निर्भया के मां-पिता के साथ निशांत चतुर्वेदी का एक देखने योग्य इंटरव्यू (देखें वीडियो)

'न्यूज एक्सप्रेस' न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ निशांत चतुर्वेदी हिंदी टीवी इंडस्ट्री के जबर्दस्त एंकर्स में से एक हैं. वे हर फन के माहिर खिलाड़ी हैं. किसी भी तरह के भाव को बखूबी स्क्रीन पर उतार पाने में सफल रहते हैं, वह भी बेहद सहजता के साथ. खबर का हिस्सा चाहे कोई भी आपदा, घटना, हालात, माहौल हो, उसे पकड़ कर उसकी संवेदना के हिसाब से आगे बढ़ जाते हैं निशांत और फिर हौले से दर्शकों के दिल के तार को जगाकर खुद के जरिए चैनल से कनेक्ट कर पाने में सफल हो जाते हैं.

बीते दिनों उन्होंने दिल्ली गैंगरेप पीड़िता निर्भया की मां-पिता का इंटरव्यू किया. यह सामान्य इंटरव्यू नहीं था. बेहद संवेदनशील मसला था. निशांत ने न सिर्फ बातचीत की बल्कि ऐसे विषयों से जुड़े इंटरव्यू को कर पाने का एक अच्छा उदाहरण नए एंकरों / पत्रकारों के सामने पेश किया है. निशांत का यह साढ़े बाइस मिनट का इंटरव्यू इस यूट्यूब लिंक के जरिए देख सकते हैं… नीचे की तस्वीर या उसके नीचे दिए गए लिंक में से किसी एक पर क्लिक करें…

http://www.youtube.com/watch?v=vTOxL7CDpCU

इस इंटरव्यू के बारे में निशांत भड़ास4मीडिया से कहते हैं: ''Few Moments in Life Shake you from inside.. One of them is this interview with the Parents of Nirbhaya.''

चैनल पर प्रसारित इंटरव्यू का जो वीडियो यूट्यूब पर है, उसमें डिटेल यह दिया गया है.. Today News Express has shared it's biggest concerned with Delhi Gang-Rape victim Parents . Brave Nirbhya who fought until the last breath of her and lost the battle of life in the Hospital in Singapore . News Express Editor-in-chief Nishant Chaturvedi talks to Brave Nirbhya's Brave heart parents . They first of all and directly demands death penalty for convict of brutally raping and murdering there daughter . they reveals the horrifying fact about these human masked animals they said that in the court proceedings these convicts never seems remorse there eyes were continuously gaze us like monsters .

the Verdict of Saket fast Trial court is postponed for friday . the tears from the eyes was uncontrollable and emotional imbalance of our team and her Parents elevating . Parents of her tells some of the gloomy memory of that day which is itself set's the goose bums , in these 8 months they have seen her in the dreams and on the roads calling them . the illusion factor was so strong that her mother even talks her on the roads . Her Conviction in every aspect and field of life is superb as information provided by Parents she was brilliant student and was very dedicated to her responsibilities . Giving and setting up the example they both gave a message to people that not to be afraid of any kind of society's evil Society should come in front to fight and deal with these curse .  Moral, Social Responsibility should be prime focus to clear heinous crime .

वाधवानी के तुगलकी फैसले से ‘दबंग दुनिया’ में हड़कंप, नाराजगी जताने पर दस कर्मियों की नौकरी गई (देखें इनटरनल मेल)

जब गैर पेशेवर लोग पत्रकारिता में आते हैं तो ऐसे-ऐसे कारनामे करते हैं कि पूरा पत्रकारिता जगत उनसे कलंकित होता है. इंदौर से प्रकाशित 'दबंग दुनिया' में भी अजीब सी परम्पराएँ जन्म ले रही हैं. ताजी जानकारी के मुताबिक 'दबंग दुनिया' के मालिक और प्रधान संपादक किशोर वाधवानी ने एक नया फरमान जारी किया है. फरमान ये है कि मार्केटिंग वाले अपने साइन किए हुए ब्लैंक चेक ऑफिस में जमा कराएँ, ताकि जिन विज्ञापनों की वसूली नहीं हो, वो मार्केटिंग के उन लोगों से की जाए जो सम्बंधित विज्ञापन लाए थे. इस बे-सिरपैर के फरमान के बाद मार्केटिंग वालों को सांप सूंघ गया है. ऐसी हालत में 'दबंग दुनिया' में मार्केटिंग के अच्छे लोगों का आना रुकेगा और विज्ञापन भी! क्योंकि, वसूली के डर से कोई रिस्क क्यों लेगा? 

इस फरमान के दायरे में मार्केटिंग लोकल एंड अपकंट्री, सर्कुलेशन और रिकवरी के लोग लाए गए हैं. इन सभी विभागों को पिछले महीने निर्देश जारी कर कहा गया कि जो लोग महीने के अंत तक ब्लैंक चेक नहीं जमा करते हैं, उनकी सेलरी होल्ड पर कर ली जाएगी. इस बारे में एचआर रिया चक्रवर्ती की तरफ से एक मेल भी जारी किया गया. इसको लेकर इन सभी विभागों में असंतोष व्याप्त हो गया. मार्केटिंग के लोगों ने इस तुगलकी फरमान की नाफरमानी करना शुरू कर दिया. इससे नाराज प्रबंधन ने दस लोगों को टर्मिनेट करने का फैसला ले लिया. टर्मिनेट किए गए लोगों के नाम इस प्रकार हैं… कपिल पवार, अशरफ गोरी, रवि शंकर शर्मा, प्रदीप दुबे, रमित गोयल, इशान पंडित, त्रिलोक सिंह भदौरिया, देवेंद्र शर्मा, रितेश सोनी और अश्विनी विधवानी.

नीचे दबंग दुनिया के एचआर और चेयरमैन डेस्क की तरफ से जारी दो मेल प्रकाशित किए जा रहे हैं…


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From: Ria chakravarty (ria.hrdabangduniya@gmail.com)

Date: Tue, Aug 27, 2013 at 7:02 PM

Subject: Cheques from all the revenue oriented departments

Dear All,

As per the instruction of chairman sir , it has been clearly instructed by him that those who will not be able to provide the cheques by the end of this month , their salary of current month will be on hold . Those who were not willing to give the cheques , can leave the job from an immediate effect.

This is a policy framed by the management & it is mandatory for  all the employees to follow the rule..This is the strict guideline given from the management.

Kindly deliver the cheques to the HR dept. asap.

The Dept's are :

Marketing Local & upcountry
Circulation
Recovery

Regards

Ria


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From: Chairman Desk (chairmandeskdd@yahoo.in)

Date: Thu, Sep 12, 2013 at 12:31 PM

Subject: Mass Termination of Marketing team

Dear All,

With reference to the group activity of Marketing team wherein the entire team has appealed a stoppage to work (strike), did not attend the office by getting indulged in mass refusal to work. which is highly disagreeable & unacceptable by the management of the company.

On the basis of the above act, management has decided to terminate the entire team.

The names of the terminated employees are as follows:

1) Kapil Pawar
2) Ashraf Ghori
3) Ravi Shankar Sharma
4) Pradeep Dubey
5) Ramit Goyal
6) Ishan Pandit
7) Trilok Singh Bhadoriya
8) Devendra Sharma
9) Ritesh Soni
10) Ashwani Vidhwani

Chairman Desk

राजेश उपाध्याय के पास दिसंबर तक भास्कर नेशनल एडिशन के सफाये का टास्क, कई वरिष्ठों की ले ली नौकरी

दैनिक भास्कर के नेशनल एडिशन की बंदी और इसमें कार्यरत कर्मियों को निकाले जाने को लेकर जो खबरें आई थीं, वो बिलकुल सही हैं. हां, ये जरूर हुआ कि भास्कर दिल्ली एडिशन की बंदी की खबर व छंटनी की खबर आ जाने और मुद्दा बन जाने से दबाव में आए भास्कर प्रबंधन ने आनन-फानन में पीआर वेबसाइट्स पर खबर छपवा दिया कि छंटनी व बंदी जैसा कुछ नहीं है, कोई घबड़ाने की बात नहीं है, सब सामान्य है. पर अब सच्चाई सामने आ रही है. पहले जहां इकट्ठे एकमुश्त छंटनी की जानी थी, अब उसे धीरे-धीरे व टुकड़ों में तब्दील कर दिया गया है.

तब से अब तक जिन कुछ लोगों की नौकरी ली जा चुकी है, उनके नाम हैं हरिमोहन मिश्रा, विमल झा, रफीक आलम, संजीव क्षितिज, मुकेश ठाकुर, नागेंद्र राय आदि. नागेंद्र राय तो दैनिक भास्कर के साथ पिछले 24 साल से थे. लोग कह रहे हैं कि इनको बुढ़ापे में अब नौकरी कहां मिलेगी. और, जब उन्हें नौकरी की सख्त जरूरत है तो भास्कर ने दूध की मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका. संजीव क्षितिज वरिष्ठ पत्रकार हैं. पहले उन्हें कहा गया कि उनका तबादला झारखंड किया जा रहा है. बताया जाता है कि वे झारखंड जाने को तैयार बैठे थे. लेकिन उनको तबादले का भी मौका नहीं दिया गया और इस्तीफा देने के लिए कह दिया गया. उन्होंने भी दस तारीख को अपना हिसाब किताब लेने के बाद आफिस को गुडबाय बोल दिया है. हरिमोहन मिश्रा और विमल झा जैसे लोग अच्छे व गंभीर पत्रकारों में शुमार होते हैं. इन लोगों से भी भास्कर ने इस्तीफा ले लिया है.

अब जो लोग बचे हुए हैं, उनसे इस्तीफा लेने की तैयारी चल रही है. यह सारा काम स्थानीय संपादक राजेश उपाध्याय कर रहे हैं. वे कई तरह के दबाव, प्रलोभन और धमकियों का सहारा लेकर इस्तीफा लिखवा रहे हैं. वे अपने खास लोगों से खुद कहते फिर रहे हैं कि उन पर सीधे सीएमडी और एमडी का प्रेशर है सबसे इस्तीफा लेने का, दिसंबर तक नेशनल एडिशन का सफाया कर देना है, यानि इसमें कार्यरत कर्मियों से इस्तीफा लिखवा लेना है. जो लोग इस्तीफा नहीं देने को तैयार होंगे, उनका हर तरह से परेशान किया जाएगा ताकि वो खुद छोड़कर भाग जाएं. पता चला है कि भास्कर के कुछ कर्मी राजेश उपाध्याय को सबक सिखाने की तैयारी में है. इन कर्मियों का कहना है कि जो संपादक उनकी लड़ाई नहीं लड़ सकता, उल्टे मैनेजमेंट के इशारे पर बिना वजह इस्तीफे लेता हो, उसको सबक सिखाना जरूरी है.

केदार के दल दल में सियासी दंगल

: केदारनाथ में एक बार फिर से बाबा भोले का जयकारा गूंजने लगा है। लगभग ८५ दिनों तक मंदिर बंद रहने के बाद बुधवार को पुन: विधिविधान के साथ पूजा शुरू हो गई। लेकिन इसके साथ ही सियासी हलचल भी शुरू हो गई है। कांग्रेस सरकार जहां इस मुददे पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में जुट गई है वहीं भाजपा ने भी उसे इस मसले पर घेरने की रणनीति बना ली है

केदारनाथ में पूजा शुरू होने के साथ ही केदार के दल दल में सियासी दंगल भी शुरू हो गया है। जल प्रलय के बाद पहली बार केदारनाथ में बाबा की पूजा शुरू होने पर जहां राज्य सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस पर कडा ऐतराज जताना शुरू कर दिया है। मंदिर में पूजा शुरू करने के मूर्हूत को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। १६/१७ जून की तबाही के बाद से ही शिव के गयाहरवें ज्र्योतिलिंग केदारनाथ में पूजा बंद हो गई थी और भगवान की भोग मूर्ति को शीतकालीन पूजा स्थल ऊखीमठ के ओकारेश्वर मंदिर मंदिर लाकर पूजा की जा रही थी। इसको लेकर भी शुरूआती दिनों में देश के प्रमुख संत, धर्माचार्य व केदारनाथ के रावल आमने सामने आ गये थे। शंकराचार्य व कुछ अन्य संतों ने तो रावल को पद से हटाने के लिए जोर अजमाइश भी शुरू कर दी थी, लेकिन किसी तरह बीच का रास्ता निकालकर मामले को शांत किया गया।

संत व धमाचार्यों की मांग थी कि केदारनाथ में पूजा जल्दी शुरू की जानी चाहिए, लेकिन सरकार व इस मंदिर को संचालन करने वाली बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के सामने केदारनाथ में हालात को सामान्य करना पहली प्राथमिकता थी। संतों की ओर से लगातार बढ रहे दबाव के चलते एक समय ऐसा भी आया कि जब राज्य सरकार व मंदिर समिति ५ अगस्त से ही केदारनाथ मंदिर में पूजा प्रारंभ करने पर सहमत हो गई थी। वकायदा इसके लिए केदारनाथ के रावल २ अगस्त की देहरादून में आयोजित बैठक के लिए अपने साथ दक्षिण भारत के २५० वेदपाठियों को भी साथ लेकर आये थे, मगर बैठक में तीर्थ पुरोहितों व हक हूकूकधरियों की आपत्ति के बाद सरकार ने फसला टाल दिया और११ सितम्बर की तिथि पर सहमति बनी।

केदारनाथ मंदिर के पांच हजार सालों के इतिहास में यह पहला मौका था, जब वहां प्राकृतिक आपदा के बाद लगभग ८५ दिनों न तो भगवान शिव का जलाभिषेक ही किया गया और नहीं नियमित पूजा अर्चना की गई। मध्य हिमालय स्थित धामों बदरीनाथ व केदारनाथ में छह माह तक ग्रीष्मकाल में नर द्वारा पूजा की जाती है और शीतकाल के छह महीनों में देवों द्वारा भगवान नारायण व केदार बाबा की पूजा की परम्परा है। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है, जिसका निर्वहन अद्यावधि तक किया जा रहा है। १६/१७ जून को केदारनाथ में मची तबाही के बाद यह परम्परा टूटी व वहां पूजा बंद हो गई। मंदिर में अंतिम पूजा १७ जून को प्रात: ४ बजे की गई थी, उसके बाद ११ सितम्बर को एक बार फिर केदारनाथ मंदिर में भोले बाबा का जयकारा गूंजा।

केदारनाथ में जल प्रलय के बाद वहां चारों ओर दल दल हो गया था, जिसमें सैकडों यात्रियों के शव दवे हुए थे। राहत व वचाव कार्य समय से न होने के चलते यात्रियों को नहीं बचाया जा सका था। कई लोग अभी भी अपने परिजनों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर राज्य सरकार व कुछ संत केदारनाथ मंदिर में फिर से पूजा शुरू करने का राग अलापते रहे। सूबे की कांग्रेस सरकार भी पूजा शुरू करने में अपना राजनीतिक फायदा लेने के लिए तत्पर दिखाई दी। इसमें कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व की भी रजामंदी थी। इसके पीछे का कारण भाजपा को इस मसले पर राजनीतकि लाभ लेने से रोकना था। हालांकि बहुगुणा कुछ हद तक अपनी रणनीति में सफल तो हुए हैं, लेकिन जिस तरह से स्थानीय लोगों, तीर्थ पुरोहितों व तीर्थ यात्रियों को वहां जाने से रोका गया है, उससे कांग्रेस सरकार को नुक्सान भी उठाना पड सकता है।  एक ओर केदारनाथ में स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है। लोगों के शव अभी भी मिल रहे हैं।

दूसरी ओर सियासी दल इसमें भी अपनी सियासत चमकाने में लगे हुए हैं। पूजा की तिथि घोषित होने से लेकर पूजा शुरू होने तक भाजपा व कांग्रेस इस मुददे पर राजनीति करते दिखे। जहां केदारनाथ में पूजा हो रही  थी वहीं केदारघाटी में भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अपने कुछ समर्थकों के साथ केदारनाथ कूच कर मीडिया का ध्यान अपनी ओर खीच रहे थे। सबसे बडा सवाल यह खडा होता है कि बदरीनाथ केदरनाथ मंदिर समिति में वर्तमान में अध्यक्ष को छोडकर उपाध्यक्ष के अलाव अधिकांश सदस्य भाजपा सरकार द्वारा ही नामित हैं। ये सभी भाजपा के कार्यकर्ता हैं। इसमें से एक ने भी २ अगस्त को सरकार की ओर से बुलाई बैठक में पूजा को लेकर अपना पक्ष नहीं रखा। इसके अलावा बैठक में केवल एक शंकराचार्य के प्रतिनिधि को आंमत्रित किये जाने पर भी मौन साधे रहे। एक सदस्य ने भी यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि आखिर केदारनाथ से संबधित विषय पर आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में केवल एक ही शंकराचार्य के प्रतिनिधि को क्यों आंमतित्र किया गया।

यहां बता दें कि केदारनाथ ज्योतिष्पीठ के अंर्तगत आता है और यहां वर्तमान में शंकराचार्य पद को लेकर तीन संत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, स्वामी वासुदेवानंद व स्वामी माधवाश्रम अपनी अपनी दावेदारी कर रहे हैं। लेकिन २ अगस्त की बैठक में केवल शंकराचार्य स्वरूपानंद के प्रतिनिधि ही शामिल हुए। इस मुददे पर भी मुख्य विपक्षी दल भाजपा खामोश रही। यहां यह बात गौर करने वाली है कि ज्योतिष्पीठ के अन्य दावेदार स्वामी वासुदेवानंद संध के करीबी माने जाते हैं। स्वामी वासुदेवानंद कारसेवा के राष्टीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं। लेकिन तब भाजपा के किसी भी नेता व पदाधिकारी ने सरकार व मंदिर समिति से यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। जब केदारनाथ में पूजा की तिथि २ अगस्त को तय कर दी गई थी तब क्यों नहीं इस पर सवाल उठाया गया। अब जबकि केदारनाथ धाम में मंदिर के शुद्विकरण के बाद एक बार फिर से भगवान केदारनाथजी की पूजा अर्चना शुरू हो गई ऐसे में विपक्ष व सत्ता पक्ष के लोगों की ओर से समय व मूर्हूत को लेकर सवाल उठाया जाना महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के अलावा कुछ नहीं है।

प्रेषक
बृजेश सती
उत्तराखंड
संपर्क: ०९४१२०३२४३७

पेड न्यूज की समस्या पर दिल्ली चुनाव आयोग गंभीर

चुनाव आयोग ने पेड न्यूज की समस्या पर चिंता जताते हुए कहा कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठाए जाएंगे. दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी विजय देव ने कहा कि इस बार पेड न्यूज उन मुद्दों में से एक है जिन पर चुनाव आयोग ध्यान दे रहा है. देव ने कहा कि हम इस संबंध में मीडिया के लोगों से बातचीत करेंगे. उन्होंने कहा कि पेड न्यूज में शामिल मीडिया के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी.

देव ने कहा कि हमने पहले ही राजनीतिक दलों को अवगत करा दिया है. मीडिया के लिए अलग से कार्यशाला आयोजित करायी जाएगी. उन्होंने कहा कि जिला स्तर पर मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मीडिया कमिटी (एमसीएमसी) गठित की जाएगी और हमारे स्तर पर अपीलीय मंच बनाया जाएगा. उन्होंने कहा कि आयोग पेड न्यूज में शामिल रहने वालों के खिलाफ कार्रवाई में नहीं हिचकेगा.

