों लोगों को अपडेट की जिम्‍मेदारी दी गई है. ये लोग टीकर की खबरों को अपडेट करेंगे.   

आजाद न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर संदीप कटियार ने समाचार प्‍लस ज्‍वाइन किया है. इन्‍हें यहां पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. अवनीश श्रीवास्‍तव भी साधना न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर समाचार प्‍लस के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. इन्‍हें यहां पर एसोसिएट प्रोड्यूसर बनाया गया है. खबर भारती से राहुल पांडेय ने इस्‍तीफा दिया है. इन्‍होंने भी अपनी नई पारी समाचार प्‍लस के साथ शुरू की है. इन्‍हें असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. ये तीनों लोगों राजस्‍थान चैनल के कॉपी/स्क्रिप्‍ट डेस्‍क पर अपनी जिम्‍मेदारी संभालेंगे.  

इंडिया न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर दिव्‍या सिंघल ने समाचार प्‍लस के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. इन्‍हें यहां पर ट्रेनी बनाया गया है. सुजीत कुमार भी ट्रेनी के रूप में समाचार प्‍लस के साथ जुड़े हैं. इंडिया न्‍यूज से इस्‍तीफा देक आने वाली उपासना बख्‍शी को समाचार प्‍लस में असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. अवनीश ने टोटल टीवी से इस्‍तीफा दे दिया है. इन्‍होंने भी अपनी नई पारी असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर के रूप में समाचार प्‍लस के साथ शुरू की है. तनिका तनेजा ट्रेनी के रूप में समाचार प्‍लस से जुड़ी हैं. इन सभी लोगों की नियुक्ति पैकेजिंग में हुई है.

इनके अलावा मोहम्‍मद शहाब खां भी समाचार प्‍लस के साथ जुड़ गए हैं. उन्‍हें यहां एंकर बनाया गया है. वे राजस्‍थान चैनल के लिए एंकरिंग करेंगे. शहाब ईटीवी से इस्‍तीफा देकर समाचार प्‍लस पहुंचे हैं. समाचार प्‍लस ने पिछले कुछ समय में ईटीवी को कई बड़े झटके दिए हैं. राजस्‍थान में तो समाचार प्‍लस अपनी लांचिंग के पहले ही ईटीवी की कमर तोड़कर रख दिया है.

प्रो. भाष्‍कर ने किया मासिक पत्रिका ‘दिव्‍यता’ का विमोचन

लखनऊ : हम अपनी मातृभाषा में बात करने में शर्म महसूस करते हैं, जबकि विदेशियों को देखिये कि वह अपने देश में हों या विदेश में, वे अपनी ही भाषा में बात करते हैं। उन्हें अपनी भाषा में बोलने में जरा सी भी शर्म महसूस नहीं होती। वहीँ हम हैं कि विदेश की छोडिये अपने देश में ही अपनी मातृभाषा में बात करने में हिचकिचाते हैं। आप चीन को देखिये केवल वे अपने व्यवसाय के लिए ही विदेशी भाषा का प्रयोग करते हैं, न कि दैनिक प्रयोग के लिए।

यह बात दिव्यता पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका 'दिव्यता' के विमोचन समारोह में भारतीय प्रबंधन संस्थान, लखनऊ के प्रो. भारत भाष्कर ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कही। उन्हों ने आगे कहा कि हमें अंग्रेजियत की मानसिकता से बाहर निकल कर हिंदी भाषा के उत्थान के बारे में सोचना चाहिए। तभी हमारी मातृभाषा को विश्व के पटल पर स्थापित कर पाएंगे। प्रो. भाष्कर ने आगे कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि 'दिव्यता 'हिंदी के प्रतिमान को अपने पाठकों के बीच स्थापित कर पायेगी।

इस मौके पर पत्रिका के संपादक प्रदीप श्रीवास्तव ने कहा कि सही मायने में देखा जाये तो हिंदी पत्रकारिता के विकास में गैर हिंदी भाषी लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है। आज हिंदी की पत्र पत्रिकाओं -फलने फूलने में मारवाड़ी समाज का महत्त्व पूर्ण योगदान है। देश के किसी कोने में जाएँ तो आप को वहां मारवाड़ी समाज के व्यवसायी जरुर मिलेंगे। जो कहीं से भी हिंदी अख़बार या पत्रिका को जरूर खरीद कर पढ़ते हैं। यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता फल-फूल रही है। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों में सर्व श्री अनिल कुमार सिंह, श्रीमती दीपा सिंह, डॉ. हिमा बिंदु ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का सफल संचालन किया लखनऊ की अनीता सहगल ने तथा धन्यवाद ज्ञापन किया युवा प्रबंधक वृतांत श्रीवास्तव ने।

लेकिन यशवंत भाई, मेरा एक विनम्र सुझाव है…

बधाई यशवंत जी, भड़ास ४ मी़डिया के पांच साल पूरे होने पर यशवंत जी और उनकी टीम को असीम बधाइयां। इसमें शक नहीं कि पूरी लगन और मेहनत से इस विशिष्ट वेब साइट ने हिंदी में एक नया शिखर और कीर्तिमान स्थापित किया। कई तमाम रिस्क उठाए। लड़ाइयां लड़ीं। दुख झेला। इससे बचपन में प्राइमरी स्कूल में पढ़ी कवि श्याम नारायण पांडेय (अब तो इस कवि का नाम कई लोग नहीं जानते) याद आती है-

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।

सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो।

….. वीर तुम बढ़े  चलो, धीर तुम बढ़े चलो।।

सचमुच अगर भड़ास नहीं होता तो हम अखबारी दुनिया की खबरें नहीं जान पाते। यह पोर्टल हमें एक दूसरे से जोड़ देता है। भड़ास की टीम के अनिल सिंह की सक्रिय उपस्थिति के बारे में हम सभी जानते ही हैं। अनिल में पूरी ऊर्जा है, मेधा है औऱ मेहनती हैं। बाकी सदस्यों से भी धीरे- धीरे परिचय होगा ही। भड़ास पर कई वे खबरें पढ़ने को मिलती हैं जो अन्यत्र नहीं मिल पातीं। कहां क्या गड़बड़ है, भड़ास के माध्यम से हम यह जान पाते हैं। बेबाक। स्पष्ट। नीचे टिप्पणी में यशवंत भाई लिख भी देते हैं- यदि किसी को इसके विरोध में लिखना है या इसका खंडन करना है तो उसका भी स्वागत है। क्या गजब। पुराने जमाने की पत्रकारिता याद आ जाती है।

लेकिन यशवंत भाई, मेरा एक विनम्र सुझाव है। भाई, ईमानदार काम के अनेक शत्रु होते हैं। बल्कि ज्यादा शत्रु  होते हैं।  आजकल तो कई लोग मानते हैं कि ईमानदार आदमी बकवास प्राणी होता है और उसका कोई भविष्य नहीं है। वे कहते हैं- जय बोलो बेईमान की। आज समाज के एक तबके में धन की इज्जत है। कोई चाहे लाख चोरी, डकैती, नीचतापूर्ण काम करता हो। नीचता और भ्रष्टाचार में वह भले ही आकंठ डूबा हो लेकिन उसके पास धन है तो वह पूज्यनीय बन जाता है। श्रद्धेय बन जाता है। कोई व्यक्ति चाहे लाख ईमानदार, मेहनती.  मेधावी और काबिल हो, लेकिन यदि उसके पास धन नहीं है तो वह दो कौड़ी की भी इज्जत नहीं पाता।   लेकिन आप चिंता न करें। भगवत गीता हमेशा ताकत देती है और देती रहेगी। गीता एक उपनिषद है।  उसका कहना है-  झूठ की  कोई सत्ता नहीं होती और सत्य का अभाव नहीं है। यानी जीत हमेशा सच की ही होती है।

