राजा भैया के खिलाफ एक पक्षीय मीडिया ट्रायल पर सूचना मंत्रालय ने दिए कार्रवाई के आदेश

डिप्टी एसपी हत्याकांड में पूर्व मंत्री राजा भैया के सम्बन्ध में विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित समाचारों के बारे में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वरा दी गयी शिकायत पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार ने आवश्यक कार्रवाई किये जाने के निर्देश दिये हैं. मंत्रालय द्वारा न्यूज़ चैनलों से सम्बंधित न्यूज़ ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन (एनबीए) की सेक्रेटरी जनरल ऐनी जोसेफ को भेजे अपने पत्र में कहा गया है कि इस सम्बन्ध में आवश्यक कार्रवाई करते हुए प्रार्थिनी और मंत्रालय को अवगत कराया जाए.

डॉ. ठाकुर ने अपने पत्र में कहा था कि डिप्टी एसपी हत्याकांड में विभिन्न न्यूज़ चैनलों ने राजा भैया के सम्बन्ध में जो खबरें प्रस्तुत की हैं वे निष्पक्ष समाचार नहीं दिख कर एकपक्षीय मीडिया ट्रायल की तरह दिखी. उन्होंने उस सम्बन्ध में 05 मार्च 2013 को प्रातः नौ बजे से दस बजे के बीच विभिन्न न्यूज़ चैनल पर आ रहे ब्रेकिंग न्यूज़ के नमूने प्रस्तुत किये थे, जैसे “राजा भईया की गिरफ़्तारी कब” , “आरोपी राजा भइया अब तक गिरफ्तार नहीं” , “क्या राजा भइया की होगी गिरफ़्तारी?” “कौन बचा रहा है राजा भैया को?”.

डॉ. ठाकुर ने कहा था कि इससे साफ़ दिखता है कि ये समाचार नहीं हो कर पूर्वानुमान हैं और एनबीए द्वारा जारी कोड ऑफ एथिक्स एंड ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड में प्रतिपादित निष्पक्ष और तटस्थ पत्रकारिता के मापदंडों के प्रतिकूल हैं. अतः उन्होंने इस सम्बन्ध में भूल सुधार नोटिस जारी करने और भविष्य में आपराधिक मामलों में बिना पर्याप्त अभिलेखीय, मौखिक तथा अन्य साक्ष्य के कोई अंतिम निष्कर्ष निकालने से बचने के निर्देश देने का निवेदन किया था.

नीचे सूचना और प्रसारण  मंत्रालय, भारत सरकार के अधिकारियों सुश्री सुप्रिया साहू और श्री के एस रेजिमोन को ईमेल jsb.inb@sb.nic.in, ks.rejimon@nic.in पर शिकायत प्रेषित…



प्रिय महोदय,

 मैं डॉ नूतन ठाकुर लखनऊ स्थित एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ जो विशेषकर प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की दिशा में कार्य करती हूँ. मैंने अपने पत्र संख्या- NT/ZUH/NBA/01 दिनांक-05/03/2013 के माध्यम से ईमेल authority@nbanewdelhi.com पर एक युवा और उत्साही डिप्टी एसपी श्री जिया उल हक की दिनांक 02/03/2013 (शनिवार) को कुंडा क्षेत्र, जनपद प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश में हुई हत्या हो और उसके बाद शहीद डिप्टी एसपी की पत्नी सुश्री परवीन आज़ाद द्वारा धारा 302  आईपीसी सहित विभिन्न धाराओं में दर्ज एफआईआर, जिसमें अन्य लोगों के अलावा उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री श्री राजा भैया भी 120बी आईपीसी में षडयंत्र करने के दोषी बताए गए थे, के सम्बन्ध में दिनांक 04/03/2013 प्रातः से रात्रि लगभग 10 बजे तथा पुनः दिनांक 05/03/2013 को विभिन्न न्यूज़ चैनल एनडीटीवी (हिंदी), एनडीटीवी 24×7 (अंग्रेजी), आइबीएन-7, सीएनएन-आइबीएन, आज तक, हेडलाइंस टुडे, ईटीवी उत्तर प्रदेश, समाचार प्लस, इंडिया न्यूज़, इंडिया टीवी, एबीपी न्यूज़, न्यूज़ 24 आदि पर प्रस्तुत खबरों के विषय में सीधे नेशनल ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन को शिकायत भेजा था.

मैंने कहा था कि जिस प्रकार से उपरोक्त वर्णित सभी न्यूज़ चैनलों ने इस सामाचार में श्री राजा भैया के सम्बन्ध में खबरें प्रस्तुत की हैं वे निष्पक्ष समाचार नहीं दिख कर एकपक्षीय समाचार जान पड़ते हैं. यह मीडिया ट्रायल का महत्वपूर्ण उदाहरण बन कर सामने आता है. इन न्यूज़ चैनलों को देख कर ऐसा लगता है मानो इनकी कोई नैतिक, विधिक और सामाजिक जिम्मेदारी हो कि श्री राजा भैया तत्काल दण्डित कर दिये जाएँ.  

मैंने दिनांक 05/03/2013 को प्रातः नौ बजे से दस बजे के बीच विभिन्न न्यूज़ चैनल पर आ रहे न्यूज़ हाईलाईट/ब्रेकिंग न्यूज़ के नमूने प्रस्तुत किये थे-
आईबीएन 7- “राजा भईया की गिरफ़्तारी कब , आरोपी राजा भईया अब तक गिरफ्तार नहीं , आरोपी राजा भईया से अब तक पूछताछ नहीं”

आज तक- “राजा भईया की होगी गिरफ़्तारी?”

तेज – क्या राजा भईया की होगी गिरफ़्तारी?”. इसके अतिरिक्त जुर्म का भईया, एक राजा का गुनाह, गुंडे को डर किससे लगता है जैसे हाईलाईट भी लगातार दिखाए गए.

इडिया न्यूज़- “राजा की राजनीति का रक्त चरित्र” नामक एक समाचार दिखाया गया जो पिछली तारीख को भी दिखाया गया था  

इंडिया न्यूज़- “राजा भैया आज गिरफ्तार होंगे?” “परसों एफआईआर, कल इस्तीफा, आज गिरफ्तार” “कौन बचा रहा है राजा भैया को?”

CNN-IBN- “Akhilesh Promises Slain DSP’s Kin Of Arrest “, Will Akhilesh Keep Promise” “Will Raja Bhaiya Be Arrested?”

Headlines Today-“Will Raja Bhaiya be arrested?”
 न्यूज़ 24- “सलाखों के पीछे जायेंगे राजा भईया”

NDTV 24×7- “Will Raja Bhaiya be arrested?”

उपरोक्त सभी न्यूज़ हाईलाईट के आधार पर मैंने कहा था कि इससे साफ़ दिखता है कि ये समाचार नहीं हो कर पूर्वानुमान हैं और अपने मंतव्य हैं. इन खबरों से ऐसा माहौल बनता है कि चूँकि श्री राजा भैया समाज के लिए हर प्रकार से अवांछनीय हैं, बहुत गलत आदमी हैं और अपराधी हैं, अतः उन्होंने निश्चित रूप से यह अपराध भी किया होगा. अतः इन खबरों में श्री राजा भैया को साफ़ तौर पर इस हत्याभियोग का अभियुक्त और दोषी बता दिया जा रहा है. एक प्रकार से यह तय कर दिया जा रहा है कि चूँकि श्री राजा भैया का बहुत पुराना आपराधिक इतिहास है, अतः वे इस मामले में भी निश्चित रूप से ही अभियुक्त और दोषी होंगे. यदि अभियुक्त और दोषी हैं तो उनकी तत्काल गिरफ़्तारी होनी चाहिए. इसके विपरीत विधिक स्थिति मात्र यह है कि अभी इस मामले में एफआईआर दर्ज किया गया है. एफआईआर करने वाली शहीद डिप्टी एसपी की पत्नी ने श्री राजा भैया को षडयंत्र का दोषी बताया है. वे इस मामले में श्री राजा भैया को ही पूरी तरह दोषी और जिम्मेदार मान रही हैं. चूँकि शहीद की पत्नी ऐसे गंभीर आरोप लगा रही हैं, अतः इसे बहुत ही गम्भिता और तत्परता से लिया जाना चाहिए. पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगा लेना चाहिए कि मामले में सभी बातें पूरी तरह साफ़ हो गयी हैं. मीडिया, विशेषकर इलेक्ट्रौनिक मीडिया जिसमे उपरोक्त वर्णित न्यूज़ चैनल भी शामिल हैं, को यह चाहिए कि मामले की निष्पक्ष विवेचना की प्रतीक्षा करें, ना कि अपनी तरफ से ही विवेचना कर के किसी व्यक्ति को कातिल और अभियुक्त घोषित कर दें.

मैंने कहा था कि बहुत संभव है कि कल को विवेचना में श्री राजा भैया दोषी पाए जाएँ और उनकी गिरफ़्तारी भी हो पर इलेक्ट्रौनिक मीडिया द्वारा निष्पक्ष प्रस्तुति को त्याग कर अपने स्तर से जज और निर्णायक की भूमिका में आ जाना और श्री राजा भैया के विरुद्ध एक प्रकार का कैम्पेन प्रारम्भ कर देना निष्पक्ष और तटस्थ पत्रकारिता के मापदंडों के प्रतिकूल दिखता है. इन समाचारों से यह स्पष्ट आभास होता है कि मीडिया (उपरोक्त न्यूज़ चैनल सहित) चाहती है कि श्री राजा भैया दोषी हों और उनकी यथाशीघ्र गिरफ़्तारी हो.

मेरा निवेदन था कि यह स्थिति मात्र इसीलिए खतरनाक है क्योंकि यदि बाद में खुदा-ना-खास्ता विवेचना के बाद यह बात सामने आती है कि श्री राजा भैया इस मामले में दोषी नहीं थे, तो यह उनके साथ तो अन्याय होगा ही, निष्पक्ष पत्रकारिता पर भी एक प्रश्नचिन्ह बन कर खड़ा हो जाएगा. अतः संभवतः उचित यह होता कि न्यूज़ चैनल सभी तथ्य उन व्यक्तियो की बानगी प्रस्तुत करते जो ऐसी बातें कह रहे हैं और उसके साथ ही दूसरे पक्ष को भी अपनी बात कहने का पूरा अवसर देते और उनकी बात भी उसी प्रमुखता से प्रस्तुत करते ताकि दर्शकों के सामने सारी बातें तथ्यात्मक रूप से सामने आ पाती और मीडिया के जज बन जाने की स्थिति नहीं दिखती.

मैंने इस सम्बन्ध में ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन द्वारा बनाए गए Code of Ethics and Broadcasting standards के भाग-एक और भाग- दो के निम्न महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत किये थे-
SECTION – 1

FUNDAMENTAL PRINCIPLES

4) Broadcasters shall, in particular, ensure that they do not select news for the purpose of either promoting or hindering either side of any controversial public issue. News shall not be selected or designed to promote any particular belief, opinion or desires of any interest group.

6)Broadcasters shall ensure a full and fair presentation of news as the same is the fundamental responsibility of each news channel. Realizing the importance of presenting all points of view in a democracy, the broadcasters should, therefore, take responsibility in ensuring that controversial subjects are fairly presented, with time being allotted fairly to each point of view. Besides, the selection of items of news shall also be governed by public interest and importance based on the significance of these items of news in a democracy

 Section 2

Principal of Self Regulations

1)Impartiality and objectivity in reporting: Accuracy is at the heart of the news television business. Viewers of 24 hour news channels expect speed, but it is the responsibility of TV news channels to keep accuracy, and balance, as precedence over speed. If despite this there are errors, channelsshould be transparent about them. Errors must be corrected promptly and clearly, whether in the use ofpictures, a news report,

a caption, a graphic or a script. Channels should also strive not to broadcast anything which is obviously defamatory or libelous. Truth will be a defense in all cases where a larger public interest is involved, and in even these cases, equal opportunities will be provided for individuals involved to present their point of view.

2) Ensuring neutrality: TV News channels must provide for neutrality by offering equality for all affected parties, players and actors in any dispute or conflict to present their point of view. Though neutrality does not always come down to giving equal space to all sides (news channels shall strive to give main view points of the main parties)news channels must strive to ensure that allegations are not portrayed as fact and charges are not conveyed as an act of guilt

अतः मैंने उपरोक्त के दृष्टिगत निवेदन किया था कि दिनांक 02/03/2013, 03/03/2013 और विशेषकर दिनांक 04/03/2013 तथा दिनांक 05/03/2013 को उपरोक्त न्यूज़ चैनल में स्वर्गीय जिया उल हक तथा श्री राजा भैया से जुडी खबरों के विषय में अपने स्तर से अवलोकन/जांच कर के एक सम्यक मंतव्य बनाए जाने की कृपा करें और यदि मेरे द्वारा कही गयी बातें और दृष्टिकोण सही साबित होते हैं तो इन निम्न कार्यवाही किये जाने की कृपा करें-

1.       इन सभी न्यूज़ चैनलों को मेरे इस पत्र के सन्दर्भ में इन खबरों में निष्पक्षता, प्रामाणिकता और तटस्थता नहीं बनाए रखने के विषय में अपने स्तर से भूल-सुधार नोटिस जारी कर दर्शकों को अवगत कराने के निर्देश निर्गत करने की कृपा करें.

2.       सभी सम्बंधित न्यूज़ चैनलों को मेरे इस पत्र के सन्दर्भ में भविष्य में अपनी खबरों में निष्पक्षता, प्रामाणिकता और तटस्थता बनाए रखने के विषय में एडवाईजरी निर्गत करने की कृपा करें जिनमे यह बात अंकित हो कि मात्र पुरानी खराब छवि आदि के आधार पर आपराधिक मामलों में सहभागिता के विषय में पूर्वानुमान/मंतव्य स्थापित कर मीडिया ट्रायल करने के स्थान पर निष्पक्ष तथ्यपरक समाचार प्रसारित किये जाएँ

3.       सभी सम्बंधित न्यूज़ चैनलों को मेरे इस पत्र के सन्दर्भ में भविष्य में आपराधिक मामलों में बिना पर्याप्त अभिलेखीय, मौखिक तथा अन्य साक्ष्य के कोई अंतिम निष्कर्ष निकाल कर एक्टिविस्ट जर्नलिज्म किये जाने की प्रवृत्ति से बचने की एडवाईजरी निर्गत करने की कृपा करें

कोई जवाब नहीं आने पर मैंने पुनः इस सम्बन्ध में दिनांक 06/03/2013 को ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन को ईमेल भेज कर जानकारी ली थी कि चूँकि मैंने एसोसियेशन को शिकायत भेजी है, तो क्या वह शिकायत स्वीकार्य होगी अथवा मुझे अलग-अलग सभी चैनलों से संपर्क करना होगा.

मुझे इस सम्बन्ध में ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन की ओर से दिनांक 08/03/2013 को सुश्री एनी का मेल प्राप्त हुआ है जिसमे मुझे अलग-अलग संपर्क करते हुए उन्हें भी प्रतिलिपि देने के निर्देश दिये गए. तब मैंने इसके क्रम में ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन के सभी सदस्यों (एनडीटीवी हिंदी और एनडीटीवी अंग्रेजी , आइबीएन सेवेन तथा सीएनएन-आइबीएन,  आजतक और हेडलाइंस टुडे न्यूज़ चैनलों,  ईटीवी उत्तर प्रदेश,  इंडिया टीवी चैनल, एबीपी न्यूज़ चैनेल तथा न्यूज़24 चैनल) को  नेशनल ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन को प्रेषित अपनी शिकायत/सुझाव की प्रति तथा इस सम्बन्ध में हुए समस्त पत्राचारों की प्रति तत्काल  संज्ञान में ले कर आवश्यक कार्यवाही किये जाने हेतु पर प्रेषित किया. मैंने उसी समय इन सभी ईमेल की प्रति ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन को उसके ईमेल nba@nbanewdelhi.com पर भी प्रेषित किया.

इसके साथ मुझे ज्ञात हुआ कि जो न्यूज़ चैनल ब्रॉडकास्टर एसोसियेशन के सदस्य नहीं हैं उनके सम्बन्ध में सूचना और प्रसारण  मंत्रालय, भारत सरकार के अधिकारियों सुश्री सुप्रिया साहू और श्री के एस रेजिमोन को ईमेल jsb.inb@sb.nic.in, ks.rejimon@nic.in पर शिकायत प्रेषित किया जाना चाहिए.

अतः मैं तदनुसार आप दोनों अधिकारियों को उक्त प्रकरण शिकायत के रूप में समाचार प्लस एवं इंडिया न्यूज़ चैनलों के सम्बन्ध में आवश्यक कार्यवाही किये जाने प्रेषित कर रही हूँ.

डॉ नूतन ठाकुर

5/426, विराम खंड,
गोमती नगर,
लखनऊ-226010
# 94155-34525

अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर जागरण पहुंचे रमाशरण

अमर उजाला, लखनऊ में उत्‍पीड़न के चलते कर्मचारियों का संस्‍थान से मोहभंग हो रहा है. लखनऊ यूनिट तथा स्‍टेट ब्‍यूरो में काम कर रहे लोग यहां की परिस्थितियों से परेशान होकर दूसरे अखबारों में कम पैसों पर भी जाने को तैयार हैं. अमर उजाला की सबसे फिसड्डी यूनिट की रेटिंग पा चुके लखनऊ एडिशन का ग्राफ लगातार नीचे की तरफ गिरता चला जा रहा है. कुछ समय पहले जहां जहां बदलाव किए गए वहां का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है. वहीं फैजाबाद से लखनऊ अटैच किए गए रमाशरण ने भी इस्‍तीफा दे दिया है.

कुछ समय पहले बहराइच से अशोक उपाध्‍याय को हटाकर सेकेंड मैन अतुल पांडेय को जिले की जिम्‍मेदारी सौंपी गई. अशोक के आने के बाद बहराइच में सर्कुलेशन प्रभावित होता जा रहा है. इसी तरह केपी तिवारी को बाराबंकी से हटाकर लखनऊ अटैच कर दिया गया. उनकी जगह इंदुभूषण पांडेय को बाराबंकी भेजा गया, अब हाल यह है कि अमर उजाला इस जिले में पिछड़ता जा रहा है. लगातार इसका सर्कुलेशन कम हो रहा है. जागरण और हिंदुस्‍तान जैसे प्रतिद्वंद्वी अखबार अमर उजाला से काफी आगे निकल गए हैं.

ऐसा ही हाल फैजाबाद का है. लेकिन फैजाबाद में हालात अन्‍य जिलों से थोड़े बेहतर हैं. रमाशरण को हटाकर सेकेंडमैन रहे राजेंद्र पांडेय को जिले का प्रभार सौंपा गया. रमाशरण को लखनऊ से अटैच कर दिया गया. इस बदलाव से रमाशरण काफी आहत थे. उन्‍हें बिना कारण ही फैजाबाद से लखनऊ अटैच कर दिया गया था. तीन दिनों पूर्व ही रमाशरण ने अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर लखनऊ में ही दैनिक जागरण ज्‍वाइन कर लिया है. संभावना है कि अमर उजाला के कुछ और कर्मचारी भी दूसरे अखबारों के प्रबंधन के संपर्क में हैं तथा अपने लिए नए ठिकाने तलाश रहे हैं.

नए सेक्स स्कैंडल के कारण चर्चा में हैं हरक सिंह रावत!

उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत फिर एक नए सेक्स स्कैंडल में फंस सकते हैं. शादीशुदा होते हुए भी उन पर एक अन्य स्त्री से संबंध रखने का मामला सामने आया है. सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में पिछले दिनों एक महिला ने एक बच्चे को जन्म दिया. महिला ने पिता के नाम के रूप में एच. एस. रावत का नाम दर्ज कराया है. इसे लेकर उत्तराखंड के सत्ता और मीडिया के गलियारों में खूब चर्चा है. आई-नेक्स्ट अखबार ने इस बारे में एक खबर का भी प्रकाशन किया. उत्तराखंड में विपक्ष के नेता अजय भट्ट ने भी प्रेस कांफ्रेंस करके इस मुद्दे को उठाया.

उल्लेखनीय है कि जेनी सैक्स स्कैंडल कांड के कारण हरक सिंह रावत पहले भी काफी चर्चा में रहे हैं. हरक सिंह रावत रसिया किस्म के नेता हैं. उन्हें रसियागिरी के मामले में उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी का उत्तराधिकारी माना जाता है. बताया जाता है कि जब वे इस बार कैबिनेट मंत्री बने तो अपने पसंद की महिला अधिकारी को अपने करीब रखने के लिए उन्होंने पूरा जोर लगवाकर दूसरे विभाग से ट्रांसफर कराके अपने मंत्रालय में ले आए और अपना ओएसडी बना लिया. उत्तराखंड में कांग्रेस ने निकाय चुनाव में घटिया प्रदर्शन किया है, जिसके कारण कांग्रेस के नेता जहां लोकसभा चुनाव को लेकर चिंतित हैं, वहीं हरक सिंह रावत प्रकरण सामने आने के बाद कांग्रेस के लिए एक और मुसीबत सामने है. उत्तराखंड पुलिस के एक अफसर पर भी एक महिला माडल और पत्रकार ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रखा है.

देहरादून से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


 


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अमर उजाला में अब संपादकों के होंगे तबादले!

अमर उजाला में एक चर्चा जोरों पर है कि जल्‍द ही संपादक तथा समाचार संपादक लेबल पर तबादले होने जा रहे हैं. हालांकि अभी यह खबर अभी चर्चा स्‍तर पर ही है. अमर उजाला का कोई भी वरिष्‍ठ अधिकारी ऐसी किसी कार्रवाई की पुष्टि नहीं कर रहा है. वरिष्‍ठों का कहना है कि हाल फिलहाल संपादक स्‍तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं होने जा रहा है. लेकिन अमर उजाला से ही जुड़े कुछ सूत्रों का कहना है कि चीफ सब और डीएनई जैसे काफी समय से एक ही यूनिट में जमे संपादक तथा समाचार संपादकों को इधर से उधर किया जाएगा.

चर्चा है कि लोकसभा चुनाव से पहले सभी यूनिटों को चुस्‍त दुरुस्‍त करने के लिए ये कवायद की जाने वाली है. सबसे ज्‍यादा चर्चा लखनऊ यूनिट को लेकर है. इंदुशेखर के नेतृत्‍व में यह यूनिट अमर उजाला में सबसे फिसड्डी साबित हुई है. इस यूनिट में बदलाव की चर्चा लंबे समय से चल रही है लेकिन अमर उजाला के वरिष्‍ठों का कहना है कि कम से कम लखनऊ में लोकसभा चुनाव से पहले कोई बदलाव के आसार नहीं हैं. अब देखने वाली बात है कि अमर उजाला में संपादकों के तबादले होने और न होने को लेकर चल रहे कयासों में कितना दम है. (कानाफूसी)

स्‍वदेश कुमार का तबादला स्‍टेट ब्‍यूरो से डाक में, परवेज को मिली जिम्‍मेदारी

दैनिक जागरण, लखनऊ से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार तथा ब्‍यूरोचीफ रहे स्‍वदेश कुमार को ब्‍यूरो से हटाकर डेस्‍क पर भेज दिया गया है. स्‍वदेश कुमार अब डाक डेस्‍क पर अपनी जिम्‍मेदारी निभाएंगे. वे अब तक ब्‍यूरो में सपा समेत कई महत्‍वपूर्ण बीट की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. स्‍वेदश कुमार की जगह हिंदुस्‍तान से आए परवेज को जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. परवेज कुछ दिन पहले ही हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देकर दैनिक जागरण से जुड़े हैं. स्‍वदेश कुमार की सारी बीट परवेज ही देखेंगे.

राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार पर मामला दर्ज, गंवई राजनीति का बना शिकार

महाराजगंज के राष्‍ट्रीय सहारा ब्‍यूरो कार्यालय तैनात पत्रकार संतोष कुमार वर्मा और उनके पिता और भाई पर मामला दर्ज कराया गया है. बताया जा रहा है कि संतोष के भाई पर दुष्‍कर्म तथा अन्‍य परिजनों पर धमकाने के अलावा कुछ धाराओं में मामला दर्ज कराया गया है. बताया जा रहा है कि संतोष और उनके पिता गंवई राजनीति के शिकार बने हैं. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

जानकारी के अनुसार संतोष के भाई का गांव की एक युवती से प्रेम चल रहा था. इसी बीच दोनों के बीच झगड़ा हो गया तथा उनकी राहें जुदा हो गईं. बताया जा रहा है कि गंवई राजनीति और सहारा के ही एक पत्रकार की शह पर लड़की के परिजनों ने संतोष के भाई के खिलाफ दुष्‍कर्म का मामला दर्ज करा दिया, जबकि संतोष और उनके पिता के खिलाफ भी कई धाराओं में मामला दर्ज कराया गया है. इस मामले में पूरी तरह निर्दोष संतोष और उनके पिता को आरोपी बनवा दिया गया.

पुलिस ने दबाव के बाद संतोष और उनके पिता के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच कर रही है. इस बारे में संतोष का कहना है कि हम लोगों को गंवई राजनीति का शिकार बनाया गया है. जांच में सारा मामला सामने आ जाएगा.

सेबी ने सहारा पर फिर कसा शिकंजा, इंदौर प्रशासन से मांगी सम्‍पत्ति की जानकारी

इंदौर। सेबी और सहारा ग्रुप के बीच चल रही लड़ाई में अब पूरे देश में ग्रुप की संपत्तियों की जानकारी ली जा रही है। सेबी ने एक पत्र इंदौर जिला प्रशासन को भेजा है। इसमें जिले में मौजूद सहारा की अचल संपत्तियों की जानकारी मांगी गई है। इस आधार पर सभी एसडीओ को इन संपत्तियों का ब्योरा बनाकर देने के निर्देश दिए गए हैं। एडीएम आलोक सिंह ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि संपत्तियों की जानकारी एकत्र की जा रही है। सारी जानकारी जुटाने के बाद इसे जल्द ही सेबी को भेज दिया जाएगा।

उधर, सहारा सिटी में फ्लैट, बंगले बुक कराने वालों की शिकायत पर प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। एसडीओ को इसका जिम्मा सौंपा है। उल्लेखनीय है कि एक माह पहले 20 लोगों ने कलेक्टर को शिकायत की थी कि साल 2003 में सहारा सिटी टाउनशिप लांच करते हुए 38 माह में पजेशन देने का वादा किया गया था, लेकिन कब्जा नहीं दिया गया। शिकायतकर्ताओं ने सुब्रतो रॉय सहारा व सुशांतो रॉय के खिलाफ करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की थी।

कानूनी पेचीदगियों में उलझाकर निवेशकों के पैसे हड़पना चाहता है सहारा : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सहारा समूह पैसा निवेशको का पैसा लौटाने के मामले में गलत व्यवहार कर रहा है। सहारा की मंशा निवेशको का पैसा लौटाने की नही है। सहारा पर ये टिप्पणी की है सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के एस राधाकृष्णन ने जस्टिस कृष्णन ने। इन्‍होंने ये भी कहा कि सहारा की नीयत में खोट इसी बात से पता चलता है कि सहारा ने निवेशको को जो चार हजार करोड़ रुपये लौटाये हैं उसका सही विवरण भी सेबी को नहीं दिया है।

सहारा ने जो भी विवरण दिया उस विवरण में एक ही व्यक्ति के बारे में कई बार नाम लिखा गया है। वहीं कुछ ऐसे भी है जिनका नाम करीब एक हज़ार बार लिखा गया है। जस्टिस कृष्णन ने सहारा पर आरोप लगाते हुए कहा कि सहारा इस मामले को कानूनी पेचीदगियों में उलझकर निवेशकों का पैसा हड़पना चाहता है या वापस नहीं करना चाहता है।

कोर्ट ने सहारा द्वारा निवेशकों के 24 हज़ार करोड़ रुपयों की देनदारी मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए विभिन्न अदालतों और पंचाटों की कार्यवाहियों पर रोक लगाते हुए सहारा समूह से कहा है कि वो इस मुद्दे पर अपना जवाब आने वाले बुधवार तक अदालत को दे। वहीं सेबी के अधिवक्ता अरविन्द पी दातार ने सहारा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सहारा अपनी देनदारियों से बचना चाह रही है। (पटु)

सीबीआई इतनी ‘निष्पक्ष’ कैसे हो गई कि रेल मंत्री के भतीजे पर हाथ डाल दिया!

Nadim S. Akhter : भ्रष्टाचार से नहाई यूपीए की केंद्र सरकार की मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही…कोलगेट में अभी कानून मंत्री अश्वनी कुमार का इस्तीफा भी नहीं हुआ है कि एक और रिश्वत कांड में रेल मंत्री पवन बंसल का नाम आ रहा है…सीबीआई ने छापेमारी और गिरफ्तारी की है… लेकिन एक बात समझ नहीं आई…केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली सीबीआई इतनी 'निष्पक्ष' कैसे हो गई कि रेल मंत्री के भतीजे पर हाथ डाल दिया…

सबको पता है कि इसके नतीजे क्या हो सकते हैं और रेल मंत्री-यूपीए सरकार इसके बाद कैसे दबाव में आएगी…विपक्ष को यूपीए पर हमले का एक और मौका मिलेगा… क्या कोलगेट में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद सीबीआई चीफ वाकई में 'निडर' हो गए हैं औौर राजनीतिक आकाओं से आदेश नहीं ले रहे…या फिर परदे के पीछे एक और पर्दा है…ये दिखाने की कवायद कि देखो…सीबीआई कितनी निष्पक्ष है…मंत्री के भतीजे पर ही हाथ डाल दिया…कितना स्वस्थ है हमारा सिस्टम…

पर एक कांटा है…अगर सीबीआई वाकई में इंडिपेंडेट है तो ये बात मेरे गले नहीं उतरती कि बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के चुनाव से ठीक ऐन पहले पूर्ति ग्रुप पर छापे क्यों पड़े थे, जिसके बाद लगभग चुनाव जीतने जैसे विजयी मुद्रा धारण कर चुके नितिन गडकरी बीजेपी में ऐसे साइडलाइन किए गए कि आज उन्हें कोई याद भी नही करता…अपने ठाकुर साहब यानी राजनाथ सिंह बीजेपी अध्यक्ष बन गए…क्या इसका क्रेडिट सीबीआई को जाता है…शायद हां, शायद ना…!!!??

नदीम अख्तर के फेसबुक वॉल से.

आल्हा सम्राट लल्लू वाजपेयी चले गए

आल्हा सम्राट लल्लू वाजपेयी का कल दिल का दौरा पडऩे से निधन हो गया। 73 वर्षीय वाजपेयी को 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आल्हा सम्राट की उपाधि से विभूषित किया था। उन्‍नाव जिले की बीघापुर तहसील के उनके गांव नारायणदास खेड़ा में अंतिम दर्शन के लिए लोगों का तांता लगा रहा। अश्रुपूरित आंखों से हर कोई यही कहता रहा कि वह आल्हा की शान के साथ ध्वज वाहक भी थे।

लल्‍लू वाजपेयी 12 बरस की उम्र से ही कक्षा तीन की पढ़ाई के दौरान ही आल्हा-ऊदल की वीरगाथा से प्रभावित हुए और आल्हा गायन करने लगे थे। लल्‍लू वाजपेयी आल्‍हा गायन परंपरा की शान थे। श्रद्धांजलि वाजपेयी जी, जब भी आल्‍हा सुनेंगे आप बहुत याद आएंगे। आप सरीखा दूसरा आल्‍हा गायक न हुआ है, और न होगा।

राजू मिश्र के फेसबुक वॉल से साभार.

कोट लखपत जेल में बंद गुजरात के कुलदीप के लिए मोदी क्यों नहीं दहाड़ रहे?

Sanjay Tiwari : सरबजीत मामले पर मोदी की दहाड़ और चिघ्घाड़ तो आपने सुन ही ली होगी। अब जरा इस सच्चाई को भी सुन लीजिए।  लाल घेरे में जो आदमी है उसका नाम है कुलदीप कुमार यादव। वह भी पाकिस्तान की उसी कोट लखपत जेल में उसी जासूसी के आरोप में बंद है जहां सरबजीत बंद था।

कुलदीप की 76 वर्षीय मां मायादेवी अहमदाबाद के चांदखेड़ा में रहती है। कुलदीप अपने वकील एम के पॉल के माध्यम से गुजरात सरकार से गुजारिश कर चुका है कि उसकी मां के गुजारे के लिए उनकी कुछ आर्थिक सहायता की जाए लेकिन सरबजीत पर सिर झुकानेवाले मोदी जी की सरकार ने आज तक अपने गुजराती सरबजीत की बूढी मां के लिए कुछ नहीं किया है।

संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

दो करोड़ लेकर प्रमोशन कराने का आरोपी रेलमंत्री का भांजा अरेस्ट

: करप्शन के आरोपों से घिरी कांग्रेस के लिए रेलमंत्री बंसल नए आफत : करप्शन के नए नए आरोपों से लगातार घिरने वाली कांग्रेस पार्टी के लिए नए आफत रेलमंत्री पवन कुमार बंसल बन गए हैं. पता चला है कि उनका भांजा एक अफसर से दो करोड़ रुपये लेकर उसका प्रमोशन कराने वाला था. दो करोड़ में से पहली किश्त नब्बे लाख रुपये रेल मंत्री के भांजे के पास पहुंच चुकी थी. इसके बाद ही रेल मंत्री पीके बंसल के भांजे को घूसखोरी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया.

यह गिरफ्तारी सीबीआई ने की. रेल मंत्री के भांजे पर 90 लाख रुपये का रिश्वत लेने का आरोप है. भांजे का नाम वी. सिंघला है. रेलमंत्री के भांजे के खिलाफ रेलवे बोर्ड के एक सदस्य से 90 लाख रुपये की रिश्वत लेने के संबंध में मामला दर्ज किया गया था.  सीबीआई ने रेलवे बोर्ड के सदस्य स्टाफ महेश कुमार और दो अन्य के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है. पवन बंसल के भांजे वी सिंघला को चंडीगढ़ से गिरफ्तार किया गया है.

वी सिंघला पर रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार से प्रमोशन के लिए घूस लेने का आरोप है. महेश कुमार को तीन दिन पहले ही रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाया गया था. सूत्रों के अनुसार सीबीआई को कुछ संदिग्ध टेलीफोन कॉल मिली थी. जिसके बाद महेश कुमार के यहां छापा मारा गया.

इस छापेमारी के बाद घूसकांड के तार पवन बंसल के भांजे वी सिंघला तक पहुंचे. सीबीआई ने रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार को भी गिरफ्तार कर लिया है. ताजा जानकारी के मुताबिक महेश ने अपने प्रमोशन के लिए दो करोड़ रुपये देने का वादा किया था. जिसकी पहली किस्त 90 लाख रुपये तय हुई थी.

सीबीआई के मुताबिक रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार अपनी पोस्टिंग बदलवाना चाहते थे. गुरुवार को ही उन्होंने रेलवे बोर्ड के सदस्य पद का कार्यभार संभाला है. महेश कुमार इससे पहले वेस्टर्न रेलवे के जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. सीबीआई इस मामले में छापेमारी कर रही है. चंडीगढ़ में दो जगहों पर छापे मारे गए हैं जिसमें से एक घर पवन बंसल के घर के पास है. चंडीगढ़ में हाउस नंबर 105 पर छापा मारा गया है जबकि दूसरा छापा सेक्टर-16 में पड़ा है.

प्रमोशन दिलाने के लिए रेलमंत्री के भतीजे ने ली घूस, सीबीआई ने अरेस्‍ट किया

नई दिल्ली। सीबीआई ने रेलमंत्री पवन कुमार बंसल के भतीजे वी. सिंगला को रेलवे में प्रमोशन दिलाने के नाम पर रेलवे बोर्ड के मेंबर से 90 लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में अरेस्‍ट किया है। सीबीआई ने रेलवे बोर्ड के मेंबर महेश कुमार व दो अन्य के खिलाफ भी इस मामले में केस दर्ज किया है। इसमें से दो लोग चंडीगढ़ से बताए जा रहे हैं। इस गिरफ्तारी के बाद रेलमंत्री पवन कुमार बंसल की तरफ भी अंगुलियां उठनी शुरू हो गई हैं। सीबीआई इस मामले में दिल्ली और चंडीगढ़ में छापेमारी कर रही है।

सूत्रों के मुताबिक पवन कुमार बंसल के भतीजे सिंगला ने रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार से प्रमोशन दिलाने के नाम पर 90 लाख रुपये लिए। महेश कुमार पश्चिम रेलवे में जीएम थे और वह प्रमोशन चाहते थे। इसके लिए उन्होंने रेलमंत्री पवन कुमार बंसल के भतीजे सिंगला और उनके दोस्त से संपर्क साधा। महेश कुमार का तीन दिन पहले ही प्रमोशन हुआ है और वह रेलवे बोर्ड के मेंबर बनाए गए हैं। इस स्थिति में महेश कुमार का प्रमोशन भी शक के घेरे में आ गया है। रेल मंत्री पवन बंसल की तरफ भी अंगुलियां उठने लगी हैं।

सीबीआई ने सिंगला को अरेस्ट कर लिया है, जबकि महेश कुमार को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। माना जा रहा है कि इस गिरफ्तारी के बाद रेलवे के अंदर चल रहे एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश हो सकता है। उधर, बीजेपी ने इस मामले में पवन कुमार बंसल को निशाने पर ले लिया है। उन्होंने बंसल का इस्तीफा मांगते हुए आरोप लगाया कि घूस उनके इशारे पर ली गई है। चंडीगढ़ में दो जगहों पर छापे की खबर है। संभावना है कि तृणमूल कांग्रेस भी रेलमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलेगी।

लालू यादव को सिर पर गंभीर चोट, फिलहाल आपरेशन थिएटर में

पटना से खबर आ रही है कि लालू यादव को सिर पर गंभीर चोट के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उनका आपरेशन चल रहा है. वे पटना के राजेश्वरी हास्पिटल के आपरेशन थिएटर में हैं. बताया जा रहा है कि कुछ लोगों ने उनकी कार पर पत्थरबाजी की जिसके कारण कार का शीशा टूट गया और कांच उनके सिर में धंस गया.

कुछ लोग लालू यादव की हालत गंभीर बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि उनकी स्थिति ठीक है, केवल सिर में कांच लगने के कारण उनका इलाज किया जा रहा है. लालू के चोटिल होने की खबर न्यूज चैनलों पर फ्लैश होने के बाद उनके समर्थकों का तांता अस्पताल की तरफ बढ़ चला है.

अनिरुद्ध बहल 6 मई को मनी लांड्रिंग पर ‘आपरेशन रेड स्पाइडर’ के सेकेंड पार्ट का करेंगे खुलासा

: कोबरापोस्ट टीम की तरफ से प्रेस कांफ्रेंस का न्योता : Dear Friends, You are invited for the screening of Operation Red Spider 2 at 9:30 am on Monday, 6th May, 2013 at the Constitutional Club of India, Deputy Chairman Hall, Rafi Marg, New Delhi. This second part of our expose is 20 times bigger than Part 1 and covers the who’s who of the Indian Banking and Financial Industry.

How long can the RBI and the Finance Minister afford to ignore the plethora of evidence on money laundering that has come out and will come out on Monday May 6th? Will they continue to say that since there were “no transactions” therefore they will do nothing and give a clean chit to everybody? Cobrapost Editor Aniruddha Bahal will address a press conference mid way through the screening of the investigative documentary. For more details, log on to www.Cobrapost.com.