भाजपा का ”राष्ट्रीय इंतकाल”…. थोड़ा वक़्त है

1984 में, आज की तारीख में दो राष्ट्रीय पार्टी में से एक का तमगा हासिल, भाजपा के पास सिर्फ 2 सीट थी ! इमरजेंसी के बाद कांग्रेस वापिस सत्ता में लौटी थी और जनता पार्टी का वज़न तेज़ी से घट रहा था ! जनता पार्टी के दो कद्दावर , तत्कालीन, मंत्री (विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और सूचना प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवानी) अलग होकर जनसंघ को भाजपा का मुखौटा पहना चुके थे ! यानि 1980 में भाजपा अस्तित्व में आयी !

तब से लेकर अब तक इसे (भाजपा को) सिर्फ 2 नामों से ही पहचाना गया- अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी ! जनसंघ  की जगह संघ का बाहुबल चलने लगा ! मगर संघ की इस राजनीतिक शाखा (भाजपा) को संसद में सीटों की ज़रुरत थी और इसके लिए खुलकर राजनीति करने वाले बड़े नामों की भी ! ज़ाहिर है, अटल और आडवानी के अलावा संघ की संजीवनी बूटी कोई नहीं था ! कारवां बढ़ा ! भाजपा ने 2 बार सत्ता का स्वाद चखा ! संघ के पास अब, भाजपा के रूप में, एक ताक़तवर राजनीतिक हथियार था !

लेकिन यहाँ एक बात गौर करने वाली है कि…पार्टी विथ डिफ़रेंस ने, परिवार और अनुशासन को करीब-करीब 2010 तक संजोये रखा ! महत्त्वाकांक्षा और परिवार-वाद को पनपने की बजाय, तज़ुर्बे और क़ाबिलियत को तराशा…प्रोत्साहित किया ! मगर 2010 के बाद  भाजपा बदल सी गयी और चल पडी जनता पार्टी की राह पर ! व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा परवान चड़ने लगी और पार्टी की उपलब्धियों पर गर्व करने की बजाय व्यक्ति-विशेष पर जोर दिया जाने लगा….कमोबेश उसी तर्ज़ पर , जैसे जनता पार्टी के इमरजेंसी के "युवा नायकों" (मुलायम, लालू, नीतीश वगैरह) और "शीर्ष नेतृत्व" (चंद्रशेखर जैसे और कई…) ने खुद की महत्त्वाकांक्षा को इस कदर बढाया कि वक़्त आने पर अपनी राह जुदा कर लिए ! इनमें से कई लोग,  कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री बन कर खुद को क्षेत्रीय पार्टियों का बॉस मान कर खुश हैं और चंद्रशेखर जैसे लोग , अल्पकाल के लिए ही सही, प्रधानमंत्री की कुर्सी हथियाने में सफल रहे ! जनता पार्टी (दल) का "राष्ट्रीय पार्टी " होने का टैग छीन गया ! टूटते-टूटते, जनता पार्टी इतना टूटी कि आज जनता पार्टी का नामलेवा भी कोई नहीं बचा ! आज उसी राह पर बी.जे.पी. है ! भाजपा शासित कई गरीब राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शानदार काम किया ! और अपने गरीब राज्य को मध्यम श्रेणी की सीढ़ी पर लाने में सफल रहे ! पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में….हमेशा अमीर राज्य की श्रेणी में शुमार , गुजरात, के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही रहे !

राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी कब से सक्रिय हैं और राष्ट्रीय स्तर पर उनका योगदान पूरे देश के लिए क्या रहा , इस बात का उत्तर तो नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक संघ परिवार और भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी नहीं पता ! पर मीडिया की आंधी ने मोदी को "आम आदमी से सरोकार" रखने वाला घोषित कर डाला ! मीडिया के इस "छिपे" एजेंडा के पीछे राज क्या है , इसका तो पता नहीं ,,,लेकिन मीडिया की इस एकतरफ़ा चाल से भाजपा के वो नेता नकार दिए गए, जो ना सिर्फ अपने बीमारू राज्य को दुरूस्त किये बल्कि कई मामलों में मोदी से आगे भी खड़े दिखाई दिए ! केंद्र में सक्रिय भाजपा के कई नेताओं को संघ दूध में पड़ी मक्खी की तरह समझने लगा ! देश में कांग्रेस के खिलाफ एक पार्टी को खडा करने वाले भाजपा के भीष्मपितामह, लाल कृष्ण आडवानी , को नज़रंदाज़ कर ये सन्देश देने की कोशिश की जाने लगी कि…… सत्ता ही सब कुछ है…..नमस्ते सदा वस्त्चले सत्ताभुमे ! संस्कृति की दुहाई देने वाली भाजपा को बुजुर्गों का सम्मान दिखाई देना बंद हो गया ! पार्टी को सिर्फ लोकसभा सीटों की चिंता है , लगभग उसी अंदाज़ में जैसे 1977 में जनता पार्टी को थी ! गुजरात दंगों के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के योगदान की तलाश जारी है ! कांग्रेस की नाकामी को, मोदी की कूबत बताने का प्रयास ज़ोरों पर है ! अमीर गुजरात को और अमीर बनाने के लिए मोदी की प्रशंसा होनी चाहिए और हो भी रही है ! मगर ये उपलब्धि उसी तरह की है , जैसे टाटा-बिरला के घर का सपूत अपने साम्राज्य को आगे बढाने के लिए लगातार अग्रसर हो ! पर एक गरीब का बेटा अपनी मेहनत से (ना कि विरासत में मिले) कोई उपलब्धि हासिल करे तो वाकई इसे योग्यता का सही पैमाना माना जाना चाहिए ! गुजरात और गरीब राज्य  के भाजपाई मुख्यमंत्रियों में कुछ ऐसा हे अंतर है !

पार्टी की बजाय व्यक्तिगत उपलब्धि का "मोदी चलन"…अब भाजपा में आम हो चला है ! पार्टी के अन्दर, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा अब सैद्धांतिक बात है ! सीनियर-जूनियर का  कोई मतलब नहीं रह गया है ! पार्टी की बजाय व्यक्तिगत छवि के बल पर पार्टी के अन्दर अपना कद बढाने की इस कला को भले ही लोग तहेदिल से , फिलहाल, पुचकार  रहे हों…पर भाजपा जनता पार्टी ,  हश्र की तरफ तेज़ी से बढ़ रही है ! संघ की हड़बड़ी और मोदी चलन, कैंसर की तरह फ़ैल रहे हैं ! सत्ता और सियासत की समझ का दम-ख़म , सिर्फ सीटों के अंकगणित तक सीमित है ! आम आदमी का सरोकार और पार्टी विथ डिफ़रेंस, भाजपा में बहुत दिनों तक टिका रह पायेगा कहना मुश्किल है ! व्यक्ति-विशेष के चलते , राष्ट्रीय स्तर पर, कोई पार्टी एक-जुट रह पायी है , भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसा देखा नहीं गया ! परिवार-वाद के चलते कांग्रेस टिकी है और इस परिवार के बिना कांग्रेस का कोई वजूद नहीं… ये भी सब जानते हैं ! मोदी ही भाजपा और भाजपा ही मोदी हैं….ऐसा संघ और राजनाथ सिंह समझाने पर जुटे हैं….पर मोदी बिना भाजपा नहीं , ऐसी कब्र भी खोदते जा रहे हैं ! ज़ाहिर है …..इस कब्र पर प्रार्थना करने बहुत कम लोग आयेंगें या कोई भी ना आये ! हालांकि कब्र से पहले इंतकाल ज़रूरी है …और भाजपा आत्म-ह्त्या के ज़रिये दफ़न होना चाहती है ! खुदा खैर करे !

नीरज के ब्लाग 'लीक से हटकर' से साभार. संपर्क: journalistebox@gmail.com

स्वतंत्र भारत का प्रथम आतंकवादी नाथूराम गोडसे

भारत को एक लंबे संघर्ष और असीमित बलिदान के बाद 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिली. अभी आजादी का जशन पूरी तरह मनाया भी नहीं गया था कि हमारा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मार कर कर दी. यह स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी घटनाक्रम था और नाथूराम गोडसे स्वतंत्र भारत का प्रथम आतंकवादी था. बहुत आश्चर्य होता है जब आज नाथू राम गोडसे को कुछ सांप्रदायिक पार्टियों द्वारा एक राष्‍ट्रीय हीरो बनाने की कोशिश चल रही है.

इस आतंकवादी को पैदा करने वाला संगठन आरएसएस था. इस संगठन की बुनियाद 1925 में विजयदशमी के दिन केशव हेडगेवार ने रखी, जिसका मक़सद हिन्दुत्व के कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ाना था. इस संगठन ने आजादी की लड़ाई में कभी भी हिस्सा नहीं लिया बल्कि बहुत से दस्तावेज़ों से साबित होता है कि संघ अंग्रेज़ों का पिछलग्गू बना रहता था. संघ ने हमेशा भगवा झंडे को तरजीह दी, कभी भी राष्ट्रीय झंडे को सैल्यूट नहीं किया.

सत्य- अहिंसा के सबसे बड़े प्रवर्तक महात्मा गाँधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को कर दी गई थी, लेकिन उनकी हत्या की साजिश रचने वालों ने इससे कुछ दिन पहले भी 20 जनवरी को एक प्रार्थना सभा में बापू को मारने का प्रयास किया था. हालांकि वे इसमें असफल रहे. बहरहाल, अगर 20 जनवरी के हादसे को गंभीरता से लिया गया होता तो शायद बापू बच गये होते. गांधी जी की हत्या का कारण पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये सरकार को बाध्य करना और उनका मुस्लिमों के प्रति प्रेम बताया जाता है. लेकिन गांधी जी के पौत्र तुषार गाँधी बापू की हत्या का यही कारण नहीं मानते, उन्होंने अपनी पुस्तक 'लेट्स किल गाँधी' में लिखा है कि गाँधी जी की हत्या पूर्वनियोजित थी और ब्राह्मणों का एक समुदाय जो हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता था, उसी ने हत्या करवाया, क्योंकि वह समुदाय गाँधी जी को अपने राह में रोड़ा समझता था.

Why Godse killed Gandhi पुस्तक मे राजशेखर लिखते हैं कि गाँधी जी की हत्या के बारे में संघ को पहले से ही मालूम था, जैसे ही हत्या की खबर मिली, मिनटों में पूरे भारत मे मिठाइयां संघ के द्वारा बांटी गयी, जिससे लोगों ने नाराज़ हो कर महाराष्ट्र और कर्नाटक में बहुत से ब्राह्मणों के घरों में आग लगा दी. गाँधी जी की हत्या के समय गोलवलकर मद्रास में ब्राह्मणों की एक सभा में उपस्थित थे, उसके बाद वे नागपुर वापस आ गये. मगर 1 फरवरी 1948 की रात्रि में उन्हें गाँधी जी की हत्या में शामिल होने पर गिरफ्तार कर लिया गया.

4 फरवरी को संघ पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया गया. गृह मंत्री सरदार पटेल 18 जुलाई1948 के एक पत्र में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखा कि हमारी रिपोर्ट के अनुसार संघ और हिन्दू महासभा खासतौर से संघ ने देश में घृणा का ऐसा माहौल बनाया जिसके करण गांधी जी की हत्या हो गयी. 11 सितंबर 1948 को एक और पत्र में पटेल ने लिखा कि जिस तरह गांधी जी की हत्या के बाद संघ वालों ने खुशी जाहिर की और मिठाइयां बांटी, उसके कारण लोगों में नाराजगी बढ गयी, इसी कारण संघ पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

अब हम आपको गांधी जी की हत्या के पीछे का एक और सच बताते हैं जो कि संघ की साम्प्रदायिक जेहनियत में पैदा हुआ था. गाँधी जी की हत्या पूर्वनियोजित थी इसलिये नाथूराम गोडसे का बंगलोर के एक हॉस्पिटल में खतना (Circumcision)  कराया गया ताकि मारने वाला मुसलमान प्रतीत हो सके, जिसके कारण जब यह खबर फैलेगी तो मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जायेगा, मगर किस्मत का खेल देखिये कि जैसे ही गांधी जी को नाथूराम गोडसे ने गोली मारी, वहां पर एक मौजूद आदमी ने कहा कि ''ए नाथु तुम ने ए क्या कर दिया?''. हत्या के कुछ देर बाद प्रधानमंत्री जवाहर लल नेहरू ऑल इंडिया रेडियो पर आये और उन्होंने एलान किया कि 'बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज एक पागल हिन्दू ने गांधी जी की हत्या कर दी.'

अब आप स्वयं देखें कि आजादी के पहले और बाद में संघ ने सिर्फ देश के खिलाफ ही काम किया है, और उनके बहुत से सदस्यों ने भी राष्ट्र के लिये काम नहीं किया है. इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहेंगे कि संघ के सदस्य अटल बिहारी बाजपेयी जो कि अंग्रेज़ों से लिखित माफी भी मांग चुके हैं और वो पत्र आउटलुक में भी प्रकाशित हो चुका है, भारत के प्रधानमंत्री भी बन चुके हैं. अंततः हम कह सकते हैं कि नाथु राम गोडसे स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी था और संघ आतंकवाद पैदा करने वाला प्रथम संगठन था.

लेखक अफ़ज़ल ख़ान का जन्म समस्तीपुर (बिहार) में हुआ. वर्ष 2000 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद इन दिनों दुबई की एक कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत हैं. 2005 से एक उर्दू साहित्यिक पत्रिका ''कसौटी जदीद'' का संपादन भी करते हैं. उनसे संपर्क 00971-55-9909671 या kasautitv@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

‘4रीयल न्यूज’ चैनल के खास कार्यक्रम ‘दिल्ली किसकी’ से जानिए ‘आप’, ‘कांग्रेस’ और ‘भाजपा’ का हाल

दिल्ली के दरवाजे पर विधानसभा चुनाव दस्तक दे रहे हैं तो पार्टीयों और नेताओं ने वोटरों के दरवाजों पर दस्तक देना शुरू कर दिया है… चुनाव में वही नेता जीत हासिल करता है जो वोटरों से ज्यादा जुड़ा हुआ होता है… जी हां,  दोस्तों, '4रीयल न्यूज़' ने 27 अगस्त से एक सिलसिला शुरू किया है, दिल्ली का रुझान जानने का…

दिल्ली का यह रुझान बड़ा अहमियत रखता है… 2014 लोकसभा चुनाव पर भी दिल्ली का नतीजा छाप छोड़ेगा… 100 दिन से भी कम का समय बाकी है… और दिल्ली की सत्ता के लिए तमाम राजनीतिक दल चुनावी अखाड़े में हुंकार भर रहे है… दिल्ली का चुनाव सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि पिछले 3 विधानसभा चुनावों में लगातार शीला की सरकार बनी है… सिर्फ इसलिए भी नहीं कि, अगले साल लोकसभा का चुनाव होना है… इसलिए की, अरविन्द केजरीवाल की राजनीति बड़े-बड़े राजनेताओं पर भारी पड़ रही है… इसलिए भी की, इस सब से इतर क्या भ्रष्टाचार भी कोई मुद्दा है..क्या अभी भी जनता के ज़हन में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है, कोयला घोटाला, CWG घोटाला है जो चुनावों में एक मुद्दा बनकर उभरेगा…

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ आन्दोलन शुरू करके राजनीतिक पार्टी बनाने वाले अरविन्द आज दिल्ली के विधानसभाओं में इस कदर छाए हुए हैं कि अब तक के तमाम अनुमानों की माने तो दिल्ली की कुर्सी इस बार किसी को आसानी से नहीं लेने देंगे अरविन्द केजरीवाल… वैसे, एनडीए के तरफ से अघोषित तौर पर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार माना जा रहा है… तो दूसरी तरफ यूपीए के तरफ से राहुल गांधी को प्रोजेक्ट किया जा रहा है…लेकिन इन सभी से ज्यादा महत्वपूर्ण जो है वो है- ''क्या शीला दीक्षित को चौथी बार भी मिलेगी दिल्ली की सत्ता''…

इस विषय पर मतदाताओं की राय अलग अलग है…कुछ लोगों का कहना है कि आम आदमी पार्टी का खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ेगा…कुछ लोगों का कहना है कि चूंकि बिजली पानी के मुद्दे के कारण अरविंद केजरीवाल की पैठ स्लम इलाका और गरीबी बस्तियों में ज्यादा है…जिसका नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है…दिल्ली का विधान सभा चुनाव…यानी दिल्ली के सत्ता का फाइनल…ये चुनाव कई मायनो में अहम है…हमने भी इस चुनाव के अहमियत को समझा…और निकल पड़े दिल्ली के रुझान को समझने के लिए…ये जानने के लिए की इस चुनाव में दिल्ली की जनता…दिल्ली के सत्ता की चाभी किसे सौपने वाली है…अपने खास कार्यक्रम- 'दिल्ली किसकी'' के माध्यम…जो सोमवार से शुक्रवार रात 8.30 बजे प्रसारित किया जाता है… दिल्ली की सत्तर विधानसभा सीटों पर क्या है जनता का मूड, यह सब 4रीयल न्यूज़ के खास कार्यक्रम- ''दिल्ली किसकी'' है में आप देख सकते हैं…. इस कार्यक्रम के प्रोडूसर हैं कुंवर सीपी सिंह.