भाई सावधान रहिए।  खुड़पेंचिए प्राणी हर युग में रहे हैं। उनका काम ही है खुड़पेंच करते रहना। षड्यंत्र करते रहना। यह उनके चरित्र में ही होता है। तो इनसे भी सावधान रहिए। हालांकि आप सावधान होंगे ही। लेकिन फिर भी मैं लिख रहा हूं क्योंकि मन में जो आया उसे लिख ही देना चाहिए। हर युग में लीक से हट कर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वालों को लगातार जंग लड़नी पड़ती है। मजा यह है कि ऐसी जंग लड़ने वाले इसे जंग मानते ही नहीं। वे तो इसे अपना धर्म मानते हैं। इसलिए  आगे बढ़िए। मैं ही नहीं अनेक लोग आपके साथ हैं। आगे बढ़ते रहिए। औऱ बीच- बीच में सन्यास का जो राग आप छेड़ते रहते हैं, वह मत कीजिए। अभी डटे रहिए। आगे बढ़ते रहिए। यह समय की मांग है। आप जैसे व्यक्ति की समाज को जरूरत है।

यार यह सब मैं इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि मुझे आपसे कोई स्वार्थ है। जब तक आप इसी तरह ईमानदारी से आगे बढ़ेंगे, मैं इसी तरह आपको बधाई देता रहूंगा। लेकिन जब लगेगा कि कुछ गड़बड़ है तो आपको खरी- खोटी भी लिख भेजूंगा। जो मन में था उसे व्यक्त कर दिया। आभार, बधाई और दीर्घ जीवन की कामना।

विनय बिहारी सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
कोलकाता
vinaybiharisingh@gmail.com


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प्रिंटलाइन से स्वतंत्र मिश्रा का नाम हटा, वाधवा का नाम दर्ज

सहारा से एक बड़ी जानकारी मिली है कि स्वतंत्र मिश्रा का नाम अखबार की प्रिंटलाइन से हटा दिया गया है. सहारा मीडिया और एंटरटेनमेंट हेड संदीप वाधवा का नाम प्रिंट लाइन में डाल दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि स्वतंत्र मिश्रा का इस्तीफा प्रबंधन ने स्वीकार कर लिया है. उसी के तहत यह कदम उठाया गया है.

स्वतंत्र मिश्रा सहारा में लंबे समय से कार्यरत थे. हाल-फिलहाल वह सहार समय यूपी उत्तराखंड न्यूज चैनल के हेड थे. क्रेडिट कार्ड चोरी प्रकरण में स्वतंत्र मिश्रा का नाम आने के बाद प्रबंधन ने अपने स्तर पर जांच के बाद स्वतंत्र मिश्रा को कार्यमुक्त करने का फैसला लिया. सहारा से मिश्रा के लंबे समय से जुड़ाव को देखते हुए उनका एक्जिट शांतिपूर्वक और सम्मान के साथ किया गया है. उधर, कुछ लोगों का कहना है कि सहारा प्रबंधन ने स्वतंत्र मिश्रा को कुछ समय तक चुप रहते हुए लो प्राफइल में पड़े रहने को कहा है. सही वक्त पर उन्हें फिर से सहारा के साथ एक्टिव किया जा सकता है.

 

बसपा ही ब्रहामण समाज की सच्ची हितैषी : सतीश चन्द्र मिश्र

सुलतानपुर। देश की आज़ादी से लेकर आजतक ब्रहामण समाज निष्ठावान भाव से देश के लिये सर्पित है लेकिन गैर बसपाई सभी सरकारें इस द्विव्य समाज का त्रिस्कार करती चली आ रही हैं। कभी कांग्रेस ने सरकार बनाने का लिये ब्रहामण समाज का इस्तेमाल किया तो कभी भाजपा और सपा ने लेकिन इन दलों ने समाज को छलने के अलावा कुछ नहीं दिया। उक्त बातें बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सदस्य सतीशचन्द्र मिश्र ने यहां आयोजित ब्रहामण समाज सम्मेलन में कहीं।

बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव एवं सांसद श्री मिश्र ने कहा कि जिस ब्रहामण समाज ने आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया आजादी के फौरन बाद कांग्रेस की सरकार आते ही इस समाज को कांग्रेस पार्टी ने जमकर छला। पांच दश्क के बाद भगवान राम के नाम की दोहाई देकर सत्ता में आई भाजपा ने भी वही काम किया जो कांग्रेस कर गुजरी थी। वैसे भाजपा से उम्मीद लगाना ही गलत था जो पार्टी भगवान से किये हुए वादे से मुकर गई उससे भला क्या उम्मीद रखा जा सकता है। वहीं इन दिनों समाजवादी पार्टी के ब्राहमण प्रेम पर अपनी भड़ास निकालते हुए श्री मिश्र ने कहा कि परशुराम जयंती के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित कर सपा ब्रहामण वोट की राजनीति कर रही है जबकि सच्चाई इससे इतर है। उन्होंने कहा कि हाल में होने वाले लोकसभा चुनाव में जहां बहन मायावती ने ब्रहामण समाज को आर्शिवाद स्वरुप प्रदेश के अन्दर 21 सीटें दी वहीं सपा ने महज 4 सीटें ही दी। वह राजनीतिक कूटनीति के साथ। लखनऊ, उन्नाव भदोही पर सपा ने ब्रहामण चेहरों को उतारा है जबकि बसपा ने यहां से पहले ही ब्रहामण चेहरे उतार रखे थे। वहीं विधानसभाध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय को शहीद करने की नियत से मैदान में उतारा ताकि उन्हें विधानसभाध्यक्ष पद से हटा दिया जाय। श्री मिश्र ने कहा कि सपा राज्य में ब्रहामणों का आलम तो यह है कि मैनपुरी और कन्नौज जैसे सपा मई इलाकों में ब्रहामण समाज का त्रिस्कार जारी है। कहीं ब्रहामणों को जूते की माला पहनाकर बेइज्जत किया जा रहा है तो कहीं मार पीटकर उन्हें हलाकान किया जा रहा है। श्री मिश्र ने अपने समाज के लोगों से अपील किया कि प्रदेश के अन्दर 16 प्रतिशत ब्रहामण वोट है इस समाज के साथ दलित समाज को अगर जोड़कर चलें तो उनके पास 25 प्रतिशत वोट बैंक हैं ऐसे में उन्हें मैदान मारने से कोई नहीं रोक सकता।

सुलतानपुर से असगर नकी की रिपोर्ट.

चर्चा है कि दैनिक जागरण, लखनऊ को ‘बॉय’ बोलने जा रहे हैं नदीम!

: (कानाफूसी) : लखनऊ में चर्चा है कि दैनिक जागरण के स्टेट ब्यूरो चीफ नदीम इस अखबार से अपना बीस साल पुराना नाता तोडऩे जा रहे है। बताया जा रहा है कि वे जल्द ही अपना इस्तीफा संस्थान को सौंप देंगे। उनका एक बड़े मीडिया संस्थान के साथ बड़े पद के लिए बात तय होने की बात कही जा रही है। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि इसी हफ्ते उनकी वहां ज्वाईनिंग हो सकती है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

अगर ऐसा हुआ तो यह घटनाक्रम दैनिक जागरण के लिए दोहरा झटका साबित होगा। नदीम सिर्फ ब्यूरो चीफ ही नहीं हैं बल्कि उनकी गिनती इस अखबार के चुनिंदा निष्ठावान लोगों में होती है। अपना पत्रकारीय जीवन दैनिक जागरण से शुरू करने के बाद लगातार वह इसी अखबार से जुड़े रहे। बीस सालों में उनका सफर ट्रेनी से स्टेट ब्यूरो चीफ तक पहुंचा। जागरण के लिए दूसरा झटका यह है कि नदीम का इस्तीफा ऐसे समय होने जा रहा है कि जब देश के सबसे बड़े राज्य में दैनिक जागरण लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस रहा था लेकिन उसका कमांडर ही सेना से अलग हो गया। नदीम से इस सम्बंध में जब उनके मोबाइल नंबर पर एसएमएस करके भड़ास की तरफ से जानकारी मांगी गई तो उनका कोई जवाब नहीं आया। हालांकि उनके करीबी लोगों ने उनके जागरण छोड़ने की तैयारी की पुष्‍टि की है।

युवक की पिटाई पर नाराज कृषि मंत्री और सपा जिलाध्यक्षा का धरना, पुलिसकर्मी निलम्बित, एफआईआर दर्ज

