सड़क हादसे में घायल टीवी पत्रकार क्रांति किशोर मिश्र का निधन

लखनऊ : प्रदेश के युवा पत्रकार क्रांति किशोर मिश्र की शनिवार को इलाज के दौरान निधन हो गया। हरिद्वार से कवरेज करके लौट रहे एक टीवी चैनल के पत्रकार क्रांति किशोर की कार बरेली के किला पुल से नीचे गिर गई थी। कार पुल की रेलिंग तोड़ते हुए नीचे रेलवे लाइन की बाउंड्री पर गिरी थी, जिसमें क्रांति किशोर को गंभीर चोटें आई थीं, जबकि उसमें सवार चार अन्‍य लोग भी घायल हुए थे।

क्रांति किशोर मूल रूप से फर्रुखाबाद के फतेहगढ़ में रेलवे स्टेशन के पास रहने वाले थे तथा वर्तमान समय में वे लखनऊ के गोमती नगर में रह रहे थे। हरिद्वार में एक कार्यक्रम होने पर वह परिवार के साथ गए थे। सोमवार को हरिद्वार से लौट रहे थे। इनोवा कार में क्रांति उनकी पत्नी रितु, बेटा शौर्य, भाई रजत व चालक आलोक था। क्रांति की मां गीता किशोर कल्याण बोर्ड फर्रुखाबाद की जज हैं।   

उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने पत्रकार क्रांति किशोर मिश्र के निधन पर गहरा दु:ख व्यक्त किया है। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त की है।

पटना में छात्रों के शांति मार्च पर पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया

पटना, 31 अगस्त। : बीडी कालेज में छात्र समागम व एबीवीपी के गुंडों द्वारा भगत सिंह के फोटो को जलाने व आयोजित छात्र सम्मेलन पर हमले के विरोध में आज प्रतिरोध मार्च निकाल रहे आज आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) की पटना जिला ईकाइ के छात्रों पर सचिवालय डीएसपी मनीष कुमार के नेतृत्व में पुलिस ने आरब्लाक चौराहे पर बर्बर लाठीचार्ज किया। लाठीचार्ज में दो दर्जन से अधिक छात्र-छात्राओं को गंभीर चोट लगी है। इन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस आशय की जानकारी संगठन के राज्य परिषद सदस्य प्रिंस कुमार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी। 
 
उन्होंने बताया कि आज इनकम टैक्स गोलंबर के पास से कल हुए हमले के विरोध में संगठन के छात्र प्रतिरोध मार्च निकालकर बीडी कालेज जा रहे थे। इसी बीच आर ब्लाक चैराहे के पास पुलिस ने आयरन गेट को बंद कर दिया। छात्र लगातार गेट खोलने की मांग कर रहे थे। छात्रों का कहना था कि वे बीडी कालेज में हुई घटना के खिलाफ मार्च लेकर बीडी कालेज तक जायेंगे, पर पुलिस ने उनकी एक न सुनी। इसके बाद छात्रों ने आयरन गेट को तोड़ दिया और आगे बढ़ने लगें। तभी सचिवालय थानाध्यक्ष के साथ पुलिसकर्मियों ने आगे बढ़ रहे छात्रों पर लाठी चलाते हुए छात्रों को पुनः आयरन गेट के पीछे कर दिया। 
 
तभी सचिवालय डीएसपी मनीष कुमार भारी मात्रा में पुलिस बल के साथ पहुँचे और छात्रों के साथ गाली-गलौज करने लगे। गाली-गलौज करने से मना करने पर डीएसपी उग्र हो गये और कोतवाली थाना एवं दूसरे थाना की पुलिस को इनकम टैक्स की ओर से बुलवाया और शांतिपूर्ण तरीके के बैठे छात्रों पर बेरहमी से लाठीचार्ज करवा दिया। डीएसपी खुद हैलमेट पहनकर छात्रों को पीटने लगे। वहीं उनके बाडीगार्ड ने प्रदर्शन कर रही छात्राओं के साथ बदसलूकी करते हुए उन्हें खींचकर गाड़ी में बैठाने का प्रयास किया। जब छात्राओं ने विरोध किया तो बाडीगार्ड के साथ अन्य पुलिसकर्मियों ने छात्राओं को पीटना शुरू कर दिया। 
 
छात्र-छात्राओं को पीटने के बाद डीएसपी ने सड़क पर घसीटते हुए जिप्सी में बैठाकर हवाई अड्डा थाने में बंद कर दिया। पुलिस द्वारा किये गये लाठीचार्ज में संगठन के राष्ट्रीय सचिव विश्वजीत कुमार, राज्य कोषाध्यक्ष सुशील कुमार, पटना जिला सचिव आकाश गौरव, राज्य छात्रा कन्वेंनर मीनू, सागर, निशा, मो. हदीश, अभिषेक, सौरव, आशुतोष, महेश, रूपेश, विकास, गोपाल, अजीत, आशीष, मोनिका, ज्ञानती, पीयूष, कल्पना, प्रिंयका, गोविंद, संतोष, उज्जवल, साज्जन, अमन समेत दो दर्जन से अधिक छात्र-छात्राएं घायल हैं। इन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर हवाई अड्डा थाना में रखा है।
 
प्रतिरोध मार्च पर लाठीचार्ज व गिरफ्तारी के बाद पुलिस हिरासत से राष्ट्रीय सचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि शुक्रवार को सम्मेलन पर असमाजीक तत्वों ने हमला किया व आज शांतिपूर्ण प्रतिरोध मार्च पर पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज व गुंडागर्दी देखने को मिला जिसका संगठन ने डटकर मुकाबला किया है। आज हुए घटना के खिलाफ व सचिवालय डीएसपी मनीष कुमार के निलंबन, भगत सिंह के फोटो को जलाने वाले गुंडों की गिरफ्तारी, लाठीचार्ज के दोषी पुलिसकर्मियों पर कारवाई की मांग को लेकर सोमवार को राज्यभर में काला दिवस मनाया जायेगा। उन्होंने कहा कि गुंडा तत्वों व पुलिसकर्मियों के बर्बर कार्रवाइ के बाद आंदोलन रूकेगा नहीं और तेज होगा।

क्या IIMCAA क़ब्रिस्तान में पंचायत करने के लिए गठित हुई है?

Abhishek Ranjan Singh : चलिए यह मान लिया जाए कि छात्र हित के नाम पर गठित आईआईएमसी एल्युमिनाई एसोशिएसन यानी भारतीय जनसंचार पूर्व छात्रसंघ; भा.ज.सं में छात्रावास से वंचित छात्रों की समस्याओं के निदान के लिए किसी तरह का कोई प्रयास नहीं करेगी. यह भी मान लेते हैं कि छात्रों की बाकी दर्द-तकलीफ़ों से भी उनका कोई वास्ता नहीं है. बकौल, एल्युमिनाई एसोशिएसन उनका संविधान इसकी इज़ाज़त नहीं देता, उनके मुताबिक़ इन मामलों में सक्रियता दिखाना भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रशासनिक कार्यों में दख़ल देना है.
 
हालांकि, उनकी यह बात कैसे मान लूं कि पिछले दिनों आईबीएन 7 और नेटवर्क 18 से निकाले गए 350 मीडियाकर्मियों पर भी वह ख़ामोश रहे और उनके ज़िबह होने का तमाशा देखे. आईआईएमसी एल्युमिनाई एसोशिएसन पत्रकारों के बीच से बना एक संगठन है. वह पत्रकार हितों की अनदेखी भला कैसे कर सकता है. आज प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में Journalist solidarity forum की ओर से अच्छी पहल हुई, हम सभी इसका स्वागत करते हैं, उनके इस संघर्ष में हमारा भी साथ है. अफ़सोस इस बात का है कि आईआईएमसी एल्युमिनाई एसोशिएसन की ओर से इस बारे में कोई बयान या उनके पदाधिकारियों की सहभागिता देखने को नहीं मिली. यहां सवाल यह उठता है कि, मीडिया संस्थानों में इसी तरह छंटनी होती रहे और मीडियाकर्मी नौकरी से दूर होते चले जाएं और इस तरह की तंज़ीमें यूं ख़ामोश रहे, तो उनके रहने या न रहने का क्या मतलब है. क्या ऐसी तंज़ीमें क्रबिस्तानों में पंचायतें करने के लिए ही बनी हैं. आख़िर जब मीडियाकर्मी ही नहीं बचेंगे, तो किसका प्रतिनिधित्व करेंगी ऐसी तंज़ीमें…..
 
अभिषेक रंजन सिंह के फेसबुक वॉल से.

छंटनी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ये सारे आइकोनिक पत्रकार ही सबसे पहले कन्नी काटते नज़र आते हैं : उर्मिलेश

: छंटनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी मौजूद : नई दिल्ली : मीडिया में जारी छंटनी और पत्रकारों की समस्याओं को ध्यान में रख आयोजित की गयी पत्रकार एकजुटता मंच (जर्नलिस्ट सोलिडेरिटी फोरम- जेएसएफ) की पब्लिक मीटिंग 31 अगस्त को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में सम्पन्न हुई। इस बैठक में मौजूद वरिष्ठ पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ वकीलों ने मीडिया पर कॉर्पोरेट के बढ़ते प्रभाव और उससे पैदा हो रही समस्याओं पर सबका ध्यान आकर्षित किया।
 
गौरतलब है कि बीती 21 अगस्त को जेएसएफ ने दो समाचार चैनलों सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 से एकमुश्त 320 पत्रकारों की हुई छंटनी के विरोध में फिल्मसिटी नोएडा में प्रदर्शन भी किया था। उसी के बाद इस बैठक की रूपरेखा तैयार की गयी थी। बैठक में मुख्यतः पत्रकार श्रमजीवी कानून-1955 और मजीठिया आयोग की मांगों को लागू करना, मीडिया इंडस्ट्री में व्याप्त कांट्रैक्ट सिस्टम का विरोध करना, मीडिया क्रॉस होल्डिंग से उपज रहे खतरे, प्रेस कमीशन को मजबूत करना और पत्रकारों के लिए मौजूदा काम के हालात जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुई।
 
बैठक की शुरुआत करते हुए जेएसएफ सदस्य और वरिष्ठ मीडिया आलोचक भूपेन सिंह ने कहा कि आज पत्रकारों के पास इतने अधिकार भी नहीं बचे हैं कि वे मालिकों के सामने नौकरी जाने की हालत में भी किसी तरह का विरोध दर्ज करा सकें। एक तरफ जहां पत्रकारों की वर्किंग कंडीशन दिन पर दिन बदतर होती जा रही है वहीं इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए पत्रकारों की योग्यता या अयोग्यता के लिए परीक्षा जैसी सुनियोजित किस्म की बातें की जा रहीं है। बैठक में बतौर वक्ता भाग ले रहे वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने मीडिया में काम कर रहे सीनियर पत्रकारों की जमकर खबर ली। उर्मिलेश ने कहा कि छंटनी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ये सारे आइकोनिक पत्रकार ही सबसे पहले कन्नी काटते नज़र आते हैं। उर्मिलेश ने मीडिया संस्थानों में यूनियनों को फिर से बहाल करने को लेकर भी ज़ोर दिया। उर्मिलेश ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध पार्लियामेंट की स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट को भी पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह एक संवैधानिक रिपोर्ट है और इसी को आधार बनाकर जेएसएफ पत्रकारों के हक़ की लड़ाई को आगे ले जा सकता है। 
वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल ने अंबानी परिवार के नब्बे के बाद से मीडिया में बदते आ रहे दखल पर कई महत्वपूर्ण बातें की। उन्होंने ऑब्जर्वर समाचार पत्र की यूनियन का अध्यक्ष होने के अपने अनुभवों को साझा किया और इतिहास कि गलतियों से सबक लेने को कहा। भारतीय जन संचार संस्थान में अध्यापक वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रधान ने जेएसएफ की इस पहल की प्रसंशा करते हुए इस मुहिम से अपनी एकजुटता जाहिर की। उन्होंने श्रमजीवी पत्रकार कानून का दायरा बढ़ाने और इसमें संशोधनों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। अभियान से बाकी मीडिया संस्थानों और लोगों को जोड़ने की सलाह देते हुए आनंद प्रधान ने कहा कि कानून को लागू करने के बाबत राज्य सरकारों द्वारा बरती गयी उपेक्षा पर भी बात कर इस बारे में और जानकारियाँ जुटानी चाहिए। 
 
दैनिक भास्कर से जबर्दस्ती निकाले गए पत्रकार जितेंद्र ने अपना अनुभव साझा करते हुए मीडिया में जारी भ्रष्टाचार पर बात करने की ज़रूरत को रेखांकित किया। भास्कर के जनसम्पर्क विभाग के हेड भरत अग्रवाल की बतौर पत्रकार प्रधानमंत्री के साथ की गयी 11 यात्राओं पर भी उन्होंने सवाल उठाए और इस पर कानूनी कारवाई की मुहिम के बारे में जानकारी दी। वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने पूरी लड़ाई को सिर्फ छंटनी के विरोध पर केन्द्रित न रख उसे आगे अधिकारों की बहाली की लड़ाई में बदलने की उम्मीद जताई। उन्होंने मीडिया में आवाज़ उठाने वालों को निशाना बनाने जैसी घटनाओं के विरुद्ध भी एकजुट होकर आवाज़ उठाने की उम्मीद ज़ाहिर की। भाषा ने मीडिया में बढ़ रही राइटविंग कैपिटल के प्रति सचेत रहने की सलाह दी।
 
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने विज्ञापन के बढ़ते प्रभाव और उपभोक्तावाद से प्रभावित मीडिया के असल सवालों से रूबरू होने के लिए पत्रकारों की एकजुटता को ज़रूरी बताया। वरिष्ठ पत्रकार सुकुमार मुरलीधरन ने विज्ञापन इंडस्ट्री की ग्रोथ को आर्थिक वृद्धि की तरह एक बुलबुला बताया और इन छंटनियों के पीछे की असल वजहों पर ध्यान देने की बात कही। उन्होंने क़ानूनों को लागू करने और इसके लिए सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए जेएसएफ को प्रेरित किया। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने मीडिया के फाइनेंशियल स्वरूप पर सवाल उठाते हुए इसे बदले बिना बाकी बातों के व्यर्थ साबित होने पर ज़ोर दिया। प्रशांत ने वैकल्पिक मॉडल की तरफ ध्यान देने और कई को-ओपरेटिव मॉडलों का उदाहरण देते हुए संभावनाओं को तलाशने की बात कही। 
 
वरिष्ठ पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता ने मुहिम से एकजुटता दिखाते हुए क्रॉस मीडिया ओनरशिप के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग पर ज़ोर दिया। उन्होंने बिड़ला, अंबानी और ओसवाल के उदाहरण देते हुए साफ किया कि किस तरह ये सब अपने दूसरे व्यवसाओं को मीडिया ओनरशिप से फायदा पहुंचा रहे हैं। नीरा रडिया टेप और कोयला घोटाले में इसकी बानगी देखी जा चुकी है। वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजलविस ने अपने वक्तव्य में यह साफ किया कि कांट्रैक्ट पर काम करने वाले पत्रकार असल में कांट्रैक्ट पर काम करने वाले मजदूर ही हैं। लेकिन इसके बावजूद अगर कांट्रैक्ट वाले भी 100 से ज्यादा कर्मचारियों को निकाला जा रहा है तो इससे पहले सरकार से अनुमति लेना ज़रूरी है। यह आपका अधिकार है और जो इन चैनलों में हुआ यह सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है। 
 
बैठक में बड़ी संख्या में छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई। बैठक में वरिष्ठ पत्रकार पंकज बिष्ट, अमित सेन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र रंजन, वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह, दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन की वरिष्ठ पत्रकार सुजाता माधोक, अतुल चौरसिया, यशवंत सिंह, सुधीर सुमन, बृजेश सिंह, प्रियंका दुबे, उमाकांत लखेड़ा, सुरेन्द्र ग्रोवर, मुकेश व्यास, अभिषेक पाराशर आदि लोग मौजूद रहे। 
पत्रकार एकजुटता मंच उर्फ र्नलिस्ट सोलिडेरिटी फोरम (जेएसएफ) की तरफ से जारी.

अखिलेश ने रोकी उत्तराखंड की मदद

: राहत राशि के दुरुपयोग से सपा सांसद नाराज : देहरादून : उत्तराखंड की आपदा में सबसे ज्यादा बढ़-चढ़ कर मदद करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मदद से अपना हाथ खींच लिया है और फिलहाल राहत की क़िस्त रोक दी है. समाजवादी पार्टी के महासचिव नरेश अग्रवाल ने पत्रकारों से इसका खुलासा करते हुए कहा कि जिस प्रकार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा लोगों द्वारा आपदाग्रस्तों के लिए बाहर से मिलने वाली राहत राशि का दुरूपयोग कर रहे हैं उससे उनके नेता अखिलेश यादव बेहद खफा हैं.
 
उन्होंने कहा कि जिस तरह बहुगुणा अपनी रूटीन खबरों को भी विज्ञापन के रूप में पांच-पांच मिनट तक टीवी चैनलों में चला कर अपनी छवि सुधार मुहिम में जुटे हैं, वह बेहद निंदनीय है. हम अपने लोगों का पेट काटकर उन लोगों की मदद करना चाहते हैं जिनका आपदा में सब कुछ उजड़ गया है, यह मदद बहुगुणा की छवि सुधार अभियान में खर्च हो, इसको कोई भी स्वीकार नहीं करेगा। अग्रवाल सहित सपा के कई वरिष्ठ सांसद इस मामले में उत्तराखंड के कई सांसदों से आपनी नाराजगी भी जाहिर कर चुके हैं. सूत्रों के अनुसार प्रेस कौंसिल आफ इंडिया भी इन विज्ञापनों को पेड न्यूज के दायरे में रखकर समीक्षा करने में जुट गया है और कांग्रेस हाई कमान के पास भी इस मामले में शिकायतें पहुँचने लगी हैं.
 
विजेंद्र रावत
पत्रकार
देहरादून
 

दो टीवी पत्रकारों पर आसाराम समर्थकों के हमले की मनीष तिवारी समेत कई नेताओं-संगठनों ने की निंदा

नई दिल्ली : सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने स्वयंभू गुरु आसाराम के समर्थकों द्वारा जोधपुर में दो टीवी पत्रकारों पर किए गए हमले की निंदा की। मंत्री ने ट्वीट किया, ‘एक धार्मिक उपदेशक के अनुयायियों द्वारा पत्रकारों पर हमला बेहद निंदनीय और परेशान करने वाला है।’ तिवारी ने पूछा, ‘क्या वह अपने अनुयायियों को यही पढ़ाते और सिखाते हैं?’ आश्रम में आसाराम के समर्थकों ने कथित तौर पर एक टीवी रिपोर्टर और एक कैमरामैन पर हमला किया। टीवी पत्रकार ने बताया कि वे आसाराम के आश्रम में कवरेज करने गए थे। तभी उनके कुछ समर्थकों ने उन पर हमला किया और उनका कैमरा छीन लिया। 
 
यौन उत्पीड़न केस में एक तरफ आसाराम बापू गिरफ्तारी से बचने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं, वहीं उनके समर्थकों ने शनिवार सुबह जोधपुर में आसाराम के आश्रम के बाहर मीडिया कर्मियों पर हमला कर दिया। इस हमले में आश्रम के बाहर कवरेज करने पहुंचे कई अखबार और टीवी पत्रकार घायल हो गए।  एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के आरोपों में फंसे आध्यात्मिक गुरु आसाराम बापू के समर्थकों ने यहां उनके आश्रम में एक टीवी रिपोर्टर और एक कैमरामैन को हमला कर घायल कर दिया। पीड़ित टीवी पत्रकार ने कहा, ‘हमें सूचना मिली थी कि आसाराम के समर्थक विभिन्न स्थानों से यहां आ रहे हैं जिसकी कवरेज़ के लिए हम यहां आए थे। हमारे पहुंचते ही उनके कुछ समर्थकों ने हमें निशाना बनाया और हमारा कैमरा छीन लिया। स्थानीय लोग हमें बचाने आए।’ 
 
पत्रकार ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उसकी फोन कॉल का जवाब नहीं दिया। पुलिस ने बताया कि दोनों मीडियाकर्मियों की चिकित्सकीय जांच कराई जाएगी और हमले में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। दरअसल आसाराम के समर्थक इस बात को लेकर गुस्से में हैं कि मीडिया उन्हें एक दोषी की तरह पेश कर रहा है। इससे पहले शुक्रवार को भी मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी आसाराम के समर्थकों ने मीडियाकर्मियों की जमकर पिटाई कर दी थी और कैमरे भी तोड़ दिए थे। मीडिया पर हमले के आरोप में अभी तक छह लोगों को हिरासत में लिया गया है। इसमें जोधपुर आसाराम आश्रम का केयर टेकर भी शामिल है। 
 
सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि मीडिया पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण है। जेडीयू नेता शरद यादव ने इस घटना पर कहा कि आसाराम को तत्काल गिरफ्तार करना चाहिए था। सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। मीडिया पर हमला निंदनीय और चिंता की बात है। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) ने भी आसाराम समर्थकों की इस हरकत की निंदा करते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है। वहीं चंडीगढ़ प्रेस क्लब ने भी इस हमले को निंदनीय करार दिया।

जोधपुर व भोपाल में पत्रकारों पर हुए हमले ने उठाये कर्इ सवाल

: संविधान का चौथा स्तंभ खतरे में : संविधान का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडियाकर्मी अब असुरक्षा के घेरे में है। जोधुपर व भोपाल में मीडियाकर्मियों के साथ जिस तरह बदसलूकी व मारपीट की घटना घटी है इसके बाद एक बार फिर मीडियाकर्मियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ खड़े हुए हैं। क्या दूसरों के अधिकारों व हक की लडार्इ लड़ने वाले पत्रकारों के खुद के लिए भी कोई हक है? क्या पत्रकार के साथ कोर्इ भी अप्रिय घटना घटने पर सरकार या जिस कंपनी के लिए वो कार्य करता है, वो आगे आती है? नहीं, ऐसा नहीं है।
 
न राज्य सरकार ने कभी इस ओर कोर्इ प्रभावी कदम उठाये ना ही न्यूज चैनल कंपनियों ने कभी पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कुछ किया। जब भी इस तरह की घटना घटती है, सब थोड़ा सा अफसोस जारी करके चुप बैठ जाते हैं। लेकिन अब शायद पत्रकारों की सुरक्षा के लिए जगने का सही समय आ गया है कि हम सब मिलकर हमारे अधिकारों के लिए एक साथ होकर लड़ें और अपने खुद व परिवार के सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठायें ओर सरकार को भी जगायें।  
 
सुशील दिवाकर की टिप्पणी.

पेमा, जालंधर की एजीएम में मीडिया राइट्स एंड प्रोटैक्शन एक्ट का खाका पेश

जालंधर : देश में मीडिया पर बढ़ते हमलों को लेकर चिंतित प्रिंट एंड इलैकट्रोनिक मीडिया एसोसिएशन, जालंधर (पेमा) ने मीडियापर्सन्स को स्पैशल एक्ट से कवर करने की दिशा में पहलकदमी है। देश के प्रमुख राज्य पंजाब की मीडिया सिटी जालंधर में पत्रकारों की भलाई के लिए काम कर रही संस्था की शनिवार को आयोजित एनुयल जनरल मीटिंग (एजीएम) में एक्ट का खाका पेश किया गया। प्रधान संजीव कुमार टोनी की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में लीगल सैल के चेयरमैन राजेश कपिल ने एक्ट का खाका पेश किया जिसको और भी प्रभावशाली बनाने के लिए सभी सदस्यगणों से एक सप्ताह में सुझाव दाखिल करने की अपील की गई है। 
 
एक्ट का खाका ड्राफ्ट करने वाले पत्रकार व लीगल सैल के चेयरमैन राजेश कपिल ने बताया कि शक्तिशाली व प्रवाभशाली एक्ट बनाने के लिए इसमें सभी धाराएं गैर-जमानती व दोषी की संपति को केस के साथ अटैच करके क्षतिपूर्ति करने के प्रावधान शामिल किए गए है। साथ ही पत्रकार के प्रति अपमानजक टिप्पणी, कवरेज से रोकने के लिए मारपीट व कैमरा आदि छीनने को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखने का प्रावधान शामिल किए गए। प्रधान संजीव टोनी के अनुसार बीते जमाने में कवरेज के दौरान व न्यूज फाइल करने के बाद पत्रकारों को सिर्फ धमकियां मिलती थी लेकिन कानून की कमजोरियों को जानने के बाद मीडिया पर हमले काफी तेजी से बढ़े है। पत्रकार से मारपीट अब आम बात हो गई है और कुछ प्रभावशाली लोग हत्या करने या करवाने से भी गुरेज नहीं कर रहें है। ऐसे में पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंच रही है और अब पत्रकार इसी दवाब में खुलकर लिखने से गुरेज भी करने लग गए है। 
 
ऐसे में एक कठोर कानून को समय की जरूरत समझते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। एक्ट के प्रति सभी सदस्यों ने सहमति दे दी है, जल्द ही इसका फाइनल ड्राफ्ट करके सरकार को भेजा जाएगा। इस बाबत सूचना व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी पहले ही सहमति दे चुके है और जल्द ही राज्य के मुख्यमंत्री व लोक संपर्क मंत्री विक्रमजीत सिंह मजीठिया तथा विपक्षी कााग्रेस पार्टी पर इसको प्रभावी रूप दिए जाने को लेकर दवाब बनाया जाएगा। इस मौके पर महासचिव राजेश टिंकू, अश्विनी खुराना, अर्जुन शर्मा, संक्रात सफरी, निखिल शर्मा, एडवोकेट राजकुमार भल्ला, संदीप साही, गगन वालिया, अनिल पाहवा, अमित शौरी, प्रदीप पंडित, जसपाल कैंथ, वरूण शर्मा, मनवीर वालिया, सतपाल, कुमार संजीव, मनजीत मनी, छिंदा, प्रदीप भल्ला, देव चीमा, परमजीत सिंह रंगपुरी सहित भारी संख्या पत्रकार व फोटो पत्रकार मौजूद थे।

एसीजेएम ने अभिनेता कमाल खान पर एफआईआर की याचिका खारिज की

एसीजेएम लखनऊ ने मेरे द्वारा फिल्म अभिनेता कमाल आर खान द्वारा राँझना फिल्म की रिव्यू में की टिप्पणी पर एफआईआर दर्ज कराने की याचिका को खारिज कर दिया. 20 जून 2013 को यूट्यूब पर लोड हुए इस वीडियो रिव्यू में खान ने कहा था- “सर, पता नहीं आप यूपी से हैं या नहीं, बट मैं यूपी से हूँ. पूरे यूपी में जैसा धनुष है, वैसे आपको भंगी मिलेंगे, चमार मिलेंगे बट एक भी इतना सड़ा हुआ पंडित आपको पूरे यूपी में कहीं नहीं मिलेगा.”
 
मैंने कमाल खान की इस टिप्पणी को सीधे सीधे जातिसूचक मानते हुए अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में एफआईआर दर्ज हेतु प्रार्थनापत्र दिया था जिस पर एसीजेएम ने कहा कि इस अधिनियम में अपराध कारित होने के लिए यह आवश्यक है कि टिप्पणी ऐसी होनी चाहिए जो किसी व्यक्ति विशेष को क्षति पहुंचती हो, अतः उन्होंने इसे संज्ञेय अपराध नहीं मानते हुए खारिज कर दिया.  अदालत द्वारा कही बात ईश्वर की आवाज़ मानी जाती है लेकिन इस मामले में मैं अभी निर्णय को लेकर कुछ हतप्रभ हूँ और इसे उच्चतर न्यायिक फोरम पर चुनौती देने की सोच रहा हूँ.  आपके क्या विचार हैं?
 
अमिताभ ठाकुर
आईपीएस
लखनऊ

जिया न्यूज, बिहार के स्टेट हेड बने कुलदीप भारद्वाज, राजीव मिश्र बिग मैजिक टीवी गए

पटना से खबर है कि कुलदीप भरद्वाज ने अपनी नयी पारी जिया न्यूज़ चैनल के साथ शुरू की है. आठ वर्षों से ज्यादा समय से मीडिया क्षेत्र का अनुभव रखने वाले कुलदीप भरद्वाज को स्टेट हेड बनाया गया है, कुलदीप ने बीएज़ी फिल्म्स से अपने करियर की शुरुआत की थी. कुलदीप भारद्वाज ने जिया न्यूज़ के बिहार स्टेट हेड की जिम्मेवारी सम्भालने से पहले इंडिया न्यूज में न्यूज़ कोआर्डिनेटर कम इंडिया न्यूज चैनल के समूह सम्पादक दीपक चौरसिया के व्यक्तिगत सहायक के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं.
 
ईटीवी, बिहार में बतौर प्रोड्यूसर अपने करियर की शुरुआत करने वाले राजीव मिश्र ने महुआ को छोड़ कर बिग मैजिक टीवी ज्वाइन किया है. 
 

BEA Condemns Attack On Media Persons

New Delhi, 31.08.2013 : The Broadcast Editors' Association (BEA) is shocked at the attack on media persons allegedly by supporters of Asaram Bapu. Condemning the attack, BEA demands immediate steps for safety and security of media persons as democracy cannot afford to allow anybody to hold the rule of law to ransom.
 
Any such attack is an attempt to prevent media from discharging it's legitimate duty of dissemination of information- a duty that is vital to the healthy functioning of a democracy.
 
NK Singh        
General Secretary       
 
Shazi Zaman
President
 
Press Note
 

एक अखबार आसाराम को बचाने, ब्रांडिंग करने में जुटा, देखिए उसका कवरेज

इंदौर से छपने वाला 'दबंग दुनिया' की दबंगई सबके सामने आ ही गई. वह बलात्कारी आसाराम को बचाने में जुट गया है. उसने आसाराम के महिमामंडन में फ्रंट पेज से लेकर अंदर तक के पेज भर डाले हैं. उसने शीर्षक से लेकर सब हेडिंग, कैप्शन तक ऐसे लगा रखे हैं कि एक नजर में देखने वाला ही समझ सकता है कि यह अखबार आसाराम को बचाने और ब्रांडिंग करने में जुटा हुआ है. 
 
गुटखा किंग कहे जाने वाले किशोर वाधवानी के रिश्ते हो सकते हैं कि आसाराम से हों, लेकिन उसने अपने अखबार को भी इस दुराचारी आसाराम के चरणों पर न्योछावर कर पत्रकारिता का जो उपहास उड़ाया है, उसकी कोई दूसरा उदाहरण शायद ही मिले. इस अखबार और इसके मालिक को शेम शेम कहिए… 

(अखबार के उपरोक्त पेज पर क्लिक कर दें ताकि पढ़ सकें)


ये जो दबंग दुनिया अखबार का ब्रांडिंग अभियान है, उसका आसाराम से मिलीभगत इसी से समझा जा सकता है कि इस अखबार के कवरेज को आसाराम की आफिसियल वेबसाइट ने अपने यहां प्रमुखता से जगह दी है ताकि इस अखबार के सहारे आसाराम का बचाव व तर्क उनके भक्तों तक पहुंच जाए. मतलब साफ है कि दबंग दुनिया ने आसाराम का भरपूर बचाव व ब्रांडिंग कर उनके पाप धोने के अभियान में खुद को शामिल कर लिया है. 

शाश्वत चिंतन :: खड़ी बोली हिंदी को जहां तक पहुंचना था, पहुंच चुकी, अब पतन के दिन शुरू

क्राइस्ट चर्च कॉलेज से ग्रेजुएशन और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से विधि स्नातक की परीक्षायें पास करने के बाद जब इच्छित रोजगार नहीं मिला तो बेरोज़गारी के कुछ दिन अपने गृह जनपद में सुकून के साथ गुजारे। काम-धाम कुछ था नहीं, तो उस छोटी सी जगह में दिन आराम के साथ गुजर रहे थे। माँ-बाप चूँकि अध्यापक थे और मित्रों में भी डिग्री कॉलेज में पढ़ा रहे लोग शामिल थे, सो बातचीत में भी अकसर शिक्षा का विषय शामिल हो ही जाता था। अपने शहर में भी विद्यार्थियों को मूर्ख बनाने के लिये जातिगत आधार पर इंटर एवं डिग्री कालेज खुले हुऐ थे, जिन्हें उन कालेजों के नाम से नहीं, बल्कि जिन जातियों ने वो कालेज खोले थे, उन जातियों के नाम से संबोधित किया जाता था। उन कालेजों की कुछ खास विशेषतायें थीं।
 
कालेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थी खड़ी बोली हिन्दी में नहीं बल्कि अवधी में बातचीत करते थे। पठन-पाठन का माध्यम भी घोषित तौर पर चाहे जो रहा हो व्यावहारिकता के धरातल पर वहाँ पढ़ाई भी स्थानीय अवधी बोली में ही होती थी। कुल मिलाकर माहौल ये था कि प्रबंधन की मिलीभगत से मास्टर बने अधिकांश वेतन भोगी ज्ञान शून्य व्यक्ति अपने सरीखे ज्ञान शून्य विद्यार्थी वहाँ तैयार कर रहे थे, जिनका कोई भविष्य नहीं था। ये लड़के ठेकेदारी करने, स्थानीय नेता बनकर दलाली करने या फिर काला कोट पहनकर स्थानीय अदालतों की भीड़ बढ़ाने को अभिशप्त थे। यहाँ पर यह जरूर याद रखें कि यह पच्चीस साल पहले का माहौल था।
 
बहरहाल, दिन तो आराम से गुजर ही रहे थे लेकिन “जे बिनुकाज दाहिने-बायें सरीखे“ व्यक्तियों से भी वहाँ मिलना-जुलना होता ही रहता था, जो मिलते ही बिना पूछे ये सलाह देने लगते थे कि व्यक्ति को कुछ करना चाहिये, क्यों करना चाहिय और क्या करना चाहिये, पर वे नहीं बताते थे। इस तरह के व्यक्तियों द्वारा लगातार कई बार कोंचे जाने के बाद जीवन में कुछ करने की जरूरत नहीं होते हुए भी कुछ करने निकल पड़ा। तय पाया गया कि पत्रकारिता की जाये, वह भी हिन्दी की, क्योंकि उस समय तक छोटे शहरों और कस्बों में लोगों को यह गलतफहमी थी कि मूलतः दुष्ट और अज्ञानी होने के बावजूद हिन्दी पत्रकारों का जलवा होता है। तो साहब इस तरह पत्रकारीय जीवन की शुरूआत हुई, जिसमें हिंदी पट्टी के कुछ शहरों में रहना पड़ा और तमाम शहरों में घूमा भी।
 
खैर जब इन जगहों पर रहा तो यहाँ के शैक्षिक संस्थानों में भी जाना हुआ। यह देखकर खासा अचरज हुआ कि जातिगत आधार पर खुलने वाले कॉलेज केवल मेरे गृह जनपद की ही, विशेषता नहीं ये बल्कि हिन्दी पट्टी के तमाम क्षेत्रों में ऐसे कॉलेज खुले थे, जहाँ वैसे ही ज्ञान शून्य अध्यापक थे और स्थानीय बोली में वार्तालाप करते विद्यार्थी। पढ़ाई का माध्यम भी स्थानीय बोलियाँ ही थीं। खड़ी बोली हिंदी इन कॉलेजों से भी नदारद थी। अपवाद सिर्फ पुराने नामचीन कॉलेज और विश्वविद्यालय थे जहाँ विद्यार्थी खड़ी बोली हिन्दी में बातचीत कर रहे थे, पढ़ाई का माध्यम भी खड़ी बोली हिन्दी ही था और अंग्रेजी भाषा की कक्षाओं में मास्टर अंग्रेजी भाषा में ही पठन-पाठन करते दिख जाते थे। ये बात है करीब एक दशक पहले की।
 
अब आते हैं आज के समय पर। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के नाम जानबूझ कर नहीं ले रहा हूँ, बिलावजह वितंडा खड़ा होगा। मुझे यकीन है नाम नहीं लेने पर भी लोग समझ जायेंगे। इधर चार-पाँच सालों में कुछ ऐसा संयोग बना कि हिन्दी पट्टी के कुछ पुराने और नामचीन विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाने का मौका एक बार फिर मिला। लेकिन इस बार स्थितियाँ एकदम बदली हुई मिली। इन विश्वविद्यालयों और कॉलेज कैंपस से भी खड़ी बोली हिन्दी नदारद हो रही है। अधिकांश छात्र-छात्रायें अपनी-अपनी स्थानीय बोलियों में संवाद कर रहे हैं और अधिकांश मास्टर भी अपने विद्यार्थियों का ही अनुसरण कर रहे हैं। टीचर्स रूम में भी स्थानीय बोलियों का ही बोलबाला है, गनीमत सिर्फ अंग्रेजी भाषा की कक्षाओं में दिखी वह भी सिर्फ इतनी कि अंग्रेजी भाषा अब अंग्रेजी के बजाये खड़ी बोली हिन्दी माध्यम से पढ़ाई जा रही है।
 
यह सब देखकर दिमाग में सोच विचार चल ही रहा था कि अवधी भाषी और भोजपुरी भाषी लोगों के सम्मेलन में जाने का मौका मिला। दोनों ही सम्मेलनों में यह विचार प्रमुखता से उठाया जा रहा था कि जब अवधी और भोजपुरी बोलने वालों की संख्या खड़ी बोली हिन्दी बोलने वालों से कहीं ज्यादा है तो राजभाषा का दर्जा खड़ी बोली हिन्दी को क्यों दिया जा रहा है और अब तो भोजपुरी बोली संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है इसलिये उसका महत्व अब भाषा का है न कि बोली का।
अनेहस शाश्वत
अनेहस शाश्वत
बात यहीं रूके तो भी गनीमत जानिये। ऐसे लोगों से भी भेंट हुई जो उत्तर प्रदेश को चार भागों में बांटने के पक्षधर हैं, हरित प्रदेश, अवध प्रदेश, पूर्वांचल और बुन्देलखण्ड। ऐसे लोगों का यह भी मानना है कि जब भी अवध प्रदेश, पूर्वांचल और बुन्देलखण्ड राज्य बने तो उनकी राजभाषा क्रमशः अवधी, भोजपुरी और बुन्देली बनाई जाये। इन राज्यों में खड़ी बोली हिन्दी का क्या काम। वैसे भी इन जगहों पर सामान्य जनजीवन तो इन्हीं बोलियों के सहारे चल रहा है और यहाँ के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विद्यार्थी पहले से ही इन्हीं बोलियों में संवाद कर रहे है। हरित प्रदेश बेशक अपनी राजभाषा खड़ी बोली हिन्दी को बनाये क्योंकि यह वहां की स्थानीय बोली है।
 
पाठकों, अभी भले ही यह आपको दूर की कौड़ी लगे लेकिन अपने देश की जो दशा-दिशा है उसमें यह परिदृश्य देखकर मुझे तो लगता है कि हिन्दी की बाकी बोलियाँ कहाँ तक पहुँचेंगी यह तो अभी नहीं मालूम, लेकिन खड़ी बोली हिन्दी को जहां तक पहुंचना था, पहुंच चुकी, अब शायद उसके पतन के दिन शुरू हो चुके हैं।
 
लेखक अनेहस शाश्वत हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अखबारों में कई शहरों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं. इन दिनों सांसारिक जीवन त्याग कर अध्यात्म की दुनिया में रमे हुए हैं.


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शाश्वत चिंतन :: इस 'रेवड़' के लिए 'सुरक्षित चरागाहें' कहां हैं?

 

 

कलीमउद्दीन शेख ने इंदौर से अपनी मासिक पत्रिका ‘कला संसार’ शुरू की

पत्रकारिता में करीब डेढ दशक से सक्रिय कलीमउद्दीन शेख ने इंदौर से अपनी मासिक पत्रिका 'कला संसार'  शुरू की है. यह पत्रिका राष्ट्रीय स्तर की कला गतिविधियों का दर्पण है. इसमें  रुपंकर कला के साथ सिनेमा और रंगमंच को शामिल किया गया है.  कलीमउद्दीन ने यह पत्रिका अपने भाई रियाज़उद्दीन के साथ शुरू की है.
कलीमउद्दीन पिछले पंद्रह वर्षों में रेडियो, टीवी, डिजिटल और  प्रिंट मीडिया के लिए काम कर चुके हैं. अखबारों की दुनिया में उन्होंने जहाँ नवभारत, नईदुनिया और भास्कर के साथ काम किया वहीँ टीवी के  इटीवी  और जैन टीवी में काम किया. कलीमउद्दीन ने  समय पहले नईदुनिया इंदौर का साथ छोड़कर अपना काम शुरू करने का निर्णय लिया.
 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

सुधीर अग्रवाल को भेजे रिजाइन लेटर में प्रशांत चाहल ने खोली भास्कर, चंडीगढ़ की पोल

सेवा में, श्री सुधीर अग्रवाल जी, मैनेजिंग डायरेक्टर, दैनिक भास्कर कॉर्पोरेशन लिमिटेड, 6, द्वारका सदन, प्रेस कॉपलेक्स, एमपी नगर, भोपाल,  मध्य-प्रदेश। विषय: पद से इस्तीफा देने का नोटिस। महोदय नमस्कार, मैं पिछले 16 महीने से भास्कर समूह का सदस्य हूं। भास्कर के चंडीगढ़ दफ्तर में संपादकीय विभाग में कार्यरत हूं और सिटी लाईफ में बतौर रिपोर्टर काम कर रहा हूं। ग्रुप के सदस्य के तौर पर गुजारे इस कार्यकाल में, जोकि बेहद छोटा है, मैंने हमेशा ही विशेष ध्यान संस्थान की नीतियों को समझने में लगाया। संस्थान की मान्यताओं, उसकी बुनियाद और उन लक्ष्यों को जानने की कोशिश की, जिन्हें कंपनी जीतना चाहती है। अखंडता, विश्वसनीयता और इनोवेशन के दम पर सामजिक-आर्थिक बदलाव लाकर देश का समानित और सबसे बड़ा मीडिया ग्रुप बनने का जो सपना कंपनी देखती है, उसे जीने का प्रयास किया। 
05 मई, 2012 को मैं पहली बार चंडीगढ़ भास्कर के दफ्तर में पहुंचा था। उस वक्त कमलेश सिंह सीपीएच-2 के स्टेट हैड हुआ करते थे और सौरभ द्विवेदी, सिटी लाईफ डेस्क के इंचार्ज थे। भास्कर मैनेजमेंट, सीपीएच-2 की राजधानी चंडीगढ़ से ऑटोमोबाइल्स पर व्हील्ज नाम का एक पाक्षिक सप्लीमेंट निकालने की तैयारी में था। मौलिक कंटेंट जुटाना इसकी पहली शर्त थी। इसके लिए कमलेश सिंह की सरपरस्ती में एक टीम का गठन हुआ, जिसमें एडिटिंग का जि़म्मा गजेंद्र सिंह भाटी और कुलदीप मिश्र को दिया गया। रिपोर्टर चुने गए मैं और देश दीपक खुराना। रिक्रूटमेंट-प्रक्रिया पूरी करने के बाद 11, मई को मेरी ऑफिशियल ज्वाइनिंग हुई, जिसमें मुझे ई-2 ग्रेड के साथ एपलाई कोड 22469 दिया गया। इसके बाद टीम ने सप्लीमेंट पर काम शुरू किया और 14 मई को व्हील्ज का पहला अंक निकाला।
 
करीब पांच महीने चले इस पुल-आउट के हमने 10 अंक तैयार किए। चूंकि हिन्दी प्रिंट मीडिया का अपने आप में यह पहला बेहद प्रोग्रेसिव प्रयास था, इसीलिए चंडीगढ़ मार्केट को फोकस कर रही करीब सभी ऑटो कंपनियों ने एक-एक कर हमसे संपर्क किया। व्हील्ज को लेकर मार्केट में सभी लोग आश्वस्त थे और रेस्पॉन्स बेहद पॉजिटिव था। तमाम बड़ी कंपनियों के इंटरव्यू और टेस्ट-ड्राइव इसके लिए लाइन-अप की जा चुकी थी। लेकिन सक्र्युलेशन, एक ऐसी समस्या रही, जिसका डिपार्टमेंट हल नहीं निकाल पाया। यह अनियमितता पाठक सर्वे में भी दर्ज हुई, पर लाईलाज ही रही। इस बीच ऐसे विज्ञापनदाता, जिन्होंने कंपनी को ऐड दी थी, वो पाठकों तक अखबार नहीं पहुंचने से नाराज हो गए। इसमें होंडा और महिंद्रा जैसे वो दो बड़े क्लाइंट भी थे, जिन्होंने व्यक्तिगत तौर पर मुझसे अपनी शिकायत रखी थी। अंतत: मार्केटिंग डिपार्टमेंट के कहने पर हमें अक्टूबर, 2012 में व्हील्ज को बंद करना पड़ा। इसका आखिरी सप्लीमेंट 24 सितंबर, 2012 को निकला था, जोकि संदर्भ के लिए संलग्न किया गया है।
 
इस बीच मैनेजमेंट ने पदों को लेकर संस्थान में भारी  फेरबदल किए। सिटी लाईफ  देख रहे सौरभ द्विवेदी को  लुधियाना भास्कर के संपादक के तौर पर ट्रांसफर कर दिया गया। पंजाब पॉलिटिकल ब्यूरो देख रही शायदा बानो को सिटी लाईफ का इंचार्ज नियुक्त किया गया। साथ ही व्हील्ज को लेकर मैनेजमेंट की कोई क्लियर रणनीति नहीं होने के कारण ऑटोमोबाइल्स को सिटी लाईफ की ही एक बीट बना दिया गया, जिसका दारोमदार मुझे सौपा गया। इस बदलाव को बेहतर ढंग से निभाने के लिए मैंने टीम की नई हैड शायदा बानो को अपने सुझाव दिए थे। मैंने उनसे कहा था कि ऑटोमोबाइल्स के लिए तीसरे या चौथे पन्ने पर एक साप्ताहिक आधा पेज फिक्स कर दिया जाए, जिसके लिए कंटेंट शहर के स्तर से ही जुटाया जाए। इससे रीडर के लिए लोकल कनेक्ट रहेगा, अखबार को गुड मिक्स मिलेगा और ऑटो इंडस्ट्री के लोकल विज्ञापनदाताओं को आकर्षित किया जा सकेगा। चूंकि यह प्रस्ताव सिटी लाइफ के लिए था, तो इसमें सक्र्युलेशन की भी कोई समस्या नहीं आती।
 
लेकिन, शुरुआत से ही शायदा जी की नजऱ में ऑटोमोबाइल एक ट्रीवीयल बीट रही है, जिसकी खबरें छापना अखबार के लिए खास जरूरी नहीं है। इस बात को लेकर मीटिंग में जितनी बार उनके साथ विमर्श किए गए, वो नाकाम रहे। व्यक्तिगत स्तर पर उनसे बात करने कि कोशिश की गई तो उनका जवाब बेहद निंदनीय था। उन्होंने कहा कि तुम नौकरी की आड़ में अपने शौक पूरे करने की कोशिश मत करो। तुम्हारे एक्सपोजर को मुझे पर्सनल लेवल पर जाकर भी काटना पड़ेगा, तो मैं काट दूंगी। मैडम शायदा के इस रवैये ने नौकरी से जुड़े मेरे पैशन को लगभग मार डाला, जो नौकरी करने का मेरा मुख्य प्रेरणा स्रोत था। यहां तक कि 01, जुलाई 2013 को कंपनी की तरफ से जारी की गई उद्देश्यों और निर्देशों की स्लाइड, जिसमें ऑटोमोबाइल अपडेट्स को टॉप फोकस एरिया में रखने की बात कही गई थी, को भी धता बताकर उन्होंने खारिज कर दिया। (कंपनी द्वारा जारी की गई उद्देश्यों और निर्देशों की स्लाइड संलग्न है) बावजूद इसके मैंने ऑटोमोबाइल की खबरों को लाईफ स्टाइल एंगल से तैयार किया और सिटी लाईफ में अपनी जगह बनाई।
 
इस प्रोफाइल में ही मैंने शहर का हर ऑटो इवेंट, मोटर-स्पोर्ट इवेंट, रैलिंग से जुड़े नामी लोगों के इंटरव्यू और मर्सडीज, आउडी, जगुआर जैसी कारों के रिव्यू को शामिल किया। साथ ही समय-समय पर महिलाओं पर बेस्ड, यंग-अचीवर्स की प्रोत्साहक कहानियों और प्रायर इन्फॉर्मेशन वाली खबरों को कवर किया। इसी दौरान कंपनी ने डीबीसीएल ग्रुप के नाम पर चंडीगढ़ के दादा मोटर्स से एक नई लग्जरी सेडान जगुआर-एक्स जे खरीदी, जिसकी डीलिंग मार्केटिंग हेड केवल साहनी ने की थी। यह कार भोपाल की जगह चंडीगढ़ से ही क्यूं खरीदी गई, शायदा जी ने इसकी छानबीन करने के आदेश मुझे दिए। इसके लिए जब मैंने साफ इनकार किया, तो उन्होंने इसे मेरी नाकामी बताया। साथ ही मुझे बीट से हटाने की बात करते हुए छानबीन की जिमेदारी देश दीपक को दे दी।
 
नीतियों को लेकर अस्पष्टता  और उसकी वजह से पनप रहे  द्वंद यही तक नहीं रहे। शायदा जी की नजऱ में अखबार के लिए प्लानिंग और कंटेंट जुटाने का संज्ञान, हमेशा ही वरीयता क्रम में टीम के सदस्यों को व्यक्तिगत तंज कसने से नीचे रहा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण बनी गैलप: एपलाई एंगेजमेंट सर्वे-2013 की रिपोर्ट, जिसे कंपनी सालाना अपने कर्मचारियों की वचनबद्धता और कार्यक्षेत्र में संतुष्टि को मापने के लिए करवाती है। इसके लिए दस करोड़ का अच्छा खासा खर्च भी अदा करती है। इस बार सिटी लाईफ का फीडबैक फार्म नवबर, 2012 में भरा गया था, जिसकी रिपोर्ट जून के आखिरी सप्ताह में सामने आई। रिपोर्ट का नंबर था 10800। इसमें सामने आए रिजल्ट काफी हैरतंगेज थे। कर्मचारियों की प्रोग्रेस और उनकी कार्य-मिशन को लेकर समझ (पर्पज) 17 फीसदी घट गई, जोकि लाजिम तौर पर समय के साथ बढनी चाहिए थी।
 
वहीं, पिछले लीडर के नेतृत्व में जहां सभी कर्मचारी 43 परसेंट काम को लेकर वचनबद्ध थे, वह घटकर 14 परसेंट ही रह गए। काम के दौरान लीडर के सामने साथियों की राय यानि ओपिनियन काउंट भी बराबर इसी दर से घट गया, जिसका सीधा असर प्रोडक्ट की क्वालिटी पर पड़ा। रही बात काम को लेकर टीम की संतुष्टि (ओवरआल सेटिस्फेक्शन) की, तो वह पिछले नेतृत्व में 33 परसेंट थी, जोकि अब शून्य रह गई है। रिपोर्ट कार्ड में ले देकर जो एक मात्र चीज बढ़ी है, वह है कर्मचारियों के लिए मुहैया कराया गया मटीरियल और सुविधाएं। इसमें लीडर की कोई भागीदारी होती नहीं है, क्योंकि इसका क्रेडिट सीधे कंपनी को जाता है। मसलन, पूरी टीम ने इस नेतृत्व को अपनी राय में सिरे से खारिज कर दिया। मैंने इसका जि़क्र अपने सालाना मूल्यांकन (अप्रेजल) फार्म में भी किया था। लेकिन उस पर कोई विचार नहीं किया गया। बल्कि उसके बदले में मेरे इंक्रीमेंट शेयर से 4 फीसदी सेलरी, जोकि बढ़ सकती थी, काट ली गई। हालांकि, यह बेहद स्पष्ट है कि कम सैलरी या इंक्रीमेंट इस नोटिस का कारण बिलकुल नहीं है। बल्कि मैं मैडम शायदा के गलत व्यवहार और इससे बिगड़ रही वर्किंग कंडीशन के कारण यह इस्तीफा देने को मजबूर हूं। (संदर्भ के लिए गैलप:एपलाई एंगेजमेंट सर्वे-2013 की रिपोर्ट संलग्न है)
 
फिलहाल, आलम यह है कि शायदा जी मेरी दी गई किसी भी खबर को सिटी लाईफ में छपने नहीं दे रही है। व्यक्तिगत तंज कसे जाने का सिलसिला जारी है, जिससे वह मजबूर है। यह रवैया टीम के बाकी सदस्यों पर भी बराबर लागू है। यहां तक की आए दिन टीम के कुछ सीनियर लोगों को धमकाकर, उनसे इस्तीफे की मांग करना इसमें शामिल है। हाल ही में उन्होंने मेरी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की प्रायर इन्फॉर्मेशन बेस्ड खबर को गिरा दिया। हवाला दिया गया मार्केटिंग टीम द्वारा जारी की गई इपॉर्टेंट फॉर न्यूज़ नाम की एक लिस्ट का, जिसमें उक्त कंपनी की खबर छापना बैन है। यह वही लिस्ट है जिसे कंपनी ने इयर क्लोजिंग और अप्रेजल के साथ तैयार किया था।
 
मार्केटिंग टीम की माने तो इसमें आदित्य बिरला, टाइटन इंडस्ट्री, नोकिया, ज़ी-टेलीफिल्स, लॉरियाल पेरिस, पेंटालून, हीरो मोटर्स, वाया कॉम 18 जैसे तमाम वो बड़े ग्रुप हैं जो भास्कर को विज्ञापन नहीं देते है। हमें यह लिस्ट शनिवार, 03 अगस्त को थमाई गई। इसके ठीक दो दिन बाद यानी सोमवार, 05 अगस्त को शायदा जी जेट-एयरवेज की फ्लाईट संख्या 92-467 से तीन दिन के लिए मुंबई की फन ट्रिप पर निकल गई। यह ट्रिप स्टार टीवी द्वारा प्रायोजित थी और नए टीवी शो, जूनियर मास्टर शेफ के प्रमोशन के लिए आयोजित की गई थी। यहां जानकारी के लिए बता दूं कि स्टार-टीवी का नाम भी उस लिस्ट में शामिल है, जिन्हें छापने पर भास्कर ने बैन लगाया है। यह जानते हुए भी वह ट्रिप पर गई। साथ ही 8 अगस्त के सिटी लाईफ में चौथे पन्ने पर उसकी कवरेज को क्वार्टर पेज साइज की जगह भी दी। ऐसे में नियम और नीतियों को लेकर यह दोहरा रवैया, मेरी समझ से परे है। (हवाई जहाज का टिकट और स्टार-टीवी की कवरेज संलग्न की गई है)
 
अपने कार्यकाल में बतौर भास्कराइट  मैंने पत्रकारिता संबंधी विविध  अवसरों का अनुभव किया। शानदार  एक्सपोजर मिला और अपनी जिमेदारी  को तहे दिल से स्वीकार किया। इस दौरान मैंने अपने सभी वरिष्ठ सहयोगियों के अनुभव का भी भरपूर लाभ उठाया। अधिक से अधिक सीखने की कोशिश की और उनका स्मरणीय स्नेह अर्जित किया। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। दफ्तर के बीचों-बीच लगे एक बड़े पोस्टर पर बोल्ड फोंट में कपनी ने लिखकर जिन तीन पिलर्स (आधार स्तंभों) का जिक्र कर रखा है, वो अब मिसिंग हैं। पिलर्स में सबसे बड़े अक्षरों में लिखा गया है एथिकल गवर्नेंस यानी नीतिपरक शासन प्रणाली, जोकि पूरी तरह से नदारद है। यह समस्या टीम लीडर के तौर पर शायदा बानो को नियुक्त करने से शुरू हुई थी और अब अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। शायदा जी की अटपटी नीतियों के चलते टीम के दो सदस्य (देश दीपक और कुलदीप) संस्थान छोड़कर जा चुके हैं। साथ ही कुछ और सदस्य ग्रुप छोडने की तैयारी में हैं।
 
इसी सिलसिले में मैं भी रोजाना बिगड़ रही वर्किंग कंडीशन के कारण अपने इस्तीफे का यह नोटिस दे रहा हूं। क्योंकि लंबे समय से चल रहे जॉब मिसमैच के हालात ने अब जाकर असंतुष्टि का रुख इतियार कर लिया है। साथ ही तयशुदा ढंग से निकाले जा रहे व्यक्तिगत द्वेष और तानाशाह रवैये ने इसे और बढ़ावा दिया है। काम के बीच आ रही इन सभी समस्याओं को मैंने गैलप सर्वे में, अप्रेजल फार्म में, गैलप एक्शन प्लान मीटिंग में, व्यक्तिगत तौर पर जाकर टीम लीडर के सामने भी मौखिक रूप से जाहिर किया था। लेकिन इस संदर्भ में किया गया हर किस्म का कयुनिकेशन विफल रहा। अत: महोदय मेरा आपसे यह विनम्र अनुरोध है कि मेरे इस नोटिस को इस्तीफे की पूर्व सूचना के तौर पर स्वीकार किया जाए।
 
नोटिस स्वीकार किए जाने की  पुष्टि अथवा इस संदर्भ में समुचित प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में यथायोग्य अभिवादन सहित।
 
धन्यवाद!
आपका
 
चौधरी प्रशांत चाहल
रिपोर्टर, सिटी लाईफ डेस्क,
चंडीगढ़, दैनिक भास्कर।
एपलाई कोड: 22469
ग्रेड: ई-2

एनयूजे की बैठक 28-29 सितम्बर को कोडरमा में

नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (एनयूजे) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 28-29 सितम्बर को कोडरमा में होगी. इस आयोजन को लेकर कोडरमा में पत्रकारों की एक बैठक भी हुई जिसमे यूनियन के झारखण्ड यूनिट अध्यक्ष रजत कुमार गुप्ता और शिव कुमार अग्रवाल भी मौजूद थे. 
बैठक में लिए निर्णय के अनुसार युएनआई के बिनोद कुमार विश्वकर्मा को आयोजन के लिए संयोजक, खबर मन्त्र के ब्यूरो हेड संजीव समीर और आज के प्रभारी मनोज कुमार झुन्नू को सह संयोजक बनाया गया है. उम्मीद है कि इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में देश भर के यूनियन से जुड़े वरीय सदस्य पत्रकार भाग लेंगे. आयोजन को लेकर रजत कुमार गुप्ता, शिव कुमार अग्रवाल, बिनोद कुमार विश्वकर्मा, संजीव समीर और मनोज कुमार झुन्नू का नंबर क्रमशः इस प्रकार है- 09431172035, 09386620006, 09431790364, 09431394736, 09431192565 
 
प्रेस विज्ञप्ति

बिजनेस भास्कर के गौरव ने डीडी न्यूज और लाइव इंडिया के इंद्रीजत राय ने पाजिटिव मीडिया ज्वाइन किया

एक मेल से मिली सूचना के अनुसार बिजनेस भास्कर से गौरव कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. गौरव कुमार यहां पिछले साढ़े तीन सालों से काम कर रहे थे. वे पिछले लगभग दो सालों से एडिट पेज का कार्यभार संभाल रहे थे. उन पर अखबार के संपादक एसके सिंह को बड़ा भरोसा था. आईआईएमसी से पास आउट गौरव ने दूरदर्शन न्यूज जॉइन कर लिया है.
लाइव इंडिया से संपादक सतीश के सिंह के इस्तीफे के बाद उनके खास लोगों के इस्तीफे का क्रम भी शुरू हो गया है. जानकारी मिली है कि एसआईटी हेड इंद्रजीत राय ने भी हफ्ते भर पहले ही लाइव इंडिया को गुड बाय बोलकर पाजिटिव मीडिया ज्वाइन कर लिया है. कुछ और लोगों के लाइव इंडिया से जाने की सूचना है पर उनका नाम नहीं मालूम चल सका है.
 