पर ब्राह्मण कहाने में उसे गुदगुदी जैसा फील गुड होता था

इसमें कोई दो राय नहीं कि पत्रकारि‍ता के पेशे में ब्राह्म्‍ण व अन्‍य सवर्ण जाति‍यां जरूरत से ज्‍यादा हैं। इनमें भी जबरदस्‍त ब्राह्म्‍णवाद है जि‍से जेपी नाम बदलने का नारा देने के बाद भी खत्‍म नहीं कर पाए। उनके नारे के साथ अपने नाम का नाड़ा बांध चुके ये पत्रकार किस मानसि‍कता से लैस हैं, इसका काफी अच्‍छा खुलासा भारत ने कि‍या है। भारत तेज तर्रार युवा पत्रकार हैं जो फि‍लहाल अपनी तेजी के चलते फेसबुक पर कई संपादकों के बैन का शि‍कार चल रहे हैं। प्रस्‍तुत है पूरा आलेख…

ब्राह्मणवादी पतकार का एक दिन

भारत सिंह

पतकार वो पूरा था पर उससे पहले था ब्राह्मणवादी, इसका पर्दाफाश बस अभी हुआ जाता है। हालांकि नाम के आगे से उसने अपना ब्राह्मण उपनाम हटा दिया था और वह अब कुछ इस तरह हो गया था- कुमार 'गजेंद्र'। फेसबुक पर अपने नामकरण के बाद उसने घोषणा कर दी थी कि वह आज से ब्राह्मणवादी नहीं रहा, पर ब्राह्मण कहाने में उसे गुदगुदी जैसा फील गुड होता था। गजेंद्र का मतलब उसे पता हो न हो लेकिन वह हमेशा सिंगल कॉमा में घिरा रहता। पतकार ऊंची कॉरपोरेट कंपनी में था, लेटेस्ट मीडियम ऑफ जर्नलिज्म में। आगे है दिन की शुरुआत का आंखों देखा हाल-

ऑफिस पहुंचने के बाद उसने अपने बैग और शरीर को टिकाया और जेब से नए स्टाइल की मगर मैली कंघी निकाली। बालों पर कंघी मारने के बाद मुंह पोंछा और पहला नमन अपने कंप्यूटर के बाईं ओर करीने से
सजाई देवी-देवताओं की चार मिनी मूर्तियों को छोड़ा। दूसरा नमन मिला दाईं ओर लगी दो मूर्तियों को (हालांकि वाम से उसका कोई जुड़ाव नहीं था पर अपनी ही बनाई वास्तु की एक फर्जी खबर पढ़कर उसने बाईं ओर ज्यादा ताकतवर और गुस्सैल देवताओं को जगह दी थी)। गला खंखारते हुए उसने पैंट्री का नंबर मिलाया और संपादकीय अंदाज में आदेश दिया- एक पानी-एक चाय। उधर से आवाज आई- सर एचआर और आईटी में नाश्ता लगाना है, थोड़ी देर लगेगी, करीब आधा घंटा (पतकार पतंगे की तरह जल-भुन गया पर दस कदम दूर पानी और चाय लेने नहीं गया, हालांकि वह जाता तो उसे पता चल जाता कि पैंट्री वाले ने जानबूझकर पतकार को टरकाने को ऐसा कहा था जिसे कुछ गैर ब्राह्मणवादी और पापी पतकारों ने ऐसा सिखाया था)।

कंप्यूटर ऑन करते समय उसे पता चला एक मूर्ति कम है। 'बाप रे बाप'। वह घबरा उठा। इधर-उधर नजर फिराई तो मूर्ति नीचे डस्टबिन में पड़ी मिली। उठाने लगा तो उस पर लगी च्यूइंगम भी हाथ में चिपक गई। बजरंगबली की ऐसी दुर्दशा देख उसकी कंजी आंखों से दो आंसों लुढ़के और गुंदाज गालों का स्पर्श करते हुए उसके मोटे पेट पर जा अटके। यहां पर पतकार भावुक हो चुका था। लेकिन कंप्यूटर पर स्क्रॉल होती खबर देख तीन नैनो सैंकेड में ही उसके आंसू सूखकर आंखों में चमक आ गई। उसके इलाके में एक रेप की खबर चल रही थी। उसने संपादक के केबिन में नजर मारी, वो भी आ चुका था। पतकार ने वहां पहुंचकर लगभग सांष्टांग प्रणाम किया और कहा- सर, बड़ा मसाला है। आगे का हाल-

संपादक- हम्‍मम, बताओ।
पतकार- सर एक लड़की का रेप हो गया, उसी के ब्वॉयफ्रेंड और दो दोस्तों ने किया है।
संपादक- हां, ठीक है, चलाओ।
पतकार- अरे सर, लड़की रात को खाने के बाद खुद अपने ब्वॉयफ्रेंड को घर पर बुलाती थी, कल उसके दो और दोस्त आ गए, बीयर पीकर। घर के पीछे कई बोतलें भी मिली हैं।
हालांकि संपादक नहीं था प्रकाण्ड बुद्धिजीवी, फिर भी बोला- अरे कहां यार, बचा करो इससे।
पतकार- सर किसी के पास नहीं है ये मसाला, लड़की के पड़ोसी भगवान जी की कसम खाकर बता रहे हैं, अब सर झूठी कसम थोड़ी ना खाएंगे, वो भी भगवान जी की।
संपादक- देख लो यार, अपन को किसी लफड़े में नहीं पड़ना।

केबिन से बाहर को लपकते हुए उसने अगला फोन (ऑफिस के नंबर से) उसने अपने अधीन और सुदूर बैठे पतकार को मिलाया, आगे की बातचीत-

पतकार- कहां रहते हो, सुबह से पांच बार फोन मिला दिया है उठाते क्यों नहीं हो।
छोटा पतकार- सर, नहीं सर, मेरे पास तो कोई फोन नहीं आया।
पतकार- अनरीचेबल रहोगे तो फोन कैसे आएगा, सुनो आज यूनिवर्सिटी का चक्कर लगा लेना।
छोटा पतकार- पर सर, परसों ही गया था, कोई खबर नहीं मिलती।
पतकार- अरे मिकी (बहन) को घी का डिब्बा और फेयर एंड लवली पहुंचाना है, अब भी कह रहा हूं काम करना भी सीख लो, संपादक जी पूछ रहे थे तुम्हारे बारे में, मैंने कहा ढीला है पर ठीक हो जाएगा।
छोटा पतकार- मन ही मन गाली देते हुए- ठीक है सर।
पतकार ने दो मिनट आंखें बंद कर सोचा
पतकार- और सुनो जो रेप हुआ है उसे पड़ोसियों से बुलवाओ कि लड़की- लौंडे से अपने घर पर मिलती थी, उनसे कहो कि नाम नहीं जाएगा किसी का।
छोटा पतकार- मन ही मन नई गाली देते हुए- ठीक है सर।

पतकार ने मन ही मन बजरंग बली को नमन किया और धांसू स्टोरी के आइडिए के बारे में सोचने लगा। सोचते-सोचते उसे एक झपकी आ गई और वह कुर्सी समेत लुढ़कते-लुढ़कते बचा। झटके से आंख खुली तो आंखें लगभग चमक रही थी, उसने कुंभ में तैनात दूसरे छोटे पतकार को फोन लगाया।

पतकार फिर से संपादकीय अंदाज में-  हां, कुछ कर नहीं रहे हो, ऐसे काम चलेगा नहीं।
छोटा पतकार- अरे सर क्या करूं, ये बाबाओं का मेला है और आपको चाहिए मसाला।
पतकार- हम्मम। चलेगा तो वही, कितने बाबा दिखाओगे, ज्यादा बाबा किया तो लोग देखने आएंगे नहीं।
छोटा पतकार- सर आप ही बता दो क्या करूं।
पतकार- यार हम तो जब भी इलाहाबाद में गंगा घाट पर जाते थे वहां कोई न कोई महिला या लड़की नहाते दिख जाती थी और झीने कपड़ों में हो तो भीड़ लग जाती थी उसे देखने को। किसी घाट से ऐसी फोटो नहीं ला सकते हो तुम?
छोटा पतकार- अरे सर लेकिन…
पतकार- अरे यार कोई काम तो कर लिया करो, एक तो तुम्हें खबरों की समझ है नहीं ऊपर से बहस करते हो। आज तक मीडियम ही नहीं समझ पाए हो तुम, अखबार की तरह नहीं है ये मीडियम।
छोटा पतकार- सर किसी ने कैमरा छीन लिया तो, वैसे भी सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है।
पतकार- अरे यार तुम तो लोगों के लिए काम कर रहे हो ना, कोई रोके तो बोलना कि अपने घर के लिए थोड़ी ना कर रहे हैं, लोगों की डिमांड है उनके लिए कर रहे हैं। कल तक मुझे कम से कम तीन सौ फोटो चाहिए लड़कियों के नहाने की। चाहे कपड़ों में हो या बिना कपड़ों के, यहां हम ब्लर करके काम चला लेंगे। बाबा-साबा बहुत दिखा लिए। कुछ ढंग का काम करो।

पतकार ने सशरीर शांति ढूंढने की कोशिश की और कुंभ में नहाती लड़कियों के लिए हेडिंग भी ढूंढ ली- देखिए क्या हो रहा है संगम में, नहीं-नहीं….संगम में देखिए स्वीमिंग पूल की मस्ती..हां, ये जबरदस्त रहेगा। इसी बीच फोन घनघना उठा। नंबर देख वह फिर से गिरते-गिरते बचा। सीधे समूह संपादक जी का फोन था।

पतकार- जी सर, नमस्ते सर, आदेश सर
बड़ा संपादक- ये रेप वाली खबर कौन लगाया।
पतकार- सर मैंने लगाई, हटा दूं क्या
बड़ा संपादक- अगर हटानी थी तो लगाई क्यों
पतकार- जी..वो…
बड़ा संपादक- तुम्हें नहीं पता रेप पीड़ित का नाम और पहचान छुपाई जाती है।
पतकार- जी सर, वो लड़की खुद सामने आकर बोली है।
बड़ा संपादक- अरे यार… खट्टाक से फोन रखा
पतकार के हाथ-पांव फूल गए। तुरंत रेप पीड़ित की फोटो ब्लर की लेकिन बड़बड़ाना छूटा नहीं- फोटो ब्लर कर देंगे तो खबर देखेगा कौन, पता नहीं सर भी नहीं समझते हैं। ज्याद कुछ कहूंगा तो कह देंगे डेमो पिक लगाओ…

इसके बाद दिन भर पतकार ने दूसरा काम नहीं किया। दोपहर बाद तक पतकार की खबर खूब चली और पतकार ने 35 रुपये के सात समोसे खरीदे और संपादक समेत अपने छह सीनियरों को खिला दिए (चाय फ्री की थी ही)। शाम तक फ्री की पंद्रह-बीस चाय पीने और आधे समोसे के अलावा कुछ न खाने से पतकार के पेट में गैस बनने लगी थी, लेकिन संपादक जी से पहले घर तो नहीं ना जा सकता था। एक लिफ्ट भी मिली थी, लेकिन पतकार ने कह दिया- संपादक जी कहते हैं कि उनके साथ ही जाया करूं (हालांकि संपादक रिक्शे से जाता था और पतकार का घर ठीक उससे उलट था, लेकिन स्वामिभक्ति भी कोई चीज होते है कि नहीं)। इसी बीच उसने सोचा कि ऑफिस में ही हल्का हो लूं तो संपादक जी ने उंगली से इशारा किया कि चलो तो उसने प्रेशर को हैंडल करते हुए राम और हनुमान का नाम लिया और कमर कसकर घर की ओर निकल पड़ा। उसकी चाल में कुछ लंगड़ाहट थी और इसे देख जमाने ने अफसाना बना दिया।

'बजार' ब्लाग से साभार.

तो इतिहास आप को कूड़ेदान में भी जगह देने को तैयार नहीं होगा मुलायम सिंह यादव!

चार दशक पुराना नीरज का एक गीत है :

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

तो क्या मु्ज़फ़्फ़र नगर के दंगों को नीरज के इस गीत के दर्पण में भी देखा जाना चाहिए? हालां कि मुलायम सिंह यादव से अब जब मुसलमान नाराज़ हो ही गए है तो मुलायम इसे सांप्रदायिक दंगा के बजाय जातिगत दंगा बता रहे हैं। तो क्या अब देश जातिगत दंगों के लिए भी मुफ़ीद हो गया है? हिंदू-मुस्लिम और हिंदू- सिख के दंगों की ज़मीन अब राजनीतिज्ञों को कम लगने लगी है? जो अब यह एक नया शोशा मुलायम ने छोड़ा है? सच अगर देश जातिगत दंगों की राह पर चल पड़ा तो प्राकृतिक आपदाएं इस आपदा से बहुत पीछे छूट जाएंगी। मुलायम के इस बयान को हमारे समाज-शास्त्री किस आलोक में पढ़ रहे हैं यह तो अभी जानना मुश्किल है पर हमारी सो काल्ड मीडिया ने मुलायम के इस बयान की ज़रा भी नोटिस नहीं ली है। यह और खतरनाक है। और इस से भी ज़्यादा खतरनाक है कि राजनीतिक पार्टियों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने भी मुलायम के इस बयान की अनदेखी की है। पर खुदा न खास्ता मुलायम का यह बयान जो ज़मीनी सच है तो यह देश के ऊपर एक गंभीर खतरे की बड़ी घंटी है।

मुलायम के इस बयान की नोटिस ली जानी चाहिए। न सिर्फ़ नोटिस ली जानी चाहिए बल्कि इस खतरे से निपटने के लिए ज़रुरी उपाय भी किए जाने चाहिए। क्यों कि सांप्रदायिक दंगों से भी खतरनाक होंगे जातिगत दंगे। ठीक वैसे ही जैसे परमाणु हमले से भी ज़्यादा खतरनाक हैं रासायनिक हमले। अगर सांप्रदायिक दंगे परमाणु बम हैं तो जातिगत दंगे रासायनिक हथियार साबित होंगे। और दुर्भाग्य से देश इस समय सामाजिक न्याय और आरक्षण के नाम पर जातिगत टुकड़ों में इस कदर विभाजित है कि जातिगत दंगों की ज़मीन बिलकुल तैयार है। खास कर सरकारी नौकरियों और गांवों में इस आंच की इबारत साफ पढ़ने को मिलती है। गांवों में पहले सिर्फ़ छुआछूत थी जातियों और उप-जातियों के बीच। अब छुआछूत गांव से लगभग समाप्त है। उस के कुछ इक्का-दुक्का अवशेष ही मिलते हैं। लेकिन जाति-पाति सर चढ़ कर बोल रही है। सवर्णों में भी, पिछड़ों में भी और दलितों में भी। यह काम किया है राजनीतिक वोट और सामाजिक न्याय के अलंबरदारों ने। राजनीति पार्टियों ने जो ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार, वैश्य, यादव, कुर्मी, दलित, अति दलित, अति पिछड़ा, मुस्लिम, पश्मांदा मुस्लिम आदि के खांचों में बांध कर जो नियमित रैलियां की हैं, तमाम प्रकोष्ठ बनाए हैं जातियों के नाम पर इन से उपजी बबूल की खेती अब अपने पूरे निखार पर है। इन को रोकने के लिए अदालती आदेश बहुत देर से आया। और अब यह सब जातियों का जाल इतना विस्तार पा चुका है कि इन से छुट्टी पा पाना भारतीय समाज के लिए बहुत जल्दी, बहुत मुश्किल काम है। हालत यह है कि सिर्फ़ नौकरियों में ही नहीं, ठेके पट्टे तक में भी जाति-पाति का खर- पतवार बड़ी तेज़ी से पनप गया है। अब यह किसी कीटनाशक दवा के छिड़काव से भी जल्दी जाता नहीं दिखता। लेकिन यह राजनीतिक जातिवाद दंगे की शक्ल में भी कभी हमारे सामने आ सकता है यह कभी सोचा नहीं गया था।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में खाप पंचायतों का आधिपत्य और उन का तालिबानी रुख किसी से कभी छुपा नहीं रहा है। हिंदू हो, मुस्लिम हो सभी में यह तालिबानी तत्व खतरनाक रुप में उपस्थित मिला है। लेकिन अभी तक यह अमूमन शादी-व्याह, लड़की-लड़का के प्रेम और उन की जघन्य हत्या आदि तक ही सीमित रहा था। लेकिन अगर यह जातिगत वैमनस्य जैसा कि मुलायम कह रहे हैं दंगे की वज़ह बन गया तो निश्चित ही दहला देने वाला है। और ऐसा भी नहीं है कि मुलायम सिर्फ़ मुसलमान उन से नाराज़ है तो मुसलमानों को सिर्फ़ बहलाने या उन को सिर्फ़ झांसा देने के लिए कह रहे हैं। यह ठीक है कि मुलायम भी तमाम राजनीतिज्ञों की तरह तमाम तरह के वोट के भी तलबगार हैं , इस के लिए वह तमाम कलाबाज़ियां और चालाकियां भी आज़माते ही हैं। लेकिन गैर ज़िम्मेदार वह नहीं हैं यह बात तो उन के विरोधी भी मानते हैं। तो ऐसे में मुलायम का यह बयान एक खतरनाक घंटी है। इस को इस आलोक में भी देखा जाना चाहिए। और कि इस से निपटने के फ़ौरी तरीकों पर अमल भी ज़रुरी है।
हालत यह है कि मंडल राजनीति के पहले तक गांवों में या शहरों में भी जैसा कि मैं ने पहले भी बताया कि छुआछूत तो थी, भयानक रुप से थी। यहां तक कि दलित भी मुसलमानों का छुआ पानी नहीं पीते थे। बावजूद इस सब के आपसी सौहार्द्र और सदभाव में कोई दिक्कत नहीं आती थी। मेल-जोल और दुख सुख में एक दूसरे के साथ खड़ा रहना सिखाया नहीं जाता था यह सब अनायास था। जाति- पति सिर्फ़ उठने-बैठने, खाने-पीने तक ही सीमित था। और वह छुआछूत का बुखार भी पढ़ाई-लिखाई और जागरुकता के बाद धीरे-धीरे उतार पर था। और फिर जातीय दंगे आदि की तो बात कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था। लेकिन यह वोट बैंक का राक्षस जब से जातियों में राजा बेटा बन कर उपस्थित हुआ है वह हैरतंगेज़ है जो आज जातीय दंगों की सूरत में हमारे सामने मुलायम के बयान के रुप में ही सही उपस्थित तो है।
हालां कि मुलायम की मौलाना छवि ने अब उन का नुकसान करना शुरु कर दिया है। मुस्लिम और यादव उन के स्वाभाविक वोटर हैं पर यह देश भी उन का है उन्हें यह भी क्या याद दिलाने की ज़रुरत है? मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों की तर्ज़ पर मोदी और आडवाणी प्रधानमंत्री बनने के लिए क्या-क्या उछल कूद नहीं कर रहे हैं यह पूरी दुनिया देख रही है। और कि उन की भद पिट रही है। आशाराम बनाम झांसाराम फेल हैं उन की इस उछल-कूद के आगे। तो क्या मुलायम भी उसी तरह, उसी ज़िद की नाव पर सवार हो कर मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों गाते हुए प्रधानमंत्री पद के लिए सवार नहीं हो गए हैं काठ के घोड़े पर? जिस काठ के घोड़े का नाम तीसरा मोर्चा है। यह इस काठ के घोड़े पर सवारी का ही रोमांच है कि विहिप के साथ दुरभिसंधि कर चौरासी कोसी परिक्रमा की आग लगा कर बुझाने की पटकथा तैयार करते हैं। कामयाब भी हो जाते हैं। मुस्लिम वोट वह भी कांग्रेस के गढ़ में आप की विसात के हिसाब से आप के काबू में आ जाते हैं। ज़िक्र ज़रुरी है कि चौरासी कोसी परिक्रमा के तहत आने वाली सभी संसदीय सीटें कांग्रेस के पास हैं अभी। बस्ती, फ़ैज़ाबाद, बहराइच, गोंडा और बाराबंकी की सभी संसदीय सीटें कांग्रेस के पास हैं और यहां मुस्लिम वोटों की भी बहार है। तो मीडिया के नक्शे ही में सही हिंदू और मुस्लिम वोट यहां ध्रुवीकरण के नतीज़े में भाजपा और सपा में आ गए। और लीजिए मुलायम का वह काठ का घोड़ा सरपट दौड़ पड़ा। तीसरा मोर्चा का घोड़ा। प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर।
लेकिन अयोध्या से सरपट दौड़ कर दिल्ली पहुंचने के ठीक पहले बीच रास्ते में मुज़फ़्फ़र नगर में आ कर यह काठ का घोड़ा झुलस क्यों जाता है? कभी सोचा है मुलायम सिंह यादव आप ने?
इस की भी पटकथा आप ने ही लिखी यह भी क्या भूल गए?
आतंकवादियों के मुकदमे वापस लेने की चुनावी घोषणा पूरी करने पर अमल करने के अमल में आप की नौकरशाही छेद पर छेद छोड़ ही रही थी कि रेत माफ़िया को बचाने के फेर में आप ने दुर्गा शक्ति नागपाल पर जो सांप्रदायिक उन्माद फैलाने का बचकाना आरोप लगाया था वही आप के गले पड़ गया। मुज़फ़्फ़र नगर की नौकरशाही ने आप के 'साइलेंट निर्देशों' पर अमल किया और लड़की छेड़ने वाले मुस्लिम लड़कों पर कोई कार्रवाई करने से आंख मूंद गए। पंचायत पर पंचायत हुई अफ़सर आंख मूंदे रहे। आप के बेटे को केंद्र ने चेताया पर पिता की ख्वाहिशो के आगे बेटा बेबस था। बेटा भी आंख मूंदे रहा। और अब जब आप और आप के पूरे कुनबे के इस मंत्रोच्चार के लाख बार दुहराने के कि यू पी को गुजरात नहीं बनने देंगे, यू पी तो गुजरात बन गया है। मुसलमानों की हत्या की संख्या का ग्राफ़ जब बढ़ गया इस दंगे में, मुसलमान जब नाराज़ हो गए तो आप कह रहे हैं कि यह जातीय दंगा है, सांप्रदायिक नहीं। जब आप का घोड़ा, काठ का घोड़ा झुलस गया है तब?
मुस्लिम संगठन सहित जब कई राजनीति पार्टियां जब अखिलेश यादव की सरकार को बर्खास्त करने की केंद्र से मांग करने लगीं तब? अब आप जागे हैं? तब क्यों नहीं जागे जब एक साथ सभी पार्टियों के मुस्लिम नेता बीते जुमे के नमाज़ के बाद दंगा करने के लिए एक साथ उकसा रहे थे ३० अगस्त को मुज़फ़्फ़र नगर में हज़ारों की भीड़ को। दफ़ा १४४ के बावजूद ! सपा के सचिव राशिद सिद्दीकी, बसपा के कादिर राणा, नूर सलीम राणा और कांग्रेस के सईद-उज़्मा जैसे नेता पार्टीगत मतभेद भूल कर एक साथ हज़ारों की संख्या में उपस्थित मुस्लिम समुदाय को दंगा करने के लिए आह्वान कर रहे थे। दूसरी तरफ़ भाजपा की प्राची साध्वी मुसलमानों को देश छोड़ कर पाकिस्तान चले जाने की हुंकार भर रही थीं। अब जब इंडियन एक्सप्रेस ने एक साथ मुज़फ़्फ़र नगर में खुदी कई कब्रों की फ़ोटो छाप दी तब आप जगे हैं?

