जेल में बस न्यूज चैनल ही देख रहे हैं श्रीशांत

तिहाड़ जेल। आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले में तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे पहुंचे राजस्थान रॉयल्स के श्रीशांत बस सारा दिन अपने सेल में टीवी पर न्यूज देखते हैं। न्यूज देखकर वह अक्सर रुआंसा हो जाते हैं। श्रीशांत और अजित चंदीला को एक ही सेल में बंद न करके अलग-अलग सेल में बंद किया गया है। लेकिन दोनों के सेल की दीवार लगी हुई है।

तिहाड़ जेल के सूत्रों का कहना है कि दोनों खिलाड़ी जेल का पानी नहीं पी रहे हैं, बल्कि कैंटीन से मिनरल वॉटर की बोतल खरीदकर पी रहे हैं। श्रीशांत ने अभी तक एक बार भी जेल के लंगर में बना हुआ खाना नहीं खाया है। वह कैंटीन में बना हुआ खाना खा रहे हैं। जेल जाने से पहले जिस वक्त श्रीशांत और चंदीला स्पेशल सेल की कस्टडी में थे। उस वक्त दोनों का झगड़ा हो गया था। श्रीशांत ने चंदीला पर आरोप लगाते हुए कहा था कि उसकी वजह से ही वह फंसे हैं। दोनों में काफी कहासुनी हो गई थी। इसके बाद से दोनों को अलग-अलग रूम में रखा गया था।

यही बात श्रीशांत ने तिहाड़ जेल में पहुंचकर भी जेल अफसरों से कही थी कि वह चंदीला के साथ नहीं रहेंगे। इस वजह से श्रीशांत को जेल नंबर-1 के वॉर्ड नंबर-1 के सेल नंबर-3 में और चंदीला को सेल नंबर-4 में रखा गया है। दोनों के साथ कुछ और विचाराधीन कैदी बंद किए गए हैं। श्रीशांत न्यूज चैनल तो बदलते ही रहते हैं, साथ ही उसने अब न्यूज पेपर भी मंगवाना शुरू कर दिया है। गर्मी अधिक होने की वजह से वह दिन में दो बार नहा रहे हैं। सुबह 5 बजे उठना और रात को 11 बजे सोना उसके टाइम टेबल का हिस्सा बन चुका है। जेल में अभी तक उनका भाई ही उनसे मिलने आया है।

जेल अफसरों का कहना है कि चंदीला से कहीं अधिक श्रीशांत बेचैन रहता है। वह रात को भी बेहद कम सो पाता है। जबकि चंदीला इतनी अधिक टेंशन में नहीं लगता है। दोनों खिलाड़ियों की सुरक्षा में कहीं कोई कमी न रह जाए, इसके सख्त इंतजाम किए गए हैं। पहले जेल अधिकारी सोच रहे थे कि इनसे अन्य कैदियों को बोलिंग के टिप्स दिलाए जाएं। मगर अब जेल अधिकारियों का कहना है कि कहीं इन्हें अन्य कैदियों के साथ शामिल करने पर कोई इनके ऊपर हमला न कर दे। यही बात सोचते हुए इन्हें इनके सेल से बाहर नहीं निकाला जा रहा है। इनकी सुरक्षा के लिए टीएसपी यानी तमिलनाडु स्पेशल पुलिस के चार जवानों को तैनात किया गया है। वे उन पर राउंड द क्लॉक नजर बनाए रखते हैं। जेल अफसरों का कहना है कि क्रिकेट के गुर सिखाने के लिए कुछ कैदियों को इन्हीं के सेल में इनसे मिलवाया जा सकता है। मगर अभी इसके लिए राइट टाइम नहीं आया है। (एनबीटी)

मतदान के विवाद को कवर कर रहे चार पत्रकारों पर हमला, कैमरे तोड़े गए

पंचकूला : नगर निगम पंचकूला के वार्ड नं. 10 में वोटों को लेकर दो ग्रुपों के बीच हो रहा झगड़ा मीडिया कर्मियों को महंगा पड़ गया। इस वार्ड से प्रत्याशी एवं पूर्व पार्षद के पति मनीष गुप्ता ने पत्रकार राजेश मलकानिया का कैमरा छीन लिया और उसे तोड़ दिया। इसके बाद बदसलूकी करके जान से मारने की धमकी देकर फरार हो गया। इस दौरान पूर्व पार्षद के समर्थकों द्वारा दो अन्‍य समाचार पत्रों के कैमरामैनों के कैमरे तोड़ दिए गए और एक वरिष्ठ पत्रकार पर गाड़ी चढ़ा दी गई। इससे नाराज पत्रकारों ने सड़क जाम कर दी। अधिकारियों के पहुंचने पर मामला शांत हुआ।

जानकारी के अनुसार वार्ड नं. 10 के सेक्टर 9 में बने बीकेएम विश्वास पब्लिक स्कूल में शाम पाच बजे वोटिग बंद होने से 5 मिनट पूर्व चार मतदाता वोटिंग करने के लिए आए। इसी बीच प्रत्याशी रंजीता मेहता के पति अभि मेहता एवं उनकी प्रतिद्वंद्वी भावना गुप्ता के पति मनीष गुप्ता के बीच वोटों को भुगताने के लिए काफी लड़ाई झगड़ा हो रहा था। पत्रकार राजेश मलकानिया ने इन दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश की, तो भावना गुप्ता के पति मनीष गुप्ता ने राजेश का कैमरा छीनकर नीचे पटक दिया। इसके बाद धक्का देकर बदसलूकी करने लगा। जान से मारने की धमकी देते हुए भाग निकाला।

इसी बीच भावना गुप्ता एवं रजीता मेहता के समर्थकों में पोलिंग स्टेशन के बाहर काफी हगामा होने लगा और दोनों पक्षों के बीच जमकर हाथापाई हुई। इस दौरान दो हिदी समाचार पत्रों के फोटोग्राफरों कर्मचंद एवं विक्रम सिंह के कैमरे तोड़ दिए गए। इस दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार मामले की सूचना पाकर मौके पर आ रहे थे, तभी पूर्व पार्षद के एक समर्थक ने अपनी स्विफ्ट गाड़ी नंबर सीएच 03 जेड 0150 उनके पैर पर चढ़ा दी। इसके बाद पत्रकारों ने सेक्टर 9 की मार्केट में सड़क जाम कर दी। मामले की जानकारी मिलते ही डीसीपी अश्विन शेणवी एवं अंबाला-पंचकूला मंडलायुक्त राजबीर देसवाल को दी। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अभी तक किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है।

पत्रकारिता कौन कर रहा है- दिल्‍ली में बैठे या गांव गिरांव में काम करने वाले लोग?

Arvind Kumar Singh : पत्रकारिता आखिर कौन कर रहा है…दिल्ली या राज्यों की राजधानियों में बैठे लोग या फिर गांव-गिरांव की खोज खबर लेने वाले लोग…इसी तरह सबसे अधिक जोखिम कौन ले रहा है..ऐसे बहुत से सवाल हिंदी और भाषाई पत्रकारिता के सामने खड़े हैं.

गुणवत्ता से लेकर जनता से जुड़ाव तक..जौनपुर और रायबरेली में हिंदी पत्रकारिता की जमीन को मजबूत करने वाले कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से मिल कर और उनके बारे में जान कर मन श्रद्धा से झुक गया…सच तो यही है कि हिंदी पत्रकारिता इनके श्रम और साधना की देन है और इनको सम्मानित करने का फैसला करने वाले जौनपुर और रायबरेली के पत्रकार मित्रों को मैं बधाई देता हूं.

वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह की एफबी वॉल से साभार.

इंडिया न्यूज के बिजनेस हेड राजेश शर्मा के जिम्मे आज समाज और संडे गार्डियन अखबार भी

खबर है कि इंडिया न्यूज़ के बिज़नेस हेड राजेश शर्मा की जिम्मेदारी बढ़ा दी गई है. राजेश अभी तक इंडिया न्यूज़ ग्रुप के सभी चैनलों का सरकारी बिज़नेस का काम देख रहे थे. प्रबंधन ने अब उनके परफारमेंस को देखते हुए उन्हें ग्रुप के दो अख़बारों आज समाज और सन्डे गार्डियन का भी अतिरिक्त प्रभार दे दिया है. राजेश शर्मा मीडिया सेल्स फील्ड के जाने-पहचाने नाम हैं. राजेश इंडिया न्यूज से पहले टोटल टीवी, एसटीवी आदि चैनलों में वरिष्ठ पदों पर अपनी सेवाए दे चुके हैं.

भड़ास से संपर्क करने के लिए आप bhadas4media@gmail.com का सहारा ले सकते हैं.

हटकर भी नहीं हटे श्रीनिवासन, खेल जारी है!

: सिर्फ खिलाड़ी बदल गये!बाकी कसर भी पूरी हो जायेगी, कीजिये अब इंतजार! : अब श्रीनिवासन का खड़ाऊं सिंहासन पर रखकर भारत सरकार के समांतर भारतीय क्रिकेट का आईपीएल साम्राज्य चलायेंगे कोलकाता के,  बंगाल क्रिकेट बोर्ड के अध्‍यक्ष जगमोहन डालमिया।बताया जा रहा है कि बैठक में अरुण जेटली ने डालमिया का नाम आगे बढ़ाया, बता दें कि बोर्ड की आपात बैठक के पहले जगमोहन डालमिया और श्रीनिवासन के बीच तकरीबन दो घंटे की बैठक हुई थी। हटकर भी नहीं हटे श्रीनिवासन और आईपीएल घोयाले का पटाक्षेप का पूरा आयोजन हो गया।

जुआड़ियों के विश्वव्यापी बेटिंग नेटवर्क, अंडरवर्ल्ड के अंधेरे कारोबार और मैच फिक्सिंग की संसस्कृति के मुताबिक चाकचौबंद बंदोबस्त के तहत भारतीय शेयर बाजार आधारित मुक्त बाजार की काला धन व्यवस्था और अबाध पूंजीप्रवाह की तरह सत्तावर्ग की सफेदपोश सेक्सी चियरिन संस्कृति की जय जयकार। कोलकाता चेन्नई के गठबंधन की जय जयकार। बेटिंग फिक्सिंग के सबसे बड़े अखाड़ों के आगे नतमस्तक हो गये पत्रकारिता से राजनीति में आकर अरबपति राजनेता बने चरम मौकापरस्त सारे काले धंदों को निर्बाध चलाने के बाद दूधधुले केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री राजीव शुक्ला आईपीएल कमिश्नर पद को तिलांजलि देकर भारतीय क्रिकेट साम्राज्य को कब्जाने का मंसूबा पूरा नहीं कर पाये। बैठक में एन श्रीनिवासन की जीत हुई है।

एन श्रीनिवासन इस्तीफा नहीं देंगे वो अपने पद पर बने रहेंगे, लेकिन बोर्ड के रोजाना के कामकाज वो नहीं देखेंगे। विरोध के मद्देनजर महज दिखावे के लिए एक अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया है। श्रीनिवासन का तर्क था कि उनके इस्तीफे से गलत संदेश जाएगा। सूत्रों की मानें तो ढाई बजे बैठक शुरू होते ही श्रीनिवासन ने आखिरी दांव चला, श्रीनिवासन ने कहा कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया इसलिए अध्यक्ष पद से हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता।श्रीनिवासन ने सीधा निशाना बनाया राजीव शुक्ला, अरुण जेटली और अनुराग ठाकुर को। उन्होंने कहा कि दामाद की गलती की सजा मुझे क्यों मिले। नेता और मीडिया इस मामले को तूल दे रहे हैं। श्रीनिवासन ने ये भी कहा कि अगर मैं इस्तीफा देता हूं तो एक अलग परंपरा की शुरुआत हो जाएगी।

अरुण जेटली और संघ परिवार का रिमोट कंट्रोल फेल हो गया। राजनीति के मराठा डान भारतीय कृषि के विध्वंसक शरद पवार भी हाथ मलते रह गये। जगताले और शिरके श्रीनिवासन के काले कारनामों में सच्ची साझेदारी निभाने के बाद रातोंरात ईमानदारी का परचम लहराने के बावजूद श्रीनिवासन का तख्ता पलट नहीं कर पाये।बीसीसीआई की चेन्नै में हुई आपात बैठक में भी आखिर एन श्रीनिवासन की ही चली। वह पद पर बने रहेंगे। रोज के काम-काज से खुद को अलग करने पर वह जरूर तैयार हो गए हैं। मगर, रोज का काम-काज देखने वाले वर्किंग ग्रुप का प्रमुख भी श्रीनिवासन की पसंद से ही तय हुआ। बैठक में ज्यादातर सदस्यों ने श्रीनिवासन के इस्तीफे के सवाल पर जोर देना ठीक नहीं समझा। इस स्थिति से नाराज संजय जगदाले और अजय शिर्के ने अपना इस्तीफा वापस लेने और बोर्ड में अपना कामकाज दोबारा संभालने का अनुरोध स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

पंजाब क्रिकेट असोसिएशन के आई एस बिंद्रा जरूर अपवाद रहे। उन्होंने श्रीनिवासन के खिलाफ हमला बोलते हुए जोरदार ढंग से उनका इस्तीफा मांगा। उनका कहना था कि इस इस्तीफे के साथ किसी तरह की शर्त नहीं लगाई जानी चाहिए। मगर श्रीनिवासन खेमा इसके लिए तैयार नहीं हुआ। बिंद्रा के समर्थन में और लोग सामने नहीं आए। ज्यादातर सदस्यों ने इस मसले पर चुप रहना ही बेहतर समझा। ऐसे में, बैठक में श्रीनिवासन की ही चली। उन्होंने साफ कर दिया कि वह पद नहीं छोड़ने वाले। आरोपों को देखते हुए जांच रिपोर्ट आने तक खुद को रोज के काम-काज से अलग करने की बात उन्होंने कही। रोज का काम-काज एक वर्किंग ग्रुप को सौंपा गया है जिसके अध्यक्ष जगमोहन डालमिया होंगे।

जगमोहन डालमिया क्रिकेट कारोबार और राजनीति दोनों में माहिर हैं।कोलकाता का आईपीएल केंद्र उन्हींके मातहत हैं, जहां से बेटिंग फिक्सिंग अंडरवर्ल्ड, चिटफंड, माफिया और राजनीति के तार प्लग अनप्लग होते रहे हैं। बंगाल और भारतीय राजनीति के संरक्षण में।डालमियां का करिश्मा यह है कि कोलकाता में पंचायत चुनाव को लेकर राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग की रस्साकशी के बीच फैलती अराजक हिंसा और हावड़ा संसदीय चुनाव के लिए हो रहे मतदान में ममता दीदी की अग्निपरीक्षा की खबरें तक दिनभर हाशिये पर रही और कोलकाता में मीडिया और सत्ता वर्चस्व को डालमिया की ताजपोशी का इंतजार रहा।

भारतीय क्रिकेट को खुल्ला बाजार के सबसे क्रेजी, सबसे सेक्सी हथियार बनाने वाले डालमिया के अंतरिम अध्यक्ष बनने से बाजार की ही जयजयकार। आईसीसी के चेयरमैन बतौर भद्रलोक के खेल के कालाबाजार में तब्दील करने का काम उन्होंने ही तो संपन्न किया।मौनी देवों और देवियों की तपस्या सार्थक हो गयी। शरद पवार खेमे को धता बताने वाले फैसले में बोर्ड की कार्यसमिति ने फैसला किया कि डालमिया उसके रोजमर्रा के कामकाज का संचालन करेंगे। इससे पहले श्रीनिवासन ने कहा कि वह स्पाट फिक्सिंग मामले में जांच पूरी होने तक अध्यक्ष पद नहीं छोड़ेंगे। अरुण जेटली, राजीव शुक्ला और अनुराग ठाकुर जैसे प्रमुख सदस्य डालमिया के पक्ष में थे।

पवार खेमा पूर्व प्रमुख शशांक मनोहर को डालमिया की जगह चाहता था लेकिन वह भी श्रीनिवासन का इस्तीफा सुनिश्चित नहीं करा सका।डालमिया अब संजय जगदाले की जगह तीन सदस्यीय जांच आयोग में एक नये सदस्य की नियुक्ति करेंगे। यह आयोग श्रीनिवासन के दामाद और चेन्नई सुपर किंग्स के टीम प्रिंसिपल गुरूनाथ मयप्पन और सीएसके के खिलाफ स्पाट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के आरोपों की जांच करेगा।

बोर्ड के 24 सदस्यों ने बैठक में भाग लिया लेकिन श्रीनिवासन ने कहा कि किसी ने उनसे इस्तीफे की मांग नहीं की. चैंपियन ट्राफी जीतकर महेंद्र सिंह धोनी फिर उग्रतम हिंदुत्व में सराबोर चियरिन राष्ट्रीयता के ध्वजावाहक बने ही रह सकते हैं। दो चार बलि हो जाने के बाद जनता का गुस्सा अपने आप शांत हो जायेगा। तमाम प्रतिरक्षा घोटालों, कोलगेट, रेलगेट, टुजी स्पेक्ट्राम, शारदा फर्जीवाड़ा, कोबरा स्टिंग आपरेशन का जो हुआ, उससे अलग हश्र होने की उम्मीद नहीं है।

जब सारा खेल खुल्ला फर्रूखाबादी संपन्न हो गया, जुआड़ियों की पसंदीदा टीम को आईपीएल छह चैंपियन बना दिया गया, विश्वव्यापी बेटिंग मीडिया प्रसारण कारोबार में अरबों का न्यारा वारा हो गया, भारतीय क्रिकेट में उजली छवि के आखिरी स्तंभ क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को टेस्ट क्रिकेट से भी रिटायर करने की परिस्थितियां बना दी गयीं, तब अब दावा है कि चौतरफा दबाव के आगे झुकते हुए एन श्रीनिवासन ने समझौते के तहत बीसीसीआई अध्यक्ष पद से किनारा कर लिया जिससे पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया की वापसी हुई जो बोर्ड के संचालन के लिए अंतरिम व्यवस्था के तौर पर चार सदस्यीय पैनल की अध्यक्षता करेंगे। शरद पवार खेमे को धता बताने वाले फैसले में बोर्ड की कार्यसमिति ने फैसला किया कि डालमिया उसके रोजमर्रा के कामकाज का संचालन करेंगे। इससे पहले, श्रीनिवासन ने कहा कि वह स्पॉट फिक्सिंग मामले में जांच पूरी होने तक अध्यक्ष पद नहीं छोड़ेंगे।

श्री निवासन हटे और नहीं भी डटे। फिक्स्ड मैच में वे चौके छक्के लगाते रहे। फील्डर दौड़कर उछलकर तमाम कवायद करके टांग उठाऊ जंपिंग झपांग करते रहे। अपना समय चुनकर अपनी सुविधा के मुताबिक राज पाट अपने ही खास आदमी को सौंपकर व्यवस्था को भारतीय अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रणाली को रोज रोज संविधान और कायदे कानून की हत्या के बावजूदखुले बाजार के कारपोरेट राज और अल्पमत जनविरोधी सरकार की तरह बदस्तूर कायम रखकर वे हटे। वे लगातार डटे रहे और उनके अंगदी पांव को प्रधानमंत्रित्व के दावेदार और संघ मुख्यालय तक टस से मस नहीं कर पाये। और अब वे हटकर भी नहीं हटे। श्रीनिवासन के बदले अंतरिम अध्यक्ष जो जगमोहन डालमियां बने वे बाकी कसर उसी तरह पूरा करेंगे जैस ललित मोदी के पलायन के बाद राजीव शुक्ला ने पूरी दक्षता और प्रतिबद्धता के साथ पूरी की। सुरेश कलमाडी और राष्ट्रमंडल खेलों में घपला किसी को याद है?

फिर इंतजार कीजिये , बाकी खेलो में खुले बाजार के मुताबिक प्रीमियर लीग के जरिये बाकी बचे खुचे स्पेस तक  गैर क्रिकेटीय आइकनों के जरिये दखल और जल जंगल जमीन आजीविक और नागरिकता से बेदखली और निर्मम सैन्य दमन की कार्रवाइयों का, जिसका कि हम लोग पिछले दो दशकों में भारतीय छिनाल राजनीति की बिस्तरी कवायद की तरह अभ्यस्त होही चुके हैं।

बल्कि इस घनघोर घटाटोप में बेसिक सारे मुद्दे हाशिये पर जाने का पूरा इंतजाम है। संसद में सर्वदलीय सहमति से देशभर में बहुसंख्य जनगण के खिलाफ नरसंहार संस्कृति के तहत जो अश्वमेध अभियान जारी है, विकास दर,वित्तीय घाटा, रेटिंग से लेकर माओवादी हिंसा तक के तर्क के तहत उसे भारतीय जनता के खिलाफ सर्वात्मक युद्ध में तब्दील करने की तैयारी है। चियरिनों के जलवे की आड़ में छुपे हैं नरसंहार के पारमाणविक शस्त्र तमाम और जनता को कानोंकान खबर नहीं है, आईपीएल विकास कथानक के विध्वंसक उत्कर्ष की तैयारी में है पक्ष विपक्ष की सम्मिलित सत्ता। सबसे उजले और चमकदार चेहरों के मार्फत जो व्यापक धोखाधड़ी का इंतजाम खुले बाजार के तहत भारत के कोने कोने में निरंकुश बाजार का वर्चस्व बनाता है , वह है क्रिकेट और इसकी सत्ता के लिए मारामारी भी राजनीति की रणनीतिक मजबूरी है, जैसे कि अश्वमेध यज्ञ के करमकांड की आध्यात्मिकता आक्रामक जनविराधी सलवा जुड़ुम धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की मनुस्मृति व्यवस्था की अनिवार्यता है।

पंजाब क्रिकेट संघ के अध्यक्ष आई एस बिंद्रा ने हालांकि दावा किया कि उन्होंने इस्तीफे की मांग की।आई एस बिंद्रा ने बीसीसीआई बैठक के नतीजों पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि जो कुछ हुआ है उससे इस देश के करोड़ों क्रिकेटप्रेमी संतुष्ट नहीं होंगे। यह फैसला ऐसा नहीं है जिसे संतोषजनक माना जा सके। कार्यसमिति के दो सीनियर सदस्यों ने भी कहा कि बैठक में इस्तीफा शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया। बैठक में सचिव जगदाले और कोषाध्यक्ष अजय शिर्के से भी इस्तीफे के फैसले पर पुनर्विचार करके बोर्ड को 24 घंटे के भीतर जवाब देने के लिये कहा गया।दोनों ने हालांकि बैठक के बाद कहा कि वे इस्तीफा वापिस नहीं लेंगे।

आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में राजस्थान रॉयल्स के तीन क्रिकेटर श्रीसंथ, अजीत चंदीला और अंकित चव्हान की गिरफ्तारी के बाद से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान उठने लगे थे। पहले दिन से आईपीएल कमिश्नर और बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन से इस्तीफे की मांग शुरू हो गई थी। दिल्ली पुलिस की पूछताछ और मुंबई क्राइम ब्रांच की कार्रवाई के बाद इस मामले के तार न सिर्फ बॉलीवुड बल्कि चेन्नई सुपर किंग्स के प्रिंसिपल और श्रीनिवासन के दामाद मयप्पन गुरुनाथ तक पहुंच गए।

गुरुनाथ की गिरफतरी के बाद से ही चौतरफा दबाव में घिरे श्रीनिवासन की विदाई की राह बनने लगी थी हालांकि चेन्नई में हुई बीसीसीआई की आपात बैठक में इस चर्चाओं पर विराम लगा और श्रीनिवासन के अध्यक्ष पद को बरकरार रखते हुए जगमोहन डालमिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया।

बीसीसीआई की एक विज्ञप्ति में कहा गया कि बैठक के बाद श्रीनिवासन ने घोषणा की कि जांच पूरी होने तक वह बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं करेंगे। जब तक जगमोहन डालमिया बोर्ड के रोजमर्रा के कामकाज का संचालन करेंगे।’ इसमें कहा गया कि समिति ने संजय जगदाले और अजय शिर्के पर पूरा विश्वास जताया और उनसे बोर्ड के व्यापक हित में इस्तीफा वापिस लेने का अनुरोध किया है।’

बैठक के बाद श्रीनिवासन ने कहा कि किसी ने उनसे इस्तीफे की मांग नहीं की और उन्होंने खुद अपने दामाद और फ्रेंचाइजी के खिलाफ जांच पूरी होने तक बोर्ड अध्यक्ष के रूप में काम नहीं करने की पेशकश की. उन्होंने कहा कि बैठक में कोई कटुता नहीं थी। दामाद के गिरफ्तार होने के बाद से ही श्रीनिवासन पर इस्तीफा देने के लिये दबाव बनाया जा रहा था. उन्होंने कहा कि खुद को अलग करके उन्होंने सही कदम उठाया है।

पवार के करीबी माने जाने वाले शिर्के ने कार्यसमिति के फैसले पर अप्रसन्नता जताते हुए कहा कि उन्हें समझ में नहीं आता कि यह व्यवस्था कैसे कामयाब होगी।पूर्व कोषाध्यक्ष अजय शिर्के ने  फैसले पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा कि वह इस फैसले से बेहद मायूस हैं। उन्होंने टाइम्स नाउ को बताया कि बैठक में उन्हें और बिंद्रा को छोड़कर एकाध लोग ही ऐसे थे जो श्रीनिवासन के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर पाए। उन्होंने कहा कि मेरे ख्याल से जो बातें तय की गई हैं वे कानून सम्मत नहीं हैं, लेकिन बड़े नेताओं ने यह वैकल्पिक व्यवस्था सुझाई है, इसलिए मैं इस पर कुछ नहीं कहूंगा।शिर्के ने बताया, जगदाले से और मुझसे कहा गया कि हम अपना इस्तीफा वापस लेकर अपना काम-काज फिर से शुरू कर दें। मगर, जगदाले ने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं भी इसे स्वीकार नहीं कर पाऊंगा।

वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास का विश्लेषण.