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सतीश के. सिंह ने लाइव इंडिया से इस्तीफा दिया, फोकस-हमार टीवी वाले पाजिटिव मीडिया ग्रुप पहुंचे

सतीश के. सिंह को लेकर जो मार्केट में चर्चा थी, और जिसका प्रकाशन भड़ास पर भी किया गया था, वो सच निकली. उन्होंने लाइव इंडिया न्यूज चैनल को गुडबाय बोल दिया है. उन्होंने एडिटर इन चीफ पद से इस्तीफा दे दिया है. वे नई पारी की शुरुआत पाजिटिव मीडिया ग्रुप के साथ करेंगे. नवीन जिंदल और मतंग सिंह वाले इस ग्रुप के फोकस, हमार समेत कई चैनल हैं. सतीश के सिंह के जाने के बाद लाइव इंडिया में काफी बदलाव होने की संभावना है. उनके खास लोग उनके आगे पीछे लाइव इंडिया से इस्तीफा देकर पाजिटिव मीडिया ग्रुप का हिस्सा बनेंगे. 
सूत्रों के मुताबिक लाइव इंडिया प्रबंधन ने सतीश के सिंह का आफिसियल मेल आईडी क्लोज करने के आदेश दे दिए हैं. उनका इस्तीफा मैनेजमेंट ने कुबूल कर लिया है. माना जा रहा है कि नवीन जिंदल ने सतीश के सिंह को इसलिए अपना मीडिया सारथी बनाया है क्योंकि वे जी ग्रुप वालों के साथ लंबे समय तक काम कर चुके हैं और उनकी सारी पोल पट्टी जानते हैं. नवीन जिंदल ने मीडिया में उतरने का फैसला तब किया जब उन्होंने जी ग्रुप द्वारा उगाही किए जाने के कार्यक्रम को कैमरे में रिकार्ड करा लिया और इसकी एफआईआर दिल्ली पुलिस में करा दी. तब जी न्यूज और जी बिजनेस के एडिटरों को जेल जाना पड़ा था. 
 
उसके बाद सुभाष चंद्रा और नवीन जिंदल में ठन गई. जी ग्रुप नवीन जिंदल के खिलाफ काफी आक्रामक हो गया. तब नवीन जिंदल ने मीडिया में उतरने का तय किया और मतंग सिंह के डूबते चैनलों को तिनके का सहारा मिल गया. सतीश के सिंह पाजिटिव मीडिया ग्रुप के पस्त व खस्ताहाल चैनलों का ग्राफ कितना उठा पाएंगे, ये तो वक्त बताएगा लेकिन यह तो तय है कि उनके सामने अब बहुत बड़ी जिम्मेदारी व चुनौती है. उन्हें जी न्यूज के टक्कर का चैनल देना होगा, इससे कम शायद नवीन जिंदल को मंजूर न हो. 

‘टूनाइट विथ दीपक’ नंबर वन न्यूज शो बना!

टैम के 34वें हफ्ते के आंकड़े बताते हैं कि इंडिया न्यूज चैनल पर प्रसारित दीपक चौरसिया का शो 'टूनाइट विथ दीपक' नंबर वन न्यूज शो हो गया है. इस 34वें हफ्ते इस शो की टीआरपी 17.4 फीसदी रही जबकी नंबर दो पर रहा इंडिया टीवी का प्रोग्राम, 15.0 फीसदी के साथ. इस उपलब्धि पर इंडिया न्यूज की तरफ से चैनल पर एक विज्ञापन प्रसारित किया जा रहा है , जो इस प्रकार है…

इंडिया न्यूज चैनल में दीपक चौरसिया की इंट्री के बाद शुरू में चैनल की टीआरपी जोरदार तरीके से बढ़ी लेकिन दीपक की सेहत खराब हो जाने के बाद डाउनफाल शुरू हो गया. अब जबकि फिर से दीपक ने दमखम के साथ मोर्चा संभाल लिया है और सामयिक मुद्दों पर आक्रामक तरीके से कवरेज शुरू किया, एंकरिंग की, टीआरपी ने फिर से उछाल मारना शुरू कर दिया है. आसाराम प्रकरण पर इंडिया न्यूज ने सबसे आफेंसिव तरीके से कवरेज किया है. दीपक का शो नंबर वन बन जाने पर चैनल के अंदर उत्साह का माहौल है. लोगों ने एक दूसरे को बधाइयां दी. 

भड़ास तक अपनी बात आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

एक बड़े न्यूज चैनल में कई हजार करोड़ रुपये डालकर ब्लैक को ह्वाइट कर लिया एक बड़े कांग्रेसी नेता ने!

चर्चा है कि एक बड़े और प्रभावशाली कांग्रेसी नेता ने अपने कई हजार करोड़ रुपये की ब्लैकमनी एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल में निवेश कर ह्वाइट कर लिया. 
इस न्यूज चैनल ने विदेश में अपना एक न्यूज चैनल लांच करके इस धन को खपाया. भारत के कई इनकम टैक्स अधिकारियों ने न्यूज चैनल और कांग्रेसी नेता के प्रभाव में हजारों करोड़ रुपये के ट्रांजैक्शन पर परदा डाल दिया और इसे वैध करार दिया. पर जब इस पर नजर कुछ अन्य आईआरएस अफसरों की पड़ी तो इन्होंने न्यूज चैनल से हजारों करोड़ रुपये आने के स्रोत के बारे में विस्तार से जानकारी मांगी. पर चैनल इसे देने से आनाकानी करता रहा है और कर रहा है.
 
कहा जा रहा है कि धन के स्रोत की जानकारी देते ही भारत के दिग्गज कांग्रेसी नेता और उनके पुत्र की जानकारी बाहर आ जाएगी और सबको पता चल जाएगा कि ये रकम भारत में टेलीकाम कंपनियों को फेवर देने और अन्य तरह की दलाली-करप्शन के जरिए एकत्रित किया गया है. जो एक आईआरएस अफसर इस मसले की तह तक जाने का प्रयास कर रहा था, उसे कई तरह के आरोपों में फंसाकर लगभग कार्यमुक्त सा कर दिया गया है. इस अफसर को दिमागी तौर पर गड़बड़ यानि पागल भी करार दिया जा चुका है.
 
न्यूज चैनल और कांग्रेसी नेता का फेवर करने वाले कुछ आईआरएस अफसरों ने बदले की भावना के तहत घोटाले को उजागर करने वाले आईआरएस अफसर पर कई तरह के आरोप भी जड़ दिए हैं. इस प्रकरण के बारे में प्राथमिक जानकारियां भड़ास के पास भेजी गई हैं. कई अन्य दस्तावेज व सबूत जल्द मिलने वाले हैं. पूरे मसले का अध्ययन किया जा रहा है.
 
यह भी बताया गया है कि कोर्ट ने मानसिक रूप से असंतुलित यानि पागल करार दिए गए अफसर के बयान व बातों को प्रकाशित करने से रोक रखा है. पूरा प्रकरण कोर्ट में लंबित है. दूसरे पक्ष का दावा है कि अगर इस मसले पर कुछ भी प्रकाशित किया गया तो वह मानहानिकारक होगा. 
 
(कानाफूसी)

नेटवर्क18 समूह की कंपनी इंफोमीडिया18 में आज हो रही है छंटनी, कई को मिले लिफाफे

मुंबई से खबर आ रही है कि नेटवर्क18 समूह की कंपनी इफोमीडिया18 में छंटनी का दौर शुरू हो चुका है. आज सुबह से लोगों को लिफाफे पकड़ाए जा रहे हैं. भड़ास के पास कम से कम पांच लोगों को बाहर कर दिए जाने की खबर पुख्ता तौर पर है. नेटवर्क18 में पिछले कई महीनों से छंटनी का दौर चल रहा है. हाल में ही सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 से सैकड़ों लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया. 
इस छंटनी के खिलाफ पत्रकारों ने नोएडा स्थित फिल्म सिटी के आफिस में इस ग्रुप के आफिसों के बाहर प्रदर्शन किया. उसके पहले ग्रुप के कई बिजनेस चैनलों और अन्य प्रिंट-वेब वेंचर्स में सैकड़ों लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया. मीडिया से जुड़े कई दिग्गजों को मुंबई में बेहद भद्दे तरीके से इस्तीफा देने को मजबूर किया गया. आज जिस इंफोमीडिया18 कंपनी में छंटनी का दौर चल रहा है, वह पब्लिक लिस्टेड कंपनी है. इस कंपनी के बारे में नेटवर्क18 समूह की आधिकारिक वेबसाइट में जो जानकारी दी गई है, वह इस प्रकार है…
 
Infomedia 18 Limited is India's leading media company with strong market presence in diverse business areas spanning Business Directories, Magazine Publishing, Printing Services, B2B online SME marketplace and Publishing Outsourcing. Infomedia 18 Limited is India's largest commercial printer of magazines, annual reports, product brochures and other publicity material. It is a certified print solution provider with an unmatched turnaround time and quality standards and a one-stop shop that can handle all the requirements from processing and printing to binding and dispatch.
 
Special Interest Publishing business: Infomedia18 publishing activities are focused at two broad categories – Special Interest Consumer Publishing and Business-to-business (B2B) / Trade publishing. Infomedia has stamped its authority, publishing 20 titles spread across 8 Consumer magazines and 12 Trade magazines. 
 
B2B SME marketplace: Alibaba.com, the world’s leading B2B online marketplace, has also built a strategic partnership with Infomedia 18, India’s largest B2B media company to provide Indian SMEs with the best solution for domestic and global trade
 
Strategic partnerships: As part of our endeavour to incorporate international standards as well as globally acclaimed brands into Indian publishing, Infomedia 18 has entered into a Joint Venture (JV) with Reed Business International (a part of Reed-Elsevier), partnership with Ringier (China), partnership with Future Publishing Limited, Walt Disney India Private Limited and Vogel Burda, Germany. 
 
Publishing BPO: Infomedia 18 entered this space through the acquisition of Cepha Imaging in Bangalore and Keyword Group Limited in the UK. In April 2006, Infomedia acquired International Typesetting and Composition (ITC).
 
Infomedia 18 has also tied up with Google and Nokia with a view to transcending media platforms and strengthening our position as a comprehensive directories and publishing solutions provider.
 
Infomedia 18 Limited is a publicly listed company with professional management. It is listed on the Bombay Stock Exchange and the National Stock Exchange. 

आगरा में चैनल्स की भीड़, मीडियाकर्मियों के लिए मारामारी

आगरा में पहले से संचालित डैन, मून, सी और डीजी में प्रतिद्वंदिता कम नहीं थी कि एक अन्य कंपनी ने दस्तक दे दी। हालांकि पहले से संचालिक मून, सी और डीजी में मून और डीजी तो पहले ही वेंटिलेटर पर हैं, डैन और सी की रेस में अब एक नया चैनल भी कूद पड़ा है। इस चैनल में तेज़ी से कर्मचारियों की भर्ती शुरू कर दी गई है जिनमें अधिकतर नैसिखिये शामिल हैं जिन्हें एक से बढ़कर एक लॉलीपॉप थमाये जा रहे हैं। जिसकी आवश्यकता नहीं उन्हें भी सिर्फ इसीलिए रखा जा रहा है क्योंकि वो अन्य चैनल्स में कार्यरत हैं। इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है डेन न्यूज़ चैनल पर जिसके कई कर्मचारी पहले ही नये चैनल का रुख कर चुके हैं। अंदरखाने में दो तीन नाम और प्रस्तावित हैं।
ऐसे में आगरा की स्टार एंकर कही जाने वाली मोहतरमा दीपाली त्रिपाठी की मुश्किलें तय हैं जिन्हें हाल ही में एक चैनल के संपादक का कार्यभार देकर कुर्सी पर बिठाया गया। सूत्रों से खबर है कि इन मोहतरमा को भी उक्त न्यूज़ चैनल से निमंत्रण मिल चुका है जिसकी एवज में मैडम को भी अच्छी खासी रकम प्रस्तावित की गई है। अपने साथी कर्मचारियों के पलायन को रोक पाने में नाकाम ये मोहतरमा चैनल को कैसे खींच पाती हैं और दूसरे चैनल से आ रहे प्रस्ताव को कुबूल करने से कैसे बच पाती हैं, ये देखना होगा। 
 
आगरा से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

दारिन शाहदी, ब्रजमोहन, आमिर, शारदा, डा. महेश चौधरी, ज्ञानेंद्र, शैलेष की नई पारी

आईबीएन7 से छंटनी के शिकार हुए स्पोर्ट्स एडिटर दारिन शाहदी स्टार स्पोर्ट्स के साथ जुड़ गए हैं. दारिन ने अपनी नई शुरुआत के बारे में फेसबुक पर खुलासा किया है. वे स्टार स्पोर्ट्स के लिए कुछ असाइनमेंट पर काम कर रहे हैं.  आईबीएन7 से ही निकले ब्रजमोहन ने न्यूज नेशन ज्वाइन कर लिया है. आईबीएन7 में ही कार्यरत आमिर अंसारी के बारे में चर्चा है कि वो दूरदर्शन से जुड़ने वाले हैं. आईबीएन7 में कार्यरत शारदा शुक्ला का इंटरनल ट्रांसफर ईटीवी पटना हो गया है. 
एटूजेड न्यूज चैनल में कार्यरत डॉ.महेश चौधरी ने चैनल से विदाई ले ली है. इनकी विदाई के समय न्यूजरूम में हर डिपार्टमेंट के साथी एकत्र हुए और केक काटा गया. डॉ. चौधरी आईआईएमसी जैसे पत्रकारिता के बड़े संस्थान में पढ़ा चुके हैं. ये जल्द ही नई पारी की शुरुआत एक नई जगह करेंगे, जिसके बारे में उन्होंने खुलासा नहीं किया है. 
 
दैनिक जागरण, रायबरेली से ज्ञानेंद्र शुक्ला और शैलेष शुक्ला ने इस्तीफा दे दिया है. दोनों ने नई पारी की शुरुआत भी कर दी है. ज्ञानेंद्र हिंदुस्तान, एटा के साथ जुड़ गए हैं जबकि शैलेष ने नवभारत टाइम्स, लखनऊ ज्वाइन किया है. 

इटावा के पत्रकार राकेश शर्मा के नामजद हत्यारे अभी तक पकड़े नहीं गए, परिजन नाराज

इटावा : पत्रकार राकेश शर्मा की हत्या में नामजद आरोपियों की एक सप्ताह बाद भी गिरफ्तारी न होने पर उनके परिजन गुरुवार को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिले। परिजनों ने अब तक हत्याभियुक्तों की गिरफ्तारी न होने पर चिंता और नाराजगी जतायी। अपेक्षा की कि जल्द गिरफ्तारी होगी। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नीलाब्जा चौधरी ने पत्रकार के परिजनों की शिकायत को संजीदगी से सुनते हुए आश्वस्त किया कि नामजद आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा। पुलिस प्रशासन इस दिशा में भरसक कोशिश कर रहा है। 
बकेवर थानाध्यक्ष को इस संबंध में निर्देशित किया गया है और एक टीम गठित कर दबिश के लिए लगाई गयी है। उल्लेखनीय है कि 23 अगस्त की रात में पत्रकार राकेश शर्मा की हत्या की घटना के बाद से जिले भर के पत्रकारों और राजनीतिक संगठनों में उबाल है। एक सप्ताह बीत चुका है जबकि खुद एसएसपी ने 24 अगस्त को जिला मुख्यालय के पत्रकारों को दो दिन के भीतर अभियुक्तों की गिरफ्तारी का आश्वासन दिया था पर अब तक कुछ हुआ नहीं।
 

अदालत की अवमानना करने वाले सुब्रत राय को दंडित किया जाए (सेबी का सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध)

चौबीस हजार करोड़ रुपये इनवेस्टरों को लौटाने के आदेश का पालन न करने के लिए सुब्रत राय और इनके तीन फर्मों के डायरेक्टरों को अदालत की अवमानना के जुर्म में दंडित किया जाना चाहिए. यह अपील बाजार नियामक सेबी ने सुप्रीम कोर्ट से की है. सेबी का कहना है कि जिन कंपनियों-फर्मों ने निवेशकों से अवैध तरीके से पैसे उगाहा है, उनमें सुब्रत राय की हिस्सेदारी सत्तर प्रतिशत है, इसलिए वह दंडित किये जाने योग्य हैं. उन्हें अवमानना के जुर्म में छह महीने के लिए जेल भेजा जाए या फिर जुर्माना लगाया जाए. इस प्रकरण की पूरी खबर समाचार एजेंसी पीटीआई ने रिलीज की है, जो इस प्रकार है…
 
Sahara chief Subrata Roy be punished for contempt: SEBI to SC
 
New Delhi: SEBI on Tuesday made a forceful plea to the Supreme Court to punish Sahara chief Subrata Roy along with his two firms and their directors for not complying with its order for refunding Rs 24,000 crore to investors.
 
Refuting the contention of Roy who had submitted that he cannot be penalised for non-refund of the money by Sahara India Real Estate Corp Ltd (SIREC) and Sahara India Housing Investment Corp Ltd (SHIC), the market regulator said that the business tycoon held 70 percent stake in the companies and liable for contempt of court punishable upto to six months imprisonment or fine.
 
"By virtue of being promoter of the companies, he holds the same position as that of Directors of the companies and he is also liable for contempt. He is liable for punishment along with other Directors of the companies," senior advocate Arvind Dattar told a bench of justices K S Radhakrishnan and J S Khehar.
 
Dattar sought maximum punishment for Roy and others under Section 12 of Contempt of Court Act which provides maximum punishment of six months jail term.
 
"Keeping in mind the magnitude of fund collected by the companies, it is fit case for imposing maximum punishment on Roy and companies," he said.
 
"There can not be a clearer case of contempt. Non payment of funds amounts to contempt," he said, adding that the companies have violated not one but three orders of the apex court.
 
The market regulator contended that the companies have not complied with apex court orders passed on August 31, December 5 last year on the issue of refunding the amount.
 
During the argument, the bench asked whether the amount can be recovered from other companies of the group.
 
SEBI contended that action can be taken against other companies as the money collected were invested in other companies of the group which is being headed by the same promoter.
 
The court was hearing three contempt petitions filed against Roy, the two firms and their directors who will present their case on the next date of hearing on August 6.
 
The apex court had on August 31 last year directed the Sahara group to refund the amount by November end. The deadline was further extended and companies were directed to deposit Rs 5120 crore immediately and Rs 10,000 crore in first week of January and remaining amount in first week of February.
 
The group, which had handed over the draft of Rs 5,120 crore on December 5, has failed to pay the rest of the amount, SEBI told the court.
 
The apex court had on August 31 last year directed the two Sahara group companies to refund the money to their investors within three months with 15 per cent interest per annum. It had also said that SEBI can attach properties and freeze bank accounts of the companies if they fail to refund the amount.
 
The two companies, their promoter Roy and directors Vandana Bhargava, Ravi Shankar Dubey and Ashok Roy Choudhary were told to refund the collected money to the regulator. 
 
SEBI said the Sahara group had also published advertisement in newspapers on September 3 last year giving its view on the apex court's judgement, which also amounts to contempt.
 
The bench after going through the content of the advertisement said in a lighter vein that nothing in it amounts to contempt and the point raised in it pertains to SEBI.
 
"This is not contempt. Expression used in the advertisement is for you," the bench told SEBI. 
 
PTI 

बाजार की चाल से सहमी केंद्र सरकार

डॉलर के मुकाबले रुपए की जिस तरह से पिटाई हुई है, उससे देश के राजनीतिक हल्कों में भी सरगर्मी बढ़ गई है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद रुपए ने गिरावट का रिकॉर्ड गोता लगा लिया है। स्टॉक बाजार भी भारी गिरावट के शिकंजे में फंस गया है। एक सप्ताह के अंदर ही सेंसेक्स में डेढ़ हजार से ज्यादा अंकों की गिरावट दर्ज हो गई है। जबकि, सोने के भाव एक बार फिर आसमान पर चढ़ गए हैं।
 
बाजार की इस अफरा-तफरी के चलते मनमोहन सरकार की राजनीतिक मुश्किलें भी बढ़ चली हैं। विपक्षी दलों को सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का यह एक नया हथियार मिल गया है। इस मुद्दे पर संसद में भी सरकार बुरी तरह घिर गई है। हालात, कुछ ऐसे बन गए हैं कि सरकार एकदम आत्म-समर्पण की मुद्रा में दिखाई पड़ती है। कांग्रेस के नेतृत्व ने भी विपक्ष से भिड़ने के बजाए विनम्रता के तेवर अपना लिए हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में कल यह स्वीकार कर लिया है कि इस समय अर्थव्यवस्था वाकई में बडेÞ संकट के दौर में है। इस संकट से बाहर आने के लिए वे तमाम उपाए करने वाले हैं। ऐसे में, घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह जरूर है कि रिजर्व बैंक की पहल से गुरुवार को रुपए की गिरावट कुछ थमी है। स्टॉक बाजार ने भी उछाल का रुख दिखाया है। लेकिन, कोई नहीं जानता कि यह ‘इलाज’ स्थाई है या महज फौरी फंडा? 
 
लेकिन, आक्रामक विपक्ष अब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के जुबानी भरोसे पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने संसद में भारी दबाव बना दिया है। इसी के चलते आज प्रधानमंत्री संसद में ताजा आर्थिक संकट पर अपना बयान देने जा रहे हैं। यूं तो उन्हें कल ही बयान देना था। संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने इस आशय की सूचना भी सदन में दे दी थी। लेकिन, ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री ने कह दिया कि वे शुक्रवार को अपना पक्ष रखेंगे। राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि मनमोहन सिंह ने कुछ और समय लेकर किसी कारगर कार्य योजना की तैयारी जरूर की होगी। ताकि, वे संसद में बता सकें कि सरकार ने इस आर्थिक तूफान से बचने के लिए क्या-क्या तैयारी कर ली है? आगे आने वाले समय में आर्थिक संतुलन ठीक रखने के लिए सरकार कौन से नए कदम उठाने वाली है?
 
दरअसल, बुधवार को रुपए में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई थी। डॉलर के मुकाबले रुपए की दर 68.80 के निचले स्तर तक पहुंच गई थी। इससे आशंका बढ़ गई थी कि कहीं एक-दो दिन में ही रुपए की दर 75 की तलहटी न छू ले? सेंसेक्स और निफ्टी में भारी गिरावट दर्ज हो गई थी। जबकि, प्रति 10 ग्राम सोने का भाव 34,500 रुपए तक पहुंच गया था। इससे बड़ा हड़कंप मच गया। इस तरह की चर्चाएं जोर-शोर से शुरू हुर्इं कि हालात और बदतर हुए तो देश बड़ी आर्थिक मंदी की चपेट में आ जाएगा। इसके चलते कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी होगी। मंदी की चपेट में तमाम उद्योग बंदी की कगार पर पहुंच सकते हैं। इन आशंकाओं को लेकर सरकार के रणनीतिकार भी खासे चौकन्ने हुए। इस संक्रमण काल में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने अपने एक सुझाव का सुर्रा छोड़कर सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दीं। उन्होंने खुले तौर पर इस आशय का सुझाव दे डाला कि सरकार अपने रिजर्व का 500 टन सोना गिरवीं रखकर डॉलर जुटा सकती है। बताया गया कि इस तरीके से सरकार 25 अरब डॉलर जुटाकर आर्थिक संकट की आफत टाल सकती है। 
 
सोना गिरवीं रखने की बात आई, तो विपक्ष ने सड़क से संसद तक कोहराम मचाना शुरू कर दिया। पहले ही कुछ नेता आशंका जता रहे थे कि देश के सामने 1991 की तरह आर्थिक संकट   आ रहा है। जबकि, ऐसी चर्चाओं का सरकार ने जमकर खंडन किया था। उल्लेखनीय है कि 1991 में चंद्रशेखर की सरकार के दौर में देश बड़े आर्थिक संकट में फंसा था। सरकार को विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए 67 टन सोना गिरवीं रखना पड़ा था। लंबे समय तक इस मुद्दे पर सरकार की खराब आर्थिक नीति की चर्चा चली थी। यूपीए सरकार के रणनीतिकार अपनी वाहवाही में लगातार कहते आए हैं कि एक दौर में भारत को सोना गिरवीं रखना पड़ा था। जबकि, मनमोहन सरकार की बेहतर आर्थिक नीतियों के चलते देश, दुनियाभर में आर्थिक विकास का नया इतिहास रच रहा है। ये बातें कांग्रेस के नेता भी हाल तक कहते रहे हैं। लेकिन, पिछले एक साल से आर्थिक हालात काफी खराब हुए हैं। देश की विकास दर 5 प्रतिशत से नीचे आ गई है। यह अलग बात है कि इस कमजोर विकास दर के लिए वित्तमंत्री चिदंबरम वैश्विक मंदी को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं। 
 
यूपीए सरकार पिछले वर्षों में तमाम बडे-बड़े घोटालों की वजह से विपक्ष के निशाने पर रही है। आमतौर पर सरकार के रणनीतिकार ऐसी चर्चाओं के दौरान यही कह देते थे कि घोटालों की जांच तो हो जाएगी, लेकिन विपक्ष इतना नकारात्मक रुख न अपनाए। क्योंकि, मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों के चलते देश में रिकॉर्ड समृद्धि आई है। क्योंकि, कई सालों तक विकास दर लगातार 8 प्रतिशत के ऊपर रही है। जबकि कई वर्षों से दुनिया के तमाम विकसित देश मंदी की चपेट में रहे हैं। 
 
अब मुश्किल यह है कि अमेरिका सहित तमाम विकसित देश मंदी से उबर गए हैं। इन देशों की अर्थ व्यवस्था ने छलांग भरनी शुरू कर दी है। ऐसे में, भारत की अर्थ व्यवस्था संकट में फंसती जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अमेरिका के हालात अच्छे होने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना निवेश निकाल रहे हैं। क्योंकि, उन्हें निवेश के लिए अब अमेरिकी बाजार फिर से मुफीद लगने लगे हैं। पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा सवाल करते हैं कि मनमोहन सरकार के किस तरह के तर्क हैं? जब कुछ साल पहले आर्थिक अव्यवस्था पर बात की जाती थी, तो वित्तमंत्री अमेरिकी मंदी का रोना रोते थे। अब वे अमेरिका में मंदी खत्म हो जाने का स्यापा कर रहे हैं। कह रहे हैं कि वैश्विक हालात ऐसे बने हैं कि बाहर के लोग पैसा भारतीय बाजार से निकाल रहे हैं। इसी से कुछ समय के लिए हमें झटका लग रहा है। सिन्हा कहते हैं कि वित्तमंत्री इस तरह की बातें करके झांसेबाजी ही कर रहे हैं। दरअसल, वे इस तरह की बहानेबाजी करके अपनी दिशाहीन आर्थिक नीतियों को छिपाना चाहते हैं। लेकिन, अब कुछ छिपने वाला नहीं है। 
 
राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कल सदन में आर्थिक मुद्दे पर सरकार पर जमकर निशाने साधे। उन्होंने यहां तक कह डाला कि जो हालात बन रहे हैं, उनसे आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति आती दिखाई पड़ रही है। जरूरी हो गया है कि प्रधानमंत्री देश के सामने सही तस्वीर पेश करें। यह भी जानकारी दें कि वे स्थितियां ठीक करने के लिए क्या-क्या करने वाले हैं? इसी चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री ने पहली बार यह स्वीकार किया कि इस दौर में आर्थिक संकट से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इसकी कई घरेलू वजहें हैं। जबकि, इसके लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दे भी जिम्मेदार हैं। इन दिनों खासतौर पर सीरिया में अमेरिकी हमले की आशंका है। इस फेर में कच्चे तेल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। एक तरफ डॉलर के मुकाबले रुपए का संकट है। दूसरी तरफ, सीरिया प्रकरण के चलते कच्चे तेल में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। जाहिर है कि इस संकट के चलते पेट्रो-पदार्थों के दाम बढ़ाने पड़ सकते हैं। इस हकीकत से वे एकदम इनकार नहीं कर सकते। 
 
तेल कंपनियों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि भारी घाटे को देखते हुए डीजल के दामों में 3-5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी जरूरी है। डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़े, तो महंगाई का एक बड़ा झटका आना तय है। हालांकि, पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने यही कहा है कि फिलहाल, डीजल के दाम बढ़ाने का कोई प्रस्ताव उनके पास नहीं है। लेकिन, मंत्रालय इस कोशिश में है कि डीजल की खपत किसी तरह से कम की जाए। ताकि, आयात घाटा कुछ संतुलित हो पाए। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर कहते हैं कि देश के लोग जानते हैं कि संसद सत्र समाप्त होते ही डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए जाएंगे। यह सरकार राजनीतिक मोर्चे की तरह आर्थिक मोर्चे पर भी फ्लॉप हो रही है। अब देशहित में यही अच्छा है कि लोकसभा के जल्दी से जल्दी चुनाव करा दिए जाएं। सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी कहते हैं कि 22 साल पहले मनमोहन सिंह ने जो आर्थिक सुधार का युग शुरू किया था, अब घूम-फिर कर देश के हालात पहली वाली स्थितियों में पहुंचते लग रहे हैं। इस तरह से मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियां फ्लॉप शो बन गई हैं। इसके चलते देश की आर्थिक सुरक्षा भी खतरे में दिखाई पड़ने लगी है। राजनीतिक क्षेत्रों में इस बात पर नजरें लगी हैं कि मनमोहन सिंह ताजा आर्थिक हालात पर आज क्या बयान देते हैं? अपने भाषण में वे सरकार के नए कदमों के बारे में क्या कहेंगे? इसको लेकर भी कयासबाजी का दौर शुरू हुआ है। फिलहाल, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेताओं ने भी इस मुद्दे पर संयम बरतना ही ठीक समझा है। कम से कम वे रुपए के संकट के   लिए भाजपा और मोदी जैसे नेताओं को नहीं कोस रहे हैं। भाजपा के नेता इस तरह की हल्की-फुल्की चर्चाओं में भी मजे लेते देखे गए। 
 
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

हे विजय बुहुगुणा, आप तो प्रोपर्टी डीलरों से घिरे हो (पढ़ें एक पत्र)

आदरणीय, भाई विजय बहुगुणा जी, मुख्यमंत्री उत्तराखंड, मान्यवर, आपने मेरी पुस्तक "रंवाई कल आज और कल" का अपने आवास पर विमोचन किया था, तब मैंने अपने संबोधन में कहा था कि आपकी प्रतियोगिता शिशुमंदिर के शिक्षक से मुख्यमंत्री बने बेचारे निशंक जैसों से नहीं है बल्कि अपने पिता स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा से है जिनकी आँखे पहाड़ और पहाड़ की महिलाओं की दयनीय दशा का बखान करते करते भर आती थी. इंदिरा गांधी जैसी नेता से टक्कर लेकर राष्ट्रीय राजनीति में नई धारा बहाने की सोच रखने वाले ये महान नेता देश के साथ -साथ पहाड़ की भी उतनी ही चिंता करते थे.
यही कारण है कि प्रसिद्ध गढ़वाल उपचुनाव में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल, हिमाचल के मुख्यमंत्री राम लाल और न जाने किन किन दिग्गजों ने उत्तखंड में डेरा डाला बावजूद उत्तराखंडियों ने क्षेत्र और जाति से ऊपर उठाकर हेमवती नंदन को जीता कर भेजा। पहाड़ में पोलिंग स्टेशनों में गड़बडी करने की कोशिश करने वाले हरियाणा पुलिस के छ फूटे जवानों को जब वहां की महिलाओं ने जान की परवाह किये बिना कंडाली से ऐसे पीटा कि उसकी जलन उन्हें आज तक याद होगी।
 
आप बिना सर्वमान्य नेता होने के बावजूद उत्तराखंड की सर्वोच्च कुर्सी पर हैं और जिस तरह आपने नौसिखिये बेटे साकेत को सांसद का टिकट दिलाया, वह आपकी कूटनीतिक शतरंज की सफल चाल कही जा सकती है. पर जैसे आप आपदाग्रस्त उतराखंड का शासन चला रहे हैं और उसमें आपके पुत्र साकेत सहयोग कर रहे हैं, उससे आपकी छवि खलनायक की बनती जा रही है. निवेश लाने के नाम पर आप जिस तरह बिल्डरों को जमीनें बाँट रहे हो वह तो उत्तराखंड को लूटने जैसा है!
 
मान्यवर, जितनी चरण बंदना आप दिल्ली जाकर नेताओं की कर रहे हो, उतनी अगर आपदाग्रस्त उत्तराखंडियों की करते तो आप उत्तराखंड के "हीरो" होते और आप सीएम की कुर्सी पर फेवीकोल के जोड़ से चिपक जाते। कभी अपने इर्द-गिर्द खड़े लोगों पर भी नजर दौडाओ और उनकी अकेले में समीक्षा करना कि इनकी जनता में छवि कैसी है? आप अपने नौकरशाहों पर भी नजर दौडाना कि देखना कि उन्होंने उत्तराखंड में रहते हुए कितनी अकूत सम्पति इकठ्ठा कर ली है। देखना कि आपके राज में उत्तराखंड से प्यार करने वाले नौकरशाह कैसे अलग-थलग रह कर सिर्फ वेतन ले रहे हैं और भ्रष्ट नौकरशाहों को कैसे आपके राज में अहम जिम्मेदारियां मिल रही हैं?
 
आप अपने और साकेत के बयानों पर भी कभी अकेले में गौर करना जब आपने चुनाव में अपने पुत्र साकेत को "इनोवा कार" और भाजपा प्रत्याशी राज्य लक्ष्मी शाह को "छकडा जीप" बता कर लोगों को अपने खिलाफ किया। कैसे साकेत अपने भाषणों में कहते थे कि वे तो बोलने के लाखों रुपये लेते हैं, अब आपके सामने फ्री में बोल रहे हैं.… आपकी इन बचकानी हरकतों ने मतदाता इतना नाखुश हुआ कि काफी वोट रानी के पक्ष के बजाये आपके विपक्ष में पड़े और आपकी हार हुई.… आपके इर्द गिर्द मंडराने वालों ने आपसे कहा होगा कि साकेत को लाखों वोट कैसे मिले, तो आपको बता दें कि साकेत की जगह अगर कांग्रेस से सौणा सिंह भी होता तो वह वोट उसको भी मिलता क्योंकि वह कांग्रेस की सौ साल से भी ज्यादा के विरासत के कारण है.
 
मान्यवर, साकेत एक लिखा पढ़ा बहुराष्ट्रीय कंपनी का कारिन्दा व वकील है, पर डीएवी कालेज देहरादून में जिस तरह उन्होंने गेट पर जड़ा ताला खुलवाया वह उनके किसी फ़िल्मी सीन जैसा था, यह किसी और राज्य में तो चल सकता है, पर उत्तराखंड जैसे शान्तिप्रिय राज्य में तो बिलकुल नहीं। साकेत उत्तराखंड के जनप्रतिनिधि बनने की होड़ में हैं, ज़रा अपने दिल्ली स्थित आवास में ध्यान देना कि वे पहाड़ के लोगों से कैसे और कितना मिलते है? और गैर उत्तराखंडी मोटे तोंद वालों से कैसे?? आम लोगों का कहना है कि निशंक सरकार के घोटालों को लोग आपके शासन में चल रही अराजकता के सामने भूल से गए हैं. निशंक शासन में कथित घोटालों का चित्रकार नौकरशाह आपके शासन में भी उत्तराखंड का प्रमुख भाग्य विधाता बना है, पता कीजिये कि वे निजी हेलीकाप्टरों में सीटी बसों की तरह क्यों और कैसे घूमते है? जबकि एक सचिव का महीने भर का वेतन दिल्ली के एक चक्कर का किराया ही होता है??.
 
मान्यवर, कुर्सी दिल्ली से मिल सकती है पर उसको मजबूती जनता ही प्रदान करती है. उत्तराखंड में आई आपदा से लोगों का पलायन तेजी से हो रहा है.. यह आपदा यहाँ आख़िरी नहीं है.आप यहाँ आपदा प्रबंधन के लिए एक बल का गठन कर रहे है जिसमें पुलिस वालों को भेज रहे हैं.… दुःख है कि आपको पहाड़ के मिजाज का अब तक पता नहीं चल पाया है.। आपको हर नदी घाटी में स्थानीय युवकों का बल गठन करना चाहिए जो आपदा प्रबंधन के समय त्वरित कार्रवाई कर सके, आप इनको 10 -15 हजार वेतन पर भी रखेंगे तब भी चलेगा और ये लोग जंगलों से आग से बचाने, बृक्षरोपण करने, पर्यटन को बढ़ावा देने जैसे कई कामों में सरकार की मदद कर सकते हैं.। क्यों न पूरे पहाड़ में ऐसे 50 हजार लोगों के बल का गठन हो, ये लोग बदरीनाथ के पास पहुंचकर मटरगस्ती करने वाले चीन को, सेना के साथ मिलकर आँखे भी दिखा सकते हैं! इससे पलायन भी रुकेगा और हिमालय भी बचेगा।
 
मान्यवर, कभी ध्यान से मनन करके तटस्थ भाव से देखना आपके इर्द गिर्द जनसेवक नहीं अधिकतर प्रोपर्टी डीलर हैं जो जहाज के डूबते ही चूहों की तरह सबसे पहले भागकर दूसरे जहाज में शरण ले लेंगे। सैकड़ों सालों के बाद उत्तराखंड इतनी भीषण आपदा की चपेट में है, आप जुगाड़बाजी के सहारे सत्ता चलाकर सबसे बड़े खलनायक भी बन हैं! और हिमालय के गरीबों की सच्चे दिल से सेवा करके सबसे बड़े हीरो भी.…!! फैसला अभी आपके हाथ में है समय बीतने के साथ-साथ आपके हाथ से वह अधिकार भी जाता रहेगा!! ज्यादा क्या लिखें आप खुद समझदार हैं कम लिखे को ही ज्यादा समझना जी!!!
 
हिमालय के चन्दन हेमवती नंदन का एक प्रशंसक और उत्तराखंड का शुभ चिन्तक
 
विजेंद्र रावत
पत्रकार 
देहरादून

यूपी में दो माह में चार पत्रकारों की हत्या पर ”वॉल स्ट्रीट जर्नल” में छपी स्टोरी

यूपी में सपा राज निश्चित रूप से बसपा राज से भी बुरा साबित हो रहा है, अभी जबकि सत्ता में आए दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं. खासकर मीडिया वालों के लिए तो यूपी बेहद असुरक्षित और डरावना इलाका बन चुका है. दो महीने में चार पत्रकारों की हत्याएं की गईं. सैकड़ों पत्रकारों पर फर्जी मुकदमे लादे गए और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया. मीडिया वाले अब लोकसभा का इंतजार कर रहे हैं जिसमें वो सपा को झटका दिला सकें. 
हालांकि मीडिया वालों के हाथों में सीधे तो वोट नहीं है लेकिन वे अपने जरिए एक बड़े समुदाय को प्रभावित करते हैं. यही कारण है पूरे यूपी में मीडिया वाले सपा के खिलाफ खड़े हो चुके हैं और बदला निकालने के लिए उचित मौके के इंतजार में हैं. मीडिया के लिहाज से यूपी की खराब हालत का जिक्र तो अब अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में होने लगा है. ''वॉल स्ट्रीट जर्नल'' में यूपी के जंगलराज के बारे में खबर छपी है जिसमें मीडिया वालों के दुख का जिक्र किया गया है. पूरी खबर इस प्रकार है…
 
Worrying Trend in Journalists’ Murders
 
By Vibhuti Agarwal
 
Four journalists have been killed in Uttar Pradesh in northern India in the last two months, according to local police and media groups, raising fears that press freedom in the world’s biggest democracy is increasingly at risk. On Sunday, Rakesh Sharma, a 50-year-old reporter with a Hindi newspaper in the state was shot dead by two men on motorcycle while he was returning home from work, according to Nilabja Chaudhary, the senior superintendent of police in Etawah, the district where the incident took place.
 
“Prima-facie, it appeared to be a case of personal hostility,” Mr. Chaudhary told India Real Time Tuesday. A comprehensive probe is underway, he added.
 
In another incident, the body of a local journalist Zakaullah, who goes by one name, was found on Saturday dumped in a jute bag by the roadside in Bulandshahr district, nearly 250 miles from the state’s capital Lucknow, said Nitin Tewari, senior superintendent of police in Bulandshahr in an interview with India Real Time Tuesday.
 
“It seemed he had been brutally beaten to death since his body had numerous wound marks,” Mr. Tewari said. The case is under investigation, he added.
 
Separately, a local television reporter Shashank Shukla was found dead in Banda district, 120 miles from Lucknow and another unnamed journalist was found murdered in Lakhimpur Kheri district, 107 miles from the state’s capital, last month, police in the two districts said.
 
In both cases, police have no clues about the identity of the attackers or the motive for the murders.
 
The Committee to Protect Journalists, a U.S. based eminent journalist body, said 51 journalists have been killed in India since 1992. Out of these, in 29 cases, the motive for the killings has been identified, while in the remaining cases, it remains unclear.
 
A survey by International News Safety Institute, a U.K. based non-governmental organization for the safety of journalists and media staff, this month listed India as the “second most dangerous” country for journalists after Syria, with six deaths during the first six months this year.
 
The last time India appeared among the top five worst countries was in 2010, the survey added.
 
Journalists in Uttar Pradesh are becoming increasingly angry with police for failing to make a breakthrough in the recent killings and have demanded greater protection from the state government.
 
“It is a matter of serious concern. The killings underline the increasing threat journalists are being subjected to by powerful political and business interests involved in unlawful activities,” said Satyaveer Singh, vice president of the Uttar Pradesh Accredited Correspondents Committee, a local body of journalists.
 
He said that in recent weeks, there had been several incidents of journalists, “mostly covering politics, business and corruption, being beaten or threatened” by politicians and criminals.
 
“This is a latest trend,” the local group of journalists said in a letter to the state’s chief minister earlier this week, according to Mr. Singh. “If such incidents continue to happen without being checked, they will certainly act as a deterrent for journalists who are exposed to multiple risks while performing their duties and investigating issues,” the letter said.
 
Siddharth Kalhans, secretary of the Uttar Pradesh Accredited Correspondents Committee said the state government was “not paying due attention” towards the security of journalists.
 
“In many cases, journalists had demanded police protection but their demands were unattended,” Mr. Kalhans said.
 
Journalists in smaller towns and cities cannot write against local authorities, he added. “Otherwise they should be ready to face the consequence,” he said.
 
In separate incidents this year, a journalist in the central Indian state of Chhattisgarh was found dead in February with his throat slit, and in May, a proof-reader of a Bengali newspaper was stabbed to death, according to the INSI.
 
After the killings in Uttar Pradesh over the last two months, the total number of journalists murdered in India so far this year has gone up to 10.
 
The INSI survey said Syria was the most dangerous country for journalists with eight deaths between January and June followed by India with six deaths, Pakistan – five, Somalia – four and Brazil – three deaths.
 
S.N. Sinha, president of the Indian Journalists Union, a New Delhi-based group of leading Indian journalists, said the central government should bring in a law to provide “legal cover” to journalists and ensure speedy trials of cases related to attacks on them.
 
“Attacks on journalists should be tackled with a strong hand. They must be allowed to work in a secure environment,” Mr. Sinha said.

वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू) यानि तीसरी आंख, जिसकी नजर है आपके फाइनेंस ट्रांजेक्‍शन पर

''बड़ा भाई देख रहा है'', ''प्रिज़्म कार्यक्रम'', ''स्नौडेन का खुलासा''। ये सभी वाक्यांश विभिन्न सरकारों द्वारा अपने ही नागरिकों की हो रही खुफ़िया निगरानी के बारे में खुलासे करते हैं और हम हमेशा इस निगरानी को बहुत नकारात्मक नज़रिए से देखा करते हैं। हम इसे हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के रूप में देखते हैं जबकि किसी भी निगरानी तंत्र का अभाव, निगरानी होने से ज़्यादा बुरी हालात को जन्म देता है। प्राचीन भारत के पहले शासक प्रबंध की शिक्षा देने वाले ग्रंथ कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र में भी राज्य द्वारा गुप्तचरों के प्रयोग करने के विशद विवरण और निर्देश दोनों मौजूद हैं फ़िर सभी प्रकार की गुप्तचरी को राजनीतिक उत्पीड़न या विचारों के दमन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। कहीं ना कहीं इससे जनकल्याण की भावना भी जुड़ी है। 
यह रिपोर्ट एक ऐसी ही बहुत छोटी संस्था जो भारत सरकार के आधीन कार्यरत है, के क्रियाकलापों और गतिविधि के बारे में बताती है। इस नामालूम सी संस्था का नाम है वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू). वर्ष 2004 में गठित यह यूनिट भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और राजस्व विभाग के अधीन कार्यरत है और अनेक स्त्रोतों से सूचना प्राप्त करती है,, किन्तु इसकी तुलना अन्य संगठनों जैसे आईबी या फ़िर डीआरआई से नहीं की जा सकती,  क्योंकि ना तो यह ज़मीनी स्तर पर जुड़ी हुई है और ना ख़ुद कोई सीधी कार्रवाई करती है। इसका गठन हाल में किया गया है।
 
इसका बजट और स्‍टॉफ किसी जिले की पुलिस जितनी भी नहीं है। लेकिन इसका अद्रश्य रूप और लघु आकार होना इसके कार्य की गंभीरता, लगन और कुशलता को न तो प्रभावित करता हैं और न ही इस पर किसी प्रकार का अविश्वास किया जाता है। विभिन्न सरकारी विभाग इसकी सूचनाओं को बेहद महत्व देते हैं और उन पर बराबर कार्यवाही की जाती है। इसकी सूचनाओं के आधार पर आयकर विभाग सर्च कर सकता है। वहीं एनआईए, सीबीआई, ईडी आदि संस्थाए इसे अपनी जरुरत के अनुरुप इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं।
 
गठन :इस संस्था का मुख्‍यालय नई दिल्ली में है और अपनी सभी गतिविधियां वहीं से चलाती है। यही पर देश के भीतर और बाहर से आई सूचनाओं को एकत्र करने, उसका प्रारंभिक विश्लेषण करने और उसे संबधित एजेंसी या विभाग को भेजने का कार्य किया जाता है। और यह सभी कार्य बामुश्किल तीस या चालीस लोगों का समूह करता है। यह बल नितांत पेशेवर है और इसमें मुख्य भूमिका निभाते है भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी गण।
 
एसटीआर-एफआईयू सूचना का सार : इस संगठन द्वारा जिस प्रारूप में सूचनाएं तैयार की जाती है उसे एसटीआर कहा जाता है जिसका अर्थ है संदिग्ध लेनदेन रिपोर्ट। इस रिपोर्ट का आधार होता है आर्थिक संस्थाएं एवं संगठन जैसे बैंक, म्‍युचुअल फंड, शेयर बाजार, क्रेडिट कार्ड और बीमा कंपनी में किए गए निवेश। इस संस्‍था को भारत से बाहर सूचनाएं मुख्य रुप से उन विदेशी एजेंसियों से मिलती हैं जिनके साथ भारत सरकार की किसी प्रकार की संधि हैं।
 
एसटीआर के विवरण: एक एसटीआर में जो विवरण होते हैं वे इस तरह हैं:
 
–  व्यक्ति का सामान्य परिचय, उसका पता, आयु, पेशा
– भूतकाल में किए गए लेन देन का संक्षेप।
– उन अमुक लेन देन का विवरण जो संदेहजनक है एवं उसका कारण।
– व्यक्ति के अन्य विवरण जैसे बैंक खाते, सम्पदा, उसका इतिहास इत्यादि।
 
एक एसटीआर अनेक कारणों से बन सकती है, कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:
 
– एक विदेशी छात्र दिल्ली में पढ़ता है। हर महीने उसके परिजन उसे खर्च के लिए 250 डॉलर भेजते हैं। अचानक एक दिन उसके खाते में एक लाख डॉलर आ जाते हैं जिसे वो तुरंत निकाल लेता है। यह पूर्णत संदेहजनक लेनदेन है कि किस कारण से उतना धन आया है, क्या वह भूमि खरीद रहा है या इस धन का कोई अन्य प्रयोग होगा? इसकी तुरंत जांच की आवश्यकता है।
 
– 40 वर्ष पार की एक महिला है जिसके बचत खातें में कभी दस–बारह हजार रुपए से ज्यादा राशि नहीं होती और साल में पांच या सात से ज्यादा लेनदेन भी नहीं होते। फ़िर एक दिन अचानक उसके खाते में लाखों करोड़ों का लेन देन हो जाता है। ऐसे में इस धन का स्त्रोत और प्रयोग दोनों ही जांच का विषय बन जाते हैं। एक एसटीआर का प्रयोग परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में संभव है हालांकि ज्यादातर इसके आधार पर सिर्फ जांच शुरू ही की जाती है।
 
यदि एक बार यह रिपोर्ट लिख दी जाए तो अगले सात सालों तक  इसका प्रयोग आयकर विभाग आपके खिलाफ कर सकता है वहीं दूसरी एजेंसी जो अपराध की जांच करती है इसका प्रयोग किसी भी समय यानी 100 साल तक कभी भी कर सकती है। ऐसी दशा में यदि आप कोई बड़ा लेनदेन कर रहे हैं और सोचते है कि मिलने वाला पैसा आप अपनी मां या दादी के बैंक खाते में रखकर चैन की बंसी बजाएंगे, कर चुकाने से बच जाएंगे या कोई गैर क़ानूनी काम करते रहेंगे और सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा एवं आपको कोई पकड़ नहीं पाएगा तो याद रखिये “वे सब जानते है” यह सिर्फ समय की बात है जब आपके दरवाजे पर दिन या आधी रात को कोई दस्तक देगा और आपसे हिसाब किताब मांगा जाएगा।
 
लेखिका अर्चना यादव स्वतंत्र पत्रकार हैं.