जब वहां पत्रकारों और फ़ोटोग्राफ़रों को पीटा जा रहा था तब क्यों नहीं जगे आप? और तो और एक पत्रकार और फ़ोटोग्राफ़र की हत्या हो गई तब भी नहीं जागे? जगना तो तभी चाहिए था। लेकिन आप एक आज़म खान को तो संभाल नहीं सकते? कैबिनेट बैठक से लगातार वह गायब हैं। आफ़िस आते हैं पर कैबिनेट मीटिंग में नहीं। मुख्यमंत्री अखिलेश की उपस्थिति में खुद बोलने लगते हैं मीडिया से। अखिलेश को बोलने ही नहेऎं देते। पार्टी की कार्यकारिणी में भी वह आने से इंकार कर देते हैं। उन के ज़िले रामपुर में कोई डाक्टर काम करने को तैयार नहीं होता। सामूहिक तबादला की मांग कर देते हैं यह डाक्टर। बाकी अधिकारी भी तलवार की धार पर हैं। रामपुर न हो गया हो सरकारी अमले के लिए काला पानी हो गया हो। हद है यह तो। खैर, उलटे मुज़फ़्फ़र नगर दंगे के बाद जिस तरह आप ने अधिकारियों को बुला कर सीधे कमान संभाल ली तो किस संवैधानिक हैसियत से भला? आप ने अपने साथ काजल की इस कोठरी में खड़ा कर अपने बेटे अखिलेश के चेहरे पर भी कालिख पुतवा दी है। अब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव मतलब एक नाकारा और गैर ज़िम्मेदार मुख्यमंत्री हो गया है।
दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ आप ने जो अन्याय किया यह उसी का प्रतिफल है मुज़फ़्फ़र नगर दंगा। नौकरशाही को आप ने और आप की तुष्टीकरण की नीति ने अपंग बना दिया है। नौकरशाही क्या है, एक शेर की सवारी है। जो मुख्यमंत्री इस सेर की सवारी को साध नहीं पाता वह बरबाद हो जाता है। अखिलेश इस शेर की सवारी को साध नहीं पाए अपने इस डेढ़ साल से अधिक के कार्यकाल में। तो मुलायम सिंह यादव सिर्फ़ आप ही के कारण।
लैपटाप की चमक और बेरोजगारी भत्ते की गमक को भी मुस्लिम तुष्टीकरण और जातीय फंदे में आप की लटकी राजनीति ने डस लिया है। नहीं याद कीजिए कि बीते दिनों आरक्षण नीति में बदलाव के बाद और फिर कोर्ट के डर से उस नीति को रद्द करने से उपजे विवाद को ले कर पिछड़ी जातियों के नाम पर सिर्फ़ यादव समाज के लोग ही क्यों आंदोलित हुए? क्या सिर्फ़ यादव जाति के लोगों का ही नफ़ा-नुकसान था उस नई आरक्षण नीति में? जो यादव नवयुवकों ने इतना हिंसक बना दिया इलाहाबाद जैसे शहर को? कि अपने भी नेता को नहीं बख्शा और उन के घर में भी तोड़-फोड़ कर दी?
ज़्यादातर थानों और तमाम प्राइज़ पोस्टिंग पर सिर्फ़ यादव जाति के लोगों की बहुतायत आखिर कैसे हो जाती है सपा राज में? ठीक वैसे ही जैसे मायावती राज में दलितों की? तिस पर आप कह रहे हैं कि मुज़फ़्फ़र नगर में सांप्रदायिक नहीं जातीय दंगे हुए हैं? नेताओं के भड़काऊ बयान फिर क्या झूठे हैं? अभी तक भड़काऊ भाषण देने वाले नेताओं की गिरफ़्तारी आखिर क्यों नहीं हुई? प्रशासन क्यों हाथ जोड़े खड़ा है उन सब के आगे? मायावती भले भ्रष्टाचार की महारानी हैं, दलित होने के नाम का हद से अधिक दुरुपयोग भी करती हैं यह सच है। पर एक सच यह भी है कि उन के राज में दंगे और अपराध तो काबू रहते ही हैं। यही नौकरशाही जो आप के बेटे के राज में निष्क्रिय दीखती है, बेपरवाह दीखती है, मायावती के राज में उतनी ही चाक-चौबंद क्यों हो जाती है? कभी गौर ज़रुर कीजिएगा बेटे अखिलेश के साथ बैठ कर। यह भी कि सब की रक्षा करने वाली पुलिस भी आप के सपा राज में निरंतर अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं से पिटने के लिए क्यों अभिशप्त हो जाती है और कि बार-बार। कि सी. ओ. रैक तक के पुलिस अफ़सर की हत्या हो जाती है, सिपाही से लगायत पुलिस अधिकारी तक पिटने लगते हैं। मुख्यमंत्री को बार-बार सार्वजनिक बयान देना पड़ता है कि अधिकारी उन की बात नहीं सुनते। और तो और आप के एक भाई रामगोपाल यादव कहते हैं कि केंद्र अपने आई.ए.एस. अफ़सरों को वापस बुला ले ! यह आप किस लोकतंत्र और गणतंत्र में जी रहे हैं? ऐसे ही गणतंत्र कायम रह पाएगा भला? किस को चुनौती दे रहे हैं आप और आप के भाई? क्या यह वही देश है जिस के प्रधानमंत्री होने की आप की चाहत है? फिर तो भाई मुलायम सिंह यादव जी बहुत गड़बड़ है। ऐसे तो न देश चल सकता है न प्रदेश। यह अराजकता तो रोकनी ही पड़ेगी। यह पारिवारिक दंगा भी पहले आप ज़रुर रोकिए। क्यों कि ऐसे तो कोई मुख्यमंत्री नौकरशाही को न तो काबू कर पाएगा, न काम ले पाएगा, न काम कर पाएगा।
बशीर बद्र का एक शेर याद आता है:
चाबुक देखते ही झुक कर सलाम करते हैं
शेर हम भी हैं, सर्कस में काम करते हैं।
मायावती के राज में उत्तर प्रदेश के आई.ए.एस. और आई. पी.एस. अफ़सरों पर यह शेर बिलकुल फ़िट बैठता है। इन अफ़सरों पर काबू कीजिए बिना भेद भाव के तभी शासन कर पाइएगा। लेकिन अगर सर्कस के इन शेरों के कई रिंग मास्टर हो जाएंगे तो यह शेर जंगल के शेर साबित हो जाएंगे और आप खुद मुंह की खाएंगे। आप के प्रधानमंत्री पद की लालसा पूरी करने वाला घोड़ा, काठ का घोड़ा अभी तो मुज़फ़्फ़र नगर के दंगों में झुलस गया है। और ३२ दंगों का सेहरा भी डेढ़ बरस में बांध दिया है आप ने बेटे अखिलेश के सर।

प्रधानमंत्री बनने का सपना बुनना बुरी बात नहीं है। लेकिन यह यादव और मुस्लिम की बैसाखी छोड़ कर जो आप चलेंगे तभी यह पूरा हो सकता है। नहीं मुज़फ़्फ़र नगर झुलसते रहेंगे, लाशें जलती रहेंगी, कब्रें खुदती रहेंगी और इतिहास आप को कूड़ेदान में भी जगह देने को तैयार नहीं होगा मुलायम सिंह यादव, यह बड़े-बड़े अक्षरों में कहीं दर्ज कर लीजिए। और कि यह भी कि दंगे दुर्गा शक्ति नागपाल जैसी नौकरशाह नहीं आप के गाज़ियाबाद में आप के उम्मीदवार नरेंद्र भाटी का रवैया, उन का बड़बोलापन, मुज़फ़्फ़र नगर में आप के नेता राशिद सिद्दीकी जैसे नेताओं की महत्वाकांक्षाएं करवाती हैं। दंगे आप की मुस्लिम तुष्टीकरण की बीमारी से उपजते हैं। और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य को आप गुजरात की राह पर ढकेल देते हैं। और आप का बेटा अखिलेश इतना नादान है कि दंगे के बाबत बयान देने मुसलमानों की गोल टोपी लगा कर मीडिया के सामने खड़ा हो जाता है। यह कौन सा संदेश है और किस के लिए है? तब और जब आप की कुछ उदार फ़ोटुएं मोदी के साथ खिलखिलाती हुई सब के सामने हैं। यह आखिर है क्या? कांग्रेस के नेता प्रमोद तिवारी एक समय भाषण देते थे कि रात के अंधेरे में मुलायम और कल्याण सिंह मिलते हैं और तय कर लेते हैं कि कितने हिंदू मारने हैं, कितने मुसलमान ! यह नब्बे के दशक की बात है। स्थितियां इतने बरसों बाद भी बदली नहीं हैं।

आप के कभी दोस्त कभी दुश्मन की भूमिका वाले यदुवंशी लालू प्रसाद यादव की याद आ गई। वह तब बिहार के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। और आप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री। तभी १९८९ में लालकृष्ण आडवाणी का रथ बिहार में उन्हों ने रोक कर तब मुलायम सिंह यादव आप की बड़ी मदद की थी। आडवाणी को अयोध्या नहीं आने दिया था। बिहार में आडवाणी को गिरफ़्तार कर लिया। नतीज़े में पूरे देश में दंगा हो गया। उत्तर प्रदेश में भी। पर बिहर जहां आडवाणी गिरफ़्तार हुए थे बिलकुल दंगा नहीं हुआ। तब के दिनों दूरदर्शन ही था। दूरदर्शन के एक इंटरव्यू में लालू से पूछा गया था कि जब पूरे देश में दंगे हो रहे थे , बिहार कैसे अछूता रह गया? बिहार में दंगे क्यों नहीं हुए? लालू ने तब छूटते ही कहा था कि इस लिए बिहार में दंगे नहीं हुए क्यों कि मैं नहीं चाहता था कि बिहार में दंगे हों। उन्हों ने जैसे दुहराया कि लालू यादव नहीं चाहता था कि बिहार में दंगे हों, इस लिए बिहार में दंगे नहीं हुए। लालू ने साथ में यह बात भी जोड़ी कि जिस दिन बिहार में दंगे हों समझ लेना कि लालू यादव दंगे करवा रहा है।

लालू की यह बात सभी मुख्यमंत्रियों को जान लेनी चाहिए। अखिलेश यादव आप को भी और आप के पिता मुलायम सिंह यादव को भी। कि सचमुच अगर कहीं भी दंगा होता है तो बिना मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की मर्जी के नहीं होता। १९८४ में यही काम राजीव गांधी ने किया था और समूचा देश दंगे की आग में तबाह हो गया था। बाद में यही इतिहास नरेंद्र मोदी ने गुजरात में दुहराया। और अब उत्तर प्रदेश में अखिलेश भी उसी कलंकित इतिहास की राह पर हैं। पिता मुलायम को क्या इसी तरह दिल्ली के राजपथ पर भेजेंगे आप अखिलेश यादव? और आप ऐसे ही जाएंगे मुलायम सिंह यादव राजपथ पर? कि दंगा इतना बढ़ जाए कि सेना बुलानी पड़े? मुज़फ़्फ़र नगर में तो अब सेना आई है १९८४ में यह प्रयोग राजीव गांधी ने किया था। कि जब सिखों का भरपूर सफाया हो गया उन की धरती ठीक से हिल गई तभी सेना बुलाई उन्हों ने। अखिलेश ने भी सेना बुलाई ज़रुर पर तब जब मुज़फ़्फ़र नगर जल गया तब। बुलानी थी सेना तो पहले ही क्यों नहीं बुलाई? और यह नौबत भी भला क्यों आने दी? वैसे ठीक यही रहता है और कि शोभा भी यही देता है कि सेना बैरकों में रहे, सड़कों पर नहीं। नीरज को फिर दुहरा दूं मुलायम सिह यादव के लिए:

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

तो मुलायम सिंह जी ज़रा संभल कर। आप की राजनीति को डुबोने के लिए आप के कारपोरेट जगत के मित्र ही काफी हैं। दंगों की आंच में वोट की रोटी मत सेंकिए। नहीं कारवां गुज़र जाएगा और आप के हाथ सिर्फ़ गुबार ही रह जाएगा। नीरज इसी गीत में आखिर में कहते हैं:

माँग भर चली कि एक जब नई नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन
पर तभी ज़हर भरी गाज एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

यह नौबत किसी के लिए न ही आए तो ही अच्छा। मुलायम सिंह यादव आप के लिए भी। कि पालकी लिए हुए कहारों को गुज़रता देखना आप के नसीब में भी न हो। मत खेलिए निर्दोषों की जान से। वह दंगा चाहे सांप्रदायिक हो या जातीय, दंगा, दंगा ही होता है। आप लाशों पर चढ़ कर मोदी की राह पर मत चलिए। प्रधानमंत्री बनने की और भी तरकीबें हैं। हताश मत होइए। बशीर बद्र का एक शेर नज़्र है आप की खिदमत में :
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
क्या करें एक संकट यह भी है कि देश में आज एक गांधी नहीं है जो नोआखली जैसा भयानक दंगा उपवास कर के खत्म करवाने का साहस और क्षमता रखता हो ! अब तो बिना कमांडो के कोई नेता चलने में भी डरता है। आखिर मुज़फ़्फ़र नगर में अभी तक प्रतिपक्ष और पक्ष क्यों अनुपस्थित है? उपस्थित है तो सिर्फ़ दंगा कराने एकजुट हुए सभी पार्टियों के नेता । बशीर बद्र फिर याद आते हैं:

यहां एक बच्चे के खून से जो लिखा गया है उसे पढ़ें
अभी कीर्तन तेरा पाप है, अभी मेरा सज़दा हराम है ।

है कोई सोचने वाला ऐसा भी, अभी भी?

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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भड़ास पर दनपा

सपा बैठक स्थल से बाहर निकाले जाने के बाद पत्रकारों और अफसरों में कहासुनी

आगरा में चल रही समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के अन्तिम दिन पार्टी पत्रकारों के सवालों से नाराज़ हो गयी। नतीजा ये हुआ कि बैठक स्थल आईटीसी मुगल होटल में पार्टी की पत्रकार वार्ता रद्द कर दी गयी और सपा के खास माने जाने वाले आगरा के आई.जी. आशुतोष पाण्डे और डीआईजी मीणा ने खुद सारे पत्रकारों को बैठक स्थल से बाहर निकाल दिया। इस बीच आगरा के पत्रकारों ने तो विरोध नहीं किया लेकिन दिल्ली से आये कई समाचार चैनलों के प्रतिनिधियों से अधिकारियों की कहासुनी ज़रूर हुई।

दरअसल दंगों पर सरकार की विफलता, आज़म खां और मुसलमानों की नाराज़गी के सवाल पर पार्टी के नेता बिखर गये और पत्रकारों को बाहर करने का फऱमान सुना दिया। इस घटना से पत्रकारों में खासा रोष व्याप्त है। अभी तक पार्टी की तरफ से कोई माफी भी नही मांगी गयी है। अब सारे पत्रकार वहां मुंह लटकाकर लॉन में घूमते नज़र आ रहे हैं।

‘पांच राज्यों के विस चुनावों के बाद ही मोदी पर फैसला हो, तो अच्छा है’

हसीन सपने तो दोनों महानुभाव देख रहे हैं। इन सपनों को साकार करने के लिए अपनी तर्इं जमकर खून-पसीना भी बहा रहे हैं। यह अलग बात है कि अपनी सुविधा की राजनीति के लिहाज से वे न्यारी छवियां गढ़ने में जुट गए हैं। सो, त्यागमयी छवि बनाने के लिए कुछ इस तरह की बातें भी की जा रही हैं, मानों सत्ता की कुर्सी से उन्हें कोई बड़ा मोह न हो। इनमें से एक महाशय तो खेले-खाए खिलाड़ी हैं। एक दशक से मुख्यमंत्री बने बैठे हैं। उनका दावा तो यही है कि उनके अलावा स्वतंत्र भारत में अब तक इतना कश्मिाई मुख्यमंत्री शायद ही कोई और हुआ हो। सो, वे अपने राज्य के ‘विकास मॉडल’ के ढोल बजाते पूरे देश में घूमते रहे हैं।

उनका दावा है कि इसी विकास मॉडल के जरिए पूरे देश का आर्थिक और सामाजिक उद्धार हो सकता है। दूसरी तरफ, जो मुकाबले में हैं वे भी ‘त्यागी पुरुष’ हैं। उनके अपने, जो उन्हें सबसे बड़ी कुर्सी का दावेदार बता देते हैं। कई बार उनको ही झिड़क चुके हैं। उनके इस अंदाज की भी जमकर वाहवाही हो चुकी है। यही कहा जा रहा है कि देखो, एक तरफ हमारा नेता है, जो कि ‘पीएम इन वेटिंग’ बनने के लिए बेताब नहीं है। दूसरी तरफ, दूसरा चेहरा अपनी उम्मीदवारी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। उसे तो यह भी परवाह नहीं है कि इस चक्कर में पार्टी की एकता को पलीता लगता हो, तो लगा करे।

जाहिर है कि इन पंक्तियों तक गुजरने के बाद आप अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि यहां पर किनकी चर्चा का संदर्भ है? आइए, पहले नरेंद्र मोदी और उनके राजनीतिक कुनबे की चर्चा कर लें। पिछले दिनों दिल्ली में 3 दिन तक संघ परिवारी घटकों का मंथन दौर चला है। उम्मीद बांधी गई थी कि इस निर्णायक महामंथन कवायद से शायद नरेंद्र मोदी का चेहरा सर्वानुमति का संदेश लेकर आ जाए। संघ नेतृत्व ने बहुत कोशिश की कि मोदी के रास्ते में रणनीतिक तौर पर अड़ंगे लगाने वाले भाजपा के ‘लौह पुरुष’ लालकृष्ण आडवाणी को किसी तरह मना लिया जाए। यदि आडवाणी को पटा लिया गया, तो शायद सुषमा स्वराज जैसों के भी बोल बदल जाएं।  

बीच-बीच में इस तरह की खबरें भी उड़वाई गईं कि आडवाणी जी मान गए हैं। क्योंकि, उन्होंने पार्टी की भावनाओं का संदेश अच्छी तरह से समझ लिया है। ऐसे में ही भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने फटाफट फैसले के लिए संसदीय बोर्ड बैठक की तारीख भी तय कर डाली। ताकि, बोर्ड की बैठक में सबकी राय से मोदी के नाम पर मुहर लग सके। मीडिया में इस तरह की खबरें भी प्रचारित-प्रसारित हो रही हैं कि 13 सितंबर को ही औपचारिक रूप से चुनावी चेहरे के रूप में मोदी के नाम का ऐलान हो जाएगा। लेकिन, एक बार फिर फांस पार्टी के ‘लौह पुरुष’ की तरफ से फंसती नजर आ रही है। बुधवार को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह, आडवाणी की थाह लेने के लिए उनके पास गए थे। खबर तो यही है कि आधे घंटे की मुलाकात में बात नहीं बन पाई।