क्या सरकारी टैबलेट को ग्रहण करना या न करना पत्रकारों का निजी मामला है? देखिए अनिल त्रिपाठी का पत्र…

प्रिय मित्रों. कृपया पूर्व प्रेषित 09 मई एवं 16 मई के ई-मेल का संन्दर्भ ग्रहण करना चाहें। मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सैमसंग टैबलेट वितरण की अन्तिम तिथि 31 मई 2013 समाप्त हो चुकी है। जो जिम्मेदार पत्रकार साथी पूर्व मेें इस तथ्य से ही इंकार कर रहे थे कि ऐसा कोई वितरण चल रहा है और दिनॉक 11 मई 2013 को सचिवालय एनेक्सी के मीडिया सेण्टर में उत्तर प्रदेश राज्यमुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की कार्यकारणी ने तो मेरे ऊपर एक तरह से हमला ही बोल दिया।

मान्यता समिति के सचिव ने तो यहॉ तक कह दिया कि यह नशे में किया गया ई-मेल है। ऐसा कुछ नहीं हो रहा है यदि वितरण हुआ है तो उन लोगो का नाम बताऐं जिन लोगो को टैबलेट दिये गयें हैं। लोग पच्चिस-पच्चिस साल की पत्रकारिता की दुहाई देकर अपने को पाक-साफ बताने लगे। और क्या क्या न कहा बताना श्रेयष्कर नहीं हैं,यदि उस समय मैं चुप न रहता तो स्थिति भयंकर हो सकती थी।

समाजवादी सरकार की पारदर्शी नीति पर पत्रकारों के ये ठेकेदार अंग्रेजो वाली डिवाइड़ एण्ड रूल की नीति का प्रयोग करने में लगे हुए हैं, जो इन ठेकेदारों की सुबह शाम की हुजूरी व इनकी फरमाइशें पूरी करते हैं वे बडे़ पत्रकार हो जाते हैं और जो इन की इस खुशामदीद में सहमती नहीं जताते वे नशे की हालत में कहलाते हैं। मुझे बडे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि समाजवादी सरकार तोकतांत्रिक है वह अपने विरोधी पर भी अलोकतांत्रिक रवैया नहीं अपनाती, परन्तु यह गैर पंजीकृत संस्था अपने कृत्यों से सरकार को अलोकतांत्रिक करार देना चाहती है, जिसके अध्यक्ष और मंत्री पत्रकार हितों की आवाज उठाने वाले पत्रकार को जनरल डायर के तरीके से मसल देना चाहतें हैं इस संस्था की सलाह पर ही कुछ चिन्हित पत्रकारों को ही टैबलेट वितरित किये गये थे। इस वितरण का खुलाशा होने पर टैबलेट प्राप्त करने वाले कुछ पत्रकारों ने यह तथ्य उद्घाटित किये कि इस वितरण को गुप्त रखने की सलाह सूचना निदेशक ने दी है।

मेरे संज्ञान में आया है कि अभी कुछ मान्यता प्राप्त पत्रकारों को टैबलेट प्राप्त नहीं हुए हैं। यदि ऐसे पत्रकार टैबलेट लेने के इच्छुक है तो 03 जून को 12.30 पर प्रेस रूम सचिवालय भवन में आहूत की गई बैठक में उपस्थित हो कर बतायें कि वे टैबेलेट लेने के इच्छुक है अथवा नहीं। सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गये टैबलेट को ग्रहण करना, लेने से इंकार करना अथवा लेने के पश्चात उसे वापस सूचना विभाग को सुपुर्द करना एक व्यक्तिगत मशला है इसलिए इस पर किसी भी प्रकार की बहस उचित प्रतीत नहीं होती। मूल प्रश्न समस्त मान्यताप्राप्त पत्रकारों को एक दृष्टि से देखे जाने का है।

(अनिल त्रिपाठी)
संयोजक
संयोजन समिति
उ0प्र0 राज्य मुख्यालय
मान्यताप्राप्त संवाददाता
अधिकार समिति
aniltripathi.2005@gmail.com
 

महाकुंभ से रजाई, गद्दा, दरी चोरी करने वाले मीडिया संस्थानों की लिस्ट देखें

इलाहाबाद में विश्व स्तरीय महाकुंभ-2013 में मीडिया कवरेज को आए संस्थान और उनके जिम्मेदार जाते-जाते दरी, कंबल, रजाई, गद्दा और चादर चुरा ले गए. महाकुंभ की समाप्ति के पश्चात महाकुंभ मेला प्रशासन ने जब सामानों की गिनती करवाई तो काफी घालमेल मिला.

काबिलेगौर है कि महाकुंभ मेला प्रशासन ने कवरेज के लिए स्थानीय, प्रदेश स्तरीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया हाउसों को प्रयाग क्षेत्र में कैंप मुहैया कराया था, जिसमें तख्त, चारपाई, कुर्सी, मेज, चादर, गद्दा, रजाई, दरी के अन्य सहूलियत की वस्तुएं उपलŽध करवाई थी, लेकिन महाकुंभ की समाप्ति के पश्चात मीडिया कर्मियों ने थोड़ा बहुत सामान वापस कर अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया और कुछ माल चुराकर रफूचक्कर हो गए. मेला प्रशासन ने जो सूची जारी की है उसके मुताबिक इस सूची में मीडिया के कुछ बड़े घराने भी शामिल हैं.

(उपरोक्त सरकारी सूची को बड़े साइज में देखने के लिए सूची के उपर ही क्लिक कर दें)


महाकुंभ -2013 मेला प्रशासन द्वारा जारी की गई सूची नीचे है. नीचे मीडिया हाउसों, अखबारों, संस्थानों के नाम दिए गए हैं फिर वे सामान जो इनने लौटाए नहीं, यानि गायब कर दिया यानि चोरी कर लिया…

एएनआई इलेक्ट्रानिक मीडिया : दो कुर्सी, एक मेज

इंडिया न्यूज इलाहाबाद : दो दरी, एक मग, एक बाल्टी

समय न्यूज चैनल : तीन चादर, दो रजाई, पांच तख्त

पी-7 न्यूज चैनल : दो कंबल, एक तकिया, एक दरी

हिंदुस्तान इलाहाबाद : एक कंबल, एक चादर, एक आलमारी, एक कुर्सी (हाथदार), पांच दरी, दो मग, दो बाल्टी

हिंदुस्तान टाइम्स : छह दरी, दो मग, दो बाल्टी

डीडी न्यूज चैनल : एक सेंट्रल टेबल

हिंदी समाचार पत्र जनमोर्चा : एक चादर

हिंदी दैनिक जनसंदेश : एक कंबल

हिंदी दैनिक पाइनियर इलाहाबाद : चार कंबल

स्वतंत्र भारत : चार कंबल, दो गद्दा, दो तकिया, दो चादर, दस कुर्सी (हाथदार), दो मेज (सनमाइका), एक सेंट्रल टेबल, आठ दरी, दो चारपाई, दो मग, दो बाल्टी और दो तख्त

हिंदी दैनिक प्रभात इलाहाबाद : चार कंबल, एक गद्दा, दो मग, एक बाल्टी

श्री इंडिया समाचार पत्र इलाहाबाद : एक सेंट्रल टेबल

हिंदी दैनिक अमृत कलश टाइम्स इलाहाबाद : एक तकिया

स्थानीय मीडिया/इलेक्ट्रानिक मीडिया : एक कंबल

हिंदी दैनिक न्याय प्रहरी : दो कंबल, एक चादर, दो दरी, एक चारपाई, एक मग, दो बाल्टी

समाचार पत्र न्यायाधीश : एक दरी

ताज हिंद : दो कंबल, तीन दरी

हिंदी दैनिक हाईटेक न्यूज इलाहाबाद : एक तकिया, एक चादर, चार दरी, एक मग, एक बाल्टी

सरकारी लिस्ट की ओरीजनल कापी यहां देखें-  mahakumbh chori


इस चोरी में सिर्फ मीडिया वाले ही लिप्त नहीं थे बल्कि दर्जनों धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं ने भी कुर्सी मेज दरी कंबल आदि की चोरी की है.. इस बारे में विस्तार से खबर लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित अखबार डेली न्यूज एक्टिविस्ट में प्रकाशित हुई है… पढ़ने के लिए क्लिक करें…

महाकुंभ में लघुचोरी की कहानी

भास्कर वालों ने मुझे फंसाया, जेल भिजवाया, अब मैं भास्कर की पोल खोलूंगा…

I am Pradeep Mishra, an editior of RNI registered monthly magazine. I had published three magazine on dated 5/01/2011,5/02/2011 and 5/11/2011. resp.against fake writer of text book mr.purshottam agrawal(the qualification of purshottam agrawal is only upto 4 th class). purshottam agrawal established a company as LBF publication pvt, ltd. And hold the post of chairman.

As status of writer he is publishing text book for nursery to class 8th. there are several factorial mistakes and irrelevant content in text book. inspite of that he tries to sell these books to the different school in rural and semi urban areas of India with the help of b&c grade bollywood hero&heroines, with margin of profit 400% and also gives bribes to principle and school teachers under the guise of quiz prizes organized by LBF publication pvt.ltd. apart from this complete violation of RTE act in his school. I have published and disclosed all this in our above mentioned magazine.

After 19 month i.e on dated 5/9/2012 police thana tukoganj indore registered an FIR against me and 18 other unknown accused u/s384,34 ipc act.on behalf of an application given by fake writer purshottam agrawal on dated 14/2/2011.alleged that I had taken a cheque of Rs 122,500 from his institution chameli devi school of engineering under extortion/blackmailing showing them computerized copy of first magazine i.e magazine which was published on dated 5/01/2011 and also thretend him and his staff that give me 45 lacs extra otherwise I would publish second and third print i.e issue of 5/02/2011and 5/09/2011.otherwise I would kill mr purshottam agrawal, broke his office and set fire etc. he has given name of his driver, receptionist, p.a cum marketing officer and one other employee of his company as witness of the incident.

While the cheque mentioned in the FIR of amount 122,500 of chameli devi school of engineering, complainant purshottam agrawal has no direct connection with chameli devi school of engineering. chameli devi school of engineering governs under maa charitable trust, Manazing trustee of this trust is mr vinod agrawal and his wife neena devi agrwal. Vinod agrawal is a younger brother of complainant purshottam agrawal.

The above mentioned cheque of amount 122500 was issued in favour of m/s Auto info media pvt.ltd (an advertising agency) by Maa charitable trust for advertisement in our magazine after deducting TDS as per income tax act1961 on dated 24/01/2011 and the cheque was duly encashed on dated27/01/2011.

There is no evidence of phone calls, noSMS, no recording of any conversation between complainant and me, neither any independent witness.

Police had not done any investigation. Meanwhile, unfortunately I surrendered in court of CJM indore with all above mentioned facts but surprisingly court send me under judicial custody, on dated 14/09/2012 Then police submitted challan in court on dated 7/10/2012 and enhanced one more sec. 387 of ipc and removed 18 unknown name which was registered in FIR.

Again very shocking news for me was session court denied bail application and told to my lawer go to highcourt. then I got bail from high court after spending 75 days in judicial custody for the allegation which I never did.

all this conspiracy was executed by dainik bhaskar group. i want to tell you the scam of bhaskar group.

criminal complain filed on dated 22/06/2012 against 21 accused in indore before special judge (prevention of corruption act ) rajeev kumar shrivastava including chairmain of dainik bhaskar group shri ramesh chandra agrawal, Dr. bharat agrawal and three other top officers of dainik bhaskar group alleged to grab crores of Rs from unemployed youth of indore & ujjain division (from more than 2000 villagers) under the guise of central & state government scheme incollusion of public servents of m.p state. cheated & grab 100 crores rs from rural unemployed youth of villages of madhyapradesh under the guise of central government sch.

Please help me to get sanction from competent authority (DOPT) against three IAS officers of m.p cadre and three senior general manager of state government of M.P.S.E.D.C (A GOVERNMENT OF M.P UNDERTAKING). who not only ruined the scheme of central government but also cheated &grab nearly100 crores from thousands of unemployed youth of poor state like madhya pradesh in the guise of central government with the collusion of private parties. The scheme was TO benefit for rural people of m.p and unemployed youth of villages and were launched by ministry of communication and information technology new delhi namely "COMMON SERVICE CENTRE SCHEME"

A criminal complained was filed in the court of sp.judge of prevention of corruption act, after examine the complainants,witnesses and evidence. court has passed the order for sanction against the accused public servant

Status as on 24 Apr 2013 Registration Number : DOPAT/E/2013/00077

Name Of Complainant : pradeep mishra

Date of Receipt : 01 Feb 2013

Received by : Department of Personnel and Training

Forwarded to : ADMINISTRATIVE VIGILANCE DIVISON-I

Officer name : Ms. Anshu Sinha

Officer Designation : DEPUTY SECRETARY

Contact Address : NORTH BLOCK

NEW DELHI

110001

Contact Number : 01123092158

Grievance Description : i have been submitted an application to the president of india and secretary of DOPT on dated 14/01/2013 for seeking sanction against the 3 IAS officer viz (a) anurag jain(b)anurag shrivastava and (c) hari ranjan rao of madhya pradesh cadre in the matter of offence u/s sec 467,468,471,420,109,120B read with sec 149 of IPC and u/s 13 (1)(d) read with sec 13(2) of prevention of corruptuion act 1988.(diary no. of the said application is 3994/13/cr) as director by the learned special judge (prevention of corruption act ) indore. shri rajeev kumar shrivastava vide order dated 9/11/2012 please tell me what is the status of my application and when i get sanction awaiting for your reply
Date of Action : 19 Feb 2013

thanks
from
pradeep mishra
indore (m.p)
mob.no. 09303223035

Letter to PM regarding Four Years Under Graduate Programme

: Dated- 1 June 2013 : Honourable Man Mohan Singh Prime Minister of India : Most Respected Sir, We write this letter to draw your kind attention to the four years under graduate programme (FYUP) being introduced by the Delhi University from this academic session. The four year degree programme changes the existing 10+2+3 structure adopted nationally. We have followed the debate over this contentious issue in the media. Several educationists and intellectuals all over the country have expressed their apprehensions about the merit of this decision.

We too believe that such a basic change in the higher education system/policy should first be considered and examined by the MHRD and the Parliament in consultation with prominent educationists of India. The Delhi University does not exist in isolation. If this change is so valuable it should be implemented on national level and there should be a national debate about its merit. Delhi University can wait for a couple of years in the best interest of the students all over India.   

We further request you that the impact on the minorities/SC/ST/OBC and financially weaker sections must be taken into consideration before such a plan is implemented. The financial burden of paying for a year more is a major concern for many families who send their wards to DU. In view of the serious apprehensions voiced by so many educationists, social workers and teachers, we plead to intervene and prevent its implementation immediately.

Thanking you.

Sincerely

Sd./-

Justice Rajindar Sachar

Kuldip Nayar

Bhai Vaidya

Sandeep Pandey

Ravi Kiran Jain

Anil Nauriya


PUCL National Office:
270-A, Ground Floor, Patpar Ganj, Mayur Vihar-I, Delhi-110091
Ph. 011-22750014
Website: www.pucl.org
 

महाकुंभ से कुर्सी, मेज, दरी चुरा ले गए छोटे व बड़े मीडिया संस्थान, नोटिस जारी

ये तो हद है. महाकुंभ में कवरेज करने गए मीडिया वाले सरकारी कुर्सी मेज दरी आदि चुरा कर ले गए. अब इन्हें वापस कराने के लिए प्रशासन को नोटिस जारी करना पड़ा है. चोरी का काम धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं ने भी खूब किया है. इस बारे में एक इंट्रेस्टिंग खबर लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित डेली न्यूज एक्टिविस्ट अखबार में प्रकाशित हुई है.

हालांकि खबर में मीडिया घरानों का नाम नहीं दिया गया है लेकिन सूत्रों का कहना है कि चोरी करने वाले मीडिया घरानों में वे भी हैं जो खुद को बड़ा मीडिया घराना बताते हैं. भड़ास पर जल्द ही इन चोर मीडिया घरानों का नाम पता और चोरी गया सामान प्रकाशित किया जाएगा. फिलहाल तो वो खबर पढ़िए जो डीएनए अखबार में प्रकाशित हुई है. नीचे दी गई कटिंग पर क्लिक कर देंगे तो आप नए विंडो में पढ़ने लायक डिस्प्ले पा लेंगे…

मीडिया से जुड़ी कोई खबर, आपबीती, सूचना, आवाजाही, सम्मान, लेख आदि भड़ास पर प्रकाशित कराना चाहते हैं तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

सुदर्शन न्यूज़ के युवा पत्रकार अभिनव मिश्रा का सड़क दुर्घटना में देहांत

सुदर्शन न्यूज़ के उभरते हुए पत्रकार अभिनव मिश्रा का आज एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। इस दुर्घटना में उनके एक और साथी का भी देहांत हो गया है। 24 वर्षीय अभिनव मिश्रा ने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत दो साल पहले सुदर्शन परिवार के साथ की थी। बेहद शांत स्वभाव वाले अभिनव यूपी में मैनपूरी के रहने वाले थे।

अभिनव अपने एक साथी के साथ किसी काम से नोएडा से गाजियाबाद जा रहे थे। हापुड़-गाजियाबाद हाईवे पर उनकी

अभिनव मिश्रा
अभिनव मिश्रा
बाईक एक ट्रक से टकरा गई, हादसे में तत्काल ही उनकी मौत हो गई।  उन्हें तुरंत हापुड़ के नगर हॉस्पिटल ले जाया गया जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। टीवी पत्रकारिता में माहिर अभिनव मिश्रा सुदर्शन न्यूज़ के वेब सेक्शन (आतंक की राजनीति या राजनीति का आतंक) के लिए भी लगातार लिखते रहते थे।

सबके साथ मिलकर काम करने वाले अभिनव मिश्रा के देहांत से सुदर्शन परिवार बेहद दुखी है।  सुदर्शन परिवार उनकी आत्मा की शांति के लिए कामना करता है और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देता है। सुदर्शन परिवार इस दुख की घड़ी में उनके परिवार के साथ है। (सुदर्शन न्यूज की तरफ से जारी खबर)

बनारस के टीवी पत्रकारों ने लगाया आरोप – बदले की भावना से कार्रवाई कर रहे हैं एसएसपी

वाराणसी। विगत दिनों वाराणसी के महाश्मशान घाट मर्णकर्णिका घाट पर 'लाशों पर लगता है सट्टा' की खबर प्रकाशित और प्रसारित होने के बाद वाराणसी पुलिस द्वारा पत्रकारों पर किये गए मुकदमे को लेकर वाराणसी के मीडिया कर्मियों में काफी रोष है। एक आपात बैठक बुलाते हुए एक स्वर से विरोध प्रकट करते हुए कहा कि यह एसएसपी अजय मिश्र के मानसिक रोगी होने का परिचय है तथा अपराध न रोके पाने के कारण बदले की भावना से कार्यवाही कर रहे हैं।

इलेक्ट्रानिक मीडिया कर्मियों की आपात बैठक सिगरा स्थित शहीद उद्यान में आहूत की गयी है, जिसमें सभी इलेक्ट्रानिक मीडिया कर्मियों ने एसएसपी अजय मिश्र के द्वारा खबर दिखाए जाने के बाद की गयी पुलिसिया कार्यवाही को चौथे स्तम्भ पर हमला बताया। बैठक में यह निर्णय लिया गया कि आसिफ और काशीनाथ शुक्ल को पूरी क़ानूनी मदद की जायेगी। बैठक में बोलते हुए सहारा समय के ब्यूरो इंचार्ज निमेश राय ने कहा कि एसएसपी अपराध रोकने में पूरी तरह से असफल हैं और जब मीडिया सच सामने ला रहा है तो बदले की भावना से कार्यवाही करते हुए एसएसपी अजय मिश्र पत्रकार और उनके परिवार का उत्पीड़न कर रहे हैं। इसका मुंह तोड़ जबाव मीडिया दे रही है।

जी न्यूज़ के ब्यूरो इंचार्ज अमित सिंह ने कहा की बेलगाम हो चुके एसएसपी को चौथे स्तम्भ हमला करने का कोई हक़ नहीं है, एसएसपी अपने पद का दुरुपयोग करते हुए पत्रकारों के खिलाफ कार्यवाही कर रहे हैं। ई टीवी के ब्यूरो प्रभारी शरद दीक्षित ने कहा की पुलिस चाहे जितना पत्रकारों का उत्पीड़न कर लें, लेकिन हम झुकने वाले नहीं हैं। समाज के सामने सच लाने का काम जारी रखेंगे और एसएसपी अजय मिश्र को इसका मुंहतोड़ जबाव दिया जायेगा।

बैठक को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और एएनआई के संवाददाता गिरीश दुबे ने कहा कि जिस प्रकार एसएसपी ने बदले की कार्रवाई की है उससे लगता है कि प्रदेश में लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है। न्यूज़ स्ट्रीट के राम सुंदर मिश्र और एबीपी न्यूज़ से संतोष चौरसिया, इंडिया टीवी से शैलेश चौरसिया, ईटीवी से दिनेश मिश्र, देवेश श्रीवास्तव, अमित मुखर्जी, ओंकार शर्मा, विकास गौड़ आजतक से नवीण पाण्डेय आदि वक्ताओं ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि एसएसपी अजय मिश्र चाहे जितना उत्पीड़नात्मक कार्यवाही करें, लेकिन हम सब सच लाने का काम जारी रखेंगे। साथ ही एसएसपी के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस महानिदेशक, मुख्यमंत्री से मिलकर पूरी घटना से अवगत करते हुए किसी अन्य न्यायिक जाँच की मांग करेंगे।

पत्रकार राम सुंदर राजू के एफबी वॉल से साभार.

गाजीपुर के ऐतिहासिक स्‍थलों का पता बदलने में जुटा है ‘हिंदुस्‍तान’

समाचार पत्रों में काम करने वालों का जनरल नालेज कम होता जा रहा है। कारण की इस पेशे में अब जानकारों की नहीं चाटूकारों की मांग बढ़ी है। जाहिर है कि कम पैसे में जानकार तो नहीं चाटूकार जरूर मिल जाएंगे। ऐसा ही एक कारनामा गाजीपुर में दैनिक हिंदुस्‍तान ने किया है। हिन्दुस्तान ने तो सारी हदें पार करते हुए जनपद के ऐतिहासिक स्थलों का पता बदलने में जुटा हुआ है। जिन स्थलों के नाम से लोग वहां के क्षेत्रों को परिभाषित करते हैं, जिनका स्थान सैकड़ों सालों से नहीं बदला जा सका है और नहीं बदला जा सकता है।

उन ऐतिहासिक स्थलों का नया पता हिन्दुस्तान दैनिक ने 01 जून 2013 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित किया है जो कि लोगों को मात्र गुमराह करने का काम कर रहा है। पाठकों को बरगलाने में माहिर हिन्दुस्तान दैनिक के एक जून के अंक में पेज नं0- 5 पर हेडर लाइन में छपा है कि ‘‘पहाड़ खान का पोखरा रौजा के पास स्थित है’’ जबकि यह ऐतहासिक पोखरा शहर के विशेश्वरगंज सकलेनाबाद क्षेत्र में स्थित है। वही ठीक इस पेज के बगल के पेज नं0- 4 पर छपा है ‘‘वेद बिहारी का पोखरा मोहम्मदाबाद में स्थित है’’ जबकि सैकड़ों सालों से यह स्थल जिले के कासिमाबाद क्षेत्र में स्थित है। इस प्रकार देखा जाय तो हिन्दुस्तान दैनिक के लोग शायद जिले का नक्शा बदलने में लगे है। जिले में तीसरे पायदान पर लगातार बने रहने का प्रमुख कारण ऐसी ही मिथ्या और अप्रमाणिक खबरों का प्रकाशन तो नहीं।

देखें दैनिक जागरण के फर्जीवाड़े के अभियुक्‍तों की लिस्‍ट, महेंद्र मोहन, संजय गुप्‍ता समेत कई और शामिल

दैनिक जागरण के मालिक-निदेशक-संपादक एवं प्रकाशक सहित 17 लोगों के खिलाफ मुजफ्फरपुर के प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी दीवांशु श्रीवास्तव ने परिवाद-पत्र संख्या-2638/2012 में 30 मई, 2013 को सम्‍मन जारी किया है. इन अभियुक्‍तों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420, 471 और 476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8 (बी),14 और 15 के तहत ‘प्रथम दृष्टया आरोप‘ सही पाया गया है.