बाराबंकी। भारतीय स्टेट बैंक रामसनेहीघाट शाखा में पैसा जमा करने गये एक युवक की चौकी प्रभारी द्वारा अकारण पिटाई करने से आक्रोशित लोगों ने सड़क जाम व कोतवाली का घेराव कर धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। डीएम व एएसपी ने मौके पर पहुंचकर मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए। मामला सपा समर्थित प्रधान से जुडा होने से कृषि राज्यमंत्री राजीव कुमार सिंह भी अपने कार्यकर्ताओं के साथ कोतवाली गेट पर धरने पर बैठ गये। मुख्यमंत्री व आईजी के हस्ताक्षेप के बाद दोषियों पर मुकदमा दर्ज कर कोतवाल सहित तीनो को लाइन हाजिर कर दिया गया।

मंगलवार को धरौली निवासी मनीष यादव पुत्र पतिराम भारतीय स्टेट बैंक सुमेंरगंज  दोपहर में रूपयें जमा करने गया था। मनीष के मुताबिक बैंक में भीड़ अधिक होने के कारण वह लाइन में नहीं लग सका  था। तभी बैंक चेकिंग के प्रभारी बनाये गये हथौंधा चौकी प्रभारी अश्विनी कुमार मिश्र बैंक पहुंचे और उससे लाइन में न लगने को लेकर पुलिस रौब दिखाने लगे। दोनो में कहासुनी होने लगी। चौकी प्रभारी ने मनीष की पिटाई करना शुरू कर दिया। पिटाई के बाद उसे कोतवाली ले आए। जहां पर कोतवाल व सिपाही सुधीर सिंह ने भी उसकी खूब पिटाई की। पुलिस की पिटाई से मनीष के दहिने चेहरे, अगूंठे व ऊपरी होंठ में काफी चोटे आई है। युवक की चाची धरौली की महिला ग्राम प्रधान शिमला देवी भी कोतवाली पहुंची। उनका आरोप है कि उनसे भी कोतवाली प्रभारी ने अभद्रता की। महिला ग्राम प्रधान की अभद्रता से आक्रोशित सपाई व हजारों कस्बावासियों ने सड़क जाम कर कोतवाली का घेराव कर लिया तथा धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। मामले की जानकारी होतेे ही डीएम को दी गई। डीएम मिनिस्ती एस. व एएसपी कुलदीप नारायण ने स्थिति का जायजा लिया और मजिस्टेªटिक जांच के निर्देश मजिस्टेªट प्रेम प्रकाश पाल को दिए। मजिस्टेªटिक जांच में कोतवाली प्रभारी रामदरस यादव, अश्विनी कुमार व सुधीर सिंह दोषी पाये गये। जांच में दोषी पाये जाने के बाद भी घण्टों तक कोई कार्रवाई न होने पर सपाई भड़क उठे और फिर रोड़ जाम कर दिया। इसके बाद जानकारी होने पर अपने कार्यकर्ताओं के साथ कृषि राज्यमंत्री राजीव कुमार सिंह भी कोतवाली पहुंच गये। वह भी कोतवाली परिसर के बाहर धरने पर बैठ गये। उनके साथ सपा जिलाध्यक्ष मौलाना मेराज सहित सैकड़ों लोग धरने में शामिल रहे। कृषि राज्यमंत्री राजीव कुमार सिंह ने बताया कि वह दो हजार आदमियों के साथ थाने के बाहर बैठे है। जब तक उन्हे एफआईआर की कापी व लाइन हाजिर का आदेश नहीं मिल जायेगा। तब वह कोतवाली के बाहर बैठे रहेंगे।

खाकी की दबंगई पर घंटो घिघयाती रही लालबत्ती

डीएम का आदेश व दरी पर सपाई, सरकार की साख पर पुलिसिया दबंग ने पोत दी कालिख

रिज़वान मुस्तफा

बाराबंकी। प्रदेश के मुख्यमंत्री की मेहनत पर पानी फेरने में खाकी अब भी पीछे होती नजर नहीं आ रही है। रामसनेहीघाट में खाकी ने बैंक में दबंगई की, युवक को पीटा। डीएम ने कार्यवाही का आदेश दिया। लेकिन कुछ न हुआ तो सपाई धरने पर जा बैठे। प्रदेश सरकार के मंत्री भी कार्यवाही को लेकर सपा जिलाध्यक्ष सहित घंटो थाने में बैठे अपनी हनक-धमक को कोसते नजर आये। जाहिर था कि खाकी की बेलगाम दबंगई ने लालबत्ती की साख पर सरेआम कालिख पोत डाली थी।

बाराबंकी जनपद में पुलिस कुछ भी करे कप्तान सैयद वसीम अहमद को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। चाहे सरकार बदनाम हो या सरकार के लोग पीटे जाये अथवा उनके साथ कुछ भी हो जाये मगरूर एसपी इस ओर ध्यान ही नहीं देते। आरएस घाट में हैदरगढ़ से आये कोतवाल आरडी यादव ने यहां भी बेलगाम खाकी के दर्शन करवा दिये। यह वही शख्स है जिसने हैदरगढ़ में महिला को पीटा, डकैतियों को चोरी दिखाया व फरियादियों को अपमानित किया। बदले में कप्तान ने इसे वहां से हटाया तो आरएसघाट कोतवाली का प्रभारी बना दिया। जुम्मा-जुम्मा पहले आया यह कोतवाल अपनी औकात पर यहां उतर आया। मनीष नामक युवक को इसने बैंक में पीटा, बाहर पीटा, फिर थाने में लाकर पीटा। इसके साथी बने दरोगा अश्वनी कुमार व एक अन्य सुधीर कुमार। जनता ने जाना तो उसका गुस्सा भड़क उठा। सपा सरकार में सपाई की पिटाई पर तमाम सपाई थाने में दरा बिछाकर जा बैठे। जानकारी हुई तो सपा के जिलाध्यक्ष मौलाना मेराज भी समझाने के नाम पर मौके पर जा धमके। उससे पहले जिलाधिकारी भी आयी थी उन्होंने तीनों पुलिस कर्मियों के खिलाफ निलम्बन के निर्देश देते हुए इनके खिलाफ रपट दर्ज करने के भी आदेश दिये थे। अतिरिक्त जिलाधिकारी प्रेम प्रकाश पाल ने जांच में ही इन पुलिस कर्मियों को दोषी पाया। लेकिन प्रदेश सरकार के एक मंत्री से नजदीकी संबंध बताने वाले कप्तान को डीएम का आदेश नहीं सुनाई दिया। आखिरकार कुछ देर बाद क्षेत्रीय विधायक व प्रदेश सरकार के कृषि राज्यमंत्री राजा राजीव सिंह भी मौके पर जा पहुंचे।

फिर रामसनेहीघाट में शुरू हुआ खाकी की गुण्डई के सामने लालबत्ती का मिमयाना अथवा घिघयाना। रात आठ बजे यहां लालबत्ती पुलिसिया गुण्डई के सामने बड़े-बड़े आंसू बहाती रही। लेकिन कप्तान का फोन न उठा तो न उठा। बातचीत में मंत्री व जिलाध्यक्ष महोदय ने बताया कि वह धरने में बैठे सपाइयों को समझाने आये हैं। लेकिन स्थिति बहुत कुछ बयां कर रही थी। बिगड़ेल वर्दी के सामने सरकार अपनी साख पर कालिख पोतवा रही थी। स्वयं राज्यमंत्री ने कहा कि यह कप्तान ऐसा कुछ करवा देगा कि उसकी भरपाई नहीं की जा सकेगी। मौलाना मेराज बोले यह मगरूर इन्सान भ्रष्टाचार का कारक बन गया है। पता चला है कि कई घंटो तक खाकी के सामने बकरी बनकर मिमयाती लालबत्ती को राहत उस समय मिली जब आईजी जोन लखनऊ परिक्षेत्र सुभाष चन्द्र ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। साफ था कि जिले के कप्तान ने एक बार फिर जिलाधिकारी के निर्देशों को धता बता डाला। यहां तक की राज्यमंत्री तक को भी अपनी हैसियत बता डाली। सवाल क्षेत्र व जनपद में यह है कि जब सपा के जिलाध्यक्ष व कार्यकर्ताओं नेताओं तथा राज्यमंत्री तक को अपनी रपट लिखाने के लिए दरे पर आसीन होना पड़ रहा है तो आम आदमी का इस सरकार में क्या हाल है इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कुछ लोगों का कहना है कि कप्तान व कोतवाल जैसे लोगों ने यह ठान रखा है कि वे मुख्यमंत्री जी कितनी भी मेहनत करें लेकिन हम सपा सरकार की साख में पलीता लगाकर ही दम लेंगे। फिलहाल रामसनेहीघाट में जो हुआ उसका नतीजन यदि प्रदेश सरकार द्वारा कोई बड़ी कार्यवाही नहीं होती तो आने वाले समय में यह प्रदेश सरकार की फजीहत को बढ़ाता ही जायेगा।
 