दरअसल, आडवाणी और उनकी निकट टोली यही कह रही है कि 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही मोदी के बारे में फैसला हो, तो अच्छा है। तर्क यही है कि औपचारिक रूप से मोदी को ‘पीएम इन वेटिंग’ बना देने से मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में चुनावी समीकरण उलझ सकते हैं। इनका भारी नुकसान पार्टी को हो सकता है। चर्चा तो यह भी रही है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संघ नेतृत्व तक इस आशय की गुहार पहले ही लगा चुके हैं। वे फरियाद कर आए हैं कि विधानसभा चुनाव के पहले मोदी के नाम का ऐलान हो गया, तो उनके राज्य में ही कम से कम 30 सीटों पर पार्टी को बड़ी राजनीतिक दुश्वारी का सामना करना पड़ सकता है।

इधर, तमाम कोशिशों के बावजूद आडवाणी की हट ने भाजपा की राजनीति में नए उलझाव पैदा कर दिए हैं। मोदी के मुद्दे पर संघ नेतृत्व की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है। ऐसे में, पार्टी के पास विकल्प यही बचता है कि वह मोदी के मुद्दे पर आडवाणी के तुनकने की परवाह न करे और उनके विरोध को रौंदते हुए आगे बढ़ जाए। मुश्किल यह है कि इस मुद्दे पर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने भी तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। वे भी कहने लगे हैं कि यदि दो-चार महीने बाद ही मोदी के नाम का ऐलान हो जाए, तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा? हालांकि, भाजपा के अंदर डॉ. जोशी के ताजा तेवरों को लेकर हैरानी जरूर जताई जा रही है। क्योंकि, उनकी छवि खांटी संघनिष्ठ नेता की है। संघ प्रमुख मोहन भागवत से उनकी जमती भी है। ऐसे में, डॉ. जोशी कौन-सा राजनीतिक दांव चला रहे हैं? इसको लेकर जोशी के करीबी भी संशय में हैं। मोदी के मुद्दे पर सुषमा स्वराज भी आडवाणी की राय की समर्थक हैं।

संकेत तो यही दिए जा रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर पार्टी संसदीय बोर्ड की बैठक के बगैर ही मोदी के नाम का ऐलान कर देगी। यदि बैठक बुलानी जरूरी भी हुई, तो बहुमत से भी फैसला लिया जा सकता है। यानी, आडवाणी को एकदम हाशिए पर पहुंचाने का भी अल्टीमेटम है। अब यह देखना दिलचस्प है कि ऐन वक्त तक आडवाणी अड़े रहते हैं या मान जाते हैं? मोदी के मुद्दे पर आडवाणी की नाराजगी एकदम नई नहीं है। जब गोवा कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपने का फैसला हुआ था, उस वक्त ही वे नाराज हो गए थे। उन्होंने पार्टी   की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए चिट्ठी लिख दी थी। इसमें पार्टी के सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश कर डाली थी। भारी मशक्कत के बाद नाराज आडवाणी अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए राजी हुए थे। निकट भविष्य में भाजपा के अंदर एक बार फिर कोई नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिले, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। यह अलग बात है कि पार्टी की अंदरूनी खींचतान को लेकर कई बार मोदी भी झल्ला उठते हैं। पिछले दिनों उन्होंने कह दिया था कि वे पीएम बनने का सपना ही कहां देखते हैं? उन्होंने एक कार्यक्रम में कुछ आध्यात्मिक पुट देते हुए कहा था, ‘मैं सपना नहीं देखता। सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं। मैं सपने देखने के बजाए काम करने में विश्वास करता हूं।’

यह अलग बात है कि पूरा संघ परिवार मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखने लगा है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में आयोजकों ने उनके भाषण के लिए ‘नकली लालकिला’ ही बनवा दिया था। इस मॉडल को तैयार करने में 2 करोड़ रुपए स्वाहा हो गए। दरअसल, मोदी के समर्थक बेचैन हैं कि उनका नेता कब दिल्ली के लालकिले से तिरंगा फहराता है? दूसरी तरफ, कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी हैं, जिन्हें पिछले दिनों ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पीएम उम्मीदवार के लिए आदर्श चेहरा बता चुके हैं। मनमोहन के ताजा सुरों से राहुल बनाम मोदी की धुनें तेज हो गई हैं। यह अलग बात है कि राहुल अपनी ‘त्यागी पुरुष’ की छवि को चमकाने में ज्यादा ऊर्जा लगा रहे हैं। उन्होंने बुधवार को उदयपुर (राजस्थान) की रैली में कह दिया, ‘आप सबका सपना पूरा करने के लिए, मैं अपना सपना कुचलने को तैयार हूं।’ यानी, जनसेवा के जुनून में इन्हें बड़ी कुर्सी तक पहुंचने की बेताबी नहीं है। अब ये त्यागमयी जुमले कितने असली हैं और कितने नकली हैं? इनका फैसला तो शायद ईवीएम मशीन से ही निकले? इधर, राहुल ने ना-ना करते हुए चुनावी चेहरा बनने की तैयारियां तेज कर दी हैं। उन्हें उम्मीद है कि देश के लोग उसे ही मौका देंगे, जो अपनी कुर्सी का सपना न देखकर, आम आदमी का सपना पूरा करने का जज्बा रखता हो।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं. इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

पत्रकार प्रमोद सिंह के आकस्मिक निधन पर शोक सभा का आयोजन चौदह को

मुंबई। पत्रकार प्रमोद सिंह की आकस्मिक मृत्यु होने की वजह से मुंबई मराठी पत्रकार संघ में शोक सभा का आयोजन किया गया है। यह शोक सभा दिनांक 14 सितम्बर 2013, दिन शनिवार सायं 5 बजे महापालिका मार्ग, आजाद मैदान के पास मुबई मराठी पत्रकार संघ में आयोजित की जायेगी। एक दशक तक पत्रकारिता जगत का रास्ता नाप चुके प्रमोद के लिए पत्रकारिता ही नहीं अपितु जि़ंदगी के लिए भी एक छोटी सी यात्रा है।

इस छोटी सी यात्रा में प्रमोद ने मीडिया जगत में पृथक पहचान बनाई थी। अदालत की खबरों से हमेशा कदमताल करते हुए प्रमोद ने हमेशा हर खबर में गहराई तक उतरकर उसका सच समाज के सामने प्रस्तुत किया है। इस शोक सभा में पत्रकार प्रमोद के परिजनों के आलावा मीडिया जगत के लोग भी उपस्थित रहेंगे।

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें –

शशिकांत सांडभोर

9869132595 

28 अक्टूबर वीएन राय का कुलपति के कार्यकाल का अंतिम दिन होगा

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अगले कुलपति के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 4 अक्तूबर तक लोगों के बायो डाटा मंगवाए हैं. 7 अक्तूबर 2013 को कुलपति खोज समिति की अगली बैठक होनी है. मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि 28 अक्तूबर को वर्तमान कुलपति वीएन राय का अंतिम दिन होगा.

सो बंधुओं, अच्छे समाजविज्ञानी को कुलपति बनाने के लिए कुछ संस्तुतियां भिजवाएं पत्र के पते पर. यह पत्र उनके लिए भी है, जो डरे हुए हैं वी एन राय के कार्यकाल विस्तार की संभावना से, उनकी गड़बड़ियों के चिट्ठे सार्वजनिक करें.

संजीव चंदन की रिपोर्ट.

नेपाल में पहली बार तीन दिवसीय अन्तरराष्‍ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन

नई दिल्‍ली। इंटरनेट से समूचे विश्‍व में सक्रियता आई है जो कि तीव्र प्रगति की एक अन्‍यतम मिसाल है। इसी दौर में विचारों के दौर को व्‍यापकता और सार्थकता मिली है। जिसमें ब्‍लॉगों की अहम् भूमिका है। सोशल मीडिया तो कल की बात है पर इन सबसे पहले ब्‍लॉगों का अविर्भाव हुआ है।

सिर्फ 10 बरस की अत्‍यल्‍प अवधि में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग ने अनेक कीर्तिमान स्‍थापित किए और उन्‍हें पहचान कर लखनऊ के सुपरिचित साहि‍त्‍यकार रवीन्‍द्र प्रभात ने इसमें उल्‍लेखनीय कार्य डाला।। उन्‍हीं में से एक कार्य हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के लिए ‘परिकल्‍पना सम्‍मान’  की वृहद स्‍तर पर भारत की राजधानी दिल्‍ली में 51 विविध विधामयी हिंदी ब्‍लॉगरों को सम्‍मानित करने की शुरूआत रही। इस अवसर पर हिंदी ब्‍लॉगिंग पर प्रथम पुस्‍तक ‘हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति’ का संपादन अविनाश वाचस्‍पति और रवीन्‍द्र प्रभात के संपादन में किया गया।

2011 के लिए फिर से उत्‍तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 51 हिंदी ब्‍लॉगरों को ‘परिकल्‍पना सम्‍मान’ एवं अन्‍य कई श्रेणियों में सम्‍मानित किया गया। उसी कड़ी में ‘इंटरनेशनल ब्‍लॉगर सम्‍मेलन’ नामक आयोजन आज 13 से 15 सितम्‍बर 2013 तक नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित किया गया है। सम्‍मेलन की अध्‍यक्षता नेपाल के महामहिम राष्‍ट्रपति श्री राम वरन यादव जी कर रहे हैं। मुख्‍य अतिथि पूर्व प्रधानमंत्री माननीय श्री पुष्प कमल दहल प्रचंड जी होंगे। विशिष्‍ट अतिथि मेलबोर्न के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार हरिहर झा, नेपाल के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार कुमुद अधिकारी, मुंबई के हिंदी फिल्‍म अभिनेता आलोक भारद्वाज और काठमांडू के चर्चित ब्‍लॉगर राजीव शंकर मिश्रा रहेंगे।

त्रि-दिवसीय इंटरनेशल ब्‍लॉगर सम्‍मेलन में ‘परिकल्‍पना ब्‍लॉग गौरव सम्‍मान’ 2012 से नेपाल के महामहिम राष्‍ट्रपति सर्वश्री डॉ. अरविन्‍द मिश्र और सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़ के मॉडरेटर तथा व्‍यंग्‍यकार अविनाश वाचस्‍पति को सम्‍मानित करेंगे। इसी क्रम में हिंदी सहित 41 अन्‍य भाषाई ब्‍लॉगरों को विविध सम्‍मानों से अलंकृत किया जाएगा। इस अवसर पर ‘परिकल्‍पना समय’ पत्रिका के ‘नेपाल अंक’ तथा कई पुस्‍तकों का लोकार्पण होगा। कार्यक्रम का जीवंत प्रसारण इंटरनेट के द्वारा पूरे विश्‍व में सोशल मीडिया साइटों पर किया जाएगा।

कार्यक्रम के संयोजक रवीन्‍द्र प्रभात ने बताया है कि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के सकारात्‍मक उपयोग संबंधी विभिन्‍न पहलुओं पर विमर्श किया जाएगा। साहित्‍य में ब्‍लॉगिंग की भूमिका, नई मीडिया के सामाजिक सरोकार, टूल्‍स और एग्रीगेटर्स पर महत्‍वपूर्ण चर्चाएं होंगी। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में साहित्य और संगीत की जुगलबंदी भी देखने को मिलेगी, वहीं मुम्बई से आए अनेक कलाकार अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे। अंत में कवि सम्‍मेलन और व्‍यंग्‍य रचनाओं के पाठ से यह कार्यक्रम संपन्‍न होगा। इसमें शिरकत करने वाले महत्‍वपूर्ण ब्‍लॉगर, कलाकार, कवियों और साहित्‍यकारों में सर्वश्री मनोज अबोध, संतोष त्रिवेदी, मनोज पाण्‍डेय, गिरीश पंकज, सिद्धेश्‍वर सिंह, मनोज भावुक, ललित शर्मा, नमिता राकेश, विनय प्रजापति, चंडीदत्‍त शुक्‍ल, संजीव तिवारी, रमा द्विवेदी, उमा सुवेदी, सुमन पोखरेल, रणधीर सिंह सुमन,जॉकिर अली रजनीश, शाहनवाज, बी एस पाबला, शैलेश भारतवासी, डॉ. विनयदास, सरोज सुमन, अशोक कुमार गुप्‍ता और अविनाश वाचस्‍पति के नाम उल्‍लेखनीय हैं। कार्यक्रम का आयोजन काठमांडू के होटल रिव्यू प्रा0 लि0, थनैल, काठमाण्डू में किया गया है और यहीं पर विश्‍वभर से पधारे आगंतुकों के ठहरने की व्‍यवस्‍था की गई है।

 
अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन

काठमाण्डू (नेपाल)

स्थानः होटल रिव्यू प्रा0लि0, थनैल, काठमाण्डू (नेपाल)

दिनांकरू 13-14-15 सितंबर 2013

प्रस्तावित समय सारणी

प्रथम दिवस (13 सितंबर 2013)

12.00- 2.00   –   पंजीकरण

2.00-5.00      – उदघाटन सह सम्मान सत्र              

अध्यक्षः श्री राम वरन यादव, पूर्व राष्ट्रपति, नेपाल              

मुख्य अतिथिः श्री पुष्प कमल दहल प्रचंड, पूर्व प्रधानमंत्री, नेपाल               

                

वक्ताः श्री गिरीश पंकज, डॉ अरविंद मिश्र और डॉ नमिता राकेश               

संचालकः श्री रवीन्द्र प्रभात

पुस्तकों का लोकार्पणः परिकल्पना समय (हिन्दी मासिक) का नेपाल अंक                   

धरतीपकड निर्दलीय (उपन्यास) , रवीन्द्र प्रभात                     

सासों का सरगम (हाइकू संग्रह) , डॉ रमा द्विवेदी                    

 यात्रा क्रम (द्वितीय खंड), सम्पत देवी मुरारका

 

5.00 -6.00    सूक्ष्म जलपान

6.00 -8.00   मुंबई फिल्म इंडस्ट्री से आए संगीतकार श्री सरोज सुमन की संगीत प्रस्तुति

8.00         रात्रि भोज

 

द्वितीय दिवस (14 सितंबर 2013)

8.00-10.00    सुबह का नाश्ता

10.00- 12.00  न्यू मीडिया के सामाजिक सरोकार पर चर्चा             

अध्यक्षः श्री गिरीश पंकज              

वक्ताः श्री के. के. यादव, श्री अविनाश वाचस्पति, डॉ रमा द्विवेदी,                    

श्री माती सुशीला पूरी, श्री ललित शर्मा एवं श्री संतोष त्रिवेदी                

 साराशंकः डॉ अरविंद मिश्र

 

12.00-2.00    साहित्य में ब्लोगिंग की भूमिका पर चर्चा            

अध्यक्षः डॉ नमिता राकेश              

 वक्ताः श्रीमती सम्पत देवी मुरारका, डॉ राम बहादुर मिश्र, श्री मनोज                   

भावुक, श्री संजीव तिवारी, श्री मुकेश सिन्हा और श्री मुकेश तिवारी              

सारांशकः श्रीमती आकांक्षा यादव  

 

2.00-3.00     दोपहर का भोजन

3.00-5.00    तकनीकी सत्र: ब्लॉग निर्माण एवं ब्लोगिंग के टूल्स            

अध्यक्षः श्री बी एस पावला              

वक्ताः श्री विनय प्रजापति, श्री शाहनवाज श्री गिरीश बिललोरे, श्री जाकिर                    

अली रजनीश, श्री अशोक कुमार गुप्ता एवं श्री अंतर सोहील       

सारांशकः श्री शैलेश भारतवासी  

5.00-6.00    सूक्ष्म जलपान  

6.00-7.00   समापन सत्र            

अध्यक्षः श्री रवीन्द्र प्रभात            

सारांशकों द्वारा सत्र चर्चाओं की संक्षिप्त प्रस्तुति

7.00-9.00   कवि सम्मेलन

9.00        रात्रि भोज  

तृतीय दिवस (15 सितंबर 2013)  

पर्यटन एवं प्रस्थान

प्रेस विज्ञप्ति

उत्तर प्रदेश का महिला एवं बाल विकास विभाग अनैतिकता के गर्त में

हमारे राजनैतिक नेतृत्व और नौकरशाहो में लोकहित के कार्यों के प्रति इच्छाशक्ति की कमी तथा नैतिकता के लोप का ही परिणाम है, प्रदेश में स्थापित महिला एवं बाल विकास विभाग में उत्पन्न अनेक विसंगतियां। मसलन प्रदेश के लगभग तीस जिलों में तैनात प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारी जो मूलतः बाल विकास परियोजना अधिकारी हैं। इनके द्वारा करोड़ों रूपये का आहरण-वितरण का कार्य किया जा रहा है जबकि वह भी यह जानते हैं कि उन्हें आहरण-वितरण का अधिकार प्राप्त ही नहीं है।

बताते चलें कि वित्त विभाग के शासनादेश के अनुसार अराजपत्रित अधिकारी जिनका वेतनमान 6500-10500 के नीचे हो तो इस वर्ग के अधिकारी को आहरण-वितरण का अधिकार नहीं दिया जा सकता। फिर प्रदेश के यह बाल विकास परियोजना अधिकारी तो 5000-8000 के ही वेतनमान वर्ग में हैं जो अराजपत्रित अधिकारी वर्ग की श्रेणी में हैं। अतः अराजपत्रित अधिकारी को आहरण-वितरण का अधिकार किसी भी दशा में देय नहीं है। यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या इन पर कोई निगरानी तंत्र नहीं है? यदि है तो वह क्या कर रहा है? आज तक इन प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारियों को अनाधिकार आहरण-वितरण करने से रोका क्यों नहीं गया? क्या निगरानी तंत्र किसी बड़ी विभागीय घटना की प्रतीक्षा कर रहा है जैसा कि आम तौर पर होता है।

दूसरी ओर भारतीय लोक प्रशासन से स्वच्छ, पारदर्शी, बेहतरीन प्राशासनिक एवं प्रबन्धकीय सेवाओं की अपेक्षा की जाती है, इनसे बेहतर निगरानी तथा समन्वय की भी आशा रहती है। खासकर उन मामलों में जिन सार्वजनिक नीतियों से नागरिक प्रभावित होते हैं फिर यह इस प्रकरण पर मूकदर्शक क्यों हैं? कारण कि यही आई0ए0एस0 कलेक्टर, निदेशक, सचिव और मुख्य सचिव निगरानीकर्ता के रूप में तैनात हैं तो क्या यह निगरानीकर्ता प्रदेश के जिलों के प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारियों के इस अनैतिक क्रिया-कलापों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। यदि हां तो क्या इस प्रकार के चूकों के लिए इन्हें दण्डित किये जाने का प्राविधान नहीं होना चाहिए। क्या दुर्गा नागपाल को आधे घण्टे में ही निलम्बित करने वाली सरकार इतने बड़े अनैतिकता पर मूकदर्शक बनी रहेगी जिसका मूल कर्तव्य ही है कि वह साफ एवं सक्षम लोक प्रशासन प्रदान करें।