न्यायालय ने नामजद सभी 17 अभियुक्तों को निबंधित डाक से ‘सम्मन‘ जारी करने का आदेश कार्यालय लिपिक को दिया है. सम्‍मन मिलने के बाद सभी सत्रह अभियुक्‍तों को कोर्ट में पेश होने का आदेश है. आप भी देखिए कोर्ट द्वारा जारी अभियुक्‍तों की लिस्‍ट…

मुजफ्फरपुर से ही नहीं, यूपी में भी कई जगहों से अवैध प्रकाशन कर रहा है दैनिक जागरण

हिंदुस्‍तान के फर्जीवाड़ा और विज्ञापन घोटाले का श्रीकृष्‍ण प्रसाद ने पोल क्‍या खोला, अब सभी बड़े अखबारों के फर्जीवाड़े और जालसाजी सामने आने लगी है. हिंदुस्‍तान के बाद अब खुद को नम्‍बर एक कहने वाले जागरण की भी पोल खुल गई है. इसके 17 संपादकों और निदेशकों के खिलाफ चार सौ बीसी समेत कई मामलों में मुकदमा दर्ज हुआ है. मुजफ्फरपुर में तो कोर्ट ने खुद अपनी जांच के बाद जागरण के निदेशकों तथा संपादकों को कोर्ट में पेश होने का सम्‍मन भेजा है. 

हालांकि अभी तो केवल मुजफ्फरपुर में मामला दर्ज हुआ है लेकिन बताया जा रहा है कि जागरण का यह फर्जीवाड़ा उसके लगभग सभी यूनिटों में चल रहा है. मुजफ्फरपुर में जागरण ने खुद अपने कारस्‍तानी से ही साबित कर दिया था कि वो फर्जीवाड़ा कर रहा है. रमण कुमार यादव ने जब जागरण की पोल आरटीआई के जरिए खोलनी शुरू की तो डरे जागरण ने फटाफट अपना आरएनई नम्‍बर आवेदित कर दिया. अब उसे नया आएनआई नम्‍बर भी मिल गया है.

पहले दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर के प्रिंट लाइन में रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर BIHHIN/2000/3097 प्रकाशित किया जाता था तथा ईमेल में patna@pat.jagran.com का प्रकाशन किया जाता था. इसके अलावा पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर तथा सिलीगुडी से प्रकाशित और पटना से मुद्रित लिख कर प्रकाशन किया जाता था. लेकिन जब रमण कुमार ने जागरण की पोल खोलनी शुरू की तो 29 जून 2012 से इसका प्रिंट लाइन चेंज हो गया. आरएनआई की जगह आवेदित, memo no- 101 dated 23/6/2012 लिखा जाने लगा. साथ ही इसका ईमेल आईडी भी बदल कर muzaffrarpur@mzf.jagran.com कर दिया गया. बाद में आरएनआई ने दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर के लिए नम्‍बर BIHHIN/2012/47184 आबंटित किया. अब इसी का प्रकाशन अखबार में किया जा रहा है.

यानी इस तथ्‍य से साफ जाहिर है कि दैनिक जागरण एक ही आरएनआई पर कई जगहों से अलग अलग एडिशन प्रकाशित करके फर्जी तरीके से सरकारी तथा गैर सरकारी विज्ञापन वसूल रहा था. साफ है कि हिंदुस्‍तान की तरह जागरण ने भी गलत तरीके से अखबार का अवैध केंद्रों से प्रकाशन कर करोड़ों रुपये के सरकार विज्ञापन की हेराफेरी की है. अब कोर्ट में सुनवाई के बाद साफ हो गया है कि जागरण के निदेशक और संपादक चार सौ बीसी के जरिए पैसा बना रहे थे.

हल्‍द्वानी में भी जागरण अखबार का अवैध प्रकाशन कर रहा है. यहां भी आरटीआई के जरिए खुलासा हुआ. अयोध्‍या प्रसाद भारती ने आरटीआई डालकर दैनिक जागरण के फर्जीवाड़े का खुलासा किया था. यहां भी देहरादून के नम्‍बर पर हल्‍द्वानी से अखबार प्रकाशित किया जा रहा था. यूपी में भी इस अखबार के छह यूनिटों को छोड़कर बाकी सारे एडिशन किसी ना किसी तरीके से फर्जी हैं. यह बात आरटीआई के जरिए सामने आ चुकी है. आरटीआई की सूचना से पता चला था कि दैनिक जागरण के बनारस, इलाहाबाद, मुरादा‍बाद, आगरा, अलीगढ़, नोएडा एडिशनों का प्रकाशन गलत नामों पर हो रहा है. क्‍योंकि आरएनआई की जानकारी में जागरण पब्लिकेशन के अंतर्गत इन एडिशनों का नाम नहीं है.

जागरण के आधा दर्जन एडिशन सही रजिस्‍ट्रेशन पर प्रकाशित हो रहे हैं तो आधा दर्जन एडिशनों को सरकार तथा आरएनआई के आंखों में धूल झोंककर प्रकाशित किया जा रहा है. सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा बनारस यूनिट में दिख रहा है क्‍योंकि यह अखबार इस नाम से रजिस्‍टर्ड न होते हुए भी बनारस तथा इलाहाबाद से दैनिक जागरण के नाम से प्रकाशित हो रहा है. इस तरह से यह अखबार पिछले कई दशकों में इन आधा दर्जन यूनिटों से अरबों का सरकारी तथा पब्लिक विज्ञापन का राजस्‍व वसूल चुका होगा. यानी अगर इसकी जांच की जाए तो शायद देश का सबसे बड़ा घोटाला सामने आएगा. इस बारे में बताया जा रहा है कि बनारस में दैनिक जागरण अवैध तरीके से नौ जिलों में अपने ए‍डिशनों का प्रकाशन कर रहा है. इसके अलावा इलाहाबाद में भी कई जिलों में अवैध प्रकाशन किया जा रहा है. बिना रजिस्‍ट्रेशन के इन सभी जिलों में अखबार के नए संस्‍करण रोज प्रकाशित किए जा रहे हैं.

फर्जी एडिशनों के जरिए यह अखबार करोड़ों का सरकारी विज्ञापन उगाह चुका है. जानकारियों में अब इस अखबार तथा इसके प्रबंधन की कलई लगातार खुलती जा रही है. जिस तरह से इस अखबार के फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है, उससे साफ लगता है कि देर सबेर इसके कर्ताधर्ताओं को जेल जाना ही पड़ेगा. धीरे धीरे खुलासा हो रहा है कि इस अखबार ने किस तरह से सबको धोखा देकर माल बटोरा है. देश का यह नम्‍बर वन अखबार यूपी में मात्र छह जगहों से रजिस्‍टर्ड है. रमन कुमार यादव द्वारा आरएनआई से मांगी गई सूचना अधिकार से इस बात का खुलासा हुआ है. सूचना में जानकारी दी गई है कि उत्‍तर प्रदेश में यह अखबार मात्र छह जगहों से प्रकाशित हो रहा है. जिन जगहों से इस अखबार का रजिस्‍ट्रेशन कराया गया है उसमें कानपुर, मेरठ, बरेली, लखनऊ, गोरखपुर और झांसी शामिल हैं. इसमें भी दिलचस्‍प बात यह है कि पांच जगहों के संपादक तो संजय गुप्‍ता हैं, लेकिन झांसी वाले एडिशन के संपादक यशवर्द्धन गुप्‍ता हैं.

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार इन छह जगहों के अलावा दैनिक जागरण के नाम से इस अखबार का कहीं भी रजिस्‍ट्रेशन नहीं है. इससे साफ है कि अन्‍य जिलों एवं जिन स्‍थानों से यह अखबार प्रकाशित हो रहा है वो पूर्ण रूप से फर्जी है. ऐसे ही फर्जी प्रकाशन के चलते बिहार में इस अखबार के प्रबंधन के खिलाफ मुजफ्फरपुर में कोर्ट में मामला दर्ज हो चुका है. बताया जा रहा है अगर इस मामले में सरकारी मशीनरी तथा अन्‍य जिम्‍मेदार संस्‍थाओं ने ईमानदारी से अपना काम किया तो एक बहुत बड़े घोटाले पर से तो पर्दा उठेगा ही, दैनिक जागरण के तमाम कर्ताधार्ता भी आईपीसी की कई धाराओं में जेल की सलाखों के पीछे होंगे.


इस बारे में और जानकारी के लिए निम्‍न लिंकों पर क्लिक करें –

बड़ा घोटाला : केवल छह जगहों से रजिस्‍टर्ड दैनिक जागरण पूरे यूपी में कर रहा है प्रकाशन

बनारस, इलाहाबाद, आगरा, मुरादाबाद, अलीगढ़ में अवैध प्रकाशन कर रहा है दैनिक जागरण!

बिना रजिस्‍ट्रेशन के हल्‍द्वानी से अखबार निकाल रहा था दैनिक जागरण

हिंदुस्‍तान के बाद जागरण का भी फर्जीवाड़ा सामने आया, रजिस्‍ट्रेशन के लिए आवेदन

दैनिक भास्‍कर, जयपुर में उठापटक, त्रिभुवन दरकिनार, गिरीराज को मिलेगा प्रमोशन!

दैनिक भास्कर, जयपुर में अंदरुनी राजनीति के चलते माहौल गर्मा रहा है। ब्यूरो चीफ त्रिभुवन शर्मा को दरकिनार कर उनके अधीनस्थ विशेष संवाददाता गिरीराज अग्रवाल को पंजाब-हरियाणा का राजनीतिक संपादक बनाया जाना लगभग तय हो चुका है। इस घटनाक्रम के चलते त्रिभुवन और गिरीराज की आपसी खींचतान खुले में आने लगी है।

त्रिभुवन भले ही गिरीराज के ब्यूरो चीफ हैं परंतु नेशनल एडीटर नवनीत गुर्जर से उनके संबंध कभी बहुत अच्छे नहीं रहे। नवनीत गुर्जर जयपुर स्टेट एडीटर थे तब भी यह बात सबको पता थी। इसके विपरीत गिरीराज नवनीत के काफी निकट माने जाते हैं। वरिष्ठता और अनुभव के कारण गिरीराज राजनीतिक बीट भी देखते रहे हैं। करीब तीन महीने पहले त्रिभुवन ने गिरीराज से भाजपा बीट छीनकर राजस्थान पत्रिका से भास्कर आए श्रवण राठौड़ को दे दी। विधानसभा चुनाव वर्ष के राजनीतिक उठापटक वाले दौर में हुआ यह बदलाव काफी सवाल खड़े कर गया।

उन्हीं दिनों जयपुर में पत्रकारों को भूखंड आवंटित होने की कवायद जारी थी। त्रिभुवन को भूखंड आवंटन समिति का सदस्य बनाया गया। भूखंड भी आवंटित होने ही वाला था कि गिरीराज ने इसकी शिकायत कर दी। बताया गया कि त्रिभुवन के पास पहले से ही पत्रकार कोटे में भूखंड है। इस शिकायत का परिणाम यह रहा कि त्रिभुवन को समिति से हटा दिया गया।

इधर गिरीराज को पंजाब हरियाणा का राजनीतिक संपादक बनाने की खबरें आने लगीं। अपने अधीनस्थ को पदोन्नति दिए जाने से त्रिभुवन का नाराज होना स्वाभाविक है। त्रिभुवन के पास ब्यूरो चीफ के नाते सभी विभागों और राजनीतिक बीट की भी जिम्मेदारी है, वहीं गिरीराज के पास वर्तमान में राजनीतिक बीट नहीं होने के बावजूद उन्हें दो राज्यों के राजनीतिक संपादक का पद दिए जाने से सभी को आश्चर्य होना स्वाभाविक है। गिरीराज के राज्य से बाहर चले जाने से राजस्थान पत्रकार परिषद के कामकाज पर भी असर पड़ने की संभावना है। गिरीराज इसके मुख्य स्तंभों में से एक माने जाते हैं। भास्कर की इस उठापटक पर निगाह गढ़ाए बैठे प्रतिद्वन्द्वी अखबार के दो पत्रकार अपना पाला बदल कर गिरीराज की जगह लेने का जुगाड़ बैठाने में जुट गए हैं।

गिरीराज इन दिनों जयपुर में नहीं है। बताया जाता है कि प्रबंधन के इशारे पर पंजाब-हरियाणा के दौरे पर हैं और अपने नए काम की तैयारी में जुटे हैं। यह और बात है कि जब उन्हें कोई फोन करता है तो वे एलएलबी की परीक्षा की तैयारियों में जुटे होने की बात कह रहे हैं।   

राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. 

चार सौ बीस निकले दैनिक जागरण निदेशक एवं संपादक, अखबार के 17 जालसाजों को कोर्ट का सम्‍मन

मुजफ्फरपुर। प्रथम श्रेणी के विद्वान न्यायिक दंडाधिकारी दीवांशु श्रीवास्तव ने परिवाद-पत्र संख्या-2638/2012 में 30 मई, 2013 को ऐतिहासिक फैसला दिया और दैनिक जागरण अखबार प्रकाशित करने वाली कंपनी मेसर्स जागरण प्रकाशन लिमिटेड, सर्वोदय नगर, कानपुर-208005, के 17 निदेशकों और संपादकों के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420, 471 और 476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8 (बी),14 और 15 के तहत ‘प्रथम दृष्टया आरोप‘ सही पाया। न्यायालय ने सभी 17 नामजद अभियुक्तों को ‘सम्मन‘ जारी करते हुए न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश पारित किया। न्यायालय ने नामजद सभी 17 अभियुक्तों को  निबंधित डाक से ‘सम्मन‘ जारी करने का आदेश कार्यालय लिपिक को दिया।

मुंगेर के दैनिक हिन्दुस्तान के 200 करोड़ के सरकरी विज्ञापन फर्जीवाड़ा के बाद विश्व का यह दूसरा सनसनीखेज सरकारी विज्ञापन घोटाला है, जिसमें दैनिक जागरण अखबार के निदेशकों और संपादकों ने करोड़ों रुपए का सरकारी विज्ञापन प्राप्त करने के लिए प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 और भारतीय दंड संहिता के कानूनों को ठेंगा दिखाया और दस्तावेजों में सनसनीखेज जालसाजी की। अभियुक्तों ने मुजफ्फरपुर से बिना निबंधन का दैनिक जागरण का मुजफ्फरपुर संस्करण लगभग सात वर्षों तक प्रकाशित किया और केन्द्र और राज्य सरकारों के समक्ष मुजफ्फपुर संस्करण को निबंधित अखबार के रूप में सरकार के समक्ष प्रस्तुत कर करोड़ों-करोड़ रुपए का सरकारी विज्ञापन प्राप्त कर सरकारी राजस्व की लूट मचाई।

कौन-कौन अभियुक्त बने?

न्यायालय ने मेसर्स जागरण प्रकाशन लिमिटेड (कानपुर) के निदेशक मंडल, संपादकीय बोर्ड और प्रबंधन के जिन अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता की धाराएं  420, 471, 476 और प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं  8 (बी), 14 और 15 के तहत अभियुक्त बनाया हैं, उनमें शामिल हैं:- (1) महेन्द्र मोहन गुप्ता (चेयरमैन सह प्रबंध निदेशक और प्रबंध संपादक, दैनिक जागरण),  (2) संजय गुप्ता (सीईओ सह संपादक, दैनिक जागरण),  (3) धीरेन्द्र मोहन गुप्ता (पूर्णकालीक निदेशक), (4) सुनील गुप्ता (पूर्णकालीक निदेशक सह स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण),  (5) शैलेश गुप्ता (पूर्णकालीक निदेशक), (6) भारतजी अग्रवाल (स्वतंत्र निदेशक), (7) किशोर वियानी (स्वतंत्र निदेशक), (8) नरेश मोहन (स्वतंत्र निदेशक), (9)  आरके झुनझुनवाला (स्वतंत्र निदेशक), (10) रशिद मिर्जा (स्वतंत्र निदेशक),  (11) शशिधर नारायण सिन्हा (स्वतंत्र निदेशक),  (12) विजय टंडन (स्वतंत्र निदेशक), (13) विक्रम बख्शी (स्वतंत्र निदेशक), (14) अमित जयसवाल (कंपनी सचिव), (15) आनन्द त्रिपाठी (महाप्रबंधक और मुद्रक, दैनिक जागरण), (16) देवेन्द्र राय (स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर) और (17) शैलेन्द्र दीक्षित (स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, पटना)।

दो धाराएं गैरजमानतीय : 7 साल की सजा का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 420 – जालसाजी और धोखाधड़ी से किसी व्यक्ति को किसी चीज देने के लिए मजबूर करना। गैर-जमानतीय है। भारतीय दंड संहिता की धारा 476। जालसाजी से किसी दस्तावेज को ‘प्रामाणिक दस्तावेज‘ का रूप देना। भी ‘गैर-जमानतीय‘ है। दोनों धाराओं में सात साल तक की सजा और जुर्माना का भी प्रावधान है। भारतीय दंड संहिता की धारा 471। जालसाजी और धोखाधड़ी के द्वारा जाली दस्तावेज को सही और वास्तविक दस्तावेज घोषित कर उपयोग करना। ‘जमानतीय‘  है।

आग का दरिया और मौत की नाव : शुरू हो गई जान से मारने की धमकी

न्यायालय के आदेश के बाद से दैनिक जागरण सरकारी विज्ञापन घोटाला के परिवादी रमण कुमार यादव (मुजफ्फरपुर), जांच साक्षी नं. – (01) कंचन शर्मा, मुंगेर, जांच – साक्षी नं. – (02) बिपिन कुमार मंडल और जांच -साक्षी नं. – (03) श्रीकृष्ण प्रसाद को अभियुक्तों के लोगों के द्वारा सपरिवार जान से मारने की लगातार धमकियां मिलनी शुरू हो गई हैं।

अभियुक्तों ने विज्ञापन मद में करोड़ों का चूना लगाया केन्द्र और राज्य सरकारों को

परिवादी और जांच -साक्षी का कहना है कि –‘‘सरकारी विज्ञापन पाने के लिए दैनिक जागरण के निदेशकों और संपादकों ने बिना निबंधन का मुजफ्फरपुर संस्करण लगभग सात वर्षों तक प्रकाशित किया और दैनिक जागरण को निबंधित अखबार केन्द्र और राज्य सरकारों की संचिकाओं में घोषित कर केन्द्र और राज्य सरकारों को सरकारी विज्ञापन प्रकाशन मद में करोड़ों रुपए के राजस्व को डंका की चोट  पर चूना लगाया।

परिवादी और जांच -साक्षी का कहना है कि —‘‘‘ दैनिक जागरण के फर्जी संस्करण और करोड़ों रुपए के सरकारी विज्ञापन घोटाला को उजागर करने का दुस्साहसिक कार्य ‘आग के दरिया में मौत की नाव में यात्रा करने‘ के बराबर है।‘‘

बहस मुंगेर के चर्चित अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने की : दैनिक जागरण के करोड़ों के सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा के मुकदमे में प्लाट का निर्माण और मुजफ्फरपुर न्यायालय में संज्ञान के बिन्दु पर अब तक की सभी बहस बिहार के मुंगेर जिले के चर्चित और वरीय अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने की थी। न्यायालय में बहस में अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867  के घोर उल्लंघन और  कानून के घोर उल्लंघन के दस्तावेजी साक्ष्यों को सिलसिलेवार ढंग से न्यायालय के समक्ष ‘अंग्रेजी‘ में प्रस्तुत किया था। जब अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद न्यायालय में

काशी प्रसाद
अंग्रेजी में विश्व के चर्चित दैनिक जागरण विज्ञापन घोटाला के मुकदमे में संज्ञान के बिन्दु पर बहस कर रहे थे, न्यायालय में उपस्थित अन्य विद्वान अधिवक्तागण गंभीरता और कौतूहलपूर्वक बहस की सूक्ष्मता पर केन्द्रित होकर गंभीरतापूर्वक मनन करते देखे गए। देश के चर्चित अखबार दैनिक जागरण के निदेशकों और संपादकों के करोड़ों-करोड़ के आर्थिक भ्रष्टाचार का सनसनीखेज और अनूठा मामला जो न्यायालय में था।

मुजफ्फरपुर से वरिष्‍ठ पत्रकार काशी प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मो. नम्‍बर 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.

मुंबई प्रेस क्लब का रेड इंक अवार्ड ब्रजेश राजपूत को

भोपाल। मुंबई प्रेस क्लब ने भोपाल में एबीपी न्यूज के विशेष संवाददाता ब्रजेश राजपूत को रेड इंक अवार्ड से सम्मानित किया है। मुंबई के एनसीपीए सभागार में हुये समारोह में महाराष्‍ट्र के राज्यपाल के शंकर नारायणन और सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने ये सम्मान दिया।

मुंबई प्रेस क्लब पत्रकारिता के क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले पत्रकारों का जूरी द्वारा चयन कर रेड इंक अवार्ड देता है। टीवी कटेगरी में ये अवार्ड पहली बार ब्रजेश राजपूत को मुरैना में चंबल किनारे होने वाली अवैध रेत उत्खनन की स्टोरी के लिये दिया गया। इसमें प्रशस्ति पत्र के साथ पच्चीस हजार रुपये दिये जाते है।

मुंबई प्रेस क्लब ने इस साल पत्रकारिता की सात विधाओं में देश भर के चौदह पत्रकारों को सम्मानित किया। जिसमें से द हिदू के संपादक एन राम और वरिप्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर को भी लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया। स्टार इंडिया के उदय शंकर को भी मुंबई प्रेस क्लब ने सत्यमेव जयते के लिये सम्मानित किया। पत्रकारिता में बीस साल से सक्रिय ब्रजेश को टीवी पत्रकारिता के लिये दिल्ली का मीडिया एक्सीलेंस अवा्रर्ड और भोपाल के माधवराव सप्रे संग्रहालय के झाबरमल्ल शर्मा सम्मान भी मिल चुका है।

‘जस्टिस काटजू आजकल चुप क्यों हैं?’

Sutanu Guru : Why is Justice Katju silent? Sources say he is wondering whose pardon he must demand. Choices are: Vindoo Dara Singh whose father restored India,s pride by defeating firang wrestlers; Maoists who are misguided freedom loving people or Sheila Dixit indicted by Lokayukta for misusing tax payer money because her family fought once for India's freedom. Any more pardon suggestions?

पत्रकार सुतानू गुरु के फेसबुक वॉल से.

निवेशक एनबीएफसी में पैसा जमा कराने से पहले रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर देखें वह पंजीबद्ध है या नहीं

: रिजर्व बैंक ने निवेशकों को दी सलाह- फर्मों में पैसा जमा करते समय सतर्कता बरतें आम निवेशक : मुंबई : फर्जी निवेश योजनाओं के अनेक मामले सामने आने के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को निवेशकों से कहा कि वे गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) सहित अन्य वित्तीय फर्मों में पैसा जमा कराने से पहले अपने फैसले पर सतर्कता से सोच विचार करें। केंद्रीय बैंक ने निवेशकों के लिए इस बारे में परामर्श सारदा घोटाले जैसी उन कई घटनाओं के सामने आने के बीच जारी किया है जिनमें हजारों निवेशकों को चूना लगाया गया है।

रिजर्व बैंक ने निवेशकों को बताया है कि किसी वित्तीय फर्म द्वारा गैर कानूनी रूप से पैसे जमा कराने या जमाओं का भुगतान नहीं किए जाने की शिकायत वे कहां कर सकते हैं। बैंक ने कहा है कि निवेशक किसी भी एनबीएफसी में पैसा जमा कराने से पहले उसकी वेबसाइट पर यह देख सकते हैं कि वह उसके यहां पंजीबद्ध है या नहीं।

इसके अलावा वे बाजार से 'अनाप शनाप' अधिक ब्याज दर या निवेश पर रिटर्न की पेशकश के प्रति भी सचेत रहें। फिलहाल एनबीएफसी किसी जमाकर्ता को 12.5 प्रतिशत से अधिक ब्याज दर की पेशकश नहीं कर सकती। हालांकि रिजर्व बैंक इस सीमा में बदलाव करता रहता है। केंद्रीय बैंक ने अपने परामर्श में जमाकर्ताओं से अपनी हर जमा की सही रसीद लेने जैसी बुनियादी जानकारियां भी दी हैं। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि वह चिटफंड गतिविधियों या सामूहिक निवेश योजनाओं (सीआईएस) का नियमन नहीं करता है। (भाषा)

स्‍पॉट फिक्सिंग : राजीव शुक्‍ला को देना पड़ा इस्‍तीफा

नई दिल्ली : आईपीएल अध्यक्ष राजीव शुक्ला ने शनिवार को स्पॉट फिक्सिंग प्रकरण से उपजे तूफान के बीच पद से इस्तीफा दे दिया। इससे बोर्ड अध्यक्ष एन श्रीनिवासन पर इस्तीफे के लिये दबाव बढ़ गया है। चेन्नई में बोर्ड की कार्यसमिति की आपात बैठक से एक दिन पहले शुक्ला ने पद छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि हालिया घटनाक्रम के मद्देनजर यह जरूरी हो गया था।

उन्होंने कहा,‘मैंने आईपीएल अध्यक्ष पद छोड़ने का फैसला किया है। मैं कुछ समय से इस पर विचार कर रहा था। मुझे लगता है कि अब इस्तीफा देने का समय आ गया है।’ उन्होंने कहा कि उन्होंने बीसीसीआई सचिव संजय जगदाले और कोषाध्यक्ष अजय शिर्के के इस्तीफे को भी ध्यान में रखा।

शुक्ला ने कहा, ‘संजय जगदाले और अजय शिर्के ने भारतीय क्रिकेट के हित में पद छोड़ा। मुझे लगता है कि यह सही समय था।’ उन्होंने कहा,‘मुझे आईपीएल का अध्यक्ष पद दिया गया था और मैने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश की। विवादों के बावजूद टूर्नामेंट का आयोजन अच्छा हुआ। स्टेडियम खचाखच भरे थे जिससे साबित होता है कि आईपीएल अभी भी लोकप्रिय है।’ उन्होंने कहा कि वह कभी किसी पद के पीछे नहीं भागे और सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर रहे थे। (एजेंसी)

तो क्या राजीव शुक्ला आंख में धूल झोंकने में फिर कामयाब हो जाएंगे?