साभार- मोलतोल

 

प्रेस क्लब आफ इंडिया और यूनिसेफ यौन हिंसा से लड़ने के लिए एक साथ काम करेंगे

: यह रेड सायरन बजाने का समय : प्रेस कल्ब आफ इंडिया और यूनिसेफ के बीच इस बात पर सहमती बनी है कि ये दोनों मिलकर बच्चों विशेष रूप से लड़कियों के खिलाफ यौन हिंसा एवं अन्य तरह के उत्पीड़न के मसले पर मिलजुलकर काम करेंगे. पत्रकारों को इस समस्या से रूबरू कराने और इस दिशा में उनका सहयोग प्राप्त करने के लिए 21 अगस्त को प्रेस क्लब आफ इंडिया के सभागार में यूनिसेफ और प्रेस क्लब आफ इंडिया ने एक परिचर्चा का आयोजन किया. दरअसल यह प्रेस क्लब आफ इंडिया और यूनिसेफ के संयुक्त प्रयास से भविष्य में आयोजित किये जाने वाले विभिन्न सेमिनारों की कड़ी में पहला सेमिनार था, जिसके तहत बच्चों के खिलाफ होने वाला हिंसा विशेष रूप से लड़कियों के साथ होने वाले यौन हिंसा और शारीरिक उत्पीड़न पर केंद्रित था. 
इस सेमिनार में यूनिसेफ की तरफ से कैरोलिन डेल डल्क, प्रमुख एडवोकेसी एंड कम्यूनिकेशन, डोरा ग्यूस्टी, चाईल्ड प्रोटेक्शन स्पेशलिस्ट, एवं इंडिया एलांर्इंस फॉर चाईल्ड राईट्स की रजिया इस्माईल ने अपनी बात रखी. प्रेस क्लब आफ इंडिया की तरफ से जनरल सेक्रेट्री अनिल दीवान व विनिता यादव, प्रमुख डिस्कशन कमिटी मौजूद रहीं. परिचर्चा की शुरूआत करते हुए इस वार्ता का आयोजन प्रेस क्लब की तरफ से किये जाने पर खुशी जाहिर करते हुए अनिल दीवान ने कहा कि दोनों संस्थाओं का एकसाथ काम करने के पीछे उद्देश्य यही है कि महिला एवं बच्चों से जुड़े मुद्दों को सक्रियता से उठाया जा सके और इसके विभिन्न पहलुओं को मिलजुलकर जनता के समक्ष लाने का प्रयास हो ताकि ऐसी घटनाओं के प्रति समाज को सजग किया जा सके. 
 
इस परिचर्चा के दौरान आयोजकों द्वारा यूनिसेफ के गुडविल अम्बास्डर अमिताभ बच्चन की आवाज में दो वीडियो भी दिखाया गया, जिसके जरिए अमिताभ बच्चन  जनता को इस बात के लिए आगाह करते हैं कि बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा एवं अन्य प्रकार के अपराध लगातार घटित हो रहे हैं. उनका कहना है कि आप बच्चों के खिलाफ घटित हो रहे हिंसा को नहीं देख पाते इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि ऐसी घटनाएं घटित नहीं हो रही हैं. अमिताभ की आवाज गूंजती है ‘ अदृश्य को सदृश्य बनायें. बच्चों के खिलाफ हिंसा को खत्म करने में हमारी मदद करें. हमारे साथ जुड़े. आवाज उठायें.’
 
एक आंकड़े के मुताबिक भारत में पिछले 10 वर्षो में जो मामले दर्ज किये गये हैं, उसमें 336 फीसदी की बढोतरी हुई है. वर्ष 2011 में बलात्कार के जो मामले दर्ज किये गये, उसमें एक तिहाई लड़कियां थीं जो कि 18 वर्ष की उम्र सीमा में शामिल थीं.  ऐसे 7,112 मामले दर्ज हुए. यौन उत्पीड़न के इससे भी ज्यादा मामले हैं, ये मामले सामने नहीं आ पाते. लड़कियों को लोकलाज के डर से अपने दर्द को छिपाने को मजबूर करता है. विनिता यादव ने सरकारी आंकड़ो का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2011-12 मे बाल मजदूरों के ट्रैफिकिंग के 1 लाख 26 हजार मामले दर्ज किये गये. इनमें से सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में 29, 947 मामले और बिहार में 9, 673 मामले सामने आये. देश की राजधानी दिल्ली में 605 मामले दर्ज किये गये. 
 
बचपन बचाओ आंदोलन के आंकड़ो के हवाले से विनिता यादव ने कहा कि वर्ष 2011 में 24, 744 बच्चे विभिन्न मेंट्रो शहरों कोलकाता, बेग्लुरू, मुंबई और दिल्ली से गायब हुए. इनमें सबसे ज्यादा बच्चे दिल्ली से 6,785 बच्चे गायब हुए. जिनमें से 850 बच्चों का अभी तक पता नहीं चल पाया है. विनिता ने प्रेस क्लब आॅफ इंडिया और यूनिसेफ की तरफ से पत्रकारों से कहा कि इस तरह के कार्यक्रम आगे भी कराये जायेंगे. प्रेस क्लब आॅफ इंडिया और यूनिसेफ के तरफ से वैसे पत्रकारों को जो कि विभिन्न जगहों पर जाकर ऐसे सामाजिक मुद्दों पर रिर्पोटिंग करना चाहते हैं, जमीनी हकीकत को टटोलना चाहते हैं, और समस्या के प्रति अधिक से अधिक लोगों को जागरूक करना चाहते हैं, उनके लिए हर तरह की सुविधा उपलब्ध करायी जायेगी. विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर आगे भी ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा. 
 
प्रेस विज्ञप्ति

कुल्लू में मुंबई गैंगरेप के खिलाफ पत्रकारों का प्रदर्शन (देखें तस्वीरें)

कुल्लू : मुबंई में महिला पत्रकार के साथ गैंगरेप करने वाले आरोपियों को सख्त से सख्त सजा देने की मांग को लेकर जिला मुख्यालय के पत्रकारों ने काले बिल्ले पहनकर रोष रैली निकाली। बाद में एडीएम कुल्लू के माध्यम से प्रधानमंत्री व कानून मंत्री को ज्ञापन भी भेजा। इस अवसर पर समस्त पत्रकारों ने गैंगरेप में शामिल रहे दोषियों को फांसी देने की मांग की। साथ ही देश भर में हो रहे गैंगरेप पर चिंता जताई तथा ऐसे कृत्य को अंजाम देने वालों को केवल फांसी दिए जाने की मांग की। 
इस अवसर पर पत्रकारों ने जिला मुख्यालय में हाथों में पट्टिकाएं लेकर अपना विरोध दर्ज किया और सरकार से महिलाओं व महिला पत्रकार तथा अन्य समस्त पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की भी मांग की है। बाद में प्रदर्शनी मैदान में इकटठा होकर पत्रकारों ने देश में हो रही गैंगरेप की घटनाओं पर चर्चा की तथा ऐसी घटनाओं की निंदा भी की गई। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार शालिनी राय, श्याम कुल्लवी, दौलत भारती, अश्वनी शर्मा, प्रदीप कुमार, युवराज बौद्ध, नारायण ठाकुर, दिपेन्द्र मांटा ने पत्रकारों को संबोधित किया।
रोष प्रदर्शन में मीडिया मंच के प्रदेशाध्यक्ष श्याम कुल्लवी, प्रेस क्लब कुल्लू के अध्यक्ष अशेष शर्मा,  महासचिव आशीष शर्मा, मीडिया मंच कुल्लू के अध्यक्ष मनमिन्द्र अरोडा, महासचिव प्रदीप कुमार सहित शालिनी राय, प्रियंका राजपूत, रेणुका गौतम, अनिता ठाकुर, कमलेश वर्मा, सीमा ठाकुर, निशा कायथ, रिनू देवी, दौलत भारती, ताराचंद थरमाणी, नारायण ठाकुर, अरूण कुमार गर्ग, युवराज बौद्ध, संदीप शर्मा, गौरी शंकर, पंकज हांडा, करतार कौशल, दिपेन्द्र मांटा, अकिल खान, विनोद महंत, गौरव ठाकुर, कैलाश ठाकुर, जसपाल सिंह, मुकेश अरोडा, जी एस बब्बू, अजय राणा, धनी राम ठाकुर, अजय कुमार, प्रेम सागर, सुमित ठाकुर, अक्षय कुमार, आलोक कुमार, सुशांत, बालकृष्ण, राम चौहान, बिलू, जोगिन्द्र सिंह, तुलसी बाबा, नलिन कार्की, तरूण विमल, अनिल कुमार चौहान, संजय कुमार, प्रताप सिंह, प्रेम चंद, तिलक राज, अजय, मोहर, दलीप, अशोक, राजेन्द्र चौधरी सहित कई अन्य पत्रकार भी उपस्थित रहे।
 
प्रेस नोट जारीकर्ता प्रदीप कुमार

1500 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की है पीके तिवारी और महुआ वालों ने, चार्जशीट दाखिल

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले पीके तिवारी उर्फ प्रमोद कुमार तिवारी की कहानी भी चरम उत्थान और चरम पतन की है. इस एक शख्स से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. अपने जीवन में जितने रंग पीके तिवारी ने देखे होंगे, उतना शायद ही किसी ने. फर्श से अर्श और फिर अर्श से फर्श की दास्तान हैं पीके तिवारी. इन पीके तिवारी की कंपनी महुआ पर पंद्रह सौ करोड़ रुपये के धोखाधड़ी का आरोप है. 
पूरे मामले की सीबीआई जांच चल रही है. ताजी जानकारी ये है कि सीबीआई ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी है. चार्जशीट में प्रमोद तिवारी के अलावा आनंद तिवारी, डा. सीताराम गुप्ता, राजेश गुप्ता, बसंत गुप्ता, ऋतु सेठी, भार्गव सहित कुल 12 लोग आरोपी बनाए गए हैं. महुआ प्राइवेट लिमिटेड ने बैंकों से करीब 1500 करोड़ रुपये की साजिश रच कर धोखाधड़ी की है. वर्ष 2012 में महुआ मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ पंजाब नेशनल बैंक, बैंक आफ बड़ौदा सहित कई अन्य बैंकों ने सीबीआई को शिकायत देकर मामला दर्ज कराया था. इस पूरे प्रकरण को लेकर आज हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में दिनेश वत्स की बाइलाइन खबर प्रकाशित हुई है. खबर की कटिंग यहां संलग्न है…

पीके तिवारी का भड़ास पर प्रकाशित एक पुराना इंटरव्यू पढ़ें : मैं रिस्क कैलकुलेटेड लेता हूं


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फेसबुक पर लव के बाद सेक्स और हत्या

नोएडा। राजधानी दिल्‍ली से सटे नोएडा में इश्‍क और बेवफाई का एक खूनी खेल सामने आया है। यहां के एक गेस्‍ट हाउस के कमरे में पेशे से फैशन डिजाइनर एक युवती का शव बरामद होने से हड़कम्‍प मच गया। ऐसा बताया जा रहा है कि उसके प्रेमी ने ही उसकी हत्‍या कर दी और फिर फरार हो गया। युवती के मुंह से झाग निकल रहा है जिसके बाद ये आशंका जताई जा रही है जहर देकर उसकी हत्‍या की गई है। पुलिस ने इस मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया है और मामले की छानबीन कर रही है। 
मूल रूप से बर्रा (कानपुर) की रहने वाली 28 वर्षीया लुबना महमूद सेक्टर-27 स्थित पीजी में रहती थी। वह सेक्टर-26 स्थित एक एक्सपोर्ट हाउस के ऑफिस में बतौर फैशन डिजाइनर कार्यरत थी। मंगलवार देर शाम को वह अपने मित्र पनवेल (मुंबई) निवासी शहबाज एम देशमुख के साथ सेक्टर-27 के रूबीकॉन रेजीडेंसी में आई थी। साढ़े छह बजे दोनों ने कमरा बुक कराया। रात साढ़े दस बजे रात को शहबाज चला गया। बुधवार दोपहर तक जब कमरे से कोई बाहर नहीं निकला तो गेट हाउस के मैनेजर को शक हुआ। 
 
उसने दरवाजा खोला तो लुबना कमरे के अंदर बेड पर पड़ी हुई थी और उसके मुंह से झाग निकल रहा था। मैनेजर ने फौरन इसकी सूचना पुलिस को दी। सूचना पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने फौरन उसे अस्‍पताल में भर्ती कराया मगर डॉक्‍टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक छानबीन में जो बात सामने आई है उसके अनुसार लुबना व शहबाज की दोस्ती एक साल पहले फेसबुक पर हुई थी। दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। शहबाज हर सप्ताह नोएडा प्रेमिका से मिलने आता था। पुलिस ने शव को पोस्‍टमार्ट के लिये भेज दिया है। वहीं लुबना के भाई की तरफ से नोएडा सेक्‍टर 20 कोतवाली में हत्‍या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस शहबाज एम देशमुख के कॉल डिटेल्‍स खंगाल रही है और उसकी गिरफ्तारी के लिये संभावित जगहों पर छापेमारी की जा रही है।
 

क्या बीइए, एनबीए इसकी भर्त्सना करते हुए प्रेस रिलीज जारी करेंगे?

Vineet Kumar : अगर जन्म के पूर्व लिंग परीक्षण कानूनी अपराध है तो जी न्यूज की अल्का सक्सेना आखिर क्यों इतनी बेशर्मी से ये लाइन बार-बार दोहरा रही थी कि- सबको चाहिए कान्हा? क्या उस क्लिनिक पर तत्काल कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए और जी न्यूज से जवाब-सवाल तलब नहीं किए जाने चाहिए कि एक क्लिनिक और उसके डॉक्टर खुलेआम सजेरियन के जरिए निर्धारित समय से पूर्व डिलिवरी करा रहे हैं तो आपने इसे महिमामंडित करने के बजाय इस पर निगेटिव स्टोरी क्यों नहीं चलायी? 
 
आपने यहां के डॉक्टरों से एक बार भी ये क्यों नहीं पूछा कि इन्हें कैसे पता कि कान्हा यानी लड़का ही होगा? इसका मतलब है कि इन्होंने पहले ही अल्ट्रसाउंड कराकर ये पता लगा लिया कि लड़का होगा..ये बात एक नेशनल चैनल से ग्लैमराइज करके हाइप क्रिएट करना किस हद तक सही है? मीडिया की नैतिकता और सामाजिक दायित्व पर अजगर जितनी लंबी-लंबी चर्चाएं करनेवाले हमारे मंहत इस पर कुछ बोलेंगे ? क्या बीइए, एनबीए इसकी भर्त्सना करते हुए प्रेस रिलीज जारी करेंगे या फिर इतनी बड़ी घोर अमानवीय और गैरकानूनी कदम पर यूं ही पर्दा डालकर चुप्प मार जाएंगे?
Vineet Kumar : अल्का सक्सेना जैसी सालों से टेलीविजन के लिए काम करती रही मीडियाकर्मी को अगर सजेरियन के जरिए निर्धारित समय से पूर्व इसलिए बच्चे को जन्म देने में कुछ भी गलत,अमानवीय और गैरकानूनी नहीं लगता क्योंकि ऐसा होने से कान्हा पैदा होंगे तो क्या आप किसी पाखंड़ी, अंधविश्वासी, और जादू-टोने की दूकान चलानेवाले से उम्मीद करते हैं कि समाज से ये सब खत्म हो जाएगा? 
 
अल्का सक्सेना जैसी पुराने पुराने मीडियाकर्मी को न्यूजरुम में इस तरह की कथा बांचने और इस घोर अमानवीय, गैरकानूनी करतूतों को सत्यनारायण स्वामी की कथा बनाकर,रस ले-लेकर बांचने में भले ही आनंद आता हो लेकिन वो इस बात का अंदाजा नहीं लगा पा रही हैं, कि नए मीडियाकर्मियों के लिए क्या देकर जाएंगी. न्यूजरुम डायवर्सिटी पर बात करते हुए अक्सर कुछ लोग इस बात पर उम्मीद जताते हैं कि अगर इसमें स्त्रियों की संख्या बढ़ती है तो स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता और न्याय का स्तर भी बढ़ेगा लेकिन अगर अल्का सक्सेना जैसे लोग ही हों तो क्या बढ़ सकेगा ? इनलोगों के पास तो पत्रकारिता की एक महान विरासत( हालांकि ऐसा मानने में मेरी असहमति है) लेकिन ये विरासत के नाम पर क्या देंगी, जरा सोचिए( जरा सोचिए पंचलाइन जी न्यूज से साभार)
 
युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

हिंदी और हिंदी पत्रकारिता के गढ़ बनारस में पत्रकारिता घुटनों के बल बैठ चुकी है

विभांशु दिव्याल : हिंदी और हिंदी पत्रकारिता के गढ़ बनारस में पत्रकारिता घुटनों के बल बैठ चुकी है। बंगाल में 'हिक्की गजट' के बाद बनारस में संस्कृत भाषा में समाचार पत्र छपने शुरू हुए। बंगाल और बनारस की पत्रकारिता ने आज़ादी की लड़ाई में बंदूक से ज्यादा गोलियां कलम से चलाई थीं। समाचार पत्रों की आवाज़ को दबाने के लिए अंग्रेजों ने 'वर्नाकुलर एक्ट' बनाया।  लेकिन अब बनारस की पत्रकारिता महज 'चंपूगिरी' और 'मुखबिरी' तक सीमित हो गई है। आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों की लाठी और गोली खाने वाले 'स्वर्गीय' पत्रकारों के 'वंशज' पुलिस की एक नोटिस पर दंडवत हो जा रहे हैं। नई नई बनी 'इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएशन' ने बीएचयू की खबरों का कवरेज नहीं करना का फैसला किया है लेकिन एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान एसएसपी के यहां से 'दुत्कार' कर भगाए जाने के बाद भी कप्तान के 'सत्कार' में लगी हुई है।
इस एसोसिएशन के कुछ पुलिसिया 'मुखबीर' गाहे बगाहे 'बाईट' लेने के बहाने कप्तान साहब के 'हमराही' की भूमिका बदस्तूर निभा रहे हैं। 'लिपलिपास्तव' मिजाज वाले ये पत्रकार, पत्रकारिता के ऊपर 'बोझा' बन चुके हैं जिन्होंने अपने 'पित्तरों' के श्राद्ध के लिए पत्रकारिता की 'दुकान' खोल रखी है। साल भर कुएं के मेढक की तरह पत्रकारिता के 'भौकाल' से बनाए गए अपने 'महलों' में रहने वाले ये पत्रकार फाइव स्टार होटलों में होने वाली प्रेस कांफ्रेंस में खूब फुदकते हैं। सबसे आगे वाली सीटों को सुशोभित कर 'गंभीर' पत्रकार की छवि को अपनी 'जेब' और 'शरीर' की तरह कायमचूर्ण खा खाकर 'भारी' बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। दलाली के माध्यम से 'बिजनेस टाइकून' बन चुके ये पत्रकार 'व्यवसायिक' सरोकारों वाली पत्रकारिता के पुरोधा बन चुके हैं जिनके बिजनेस में मंदी का दौर कभी नहीं आता। 
 
'दिवंगत' होने की कगार पर खड़े कुछ पत्रकारों की 'पगार' पराड़कर भवन से ही मिलती है। हिंदी पत्रकारिता के जनक माने जाने वाले पराड़कर जी के नाम पर बनाए गए 'पराड़कर कांफ्रेंस हाल' में कुछ पत्रकार अल सुबह ही आ बैठते हैं। 'गैर सरकारी' आंकड़ों पर भरोसा किया जाय तो पत्रकारिता के अपने बिजनेस के दौरान एक एक पत्रकार पराड़कर भवन में बैठ कई 'ट्रक' समोसों का रसास्वादन कर चुका है। 
 
खड़ी बोली साहित्य के जनक भारतेंदु जी की जन्मभूमि में हिंदी का हाल भी बेहाल है। हालिया दिनों में 'पोर्न' पत्रकारिता के लिए कुख्यात हुए समाचार पत्र के न्यूज़ पोर्टल के लिए बनारस में कार्यरत संवाददाता की हिंदी में काबिलियत ऑनलाइन देखी जा सकती है। कहने को तो मीडिया में कार्यरत हैं लेकिन इनके लिए मीडिया का तत्सम रूप 'मिडिया' होता है( पोर्टल पर लगी राजा भैया वाली खबर के अनुसार), बंगाल से इम्पोर्ट होकर आये ये 'बाबू मोशाय' अक्सर भारतेंदु जी की हिंदी पर सवालिया निशान लगाते रहते हैं। 
 
उत्तर प्रदेश में तीसरे नंबर पर पहुंच चुके क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल के संवाददाता हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी की भी टांग तोड़ते रहते हैं। इन्हें हिंदी लिखने नहीं आई तो 'वरुणा' की कसम खाकर इन्होने 'ताउम्र' अंग्रेजी को 'प्लस माइनस' करते रहने की कसम खा ली। 
 
यारों मुझे मुआफ़ रखो, मैं नशे में हूं.
 
बनारस के युवा पत्रकार विभांशु दिव्याल के फेसबुक वॉल से.

राजस्थान में शराब के कारोबार को बढ़ावा देती सरकार

राजस्थान में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। पिछले चुनाव के समय आबकारी नीति एक मुद्दा थी। तब कांग्रेस विपक्ष में थी और भाजपा सत्ता में। हमलावर कांग्रेस और मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाए थे कि भाजपा शराब संस्कृति को बढ़ावा दे रही है। तब ’एट पीएम, नो सीएम’, जैसे जुमले कांग्रेस के मंच से कहे जाते थे। हालांकि भाजपा ने आरोप को बेबुनियाद बताया था। लेकिन, कांग्रेस ने जो घेराबंदी की, उससे चुनाव में भाजपा के खिलाफ शराब को लेकर एक माहौल बना। तब शराब के दुष्परिणामों के भुगतभोगियों और उनके परिजनों में यह उम्मीद जगी थी कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर शराब की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। बल्कि, बीते साढ़े चार साल के आंकड़े और घटनाएं इसके उलट है।
सरकार बनने के बाद शराब के प्रति कांग्रेस का रवैया कैसा रहा है ? इसका आभास इन तथ्यों से सहजता से लगाया जा सकता है। गहलोत राज में आबकारी से होने वाली आमदनी दोगुनी से ज्यादा हो गई है। सत्ताच्युत भाजपा सरकार के अन्तिम वर्ष 2007-8 में आबकारी से 1805 करोड़ रुपए की आमदनी हुई थी। वित्तीय वर्ष 2012-13 में यह 3775 करोड़ रुपए रही। सरकार ने अगले साल का लक्ष्य 4500 करोड़ रूपए रखा है। इन आंकड़ों से एक बालक भी यह समझ सकता है कि सरकार के प्रयास शराब को हतोत्साहित करने के रहे या इसे प्रोत्साहन देने के। भाजपा पर सुरा सेवन को बढ़ावा देने का राग अलापने वाले गहलोत को अपने गिरेबा में झांकना चाहिए कि उन्होंने शराब संस्कृति को रोकने के लिए क्या प्रयास किए ?
 
शराब बिक्री को प्रोत्साहन:
 
सरकार का एकमात्र सार्थक प्रयास शराब की दुकानों के संचालन के समय में कमी करना है। पहले सुबह नौ बजे से रात ग्यारह बजे तक दुकानें खुलती थी। अब सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक। हालांकि होटल बार और रेस्तरां बार के समय पूर्ववत ही है। रेस्तरां बार जहां रात 11 बजे तक खुले है, वहीं होटल बारों में 24 घंटों शराब परोसी जा रही है। गहलोत सरकार ने कार्यकाल के पहले साल में विदेशी शराब और बीयर की 800 दुकानों के लाइसेंस रद्द किए थे। तब से अब तक विदेशी शराब या बीयर के 1000 और देशी शराब की बिक्री के 6632 लाइसेंस यथावत जारी है। जानकारों का कहना है कि पुलिस और आबकारी अधिकारियों की मिलीभगत से जारी वैध दुकानों के मुकाबले कम से कम दस गुना दुकानें अवैध रूप से संचालित हो रही है।
 
सरकार की जो आबकारी नीति है, उससे तो यह सन्देश बिल्कुल नहीं जाता कि उसकी मंशा शराब संस्कृति को हतोत्साहित करने की है। तथ्य बताते है कि  आबकारी नीति का मुख्य लक्ष्य राजस्व बढ़ाना ही है। इसके चलते ही राज्य सरकार को दूसरी सर्वाधिक आमदनी आबकारी मद से ही हो रही है। तभी सरकार अपनी पीठ थपथपाते हुए कहती है कि शराब की दुकानों के लाईसेंस शुल्क और इनके नवीनीकरण शुल्क में दस से बीस फीसदी की बढ़ोतरी करने, सीमावर्ती जिलों में शराब की बिक्री बढ़ाने जैसे कदमों से ही सरकार का खजाना भर रहा है। जब सरकार की सोच ही शराब से अधिकाधिक राजस्व प्राप्त करने की हो, तब कैसे शराब संस्कृति को बढ़ने से रोका जा सकेगा। क्या शराब की दुकानों के संचालन समय में चार घंटे कम कर देने मात्र से शराब सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति को रोका जा सकेगा ? यदि ऐसी खुशफहमी गहलोत को है, तो यह उनको मुबारक हो। लेकिन, शराब को अपराधों की जननी मानने वाले लोग इस कार्रवाई को उॅट के मुंह में जीरा मानने को भी तैयार नहीं हैं।
 
छाबड़ा से छल:
 
सरकार को उसका चुनावी वादा याद दिलाते हुए अनेक संगठनों ने बीते चार सालों में शराब व्यवसाय पर रोक लगाने के लिए धरने, प्रदर्शन और आंदोलन किए। उच्च न्यायालय में भी जनहित याचिका दायर की गई। तब सरकार ने सर्वोदयी नेता सिद्धराज ढढ्ढ़ा की याचिका पर न्यायालय में शपथ पत्र देकर कहा था कि सरकार चरणबद्ध तरीके से शराब बंद करेगी। तीन साल हो गए, सरकार ने इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसी स्थिति में सरकार के रवैये से खफा होकर राजस्थान सम्पूर्ण शराबबंदी मंच के बेनर तले पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा इस साल 11 मार्च को अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे गए। छाबड़ा के अनशन से सरकार घबराई। गहलोत को अपने सर से गांधीवादी छवि का ताज छिनने की चिंता सताने लगी। ऐसे में सरकार ने छाबड़ा से बातचीत की और शराबबंदी की प्रक्रिया और इससे होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए एक कमेटी का गठन कर 15वें दिन उनका अनशन समाप्त कराया।
 
तथ्य बताते है कि सरकार ने छाबड़ा से छल किया। उन्हें बताया गया कि कमेटी दो महीने में रिपोर्ट देगी, लेकिन कुछ ही घंटों के बाद इसे संशोधित करते हुए 6 महीने में रिपोर्ट देने का नया आदेश जारी कर दिया गया। नए आदेश से कमेटी के औचित्य पर ही सवाल खड़े हो गए। क्योंकि रिपोर्ट आने से पहले ही राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो जाएगी और तब आचार संहिता लग जाएगी। सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएगी। ऐसे में कमेटी की घोषणा ओपचारिकता ज्यादा लगती है।
 
छाबड़ा फिर से अनशन पर:
 
सरकार के छल से आहत छाबड़ा ने स्वाधीन दिवस यानी 15 अगस्त से फिर अनशन शुरू कर दिया है। सरकार की साख फिर दांव पर है। छाबड़ा और उनके समर्थक सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाकर इस मुद्दे को चुनाव में ले जाने का ऐलान कर चुके हैं। विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया ने भी छाबड़ा के अनशन और शराब बंदी का मामला मंगलवार को विधान सभा में उठाया। पर, सरकार की ओर से इस पर सार्थक जबाव नहीं दिया गया। इससे सरकार की मंशा उजागर हो जाती है। अब देखना यह है कि जादूगर गहलोत इस बार फिर किस चतुराई से अपने शराब विरोधी होने और गांधीवादी छवि को धूमिल होने से बचाएंगे।
 
राजेन्द्र राज का विश्लेषण.

श्रेय शुक्ला बने श्री न्यूज चैनल के प्रधान संपादक, उनकी टीम के पांच लोग भी जुड़े

श्री न्यूज चैनल से सूचना मिली है कि लखनऊ में इंडिया न्यूज के ब्यूरो चीफ रहे श्रेय शुक्ला एडिटर इन चीफ के पद पर ज्वाइन कर रहे हैं. श्रेय के ससुर के निधन से फिलहाल उनकी ज्वायनिंग टल गई है. लेकिन उनकी टीम के पांच लोगों ने श्री न्यूज ज्वाइन कर लिया है. फरमान अब्बास को लखनऊ में ब्यूरो चीफ बनाया गया है. 
इनके अलावा अभिषेक पांडेय, अभिषेक मिश्रा, राधेश्याम दीक्षित और अखंड ने भी ज्वाइन कर लिया है. श्रेय शुक्ला ज्वाइन करने के बाद नोएडा आफिस में बैठेंगे. चर्चा है कि उनको सीओओ भी बनाया गया है. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. श्रेय शुक्ला ने पिछले दिनों दीपक चौरसिया की टीम के लोगों के बुरे व्यवहार से नाराज होकर अपनी पूरी टीम के साथ इस्तीफा दे दिया था.
 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.
 
 

मनीष अरोड़ा को जागरण में प्रमोशन और ट्रांसफर, पंकज मलिक का नई दुनिया से इस्तीफा

दैनिक जागरण, पानीपत से खबर है कि मार्केटिंग के एरिया मैनेजर मनीष अरोड़ा को ग्रुप का क्लासीफाइड हेड बनाया गया है. वे अब कानपुर में बैठकर काम देखेंगे. वे कानपुर चले गए हैं. उनकी जगह पानीपत में संजीव तिवारी काम देखेंगे. उधर, नई दुनिया से सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पंकज मलिक ने इस्तीफा दे दिया है. वे ग्रपु मैनेजर (प्रोडक्शन) के पद पर कार्यरत थे. 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

पत्रकार दीप्ति चौरसिया पर भड़के आसाराम

भोपाल : पहले दीपक चौरसिया को आसाराम की प्रवक्ता नीलम दुबे ने दलाल कह डाला था और अब खुद आसाराम ने दीपक चौरसिया की पत्रकार बहन दीप्ति चौरसिया को अनाप-शनाप कह डाला. दीप्ति चौरसिया ने जब आसाराम से उन पर लगे आरोपों के बारे में पूछा तो आसाराम भड़क गए और तू-तड़ाक करते हुए बेशर्म तक कह डाला. इस बीच, दीपक चौरसिया के प्रधान संपादकत्व वाले इंडिया न्यूज चैनल ने आसाराम बापू के खिलाफ अभियान तेज कर दिया है. 
सूत्रों का कहना है कि जिस दिन आसाराम की प्रवक्ता नीलम दुबे ने दीपक चौरसिया को इंडिया न्यूज पर लाइव प्रोग्राम के दौरान दलाल कह डाला था, उसी के बाद से इंडिया न्यूज चैनल ने आसाराम के खिलाफ आक्रामक अभियान छेड़ दिया है. रोजाना कई घंटे आसाराम के खिलाफ खबरें दिखाई जा रही हैं. 
 
यौन शोषण मामले में फंसे प्रवचनकर्ता आसाराम ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं उनके पुत्र और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का नाम लिए बिना आरोप लगाया है कि उनके साथ जो कुछ हो रहा है, वह ‘मैडम और उनके सुपुत्र’ के इशारे पर हो रहा है. अपने समधी देव किसनानी के अंतिम संस्कार में शामिल होने भोपाल आए आसाराम ने राजा भोज विमानतल पर संवाददाताओं के सवालों के जवाब में कहा, ‘‘मैं आपको क्या बताउं, मैं किसी पार्टी का विरोध नहीं करना चाहता, मुझे लोग बताते हैं कि मैडम और उनके सुपुत्र के इशारे पर यह सब हो रहा है.. ठीक है करने दो, जो वे करना चाहते हैं.’’  उन्होने कहा, ‘‘पिछले साढ़े चार सालों से धर्मान्तरण वालों को इनका ‘सपोर्ट’ है, ऐसा लोग बताते हैं, पर मैं तो चाहूंगा कि भगवान सबका मंगल करे’’.
 
आसाराम ने कहा, ‘‘मैं किसी पर आरोप भी नहीं लगा रहा हूं, मैंने जो सुना वह आपको बता रहा हूं.’’  भाजपा उपाध्यक्ष उमा भारती के उनके समर्थन में खड़े होने को लेकर पूछने पर आसाराम मीडिया पर भड़क गए और नाराज होते हुए उन्होने कहा, ‘‘कोई मेरे बचाव में सामने नहीं आया है, यह गलत बात है, कोई पार्टी मेरे बचाव में नहीं आई है, आप मुझे सताने का प्रयास नहीं करें…’’  आसाराम के मीडिया पर भड़कते ही विमानतल पर मौजूद उनके समर्थकों ने हंगामा शुरु कर दिया और उनमें से कई ने अभद्र भाषा का प्रयोग भी किया. इसी बीच आसाराम अपने वाहन में बैठकर वहां से चले गए.
 
एक संवाददाता द्वारा यह पूछने पर कि जोधपुर पुलिस के सामने पेश होने के लिए क्या आपने और समय मांगा है, आसाराम ने कहा, ‘‘मैने कोई समय नहीं मांगा, मैं तो तैयार हूं, मेरे लिए जैसे यहां वैसी जेल, लेकिन जब मैने ये साजिशें सुनीं, तो वहां कोई खिलाने-पिलाने में ‘ब्रेन’ को ऐसा-वैसा कर दे, इसलिए तय किया है कि जेल में अन्न-जल छोड़ दूंगा, ये बात किसी से मैने कही, तो मीडिया में आ गई’’.
 
उल्लेखनीय है कि आसाराम के समधी एवं उनके पुत्र नारायण सांई के सुसर देव किसनानी का कल यहां दिल का दौरा पडने से निधन हो गया था. किसनानी यहां आसाराम आश्रम के संचालक भी थे. उनके पार्थिव शरीर का यहां अंतिम संस्कार किया गया. 
 
उधर, नागपुर में बुधवार को आसाराम के आश्रम पर भीमसेना के लोगों ने हमला कर दिया. पुलिस ने बताया कि युवकों के एक समूह के द्वारा नागपुर के पास फेतरी इलाके में आसाराम के आश्रम में कथित रूप से तोड़फोड़ की गई. ये युवक बाईक पर सवार होकर आये थे. हमलावरों ने आसाराम के कुछ अनुयायियों के साथ हाथापाई भी की. यह घटना उस समय हुई जब कुछ अनुयाई आश्रम परिसर में कृष्ण जन्माष्टमी मना रहे थे. हालांकि आसाराम के अनुयाईयों ने एक हमलावर को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया जबकि अन्य हमलावर भागने में सफल रहे. 
 
आसाराम के अहमदाबाद स्थित आश्रम के पास वर्ष 2008 में मृत मिले दो बच्चों में से एक बच्चे के पिता ने दावा किया कि असली गुनहगार अभी भी खुलेआम घूम रहे हैं और आसाराम को ‘राजनीतिक संरक्षण’ प्राप्त है. चचेरे भाइयों दीपेश वाघेला (10) और अभिषेक वाघेला (11) तीन जुलाई 2008 को आसाराम द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय ‘गुरुकुल’ से लापता हो गए थे. दो दिन बाद उनके क्षतविक्षत शव पास में नदी किनारे मिले.

 

नभाटा, गाजियाबाद के ब्यूरो चीफ राकेश रिटायर, संजय को जिम्मेदारी, साजिद रजा जागरण से जुड़े

नवभारत टाइम्स, गाजियाबाद से सूचना है कि यहां के ब्यूरो चीफ राकेश पाराशर रिटायर हो गए हैं. उनकी जगह पर संजय श्रीवास्तव को ब्यूरो चीफ का कार्यभार मिला है. संजय के ब्यूरो चीफ बनने के बाद से आफिस में अंदरुनी राजनीति तेज हो गई है. लंबे से कार्यरत लोग खुद को उपेक्षित और प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं. पुराने लोगों का आरोप है कि नवभारत टाइम्स के गाजियाबाद कार्यालय में ब्यूरो चीफ संजय श्रीवास्तव मनमानी कर रहे हैं. मौजूदा रिपोर्टरों से आए दिन किसी न किसी बात पर झगड़ा होता रहता है. नए लोगों को आफिस में इंट्री दिलाने की भी कोशिशें हो रही हैं. 
हिंदुस्तान, बरेली से खबर है कि साजिद रजा खां ने इस्तीफा देकर दैनिक जागरण, बरेली ज्वाइन कर लिया है. इन्हें जागरण में सब एडिटर बनाया गया है. साजिद ने शाहजहांपुर में तैनाती के दौरान जलती ट्रेन से डाक्टर दंपत्ति को बचाया था. इस नेक काम पर संपादक शशि शेखर ने उन्हें आउट आफ टर्न प्रमोशन दिया था. उसके बाद उन्हें शाहजहांपुर से बरेली बुला लिया गया था. वे तीन साल से हिंदुस्तान, बरेली से जुड़े हुए थे. 
 

नवभारत में मजीठिया वेतनमान लागू, ठेका कर्मचारियों को ठेंगा

नवभारत छत्तीसगढ़ में मजीठिया वेतनमान पिछले महीने से दिया जा रहा है लेकिन इस वेतनमान का लाभ रेगुलर कर्मचारियों को ही मिल रहा है। अन्य को ठेका कर्मचारी बोलकर उन्हें ठेगा दिखा दिया गया है। चूंकि छत्तीसगढ़ में नवभारत ठेके में चल रहा है, इसका ठेका आर अजीत लिए हुए हैं। अनुबंध के अनुसार वे प्रतिमाह मालिक को 65 से 70 लाख रूपए देते हैं और इतना लक्ष्य उन्हें सरकारी विज्ञापनों से मिल जाता है। 
नवभारत व हरिभूमि छत्तीसगढ़ के दो ऐसे अखबार है जहां पत्रकारों का ज्यादा जाब सिक्योरटी मिलती है लेकिन हरिभूमि में मनरेगा के मजदूरों के समान वेतन मिलता है। यहां 4 हजार से अधिकतम 8 हजार वेतन दिया जाता है। वही नवभारत में रेगुलर स्टापों की नौकरी सरकारी नौकरी के समान सुरक्षित है इसलिए यहां के कर्मचारी पूर्व मे 6 वे वेतनमान के लिए हड़ताल भी कर चुके है।
 
दिल्ली व छत्तीसगढ़ नवभारत का हाल देखकर यही लग रहा है कि सुको का फैसला अखबार मालिकों के विपक्ष में जा रहा है। वैसे वेतनबोर्ड की अनुशंसाएं व वेतनमान देखकर साफ जाहिर होता है मजीठिया जी ने पत्रकारों व मालिकों दोनों का हित देखकर यह अनुशंसा दी है। इसके बचाव में मालिकों को बोलने के लिए कुछ नहीं है लाभ के अनुसार वेतनमान देने की गणना की गई है। 
 
छत्तीसगढ़ श्रम विभाग ने सभी सहायक श्रम आयुक्तों पर इस बात का दबाब बना रहा है कि वे मजीठिया वेतन बोर्ड का पालन अखबार मालिकों से सुनिश्ति कराए और जो जानकारी देने में आनाकानी करें उनके खिलाफ परिवाद दायर करें। दरअसल जब सहायक श्रमायुक्त अखबार मालिकों को नोटिस देते है तो वे या तो नोटिस लेते नहीं या यह जवाब दे देते है कि यहां कोई काम नहीं कर रहा है। कुछ प्लेसमेंट व ठेका में काम देने का बहाना बनाते है लेकिन श्रम विभाग अब उनकी भी जानकारी लेगा कि ठेका और प्लेसमेट कौन लिया है उसके बाद उन्हें नोटिस जारी की जाएंगी। अखबारों से डरने वाला यह विभाग श्रमायुक्त के निर्देश के बाद शायद डर के आगे निकले। 
 

गोवा की अय्याशी में शामिल बाराबंकी के सदर विधायक के भाई को बख्श दिया?

: शहर में सीएम के साथ लगी धर्मेन्द्र यादव की होर्डिंग्स आज सपाइयों ने ही फाड़ डाली : बाराबंकी। समाजवादी पार्टी द्वारा तीन विधायकों को निलम्बित करने व दो विधायकों के पुत्र को पार्टी से निष्काषित करने के मामले में आज उस वक्त नया मोड़ ले लिया जब आलाकामान के फैसले पर सवालिया निशान लगाते हुए सपा के ही कुछ नेता नजर आये। उनका कहना था कि बाराबंकी शहर के विधायक सुरेश यादव का भाई धर्मेन्द्र यादव भी गोवा की अय्याशी में पकड़ा गया। न इनको निलम्बित किया गया और न उसको निकाला किया गया। बंकी ब्लाक का प्रमुख बताकर बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स मुख्यमंत्री की तस्वीर के साथ लगाने वाला धर्मेन्द्र यादव क्या गोवा में सीतापुर के सपा विधायक के साथ अय्याशी करते हुए पकड़ा गया है? ऐसी चर्चायें आज उस वक्त सही साबित होने लगी जब धर्मेन्द्र यादव की होर्डिंग्स ही उनके अपने ही गुर्गे फाड़ने लगे।
मालूम हो गोवा में अय्याशी करने गये सीतापुर के विधायक महेन्द्र सिंह उर्फ झीन बाबू के साथ बाराबंकी के सदर विधायक सुरेश यादव का भाई जो अपने आपको बंकी का ब्लाक प्रमुख बताकर बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स लगाकर अधिकारियों पर सीएम का खास बताकर रौब डाला करता था, भी साथ में था। गिरफ्तारी पर छपी खबर के बाद धर्मेन्द्र प्रसाद का नाम आया लेकिन बाद में धीरे-धीरे चर्चा ने जोर पकड़ा और मालूम हुआ कि यह बाराबंकी की देवां-महादेवा की पवित्र भूमि को कलंक करने के लिए गोवा पहुंच गये थे। पकड़े गये लोगों में एक आवास विकास में रहने वाले बैंक मैनेजर की पत्नी भी शामिल बतायी जा रही है। वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कड़े तेवर के बाद तीन विधायक रामलाल अकेला बछरावां, सीतापुर के अय्याश विधायक महेन्द्र सिंह उर्फ झीन बाबू, सीतापुर के दूसरे विधायक राधेश्याम जायसवाल के साथ इनके पुत्रों को दबंगई करने पर निष्काषित कर दिया गया है। लेकिन बाराबंकी के विधायक सुरेश यादव के भाई की करतूतों पर क्यों खामोशी हुई, यह जनचर्चा है। 
 
वैसे पार्टी के प्रमुख लोग खामोश हैं जबकि कुछ लोग दबी जबान यह कहते जरूर नजर आये कि पार्टी को धर्मेन्द्र यादव को निष्काषित कर सपा को कलंक धुलने के लिए कड़े कदम उठाना चाहिए। जबकि विधायक सुरेश यादव के खास लोगों का कहना है कि विधायक जी का संबंध भाई से नहीं है, आपस में बंटवारा है। शहर के कई लोगों ने अपना न छापने की शर्त पर बताया कि मुहारीपुरवा में हुआ कैटर्स का मर्डर में भी धर्मेन्द्र का नाम चर्चा में आया था लेकिन बाद में सत्ता की हनक के आगे मामला रफा-दफा हो गया। वहीं सफेदाबाद में एक दलित की डम्फर से दबाकर हत्या के मामले में भी इनके नाम ने तूल पकड़ा था। वहीं सफेदाबाद पुल पर कोठी क्षेत्र के एक युवक को इन लोगों ने जमकर मारा पीटा था और पुल के नीचे उल्टा लटका दिया था। 
 
इस मामले में भी कोतवाली पुलिस ने लाख चाहने के बावजूद भी कोई कार्यवाही नहीं की थी व गरीबों के मकानों पर बुल्डोजर चलवाने में भी इसकी प्रमुख भूमिका थी। इस तरह के एक नहीं दर्जनों उदाहरण सपा सरकार बनने के बाद आ चुके हैं क्योंकि यह सदर विधायक के भाई हैं इसीलिए अधिकारी और पुलिस कर्मी इन पर कार्यवाही करने से हमेशा बचते रहे हैं। वहीं गोवा की एसपी प्रियंका ने बताया कि इस अभियुक्त ने अपना नाम धर्मेन्द्र प्रसाद यादव पुत्र महादेव प्रसाद यादव निवासी 6/33 चिनहट लखनऊ यूपी का बताया है। जबकि हकीकत में धर्मेन्द्र यादव 633/008ए मटियारी चौराहे पर रहता था अब यह गोमती नगर में रहने लगा है। वहीं सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी का इस संबंध में कहना था कि मुझे पता नहीं था मैं इसकी जांच कराकर मुख्यमंत्री जी के संज्ञान में डालता हूं अगर ऐसा है तो कार्यवाही होगी।
 
बाराबंकी से रिज़वान मुस्तफा की रिपोर्ट.

चुनावी टीस और मरहमी फंडा

कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब-तब वंचित वर्गों के दर्द को लेकर एकदम खांटी दार्शनिक वाला चोला ओढ़ लेते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि इस संवेदनशील नेता को शायद अब तक पता ही नहीं था कि दलित और वंचित वर्गों की हालत आज भी ज्यादा अच्छी नहीं है। भले विकास और बढ़ती समृद्धि के तमाम दावे किए जाते रहे हों। उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के एक आयोजन में दलितों की स्थिति पर काफी चिंता जताई। इस बात पर खास जोर दिया कि जब तक पूरे देश में यह वंचित समाज कांग्रेस के साथ मजबूती से नहीं खड़ा होगा, तब तक पार्टी की जड़ें राजनीतिक रूप से पहले की तरह पुख्ता नहीं हो सकतीं। 
उन्होंने खास तौर पर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में पार्टी के हाल का जिक्र किया। कहा कि यदि यहां पर पांच दलित नेताओं का नाम गिनाने के लिए कहा जाए, तो सिर्फ मायावती का नाम ही एक से पांच नंबर तक आएगा। उनका सवाल यही था कि कांग्रेस के लोगों को इस बारे में जरूर विचार मंथन करना चाहिए कि ऐसी स्थिति कैसे पैदा हुई? यह अलग बात है कि राहुल दो साल पहले उत्तर प्रदेश के कई जिलों में दलितों के यहां रैन-बसेरा करके गरीबी की बदहाली का साक्षात्कार कर आए थे। अब लंबे विराम के बाद उन्हें फिर दलित समाज की पीड़ा की याद आई है। ऐसे में, इस संवेदनशीलता के निहितार्थ पर सवाल भी उठेंगे। इसकी जवाबदेही के लिए भी उन्हें तैयार रहना होगा। 
 
कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार 2004 से सत्ता में बनी हुई है। कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने पिछले दिनों यह उम्मीद जाहिर की है कि अगले लोकसभा चुनाव के बाद यूपीए सरकार की तीसरी पारी जरूर शुरू होगी। इसका उन्हें 100 प्रतिशत भरोसा है। सोमवार को लंबी जद्दोजहद के बाद सरकार ने बहुचर्चित खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी विधेयक लोकसभा में पास करा लिया है। इस तरह से सरकार ने इस मोर्चे पर एक बड़ी राजनीतिक बाधा पार कर ली है। कांग्रेस के रणनीतिकार मानकर चल रहे हैं कि खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून के अमल में आने से एक बड़ा राजनीतिक बदलाव तय है। यूपीए सरकार की पहली पारी में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) लागू हुई थी। इसके चलते 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली थी। 
 
खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून के तहत दावा किया जा रहा है कि देश की 67 प्रतिशत आबादी को सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिलना सुनिश्चित हो जाएगा। इसका फायदा देश की करीब 82 करोड़ जनसंख्या को मिलेगा। गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी वाले परिवारों को अनाज एक से लेकर तीन रुपए प्रति किलो की दर से मिलेगा। यह कार्य योजना कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी की खास राजनीतिक पहल से ही आगे बढ़ी है। दावा तो यही किया जा रहा है कि अगले चुनाव में यही योजना सरकार की गाड़ी पार लगा देगी। सोमवार को देर रात लोकसभा में इस विधेयक पर मुहर लगी थी। लेकिन, अगले दिन स्टॉक बाजार खुलते ही गिरावट का धमाका हुआ। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज हुई। सेंसेक्स में भी भारी उतार दर्ज हुआ। बुधवार को तो डॉलर के मुकाबले रुपए ने 68 की दर पार कर ली। आशंका तो यहां तक है कि यह गिरावट की दर 75 तक पहुंच सकती है। जाहिर है कि ऐसे में, महंगाई का एक जोरदार झटका लगना तय है। 
 
पहले से ही बढ़ती महंगाई से लोग त्रस्त हैं। महंगाई का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी सरकार के लिए संवेदनशील विषय बना हुआ है। पिछले सालों में वित्तमंत्री कई बार लोगों को भरोसा दिला चुके हैं कि जल्द ही महंगाई पर नियंत्रण का दौर शुरू हो जाएगा। लेकिन, महंगाई के मोर्चे पर सरकार के वायदे उलटबासी ही साबित हुए हैं। क्योंकि, महंगाई का दौर लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तो प्रधानमंत्री भी इस मुद्दे पर बेचारगी जैसी जता कर यही कह देते हैं कि वैश्विक कारणों से पूरी दुनिया में आर्थिक संकट रहा है। इससे भारत भी प्रभावित हो रहा है। 
 
अब मुश्किल यह हो रही है कि कई वजहों से सरकार की विश्वसनीयता तेजी से घटी है। दरअसल, पिछले सालों में 2जी, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, कोयला घोटाला व आदर्श सोसायटी घोटाले जैसे तमाम कारनामे लगातार चर्चा में रहे हैं। इन घोटालों में यूपीए सरकार के कई दिग्गजों की भी भूमिका रही है। अरबों रुपए के इन घोटालों को लेकर पिछले सालों में संसद का लगभग हर सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता रहा है। इन स्थितियों में सरकार की राजनीतिक साख को लगातार झटका लगा है। यूपीए सरकार की पहली पारी में देश की विकास दर ने नई बुलंदियों को छू लिया था। लेकिन, पिछले एक साल से देश की सकल विकास दर भी काफी नीचे आई है। इसके चलते आर्थिक विशेषज्ञ प्रधानमंत्री की आर्थिक नीतियों को लेकर भी तरह-तरह के संशय खड़े हो गए हैं। 
 
अहम सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ही वोट बैंक की राजनीति पर उतारू है, बाकी सब लोग दूध के धुले हैं? यूपीए के मुकाबले एनडीए केंद्रीय सत्ता में आने का प्रबल दावेदार है। यह गठबंधन भाजपा के नेतृत्व में चलता है। भाजपा के दिग्गज नेताओं ने कहना शुरू कर दिया है कि मनमोहन सिंह, अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। इस सरकार के नेतृत्व में अब देश की सीमाएं भी पूरी तौर पर सुरक्षित नहीं रही हैं। क्योंकि पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन लगातार सीमाओं पर घुसपैठ करने की जुर्रत कर रहे हैं। हम लोग इन्हें माकूल जवाब नहीं दे पाए हैं। इस तरह की टिप्पणियां सड़क से संसद तक लगातार की जा रही हैं। पिछले सालों में भाजपा नेतृत्व ने अयोध्या के राम मंदिर विवाद को लेकर काफी राजनीतिक तमाशा खड़ा किया था। इस मुद्दे पर संघ परिवार के घटकों ने सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश की थी। इसी के चलते भाजपा को केंद्र की सत्ता भी मिली थी। 
 
गठबंधन राजनीति की मजबूरियों के चलते भाजपा नेतृत्व को राम मंदिर जैसे विवादित मुद्दों को ठंडे बस्ते में रखना पड़ा था। लेकिन, अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन पाने के लिए भाजपा का एक बड़ा धड़ा फिर से राम मंदिर जैसे विवादित मुद्दों को अपनी राजनीतिक बैसाखी बनाना चाहता है। ऐसे में, विश्व हिंदू परिषद जैसे संघ परिवारी घटकों ने एक बार फिर अयोध्या का टंटा तेज करने की कोशिश की है। पिछले दिनों 84 कोसी परिक्रमा के नाम पर काफी तमाशा किया गया। यह अलग बात है कि इस बार इस मुद्दे पर संघ परिवारी घटक लोगों के अंदर ज्यादा ‘राम-लहर’ नहीं पैदा कर पा रहे हैं। लेकिन, जवाबी मुकाबले में सपा जैसे दल भी अतिरिक्त दबंगई दिखा रहे हैं, ताकि मुस्लिम समाज में यह संदेश जाए कि कौन ताकतें उन्हें कट्टर हिंदुत्वादियों से बचा सकती हैं? इसको लेकर सपा, बसपा व कांग्रेस जैसे दलों के बीच ज्यादा सेक्यूलर चेहरा दिखाने की होड़ मच गई है। खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी योजना की पहल करके कांग्रेस के रणनीतिकार यही संदेश देने में लगे हैं कि उन्हें ही गरीब की रोजी-रोटी को लेकर ज्यादा चिंता है। भले, डॉलर के मुकाबले रुपए का भुर्ता बने। लेकिन, गरीबों की सस्ती थाली में वह कटौती नहीं करेगी। दूसरी तरफ, भाजपा का चुनावी चेहरा बनने जा रहे नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक अलाप तेज कर दिए हैं। उन्होंने बात-बात पर कांग्रेस के नेतृत्व को कोसना शुरू किया है। कुछ इस अंदाज में बोल रहे हैं मानों उन्हें सत्ता मिल गई, तो वे रातों-रात ‘रामराज’ ले आएंगे।
 