सहारा मामले में सेबी ने शुरू की रिफंड की प्रक्रिया

नई दिल्ली : बाजार नियामक सेबी ने बहुचर्चित सहारा मामले में उन व्यक्तिगत निवेशकों का पैसा वापस किए जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है जिनका सत्यापन वह कर चुका है। यह मामला सहारा द्वारा ‘विभिन्न गैरकानूनी तरीकों’ से 24,000 करोड़ रुपये की राशि जुटाने से जुड़ा है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने केवल उन निवेशकों को पैसा लौटाना शुरू किया है जिनके मामलों में सत्यापन प्रक्रिया के दौरान किसी तरह का दोहराव सामने नहीं आया। बाकी निवेशकों को रिफंड के लिए उच्चतम न्यायालय के आगामी निर्देशों तक इंतजार करना होगा। न्यायालय इस मामले पर 17 जुलाई को सुनवाई कर सकता है।

सहारा ग्रुप ने इस मामले में सेबी के पास 5,120 करोड़ रुपये जमा कराये थे और दावा किया है कि वह अपनी दो कंपनियों के बांडधारकों को 20,000 करोड़ रुपये पहले ही लौटा चुका है। निवेशकों का रिफंड सेबी के पास जमा कराई गयी राशि में से किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार सहारा का दावा है कि उसने उच्चतम न्यायालय के 31 अगस्त 2012 के आदेश से पहले ही सीधे तौर पर रिफंड किये थे। उसके इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अभी की जानी है।

सूत्रों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद सहारा ने सेबी को निवेशकों की जो सूचियां सौंपी हैं उनमें भी अनेक दोहराव व अन्य विसंगतियां देखने को मिली हैं। सूत्रों के अनुसार ऐसे अनेक मामले हैं जहां किसी एक निवेशक का नाम सैकड़ों जगह आया है। इसके अलावा एक ही निवेश के अलग अलग पते या एक ही पता सैकड़ों निवेशकों के नाम दर्ज है। बाजार नियामक ने जिन सबसे बड़ी विसंगतियों का संदेह जताया है उनमें बड़ी संख्या में निवेशकों के ब्यौरे तथा पते की जानकारी नहीं होने का संदह है।

सूत्रों के अनुसार रिफंड उन असली निवेशकों को किया जा रहा है जिनके ब्यौरे का सत्यापन हो चुका है। हालांकि इस तरह के निवेशकों की संख्या बहुत छोटी है जबकि शुरआती दावा किया गया था कि सहारा समूह की इन कंपनियों ने 24,000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि तीन करोड़ बांडधारकों से जुटाई है। सेबी ने पहले ही प्रवर्तन निदेशालय, भारतीय रिजर्व बैंक त्था अन्य सरकारी एजेंसियों से कहा है कि वे इस मामले में सहारा द्वारा नियमों के संभावित उल्लंघन की जांच करें जिसमें जिसमें जाली फम्रों के जरिए मनी लांड्रिंग की गतिविधि में शामिल होने की जांच भी शामिल हो सकती है। (एजेंसी)

हनी सिंह के गाने सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है, इसके खिलाफ कार्रवाई हो : अदालत

चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अश्लील गीत गाने को लेकर रैप गायक हनी सिंह के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए पंजाब सरकार की आलोचना की। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जसबीर सिंह और न्यायमूर्ति आरके जैन की पीठ ने पंजाब सरकार को आदेश दिया कि वह भारतीय संस्कृति को बदनाम करने के लिए तत्काल रैप गायक के खिलाफ कार्रवाई करे। अदालत ने कहा कि हनी सिंह के गाने सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है। अदालत ने यह भी कहा कि हनी सिंह का बहिष्कार किया जाना चाहिए।

इससे पहले, पंजाब के नवांशहर के एक गैर सरकारी संगठन हेल्प की याचिका में अदालत से सरकार को अश्लील गानों की समस्या पर रोक लगाने के लिए कारगर तंत्र स्थापित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। इस संगठन ने यह जनहित याचिका तब दायर की थी जब गायकों और संगीतकारों के एक समूह ने कुछ पंजाबी गायकों द्वारा गानों में इस्तेमाल किए जा रहे अश्लील बोल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। उन्होंने कहा था कि ये गीत पंजाबी संगीत पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं।

दैनिक जागरण में अरुण चौधरी एवं संतोष ठाकुर का तबादला

दैनिक जागरण, जम्‍मू से खबर है अरुण चौधरी को नोएडा बुलाया जा रहा है. वे न्‍यूज एडिटर के पद पर कार्यरत थे. अरुण नोएडा में सेंट्रल डेस्‍क पर अपनी जिम्‍मेदारी संभालेंगे. वे पिछले चार सालों से जम्‍मू में अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. अरुण की रिपोर्टिंग सेंट्रल डेस्‍क इंचार्ज राजीव सचान को होगी.

दैनिक जागरण, उधमपुर से खबर है कि संतोष ठाकुर को दिल्‍ली बुलाया जा रहा है. संतोष चीफ रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. वे पिछल सात सालों से उधमपुर में कार्यरत थे. संतोष को क्‍या जिम्‍मेदारी दी जाएगी इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. संभावना जताई जा रही है कि कुछ और बदलाव किए जा सकते हैं.

नेशनल दुनिया के फोटोग्राफर जोगिन्‍दर शर्मा घायल

नेशनल दुनिया, फरीदाबाद में कार्यरत फोटोग्राफर जोगिन्दर शर्मा रेलवे स्टेशन पर यात्रियों द्वारा किये जा रहे हंगामे के दौरान पटरी पर गिरकर घायल हो गए। दुर्घटना के समय वह हंगामे की फोटो खींच रहे थे। जोगिन्‍दर को उपचार के लिए बीके हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है, चिकत्सकों ने बेहतर इलाज के लिए उन्हें निजी हॉस्पिटल में रेफ़र कर दिया। अब सबकी नजर इस पर लगी हैं कि नेशनल दुनिया मैनेजमेंट उनको मेडीक्लेम का लाभ या कोई आर्थिक मदद देता है या नहीं?