तो क्या राजीव शुक्ला अपने को फिर मैनेज कर ले जाएंगे? आंख में धूल झोंकने में फिर कामयाब हो जाएंगे? जैसी कि उन की किस्मत और आदत में शुमार है। कहना बहुत मुश्किल है। हालां कि राजनीतिक पंडित अनुमानबाज़ी कर रहे हैं कि बी.सी.सी.आई के चेयरमैन श्रीनिवासन का सिंहासन हिलने के बाद अपने राजीव शुक्ला का मंत्री पद भी स्वाहा हो जाएगा। आई. पी. एल. कमिश्नर वह  नहीं रहेंगे ऐसा ऐलान करते-करते वह अब इस्तीफ़ा भी दे ही चुके हैं। तो क्या वह सचमुच आंख में धूल झोंक रहे हैं यह इस्तीफ़ा दे कर? 

जो भी हो राजीव शुक्ला के चेहरे पर तनाव की इबारत साफ पढ़ी जा सकती है। इस लिए भी कि दलाली में अमर सिंह के कभी कान काटने वाले राजीव शुक्ला अब एक साथ कई मामलों में फंसने जा रहे हैं। पवन बंसल, सुरेश कलमाड़ी वगैरह पर तो सिर्फ़ भ्रष्टाचार आदि ही के बादल हैं पर राजीव शुक्ला पर तो यह और ऐसे तमाम मामलों को ले कर समूचा मानसून ही न्यौछावर होने जा रहा है।

खबर है कि राजीव शुक्ला पर न सिर्फ़ मैच फ़िक्सिंग की तेज़ बौछारें पड़ेंगी बल्कि दलाली से कमाई गई संपत्तियों की भी छानबीन होगी। आखिर वह ऐसा कौन सा उद्योग चलाते हैं जो अरबों की संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं? यह सवाल भी सुलग चुका है। राजनीति और खेल का घालमेल न करने संबंधी मनमोहन सिंह के बयान की रोशनी में राजीव शुक्ला की कारगुज़ारियों को भी पढ़ने वाले पढ़ रहे हैं। हालां कि शरद पवार के पंख भी इस बयान की आंच में झुलसे हैं।

जैसे श्रीनिवासन लाख बेशर्मी और हेकड़ी दिखाएं, उन की बेहयाई का सीमेंट अब काम आने वाला है नहीं। ठीक वैसे ही राजीव शुक्ला का भी सारा मैनेजमेंट अब मैनेज होने से पानी मांग गया है। सोनिया गांधी और राहुल उन से पहले ही से हिट लिस्ट में डाले हुए हैं प्रियंका और शाहरुख फ़ैक्टर भी अब उन के गले की फांस बन चला है। गौरतलब है कि कभी अमिताभ बच्चन के पांव दबाने वाले राजीव शुक्ला जब राजीव गांधी की हत्या हुई थी तब अमिताभ की मिज़ाज़पुर्सी में सोनिया को इटली उड़ाने की कयास भरी खबरें अखबारों में प्लांट कर रहे थे। क्यों कि अमिताभ बच्चन के संबंध तब के समय तक सोनिया से बेहद खराब हो चले थे। बाद में तो वह खुद को रंक और सोनिया को राजा कह कर वार करने लग गए थे।

दरअसल दोनों का ईगो राजीव गांधी के जीते जी ही क्लैश कर गया था। तब जब कि एक समय वह भी था कि जब राजीव -सोनिया के प्यार को ले कर इंदिरा गांधी भी विरोध में थीं। लेकिन अमिताभ ने तब बाल सखा होने की बिना पर राजीव-सोनिया का न सिर्फ़ साथ दिया बल्कि जब सोनिया को ले कर राजीव भारत आए तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उन्हें रिसीव करने सुबह-सुबह अकेले अमिताभ बच्चन ही मौजूद थे। न सिर्फ़ एयरपोर्ट पर उन्हें रिसीव किया बल्कि अपने घर लाए। तेजी बच्चन ने सोनिया को न सिर्फ़ शरण दी बल्कि साड़ी पहनने से ले कर तमाम भारतीय तौर तरीके भी सिखाए सोनिया को। इंदिरा गांधी को मनाया और शादी करवाई। यह सब बच्चन परिवार ने मिल-जुल कर किया। राजीव और अमिताभ की दोस्ती और प्रगाढ़ हो गई। संबंध इतना घना हुआ कि राजीव के बच्चे भी तेजी बच्चन के साथ ही समय गुज़ारते। प्रियंका गांधी तो आज भी जब तब यह कहते नहीं अघातीं कि उन की हिंदी अगर इतनी अच्छी है तो तेजी बच्चन के चलते है। उन्हों ने ही हिंदी सिखाई। सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था। कि इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। राजीव को सिंहासन संभालना पड़ा। अमिताभ भी बाल सखा  की मदद खातिर राजनीति में कूद पड़े। पर वो कहते हैं न कि हाय गज़ब कहीं तारा टूटा ! तो अमिताभ इलाहाबाद से सांसद क्या हुए, यह इलाहाबाद ही उन के गले की फांस बन गया।

वह विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजनीति के फंदे में आ गए। दोनों के अहंकार और हेकड़ी आमने-सामने आ गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब दस्यु उन्मूलन के फेर में इटावा बेल्ट में पिछड़ी जाति के कई नेताओं और उन के चेले चपाटों को चहेटे पड़े थे। उसी चपेट में मुलायम सिंह यादव और उन के तमाम लोग आए। मुलायम की भी कभी हिस्ट्रीशीट थी। इंडियन एक्सप्रेस ने छापी भी थी। पर चौधरी चरण सिंह की शरण में जा कर मुलायम बचते रहे। फ़ूलन ने बेहमई कांड कर दिया। विश्वनाथ प्रताप सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ गया था मुख्यमंत्री पद से तब। खैर मुलायम की जान बची। पर वह विश्वनाथ प्रताप सिंह के हमले नहीं भूले।  आज तक नहीं भूले। तो उन्हों ने उन के खिलाफ़ डहिया ट्रस्ट का मामला निकाला। दिल्ली के अखबारों में तमाम प्रयास के बाद भी नहीं छपा। साइक्लोस्टाइल करवा कर बंटवा दिया। राजीव शुक्ला तब कोलकाता से प्रकाशित रविवार के नए-नए विशेष संवाददाता हुए थे। उदयन शर्मा की कप्तानी में दनादन बल्लेबाज़ी कर रहे थे। सिक्सर पर सिक्सर मार रहे थे। गरज यह कि पत्रकारिता में फ़िक्सिंग का फन फैला रहे थे।

विश्वनाथ प्रताप सिंह के डहिया ट्रस्ट की खबर को उन्हों ने इसी फिक्सिंग के फन में समेटा और रविवार की कवर स्टोरी

राजीव शुक्‍ला
बना कर छाप बैठे। तब  कि जब राजीव शुक्ला लखनऊ में थे दैनिक जागरण में तब वह इन्हीं राजा साहब यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह के ताबेदार थे। उन की कोर्निश बजाया करते थे। लेकिन मुलायम ने जाने क्या सुंघाया कि राजीव राजा साहब के पाले से पलटी मार गए। उन्हें मुलायम के धोबियापाट में घेर बैठे। चरखा दांव भी चले लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह को चित्त नहीं कर पाए। इस लिए भी कि डहिया ट्रस्ट के आरोपों में कुछ दम था ही नहीं। बासी मामला था। पहले भी उत्तर प्रदेश विधान सभा में गूंज चुका था। जांच वगैरह की नौटंकी हो चुकी थी। जो हो लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह से खार खाए अमिताभ बच्चन को लगा कि राजीव शुक्ला तो बड़े काम का आदमी है। बुलवा लिया। पुचकारा और राजीव गांधी से मिलवाया। बाल सखा की बात थी, विश्वनाथ प्रताप सिंह को निपटाने की बात थी सो राजीव गांधी ने भी राजीव शुक्ला को घास डाल दी। न सिर्फ़ घास डाली बल्कि अपनी अंतरंग रही अनुराधा प्रसाद से भी मिलवा दिया। बात बहुत आगे पहुंच गई। 'आशीर्वाद ' दे कर शादी भी करवा दी। अब राजीव शुक्ला की बल्ले-बल्ले हो गई। उन के पुराने मित्र उन की दिन दूनी, रात चौगुनी सफलता देख कर भकुवा-भकुवा जाते। पर जानने वाले जानते थे कि राजीव शुक्ला की पांचों अंगुली घी में है और सर कड़ाही में। पर मसोस कर रह जाते। कुछ कह नहीं पाते। पर तभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफ़ोर्स का घड़ा फोड़ दिया। बोफ़ोर्स में राजीव गांधी बह बिला गए। विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री पद पर काबिज हो गए।

अमर बनने के चक्कर में मंडल का दांव चले। कमंडल ने पटक दिया। सरकार से गए। चंद्रशेखर आए। राजीव की हत्या हो गई। अब बाल सखा अमिताभ की ईगो फंस गई सोनिया से। खदबदाहट पहले ही से थी। बातें कई थीं। अमिताभ राजनीति भले छोड़ चुके थे, ईगो नहीं छोड़ा था। सोनिया को इटली उड़ाने लगे। बरास्ता राजीव शुक्ला। खैर सोनिया चली गईं परदे के पीछे। नरसिंहा राव वगैरह हुए। लोग आए गए। राजीव शुक्ला भी सिक्सर मारते हुए अचानक राजनीति में लैंड कर गए बरास्ता नरेश अग्रवाल। राज्य सभा में रिकार्ड वोटों से जीत दर्ज की। भाजपा विधायकों के वोट के दम पर। तब शायद भाजपा में राजीव शुक्ला को सांप्रदायिक बू नहीं मिली। गो कि वह 'सेक्यूलर' होने की चाह में तब भी थे। अब अलग बात है कि 'सेक्यूलर' की हुंकार भरने वाले तमाम-तमाम लोग भाजपा की सांस पर ही आला कुर्सी तक पहुंचे हैं अब तक। मुलायम सिंह यादव १९७७ में जब पहली बार रामनरेश यादव मंत्रिमंडल में मंत्री बने तो जनसंघ के लोग भी कल्याण सिंह समेत उस जनता सरकार में थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह जब प्रधानमंत्री बने १९८९ में  तो भाजपा के ही समर्थन से।

मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने १९८९ में तो भाजपा ही के समर्थन से। तो अपने सेक्यूलर राजीव शुक्ला भी भाजपा विधायकों के वोट से ही पहली बार राज्य सभा पहुंचे। दिलचस्प यह भी कि भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों से ज़्यादा वोट मिले थे राजीव शुक्ला को। तो नरेश अग्रवाल का भी यह कमाल था। कहते हैं कि अंबानी की तिजोरी का भी रसूख तब चला था। खैर राजीव शुक्ला जल्दी ही नरेश को भी धता बता गए। नरेश अग्रवाल अपनी पार्टी की मीट बुलाए थे हरिद्वार में। राजनाथ सिंह ने उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया। तनातनी पहले से चल रही थी। पर बर्खास्तगी की खबर मिलते ही राजीव ने सिराज़ मेंहदी को साथ लिया और हरिद्वार से कूच कर गए। नरेश अग्रवाल से औपचारिक रुप से मिले भी नहीं। दिल्ली लौट कर राजीव गांधी वाले संपर्कों को खंगाला। जल्दी ही वह कांग्रेस में दिखे। राज्यसभा सदस्यता कांग्रेस में भी बरकरार रही। अब की वह महाराष्ट्र से प्रतिनिधित्व करने लगे। अब वह प्रियंका की सेवा-टहल में लग गए थे। उन के बच्चों के पोतड़े बदलने लगे। प्रियंका की हर ख्वाहिश का, खांसी-जुकाम का, हर चाहत का वह खयाल रखने लगे। प्रियंका के वह चेतक बन गए। इसी फेर में प्रियंका की नज़र शाहरुख खान पर चली गई तो यह देखिए राजीव शाहरुख के खास दोस्त बन गए। अमिताभ को तो वह कब का किनारे कर चुके थे। वैसे भी अमिताभ के पास अब अमर सिंह आ गए थे। तो अमिताभ-अमर सिंह-जयप्रदा और प्रियंका-शाहरुख-राजीव के दिन थे अब।

सोनिया और राहुल ने इसे ठीक नहीं माना। फिर भी राजीव चलते रहे। न्यूज़ २४ वगैरह का कारोबार भी शुरू हो गया। क्रिकेट में भी उन की दिलचस्पी बढ़ गई। पता चला वह मैनेजर हो गए हैं क्रिकेट टीम के। फिर तो वह कब राजनीति खेल रहे हैं और कब क्रिकेट पता करना मुश्किल होने लगा उन की अर्धांगिनी अनुराधा प्रसाद को भी। बाकी लोगों की क्या बिसात। पर सब कुछ के बावजूद उन की असल इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी मंत्री बनने की। प्रियंका की सारी तज़वीज़, तावीज़ और प्रयास के बावजूद। इसी बीच उन्हों ने राज्यसभा में जब अपनी व्यक्तिगत  संपत्ति घोषित की सौ करोड़ की तो मैं चकरा गया। चकरा गया कि यह कानपुर का पत्रकार कौन सा व्यापार कर रहा है आखिर? सोचने लगा कि यह तो घोषित है। बेनामी कितनी होगी? तभी इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट याद आ गई। तब के दिनों अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, सोनिया गांधी नेता प्रतिपक्ष। और राजीव शुक्ला उन दिनों ज़ी टी.वी पर रुबरु पेश करते थे हर हफ़्ते, अनुराधा प्रसाद के नेतृत्व में।

इंडिया टुडे में वह रिपोर्ट  राजीव शुक्ला पर केंद्रित थी। स्टोरी में राजीव शुक्ला का गुणगान करते हुए लिखा गया था कि वह अब अमर सिंह से भी बड़े पावर ब्रोकर हैं। और कि अगर वह चाहें तो अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया से एक साथ किसी को मिलवा सकते हैं। बल्कि इसी तरह की तमाम निगेटिव सूचनाओं से भरी पड़ी थी यह रिपोर्ट। मैं यह पढ़ कर बड़े अचरज में पड़ गया। इंडिया टुडे में मेरे तब कई मित्र थे जिन के साथ जनसत्ता में हम काम कर चुके थे। राजी्व शुक्ला भी जनसता में तब हम सब के साथ काम करते थे। तो इस बिना पर एक मित्र को फ़ोन कर मैं ने पूछा कि यह रिपोर्ट आप लोगों ने छापी है, राजीव शुक्ला ने इस का बुरा नहीं माना? कोई ऐतराज नहीं जताया? यह सुन कर मित्र हंसने लगे। मैं ने पूछा कि हंस क्यों रहे हैं? तो वह मित्र कहने लगे कि दुनिया अब बहुत बदल चुकी है। और हंसते हुए ही उन्हों ने कहा कि, 'ऐतराज?' वह रुके और बोले, 'यह सब राजीव शुक्ला ने कह कर छपवाया है !' मैं अवाक रह गया। बड़ी मुश्किल से पूछ पाया , 'क्या?' मित्र बोले, 'हां। इस से उस की दलाली की दुकान और चल जाएगी।' और अब देखिए न कि दुकान और दलाली ऐसी चली है राजीव शुक्ला की बड़े-बड़े श्रीनिवासन, शरद पवार और ललित मोदी उन से पानी मांगें।

सोचिए कि कितना करामाती है अपना मित्र राजीव शुक्ला। कि आई.पी.एल. का कमिश्नर पट्ठा खुद रहा। फ़िक्सिंग, स्पाट फ़िक्सिंग भी आई.पी.एल. में हुई है और बहस सारी की सारी इधर-उधर की है। सिंहासन भी डोला है तो श्रीनिवासन का। राजीव शुक्ला का नहीं। लोग पिल पड़े हैं लोटा-थाली ले कर श्रीनिवासन के पीछे। पर वो भी पट्ठा सीमेंट से मज़बूत बेशर्म है। हेकड़ी देखिए कि कह रहा है कि इस्तीफ़ा नहीं दूंगा। पर अपने भाई राजीव शुक्ला से तो कोई यह पूछने वाला भी नहीं था कि यार तू कब दे रहा है इस्तीफ़ा? कि सीधा जेल ही जा कर देगा? वो तो मनमोहन सिंह के एक बयान ने  कि राजनीति और खेल का घालमेल ठीक नही है, राजीव शुक्ला को सकते में डाल दिया। उन्हें आई.पी.एल. से इस्तीफ़ा दे देने में ही कल्याण दिखा। पर सच तो यह है कि उन की मत्री की कुर्सी पर भी अब आंच आ गई है।

पुलिसिया जांच अगर ठीक लाइन पर हो तो राजीव के खिलाफ़ सुबूत बहुतेरे हैं। इतने कि उन्हें सींखचों के पीछे भेजने में कोई दिक्कत नहीं होगी। न सिर्फ़ क्रिकेट के बाबत बल्कि  बाकी मामले भी क्यों नहीं खोले जाएं? और जो चौटाला की संपत्ति ज़ब्त कर सकती है सरकार तो राजीव शुक्ला की भी क्यों नही? वह कौन दूध के धोए हैं? देर सबेर शाहरुख खान तक भी फ़िक्सिंग की आंच आनी ही आनी है। और आए या नहीं यह क्रिकेट की आड़ में पैसे की लूट कैसे होने दी गई। राजीव कह रहे हैं कि आई.पी.एल. के बाद उन का काम अब नहीं रह गया है इस लिए इस्तीफ़ा दे रहे हैं। तो यह बात प्रधानमंत्री के बयान के बाद ही क्यों खत्म हुआ? और जो कीर्ति आज़ाद कह रहे हैं कि यह तो आंख में धूल झोंकने का काम है। आई.पी.एल के बाद उन की ज़रुरत नहीं रह गई थी। उन्हें तो बी.सी.आई. के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए था। क्यों की न सिर्फ़ श्रीनिवासन बल्कि समूची बी.सी.सी.आई. कठघरे में है। सब को इस्तीफ़ा देना चाहिए।

पर सवाल है कि क्या जांच भी निष्पक्ष होगी भला? ललित मोदी के मामले में अब तक कुछ हुआ नहीं । न होने की कोई उम्मीद दिखती है। सरकार इतनी लाचार और हताश क्यों है? ललित मोदी और राजीव शुक्ला जैसे लोग  सिस्टम के आगे इतने बड़े कैसे हो जाते हैं कि सिस्टम बौना पड़ जाता है। यह ज़रुर सोचा जाना चाहिए। राजीव शुक्ला या अमर सिंह जैसे दलाल आखिर कैसे राजनीति, कारपोरेट , क्रिकेट और सिनेमा के सिरमौर बन जाते हैं? उन की ज़रुरत बन कर अपनी नायक की छवि बनाने लग जाते हैं? यह और ऐसे सवालों से रुबरु होने का मौका अब आ गया है। वैसे अब यह देखना भी दिलचस्प हो गया है कि राजीव शुक्ला का नया गेम क्या होगा? श्रीनिवासन का इस्तीफ़ा अब निश्चित है। सवाल फिर दुहरा रहा हूं तो क्या राजीव शुक्ला अपने को फिर मैनेज कर ले जाएंगे? आंख में धूल झोंकने में फिर कामयाब हो जाएंगे? जैसी कि उन की किस्मत और आदत में शुमार है। (सरोकारनामा ब्लाग से साभार)

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.


राजीव शुक्ला पर लिखा दयानंद पांडेय के इस पुराने विश्लेषण को भी पढ़ सकते हैं…

मौकापरस्ती, धोखा और बेशर्मी जैसे शब्द भी राजीव शुक्ला से शर्मा जाएंगे

अगरतला में तीन मीडियाकर्मियों की हत्‍या का मामला : एक मृतक मीडियाकर्मी की विधवा अरेस्‍ट

अगरतला में तीन व्यक्तियों की हत्या मामले में एक विधवा की गिरफ्तारी हुई है. अगरतला में 19 मई को एक स्थानीय दैनिक अखबार के कार्यालय में तीन कर्मचारियों की हत्या हो गई थी. इस मामले में एक पीड़ित की विधवा की गिरफ्तारी हुई है जिससे मामले की जांच में नया मोड़ आ गया है.

त्रिपुरा पुलिस ने बताया कि उन्होंने दैनिक गणदूत के संपादक के ड्राइवर दिवंगत बलराम घोष की पत्नी नियति घोष को गिरफ्तार किया है. ड्राइवर अखबार के कार्यालय के भीतर ही एक कमरे में रहता था. मोटरसाइकिल पर सवार होकर आए दो लोगों ने पैलेस परिसर में दैनिक गणदूत के कार्यालय में घुसकर प्रूफ रीडर सुजीत भट्टाचार्य, ड्राइवर बलराम घोष और ऑफिस मैनेजर रंजीत चौधरी पर चाकू से वार किया.

पुलिस ने बताया कि विधवा को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह लगातार गुमराह करने वाला बयान दे रही थी. इसके साथ ही इस मामले में यह पहली गिरफ्तारी है. उन्होंने बताया कि उसी परिसर में रहने वाले सुशील चौधरी घटना के वक्त कार्यालय में मौजूद था लेकिन उसने दावा किया है कि उसने कुछ नहीं देखा है. (सहारा)

चण्‍डीदत्‍त शुक्‍ल बने नवरंग के फीचर एडिटर, मुंबई में संभालेंगे जिम्‍मेदारी

दैनिक भास्कर समूह की मैग्ज़ीन डिवीज़न में फीचर एडिटर के रूप में जयपुर में पिछले दो साल से कार्यरत रहे पत्रकार चंडीदत्‍त शुक्‍ल अब अहा जिंदगी से विदा हो गए हैं। उन्‍हें समूह में ही अब नई जिम्‍मेदारी सौंपी गई है। प्रबंधन ने उन्‍हें नवरंग पत्रिका का फीचर एडिटर बना दिया गया है। वे अब मुंबई में बैठेंगे। उन्‍होंने अपनी नई जिम्‍मेदारी संभाल ली है। उनकी रिपोर्टिंग भास्‍कर समूह के मैगजीन डिविजन के संपादक आलोक श्रीवास्‍तव को होगी। चण्‍डीदत्‍त इंटरटेनमेंट में स्‍पेशल प्रोजेक्‍ट और स्‍टोरी पर काम करेंगे।

सूत्रों का कहना है कि नवरंग को मजबूत करने के लिए प्रबंधन ने उन्‍हें यह महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी सौंपी है। वे दो साल पहले भास्‍कर समूह की पत्रिका अहा जिंदगी के साथ इस समूह का हिस्‍सा बने थे। प्रबंधन ने उनकी क्षमता को देखते हुए ही नवरंग का फीचर एडिटर बनाया है। डेढ़ दशक से हिंदी पत्रकारिता से जुड़े चण्डीदत्त शुक्ल प्रिंट, टेलिविजन, रेडियो और साइबर माध्यमों में कार्य कर चुके हैं। दैनिक जागरण में चण्डीदत्त ने फीचर विभाग से शुरुआत कर हरियाणा प्रदेश प्रभारी और जागरण सिटी दिल्ली के लॉन्चिंग प्रभारी की भूमिका भी निभाई।

इसके अलावा, विभिन्न फीचर सप्लीमेंट्स में लेखन और संपादन की बागडोर भी संभाली। दैनिक जागरण में चीफ सब एडिटर रहे चण्डीदत्त अमर उजाला के पंजाब संस्करण से भी संबद्ध रहे हैं। चण्डीदत्त ने एशिया के पहले वूमेन बेस्ड न्यूज़ एंड करेंट अफेयर्स चैनल फोकस टीवी में एडिटर, स्क्रिप्ट और आउटपुट हिंदी डेस्क के प्रोड्यूसर के रूप में कार्य किया। चण्डीदत्त ने दिल्ली दूरदर्शन के कला परिक्रमा कार्यक्रम के लिए लंबे समय तक लेखन कार्य किया है, वहीं वे एक पोर्टल चौराहा का संचालन भी कर रहे हैं।

चण्डीदत्त भास्कर समूह से जुड़ने से ऐन पहले स्वाभिमान टाइम्स हिंदी दैनिक की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा थे और यहां वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत थे। यूपी के गोंडा ज़िले के मूल निवासी चण्डीदत्त छात्रजीवन में महाविद्यालयी छात्र राजनीति में सक्रिय रहे और डिग्री कॉलेज छात्रसंघ में पदाधिकारी भी रहे। वे कई टेलीफ़िल्मों, फीचर फ़िल्म घाव प्यार का और सैकड़ों नाटकों, नुक्कड़ प्रस्तुतियों में शामिल हो चुके हैं। इसके अलावा उनकी पहचान एक कवि के रूप में भी है।

बनारस में पुलिस ने पत्रकार की गर्भवती पत्‍नी से की मारपीट, शिकायत महिला आयोग को

बनारस में महाश्‍मशान पर लाशों को सट्टा लेकर कुछ चैनलों एक खबर प्रसारित किया था, जिसको पुलिस ने प्रायोजित खबर बताया था. इस मामले को लेकर एसएसपी ने सीआरपीसी 160 के तहत पत्रकारों को नोटिस भी जारी किया था.