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

आसाराम के आश्रमों में भ्रष्टाचार और महिलाओं के शोषण को नजदीक से देखा है वैद्य अमृत प्रजापति ने

: आसाराम की कुंडली : 425 आश्रम, 1400 समिति, 17000 बाल संस्कार केन्द्र, 50 गुरुकुल… : जब से दिल्ली में, आसाराम बापू पर जोधपुर में एक नाबालिक लड़की से बलात्कार करने का आरोप लगा है, तब से आसाराम अपने कारनामों और बयानों से लगातार मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं। दिल्ली में एक लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद जब लोग सड़कों पर उतरे थे, तब आसाराम ने बलात्कार के खिलाफ कानून बनाने का विरोध करते हुए बयान दिया था।  
 
आसाराम के पास अकूत दौलत है, राजनीतिक समर्थन है और अनेकों प्रभावशाली शिष्य हैं। आसाराम स्वयं को भगवान बताते हैं और हमारा निज़ाम यह सुनाता रहता है। यह अकारण नहीं है। उनके आश्रम के प्रवक्ता मनीष बगाड़िया के अनुसार आज आसाराम के पास 425 आश्रम, 1,400 समिति, 17,000 बाल संस्कार केन्द्र और 50 गुरुकुल हैं। बगाड़िया का दावा है कि भारत और विदेश में आसाराम के पांच करोड़ से अधिक अनुयायी हैं. इनमें छात्र, फ़िल्म स्टार्स, क्रिकेटर, उद्योगपति और राजनेता शामिल हैं।
 
ध्यातव्य है, आसाराम पर सरकारी मेहरबानियाँ हमेशा होती रहीं हैं। किसानों की निजी जमीनों को भी जबरिया कब्जाने में आसाराम ने कोई कसर नहीं छोड़ी। आसाराम को भगवान बनाने में सरकारी तंत्र का भी पूरा सहयोग रहा है। मोटेरा, अहमदाबाद में जो आसाराम का आश्रम है वही उनका मुख्यालय है। यह सरदार पटेल क्रिकेट स्टेडियम के पास 10 एकड़ भूमि पर स्थित है। यह ज़मीन उन्हें राज्य सरकार ने दी थी। फरवरी 2009 में गुजरात सरकार ने विधानसभा में स्वीकार किया कि आसाराम के आश्रम ने 67,089 वर्ग मीटर जमीन कब्जा ली है।
 
इस समय आसाराम के खिलाफ अलग-अलग जगहों पर एक दर्जन से ज्यादा केस चल रहे हैं। मोटेरा के अशोक ठाकुर ने आश्रम पर अपनी पांच एकड़ जमीन कब्जाने का आरोप लगाया। अशोक का कहना है कि उनकी जमीन आश्रम से लगी हुई है और गुरु पूर्णिमा के दिन उनकी जमीन में टेंट लगाये जाते थे। आश्रम वालों को टेंट लगाने की इजाजत उनके पिता ने दी थी। उनके पिता की मौत के बाद आश्रम वालों ने उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया और कहा कि यह जमीन उनके पिता ने आश्रम को दान में दी थी। लेकिन आश्रम इस बारे में कोई सबूत पेश नहीं कर सका था।
 
दूसरा केस सूरत के जहांगीरपुरा गांव के किसान अनिल व्यास ने किया है। यहां के आश्रम पर कई लोगों की जमीनें कब्जाने के आरोप हैं। व्यास आश्रम से अपनी 34,400 वर्ग मीटर जमीन वापस लेने का केस लड़ रहे हैं। व्यास का कहना है कि मामला अदालत में होने के बावजूद गुजरात सरकार ने 24 जनवरी 1997 को जमीन के अधिग्रहण को नियमित कर दिया था। हालांकि 8 दिसंबर 2006 को हाईकोर्ट ने जमीन के अधिग्रहण को गैरकानूनी करार दिया और फैसला किसान के पक्ष में दिया। इसके बाद आश्रम ने इस फैसले के खिलाफ डिविजन बेंच में अपील की थी।
 
दिल्ली की विधवा महिला सुदर्शन कुमारी ने भी आसाराम के ट्रस्ट के खिलाफ केस दर्ज कराया है। महिला का कहना है कि उसे धोखा देकर कुछ कागजों पर साइन लिए गए थे जिसे बाद में राजौरी गार्डन में उनके मकान का ग्राउंड फ्लोर आश्रम को दान में दिया दिखाया गया। महिला ने कहा है कि 6 जुलाई 2000 को आश्रम के सत्संग में ले जाने के बहाने उसे जनकपुरी के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस ले जाया गया। यहां उसे हिप्नोटाइज करके कुछ कागजों पर साइन ले लिए। बाद में नगर निगम अधिकारियों के आने पर उसे पता चला कि उसका ग्राउंड फ्लोर उससे ले लिया गया है। 
 
गुड़गांव के पास राजकोरी गांव में बने आश्रम के अधिकारियों पर फर्जी दस्तावेज देकर आश्रम का रजिस्ट्रेशन कराने का आरोप लगा। राजकोरी निवासी भगवानी देवी ने आसाराम के आश्रम पर अपनी जमीन कब्जाने पर दिल्ली हाईकोर्ट की शरण ली। सरकारी एजेंसियों ने भी आसाराम के ट्रस्ट पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने के आरोप लगाए। 2008 में बिहार स्टेट बोर्ड ऑफ रिलीजियस ट्रस्ट ने आसाराम के ट्रस्ट को अपनी 80 करोड़ रुपये की जमीन कब्जाने पर नोटिस दिया था।  अप्रैल 2007 में पटना हाईकोर्ट से रिटायर्ड जज ने आसाराम बापू और उनके चेलों पर अपनी जमीन पर कब्जा करने की शिकायत दर्ज कराई। 
 
आसाराम की योग वेदांत समिति को 2001 में एक कथित सत्संग के लिए 11 दिन के लिए मध्य प्रदेश के रतलाम में मंगल्य मंदिर के परिसर का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी लेकिन 12 साल बाद भी समिति ने परिसर को ख़ाली नहीं किया है और 700 करोड़ रुपए मूल्य की 100 एकड़ भूमि पर क़ब्ज़ा किया हुआ है। सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टीगेटिंग ऑफिस (एसएफआईओ) आसाराम, उनके बेटे नारायण साई पर आईपीसी और कंपनीज एक्ट 1956 के तहत मुकदमा चलाना चाहता है। इस बारे में एसएफआईओ ने कॉरपोरेट मंत्रालय को सिफारिश भेजी है।
 
कॉरपोरेट मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, हमें एसएफआईओ की सिफारिश मिली है, जिसमें आसाराम, उनके बेटे और कुछ अन्य लोगों पर मुकदमा चलाने की बात कही गई है। इस पर विचार हो रहा है। विवादित जमीन का मालिकाना हक जयंत विटामिंस लिमिटेड (जेवीएल) नाम की एक फर्म के पास बताया जा रहा है। जेवीएल के पब्लिक लिस्टेड कंपनी है जिसे 2004 में अनियमितताओं के चलते बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट कर दिया गया था। 
 
साल 2000 में गुजरात सरकार ने आसाराम आश्रम को नवसारी जिले के भैरवी गांव में 10 एकड़ ज़मीन दी थी। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि आश्रम ने और छह एकड़ भूमि पर अतिक्रमण कर लिया है। ग्रामीणों के कड़े विरोध के बाद पुलिस की सहायता से ज़िला प्रशासन ने अतिक्रमण गिरा दिया और भूमि का क़ब्ज़ा ले लिया। इतना ही नहीं आसाराम के आश्रमों में नाबालिग बच्चों की हत्याएं होतीं रहीं। जमीन कब्जाने से लेकर बागी शिष्यों पर हमले करवाने तक, महिलाओं के यौन शोषण से लेकर संदिग्ध स्रोतों से दौलत जमा करने तक, आसाराम बापू हर तरह के विवादों में लिप्त रहे लेकिन आसाराम नेताओं की मेहरबानी से कानून की गिरफ्त में कभी नहीं आ पाए।
 
पांच जुलाई 2008 को दो छात्रों के शव साबरमती नदी के तट पर पाए गए थे। 10 वर्ष के दीपेश वाघेला और 11 के अभिषेक वाघेला। दोनों बच्चे मोटेरा में आसाराम आश्रम के गुरुकुल (आवासीय विद्यालय) में पढ़ रहे चचेरे भाई थे। बच्चों के घरवाले एक महीने में आठ बार उनसे मिलने आश्रम गए थे। तीन जुलाई को उन्हें आश्रम से फोन पर पूछा गया कि क्या बच्चे घर पहुंचे हैं? लेकिन बच्चे घर पर नहीं थे। आश्रम में जाकर बच्चों के बारे में पूछने पर गुरुकुल के व्यवस्थापक पंकज सक्सेना ने उनसे पीपल के पेड़ के 11 चक्कर लगाकर अपने बच्चों के बारे में पूछने को कहा। परिवार वालों ने ऐसा ही किया पर कुछ नहीं हुआ। आश्रम वालों ने उन्हें पुलिस में शिकायत भी नहीं करने दी। अगली सुबह पुलिस में शिकायत दर्ज करने गए तो पुलिस ने शिकायत दर्ज करने के बजाय उन्हें ही डांटा।
 
बाद में आश्रम के पास दोनों बच्चों के शव मिले लेकिन पुलिस ने फिर भी कार्रवाई नहीं की। बाद में मीडिया द्वारा मामले को उठाने पर आश्रम वालों ने पत्रकारों को ही पीटना शुरू कर दिया था। बच्चों में से एक के पिता ने आरोप लगाया कि उनके पुत्र को एक तांत्रिक अनुष्ठान में मारा गया था। मामला गरमाने के बाद मामला सीआईडी को सौंप दिया गया। जांच के एक साल बाद सीआईडी ने इसे गैर इरादतन हत्या का मामला करार दिया। अपनी रिपोर्ट में सीआईडी ने कहा जांच के दौरान उन्हें आश्रम में तंत्र साधना और काले जादू की गतिविधियों का कोई सीधा सबूत नहीं मिला है। लेकिन इस संबंध में किए गए लाई डिटेक्टर टेस्ट में मामले के अभियुक्त फेल हो गए थे। लेकिन उनपर कोई कार्यवाही नहीं हुई। 23 जनवरी 2013 को अहमदाबाद कोर्ट ने इस हत्या में आरोपी उनके आश्रम के सात शिष्यों को समन जारी किया था। 
 
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में आसाराम के ही दूसरे आश्रम में दो और बच्चे मरे पाए गए थे। ये बच्चे रामकृष्ण यादव (नर्सरी) और वेदांत मौर्या (पहली क्लास) स्टूडेंट थे। इन दोनों की लाश 31 जनवरी 2008 को हॉस्टल के टॉयलेट में मिली थी। गुस्साए लोगों ने आश्रम के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया था और इसे बंद करने की मांग की थी।गुजरात में मृत मिले बच्चों के परिजनों ने मामले की जांच के लिए गठित जस्टिस डीके त्रिवेदी कमीशन के सामने कहा था कि उनके बच्चों की जान काले जादू और तांत्रिक क्रिया में गई थी। इस कमीशन का गठन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों के बढ़ते विरोध के बाद किया था। हालांकि कमीशन की कार्रवाई भी विवादों के घेरे में रही थी और गुजरात हाईकोर्ट ने कमीशन की आसाराम बापू और उनके बेटे पर कठोर न होने की निंदा भी की थी।
 
जबलपुर स्थित उनके आश्रम के एक शिष्‍य की रहस्‍यमय मौत को लेकर वह और उनका आश्रम सवालों के घेरे में आए हैं। मृतक राहुल पचौरी के परिजनों का कहना है कि वह आसाराम का करीबी था और उनके कई राज जानता था। आश्रम में बनने वाली दवाइयों में गडबड़ी से संबंधित बातें वह आसाराम को बताने वाला था। राहुल के पिता इन्‍हीं सब बातों को अपने बेटे की ‘हत्‍या’ की वजह बता रहे हैं। पुलिस अभी इस आरोप की जांच कर रही है।
 
2008 से लेकर 2010 के बीच उन्हें और उनके पुत्र नारायण साईं को महिलाओं के यौन शोषण, तांत्रिक उद्देश्यों के लिए बच्चों की बलि और हिंसा का इस्तेमाल कर जमीन हथियाने जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा लेकिन सबूतों के आभाव में, जो आसाराम एंड कंपनी सरकारी तंत्र के सहयोग से हमेशा मैनेज करती रही आरोप साबित नहीं हो पाए। इतना ही नहीं, इन आरोपों से उनकी छवि पर भी कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि उनके शिष्यों की संख्या या तो स्थिर रही या कई स्थानों पर बढ़ती गई।
 
आसाराम के करीबी और पूर्व सचिव राजू चांडाक और निजी फिजिशियन रहे अमृत प्रजापति ने आश्रम में कई गैरकानूनी धंधों के होने की बात कही थी। लेकिन त्रिवेदी कमीशन के सामने पेश होने से पहले चांडाक को तीन गोलियां मारी गईं और प्रजापति का आरोप रहा है कि उन पर आश्रम से जुड़े लोगों ने कम से कम छह बार हमला किया है। बीएएमएस की पढ़ाई करने वाले प्रजापति ने ‘ओपन’ पत्रिका को बताया था कि वह आश्रम में डॉक्टर की जगह खाली होने पर 1988 में पहली बार आसाराम से मिला था। उसे खाने और रहने के अलावा 15000 रुपये मासिक वेतन देना तय हुआ। उसे सूरत आश्रम में आयुर्वेदिक लैब बनाने का काम दिया गया। शिष्यों की संख्या बढ़ने पर आसाराम ने दवाइयों की गुणवत्ता कम करने पर जोर दिया। गाय के घी की जगह मिलावटी घी का इस्तेमाल होने लगा।
 
प्रजापति कहते हैं कि वह आश्रम के भ्रष्टाचार और महिलाओं के शोषण का गवाह हैं। वह कहते हैं, ‘उनका निजी फिजिशियन बनने पर मैंने ये चीजें बहुत नजदीकी से देखी हैं। मैं आसाराम के कमरे में कभी भी जा सकता था। उनकी मां की मौत होने के अगले दिन मैं उनके दिल्ली के आश्रम में गया। वहां एक महिला लेटी हुई थी। इसके आगे मैं नहीं देख सका।’ प्रजापति बताते हैं कि धमकाए जाने पर 20 अगस्त 2005 को उन्होंने आश्रम छोड़ दिया। सितंबर 2005 को उन्हें गाजियाबाद में करीब 15 लोगों ने पीटा। उन्होंने प्रजापति को आसाराम के खिलाफ बोलने पर जान से मारने की धमकी दी।
 
जोधपुर के अपने आश्रम की जिस बालिका के साथ उन पर दुराचार का आरोप लगा है, उसने खुद पुलिस में रपट लिखाई है। बलात्कार संबंधी कानून के मुताबिक पीड़िता का बयान ही काफी होता है इसलिए यह मामला संगीन है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बार भी संत समुदाय और हिंदुत्व का झंडा उठाने वाले संगठन व नेता उनके समर्थन में उतर आए हैं। शायद बलात्कार हिन्दू धर्म में अपराध की श्रेणी में नहीं आते। पुलिस इस मामले में अपनी ही तरह छानबीन कर रही है। आसाराम को समन देने के लिए पुलिस टीम को उनके इंदौर आश्रम के बाहर छह घंटों का इंतजार करना पड़ता है जब कि सामान्य नागरिक के साथ पुलिस इस तह पेश नहीं आती। यह हमारे इस महान देश में ही संभव है।
 
आसाराम अनापशनाप बयान दिए जा रहे हैं लोग उन्हें सुन रहे हैं। किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि उनपर लगाम लगा सके। ऐसी स्थिति में सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि इस मामले का अंजाम क्या होगा। पिछले सभी आपराधिक मामलों की तरह यह मामला भी अनिर्णीत ही रहेगा ऐसी आशंका के लिए पर्याप्त कारण निकट अतीत में ही मौजूद हैं।     
 
शैलेन्द्र चौहान का विश्लेषण. संपर्क: shailendrachauhan@hotmail.com

छंटनी मसले पर एक्‍शन चाहते हैं तो ये आरटीआई अपने अपने नाम से लगाएं

Rising Rahul : साथि‍यों, छंटनी के मसले पर अगर सच में कोई एक्‍शन चाहते हैं तो नि‍म्‍न आरटीआई अपने अपने नाम से लगाएं। यकीन मानें, इसके बाद सत्‍ता को एक्‍शन लेना ही पड़ेगा। बस यहां से कॉपी करें और अपना नाम नीचे लि‍खकर पोस्‍ट कर दें।

सेवा में,
जन सूचना अधि‍कारी,
श्रम नि‍देशालय,
उत्‍तर प्रदेश

वि‍षय: सूचना के अधि‍कार अधि‍नि‍यम के तहत अपेक्षि‍त सूचना

महोदय,

सूचना के अधि‍कार अधि‍नि‍यम के तहत नि‍म्‍न सूचनाएं आपके वि‍भाग से अपेक्षि‍त हैं:-

1- उत्‍तर प्रदेश से/में नि‍कलने/चलने वाले समाचार पत्र/समाचार चैनलों में पत्रकारों की संख्‍या व इनका मासि‍क वेतनमान।

2- नोएडा के फि‍ल्‍म सि‍टी में श्रम वि‍भाग में रजि‍स्‍टर्ड सभी समाचार चैनलों के नाम।

3- बिंदु 2 में आने वाले सभी समाचार चैनलों में काम करने वाले कर्मियों की संख्‍या व उनका वेतनमान।

4- कृपया बताएं कि जुलाई व अगस्‍त 2013 में नोएडा के फि‍ल्‍म सि‍टी में चलने वाले कि‍सी समाचार चैनल से कई कर्मियों को सेवानि‍वृत्‍ति की आयु से पहले कार्यमुक्‍त कि‍या गया है।

5- कृपया बताएं कि इन कर्मियों को नि‍कालने में क्‍या समस्‍त श्रम कानूनों का पालन कि‍या गया है। यदि हां तो कि‍स कानून का पालन कि‍या गया है और यदि नहीं तो कौन सा श्रम कानून तोड़ा गया है।

6- समाचार पत्रों/समाचार चैनलों से जनवरी 2013 से अगस्‍त 2013 तक कि‍तने कर्मचारि‍यों को रि‍टायरमेंट की उम्र से पहले ही कार्यमुक्‍त कि‍या जा चुका है।

आशा है कि अधि‍नि‍यम में तय समयावधि में सूचना प्राप्‍त होगी।

शुल्‍क के रूप में दस रुपये का पोस्‍टल ऑर्डर संख्‍या…….. संलग्‍न है।

भवदीय

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प्रेममंदिर लाइव कवरेज : कृपालु महाराज के पेड न्यूज़ पर नाचे न्यूज़ चैनल

दुनिया को नैतिकता के कठघरे में खड़ा करने वाले मीडिया का यह रूप आखिर किस नैतिकता की कैटेगरी में आएगा?  कल कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी की रात मैंने सोचा कि टीवी न्‍यूज चैनलों पर देश के विभिन्‍न भागों में, यथा- मथुरा, वृंदावन, द्वारका, मुंबई, दिल्‍ली……में यह पर्व किस तरह से मनाया जाता है, देखा जाए। रात के 11.45 पर जैसे ही टीवी ऑन किया, तो झटका लगा।

सभी चैनलों पर एक ही मंदिर से लाइव कवरेज, वृंदावन स्थित 'प्रेममंदिर' से लाइव कवरेज। सब चैनलों के पत्रकार प्रेममंदिर में मनाए जा रहे पर्व के बारे में बता रहे थे। कुछ समझ नहीं आया। एक के बाद एक न्‍यूज चैनल बदलता गया। आजतक, इंडियाटीवी, एनडीटीवी, न्‍यूज24, जीन्‍यूज, आइबीएन7…सभी जगह प्रेममंदिर से लाइव कवरेज। माजरा तब समझ में आया जब 'आजतक' पर चल रहे 'प्रेममंदिर लाइव कवरेज' पर ADVT लिखा देखा।

जाहिर है वृंदावन स्थित इस प्रेममंदिर के कर्ताधर्ता 'जगद्गुरु कृपालु जी महाराज' की ओर से न्‍यूज चैनलों को इस लाइव कवरेज के लिए पैसे दिए गए होंगे। सब जानते हैं कि रात के 12 बजे कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी का पर्व मनाया जाता है। ऐसे में ठीक इसी समय पर एक खास मंदिर से लाइव कवरेज। यानी करोड़ों दर्शकों के साथ धोखा किया गया। बहुत ठगा सा महसूस किया।

आखिर 400 रुपए मासिक देकर टीवी चैनलों को देख पाता हूं। यदि यह विज्ञापन जैसा मामला था तो प्रश्‍न खड़ा होता है कि फिर सभी चैनलों के पत्रकार क्‍यों लाइव कवरेज कर रहे थे और प्रेममंदिर के गुणगान में जुटे थे तथा क्‍यों नहीं अन्‍य चैनलों पर उस समय इसे ADVT बताया गया?

प्रवक्ता डॉट कॉम के संपादक संजीव सिन्हा के फेसबुक वाल से.


स्टेटस पर आई टिप्पणियाँ यूं हैं….

राकेश कुमार सिंह naitikta tijarat ban gayee hai.

Saleem Khan Raat 12 ke baad ADVT aate haiN ,,,jab ghatiya produt ka vigyapan hopta hai ,,,, mujhe lagta hai ham kasaai se bakre ki guhaar lagaa rahe haiN media ko apna dhandha dekhna hai na ki naitikta ,,,,naitikta kisee aur ki thi jisne is kaam ke liye paise diye wo bhagwan ka nahiN apni dukan (kada shabd kshama yachna ke saath) prachar kar rahe the
 
Sushant Jha यानी धंधा चैनलों को ही नहीं, बाबाओं को भी खूब करना आता है।
 
Kumar Ranjeet अब इसमें भला कौन सी आश्चर्य की बात ….वैसे भी 'नैतिकता' का भम्र जाल तो मीडीया खाली अपनी दुकान चलाने के लिए बुनता है ….!
 
Satinder Prakash marketing manager of prem mandir is an IIM and know how to market a mandir to get more business(donations).
 
राय संजय agar main p.m ban jaun to pahla kam in sabhi chinalon ko band kar doon ….or aise patrakaron ko bhukha mar doon ……….kya banaoge mujhko p.m ( purana menejar) bhaee
 
Rahul Gaur खबरें खबरों से लड़ती हैं ! अब, पैसे के लिए खबर चलती हैं .
 
Shekhar Chaturvedi DD National par Krishnjanm sthaan Matura se aur dwarka se Live aaya tha. Lekin Har baar jo Dwarkadish mandir, mathura se aata tha uski jagah PREM Mandir ne le li.
 
Rakesh Sharma संजीव जी जानकारी के लिये आभार।
 
Nawal S Singal संजीव जी, आज के युग में मीडिया से नैतिकता की अपेक्षा रख रहे हैं आप??? ये तो नैतिकता के सबसे बड़े सौदागर हैं….
 
Prathak Batohi ADVT लिखा तो हमने भी देखा पर बात को इस नजरिये से नही देखा..
 
पंकज कुमार झा ओह…ज़रूरी एवं शर्मनाक जानकारी. बहुत तीक्ष्णता के साथ पकड़ा है आपने. लेकिन सवाल यहां केवल चैनलों का ही नहीं है. वे तो हैं ही घोषित दुकानदार. सवाल तो धर्म को खरीदने बेचने की वस्तु बना देने वाले कृपालु महराजों, आशारामों, जैसे निर्मल बाबाओं पर भी उठाना बनता है न ?See Translation
 
रजनीश के झा शर्मनाक !

Vendy Sharma aapki is khoji ptrkarita ke liye abhar!
 
संजीव सिन्हा पंकज कुमार झा सर, यहां मेरा सवाल मीडिया से है कृपालु जी से नहीं, क्‍योंकि वे तो चाहेंगे अपने काम का प्रचार-प्रसार। मीडिया को चाहिए था कि वो कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी के समय रात के 12 बजे ऐसा धोखा दर्शकों के सामने न करें और यदि यह विज्ञापन जैसा था तो ऊपर स्‍पष्‍ट लिखते ADVT.
 
Samanwaya Nanda बिल्कुल सही संजीव जी
 
Deep Sankhla पत्रकारिता के मूल्यों के साथ-साथ व्यावसायिक मूल्यों का भी क्षरण…  
 
Rakesh Kumar Singh संजीव भाई, लगता है आपको कि चैनलों पर चांय-चांय करने वाले पत्रकार हैं ..
 
रजनीश के झा चिंता जायज है, मगर नैतिकता और मूल्यों का पतन जहाँ चहुँओर हो रहा हो वहां केवल पत्रकारिता को कटघड़े में खड़ा करना शायद जायज भी नहीं !
 
संजीव सिन्हा साफ-साफ कहिए राकेशजी।
 
Raj Paliwal media bikau hai bhai koi bhi khreed le khardne wala chahiye
 
Sc Mudgal तो फिर मुंह बंद रखा जाए क्या रजनीश झा जी, क्योंकि एक समय एक ही व्यक्ति, संस्था, या मुद्दे को उठाया जा सकता है, अन्यथा तो यही वाकया काफी होगा कि सब भ्रस्ट हैं, अपना काम करो, और मस्त रहो,
 
Rakesh Kumar Singh मैं इन चांय-चांयकारों को कुछ और मान सकता हूं पत्रकार कभी नहीं. मानने की कोई वजह हो तो आप ही समझा दीजिए.  
 
Avtansh Chitransh क्या संजीव भाई सबकुछ जानते हुए भी सवाल उठा रहे हैं…जो पत्रकार बंधू वहां से लाइव कर रहे हैं वो वैसे ही अपनी नौकरी कर रहे हैं…जैसे अन्य कंपनियों में करने वाले और सरकारी कर्मचारी …वो खाए पूड़ी मलाई और मीडिया वालों से नैतिकता की उम्मीद की जाए…ये तो नाइंसाफी
 
Vivek Narayan Singh parkhi nazar……..
 
Sharad Prasad When Baba's act like that – why should channels be behind

अशोक सिंघल की अवैध हिरासत के खिलाफ मानवाधिकार आयोग को शिकायत

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आज राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को विहिप नेता अशोक सिंघल की अवैध हिरासत के खिलाफ शिकायत भेजी है. शिकायत के अनुसार 25 अगस्त 2013 को सिंघल को अमौसी हवाईअड्डे पहुँचते ही लगभग 10.30 बजे पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. सभी न्यूज़ चैनल ने तत्काल यह खबर प्रसारित की. अरुण कुमार, एडीजी क़ानून व्यवस्था ने लगभग 11 बजे और बाद में आर के विश्वकर्मा, आईजी क़ानून व्यवस्था और कमाल सक्सेना, गृह सचिव ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की. 

लेकिन शंकर मुखर्जी, एसीएम-तृतीय, लखनऊ ने डीएम लखनऊ की तरफ से इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में इन नेताओं की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में अपने प्रति शपथपत्र में कहा कि सिंघल को अमौसी हवाईअड्डे पर नहीं,  बल्कि रात्रि 10.20 बजे एसओ सरोजिनी नगर द्वारा तब गिरफ्तार किया गया जब वे नवाबगंज पक्षी विहार से लौट कर शहीद पथ पर जा रहे थे.

ठाकुर के अनुसार इस प्रकार यह मामला अशोक सिंघल को 10.30 प्रातः से 10.20 रात्रि तक अवैध हिरासत में रखने और हाई कोर्ट में गलत हलफनामा दायर करने का है. उनका कहना है कि यदि इतने बड़े मामले में, जिसमे पूरे देश की मीडिया की निगाहें लगी हों, इस तरह का कृत्य किया जा सकता है तो इससे आसानी से समझा जा सकता है कि साधारण मामलों में क्या होता होगा. अतः उन्होंने इन सारे तथ्यों की जांच करा कर आवश्यक विधिक कार्यवाही किये जाने की मांग की है. साथ ही सभी राज्यों के मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी को भी अवैध हिरासत रोके जाने के सम्बन्ध में तत्काल आदेश निर्गत करने की भी मांग की है.
 

साजिश के तहत हो रहा है मीडिया पर हमला

“लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” (लीपा) के अध्यक्ष सुभाष सिंह ने मीडिया की विश्वसनीयत पर हो रहे हमलों की घोर निन्दा करते हुए कहा है कि मीडिया की छवि को ध्वस्त करने का काम बड़े सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया, क्षेत्रिय मीडिया, टीवी मीडिया एवं वेब मीडिया से इन सुनियोजित हमलों के खिलाफ एकजुट होने की अपील की।

उन्होंने कहा कि भारत में मीडिया को निशाना बनाने का एक नया चलन शुरू हुआ है। मीडिया पर सीधा प्रहार किया जा रहा है। पत्रकार का काम है जनता के लिये सवाल पूछना। सवालों से बचने के लिये पत्रकारिता को खरीदने और उसके मुंह पर लगाम लगाने के प्रयास नई बात नहीं है। लेकिन वर्तमान में यह नया प्रयोग हो रहा है। मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयोग।

हाल ही में आसाराम की प्रवक्ता नीलम दुबे ने टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया को दलाल पत्रकार कह दिया और एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा के नेता कैलाश विजयवर्गीय ने संयम खोते हुए टाइम्स नाऊ के टीवी एंकर व एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को पत्रकारिता की हैसियत समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि तुम्हारी हैसियत नहीं कि मेरे पांच वोट भी काट सको। ये मीडिया की छवि पर सीधा हमला है।

कुछ लोगों की रणनीति है कि जब मीडिया कोई मामला उठाये तो उसे गम्भीरता से लिया ही ना जाये। कॉर्पोरेट और पॉलीटिशियन वर्ग के कुछ लोग चाहते हैं कि जनता का विश्वास मीडिया से उठ जाये। क्योंकि मीडिया ही ऐसा माध्यम है जहां जनता की आवाज को बल मिलता है। मीडिया घोटालों को उजागर करने का काम शुरू से ही करता आ रहा है बीते कुछ समय से मीडिया ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काफी मुखर प्रतिक्रिया दी है। 2जी, कोयला, कॉमनवेल्थ जैसे जल,थल और नभ में हुए बड़े घोटाले मीडिया की बदौलत ही उजागर हुये।

श्री सिंह ने कहा कि सोशल मीडिया पर भी अभिव्यक्ति के नाम पर पत्रकारों को दलाल साबित करने की कोशिश की जा रही है। दीपक चौरसिया हों या अर्णब गोस्वामी हर पत्रकार की अलग-अलग शैली होती है जिसमें वो जनता के लिये सवाल पूछता है उसका मकसद अपने हित को साधना नहीं होता।

श्री सुभाष सिंह ने कहा कि कभी राजदीप सरदेसाई, कभी आशुतोष, कभी ओम थानवी के खिलाफ सीधे अभद्र शब्दों का प्रयोग किया जाता है कभी पत्रकारों पर जानलेवा हमले होते हैं। उत्तर प्रदेश में हाल ही में कल्पतरू अखबार के पत्रकार पर जानलेवा हमला हुआ। 17 जुलाई को मध्य प्रदेश के उमेरिया में माईनिंग माफिया के खिलाफ लगातार खबर छापने के लिये पत्रकार चन्द्रिका राय की उनके परिवार समेत हत्या कर दी गई। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया, क्षेत्रिय मीडिया, टीवी मीडिया से इन हमलों के खिलाफ एक मंच पर आने का आह्वान किया।

सुभाष सिंह ने कहा कि सरकार से मांग करते हुए कहा कि “लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” चाहती है कि सरकार मीडिया कर्मियों की सुरक्षा के लिये कड़े कानून बनाये। अगर कोई भी मीडिया को उसका उत्तरदायित्व को निभाने से रोकता है या उसे कमजोर करने का प्रयास करता है तो उनके खिलाफ इस तरह कार्यवाई के प्रावधान होने चाहिये जैसे आईपीसी में सरकारी कामकाज में बाधा उत्पन्न करने वालो के खिलाफ होता है।

दभोलकर की हत्या के मायने

विज्ञान हार गया ! आप सोच रहे होंगे कैसी पहेली समझाई जा रही है?….जी हां,ये चीत्कार है उन तमाम लोगों की जिनकी संवेदनाएं नरेन्द्र दभोलकर की हत्या किए जाने से हिल गई हैं। जो आहत हुए वे प्रगतिशील,आधुनिक और संविधानिक इंडिया के हितों के समझदार कहे जाते हैं। इन्हें रंज है कि हत्यारे पकड़े नहीं गए हैं लिहाजा जादू-टोने और अंधविश्वास के उभार की आशंका में ये दुबले हुए जा रहे हैं। बौद्धिक जगत,मेनस्ट्रीम और सोशल मीडिया में इस मुतल्लिक बहस जारी है। इनके सुर में सुर मिला रहे हैं राजनीतिक जमात के वे लोग जो इस वारदात के बहाने दक्षिणपंथियों को घेरने की जुगत में हिन्दू धर्म पर हमले किए जा रहे हैं।

क्या वाकई विज्ञान हार गया है? या फिर नेहरू की चाहत वाली साइंटिफिक टेंपर की कोशिशें हारी हैं। विलाप करने वाले ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन हारा है? जिसे आप पढ़ाई का विषय समझते आए हैं उस विज्ञान के हारने का मतलब है कि इसे राजनीतिक-सामाजिक लक्ष्य को पूरा करने का हथियार बनाया गया था और ये हथियार चूक गया। या फिर हिन्दू जीवन शैली की हर नई परिस्थितियों में परिमार्जन करने की खूबी, इसके निमित जरूरी समाजिक बदलाव और वैज्ञानिक मिजाज के सम्मिलित चित के परिष्कार की जो आभा संविधान में प्रकट हुई थी …….. वो प्रयास निष्फल हुए? क्या प्रगतिशील तबका ऐसे किसी परिष्कार में यकीन रखता है?

पश्चिम के देशों से लेकर अमेरिका तक में क्रिस्टियन इवेंजेलिज्म सर उठा रहा है… उधर मुसलमानों में इंडिया सहित अधिकांश मुसलमान बहुल देशों में धर्म के लिए गतिविधियों बढ़ी हैं … वहीं हाल के दशकों में हिन्दुओं में धर्म के साथ बाबाओं के लिए आकर्षण बढ़ा है। ऐसी सूरत में मर्सिया गाया जाना जायज है। लेकिन सवाल ये कि आखिरकार प्रगतिशीलों की कामना क्या थी? इंडिया में तो नेहरू की अगुवाई में नए सवेरे की तरफ बढ़े थे यहां के लोग… फैक्ट्रियां आधुनिक मंदिर कहलाई…आधुनिक जीवन शैली में रंगने लगे लोग…उपर से इस देश में सक्रिय वाम, समाजवादी, मध्यमार्गी और अन्य जमातों के लोग उन्नतिकामी विचारों को बढ़ावा देने में लगे रहे हैं। फिर क्या हुआ कि दभोलकरों की हत्या हो जाती है? संभव है तेज आधुनिक जीवन शैली ने इस देश के तमाम धार्मिक समुदायों को डराया, सहमाया होगा… उन्हें लगा हो कि उनके पारंपरिक जीवन के तत्व खतरे में पड़ रहे हैं।  

प्रगतिशीलों की छटपटाहट की वजहों को खोजा जाना जरूरी है। अक्सर जो तर्क परोसे जाते हैं उसके मुताबिक इंडिया ६५ साल का नौजवान देश है और भारत रूपी सनातन विरासत की ये कंटिनियूटी नहीं है। माने ये कि उस पुरातन संस्कृति का लोप हुआ और नेहरू के सपनों के अनुरूप एक नए देश ने आकार लिया। प्रगतिशील तबके के अधिकांश लोग ६५ साला कंसेप्ट में यकीन रखते हैं। तो फिर वे किस आबादी की किस समझ में वैज्ञानिक चेतना का संचार करना चाहते थे?

देश चलाने वाले भले नेहरू के संकल्प के साथ चले होंगे पर यहां की बहुसंख्य आबादी सनातन परंपरा का निर्वाह पिछली शताब्दी के छठे दशक के आखिर तक करती रही। उसके बाद इंदिरा युग में वाम असर वाले प्रगतिशीलों के संरक्षण में जो शिक्षा दी गई उसने संस्कृति के लिहाज से रूटलेस पीढ़ी को जन्म दिया। मदरसा और संस्कृत संस्थानों में पढ़नेवालों को छोड़ दें तो इस पीढ़ी से धर्म की जानकारी दूर ही रखी गई। इधर-उधर से मिली जानकारी के कारण उनकी धार्मिक समझ अधकचरी बनी रही।

उस पीढ़ी में अपने धर्म के लिए हीनता बोध का संचार हुआ। यही कारण है कि आठवें दशक में जब दूरदर्शन ने रामायण सिरियल का प्रसारण किया तो इन्होंने काफी उत्सुकता दिखाई। पर वामपंथियों को ये नहीं सुहाया और उन्होंने प्रसारण का तीखा विरोध किया। नब्बे के दशक में बाजार का असर बढ़ा तो संचार के क्षेत्र ने नया आयाम देखा। निजी टीवी चैनल खुले साथ में धार्मिक सिरियलों की बाढ़ आई। ऐसा क्यों हुआ कि लोग प्यासे की तरह धार्मिक कार्यक्रम देखने लगे? टीआरपी के बहाने जादू-टोने, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास से भरे कार्यक्रमों की बाढ़ आई।  

बाजार के असर ने लोगों को मतलबी बनाया साथ ही इसने बाबाओं(ढ़ोंगी सहित) की मार्केटिंग के द्वार भी खोले। इनकी चमक-दमक से वशीभूत होने वालों की तादाद कई गुणा बढ़ गई। यहां तक कि विभिन्न धर्म के अलग अलग चैनलों के पट भी खुल गए। एक निजी चैनल है जो बच्चों को कुरान की आयतों का अर्थ समझाता है। जाहिर है निशाना वे बच्चे हैं जो मदरसों में नहीं जाते बल्कि सरकारी या फिर महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं।

बेशक बाबा टाइप के लोग चमत्कार की भाषा बोलते। ऐसा लगता मानो असंभव को संभव कर लेने की छुपी हुई इनसानी अतृप्त आकांक्षा का द्वार ये बाबा अपने भक्तों के लिए खोल देंगे। कई लोग बेमन से इन बाबाओं के पास जाते। तमाम तरह की असुरक्षा के डर से सहमे लोग इनकी शरण में जाते। अंगूठी, ताबीज… जैसी चीजें उन्हें संबल देती। उपर से प्राकृतिक आपदा झेलने की मजबूरी तो कमोबेश रहती ही है। जापान के सुनामी और उत्तराखंड के तांडव के सर्वाइवरों की मनहस्थिति को याद करें। क्या इंडिया के हुक्मरान सुरक्षा जगाने में कामयाब हुए हैं? जवाब नकारात्मक ही दिखता है। तो फिर दुखी मन कहां जाए? सरकार से आस नहीं… एक जरिया समाज थी जिसमें इन्हीं राजनीतिज्ञों ने दरार पैदा कर दिए। ले-देकर धर्म बचता है।

जब धर्म के ज्यादा करीब आएंगे तो कुरीतियों का असर भी पड़ेगा। कुरीतियों से बचने की आकांक्षा वालों का साथ निभाने के लिए प्रगतिशील तबके ने क्या किया? अवैज्ञानिकता दूर करने की उत्कट अभिलाषा थी तो धार्मिक आबादी के साथ ठोस संवाद कायम करने की जहमत उठानी चाहिए थी। हर काल के संदर्भ के अनुरूप अपने ही ग्रंथों पर नए सिरे से टीका लिखने और मीमांसा करने की परंपरा वालों से इस तरह का संवाद अवसर पैदा कर सकता था। यहां भी नतीजा सिफर ही दिखता है। उल्टे हिन्दू धर्म के भगवानों को विभिन्न माध्यमों से जब अश्लील गालियां दी जाती है तो वे चुप रहते। ये चलन सोशल मीडिया में चरम पर है। नेताओं पर अमर्यादित टिप्पणी हो तो मामला दर्ज होता पर हिन्दू धर्म के ईश की निंदा होती तो कुछ नहीं होता।

दिलचस्प है कि कांसीराम ने वाम नेताओं के लिए -हरे घास में छुपे हरे सांप- की संज्ञा दी थी। बावजूद इसके जातीए राजनीति से दूरी रखने वाले वाम राजनेता अपने फायदे के लिए दलित राजनीति से मिलकर खुलेआम एनीहिलेशन ऑफ कास्ट सिस्टम की बात करते नजर आते। रोचक है कि समाजवादियों के अलावा कई दक्षिणपंथी राजनेता भी इससे सहमति जताते हैं। पर इस देश ने कभी भी इन राजनीतिज्ञों को मुसलमानों में पनपे कास्ट सिस्टम के एनीहिलेशन की चर्चा करते नहीं देखा है।  

यानि प्रगतिशीलों का दुराग्रह है कि जिस धर्म के खास अवयव का अंत वे चाहते उसी समाज से वैज्ञानिक चेतना जगाने के लिए सरोकार भी जताने को कहते। ये अजीबोगरीब स्थिति है इस देश की। प्रगतिशील तबका ये आरोप तो लगाता है कि धर्म से जुड़े लोगों ने समय के बहाव के साथ चिंतन करना छोड़ दिया है। पर धर्म की परिधि में जो बदलाव हो रहे उसे देखना नहीं चाहता। हिन्दू और बौद्ध धर्म में कई धाराएं हैं जिनमें तंत्र के असर वाली धारा भी है। कर्मकांड में जटिल प्रक्रियाओं के अलावा पशु बलि चढ़ाने की पिपाशा है। कुछ लोग मानते कि तंत्र वेद विरोधी धारा है जबकि कई मानते कि ये ट्रांस वैदिक परंपरा है। तमिल सिद्ध परंपरा से लेकर असम तक में तंत्र का असर है।

वैदिक धारा और बुद्ध के शांति की धारा वालों से संवाद बनाकर अंध विश्वास को हताश किया जा सकता था। बिहार के कोसी इलाके के यादवों की तरह देश के कई हिस्सों में ब्राम्हण पुरोहितों के वर्चस्व को हतोत्साहित करने के लिए विभिन्न जातियों ने अपनी ही जाति के पुरोहितों से सरल कर्मकांड की राह चुनी है। इसी तरह बीजेपी के कई नेता गैर-द्विजों के उपनयन संस्कार की मुहिम चलाते रहे हैं। इस तरह की मुहिम को समर्थन दिया जा सकता था। प्रगतिशील तबका ये क्यों मानता कि धार्मिक लोग विचारवान नहीं हो सकते? दभोलकर की हत्या के बहाने जो सुखद आत्मनिरीक्षण चल रहा है उसे इन सवालों से भी जूझना चाहिए।

-संजय मिश्र

Ensure the Rights of Media Workers! Democratize Indian Media Now!

: SOLIDARITY MEETING ON: JOURNALISTIC FREEDOM AND CORPORATE OWNERSHIP OF MEDIA IN THE WAKE OF RECENT CNN-IBN LAY OFF : Date: August 31, 2013.  Time: 11.30 am : Venue: Press Club of India, Raisina Road, Delhi-01 : Dear Friends, The recent sacking of CNN-IBN and IBN 7 journalists is not just an isolated incident, there has been a number of examples where corporate media owners/managements have violated the labor rules and exploited journalists and other media workers. Hiring and firing has become a common phenomenon in Indian media industry. There are no fixed working hours.

This is an irony that press council of India’s chairman Markanedy Katju and Information and broadcasting minister Manish Tiwari are trying to divert the issue of the job security of media persons. They are raising the issue of qualification and license for journalists as if only journalists are responsible for the degradation of Indian media. Why don’t they question the corporate media owners who have no qualification except the power of money? Many corrupt business houses are entering in the news media business to promote their other business interests in the name of media.

There is a danger of media consolidation in India. Only a handful of big companies are holding many media entities including Radio, TV, Internet and Print. They are trying to manufacture public opinion in their own interests. In a way, corporate are running our media without any responsibility! Corporate are putting our democracy on ransom!!!

Journalists’ Solidarity Forum (JSF) is a loosely knitted body of journalists. We are asking for the democratization of Indian media. We are against whims and fancies of powerful corporate and their agents politicians/editors. We demand that there should be a strong measure to regulate the ownership of media. We must not leave media on the mercy of corporate. Self regulation is a fake idea projected by corporate. Freedom of press is not the freedom of profiteering media owners! And we want to proclaim that Corporate media editors/managing editors are not the representatives of journalists. They are only the agents of media owners/managements. EXPOSE THEM!

We are the common journalists who don’t draw vulgar salaries in crores of rupees. We work on contractual basis. We don’t have any job security. Corporate Owners and management have made it completely impossible to form a union in any media house. They have even got success to tag journalist union activity as criminal act. We are against this corporate highhandedness!

If CNN-IBN journalists had journalists union the management would not have dared to sack around 400 journalists at one go.

Thus we demand:

-Immediately implement the Working Journalists Act in EVERY media organization which has provision of fixed working hours, job security and right to form a union!

-Declare Rs 25,000 to Rs 30,000 minimum wage for entry level journalists and implement Majithia Wage Board report for all working journalists!

-Immediately stop cross media holding and other mal practices like Paid News, Private Treaties and Medianet! Make strong rules for corporate media ownership and Ensure democratization of media!

-Establish third Press Commission to investigate the current state of Indian media and make a mandatory its recommendations.

We solicit your presence on 31 august 2013 at Press Club of India. We are inviting many journalists, academics, writers, film makers, student leaders and other concerned people to discuss the issue and decide further course of action. Your solidarity will definitely count in the democratization of Indian media and the rights of journalists!

Released by Bhupen Singh

on behalf of Journalists Solidarity Forum (JSF)

मलयालम पत्रकार विथुरा बेबी का निधन

तिरूवनंतपुरम : पांच दशकों से भी ज्यादा समय तक केरल के राजनैतिक और सांस्कृतिक बदलावों के साक्षी रहे वरिष्ठ मलयाली पत्रकार और लेखक विथुरा बेबी का कल निधन हो गया।

सूत्रों ने कहा कि 75 वर्षीय बेबी अंत तक एक स्वतंत्र पेशेवर पत्रकार के रूप में काम करते रहे। सिटी बस में यात्रा करते हुए वे गिर गए थे। उन्हें मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया जहां कल उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं।

एक और लड़की का आरोप- आसाराम ने आशीर्वाद के बहाने मेरे अंगों को छुआ

रायपुर से खबर है कि एक और लड़की सामने आई है और आसाराम पर यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है. इस लड़की का कहना है कि आसाराम हमेशा से ही कम उम्र की लड़कियों के साथ कुकृत्य करते आए हैं. वह खुद इस तरह की घटना का शिकार हो चुकी है. रायपुर से सामने आई लड़की का नाम है टीना (बदला हुआ नाम). टीना का दावा है कि वह आसाराम के सत्संग में कई बार शामिल हो चुकी है. उसने बताया कि आसाराम अक्सर कम उम्र की लड़कियों के साथ गलत हरकतें करते हैं. उसके मुताबिक, वह आसाराम की वासना का शिकार होते-होते बची है. आसाराम ने उसके अंगों के साथ जो छेड़छाड़ की इस घटना की, वह उसे अभी तक भूल नहीं पाई है.
मीडिया में आसाराम की खबरें देखने के बाद टीना के दिमाग में करीब 9 साल पुरानी वो घटना ताजा हो गई. टीना के अनुसार, यह घटना तब की है जब वह संत आसाराम सत्संग करने रायपुर आये थे. उस दौरान वह भी सत्संग में मौजूद थी. आम भक्तों के साथ जब इस लड़की ने संत आसाराम बापू के पैर छुए तो उसे आशीर्वाद की उम्मीद थी, लेकिन हुआ कुछ और. टीना ने बताया कि आशीर्वाद के बहाने आसाराम ने उसके प्राइवेट पार्ट्स से छेड़छाड़ की. टीना ने कहा, ''ये सन 2004 की बात है, जब वो हमारे शहर में प्रवचन देने आये थे. मैं उस समय दसवीं कक्षा में NCC में थी. आसाराम आशीर्वाद देने के बहाने लड़कियों के निजी अंगों से छेड़छाड़ करते थे. वह सभी कम उम्र की लड़कियों के साथ ऐसा ही करते थे. हमें यह अच्छा नहीं लगता था. हम छोटे थे और परिवार के डर से कुछ कहते नहीं थे. हमें डर लगता था कि वे इतने बड़े संत हैं, इसलिए हम चुप रहते थे.'' (आजतक)

उत्तराखंड में ढाई माह बाद भी नहीं मिला आपदा पीड़ितों को मुआवजा, प्रदर्शन

धारचूला : ढाई माह बीत जाने के बाद भी आपदा पीड़ितों के अभी तक मकान और मवेशियों के नुकसान का मुआवजा तक नहीं मिल पाया है। किसान महासभा के बैनर तले आपदा पीड़ितों ने आज तहसील कार्यालय पर ज्ञापनों के साथ प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि दो दिन के भीतर प्रशासन आपदा पीड़ितों के चैकों का वितरण करें। इसी के साथ फाइबर हट इण्टर कॉलेज के खेल मैदान और स्टेडियम में बनाने की मांग भी उठी। किसान महासभा के बैनर तले सोबला, तीजम, न्यू, खिम, कन्च्यौती, खेत, तवाघाट, ऐलागाड़ सहित दर्जनों गांवों के आपदा प्रभावित उपजिलाधिकारी कार्यालय के आगे जमा हुए। हाथों में ज्ञापन लेकर प्रदर्शन करते हुए भाकपा माले के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने कहा कि ढाई माह बीत गया है। अभी तक आपदा पीड़ितों को मकान और मवेशियों के नुकसान का मुआवजे का चैक तक नहीं दिया गया है। ढाई माह से आपदा पीड़ित तहसील का चक्कर काट रहे हैं। 
राजस्व निरीक्षक से लेकर उपजिलाधिकारी तक आपदा पीड़ितों को झूठे आश्वासन देकर रोज ठग रहे हैं। जिस कारण आपदा पीड़ित परेशान हो गये हैं। उन्होंने कहा कि चैक बांटने के साथ ही अभी तक छूटे हुए पीड़ितों को मौका देने की कार्यवाही शुरू होनी चाहिए। आपदा पीड़ितों से पूछे बगैर फाइबर हट बनाने के लिए जगह तलाशी जा रही है। राजकीय इण्टर कॉलेज धारचूला के शिविर में रहने वाले आपदा पीड़ितों ने आज सुबह बैठक कर यह तय किया है कि इण्टर कॉलेज के मैदान और स्टेडियम में ही फाइबर हट बनाये जायें। इसके अलावा और कोई स्थान उन्हें मंजूर नहीं होगा। प्रशासन पर आरोप लगाया गया कि वह आपदा पीड़ितों को पूछे बगैर भूमि चयन की कार्यवाही कर रही है। भाकपा माले के जिला सचिव ने कहा कि उत्तराखण्ड सरकार और कांग्रेसी झूठ बोल कर आपदा पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। उपजिलाधिकारी को सौंपे गये ज्ञापन में चेतावनी दी है कि दो दिन के भीतर चैक नहीं कटे तो उग्र आन्दोलन शुरू कर दिया जायेगा। इस मौके पर आइसा के तहसील प्रभारी सुनील आगरी किसान संगठन के रमेश बिष्ट के अलावा निगरानी कमेटी के सदस्य त्रिलोक सिंह, राम सिंह, मदन सिंह, शान्ती देवी, मोहन सिंह, मंजू देवी, गोपाल सिंह, चन्द्र सिंह, खुशाल सिंह, मोहन सिंह, शेर सिंह, सुन्दर सिंह, दौलत सिंह, भूपेन्द्र सिंह सहित सैकड़ों आपदा पीड़ित मौजूद थे।

जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार डीसी प्रशांत का निधन

पूर्व राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार डीसी प्रशांत का जम्मू-कश्मीर में उनके निवास पर 28 अगस्त 2013 को निधन हो गया. वह 96 वर्ष के थे और काफी समय से बीमार थे. डीसी प्रशांत ने अपना करियर आजादी से पहले असोसिएटेड प्रेस से शुरू किया था. वह आकाशवाणी और पीटीआई से भी लम्बे समय तक जुड़े रहे. 
उन्होंने पत्रकारिता और डोगरी व हिन्दी भाषा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया. वह डोगरी संस्था के संस्थापक सदस्य थे और उन्होंने डोगरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज कराने हेतु अथक संघर्ष किया. डोगरी भाषा के आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद उन्होंने स्नातकोत्तर स्तर तक शैक्षणिक संस्थानों में डोगरी भाषा लागू किए जाने का अभियान चलाया. हिन्दी और डोगरी में डीसी प्रशांत के नाटकों ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी. डीसी प्रशांत जम्मू-कश्मीर से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुने जाने के बाद 1982 से 1988 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. उनके परिवार में तीन बेटे और चार बेटियां हैं.

फोटो जर्नलिस्ट अस्पताल से अपने घर पहुंची, आरोपियों को घटनास्थल पर ले जाया गया

मुंबई में पिछले हफ्ते गैंगरेप की शिकार हुई 23 वर्षीय फोटो पत्रकार का इलाज कर रहे डाक्टरों ने उसे ‘‘स्वस्थ’’ घोषित करते हुए अस्पताल से छुट्टी दे दी है. पीड़िता को जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. अस्पताल ने एक बयान में कहा कि मरीज की हालत में लगातार सुधार हुआ और उसका इलाज कर रहे डाक्टरों ने मंगलवार रात बताया कि वह पूरी तरह से स्वस्थ है और उसे छुट्टी दी जा सकती है.  इसके बाद उसे देर रात छुट्टी दे दी गई. अस्पताल ने कहा कि मरीज को हर वक्त बेहतरीन चिकित्सा सुविधा प्रदान की गई. यह बयान जसलोक मेडिकल सेवाओं की निदेशक और कार्यवाहक सीईओ डा. तरंग ज्ञानचंदानी द्वारा जारी किया गया था.       
गौरतलब है कि पीड़ित एक अंग्रेजी पत्रिका में इंटर्न है. 22 अगस्त को उसके साथ पांच लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया था जब वह अपने एक साथी के साथ ‘‘एसाइनमेंट’’ पर एक खाली मिल परिसर गई थी. इस घटना पर देश भर में आक्रोश व्यक्त किया गया और समाज के विभिन्न वगरें ने इस घटना की निंदा करते हुए दोषियों को सख्त सजा दिए जाने की मांग की थी. फोटो पत्रकार के साथ गैंगरेप के संबंध में गिरफ्तार किए गए पांच आरोपियों को अपराध की कड़ियों को जोड़ने के लिए शक्ति मिल परिसर में ले जाया गया है. सभी पांचों आरोपियों को दोपहर बाद करीब एक बजे घटनास्थल पर ले जाया गया और पुलिस ने हादसे के दिन के घटनाक्रम की उनसे जानकारी मांगी. इस मामले की जांच की निगरानी कर रहे संयुक्त पुलिस आयुक्त हिमांशु राय भी आरोपियों को मिल में लाए जाने के समय वहां मौजूद थे. पुलिस सूत्रों ने बताया कि अपराध की कड़ियों को जोड़ने के लिए घटनाओं का ताना बाना बुने जाने की वीडियो रिकार्डिंग की जा रही है. सभी पांचों आरोपी सलीम अंसारी, विजय जाधव, चंद बाबू सत्तार शेख, मोहम्मद कासिम हाफिज शेख उर्फ कासिम बंगाली और सिराज रहमान खान मुंबई पुलिस की अपराध शाखा की हिरासत में हैं.

