गुजरात दंगों पर मार्च 2002 में लिखे गए लेख ने मुझे पहली नौकरी दिलाई थी

Vikram Singh Chauhan : मुझे अच्छी तरह से याद है गुजरात दंगों पर मार्च 2002 में लिखे गए मेरे लेख ने मुझे पहली नौकरी दिलाई थी. छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित अख़बार देशबंधु में "पाठकों के पत्र" स्तंभ में मैंने गुजरात दंगों पर टूटे-फूटे और अस्पष्ट हिंदी में अपनी भावनाओं को लिखा था. यह लेख संपादक को पसंद आया और उन्होंने तुरंत मुझे संपादकीय विभाग में रख लिया. रुचिर गर्ग सर ने मेरा इंटरव्यू लिया. मैंने तब उनसे कहा था गुजरात दंगा हुआ नहीं, होने दिया गया! नरेन्द्र मोदी ने राजधर्म का पालन नहीं किया!

रुचिर सर ने मेरा हौसला बढाया और तबसे मैंने पत्रकारिता में पीछे मुड़कर नहीं देखा. आज उसी व्यक्ति को देश का भावी प्रधानमंत्री बताया जा रहा है. उसके लिए मेरे मन में गुस्सा आज का नहीं पिछले 11 सालों का है और आज भी मैं लिख रहा हूं पर इस बार अख़बार की जगह फेसबुक है. ऐसे व्यक्ति के हाथों हम देश कैसे दे सकते हैं जो हिन्दू वोट बैंक के लिए देश के दूसरे कौम के लोगों को मरवा सकता है! ऐसे लोग किसी धर्म के नहीं हो सकते! मोदी और भाजपा कट्टरवादी हिन्दुत्व का पोषक हैं. दंगो का न दाग मिटा है और न धब्बे छूटे हैं! और हमारी कलम भी नहीं रुकी है.

पत्रकार विक्रम सिंह चौहान के फेसबुक वॉल से.

बुरा यह है कि आप हिन्दू होने के कारण गैर हिंदुओं को अपने से नीच गन्दा और अछूत मानते हो

Himanshu Kumar :  हिन्दू होना पाप नहीं है. ना राष्ट्रवादी होना बुरा है. बल्कि बुरा यह है कि आप हिन्दू होने के कारण गैर हिंदुओं को अपने से नीच गन्दा और अछूत मानते हो. इस तरह से असल में आप समाज के प्रति अपने कर्तव्य के पालन से चालाकी से बच जाते हो क्योंकि लोकतांत्रिक समाज का सदस्य होने के बाद तो आप और टट्टी साफ़ करने वाला अपढ़ आदमी, या गरीब फटे कपडे पहने मुसलमान सब बराबर इज्ज़त अधिकार वाले हो जाने चाहिये थे.

लेकिन आपको सबके बराबर में खड़ी कर देने वाली आपकी इस नई लोकतांत्रिक बराबरी वाली हैसियत से बचने के लिये आप चालाकी से अपनी हिन्दू वाली पहचान को ढाल बना कर ओढ़ लेते हो. फिर आप कहने लगते हो कि अरे हम इन गद्दार मुसलमानों के बराबर कैसे हो सकते हैं? हम हिन्दू तो पैदाइशी देशभक्त हैं. या हम इन गंदे छोटी ज़ात वालों के बराबर कैसे हो सकते हैं? देखो हिन्दू होने के नाते तो मैं इतनी ऊंची जाति का हूं. और इस तरह मैं तो पैदाइशी महान और सम्मानित हूं.

इसलिये लोकतन्त्र में आपकी ये नागरिक होने की नई हैसियत के अलावा आपकी कोई भी अलग पहचान असल में लोकतन्त्र के विरुद्ध है. इसलिये आपकी इस परम्परागत पहचान को अब ये लोकतन्त्र रोज़ चुनौती दे रहा है. ये सारी बातें सभी उन विशेधिकार प्राप्त सम्प्रदायों के ऊपर लागू होती हैं जो अलग अलग जगहों पर अपनी संख्या के आधार पर विशेष स्तिथी में हैं जैसे कहीं पकिस्तान में मुसलमान, काफी जगह में सुन्नी, कई जगह कैथोलिक तो श्री लंका में सिंघली. लोकतन्त्र आपसे आपके परम्परागत विशेषाधिकार छीन लेगा, तैयार रहिये .

सोशल एक्टिविस्ट और मानवाधिकार वादी हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

एक है टाइगर उर्फ मनोज रंजन दीक्षित

प्रसिद्ध बालीवुड फिल्म ‘एक था टाइगर’ में अभिनेता सलमान खान ने देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालासिस विंग) के एजेंट का किरदार निभाया था। टाइगर, एजेंट विनोद, जेम्स बांड और खुफिया एजेण्ट के कई किरदार आपने सिल्वर स्क्रीन पर देखे होंगे एवं जासूसी उपन्यास और कामिक्स में उनके रोंगटे खड़े कर देने वाले किस्से भी पढ़े होंगे। लेकिन आम जिंदगी में शायद ही कभी आपकी मुलाकात किसी असली टाइगर या खुफिया  एजेंट से हुई हो। मौत को हथेली पर रखकर बीस बरस तक पाकिस्तान में रहरक देश के लिए जरूरी सूचनाएं जुटाने वाला भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के एक ऐसे ही एजेंट का नाम है मनोज रंजन दीक्षित।

मनोज रील (फिल्मी) नहीं रियल (असल) जिंदगी का एजेंट अर्थात टाइगर हैं। जासूसी के आरोप में पकड़े जाने के बाद भी मनोज ने पाकिस्तान की मिलेट्री इंटेलिजेंस और खुफिया एजेंसी आइएसआई की मृत्यु तुल्य यातनाओं वाली चार साल लम्बी पूछताछ प्रक्रिया को झेलने के बावजूद भी मुंह नहीं खोला था, क्योंकि पाकिस्तानी एजेंसियां मनोज से कुछ भी उगलवाने में पूर्णतः असफल रहीं थी अंततः पाकिस्तान में अवैध रूप से घुसने के आरोप में उसे सजा सुनायी गयी। मनोज रंजन ने पाकिस्तानी और वहां की नरकनुमा जेलों में अपने जीवन के बीस अनमोल वर्ष गुजार दिए। 2005 में रिहा होकर भारत वापस लौटने पर उस खुफिया एजेंसी, जिसने उसे पाकिस्तान भेजा था, ने मात्र एक लाख छत्तीस हजार रुपये थमाकर अपना पल्ला झाड़ लिया था। रॉ ने सम्मानपूर्वक जिंदगी जीने के साधन मुहैया कराने की बजाय मनोज को अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ दिया। खराब माली हालत, बेरोजगारी और पारिवारिक हालातों ने मनोज को इस कदर तोड़ दिया कि अपनी पहचान गुप्त रखने वाले एजेंट को अपनी पहचान जाहिर करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

मनोज की कहानी किसी जासूसी नावेल के एजेंट की तरह दिलचस्प और रोमांच से भरी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जापतागंज, नजीबाबाद जिला बिजनौर के विद्या सागर दीक्षित और मिथिलेश दीक्षित की दो संतानों में बड़े मनोज रंजन दीक्षित में देश भक्ति का जज्बा बचपन से ही भरा था। पिता विद्या सागर पेशे से टीचर थे। मनोज बताते हैं कि, बचपन से

मनोज राजन दीक्षित
मनोज राजन दीक्षित
जासूसी कहानियां पढने का शौक था। 1984 में नजीबाबाद के साहू जैन कॉलेज से ग्रेजुएशन के बाद सरकारी नौकरी की तलाश में था, इसी दौरान मेरी मुलाकात एजेंसी (रॉ) के टेलेंट फांइडर जितेन्द्र नाथ परमार से हुई। मुझे ऑफर अच्छा लगा और जनवरी 1985 में मैँ एजेंसी में बतौर एजेंट शामिल हो गया। बकौल मनोज नौ महीने की कड़ी ट्रेनिंग के बाद सितम्बर माह में उन्हें अमृतसर कसूर (लाहौर ) बार्डर पर छोड़ दिया गया। अपनी जान जोखिम में डालकर किसी तरह मनोज दीक्षित पाकिस्तान में दाखिल हो गए और वहां उन्होंने मोहम्मद इमरान नाम से अध्यापन कार्य शुरू कर दिया। इस दौरान वो रावलपिंडी, कराची, लाहौर और इस्लामाबाद आदि शहरों में गया। अध्यापन के साथ उन्होंने काम को अंजाम देने के लिए कई पेशे अपनाएं।

मोहम्मद इमरान अध्यापक के तौर पर पाकिस्तानी सेना की  इंटेलिजेंस बटालियन के कर्नल जादौन के बेटे अजीम जादौन को पढ़ाया करता था। पढ़ाई में कमजोर अजीम जादौन को उसके कर्नल पिता ने आई.एस.आई का फील्ड आफीसर बना दिया।  अजीम जादौन से किसी बात को लेकर हुई मारपीट के बाद आईएसआई ने मोहम्मद इमरान उर्फ मनोज रंजन दीक्षित को पकडने के लिए खुफिया जाल बिछा दिया। 23 जनवरी 1992 को हैदराबाद के सिंध से पाकिस्तानी सेना ने मनेाज को जासूसी के आरोप में  गिरफ्तार कर लिया गया और यहां से अमानवीय यातनाओ का दौर शुरू हुआ।

मनोज के अनुसार, हैदराबाद सिंध में पकड़े जाने के बाद मुझे 21 दिसम्बर 1992 को 2 हेड सेकेण्ड कोर क्वाटर, कराची में डाल दिया गया। यहां उन्हें बर्फ की सिल्लियो पर लिटाकर यातनायें दी गयी। पन्द्रह पन्द्रह दिन खड़े रहने दिया। बिजली के झटके दिए गए। उलटा लटकाया गया मगर मनोज ने अपनी जुबान नहीं खोली। इस बीच मनोज के पकड़े जाने की खबर किसी तरह उनके परिजनों को भी लग चुकी थी जिन्होंने अपने स्तर से रॉ  के अधिकारियों और भारत सरकार को सूचित किया लेकिन तसल्लीबख्श उत्तर नहीं मिला। जून १९९२ में मनेाज को कराची से निकाला गया और 82 एस एंड टी (सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट बटालियन) 44 एफ एफ की क्वाटर गार्ड में रखा गया (यह क्वाटर गार्ड अपनी यातनाओ के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं)। यहां मनोज को समरी एंड एविडेंस मेजर इस्लामुद्दीन कुरैशी  की सुपुर्दगी में दिया गया। यहां मनोज ने जो कुछ भी सहा और झेला वो मजबूत से मजबूत इरादे वाले को भी उसके रास्ता से डिगा सकता है उसकी जुबान खुलवा सकता है लेकिन मनोज ने अपने होंठ सिल लिये थे देश की खातिर।

चार साल के यातनाओं के बाद कोई सुबूत ने मिलने के बाद पाकिस्तान सेना ने मनोज को 8 फरवरी, 1996 को जासूसी के आरोपों से बरी करके बिना पासपोर्ट-वीजा ( इल्लीगल इमिग्रेशन ) के पाकिस्तान में घुसपैठ करने के आरोप में सिविल पुलिस के सिपुर्द कर लांडी जेल मलीर, कराची  भेज दिया। इस दौरान उनका सुप्रीम कोर्ट में केस चलता रहा। और कुछ हाथ ना लगने पर आखिरकार 22 मार्च 2005 को वाघा बार्डर पर भारत सरकार के हवाले कर दिया गया। मनोज बताते हैं उनकी रिहाई के आदेश तो 30 सिंतबर, 2000 को ही हो गये थे लेकिन पाक फौज के अधिकारियों ने उनकी रिहाई पांच साल तक लटकाये रखी। भारत लौटने पर मनोज ने नौकरी व आर्थिक मदद के सरकार और अधिकारियों से संपर्क किया पर उसे कोई जवाब नहीं मिला।

रॉ एजेंट के तौर पर बिताए दिनों का याद करते हुए मनोज बताते हैं कि फिल्मों में जैसे एजेंट को दिखाया जाता है असल में एक एजेंट की जिंदगी उससे बिल्कुल अलग होती है। फिल्मों में एजेंट को मौज मस्ती करते और एक्शन हीरो की तरह पेश किया जाता है, जबकि असल जिंदगी इससे बिल्कुल अलग होती है। और जहां तक बात मारधाड़ की है तो एक एजेंट उतना ही क्राइम करता है जितने की जरूरत होती है। गुप्तचरों और जासूस को समाज में सही दृष्टि से नहीं देखे जाने के सवाल पर मनोज बताते हैं कि, जासूसी कोई अपराध या जासूस होना बुरा नहीं है। मेरी निगाह में एजेंट बनना शुद्ध रूप से देश सेवा है। अगर जासूस नहीं होंगे तो दुशमन देश की गतिविधियों के बारे में जानकारी नहीं मिल पाएगी। एजेंट से मिली जानकारियों के आधार पर ही विदेश नीति और फौज की कार्रवाई तय होती है। पकड़े जाने और मौत का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता है लेकिन देशभक्ति  की भावना काम करने की प्रेरणा देती है। जब दुशमन देश में लोग हमारे देश के बारे में  गलत बोलते हैं तो गुस्सा आता है और यही गुस्सा देशभक्ति के जज्बे को बढ़ाने का काम भी करता है।  

एक जासूस की पृष्ठभूमि के चलते मनोज नौकरी पाने से लेकर आम जीवन में कई मुसीबतों का सामना कर रहे हैं क्योंकि समाज जासूस को गलत नजर से देखता है। मनोज बताते हैं कि हरिद्वार जिले के रोशनाबाद क्षेत्र में अमन मेटल में मुझे नौकरी मिली। नौकरी मिलने के तीन-चार महीने बाद हरिद्वार की एक अखबार में  मेरे बारे में खबर छपी। फैक्ट्री के कुछ कर्मचारियों ने फैक्ट्री मालिक को इसकी सूचना दे दी। खबर छपने के एक महीने बाद फैक्ट्री मालिक ने, काम की कमी का बहाना बनाकर  मुझे नौकरी से निकाल दिया। एक जासूस को समाज और परिवार में भी शक की नजर से देखता है।

मनोज के अनुसार, सरकार ने उसे वर्ष 2005 में 36 हजार और फिर एक बार एक लाख रुपये दिये लेकिन बाद में एजेंसी ने किनारा कर लिया। इसी बीच मनोज ने लखनऊ निवासी शोभा से विवाह कर लिया। मनोज कहते हैं कि मैं सरकार और एजेंसी के खिलाफ लड़ाई केवल अपने लिए नहीं लड़ रहा हूं, बल्कि मैं तो चाहता हूं कि भविष्य में जो भी व्यक्ति एजेंसी में शामिल हो सरकार उसके सुरक्षित भविष्य की गारंटी उसे दे ताकि उसे मेरी तरह परेशानियों का सामना न करना पड़े। मैं नाराजगरी सिस्टम से है देश से नहीं।  देश सेवा जरूरी है क्योंकि देश तो अपना है।

गुजर बसर के लिए मनोज ने मंगलौर, रूढ़की, उत्तराखण्ड स्थित एक ईंट भट्ठे में मुनीम की नौकरी कर ली। कुछ माह पूर्व मनोज की पत्नी शोभा की तबीयत अचानक बिगडने लगी। उन्होंने पत्नी को चेकअप कराया तो उनके पेट में दो ट्यूमर व गालब्रेडर में पथरी निकली। मनोज पत्नी को लेकर गोमती स्थित राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान आए, जहंा जांच के बाद पता चला कि शोभा को कैंसर है। अब यही उनका इलाज चल रहा है लेकिन मनोज के पास इलाज के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। पत्नी के इलाज के चलते उसकी नौकरी भी छूट गई है।

मनोज के मुताबिक वह प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री से नौकरी व आर्थिक मदद की गुहार लगा रहे हैं लेकिन कोई पुरसाहाल नहीं है।  पूर्व में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें पांच हजार रुपये की आर्थिक मदद भेजी थी। तब नजीबाबाद के तत्कालीन विधायक शीशराम ने उनकी मदद का आश्वासन दिया था पर कुछ नहीं हुआ। पत्नी की बीमारी, सरकार और समाज की बेरूखी ने मनोज की कमर तोड़ दी है। मनोज कहता है कि दुश्मन देश की यातनाओं से ज्यादा दर्द अपनों की बेरूखी और सरकार के रवैये ने दिया है। फिलवक्त मनोज कैंसर से जूझ रही पत्नी के इलाज के लिए दो लाख की रकम जुटाने में लगा है। मनोज कहते हैं कि मैंने अपनी जिंदगी के दो दशक देशसेवा में गुजारे हैं, मैं नहीं चाहता हूं कि सरकार मेरे लिए बहुम कुछ करे पर कम से कम मेरी इतनी मदद तो करे की मैं इज्जत से जिंदगी गुजार सकूं।

लेखक आशीष वशिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं.

मोदी को ‘रैंबो’ बताने वाले टाइम्स आफ इंडिया ने आखिरकार माफी मांगी

ये है खंडन और माफीनामा, जिसे टाइम्स आफ इंडिया में टीओआई मैनेजमेंट ने प्रकाशित कराया है… 

''The Times of India on June 23 published a report from Uttarakhand headlined “Modi in Rambo act, saves 15,000.” The report sparked off a flurry of political claims and counterclaims. Our correspondent has already given a detailed explanation on how he gathered the facts for the report. During the course of this process, he spoke to Anil Baluni, the Uttarakhand BJP spokesperson, and many others. Among the details that emerged from these conversations was that the Gujarat government’s efforts had helped around 15,000 people in various ways. This included giving them food, shelter, medicines and transport to reach their homes. Mr Baluni did not say that 15,000 people had been “rescued”. He neither tried to exaggerate facts nor mislead us. We regret any inadvertent inconvenience caused to any individual by the article. We are mortified by the controversy surrounding the report.''

4रीयल न्यूज से वाइस प्रेसिडेंट सेल्स एंड मार्केटिंग श्रद्धा मिश्रा बर्खास्त, एडी वर्मा भी हटाए गए

4रीयल न्यूज प्रबंधन की तरफ से बताया गया है कि चैनल की वाइस प्रेसिडेंट सेल्स एंड मार्केटिंग श्रद्धा मिश्रा को बर्खास्त कर दिया गया है। इन्हें बर्खास्त वीरेंद्र कुमार ने किया। 4 रीयल न्यूज चैनल में श्रद्धा का लास्ट वर्किंग डे 23 जून 2013 रहा। श्रद्धा मिश्रा पर प्रबंधन की ओर से कई आरोप लगाए गए हैं।

4रीयल न्यूज की तरफ से बताया गया है कि श्रद्धा को कंपनी ने जो गाड़ी दी थी उसमें लगा जीपीएस सिस्टम चोरी कर लिया गया है। इसकी एफआईआर मैनेजमेंट ने नोएडा के सेक्टर 20 थाना में करवाई है। कंपनी की तरफ से बताया गया है कि श्रद्धा मिश्रा के बाद चैनल में एडी वर्मा नाम के जीएम के पद पर ज्वाइन किया। इन्हें भी चैनल मैनेजमेंट की तरफ से हटाया गया।

 

सलमान खान के धमकाने पर ब्लागर ने पोस्ट हटाई, माफी मांगी!

एक हैं सौम्यदीप्त बनर्जी. वे बालीवुडजर्नलिस्ट डॉट कॉम नामक ब्लाग / वेबसाइट के संचालक हैं. उन्होंने सलमान खान को लेकर कुछ लिखा तो उन्हें कई तरह की धमकियां मिलने लगी और आखिर में दबाव में आकर उन्होंने सलमान खान के बारे में जो लिखा था, उसे हटा दिया. साथ ही उन्होंने अपने ब्लाग पर एक माफीनामा भी प्रकाशित किया.

आठ जुलाई को अपने ब्लाग बालीवुडजर्नलिस्ट डाट काम पर प्रकाशित माफीनामा में सौम्यदीप्त बनर्जी लिखते हैं उन्हें सलमान खान से 'संदेश' मिला है. उसी कारण वे अपने दो ब्लाग पोस्ट हटा रहे हैं, जिसमें उन्होंने सलमान खान के बारे में लिखा था. सौम्यदीप्त ने जो कुछ आठ जुलाई को लिखा वो इस प्रकार है-

''The last two days have been really excruciating for me. I have received a communication from Mr Salman Khan. There I have been instructed to remove two blog posts that I have written about him. Those articles have been removed from this blog. Here’s a public apology to Mr Salman Khan for writing two blog posts that he didn’t consider appropriate. I am taking a break from writing on this blog till I am in a proper frame of mind to write again. I am really sorry.''

बाद में 14 जुलाई को यानि आज के दिन सौम्यदीप्त बनर्जी ने फिर एक पोस्ट अपने ब्लाग पर प्रकाशित किया है, और पूरे प्रकरण पर अपनी बात रखी है. शीर्षक है- ''An offer I couldn’t refuse''. इसमें उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह इस प्रकार है…

I am getting back to blogging from today. But before that there are certain clarifications I wanted to put forward before my readers. There are certain things that everybody should know. I am not going to stop writing on Salman Khan If you are a Bollywood writer then it’s a bit odd to say that you won’t write on Salman Khan. It’s not possible at all. Salman Khan, with all the dichotomies that exist in his life, makes for a really good subject, if not the best.

I don’t think there’s any law under the Sun which prevents a blogger from picking up Salman Khan as a subject because there are court cases pending against him. There’s a lot more to Salman Khan than the criminal cases that have been filed against him. For obvious reasons, I am not going to write on the 2002 Hit-and-Run case till the court delivers a verdict on it. Also, I am also not going to write on the other cases of Salman Khan (like the Black Buck poaching case) that are also pending before a court of law.

Any references to the above cases will strictly adhere to what has already been reported and verifiable with documents made available to the public. Some of the information about Salman Khan’s court cases are also available on Salman Khan’s own blog.

Yes, in that sense Salman Khan is a fellow blogger too. Ha!

Though there hasn’t been any such incident, I still want to reiterate that there will be no value judgment or comments made on Salman Khan when I refer to the court cases. I will just report what is already there in the public domain and as always, I will desist from airing my personal views on my blog when I talk about the court cases.

What really happened?

Over the last few days, I have received a lot of calls and messages from my friends and colleagues in the industry. I want to thank all of them for the concern.

Everybody wants to know about the exact nature of communication that I had received from Salman Khan and the reason behind posting a public apology. I was also asked if I felt intimidated. So, I will clarify a few points here. I think it is not prudent or necessary to disclose the communication that I have received from Salman Khan. But for clarity’s sake, the ‘communication’ was not a phone call from Salman.

It’s sort of funny that my interaction with the actor has not been much. I can count on my fingers the number of times I have spoken to him on the phone. The last time I spoke to him on the phone was three years back. I remember, that I was filing an important report and my deadline was nearing. I urgently needed a quote from Salman Khan and when all efforts to reach him failed, I dialed his mom’s (Salma Khan) mobile. After I explained to her why I really needed to speak to her son, she just called out to Salman and said , “Tumhara phone hai, lo baat karo.” He immediately came on the line.

The rest of the times that I have met him, it has always been for interviews with him sitting across the table and most of the time, those interactions never lasted beyond 30 minutes.

So, no it was not a phone call!

Did I get threatened? No.

But I did get intimidated a bit.

I pulled down the blog post and posted an apology because that is considered good conduct in the eyes of the law. Very few bloggers have agreed to remove their posts on demand.

Across the globe, bloggers are fighting for their rights and freedom of speech on the internet, India is a part of that movement too. In this case, pulling down the blog meant that I have respect for the spirit of the law and that I respect the sentiments of Salman Khan more than my ideals of freedom of speech. I guess that means a lot respect.

I am still not convinced about the apology bit – Why was I required to apologise to Salman when I did nothing wrong? I am still looking for an answer to that question.

I hope that from now on, I will be able to blog in peace and write many more articles on Salman Khan that tells nothing but the truth.

I wish him all the best for the upcoming verdict in the 2002 accident case. May only the truth prevail.

Before we go, here is a facet of Salman Khan that you don’t generally see these days. This is a video footage of a press meet of Salman Khan that dates back to 1998 where he expressed his views about the media in Bollywood. I found this video interesting.

http://www.youtube.com/watch?v=zOVFdWDwI28

सौम्यदीप्त बनर्जी ने आखिर ऐसा क्या लिखा जिससे सलमान खान को उन्हें धमकाने औ पोस्ट हटाने के लिए मजबूर करने को विवश होना पड़ा… थोड़ी ही देर में पढ़ें, भड़ास पर…


यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

जिन्दा को मुर्दा बताने से नहीं चूके न्यूज़ चैनल वाले

न्यूज़ चैनल वालों ने अपनी न्यूज़ के लिए एक बार नहीं वरन सैकड़ो बार मार दिया उस लड़की को जो अभी जीवन और मौत से जूझ रही है और जिन्दा है। उसे मरा हुआ सिर्फ सहारा समय, लाइव इंडिया, एनडीटीवी जैसे न्यूज़ चैनलों ने ही नहीं दिखाया वरन देश भर के हर न्यूज़ चैनलों ने लड़की को अपनी न्यूज़ में एक बार नहीं सैकड़ों बार मारा। इटावा में जलजला आ गया था, शुक्रवार के दिन। पूरे देश की मीडिया का ध्यान उस वक्त इटावा पर आकर टिक गया जब यह पता चला कि इटावा में एक लड़की के साथ गैंगरेप करके उसको जिंदा जला दिया गया है। बताया गया कि गैंगरेप की शिकार लड़की की जलने से मौत भी हो गई है।

मामला प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह जनपद से जुड़ा हुआ था इसलिए यह स्यापा भी काटा गया कि प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह जनपद में जब ऐसा जघन्य अपराध हो सकता है तो बाकी सूबे की क्या दशा होगी? लेकिन हकीकत यह है कि इटावा में गैंगरेप की यह खबर सिर्फ मीडिया की कारस्तानी थी। न गैंगरेप हुआ था। न लड़की को गैंगरेप करनेवालों ने जलाया था। फिलहाल लड़की जीवित है और उसका सैफई के ग्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान में इलाज चल रहा है। हां, इतना जरूर है कि बुरी तरह जली हुई अवस्था में अस्पताल लाई गई लड़की की हालत चिंताजनक बनी हुई है।

दस जुलाई की सुबह हुई एक वारदात की खबर मीडिया को ग्यारह जुलाई को मिल पाई जब सैफई स्थित ग्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान में इस लड़की के इलाज के बाद पुलिस की तहकीकात शुरू हुई। पुलिस के पास पीड़ित लड़की पक्ष से जो एफआईआर दर्ज कराई गई थी उसमें कहा गया था कि उसके साथ गैंगरेप हुआ था। पुलिस ने भी अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में गैंगरेप का ही उल्लेख किया और जांच पड़ताल शुरू की तो दूसरी ही कहानी उभरकर सामने आई। हालांकि ऐसे मामलों में सीधे गैंगरेप के आरोप पर एफआईआर लिखने से पुलिस हमेशा बचती रही है लेकिन वर्तमान माहौल में पुलिस वाले अगर लापरवाही करते तो यह लापरवाही उन्हें भारी पड़ जाती।

एफआईआर लिखने के साथ ही पीड़ित लड़की का सैफई के मेडिकल कालेज में इलाज भी शुरू हो गया था, लेकिन 12 जुलाई को मीडिया ने न सिर्फ जीते जी उस पी़ड़ित लड़की को मृत घोषित कर दिया बल्कि इस मामले को पुलिस की तहकीकात से पहले ही गैंगरेप की घटना बताकर सारी दुनिया में प्रचारित कर दिया। भले ही एफआईआर में छह लोगों का नाम दर्ज कराया गया हो लेकिन 12 जुलाई तक पुलिस इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि मामला गैंगरेप से जुड़ा हुआ नहीं है। 12 जुलाई की देर रात पुलिस अधिकारियों ने सैफई मेडिकल कालेज जाकर लड़की के स्वास्थ्य का भी जायजा लिया और जांच पड़ताल के दौरान पूरे मामले में फर्जी तत्वों की पहचान भी शुरू कर दी।

12 जुलाई की पूरी कवायद के बाद पुलिस ने पाया कि यह मामला न तो गैंगरेप से जुड़ा है और न ही लड़की को जलाकर मारने की कोशिश की गई है। मामला यह है कि एक ही कुनबे के दो बच्चे आपस में प्यार करते थे। ये दोनों मुस्लिम परिवार से आते थे, और दोनों ही पक्षों को इस प्यार पर कोई ऐतराज भी नहीं था। बात इस पर अटकी हुई थी कि शादी का खर्च कौन उठायेगा। लड़का और लड़की की उम्र भी कानूनी लिहाज से अभी नाबालिग ही कही जा सकती है। लड़की के बारे में तो पता नहीं लेकिन पुलिस की गिरफ्त में आ चुका लड़का फरमान अपनी उम्र 17 साल बता रहा है। जो जानकारी मिली है उसके मुताबित शादी के खर्च को लेकर दोनों पक्षों में तकरार इतना बढ़ गया था कि लड़की ने लड़के के घर के सामने पहुंचकर खुद को आग के हवाले कर दिया। उसकी इस नादान खता ने उसको मौत के दरवाजे पर तो धकेल ही दिया, लड़के के परिवार के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी।

बहरहाल, लड़की अभी तक जीवित है और उसके स्वास्थ्य में भी सुधार हो रहा है। ग्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ जेवी सिंह ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि लड़की की हालत में सुधार हो रहा है और उसने बात भी की है। लेकिन 80 फीसदी तक जल चुकी लड़की की स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। लेकिन लड़की की स्थिति से ज्यादा चिंताजनक स्थिति उस मीडिया की है जो पहले ही लड़की को मार चुका है और पूरे मामले को गैंगरेप की घटना साबित कर चुका है। अगर मीडिया के कारिंदो ने एफआईआर पर भी ध्यान दिया होता तो उन्हें पता चलता कि जिन छह लोगों पर एफआईआर दर्ज कराई गई है उसमें तीन महिलाओं के भी नाम हैं। और कम से कम महिलाएं महिला का गैंगरेप नहीं कर सकती हैं। बहरहाल ताजा घटनाक्रम यह है कि आरोपी लड़के अरमान को गिरफ्तार कर लिया गया है और मामले में पुलिस आगे की तफ्तीश कर रही है।

प्रेमी और उसके दोस्तों के द्वारा छली गयी पीड़िता पिछले चार दिनों से मौत से संघर्ष कर रही है। 98 फीसदी तक बुरी तरह से जल चुकी पीड़िता के शरीर में क्या बचा होगा, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है। भारी डोज वाली दवाओं का असर कम होने के बाद जब भी उसके शरीर मे हलचल होती है परिजन सिहर उठते हैं, उन्हें लगता है कि बेटी शायद बच जाए। पीड़िता का पिता मुन्ने खां सैफई पीजीआई के बाहर तीन दिनों से भूखा प्यासा पड़ा हुआ है। पीड़िता की साठ वर्षीय बूढ़ी दादी रमीना बेगम कम पढ़ी लिखी हैं उन्हें यह नहीं पता है कि पोती कितनी पढ़ी हैं। कहती हैं कि पोती उन्हें बहुत प्यार करती थी। टीवी वालों पर बहुत गुस्सा हैं, आंख में आंसू भरकर कहती हैं, दुआ न करो तो मत करो, मेरी बेटी को जिंदा ही क्यों मार रहे हो। युवती की चचेरी दादी, बहन व ताई हसीना, चचेरी बहन बानो, उसका पति व गांव की अन्य औरतें पिछले तीन दिनों से बर्न बार्ड के आगे लॉन में डेरा डाले हैं। वे कभी रोती हैं तो कभी अल्लाह से बेटी की सही सलामती की दुआ मांग रही हैं, उसकी मां तो बार बार बेहोश हो जाती हैं।

लेखक दिनेश शाक्य सहारा समय चैनल के इटावा जिले के रिपोर्टर हैं.

NHRC team to visit Uttarakhand from 15th – 18th July, 2013 for an on-the-spot assessment of the situation.

New Delhi : A team from the National Human Rights Commission, headed by Smt. Kanwaljit Deol, DG (Investigation) and comprising of Shri A.K. Garg, Registrar (Law), Shri A.K. Parashar, Joint Registrar (Law), Shri P.D. Prasad, SSP and Shri C.S. Mawri, Assistant Registrar (Law) will be visiting the State of Uttarakhand from 15th to 18th July, 2013 for the purpose of an on-the-spot assessment of situation in the State due to massive tragedy of loss of human lives and property caused by the recent floods/cloud burst and landslides.

The team will hold a meeting with senior officers of State Government on 16th July, 2013 in Dehradun. It will also hold a meeting with the NGOs and visit the worst affected areas. The team will make assessment of various aspects including the number of deaths, relief camps, accessibility of food and drinking water, alternate arrangements for rehabilitation of affected people, assistance to farmers, medical facilities, provisions for the last rites of the dead, safety and security of the people, restoration of infrastructure, disaster management system, monetary relief, etc.

कल भोपाल में अखिल भारतीय कुकुर महासभा की विशेष बैठक हुई

Sachin Kumar Jain : कल भोपाल में अखिल भारतीय कुकुर महासभा की विशेष बैठक हुई, जिसमे मोदी के बयान के बाद उपजी स्थितियों पर गंभीर चर्चा की गयी. महासभा के विशेष सलाहकार ने मुख्य वक्तव्य देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि अल्प-संख्यकों के बाद अब कुकुर समाज भी मोदी की नज़रों में आ चुका है और उनके वक्तव्य से संकेत मिलता है कि उनका अगला निशाना कुकुर समुदाय हो सकता है. हमारी गुप्तचर शाखा की सूचना के मुताबिक सबसे पहला निशाना फोर-लेन और एट-लेन सड़कों पर दिखाई देने वाले कुकुर हो सकते हैं क्योंकि इससे विकास पर फर्क पड़ता है.

कार उद्योग वालों ने मांग भी की है कि इस कुकुर कुकुर समुदाय का इलाज़ किया जाए क्योंकि इससे अत्याधुनिक इंजन वाले वाहनों की स्पीड पर गहरा असर पड़ता है और विकास की दर धीमी हो सकती है. मोदी ने यह संकेत दिए हैं कि अब सभी कार वालों को कुकुरों और उनके पिल्लों को कुचलने का अधिकार दे दिया जाएगा.

अध्यक्ष महोदय ने कहा कि यह हमारे सम्मान की बात है. अब हमें इंसानों से दूर जाने के बारे में सोचना चाहिए. हम सुन रहे हैं कि इन जैसों को सत्ता में लाने की बात चल रही है. यदि ये सत्ता में आ गए तो पीछे बैठ कर कुचल देंगे. इंसान बदला गया है, अपने साथी कुकुर समाज के बारे में कितना निकृष्ट सोच रहे हैं. एक निंदा प्रस्ताव के साथ बैठक खत्म हुई.

इस व्यंग्य को सचिन कुमार जैन के फेसबुक वॉल से लिया गया है.

भाई मान गए, मीडिया में नरेन्द्र मोदी की बड़ी ज़बरदस्त पीआर शिप और सेटिंग है

Zafar Irshad : भाई मान गए, बड़ी ज़बरदस्त पीआर शिप और सेटिंग हैं, मीडिया में नरेन्द्र मोदी की…आज पुणे के एक कॉलेज में उनके दिए जा रहे लेक्चर को सभी टीवी चैनल ऐसे लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे, जैसे प्रधानमन्त्री लाल किले से 15 अगस्त को जनता को संबोधित कर रहे है, या फिर वर्ल्ड कप क्रिकेट का कोई फाइनल मैच चल रहा हो… सेटिंग और गेटिंग में कांग्रेस उनसे कोसों दूर चल रही है फ़िलहाल…

कानपुर के पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.

तेरह साल से पत्रिका के लिए काम कर रहे राकेश कुमार शर्मा ने इस्तीफा दिया

राजस्थान पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार और चीफ सब एडिटर राकेश कुमार शर्मा ने पत्रिका समूह को अलविदा कह दिया है। करीब तेरह साल तक राकेश शर्मा ने जयपुर संस्करण में न्यायपालिका, क्राइम, पर्यटन बीट में ख्याति पाई और वे चीफ क्राइम रिपोर्टर और सिटी चीफ भी रहे।

करीब चार महीने पहले इरादतन उनका तबादला बीकानेर संस्करण में कर दिया था। इसके पीछे जयपुर कार्यालय में अहम पद पर काबिज एक वरिष्ठ पत्रकार का हाथ बताया जा रहा है। लेकिन राकेश शर्मा ने इस फैसले को नतमस्तक हो मानने की बजाय पत्रिका छोडऩा ही बेहतर समझा। अब राकेश की नेशनल दुनिया अखबार ज्वॉइन करने की चर्चा है।

राकेश शर्मा ने राजस्थान के बहुचर्चित जलमहल लीज प्रकरण को जोर-शोर से उठाया था। सौ एकड़ भूमि पर पर्यटन योजना वाले जलमहल लीज प्रोजेक्ट को राजस्थान पत्रिका समूह के मालिक लंबे समय से हथियाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन बाजी मारी नवरतन कोठारी ने। जलमहल रिसोटर्स प्राइवेट लिमिटेड के कर्ताधर्ता और देश के नामी ज्वैलर नवरतन कोठारी ने इसे 99 साल की लीज पर ले लिया। तभी से हजारों करोड़ों रुपए का यह लीज समझौता पत्रिका की आंखों में खटकता रहा। तब भी पत्रिका ने अभियान चलाया, लेकिन सफलता नहीं मिली।

करीब ढाई साल पहले स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल, पर्यटन मंत्री बीना काक के जलमहल दौरे के साथ ही पत्रिका ने इस मामले को फिर से उठाने का फैसला किया। यह मामला राकेश शर्मा को दिया गया, तब पत्रिका प्रबंधन और प्रशासन के पास नाममात्र के भी दस्तावेज नहीं थे। आरटीआई और अपने प्रयासों से जलमहल लीज समझौते के करीब चार हजार पेज निकलवाए और एक अभियान चलाकर समझौते की गड़बडिय़ों और घोटालों को उजागर किया।

साथ ही अधीनस्थ न्यायालय और हाईकोर्ट में इस्तगासे और याचिका लगाई। यहीं नहीं इस मामले को जागरुक जन संगठनों के जरिए जनता तक लेकर गए। पहली बार इस मुद्दे पर जन संगठनों  ने जयपुर बंद करवाया। हाईकोर्ट से जलमहल लीज समझौता रद्द हुआ और नवरतन कोठारी की गिरफ्तारी तक हुई।

राकेश शर्मा को पत्रिका प्रबंधन ने करीब चार महीने पहले उनका बीकानेर तबादला कर दिया। वैसे ऐसी हरकतें पत्रिका प्रबंधन की आदत में रही है। हां, जब से राकेश शर्मा का तबादला हुआ है तब से यह मामला पिटता जा रहा है, चाहे वह हाईकोर्ट में सीबीआई जांच की बात हो या निचली अदालत में, अन्य एक दर्जन आईएएस अफसरों के खिलाफ अभियोग चलाने की मंजूरी, वहां आरोपी पक्ष को ही फायदा मिला।

राकेश शर्मा ने 2 जुलाई को इस्तीफा दे दिया था। अभी वे 30 दिन के नोटिस पीरियड पर है। चर्चा है कि राकेश शर्मा ने अपने इस्तीफे में पत्रिका समूह में पत्रकारिता और पत्रकारों के लिए ठीक माहौल नहीं होने का कारण बताया है। साथ ही भ्रष्ट व चापलूसों को आगे बढ़ाने और ईमानदार व कार्य के प्रति वफादार लोगों को किनारे करने का आरोप लगाया है।

BBC apologises following journalist’s suicide

THE BBC has apologised for the way it handled a journalist's complaint of sexual harrassment following an inquest into his death. A packed Leamington Justice Centre heard on Friday (July 5) how former Coventry and Warwickshire reporter Russell Joslin took his own life in October last year.

The court was told how Mr Joslin, who lived in Kenilworth, had been subject to 'unwanted advances' from a female colleague back in 2006 but had become increasingly upset following the colleague's decision to speak out in the national media about the Jimmy Savile scandal. During the inquest, the BBC came under fire for failing to properly handle records of the complaints, which Mr Joslin believed were part of a 'cover up' by the corporation.

The court heard Mr Joslin had originally mentioned his concerns during a conversation with an assistant editor in Stratford, who recommended he seek counselling. He went on to discuss the matter with Occupation Health experts in March last year but was subsequently told by BBC HR bosses there was no record of his allegations.

The 50-year-old was then admitted to St Michael's Hospital in Warwick after he threw himself under a bus in Kenilworth. During his stay Mr Joslin had been diagnosed with psychosis and paranoia but despite the previous attempt on his life, mental health nurse Claire Lennox told the court she had deemed Mr Joslin to be' low risk' – meaning he required only 15 minute staff checks as opposed to constant supervision.

She claimed his eye-contact and body language led her to believe he was being genuine when he told her he had no further intention of harming himself. But just three days later Mr Joslin died from asphyxiation in Warwick Hospital after swallowing a shower cap while alone in his room. Recording the verdict he took his own life, coroner Louise Hunt said 'multiple factors' had contributed to Mr Joslin's suicide.

She said: "We know from medical evidence Russell was paranoid. He had had a lack of sleep, there was a lack of career progression and he was frustrated with the situation with the colleague.

"I don't think any one of those factors can be split out – in my view they were all relevant and interplayed together."

Since his death, Mr Joslin's family have been assisting the BBC in overseeing UK-wide changes to the way the broadcaster responds to staff concerns relating to stress, bullying and harassment claims.

And shortly after the inquest, the broadcaster issued a statement reiterating its desire to learn from Mr Joslin's death.

It said: "Russell Joslin was a respected and much-loved member of the team at Radio Coventry and Warwickshire who is greatly missed.

"We have made progress but would like to reassure Russell’s family we remain absolutely committed to implementing improvements.

"These include a confidential bullying and harassment helpline, a review of all employee support services, improved training for managers in bullying, harassment and mental health and a review of Occupational Health services."

साभार- Leamington Observer

‘इंडिया टीवी’ की ब्लैकमेलिंग को बिजनेस मॉडल मानते हैं अजीत अंजुम!

निर्मल बाबा दोबारा प्रकट हो गये हैं. उसी 'इंडिया टीवी' पर जिस पर उनकी जम कर आलोचना की गयी. खबर है कि इंडिया टीवी ने ये आलोचना और पोल-खोल अभियान बाबा की बांह मरोड़ने के लिये ही चलाया था और अब दोगुने रेट पर विज्ञापन चला रहा है. दिलचस्प बात ये है कि टीवी के स्वयंभू धुरंधर इसे 'बिजनेस मॉडल' बता रहे हैं. एक सेमिनार में इंडिया टीवी के विनोद कापड़ी से एक पत्रकार ने पूछा कि निर्मल बाबा के दोबारा आपके चैनल पर प्रकट होने पर आपको कुछ कहना है, तो वे बगलें झांकने लगे, लेकिन न्यूज-24 के अजीत अंजुम अपने उल-जुलूल तर्कों के साथ मैदान में कूद पड़े.

अजीत अंजुम ने बाबा के विज्ञापन की तुलना पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले इंटरव्यू से कर डाली. कहने लगे, "ये भी एक बिजनेस मॉडल है. पत्रिका वाले पैसे लेकर इंटरव्यू छापते हैं तो हम पैसे लेकर निर्मल बाबा को बोलने का मौका देते हैं." सेमिनार में आये दर्शकों से लेकर वक्ता तक अजीत अंजुम के इस तर्क पर हंसने लगे, लेकिन मजेदार बात ये कि, उन्हें ये अपनी तारीफ लग रही थी. जब उन्हें बताया गया कि ब्लैकमेलिंग और निगेटिव खबरें चलाकर विज्ञापन वसूलना कोई ऐसा बिजनेस मॉडल नहीं है जिसे मंच से प्रचारित किया जाये तब जाकर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और चुप बैठे. बाद में मंच से उतरने के बाद वे पत्रकारों के पास गये और चिरौरी करते हुए बोले, "ये सब फेसबुक पर मत लिख देना भाइयों."

लेखक अभिषेक आनंद युवा और तेज तर्रार पत्रकार हैं. उनसे संपर्क abhisheka049@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.
 

ऑनलाइन पत्रिका ‘दृष्टि विमर्श’ का शुभारंभ

चिंतन-मनन की गंभीर वैचारिक एवं शोधपरक पत्रिका 'दृष्टि विमर्श' का ऑनलाइन प्रकाशन आरंभ हो गया है. इसे drishtionline.in पर लॉग इन करके पढ़ा जा सकता है. यह पत्रिका शिक्षा पर कार्य करनेवाली मशहूर संस्था 'सिद्ध' (मसूरी, उत्तराखंड) की ओर से प्रकाशित की जा रही है.

आरंभ में इसके कुछ अंक सिर्फ ऑनलाइन ही निकाले जाएंगे, फिर इसे मुद्रित रूप में भी निकालने की योजना है. वैसे इसके संपादक मंडल में 'सिद्ध' के निदेशक पवनकुमार गुप्त के आलावा आज़ादी बचाओ आंदोलन से लम्बे समय तक जुड़े रहे अभय प्रताप, संत समीर एवं शिवदत्त जैसे गंभीर लोग शामिल हैं. अभी इसके संपादन का दारोमदार मुख्य रूप से अभय प्रताप एवं शिवदत्त पर है.

'दृष्टि विमर्श' का प्रवेशांक 'भारतीय बनाम पश्चिमी सभ्यता' पर केंद्रित है. इस अंक में तिब्बती सरकार (निर्वासित) के पूर्व प्रधानमंत्री समदोंग रिनपोछे, भारतीय समाज व्यवस्था के अध्येता रविन्द्र शर्मा 'गुरूजी', प्रख्यात विचारक एवं चिंतक धर्मपाल, जाने माने चिंतक-विचारक नंदकिशोर आचार्य, प्रख्यात गाँधीवादी लेखक जैनेन्द्र कुमार जैसे दिग्गज लोगों के लेख समाहित हैं. प्रवेशांक का प्रत्येक लेख अपनेआप में कुछ नया कहने की कोशिश तो करता ही है, एक गंभीर बहस को भी आमंत्रित करता है.

प्रेस रिलीज
 

इलाहाबाद के शायर ख़्वाज़ा जावेद अख़्तर का इंतिकाल

इलाहाबाद। शहर के मशहूर शायर ख़्वाजा जावेद अख़्तर का दिल का दौरा पड़ने से इंतिकाल हो गया। उन्हें तीन दिन से वाइरल फीवर आ रहा था, हालत ज्यादा बिगड़ने पर उन्हें शनिवार की दोपहर तकरीबन डेढ़ बजे नाजरेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा और लगभग 5:30 बजे इंतिकाल हो गया। 2 सितंबर 1964 को कोलकाता में जन्मे श्री अख़्तर ने अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से एमए किया था। वे शायर के साथ-साथ फुटबाल के खिलाड़ी भी थे, और इलाहाबाद स्थित एजी आफिस में नौकरी कर रहे थे।

पिछले वर्ष उनका ग़ज़ल संग्रह ‘नींद शर्त नहीं’ प्रकाशित हुआ था, जिस पर उन्हें बिहार उर्दू अकादमी और पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने एवार्ड दिया था। उनके इंतिकाल से जहां साहित्य जगत में शोक का माहौल है, वहीं उनकी तीन छोटी-छोटी बेटियों से बाप का साया छिन गया। प्रो. अली अहमद फ़ातमी, शम्सुर्रहमान फारूक़ी, एसएमए काज़मी, असरार गांधी, अख़्तर अज़ीज़, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, यश मालवीय, जयकृष्ण राय तुषार, वीनस केसरी, सुरेंद्र राही, प्रो.संतोष भदौरिया, रमेश नाचीज़, एहतराम इस्लाम, सौरभ पांडेय, शकील ग़ाज़ीपुरी समेत एजी आफिस के कर्मियों आदि ने उनके देहांत पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

भोपाल में पत्रकार पर गोली चली, घायल, साथी की मौत

शुक्रवार की रात करीब 11 बजे भोपाल में मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रांतीय अध्यक्ष शलभ भदौरिया के पुत्र आदेश भदौरिया और उनके साथी पर दंबंगों द्वारा दनादन गोलियां बरसाई गईं। पत्रकार आदेश भदौरिया अपने संस्थान से काम निपटाकर घर वापस लौट रहे थे. उनके साथ सुनील नामक व्यक्ति भी था. रात करीब 11 बजे किसी ने उन पर अंधाधुन्ध फायर कर डाले. अचानक हुए इस हमले में पत्रकार आदेश भदौरिया के हाथ में गोली लगी, वहीं सुनील के शरीर में गोली लगी. इस घटना में सुनील की मौत हो गई. पत्रकार आदेश भदौरिया बुरी तरह घायल हैं और उनका ईलाज भोपाल के एक अस्पताल में किया जा रहा है.

पत्रकार पर हुए इस हमले से प्रदेश भर के पत्रकार जगत में रोष व्याप्त है. मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के जिाध्यक्ष पण्डित कृष्ण मुरारी शर्मा एवं संघ के समस्त पत्रकारों ने पत्रकार पर हुए इस हमले की निन्दा करते हुए इसकी घोर भर्त्सना की है. श्री शर्मा और समस्त पत्रकारों ने पत्रकार श्री भदौरिया के परिवार को सुरक्षा प्रदान किए जाने की मांग की है. मुख्यमंत्री से हमले में घायल हुए पत्रकार भदौरिया के ईलाज के लिए आर्थिक सहायता करने की भी गुहार लगाई है.

हमले की निन्दा करने वालों में श्रमजीवी पत्रकार संघ के जिलाध्यक्ष पण्डित कृष्ण मुरारी शर्मा, पवन जैन, राजेन्द्र शर्मा, सुनील कलाकार, राकेश वर्मा, अभिषेक खैरा, आशीष मालवीय, सचिन शर्मा, अजय जैन, राजेन्द्र रजक , चन्द्र मोहन मेहता, दीपक कलेशिया,अशोक जैन, प्रेम सड़ाना, अशोक यादव, राजेन्द्र तिवारी, डॉ. जयमण्डलसिंह यादव, डॉ. हरवीर सिंह रघुवंशी, नरेन्द्र दुवे, कुमार संभव, नरेश गोस्वामी, ओपी शर्मा,समीर द्विवेदी, राजकुमार शर्मा, पयोद शर्मा, राजेश दुवे आदि प्रमुख हैं. पत्रकारों ने इस कृत्य की निन्दा करते हुए अपराधियों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की मांग की है.