कई पत्रकारों ने इस मामले में अपना बयान दर्ज कराया, लेकिन पुलिस न्‍यूज नेशन के पत्रकार को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया. इसके बाद उनकी गर्भवती पत्‍नी के साथ भी पुलिस ने अभद्र व्‍यवहार किया, जिसकी शिकायत पत्रकार राम सुंदर मिश्र ने महिला आयोग की अध्‍यक्ष से की है. नीचे महिला आयोग को भेजा गया पत्र..



सेवा में
माननीय श्रीमती ममता शर्मा जी
अध्यक्ष रास्ट्रीय महिला आयोग
नयी दिल्ली

विषय – वाराणसी पुलिस द्वारा पत्रकार के गर्भवती पत्नी के साथ मार पीट करने तथा गली गाली गलौज करने के विषय में!

महोदय,

सादर करबद्ध प्रार्थना के साथ अवगत करा रहा हूँ कि उपरोक्त संलग्न फाईल वाराणसी के एक इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार काशी नाथ शुक्ल के पत्नी कंचन शुक्ल की है। काशी नाथ शुक्ल पेशे से पत्रकार हैं, इसलिए मेरी भी नैतिक और व्‍यवहारिक जिम्मेदारी बनती है कि इस विपरीत परिस्थितियों में काशीनाथ शुक्ल के परिवार के साथ खड़े रहें। महोदया वाराणसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मिश्र द्वारा पहले तो पत्रकारों को थाने बुलाकर प्रताड़ित किया गया। उसके बाद पत्रकारों के परिवार वालों को प्रताड़ित किया जा रहा है।

महोदया छोटे में आपको अवगत कराना चाहूंगा कि काशी नाथ शुक्ल ने एक खबर नेशनल न्यूज चैनल पर शीर्षक "वाराणसी में लाशों पर सट्टा" से चलाया, जिसमें ये दिखाया गया कि एक घंटे में कितनी लाश घाटों पर आने पर शर्त लगाई जाती है। उस खबर को न्यूज़ नेशन चैनल ने दिनांक 21 मई को प्रसारित किया। इसके बाद अन्य चैनल सहारा समय उत्तर प्रदेश, जी न्यूज़ उत्तर प्रदेश, समाचार प्लस आदि अन्य चैनलों ने खबर प्रसारित की। दिनांक 23 मई को सहारा समय उत्तर प्रदेश ने समाचार प्रसारित करते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मिश्र का फ़ोनो लाइव लेते हुए सवाल जबाव लेते हुए कई सवाल किये, जिससे खफा होकर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने कई चैनलों को 160 सीआरपीसी की नोटिस दे दी।

नोटिस प्राप्त सभी मीडियाकर्मियों ने अपना अपना बयान दर्ज कराया, उसके बाद भी चौक पुलिस द्वारा मीडिया कर्मियों को एसएसपी के निर्देश पर घंटों थाने बुलाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा, इसके अलावा वाराणसी पुलिस ने न्यूज़ नेशन के स्ट्रिंगर काशी नाथ शुक्ल को बार-बार थाने बुलाकर प्रताड़ित करने लगी, जिसके कारण काशी शुक्ल ने घर छोड़कर चला गया। काशी नाथ शुक्ल के घर छोड़कर जाने के बाद पुलिस अब काशी नाथ शुक्ल के परिजनों को प्रताड़ित कर रही है, सबसे बड़ा दुखद ये है कि काशी नाथ शुक्ल की पत्नी गर्भवती है और उसका अंतिम माह चल रहा है। पुलिस द्वारा बार बार घर में घुसकर प्रताड़ित करते हुए महिलाओं के साथ गाली गलौज और मारपीट की जा रही है, जिसके कारण काशी नाथ शुक्ल की पत्नी बार बार बेहोश हो जा रही है, उसके  बार बेहोश होने से गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ उसका भी खतरे में है।
          
ऐसे में आपसे अनुरोध के साथ कहना चाहूंगा कि पत्रकारों द्वारा खबर दिखाए जाने से नाराज एसएसपी अजय मिश्र द्वारा पद का दुरुपयोग करते हुए पत्रकारों के साथ उसके परिजनों को भी प्रताड़ित करने वाले पुलिस कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की कृपा करें ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ उसके माँ का भी जीवन बचाया जा सके।

प्रतिलिपि –
1.  राज्य महिला आयोग
2.पुलिस महानिदेहक उत्तर प्रदेश
3. अपर पुलिस महानिदेशक,ला & आर्डर ,उत्तर प्रदेश
4 .पुलिस महानिरीक्षक वाराणसी

प्रार्थी
राम सुंदर मिश्र
पत्रकार
9918701615,9336933552



तृणमूल में अंतर्कलह विस्‍फोट : एक मिनट में शताब्‍दी सबको खतम कर देंगी!

बंगाली फिल्मों की अपने समय की जानी मानी अभिनेत्री शताब्दी राय पिछले कुछ अरसे से अपने संसदीय क्षेत्र में असंतुष्टों का सामना कर रही है। शारदा फर्जीवाड़े मामले में नाम उछलने के बाद अब तक वे इस मामले में खामोश रहीं। मीडिया में छप रही सामग्री का ही अब तक वे नोटिस लेती रही और सफाई देती रही। अपनी सफाई में तृणमूलपंथी फिल्मकार अपर्णा सेन को भी उन्होंने लपेटने से परहेज नहीं किया और कहा कि अपर्णा तो शारदा समूह की पत्रिका की संपादक रही हैं और उनपर कोई आरोप नहीं लगा रहा।

आज ही उन्होंने सिउड़ी में एक बच्चे को गोद लिया। लेकिन अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के प्रति उनका ममत्व अब खत्म होने के कगार पर है। शारदा चिटफंड कांड को लेकर मुख्यमंत्री जहां मैदान में उतरकर सभी दागियों का बचाव कर रही है, वहीं पार्टी में घमासान मचा हुआ है। वीरभूम में जिसतरह सारे लोग सांसद के खिलाफ आ गये हैं और सांसद उन्हें खुली चुनौती दे रही हैं, उससे पता चलता है कि स्थिति कितनी विस्‍फोटक हो चुकी है।

उन्होंने पूरे वीरभूम जिले के तृणमूल कार्यकर्ताओं और नेताओं को बेईमान, अहसानफरामोश और बिना वजूद का बता दिया और फिर पार्टी सुप्रीमो की तरह चेतावनी दी कि वे एक मिनट में सबको खत्म कर देंगी। शताब्दी का मिजाज तब बिगड़ा जबकि उनकी बुलायी कार्यकर्ताओं की सभा में बड़े पैमाने पर जिले के नेता और कार्यकर्ता गैरहाजिर रहे। पहले से ही अंतर्कलह से परेशान सांसद इस पर गुस्से से उबल पड़ी। उनहोंने दावा किया कि जिले में उनके बिना इन कार्यकर्ताओं और नेताओं का कोई वजूद ही नहीं है। सांसद के गुस्से की खास वजह यह है कि इस बैठक में पार्टी के जिलाध्यक्ष अनुव्रत मंडल भी गैरमौजूद थे।ऐन पंचायत चुनाव से पहले सांसद के इस बयान से सत्तादल में अंतर्कलह फिर तेज हो जाने की आशंका है।सिउड़ी इंडोर स्टेडियम में हुई इस बैठक में तो पार्टी में एकता बनाये रखने की दीदी की सख्त हिदायत की खुद सांसद ने ही धज्जियां उधेड़ दी।

शारदा चिट फ़ंड कंपनी के दिवालिया होने के बाद इससे जुड़े हजारों निवेशक, दलाल और कर्मचारियों के भविष्य पर अंधेरा छा गया है। कंपनी के दिवालिया होने के समाचार के बाद शारदा समूह की दूसरी कंपनियों पर ताले लग रहे हैं जिसकी वजह से इन कंपनियों में काम करने वाले हजारों कर्मचारी रास्ते पर आ गये है। जहां सत्ताधारी तृणमुल कांग्रेस और सीपीएम एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर रहे है, चिट-फ़ंड में अपने पूरे जीवन की पूंजी लगाकर ठगे जमाकर्ता न्याय की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आये हैं। शारदा ग्रुप राज्य में होने वाले पंचायत चुनावों से ऐन पहले ढहा है। इस घटना ने तृणमूल नेतृत्व की पेशानी पर बल ला दिया है, क्योंकि निवेशकों में से अधिकांश ग्रामीण गरीब लोग हैं। अप्रैल के मध्य में जैसे ही घोटाले से पर्दे उठने शुरू हुए वैसे ही राजनेताओं और घोटालेबाजों के बीच कथित गठजोड़ की चेतावनी सामने आने लगी। जिन लोगों का नाम घोटाले में उछला है उनमें सबसे अग्रणी तृणमूल के राज्य सभा सांसद कुणाल घोष हैं। सेन ने घोष पर असामाजिक तत्वों के साथ उनके कार्यालय में घुसकर चैनल-10 की बिक्री का जबरिया इकरारनामा कराने का आरोप लगाया है। पत्र में बंगाली दैनिक 'संवाद प्रोतिदिन' के मालिक संपादक सृंजय बोस (अब तृणमूल के राज्य सभा सांसद) पर अखबार को चैनल चलाने के लिए हर महीने 60 लाख रुपए भुगतान करने का दबाव डालने का आरोप लगाया है। सौदा यह हुआ था कि संपादक सेन के कारोबार को सरकार से बचाए रखेंगे।

इस मामले में जिस तीसरे तृणमूल सांसद का नाम उछला है वह बंगाली फिल्मों की अपने समय की जानीमानी अभिनेत्री शताब्दी राय हैं। राय ग्रुप की ब्रैंड एंबेस्डर थीं। राय ने कहा है कि उन्होंने कभी किसी उत्पाद की पैरवी नहीं की केवल कार्यक्रमों में एक अभिनेत्री के तौर पर रुपए लेकर हाजिर होती थीं।शताब्दी राय अब  मानने लगी हैं कि शारदा समूह के कार्यक्रमों में वे जाती रहीं हैं और उन्हें समूह से भुगतान भी होता रहा है। जो कि फिल्मी दुनिया के लोग किसी भी पेशेवर काम के लिए लेते रहते हैं। लेकिन वे अब भी सुदीप्त की कंपनी के ब्रांड एम्बेसेडर होने की बात सिरे से खारिज करती हैं। उन्हें शिकायत है कि तृणमूल सांसद होने की वजह से ही उन्हें विवाद में फंसाया जा रहा है। अब तृणमूल के लोग ही बचाव में यह दलील दे रहे हैं कि सभी लोग बेमतलब शताब्दी के पीछे पड़े हैं, जबकि कुणाल घोष और अर्पिता घोष की तरह मशहूर फिल्म निदेशक व अभिनेत्री अपर्णा सेन भी शारदा समूह की पत्रिका की संपादक रही हैं। दिनप्रतिदिन श्रद्धासमूह से जुड़ रहने के बाद भी मीडिया में उनका नाम विवाद में सिऱ्फ इसलिए घसीटा नहीं जा रहा है क्योंकि राज्य में मां माटी मानुष की सरकार बनने के बाद सत्तादल से उन्होंने खुद को अलग कर लिया। जबकि दीदी के भूमि आंदलन में वे बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती रही हैं।​

​​मालूम हो कि लंबे समय तक महिलाओं की प्रमुक पत्रिका सानंदा की संपादक बतौर मीडिया में अपर्णा का बहुत सम्मान है। सानंदा छोड़ने के बाद वे श्रद्धा समूक की पत्रिका परमा की संपादक बन गयी।लेकिन कोई इसकी चर्चा तक नहीं कर रहा।इसीतरह   शारदा समूह के बंद अखबारों की खूब चर्चा हो रही है, पर रतिकांत बोस से तारा समूह के अधिग्रहण की खास चर्चा नहीं हुई। गौरतलब है कि तारा न्यूज के एफआईआर के आधार पर ही सुदीप्त की गिरफ्तारी हुई।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

फर्जी पट्टा देकर पैसे वसूलने वाले दो पत्रकार हिरासत में

पत्रकार भी पता नहीं कैसे-कैसे काम करने लगे हैं. पत्रकारों दुश्‍मन पहले ही कम नहीं हैं, अब वे खुद अपने दुश्‍मनों को आमंत्रित कर रहे हैं. खबर जयपुर से है कि दो पत्रकार भाई अमित कुमावत और सुमित कुमावत को पुलिस ने एक व्‍यक्ति को फर्जी पट्टा देकर पैसे लेने के आरोप में हिरासत में लिया है. इन दोनों भाइयों से पूछताछ की जा रही है.

जयराम गुर्जर ने दोनों भाइयों के खिलाफ फर्जी पट्टा देकर पैसे लेने की शिकायत जीडीए पुलिस से की थी. इसके बाद पुलिस ने इन दोनों को हिरासत में लिया है. दोनों जयपुर से प्रकाशित दैनिक अखबार में कार्यरत हैं.

पुलिस का आतंक : झांसी में तीन और पत्रकारों को पुलिस ने जेल भेजा

: पुलिस की शह पर पुराने मामले में भिड़े पत्रकारों के गुट : झांसी में पुलिस और पत्रकारों के बीच चल रहे तनाव ने नया रूप ले लिया है. पुलिस की शह पर पत्रकार आपस में भिड़ गए, नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने तीन पत्रकारों को अरेस्‍ट करके जेल भेज दिया. साथ ही अमित की गिरफ्तारी के विरोध में धरना दे रहा आंदोलन भी खतम हो गया. पुलिस ने पत्रकारों की गुटबाजी का पूरा फायदा उठाते हुए उन्‍हें जेल भी भेज दिया और अपनी धमक भी कायम कर ली.

उल्‍लेखनीय है कि आजतक के पत्रकार अमित श्रीवास्‍तव को फर्जी फंसाने का आरोप लगाते हुए पत्रकार इलेक्‍ट्रानिक प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष शकील अली हाशमी के नेतृत्‍व में भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे. अमित को पुलिस ने एक महिला के साथ रेप के आरोप के प्रयास में अरेस्‍ट किया है. पर इस गिरफ्तारी के पीछे कहानी यह है कि नवाबाद पुलिस आजतक पर कुछ खबरें प्रसारित किए जाने के चलते अमित से चिढ़ी हुई थी. मौका मिलते ही उन्‍होंने अमित को अरेस्‍ट कर लिया.

अनशन के चलते पुलिस एवं प्रशासन पर दारोगा के खिलाफ कार्रवाई का दबाव बढ़ रहा था, लिहाजा पुलिस ने चाल चल दी. शकील और नासिर के बीच पुरानी अदावत है, इसलिए पुलिस ने एक तीर से दो शिकार करने की ठानी. पहले तो अनशन खतम करने के लिए पत्रकारों को आपस में भिड़ाने की, दूसरे इस मामले को आपसी और पुरानी लड़ाई दिखाकर दोनों पक्षों अनशन स्‍थल से हटा देने की. इसी को ध्‍यान में रखकर पुलिस ने नासिर जैदी को शह दे दिया. झांसी के डीएम-एसपी पर भी भारी पड़ने वाले दारोगा जेपी यादव की शह पाकर नासिर जैदी अपने साथी पवन झा के साथ अनशन स्‍थल पर पहुंच गए.

वहां पहुंचकर उन्‍होंने विवाद शुरू कर दी. सारा मामला पुलिस के अनुसार ही चल रहा था लेकिन पवन झा द्वारा किसी और के रिवाल्‍वर से हवाई फायर तथा शकील के ऊपर हमला करने की कोशिश ने पुलिस की सारी योजना को उल्‍टा कर दिया. पत्रकार तथा स्‍थानीय लोग नासिर तथा पवन को पकड़कर पुलिस के पास ले गए तथा मय रिवाल्‍वर उन्‍हें पकड़वा दिया. रात नौ बजे तक पुलिस को मजबूरी में दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी पड़ी. पर पुलिस को किसी भी तरह अनशन खतम करवाना था, लिहाजा नासिर और पवन की तरफ से क्रास एफआईआर पुलिस ने दर्ज करवा दिया. इसके बाद रात दो बजे पुलिस ने शकील को अनशन स्‍थल से उठा लिया.

बताया जा रहा है कि पुलिस शकील के खिलाफ भी बलात्‍कार के मामले का मुकदमा दर्ज किया है. इसी मामले में अमित को भी फंसा कर जेल भेजा गया है. इसके बाद दोनों पक्षों की तरफ से आईपीसी की धारा 143, 148, 149, 307, 323, 504 व 506 के तहत मामला दर्ज कर लिया. इसके बाद पुलिस ने नासिर जैदी, पवन झा तथा शकील अली हाशमी तीनों को अरेस्‍ट कर लिया. इसके बाद उन्‍हें सीजेएम कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्‍हें चौदह दिन की न्‍यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इस तरीके से पुलिस ने अब अपने सारे मोहरे सेट कर लिए हैं.

उल्‍लेखनीय है कि झांसी में लंबे समय से पत्रकारों के बीच में गुटबाजी चलती आ रही है. सपा नेता चंद्रपाल यादव के लोगों ने भी चुनाव के दौरान मीडियाकर्मियों पर हमला किया था. उसमें भी पुलिस को सपाइयों ने शह दे रखा था. शासन का साथ मिलने के बाद झांसी की पुलिस पूरी तरह निरंकुश होकर पत्रकारों के खिलाफ मामले दर्ज किए. मौका मिलते ही उन्‍हें जेल भी भेज दिया.


झांसी में पत्रकार-पुलिस तथा सपाइयों के बीच विवाद के बारे में जानने के लिए निम्‍न लिंकों पर क्लिक करें –

अमित को फंसाए जाने के विरोध में अनशन पर बैठे झांसी के पत्रकार

रेप के प्रयास के आरोप में आजतक का पत्रकार अरेस्‍ट

यूपी में एक और पत्रकार पुलिसिया उत्‍पीड़न का शिकार

आजतक के रिपोर्टर अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज

एक पत्रकार ने दूसरे पत्रकार पर लगाया पत्‍नी से अवैध संबंध के चलते मारपीट का आरोप

जीत के बाद सपाइयों की गुंडई शुरू : मीडियाकर्मियों पर हमला किया, कई घायल

झांसी में सपा प्रत्याशी के खास टीवी पत्रकार ने मीडिया पर हमले के लिए बोला था!

पत्रकारों पर हमला करने वालों पर नहीं हुई कारवाई, डीएम को ज्ञापन सौंपा

पत्रकारिता दिवस पर दिवंगत पत्रकार की पत्‍नी को दिया पचास हजार रुपये

: पेड न्‍यूज पर विधायकी जा सकती है तो अखबार का रजिस्‍ट्रेशन निरस्‍त क्‍यों नहीं : गोंडा। हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर एक अनूठी पहल करते हुए उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की जिला इकाई ने चन्दा लगाकर एकत्रित किए गए पचास हजार रुपए का डिमांड ड्राफ्ट स्व. राम मोहन पाण्डेय की पत्नी श्रीमती सुमन पाण्डेय को प्रदान किया। कार्यक्रम के अतिथि प्रदेश के बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री योगेश प्रताप सिंह व माध्यमिक शिक्षा राज्यमंत्री विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह के द्वारा उन्हें यह धनराशि प्रदान करवाई गई।

इस अवसर पर यूनियन की ओर से आयोजित एक संगोष्‍ठी को सम्बोधित करते हुए भारतीय प्रेस परिशद के सदस्य शीतला सिंह ने कहा कि पेड न्यूज समाज के लिए काफी खतरनाक है। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज छपवाकर चुनाव जीतने वाली उत्तर प्रदेश की एक विधायक की सदस्यता तो खत्म कर दी जाती है किन्तु पेड न्यूज छापने वाले समाचार पत्र के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती। यह दोहरा मानदंड समाज के लिए खतरनाक है। उन्होंने पूंजीवाद के खिलाफ पत्रकारों को एकजुट होने की अपील की।

प्रदेश के बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री योगेश प्रताप सिंह ने कहा कि लोकतंत्र के अन्य स्तंभों की भांति मीडिया में भी गिरावट आई है। इसके बावजूद उसका महत्व कम नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को समाज हित में कार्य करना चाहिए, न कि व्‍यक्ति हित में। प्रदेश सरकार पत्रकारों के हित के लिए प्रतिबद्ध है। माध्यमिक शिक्षा राज्यमंत्री विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह ने स्वच्छ व निष्‍पक्ष पत्रकारिता की वकालत की और कहा कि पत्रकारों को तथ्यों की जांच पड़ताल करके ही समाचार देना चाहिए। बीबीसी लंदन के उत्तर प्रदेश प्रभारी राम दत्त त्रिपाठी ने कहा कि मीडिया संस्थानों को अपनी सकल आय का एक निश्चित हिस्सा पत्रकारों को देना चाहिए। उन्होंने पत्रकार संगठनों के माध्यम से उन पर दबाव बनाए की जरूरत बताई। त्रिपाठी ने कहा कि समाचार बंदूक से निकली गोली की तरह है, इसलिए उसे प्रसारित करने से पहले क्रास चेक अवश्य करें। उन्होंने सवाल उठाया कि श्रम विभाग के अधिकारी मीडिया घरानों के कार्यालयों की पड़ताल करके उन संस्थानों में काम करने वाले पत्रकार व गैर पत्रकार कर्मचारियों के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

देवीपाटन परिक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक सत्येन्द्र वीर सिंह ने कहा कि पत्रकारिता की धार तलवार से भी तेज होती है। इसलिए पत्रकार अपनी ताकत को पहचानें और समाज हित में कार्य करें। उन्होंने कहा कि पत्रकारों ने हमेशा देश को दिशा दी है और आज भी आपमें धारा मोड़ने की ताकत है। डीआईजी ने पत्रकारों से स्व अनुशासित होने की अपील की। पुलिस अधीक्षक आरपी सिंह यादव ने पत्रकारों को लक्ष्मण रेखा पार न करने का सुझाव दिया। एसपी ने कहा कि पत्रकारिता दिवस अपने मिशन को कसौटी पर कसने का दिन है। भविष्‍य की योजनाओं पर संकल्प लेने का दिन है। उन्होंने कहा कि हमें आत्मावलोकन करना चाहिए कि हम अपने उद्देश्य से भटक तो नहीं रहे हैं। उन्होंने समाचार पत्र के मिशन, प्रोफेशन अथवा बिजनेस होने के बीच सीमा रेखा निर्धारित करने की बात कही। उन्होंने सुझाव दिया कि पत्रकार अपनी साख बचाएं तथा सनसनी पैदा करने से बचें।

भारतीय प्रेस परिषद की पूर्व सदस्य सुश्री सुमन गुप्ता ने कहा कि पत्रकार भारतीय संविधान में प्रदत्त अभिव्‍यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों के तहत काम करते हैं। उन्होंने कहा कि आज समाचार पत्रों में स्थानीयकरण बढ़ा है। एक जिले की खबरें दूसरे जिले में नहीं मिलती। हमें राष्‍ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय खबरों से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मीडिया घरानों के मालिकान करोड़ों का माल काट रहे हैं किन्तु दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों को बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है। अपने हक के लिए हमें मीडिया घरानों पर दबाव बनाने की जरूरत है। साहित्यकार डा. सूर्यपाल सिंह ने पत्रकारिता में शुचिता के साथ मानवीय संवेदनाओं को उठाते हुए कहा कि आज सम्पादकों की हैसियत घट गई है। दूसरी तरफ पत्रकारों को उनका हक व जीविका के लिए धन नहीं दिया जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में पत्रकारिता कैसे स्वतंत्र रह सकती है?