एनडीटीवी, आउटलुक, नेटवर्क18, भास्कर के बाद अब ब्लूमबर्ग टीवी में छंटनी की तैयारी

मुंबई : मीडिया में हाहाकार की स्थिति है. किसी भी चैनल, अखबार में किसी की नौकरी सुरक्षित नहीं दिख रही है. छंटनी पर छंटनी हो रही है. अब खबर ब्लूमबर्ग टीवी से छंटनी की है. यहां से करीब तीन दर्जन मीडियाकर्मियों को निकाला जा रहा है. खुद चैनल की तरफ से कहा गया है कि वह चार सौ कर्मचारियों में से तीस को निकाल रहा है. यह तो घोषित तौर पर छंटनी है. ढेर सारे लोगों को गुपचुप तरीके से इस चैनल से निकाले जाने की आशंका है. 
 
बताया जा रहा है कि ब्लूमबर्ग टीवी में छंटनी के लिफाफे अगले हफ्ते कर्मियों को दे दिए जाएंगे. ब्लूमबर्ग टीवी बिजनेस न्यूज चैनल है. इस चैनल में अनिल अंबानी का 18 प्रतिशत हिस्सा है. छंटनी की जो लिस्ट बनाई गई है उसमें इस चैनल के पत्रकार, कैमरामैन समेत टेक्निकल, मार्केटिंग व सेल्स के लोग शामिल हैं. ब्लूमबर्ग टीवी में बुलेटिन, लाइव शो और कई प्रोग्राम्स को पहले ही कम कर दिया गया है या बंद कर दिया गया है. इसके बाद अब स्टाफ को निकालने की तैयारी हो गई है.
 
एनडीटीवी ने भी कुछ ऐसा ही किया था. कम से कम बुलेटिन, लाइव शो और प्रोग्राम होने से स्टाफ की कम जरूरत पड़ती है. ब्लूमबर्ग टीवी इंडिया ने अपने अंतरराष्ट्रीय पार्टनर चैनल ब्लूमबर्ग एलपी से ज्यादा से ज्यादा कंटेंट लेना शुरू किया. इससे भी स्थानीय स्तर पर स्टाफ की जरूरत कम हो गई. मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि भारत भयंकर रूप से मंदी की चपेट में है. कारपोरेट घराने और विज्ञापनदाताओं ने मीडिया को जाने वाले रेवेन्यू पर काफी लगाम लगा दिया है. इससे मीडिया के लोग अपने मुनाफे को कायम रखने या घाटे को न बढ़ने देने के लिए छंटनी समेत कई तरह के हथकंडों का इस्तेमाल कर रहे हैं. 

अंशुमान तिवारी का तबादला, देवेंद्र और सुधीर ने अमर उजाला ज्वाइन किया

रामेश्वर पांडेय के रिटायरमेंट के बाद जागरण प्रबंधन ने नेशनल ब्यूरो के प्रभारी अंशुमान तिवारी का तबादला लखनऊ कर दिया है. उन्हें स्टेट ब्यूरो का चीफ और यूपी का हेड बनाया गया है. अंशुमान तिवारी का काफी समय से राजनीतिक संपादक प्रशांत मिश्रा से मनमुटाव चल रहा है. इसी कारण वे बीच में अवकाश पर भी चले गए थे और उनके इस्तीफे की खबरें भी कई बार उड़ीं. प्रबंधन ने यूपी जैसे महत्वपूर्ण स्टेट का प्रभार और लखनऊ में कार्यरत स्टेट ब्यूरो का प्रभार देकर अंशुमान को अपने लिए महत्वपूर्ण माना है. 
उधर, जनवाणी, मेरठ में जनरल डेस्क पर कार्यरत सुधीर और फीचर डेस्क पर काम कर रहे देवेंद्र प्रताप ने इस्तीफा दे दिया है. इन दोनों ने अमर उजाला, जम्मू के साथ नई पारी की शुरुआत की है. खबर है कि जनवाणी प्रबंधन ने रिपोर्टर दीपक शर्मा से भी इस्तीफा ले लिया है. 
 
एक अन्य जानकारी के मुताबिक बीबीसी हिंदी के दिल्ली आफिस के साथ तीन हिंदी पत्रकार जुड़ गए हैं. ये हैं संजय श्रीवास्तव, ऋचा और संदीप राउजी. संजय हिंदुस्तान में हुआ करते थे. ऋचा अमर उजाला में काम कर चुकी हैं. संदीप दैनिक जागरण में सेवाएं दे चुके हैं. 

ट्रेनी-ट्रेनी जपो, चले आएंगे बिहारी…

Jitendra Dixit :  राधे-राधे जपो…. उन दिनों पत्रकार साथी राधे-राधे गुनगुनाते मिलते थे। एक-दूसरे को देखकर यही जपना और फिर खिलखिलाना। बात तब की है जब अमर उजाला हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और जम्मू में विस्तार की तैयारी में लगा था। बड़े पैमाने पर पत्रकारों की भर्ती चल रही थी। विस्तार की सभी गतिविधियां मेरठ से ही संचालित हो रहीं थी। तब मेरठ में ही अमर उजाला का कॉरपोरेट आफिस था। दफ्तर में पूरा दिन पूर्वांचल और बिहार के युवाओं का जमावड़ा रहता था। 
लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के दौर चलते रहते थे। भर्ती में सबसे ज्यादा भीड़ बिहारी युवाओं की देखकर संपादकीय विभाग में राधे-राधे जपो चले आएंगे….भजन की पैरोडी तैयार की गयी। सभी साथियों की जुबान पर रहता था- ट्रेनी-ट्रेनी जपो, चले आएंगे बिहारी। आज जन्माष्टमी पर सहज ही यह पैरोडी याद आ गयी। कान्हा परमानंद हैं। उन्हें कभी किसी ने उदास नहीं देखा। प्रतिकूल स्थिति में भी वह खिन्न नहीं हुए। सदा-सर्वदा उनके अधरों पर मनमोहिनी मुस्कान रही। उन्हीं को केंद्र में रखकर प्रकृति का विस्तार हुआ। उनका सानिध्य प्राप्त होने के कारण प्रकृति भी सदा हंसती-खिलखिलाती रहती है। अहंकार मुक्त व्यक्ति जब दूसरों के लिए कुछ करके संतोष की अनुभूति करता है तो उसकी आत्मा श्रीकृष्ण का स्वत: सानिध्य पाकर आनंदित हो उठती है। जब आत्मा इस आनंद का सामीप्य पाती है तो नाना प्रकार की भवबाधाओं से उबरने का मार्ग प्रशस्त होता है। आइए आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मेरी पोस्ट आपको थोड़ा गुदगुदाए तो सार्थक हो जाएगा लीलानागर हे कृष्ण माधव गोविंद मुरारी को पाने का प्रयत्न। ऊ नमो भगवते बासुदेवाय नम:।
 
मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

कैंसर से लड़ रहे वीरेन डंगवाल का आपरेशन सफल

Ashutosh Kumar : कल के आपरेशन के बाद वीरेन दा से मिलने गया. वे अभी अभी आईसीयू में पहुंचे थे. आपरेशन कठिन था. कुछ ही समय पहले हुई एंजियोप्लास्टी के कारण नाज़ुक भी. लगभग पांच घंटे चला. डाक्टर सुधीर बहादुर के सधे हुए हाथों से सब कुछ संतोषजनक तरीके से निभ गया. मैं आईसीयू में उन्हें तलाश रहा था. उम्मीद थी वे बेहोशी के असर में होंगे. तभी तरह-तरह की नालियों और उपकरणों से ढंके एक मुखड़े की आधी छुपी चिर- परिचित मुस्कान मेरी तरफ लपकी. 
बाकायदा हाथ हिला कर वीरेन दा ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा. किस कैंड़े का आदमी है, यार. मैं हतप्रभ देखता रह गया. धीरे से उनकी हथेलियों का स्पर्श किया. पाया कि हाथ मेरे काँप रहे हैं, और वीरेन दा की हथेलियीं हमेशा की तरह मुझे ही सम्हालने की कोशिश कर रही हैं. आँखों में वही शरारती शायराना चमक. कुछ कहने को बेचैन होंठ. हमने चुप रहने का इशारा किया. होंठों की जुम्बिश से वे कह गए- ममा (इसी नाम से वे अपनी जीवन-संगिनी को पुकारते हैं) से कह दो – मैं ठीक हूँ. 

पांच अगस्त को अपने 66वें जन्मदिन पर कविता पाठ करते वीरेन डंगवाल.  बगल में हैं प्रो. आशुतोष कुमार. (फाइल फोटो)


मित्रों, हमारे प्यारे कवि ने जंग का यह दौर जीत लिया है. आनेवाले दौर भी जीत लेंगे. लेकिन हम सब को इस लड़ाई में उनका साथ देना है. आज यह हुआ कि जनरल वार्ड में आते ही अनगिनत लोग उनसे मिलने आते रहे. दिन भर मिलना जुलना चलता रहा. अभी की सूरत में उन्हें इतनी थकान देना बिलकुल वाजिब नहीं है. डाक्टर सर पीट रहे हैं और मित्र लोग हैं कि मानते नहीं. शाम होते न होते हालत यह हुई कि एक बार फिर आईसीयू की शरण में जाना पडा.  अभी स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है. लेकिन प्रबल अनुरोध है कि अभी कुछ दिन हम बिलकुल उनसे मिलने की कोशिश न करें. प्लीज़. उन्हें चंद रोज आराम की सख्त जरूरत है. उनकी सेहत की खबरे आपको यहीं बराबर मिलती रहेंगी. समय से और सही-सही. पक्का वादा. अब बस मुस्कुराइए और घर जाइए.
 
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष कुमार के फेसबुक वॉल से.

नंद घर बाजे… बाजे बधइया.. (सुनें) …पंडित छन्नूलाल मिश्रा की आवाज

जन्माष्टमी के मौके पर पंडित छन्नूलाल मिश्रा की आवाज में एक शानदार भजन.. नंद घर बाजे … बाजे बधइया.. 

नंद घर बाजे .. बाजे बधइया… (पंडित छन्नूलाल मिश्रा)


(सुनें)

खेलें मसाने में होरी… पीटें प्रेत थपोरी… 


मैंने पत्थर से जिनको बनाया सनम, वो खुदा हो गए देखते देखते… 


रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे… 


लता और जगजीत की आवाज में दो ग़ज़लें


तू जो नहीं है तो कुछ भी नहीं है.. 


बीत गये दिन भजन बिना रे… 


रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो…


वो इश्क जो हमसे रुठ गया…


हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है…. 


हमारी मय्यत पर तुम जो आना तो चार आंसू बहा के जाना… 


थोड़ी सी पी शराब, थोड़ी उछाल दी… 


 

जी ग्रुप ला रहा चौबीसों घंटे का क्राइम बेस्ड न्यूज चैनल, कई जुड़े

अपराध जगत से जुड़ी खबरों और शो पर आधारित चौबीसों घंटे के न्यूज चैनल की योजना बना रहा है जी समूह. बताया जाता है कि अंदरखाने सब कुछ फाइनल हो चुका है. इस चैनल का हेड नवीन कुमार को बनाए जाने की चर्चा है. माना जा रहा है कि ये चैनल देश का पहला ऐसा चैनल होगा जो सिर्फ क्राइम की खबरें प्रासरित करेगा. इस नए चैनल से जुड़ने को लेकर कई नामों की चर्चा है.
 
इंडिया टीवी पर क्राइम खबरों की डेस्क संभालने वाले विनय पाठक इस चैनल से जुड़ गए हैं. 'सनसनी' में काम कर चुके तमाम लोग जी के इस नए वेंचर का हिस्सा होंगे. एबीपी न्यूज, आईबीएन7, न्यूज24, टोटल टीवी और चैनल वन से भी कुछ लोग इस नए चैनल से जुड़ रहे हैं. रवींद्र रंजन, आनंद तिवारी, दीपक गंभीर, लोकेंद्र सिंह, जितेंद्र शर्मा को लेकर कानाफूसी है कि ये लोग जी ग्रुप से जुड़ चुके हैं या जुड़ने वाले हैं. हालांकि अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है. 
 

ये न्यूज चैनल वाले कब सुधरेंगे? देश की बेटी को रुला डाला, ‘द हिंदू’ ने ली खबर

न्यूज चैनलों में कुछ हरामखोर किस्म के लतिहड़ पत्रकार और कैमरामैन हैं जो खुद को सबसे बड़ा समझने का भरम पाले रहते हैं. इन चिरकुटों ने कल उस लड़की को रुला डाला जो तीरंदाजी के क्षेत्र में परदेश में आयोजित प्रतियोगिता में देश का नाम रोशन कर लौटी. इस लड़की से सारे चैनल वाले अलग अलग इंटरव्यू चाहते थे. पर यह ऐसा कर पाने में असमर्थ थी. लगातार यात्रा की थकान और न सो पाने के कारण परेशान तो थी ही, भारत आते ही इनके सम्मान में एक प्रोग्राम रख दिए जाने और ढेर सारे प्रशंसकों से घिर जाने के बाद इनके लिए सांस लेना मुश्किल हो गया. 
 
बाद में चैनल वाले अलग – अलग इंटरव्यू लेने पर अड़ गए. जब इस लड़की ने अपनी मजबूरी बताई तो चैनल वाले तरह तरह के ताने मारने लगे. अंततः देश की बेटी रो पड़ी. वह इतना प्रेशर सह न सकी. इस बारे में समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया ने खबर व तस्वीर रिलीज की लेकिन द हिंदू जैसे कुछ एक अखबारों ने ही इसे प्रकाशित किया. हां, न्यूज चैनल के गणमान्य संपादक न तो इस पर कुछ बोलेंगे और न ही खबर दिखाएंगे, क्योंकि इन हिप्पोक्रेटों को अपनी कमीज हमेशा उजली लगती है, और जमाने भर की काली-दागी. शेम शेम.
 
-यशवंत
 
एडिटर, भड़ास4मीडिया 
 

ये है द हिंदू अखबार में प्रकाशित खबर और तस्वीर
 
Rude electronic media leaves Deepika in tears
Ace archer Dipika Kumari in tears after intense media pressure for interviews in New Delhi on Tuesday
 
SPECIAL CORRESPONDENT, NEW DELHI, August 28, 2013
तस्वीर : PTI
Rude behaviour from members of the electronic media marred the felicitation function of the gold-winning archers here on Tuesday with Deepika Kumari breaking into tears. Deepika, the star of the Indian women’s recurve archery team that won the gold at the Wroclaw World Cup in Poland, along with Rimil Buruily and L. Bombayla Devi, was much in demand during the media interaction at the residence of Archery Association of India (AAI) president V.K. Malhotra.
 
However, things escalated when the TV channels demanded individual interviews and Deepika was left a distressed individual amidst a crowd of ‘admirers’. The jetlagged archers arrived here on Tuesday morning en route the national camp at Aurangabad. Though there was no grand welcome arranged for them, several news channels gathered at the airport. Most managed to get sound bytes from all concerned.
 
Taunts
 
Hungry for more, the news channels persisted with their relentless questioning at the felicitation and demanded one-on-one interviews. One cameraman followed every move of the archers, forcing Deepika to request him to move away even as she had breakfast with the team coach. Instead of acceding to the request, the cameraman taunted the 18-year-old, saying Deepika should actually be grateful for such media coverage.
 
Unmindful of the affront — to a World Cup champion, ranked No. 2 in the world in her sport — the smiling trio of Deepika, Buruily and Bombayla obliged the interview requests patiently. But with time running out and the team scheduled to fly out in the afternoon, they requested the remaining TV crew to conduct combined interviews instead.
 
That became a sore point with a couple of reporters insisting on ‘exclusive’ sound bytes. Things went out of hand when a reporter accused Deepika of being arrogant by refusing to talk individually to everyone. That’s when Deepika broke down. Wiping her tears, Deepika said she had not slept for more than 24 hours, had a headache because she had not eaten since morning and was rushing to catch a flight.
 
In no state to talk
 
The AAI officials tried to calm tempers and even attempted to get Deepika to continue with the interactions, but she was in no state to talk coherently. Immediately thereafter, the entire squad left the venue with Deepika requesting to be spared further humiliation even as the TV cameras kept rolling. (PTI ) 
 
साभार- द हिंदू

‘हमारा महानगर’ के पत्रकार ने दिखाई देशभक्ति

: तिरंगे का अपमान करने वाली फोटो डालने वाले के खिलाफ कराई एफ आई आर : नई मुंबई : राष्ट्रध्वज पर पैर रखकर इसका अपमान करने और इस घृणित तस्वीर को फेसबुक पर अपलोड करने वाले शरारती युवक के खिलाफ एक पत्रकार ने तुर्भे पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में यह बताया गया कि पत्रकार ने जब लैपटाप खोला तो फेसबुक पर एक तस्वीर में एक युवक राष्ट्रध्वज पर पैर रखकर खड़ा दिखा और इंग्लिश में यह लिखा मिला कि हम लोग नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। 
 
शिकायत के आधार पर पुलिस राष्ट्रध्वज का अपमान करने वाले की खोजबीन शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार तुर्भे निवासी हमारा महानगर के पत्रकार नागमणि पांडेय ने जब अपना लैपटाप चालू किया और फेसबुक खोला तो एक शरारती युवक द्वारा राष्ट्रध्वज का अपमान किए जाने को देखकर देश भक्ति का परिचय दिखाते हुए देर रात तुर्भे पुलिस स्टेशन पहुंचकर राष्ट्रध्वज का अपमान करने वाले युवक की फेसबुक से तस्वीर निकालकर पुलिस को दिखाते हुए कार्यवाई की मांग की है। पुलिस ने राष्ट्रध्वज का अपमान करने वाले युवक के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत धारा 66 A के अंतर्गत शिकायत दर्ज कर जांच शुरू कर दिया है।  
 
आपत्तिजनक तस्वीर देखने के लिए यहां क्लिक करें:
 

एमिटी वालों ने मुझे जिंदा जमीन में गड़वा देने की धमकी दी : अखिल खरे

अखिल खरे ने एमिटी यूनिवर्सिटी के घपलों-गड़बड़ियों को लेकर भड़ास को एक मेल लिखा. इसके बाद एमिटी मैनेजमेंट ने अखिल को जमकर डराया-धमकाया. उनका लैपटाप छीन लिया. चेकबुक ले लिए. गार्डों से घेर कर धमकी दी कि राजस्थान में जिंदा गड़वा देंगे. ये सारे आरोप अखिल खरे ने एमिटी मैनेजमेंट पर लगाए हैं. भड़ास4मीडिया ने जब पूछा कि क्या आपने पुलिस में इसकी शिकायत की तो उनका जवाब था कि इतने बड़े लोगों के खिलाफ कौन रिपोर्ट दर्ज कराएगा. अखिल खरे फिलहाल अपने गृह जिले रायसेन चले गए हैं. नीचे उनके वो पत्र हैं जो उन्होंने भड़ास के पास भेजे हैं.. 
Respected Sir
 
I am very thankful for your help as you published against Amity University in your news paper regarding illegal works and harassment. As a result I lost my job and my valuables things are still in possession of our management and I am unable to take my things because my life is in danger . They threatened me a lot . There are too many people harassed by Amity management. Kindly help them sir.
 
I am forwarding my previous message to remind you sir. I request you to please help me to get my valuables from Amity and my arrears.
 
yours Sincerely
 
Akhil Khare
 
akh_forensic@yahoo.co.in

इसके पहले का मेल, जिससे एमिटी प्रबंधन बौखला गया…
 
Respected sir,
 
1. I am working here in Noida Amity University as a vigilance official and presently attached in Transport Division.
 
2. I am regular reader of Bhadas4 media  so I wish to inform you about an incident which may come to destroy my future and family life. Then someone told me that only Yashwant sir is the only person who can save me.
 
3. In short cut , I wish to inform you that Amity University had used me a lot in their illegal works and now they plant me an enquiry against me , which i had not done .
4. Matter is under investigation and as u aware Mr. Ashok Chauhan is a big personality , he can do any thing against me .
 
4. My whole family and myself is in great depression. I have only option to take help from you sir.
 
5. Kindly help me . My mobile no. is 09810733574. You can discuss me about the matter as the Administration of UP is under influence of my management.
 
6.I also want to meet you personally sir. Kindly give me an appointment.
 
I hope you can understand mental situation of an youth who is already suffering from that harassement and one more youth power can decay his power and intelligence due to unlawfull act from Amity University. Anticipating a favorable response.
 
thanks and regards,
 
Akhil  khare

मुसलमानों के विकास में बाधक रहे बिरादरी वाले

सच्चा मुसलमान वतन के लिए कुर्बान होता है। यहां तक कि हिन्दू से भी ज्यादा हमदर्द होता है। उसकी गरीबी के कारणों में उसकी मजहबी कट्रता भी शामिल है। सबसे ज्यादा वह अपनी बिरादरी में ऊँचे पर बैठे लोगों द्वारा ही ठगा गया है। स्वारथी लोगों ने इस वर्ग को गलत रास्ते पर ढ़केल दिया। जिससे कि वह जीवन भर अपनों से ही अपनी गुलामी करा सकें। आज वही हुआ अपने आप तो काफी आगे चले गए अपनों को अपने पीछे ही रखा। फिर भी मुसलमान अपने जातिवादी प्रेम विचार धारा के चक्रव्यूह को नहीं तोड़ सका। जिससे मुसलमान अपने उस मुकाम तक नहीं पहुँच सका जहाँ तक उसको पहुँचना चाहिए था।
ग्रामीण पत्रकार होने के नाते शहरी और उच्चस्तरीय जाति बिरादरी के मसलों पर अनुभव हीन हूँ। मेरे भी मन में मुसलमानों के प्रति भावनाओं का जो गुबार था अनुभव देखा सुना और परखा था उसको बयाँ कर रहा हूँ। पत्रकारिता के दौरान तमाम ऐसे लोगों से मिलने और बात करने का मौका मिला जिनसे बातों ही बातों में उनके भाव देखे सुने और अपनी बात उनसे मुँह खोलकर नहीं कह पाया। जीवन का दुर्भाग्य कहिए कि जो बात मन में रही वह वह बाहर नहीं आ सकी। क्योंकि बात बाहर होती तो हम अन्दर होते जिनके लिए अन्दर होते वह हमसे बाहर होते। कड़वा अनुभव है कि मुसलमान अपनी जाति बिरादरी पर मर मिटने वाला होता है अपेक्षा अन्य जाति धर्म के। सच्चाई की कसौटी पर यह भी है कि अगर किसी मुसलमान ने आपका दामन थाम लिया तो फिर उसकी जान जाने के बाद ही दामन छूटेगा।
 
मुसलमान की कमजोर नस जाति बिरादरी के प्रति वफादारी को इस बिरादरी में ऊँचाइयों को छूने वालों ने बखूबी भुनाया है। मुसलमान जाति के अमीरों मन्त्रियों को बखूबी जानता हूं। उनके कारनामों को देखा है। जब वह वोट लेते हैं तो दाढ़ी खुजलाते हैं कि इस दाढ़ी की लाज रखना हममें तुममें कोई भेद नहीं। जब चुनाव में जीत जाते हैं। तो कहते कि ठीक है तुम तो हमारे हो ही अन्य लोगों की डील करने के लिए जरूरी है अपनों की उपेक्षा। यह कहकर मुसलमानों को भरमा दिया जाता है। जिससे वह अपनी मूल स्थिति से उबर नहीं पाते। चुनाव के समय घर परिवार सहित तन्मयता के साथ मद्द करते। जब नेता बहुत खुश होता है तो कहता है कि अवैध कटान कराओ, या फिर बताओ तो बूचड़ खाने की लाइसेन्स मंजूर करा दें आदि धन्धों में अपने नजदीकियों को डालकर जीवन भर अपनी गुलामी कराता है। अवैध कारोबार की खासियत है कि बिना किसी संरक्षण के चलना नहीं। जिससे दया कृपा पर कुछ दिन धन्धा चला और जरा सी भी सम्बन्धों में खटास हुई तो बन्द हो गया। इस तरह ऐसे तमाम लोग विकास की मुख्यधारा से जुड़े और बह गए।
 
जहाँ तक शिक्षा दीक्षा का सवाल है तो इसके मजहबी स्कूल भी कम हैं। जो स्कूल हैं भी वह कागजों पर आँकड़ेबाजी दर्शा रहे हैं। मौके की हकीकत और आँकड़ों में काफी भेद है। जिससे इस बिरादरी का शिक्षा प्रतिशत नहीं सुधर सका। अल्प शिक्षा के कारण कोई सड़क किनारे बैठकर पिंचर जोड़ता है तो कोई बाल काटता है। गरीब मुसलमान इस तरह छोटे छोटे धन्धेकर मेहनत मजदूरी से अपना काम चला रहा है। पाँच वक्त की नमाज भी तो अदा करनी है इसलिए नौकरी के प्रति मुसलमानों को अधिक दिलचस्पी भी नहीं देखी। नियम धर्म से चलने वाले मुसलमान गरीब भले ही हैं उनके पास सबूरी है। उनके पास बैठ जाओ तो ऐसा अनुभव बताते हैं कि जीवन की थकान भूल जाओ।
 
मजहबी धर्म के नाम पर मुसलमानों को सबसे ज्यादा मुसलमानों ने गुमराह कर अपना उल्लू सीधा किया। हर पार्टी में एक चर्चित मुसलमान चेहरा बिरादरी की कमजोरी को ठगने के लिए मोहरा बना हुआ है। मुस्लिम हितों की बात सिर्फ मंच से की जाती है। फिर भी मुस्लिम वर्ग जागरूक नहीं हुआ जिससे आज भी ठगा जा रहा है।  ऐसे आस्था वान कटट्र हिन्दू भी हैं जिनको मुस्लिमों से कोई शिकवा नहीं और ऐसे कट्टर मुसलमान भी हैं जिनको हिन्दुओं के प्रति बड़ी आस्था है। जो पूरे समाज के हित की बात करते हैं। मुसलमान भाई अपने घर की तस्वीर को संवारें तभी देश की तस्वीर संभरेगी। एक मुसलमान नहीं हर इंसान की तकदीर बदल जाएगी। स्वारथी ठगों सत्ता के लोलुपों से सावधान रहें। राजनीतिक मुखौटों से बचना जरूरी है नहीं तो यह पूरे जीवन गुलामी कराकर शोषण करते रहेगें।
 
जनसंख्या की बड़ोत्तरी से उत्थान नहीं पतन होगा। जैसे एक सूर्य पूरे देश को रोशन करता है असंख्य सितारे टिमटिमाते रहते हैं। उस तरह टिमटिमाते तारे नहीं सूर्य बनिए। तबलमंजनी से अपने समाज के विकास की कल्पना करना अच्छा नहीं। अपने आप अपनी मंजिल को तलाशो और उसको पाने के लिए भरसक प्रयत्नकर सफलता को पाओ। ठगने वाले मुखौटे इतनी आसानी से चक्रव्यूह बनाकर ठगते हैं। आम मतदाता उनकी चाल को नहीं समझ पाता। जातिवादी झांसे में आकर अमूल्य मतदान कर बैठता है। वोट के बदले फूट मिलती। आपसी भाईचारे अमन चैन को आग लगाने में वही लोग आगे देखे जाते हैं जो मंच से शान्ति का उपदेश देते हैं।
 
सरकारों ने मुस्लिम समाज का उत्थान तो नहीं कर पाया लेकिन उसके उत्थान के नाम पर सरकारी धन को ठगने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ग्राम सभा स्तर पर देखो तो पता चल जाता है कि मुसलमान किस तरह अपना जीवन जी रहे हैं। तमाम हिन्दू-मुस्लिम परिवार ऐसे हैं अगर उनका हिन्दू साथ छोड़ दें तो वह भूँखों मर जाएंगे। चुनाव के समय में मुस्लिम समाज के लोग दाढ़ी दिखाकर अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। लेकिन ईमान पर डटा मुसलमान उनके फरमान को नकार देता है। क्योंकि वह जानता है कि जिसकी बदौलत उसकी रोजी रोटी चल रही है जो शुभचिन्तक है, उसको वह कैसे छोड़ सकता है। हमारे यहाँ के काफी मुसलमान गरीब हैं। उनके त्यौहार पर उनके हौसले को बढ़ाने के लिए जो अपनी ताजिया भी उठाते हैं तो हिन्दुओं के द्वारा उनका सहयोग किया जाता है। मुस्लिम नेताओं को हमने कभी भी ग्रामीण इलाकों के गरीब मुसलमानों के साथ त्यौहार में नहीं पाया। हाँ होली मिलन समारोह में खूब देखा है।
 
आरक्षण पर गौर करें तो उसमें भी मुसलमानों के साथ भेदभाव हुआ है। मुसलमानों में भी हिन्दुओं की तरह ऊंची नीची बिरादरी का प्रावधान है। उसमें गरीब गुनबे वाले मुसलमानों को क्या मिला? मुसलमानों की स्थिति पर विचार नहीं हुआ। इन्हीं सब कारणों के चलते मुसलमान जमाने के साथ कदम ताल न कर सका। मुसलमानों मे सम्पन्न लोगों द्वारा विरादरी को बहकाकर स्वार्थ सिद्व किया गया। मुसलमानों की गरीबी और पिछड़ापन का कारण अपनों से उपेक्षित होना है। जातिवादी विचारधारा के कारण मुसलमान दोनों पक्षों से उपेक्षित हुआ।
 
लेखक सुधीर अवस्थी 'परदेशी' हरदोई जिले में ग्रामीण पत्रकार हैं.

ज्वाइन द मैचलेस टी.वी. चैनल

एक दिन सपने में मेरी मुलाकात अब तक के सर्वोपरि मीडिया परसन नारद जी से हो गई। वही नारद जो हिन्दी टी.वी. धारावाहिकों के धार्मिक एपीसोड्स में आकाश-पाताल एवं धरती लोक का विचरण करके संवादों का संकलन करते दिखाए जाते हैं। जी हाँ वही जो टी.वी. चैनलों के ओ.बी. वैन के डिश एण्टिना जैसी चोटी रखे, हाथ में करताल और इकतारा लिए रहते हैं। जहाँ तक मैं जानता हूँ कि नारद जी को हर लोग जानते होंगे। नारद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी मीडिया परसन हैं। वह चिर कुँवारे और सुशिक्षित-प्रशिक्षित पत्रकार हैं। उनके पास आधुनिकतम संसाधन हैं, जिसे हम तपोबल कहते हैं। जब चाहे पलक झपकते किसी भी लोक में पहुँच सकते हैं।
नारद जी के बारे में अधिक जानकारी देने के लिए कई पृष्ठीय ग्रन्थ लिखना पड़ेगा। बस इतना ही कहना है कि ब्रम्हा के मानस पुत्र, विष्णु जी के प्रिय और भगवान शंकर के भक्तों में नारद जी शुमार हैं साथ ही इन पर माता सरस्वती, माता लक्ष्मी और माता पार्वती जी की अपार कृपा है। ये बहुत ही व्यस्त रहते हैं क्योंकि इन्हें मृत्युलोक, पाताल लोक और आकाश लोक समूचे ब्रम्हाण्ड का संवाद संकलन करके उसे प्रचारित/प्रसारित करना रहता है। वही हम पत्रकारों/मीडिया परसन्स के आराध्य मुझे स्वप्न में मिले और पत्रकारिता के टिप्स देने के साथ-साथ बोले कि हे प्रिय अब तुम कोई न्यूज चैनल संचालित करो। मैं सपने में हुई नारद जी से वार्ता का कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
 
देवर्षि नारद जी ने कहा कि वत्स एक ऐसा टी.वी. चैनल शुरू करो जो तुम्हारे आर्यावर्त में अद्वितीय हो मसलन तीनों लोकों की अफवाहों, बेसिर-पैर वाली खबरों से ओत-प्रोत हो। उन्होंने कहा कि यदि तुम्हारा टी.वी. चैनल भूत-प्रेत, अंधविश्वास और प्रेम लीलाओं, बलात्कार आदि घटनाओं को मिर्च मसाला लगाकर प्रसारित करेगा तो रातो-रात तुम और तुम्हारा टी.वी. चैनल स्टार बन जावोगे। मैंने कहा देवर्षि इसके लिए मुझे करना क्या होगा? वह बोले वत्स अब ध्यान मग्न होकर मेरी बातें सुनो। टी.वी. चैनल संचालन के लिए पैसों की आवश्यकता पड़ेगी तब तुम्हें कुछेक पॉलिटिकल पार्टीज, कालाबाजारिए, ढोंगी बाबाओं, दंगाइयों, माफियाओं, तान्त्रिकों, धन्ना सेठों के साथ मित्रता करनी पड़ेगी। ऐसा करके तुम समूचे समाज को मूर्ख, अज्ञानी, विवेकहीन अंधविश्वासी बनाने वाला टी.वी. चैनल संचालित करने के लिए अकूत धन प्राप्त कर सकोगे। 
 
देवर्षि नारद की बात में दम दिखाई पड़ रहा था सो मैं एक अच्छे श्रोता की तरह उनके प्रस्ताव/सुझाव को एकाग्र होकर सुनता रहा। अपने प्रवचन में आगे वह बोले डियर कलमघसीट आजकल दर्शक ऐसा टी.वी. चैनल ही देखते हैं, जिसमें ऐंकरिंग करने वाला पत्रकार घण्टों बेमतलब चीखता, चिल्लाता हो, चैनल की टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए नदी, तालाब, अखाड़े और जलती आग में कूद पड़ने की क्षमता रखता हो, साथ ही पति-पत्नियों के बीच 63 के आँकड़े को 36 में तब्दील कराकर उसका लाइव टेलीकास्ट करता हो। स्टिंग अभियान के तहत किसी भी कथित सम्मानित/इज्जतदार की इज्जत आबरू सरेआम उतर सकता हो। मैं खामोश नारद जी की बातें सुन रहा था इसी बीच वह बोले वत्स कलमघसीट सुन रहे हो ना मेरी बात?
 
मैंने कहा हाँ देवर्षि आप रूकें नहीं, मैं आप की एक-एक बात अक्षरशः अपने मस्तिष्क में फीड कर रहा हूँ। इतना सुनना था वह हंसकर बोले तो सुनो तुम्हें तुम्हारे टी.वी. चैनल को आए दिन धरती के विनाश की बातें प्रमुखता से प्रसारित करनी होगी, इससे लोगों में भय व्याप्त होगा और दर्शकों/उपभोक्ताओं की संख्या अपने आप बढ़ने लगेगी। डियर कलमघसीट टी.वी. चैनल को अद्वितीय बनाने के लिए फर्जी डिग्री धारी नर नारियों को तरजीह देनी होगी जिन्हें पढ़ना लिखना न आता हो लेकिन बोलने में महारत हासिल हो। टी.वी. चैनल के लिए ऐसे स्ट्रिंगर/संवाददाताओं की आवश्यकता होती है जो लतखोर हो, उन्हें अपने मान सम्मान की फिक्र न हो उन्हें लातघूसे खाने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं आनी चाहिए। 
 
तुम्हारे अद्वितीय टी.वी. चैनल के स्टूडियों में ऐसे लोग जब बन्दरों की तरह उछल कूद कर खबरे पढ़ेंगे, तब लोग वाह-वाह कर उठेंगे। वत्स सुन रहे हो ना मेरी बात। मैंने कहा हाँ देवर्षि। उन्होंने बोलना शुरू कर दिया। तुम्हें टी.वी. चैनल के लिए संवाददाताओं/स्ट्रिंगरों हेतु आवश्यकता है का विज्ञापन देना होगा, उसमें विशेष रूप से लिखना कि फर्जी धारक, सामान्य ज्ञान में जीरो, मक्खनबाजी और चापलूसी में दक्ष, स्टूडियों में साक्षात्कार के लिए बुलाए गए मेहमानों को बोलने देने के बजाए खुद ही चीखने चिल्लाने की लियाकत/विशेषता रखने वाले ही आवेदन करें। मानव पूर्वज बन्दर की तरह उछल कूद करने में माहिर, सौ-सौ जूते खाएँ, तमाशा घुसकर देखने वाले, दंगा, हिंसा व अफवाहें फैलाने की कला में माहिर उम्मीदवारों को वरीयता दी जाएगी। 
 
उक्त कार्यों में एक सामान्य मानव से दस गुना अधिक क्षमता वालों को सिर आँखों पर रखा जाएगा। दुर्घटनाओं एवं त्रासदी व दुःखद घटनाओं की खबरों को उछल कूद कर चीख चिल्लाकर टी.वी. चैनल पर सुनाने वालों के शीघ्र पदोन्नति के सुअवसर प्राप्त होंगे। वत्स अपने टी.वी. चैनल में कार्य करने के लिए उन्हीं लोगों की भर्ती करना जिसके दिमाग में भूसा भरा हो और वे लोग पत्थर दिल हों। साथ ही इन लोगों को किसी के मरने-जीने से कोई मतलब न हो, बस चैनल की टी.आर.पी. पर ध्यान केन्द्रित हो। टी.वी. चैनल के संवाददाताओं/स्ट्रिंगरों को इतना कठोर दिल होना चाहिए कि यदि कोई आग लगाकर खुदकुशी कर रहा हो तो उसे बचाने के बजाए ये उस पर पेट्रोल डालकर उसे शीघ्र जलकर मरने में हेल्प करें और छटपटाकर मरने वाले का फोटो शूट करते रहें। ऐसे संवाददाता सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं। 
 
साथ ही माँ-बहन की गालियाँ बर्दाश्त करने तथा दूसरों को अपशब्दों से अलंकृत करने का दमखम रखने वाले भी टी.वी. चैनल के लिए काफी उपयोगी साबित होते होंगे। फिर कुछ क्षण के लिए देवर्षि नारद ने अपनी वाणी को विराम दिया। तब तक मैं थोड़ा चैतन्य हो चुका था। थोड़े से मध्यान्तर उपरान्त मैंने पत्रकार/मीडिया शिरोमणि देवर्षि नारद से कहा भगवन आप के सुझाव पर अमल करने वाला शीघ्र ही कंगाल से करोड़पति हो जाएगा। मैने निश्चय कर लिया है कि अब शीघ्र ही आप द्वारा सुझाए गए टिप्स को अमली जामा पहनाकर धन और शोहरत की बुलन्दी पर पहुँच जाऊँ। मेरी बात सुनकर वह अपनी चिर प्रतीक्षित फिल्मी/टी.वी. मुद्रा में मुस्कुराने लगे थे। 
 
अब मैंने सोच रखा है कि देवर्षि नारद के बताए अनुसार आग लगाने, दंगा भड़काने, सिर फुटौव्वल कराने, हत्या, आत्म हत्याएँ कराने, लोगों को अज्ञानी, मूर्ख बनाकर अंधविश्वासी बनाने वालों की भर्ती कर एक टी.वी. चैनल जिसका नाम ‘मैचलेस न्यूज चैनल‘ रखूँगा। इससे चैनल की टी.आर.पी. बढ़ेगी साथ ही विज्ञापनों से खूब आमदनी भी होगी। कुल मिलाकर दसो अँगुली घी में और सर कड़ाहे में होगी। मैं यही सब सोच रहा था, तभी देवर्षि नारद जी ने कहा डियर कलमघसीट अब प्रस्थान करूँगा, क्योंकि पाताल लोक की कुछ घटनाओं की कवरेज करनी है उसे कवर करके आकाश लोक में त्रिदेव एवं त्रिदेवियों को बताना भी है। 
 
मैंने नारद जी को प्रणाम किया वह अपने अगले डेस्टीनेशन को प्रस्थान कर गए। मैं नींद में ही था और सोच रहा था कि नारद जी द्वारा बताए गए टिप्स पर गम्भीरता से ध्यान दूँ तो शीघ्र ही सभी कष्ट कट जाएँगे तो क्या आप में वह सभी गुण विद्यमान हैं? यदि हाँ तो कृपा कर मेरे मैचलेस न्यूज चैनल की भावी टीम के सदस्य बनने हेतु अपना आवेदन-पत्र भर कर यथा शीघ्र हमारे पंजीकृत कार्यालय तक भिजवाएँ। इसी बीच बिजली चली गई मेरी नींद उचट गई। उमस भरी गर्मी में मच्छरों ने काटना शुरू किया मैं हैण्डफैन चलाता हुआ बिजली विभाग को कोसने लगा। 
 
डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
 
मो.नं. 9454908400

छोटे और मझोले अख़बारों को बचाने के लिए एकजुट हों

छोटी-छोटी पूँजी से संञ्चालित होने वाले लघु एवं मध्यम समाचार पत्र देश में पत्रकारिता की प्राण-आत्मा हैं. इन्हीं में सही तरीके से आज भी देश की बहुतायत ग्रामीण जनता, किसानों और आम आदमी की समस्याओं और पीड़ा को स्थान मिलता है. व्यवस्था से शिकायत के साथ उसके प्रति आम लोगों के आक्रोश, क्षोभ, गुस्से तथा कुण्ठा का बिना लाग-लपेट इज़हार होता है. उन पर ज़ुल्म-ओ- सितम और अन्याय की बातें बिना ‘टिल्ट’ या ‘ट्विस्ट’ हुए छपती हैं. यही सरकार के विकास कार्यक्रमों की सही झलक आम जनता को दिखलाते हैं और उसकी बात को सही तरीके से जनता के समक्ष रखते हैं. अनेक अवसरों पर राज्य सरकार के नुमाइन्दों के अलावा केन्द्र सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों ने भी यह बात खुद ही न केवल स्वीकारी है बल्कि अपनी ओर से भी कही है.
 
हमारे राष्ट्रीय दिवसों- छब्बीस जनवरी, पन्द्रह अगस्त, गांधी जयन्ती के अलावा कुछ और महत्वपूर्ण दिवसों, अवसरों पर राज्य और केन्द्र सरकार नियमित प्रकाशित होने वाले लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों को परम्परागत रूप से ऐसे विज्ञापन देती रही है जिनमें आम  आदमी को बधाइयों, प्रासंगिक सन्देशों के साथ सरकार की प्रमुख नीतियों और कार्यक्रमों का ज़िक्र होता आया है. इन विज्ञापनों से छोटे  अख़बारों और पत्रिकाओं को बड़ी राहत मिलती है क्योंकि वे उनकी सार्वजनिक व सरकारी मान्यता के सनद बनते हैं. इस बार स्वतंत्रता दिवस पर न तो राज्य सरकार के सूचना और जन सम्पर्क विभाग और न ही केन्द्र सरकार के विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय ने ही बहुतायत छोटे व मझोले अख़बारों को विज्ञापन दिये. इस सम्बन्ध में कुछ साल पहले तक विज्ञापन प्रकाशित करने के  आदेश (R.O.) राष्ट्रीय दिवसों के कई दिन पूर्व ही छोटे अख़बारों के स्वामियों-प्रबन्धकों को मिल जाया करते थे. अबकी न मिलने पर  छोटे अख़बारों के द्वारा जब सम्बन्धित प्राधिकारियों से सम्पर्क किया गया तो उन्हें बताया गया कि बजट नहीं है. यह अत्यन्त आश्चर्य  तथा ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय है ! उल्लेख जुरूरी है कि इसी अवसर पर बड़े तथा कॉरपोरेट घरानों के द्वारा सञ्चालित-सेवित ‘बड़े’  समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापनों से भर दिया गया. अभी 20 अगस्त को राजीव गांधी की जयन्ती पर तो अनेक अख़बारों में ख़बरों के  लिए जगह तलाशनी पड़ी.
 
दरअसल, आज केन्द्र ही नहीं, राज्य सरकार भी ‘कॉरपोरेट घरानों की रखैल’ की तरह हो गयी ही जो उन्हें स्वयं या अपने एजेण्टों के  ज़रिये उसे चला रहे हैं. इन सरकारों पर पूँजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों का कब्ज़ा हो चुका है. इससे छोटे-छोटे अख़बारों और पत्रिकाओं  के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है और अधिसंख्य लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र  अपनी समस्याओं से ही मुक्ति नहीं पा रहे हैं.
 
बड़े अख़बारों को देश की आम आबादी और ग्रामीण जनता की ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. वे सिर्फ़ मुठ्ठी भर शहरी युवाओं को पूरा भारत मान  बैठे हैं और कथित तौर पर उन्हें स्मार्ट बनाने के नाम पर न केवल देश की भाषा और संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट कर रहे हैं बल्कि युवाओं  की क्षमता और मेधा का दुरुपयोग भी कर रहे हैं. उन्होंने बड़े चैनलों की तरह समूची शहरी जनता को ‘अपने मनोरञ्जन’ का विषय बना  दिया है और अपनी भौंड़ी प्रस्तुति से उसकी मानसिकता को बदलने के लिए ‘मीठे ज़हर’ (Sweet Poison) का काम कर रहे हैं. देश  की बहुतायत आबादी- ग्रामीण जनता और किसानों की समस्याएं उनकी चिन्ता का विषय नहीं है. हाँ, प्रायोजित आधार पर कभी-कभी वे  संस्थान और उनके लोग गाँव-गिरांव के लिए घड़ियाली आँसू बहाते ज़ुरूर दिख जाते हैं जिन्होंने गांवों में शायद ही कभी कदम रखा हो और दिन-रात काटी हो. 
 
आज़ादी की लड़ाई के दौरान राष्ट्रीयता की अलख जगाने में देश के छोटे-छोटे अख़बारों-पत्रिकाओं का अहम योगदान रहा है. उनकी इस  महत्ता को देखते हुए ही पहले कहा जाता रहा:- “खींचो न कमानों को न शमशीर निकालो. ग़र तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो.” मुमकिन है कि किन्हीं मजबूरियों और सामाजिक दुर्बलताओं के चलते कुछ छोटे अख़बार आज वैसा न कर रहे, अथवा न कर पा रहे हों,  क्योंकि और बड़े पत्रकारों की भांति छोटा पत्रकार भी इसी समाज की देन है. मगर हमारा भी तो यह सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व है कि  हम उनकी समस्याओं को पहचानें, उनका पथ-विचलन रोकें. आज देश चतुर्दिक संकट में है. हर जगह दलालों और ‘मीडिएटर्स’ की पैठ बन चुकी है, इस पर देश की सर्वोच्च अदालत ने भी हाल ही में भारी चिन्ता जतायी है.
 
इसलिए देश-प्रदेश के सभी छोटे एवं मझोले अख़बारों के सञ्चालकों, मालिकों, प्रबन्धकों, कार्यकर्ताओं जागो, उठो और आगे बढ़ो, किसी  को नेता बनाने के लिए नहीं अपितु अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए. अपने हक़-ओ-हुकूक के लिए. आपको उचित छाया देने के लिए जर्नलिस्ट्स फ़ोरम आपके साथ है. याद रखिये, देश को वर्तमान में किसी से अगरचे, आशा की थोड़ी-बहुत किरण दिखती है तो मीडिया, ख़ासकर छोटे-छोटे भाषायी अख़बार  और पत्रिकाएं ही हैं. सो, आइये खुद नेतृत्व लीजिए अपने हाथों में और अपनी एकता से दिखा दीजिये कि कोई भी ताक़त आपको नज़रन्दाज़ कर सुरक्षित नहीं रह सकती.
 
 
ध्यान दें मनीष तिवारी और उनकी सरकार… ज्ञान, बुद्धि, युक्ति, कौशल, विवेक और संघर्ष से बनता है पत्रकार… जाहिर है सिर्फ़ शिक्षा से हो सकती है इनकी भरमार
 
कदाचित, पत्रकारिता देश में हर समय यौन सुखेच्क्षुक कोटि के कुछ लोगों को ‘हस्त क्रीड़ा’ की तरह लगती है. दुर्योग से इस तरह के  लोगों की आज राजनीतिक और कथित तौर पर सम्मानित समझे जाने वाले प्रशासनिक क्षेत्र में भरमार हो गयी है. लिहाज़ा वे पत्रकारिता  क्षेत्र में सक्रिय लोगों को किसी न किसी तरह से काबू करना, दाब-दबाव में रखना और अपने इशारे पर चलाना चाहते हैं. इन्हीं में से  एक शख्स मनीष तिवारी भी जान पड़ते हैं. साहब ने फ़रमाया है कि पत्रकार लाइसेंसधारी होने चाहिए. गोया, लाइसेंस लेकर कोई कार्य  और उसे करने वाला जायज़ हो जाता है. … बदनीयती की ‘बू’ आती है ऐसे सोच पर और नफ़रत होती है इस ख़याल पर !! यह  व्यापक और निरपेक्ष भाव से लोकहित को लेकर चलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने से भी कहीं बहुत आगे- उसे  रौंदने का एक खतरनाक ख़याल है, जिसे अवसरपरस्तों तथा सत्ता-सुखेच्क्षुओं का व्यापक समर्थन मिल सकता है !!!
सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी को लगता है कि जिस तरह वकील लाइसेंसधारी होते हैं वैसे हो पत्रकार भी लाइसेंसधारी होने चाहिए.  
 
यह ख़याल तो ब्रिटिश हुकूमत में कभी फिरंगियों के मन में भी नहीं आया होगा जिनके द्वारा लादी गयी मानसिकता की एक विशिष्ट उपज मनीष तिवारी भी हैं. मनीष (तिवारी)जी आप देश के मंत्री हैं, पहले खोजिए, सर्वेक्षण कराइए और जनता तथा समाज को बताइए की विभिन्न क्षेत्रों में कितने फ़ीसद लोग ‘असल लाइसेंस’ लेकर किस स्तर तक वैध और जनहितैषी कार्य कर रहे हैं ! अरे मनीष बाबू ! देश में जितने काले कोट वाले हैं, या लाइसेंसधारी होकर काम कर रहे हैं उनमें भी सभी उसकी पात्रता नहीं रखते.  बाकी के बारे में सोच और कहकर तो मैं अपना तथा इस पोस्ट के विचार को समर्थन देने वालों का वक़्त नहीं जाया करना चाहता. कहते  हैं कि समझदार को इशारा ही काफ़ी होता है. 
 
हे देश और व्यवस्था के लाइसेंसधारी ‘भाग्य-विधाता’ ! पत्रकार भी उसी समाज का उत्पाद है जिसके उत्पादन आप जैसे ‘मनीषी’ हैं.  पत्रकार किसी और कार्यशाला में नहीं बनाये जाते. अन्तर है तो सिर्फ़ इतना कि एकाध अपवादों को छोड़ दें तो ज़ियादातर पत्रकार विपरीत  परिस्थितियों से लड़कर स्वरूप धारण करते हैं, ज्ञान, बुद्धि, युक्ति, कौशल एवं विवेक से अपनी हैसियत बनाते हैं और अपने संघर्षों से  खड़े होते हैं जबकि आप सियासत के जिस क्षेत्र में हैं वहां तो अब अपवादस्वरूप ही कोई संघर्ष से बनकर अस्तित्वमान हैं. आपके पहले  की पीढ़ी के कुछ लोग जिनमें माया, ममता, मुलायम, लालू, कल्याण, उमा और इन जैसे लोगों का नाम मैं प्रमुखता से लेना चाहूँगा,  ही विपरीत परिस्थितियों में अपना मक़ाम बना सके हैं, बाकी तो आपके राजनीतिक क्षेत्र की भांति बपौती, ‘भयौती’ तथा रिश्तौती जैसी  विरासत और धनबल व उसकी महिमा की उपज हैं.
 
मुमकिन है कि पत्रकारिता क्षेत्र में आज भी कुछ लोग कम पढ़े-लिखे रह गये हों, पर किसी जिला या तहसील स्तर पर रहकर छोटे से  छोटा अख़बार या पत्रिका निकाल रहा अथवा ख़बरों के लिए किसी अख़बार के लिए नुमाइन्दगी करटे हुए अपने अस्तिस्व के लिए खून- पसीना एक किये दिन-रात तड़प रहा एक साधारण सहाफ़ी भी अपने स्तर के किसी सियासतबाज़ और अनेक मामलों में तो आपकी ज़मात  के बहुतायत कानून निर्माताओं से बेहतर ख़याल रखता है. यही नहीं, वह हर समय उसका बेहतर इस्तेमाल करने के लिए प्रयत्नशील  और लोकतंत्र को बचाये रखने को उद्यत रहता है. उस समय भी जब देश की 95 फ़ीसद से अधिक आबादी टांग-से टांग चिपकाकर  बहुआयामी सपनों में गोते लगा रही होती है. 
 
सो, हे मंत्रिवर ! पहले यह सुझाव दीजिए कि ऐसा पत्रकर निरपेक्ष भाव से अपने द्वारा स्वयं ओढ़े गये दायित्व को किस तरह से सरलता और कम से कम इस सुविधा की निश्चिन्तता के साथ अंज़ाम देता रहे कि उसके बच्चे की फ़ीस उसके बिना भी भरी जा सकेगी,  पत्नी और मां-बाप तथा अन्य परिजनों के पेट की भूख मिटती रहेगी, उमर होने पर उसकी बहन या बिटिया की मांग सूनी नहीं रहेगी.
 