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पत्रकार का 40 हजार का चेक बांउस कराया, फिर 45 हजार देकर पीछा छुड़ाया

महिलाओं पर आधारित एक वेबसाइट चलाने वाले संदीप कुमार देव का 40 हजार का चेक बाउंस कराना द्वारका के मैक्स लाइफ केयर अस्पताल को काफी महंगा पड़ा। आखिरकार तीस हजारी कोर्ट में 45 हजार रुपये दे कर उस अस्पताल मालिक ने अपना पीछा छुड़ाया। आधी आबादी डॉट.कॉम के पार्टनर कपोट मीडिया नाम से एक कंपनी चलाते हैं।

यह कंपनी पब्लिक रिलेशन का काम भी देखती है। उस कंपनी को मैक्स लाइफ केयर के डायरेक्टर डॉ. नितेन्द्र सिंह ने कुल 40 हजार के चेक जारी किए थे। लेकिन यह चेक बाउंस हो गए।  काफी समझाने के बाद भी जब उनका पैसा नहीं मिला तो उन्होंने कोर्ट की शरण ली। जमानती वारंट जारी होने के बाद डॉ. नितेन्द्र ने 45 हजार रुपए देकर अपना मामला सेटल किया।  

जानकारी के मुताबिक, संदीप कुमार देव दिल्ली में अपनी वेबसाइट चलाते हैं। इससे पहले वह दैनिक जागरण और नई दुनिया में बतौर संवाददाता काम कर चुके हैं। उन्होंने जब अपनी पब्लिक रिलेशन का काम बखूबी निपटा दिया तो उन्हें मैक्स लाइफ केयर की ओर से कुल 40 हजार के चेक मिले। यह चेक उन्होंने अकाउंट में डाले तो वह पैसा नहीं होने कारण बाउंस हो गए।

इसके  बाद श्री देव ने अपने वकील पीयूष जैन के माध्यम से तीसहजारी कोर्ट चले गए। मजिस्ट्रेट ने चेक बाउंस के लिए जिम्मेदार डायरेक्टर डॉ. नितेन्द्र सिंह के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिए। इतना सुनने के बाद डायरेक्टर समझौता करने को तैयार हो गए। डॉ. सिंह ने बतौर मुआवजा पांच हजार रुपये अधिक दिए और समझौता कर लिया। उल्लेखनीय है कि इसके पहले एक और मीडियाकर्मी ने चेक बाउंस के मामले में मीडिया कंपनी पर पत्रकार से वकील बने पीयूष जैन के जरिए दावा ठोंका था। बाद में उस मीडिया कंपनी ने पैसे देकर समझौता किया।

भड़ास के पांचवें बर्थडे पर आपको आना है, ये न्योता कुबूल करें

भड़ास के पांचवें जन्मदिन पर 17 मई 2013 को आईटीओ के नजदीक दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित राजेंद्र भवन में दोपहर बाद दो बजे से शाम छह बजे तक संगीत, व्याख्यान और सम्मान का जलसा चलेगा. इसमें चर्चित पत्रकार अनिरुद्ध बहल अपना व्याख्यान देंगे. विषय है- करप्शन, कारपोरेट और मीडिया. इसी विषय पर कई वरिष्ठ पत्रकार, प्रोफेसर, साहित्यकार, नेता अपना नजरिया पेश करेंगे.

अंशुमाला झा और उनकी टीम के लोग सूफी, फोक से लेकर फिल्मी व गैर-फिल्मी गीतों का जलवा बिखेरेंगे. पत्रकारिता से जुड़े कई साथियों का सम्मान किया जाएगा. भड़ास न्यू मीडिया का माध्यम है, इसलिए निमंत्रण पत्र प्रिंट करके सबके पते पर भेजने की जगह उन्हें भड़ास, फेसबुक, मेल, एसएमएस आदि न्यू मीडिया के माध्यमों के जरिए पहुंचाया जाएगा. इसी कड़ी के तहत यहा निमंत्रण पत्र प्रकाशित किया जा रहा है. इसे आप कुबूल करें…

((देखने-पढ़ने में दिक्कत आ रही हो तो उपरोक्त निमंत्रण पत्र पर क्लिक कर दें))


यही है आप सभी साथियों को विधिवत न्योता.. आप सभी मेरे लिए खास हैं क्योंकि आपकी ताकत ही भड़ास, मुझे और पूरी टीम को खास बनाती है. आपका इंतजार रहेगा. डायरी में नोट कर लें. मोबाइल में उस दिन का एलार्म लगा लें… खासकर, दिल्ली के बाहर के न्यू मीडिया के साथियों, फेसबुक के साथियों और वेब-ब्लाग वाले दोस्तों से कहना चाहूंगा कि वे इस आयोजन में शिरकत करने के लिए योजना बनाएं. आएं. भागीदारी करें. सुनें, सुनाएं और न्यू मीडिया की एकजुटता और त्वरा का घोष करें.. दिल्ली के साथी आएंगे ही, यह मानकर चल रहा हूं. संभव है, बहुत सारे साथियों तक फोन, मैसेज, मेल न पहुंचे, इसलिए आप सभी से यह अनुरोध करता हूं कि इसे ही विधिवत निमंत्रण मानें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


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दीपकजी! अंध भक्ति वाले सच नहीं जान सकते

दीपकजी, आपने प्रभात किरण के संपादक प्रकाश पुरोहित के व्यक्तित्व, संपादक के रूप में उनकी निष्पक्षता और अखबार के रूप में प्रभातकिरण की विश्वसनीयता की खूब सारी बातें बेहद भावुक होकर कही हैं। अब मुश्किल यह है कि शुरुआत में ही आपने स्पष्ट कर दिया कि आप प्रकाश पुरोहित के अंध भक्त हैं। अब आप इतना तो जानते ही होंगे कि जो भक्ति अंधी होती है, वह अतार्किक हो जाती है।

जैसे धृतराष्ट्र को कुछ समझाया नहीं जा सकता था या वे दुर्योधन के बारे में कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, वैसा ही किसी भी अंध भक्त के साथ होता है। आप जैसा दृष्टि युक्त व्यक्ति भी अंधा होना चाहे तो यह वैसा ही हो जाएगा जैसा गांधारी ने किया था। याने धृतराष्ट्र तो जन्मांध थे, लेकिन गांधारी तो अच्छी-भली आंख वाली होकर आपकी तरह अंध भक्ति के चलते ही अंधत्व भोगने को अभिशप्त हो गई थीं और धृतराष्ट्र की हां में हां मिलाती रही और अंतत: पूरे कौरव वंश का नाश होकर रहा। बहरहाल।

अब चूंकि आपने कुछ मुद्दे उठाए हैं तो आप भी जान लीजिए कि वास्तविकता क्या है?

1- आपने लिखा- प्रकाशजी की प्राथमिकता पठनीय अखबार निकालना है और अगर उनका बेटा सुधांशु अच्छा लिखता है तो सुधांशु क्यों नहीं? तो क्या अच्छा सिर्फ सुधांशु ही लिखता है? सुधांशु के जिस मुफ्त पर्यटन की बातें आप कर रहे हैं, उनका खर्च संस्थान पर तो वैसे भी नहीं आना था, क्योंकि ये यात्राएं गुजरात और राजस्थान पर्यटन विकास निगम के सौजन्य से आयोजित की गई थीं। इन पर जाने का हक प्रभात किरण के किसी पत्रकार का होता है, सुधांशु का नहीं। वह अपन खर्च पर देश-दुनिया घूमकर लिखे ना, कौन रोकता है? सुधांशु, सुदीप, प्रज्ञा मिश्रा को छापना वैसा ही है, जैसे दावत का आपको न्यौता मिले और आप पड़ोसियों को भी ले जाएं। फिर, जब घर का आदमी अच्छा है और उसे बढ़ावा देना है तो जनाब राहुल गांधी, अखिलेश यादव जैसों के आगे आने पर अंगुली क्यों उठाते हो? उनकी पार्टी अच्छा जानकर ही उन्हें माथे पर बैठा रही है। आप सहित तमाम अखबार वाले परिवारवाद का राग आलापना बंद कर दें।

2- आपने प्रभात किरण को महान अखबार बताते हुए लिखा है कि इसमें खूब सारी समीक्षाएं छपती हैं। यही तो सबसे बड़ी गड़बड़ है कि यह अखबार सभी कार्यक्रमों की समीक्षा करता है, खबर नहीं देता। पूरा अखबार संपादकीय लगता है, खबरें तो चंद ही होती हैं। भारत लोकतांत्रिक मुल्क है और अभिव्यक्ति की आजादी है याने आप ही पूरे शहर को बताएंगे कि कार्यक्रम में कौन वक्ता बकवास कर रहा था, कौन चापलूसी कर रहा था, कौन जमावट कर रहा था। किसी भी कार्यक्रम में बकौल प्रभात किरण कुछ अच्छा होता ही नहीं।

3- आप लिखते हैं कि आदिल सईद ने क्या गलत लिख दिया कि आपका घमंड चोटिल हो गया? तो दीपकजी हमने ऐसा क्या लिख दिया कि आपका घमंड चोटिल हो गया? क्यूं प्रभात किरण और संपादक की इतनी पैरवी कर रहे हैं, जबकि आप वहां काम नहीं कर रहे। हमारी बातों का जवाब देने में संपादक और प्रबंधन का अहम आड़े क्यों आ रहा है जो आपको ढाल बना दिया? वैसे हमें उनसे कोई जवाब चाहिए भी नहीं। वह यदि इंदौर प्रेस क्लब या प्रेस क्लब टाइम्स को लेकर अर्नगल प्रलाप करेंगे तो हम जरूर जवाब देंगे। उनसे पूछिएगा कि लोकतंत्र के पैरोकार आपके अखबार और संपादक ने हमारा पूरा पत्र क्यों नहीं छापा, उसे संपादन कर क्यों छापा? फिर वह 365 दिन क्या लिखता है और उस पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की इससे हमारा कोई संबंध नहीं। वैसे भी इतना तो आप भी जानते होंगे कि जो अपनी लड़ाई लडऩा नहीं जानता या चाहता उसकी पैरवी भी कोई नहीं करता। दूसरे, अन्य किसी ने कभी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की तो गनीमत समझिए कि लोग पत्रकारिता के पेशे का अभी-भी सम्मान करते हैं और उनका सोच प्रभात किरण के संपादक और प्रबंधन की तरह विघ्न संतोषी, आत्म मुग्ध, परपीड़ा देने और किसी को भी आहत करने का नहीं हुआ, वरना..।

4- आपने लिखा है- एक अखबार ने यदि कुछ अनचाहा लिख भी दिया तो लिख दिया होगा। बाकी दस तो तारीफ कर ही रहे हैं। उनकी तारीफ बड़ी है या एक की आलोचना? तो दीपकजी, हमने भी आपके प्रिय अखबार और उसके संपादक को पत्र लिख दिया तो लिख दिया, आप क्यों इतने विचलित हो गए कि उनकी ओर से जवाब दे मारा? और सुन लीजिए-हम किसी भी आलोचना से विचलित नहीं होते, लेकिन जो आपने पहले कहा था न कि प्रभात किरण तो 365 दिन ऐसा ही लिखता है, कोई आपत्ति क्यों नहीं लेता? तो हमने बेहद लोकतांत्रिक तरीके से आपत्ति ही तो दर्ज कराई है तो आपको इतना बुरा क्यों लग गया? फिर, एक बात ध्यान रखिए कि किसी क्रिया की प्रतिक्रिया कैसे होगी यह आप तय नहीं कर सकते। जैसे आप किसी रास्ते चलते को हलकी-सी टक्कर लगने पर थप्पड़ मार दें और बदले में वह पलटकर आपको चाकू मार दें तो आप यह तय नहीं कर सकते कि वह भी आपको थप्पड़ ही मारे। हो सकता है गोली मार दे। हो सकता है आपके पूरे कुनबे को ही खत्म कर दे। यह इस पर निर्भर करता है कि वह कितना आहत हुआ है और चीजों को देखने का उसका नजरिया क्या है?

5- एक बिन मांगी सलाह-जिस प्रभात किरण और उसके संपादक के आप मुरीद हैं, उन्हें बताइये कि पत्रकारिता का मतलब यह नहीं होता है कि आप हर कार्यक्रम की सिर्फ आलोचना करें, उसमें कमियां ढूंढें, उसका नकारात्मक पक्ष ही उभारें। यह तो ऐसा ही हुआ कि किसी महिला ने बालिका को या विकलांग बच्चे को जन्म दिया तो आप मां की कोख को ही दोष दें कि क्या वह एक स्वस्थ बच्चा नहीं जन सकती थी? जैसे एक औरत की प्रसव पीड़ा को कोई दूसरा नहीं जान सकता, वैसे ही किसी कार्यक्रम को आयोजित करना भी एक तरह की प्रसव पीडा़ ही है। पहले कोई संरचना कीजिए, निर्माण कीजिए, जो बन चुका है, जो सृजित हो चुका है, उसमें सिर्फ खामी मत देखिए। आप सराहना भी मत कीजिए। समाज में अभी-भी ऐसा बहुत कुछ हो रहा है, जिसे खोज और शोध के जरिए उजागर करने की जरूरत है। जो लोग फुटपॉथ पर बगीचा बनाकर कब्जा कर लें, लेकिन एक छत के अभाव में फुटपॉथ पर सोने वालों या अपनी आजीविका चलाने के लिए छबड़ी-ठेला लगा लेने वालों को अतिक्रमणकर्ता मानें या जो सरकारी सौजन्य यात्राओं पर अपने परिवार वालों को भेज दें उनसे किसी नैतिकता के उपदेश या नसीहत की हमें जरूरत नहीं है।
 
प्रवीणकुमार खारीवाल                                                                   कमल कस्तूरी

अध्यक्ष-इंदौर प्रेस क्लब                                                              संपादक-प्रेस क्लब टाइम्स


इस मामले में पहले की खबरों को पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें –

प्रवीण भाई और कस्तूरी जी को इतना विचलित नहीं होना चाहिए

22 बरस से अखबार निकाल रहे हैं, आपने कितना समाज सुधार कर लिया?

‘जनसंदेश टाइम्‍स’ वालों को कब दी जाएगी सीख?

जनसंदेश टाइम्स बनारस यूनिट के 'तथाकथित सर्वोत्तम संपादकीय मंडल' ने फिर वो कमाल किया जिसकी उम्मीद किसी भी अखबार के सम्पादकीय मंडल से नहीं की जा सकती। खबर फिर चन्दौली ब्यूरो से है कि 2 मई को मुगलसराय नगर में शास्त्रीय संगीत की दुनिया की नामचीन हस्ती और पद्मभूषण से सम्मानित पं. राजन-साजन मिश्र बंधु आये थे किसी संगीत संस्था का उद्घाटन करने। पं. राजन व साजन मिश्र को पूरी दुनिया उनके संगीत के लिए जानती-पहचानती है। कोई भी भारी भीड़ में भी देख ले तो पहचान जायेगा।

नगर में आने की चर्चा से 2 मई की शाम को नगर के गणमान्य लोग जुटे। मिश्र बंधु आये और लोगों को अपनी वाणी से प्रभावित किया। संगीत प्रेमियों को मिश्र बंधुओं ने संबोधित किया। लेकिन 'जनसंदेश टाइम्स' का 3 मई का अंक देखा तो भौचक्का रह गया। बड़े और मोटे अक्षरों में शीर्षक लिखा था 'संगीत के साथ नृत्य की भी दी जायेगी सीख – पीयूष।' अब बताइये अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पहचान और पद्मभूषण से सम्मानित दो दिग्गज नगर में आते हैं, लोगों को शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देते हैं और जनसंदेश टाइम्स ऐसी हस्ती के सामने खबर छापता है संगीत संस्था के मालिक पीयूष मिश्रा की। जय हो जनसंदेश टाइम्स। पत्रकारिता की मार के रख दी है इन 'जनसंदेशियों' ने तो।

सर्वविदित है कि जिलों से कैसी खबरें आती हैं, लेकिन कोई ज़रुरी तो नहीं कि हर ख़बर हु-ब-हू वैसी ही उतारें। इसीलिए सम्पादकीय मंडल होता है जो अख़बार में जा रहे सभी कंटेंट को देखता है और फ़ैसले लेता है। लेकिन इस ख़बर को देखकर ज्ञात हो जाता है कि 'तथाकथित सर्वोत्तम सम्पादकीय मंडल' इतना कुछ गुजर जाने के बाद भी क्या कर रहा है? वैसे भी जब अखबार नौसिखियों के भरोसे रहेगा तो इससे ज्‍यादा की उम्‍मीद भी कहां की जा सकती है।

पता नहीं यह बात अख़बार के डायरेक्टर समझते हैं कि नहीं कि यही सब वजहें हैं जो उनके अख़बार को बढ़ने नहीं दे रहा है? मालिकान को समझ लेना चाहिए कि उनका अख़बार तथाकथित संपादकीय मंडल की ग़लत नीतियों के चंगुल में फँस चुका है जो अख़बार को गर्क़ में एक दिन धकेल कर ही दम लेंगे।

रीतेश कुमार

ritesh26192@gmail.com

9 मई को लांच होगा नेशनल दुनिया का मेरठ एडिशन, नोएडा के नए बिल्डिंग में शिफ्ट हुआ कार्यालय

नेशनल दुनिया अपने विस्‍तार की तैयारियां शुरू कर दी है. आगामी 9 मई को मेरठ से नेशनल दुनिया का नया संस्‍करण लांच होने जा रहा है. गुरुवार को विधिवत पूजा पाठ भी किया गया. इसके लिए श्रीकांत अस्‍थाना तथा मनोज दुबे के नेतृत्‍व तथा प्रदीप सौरभ एवं कुमार आनंद के निर्देशन में टीम तैयार की जा चुकी है. सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. एसबी मीडिया के बैनर तले प्रकाशित हो रहे नेशनल दुनिया 9 मई से मेरठ के जमे जमाए अखबारों के लिए चुनौती लेकर आने वाला है.

9 मई को लांचिंग की तैयारियों के लिए बैनर पोस्‍टर भी लगाए जा चुके हैं. मेरठ के बाद अखबार का अगला लक्ष्‍य लखनऊ की सरजमीं होगा. उल्‍लेखनीय है कि प्रबंधन ने दिल्‍ली एडिशन के एक साल पूरे होने वाले दिन ही मेरठ एडिशन की लांचिंग की तैयारी की थी, परन्‍तु तकनीकी कारणों से इसकी तिथि 9 मई कर दी गई थी.

नेशनल दुनिया से दूसरी बड़ी खबर है कि अब यह अखबार शुक्रवार से अपने खुद के बिल्डिंग में शिफ्ट हो गया है. नोएडा के सेक्‍टर 11 में स्थित डब्‍ल्‍यू-23 अब इस अखबार का नया पता है. शनिवार का अखबार अब नोएडा के नेशनल दुनिया टॉवर से ही प्रकाशित होगा. अभी तक इस अखबार का ऑफिस दिल्‍ली में किराए पर चल रहा था, परन्‍तु अब यह खुद की बिल्डिंग में शिफ्ट हो गया है. प्रदीप सौरभ एवं कुमार आनंद के पद भार संभालते ही यह अखबार कंटेंट से लेकर विस्‍तार में तेजी से आगे बढ़ रहा है.

एनई के रूप में नेशनल दुनिया से जुड़े रियाज हाशमी

दैनिक जागरण, मेरठ से इस्‍तीफा देने वाले रियाज हाशमी ने नेशनल दुनिया ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍होंने लगभग ए‍क सप्‍ताह पहले ही दैनिक जागरण से इस्‍तीफा दिया था. रियाज हाशमी नेशनल दुनिया के साथ अपनी नई पारी समाचार संपादक के रूप में कर रहे हैं. उन्‍होंने अपना कार्यभार संभाल लिया है. रियाज पिछले 21 सालों से दैनिक जागरण के साथ जुड़े हुए थे. नेशनल दुनिया जल्‍द ही मेरठ से लांच होने जा रहा है.

समाचार प्‍लस ने जी न्‍यूज और सहारा को पछाड़ा

यूपी-उत्‍तराखंड बेस्‍ड रीजनल चैनलों की सत्रहवें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. इस सप्‍ताह समाचार प्‍लस यूपी-उत्‍तराखंड चैनल जबर्दस्‍त धमाका करते हुए दूसरे स्‍थान पर पहुंच गया है. समाचार प्‍लस की यह कामयाबी इसलिए भी मायने रखती है कि इस चैनल को लांच हुए अभी मात्र दस महीने ही हुए हैं, लेकिन इस चैनल ने जी न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड और सहारा समय यूपी-उत्‍तराखंड जैसे जमे जमाए और पुराने चैनलों को पछाड़ दिया है.

समाचार प्‍लस तेजी से नम्‍बर एक पायदान की तरफ बढ़ रहा है. चैनल की इस कामयाबी का श्रेय इसकी टीम और विजन को भी जाता है. जिस तरह चैनल की लोकप्रियता यूपी-उत्‍तराखंड में बढ़ रही है उससे लगता है कि जल्‍द ही यह चैनल ईटीवी को पीछे छोड़ते हुए नम्‍बर एक के पायदान पर काबिज हो जाएगा. समाचार प्लस की इस कामयाबी पर न्यूज चैनलों की दुनिया के जानकार इसलिए भी हैरान हैं क्योंकि यह चैनल अभी इन दोनों राज्यों में केवल केबल नेटवर्क पर ही उपलब्ध है. जबकि ईटीवी, जी न्यूज और सहारा समय जैसे चैनल केबल नेटवर्क के साथ-साथ सभी प्रमुख डीटीएच प्लेटफार्मों और टैम के नए बने एलसी-1 मार्केट में भी मौजूद हैं.

सत्रहवें सप्‍ताह में समाचार प्लस दोनों राज्यों में नंबर दो की पोजीशन पर स्थापित हो गया है. माना जा रहा है कि जैसे ही समाचार प्लस डीटीएच प्लेटफार्म पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराएगा, वैसे ही वह चैनल मजबूती से नम्‍बर एक की तरफ बढ़ जाएगा. समाचार प्‍लस के पहले तथा लगभग उसके साथ शुरू हुए साधना न्‍यूज, टीवी100 और नेटवर्क 10 जैसे न्‍यूज चैनल या तो हांफ रहे हैं या फिर दम तोड़ने की कगार पर खड़े हैं वहीं समाचार प्‍लस कम समय में तेजी से ऊपर बढ़ता जा रहा है. टीवी मीडिया इंडस्‍ट्री में ऐसी सफलता कम ही देखने को मिलती है लेकिन एडिटर इन चीफ उमेश कुमार के नेतृत्‍व में यह चैनल तेजी से उड़ान भर रहा है. गौरतलब है कि समाचार प्लस बहुत जल्द अपना राजस्थान चैनल भी लॉन्च करने जा रहा है.

प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस : 133 पत्रकार मारे गए 2012 में

इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्‍यूट के अनुसार वर्ष 2012 में अपना काम करते हुए कम से कम 133 पत्रकार मारे गए। इस लिहाज से यह बहुत हिंसक वर्ष भी साबित हुआ। यह इससे पहले के वर्ष की तुलना में 53 और ज्यादा मौतें थीं।

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्‍स ने यह जानकारी भी दी कि आलोच्य अवधि में 232 से अधिक रिपोर्टर्स अथवा मीडिया कर्मी गिरफ्‍तार भी किए गए। इसके साथ यह भी जान लें कि इन आंकड़ों में उन ब्लागर्स या सिटीजन जर्नर्लिस्ट्‍स की संख्या शामिल नहीं है जिन्होंने अपने बंद समाजों पर रोशनी डालकर खुद की जान को जोखिम में डाल दिया।

विकासशील देशों सें हमें मिनट दर मिनट पर बहुत सी सूचना मिलती है इसलिए हम मीडिया के महत्व को नजरअंदाज करते हैं और इस बात को नहीं सोचते हैं कि वे कौन से लोग हैं जो टैंक या संगीनों के सामने खड़े होने से नहीं घबराते या फिर वे अपने बोलने के अधिकार का इस्तेमाल कर अपनी जान को जोखिम में डालने से नहीं डरते हैं। लेकिन अधिनायकवादी शासकों के सामने सारी दुनिया में एक मुक्त मीडिया इतना बड़ा खतरा पैदा कर देता है कि वे उसकी अंतत: उपेक्षा नहीं कर पाते हैं।

फ्रीलांस पत्रकारों और फोटोग्राफरों की मदद के लिए वेबसाइट लांच

लंदन। ब्रिटेन में एक ऐसी वेबसाइट लांच की गई है जोकि मीडिया ग्रुप्स को फ्रीलांस रिपोर्टर्स और फोटोग्राफरों से सीधे सोर्स वर्क कराने में मदद देगी। न्यूजमोडो नाम की इस वेबसाइट राल एबली के दिमाग की उपज है जोकि पूर्व में ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टर चैनल टेन में एक पत्रकार थे। न्यूजमोडो एक नई और ऐसी वेबसाइट है जोकि फ्रीलांस पत्रकारों और फोटोग्राफरों को अपना काम दुनिया भर के मीडिया संगठनों को सीधे बेचने में मदद करेगी। इस वेबसाइट को ब्रिटेन में लांच कर दिया गया है और इसे ऑस्ट्रेलिया के एक बहुत अमीर टेक कारोबारी का सहयोग हासिल है।

अपनी टेलीकॉम कंपनी 'डोडो' को बेचकर करीब दस करोड़ पाउंड कमाने वाले लैरी केस्लमैन न्यूजमोडो को खरीदने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि प्रोफेशनल कंटेंट की जरूरत वाली मीडिया कंपनियों की संख्या बढ़ रही है जिससे वेबसाइट के सफल होने की उम्मीद है।

एबली ने अब तक चार हजार कांटीब्यूटर्स और करीब 75 मीडिया संगठनों को आकर्षित किया है जिससे साइट का बीटा वर्शन चल रहा है। इतना ही नहीं, उनकी आई टीवी, बीबीसी और ब्रिटेन के समाचार पत्रों के ग्रुपों से बात चल रही है जोकि उनके खरीदने वाले ग्राहकों की सूची में शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा वास्तव में अनुभवी पेशेवर लोगों भी बहुत बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं क्योंकि बहुत सारी नौकरियां समाप्त हो गई हैं और उन्हें काम की जरूरत है।

लेखक तस्वीरों, वीडियो और कहानियों के लिए अपनी कीमत तय कर सकते हैं और इन्हें वेबसाइट पर या एक एप्लीकेशन के जरिए न्यूजमोडो पर स्टोर कर सकते हैं। खरीददार विज्ञापित मूल्य पर उत्पाद को खरीद सकते हैं या उनके अपने एसाइनमेंट का कमीशन ले सकते हैं।

एबली का कहना है, 'न्यूजरूम्स सारी दुनिया में कहीं भी होने वाली घटनाओं के लक्ष्यित कवरेज के लिए एसाइनमेंट्‍स तय कर सकते हैं। एक एसाइनमेंट तय करके वे उन पेशेवर लोगों को इकट्‍ठा कर सकते हैं और उनसे वह समाचार पा सकते हैं जिसकी उन्हें जरूरत है। इसमें आने-जाने का खर्च नहीं होगा, काम तेज और स्पष्ट तौर पर कम कीमत में होगा।'

एबली को यह विचार तीन वर्ष पहले तब आया था जब एक रिपोर्टर के तौर पर वे स्टोरीज की तस्वीरों या वीडियो को अपलोड करने की अधूरी सुविधाओं से निराश हो गए थे। उस समय वे अपनी न्यूज डेस्क से सीधा कवर करते थे। अब यूजन-जेनरेटेड कंटेंट की मांग में भारी बढ़ोतरी को देखते हुए उन्होंने एक सिटीजन जर्नलिज्म एप्लीकेशन विकसित किया है और वे चाहते हैं कि इसका अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाएगा लेकिन न्यूजमोडो का फोकस पेशेवर पत्रकारों पर है। (एजेंसी)

चैनल के इंटरव्‍यू का बतौर सबूत इस्‍तेमाल गलत : सुपीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 16 दिसंबर को राजधानी में पैरामेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में हुए गैंगरेप और उसकी हत्या के मामले की सुनवाई में उसके पुरुष मित्र के इंटरव्यू को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति देने से आज इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश पलटते हुए कहा कि गुजर चुकी लड़की के पुरुष मित्र द्वारा टेलीविजन चैनलों को दिए गए इंटरव्यू को सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने इंटरव्यू को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी। लड़की के दोस्त ने अपने इंटरव्यू में दिल्ली पुलिस की कोताही और लापारवाही उजागर करते हुए कहा था कि अगर पुलिस समय पर आ गई होती तो छात्रा की जान बचाई जा सकती थी। उसने कहा था कि गैंगरेप के बाद आरोपियों ने दोनों को बस से बाहर फेंक दिया था। उन्हें राहगीरों के अलावा पुलिस से भी समय पर मदद नहीं मिली थी। लड़के ने अपने इंटरव्‍यू में पुलिस समेत समाज की भी पोल खोली थी।

दैनिक जागरण, आई नेक्‍स्‍ट एवं मिड डे को इनमा अवार्ड

न्यूयॉर्क। जागरण समूह के तीन अखबारों ने इंटरनेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन [इनमा] के तीन श्रेणियों के पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया। यह पहली बार है जब किसी समूह के तीन अखबारों को एक साथ यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं। यहां टाइम्स स्क्वायर के मैरियट मा‌र्क्वस में आयोजित इनमा अवार्ड-2013 के समारोह में जागरण समूह के हिंदी अखबार दैनिक जागरण, युवाओं के अखबार आई नेक्स्ट और अंग्रेजी दैनिक मिड डे को पुरस्कारों से नवाजा गया।

रीडरशिप-यूसेज ऑफ द प्रिंट पब्लिकेशन श्रेणी में दैनिक जागरण को दूसरा पुरस्कार दिया गया। यह पुरस्कार झारखंड में इसके अभियान 'और कितना वक्त चाहिए झारखंड को' के लिए दिया गया। इनमा पुरस्कारों की इस प्रतियोगिता में अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, कनाडा, स्वीडन, डेनमार्क, पाकिस्तान सहित 87 प्रविष्टियां थीं।

दैनिक जागरण के इस अभियान में झारखंड के लोगों की भावनाओं के साथ यहां के सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिकों, संस्कृतिकर्मियों, प्रबुद्धों, छात्र-छात्राओं,महिलाओं, युवाओं की सशक्त भागीदारी थी। इस दौरान दैनिक जागरण के माध्यम से जो बातें आईं उस पर निर्णायकों ने गौर करते हुए इसे सर्वोत्तम अभियान बताया, जिसमें एक गंभीर मुद्दे पर पूरे राज्य के लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी थी। इससे पहले भी दैनिक जागरण को न्यायिक सुधार जैसे अभियान के लिए इनमा पुरस्कार मिल चुका है।

दैनिक जागरण के अलावा समूह के दो अन्य अखबारों आइ नेक्स्ट और मिड डे ने भी इस प्रतियोगिता में पुरस्कार जीते। एडवर्टाइजिंग सेल्स एंड रिटेंशन श्रेणी में आई-नेक्स्ट को दूसरा और डिजिटल ऑडिएंस यूसेज एंड एंगेजमेंट श्रेणी में मिड डे को भी दूसरा पुरस्कार मिला। (जागरण)

मैक्सिको में लापता हुआ एक पत्रकार

समाचार एजेंसी ईएफई के मुताबिक राज्य सुरक्षा के प्रवक्ता जीसस करांजा ने बताया कि जोस गेराडरे पाडिला ब्लैनक्वेट नाम का यह शख्स मंगलवार को राजधानी साल्टिलो से गायब हुआ है। करांजा ने कहा कि पाडिला के मित्र और सह कार्यकर्ताओं ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इस बात की जानकारी दी थी। बुधवार को पत्रकार के परिजनों ने उसके लापता होने का मामला दर्ज करा दिया है।

गौरतलब है कि पाडिला स्थानीय रेडियो 'ग्रैंड डे कोवाविला' के लिए काम करता है। कुछ समय पहले ही इस रेडियो के निदेशक को भी कई धमकियां मिली थी और उनके साथ मारपीट की गई थी। कोवाविला सार्वजनिक सुरक्षा के सचिव जोस गेराडरे विलार्रियल ने मीडिया को बताया कि राज्य अभियोजकों द्वारा पाडिला की खोज की जा रही हैं।

उन्होंने कहा, "जांच और लापता लोगों का पता लगाने वाले उप अभियोजक के कार्यालय ने पाडिला की खोज के लिए तुरंत ही एक दल का गठन किया है और इस दल की हर संभव जरूरत को पूरा करने में हम पूरा सहयोग करेंगे।"

तेज की चैनल हेड पूनम शर्मा का इस्‍तीफा

टीवी टुडे समूह से खबर है कि तेज चैनल की हेड पूनम शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. फिलहाल वे नोटिस पीरियड पर चल रही हैं. पूनम ने तेज से इस्‍तीफा देने के कारण को व्‍यक्तिगत बताया है. वे लंबे समय तक टीवी टुडे समूह से जुड़ी हुई हैं. हालांकि अभी ये पता नहीं चल पाया है कि वे अपनी नई पारी किसी अन्‍य संस्‍थान से शुरू करेंगी या फिर ब्रेक लेंगी. पूनम की गिनती तेजतर्रार महिला पत्रकारों में होती है. 31 मई को तेज में उनका आखिरी दिन होगा.

मैं पागल नही हूं…

एक युवक चिल्‍ला-चिल्‍लाकर कह रहा था, मैं पागल नहीं हूं। मानवीय संवेदनाएं किस प्रकार मर गयी हैं अनिल के मामले में। सम्‍मानित साथियों। आज वाराणसी रोडवेज बस स्‍टैण्‍ड के पास यह युवक मुझे बेडियों में जकडा मिल गया। मैने रूककर उनसे पूछा कि आपको इस प्रकार पैरों में मजबूत लोहे की बेडी क्‍यों डाली गयी है, तो उनका जबाब था कि उपर वाले की शायद यही मर्जी है। मुझे गांव के लोगों ने पागल बनाकर ये बेडी पैरों में डाल दिया है जिससे हमें चलने के साथ नित्‍य क्रिया करने व पूरी दिनचर्या में परेशानी होती है। बताने वाला यह युवक शान्‍त भाव से पढे लिखे लोगों की तरह जबाब खडी हिन्‍दी में दे रहा था। पूछने पर अपना पता जौनपुर जिले के एक गांव का बताया। कहा कि एक केस में मुझे फर्जी फंसाया गया था और जिसमें सजा भी हुयी। सजा काटकर आया तो विपक्षियों ने मानसिक चिकित्‍सालय में दिखाकर पागल घोषित करा दिया। अब चिल्‍ला-चिल्‍लाकर सबसे कहता हूं कि मैं पागल नहीं हूं तो कोई मानता नहीं। मैने कहा कि आप जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक से क्‍यों नहीं मिलकर गुहार लगाते हैं तो उनका कहना था कि गया तो कई बार, किन्‍तु उनके सुरक्षा कर्मी हमें मिलने ही नहीं देते। मैने अपने कुछ मित्रों को उनके साथ लगा दिया है जो वाराणसी के जिलाधिकारी/पुलिस अधीक्षक से उन्‍हें मिलवाकर उनकी बेडी हटवाने का कार्य करेंगे। अनिल के मानव अधिकार हनन के लिये किसे दोषी बताया जाय। समाज के लिए यह एक बडा प्रश्‍न है। रिपोर्ट-ब्रजभूषण दूबे, सामाजिक कार्यकर्ता गाजीपुर,9452455444

राजस्‍थान सरकार का पत्रकारों को एक और तोहफा

चुनाव से पहले राजस्‍थान सरकार पत्रकारों पर जमकर कृपा बरसा रहा है. कुछ दिन पहले ही सरकार ने पांच सौ से ज्‍यादा पत्रकारों को सस्‍ती दर पर भूमि आवंटित किया है. अब सरकार ने पत्रकारों के लिए विशेष आवासीय योजना को अब नगरपालिका, नगर परिषद, नगर निगम और राजस्थान आवासन मंडल के लिए भी लागू कर दिया है. बार-बार स्वीकृति नहीं लेनी पड़े इसके लिए भूमि निष्पादन नियमों में भी संशोधन किया गया है.

अब आप स्थानीय स्तर पर विशेष योजना बनवाकर पत्रकार साथियों को आरक्षित दर की पचास प्रतिशत पर भूखंड दिए जा सकेंगे. अब इसे तहसील स्‍तर पर भी लागू किए जाने वाला है.

पत्रिका के ब्‍यूरोचीफ पर जानलेवा हमला करने वाला पार्षद पुलिस पकड़ से दूर

रायगढ़। पत्रिका के ब्‍यूरोचीफ प्रवीण त्रिपाठी पर जानलेवा हमला करने वाला भाजपा पार्षद आशीष ताम्रकार अब भी पुलिस पकड़ से बाहर है. इसकी वजह से पत्रकार पुलिस प्रशासन से नाराज हैं. पुलिस पर दो तरफा दबाव बना हुआ है. एक तरफ पत्रकार हमलावर की गिरफ्तारी के लिए सात दिन का समय दे रखे हैं तो दूसरी तरफ सत्‍ता पक्ष से जुड़े लोग पार्षद के पक्ष में लामबंद हो रहे हैं. हालांकि पुलिस आरोपी के जल्‍द से जल्‍द गिरफ्तार होने की बात कही है, परन्‍तु अब तक आशीष पुलिस गिरफ्त से दूर है.

गौरतलब है कि पत्रकारों के अल्‍टीमेटम के छह दिन बीत चुके हैं. लेकिन पुलिस प्रवीण त्रिपाठी पर जानलेवा हमला करने के आरोपी आशीष ताम्रकार को खोज नहीं पाई है. दूसरी तरफ एसपी राहुल भगत ने आशीष का पक्ष लेकर मिलने पहुंचे महापौर महेंद्र चौहथा समेत तमाम पाषर्दों को बैरंग वापस लौटा दिया. आरोपियों की गिरफ्तारी व पार्टी से निष्कासन की मांग पत्रकार संघ कर रहा है, लेकिन अब तक न तो आरोपी पार्षद गिरफ्तार हो सका है और ना ही भाजपा के आलाकमान ने उसे निष्कासित किया है.

डीडी न्‍यूज ने किया धमाका, एबीपी और इंडिया न्‍यूज को फायदा

सत्रहवें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. इस सप्‍ताह टॉप टेन के ज्‍यादातर चैनलों को नुकसान उठाना पड़ा है. एबीपी न्‍यूज, इंडिया न्‍यूज और डीडी न्‍यूज को फायदा हुआ है. लाइव इंडिया भी इस सप्‍ताह टॉप टेन में वापस आ गया है. इसमें सबसे ज्‍यादा चौकाने वाला रिजल्‍ट डीडी न्‍यूज ने दिया है. उसे इस सप्‍ताह 3.7 अंकों का फायदा हुआ है. डीडी न्‍यूज ने इस सप्‍ताह आईबीएन7 तथा एनडीटीवी को भी पीछे छोड़ दिया है.

आजतक इस सप्‍ताह भी नवम्‍बर वन के स्‍थान पर काबिज है. जबकि एबीपी ने दूसरे नम्‍बर पर मौजूद इंडिया टीवी से अपनी दूरी घटा ली है. इस सप्‍ताह इंडिया न्‍यूज को भी फायदा हुआ है. इंडिया न्‍यूज की टीआरपी फिर बढ़ रही है और वह तेज और एनडीटीवी के नजदीक पहुंचता दिख रहा है. अन्‍य चैनलों के स्‍थानों में कोई खास परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. सोलहवें सप्‍ताह की टीआरपी इस प्रकार है….

WK 17 2013, (0600-2400)
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मेरी और पत्रकार राजेंद्र सिसोदिया की किस मामले में है पेशी?

एसीजे (जेडी) द्वितीय की अदालत में मेरी पेशी होगी। इस आशय का समन (पेशी वारंट) लेकर एक पुलिस कर्मी आज सुबह देशधर्म कार्यालय में आया था, जिसमें 8 मई 2013 को एसीजे (जेडी) द्वितीय की अदालत में पेश होने का उल्लेख है। सवाल उठता है कि किस मामले में है पेशी? ऐसा क्या अपराध किया?