पत्रकार भदौरिया पर जान लेवा हमले की निंदा

राजगढ़ : भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार आदेशप्रताप सिंह भदौरिया पर हुए जान लेवा हमले से जिले भर के पत्रकार जगत में रोष व्याप्त है। गणेशशंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब के जिला अध्यक्ष माखन विजयवर्गीय संरक्षक प्रेम वर्मा एवं संघ के समस्त पत्रकारों ने भदौरिया पर हुए इस हमले की निंदा करते हुए इसकी घोर भर्त्सना की है। उन्होंने कहा की लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सरेआम हमला किया गया है। यह निंदनीय कृत्य है। वर्मा और विजयवर्गीय एवं जिले के पत्रकारों ने पत्रकार भदौरिया के परिवार को सुरक्षा प्रदान किए जाने की मांग की है।

लोकसभा चुनाव के बाद ही नौकरी बदलने के बारे में सोचें पत्रकार

यशवंतजी बहुत बहुत धन्‍यवाद इस बात के लिए आगाह करने के लिए कि जल्‍द ही पूरी मीडिया इंडस्‍ट्री भयानक मंदी की चपेट में आने वाली है.. अर्थशास्त्रियों का तो यहां तक कहना है कि इस बार की मंदी भारत के लिए 2008 की मंदी से भी ज्‍यादा घातक साबित होगी.. मंदी की मार का जिन क्षेत्रों पर सबसे ज्‍यादा असर होता है उनमें मी‍डिया उद्योग भी शामिल है.. इस उद्योग में कई आंख के अंधे और गांठ के पूरे फायदा उठाने की होड़ में कूद पड़ते हैं और उनकी इसी बे‍वकूफी का शिकार सैकड़ों पत्रकार और अन्‍य मीडियाकर्मी होते हैं जो ऐसे संस्‍थानों में नौकरी करने के लिए मजबूर हैं..

2014 लोकसभा चुनाव का वर्ष है.. यही वजह है कि इस समय कई चैनल और अखबार खम ठोक कर मैदान में उतरने का ऐलान कर रहे हैं.. लेकिन ऐसे चैनल और अखबारों के बारे में अच्‍छी तरह से मालूमात करने के बाद ही पत्रकार साथियों को कोई फैसला करना चाहिए.. मैं 2008 की मंदी का शिकार रहा हूं.. जब एक बड़े समूह के अखबार में अच्‍छे पैकेज पर जाने के बाद ही आठ महीने के भीतर ही फिर दूसरी नौकरी तलाशने के लिए मजबूर हुआ था.. मैं अपने सभी साथियों से भड़ास के जरिए अनुरोध करना चाहूंगा कि लोकसभा चुनाव और मंदी की समाप्ति के बाद ही नौकरी बदलने के बारे में विचार करें..

आशीष तिवारी
vivakanandnj@gmail.com
 

Sixth Somali journalist killed in 2013

VIENNA : The International Press Institute (IPI) condemns the murder of Somali television journalist Liban Abdullahi Farah—the sixth journalist to be killed in the east African country this year—and urges Somali authorities to take the prompt and necessary steps to bring the crime’s perpetrators to justice.

According to IPI sources, Farah was shot four to six times while on his way home from work in Galkacyo, a city in the Puntland autonomous region, on July 7.  He was immediately rushed to the hospital, but soon succumbed from injuries to the throat, chest and legs.  The attack is believed to have been carried out by two to three assailants, whose identity remains unknown.

“We offer our most sincere condolences to Mr. Farah’s family, friends, and colleagues,” said IPI Executive Director Alison Bethel McKenzie.  “For many years now, Somalia has been among the deadliest countries for journalists and we are still seeing an alarming lack of action on the part of Somali authorities. As long as the pervasive impunity in the country continues, Somali journalists will still be at risk of death just for doing their job.”

Farah’s extensive journalistic background included work for various media houses—such as Radio Daljir, Radio SBC, and Royal Television.  He was currently working for the privately-owned Kalsan TV at the time of his death.

While the lack of investigations in this and any other attacks against Somali journalists makes it difficult to clearly establish the motive behind the killings, it is thought that Farah’s work covering political campaigns and candidates may have raised the anger of political players. Puntland is expected to hold elections on July 17.

Mohamed Ibrahim, secretary general of the National Union of Somali Journalists (NUSOJ) told IPI:  “We condemn this heinous murder against our colleague and mourn his loss.  NUSOJ makes a call for an urgent and independent investigation into his murder and urges the authorities of Puntland to bring the killers to justice.”

He added: “This murder could seriously cripple media freedom.  It compromises fair reporting and causes journalists to fear reprisals for their work. Thus, it is of vital importance that members of the press be afforded the necessary protection to work freely.”

Earlier this year, IPI reported on the murder of Abdihared Osman Adan, a reporter for Radio Shabelle, who was shot three times in January.  Similarly, Mohamed Ibrahim Rageh—a journalist with Somali National Television and Radio Mogadishu—was shot dead while on his way back home in April.  Rageh had just returned to Somalia, which he had left because of threats in 2009.   

IPI’s Death Watch places Somalia as the deadliest country in Africa for journalists, with 6 killings thus far in 2013 and 16 in 2012.

(इंटरनेशनल प्रेस इंस्ट्टीट्यूट की तरफ से जारी)

Probe into suicide of former journalist

MUMBAI: Home minister R R Patil has handed over the probe into the suicide of Charudatta Deshpande (57), former journalist and Tata Steel's ex-head of corporate communications, to the crime branch. Patil said the state CID will assist in the inquiry. He directed the crime branch to immediately send teams to Jamshedpur and Thane, where Deshpande lived.

The probe will ascertain if there was any coercion, intimidation or any other criminal act that led to Deshpande ending his life. "A crime branch team has visited Vasai and is examining call records, emails and important witnesses. We will take the probe to a logical conclusion and if need be call the Tata Steel management to record their statements in due course," joint police commissioner (crime) Himanshu Roy told TOI.

A Tata Steel spokesperson stated in an email, "We will offer our full cooperation, if required." Friends and ex-colleagues of Deshpande, who committed suicide at his Vasai home on June 28, had alleged that he had been harassed at work. Tata Group chairman Cyrus Mistry has ordered a departmental inquiry into the circumstances leading to Deshpande's death. Patil's directive came after a delegation from the Mumbai Press Club demanded that the investigation into the case be scaled up and shifted from the Vasai police to a more competent agency. The delegation appealed to Patil that Deshpande's death should not be closed as a case of "accidental death".
साभार- टाइम्स आफ इंडिया
 

Sumit Vats was a journalist before becoming a TV actor

Sumit Vats who plays Rishi in Trilogy Media Pvt. Ltd has experienced fame and recognition courtesy the hit show Hitler Didi. Not many know Sumit Vats was a journalist before he turned actor. He says, "I was bornand brought up in Delhi. I have done my schooling and college from there. I have completed my post graduation in journalism from Delhi. I was active in theatre and play before that. A team had come to Delhi for auditioning for TV show Kaashi. I got selected and got to come to Mumbai. In Mumbai you are accepted by Mumbai once you start getting work here."

On being asked if he struggled he says, "I was very fortunate. I have hardly struggled. I always wanted to come to Mumbai but it was not getting possible initially but because of Kaashi I got it." On being asked how life changed post Hitler Didi he says, "It's great fun to be a part of show like Hitler Didi. The story is gripping. I get ample opportunity to perform."

साभार- टाइम्स आफ इंडिया
 

For journalist in Chhattisgarh, justice delayed, denied

New York : Indian authorities' failure to proceed expeditiously in the prosecution of a freelance journalist is a miscarriage of justice, the Committee to Protect Journalists said today. The journalist, who has been held for almost two years without bail on anti-state charges, had exposed police wrongdoing in central Chhattisgarh state.

"Every day authorities hold Lingaram Kodopi in prison, they are exacting punishment without providing fair and effective due process," said CPJ Asia program coordinator Bob Dietz. "The charges against him smack of retaliation and we call for his immediate release."

The Chhattisgarh High Court on Monday denied bail to Kodopi, who has been imprisoned since September 2011, saying his crime was "of a heinous nature," news reports said. Kodopi's next hearing is scheduled for August, according to a Siddhartha Mitra, a New York-based human rights activist familiar with Kodopi's case. A bail plea had been brought to the high court last month after efforts failed in the lower court.

Authorities accused Kodopi of being a Maoist associate after he allegedly facilitated a transfer of funds between representatives of a steel company and Maoists in Chhattisgarh, where security forces and Maoists are in conflict, according to news reports. The journalist has been charged with criminal conspiracy, sedition, and waging war against the state, according to the New Delhi-based Tehelka magazine. Kodopi had also been accused of carrying out an attack against a local politician, but he has been acquitted in that case, reports said.

Kodopi has denied all of the accusations and said the cases have been filed in retaliation for his documentation of police violence in the area, according to news reports. In April 2011, Kodopi had documented the destruction of houses during an anti-Maoist police operation in three Dantewada villages and "recorded on video precise narrations of police atrocities," Tehelka reported. At a public forum in Delhi in April 2010, Kodopi spoke about police officers taking part in sexual assaults. He also described his own experience being tortured by police. In August 2009, he was held in police custody without legal basis for 40 days, according to Human Rights Watch. During that time he was beaten and pressured to join Indian law enforcement's fight against the Maoist insurgency, according to Tehelka. Kodopi refused and, fearing retribution, fled the state to seek journalism training in New Delhi, Tehelka reported.

Tehelka recorded a local police official admitting that Kodopi had been framed, but the journalist remains in prison. Local human rights activists have cast doubts on the fairness of his ongoing trial and have called for an independent probe, news reports said.

‘जनसंदेश टाइम्स’ की तरफ से उत्तराखंड के लिए पीएम राहत कोष में पांच लाख रुपये

उत्तराखंड की पीड़ा पर मरहम। जनसंदेश टाइम्स परिवार की ओर से प्रधानमंत्री राहत कोष में पाँच लाख रुपये दिये गये। ये रुपए जन सन्देश टाइम्स के कर्मचारियों ने अपनी एक दिन की तनख्वाह दान कर इकठ्ठे किये हैं। इस पवित्र कार्य मैं जनसन्देश टाइम्स के मैनेजमेंट का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

इस अवसर पर राज्यपाल बीएल जोशी बड़े भावुक दिखे। जनसंदेश टाइम्स की तो सराहना की ही, साथ ही बताया कि उन्होंने भी अपनी एक महीने की तनख्वाह दान मैं दी है। राज्यपाल से मिलने गये थे प्रधान सम्पादक सुभाष राय, जनसन्देश टाइम्स लखनऊ के महाप्रबंधक विनीत मौर्य और शिवशंकर गोस्वामी।  
 

एबीपी न्यूज पर आज रात दस बजे से शेखर कपूर पेश करेंगे ‘प्रधानमंत्री’

नई दिल्ली: एबीपी न्यूज पर आज से एक नया शो 'प्रधानमंत्री' शुरू हो रहा है. ये शो हर शनिवार और रविवार को रात दस बजे दिखेगा. इस शो के होस्ट शेखर कपूर का कहना है कि इसमें आज के भारत की ऐसी घटनाएं होंगी, जो बड़े बदलाव और घटनाओं के शोर में दब जाती हैं. शेखर यह भी कहते हैं कि मुमकिन है कि इस शो से विवाद पैदा हो, लेकिन इस शो में बनते भारत की पूरी कहानी पेश करने की कोशिश की गई है. आम तौर पर इतिहास की पुस्तकों में सभी घटनाओं का समावेश नहीं मिलता. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भारत विभाजन, इतिहास की ऐसी युगांतकारी घटनाएं हैं जिनके हर पहलू की रोचकता का हर कोई अनुभव करना चाहता है.

इतिहास की ऐसी ही गुमशुदा रोचक घटनाओं को कड़ियों में पिरोकर समाचार चैनल एबीपी न्यूज अपने 'प्रधानमंत्री' कार्यक्रम में प्रस्तुत करने जा रहा है. हर शनिवार रात 10 बजे प्रसारित होने जा रहे इस कार्यक्रम में विभाजन के बाद से देश के 65 वर्षो के इतिहास को समेटा गया है. आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री से अब तक 13 लोग सत्ता के इस शीर्ष पर काबिज हो चुके हैं. प्रधानमंत्री कार्यक्रम का चरम बिंदु सिर्फ मनमोहन सिंह का सत्तारूढ़ होने पर ही खत्म नहीं होता है, बल्कि अब तक के प्रधानमंत्री के कार्यकाल की उन घटनाओं का जिनसे हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों पर गहरा असर पड़ता है या पड़ रहा है, को शामिल किया गया है.

इस कार्यक्रम की रोचक शुरुआत आजादी की घोषणा के ठीक 9 दिन पहले यानी 6 अगस्त 1947 को दिल्ली के औरंगजेब रोड के एक बंगले की घटना से होगी. 10 औरंगजेब रोड के उस बंगले पर उस दिन पृथक पाकिस्तान के मुखर पैरोकार मुहम्मद अली जिन्ना ने एक महाराजा के हाथ से सादे कागज का एक टुकड़ा छीन लिया था और आजाद भारत का भूगोल बदल दिया था. इस कार्यक्रम की हर कड़ी कुछ ऐसी ही रोचक घटनाओं को पिरोकर तैयार की गई है.

किस्सों के नाट्य रूपांतरण में कहीं भी तथ्यों से छेड़छाड़ नहीं की गई है. शो का मकसद सिर्फ पिछले 65 साल के इतिहास को पर्दे पर लाना नहीं है, बल्कि यह बताना भी है कि कैसे हर छोटी से छोटी घटना और बड़े से बड़े किरदार ने आज के भारत को बनाने में अपनी भूमिका निभाई है. इसके अलावा देश आज जिन समस्याओं का सामना कर रहा है उनकी भी पड़ताल की गई है. भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर पर विवाद की शुरुआत, चीन के साथ संबंधों में तल्खी के कारण और छोटे राज्यों की मांग के पीछे के कारणों से लेकर आपातकाल और मारुती कार के बीच रिश्ता तक की पड़ताल इस कार्यक्रम में की गई है.

एबीपी ने कहा है, "इस शो का हर एपिसोड गहन रिसर्च पर आधारित है. मूल दस्तावेजों और अखबारों में छपी खबरों की मदद से हर घटना के सभी पहलुओं को परखा गया है. इसके अलावा इतिहासकारों, शिक्षाविदों और संबंधित व्यक्तियों के पक्ष को भी शामिल किया गया है." मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक शेखर कपूर कार्यक्रम में सूत्रधार/एंकर के रूप में होंगे. शेखर कपूर का कहना है कि आमतौर पर जो इतिहास पढ़ाया जाता है.. और जो घटनाएं घटी हैं उसमें बहुत फर्क है. इसलिए 'प्रधानमंत्री' जैसे कार्यक्रमों की काफी जरूरत है.

Pepsi is Playing with the Health of Human Lives

hi, Please consider the fact in a shape of a real story, which probably be happening in every second house of India or as a matter of fact the World. Every Kid or Youth right now says the Campaign line of the soft Drink “Mountain Dew” (A Product of Pepsico India) and they also have some remarkable lines about their Quality Manufacturing Process and still they are producing dead flies in their bottles.

My son (one and a half year old) watched the so much mentioned advertisement on the TV and got stubborn to have the very same product at the market (of-course seeing it ta the confectionary shop).

After purchasing, when I was giving the same to my son, suddenly saw that a dead fly was inside the Bottle and the bottle was very much sealed and I was shocked that f I would have given this to my son than I only left with the sayings that “Dar (Dew) ke Aage Maut Hai”, instead of their original quote That says, “Dar ke Aage Jeet Hai”.

Most importantly, after complaining about the same to the so reliable and Quality Standard Company Pepsico, there is no one in the company who could take it seriously, it looked like a daily routine to them.

Being a Human and an Indian and on behalf of all Indians, I really want them to stand in the Human Court and ask what Happened if I would have lost my son (And that was really ridiculous if someone says that it didn’t happen cause should we wait till that time when something will happen).

I still have that Mountain Dew Bottle as a souvenir to the company who says that there manufacturing process is world class and I am looking very positive from this part from the most powerful (way to express the right and the good) Media to think genuinely on this.

Thanks & Regards

Vishal Parmar

mabelmedia@gmail.com

हिमाचल प्रदेश में अफसरों ने पत्रकार व कैमरामैन को गिरफ्तार कराया, खफा मीडियाकर्मी सड़कों पर उतरे

बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश) : जुखाला के पत्रकार अभिषेक मिश्रा और कैमरामैन चैतन्य शर्मा को बीते दिनों पुलिस ने साल भर पुराने मामले में एकतरफा कार्रवाई करते हुए गिरफ्तार कर लिया. पिछले वर्ष युवा सेवाएं एवं खेल विभाग के हास्टल में रहने वाली छात्राओं को किसी तांत्रिक के पास कथित इलाज के लिए ले जाया गया. ऐसा अफसरों के कहने पर किया गया. तांत्रिक के यहां अफसर लोग भी पहुंचे हुए थे. इसकी भनक लगने पर पत्रकार अभिषेक और कैमरामैन चैतन्य कवरेज करने व फोटो खींचने मौके पर पहुंचे थे.

जब अफसरों ने देखा कि मीडिया के लोग आ गए तो इन्हें सबक सिखाने के लिए इनके साथ मारपीट की गई, इनके पैसे छीन लिए गए और उल्टे इनके उपर ही लड़कियों की तरफ से छेड़छाड़ करने का मुकदमा लिखा दिया गया. पत्रकार अभिषेक और कैमरामैन चैतन्य ने भी अफसरों के खिलाफ मारपीट और लूटपाट की रिपोर्ट दर्ज कराई. क्रास एफआईआर होने के बावजूद खेल विभाग के अधिकारियों की शह पर पुलिस ने दोनों पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया.

हालांकि इस मामले की जांच के दौरान अधिकारियों ने चैतन्य का कैमरा अपने कब्जे में लेकर जांच के लिए भेज दिया था जिसमें किसी लड़की की कोई तस्वीर न होने की बात सामने आई. बावजूद इसके, मीडिया को सबक सिखाने के मकसद से पुलिस ने पत्रकार व कैमरामैन को गिरफ्तार कर हवालात में बंद कर दिया. दोनों को इनके घरों से गिरफ्तार किया गया. इन्हें बरमाणा थाने की हवालात में रखने के बाद वीरवार को अदालत में पेश किया गया जहां से इन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.

पत्रकारों की गिरफ्तारी मामले को लेकर शुक्रवार को जिला भर से आए पत्रकार पुलिस प्रशासन के खिलाफ सड़कों पर उतर गए. पत्रकार महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष पंडित जयकुमार शर्मा के नेतृत्व में पत्रकारों ने शहर में रोष रैली निकालकर पुलिस अधीक्षक कार्यालय का घेराव किया और पुलिस प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी की. इससे पहले स्थानीय परिधि गृह में आयोजित बैठक में जिला भर से आए पत्रकारों ने पुलिस प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की. बैठक में निर्णय लिया गया कि 15 जुलाई को मुंह पर काली पट्टियां बांधकर पुलिस अधीक्षक का घेराव किया जाएगा और दो घंटे तक धरना प्रदर्शन किया जाएगा. इसके साथ उपायुक्त के माध्यम से पुलिस प्रशासन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को एक ज्ञापन सौंपा जाएगा.

बैठक की अध्यक्षता करते हुए पंडित जयकुमार शर्मा ने कहा कि इस मामले पर प्रदेश भर में आंदोलन किए जाएंगे. उन्होंने इस कार्रवाई को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारी व कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ ही इस मामले से जुड़े खेल विभाग के अधिकारियों को भी शीघ्र गिरफ्तार करने की मांग की है. उधर, पत्रकार पर हुई कार्रवाई के पीछे जिला से संबंधित एक बड़े नेता का हाथ होने के कयास लगाए जा रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक अभिषेक को गिरफ्तार करने पहुंचे पुलिस अधिकारी ने कहा था कि उनके ऊपर बहुत प्रेशर है, जिस कारण उन्हें गिरफ्तारी करनी पड़ेगी.

प्राण को तलाशते हुए चले गए प्राण

जिन्दगी की भी अपनी एक अलग तासीर होती है। कहा तो यही जाता है कि हम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, जिंदगी को हार या जीत के खेल में तब्दील नहीं सकते। लेकिन, यह जरूर है कि जिंदगी अगर चाहे, तो वो हमें अपने खेल में एक मोहरे की तरह बहुत आसानी से इस्तेमाल कर सकती है। जैसा कि असकर वह कर ही लेती है। क्या आप और क्या हम, सब के सब मोहरे ही तो हैं जिंदगी के। लेकिन हमारे जमाने में एक आदमी ऐसा भी रहा, जिंदगी जिसके साथ कोई खेल नहीं कर पाई। उस सख्श का नाम था –  प्राण सिकंद। लेकिन दुनिया उन्हें प्राण के नाम से जानती है, सिर्फ प्राण। जिन्होंने जिंदगी को ही उल्टे अपने लिए खेल का सामान बना डाला। और खेलते रहे, पूरे 93 साल तक।

जिदगी तो उनकी गुलाम बनकर रही, पर मौत भी कई बार उनके सामने आकर खड़ी हुई, तो वे असकर खेलते रहे उसके साथ भी। शायद इसलिए, क्योंकि प्राण के लिए जिंदगी, जिंदगी थी और मौत उसका मुकाम। वैसे तो जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं कि वो हमको किस रास्ते ले जाए… लेकिन प्राण ने तो जिंदगी और मौत की हार और जीत दोनों के साथ बहुत सारे सपने भी जोड़ लिए थे। कुछ अपने, कुछ अपनों के और बहुत सारे आप और हम जैसे करोड़ों लोगों के सपने, यही वजह थी कि जिंदगी प्राण के साथ कोई खेल नहीं कर पाई।

जिंदगी भर अपने जीए हुए, किए हुए और दुनिया भर को दिए हुए की यादों के सुख का बड़ा सा संसार अपनी आगोश में समेटे प्राण अपने आखरी दिनों में पूरे साढ़े तीन महीने मुंबई के लीलावती अस्पताल में सूनी आंखों से निहारते रहते थे। और बाहर थोड़ी सी दूर अरब सागर की लहरें किनारे पर आकर पछाड़ मार मार कर सवाल करती रहती थी कि क्या यह वही शख्स है जो जिंदगी भर जिंदगी से खेलता रहा। वैभव, ग्लैमर और सपनीली रंगीन रोशनी से सजे सिनेमा के संसार में रहने वाले लोगों का अक्स भी औरों को अपनी ओर खींचने का माद्दा रखता है, तो वह तो प्राण थे, जिनका नाम ही बस काफी था। 12 फरवरी 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके के एक धनी पंजाबी परिवार में जन्मे प्राण 12 जुलाई 2013 को मुंबई में इस तरह से गए जैसे शरीर पर जन्मा कोई बहुत मजबूत सा फोड़ा लंबे समय से फूट जाने को बेताब ही रहा हो।

वैसे तो, सिनेमा को हम ख्वाबों की दुनिया मानते हैं, लेकिन सिनेमा ही अगर किसी के लिए ख्वाब पाल ले तो उसे किसी और ख्वाब की जरूरत नहीं होती। प्राण के साथ भी ऐसा ही हुआ। वे जिंदगी में चाहते तो थे फोटोग्राफर बनना, लेकिन सिनेमा ने उनको अभिनेता बनाने का ख्वाब बुन रखा था। एक ऐसा अभिनेता, जो सन 1940 में एक पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ से लेकर 1997 में फिल्म ‘मृत्युदाता’ तक लगातार 6 दशक तक हर फिल्म में अपने अभिनय के जानदार, शानदार, धारदार और धुंआधार किस्म के नए नए आयाम रचता रहा। प्राण अगर हमारे बीच से अकाल जाते, तो जमाना सन्न रह जाता। लेकिन वे तो मौत को भी आसन्न ही प्राप्त हुए। लंबे समय तक अशक्त रहे, बीमार भी रहे और धीरे धीरे हम सबको उनने एक ऐसे माहौल में ढाल दिया कि हमने और हमारे सिनेमा ने प्राण के रहते हुए ही उनके बिना जीने की आदत डाल सी ली थी। वैसे तो जीवन में प्राण के बिना कोई जी नहीं पाता, लेकिन क्योंकि प्राण ने 1997 में जब फिल्मों में काम करना छोड़ा था, तभी से सिनेमा उनके बिना जीने की तैयारी कर चुका था। ‘यमला जट’ के बाद से वे हमारी फिल्मों में ऐसे छाए कि लगातार साठ साल तक काम करते रहे। भारतीय सिनेमा में शायद ही कोई दूसरा शख्स हो, जिसने इतने लंबे समय तक काम करते हुए पूरी 350 फिल्मों में काम किया हो और जिनमें काम किया, उनमें से अधिकांश फिल्में हर पिछली फिल्म का रिकॉर्ड तोड़ने में कामयाब रही हो। सन 1948 में 'जिद्दी' उनकी जिंदगी को अहम मोड़ देकर कामयाबी का नया अध्याय लिखने में सफल रही। और फिर तो ऐसा हुआ कि लगातार 1982 लगभग हर हीरो के खिलाफ विलेन की भूमिका में सिर्फ और सिर्फ प्राण ही रहे।  'खानदान', 'औरत', 'बड़ी बहन', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'हाफ टिकट', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'डॉन' 'जंजीर' ‘कालिया’ आदि के अलावा अनेक फिल्में हैं, जो आनेवाले अनेक सालों तक हमारे सिनेमा में याद की जाती रहेंगी।                                                     

वैसे, बहुत कम लोग होते हैं, जिनमें ऊपरवाला बहुत सारी कलाएं एक साथ भर कर भेजता है। प्राण भी ऐसे ही थे। उनका अभिनय न केवल बोलता था, बल्कि इतना जीवंत था कि लोग सिर्फ उसके दीवाने ही हो सकते थे। लेकिन जो वे अपने अभिनय से नहीं बोल पाते थे, वह सब का सब अपनी आंखों के जरिए बोल जाते थे। प्राण की संवाद अदायगी का लयदार अंदाज ही इस कदर निराला रहा कि बरसों बाद आज भी परदे पर उनकी उपस्थिति कभी सिरहन पैदा करती है तो कभी हत्तप्रभ। लोग तब भी दबाते थे और आज भी उनके अभिनय पर दांतों तले उंगली दबाते हैं, खासकर उनके डायलॉग सुनकर। शब्द के अर्थ में जान फूंकनेवाले अंदाज में उसे बोलना, उनके खड़े होने का अंदाज, धीमे कदमों से आगे बढ़ते हुए अचानक गरदन तरेरकर सामनेवाले की आंखों में आंख डालकर बिन बोले ही बहुत कुछ कहकर हर किसी को हिला देने का अंदाज, ये सारे तत्व आपस में मिलकर एक ऐसा दृश्य बुनते रहे, जो सिनेमा को, दर्शक को, बाजार को और हम सबको वास्तव में चाहिए था। यही तो था उनके प्राण होने का असली तत्व, जो किसी को भी अंदर तक हिला कर रख देने का माद्दा रखता था। किरदार कैसा भी हो, प्राण उसमें पूरी तरह से ढल जाते थे। इस कदर कि कोई उनको पहचान भी नहीं पाता। इसका सबसे अहम उदाहरण यही माना जाता है कि एक बार शूटिंग पर उनका जवान बेटा उनसे मिलने आया, और अपने पिता को तलाशता हुआ उनके पास से गुजर गया, तो प्राण ने पीछे से कहा – पहचाना नहीं बरखुरदार ? फिर तो यह डायलॉग ही उनकी पहचान बन गया जो बाद में फिल्मों में भी सुनने को मिला और फिर तो घर घर में बोला भी जाने लगा।

कहा जाता है कि कामयाबी अकसर किसी को भी थोड़ा बहुत मगरूर तो बना ही देती है। लेकिन मगरूरी भी बेचारी प्राण की जिंदगी में अपने लिए कभी कोई जगह नबीं तलाश पाई। वे मन के बहुत कोमल थे। लेकिन सिनेमा ने अपने परदे पर हमेशा उनके लिए बदमाश, मक्कार, चोर, लुटेरे, डाकू, तस्कर, बलात्कारी, खूनी, खतरनाक और ऐसे ही किरदार तय कर रखे थे, जिनको उनने इतना जीवंत और बखूबी जिया कि इसी वजह से बरसों बरसों तक किसी ने अपने बच्चे का नाम प्राण रखा ही नहीं। यही वजह थी कि जिंदगी के आखरी मुकाम पर भी प्राण अपनी जिंदगी में प्राण को तलाशते रहे। बात 2005 की है, जब ऊम्र तो उनकी 85 की हो गई थी, पर थोड़े से स्वस्थ थे। अपन उनसे मिलने गए थे। मिले तो लगा कि इतनी ऊम्र में भी उम्मीदों के आसमान की उड़ान भरने वाले लोग कहां बूढ़े हो पाते हैं ! दरअसल, अपन इसलिए मिलने गए थे कि प्राण उस किसी एक मां के दर्शन करना चाहते थे, जिसने अपने बेटे का नाम प्राण रखा हो। इसके लिए बाकायदा तलाशी अभियान रखा गया, जिसका नाम था – ‘हंट फॉर प्राण’, लेकिन कोई मिला ही नहीं। लेकिन अब तो प्राण भी सिर्फ परदे पर ही मिलेंगे। वैसे, भी प्राण तो प्राण हैं, जो सबमें सिर्फ एक ही हुआ करता है। न हममें, न सिनेमा में, दो – दो प्राण कहां हो पाते हैं ! हो तो, बताना।

लेखक निरंजन परिहाल वरिष्ठ पत्रकार हैं.

केके का आना और उनकी बांछों का खिलना

केके उपाध्याय के लखनऊ हिन्दुस्तान में ज्वाइन करते ही कुछ लोगों की बांछें खिल गई हैं। इसमें वे लोग शामिल हैं, जो केके के करीबी और साथ ही नाकाबिल भी हैं। उन लोगों को इतनी बधाईयां मिल रही हैं, जितनी तो शायद खुद केके को भी नहीं मिल रही होंगी। शुक्रवार को केके उपाध्याय ने लखनऊ में बतौर संपादक कार्यभार संभाल  लिया। यह खबर जैसे ही कुछ पोर्टल और फोन पर लोगों को मिलीं वे चौड़े होकर घूमने लगे। यह वे लोग हैं जो स्वयं को केके का करीबी बताते हैं। खास बात यह है कि उन्हें कामधाम से कोई मतलब नहीं वह सिर्फ लॉबिंग में ही दिन-रात जुटे रहते हैं। कई लोग ऐसे हैं, जिनकी ताजपोशी केके ने की थी और सही तरीके से काम को अंजाम न दे पाने के कारण वे इस वक्त हाशिए पर चल रहे हैं। उन्हें एक बार फिर तेल लगाकर अपने दिन बहुरने का इंतजार है।

केके उपाध्याय ने हिन्दुस्तान यूपी में बहुत समय दिया। बरेली, आगरा और मेरठ में तो वे काफी दिन रहे भी। इसी दौरान उन्होंने कई ऐसे लोगों को भर्ती कर लिया, जिनको काम-धाम तो आता नहीं था और अमर उजाला में हाशिए पर चले गए थे। उनकी जगह उनके जूनियर को इंजार्च बनाकर बैठा दिया गया था। ऐसे में ये लोग केके की शरण में आए। केके ने इन लोगों को इसलिए हिन्दुस्तान में ले लिया क्योंकि ये लोग उनकी जी-हूजूरी कर रहे थे। चुंकि ज्यादातर लोग अमर उजाला में थे, सो केके को उन्हें हिन्दुस्तान में लाने में ज्यादा दिक्कत भी नहीं हुई। आखिर जिस अखबार का प्रधान संपादक से लेकर हर कर्मचारी अमर उजाला का हो वहां यह काम क्या मुश्किल है। केके ने न सिर्फ ऐसे लोगों की हिन्दुस्तान में इंट्री कराई बल्कि पैसे और पद भी ज्यादा दिला दिया। जो लोग अमर उजाला में सब एडिटर थे, उन्हें सीनियर सब और जो लोग सीनियर सब थे उन्हेंं चीफ सब बना दिया। यानी लगभग सबको एक-एक पद बढ़ा कर दिया गया। इसी क्रम में उनका वेतन भी बढ़ गया।

यही नहीं सभी लोगों को किसी न किसी जगह का इंचार्ज भी बना दिया गया। जब तक केके यूपी की विभिन्न यूनिटों में रहे तब तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, उनके बिहार जाते ही समीकरण बदल गए। नए संपादकों ने जब देखा कि पुराने लोग सही परिणाम नहीं दे पा रहे हैं रहे हैं तो उन्हें हटाकर नए लोगों को लाया गया। हालांकि बिहार में रहते हुए भी केके ने इन लोगों को बचाने की काफी कोशिश की। लेकिन नाकाबिल लोग आखिर कब तक ढोए जाते। और हुआ भी ऐसा ही। सबको इधर से उधर किया जाने लगा। जिन लोगों की कहीं और जुगाड़ थी वे तो चले गए। लेकिन जिनकी कहीं जुगाड़ नहीं हो पाई वे दिन काटते रहे। अब उनका इंतजार खत्म हो गया। उनके दिन फिर से बहुरने वाले हैं। यह सोचकर वे लोग काफी खुश हैं। मजे की बात यह है कि उन्होंने खुशी अपने तक ही सीमित नहीं रखी, सबको बांटी भी। जिन लोगों की पहुंच केके तक नहीं हैं, वे उन चहेतों को फोन करके बधाई दे रहे हैं। चहेते भी कम नहीं वे खुशी-खुशी बधाई स्वीकार भी कर रहे हैं और पूरे यूपी में छा जाने की बात भी कर रहे हैं।

दरअसल केके उपाध्याय हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर के खास माने जाते हैं। शशि शेखर ने केके को अपनी स्टाइल में काम करने की पूरी छूट दे रखी है। हालांकि यह भी सच है कि केके बहुत सारे काबिल लोगों को हिन्दुस्तान में लाए। इससे अखबार की सेहत भी सुधरी, लेकिन अपने गुरु शशि शेखर से केके ने एक खास गुण ले लिया। और वह गुण है, अपने नीचे कुछ चूतिया लोगों को रखने का। जो अखबार का काम छोड़कर हर काम करने के लिए तैयार रहें। जो आपको पूजते रहें और यस सर यस सर कहते रहें। यही हुआ भी। केके यूपी की जिन यूनिटों में भी रहे वहां से जाने के बाद भी एक-दो लोग ऐसे छोड़ गए जो पल-पल की खबर उन्हें देते रहें। ये लोग अपने काम को ठीक प्रकार से अंजाम भी देते रहे। अब उस काम का परिणाम आने का वक्त हो गया है।

आगरा और बरेली में अभी भी ऐसे लोग हैं जो केके के जाने के बाद भी लगातार उनके सम्पर्क में रहे और हर अंतरिक जानकारी केके को देते रहे। इसलिए केके को भले लखनऊ और पूर्वी उत्तर प्रदेश का काम दिया गया हो, लेकिन उनकी नजर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा और बरेली पर बनी रहेगी। हालांकि माना यह भी जा रहा है कि अनिल भास्कर को भले पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हेड बनाया गया हो, लेकिन उन्हें मेरठ तक ही सीमित होकर रह जाना पड़ेगा। आगरा और बरेली का काम भी अप्रत्यक्ष रूप से केके ही देखेंगे। यानी वे जो निर्णय लेंगे वही अंतिम निर्णय होगा। इन यूनिटों में जितने भी केके के चहेते और नाकाबिल लोग हाशिए पर हैं वे अब बदला लेने के मूड में आ गए हैं, और खूलेआम यह कहते घूम रहे हैं कि देखें अब कौन हमारा क्या बिगाड़ लेगा। ऐसे में जहां एक ओर केके के लिए लखनऊ की स्थिति को समझना और वहां के लोगों को यह विश्वास दिलाना कि वे उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे से ज्यादा मुश्किल काम इन चहेतों के लिए कुछ करना रहेगा। उम्मीद पर तो दुनिया कायम है तो यह लोग क्यों नहीं। जानकार मान रहे हैं कि जल्द ही पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी बड़ा सत्ता परिवर्तन देखने को मिले तो कोई बड़ी बात नहीं है। अब तो बस तेल देखिए और तेल की धार देखिए। (कानाफूसी)

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘खबर मंत्र’ के साथ शंभूनाथ चौधरी, संदीप कमल, अखिलेश कुमार सिंह, सुनील सौरभ जुड़े

झारखंड से 'खबर मंत्र' अखबार 11 जुलाई को लांच हो गया. अब इस अखबार से जुड़े कुछ लोगों के बारे में जान लेते हैं. इस अखबार के एडिटर इन चीफ तो हरिनारायण सिंह हैं, जिनके बारे में सब जानते हैं. अखबार के रेजीडेंट एडिटर हैं शंभूनाथ चौधरी. न्यूज एडिटर का दायित्व निभा रहे हैं संदीप कमल.

अखबार के जनरल मैनेजर बनाए गए हैं अखिलेश कुमार सिंह. अखबार के लिए दिल्ली ब्यूरो के हेड के रूप में कामकाज देख रहे हैं सुनील सौरभ. सुनील सौरभ इसके पहले स्वाभिमान टाइम्स में बिजनेस एडिटर हुआ करते थे. वे हिंदुस्तान अखबार में बिजनेस ब्यूरो में कार्यरत थे.

भड़ास तक मीडिया की सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

हरिनारायण सिंह के नेतृत्व में ‘खबर मंत्र’ की झारखंड में दमदार दस्तक

वरिष्ठ पत्रकार हरिनारायण सिंह के नेतृत्व में चुपचाप लांच हुए 'खबर मंत्र' अखबार ने झारखंड में जोरदार दस्तक दी है. 11 जुलाई को लांच हुए इस अखबार के लिए पिछले दो सालों से तैयारियां चल रही थीं. लांच से पहले अखबार की सदस्यता करीब दो लाख लोगों ने ली. अखबार में विज्ञापनों की संख्या देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस अखबार को लाने से पहले मार्केटिंग से लेकर ब्रांडिंग, कंटेंट सभी फील्ड में काफी काम किया गया है.

‘खबर मंत्र’ के संपादक हरिनारायण सिंह हैं जो लंबे समय तक प्रभात खबर और हिंदुस्तान अखबार के संपादक रहे हैं. इस बारे में हरिनारायण सिंह कहते हैं कि- ''अखबार में सामाजिक सरोकार के मुद्दे को हम लोग प्राथमिकता देंगे. अखबार भले ही झारखंड से प्रकाशित हो रहा है, लेकिन इसका कलेवर पूरी तरह से राष्ट्रीय स्तर का होगा. 'खबर मंत्र' को उत्कृष्ट बनाने के लिए पिछले एक वर्ष से एक रिसर्च टीम काम कर रही है. खबरों के मामले में भी यह अखबार दूसरों से बीस साबित होगा. अखबार में राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इसके अलावा, सोशल मीडिया की लोकप्रियता को देखते हुए, इससे जुड़े लोगों के लिए भी अखबार में एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया गया है, इसके माध्यम से वे किसी मुद्दे पर बहस में हिस्सा ले सकेंगे. राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, स्थानीय, खेल, बिजनेस से जुड़ी खबरें तो हैं ही, स्टूडेंट्स के लिए एजुकेशन के जुड़ी सभी जानकारियां मुहैया कराई जा रही हैं.''

दैनिक भास्कर, जयपुर के विशेष संवाददाता मदन कलाल का इस्तीफा, नेशनल दुनिया ज्वाइन करेंगे

दैनिक भास्कर, जयपुर के विशेष संवाददाता मदन कलाल ने भास्कर से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा मंजूर होने की प्रक्रिया विचाराधीन है। सधी और सटीक रिपोर्टिंग की पहचान रखने वाले मदन कलाल पिछले ग्यारह साल से भास्कर से जुड़े रहे हैं। वे भास्कर एकेडेमी के पहले बैच के विद्यार्थी रहे हैं। शिक्षा, समाज और राजनीति विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।

कई वरिष्ठ संपादकों के साथ काम कर चुके कलाल के बाद आए भास्कर ज्वाइन करने वाले कई जूनियरों को पदोन्नति दे दी गई परंतु वे जहां के तहां थे। खबर है कि वे जयपुर से प्रकाशित होने जा रहा ‘नेशनल दुनिया’ ज्वाइन करेंगे।

राजस्थान से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: 09829270160

थानवी और भंडारी पत्रकारिता विश्वविद्यालय प्रबंध मंडल के सदस्य बने

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और विजय भंडारी राजस्थान में नवगठित ‘हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय’ के प्रबंध मंडल के सदस्य बनाए गए है। राजस्थान सरकार ने शुक्रवार को उनके मनोनयन आदेश जारी किए। बीकानेर के मूल निवास ओम थानवी ‘जनसत्ता’, नई दिल्ली के कार्यकारी संपादक हैं जबकि विजय भंडारी राजस्थान पत्रिका के संपादक रह चुके हैं। दोनों तीन साल तक मंडल के सदस्य रहेंगे।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछले साल के बजट में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के नाम पर राज्य के इस पहले पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। ‘द हिन्दू’ के जयपुर सह संपादक सन्नी सैबेस्टियन को इसका कुलपति बनाया गया है। जयपुर के झालाना संस्थानिक क्षेत्र में विश्वविद्यालय का भवन और आधारभूत ढांचा खड़ा करने का काम जारी है। 

राजस्थान से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: 09829270160

नवभारत टाइम्स ओर सांध्य टाइम्स में कइयों को प्रमोशन और इंक्रीमेंट

दिल्ली : बीसीसीएल कंपनी की तरफ से इस बार टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप के हिंदी ब्रांड नवभारत टाइम्स और सांध्य टाइम्स में धुंआधार प्रमोशन और इक्रीमेंट मिले हैं. नवभारत टाइम्स में क्राइम बीट के मास्टर पंकज त्यागी को प्रिंसिपल कारेसपोंडेंट से स्पेशल कारेसपोंडेट बनाया गया है. सूचना है कि पंकज त्यागी को अब क्राइम बीट से हटाकर दिल्ली ब्यूरो में टांसफर कर एनआईए, सीबीआई, होम मिनिस्टी व अन्य महत्वपूर्ण बीटें दी गई हैं.

एनबीटी में क्राइम देख रहे सीनियर कारेसपोंडेंट मनीष अग्रवाल को भी प्रमोशन मिला है. उन्हें प्रिंसिपल करेस्पांडेंट बनाया गया है. नवभारत टाइम्स दिल्ली के अलावा एनसीआर के ब्यूरो में सिर्फ ग्रेटर नोएडा ब्यूरो में श्याम को सीनियर रिपोर्टर का लेटर मिला है. बाकी ब्यूरो मे मायूसी है. एनबीटी दिल्ली में अलग अलग बीट के आधा दर्जन को प्रमोशन की सूचना है. वहीं सांध्य टाइम्स में तीन लोगों को प्रमोशन की सूचना है.

इनमें हाल ही में एनबीटी दिल्ली से टांसफर होकर आए प्रमुख संवाददाता रामेश्वर दयाल को विशेष संवाददाता बनाया गया है. ललित वर्मा को एएनई का लेटर मिला है. नोएडा नवभारत टाइम्स में क्राइम रिपोर्टर विशाल आनंद को डेढ साल पहले नोएडा से दिल्ली सांध्य टाइम्स में तबादला किया गया था, उन्हें भी सांध्य टाइम्स में क्राइम बीट के लिए सीनियर करेस्पांडेंट बनाया गया है. इसके अलावा सूचना है कि सभी को इंक्रीमेंट में भी ठीक ठाक मिला है.

उत्तराखंड आपदा पर जमीनी रिपोर्ट : सरकार का आपदा प्रबंधन फेल

धारचूला के बाजार में आज से चाय मिलनी बन्द हो गयी, दो-चार दिन में खाना भी मिलना शायद बन्द हो जायेगा। आपदा की त्रासदी से कराह रहा पिथौरागढ़ जिले का धारचूला व मुनस्यारी का इलाका सबसे न्याय की उम्मीद कर रहा है। आपदा की त्रासदी आज बीसवां दिन है। मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत का दौरा हो चुका है। सांसद व विधायक कई बार इलाके का दौरा कर चुके हैं। आज पता चला कि आपदा मंत्री धारचूला में हैं। 1977 में तवाघाट में आयी भीषण आपदा की त्रासदी के दौरान भी धारचूला का इलाका पिथौरागढ़ से केवल एक दिन सड़क मार्ग से कटा रहा। धारचूला में अस्सी साल से अधिक उम्र के वृद्धों की जुबान पर यह बात है कि पहली बार बीस दिन से सड़क बन्द होने के बाद उपजी स्थितियों का वह सामना कर रहे हैं।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहां की सरकारें अपनी पीठ थपथपा रही थी कि वह पहला राज्य है जिसने आपदा के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया। आपदा प्रबन्धन के नाम पर होने वाली लूट खसौट की लम्बी फेहरिस्त है। यूनेस्को से लेकर तमाम विदेशी वित्तीय ऐजेन्सीज द्वारा मिलने वाली करोड़ों की राशि आपदा प्रबन्धन के नाम पर उत्तराखण्ड में खपाई जा रही है। उत्तराखण्ड में कार्यशाला, प्रशिक्षण, आपदा से पूर्व तथा आपदा के बाद निपटने की बात पर खर्च तो करोड़ों होते हैं लेकिन उनसे क्या निकल रहा है। यह इस बार जमीन पर धारचूला व मुनस्यारी में दिखा है। बात यहां से शुरू करते हैं हैलीकॉप्टरों से जो राशन के पैकेट भेजे गये उनकी पैंकिंग तक यहां के कर्मचारियों को नहीं आती है। जिस कारण हैली से फेंके गये राशन के पैकेट आसमान में ही फट गये और आपदा पीड़ितों को चावल-आटा केवल चाटने को मिला। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आपका सरकारी प्रबन्धन कितना कुशल है। इस बीच हम धारचूला में हैं आपदा के बाद जब 21 जून को यहां पहली बार आये थे तो निगालपानी, गोठी के निकट मोटर मार्ग में पैदल रास्ता बचा था।

इस बार फिर 3 जुलाई को जब फिर धारचूला पहुंचे तो इन दोनों जगहों पर पैदल चलने के लिए रास्ता मात्र तक नहीं था। सीमा सड़क संगठन के इंजीनियर मोटर मार्ग नहीं खोल पाये। इस पर तो बात होनी चाहिए लेकिन पैदल रास्ता भी बचा नहीं पाये यह बात तो शर्म की है। आज 20 दिन बीत रहे हैं केवल दो स्थानों में सड़क खोली गयी है। कहने को तो यह राष्ट्रीय राजमार्ग है। इस सड़क के बन्द होने से धारचूला बाजार का नजारा कुछ इस तरह है कि राशन की दुकानों के बारदाने जो सामानों से भरे थे, खाली हो चुके हैं। गोदाम सूने हो गये हैं। एक राशन के दुकानदार ने बाताया कि आज तक जो माल नहीं बिका था वह भी इस बार बिक गया। सब्जी खाना तो यहां के लोगों के लिए अब एक स्वप्न हो गया है। 19 रूपये किलो चावल 100 रूपये में भी नहीं मिल रहा है। यहां से बलुवाकोट कुछ पैदल-कुछ जीप में जाकर राशनों के कट्ठे अपने पीठ में लादकर ला रहे हैं और सरकार को आईना दिखा रहे हैं कि इस आपदा से उपजी भूख से निपटने के लिए उसके पास कोई प्रबन्धन नहीं है। जो जनता कर रही है, वह भी सरकार नहीं कर सकती है। जौलजीबी से धारचूला के राष्ट्रीय राजमार्ग में कालिका से आगे मार्ग बन्द है।

यहां से आगे के पैंतीस से अधिक ग्राम पंचायतें और तीस हजार की आबादी चावल के दाने के लिए तरस रही है। धारचूला बाजार से आगे व्यांस, चौंदास, दारमा घाटी, तल्ला दारमा घाटी, खुमती क्षेत्र, गलाती क्षेत्र, रांथी से लेकर खेत तक का इलाका राशन के एक-एक दाने के लिए मोहताज है। धारचूला व मुनस्यारी के आपदा पीड़ित ही नहीं बल्कि अब साठ हजार की जनसंख्या को दाल, आटा, चावल की आवश्यकता है। इस पर सरकार का ध्यान अभी तक तो कतई नहीं है। धारचूला से आगे के और धारचूला तक जोड़ने वाले मोटर मार्ग कब खुलेंगे इसका जवाब सीमा सड़क संगठन दे नहीं पा रहा है। चीन तथा नेपाल सीमा के बार्डर का यह हाल है, यहां सुरक्षा तो एक सवाल है ही, क्या इस सिस्टम पर हम कोई भरोसा कर सकते हैं यह चिन्ता भी एक बात है। लेकिन हम उन हजारों लोगों की बात कर रहे हैं, जिनके घर में आटा चावल अब खतम होने को है। इस पूरे प्रक्रिया में कहीं भी सरकार तथा प्रशासन के कामकाज में यह बात नहीं है कि वह राशन आम लोगों तक पहुंचाने का कोई विकल्प दे पाया है। सोई हुई सरकार, जन प्रतिनिधियों के पीछे भाग रही नौकरशाही क्या इस इलाके के लोगों को एकमात्र राशन दे पायेगी।

आज अखबार में खबर है कि जौलजीबी से मदकोट का मोटरमार्ग दो माह में खुलेगा। गोरीछाल घाटी के सैकड़ों गांवों की बीस हजार की आबादी का भी राशन खत्म होने को है। इनके बारे में क्या बहुगुणा सरकार ने कुछ सोचा है? यही उत्तर मिलेगा कि -नहीं। मुनस्यारी के जोहार तथा रालम घाटी में लोग आज भी फंसे हुए हैं। कन्ज्योति के 35 आपदा पीड़ितों को आज तक नहीं निकाला गया है। यही हाल दारमा घाटी का भी है। यहां अधिकारी कर्मचारी बहुत हैं लेकिन उनके पास इस आपदा से निपटने का कोई सरकारी दिशा तक नहीं है। धौलीगंगा जल विद्युत परियोजना के छिरकिला बांध पर भी लोगों के सवाल हैं, नेपाल ने तो भारत पर यह आरोप भी लगा दिया है कि बांध का पानी एकसाथ खुलने से नेपाल को भारी नुकसान हो गया है। भारतीय राजदूत के ना-नुकुर के बाद यह सवाल लोगों की जुबां पर है कि 15 जून की रात्री से ही बारिश शुरू हो गयी थी तो क्यों 17 जून को क्यों बारिश का पानी एक साथ खोला गया।

ऐलागाड़ का कस्बा इसलिए बह गया कि टनल से जो अतिरिक्त पानी छोड़ा गया उसे ऐलागाड़ गधेरे के पानी ने पूरे वेग से रोक दिया और उसने ऐलागाड़ के कस्बे का नामोनिशान मिटा दिया। एनएचपीसी यह कह चुकी है कब उसकी परियोजना शुरू होगी वह कह नहीं सकती। करोड़ों का नुकसान अलग से है। पहाड़ों में परियोजना तथा बांध के समर्थक इस सवाल पर भी जवाब देंगें। मुख्यमंत्री ने सोबला, न्यू, कन्च्यौति, खिम के 171 परिवारों को यहां राजकीय इण्टर कॉलेज धारचूला में बुलाकर ठहराया है। एक सप्ताह के बाद भी प्रभावित परिवार सिमेन्ट के फर्श में बिना चटाई दरी के लेट रहे हैं। उन्हें देखने वाला कोई नहीं है। इन परिवारों की सुध क्यों नहीं ली गयी, क्योंकि हमारे आपदा प्रबन्धन महकमें के पास कार्य करने के लिए कोई रूटमैप है ही नहीं। आज इतना ही फिर कल से और क्षेत्र की स्थिति पर पर हकीकत बयां करते रहेंगे।