 
Dr Matsyendra Prabhakar
 
जर्नलिस्ट्स फ़ोरम
journalistsforum92@gmail.com 
pmatsya1965@rediffmail.com

उत्तराखंड में पुलिसकर्मियों ने पूर्व सैनिक से की मारपीट, पत्रकारों से बदसलूकी

कोटद्वार में हफ्ता देने से इनकार करने वाले वाहन चालाक पूर्व सैनिक पर जानलेवा हमला करने वाले पुलिसकर्मियों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारीयों के खिलाफ जनांदोलन होने के बावजूद घटना के एक हफ्ते बाद भी उत्तराखण्ड सरकार निर्णय नहीं ले पायी है। निर्दोष को सजा और दोषी को मजा… शायद यही है कलियुग – धन्य हो सरकार। दुगड्डा चौकी के पुलिसकर्मियों ने जिस पूर्व सैनिक वाहन चालक को निर्दयतापूर्वक पीटकर गंभीर रूप से घायल किया, उसे गुप्तकाशी से आपदा राहत कार्य कर वापस घर आये महज एक दिन ही हुआ था और घर आने की वजह भी उसका स्वास्थ्य ख़राब होना था। 
 
इस घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय पत्रकार जब समाचार संकलन के लिए कोतवाली गए तो घटना छुपाने प्रयास कर रहे पुलिस अधिकारीयों ने मीडियाकर्मियों से भी बदसुलूकी की। मीडियाकर्मियों की सक्रियता और दबाव के चलते दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुक़दमा तो दर्ज कर दिया गया लेकिन पत्रकारों के साथ अभद्रता करने व बर्बरता के दोषियों को संरक्षण देने वाले कोतवाल और पुलिस क्षेत्राधिकारी के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की गयी। सीमा पर अपने जीवन के स्वर्णिम समय को न्योछावर कर देने वाले पूर्व सैनिक भगवन सिंह की पिटाई सिर्फ इसलिए कर दी गयी क्योंकि उसने अवैध ढंग से संचालित बैरियर पर रिश्वत देने से मना कर दिया था। 
 
जब उत्तराखण्ड की मित्र पुलिस के सिपाही पूर्व सैनिक से हिंसात्मक मित्रता निभा रहे थे तभी एक व्यक्ति ने पुलिस क्षेत्राधिकारी अरुणा भारती को फोन कर अमानवीय घटना रोकने की गुहार लगाई। घर में आराम फरमा रहीं इन कर्तव्यपरायण पुलिस अधिकारी ने जवाब दिया कि वे मामले को शाम को अपने कार्यालय में आकर देखेंगी। अब बात करें कोतवाल यानी लेडी दबंग अंशु चौधरी की तो इन मोहतरमा के सामने ही दुगड्डा पुलिस पीड़ित भगवान सिंह को कोटद्वार थाने लाई जहाँ इन्होंने भी उन पर जमकर अपनी बहुचर्चित अश्लील गालियों की भड़ास निकाली। पीड़ित भगवान सिंह आज भी कोटद्वार के राजकीय संयुक्त चिकित्लसाय में भर्ती है और उपचार करवा रहा है। 

मजीठिया वेतनमान क्यों जरूरी?

यदि समाज में संचार का स्वच्छ वातावरण बनाना है तो उसके लिए पत्रकारों को निष्पक्ष होना जरूरी है और पत्रकार तभी निष्पक्ष पत्रकारिता कर सकते हैं जब उन्हें अपेक्षा के अनुरूप वेतन मिले, जाब सिक्योरटी मिले। नहीं तो वे आय का अन्य रास्ता खोजेंगे जो भ्रष्टाचार के द्वार से होकर जाता है।  यूं तो श्रम विभाग खुद को मजदूरों का हितैषी बताता है लेकिन पत्रकारों के साथ किस तरह का शोषण हो रहा है, कोई नहीं देखता। कहने को तो केन्द्र सरकार ने मजीठिया वेतन बोर्ड लागू कर वाह -वाही लूट ली लेकिन मालिक किस तरह पत्रकारों व सरकार को लूट रहे है इसे कोई नहीं देखता।  
 
क्या होता है पत्रकारों के साथ
बेरोजगार युवाओं को विभिन्न मीडिया संस्थान अपने हित के लिए उपयोग करता है और वहीं खबर बनाने देता है जिससे उन्हें व्यवसायिक लाभ होता है। पत्रकार की नौकरी हमेशा तलवार की नोंक पर होती है इसकी गारंटी नहीं होती है कल नौकरी करने आएंगा या नहीं।  ज्वानिंग के समय पत्रकारों को नियुक्ति पत्र भी नहीं दिया जाता जिससे कोई यह सिद्ध नहीं कर सकता कि उक्त व्यक्ति अमुक संस्थान में पत्रकार था। यहां तक कि संस्थान पत्रकारों को अपना परिचय पत्र भी नहीं देती। वेतन की बात आती है तो क्षेत्र में बेरोजगारों की उपलब्धता के अनुसार वेतन की बोली लगाई जाती है उसमें छुट्टी लेने पर आनाकानी, साप्ताहिक अवकाश नहीं दिया जाता।  लेकिन सरकार ने उक्त सब के लिए कानून बनाया हुआ है जैसे किसी पत्रकार को नौकरी से निकालने से पहले 6 माह पहले सूचना देनी होती है। भोजन समय जोड़कर 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता। हफ्ते में निर्धारित घंटे ही काम करा सकते है आदि लेकिन पालन कहां होता। 
 
क्या करती है कंपनियां
कंपनियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे श्रम विभाग के पूछने पर कह देती हैं कि यहां कोई काम नहीं करता। नोटिस नहीं लेते, लेते भी हैं तो कह देते हैं कि ठेके के कर्मचारी हैं, प्लेसमेन्ट एजेंसी के कर्मचारी काम कर रहे हैं। सरकार के लचर रवैये का फायदा उद्योगपति उठा रहे हैं। 
 
क्या करें 
सरकार को मजीठिया वेतन बोर्ड को लेकर सख्ती बरतनी चाहिए। ठेका व प्लेसमेंट के नाम पर हो रही लूट बंद करनी चाहिए। उन्हीं पत्रकारों को रिपोटिंग का अधिकार देना चहिए, जिनका लाइसेंस है। आकस्मिक रूप से छापामार कर ये पता लगाना चहिए कि उक्त संस्थान में कितने लोग कार्य कर रहे हैं। नियुक्ति से पहले मीडिया संस्थान को कर्मचारी रखने की अनुमति श्रम विभाग से मिले। 
 
महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार

दैनिक भास्कर, दिल्ली में आपाधापी का आलम, छंटनी-ट्रांसफर के लिफाफे तैयार

दैनिक भास्कर, दिल्ली के कर्मियों के बीच आपाधापी का आलम है. हर किसी की सांस टंगी है कि कहीं उसका नाम छंटनी की लिस्ट में न हो. ढेर सारे लोगों का ट्रांसफर भी होना है. आज जन्माष्टमी पर शायद लिफाफा न बंटे, लेकिन कल तो सब कुछ सामने आना ही है. इसी कारण हर कोई बुझे व आधे मन से काम कर रहा है. कई लोग तो छुट्टी पर चले गए हैं. सूत्रों का कहना है कि तबादले की लिस्ट में कई लोगों का नाम है जिनमें नेशनल ब्यूरो में कार्यरत कई लोग भी हैं. बताया जाता है कि नेशनल ब्यूरो से सचिन देव का ट्रांसफर भोपाल किया जाना है. हालांकि इसकी अभी आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हो पाई है.
 
इसी तरह संतोष ठाकुर के बारे में चर्चा है कि इनका भी तबादला होगा. ये भी नेशनल ब्यूरो में हैं. प्रमोद कुमार सुमन नेशनल ब्यूरो में झारखंड बीट देखते हैं. इनके बारे में भी बताया जा रहा है कि इनका तबादला तय है. पिछली छंटनी में सुमन को कार्यमुक्त कर दिया गया था लेकिन जब श्रवण गर्ग की भास्कर से विदाई हुई तो उसके बाद प्रमोद कुमार सुमन फिर से भास्कर के हिस्से बन गए. गणेश भट्ट नेशनल ब्यूरो में हरियाणा पंजाब देखते हैं. इनको लेकर भी तबादले की चर्चा है. पर अभी कुछ भी आधिकारिक रूप से पुष्ट नहीं है क्योंकि लिफाफे खुले नहीं हैं. उधर, कुछ लोगों को बिहार में लांच होने वाले भास्कर के अखबार में समायोजित किए जाने की बात चल रही है. 
 

मेरे कस्बेनुमा गाँव में मायूसी पसरी हुई है : मुकेश कुमार

Mukesh Kumar : घर से वापस लौट आया हूँ। इस बार मैंने पाया कि मेरे कस्बेनुमा गाँव में मायूसी पसरी हुई है। मंदी और मँहगाई और भ्रष्टाचार से पैदा हुई मायूसी। चेहरों के रंग उड़े हुए हैं। जीवन को लेकर उत्साह नहीं है। बाज़ार की रौनक़ गायब है। लोग बारिश के बाद सबसे ज़्यादा चर्चा आने वाले बुरे दिनों की कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि वे नाउम्मीद भी हैं। स्थानीय राजनीति का इस कदर अपराधीकरण हो गया है कि एक तरह का आतंक लोगों के चेहरों पर पढ़ा जा सकता है।
 
माफ़िया राज कायम हो गया हो जैसे। हालाँकि ये सब अचानक हो गया हो ऐसा नहीं है। आसपास कोयला खदानें होने के कारण कोयला माफिया का गुंडा राज पहले ही कायम हो चुका था। राजनीति पर कब्ज़ा कर लेने की वजह से उसका रंग और भी गाढ़ा हो चुका था। उधर मीडिया ने एक दूसरी तरह का अँधेरा पैदा कर दिया है जिसमें असमंजस, संदेह और दिशाभ्रम सब कुछ शामिल है। लेकिन संघर्षशील ताक़तों के परिदृश्य से गायब हो जाने से बदलाव की आस भी जाती रही है। ये लाचारी चुभने वाली है। अच्छी बात ये है कि कुछ लोगों में इससे मुक्ति की छटपटाहट पैदा होने लगी है।
 
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

नीलम दुबे ने पीड़िता की मां से मिलकर आसाराम को माफ करने को कहा

आसाराम की प्रवक्ता नीलम दुबे और उनकी बेटी पूजा बेन ने शाहजहांपुर में पीड़ित लड़की की मां से मुलाकात की। ये लोग पीड़ित लड़की के घर में पिछले दरवाजे से घुसे। इन लोगों ने पीड़ित लड़की की मां से एक बार आसाराम से मिलने की गुजारिश की। ये दोनों आसाराम को माफ करने की मिन्नतें कर रही थीं।
 
पीड़ित लड़की की मां ने कहा कि आप औरत हो कर मुझसे आसाराम को माफ करने की बात कर रही हो। पीड़ित लड़की की मां ने कहा कि आसाराम को जब तक सजा नहीं मिलती तब तक वह चैन से नहीं बैठेगी। पीड़ित लड़की की मां के इतना सब कुछ कहने के बाद भी नीलम, पूजा बेन आसाराम पर लगाए गए आरोप वापस लेने की मिन्नतें करती रहीं। नीलम और पूजा बेन ने जिले के आसाराम के साधकों से भी गुप्त स्थानों पर मुलाकात कर उनको आसाराम का संदेश दिया।
 
शाहजहांपुर से पत्रकार सौरभ दीक्षित की रिपोर्ट. 

हमें नहीं पता था कि आसाराम के कमरे में चोर दरवाजा है जिससे वह बेटी के कमरे में घुस गए

आसाराम पर बलात्कार की गूंज संसद से सड़क तक हो रही है। आसाराम द्वारा अपने ही शिष्य की बेटी के साथ बलात्कार करने घटना के बाद पूरे देश में आसाराम की गिरफ्तारी की मांग हो रही है। वहीं आसाराम खुले आम घूम रहा है। पुलिस उसे क्यो गिरफ्तार नही कर रही है? आसाराम को कोई बचा रहा है? अभी मुम्बई में एक पत्रकार के साथ गैंग रेप के मामले में मुम्बई पुलिस ने 72 घंटे में पांचों आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। पर आसाराम को गिरफ्तार करने में राजस्थान पुलिस को पसीना क्यो आ रहा है? आशाराम पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली नाबालिग लड़की का पिता आज मीडिया के सामने आया और सीबीआई जांच की मांग की। साथी ही कहा कि आसाराम को फांसी की सजा मिलनी चाहिए।
 
लड़की के पिता ने पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया। बापू के आश्रम से फोन अया कि आपकी बेटी की तबियत खराब है। हम और हमारी पत्नी बेटी से मिलने आश्रम पहुंचे आश्रम में बताया गया कि यहा पर कुछ भूत-बाधा है। बापू से मिलो वह अनुष्ठान कर के बेटी को ठीक कर देंगे। हम बेटी को लेकर दिल्ली गए वहां पर बापू से मुलाकात नहीं हुई। हमने बापू के साथ रहने वलों से बात की तो पता चला कि बापू राजस्थान में आश्रम में है हम वहां पहुंचे तो वहां पता चला कि बापू एकांतवास में हैं। वहां गया तो बपू शाम को मिले और बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि ऐसा अनुष्ठान करूंगा कि बेटी बहुत तेज हो जाएगी। जब बापू ने मुझे देख तो बोले, तेरी बेटी है। बाबा ने चटाई बिछा दी और दूध दे दिया व मंत्र जपने को कहा। बाबा ने हमसे कहा कि तुम जा के आराम कर लो। हमने कहा कि हम भी जप कर लेगे। बापू अपने कमरे में चले गए। हमें दिख रहा था कि बापू अपने कमरे में है। यदि वह बेटी के कमरे में जाएंगे तो हमको दिखेंगे। पर हमें यह नहीं पता था कि बापू के कमरे में एक चोर दरवाजा है जिससे वह बेटी के कमरे में चले गए। 
 
हम बेटी का इंतजार करने लगे। एक बार सेवादार आया बोला कि अभी तक तक आप लोग गए नहीं। बाबा द्वारा खुद को निर्दोष बताए जाने पर पीड़ित लड़की के पिता ने कहा कि वह तो अपने को निर्दोष बताएंगे ही, पर मेरी बेटी का जीवन बर्बाद हुआ है, मेरे परिवार पर क्या बीत रही है, यह हम ही जानते हैं। एफआईआर में लिखाई गई एक-एक बात सच है। आसाराम चोर दरवाजे से बेटी के कमरे में पहंचे और बेटी के साथ जोर जबरदस्ती की। मैं 11 साल से बापू का अनुयायी हूं। जब बाबा के खिलाफ मीडिया में कोई खबर आती थी तो अन्य अनुयायियों की तरह मैं भी मीडिया वालों को गाली देता था। बाबा कहता था कि इसाई मिशनरी ने मीडिया को खरीद रखा है। लोगों की आस्था हिन्दू धर्म से खत्म हो जाए और संतो के प्रति द्वैश हो जाए। मेरे सामने जब तक इसका चेहरा सामने नहीं आया था तो मैं आसाराम को भगवान मानता था। आसाराम की गिरफ्तारी न होने पर पिता बोला कि नेताओं कि गलती है। इसीलिए बाबा की गिरफ्तारी नहीं हो रही है। मुझे पुलिस और कानून पर विश्वास है। बाबा खुला घूम रहा है। यह तो देश के कानून के रक्षकों की गलती है। उसे पकड़ कर बंद कर देना चाहिए था।
 
मेडिकल में घपलेबाजी पर बोले कि 15 अगस्त की घटना है। 20 को मेडिकल कराया गया है। मुझे बाबा की तरफ से जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। गोविंद तनेजा ने धमकियां दी की आप ठीक नहीं कर रहे हैं। मैं ऊपर तक लड़ाई लडूंगा। कानून को एसे आदमी को फांसी पर लटका देना चाहिए। आश्रम में जब मैंने बेटी से पूछा कि बाबा कैसे हैं तो वह रोने लगी और कहा कि पापा घर चलो, यह बाबा नहीं, ढोंगी है। बेटी को लेकर हम घर आ गए। 19 अगस्त को बेटी ने पूरी घटना अपनी मां को बताई तो वह सन्न रह गई। मेरी जानकारी में आने पर मैं तुरंत ही बाबा से मिलने दिल्ली सत्संग स्थल पहुंचा और बाबा से मुलाकात की। सामने ही पुलिस का आफिस था। तो मेरी पत्नी ने पुलिस से मदद लेने की बात कही। मेरी पत्नी ने थाने जाकर महिला पुलिस अधिकारी को सारी घटना बताई, जिसके बाद मेरा मुकदमा लिख लिया गया।
 
शाहजहांपुर से पत्रकार सौरभ दीक्षित की रिपोर्ट. 

लखीमपुर खीरी में पत्रकार की हत्‍या

लखीमपुर खीरी। उत्तर प्रदेश में लखीमपुर खीरी जिले के फूलबिहार थाना क्षेत्र में चार हथियार बंद हमलावरों ने एक स्थानीय पत्रकार 40 वर्षीय लेखराम भारती की हत्या कर दी। पुलिस ने बताया कि फूलबिहार थाना क्षेत्र में सैदपुर गांव के पास मोटरसाइकल पर एक पेट्रोल पंप के पास से गुजर रहे स्थानीय पत्रकार भारती पर चार लोगों ने लोहे की छड़ों से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल भारती को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गई।

फूलबिहार पुलिस ने नामजद प्राथमिकी के आधार पर चार अभियुक्तों इशहाक, नन्हे, नईम और अनीस को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने बताया कि प्रारंभिक जांच में हत्या का कारण भारती के गांव तेदुआं में जमीन को लेकर चल रही रंजिश लगती है। एसपी प्रशांत कुमार ने इस मामले की जांच धौरहरा के पुलिस क्षेत्राधिकारी को सौंपी है।

गरीब की लाशों पर मगरमच्छ का पहरा.. कोई अमीर मरा होता तो?

बाराबंकी। घाघरा जिले में हमेशा विनाश लीला ही खेलती आयी है। बाढ़ पीड़ितों से ज्यादा इसका दर्द कौन जा सकता है। नेताओं व अधिकारियों के मेले इसके तट पर हर वर्ष लगते हैं लेकिन जब सवाल हो घाघरा में डूबे हुए नौ गरीबों की मौत का अथवा उनकी लाशों का तो केवल मगरमच्छ के दर्शन मात्र से ही प्रशासन की संवेदनशीलता मर जाये यह चौकाता जरूर है। ऐसे में प्रश्न है कि क्या कोई प्रभावी या अमीर अथवा राजा-महराजा या फिर कोई नेता पानी में डूबा होता तो क्या प्रशासन मगरमच्छ के डर से छिटक कर दूर खड़ा हो जाता? 
 
बीती 23 व 24 की रात श्रावस्ती, नानपारा, बहराइच के गरीब मजदूरों की जिन्दगी पर ऐसा भारी पड़ी कि इन गरीबों को पेट की रोटी तो न मिली लेकिन घाघरा ने उन्हें जीते जी मौत की नींद जरूर सुला दिया। बचाव कार्य देर से शुरू हुए, अधिकारियों ने दौरा तत्काल किया, क्रेने आयी चली गयी। लेकिन जब आज मगरमच्छों का रूतबा घाघरा में दिखाई दिया तो प्रशासन का रूतबा घाघरा के पानी में पानी-पानी होता नजर आया। पुल के ऊपर खड़े हुए लापता लोगों के परिजन बस रोते रहे। कहते रहे जिन्दगी तो ईश्वर ने ले ली अब अपनों की लाश ही मिल जाये जिससे कम से कम उनका अन्तिम संस्कार तो किया जा सके। लेकिन गरीब की मौत हुई तो गरीबों की लाशे पानी में हैं मगरमच्छ भी पानी में ही हैं। काश वो पेड़ पर रहते तो बचाव टीम दुम दबाकर न भागती। पेट की आग पानी में मौत के रूप में दफन हो गयी। अमेरिका, प्रधान, कन्हई, वृक्षलाल, रामवैश्य के परिजन बार-बार यही कह रहे थे हमारे घर का क्या होगा? कौन खिलायेगा कमाकर हमें रोटी? हमारे बच्चों का क्या होगा? हमारे अपनों की लाश नदी में किस हालत में है इसका भी पता नहीं। वाह री गरीबी। काश हम बड़े होते तो हमारे घर के लोग कम किराये के चक्कर में मौत की सवारी न करते। 
मगरमच्छ यहां खलनायक बना नजर आया तो जिला प्रशासन की सोंच यहां भीरू बनी नजर आयी। कहते हैं गरीबी की स्थिति दास्तां बोलती है अमीरी का मुंह इन्तकाम बोलता है। सवाल है कि अगर कहीं घाघरा में कोई राजा-महाराजा या अमीर आदमी अथवा भगवान न करे कोई नेता पानीदोज हुआ होता तो क्या यह मगरमच्छ बचाव कार्यों का कुछ बिगाड़ पाते? क्या बड़ी क्रेन आने में देर लगती? शायद नहीं। क्योंकि यहां तो पूरा सिस्टम ही जुगाड़ पर चल रहा है। मानवीय संवेदनाओं का कोई मूल्य नहीं है। घाघरा में डूबे तो डूबे हैं दो दर्जन गरीब, मजदूर ऐसे लोग जो पेट पालने के लिए रोज मेहनत करते हैं और फिर पेट की आग को शांत करते हैं। आंसू बहाकर घाघरा के पानी को मिन्नत कर यह कहते परिजन हे घाघरा मैया मुझे मेरे अपने मरे ही लौटा दो। लेकिन घाघरा तो घाघरा है वह जानती है कि नेताओं के वादे, अधिकारियों के आश्वासन मेरे घाट पर पानी पीते नजर आते हैं। गरीबों की आहें मेरा भोजन हैं और फोटू छपाऊ नौकरशाहों की तकदीर। इससे गरीबों की तकदीर कहां बदलने वाली है। 
 
22 से 24 लोगों की जलसमाधि हो गयी। जिलाधिकारी ने एक नहीं कई बार दौरा किया। वरिष्ठ नेता मंत्री व अन्य लोग भी मौके पर पहुंचे लेकिन वाह रहे मगरमच्छ आज तूने अपनी बिरादरी के साथ यहां पहुंचकर प्रशासन को डर रूपी मगरमच्छी आंसू बहाने पर विवश कर दिया-तेरी जय हो। मरे हैं तो गरीब। काश कोई बड़का आदमी मरा होता, दुम हिलाता नजर आता जिला प्रशासन। उसकी मौत की कीमत को समझता जिला प्रशासन। घंटो बड़े अधिकारी यहां बैठकर बड़ी-बड़ी बाते करते। उद्देश्य भी होते जीवन मृत्यु पर। लेकिन यहां कौन रोये और किसकी हालत पर। क्योंकि गरीबों की किसमत में हमेशा मौत अभावों को लेकर आती है। फिर अपनों की जान को जोखिम में क्या डालना। वह भी तब जब मरे मजदूरपेशा गरीबों की लाशों पर मगरमच्छों ने अपना पहरा जमा लिया हो। ऐसे में सियासी व प्रशासनिक हल्कों के कथित मगरमच्छी आंसू बहाने वाले लोगों के बारे में क्या कहना? हर बात छोटी ही पड़ जायेगी। एक बात के सिवा कि गरीब हमेशा गरीब होता है। उसकी मौत पर गरीब ही आंसू बहाते हैं वह नहीं जो वातानुकूलित व्यवस्था में अमीरी का जीवन जीते हैं। गरीबी के साथ मगरमच्छों को शर्मशार प्रणाम…! उफ! भगवान यहां इतनी बड़ी संख्या में अमीरों को मौत न देना अन्यथा जिला प्रशासन के लिए बड़ी परेशानी हो जायेगी?
 
बाराबंकी से रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट.

आनलाइन माध्यम से हिंदी पट्टी के पत्रकार कमा सकते हैं ठीकठाक रकम, क्यों न एक वर्कशाप करें?

Yashwant Singh :  जब मैं भड़ास4मीडिया वेबसाइट शुरू कर रहा था तो मुझे इस बात का मलाल था कि मेरी फितरत, मेरी हरकतों, मेरी अराजकताओं, मेरी प्रवृत्तियों, मेरे सोचने-जीने के तौर-तरीकों को बेहद ना-पसंद करने वाले हिंदी पट्टी के लालाओं और इनके डरपोक किस्म के चमचे संपादकों ने मेरे लिए हिंदी अखबारों में कोई जगह न होने की अघोषित घोषणा कर दी थी और इसको लेकर आपस में अंदरखाने एकजुटता, एकगुटता भी बना ली थी. डरपोक व चमचा संपादक कभी किसी बहादुर व सरोकारी पत्रकार को बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि उसे डर लगा रहता है कि पता नहीं कब यह सवाल खड़ा करने लगे, बहस करने लगे, अच्छा-बुरा समझाने लगे और क्या करें क्या ना करें की बात बताने लगे… 
 
हम हिंदी पट्टी वाले नौकरी जाने के बाद अचानक खुद को बेहद पस्त, दयनीय, शोकग्रस्त पाते हैं क्योंकि हम लोगों को जन्म से ही नौकरी करने के लिए जीना सिखाया गया… और नौकर न बन पाने की स्थिति में सबसे नाकारा घोषित किया गया.. खासकर सवर्ण घरों के युवाओं की स्थिति ज्यादा दुखद होती है क्योंकि उन्हें स्व-रोजगार करना किसी घटिया काम करने जैसा लगता है और नौकरी पाना-करना इनमें से ज्यादातर के वश की बात होती नहीं. पर थोड़े समझदार युवा जब नौकरी में जाते हैं और किन्हीं कारणों से छंटनी के शिकार या पैदल हो जाते हैं तो इनके आंख के आगे अंधेरा छाने लगता है… कि अब क्या करें… 
 
सीएनएन-आईबीएन व आईबीएन7 में सैकड़ों पत्रकारों की छंटनी के बाद अब दैनिक भास्कर दिल्ली आफिस से खबर है कि सैकड़ों लोगों को कार्यमुक्त करने की तैयारी है.. कइयों को लेटर थमा दिया गया है… भास्कर के दिल्ली एडिशन को मैनेजमेंट बंद कर रहा है.. मतलब ये कि सैकड़ों की संख्या में पत्रकार बेरोजगार होंगे और इन्हें खुद को नौकरी पाने के लिए यहां वहां जूझना घूमना पड़ेगा… जो पहले से ही सैकड़ों बेरोजगार हैं, उनके साथ नौकरी पाने के लिए होड़ में जुटना पड़ेगा… लेकिन मेरा सवाल इन बेरोजगारों से ये है कि इनमें से कितने लोग हैं जो अब अपना खुद का काम करना चाहते हैं और उस काम से उतना ही कमा लेना चाहते हैं जितना वह नौकर बनकर (कारपोरेट मीडिया घरानों में पत्रकार की नौकरी करना किसी नौकर जैसा ही होना है, जो अपने विवेक से नहीं बल्कि मालिक के आदेश इशारों व रहमोकरम पर निर्भर करता जीता है) कमा पाता है? 
 
मैं बहुत दिनों से सोच रहा हूं कि हिंदी पट्टी के युवाओं, खासकर मीडिया वालों को यह बताया जाए कि इस दौर में जब आनलाइन माध्यम तेजी से विकसित हो रहे हैं, मार्केट का खास तवज्जो इस ओर है तो वे कैसे यहां खुद की दुकान सजा सकते हैं, खुद का बिजनेस माडल डेवलप कर सकते हैं, खुद के परिश्रम से कमा सकते हैं? इसको लेकर एक वर्कशाप करने की योजना मेरे दिमाग में है. वर्कशाप में कंटेंट पर कम (क्योंकि पत्रकार की कंटेंट पर पकड़ पहले से ही होती है), बिजनेस जनरेट करने पर ज्यादा जोर रहेगा. इसके लिए कुछ एक्सपर्ट को भी बुलाया जाएगा… कैसे वेबसाइट बनाएं, कैसे गूगल एडसेंस को एक्टिविट कर पैसे पाएं, किन किन फील्ड में आनलाइन काम कर लाखों कमाएं… इन विषयों पर वर्कशाप की जरूरत है क्योंकि एक अकेला बेरोजगार पत्रकार अपनी तात्कालिक त्रासदी से उबर नहीं पाता तो भला इन विषयों पर क्या सोच पाएगा, क्या विचार कर पाएगा.. आप लोग सोचें और बताएं कि क्या वर्कशाप की दिशा में बढ़ा जाए या फिर साथियों की बलि पर सिर्फ शोक व्यक्त कर शांत रहा जाए…
 
 
 
Kabeer Anand ye batayiye jo rangdari abhi kuchh din pehle aayi thi uski party ho gayi ya offer abhi bhi available hai ?
 
Yashwant Singh Kabeer Anand भाई, पार्टी लेने कोई आया ही नहीं, इसलिए सब सेफ है..  🙂
 
Palash Biswas yaar, jakhm abhi hare hain.kaise kred rahe hoa yasjhwant pyaare? ..Apne blogon par laga raha hun taki sanad rahe.
 
चैतन्य चन्दन Achchha Idea hai.
 
Bhim Nagda Well achhi bat hai or uchhit samay par
 
Prashant Mishra shandar idea.
 
Syed Quasim ab chote akhbara shara hain jinko ye bade ignore karte the
 
पंकज कुमार झा बिजनेस के मामले में जब आपके खुद का भी अनुभव कोई अच्छा नहीं रहा है, हिन्दी की सबसे बड़ी साईट बना देने के बावजूद जब आप भड़ास का कोई ठीक-ठाक व्यावसायिक मॉडल (मेरी जानकारी अनुसार) विकसित नहीं कर पाए तो फिर नए-नवेले-नौसिखियों को इस दलदल में धकेल देने का ख़तरा क्यूँ मोल दिलाना चाह ते हैं उन्हें आप?
 
Yashwant Singh पंकज भाई… दो बातें कहूंगा.. मुझे यानि भड़ास को टर्नओवर नहीं बढ़ाना, इसलिए जितना चाहिए होता है, उतना आसानी से हर महीने मिलता है.. नहीं मिलता है तो आप सबों से मांग लते हैं, आनलाइन या आफलाइन अपील करके… लेकिन अगर रेवेन्यू के लिहाज से हम लोग काम करें तो अरबों का पोटेंशियल है भड़ास में.. लेकिन अपन की फितरत थोड़ी अलग है… उतना ही पाने की इच्छा है जितने में खा पी जी सकें… दूसरों को इसलिए बताना चाहता हूं ताकि वे बेकारी में डिप्रेशन में न चले जाएं.. वे अपना खुद का काम खड़ा करके जीवन सही तरीके से जी सकें… पांच साढ़े पांच साल के अनुभवों से आनलाइन माध्यम से पैसे बनाने के बारे में प्रोफेशनल समझ तो डेवलप हो ही गई है पंकज भाई.. तो ज्ञान को बांटने में क्या बुराई है.. जिसे कुबूल करना होगा, कुबूलेगा और जो नहीं समझ कर पाएगा वो नहीं करेगा…
 
Ankit Mathur Zyadaatar ChhatniShuda Patrakaaron ki vision, Management perspective se vanchit hoti hai, Aap bhi nikale gaye the, lekin aapke pass ek management funda, online funda, wo bhi unique funda tha, Isliye aap Gyan baant rahe hain! Har ChhatniShuda Patrakaar is prakaar ke udyam ke liye sahas (baad ki baat hai) Idea hi generate nahi kar sakta. Patrakaritaa ki aadhaarbhoot Parikalpana hi badal chuki hai aaj ke pariprekshya mein. Aapki safalta ke liye Badhaai, parantu har ChhatniShuda Vyakti Yashwant nahi ban sakta. (PS: I am not here to discourage your management session)
 
Yashwant Singh Ankit Mathur भाई, आप से सहमत, लेकिन मैं इतना कहूंगा कि संभावनाएं सबमें होती हैं, उसे कोई कितना डेवलप और एक्जीक्यूट कर पाता है, ये बड़ी बात है.. मेरे पास तो कोई मेंटर, गुरु या गाइड नहीं था.. पर अपने दम पर कर सका.. लेकिन अगर मेरे जैसा गाइड करने वाला कुछ साथियों को मिल जाए और वे साहस के साथ नए प्रयोग को कर सकें तो लिख कर दे रहा हूं कि वे अच्छा खासा काम खड़ा कर सकेंगे…
 
Ankit Mathur Dada, Guide ya Mentor ke role ko undermine nahi kar raha hoon, lekin jaisa ki aapne apni original post mein likha hai, ki zyadatar log Naukri karne ke liye is qadar taiyaar kar diye jaate hain ke wo vipreet se vipreet paristhiti mein bhi udyam ki taraf nahi sochte, lakh koi Mentor samjha de! 100 mein se koi 0.2 percent log milenge aapko!
 
Aadarsh Shukla achha vichar hai aage badhiye
 
Ankit Singhal Yashwant ji bhadas kis tym shuru hua tha
 
Nextlife Kanpur @yashwant ji.. Accha Idea hai.. Jaroor aage badhna chahiye..
 
Pt Anuj K. Shukla bahut sunadar vichar h. jai veer hanuman
 
Raju Das Manikpuri Acchi soch hai aapki, bhiya dubte ko tinke ka sahara bhi kafi hota hai par yaha to ubara ja raha hai khub sahyog milega subkamnaye aap ke sath.
 
Sandeep Verma यह बढ़िया कदम है .
 
Sanjay Sharma Gud Idea..
 
Jay Prakash Kar daliye bus jo hoga wo acha he hoga ,kuch na se kuch to melega agey badne ko
 
रहीसुद्दीन 'रिहान' Yashwant Singh भाई जी. मैं आपके वर्कशॉप वाले आईडिये पर सहमत हूं. गूगल एड से कमाई के बारे में काफी समय से सोच रहा हूं. आप वर्कशॉप को ऑर्गनाईज करने की तैयारी कीजिये. जैसी भी मदद चाहिये तैयार है.
 
Harsh Kumar gud thought
 
Rakesh Mishra Kanpur workshop ka kadam sarahniya hai…. mujhe iska hissa ban ke khushi hogi….. mai bhi isi disha me soch raha tha.
 
Anil Singh बिल्‍कुल भ्इया
 
Pramod Kaushik YASHWANTJI HUM TO LALAON KI NAUKARI THOKAR PAR RAKHATE HAIN OR APANI SHARTON PE ZINDAGI JEETE HAIN……NA KISI KI BUTTERING KA SAHOOR NA KISI KI GULAMI KARANE KI AKAL HUME…FIR BHI MAST ZINDAGI JEE RAHE HAIN FHAKKAD WALI.
 
Harish Singh sau pratishat sach hai boss, ham khud bhukt bhogi hai, par himmat nahi haare hai
 
Mahandra Singh Rathore bilkul sahi. safgoi ke liye yashwant ji badhai ho. aap vesse bhi kahri kahri likhne ke liye jante bhi jate hain. kya kisi chamche sampadak ki koi prtikirya aai.
 
Papia Pandey yaswant ji apke anubhav bahut kuch mere anubhav se milte julte hai…
 
Bhupendra Singh Sir ji, aapka udaaharan sabke saamne hai…waise is tarah ka workshop zarur karavaaiye..keval berozgaar huye media ke saathiyon ke liye hi nahin, balki tv channels aur akhbaaron me ghut-ghut ke kaam kar rahe saathiyon ke liye bhi media ki naukari ke itar sochne aur khud ka kuchh karne ke baaren me jaankaari paane ka yah ek achcha avsar hoga… Ab waqt aa gayaa hai ki patrakaarita se jude log patrakaarita ke saath-saath technology, buisness management aur market ki puri jaankaari len taaki ye apna khud ka kaam shuru kar maalikon aur chamcha sampadakon ki gulami se nijaat paa saken…
 
Bhavendra Prakash bilkul sahi rasta h sir in lalao ko int ka javab patthar se dene ka
 
Vijay Raaj Singh यशवंत जी दिन और जगह मुकर्रर करिये..
 
Prakash K Ray You must have this workshop. I am ready to help in whatever manner I can.


भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

 

जुलाई के पहले हफ्ते में यशवंत ने पत्रकारों के लिए जो लिखा था, वो अब सही साबित हो रहा

Shambhunath Shukla : जुलाई के पहले हफ्ते में Yashwant Singh ने यह पोस्ट डाली थी तब इसका सिरा या पूँछ किसी को समझ में नहीं आया था। लेकिन जिस तरह से चैनलों में छंटनी हुई और अचानक तमाम पत्रकार बाहर हो गए उससे लगा कि Yashwant ने सही लिखा था। ठीक उसी तरह एक बड़े कहे जाने वाले अखबार ने भी अब अपना दिल्ली संस्करण बंद करने का फैसला किया है। जाहिर है और तमाम पत्रकार बाहर हो जाएंगे। संकट अब और गहरा गया है। कब कौन सा मीडिया संस्थान छंटनी शुरू कर दे कुछ पता नहीं।
 
अभी एक मित्र ने सूचना दी है कि एक शिक्षण संस्थान के बहुसंस्करणी अखबार ने भी छंटनी की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मेरी शुभकामना है कि वहां काम कर रहे पत्रकार अपनी नौकरी बचाए रख सकें। छंटनी होते ही गाज सबसे पहले पत्रकारों पर ही पड़ती है और उसकी वजह भी है क्योंकि अधिकांश हिंदी पत्रकार संपादक का लैपटॉप उठाकर अपनी नौकरी बचाते हैं और संपादक मालिक को अपनी बहबूदी के झूठे किस्से सुनाकर। पोल तो कभी न कभी खुलती ही है।
 
 
 
मंदी ने फिर भारत को अपने आगोश में ले लिया है. मीडिया वाले कतई मंदी के बाबत नहीं बताएंगे क्योंकि जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ के शब्दों में- ''बाजार के उतार-चढ़ाव से टाइम्स आफ इंडिया समेत कई मीडिया कंपनियां जुड़ी हैं और इनका सैकड़ों लिस्टेड कंपनियों के शेयरों पर कब्जा है, अगर ये मंदी के बारे में ज्यादा बताएंगी तो निवेशक पैसे नहीं लगाएगा, या लगा हुआ पैसा निकाल लेगा, सो इन्हें घाटा झेलना पड़ेगा, इसलिए बाजारू मजबूरियों के कारण ये मीडिया कंपनियां भारत में आशावादी माहौल जबरन बनाए रखती हैं जबकि जमीन पर मंदी का बुरा असर चहुंओर दिखने लगा है''.
अभी अभी आजतक के पत्रकार Deepak Sharma ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि किस तरह साल के अंत तक निजी सेक्टर में कार्यरत हर तीसरे व्यक्ति की नौकरी ये मंदी निगल जाएगी. रीयल इस्टेट समेत ढेर सारे उद्योग क्रैश कर रहे हैं. रीयल स्टेट कंपनी के एक न्यूज चैनल श्री न्यूज से दर्जनों लोग छंटनी के शिकार हुए हैं, पर मीडिया जगत में सन्नाटा है. मारुति ने दो सौ से ज्यादा अपने वर्करों को अचानक पैदल कर दिया, इस पर मीडिया में कोई हो-हल्ला नहीं हुआ. टाटा की कंपनी टीसीएस ने सैकड़ों कर्मियों को निकालने का फैसला लिया है. सुजलान एनर्जी ने एक हजार कर्मियों को बाहर करने का ऐलान किया है. नोएडा-गाजियाबाद से प्रकाशित डीएलए अखबार बंद हो चुका है और दर्जनों कर्मी सड़क पर आ चुके हैं. दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों-मीडिया हाउसों ने अपने यहां दर्जनों लोगों को किसी न किसी बहाने निकाल दिया है और कइयों को निकालने की तैयारी है.
 
छोटी-मोटी कंपनियां और न्यूज चैनल रोजाना अपने यहां कम या ज्यादा संख्या में छंटनी कर रहे हैं. लेकिन देश का कारपोरेट मीडिया 'भारत निर्माण' का विज्ञापन पाकर चलाकर गदगद कृतज्ञ है और गैर-जरूरी मुद्दों पर बहसियाने-बतियाने में लगा है. लोकसभा चुनाव आते आते जमीन पर भारत निर्माण की जगह भारत विनाश के हालत दिखने लगेंगे, इसमें कोई दो-राय नहीं है.
 
मीडिया के साथियों से अपील है कि वे मंदी के हालात की सच्चाई अगर अपने चैनलों, अखबारों में बयान नहीं कर पा रहे हैं तो कृपया सोशल मीडिया और वेब-ब्लाग पर इस बारे में चर्चा करें, आकड़ें रखें और देश के सामने खड़े भीमकाय संकट से सबको अवगत कराएं, आगाह करें. खुद मीडिया के साथियों से कहना चाहूंगा कि मंदी छंटनी के दौर को देखते हुए वे मेहनत से कमाए अपने पैसे का निवेश कहीं ऐसी जगह न कर दें कि उन्हें बाद में जीवन निर्वाह के लिए मुसीबत का सामना करना पड़े. वे अपने पास जितना भी कैश है, उसे बचाकर सुरक्षित जगह रखें. साथ ही, नौकरी जाने की आशंका को देखते हुए अपने लिए वैकल्पिक उद्यम के बारे में देखें-सोचें-प्रयास करें. इस बारे में अगर कोई साथी किसी आर्थिक विशेषज्ञ से बातचीत कर कुछ टिप्स सामने रखे तो ज्यादा उपयोगी होगा.
 
मैं पिछले पांच वर्ष से भड़ास संचालित करते हुए देख रहा हूं कि जब जब छंटनी का दौर मीडिया में शुरू होता है, ढेर सारे मीडियाकर्मी साथी अचानक सड़क पर आ जाते हैं और उनके पास करने के लिए कुछ नहीं होता. बाद में उन्हें खाने, किराया देने, बच्चों की फीस देने तक के लाले पड़ जाते हैं. इसलिए सभी को अपनी ताकत क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करते हुए थोड़े थोड़े पैसे कमाने और जुटाने चाहिए, इसके लिए भले ही अनुवाद से लेकर आर्टकिल लिखने और कोई दुकान खोलने चलाने तक का काम करना पड़े, जरूर करना शुरू कर दें. खासकर उन क्षेत्रों की पहचान कर सक्रिय होना चाहिए जहां पर मंदी का असर न पड़ने वाला हो.
 
मैं मीडिया क्षेत्र से जुड़ा रहा हूं और इसी के पैसे से जीवन यापन करता आया हूं इसलिए मैं सबसे पहले मीडिया के साथियों को ही आगाह करना चाहूंगा कि वे पाई पाई बचाकर रखें, कोई नई चीज न खरीदें, मकान आदि खरीदने में पैसे निवेश न करें, गैर-जरूरी खर्चों को कम कर दें. मोबाइल के कम इस्तेमाल, वाहन के कम इस्तेमाल, चाय-पान-सिगरेट व नशे की अन्य चीजों के सेवन पर पाबंदी आदि से भी काफी पैसा बचाया जा सकता है. ऐसी ही छोटी छोटी बचत करके आप मुश्किल के दिनों को झेल पाने में सक्षम होंगे. साथ ही आप मीडिया के साथियों का दायित्व है कि देश को मुश्किल हालात की तरफ ले जाने वाले लुटेरे कारपोरेट, भ्रष्ट सरकारों, नपुंसक मीडिया, रीढ़विहीन नौकरशाही के गठजोड़ के बारे में ज्यादा से ज्यादा खुलासा करें ताकि हर कोई सावधान, सतर्क हो सके.
 

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

राडिया मामले की सुप्रीम कोर्ट में बंद कमरे में होगी सुनवाई

नई दिल्ली : पूर्व कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के फोन टेप मीडिया में लीक होने की जांच करने वाली जांच समिति की रिपोर्ट पर सर्वोच्च न्यायालय गुरुवार को बंद कमरे में सुनवाई करेगा। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति वी. गोपाल गौड़ा की पीठ ने जांच समिति की रिपोर्ट को परखने के बाद बंद कमरे में सुनवाई का फैसला किया। राडिया का टेप मीडिया को लीक करने की जांच के लिए समिति गठित की गई थी। टाटा सन्स के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा एवं गैर सरकारी संगठन, सेंटर फॉर पब्लिक इन्ट्रेस्ट लिटीगेशन (सीपीआईएल) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा, "हम रिपोर्ट का अध्ययन करेंगे।"
 
जहां टाटा ने मीडिया को किसने टेप लीक किया इसकी जांच करने की मांग की है, वहीं सीपीआईएल ने टेप को सार्वजनिक करने की मांग की है ताकि सरकार की नीति निर्धारण प्रक्रिया के पीछे रसूखदारों के हाथ का पता चल सके। टेप लीक होना स्वीकार करते हुए नव नियुक्त अतिरिक्त सोलिसीटर जनरल एल. नागेश्वर राव ने कहा कि आयकर विभाग से यह नहीं हुआ होगा। चूंकि राव ने अदालत से कहा कि दूरसंचार सेवा प्रदाता ने भी लीक नहीं किया गया है, टाटा की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने अदालत से कहा कि उनकी दिलचस्पी यह जानने में नहीं है कि किसने लीक नहीं किया, बल्कि इसमें है कि लीक किसने किया।

उड़ते जहाज में आसाराम समर्थकों का ‘मीडिया पर पंच’

मुंबई। पिछले 12 दिनों से जो इनसान सबसे ज्यादा सुर्खियों में बना हुआ है तो वह है आसाराम बापू। 16 साल की लड़की द्वारा बलात्कार के आरोप को झेल रहे आसाराम मंगलवार को इंदौर से सूरत जाते वक्त एक दफा फिर चर्चा में इससिए आ गए क्योंकि उड़ते जहाज में आसाराम के समर्थकों ने टीवी चैनल 'आजतक' के कैमरामैन पर अपना पंच चला दिया। आसाराम की मौजूदगी में उनके समर्थकों ने रिपोर्टर को अपशब्द कहे, हाथापाई हुई, कैमरा गिरा दिया और देख लेने की धमकी दी। यदि विमान के क्रू मेंबर आकर मामले को शांत नहीं करते तो हो सकता था कि हवा में ही कोई अनहोनी हो जाती…
 
दअरसल एक नाबालिग लड़की द्वारा बलात्कार के गंभीर आरोप लगने के बाद आसाराम बापू इंदौर में अज्ञातवास बिताने आए थे, लेकिन मंगलवार के दिन वे पत्रकारों के सामने अपनी बात रखने के लिए आ गए। मीडिया ने उनका लाइव इंटरव्यू लिया।  इस इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा कि वे अग्रिम जमानत नहीं लेंगे, उनके खिलाफ गंभीर साजिश रची जा रही है, उन्हें जो कुछ कहना है, वे कोर्ट के सामने कहेंगे। मीडिया के कई गंभीर सवालों का आसाराम ने या तो जवाब नहीं दिया या फिर उसे हंसी में गुम कर दिया। वे बार-बार घड़ी देख रहे थे और बता रहे थे कि उनके विमान में सवार होने का वक्त हो गया है।
 
आसाराम इंदौर से सूरत जाने के लिए विमान में सवार हुए। मुंबई में जब विमान आसमान में था, तब 'आजतक' के ‍रिपोर्टर ने अपने कैमरामैन के साथ आसाराम से यह जानना चाहा कि उन पर लगे आरोप के बारे में वे क्या कहना चाहते हैं? सवाल का जवाब मिलता, उसके पहले ही विमान में मौजूद आसाराम की महिला ब्रिगेड ने मीडिया से बदतमीजी शुरू कर दी। कुछ ने कैमरे पर हाथ धर दिया ताकि कैमरा आसाराम को कैद नहीं कर सके। इस रोक के बाद भी कैमरा चालू था, जिससे यह पता चल रहा था कि आसाराम ने सवाल के जवाब में कुछ नहीं कहा…कुछ देर बाद मुंह पर कपड़ा रख लिया। वे पैर पसारे विमान की खिड़की में देखते रहे। मीडिया के साथ बदसलूकी जारी थी और आसाराम चुपचाप तमाशा देखते रहे।  आसाराम का अगला कार्यक्रम सूरत में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर श्रीकृष्ण लीला रचाने का है…आसाराम की यह लीला रचती, उसके पहले ही हवा में एक नई लीला सामने आ गई, जिसकी वजह से वे फिर विवादों में घिर गए हैं। (वेबदुनिया न्यूज)

सहारा में प्रमोशन देने के लिए स्ट्रिंगरों का एक्जाम हुआ, नकल की शिकायत

सहारा इंडिया परिवार ने सालों बाद एक अच्छा निर्णय लिया, लेकिन वही हुआ जिसका डर था। कुछ पत्रकार साथियों के सपने को कुछ दलाल टाइप पत्रकारों ने मिट्टी में मिला दिया। कुछ महीने पहले ‘राष्ट्रीय सहारा’ का जिम्मा दोबारा संभालने के बाद सहारा समूह के छोटे मालिक जेबी राय ने आते ही पुनीत कार्य यह किया कि सभी स्ट्रिंगरों, रिपोर्टरों और डेस्क के लोगों को कन्फर्म कर स्टॉफर बनाने का आदेश अधीनस्थों को दिया। सालों से बतौर स्ट्रिंगर अल्प वेतन पर काम कर रहे पत्रकारों के लिये यह आदेश खुशियां और सपने लेकर आया। सब खुश थे कि चलो अब हम भी वास्तव में पत्रकार कहलाएंगे, लेकिन स्थापना के दिन से भाई-तीजावाद, गुटबाजी और गंदी राजनीति का अड्डा बनी राष्ट्रीय सहारा की देहरादून यूनिट ने उनके सपनों पर पानी फेर दिया लगता है।
 
नोएडा मुख्याय से करीब एक पखवाड़े पूर्व स्ट्रिंगरों को स्टाफर बनाने के लिए परीक्षा कराने का आदेश आया था जिसके लिए 26 अगस्त का दिन तय किया गया। हालांकि सहारा के कुछ घाघ पत्रकारों ने अपने कुछ स्ट्रिंगर गुर्गों को खुलेआम कहना शुरू कर दिया कि उन्हें हम परीक्षा पास कराएंगे और स्टाफर भी बनवाएंगे। इनमें कुछ स्ट्रिंगरों को तो बाकायदा परचा भी दिलवाने के दावे किये गए। और हुआ भी वही। 26 अगस्त को परीक्षा हुई तो कुछ लोगों को वास्तव में जमकर नकल करायी गयी। बाकी स्ट्रिंगर निराश-मायूस हुए और आक्रोशित भी। लेकिन क्या करते, विरोध की कुव्वत किसी में नहीं थी। यद्यपि पता चला है कि अगले दिन किसी स्ट्रिंगर ने परीक्षा में भारी नकल होने की शिकायत नोएडा कर दी जिस पर देहरादून के संपादकीय अधिकारियों से जवाब तलब किया गया है। यह भी चर्चा है कि यह परीक्षा रद्द की जा रही है और इसी के साथ स्ट्रिंगर भाइयों का स्टाफर बनने का सपना भी बिखरता नजर आ रहा है।
 
सहारा से जुड़े एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मुंबई व इटावा कांड के खिलाफ पत्रकारों में गुस्सा, कई जगहों पर सभाएं व जुलूस

मुगलसराय। मुंबई में महिला पत्रकार के साथ समाचार संकलन के दौरान हुए गैंग रेप व उत्तर प्रदेश के इटावा क्षेत्र में पत्रकार की हत्या के विरोध में स्थानीय लाल बहादुर शास्त्री पार्क से नगर के समस्त पत्रकारों द्वारा एक मौन जुलूस निकाला गया। जुलूस नगर भ्रमण करते हुए नेता जी सुभाष पार्क में जाकर गोष्ठी के रूप में तब्दील हुआ। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार भागवत नरायण चौरसिया व संचालन कमलेश तिवारी ने किया।
इस दौरान वक्ताओं ने इस कुकृत्य की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए कहा कि दोषियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए तथा पत्रकारों को प्रशासन के द्वारा सुरक्षा मुहैया कराई जाए। साथ ही साथ कहा कि पिछले सपा सरकार में शासन ने पत्रकारों की समस्याओं के निराकरण के लिए पृथक पीआरओ की व्यवस्था की थी जिससे उनकी समस्याओं का तत्काल निराकरण संभव हो पाता था। परन्तु वर्तमान सपा सरकार के लगभग दो वर्ष पूर्ण होने पर भी उक्त व्यवस्था अभी तक लागू नही की गयी है, जिससे पत्रकारों की समस्याओं का समुचित व तत्कालिक समाधान होना संभव नहीं हो पा रहा है।
 
इस दौरान करूणापति तिवारी, संजय अग्रवाल, विनय वर्मा, राजीव कुमार, सरदार महेन्द्र सिंह, एल उमाशंकर, सरदार कमलजीत सिंह, महेन्द्र प्रजापति, राजेन्द्र प्रकाश यादव, मनोहर गुप्ता, धर्मप्रकाश, आशाराम यादव, संदीप कुमार, ज्ञानप्रकाश धर दुबे, संजय गुप्ता, फैयाज अंसारी, कृष्ण कुमार गोंड, कृष्णा गोंड, मारूफ अंसारी, इखलाक अहमद, नंद लाल नंदू, राजू इकबाल, धमेन्द्र कुमार, अखिलेश श्रीवास्तव, पी धंनज्जय , विजय जायसवाल आदि पत्रकार मौजूद रहे।


लखनऊ : उत्तर प्रदेश फोटोजर्नलिस्ट एसोसिएसन द्वारा मुंबई में महिला फोटोजर्नलिस्ट के साथ हुए गैंग रेप व इटावा में पत्रकार की गोली मारकर हत्या किये जाने के विरोध में 24 अगस्त 2013 को लखनऊ के हजरतगंज गाँधी प्रतिमा पर कैन्डिल जलाकर व विरोध सभा कर के सारे छायाकारों द्वारा विरोध प्रकट किया गया। इस मौके पर आयोजित सभा में एसोसिएसन के अध्यक्ष रुपेश कुमार ने कहा कि यह घटना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण व निन्दनीय है जिसका उत्तरप्रदेश फोटोजर्नलिस्ट एसोसिएसन सारे फोटोजर्नलिस्टों की तरफ से घोर निन्दा करता है।

संगठन के कोषाध्यक्ष गोपी रस्तोगी ने दोषी आरोपियों की गिरफ़्तारी व सख्त से सख्त कार्यवाही की माँग की है। संगठन के महामंत्री एरिक सिरिल थाम्पसन ने सभा में कहा अब समय आ गया है कि सिर्फ सख्त कानून बनाने से काम नहीं चलेगा रेप व हत्या जैसे अपराधों में लिप्त आरोपियों को सिर्फ और सिर्फ फाँसी की सजा की दी जाए। इस मौके पर एसोसिएसन के संरक्षक व सीनियर फोटोजर्नलिस्ट प्रदीप शाह जी भी उपस्थित थे। विरोध सभा में लखनऊ के छायाकार अशफाक अहमद, आशुतोष गुप्ता, सुशील सहाय, सुरेश वर्मा, विजय पिंटू, हेमन्त चौहान, मनीष वर्मा, संजय सोनकर, धर्मचन्द, मिथलेश त्रिपाठी, अरुण यादव बबलू, ब्रजेश तिवारी, हरजिन्दर सिंह, इन्द्रेश रस्तोगी, जगत सिंह, शैलेश गुप्ता, अतहर रजा, अर्जुन साहू प्रमोद शर्मा, राजकुमार,बबलू शर्मा व समाज सेवी मयंक रंजन सहित भारी संख्या में फोटोजर्नलिस्ट मौजूद रहे।

पंचकूला : मुंबई में महिला फोटोग्राफर के साथ हुए गैंगरेप के मामले के विरोध में रविवार शाम को पंचकूला प्रेस क्लब पंचकूला की ओर से कैंडल मार्च निकाला गया। जिसमें आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवई करने के साथ कठोर सजा की मांग की गई। इस मामले में जल्द ही क्लब की ओर से उपायुक्त को एक ज्ञापन दिया जाएगा। इस मौके पर सामाजिक एवं राजनैतिक संगठनों लोग भी उपस्थित थे। उन्होंने भी इस मामले की निंदा की और कहा कि प्रेस लोकतंत्र का चौथा सतंभ है। इसके कर्मचारियों के साथ एेसी घटना होगा दुर्भाया पूर्ण है। प्रेस क्लब के प्रधान रोहित रोहिला, महासचिव सुरेंद्र गोयल एवं कोषाध्यक्ष राजेश मलकानियां ने कहा कि यह एक शर्मनाक घटना है। उन्होंने कहा कि अगर समाज में पत्रकारों के साथ एेसी घटनाएं होगी तो केसे चलेगा। उन्होंने इस मामले में उपायुक्त को ज्ञापन देकर आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवई करने की मांग करंगे। इस मौके पर कांग्रेसी रंजीता मेहता ने कहा कि यह एक शर्मनक घटना है। हजकां नेता दलबीर सिंहं बाल्मिकी ने भी महिला फोटोग्राफर के साथ हुई रप की घटना की निंदा करते हुए आरोपियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की मांग की। इस मौके पर सुधा जग्गा, संजय राय, करूणा जिंदल, दयानंद चौधरी, कमल कलसी, रामचंद्र, अमित, विजय, संत अरोडा,सत्यनारायाण गुप्ता, विनोद शर्मा, अजय गुप्ता, कुलबीर दिवान, अनिल, राजेश मलकानियां, सुरेंद्र गोयल, जगदीश भगत सिंह, विजय, केपी अरोडा, सहित अन्प्य लोग उपपस्थित थे।


DUJ Condemns Sexual Assault on Mumbai Journalist

The Delhi Union of Journalists expresses its outrage at the sexual assault on a woman photojournalist in Mumbai while she was on an assignment for her magazine.  The daylight rape in the heart of the metropolis has shocked us.  We also condemn the attack on her male colleague and demand immediate arrest and speedy prosecution of the criminals responsible.    
 