वाद संख्या 307/2012 धारा 504/506 में वादी राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट ने 5 लोगों को अभियुक्त बनाया है, इनमें मैं (देवेश अवस्थी पुत्र स्व. रामशरण अवस्थी निवासी लालपुरा इटावा) व पत्रकार राजेन्द्र सिसोदिया पुत्र गंगाराम निवासी गाड़ीपुरा इटावा शामिल हैं। तीन अन्य हैं शिवमंगल यादव, बृजमोहन और अनिल कुमार। इस तरह हम पांचों की पेशी है। मामला क्या है? हम किसी को कुछ पता नहीं। किन्तु यह सर्वविदित है कि वादी राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट चर्चित मंजूकांड मुकदमा नं. 702/11 का नामजद आरोपी हैं, जिसमें मैं (देवेश शास्त्री), शिवमंगल यादव व अनिल कुमार गवाह हैं।

मंजूकांड मुकदमा नं. 702/11 के वादी व गवाहों तथा उनके मिलने जुलने वालों को फर्जी मुकदमों में फंसाने की कवायद में लगे वकील साहब (राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट) द्वारा फिलहाल यह चौथा मुकदमा है, जिसमें मेरी पेशी होनी है, वकील साहब ने मुहल्ले में अफवाह उड़ानी तेज कर दी है कि 8 तारीख को सलाखों के अंदर कर दिया जायेगा।

उल्लेखनीय है कि 04.08.2011 को राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट के अनुज धर्मेंन्द्र कुमार वर्मा की दूसरी पत्नी श्रीमती मंजू को मौत के घाट उतारकर शव को गायब कर दिया गया। मृतका के पिता श्री बंशीलाल पुत्र इनेमल निवासी इंदौर (मध्य प्रदेश) ने इटावा कोतवाली में श्री रामबाबू वर्मा (ससुर), श्री रमाकांत वर्मा, श्री राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट (जेठ), श्री धर्मेन्द्र कुमार वर्मा (पति), बसंत व कैंका वर्मा (सौतेले पुत्र) के खिलाफ अभियोग मु. नं. 702/2011 धारा 364 में पंजीकृत कराया।
यहीं से शुरू हुआ तथाकथित वकील राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट का गोरखधंधा –

1- अनुच्छेद 156 (3) के तहत मुकदमा नं 702/2011 के कुछ गवाहों व उनके साथियों के खिलाफ अपनी भाभी श्रीमती लता वर्मा पत्नी रमाकान्त के माध्यम से डकैती का फर्जी मुकदमा नं 13/2012 धारा 395, 397 में दर्ज कराया, जो कई दौर की विवेचना में फर्जी पाया गया।

2- अनुच्छेद 156 (3) के तहत मुकदमा नं 702/2011 के वादी श्री बंशीलाल पुत्र इनेमल निवासी इंदौर (मध्य प्रदेश) व उनके परिजनों को नवजात मृत-शिशु की हत्या के फर्जी मुकदमा नं 332/2012 में उलझाने का प्रयास किया, जो विवेचना में फर्जी पाया गया।

3- यह कि वर्ष 2012 की होली पर मेरे घर में श्री राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट की ओर से ईंट पत्थर फेंके गये तथा मुकदमा नं. 702/11 के अन्य गवाहों के यहां उक्त वकील के परिजनों ने जाकर मारपीट की, जब हम लोगों ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को प्रार्थनापत्र दिये तो उक्त वकील ने प्रशासन को गुमराह करते हुए हम सभी पीड़ितों को शांतिभंग की आशंका की धारा 107/116 में पाबंद करवा दिया।

4- राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट ने हार्टपेसेंट अपनी वृद्धा मां की उपचार के दौरान हुई मौत पर फर्जी कहानी गढ़कर अनुच्छेद 156 (3) के तहत मुकदमा नं 702/2011 के मुख्य गवाह मुझ (देवेश शास्त्री) तथा 6 अन्य के खिलाफ मुकदमा नं 587/2012 धारा 141, 304 के तहत दर्ज कराया, जिसकी विवेचना लगभग 6 महीने से जल रही है। उक्त वकील विवेचना पूरी होने से पहले ही दरख्वास्त देकर लगातार जांच हस्तांतरित करवाता चला आ रहा है।

5- वाद संख्या 307/2012 धारा 504/506 में वादी राजेश कुमार वर्मा एडवोकेट ने 5 लोगों को अभियुक्त बनाया है, जिसमें 8 मई 2013 को एसीजे (जेडी) द्वितीय की अदालत में हम पांचों की पेशी होनी है।

!!सत्यमेव जयते!!

देवेश शास्त्री

साहित्यकार/पत्रकार

पत्रकारिता में पेड न्यूज का चलन बेहद शर्मनाक है : अच्‍युतानंद मिश्र

: उपजा ने मनाया मई दिवस : लखनऊ। पत्रकारिता कोई अखबार निकालना नहीं है। इसके लिए वैचारिक प्रतिबद्धता की जरूरत है। वर्तमान में मूल्यों का भारी संकट है और वैचारिक प्रतिबद्धता में कमी आई है और अगर सिद्धांत नहीं रहेंगे तो वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं रहेगी। सौ करोड़ ज्यादा लोगों का भरोसा लोकतंत्र के चारों खंभों पर टिका है, इसमें मीडिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, 100 करोड़ से ज्यादा लोगों की ताकत और आवाज मीडिया है। प्रदेश के कारागार एवं खाद्य रसद मंत्री राजेन्द्र चौधरी बतौर मुख्य अतिथि अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस के असवर पर उप्र जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) एवं लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (एलजेए) के संयुक्त तत्वावधान में राय उमा नाथ बली प्रेक्षागृह में आयोजित मई दिवस कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे।

श्री चौधरी ने कहा कि पिछले 65 वर्षों में वैचारिक हमले हुये हैं जब तक हम पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी नहीं हो जाते तब तक लोकतंत्र को मजबूत नहीं किया जा सकता। डॉ. लोहिया ने कहा था कि बिना व्यवस्था बदले हम न्याय नहीं कर सकते। मूल्यों में बड़ी तेजी से गिरावट आ रही है, लेकिन मूल्यों में गिरावट कोई एक दिन में नहीं आई है यह व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। वर्तमान में पत्रकारिता के सामने भी घोर संकट खड़ा है। लोकतंत्र के चारों खंभों में पत्रकारों की भूमिका बेहद अहम हैं, क्योंकि जो आप लिखते हैं वो शासक को संकेत करती है कि समाज और सत्ता किस दिशा में बढ़ रही है। पत्रकारिता का अतीत समृद्ध है और पत्रकार अगर वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ है तो वो टूट नहीं सकता। समाजवादी पार्टी की सरकार ने हमेशा पत्रकारों की परेशानियों को समझा है और आगे भी जो परेशानियों होंगी उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाएगा।

उपजा के संस्थापक अध्यक्ष अच्युता नन्द मिश्र ने इस अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि मई दिवस आत्म चिंतन का दिन है। भारत में मई दिवस संघर्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज पत्रकारिता के समक्ष कई संकट है। गुलामी के दिनों ने अंग्रेजी हकूमत ने अखबारों का गला घोंटने के लिये कई कानून बनाये थे लेकिन उस वक्त का पत्रकार क्रांतिकारी होता था और पत्रकारों ने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। आजादी के बाद पत्रकारिता राह भटक गई और वो प्रभावी नहीं रह गयी। वर्तमान में सत्ता को प्रभावित करने के लिए पत्रकारिता कई हथकंडे अपना रही है। पत्रकारिता अपने सिद्धांत से क्यों टल गई यह चिंतन का विषय है। पत्रकारिता में पेड न्यूज का चलन बेहद शर्मनाक है। शिकायतें सबसे हैं लेकिन जरूरत आत्ममंथन की है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुये राजकिशोर मिश्र, राज्यमंत्री/अध्यक्ष, भारतेन्दु नाट्य अकादमी ने श्रम दिवस की बधाई और शुभकामनाएं दी और सकारात्मक एंव समाज निर्माण की दिशा में प्रभावी भूमिका निभाने का आह्वान किया। वरिष्ठ पत्रकार एवं पीटीआई के ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी ने कहा कि बाजारवादी ताकतों के प्रभावी होने से पत्रकारों के अधिकारों का हनन बढ़ा है और उनकी दुर्गति हो रही है। मालिकों के दुष्प्रवृत्ति के कारण पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड का गठन नहीं हो पाया है। केन्द्र सरकार सातवां वेतन आयोग लाने वाली और पत्रकारों की भलाई के लिए कोई ठोस पहल केन्द्र और राज्य सरकारें नहीं कर रही हैं। पत्रकार और पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों के साथ उनकी अपनी चिंताएं और मजबूरियां भी हैं लेकिन पत्रकारों की अगली पीढ़ी से अनुरोध है कि वो लोकतंत्र के चौथे खंभे की मान मर्यादा का सम्मान रखेंगे और इस परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करेंगे।

उप्र जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) के अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि पत्रकारिता सत्ता की चेरी न बनें और आवश्यक अधिकार पत्रकारों को मिलें। श्री दीक्षित ने उपजा के गौरवपूर्ण इतिहास और पत्रकारिता की वर्तमान चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने पीजीआई में पत्रकारों को निःशुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। अतिथियों का अभार व्यक्त करते हुये वरिष्ठ पत्रकार दादा पीके राय ने कहा कि सत्ता और पत्रकारिता के बीच लव एण्ड हेट (प्यार एवं नफरत) का रिशता है, दोनों साथ मिलकर समाज और देश को सकारात्मक दशा और दिशा दे सकते हैं। उन्होंने पत्रकारिता की वर्तमान चुनौतियों और पत्रकारों की परेशानियों पर भी प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का शुभांरभ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना से हुआ। इस अवसर पर उपजा के संस्थापक सदस्य वरिष्ठ पत्रकार अच्युता नंद मिश्र जी का नागरिक अभिनंदन अंगवस्त्र एवं श्रीफल देकर किया गया। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय कथक संस्थान, लखनऊ की सचिव सरिता श्रीवास्तव की अवधारणा एवं परिकल्पना पर आधारित नृत्य नाटिका ‘ईदगाह’ का भव्य मंचन कथक संस्थान के कलाकारों द्वारा किया गया। मुख्य अतिथि ने कलाकारों को पुरस्कृत किया। कार्यक्रम का संचालन उपजा के महामंत्री सर्वेश कुमार सिंह एवं कार्यालय मंत्री पं. टीटी ‘सुनील’ द्वारा किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं उपजा के संस्थापक सदस्य दादा पीके राय, वरिष्ठ पत्रकार वीर विक्रम बहादुर मिश्र, उपजा के अध्यक्षा रतन कुमार दीक्षित, महामंत्री सर्वेश कुमार सिंह, कोषाध्यक्ष सत्येन्द्र नाथ अवस्थी, कार्यालय मंत्री पं. टीटी ‘सुनील’ एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद गोस्वामी, अजय कुमार, वीरेन्द्र सक्सेना, तारकेशवर मिश्र, राजीव शुक्ल, अरविन्द शुक्ल लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक मिश्र, महामंत्री भारत सिंह और कोषाध्यक्ष राजेश सिंह के अलावा बड़ी संख्या में पत्रकार एवं गणमान्य लोग मौजूद थे।

विनोद भारद्वाज का तबादला बदायूं, पराशरी को लेकर असमंजस

अमर उजाला, लखीमपुर खीरी से विनोद भारद्वाज का तबादला बदायूं के लिए कर दिया गया है. वे इसके पहले भी बदायूं में रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इसके साथ ही शाहजहांपुर के विवादित ब्‍यूरोचीफ अरुण पराशरी को लखीमपुर खीरी का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है.

अरुण पराशरी शाहजहांपुर में चिन्‍मयानंद के ट्रस्‍ट में भी पदाधिकारी हैं, इसलिए इनका यहां से लखीमपुर खीरी भेजा जाना इनके पर कतरने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि खबर यह भी आ रही है कि पराशरी सेटिंग करके अपना तबादला रुकवाने की कोशिश में जुटे हुए हैं, जबकि काम्‍पैक्‍ट में तैनात कैलाश सिंह शाहजहांपुर आने की कोशिश कर रहे हैं. 

जनसंदेश टाइम्स में खबरों की हो रही हूबहू नकल

जनसंदेश टाइम्स के गोरखपुर यूनिट अंतर्गत संतकबीरनगर जिले की व्यवस्था सुधारने के लिए संपादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने मुकेश पाण्डेय को नया ब्‍यूरो प्रभारी बनाकर भेजा है। लेकिन उनके आने के बाद से ही अखबार का संपादकीय से लेकर विज्ञापन तक की व्यवस्था बिगड़ती चली जा रही है। एक तरफ जहां नए ब्‍यूरो प्रभारी हप्ते में दो दिन ही कार्यालय में हाजिरी लगाते हैं, वहीं खबर की नकल करने में उनसे बड़ा नकलची कोई हो ही नहीं सकता। इसको यहां पर स्कैन कर लगाई गई खबरों से देख कर पढ़ा जा सकता है।

29 अप्रैल को प्रकाशित अमर उजाला की खबर को हुबहू नए प्रभारी ने जनसंदेश टाइम्स के 1 मई के अंक में छाप दिया। इससे यह संकेत मिल रहा है कि प्रबंधन भी संतकबीरनगर कार्यालय से बेखबर होकर जिले में जनसंदेश को बैठाने में लग गया है। सूत्र बताते है कि जनसंदेश टाइम्स कार्यालय में न तो इनवर्टर है और न ही इंटरनेट कनेक्शन। जिससे वहां पर काम करने वाले लोगों को काफी दिक्कतों के बीच काम करना पड़ रहा है।

जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित खबर
अमर उजाला में प्रकाशित खबर, जिसकी नकल की गई है

लड़कियों की इन तस्वीरों में कोई खबर है क्या?

पटना : ‘फुर्सत के पल’ शीर्षक के साथ मोबाइल लिए दो लड़कियों की तस्वीर,…. कैप्शन में कुछ यों कि .. ऐसा लग रहा है कि घर लौटने के दौरान छात्राएं परिवारजनों से बात करती हुई…../ ‘चलो घर चलें’ शीर्षक के साथ तीन लड़कियों की तस्वीर…. कैप्शन में- घर जाने के दौरान बातचीत करने में मशगूल दिखी छात्राएं…./ ‘चलो परीक्षा अच्छी गई’ .. परीक्षा भवन से निकलती खुश-खुश लड़कियों का तस्वीर…../इन तस्वीरों में कोई खबर है क्या?

जी हां इंच- इंच जगह का इस्तेमाल करने वाले प्रिंट मीडिया के पास लड़कियों की तस्वीरों के लिए जगह की कोई कमी नहीं है। फिर चाहे तस्वीर कोई खबर बयान करती हो या नहीं! कोई फर्क नहीं पड़ता! भले ही खबरों के मामले में तस्वीरें के कोई मायने ना हों, ऐसी बेखबरों वाली लड़कियों की तस्वीरें अमूमन रोजाना ही शहर के कथित प्रतिष्ठित अखबार में छापे जाते हैं। गौरतलब यह भी है कि इन तस्वीरों में उनका कोई बयान या बात भी नहीं कही जाती, सिर्फ देखकर अपने मन से अख़बार कोई कैप्शन लगा देता है- ऐसा लग रहा है, ऐसा ही कुछ करती हुई.

यही नहीं “are you our star” के तहत एक अंग्रेजी अखबार द्वारा दिए जाने वाले तस्वीरों (जिसमें पत्र के छायाकार द्वारा ली गई तस्वीर में किसी एक के चेहरे को घेर दिया जाता है और फिर उसे इनाम लेने के लिए बुलाया जाता है।) में अधिकतर (90 फीसदी) लड़कियों/ महिलाओं के समूह की ही तस्वीर होती हैं।

फुर्सत के पल तो लड़कों के भी होते हैं, लड़के भी स्कूल कालेज से लौटते हुए मजे करते हैं, परीक्षा का टेंशन तो उनका भी खत्म होता है … लेकिन बिना खबरों वाली ये तस्वीरें लड़कियों की ही छापी जाती है क्यों? बाकायदा छायाकारों को हिदायत होती है कि शहर के हाई प्रोफाइल गर्ल्स स्कूल व कालेज के बाहर डंटा रहे और छुट्टी के बाद निकलती लड़कियों की तस्वीर ली जाए। छायाकार भी मुस्तैदी से वहां लगा रहता है। छपी हुई प्रति तस्वीर पर भुगतान पाने वाले आज के छायाकार निश्चिंत रहते हैं कि लड़कियों वाली तस्वीर तो छप ही जाऐंगी। मेहनत सफल होगा। छापी गईं अधिकतर तस्वीरें शहर के कुछेक कथित हाई प्रोफाइल गर्ल्स स्कूल व कालेज के बाहर की ही होती हैं। यह तस्वीरों में दिखता भी है और उनके कैप्शन में अक्सर लिखा भी होता है।

आखिर लड़कियों की तस्वीर छापने के पीछे मीडिया की मंशा क्या है? इन बेमतलब की तस्वीरों को छापने में इतनी दिलचस्पी क्यों? क्या प्रबंधन, छायाकारों, संपादकीय विभाग की सोच लड़कियों तक ही सीमित है और उन्हें ऐसा लगता है कि इससे पाठक वर्ग अखबार के प्रति आकर्षित होगा? इन तस्वीरों को छापने के पीछे उनकी कुत्सित सोच साफ दिखती है। इसका मतलब साफ है कि उन्होंने लड़कियों को शोभा की वस्तु समझ लिया है।

यहां एक सवाल और उठता है कि क्या तस्वीरें खींचने और फिर छापने के लिए अखबार ने उन लड़कियों या महिलाओं से इजाजत ली है? यहां अखबार कह सकता है कि तस्वीर छापने को लेकर उन लड़कियों को कोई आपत्ति नहीं रही है। स्वाभाविक है। ‘अखबार में नाम’ को लेकर कोई क्या क्या नहीं कर गुजरता, तो फिर यों ही किसी की तस्वीर छप जाए तो वह भला आपत्ति क्यों कर करेगा? (जब तक कि उसका बेजा इस्तेमाल ना हो) लेकिन अखबारों की सोच क्या है?

यहां प्रिंट मीडिया पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह कभी राह चलते लड़कों, बुजुर्गों, वृद्धों, दबे कुचले वर्ग के लोगों-बच्चों की बिना खबरों वाली कोई तस्‍वीर यों ही क्यों नहीं छापता? वह महिलाओं को शोभा की वस्तु बनाना कब छोड़ेगा?

लेखिका लीना मीडिया मोरचा की संपादक हैं.

एक औरत के संघर्ष की गाथा है नूर ज़हीर की पुस्तक!

: दक्षिण पूर्व एशिया में महिलाओं की व्यथा कथा कहती है यह पुस्तक : पटना। प्रगतिशील लेखक संघ की पटना इकाई के तत्वावधान में स्थानीय केदार भवन के कविवर कन्हैया कक्ष में चर्चित लेखिका एवं समाजिक कार्यकर्ता नूर जहीर के ‘माई गौड इज़ ए वूमन’ का हिन्दी अनुवाद ‘अपना खुदा एक औरत’ पर विचार -गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन ने की तथा संचालन शहंशाह आलम ने किया। इस अवसर पर युवा कवि राजकिशोर राजन ने कहा कि प्रस्तुत पुस्तक एक मुसलमान औरत के खु़द की तकदीर चूनने की कथा ही नहीं है अपितु हर उस औरत की कथा है जो ख़ुदमोख्तार होना चाहती है।

मधेपुरा से पधारे अरविन्द श्रीवास्तव ने नूर ज़हीर से अपनी मुलाकात का हवाला देते हुए कहा कि नूर ज़हीर जब अपनी इस पुस्तक के उर्दू संस्करण प्रकाशित करने संबन्ध में जब लाहौर गई थीं तब वहाँ के साहित्यकार साथियों ने कहा था कि इस पुस्तक का उर्दू संस्करण छपवा देते हैं और फिर ‘तुम भी मरो और हम भी मरते हैं’। चर्चित शायर विभूति कुमार ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि नूर ज़हीर की यह कृति कट्टरपंथी सोच के प्रति गहरे आक्रोश से पैदा हुई है। यह पुस्तक सभी से यह सवाल करती है कि क्या औरत वह खुदा नहीं बन सकती है जो उसे हमेशा से बनना था।

वहीं युवा कवि शहंशाह आलम ने नूर ज़हीर की इस गाथा पर बोलते हुए कहा कि नूर ज़हीर की प्रस्तुत कहीं से अनुदित नहीं लगती बल्कि लगता है कि हम मूल कृति पढ़ रहे हैं। यह कृति सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के बारे में नहीं कहती बल्कि इसी बहाने पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में महिलाओं की व्यथा कथा भी कहती है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में राजेन्द्र राजन ने नूर ज़हीर के संबन्ध में अपनी मुलाकात के कई संस्मरण को साझा किया। उन्होंने कहा कि नूर ज़हीर की इस किताब पर चर्चा करने का अर्थ पूरे स्त्री समाज पर चर्चा करना है। इस अवसर पर राकेश प्रियदर्शी, परमानंद राम, मुकेश तिवारी, चन्द्रमोहन मिश्र तथा मनोज कुमार मिश्र ने भी अपने-अपने विचारों को रखा। धन्यवाद ज्ञापन राजकिशोर राजन ने किया।

डिप्‍टी जीएम बने मुकेश कुमार, अमिताभ, मिथिलेश एवं अजातशत्रु का तबादला

हिंदुस्‍तान, रांची से खबर है कि प्रबंधन ने मुकेश कुमार को प्रमोट करके विज्ञापन विभाग का नया डिप्‍टी जनरल मैनेजर बना दिया है. वे लंबे समय से हिंदुस्‍तान को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इनके नेतृत्‍व में हिंदुस्‍तान की मार्केटिंग टीम मजबूत हुई है. हिंदुस्‍तान से ही दूसरी खबर है कि रांची में तैनात अमिताभ कुमार का तबादला मुजफ्फरपुर के लिए कर दिया गया है.

अमर उजाला, बनारस से खबर है कि सब एडिटर मिथिलेश दुबे का तबादला चंदौली के लिए कर दिया गया है. उन्‍हें अखबार का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. मिथिलेश इसके पहले भी ब्‍यूरोचीफ थे, परन्‍तु कुछ दिनों पूर्व उन्‍हें बनारस बुलाकर अजातशत्रु चौबे को चंदौली भेजा गया था. अब अजातशत्रु को बनारस बुला लिया गया है. 

साधना न्‍यूज के रिपोर्टर ने वसूले रुपये, पुलिस ने घंटों हाजत में बैठाया

साधना समूह में केवल मालिक और सीनियर ही ऐन केन प्रकारेण पैसा कमाने की कोशिश नहीं करते हैं बल्कि उन्‍होंने ऐसे स्ट्रिंगर और रिपोर्टर भी रख छोड़े हैं, जो पैसा कमाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. लाशों पर भी पैसा बना सकते हैं. ऐसा ही एक मामला भागलपुर में सामने आया है. साधना न्‍यूज भागलपुर के रिपोर्टर विजय कुमार तथा उनका कैमरामैन सुबोध इसी वसूली के चलते घंटों लाकअप में बैठाए गए, जब उन्‍होंने पैसे वापस किए तब जाकर पुलिस ने उन्‍हें बाहर निकाला. इस दौरान साधना न्‍यूज और उनके लोगों की जमकर किरकिरी हुई.

जानकारी के अनुसार भागलपुर में एक व्‍यक्ति ने जहर खाकर आत्‍महत्‍या कर ली. सूचना मिलने पर साधना न्‍यूज के विजय कुमार सिन्‍हा और सुबोध कुमार पहुंचे. इन लोगों ने मृतक के छोटे भाई को फंसने-फंसाने की धमकी देकर चार हजार रुपये की मांग की. एक तो भाई की मौत दूसरे इन दोनों के हड़काए और धमकाए जाने पर मृतक का छोटा भाई काफी डर गया, जिसके बाद इन दोनों ने उससे चार हजार रुपये वसूली लिए और निकल गए.

इस बीच मौत की सूचना पर तमाम परिजन भी पहुंच गए. मृतक के परिजनों में एक पत्रकार भी था, जब उसे इस बात की सूचना मिली कि साधना न्‍यूज के पत्रकार ने वसूली की है तो उसने विरोध जताना शुरू किया. इन लोगों को ढूंढा गया, तब तक ये लोग पूरी तरह नशे में हो चुके थे. मृतक के परिजन इन लोगों को मारने-पीटने की भी तैयारी कर रहे थे, लेकिन किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस मौके पर पहुंची तथा किसी तरह इन दोनों को भीड़ से बचाकर थाने ले आई.

दोनों पत्रकारों को थाने के हाजत में बंद कर दिया गया. तीन घंटे तक ये दोनों हाजत में बंद रहे. इस दौरान इन दोनों की जमकर किरकिरी हुई. भीड़ में तमाम लोगों ने इन दोनों के साथ चैनल के बारे में भी अपशब्‍द कहे. बाद में स्‍थानीय मीडियाकर्मियों के हस्‍तक्षेप के बाद दोनों ने वसूली गई रकम वापस की, तब जाकर पुलिस ने इन्‍हें हाजत से बाहर निकाला. हालांकि इस दौरान साधना न्‍यूज के इन दोनों होनहारों की जमकर किरकिरी हुई. स्‍थानीय अखबारों ने भी इस खबर को प्रकाशित किया.

हालांकि साधना न्‍यूज के रिपोर्टर विजय कुमार सिन्‍हा के बारे में साधना के वाइस प्रेसिडेंट शैलेंद्र सिंह का कहना है कि वो उनके चैनल से जनवरी में ही इस्‍तीफा दे दिया था. अब उनका साधना न्‍यूज से कोई लेना देना नहीं है.

पत्रकारों के हमलावरों की गिरफ्तारी ना होने से नाराज मीडियाकर्मियों ने दिया धरना

बरनाला शहर में भास्‍कर के दो पत्रकारों हिमांशु दुआ और जतिन्द्र देवगन पर जानलेवा हमला करने के आरोपियों को नौ दिन बाद भी गिरफ्तार न करने पर जिले के समूह पत्रकारों ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर वीरवार को डीसी कार्यालय के समक्ष धरना दिया। इस दौरान लोगों ने पुलिस-प्रशासन व पत्रकारों पर हमला करने वालों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। डीसी इंदू मलहोत्रा ने धरना स्थल पर पहुंच कर पत्रकारों से ज्ञापन लिया।

एक्शन कमेटी के सदस्य जगीर जगतार ने कहा कि अगर आरोपियों को तीन दिन के भीतर गिरफ्तार नहीं किया गया और दर्ज मामले से राजनीतिक दबाव के कारण कातिलाना हमले की धारा को हटाने का प्रयास किया गया तो संघर्ष तेज किया जाएगा। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गठित एक्शन कमेटी अन्य संगठनों के साथ बैठक कर पांच मई को अगले संघर्ष का एलान करेगी। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी कि पांच मई तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई तो सिविल व पुलिस प्रशासन के कार्यक्रमों का बायकाट किया जाएगा।

एक्शन कमेटी के नेता जगसीर संधू, विवेक सिंधवानी, हरिंदर पाल निक्का, राजमहेंदर सिंह, यादविंदर तपा ने कहा कि मीडिया की आजादी पर हमला करने वालों के जुल्म के खिलाफ समूह पत्रकार डटकर लड़ाई लड़ेंगे। भारतीय किसान यूनियन (डकौदा) के प्रांतीय नेता मनजीत धनेर, इंकलावी केंद्र के प्रांतीय नेता नरायण दत्त ने कहा कि अगर लोगों के संघर्ष की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने वाले मीडिया कर्मी सुरक्षित नही हैं तो आम लोगों का क्या हाल होगा। उन्होंने कहा कि यह मामला वह राज्य के सत्रह किसान मजदूर संगठनों की बैठक में भी विचार के लिए रखेंगे।

इस मौके पर पत्रकार सुखचरण सुखी,जतिंदर धनौला,मदन लाल गर्ग,अवतार अणखी ने भी संबोधित किया। इस मौके पर एक्शन कमेटी के सदस्य नील कमल, जीवन रामगढ़, रविंदर रवि, आशीष पालको, निर्मल सिंह ढिल्लो, बाल कृष्ण गोयल विशेष तौर पर उपस्थित रहे। मंच संचालन पत्रकार सतीश सिंधवानी ने किया।

गौरतलब है कि पत्रकार हिमांशु दुआ और जतिन्द्र देवगन ने बरनाला के आरएसएस पदाधिकारी और पंजाब एग्रो के इंस्पेक्टर राम कुमार ब्यास पर 5200 बोरी गेहूं खुर्द-बुर्द करने के आरोप की खबर छापी थी। तभी से वह इनसे रंजिश रखता था। जिसके चलते राम कुमार ब्यास ने बुधवार रात दोनों पत्रकारों को साजिश के तहत एक दुकान पर बुलाया और इन्हें बंधक बनाकर मारपीट की।

संदीप विश्‍नोई बने अमर उजाला, अलीगढ़ के यूनिट हेड

नेशनल दुनिया के सीओओ पद से इस्‍तीफा देने वाले संदीप विश्‍नोई ने अपनी नई पारी अमर उजाला के साथ शुरू की है. उन्‍हें अमर उजाला में अलीगढ़ का यूनिट हेड बनाया गया है. उनका पद जनरल मैनेजर मार्केटिंग का होगा. सिम्‍बोसिस इं‍स्‍टीट्यूट, पुणे से पीजीडी करने वाले संदीप विश्‍नोई तेरह सालों से मीडिया में सक्रिय हैं. नेशनल दुनिया से पहले वे दिल्‍ली प्रेस, दैनिक भास्‍कर समूह, लोकमत मीडिया तथा साकाल मीडिया के साथ लंबे समय तक काम कर चुके हैं. पिछले दिनों ही उन्‍होंने नेशनल दुनिया को अलविदा कहा था.

‘देख तमाशा’ अनुरंजन बाबा के ‘शगुन’ का!

तहसीन मुनव्वर ने अपने 'देख-तमाशा' कालम में इस बार अनुरंजन बाबा और उनके नए नवेले शगुन चैनल को विषय बनाया है. इस कालम में अनुरंजन का कार्टून बड़ा जोरदार है.. देखें और पढ़ें…

((अगर पढ़ने में नहीं आ रहा हो तो उपरोक्त कालम पर ही क्लिक कर दें))

‘अमर भारती’ अखबार में फुल पेज प्रकाशित एक कार्टून (देखें कार्टून)

अमर भारती साप्ताहिक अखबार के नए अंक में चीन की घुसपैठ पर विशेष और तथ्यपरक कवरेज दी गई है. आखिरी पेज यानि पेज संख्या- 16 पर फुल पेज का कार्टून प्रकाशित किया गया है, जो इस प्रकार है…

सरबजीत हत्या प्रकरण : स्वाभिमान नहीं बचा इन बेशर्म राजनेताओं में!

सरबजीत अब तुम फिर इस देश में जन्म मत लेना। यह देश अब तुम्हारे लायक नहीं रहा। अब यहां सरबजीत जैसों की जरुरत भी नहीं। यहां के लोगों ने शायद तय कर लिया है कि हमें बेईमानों, भ्रष्टाचारियों और नपुसंक लोगों का ही नेतृत्व चाहिए। इसलिए सरबजीत हमें ऐसे लोग नहीं चाहिए जिनकी जान की रक्षा हमारा देश नहीं कर सके। हमको आदत पड़ गयी है भीख मांगने की, गिड़गिड़ाने की इसलिए हम नहीं चाहते कि हमारे यहां और सरबजीत पैदा होकर हमें शर्मिंदा करे।

दरअसल हमारे देश के हुक्मरानों को गलतफहमी हो गयी है। उन्हें लगता है कि वह कुछ भी कहेगे इस देश की जनता उसे स्वीकार कर लेगी उसका प्रतिरोध नहीं करेगी। उनकी बात कुुछ हद तक सही भी है। दुनिया में कोई भी, कभी भी हमारे देश को बेइज्जत करके चला जाता है। उसे पता है इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे देश के कर्ताधर्ता भूल चुके हैं कि हमारी भी कोई इज्जत है। उनका स्वाभिमान जैसे शब्द से नाता खत्म हो चुका है। अगर ऐसा नहीं होता तो पाकिस्तान की इतनी औकात नहीं थी कि वह इतनी बेरहमी से सरबजीत की हत्या कर देता। राजनेताओं की तरह अफसरों की भी हालत वैसी ही हो गयी है।

अगर यह नहीं होता तो घायल पड़े सरबजीत के लिए काबिल नौकरशाहों की तरफ से सरकार के पास यह राय नहीं आती कि सरबजीत का इलाज किसी तीसरे देश में कराया जाए। अगर इनमे जरा सा भी स्वाभिमान बचा होता तो अकड़ कर कहा जाता कि सरबजीत का इलाज भारत में करवाओ। जोश से कहा गया होता कि सरबजीत को कुछ हो गया तो पाक की खैर नहीं। अगर हमारे हुक्मरानों में इतना हौसला आ गया होता तो जरदारी तो क्या उनके खानदान के भी किसी आदमी की इतनी हैसियत नहीं थी कि वो सरबजीत का बेरहमी से कत्ल करते।

अब हमारे माननीय मंत्री भी कह रहे हैं कि सरबजीत की बेरहमी से हत्य कर दी गयी। उनका यह भी कहना है कि जेल में बंद सरबजीत पर जानबूझ कर हमला करवाया गया। अगर पाकिस्तान कसाब की फांसी के बदले एक बेकसूर भारतीय की जान ले सकता है तो हम जेलो में बंद पाकिस्तान आतंकियों को क्यों अपने रिश्तेदारों की तरह दुलारने में लगे हैं।  क्या दुनिया के सारे संविधान और मानवाधिकार के नियम सिर्फ पाकिस्तान जैसे देशों के लिए बने हैं, जो आतंकियों की फैक्ट्री चलाये और बाकी दुनिया उनके आतंक से परेशान होती रहे।  सरबजीत पाकिस्तान की जेल में सुरक्षित नहीं रहे और हमारे यहां कसाब को बिरयानी खिलाने में और उसकी सुरक्षा, सत्कार में ही करोड़ों खर्च हो गये।

यह मानवाधिकार का पाठ है या फिर कायरता का! पाकिस्तान ने तो हमें उस दिन ही कायर समझ लिया होगा जब हम डर के कारण अफजल गुरू का शव तक उसके परिवार वालों को नही सौंप पाये। काश हमारा नेतृत्व इतना साहस वाला होता कि वह अफजल गुरू के शव को जम्मू भेजता और साफ तौर पर कहता कि आतंकियों की मदद करने वालों और उनका साथ देने वालों का इलाज यह देश करना जानता है तो जम्मू में पत्ता भी नहीं खड़कता। मगर हमेशा मुंह बंद रखने वाला हमारे प्रधानमंत्री ने इस देश की मान मर्यादा और हिम्मत को भी मानो बंद कर दिया है।
जब सरबजीत की मृत्यु की खबर भारत आयी तो लोकसभा में भाजपा के सांसदों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाकर संसद नहीं चलने दी। अच्छा है इतना आक्रोश दिखना भी चाहिए। मगर यहां भी हालात कांग्रेस जैसे ही है। फर्क सिर्फ सत्ता का ही है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो बढिया स्काच पीने के शौकीन रहे हमरे पूर्व प्रधानमंत्री, लाहौर बस यात्रा जैसे लुभावनी बातें नहीं करते और देश को कारगिल तोहफे में नहीं मिलता। अगर भाजपा इतनी ही राष्ट्र्रवादी पार्टी होती तो उसके विदेश मंत्री उन आतंकियों को भारी रकम के साथ कंधार छोडने नही जाते जो आतंकी आज भी पाकिस्तान में बैठकर हमारे देश में आतंक की नई परिभाषायें लिख रहे है। अगर उस समय की सरकार भी शहीदों को सम्मान देना जानती तो उसका रक्षा मंत्री अपने घर में बैठकर कारगिल में शहीद हुए सैनिकों के कफन और ताबूत में कमीशन खाने की बात नहीं कर रहा होता।

पाकिस्तान लगातार अपने नापाक इरादों से भारत में दहशत फैलाता रहा है। देश के विभिन्न भागों में बम विस्फोटों के बाद मिले सबूत इस बात के गवाह हैं कि पाकिस्तान नहीं चाहता कि भारत में कभी भी शांति रहे। मगर हमारा देश इन सबूतों को लेकर अमेरिका के सामने रोता रहता है कि माई बाप देखो फिर पाकिस्तान ने हमारे यहां बम फोड़ दिया। सवाल यह है कि क्या अमेरिका की तरह हम कभी इस हैसियत में नहीं आ पायेंगे कि पाकिस्तान को समझा सकें कि हमारे देश की तरफ आंख उठाने के क्या घातक परिणाम होते हैं। ऐसा करने के लिए दृढ़ शक्ति चाहिए जो हमारे नेतृत्व के पास नहीं है।

उत्तर कोरिया उत्तर प्रदेश से भी कहीं ज्यादा छोटा देश है। मगर उसने अमेरिका को ऐसी आंख दिखाई है कि उसे भी कंपकपी आ गयी। भारतीय नागरिकों की हत्या करके इटली चले गये दो सैनिकों को वापस बुलाने में सरकार की जान सूख गई। और वह वापस भी सिर्फ इसी शर्त पर आये कि उन्हों फांसी नहीं होगी और अपने दूतावास या पांच सितारा सुविधाओं से सम्पन्न जगह पर रहेंगे। छोटे-छोटे देश और उनमें इतना गजब का आत्म विश्वास।

हम 125 करोड़ की आबादी का देश होते हुए भी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाते तो क्या गलती सिर्फ राजनेताओं की ही है हमारी नहीं।  पाकिस्तान ने 125 करोड़ लोगों के मुंह पर जो तमाचा मारा है उसका जवाब देने का वक्त आ गया है। हम सबको अपने-अपने स्वर से अपने-अपने तरीके से पाकिस्तान को ऐसा करारा जवाब देना चाहिए जिससे फिर कभी पाकिस्तान इतनी हिम्मत न कर सके। मगर इस बार भी हमने यह काम अपने राजनेताओं पर ही छोड़ दिया, तो वह अपना बेशर्मी भरा हुआ जोशीला भाषण देंगे और कुछ दिनों बाद फिर हमको बेईज्जत करने के लिए पाकिस्तान कोई नयी साजिश रच रहा होगा।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदी वीकली वीकएंड टाइम्स के प्रधान संपादक हैं.

सीबीआई उर्फ कांग्रेस बचाओ इनवेस्टीगेशन!

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी इसी शैली पर काम कर रही है। आने वाले दिनों में यही शैली चुनावी मुद्दा भी बनने जा रही है। सीबीआई पर लगे दागों से उत्तर प्रदेश के दो सबसे बड़े दल बेहद खुश हैं। क्योंकि केन्द्र में शासन कर रही सरकार सीबीआई के डर से ही लंबे समय से क्षेत्रीय पार्टियों को आतंकित करती रही है। करीब आ रहे चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियां इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने जा रही हैं।

दरअसल सीबीआई केन्द्र सरकार के लिए हमेशा मारक हथियार रहा है। सीबीआई का गठन करते समय मूल भावना यह थी कि देश में बड़े अर्थिक अपराधों या अन्य बड़े अपराधों पर यह विशेष रूप से निगाह रखेगी और इसके सार्थक परिणाम देखने को मिलेंगे। मगर कुछ समय बाद ही देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी अपने मकसद से भटक गयी। सीबीआई के निदेशक के रूप में उसी व्यक्ति का चयन किया जाने लगा जो सत्ता प्रतिष्ठानों के करीब हो। लिहाजा सीबीआई सिर्फ केन्द्र सरकार के हाथों की कठपुतली बनकर रह गयी। सीबीआई का दुरूपयोग हर उस सरकार ने किया जो केन्द्र में शासन कर रही थी। नतीजा यह हुआ कि सीबीआई की निष्ठायें भी राजनीतिक रूप लेती चली गयीं।

कोयला घोटाले में सीबीआई की इसी छुपी हुई हकीकत को सबके सामने ला दिया। इस घोटाले की जांच सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सौंपी गयी थी। देश की सबसे बड़ी अदालत ने यह भी आदेश दिये थे कि इस मामले की सीधी रिपोर्ट उसे की जाये। मगर जब यह सूचना लीक हुई कि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में दी जाने वाली रिपोर्ट को शेयर किया है तो हंगामा मच गया। इससे पहले सरकार की तरफ से पेश हुए सालीसीटर जनरल हरीन रावल सुप्रीम कोर्ट में कह चुके थे कि यह रिपोर्ट किसी को नहीं दिखाई गयी है।

तब तक देश के कानून मंत्री और खुद सीबीआई के निदेशक को सपने में भी अनुमान नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में इतना गंभीर रूख अपना सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जब देखा कि सीबीआई किस तरह उन्हीं लोगों पर भरोसा कर रही है जिनके खिलाफ वह जांच कर रही है तो उसके तेवर भी तीखे हो गये।

सुप्रीम कोर्ट ने न केवल सीबीआई को फटकारा बल्कि पूरी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि इस तरह के फैसले से पूरी बुनियाद ही हिल गयी है। जाहिर है केन्द्र सरकार के विरूद्ध ऐसी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने पहले कभी नहीं की थी। इस टिप्पणी के बाद हंगामा मच गया। भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया। भाजपा ने संसद प्रधानमंत्री और कानून मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर ठप कर दी। भाजपा को भी लगता था कि यह बिलकुल सही मौका है जब केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। सीबीआई के बहाने उसने न सिर्फ प्रधानमंत्री को बल्कि पूरी सरकार को ही बता दिया कि इस मसले पर वह किसी प्रकार का समझौता करने को राजी नहीं है।

भाजपा सीबीआई को स्वायत्त बनाना चाहती हो ऐसा भी नहीं है। इसके पीछे उसका भी गणित जायज है। वह जानती है कि अगर वह सत्ता में आ गयी तो सीबीआई उसके लिए भी वही काम करेगी जो इस समय कांग्रेस के लिए कर रही है। जाहिर है भाजपा का दामन भी कांग्रेस से कम काला नहीं है। भाजपा को लगता है कि अब अपने सहयोगियों के साथ वह केन्द्र में अगली सरकार बना सकती है। ऐसे में वह कभी नहीं चाहेगी कि सीबीआई को इतने अधिकार दे दिये जाये कि वह प्रधानमंत्री या केन्द्र सरकार के प्रमुख लोगों की बात भी न सुने। भाजपा तो यह ही चाहती है कि सीबीआई सरकार आने पर और निष्ठा के साथ केन्द्र के लिए काम करे।

मगर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से क्षेत्रीय दल बेहद खुश हैं। लंबे अरसे के बाद यह हुआ है कि किसी मुद्दे पर सपा और बसपा दोनों ही बेहद खुश हों। दरअसल सीबीआई के बहाने कांगेस लंबे समय से मुलायम सिंह और मायावती की लगाम अपने हाथों में थामें हुई थी। वक्त-वक्त पर कांग्रेस ने इन दोनों नेताओं को वैसे ही नचाया जैसा वह नचाना चाहती थी। जब-जब उसे सपा, बसपा की जरूरत महसूस हुई तब-तब उसने इन दलों को मजबूर कर दिया कि वह कांग्रेस का साथ दें। जाहिर है मजबूरी के इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए सीबीआई से बेहतर हथियार कांग्रेस के पास कोई और दूसरा नहीं था।  ताज कारिडोर मामला और आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई ने मायावती के सिर पर तलवार लटका रखी है। बसपा जब-जब केन्द्र सरकार पर हमलावर होती है और कांग्रेस को लगता है कि अब पानी सिर से ऊपर चढ़ रहा है तब-तब सीबीआई के अफसर बसपा नेत्री की फाइलों की झाड़ पोछ शुरू कर देते हैं और बसपा नेत्री के तीखे तेवर ठंडे पड़ जाते हैं।

कुछ ऐसा ही हाल सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव का भी है। उनके तथा उनके परिवार के लोगों के खिलाफ सीबीआई नें आय से अधिक सम्पत्ति के कई मामले दर्ज कर रखे हैं। इनका इस्तेमाल भी वह जब तब करती रहती हैं। इस चक्कर में वह सुप्रीम कोर्ट से पहले फटकार भी खा चुकी हैं मगर उसकी स्थितियों में कोई बदलाव नजर नहीं आया।

इन हालातों के चलते सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से आम आदमी बेहद खुश है उसको लगता है कि अन्ना और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन में सीबीआई को अलग बनाने की मांग बिलकुल उचित ही थी। ऐसा सोचने के पीछे अब पुख्ता बातें भी सामने आ रहीं हैं। अगर सीबीआई जैसी संस्था भी नेताओं के प्रभाव में रहेंगी तो इस देश से भ्रष्टाचार कभी खत्म नहीं होगा। जो सीबीआई इस समय कांग्रेस बचाओ इन्वेस्टीगेशन बन गयी है वह किसी और पार्टी को बचाने के लिए इन्वेस्टीगेशन एजेंसी बनकर रह जायेगी। स्वाभाविक है यह वह समय है जब सीबीआई के भविष्य को लेकर किसी बड़े फैसले का यह देश इंतजार कर रहा है।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के प्रधान संपादक हैं.