धारचूला और मुनस्यारी पर : दूसरी रपट

घर-बार बर्बाद हो गया, आंखों में आँसू है और सामने अंधेरा। रोज कोई नेता आता है, सपने दिखाने के लिए। बारिश से रात को नींद भी नहीं आ रही है। 15 जून के बाद की रातों की याद ने नींद भी छीन ली है। हर बारिश की बूँद की आवाज से खौफनाक अंदेशा इनके चैन को छीन कर ले गया। सोबला, न्यू, कन्च्यौती, खिम के 175 से अधिक परिवारों को जान बच जाने की थोड़ी खुशी तो है। कन्च्यौती में दो लोगों की जान इस आपदा से गयी। उनकी यादें अपने जीवन के बच जाने के बीच इन परिवारों के चेहरों पर यह परेशानी साफ तौर पर देखी जा रही है कि अब कैसे उनका कुनबा बसेगा। धारचूला व  मुनस्यारी क्षेत्र में आयी आपदा में ये चार गाँव हैं, जो अब इतिहास में दफन हो चुके हैं। इन गाँवों की वो खुशहाली अब बीते दिनों की याद बनकर रह गयी है। राजकीय इण्टर कॉलेज धारचूला के उन कक्षों में जहाँ कभी बच्चे पढ़ते थे आज इनकी शरण स्थली बन गयी है। इन लोगों को इस बात का डर है कि डीडीहाट के हुड़की, धारचूला के बरम तथा मुनस्यारी के ला, झेकला, सैणराँथी के आपदा पीड़ितों के साथ सरकार ने जो अन्याय किया है, कहीं उनके साथ भी ऐसा न हो। आज उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कैसे सितम्बर तक का समय गुजरे।

भाकपा (माले) की एक टीम इन दिनों धारचूला क्षेत्र में है। टीम धारचूला के सामाजिक कार्यकर्ता केशर सिंह धामी के साथ जैसे ही आज राजकीय इण्टर कॉलेज में पहुँचे तो वहाँ ठहरे आपदा पीड़ित एक-एक करके बाहर निकलने लगे। उनकी आँखें अब इन्तजार करते-करते थक चुकी हैं। पैरों में अब खड़े होने की ताकत भी नहीं बची है। एक सप्ताह से इस शरण स्थल में रहने वाले इन 175 परिवारों के सैकड़ों आपदा पीड़ित 15 दिनों से कपड़े तक नहीं बदल पाये हैं। इन गाँवों से इन्हें हैली में लाया गया। घर के साथ ही इनके तन के कपड़े भी धौलीगंगा में समा चुके हैं। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इन परिवारों को इनके गाँवों से यहां आमन्त्रण देकर बुला तो लिया लेकिन इन्हें किस बात की आवश्यकता होगी, इसका कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस टीम के सदस्य किसान महासभा के नेता सुरेन्द्र बृजवाल, पिथौरागढ़ छात्र संघ के अध्यक्ष हेमन्त खाती और भाकपा (माले) के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने इन परिवारों से अलग-अलग वार्तायें की। बात करते-करते इनकी आवाज रूक जा रही है। गला भर आ रहा है। आँखों में आँसुओं की बूँदें और आँसू से चपचपाती पलकें इनके दर्दों को स्वयं ही बता दे रही हैं।

धारचूला क्षेत्र में कीड़ा जड़ी को जमा करना भी एवरेस्ट चढ़ने से अधिक चुनौती भरा है। अपनी जान पर खेल कर इन्होंने धन इकट्ठा किया और उससे घर बनाया। जो अब धौली का निवाला बन गया है। इनके घर अब दुबारा बिछड़े गाँव में नहीं बन सकते। अब इन्हें एक नया गाँव और नया आशियाना चाहिए। तन में केवल एक कपड़ा लेकर धारचूला पहुँचने के बाद इस शहर में में पहुँच गये हैं। शहर वालों के साथ चलने की हिम्मत इनके पास नहीं है। जिनके पास खाने के लिए अपने बर्तन न हों, चटाई में लेटने के लिए इन्हें यहाँ छोड़ दिया गया है। इनके बचे कुचे जानवर अभी गाँव में हैं, जो इन्हें ढूँढ रहे होंगे। यह चिन्ता भी इनके जुबाँ पर है। धारचूला की गर्मी और मच्छरों को प्रकोप इन्हें धौलीगंगा के द्वारा दिये गये गम की तरह लग रहा है। अभी तक तो ये मात्र एक चटाई के सहारे सीलन भरे कमरे में लेटे हुए थे। बाहर हो रही बारिश की बूँदें छतों से टपक कर इनके कमरों में इनकी शान्ति को भंग कर रही है और साथ ही इनके चैन को इनसे छीनती जा रही है।

एक सप्ताह बाद भाकपा (माले) के हस्तक्षेप के चलते तहसील प्रशासन ने 50 गद्दे यहाँ बांटे गये हैं। बताये गये कि 150 गद्दे और बन रहे हैं। इससे इनके बिस्तरों की समस्या तो पूरी नहीं होगी लेकिन कुछ आराम तो मिलेगा। इण्टर कॉलेज के कमरे 15 दिनों से बन्द थे। कमरों में सीलन की बदबू अलग है और पानी रिसने के कारण पूरा कमरा निमोनिया और टाइफाइड जैसी कई बिमारियों को न्यौता दे रही है। खिड़कियों में जालियां नहीं हैं। मच्छरों के अलावा कई प्रकार के कीट कमरों में घुस कर इन परिवारों को परेशान कर रहे हैं। पहले से ही घर और गाँव खोने से परेशान इन परिवारों को कीट मच्छर तो नहीं पहचानते लेकिन सरकार को जानती थी, उसके बाद भी उसने क्यों बन्दोबस्त नहीं किया। आपदा राहत शिविर का नाम इसे दिया गया। सीधे तौर पर कह सकते हैं यह राहत नहीं आफत शिविर है। एक आफत से बचकर यहाँ पहुँचे इन पीड़ितों को इन आफतों से गुजरना पड़ रहा है। एक कमरे में चार से छः परिवारों को जानवरों की तरह ठूँसा गया है। स्कूल के कुर्सी व टेबल ही इनके सहारे हैं। धारचूला के कई स्कूली बच्चों ने इस सवाल को भी उठाना शुरू कर दिया है कि अब वे कहाँ पढ़ेंगे।

इन गाँवों के नेता और प्रशासनिक अधिकारी आपदा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने की जगह उनका डांटते फिर रहे हैं।‘‘अरे हमने कमरा तो दे दिया, अब हम क्या करें? इतना बहुत है’’ इन बातों से नाराज आपदा पीड़ित परिवारों के सदस्यों का कहना है कि हमें हमारे गाँवों से क्यों यहाँ लाया गया। स्कूल जाने वाले बच्चे इस स्कूल के आंगन में खेल रहे हैं। उनका बस्ता धौली गंगा में बह गया है। उन्हें आज भी पहाड़े व गिनती और कुछ कवितायें याद हैं। गणित के सवाल भी उनके दिमाग में हैं लेकिन उनको उकरने के लिए उनके पास कॉपी पेन्सिल नहीं है। बच्चों का कहना था कि हमारा स्कूल भी तो बह गया है। अब हम कहाँ पढ़ने को जायेंगे। इन बच्चों की तोतली आवाज से दिल को चीरने वाली जो पुकार निकल रही है। उसे यहाँ बार-बार आने वाले विधायक, सांसद, मंत्री और प्रशासनिक अमले के अधिकारी सुन तक नहीं पा रहे हैं। कन्च्यौती के मोहन सिंह का कहना है कि तीन महिने कैसे गुजरें? यह हमारी पहली समस्या है।

स्कूल में ज्यादा समय नहीं रह सकते। आपदा मंत्री टिन शैड बनाने की बात कह गये हैं। इसे बनने में तो महिने बीत जायेंगे। जब गद्दे व कम्बल देने में इतने दिन बीत गये। खिम की सरस्वती बिष्ट का कहना है कि हमारे खेत बह गये। जानवर भी साथ में धौली में बह गये। हम हम क्या करें। कैसे अपनी जिन्दगी गुजारें। इस जिन्दगी को गुजारने के लिए कौन हमारी मदद करेगा। न्यू ग्राम की नीरू देवी तो काफी दुःखी है। कहती है कि ‘‘कभी न सोचा था कि कभी अपना गाँव छोड़ेगे। अब हमें कैसे एक गाँव मिलेगा। जहाँ हम सब महिलायें इस त्रासदी को आपस में एक दूसरे में बांट सकेंगी।’’ सोबला के नेत्र सिंह का कहना है कि गाँव तो गया। अब नहीं लगता है कि दुबारा हमारा कोई गाँव होगा। सरकारें तो झूठ बोलती हैं। झूठ से कुछ दिनों तक सन्तोष मिल सकता है लेकिन आगे नहीं। यह बात तो केवल चार उन गाँवों की है। जो अपना सब कुछ धौलीगंगा को सौंपकर खाली हाथ इण्टर कॉलेज के शरण स्थली में बैठकर टकटकी लगा बैठे हैं कि अब क्या होगा?

धारचूला और मुनस्यारी पर : तीसरी रपट

उत्तराखंड में आपदा की त्रासदी को 25 दिन बीत गये, अभी तक राहत एवं बचाव की तस्वीर साफ नहीं हो पायी है। धारचूला और मुनस्यारी के इन दुर्गम इलाकों तक देहरादून में किये गये दावे कुछ अभी तक नहीं पहुचे हैं और कुछ अव्यवहारिक नजर आने लगे हैं। उत्तराखंड की सरकारें अभी तक यह नहीं समझ पायी हैं कि आपदा की घटनाओं के बाद राज्य सरकार को किस तरह से जनपक्षीय सरकार बनने की ओर बढ़ना चाहिए। धारचूला और मुनस्यारी दोनों तहसीलों में अभी तक सरकार के मंत्री और नौकरषाह दौरा कर लौट चुके हैं। आपदा पीड़ितों के जो सवाल हैं उनका हल न होना और उनको आपदा की आफत से राहत न मिलना सरकार के हर दावे को झुठला रहा है।

मुनस्यारी के जिमीघाट से लेकर जौलजीवी तथा धारचूला के दारमा से जौलजीवी तक सैकड़ों परिवार ऐसे हैं जिनके आवासीय भवन बेनाप जमीन पर बने थे और उनका घर-बार आपदा की भेंट चढ़ चुका हैं। सरकार के पुराने नियमों को देखें तो इन परिवारों को राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली राहत नहीं मिल सकती। हो भी यही रहा है। अभी तक इस तरह के सैकड़ों परिवार राहत के लिये राज्य सरकार की ओर टकटकी लगाये बैठे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में एक घर में पिता सहित पुत्रों का अलग-अलग चूल्हा जलता है। राषन कार्ड और भाग दो रजिस्टर में भी नाम अलग-अलग हैं, लेकिन पिता के जीवत होने के कारण जमीन का मालिक मुखिया होने के कारण पिता है, इन स्थितियों में केवल पिता को ही मुआवजे का हकदार बनाया जा रहा है। गृह नुकसान के लिये मिलने वाली दो लाख रूपये की राषि में भी यही स्थिति है। चूल्हे के हिसाब से हकदारी का मामला यहां की सरकार की समझ में नहीं आ रहा है। अभी हाल में ही सरकार ने एक और अव्यवहारिक घोशणा कर डाली कि जिन परिवारों के आवासीय मकान टूट गये उन्हें रहने की व्यवस्था के लिये सरकार 6 महीने तक दो हजार रूपये किराया देगी। उसके पीछे सरकार का शड्यंत्र भी है।

सरकार चाहती है कि आपदा पीड़ितों को एक जगह पर न रहने दिया जाय ताकि वे पुनर्वास के सवाल पर राज्य सरकार को घेर न सकें। यह तो एक बात है लेकिन धारचूला, बलुवाकोट, मदकोट, जौलजीवी जैसे कस्बों की बात करें तो यहां किराये के लिये कमरे नहीं हैं। धारचूला में अचानक दो सौ से अधिक परिवारों के लिये किराये के कमरे कहां से पैदा हो जायेंगे। इस बात को देहरादून में बैठी सरकार नहीं समझ पा रही है। एक और उदाहरण है कि घट्टाबगड़ में 55 दलितों के परिवार सड़क में आ गये हैं। इन परिवारों को किराये में घर कहां मिलेगा। क्योंकि घट्टाबगड़ जैसे गांव के आसपास के गांवों को देखें तो बंदरखेत, तोली गांव में एक दो घर ही ऐसे हैं जो एक दो कमरों को किराये पर लगा सकते हैं ऐसे में किराये का यह फरमान राज्य सरकार की हवाई सोच को दिखाता है।

धारचूला तहसील में खेत, छिरकिला, तीजम, सुमदुम, धारचूला नगर, गोठी, नयाबस्ती सीपू, बलुवाकोट, घाटीबगड़, गो, जौलजीवी, घट्टाबगड़, लुमती, मोरी, बांसबगड़, छोरीबगड़, बंगापानी, उमरगड़ा, मदकोट, भदेली, तल्ला दुम्मर, दराती, सेविला, जिमीघाट जैसे कई स्थान हैं जहां गोरी गंगा, काली गांगा तथा धौलीगंगा से भूकटाव हो रहा है। इन स्थानों को बसाया जाना जरूरी है। नहीं तो बेघरबार लोगों की संख्या हजारों में हो जायेगी। अभी सिंचाई विभाग ने धारचूला, बलुवाकोट, जौलजीवी और मदकोट के लिये सुरक्षा हेतु प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा हैं आज 25 दिन बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार ने इन कस्बों की सुरक्षा के लिये एक ढेला भी स्वीकृत नहीं किया है। विधायक और सांसदों के पास करोड़ों रूपये की निधियां हैं, लेकिन इन कस्बों को बचाने के लिये उन्होंने एक रूपये भी नहीं दिया है। बलुवाकोट में भूकटाव को रोकने के लिये संबंधित विभाग ने 62 लाख रूपये का प्रस्ताव भेजा था। इसकी स्वीकृति नहीं मिलने से बलुवाकोट वासियों ने ‘बलुवाकोट बचाओ संघर्श समिति’ बनाकर सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई छेड़ दी है।

धारचूला विधायक हरीष धामी और सांसद प्रदीप टम्टा पट्टी पटवारी की तरह इधर-उधर दौड़ लगाने में हैं। उनका न प्रषासनिक अधिकारियों में नियंत्रण है और न ही वह राज्य सरकार से कोई बजट ला पा रहे हैं। इससे इस क्षेत्र को बचाने और राहत कार्यों में तेजी लाने के प्रयास ठंडे बस्ते में हैं। अभी भी आपदा की दृश्टि से खतरनाक जगहों में आपदा पीड़ित टैण्टों में रह रहे हैं। मौसम विभाग एक दो दिन खतरे का बता रहा है लेकिन यहां तो लोगों का हर पल खतरे में बीत रहा है। आज तक किसी भी परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहंुचाने की जहमत नहीं उठायी। इस क्षेत्र के सरकारी और गैर सरकारी विद्यालयों को आज से खोलने जा रही है। लेकिन जिन विद्यालयों में आपदा पीड़ित रह रहे हैं उन्हें सरकार कहां रखेगी इसका विकल्प सरकार के पास नहीं है। पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी और आपदा मंत्री जौलजीवी से आगे को बड़े कि घट्टाबगड़ में आपदा पीड़ितों से मिलेंगे लेकिन पैदल चलन से बचने के लिये दोनों आधे रास्ते से लौट गये। यह हमारी सरकार और प्रषासन का चेहरा है।

धारचूला से मुनस्यारी तक कई आईएएस और पीसीएस अधिकारी बिठाये गये हैं जो आपदा राहत कार्यों में हाथ बढ़ाने का दावा कर रहे है, लेकिन हकीकत यह है कि यह अधिकारीगण सड़कों में गाड़ी से दौड़ रहे हैं। किसी को भी किसी गांव में जाते अभी तक नहीं देखा गया है। धारचूला में तो हाल यह है कि सरकार की ओर से नियुक्त नोडल अधिकारी आईएएस दीपक रावत सुबह कुमाउ मंडल विकास मंडल के आवास गृह से हैलीपैड जाते है और सायं हैलीपैड से लौटकर आवासगृह लौट आते हैं। उनसे मिलने के लिये उन्ही से अनुमति लेनी होती है जो मिल नही रही है। नोडल अधिकारी के रू9 में तैनात दीपक रावत न जन प्रतिनधियों की सुन रहे हैं और न ही आपदा पीड़ितों को राहत देने में कोई भूमिका निभा रहे हैं।

बड़ी बात यह है कि मुख्यमंत्री तक धारचूला आते हैं लेकिन मुख्यमंत्री के पास न कोई लाल बत्ती थी और मुख्यमंत्री का बोर्ड लेकिन दीपक रावत अपने साथ नैनीताल से आते समय एक एमडी केएमवीएन तथा एक नीली बत्ती लेकर आये थे। जिसे एक प्राइवेट वाहन में लगाकर घूम रहे हैं और उत्तराखंड की नौकरषाही की सत्ता में पकड़ को जाहिर भी कर रहे हैं। स्कार्पिओ जैसे लक्जरी वाहन में उन्होंने एक कुर्सी भी डाल रखी है ताकि उनकी षानषौकत में किसी भी प्रकार की कोई कमी न रह जाये। उत्तराखंड में नौकरषाही आपदा के समय सत्ताधारियों में अपनी दाल गला रहे हैं इससे बडा उदाहरण दूसरा नहीं हो सकता। उत्तराखंड में सभी जानते हैं कि सस्ते गल्ले के दुकान से मिलने वाले राषन से दस दिन भी परिवारों का निवाला नहीं चल पाता है। बीस दिन निजी दुकानों से राषन खरीदकर यहां के चूल्हे जलते हैं। पटवारी से लेकर मुख्य सचिव तक यही अलाप रहे हैं कि हमारे गोदाम राषन से भरे हैं। लेकिन इन गोदामों से मिलने वाला राषन एक माह के लिये र्प्याप्त नहीं होता। इस बात को कोई समझने को तैयार नहीं है। सस्ता गल्ले की दुकानों को डिपार्टमेंट स्टोर में तब्दील करते हुए इनको राषन का बिक्री केन्द्र बनाया जाना चाहिए था, लेकिन इस पर कोई भी बात करने को तैयार नहीं है। एक सप्ताह के बाद धारचूला और मुनस्यारी की पचास हजार से अधिक की आबादी राषन को लेकर सड़क में उतरने वाली है। क्या तभी जाकर यह सरकार चेतेगी।

जगत मर्तोलिया

जिला सचिव

भाकपा माले पिथौरागढ़

0941138833

09997417746

आपदा की खबरें ‘मैनेज’ न कर पाने की गाज विनोद शर्मा और अनिल चंदोला पर गिरी

देहरादून। खबर है कि सूचना निदेशालय के डीजी विनोद शर्मा को आपदा की खबरों को ठीक से मैनेज न करने के कारण हटा दिया गया है. साथ ही इसी मामले में सूचना विभाग के अनिल चंदोला को कुमांऊ स्थानांतरण किये जाने की कार्यवाही को भी अंजाम दिया जा रहा है. माना जा रहा है मुख्यमंत्री के खिलापफ मीडिया में आपदा को लेकर छपी खबरें व सही मैनेजमेंट नहीं किये जाने के चलते विनोद शर्मा की डीजी पद से छुट्टी की गयी है. हालांकि चर्चा है कि चंदोला मुख्मयंत्री के एक करीबी से मिलकर खुद की वापसी के लिए जुगाड़ लगा रहे हैं.

उधर, डीएवीपी और आरएनआई द्वारा कैंसल किए जाने के आर्डर के बावजूद देहरादून की एक संपादिका के कई समाचार पत्रों पर सूचना विभाग की कृपा लगातार बरकरार है. जून माह में निरस्त किये गये पांच समाचार पत्रों को जुलाई माह में भी लगातार विज्ञापन दिये जा रहे हैं जबकि समाचार पत्रों को निरस्त किये जाने की जानकारी सूचना विभाग के अधिकारियों को विभागीय पत्र के माध्यम से अवगत करा दी गयी है. इसके बाद भी प्रभा वर्मा नाम की महिला पर कृपा की जा रही है.
 

दो बड़े अखबारों के पोलिटिकल ब्यूरो अरुण जेटली के चहेते पत्रकार चलाते हैं!

कारवां मैग्जीन के जुलाई अंक में भारतीय जनता पार्टी पर एक कवर स्टोरी है. इसमें बताया गया है कि अरुण जेटली को भाजपा के अंदर 'ब्यूरो चीफ' कहा जाता है क्योंकि उनके चहेते पत्रकार दो बड़े अखबारों के पोलिटिकल ब्यूरो चलाते हैं. कारवां मैग्जीन में पत्रकार पूर्णिमा जोशी द्वारा लिखित कवर स्टोरी में कहा गया है कि गडकरी के खिलाफ खबरें छापे जाने, उनको पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन न होने देने के लिए माहौल बनाने, फिर आडवाणी के खिलाफ खबरों के प्रकाशन आदि के लिए भाजपा के लोग अरुण जेटली को ही जिम्मेदार मानते हैं. पेश है मैग्जीन में प्रकाशित स्टोरी के कुछ अंश…

"Although L.K. Advani had championed the effort to forcefully eject Gadkari from the president’s chair last year—over the fervent objections of the RSS—he was later convinced that Gadkari had been the victim of a conspiracy to tarnish him with an orchestrated campaign of planted stories in the media.

"Inside the BJP, suspicions pointed to Arun Jaitley, the Rajya Sabha opposition leader, who is known within the party as “bureau chief” for the extraordinary influence he wields at two large-selling national dailies where his favourite journalists run political bureaus.

"Although nobody knows whether Jaitley was actually responsible for the stories, most people in the BJP, including Advani, believe that he was. Jaitley and Advani, who were once seen as pupil and teacher, have been in enemy camps since last December, when Advani put forth his acolyte Sushma Swaraj, the party’s leader in the Lok Sabha and Jaitley’s bête noire, as a nominee to replace Gadkari as president."

पूरा आर्टिकल आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

Stratagems and Spoils : The BJP prepares to bet everything on Narendra Modi

उत्तराखण्ड को मानव तस्करों से बचाओ

चरित्र के मामले में काफी विवादित रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम ने घोषणा की है कि उनके पंद्रह सौ अनुयायी उत्तराखण्ड के केदारनाथ क्षेत्र में आयी आपदा के कारण विधवा हुई महिलाओं से विवाह करेंगे। इस मामले पर उत्तराखंड के शासन, प्रशासन और यहां के हर इनसाफपसंद व्यक्ति को कड़ी नजर रखनी चाहिए। यहां पहले से ही लड़कियों और महिलाओं के तस्कर सक्रिय हैं। इसके अलावा देह व्यापार कराने वालों ने यहीं की लड़कियों को यहां भी इस धंधे में धकेला हुआ है। उत्तराखंड जिसे देव भूमि कहा जाता है लंबे समय से अय्याशों की भूमि बना हुआ है और अय्याशों के कारण ही इतनी बड़ी त्रासदि घटित भी हुई है।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब नैनीताल जिले के भीमताल से खबर छपी कि पहाड़ खासकर कुमाऊं के दूरदराज के गांवों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग का मामला कोई नया नहीं है पर सुंदरखाली में नाबालिग का ब्याह रचाने पहुंचे हरियाणा के नारबौड़ गांव निवासी दस लोगों ने उस सच से पर्दा उठाया है जिसके पीछे एक नाबालिग नहीं बल्कि कई बेटियां हालातों की बलि चढ़ी हैं। राजस्व पुलिस की पूछताछ में यह सामने आया कि सुंदरखाल की किशोरी का सौदा हो चुका था। बस एक विवाह के जरिए सामाजिक रूप से उसे ले जाने की तैयारी थी। ताकि कोई आवाज न उठा सके।

इस सौदे में स्थानीय बिचौलियों ने कहानी के महत्वपूर्ण किरदार की भूमिका निभाई है। पता चला कि पहाड़ से इसी तरह से बेटियों को ले जाया जाता है और हरियाणा, पंजाब या फिर दूसरे राज्यों में उसे किसी और के सुपुर्द कर दिया जाता है। बाद में यही बेटियां देह व्यापार में उतार दी जाती हैं। सात माह पहले भी सुंदरखाली तोक में एक गरीब विवाहित महिला का सौदा 80 हजार रुपये में होने की बात इन्होंने कुबूली है। यही नहीं खरीद-फरोख्त के लिए तब महिला का उसके पति से तलाक करवाया गया। इस पूरे मामले में गांव के वो गरीब परिवार भी शामिल हैं, जिन्होंने पैसे के लिए बेटियां बेचीं। स्थानीय बिचौलिये राज्य से बाहर के उस गैंग को गांवों में अविवाहित, तलाकशुदा और पति द्वारा छोड़ी गई महिलाओं के बारे में जानकारी देते हैं। राजस्व पुलिस ने बताया कि हरियाणा के ह्यूमन ट्रैफिकिंग के बड़े गैंग के पहाड़ में होने की बात सामने आई है। लड़कियां खरीदने के बाद लोकल बिचौलियों को भी खरीद का हिस्सा मिलता है और यह गैंग सामाजिक ब्याह के बाद ही लड़कियां, महिलाओं को पहाड़ से लेकर जाता है।

कुछ महीने पहले हिंदी समाचार पत्रिका तहलका ने अपनी आवरण कथा में खुलासा किया था, कि उत्तराखंड से लड़कियों महिलाओं की तस्करी की जा रही है, जिसके लिए यदि सीधे-खरीद नहीं हो पाती तो विवाह करके ले जाया जाता है। जिस लड़की पर नजर पड़ गई उसे तस्कर किसी सूरत में नहीं छोड़ते, अगर उसकी शादी भी यहां हो जाए तो तलाक दिलवा दिया जाता है और एकाध प्रकरण में तो पति की हत्या तक करा दी गई और फिर उस लड़की को यहां से शादी के बहाने ले जाया गया। यहां से शादी, नौकरी इत्यादि विविध बहानों से लड़कियां ले जाकर हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बेची जाती हैं जहां यह बच्चे पैदा करने, घरेलू काम-काज और वेश्यावृत्ति आदि में लगाई जाती हैं। मानव अंग तस्करी में भी इनका प्रयोग हो सकता है। अनेक प्रकरण सामने आने के बावजूद यहां के एनजीओ, नेताओं, शासन-प्रशासन ने समस्या को गंभीरता से नहीं लिया है। आपदा के राहत कार्याें और पुनर्वास की आपाधापी के बीच मानव तस्करों ने भी अपना काम किया होगा, कर रहे होंगे और करेंगे, इस पर स्थानीय लोगों को नजर रखनी चाहिए। डेरा प्रमुख राम रहीम अनेक आरोपों में घिरे रहे हैं, उनके शिष्य भी इसी समाज के आम दुनियादार आदमी हैं। यद्यपि डेरा सच्चा सौदा द्वारा आपदा के बाद कई जगह राहत कार्य किए जा रहे हैं लेकिन समाज सेवा के काम तो उन धन्नासेठों, कॉरपोरेट द्वारा भी किए जाते हैं जो जो व्यापक जनता का आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक शोषण करते हैं, जनता को उनके प्राकृतिक, सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित करते हैं, इन धन्नासेठों, कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार नीतियां बनाती है और अपने विभिन्न सुरक्षाबलों से जनता का कत्लेआम करती हैं।

इधर एक चीज पर और ध्यान देने की जरूरत है- अवकाश प्राप्त ले. जनरल मोहन चंद्र भंडारी ने कहा है कि सरकार के सम्मुख अब दैवीय आपदा के कारण अनाथ हुए नवयुवकों के संरक्षण की बड़ी चुनौती है। सरकार की छोटी सी चूक नवयुवकों को गैरकानूनी कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकती है। राज्य बनने और पर्यटन पर अत्यधिक जोर देने के कारण राज्य में पर्यटन से संबंधित काम-धंधों की बाढ़ आ गई। यही कारण है कि नदियों किनारे बड़े पैमाने पर खतरनाक अवैध निर्माण हुए। यहां पिछले दस सालों में हजारों होटल खुल गये, इनमें स्थानीय और बाहरी लोग आकर अय्याशी करते हैं और इस गलीज धंधे में यहीं की युवक-युवतियां बड़े पैमाने पर शामिल हैं। इसके अलावा लोगों ने दूर गांव छोड़कर रोड किनारे तमाम तरह की दुकानें खोल लीं और बहुत सारे लोग व्यापारिक-व्यावसायिक गतिविधियों में लग गये। नये जमाने की चमक-दमक में अधिकांश युवा सही-गलत की भावना से ऊपर उठ गये हैं और किसी भी तरह अधिकाधिक पैसा कमाने और मौज-मस्ती की कोशिशों में रहते हैं। इनमें से बहुतों के दिमाग में मेहनत और ईमानदारी से जीने के लिए जरूरी चीजें जुटाने जैसी भावना नहीं है, संघर्ष करने की क्षमता नहीं है, काहिली, नशे और मौज-मस्ती में इनकी हालत 40 की उम्र में ही 60 के बूढ़ों जैसी हो चली है। इन्हें आसानी से, अधिकाधिक पैसा और सुविधा चाहिए। ऐसे लोग तमाम चीजों के वैध-अवैध काम-धंधों में संलग्न हो जाते हैं और इसका असर व्यापक स्तर पर शेष लोगों पर पड़ता है। इन्हें शेष लोगों के सुख-दुख से कोई मतलब नहीं होता। ऐसो युवा शून्य से शिखर तक हैं। किसी आम किशोर से लेकर उत्तराखण्ड मूल के वर्तमान भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धौनी तक। अपने परंपरागत खेती-किसानी और अन्यान्य धंधों को चौपट कर बैठे हजारों लोग आपदा के बाद खत्म हुए पर्यटन के कारण बेरोजगार हो गये हैं।

मध्य कमान के जीओसी लै0जनरल अनिल चैत के अनुसार आपदा करीबी चालीस हजार वर्ग किलोमीटर में फैली है, पूरब से पश्चिम तक करीब 360 किलोमीटर तक इसका असर हुआ है, करीब 16 लाख लोगों को नुक्सान हुआ है और करीब 1 लाख लोग बेघर हो गये हैं।

इतना व्यापक असर रखने वाली आपदा से प्रभावित लोगों का पुनर्वास निश्चय ही बड़ी चुनौती है, अपनों के खो जाने, घर-संपत्ति और रोजी-रोटी का साधन खत्म हो जाने वाले लोगों में अवसाद भी है। अपने कारोबार और निजी क्षेत्र में कार्यरत लाखों लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ है। इसके बाद राहत तथा पुनर्वास में हो रही देरी से समस्याएं और गंभीर हो रही हैं। ऐसे में जबरदस्त पलायन तो होना ही है बहुत से लोग अपराधों की ओर भी बढ़ेंगे। मानव तस्कर अपना काम करेंगे। बच्चों, युवक-युवतियों को विभिन्न बहानों से यहां से बाहर ले जाया जाएगा। यहां का शासन-प्रशासन पूरी तरह गैरजिम्मेदार और असंवेदनशील है। अच्छी बात यह है कि उत्तराखण्ड में अच्छे पत्रकारों, जुझारू जनपक्षीय लोगों की अच्छी संख्या है। संवेदनशील लोगों की भी अच्छी तादाद है। यह लोग अपना काम बखूबी कर भी रहे हैं। इन्हीं सब लोगों को आगे आकर हालातों को संभालने का प्रयास करना चाहिए। लोगों के पुनर्वास और भविष्य में सामान्य सुविधाजनक जनजीवन के लिए गांधी के ग्राम स्वराज, कम्युनिज्म के कम्यून की तरह का कोई मॉडल पहाड़ों में खड़ा करना चाहिए। मनरेगा जैसी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू कर भी पलायन को रोकने और जन-जीवन को सामान्य और सुविधाजनक बनाने का काम किया जा सकता है। 

लेखक अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09897791822 के जरिए किया जा सकता है.

दो बार एमएलए रहा शख्स पैसे की कमी से मर गया, पड़ोसियों ने कफन के लिए दिए पैसे

नेता, विधायक, मंत्री बनकर आज लोगों में होड़ है ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने की. पर एक शख्स विधायक रहकर भी पैसे वाला न बन सका. सिर्फ इसलिए कि उसे ईमानदारी से प्यार था और ईमानदारी को वह आदमी जीता था. भगवती प्रसाद एक बार नहीं बल्कि दो बार उत्तर प्रदेश में विधायक रहे. पहली बार 1967 में और दूसरी मर्तबा 1969 में. इतना होने के बाद जब उनका आखरि वक़्त आया तो मजबूरन उनको एक चाय की दुकान खोल कर बैठना पड़ा ताकि वह अपना और अपने घर वालों का पेट पाल सके. आखिरकार 70 साल की उम्र में कल उन्होंने आखिरी सांस ली.

यूपी के श्रावस्ती जिला के एकोना रिज़र्व्ड असेंबली सीट से दो बार जीते भगवती प्रसाद आखिरी दौर में काफी बीमार थे. उनके घर वालों के पास उनका इलाज कराने तक को पैसे नहीं थे. इलाज न होने से बहराइच के सरकारी अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली. भगवती अपने पीछे तीन बेटे और एक बेटी छोड़ गए हैं. भगवती प्रसाद एक ऐसे सियासतदान थे जिन्होंने 1967 मे अपना पहला इलेक्शन लड़ने के लिए 1800 रुपये में अपनी भैंस बेचा और जीत कर असेम्बली पहुंचे. चुनाव में कुल सोलह सौ रुपये खर्च किए. दो साल बाद उत्तर प्रदेश असेंबली का जब दोबारा इलेक्शन हुआ तब भी भगवती प्रसाद ने सिर्फ लगभग 2000 रुपया में ही इलेक्शन लड़ कर दोबारा से उसी एकोना असेंबली सीट से मुन्तखब होकर उत्तर प्रदेश असेंबली तक पहुंचे.

दो बार एमएलए रहने के बावजूद भी भगवती प्रसाद ने कभी पैसे कमाने को तरजीह नहीं दी और खुले दिल से अवाम की खिदमत को ही अपना फ़र्ज़ समझा. जब कुर्सी गयी तो घर चलाने को चाय की दुकान खोल कर बैठना पड़ा. जब आखरी वक़्त आया तो पैसे न होने की वजह से इलाज से महरूम होकर उत्तर प्रदेश के बहरैच जिला के सरकारी अस्पताल के फर्श पर दम तोड़ दिया. भगवती प्रसाद के घर के हालात इतने खस्ता हैं कि उनके कफ़न के लिए भी पैसे उनके पड़ोसियों ने दिए. आज के दौर का एक भी नेता या सरकार का कोई नुमाइंदा उनकी सुध लेने एक बार भी उनके पास नहीं गया.

भगवती प्रसाद जिस पार्टी के नेता थे, उस पार्टी के आज के एक नेता, खुले तौर पर यह दावा करते हैं कि उन्होंने अपने एक इलेक्शन में 8 करोड़ रुपये खर्च किये.. काश, इन सभी नेताओं के हाथ की मैल भी अगर भगवती प्रसाद को मिल जाती तो शायद उन्हें बचाया जा सकता था.. उनके अहले खानदान आज भी दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं, लेकिन, किसी को कोई परवाह नहीं, क्योंकि वह उस खानदान से वास्ता रखते हैं, जिसके मुखिया ने कभी पैसे नहीं कमाए, सादगी से अपनी ज़िन्दगी बसर करने की सोची और ता-ज़िन्दगी शराफत का दामन पकडे रखा.. भगवती प्रसाद सभी परेशानियों का सामना करते हुए हम से रुखसत तो हो गए, लेकिन जाते जाते हम सभी को एक सीख तो दे ही गए, साथ ही हम सभी के मुंह पर डला बेशर्मी का पर्दा भी दिखा गए..

शायद भगवती प्रसाद को आज के दौर का अंदाज़ा बखूबी लग चुका था, तब ही उन्होंने तीसरी बार सियासत के मैदान में कूदने से परहेज़ किया और चाय की दुकान खोल किसी तरह अपने घर वालों का गुज़ारा करने में ही अपनी बेहतरी समझी..

लेखक सैयद असदर अली दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क asdarali@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

दैनिक जागरण के जिला प्रतिनिधि को दी जान से मारने की धमकी

उरई (जालौन) से खबर है कि विज्ञापन के चेक का फर्जी तरीके से भुगतान कराकर हजारों रुपये हड़पने के मामले में रिपोर्ट दर्ज होने से झल्लाये आरोपी मुकेश उदैनिया ने दैनिक जागरण, झांसी के जिला प्रतिनिधि मनोज राजा को जान से मारने की धमकी दे डाली. इसकी लिखित शिकायत पुलिस के साथ-साथ जिला प्रशासन से की गई है. कई पत्रकारों ने दैनिक जागरण, के जिला प्रतिनिधि को दी गई धमकी पर नाराजगी व्यक्ति की है और कार्यवाही की मांग की है.

आरोप है कि मुकेश उदैनिया ने डेढ़ साल पहले दैनिक जागरण (झांसी) के नाम से जारी पैंतीस हजार रुपये के चेक को फर्जी ढंग से अपने नाम से भुगतान करा लिया था. इसकी जानकारी जब जागरण, झांसी आफिस को हुई तो मुकेश के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था.

कात्यायनी के नोटिस का जवाब : वाह! खूब…उल्टा चोर…

हमें जानकारी मिली है कि सुश्री कात्यायनी, सत्यम एवं रामबाबू जो एक व्यक्ति भी है एवं कुछ संस्थाओं के अधिकारी भी, ये लोग संस्थाओं के माध्यम से हमारे ऊपर 25 लाख की मानहानि का वकालतन नोटिस भेज रखा है। उस नोटिस में मानहानि का आधार पुस्तक 'क्रान्ति की नटवरगिरी' के आलेखों को बनाया गया है।

मेरा कहना है कि उस पुस्तिका में मैंने नटवरगिरी का आरोप सुश्री कात्यायनी के पतिदेव शशिप्रकाश पर ही लगाया है, जिसका उन्होंने अपनी निकृष्ट भाषा का इस्तेमाल करते हुये मेरी बेटी शालिनी के नाम से जबाब दिया है। जो कि उसी पुस्तिका में छपा भी है। उस पुस्तिका में तो सारी बहस शशि प्रकाश से है तो इसमें सुश्री कात्यायनी अपनी क्यों नाक घुसा रही है। शशि प्रकाश का कोई मान नहीं है क्या? वो तो सामने आयें। कभी मेरी बेटी शालिनी, कभी अपनी पत्नी कात्यायनी के कन्धे का इस्तेमाल बार-2 क्यों करते है। जैसे डा0 दूधनाथ की  बेटी समीक्षा ने स्वीकार किया कि साथी देवेन्द्र को जलील करने के लिए नोएडा में उसका इस्तेमाल किया गया और मामला पुलिस तक पहुँच गया था। इसकी सारी फर्जी योजना शशि प्रकाश ने ही बनाई थी।

मेरा स्पष्ट कहना है कि महान माओवादी-क्रान्तिकारी शशि प्रकाश बार-बार पुलिस-अदालत महिलाओं आदि का सहारा क्यों लेते है। आखिर खुलकर सामने आने में हिचकते क्यों है। जब उनकी सारी क्रान्तिकारिता बुर्जुवा व्यवस्था की पुलिस-अदालत पर ही निर्भर है तो उस संगठन से सब कुछ लुटाने के बाद बाहर आये सारे लोग अदालतों तक पहुँच कर अपना गवाही देने को मजबूर होंगे। अदालतों को सबूत चाहिये और उसे सबूत मिलेगा। पहले जनाब अदालत में जाकर शुरूआत तो करें।

मेरी बेटी शालिनी कैन्सर की बीमारी से 29 मार्च 2013 को चली गयी। जब से 15 जनवरी 2013 को हम लोगों को (मां-बाप-बहनों) को मालूम हुआ, उसके बाद से लखनऊ में जो-जो झूठ का ड्रामा खेला गया उसमें गवाह लखनऊ के बहुत जिम्मेदार वरिष्ठ क्रान्तिकारी साथी भी है। बाद में काफी दबाव में आने के बाद केवल मां को ही मिलने की इजाजत मिली। शशि प्रकाश पता नहीं कौन से मार्क्स-माओं का सिद्धान्त पढ़े है। सारी संवेदनायें सूख गयी है या कम्युनिजम का नाटक करते है। जिसकी बेटी कैन्सर से मरने वाली हो, उस मां को महीनों बाद जानकारी मिलती है और केवल अकेले मिलने की इजाजत मिलती है। कारण यह कि वह भी शशि प्रकाश के साथ विवाद में अपने पति यानी मेरे साथ खड़ी थी वगैरह-वगैरह …एक मां की पीड़ा को शशि प्रकाश समझ ही नहीं सकते है। वैसे भी यह सब तो वास्तव में एक संवेदनशील इन्सान ही समझ सकता है। 15 जनवरी के बाद से हमें अपनी पत्नी से आंख मिलाते हुये हिचक हो रही थी कि मेरे ही कारण मेरे ही साथ मेरी-बेटी शशि प्रकाश के संगठन उर्फ गैंग में गयी थी।

मैंने कुछ बुनियादी सवाल खड़ा किया तो बाहर कर दिया और मेरे खिलाफ बेटी का इस्तेमाल किया गया। एक माह जिसकी संतान मृत्युशैय्या पर हो, उसको मिलने न दिया जाय और उस पर राजनीति खेला जाय, वह समझ नहीं पा रही थी और मैं अपने आप को अपराधी महसूस कर रहा था। क्या मेरी सोच गलत थी? अपने बच्चों को सामाजिक परिवर्तन की राह पर भेजना एक अपराधिक कृत्य था। बाद में मिलने को इजाजत मिली भी तो बहुत शर्तों के साथ। यहाँ तक कि मां ने अपनी दुकान की कमाई का दस हजार रूपया शालिनी को दिया इलाज के लिए, तो पहले उसने रख लिया फिर शशि प्रकाश का फोन आने पर लौटा दिया। पाठक खुद महसूस करें कि उस मां पर क्या बीता होगा। दो दिन बाद ही मां से कहा गया कि अब आप जाइये और कभी-भी यहाँ आ सकती है, जबकि वो तो अपने जिगर के टुकड़े के साथ ही रहना चाहती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनकी इस इच्छा को खारिज कर दिया गया।

अन्तिम बार मरने के 25-26 दिन पहले कुछ मिन्टों के लिए धर्मशिला अस्पताल में माँ मिली और जाते समय बेटी की आँखें मां का पीछा करती रही…जिसको याद करके मां आज भी रोते-2 बेहाल हो जाती है। उस समय मै अपने आप को अपराधी महसूस करने लगता हूँ। मेरा अपराध केवल यही था कि सामाजिक परिवर्तन की राह पर मैं तन मन धन से अपने परिवार और बच्चों के साथ निकल पड़ा और आज भी वही कार्य कर रहा हूँ। तो गलती कहाँ हुई? क्या मेरी कहानी के बाद कोई बाप अपने बेटे-बेटियों को इस राह में भेजना चाहेगा? आखिर कारवां  बनेगा कैसे? दुनिया बदलेगी कैसे?

अपने कार्यकर्ताओं को क्रान्ति के नाम पर तरंगित करने के लिए शशि प्रकाश ने बेटी शालिनी के नाम से एक कवितारूपी वसीयतनामा भी जारी किया। उसी समय तुरंत, बेटी के नाम से ब्लाग बनाकर जिसमें मुझे गाली देने के साथ मृत्यु के बाद शरीर दान का जिक्र था। परन्तु उसकी भावनाओं की अवहेलना करते हुये महान क्रान्तिकारी शशि प्रकाश एक तो उसके अन्तिम क्रिया में भी नहीं गये और उसे शवदाह गृह में जलाया गया। जबकि मैं खुद बेटी की वसीयत का सम्मान करते हुये उसके शरीर के पास तक नहीं गया जैसा कि उसने वसीयत कर रखा था। एक पिता की पीड़ा शशि प्रकाश नहीं समझ सकते। वो तो डर के मारे वहाँ पहुँचा ही नहीं। माओ ने तो कहा है कि एक सच्चा क्रान्तिकारी किसी से नहीं डरता, फिर शशि प्रकाश ?

शालिनी के शरीर को जलाकर शशि प्रकाश मात्र सबूत नष्ट करना चाहते थे, ताकि कल यह न पता चल पाये कि शालिनी को विगत दो-तीन वर्षों से बच्चेदानी में ट्यूमर था, जिसके ही कारण-कैंसर फैला। लड़की इलाज के अभाव में गयी। ऐसा ही साथी अरविन्द्र के साथ भी हुआ था। शशि प्रकाश जी आप आइये मैदान में…बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जायेगी।

सत्येन्द्र कुमार

लखनऊ


कभी शशि प्रकाश मेरे आदर्श थे, आज क्रांति का भगोड़ा
 
 
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कात्यायनी ने चार लोगों को भेजा मानहानि का नोटिस

केके उपाध्याय ने हिंदुस्तान लखनऊ का चार्ज लिया

हिंदुस्तान, लखनऊ से नवीन जोशी की विदाई हो गई है. वे रिटायरमेंट तक हिंदुस्तान, दिल्ली के साथ संबद्ध रहेंगे. उनकी जगह लखनऊ में केके उपाध्याय ने ले ली है जो अभी तक हिंदुस्तान, पटना में कार्यरत रहे हैं. पटना के संपादक पद पर तीरविजय सिंह पहले ही बैठ चुके हैं.

लखनऊ में आज हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशिशेखर समेत कई वरिष्ठ अधिकारी पहुंचे थे और केके उपाध्याय की ताजपोशी कराई. लखनऊ के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश की यूनिटों के कोआर्डिनेशन का काम भी केके उपाध्याय को मिला है.

सूरतगढ़ की रहने वाली सुकृति शर्मा का चयन जी के पंजाबी चैनल के लिए हुआ है. इसके पहले वे न्यूज24 में कार्य कर चुकी हैं.

भड़ास तक मीडिया जगत की सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

नीरा राडिया के टेप रिकार्ड पर लेने की सीबीआई की मांग खारिज

दिल्ली की एक अदालत ने सीबीआई की उस याचिका को आज खारिज कर दिया जिसमें उसने पूर्व कॉरपोरेट लॉबीस्ट नीरा राडिया की टेप की हुई बातचीत की सीडी और स्पेक्ट्रम के आवंटन के संबंध में उसकी कथित बातचीत के लिखित अंश को रिकॉर्ड में लेने की मांग की थी. विशेष सीबीआई न्यायाधीश ओ पी सैनी ने याचिका यह कहते खारिज कर दी कि ऐसा लगता है एजेंसी इसे लेकर गंभीर नहीं है क्योंकि उसने आरोपी को कुछ दस्तावेज मुहैया नहीं कराए हैं.

अदालत ने कहा, ‘‘उक्त पत्र का संलग्नक आरोपी को सौंपने में अभियोजन पक्ष के विफल रहने के मद्देनजर, उसने आवेदन पर गंभीरता से जोर नहीं दिया है. ’’ अदालत ने कहा, ‘‘चूंकि आवेदन का बचाव पक्ष ने जोरदार विरोध किया है और साथ ही बचाव पक्ष को पूरा आवेदन नहीं सौंपा गया है और अभियोजन पक्ष खुद आवेदन के प्रति उतना गंभीर नहीं लग रहा है इसलिए वह खारिज किए जाने का हकदार है और इसलिए उसे खारिज किया जाता है.’’

अदालत ने कहा, ‘‘सीडी को रिकार्ड में दर्ज करने के आवेदन का बचाव पक्ष ने विभिन्न आधारों पर जोरदार विरोध किया है. इसमें एक आधार यह भी है कि बचाव पक्ष के लिए यह पूर्वाग्रहपूर्ण होगा क्योंकि उसे रिकार्ड में देर से रखने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि आरोपी ने अपने बचाव का खुलासा कर दिया है.’’ न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह भी कहा गया है कि इस सीडी को अधूरे आवेदन के जरिए रिकॉर्ड में नहीं लिया जा सकता है क्योंकि उस पत्र का संलग्नक ‘ए’ उन्हें नहीं सौंपा गया है.’’  अदालत ने गौर किया कि सीबीआई ने 20 मई 2010 के पत्र का संलग्नक ‘ए’ आरोपी को नहीं सौंपा.

यह पत्र उसे आयकर विभाग से मिला था जिसमें टैप किए गए कॉल का विवरण एक यूएसबी हार्ड डिस्क में रखा गया था. संक्षिप्त दलील के दौरान विशेष लोक अभियोजक यू यू ललित ने आज अदालत से कहा कि वह दस्तावेज सौंपने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि इसमें अन्य विवरण भी हैं जो इस मामले के लिए प्रासंगिक नहीं हैं और ‘‘देश की सुरक्षा के हित में उनका खुलासा नहीं किया जा सकता है.’’ अदालत ने याचिका खारिज कर दी और एजेंसी को मुकदमा की कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्देश दिया. न्यायाधीश ने कहा, ‘‘याचिका खारिज की जाती है. आप (सीबीआई) कितने आवेदन देंगे. मामले को आगे बढ़ने दें.’’


नीरा राडिया से संबंधित टेप सुनने के लिए यहां क्लिक करें–

http://old.bhadas4media.com/vividh/11132-2011-05-14-08-29-35.html

यूपी में अमिताभ ठाकुर को जवाब न देने के कारण छह सप्ताह में तीन जन सूचना अधिकारी दण्डित

डीजीपी कार्यालय के जन सूचना अधिकारी धर्मेन्द्र सचान पर यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह पंकज ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर को सूचना नहीं दिये जाने के मामले में 25,000 रुपये का अर्थदंड लगाया है. ठाकुर ने रूल्स एवं मैनुअल्स विभाग में नियमों के विपरीत अपनी नियुक्ति के सम्बन्ध में आरटीआई में कुछ सूचनायें मांगी थी.

पंकज ने जन सूचना अधिकारी को बार-बार सूचना दिये जाने के लिए निर्देशित किया था लेकिन उसका अनुपालन नहीं हुआ था. आज जब वे आयोग के समक्ष उपस्थित भी नहीं हुए तो बाध्य हो कर मुख्य सूचना आयुक्त ने धारा 20(1) के तहत 25,000 रुपये का अर्थदंड लगाया. पिछले छः सप्ताह में आईजी (कार्मिक) तनूजा श्रीवास्तव और गृह विभाग के उपसचिव कमल किशोर श्रीवास्तव के बाद यह तीसरा मामला है जिसमे ठाकुर को सूचना नहीं देने के मामले में जन सूचना अधिकारी को दण्डित किया गया हो.