The Gender Council of the DUJ notes with concern the growing backlash against the increasing entry of women into the public and professional spheres that is taking violent forms, ranging from sexual harassment to acid attacks, rape and murder. 
 
The DUJ supports the Maharashtra state government’s announcement of trial in a fast track court once the criminals in the photojournalist’s case are arrested. However, we demand that all such cases are fast tracked. Judicial delays and low conviction rates are at the heart of the denial of justice to many rape victims.
 
DUJ expects the employers of the two journalists to pay their medical bills and provide compensation for injuries incurred while on duty. We urge media employers to provide safe transport and take security measures to protect all employees, including women working night shifts or covering assignments that entail serious risk.  In recent times the special vulnerability of women journalists has come to the fore with the arbitrary arrest of a reporter for alleged involvement in the mafia murder of her colleague, the discovery of a woman editor who was rendered homeless and living outside a gurudwara and other such episodes.  We call for greater vigilance and solidarity within the profession.
 
 The DUJ calls for a risk insurance cover for all journalists in the country covered under the wage board or on contract basis, taking into account increasing reports of press bashing. Newspaper managements and the government have to take this responsibility in an explosive situation where journalists are being exposed to increasing attacks.
 
It welcomes the suo moto intervention by the Chairman of the Press Council of India.
 
 
Sujata Madhok                                                                                      
President   
S.K. Pande
General Secretary

यूपी के औरैया में पत्रकार को पुलिस जिप्सी से कुचलने का प्रयास

औरैया के बीहड़ क्षेत्र में पुलिस की नाकामियों को उजागर करने वाले एक पत्रकार को दिन दहाडे पुलिस जिप्सी से रौदने की असफल कोशिश की गई है। गनीमत रही कि पत्रकार ने पुलिस की मन्शा भांप खड्ड में बाईक डालकर जैसे तैसे जान बचाने में सफलता पा ली वरना इटावा में पत्रकार की हत्या के महज कुछ घण्टों के अन्तराल पर औरैया में भी एक पत्रकार की हत्या को दुर्घटना का रूप देने में देर नहीं थी।
 
घटनाक्रम के अनुसार पीड़ित पत्रकार हरेन्द्र राठौर अपने साथी पत्रकार अभय सिंह राजावत के साथ औरैया जनपद के थाना अयाना क्षेत्र में शनिवार प्रातः घटित स्कूली छात्रा के साथ असफल रेप के प्रयास की घटना को कवरेज करने अपने निजी बाईक से जा रहे थे। जैसे ही वह अयाना – सेंगनपुर मार्ग पर स्थित जीआईसी इंटर कालेज से आगे बढ़े तभी सामने से रही पुलिस जिप्सी के चालक ने तेजी से रफ्तार बढ़ाते हुये बाईक सवार पत्रकारों को कुचलने का दुःसाहस कर डाला। मगर जिप्सी चालक की मंशा भांप पत्रकारों ने बाईक को विवश होकर सड़क किनारे खड्ड में डालकर जैसे तैसे अपनी जांन बचायी।
 
पुलिस जिप्सी तेज रफ्तार के साथ आगे निकल गई। घटना से अन्जान पत्रकारों को उस वक्त गहरा आश्चर्य हुआ कि जब गाड़ी में बैठे थाना अध्यक्ष राजा दिनेश सिंह ने भी चालक से गाड़ी रोकने व खड्ड में गिर पड़े पत्रकारों से हालचाल पूछना भी मुनासिब नहीं समझा। कल्पतरू एक्सप्रेस अखबार के बीहडी मामलों का कवरेज करने वाले पत्रकार हरेन्द्र राठौर ने सम्बन्धित पुलिस कर्मियों के विरूद्ध कई खबरें छापी जिसको लेकर सम्बन्धित पुलिस कर्मी उन्हें कई बार संकेतों में जान माल की धमकी देते आये हैं। श्री राठौर के साथ घटित घटना को लेकर जनपद भर के पत्रकारों में आक्रोश है। पत्रकारों ने जिलाधिकारी समेत वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिलकर घटना का विरोध दर्ज करने का फैसला किया। 
 
औरैया जनपद का थाना अयाना भौगोलिक रूप से दुर्दान्त बीहड़ में स्थित है। यहां पुलिस सांठगांठ से अवैध वन कटान, चम्बल सेन्चुरी क्षेत्र में पुलिस की मिली भगत से मत्स्य आखेट का कारोबार सहित जुआ सटटा शराब जैसे अपराध होते हैं। पुलिस कर्मियों को आये दिन अखबारों की सुर्खियां बनना नागवर लगता है। पिछले दिनों थाने के अन्दर भ्रष्ट पुलिसिया कार्य शैली की विवेचना को उजागर करती खबर का प्रमुखता से प्रकाशित होना व गैर प्रांतों से तस्करी कर लाई गयी शराब के आरोपियों के बचाव को लेकर संकलित समाचार से पैदा हुई पुलिसिया बौखलाहट घटना के पीछे वजह है। 
 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मनोज व्यास और संजय पाठक का पत्रिका को बाय-बाय

मनोज व्यास ने पत्रिका, रायपुर छोड़कर भास्कर का दामन थाम लिया है। मनोज पत्रिका के मजबूत रिपोर्टरों में से एक थे। पिछले कुछ दिनों से वे पत्रिका में काफी असहज महसूस कर रहे थे। इन दिनों पत्रिका से लोगों के छोड़ने का सिलसिला जारी है। रिपोर्टर संजय पाठक ने भी पत्रिका से नाता तोड़ लिया है। सिटी में रहने के दौरान मनोज और संजय ने बेहतरीन काम किया। शिक्षाकर्मी आंदोलन, नगर सुराज से लेकर कई अभियानों को सफलतापूर्वक पूरा किया।
 
मनोज के भास्कर ज्वाइन करने के बाद पत्रिका की तरफ से उन्हें वापस लाने का भरपूर प्रयास किया गया, पर उन्होंने अपना फैसला नहीं बदला। ऐसा ही संजय के साथ हुआ। पत्रिका के अराजक माहौल के बीच कई और पत्रकारों के नौकरी छोड़ने की सूचना मिल रही है। नई दुनिया के राष्ट्रीय संपादक जल्द ही रायपुर आने वाले हैं। उनके आने के बाद पत्रिका के दो-तीन विकेट और गिरना तय माना जा रहा है।
 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अमुक-अमुक को ज्यादा से ज्यादा छापो, ये लोग बेरोजगार हैं और उनका भी घर चलना चाहिए

हिंदी के इन दिनों खूब छपने वाले एक स्तंभकार और एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार जो बड़ी जगह पर कार्यरत थे, को पिछली सदी के आखिरी सालों में शिद्दत से नौकरी की तलाश थी…तब दैनिक भास्कर में कमलेश्वर जी प्रधान संपादक की हैसियत से कार्यरत थे। यह बात और है कि दफ्तर कम ही आते थे। बहरहाल दोनों सज्जनों को कमलेश्वर जी भास्कर में लाना चाहते थे। भास्कर के प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल से मुलाकात भी करवाई। यह बात और है कि उन्हें नौकरी नहीं मिली। लेकिन कमलेश्वर जी उन लोगों की मदद करना चाहते थे। 
 
उन्होंने तब फीचर सेक्शन में काम करने वाले मुझ समेत सभी पांचों लोगों को बुलाया और कहा कि अमुक-अमुक को ज्यादा से ज्यादा छापो…ये लोग बेरोजगार हैं और उनका भी घर चलना चाहिए। संपादक के निर्देशानुसार हम लोग उन जैसे कई लोगों से साग्रह लिखवाते थे। इसी तरह दैनिक हिंदुस्तान में एक कृष्णकिशोर पांडेय जी होते थे। संपादकीय पृष्ठ के प्रभारी थे। वे भी बेरोजगार फ्रीलांसरों पर ज्यादा ध्यान देते थे।
 
इसका यह भी मतलब नहीं कि सारे फ्रीलांसर खराब लिखते थे, उनकी पढ़ाई-लिखाई कमजोर थी और नजरिया खराब था। लेकिन आज देखिए. ठेठ खालिस हिंदी के लेखन पर अखबारों का भरोसा कम हुआ है। अंग्रेजी के तुक्कामार लेखक और टीवी के उलथा लिखने वाले चेहरों पर हिंदी अखबारों का भरोसा बढ़ गया है। ऐसे में कमलेश्वर और कृष्ण किशोर पांडेय ज्यादा याद आते हैं। कमलेश्वर जी नहीं रहे..पांडे जी दिल्ली में ही रहते हैं..।
 
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मीडिया की एक बड़ी समस्या यह हो गई है कि यहां एक पारदर्शी भर्ती नीति नहीं है..नए लोगों से मिलने में सीनियरों को तकलीफ होती है..हालांकि उनकी भी सीमाएं हैं..जॉब की तलाश करते कई कई नए पत्रकारों की तकलीफ यही है कि अगर पहचान नहीं हुई तो आपकी सीवी कूड़े के ढेर में फेंक दी जाती है..हमने जब पत्रकारिता शुरू की, उन्हीं दिनों पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया को किनारे लगाया जाने लगा था…लेकिन ऐसा नहीं है कि उस दौर में भी लोग नए लोगों के लिए दरवाजे खोलकर रखा करते थे…अपना भी कुछ ऐसा ही अनुभव रहा है….1994 में भारतीय जनसंचार संस्थान से निकलते वक्त मैंने संस्थान के ही एक रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम किया था..कीटनाशक बनाम पर्यावरण के इस प्रोजेक्ट के लिए मुझे ठीकठाक 25 मीडिया शख्सीयतों से मिलकर उनका इंटरव्यू करने की जिम्मेदारी दी गई। तब मैं दिल्ली में मीडिया के तब के गढ़ आईएनएस बिल्डिंग पहुंचा। 
 
उन दिनों इतने मीडिया वालों को जानता भी नहीं था। लिहाजा भारतीय जनसंचार संस्थान के रिसर्च विभाग ने बाकायदा एक सूची भी दी। आईएनएस पहुंचा और जिस कमरे में जाता और वहां के संबंधित व्यक्ति से मिलकर अपना परिचय देता..एक ही जवाब मिलता..नहीं मैं कैसे जवाब दे सकता हूं या हाउ कैन आई एंटरटेन यू…लेकिन मेरा सौभाग्य…आईएनएस बिल्डिंग में तीन लोगों ने ना मुझे पहली ही मुलाकात में इंटरव्यू दिया..बल्कि उस दौर के फटेहाल मुझ जैसे शावक पत्रकार को नाश्ता-चाय भी कराया। ये शख्यिसतें थीं उस दौर के अमर उजाला के ब्यूरो प्रमुख प्रवाल मैत्र, जन्मभूमि समूह के ब्यूरो प्रमुख कुंदनलाल व्यास और मराठी के सकाल की विशेष संवाददाता सुरेखा टकसाल। प्रवाल जी और सुरेखा जी अपने-अपने पदों से अवकाश ग्रहण कर चुके हैं, जबकि कुंदनजी अब मुंबई में जन्मभूमि के प्रमुख संपादक हैं।
 
बाद में तो प्रवाल जी ने मुझसे अमर उजाला में बीसियों रिपोर्टें लिखवाईं। सुरेखा जी के साथ 2008-09 में साथ काम करने का मौका भी मिला। तब मैं सकाल के टीवी डिविजन के दिल्ली दफ्तर में ठीकठाक पद पर काम कर रहा था। वैसे तो संघर्ष अब भी जारी है। लेकिन शुरुआती संघर्ष के दिन जब भी याद आते हैं..ये तीनों ही हस्तियां याद आती हैं..उनका प्यार और नए लोगों की मदद करने का जज्बा भुलाना मुश्किल है… काश कि ऐसे ही तमाम वरिष्ठ होते..तब पत्रकारिता की दशा ही कुछ और होती…
 
वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के ब्लाग मीडिया मीमांसा से साभार.

पत्रकारों ने किया एएमयू कुलपति के सम्मेलन का बहिष्कार

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति जमीरुद्दीन शाह द्वारा एक पत्रकार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की धमकी दिये जाने पर सभी मीडियाकर्मियों ने संवाददाता सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया. यह घटना एएमयू के जवाहरलाल मेडिकल कॉलेज में छात्रों द्वारा रैगिंग के आरोप में मुकदमा दर्ज किये जाने के सिलसिले में बुलाये गये संवाददाता सम्मेलन में दौरान हुई. शाह ने कहा कि रैगिंग के कथित मामले की शुरुआती जांच में यह पता लगा है कि वह घटना छात्रावास में रहने वाले छात्रों के दो गुटों के बीच तनातनी और कहासुनी का परिणाम था और वह रैगिंग का मामला कतई नहीं था.
 
कुलपति ने मीडिया को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि उसकी वजह से ही आपसी झगड़े के मामले को रैगिंग का प्रकरण बना दिया गया. इस पर जब एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक के पत्रकार ने दलील दी कि रैगिंग की खबर तो इस सिलसिले में दर्ज मुकदमे पर आधारित थी, शाह बेहद खफा हो गये. इस पर पत्रकार और कुलपति के बीच बहस-मुबाहिसा होने लगा. एएमयू के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति को सम्भालने की कोशिश की. इसी बीच, शाह के बर्ताव से खफा होकर प्रेस कांफ्रेंस में आये पत्रकारों ने संवाददाता सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया और बाहर चले गये.

अज़ीज़ बर्नी : एक अबूझ पहेली

उर्दू मीडिया में अज़ीज़ बर्नी एक अजब ही टाइप के इंसान का नाम है। वह कब क्या करेंगे किसी को पता नहीं। सहारा में रहते हुये तो उनहों ने बहुत सारी नौटंकी की अब सहारा से अलग होकर तरह तरह की नौटंकी कर रहे हैं। सहारा उर्दू से अलग होने के बाद वह बहुत दिनों तक किसी अखबार से जुड़े नहीं रहे अलबत्ता तरह का एलान करते रहे। शहर शहर घूमते रहे और आखिर में उनहों ने उर्दू का एक एक अखबार अजीजुल हिन्द निकाल कर यह ज़ाहिर कर दिया कि वह शहर शहर घूम कर आखिर क्या करना चाह रहे थे।
 
कोई माने या न माने बर्नी भारत में उर्दू मीडिया का सबसे बड़ा नाम है। यह बर्नी का ही कमाल है कि उर्दू में भी पत्रकारों को ठीक ठाक तनख्वाह मिलने लगी। बर्नी साहब भारत के ऐसे पहले उर्दू संपादक हैं जिन्हों ने यह साबित करके दिखाया कि उर्दू के अखबार भी बड़े पैमाने पर देश के विभिन्न भागों से निकल  सकते हैं। इसके बावजूद उनमें एक बड़ी खराबी यह थी कि जहां एक तरफ उनहों ने अपने चमचों को अच्छी तनख्वाह दी वही ऐसे लोगों को हमेशा तंग किया जो पत्रकार तो अच्छे थे मगर उनकी चमचागीरी नहीं करते थे। 
 
बर्नी के लाख कमाल के बावजूद ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं है जो बर्नी साहब को गाली देते हैं। उनपर तरह तरह के आरोप लगाते हैं। बर्नी को बुरा भला कहने वालों में ऐसे लोग अधिक हैं, जो हैं तो बर्नी से अधिक योग्य मगर बर्नी ने उनको कभी महत्व नहीं दिया। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनसे बर्नी की मुलाकात भी नहीं है मगर वह सिर्फ बर्नी को इसलिए बुरा भला कहते हैं क्यूंकि  वह बर्नी की शोहरत से जलते हैं। यह भी एक बड़ा सत्य है कि बर्नी साहब को बुरा कहने वालों की संख्या जहां बहुत अधिक है वहीं उनके सामने उनको बुरा कहने वाले शायद ही मिलें। जो लोग उनके खिलाफ उर्दू अखबार में लिखते भी हैं वह भी फर्जी नाम से लिखते हैं।  और जहां तक बर्नी की शोहरत का सवाल है तो यह एक हक़ीक़त है कि भारत में उनसे मशहूर उर्दू का कोई भी संपादक नहीं है। आज भी उर्दू नहीं जानने वाले 10 बड़े पत्रकार से किसी एक उर्दू संपादक का नाम पूछें तो उनमें से 9 बर्नी का ही नाम कहेंगे।
 
खैर अब बात बर्नी के अपने अखबार अजीजुल हिन्द की। जब बर्नी ने यह अखबार शुरू किया तो चूंकि उनका नाम बड़ा था इसलिए बड़ी संख्या में पत्रकार उनके अखबार में नौकरी के लिए उनके यहाँ पहुंचे। इनमें कई तो ऐसे थे जो बर्नी का नोएडा में आलीशान मकान देख कर ही हैरान हो गए। उनहों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उर्दू अखबार का संपादक भी इतना अमीर हो सकता है। मगर नौकरी के लिए गए इन पत्रकारों को बड़ी हैरानी तब हुई जब बर्नी ने उनमें से अधिकतर से यही कहा  कि मेरे साथ अप यह सोच कर शामिल हों कि क़ौम की सेवा करनी है मेरे यहाँ बड़ी तनख्वाह की उम्मीद न रखें। इन पत्रकारों को यह सुनकर बड़ी हैरानी हुई जो बर्नी इतने आलीशान मकान में रहता है और जो इतने महंगे कपड़े पहनता है उसे तनख्वाह देने में परेशानी हो रही है। खैर जिन लोगों को कुछ हद तक मुनासिब तनख्वाह मिली उन्होने बर्नी साहब के साथ काम करा शुरू कर दिया। मगर अभी ज्यादाह दिन नहीं बीते थे कि बर्नी साहब ने अपनी हरकत दिखानी शुरू कर दी। कई को उतने पैसे नहीं दिये गए जीतने के वादे किए गए थे और  किसी को सिर्फ इसलिए नौकरी से निकल दिया गया कि उसने दो दिन कि छुट्टी कर ली थी। कुल मिलाकर उनहों ने अपनी वह हरकत दिखनी शुरू कर दी हैं जिसके लिए वह मशशूर रहे हैं और उनकी जिस हरकत से उनके साथ काम करने वाले नाराज़ रहते थे।
 
कमाल की बात यह है कि एक तरफ जहां वह अपने साथ काम करने वालों को उचित तनख्वाह नहीं दे रहे हैं वहीं दूसरी तरफ वह अखबार चलाने के के लिए लोगों से चंदा मांग रहे हैं। रौजाना अपने अखबार में कुछ न कुछ ऐसा लिखने रहे हैं जो चर्चा का विषय बन रहा है। 26 अगस्त के अखबार में उनहों ने पहले पृष्ट पर दो लड़कियों का पत्र प्रकाशित किया है जो उनको अखबार निकालने के लिए मदद करना छह रही हैं। एक ने तो यहाँ तक लिख दिया है की मैं अपनी ईदी आपको मदद के तौर पर देना चाहती हूँ। हाल ही में उनहों ने अखबार में पूरे एक पेज का विज्ञापन छाप कर विभिन्न पदों के लिए आवेदन मांगे। हद तो तब हो गई जब उनहों ने एक पद के लिए 2 लाख से 5 लाख तक तनख्वाह देने की  बात कही है। इस विज्ञापन के बाद पहले उनसे धोखा खा चुके लोग उन्हें गाली दे रहे हैं और अन्य लोगों को बता रहे हैं की बर्नी के बहकावे में नहीं आयो वह ऐसे ही धोखा बाज़ी कर रहे हैं। श्रीनगर और हैदराबाद के लोगों में भी बर्नी को लेकर गुस्सा है। वहाँ के पत्रकारों का कहना है कि बर्नी ने कई को तनख्वाह नहीं दी और उसके साथ धोखा किया। जो सहारा छोड़ कर बर्नी के कहने पर उनके अखबार में आए थे वह कहीं के नहीं रहे।
 
समझ में नहीं आता कि बर्नी आखिर चाहते क्या हैं। उर्दू में काम करने वालों की वह उचित तरीके से तनख्वाह दे नहीं रहे हैं और दूसरी तरफ हिन्दी और अंग्रेज़ी में भी अखबार लाने की बात कर रहे हैं।  जहां तक अखबार के लिए पैसे का सवाल है तो वह हर रोज़ यही कह रहे हैं कि अब हमने अखबार शुरू कर दिया अब क़ौम की ज़िम्मेदारी है कि वह इस अखबार को चलाये। बर्नी साहब को यह कौन समझाये  कि यदि किसी को पैसों से मदद करनी ही होगी तो वह मदरसों में पढ़ने वाले ग़रीब बच्चों की मदद करेगा या बर्नी साहब को अखबार के नाम पर ऐश करने के लिए देगा। बर्नी की कुछ अलग टाइप की हरकत के कारण ही अब उनसे लोग हटने लगे हैं। जब वह सहारा में थे तो हर बड़ा मुसलमान उनसे मिलना चाहता था मगर अब हर कोई उनसे कट गया है। बहुत से लोग उनसे कट गए हैं। अधिकतर को यही समझ में नहीं आ रहा कि बर्नी साहब असल में चाहते क्या हैं। अगर वह बड़े पैमाने पर अखबार निकालना ही चाहते हैं तो देश के बड़े बड़े अमीरों से बात करें , अच्छा अखबार निकालें ताकि उनका भी नाम हो और पैसा लगाने वालों को आर्थिक लाभ भी हो। कुल मिलाकर बर्नी एक ऐसी अबूझ पहेली हैं जिसे समझना आसान नहीं है। आने वाले दिनों में वह और क्या क्या नया करेंगे यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा।
 
पत्रकार एएन शिबली का विश्लेषण.

मीडिया में छंटनी का मुद्दा राज्यसभा में नरेश अग्रवाल ने उठाया

समाजवादी पार्टी सांसद नरेश अग्रवाल ने राज्यसभा में आर्थिक स्थिति के मुद्दे पर चर्चा के दौरान बेरोजगारी का मुद्दा उठाया। केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए नरेश अग्रवाल ने कहा कि देश में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी से हर क्षेत्र प्रभावित है। लेकिन सरकार को कई चिंता नहीं है। टीवी 18 ग्रुप में हुई 350 मीडियाकर्मियों की छंटनी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पत्रकार भयभीत है, इस कारण जिम्मेदारी के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं। 

भड़ास तक सूचनाएं, जानकारियां bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

आसाराम की मौजूदगी में उनके आदमियों ने हेडलाइंस टुडे के पत्रकार-कैमरामैन पर किया हमला

आसाराम जब जहाज में सवार हुआ, कहीं जाने के लिए तो हेडलाइंस टुडे के पत्रकार व कैमरामैन को भनक लग गई और ये मीडियाकर्मी जहाज में पहुंच गए, बलात्कार प्रकरण में आसाराम का पक्ष जानने के लिए. रिपोर्टर ने ज्योंही बोलना शुरू किया और कैमरामैन ने शूट करना शुरू किया, आसाराम के आदमियों ने कैमरे पर हाथ रख दिया. कैमरामैन पर हमला बोल दिया. पत्रकार के साथ बदतमीजी की. इस पूरे प्रकरण का वीडियो टीवी टुडे ग्रुप के चैनलों आजतक व हेडलाइंस टुडे पर दिखाया गया. इस मुद्दे पर युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने फेसबुक पर लिखा….
 
Vineet Kumar :   आसाराम के लोगों ने किया मीडिया पर हमला. हेडलाइंस टुडे के कैमरे पर बार-बार मना करने पर हाथ रखा और शूट करने से बुरी तरह रोका. आसाराम के लोगों द्वारा मीडिया पर हमले की ये कोई पहली घटना नहीं है. अहमदाबाद आश्रम के पास दो बच्चों के शव मिलने और शूट के दौरान भी ऐसा ही किया गया था. इसके पहले आसाराम ने मीडियावालों को कुत्ता भी कहा था.

मुंबई रेपकांड के आरोपी तुरंत धरे गए, पर आसाराम मामले में पुलिस को क्या हो गया : उदय प्रकाश

Uday Prakash : मुंबई में 'शक्ति मिल' के खंडहर में एक फोटो जर्नलिस्ट के साथ हुए बलात्कार के पांचो अपराधी चौबीस घंटे के भीतर गिरफ़्तार हो गये . पुलिस ने काबिले तारीफ़ सक्रियता दिखाई.  लेकिन आसाराम के खिलाफ़ एफ आई आर दर्ज होने के चार दिन बाद भी पुलिस कुछ नहीं कर पाई. यह एक बुनियादी सवाल है.
आज 'टाइम्स नाउ' में अर्नब गोस्वामी ने आसाराम की हिफाज़त में खड़े भाजपा और कांग्रेस समेत पूरी क़ानून-व्यवस्था पर ज़ोरदार बहस की . और हमारे पुराने दोस्त और देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग तो जैसे हम सबके दिल और दिमाग की बातें बोल रहे थे.  आज मध्य प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े ताकतवर नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का असली चेहरा सामने आया .
 
जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश के फेसबुक वॉल से.

सपा विधायक को गोवा में कालगर्ल संग गिरफ्तार कर बीजेपी ने ले लिया बदला!

Sanjay Sharma : बीजेपी ऐसा ही गलत सलत काम करती है. यूपी में अखिलेश भैया ने विहिप की हवा क्या निकाली, उन्होंने गोवा में बदला ले लिया. समाजवादी पार्टी के सीतापुर के विधायक महेंद्र सिंह को 6 कालगर्ल के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है. अब बताओ भला यह भी कोई बात हुई.
विधायक जी हैं, इतना तो हक़ बनता है. जब पार्टी के सारे बड़े-बड़े नेता पंडित नारायण दत्त तिवारी के चरण छू रहे हों तो बेचारे विधायक जी तो उन्हीं की परम्परा को आगे बढ़ा रहे थे. आंध्रा के राज भवन वाले पंडित जी के साथ भी तो चार महिलायें थीं. उनके तो सब पैर छूते हैं और विधायक जी के साथ यह सलूक. अब इन बीजेपी के लोगो को घुसने मत देना भैया. इतना जुल्म, कितनी मेहनत करते हैं विधायक जी.. तनिक गोवा क्या चले गए हंगामा ही कर दिया ससुरों ने…
 
लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा के फेसबुक वॉल से.

शेखर गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस के सीईओ का पद छोड़ा (पढ़ें मेल)

इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के सीईओ का पद शेखर गुप्ता ने छोड़ दिया है. इस बाबत एक लंबा इंटरनल मेल खुद शेखर गुप्ता की तरफ से जारी किया गया है. इस मेल में शेखर ने सीईओ का पद थामने और छोड़ने के बारे में विस्तार से बताया है. शेखर गुप्ता एडिटर इन चीफ के रूप में काम देखते रहेंगे. उन्होंने सीईओ का पद छोड़कर मैनेजेरियल दायित्वों से मुक्ति पा ली है. एक्सप्रेस ग्रुप के सीईओ का दायित्व जार्ज वर्गीस को दे दिया गया है. वर्गीस ग्रुप के एमडी विवेक गोयनका को रिपोर्ट करेंगे. नीचे वो पत्र है जो शेखर गुप्ता ने एक्सप्रेस समूह के सभी लोगों को भेजा है…
 
Dear All,
 
Looking at the flurry of communication from me over the past few weeks, mainly on corporate and business issues, some of you may have wondered what was going on. This is particularly because it hasn’t been my method to write “dear all” mails often.
 
Or, more likely, that I am too lazy to be doing so.
 
Those of you in the New Delhi newsroom know this well, since you see me pacing up and down every Friday evening, wrestling with those 1200 words for National Interest, and in the dread of delaying City-I once again.
 
So here is the story.
 
This series of mails was by way of completing a great deal of unfinished business. All of you know what a procrastinator I am. So everything that can be put off till the last moment, is put off. Or, as we like to say in cliched journalism, put on the backburner. Until a deadline takes away the excuses.
 
The deadline we had given ourselves was end of August (and on a personal note, August 26, my 56th birthday).  And both ways we are getting there now. Hence, this note.
 
***
 
As you may have seen from my earlier communication, as also the buzz in the market, our company is now in an unprecedentedly robust shape.
 
We have already had six stellar quarters and, on all evidence as I track revenue figures for this month and the projections for September, are heading for an even better seventh. Businesses have to now work in this brutal QSQT (Quarter-se-Quarter-Tak) environment. And it is a truly brilliant achievement on the part of our various teams given the mayhem in media markets.
 
We are today acknowledged to be one of the soundest news media companies within-our-size category. And no, we never do paid news, or stretch any of the First Principles of Journalism.
 
Never.
 
The truth is, it is overly simplistic to say, that we have a Chinese wall between marketing and editorial. We have never needed one. Because it is our colleagues in sales and marketing who have protected our editorial integrity with as much zeal and commitment as us journalists.
 
And yet, we have built such a fine company. It vindicates our belief, our founder’s and our CMD Viveck Goenka‘s, that there is no contradiction between good journalism and the market.
 
This is why, I believe, and can say with great satisfaction, that my job on the corporate side is now done.
 
***
 
It was in an unusual set of circumstances, and at a critical juncture in the history of our company, that Viveck had asked me to take over the additional responsibility of overseeing the management.
 
Those unusual circumstances, or any sense of imminent crisis, no longer exist.
 
From those perilous years, the company has now been nursed into great health.
 
Credit for this goes to all of you, but most of all to Viveck.
 
My profound gratitude is also owed to him for placing his trust in me to handle a responsibility I had no skills or training for. It is a perfect time, therefore, for me, to hand over a flourishing company back to Viveck, now that he has the time to take over the management.
 
And since you can always trust him to pick the most auspicious day in the calendar, he has chosen, for the new arrangement, August 28, Janmashtami.
 
***
 
We will share more details with you in the course of time. I am pleased to also inform you, meanwhile, about the return of another Express Group veteran, George Varghese, as the Company’s CEO, to assist Viveck who will be fully hands-on.
 
Given where the company has reached now, I believe that we need a more structured and formally organized corporate leadership to build on the wonderful platform all of you have created. That is precisely what we will get now. George is a wonderful professional and old-timers among us remember him fondly.
 
Please join me in wishing him, and Viveck well.
 
Since I am a story-teller by profession, though, I can’t help but tell you one here. When Viveck asked me to take over this additional charge one winter afternoon, I was petrified. I did not even know debit from credit and thought an RO, our daily bread-giving advertisement Release Order, was some water purifying system.
 
So I excused myself for a minute, went outside, and called T.N. Ninan, my friend and former editor whose counsel I have sometimes sought with such dilemmas and who has himself done a fine job of balancing edit and business leadership.
 
He gave me a bunch of quick suggestions and then concluded, in his usual grave tone: but be careful so-and-so…people should not say that a journalist took over a publishing business and made a mess of it.
 
If I have no such concerns now, it is entirely because of the motivation, talent, commitment and trust that all of you have shown, often surprising even the thick-skinned me with your resilience and optimism.
 
***
 
A couple more thoughts. Besides a consistently decent bottomline, we had also set ourselves stiff targets on improving our working conditions, technologies and, of course, compensations. All of you have contributed to turning into reality what had then looked like an impossibility.
 
We routinely have media websites wondering how we manage to have such nice offices and pay ourselves so well.
 
Our answer: go check our balance sheets. So thank you all once again for so energetically putting your shoulder to the wheel, even overlooking the unusual fact that I was such a novice to business. And nor did I carry a corporate title, or any title other than the old-fashioned Group Editor-In-Chief.
 
Which is how I will be working full-time henceforth. Besides all editorial teams (except Loksatta), our tiny but super-productive brand, innovation, archive and CSR teams will continue working with me. I also hope to be able to find more time to build EXIMS, our media school, which is a labour of love.
 
I will soon be speaking with the team heads individually and answering any questions they might have. I will be fully helping out with transition on the corporate side. Meanwhile, please make sure nothing falls between the cracks. We must maintain total continuity.
 
If confused, send communication, clearances etc to me with copy to Kumar Gyanam and we will either give you the answers, or be good postmen and redirect you to the correct addressees.
 
Yet again, before I sign off for the day, thanks and all the best. In any case, I am always around, and accessible and just as chaotically so — as before.
 
Shekhar Gupta
 
Editor-in-Chief

पिता ने किया खुलासा- गुरुकुल से आसाराम के पास जाती रहती हैं लड़कियां

: साहसी छात्रा के हवाले से पिता ने किया सनसनीखेज खुलासा : भय के चलते मौन ही रह जाती हैं अधिकाँश शोषित लड़कियां : मुंह खोलने पर एक लड़की को शिक्षकाओं ने बेरहमी से पीटा : बदायूं : कथित धर्म गुरु आसाराम गुरुकुल से महीने में एक-दो बार अनुष्ठान आदि के बहाने छात्राओं को अपने आश्रम में बुला कर यौन शोषण करता ही रहता है, उसके इस कुकृत्य में गुरुकुल की शिक्षकायें पूरा साथ देती हैं। उसकी शिकार अधिकाँश लड़कियां बहशी आसाराम के बारे में भय के चलते चर्चा तक नहीं करतीं। एक लड़की ने सहेलियों को बताया था, इसके बाद सब ने मिल कर शिक्षकाओं को आसाराम के कुकृत्य की जानकारी दी थी, तो शिक्षकाओं ने उस लड़की को बेरहमी से पीटा था, साथ ही उसके परिजनों को बुला कर गुरुकुल से भगा दिया, जिसके बाद किसी ने आसाराम के विरुद्ध मुंह नहीं खोला।

उक्त सनसनीखेज खुलासा कथित धर्म गुरु आसाराम के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराने वाली नाबालिग छात्रा के हवाले से उसके पिता ने किया है। साहसी छात्रा के हवाले से पिता ने फोन पर ''गौतम संदेश'' को बताया कि आसाराम महीने में एक-दो बार किसी न किसी बहाने से बच्चियों को गुरुकुल से अपने निवास पर बुलाते रहते हैं और उनका यौन शोषण करते रहते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसी ही एक लड़की ने सहेलियों को आकर बताया, तो उसे बेरहमी से पीटा गया और गुरुकुल से निकाल दिया गया, जिससे लड़कियां और डर गईं। बोले- उनकी लड़की ने इस घटना के बारे में उस समय ही बता दिया होता, तो वह अपने बच्चों को गुरुकुल से निकाल लाते, पर यह सब उन्हें उनकी बेटी ने अब बताया है। बोले- आसाराम वशीकरण का प्रयोग जानते हैं और वह इंसान के रूप में बहशी जानवर है।

आसाराम का पूरे सिस्टम पर कब्ज़ा है

मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि न होने के सवाल पर पीड़ित के पिता ने कहा कि पूरे सिस्टम पर उसका कब्जा है। हर पार्टी में बड़े नेता उसके चेले हैं, उसके विरुद्ध कोई कुछ बोलने तक को तैयार नहीं है, ऐसे में रेप की पुष्टि न होना, तो छोटी बात है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना 15 अगस्त की रात की है और मेडिकल कई दिनों बाद हुआ है, जिससे मेडिकल रिपोर्ट में कुछ भी स्पष्ट नहीं आना स्वाभाविक ही है।

भाई को हथियार बना कर कराना चाहते थे फैसला

आसाराम का असली चेहरा उजागर करने वाली साहसी छात्रा का छोटा भाई आश्रम में ही था, जिसके सहारे आसाराम के लोग फैसले का दबाव बना रहे थे। साहसी छात्रा के पिता ने बताया कि पहले कहा कि मेल के द्वारा प्रार्थना पत्र भेजो, तब छात्र को छोड़ेंगे, लेकिन मेल भेजने के बाद भी बेटे को नहीं भेजा, इसके बाद कहने लगे कि सामने आकर लो, तभी देंगे। उन्होंने कहा कि वह तत्काल ट्रेन में बैठ गये। बोले- तीन दिन से न ठीक से खाया है और न ही सो पाए हैं। नहाए भी नहीं हैं और कपड़े भी नहीं बदले हैं। बोले-उनका इरादा जबरन फैसला कराने का था, लेकिन वह छिंदबाड़ा स्थित गुरुकुल में पुलिस के साथ ही गए, जिससे उन पर कोई किसी तरह का दबाव नहीं बना पाया। बोले- बेटा उनके पास है और वह अब उसके साथ शाहजहांपुर लौट रहे हैं।

दुखी पिता अंतिम सांस तक लड़ने को तैयार

साहसी छात्रा के पिता ने बताया कि उनकी बेटी और बेटों का कैरियर तबाह हो चुका है, सामाजिक प्रतिष्ठा मिटटी में मिल चुकी है। दुखी मन और रुआंसी आवाज में बोले कि अब उनके बच्चों के विवाह तक नहीं होंगे, फिर भी वह आसाराम को माफ़ नहीं करेंगे और अंतिम सांस तक उसे दंड दिलाने की लड़ाई लड़ेंगे।

शर्म है कि आती ही नहीं

सब के अपने स्वार्थ हैं। कोई हिन्दू धर्म के नाम पर, तो कोई जाति के नाम पर, कोई भक्त होने के कारण, तो कोई उसके नाम के सहारे तमाम तरह के स्वार्थ पूरा करने के चलते आसाराम का बचाव कर रहा है। आसाराम और उसके अनुयायी अब तक कांग्रेस और ईसाई मिशनरियों का षड्यंत्र बता रहे थे, लेकिन उसी कांग्रेस राज़ के डाक्टर ने रेप की पुष्टि नहीं की है और मुकदमा लिखाने वाली लड़की और उसका पूरा परिवार आसाराम का ही अनन्य भक्त रहा है, ऐसे में आसाराम का बचाव करने वालों को शर्म आना चाहिए।

बीपी गौतम की रिपोर्ट. बीपी गौतम बदायूं के वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'गौतम संदेश' के संस्थापक व संपादक हैं.

दैनिक भास्कर दिल्ली में छंटनी शुरू, विमल झा और रफीक विशाल की विदाई, संजीव क्षितिज और हरिमोहन मिश्रा के जाने की चर्चा

सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 में सैकड़ों लोगों की छंटनी की मार से पत्रकार समुदाय अभी उबरा भी नहीं था कि दिल्ली में ही एक बड़े अखबार का एडिशन बंद करने व छंटनी की कवायद शुरू हो गई है. भास्कर प्रबंधन दैनिक भास्कर दिल्ली का शटर गिरा रहा है. बताया जाता है कि दिल्ली एडिशन के नाम पर दिल्ली में बस पांच-सात लोग रहेंगे. जनरल डेस्क भोपाल शिफ्ट किया जा रहा है. बाकी सारे पेजेज भोपाल में तैयार व फाइनल होंगे. केवल प्रिंटिंग का काम दिल्ली में किया जाएगा. इस तरह सैकड़ों लोगों को अब कार्यमुक्त करने व ट्रांसफर करने की कवायद शुरू हो चुकी है.

ताजी सूचना के मुताबिक दैनिक भास्कर दिल्ली में कार्यरत विमल झा और रफीक विशाल को कार्यमुक्ति का पत्र थमा दिया गया है. इनको एक महीने का नोटिस प्रबंधन ने दिया है. विमल झा न्यूज एडिटर के पद पर कार्यरत थे और एडिटोरियल पेज देखते थे. रफीक विशाल चीफ कापी एडिटर के पद पर थे और गुड़गांव-फरीदाबाद डेस्क हैंडल करते थे. इन दोनों को दिए गए लेटर में महीने भर का वक्त दिया गया है. कई और लोगों की विदाई के चर्चे हैं. वरिष्ठ पत्रकार संजीव क्षितिज और हरिमोहन मिश्रा के बारे में बताया जा रहा है कि इनका भी नाम छंटनी की लिस्ट में है. पर इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पा रही है. संजीव क्षितिज एक्जीक्यूटिव एडिटर के पद पर भास्कर, दिल्ली में कार्यरत हैं. हरिमोहन मिश्रा डिप्टी एडिटर हैं और जनरल डेस्क देखते हैं.


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Awadhesh Kumar : दैनिक भास्कर दिल्ली संस्करण बंद किए जाने की सूचना.. अभी कम्प्यूटर पर बैठा कुछ लिख रहा था कि अचानक हमारे पुराने मित्र और वरिष्ठ पत्रकार रफीक विशाल का फोन आया। रफीक इंदौर के पत्रकार हैं और नई दुनिया में लेखन के समय से ही उनके साथ संबंध हैं। उन्होंने मुझसे पूछा, ‘सर, कुछ पता है’? मैंने जवाब दिया,‘ क्या’? उनने बताया- हमलोग सड़क पर आ गए।

मुझे लगा शायद भास्कर ने इन्हें हटा दिया है। लेकिन शब्दप्रयोग था, हमलोग। मैंने पूछा,‘कैसे’? उत्तर था, भास्कर दिल्ली संस्करण 1 सितंबर से नहीं निकलेगा। यह सुनते ही कुछ समय के लिए मेरी आवाज बंद हो गई। पता चला कल रात इसकी घोषणा अचानक की गई। इसीलिए आज ऑप एड पृष्ठ नहीं निकला है। श्री विमल झा ने कल ही मुझसे एक लेख लिखवाया था। सुबह अखबार देखा तो पृष्ठ ही नहीं था। ऐसा एकाध बार पहले भी हुआ है। सोचा, शायद कल आ जाएगा। लेकिन इसका कारण तो और है।

रफीक एक अच्छे पत्रकार और भले इन्सान हैं। वे इन्दौर से दिल्ली काफी उम्मीद से आए थे। उनकी पत्नी बीमार हैं, जिनका इलाज चल रहा है। उनके लिए नौकरी अपरिहार्य है। रफीक अकेले नहीं हैं ऐसे। भास्कर में काम करने वाले कई मित्र उत्कृष्ट श्रेणी के पत्रकार हैं। श्री हरिमोहन मिश्रा जी के ज्ञान और व्यक्तिगत व्यवहार कई मायनों में आदर्श हैं। इसी तरह और लोग हैं। एक अखबार बंद होने का प्रत्यक्ष-परोक्ष असर न जाने कितने लोगों पर पड़ता है। अनेक लेखक भास्कर में लिखते थे, जिन्हें आत्मसंतुष्टि के साथ मानदेय मिलता था। उन सारे लोगों की आय और आत्मतुष्टि का बड़ा साधन एकाएक बंद हो गया। मैं भी उसमें शामिल हूं। भास्कर ने दिल्ली संस्करण में काफी प्रबुद्ध पाठक बनाए थे। उनके लिए भी यह बहुत बड़ा धक्का है। हमें अपने लेखों पर बराबर उनकी प्रतिक्रियाएं मिलतीं थीं।

आखिर कोई अखबार बंद क्यों किया जाता है? भास्कर एक ओर तो पटना संस्करण आरंभ कर रहा है, इसके पूर्व झारखंड संस्करण निकाल चुका है और दूसरी ओर बंद करने का निर्णय। इनके बीच कोई सुसंगति नहीं। दिल्ली संस्करण में कोई समस्या नहीं थी। आर्थिक संकट का तो प्रश्न ही नहीं था। फिर ऐसा निर्णय क्यों किया गया? इसका उत्तर तो मिलना चाहिए। आखिर किसी अखबार या संस्थान को बंद करने का कोई तो आधार होना चाहिए। हो सकता है भास्कर की देखादेखी कोई और मालिक ऐसा कर बैठे।

क्या किसी मालिक को, जो कि शेयर बाजार में जाने के बाद सम्पूर्ण मालिक भी नहीं होता, एकपक्षीय तरीके से किसी अखबार या ऐसे संस्थान को बंद करने का अधिकार होना चाहिए? पत्रकारों के लिए तो यह आफत का समय है। इसके पूर्व टीवी 18 से काफी पत्रकार और आम कर्मचारी निकाले गए। इसके पूर्व नईदिल्ली टेलीविजन के मुंबई कार्यालय से काफी संख्या में लोग हटाए गए…. लंबी कथा है। लेकिन इसका उपाय क्या है? जब देश की नियति बनाने वाली संसद अपने को पूंजीशाहों और मीडिया स्वामियों पर अंकुश लगाने में अक्षम पा रही है या फिर किन्हीं कारणों से ऐसा करना नहीं चाहती तो फिर अपने पास दूसरा विकल्प तलाशने की आवश्यकता है। न्यायालय में मामला इतना लंबा खींचता है कि वेतन पर जीने वाले लोगों के लिए उतने समय तक अड़े रहना कठिन हो जाता है। वैसे भी न्यायालय वित्तीय क्षतिपूर्ति के लिए तो आदेश दे सकती है, संस्थान को दोबारा आरंभ करने के लिए नहीं।

    Badrinath Verma सर, अपुष्ट खबर है कि किसी ने भास्कर की फ्रेंचाइजी खरीदी है। हो सकता है इस बंदी के पीछे यही कारण हो।
 
    Satish Misra Afsos. yeh sab kya ho raha hai. Arthik mar pad rahi hai yr kuch aur bat hai?
 
    Affan Nomani so sad news sir ! koi milijuli uljhi rahasya karan se band huwa hoga , iska rahasya to malum ho hi jayega.
 
    Lokmitra Gautam सुनकर वाकई दुःख हुआ …एक ज़माने में मैंने भी खूब भास्कर में लिखा था ..विशेषकर कमलेश्वर जी के समय में उन्होंने सुधीर अग्रवाल जी से मुझे मिलवाया था और सहायक संपादक के पद पर नौकरी की भी बात हुई लेकिन मैं चंडीगढ़ नहीं जा सकता था और फिर उन दिनों नौकरी भी माया में कर रहा था इसलिए भास्कर से जुड़ना संभव नहीं हुआ लेकिन ७-८ साल तक लिखा है तब भास्कर मानदेय भी हिंदी में सबसे ज्यादा देता था ..इधर कुछ दिनों से फिर भास्कर में लिखने की चाह हो रही थी लेकिन विमल जी में मुझे लेकर शायद कुछ दुराग्रह है ..इसलिए वो जहां होते हैं वहां मेरे लिएछपना मुश्किल हो जाता है सो बातचीत होने के बाद भी भेजे गए ६-७ लेखों में से कोई नहीं छपा फिर भी भास्कर दिल्ली संस्करण के पढने की लत थी विशेषकर आपका ,अभय दुबे का ,वेद प्रताप वैदिक जी का और जय प्रकाश चौकसे जी के लेख नियमित पढता था …..
   
   पंकज कुमार झा उफ़ उफ़…वज्रपात सरीखा है ऐसी खबर तो. पता नहीं कार्पोरेट कब तक इस तरह खिलवाड़ करता रहेगा लोगों के साथ. शोचनीय स्थिति.
     
    Sagar Mishra दुखद है पर जिस प्रकार मिडिया की विश्वसनीयता शक के दायरे में आई उसका परिणाम ऐसे होंगे …जब पाठक आपके लिखे पर भरोसा ही न करेगा तो फिर पढ़ेगा क्यों ?
     
   विशाल तिवारी दुखद है सर
     
    Ravindra Agrawal Patrikeita sabse asukrishit karya ho gaya hai. Prabhandan par koi ankush nahi hai. Sarkar ke liya yaha suvidhajanak sthiti hai. Kuch din pahalei hee IBN7 se 350 se jayad log nikele gaye. Kuch karne kee jarurat hai. es ke sath hee jo vidhyarthi Masscom mae padh rahain unahe savdhan hone kee bhe jarurat hai. Patrakar sab kee chinta karte hain paruntu unkee chinta kaun kare?

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

कारपोरेट का कसाई अब पहुंचा है भास्कर के दिल्ली दफ्तर

पंकज कुमार झा : खबरें आतंकित करने वाली है. रूहें काप जाती है कल्पना कर की कत्ल होने वाले सरों में अपन भी हो सकते थे. सरदेसाई के कत्लखाने से सैकड़ों हलाली के बाद कारपोरेट का कसाई अब पहुचा है भास्कर के दफ्तर. दिल्ली संस्करण बंद होने की खबर. इससे पहले भी थोक में निरीह पत्रकारों के क़त्ल का सिलसिला चलाते रहे हैं अंबानीगण. क्या यह समय समाचार माध्यमों के राष्ट्रीयकरण का नहीं है? तेल लेने गयी अभिव्यक्ति की आज़ादी भाई. भरण-पोषण रोजी-रोज़गार की आज़ादी सबसे बड़ी है. शेष बातें बाद की. उफ़ उफ़.

    Ranjay Tripathi कोई बात नहीं फ़ूड गारंटी है … और दूसरी बात, ये पत्रकार इसी लायक है … घटियाही पर इनका छातीफाड़ रुदाली क्रुन्दन याद है न ….
 
   पंकज कुमार झा सहमत हूँ Ranjay भाई. वास्तव में बैनर का अहंकार कई बार पत्रकारों को इंसान भी नहीं रहने देता. हाल ही में ऐसे एक कटु अनुभव को बिना नाम लिए शेयर किया था मैंने. लेकिन बावजूद इसके ऐसी खबरें हृदयविदारक हैं.
 
    Samanwaya Nanda दुखद स्थिति
 
    Sanjay Bengani रोजगार गेरेंटी योजना और खाद्य सुरक्षा योजना है तो सही. काहे की फिकर?
 
    Navin Dewangan किसी – किसी जगह तो पत्रकारो की तनख्वाह तो वहां के सिक्यूरटी गार्ड से भी कम रहती है.दुखद स्थिति..

पत्रकार और पालिटिशियन पंकज झा के फेसबुक वॉल से.

क्या भास्कर का दिल्ली एडिशन पहली तारीख से बंद हो रहा है?

Arvind K Singh : दैनिक भास्कर का दिल्ली संस्करण बंदी की कगार पर… थोड़ी देर पहले अपने मित्र और विख्यात कलमकार भाई अवधेश कुमार से जानकारी मिली कि दैनिक भास्कर का दिल्ली संस्करण 1 सितंबर 2013 से नहीं निकलेगा…इस खबर से दुख हुआ…मेरे कई दोस्त वहां हैं जिन्होंने अपने श्रम से इस अखबार को जमाया… हालांकि यही एक ऐसा अखबार है जिससे मेरा लेखक के तौर पर रिश्ता रहा नहीं… पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में मेरे कुछेक लेख वहां छपे थे लेकिन बाद में मैने कभी लिखा नहीं…लेकिन यह खबर पीड़ाजनक है…

शिवानन्द द्विवेदी सहर दिल्ली और राष्ट्रीय संस्करण एक ही है न ?
 
Rudra Bhanu Pratap Singh ek ke bad ek jis tarah se ye ghatanae ho rahi hai kya uska asar ptrakarita par nahi pdesa .
 
Vijay Kumar Singh दुखद जानकारी। सैकडो की संख्या में इस न्युज पेपर में काम कर रहे लोगो की रोजगार समाप्त होगी। वही हजारो की संख्या के वैसे पाठक जिनको इस अखबार से गहरा लगाव हो गया होगा। उनका इससे संबंध विछेद हो जाएगा।
 
Ashis Kumar Mehrotra really very sad news.
 
Sandeep Yash aage aage dekhiye hota hai kya…. ab aisi khabaron ki aadat pad jaani chahiye
 
Ghansham Dass Sad very sad
 
Avaidya Nath Dubey क्‍या नेशनल एडिशन? यहां से तो बिजनेस भास्‍कर भी छपता है। कहीं बिजनेस वाला तो नहीं बंद होने जा रहा?
 
Laxman Singh i have sympthy thos who have become unemployed but no sympathy with its news..its a porn akhbaar..dont u know how they published a false news of jnu girlhttp://subalternsex.blogspot.in/2013/08/porn-journalism-foul-trend.html
 
Arvind Jaiteelak kya fark padta hai. dhero lajwab, shandar akhbar desh-samaj ke liye aabhi maujud hain…………..
 
Anil Pandey Sorry
 
Vivek Shukla अरविंद जी,अगर इस खबर में रत्तीभर भी सच्चाई है तो वास्तव में ये बहुत दुखद है। मुझे दैनिक भास्कर में काम करने का मौका मिला करीब एक साल तक। तब मैं इसकी पाठक संख्या का मैं कायल हो गया।
 
Dataram Chamoli खबर वाकई पीड़ाजनक है।
 
Ramesh Singh Really its painful……………..
 