प्रसंगवश : हम ‘उनके’ मरने नहीं देते, वह ‘हमारे’ जीने नहीं देते

पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में उम्रक़ैद की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह पर हमला साजिश का नतीजा हो सकता है। यह मत मेरा नहीं है। कहने का मतलब यह, कि इस मत में मेरी ‘हां’ या ‘न’ कोई मायने नहीं रखती है। यह सोच उन तमाम भारतीय क़ैदियों की है, जो अपनी आधी से ज्यादा ज़िंदगी पाकिस्तानी जेलों में गुजारकर लौटे हैं। ऐसे तमाम क़ैदियों से रुबरु होने का मौका कई बार मुझे भी मिला। ऐसे क़ैदियों की फेहरिस्त यूं तो लंबी है। इनमें कुछ क़ैदी मुझे आज भी याद हैं।

अक्सर इनसे आज भी मुलाकात और बात होती रहती है। मसलन करामत राही, गोपाल दास, महेंद्र सिंह, सरदार बलवीर सिंह आदि-आदि। पाकिस्तान के पूर्व सजायाफ्ता क़ैदी सरदार बलवीर सिंह से मैं सन् 2012 के मध्य में अमृतसर में उनके घर पर मिला था। एक खास इंटरव्यू के सिलसिले में। बलवीर से इससे पहले भी यूं तो कई बार मैं पंजाब जाकर मिल चुका था। सन् 2012 के मध्य की बलवीर से मेरी भेंट, आखिरी मुलाकात साबित हुई।

2012 में जब मैं बलवीर से मिला, तो उन्होंने बताया, कि पाकिस्तान में गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान, उन्हें जो यातनाएं दी गयीं, उसी के चलते उन्हें फेफड़ों की बीमारी हो गयी है। इस मुलाकात के दो-तीन महीने बाद ही एक दिन पता चला, कि बलवीर सिंह की मौत हो गयी है। बलवीर सिंह ने बताया था, कि पाकिस्तान में पूछताछ के दौरान उन्हें बर्फ की सिल्लियों में दबा दिया जाता था। नंगे बदन पर चमड़े के गीले पट्टे से पीटा जाता था। बदन से खून रिसने लगता था। बकौल बलवीर- ‘जिस अंधेरी कोठरी में मैं बंद था। पांच दिन से पानी की बूंद नहीं दी गयी थी। प्यास से हलक सूख गया था। इसके बाद भी और ज्यादा परेशान करने के लिए पूछताछ कर रहे पाकिस्तानी अफसरों के इशारे पर उनके मातहतों ने अंधेरी-बदबूदार संकरी कोठरी में सांप के छोटे-छोटे बच्चे छोड़ दिये थे।’

संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी करामत राही के साथ.....राही के मुताबिक उन्होंने जेल में सरबजीत का लंगर भी बनाया था..करामत राही 18 साल बाद पाकिस्तान से छूट कर भारत लौटे हैं
संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी करामत राही के साथ…..राही के मुताबिक उन्होंने जेल में सरबजीत का लंगर भी बनाया था..करामत राही 18 साल बाद पाकिस्तान से छूट कर भारत लौटे हैं

करामत राही की कहानी इससे भी ज्यादा रुह कंपा देने वाली है। करामत राही मूलत: पाकिस्तानी हैं। बाद में उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल कर ली। भारत की नागरिकता हासिल करने के बाद करामत राही बटाला, गुरदासपुर (पंजाब) के फतेहगढ़ चूड़ियांवालां इलाके में रहने लगे। राही पाकिस्तान की कई जेलों में सज़ायाफ्ता के रुप में क़ैद रहे हैं। बकौल राही –‘पाकिस्तान में गिरफ्तारी से पहले कई बार वह सरबजीत सिंह से मिलते रहे हैं। अक्सर सरबजीत उनके गांव आ जाता था मिलने।

पाकिस्तान में सज़ा होने के बाद मैं करीब चार साल तक (सन् 2001 से 2004 या 2005 रिहाई के समय तक) कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ क़ैद रहा । सरबजीत वार्ड में (तन्हाई) और मैं बैरक में बंद था।’ अब सरबजीत पर उसी कोट लखपत जेल में क़ैद रहते हुए जब हमले की खबर सुनी, तो करामत राही को एक बाकया याद आता है।

संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी गोपाल दास के साथ...गोपाल दास 28 साल बाद पाकिस्तान से छूटकर आये
संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी गोपाल दास के साथ…गोपाल दास 28 साल बाद पाकिस्तान से छूटकर आये

पाकिस्तानी जेलों में बिताई ज़िंदगी के पन्ने पलटते हुए करामत राही बताते हैं – ‘चार साल के लिए जब पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में मुझे लाकर बंद किया गया, उस समय वहां तन्हाई में सरबजीत सिंह भी बंद था। तब उस जेल का आईजी था अब्दुल सत्तार आजज। आजज ईमानदार और तेज-तरार्र जेल अफसर था। जाड़े के दिन थे। सुबह करीब दस-ग्यारह बजे कुछ लोग बाहर से जेल में क़ैदियों को कंबल बांटने आये थे। सभी क़ैदियों को कंबल लेने के लिए जेल की बैरक-वार्डों से बाहर निकाला गया।

मेरे पांवों में बेड़ियां और हाथों में हथकड़ियां लगीं थीं। बेड़ी-हथकड़ी में जकड़े सरबजीत सिंह को जैसे ही मैंने सामने देखा, उससे हाथ मिलाने लगा। उसी समय सरबजीत और मुझ पर आईजी जेल आजज की नज़र पड़ गयी। आईजी आजज ने मातहतों को हुक्म दिया, कि वे तुरंत सरबजीत सिंह को उसके वार्ड (तन्हा काल-कोठरी) में ले जाकर बंद कर दें। साथ ही सरबजीत का कंबल उसके वार्ड में ही पहुंचा दें।’ सरबजीत पर हमले के पीछे करामत राही किसी पाकिस्तानी तनजीम का हाथ मानते हैं।

लंबे समय तक कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के लिए ‘लंगर’ (खाना) पका चुके करामत राही के मुताबिक, पाकिस्तानी जेलों में क़ैद भारतीय क़ैदियों को खतरा आम या आपराधिक छवि वाले पाकिस्तानी क़ैदियों से नहीं रहता है। पाकिस्तान की जेलों में क़ैद तनजीमों के नुमाईंदों (शुभचिंतकों) से भारतीय क़ैदियों को ज्यादा खतरा रहता है।  पाकिस्तानी जेलों के अंदर बंद तनजीमी क़ैदी और बाहर मौजूद उनके कट्टरपंथी आका हमेशा भारतीय क़ैदियों की तलाश में रहते हैं। करीब 18 साल पाकिस्तान की जेलों में सज़ा काटकर लौटे करामत राही इस बात से इंकार नहीं करते हैं, कि कोट लखपत जेल में बंद फांसी की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी सरबजीत भी ऐसी की किसी तन्जीम के आकाओं की साजिश का शिकार बन गया हो।

भारत के प्रधानमंत्री और भारतीय सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तान की जेल से करीब 28 साल बाद छूटे गोपाल दास भी करामत राही की बात का समर्थन करते हैं। बकौल गोपाल दास- ‘भारत की जेलों में बंद किसी पाकिस्तानी पर अमूमन तो मैंने कभी हमले की खबर सुनी ही नहीं है। कभी अगर कोई ऐसी घटना घट भी जाती है, तो भारत सरकार तुरंत पाकिस्तान प्रशासन, भारत में पाकिस्तानी दूतावास को इसकी सूचना देता है। जबकि पाकिस्तान की जेलों में भारतीय क़ैदियों के साथ मारपीट, जानलेवा हमलों की वारदातें अक्सर होती रहती हैं। इन वारदातों की पहले तो पाकिस्तान सरकार सूचना देने से ही कतराती है। अगर किसी घटना की जानकारी बाहर आ भी जाये, तो पाकिस्तान में मौजूद भारतीय दूतावास के अफसरान पाकिस्तानी जेलों में घुसने की हिम्मत ही नहीं करते हैं। आखिर ऐसा क्यों ?’

पाकिस्तान में उम्र क़ैद की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह के साथ कोट लखपत जेल में गोपाल दास भी कई साल बंद रह चुके हैं। गोपाल दास के मुताबिक –‘मुझे लग रहा था, कि भारत में अफजल गुरु और कसाब की फांसी कहीं न कहीं पाकिस्तान में बंद सरबजीत सिंह पर नाजायज असर डालेगी। वही हुआ। संभव है कि पाकिस्तान में मौजूद अपने कट्टरपंथी आकाओं को खुश करने के लिए ही जेल में बंद कट्टरपंथियों ने सरबजीत को निशाना बना दिया हो। पाकिस्तान में सरकारें नहीं, सरकारों पर तनजीमें हावी रहती हैं। कोई बड़ी बात नहीं है कि, किसी तनजीम ने देश की जनता की नज़रों में खुद को ऊंचा दिखाने के लिए सरबजीत को निशाना बना दिया हो, और पाकिस्तानी हुकूमत सोती रही हो।’ सन् 1984 से 2011 तक पाकिस्तान की मुलतान, मियांवाली, सियालकोट सहित कोट लखपत जेल में क़ैद रहने वाले गोपाल दास के मुताबिक- ‘कोट लखपत जेल में मैं करीब तीन साल बंद रहा। उस समय सरबजीत सिंह भी वहां क़ैद थे। इस तीन साल के लंबे अरसे में मेरी सरबजीत से ब-मुश्किल 4-5 मिनट की ही मुलाकात हो सकी थी। मतलब यह कि इतना कड़ा पहरा था, कि जेल में परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।’ गोपाल दास सवाल करते हैं कि- ‘इतने चाक-चौबंद इंतजामों के बीच सरबजीत पर हमला सोची-समझी साजिश नहीं तो और क्या है?’ गोपाल दास तो ये भी कहते हैं कि- ‘कोई बड़ी बात नहीं कि, किसी मजहबी तनजीम के दबाब में आकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआई ने ही कट्टरपंथी आकाओं और उनके नुमाईंदों को कहीं छूट न दे दी हो, और उन्होंने मौका हाथ से खाली नहीं जाने दिया।’ गोपाल दास के मुताबिक- ‘ बिना सोची-समझी रणनीति के पाकिस्तानी जेलों में सरबजीत सिंह जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उम्र-क़ैद की सज़ा पाये क़ैदी पर इस तरह और इतना खतरनाक हमला संभव ही नहीं है।’

जो भी हो, पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद उम्र क़ैद की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी पर सरबजीत सिंह पर जैसा हमला हुआ, वैसा हमला मैंने हाल-फिलहाल या फिर पिछले कम से कम दो दशक के अपने पत्रकारिता के करियर में भारत में किसी पाकिस्तानी क़ैदी के ऊपर कभी न सुना न देखा। ऐसा नहीं है, कि भारत की जेलों में कुछ गलत नहीं होता है। ऐसा भी नहीं है, कि भारत की जेलों में दंगा-फसाद, मारपीट, जानलेवा हमले या फिर हत्या की घटनाएं ही नहीं होती हैं। भारत की जेलों में गाहे-बगाहे यह सब होता है, लेकिन सरबजीत सिंह की जैसी दुर्गति पाकिस्तान की हाई-सिक्योरिटी वाली कोट लखपत जेल में हुई है, कभी किसी पाकिस्तानी क़ैदी की इतनी दुर्गति किसी भारतीय जेल में मैंने न देखी न सुनी। विदेशी क़ैदियों की सुरक्षा और उनके आंकड़ों की बात की जाये, तो दिल्ली में स्थित तिहाड़ जेल में इस वक्त करीब 4 सौ विदेशी क़ैदी बंद हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या 100 के आसपास नाइजीरियाई क़ैदियों की है। इन चार सौ क़ैदियों में करीब 50 क़ैदी पाकिस्तानी हैं। इन पचास पाकिस्तानी क़ैदियों में लाल किले पर हमले का मुख्य षडयंत्रकारी लश्कर-ए-तैय्यबा का आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक अहमद भी बंद है। आरिफ को भारतीय सुप्रीम कोर्ट फांसी की सज़ा सुना चुका है। आरिफ करीब 13 साल से तिहाड़ जेल में बंद है, लेकिन आज तक जेल में आरिफ के ऊपर कभी किसी ने हमला नहीं किया। आरिफ ही क्यों मुंबई की जेल में कई साल तक बंद कसाब पर भी कभी किसी ने ऐसा कोई हमला करने की जुर्रत नहीं की, जैसा कि पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह पर जानलेवा हमला हुआ।

कुल जमा अगर पाकिस्तान और भारत की जेलों में बंद एक-दूसरे देश के क़ैदियों की सुरक्षा के मुद्दे पर नज़र डाली जाये, तो निचोड़ यही निकलता है, कि हम अपनी जेलों में बंद पाकिस्तानियों को मरने नहीं देते हैं। उनकी हिफाजत ही करते रहते हैं। कसाब जैसे पाकिस्तानी कसाईयों की सुरक्षा पर करोड़ों रुपया खर्च करते हैं, जबकि पाकिस्तान की जेलों में भारतीय क़ैदियों को जीने नहीं देते हैं। अगर यह कहा और समझा जाये, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, भारत की जेलों में आखिरी समय तक सुरक्षित रहा मुंबई हमलों का एकमात्र जिंदा पकड़ा गया कसाब और तिहाड़ में कई साल से बंद लालकिले पर हमले का मास्टरमाइंड पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अशफाक। जबकि पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह को पाकिस्तानी हुकूमत सलाखों और सात तालों में भी सलामत नहीं रख सकी। आखिर क्यों? वह (पाकिस्तान) हमारे (भारत )क़ैदियों को जीने नहीं देते, हम (भारत) उनके (पाकिस्तान) क़ैदियों को मरने नहीं देते?

लेखक संजीव चौहान देश के जाने माने क्राइम जर्नलिस्ट हैं.

बीसीसीआई द्वारा अर्जुन, ध्यानचंद पुरस्कार की संस्तुति का विरोध

सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ और नूतन ठाकुर ने बोर्ड ऑफ कंट्रोल फोर क्रिकेट इन इंडिया (बीसीसीआई) द्वारा क्रिकेट खिलाडियों को शासकीय खेल पुरस्कार दिये जाने की संस्तुति का विरोध किया है. उन्होंने खेल एवं युवा मामले मंत्रालय को भेजे अपने पत्र में कहा है कि बीसीसीआई द्वारा बल्लेबाज विराट कोहली को अर्जुन पुरस्कार और पूर्व बल्लेबाज सुनील  गावस्कर को ध्यानचंद पुरस्कार के लिए नामांकित करना सरकारी नियमों के खिलाफ है.

विभिन्न खेल पुरस्कारों से सम्बंधित सरकारी नियमावली के अनुसार मात्र नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन (एनएसएफ) द्वारा किये नामांकन ही स्वीकार किये जाते हैं, लेकिन बीसीसीआई के एनएसएफ नहीं होने के बाद भी उसके द्वारा इन पुरस्कारों के लिए मनोनयन किये जाते हैं. अमिताभ और नूतन ने कहा है कि उनके द्वारा बीसीसीआई के एनएसएफ नहीं होने के बाद भी उससे जुड़े सभी लाभ उठाने और हर प्रकार के उत्तरदायित्व से बचे रहने के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में रिट याचिका संख्या 3153/2012 दायर किया गया है.

इस याचिका में ए के पात्रो, अंडर सेक्रेटरी, खेल मंत्रालय द्वारा दायर प्रतिशपथ पत्र में भारत सरकार ने स्वीकार किया है कि उनके द्वारा मान्य 51 एनएसएफ में बीसीसीआई शामिल नहीं है जबकि मंत्रालय ने बार-बार उन्हें इसके लिए आमंत्रित किया है. ऐसी स्थितियों में जब तक वे एनएसएफ का दर्जा स्वीकार कर उससे सम्बंधित उत्तरदायित्व लिये जाने को सहमत नहीं होते हैं, बीसीसीआई द्वारा इन खेल पुरस्कारों के सम्बन्ध में किये गए कोई भी मनोनयन स्वीकार नहीं किये जाने की बात कही गयी है.

To,
The Secretary,
Department of Sports,  
Ministry of Youth Affairs and Sports,  
Government of India,  
Shastri Bhawan,
New Delhi
 
Subject- Regarding Arjuna award and Dronacharya award recommendation by Board of Control for Cricket in India (BCCI)

Sir,
 We, social activists Amitabh Thakur and Dr Nutan Thakur, residents of 5/426, Viram Khand, Gomti Nagar, Lucknow, present two news articles published in various Internet sites which say that the Board of Control for Cricket in India (BCCI) has recommended the names of young batsman Sri Virat Kohli for the prestigious Arjuna award and former captain Sri Sunil Gavaskar for the Dhyanchand lifetime achievement honour to the Ministry of Youth Affairs and Sports, Government of India, as the last date for receiving nominations for the Arjuna, Rajiv Gandhi Khel Ratna, Dronacharya and Dhyanchand awards is Tuesday, April 30, 2013.
 
We would request you to refer to the Writ Petition No (PIL-Civil) No 3153/2012 filed in the Hon’ble Allahabad High Court, Lucknow bench against the Ministry and BCCI by us.

In its Counter Affidavit to our petition filed by Sri A K Patro, Under Secretary in the Ministry of Sports and Youth Affairs, the Ministry has accepted in that they have been requesting BCCI to get recognized as a National Sports Federation (NSF) but BCCI is not paying any attention to it.  In this affidavit filed by the Ministry, it is said that there are presently 51 recognized NSFs . BCCI had also made a request on 05 February 2011 to get recognized as a NSF. But when the Sports Ministry sent a letter in April 2011 asking BCCI to submit its acceptance to the Government guidelines on age and tenure limits of their office bearers, BCCI never replied back. BCCI did not inform the Ministry about the steps taken for prevention of age fraud and for eradication of doping. It also did not share information regarding mode of selection and selectors of National teams.  
 
As per the Ministry’s affidavit, though BCCI does not take direct financial assistance but the State provides crores of assistance through Income Tax and Customs duty exemptions. Many State Cricket associations have been provided land at cheaper rates. Thus the Ministry agreed to our submission that BCCI shall get recognized as a NSF.

The petitioners have prayed in the petition that either BCCI gets the status of NSF and follows the required government rules or the Central Government declares some other willing body as the NSF for cricket.

In the light of the above facts submitted and admitted by the Ministry, we as the petitioners of the above Writ Petition No (PIL-Civil) No 3153/2012 humbly pray before you to kindly act in accordance with law.

The Government Rules say that nominations for the various sports awards like the Dronacharya Award, Arjun Award, Dhyan Chand Award and Rajiv Gandhi Khel Ratna Award awarded by the Department of Sports, Government of India shall be invited only from recognized National Sports Federations (NSFs) and the scrutiny of nominations of the above mentioned sports awards (except the Arjun Award) need compulsorily be done by the concerned NSFAs per Para 6.1 of the Rules framed for awarding the Dronacharya Award for Outstanding Coaches, “the nominations for the Award are invited by the Ministry of Youth Affairs and Sports from all recognized National Sports Federations recognized by the Government of India, Indian Olympic Association and State/UT Governments in the month of January every year. The National Sports Federations recognized by the Government of India; the Indian Olympic Association and the State/UT Governments may nominate more than one and upto three names in a particular year.” As per Para 6.2 of these Rules, in addition to these, Rajiv Gandhi Khel Ratna Awardees of the previous years can also nominate one eligible coach each for Dronacharya Award. This is the same for the Rajiv Gandhi Khel Ratna Award where these points are enumerated at Para 5.1, Para 5.2 and Para 6, Arjuna Awards where these rules are enumerated at Para 5.1, 5.2 and 5.3 as regards those who can send the nominations and Dhyan Chand Award where again Para 5.1 and Para 5.2 enumerate who can send the nominations. The only thing different in case of the Arjuna Awards is that here the nominations are not sent for scrutiny to the concerned NSF while for other awards the nominations are sent to the concerned NSFs for scrutiny. Thus there is a clear violation of rules in grating sports awards because BCCI, which is not a NSF is being permitted to send nominations for the various sports awards, despite not being a recognized NSF. A copy of the relevant pages of the Rules for the above mentioned awards have also been attached as Annexure No 3 in our Writ Petition.

In light of the above facts, we pray before you to ensure strict compliance of law and not to consider the recommendation of BCCI for various awards as long as it does not agree to abide by the law of the land and does not formally agree to become a NSF.

 
Only such a strict legal action can stop the present mockery of law where BCCI is trying to have the best of both the worlds on all possible fronts by getting all the privileges of being a de facto NSF but is still keeping its complete autonomy with no government control and no public accountability. This is certainly dangerous, unethical and improper and definitely illegal and it needs to be stopped immediately by your taking a firm view on the matter.

In case we get no response from you in this matter, we would be forced to move to the competent Court for ensuring the law of the land.

Yours

Dr Nutan Thakur
Amitabh Thakur

Gomti Nagar, Lucknow

nutanthakurlko@gmail.com ,    
amitabhthakurlko@gmail.com

Lt No- IRDS/BCCI/Arjuna/01        
Dated-02/05/2013

Osho, The Book of Secrets, Talk #70

: a small gift for you… : Let It Be! : The cyclone has gone and you will now be centered, centered as you never were before. And once you know the art of letting things be, you will know one of the master keys that opens all the inner doors. Then whatsoever the case is, let it be; don’t avoid it.

If just for three months you can be in total solitude, in total silence, not fighting with anything, allowing everything to be, whatsoever it is, within three months the old will be gone and the new will be there. But the secret is allowing it to be…howsoever fearful and painful, howsoever apparently dangerous and deathlike.

Many moments will come when you will feel as if you will go mad if you don’t do something and involuntarily you will start to do something. You may know that nothing can be done, but you will not be in control and you will start to do something.

It is just as if you are moving through a dark street in the night, at midnight, and you feel fear because there is no one around and the night is dark and the street is unknown – so you start whistling. What can whistling do? You know it can do nothing. Then you start singing a song. You know nothing can be done by singing a song – the darkness cannot be dispelled, you will remain alone – but still it diverts the mind. If you start whistling, just by whistling you gain confidence and you forget the darkness. Your mind moves into whistling and you start feeling good.

Nothing has happened. The street is the same, the darkness is the same the danger, if there is any, is there, but now you feel more protected. All is the same, but now you are doing something. You can start chanting a name, a mantra: that will be a sort of whistling. It will give you strength but that strength is dangerous, that strength will again become a problem, because that strength is going to be your old ego. You are reviving it.

Remain a witness and allow whatsoever happens to happen.

Fear has to be faced to go beyond it.

Anguish has to be faced to transcend it. And the more authentic the encounter, the more looking at it face to face, the more looking at things as they are, the sooner the happening will be there.

It takes time only because your authenticity is not intense.

So you may take three days, three months or three lives; it depends on the intensity. Really, three minutes can also do, three seconds can also do. But then you will have to pass through a tremendous hell with such intensity that you may not be able to bear it, to tolerate it. If one can face whatsoever is hidden in oneself, it passes, and when it has gone you are different because all that has left you was part of you before and now it is no longer a part.

So don’t ask what to do. There is no need to do anything. Non-doing, witnessing, effortlessly facing whatsoever is, not even making a slight effort, just allowing it to be….

Remain passive and let it pass. It always passes. When you do something, that is the undoing because then you interfere.

And who will interfere? Who is afraid? The same that is the disease will interfere. The same ego that has to be left behind will interfere. I told you that the ego is part of the society. You left the society but you don’t want to leave the part that society has given to you. It is rooted in society; it cannot live without society. So either you have to leave it or you have to create a new society in which it can live.

To be solitary means not to create an alternative society. Just move out of society, and then whatsoever society has given you will leave you. You will have to drop it. It will be painful because you are so adjusted to it, everything is so arranged. It has become such a comfort to be adjusted, where everything is convenient.

When you change and move alone, you are leaving all comforts, all conveniences, all that society can give – and when society gives something to you, it also takes something from you: your liberty, your soul.

So it is an exchange – and when you are trying to get to your soul in its purity you have to stop the bargaining.
 
It will be painful, but if you can pass through it, the highest bliss is just near. Society is not as painful as loneliness. Society is tranquilizing, society is convenient and comfortable but it gives you a sort of sleep. If you move out of it inconvenience is bound to be there. All types of inconveniences will be there. Those inconveniences have to be suffered with the understanding that they are part of solitude and part of regaining yourself.

You will come out of it new, with a new glory and dignity, a new purity and innocence.

Osho

The Book of Secrets

Talk #70

सरबजीत हत्या के बाद सीमा पर हाई एलर्ट, बीएसएफ डीजी बोले- हर हालत के लिए हम तैयार

बाड़मेर । सरबजीत सिंह की हत्या के बाद सीमा पर हाई अलर्ट हैं और भारत की सीमाओ की निगेहबानी करने वाली सीमा सुरक्षा बल भी सीमा को सीज करके किसी भी हलचल पर पैनी नज़र रखे हुए हैं। ऐसे हालातो में बाड़मेर के सीमावर्ती इलाको का सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक सुभाष जोशी ने निरीक्षण किया और अत्याधुनिक सीमा चौकी का भी लोकार्पण किया। हरसाणी फांटा स्थित सीमा सुरक्षा बल के 99 बटालियन परिसर मे पत्रकारों से बातचीत में महानिदेशक ने कई मुद्दों पर चर्चा करते हुए सवालों के जवाब दिए। उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा बल सरबजीत सिंह की हत्या के बाद से नहीं बल्कि हमेशा से सतर्क और चौकस रहती हैं।

उन्होंने कहा कि उन्होंने रात्रि और दिन को रेतीले सीमावर्ती इलाके में होने वाली गश्त और अन्य प्रक्रियाओं का निरीक्षण किया हैं और वो सतर्क सीमा सुरक्षा बल के काम काज से पूरे संतुष्ट हैं। महानिदेशक ने सीमा पर जवानो से मुलाक़ात की और उनका हौसला बढ़ाया। पत्रकारों के एक सवाल पर उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा बल हर परिस्थिति से निपटने में सक्षम और तैयार हैं। उन्होंने कहा कि सीमा की चौकसी में कोई ढील नहीं छोड़ी जा रही हैं। चीन की लद्दाख में घुसपैठ के मामले में महानिदेशक ने कहा कि वो क्षेत्र सीमा सुरक्षा बल के अधिकार में नहीं हैं इसलिए वो इस पर कोई टिप्पणी करे यह सही नहीं होगा। उन्होंने कहा कि हमारी फ़ोर्स हर वक्त सीमा पर जहां उनको जिम्मेदारी दी गई हैं वहां पर सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोडती। सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक ने कहा कि बीएसएफ को अत्याधुनिक सुविधाओं से जोड़ने के लिए ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स के द्वारा आगामी पांच सालो में दो हजार करोड़ रूपए खर्च किये जाने की योजना की जानकारी भी पत्रकारों को दी।

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत यह राशि खर्च की जाएगी। बीएसएफ के महानिदेशक सुभाष जोशी की माने तो केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक दिन पहले इस बजट के लिए अपनी मंजूरी दे दी है और अब यह राशी सीमा सुरक्षा बल के आधुनिकीकरण पर खर्च किया जायेगा। दरअसल दो दिनों से महानिदेशक बाड़मेर के सीमावर्ती इलाको में हैं। गुरुवार को पश्चिमी सीमा की नवनिर्मित अत्याधुनिक सुविधाओं युक्त सीमा चौकी का भी उन्होंने उद्घाटन किया। उन्होंने बाड़मेर में स्थित बीएसएफ कैम्प में जवानो से मुलाकात भी की। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में सीमा सुरक्षा बल के जवान सबसे अच्छी भूमिका निभा रहे है और अंतरराष्ट्रीय सीमा को सुरक्षित कर रहे हैं और यह कहते हुए वे गर्व महसूस करेंगे। पश्चिमी सीमा पर मौजूदा माह में तापमान पर जवानों की स्थिति पर बोलते हुए जोशी ने कहा कि सीमा सुरक्षा बल की सीमा पर 50 डिग्री तापमान में भी ड्यूटी निभाते हैं और पूरी भारतीय सीमा सुरक्षित है।

सीमा सुरक्षा बल में स्वेच्छिक सेवानिवृति और जवानो में आत्महत्या में वृद्धि के मामलों से सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक से पूछे एक सवाल में उन्होंने कहा कि हमने बहुत गंभीरता से इस स्थिति को संभाल लिया है और फ़ोर्स इस गम्भीर मामले पर बेहतर समन्वय का काम कर रही है। उन्होंने कहा कि आत्महत्या के मामलों के पीछे मुख्य कारण कर्मियों की पारिवारिक समस्याओं का हैं। महानिदेशक जोशी के अनुसार सीमा सुरक्षा बल के कर्मियों के लिए एक विशेष पोशाक बनाने के लिए 'डीआरडीओ' द्वारा कार्य करने का अनुरोध किया है गया हैं जिसे पहन कर इस पोशाक से को सैनिकों बाहरी तापमान से 15 प्रतिशत तक की राहत मिल जाएगी। जोशी के मुताबिक पाक जेल में भारतीय कैदी सरबजीत सिंह की मौत की हाल की घटना के बाद पश्चिमी सीमा पर कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन हम  सतर्क और स्थिति देखते हुए चौकस है।
बाड़मेर से दुर्गसिंह राजपुरोहित की रिपोर्ट.

सहारा के सभी मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी, सेबी की अर्जी कुबूल

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बाजार नियामक सेबी की उस याचिका को स्वीकार कर लिया है जिसमें कहा गया है कि सहारा से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई एक जगह की जाए. सहारा से जुड़े प्रकरण इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ खंडपीठ और सेक्युरिटीज अपीलैट ट्रिब्यूनल मुंबई में भी चल रहे हैं. सेबी के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मामलों की सुनवाई पर रोक लगाकर उन्हें सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर करने को कहा है. 

इस तरह निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपए लौटाने के खिलाफ सैट, इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ खंडपीठ में सहारा और सुब्रत राय को लेकर चल रही सभी याचिकाओं मुकदमों पर रोक लगा दी गई है. इस मामले की अगली सुनवाई आठ मई को होनी है.

निवेशकों के 24000 करोड़ रुपये न चुकाने के मामले में सेबी ने 15 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी और सुब्रत रॉय सहारा की गिफ्तारी की मांग की थी. गौरतलब है कि  नवंबर 2010 में सेबी ने सहारा ग्रुप की 2 कंपनियों को ऑप्शनली फुली कंवर्टिबल डिबेंचर्स (ओएफसीडी) के जरिए रकम जुटाने के लिए रोका था. जनवरी 2011 में सेबी ने एक विज्ञापन देकर निवेशकों को सावधानी बरतने को कहा था. इसके बाद सेबी और सहारा के बीच एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में जाने का खेल चला था.

‘हिन्दुस्थान समाचार’ प्रबंधन को मोदी देंगे डिनर

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और महानायक अमिताभ बच्चन द्वारा बोला गया जुमला, 'कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में' पर्यटकों को खूब आकर्षित कर रहा है। पर पत्रकार भी इसके मुरीद हो जाएंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था। आरएसएस से जुड़ी बहुभाषी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के सभी ब्यूरो प्रमुख व प्रबंधन मंडल के सदस्य व उनके खासमखास पत्रकार 3 मई से 7-8 मई तक गुजरात यात्रा पर जा रहे हैं।

सभी मोदी सरकार के खर्चे पर गुजरात की तफरीह करेंगे और मोदी के साथ रात्रिभोज भी करेंगे। इसमें सभी राज्यों के ब्यूरो प्रमुख, ब्यूरो प्रमुखों के खासमखास लोग, समिति के सदस्यों समेत दिल्ली में बैठे प्रबंधन के लोग शामिल होंगे। करीब 50-60 लोगों का दस्ता गुजरात के तमाम पर्यटन स्थलों की तफरीह पर निकलेगा। बता दें कि वैसे तो इस एजेंसी से ज्यादा अखबार खबर नहीं लेते एवं न ही इसका सर्कुलेशन ज्यादा है, फिर भी संघ से जुड़ाव के नाते और दमखम के साथ भावी पीएम उम्मीदवारी बनाने के लिए मोदी के मातहत कतई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं।

‘हमारा महानगर’ से सुधांशु पहुचे ‘दक्षिण मुंबई’

मुंबई : 'हमारा महानगर' अखबार में लगभग पिछले 15 वर्षों से सेवा दे रहे सुधांशु झा आखिरकार हमारा महानगर को गुडबाय बोलकर मुंबई से प्रकाशित किये जा रहे 'दक्षिण मुंबई' अखबार में पहुंच गए हैं. हमारा महानगर में कार्यकारी संपादक पद पर कार्यरत सुधांशु झा हमारा महानगर की नयी टीम आने के बाद से नाराज चल रहे थे. लगभग चार साल पहले जब नवभारत से राघवेन्द्र ने अपनी पूरी टीम के साथ हमारा महानगर ज्वाइन किया था तो सुधांशु पर्दे के पीछे चले गए थे. पिछले २-३ वर्षों से सुधांशु सक्रिय नहीं थे.

सुधांशु हमारा महानगर से पहले जनसत्ता सहित कई अखबारों में काम कर चुके हैं. सुधांशु को पिछले वर्ष हमारा महानगर प्रबंधन ने निकाले जाने की नोटिस दिया तो उन्होंने मुंबई हाईकोर्ट में केस कर दिया. पता चला है कि सुधांशु का हमारा महानगर के मैनेजमेंट से सेटलमेंट हो गया है. सुधांशु के 'दक्षिण मुंबई' जाने के बाद से हमारा महानगर में उनके साथ सेवा दे रहे उपसंपादको सहयोगियों और डीटीपी ओपरेटरों के दक्षिण मुंबई में जाने की संभावना है. पहली मई से हमारा महानगर के डीटीपी ओपरेटर सतीश शर्मा ने दक्षिण मुंबई ज्वाइन भी कर लिया है.
 

‘तीसरे प्रेस आयोग’ पर राष्ट्रीय परिसंवाद कल यानि तीन मई को इंदौर में

इंदौर। अंतर्राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इंदौर प्रेस क्लब ‘तीसरे प्रेस आयोग की आवश्यकता’ विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन करने जा रहा है। इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल एवं महासचिव अरविंद तिवारी ने बताया कि लंबे समय से देश में तीसरे प्रेस आयोग की मांग उठ रही है।

देश के कई पत्रकार संगठन और सरकार द्वारा गठित समितियों ने प्रेस आयोग की जरूरत को महसूस किया है। शुक्रवार ०३ मई २०१३ को शाम ०४ बजे आयोजित परिसंवाद में वरिष्ठ पत्रकार सर्वश्री रामशरण जोशी, मधूसुदन आनंद, राहुल देव, अवधेश कुमार एवं परंजॉय गुहा ठाकुरता प्रेस आयोग की महत्ता एवं आवश्यकता पर अपने विचार व्यक्त करेंगे।

पत्रकार आलोक कुमार की स्वैच्छिक संस्था ‘जलजोगिनी’ का पहला कार्यक्रम 13 मई को देवघर (झारखंड) में

यशवंत भाई, नमस्ते। मुझमें सकारात्मकता का इजाफा करने के लिए कोटिश: धन्यवाद। इष्ट मित्रों से मिले मनोबल को शिवगंगा निर्मल अभियान में रुपांतरित करने जा रहा हूं। 24 साल के पत्रकारीय अनुभव के आधार पर मेरी ठोस समझ है कि समाजिक व्यवस्था में संवेदना की कमी होती जा रही है। प्रबल सोच का हूं कि मात्र लिखने भर से बात नहीं बनेगी।  हालात को ठीक करने के लिए नित नए तरीके से सुधी जनों को हस्तक्षेप करना पडेगा।

स्वच्छता की स्थापना के लिए जल को बिंब बनाकर काम करना शुरू किया है। समान सोच वाले साथी और पत्रकार मित्रों के साथ मिलकर जलजोगिनी नाम की स्वैच्छिक संस्था बनाई है। जलजोगिनी का पहला कार्यक्रम आगामी अक्षय तृतीया यानी 13 मई को देवघर (झारखंड) में है। इसकी सफलता जलजोगिनी के देश के अन्य आस्था के केंद्रों के जलाशयों को संवारने के दिशा में बढाने का रास्ता बनाएगा।

देवघर के बैद्यनाथधाम मंदिर के मुख्य सरोवर शिवगंगा की स्वच्छता के लिए 13 मई को दिन भर का कार्यक्रम है। इसके लिए दिल्ली से जलजोगिनी रथ पर सवार होकर जलजोगिनी की पुष्कर, बुंदेलखंड और दिल्ली इकाई से जुडे साथियों के साथ  हम कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी आदि के रास्ते 12 मई की शाम तक देवघर पहुंच रहे हैं। दिल्ली से हमारी यात्रा 10 मई की देर शाम शुरू होगी। जलजोगिनी से देवघर के सैकडों स्वंयसेवक जुड चुके हैं। शिवगंगा सेवा समिति शिवगंगा निर्मल अभियान में जलजोगिनी के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम कर रही है।  जन सहयोग से शिवगंगा की स्वच्छता के लिए श्रमदान,बच्चों की प्रभात फेरी.दीपोत्सव, संगोष्ठी के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन है। मेल के साथ सलंग्न फोल्डर में कार्यक्रम व उद्देश्य की वृहत जानकारी है।

इस बारे में हम आपसे हर संभावित सहयोग चाहते हैं। आपके जरिए सकारात्मक सोच के साथियों और तमाम पत्रकार बधुंओं से 13 मई को देवघर की शिवगंगा तट पर मौजूद रहने का आह्वान करते हैं। कहते हैं कि अक्षय तृतीया को किया गया कोई भी काम आपके जीवन में अक्षय रहता है, हम बाबा वैद्यनाथ की नगरी में अक्षय तृतीया के दिन श्रमदान करके हम ईश्वर से ताउम्र श्रमदान की क्षमता को अक्षुण्ण बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।

बेहतर कल की कामना के लिए सदैव आपके साथ।

आभार
आलोक कुमार
संस्थापक सचिव
जलजोगिनी
फोन नंबर 9873417449

इंटरनेट अखबार के साथ जुड़े कुमार राकेश

पत्रकार कुमार राकेश हिंदी इन्टरनेट समाचार-पत्र पल-पल इंडिया डॉट कॉम से जुड़ गए हैं. वे एडिटोरियल डायरेक्टर बनाए गए हैं. इसके पहले कुमार राकेश एनई टीवी ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे. कुमार राकेश 27 साल से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं.