70 साल के रमाशंकर चौरसिया को समाज, सरकार और लोकतंत्र ने पागलपन परोसा

सत्तर बरस के रमाशंकर चौरसिया फिलहाल पागलों की तरह यहां वहां भटक, टहल के जीवन के आखिरी दिन काट रहे हैं. उनका कोई बसेरा नहीं. उनकी संपत्ति, जायदाद पर इनकी बेटियां सपरिवार काबिज हो गई हैं और ये अपने ही घर से बेदखल किए जा चुके हैं. यह किसी एक रमाशंकर का मामला नहीं बल्कि गाजीपुर जिले में ही करीब 13 हजार से ज्यादा अति बुजुर्ग लोग अपनों के सताए हैं और अपनी ही धन-संपत्ति से भगाए हुए हैं.

केंद्र सरकार की पहल पर देश भर के बुजुर्ग माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण तथा कल्याण के लिए वर्ष  2007 में एक कानून बनाया गया. इसके तहत यह निश्चित किया गया कि बुजुर्गों का भरण पोषण न करने वाले बेटों, परिजनों, नातेदारों को 30 महीने की जेल भी हो सकती है. नि:सन्तान बुर्जुग की जिम्मेदारी उस नातेदार की होगी जो उसकी संपत्ति का वारिस बनेगा, ऐसी भी व्यवस्था की गई. इस कानून के तहत कई प्रदेशों में अपील अधिकरण का गठन भी हो चुका है और इसका अध्यक्ष जिला मजिस्ट्रेट रैंक के अधिकारी तय किये गये हैं. अपील अथारिटी को यह अधिकार दिया गया कि आवेदक बुजुर्ग को 90 दिन के अंदर मासिक-भत्त तय करा दिया जाए.

सत्तर साल के रमाशंकर चौरसिया
सत्तर साल के रमाशंकर चौरसिया

पर इस कानून का लाभ किसी को मिलता दिख नहीं रहा. अगर कानून बनने मात्र से ही सब कुछ अच्छा हो गया होता तो रमाशंकर चौरसिया यूं दर दर भटकने को मजबूर न होते. पर इस लोकतंत्र की खासियत है कि यहां बातें खूब होती हैं, कानून खूब बनते हैं, पर जमीनी स्तर पर क्या दशा है, इसे जानने की किसी को फुर्सत नहीं. संभव है कल को आपको भी अपने आसपास कोई रमाशंकर चौरसिया पागल सी हालत में दिख जाए, और आप मुंह फेरकर चल दें क्योंकि यह मामला आपके घर का नहीं.

बाजार, लोभ और निज स्वार्थ के इस दौर में कल को आप जब बुजुर्ग होंगे और आपके अपने ही आपको संपत्ति से बेदखल कर देंगे तो आपको जरूर महसूस होगा कि कहीं कुछ गड़बड़ जीवन में हो चुका है, जिसका संताप-पाप आप भोगने को मजबूर हैं. आइए, हम सब आप मिलकर इन बुजुर्गों के लिए लड़ें और इन्हें इनका अधिकार दिलाएं. सरकारों, अफसरों को मजबूर करें कि वे बुजुर्गों के बारे में ज्यादा संवेदनशीलता से सोचें और बुजुर्गों के आखिरी दिनों को शांत, सुगम और स्नेहिल बनाएं.

गाजीपुर से राकेश पांडेय की रिपोर्ट.

यूपी पुलिस शर्म करो : हवालात में पानी के लिए तड़पते एक युवक की दास्तान (देखें वीडियो)

वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौहान ने भड़ास को एक वीडियो उपलब्ध कराया है जो आगरा के एक थाने का है. हवालात में एक युवक बंधा पड़ा है और पानी के लिए तड़प रहा है. अगर मीडिया के लोग न पहुंचते तो यह तड़प तड़प कर मर जाता. इस हृदय विदारक दृश्य को देखकर किसकी रुह नहीं कांप उठेगी. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके इस वीडियो को देख सकते हैं.

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके वीडियो देखने के बाद जरूर सोचिएगा कि हम किस देश प्रदेश में रह रहे हैं? यूपी पुलिस को सुधारने के लिए ढेरों कवायद की जा रही है. पर सामंती माइंडसेट से संचालित कई पुलिस अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आ रहा है.

यह वीडियो कोई एक घटना भर नहीं है. यह एक प्रतीकात्मक घटना है. किसी को भी यूपी में पुलिस अमानवीयता और पुलिस संवेदनहीनता का एक्स्ट्रीम देखना हो तो इस वीडियो को देख सकता है. भले ही यह युवक अभी जिंदा हो, लेकिन यह वीडियो दोषी पुलिसवालों पर आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार है कि आखिर उन्होंने प्यास से तड़प रहे और हवालात में बंधे युवक को पानी क्यों नहीं दिया, जबकि वह युवक बार-बार पानी मांग रहा है.

यह संयोग की बात है कि थाने में जाकर मीडिया वाले वीडियो बना लाए. हवालातों में ऐसा होते रहना रुटीन है. जनता के पैसे से सेलरी पा रहे और जनता की रक्षा के नाम पर वर्दी पहने घूम रहे पुलिसवालों का दिमाग ठिकाने के लिए क्या करना होगा, यह किसी को पता हो तो जरूर बताए, क्योंकि ''उल्टी पड़ गईं सब तदबीरें, कुछ ना दवा ने काम किया… ''

मोदी, राहुल, नेता, राजनीति, अपराधी में डूबे और गलचौर कर रहे मीडिया वालों के लिए अब ऐसी चीजें भले ही बड़ी खबर नहीं हो पर सोशल मीडिया और न्यू मीडिया ऐसे मसलों को जोरदार तरीके से उठाते रहेंगे ताकि समाज, सरकार, सत्ता, सिस्टम की असल सच्चाई सामने आती रहे.

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/742/man-and-struggle/agra-mei-hawalaat-mei-bnad-yuvak-paani-ke-liye-tadap-raha.html

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


 

कुमार विक्रांत सिंह ने एनडीटीवी से इस्तीफा दिया, विवेक अग्रवाल न्यूज एक्सप्रेस से बर्खास्त

हिंदी न्यूज चैनल एनडीटीवी इंडिया के चीफ करेस्पांडेंट (पोलिटिकल) कुमार विक्रांत सिंह ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने अपना त्यागपत्र प्रबंधन के पास भेज दिया है. चर्चा है कि वे आजतक न्यूज चैनल के साथ नई पारी की शुरुआत कर सकते हैं.

एक अन्य सूचना न्यूज एक्सप्रेस चैनल से आई है. पता चला है कि इस चैनल के मुंबई ब्यूरो चीफ रहे विवेक अग्रवाल को चैनल प्रबंधन ने बर्खास्त कर दिया है. विवेक अग्रवाल काफी दिनों से छुट्टी पर चल रहे थे. उन्हें किन वजहों से बर्खास्त किया गया है, यह मालूम नहीं हो सका है.

भड़ास तक मीडिया की सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

शंकर दुबे के आरोपों पर सिद्धार्थ कलहंस ने भी दी सफाई

अभी दो दिन पहले भड़ास में वाराणसी के किसी सज्जन (जो स्वंय को श्रमजीवी पत्रकार और आईएफडब्लूजे का 27 साल पुराना साथी होने का दावा भी करते हैं) का लेख पढ़ा। लेख पोस्ट करने वाले श्री शंकर दुबे, हालांकि काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी ऐसे किसी नामधारी के आईएफडब्लूजे के रायपुर अधिवेशन में जाने के दावे या उसके पत्रकार संघ के सदस्य होने की बात को सिरे से खारिज करते हैं, ने अधिवेशन में गैर पत्रकारों के यूपी से जाने की बात कही।

यूपी से गए 70 सदस्यों के दल के बारे में इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वो सबके सब अखबार कर्मी थे न कि किसी मजदूर विरोधी संगठन के मुखबिर या यूनियन विरोधी तत्व जैसा कि दुबे जी के आलेख से झलकता है। आईएफडब्लूजे को लंबे समय से जानने वालों (जैसा कि दुबे जी का दावा है) को पता है हम केवल अपनी लड़ाई अकेले लड़ने में यकीन नही रखते बल्कि समान विचार वाले अन्य मजदूर संगठनों का साथ देते और लेते हैं। क्या बुरा था अगर विभिन्न क्षेत्रों के मजदूरों, कामगारों, गरीबों वंचितों की यूनियनों ने हमारे नेता का भिलाई में स्वागत कर दिया। हमारा तो नारा है कि दुनिया के मजदूरों एक हो। मजदूर संगठनों की एकजुटता मालिकों के लिए बड़ा खतरा होती है।

राजधानी लखनऊ में पत्रकारों के संघर्ष में रेल मजदूर यूनियन, अपट्रान, स्कूटर्स इंडिया के लोग हमारे साथ शाना ब शाना लड़े हैं और हम भी उनके साथ खड़े हुए हैं। अभी हाल में आईएफडब्लूजे के लखनऊ के साथी पत्थरकट्ट के नाम से जाने वाले गरीब कारीगरों के उत्पीड़न के खिलाफ फुटपाथ पर धरने पर बैठे और गले में तख्ती टांग कर जुलूस भी निकाला। इस संघर्ष में हमारे साथ जाने माने गांधीवादी विचारक संदीप पांडे भी शामिल थे।

बड़े पत्रकारों अखबारों के बारे में भी आदरणीय दुबे जी (यदि वे कोई हैं तो) अपने लेख में कहते हैं। आप खुद को काशी पत्रकार संघ से जुड़ा बताते हैं तो यह भी जानते हैं कि कैसे मजीठिया वेज बोर्ड के लिए लड़ाई लड़ने वाले इस संघ की सदस्यता से पत्रकारों का खून चूसने के लिए कुख्यात अखबार मालिकों ने अपने यहां काम करने वालों से इस्तीफा दिलवाया। इतना ही नहीं, उनसे यह भी लिखवा लिया कि उन्हें वेज बोर्ड की जरूरत ही नहीं है। मजीठिया बोर्ड को लेकर हम लोग जब लखनऊ में धरना प्रदर्शन करते हैं तो बड़े अखबारों को लोग कहीं नजर नहीं आते। इतना ही नहीं, ये लोग तो खुद अपने हित की खबरें भी मालिकों के डर से कहीं प्रकाशित नही करते।

महोदय आपने रायपुर के कार्यक्रम की खबर के कहीं न प्रकाशन की बात कही। जबकि आप, अगर वहीं थे, को पता है कि रमन सिंह के कार्यक्रम में रायपुर के सभी बड़े अखबारों के प्रतिनिधि मौजूद थे जहां उनके लिए पेंशन से लेकर आवास सुविधा देने तक का एलान हुआ। क्या ये सवाल उन बड़े पत्रकारों से नहीं पूछा जाना चाहिए कि अपनी बिरादरी के कल्याण की घोषणाएं न छाप कर वो किसका भला कर रहे थे। कम से कम पत्रकारों का तो नही। ये बात दीगर है कि उस दिन रविवार था अगले दिन जब प्रेस रिलीज भेजी गयी तो खबरें बहुत सारी जगहों पर छपी (इससे साबित होता है कि प्रेस रिलीज पत्रकारिता देश भर में फैली है).

सिद्धार्थ कलहंस

सदस्य कार्यसमिति, आईएफडब्लूजे

अध्यक्ष, लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार यूनियन

09336154024


मूल खबर–

यही जुगाड़ू पत्रकार आईएफडब्लूजे अध्यक्ष के बगलगीर थे

के. विक्रम राव को सत्ता सुख लेना होता तो 1977 में जेल से ही चुनाव लड़ लोस पहुंच जाते और मंत्री बन जाते

आज उत्तराखंड को ऐसे ही संवेदनशील पत्रकारों की जरूरत है

लक्ष्मी प्रसाद पन्त जी ने टेहरी के डूबने पर भी बेहतरीन रिपोर्टिंग की थी. अमर उजाला में स्वर्गीय राजेन टोंडरिया जी और जागरण से लक्ष्मी भाई की लेखनी से आँखे कई बार नम हुई थी. आज उत्तराखंड को ऐसे ही संवेदनशील पत्रकारों की जरूरत है. जो सच को पहले ही सूंघ कर सिस्टम को आगाह कर सकें. पन्त जी की केदारनाथ के बारे में लिखी गयी रिपोर्ट का मैं भी गवाह रहा हूँ. पन्त जी की जरूरत इस समय उत्तराखंड को है.

अविकल थपलियाल

पत्रकार

देहरादून


मूल खबर-

केदारनाथ के बारे में पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत की वर्ष 2004 में लिखी ये खबर पढ़िए

एकीकृत न्यूजरूम के जरिए नेटवर्क18 ग्रुप में छंटनी, बिजनेस न्यूजरूम के एडिटर इन चीफ बने सी. सेंथिल

नेटवर्क18 ग्रुप ने छंटनी के लिए नया तरीका निकाला है. इसने अब एकीकृत न्यूज रूम बनाने का फैसला किया है. अंग्रेजी बिजनेस चैनल, हिंदी बिजनेस चैनल, बिजनेस न्यूज वेबसाइट के लिए अब-अब अलग संपादकीय टीम नहीं होगी. इन सभी के लिए एक बिजनेस न्यूरूम बनाया गया है. इसी न्यूज रूम से अंग्रेजी-हिंदी बिजनेस चैनलों और डिजिटल मीडिया के लिए खबरें निकलेंगी.

((इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एकीकृत न्यूजरूम बनाए जाने की प्रक्रिया में ढेर सारे लोगों को बेरोजगार होना पड़ेगा और इसकी शुरुआत हो चुकी है. माना जा रहा है कि कल को आईबीएन7, ईटीवी हिंदी चैनल्स, हिंदी वेबसाइट्स आदि के लिए एकीकृत न्यूज रूम बना दिया जाएगा और इसका किसी को एडिटर इन चीफ. यही न्यूज रूम फिर ग्रुप के सारे हिंदी मीडिया को कंटेंट प्रोवाइड करने लगेगा. तो, इस एकीकरण से ढेर सारे लोगों को बेरोजगार होना पड़ेगा.))

सीएनबीसी-टीवी18, सीएनबीसी-आवाज, सीएनबीसी-टीवी18प्राइम एचडी और मनी कंट्रोल डाट काम के लिए एक बिजनेस न्यूरूम बनाया गया है, जिसके एडिटर इन चीफ सेंथिल चेंगलवारयन बनाए गए हैं. सीएनबीसी-टीवी18 में सीनियर एडिटर के रूप में कार्यरत मेनका दोषी और लता वेंकटेश को एक्जीक्यूटिव एडिटर बना दिया गया है और इन्हें बिजनेस न्यूज रूम में अलग जिम्मेदारी दी गई है. इस पूरे डेवलपमेंट के बारे में नेटवर्क18 ग्रुप की वेबसाइट मनीकंट्रोल डाट काम पर एक विस्तृत खबर प्रकाशित हुई है, जो यूं है…

Jul 12, 2013, 02.35 PM IST

Senthil Chengalvarayan appointed editor-in-chief for Network18 Business Newsroom

Network18 Group today announced the setting up of 'Network18 Business Newsroom', an integrated newsroom comprising its market leading broadcast and digital news outlets in the business media space, under the leadership of Senthil Chengalvarayan. India's No.1 business news network comprising broadcast services, CNBC-TV18, CNBC Awaaz, CNBC-TV18 Prime HD and Moneycontrol.com, the country's premier digital destination for financial news and information will now function as part of this larger editorial set-up. This follows the appointment of Shereen Bhan as the Managing Editor for CNBC-TV18.

The Newsroom will act as a common hub to ensure seamless broadcast and digital synergies from both a newsgathering and output perspective across these brands, which cumulatively attract over 40 million viewers and 15 million unique visitors on an average every month. In this new capacity, Senthil will work closely with R. Jagannathan, Editor-In-Chief of Network18's web and publishing stable which includes Moneycontrol.com, Sanjay Pugalia, Editor-In-Chief, CNBC Awaaz and the editorial leads at CNBC-TV18.

In a concurrent development, the editorial leadership team at CNBC-TV18 has been strengthened further with senior editors Menaka Doshi and Latha Venkatesh being elevated as Executive Editors and also given charge for key verticals at the Network18 Business Newsroom. At the Newsroom, Menaka has been assigned the mandate to lead the corporate reportage, law and associated areas and Latha Venkatesh will take charge of the Banking and Financial Markets vertical.

Speaking on this development, Raghav Bahl, Founder & Editor, Network18 said "As the country's leading broadcast and digital player in business news, we are well-positioned to re-define the category in the context of a converging media landscape. The Network18 Business Newsroom is designed to capitalize on the deep engagement and trust our iconic brands enjoy. We are confident that the editorial leadership team under Senthil's guidance will be able to craft a new paradigm in business media"

Commenting on this, B Sai Kumar, Group CEO, Network18 said "CNBC-TV18, CNBC Awaaz and Moneycontrol have set the benchmark when it comes to innovation and influence in business media. As they propel ahead in their growth journey, it is imperative that we fuse their editorial strengths in a manner that enhances our offering further and the Network18 Business Newsroom fulfills this objective. In Senthil, Menaka and Latha, we have the most trusted voices in business journalism today and we believe that they will bring their deep expertise and insights to bear at the Newsroom"

Senthil Chengalvarayan, Editor-In-Chief, Network18 Business Newsroom added "I am a firm believer in the benefit that the Network18 Business Newsroom can unleash for our stellar editorial products. We pioneered business news on television and the web in India and the Newsroom is a natural extension of our successful journey. I believe that it will achieve two critical objectives for us. It'll ensure that each of our brands access the best editorial expertise across the Group while they continue to fulfill their distinct editorial propositions. And they'll do so through a structure that capitalizes on the new realities in the media landscape"

Senthil, who's currently the President & Editorial Director for TV18 Business Media, has been with the Group for 19 years and was earlier the Managing Editor for CNBC-TV18.

मंदी की चपेट में आए पत्रकारों को भड़ास की नेक सलाह से मैं भी सहमत

: मीडिया में यह मंदी का वक्त, पत्रकार बंधुओं संभल जाओ : अपनी आय नकदी के रुप में न संभाली तो संकट का सामना मुश्किल : मंदी की चपेट में आए पत्रकारों को भड़ास की नेक सलाह से मैं भी सहमत : मीडिया पहले अपने बारे में अमूमन नहीं लिखता है। दुनिया को शोषण और अत्याचार की कहानी बताएगा अपने घर और पड़ोस के मीडिया पर चुप्पी साध लेता है। हमें शुक्रगुजार होना चाहिए कि वेबसाइटों, ब्लागों, सोशल मीडिया का जिनके जरिए पत्रकारों और मीडिया जगत में हो रहे हलचल की जानकारी लगातार मिलती रहती है। मीडिया सेक्टर की खबरें निकालना कोल्हू में तेल निकालने के समान है। इससे पत्रकार कितने सशक्त होंगे इसका आकलन कुछ समय बाद ही हो सकेगा।

आज शुक्रवार को भड़ास 4 मीडिया पर इसके संपादक यशवंत सिंह की एक रिपोर्ट पर मेरी नजर पड़ी-पाई-पाई बचाकर रखें मीडियाकर्मी क्योंकि मंदी है छाई, छंटनी शुरू हो गई भाई। पूरा पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। यशवंत ने नेक सलाह दी है कि मंदी का समय है पत्रकार बंधुओं संभलकर खर्च करो। ऐसा न हो कि पैसे के लिए आगे चलकर लाले पड़ जाए। उन्होंने कुछ समय के लिए कुछ भी काम करने को कहा है ताकि परिवार का खर्चा चल सके।

इस कड़ी में मैं एक बात जोड़ना चाहूंगा कि अगर पत्रकार की पत्नी भी कुछ अर्जित करती रहे तो फिर बड़ा संकट नहीं आएगा। कल गुरुवार को उदयन शर्मा की याद में हुए एक सेमिनार में राजदीप सरदेसाई ने भी टीवी चैनलों में मंदी की आहट का इशारा किया था। इस मसले पर आगे भी मैं कुछ इनपुट देना चाहूंगा। फिलहाल यहीं तक।

लेखक राय तपन भारती दिल्ली में आर्थिक मामलों के पत्रकार हैं. संपर्क- 09899075196


ये है भड़ास की नेक सलाह..

पाई-पाई बचाकर रखें मीडियाकर्मी क्योंकि मंदी है छाई, छंटनी शुरू हो गई भाई

दलाल लोग सरकार चलाएंगे, जनहित के लिए लड़ने वाले चुनाव नहीं लड़ पाएंगे

Vishnu Gupt : सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उछलिये मत, खुशफहमी मत पालिये, यह लोकतंत्र की हत्या है, जनता के अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों के हाथों में हथकंडिया डालना का फैसला है, सोनिया गांधी-राहुल गांधी और मनमोहन सिंह जैसे लोगों की राह आसान होगी…… अब राजनीति पर कारपोरेट घरानों, कारपोरेट चमचों और नौकरशाही का कब्जा होगा, जनता के हितों को लड़़ने वाले लोग चुनाव लड़ने से वंचित होंगे।

उदाहरण एक- अगर आप पानी -बिजली की किल्लत के खिलाफ सड़क जाम करते हैं तो इसके खिलाफ पुलिस मुकदमा दर्ज कर लेगी, आपको सजा होगी, आप चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

उदाहरण दो- पुलिस अत्याचार और भ्रष्टचार आदि के खिलाफ लड़ाई लड़ते हैं और रोषपूर्ण प्रदर्शन कामकाज बंद कराते हैं तो यह अपराध सरकारी कामकाज में बाधा डालने का बनता है, सजा होगी और आप चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। सत्ताधारी पार्टी साजिश कर किसी को भी जेल भेजवा कर उसे चुनाव लड़ने से वंचित कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट अपने भ्रष्ट न्यायधीशों, नौकरशाही और कारपोरेट घरानों के खिलाफ फैसला देने से क्यों बचती है, इनके खिलाफ मुकदमें को क्यों लटका देती है?टू जी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट टाटा और अनिल अंबानी को संरक्षण क्यों प्रदान करता है?

फिर आप सुप्रीम कोर्ट की इस लोकतंत्र की हत्या करने वाले फैसले का समर्थन करते हैं, इस पर उछलते है तों यह मेरी गलती नहीं है। मैं इसका समर्थन किसी भी स्थिति में नहीं कर सकता हूं।

विष्णु गुप्त के फेसबुक वॉल से.

सुखतवा मीडिया संवाद (3) : मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे, इसीलिए चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है

इस सत्र के खत्म होते-होते हॉल में वो शख्स दाखिल हो गया, जो पत्रकारिता जगत में एक आदर्श नायक की तरह स्थापित है। 70 के दशक के अमिताभ (गरीब, मजलूम और किसानों के हक की लड़ाई का प्रतीक नायक) सरीखा कद हासिल कर चुके पी साईंनाथ मंच पर आसीन थे। 'कॉरपोरेट हस्तक्षेप और मीडिया' पर अपनी बात इस मुनादी के साथ शुरू की कि असहमति का कोई भी सुर, कोई भी सवाल बीच व्याख्यान में मुमकिन है।

पी साईंनाथ ने कहा कि विकास संवाद की परिचर्चा के इन तीन दिनों में देश में समानांतर रूप से जो कुछ घटित हो रहा है, वो काफी चिंतनीय है। इन तीन दिनों में देश के 147 किसान आत्महत्या कर चुके होंगे, इन तीन दिनों में 3000 बच्चे कुपोषण और उसकी वजह से होने वाली बीमारियों से दम तोड़ चुके होंगे।

मीडिया को उन्होंने राजनीतिक रूप से स्वतंत्र लेकिन मुनाफे का गुलाम बताया। शारदा चिटफंड से लेकर एनडीटीवी प्रॉफिट से पत्रकारों की छंटनी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की नौकरी की किसी को चिंता नहीं है बल्कि इस पूरे गोरखधंधे में मीडिया हाउसेस कॉरपोरेट घरानों की मनमर्जी और इशारे के तहत काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया मॉनोपॉली को कॉरपोरेट मोनोपॉली का एक हिस्सा बताया।

पी साईंनाथ ने कहा कि अब मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे हैं। यही वजह है कि चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है क्योंकि इसमें खर्च कम है। इसी तरह संपादकों की जगह सीईओ, मैनेजिंग एडिटर, एक्जक्यूटिव एडिटर जैसे पदों के गठन को भी उन्होंने पत्रकारिता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। मीडिया हाउसेस और कॉरपोरेट हाउसेस के बीच होने वाली 'प्राइवेट ट्रीटी' को भी उन्होंने पत्रकारिता की आजादी में बाधक बताया। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मीडिया घरानों के हित बाजार के हित के साथ जुड़ते जाएंगे, एक तरह का खतरनाक नेक्सस खबरों को दबाने, छिपाने और उन्हें विकृत करने में सक्रिय होता जाएगा।

पी साईंनाथ ने कहा कि हाल के दिनों में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कोई बड़ी ख़बर ब्रेक की हो, इसके उदाहरण बेहद कम मिलते हैं। मीडिया के पतन के साथ पत्रकार 'कॉमेडियन रिलीफ' देने का काम करते नजर आते हैं। ऐसे में पत्रकारों को गुरिल्ला जर्नलिज्म की आदत डाल लेनी चाहिए। संस्थानों में रहते हुए वो कैसे समाज और आम आदमी की बात सामने रख पाते हैं, ये उनकी निजी काबिलियत का विषय है।

इसके साथ ही उन्होंने पेड न्यूज को लेकर भी अपनी राय रखी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इलेक्शन के दौरान पेड न्यूज की पकड़ आसान हो जाती है लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा नॉन इलेक्शन पेड न्यूज का भी है। उन्होंने पत्रकारिता जगत में आने वाले युवाओं से वैकल्पिक मीडिया को अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को एक से ज्यादा हुनर का मास्टर होना चाहिए ताकि वो अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात कह सके। उन्होंने अपनी ओर से किए जा रहे आर्काइव प्रोग्राम की एक झलक भी दिखाई। पी साईंनाथ ने उन लोगों के दिमाग के तारों को झंकृत कर दिया जो न्यूज रूम के शोर में भी सोने की आदत पाले बैठे हैं।

विकास संवाद में इसके बाद के सत्रों में भी कुछ बातें हुईं लेकिन पी साईंनाथ ने मीडिया के इतने आयाम खोल दिए कि दिमाग में लंबे समय तक वो उमड़ते घुमड़ते रहेंगे।

केसला से वापसी में एक अलग तरह की भूख का एहसास तीव्रतर हो गया। 'भूख' उदर से कुछ ऊपर शिफ्ट हो चुकी थी। विकास संवाद की सार्थकता बस इतनी है कि वो इस भूख को जगा तो सकता है मिटा नहीं सकता। भूखे पेट भजन भले न हो भूखे मन में नए गीत गूंजते हैं… शायद हममें से कोई साथी कभी ऐसा ही कोई नया गीत गुनगुनाएं तो इस आयोजन की सार्थकता और ज्यादा बढ़ जाएगी।

…समाप्त…

पशुपति शर्मा की रिपोर्ट. संपर्क: 9868203840


इसके पहले के पार्ट…

सुखतवा मीडिया संवाद (2) : मंगल पर जीवन तलाशने वाला मानव पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है

सुखतवा मीडिया संवाद (1) : आजादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे


इसी आयोजन की कुछ अन्य रिपोर्ट–

दैनिक जागरण के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में रियल एस्टेट, मैक्डोनल्ड्‍स, टैक्स कंसल्टेंट्स और सीए नजर आएंगे, पत्रकार नहीं
 
टीओआई वाले 119 कंपनियों के लिए पेड न्यूज छापते हैं
 
 
एनडीटीवी के मुंबई दफ्तर से 250 पत्रकारों की नौकरियां गईं, सब चुप रहे
 
 
‘न्यू कन्वर्जेंस’ मीडिया के लिए नया और बहुत बड़ा खतरा : पी साईनाथ

सुखतवा मीडिया संवाद (2) : मंगल पर जीवन तलाशने वाला मानव पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है

भोजन उपरांत का सत्र- 'बाबा बागदेव' के पाठ के साथ हुआ। पचमढ़ी में भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'सतपुड़ा के घने जंगल' का जो वाचन प्रशांत ने किया था, यहां उसे कश्मीर उप्पल ने अपनी ही कविता के जरिए विस्तार दिया…

कभी किसी ने
बाघ नहीं कहा उन्हें
न ही कहा शेर
बाबा के बारे में
बोलते लोगों की आंखें
चमकने लगतीं
सांस भर आती

….

बाबा मायाराम ने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों और उनकी नियति पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ये अजीब विडंबना है कि मानव एक तरफ मंगल पर जीवन तलाश रहा है और दूसरी तरफ पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है। टाइगर रिजर्व में वन विभाग के अधिकारियों की एक अजीबोगरीब दलील का जिक्र किया- मछली से बाघ चमकता है इसलिए मछली पालन का काम इस इलाके से ख़त्म कर दिया जाए। विस्थापन के नाम पर आदिवासियों के साथ हो रही लूट-खसोट को उन्होंने बेहद दुखद घटना बताया।

इसके बाद फागराम ने आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि लकड़ी-गट्ठे के झूठे केस में पुलिस ने उन्हें जेल भेजा और सताया। ग्रामीण शिक्षा के बारे में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि 150 बच्चों पर एक गुरूजी। ऐसे में गुरूजी की हालत बेहद दयनीय हो जाती है- इते देखईं कि उते देखईं। अब ऐसे में मास्टरसाहब क्या तो 'मास्टरप्लान' समझेंगे और समझाएंगे। बिना लड़े इस देश में कुछ नहीं मिलता, राह-ए-संघर्ष चुननी ही पड़ेगी।

चाय के उपरांत, दिन के तीसरे सत्र में 'मौजूदा दलीय लोकतंत्र-कितना संवैधानिक' विषय पर 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के संपादक अरुण त्रिपाठी ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने 1975 और उसके बाद 1992 को भारतीय लोकतंत्र के लिहाज़ से दो ख़तरनाक 'काल' बताया। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को परिवारवाद, पक्षपात, तानाशाही का गढ़ बताया तो वहीं क्षेत्रीय दलों के उभार का भी जिक्र किया। इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि उत्तरप्रदेश जैसे सूबे की दो बड़ी पार्टियां चाहें सवारी हाथी या साईकिल की कर रही हों, परसुराम जयंती मनाने में दोनों ही दलों के कार्यकर्ताओं का उत्साह एक सा है।

बातचीत के क्रम में अरुण त्रिपाठी ने बीडी शर्मा का एक कथन उद्धृत किया- संविधान ने लोगों को आज़ादी दी, आदिवासियों को गुलामी। इसके साथ ही इस बात पर चिंता भी जाहिर की कि देश की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका ऐसी भी लंबित है, जिसमें संविधान से 'समाजवाद' शब्द को हटाने की गुहार लगाई गई है। त्रिपाठीजी ने कहा कि अब लोकतंत्र में भागीदारी के लिए भी बड़ी पूंजी चाहिए। दिनोंदिन पूंजी का बोलबाला बढ़ा है और बौद्धिक लोगों की उपेक्षा हर मोर्चे और हर पार्टी में नजर आने लगी है। सबसे बड़ी विडंबना तो ये है कि देश का नेता भी विदेश में तय होने लगा है।

इस सत्र में हस्तक्षेप के तौर पर एशियन ह्यूमन राइट्स के सदस्य समर अनार्य ने अन्ना के आंदोलन को मौजूदा दौर का सबसे गैर-लोकतांत्रिक आंदोलन बताया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे अखलाक अहमद ने कहा कि विदेशी शक्तियों का दखल केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारों का मुखिया तय करने में भी बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है। पहले दिन का आखिरी और खुला सत्र कश्मीर उप्पल, रजनी बख्शी, सुनील, सचिन जैन और राकेश दीवान की टिप्पणियों के साथ समाप्त हुआ।

दूसरे दिन के पहले सत्र की शुरुआत गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम मिश्र के प्रजेंटेशन से हुई। पानी और उनके संरक्षण के कई उदाहरण चित्रों के जरिए सामने आए और उनके साथ अनुपमजी की लाइव कमेंट्री चलती रही। पानी के संरक्षण को जितने सुंदर चित्रों में सहेजा गया था, उतनी ही कोमल वाणी में उसका महात्म्य बखाना जा रहा था। हॉल में बैठे लोग मंत्रमुग्ध से कभी सेलुलाइड के चित्रों को और कभी अनुपम मिश्र को निहार रहे थे। पानी के इसी जनतांत्रिक संरक्षण के जरिए उन्होंने 'समाज के लोकतंत्र और संवैधानिक लोकतंत्र' के फर्क को बड़ी सरलता और सहजता से मन में उतार दिया।

इस सत्र में कश्मीर उप्पल ने नागार्जुन, श्रीकृष्ण कुमार और सच्चिदाननंद सिन्हा के कुछ पत्रों का वाचन किया। ये वो पत्र थे, जिनसे पत्रकारिता के क्षरण का इतिहास झांक रहा था। पशुपति शर्मा ने बतौर हस्तक्षेप एक पत्रकार के स्टाइलशीटिया बन जाने पर अफसोस जताया। अख़बारों के संपादकों से जैसा तादात्म्य आम लोगों का था, ठीक वैसा ही चैनलों के संपादकों के साथ क्यों नहीं?, ये सवाल भी उठाया।

…जारी…

पशुपति शर्मा की रिपोर्ट. संपर्क: 9868203840


उपरोक्त के आगे-पीछे के पार्ट…

 

सुखतवा मीडिया संवाद (3) : मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे, इसीलिए चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है

सुखतवा मीडिया संवाद (1) : आजादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे


इसी आयोजन की कुछ अन्य रिपोर्ट्स–

दैनिक जागरण के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में रियल एस्टेट, मैक्डोनल्ड्‍स, टैक्स कंसल्टेंट्स और सीए नजर आएंगे, पत्रकार नहीं
 
टीओआई वाले 119 कंपनियों के लिए पेड न्यूज छापते हैं
 
 
एनडीटीवी के मुंबई दफ्तर से 250 पत्रकारों की नौकरियां गईं, सब चुप रहे
 
 
‘न्यू कन्वर्जेंस’ मीडिया के लिए नया और बहुत बड़ा खतरा : पी साईनाथ

सुखतवा मीडिया संवाद (1) : आजादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे

सुखतवा, केसला के जंगलों को रात के अंधेरे में चीरती हुई हमारी गाड़ी रात करीब डेढ से दो बजे के बीच प्रदान के कैंपस में पहुंची। पेट में चूहे दौड़ रहे थे और उनींदी सी रोली शिवहरे पुरानी चिरपरिचित गर्मजोशी से सभी साथियों का स्वागत कर रहीं थीं। बावजूद इसके इतनी रात गए ये बेतकल्लुफी कौन करता… कौन ये कहता कि हमें भूख भी लग रही है, सो हम सभी अपने-अपने कमरों में जा विराजे। कुछ देर बाद अखलाक ने मेरा दरवाजा खटखटाया, वो बिस्किट का एक डिब्बा कहीं से जुगाड़ लाया था। तब तक मैं भी अपने बैग से बिस्किट के एक आध-पैकेट ढूंढ चुका था। खैर, दो चार बिस्किट चबाए, पानी गटका और सो गए।

सुबह नींद खुली तो… सतपुड़ा के जंगलों का पिछले साल सा एहसास। आंखें रूम के कमरों से ही वो पंडाल भी ढूंढने लगीं जो पचमढ़ी में तना था। नास्ता हुआ और कुछ देर बाद हम उस हॉल में जा पहुंचे, जहां सातवां विकास संवाद शुरू हो चुका था। साथियों के परिचय का सिलसिला जारी था। सत्र की औपचारिक शुरुआत के साथ ही संचालक चिन्मय मिश्र ने वो बात कह डाली, जो मन में उमड़-घुमड़ रही थी- पचमढ़ी का एक्सटेंशन है केसला। सच, वही सतपुड़ा की पहाड़ियां और वैसे ही सघन सत्र। बंदरों की धींगामुश्ती इस बार के सत्रों में व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाई क्योंकि पंडाल का विस्तार प्रदान के पक्के सभागृह में तब्दील था।

सुनील भाई ने 'संघर्षों के राष्ट्रीय संदर्भ' से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि निराशाजनक संकेतों के साथ ही आशाजनक संकेत भी मिल रहे हैं। विकास के मौजूदा ढांचे और उसके गुणगान पर उन्होंने सवाल उठाए। विकास की बलि चढ़ने वाले लोग कोई और हैं और उनका फायदा गिनाने वाले कोई और। मीडिया के चरित्र की विडंबना को उन्होंने रेखांकित किया। नक्सली आंदोलन में जब बड़ी हिंसात्मक घटना होती है तो पूरा मीडिया उस पर टूट पड़ता है लेकिन अहिंसक तरीके से चलने वाले आंदोलन और अनशन के कवरेज की मीडिया को फुर्सत नहीं होती।

'शक्तिमान' परियोजना के उद्धाटन की मिसाल पेश करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान मुकेश खन्ना की मौजूदगी का 'स्टार कवरेज' हुआ लेकिन परियोजना का विरोध कर रहे लोगों, उनके धरने और उनकी गिरफ्तारी के लिए एक दो लाइन लिखना भी पत्रकारों ने मुनासिब नहीं समझा। मंच से उन्होंने अन्ना और उनके साथियों के लिए एक सवाल भी उछाल दिया- भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन को व्यापक कवरेज मिली लेकिन आंदोलनकारियों ने इसके बाद भ्रष्टाचार की जड़ें कहां हैं, इस पर कोई सेमिनार क्यों नहीं करवाया?

'संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा' विषय पर परिचर्चा की शुरुआत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति वी के कुठियालाजी की 'सुख की अनुभूति' के साथ हुई। कुठियालाजी ने अपने व्याख्यान को इतने आयाम और इतना विस्तार दे दिया कि उनकी 'सुख की अनुभूति' में श्रोता अपने लिए 'सुख' तलाशते रह गए। स्वतंत्रता प्राप्ति का नशा ख़त्म होने के बाद के लोगों के इस जमावड़े के सामने उन्होंने मछलियों को डूबने से बचाने के बंदर के प्रयास की मिसाल रखी। वैज्ञानिक विकास, हरित क्रांति, न्यूक्लियर विकास से लेकर क्रायोजेनिक ईंजन तक कई मोर्चों पर मिली विजय को उन्होंने बड़ी उपलब्धि बताया। मनुष्य के नवजात शिशु को उन्होंने सबसे ज्यादा हेल्पलेस प्राणी करार दिया और इस सिलसिले में संवाद की महती भूमिका को रेखांकित किया।

संचालक चिन्मय मिश्र ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की एक कविता से कुठियालाजी के भाषण का समअप किया, लेकिन इस दौरान माइक ने व्यवधान पैदा कर दिया। तभी भीड़ से एक जुमला उछला- 'ये वर्तमान मीडिया की कविता है।' हल्की-फुल्की टिप्पणियों के इस मिजाज को अगले वक्ता अनिल बैरवाल ने अपने अंदाज में 'मैनटेन' किये रखा। हॉल में बैठे एक साथी की टी शर्ट पर लिखी चंद लाइनों पर उनकी नज़रें जा टिकीं- 'लव इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' इसे उन्होंने विस्तार दे दिया- 'पॉलिटिक्स इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' हालांकि उनका अपना ऑब्जर्बेशन कुछ ऐसा है कि आज़ादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच, जैसे मिनी मूवमेंट चला रहे अनिल बैरवाल ने बातों ही बातों में मौजूदा राजनीतिक तंत्र और राजनेताओं की कुंठाओं और विंडबनाओं को भी बेपर्दा करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे संसद में एक दूसरे के ख़िलाफ़ हो-हंगामा मचाने वाले राजनीतिक दल, तब एक सुर में बातें करने लगते हैं, जब उनकी जवाबदेही तय करने का सवाल सामने आता है। 1991 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने एक पीआईएल दायर कर चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग उठाई थी। साल 2002 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मांग को जायज ठहराया। सारे राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एक हो गए और हाईकोर्ट के फ़ैसले को बेअसर करने के लिए एक अध्यादेश लेकर आए।

राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार इस पर हस्ताक्षर नहीं किया, तो कैबिनेट ने दोबारा इसे उनके पास भेजा। हालांकि सरकारी ये कोशिशें सुप्रीम कोर्ट में जाकर बेकार साबित हुईं। राजनेताओं को जवाबदेह बनाना इस वक़्त की सबसे बड़ी चुनौती है।

अनिल बैरवाल ने सवाल उठाया कि राजनीतिक दल इस बात के लिए राजी क्यों नहीं होते कि उन्हें आरटीआई के दायरे में लाया जाए? राजनीतिक दल ये बताने को तैयार क्यों नहीं होते कि उनके पास पैसा कहां से आ रहा है? राजनीतिक दल ये क्यों नहीं बताते कि सरकार से उन्हें कितना पैसा या सुविधाएं मिल रही हैं? सुप्रीम कोर्ट जब आरटीआई के दायरे में आ सकता है तो फिर राजनीतिक पार्टियां इसके लिए क्यों हामी नहीं भरतीं? इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब सज़ायाफ़्ता चुनाव नहीं लड़ सकते तो फिर सज़ा के एलान के बाद विधायकों सांसदों को हटाए जाने की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं?

भोजन के पूर्व सत्र के आख़िरी वक्ता के तौर पर दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व संपादक अरविंद मोहन ने मंच संभाला। संवैधानिक तंत्र के बदलते चेहरे पर बेहद अहम टिप्पणी के साथ उन्होंने अपनी बात शुरू की- अब कानून अपराधियों के साथ कॉरपोरेट हाउस और उनके दलाल बना रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की मजबूती को देश की जनता में स्थापित करने के लिए टी एन शेषन की तारीफ की तो वहीं सीएजी रिपोर्ट के जरिए एक के बाद एक प्राकृतिक संसाधनों की सार्वजनिक लूट को जगजाहिर करने के लिए विनोद राय के काम की सराहना की। हालांकि इस सिलसिले में मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर चुटकी भी ली- 'वो तो प्लानिंग कमीशन में बेरोजगारी के दिन काट रहे हैं वरना देश के वित्त मंत्री होते'।

अरविंदजी ने कहा कि जेनुइन डेमोक्रेसी की लड़ाई अभी बाकी है लेकिन अन्ना के आंदोलन से ये भरोसा भी पैदा होता है कि कोई भी पीढ़ी ख़ामोश नहीं रहती, वो हस्तक्षेप जरूर करती है। डेमोक्रेसी की परिभाषा को उन्होंने दो स्तरों पर समझाया- एक तो सांस्थानिक डेमोक्रेसी और दूसरी- दिल की डेमोक्रेसी। जब तक हम दिल से लोकतंत्र को स्वीकार नहीं करते, अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते, सांस्थानिक लोकतंत्र मजबूत होता नहीं दिखेगा।

…जारी…

पशुपति शर्मा की रिपोर्ट. संपर्क: 9868203840


इसके आगे के पार्ट…

 

सुखतवा मीडिया संवाद (2) : मंगल पर जीवन तलाशने वाला मानव पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है

सुखतवा मीडिया संवाद (3) : मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे, इसीलिए चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है


इसी आयोजन की कुछ अन्य रिपोर्ट–

दैनिक जागरण के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में रियल एस्टेट, मैक्डोनल्ड्‍स, टैक्स कंसल्टेंट्स और सीए नजर आएंगे, पत्रकार नहीं
 
टीओआई वाले 119 कंपनियों के लिए पेड न्यूज छापते हैं
 
 
एनडीटीवी के मुंबई दफ्तर से 250 पत्रकारों की नौकरियां गईं, सब चुप रहे
 
 
‘न्यू कन्वर्जेंस’ मीडिया के लिए नया और बहुत बड़ा खतरा : पी साईनाथ

‘नेशनल दुनिया’, दिल्ली में श्री चंद्र बने रेजीडेंट एडिटर

खुद श्री चंद्र ने ये जानकारी अपने फेसबुक वॉल के जरिए अपने जानने वालों को दी है. उन्होंने लिखा है- ''८ जुलाई को जब नेशनल दुनिया के प्रधान सम्पादक श्री शैलेंद्र भदौरिया ने मुझे दिल्ली संस्करण का स्थानीय संपादक बनाने की घोषणा की तो मित्रों और सहयोगिओं ने जमकर खुशियाँ मनाई। मुझे भी अच्छा लगा। कुछ अजीब भी लगा कि कैरिअर के इतने साल बाद इसका क्या मतलब है। फिर लगा, तरक्की जीवन के किसी भी मुकाम में मिले, उसे अपनी मिहनत का फल मानना चाहिय और मैंने माना भी। इसी भाव से मैंने इसे ग्रहण किया और खुश हो गया। तो मित्रों अब मैं नेशनल दुनिया का रेजिडेंट एडिटर हूँ और अपने आलोचकों का जीवंत जबाव भी। लेकिन अपने शुभचिंतकों का शुक्रिया अदा करना भी मेरा फ़र्ज़ है सो, उन सभी का शुक्रिया जिन्होंने कभी भी मेरे लिए कुछ भी अच्छा सोचा या कामना की।''

इसको लेकर यह चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि दिल्ली के संपादक प्रदीप सौरभ की क्या स्थिति होगी? प्रदीप सौरभ से जुड़े लोगों का कहना है कि नेशनल दुनियों में एडिटरों की फौज है. ज्यादातर लोगों को यहां एडिटर बनाकर रखा गया है. ऐसे में किसी को प्रमोट कर रेजीडेंट एडिटर बना देने से कोई खास अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए. प्रदीप सौरभ दिल्ली एडिशन के एडिटर हैं और श्री चंद रेजीडेंट एडिटर बनाए  गए हैं. रेजीडेंट एडिटर हमेशा एडिटर के अधीन रहकर काम करता है.

उधर, कुछ लोगों का कहना है कि नेशनल दुनिया प्रबंधन श्री चंद को प्रमोट कर उन्हें प्रदीप सौरभ का विकल्प बना रहा है. इससे प्रतीत होता है कि देर सबेर नेशनल दुनिया, दिल्ली में उलटफेर हो सकता है.

केदारनाथ के बारे में पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत की वर्ष 2004 में लिखी ये खबर पढ़िए

पत्रकार अगर दिल से और ईमानदारी से रिपोर्टिंग करे तो वह भविष्य की आहट को सूंघ-समझ लेता है और उसे सामने लाकर सरकार, समाज और देश को आगाह कर देता है. पर अगर सिस्टम सड़ा,  सरकार सोई व समाज सुन्न हो तो कुछ नहीं हो सकता. बात वर्ष 2004 की है. उन दिनों पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत दैनिक जागरण अखबार के देहरादून एडिशन में काम किया करते थे.

लक्ष्मी प्रसाद पंत पढ़ने लिखने वाले और संवेदनशील पत्रकार हैं. उनकी लिखी एक खबर उस साल दो अगस्त को दैनिक जागरण, देहरादून में पहल्ले पन्ने पर टाप बाक्स में प्रकाशित हुई. इस खबर में केदारनाथ पर आने वाले संकट के बारे में बड़ी बेबाकी से बताया गया था. हेडिंग से ही जाहिर है कि सबको सब कुछ पता था.


(समाचार पढ़ने के लिए उपरोक्त खबर की कटिंग पर ही क्लिक कर दें)


लेकिन सरकारें सोई रहीं और मनुष्य द्वारा निर्मित 'विकास' से विनाश हो गया. इस खबर को पढ़कर अगर आपका भी लक्ष्मी प्रसाद पंत को ऐसी रिपोर्टिंग के लिए बधाई देने का मन करे तो जरूर दे दीजिएगा क्योंकि इससे अच्छे पत्रकारों का मनोबल बढ़ेगा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

पत्रकार की गल्ती से अखबार में छप गई आजम खां के मरने की खबर

दिल्ली से प्रकाशित एक हिंदी अखबार 'अवाम-ए-हिंद' के एक पत्रकार के 'स्लिप आफ पेन' से ब्लंडर हो गया. खबर में लिख दिया गया कि यूपी के नगर विकास मंत्री आजम खां का इंतकाल हो गया. जबकि इंतकाल हुआ उनकी मां का. अखबार के 10 जुलाई के अंक में पहले पेज पर एक 4 कॉलम की बॉटम खबर छपी.

हेडिंग तो सही प्रकाशित हुई लेकिन इंट्रो में गड़बड़ हो गई. फहीम कुरैशी की बाइलाइन और रामपुर डेटलाइन से छपी खबर में कहा गया कि – ''प्रदेश के नगर विकास एवं संसदीय कार्यमंत्री आजम खां का लंबी बीमारी के बाद बीती रात लगभग दो बजे घर पर ही इंतेकाल हो गया.''