Rashtriya Janmorcha बहुत दुखद
 
Reena Sopam Bauddhik sankraman ka samay kareeb dikhta hai
 
Janki Sharan Dwivedi Really painful……….
 
पवन प्रणव सुन कर बेहद दुख हो रहा है…
 
Anil Khamparia नेताओं और अफ़्सरों को छोड़ कहीं सेवा सुरक्षा नहीं..

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

छह महीने पार्ट टाइम करता रहा और एक अधिकारी से पंगा ले कर सचमुच सस्पेंड हो गया

: मेरा पहला इंटरव्यू और अंतिम भी : लगभग 40 साल के नौकरी जीवन में लंबी और छोटी अवधि की कुल मिला कर आठ नौकरियां कीं मगर इंटरव्यू केवल एक ही नौकरी के लिए दिया बस यही पहला और अंतिम इंटरव्यू साबित हुआ। हालात ऐसे बने कि बी. ए. की पढाई बीच में ही छोड़ कर नौकरी करना मजबूरी बन गया। शादी इंटर के बाद ही कर दी गई थी। अमरोहा में एक मौसा जी रहते थे उन्हें जैसे ही हालात का पता चला तो उन्होने अमरोहा बुला लिया। उनके जानकार एक सेठ को ऐसे आदमी की आवश्यकता थी जो हिंदी उर्दू और अंग्रेजी में उन का हिसाब किताब रख सके। अमरोहा जाते ही काम मिल गया।

इस नौकरी में एक और काम यह था कि सेठ के एक भाई की हिंदू प्रेमिका दूसरे शहर में थी वह उर्दू नहीं जानती थी और सेठ जी हिंदी नहीं जानते थे। प्रेमिका के हिंदी में आए प्रेम पत्र का उर्दू में अनुवाद कर सेठ जी को सुनाना होता और सेठ जी के उर्दू में लिखे प्रेम पत्र की हिंदी कर उसे प्रेमिका को भेजना होता। इस नौकरी में गणित का काम अधिक था और मेरा गणित कमजोर रहा है इसलिए यहां मन नहीं लग रहा था। इसी बीच अखबार में एक विज्ञापन देखा कांठ के एक इंटर कालेज को टाइपिस्ट की आवश्यकता थी। आवेदक को एक निश्चित तारीख पर मुरादाबाद के कांठ हाउस पर इंटरव्यू के लिए बुलाया था।

अनजान जगह कोई जान पहचान नही फिर भी यह देखने के लिए कि इंटरव्यू कैसा होता है निश्चित तारीख पर कांठ हाउस पहुंच गया। यह किसी बड़े जमीदार की शानदार कोठी थी। बुलावा आने पर अंदर गया तो देखा वहां चार पांच पगड़ीधारी लोग बैठे थे बीच में एक हुक्का भी रखा था। उन्होंने मुझे बैठने को कहा और बैठते ही पहला सवाल किया-किस जिले के हो। मैंने बताया कि बुलंदशहर से। तब दादरी जिला बुलंदशहर में था। उनमें से एक बोला- बुलंदशहर में एक शिकारपुर भी तो है वह किस चीज के लिए मशहूर है। मैं समझ गया कि अब ये लोग शिकार पुर के नाम पर मेरी खिल्ली उड़ाएंगे इन्हें माकूल जवाब दिया जाए, मैंने कहा- श्रीमान आप जैसे कुछ बुद्धिमान लोगो के कारण ही शिकारपुर जाना जाता है।

क्या मतलब? उनकी त्यौरियों पर बल पड़ गए। मैंने डरते डरते कहा- श्रीमान बात ये है कि शिकारपुर के बाहर एक बोर्ड लगा था। पहले उर्दू का जमाना था बोर्ड पर लिखा था- शिकार पुर की जूतियां मशहूर हैं। आप तो जानते होंगे कि उर्दू में ज पर एक नुक्ता होता है और च पर तीन नुक्ते होते हैं। किसी मनचले ने दो नुक्ते और लगा दिए और जूतिया का चूतिया हो गया। बस तब से अब तक शिकारपुर का नाम आते ही चूतिया सामने आ जाता है। शिकार पुर के साथ मनचले की हरकत की सजा आज तक शिकार पुर को मिल रही है।

मेरी बात सुन कर वह खुश दिखे और मेरा डर भी जाता रहा। इंटरव्यू यहीं समाप्त हो गया मैं बाहर आया और अपना बैग उठा कर चल दिया। अभी कोठी के गेट तक ही आया था कि एक अर्दली दौड़ता हुआ आया और कहा कि मुझे बुला रहे हैं। मन में एक बार फिर डर समा गया सोचा मना कर दूं मगर फिर वापस आ कर उनके सामने पेश हो गया। एक सज्जन ने कहा- महरउद्दीन हमें टाइपिस्ट मिल गया है एक अध्यापक चाहिए क्या आप मिडिल कक्षाओं को पढा सकेंगे। मेरे हां कहने पर कहा- ठीक है हम आपको नौकरी पर रखते हैं कल या परसों से आ जाओ। मेरी हैरत का ठिकाना नहीं था। कहां तो डर मारे बेचैन था और यहां नौकरी मिल गई। इस उहापोह में उनका धन्यवाद भी नहीं कर सका औ बिना देरी किए अगले दिन ही कांठ पहुंच गया।

चार पांच महीने ही यह नौकरी चल पाई और मुझे निष्कासित कर दिया। इसकी कहानी भी काफी रोचक है जो अगले एपीसोड में बताउंगा। कांठ की नौकरी में रह कर आगे की दिशा यह मिली कि अध्यापक की नौकरी ही आगे करनी है। सो जामिया में शिक्षक प्रशिक्षण के लिए टेस्ट दिया और चुन लिया गया। तब प्रशिक्षण के बाद नगर निगम में सीधे नियुक्ति मिल जाती थी बिना किसी इंटरव्यू के। प्रशिक्षण के बाद दो महीने दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान में नौकरी की। ये लोग फर्जी मार्कशीट आदि का धंधा भी करते थे। मुझे इसका पता चल गया तो ये लोग मेरी जान के दुश्मन बन गए तो यहां से भी गुपचुप पलायन करना पड़ा। नगर निगम में नौकरी मिल गई तो जिंदगी को एक राह मिल गई।

बचपन में तुकबंदी करते करते पहले कुछ कविताओं की पैरॉडी लिखी और बाद में कविता लिखने लगा। स्थानीय साप्ताहिकों के अतिरिक्त भारत चीन युद्ध पर एक कविता नवभारत टाइम्स में छपी और जामिया में प्रशिक्षण के दौरान पहली कहानी 23 जनवरी 1966 के साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी। इसके अतिरिक्त यूनीवर्सल फीचर सर्विस के माध्यम से अनेक पत्र पत्रिकाओं में लेख छपने लगे। इससे कुछ अतिरिक्त आय भी होने लगी। यहां यह बता दूं कि दादरी में उस समय कोई लेखक, पत्रकार या कवि नहीं था जिससे गाइडेंस ली जा सके। इस प्रकार लेखन के क्षेत्र में मेरा कोई गुरु नहीं है। नौकरी में काफी समय मिलता था सो ग्रामीण विषयों पर जमकर लिखने लगा और छपने भी लगा। सेवाग्राम साप्ताहिक में नियमित लिखने लगा। मेरे विषय सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे इस लिए आसानी से छप जाते थे। एक और बात यह कि अभी तक सेवाग्राम के अलावा किसी अखबार के कार्यालय भी नही गया था।

दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं सरिता और मुक्ता में मेरे लेख व कहानियां छपते रहते थे। इस दौरान दिल्ली प्रेस ने ग्रामीण जनजीवन से सम्बंधित पत्रिका भू भारती का प्रकाशन आरंभ किया तो सेवाग्राम और अन्य पत्र पत्रिकाओं में मेरे लेख देख कर परेश नाथ जी का बुलावा मिला। दिल्ली प्रेस गया तो परेश नाथ जी ने पूछा कि क्या मैं कुछ समय दे सकता हूं। मैने बताया कि फिलहाल दो घंटे रोजाना दे सकता हूं सरकारी नौकरी है। सस्पेंड होने का प्रयास करता हूं अगर सफल हो गया तो फुल टाइम दे दूंगा। परेश जी मेरी बात पर हंसे और मैं दो घंटे के लिए रोजाना दिल्ली प्रेस जाने लगा। दोपहर बाद का स्कूल था इस लिए कोई परेशानी नहीं हुई।

छह महीने पार्ट टाइम करता रहा और छह महीने बाद एक अधिकारी से पंगा ले कर सचमुच सस्पेंड हो गया। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार दिल्ली प्रेस में पूरा समय देने लगा। वहां मेरा काम भू भारती के लिए आए लेखों पर टिप्पणी देना और परेश जी से डिसकस कर अन्य विषयों पर लिखना था। दिल्ली प्रेस में कई लेखकों एवं पत्रकारों से जान पहचान हुई और इस बिरादरी को निकट से दखने का अवसर भी मिला। बिना इंटरव्यू के मिली यह नौकरी साल भर चली। बाद में परेश जी ने आग्रह किया कि मैं प्रेस में नौकरी कर लूं मगर मैंने मना कर दिया।

अब मैं एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय था। धुआंधार लेखन, नौकरी परिवार की देख भाल और छूटी हुई शिक्षा को आगे जारी करना। इसके लिए नए सिरे से बी. ए. किया, बी. एड. किया, एम. ए. और फिर पी-एच. डी.। इस बीच बिना किसी ठोस प्रयास के डिग्री कालेज में भी लीव वेकेंसी पर नियुक्ति मिल गई। उन दिनों लेखन का हाल यह था कि नवभारत टाइम्स, जनसत्ता और हिंदुस्तान में नियमित रूप से लेख छपने लगे। कई फीचर सर्विस के माध्यम से दिल्ली के बाहर के अखबारों में खूब छपने लगा। 1984 की बात है एक दिन नवभारत टाइम्स गया तो रब्बी जी ने बताया कि संपादक श्री राजेंद्र माथुर मिलना चाहते हैं। मैं गया तो मेरे नाम की पर्ची पाते ही मुझे तुरंत बुला लिया गया।

माथुर जी ने मेरे लेखन को सराहते हुए पूछा-अखबार में नौकरी कर सकते हो। मैंने कहा अगर पैसा ठीक मिले तो कर सकता हूं। इसके बाद माथुर साहब ने और इधर उधर की बात की और साथ में यह भी पूछ लिया कि अब कितना कमा लेते हो। लगभग दो सप्ताह बाद माथुर जी का संदेश मिला कि मैं उनसे मिलूं। मिलने पर माथुर जी ने बताया कि लखनउ से नवभारत टाइम्स आरंभ हो रहा है, आपको वहां नियुक्त करने का विचार है। साथ ही बताया कि आपका वेतन वहां के मैनेजर के बराबर यानि दो हजार रुपए होगा। उस समय डिग्री कालेज के प्रवक्ता का वेतन डेढ हजार होता था। मैंने अपने घर के हालात बताए और कहा कि लखनऊ जाना संभव नही हो पाएगा अगर दिल्ली में रखने की बात हो तो मैं तैयार हूं। माथुर जी ने कोई आश्वासन नही दिया बस इतना कहा कि लिखते रहो।

लगभग दो महीने बाद माथुर जी ने फिर बुलाया और बताया कि नवभारत टाइम्स दिल्ली का विस्तार करने की योजना है, आपको मेरठ में नियुक्ति दी जा सकती है। मैंने इसके लिए हां भर दी। वेतन के बारे में पूछने पर मैंने यह माथुर जी पर ही छोड़ दिया कि वह जो भी दिलाएंगे मुझे स्वीकार होगा। एक सप्ताह बाद बुलावा आया मिला तो माथुर जी ने बधाई देते हुए कहा कि जाओ अपना नियुक्ति पत्र ले लो। नीचे जा कर नियुक्ति पत्र लिया तो आश्चर्य हुआ। वेतन व भत्ते कुल मिला कर साढे तीन हजार बन रहे थे जो प्रवक्ता के वेतन का ढाई गुना था। नियुक्ति पत्र लेकर माथुर जी से मिला तो उन्होंने बताया कि अभी आप अखबार के लिए नए हो इसलिए फिलहाल दिल्ली में रह कर अखबार के बारे में जानो और सीखो। उन्होंने रब्बी जी को बुलाया और कहा कि इन्हें अपने साथ रखो, उ. प्र. के समाचार के लिए जहां चाहो भेजना और बाकी समय में अखबार के बारे में बताना। इस प्रकार यह नौकरी भी बिना किसी इंटरव्यू के हाथ लग गई।

लगभग 15 साल की सेवा के बाद नवभारत टाइम्स से निकाल दिया गया, वह एक अलग कहानी है। इसके बाद सहारा के तत्कालीन संपादक ने सहारा में नौकरी का आफर दिया, मगर मैंने इंकार कर दिया। अब मैंने तय कर लिया था कि अखबार में अगर नौकरी करनी है तो संपादक के रूप में ही करनी है। यह निर्णय बस यूं ही था मुझे पता था कि यह संभव नहीं होगा। वर्तमान में कोई अखबार किसी मुसलमान को संपादक नहीं बनाने वाला। मुसलमान ही नहीं,  दलित और पिछड़़ों को भी यह अवसर नहीं मिलने वाला, सो पूरा ध्यान लेखन पर लगा दिया। मगर एक दिन देखा कि शाह टाइम्स के मैनेजर गांव आए और बताया कि मालिक लोग आपको संपादक बनाना चाहते हैं। वेतन आदि के बारे में तय करने के बाद कहा कि अपनी सुविधा के अनुसार दो चार दिन में आ कर ज्वाइन कर लें। इस प्रकार बिना किसी इंटरव्यू के यह नौकरी भी मिल गई।

शाह टाइम्स में मुजफ्फर नगर दिल्ली देहरादून और मुरादाबाद केंद्रों पर पांच छह साल मजे में बीत गए। अब सेहत इजाजत नहीं दे रही थी सो घर आ गया। पिछले साल भास्कर पुणे से आफर मिला था मगर सेहत के चलते उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। इस बीच एक महीना सहारा समय के लिए पटकथा लेखन किया तथा दो महीने मध्य प्रदेश और बिहार में साधना न्यूज के लिए भी काम किया। बाकी होली के अवसर पर एकाध चैनल से बुलावा आ जाता है। जिंदगी मजे में कट रही है।

डॉ. महर उद्दीन खां

सैफी हास्पिटल रेलवे रोड

दादरी, गौतमबुद्ध नगर-203207    

मोबाइल: 9312076949


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कविता सुन कुंवर साहेब नाराज हुए और मुझे शिक्षक पद से बर्खास्त कर दिया

बनारस में सड़क पर उतरे पत्रकार, अखबारों में खबर नहीं छपी

वाराणसी। इसे किस तरह की पत्रकारिता कहेंगे आप कि मुंबई में महिला पत्रकार के साथ हुए गैंगरेप के विरोध में बनारस में युवा पत्रकारों के प्रदर्शन को स्थानीय अखबारों ने छापना तक जरूरी नहीं समझा। ये अलग बात है कि मौके पर प्रमुख अखबारों के संवाददाता पहुंचे तो जरूर, विज्ञप्ति भी लिया लेकिन इतने संवेदनशील मसले पर उठे आवाज को अखबार से गायब कर दिया। सिर्फ दैनिक राष्ट्रीय सहारा ने इस युवा पत्रकारों के विरोध मार्च को अपने अखबार में  ''पत्रकारों ने की न्याय दिलाने की मांग'' शीर्षक से प्रमुखता से छापा।

मुंबई में महिला फोटोग्राफर के साथ हुए गैंगरेप के विरोध में वाराणसी के युवा पत्रकारों ने वाराणसी जर्नलिस्ट फ्रन्ट मंच बनाकर शनिवार को सिगरा स्थित भारत माता मंदिर से लहुराबीर स्थित शहीद चंन्द्रशेखर पार्क तक ''खामोश क्यों'' मार्च निकाल कर विरोध दर्ज करवाया। मार्च की सूचना एक दिन पहले ही सभी प्रमुख अखबरों को दी गई थी। हैरत की बात तो ये है कि शहर में मौजूद तमाम पत्रकार संगठनों में से किसी भी संगठन ने मार्च में शामिल होना जरूरी नहीं समझा। बावजूद इसके युवा पत्रकारों ने भारतमाता मंदिर से शहीद चन्द्रशेखर पार्क तक मार्च निकाल कर अपना विरोध दर्ज किया।

मार्च में शामिल पत्रकार अपने हाथों में ''घटनाए हो रही है सरकार सो रही है, पत्रकारों पर हमला क्यों?, पत्रकारों की सुरक्षा की गारंटी करो'' आदि तख्तियां और ''सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए'' जैसे गीत गाते हुए चल रहे थे। मार्च विद्यापीठ, मलदहिया, होते हुए लहुराबीर स्थित आजाद पार्क पहुंचकर सभा में तब्दील हो गया। सभा में पत्रकारों ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर होने वाली घटनाओं से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरें में नजर आ रही है। मुबंई और इटावा की घटना कानून-व्यवस्था और सरकार के सामजिक सुरक्षा के दावों पर प्रश्न चिन्ह लगा रही है।

वक्ताओं ने कहा कि सरकार के चमकते विकास के दावों का सच अब सामने आने लगा है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सैनिक माने जाने वाले पत्रकार तक इस व्यवस्था में सुरक्षित नहीं रह गए है तो आम आदमी की क्या बिसात। वक्ताओं ने सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की भी मांग की। सभा में वक्ताओं ने आम आदमी से आहवान करते हुए उनसे गुजारिष की कि वो इस तरह की घटनाओं का विरोध प्रधान मंत्री को पत्र भेजकर करें। कार्यक्रम का नेतृत्व पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी, संचालन मनीष सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन राजेश मिश्रा ने किया।

जुलूस और सभा में मुख्य रूप से अजय रोशन, अजय थापा, डा. रूद्रानंद तिवारी, मनीष सिंह, आर.के.श्रीवास्तव, अतीक खान, राजेश मिश्रा, अरविन्द मिश्रा, शैलेश चौरसिया, संतोष चौरसिया, उत्पल मुखर्जी, मुकेश मिश्रा, डा. मुअज्जम खान, किशन राजा, आरिफ, जावेद खान, अरशद खान, उमेश सिंह, प्रदीप राय, फारूकी, अभय श्रीवास्तव, रवि गौड़ आदि पत्रकार शामिल थे।

अगर दोषी पाए जाएं तो सुब्रत राय को जेल भेजो : राम जेठमलानी

सहारा ग्रुप की तरफ से जाने माने वकील राम जेठमलानी ने सुप्रीम कोर्ट से इस बात की जांच कराने की अपील की है कि उसने प्रीमैच्योर रिडेंप्शन पर इन्वेस्टर्स को कितना पेमेंट किया है. जेठमलानी ने कहा कि अगर कंपनी की इस मामले में बड़ी गलती पाई जाती है, तो कोर्ट उनके डायरेक्टर्स और फाउंडर सुब्रत रॉय को जेल भेज दे. सोमवार को सहारा, उसके डायरेक्टर्स और रॉय के खिलाफ मार्केट्स रेग्युलेटर सेबी की अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान कंपनी के सीनियर वकील राम जेठमलानी ने जस्टिस के एस राधाकृष्णन और जस्टिस जे एस खेहर की दो जज की बेंच से कहा, 'इस बात की समुचित जांच कराएं कि हमने इन्वेस्टर्स को कितना पैसा चुकाया। अगर हम गलत साबित होते हैं, मैं गुनाह कबूल कर लूंगा। फिर हमें जेल भेज दें।'

उन्होंने कहा, 'कोर्ट के आदेश का मकसद यह नहीं हो सकता कि निवेशक किसी गलती की कीमत चुकाएं।' उन्होंने यह बात इन्वेस्टर्स कहने पर पेमेंट करने के कंपनी के फैसले को सही ठहराते हुए कही। उन्होंने यह साबित करने के लिए सैट और लोअर कोर्ट के सामने पेश किए गए कई डॉक्यूमेंट्स दिखाए कि कंपनी ने सही में ये रिडेम्पशन किए। जेठमलानी ने कहा, 'यह कहना गलत होगा कि सहारा ने रिडेम्पशन किए जाने के बारे में कभी सैट/कोर्ट को सूचित नहीं किया।' उन्होंने 14 सितंबर 2011 को सैट के सामने सहारा की तरफ से पेश किए गए हलफनामों और 15 जून 2012 को सहारा की तरफ से दिए गए बयान का हवाला देते हुए यह बात कही। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से पूर्व जज बी एन अग्रवाल को अर्धन्यायिक अधिकार दिए जाने की अपील की जिनको इन्वेस्टर्स के वेरिफिकेशन प्रोसेस की निगरानी करने और उनका पैसा लौटाने का काम दिया गया है। उन्होंने कहा, किसी ने अभी तक हमारे पेमेंट को वेरिफाई नहीं किया है।'

उन्होंने सेबी पर इन्वेस्टर्स से रिलेटेड डॉक्यूमेंट्स एक्सेप्ट नहीं करके कंपनी को कोर्ट के आदेश का पालन करने से रोकने का आरोप लगाया है। सीनियर वकील सोमवार को अदालत की कार्रवाई खत्म होने तक अपनी दलील पूरी नहीं कर पाए थे। वह 2 सितंबर को मामले की अगली सुनवाई पर सहारा के खिलाफ अवमानना की किसी भी कार्रवाई के खिलाफ अपनी दलील जारी रखेंगे। सेबी ने सहारा की कंपनियों के दो स्कीमों के निवेशकों को पेमेंट देने के लिए 24,000 करोड़ रुपए सौंपे जाने के कोर्ट के 31 अगस्त 2012 के आदेश को जानबूझ कर नहीं मानने का आरोप लगाते हुए सहारा के खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाने की मांग की थी। सहारा की दोनों कंपनियों ने सेबी को दरकिनार करके फंड जुटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में कंपनियों की फंड जुटाने की कवायद को गलत ठहराया और सेबी के जरिए इन्वेस्टर्स का पैसा लौटाने का आदेश जारी किया। कंपनी को 15 फीसदी ब्याज के साथ डिपॉजिट लौटाने के लिए कहा गया।

आसाराम की तुलना गुरु नानक से करने पर प्रवक्ता नीलम दुबे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज

नई दिल्ली : आसाराम की प्रवक्ता पर कथित तौर पर उनका बचाव करने के लिए टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में अनेक धार्मिक संतों पर अपमानजनक टिप्पणी करने का मामला दर्ज किया गया है। पुलिस सूत्रों अनुसार दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी ने राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग थाने में प्रवक्ता नीलम दुबे के खिलाफ समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला दर्ज कराया। शिकायत में आरोप है कि नीलम ने एक हिंदी समाचार चैनल पर आसाराम के खिलाफ नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के आरोपों से संबंधित बहस में गुरु नानक, गौतम बुद्ध और अन्य धार्मिक गुरुओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं।

उधर, जोधपुर पुलिस ने नाबालिग से यौन शोषण के आरोपी आसाराम बापू को 30 अगस्त तक पेशी का समन दिया है। जोधपुर पुलिस ने आसाराम के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर भी जारी किया है। ऐसे में अब वो देश छोड़ कर नहीं जा सकेंगे। समन सौंपने के बाद वापस लौटते हुए पुलिस ने कहा कि आसाराम ने जांच में सहयोग करने की बात कही है। आसाराम ने कहा है कि 'जो गंदे आरोप मुझ पर लगाए गए हैं, वे पूरी तरह गलत हैं। दूसरे आरोप जैसे मुंह दबोचने की बात भी गलत है। लड़की और उसकी मां मुझसे इतनी कम दूरी पर थी कि उसकी मां तक धीमी आवाज भी पहुंच सकती थी।'

Zee News’ exclusive story on former Asian Gold medalist Makhan Singh awakens Lok Sabha

New Delhi : Zee News’ recent exclusive story on former Asian Gold medallist late Makhan Singh, was hard hitting enough that it was even raised in Lok Sabha by BJP leader Sushma Swaraj. Makhan Singh was an athlete from Punjab who won number of gold medals in National Games and even defeated Milkha Singh in the 1962 National Games in Calcutta. He passed away in 2002 due to extreme poverty. His family is now going through all kinds of trauma and sufferings and is willing to auction his medals including his Arjuna Award.

Zee News’ coverage shook the heart of senior BJP leader, Sushma Swaraj, who raised the issue in the Lok Sabha where she demanded financial help not only to Makhan Singh’s family but also other athletes who are going through the same plight.

Sushma Swaraj said, “Zee News showed how Arjuna Awardee late Sardar Makhan Singh’s  widow is now going to sell all his medals to combat poverty and for her survival. “

Sushma Swaraj also said that she was saddened to know about the condition of the family of a great athlete and asked the Sports Ministry to contact the family and provide adequate financial support immediately.

“There is story like Makhan Singh’s everyday in the media. Govt should take adequate steps to offer jobs and pensions to the award winner athletes and their families. If a huge country like India cannot honour its heroes then it is really a matter of shame for everybody. These heroes are inspiration for our young generation, but these type of stories will refrain our youngsters from joining sports in the future’’, added Sushma Swaraj.

Impact of Zee News’ story was such that just after four hours of airing the show, Indian Sports ministry & the Minister of State for Youth Affairs & Sports, Jitendra Singh took notice of the plight and offered immediate assistance to the family.

As a responsible fourth estate of democracy, Zee News through its sincere and responsible news has always been able to create an impact on people’s lives by raising their voice. Zee News, in line with its philosophy ‘Soch Badlo Desh Badlo’, always tries to represent people through its news and believes in bringing a positive change in India.

Sudhir Chaudhary, Editor, Zee News said, “We are glad that our news on such a genuine issue has not only made the people and leaders of India think but also act by helping Makhan Singh’s family. The story has also paved way for improving the lives of many other unsung heroes. As a responsible news channel, Zee News will continue showcasing many more stories of such heroes who are neglected and deprived of government support to lead a normal, rewarding life.’’

Press Release
 

हक की लड़ाई लड़ रहीं डिंपल को भदोही में मिला सहयोग और सम्मान

गोपीगंज (भदोही) : सोशल मीडिया के माध्यम से हक की लड़ाई लड़ने वाली डिंपल मिश्रा को नगर में सम्मान के साथ सहयोग प्रदान किया गया। आदर्श अतिथि भवन गोपीगंज में हर्षवर्धन सेवा समिति गोपीगंज द्वारा समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें पुत्री आंचल के साथ शामिल डिंपल मिश्रा को उसकी लड़ाई में सहयोग का भरोसा दिलाते हुए उपस्थित लोगों ने भरपूर सहयोग भी दिया। समारोह का दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारम्भ करते हुए मुख्य अतिथि नगर पालिका अध्यक्ष प्रहलाद दास गुप्त ने डिंपल मिश्रा की सराहना की कहा कि अपने हक की लड़ाई लड़ कर महिलाओं में जागरुकता पैदा की है।

समाज में पीड़ित ऐसी हर एक महिलाओं के सहयोग का आह्वान किया। युवा समाजसेवी राजेश मिश्र राजन ने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम व सहयोग से मासूम बेटी आंचल को पिता का हक दिलाने का आवाज बुलंद कर डिंपल ने एक मिशाल कायम किया है। उसकी लड़ाई में सहयोग का भरोसा दिलाते हुए लोगों से कहा कि हर व्यक्ति को पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए आगे आना होगा। समारोह में शामिल उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आनंद पांडेय ने भी हक की लड़ाई में सहयोग का आश्वासन दिया। साथ ही लोवर कोर्ट के फैसले के बाद आगे की लड़ाई नि:शुल्क लड़ने की घोषणा की।

इस अवसर पर जिला योजना समिति की सदस्य महिला सभासद सपना दुबे ने नगर की जागरुक महिलाओं की ओर से सहयोग का संकल्प दोहराया कहा कि महापंचायत व जनता से न्याय प्राप्त कर चुकी डिंपल मिश्रा को न्यायालय से भी न्याय मिलेगा। आगे की लड़ाई में संस्था के लोगों की पूरी सहभागिता देगी। इस दौरान संस्था की ओर से आर्थिक सहयोग के लिए चेक प्रदान किया गया। समारोह में उपस्थित अन्य लोगों ने भी भरपूर सहयोग किया। इस अवसर पर राघवेंद्र सिंह, योगिता हेमकर, शकुंतला देवी, संजय तिवारी, विभूति नारायण सिंह, शंकराचारी दुबे, धर्मेन्द्र द्विवेदी, धर्मेन्द्र दुबे, धर्मराज दुबे समेत अन्य थे। समारोह का शुभारम्भ राजेश परदेशी के सरस्वती वंदना के साथ हुआ। (साभार- दैनिक जागरण)

छंटनी के खिलाफ पत्रकारों के प्रदर्शन पर ‘न्यूजलांड्री’ में स्टोरी व वीडियोज

न्यूजलांड्री डाट काम की तरफ से सोमी दास उस दिन पत्रकारों के प्रोटेस्ट को कवर करने के लिए लगातार मौके पर डंटी रहीं. वे प्रोटेस्ट में शामिल लोगों से विरोध प्रदर्शन के प्रत्येक पक्ष के बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करती रहीं. कई लोगों की बाइट ली.

पूरे आंदोलन को जानने-समझने के बाद जब वो देर शाम अपने आफिस की ओर लौटीं तो उनसे कई लोगों ने पूछा कि ये कब आयेगा आप लोगों के यहां, कब छपेगा, कब वीडियो देख सकेंगे? सोमी ने बताया जल्द ही सभी पहलुओं को समेटते हुए एक रिपोर्ट न्यूजलांड्री में फाइल होगी जिसमें वीडियोज भी होंगे. 26 अगस्त को वो स्टोरी न्यूजलांड्री डाट काम पर प्रकाशित हो गई. न्यूजलांड्री डाट काम एक अंग्रेजी वेबसाइट है जो मीडिया सेंट्रिक है. न्यूजलांड्री को मधु त्रेहन, प्रशांत सरीन, अभिनंदन सेखरी और रूपक कपूर बराबरी की साझेदारी में संचालित करते हैं.

वेबसाइट पर प्रकाशित पत्रकारों के विरोध प्रदर्शन की स्टोरी की शुरुआत यूं है…

United They Stood

Somi Das

It isn’t every day that journalists aren’t covering a protest, but are leading a protest. A group of journalists organised a protest march on August 21, 2013 in Film City, Noida under the banner of ‘Journalism Solidarity Forum’ (JSF) or ‘Patrakar Ekjuta Manch’. The protest march saw the participation of journalists from different media organisations, All Indian Student Federation, JNU

सोमी
सोमी
student Union. They were protesting the sacking of over 300 employees by Network 18’s different news channels -CNBC, IBN 7 and CNN IBN. The loosely formed organisation has made some ripples on Twitter and facebook with provocative slogans like “Ambani ke dalalo sharam karo” (Brokers of Ambani, shame on you) and “Punjipatyon ki patrakarita band karo” (End this journalism which favours capitalists). While the protest began only with a handful of people, as the day progressed more people joined in despite the scorching sun.

The protesters were from websites such as Media Darbar and www.bhadas4media.com, Dainik Bhaskar, Hindustan, Nav Bharat Times and other media organisations. While the pictures of this agitation were being circulated online and touted as a fight by IBN 7 employees against their sudden sacking, on-ground no one from IBN participated in the protest. Even when we spotted a couple of IBN 7 employees in the crowd, they disappeared once the cameras started rolling. It is strange that even after losing jobs, they are still too scared of coming out in the open.

The major demand of the protesters is the reinstatement of all the employees of Network 18 who have been sacked. Yashwant Singh, Editor of media-watch website www.bhadaas4media.com , who has been at the forefront of the protests, explains why employees of IBN desisted from participating in the protests.

पूरी स्टोरी पढ़ने और प्रोटेस्ट में शामिल लोगों के बाइट सुनने के लिए यहां क्लिक करें…

http://www.newslaundry.com/2013/08/united-they-stood/


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छंटनी के खिलाफ नोएडा फिल्म सिटी में प्रदर्शन की कुछ झलकियां (देखें वीडियो)

फुटेला खतरे से बाहर लेकिन बोलने की हालत में नहीं

मैं रोज ''जर्नलिस्टकम्युनिटी.काम'' साइट खोलता हूं इस उम्मीद में कि जगमोहन फुटेला फिर सक्रिय हो गया होगा। ग्रोवर साहब अब नोएडा आ गये हैं और उन्होंने फोन पर आश्वस्त किया था कि फुटेला खतरे से बाहर हैं। फुटेला किछा से हैं और ठीक 16 कुमी दूर मेरा घर बसंतीपुर में। किछा में हमारे पुराने मित्र कवि मदन पांडे भी शिक्षक थे। किछा से हैं बीबीसी हिंदी के हमारे मित्र राजेश जोशी भी। राजेश लंदन से दिल्ली आ गये हैं, यह हमारे फिल्मकार मित्र राजीव कटियार से मालूम हुआ। हिमालयी आपदा के बेहतरीन कवरेज के लिए उसे बधाई देना बाकी था। फिर उसका फोन आया। वहीं पुराना जनसत्ताई अंदाज। लंबी चौड़ी बातें हुईं। उसने बताया कि फुटेला के घर में बात हुई है और अभी हालत बेहतर है।

मैं बार बार रिंग किये जा रहा था और उधर से स्विच आफ। बेचैनी बढ़ती जा रही थी। हारकर सविता ने कहा कि घर पर भाई पद्दोलोचन से कहो कि पता लगाये कि क्या हाल है। हमने फेसबुक और ब्लागों के जरिये दिल्ली और चंडीगढ़ के पत्रकारों से फुटेला का ख्याल रखने का आवेदन किया था। भड़ास में खबर आ गयी थी। उसके बाद सोशल मीडिया में खबरें आती रही। लेकिन अफसोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि चंडीगढ़ और दिल्ली के पत्रकारों ने फुटेला के परिजनों से संपर्क नहीं साधा। इतने लंबे पत्रकारिता जीवन में हमारे सहकर्मी कम नहीं होते। विडंबना है कि हर पत्रकार अकेला होता है। आज फुटेला इस अकेलेपन का शिकार है। कल हम भी होंगे।

हमारे प्रिय कवि गिरदा अक्सर बूढ़ी रंडी की मिसाल दिया करते थे। उस कविता की हालत से पत्रकारों की दुर्गति कोई अलहदा नहीं होती। सारे संपर्क और कनेक्शन धरे के धरे रह जाते हैं। बाकी पेशों में लोग एक दूसरे की खबर लेते हैं। साथ भी खड़ा होते हैं। पर मीडिया में यह मिसाल कम ही है। इस धारा को पलटने की कोशिश में हैं यशवंत जैसे युवा तुर्क। हमारी दुनिया की खबरें भी रोशन होने लगी हैं। लेकिन हालात नहीं बदले हैं।

फुटेला मिसाल हैं। तेजतर्रार यह पत्रकार ब्रेन स्ट्रोक के बाद पैरालिसिस के शिकार हैं। बेटा हरियाणा में मजिस्ट्रेट है। उसकी पत्रकारिता की दुनिया में कोई पहचान नहीं है। पत्रकारिता के तनाव और समस्याओं के बारे में भी मालूम नहीं है। आज शाम फिर कोशिश की तो उसने फोन उठाया। फुटेला को मधुमेह भी है। इंसुलिन लगता है सुबह शाम। दिमाग में क्लोटिंग की वजह से ब्रेन स्ट्रोक हुआ। बीपी नार्मल है। बाकी कोई दिक्कत भी नहीं है। जितनी जल्दी हो दिमाग की क्लोटिंग हटाये जाने की जरुरत है। अभी फीजियोथेरापी चल रही है।

गनीमत है कि फुटेला होश में हैं और सबको पहचान भी रहे हैं। मित्रों को भी पहचान लेंगे। हमारी दिक्कत यह है कि चंडीगढ़ कोलकाता से पहुंचना हमारे लिए अब हर मायने में असंभव है। हमारे साधन भी इतने नहीं हैं कि पहुंचकर वहां हम उसकी या परिजनों की कोई मदद कर सकते हैं। लेकिन मीडिया अभी कारपोरेट हैं। हमारे कई मित्र बड़े बड़े संपादक और समर्थ लोग हैं। वे चाहे तो फुटेला और उनके परिजनों के सात खड़े हो सकते हैं।

हाल में कैंसर को जीतकर लौटा है फुटेला। अब हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि जल्द ही वह बोलने और लिखने लगेगा। इसके साथ ही अपनी भी खैर मना रहे हैं हम कि न जाने कौन कहां फुटेला की तरह ऐसा अकेला हो जाये कि उसकी दुनिया को न उसकी खबर हो और न परवाह। यह नौबत हममें से किसी के साथ भी आ सकती है। छंटनी के बाद जैसे हमारे लोग सड़कों पर आ रहे हैं और हमारे तमाम महामहिम खामोश हैं तो परिजनों का ही भरोसा है। एक बार फिर, दिल्ली और चंडीगढ़ के मित्रों से आवेदन है कि अगर वे फुटेला के साथ खड़े हो सकें तो मेहरबानी होगी। कम से कम हमें अच्छी बुरी खबरें मिलती रहेगी।

लेखक पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

वाह रे गुलाब कोठारी जी, एक तरफ धंधेबाजी और दूसरी तरफ प्रवचन!

इंदौर के 'पत्रिका' अखबार के एक्सपोज़ परिशिष्ट में आज पहले पेज पर विशेष खबर है –''मोबाइल कंपनियों के टॉवर लगाने के नाम पर ठगी हो रही है… धोखेबाजी हो रही है"… आदि। अखबार ने लिखा है -"अगर ठगी के बारे में जानकारी हो तो हमें बताएं।'' 

शर्मनाक बात यह कि आज ही पत्रिका अखबार के बारह नंबर पेज पर ऐसी ही कंपनियों के तीन विज्ञापन छापे हैं। ये विज्ञापन बरसों से छप रहे हैं इसी अखबार में। कोठारी जी, बताएं कि ठगी, धोखे के बारे में किसको जानकारी दें? आपको ताकि आप ऐसे ठगों से और विज्ञापन ल सको?

गुलाब कोठारी जी, चोरों का धंधा बढ़ाने के विज्ञापन छाप रहे हो और पाठकों को कह रहे हो सावधान रहो। कोठारी जी, आप खुद तो चोरों को शरण देते हो तो आदर्शों के प्रवचन मत दिया करो, शरम आती है…. !

इंदौर से वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी की टिप्पणी.

कविता सुन कुंवर साहेब नाराज हुए और मुझे शिक्षक पद से बर्खास्त कर दिया

: मेरा पहला कवि सम्मेलन, अंतिम भी : मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्तित्व के निर्माण में दो बातों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक वंशानुगत और दूसरा वातावरण। मगर एक बात और होती है जिसे गॉड गिफ्ट कह सकते हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मेरे परिवार में दूर तक कोई कवि नही था और वातावरण एक दम गंवई और कस्बाई। यहां भी कोई कवि नहीं था, यहां तक कि अपना कोई अध्यापक भी कवि नहीं था और मैं टूटी फूटी तुकबंदी ही सही कविता करने लगा। इस कविता ने मुझे काफी कष्ट भी दिए मगर यह जारी रही। तुकबंदी तो पता नहीं कब से कर रहा था मगर 1962 के चीन युद्ध के समय एक वीर रस की कविता लिखी जो नवभारत टाइम्स में छपी वीर रस की यही एक मात्र कविता थी, बाकी तो सब हास्य और व्यंग्य में ही लिखता रहा।

कविता से पहला कष्ट इंटर के बाद मिला। डिग्री कालेज के प्राचार्य, प्रबंधक या सर्वेसर्वा को सब बाबा कहते थे। बाबा की आयु लगभग 65 साल थी। पुत्र प्रप्ति के लिए उन्होंने 16 साल की एक कन्या से तीसरा विवाह रचाया। वह कन्या हाई स्कूल पास थी। 11वीं में उसे अपने ही कालेज में दाखिल कर लिया। अब बाबा के घर में थी तो सब छात्र उसे उसके पीछे दादी कहते थे। उस कन्या की पीड़ा का बखान करते हुए मैंने दो तुकबंदियां की। पहली में दादी कह रही है- ''मैं गरीब की बेटी दादी बन गई सोलह साल में, अब तो इस बाबा के ही संग रहना है हर हाल में।'' दूसरी में वह अपनी सखी से कहती है- ''ना मेरी उसकी जोट सखी, मैं एक चवन्नी छोटी सी वह पूरे दस का नोट सखी।'' कविताएं तो लंबी थीं मगर अब इतनी ही याद रहीं। कविताएं बाबा तक गईं और फिर बाबा ने मेरे साथ जो किया उससे सारा कैरियर चौपट हो गया जिसे फिर से पटरी पर लाने में छह सात साल लग गए।

कविता से दूसरा कष्ट मिला कांठ में। कालेज के प्रबंधक एक कुंवर साहब थे। उन्होंने कालेज में एक कवि सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन कराया जिसमें हिंदी और उर्दू के उस समय के नामी कवियों और शायरों ने भाग लिया। इस आयोजन में मैंने भी एक कविता पढी। 1962 का भारत चीन युद्ध हो चुका था। राशन की समस्या विकट थी। मेरी कविता में इसी पर व्यंग्य किया था। विषय सामयिक था सो खूब तालियां बज रही थीं। पता नहीं क्या हुआ इन तालियों के बीच कुंवर साहेब मंच से उठ कर अंदर कमरे में जा बैठे। मैं कविता समाप्त कर एक ओर बैठ गया और उधर कई कवि और शायर बारी बारी कुंवर साहब के पास जाने लगे। थोड़ी देर बाद एक शायर मेरे पास आ कर बोले मास्टर जी आपकी कविता से कुंवर साहब बहुत नाराज हैं। आप उनसे जा कर माफी मांग लें। इसके बाद कई अन्य कवियों ओर शायरों ने यही बात दोहराई और कहा आप हमारे साथ चलिए वरना आपकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। मैंने माफी मांगने से साफ इंकार कर दिया और कार्यक्रम बीच में ही छोड़ कर अपने कमरे पर आ गया।

अगले दिन अवकाश था। तीसरे दिन कालेज आया तो पहले पीरियड में ही चपरासी नौकरी से बर्खास्त करने का परवाना थमा गया। मैं तैयार था क्योंकि इसकी भनक पहले ही मिल गई थी। कमरे पर आ कर भावी कार्यक्रम के बारे में सोचता रहा। शाम को उठ कर बाहर आया और उधार का हिसाब चुकता किया ढाबे पर खाने गया तो ढाबे वाले ने सहानुभूति प्रकट की। कालेज का कोई अध्यापक नहीं आया। आखिर कवुंर साहब का आतंक जो था। रात में कुछ छात्र अवश्य आए। उन्हें मेरे जाने का दुख हो रहा थ।

अगले दिन चलने से पहले सोचा कि आखिरी बार कुंवर साहब से भी मिल लिया जाए। गया तो उनका दरबार सजा था। इंटरव्यू वाली मंडली भी बैठी थी। मैंने जाकर नमस्ते की और कहा- जा रहा हूं कुंवर साहेब। कुंवर साहेब कुछ नहीं बोले। एक अन्य ने कहा- मास्टर जी एक बार फिर सोच लो कुंवर साहब आपको माफ कर सकते हैं। मैंने कहा- खूब सोच लिया, अच्छा है यहां से छुटकारा मिल गया वरना तो यहीं उलझ कर रह जाता। मेरी बात पर कुंवर साहब ने मुझे घूरा और अपन साथ वाले से कहा- ही लूजेज सम स्क्रूज आफ हिज माइंड। मैंने धन्यवाद कहा और नमस्ते कर वापस चला आया और इसी के साथ यह प्रतिज्ञा भी कर ली कि भविष्य में किसी कवि सम्मेलन में भाग नहीं लूंगा। इस पहले और अंतिम कवि सम्मेलन में एक भी कवि ऐसा नहीं था जो मेरे पक्ष में बोल सके इसलिए कइयों के प्रति मन खट्टा हो गया। बाद में पता चला कि कुंवर साहब के कुछ लोगों के पास राशन के डिपो थे। कुंवर साहब का वह कथन आज भी दिमाग के किसी कोने में चिपका है और ऐसे अवसरों पर प्रायः याद आ जाता है। कभी कभी सोचता हूं कि क्या वास्तव में ही मेरे दिमाग के कुछ पुर्जे ढीले हैं।

इतना सब होने के बाद भी कविता लिखना जारी रहा। स्थानीय पत्रों में तथा सेवाग्राम में छपना जारी रहा। कविता के बारे में मुझे कुंडली लिखने में महारत हासिल है। हाथ के हाथ छंद तैयार कर देता हूं। इसका लाभ मिला नवभारत टाइम्स में। 1984 के चुनाव की चर्चा चल रही थी। कुछ लोग रब्बी जी के पास आए चुनाव के बारे में नेताओं की बात कर रहे थे। उनके जाने के बाद मैंने चार पांच कुंडलियां लिखीं और मजे लेने के लिए रब्बी जी को दे दी। रब्बी जी ने उन्हें सरसरी तौर पर देखा और अपने पास रख लीं। अगल्रे दिन अखबार देखा तो आश्चर्य की सीमा न रही। एक कुंडली उत्तर प्रदेश के पेज पर छपी थी। शीर्षक था- कबीर चौरा, और नीचे लेखक का नाम लिखा था संत मेहर दास। मैं चुनाव दौरे पर निकल आया था। सो इस बारे में रब्बी जी से कोई बात न कर सका।

इस दौरे में तीसरे दिन देखा कि ''कबीर चौरा'' संपादकीय पृष्ठ पर छपा था। वापस आने पर पता चला कि संपादक श्री राजेंद्र माथुर ने ''कबीर चौरा'' देखा और रब्बी जी से कहा कि इतनी अच्छी कविता को उत्तर प्रदेश तक ही क्यों सीमित किया जाए, सब पाठकों को इस का आनंद उठाना चाहिए। माथुर जी ने मुम्बई पटना जयपुर और लखनउ के संपादकों को भी ''कबीर चौरा'' छापने का संदेश भिजवा दिया। इस प्रकार ''कबीर चौरा'' नवभारत टाइम्स का अखिल भारतीय स्तंभ बन गया। माथुर जी को बाद में पता चला कि यह छंद मैं लिखता हूं। यह एक गुण था माथुर जी का कि उन्होंने सामग्री देखी, नाम नहीं देखा और कोई संपादक होता तो पहले पूरी पड़ताल करता और बाद में अहसान जताते हुए छापना आरंभ करता। तीनेक साल संत मेहरदास के नाम से छपने के बाद ''कबीर चौरा'' मेरे असली नाम से छपने लगा और दस साल तक लगातार छपता रहा। इसके छपने को लेकर क्या क्या नहीं हुआ, यह एक अलग विषय है। नभाटा की देखा देखी अमर उजाला ने भी कुंडली छापनी आरंभ की मगर एकाध महीने ही चल सकी। जागरण ने भी प्रयास किया मगर वह एक सप्ताह में ही दम तोड़ गया। कबीर चौरा की धूम इतनी थी कि हाजी मस्तान ने अपने बारे में पढा तो खुश हो कर 25 रुपये का चैक इनाम में भेज दिया।

चौ. चरण सिंह के एक भक्त ने खुश हो कर 250 रुपये का चैक भेज दिया। आज भी कई लोग किसी समारोह में मिल जाते हैं जो अपनी पसंद का याद किया छंद सुना देते हैं तो लगता है मैंने कुछ लिखा था। कवि सम्मेलनों के निमंत्रण मिलते रहते थे मगर मैं किसी में नहीं गया। कबीर चौरा के बाद तो देश भर से बुलावा आने लगा मगर मैंने जो तय कर लिया था उस पर ही अटल रहा। अंतिम निमंत्रण आजादी की पचासवीं सालगिरह पर भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश के संयुक्त रूप से आयोजित कवि सम्मेलन का मिला। मैंने उसे भी विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर दिया। आखिर मेरे दिमाग के कुछ पुर्जे ढीले जो हैं।

डॉ. महर उद्दीन खां

सैफी हास्पिटल
रेलवे रोड
दादरी
गौतमबुद्ध नगर- 203207 

मो. 9312076949

पत्रकार ने खुद की पैरवी और विजयश्री हासिल की, जज ने डीपीआरओ को दोषी माना, सौ रुपये जुर्माना

: पत्रकार प्रेस का मान्यता से सम्बंधित फार्म देरी से भेजना जिला लोक संपर्क अधिकारी पर पड़ा भारी : हरियाणा प्रदेश का इस तरह का पहला मामला, पत्रकार ने खुद की अपने केस की पैरवी : अदालत ने पत्रकार को 100 रुपये हर्जाना अदा करने के आदेश दिए  :

हिसार। एक पत्रकार का प्रेस मान्यता से सम्बंधित आवेदन फार्म मुख्यालय में न भेजना हिसार की तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मलिक के लिए भारी पड़ गया। पत्रकार द्वारा दायर एक मामले में अदालत ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उनका प्रेस मान्यता से सम्बंधित आवेदन फार्म मुख्यालय में देरी से भेजने के लिए सम्बंधित पत्रकार को हुई मनसिक परेशानी के लिए तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मालिक को दोषी करार दिया एवं हर्जाने के तौर पर को सौ रुपये अदा करने के आदेश दिए हैं।

पत्रकार ने स्थानीय अदालत में दायर मामले में आरोपी अधिकारी पर सांकेतिक सौ रुपये जुर्माना लगाने के लिए ही गुजारिश की थी। उल्लेखनीय है की हिसार टुडे के संपादक एवं आरटीआइ कार्यकर्ता महेश मेहता ने करीब दो साल पहले इस संदर्भ में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। जिसमे कहा गया था की उपरोक्त अधिकारी ,कार्यालय हिसार के कर्मचारी राजकुमार एवं अतिरिक्त निदेशक (प्रेस) के पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण उसको मान्यता कार्ड मिलने में करीब दो साल की देरी हो गयी। जिसके लिए उपरोक्त तीनों जिम्मेवार हैं। इस मामले में खास बात ये रही की पत्रकार महेश मेहता ने अपने केस की पैरवी खुद की तथा सभी गवाहों का क्रोस एग्जामिनेशन भी खुद किया। हालांकि ये काम काफी कठिन था पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पत्रकार ने कानून की कोई ओपचारिक शिक्षा लिए बिना मामले को अंजाम तक पहुँचाया।

करीब दो साल तक चले अभियोग के दौरान पत्रकार महेश मेहता ने अपने आरोपों को साबित करने के लिए अदालत के समक्ष ऐसे पुख्ता दस्तावेजी सबूत पेश किये जिनके आधार पर उन्होंने यह साबित कर दिया कि दोषी तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मलिक ने जानबुझ कर उनका प्रेस मान्यता से सम्बंधित आवेदन फार्म मुख्यालय में देरी से भेजा। इस सन्दर्भ में उन्होंने खुफिया कैमरे से की गयी विडियो रिकॉर्डिंग अदालत के समक्ष पेश की। विडियो रिकॉर्डिंग में परमजीत मालिक द्वारा महेश मेहता से किया गया दुर्व्यवहार साफ तौर पर प्रमाणित होता है। पत्रकार ने अदालत को मान्यता से सम्बंधित आवेदन फार्म के साथ सभी वांछित  दस्तावेज लगा कर तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मालिक के कार्यालय में जमा करवाए थे पर उन्होंने रंजिश वश उनके फार्म मुख्यालय में देरी से भेजे साथ ही मानसिक प्रताडऩा के मकसद से ऐसे आब्जेक्शन लगाती रही ताकि उसे प्रेस मान्यता कार्ड न मिले। अंत: 6 फरवरी 2012 को पत्रकार महेश मेहता ने पुन: अपने फार्म से सम्बंधित सभी दस्तावेज तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मलिक के कार्यालय में जमा कराये पर इसके बावजूद भी उनको करीब 9 माह बाद 22 नवम्बर 2012 को प्रेस मान्यता कार्ड प्राप्त हुआ।

सिविल जज श्री अरविन्द कुमार की अदालत द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया है कि तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मलिक यदि चाहती तो ये देरी न होती और पत्रकार महेश मेहता को मान्यता कार्ड समय पर न मिलना तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मलिक द्वारा की गयी इसी देरी का नतीजा है। लिहाजा अदालत तत्कालीन जिला लोक संपर्क अधिकारी परमजीत मलिक को आदेश देती है कि वो पत्रकार महेश मेहता को 100 रुपये बतौर कंपनसेशन अदा करे।

भड़ास4मीडिया.कॉम पर प्रकाशित खबर का असर

प्रिय यशवंत जी! मेरी ओर से प्रेषित खबर…सोनभद्र सूचना विभाग का फर्जीवाड़ा…का प्रकाशन आपने अपनी वेबसाइट पर किया, इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। आपको अवगत कराना है कि मैंने आपकी वेबसाइट पर प्रकाशित खबर का लिंक सोनभद्र के जिला सूचना केंद्र की वेबसाइट पर दिए गए ई-मेल पते पर भेज दिया था, जिसके बाद पत्रकारों की सूची वेबसाइट से हटा ली गई है और उसके वेरीफिकेशन के लिए जिला सूचना कार्यालय को प्रेषित कर दिया गया है।

लिंक देखें

http://sonbhadra.nic.in/press1.htm

यह भड़ास4मीडिया की सफलता में एक कड़ी और जोड़ देता है। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

पूर्व में प्रकाशित खबर का लिंक..

http://bhadas4media.com/state/up/sonbhadra/13951-2013-08-22-08-48-14.html

सादर

शिव दास

आसाराम ने एबीपी न्यूज के अभिसार शर्मा से लाइव इंटरव्यू के दौरान दिखाए कई रंग

आसाराम ने कुछ ही मिनटों में कई रंग दिखाए. वे मंचासीन थे और सामने ढेर सारे भक्तगण. एबीपी न्यूज की तरफ से रिपोर्टिंग करने गए अभिसार शर्मा से पूछे जाने वाले सवाल पहले ही आसाराम ने मंगवा लिए थे. अभिसार को पंडाल में जाने दिया गया और आसाराम से दूर से ही सवाल पूछने को कहा गया. आसाराम अपनी जगह पर बैठे रहे और मंच के ठीक नीचे खड़े होकर अभिसार सवाल पूछने लगे.

आसाराम ने पहले तो सवालों के ज