चौथी तिमाही में एचटी मीडिया का मुनाफा 25 फीसदी घटा

वित्त वर्ष 2013 की चौथी तिमाही में एचटी मीडिया का मुनाफा 25.2 फीसदी घटकर 40.1 करोड़ रुपये रहा। पिछली तिमाही में कंपनी का मुनाफा 53.6 करोड़ रुपये रहा था। वित्त वर्ष 2013 की चौथी तिमाही में एचटी मीडिया की बिक्री 9 फीसदी घटकर 491.5 करोड़ रुपये रही। पिछली तिमाही में कंपनी की बिक्री 540.2 करोड़ रुपये रही थी।

एचटी मीडिया के बोर्ड ने एचटी बुरडा की 51 फीसदी हिस्सेदारी 60 करोड़ रुपये में बेचने को मंजूरी दी है। साथ ही, बोर्ड ने 25 करोड़ रुपये तक के शेयरों के बायबैक को मंजूरी दी है। बायबैक का भाव 110 रुपये प्रति शेयर तक होगा। एचटी मीडिया के मुताबिक हिंदुस्तान वेंचर्स में ऑफर फॉर सेल के जरिए हिस्सेदारी बेची जाएगी। न्यूनतम 25 फीसदी पब्लिक शेयरहोल्डिंग के नियमों को हासिल करने के लिए हिस्सेदारी बेचने की योजना है। (मनी कंट्रोल)

मोदी व कांग्रेस के बीच और तेज होगी सियासी जंग

कर्नाटक चुनाव के बाद कांग्रेस नेतृत्व के हौसले एकदम बढ़ गए हैं। इसी के चलते कांग्रेस नेतृत्व अब बचाव की जगह आक्रामक मुद्रा में आता जा रहा है। खासतौर पर भाजपा के चर्चित नेता नरेंद्र मोदी को लेकर कांग्रेस ने जमकर निशाने साधने के संकेत दे दिए हैं। मोदी भी लगातार मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं चूकते। पलटवार करते हुए केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कह दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर मोदी के मामले में बड़ा खुलासा कर देंगे।

संकेत यही हैं कि यह खुलासा गुजरात दंगों के मामले से जुड़ा होगा। सिब्बल ने कहा है कि दंगों के मामले में मोदी को बचाने के लिए गुजरात सरकार के एक आलाधिकारी ने दस्तावेजों में काफी हेरफेर कराए थे। यहां तक कि राज्य के मुख्य सचिव ने खुलकर मोदी को बचाने के लिए तमाम खेल किया था। जल्द ही पुख्ता प्रमाणों के साथ वे मोदी की पोल खोल देंगे। कोशिश की जा रही है कि एक बार फिर कांग्रेस बनाम भाजपा का राजनीतिक फोकस मोदी के मुद्दे पर आकर टिक जाए।

कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में भाजपा की करारी हार से मोदी की राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। उल्लेखनीय है कि इस चुनाव के प्रचार अभियान में भाजपा की तरफ से ‘सुपरस्टार’ की हैसियत से नरेंद्र मोदी को भेजा गया था। बंगलुरु सहित कई चुनाव क्षेत्रों में मोदी ने कांग्रेस के खिलाफ जमकर हुंकार लगाई थी। राष्ट्रीय मुद्दों का जिक्र करते हुए उन्होंने कर्नाटक की जनता से कांग्रेस को सबक सिखाने की अपील की थी। मोदी सहित भाजपा के तमाम बड़े नेताओं की चुनावी हुंकार के बाद भी यहां पार्टी बुरी तरह से पस्त हुई है। जबकि, 224 में से कांग्रेस 121 सीटें पाकर पूरा बहुमत हासिल करने में सफल रही। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या अपने गृहराज्य गुजरात के बाहर मोदी की राजनीतिक अपील कोई मायने रखती है या नहीं? यह बात खास तौर पर इसलिए कही जा रही है क्योंकि, पिछले साल हिमाचल और उत्तराखंड के चुनावों में भी भाजपा ने करारी मात खाई थी। इन दोनों प्रदेशों में भाजपा को चुनाव जिताने के लिए मोदी ने दौरे किए थे। लेकिन, दोनों राज्यों में भाजपा के हाथ से सत्ता कांग्रेस के पाले में गई। यही स्थिति कर्नाटक में भी दोहराई गई।

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह कहते हैं कि अब तो भाजपा वालों को यह समझ में आ जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी की गुजरात से बाहर कोई पहचान नहीं है। गुजरात से बाहर उनकी छवि महज दंगा-फसाद कराने वाले नेता की है। लेकिन, इस पार्टी के लोग मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर जुटे हैं। कांग्रेस महासचिव का आरोप है कि मोदी तमाम अर्ध सत्यों के जरिए कई मुद्दों पर राजनीतिक झांसा देने की राजनीति ही करते आए हैं। लेकिन, गुजरात के बाहर उनकी यह नीति कामयाब नहीं हो सकती।

पिछले कई महीनों से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर संघ परिवार में मोदी का नाम जमकर उछाला जा रहा है। भाजपा की एक बड़ी लॉबी भी इस मुद्दे पर उनके पक्ष में मुहिम चलाने लगी है। इस मामले को लेकर एनडीए का बड़ा घटक जदयू नाराज भी है। इस दल के वरिष्ठ नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साफ-साफ कह चुके हैं कि यदि भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रूप में नरेंद्र मोदी का नाम प्रोजेक्ट किया, तो उनकी पार्टी एनडीए गठबंधन से नाता तोड़ लेगी। चूंकि, जदयू सेक्यूलर राजनीति की बात करके अपने मुस्लिम वोट  बैंक को भी अपने पाले में रखना चाहती है। ऐसे में, मोदी को लेकर उसने अपना दो टूक स्टैंड तय कर लिया है। जदयू की इस टेक के चलते भाजपा के अंदर मोदी के मुद्दे पर कोई फैसला नहीं हो पा रहा है।

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह यह बात कई बार दोहरा चुके हैं कि पीएम उम्मीदवारी का फैसला संसदीय बोर्ड करेगा। इसलिए भाजपा के अंदर इस मुद्दे पर ज्यादा विवाद नहीं खड़ा किया जाना चाहिए। राजनाथ सिंह की इस नसीहत के बावजूद पार्टी के कुछ बड़े नेता मोदी की पैरवी में कुछ न कुछ बोलकर विवाद बढ़ा देते हैं। पार्टी ने भले इस मुद्दे पर कोई फैसला नहीं किया हो, लेकिन, नरेंद्र मोदी खुद अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं छिपा नहीं पा रहे हैं। पहले वे गुजरात में हुए अपने कार्यकाल की विकास की दुहाई देते घूमते रहते थे। लेकिन, अब वे   बात-बात पर केंद्र सरकार और कांग्रेस को कोसते नजर आते हैं। उनका राजनीतिक एजेंडा गुजरात के बजाए पूरे देश का हो गया है। वे कह भी चुके हैं कि पिछले 12 वर्षों में सत्ता के दौरान गुजरात की धरती का कर्ज तो उन्होंने उतार दिया है, अब समय आ गया है कि देश की सेवा करके उसका कर्ज भी उतार दूं। उनके इस बहुचर्चित जुमले का आशय यही समझा गया कि मोदी खुद को प्रधानमंत्री पद का भावी उम्मीदवार मानकर चल रहे हैं।
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह सहित पार्टी के और कई बड़े नेता लगातार यही कह रहे हैं कि मोदी सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता हैं। पार्टी अध्यक्ष यह भी कह चुके हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में निश्चित तौर पर उनकी बड़ी भूमिका रहेगी। इस तरह की टिप्पणियां करके वे मोदी के पक्ष में लगातार संकेत दे रहे हैं। इससे मोदी और उनकी टोली जमकर उत्साहित भी हैं। पार्टी के रणनीतिकारों का आकलन यही है कि मोदी को प्रोजेक्ट करने से भाजपा बड़े पैमाने पर वोटों का सामाजिक ध्रुवीकरण करने में सफल हो सकती है। चूंकि मोदी, कांग्रेस और केंद्र सरकार पर बहुत आक्रामक ढंग से प्रहार करते हैं, ऐसे में कांग्रेस के विरोध में सियासी ध्रवीकरण होने की ज्यादा उम्मीद भी की जा सकती है।

‘गुजरात दिवस’ के अवसर पर मोदी ने अमेरिका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सोमवार को संबोधित किया। अमेरिका के 20 शहरों में एक साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सभाओं को मोदी ने संबोधित किया। करीब 1 घंटे के भाषण में मोदी ने कई मुद्दों पर मनमोहन सरकार को जमकर लताड़ा। खासतौर पर विदेश नीति पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि पड़ोसी मुल्क (पाकिस्तान) के सैनिक हमारे जवानों के सिर काट कर ले जाते हैं। इस बर्बर कारनामे के बाद भी हमारी सरकार वहां के प्रधानमंत्री की निजी यात्रा के समय भी पलक-पांवड़े बिछाने पर उतारू रहती है। विदेश मंत्री, उन्हें बिरयानी का भोज देने पहुंच जाते हैं। जाहिर है इस कार्यशैली से फौज का कहीं न कहीं मनोबल जरूर कमजोर होता होगा। मोदी ने भारत-चीन के बीच हुए ताजा विवाद का भी जिक्र किया। कह दिया कि 20 दिनों बाद चीन सेना के घुसपैठिए किसी तरह वापस तो लौट गए हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि हमारी सेना अपनी ही सीमा में कई किलोमीटर पीछे क्यों लौट आई? आखिर यह कौन-सी रणनीति है? मोदी ने इस मुद्दे पर सरकार की रणनीति पर तीखे कटाक्ष कर डाले।