गाजीपुर से शिवेंद्र पाठक की रिपोर्ट. संपर्क 09415290771 या pathakgzp92@gmail.com

पत्रकार प्रमोद ने सबकी मदद की, लेकिन उनको काम किसी ने नहीं दिया

: प्रमोद सिंह के बहाने मीडिया की पड़ताल : ऐसे मीडिया की वजह से क्यूं मरे कोई? : प्रमोद सिंह नहीं रहे। उनने आत्महत्या कर ली। अपन सन्न हैं। सन्न इसलिए, क्योंकि प्रमोद सिंह जैसे प्रतिभाशाली रिपोर्टर के इस दुनिया से चले जाने के तरीके ने हम सबको एक बार फिर से मीडिया में हमारे काम, उस काम को करते रहने के तरीके, और उसकी जरूरत के साथ साथ जिंदगी के मुकाबले मीडिया की औकात के प्रति हमेशा सजग रहने के प्रति चिंतित करनेवाले सवाल खड़े कर दिये हैं।  जो लोग प्रमोद सिंह को जानते है, वे यह भी जानते हैं कि प्रमोद सिंह मीडिया में कोई इतने बड़े आदमी नहीं थे, कि उन पर मृत्यु लेख लिखे जाएं। लेकिन फिर भी लिखा जाना चाहिए। क्योंकि प्रमोद सिंह का जिंदगी से जाने का माहौल और तरीका दोनों, लिखे जाने के काबिल है।

मौत वैसे भी कोई इतनी आसान चीज नहीं होती, जिस पर नहीं लिखा जाना चाहिए। फिर, यह तो एक पत्रकार की मौत है। पत्रकार, जिसे किसी भी सामान्य आदमी के मुकाबले आम तौर पर समझदार माना जाता है, समाज का पहरेदार कहा जाता है। लेकिन मुश्किल यह है कि कोर्ट और अपराध कवर करनेवाले जिन बहुत सारे पत्रकारों को अपन करीब से जानते हैं, उनमें काम का तो जज्बा तो बहुत दिखता है, लेकिन उसके उलट कुछेक को छोड़ दें, तो ज्यादातर लोगों में व्यक्तिगत जीवन के प्रति गंभीरता न के बराबर दिखाई देती है। या यूं कहा जा सकता है कि वे काम की गहराइयों को छूने की कोशिश में अपराधियों तक से भी निजी रिश्ते बनाने के लिए बहुत गहरे उतर जाने की वजह से जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। इसी वजह से उनके जीवन में एक खास किस्म का अवसाद भी घर कर जाता है, जो धीरे धीरे जिंदगी पर काल बनकर छा जाता है। फिर जीवन के रहने और न रहने के बीच कोई खास फर्क ही नहीं लगता। जीवन के अर्थ के मुकाबले निरर्थकता ज्यादा भाने लगती है।

यही वजह है कि खेल, फिल्म, व्यापार, राजनीति, और बाकी काम करनेवाले पत्रकारों के मुकाबले अपराध करनेवाले पत्रकारों में फ्रस्ट्रेशन बहुत ज्यादा दिखाई देता है। फिर जिंदगी का एक सीधा सादा गणित यह भी है कि जो काम आप रोज देखते रहते हैं, उसी में आपको ज्यादा आसानी लगती है। सो अपराध कवर करनेवाले पत्रकारों को मौत भी आसान रास्ते के रूप में दिखाई देती है। पिछले दस सालों में पत्रकारों की आत्महत्या और अकाल मौत के अलावा उनके अपराध में लिप्त होने की जो खबरे आई हैं, उनमें सबसे ज्यादा लोग वे हैं, जो अपराध कवर करते रहे हैं। कोर्ट और अपराध कवर करते करते हम लोग खुद भी कब उसी मानसिकता के हो जाते हैं, यह कोई नहीं जानता।

दरअसल, प्रमोद सिंह नाराज थे। उन लोगों से, जिनने प्रमोद सिंह की खबरों के जरिये अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाया, और जब मदद करने की बारी आई, तो हाथ खड़े कर दिए। मुंबई के बहुत सारे पत्रकार जानते हैं कि प्रमोद सिंह ने सबकी मदद की, लेकिन उनको काम देने की बारी आई, तो उन लोगों में से किसी ने उनकी मदद नहीं की, काम भी नहीं दिया। वे लोग उनके फोन भी नहीं उठाते थे। अपनों के ही इस कदर बेगाना हो जाने के अवसाद ने प्रमोद सिंह को लील लिया। उन की आत्महत्या से अपन भी दुखी हैं। आहत भी हैं। और चिंतित भी। उन्होंने अपने पास काम किया है। वे लगनशील थे और मेहनती भी। ऐसे प्रमोद सिंह की आत्महत्या के बाद यह समझ में आता है कि पत्रकारिता की हमारी दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो देह त्यागने के बाद के जीवन को न जानने के अज्ञानी हैं। हमें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि जिंदगी है, तो ही सब कुछ है। जिंदगी है तो कुछ भी किया जा सकता है, लेकिन जब जिंदगी ही नहीं, तो कोई किसी के लिए कुछ भी नहीं कर सकता। सिवाय रोने के।

प्रमोद सिंह सिर्फ 33 साल के ही थे। विनम्र थे। मुंबई में अपराध के बढ़िया रिपोर्टर थे। और इंसान होने के तौर पर भी ठीक ठाक ही थे। ठीक ठाक इसलिए, क्योंकि आमतौर पर अपराध की रिपोर्टिंग करनेवाले जहां दो चार खबरों के बाद ही अपने आप को तुर्रमखां समझने लगते हैं, उनको अगर टुच्चा कहा जाए, तो उनके मुकाबले प्रमोद सिंह बहुत ऊंचे आदमी थे। न कोई घमंड और न कोई दर्प। लेकिन मीडिया, और खासकर अपराध कवर करने के काम में यह ऊंचापन कब जिंदगी को अंदर से खोखला कर देता है, यह समझने की जरूरत है। प्रमोद सिंह यह नहीं जानते थे। इसीलिए खुद ही अपनी जिंदगी को खा गए। आत्महत्या कर ली। वे कोई दस साल मे इस पेशे में थे, और जैसा कि हमारे बाजार में चैनलों के खुलने और बंद होने का हाल है, उन्होंने जितने साल काम किया उतने ही साल घर भी बैठे रहे। वैसे, प्रमोद सिंह उन लोगों में नहीं थे, जो रोजमर्रा की अपराध की खबरें कवर करके भी खुद ही वाहवाहियां लेने की कोशिश में अपनी पीठ थापथपाते रहते हैं। वे गहरे आदमी थे। और लगता है कि अपनी जिंदगी की गहराइयों में वे इतने गहरे उतर गए थे कि वापस उबर ही नहीं पाए। वे खुद्दार थे।  

हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि हमारा काम हमारे जीने और जीवन को जीतने का साधन रहे, तब तक तो ठीक, लेकिन वही काम जब मौत का कारण बनकर सामने आने लगे, तो उस काम के बारे में पुनर्विचार करना बहुत जायज हो जाता है। मीडिया वैसे भी अब कोई पहले जितना बहुत इज्जतदार काम नहीं रह गया है। ज्ञान प्राप्ति के साधन के रूप में तो मीडिया ने बहुत पहले ही अपनी साख खो दी थी। सूचनाएं देने में भी बहुत ज्यादा घालमेल होने की वजह से अब यह जानकारी के माध्यम के रूप में भी अपनी साख खोता जा रहा है। अब मीडिया सिर्फ और सिर्फ व्यापार है। सर्वशुद्ध व्यापार। जिसे जिंदगी की कीमत पर भी सिर्फ अपने मुनाफे की पड़ी रहती है। जितना बड़ा ब्रांड, उतना ही बड़ा धंधा। धंधा करनेवालों और धंधेवालियों की वैसे भी कोई औकात नहीं मानी जाती। शायद यही वजह है कि मीडिया के भी धंधा बन जाने के बाद इसीलिए बाजार में अब मीडिया की औकात नपने लगी है। किसी को बुरा लगे, तो अपने जूते पर, लेकिन ऐसे धंधे के लिए कोई अपनी जिंदगी को क्यों स्वाहा करें, यह सबसे बड़ा सवाल है।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं, उनसे 09821226894 पर संपर्क किया जा सकता है.


मूल खबर–

बीमारी से जूझ रहे मुंबई के क्राइम जर्नलिस्ट प्रमोद सिंह ने जहर खाकर जान दे दी

जिंदल समूह ला रहा नेशनल न्यूज चैनल, सतीश के. सिंह बने न्यूज डायरेक्टर

जी ग्रुप के 'जी न्यूज' चैनल से टक्कर लेने और पछाड़ने के लिए जिंदल समूह ने एक नेशनल न्यूज चैनल लाने की तैयारी शुरू कर दी है. यह चैनल हिंदी में होगा और इसके न्यूज डायरेक्टर बनाए गए हैं सतीश के. सिंह. बताया जाता है कि इस नेशनल न्यूज चैनल के लिए भर्तियों का काम शुरू कर दिया गया है. हिंदी टीवी जर्नलिज्म के कुछ बड़े नामों को भी लाने की कोशिश की जा रही है.

बताया जाता है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी समेत कई लोगों से जिंदल ग्रुप की तरफ से संपर्क साधा जा रहा है. हालांकि यह मुश्किल दिख रहा है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी आजतक जैसे प्रोफेशनल और नंबर वन न्यूज चैनल को छोड़कर जिंदल ग्रुप के नए आ रहे चैनल के साथ जाएंगे. दूसरे न्यूज चैनलों के अच्छे लोगों को भी तोड़ने की कवायद चल रही है. माना जा रहा है कि अगले कुछ हफ्तों में कई उलटफेर देखने को मिलेंगे.

ज्ञात हो कि जी ग्रुप और जिंदल ग्रुप में झगड़े के बाद जिंदल ग्रुप ने भी अपना मीडिया हाउस खड़ा करने का इरादा किया और इसके तहत मतंग सिंह वाले पाजिटिव मीडिया ग्रुप को खरीद लिया. इसी कंपनी के तले एक नेशनल न्यूज चैनल लाया जा रहा है. पाजिटिव मीडिया ग्रुप के अपने कई चैनल पहले से ही हैं.

चीन वाले जिला गाजीपुर को ‘चेन-चू’ शब्द से क्यों संबोधित करते हैं?

दौराने पत्रकारिता अपने सम्पादक श्री ईश्वरदेव मिश्र जी के निर्देश पर प्राचार्य श्री कुबेर नाथ राय जी का साक्षात्कार लेने का अवसर मिला। पहली मुलाकात में ही उनके आडम्बरहीन, विद्वतापूर्ण, सरल व्यक्तित्व से मैं सम्मोहित सा हो गया। साक्षात्कार का अंतिम प्रश्न जो जनपद गाजीपुर को चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ‘‘चेन-चू’’ से सम्बोधित किया है, विषयक था जिस बावत तमाम विद्वान अलग-अलग अर्थ बताते हैं कोई युद्ध देव का साम्राज्य बताता है जिसे संस्कृत में युद्धरणपुर या गर्जपतिपुर कहा जा सकता है तो कुछ लोग बहादुरों का देश बताकर इतिश्री कर लेते हैं। वाकई इस चेन-चू का सही अर्थ क्या होगा? यह हम सभी को जानने की इच्छा रहती है। प्राचार्य ने जो बताया वह अक्षरशः उन्हीं के शब्दों में-

''गाजीपुर के प्राचीन नाम के सम्बन्ध में पुराने गजेटेरियों ने लिखा है कि गुप्तकाल में आने वाले चीनी यात्री ने इस क्षेत्र का नाम चेन-चू लिखा है। इस चीनी शब्द का अनुवाद हिन्दी भाषा-भाषी वैज्ञानिकों ने योद्धाओं का क्षेत्र या युद्ध प्रिय लोगों का क्षेत्र कहा है। सर्वदा तत्सम्बन्धी प्रत्येक थिसिस या लेख में यही बात दोहराई जाती है, परन्तु इस बात से मैं सहमत नहीं हूं, मेरी समझ में चेन-चू का सही अनुवाद गाधि क्षेत्र ही है जो लोक परम्परा से प्रमाणित होता है।''

भारत प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक सुनीत कुमार जी ने चीनी लिपि की विशेषता के बारे में हमें पढ़ाया था कि यह चित्र लिपि होती है और ऊपर से नीचे लिखी जाती है। कुछ भारतीय शब्दों के लिए तो यह चिन्ह या चित्र निश्चित कर लिया गया है जैसे-बुद्ध जैसा प्रसिद्ध शब्द है, बुद्ध सूर्यवंश में पैदा हुए थे अतः सूर्य के चित्र प्रतीक के माथे पर ही एक विशेष नया चिन्ह देकर काम चला लेते हैं। पहले प्राचीन काल में बुद्ध का उच्चारण ठीक होता रहा होगा परन्तु आज बिगड़कर फो और फा हो गया है। यह ध्वनि परिवर्तन इस प्रकार हुआ होगा बुद्ध-बुध-भूत-घुर-फुर-फु-फा। लेकिन शेष भारतीय नामों को उनके यहां अनुवाद करके लिखने की परम्परा थी। जैसे शुद्धोधन लिखना हुआ तो पहले शुद्ध का चिन्ह लिखेंगे फिर ओदन का परन्तु अपनी सामर्थ्य के अनुसार उच्चारण करेंगे शुद्धोधन शब्द की ही विकृत रूप। वे इसी तथ्य को अपने एक निबन्ध में एशिया खण्डे संस्कृत भाषा प्रसार और प्रभाव (पृष्ठ सं0-116 निबन्ध संग्रह, सांस्कृतिकी-भाग-2) में भी चर्चित करते हैं इसी प्रकार सैकड़ों संस्कृत नाम चीनी भाषा में प्रचलित होते हुए भी आत्मगोपन करके स्थित है। अश्वघोष को मॉ-हेड अर्थात घोड़े की हिनहिनाहट, तथागत को जू-लाई, धर्म सिंह को फा-शिह लिखने या कहने पर आज कोई संस्कृतज्ञ उन्हें पहचाने और चीनी भाषा पर संस्कृत का प्रभाव आंके यह कठिन है। उसी निबन्ध में बताया गया है कि कवि रविन्द्र नाथ ठाकुर जब चीन गये तो वहां अखबारों ने उनके नाम का चीनी संस्करण बनाया चू-चेन-तान इसका अर्थ होता है सिन्धु देशीय (भारतीय) $ रवि जो उल्टा क्रम में रवि $ इन्द्र $ भारतीय होगा। चीनी भाषा में भारतीयों के लिए थियेन-चू या सियेनचू दो शब्द हैं और इनका संस्कृत रूप है चू मात्र जिसका अर्थ होता है क्षेत्र। प्राचीन चीनी परम्परा से यह संक्षिप्त रूप चलता है।

सूर्य या रवि के लिए चीनी शब्द है तान और चेढ़्। चेन शब्द का अर्थ होता है 1-आकाश से कड़कने वाला बज्र, 2-ब्रजधर देवता इन्द्र। चीनी भाषा में इन्द्र शब्द को सदैव चेन ही परम्परा के रूप से लिया जाता है। लिपि, चित्र लिपि होने से एक ही प्रतीक चित्र का प्रयोग परस्पर सम्बन्धित शब्दों के लिए करने की परम्परा है। अतः स्पष्ट है कि चेन-चू का अर्थ हुआ इन्द्र-क्षेत्र।

मेरी समझ में इन्द्र क्षेत्र का प्रयोग ही गाधि क्षेत्र के रूप में हुआ है। मेरी इस कल्पना का आधार पुराणों में है। बी0एस0आप्टे ने अपनी संस्कृत डिक्शेनरी में बताया है कि परम्परा के अनुसार राजा गाधि इन्द्र के अवतार थे और ये कुशाम्ब के पुत्र थे। परन्तु हरिवशं पुराण से पता चलता है और प्रायः अन्यत्र भी माना जाता है कि ये कुशाम्ब के ही भाई कुशिक के पुत्र थे और इन्द्र ही स्वयं गाधि बनकर अवतरित हुए थे। इसी से इस वंश का नाम कौशिक हुआ। गाधि पुत्र विश्वामित्र को कौशिक इसी से कहा जाता है। हरिवंश पुराण के प्रथम पर्व हरिवंश पर्व के 27वें सर्ग के श्लोक (12-16) इस तथ्य को बड़ी स्पष्ट भाषा में कहते हैं। इन श्लोकों का अर्थ इस प्रकार है कि कुशिक ने इन्द्र के समान पुत्र पाने की इच्छा से तप करना आरम्भ किया तब इन्द्र स्वयं मारे भय के उनके पुत्र बन स्वयं उत्पन्न हुए। राजा कुशिक को तब तप करते हुए एक हजार वर्ष बीत गये तब इन्द्र का ध्यान कुशिक की ओर गया था। अति उग्र तप करके पुत्र पाने में समर्थ उन्हें देखकर सहस्राक्ष पुरन्दर ने उनमें अपने अंश को स्थापित किया। इस प्रकार देवेन्द्र इन्द्र कुशिक के पुत्र बने थे (13-15) फिर अंतिम श्लोक है…

स गाधिरभवत राजा मघवान कौशिक स्वयं।
पौर कुत्स्यभव भार्या गाधिः तस्यामजायत।।

(इस प्रकार मघवा इन्द्र स्वयं कौशिक गाधि बने राजा कुशिक की भार्या जो पुरूकुत्स की पुत्री थी उससे गाधि पैदा हुए) जब चीनी यात्री इस क्षेत्र में आया होगा तो लोगों ने इसका नाम गाधि क्षेत्र या गाधि देश बताया होगा। भारतीय क्षेत्र के लिए चू शब्द उसे ज्ञात था पर गाधि के लिए उसकी लिपि में कोई चित्र प्रतीक नहीं रहा होगा। अतः निकटतम एवं सम्बन्धी चित्र प्रतीक द्वारा ही इसे व्यक्त किया गया होगा। जैसा कि चीनी भाषा और लिपि की विशेष प्रकृति के बारे में बताया गया है उसके पास गाधि व्यक्ति वाचक संज्ञा को अन्य तरह से लिखने का विकल्प नहीं था अतः उसने अपने लिपि में इन्द्र-क्षेत्र लिखकर उच्चारण गाधि ही किया होगा जैसा कि शुद्धोधन, अश्वघोष या धर्मसिंह जैसी संज्ञाओं के बारे में बताया गया है। अतः मेरी धारणा है कि चीनी यात्री ने चेन-चू शब्द गाधि क्षेत्र के अर्थ में लिखा है। गाधि यहां के राजा थे तो उन्होंने अपने नाम पर गाधिपुर बसाया होगा ऐसा अनुमान सहज ही किया सकता है। लोक परम्परा आज भी बलिया को भृगु क्षेत्र गाजीपुर को गाधिपुर और जमानियां को जमदग्नि क्षेत्र कहती है तो इस लोक परम्परा के पीछे ऐतिहासिकता अवश्य है। कम से कम चीनी यात्री द्वारा उल्लेखित चेन-चू शब्द का यह अर्थ लोक परम्परा की ऐतिहासिकता का एक प्रमाण तो देता ही है।

प्राचार्य इस संसार से चले गये जिसे भगवान ने बनाया है पर अपनी अनेक रचनाओं, पुस्तकों का संसार जो प्राचार्य ने बनाया है, वे इस धरती पर रच-बस रहे हैं। अभी कितनी ही रचनाएं पाठकों के हाथ में थमाते, पर अचानक ही कोई आवाज सुनकर उठे और उसके पीछे चले गये जैसे भरी बहस से उठकर चुपके से कोई चला जाता है, जिसकी स्मृति ही अब शेष है।

लेखक शिवेंद्र पाठक से संपर्क 09415290771 या pathakgzp92@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

‘जन-जन जागरण’ के एजीएम बालेन्द्र गुप्ता को दैनिक जागरण के मालिकान से जान का खतरा!