लखनऊ में बुजुर्ग पत्रकार सैयद अख्तरूल मुल्क को मदद की दरकार

Kumar Sauvir : एक बुजुर्ग पत्रकार अपनी आखिरी सांसें ले रहा है, लेकिन सिविल अस्प‍ताल के डॉक्टरों को उनकी परवाह नहीं। यह बुजुर्ग पत्रकार लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी चिकित्सालय यानी सिविल अस्पताल में फर्श पर बेहोश पड़ा है। वजह है 20 हजार रुपया, जो यहां के डॉक्ट‍र मांग रहे हैं। जाहिर है कि यह घूस की रकम मांगी जा रही है। नतीजा यह है कि यह पत्रकार हर सांस पर अपनी मौत की रवानगी दर्ज करवा रहा है। यह हालत तब है जबकि प्रदेश सरकार ने पत्रकारों को नि:शुल्क चिकित्सा की व्यवस्था का ऐलान कर रखा है।

यह कहानी है अंग्रेजी के दैनिक समाचारपत्र नेशनल हेराल्ड में वरिष्ठ रिपोर्टर रहे सैयद अख्तरूल मुल्क की। कई बरस पहले श्री मुल्क को हृदयाघात हुआ था। डाक्टरों ने उनकी बाईपास सर्जरी करवाई थी। तब सैयद मियां की माली हालत दुरूस्त थी, सो कोई बड़ी दिक्कत नहीं आयी, लेकिन कल रात अचानक उनकी तबियत बहुत खराब हो गयी। सुबह-सुबह उनके घरवाले उन्हें लेकर सिविल अस्पताल पहुंचे। वहां इमर्जेंसी में उनके डॉक्टरों ने चेकअप के बाद उन्हें दिल के डॉक्टर से राय-मशविरा करके बताया कि सैयद मियां की तबियत ज्यादा खराब है, उन्हें सघन चिकित्सा कक्ष में भर्ती कराया जाना जरूरी।

देखभाल करने वालों ने जब इसके लिए हां कह दिया तो वहां मौजूद डॉक्टर ने इसके लिए उनसे 20 हजार रूपयों की मांग कर ली। चूंकि इतनी रकम का इंतजाम उनके तिमारदार नहीं कर पाये तो उन्हें इमर्जेंसी में ही लेटा रखा गया। लेकिन कुछ ही वक्तद बाद उन्हें बाहर जाने का फरमान जारी कर दिया गया। उनकी देखभाल करने के लिए पहुंचे एक पत्रकार संजोग वाल्टर का कहना है कि उन्होंने जब डॉक्टर को प्रायवेट वार्ड में रखने की गुजारिश की तो बताया गया कि इसके लिए केवल किराये के तौर पर रोजाना भी 334 रूपयों का खर्चा आयेगा। कुछ मित्र वहां भी पहुंच गये और प्रस्ताव रखा गया कि यह रोजाना खर्चा सारे दोस्त-आसबाब सहन कर लेंगे, तो अस्पताल के सीएमएस डॉक्टर खुर्शीद हसन ने उसके लिए 20 हजार रूपयों अदा करने का हुक्म दिया। खैर, अब प्राथमिक समस्या तो है पैसों की व्यवस्था करना। सो, आप सारे दोस्तों से अनुरोध है कि जितना भी कर सकें, सैयद भाई के परिवारों की आर्थिक मदद कर दें। उनके घरवालों का मोबाइल नम्बर 9415582689 और संजोग वाल्टर का मोबाइल नम्बर 9415768680 है।

वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

समाचार विस्फोट के दो वर्ष पूरे, अब सप्ताहिक होगा प्रकाशित

नागपुर से प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका समाचार विस्फोट ने सफलतापूर्वक दो वर्ष पूरा कर लिए हैं। अगस्त, 2011 से शुरू हुई यह मासिक पत्रिका ने समाचारों के वैचारिक तेवरों के साथ तेजी से महाराष्टÑ, छत्तीसढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार एवं ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में प्रसार किया हैं।

समाचार विस्फोट के व्यवस्थापक डा. महेंद्र धावड़े ने बताया कि गत दो वर्षों दो वर्ष में समाचार विस्फोट को पाठकों से मिले रिस्पांस को देखते हुए इसका अन्य क्षेत्रों में भी प्रसार किया जा रहा है। संभावना है कि अगस्त महीने से ही समाचार विस्फोट छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से टेबुलाइट साइज में साप्ताहिक संस्करण के रूप में प्रकाशित होगा। यही से इसे देशभर में प्रसार की योजना है। साप्ताहिक समाचार विस्फोट को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचाने के लिए देश भर से प्रतिनिधियों को जोड़ने का क्रम जारी है।

प्रेस रिलीज

एक्‍सप्रेस टावर : भव्‍य इतिहास लौटने का झूठा इंतजार

आज लंबे समय बाद या यूं कह लीजिए कई साल बाद अपने एक पत्रकार मित्र से मिलने मुंबई के नरीमन पाइंट इलाके में गया। मित्रवर का कहना था कि शाम को मेरे दफ्तर ही आ जाइए। यही चर्चा कर लेंगे। उनके अखबार में पहुंचते ही पानी-चाय से स्‍वागत हुआ। इसके बाद जरुरी चर्चा….चर्चा चल ही रही थी कि मित्र ने आग्रह किया कमल जी कुछ खाने का मन हो तो बताएगा। नरीमन पाइंट की कई चीजें फैम्‍स है, जिनमें से आपकी पसंद की चीज आपको खिलाई जाएगी। इस बात ने बरसों पहले की याद ताजा दिला दी।

जब नरीमन पाइंट स्थित एक्‍सप्रेस टावर में शाम को जबरदस्‍त गहमागहमी रहती थी। रामनाथ गोयनका जी के अलग-अलग अखबारों और पत्रिकाओं में काम करने वाले पत्रकारों के अलावा अन्‍य समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो और दूरदर्शन के ढ़ेरों पत्रकारों से लेकर जनसम्‍पर्क अधिकारियों की फौज तक यहां हर शाम जुटती थी। मुंबई महानगर में किसी भी पत्रकार से मिलना हो तो बस यह कह दीजिए, शाम को मिलते हैं एक्‍सप्रेस टावर में। या आपने सामने वाले पत्रकार अथवा जनसम्‍पर्क अधिकारी से पूछ भी लिया कि आज शाम कहां मुलाकात हो सकती है तो उसका भी यही जबाव होता था, आ जाइए एक्‍सप्रेस टावर। मुलाकात भी हो जाएगी, चौपटी का आनंद भी ले लेंगे और एक्‍सप्रेस की कैंटिन में चाय-कॉफी या नाशता अथवा खाना।

मैं मुंबई पहुंचा था जून 1989 में और दो चार महीनों में ही जनसत्ता के अनेक पत्रकारों से दोस्‍ती हो गई। इसके अलावा वरिष्‍ठ पत्रकारों से भी परिचय हुआ। उस समय शादी हुई नहीं थी और जन्‍मभूमि के अखबार व्‍यापार जहां मैं नौकरी करता था, शाम को फ्री होने के बाद महीने में 15 बार पैदल या बस से एक्‍सप्रेस टावर पहुंच जाता था। गुजरात के शहर राजकोट में पढ़े होने एवं गुजराती समाचार पत्र समूह जन्‍मभूमि में काम करने की वजह से गुजराती पत्रकारों से भी खूब दोस्‍ती थी जिसकी वजह से एक्‍सप्रेस टावर में जाने पर सारा माहौल घरेलूनुमा लगता था। एक्‍सप्रेस टावर जाने के साथ जनसत्ता, समकालीन (दैनिक गुजराती अखबार), लोकसत्ता (दैनिक मराठी अखबार) संझा जनसत्ता, हिंदी स्‍क्रीन, स्‍क्रीन इंडिया, फाइनेंशियल एक्‍सप्रेस में खूब परिचय बढ़ा। इनमें वहां काम करने वाले पत्रकार एवं मिलने जुलने आने वाले पत्रकार थे। लेकिन ज्‍यादा समय जनसत्ता, संझा जनसत्ता में ही बीतता था।

जनसत्ता के संपादक राहुल जी एवं बाद में प्रदीप सिंह जी से यही पहचान हुई। इन दोनों संपादकों के दिए कई स्‍टोरी एसाइनमेंट किए। सतीश पेडणेकर, संजय निरुपम,  दीपक पाचपोरे, द्धिजेद्र तिवारी, ओम प्रकाश सिंह, प्राण धाबर्डे, भृगुनाथ चौहान, सुधांशु शेखर, सदानंद गोडबोले, गणेश झा, आलोक गुप्‍ता, बसंत मौर्य, विजय शंकर चतुर्वेदी, अनुज अलंकार आदि-आदि से गपशप होती, काफी कुछ सीखने को मिलता एवं कोई स्‍टोरी करनी होती तो उस पर जमकर चर्चा। संझा जनसत्ता में तो सतीश पेडणेकर जी ने जनरल और बिजनैस स्‍टोरी से लेकर अनेक इंटरव्‍यू तक लिखवाएं। या यूं भी कह सकते हैं कि संझा जनसत्ता में खूब छपा। एक्‍सप्रेस टावर की कैंटिन में चाय पानी के अलावा लेट हो जाने पर खाना भी हो जाता। खाना अक्‍सर गणेश झा के साथ खाता था।

एक समय पत्रकारों की जोरदार चहल पहल से गुंजने वाला यह एक्‍सप्रेस टावर शायद आज अपने भव्‍य इतिहास के साथ खड़ा है। मैं मिला नहीं लेकिन सुन रखा था कि स्‍वयं रामनाथ गोयनका जी भी यही सबसे ऊपरी मंजिल पर पेंट हाउस में रहते थे। लेकिन अब यहां न तो पत्रकार है और न ही वह चहल पहल। बस है तो इतिहास, एक भव्‍य इतिहास जिसमें दर्ज है कि इंडियन एक्‍सप्रेस समूह के अखबारों ने कई सरकारों और मंत्रियों की नींद उड़ाकर ही नहीं रख दी, उखाड़ भी दिया था। महाराष्‍ट्र के एक समय मुख्‍यमंत्री रहे अंतुले तो इस टावर की परछाई से भी भय खाने लगे थे जिसने सीमेंट घोटाले को उजागर कर उनका कैरियर चौपट कर दिया था।

एक्‍सप्रेस का सारा कामकाज अब मुंबई के उपनगर परेल से हो रहा है लेकिन पत्रकारों का लगने वाला मेला वहां देखने को नहीं मिलता। जबकि यह एक्‍सप्रेस टावर अपने भव्‍य इतिहास के साथ अपने दिन लौटने का झूठा इंतजार कर रहा है। आज इंडियन एक्‍सप्रेस के अखबार कई स्‍टॉल पर तो मिलते ही नहीं या हॉकर ही लाकर देने से मना कर देता है कि साब बिकता ही नहीं। आपके लिए एक कॉपी खरीदने का झंझट कौन मोल ले।

लेखक कमल शर्मा, आईआईएमसी, नई दिल्‍ली के पूर्व छात्र हैं एवं इन दिनों मुंबई में एक मीडिया हाउस में कार्य कर रहे हैं. संपर्क- kamaljalaj@gmail.com


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विवेक गोयनका के बेटे अनंत गोयनका आए मैदान में, शेखर गुप्ता के काम को 'फैंटास्टिक' बताया

के. विक्रम राव को सत्ता सुख लेना होता तो 1977 में जेल से ही चुनाव लड़ लोस पहुंच जाते और मंत्री बन जाते

यशवंत जी नमस्कार, अनिल सिंह की नयी यात्रा के सम्बन्ध में पढ़कर प्रसन्नता तो हुई लेकिन दुःख भी हुआ कि टीम के सबसे भरोसेमंद साथी की समर्पित सेवाएँ अब हम लोगो को नहीं मिल पाएंगी. भड़ास की लोकप्रियता के पीछे निश्चित तौर पर अनिल सिंह का योगदान अविस्मरणीय है. आपके साथ अनिल सिंह की कारागार यात्रा का वो दौर भी हमें याद है जब सत्य को छाती ठोंक कर सत्य कहने के चलते कुछ ऐसे व्यापारियों ने साजिशन आपको और अनिल को डासना का दंश झेलने पर मजबूर किया था जिनके बारे में कहा जाता है कि 1975 के आपातकाल के दौर में जब के. विक्रम राव सरीखे पत्रकार आपातकाल का विरोध कर जेल जा रहे थे तो इन व्यापारियों के पुरखे तानाशाह के आगे घुटने टेक कर बाकायदा माफ़ी मांग कर जेल से बाहर आ गए थे ताकि इनकी विलासिता में कोई कमी न आ सके. 

आश्चर्यजनक रूप से एक खबर आज के. विक्रम राव साहब के बारे में भी पढने को मिली जिनमें कोई सज्जन अभी हाल ही में रायपुर में सम्पन्न हुई आई. एफ. डब्लू. जे. के सम्मलेन की बुराई करते नजर आये और राव साहब की राजनैतिक लालसा के बारे में भी बहुत कुछ बातें सुनाते नज़र आये. एक सबसे महत्वपूर्ण बात जो मैं उस समाचार के लेखक श्रद्धेय जन को बताना चाहूँगा कि अगर राव साहब को इस भौतिक सत्ता का सुख लेना होता तो 1977 में जेल के भीतर से ही वो चुनाव लड़ कर लोक सभा पहुँच जाते और किसी महत्वपूर्ण विभाग के कैबिनेट स्तर के मंत्री हो जाते. जिस व्यक्ति ने आज से 35 वर्ष पूर्व भौतिक सत्ता को छोड़ कर पत्रकारिता का संघर्ष पथ चुना उसके मन में राज्यसभा जाने की लालसा शेष रह गई होगी, ऐसा कोई भी बुद्धिजीवी मानने को तैयार नहीं होगा.  

समस्या दरअसल व्यक्तिगत सोच में नहीं, तंत्र की है. आज इस तन्त्र की व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई है कि लोग संघर्ष, समर्पण और त्याग जैसे शब्दों के मायने भूल चुके हैं और अखबारों में जो संघर्ष प्रकाशित होता है उसकी अंतिम परिणिति सत्ता है. आज राजनैतिक दल ''जेल भरो आन्दोलन'' करते हैं तो जानते हैं कि कितने दिन में जेल से बाहर आ जायेंगे लेकिन जब के. विक्रम राव को इंदिरा गांधी ने बडौदा डायनामाईट काण्ड का आरोपी बना कर जेल में डाला था तब उनको क्या, आपातकाल के किसी भी राजनैतिक बंदी को नहीं पता था कि जेल से बाहर आयेंगे भी नहीं. और, सबसे बड़ी विडंबना देखिये कि तब के. विक्रम राव ने कह दिया था कि "तेरी जय तेरे नाम की जय, तेरी सुबह की जय तेरी शाम की जय" नहीं कहेंगे, जो सच है वो सच कहेंगे, तो उनको काल कोठरियों में डाल दिया गया और आज अगर यशवंत यही पंक्तिया कहते हैं तो उनको काल कोठरी में ठूंस दिया जाता है. लेकिन ये सब वो लोग क्या समझेंगे जिनका संघर्ष के प्रथम शब्द तक से कभी साबका न हुआ हो.  

अपने ७ प्रस्तर के लेख से भद्र जन कहना क्या चाहते थे, ये तो मुझे समझ ही नहीं आया क्योंकि शुरुआत उन्होंने कार्यक्रम के आयोजक और संस्था की बुराई से की और अंत तक पहुँचते-२ वो आयोजकों की प्रशंसा करने लगे. इससे मुझ जैसे अल्प ज्ञानी को तो इतना ही समझ आया कि भद्र लेखक श्रमजीवी का अर्थ ढूंढते -२ श्रम संघ का मतलब भूल गए अन्यथा वो कदाचित यह न लिखते कि तमाम श्रमिक संघों ने इस कार्यक्रम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की. साथ ही उनका 1986 से आई. एफ. डब्लू. जे. जुड़ा होना भी संदेहास्पद प्रतीत होता है क्योंकि यदि ऐसा होता तो वे अवश्य ये जान गए होते कि आई. एफ. डब्लू. जे. का पंजीयन श्रम संघ की श्रेणी में है न कि किसी साधारण समिति की तरह और वे प्रेस कर्मचारी यूनियन के सदस्यों की कार्यक्रम में उपस्थिति पर प्रश्न नहीं करते.

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र को मजबूती देती है और मुझ अल्पज्ञानी की एक तुच्छ सलाह है कि अगर उर्जा प्रेम न बनी तो वासना बनेगी, उर्जा करूणा न बनी तो क्रोध बनेगी, उर्जा दान न बनी तो लोभ बनेगी, उर्जा ध्यान न बनी तो पांडित्य बनेगी जैसे दूध का उपयोग न किया तो उसमें खटास आने लगती है! ऐसे ही उर्जा को निरन्तर गति न दी तो, ठहरी उर्जा काम, क्रोध, लोभ, झूठ बन जाती है! उर्जा का ठहराव पाप है! उर्जा को प्रतिक्षण गति देना पुण्य है! अतः हे श्रद्धेय भद्र जन अपनी ऊर्जा को उचित दिशा दो, क्या पता आपकी ऊर्जा किसी के काम आ जाए.

क्रान्ति किशोर मिश्र

ब्यूरो प्रमुख
सुदर्शन टी .वी .न्यूज़
लखनऊ (उत्तर प्रदेश )
संपर्क- krantikmishra@gmail.com
    
 

पाई-पाई बचाकर रखें मीडियाकर्मी क्योंकि मंदी है छाई, छंटनी शुरू हो गई भाई

मंदी ने फिर भारत को अपने आगोश में ले लिया है. मीडिया वाले कतई मंदी के बाबत नहीं बताएंगे क्योंकि जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ के शब्दों में- ''बाजार के उतार-चढ़ाव से टाइम्स आफ इंडिया समेत कई मीडिया कंपनियां जुड़ी हैं और इनका सैकड़ों लिस्टेड कंपनियों के शेयरों पर कब्जा है, अगर ये मंदी के बारे में ज्यादा बताएंगी तो निवेशक पैसे नहीं लगाएगा, या लगा हुआ पैसा निकाल लेगा, सो इन्हें घाटा झेलना पड़ेगा, इसलिए बाजारू मजबूरियों के कारण ये मीडिया कंपनियां भारत में आशावादी माहौल जबरन बनाए रखती हैं जबकि जमीन पर मंदी का बुरा असर चहुंओर दिखने लगा है''.

अभी अभी आजतक के पत्रकार Deepak Sharma ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि किस तरह साल के अंत तक निजी सेक्टर में कार्यरत हर तीसरे व्यक्ति की नौकरी ये मंदी निगल जाएगी. रीयल इस्टेट समेत ढेर सारे उद्योग क्रैश कर रहे हैं. रीयल स्टेट कंपनी के एक न्यूज चैनल श्री न्यूज से दर्जनों लोग छंटनी के शिकार हुए हैं, पर मीडिया जगत में सन्नाटा है. मारुति ने दो सौ से ज्यादा अपने वर्करों को अचानक पैदल कर दिया, इस पर मीडिया में कोई हो-हल्ला नहीं हुआ. टाटा की कंपनी टीसीएस ने सैकड़ों कर्मियों को निकालने का फैसला लिया है. सुजलान एनर्जी ने एक हजार कर्मियों को बाहर करने का ऐलान किया है. नोएडा-गाजियाबाद से प्रकाशित डीएलए अखबार बंद हो चुका है और दर्जनों कर्मी सड़क पर आ चुके हैं. दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों-मीडिया हाउसों ने अपने यहां दर्जनों लोगों को किसी न किसी बहाने निकाल दिया है और कइयों को निकालने की तैयारी है.

छोटी-मोटी कंपनियां और न्यूज चैनल रोजाना अपने यहां कम या ज्यादा संख्या में छंटनी कर रहे हैं. लेकिन देश का कारपोरेट मीडिया 'भारत निर्माण' का विज्ञापन पाकर चलाकर गदगद कृतज्ञ है और गैर-जरूरी मुद्दों पर बहसियाने-बतियाने में लगा है. लोकसभा चुनाव आते आते जमीन पर भारत निर्माण की जगह भारत विनाश के हालत दिखने लगेंगे, इसमें कोई दो-राय नहीं है.

मीडिया के साथियों से अपील है कि वे मंदी के हालात की सच्चाई अगर अपने चैनलों, अखबारों में बयान नहीं कर पा रहे हैं तो कृपया सोशल मीडिया और वेब-ब्लाग पर इस बारे में चर्चा करें, आकड़ें रखें और देश के सामने खड़े भीमकाय संकट से सबको अवगत कराएं, आगाह करें. खुद मीडिया के साथियों से कहना चाहूंगा कि मंदी छंटनी के दौर को देखते हुए वे मेहनत से कमाए अपने पैसे का निवेश कहीं ऐसी जगह न कर दें कि उन्हें बाद में जीवन निर्वाह के लिए मुसीबत का सामना करना पड़े. वे अपने पास जितना भी कैश है, उसे बचाकर सुरक्षित जगह रखें. साथ ही, नौकरी जाने की आशंका को देखते हुए अपने लिए वैकल्पिक उद्यम के बारे में देखें-सोचें-प्रयास करें. इस बारे में अगर कोई साथी किसी आर्थिक विशेषज्ञ से बातचीत कर कुछ टिप्स सामने रखे तो ज्यादा उपयोगी होगा.

मैं पिछले पांच वर्ष से भड़ास संचालित करते हुए देख रहा हूं कि जब जब छंटनी का दौर मीडिया में शुरू होता है, ढेर सारे मीडियाकर्मी साथी अचानक सड़क पर आ जाते हैं और उनके पास करने के लिए कुछ नहीं होता. बाद में उन्हें खाने, किराया देने, बच्चों की फीस देने तक के लाले पड़ जाते हैं. इसलिए सभी को अपनी ताकत क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करते हुए थोड़े थोड़े पैसे कमाने और जुटाने चाहिए, इसके लिए भले ही अनुवाद से लेकर आर्टकिल लिखने और कोई दुकान खोलने चलाने तक का काम करना पड़े, जरूर करना शुरू कर दें. खासकर उन क्षेत्रों की पहचान कर सक्रिय होना चाहिए जहां पर मंदी का असर न पड़ने वाला हो.

मैं मीडिया क्षेत्र से जुड़ा रहा हूं और इसी के पैसे से जीवन यापन करता आया हूं इसलिए मैं सबसे पहले मीडिया के साथियों को ही आगाह करना चाहूंगा कि वे पाई पाई बचाकर रखें, कोई नई चीज न खरीदें, मकान आदि खरीदने में पैसे निवेश न करें, गैर-जरूरी खर्चों को कम कर दें. मोबाइल के कम इस्तेमाल, वाहन के कम इस्तेमाल, चाय-पान-सिगरेट व नशे की अन्य चीजों के सेवन पर पाबंदी आदि से भी काफी पैसा बचाया जा सकता है. ऐसी ही छोटी छोटी बचत करके आप मुश्किल के दिनों को झेल पाने में सक्षम होंगे. साथ ही आप मीडिया के साथियों का दायित्व है कि देश को मुश्किल हालात की तरफ ले जाने वाले लुटेरे कारपोरेट, भ्रष्ट सरकारों, नपुंसक मीडिया, रीढ़विहीन नौकरशाही के गठजोड़ के बारे में ज्यादा से ज्यादा खुलासा करें ताकि हर कोई सावधान, सतर्क हो सके.

यशवंत सिंह

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwanat@bhadas4media.com


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Deepak Sharma : वोडाफोन को अपना नेटवर्क बेच कर एस्सार ग्रुप ने अपनी झोली में 75000 करोड़ रुपए भर लिए …. लेकिन आज एस्सार घाटे में है और वहाँ वर्कर्स की छंटनी हो रही है. भाई से अलग होकर अनिल अंबानी टॉप टेन की सूची में तो आ गए पर आज 35000 करोड़ के नुक्सान में है. टाटा मोटर्स से लेकर टाटा केमिकल की हालत खस्ता है. ये रिपोर्ट वित् मंत्रालय की है. रिपोर्ट जाहिर करती है कि रीयल एस्टेट में 30 फीसदी तक बाजार क्रैश कर गया है.

IT कंपनियों की बैलेंस शीट घाटा दिखा रही है. मीडिया इंडस्ट्री के गले पर सरकार की नीतियों का फंदा कसता जा रहा है. एक्सपोर्ट रूपए की गिरती साख के नीचे दब रहा है. ये बदहाली इंडस्ट्री के तकरीबन हर एक सेक्टर में है. साल के आखिर तक छंटनी और बेरोज़गारी भारत में निजी सेक्टर में काम कर रहे हर तीसरे व्यक्ति को निगल जायेगी. मित्रों ये संकट का समय है पर देश में इस वक्त मोदी, अमित शाह, नितीश, इशरत जहाँ पर बहस छिड़ी है. हम हिंदू मुस्लमान ही करते रह जायेंगे और उधर चीन हमें रौंद करके निकल जायेगा .

नींद भी खुली ना थी कि हाय धूप ढल गयी
पाँव जब तक उठे की जिंदगी फिसल गयी
पात पात झड गए कि शाख शाख जल गयी
चाह तो निकल सकी ना पर उमर निकल गयी
..और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

फाइनेंस कंपनियों का आतंक, एक और कर्जदार ने की आत्महत्या

बाड़मेर। मनमानी दरों पर ब्याज वसूलने वाली फाइनेंस कंपनियों के चक्कर में एक युवक की बीते महीने हत्या अथवा आत्महत्या की गुत्थी अब तक सुलझी ही नहीं थी कि इस बीच ऐसे ही एक मामले में दो दिन पहले बाड़मेर के एक युवक के गोवा में आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। युवक पिछले पांच-छः दिन से घर से गायब बताया जा रहा हैं। वहीं उसका भाई भी इतने ही दिन से गायब है जिसका अब तक कोई सुराग नहीं लग पाया है।

अहिंसा चौराहे के पास स्थित चाय की होटल चलाकर जीवन यापन करने वाला 30 वर्षीय युवक दीपू बख्ताणी एवं पालिका बाजार में रेडीमेड कपड़ों की दुकान चलाने वाला उसका भाई मनीष बख्ताणी पिछले पांच-छः दिन से घर से गायब थे और इनके फोन भी बंद चल रहे थे। इनमें से मनीष बख्ताणी उम्र 25 वर्ष निवासी महावीर नगर द्वारा गोवा स्थित एक होटल में आत्महत्या करने की जानकारी मंगलवार की शाम उनके परिजनों को लगी जबकि दूसरे का अब तक पता नहीं चल पाया है। परिजनों का कहना हैं कि मनीष के भाई पर कुछ कर्जा चल रहा था जिसे लेकर फाईनेंस कंपनियों के संचालक पिछले काफी समय से उन्हें परेशान कर रहे थे।

परिजनों के मुताबिक ब्याज के रूप में मोटी रकम अदा करने के बाद भी वह लोग उनका पीछा छोड़ नहीं रहे थे और पैसो के लिए दबाव बना रहे थे। इसी को लेकर मनीष पर भी पिछले कई दिनों से दबाव था। इससे तंग आकर दोनो भाई अलग-अलग दिन एवं समय में करीब पांच-छः दिन पूर्व घर से गायब हो गए। घर से जाने के बाद उनके फोन बंद बताए जा रहे थे। जहां घर वाले उनकी तलाश में दिन रात एक किए हुए थे वहीं इस बीच मंगलवार की शाम को परिजनो को कोतवाली पुलिस की ओर से सूचना दी गई कि मनीष ने गोवा स्थित एक होटल में आत्महत्या कर ली है। परिजन जैसे-तैसे खुद को संभालते हुए बुधवार की सुबह शव को लेने के लिए गोवा के लिए रवाना हुए। सूत्रों का कहना हैं कि घटनास्थल से गोवा पुलिस को सुसाईड नोट भी मिला है लेकिन इस बात की अधिकारिक पुष्टि ना तो बाड़मेर पुलिस कर रही है और ना ही उनके परिजन।

बाड़मेर शहर में इन दिनों कुकरमुत्तों की तरह फैली अवैध फाईनेंस कंपनियों का आतंक सर चढ़कर बोल रहा हैं। हालात यह है कि इन फाईनेंस कंपनियों की अवैध वसूली एवं वसूली के तौर तरीको के चलते बाड़मेर के सैकड़ों युवा अवसाद से ग्रस्त हैं। वहीं कुछ अपना घर तक छोड़ मारे डर के छिपकर फिर रहे हैं। वहीं कुछ ने तो इन कंपनियों की अवैध वसूली से तंग आकर अपनी जान तक दे दी है। इतना सब कुछ होने के बाद भी ना तो जिला प्रशासन और ना ही पुलिस प्रशासन इस तरह की अवैध फाईनेंस कंपनिया चलाने वाले संचालकों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही कर रही हैं। नतीजन आए दिन बाड़मेर के लोग विशेषकर युवा वर्ग इसका शिकार हो रहा हैं। लगता हैं कि जिला प्रशासन एवं पुलिस को अब भी और मौतों का इंतजार है, शायद इसके बाद ही उनकी कुंभकर्णी नींद खुल सके।

कुकरमुत्तों की तरह शहर में जगह-जगह स्थापित हुई अवैध फाईनेंस कंपनियों के संचालकों द्वारा पहले तो युवाओं को स्वपन दिखाए जाते हैं फिर अपने जाल में फंसाकर उन्हें भारी भरकम ब्याज पर पैसे उधार दिये जाते हैं। इसके बाद जब उधार पैसे लेने वालो के हाथ तंग होते हैं तब यह लोग प्रतिदिन उनसे पैसे की वसूली के लिए उन पर दबाव बनाते हैं। उनके द्वारा मोहलत मांगे जाने पर भी यह लोग उनकी एक भी नहीं सुनते और पैसे की वसूली के लिए मारपीट, अपहरण तक से नहीं चूकते हैं। बाड़मेर शहर में इस तरह के दर्जनों मामले अब तक प्रकाश में आ चुके हैं। लेकिन जिला प्रशासन एवं पुलिस ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

बाड़मेर से चंदन भाटी की रिपोर्ट. संपर्क- cbhati48@gmail.com

ब्रजमोहन सिंह पीटीसी और विजय मौर्या दैनिक भास्कर से जुड़ रहे

चंडीगढ़ के पत्रकार ब्रजमोहन सिंह पीटीसी (पंजाबी चैनल) से जुड़ने जा रहे हैं. वे इसके पहले दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ के साथ जुड़े हुए थे. पीटीसी में वे डिप्टी एडिटर के पद पर जुड़ेंगे. बताया जाता है कि वे दिल्ली आफिस से जुड़कर कार्य करेंगे. ब्रजमोहन एनडीटीवी के साथ लंबे समय तक कार्य कर चुके हैं. वे ईटीवी, जी न्यूज, एएनआई के साथ भी काम कर चुके हैं.

दैनिक जागरण, लुधियाना से विजय मौर्या ने इस्तीफा देकर लुधियाना में ही दैनिक भास्कर के साथ चीफ रिपोर्टर के रूप में जुड़ गए हैं.
 

यशवंत जैसा बनने की कोशिश मत करो!

Yashwant Singh : ''यशवंत जैसा बनने की कोशिश मत करो'' … मेरे एक पत्रकार मित्र को किन्हीं सज्जन ने उपरोक्त गंभीर चेतावनी दी है… मैं तबसे सोच रहा हूं कि उन्होंने मेरी बुराई की या अच्छाई बताई…

वैसे, ये दोनों चीजें अलग-अलग नहीं होतीं, पर समाज-देश में एक पैरामीटर बनाया गया होता है जिसके कारण अच्छाई तो खूब प्रदर्शित की जाती है लेकिन बुराई दबा कर रखी जाती है जब तक कि वह किसी तरीके से उदघाटित न हो जाए…

इसलिए दोनों कुबूल है… जो चाहें दे दो दोस्तों… आनंद संपूर्णता को स्वीकारने में है.. आंशिक स्वीकार या नकार में फंसे रहने वाले लोग ता-उम्र गलत अच्छा ये बुरा वो अच्छा ये नहीं वो सही वो नहीं ये ही सही के चक्कर में चकमकाते मिचमिचाते घिघियाते रहते हैं…

और, रही बात लोगों के कहने का तो बहुत पहले से गाया जा रहा है कि लोगों का काम है कहना… कर गुजरने वाले अगर लोगों के चेहरे मुंह बातों पर फंसे रहते तो वे भी लोगों के भीड़ में रुके रहते और चरित्र – चेहरे से विहीन भीड़ का कोई मुकाम नहीं होता.. वह कुंठाओं का अथाह सागर होता है जहां क्षुद्रता, किचकिच, कांवकांव का जोर पुरजोर होता है… इसलिए..

खुद को स्पेशल मानिए
भीड़ से अलग होइए
और काम पर चलिए…
जय हो.. — feeling special.

उपरोक्त तस्वीर मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित तवा नदी पर बने विशाल बांध के जलाशय पर संचालित क्रूज की है. तस्वीर में सबसे बाएं यशवंत के साथ बीच में पत्रकार राम जोशी और दाएं अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकरवादी अविनाश पांडेय 'समर' उर्फ समर अनार्या
उपरोक्त तस्वीर मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित तवा नदी पर बने विशाल बांध के जलाशय पर संचालित क्रूज की है. तस्वीर में सबसे बाएं यशवंत के साथ बीच में पत्रकार राम जोशी और दाएं अंतरराष्ट्रीय मानविधाकर वादी अविनाश पांडेय ‘समर’ उर्फ समर अनार्या

    Naveen Chhibbar प्रेरक पोस्ट, धन्यवाद
 
    Siddharth Pandey main sanshay mein hoon kadaachit ye jai ho aapke swayam ke liye hi tha ….dhanya hain aap …waise aap aur sabhi deshbhakt ki jai ho
   
    Vivek Dutt Mathuria उन्होंने मेरी बुराई की या अच्छाई बताई…
    
    Badrinath Verma यशवंत कोई ऐसा ही नहीं बनता, कबीर की इस पंक्ति को अपना वेदवाक्य बनाना पड़ता है। कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।
     
    Ravindra Ranjan हमें पता है किसने किस‌को ऎसा कहा, गलत है वो, आज हर पत्रकार को आपके जैसा ही बनना चाहिए.
     
    RC Shukl Achcha likha Bhai…
     
    Harish Singh Yashwant banna aj ke yug me bhagat singh jaisa hai. Log soch to sakte hai par ban nahi sakte.
     
    Rajeev Sharma कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।
     
    Richa Sakalley koi baat nahi Yashwant do'nt take it seriously, life hai ye to, kai tarah ke log hein yahan. Ladkiyan to dekho media mein kitna bardasht karti hein, log bina soche samjhe unke charitra ka map banate rahte hein. Ab spl feel karo ya shame, ye to hota rahega.
     
    Dm Singh kya bbat hai..
     
    Radheyshyam Singh Ninda bhi ki to uske jehan me aapne apna space banaya hai.yah kum uplabdhi nahi hai.
     
    Rakesh Soni Bahut khuub
     
    Santosh Singh जय हो..
     
    Arvind Kumar Singh मेरे हिसाब से दोनों कहा…लेकिन उनको फिर भी समझ नहीं आया कि यशवंत सिंगल पीस ही हैं…दूसरा यशवंत कौन बनेगा…
     
    Riyaz Hashmi दादा आप बहुत बुरे हो। बस यही एक अच्छाई है आपमें।
     
    Mansi Manish Wo kahna chaah rahe honge 'JYADA TURRAM KHA NA BANO…'
     
    Mansi Manish kuchh din baad log kahenge… YASHWANT KAHIIN KA….! (Ab ise samjhna to assan hoga na???)
     
    Shambhu Dayal Vajpayee अब यशवंत जैसा बनना इतना आसान भी नहीं।
     
    Sunil Kumar khul ke bol
     
    Samar Anarya उनका तात्पर्य जो भी हो, इस बात का सार्वभौमिक अर्थ यशवंत का स्वीकार ही है।
     
    Manish Soni बात तो सही है ,पर मैंने जवाब दिया था उन लोगो को की तुम लोगो ने ऐसा कह कर वाकई प्रूफ कर दिया मिडिया जगत में यशवंत नाम का कोई शकशियत है। और तब मुझे मेरे किये पर दोगुनी ख़ुशी हुई .जय हो …
     
    Bharti Jha bilkul sahi kaha
     
    प्रदुम्न कौशिक मीडिया मे यशवंत का वैसा ही खौफ है …….जैसा शोले मे गब्बर का था …………
 
    Ashish Sagar Dixit Dahsat….!
 
    Krishna Kumar Singh mai jo hu, jaisa hu, swikar karane me koi harz nahi balki badappan hai
   
    Ashish Tiwari Jai ho..jai ho….
    
    Robin Singh सही तो कहा … पेट पलना है तो यशवंत जैसा मत बनो.. सब कुछ तक पर रख कर रंग से जीना हो तो बनो..
     
    Rahul Rana सर आप गिरेट है यशवंत जेसा कोई नही
     
    Harishankar Shahi इ यशवंत बनने का कोर्स कहाँ होता है… आजकल कोर्स का जमाना है…
     
    Aamir Kirmani यशवंत भाई जैसे लोग सदियों में पैदा होते हैं, हमें आप पर नाज़ है…
     
    Sujeet Kumar Chauhan san se jene wale jhukte nhe ya to jhuka deye jate hai ya jhuka dete h nete yahe kahte ke budheman purush samya ke sath chalta h khu c or gum do word h or ak h ak bat se koe khush rahta to koe dukhe
     
    Bharat Shah भगवान करे यशंवत जैसा कोई ना हो…
     
    Aamir Khan mere bhai jese koi nahi ho sakta , aur yeh baat muje se hi kahi gayi thi ke yaswant jase maat bano , mere bhai me jo baat hai wo kissi me nahi aa sakti jai ho
     
    Yashwant Singh shukriya dosto, etna pyar dulaar ke liye …
     
    Danish Rizwan ye to mujhe bhi pata nahi chala
     
    Avnendra Kamal yasvant ya khusvant banana asan nahe lihaja udant ban jane me he bhalae hai har har mahadev……jai ho ……
     
    Puneet Nigam किसी ने कभी मुझसे कहा था कि मैं श्रवणीय हूं अनुकरणीय नहीं। आप पर फिट होता है। क्‍योंकि आप जैसा बनने को बहुत कुर्बानी देनी पडेगी जो सबके बस की बात नहीं है।
     
    Mukesh Yadav दारू छोड़ी थी तो आपने फेसबुक पर लिखा था लेकिन अब क्या प्रोग्रेस है इसके बारे में नहीं बताया।
     
    Jai Prakash Tripathi इसलिए दोनों कुबूल है… जो चाहें दे दो दोस्तों… आनंद संपूर्णता को स्वीकारने में है.. आंशिक स्वीकार या नकार में फंसे रहने वाले लोग ता-उम्र गलत अच्छा ये बुरा वो अच्छा ये नहीं वो सही वो नहीं ये ही सही के चक्कर में चकमकाते मिचमिचाते घिघियाते रहते हैं… यानी अत्यंत सभ्य, सुवचनीय और लंबी दूरी की मार करने वाले रचनाकार भी
     
    Avnendra Kamal sab nirarthak
     
    सुनीता भास्कर हिहिहीई…बढ़िया
     
    Naveen Kanswal bahut khoob ..

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


यशवंत का लिखा ये भी स्टेटस पढ़ सकते हैं-

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Yashwant Singh : कुछ भाई लोग बड़े खुश हैं और बार बार लिख बोल रहे हैं… ऐतिहासिक फैसला.. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला… इन बाल बुद्धियों को कहना चाहूंगा कि नेता बुद्धि से सोचें… जिस तरह नेताओं ने आरटीआई के दायरे में पोलिटिकल पार्टीज को लाने से बचाने की तैयारी कर ली है और अध्यादेश लाया जा रहा है, उसी तरह संसद के जरिए ये प्रस्ताव पास करा लेंगे कि … ''सजा और सांसद के बीच कोई रिश्ता न रखा जाए क्योंकि नेता तो जनता के लिए लड़ते हुए कई बार जेल जाता है और सजा तक पा जाता है.. तो ये गलत बात है….'' ऐसी ही बहसें आपको आगे नेताओं के श्रीमुख से सुनने जानने को मिलेंगी… इसलिए दिमाग को डेमोक्रेटिकली मेच्योर बनाइए और नेताक्रेसी-ब्यूरोक्रेसी के बीच नत्थी डेमोक्रेसी के असली नटखट नट-बोल्टुओं पेंचों का पता लगाइए..

    Naveen Chhibbar बिलकुल सही कहा
 
    याज्ञवल्क्य वशिष्ठ सटीक
 
    Mangala Yadav जिस प्रकार चुहा अपने आप को बचाने के लिए कई बिल बना कर रखता है, उसी तरह नेता भी इस फैसले से बचने के लिए कोई रास्ता निकाल लेंगें! कोई फर्क इन नेताऔं और चुहों मे….
   
    Shambhu Dayal Vajpayee फिर इससे सफेदपोशों पर तो कोई अंकुश लगेगा नहीं। राजनीति में सफेदपोश अपराधी भरे पडे हैं।
    
    Subhash Gupta ha ha haaaaaalllllllllllllllllRIGHT SIR.
     
    Sanjeev Chauhan अगर ऐसी बुद्धि न बनी होती जनता की तो जनता ही न कोसती मनमोहन-सोनिया जी को
     
    Danish Rizwan eee bat to sahi kahi aapne…
     
    Minakshi Mathur sahi kaha
     
    Vasant Joshi Sahi kaha hai.
     
    Kamal K. Jain agreed
     
    Vinay Maurya Right brother
     
    Ashutosh Srivastava Bilkul sach
     
    Uttam Kumar tru
     
    Ashok Gupta ·जनता जिस दिन बुद्धिमान हो गयी नेता कहाँ जायेंगे लेकिन कुछ भी हो जाये नेता ऐसा कभी होने नहीं देंगे
     
    Ashish Sagar Dixit हरी ॐ राधे …..!
     
    Bharti Jha right sir
     
    Ashish Sagar Dixit अन्दर से केंद्र सरकार की आवाज सुनाई दे रही है कि वे इसके खिलाफ याचिका दायर करेगी और अगर फिर भी बात नही बनती है तो अंतिम अधिकार जो संसद के पास है वे कानून में संसोधन / नया विधेयक पारित कर लेगे …सुप्रीम कोर्ट को जब तक फुल पावर नही मिल जाता वो महज इस देश के लोकतंत्र की प्रहरी तो हो सकती है लेकिन इन दोगले स्वाभाव वाले नेताओ से देश की अस्मत नही बचा पायेगी क्योकि ये नेता कभी नहीं चाहेगे कि राजनीति से अपराध / अपराधिक छवि वाले लोग बाहर जाये l वे ही अन्य तरीको से पार्टी फंड और स्रोत जुटाते है चुनाव में भारतीय भीड़ तंत्र को वोट में बदलने के लिए ….जय हो भारत की बदहाल माता की !
     
    Sunil Kumar anar ki bat
     
    Jitendra Dixit सही कह रहे हैं। घाघ प्रजाति कोई रास्ता जरूर खोज लेगी, जनसेवा के नाम पर।
     
    राकेश कुमार सिंह नाडी पकड़ ली आपने। पत्रकारिता के वैद्य है आप। दुर्भाग्य है अधिकतर "प्रिय बोलहि भय आस" पब्लिक है सब जानती है साहब।
     
    Anil Attri दिल्ली पुलिस के अधिकारी की बेटी CEO ..थानो में निजी चेनल(मनोरजन ) के कैमरे लगाये …. सावधान दिल्ली ….. आजकल दिल्ली में जहा भी मर्डर / फायरिंग / या कोई दूसरी बड़ी वारदात होती है तो वहा जब समाचार चैनल / या समाचार पत्र के लोग पहुंचते है तो वहा पहले से लाइफ ओके (मनोरंजन चेनल) की टीम आन द स्पॉट पर यहां तक कि डेड बोडी के पास लाइव कवरेज करती मिलती है ..समाचार चैनल / या समाचार पत्र के रिपोर्टर क्राइम टीम से पहले कही अंदर नहीं जाते पर आजकल ये मनोरजन के चैनल असली शूट कर रहे हैं और पुलिस टीम के साथ ही इनकी टीम निकल रही है ..यहां तक कि कई थानों में काम रोककर इस चैनल की फिल्में / या धारावाहिक शूट किये जा रहे है .. पीड़ित परिवार चाहे या न चाहे ये शूट कर लेते है ..पीड़ित परिवार को पता भी नही की ये क्राइम टीम है या नाटक मंडली … सूत्रों से खबर है कि लाइफ ओके चैनल की बड़ी अधिकारी दिल्ली पुलिस के बहुत बड़े अधिकारी की बेटी है ..और एक नाटक की टीआरपी के लिए खेल हो रहा है ….. कृपया शूट पर जाने वाले रिपोर्टर ध्यान दे अंदर नाटक मंडली मिलेगी … इनके नाटको में कई असली फूटेज चलती है जो उसे देख आप न्यायलय की शरण जाकर इस अधिकारी को बेपर्दा करे …………. एक साथी का ये 3 जुलाई का पोस्ट पेस्ट कर रहा हूँ …सॉरी डीयर आपका ये निचे सेम पेस्ट कर रहा हूँ .. ''mai apne ek journalist sathi ke sath ek case ke silsile me vasant vihar police station gaya …isi ilake me 16 dec ko gangrape hua tha..police station me dekha to pata chala ki SHO sahab dialogue bol rahe hai…Life Ok ke liye crime show shoot ho raha hai …mai policewalo ko bina disturb kiye vapas laut aya ..socha ki hum to inhe har roz galiya dete hai…kam se kam ye apne hi show me Spiderman ban le….vaise delhi police is show ke chalte light,camera aur action me mahir ho jayegi ….asal me uska action kaisa bhi ho !''

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

‘रांझड़ा’ फिल्म में यही वह हिंदुत्ववादी ‘सेक्युलरिज़्म’ है, जिसे पहचानने की ज़रूरत है

Uday Prakash : कई दिनों से टीवी चैनलों में केदारनाथ, अमरनाथ, जगन्नाथ आदि छाये हुए हैं. सारा सीन नाथ-मय हो रहा है. अयोध्या फिर से लौट रहा है. बोध गया उभर आया है. बाबा राम देव फिर से नमूदार हैं. सारे जोगड़े झुंड बना रहे हैं. १२ साल का एक युग बनता है. एक युग से गुजरात का मुख्यमंत्री हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनने के लिए रथ खींच रहा है. उसी की आइडियोलाजी का एक ताकतवर सत्तर पार का बूढ़ा मंत्री नौकर के साथ सोडोमी के जुर्म में जेल पहुंच गया है. उसी की पार्टी के राज में एक कंपाउडर के पास से दो सौ करोड़ बरामद हो चुका है और उसी कंपाउडर को राष्ट्रपति सम्मान दे चुके हैं और स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाहकार समिति का वह सम्मानित सदस्य है.

रविशंकर प्रसाद के डालर-रुपया वाला यह पंच हर चैनल और अखबार में चमकाया जा रहा है – कि यूपीए की पहली सरकार के दौरान डालर के मुकाबले रुपये का रेट राहुल गांधी की उम्र तिरालिस के बराबर था. यूपीए की दूसरी सरकार के वक्त में यह सोनिया गांधी की तिरसठ की उम्र के बराबर पुंच गया है और अगर मनमोहन सिंह दुबारा पीएम बने तो रुपया उनकी उम्र अस्सी तक खिसक जायेगा.

बहुत तालियां बज रही हैं इस पर कि वाह क्या शाट लगाया है ..

लेकिन रविशंकर प्रसाद यह सच गोल कर जाते हैं कि अगर भाजपा और एनडीए की सरकार आयी तो डालर के मुकाबले रुपया या तो आडवानी जी की उम्र के बराबर पहुंचेग या फिर अटल जी की तरह बिस्तर बंद होकर सारे मंज़र से गायब हो जायेगा ….

कल 'रांझणा' देखने गया. जेएनयू के बारे में ऐसी सोच को देख कर तरस आया. इस फ़िल्म में भी बनारस के एक मोहल्ले का पंडित कुंदन उसी मोहल्ले की ज़ोया हैदर नाम की लड़की से 'इश्क' कर बैठता है और फ़िल्म के आखीर में गिल-गिल रोमेंटिक-पोलिटिकल शहीद बन कर 'हीरो' हो जाता है और खलनायिका बनती है –ज़ोया हैदर.

यही वह हिंदुत्ववादी 'सेक्युलरिज़्म' है, जिसे पहचानने की ज़रूरत है.

खैर, जो जी में आया लिख दिया. बाकी आप दोस्त लोग जानें…!

कई दिनों से जेएनयू के अपने पुराने सहपाठी भूपिंदर बराड़ की कविताएं 'सूखी हवा की आवाज़' संग्रह में पढ़ रहा हूं. कुछ उस पर लिखने का इरादा है….

जाने-माने कथाकार-उपन्यासकार उदय प्रकाश के फेसबुक वॉल से.

इस तस्वीर में जी न्यूज की माइक आईडी लिए शख्स कौन है?

नीचे लखनऊ की एक तस्वीर है जिसमें एक युवक के हाथ में जी न्यूज की माइक आईडी है. मेरा सवाल आपसे है कि ये शख्स  कौन है? क्या लखनऊ का कोई पत्रकार साथी मेरी मदद कर सकता है? यह सवाल पूछने के पीछे एक मकसद है. किसी ने इस फोटो और जी न्यूज की माइक आईडी संभाले शख्स को लेकर एक खबर भड़ास के पास भेजी है, लेकिन मैं अपने लेवल पर तहकीकात करना चाहता हूं कि ये बंदा है कौन… ?