गुजरात के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य के विकास के आंकड़े बताते हुए खूब शाबासी दे डाली। यहां तक कहा कि गुजरात के विकास मॉडल को इतिहास हमेशा याद रखेगा। क्योंकि, केंद्र के सौतेले व्यवहार के बावजूद राज्य में विकास के नए रिकॉर्ड बने हैं। उन्होंने कहा कि इस समय केंद्र की लचर और कमजोर सरकार की वजह से देश का आत्मविश्वास पूरी तरह से हिल गया है। यह सबसे खतरनाक स्थिति है। इसलिए जरूरी हो गया है कि यह कमजोर और लाचार सरकार जल्द से जल्द विदा हो जाए। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल कह चुके हैं कि मोदी, अपने राज्य के विकास के तमाम दावे गलत ढंग से पेश करते हैं। वे कहते हैं कि राज्य में कृषि का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है। जबकि, सच्चाई यह है कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों के मुकाबले गुजरात का कृषि उत्पादन बहुत कम है। यहां का तमाम विकास कांग्रेस के दौर में ही हुआ था। ऐसे में, मोदी विकास को लेकर लफ्फाजी ज्यादा करते हैं।

सिब्बल, मोदी के विकास को ‘बिग-0’ करार करते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेसी नेता सुबोधकांत सहाय ने कह दिया है कि नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की तुलना नहीं की जानी चाहिए। राहुल गांधी की राजनीतिक अपील काफी ज्यादा है। जबकि, गुजरात के बाहर, मोदी जहां-जहां पैर रखते हैं, वहां भाजपा का चुनावी बाजा बज जाता है। कपिल सिब्बल ने कल ही कानून मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार औपचारिक रूप से संभाल लिया है। प्रभार संभालते ही उन्होंने मोदी की पोल खोलने का दावा कर दिया। यहां राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि कांग्रेस नियोजित रणनीति के तहत राजनीतिक फोकस मोदी बनाम कांग्रेस कराने की कोशिश कर रही है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

मुस्‍तफा पटेल ने हड़प रखा है दशरथ भाई गोहिल का होटल

यशवंत जी, कुछ दिन पहले आपके भड़ास पर खबर आई थी कि "गुजरात पुलिस मुस्तफा पटेल की मदद नहीं कर रही है" और मोदी के राज में मुसलमानों को आज़ादी से बिजनेस नहीं करने दिया जा रहा है और उन्हें अपना धंधा बंद करने की धमकी मिल रही है। और मीडिया ने अहमदाबाद भुज हाइवे पर विरमगाम के पास स्थित एक ज्योति होटल और उसे चलाने वाले मुस्तफा पटेल के बारे में बताया था कि इनको धंधा नही करने दिया जा रहा है।

मित्रों, भारतीय मीडिया के दोगलापन और कुत्तापन का इससे बड़ा उदाहरण दूसरा कही नहीं देखने को मिलेगा। मीडिया ने पूरी सच्चाई नही बताई … असल में ये ज्योति होटल इस मुस्तफा पटेल का है ही नहीं.. इस होटल के मूल मालिक का नाम राजेन्द्र शांतिलाल शाह है.. जिसने कुछ दिनों तक ये होटल चलाने के बाद इसे मुस्तफा पटेल को भाड़े पर दे दिया था… फिर कुछ सालों के बाद राजेन्द्र शांतिलाल शाह ने इस होटल को बगल में ही पेट्रोल पम्प के मालिक दशरथ भाई गोहिल को बेच दिया. मुस्तफा पटेल ने दशरथ भाई गोहिल से निवेदन किया कि वो जो भाड़ा लेना चाहते हैं तय कर लें लेकिन होटल मुझे ही चलाने दें… लेकिन दशरथ भाई गोहिल होटल इसलिए खरीदे थे ताकि बगल में सीएनजी पम्प बनाया जा सके..इसलिए उन्होंने मना कर दिया। फिर कुछ महीनों तक ये चतुर और शातिर मुस्तफा पटेल ने आज कल आज कल का बहाना बनाया फिर अपने असली रंग पर आ गया।

इसने मीडिया में ये कहना शुरू कर दिया कि चूँकि वो मुसलमान है इसलिए उसे परेशान किया जा रहा है.. उधर दशरथ भाई ने जब देखा कि ये मुस्तफा अब नीचता पर उतर गया तो वो कोर्ट गये और कोर्ट से होटल को तत्काल प्रभाव से बंद करवाने का आदेश ले आये.. फिर कोर्ट के आदेश पर अमल करते हुए पुलिस ने होटल को बंद करवा दिया। फिर ये मुस्तफा पटेल इस मुद्दे को राजकीय रंग देने के लिए घोर मोदी विरोधी मुकुल सिन्हा और तीस्ता जावेद तथा शबनम हाशमी के साथ इसे साम्प्रदायिक रंग देने लगा।

सोचिये मित्रों, जिस मुकुल सिन्हा और तीस्ता जावेद की वजह से आज हर रोज कोर्ट नये नये आदेश दे रही है तो फिर ये दोनों वकील कोर्ट से मुस्तफा पटेल के फेवर में कोई आदेश क्यों नहीं दिलवा पा रहे हैं? क्योंकि इस चतुर और शातिर मुस्तफा पटेल की नीयत में ही खोट है और ये दूसरे की बेशकीमती जमीन पर से गैरक़ानूनी कब्जा खाली ही नहीं करना चाहता। आज जो ये धूर्त मुस्तफा पटेल मीडिया के लोगों को पैसा देकर इसे मोदी बनाम मुसलमान का मुद्दा बना रहा है। मैं इस मुस्तफा से पूछना चाहता हूँ कि क्या इस्लाम दूसरे की सम्पत्ति पर गैरक़ानूनी तरीके से कब्जा करने की इजाजत देता है?

असल में ये मुस्तफा पटेल सिर्फ उसी रटे रटाये ढोंग का पालन कर रहा जिसे अमूमन भारत के हर मुसलमान करते हैं.. जब तक अजहरुद्दीन भारतीय क्रिकेट टीम का कैप्टन रहा तब तक कोई बात नहीं.. लेकिन जैसे ही मैच फिक्सिंग में फंसा तो कहने लगा कि चूँकि वो मुसलमान है इसलिए उसे हैरान परेशान किया जाता है.. जैसे संगीतकार नदीम को भारत के लोगों ने सर आँखों पर बिठाया लेकिन जब उसका नाम गुलशन कुमार हत्या कांड में आया तो वो ब्रिटेन भाग गया और ब्रिटेन की अदालत में कहता है कि चूँकि वो मुस्लिम है और भारत में मुस्लिमों के साथ भेदभाव किया जाता है, इसलिए उसे भारत के हवाले नहीं किया जाये ….ये इनका एक हथकंडा है।

जितेंद्र प्रताप सिंह

jp20024@gmail.com


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नईदुनिया से सागर एवं प्रसन्‍ना का इस्‍तीफा, संजय कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस पहुंचे

नईदुनिया, इंदौर में असंतोष का दौर जारी है। हाल ही में इंदौर स्थित राष्ट्रीय संस्करण से दो लोगों ने इस्तीफा दे दिया है। दिल्ली से आए सागर पाटील और प्रसन्ना झा ने इस्तीफा दिया है। ये लोग अपनी नई पारी कहां से शुरू करने वाले हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। नईदुनिया, इंदौर में स्थित राष्ट्रीय संस्करण के प्रभारी विभूति शर्मा के भी इस्तीफा देने की खबरें हैं। विभूति नईदुनिया जबलपुर के संपादक भी रह चुके हैं। हालांकि विभूति के इस्‍तीफे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