उन्होंने 1986 में 'द इंडियन नेशन', पटना के साथ अपने कैरियर की शुरुआत की थी, इसके अलावा वे नवभारत टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा, नईदुनिया, दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर, ,न्यूज़ एक्सप्रेस आदि संस्थानों में भी काम कर चुके हैं . फिलहाल वे पल-पल इंडिया ग्रुप के एशिया के पहले द्विभाषीय गवर्नेंस न्यूज़ पोर्टल ‘ग्लोबल गवर्नेंस न्यूज़’ और समग्र भारत के माध्यम से वेब पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं .

लौट के संजय झा पानीपत आए

दैनिक जागरण, पानीपत से संजय झा बहुत खुशी खुशी पटना गए. उनका ट्रांसफर हो गया था. जागरण की एचआर एडिटोरियल पालिसी के तहत उनका तबादला हुआ. उन्होंने बच्चों का नाम स्कूल से कटवाया. सामान समेटा. पूरे परिवार के साथ पटना पहुंच गए. पर दैनिक जागरण, पटना में उनकी मुश्किलें शुरू हो गईं. उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित परेशान किया जाने लगा.

निशिकांत ठाकुर का खास आदमी होने का पूरा बदला पटना यूनिट वालों ने संजय झा से लिया. संजय झा को समझ में आना बंद हो गया कि वे करें तो क्या करें. वे दिल्ली आए. अपने आका निशिकांत ठाकुर से मिले. निशिकांत ठाकुर ने उन्हें फिर से पानीपत में जमा दिया है. मतलब कि लौट के संजय झा पानीपत आए. पचास साल से ज्यादा उम्र वाले संजय झा दैनिक जागरण में सीनियर सब एडिटर हैं.

पानीपत से पटना और पटना से पानीपत करने में संजय झा की हवा खराब हो गई है. पैसा रुपया स्कूल फीस किराया…. इस सबको मिला दें तो संजय झा की गृहस्थी की गाड़ी इन दिनों गड़बड़ा गई है. अभी उनके बच्चे और पत्नी पटना में हैं. उन लोगों को फिर से पानीपत लाकर जमाना पड़ेगा. स्कूल में नाम लिखाना पड़ेगा. संजय झा अब उस घड़ी को कोस रहे हैं जब उन्होंने पटना जाकर अपने बिहार के करीब रहने का सुख प्राप्त करने का तय किया और तबादले के लिए हामी भर दी.

‘लौंडा बदनाम हुआ’ का मंचन चार मई को शाम साढ़े सात बजे इंडिया हैबिटेट सेंटर में

We at SEHAR would like to inform to you that we are going to perform our play ‘Launda Badnam Hua’ once again in Delhi. We are performing in Stein Auditorium, India Habitat Centre on 4th May, 2013 at 7.30pm. ‘Launda Badnam Hua’ has created a wave on stage last year when it was first performed in Muktdhara Auditorium, Delhi.

We have done more than half a dozen shows of this performance in Delhi and outside. The show has already travelled to Multi Art Cultural Centre, Kurukshetra and in Majma Theatre Festival, Patna. The performance has been invited by Kingdom of Dreams, Gurgaon for a special show for the cast and crew members of Kingdom of Dreams and staged on the stage of Nautanki Mahal, watched & appreciated by famous tv and film actor Hussein Kuwajerwala and others.

We would like to request you to cover the event for your media organization and send a representative for the same. It would be nice if you can bring a story in advance in your organ.

Thanking You

Mrityunjay Prabhakar

Secretary

SEHAR

महाराष्‍ट्र के परभणी जिले में एक और पत्रकार पर जानलेवा हमला

महाराष्ट्र में परभणी जिले के सोनपेठ में गुरुवार की दोपहर दो बजे साकाल न्यूज पेपर के रिपोर्टर सुधीर बिंदू पर राष्ट्रवादी पार्टी के नगरसेवक चद्रकांत राठौड़ ने जानलेवा हमला किया. 'राष्ट्रवादी के शहर अध्यक्ष पद पर जिलानी की नियुक्ति' इस हेडिंग से आज सकाल में एक खबर पब्लिश हुई है. इस खबर में राठौड़ का उल्लेख था. इसी से खफा होकर उन्होंने सुधीर पर हमला बोल दिया. सुधीर ने इस मामले की रिपोर्ट स्थानीय पुलिस स्‍टेशन में दर्ज कराई है.

सुधीर पर हुए हमले के विरोध में पत्रकार संगठनों ने कल यानी शुक्रवार को सोनपेठ बंद का आवाहन किया है. पिछले एक महीने में परभणी जिले में पत्रकार के उपर हुये हमले की यह चौथी वारदात है. गौरतलब है कि पूर्णा के पत्रकार दिनेश चौधरी पर हुये हमले के मुख्य आरोपी पर अभी तक कोई भी कार्रवाई नहीं हुई है. आज के हमले की महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति के प्रमुख एसएम देशमुख ने कड़े शब्दों में निंदा की है.

Report of the Key Advisory Group On the Chit Fund Companies

The Government constituted a Key Advisory Group on Chit Fund / Nidhi Companies vide Order dated 30.09.2011. The constitution and terms of reference of the Group are in ANNEX. The Group had representation from all the stakeholders from the sector including the the Reserve Bank of India (RBI),  ISRAC,the Indian Banks' Association (IBA), PHDCCI, CII; Ernst & Young, prominent Law firms viz. Amarchand Mangaldas, Juris Corp; ISB Hyderabad, AIACF (a representative body of Chit Fund companies), Various State Government Representatives and also from some prominent Chit Fund Companies, with the following Terms of Reference:–

-Review of existing legal / regulatory / institutional framework for Chit Fund /Nidhi Companies and its efficacy;

-Action plan including policy initiatives for orderly growth of the Sector;

-To recommend the legal / institutional / regulatory initiatives related measures required for orderly growth of the Sector.

 2. After detailed deliberations a core Committee was formed under the Chairmanship of the PHDCCI representative. The committee after a few round of meetings submitted  a draft Report  which was circulated among the KAG members, discussed with the stakeholders, and has been modified taking into consideration the views expressed by the stakeholders. .A final Report of the Group has been finalized after extensive deliberations and consultation on a wide range of issues having a bearing on orderly growth of the sector.

 
I.  Consultation paper on Chit Funds

1.1 What is a chit fund?

Chit fund is a traditional financial system which was prevalent even before the evolution of Banking.  Though the system exists in other parts of the world by the name Rotating Savings and Credit Association (ROSCA), India is the only country where its operations are governed by legislations. Chit funds are classified as Miscellaneous Non banking Financial Institutions, under the Reserve Bank of India Act, 1934 and are now governed by Chit Fund Act 1982 which is administered by the respective State governments. This system with numerous in built advantages viz. tax free dividend, easy accessibility, user friendly services etc; and free of latent cost and periodic interest hikes, or pre closure charges, is the most preferred option, for those who plan to save small amounts. Chit fund is a saving cum borrowing instrument, which is unique when compared to other financial products.

The uniqueness of this industry over other financial intermediaries is the ability of the chit operators to evaluate the intrinsic strength of potential clients mainly on the faith of the subscribers’ ability to repay, a succor to lower / middle income group, small business man etc who are often wedged between the exorbitant cost of the money lenders and the stringent procedure of the bank.  The chit is also seen not merely as an investment but a drop-by-drop plan to get lump sum finance for marriage, education, housing, business etc, at a future date. The chit funds are of a self-liquidating nature and partake the character of Mutual Benefit.

1.2 How do they work?

A chit scheme generally has a predetermined value and duration. Each scheme admits a particular number of members (generally equal to the duration of the scheme), who contribute a certain sum of money every month (or everyday) to the ‘pot’. The ‘pot’ is then auctioned out every month. The highest bidder (also known as the prized subscriber) wins the ‘pot’ for that month. The bid amount is also called the ‘discount’ and the prized subscriber wins the sum of money equal to the chit value less the discount and the fixed fee to the foreman. The discount money is then distributed among the rest of the members (or the non-prized subscribers) as ‘dividend’ and in the subsequent month, the required contribution is brought down by the amount of dividend.

To illustrate the above, let us consider an example of a chit scheme with the following characteristics. Chit Value = Rupees Rs.5,00,000, Duration = 50 months and Members = 50. The contribution in this case would be initially Rs.10000 per month per member. In the first month, the collection would, therefore, be Rs.10000 multiplied by the number of members i.e. Rs.5,00,000. This amount is called the ‘pot’ which is auctioned out at the end of the month. Now let us assume that the highest bid in the first month auction is Rs.100000. This is called the ‘discount’. The highest bidder now gets the amount equal to the chit value, less the discount, less 5% commission to the foreman, i.e. Rs.375000. The discount amount is then divided among the 50 members equally (the dividend for the 50 members work out to roughly Rs.2000 each). For the subsequent month, therefore, the contribution of these members reduces by the amount of dividend (i.e. the contribution in the second month for the members would be Rs.8000. This process gets repeated for all months till the end of the scheme. The contributions are the same for each member, but the total amount taken out or bid by each member varies.

In case of default or delayed payment, the Chit Fund organizer has to put up the liquidity on behalf of the defaulting and delaying members.

1.3 Why people use Chit Funds?

In many parts of India, Chit Funds address gaps left by the traditional banking sector. They mobilize huge amounts of small savings, and in return allow members to have access in the form of loans to lump sum amount of money that they would often not be able to get from traditional banks. Easy accessibility and flexibility are important aspects of this form of financing. Compared to banks, Chit Funds require less documentation, are more flexible about collateral, and allow to determine own interest rate (within the constraints of a given chit scheme). Furthermore, there is no need to determine upfront whether funds are used for saving or borrowing. This is a salient feature of chit funds as it not only puts in place a disciplined saving mechanism, but it also allows access to cash when needed. In addition, as Chit Funds use the funds of the participants, there is much less capital requirements for the institution (unlike banks).

The primary uses of Chit Funds include:-

    To address consumption needs, such as, marriage, education, property purchase and so on.
    To pay off costlier loans from outside sources like loan from money lenders.
    To address working capital, business expansion or start-up capital needs of small businesses, besides providing bridge loans.
    For an emergency or simply as savings for future needs.

1.4 Characteristic of the Chit Fund Participants

A survey by Institute of Financial Management and Research, Chennai, reveal that approximately 80 percent of the participants in the registered chit fund industry are male and the average age is 40 to 45 years. It is also important to mention that more than 80 percent of the chit fund participants have more than high school level of education. In terms of the occupational characteristics approximately 40 percent of the participants are self-employed, 23 percent of the participants are salaried class in the private sector, 13 percent salaried class in the government sector and 10 percent are housewives.

1.5 Volume of Chit Funds

Capitalizing on the social networking and community participation, this institution has survived over several years even after the influx of several other organized financial institutions and the increased complexity of financial markets. Under this model, money is circulated to the entire cross section of our society; be it housewives, salaried class businessmen, government servants, club members under different names namely: Kitties, Bisies, Kuries, Chit funds etc. It is estimated that the value of Chit turnover in States like Kerala, Tamil Nadu, and Andhra etc are almost 10,000/- crore each per annum. Though no authentic figures are available, the size of the unregistered chit fund industry as estimated by the Association of Chit Funds is almost 100 times that of the registered ones. As the growth of this unregistered sector is not in the national interest, there is an urgent need to ascertain the exact volume and take remedial measure to contain the same. Value of each Chit registered with the office of Registrar in rural areas   is around Rs.1 lakh where as in urban and metro cities the average value goes up to a maximum of Rs.10 lakhs and Rs.50 lakhs, respectively

The presence of more than 30,000 registered chit operators generating employment opportunities for several lakh people either directly or indirectly especially in rural areas, without taking any subsidy from the government, speaks volumes for its strength in our national economy.

1.6 Background for Regulation

While traditionally chit funds primarily serve as a saving mechanism, commercially they act more like a financial intermediary bringing together borrowers and savers, aiming to channelize the liquidity from agents with surplus towards deficit spenders. At the time when banks were getting nationalized and the entire financial system was being restructured as per new regulations, the Government being aware of the popularity of the chit funds primarily among the lower income households brought this alternative informal financial institution under the network of the formal credit market. Regulation in the Chit Fund industry was brought about by the Government of India to address mainly the problem of misuse of informal Chit Funds by unscrupulous promoters and to have a level playing field for the Industry throughout.

1.7 Introduction to Chit Fund Act

The first enactment on chit funds was by Government of Travancore (Kerala) in the year 1932, which was later followed by Madras Chit Fund Act 1961, Kerala Chitties Act 1975 etc.  The Banking Commission while examining in depth the activities of the non-banking financial intermediaries in early 1970s had, inter alia, recommended that it is essential to have uniform chit legislation applicable to the whole of the country. The Reserve Bank of India (RBI), at the instance of the Government, accordingly drafted a Model Bill for the Chit Fund. RBI also sent the draft bill to the study group under the Chairmanship of Shri James S. Raj. On the recommendation of this Committee, a special Act was formulated under the name of 'The Chit Funds Act 1982' by the Parliament which now provides for minimum capital requirement for companies for conducting chit business, a ceiling on the aggregate chit amount -which is 10 times of the net-owned funds, a self-contained machinery for settlement of disputes etc; and a number of penal provision for various defaults.

The Central Act has been notified in all the States like Tamil Nadu, Andhra Pradesh, Karnataka, Maharashtra, Rajasthan, Uttar Pradesh, West Bengal, Delhi, Kerala and Haryana etc.

1.8 Unregistered Chit Funds

With insufficient and/or volatile income streams, rural households heavily depend on various credit options from a basket of formal and informal financial sources.  Recent survey by Institute of Financial Management an Research, Chennai reveal that 71% of the households take loans mainly for health expenditures (28%), which highlight an urgent need for not only providing affordable subsidized health facilities but also financial services and schemes directed to health services. People clustered around the poverty line have different incentives and requirements when compared to the middle and high income groups. Essentially what we see is that poor and vulnerable segment is particularly at risk of being further squeezed as they are dependent on informal sources for credit like friends/family and money lenders and use credit to meet basic needs like household consumption requirements (21%), meeting expenditures during financial difficulties (17%) and also to repay loans (15%). While friends and families are a convenient and relatively benign form of finance, it is worthwhile to take cognizance of the fact that typically friends and families of people in this segment may not have sufficient money to spare since in all likelihood they also belong to this segment and are also hard pressed for their needs. Also in situations when the demand is inelastic, money lenders can take advantage of the urgency and charge exorbitant interest rates. Middle and High Income groups rely more on formal sources like banks and SHG’s to avail loans. General credit behavior predicts the chit usage between these two groups with the poor and vulnerable group focusing on immediate and basic needs like household consumption expenditure, emergency needs and repaying loans while the middle and high income groups have a more diversified usage.

The unregistered chits operate in different models. The profile of the participants of the Beesi model in Maharashtra is typically a married woman who is not the main bread winner of the house, frequent contributions in Beesi not only provides her a safe outlet for savings but also helps her to get a degree of control over her household resources which she can use to increase household assets and smoothen out consumption needs. It is a forced savings mechanism, sometimes even without the knowledge of the husband which increases the saving rates of the household, which may not be possible if the same amount was saved at home. In Karnataka, the pot money is mainly used to meet business expenses (25%) where as in Andhra Pradesh, the pot money is used more to meet basic needs of household expenses. Kitty parties among the urban house wives need no introduction.

Unregistered chits are popular because of various improvisations in the chit model at the informal and local level in the villages to overcome drawbacks like conducting multiple auctions to increase liquidity, availing loans from the wining chit scheme member and leeway in making late payments etc which is not possible in the case of registered chits. Philanthropic organizations like Bill and Melinda Gates Foundation find huge scope in streamlining this activity and enhancing its reach to the underprivileged, due to the inherent merits of the scheme when compared to Micro Finance Institutions and other financial institutions.

Extra effort on the part of the legislators and administers are needed all the more when the volume of such single pot is as high as Rs.1 core especially in wholesale markets in the metropolitan cities. Relaxing the rigors of the Chit Fund Act 1982 could be an effective remedy to eradicating this evil and curtailing the parallel economy

1.9 The tie –up with Bill and Melinda Gates Foundation

While the “Financial Inclusion Program” is of recent origin, whereas Chit Funds and other informal Financial Institutions, knowingly or unknowingly are already implementing this, for the last several decades, catering to those cross sections, which are beyond the reach of Banking and other Financial Intermediaries.  M/s Bill and Melinda Gates Foundation has come out to reach the economically weaker section of the society through Chit Fund companies; under their ‘Poverty Alleviation Program’. The maiden survey recently conducted on the working of chit Funds by M/s Institute of Financial Management and Research, Chennai under the Aegis of the Gates Foundation is an eye opener unraveling the inherent potential of this industry and suggesting ways and means to enhance its services to the deserving lot, in context of the current economic policies. The potential of this Industry to cater to the Lower and Middle Income Households is quite substantial, which is possible only with the legislative and Administrative support.

II Recommendation of the Core committee of the Key Advisory Group – Yet to be accepted by the Ministry

2. Chit Funds are an integral part of the financial networking in our society since time immemorial. As any suggestion / recommendation can be given effect only with Legislative and Administrative support, amendment of the Chit Fund Act 1982 will be the logical step in this direction.

The Act is a modified version of the Cochin Kuries Act 1932 and naturally not in tune with the liberalization policies and the Financial Sector Reforms, and thus has to be modernized. We are given to understand that even the Registrar of Chits are of the view that, once the prudential norms, capital adequacy norms, Investor protection measures etc are in place, provisions for day-to-day sanctions from the office of the Registrar should be done away with. It is not the mere formulation of an Act, but its effective implementation that matters.

2.1 Insurance coverage

The Act rightly provides Penal provisions for various defaults on the part of the foreman but the subscribers’ main concern is safety and security of their money in the hands of the foreman and not the punitive provisions of the Act as such. So, extending Insurance coverage to the subscribers money in the hands of the Forman may be a prudent initiative. Extending insurance coverage, apart from safe-guarding the hard earned money of the subscribing public, will make good business sense for the Insurance companies.

2.2 Securitization facility

RBI rightly has prohibited Chit companies from accepting any deposit from the public but at the same time there should be some options for arranging liquidity, in order to enable the foreman to honor their commitments to the chit subscribers. Securitization can be a right step in this direction. This may also be permitted to raise funds with in his frame work of his functioning. There is a need for a dialogue with Asset Reconstruction Companies by the Chit Fund Associations.

2.3 Value addition to the Chit Industry

The Chit Fund Association’s request to allow undertaking fee based activity like selling insurance policies and other financial products seems fair. The availability of Credit history is essential in the context of selling these products from the banks and other deposit taking institutions. The data bank that the chit fund companies have on this information qualifies them to undertake procurement, processing and disbursement of such products very effectively in view of their skill on intrinsic evaluation, cost effectiveness, market intelligence and quality of ownership. This will also benefit those cross sections that are beyond the reach of banking and other financial intermediaries.

2.4 Grievance redressal cell

We are of the opinion that the Chit Fund Association/Promoters should take the primary responsibility of addressing the subscribers’ grievances. A grievance redressal cell may be constituted which can consist of a representative of the Registrar of Chit Funds, a representative of the Chit Association and representative of the subscribing public/or anyone as decided by the advisory panel so that complaints, as and when occur, can be resolved in the elementary stages. Though the proposed cell may not have legal sanctity, we are given to understand that it has yielded result in States where it had been voluntarily set up.

2.5 Rating of chit fund companies

We find that chit funds traditionally operate on a small scale; foreman-participant as well as intra-participant relations is based upon mutual trust and personal information. The smaller Chit Funds have higher overheads and less capital cushioning but often provide more customized services and personalized attention to their clients. The larger Chit Funds are regarded as financially more reliable. To be successful and acceptable at an increased size and scale, chit funds need transparent processes, risk identification and management strategies, a pool of useful products, professional management, proper documentation, increased use of technology and financial strength to bear the risks.  Brand recognition comes with this type of professional management.  Though some process certifications, (such as ISO) exist, a holistic assessment of the quality of governance and strategies, strength of risk management and operating systems, legal compliance and financial performance can be delivered only by undergoing a detailed performance rating process. Hence it is recommended that ‘Ratings’ be given by agencies like M-CRIL / CRISIL which will be beneficial both to the subscribing public and also motivate the chit promoters to excel.

2.6 Formation of SRO

It’s high time that Chit Funds constitute an SRO, which we understand has also been suggested many times by RBI, as in the case of Bar Association of India, Institute of Chartered Accountants, and Medical Council for Doctors etc. The said SRO will further increase the transparency and ethical practices. This body can keep a tab on the chit promoters and can act as a deterrent for the erring companies thereby reducing the burden on the administrators.  This forum may further help in

    Advocacy of best practices
    Corporate Governance
    Best financial practices
    Ethical behavior
    Educational and awareness activities

2.7 Requirement of a common Registrar

One major drawback we find is that activities of any company in one State are not made known to the Registrar of another State. Creation of the post of a ‘Common Registrar’ for all the States will enable the working status of companies in different States and look into the complaints, if any, for the overall benefit of the subscribing public. The respective State Registrar can keep posting computerized financial and other relevant reports on a periodical basis.

Easy availability of the computerized information to the public from the office of the Common Registrar, based on a few points, and not the entire balance sheet, and some awareness program to the extent that they should deal only with companies who are in the approved list and not in the Black list etc will be enough to maintain effective control.  If any individual chooses to deal with a black listed company just for the sake of better returns, he will do so at his own risk.  Risk taking behavior is inherent in human nature and undue concern on the part of the Reserve Bank of India or other departments to protect the public who knowingly land themselves in the hands of unscrupulous elements in our opinion is unwarranted.  Over regulation can only result in increasing corruption and is against the ongoing liberalization program.

In fact the activities of all the non-banking financial institutions can be monitored by this common Registrar.

2.8 Formation of Advisory Committee for future control

One reason standing in the way of amendment could be the lack of coordination between RBI, Central and the State Governments which we have seen in other spheres as well. Formation of this Advisory Committee, which is informal and independent in nature is a simple and ideal solution in enabling the departments in maintaining transparency, take the affected parties into confidence and make things happen on a time bound manner. Making this committee permanent and strengthening it with more powers may be the next logical step. The tenure of this panel should be for a period of around three years or so and the members should be replaced on a partial rotation basis in order to maintain continuity.

2.9 Amendment of Chit Fund Act 1982

We had very detailed discussions with the Association members. We do agree that Amendment of Act is the first requirement if Chit Funds have to be encouraged to play a more effective role in the Financial Inclusion Programme.

A brief description of the above issues under consideration with the department for amendment and our recommendation is as follows.

Section 2(b) – There is no harm in considering the demand of the Chit Fund Association to change the word ‘Chit Fund’ to ‘Fraternity Fund’ in the definition. This may help distinguish its working from the ‘Prize Chits’ which is banned under a separate legislation.

Though the contents of Section 12 provide for transacting other business with the permission of the State Government, the word ‘Prohibition’ in the heading may be replaced with the word ‘Permission’ as it is misleading.

Section 16 of the Chit Fund Act provide for 2 subscribers presence for the auction meaning thereby a needy subscriber cannot get the chit confirmed unless there are two more subscribers physically present. As we see it, when chit fund companies are working towards e-auction, advent of the electronic revolution and availability of facilities like e-payment etc., such requirements are hindering. It is recommended to look into the possibility of doing away with the 'physical' presence and permitting 'virtual' presence or ‘Proxy’ with a view to avoid practical difficulty and at the same time maintaining transparency.

Section 20(1) provide for 100% of the chit value to be deposited in a separate account for the proper conduct of the chits.  Even Deposit taking companies, as illustrated in the chart below shared with us by the chit fund association, do not have such restrictions. If this holds well, this Section may to be diluted, as it causes undue hardship and heavy financial burden on the chit promoter as the RBI Act prohibits him to take any deposit from the company shareholder or the public even to honor his commitment to the chit holders.

 
Object of the RBI Act         Relevant Sections
                           RBI ACT     Chit Fund Act 1982

Registration                 45  1A      Sec. 4 and 14 etc.,

Minimum capital requirements 45  1A       Sec. 8(1)

Prudential norms             45  1B       Sec. 13

Reserve Fund                 45  1C       Sec. 8(3)

Security deposit              NIL         20(1)(a)
            

If at all some amount is to be deposited that can be at the time of the commencement of the chit not at the time of previous sanction.

As we understand, one major difficulty for the promoters is getting previous sanction for each chit and filing the minutes of the auction proceedings etc on a monthly basis. As the office of the Registrar Chit Funds do not have the time to monitor such procedures on a case to case basis, it may be advisable to issue previous sanction on an annual or half yearly basis. Deposit security if needed can be done at the time of the commencement of each chit. Penal clause for violations, if any, can of course be made stringent to act as a deterrent.

One lacuna, we notice from the point of view of the subscribers, in the Chit Fund Act is that the needy members cannot be sure of getting financial support at a given time. In view of the urgent financial requirements like medical exigencies, education etc., several members look forward to some support even to the extent of money paid by them in the chit. As there are restrictions provided in this regard in Section 21(1), Section 14 and Section 22, we have no objection is acceding to the chit fund association’s request to modify the relevant sections in such a way so as the foreman is allowed to borrow money from the prized subscribers to the extent of their future liability and lend it to the non-prized subscribers to cater to the subscribers’ urgent financial needs.

As Chit funds are supposed to cater to the Lower and Middle Income Households who are beyond the reach of the banks and other intermediaries, a fact that has also been substantiated by report of IFMR etc., we see merit in granting necessary concessions for chits at least up to Rs.1lakh or even a little more. Section 20 and Section 63 may be amended accordingly.

पूर्व सीएम के जन्‍मदिन पर पत्रकारों, नेताओं और अधिकारियों की जेबें कटीं, एक कैमरामैन भी घायल

रायपुर में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के 67वां जन्मदिन पूर्व मंत्री, अधिकारी और पत्रकारों के लिए भारी पड़ गया.. जोगी के बंगले में सोमवार को कई नेताओं, अधिकारियों और पत्रकारों की की जेबें कट गईं.. अजीत जोगी के जन्मदिन के जश्न पर भगदड़ मचने के कारण वहां कवरेज करने के लिए पहुँचे एक निजी चैनल का कैमरामैन गिर गया.. जिससे उसके पैरों में गंभीर चोटें आई हैं.. वहीं कैमरामैन के साथ पहुँचे रिपोर्टर की महंगी मोबाइल गैलेक्सी ग्रांड पर भी जेबकतरों ने हाथ साफ कर दिया.. जेबकतरों ने इसके अलावा भी कई पत्रकारों और लोगों की जेब भी काटीं.

अजीत जोगी के जन्मदिन के जश्न पर भारी भीड़ जुटी थी.. इनमें कई राजनीतिज्ञ, पत्रकार एवं अधिकारी भी शामिल थे.. आईजी स्तर के एक अधिकारी को जेबकतरों ने नहीं छोड़ा.. पूर्व मंत्री रामचंद सिंहदेव की जेब भी कट गई.. पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के समर्थक चंद्रशेखर शुक्ला का भी पर्स भी चोरी हो गया… आईपीएस अधिकारी की जेब कटने के बाद पुलिस सक्रिय हुई.. मंगलवार को पुलिस जेबकतरों की धरपकड़ में जुटी रही… लेकिन पुलिस को खास सफलता नहीं मिली.

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निवास सागौन बंगले में सोमवार को कांग्रेस विधायकों और समर्थकों का मेला-सा लगा था.. अजीत जोगी के 67वें जन्मदिन का इंतजार जोगी के साथ ही छत्तीसगढ़ के पत्रकार और उनके समर्थक लंबे समय से कर रहे थे.. जन्मदिन के इस खास मौके पर जोगी 9 साल बाद व्हील चेयर छोड़कर ई-लेग्स के सहारे अपने पैरों से चले और अपने समर्थकों से मुलाकात की.. जन्मदिन के बहाने उन्होंने प्रदेश में एक बार फिर अपने विरोधियों को अपनी ताकत अहसास कराया.. लेकिन उनके इस ताकत का एहसास करना कई पत्रकारों, आईपीएस अधिकारीयों और नेताओं के लिए किसी शामत से कम नहीं रहा.

Chit Fund association of India gives important clarification on Chit Sharda scam

New Delhi : In 1919, Carlo Ponzi started the scheme for which he became famous: he paid off early investors with money taken in by later investors by creating a consumer stampede with hype of phenomenal returns within a very short period of time. Ponzi exploited the investor market by approaching people most likely to trust him — his family and friends, his Catholic priest, and some neighbors from whom he collected a total of about $1250. Ninety days later, he returned $750 in "interest". His ecstatic original investors unwittingly did his marketing for him — they told everyone they knew about this "bonanza," and investments snowballed.

The party did not last. Within a year, a suspicious Boston Post's front page questioned the legitimacy of the enterprise. Investors panicked and demanded their money back. It's a bit difficult to give it back once it's spent! Without the false hype to induce new participants, Ponzi's scheme folded. Most of his 40,000 investors lost everything they had invested.

Fast forward to 2013, the scene hasn’t changed much; only the operators, victims have new faces. Ponzi changed name to MLM- Multi Level Marketing. Of course, the magnitude has undergone a sea-change, heading north. One of the most unsavory aspects of globalization and a growing economy is that this aspect of white-collar crime, has gained wings. Fraudulent mass-marketers reach victims via all modes of communication—postal service, telephone, e-mail, Internet sites, television, radio, and even in person. Viable multi level marketing fraud groups require a variety of resources to operate, including the means to target and communicate with prospective victims, obtain and launder illicit proceeds, and evade law enforcement detection and investigation. These include legitimate business services, communications tools, payment processors, fraudulent identification documents, and even counterfeit financial instruments.

As a whole, nowadays, fraudulent multi level marketing operations are increasingly transnational, interconnected, and fluid, with groups shifting alliances according to the particular needs of a scheme.

The results are unbearable, tragic.

§ For some victims, the risks extend well beyond loss of personal savings or funds to include physical threats or risks, loss of their homes, depression, and even contemplated, attempted, or actual suicide.

§ Multi level marketing fraud has a substantial impact on economies and markets by undermining consumer trust and confidence in legitimate businesses.

Operators of MLM fraud schemes are highly adaptive, rapidly changing their methods and techniques to reduce the risks of law enforcement detection and investigation and to respond to consumer and business awareness of their current methods.

But what all these scams, one after another, reveal is we haven’t learnt any lesson from our previous outings. We make a huge hue & cry, play the blame game for a while, and very soon forget everything till the next attack!

When the outrage is over ‘rape’ we blame the Police authorities who in turn fortify the roads for a few days, force shut the shops early and relax thereafter, till the next victim surfaces.

When it a financial scam, whoever pulls it, the easy way out is ‘blame it on Chit Fund’, with a attitude of who cares what is a chit fund?.

The authorities, even those hand-in-gloves with the unscrupulous, Politicians, and more importantly the media who in their pursuit to garner more TRPs/Readership and outwit competition turn their backs to the facts and hurry to find a scapegoat, which can sensationalize the whole issue for a while, till the next ‘breaking news’ .

Unfortunately, more often than not, it’s is a financial scam and the scapegoat; always is ‘Chit Funds’. In the case in question the ‘Saradha Group’ it could be seen that they had varied business interests with around hundred and odd companies which were in Realty, Construction, Tours & Travels, Exports, Agro, Livestock, Foods, Multipurpose, Ad agency and of course, presence in media with their 24 hour ‘channel 10’ and also newspapers and magazines. However, what is quite glaring is that they did not float any ‘Chit Fund’ company, yet their scam/failure is attributed to Chit Funds!

 

While doing it, we simply forget that

1. Chit Funds are not allowed to accept deposits from the public.

2. Chit Funds are perfectly legal, governed by the “Chit Funds Act, 1982, and administered by the State Governments

3. There is an office of ‘Registrar of Chit Funds ‘in every state who monitors their operations, rather minutely. The Kokotta Registrar is in 3rd floor, Writers building, 1, K.S. Road.

4. The regulations over chit funds are more stringent, even compared to deposit accepting companies. Utilisation and appropriation of subscribers’ money is strictly prohibited , and provide for capital adequacy and other prudential norms

5. Chit Funds, as of now, are not allowed to carry on other businesses without the permission of the Registrar/State Governments and as of date no permission has been given.

6. Chit Funds have been there from time-immemorial, even before the advent of banking.Many of the companies having been around for more than 100 years! And have been carrying on their business in a impeccable manner.

7. Though the buzzword ‘Financial Inclusion’ is recent, Chit Funds have been doing it since inception, catering to the un-served population in remote areas and are one of the most popular & trusted form of informal finance.

8. Even the Bill & Melinda Foundation have chosen the channel of ‘Chit Funds’ for their poverty alleviation program, in India and are working closely with them in rural as well as urban India

 

The fact remains that the Chit Fund is a time-tested tool and shall always remain so. However, what we need to think is

 

1. Will passing the buck to chit funds or for that matter anybody, help stem the rot.

2. Is it fair on our part to defame any individual or institution for no fault of theirs? More so, when the culprit is of a different breed/variety.

3. Is it not more important to find out the root-cause and weed it out, lest it springs up again?

4. Is it not our moral duty, be it Administrators, Regulators, Politicians, or the ever important fourth estate, Media to rather find the actual culprit and then pass the verdict!

To counter the threat of multi level marketing fraud effectively, investigative, law enforcement, and regulatory authorities will need to work in close coordination. Their focus should be

(1) Expansion of their capability to gather and share intelligence on all aspects of MLM, Residuary and other deposit taking institutions and their key participants; and acting thereupon to initiate remedial measures, if required.

(2)  Increase public awareness and education programs to help individuals and businesses to more readily recognize solicitations by fraudulent companies and take action to avoid or minimize losses to such schemes;

(4) Development of effective measures to more promptly identify and support victims of MLM/other ponzi schemes through public- and private-sector resources like introducing Deposit insurance, as prevention is better than cure; and

(5) Look into investor protection measures, to enhance the participation of informal finance   

in the National Financial Inclusion Program, as suggested by the Key Advisory Group on Chit Funds, formed by the Department of Financial Services, Ministry of Finance, Government of India, etc. etc..

 

For the investors, a thought to chew, ‘to err is human, greed is inherent in most of us, but should we blame others for our plight?’

Our Concern

While the recent incidents are definitely scary & tragic, attributing it to chit funds, will only further aggravate the whole issue, as it may create a run even in the established in the chit fund companies, who are playing a major role in the National Economy.

While our representatives will be more than glad to offer solution and remove shortcomings, if any, our immediate request is set the records straight, i.e. stop misuse of the word ‘Chit Fund’ in such reporting.

Issued in the Interest of all

T.S Sivaramakrishnan

General Secretary

All India Association of Chit Funds (Regd.)

New Delhi

PRESS RELEASE

‘चिट फंड’ पारदर्शी है, इसे बदनाम मत करो, चिट फंड पर गलत रिपोर्टिंग बंद करो!

: चिट फंड एसोसिएशन ने शारदा घोटाले से नाम जोड़ने पर आपत्ति जताई : इस मामले पर चिट फंड एसोसिएशन ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी ने दिया स्पष्टीकरण : नई दिल्ली । लोगों को झांसे में रखकर ज्यादा कमाई का चस्का लगाया जाता है। यही चस्का ज्यादा निवेशकों को आकर्षित करता है और परिणाम होता है बड़ा फ्रॉड। ऐसे तमाम मसले हमारे सामने आते रहे हैं। ऐसे में एक है वर्ष 1919 में कार्लो पोंजी से जुड़ा। पोंजी ने एक ऐसी योजना बनाई कि वह जल्दी ही बहुत मशहूर हो गया।

बहुत कम समय में निवेशकों को उनकी पूंजी का बड़ा ब्याज देकर उन्होंने बिना विज्ञापन के प्रचार पाना शुरू कर दिया। शुरू में उसने ऐसा किया कि निवेशकों का विश्वास जगता गया। उसमें अपने ही जानकारों को जोड़ा। उसके परिवार के लोग, दोस्त-यार, पुजारी और पड़ोसी। इन सबसे उसने लगभग 1250 डॉलर जमा कर लिया। 90 दिनों के बाद उसे बतौर ब्याज 750 डॉलर वापस किया। अपने धन की ऐसी वापसी से उत्साहित निवेशकों ने उसका गुणगान शुरू कर दिया। उसकी मार्केटिंग होने लगी। वह यह बात हर उस व्यक्ति को बताने लगे जो अपने धन को लगाकर मोटा कमाना चाहते थे।

एक साल में ही बोस्टन पोस्ट के पहले पेज पर इस उद्यम की वैधता पर ही सवाल उठाए गए। इस खबर के बाद निवेशकों में उत्तेजना फैल गई और सभी अपना पैसा वापस मांगने लगे। अब जो पैसा खर्च किया जा चुका था उसे वापस करना कठिन था। यह कठिनाई तब तक बनी रहती जब तक कि गलत प्रचार को रोककर नए प्रतिभागियों को शामिल नहीं कर लिया जाता। नए प्रतिभागी जुड़े और परिणाम यह रहा कि करीब 40 हजार निवेशक अपना सबकुछ गंवा चुके थे।

तब से लेकर अब तक परिस्थितियां बदली नहीं हैं। पीड़ितों को बस लूटने वाले चेहरे नए मिल गए हैं। पोंजी का नाम बदलकर मल्टी लेवल मार्केटिंग हो गया है। बेशक आज परिस्थितियों में पूरा बदलाव आ चुका है। आज के वैश्वीकरण का सबसे घृणित पहलू यह है कि अर्थव्यवस्था के बढ़ते रुख में सफेद पोशों ने नई उड़ान भरी है। इस फ्रॉड की बृहद मार्केटिंग हो रही है। संचार के हर तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोगों को फांसने में डाक सेवा, टेलीफोन, ई-मेल, इंटरनेट, टेलीविजन, रेडियो और यहां तक कि व्यक्तिगत रूप से भी इसका प्रचार किया जाता है। इस गोरखधंधे का इन दिनों रूप बहुत व्यापक हो गया है। इनके तमाम स्थितियों के चलते पीड़ितों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। मल्टी लेवल मार्केटिंग के नाम पर इन दिनों कई तरह से फ्रॉड की संख्या में खासी बढ़ोतरी हो गई है।

परिणाम असहनीय और दुखद है

अनेक पीड़ित ऐसे हैं, जिनकी अपनी बचत ऐसे फ्रॉड में चली जाती है। इसके चलते उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत दिक्कत होती है, उन्हें अपना घर गंवाना पड़ा, वे कुंठा में आ गए और कई बार तो कुछ लोगों ने आत्महत्या तक की कोशिश की। मल्टी लेवल मार्केटिंग के नाम पर फ्रॉड के चलते उपभोक्ताओं का विश्वास डिगा है और वे खोखले हुए हैं। एमएलएम फ्रॉड स्कीम के प्रमोटर बहुत जल्दी चीजों में ढल जाते हैं और अपने तकनीकी और अन्य तरीकों से लॉ इंफोर्समेंट ऑफ डिटेक्षन के खतरों को कम कर देते हैं। और अपने मौजूदा तरीके से ग्राहकों को कारोबारी जागरूकता से परिचित करा देते हैं।

लेकिन इन घोटालों का क्या जो एक के बाद एक हो रहे हैं इससे पता चलता है कि हमने पहले की घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया है। और हम एक दूसरे पर चीजों को थोपते हुए थोडी देर के लिए हम उसका बहुत बडा तमाशा खड़ा कर देते हैं। और बहुत जल्दी ही अगली घटना घटने तक हम फिर सब भूल जाते हैं। इसी तरह जब कोई आर्थिक घोटाला घटता है तो हम नींद से जगते हैं।

शारदा ग्रुप की बात करें तो इससे पता चलता है कि उनका ढेर सारा कारोबार है और उनके पास 100 से अधिक कंपनियां हैं, जिसमें रियालिटी, कंसस्ट्रक्षन, टूर एंड ट्रैवल, एक्सपोर्ट, एग्रो, लाइवस्टॉक, फूड, मल्टीपर्पज, एड एजेंसी, मीडिया ग्रुप, न्यूज चैनल व ढेर सारी पत्रिकाएं हैं। हालांकि यह इस बात का सुबूत है कि उन लोगों ने किसी चिट फंड को इसका माध्यम नहीं बनाया। फिर भी उनके इस असफलता का गुबार भी चिट फंड के रूप में लोगों को दिखाया जाता है।

ध्यान रखने वाली जरूरी बातें:

-चिटफंड लोगों के डिपॉजिट को स्वीकार नहीं करती हैं

-चिटफंड पूरी तरह से कानूनी है और इसे चिट फंड एक्ट 1982 के तहत संचालित किया जाता है और यह राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

-हर राज्य में एक चिटफंड रजिस्टार का ऑफिस होता है जो सारे संचालन पर हर पल नजर रखता है। कोलकाता रजिस्टार तीसरे मंजिल पर राइटर्स बिल्डिंग में, 1, केएस रोड पर स्थित है।

-चिट फंड नियामक के नियम बहुत ही सख्त हैं, यहां तक कि डिपॉजिट लेने वाली कंपनियों से भी ज्यादा ये सावधानी बरतती है।

-चिट फंड, यहां तक कि कोई बिजनेस रजिस्ट्रार/राज्य सरकार के अनुमति के बिना स्वीकार नहीं करती। और अब तक कोई ऐसा परमीशन नहीं दिया गया है।

-चिट फंड का इतिहास बहुत पुराना है और यदि इसके समय की बात करें तो इसका अस्तित्व बैंकिंग के समय से भी पहले का है। बहुत सारी कंपनियां लगभग 100 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं और अपना कारोबार अबाध ढंग से कर रही हैं।

-यद्यपि 'फाइनेंशियल इंक्लूजन' बहुत नया है, चिट फंड अपना काम बहुत समय पहले से कर रही है और यह ग्रामीण इलाकों में व्यवस्थित अंदाज में ढलकर वहां के लोगों को विश्वसनीय ढंग से निवेश का माध्यम देती है।

-यहां तक कि भारत में बिल एंड मेलिंडा फाउंडेशन ने भी चिट फंड के चैनल को ही अपने गरीबी सुधारक कार्यक्रम के लिए चुना। और ये कंपनी बहुत ही निकटता के साथ ग्रामीण और शहरी इलाकों में सफलता पूर्वक काम कर रहे हैं।

-चिट फंड एक मजबूत माध्यम है जो किसी का पैसा नहीं डुबोती।

– क्या ये मुनासिब है किसी व्यक्ति विशेष या संस्थान को उनके बिना किसी के गलती के बदनाम कर दिया जाए, जब तक कि भुक्तभोगी किसी अलग किस्म का न हो।

– क्या ये जरूरी नहीं है कि पहले उस जड़ का पता लगाया जाए फिर उस पर कोई फैसला दिया जाए।

-क्या यह हमारे नियामकों व मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि वो वास्तविकता के तह में जाकर इसका पता लगाए फिर इस पर कार्रवाई करें।

समन्वयन के तहत कैसे हो समाधानः-

-लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए एजूकेशन प्रोग्राम का सहारा लेकर हर किसी को फ्रॉड कंपनियों के बारे में लोगों को जागरूक करना व उनके खिलाफ एक्षन लेना बेहद जरूरी है।

-रोकथाम इलाज से बेहतर है और ये मुहावरा इस मामले में लागू होता है। बाद में पछताने से अच्छा है कि पहले ही हर चीज की जॉंच परख कर ली जाए।

-चिट फंड एवाइजरी के सुझाव द्वारा नेषनल फाइनेंषियल इन्क्लूजन प्रोग्राम जिसे डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंषियल सर्विसेस मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस और भारत सरकार ने बनाया है।

हमारी चिंताः

हाल में घटी यह घटना काफी दुखद व भयावह है और इसे चिटफंड का नाम दिया गया है यह इस मामले को और खराब करेगा। इसके कारण चिट फंड जो कि एक स्थापित संस्थान है उसमें उथल-पुथल मचा दी है जो कि एक राष्ट्र के आर्थिक विकास में अहम योगदान दे रहा है। हमारे प्रतिनिधि इस समस्याओं का समाधान करने में और ऐसी गलत चीजों को हटाकर बहुत खुश होंगे, हमारी प्रार्थना है कि एक सीधा रिकॉर्ड बनाया जाए बिना कोई देरी किए और उदाहरण के लिए चिट फंड पर गलत रिपोर्टिंग बंद की जाए।

प्रेस विज्ञप्ति

एएआरडी बिल्‍डर ने हजारों लोगों से की ठगी, बिना कम्‍पलीशन सर्टिफिकेट जमा किए कर दी रजिस्‍ट्री

देश में चिटफंड कंपनियां और बिल्‍डर तमाम लोगों के सपने और अरमान अक्‍सर तोड़ते रहते हैं. अभी शारदा ग्रुप की चिटफंड कंपनी ने हजारों लोगों को ठगा है तो 217 शहरों में लोगों के लिए आशियाना बनाने का सपना दिखाने वाले सहारा ने सपने ही छल लिया. अब ऐसी ही एक खबर गुडगांव से आ रही है, जहां एक बड़े बिल्‍डर समूह ने हजारों लोगों को ठग लिया है. इस समूह में फ्लैट और घर खरीदने वाले सैकड़ों लोग ठगे जा चुके हैं. यहां रहने वाले लोग अब इस मामले को लेकर सरकार और कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं. 