उम्मीद करता हूं आप में से कोई मेरी मदद करेगा. अगर आप कुछ बताना कहना चाहें तो नीचे कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

-यशवंत, भड़ास4मीडिया

सिर्फ चार अखबारों में ही टेंडर प्रकाशित कराया जाए- एडीएम का फरमान

: जनपद की नगर पंचायतों को लिखित दिया आदेश : पत्रकारों ने भेजा प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया को शिकायती पत्र : बाराबंकी। अपर जिलाधिकारी द्वारा नगर पंचायतों में होने वाले विकास कार्यों में टेण्डर प्रक्रिया के प्रकाशित विज्ञापनों के लिए सिर्फ चार अखबारों को छपवाने के निर्देश के बाद अधिकांश अखबारों के पत्रकारों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त हो गया है। एक तरफ जहां अपर जिलाधिकारी के इस तुगलकी फरमान से नाराज होकर पत्रकारों ने इसकी शिकायत प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया व प्रदेश के मुख्यमंत्री से की है। वहीं दूसरी तरफ जनपद के पत्रकारों ने इनके खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया है।

जानकारी के अनुसार बाराबंकी जनपद में लगभग दो दर्जन के करीब दैनिक समाचार पत्र आते हैं। इनके पाठकों की संख्या भी कम नहीं है। इतना ही नहीं इन अखबारों में विज्ञापन और दृष्य प्रचार निदेशालय व सूचना निदेशालय उ0प्र0 द्वारा सरकारी रेट भी निर्धारित कर रखे हैं। जिसमें अधिकांश विभागों के अधिकारियों द्वारा विज्ञापन भी दिया जाता है। इन अधिकारियों की यह सोच रखी है कि कम पैसे में काम भी हो जाये और सरकारी पैसो की ज्यादा बरबादी न हो जाये।

इधर आठ जुलाई को अपर जिलाधिकारी बाराबंकी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने पत्रांक संख्या 1982 (टीएसी निर्माण कार्य टेण्डर) में जनपद की नगर पंचायतों क्रमशः नगर पालिका नवाबगंज, नगर पंचायत हैदरगढ़, दरियाबाद, टिकैतनगर, सिद्धौर, जैदपुर, सतरिख, सुबेहा, बंकी, देवां, फतेहपुर, रामनगर आदि के अधिशाषी अधिकारियों को यह निर्देशित किया है कि जितने भी टेण्डर इन नगर पंचायतों में निकाले जाये वे सिर्फ चार समाचार पत्र (दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा व उमर उजाला) में ही निकलवाये जायें।

उन्होंने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि यह सभी टेण्डर और अनुबंधो का विवरण विभागीय वेबसाइड पर अपलोड करे जाये तथा इनकी एनआईसी बाराबंकी में सीडी के माध्यम से जिले की वेबसाइड पर अपलोड कर दी जाये। इतना ही नहीं सभी टेण्डरों के विज्ञापन प्रति को कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर चस्पा करायें। उन्होंने यह भी कहा है कि टेण्डर बिक्री करने के लिए नामित सम्बन्धित कार्यालय से बिक्री कराये जायें। इतना ही नहीं पांच लाख रूपये से अधिक लागत वाले प्रत्येक कार्य के टेण्डर को जिला स्तर पर जमा कराया जाये।

उन्होंने अपने पत्र में इन समाचार पत्रों के अलावा अन्य समाचार पत्रों को चोर साबित कर दिया है क्योंकि उन्होंने लिखा है कि इन चार समाचार पत्रों के अलावा जो भी विज्ञापन अन्य अखबारों में छपवाये जाते हैं वे चोरी छुपे होते हैं। अगर इन अखबारों के अलावा अन्य समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवाये गये तो वे मान्य नहीं होंगे व इनके विरूद्ध कार्यवाही भी की जायेगी।

अपर जिलाधिकारी जितेन्द्र सिंह के इस तुगलकी फरमान के बाद नगर पंचायतों के अधिशाषी अधिकारियों सहित नगर पंचायत अध्यक्षों में भी आक्रोश व्याप्त है। नगर पंचायत देवां, सिद्धौर आदि के अध्यक्षों ने तो अपनी शिकायत भी प्रदेश के ग्राम्य विकास मंत्री अरविन्द सिंह गोप से दर्ज करा दी है। वहीं अपर जिलाधिकारी के इस हिटलरशाही आदेश के बाद जनपद के कई दशकों से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्रों के पत्रकारों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त हो गया है।

(अगर पढ़ने में न आए तो उपरोक्त पत्र पर क्लिक कर दें)


जिले के पत्रकार व ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष संतोष कुमार शुक्ला ने अपर जिलाधिकारी के इस तुगलकी फरमान की लिखित शिकायत प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष श्री काटजू से की है। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर अपर जिलाधिकारी ने अपर तुगलकी आदेश वापस नहीं लिया तो इनके खिलाफ मोर्चा खोला जायेगा। इनकी खबरों का बहिष्कार किया जायेगा और धरना प्रदर्शन भी किया जायेगा। इस संबंध में एडीएम के सीयूजी नम्बर पर फोन करके उनकी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की गयी तो उन्होंने फोन नहीं उठाया। वैसे इस तुगलकी फरमान के आदेश की कई राजनैतिक दलों के नेताओं ने भी निन्दा की है।

बाराबंकी के वरिष्ठ पत्रकार गिरजा शंकर शुक्ल उर्फ गिरजा गुरू का निधन

बाराबंकी। हिन्दी पत्रकारिता में जिले को लगभग पांच दशक तक नये आयाम और नई सोच देने वाले गिरजा शंकर शुक्ल उर्फ गिरजा गुरू का गुरूवार को देहान्त हो गया है, वह 85 वर्ष के थे। उनका अन्तिम संस्कार शुक्रवार को दोपहर बाद किया जायेगा। श्री गिरजा शंकर शुक्ल का परिवार आजादी के पहले से ही हिन्दी पत्रकारिता से जुड़ा रहा है।

इनके परिजनों ने जिले से 1920 में पहला हिन्दी सप्ताहिक देश बन्धु प्रकाशित किया था जिसके सम्पादक पण्डित बद्री प्रसाद शुक्ल थे और यह अखबार छः माह तक चला और उसके बाद अंग्रेजी शासकों द्वारा इसे जब्त कर लिया गया था। वरिष्ठ पत्रकार गिरिजाशंकर शुक्ल ने 1952 में विश्ववाणी हिन्दी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया था जो लम्बे समय तक लोगों को पठनीय सामग्री उपलब्ध कराता रहा।

पं गिरिजाशंकर शुक्ल का जन्म 11 जनवरी 1928 में हुआ था। आज वह 85 वर्ष के थे। वह अपने पीछे दो पुत्र तथा नौ पुत्रियां छोड़ गये हैं। श्री शुक्ल ने हिन्दी पत्रकारिता में जिले को लम्बी ऊंचाइया प्रदान की हैं। वह गिरजा गुरू के नाम से जाने और पहचाने जाते थे। श्री शुक्ल समाजिक कुरीतियों और जिले के विकास के लिए भी सदैव संघर्षरत रहे हैं। उन्होंने धनोखर तालाब के सौंदीर्यकरण और शहर के पर्यावरण को बचाने के लिए भी लम्बा संघर्ष किया। धनोखर तालाब के सौंदीर्यकरण को लेकर जिला प्रशासन सजग हुआ और लम्बी चौड़ी धनराशि भी उपलब्ध करायी लेकिन निर्माण इकाई की लापरवाही के चलते यह योजना धरासायी हो गयी और श्री शुक्ल के दिल में अन्तिम क्षणों तक संघर्षरत रहे लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। पत्रकारिता दिवस पर उन्हें सम्मानित भी किया गया था, जो उनका अन्तिम सम्मान था।

इस सम्मान समारोह में रिजवान मुस्तफा, प्रदीप सारंग, कृष्ण कुमार द्विवेदी राजू भैया, हरि प्रसाद वर्मा, सरवर अली, आरबी सिंह, दीपक मिश्रा, अतुल वर्मा, अरूण कुमार, प्रमुख रूप से शामिल थे। श्री गिरजा शंकर शुक्ल के निधन पर पत्रकारों, साहित्यकारों और समाजसेवियों के साथ राजनैतिज्ञों ने भी शोक व्यक्त किया है। उनके निधन पर हिन्दी पत्रकारिता को अपूर्णनीय क्षति हुई है।

राष्ट्र परिषद के महासचिव अजय सिंह जनेस्मा के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डा0 भगवान वत्स, पत्रकर केपी तिवारी, नरेन्द्र नरायन मिश्रा, शोभित मिश्रा, चन्द्रकान्त मौर्या, विकास शुक्ला, आनंद शर्मा, केपी शुक्ला, हशमत उल्लाह, मो0 अकील, परवेज अहमद, बीपी दास बाबा, सुरेश बहादुर सिंह कौशिक, आलोक श्रीवास्तव, संजय शर्मा, रेहान मुस्तफा, नीरज श्रीवास्तव, गोल्डी सिंह, भूपेन्द्र मिश्रा, देवेन्द्र मिश्रा, नवनीत तिवारी, प्रेम अवस्थी, राजू अवस्थी, श्रुतिमान शुक्ला, योगेन्द्र मधुप, मयंक पाण्डेय सहित सैकड़ों लोगों ने दुःख व्यक्त करते हुए उनके परिवार को सांत्वना दी है और उनकी आत्मा की शान्ति के लिए दुआ की।

बाराबंकी से रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट.

इस दैनिक सवेरा ने तो पंजाब केसरी की वॉट लगा कर रख दी

पंजाब से खबर आ रही है कि डेढ़ साल पहले जालंधर से शुरू हुए दैनिक सवेरा हिंदी दैनिक ने ''उत्तराखंड रिलीफ फंड'' के लिए दो करोड़ से ज्यादा की राशि सिर्फ 19-20 दिन के समय अंतराल में एकत्रित कर ली है। राज्य के जाने वाले इंडस्ट्रलिस्ट कंबल किंग शीतल विज के दैनिक सवेरा ने कम समय में इतनी राशि एकत्रित करके पंजाब के आवाम पर तो छाप छोड़ी ही है, साथ ही पंजाब केसरी के मुंह पर भी जबरदस्त तमाचा मारा है।

पिछले पचास साल से पंजाब की मार्किंट में मोनपली में रहा हिंद समाचार ग्रुप का पंजाब केसरी अब तक राहत फंड सरीखे काम करता था, लेकिन अब मैदान में दैनिक सवेरा भी आ गया है। बताते चलें कि उत्तराखंड के लिए चाहे पंजाब केसरी के मुख्य संपादक विजय चोपड़ा ने अपने तमाम प्रयासों के बावजूद ढाई करोड़ की राशि एकत्रित की है। लेकिन मीडिया घरानों में इस बात की चर्चा आम है कि नन्हे दैनिक सवेरा ने उम्र दराज पंजाब केसरी को चपत लगा दी है।

बता दें कि दैनिक सवेरा ने पंजाब केसरी के मुख्य संपादक विजय चोपड़ा की नाक में दम कर रखा है। भगवान परशुराम के खिलाफ जींद से प्रकाशित खबर पर ही दैनिक सवेरा की मैनेजमेंट ने जबरदस्त गेम चला कर पूरे पंजाब में ही नहीं हरियाणा और हिमाचल तक में पंजाब केसरी की होली जलाई थी। इसके बाद वकीलों पर किए कमेंट और ना जाने कितनी इसी पंजाब केसरी-जगबाणी को कोर्ट नोटिस और केस में सम्मन की खबरें छाप-छाप कर दैनिक सवेरा ने पंजब केसरी की नाक में दम कर रखा है। पंजाब केसरी की मैनेजमेंट ने तो लुधियाना, बठिंडा, जालंधर, अमृतसर सरीखे महानगरों में अपनी टीम को दैनिक सवेरा के दफतरों में तांकझांक के स्पष्ट आदेश दिए हैं।

इसके अलावा वहां पर पंजाब केसरी ने अपने प्रतिनिधियों को कह दिया है कि वे दैनिक सवेरा के कर्मचारियों से किसी प्रकार का लिंक ना रखे और जो लोग दैनिक सवेरा की सहायता करते हैं उनकी खबरें नहीं छापें हो सकें तो उनके खिलाफ खबरों खड़ी करें। शीतल विज की टीम में शमिल चंडीगढ़ से नरेश शर्मा, लुधियाना से नीरज मैनरा, पठानकोट से जतिंदर शर्मा, बठिंडा से रितेश श्रीवास्तव, जालंधर से रविंदर शर्मा, अमृतसर से संजय गर्ग सरीखे कद्दावर पत्रकारों के बूते पर दैनिक सवेरा बुलंदी पर है।

दैनिक सवेरा की मैनेजमेंट चाहे कमजोर है लेकिन कंबल किंग और धार्मिक नेता शीतल विज के निजी रसूखों की वजह से करीब दो लाख प्रतियां छप रही है। उड़ते-उड़ते यह खबर भी अई है कि बठिंडा में पंजाब केसरी की प्रेस लग रही है। इसके चलते शीतल विज भी अपनी प्रेस यहां गाडऩे का मन बना रहे हैं। बठिंडा में उन्होंने अपने खास सिपेहसलार ब्यूरो चीफ रितेश श्रीवास्तव को इस बाबत कह दिया है। (कानाफूसी)

Wipro Technologies does not have enough profit and money to give hike to their all employees

A news about Wipro Technologies management fanda… Wipro Technologies does not have enough money to give hike to their own employees. Wipro Technologies is giving highly demotivative  atmosphere to their a large number of employee by giving them only  0% hike this year. This year Wipro Technologies has given corporate guide line the employees who belongs to band B1and got rating HVC in their annual appraisal rating. Those employees will get 0% hike. If the overall rating is HVC employee will get 0% hike.

Even though If employees is having 11 goals and objectives and they got 5 rating as EC and 7 HVC, Still they will consider overall ratings as HVC and for them 0% hike only. If employees will raise vice against this they will tell its corporate guideline for B1 band employees. It is highly demotivative step for employees. There is a huge number of employees who are coming under this criteria.

Band B1 (1 year to 3 year experienced employees)

HVC: Highly Valued Contribution(3 rating out of 5)

EC: Highly valued contribution (4 rating out of 5)

Regards,

Shivani

shivani.dubey54@gmail.com

Stop Repression of Maruti Workers!

Press Release- Bigul Mazdoor Dasta and other organizations today protested at Jantar Mantar to support the struggling Maruti workers facing state repression for past one year. More than 150 workers, students and citizens gathered to support the protest demonstration. A memorandum stating the demands of Maruti workers was given to Prime minister office (PMO) and central labour ministry.

Ajay of Bigul Mazdoor Dasta told that in last year after 18th July incident, hundreds of workers were arrested without any inquiry. This year Haryana Police lathicharged brutally on workers and their families and arrested few workers who gathered to protest peacefully at residence of industrial minister at Kaithal. There are such innumerable incidences of repression on Maruti workers since last year which every justice loving citizen should protest against.

Shivani of Stree Mazdoor Sangathan told that even after one year the government or courts have not ordered for an inquiry or bailed the innocent workers. The memorandum submitted to PMO and central labour minstry demanded that a high level inquiry should be placed, reinstatement of the of the suspended workers. It also underlined that proper security should be provided to Maruti workers who will protesting on 18th July at Manesar.

Disha student organisation did a street play 'Machine' which displays how this profit driven system exploits workers and rising of workers against it. Naujawan Bharat Sabha, Stree Mazdoor Sangathan and Karawal Ngar Mazdoor Union were also present here to support the protest demonstration.

Convener

Ajay

Bigul Mazdoor Dasta

भारत में मंदी का दौर शुरू, घबराए वित्तमंत्री दौड़ पड़े अमेरिका!

भारत की कारपोरेट सरकार के वित्तमंत्री एकबार फिर भारत बेचने के अभियान पर निकले हैं और विश्वव्यवस्था के मुख्यालय पहुंच गये हैं। उम्मीद है कि विकास कथा जारी रखने के लिए वे सीधे विश्वबैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से दिशा निर्देश प्राप्त करेंगे। लेकिन दिल्ली और वाशिंगटन के बीच हाटलाइन होने और पिछले बीस साल से वाशिंगटन के दिशा निर्देश से ही सुधारअश्वमेध चलाने के अमेरिकी दिशानिर्देश प्राप्त करने की अटल रघुकुल नीति के बावजूद उन्हें यह कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता पड़ी?

आकाओं के दरबार में हाजिरी बजाते रहने का तकादा हो सकता है, पर उत्तर आधुनिक इंतजामात में वीडियो कांफ्रेस के जरिये जब हमलोग सीधे अमेरिका में बात कर सकते हैं, तब भारत के सर्वशक्तिमान वित्तमंत्री की इस विदेशयात्रा का तात्पर्य कुछ दूसरा ही होना चाहिए। तो क्या चिदंबरम साहब फेडरल बैंक के अध्यक्ष माननीय बारनेंके साहब से यह निवेदन करने वाले हैं कि वे तत्काल प्रभाव से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए जो नीतियां अपना रहे हैं, उन्हें विराम दें, क्योंकि इसके नतीजतन रुपया इकसठ पार हो गया है?

बारनेंके साहब अपने रिजर्व बैंक के गवर्नर तो हैं नहीं कि चिदंबरम साहब की बंदरघुड़की से तत्काल नीतियां बदल दें, वे अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा को सुनने के लिए भी बाध्य नहीं हैं। देश के मौजूदा आर्थिक हालात एक बार फिर साल 1991 के भारी आर्थिक मंदी की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। वहीं एचयूएल के बायबैक से एलआईसी के पास काफी रकम आने की उम्मीद है। एलआईसी यह रकम बाजार में लगाती है तो इससे बाजारों को फौरी तौर पर बड़ा सहारा मिलेगा। हालांकि हालातों को देखते हुए लगता है लंबी अवधि में भी निफ्टी 5,400-6,000 के दायरे में ही घूमता नजर आएगा। आरबीआई की रुपये को थामने की कोशिशें फेल हो रही हैं।

आम जनता की नहीं, भारत के वित्तमंत्री और भारत की कारपोरेट सरकार की मुख्य चिंता यह है कि  डॉलर की तुलना में रुपये में दर्ज की जा रही रिकॉर्डतोड़ गिरावट, अमेरिका में फेडरल रिजर्व द्वारा बांड खरीद कार्यक्रम का आकार घटाने व चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती जैसे कारणों की वजह से सेंसेक्स की तेजी पर लगाम लगती दिख रही है।ड्यूश बैंक ने सोमवार को जारी अपनी रिपोर्ट में सेंसेक्स के लिए इस साल का अपना लक्ष्य पहले के 22,500 अंक से घटाकर 21,000 अंक कर दिया है।बैंक ने कहा है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा उम्मीद से काफी पहले अपने 85 अरब डॉलर प्रतिमाह के बांड खरीद कार्यक्रम का आकार छोटा किए जाने, चीन की अर्थव्यवस्था में स्लोडाउन के हालात पैदा होने और भारत पर छोटी अवधि की विदेशी मुद्रा उधारी ऊंचे स्तर पर होने के मद्देनजर इस साल सेंसेक्स में ज्यादा तेजी की संभावना नहीं है।डॉलर  के मुकाबले गिरता रुपया, धराशाही होते शेयर बाजार, कमरतोड़ महंगाई ये सब देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े खतरे की तरफ इशारा कर रहे हैं।

सरकार गिरती अर्थव्यव्स्था को संभालने के लिए लिए भले ही आर्थिक सुधारों का ऐलान करें लेकिन उस पर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। इन सब के कारण देश की आर्थिक हालत बिगड़ रही है। मंदी की ओर धकेलते देश के बदतर आर्थिक हालात से हमारी-आपकी जेब तो मुश्किल में आएगी जो आएगी साथ ही नौकरी और धंधेपानी पर भी सकंट आ सकता है।

लंबे अरसे से विकास की डगर पर छलांग लगाती भारतीय अर्थव्यवस्था में तब पहली बार रुग्णता के लक्षण प्रकट हुए थे. अब जबकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के वापस पटरी पर लौटने की खबर मिल रही है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद आयी मंदी का किस्सा भी यही बताता है कि निवेशक अपनी अर्थव्यवस्था के संकट में पड़ जाने से अन्यत्र निवेश करके अपनी पूंजी बचाते रहे और स्वदेश में अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटते ही हाथ खींच लिये। विदेशी पूंजी और विदेशी निवेशकों की आस्था पर निर्भर किसी अर्थव्यवस्था की जो दुर्गति होनी चाहिए वह हो रही है, वैसी ही हो रही है और होती रहेगी। किसी मैराथन दौड़ से मोक्ष पाने की कोई संभावना नहीं है।लगातार मजबूत होते डॉलर समूचे इर्मजिंग मार्केट में कोहराम मचाया हुआ है।

डॉलर के मुकाबले दूसरे देशों की करेंसी को करारा झटक लग रहा है, लेकिन सबसे ज्यागा रुपया टूट रहा है। इसके अलावा बढ़ते वित्तीय घाटे और चालू खाते के घाटे से भी रुपये को संभलने का मौका नहीं मिल रहा है। ऐसे में छोटी अवधि के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया 60 के स्तर के आसपास ही कारोबार करता नजर आएगा। वहीं हालात नकारात्मक बने रहते हैं तो अगले 3-6 महीनों में रुपया एक बार फिर 61 का स्तर कर सकता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेतों के बावजूद निर्यात में ज्यादा उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है। वहीं इर्मजिंग मार्केट से पैसा निकलर अमेरिका के बाजारों में जा रहा है, जिसके चलते रुपये पर भारी मार पड़ रही है।

खास बात तो यह है कि पिछले छह महीने से कम समय में यह चिदंबरम की दूसरी अमेरिकी यात्रा है। चिदंबरम वाशिंगटन की इस चार दिवसीय यात्रा में अमेरिका भारत व्यापार परिषद यूएसआईबीसी के वार्षिक नेतत्व सम्मेलन को संबोधित करेंगे और अमेरिकी वित्त मंत्री, जैक ल्यू से मुलाकात करेंगे।वह कई अमेरिकी उद्योगपतियों और सांसदों से भी मुलाकात करेंगे जो हाल में भारत की नीतियों विशेष तौर पर बौद्धिक संपदा अधिकार व्यवस्था और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं।

दरअसल, यह गौर करनेवाली बात है कि देश के वित्तीय प्रबंधन के शीर्ष नेतृत्व को बार बार अमेरिका जाने की जरुरत क्यों होती है। चिदंबरम कोई भारत के विदेश मंत्री नहीं हैं कि उन्हें कोई राजनयिक अभियान पर निकलना पड़ता है। नवउदारवादी जमाने में आर्थिक स्वायत्तता और संप्रभुता गिरवी रखने का यह दुष्परिणाम है। कहने को तो शेयरउछालों पर आधारित विकासगाथा और रेटिंग आधारित विकासदर वाशिंगटन से ही निर्धारित होती है, तो भारतीय वित्तमंत्री को आंकड़े दुरुस्त करने करने के लिए ऐसी अमेरिकी यात्रा तो करनी ही पड़ती है, जिसकी भारतीय वित्तमंत्रियों को वांशिंगटन ईश्वर के िइच्छानुसार डा. मनमोहन सिंह के अवतरण से पहले आवश्यकता नहीं हुई होगी। यह भी कहा जा सकता है कि विश्व की पूंजी व्यवस्था वाशिंगटन में ही आधारित है, इसलिए अबाध पूंजी प्रवाह जारी रखने के लिए और निवेशकों की आस्था बनाये रखने  के लिए उनकी यह परराष्ट्र यात्रा है।

लेकिन जरा अमेरिकी अखबारों और खास तौर पर अमेरिकी आर्थिक अखबारों पर नजर डालें तो कुछ दूसरी ही किस्म की शंकाएं पैदा होती है। यूपीए गठबंधन पर दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों के निष्पादन का महती कार्यभार है, जिसके जरिये वित्तीय घाटा और भुगतान संतुलन को साध लेने का असंभव लक्ष्य है। लेकिन लोकसभा चुनावों के मद्देनजर और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व की दोवेदारी के परिप्रेक्ष्य में इस सरकार के सामाजिक सरोकार को लेकर अवांछित सवाल उठाये जा रहे हैं। गेमचेंजर कैश सब्सिडी से अमेरिकी विशेषज्ञ यथेष्ट प्रसन्न थे। क्योंकि यह आर्थिक सुधारों की दिशा में लंबी छलांग समझी जा रही है। लेकिन खाद्य सुरक्षा योजना के औचित्य को लेकर अमेरिकी भारी दुश्चिंता में है। बाजार के विस्तार के लिए सरकारी खर्च में इजाफा के लिए सामाजिक करिश्मा और कारपोरेट समाज प्रतिबद्धता, भारत में स्तंभित बाजार विकास की समस्याओं और अनुकूलन के बारे में वे नहीं जानते हों ,ऐसा भी नहीं है।

आखिरकार ये योजनाएं विश्वबैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्ज से ही पोषित होती हैं। भारत की वोट बैंक राजनीति के तहत समय समय पर बदल जी जाती गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करने वालों के नाम बाकी जनता पर विदेशी कर्ज को बोझ लदते जाना अमेरिकी विशेषज्ञों के सरदर्द का कारण तो कतई नहीं हो सकता। यह भी कोई कारण नहीं है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव घोषणापत्र को भी चुनाव आचारसंहिता के दायरे में रखकर सत्तासमीकरण के लिए दिये जाने वाले आश्वासनों पर अंकुश लगाने का निर्देश दे रहा हो तो अल्पमत भारत सरकार संसद को हाशिये पर रखकर डंके की चोट पर एकतरफा तौर पर गेम चेंजर बतौर खाद्य सुरक्षा योजना  क्यों लागू कर रहा है। इसकी संवैधानिक वैधता और बाकी बचे आम लोगों की क्रयशक्ति और खाद्यसुरक्षा को लेकर भी जाहिर है कि अमेरिका की कोई चिंता नहीं होगी।

अमेरिकियों को चिंता इस बात की है कि भारतीय अर्थ व्यवस्था और उत्पादन प्रणाली की बुनियादी समस्याओं को संबोधित किये बिना, बिना किसी युक्तिपूर्ण वितरण व्यवस्था के यह जो समाजसेवा की जा रही है, उस पर सुधारों की सेहत का क्या होगा। जो सब्सिडी दी जायेगी, उसके दुष्परिणाम मुताबिक भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था और खुले बाजार की जो दुर्गति होनी है, उसमें अमेरिकी कंपनियों और निवेशकों के हित कितने सध पायेंगे और कारपोरेट पूजी के लिए नये जोखिम क्या होंगे। दरअसल चिदंबरम बाबू को इसी सिलसिले में गलतफहमियां दूर करनी है। भारतीय बाजारों में उतार-चढ़ाव की स्थिति बरकरार है। मौजूदा समय में वैश्विक माहौल से ज्यादा घरेलू स्तर पर समस्याएं बाजारों की मायूसी का बड़ा कारण बन रही हैं। सरकार आर्थिक सुधारों के नाम पर नीतियों का ढोल तो पीटती है, लेकिन उन नीतियों में कहीं से भी स्पष्टता नजर नहीं आती है।

अमेरिकियों को चिंता इस बात की है कि फूड सिक्योरिटी अध्यादेश से सरकारी खजाने पर अनुमानित करीब 1.25 लाख करोड रुपये अतिरिक्त सब्सिडी बोझ पड़ेगा। वहीं आगे चलकर सब्सिडी का ये अनुमानित बोझ इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। पहले ही भारी वित्तीय घाटे और बेलगाम चालू खाते के घाटे की दोहरी मार झेल रही देश की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा यहां इसका अंदाजा लगाना ज्यादा कठिन नहीं है। ऐसी परिस्थितियों पर आर्थिक सुधारों की बाट जोह रहे भारतीय बाजार किस दिशा में जाएंगे देश की सरकार को इसकी तनिक भी चिंता नहीं है। भारतीय बाजारों की कमजोरी के लिए विदेशी से ज्यादा घरेलू कारक ज्यादा जिम्मेदार साबित हो रहे हैं। सरकार की अस्पष्ट नीतियां बाजारों को मायूसी के गर्त में ढकेल रही हैं। रुपया है कि औंधे मुंह लुढ़कता जा रहा है, एफडीआई जैसे मुद्दों पर सरकार लगातार असहमति का शिकार हो रही है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली बाजार की चिंताओं और बढ़ा रही हैं।

दुनिया में 2008 में आया आर्थिक संकट अमेरिका की देन था। तब से ही दुनिया को इस बात का इंतजार था कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार होना चाहिए। अब धीरे-धीरे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है लेकिन खास बात यह है कि भारत और ब्राजील जैसे देशों पर इसका विपरीत असर भी हो रहा है। इन देशों की करेंसी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के कारण कमजोर हो रही है। भारत में हालत यह हो गई है कि भारतीय करेंसी रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया।

सुजलॉन एनर्जी निकालेगी 1000 कर्मचारी

सुजलॉन एनर्जी की वित्त वर्ष 2014 में 1,000 कर्मचारियों की छंटनी करने की योजना है। साथ ही सुजलॉन एनर्जी का घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग कारोबार में 70-75 फीसदी हिस्सा बेचने का इरादा है। सूत्रों का कहना है कि सुजलॉन एनर्जी की मैंगलोर एसईजेड के मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट में हिस्सा बेचने के लिए बातचीत चल रही है। सुजलॉन की तरफ से पुड्डुचेरी मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट में भी हिस्सा बेचा सकता है। एसई फोर्ज में भी हिस्सेदारी बिक सकती है। साथ ही पूरे भारत में कुछ कार्यालयों को भी बेचा जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक सुजलॉन एनर्जी चीन में कारोबार करने वाली उसकी सब्सिडियरी सुजलॉन एनर्जी तियांजिन में अगस्त के अंत तक हिस्सा बेच सकती है। माना जा रहा है कि वित्त वर्ष 2014 में सुजलॉन एनर्जी हिस्सा बेचकर 2,000 करोड़ रुपये तक कर्ज का बोझ घटाने वाली है।

मंदी के चलते TCS निकालेगी कर्मचारी

देश की सबसे बडी साफ्टवेयर कंपनी ‘टाटा कंसल्टेसी र्सविसेज’ अपने फिनलैंड स्थित कार्यालय मे 290 र्कमचारियों की छंटनी करने की योजना बना रही है। कंपनी के सूत्रो ने बताया कि फिनलैंड के विभिन्न कार्यालयो मे उसके 800 र्कमचारी कार्यरत है और उनमे से 290 र्कमचारियो को हटाया जा सकता है। उन्होने बताया कि कंपनी की जरूरत के मुताबिक यह संख्या कुछ और कम भी हो सकती है लेकिन इससे ज्यादा र्कमचारियो की छंटनी की योजना नहीं है। हालांकि कंपनी के र्कमचारियो के  प्रतिनिधि संगठन ‘यूनियन ऑफ प्रोफेसनल इंजीनियर्स इन फिनलैंड’ का दावा है कि टीसीएस 412 र्कमचारियो की छंटनी करने वाला है। कंपनी ने इस आंकडे को खारिज कर दिया है। र्कमचारियो का यह भी कहना है कि कंपनी ने भारत मे रोजगार उत्पन्न करने के लिये फिनलैंड मे छंटनी की योजना बनायी है।

पलाश विश्वास का विश्लेषण.

चिटफंड मामले में सेबी की नींद फिर खुली, रोजवैली के खिलाफ जमा लेने पर रोक

लंबे अंतराल के बाद बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की नींद खुली है। आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की कब नींद खुलेगी या खुलेगी भी नहीं कहना मुश्किल है। बंगाल में चिटफंड कंपनियों की सीबीआई जांच के लिए हाई कोर्ट से मना हो गया। लेकिन सीबीआई असम में क्या गुल खिला रहीं है,अभी पता नहीं चला।इस बीच शारदा चिटफंड फर्जीवाड़े के भंडाफोड़ के बाद राजनीतिक तूपान भी थम गया है। हावड़ा लोकसभा उपचुनाव में जो दागी नेताओं को लेकर जो राजनीतिक संकट नजर आ रहा था, वह सिरे से गायब है। पंचायत चुनाव के लिए मतदान बी शुरु हो गया। शारदा कर्णधार सुदीप्त सेन और उनकी खासमखास देवयानी मुखर्जी को जेल हिरासत में सत्तर दिन बिताये हो गये। चिटफंड पर अंकुश के राज्य और केंद्र सरकारों के कदमों का क्या असर हुआ मालूम ही नहीं पड़ा। बंगाल में सैकड़ों छोटी बड़ी चिटफंड कंपनियों का धंधा बेरोकटोक जारी है जबकि जांच में किसी प्रगति की सूचना नहीं है।

सेबी ने पहले सभी चिटफंड कंपनियों को चेतावनी जारी की थी। फिर बाकायदा विज्ञापन के जरिये एमपीएस और रोजवैली में निवेश के खिलाफ आम निवेशकों को अलर्ट भी किया। जिसके जवाब में दोनों कंपनियों ने सफाई दी कि उनका मामला तो अदालत में विचाराधीन है। इसपर सेबी ने चुप्पी साध ली और अब जाकर कहीं बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने रोज वैली होटल्स ऐंड एंटरटेनमेंट्स लिमिटेड को निवेशकों से किसी तरह का अतिरिक्त धन जमा करने पर रोक लगा दी है। यह सामूहिक निवेश योजनाओं के खिलाफ सेबी द्वारा जारी आदेश की ही एक कड़ी है। रोज वैली समूह की कंपनियों पर करीब 20 लाख निवेशकों से 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम जमा कराने का अनुमान है।

सेबी ने आज जारी अपने अंतरिम आदेश में कहा कि योजना के तहत जुटाए गए धन को कंपनी कहीं और नहीं लगाएगी और न ही कोई नई योजना लॉन्च करेगी। सेबी ने आदेश में कहा, 'रोज वैली होटल्स बिना पंजीकरण के सामूहिक निवेश योजना चला रही थी। ऐसे में नियामक के पास कंपनी को आगे रकम जुटाने की गतिविधि बंद करने का आदेश देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।’ कंपनी ने 2010 में हॉलिडे सदस्यता योजना पेश की थी जिसके तहत निवेशकों को मासिक किस्तों में हॉलिडे पैकेज देने की बात कही गई थी। किस्त पूरी होने के बाद निवेशक पैकेज का इस्तेमाल कर सकते हैं या ब्याज सहित पैसे वापस ले सकते है।

अब देखना है कि सेबी दूसरी कंपनियों के खिलाफ क्या कार्रवाई करती है और इन कंपनियों का जवाबी कदम क्या होता है।उधर, त्रिपुरा सरकार ने रोज वैली सहित चार गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों (एनबीएफसी) को आम लोगों से जमा स्वीकार नहीं करने और 31 जुलाई तक जमाकर्ताओं की जमा राशि वापस करने का आदेश दिया है।इस पर इन कंपनियों का क्या रुख होता है, यह देखना भी दिलच्प होगा।

शारदा समूह के मुख्य निदेशक सुदीप्त सेन व उनकी सहयोगी देवजानी मुखर्जी को  पुलिस ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सोमवार को सिलीगुड़ी में एसीजेएम मधुमिता बसु के अदालत में पेश किया।दोनों को  सात दिनों की रिमांड पर पुलिस को सौंप दिया गया। अब इन दोनों से गहन पूछताछ की जाएगी।

सरकारी पक्ष के वकील सुदीप राय बासुनिया ने बताया कि सुदीप्त सेन व देवजानी के खिलाफ यहां काफी संख्या में मुकदमे दर्ज हैं। ऐसे में पूछताछ के लिए पुलिस दोनों को रिमांड पर लेना चाहती थी। पिछले सप्ताह शनिवार को उसने सिलीगुड़ी कोर्ट में अर्जी दी थी। उन्होंने बताया कि जलपाईगुड़ी व अलीपुरद्वार में भी दोनों के खिलाफ केस दर्ज हैं। एक मामले में मंगलवार को कोलकाता के अलीपुर कोर्ट में सुनवाई के लिए इन दोनों लोगों को वहां ले जाया जाना है लेकिन जब-तक यहां पूछताछ पूरी नहीं हो जाएगी, तब-तक इन्हें नहीं छोड़ा जाएगा। गौरतलब है कि सुदीप्त व देवजानी को पांच जुलाई को भी सिलीगुड़ी कोर्ट में पेश किया गया था। उस दिन भी पुलिस ने इन्हें रिमांड पर लेने की अर्जी दी थी, लेकिन सुनवाई के दौरान दोनों को 19 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। हालांकि जेल में ही पूछताछ करने के लिए पुलिस को अनुमति दे दी गई थी। पांच जुलाई को कोर्ट में पेशी के दौरान इन्हें एजेंट व जमाकर्ताओं के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था। इधर विपक्ष के वकील ने अपने मुवक्किल की बीमारी का हवाला देते अस्पताल में ले जाने की अनुमति मांगी थी। मिली जानकारी के अनुसार कोर्ट ने इस मामले में मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया है।

शारदा चिट फंड घोटाले की फिलहाल सीबीआइ जांच कराने से हाईकोर्ट ने इंकार कर दिया है। हालांकि हाईकोर्ट ने सीबीआइ जांच का रास्ता अब भी खुला रखा है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फिलहाल मामले की सीआइडी जांच पर ही भरोसा जताया है। न्यायाधीश एके बनर्जी व न्यायाधीश एमके चौधरी ने सीबीआइ जांच की मांग पर की गई जनहित याचिका को फिलहाल खारिज कर दिया है। हालांकि हाईकोर्ट ने मामले को फिलहाल अपने पास सुरक्षित रखा है।

एक याचिकाकर्ता की मांग को लेकर अधिवक्ता विकास भंट्टाचार्य ने शारदा चिट फंड कांड की सीबीआइ जांच की याचिका दायर की थी। अधिवक्ता ने अपनी याचिका में कहा था कि शारदा कांड से जुड़े मामले पश्चिम बंगाल के अलावा अन्य राज्यों व विदेश में भी हैं। ऐसे में इसकी सीबीआइ जांच कराई जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि इसी तरह नेताई कांड में नौ लोगों के मरने की घटना के बाद भी पहले हाईकोर्ट ने सीआइडी जांच पर ही संतुष्टि जताई थी। हालांकि बाद में जांच से असंतुष्ट होकर हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआइ जांच का निर्देश दिया था। वहीं शारदा मामले की सीबीआइ जांच हो या न हो इसे लेकर कोर्ट की ओर से नियुक्त अमिकस ज्युरी लक्ष्मी गुप्ता ने रिपोर्ट में कहा था कि किसी भी याचिका को व्यर्थ नहीं समझा जा सकता है। ताकि कोई भी यदि वंचित होता है तो वह कोर्ट के समक्ष याचिका कर सकता है। रिपोर्ट में गुप्ता ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से न्यायाधीश श्यामल सेन के नेतृत्व में गठित कमीशन की समय सीमा को बढ़ाया जा सकता है। इसके माध्यम से सारधा चिट फंड के शिकार निवेशकों को पैसा वापस करने में सहूलियत हो सकेगी। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सीआइडी जांच को लेकर कुछ जरूरी दिशा-निर्देश भी दिए हैं।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

अनिल सिंह ने भड़ास4मीडिया को अलविदा कहा, डीएनए अखबार संग नई पारी

भड़ास4मीडिया में कंटेंट एडिटर पद पर कार्यरत अनिल सिंह ने इस चर्चित न्यूज पोर्टल को अलविदा कह दिया है. उन्होंने नई पारी की शुरुआत लखनऊ समेत कई शहरों से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट (डीएनए) के साथ की है. अनिल भड़ास के साथ कई वर्षों तक जुड़े रहे. उन्होंने अपनी मेहनत से भड़ास को नई उंचाइयों तक पहुंचाया. पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के रहने वाले अनिल दैनिक जागरण अखबार और हमार टीवी समेत कई अखबारों-चैनलों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं.

दैनिक जागरण प्रबंधन की साजिशों के कारण उन्हें भड़ास में कार्य करते हुए कुछ दिनों के लिए डासना जेल भी जाना पड़ा था. यह वह दौर था जब इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा, संपादक विनोद कापड़ी और कापड़ी की पत्रकार पत्नी साक्षी जोशी ने साजिश करके भड़ास के संस्थापक यशवंत को जेल भिजवाया था. तब भड़ास को पूरी तरह बंद कराने हेतु एक उच्चस्तरीय साजिश रची गई जिसमें शशि शेखर, निशिकांत ठाकुर, आलोक मेहता, विनोद कापड़ी, रजत शर्मा, संजय गुप्ता, महेंद्र मोहन गुप्ता आदि लोग शामिल थे.

इन सभी ने मिलकर यह तय किया कि इसी झटके में भड़ास को बर्बाद व समाप्त करा देना है ताकि यह फिर से सर न उठा सके. इस साजिश के तहत दैनिक जागरण की तरफ से एक फर्जी मुकदमा अनिल के खिलाफ कराया गया और उन्हें अरेस्ट कर जेल भेज दिया गया. उसके बाद भड़ास के आफिस और यशवंत के घर पर पुलिस ने छापेमारी कर लैपटाप, कंप्यूटर आदि ले गई. यही नहीं, जिस कंपनी ने भड़ास को सर्वर प्रोवाइड किया है, उसके दक्षिण भारत स्थित आफिस भी नोएडा पुलिस पहुंची थी और भड़ास का डाटाबेस लेकर आई. ये अलग बात है कि उन्हें डाटाबेस की जगह सर्वर वालों ने सीडी में कुछ और कापी करके थमा दिया और पुलिस लेकर लौट आई. 

उन मुश्किल दिनों में जेल से छूटने के बाद भी अनिल ने डरने-झुकने की जगह भड़ास का काम जारी रखा और दैनिक जागरण प्रबंधन को दिखा दिया कि मक्कार कंपनियां और इसके दलाल मालिक व मैनेजर नहीं बल्कि मजबूत इरादों वाला ईमानदार जुझारू व्यक्ति बड़ा हुआ करता है. अनिल ने कई वर्ष तक भड़ास में कंटेंट एडिटर पद पर भड़ास के दिल्ली आफिस में काम किया. बाद में अनिल का तबादला उनकी मर्जी के तहत लखनऊ कर दिया गया. अनिल का कहना है कि भड़ास4मीडिया के साथ काम करते हुए उन्होंने बहुत कुछ सीखा जाना देखा. कई वर्षों से एक ही तरह का काम करते करते एकरसता सी आ गई थी. इसलिए कुछ नया करने हेतु भड़ास को अलविदा कहा है.

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने अनिल के इस्तीफे के बारे में कहा कि सब कुछ अनिल की मर्जी से हुआ है. अनिल बेहद संकोची, स्वाभिमानी, ईमानदार और मेहनती पत्रकार हैं. वे खुद के बारे में कुछ कहते नहीं, अक्सर उनके बारे में दूसरों को ही सोचना पड़ता है. वे भड़ास के हर मोर्चे पर हमेशा डटे, अड़े, लड़े रहे. उनकी इच्छा को देखते हुए भड़ास की तरफ से उनहें लखनऊ भेजा गया और अब कुछ नया करने की चाहत के तहत वे भड़ास से विदा ले रहे हैं. अनिल के उज्जवल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं. अनिल के साथ मेरी जो सबसे अच्छी यादें हैं, वो जेल के दौरान की हैं. हम लोग वैसे तो जेल में अलग अलग बैरकों में रखे गए थे लेकिन जब कभी कभार मिलते थे तो एक दूसरे को देख कर हंसते मुस्कराते थे और कहते थे कि अब हम लोग असली जर्नलिस्ट हो गए क्योंकि लिखने पढ़ने के कारण हरामियों के लिए अझेल हो गए, सो अपन लोग जेल के हो गए. यशवंत ने उम्मीद जताई कि अनिल डीएनए अखबार के साथ जुड़कर नया मुकाम हासिल करेंगे और अखबार के लिए मजबूत साथी साबित होंगे.


अनिल का परिचय यूं है : वाराणसी से प्रकाशित दैनिक 'काशीवार्ता' से करियर की शुरुआत की. कुछ समय तक मासिक पत्रिका 'मीडिया रिपोर्ट' के साथ जुड़े रहे. 'दैनिक जागरण', मुगलसराय और चंदौली के साथ तीन वर्ष से ज्‍यादा समय तक काम किया. कुछ समय के लिए 'दैनिक हिन्‍दुस्‍तान' के संग भी रहे. 'युनाइटेड भारत', दिल्‍ली के ब्‍यूरो इंचार्ज पद पर लगभग दस महीने तक आसीन रहे. डेढ़ वर्ष तक भोजपुरी न्‍यूज चैनल 'हमार टीवी' में काम करने के बाद भड़ास4मीडिया में कंटेंट एडिटर बने. पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के निवासी. स्‍नातकोत्‍तर की पढ़ाई महात्‍मा गांधी विद्यापीठ, वाराणसी से. पत्रकारिता की शिक्षा इलाहाबाद से. आदर्शवाद, जमीन से जुड़ाव, लगातार सीखने का जज्बा और कठिन मेहनत की क्षमता.


जब अनिल ने भड़ास4मीडिया ज्वाइन किया था, उस दौरान प्रकाशित खबर यूं है–

अनिल बने भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर

ताज टीवी के सीईओ बने राजेश सेठी, एडी वर्मा ने ज्वाइन करते ही 4रीयल न्यूज छोड़ा

जी ग्रुप के चैनल ताज टेलीविजन के साथ राजेश सेठी जुड़ गए हैं. उन्होंने सीईओ के रूप में ज्वाइन किया है. वे जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइज (ZEE) के एमडी और सीईओ पुनीत गोयनका को रिपोर्ट करेंगे. सेठी टेन स्पोर्ट्स चैनलों और संपूर्ण स्पोर्ट्स बिजनेस के लिए जिम्मेदार होंगे. अभी तक सीईओ का काम अतुल पांडे देख रहे थे जिन्हें जी वालों की ही कंपनी एस्सेल ग्रुप में भेज दिया गया है किसी नई जिम्मेदारी के लिए.

4रीयल न्यूज चैनल से सूचना है कि एडी वर्मा ने ज्वाइन करते ही चैनल को छोड़ दिया. वे कई संस्थानों में सेल्स हेड रहे हैं और यहां भी सेल्स मार्केटिंग का काम देखने आए थे. ये पता नहीं चल पाया है कि उन्होंने किन कारणों से चैनल ज्वाइन करने के कुछ ही दिनों बाद छोड़ दिया. इस बारे में खुद एडी वर्मा का कहना है कि चैनल का माहौल उन्हें पसंद नहीं आया. यहां प्रोफेशनल लोग नही हैं, तभी तो पहले भी मार्केटिंग में कोई यहां टिक नही पाया.

चार शीशी केशर लेकर भी न्यूज न छापने वाले ब्यूरो चीफ से डायमंड कंपनी दुखी!

गुडगांव से खबर है कि डीएलएफ गोल्फ कंट्री क्लब से टी-शर्ट और कैप मांगने को लेकर गुडगांव में एक अखबार के ब्यूरो चीफ पहले से ही चर्चा का विषय बने हुए थे लेकिन अब एक नई चर्चा उनके साथ और जुड़ गई है. उनके मांगने का यह सिलसिला उत्तर प्रदेश की एक डायमंड कंपनी से भी जारी रहा पर भरपूर दान देकर भी भुगतना पड़ा कंपनी को. बीते मंगलवार को शहर के बड़े होटल में कंपनी ने प्रेस कान्फ्रेंस आयोजित की.

इस प्रेस कान्फ्रेंस में शहर के करीब सभी समाचार पत्रों के पत्रकारों ने हिस्सा लिया. डायमंड कंपनी की तरफ से आए हुए सभी पत्रकारों छायाकारों को गिफ्ट दिया गया. कंपनी की तरफ से गिफ्ट में केसर (सेफरोन) की एक-एक शीशी भी दी गई जिसकी कीमत 2200 रुपये की बताई जा रही है. इसे शीशी को देखने के बाद एक अखबार के ब्यूरो प्रमुख को लालच आ गया और उन्होंने कंपनी से चार शीशी की मांग कर दी.

कंपनी ने यह मांग भी पूरी कर दी लेकिन अगले दिन कंपनी की न्यूज नहीं छपी. बताया जा रहा है कि इस संबंध में कंपनी की तरफ से ब्यूरो प्रमुख को न्यूज छापने के लिए बोला गया लेकिन दो दिन बाद भी न्यूज नहीं छापी गई. अब कंपनी 4 केसर की शीशी देकर परेशान है. कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि चार शीशियों की कीमत 8800 रुपये है और ब्यूरो चीफ को गिफ्ट देने के बजाय इतने पैसा विज्ञापन इस अखबार को दे देते तो न्यूज आसानी से प्रकाशित हो जाती. (कानाफूसी)

सागर के वरिष्ठ पत्रकार सतीश गौतम का निधन

सागर जिले के प्रखर पत्रकार सतीश गौतम 47 का बीते दिनों दिल का दौरा पडऩे से निधन हो गया. उनकी अंतिम यात्रा वसंत विहार कालोनी स्थित निवास से निकली व गोपालगंज विश्राम घाट पर अंतिम संस्कार किया गया. अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में पत्रकारों और समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों ने शामिल होकर श्रद्धांजलि अर्पित की.

अपनी पैनी कलम के लिए जाने जाने वाले सतीश गौतम ने दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित विभिन्न समाचार पत्रों में संवाददाता के तौर पर कार्य कर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. उन्हें अपराध और स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित रिपोर्टिंग में सिद्धहस्त माना जाता था. पत्रकारों ने उनके निधन पर गहरा दुख जाहिर किया है.
 

Law Min asked to expedite Majithia wageboard matter : Suresh

BHOPAL: Government is in favour of implementing the Majithia Wage Board report for journalists and non-journalists and has also given an affidavit in the Supreme Court on the issue, Union Minister of State for Labour and Employment K Suresh said here.

"We are not against it. We are in favour of Majithia Wage Board," the Minister said.

"We have also requested the Law Ministry to expedite the matter and pursue it with the Supreme Court," Suresh said.

"The government has also given an affidavit in the apex court on the issue," the Minister said.

The Wage Board report, which was notified by the Union Cabinet on November 11, 2011, has not been implemented in the newspaper industry and news agencies as managements have moved the Supreme Court against it.

The matter has been posted for fresh hearing by a new Bench.  PTI

कई चैनलों के लिए मंथली टीआरपी जारी करने पर टैम हुआ राजी

कई टीवी चैनलों में काम करने वालों के लिए ये सबसे अच्छी खबर है. उन्हें अब हर हफ्ते 'धक धक करने लगा' टाइप की स्थिति में नहीं जीना पड़ेगा क्योंकि टैम वाले टामियों ने कई चैनलों के लिए टीआरपी को हफ्ते की बजाय महीने में एक बार जारी करने का फैसला किया है. कई चैनलों और टैम के बीच चल रहे गतिरोध को खत्म करने के लिए इनके बीच कई मुद्दों पर सहमति बनी है.

इसमें एक तो यही है कि टीआरपी के आंकड़े हफ्ते की बजाय महीने में एक बार जारी किए जाएंगे. जिन चैनलों ने इस नए फार्मूले पर सहमति जताई है वो हैं स्टार इंडिया (एशियानेट, ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स समेत), मल्टी स्क्रीन मीडिया, वायकाम18, टीवी18, जी नेटवर्क, टाइम्स टेलीविजन नेटवर्क, एनडीटीवी और कुछ अन्य चैनल. इन चैनलों के लिए मंथली टीआरपी की शुरुआत आज से कर दी गई है.

इन चैनलों के लिए आज जो टीआरपी जारी की गई है, इसके बाद अगली टीआरपी महीने भर बाद आएगी. इनके लिए टीआरपी डाटा प्रजेंटेशन में भी बदलाव किया गया है. इनके लिए टीआरपी को शेयर की बजाय सैकड़ा में जारी किए जाएंगे. इसका मतलब सीपीटी बाइंग बेस्ड. अन्य चैनलों के लिए वीकली टीआरपी और शेयर बेस्ड डाटा टैम की तरफ से जारी रहेगा. बताया जाता है कि ये फार्मूल आईबीएफ का फैसला या टीवी इंडस्ट्री का समेकित फैसला नहीं है. यह टैम ने अपने क्लाइंट्स टीवी चैनलों की इच्छानुसार अपनी तरफ से बदलाव किए हैं.
 

श्री न्यूज में बड़े पैमाने पर छंटनी, दर्जनों की नौकरी गई

लखनऊ : खबर है कि श्री न्यूज चैनल से दर्जनों कर्मियों की छंटनी कर दी गई है. शुरुआती झटके में 35 से ज्यादा पत्रकारों और कर्मचारियों को हटाया गया. फिर 70 अन्य पत्रकारों और कर्मचारियों को हलाल कर दिया गया.  सूत्रों के मुताबिक 10 कैमरामैन, 7 रिपोर्टर, 5 मार्केंटिंग और 14 डेस्क सहायकों के साथ ही बड़ी तादात में लोगों को पैदल कर दिया गया है.

खबर है कि इस संस्थान ने अपने बरेली, हिमाचल बुलेटिन को बंद कर दिया है. बर्खास्त किये गये पत्रकारों में बड़ी संख्या में स्ट्रिंगर्स भी है. इन लोगों के मेहनताना का भुगतान भी लटक गया बताया जाता है. वहीं चैनल से जुड़े एक कर्मी का कहना है कि कुल 30 लोगों को टर्मिनेट किया गया है, एक महीने की नोटिस पीरियड के साथ.