सम्पादक रजा रिजवी ने जिलों में कार्यरत पत्रकारों को भी मान्यता तथा इलाज की सुविधाएं देने की मांग की। कार्यक्रम को एडीएम अंजनी कुमार सिंह, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सिंह, पूर्व अध्यक्ष सुरेश त्रिपाठी, सांसद प्रतिनिधि संजीव सिंह, शास्त्री कालेज के प्राध्यापक डा. श्याम बहादुर सिंह, जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) मिर्जा शाहिद बेग आदि ने भी सम्बोधित किया। विषय प्रवर्तन एसपी मिश्र ने किया। यूनियन के जिलाध्यक्ष कैलाश वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन तथा महामंत्री जानकी शरण द्विवेदी ने संचालन किया। इस मौके पर यूनियन की ओर प्रकाशित स्मारिका ‘यादगार-2013’ का विमोचन किया गया। जगदीश भारती पुरवार ने जादू का कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम में ब्लाक प्रमुख राजीव कुमार उर्फ बिट्टू सिंह, साबिर अली, कामेश प्रताप सिंह, राजू ओझा, अम्बरीश दत्त सिंह, अशोक पाण्डेय, शिव कुमार शुक्ल, सत्य प्रकाश शुक्ल, विक्रम सिंह, वरिष्‍ठ अधिवक्ता केके श्रीवास्तव, पत्रकार कमर अब्बास, पीपी यादव, टीपी सिंह, धनंजय तिवारी, संजय तिवारी, अंचल श्रीवास्तव, अम्बिकेश्वर पाण्डेय, अकील सिद्दीकी, पवन जायसवाल, पंकज सिन्हा, अब्दुल हफीज, मोमराज सिंह, रघुनाथ पाण्डेय, यशोदा नंदन त्रिपाठी, मनोज श्रीवास्तव, एसएन शर्मा, राजेश कुमार, सुधांशु गुप्ता, उमेश मिश्रा, जलील अहमद खान, एनके वर्मा, अशोक सिंह, केके मिश्रा, शोभनाथ पाण्डेय, सरदार जिन्दर सिंह, महादेव सागर, मथुरा प्रसाद मिश्र, विजय शुक्ला, अजीज सिद्दीकी, राज किशोर शुक्ला, इन्द्र प्रकाश शुक्ला, आरपी पाण्डेय, सुरेश गुप्ता, वरुण यादव आदि मौजूद रहे।

पीयूष राठी ने समाचार प्‍लस एवं आकाश सिंह ने इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन किया

राजस्‍थान के अजमेर जिले के रहने वाले पीयूष राठी ने अपनी नई पारी जल्‍द ही शुरू होने जा रहे समाचार प्‍लस राजस्‍थान चैनल से की है. वे इसके पहले राजस्‍थान के रीजनल चैनल एचबीसी को अपनी सेवाएं दे रहे थे. एचबीसी के बंद होने के बाद उन्‍होंने समाचार प्‍लस ज्‍वाइन किया है. 

दूसरी तरफ एमएच1 से आकाश सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे चैनल के साथ असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत थे. आकाश ने अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. वे इसके पहले हमार टीवी को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. टेकवन इंस्‍टीट्यूट और एमिटी से उन्‍होंने पढ़ाई की हुई है.

अतिशय हारमोन थेरापी ने ली ऋतुपर्णो घोष की जान!

समकालीन भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली हस्ताक्षरों में से एक ऋतुपर्णो घोष के देहांत पर राजनीतिक दखल का दृश्य कोलकाता के मौजूदा सांस्कृतिक परिदृश्य को ही रेखांकित कर गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मृत्यु के समाचार फैलते न फैलते फिल्मी दुनिया के ग्लेमर को हाशिये पर धकेलकर फिर टीवी के परदे पर छा गी। अंतिम संस्कार तक उन्हीं के दिशा निर्देशन में हुआ।

बारिश के बावजूद हजारों सिनेप्रेमी प्रसिद्ध फिल्मकार ऋतुपर्णो घोष को अश्रुपूर्ण विदाई देने के लिए सरकारी सांस्कृतिक परिसर 'नंदन' के बाहर जुटे। घोष का गुरुवार की सुबह निधन हो गया। वह पैंक्रिएटाइटिस से पीड़ित थे।इस राजनीतिक मारामारी में वामपंथी लोग किनारे हो गये। यह दीदी की उपलब्धि बतायी जा सकती है और फिर एकबार उन्होंने खुद को फिल्मी दुनिया के सबसे करीबी होने का सच साबित कर दिया। लेकिन विडंबना यह है कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी के बावजूद नींद में ही ऋतुपर्णो की आकस्मिक मृत्यु होने के बावजूद उनकी देह का पोस्टमार्टम नहीं हुआ। वे मधुमेह के मरीज थे। लेकिन उनका रक्तचाप सामान्य से अधिक रहता है। मधुमेह और रक्तचाप के दोहरे समीकरण से उनकी मृत्यु नहीं हुई। सेक्स चेंज ऑपरेशन के बाद उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी। परिजनों के अनुसार नींद में ही उनकी मौत हो गई थी। सुबह 8 बजे उन्हें ऋतुपर्णो की मौत का पता चला।

चोखेरबाली, रेनकोट और अबोहोमन जैसी फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता घोष की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत में थी। उन्होंने और उनकी फिल्मों ने रिकॉर्ड 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीते थे। चिकित्सकों के मुताबिक मृत्यु के समय ऋतुपर्णो  का रक्तचाप सामान्य था। तो आकस्मिक दिल का दौरा कैसे पड़ा,यह बड़ा सवाल है। दिल का दौरा पड़ने पर आम तौर पर जो दर्द मरीज को झेलना पड़ता है, उनके चेहरे पर उसकी झलक भी नहीं थी।

अब चिकित्सकों की आम राय है कि मुकम्मल औरत बनने की कोशिश में अतिशय हारमोन थेरापी ने उनकी जान ले ली। यह अत्यंत गंभीर मामला है और आपराधिक चिकित्सकीय लापरवाही है, जिसकी वजह से मरीज की जान गयी। लेकिन इस सिलसिले में कोई तफतीश नहीं हो सकती। चीरफाड़ के बिना अपरातफरी में अंत्येष्टि हो गयी और विसरा रपट मिलने का सवाल ही नहीं उठता। दोषी चिकित्सक अपना मौत का कारोबार सामान्य ढंग से जारी रख सकेंगे और फिर किसी ऐसी ही मौत पर हम मातम मनाते रहेंगे। विश्वप्रसिद्ध माइकेल जैक्शन की मौत की जांच हो रही है, लेकिन भारत और खासकर बंगाल में हारमोन थेरापी और मादक द्रव्य के गोरखधंधे से मौत का कारोबार बेरोकटोक चल रहा है। कौन है जिम्मेदार?

सपनों के पीछे दीवानगी की हद तक भागना जरुरी नहीं कि अच्छे कर्म ही कराये और कई बार “पैशन” ऐसे काम करने के लिये विवश कर देता है जो कम से कम किसी देश के कानून को तो तोड़ते ही हैं। लेखक और कलाकार हमेशा कानून के दायरे में रह कर ही काम नहीं करते!अपनी फिल्म `खेला' का यह सार उनके ही जीवनावसान पर लागू हो गया।

जैसा कि खूब छपा है कि ऋतुपर्णो फिल्मों में समलैंगिकता के प्रवक्ता हैं, लेकिन सच इसके विपरीत है। उन्होंने न `फायर' और न ही `दायरा' और `न कुंआरा बाप' जैसी कोई फिल्म बनायी। हां, `चित्रांगदा' के ट्रीटमेंट को नया कहा जा सकता है।फिल्म समीक्षक मानते हैं कि चित्रांगदा ऋतुपर्णो की अब तक की सबसे बेस्ट क्रिएशन है।

इस फिल्म ने ऋतुपर्णो की आर्ट फिल्मों पर पकड़ और तगड़ी कर दी। यह फिल्म रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रमुख कृति की समकालीन व्याख्या पर आधारित है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता ऋतुपर्णो घोष  ने फिल्म में मुख्य कोरियोग्राफर का किरदार स्वयं निभाया है। लेकिन सच यह है कि भारतीय आख्यान के मुताबिक चित्रांगदा पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध स्त्री अस्मिता की कथा है। उन्होंने जिन समलैंगिकता कथ्य आधारित फिल्मो, कुल मिलाकर दो में अभिनय किया,उनके निर्माता निर्देशक वे स्वयं नहीं, दूसरे लोग हैं। दीप्ति नवल का साक्षात्कार एक ऐसी ही फिल्म पर आधारित है।

समलैंगिकता की बहुप्रचारित छवि से मुक्ति के लिए छटपटा रही थी उनकी आत्मा और इसी वजह से मुकम्मल औरत बनने की हरचंद कोशिश के तहत वे अतिशय हारमोन थेरापी के शिकार हो गये। ऋतुपर्णो घोष ने अपने निधन से कुछ ही दिन पहले बंगाली जासूस ब्योमकेश बख्शी की कहानी पर बन रही फिल्म 'सत्यान्वेषी' की शूटिंग पूरी की थी। दादा साहेब फालके अवार्ड से सम्मानित एक्टर और पोएट सौमित्र चटर्जी की मुलाकात ऋतुपर्णो घोष से पहली बार एक स्क्रिप्ट कंपटीशन में हुई थी।

उन्होंने ऋतुपर्णो की फिल्मों में काम भी किया और उनके काम की खूबियों को पहचाना भी। उनका कहना है कि उनकी फिल्मों में आधुनिक बंगाली दिमाग झलकता है। सौमित्र चटर्जी ने कहा, `मैंने ऋतुपर्णों की फिल्म में काम किया और पाया कि उसमें कुछ खास योग्यताएं थीं, जो किसी भी अच्छे फिल्म मेकर के लिए जरूरी हैं। इनमें पहली थी साहित्य बोध। पहले के बंगाली निदेर्शकों की भी यह विशेषता हुआ करती थी। लेकिन अब यह बहुत कम नजर आती है।'

फिल्म 'चित्रांगदा' खुद को पहचानने के सफर की कहानी है, इन्सान की पहचान खुद से नहीं है और ना ही उसकी सेक्सुअल इमेज से बल्कि उसके जीवन के सफर से होती है।  ऋतुपर्णो घोष ने फिल्म रिलीज के बाद ट्वीट किया था कि इस फिल्म ने उनकी जिंदगी ही बदल दी। उन्हें जीवन के सही फलसफे सिखाए।

दरअसल, `उनीशे अप्रैल', `दहन', `चोखेर बाली', `नौका डूबी', `अंतर्महल', `आबोहमान', `खेला', `रेनकोट',`असुख', `उत्सव', जैसी उनकी तमाम फिल्में नारी अस्मिता की ही अनंत कथा है। नारी चरित्रों को उकेरने में और कलाकारों से उन पात्रों के अभिनय कराने में उनकी दक्षता अतुलनीय है क्योंकि शारीरिक द्वंद्व के बावजूद वे पूरी तरह अपने दिलोदिमाग में एक मुकम्मल औरत थे। शारीरिक द्वंद्व का अवसान करने के लिए ही वे हारमोन थेरापी का जोखिम उठाते रहे, प्रसेनजीत जैसे घनिष्ठ मित्रों की सख्त मनाही के बावजूद।

फिल्मी सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ अरसे से ऋतुपर्णो ने आरेकटि प्रेमेर गल्पो नामक फिलम में नारी चरित्र में अभिनय के लिए  शारीरिक तौर पर नारी बनने के लिए जुनून की हद तक हारमोन थेरापी आजमा रहे थे।गौरतलब है कि लिंग परिवर्तन कराने के बाद से ही उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी। अप्राकृतिक ढंग से लिंग परिवर्तन कराने के चालू फैशन की चिकित्सकीय वैधता पर कोई सार्थक बहस शुरु हो तो शायद इस असामयिक मौत की कुछ सांन्त्वना मिले।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

अबीर कल ऋतुपर्णो को श्रद्धांजलि लिख रहे थे, आज लोग अबीर को श्रद्धांजलि दे रहे हैं

छोटे पर्दे पर प्रदर्शित धारावाहिक ‘कुसुम’ और ‘प्यार का दर्द है’ में अपने अभिनय के रंग भरने वाले अभिनेता अबीर गोस्वामी का शुक्रवार को दोपहर बाद निधन हो गया। वह महज 30 साल के थे। अबीर के साथियों ने बताया कि युवा अभिनेता का स्वास्थ्य ठीक था और वह अपने काम में व्यस्त थे, तभी उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिसने एक बेहतरीन कलाकार को हमसे छीन लिया।

अबीर ने सयंतनी घोष के साथ बांग्ला फिल्म ‘सक्खत’ में काम किया था। उन्होंने कहा कि शुक्रवार को दोहपर 1.15 बजे उनकी अबीर से फोन पर बात हुई थी। उन्होंने कहा, ‘‘हमने साथ मूवी देखने जाने की योजना बनाई थी और करीब तीन बजे उसकी मौत की खबर मिली। वह बिल्कुल तंदुरुस्त था और एक पल में न जाने क्या हो गया, मैं यह सुनकर बहुत विचलित हूं। सचमुच यह बहुत दुखद समाचार है।’’

अभी कल ही (30 मई) अबीर ने प्रसिद्ध फिल्मकार ऋतुपर्णो घोष का दिल का दौरा पडऩे से हुए निधन का समाचार सुनकर ट्विटर पर श्रद्धांजलि के शब्द लिखे थे। आज लोग अबीर को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। जिन लोगों ने टीवी पर ‘होटल किंस्टन’, ‘कुमकुम’, ‘छोटी मां’, ‘बदलते रिश्तों की दास्तान’ और ‘घर आजा परदेसी’ देखा है उन्हें अबीर बहुत याद आएंगे। 

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

डा. कुमार विश्वास ने किया प्रभावित, कनाडा में होगी हिंदी की पढ़ाई

गत 25 मई को कनाडा के इमीग्रेशन मिनिस्टर श्री जैसन केनी ने घोषणा की, कि 'कनाडा के प्राथमिक स्कूलों में अब से हिंदी की पढ़ाई लागू की जाएगी'. कनाडा के एक हिंदी अख़बार 'द हिन्दी टाइम्स' की दसवीं सालगिरह पर आयोजित काव्य संध्या में हिन्दी के प्रसिद्द कवि डा कुमार विश्वास को सुनने आई भीड़ और कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं के उत्साह से प्रभावित होने के बाद उन्होंने यह त्वरित घोषणा की.

उन्होंने कहा कि हिन्दी की कविता का प्रभाव देख कर मुझे लगता है, कि इसे प्राथमिक शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए. इसके बाद श्री केनी ने सोशल नेटवर्किंग साईट ट्वीटर पर इस सन्दर्भ में ट्वीट भी किया. डा कुमार विश्वास का कहना है, कि हिंदी के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है, कि कनाडा में प्राथमिक स्कूलों में हिन्दी को स्थान मिले. लगभग एक महीने की अमेरिका-कनाडा यात्रा से लौटे डा कुमार विश्वास ने इस घोषणा को एक ऐतिहासिक घोषणा बताया.

जो काम संजय गुप्ता, महेंद्र मोहन समेत पूरा जागरण नहीं कर पाया, वह नदीम ने एक दिन में करके दिखा दिया!

लखनऊ :  महेंद्र मोहन से लेकर संजय गुप्‍ता तक कई-कई दिन लखनऊ में पड़े रहे लेकिन सीएम अखिलेश यादव से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई। जागरण के लोग सीएम के इंटरव्‍यू के लिए एक साल से कोशिश करते रहे लेकिन प्रेस कांफ्रेंस को छोड़कर सीएम ने उन लोगों से कभी बात करना गंवारा नहीं किया। अखिलेश यादव को खुश करने के लिए दैनिक जागरण के मालिकों ने एक जुगत निकाली, अपने एक कार्यक्रम में सीएम की पत्‍नी को बतौर मुख्‍य अतिथि आमंत्रित किया लेकिन सीएम इस चाल को समझ गए और उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को इस कार्यक्रम के लिए सहमति न देने को कह दिया।

धोबी से न जीते गधे के कान उमेठे, वाली कहावत को चरित्राथ करते हुए जागरण के मालिकों ने राज्‍य ब्‍यूरो में सपा की बीट देखने वाले विशेष संवाददाता स्‍वदेश कुमार को जिला डेस्‍क पर भेज दिया। अब तस्‍वीर का दूसरा पहलू देखिए। लखनऊ में नवभारत टाइम्‍स आने वाला है। उससे सबसे ज्‍यादा परेशान दैनिक जागरण वाले हैं। परेशानी का आलम यह है कि मुकाबले को प्रचार युद्ध पर उतर आए हैं। शहर में गाड़ियां चलवा कर प्रचार हो रहा है जागरण का, रेडियो पर विज्ञापन दिया जा रहा है।

जिस नभाटा से जागरण वाले इस हद दर्जे तक परेशान है, उसके लखनऊ से प्रकाशन से पहले ही सीएम अखिलेश यादव ने  उसे (नभाटा) को अपना इंटरव्यू दे डाला। और वह भी जागरण छोड़कर नभाटा के असिस्‍टेंट एडीटर बने नदीम को। नभाटा प्रबंधन ने सीएम अखिलेश यादव के इंटरव्‍यू को बहुत अच्‍छे डिस्‍प्ले के साथ 31 मई को दिल्‍ली एडीशन में छापा है। इसे आप क्‍या कहेंगे? क्या जागरण की असलियत अखिलेश यादव ने जान ली है या जागरण को अखिलेश यादव घर का अखबार मानते हैं इसलिए दूसरे अखबारों को इंटरव्यू देने में ज्यादा भरोसा रखते हैं?

जो भी हो, पर परसेप्शन तो यही है कि जागरण वाले अखिलेश को अपने रंग में रंग नहीं पाए। उधर, उन्हीं जागरण वालों का आदमी जो अब नभाटा के पाले में हैं, अखिलेश का इंटरव्यू करने में एक दिन में ही सफल हो गए और वह भी बिना लखनऊ एडिशन लांच हुए ही। यह जागरण वालों के लिए सोचने की बात है कि आखिर कहीं तो कुछ गड़बड़ है जिसके कारण उनकी धमक चमक फीकी पड़ती जा रही है। वो कहते हैं न कि जागरण वाले सब पाने के चक्कर में अपना जो कुछ ओरीजनल था, वो भी गंवा बैठे हैं। माया मिली न राम… जय श्री राम!!!!

नभाटा में छपा सीएम अखिलेश का इंटरव्यू पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- Akhilesh Yadav Interview

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

संवैधानिक अधिकार का हनन : अमिताभ ठाकुर के पीसी करने के आवेदन पर अब तक कोई निर्णय नहीं

आरटीआई से प्राप्त सूचना के अनुसार डीजीपी कार्यालय द्वारा आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के संवैधानिक और विधिक अधिकारों का हनन किया गया है. अमिताभ ने एसपी गोण्डा कार्यकाल के शस्त्र जॉच प्रकरण में कुछ पुलिस अधिकारियों द्वारा उन्हें फर्जी तरीके से आपराधिक मुकदमे में फंसाने के मामले में आईपीएस सेवा नियमावली के तहत मीडिया तक अपनी बात रखने की अनुमति मांगी थी. नियम के अनुसार आवेदन के 12 सप्ताह बाद ऐसे मामलों में स्वतः ही अनुमति मान ली जाती है.

अमिताभ ने 12 सप्ताह बीतने के बाद प्रेस वार्ता करने का निश्चय किया पर उन्हें एक दिन पूर्व रोक दिया गया. आरटीआई सूचना के अनुसार गृह सचिव जेपी गुप्ता के मौखिक निर्देश पर एसी शर्मा, तत्कालीन डीजी ने 12 सप्ताह बीतने के बाद बिना किसी अधिकार के ही विधि विरुद्ध तरीके से अमिताभ की प्रेस वार्ता पर रोक लगा दिया जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अवैध उल्लंघन है. इसके बाद भी 18 सप्ताह बीत चुके हैं पर ना तो अमिताभ के आवेदन पर कोई निर्णय हुआ है और ना ही यह अवैध रोक हटाया गया है. वास्तव में यह जबरा मारे, रोये ना दे वाली स्थिति है.

जानी मानी समाजिक कार्यकत्री डा. नूतन ठाकुर के एफबी वॉल से साभार.

जागरण में निशिकांत ठाकुर के दिन लदे! करीबियों में खलबली!!

विष्णु त्रिपाठी को दैनिक जागरण में दिल्ली-एनसीआर का संपादक बनाए जाने के बाद माना जा रहा है कि जागरण प्रबंधन ने चीफ जनरल मैनेजर निशिकांत ठाकुर की उल्टी गिनती शुरू कर दी है. सबसे पहले निशिकांत ठाकुर के करीबियों पर गाज गिरेगी जो निशिकांत ठाकुर के शह के कारण प्रमुख पदों पर हैं और करोड़ों की अवैध संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं. चर्चा है कि कविलाश मिश्रा पर सबसे पहले गाज गिरेगी. कविलाश निशिकांत ठाकुर के नजदीकी रिश्तेदार हैं और इन दिनों दिल्ली जागरण के हेड हैं.

कविलाश के अलावा पूरे एनसीआर में संपादकीय और गैर-संपादकीय के प्रमुख पदों पर निशिकांत के आदमी विराजे हैं. इनमें ज्यादातर निशिकांत के गृह प्रदेश बिहार से ताल्लुक रखते हैं. इन लोगों की जागरण में नियुक्ति किसी मेरिट के आधार पर नहीं बल्कि निशिकांत ठाकुर का करीबी या उनके गृह जिले का होने के नाते या रिश्तेदार होने के नाते या बिहार का होने के नाते या चरण छूने की प्रतिभा के कारण की गई है. इनमें से ज्यादातर लोग जब जागरण में नियुक्त हुए तो इनके पास संपत्ति के नाम पर केवल झोला था.

पर अब ये जागरण ब्रांड का उपयोग करके और निशिकांत का संरक्षण प्राप्त करके करोड़ों की संपत्तियों, मकानों, प्लाटों, दुकानों आदि के मालिक बन चुके हैं. ऐसा नहीं कि जागरण के मालिकान संजय गुप्ता आदि निशिकांत ठाकुर के इस मायाजाल को नहीं जानते. खूब जानते हैं. लेकिन वो कहा जाता है न कि जब आप किसी से कंपनी के लिए उगाही कराओगे, तो उसे भी खुद के लिए उगाही करने की छूट दोगे.

दैनिक जागरण के एनसीआर एडिशनों और इससे संबंधित जिलों में रखे गए लोग निशिकांत ठाकुर को रिपोर्ट करते हैं, खासकर रेवेन्यू के मामले में. पेड न्यूज से लेकर अन्य तरीकों से रेवेन्यू जनरेट करने का काम निशिकांत ठाकुर के निर्देशन में कुशलतापूर्वक एनसीआर के जिलों में चलता रहता है. दैनिक जागरण के मालिकान भी इस पर कुछ नहीं बोलते क्योंकि अंततः उनकी ही तिजोरी इससे भरती है.

इस प्रक्रिया में निशिकांत ठाकुर और इनके लोग अपने लिए भी काफी कुछ वारा-न्यारा कर डालते हैं. जो लोग इस काम में बाधक बनते हैं या रोड़ा अटकाते हैं, उन्हें निशिकांत एंड कंपनी ऐन-केन प्रकारेण निपटा देती हैं. ऐसे दर्जनों लोग हैं जो निशिकांत एंड कंपनी के सताए हुए हैं. इन सभी ने समय समय पर जागरण प्रबंधन को निशिकांत ठाकुर और इनके लोगों की सच्चाई बयान की पर जागरण के मालिकान कान में तेल डालकर बैठे रहे. सूत्रों का कहना है कि जागरण प्रबंधन अब निशिकांत और इनके लोगों को किनारे लगाने का मन बना चुका है.

इसी के तहत बड़ा व सख्त फैसला लेते हुए विष्णु त्रिपाठी को दिल्ली-एनसीआर के एडीशनों का संपादक बना दिया है. विष्णु त्रिपाठी मेरिट पर काम करने-कराने वाले पत्रकार हैं. इन्होंने अतीत में जब जब मेरिट के आधार पर सख्त फैसले लिए तब-तब निशाने पर निशिकांत ठाकुर के लोग ही आए. निशिकांत के करीबी लोग विष्णु त्रिपाठी को फूटी आंख नहीं देखना पसंद करते.