झांसी से प्रकाशित दैनिक 'जन-जन जागरण' दिन प्रतिदिन तरक्की कर रहा है। इस तरक्की के कारण दैनिक जागरण झांसी, कानपुर व अन्य संस्करणों के मालिक बौखला गए हैं, जिसके चलते वह सोची-समझी साजिश करने लगे हैं। दैनिक जन-जन जागरण को झांसी में तरक्की देने में एजीएम बालेन्द्र गुप्ता का अहम योगदान हैं, जिसके चलते वह बालेन्द्र गुप्ता को निशाना बनाने की फिराक में हैं। राह चलते उनको धमकियां मिल रही हैं, जिसके चलते उनको दैनिक जागरण के मालिकों से जान से खतरा है। वह इसकी शिकायत मुख्यमंत्री समेत झांसी डीआईजी व एसएसपी से कर चुके हैं, लेकिन आज तक इस संबंध में किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं हुई है। कार्यवाही न होते हुए एजीएम बालेन्द्र गुप्ता ने पुनः इसकी शिकायत पुनः मुख्यमंत्री समेत झांसी डीआईजी व एसएसपी से करेंगे।

दैनिक जन-जन जागरण झांसी ही नहीं बल्कि बुन्देलखण्ड के प्रत्येक जिलों से लेकर प्रत्येक गांवों तक पाठकों तक पहुंच रहा है। झांसी संस्करण में झांसी जिले के ग्रामीण अंचल से लेकर ललितपुर, जालौन-उरई, हमीरपुर, महोबा, बांदा, चित्रकूट, टीकमगढ़, छतरपुर समेत अन्य जिलों व गांवों की खबरंे प्रकाशित हो रही हैं। इतने जिलों की खबरें प्रकाशित होने से दैनिक जागरण का अस्तित्व खतरे में है जिसके चलते अखबार की लोकप्रियता पर खासा असर पड़ा है और जिसका पूरा-पूरा फायदा जन-जन जागरण को मिला है। इसी लोकप्रियता को दैनिक जागरण पचा नहीं पाया है और दैनिक जागरण के मालिकों ने सोची-समझी साजिश करते हुए दैनिक जन-जन जागरण के एजीएम बालेन्द्र गुप्ता को टारगेट बनाना शुरू कर दिया है। गुंडों द्वारा उनको राह चलते धमकी मिलती है तो कई तरह से परेशान भी किया जाने लगा है। इसके अलावा कई खबरों में फर्जी तरीके से नोटिस भी दिया जा रहा है। जिसके मुकदमें अभी भी कोर्ट में विचाराधीन हैं। इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट में जन-जन जागरण को फर्जी अखबार बताकर मुकदमा किया है, लेकिन साक्ष्य उनके पास कुछ भी नहीं हंै, जो मुकदमा विचाराधीन है।

वहीं, बांदा, महोबा, ललितपुर समेत अन्य जिलों से भी नोटिस भेजा जा रहा है तो कई जिलों से नोटिस भेजने की तैयारी की जा रही हैं, साथ ही साथ अन्य जिलों के संवाददाताओं को भी धमकाया जा रहा है, जिससे वह जिले की एजेंसी बंद कर दें। दैनिक जागरण की इस गुंडागर्दी के चलते जन-जन अखबार के कई संवाददाता घबराए हुए हैं। इसी के चलते एजीएम बालेन्द्र गुप्ता ने 10 जुलाई 2012 को मुख्यमंत्री समेत झांसी डीआईजी व एसएसपी को शिकायती पत्र भेजकर अपनी व अपने कर्मचारियों की जानमाल का खतरा बताया था, लेकिन अभी तक किसी पर भी कार्यवाही न होने से रोष व्याप्त है। उन्होंने पुनः मुख्यमंत्री समेत झांसी डीआईजी व एसएसपी को शिकायती पत्र भेजने का निर्णय लिया है। अगर इसके बाद भी कार्यवाही न हुई तो वह लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री आवास पर धरना देंगे।

वहीं, दूसरी ओर दैनिक जागरण के सम्पादक व उनके पत्रकारों पर कई मुकदमें पंजीकृत होने से उनके हौंसले पस्त हुए हैं। जिसके चलते दैनिक जागरण के सम्पादक ने इलेक्ट्रोनिक मीडिया समेत अधिकांश पत्रकारगण, चंद व्यापारी व नेताओं का सहारा लेकर ज्ञापन देने शुरू कर दिए हैं, ताकि प्रशासन पर दवाब बनाया जाए, इसके चलते दैनिक जागरण के मालिक ने पत्रकारों से मेलजोल भी बढ़ा दिया है। लेकिन यह उनकी कैसी सोच है कि दूसरी तरफ वह जन-जन जागरण को अपन दुश्मन मान रहे हैं, कुल मिलाकर वह अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं और काम पूरा होने के बाद भी वह अन्य पत्रकारों को दूध में से मक्खी की तरफ बाहर निकालकर फेंक देंगे।

झांसी से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बीमारी से जूझ रहे मुंबई के क्राइम जर्नलिस्ट प्रमोद सिंह ने जहर खाकर जान दे दी

मुंबई : एक दशक से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय पत्रकार प्रमोद सिंह ने सोमवार के दिन पृथ्वी लोक को आखिरी सलाम कर लिया। पिछले कई महीनों से बीमारी से जूझ रहे पत्रकार प्रमोद सिंह ने सोमवार को सुबह अपने आवास पर उस समय जहरीले पदार्थ का सेवन कर लिया जब घर पर कोई नहीं था।

उनकी हालत बिगड़ते देख पड़ोसियों ने तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया। परिजन जब अस्पताल पहुँचे तब प्रमोद आईसीयू में भर्ती थे। डॉक्टरों ने लाख कोशिश की लेकिन नहीं बचा सके। प्रमोद के अनुज (छोटा भाई) धर्मराज का कहना है कि कुछ

प्रमोद सिंह
प्रमोद सिंह
दिन पहले काम के सिलसिले में इंदौर जाने के लिए कहकर इंदौर चले गये थे। इसके बाद इंदौर से वापस आने के कुछ दिन बाद सोमवार को सुबह जब छोटा भाई काम पर चला गया। घर पर कोई नहीं था। तभी जहरीले पदार्थ का सेवन कर लिया।

एक साल पहले प्रमोद की मानसिक तनाव के चलते तबियत खराब हो गई थी लेकिन बाद में सेहत में सुधार हो गया था। प्रमोद सिंह मुंबई में क्राइम बीट के जाने माने पत्रकार हैं। अदालत की खबरें कवरेज़ करने में उन्हें महारत हासिल थी। पत्रकार प्रमोद ने मुंबई के लोकल चैनल सीटीवी, टीवी9, और जय महाराष्ट्र जैसे चैनलों में अपनी सेवाएं दे चुके थे। पत्रकार प्रमोद की मित्र मंडली में शोक का माहौल है।  

मुंबई से जितेंद्र की रिपोर्ट.
 

सियासत का नंगा चेहरा, सांप्रदायिकता और मुजफ्फरनगर

शुक्र है कि सांप्रदायिकता की आग में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को झोंक देने की साजिश ज्यादा कामयाब नहीं हुई। उन्माद का दौर कुछ थमता नजर आने लगा है। लेकिन, पिछले 3-4 दिनों में जितनी मार-काट हो चुकी है, वह कम नहीं है। खतरे की घंटी बज गई है। समाज के सेक्यूलर मिजाज के लोगों को आगे आना चाहिए। क्योंकि, यदि सरकार और प्रशासन के भरोसे ही सब कुछ छोड़ दिया गया, तो खतरा यही है कि केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही नहीं, देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जा सकता है।

अगले कुछ महीनों में उत्तर भारत के चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव का प्रचार अभियान भी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है। कई सियासी दलों को इंतजार है कि ऐसा कुछ हो जाए, जिससे की बैठे-बिठाए ही उनके पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए। ये सियासी दल, ऐसे नापाक हथकंडे पहले भी अजमा चुके हैं। ये लोग इस बार भी इस जुगाड़ में बढ़ते दिख रहे हैं। इसलिए, मुजफ्फरनगर की सांप्रदायिक चिंगारी के काफी खतरनाक निहितार्थ भी हो सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि इनकी चालों को समय रहते ही समझ लिया जाए।

उत्तर प्रदेश सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए अब काफी कड़े कदम उठाए हैं। सेना सहित तमाम सुरक्षा बलों को चप्पे-चप्पे पर तैनात किया गया है। लापरवाही के आरोप में सहारनपुर मंडल के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर तबादले आदि की गाज भी गिराई गई है। सरकार के इस कड़े रुख के बाद प्रशासन में चुस्ती देखने को जरूर मिल रही है। लेकिन, अहम सवाल यह है कि आखिर शुरुआती दौर में मुजफ्फरनगर का जिला प्रशासन और लखनऊ में बैठी अखिलेश सरकार इतनी गफलत में कैसे रही? प्रशासन के घोर नाकारापन को समझने के लिए, आइए दंगाई घटनाक्रम की कुछ बातों पर चर्चा करते चलें।

27 अगस्त को मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में एक मामूली झगड़े से पूरी रार बढ़ी है। हुआ यह था कि गांव की एक लड़की ने इस बात की शिकायत की थी कि उसे बस में एक अल्पसंख्यक लड़के ने छेड़ दिया था। इसकी शिकायत पीड़िता ने अपने मोबाइल से परिजनों को की थी। यह सूचना पाकर उसके खानदानी युवकों ने बस से छेड़छाड़ करने वाले दो युवकों को उतार लिया था। इनकी जमकर पिटाई की गई। इस पिटाई से एक की मौत हो गई थी। जब यह सूचना फैली, तो अल्पसंख्यकों की भीड़ ने दो हमलावर भाइयों की हत्या कर दी। दरअसल, एक ही दिन में हुई तीन हत्याओं से तनाव फैला था। यदि प्रशासन ने समय रहते कार्रवाई की होती, तो जातीय और सांप्रदायिक उन्माद बढ़ने की नौबत नहीं आती।

इस मामले में पीड़िता के परिजनों ने बिरादरी के लोगों से यही गुहार लगाई कि दूसरे पक्ष ने गलत लोगों को नामजद किया है। जबकि, ये लोग तो मारपीट में शामिल ही नहीं थे। इस बीच दोनों धड़ों के लोगों ने इस आपसी झगड़े को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। 30 अगस्त को मुजफ्फरनगर के मीनाक्षी चौक पर अल्पसंख्यक बिरादरी के कुछ लोगों ने इंसाफ दिलाने के नाम पर पंचायत कर डाली। इसमें कई छुटभैया नेताओं ने जहरीले भाषण किए। इसमें काफी भीड़ जुटी थी। लेकिन, प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। यहां तक कि अधिकारी इनसे ज्ञापन लेने के लिए इस पंचायत में ही पहुंच गए। इस घटना का प्रचार संघ परिवार के लोगों ने इस तरह किया कि सपा नेताओं के दबाव में प्रशासन काम कर रहा है। ऐसे में, उनका ज्ञापन लेने के लिए अधिकारी टोपीधारियों की पंचायत में भेजे गए। इस तरह साफ है कि सरकार और प्रशासन एक खास समुदाय के पक्ष में खड़ा है। ऐसे में, बहुसंख्यक समुदाय को इंसाफ नहीं मिल सकता।

भाजपा के कुछ नेताओं की सक्रियता के चलते जाटों की 36 बिरादरी की एक पंचायत नंगला मंदौड़ में 31 अगस्त को बुला ली गई। इसमें कई वक्ताओं ने भड़काऊ बयानबाजी की। प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि 7 सितंबर तक दूसरे पक्ष के नामित लोगों को हत्या के  मामले में गिरफ्तार नहीं किया जाता है, तो महापंचायत बुलाई जाएगी। इसमें आर-पार का फैसला होगा। दावा किया जा रहा है कि इस पंचायत में भाजपा के एक विधायक ने काफी भड़काऊ भाषण किया था। उसने इस कांड को हिंदुत्व की अस्मिता से जोड़ने की कोशिश की थी। यहां तक कहा था कि मुकाबला नहीं किया गया, तो बिरादरी की बहू-बेटियों की इज्जत सुरक्षित नहीं रह सकती। इन दो पंचायतों के बाद माहौल को गर्म करने की कोशिशें जारी हो गई थीं। लेकिन, जिला प्रशासन का रवैया लापरवाही का बना रहा। हालांकि, तनाव को देखते हुए प्रदेश के डीजीपी भी यहां का दौरा करके गए थे। जबकि, कई धड़े यहां नफरत की आग को हवा देने के काम में जुटे हुए थे। पता नहीं, कैसे खुफिया तंत्र को इसकी कोई भनक नहीं लग पाई?

5 सितंबर को संघ परिवार के घटकों ने मुजफ्फरनगर बंद का आह्वान किया था। इसको लेकर सांप्रदायिक आधार पर लामबंदी तेज की गई। इसके बावजूद प्रशासन ने इन गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाने की जरूरत नहीं समझी। इसी दौरान नंगला मंदौड़ गांव में ही महापंचायत बुलाने का फैसला किया गया। इसके लिए 7 सितंबर की तारीख तय की गई। शहर के तमाम लोगों को यह आभास हो गया था कि दोनों तरफ से पंचायतें होंगी, तो माहौल खराब होगा। तमाम आशंकाओं के बावजूद नंगला मंदौड़ में आयोजित ‘बहू-बेटियों की इज्जत बचाओ’ महापंचायत को होने दिया गया। यद्यपि, अब प्रशासन द्वारा दावा किया जा रहा है कि उसने इसके लिए आधिकारिक अनुमति नहीं दी थी। सवाल यह है कि यदि अनुमति नहीं दी थी, तो इस पंचायत को रोकने-टोकने की कोशिशें क्यों नहीं की गईं? जबकि, यह महापंचायत कोई अंडर ग्राउंड तौर-तरीकों से नहीं हो रही थी। पूरे प्रशासन को पता था कि इस महापंचायत के लिए भाजपा ने पूरा जोर लगा रखा है। फिर भी, प्रशासन की नींद नहीं टूटी।

इस महापंचायत में करीब 1 लाख लोग जुटे थे। ये भीड़ स्थानीय लोगों की थी। इसमें खासतौर पर एक बिरादरी के लोग ही जुटे थे। ट्रैक्टरों में भरकर ये लोग आए थे। सबको दिखाई पड़ रहा था कि ट्रैक्टरों में आई भीड़ के पास राइफल और बंदूक जैसे हथियार भी हैं। इस पर शुरुआती दौर में यही कहा गया कि ये हथियार लाइसेंस वाले हैं। इनको लेकर ज्यादा ऐतराज करने की जरूरत नहीं है। बताते हैं कि महापंचायत में कई सियासी नेताओं ने जमकर भड़काने वाले भाषण किए। इससे लोगों के अंदर गुस्से जज्बा बढ़ा। जब भीड़ वापस जा रही थी, तो लौटते वक्त अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाकों में इन पर कुछ पत्थरबाजी हुई। यहीं से सांप्रदायिक हिंसा का नंगा नाच शुरू हुआ। पहले ही दिन करीब 10 लोग मारे गए। सैकड़ों लोगों के घर जला दिए गए। दर्जनों लोग लहू-लुहान होकर अस्पतालों की तरफ भागे। इसके पहले ही सोशल मीडिया के जरिए शरारती तत्वों ने बड़ी साजिश की तैयारी कर ली थी। खास तौर पर फेसबुक के जरिए एक फर्जी वीडियो अपलोड किया गया। इसमें दिखाया गया कि कैसे टोपीधारी भीड़ दो युवकों को दरिंदगी से पीट-पीट कर मार डालती है। इस फर्जी वीडियो की क्लिपिंग लोगों के मोबाइल पर भी भेजी जाने लगी। जिस तरह से कुछ साल पहले गणेश जी को दूध पीने वाली अफवाह कुछ घंटों में ही देशव्यापी बना दी गई थी। कुछ इसी तर्ज पर इस क्लिपिंग का भी प्रसार किया गया। यह अफवाह फैलाई गई कि एक खास समुदाय के लोगों ने हमारे दो लड़कों का यह हाल किया है। जाहिर है ऐसे में, लोगों का सांप्रदायिक गुस्सा ऊफान पर आना था। वह जमकर आया भी। जबकि, हकीकत यह है कि यह फर्जी वीडियो अफगानी तालिबानियों की एक करतूत का था।

सांप्रदायिक आग जब बेकाबू होने लगी, तो प्रशासन ने सेना बुला ली। फ्लैग मार्च हुए। मुजफ्फरनगर में ही करीब 10 हजार सुरक्षाबल तैनात कर दिए गए। इसके बावजूद रविवार और सोमवार को भी हिंसा का उन्माद बढ़ता रहा। शहर में कर्फ्यू के बावजूद शामली, बागपत व हापुड़ तक हिंसा की लपटें फैलने लगीं। मुश्किल यह आई कि नफरत की आग ग्रामीण इलाकों में ज्यादा फैल गई, तो वहां सुरक्षाबलों के जरिए भी स्थिति नियंत्रण में लाना मुश्किल रहेगा। यह जरूर रहा कि स्थिति काफी गंभीर होने पर लखनऊ में सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने निर्णायक भूमिका में अपने को आगे किया। उन्होंने देर रात जाग-जागकर आलाअफसरों से रिपोर्ट ली। जल्दी-जल्दी कई कदम उठाए। सख्त संदेश देने के लिए कई अफसरों के खिलाफ कार्रवाई हुई। विपक्ष के 40 नेताओं के खिलाफ दंगा भड़काने के लिए गिरफ्तारी के आदेश जारी किए गए। इस ताबड़तोड़ कार्रवाई से सियासी नेताओं के हौसले भी कुछ कमजोर जरूर पड़े। लेकिन, तब तक काफी देर हो चुकी थी। खतरनाक बात यह रही कि कई इलाकों से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बड़े शहरों के लिए पलायन करने लगे। खबर है कि करीब 300 परिवार डरकर अपने गांवों से ही चले गए हैं।

इस बीच सपा के खिलाफ बसपा, रालोद व भाजपा जैसे दल खुलकर सामने आए। इन दलों ने अखिलेश सरकार को बर्खास्त करने की मांग भी शुरू की। कांग्रेस ने भी तीखे तेवर दिखाए। राज्यपाल बीएल जोशी ने केंद्र को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में प्रशासनिक लापरवाही का उल्लेख किया है। राज्यपाल की रिपोर्ट से सपा नेताओं को मिर्ची लगी है। नरेश अग्रवाल जैसे सपाई नेताओं ने इस पर नाराजगी भी जाहिर की है। अब मुलायम सिंह ने कहना शुरू किया है कि मुजफ्फरनगर में जो कुछ हुआ है, यह सांप्रदायिक दंगा नहीं, बल्कि यह तो एक बड़ा जातीय संघर्ष था। सपा सुप्रीमो भले इस हादसे को लेकर अपनी सरकार की इज्जत बचाने के लिए ‘नई परिभाषाएं’ गढ़ें। लेकिन, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जरूरत इस बात की है कि लोग सियासी दलों के नापाक झांसों का असली मकसद समझ लें। वे अच्छी तरह जान लें कि वोट बैंक की राजनीति के लिए ज्यादा हाय-तौबा मचाया जा रहा है। सपा नेतृत्व के लिए भी अभी एक मौका है कि वह सांप्रदायिक आग के खेल में न उलझे। वरना, इसमें जलकर बहुत कुछ रहा-सहा खाक हो सकता है। क्योंकि, आग का ऐसा धर्म होता है कि वह अपने-पराए में फर्क नहीं करती। इन दंगों में अभी तक 42 लोगों के मरने की खबर है। इस मामले में केंद्र को भी केवल तमाशबीन की भूमिका में नहीं रहना चाहिए। क्योंकि, नफरत का यह लुकाटा कहीं भी बर्बादी की नई कहानी लिख सकता है। यह खतरा टला भी कहां है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

यशभारती से सम्‍मानित गाजीपुर के पत्रकार विजय बाबू का निधन

पूर्वान्चल के वयोवृद्ध पत्रकार विजय कुमार का बुधवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।पत्रकार विजय कुमार प्रदेश सरकार की ओर से यशभारती सम्मान से सम्मानित थे।बेहद सरल स्वभाव के विजय कुमार जी ने समाचारपत्र राष्ट्रीय सहारा,दैनिक आज,जनवार्ता समेत कई पत्र पत्रिकाओं मे बतौर पत्रकार अपनी सेवाएं दी थी।

ग्रामीण परिवेश से लगाव रखने वाले विजय कुमार ने हमेशा अपने जनपद गाजीपुर मे ही रहकर काम किया।ग्रामीण अंचलों की खबरो को प्रमुखता देने वाले विजय कुमार ने कई बड़े समाचार पत्रों मे महत्वपूर्ण पदो को ठुकराते हुये आजीवन गाजीपुर के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के मद्देनजर अपनी लेखनी को केन्द्रित रखा। लंबे अर्से तक पत्रकारिता जगत से जुड़े रहे विजय कुमार अपने अंतिम समय तक नये पत्रकारों को प्रोत्साहन देने मे जुटे रहे।गाजीपुर के पत्रकारिता जगत की दो पीढ़ियां विजय बाबू की बेबाक लेखनी की गवाह हैं।पिछले कुछ दिन पहले ही उन्होने हार्निया का आपरेशन कराया था और तबियत बिगड़ने पर उन्हे इलाज के लिये वाराणसी ले जाया जा रहा था कि रास्ते मे ही उनकी मृत्यु हो गयी।उनके निधन की खबर मिलते ही पत्रकारिता जगत मे शोक की लहर दौड़ गयी।गाजीपुर के बड़ीबाग स्थित उनके निवास पर पहुंच कर बड़ी संख्या मे पत्रकारो ने शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाया।विजय बाबू पत्रकारिता के साथ साथ राजनीति और समाजसेवा मे भी लगातार सक्रिय रहे।उन्होने विधानसभा का चुनाव भी लड़ा।यशभारती से सम्मानित विजय कुमार को पत्रकारिता मे उनके उल्लेखनीय कार्य के चलते गाजीपुर गौरव सम्मान से भी नवाजा गया था।

गाजीपुर से केके की रिपोर्ट.