प्रधानपति को गोली मारकर भाग रहे बदमाशों को ग्रामीणों ने पीटा, हुई मौत

एक सनसनीखेज वारदात के तहत गाजीपुर के नंदगंज थाना क्षेत्र मे गुरूवार को महिला ग्राम प्रधान के पति पर दिनदहाड़े जानलेवा हमला कर भाग रहे तीन बदमाशों को गुस्साये ग्रामीणों ने पीट पीट कर मौत के घाट उतार दिया। घटना क्षेत्र के फतेहउल्लाहपुर गांव की है। घटना के बारे मे बताया जा रहा है,कि इस गांव की प्रधान शिव कुमारी बिंद के पति राम किशुन बिंद आज सुबह क्षेत्र मे स्थित एक प्राइमरी स्कूल पर बच्चों के मिड डे मील की व्यवस्था करा कर बाइक से घर वापस लौट रहे थे।

प्रधान पति घर के करीब पहुंचे थे कि इसी दौरान बाइक सवार तीन बदमाशों ने उन पर निशाना साध कर फायरिग शुरु कर दी। बदमाशों ने प्रधान पति को तीन गोलिया मारी,और भागने लगे। गांव में गोलियों की तड़तड़हाट सुन मौके पर भीड़ जुट गई। ग्रामीणों ने गंभीर रुप से घायल प्रधान पति को इलाज के लिए अस्पताल भेजा, प्रधान पति पर दिन दहाड़े जानलेवा हमले की इस घटना से गांव वाले भड़क गये। आक्रोशित ग्रामीणों ने वारदात को अंजाम देकर भाग रहे बदमाशों को दौड़ा कर पकड़ लिया,और जम कर पिटाई की।

भारी संख्या मे मौके पर जुटी भीड़ ने तीनो बदमाशों को जम कर पीटा। घटना की सूचना पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने आरोपी हमलावरों को आक्रोशित ग्रामीणों के चंगुल से मुक्त कराया और इलाज के लिए जिला अस्पताल भेजा,जहां तीनो ने दम तोड़ दिया। घटना के पीछे चुनावी रंजिश की वजह सामने आ रही है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की तफ्तीश कर रही है।

गाजीपुर से के0के0 की रिपोर्ट

सम्‍पर्क 9415280945

विवेक गोयनका के बेटे अनंत गोयनका आए मैदान में, शेखर गुप्ता के काम को ‘फैंटास्टिक’ बताया

राजनीति में ही नहीं, मीडिया में भरपूर वंशवाद चलता है और धड़ल्ले से चलता है. मालिक का बेटा ही अगला मालिक होता है, जैसे नेता का बेटा ही इलाके का अगला नेता होता है. नेता पुत्रों ने राजनीति पर कब्जा जमाना शुरू किया है तो मीडिया मालिकों के बेटों ने मीडिया पर. ताजा मामला इंडियन एक्सप्रेस के मालिक विवेक गोयनका का है. उनके पुत्र यानि रामनाथ गोयनका के पोते अनंत गोयनका मैदान में आ चुके हैं. उनका बड़ा सा इंटरव्यू भी मिंट अखबार में छप चुका है ताकि उनका एक्सपोजर हों और लोग उन्हें ही असली व भावी मालिक मानने लगें.

इस इंटरव्यू में उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर इन चीफ शेखर गुप्ता की खूब जय जय की है. हालांकि मीडिया विश्लेषक कहते हैं कि हाल के दिनों में इंडियन एक्सप्रेस जिस कदर सत्ता और कारपोरेट के इशारे पर संचालित हुआ है, वह उसके पतन की कहानी बयान करने के लिए पर्याप्त है. जाने माने पत्रकार पी. साईंनाथ ने हाल में ही होशंगाबाद जिले में आयोजित विकास संवाद के मीडिया विमर्श में इंडियन एक्सप्रेस के पतन की कहानी को बयान किया था. खैर, बात हो रही है अनंत गोयनका के इंटरव्यू की. अनंत ने इंटरव्यू में खूब सारी बातें कही हैं. कुछ सवाल जवाब यूं हैं-

-When did you realize you were interested in the newspaper business?

I always loved it. There are photographs of Ramnath-ji taking me to the press at a very young age. The press was in my house, it was in the basement of the Express Towers (in Mumbai), so every night I would always take a walk down with dad or mom.

I’ve always had a lot of love, passion and affection for Express because of the kind of stories that you hear about it, kind of change it’s made with the Emergency stories. It’s too inspiring to be able to walk away from. It’s always been something that I wanted to do….

-What kind of relationship do you share with the editor?

I think Shekhar (Gupta) has done a fantastic job with Express.

If you look at the last 13 years, we have had some really rough patches. I think ever since the family fight, and ever since Express was split three ways, it really cost the group. Real estate, what is worth about a billion dollars now, went to Ramnathj-ji’s daughter-in-law, Saroj Goenka. Manoj Sonthalia, my uncle, got The Indian Express in the south.

We had to let go of Express Towers in Noida. In Delhi, we have been very unlucky. We pay market rent on this building (Express Building on Bahadur Shah Zafar Marg) to Saroj Goenka, dadiji as I call her.

The position that we have today is something that has worked but it also worked because of Shekhar’s complete editorial independence. And he has ruthlessly cut costs. We have come down from 4,000 to 2,400 people.

पूरी बातचीत पढ़ने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- मिंट में अनंत गोयनका

सीएनबीसी टीवी18 के मैनेजिंग एडिटर पद से उदयन मुखर्जी हटे, शेरीन भान को जिम्मेदारी

नेटवर्क18 का असली मालिक रिलायंस के बन जाने के बाद इस मीडिया समूह पर रिलायंस का असर खूब दिख रहा है. टाप लेवल पर धड़ाधड़ चेंजेज हो रहे हैं. पिछले दिनों फोर्ब्स इंडिया के चार बड़े पत्रकारों से जबरन इस्तीफे लेते हुए उन्हें बेआबरू करके हटाया गया, अब निशाना बना है बिजनेस चैनल सीएनबीसी टीवी18.

इस बिजनेस चैनल के मैनेजिंग एडिटर पद से उदयन मुखर्जी को हटा दिया गया है. नई जिम्मेदारी चैनल के एक्जीक्यूटिव एडिटर शेरीन भान को दी गई है. इस बारे में एक इनटरनल प्रेस रिलीज जारी की गई है. प्रेस रिलीज में कहा गया है कि उदयन ग्रुप से जुड़े रहेंगे और निजी कारणों से वे अपने पद से हट रहे हैं. प्रेस रिलीज में बदलावों के बारे में ऐसी ही बातें की जाती हैं. खैर, पूरी प्रेस रिलीज यूं है…

PRESS RELEASE

NETWORK18 ANNOUNCES CHANGE OF GUARD AT CNBC-TV18

Udayan Mukherjee, managing editor, CNBC-TV18 has decided to step down from his full time role, after 15 years of service with the group. The reasons for this change are entirely personal. Udayan has been facing issues of professional exhaustion and wants to devote more time to other pursuits of personal interest.

However, he will continue his exclusive association with the group, albeit in a contributory and consulting role, through a mix of events, shows and appearances, even as he relinquishes his daily responsibilities. Shereen Bhan, executive editor, CNBC-TV18 will take over responsibility of the day to day running of the channel as its new Managing Editor from September 1, 2013.

Speaking on this development, Raghav Bahl, founder & editor, Network18 said: “Udayan has contributed to the emergence of CNBC-TV18 as a benchmark in business news since its formative years. He has ably led the team to many successes and we wish him the very best in his new avatar at CNBC-TV18. Shereen has all the skills and experience to take this mantle forward and we look forward to her leadership”

B. Sai Kumar, group CEO, Network18 said: “Udayan has been instrumental in making CNBC-TV18 the success it is today. We thank him for his invaluable contribution and look forward to his new role with us. In Shereen we entrust the task of leading CNBC-TV18 onto new levels of growth and leadership.”

Udayan Mukherjee said: “I have had a rewarding and enriching 15 year stint with Network 18, but of late the responsibility of running the channel had become repetitive and I had a difficult time motivating myself to continue. At this stage of my life, I need to devote more of my time to other personal passions and interests. CNBC-TV18 has a very talented team in place which will ensure that the channel’s high standards are maintained in the future. I wish the new editorial leadership team the very best and will try, in my limited way, to contribute to its success”

मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच छह अगस्त को करेगी अंतिम सुनवाई

द हिंदू में जे. वेंकटेश की एक बाइलाइन खबर प्रकाशित हुई है जिसमें बताया गया है कि मीडियाकर्मियों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड के खिलाफ दायर अखबार मालिकों की याचिका पर आखिरी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच 6 अगस्त से करेगी. पूरी खबर इस प्रकार है…

New SC Bench to hear afresh wage board case from Aug. 6

J. Venkatesan

The Supreme Court on Tuesday posted for final hearing on August 6 a batch of petitions newspaper managements had filed to challenge the Justice Majithia Wage Board’s recommendations for journalists and non-journalists. A new Bench of Justices C.K. Prasad and Ranjana Desai took the decision after senior counsel K.K. Venugopal, appearing for the Indian Newspaper Society (INS), submitted that it would require at least five weeks for completion of the hearing.

A Bench of Justices Aftab Alam and Ms. Desai started hearing the matter on February 5. The hearing went on for more than two weeks, but the final hearing could not be concluded because Justice Alam, who was presiding over the Forest Bench, took up certain important matters in March. As he retired on April 18, the matter could not be taken up by that Bench and was adjourned to July 9. Besides ABP Ltd., Bennett Coleman and Co. Ltd., publishers of The Times of India, and other newspapers, and the INS have challenged the report and its notification.

साभार- द हिंदू

सीपी ने टीओआई और मोहित ने भास्कर से नाता तोड़ा

खबर है कि टाइम्स आफ इंडिया, गुड़गांव के सीनियर एडिटर सीपी सुरेंद्रन ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने किन वजहों से इस्तीफा दिया और कहां ज्वाइन करने जा रहे हैं, यह पता नहीं चल पाया है. वे टीओआई के पुणे एडिशन के भी आरई रह चुके हैं.

दैनिक भास्कर, जमशेदपुर से मोहित शुक्ला ने इस्तीफा देकर अपनी नई पारी दैनिक जागरण, मेरठ के साथ शुरू की है. मोहित भास्कर जमशेदपुर की लांचिंग टीम के सदस्य रहे हैं. वे हिंदुस्तान, कानपुर में भी कार्य कर चुके हैं. दैनिक भास्कर, जमशेदपुर से इससे पहले सीनियर सब एडिटर ओम प्रकाश, रंजीत सिंह और दीपक ने इस्तीफा दिया था. ओमप्रकाश हिंदुस्तान, रांची गए. रंजीत सिंह देशबंधु पटना में. दीपक ने मीडिया को ही बाय बोल दिया.
 

दैनिक जागरण Žब्यूरो चीफ की बेटी फॉरेस्ट गार्ड की एसएलआर राइफल लेकर फोटो शूट कराती रही

ललितपुर। शुक्रवार को ललितपुर जिले में आयोजित वन विभाग का एक कार्यक्रम पूरी तरह से दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ रवीन्द्र दिवाकर का पारिवारिक कार्यक्रम बन कर रह गया। ब्यूरो चीफ की बेटी फॉरेस्ट गार्ड की एसएलआर राइफल को लेकर फोटो शूट कराती रही। इस दौरान जिलाधिकारी ओपी वर्मा, डीएफओ से लेकर सारे आला अधिकारी समेत तमाम पुलिस कर्मी भी मौजूद थे।

ब्यूरो चीफ की बेटी एसएलआर राइफल से आधे घंटे तक खेलती रही। इस दौरान वहां खड़े पुलिस वाले मुस्कराते रहे। अधिकारी भी इसे सामान्य घटनाक्रम मानकर शांत रहे। क्या कानूनन यह सही है कि किसी सरकारी गार्ड की एसएलआर लेकर कोई फोटो खिंचाता रहे?

दूसरे, क्या यह किसी पत्रकार के लिए उचित है कि वह किसी सरकारी कार्यक्रम में अपने परिजनों के साथ जाकर वहां इतना करीबी बन जाए और घुलमिल जाए कि ब्यूरोक्रेसी व मीडिया में कोई फर्क ही नजर न आए? मीडिया का काम तो ब्यूरोक्रेसी और सरकारी कार्यक्रमों पर नजर रखना है, लेकिन जब मीडिया के लोग खुद इनके इतने नजदीकी बन जाएंगे तो फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग होगी?

ललितपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

गोमतीनगर दुराचार में पुलिसवालों पर धारा 21 में मुक़दमा दर्ज हो

थाना गोमतीनगर, जनपद लखनऊ में बच्ची के दुराचार और हत्या मामले में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने पीड़ित पक्ष से बातचीत के बाद देवराज नागर, डीजीपी, यूपी को पत्र लिख कर इस मुकदमे में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2005 की धारा 6 बढाए जाने की मांग की है. अभी मुकदमे में यह महत्वपूर्ण आपराधिक धारा नहीं लगाई गयी है जो गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला से सम्बंधित है और जिसमें न्यूनतम दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा है.

इस अधिनियम की धारा 19(2) के अनुसार स्थानीय पुलिस थाने की यह विधिक जिम्मेदारी है कि वह तत्काल ऐसे प्रकरणों में अपराध पंजीकृत करे. इस धारा के अनुसार ना सिर्फ अपराध के वास्तव में घटने बल्कि अपराध होने की संभावना भी सम्मिलित है. यदि कोई भी पुलिस कर्मी तत्काल मुक़दमा दर्ज नहीं करता है तो वह भी धारा 21 में अपराधी माना जाएगा, जिस पर छः माह के कारावास और जुर्माना की सजा है. ठाकुर ने इस घटना में धारा 19(2) के प्रावधानों के तहत जिम्मेदार थाना गोमतीनगर के प्रत्येक उस पुलिस कर्मी के विरुद्ध धारा 21 में मुक़दमा दर्ज कर कार्यवाही की मांग की है जिन्होंने तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं किया.

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ  
विषय- थाना गोमतीनगर में एक बच्ची से हुए जघन्य और हिंसक दुराचार और निर्मम हत्या विषयक
महोदय,

कृपया थाना गोमतीनगर, जनपद लखनऊ में एक गरीब बच्ची के साथ हुए जघन्य और हिंसक दुराचार और निर्मम तथा पाशविक हत्या का सन्दर्भ ग्रहण करने की कृपा करें. इस प्रकरण में अब पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट के बाद हत्या और दुराचार का मुक़दमा पंजीकृत किया जा चुका है और इस मामले में समाचार पत्रों के अनुसार थानाध्यक्ष और अन्य पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच भी संभवतः क्षेत्राधिकारी, गोमतीनगर द्वारा कराई गयी है.  

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का यह भी दावा है कि शीघ्र इस प्रकरण का अनावरण कर लिया जाएगा, जिस पर अभी टिप्पणी करना शायद जल्दीबाजी होगी.  मैं आज इस घटना के मौके पर गयी थी और मिठाईवाला चौराहा के पास स्थित बच्ची के माँ के घर भी. इसके अलावा मैं बच्ची की माँ के चिनहट थाने के पीछे स्थित आवास भी गयी. मैंने इन सभी जगहों पर पीड़ित पक्ष के कई लोगों से भी वार्ता की. मैंने विभिन्न चैनलों पर प्रसारित समाचारों को देखा और अपने पत्रकार साथियों की मदद से बच्ची ले शव मिलने के दिन उस बच्ची की माँ द्वारा कही जा रही बातों की विडियो क्लिपिंग भी मैंने प्राप्त की.  इन सब तथ्यों के आधार पर मैं निम्न निश्चित मंतव्य पर पहुंची हूँ-

1. यह दुराचार और हत्या की घटना दिनांक 07/08 2013 की रात्रि की है  

2. उसी रात्रि बच्ची की माँ ने आसपास तलाश किया लेकिन बच्ची नहीं मिली तो वे रात में ही थाने गयी. वहाँ उसे भगा दिया गया लेकिन पुनः जाने पर दो पुलिसवाले साथ गए, कुछ देर घूम कर फिर वापस लौट गए  

3. दिनांक 08/07/2013 सुबह 04.30 बजे लाश मिली जो एक टहलने वाले ने लोगों को सूचित किया. बच्ची की माँ को भी सूचना मिली और वह मौके पर गयी.  

4. पुलिस भी मौके पर गयी जहाँ पंचनामा आनन-फानन में किया गया और शव अंतिम संस्कार कराने हेतु सौंप दिया गया. लोगों के विरोध करने पर पोस्ट मॉर्टम कराया गया  

5. जहाँ बच्ची की माँ कह रही थी कि दुराचार हुआ है और सिगरेट के दागने का निशान भी बता रही थी, वहीँ थानाध्यक्ष गोमतीनगर और अन्य पुलिस के लोग कह रहे थे कि कुत्ते के नोचने से मौत हुई है  

6. थाने ने बच्ची की माँ की बात दरकिनार करते हुए जबरदस्ती एक तहरीर लिखवाई और दिनांक 08/07/2013 को कोई मुक़दमा नहीं पंजीकृत किया गया  

7. पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही दिनांक 09/07/2013 को मुक़दमा दर्ज हुआ  

मैं यहाँ अन्य सभी बातों के अलावा  मुख्य रूप से लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2005 (Protection of Child from Sexual Protection Act 2005) का उल्लेख करना चाहूंगी. इस अधिनियम की धारा 6 जो गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला (Aggravated penetrative  sexual assault) से सम्बंधित है, में न्यूनतम दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा बतायी गयी है. इस गरीब और असहाय बच्ची के मामले में भी यह धारा छः का अपराध अत्यंत दानवीय और पाशविक ढंग से कारित किया गया है. अतः मैं आपसे पहला निवेदन यह करुँगी कि इस अभियोग में नियमानुसार तत्काल धारा छः सम्मिलित किये जाने के निर्देश जारी करें.  

इसके अतिरिक्त इस अधिनियम की धारा 19(2) के अनुसार स्थानीय पुलिस थाने की यह विधिक जिम्मेदारी है कि वह तत्काल ऐसे प्रकरणों में अपराध पंजीकृत करे. इस धारा के अनुसार ना सिर्फ अपराध के वास्तव में घटने बल्कि अपराध होने की संभावना भी सम्मिलित है. अतः पुलिस इस बात का सहारा नहीं ले सकती कि मात्र आशंका के आधार पर मुक़दमा पंजीकृत नहीं किया जा सकता. इसी अधिनियम की धारा 21 के अनुसार यदि कोई भी व्यक्ति धारा 19(2) में दी गयी जिम्मेदारी के विपरीत मुक़दमा दर्ज नहीं करता है तो वह भी इस अधिनियम में अपराधी माना जाएगा और उसे छः माह के कारावास और जुर्माना की सजा है.  

अतः मैं लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधियम 2005 की धारा 19(2) तथा 21 में दिये प्रावधानों के अनुसार यह मांग करती हूँ कि इस प्रकरण में दुराचार और हत्या के दोषी पाए गए लोगों के अलावा थाना गोमतीनगर के प्रत्येक उस पुलिस कर्मी के भी उक्त अधिनियम के अंतर्गत अपराध का निर्धारण करने के आदेश निर्गत करने की कृपा करें.

भवदीय

नूतन ठाकुर

गोमती नगर, लखनऊ           

nutanthakurlko@gmai.com 

तो क्या खालिद की मौत स्वाभाविक थी!

उत्तर प्रदेश पुलिस हिरासत में 20 मई 2013 को फैजाबाद से लखनऊ पेशी पर जा रहे सीरियल बम ब्लास्ट कांड के आरोपी आतंकवादी खालिद मुजाहिद की मौत स्वभाविक थी। न कि किसी साजिश का हिस्सा। इस बात का खुलासा उत्तर प्रदेश विधि विज्ञान प्रयोगशाला (लखनऊ) में हुए बिसरे की जांच के बाद हुआ। यह रिपोर्ट शासन को सौंप दी गई है। रिपोर्ट आने के बाद इस बात की संभावना जताई जा रही है कि खालिद की मौत के बाद हत्या और साध्य मिटाने के आरोप का मुकदमा झेल रहे पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह और तत्कालीन डीजी लॉ एंड आर्डर ब्रजलाल सहित उन पुलिस वालों की मुश्किले कम हो जायेंगी जिनकी कस्टडी में खालिद की मौत हुई थी।

गौरतलब हो 20 मई 13 को फैजाबाद से पेशी के लिये लखनऊ आ रहे खालिद की जिला बाराबंकी से गुजरते समय अचानक मौत हो गई थी, जिस पर काफी हो-हल्ला मचा था और यहां तक कहां गया था कि खालिद की हत्या की गई है। इस पर खूब राजनीति भी हुई। अखिलेश सरकार ने खालिद के परिवार को मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा करना चाह, लेकिन जब बात नहीं बनी तो कई पुलिस वालों को आरोपी बनाकर उनके ऊपर मुकदमा ठोंक दिया गया।

उधर,पांच डाक्टरों के पैनल ने जिसमें दो मुसलमान चिकित्सक भी थे खालिद के शव का पोस्टमार्टम किया। पोस्टमार्टम से यह तो साफ हो गया था कि उसके साथ किसी तरह की मारपीट नहीं की गई थी, लेकिन पोस्टमार्टम कर रही टीम ने संभावना व्यक्त की कि हो सकता है कोई जहरीला पदार्थ देकर खालिद को मौत की नींद सुलाया गया हो, इसलिये खालिद के बिसरे (पेट में मिले खाद्य पदार्थ) की जांच की जाये। पोस्टमार्टम करने वाली टीम की सिफारिश को तुरंत मान कर खालिद का बिसरा विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया गया, जहां बिसरे का परीक्षण करने के बाद डाक्टरों ने और पाया कि खालिद के बिसरे में कोई जहरीला पदार्थ नहीं था।

भाजपा नेता और प्रवक्ता विजय पाठक ने खालिद की मौत से पर्दा हटने के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए था, खालिद की मौत स्वभाविक थी, यह बात तब भी लोग जानते थे और अब भी यही सच्चाई सामने आई है। बात राजनीति की कि जाये तो सपा ने खालिद की मौत को खूब राजनीतिक रंग दिया था। समाजवादी पार्टी वोट बैंक की राजनीति में कितना गिर जाती है, इसकी बानगी आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद खालिद की पुलिस कस्टडी में हुई मौत के बाद हुई सियासत में जनता को देखने को मिली थी। सरकार ने मुसलमानों को खुश करने के लिये खालिद के परिवार को मुआवजा देने में भी संकोच नहीं किया था। पुलिस वालों के खिलाफ अनाप-शनाप मुकदमें ठोंक दिये गये थे, जबकि वह अपने को बेकसूर बता रहे थे।

यहां तक की एक मुकदमा रिटायर्ड डीजीपी विक्रम सिंह के खिलाफ भी दर्ज कर दिया गया, जो खालिद की मौत के समय रूड़की के रामकृष्ण ट्रस्ट मिशन में व्याख्यान दे रहे थे। अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की बात सुनकर वह गुस्सा हो गये थे और उन्होंने यहां तक कह दिया था ‘यह सब सरकार के पैंतरे हैं। खालिद की गिरफ्तारी मेरे ही कार्यकाल में हुई थी। मैं दावे के साथ कह सकता हॅू कि वह आतंकवादी था और रहेगा। पता नहीं खालिद के परिवार को छह लाख रूपये की मदद देकर राज्य सरकार के नुमाइंदे क्या संदेश देना चाहते है।’ उन्होंने पुलिस वालों का मनोबल बढ़ाते हुए यहां तक कहा था कि ऐसे मुकदमों से पुलिस वालों को परेशान नहीं होना चाहिए। पूर्व डीजीपी के एल गुप्ता ने बिसरा रिपोर्ट आने के बाद पिछले घटनाक्रम को याद करते हुए आतंक के आरोपियों के नाम पर वोट बैंक की राजनीति को घातक करार दिया। उनका कहना था सच को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। बिसरा रिपोर्ट से यह साफ हो गया है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. 

सपाइयों के ‘टमाटर’ से डर गये बेनी बाबू

‘डर के आगे जीत है।’ पेय पदार्थ बनाने वाली एक कम्पनी का यह स्लोगन कांग्रेस नेता और केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा पर स्टीक बैठता है। पिछले काफी समय से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को पानी पी-पीकर कोसने वाले बेनी बाबू के अचानक मुलायम के प्रति सुर बदलने को उक्त स्लोगन के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है। बेनी प्रसाद वर्मा पिछले कुछ माह से अपने पूर्व साथी और राजनैतिक हमसफर रहे मुलायम के खिलाफ काफी तल्ख टिप्पणी कर रहे थे। असंसदीय भाषा का भी प्रयोग उनके(बेनी) द्वारा किया जा रहा था। पिछले दिनों उन्होंने यह कहकर सभी मर्यादाएं लांघ ली कि मुलायम तो प्रधानमंत्री निवास पर झाड़ू लगाने लायक भी नहीं है।इस बात को मुलायम ने ज्यादा तरजीह नहीं दी और यह कहकर चुप हो गये कि वह हमारे पुराने मित्र हैं और हमारा प्रचार कर रहे हैं।

कांग्रेस ने बेनी को जुबान पर लगाम लगाने को कहा तो वह गुस्से से लाल पीले हो गये और यहां तक कह दिया कि मुलायम के खिलाफ बोलने से रोका गया तो वह कांग्रेस छोड़ देंगे, लेकिन उनकी यह धमकी हेकड़ी से अधिक कुछ नहीं थी। वह ठंडे पड़ गये, परंतु, नेताजी के समर्थकों का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। उन्होंने बेनी को उनके ही संसदीय क्षेत्र में सबक सिखाने का मन बना लिया। गोंडा में बस स्टैंड स्थित डाकघर परिसर और खोरहसा में बेनी के 07 जुलाई को दो कार्यक्रम लगे थे। डाकघर स्थित कार्यक्रम में उनके पहुंचने से पहले ही सपा कार्यकर्ता वहां आ धमके और खूब हुड़दंग किया। कुर्सियां फेंक दीं। बेनी बाबू के बैनर फाड़ने की कोशिश भी हुई। पुलिस के पहुंचते ही सपाई वहां से खिसक गये। पुलिस ने किसी तरह भारी सुरक्षा बल के सहारे बेनी का कार्यक्रम निपटवा दिया। उनके खोरहसा में होने वाले कार्यक्रम में भी सपाई व्यवधान खड़ा करने की पूरी तैयारी में थे। संभवतया इस बात की भनक बेनी को भी लग गई थी। यही वजह थी बेनी के सुर एकदम से बदल गये। मीडिया ने जब बेनी को उनके संबंधम में मुलायम के बयान की जानकारी दी तो बेनी बाबू ने पलटी मारते हुए घोषणा कर दी, ‘मुलायम प्रधानमंत्री बनते हैं तो सबसे पहले मैं ही उन्हें माला पहनाऊंगा।’

बेनी के बयान के बाद सपा कार्यकर्ताओं का गुस्सा शांत हो गया। सपा के जिलाध्यक्ष महफूज खॉ ने बाद में रहस्योद्घाटन किया कि डाकघर के पास बेनी के कार्यक्रम में किसने क्या व्यवधान खड़ा किया यह तो वह नहीं जानते, लेकिन खोरहसा में बेनी प्रसाद को वर्मा को सपा कार्यकर्ताओं ने मुंहतोड़ जबाव देने के लिये योजना बनाई थी। बेनी बाबू के बदले रूख से सपाई गद्गद नजर दिखे उनका कहना था जो काम कांग्रेस की नसीहत और सपा के बड़े नेताओं तल्खी नहीं कर पाई, वह टमाटर और अंडों के डर ने पूरा कर दिया। बेनी ‘डर’ गये और सपा ‘जीत’ गई। बेनी प्रसाद यहां नेताजी के प्रति कोई अपमानजनक टिप्पणी करते तो सपा कार्यकर्ता उनके ऊपर सड़े टमाटरों और अंडों की बारिश करते। वैसे बेनी के निशाने पर मोदी जरूर रहे, और उन्होंने कहा कि मोदी गंगाजल पीकर लौट जायेंगे।

बहरहाल बात कुछ समय पहले की कि जाये तो सांसद सत्र के दौरान अपने विवादित बयान से केन्द्र की यूपीए सरकार के लिये परेशानी खड़ी करने वाले केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का मुलायम राग लम्बे समय से चल रहा था। शायद उन्हें पता रहता था कि मुलायम पर हमला करने से सपा के अंदर उबाल आ जाता है। इसीलिये उन्होंने कभी डा लोहिया के सहारे सपा के ब्राहमण सम्मेलनों पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया और सपा के ब्राहमण सम्मेलनों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह सब सपा वोट बैंक की राजनीति के लिये कर रही है जबकि लोहिया जी हमेशा जातिगत राजनीति का विरोध करते हुए कहा करते थे ‘जाति तोड़ो, समाज जोड़ो।‘ तो कभी यहां तक कह दिया कि बाबरी मस्जिद विध्वंस सपा प्रमुख की भाजपा से साठगांठ थी।

अपनी बात साबित करने के लिये वह कुछ तथ्य भी सामने रखते थे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बेनी जैसा चाहते थे, हर बार वैसा ही होता था। सपाई बेनी के खिलाफ जहर उगलने लगते। बेनी को भी बिना ज्यादा मेहनत किये प्रचार मिल जाता। बात रोग से ग्रस्त बेनी पर समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने हमला बोलते हुए यहां तक कह दिया कि केन्द्रीय इस्पात मंत्री किसी गम्भीर मनोरोग से ग्रसित हैं। वे अनर्गल, ऊलजुलूल और बेसिर पैर के बयान दे रहे है। अपने इतिहास ज्ञान का वे सार्वजनिक मजाक बना रहे हैं। आरएसएस की शाखाओं में ''नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे'' का नित्यप्रति पाठ करनेवाले बेनी प्रसाद वर्मा को न जाने कहां से डा0 लोहिया याद आ गए। उनको डा0 लोहिया की विचारधारा की इतनी ही समझ होती तो वे समाजवादी पार्टी में बने रहते। अपने अवसरवादी चरित्र का परिचय ही उनकी अपनी नीति और नियत है।

सपा नेता आरोप लगाते हैं कि बेनी जानते है कि मुलायम सिंह यादव ऐसे पहले राजनेता थे जिन्होने यह एलान किया था कि यह देश आस्था से नहीं संविधान से चलेगा। जहां कहीं अन्याय या धर्मनिरपेक्षता पर चोट हुई है, आगे बढ़कर मुलायम ने ही मोर्चा सभाला है। आज भी वे सामाजिक न्याय की ताकतों को मजबूत करने में लगे हैं। उन पर केन्द्रीय इस्पात मंत्री के आरोप स्वयं को लांछित करनेवाले हैं। उनका बयान घोर निन्दनीय है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का विश्लेषण.

कांग्रेसियों के नाम एक और घोटाला, अबकी Facebook Like Scam

सोशल मीडिया पर जारी सियासत ने राजस्‍थान में नया मोड़ ले लिया है। भाजपा ने राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर अपनी शोहरत बढ़ाने की कोशिश में आधिकारिक फेसबुक पेज के लिए 'लाइक्स खरीदने' का आरोप लगाया है। इसे सोशल मीडिया घोटाला करार देते हुए भाजपा प्रवक्ता ज्योति किरण ने कहा कि गहलोत का फेसबुक पेज का जिम्मा एक अलग टेक टीम संभालती है और 1 जून तक इसे 1,69,077 लाइक्स मिले हुए थे। ज्यदातर लाइक्स 5 मई वाले हफ्ते में आए हैं।

किरण ने बताया कि यह आंकड़ा 30 जून तक उछलकर 2,14,639 पर पहुंच गया। उनका दावा है कि 1 जून तक गहलोत की 'मोस्ट पॉपुलर सिटी' जयपुर दिख रही थी। यानी सबसे ज्यादा फोलोअर इस शहर से आए। लेकिन संख्या में उछाल के बाद यह शहर बदलकर इंस्ताबुल हो गया, जो तुर्की की राजधानी है। उन्होंने कहा, 'कुछ आईटी कंपनियां बल्क में लाइक्स बेचने का कारोबार करती हैं…जिससे किसी की शोहरत को लेकर गलत अंदाजा जाता है।'

किरण ने सवाल उठाया कि गहलोत को लेकर इंस्ताबुल में इतनी चर्चा कैसे हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि ये लाइक्स इंस्ताबुल की किसी आईटी कंपनी से खरीदे गए हैं। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस सोशल मीडिय पर भी गलत छवि पेश कर रही है। इसके जवाब में कांग्रेस प्रवक्ता अर्चना शर्मा ने कहा, 'मुख्यमंत्री एक मशहूर हस्ती हैं और उन्हें यह सब करने की जरूरत नहीं है। फेसबुक पर लाइक्स कहीं से भी आ सकते हैं, अमेरिका से भी। इसमें इतना शक क्यों हो रहा है?'

Force Facebook to stop turning over our private conversations to NSA and U.S. govt

जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता तथा श्रम व विकास संबंधी मामलों के गहरे जानकार मित्र Partha Banerjee ने फेसबुक छोड़ने की घोषणा करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है… आप सबके विचारार्थ :

1. Force Facebook to stop turning over our private conversations to NSA and U.S. govt.

2. Time yourself, discipline yourself to be or not to be on Facebook (I failed to do it).

3. Unfriend people who never agree with you and never make you happy.

4. Do not believe Facebook is a society: it is NOT.

5. Get out, meet real people, befriend them, and form a real society.

6. Reject narcissism.

7. Boycott meaningless time-killers. Just a quick, short list.

प्रियंकर पालीवाल के फेसबुक वॉल से.

टीम मोदी को पता है कि यदि पीएम बनना है तो यूपी में भाजपा की सेहत ठीक करनी होगी

वे बड़ा लक्ष्य लेकर गुजरात से लखनऊ पहुंचे हैं। अगले ही कुछ महीनों में उन्हें यहां पार्टी के लिए रेतीली हो चली जमीन में शानदार चुनावी फसल लहलहानी है। इस मुश्किल काम की जिम्मेदारी उनके उस्ताद ने दिलाई है। सो, वे पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर सियासी अलख जगाने की जुगाड़बंदी देख रहे हैं। फिलहाल, उन्हें चुनावी संजीवनी के लिए रामलला की शरण ही मौंजू लग रही है। उन्हें लगता है कि पार्टी को राम-मंदिर मुद्दे से दूरी नहीं बनानी चाहिए। क्योंकि, देश के करोड़ों-करोड़ हिंदुओं की भावनाएं इससे जुड़ी हैं।

उन्हें यह पसंद नहीं आ रहा कि कुछ सहयोगी दलों के दबाव में इस मुद्दे को दरकिनार कर दिया जाए। वे ये बातें अनौपचारिक रूप से अपने सहयोगियों के बीच कहने लगे हैं। ‘मिशन-2014’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के रूप में उत्तर प्रदेश संगठन का प्रभारी बनाया गया है। उनकी पहली जिम्मेदारी यही है कि वे हर इलाके में जाकर ‘जिताऊ’ उम्मीदवारों की एक सूची तैयार करें। ताकि, इस पर आगे चर्चा की जा सके। वे अपने मिशन में जुट गए हैं। इसी के तहत शनिवार को वे अयोध्या पहुंचे थे। वहां पर उन्होंने भव्य राम-मंदिर बनवाने का संकल्प दोहराया। इस तरह से उन्होंने संकेत दे दिए कि अब की बार भाजपा के लिए यह मुद्दा ‘अछूत’ नहीं रहेगा और रामलला की ‘कृपा’ से बड़ा सपना हकीकत बन जाएगा।

हम यहां बात कर रहे हैं भाजपा के नव नियुक्त राष्ट्रीय महासचिव अमित शाह की। वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खास करीबी माने जाते हैं। मोदी सरकार में वे चर्चित गृहराज्य मंत्री रह चुके हैं। मंत्री के रूप में गृह मंत्रालय के अलावा उनके पास करीब 10 मंत्रालयों का कामकाज था। मोदी सरकार में लंबे समय तक शाह का राजनीतिक रुतबा रहा है। 2002 में गुजरात में भयानक सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों के बाद ही टीम मोदी ने सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण का खेल खेला था। इसमें वे पूरी तौर पर सफल भी रहे। तमाम विरोध के बावजूद उन्हें चुनावी सफलता मिली थी। इस दौर में ही अमित शाह जैसे मोदी के ‘नवरत्नों’ का उभार हुआ था। अमित शाह, शुरुआत से ही जोशीले जज्बे के शख्स रहे हैं। जल्दी ही उन्होंने समझ लिया था कि उनके उस्ताद मोदी को किस तरह की राजनीतिक शैली पसंद है? इस हुनर में वे इतने दक्ष हो गए कि उन्होंने मोदी के तमाम और करीबियों को पछाड़ कर रख दिया। 2004 आते-आते उनकी गिनती मोदी के सबसे उम्दा वफादारों में होने लगी थी।

हिंदुत्व के प्रति वे आम तौर पर बेलाग टिप्पणियां करते रहे हैं। कई बार तो उनका अंदाज प्रवीण तोगड़िया जैसे विहिप के जाने-माने नेताओं से भी ज्यादा ‘विस्फोटक’ होता था। इसके चलते वे संघ परिवार के दूसरे घटकों के बीच भी खासे लोकप्रिय बन गए। दरअसल, टीम मोदी को काफी पहले से 2007 की चुनावी चुनौती की चिंता हो गई थी। क्योंकि, 2002 का चुनाव तो दंगों के बाद हुए हिंदुवादी ध्रुवीकरण के बल पर आसानी से पार हो गया था। ऐसे में, हर तरह के कंटक दूर करने के लिए शाह जैसे नेताओं को खास जिम्मेदारियां दी गई थीं। भाजपा नेताओं ने यह प्रचार जोर-शोर से शुरू किया था कि कुछ इस्लामी आतंकवादी संगठन नरेंद्र मोदी के खिलाफ घातक साजिश रच रहे हैं। ऐसे में, जरूरी है कि सुरक्षा मामलों में प्रशासन ज्यादा सतर्क रहे। गृहराज्य मंत्री के रूप में शाह खुद इस तरह के संवेदनशील मामलों की निगरानी करते थे।

26 नवंबर 2005 को राज्य की पुलिस ने एक ‘मुठभेड़’ में शोहराबुद्दीन नाम के व्यक्ति को मार गिराया था। कहानी यही बनाई गई कि ये शख्स आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैएबा से जुड़ा था। इसके तहत मुख्यमंत्री मोदी की हत्या की साजिश रची जा रही थी। इसमें इसकी खास भूमिका थी। शोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी को भी तमाम यातनाएं दी गई थीं। उसके साथ सामूहिक बलात्कार भी हुआ   था। बाद में, उसकी भी मौत हो गई। एक साल बाद इस ‘मुठभेड़’ के चश्मदीद गवाह तुलसी प्रजापति को भी एक ‘मुठभेड़’ में मार गिराया गया। लेकिन, कुछ मानवाधिकार संगठनों और शोहराबुद्दीन के भाई रुवाबुद्दीन ने अदालतों का दरवाजा खटखटाना शुरू किया। गुहार लगाई कि फर्जी मुठभेड़ों में दोनों को मारा गया है। ऐसे में, इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए। बवाल बढ़ा तो राज्य सरकार ने मामला सीआईडी पुलिस को दे दिया था। मजेदार बात है कि इस मामले में आरोप गृहमंत्री शाह पर भी थे। लेकिन, जांच सीआईडी को सौंपी गई, जो कि शाह के गृह मंत्रालय के मातहत ही काम करती थी।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जब उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच के आदेश दिए, तो इस मामले में पुलिस के कई आलाधिकारी भी फंसने लगे। पड़ताल में ये तथ्य सामने आए कि डीआईजी डी जी वंजारा, राजकुमार पांड्या सहित आठ बड़े पुलिस अधिकारियों की भूमिका इन मुठभेड़ों में रही है। मोदी और शाह के प्रति खास वफादारी दिखाने के लिए इन अधिकारियों ने मुठभेड़ के नाम पर हत्याएं कराई थीं। पड़ताल के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि सीआईडी के अधिकारियों ने अमित शाह को बचाने के लिए जांच से तमाम जरूरी दस्तावेज ही गायब करा दिए थे। सीबीआई ने तमाम प्रमाणों के साथ ये तथ्य अदालत में रखे, तो अमित शाह पर भी कानूनी शिकंजा कसा। गिरफ्तारी से बचने के लिए शाह ने उच्च न्यायालय से फटाफट जमानत ले ली। लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय में जमानत के मामले में याचिका हो जाने से केस ने गंभीर मोड़ ले लिया। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि जब तक इस मामले की सुनवाई इस अदालत में चल रही है, तब तक अमित शाह गुजरात में नहीं रहेंगे। ताकि, वे अपने राजनीतिक रुतबे के चलते मामले में हस्तक्षेप न कर पाएं।

लगभग इसी दौर में बहुचर्चित इशरत जहां कांड भी हुआ था। मुंबई की एक 19 वर्षीय लड़की इशरत को तीन अन्य लोगों के साथ अहमदाबाद में मार गिराया गया था। कहानी यही प्रचारित की गई कि इशरत और उसके साथी आतंकी संगठन लश्कर की योजना के तहत मोदी को मारने अहमदाबाद पहुंचे थे। बाद में, इशरत के परिजनों ने अदालत में गुहार लगाई, तो उच्च स्तरीय जांच शुरू हुई। सीबीआई जांच में यह तथ्य सामने आया कि इस मामले में भी उन पुलिस अफसरों की भूमिका रही है, जिन्होंने शोहराबुद्दीन कांड को अंजाम दिया है। शोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह को जेल भी जाना पड़ा है। अभी भी उन्हें कानूनी शिकंजे से मुक्ति नहीं मिली। इस बीच इशरत जहां मामले में सीबीआई ने पिछले दिनों अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया है। इसमें कहा गया है कि आठ पुलिस अधिकारियों ने अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए यह फर्जी मुठभेड़ की थी। इस मामले की आंच अमित शाह और नरेंद्र मोदी तक पहुंच सकती है। हालांकि, पहले आरोप पत्र में इन दोनों के नाम नहीं है। लेकिन, 26 जुलाई को इस मामले में एक पूरक आरोप पत्र भी आने वाला है। कयास यही है कि इसमें अमित शाह का नाम जरूर आ सकता है। क्योंकि, सीबीआई के हाथ कुछ प्रमाण आ गए हैं। यूं तो मोदी ने जगह-जगह कहना शुरू कर दिया है कि कांग्रेस नेतृत्व के इशारे पर उन्हें और अमित शाह को इस मामले में घसीटने की साजिश चल रही है। लेकिन, वे इससे डरने वाले नहीं हैं।

शोहराबुद्दीन और इशरत जहां मामले में शक की सुई शाह की तरफ घूमी है। इसके बाद भी अमित शाह फिर से भारी रुतबे वाले नेता हो चले है। क्योंकि, नरेंद्र मोदी का उन्हें पूरा राजनीतिक संरक्षण हासिल है। हालांकि, शोहराबुद्दीन और प्रजापति फर्जी मुठभेड़ों के मामले अभी भी लंबित हैं। अमित शाह, जमानत पर बाहर हैं। लेकिन, इस मामले से उनकी राजनीतिक सेहत पर शायद ही कोई अंतर पड़ा हो। राज्य की राजनीति में उनका पुराना रुतबा फिर से कायम हो गया है। टीम मोदी लगातार तीसरी बार विधानसभा का चुनाव जीतने में सफल रही है। इसके बाद मोदी को दिल्ली में बड़े किरदार के रूप में स्थापित करने के लिए मुहिम तेज हुई है। संघ नेतृत्व ने भी दबाव बढ़ाया कि 2014 के चुनाव के लिए मोदी को ही पार्टी का चुनावी चेहरा बनाया जाए। क्योंकि, दबंग नेता मोदी ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई राजनीतिक करिश्मा कर सकते हैं। इसी के बल पर भाजपा एक बार फिर केंद्रीय सत्ता हासिल कर सकती है। मुहिम मोदी को लेकर पार्टी के अंदर भी विरोध रहा है। यहां तक कि वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने दबाव बनाने के लिए अपने इस्तीफे का कार्ड भी चला था। लेकिन, संघ नेतृत्व के दबाव के चलते आडवाणी की नाराजगी भी मोदी मुहिम को नहीं थाम पाई। भाजपा की गोवा कार्यकारिणी में मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया गया।

इस नई जिम्मेदारी के बाद मोदी भाजपा की राजनीति में बड़े ‘पॉवर हाऊस’ बन गए हैं। टीम मोदी को अच्छी तरह पता है कि यदि प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करना है, तो उत्तर प्रदेश में पार्टी की सेहत ठीक करनी होगी। क्योंकि, यहां पर लोकसभा की 80 सीटें हैं। जबकि, पिछले दो चुनावों से यहां पर भाजपा महज 10 सीटों पर अटकी हुई है। उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 120 सीटें हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि इनमें से जब तक 50 सीटें भाजपा की झोली में नहीं आएंगी, तब तक भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बनना मुमकिन नहीं हो सकता। इस खास राजनीतिक   जरूरत ध्यान में रखते हुए मोदी ने अपने खास वफादार अमित शाह को उत्तर प्रदेश संगठन का प्रभार दिला दिया है। ताकि, वे प्रदेश में किसी न किसी तरीके से जीत का मंत्र ढूंढ सकें। संघ नेतृत्व के इशारे पर यहां पर एकबार फिर अयोध्या मुद्दा गर्म करने की तैयारी हुई है। उल्लेखनीय है कि 1996 में पहली बार भाजपा ने केंद्र की सत्ता का स्वाद चखा था। यह अलग बात है कि यह सरकार महज 13 दिन ही चल पाई थी। लेकिन, इसके बाद एनडीए के राजनीतिक प्रयोग से भाजपा नेतृत्व वाली सरकारें छह साल तक सत्ता में रही हैं। लेकिन, गठबंधन राजनीति की बंदिशों के चलते भाजपा को राम-मंदिर सहित सभी विवादित मुद्दों पर चुप्पी साधनी पड़ी।

2004 के बाद से भाजपा केंद्र की सत्ता से बाहर है। हालांकि, यूपीए सरकार भी घोटालों और महंगाई के मुद्दों के चलते राजनीतिक सुकून में नहीं है। यूपीए के इस संकट के बावजूद एनडीए के लिए सत्ता में लौटना आसान नहीं है। ऐसे में, राजनीतिक जोखिम लेकर मोदी को ‘पीएम इन वेटिंग’ बनाने की तैयारी है। शायद, इसीलिए कोशिश हो रही है कि अयोध्या के रामलला के सहारे सत्ता की डगर एक बार फिर पकड़ ली जाए। चूंकि, मोदी की छवि एक धुर हिंदुत्ववादी नेता की है। ऐेसे में, इस मुहिम को आगे बढ़ाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। यह अलग बात है कि मोदी के मुद्दे पर जदयू ने भाजपा से 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया है। अब टीम मोदी का लक्ष्य यही है कि अघोषित रूप से ‘हिंदुत्व कार्ड’ चलाया जाए। इसके जरिए भाजपा लोकसभा की कम से कम 180 सीटें हासिल कर ले, तो नए सहयोगी मिलने का रास्ता अपने आप निकल आएगा।

अमित शाह ने अयोध्या में पहुंचते ही भव्य राम-मंदिर की हुंकार लगा दी है। इससे सियासी पारा गर्म हो गया है। भाजपा के रणनीतिकार खुश हैं कि इस कार्ययोजना से संघ परिवार के तमाम घटक फिर से भाजपा के लिए ताकत लगाने लगे हैं। नरेंद्र मोदी जल्दी ही पुरी (ओडिशा) के दौरे पर जा रहे हैं। वे वहां पर धार्मिक रथ यात्रा में हिस्सेदारी करेंगे। जाहिर है राम-मंदिर से लेकर पुरी की रथयात्रा तक की कवायद इसीलिए है ताकि, हिंदुओं के बीच एक खास संदेश चला जाए। कहीं ‘हिंदुत्व कार्ड’ से कोई भारी राजनीतिक जोखिम की स्थिति न बने? इसके लिए भी खास राजनीतिक सतर्कता बरती जा रही है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अमित शाह के बहुचर्चित बयान के बाद कह दिया है कि वे सब लोग चाहते हैं कि अयोध्या में भव्य राम-मंदिर जरूर बने। क्योंकि, यह तो करोड़ों लोगों की आस्था का सवाल है। लेकिन, मंदिर मुद्दा भाजपा के लिए राजनीतिक एजेंडा नहीं है। क्योंकि, मुख्य रूप से भाजपा सुशासन और विकास के मुद्दों पर जोर दे रही है। पार्टी अध्यक्ष भले इस मुद्दे पर तमाम सफाई दे रहे हों, लेकिन टीम मोदी इस मामले में ज्यादा ‘लुकाछिपी’ की राजनीतिक शैली पसंद नहीं करती। यह अलग बात है कि अयोध्या यात्रा से तमाम राजनीतिक बवाल हो जाने से अमित शाह कुछ ‘लो प्रोफाइल’ में नजर आ रहे हैं। अब यही कह रहे हैं कि राम जी चाहेंगे, तो वहां भव्य मंदिर जरूर बनेगा। उन जैसे लोग तो सिर्फ प्रार्थना भर कर सकते हैं। उन्होंने अपने सहयोगियों को बता दिया है कि वे अयोध्या में रामलला से प्रार्थना कर आए हैं कि देश को राम जी कांग्रेस के कुशासन से मुक्ति दिलाएं। सभी को चाहिए कि राम जी से ऐसी ही प्रार्थनाएं करें। लेकिन, उन्हें यह देखकर बहुत कष्ट हुआ कि अयोध्या के रामलला एक कटे-फटे टेंट के नीचे पड़े हैं। आखिर उन्होंने भव्य राम-मंदिर की बात कहकर क्या गुनाह कर दिया?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

लोअर कोर्ट से भी दो साल की सजा हो गई तो समझो विधायकी, सांसदी गई

सुप्रीम कोर्ट ने एक जोरदार फैसला सुनाया है. उसने कहा है कि अगर किसी को दो साल की सजा हो गई तो समझो उसकी सांसदी, विधायकी चली गई. ऐसे सजायाफ्ता नेताओं की विधानसभा या लोकसभा की सदस्यता को रद्द कर दिया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधि कानून की धारा- 8 [4] को निरस्त कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा सांसद या विधायक के दोषी पाये जाने पर उसकी सदस्यता रद कर दी जाएगी. इसके साथ ही दो साल से ज्यादा सजा होने वाले जनप्रतिनिधियों को अयोग्य करार दिया जाएगा.

जस्टिस एके पटनायक और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने आज यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. गौरतलब है कि जनप्रतिनिधि कानून की धारा- 8 [4] के सहारे सजा पाने वाले सांसद या विधायक हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में सजा के फैसले को चुनौती देकर संसद या विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य करार दिए जाने से बच जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब कोई भी नेता जेल से चुनाव नहीं लड़ सकेगा. किसी कोर्ट में दोषी करार दिए जाने वाले जनप्रतिनिधियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनकी सदस्‍यता उसी क्षण से खत्‍म मानी जाएगी जिस क्षण कोई अदालत उन्‍हें किसी मामले में दोषी करार देगी.
 