सूत्रों के मुताबिक निशिकांत की बढ़ती उम्र, घटती कार्यक्षमता और इनके नजदीकी लोगों के क्रियाकलाप के कारण जागरण ब्रांड पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के चलते प्रबंधन ने अंदरखाने इन्हें किनारे करने का फैसला लिया है. सूत्रों के मुताबिक विष्णु त्रिपाठी की राह आसान नहीं है क्योंकि निशिकांत के लोग एकजुट होकर कदम कदम पर उन्हें फंसाने परेशान करने की कोशिश करेंगे. पर प्रबंधन से अभयदान पाए और मेरिट के आधार पर काम करने के आदी विष्णु त्रिपाठी पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा और ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे जो जागरण में काम की बजाय अन्य कारणों से नौकरी चला रहे हैं. (कानाफूसी)

मूल खबर…

विष्‍णु त्रिपाठी बने दैनिक जागरण दिल्‍ली-एनसीआर के आरई

ताजा टीवी, पटना से ऑफिस मैनेजर समेत चार लोगों का इस्‍तीफा

ताज़ा टीवी के पटना ऑफिस से खबर है कि यहाँ से चार लोगों ने अपना इस्तीफा प्रबंधन को सौंप दिया है. एक अन्य कर्मचारी के भी जल्‍द ही इस्तीफा होने की खबर है. जिन चार लोगों ने प्रबंधन को अपना इस्तीफा भेजा हैं उनमें ऑफिस मैनेजर राकेश कुमार, वीडियो एडिटर राजीव रंजन, वीडियो एडिटर सुधांशु कुमार और ऑफिस का चपरासी नीलमणि पाठक के नाम शामिल हैं. राकेश कुमार इससे पूर्व इंडिया न्यूज़ में भी लम्बे समय तक काम कर चुके हैं.

खबर है कि एक अन्य कर्मचारी भी जल्द ही अपना इस्तीफा प्रबंधन को सौंपने की तयारी में है. सूत्रों के मुताबिक़ ताज़ा टीवी प्रबंधन काफी कम वेतन में ज़्यादा काम लेने के कारण सुर्खियों में रहा है. यहाँ कई रिपोर्टर और कैमरामेन ऐसे हैं, जो पिछले कई सालों से मात्र पांच हजार रुपये में काम करने को मजबूर हैं. जब वे इस बारे में बात करते हैं उन्हें हर बार प्रबंधन की ओर से वेतन बढ़ाने का केवल आश्‍वासन मिलता है. चैनल की शुरुआत के समय बिहार के तत्कालीन ब्‍यूरोचीफ चीफ दिनेश आनंद द्वारा ज्यादातर लोगों को नियुक्त किया गया था. श्री आनंद ने सभी के वेतन वृद्धि को लेकर कई बार मालिकों से बात की परन्तु कोई नतीजा न निकलता देख उन्होंने चैनल को बाय बोल दिया था. इन चारों का इस्‍तीफा प्रबंधन द्वारा कम वेतन दिए जाने की नाराजगी को माना जा रहा है.

पाकिस्तान पहुंचे डा. वेद प्रताप वैदिक बता रहे- यहां भारत के लिए है उत्साह

पिछले पांच दिनों में, जब से मैं लाहौर पहुंचा हूं, पाकिस्तान के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं से मेरी भेंट हो चुकी हैं. भावीप्रधानमंत्री मियां नवाज़ शरीफ और प्रांतों के मुख्यमंत्रियों से भी मिल चुका हूं. राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने मुझे कराची बुलाया और उन्होंने 'ज़रदारी हाउस' में मुझे स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन करवाया. उन्होंने अपने हाथ से मुझे सिंधी टोपी पहनाई और मोइन जोदड़ो का चादर उढ़ाया.

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी शुजात,  इमरान खान,  मुख्यमंत्री नज़्म सेठी, राज्यपाल मख्दूम तथा अनेक कश्मीरी पख्तून,  बलूच और सिंधी नेताओं से भी बात हुई. लाहौर के चेम्बर ऑफ कामर्स और जीमखाना क्लब में दर्जनों उद्योगपतियों और बुद्धिजीवियों से लंबे-लंबे संवाद भी हुए. पाकिस्तान के कई प्रसिद्ध टीवी और रेडियो के एंकर मुझे लगभग रोज़ इन्टरव्यू कर रहे हैं. कई पुराने विदेश मंत्रियों जैसे सरताज़ अजीज और खुर्शीद कसूरी आदि से व्यक्तिगत बातचीत हो रही है. बड़े संपादकों, प्रोफेसरों और फौज के सेवा-निवृत्त अफसरों से भी खुलकर बात हो रही है. 18 से 20 घंटे रोजाना की व्यस्तता के बावजूद थकावट महसूस नहीं हो रही है.

ऐसा क्यों हो रहा है? इसका रहस्य क्या है? शायद यह है कि पिछले 30 वर्षों से मैं लगातार पाकिस्तान आ रहा हूं लेकिन इस बार यहां भारत से संबंध-सुधार की जितनी आशा जगी है,  शायद पहले कभी नहीं जगी.मुझे अभी तक एक भी आदमी,  लाहौर या कराची में ऐसा नहीं मिला,  जिसका रवैया निषेधात्मक हो. हर तबके के लोग यही चाहते हैं कि मियां नवाज़ शरीफ के नेतृत्व में भारत और पाकिस्तान के सबंध ऐसे हो जाएं,   जैसे फ्रांस और जर्मनी के हैं. कल रात लाहौर के सबसे लोकप्रिय रेडियो चैनल एफ.एम. 95 (पंजाब रंग) ने मुझे लगभग एक घंटे इंटरव्यू किया. इस चैनल को लगभग 7-8 करोड़ लोग रोज सुनते हैं.बिजली-संकट के कारण टीवी चैनलों से ज्यादा श्रोता रेडियो चैनलों को मिल जाते हैं. कल इंटरव्यू के दौरान श्रोताओं ने इतनी बड़ी संख्या में कंप्यूटर और फोन पर मुझसे बात करनी चाही कि एंकर इफ्तिखारमलिक को उनसे माफी मांगनी पड़ी. एक श्रोता ने कहा कि मैं 'डॉक्टर साहब वैदिक' के लिए अल्लाह ताला से दुआ करने के लिए विशेष नमाज पढ़ूंगा.

मैंने अपनी सभी भेंट-वार्ताओं में पाकिस्तानी पत्र्कार-बंधुओं से कहा कि ''हॉ,   भारत बड़ा भाई है. हम यह मानते है. लेकिन वह 'दादा' नहीं है,  'भाई' है. वह 'बिग ब्रदर' नहीं है,  'एल्डर ब्रदर' है. अगर आप अपने बड़े भाई का सम्मान करेंगे तो वह आप पर अपना प्यार लुटाने में जरा भी कोताही नहीं करेगा.'' दो वरिष्ठ पत्रकारों ने,  जो भारत के प्रति कठोर रवैए के लिए जाने जाते हैं,  टीवी इंटरव्यू में मुझसे कश्मीर और सियाचिन के बारे में ज़रा तीखे सवाल पूछे. उन्होंने कहा कि आप कश्मीर को कब आजाद करेंगे? संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रस्ताव के मुताबिक उसे आत्म-निर्णय का अधिकार कब देंगे? मैंने उन्हें कहा कि आत्म-निर्णय का अधिकार और द्विराष्ट्रवाद (टू नेशन थ्योरी),  दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं,  क्योंकि आत्म-निर्णय के तहत कश्मीरी लोग भारत में भी मिल सकते हैं या बिल्कुल आजाद भी हो सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो जिन्ना साहब का सिद्धांत तो गल जाएगा,  क्योंकि उसके मुताबिक कश्मीर को सिर्फ पाकिस्तान में ही मिलना चाहिए. कश्मीर मुस्लिम इलाका है,  इसलिए उसे इस्लामी पाकिस्तान में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. मैंने एक बार प्रधानमंत्री बेनज़री भुट्टो से पूछा था कि ''आप अपने कश्मीर में पहले आत्म-निर्णय क्यों नहीं करवा लेंती? शर्मा-शर्मी में शायद फिर हमारे नेता भी तैयार हो जाएं.'' वे हंस पड़ीं लेकिन दूसरे दिन 'न्यूयार्क टाइम्स' में उन्होंने इसी सवाल का जवाब देते हुए साफ कहा कि ''हम, पाकिस्तानी सरकार, कश्मीर को तीसरा विकल्प नहीं दे सकते याने आजाद होने का हक नहीं दे सकते.''

वैसे जितने भी नेताओं से बात हुई सब ने यह बात दोहराई कि वे कश्मीर को डंडे के जोर से नहीं ले सकते. कश्मीर पर सबसे ज्यादा सख्त रवैया रखनेवाले बुजुर्ग पत्र्कार 'नवा-ए-वक्त' के मालिक मजीद नि़जामी साहब ने भी कहा कि 'यह मसला बातचीत से हल किया जाए.'उन्होंने कहा कि जब तक आप कश्मीर को आजाद नहीं करते,  मैं भारत में कदम भी नहीं रखना चाहता लेकिन पाकिस्तान के कई पूर्व प्रधानमंत्रियों और विदेश मंत्रियों तथा पाकिस्तानी कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री का रवैया बहुत रचनात्मक और व्यावहारिक था.

मुझे महसूस यह हुआ कि इस वक्त पाकिस्तान में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर है कि भारत के साथ आर्थिक संबंध घनिष्ट हों. एक दूसरे के लिए उनके बाज़ार खुले. एक-दूसरे के देशों में पूंजी लगाएं. कारखाने खोलें.आवाजाही बढ़े. वीज़ा आसानी से मिलें. मुझे लगता है कि मियां नवाज़ शरीफ 'सर्वाधिक अनुगृहीत राष्ट्र' का दर्जा भारत के लिए जल्दी ही घोषित कर देंगे,  हालांकि कृषि-लॉबी अपने लिए पहले बहुत-सी रियायतें चाहती हैं.

पाकिस्तान के लगभग हर नेता ने मुझसे पूछा कि क्या भारत की सरकार इतनी सक्षम है कि वह कुछ नई पहल कर सके. उनका मानना है कि भारत में चुनाव कभी भी हो सकते हैं. इसके अलावा बड़े-बड़े घोटालों ने सरकार की छवि चौपट कर दी है. कुछ नेताओं ने पूछा कि हम थोड़ा इंतजार करें तो कैसा रहे? मेरा जवाब था कि हमारी सरकार अभी एक साल से भी ज्यादा चलेगी. उसके गिरने के आसार बहुत कमहैं. इसके अलावा जहां तक पाकिस्तान का सवाल है,  उससे बात करने में वह पूर्ण सक्षम है. यदि भारत सरकार पाकिस्तान से संबंध सुधारने की कोई उचित पहल करेगी तो भारत के लगभग सभी दल उसका समर्थन करेंगे.

इस वक्त मियां नवाज़ शरीफ के सामने नई-नई समस्याएं,  खड़ी हो रही हैं. उन्होंने इधर तालिबान से शांति-वार्ता की पेशकश की और उधर अमेरिकी फौज ने 'ड्रोन' हमला कर दिया. उसमें तालिबान का बड़ा नेता वलीउल्लाह मारा गया. बात होती,  उसके पहले ही टूट गई. सउदी अरब से हजारों पाकिस्तानी बेरोजगार होकर लौट रहे हैं. बलूचिस्तान में अभी तक मुख्यमंत्री के नाम ही तय नहीं हो पा रहा है. बिजली का संकट गर्मी के कारण और भंयकर हो गया है. लेकिन स्वयं मियां नवाज़ औरपाकिस्तान की आम जनता को भरोसा है कि नई सरकार जैसे ही अगले सप्ताह अपना काम शुरु करेगी,  हालात में सुधार होगा. मुझे सबसे संतोषजनक बात यह लगी कि सभी पाकिस्तानी दलों के नेताओं ने मुझे भरोसा दिलाया कि आंतरिक मामलों में चाहें हमें मियां नवाज़ का विरोध करना पड़े लेकिन भारत से संबंध-सुधार के लिए वे जो भी पहल करेंगे, उसका हम खुलकर समर्थन करेंगे. मियां नवाज़ शरीफ और उनके भाई मियां शाहबाज़ शरीफ को मैंने भारत के कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों के अध्यक्षों के शुभकामना संदेश दिए और उनकी विजय पर भारत की आम खुशी जाहिर की तो उन्होंने भी कहा कि पाकिस्तान में भी भारत के लिए पूरा उत्साह है.  हम लोग मिलकर अब दक्षिण एशिया के इतिहास का नया अध्याय क्यों नहीं लिखें?

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क dr.vpvaidik@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

विष्‍णु त्रिपाठी बने दैनिक जागरण दिल्‍ली-एनसीआर के आरई

दैनिक जागरण से खबर है कि एसोसिएट एडिटर कम नेशनल आउटपुट हेड विष्‍णु त्रिपाठी का कद बढ़ा दिया गया है. अब उन्‍हें दिल्‍ली-एनसीआर का स्‍थानीय संपादक बना दिया गया है. इसके साथ ही विष्‍णु त्रिपाठी दिल्‍ली-एनसीआर के आठ यूनिटों के संपादक हो गए हैं. इन्‍हें यह यह अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी दी गई है. दिल्‍ली-एनसीआर के स्‍थानीय संपादक के रूप में विष्‍णु त्रिपाठी का नाम पब्लिश होगा. अब तक दिल्‍ली-एनसीआर के संपादक के रूप में संजय गुप्‍ता का नाम प्रकाशित होता आ रहा है. संजय गुप्‍ता का नाम समूह संपादक के रूप में प्रकाशित होता रहेगा. 

विष्‍णु त्रिपाठी दैनिक जागरण में इसके पहले भी महत्‍वपूर्ण पदों की जिम्‍मेदारी संभाल चुके हैं. अभी तक वे नेशनल आउटपुट देखने के साथ ग्रुप के सभी प्रोडक्ट्स के बीच एडिटोरियल कोआर्डिनेशन की जिम्‍मेदारी भी संभाल रहे थे. वे सीएनटी की जिम्‍मेदारी भी संभाल चुके हैं. मूल रूप से कानपुर के रहने वाले विष्‍णु त्रिपाठी लम्‍बे समय से दैनिक जागरण से जुड़े हुए हैं तथा ग्रुप एडिटर संजय गुप्‍ता के खास माने जाते हैं. उन्‍हें दिल्‍ली-एनसीआर का स्‍थानीय संपादक बनाकर संजय गुप्‍ता ने इसकी पुष्टि भी कर दी है.

ईडी ने जगन की मीडिया कम्पनी जगती पब्लिकेशन के 34 करोड़ जब्त किए

नई दिल्ली : प्रवर्तन निदेशालय ने जेल में बंद वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगनमोहन रेड्डी की मीडिया कम्पनी के 34 करोड़ रुपये से ज्यादा की सावधि जमा राशि को जब्त कर लिया है। रेड्डी एवं अन्य के खिलाफ मनी लांड्रिंग जांच के सिलसिले में यह राशि जब्त की गई।

इसके साथ ही एजेंसी ने जगन एवं अन्य की 300 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति को जब्त किया है। जगन एवं अन्य की आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई संयुक्त रूप से कर रही है। 34.66 करोड़ रुपये हैदराबाद के ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स की जुबली हिल शाखा में जगती पब्लिकेशन लिमिटेड के नाम से जमा है। यह कम्पनी आंध्रप्रदेश में कडप्पा के सांसद के स्वामित्व वाली है।

प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत प्रवर्तन निदेशालय अवैध तरीके से या अपराध से प्राप्त संपत्ति से वंचित करने के लिए जब्ती की कार्रवाई करता है। मामले के जांच अधिकारी की तरफ से जारी इस आदेश को 180 दिनों के अंदर पीएमएलए की अपीलीय प्राधिकार के समक्ष चुनौती दी जा सकती है। आदेश के मुताबिक प्रवर्तन निदेशालय ने जब्त सावधि जमा संपत्ति को ‘अपराध से प्राप्त’ के तौर पर पहचान की।

जगन पिछले कुछ दिनों से आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल में बंद हैं और सुप्रीम कोर्ट ने हाल में उनकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। इस मामले की जांच दोनों एजेंसियां संयुक्त रूप से कर रही हैं। (एजेंसी)

आजतक के पत्रकार की गिरफ्तारी का मामला : झांसी में अनशन कर रहे मीडियाकर्मियों पर जानलेवा हमला

: दारोगा की शह पर रची गई पत्रकारों को फर्जी फंसाने की साजिश : पुलिस ने क्रास एफआईआर दर्ज किया : अखिलेश सरकार की पुलिस अब पत्रकारों को आतंकी बनाने पर तुल गई है. झांसी से खबर है कि आजतक के पत्रकार अमित श्रीवास्‍तव को फर्जी फंसाए जाने के विरोध में धरना दे रहे पत्रकारों पर जानलेवा हमला किया गया. पुलिस ने आरोपियों पर सीधी कार्रवाई करने की बजाय क्रास एफआईआर दर्ज कर लिया है. खबर है कि यह सब काम पुलिस की शह पर किया जा रहा है. पुलिस ने जनसंदेश टाइम्‍स एवं आईबीएन7 से जुड़े शकील हाशमी को भी गलत तरीके से डीटेन करके रखा हुआ है. पत्रकारों को उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है.

खबर के मुताबिक ईलाइट चौराहे पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्लब के अध्यक्ष शकील अली हाशमी, लक्ष्मी नारायण शर्मा, संतोष पाठक, सत्तार खान, जावेद असलम, एस एस झा, मो. इमरान, तारिक इकबाल शीबू, नीरज जैन, अजय झां, संजय सिन्हा, प्रमेन्द्र कुमार वर्मा, संजय सिन्हा, विनोद सुडेले, संजय गुप्ता, नंदकिशोर नंदू, परवेज आलम, विकास शर्मा, मनीष श्रीवास्तव, हनीफ खान, सुरेन्द्र कुमार, विनोद गौतम, शेख शमीम, उमेश शर्मा पत्रकार धरना और अनशन कर रहे थे.

इसी बीच पवन झा और नासिर नाम के दो व्‍यक्ति अनशन स्‍थल पर पहुंचते हैं, जो साप्‍ताहिक अखबार में पत्रकारिता का चोला पहले हुए हैं, बिना बात के हवाई फायर झोंक देते हैं. रिवाल्‍वर से दो फायर होते ही वहां खलबली मच जाती है. इसके बाद जब ये पत्रकारों पर सीधा निशाना साधने की तैयारी करते हैं तो मौके पर मौजूद स्‍थानीय लोगों ने दोनों को पकड़ लिया. इस के बाद पिटाई कर दी. पत्रकार इन दोनों को खुद पकड़कर पुलिस के पास ले गए तथा पिस्‍टल तथा गोलियां बरामद कराईं. वैसे आरोप है कि ये दोनों पुलिस की शह पर ही पत्रकारों का अनशन बिगाड़ने पहुंचे थे.

आरोपियों के पास से बरामद रिवाल्‍वर भी किसी दूसरे का बताया जा रहा है. इतना होने के बाद भी पुलिस सीधी एफआईआर दर्ज करने की बजाय क्रास एफआईआर दर्ज लेती है. बताया जाता है कि इसके बाद पुलिस रात को फोर्स के साथ अनशन स्‍थल पर पहुंचती है और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया क्‍लब के अध्‍यक्ष शकील अली हाशमी को बात करने के बहाने बुलाकर जबरिया जीप में लादकर ले जाती है. पत्रकारों को अब तक पता नहीं है कि शकील हाशमी को पुलिस ने कहां रखा है. हालांकि बताया जा रहा है कि शकील को पुलिस अरेस्‍ट करके कोर्ट में पेश करने वाली है. झांसी के पत्रकारों में जबर्दस्‍त नाराजगी है.

बताया जा रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे मौजूद दारोगा जेपी यादव प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव का रिश्‍तेदार है, लिहाजा पुलिस के बड़े अधिकारी भी उसके खिलाफ कार्रवाई करने से डर रहे हैं. इसी का परिणाम है कि झांसी का एक कोतवाली इंस्‍पेक्‍टर नहीं बल्कि दारोगा चला रहा है. पिछले एक साल के अंदर प्रदेश में जिस तरीके से पत्रकारों का उत्‍पीड़न किया जा रहा है उससे आपात काल जैसी स्थिति पैदा होती दिख रही है. पुलिस अपने कारस्‍तानी के खिलाफ उठने वाली हर आवाज दबाने को तत्‍पर है. निरंकुशता की हद तक जा रही पुलिस की कीमत सपा को लोकसभा चुनावों में जरूर भुगतना पड़ेगा. 


इस पूरे मामले के बारे में जानने के लिए नीचे दिए गए लिंकों पर क्लिक करें –

अमित को फंसाए जाने के विरोध में अनशन पर बैठे झांसी के पत्रकार

रेप के प्रयास के आरोप में आजतक का पत्रकार अरेस्‍ट

यूपी में एक और पत्रकार पुलिसिया उत्‍पीड़न का शिकार

आजतक के रिपोर्टर अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज

हिंदुस्‍तान, उत्‍तराखंड : इंक्रीमेंट से मिली खुशी, प्रमोशन ने दिया गम

हिंदुस्‍तान में इंक्रीमेंट और प्रमोशन का सिलसिला जारी है. उत्‍तराखंड से खबर आ रही है कि यहां इंक्रीमेंट को लेकर लोगों में खुशी है वहीं प्रमोशन को लेकर गम का माहौल बना हुआ है. हालांकि दिल्‍ली के सूत्रों के हवाले से जो खबर मिल रही है, उससे जाहिर है कि हिंदुस्‍तान मैनेजमेंट ने इस बार पूरे समूह में प्रमोशन देने में कंजूसी बरती है. दिल्‍ली में 125 लोगों की टीम में मात्र तीन लोगों को प्रमोट किया गया है. कानपुर में भी लगभग 54 लोगों की टीम में तीन, लखनऊ में भी तीन एवं उत्‍तराखंड में भी तीन लोगों को प्रमोट किया गया है.

उत्‍तराखंड में तीन लोगों को प्रमोशन मिला है. जबकि कम से कम आधा दर्जन लोग अपने को प्रमोशन की लाइन में मान रहे थे. सूत्र बता रहे हैं कि देहरादून के संपादक गिरीश गुरनानी तमाम कोशिशों के बाद तीन से ज्‍यादा लोगों का प्रमोशन नहीं करा पाए क्‍योंकि कंपनी ने इस बार कम लोगों को प्रमोट करने की पॉलिसी अपना रखा है. हालांकि इसके पीछे कारण यह भी बताया जा रहा है कि उत्‍तराखंड में चीफ सब लेबल स्‍तर के कम से कम एक दर्जन स्‍टाफ हैं, जो मैनेजमेंट के हिसाब से ज्‍यादा हैं. इसके अलावा आधा दर्जन की संख्‍या में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट, डीएनई और एनई मिलाकर हैं. बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने संपादक के चाहने के बावजूद चीफ सब एडिटर के लेबल में एक भी प्रमोशन नहीं किया है.

वैसे भी उत्‍तराखंड में जिन तीन लोगों को प्रमोट किया गया है वे सब एडिटर लेबल के हैं. देहरादून में पवन कुमार तथा हल्‍द्वानी में बी भट्ट एवं हरीश बिष्‍ट को प्रमोट करके सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. सूत्रों ने बताया कि खुद को प्रमोशन की कतार में मानने वाले लोग प्रमोशन लिस्‍ट देखकर असंतुष्‍ट थे, लेकिन स्‍थानीय संपादक गिरीश गुरनानी ने अपने नेतृत्‍व क्षमता का परिचय देते हुए इन लोगों को मना लिया है. उत्‍तराखंड के लगभग पांच दर्जन कर्मचारियों के प्रमोशन का गम इंक्रीमेंट ने दूर कर दिया है. खबर है कि पिछली बार इंक्रीमेंट से भी असंतुष्‍ट लोग इस बार के इंक्रीमेंट से संतुष्‍ट और खुश हैं. औसतन दस फीसदी तक इंक्रीमेंट मिला है.  

इंक्रीमेंट ने कर्मचारियों का विश्‍वास भी संपादक के ऊपर बढ़ा दिया है. अन्‍य संपादकों की तर्ज पर गिरीश गुरनानी अमर उजाला से अपनी टीम लेकर नहीं आए बल्कि उन्‍होंने हिंदुस्‍तान के ही पुराने लोगों पर विश्‍वास करते हुए उन्‍हें काम करने का मौका दिया. इसी का परिणाम है कि कर्मचारी अब संपादक की बात मानने और समझने लगे हैं. सूत्रों ने बताया कि गिरीश गुरनानी ने पिछले कुछ समय में आधा दर्जन से अधिक स्ट्रिंगरों को कनफर्म किया है, इसके चलते भी संस्‍थान से जुड़े पत्रकार मेहनत से काम कर रहे हैं. उन्‍हें उम्‍मीद है कि देर सबेर काम देखकर उन्‍हें भी कनफर्म किया जा सकता है. स्ट्रिंगरों एवं रिटेनरों की मेहनत अखबार में भी दिखने लगी है. हालांकि किन स्ट्रिंगरों को कनफर्म किया गया है उनके नाम की जानकारी नहीं मिल पाई है.

4रीयलन्यूज में यूपी फ्रेंचाइजी को लेकर जूतम पैजार, यश मेहता समेत कई को नोटिस भेजा धीरज गिरी ने

आजकल न्यूज चैनल खोल कर पैसे बनाने के लिए किसी का कुछ भी हड़प लेने का खेल बहुत तेजी से जारी है. मजेदार है कि ढेर सारे मूर्ख लोग पैसे लिए टहल भी रहे हैं जिन्हें आसानी से न्यूज चैनल वाले बेवकूफ बना कर पैसे हड़प ले रहे हैं और उन्हें चैनल से भी भगा दे रहे हैं. साधना न्यूज तो इस काम में पारंगत है. अभी हाल फिलहाल लगभग साठ लाख रुपये की ठगी साधना न्यूज वालों ने मध्य प्रदेश की एक पार्टी से की.