राजस्थान पत्रिका के अखबार पत्रिका पिछले छह महीनों से लोगों की कमी से जूझ रहा है। वहां के विकेट गिरकर नईदुनिया और भास्कर में पहुंच रहे हैं। कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि अमित मंडलोई पत्रिका से इस्तीफा दे रहे हैं। लेकिन अब पत्रिका के सूत्रों से खबर मिल रही है कि ​अमित ने इंक्रीमेंट मिलने तक संस्थान न छोडने का मन बनाया है। पता चला है कि पत्रिका ने उनके पैसे बढ़ाकर उनको रोक लिया है। उधर नईदुनिया, इंदौर में अब भी अमित के आने का इंतजार किया जा रहा है।

द सी एक्‍सप्रेस, हाथरस से खबर है कि संजय दीक्षित ने इस्‍तीफा दे दिया है। वे अपनी नई पारी हाथरस में ही कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस के साथ शुरू कर रहे हैं। उन्‍हें अखबार में सीनियर सब एडिटर बनाया गया है। संजय दीक्षित इसके पहले हिंदुस्‍तान, अमर उजाला तथा कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. कल्‍पतरु के साथ यह उनकी दूसरी पारी है।

पूरा हुआ आशियाने सपना : उदयपुर में 102 पत्रकारों को मिला भूखंड

राजस्‍थान सरकार राज्‍य के पत्रकारों पर मेहरबान है। पत्रकारों को रियायत दर पर भूखंड आवंटन करने की योजना के तहत उदयपुर शहर के एक सौ दो पत्रकारों के आशियाने के सपने को सच करते हुए आज नगर विकास प्रन्यास द्वारा दक्षिण विस्तार योजना की लॉटरी निकाली गई। प्रन्यास कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में अध्यक्ष रूप कुमार खुराना, भूमि अवाप्ति अधिकारी जगमोहन सिंह, विशेषाधिकारी प्रदीप सिंह संगावत द्वारा लॉटरी निकाली गईl

जिन पत्रकारों का नाम लॉटरी में निकला वे खुशी से झूम उठे। लेक सिटी प्रेस क्लब की ओर से अध्यक्ष और अधिकारियों का आभार व्यक्त किया गया। लॉटरी निकाले जाने के दौरान शहर के सभी पत्रकारगण मौजूद थेl

तहसीन मुनव्वर के ‘देख-तमाशा’ में अबकी यशवंत और भड़ासी रंगदारी

इंदौर से प्रकाशित मैग्जीन 'लोकस्वामी' के नए अंक में तहसीन मुनव्वर के कालम 'देख तमाशा' में अबकी भड़ास और इसके संस्थापक यशवंत सिंह के बारे में लिखा गया है. इस कालम में मीडिया से जुड़े लोगों के बारे में बातचीत करते हैं तहसीन मुनव्वर. उनके नजरिये के हिसाब से यशवंत और भड़ास के अच्छे – बुरे पहलू क्या हैं, खुद पढ़कर जानिए…

नीचे है मैग्जीन में प्रकाशित कालम की कटिंग….

पढ़ने में दिक्कत हो तो कालम के उपर ही क्लिक कर दें…


भड़ास ने यह भी बताया है कि उसकी लोकप्रियता किसी भी अखबार से अधिक है : शंभूनाथ शुक्ला

दोस्‍तों, दिवंगत साथी गंगेश के परिवार चाहिए मदद

दोस्तों, जैसा कि आपको मालूम है वरिष्ठ पत्रकार गंगेश श्रीवास्तव का सड़क हादसे में शनिवार को निधन हो गया। पटना हिन्दुस्तान में मुख्य उप संपादक रहे गंगेश के परिवार में अब सिर्फ बूढ़ी मां, पत्नी आशा देवी, तीन बच्चियां शिवांगी (12), शिवानी (10) और सुहानी (10) ही हैं। हादसे में घायल पत्नी और बच्ची की हालत अब भी ठीक नहीं है। डॉक्टरों के अनुसार पत्नी को हाथ में राड डालना होगा और सिर में लगी भीतरी चोट का इलाज करना होगा।

बच्ची के सिर में भी भीतरी चोट लगी है। आज पता चला कि बच्ची के पीठ में भी दिक्कत है। सिटी स्कैन कराया गया है। रिपोर्ट शाम तक मिल जाएगी। देवरिया के सदर अस्पताल में अब दोनों का आपरेशन और इलाज संभव नहीं है। किसी निजी अस्पताल या किसी बड़े सरकारी अस्पताल में रेफर करने की भी तैयारी चल रही है। हो सकता है लखनऊ, गोरखपुर या वाराणसी ले जाना पड़े।

गंगेश के दूर के रिश्तेदार और हिन्दुस्तान के अलावा अन्य अखबारों के साथी पत्रकार अस्पताल में पूरी मदद में लगे हुए हैं। हिन्दुस्तान पटना ने अपनी तरफ से गंगेश के एक साथी को कुछ रुपये लेकर भेजा भी है। अगर पत्नी और बच्ची को रेफर किया जाता है तो बहुत ज्यादा रुपयों की जरूरत होगी। अगर आप गंगेश के परिवार की मदद करना चाहते हैं तो उनकी पत्नी आशा देवी के पंजाब नेशनल बैंक स्थित खाते में मदद भेज सकते हैं। डिटेल्स नीचे हैं।

Asha srivastava

a/c : 1973000101005555

Punjab National Bank, Pthardeva

Ifc code : PUNBO197300

एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट चार)

भांड सीईओ का चांपना न्यूज के उत्तराखण्ड चैनल में कुछ ज्यादा ही इंट्रेस्ट रहता है। उत्तराखण्ड के एक नेता सशंकितजी से भांड का अच्छा-खासा रिश्ता है। कहा तो यह भी जाता है कि सशंकितजी ने अपने काले हाथों की गाढी़ कमाई का एक बड़ा हिस्सा चांपना न्यूज में इनवेस्ट कर रखा है। चांपना न्यूज में सशंकितजी की हर खबर चलती है। सशंकितजी को सिर दर्द हुआ तो चांपना में ब्रेकिंग, सशंकितजी को लघुशंका बार-बार आ रही है तो चांपना न्यूज में ब्रेकिंग, सशंकितजी खुश दिख रहे हैं तो ब्रेकिंग और अगर सशंकितजी को खुलकर दस्त आ गए तो सशंकितजी का टिक-टैक तो चलेगा ही है। सशंकितजी की ऐसी-वैसी खबरों से देहरादून के ब्यूरो और उत्तराखण्ड डेस्क की ऐसी-तैसी लगी रहती है।

भांड सीईओ भले ही दुनिया के किसी कौने में रहे लेकिन उत्तराखण्ड से कौन सी खबर आई कौन सी खबर नहीं आई, कितनी चली, किस फॉर्मेट में, फोनो हुआ या नहीं हुआ, हुआ तो फोनो किसने दिया, फोनो में क्या बोला, सशंकित के बारे में तो कुछ ऐसा-वैसा तो नहीं बोला-ये सब तमाम और इनके अलावा भी ढेर सारी जानकारी भांड, उत्तराखण्ड डेस्क पर मौजूद अपने ‘खास सूत्र’ से लगातार हासिल करता रहता है। उत्तराखण्ड डेस्क पर मौजूद इसी खास सूत्र की बदौलत भांड यूपी-उत्तराखण्ड चैनल के हैड गज गोबर सिंह की पुंगी भी अक्सर बजाता रहता है। लानचूसी और भड़ैती में भांड और गज गोबर सिंह सहोदर जैसे हैं। ताकतवर के सामने पूंछ हिलाने और दांत निपोरने में गज गोबर सिंह, भांड से थोड़ा आगे हैं। सो भांड के आगे गज गोबर सिहं की हालत पूछ हिलाने और दांत निपोरने की ही रहती है, और जब से लौंडा मालिक मयंक ने गज गोबर सिंह को भरी मीटिंग में सरे आम कई श्रेष्ठ श्लोकों के साथ ‘दलाल’ की ‘पदवी’ से सुशोभित किया है, तब से तो गज गोबर सिंह के पास भांड के आगे पूछ हिलाने और दांत निपोरने के अलावा दूसरा चारा बचा भी नहीं है।