पीपुल्‍स रिप्रेजेंटेटिव एक्‍ट की एक धारा के तहत किसी आपराधिक मामले में भी दोषी करार दिए जाने की स्थिति में सांसदों और विधायकों को अयोग्‍य करार दिए जाने के खिलाफ उन्‍हें मिली सुरक्षा के बारे में कानूनी प्रावधान को स्‍पष्‍ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि यह आदेश तत्‍काल प्रभाव से लागू होगा. यानी अब ट्रायल कोर्ट में भी दोषी करार दिए जाने पर सांसदों या विधायकों को सदस्‍यता छोड़नी पड़ेगी और कोई नेता जेल से चुनाव भी नहीं लड़ पाएगा. वैसे, जिन नेताओं ने सजा के खिलाफ अपील कर रखी है, उन पर यह फैसला अभी लागू नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर कई नेताओं पर हो सकता है. दो पूर्व रेल मंत्री और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव इसके पहले शिकार हो सकते हैं. चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में लालू के खिलाफ अदालत का फैसला जल्‍द ही आने वाला है. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव के भी आसार बन गए हैं. नेता एक मत से संसद के जरिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्‍त कर सकते हैं.
 
तमिलनाडु की मुख्‍यमंत्री जयललिता को दो मामलों में क्रमश: दो और तीन साल की सजा हुई है. उन्‍होंने इसके खिलाफ अपील कर रखी है और इसी आधार पर वह मुख्‍यमंत्री बनी हुई हैं. लेकिन अब ऐसा संभव नहीं हो सकेगा. हालांकि फिलहाल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन नेताओं ने अपनी सजा के खिलाफ अपील कर रखी है, उन पर ताजा आदेश नहीं लागू होगा. लेकिन यह केवल पुराने मामलों में लागू होगा. अब नए केस में अपील के आधार पर कोई नेता ऐसा फायदा नहीं उठा पाएगा. पहले अदालती प्रक्रिया पूरी होने में देरी का फायदा उठा कर नेता अपना राजनीतिक कॅरियर सुरक्षित रख लिया करता था. सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला नेताओं की इस प्रवृत्ति पर रोक लगाएगा.

किसने क्या कहा-

सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह- न्यायपालिका को यह कदम आजादी मिलने के बाद ही उठा लेना चाहिए था. 

राज्यसभा सांसद और सीपीआई नेता डी राजा- सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है. इसके आगामी परिणाम काफी महत्वपूर्ण होंगे. 

कानून मंत्री कपिल सिब्बल- न्यायपालिका, सरकार के उद्देश्यों को नहीं समझ पाती है. 

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी- फैसला काफी महत्वपूर्ण है. यह मौजूदा व्यवस्था में काफी पारदर्शिता लाने का काम करेगा.

आशीष महर्षि का जयपुर तबादला, कुमार विक्रांत के एनडीटीवी छोड़ने की चर्चा

भास्कर डाट काम, नोएडा में कार्यरत आशीष महर्षि के बारे में सूचना है कि उनका तबादला भास्कर डाट काम, जयपुर के आफिस के लिए कर दिया गया है. आशीष भास्कर में लंबे समय से हैं. उसके पहले वे कई जगहों पर विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं. आशीष महर्षि हिंदी ब्लागिंग के शुरुआती दौर से वेब माध्यमों में सक्रिय हैं और अपने खरे व लीक से हटकर लेखन के लिए जाने जाते हैं.

एक अन्य सूचना एनडीटीवी से आ रही है कि यहां कार्यरत कुमार विक्रांत ने इस्तीफा दे दिया है. हालांकि इस्तीफे की पुष्टि नहीं हो पा रही है पर मार्केट में चर्चा है कि कुमार विक्रांत कुछ आंतरिक वजहों से संस्थान से अलग हो रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि वे एक दूसरे बड़े न्यूज चैनल के साथ नई पारी की शुरुआत कर सकते हैं. हालांकि इस डेवलपमेंट की अभी पुष्टि नहीं हो पाई है.

मेरी लायब्रेरी को किताबों के कोप भवन में तब्दील कर चुकी काकू

: मेरी प्रिय पुस्तकों पर काकू का प्रलय-स्नान : वह नन्ही सी है अभी डेढ़-दो साल की। फुदर-फुदर पूरे घर को सिर पर उठाये हुए-सी। कभी टीवी पर हाथ मारना, तार निकाल कर बाहर कर देना, कभी दवा, ट्रे में रखे पानी गिलास और टोकरी की सब्जियां जहां तहां बिखेर देना और इतना ही नहीं क्रिकेट का बैट सो रहे घर के किसी भी प्राणी के सिर पर सुबह-सवेरे दे मारना…..

मेरी व्यक्तिगत क्षति करने वाली काकू की एक अलग कहानी है, जितनी दुखदायी, उतनी ऊटपटांग सुखदायी।

मैं अपनी आंखों के सामने अपनी घरेलू नन्ही-सी हजार-पांच सौ किताबों वाली लायब्रेरी को तहस-नहस होते हुए देख रहा हूं, कुछ नहीं कर पा रहा हूं क्यों कि काकू की इस प्रलय-क्रिया में व्यवधान डालने का मतलब है पड़ोस के सभी मकानों तक का उसकी चीखों से चौंक उठना।

यद्यपि मैं निचली रैक से अति महत्व की पुस्तकों को निकाल कर उसके कद से काफी ऊपर आखिरी की दो रैक में पहुंचा चुका हूं, फिर भी उसके लिए नीचे की दो रैक में भी किताबें होना जरूरी है, और वे भी मेरे लिए उतनी ही प्यारी हैं, जितनी कि ऊपरी रैक में भरी किताबें। नीचे की दो रैक खाली-खाली पाकर भी काकू अपने प्रलय नाद से आसमान सिर पर उठा लेगी, इसलिए उसे खाली रखना भी कुछ कम जोखिम का काम नहीं।

तो काकू निचली रैक से एक एक किताब उठा रही है। इत्मीनान से निहार रही है। पहल कवर पेज फाड़ती है, फिर जमीन पर पटक पटक कर उसके पन्ने-पन्ने उधेड़ती है और उसी पर बैठ कर रैक से दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवीं, छठवीं…. किताबे खींचती है, उनकी कपाल क्रिया करती है और चिंदी चिंदी बिखेरती जाती है…..

मैं उकसता, अकुलाता, छटपाता, झींकता, तनता, लुढकता असहाय से मन मसोसते-मसोसते न जाने कैसे मन ही मन मुसकरा उठता हूं। अपनी इस मुसकान की विडंबना पर भीतर तक थरथराता हूं। जी करता है, तेज डपट दूं, हाथों में कंपन होता है, हथेलियों में खुजली। जी करता है थप्पड़ जड़ दूं, तभी तुतला उठती है वह नन्ना ये, नन्ना ये। मेरी सबसे छोटी बेटी की ये नन्ही जान, मुझे अभी नाना नहीं कह पाती है, सो नन्ना, नन्ना….

और मैं उसके तोतले वात्सल्य में निमग्न हो लेता हूं निष्प्राण-निस्पंद-सा…

काकू के हाथो एक दिन की पुस्तक-कपाल क्रिया कुछ इस तरह….

निचली रैक से वह जाने कितनी ताकत लगा कर वेदांत दर्शन की मोटी सी पुस्तक खींच लेती है और उसके कवर पेज के अनगिनत टुकड़े, जैसे कड़ाही में भुन जाने के बाद दलिया के एक-एक दाने छिन्न-भिन्न….

ये स्वामी विवेकानंद साहित्य श्रृंखला का खंड-एक, पेपर बैक में, काकू कर चुकी है उसका खंड-खंड, इस समय दूसरे खंड पर लपकती हुई। किताब ज्यादा वजनी नहीं है उसके लिए, खींच चुकी है, पटक चुकी है, फाड़ने ही वाली है

इससे पहले भूलवश नीचे की रैक में छूट गयीं 'एक पुस्तक माता-पिता के लिए' (लेखक-अंतोन मकारेंको), 'य़ुद्ध और शांति' (टॉलस्टोय) का तीसरा खंड, डॉ.हरदेव बाहरी का अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश का पोस्टमार्टम हो चुका है….. सब-की-सब पुस्तकें अपनी ऐसी गति पर चिंदी-चिंदी बिसूरती हुई….

मेरी सबसे प्रिय पुस्तकों 'आग्नेय वर्ष' (कोन्स्तांतिन फेदिन), 'तरुण गार्ड' (अलेक्सांद्र फदेयेव) और 'मेरा बचपन' (गोर्की) की कपाल क्रिया के लिए रैक के उस तरफ वह लपकने ही वाली है कि मैं भी विद्युत वेग से उसी ओर झपटता हूं और अत्यंत दयनीय मुखमुद्रा में अपने शरीर की ओट देकर वहीं धम्म से बैठ जाता हूं किंकर्तव्यविमूढ़, महामूढ़ सा….

और काकू का महा आर्तनाद, पूरा घर झनझना उठता है, जो जहां है, वहीं से दौड़ा हुआ आ जाता है इस ओर, किसी के हाथ में अखबार, कोई कटोरी, चम्मच, कोई हाथो में चाय भरा कप लिये हुए, अभी अभी सुबह हुई है सो सबसे पहले चारपाई छोड़ कर मेरी लायब्रेरी को किताबों के कोप भवन में तब्दील कर चुकी काकू को आंसू-हिचकियों के साथ फर्श पर फड़फड़ाते पन्नों पर लोटते-पोटते देख सबके चेहरे हंसी से खिल जाते हैं और मैं एक बार फिर अपने अंदर के कर्फ्यू से हांफ उठता हूं, जैसे जुबान सील दी गयी हो, कंठ अपंग-अवरुद्ध सा, परिजनों की हंसी मुझे रत्ती भर रास नहीं आती है……

घर वालों की अनायास की मौजूदगी से मानो काकू के हाथ फिर चार सौ चालीस वोल्ट के वेग से 'तरुण गार्ड' को रैक से घसीट ही लेते हैं, नाचने को उकसाते संपेरे … और दूसरे ही पल वह अपनी नानी की कांपती उंगलियों में कसे चाय भरे कप पर झपट्टा मारती है…… अंतिम संस्कार हो रहा हो, मानो मनोहरश्याम रंग में 'कुरु-कुरु स्वाहा'

…..किताबें, न-न्ना..न ना नाआआआ

काकू को भला क्या मालूम, मैंने कैसे अपनी गृहस्थी के पेट काट कर कहां कहां से ढोकर लाये हैं ये किताबें, और इनकी ये गति, दुर्गति, अंतिम गति।

वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से साभार.

इन कारणों से ब्लैकबेरी से मेरी निष्ठा डिग गई

Om Thanvi : BlackBerry तब से प्रयोग कर रहा हूँ, तकरीबन जब से इसका आविष्कार हुआ। यानी निष्ठावान प्रयोक्ता हूँ। मगर इस दफा निष्ठा डिग गई। आते ही नया मॉडल Q10 खरीदा। निश्चय ही उसकी मशीन (OS) त्वरित है। कई खूबियाँ हैं। सबसे बड़ा गुण यह (जो मुझे दरकार है) कि डायलिंग-पैड भी है और शानदार टच-पैड भी है, जैसा कि पिछले मॉडल 9900 में था। फिर भी मेरी निष्ठा डिग क्यों गई?

क्योंकि फोन में जमा किसी चीज (सन्देश, पत्र, टिप्पणी आदि) को खंगालने अर्थात सर्च करने में 9900 के मुकाबले नया मॉडल Q10 धीमा है! 9900 में ऐसा था कि होमस्क्रीन पर सर्च के लिए पहला अक्षर टांकने के साथ ही संभावित परिणाम बिजली की गति से झलकने शुरू हो जाते थे। नए मॉडल में इसमें किंचित वक्त लगता है।

दूसरी बड़ी खामी यह: 9900 के 24 बटनों से मैंने अपने 24 जरूरी फोन नंबर जोड़ रखे थे। होमस्क्रीन पर एक बटन दबाते ही (मसलन एच से घर का, ओ से दफ्तर का, एम से मिहिर का आदि) मिल जाते थे। यानी ज्यादातर जरूरी नंबर फोन खोले बगैर सुगमता से मिलाए जा सकते थे। मेरे लिए यह सबसे बड़ी सुविधा थी। Q10 में भी 'स्मार्ट डायलिंग' तो है, पर उसके लिए जतन करना पड़ता है; पहले 'फोन' वाला आइकन दबाना पड़ता है, फिर डायलिंग-पैड का, उसके बाद कीजिए जो करनी हो 'स्मार्ट डायलिंग'! माना जाता है कि नई तकनीक हमेशा पहले से कुछ आगे ले जाती है। इस भरोसे में लगता है इस दफा कुछ धोखा हो गया। (यह कोई फोन-समीक्षा नहीं है, महज उपभोक्ता के नाते फौरी प्रतिक्रिया है!)

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

सैक्स से चरित्र को समझने में या उसे सामने लाने में शायद ही कोई मदद मिलती हो : चार्ली चैप्लिन

चार्ली चैप्लिन ने आजीवन हँसाने का काम किया। दुनिया भर के लिए। बिना किसी भेद भाव के। उन्होंने राजाओं को भी हँसाया और रंक को भी हँसाया। उन्होंने चालीस बरस तक अमेरिका में रहते हुए पूरे विश्व के लिए भरपूर हँसी बिखेरी। उन्होंने अपने बटलर को भी हँसाया, और सुदूर चीन के प्रधान मंत्री चाऊ एन लाइ भी इस बात के लिए विवश हुए कि विश्व शांति के, जीवन मरण के प्रश्न पर मसले पर हो रही विश्व नेताओं की बैठक से पहले से वे खास तौर पर मंगवा कर चार्ली चैप्लिन की फिल्म देखें और चार्ली के इंतज़ार में अपने घर की सीढ़ियों पर खड़े रहें। चार्ली ने अधिकांश मूक फिल्में बनायीं और जीवन भर बेज़ुबान ट्रैम्प के चरित्र को साकार करते रहे, लेकिन इस ट्रैम्प ने अपनी मूक वाणी से दुनिया भर के करोड़ों लोगों से बरसों बरस संवाद बनाये रखा और न केवल अपने मन की बात उन तक पहुंचायी, बल्कि लोगों की जीवन शैली भी बदली। चार्ली ने ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में बनायीं लेकिन उन्होंने सबकी ज़िंदगी में इतने रंग भरे कि यकीन नहीं होता कि एक अकेला व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है। लेकिन चार्ली ने ये काम किया और बखूबी किया।

दोनों विश्व युद्धों के दौरान जब चारों तरफ भीषण मार काट मची हुई थी और दूर दूर तक कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, न नेता, न राजा, न पीर, न फकीर, जो लाखों घायलों के जख्मों पर मरहम लगाता या, जिनके बेटे बेहतर जीवन के नाम पर, इन्सानियत के नाम पर युद्ध की आग में झोंक दिये गये थे, उनके परिवारों को दिलासा दे पाता, ऐसे वक्त में हमारे सामने एक छोटे से कद का आदमी आता है, जिसके चेहरे पर गज़ब की मासूमियत है, आँखों में हैरानी है, जिसके अपने सीने में जलन और आंखों में तूफान है, और वह सबके होंठों पर मुस्कान लाने का काम करता है। 'इस आदमी के व्यक्तित्व के कई पहलु हैं। वह घुमक्कड़, मस्त मौला है, भला आदमी है, कवि है, स्वप्नजीवी है, अकेला जीव है, हमेशा रोमांस और रोमांच की उम्मीदें लगाये रहता है। वह तुम्हें इस बात की यकीन दिला देगा कि वह वैज्ञानिक है, संगीतज्ञ है, ड्यूक है, पोलो खिलाड़ी है, अलबत्ता, वह सड़क पर से सिगरेटें उठा कर पीने वाले और किसी बच्चे से उसकी टॉफी छीन लेने वाले से ज्यादा कुछ नहीं। और हाँ, यदि मौका आये तो वह किसी भली औरत को उसके पिछवाड़े लात भी जमा सकता है, लेकिन बेइंतहा गुस्से में ही।' वह यह काम अपने अकेले के बलबूते पर करता है। वह सबको हँसाता है और रुलाता भी है। 'हम हँसे, कई बार दिल खोल कर और हम रोये, असली आँसुओं के साथ – आपके आँसुओं के साथ, क्योंकि आप ही ने हमें आँसुओं का कीमती उपहार दिया है।'

चार्ली जीनियस थे, सही मायने में जीनियस। 'जीनियस शब्द को तभी उसका सही अर्थ मिलता है जब इसे किसी ऐसे व्यक्ति के साथ जोड़ा जाता है जो न केवल उत्कृष्ट कॉमेडियन है बल्कि एक लेखक, संगीतकार, निर्माता है और सबसे बड़ी बात, उस व्यक्ति में ऊष्मा्, उदारता और महानता है। आप में ये सारे गुण वास करते हैं और इससे बड़ी बात, कि आप में वह सादगी है जिससे आपका कद और ऊंचा होता है और एक गरमाहट भरी सहज अपील के दर्शन होते हैं जिसमें न तो कोई हिसाबी गणना होती है और न ही कोई प्रयास ही आप इसके लिए करते हैं और इनसे आप सीधे इन्सान के दिल में प्रवेश करते हैं। इन्सान, जो आप ही की तरह मुसीबतों का मारा है।'

लेकिन चार्ली को ये बाना धारण करने में, करोड़ों लोगों के चेहरे पर हँसी लाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े। भयंकर हताशाओं के, अकेलेपन के दौर उनके जीवन में आये, पारिवारिक और राजनैतिक मोर्चों पर एक के बाद एक मुसीबत उनके सामने आयीं लेकिन चार्ली कभी डिगे नहीं। उन्हें अपने आप पर विश्वास था, अपनी कला की ईमानदारी, अपनी अथिभव्यक्ति की सच्चाई पर विश्वास था और सबसे बड़ी बात उनकी नीयत साफ थी और वे अपने आप पर भरोसा करते थे।

उनका पूरा जीवन उतार-चढ़ावों से भरा रहा। बदकिस्मती एक के बाद एक अपनी पोटलियां खोल कर उनके इम्तिहान लेती रही। जब वे बारह बरस के ही थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी। मात्र सैंतीस बरस की उम्र में। बहुत अधिक शराब पीने के कारण। हालांकि वे लिखते हैं कि मैं पिता को बहुत ही कम जानता था और मुझे इस बात की बिल्कुल भी याद नहीं थी कि वे कभी हमारे साथ रहे हों। उनके पिता और मां में नहीं बनती थी इसलिए चार्ली ने अपना बचपन मां की छत्र छाया में ही बिताया। चार्ली के माता पिता, दोनों ही मंच के कलाकार थे लेकिन ये उसकी (मां की) आवाज़ के खराब होते चले जाने के कारण ही था कि मुझे पांच बरस की उम्र में पहली बार स्टेज पर उतरना पड़ा। उस रात मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार स्टेज पर उतरा था और मां आखिरी बार। वे अपनी पहली मंच प्रस्तुति से ही सबके चहेते बन गये और फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 'अभी मैंने आधा ही गीत गाया था कि स्टेज पर सिक्कों की बरसात होने लगी।

मैंने तत्काल घोषणा कर दी कि मैं पहले पैसे बटोरूंगा और उसके बाद ही गाना गाऊंगा। इस बात पर और अधिक ठहाके लगे। स्टेज मैनेजर एक रुमाल ले कर स्टेज पर आया और सिक्के बटोरने में मेरी मदद करने लगा। मुझे लगा कि वो सिक्के अपने पास रखना चाहता है। मैंने ये बात दर्शकों तक पहुंचा दी तो ठहाकों का जो दौरा पड़ा वो थमने का नाम ही न ले। खास तौर पर तब जब वह रुमाल लिये-लिये विंग्स में जाने लगा और मैं चिंतातुर उसके पीछे-पीछे लपका। जब तक उसने सिक्कों की वो पोटली मेरी मां को नहीं थमा दी, मैं स्टेज पर वापिस गाने के लिए नहीं आया। अब मैं बिल्कुल सहज था। मैं दर्शकों से बातें करता रहा, मैं नाचा और मैंने तरह-तरह की नकल करके दिखायी। मैंने मां के आयरिश मार्च थीम की भी नकल करके बतायी।'

चार्ली का बचपन बेहद गरीबी में गुज़रा। 'वे लोग, जो रविवार की शाम घर पर डिनर के लिए नहीं बैठ पाते थे, उन्हें भिखमंगे वर्ग का माना जाता था और हम उसी वर्ग में आते थे।' पिता के मरने और मां के पागल हो जाने और कोई स्थायी आधार न होने के कारण चार्ली को पूरा बचपन अभावों में गुज़ारना पड़ा और यतीम खानों में रहना पड़ा। 'हमारा वक्त खराब चल रहा था और हम गिरजा घरों की खैरात पर पल रहे थे।' मां पागल खाने में और भाई सिडनी अपनी नौकरी पर जहाज में, चार्ली को डर रहता कि कहीं उसे फिर से यतीम खाने न भेज दिया जाये, वह सारा सारा दिन मकान मालकिन की निगाहों से बचने के लिए सड़कों पर मारे मारे फिरते,'मैं लैम्बेथ वॉक पर और दूसरी सड़कों पर भूखा-प्यासा केक की दुकानों की खिड़कियां में झांकता चलता रहा और गाय और सूअर के मांस के गरमा-गरम स्वादिष्ट लजीज पकवानों को और शोरबे में डूबे गुलाबी लाल आलुओं को देख-देख कर मेरे मुंह में पानी आता रहा।'

चार्ली को चलना और बोलना सीखने से पहले पहले गाना और नाचना सिखाया गया था और यही वज़ह रही कि वे पांच बरस में मंच पर उतर गये थे और इससे भी बड़ी बात कि सात बरस की उम्र में वे नृत्य के लैसन दिया करते थे और इस तरह से होने वाली कमाई से घर चलाने में मां का हाथ बंटाते थे। बेशक हम समाज के जिस निम्नतर स्तर के जीवन में रहने को मज़बूर थे वहां ये सहज स्वाभाविक था कि हम अपनी भाषा-शैली के स्तर के प्रति लापरवाह होते चले जाते लेकिन मां हमेशा अपने परिवेश से बाहर ही खड़ी हमें समझाती और हमारे बात करने के ढंग, उच्चारण पर ध्यान देती रहती, हमारा व्याकरण सुधारती रहती और हमें यह महसूस कराती रहती कि हम खास हैं।

चार्ली की स्कूली पढ़ाई आधी अधूरी रही। देखा जाये तो वे औपचारिक रूप से दो बरस ही स्कूल जा पाये और बाकी पढ़ाई अनाथ आश्रमों के स्कूलों में या इंगलैंड के प्रदेशों में नाटक मंडली के साथ शो करते हुए एक एक हफ्ते के लिए अलग अलग शहरों के स्कूलों में करते रहे। चार्ली ने नियमित रूप से आठ बरस की उम्र में ही एट लंकाशयर लैड्स मंडली में बाल कलाकार के रूप में काम करना शुरू कर दिया था और बारह बरस की उम्र तक आते आते वे इंगलैंड के सर्वाधिक चर्चित बाल कलाकार बन चुके थे और जीवन की असली पाठशाला में अपनी पढ़ाई कर रहे थे, फिर भी स्कूली पढ़ाई ने उन्हें जो कुछ सिखाया, उसके बारे में वे लिखते हैं: काश, किसी ने कारोबारी दिमाग इस्तेमाल किया होता, प्रत्येक अध्ययन की उत्तेजनापूर्ण प्रस्तावना पढ़ी होती जिसने मेरा दिमाग झकझोरा होता, तथ्यों के बजाये मुझ में रुचि पैदा की होती, अंकों की कलाबाजी से मुझे आनंदित किया होता, नक्शों के प्रति रोमांच पैदा किया होता, इतिहास के बारे में मेरी दृष्टिकोण विकसित किया होता, मुझे कविता की लय और धुन को भीतर उतारने के मौके दिये होते तो मैं भी आज विद्वान बन सकता था।

मात्र आठ बरस की उम्र में उन्हें जिन संकटों का सामना करना पड़ा, उससे कोई भी दूसरा बच्चा बिल्कुल टूट ही जाता। चार्ली काम धंधे की तलाश में गलियों में मारे मारे फिरते: उस वक्त मैं आठ बरस का भी नहीं हुआ था लेकिन वे दिन मेरी ज़िन्दगी के सबसे लम्बे और उदासी भरे दिन थे। ऐसे में भी चार्ली ने कभी हिम्मत नहीं हारी क्योंकि लक्ष्य उनके सामने था कि उन्हें जो भी करना है, थियेटर में ही करना है। उन्होंने बीसियों धंधे किये: मुझमें धंधा करने की जबरदस्त समझ थी। मैं हमेशा कारोबार करने की नयी-नयी योजनाएं बनाने में उलझा रहता। मैं खाली दुकानों की तरफ देखता, सोचता, इनमें पैसा पीटने का कौन सा धंधा किया जा सकता है। ये सोचना मछली बेचने, चिप्स बेचने से ले कर पंसारी की दुकान खोलने तक होता। हमेशा जो भी योजना बनती, उसमे खाना ज़रूर होता। मुझे बस पूंजी की ही ज़रूरत होती लेकिन पूंजी ही की समस्या थी कि कहां से आये। आखिर मैंने मां से कहा कि वह मेरा स्कूल छुड़वा दे और काम तलाशने दे।

मैंने बहुत धंधे किये। मैंने अखबार बेचे, प्रिंटर का काम किया, खिलौने बनाए, ग्लास ब्लोअर का काम किया, डॉक्टर के यहाँ काम किया लेकिन इन तरह-तरह के धंधों को करते हुए मैने सिडनी की तरह इस लक्ष्य से कभी भी निगाह नहीं हटायी कि मुझे अंतत: अभिनेता बनना है, इसलिए अलग-अलग कामों के बीच अपने जूते चमकाता, अपने कपड़ों पर ब्रश फेरता, साफ कॉलर लगाता और स्ट्रैंड के पास बेड फोर्ड स्ट्रीट में ब्लैक मोर थिएटर एजेन्सी में बीच-बीच में चक्कर काटता। मैं तब तक वहाँ चक्कर लगाता रहा जब तक मेरे कपड़ों की हालत ने मुझे वहाँ और जाने से बिलकुल ही रोक नहीं दिया।

चार्ली चैप्लिन ने बचपन में नाई की दुकान पर भी काम किया था लेकिन इस आत्म कथा में उन्होंने इसका कोई ज़िक्र नहीं किया है। इस काम का उन्हें ये फायदा हुआ कि वे अपनी महान फिल्म द ग्रेट थिडक्टेटर में यहूदी नाई का चरित्र बखूबी निभा सके। जब उन्हें पहली बार नाटक में काम करने के लिए विधिवत काम मिला तो वे जैसे सातवें आसमान पर थे, 'मैं खुशी के मारे पागल होता हुआ बस में घर पहुंचा और दिल की गहराइयों से यह महसूस करने लगा कि मेरे साथ क्या हो गया है। मैंने अचानक ही गरीबी की अपनी ज़िंदगी पीछे छोड़ दी थी और अपना बहुत पुराना सपना पूरा करने जा रहा था। ये सपना जिसके बारे में अक्सर मां ने बातें की थीं और उसे मैं पूरा करने जा रहा था। अब मैं अभिनेता होने जा रहा था। मैं अपनी भूमिका के पन्नों को सहलाता रहा। इस पर नया खाकी लिफाफा था। यह मेरी अब तक की ज़िंदगी का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज था। बस की यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि मैंने एक बहुत बड़ा किला फतह कर लिया है। अब मैं झोपड़ पट्टी में रहने वाला नामालूम सा छोकरा नहीं था। अब मैं थिएटर का एक खास आदमी होने जा रहा था। मेरा मन किया कि मैं रो पडूं।

और इस भूमिका के लिए उन्होंने खूब मेहनत की और अपने चरित्र के साथ पूरी तरह से न्याय किया। वे लगातार दर्शकों के चहेते बनते गये। एक मज़ेदार बात ये हुई कि वे अपनी ज़िंदगी का पहला करार करने जा रहे थे लेकिन उन्हें लग रहा था कि जितना मिल रहा है, वे उससे ज्यादा के हकदार हैं और वहां वे अपनी व्यावसायिक बनिया बुद्धि का एक नमूना दिखा ही आये थे, 'हालांकि यह राशि मेरे लिए छप्पर फाड़ लॉटरी खुलने जैसी थी फिर भी मैंने यह बात अपने चेहरे पर नहीं झलकने दी। मैंने निम्रता से कहा, 'शर्तों के बारे में मैं अपने भाई से सलाह लेना चाहूंगा।'

उन्नीस बरस की उम्र तक आते आते वे इंगलिश थियेटर में अपनी जगह बना चुके थे लेकिन अपने आपको अकेला महसूस करते। वे बरसों से अकेले ही रहते आये थे। प्यार ने उनकी ज़िदंगी में बहुत देर से दस्तक दी थी लेकिन वे अपनी अकड़ के चलते वहां भी अपने पत्ते फेंक आये थे। हालांकि अपने पहले प्यार को वे लम्बे अरसे तक भुला नहीं पाये। 'सोलह बरस की उम्र में रोमांस के बारे में मेरे ख्यालों को प्रेरणा दी थी एक थियेटर के पोस्टर ने जिसमें खड़ी चट्टान पर खड़ी एक लड़की के बाल हवा में उड़े जा रहे थे। मैं कल्पना करता कि मैं उसके साथ गोल्फ खेल रहा हूं।

यही मेरे लिए रोमांस था। लेकिन कम उम्र का प्यार तो कुछ और ही होता है। एक नज़र मिलने पर, शुरुआत में कुछ शब्दों का आदान प्रदान (आम तौर पर गदहपचीसी के शब्द), कुछ ही मिनटों के भीतर पूरी जिंदगी का नज़रिया ही बदल जाता है। पूरी कायनात हमारे साथ सहानुभूति में खड़ी हो जाती है और अचानक हमारे सामने छुपी हुई खुशियों का खज़ाना खोल देती है। मैं उन्नीस बरस का होने को आया था और कार्नो कम्पनी का सफल कामेडियन था। लेकिन कुछ था जिसकी अनुपस्थिति खटक रही थी। वसंत आ कर जा चुका था और गर्मियां अपने पूरे खालीपन के साथ मुझ पर हावी थीं। मेरी दिनचर्या बासीपन लिये हुए थी और मेरा परिवेश शुष्क। मैं अपने भविष्य में कुछ भी नहीं देख पाता था, वहां सिर्फ अनमनापन, सब कुछ उदासीनता लिये हुए और चारों तरफ आदमी ही आदमी। सिर्फ पेट भरने की खातिर काम धंधे से जुड़े रहना ही काफी नहीं लग रहा था। ज़िंदगी नौकर सरीखी हो रही थी और उसमें किसी किस्म की बांध लेने वाली बात नहीं थी।

मैं बुद्धूपने और अतिनाटकीयता का पुजारी था, स्वप्नजीवी भी और उदास भी। मैं ज़िंदगी से खफ़ा भी रहता था और उसे प्यार भी करता था। कला शब्द कभी भी मेरे भेजे में या मेरी शब्द सम्पदा में नहीं घुसा। थियेटर मेरे लिए रोज़ी-रोटी का साधन था, इससे ज्यादा कुछ नहीं। मैं अकेला होता चला गया, अपने आप से असंतुष्ट। मैं रविवारों को अकेला भटकता घूमता रहता, पार्कों में बज रहे बैंडों को सुन का दिल बहलाता। न तो मैं अपनी खुद की कम्पनी झेल पाता था और न ही किसी और की ही। और तभी एक खास बात हो गयी – मुझे प्यार हो गया। मुझे अचानक दो बड़ी-बड़ी भूरी शरारत से चमकती आंखों ने जैसे बांध लिया। ये आंखें एक दुबले, हिरनी जैसे, सांचे में ढले चेहरे पर टंगी हुई थीं और बांध लेने वाला उसका भरा पूरा चेहरा, खूबसूरत दांत, ये सब देखने का असर बिजली जैसा था। लेकिन हैट्टी को जी जान से चाहने के बावजूद उन्होंने अपनी चौथी मुलाकात में ही उसके खराब मूड को देख कर फैसला कर लिया कि वह उनसे प्यार नहीं करती। और संबंध तोड़ बैठे।' 'मेरा ख्याल यही है कि हम विदा हो जायें और फिर कभी दोबारा एक दूजे से न मिलें।' मैंने कहा और सोचता रहा कि उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी।

लेकिन अब क्या हो सकता था। 'मैंने क्या कर डाला था? क्या मैंने बहुत जल्दीबाजी की? मुझे उसे चुनौती नहीं देनी चाहिये थी। मैं भी निरा गावदी हूं कि उससे दोबारा मिलने के सारे रास्ते ही बंद कर दिये? लेकिन किस्मत उन्हें दूसरे दरवाजे से दस्तक दे रही थी। संभावनाओं ने नये दरवाजे खुल रहे थे: अमेरिका में संभावनाओं का अंनत आकाश था। मुझे अमेरिका जाने के लिए इसी तरह के किसी मौके की जरूरत थी। इंगलैंड में मुझे लग रहा था कि मैं अपनी संभावनाओं के शिखर पर पहुँच चुका हूँ और इसके अलावा, वहाँ पर मेरे अवसर अब बंधे बंधाये रह गये थे। आधी-अधूरी पढ़ाई के चलते अगर मैं म्यूजिक हॉल के कामेडियन के रूप में फेल हो जाता तो मेरे पास मजदूरी के काम करने के भी बहुत ही सीमित आसार होते।

उनके जीवन का सबसे सुखद पहलू अगर अमेरिका जाना था और वहां चालीस बरस तक रह कर नाटक, फिल्मों और मनोरंजन के सर्वाधिक सफल व्यक्तित्व के रूप में पूरी दुनिया के लोगों के दिल पर राज करना था तो वहां से जाना भी उनके लिए सबसे दुखद घटना बन कर आयी। वे खुली अनंत आकाश की खुली हवा की तलाश में अमेरिका गये थे और आखिर खुली हवा की तताश में मज़बूर हो कर वहां से कूच करना पड़ा और उम्र के छठे दशक में स्विटज़रलैंड को अपना घर बनाना पड़ा।

चार्ली पूरी दुनिया के चहेते थे। वे शायद अकेले ऐसे शख्स रहे होंगे जिनके दोस्त हर देश में, हर फील्ड में और हर उम्र के थे। वे अमूमन हर देश के राज्याध्यक्ष, राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री से मित्रता के स्तर पर मिलते थे। वे उनकी फिल्में दिखाये जाने का आग्रह करते, उन्हें राजकीय सम्मान देते। उनके घर पर आते और उनके साथ खाना खाते। वे गांधी जी से भी मिले थे और नेहरू जी से भी। गांधी जी से वे बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने बर्नार्ड शॉ के घर पर कई बार खाना खाया था और आइंस्टीन कई बार चार्ली के घर आ चुके थे। जीवन के हर क्षेत्र के लोग उनके मित्र थे: मैं दोस्तों को वैसे ही पसंद करता हूं जैसे संगीत को पसंद करता हूं। शायद मुझे कभी भी बहुत ज्यादा दोस्तों की ज़रूरत नहीं रही – आदमी जब किसी ऊंची जगह पर पहुंच जाता है तो दोस्त चुनने में कोई विवेक काम नहीं करता। अलबत्ता वे मानते थे कि ज़रूरत के वक्त किसी दोस्त की मदद करना आसान होता है लेकिन आप हमेशा इतने खुशनसीब नहीं होते कि उसे अपना समय दे पायें।

चार्ली ने इकतरफा प्रेम बहुत किये। वैसे देखा जाये तो हैट्टी के साथ उनका पहला प्यार भी इकतरफा ही था और शायद यही वजह रही कि वे उनतीस बरस की उम्र तक अकेले ही रहे। मेरा अकेलापन कुंठित करने वाला था क्योंकि मैं दोस्ती करने की सारी ज़रूरतें पूरी करता था। मैं युवा था, अमीर था और बड़ी हस्ती था। इसके बावज़ूद मैं न्यू यार्क में अकेला और परेशान हाल घूम रहा था। हालांकि चार्ली ने चार शादियां कीं लेकिन पहली तीन शादियों से उन्हें बहुत तकलीफ पहुंची। पहली शादी करने जाते समय तो वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि वे ये शादी कर ही क्यों रहे हैं। दूसरी शादी ने उन्हें इतनी तकलीफ पहुंचायी कि इस आत्म कथा में अपनी दूसरी पत्नी का नाम तक नहीं बताया है। अलबत्ता, ऊना ओ नील से उनकी चौथी शादी सर्वाधिक सफल रही। हालांकि दोनों की उम्र में 36 बरस का फर्क था और ऊना उनकी छत्तीस बरस तक, यानी आजीवन उनकी पत्नी रहीं। वे अपने जीवन के अंतिम 36 बरस उसी की वजह से अच्छी तरह से गुज़ार सके। पिछले बीस बरस से मैं जानता हूं कि खुशी क्या होती है। मैं किस्मत का धनी रहा कि मुझे इतनी शानदार बीवी मिली। काश, मैं इस बारे में और ज्यादा लिख पाता लेकिन इससे प्यार जुड़ा हुआ है और परफैक्ट प्यार सारी कुंठाओं से ज्यादा सुंदर होता है क्योंकि इसे जितना ज्यादा अभिव्यक्त किया जाये, उससे अधिक ही होता है। मैं ऊना के साथ रहता हूं और उसके चरित्र की गहराई और सौन्दर्य मेरे सामने हमेशा नये नये रूपों में आते रहते हैं।

हालांकि चार्ली ने अपनी आत्म कथा में पोला नेगरी से अपनी अभिन्न मित्रता का ही ज़िक्र किया है, तथ्य बताते हैं कि नेगरी से उनकी पन्द्रह दिन के भीतर ही दो बार सगाई हुई थी और टूटी थी। चार्ली ने अपनी आत्म कथा में अपनी सभी संतानों का भी उल्लेख नहीं किया है। इसकी वजह ये भी हो सकती है कि ये आत्म कथा 1960 में लिखी गयी थी जब वे 71 बरस के थे और ऊना ने कुल मिला कर उन्हें आठ संतानों का उपहार दिया था और उनकी आठवीं संतान तब हुई थी जब चार्ली 73 बरस के थे और ऊना 37 बरस की।

अलबत्ता, अपनी आत्म कथा में चार्ली ने अपने सैक्स संबंधों के बारे में काफी खुल कर चर्चा की है: हर दूसरे व्यक्ति की तरह मेरे जीवन में भी सैक्स के दौर आते-जाते रहे। लेकिन उनका मानना है: मेरे ख्याल से तो सैक्स से चरित्र को समझने में या उसे सामने लाने में शायद ही कोई मदद मिलती हो। और कि ठंड, भूख और गरीबी की शर्म से व्यक्ति के मनोविज्ञान पर कहीं अधिक असर पड़ सकता है। जो परिस्थितियां आपको सैक्स की तरफ ले जाती हैं, वे मुझे ज्यादा रोमांचक लगती हैं।

चार्ली अमेरिका गये तो थियेटर करने थे लेकिन उनके भाग्य में और बड़े पैमाने पर दुनिया का मनोरंजन करना लिखा था। अमेरिका में और भी कई संभावनाएं थीं। मैं थिएटर की दुनिया से क्यूँ चिपका रहूँ? मैं कला को समर्पित तो था नहीं। कोई दूसरा धंधा कर लेता। मैंने अमेरिका में टिकने की ठान ली थी। शुरू शुरू में उन्हें अपने पैर जमाने में और अपने मन की करने में तकलीफ हुई लेकिन एक बार ट्रैम्प का बाना धारण करने लेने के बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेरा चरित्र थोड़ा अलग था और अमेरिकी जनता के लिए अनजाना भी। यहाँ तक कि मैं भी उससे कहाँ परिचित था। लेकिन वे कपड़े पहन लेने के बाद मैं यही महसूस करता था कि मैं एक वास्तविकता हूँ, एक जीवित व्यक्ति हूँ। दरअसल, जब मैं वे कपड़े पहन लेता और ट्रैम्प का बाना धारण कर लेता तो मुझे तरह तरह के मज़ाकिया ख्याल आने लगते जिनके बारे में मैं कभी सोच भी नहीं सकता था। चूँकि मेरे कपड़े मेरे चरित्र से मेल खा रहे थे, मैंने तभी और उसी वक्त ही तय कर लिया कि भले ही कुछ भी हो जाये, मैं अपनी इसी ढब को बनाये रखूँगा।

वे जल्दी ही अपनी मेहनत और हुनर के बल पर ऐसी स्थिति में आ गये कि मनमानी कीमत वसूल कर सकें। वे ऑल इन वन थे। लेखक, अभिनेता, निर्देशक, संगीतकार, संपादक, निर्माता और बाद में तो वितरक भी। जल्द ही उनकी तूती बोलने लगी। लेकिन एक मज़ेदार बात थी उनके व्यक्तित्व में। किसी भी फिल्म के प्रदर्शन से पहले वे बेहद नर्वस हो जाते। उनकी रातों की नींद उड़ जाती। पहले शो में वे थियेटर के अंदर बाहर होते रहते, लेकिन आश्चर्य की बात, कि सब कुछ ठीक हो जाता और हर फिल्म पहले की फिल्मों की तुलना में और सफल होती।

हर फिल्म के साथ चार्ली की प्रसिद्धि का ग्राफ ऊपर उठता जा रहा था और साथ ही उनकी कीमत भी बढ़ती जा रही थी। वे मनमाने दाम वसूल करने की हैसियत रखते थे और कर भी रहे थे। न्यू यार्क में मेरे चरित्र, कैलेक्टर के खिलौने और मूर्तियां सभी डिपार्टमेंट स्टोरों और ड्रगस्टोरों में बिक रहे थे। जिगफेल्ड लड़कियां चार्ली चैप्लिन गीत गा रही थीं। उन्होंने बहुत तेजी से बहुत कुछ हासिल कर लिया था। मैं सिर्फ सत्ताइस बरस का था और मेरे सामने अनंत सम्भावनाएं थीं, और थी मेरे सामने एक दोस्तानी दुनिया। थोड़े से ही अरसे में मैं करोड़पति हो जाऊंगा। मैं कभी इस सब की कल्पना भी नहीं कर सकता था।

चार्ली के बहुत से मित्र थे और उनकी कई मित्रताएं आजीवन रहीं। पुरुषों से भी और महिलाओं से भी। वे दूसरों से प्रभावित भी हुए और पूरी दुनिया को भी अपने तरीके से प्रभावित किया। हर्स्ट उनके बेहद करीबी मित्र थे और उन्हें अपना आदर्श मानते थे। मेरे एक-दो बहुत ही अच्छे दोस्त हैं जो मेरे क्षितिज को रौशन बनाये रहते हैं। भारतीय सिनेमा के कितने ही कलाकारों ने चार्ली के ट्रैम्प की नकल करने की कोशिश की लेकिन वे उसे दो एक फिल्मों से आगे नहीं ले जा पाये।

हालांकि चार्ली ने स्कूली शिक्षा बहुत कम पायी थी लेकिन उन्होंने जीवन की किताब को शुरू से आखिर तक कई बार पढ़ा था। एक बात और भी कि बेशक चार्ली ने विधिवत स्कूली शिक्षा नहीं पायी थी, लेकिन उनका भाषा ज्ञान अद्भुत है। उन्होंने न केवल अंग्रेज़ी के, बल्कि फ्रेंच, इताल्वी, ग्रीक और जर्मन संदर्भ भी खूब दिये हैं। भाषा उनकी शानदार अंग्रेज़ी की मिसाल है। उन्हें मनोविज्ञान की गहरी समझ थी। उनका बचपन बहुत अभावों में गुज़रा था और उन्होंने तकलीफों को बहुत नज़दीक से जाना और पहचाना था। इसके अलावा वे सेल्फ मेड आदमी थे लेकिन उन्हें अपने आप पर बहुत भरोसा था। इस आत्म कथा में उन्होंने अमूमन सब कुछ पर लिखा है और बेहतरीन लिखा है। अभिनय, कला, संवाद अदायगी, कैमरा एंगल, निर्देशन, थियेटर, विज्ञान, परमाणु बम, मानव मनोविज्ञान, मछली मारना, साम्यवाद, समाजवाद, पूंजीवाद, युद्ध, अमीरी, गरीबी, राजनीति, साहित्य, संगीत, कला, धर्म, दोस्ती, भूत प्रेत कुछ भी तो ऐसा नहीं बचा है जिस पर उन्होंने अपनी विशेषज्ञ वाली राय न जाहिर की हो। कॉमेडी की परिभाषा देते हुए वे कहते हैं, किसी भी कॉमेडी में सबसे महत्त्वपूर्ण होता है नज़रिया। लेकिन हर बार नज़रिया ढूंढना आसान भी नहीं होता। किसी कॉमेडी को सोचने और उसे निर्देशित करने से ज्यादा दिमाग की सतर्कता किसी और काम में ज़रूरी नहीं होती। अभिनय के बारे में वे कहते हैं: मैंने कभी भी अभिनय का अध्ययन नहीं किया है लेकिन लड़कपन में ये मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे महान अभिनेताओं के युग में रहने का मौका मिला और मैंने उनके ज्ञान और अनुभव के विस्तार को हासिल किया।

शायद चार्ली का नाम इस बात के लिए गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में लिखा जायेगा कि उन पर, उनकी अभिनय कला पर, उनकी फिल्मों पर, उनकी शैली पर और उनके ट्रैम्प पर दुनिया भर की भाषाओं में शायद एक हज़ार से भी ज्यादा किताबें लिखी गयी हैं। जो भी उनके जीवन में आया, या नहीं भी आया, उसने चार्ली पर लिखा। अमेरिका जाने और खूब सफल हो जाने के बाद चार्ली पहली बार दस बरस बाद और दूसरी बार बीस बरस बाद लंदन आये थे और उन्हें वहां बचपन की स्मृतियों ने एक तरह से घेर लिया था। मेरे अतीत के दिनों से हैट्टी ही वह अकेली परिचित व्यक्ति थी जिससे दोबारा मिलना मुझे अच्छा लगता, खास तौर पर इन बेहतरीन परिस्थितियों में उससे मिलने का सुख मिलता।

उन्होंने जीवन में भरपूर दुख भी भोगे और सुख भी। ऐसा और कौन अभागा होगा जो सिर्फ इसलिए दोस्त के घर के आसपास मंडराता रहे ताकि उसे भी शाम के खाने के लिए बुलवा लिया जाये और ऐसे व्यक्ति से ज्यादा सुखी और कौन होगा जिसे कमोबेश हर देश के राज्याध्यक्षों के यहां से न्यौते मिलते हों, विश्व विख्यात वैज्ञानिक, लेखक और राजनयिक उनसे मिलने के लिए समय मांगते हों और उसके आस पास विलासिता की ऐसी दुनिया हो जिसकी हम और आप कल्पना भी न कर सकते हों। जीवन के ये दोनों पक्ष चार्ली स्पेंसर चैप्लिन ने देखे और भरपूर देखे। उनके जीवन का सबसे दुखद पक्ष रहा, अमेरिका द्वारा उन पर ये शक किया जाना कि वे खुद कम्यूनिस्ट हैं और अगर नहीं भी हैं तो कम से कम उनसे सहानुभूति तो रखते ही हैं और उनकी पार्टी लाइन पर चलते हैं।

इस भ्रम भूत ने आजीवन उनका पीछा नहीं छोड़ा और अंतत: अमेरिका में चालीस बरस रह कर, उस देश के लिए इतना कुछ करने के बाद जब उन्हें बेआबरू हो कर अपना जमा जमाया संसार छोड़ कर एक नये घर कर तलाश में स्विट्ज़रलैंड जाना पड़ा तो वे बेहद व्यथित थे। उन पर ये आरोप भी लगाया गया कि वे अमेरिकी नागरिक क्यों नहीं बने। आप्रवास विभाग के अधिकारियों के सवालों को जवाब देते हुए वे कहते हैं, 'क्या आप जानते हैं कि मैं इस सारी मुसीबत में कैसे फंसा? आपकी सरकार पर अहसान करके! रूस में आपके राजदूत मिस्टर जोसेफ डेविस को रूसी युद्ध राहत की ओर से सैन फ्रांसिस्को में भाषण देना था, लेकिन ऐन मौके पर उनका गला खराब हो गया और आपकी सरकार के एक उच्च अधिकारी ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके स्थान पर बोलने की मेहरबानी करूंगा और तब से मैं इसमें अपनी गर्दन फंसाये बैठा हूं।'
'मैं कम्यूनिस्ट नहीं हूं फिर भी मैं उनके विरोध में खड़ा होने से इन्कार करता रहा। मैंने कभी भी अमेरिकी नागरिक बनने का प्रयास नहीं किया। हालांकि सैकड़ों अमेरिकी बाशिंदे इंगलैंड में अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। वे कभी भी ब्रिटिश नागरिक बनने का प्रयास नहीं करते।

चार्ली चैप्लिन की यह आत्म कथा एक महाकाव्य है एक ऐसे शख्स के जीवन का, जिसे दिया ही दिया है और बदले में सिर्फ वही मांगा जो उसका हक था। उसने हँसी बांटी और बदले में प्यार भी पाया और आंसू भी पाये। उसने कभी भी नाराज़ हो कर ये नहीं कहा कि आप गलत हैं। उसे अपने आप पर, अपने फैसलों पर, अपनी कला पर और अपनी अभिव्यक्ति शैली पर विश्वास था और उस विश्वास के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता भी थी। वह अपने पक्ष में किसी से भी लड़ने भिड़ने की हिम्मत रखता था क्योंकि वह जानता था कि सच उसके साथ है। उसमें परफैक्शन के लिए इतनी ज़िद थी कि सिटीलाइट्स के 70 सेकेंड के एक दृश्य के लिए पांच दिन तक रीटेक लेता रहा। अपने काम के प्रति उसमें इतनी निष्ठा थी कि मूक फिल्मों का युग बीत जाने के 4 बरस बाद भी वह लाखों डॉलर लगा कर मूक फिल्म बनाता है क्योंकि उसका मानना है कि हर तरह के मनोरंजन की ज़रूरत होती है। वह सच्चे अर्थों में जीनियस था और ये बात आज भी इस तथ्य से सिद्ध हो जाती है कि फिल्मों के इतने अधिक परिवर्तनों से गुज़र कर यहां तक आ पहुंचने के बाद भी सत्तर अस्सी बरस पहले बनी उसकी फिल्में हमें आज भी गुदगुदाती है। उस व्यक्ति के पास मास अपील का जादुई चिराग था।
 

हिंदुस्तान अखबार के घोटाले की कहानी, दस्तावेजों की जुबानी (पार्ट बाइस और अंतिम)

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हिंदुस्तान अखबार के घोटाले की कहानी, दस्तावेजों की जुबानी (पार्ट इक्कीस)

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हिंदुस्तान अखबार के घोटाले की कहानी, दस्तावेजों की जुबानी (पार्ट बीस)

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हिंदुस्तान अखबार के घोटाले की कहानी, दस्तावेजों की जुबानी (पार्ट उन्नीस)

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हिंदुस्तान अखबार के घोटाले की कहानी, दस्तावेजों की जुबानी (पार्ट अट्ठारह)

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हिंदुस्तान अखबार के घोटाले की कहानी, दस्तावेजों की जुबानी (पार्ट चौदह)

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