यह पार्टी एसएन विनोद के चलते चैनल से जुड़ी थी और एमपी छत्तीसगढ़ की फ्रेंचाइजी ली थी, इसलिए एसएन विनोद ने अपनी साख दांव पर लगाकर और साधना प्रबंधन से लड़ भिड़कर इनके साठ लाख रुपये वापस करा दिए. पर कल्पना कीजिए, अगर एसएन विनोद न होते तो इन लोगों के साठ लाख रुपये डूब गए होते.

ऐसा ही कुछ खेल 4रीयल न्यूज ने चला रखा है. इस चैनल की यूपी फ्रेंचाइजी धीरज गिरी को दी गई. धीरज ने लाखों रुपये जमा भी कर दिए, पर बाद में इन्हें कुछ न मिला, न चैनल की यूपी फ्रेंचाइजी का अधिकार और न ही अपना पैसा. ऐसे में उन्होंने चैनल के सीईओ यश मेहता, एचआर हेड रवि किरण और चैनल हेड दीपक सैनी को लीगल नोटिस भेजा है.

नीचे जो सबसे पहला पत्र है वह 4रीयल न्यूज की तरफ से धीरज गिरी को दिया गया है जिससे पता चलता है कि धीरज को 4रीयल न्यूज ने अपने से जोड़ा था. उसके बाद लीगल नोटिस है जो धीरज गिरी के वकील ने 4रीयल न्यूज के मैनेजमेंट को भेजा है.


फ्रेंचाइजी देने या चैनल पार्टनर बनाने या किसी अन्य नाम पर अगर किसी न्यूज चैनल वाले ने आपको भी लूटा है तो फौरन अपनी राम कहानी लिखकर भड़ास के पास भेजें ताकि इसे सूचना और प्रसारण मंत्रालय पहुंचा कर संबंधित चैनलों की गुंडागर्दी पर लगाम लगवाया जा सके. भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

दैनिक जागरण ने शिक्षामित्र को बनाया अमेठी का ब्‍यूरोचीफ

दैनिक जागरण समाचार पत्र के कानपुर संस्करण के लिए अमेठी जिले के मुख्यालय गौरीगंज में खोले गये कार्यालय पर गौरीगंज के निवासी दिलीप सिंह को ब्यूरो चीफ नियुक्त किया गया है। हालांकि दिलीप की नियुक्ति को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। दिलीप शिक्षा मित्र के रूप में कार्यरत हैं तथा सरकार से इसके लिए मानदेय भी प्राप्‍त कर रहे हैं। आरोप है कि दिलीप की नियुक्ति के समय जागरण प्रबंधन ने इस तथ्‍य की अनदेखी की है।

सवाल यह भी उठाए जा रहे हैं कि कोई व्‍यक्ति दो जगह से वेतन कैसे उठा सकता है और सरकार की नौकरी करने वाला व्‍यक्ति जिला प्रशासन की कमियों को कैसे उजागर करेगा। कैसे खबरें लिखने की हिम्‍मत जुटा सकेगा। दिलीप गौरीगंज ब्लाक के प्राइमरी पाठशाला गूजरटोला में शिक्षा मित्र के रुप में कार्यरत हैं। शिक्षा मित्र और ब्यूरो चीफ के रूप में दो संस्थानों से वेतन लेने के अनैतिक काम करने वाला कदाचारी किस मुंह से नैतिकता की बात करेगा और अपनी कलम से ईमानदारी पूर्वक अपने कर्तव्‍यों का निर्वहन कर सकेगा।

आरोप लगाया जा रहा है कि इसके अलावा भी तमाम तरह के धंधे करने वाला पत्रकार निष्‍पक्ष, निर्भीक और स्वच्छ पत्रकारिता कैसे कर सकता है। हाल ही में दैनिक जागरण समूह ने दिलीप को प्रमोट करके जूनियर सब एडीटर बनाया है। प्रश्न यह है कि क्या जागरण समूह के पास अमेठी के लिए इनसे योग्य कोई नहीं बचा है?

मेरे जीवन का सबसे यादगार क्षण था उन पांच पत्रकारों को सम्मानित करना

Arvind K Singh : हिंदी पत्रकारिता दिवस 2013 पर मैं जौनपुर पत्रकार संघ के आमंत्रण पर एक वक्ता के तौर पर गया लेकिन वहां पत्रकार मित्रों के स्वागत-सत्कार से अभिभूत होकर लौटा..अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल श्री माता प्रसाद और विख्यात लेखक चंचलजी का मंच पर सानिध्य होगा मुझे पता नहीं था..अनुज हेमंत, जौनपुर पत्रकार संघ के अध्यक्ष ओमप्रकाशजी और उनकी टीम ने आयोजन को यादगार बना दिया..इनके बीच मैं मुख्य वक्ता था…

मुझे अभिनंदन पत्र दिया गया तो यह भी मुझे हैरान करने वाला था …लेकिन मेरे जीवन का सबसे यादगार क्षण था उन पांच पत्रकारों को सम्मानित करना जिन्होंने जीवन भर हिंदी पत्रकारिता की सेवा की..उनमें दो लोगों को तो बचपन से जानता था मैं..इनको सम्मानित करते हुए मैं खुद को सम्मानित महसूस कर रहा था..जमीन पर काम करने वाले यही पत्रकार दरअसल हिंदी पत्रकारिता की रीढ़ हैं…रायबरेली में भी यही दोहराया गया लेकिन यह कहानी फिर…

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

दैनिक भास्‍कर शरद गुप्‍ता के नाम से भानुप्रताप शुक्‍ल की भाषा बोलता दिख रहा

Abhishek Srivastava : फरवरी 2002 में जब गुजरात के मुस्लिमों को चुन-चुन कर मारा जा रहा था, तब बनारस में संकटमोचन के पास एक चाय की दुकान पर दैनिक जागरण के संपादकीय पन्‍ने पर नज़र गई थी। मुख्‍य लेख भानुप्रताप शुक्‍ल का था, जिसका हाइलाइटर तकरीबन कुछ यूं था: ''भारत मां के सपूतों, कहां हो। आओ और बाबर की इन संतानों का नाश करो।''

बीच के वक्‍फे में वरुण गांधी के हास्‍यास्‍पद ''जय श्रीराम'' को छोड़ दें, तो 11 साल बाद 31 मई 2013 का दैनिक भास्‍कर अपने एक वरिष्‍ठ संपादक शरद गुप्‍ता के नाम से भानुप्रताप शुक्‍ल की भाषा बोलता दिख रहा है। ऐसी ही घृणित भाषा पिछले हफ्ते भोपाल के किन्‍हीं संजय द्विवेदी और रायपुर के किन्‍हीं अनिल पुसदकर की देखी गई है।

इन नामालूम व्‍यक्तियों पर बात बाद में, लेकिन एक संस्‍थान के तौर पर दैनिक भास्‍कर चाहे जितना गिरा हुआ हो, पर देश को मिलिटरी स्‍टेट में तब्‍दील करने की हिमायत कैसे कर सकता है? क्‍या इसलिए, कि धरमजयगढ़ में खुद उसकी खदानों को आदिवासियों से चुनौती मिल रही है? क्‍या इसलिए, कि कोयला घोटाले में अपना नाम आने से रोकने के लिए वह सरकार को खुश कर सके?

क्‍या इसलिए कि अखबार का एक वरिष्‍ठ दलाल प्रधानमंत्री के विदेश दौरे पर पीआईबी पत्रकार बनकर आगे भी विमान में साथ जाता रहे और अग्रवाल परिवार के पाप गलत करता रहे? हिंदुस्‍तान और संडे इंडियन में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके संघी पृष्‍ठभूमि के शरद गुप्‍ता जैसे पत्रकार आखिर अपने मगज को क्‍या पूरी तरह बेच चुके हैं?

उन्‍हें क्‍या लगता है कि आज मालिकान के हितों को बचाने के लिए वे जिस जहरीले ''दृष्टिकोण'' का प्रचार कर रहे हैं, वह उन्‍हें अग्रवालों से आजीवन पेंशन दिलवाता रहेगा? सवाल उन ''कायदे के पत्रकारों'' से भी उतना ही है जो 31 मई के बाद भी भास्‍कर की नौकरी मुसल्‍सल बजा रहे हैं? सवाल जनसत्‍ता से भी है जिसने दैनिक भास्‍कर के खिलाफ एक पत्रकार का लेख छापने से पिछले दिनों मना कर दिया?

सवाल उनसे भी जिन्‍होंने 31 मई का दैनिक भास्‍कर पढ़ा और निराकार भाव से काम पर निकल गए? शुक्रिया Pankaj Srivastava जी का, जिन्‍होंने इस पर चिंता तो ज़ाहिर की। अगर सबसे ज्‍यादा राज्‍यों में पढ़ा जाने वाला अखबार इस देश को मिलिटरी स्‍टेट ही बनाना चाह रहा है, तो मामला वाकई गंभीर है।

तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

दैनिक जागरण, गोरखपुर में व्‍यापक फेरबदल, एक दर्जन हुए इधर-उधर

दैनिक जागरण, गोरखपुर से खबर है कि यहां व्‍यापक फेरबदल किया गया है. देवरिया के प्रभारी देवेंद्र ओझा को गोरखपुर बुला लिया गया है. गोरखपुर में तैनात मनोज मिश्रा को देवरिया का नया प्रभारी बनाया गया है. महाराजगंज से महेंद्र त्रिपाठी का तबादला बस्‍ती कर दिया गया है. इन्‍हें बस्‍ती का प्रभारी बनाया गया है. आनंद नगर से विश्‍व दीपक त्रिपाठी को महाराजगंज का प्रभारी बनाकर भेजा गया है. 

कुशीनगर के प्रभारी आशीष को गोरखपुर बुला लिया गया है. अजय शुक्‍ल को कुशीनगर का नया प्रभारी बनाया गया है. बस्‍ती से दिनेश कसेरा को गोरखपुर बुला लिया गया है. गोरखपुर डेस्‍क से त्रिलोकी नाथ पांडेय को सिद्धार्थनगर में रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया गया. सिद्धार्थनगर में ब्रजेश पांडेय प्रभारी बने रहेंगे. गोरखपुर डेस्‍क पर तैनात आरपी सिंह को संतकबीरनगर रिपोर्टिंग में भेजा गया है. अनिल पथिक का तबादला कुशीनगर से महाराजगंज कर दिया गया है. वे यहां रिपोर्टिंग करेंगे. गोरखपुर डेस्‍क पर तैनात कौशल तिवारी को भी महाराजगंज रिपोर्टिंग में भेजा गया है. गोरखपुर डेस्‍क से श्‍याम नारायण भट्ट को बस्‍ती में डेस्‍क पर भेजा गया है.

सोएपुर शराबकांड में पत्रकार पवन सिंह समेत चार को हाई कोर्ट की नोटिस

बनारस के चर्चित सोयेपुर शराब कांड के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के आदेश के खिलाफ की गयी अपील में उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने मामले के आरोपितों जनसंदेश टाइम्‍स के पत्रकार पवन सिंह, वंश नारायण राजभर, अजय गुप्ता व सुरेश पाल को नोटिस जारी किया है। हाई कोर्ट से नोटिस जारी होने के बाद इन लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

मामले के अनुसार कैंट थानान्तर्गत सोयेपुर गांव में 16 फरवरी 2010 को जहरीली शराब पीने से 27 लोगों की मौत हो गयी थी, जिसमें महेश जायसवाल समेत अन्य आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। बाद में महेश जायसवाल की पत्नी नीतू जायसवाल ने अदालत के माध्यम से पवन सिंह, वंश नारायण राजभर, अजय गुप्ता व सुरेश पाल के खिलाफ आईपीसी की धारा 304, 272, 386 व 387 के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। इस मुकदमे में उसने आरोप लगाया था कि उसके पति महेश जायसवाल सोयेपुर में जमीन खरीदने-बेचने का काम करते हैं। इन आरोपितों ने उनसे 20 लाख रुपये व चार बिस्वा जमीन की मांग की थी, मांग पूरी नहीं करने पर फर्जी मुकदमे में फंसाने की धमकी दी थी।

नीतू ने कोर्ट को बताया कि इस पर प्रार्थिनी ने आईजी से शिकायत की थी। इस शिकायत से नाराज होकर उक्त आरोपितों ने साजिश के तहत सोयेपुर शराब कांड को अंजाम देते हुए फर्जी तौर पर मेरे पति को फंसा दिया। इस मामले में कैंट पुलिस ने सभी आरोपियों को क्लीन चिट देते हुए अदालत में फाइनल रिपोर्ट प्रेषित कर दिया था। इस बात की जानकारी जब नीतू को हुई तो उसने अदालत में प्रोटेस्ट दाखिल किया। प्रोटेस्ट पर सुनवाई के बाद अदालत ने चारों आरोपितों को तलब किया और धारा 388 व 506 में विचारण हेतु 18 जुलाई 2013 की तिथि नियत किया है। इस आदेश से क्षुब्ध नीतू जायसवाल ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद के समक्ष याचिका दाखिल की और आरोपियों पर 304, 272, 386 एवं 387 लगाए जाने की मांग की। इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एससी अग्रवाल ने चारों आरोपितों को चार सप्ताह में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने को कहा है।

स्टील मंत्रालय के करोड़ों रुपए बेनी ने निजी फायदे में फूंके, सीबीआई जांच होगी

केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा बुरी तरह फंस गए हैं। अपने चुनाव क्षेत्र गोंडा और अपने बेटे के चुनाव क्षेत्र बाराबंकी में स्टील मंत्रालय के पैसों की जमकर बर्बादी करने के मामले में स्टील मंत्रालय की संसदीय समिति ने उन्हें लपेटे में ले लिया है। समिति ने बेनी प्रसाद वर्मा और उनके मंत्रालय को पद के दुरुपयोग का दोषी करार देते हुए केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच कराने की सिफारिश कर दी है।

इसके साथ ही बेनी वर्मा के इशारे पर बाराबंकी और गोंडा में स्टील मंत्रालय के करोड़ों फूंक देने वाले अफसरों के खिलाफ भी कड़ी विभागीय कार्यवाही की सिफारिश की गई है। ध्यान देने वाली बात यह है कि स्टील मंत्री बेनी वर्मा ने अपने मंत्रालय के करोड़ों रुपए बाराबंकी व गोंडा में खुद के फायदे के लिए फूंक डाले थे। उन्होंने इस पैसे से खुद का स्कूल तक बनवा लिया।

अपने बेटे के चुनाव क्षेत्र में करोड़ों रुपए स्कूल, कालेज, सड़कों और पुल के नाम पर कागजों में खर्च कर दिए। मगर हकीकत में काम न के बराबर हुआ। स्टील मंत्रालय की संसदीय समिति ने इसी गोरखधंधे की जांच करके अपनी रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट के आने के बाद बेनी भारी मुश्किल में फंस सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बैनर्जी की अगुवाई वाली स्टील एवं कोल
मंत्रालय की संसदीय समिति ने मंत्रालय के अफसरों से पूछताछ करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट के तथ्य बेनी प्रसाद वर्मा के निजी फायदे के लिए स्टील मंत्री पद के गंभीर दुरुपयोग की पूरी कहानी बयां करते हैं। रिपोर्ट में लिखा है कि स्टील मंत्रालय ने स्टील मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को संतुष्ट
करने के लिए मंत्रालय के फंड का जमकर दुरुपयोग किया।

स्टील मंत्रालय के सीएसआर फंड का पैसा यूपी के दो जिलों गोंडा और बाराबंकी में अंधाधुंध तरीके से खर्च किया गया, जबकि वहां स्टील के प्लांट और प्रोजेक्ट दोनो ही नदारद हैं। सीएसआर फंड का मतलब स्टील मंत्रालय के कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलटी फंड से है जो देश के उन हिस्सों की गरीब व पिछड़ी जनता के विकास के लिए होता है, जहां स्टील मंत्रालय के प्लांट्स व यूनिटें हैं। संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक इन जरूरत वाली जगहों की उपेक्षा कर स्टील मंत्रालय की करोड़ों की धनराशि स्टील मंत्री को संतुष्ट करने की खातिर इन दो जिलों मे फूंक दी गई।

मई 2013 यानि इसी महीने तैयार हुई यह रिपोर्ट बेनी वर्मा समेत स्टील मंत्रालय के अधिकारियों के होश उड़ा देने के लिए काफी है। बेनी की करतूतों का जिक्र करते हुए इस रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2012-13 में देश भर में कुल 64 करोड़ रुपए सेल यानि स्टील अथारिटी आफ इंडिया के सीएसआर फंड में खर्च किए गए। हैरानी की बात यह है कि इसमें से अधिकतम धनराशि यूपी के सिर्फ एक जिले यानि बाराबंकी में ही खर्च कर दी गई। सबूतों की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि बाराबंकी में एक भी स्टील प्लांट नहीं है, इसके बावजूद स्टील मंत्रालय के कामकाज के इलाकों की गरीब पिछड़ी जनता की भलाई के लिए जुटाए गए करोड़ों रुपए महज बेनी की मिजाज पुर्सी में फूंक डाले गए।

संसदीय समिति को इस बात की भी जानकारी मिली कि यूपी में साल 2012-13 के बीच सेल ने सीएसआर फंड के मद से 90.6 फीसदी धनराशि केवल बाराबंकी, गोंडा और बलरामपुर में खर्च कर दी। मतलब यूं कि कुल 8,19,98,180 रुपए में से 7,43,32,180 रुपए बेनी की सनक की भेंट चढ़ गए।

स्टील मंत्रालय की हर कंपनी पर बेनी का ग्रहण

बेनी ने सिर्फ स्टील अथारिटी आफ इंडिया को ही अपनी सनक का शिकार नहीं बनाया बल्कि संसदीय समिति के मुताबिक स्टील मंत्रालय की हर कंपनी को बेनी का मिजाज ठीक रखने की भारी कीमत चुकानी पड़ी। स्टील मंत्रालय की एक और कंपनी एनएमडीसी यानि नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कार्पोरेशन ने सीएसआर फंड के तहत यूपी में कुल 7 प्रोजेक्ट लिए जिसमें से 5 प्रोजेक्ट केवल गोंडा और बाराबंकी के खाते में डाल दिए गए। इसका मतलब यह कि कुल 97 फीसदी रकम इन्हीं दो जिलों में खर्च कर दी गई। इसी तरह से स्टील मंत्रालय की नागपुर स्थित कंपनी MOIL यानि मैंगनीज ओर लिमिटेड से भी 83,38,000 की रकम गोंडा में फूंक दी गई।

बेनी ने स्टील मंत्रालय में कुछ भी नही छोड़ा

स्टील मंत्रालय के पैसों की बर्बादी की यह कतार खासी लंबी है। इसी तर्ज पर स्टील मंत्रालय की एक कंपनी मेकान लिमिटेड से भी बाराबंकी, गोंडा और बलरामपुर में साल 2012-13 के बीच 31,56,786 रुपए खर्च कर दिए गए। स्टील मंत्रालय की ही एक कंपनी एमएसटीसी के मामले में तो बेनी की शह पर कमाल ही हो गया। कंपनी के सीएसआर फंड की 70 फीसदी रकम सिर्फ बाराबंकी में एक कम्युनिटी सेंटर बनाने में खर्च कर दी गई। बाकी की 30 फीसदी रकम पश्चिम बंगाल में 16 अलग लग प्रोजेक्टों में खर्च की गई। यह तब किया गया जबकि एमएसटीसी कंपनी का यूपी में एक राई रत्ती भर का भी काम नहीं है। इसी तरह से स्टील मंत्रालय की एक और कंपनी हिंदुस्तान स्टील वर्क कंस्ट्रक्शन लिमिटेड यानि एचएससीएल के खाते से 18 लाख की रकम बाराबंकी में रोड के नाम पर फूंक दी गई, रोड का क्या हुआ, ये कहानी भी बेहद ही दिलचस्प है।

स्टील मंत्रालय के चुनाव के लिए नहीं है सीएसआर फंड

संसदीय समिति ने खास तौर पर इस बात का संज्ञान लिया है कि सीएसआर फंड को स्टील मंत्री के चुनाव क्षेत्र में खर्च कर दिया गया  जबकि वहां पर स्टील के न तो कोई बड़े प्लांट हैं और न ही कोई प्रोजेक्ट हैं। समिति ने इसे सीधे तौर पर मंत्रालय की ओर से आफिस के दुरुपयोग का मामला करार दिया जो केवल मंत्री को संतुष्ट करने की खातिर किया गया।

राष्ट्रीय हित के साथ खिलवाड़

बेनी वर्मा के मामले में संसद की इस समिति की कुछ टिप्पणियां बेहद ही गंभीर हैं। समिति ने साफ तौर पर कहा है कि स्टील मंत्रालय की इन कंपनियों ने नियम कायदों को ताक पर रखकर अपनी गतिविधियां कीं। कंपनियों की यह हरकत राष्ट्र के हितों के सख्त खिलाफ है।

बेटे के मोह में धृतराष्ट्र बने बेनी

संसदीय समिति ने बेनी वर्मा के इशारे पर हुई स्टील मंत्रालय के पैसों की बर्बादी की जो कलई खोली है, उसके पीछे की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। बेनी वर्मा के इशारों पर यह धनराशि साल 2011 के अंतिम महीनों में विशेष तौर पर बाराबंकी के दरियाबाद इलाके में खर्च के लिए स्वीकृत की गई। इसी इलाके से बेनी के बेटे राकेश वर्मा ने कांग्रेस के टिकट पर यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ा था। राकेश वर्मा को चुनाव जिताने के लिए बेनी ने स्टील मंत्रालय के पैसों की दरियाबाद और उसके आस पास के इलाकों में जमकर बंदरबाट की। स्कूलों को पैसा बांटा गया, सड़क, पुल के नाम पर करोड़ों का खर्च घोषित कर दिया गया। मगर चुनाव के नतीजे बेनी की उम्मीदों के खिलाफ रहे और राकेश वर्मा बुरी तरह चुनाव हार गए।

बेटे के चुनाव हारते ही बेनी भूले वायदे

बेटे के चुनाव हारते ही बेनी ने दरियाबाद इलाके से किनारा कर लिया। स्टील मंत्रालय के पैसों से जो स्कूल स्वीकृत किए गए थे, वे आधे अधूरे ही रह गए। सड़क बीच से टूट गई और पुल बना ही नहीं। ये अलग बात है कि स्टील मंत्रालय के इन पैसों से ठेकेदारों और बेनी के करीबियों की बन आई।

अब गोंडा में बंट रही हैं लालटेने

लोकसभा के चुनाव नजदीक हैं, सो बेनी वर्मा के इशारों पर स्टील मंत्रालय की कंपनियां गोंडा में जमकर सोलर लालटेने, सोलर लाइट्स बांट रही हैं। विशेषकर सेल (स्टील अथारिटी आफ इंडिया लिमिटेड), एनएमडीसी (नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कार्पोरेशन) और आरइएनएल (राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड) के पैसों पर ये बंदरबांट जारी है। बेनी वर्मा स्टील मंत्रालय के इन्हीं पैसों के जरिए वोटरों को लुभाकर चुनाव जीतने के लिए बेचैन हैं।

कहां खर्च हो सीएसआर की रकम

संसदीय समिति के मुताबिक सीएसआर की रकम वहां खर्च की जानी चाहिए, जहां स्टील के प्लांट हों। नैतिकता यही कहती है। मगर बेनी वर्मा ने इस नैतिकता की सारी इबारत ही ध्वस्त कर डाली।

बाराबंकी से रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट.

मार्च 2013 तिमाही में जागरण का शुद्ध लाभ घटा

दैनिक जागरण समूह का सर्कुलेशन और साख कम होने के बाद अब आमदनी भी कम होने लगी है. मार्च 2013 की तिमाही में जागरण के शुद्ध लाभ में 10.18 फीसदी की कमी आई है. मार्च 2012 की तिमाही में जागरण प्रकाशन का शुद्ध लाभ 42.85 करोड़ रुपये था, जो 2013 मार्च की तिमाही में घटकर 38.49 करोड़ रुपये रह गया है. नीचे बीएस में प्रकाशित खबर…

Jagran Prakashan net profit declines 10.18% in the March 2013 quarter

Net profit of Jagran Prakashan declined 10.18% to Rs 38.49 crore in the quarter ended March 2013 as against Rs 42.85 crore during the previous quarter ended March 2012. Sales rose 10.18% to Rs 334.21 crore in the quarter ended March 2013 as against Rs 303.34 crore during the previous quarter ended March 2012.

For the Audited full year,net profit rose 22.75% to Rs 220.51 crore in the year ended March 2013 as against Rs 179.64 crore during the previous year ended March 2012. Sales rose 13.17% to Rs 1376.06 crore in the year ended March 2013 as against Rs 1215.92 crore during the previous year ended March 2012.