एएआरडी नाम की कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी, जिसका दिल्‍ली में बाराखंभा पर मशहूर गोपालदास बिल्डिंग है, ने गुडगांव के सेक्‍टर 52 में कुछ साल पहले एक कॉलोनी का निर्माण किया. यहां मॉल, टॉवर, मल्‍टी स्‍टो‍रीज बिल्डिंग, विला, पेंट हाउसों का निर्माण करवाया. सैकड़ों लोगों ने कंपनी के इस प्रोजेक्‍ट में अपना अपना घर, फ्लैट, दुकान आदि बुक कराया. कंपनी ने इस प्रोजेक्‍ट को पूरा करने के बाद लगभग दो साल पहले सभी को बुक कराई गई प्रापॅर्टी रजिस्‍ट्री कर दी. यहां तक तो ठीक था, पर सरकार की तरफ से इस कॉलोनी के आरडब्‍ल्‍यूए को आई सूचना ने पूरी कॉलोनी को हिला कर रख दिया है.

बताया जा रहा है कि एएआरडी कंपनी ने गैरकानूनी तरीके से बिना कम्‍पलीशन सर्टिफिकेट जमा किए लोगों को उनकी प्रॉपर्टी रजिस्‍ट्री कर दी, जबकि बिना कम्‍पलीशन सर्टिफिकेट के रजिस्‍ट्री पूरी तरह गैर कानूनी तथा अमान्‍य है. सभी कंपनियों को कम्‍पलीशन सर्टिफिकेट लेना इसलिए जरूरी होता है ताकि इस बात की जांच की जा सके कि कंपनी ने जिस तरह और जितना एरिया में प्रोजेक्‍ट के लिए नक्‍शा पास कराया गया था, उतना ही निर्माण हुआ है या फिर कम या ज्‍यादा. परन्‍तु एएआरडी कंपनी ने बिना कम्‍पलीशन सर्टिफिकेट जमा किए ही रजिस्‍ट्री कर दी.

रजिस्‍ट्री होने के बाद सभी निवासी इस मल्‍टी स्‍टोरीज कॉलोनी में रहने लगे. अब सरकार की तरफ से सूचना दी गई है कि इन लोगों को गैरकानूनी तरीके से कब्‍जा मिला है. यहां रहने वाले हजारों लोग अब अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं. आरडब्‍ल्‍यूए भी परेशान हैं. सरकार ने सीवर के इस्‍तेमाल पर भी रोक लगा दी है. यानी एएआरडी कंपनी ने सैकड़ों लोगों से धोखा करके उन्‍हें ठग कर निकल चुकी है. यहां रहने वाले वाशिंदे बुरी तरह परेशान हैं. आरडब्‍ल्‍यूए रास्‍ता निकालने की तैयारी कर रहा है लेकिन यहां रहने वाले लोग अपने करोड़ों के निवेश के फंसने से परेशान हैं.

बताया जा रहा है कि एएआरडी का विरोध भी शुरू हो चुका है. यहां के रहने वाले लोग अब हरियाणा सरकार का दरवाजा  खटखटाने के साथ कोर्ट जाने की भी तैयारी कर रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना कम्‍पलीशन सर्टिफिकेट दिए किस तरह से इस कंपनी को रजिस्‍ट्री करने दिया गया. सरकारी अधिकारी और संबंधित विभाग के लोग इतने समय तक चुप्‍पी क्‍यों ओढ़े रहे. आरोप लग रहा है कि इस प्रोजेक्‍ट में नेता और अधिकारियों ने भी जमकर पैसा बनाया है, इसीलिए रजिस्‍ट्री से पहले कंपनी से कम्‍पलीशन सर्टिफिकेट और अन्‍य चीजों की मांग नहीं की गई. 

सहारा की 5984 ‘कलावतियों’ की तलाश, इनमें से 55 का एक ही पता

नीचे इंदौर के प्रभात किरण अखबार में प्रकाशित एक खबर है. उसे पढ़िए. राहुल ने एक कलावती खोजी थी, पर सहारा को चाहिए 5984 कलावती. उसमें भी एक ही पते पर 55 कलावती चाहिए.  वह भी आज तक. यानि 2 मई डेड लाइन है। वन्दे मातरम, भारत माता की जय!

–एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

स्क्रिप्‍ट चोर हैं अनुराग कश्‍यप!

मुंबई। सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर बनाई गई फिल्म बॉम्बे टॉकीज में शॉर्ट फिल्म के लिए फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप पर एक राइटर ने चोरी का आरोप लगाया है। सूत्रों के अनुसार राइटर निशांत जी रंजन का दावा है कि बॉम्बे टॉकीज में कश्यप की शॉर्ट फिल्म उनकी स्टोरी पर आधारित है। उनका कहना है कि उन्होंने 2011 में कश्यप को एक स्टोरी भेजी थी जिसका अनुराग ने कोई जवाब नहीं दिया। बाद में स्टोरी की बात को भूल गए।

जब उन्होंने अनुराग की शॉर्ट फिल्म की रिपोर्टस पढ़ी तो उन्हें एहसास हुआ कि दोनों स्टोरीज एक जैसी है। उन्होंने फिल्म राइटर एसोसियशन में मामले को उठाया है। उल्लेखनीय है कि हाल ही एक इंटरव्यू के दौरान अनुराग ने कहा था कि शॉर्ट फिल्म की स्क्रिप्ट उनकी लिखी गई स्क्रिप्ट्स में से एक है। आपकों बता दें पिछले सप्ताह भी ऎसा मामला सामने आया था जिसमें राइटर-डायरेक्टर सुदीप्तो चट्टोपाध्याय ने जोया अख्तर पर स्टोरी चुराने का आरोप लगाया था।

हालांकि कश्यप ने रंजन के आरोपों से इनकार किया है। कश्यप ने टि्वट किया मिस्टर निशांत रंजन आपका आरोप बिल्कुल गलत है। मेरी अपनी रेपोटेशन है। इस तरह से चीफ पब्लिसिटी मुझे पसंद नहीं है। (पत्रिका)

SC to take cognisance of CBI keeping scribe in dark about Upendra Rai and ED Sharad Chaudhary case

New Delhi: The Supreme Court on Wednesday decided to take cognizance of the case of CBI keeping a scribe in the dark for 20 months about the closure of preliminary inquiry against him for allegedly trying to influence the Enforcement Directorate's probe in the 2G spectrum allocation scam.

"We will take cognisance of it," a bench comprising justices G S Singhvi and K S Radhakrishnan said after senior advoacte Ram Jethmalani showed the CBI communication received by the journalist. The CBI communication dated April 16, 2013 stated that the preliminary inquiry started on the apex court's May 5, 2011 order against Upendra Rai, then director (News) Sahara News Network, was closed on August, 30 2011.

It was alleged that Rai had tried to bribe Assistant Director of ED Sharad Chaudhary to get favour for corporate lobbyist Niira Radia. The bench, which took on record the copy of the communication, asked Jethmalani to file a proper affidavit in this regard. The issue was taken up when the bench was to hear the contempt case against Sahara Group Chief Subrata Roy for allegedly interfering with the probe in the 2G spectrum case.

Jethmalani, who alongwith advocate Keshav Mohan was appearing for Roy, said this closure of preliminary inquiry against Rai will have a bearing on the main contempt petition. The CBI was asked to inquire after an NGO, Centre for Public Interest Litigation (CPIL), had alleged that Rai had allegedly met an Assistant Director of ED and offered him Rs two crore as bribe for getting favour for Radia, who was under the scanner of various government agencies.

A day after, the apex court on May 6, 2011 had initiated suo motu contempt proceedings against Roy and two scribes — Upendra Rai and Subodh Jain — who were then with Sahara India News Network.

The apex court had taken note of the fact that they had allegedly tried to intimidate and blackmail Enforcement Directorate's Assistant Director Rajeshwar Singh, who is the investigating officer in the 2G spectrum case. Senior advocate Rajeev Dhavan was appearing for Rai.

Senior advocate, Vikas Singh, appearing for Jain, said even before the court had passed the order, his client had written to the Prime Minister and Ministry of Finance about the allegation against Singh. Further, he said allegations about Singh were not in connection with his tenure in the ED but during his posting with the Uttar Pradesh Police. (PTI)

दैनिक जागरण में ग्रुप इंटरटेनमेंट एडिटर बनीं शुभा शेट्टी साहा

जागरण से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार शुभा शेट्टी साहा ने अपनी नई पारी शुरू की हैं. उन्‍हें अखबार में ग्रुप इंटरटेनमेंट एडिटर बनाया गया है. शुभा जानी मानी इंटरटेनमेंट पत्रकार हैं. पिछले लगभग दो दशकों से वे इंटरटेनमेंट जर्नलिज्‍म में सक्रिय हैं. वे जागरण समूह के ही अखबार मिड डे से एक साल पहले इस्‍तीफा दे दिया था. वे दुबारा जागरण समूह के साथ जुड़ी हैं. इसके पहले वे सिनेब्लिट्ज, डीएनए, गल्‍फ न्‍यूज के साथ इंटरटेनमेंट जर्नलिस्‍ट के तौर पर काम कर चुकी हैं.

विवेक पांडेय एवं संतोष पांडेय ने शुरू की नई पारी

काम्‍पैक्‍ट, गोरखपुर से खबर है कि विवेक पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे तथा रिपोर्टिंग इंचार्ज की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. विवेक अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान के साथ गोरखपुर में ही शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें यहां सीनियर सब एडिटर बनाया जा रहा है. विवेक ने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला, गोरखपुर से की थी. उनके बाद जब काम्‍पैक्‍ट लांच हुआ तो वे इस टैबलाइड के साथ जुड़ गए. विवेक काम्‍पैक्‍ट की लांचिंग टीम के सदस्‍य थे.

वॉयस ऑफ मूवमेंट, लखनऊ से खबर है कि संतोष पांडेय ने अपनी नई पारी शुरू की है. संतोष को सब एडिटर बनाया गया है. संतोष ने कुछ समय पहले जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस से इस्‍तीफा दिया था. संतोष इसके पहले भी कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं. उनकी गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है.

बनारस में पत्रकारिता की हंसी उड़वा रहा है ‘जनसंदेश टाइम्‍स’

एक कहावत है 'बदनाम हुए तो क्या नाम ना होगा'। इसी कहावत पर 'जनसंदेश टाइम्स' चलते हुए मान चुका है कि कंटेंट में वो खूबी तो अब तक आ ना पायी कि लोग खुद से अख़बार को खोजकर पढ़ें। सो इसने भी ठान लिया है कि खबरों में ऐसा टाइटिल लगाओ कि लोग पढ़कर पत्रकारिता की हँसी उड़ाएं।

अख़बार के बनारस यूनिट ऑफिस के डेस्क प्रभारी और डेस्क पर कार्यरत पेजीनेटरों का कमाल देख ही चुके हैं कि किस तरह वे कार्य कर रहे हैं? लगता है संपादकीय विभाग भी इस पर अपनी मुहर लगा चुका है तभी तो अभी और गलतियां आनी बाकी थीं।

1 मई 2013 का चन्दौली संस्करण। खबर फिर सकलडीहा से है कि भाकपा माले ने बैठक की और पिछले दिनों क्षेत्र में हुए दुष्कर्म मामले में पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ 8 मई को विधानसभा घेराव पर रणनीति बनायी। चन्दौली कार्यालय से खबर निकली। डेस्क पर पहुँची और अगले दिन छपी कि 'भाजपाई 8 को घेरेंगे विधानसभा।' बैठक की भाकपा माले ने, श्रेय ले गयी भाजपा। इस खबर ने जिले में तो तहलका मचाया ही, बनारस में इस अखबार को भाजपाइयों ने खोज-खोजकर पढ़ा। भाजपाई भी दंग रह गये हेडलाइन देखकर। भाकपा माले भी आश्चर्यचकित। चर्चाओं में सभी ने कहा 'वाक़ई जनसंदेश अखबार जन का संदेश देने वाला और सच को अच्छे से परखने वाला है।'

पत्रकारिता का उपहास उड़ना अभी बाकी था इसलिए 1 मई का कसर चकिया के एक खबर 'राष्ट्रीय सम्मेलन व कवि सम्मेलन आज' ने पूरी कर दी। क्योंकि खबर एक थी लेकिन लगता है डेस्क पर कार्य करने वाला इतना खुश हुआ कि वह भूल गया कि और भी खबरें हैं जिन्हें जगह देनी हैं। उसने इस खबर को पेज 4 और 5 दोनों पर पीटा। डेस्क प्रभारी भी लगता है जल्दी में थे सो उन्होंने भी ओके कर दिया और खबर आयी तो आयोजक खूब खुश कि 'जनसंदेश टाइम्स' ने उनकी खबर को औरों के मुक़ाबले ज़्यादा महत्व दिया है।

ख़ैर इस पूरे प्रक़रण में ना तो दोषी पत्रकार को कहा जा सकता है, ना जिला कार्यालय को और ना ही पेजीनेटरों और डेस्क पर काम करने वाले लोगों को। ग़लती तो 'तथाकथित सर्वोत्तम टीम' से बनी सम्पादकीय प्रभाग की ही कही जा सकती है, जो पेज फ़ाइनल करने से पहले केवल रस्म अदायगी के लिए पेज देख लेते हैं, दो-चार शब्द इधर-उधर कर लेते हैं और महीने के पहले सप्ताह अपनी पगार ले लेते हैं।

ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिला प्रभारियों को कम्पनी से पैसा पिछले साल के अगस्त से ही बंद किया जा चुका है। कम्पनी की हालत ऐसी है कि एक साल की खुशियां मनाने के लिए तो पैसे हैं, लेकिन कर्मचारियों को देने के लिए पैसा नहीं है। ये पेजीनेटर तीन महीने से अपना कोरम पूरा कर रहे हैं। ऐसे अख़बार क्या पत्रकारिता को सिद्ध कर पायेंगे जहाँ गुलछर्रे उड़ाने और फर्स्ट लाइनर के लिए पैसे तो हैं, लेकिन नीचे के लोगों के लिए बस बंधुआ मजदूरी। लेबर कार्यालय को ऐसे कम्पनी को अंतिम नोटिस दे देनी चाहिए जहाँ इस तरह से कर्मचारियों का शोषण होता है।

रीतेश कुमार

ritesh26192@gmail.com

बृजेंद्र सिंह शेखावत होंगे दैनिक भास्‍कर, सीकर के संपादक

दैनिक भास्‍कर, जयपुर से खबर है कि बृजेंद्र सिंह शेखावत को सीकर का संपादक होंगे. श्री शेखावत जयपुर में खेल इंचार्ज के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. उन्‍हें बलदेव शर्मा की जगह सीकर का संपादक बनाकर भेजा गया है. गौरतलब है कि सीकर के संपादक रहे बलदेव शर्मा को सुधीर मिश्रा की जगह उदयपुर का संपादक बनाया गया है. सुधीर मिश्रा भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर नवभारत टाइम्‍स, लखनऊ के संपादक बन चुके हैं. 

Aaj Tak crosses 1 million mark on Facebook

India's leading Hindi news Channel Aaj Tak has created milestone on the Digital world by crossing the much coveted 1 million mark on Facebook. The most trusted channel is widely followed by the Facebook users and boasts of more than a million fans on the digital world and thus, achieving the feat of becoming the first Hindi website to have 1 million fans.

In the fast changing scenario, news consumption on social media has been on the rise. Aaj Tak, over the last few years has been instrumental in reaching out to viewers on social media and the one million mark shows the popularity of the channel among the Digital world.

Aaj Tak on Facebook has been actively engaging with the audience by using various tools & mediums such as debates, polls, issues & news. Social media is a high interaction platform where the communication is between both the parties & Aaj Tak has always been raising the issues of the public of the digital platform. (mm)

सुप्रीम कोर्ट में आज तय होगा सुब्रत रॉय जेल जाएंगे या नहीं

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट आज सहारा ग्रुप के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करेगा। सेबी की इस याचिका में कहा गया है कि सहारा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया, जिसमें उसे निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया था। अपनी अवमानना याचिका में सेबी ने कोर्ट से अपील की है कि सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय और सहारा के दो डायरेक्टर्स को जेल भेजा जाए।

उधर, सहारा समूह और इसके प्रवर्तक सुब्रत राय ने बताया है कि उनके खिलाफ आदेश की अवमानना का कोई मामला नहीं बनता क्योंकि उन्होंने सेबी को दस्तावेजों की आपूर्ति करने के मुद्दे पर न्यायालय के निर्देशों का पालन किया है और अपने निवेशकों को 24,000 करोड़ रुपये लौटाना शुरू कर दिया है। सहारा के वकीलों ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने का कोई मामला नहीं बनता, क्योंकि दस्तावेज सेबी को उपलब्ध कराए जा चुके हैं और अदालत 5 दिसंबर, 2012 को धन जमा करने के मुद्दे पर विचार कर चुकी है। (एनडीटीवी)

टीवी100 से इस्‍तीफा देकर नीरज टोटल टीवी तथा नेहा आजाद न्‍यूज पहुंचीं

टीवी100 से खबर है कि नीरज राठी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर पिछले तीन सालों से कार्यरत थे तथा रन डाउन प्रोड्यूसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. नीरज ने अपनी नई पारी टोटल टीवी के साथ शुरू की है. यहां भी इन्‍हें प्रोड्यूसर बनाया गया है. यहां भी ये रनडाउन की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. डेस्‍क के अलावा एंकरिंग और रिपोर्टिंग का भी नीरज राठी को लंबा अनुभव है.

नीरज राठी
नीरज ने अपने करियर की शुरुआत लोकसभा से की थी. इसके बाद हरियाणा न्‍यूज, वीओएन होते हुए टीवी100 पहुंचे थे. नीरज की गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है.  

टीवी100 से ही दूसरी खबर है कि नेहा शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एंकर थीं. नेहा ने अपनी नई पारी आजाद न्‍यूज चैनल से शुरू की है. उन्‍हें यहां भी एंकर बनाया गया है. नेहा इसके पहले सुदर्शन टीवी को भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. नेहा को एंकरिंग के साथ रिपोर्टिंग का भी अच्‍छा खासा अनुभव है.

अशोक पांडेय की पॉलिसी से डूब गया नेटवर्क 10, प्रसारण बंद

यशवंतजी, देहरादून से ऑन एयर होने वाले नेटवर्क 10 न्यूज चैनल का बाजा बज गया है। पहले से बैसाखियों के सहारे चल रहा नेटवर्क 10 न्यूज चैनल अपनी आखरी सांसे ले रहा है। इस वक्त चैनल का प्रसारण बंद पड़ा हुआ है। अब उम्मीद कम ही है कि यह चैनल फिर से ऑन एयर हो पाएगा। पहले से ही इस चैनल में गिने चुने कर्मचारी बचे हुए थे। इस चैनल के साथ काम कर रहे कर्मचारियों की सबसे बड़ी परेशानी अपनी बकाया सैलरी को चुकता कराने की है।

चैनल के कर्मचारियों से पता चला है कि एक कर्मचारी की 40 से 50 हजार की सैलरी अभी तक पेंडिंग पड़ी है। चैनल प्रबंधन बकाया रकम चुकता करने को तैयार नहीं है। ऐसे में कर्मचारियों का कहना है कि अगर चैनल पर ताला लगता है तो सैलेरी लेकर ही यहां से जाएंगे अन्यथा आंदोलन का रास्ता इख्तियार किया जाएगा। कर्मचारी चैनल के बंद होने के लिए सीधे तौर पर एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर अशोक पांडेय को जिम्‍मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि उन्‍होंने अपना भला तो कर लिया लेकिन चैनल और कर्मचारियों को गड्ढे में ढकेल दिया।

आपको एक बार फिर से याद दिलाते हैं कि नेटवर्क 10 कैसे खड़ा हुआ और इसके डूबने के पीछे कौन लोग जिम्मेदार है। विधानसभा चुनाव 2012 के दौरान उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से नेटवर्क 10 नाम से एक चैनल की लॉंन्चिंग की तैयारी शुरू हुई। उस वक्त इस चैनल की कमान बसंत निगम को सौंपी गई थी। शिमला बाईपास के पास एक बड़ी से बिल्डिंग में चैनल का ऑफिस खोलने की तैयारी की गई। देहरादून में नेटवर्क 10 के बडे बड़े पोस्टर लगाए गए। इस तरह का माहौल बनाया गया कि मीडिया जगत में नेटवर्क 10 कोई बड़ा करिश्मा करने वाला हो।

इसके बाद इस चैनल के साथ अशोक पांडेय एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर के रूप में जुड़ गए। चैनल प्रबंधन से नेटवर्क 10 को 'सच की हद' तक ले जाने के दावे के साथ भारी रकम खर्च कर आधुनिक मशीनें भी लगवाई गईं। पीसीआर, से लेकर एडिटिंग, एडीटोरियल और कैमरा यूनिट तमाम सामान पर खूब पैसा खर्च किया गया। यानी मालिक को शुरू में ही दूह लिया गया। अशोक पांडे की अगुवाई में विधानसभा चुनाव 2012 से पहले ही इस चैनल को जैसे तैसे ऑन एयर कर दिया गया। बाद में अशोक पांडेय ने बसंत निगम को किनारे करके चैनल पर अपना एकाधिकार कर लिया।

यशवंतजी, आपको बताना चाहूंगा कि शुरुआत में इस चैनल ने अपने स्ट्रिंगर तक को मोटी सैलरी पर रखा था। सैलरी के लालच में आकर ही दूसरे चैनल के साथ काम कर रहे रिपोर्टरों नेटवर्क 10 का दामन थाम लिया। जैसे ही विधानसभा चुनाव निपटे और कांग्रेस की सरकार बनी चैनल की हालत पतली होने लगी। चैनल के कर्ताधर्ता अशोक पांडे और इनकी टीम की पॉलिसी इस चैनल को ले डूबी। मुश्किल दरअसल इस बात की थी कि चैनल ने इन लोगों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया था। और इन लोगों ने आंख खोलकर चैनल को लूट लिया।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सी न्‍यूज में कर्मचारियों का टोटा, नहीं मिलता है वीकली ऑफ

आगरा से संचालित होने वाले सी न्यूज में हालात अच्छे नहीं बताए जा रहे हैं। इस चैनल में कर्मचारियों के चैनल छोड़ने का सिलसिला रुक नहीं रहा है। कुछ कर्मचारी पहले ही ग्वालियर का रूख कर चुके हैं जबकि कुछ दिल्ली के चैनलों में जुडे हैं। चैनल प्रबंधन ने सैलरी इंक्रीमेंट के बहाने कुछ लोगों को रोककर जैसे तैसे काम चला रखा है, लेकिन ये लोग भी इस चैनल में तब तक ही काम कर रहे हैं जब तक की इनके पास कोई अच्छी नौकरी हाथ नहीं आती है।

खबर है कि चैनल के एडिटोरियल, एडिटिंग, पीसीआर और आईटी तक के लोग अपने संबंधों के जरिए लगातार दिल्ली और दूसरी जगह पर मीडिया जगत के दूसरे लोगों से लगातार संपर्क बनाए हुए हैं। इन लोगों को जैसे ही कोई दूसरा विकल्प मिलता है तो फौरन नौकरी से बाय बाय कर देंगे। इन हालात में सी न्यूज निश्चित तौर पर संकट में घिर सकता है। कर्मचारियों की परेशानी इस बात को लेकर है कि जब से उन्होंने चैनल ज्वाइन किया है सैलरी इंक्रीमेंट नहीं हुआ है। महज कुछ एक लोगों को छोड दें तो किसी की सैलरी में इकन्नी भर भी इजाफा नहीं किया गया है। साथ ही इस चैनल में विकली ऑफ का भी कोई सीन नजर नहीं आता है।

चैनल के कर्ताधर्ताओं का कहना है कि वीकली ऑफ नहीं मिलेगी, हां जरूरत हो तो वैसे ही छुट्टी ले सकते हो। जाहिर है इन हालात में वही काम कर सकता है जो बेरोजगार नहीं होना चाहता है। सी न्यूज का इतिहास वैसे ज्यादा पुराना नहीं है। यूपी और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2012 के दौरान इस चैनल की शुरुआत की गई थी। उस दौरान लोगों को मोटी सैलरी पर बुलाया गया था लेकिन कुछ ही महीने बाद इस चैनल से लोगों के जाने का सिलसिला शुरू हो गया। अब चैनल प्रबंधन की कोशिश है कि सी न्यूज को किसी तरह से लोकसभा चुनाव 2014 तक चलाया जाए ताकि उस दौरान कुछ कमाई हो सके। वैसे चैनल की पॉलिसी भी सही है कि लोकसभा चुनाव के दौरान हर रीजनल चैनल को विज्ञापन के रूप में मोटी कमाई होगी भी, क्योंकि इस चुनाव में इस बार यूपीए और एनडीए में कांटे की टक्कर होने की पूरी उम्मीद की जा रही है। इसी बात का फायदा तमाम चैनल उठाने की तैयारी कर रहे हैं।

सरबजीत सिंह का निधन, मनमोहन सिंह ने जताया शोक

पाकिस्तान में मौत की सजा का सामना कर रहे भारतीय कैदी सरबजीत सिंह का लाहौर के एक अस्पताल में देर रात डेढ़ बजे निधन हो गया। सरबजीत की मृत्यु कड़ी सुरक्षा वाले जेल में कैदियों द्वारा बर्बर हमला किए जाने के बाद पिछले छह दिनों तक कोमा में रहने के बाद हुई। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरबजीत सिंह के निधन पर शोक जताया है। प्रधानमंत्री ने खेद व्यक्त किया कि मामले में मानवीय रवैया अपनाने के लिए पाकिस्तान ने भारत और सरबजीत के परिवार के आग्रह पर ध्यान नहीं दिया।

सरबजीत के इलाज की निगरानी कर रहे मेडिकल बोर्ड के प्रमुख महमूद शौकत ने बताया कि जिन्ना अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात एक डॉक्टर के पास से मेरे पास देर भारतीय समयानुसार डेढ़ बजे फोन आया जिसमें सूचित किया गया कि सरबजीत नहीं रहे। इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों ने बताया कि उन्हें जिन्ना अस्पताल के अधिकारियों ने सरबजीत की मृत्यु के बारे में सूचित किया है।

शौकत ने कहा कि सरबजीत के शव को उनके परिजनों या भारतीय अधिकारियों को सौंपने के बारे में कोई फैसला नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि इन मामलों को सरकार की ओर से दिए जाने वाले निर्देश के अनुसार तय किया जाएगा। इससे पहले दिन में लाहौर में आधिकारिक सूत्रों ने बताया था कि सरबजीत की हालत जिस तरह से गिर रही है उससे वह दिमागी रूप से मृत हालत में जा सकते हैं।सरबजीत सिंह पर 26 अप्रैल को लाहौर की कोट लखपत जेल में 4 से 5 कैदियों ने हमला किया जिसमें वे बुरी तरह घायल हो गए थे। इलाज के लिए उन्हें वहां के जिन्ना अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां वे तभी से वेंटिलेटर पर थे। लेकिन दिनों-दिन सरबजीत की हालत बिगड़ती चली गई और आखिरकार वह जिंदगी की जंग हार गए।

सरबजीत के परिवार ने उनके शव को सौंपे जाने की मांग की है। सरबजीत का परिवार दिल्ली में ठहरा हुआ है। सरबजीत के परिवार से मिलने केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे भी पहुंचे। सरबजीत के परिवार ने उन्हें शहीद घोषित करने की मांग की है। सरबजीत को वर्ष 1990 में पंजाब प्रांत में हुए कई बम विस्फोटों में कथित रूप से उनकी संलिप्तता के लिए दोषी ठहराया गया था। इस हमले में 14 लोग मारे गए थे । अदालतों तथा पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने उसकी दया याचिकाओं को ठुकरा दिया था।पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अगुवाई वाली पिछली सरकार ने वर्ष 2008 में सरबजीत की फांसी पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा दी थी।

इधर, सरबजीत के निधन पर शोक जताने के बाद पीएम ने कहा है कि सरबजीत के शव को भारत लाने की कोशिश की जा रही है ताकि उनका अंतिम संस्कार परिवार मर्जी के मुताबिक कर सके। पीएम ने कहा कि सरकार सरबजीत के शव को घर लाने और उनका अंतिम संस्कार करने के इंतजाम करेगी। उन्होंने कहा कि सरबजीत पर बर्बर और कातिलाना हमले के जिम्मेदार अपराधियों को न्याय के कठघरे में लाया जाए और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले।

मजदूर दिवस पर पत्रकारों ने निकाली रैली, ज्ञापन भी सौंपा

इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन से संबद्ध चंडीगढ़ और पंजाब यूनियन ऑफ र्जनलिस्ट्स ने बुधवार को मई दिवस के अवसर पर रैली की। संगठन ने मानव जंजीर बनाकर एकजुटता का संकल्प लिया। इस अवसर पर यूनियन के अध्यक्ष विनोद कोहली ने समाचार पत्रों के कर्मचारियों के वर्तमान वेतन ढांचे पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट से वेतन बोर्ड से संबंधित मामले का शीघ्र निपटारा करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि पत्रकार वर्ग मौजूदा हालात में सबसे कम वेतन पा रहा है। उन्हें आज भी अठारह साल पुराने वेतनमान दिए जा रहे हैं। जबकि महंगाई कई गुणा बढ़ चुकी है। कोहली ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भारतीय प्रेस परिषद के अंतर्गत लाने की जोरदार मांग करते हुए कहा कि इससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े अनेक मामलों का शीघ्र निपटारा हो सकेगा।

दूसरी तरफ भिंड में भी बुधवार को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ ने पत्रकारों के हित में तमाम मांगों को रखकर मुख्यमंत्री के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ की जिला इकाई के बैनर तले पत्रकारों ने प्रदेश के संगठन महामंत्री प्रहलाद भदौरिया और जिलाध्यक्ष अनिल शर्मा के नेतृत्व में सीएम के नाम कलेक्टर अखिलेश श्रीवास्तव को ज्ञापन सौंपा। इसमें मांग की गई है कि पत्रकारों को न सिर्फ तहसील व जिला स्तर पर अधिमान्यता देकर उन्हें विभिन्न प्रकार की प्रताडऩा से बचाया जाए बल्कि पत्रकार पंचायत बुलाने, बेगारी प्रथा पर रोक, कम ब्याज पर ऋण देने, श्रमजीवी पत्रकार कल्याण कोष, विश्राम भवनों पर रुकने की सुविधा, यात्री वाहनों में कम किराया आदि मांगें भी इसमें शामिल की गईं हैं।

पत्रकार बनकर पैसे ऐंठने वाले पांच लोग पुलिस गिरफ्त में, आई कार्ड व कैमरा बरामद

: आरोपियों में एक महिला भी शामिल : अमृतसर के थाना रमदास पुलिस ने पत्रकार बनकर लोगों से रुपये ऐंठने वाले गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए एक युवती समेत पांच लोगों को अरेस्‍ट किया है। पुलिस ने यह कार्रवाई एक ट्रक ड्राइवर की शिकायत पर की। आरोपियों से कैमरे, प्रेस के नकली पहचान पत्र और ट्रक ड्राइवरों से लूटी गई रकम बरामद की है। अमृतसर देहाती के एसएसपी मनमोहन सिंह ने बताया कि उन्हें पिछले कई दिनों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि अमृतसर देहाती के इलाकों में एक ऐसा गिरोह सक्रिय है जो खुद को पत्रकार बताकर लोगों को धमकाता है और खबरें न लगाने की एवज में उनसे रुपये वसूल रहा है।

थाना रमदास के एसएचओ हरजीत सिंह को 30 अप्रैल को कोटला सैदां गांव निवासी भजन सिंह ने शिकायत की थी कि वह अपना ट्रक और उसके साथी लवदीप सिंह और गुरभेज सिंह अपनी-अपनी ट्राली में रेत भरकर रावी दरिया से रमदास की तरफ आ रहे थे। लगभग दस दिन पहले रात डेढ़ बजे उन्हें एक आल्टो कार में सवार कुछ लोगों ने रमदास के नजदीक रोका। कार सवारों ने उनकी फोटो खींचीं और कहा कि वह पत्रकार हैं। वह दरिया से रेत चोरी करने की खबर अखबार में छापेंगे। खबर न छापने की एवज में पत्रकारों ने उनसे आठ हजार रुपये, टैक्‍ट्रर चालक लवदीप सिंह से 4500 रुपये और गुरभेज सिंह से 2500 सौ रुपये लिए। पुलिस ने मामले की जांच की तो पता चला कि अनिल सिंह निवासी आजाद नगर सुल्तानविंड रोड, राजिंदर कुमार निवासी छेहरटा, गुरप्रदीप सिंह उर्फ पंकज निवासी झब्बाल रोड अमृतसर और दविंदर कौर ढिल्लों पुत्री बलदेव सिंह निवासी गांव सुल्तानविंड ने गिरोह बना रखा है। इन लोगों का मीडिया के साथ कोई संबंध नहीं है। आरोपियों ने नकली पहचान पत्र बनाए हुए हैं और लोगों को ब्लैकमेल करते हैं।

पहचान होने के बाद पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की। बुधवार को पुलिस ने एक महिला समेत पांचों फर्जी पत्रकारों को अरेस्‍ट कर लिया। इनके पास से ट्रक चालकों से ऐंठे गए पैसों के अलावा प्रेस का आई कार्ड, कैमरा और अन्‍य सामान बरामद हुए। पुलिस आई कार्ड की जांच करा रही है। शुरुआती पूछताछ में इन लोगों ने बताया कि यह नकली आई कार्ड है। फिर भी पुलिस जांच करा रही है। इसके बाद इन लोगों पर फर्जीवाड़ा का मामला भी दर्ज किया जाएगा।

बादशाहपुर गैंगरेप मामले में पत्रकार के बयान हुए दर्ज

पटियाला के बादशाहपुर गैंगरेप मामले में जिला अतिरिक्त सेशन जज निरभो सिंह गिल की अदालत में पुलिस ने सभी आरोपियों को पेश किया किया. इस मामले में एक एसआई समेत चैनल के पत्रकार का बयान भी दर्ज किया गया.

पुलिस ने इस रेपकांड के आरोपी पूर्व पुलिस चौकी इंचार्ज नसीब सिंह, गुरप्रीत सिंह, बलविंदर सिंह, संदीप सिंह व शिंदरपाल कौर को कोर्ट में पेश किया. इसके बाद एसआई मोहनजीत सिंह, रीडर डीआईजी क्राइम ब्रांच और पत्रकार के बयान कमलबंद किए गए. अब मामले की सुनवाई आगे होगी.

मेरी खबर के कारण जागरण वालों ने यशवंत और अनिल पर अत्याचार किया : बीना शुक्ला

बीना शुक्‍ला जागरण, कानपुर की कर्मचारी हैं. इनके साथ ही जागरण प्रबंधन ने अनुचित व्‍यवहार किया था. बीना शुक्‍ला के साथ जागरण में घटे घटनाक्रम की खबर को भड़ास ने प्रकाशित किया था. इसी खबर के लिए भड़ास की तरफ डीजीएम नितिन (नितेंद्र) श्रीवास्‍तव का पक्ष लेने के लिए फोन किया गया था. बाद में जागरण प्रबंधन ने इसी फोन कॉल को रंगदारी मांगने का फोन बताकर नोएडा में मामला दर्ज कराया, वह भी चार दिनों बाद, जबकि अगर रंगदारी मांगी गई थी तो उसी समय मामला दर्ज कराया जाना चाहिए था, लेकिन मामले में सच्‍चाई नहीं थी, इसलिए कहानी गढ़कर चार दिन बाद रंगदारी का मामला यशवंत सिंह एवं अनिल सिंह पर दर्ज कराया गया.

जबकि सच यह है कि नितेंद्र श्रीवास्‍तव को ना तो इसके पहले कभी भड़ास की तरफ से फोन किया गया था और ना ही कभी उसके बाद किया गया. परन्‍तु भड़ास पर प्रकाशित पत्रकारों की छंटनी की खबरों से बौखलाए जागरण जैसे बड़े संस्‍थान ने सारी नैतिकता और मर्यादाओं को ताख पर रखते हुए फर्जी मामला दर्ज करा दिया. यशवंत और अनिल को ज्‍यादा से ज्‍यादा समय तक जमानत नहीं मिलने देने के लिए हर संभव उपाय किए गए. इसकी जानकारी जब देर सबेर बीना शुक्‍ला को मिली तो उन्‍होंने भड़ास को पत्र भेजा, जिसे हू-ब-हू प्रकाशित किया जा रहा है….. 