बेचारा गज गोबर सिंह, ओहदा चैनल हैड का और जिम्मेदारी लण्ठई की। भांड हो या लौंडा मालिक लखनऊ आय-जाएंगे तो उनके आने-जाने, खाने-पीने और रहने-सहने की सभी ‘सुख सुविधाओं’ की जिम्मेदारी बेचारा गज गोबर सिंह ही उठाएगा। इसके बावजूद भांड झण्डेवालान में लौंडा मालिक मयंक के साथ जब गज गोबर सिंह का सामुहिक (मानसिक) बलात्कार करता है तो गज गोबर सिंह दर्द से रोता-चिल्लाता नहीं है बस खींसें निपोर के रह जाता है। भांड और लौंडा मालिक समझते हैं कि गज गोबर सिंह को बलात्कार से मजा आ रहा है, दोनों अगली बार गज गोबर सिंह की और ज्यादा जोर से रगड़ते हैं।

लखनऊ में गज गोबर सिंह ने सांवलीसलोनी को को रिपोर्टर अपॉइंट करवाया। ज्वाइनिंग से पहले मीडिया की मजबूती और मजबूरियों की जानकारी बारीकी से ली-दी गई। मीडिया में समझौते, सूझ-बूझ और चाल-चलन की शिक्षा-दीक्षा भी हुई। सांवलीसलोनी ने भी जोरदार तरीके से काम शुरू किया। गज गोबर सिंह भी उसकी खूब तारीफ करता। इस बीच लौंडा मालिक मयंक और भांड सीईओ का कई बार लखनऊ आना जाना हुआ। उम्मीद के खिलाफ तीखे सांवलीसलोनी ने लौंडा मालिक और भांड को कभी घास नहीं डाली। सांवलीसलनी की बीट छीन ली गई। मार्केटिंग की स्टोरी करने का हुक्म सुना दिया गया। लौंडा मालिक मयंक चाहता था कि सांवलीसलोनी की ड्यूटी कुम्भ के मीडिया सेंटर में लगा दी जाए। जहां वो भांड सीईओ के सानिद्धय में मीडिया की वो सभी बारीकियां ठीक से सीख ले जिन्हें गज गोबर सिंह नहीं सिखा पाया था।

कुम्भ के मीडिया सेंटर का सरकारी पैसा जल्द से जल्द से वसूलने के लिए भी गज गोबर सिंह और भांड ने सांवलीसलोनी से कहा कि वित्तल जी के सम्पर्क में रहो और मैटर को ठीक से परस्यु करो। जो भी हो, जैसे भी पेमेंट तुरंत निकलवानी है। किसी ने मीडिया सेंटर के खिलाफ रिट डाल दी तो पैसा फंस जाएगा। सांवलीसलोनी के जितने तीखे नैन नख्श थे उससे तेज उसकी चाल। सांवलीसलोनी ने चांपना में छुट्टी की एप्लीकेशन दी और दूसरे चैनल में इंटरव्यू। इससे पहले कि गज गोबर सिंह, भांड या लौंडा मालिक कुछ कर पाते, सांवलीसलोनी फुर्र हो गई। सांवलीसलोनी तो फुर्र हो गई लेकिन गाज गज गोबर सिंह पर गिरी। अब बेचारे गज गोबर सिंह को गाहे-बगाहे भांड और लौंडा मालिक खरी-खरी सुनाते हैं, और बेचारा गज गोबर सिंह बस खीसें निपोरता है और अपने काम पर लग जाता है।

बात तो हम सशंकितजी की कर रहे थे की लेकिन बीच में इस किस्से का जिक्र भी जरूरी था। तो सशंकितजी की भूमिका चांपना न्यूज चैनल में ठीक वैसी ही है जैसे इंदौर के वर्गीय जी की थी। वर्गीय जी के तो बरखुरदार चांपना में बतौर ओहदेदार बैठा करते थे, लेकिन सशंकितजी चांपना न्यूज के साइलेंट भामा शाह हैं। वर्गीय जी का इंट्रेस्ट केवल मध्यप्रदेश में था और सशंकितजी का उत्तराखण्ड में है। वर्गीय जी के लगभग दो करोड़ चांपना ने चट कर लिए। बेचारे वर्गीय जी कुछ नहीं कर पाए। अब सशंकितजी कितने करोड़ से हाथ धो बैठेंगे, यह लोक सभा चुनाव के बाद ही पता चलेगा। फिल्हाल सशंकितजी के इशारे पर ऐसी स्टोरीज ही टेलीकास्ट होती हैं जो सिर्फ और सिर्फ सशंकितजी के हित साधती हैं। कई स्टिंग भी सशंकितजी के इशारे पर हुए हैं। ये बात अलग है कि वो टेलीकास्ट नहीं हुए या कुछ सैटिंग-गैटिंग हो गई। कुछ ऐसे भी स्टिंग हैं वो तब टेलिकास्ट होंगे जब 'उपयुक्त' समय आ जाएगा।

सशंकितजी के इंट्रेस्ट्स और हॉवीज़, भांड के इंट्रेस्ट्स और हॉवीज़ से काफी मेल खाते हैं। सशंकितजी और भांड के बीच का एक सोर्स भी 'कॉमन' है। सशंकितजी ने अक्टूबर 2012 में भांड को एक 'दुधारू लीड' दी। ये 'दुधारू लीड' देहरादून के एक बिल्डर के विषय में है, इसलिए कि इस बिल्डर को बार-बार दुहने के निर्देश जारी होते रहते हैं। भांड ने तुरंत यूपी-उत्तराखण्ड चैनल को आदेश दिए कि किसी भी सूरत में इस 'दुधारू लीड' को 'दुधारू डील' में परिवर्तित किया जाए। देहरादून ब्यूरो को खास दिशा-निर्देश दिए गए। बिल्डर का स्टिंग करवाया गया। साइट पर बाइट्स और विजुवल्स भी लिए गए और साथ में तीन किश्तों में कुछ लाख रुपये भी। स्टिंग भांड के पास और पैसे एकाउंट में। जब जरूरत होती है तब भांड इस बिल्डर को दुह लेता है। भांड के इस दुधारू खेल की जानकारी लौंडा मालिक और चांपना न्यूज के बड़े मालिक को भी है।

भांड़ ने कुम्भ में लगे मीडिया सेंटर में भी खूब गुल खिलाए हैं। दो लाख रुपये सिर्फ अटैच लेट-बाथ बनवाने में खर्च कर दिए। परमातम के सीईओ की सीक्रेसी भी कोई चीज़ होती है ना। कॉमन लेट-बाथ में वनडोम विसर्जन उचित नहीं था। सीईओ के वनडोम विसर्जन के लिए सेपरेट लेट-बाथ जरूरी था। वनडोम विसर्जन के लिए भले ही दो लाख खर्च हुए लेकिन उसकी भरपाई वीडिया सेंटर की सीलिंग से कर दी गई। सेंटर की टीन के नीचे सीलिंग नहीं, सीलिंग जैसा सीलिंग के रंग का मजबूत कपड़ा तनवा दिया गया। सीलिंग की जगह ये कपड़ा डेढ़ महीने तक पूरी मजबूती से तना रहा। परमातम की इज्जत पर आंच भी न आने दी। आखिरी दिनों में वो तो बारिश ही इतनी जोर से आई कि जब टीन नहीं झेल पाई तो बेचारा कपड़ा क्या करता। सो डिब्बे नुमा कम्प्यूटर कागज़ की किश्ती की तरह तैरने लगे। सब दिखावटी थे, इसलिए कुछ खास नुकसान भी नहीं हुआ। कपड़ा फिर भी टस से मस न हुआ। सीलिंग की जगह, सीलिंग की तरह तना ही रहा।

भांड की भड़ैती के कुछ राज़ भोपाल में भी हैं। भोपाल के झकास तिवारी और भांड के बीच दोस्ती सबब एक गोल्डन चिप है। कहा जाता है कि इस ‘गोल्डन चिप’ में पापा मालिक और लौंडा मालिक की अलग-अलग ऐशगाहों में अलग-अलग नीली-पीली तस्बीरें भी हैं। इन नीली-पीली तस्बीर