यशवंत जी, नमस्ते.. आपके और अनिल जी के साथ हुए दुर्व्यवहार और जेल भेजे जाने के संबंध में मैंने जाना. मुझे बहुत अफसोस है कि मेरी न्यूज (जागरण, कानपुर में यूनिट हेड, सीजीएम एवं आईटी हेड पर महिलाकर्मी ने लगाया यौन शोषण का आरोप) भड़ास साइट पर देने के बाद आपके और आपके साथी अनिल जी के साथ काफी दुर्व्यवहार एवं अत्याचार किया गया। आप लोगों पर मुकदमा लादा गया और जेल भिजवाया गया। जमानत न होने देने का अधिकतम प्रयास जागरण वालों ने किया। यह गलत और निंदनीय है।

कहने को तो जागरण नं. 1 अखबार है, लेकिन उसकी हरकतें बहुत ही घटिया किस्म की है। मैंने भड़ास साइट पर पूरा विवरण पढ़ा तब मुझे काफी दुख हुआ। क्या नं. 1 अखबार वाले खुलेआम गुण्डागर्दी करते रहेंगे प्रशासन आंखें बंद कर हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा। जागरण जैसे संस्थान में गलत लोगों का साथ दिया जाता है। प्रबंधक महोदय को उच्चाधिकारी जितना दिखाते एवं बताते हैं वही दिखाई देता है। प्रोडक्शन हेड प्रदीप अवस्थी बहुत ही बदतमीज एवं घटिया व्यक्ति है। मेरे साथ कई बार बदतमीजी एवं छेड़खानी की, मुझे बदनाम किया। मैंने डीजीएम नितिन श्रीवास्तव जी से कई बार शिकायत की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। उल्टा मुझे ही हमेश गलत ठहराते हैं और मेरे बारे में अपशब्द कहते हैं एवं बदनाम करते हैं। एक डीजीएम को यह सब शोभा नहीं देता, वो हमेशा गलत लोगों का साथ देते हैं, डायरेक्टर एवं प्रबन्धक महोदय को गलत जानकारी देते हैं। वहां छोटे कर्मचारी को कीड़ा-मकौड़ा समझा जाता है। आपको जो भी जानकारी मेरे केस में करनी है वी सीओ स्वरूप नगर, कानपुर से की जा सकती है। वे ही जांच कर रहे हैं। महिला आयोग से 30 दिन के अंदर रिपोर्ट मांगी गयी है। अभी तक क्या कार्रवाई हुई है वहीं से पता चलेगा।

आपने जून में जो भी न्यूज साइट पर दी थी उसमें यह था कि मेरे साथ संस्थान में यौन शोषण हुआ, जबकि 30.5.12 को मैंने चेयरमैन से उच्चाधिकारियों की शिकायत की थी, इसलिये लगभग 2 घंटे तक मुझे कमरे में बंद करके सादे कागज पर हस्ताक्षर का दबाव देते रहे। मैं वहां से किसी तरह अपनी जान बचा कर भागी नहीं तो कोई भी दुर्घटना मेरे साथ घट सकती थी। फिर मुझपर झूठे आरोप लगाकर सस्पेंड कर दिया गया। फिर घरेलू जांच के नाम पर 5 महीने तक मुझे मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया। कोई आरोप साबित न होने पर अपनी गलती छुपाने के लिये मेरा ट्रांसफर उन्नाव कर दिया गया। घरेलू जांच खत्म होने एवं बहाल होने के बाद भी जून 2012 से नवंबर 2012 का मेरा 6 महीने का वेतन एवं 6 महीने का फंड भी नहीं जमा किया गया। मैंने जब अपना बकाया वेतन मांगा तो मेरे साथ अभद्र व्यवहार किया गया। 11 महीने से मैं आर्थिक कष्ट से गुजर रही हूं कोई भी सुनवाई नहीं हो रही है।

पाकिस्‍तानी जेलों में बंद भारतीय कैदियों की सुरक्षा को लेकर परिजन चिंतित

बाड़मेर पाकिस्तान की लखपत जेल में बंद भारतीय कैदी सरबजीत पर हुए कातिलाना हमले के बाद राजस्थान के सरहदी जिले बाड़मेर जैसलमेर जिले के पाकिस्तानी जेलों में बंद नागरिकों की सुरक्षा को लेकर घरवाले चिंतित हैं. बाड़मेर जिले के चौहटन तहसील के धनाऊ गाँव के भाग सिंह, स्वरूपे का तला निवासी सहुराम, भीलो का तला निवासी तील सिंह, जैसलमेर के रामगढ़ निवासी जमालदीन पिछले अट्ठाईस सालों से पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं.

लम्बे समय से उनकी वतन वापसी की राह देखी जा रही है, इसके लिए उच्च स्तरीय प्रयास भी किये गए, अब जबकि पाकिस्‍तान की लखपत जेल में बंद सरबजीत पर हमले के बाद इस कैदियों के परिवार को भी इनकी सुरक्षा को लेकर चिंता हो गई है. पाकिस्तान की जेल में बंद भाग सिंह के बीस वर्षीय पुत्र अर्जुन सिंह ने बताया कि पिछले दो दशको से मेरी माँ मेरे पिता के लौटने का इंतज़ार कर रही है. पहले उनकी चिट्ठी-पत्री आती थी मगर अब वो भी बंद हो गई है. वो कहां और किस हाल में हैं यह जानकारी नहीं है, मगर उनकी सुरक्षा को को लेकर अब चिंता हो रही है. उन्होंने बताया कि भारत सरकार को इसके लिए पहल करनी चाहिए ताकि भारतीय बंदियों की सुरक्षा का दबाव पाकिस्तान पर बने. उनका मानना है कि भारत में कसाब और अफज़ल को फांसी देने के बाद से कट्टरपंथी भारतीय नागरिकों के जानी दुश्मन बन गए हैं.

इधर, टीलाराम के भाई हुकमाराम और बहन राधा अपने भाई की सुरक्षा को लेकर चिंतित दिखे. वीरे भाग सिंह की पत्नी लक्ष्मी कँवर कई दशकों से अपने सुहाग के लौटने का इंतज़ार कर रही हैं. अब उन्‍हें अपने सुहाग की चिंता सता रही है. भाग सिंह के पुत्र अर्जुन सिंह और प्रताप सिंह अपने पिता की सुरक्षा की खबर पाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. जैसलमेर जिले के रामगढ़ निवासी जमालदीन की पत्नी हनीफा भी उसके लौटने का इंतज़ार कर रही हैं. उसकी आँखों में विश्‍वास झलकता है कि जमालदीन वापस जरूर आएगा. अलबता वह सरबजीत पर हुए हमले के बाद चिंतित जरूर हैं.  हनीफा का मानना है कि भारत सरकार भारतीय कैदियों की सुरक्षा को लेकर पुख्ता प्रबंध करेगी. पूर्व सांसद मानवेन्द्र सिंह ने बताया कि पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीयों की सुरक्षा को लेकर वो जल्द भारत सरकार के उच्च स्तरीय अधिकारियों से मिलेंगे. उनकी रिहाई के प्रयास करेंगे.

बाड़मेर से चंदन सिंह भाटी की रिपोर्ट.

शोभित मिश्रा, मो. नवाब, नवनीत तिवारी हुए तनवीर सिद्दीकी अवार्ड से सम्मानित

बाराबंकी। हिन्दी पत्रकारिता के लिए शोभित मिश्रा, उर्दू के लिए मो0 नवाब और छायाकार नवनीत तिवारी स्व0 तनवीर अहमद सिद्दीकी एवार्ड 2013 देते हुए ग्राम्य विकास अरविन्द सिंह गोप ने कहा कि स्व0 तनवीर सिद्दीकी ने अपनी लेखनी एवं कार्यशैली को हथियार बनाकर निष्पक्ष पत्रकारिता के माध्यम से समाज एवं देश को जागरूक करने का काम किया है। जो उनके न रहने पर आज भी समाज में अपनी पहचान और स्मृति को बनाये हुए है।

हृयूमन वेलफेयर सोसायटी (रजि0) द्वारा गांधी भवन में स्व0 तनवीर सिद्दीकी की छठी पुण्य तिथि के अवसर पर आयोजित सेमिनार एंव जर्नालिस्ट एवार्ड समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थिति उत्तर प्रदेश सरकार के ग्राम्य विकास मंत्री अरविन्द सिंह गोप ने कहा कि लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तम्भ पत्रकारिता है। आज के दौर में निष्पक्ष रुप से पत्रकारिता करना सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती में समारोह में उपस्थित शोभित मिश्रा ने अपना एक अलग मुकाम बनाया है, खासतौर से इस समारोह के माध्यम से सोसायटी द्वारा पत्रकारों का सम्मान किया जाना वाकई काबिले तारीफ है और यही स्व0 तनवीर सिद्दीकी को सच्ची श्रद्धाजंलि है।
        
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रुप में उपस्थित न्यू पावर लि0 मुम्बई के जीएम एचआर नदीम सिद्दीकी ने स्व0 सिद्दीकी के चित्र पर पुष्प अर्पित करते हुए कहा कि पत्रकारिता की इस समाज में अहम भागीदारी है। जिसे समाज का दर्पण भी कहा जाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गांधी ट्रस्ट के अध्यक्ष पं0 राजनाथ शर्मा ने कहा कि स्व0 तनवीर सिद्दीकी निडर एवं निर्भीक पत्रकार थे। जिनके पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए गए योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। स्व0 सिद्दीकी के छोटे भाई एंव सोसायटी के अध्यक्ष डा0 तौसीफ सिद्दीकी ने कहा कि मुम्बई से प्रकाशित हिन्दुस्तान उर्दू दैनिक के साथ स्व0 सिद्दीकी ने अपना पत्रकारिता का सफर शुरू किया। इसके साथ उर्दू इंकलाब, उर्दू इन दिनों, उर्दू सियासत ज़दीद, सहित कई हिन्दी एवं उर्दू समाचार पत्रों में कार्य करके अपने निर्भीक पत्रकारिता का परिचय दिया है। उन्होनें समारोह में आए हुए सभी लोगों का स्वागत किया।
        
समारोह के दौरान मुख्य अतिथि अरविन्द सिंह गोप ने हिन्दी पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए दैनिक हिन्दुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार शोभित मिश्रा, दैनिक सहाफत उर्दू के तेजतर्रार पत्रकार मोहम्मद नवाब व तहसील फतेहपुर के पत्रकार नसीम नदवी, एवं दैनिक जागरण के कुशल छायाकार नवनीत तिवारी को हृयूमन वेलफेयर सोसायटी की ओर से मोमेंटो एवं शाल देकर सम्मानित किया।

समारोह का संचालन वरिष्ठ अधिवक्ता हमायुं नईम खान ने किया। समारोह में मुख्य रुप से यादवेन्द्र प्रताप एडवोकेट, हिसाल बारी किदवई ‘एडवोकेट’, महामाया सिंह, उस्मान किदवई, इरशाद कमर, सुहेल किदवई, दानिश सिद्दीकी, रेहान फरीदी (एमएलवी अध्यक्ष), शिवकरन यादव, पाटेश्वरी प्रसाद, वरिष्ठ अधिवक्ता इजहार हुसैन, फराज खान, विपिन सिंह राठौर, मृत्यंजय शर्मा, बब्लु असलम, भरतलाल, उमानाथ यादव, वेद यादव, अली मियां, अलीम शेख, कलीम खान, जावेद, रेहान वारसी आदि लोग उपस्थित रहे। समारोह के समापन पर सोसायटी के कोषाध्यक्ष फहीम सिद्दीकी ने आए हुए सभी अतिथियों व उपस्थित लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

‘एक रौशन मीनार’ व ‘मनुष्य विरोधी समय में’ का लोकार्पण

लखनऊ। उर्दू के मशहूर प्रगतिशील शायर वामिक़ जौनपुरी की कविताओं का संकलन ‘एक रौशन मीनार’ का विमोचन आज वाल्मीकि रंगशाला में हुआ। वामिक़ की कविताओं का हिन्दी अनुवाद कवि व अनुवादक अजय कुमार ने किया है। इसके साथ ही हिन्दी के जाने माने कवि भगवान स्वरूप कटियार के नये कविता संग्रह ‘मनुष्य विरोधी समय में’ का भी विमाचन हुआ। यह कवि कटियार का तीसरा कविता संकलन है।

विमोचन का यह कार्यक्रम जन संस्कृति मंच द्वारा स्थानीय वाल्मीकि रंगशाला, संगीत नाटक अकादमी, गोमती नगर में आयोजित किया गया। इस मौके पर बी एन गौड़ ने वामिक़ की 1940 के दशक में आये बंगाल के दुर्भिक्ष पर लिखी अत्यन्त चर्चित व लोकप्रिय  कविता ‘भूका बंगाल’ का पाठ किया। वहीं, भगवान स्वरूप कटियार ने भी अपने संग्रह से ‘प्रेम का तर्क’, ‘फर्क पड़ना’, ‘मां’ आदि कविताएं सुनाकर अपनी कविता के विविध रंगों से परिचित कराया।

वामिक़ व कटियार के कविता संग्रहों का लोकार्पण करते हुए आलोचक व जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि हमारे प्रगतिशील आंदोलन के दौर में हिन्दी व उर्दू के बीच जो एकता बनी वैसी एकता न पहले और न ही बाद में देखने को मिलती है। वामिक़ साहब इस एकता के बेमिसाल उदाहरण हैं। उनके अन्दर सच्ची आजादी की ललक है। वे उर्दू के पहले शायर हैं जिन्होंने नक्सलबाड़ी संघर्ष का स्वागत किया और इसे तेलंगना किसान संघर्ष की अगली कड़ी बताया। वे लिखते हैं ‘वो जिसने पुकारा था हमको नौजवानी में/उफ़क पर चीख रहा वही सितारा फिर’।

भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं पर बोलते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि आज की हिन्दी कविता प्रगतिशील आंदोलन की परंपरा से जुड़ती है। यह बेहतर दुनिया को समर्पित, लोकतांत्रिक और सेक्युलर है। कटियार जी की कविताएं ऐसी हैं जो उम्मीद पैदा करती हैं। यहां नाउम्मीदी की सरहदों तक जाकर उम्मीद को रचने की जिद है। ‘मनुष्य विरोधी समय में’ कवि मनुष्य होने की गरिमा व गौरव को बचाने का रास्ता खोजता है। स्त्री जीवन पर लिखी कविताओं में ‘आजादी’ को मूल्य के रूप में  स्थापित किया गया है।  इसमें उस पूंजीवादी विकास व सभ्यता की आलोचना  व प्रतिकार है जिसने मनुष्य को पशु से भी बदतर बना दिया है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने की। उनका कहना था कि कवि भगवान स्वरुप कटियार इस अँधेरे समय में भी उम्मीद और स्वप्न के कवि हैं। वे मनुष्य विरोधी समय में भी मनुष्यता की पहचान करने वाले सरल-सहज संवेदना के कवि हैं। वे सामाजिक सरोकार रखने वाले एक प्रतिबद्ध कवि हैं। वे वैश्वीकरण के दौर में भी कविता पर यकीन रखे हुए हैं। वे साफ लिखते हैं कि लिखने से भले कोई खास फर्क न पड़े, पर न लिखने से फर्क पड़ता है। वे सोचना, बोलना और लिखना जरूरी मानते हैं। वे प्रतिरोध के कवि हैं। एक कविता में वे कहते हैं कि अगर उन्हें स्त्री और ईश्वर में से किसी एक को चुनना हो तो वे स्त्री को चुनेंगे। वे प्रेम को एक क्रन्तिकारी मूल्य मानते हैं। वे अपने समय की खौफनाक सच्चाइयों को भी कविता में दर्ज करते हैं। वे एक बेहतर दुनिया के लिए काम करने वाले कवि हैं। वे देशों की सरहदों को मिटा देना चाहते हैं। वे मनुष्य मात्र में यकीन रखने वाले कवि हैं। ‘समकालीन सरोकार’ के प्रधान संपादक सुभाष राय तथा वरिष्ठ लेखक शकील सिद्दीकी ने भी वामिक व भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

इन्द्रप्रस्थ प्रेस क्लब ऑफ इण्डिया की देवास इकाई ने किया पत्रकारों का सम्‍मान

देवास। जिस नववर्ष के स्वागत में रितुराज बसंत प्रकृति श्रृगांर के वन्दनवार सजाते है, पुष्प सुगन्ध से वातावरण महकाते हैं, पलाश-गुलमोहर केसरिया पताकाएं फहराते हैं, होली के रंग मुस्कुराते हैं, खेत फसलों का सोना लुटाते हैं, कोयल के स्वर मिठास का अमृत बरसाते हैं, उस भारतीय नववर्ष का अभिनंदन हमे भी आत्मीयता से करना चाहिए। श्री गीता  की प्रेरणा और भारतीय संस्कृति का विस्तार करने वाले गीताभवन के पवित्र मंच से श्रेष्ठ पत्रकार, दानवीर और सद्भावना के प्रतीक समाजसेवियो का सम्मान अत्याचार-अन्याय विरोध के प्रेरक श्री कृष्ण का आशीर्वाद भी है। इन्द्रप्रस्थ प्रेस क्लब ऑफ इण्डिया की म.प्र. ईकाई में संभागीय संयोजक शाकिर अली दीप ने भारतीय नवसंवत्सर मिलन, पत्रकार सम्मान समारोह में स्वागत, शŽदों से उपरोक्त बातें कहीं।

देवी सरस्वती के समक्ष नव संकल्प दीप जागृति और पुष्पांजलि, सरस्वती वंदना से प्रारंभ इस आयोजन की अध्यक्षता प्रेस क्लब के म.प्र. संयोजक कमलेश श्रीवंश ने की। मुख्य अतिथि रफ्तार चैनल के म.प्र.-छग. प्रमुख जयसिंह चौहान रहे। विशेष अतिथि आदित्य नारायण उपाध्याय नवप्रभात, मनीष वर्मा सुदर्शन चैनल, रामदयाल राठौर अश्वमेध, दुर्गालाल शर्मा प्रदेश प्रवक्ता इन्द्रप्रस्थ भोपाल, आय.के.शुक्ला 7-सी चैनल इन्दौर-उज्‍जैन संभाग प्रमुख, गणपतसिंह चौहान उज्‍जैन, जगदीश जोशी प्रचण्ड-खबर भड़ास-आयएनआय न्यूज पोर्टल, डॉ. चन्द्रकिरण गुप्ता, पूर्व महापौर जयसिंह ठाकुर, हिमांशु राठौर बाबा, पार्षद अशोक कहार, म.प्र. मीडिया संघ के अजय सांगते रहे। अतिथियों और उपस्थितों को सुरेश शर्मा क्रांति ने मंगल तिलक लगाकर भारतीय नववर्ष की बधाई दी। म.प्र. पाठ्य पुस्तक निगम अध्यक्ष रायसिंह सेंधव की ओर से नववर्ष कैलेण्डर वितरीत किये गये।

अतिथि स्वागत संभागीय संयोजक शाकिर अली दीप सहित बसंत वर्मा, खुमानसिंह बैस, देवास जिला संयोजक बाबू शेख बीके, विजय शर्मा, लाला शाह, रफीक अंसारी, ईशा सैयद, सैयद सादिक अली, नीलम चौहान, अर्जुनसिंह ठाकुर, आंनद वर्मा, संदीप जाधव, इरफान अली, आशिक माचिया, अरविंद राजपूत, हीना कौशल, भगवती वर्मा, ने किया। अतिथियों ने पत्रकार कर्तव्य, अधिकार, बिटिया, जल, वन सुरक्षा, प्रशासनिक समन्वय से सुव्यवस्था पर भी अपने विचार व्यक्त किये। प्रमुख वक्ता आदित्य नारायण उपाध्याय और आई.के. शुक्ला ने पत्रकारिता, बेटी सुरक्षा, संबोधन से सभी को प्रभावित किया। देवास विधायक -मंत्री तुकोजीराव पवार को अंगदान से नवजीवन देने वाले महादानी गणेश पटेल के सम्मान से सम्मान समारोह का श्री गणेश किया गया। देवास में समर्पित पत्रकारिता के माध्यम से सुव्यवस्था और भ्रष्टों को आयने में दिखाने वाले देवास दर्पण के असलम खान, सरप्राइज टाईम्स के कमल माचले, दृश्य माध्यम रेड लाईन केबल के हिमांशु राठौर बाबा, नईदुनिया भोपाल, 6 पीएम इंदौर के हेमन्त शर्मा, रेड नाईन की संध्या पंवार, को श्रेष्ठ पत्रकारिता सम्मान प्रदान किया गया।

माता चामुण्डा मंदिर के बसंत नाथ पुजारी, शीलनाथ धुनी संस्थान,काली मस्जिद, देव स्थान के अध्यक्ष अर्जुन वर्मा, नवरात्रि में भजन कव्वाली से सद््भावना का संदेश देने वाले गणेश पटेल को मंत्री जी को अंगदान की प्रेरणा देने वाले रामेश्वर दायमा, सहित समाजसेवी रितु व्यास, नासिर खान का सम्मान भी किया गया। इस अवसर पर शाजापुर के फय्यास खान, देवास जिले सहित रतलाम, मंदसौर के पत्रकार भी उपस्थित रहे। संचालन अरविंद त्रिवेदी ने किया । आभार खुमान सिंह बैस ने माना।

नेशनल दुनिया से डाइरेक्‍टर आलोक मेहता का इस्‍तीफा

वरिष्‍ठ पत्रकार आलोक मेहता आखिरकार नेशनल दुनिया से चले ही गए. प्रबंधन की तरफ से कई बार जाने का इशारा किए जाने के बाद भी आलोक मेहता बड़प्‍पन दिखाते हुए नेशनल दुनिया में टिके हुए थे. लेकिन जब प्रबंधन ने उनके बैठने की जगह पर भी हथौड़ा चलवा दिया तो आलोक मेहता ने अखबार को बाय करना ही बेहतर समझा और इस्‍तीफा देकर चले गए. आलोक मेहता अब किस संस्‍थान से जुड़ेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

रातोंरात नईदुनिया की जमीन पर नेशनल दुनिया लांच करवाने वाले आलोक मेहता ने अखबार को चमकाने की जगह अपने लोगों को ही चमकाने में अपनी पूरी ऊर्जा खतम कर दी. अखबार लांचिंग के आठ महीने बाद ही प्रबंधन को आलोक मेहता की काम करने की शैली पता चल गई. क्‍यों कि कहीं ना कहीं नईदुनिया के ताबूत में कील ठोंकने का काम मेहता एंड कंपनी ने ही की थी. इसके बाद मालिक शैलेंद्र भदौरिया ने खुद अखबार की कमान अपने हाथ में ले ली. पहले इनको समूह संपादक के पद से हटाकर डाइरेक्‍टर बनाया गया. इसके बाद वरिष्‍ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ को संपादक तथा कुमार आनंद को समूह संपादक नियुक्‍त किया गया.

अखबार के प्रिंट लाइन से आलोक मेहता का नाम भी हटाया गया. उनके खास और नजदीकी रहे लोगों में कई को बाहर किया गया तो कई लोगों ने खुद इस्‍तीफा दे दिया. इसके बाद भी आलोक मेहता डाइरेक्‍टर बन कर डंटे रहे और बिना किसी काम के पैसे लेते रहे. कई तरह के इशारा किए जाने के बाद भी जब आलोक मेहता नेशनल दुनिया को अलविदा कहने को तैयार नहीं दिखे तो प्रबंधन ने दूसरा रास्‍ता अपनाया. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने उनके चेम्‍बर को दो दिन पहले तोड़वा दिया, उनके बैठने का स्‍थान भी खतम कर दिया गया. यानी जब प्रबंधन की तरफ से बिल्‍कुल आखिरी इशारा कर दिया गया तब जाकर आलोक मेहता ने अखबार प्रबंधन को अपना इस्‍तीफा सौंपा.   

बांग्‍लादेश में भी छपी तारा टीवी के मालिक के गिरफ्तारी की खबर

कोलकाता। बांग्लादेश की मीडिया में भी शारदा घोटाले को प्रमुखता से जगह मिली है। ढाका से प्रकाशित होने वाले तमाम प्रमुख अखबारों व वहां से संचालित वेबसाइटों पर सुदीप्तों सेन की जालसाजी और उसके राजनीतिक संपर्कों पर कई स्टोरी प्रकाशित की गई है। शारदा समूह के हेराफेरी से पश्चिम बंगाल की सरकार भी हिली हुई है।

'द बांग्लादेश क्रानिकल' ने सुदीप्त सेन की कुणाल घोष के साथ वाली फोटो लगाकर लिखा है कि तारा टीवी के मालिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उनसे कोलकाता में पूछताछ की जा रही है। उल्लेखनीय है कि सुदीप्त सेन के स्वामित्व वाले तारा टीवी का प्रसारण बांग्लादेश में भी होता था। 'बीडी न्यूज 24 डाट काम' ने भी इसी आशय की खबर प्रकाशित की है।

'डान' ने 'नो कंपनसेशन फार डिस्ट्रेस' शीर्षक लेख में सुदीप्त सेन व उसकी चिटफंड कंपनी सारधा के बारे में बड़ी स्टोरी छापी है। इसमें उसके मीडिया व्यवसाय और सीबीआइ को लिखी चिट्ठी की भी चर्चा है। 'बांग्ला 71 डाट काम' ने भी तारा म्यूजिक के बंद होने की स्टोरी की है। चैनल के जीएम इंद्रजीत राय के हवाले से वेबसाइट ने लिखा है कि किन परिस्थितियों में सुदीप्त सेन के स्वामित्व वाले चैनलों को बंद किया गया। 'सनहाती डाट काम' ने 'द चिट फंड क्रायसिस, लूटिंग द पूअर विद पालिटिकल कनविंस' शीर्षक लेख में इस घोटाले की स्टोरी छापी है।

मेरे निर्माण और रचनाशीलता में इलाहाबाद का है अहम रोल : रवींद्र कालिया

: हिंदी विवि के इलाहाबाद केंद्र में आयोजित हुई ‘मेरी शब्दयात्रा’ श्रृंखला : महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र में दिनांक 27 अप्रैल 2013 को ‘मेरी शब्द यात्रा’ श्रृंखला के तहत आयोजित तीसरे कार्यक्रम में वरिष्‍ठ साहित्यकार एवं ज्ञानोदय के संपादक श्री रवींद्र कालिया ने अपनी रचना प्रक्रिया को साझा करते हुए कहा कि अब साहित्‍य, समाज के आगे चलने वाली मशाल नहीं रही, अब वह समाज से बहुत ज्‍यादा पीछ रहकर लंगड़ाते हुए चल रहा है। कालिया जी अपनों से मुखातिब हुए तो फिर पूरी साफगोई से कल से आज तक का सफरनामा सुनाया।

उन्‍होंने कहा कि आज हिंदी का वर्चस्‍व बढ़ रहा है और इसका भविष्‍य उज्‍ज्‍वल है। आने वाले कल में लोग हिंदी के अच्‍छे स्‍कूलों के लिए भागेंगे। मेरा सौभाग्‍य है कि इसी हिंदी के सहारे मैंने पूरी दुनिया की सैर की। जहां तक लिखने के लिए समय निकालने की बात है तो मैंने जो कुछ भी लिखा, अपने व्यस्ततम क्षणों में ही लिखा। जितना ज्‍यादा व्‍यस्‍त रहा, उतना ही ज्‍यादा लिखा। अपने आसपास की जिंदगी को जितना अच्‍छा समझ सकेंगे, उतना ही अच्‍छा लिख सकेंगे। कई बार समय को जानने के लिए टीनएजर्स को समझना जरूरी है, उनकी ऊर्जा और सोच में समय का सच होता है।

मेरा  मनना है कि जो बीत जाता है, उसे भुला देना बेहतर है, उसे खोजना अपना समय व्‍यर्थ करना है। लोग जड़ों के पीछे भागते हैं, मैं अपनी जड़े खोजने जालंधर गया, पर वहां इतना कुछ बदल चुका था कि बीते हुए कल के निशान तक नहीं मिले। मेरी स्‍मृतियों में इलाहाबाद आज भी जिंदा है, रानी मंडी को मैं आज भी महसूस करता हूं। मैं जब पहली बार इलाहाबाद पहुंचा था तो मेरी जेब में सिर्फ बीस रुपये थे और जानने वाले के नाम पर अश्‍क जी, जो उन दिनों शहर से बाहर थे। माना जाता था कि जिसे इलाहाबाद ने मान्‍यता दे दी, वह लेखक मान लिया जाता था। इसी शहर ने मुझे ‘पर’ बांधना सिखाया और उड़ना भी। यहां सबसे ज्‍यादा कठिन लोग रहते हैं। यहां सबसे ज्‍यादा स्‍पीड ब्रेकर हैं, सड़कों पर और जिंदगी में भी। इस शहर में प्रतिरोध का स्‍वर है। हालांकि आज हम दोहरा चरित्र लेकर जीते हैं, ऐसा नहीं होता तो दिखने वाले प्रतिरोध के स्‍वर के बाद दिल्‍ली जैसी कोई घटना दोबारा नहीं होती। अब प्रतिरोध का शोकगीत लिखने का समय आ गया है। जरूरत है उन चेहरों के शिनाख्‍त की जो मुखौटे लगाकर प्रतिरोध करते हैं। साहित्‍यकार होने के नाते मैं भी शर्मिंदा हूं। जो साहित्‍य जिंदगी के बदलाव की तस्‍वीर पेश करता है, वही सच्‍चा साहित्‍य है। यदि हमारा साहित्‍य लेखन समाज को नहीं बदलता है तो वह झक मारने जैसा ही है। प्रेमचंद का लेखन जमीन से जुड़ा था, इसीलिए वह आज भी सबसे ज्‍यादा प्रासंगिक और पठनीय है। मेरी कोशिश रहेगी कि मैं अपने लेखन में समाज से ज्‍यादा जुड़ा रह सकूं।

अतीत  की स्‍मृतियों को सहेजते हुए उन्‍होंने हिंदी  और लेखन से नाता जोड़ने की दिलचस्‍प  दास्‍तां सुनाई। बोले, घर में आने वाले हिंदी के अखबार में बच्‍चों का कोना के लिए कोई रचना भेजी थी, तब मुझे सलीके से अपना नाम भी लिखना नहीं आता था। चंद्रकांता संतति जैसी कुछ किताबें लेकर पढ़ना शुरू किया। कुछ लेखकों के नाम समझ में आने लगे। जाना कि अश्‍क जी जालंधर के हैं तो एक परिचित के माध्‍यम से उनसे मिलना हुआ, साथ में मोहन राकेश भी थे। इस बीच एक बार बहुत हिम्‍मत करके अश्‍क जी का इंटरव्‍यु लेने पहुंचा तो उनका बड़प्‍पन कि उन्‍होंने मुझसे कागज लेकर उस पर सवाल और जवाब दोनों ही लिखकर दे दिए। उनका इंटरव्‍यु साप्‍ताहिक हिंदुस्तान में छपा। सिलसिला शुरू हुआ तो एक गोष्‍ठी में पहली कहानी पढ़ी। साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान और फिर आदर्श पत्रिका में कहानी छपी तो पहचान बनने लगी। परिणाम यह कि जालंधर आने पर एक दिन मोहन राकेश जी मुझे ढूंढते हुए घर तक आ पहुंचे। उन्‍होंने ही मुझे हिंदी से बीए आनर्स करने को कहा। हालांकि मेरी बहनों ने पालिटिकल साइंस में पढ़ाई की। शुरूआत में विरोध तो हुआ लेकिन बाद में सब ठीक होगा। कपूरथला के सरकारी कालेज में पहली नौकरी की। आरंभिक दौर में मेरी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में जिस गति से जाती, उसी गति से लौट आती। बाद में वे सभी उन्‍हीं पत्रिकाओं में छपीं, जहां से लौटी थीं। आकाशवाणी में भी कार्यक्रम मिलने लगे जहां जगजीत सिंह जैसे दोस्‍त भी मिले। इससे पहले कालिया जी ने अपनी कहानी ‘एक होम्योपैथिक कहानी’का पाठ किया। बतौर अध्यक्ष लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि, आज कालिया जी को सुनना जितना अच्‍छा लगा, अब से पहले कभी नहीं। यह इसलिए सुखद लगा क्‍योंकि शब्‍दों में अर्थ विलीन होता रहा, लेकिन आज जरूरत है कि समाज और साहित्‍य को लेकर उनकी चिंताएं साझा की जाएं।

कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया द्वारा किया गया। लाल बहादुर वर्मा एवं अजित पुश्कल ने शाल, पुष्‍पगुच्छ प्रदान कर साहित्यकार रवींद्र कालिया का स्वागत किया एवं धनन्जय चोपड़ा ने रवींद्र कालिया के जीवन वृत्त पर प्रकाश डाला। प्रो. ए.ए. फातमी ने अतिथियों का स्वागत किया।

गोष्ठी में प्रमुख रूप से ममता कालिया, अजीत पुश्कल, ए.ए. फातमी, असरफ अली बेग, अनीता गोपेश, दिनेश ग्रोवर, रमेश ग्रोवर, एहतराम इस्लाम, रविनंदन सिंह, अनिल रंजन भौमिक, अजय प्रकाश, विवेक सत्यांशु, नीलम शंकर, बद्रीनारायण, हरीशचन्द पाण्डेय, जयकृष्‍ण राय तुषार, नन्दल हितैषी, फखरूल करीम, जेपी मिश्रा, सुबोध शुक्ला, धनंजय चोपड़ा, अविनाश मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, आमोद माहेश्‍वरी, फज़ले हसनैन, सुरेन्द्र राही, अमरेन्द्र सिंह सहित तमाम साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

न्यूज़ टुडे ने इंदौर को दिलाया स्थापना दिवस का गौरव

आखिर न्यूज़ टुडे इंदौर ने वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े दिग्गज नहीं कर सके। पत्रिका समूह के इस सांध्य दैनिक ने इंदौर के इतिहास में एक मील का पत्थर स्थापित कर दिया है। किसी शहर का स्थापना दिवस अपने आप में एक महत्वपूर्ण तारीख होती है, ठीक उसी तरह जैसे किसी का जन्मदिन। हैरानी की बात है कि आज तक इंदौर इस गरिमामय तारीख से महरूम था। इंदौर में बरसों से पत्रकारिता कर रहे दिग्गज अखबारों ने भी कभी इस पर ध्यान नहीं दिया कि आखिर इंदौर का स्थापना दिवस कब है?

इस बीच न्यूज़ टुडे ने तमाम शोध और विशेषज्ञों से राय लेकर 18 फरवरी को इंदौर की स्थापना दिवस की कैंपेन लांच की। लगातार दो महीने तक न्यूज़ टुडे ने लगातार कैंपेन चलाई। इसमें ऐतिहासिक दस्तावेजों के संदर्भों का हवाला दिया गया। साथ ही इंदौर की तमाम उपलब्धियों का भी जिक्र किया गया। इसके अलावा शहर की नामी हस्तियों की राय भी इस बात पर ली गई कि इंदौर का स्थापना दिवस कब मनाया जाए। इस सारी मुहिम का सार्थक नतीजा निकला जब न्यूज़ टुडे के सर्वे में करीब 50 हजार लोगों ने 18 मई को इंदौर की स्थापना दिवस मनाने पर मुहर लगाई। इसके बाद 16 अप्रैल को इंदौर नगर निगम परिषद ने प्रस्ताव लाकर 18 मई को इंदौर की स्थापना दिवस मनाने पर मुहर लगा दी। इसके बाद से शहरवासियों में जश्न का माहौल है। लगातार इस बात पर चर्चा चल रही है कि 18 मई को इंदौर पर्व किस तरह मनाया जाए कि यह यादगार हो जाए। न्यूज़ टुडे की इस मुहिम को ऐतिहासिक माना जा रहा है।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गए पत्र पर आधारित.

इस नगर सेवक के खिलाफ मुंह क्‍यों नहीं खोलता है मीडिया?

नवी मुंबई की मीडिया में ऐसे लोगों की लगातार कमी हो रही है जो खबरों को पूरी हिम्मत और शिद्दत से परोसने का दम खम रखते हों. इसका सबसे ताजा उदाहरण यह है कि नवी मुंबई मनपा की स्थायी समिति में नये कार्यकाल के लिये सभापति का चुनाव होना है, लेकिन इस पद के लिये एक ऐसे नगरसेवक का नाम सामने आ रहा है जिसने ना तो कभी अपने वार्ड की समस्या के लिये महासभा में मुंह खोला है और ना ही इससे पहले स्थायी समिति में सदस्य रहते हुये उनकी जुबान कभी खुली.

जिस नगरसेवक का नाम सभापति के रूप में सबसे ज्यादा चर्चा में वह हैं सुरेश कुलकर्णी. इनका वार्ड नवी मुंबई के सबसे पिछड़े वार्ड में आता है. लेकिन इन्होंने शायद ही कभी अपने वार्ड की समस्यायें सदन में उठाई हों. अब दिक्कत यह है कि यह बात नवी मुंबई मीडिया को भलीभांति पता है कि उनके चयन की संभावना सबसे ज्यादा है, लेकिन उसके बावजूद अबतक एक भी रिपोर्ट ऐसी सामने नहीं आयी है, जिससे यह पता चल सके कि ऐसे पद के लिये उनकी योग्यता, उनका अपने में रहना नुकसान पहुंचा सकता है.

दरअसल इसके पीछे की असली हकीकत यह है कि इस नगरसेवक ने कुछ पत्रकारों को काफी समय से अपने पक्ष में कर रखा है. एक पत्रकार के बारे में तो यहां तक कहां जाता है कि वह जब लोकल न्यूज चैनल में थे तो सुरेश कुलकर्णी का ही न्यूज लगाने के लिये बेताब रहते थे. अब ऐसे में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि सभापति जैसे पद के लिये एक नाकाबिल उम्मीदरवार के खिलाफ पत्रकार  अपनी कलम चलायेंगे. सवाल उठ रहा है कि सुरेश कुलकर्णी को अगर स्थायी समिति का सभापति बना दिया जाता है तो आखिर वह करेंगे क्या. वह कैसे 16 नगरसेवकों, अधिकारियों के बीच स्थायी समिति का कामकाज ठीक से संचालित कर पायेंगे.

राकेश श्रीवास्तव

नवी मुंबई

चीनी सेना अपने रुख पर अड़ी, लद्दाख से हटने की संभावना कम

नई दिल्‍ली: चीनी सेना की ओर से भारतीय सीमा के भीतर दौलत बेग ओल्डी के निकट 19 किलोमीटर तक घुसपैठ के मसले पर भारत और चीन के बीच लद्दाख के चुंशुल में बीते दिनों हुई तीसरी फ्लैग मीटिंग के बाद भी दोनों पक्षों के बीच का गतिरोध जस का तस बना हुआ है। इसके एक दिन बाद बुधवार को उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय सीमा में अभी जिस स्‍थान पर चीनी सेना ने अपना कैंप बनाया हुआ है, वहां से उनके हटने की संभावना काफी कम है।

चीनी सेना का यह रुख उस वाकये के बाद भी कायम है, जब भारत ने लगातार उस जगह को अपनी सीमा क्षेत्र में स्थित बताया है। गौर हो कि चीनी सेना ने लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में 19 किलोमीटर अंदर घुसकर अपना कैंप स्‍थापित कर लिया है।

इस बीच, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक अंग्रेजी न्‍यूज चैनल से कहा कि अभी इस मामले से ज्‍यादा घबराने की आवश्‍यकता नहीं है। खुर्शीद ने कहा कि यह हालात विचारों में अंतर और नजरिये की वजह से हुआ है, लेकिन किसी तरह की कोई तनातनी की स्थिति नहीं है।

लद्दाख के चुंशुल में हुई तीसरी फ्लैग मीटिंग के बाद भी दोनों पक्षों के बीच का गतिरोध जस का तस बने रहने के बाद यह मामला अब गंभीर जरूर हो गया है। सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्षों की ओर से ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारियों की बैठक तीन घंटे से ज्यादा लंबी चली। इस बैठक के बावजूद इस मसले का कोई हल नहीं निकल पाया है। उन्होंने बताया कि पूर्वी लद्दाख में भारतीय धारणा के अनुसार वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट भारत द्वारा नवनिर्मित बंकरों और सड़क को नष्ट करने की मांग पर चीन अड़ा हुआ है।

उन्होंने बताया कि इस बैठक में भारत ने भी अपना पक्ष साफ करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित सहमति पत्र के अनुसार चीनी सेना को बिना किसी शर्त के भारतीय सीमा से वापस जाना होगा। वहीं, एकीकृत कमांडरों के सम्मेलन में रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने भी इस मसले पर सख्त रख अपनाते हुए कहा कि इस घुसपैठ के लिए भारत को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि यह ‘हमने नहीं किया है’। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारत इस क्षेत्र में अपनी हितों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा। वहीं सूत्रों ने साथ ही बताया कि चीनी सेना के जवान इलाके में अब भी तंबू गाड़े हुए है।

सुरक्षा की समीक्षा के लिए ए के एंटनी की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन व तीनों सेना प्रमुखों के साथ हुई बैठक में भी इस मसले पर विस्तार से चर्चा की गई। इस मसले पर भारतीय और चीनी सेना के बीच हुई पहले की दो बैठकें भी बेनतीजा ही रही थीं। चीनी सेना ने क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाते हुए वहां नए तंबू बनाने शुरू कर दिए हैं। इस टुकड़ी को टकराव बिंदु से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चीनी सेना से रसद की आपूर्ति जारी है। (जी)

मतंग सिंह के चैनल हमार-फोकस में नवीन जिंदल नहीं कर रहे इनवेस्‍ट!

पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा सुदीप्‍तो सेन की चिट्ठी से चर्चा में आए मतंग सिंह के मीडिया समूह से खबर आ रही है कि इसके दो चैनल फोकस टीवी तथा हमार टीवी में इनवेस्‍ट करवाए जाने की तैयारी हो रही है. दोनों चैनलों में पैसे निवेश करने वाले इनवेस्‍टर को इसके बदले दोनों चैनलों में शेयर या हिस्‍सेदारी दी जाएगी. हालांकि लंबे समय से यह चर्चा है कि नवीन जिंदल पर हमार टीवी तथा फोकस में पैसा निवेश करने के लिए बातचीत की जा रही है, लेकिन नवीन जिंदल के सीधे निवेश करने की बात सामने नहीं आ रही है. खबर है कि वो किसी और से इस चैनल में इनवेस्‍ट करवा सकते हैं.

सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से मतंग सिंह और मनोरंजना सिंह के बीच हुए विवाद के बाद चैनल की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाई है, उसके चलते मतंग सिंह लंबे समय से निवेशक खोजते रहे हैं. इसके पहले भी एक बार एके खुराना नाम के व्‍यवसायी ने चैनल में पैसा इनवेस्‍ट किया था, परन्‍तु दोनों चैनलों की स्थितियां तथा मतंग सिंह के स्‍पष्‍ट कोई बात नहीं बताए जाने के बाद उसने चैनल से अपना हिसाब-किताब अलग कर लिया था.

हालांकि एक बार फिर हमार टीवी और फोकस टीवी में इनवेस्‍टमेंट की चर्चाएं सामने आ रही हैं. खबर है कि कोई अभय कुमार ओसवाल नामक व्‍यवसायी से बात चल रही है. हालांकि अभी बातचीत शुरुआती स्‍तर पर ही बताई जा रही है. इसके पहले नवीन जिंदल हमार टीवी और फोकस टीवी खरीदने की चर्चाएं जरूर सामने आई थीं. बीते साल नवम्‍बर में नवीन जिंदल ने नोएडा में हमार टीवी और फोकस टीवी के कार्यालयों को देखा भी था. इसके बाद से ही नवीन जिंदल के हमार टीवी और फोकस टीवी में इनवेस्‍ट की चर्चा चल निकली थी.

सूत्रों का कहना है कि नवीन जिंदल मीडिया में सीधे निवेश के पक्षधर नहीं दिख रहे हैं. हालांकि वे मीडिया में मौजूद संभावनाओं को खंगाल रहे हैं. हमार टीवी से जुड़े वरिष्‍ठ भी नवीन जिंदल की कंपनी से टाइअप या इनवेस्‍टमेंट जैसी किसी भी संभावना से इनकार कर रहे हैं. दूसरी तरफ नवीन जिंदल के मीडिया एडवाइजर कल्‍याण कुमार भी ऐसी किसी बात से पूरी तरह इनकार करते हुए कहते हैं कि कई लोग नवीन जिंदल से चैनल में इनवेस्‍ट करने तथा लांच करने जैसे मामलों में मिलने जुलने आए हैं, लेकिन उनके किसी चैनल में इनवेस्‍ट करने की बात बिल्‍कुल निराधार है. हमार टीवी के मैनेजिंग एडिटर कुमार राजेश भी ऐसी किसी बात से साफ इनकार करते हैं. 


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सीएनएन-आईबीएन की सागरिका घोष क्‍यों आहत हैं ट्विटर से?

एक वरिष्ठ महिला पत्रकार को ट्विटर पर तीन साल तक बार-बार बलात्कार और जान से मारने की धमकी दी जाए और वैश्या के नाम से पुकारा जाए तो वो क्या करेंगी? और अगर उनकी बेटी का नाम, क्लास और स्कूल की जानकारी ही ट्वीट की जाए तो? भारतीय टेलीविज़न का जाना-पहचाना चेहरा, सीएनएन-आईबीएन चैनल की डिप्टी एडिटर सागरिका घोष इन सबसे तंग आ चुकी हैं.

बीबीसी से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा, “किस धमकी पर अमल किया जाएगा, ये जानना मुश्किल है, लेकिन जब मेरी बेटी के बारे में ट्वीट हुआ था, तो मैं डर गई, कुछ समय के लिए उसे स्कूल बस की जगह अपनी कार से स्कूल भेजा.” ट्विटर पर इस वक्त सागरिका घोष के 1,74,000 से भी ज़्यादा फॉलोअर हैं.

वो कहती हैं, “मेरी पत्रकारिता पर बहस हो तो ठीक है, लेकिन सेक्सिस्ट और अभद्र भाषा के इस्तेमाल पर गुस्सा आता है, पहले मैं भी जवाब देती थी, लेकिन उससे माहौल और बिगड़ जाता था, तो अब मैं या तो ध्यान नहीं देती, या फिर महिला पत्रकारों के साथ होनी वाली बदतमीज़ी दर्शाने के लिए उन ट्वीट्स को री-ट्वी्ट करती हूं.”

क्यों होती है बदतमीज़ी?

तमिल नाडू के तिरुनेलवली में क्रिमिनॉलॉजी के प्रोफेसर डॉ. जयशंकर और वक़ील देबरती हल्दर ने इंटरनेट पर हमलों में महिलाओं को निशाना बनाए जाने पर शोध कर, 'क्राइम एंड द विक्टिमाइज़ेशन ऑफ वीमेन' नाम की किताब लिखी है. सागरिका से इत्तफ़ाक रखते हुए वो कहते हैं, "हमारे समाज की पुरुषवादी मानसिकता इंटरनेट पर भी झलकती है, महिलाएं बहस करें या जवाब दें, ये मर्दों को पसंद नहीं. तो जानीमानी हस्तियों को अभद्र भाषा से निशाना बनाया जाता है और आम महिलाओं का पीछा कर उनसे असल ज़िन्दगी में संपर्क करने की कोशिश की जाती है."

सागरिका घोष को किया गया एक ट्वीट

उनके शोध में पाया गया कि ऐसी बदतमीज़ी करनेवाले पुरुष असल ज़िन्दगी में डॉक्टर, वकील या टीचर भी हो सकते हैं, लेकिन इंटरनेट पर अपनी पहचान ज़ाहिर किए बगैर बोलने की छूट उनके व्यक्तित्व के भद्दे चेहरे को उभरने का मौका देती है. सागरिका के ट्विटर अकाउंट पर नज़र डालें तो पता चलता है कि ऐसे कमेन्ट्स खास तौर पर तब आते हैं जब वो देश की राजनीति पर टिप्पणी करती हैं.

सागरिका का मानना है कि, “ट्विटर पर उन महिलाओं को निशाना बनाया जाता है जो उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष विचार रखती हैं, और उनसे बदतमीज़ी करनेवाले पुरुष दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी सोच रखते हैं.” सागरिका कहती हैं कि अब उन्होंने ट्विटर पर अपने व्यक्तिगत विचार रखना छोड़ दिया है, वो इसपर अब सिर्फ अपने काम की जानकारी देती हैं.

कौन परवाह करे इन पुरुषों की?

सागरिका अकेली नहीं हैं. जानी-मानी दलित लेखक मीना कंडासामी ने भी ट्विटर से किनारा कर लिया है. पिछले साल अप्रैल में उस्मानिया विश्वविद्यालय में ‘बीफ फेस्टिवल’ के आयोजन पर उनकी ट्विटर पोस्ट पर बहुत अभद्र टिप्पणियां आने लगीं. उन्हें सामूहिक बलात्कार की धमकी दी गई और इसका टीवी पर सीधा प्रसारण करने की भी. कुछ ने तेज़ाब फेंकने की बात कही. इनमें से कुछ के ख़िलाफ मीना ने पुलिस में शिकायत भी की.

मीना ने बीबीसी को बताया, “मेरी किताबों और लेखनी की फेसबुक और ट्विटर पर ही नहीं, असल ज़िन्दगी में भी बहुत आलोचना होती है.. प्रकाशित सामान को जलाया जाता है और मुझे वो ज़्यादा दुख देता है.. मैंने तय किया है कि मैं अपना कीमती समय अब वर्चुअल वर्ल्ड के अनजान लोगों की टिप्पणियों से परेशान होने में नहीं गुज़ारूंगी.” मीना का मानना है कि सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ बदतमीज़ी करनेवालों में ज़्यादातर ऐसे पुरुष होते हैं जिन्हें ‘जाति और हिन्दुत्व की आलोचना करनेवाले’ पसंद नहीं आते.

मीना कंडासामी को किया गया एक ट्वीट

महिला आंदोलनकारी ही निशाना?

दिसंबर में सामूहिक बलात्कार के बाद महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा कई बहसों का चर्चा बना, पर पिछले हफ्ते इंटरनेट पर हो रही ऐसी ही एक चर्चा में एक महिला आंदोलनकारी के साथ ही बदतमीज़ी हुई. महिलाओं के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रहीं कविता कृष्णनन ने बीबीसी को बताया कि ‘रेडिफ वेबसाइट’ के द्वारा आयोजित एक चैट के दौरान @RAPIST नाम के हैंडल से एक व्यक्ति ने उनका बलात्कार करने की धमकी दी.

कविता ने कहा, “कुछ ही देर में मैंने वो चैट छोड़ दी, मुझे दुख इस बात का है कि एक जानकार के तौर पर मुझे बुलाया गया लेकिन मुझे सुरक्षित माहौल नहीं मिला. रेपिस्ट जैसे नाम वाले हैंडल को इस चैट में शामिल होने दिया गया, ना उसे रोका गया ना बाद में ब्लॉक किया गया.” रेडिफ वेबसाइट ने इस मामले में बीबीसी से बात तो नहीं की, पर अपनी वेबसाइट पर चैट की जानकारी देते हुए अभद्र टिप्पणियों के लिए कविता से माफी मांगी. कविता ने अब उस व्यक्ति के ख़िलाफ एफआईआर दर्ज कराई है.

पुलिस और क़ानून

पुलिस की मदद लेने का रास्ता चुनने वाली कविता और मीना को एक अपवाद बताते हुए देबरती हल्दर कहती हैं कि ज़्यादातर महिलाएं पुलिस के पास जाने की बजाय हैकर्स की मदद लेना पसंद करती हैं. देबरती और डॉ. जयशंकर साल 2009 से चेन्नई में इंटरनेट पर हमलों का शिकार हुए लोगों के लिए काउंसलिंग सेंटर चलाते हैं. वो बताती हैं कि शुरुआत में उन्हें हैकर समझा गया और कई लोग अभद्र सामग्री हटाने की दरख़्वास्त लेकर उनके पास आए.

देबरती ने कहा, "आखिरकार हमने कुछ महिलाओं को पुलिस के पास जाने के लिए राज़ी किया, पर उनमें से कई ने लौटकर मुझे बताया कि उनकी शिकायत पर ग़ौर करने की बजाय पुलिस ने उन्हें कहा कि सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने की ज़रूरत क्या थी?" भारत में इंटरनेट पर सेक्सिस्ट और अभद्र भाषा से महिलाओं के निशाना बनाए जाने से निपटने के लिए फ़िलहाल कोई क़ानून नहीं है.

पर देबरती का मानना है कि यौन उत्पीड़न और इंटरनेट पर आपत्तिजनक संदेश भेजने के ख़िलाफ मौजूदा क़ानूनों पर भी अगर सही तरीके से अमल किया जाए तो महिलाओं को इंटरनेट पर अपनी बात रखने के लिए सुरक्षित माहौल मिलने में मदद मिलेगी. (बीबीसी)

निशांत चतुर्वेदी ने शिकायत ली वापस, दोनों पक्षों में हुआ समझौता

न्‍यूज एक्‍सप्रेस में कल चैनल हेड निशांत चतुर्वेदी तथा एसोसिएट प्रोड्यूसर कुबेर नाथ सिंह के बीच हुए विवाद में खबर आ रही है कि निशांत चतुर्वेदी ने पुलिस को की गई शिकायत वापस ले ली है. इस मामले को लेकर दोनों पक्षों में समझौता हो गया है. उल्‍लेखनीय है कि मंगलवार को निशांत चतुर्वेदी और कुबेरनाथ सिंह के बीच विवाद तथा हाथापाई हो गई थी, जिसके बाद निशांत चतुर्वेदी ने पुलिस से लिखित शिकायत की. पुलिस कुबेरनाथ सिंह को लेकर थाने गई थी.

बताया जा रहा है कि कुबेरनाथ सिंह भी क्रास एफआईआर लिख कर दिया था. परन्‍तु पुलिस ने किसी भी शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की थी. देर शाम कुछ लोगों के समझाने तथा मामला पत्रकारों के बीच का होने के चलते दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी शिकायत वापस ले ली. पुलिस के सामने ही दोनों पक्षों की तरफ से समझौता हो गया. हालांकि कुबेरनाथ सिंह की बर्खास्‍तगी को वापस नहीं ली गई है.

भूकंप के झटके से एक बार फिर हिला उत्‍तर भारत

राजधानी दिल्‍ली और एनसीआर समेत उत्तर भारत में एक बार फिर भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं. भूकंप के झटके काफी देर तक महसूस किए गए और लोग अपने दफ्तरों से बाहर निकल आए. भूकंप की तीव्रता रिक्‍टर स्‍केल पर 5.7 दर्ज मापी गई है. भूकंप का केंद्र जमीन से 9 किलोमीटर नीचे जम्‍मू-कश्‍मीर के भ्रदवाह में था.

आज दोपहर 12:27 बजे के आसपास दिल्‍ली-एनसीआर में भूकंप के हल्‍के झटके महसूस किए गए. हालांकि जम्‍मू-कश्‍मीर और हिमाचल प्रदेश में झटके काफी तेज थे और लोग घबराकर इमारतों से बाहर निकल आए. इसके अलावा उत्तर प्रदेश, पंजाब और पाकिस्‍तान में भी लोगों ने भूकंप के झटकों को महसूस किया. हालांकि शुरुआती दौर में किसी नुकसान की आशंका नहीं है.

उधर, मौसम विभाग के डीजी एलएस राठौड़ ने भूकंप के झटकों को सामन्‍य प्रक्रिया बताया है. उन्‍होंने कहा, 'हल्‍के झटकों से घबराने की जरूरत नहीं है. धरती के गर्भ के अंदर हलचल होती रहती है इसलिए हम इसे असामान्‍य प्रक्रिया नहीं कह सकते. यह बेहद सामान्‍य है. पिछले दिनों जो झटके महसूस किए गए उनमें केवल 16 अप्रैल को आया भूकंप तेज था.' उल्‍लेखनीय है कि पिछले एक पखवाड़े में यह तीसरी बार है जब भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं. इससे पहले 16 और 24 अप्रैल को भी भूकंप के झटके आए थे.

‘भारत भावना दिवस’ के बहाने भावनाओं से खेलने की तैयारी में सहारा समूह!

सुप्रीम कोर्ट और सेबी के फंदे में बुरी तरह उलझा सहारा समूह पहले तो तमाम याचिकाएं दायर करके सेबी और सुप्रीम कोर्ट को बरलगलाने-उलझाने तथा ज्‍यादा से ज्‍यादा समय तक इस मामले को लटकाए रखने की कोशिश की. कई बार  विज्ञापन प्रकाशित करवाकर सेबी समेत तमाम संस्‍थाओं को परोक्ष रूप से डराने की भी कोशिश की. पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद अब सहारा समूह ने बिना मौसम के बरसात की तरह 'भारत भावना दिवस' मनाने जा रहा है. इसके लिए तमाम अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित कराए गए हैं.

सहारा समूह 6 मई को भारत भावना दिवस के तहत विश्‍व रिकार्ड बनाने की तैयारी कर रहा है. इसके तहत ग्‍यारह लाख लोग एक साथ राष्‍ट्रगान गाएंगे. सहारा पाकिस्‍तान द्वारा बनाए गए रिकार्ड को तोड़ना चाहता है. सहारा इसके पहले भी देश के नाम पर अजीबो गरीब विज्ञापन प्रकाशित करवा चुका है. चाहे वो कामनवेल्‍थ गेम्‍स के दौरान भ्रष्‍टाचार से जुड़े मामले के समय का हो या किसी और मामले का. पर इस बार माना जा रहा है कि सहारा की सारी कवायद बेकार जाने वाली है.

इसकी टोपी उसके सर पर पहनाकर बड़ा आर्थिक साम्राज्‍य बनाने वाले सहारा समूह की गर्दन सेबी और सुप्रीम कोर्ट के पंजे में बुरी तरह फंस चुकी है. 217 शहरों में लोगों को आवास उपलब्‍ध कराने का सपना दिखाकर धंधा करने वाला सहारा समूह आजतक किसी शहर में इस सपने को पूरा नहीं कर सका है. लखनऊ के गोमती नगर में ही शर्तो का उल्‍लंघन करते हुए सुब्रत रॉय ने लोगों को आवास उपलब्‍ध कराने की बजाय खुद का राजमहल तैयार करा रखा है. अब तक तमाम नेताओं, अभिनेताओं, ब्‍यूरोक्रेट्स को ओबलाइज करने वाला सहारा समूह इस कदर उलझ गया है कि खुद सुब्रत रॉय पर ही गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है.

बताया जा रहा है कि सेबी के चंगुल में फंस चुका सहारा समूह अब भारत भावना दिवस मनाकर और अपने पोती के अन्‍नप्रासन्‍न की तस्‍वीरें अखबारों में प्रकाशित करवाकर निवेशकों के टूट चुके विश्‍वास को रोकने का प्रयास कर रहा है. सेबी प्रकरण के बाद से कंपनी को कानूनी मोर्चे पर मुश्किलों का सामना तो करना ही पड़ रहा है, निवेशक भी सहारा से दूर जा रहे हैं. तमाम निवेशक अपने पैसे निकालने के लिए आवेदन भी कर रहे हैं. इन सब कारणों से सहारा समूह परेशान है इसलिए भावना दिवस की आड़ में लोगों की भावनाओं से खेलने की तैयारी कर रहा है. 

अखबार ‘द गार्जियन’ के ट्विटर एकाउंट पर साइबर हमला

इंग्‍लैंड का प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'द गार्जियन' ने आरोप लगाया है कि उसके ट्विटर अकाउंट पर साइबर हमला हुआ है। खबर के मुताबिक सीरियन इलेक्ट्रॉनिक आर्मी नाम के एक समूह ने इसकी जिम्मेदारी ली है। सोमवार को साइबर हमले की सूचना देते हुए समाचार पत्र ने अपनी वेबसाइट पर लिखा कि सप्ताहांत में उसके कई ट्विटर पोस्ट से छेड़छाड़ की गई। गार्जियन के मुताबिक इस बात का पता पहली बार तब चला जब स्टाफ को संदिग्ध ई-मेल भेजे गए। इसके बाद किताबों और फिल्मों पर केंद्रित गार्जियन के ट्विटर अकाउंट को सोमवार को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया।

समाचार पत्र का कहना है कि सीरियन इलेक्ट्रॉनिक आर्मी इससे पूर्व द एसोसिएटेड प्रेस जैसे कई प्रतिष्ठित मीडिया घरानों को निशाना बना चुका है। इस समूह ने द गार्जियन पर सीरिया के बारे में दुष्प्रचार करने का आरोप भी लगाया था।

हर महीने 60 लाख लेने वाले कुणाल घोष का दामन साफ कैसे : तस्‍लीमा

कोलकाता : तृणमूल सांसद व पत्रकार कुणाल घोष की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं. शारदा चिटफंड घोटाले में पुलिस पूछताछ के बाद वे सहज होते उसके पहले ही चर्चित बांग्‍लादेशी लेखिका तस्‍लीमा नसरीन ने उन्‍हें शारदा घोटाले में शामिल बताकर चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है. मंगलवार की दोपहर तस्‍लीमा नसरीन ने कुणाल घोष को कटघरे में खड़ा करते हुए दो ट्वीट किए.

तस्‍लीमा ने लिखा कि चिटफंड से हर महीने 60 लाख रुपये लेने वाले कुणाल घोष का दामन साफ कैसे हो सकता है. हालांकि, कुणाल घोष का वेतन 15 लाख रुपये प्रतिमाह था लेकिन तस्‍लीमा ने 60 क्‍यों लिखा यह समझ से परे है. इसके बाद उन्‍होंने लिखा कि कोलकाता से प्रकाशित बांग्‍ला साप्‍ताहिक रोबबार में छपने वाले उनके कॉलम का प्रकाशन कुणाल घोष ने ही बंद करवाया, ताकि वह मुख्‍यमंत्री को खुश कर सकें.

सांसद डा. महेश जोशी बने प्रेस परिषद के सदस्‍य

नई दिल्ली : राजस्थान के लोकसभा सदस्‍य सांसद डॉ. महेश जोशी को लोकसभा अध्यक्ष द्वारा भारतीय प्रेस परिषद के 11वें सत्र के लिये सदस्य मनोनीत किया गया है। यह जानकारी सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी की गई अधिसूचना एवं भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय की भारत के असाधारण राजपत्र में दी गई है। डॉ. जोशी का मनोनयन केंद्रीय सरकार प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978 (1978 का 37) की धारा 6 की उप-धरा (6) के साथ पठित धारा 5 की उप-धारा (3) और उप-धारा (5) के अनुसरण में 15 जून, 2011 को जारी की गई अधिसूचना में संशोधन करते हुए किया गया है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रेस परिषद के 11वें सत्र के लिये कुल सत्ताईस सदस्यों को मनोनीत किया गया था, जिनमें लोकसभा से मीनाक्षी नटराजन, श्री हरीन पाठक और श्री संजय दीना पाटिल (सभी सांसद) और राज्य सभा से केंद्रीय राज्य मंत्री राजीव शुक्ला और प्रकाश जावडेकर (सांसद) को मनोनीत किया गया था। श्री जोशी को मीनाक्षी नटराजन के स्थान पर प्रेस परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया है।

उत्‍तराखंड पुलिस की वर्दी पर दाग : एएसपी ने किया महिला पत्रकार का यौन शोषण

उत्तराखंड की पुलिस को मित्र पुलिस के नाम से जाना जाता है, लेकिन रणवीर एन्काउन्टर हो या हल्द्वानी का प्रीती शर्मा हत्याकांड, सभी जगह पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं. खैर मुद्दे पर आते हैं, हल्द्वानी की एक महिला पत्रकार ने एडिशनल एसपी प्रमेन्द्र डोभाल पर लगाए हैं गंभीर आरोप. महिला पत्रकार के मुताबिक़ प्रमेन्द्र डोभाल द्वारा उन्हें शादी का झांसा देकर कई बार यौन शोषण किया गया है. जब उन्होंने विरोध किया तो डोभाल ने अपने रसूख का प्रयोग कर महिला पत्रकार को जान से मारने की धमकी दे डाली.

डरी सहमी महिला पत्रकार इसके बाद महिला पुलिस मुख्यालय में डीजीपी सत्यव्रत और आईजी ला एंड ऑर्डर राम सिंह मीना से भी मिलीं. डीजीपी ने मामले की जांच एसएसपी नैनीताल डाक्टर सदानंद शंकर राव दाते को सौंपी है. आपको बता दें कि प्रमेन्द्र डोभाल पहले हल्द्वानी में सीओ सिटी के पद पर तैनात थे और अब प्रमोशन के बाद अपने रसूख के कारण वहीँ पर एसपी सिटी भी बनाए गए हैं. प्रमेन्द्र डोभाल पर हल्द्वानी में कुछ साल पहले हुए प्रीती शर्मा हत्याकांड में आरोपियों को बचाने के एवज में काफी पैसे लेने तथा जांच का रुख बदलने का आरोप भी लगा था. अब इस पीड़ित महिला पत्रकार के मामले में क्या करती है मित्र पुलिस ये देखना होगा.

देहरादून से रणविजय सिंह की रिपोर्ट.

पत्रकार के पिता की पुण्‍यतिथि पर रेड एफएम की आरजे अनादि ने किया भद्दा मजाक

भोपाल : जहां एक और समाचार पत्र, टीवी, रेडियो, वेब मीडिया जन संचार के माध्यम हैं तो वहीं कुछ लोग इसमें उत्‍तरदायी नही होने की बजाय संचार माध्‍यमों और पत्रकारिता को हंसी खेल समझ रखा है. ऐसा ही एक उदाहरण मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल रेड एफएम के आरजे अनादि का सामने आया है, जो आज कल लोगो को गलत सूचनाएं देकर परेशान कर रही हैं. अनादि कार्यालय के फ़ोन से कॉल कर के खुद को मॉडलिंग एजेंसी का मालिक बता रही हैं, साथ ही अपना नाम फ़ोन पर स्वाति बोलती हैं. ऐसे ही कई कॉल पत्रकार आमिर खान को किए जा रहे हैं, जिस से पत्रकार खान काफी परेशान व दुखी हैं. 

29 अप्रैल शाम 04:55 पर रेड एफएम के ऑफिस के इस नंबर +91-07552776935, 07552776935, 07554000935 से कई कॉल पत्रकार आमिर खान को किए गए. रेड एफएम की आरजे अनादि ने  पत्रकार आमिर खान से यह कहा कि "मैं भोपाल मॉडलिंग एजेंसी से कॉल कर रही हूं और आप को मजदूर दिवस पर मॉडलिंग करनी है, उन पर जबरदस्‍ती मॉडलिंग करने का दबाव बनाया गया. जब पत्रकार आमिर खान द्वारा कई बार कहा गया कि मैं एक बच्ची के रेप व हत्या के कवरेज पर हूं, फिर भी बार बार फ़ोन कर रेड एफएम की आरजे अनादि ने कार्य में विघ्न डाला, जिस के कारण कवरेज में काफी दिक्क़तों का सामना करना पड़ा.  

अगले ही दिन 30 अप्रैल को फिर से रेड एफएम की आरजे अनादि ने कार्यालय के नंबर +91-07552773935, +91-07552776935, 07552776935, 07554000935 से कॉल किया और यहाँ तक कहा कि मजदूर दिवस पर आप को मजदूरों की तरह सर पर तगाड़ी रख कर मॉडलिंग करना होगी जिस के लिए "मैं आप को भुगतान करुंगी " क्या मजदूरों की मेहनत को कार्यालय में बैठ कर तथा मॉडलिंग के नाम पर मजाक उड़ना कहां तक ठीक है?

जब पत्रकार द्वारा पूछा गया कि आप ने कहां पर कॉल किया है और किस से बात करनी है, मैं मॉडलिंग नहीं करता हूं फिर भी आरजे अनादी बार बार कार्यालय के लैंडलाइन फ़ोन से कॉल कर स्वयं को मॉडलिंग एजेंसी का स्वामी बता रही थीं व खुद से बात करने का दबाव बना रही थीं. उल्लेखनीय है कि पत्रकार आमिर खान के पिता की मृत्यु 01- मई 1993 को हुई थी, जिस समय वह सिर्फ 7 साल के थे. इस 01- मई को उनकी 20वीं पुण्यतिथि है और आरजे अनादि  01-मई को मजदूर दिवस की आड़ में पत्रकार आमिर खान के पिता 20 पुण्यतिथि पर मॉडलिंग करने जैसा भद्दा मजाक कर रही हैं.  रेड एफएम की आरजे अनादि द्वारा किए गए भद्दे मजाक से पत्रकार आमिर काफी दुखी व नाराज़ हैं और जिस की शिकायत पुलिस प्रशासन व पत्रकार संघ के अलावा रेड एफएम मुख्यालय SUN TV NETWORK Chennai Tamil Nadu में करने के लिए कमर कस चुके हैं.

कुछ सवाल

– क्या एक बेटा अपनी पिता की पुण्यतिथि पर मॉडलिंग करे? जिस के लिए रेड एफएम की आरजे अनादि द्वारा मानसिक दवाब बनाना कहां तक ठीक है?

– अपने कार्य व ज़िम्मेदारी को न निभाते हुए कार्यालय के फ़ोन का दुरुपयोग कहां तक ठीक है?

– क्या आरजे अनादि किसी फर्जी मॉडलिंग एजेंसी को संचालित कर रही हैं? व लोगों से किसी ठगी के लिए तत्पर हैं? और जवाब में सुनने को मिलता है कि बजाते रहो! लोगो को मानसिक सजा देना कहां तक ठीक है?

– क्या किसी के पिता की पुण्यतिथि पर इस तरह का भद्दा मजाक और किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कहां तक वैध है?

– क्या मजदूर दिवस पर मजदूरों को पॉइंट करते हुए किसी के साथ मजाक करना ठीक है?

सूत्रों की अगर माने तो रेड एफएम की आरजे अनादि एसे भद्दे मजाक आए दिन करती हैं. सूत्रों की अगर आगे माने तो आरजे अनादि प्रशासन के आला अधिकारियों तक को नहीं बख्‍श रही हैं. हद तो तब हो जाती है जब इस तरह के भद्दे व भावनाओ को ठेस पहुंचाने वाली बातों को रेडियो पर ऑन एयर कर देती हैं, जिस से काफी लोग दुखी व पेरशान हैं.

मामले को दबाने की कोशिश

उल्लेखनीय है कि जब इस पूरी घटना की जानकारी भोपाल एफएम कार्यालय के कर्मचरियों को पता चली तो पत्रकार आमिर खान को पुलिस प्रशासन, पत्रकार संघ व रेड एफएम प्रबंधन से न करने की हिदायत दे रहे हैं. साथ ही रुपये की पेशकश कर मामले को दबाने की बात कही जा रही है.

लखनऊ में 6 मई को होने वाला पत्रकार सम्मान समारोह स्थगित

लखनऊ में 6 मई को आयोजित होना वाला स्‍मृति एवं पत्रकार सम्‍मान समारोह को स्‍थगित कर दिया गया है. इस समारोह में सुरेन्द्र प्रताप सिंह, पंडित विनोद शुक्ल, पद्मश्री वचनेश त्रिपाठी, अखिलेश मिश्र, वीरेन्द्र सिंह, घनश्याम पंकज, पंडित शिव कुमार (एसके) त्रिपाठी, डा. सदाशिव द्विवेदी, मोहम्मद अब्दुल (एमए)हफीज, श्रीप्रकाश शुक्ल, ओसामा तलहा, जयप्रकाश शाही, ज़ावेद अंसारी और सियाराम शरण त्रिपाठी की सृजनशील स्मृतियों पर चर्चा करने के साथ कई पत्रकारों को सम्‍मानित किया जाना था. इसका आयोजन सर्वप्रथम और जर्नलिस्‍ट फोरम ने संयुक्‍त रूप से किया था.

कार्यक्रम के संयोजक वरिष्‍ठ पत्रकार एवं सर्वप्रथम के कार्यकारी संपादक धीरेंद्र श्रीवास्‍तव के भांजे के असामयिक निधन हो जाने के चलते इसे स्‍थगित किया गया है. बीते शनिवार को उनके भांजे 44 वर्षीय कृष्‍ण कुमार श्रीवास्‍तव का दिल्‍ली में निधन हो गया है. इस कार्यक्रम के लिए अब आगे कोई तिथि तय की जाएगी.

लाइव इंडिया प्रबंधन से नाराज रवि तिवारी नहीं जा रहे ऑफिस

लाइव इंडिया, मुंबई से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ रहे रवि तिवारी ने ऑफिस जाना बंद कर दिया है. वे पिछले कई दिनों से ऑफिस नहीं जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि रवि प्रबंधन के रवैये से बहुत ही नाराज हैं. रवि लाइव इंडिया के पुराने कर्मचारियों को सम्‍मान और तवज्‍जो नहीं मिलने से नाराज बताए जा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि जब से जी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर विजय शेखर लाइव इंडिया पहुंचे हैं तब से पुराने कर्मचारियों के लिए स्थितियां खराब हो गई हैं.

विजय शेखर के आने से पहले रवि तिवारी ही लाइव इंडिया और मी मराठी की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. अब जी न्‍यूज और जी मराठी से निकाले गए या इस्‍तीफा देने वालों के लिए लाइव इंडिया और मी‍ मराठी नया घर साबित हो रहा है. सतीश के सिंह के सौजन्‍य से ये लोग बड़ी-बड़ी सैलरी पर चैनल ज्‍वाइन कर रहे हैं, जबकि पुराने लोग बहुत ही कम सैलरी पर काम कर रहे हैं. प्रबंधन से जब पुराने लोगों की सैलरी बढ़ाने की बात कही जा रही है कि नए लोगों का कहना है कि पुराने कर्मचारियों से उनका कोई लेना देना नहीं है.

खबर है कि जी मराठी छोड़ने वाले तमाम लोगों को मी मराठी ज्‍वाइन कराया गया है. जबकि इसके उलट लाइव इंडिया से इस्‍तीफा देने वालों के लिए जी का दरवाजा इतनी आसानी से खुलता नहीं दिख रहा है. पुराने कर्मचारी तनाव में काम कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि ऐसी ही तमाम परिस्थितियों से नाराज रवि तिवारी ने ऑफिस जाना बंद कर दिया है. उन्‍होंने अभी अपना इस्‍तीफा नहीं सौंपा है. रवि की गिनती मुंबई के सुलझे तथा अच्‍छे पत्रकारों में होती है. अब देखना है कि रवि आगे क्‍या निर्णय लेते हैं.

निरुपमा पाठक सुसाइड मामले में प्रियभांशु के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता : कोर्ट

रांची : झारखंड उच्च न्यायालय ने चर्चित निरुपमा पाठक मामले में दिल्ली के पत्रकार और निरुपमा के मित्र प्रियभांशु को क्लीन चिट दे दी है और कहा है कि मौजूदा साक्ष्यों के आधार पर उसके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता.

झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर आर प्रसाद की एकल पीठ ने आज इस मामले में सुनवाई के बाद प्रियभांशु के खिलाफ पुलिस की प्राथमिकी को रद्द कर दिया. दिल्ली के एक अखबार में पत्रकार निरुपमा पाठक को 29 अप्रैल 2010 को संदिग्ध परिस्थितियों में अपने कोडरमा स्थित आवास पर पंखे से लटकते पाया गया था. पुलिस ने इसे प्रथम दृष्टया झूठी शान के लिए हत्या का मामला मानते हुए लड़की की मां को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

इस मामले में बाद में पुलिस ने निरुपमा की मां की शिकायत पर दिल्ली के पत्रकार प्रियभांशु के खिलाफ बलात्कार, आत्महत्या के लिए उकसाने, धोखाधड़ी और धमकाने का मामला मई 2010 में दर्ज किया. पुलिस ने जांच के दौरान ही प्रियभांशु को बलात्कार, आपराधिक रुप से धमकाने और धोखाधड़ी के आरोपों से मुक्त कर दिया था, लेकिन आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 306 में उसके खिलाफ कोडरमा की निचली अदालत ने वारंट जारी किया था.

प्रियभांशु ने इस मामले में पांच जून 2012 को आत्मसमर्पण किया और उसे 30 जुलाई को जमानत पर रिहा कर दिया गया. झारखंड उच्च न्यायालय ने आज अपने फैसले में कहा कि पेश साक्ष्यों के आधार पर प्रियभांशु के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता, लिहाजा उसके खिलाफ पुलिस की प्राथमिकी खारिज की जाती है. इसके साथ ही प्रियभांशु इस मामले के तमाम आरोपों से बरी हो गए हैं. (प्रभात खबर)

नौकरी-शादी का झांसा देकर रेप करने के आरोपी पत्रकार को अंतरिम जमानत

एक युवती के साथ शादी और नौकरी का झांसा देकर रेप करने के आरोपी पत्रकार सिद्धार्थ शेखर कोर्ट ने अंतरिम जमानत दे दी है। साथ ही कोर्ट ने उसे पुलिस जांच में शामिल होने तथा सहयोग करने का आदेश भी दिया है। उल्‍लेखनीय है कि पूर्व कर्मचारी और उसकी पत्नी दोनों के खिलाफ इस मामले में केस दर्ज किया गया था। आरोपी पर रेप व जान से मारने की धमकी देने व उसकी पत्नी पर साजिश रचने का मामला दर्ज है। केस दर्ज होने के बाद से ही दोनों फरार हैं।

पुलिस ने आरोपी की गिरफ्तारी के लिए राजस्थान, दिल्ली व गुड़गांव में कई जगहों पर रेड भी की। लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं आया। इसके बाद उसके वकील की ओर से बीते सप्ताह कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई गई थी। बीते 15 अप्रैल को डीएलएफ फेज-2 के यू ब्लॉक निवासी 23 वर्षीय एक युवती ने आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी थी। इसमें कहा गया था कि अपने आप को एक नेशनल अंग्रेजी अखबार का कर्मचारी बताने वाले सिद्धार्थ शेखर नामक युवक ने उससे मीडिया हाउस में काम दिलवाने के अलावा शादी का झांसा देकर दो साल तक रेप किया।

इस युवक ने उसे यू ब्लॉक में किराये पर मकान भी दिलाया। युवती ने पुलिस को बताया कि उसे बाद में पता चला कि युवक शादीशुदा है। इसके बाद दोनों की बहस हो गई थी। युवती का आरोप था कि वह दो साल से उसके साथ रेप करता आ रहा है। उसे जान से मारने की भी धमकी दी गई। मामले की जांच में जुटे एएसआई नरेश कुमार ने बताया कि कोर्ट ने आरोपी को अंतरिम जमानत दे दी है। उसे जांच में शामिल होने को भी कहा गया है।

बलदेव शर्मा बनेंगे दैनिक भास्‍कर, उदयपुर के संपादक

दैनिक भास्‍कर से खबर है कि बलदेव शर्मा को उदयपुर का संपादक बनाया जा रहा है. वे फिलहाल दैनिक भास्‍कर, सीकर के संपादक के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे हैं. वे जल्‍द ही उदयपुर में कार्यभार ग्रहण कर लेंगे. उदयपुर में स्‍थानीय संपादक के पद पर कार्यरत रहे सुधीर मिश्रा के इस्‍तीफा देने के बाद से यह पद खाली चल रहा था. सुधीर मिश्रा नवभारत टाइम्‍स, लखनऊ के संपादक बनने के बाद भास्‍कर, उदयपुर से इस्‍तीफा दे दिया था. सीकर का संपादक किसे बनाया जाएगा इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

पत्रकार जितेंद्र सिंह के हत्‍यारों की गिरफ्तारी के लिए राज्‍यपाल को ज्ञापन दिया

चाईबासा। जितेंद्र सिंह के हत्‍यारों को अरेस्‍ट करने की मांग को लेकर पत्रकारों का आंदोलन तेज होता जा रहा है। सिंहभूम जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर खूंटी के पत्रकार जीतेंद्र सिंह के हत्यारे की गिरफ्तारी करवाने की मांग की है। एसोसिएशन ने मंगलवार को प्रभारी उपायुक्त सह उप विकास आयुक्त बालकिशुन मुंडा को राज्यपाल के नाम पांच सूत्री ज्ञापन सौंपकर इस हत्याकांड की निंदा भी की है।

एसोसिएशन ने पत्रकार जीतेंद्र सिंह के हत्यारे को अविलंब गिरफ्तार करने, स्वर्गीय सिंह के परिजनों को नक्सली हिंसा के प्रावधान के मुताबिक दस लाख रुपए का मुआवजा देने, उनके आश्रितों को सरकारी नौकरी देने, पत्रकारों के जानमाल की सुरक्षा की गारंटी देने व राज्य में पत्रकार प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने की मांग की है।

ज्ञापन में इस मामले में शीघ्र कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में बाध्य होकर आंदोलन का रास्ता अख्तियार करने की चेतावनी भी दी गई है। ज्ञापन सौंपने वालों में एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव नयनम, उपाध्यक्ष प्रमोद कुमार, संतोष सुलतानियां, शिशिर टोप्पो, संतोष कुमार, भागीरथी महतो, गौरीशंकर झा, रमेंद्र कुमार सिन्हा, सुजीत कुमार साहू, राजा राम गुप्ता, आनंद प्रियदर्शी, प्रभात कुमार राय आदि शामिल थे। एसोसिएशन ने ज्ञापन सौंपने के बाद बैठक कर स्वर्गीय जीतेंद्र कुमार सिंह की दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर ईश्वर से प्रार्थना की। गौरतलब है कि खूंटी के पत्रकार जीतेंद्र कुमार सिंह की नक्सलियों ने 27 अप्रैल को हत्या कर दी थी।