इंजेक्शन देख डरे आसाराम ने नारको टेस्ट से बचाने के लिए डाक्टरों के आगे हाथ जोड़े

जोधपुर से खबर है कि जेल में बंद आसाराम बापू ने मेडिकल टेस्ट के लिए खून देने से इनकार कर दिया. ब्लड सैंपल लेते समय आसाराम बहुत घबराए हुए थे. उन्हें इंजेक्शन लगाकर नारको टेस्ट किए जाने का डर सता रहा था. सोमवार को जोधपुर के मथुरादास माथुर हॉस्पिटल में आसाराम की करीब डेढ़ घंटे तक मेडिकल जांच की गई. डॉक्टरों ने टेस्ट के लिए उनका ब्लड सैंपल लेना चाहा, तो वह आनाकानी करने लगे. कभी वह डॉक्टरों के आगे हाथ जोड़ते तो कभी उन्हें दुलारने लगते. वह कहने लगे कि मुझ पर जुल्म किया जा रहा है.

इंजेक्शन देखकर तो वह और घबरा गए. उन्होंने कहा कि पुलिस के कहने पर मुझे गलत इंजेक्शन लगाया जा सकता है. आसाराम को यह डर भी सता रहा था कि उनका नारको टेस्ट किया जा सकता है. उन्होंने डॉक्टरों से पूछा कि कहीं इंजेक्शन लगाकर मेरा नारको टेस्ट तो नहीं कराया जा रहा. जिस वक्त यह सब हो रहा था, मीडियाकर्मी भी पास ही मौजूद थे. एक न्यूज चैनल के मुताबिक आसाराम ने डॉक्टरों से कहा कि पत्रकारों को यहां से बाहर भेजिए. आसाराम ने आशंका जाहिर की कि मीडिया उन्हें एड्स होने की खबर चला सकता है. 6 सितंबर को डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशन कोर्ट ने आदेश दिया था कि आसाराम की सेहत की जांच करने के बाद पूरी रिपोर्ट कोर्ट में जमा कराई जाए.

आसाराम के यौन उत्पीड़न की शिकार लड़की के पिता ने आसाराम का नार्को टेस्ट कराने की मांग की है. लड़की के पिता ने आज शाहजहांपुर में अपने आवास पर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि पुलिस को आसाराम का पॉलीग्राफ टेस्ट और ब्रेन मैपिंग करानी चाहिए, जिससे उनका सच दुनिया के सामने आ सके और झूठ बेनकाब हो. उन्होंने कहा कि यदि आसाराम समर्थक मेरी बेटी को गलत मानते हैं, तो भी उनका नार्को परीक्षण कराया जाये और मेरे पूरे परिवार की भी जांच करा ली जाये. पीड़िता के पिता ने सीबीआई जांच पर जोर देते हुए कहा कि जो लोग आसाराम का बचाव कर रहे हैं, उन्हें भी इस बात पर जोर देना चाहिए ताकि सच सामने आ सके.

आसाराम पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगानेवाली नाबालिग लड़की ने कहा है कि उसका मकसद अब आईएएस अफसर बनना है. उसने कहा कि वह उस रात को कभी नहीं भूल पाएगी जो उसके साथ हुआ है.  उसने कहा- पहले मैं चार्ट्ड एकाउंटेंट बनना चाहती थी लेकिन अब मैं आईएएस अफसर बनकर ऐसे लोगों (आसाराम) को सबक सिखाना चाहती हूं. उसने कहा कि मेरी जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही. वह रात मेरी जिंदगी में कहर बनकर आई. कभी नहीं भूल पाऊंगी मैं वह सब. आसाराम ने हमारे सपने चूर कर दिए. कल तक मैं सीए बनना चाहती थी. लेकिन अब आईएएस ही बनूंगी. इसके लिए चाहे मुझे कितना भी कड़ा संघर्ष क्यों न करना पड़े. बस यह बुरा वक्त गुजर जाए. पीड़ित लड़की ने इस बात की अपने पिता से आशंका जताई है कि वह अब जोधपुर में अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाएगी.

Cartoonist Sushil Kalra passed away on September 8, 2013 in Maryland USA

: Sushil Kalra – An HT Cartoonist :  Sushil Kalra was born on a sizzling day, the 13th of June, 1940 at Gujranwala, now Pakistan.  After dabbling a lot in various sciences, he realized his aptitude and joined the College of Arts in New Delhi.  Working as an ad man, he found that the products he campaigned for became more popular than him, and he started scribbling humor drawings under his initials.  Subsequently, he completely drifted into the world of humor and by 1968, was drawing cartoons for Hindustan Times publications. His cartoons used to appear on the front page of Hindi Hindustan and Evening News.

Widely travelled abroad, as far as the North pole, his works were exhibited and published in several Western and European Countries. He had a number of political columns, including his creation, Chittu Nittu,a column in Nandan, an HT monthly children’s magazine.  He had been drawing this children cartoons strip for 44 years.  He wrote a novel (Nikka Nimana), subsequently translated in Punjabi and English.

He was a well-known Indian TV personality and was interviewed on BBC.  He presented a 38 episode primetime Sunday TV quiz and was selected as one of the top 10 Indian Cartoonists in a TV series. Upon retirement from Hindustan Times, he started spending a considerable time in US with his sons.  To help aspiring artists he joined International Artists Support Group (IASG), a Washington DC, organization. He single handedly organized 6 international exhibits for this group at Lalit Kala Academy in New Delhi.

In 2011, he was diagnosed with stage 4 cancer.  When his daughter in law (cancer doctor) broke the news to him. He told his family, not to disclose the diagnosis to anyone, as he did not want anyone to ask “how he is doing”.  While undergoing chemotherapy treatment, he started at a rapid speed to finish the translation of “Nikka Nimana” in English.  He also regularly continued to submit the monthly chittu Nittu script from US, irrespective of his health condition.  Upon finishing the Nikka Nimana’s translation, he decided that he needed to write about the most important segment of his life, partition of India and Pakistan and his experience as a 7 year old child through this event, Ek Mat, Kayamat. Both the books are in-print.

Sushil Kalra passed away on September 8, 2013 in Maryland USA.  He was surrounded by wife, two sons, daughters in laws and grandchildren.

हां, हम स्ट्रिंगर हैं, हमें इसका गुमान है, हमने बचा रखी है अपने दिल में धड़कन, आंखों में पानी और चेहरे पर लज्जा…

प्रिय यशवंत जी, राजेश वर्मा की शहादत के बाद से लगातार भड़ास देख पढ़ रहा हूं। आइबीएन वालों का जमीर अब तो जागे। ये सिर्फ एक राजेश वर्मा की कहानी नहीं है, हजारों राजेश वर्मा जो फर्ज के लिए जान न्योछावर करते हैं, इन्हें इनकी कोई परवाह नहीं होती … परवाह बस टीआरपी और पैसों की होती है।

पूरा देश आज इनसे इंसाफ मांग रहा है… आपके साथ पूरा देश खड़ा है । हम सब मिलकर इस आवाज को इतना बुलंद करें कि इन बहरों के कान तक ये आवाज पहुंचे। अगुआ आप बनें,  हम सब साथ हैं। एक स्ट्रिंगर के दर्द की बानगी कुछ लाइनों में भेज रहा हूं। हो सके तो इसे पोर्टल पर स्थान दें। आग्रह यह भी कि इन आकाओं के खिलाफ तब तक आवाज उठती रहे जब तक कोई गंगा इस हिमालय से न निकल जाए।

भवदीय

विवेक चन्द्र

लाइफस्टाइल टीवी

पटना


एक स्ट्रिंगर के आंसू…….

-विवेक चंद्र-

मुझसे मत पुछो मेरा दर्द……  बस सिसकने दो मुझे यू ही अनवरत….. सिसकता ही तो आया हूं अब तक…. आज मेरा एक और भाई षहीद हो गया…..पता था मुझे कि फर्ज पर कुर्बान होने के बाद भी आकाओं को एक स्क्रांल तक चलाने का वक्त नहीं मिलेगा। दुख नहीं होता मुझे अब तो आदत हो गई है। खुद के कैमरे से जान पर खेल ब्रेककिंग करने वालों के लिए किसे फुर्सत है। हम टीआरपी  देते हैं पर टीआरपी नहीं बन पातें । गलती हमारी ही है हम ने अपने अंदर के पत्रकार को अब तक नहीं मारा। एक धंधेबाज नहीं बन पाए… एक लाइजनर नहीं बन पाए… बन पाते तो आज बाइक पर कैमरा लाद खबरें ढूढने और लाने का जुनून छोड़ एसी स्टुडियेां में ब्रेक के बाद कर रहे होते…. चेहरे

पर मेकअप पुतबा पोलिटिकल डीवेट कर रहे होते और किसी  के मौत की वैल्यू टीआरपी के वेट से टटोल रहे होते…. नहीं …नहीं …. नहीं … चाहिए हमें ऐसी खुशी…. नहीं चाहिए वैसा काम ….जहां दिल बस साउंड इफेंकट डाल धड़काया जाता है और कैमरे के सामने चीख चिल्ला कर लाशें बेची जाती हैं, वो भी प्रोफाइल देखकर ….. मेरे हजारों भाइयों ने आज भी अपना जमीर बेचना मुनासिब नहीं समझा … हमें गर्व है कि हम फर्ज के लिए अपनी जान देते हैं…. हां, हम स्ट्रिंगर हैं….. और हमें इसका गुमान है….. हमें गर्व भी है कि आज भी हमने बचा रखी है अपने दिल में धड़कन, आंखों में पानी और चेहरे पर लज्जा। हिम्मत हो तो कभी एसी न्यूज रूम से निकल एक दिन के लिए भी स्ट्रिंगर बनकर देख लेना। सिसकने दो मुझे.. रोने दो मुझे… आज तो मत रोको… बह जाने दो आंसुओं को … मैंने अपने भाई को खोया है……

क़मर मेवाड़ी को देवेन्द्र स्मृति पुरस्कार

राजसमन्द। गांधी सेवा सदन राजसमन्द के संस्थापक, साहित्यकार, पत्रकार, स्वाधीनता सेनानी एवं चिन्तक देवेन्द्र कर्णावट की पुण्य तिथि पर छठा देवेन्द्र स्मृति पुरस्कार वरिष्ठ साहित्यकार एवं संबोधन त्रैमासिक के सम्पादक क़मर मेवाड़ी को प्रदान किया गया. उन्हें शाल, प्रशस्ति पत्र एवं 210000/- रु की राशि भेंट कर समानित किया गया.

कार्यक्रम का संचालन डॉ महेंद्र कर्णावट ने किया. मुख्य अतिथि राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष वेद व्यास थे. क़मर मेवाड़ी ने कई संस्मरण सुनाकर देवेन्द्र कर्णावट की यादों को ताज़ा किया. इस अवसर पर मधुसूदन पंड्या, कर्नल देशबंधु आचार्य, माधव नागदा गुणसागर कर्नावट, प्रफुल्ल बड़ोला, शेख अब्दुल हमीद, डूंगरसिंह कर्णावट, मधुसूदन व्यास, अफ़जल खां अफ़जल, किशन कबीरा और एम डी कनेरिया की महत्त्वपूर्ण भागीदारी रही.

‘के न्यूज’ चैनल से राजीव ओझा और काशीनाथ यादव का इस्तीफा, सेलरी न मिलने से स्ट्रिंगरों में असंतोष

कानपुर से शुरू हुआ 'के न्यूज' चैनल परवान चढ़ने से पहले ही मालिकों की अदूरदर्शिता का शिकार होने लगा है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पत्रकारों को 2 माह बिना आई.डी. और 2 माह बना अथारिटी लेटर के काम करना पड़ा. अब दोनों देने के बाद सैलरी के लिए परेशान किया जा रहा है..

कहीं-कहीं 3 से 4 माह काम करने वालों को भीख के तौर पर 500 से लेकर 2500 तक दिया गया है.. साथ ही साथ कई जिलों के स्टाफरों और मंडलों के पत्रकारों को केवल आश्वासन देते बाहर का रास्ता दिखा दिया है.. इनपुट और एसाइनमेंट का काम देखने वाले राजीव ओझा और वरिष्ठ पत्रकार काशीनाथ यादव पहले ही मालिकों के कारनामों को भांपकर किनारा कर चुके हैं.. अब तो हालात यह हो गई है कि कई  पत्रकारों ने खबरों को भेजना बंद कर दिया है..
 

दैनिक भास्कर, सोनीपत के ब्यूरो चीफ पर ब्लैकमेलिंग व उगाही के आरोप लगाते हुए कोलोनाइजर ने भेजा मालिकों को पत्र

Dear Editor Sir, I am writing this mail to you to inform you about a person, Mr. Dharmesh Pandey. He is the Beaureu Chief of Sonipat centre, Dainik Bhaskar. He is a person who selling media for his personal benefits. I had bought a land and after some days he publishes a news in dainik bhaskar saying that the land is illeagal.

When I asked him he just said that he has 2 daughters, if I could do anything for them, he would not publish any further news on that matter and asked a big amount of bribe from me. After giving him the money also he threatens me and blackmails me for more money. Regarding this matter earlier I have mailed to the GM and many more persons of higher posts of Dainik Bhaskar but no action was taken. With this mail I am attaching the mail which I have done earlier, So sir please help me out in this matter.

Regards

Ashok Sharma


कोलोनाइजर अशोक शर्मा द्वारा दैनिक भास्कर के मालिकों को भेजा गया पत्र ये है…

From: "ashok sharma"

Sent: Mon, 05 Aug 2013 12:12:20

To: "pawan@dainikbhaskargroup.com (pawan@dainikbhaskargroup.com),"md@dainikbhaskargroup.com"(md@dainikbhaskargroup.com),"sudhir@dainikbhaskargroup.com"(sudhir@dainikbhaskargroup.com),"girish@dainikbhaskargroup.com"(girish@dainikbhaskargroup.com)
Cc: "hrcell@mp.bhaskarnet.com"(hrcell@mp.bhaskarnet.com)
Subject: infomartion for sonipat

R/sir,

My name is Ashok Sharma and I am a colonizer from Sonipat. Recently I had purchased the land of ECE factory. The bureau chief of your news paper in Sonipat Mr. Dharmesh Pandey says it to be illegal which is a Legal Peace of Land. Regarding this land of mine, Dharmesh Pandey published  a very big news on the front page of your news paper on 30/5/13 When I talked to him regarding that news, he straightaway asked for a bribe of 30lakhs. After many negotiations I gave him Rs.1.5 lakhs.

I thought that it would be the end of my problems, but it was not so. Even after taking 1.5lakhs from me, he is again blackmailing me. He blackmails me and says that Sonipat Bhaskar news paper belongs to him. Now at this point of time I am feddup with this person because I cannot tolerate this blackmailing anymore. Earlier I made a complaint to the editor Mr. Shiv Kumar Vivek and the G.M Mr. Dheeraj Tripathi of your news paper and after which Dharmesh Pandey started to blackmail me more as compared to earlier and no action was taken against Dharmesh Pandey after my Compliant. As no news was being published regarding me in the news paper after giving him 1.5Lakhs but I was being blackmailed again and again.

In Sonipat the situation is so worse that if a person wants a real news to be published in Dainik Bhaskar, it is not possible without money and if a person wants a fake news to be published, it is possible with money. Dharmesh Pandey takes 500 to 1000 rupees of a photograph to be published. The people who are a garbage in the society, their photographs are being published in Sonipat Bhaskar with the title-'Pramukh Samaaj Sevi'. I am associated with Dainik Bhaskar from the time when no one knew Dainik Bhaskar. From the year 2000 I am associated with Dainik Bhaskar but I did not knew that this is not a media which shows a true face of society but it is an organization lead by people like Dharmesh Pandey.

In Sonipat if a big business man asks Dharmesh Pandey for any favour, he straightaway says that he has two daughters and just do whatever they can do for them. All the expenses of his daughters are paid by the big businessmen of Sonipat. Sir, I by many efforts have collected all your E-mail I'd's and hope that you people would help me out in this matter, but if you do not solve my problem, I with all my circle and group of businessman would boycott your newspaper in Haryana and would try to remove your newspaper from wherever possible for me. Many people from Sonipat are irritated from this person but no one raises voice against him, but I have done so because, I can say these words in front of you and Dharmesh Pandey also, if you say me to do so. Earlier also there was a complaint against him in Karnal, but no action was taken against him. I want this person to be removed from this organization or else I shall do what I want.

Regards

Ashok Sharma

बनारस में ‘जी न्यूज’ से क्यों देना पड़ा राम सुंदर मिश्रा को इस्तीफा, पढ़ें पूरा पत्र

सेवा में, श्रीमान इनपुट एडिटर, जी न्यूज़ उत्तर प्रदेश /उत्तराखंड, महोदय, सविनय निवेदन के साथ अवगत कराते हुए बताना चाहता हूं कि मैं पिछले चार वर्षों से चैनल की सेवा कर रहा हूँ। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हमेशा चैनल को आगे रक्खा हूँ। वाराणसी का बम ब्लास्ट रहा हो, सोयेपुर जहरीली शराब कांड, लिकर किंग पूर्व सांसद की जवाहर जायसवाल की गिरफ़्तारी, विधायक अजय राय के गुर्गों द्वारा बीज व्यापारी को जलाने का मामला, सेना की तोप लादे ट्रक से वसूली के मामले के बाद बवाल, ऐसे न जाने कितनी और खबरें। मेरे द्वारा भेजी गई खबरें स्पेशल ही नहीं बल्कि ब्रेकिंग और पूरे दीन की हेडलाइन रही है।

13 महीने के बनवास के बाद जब पुनः आया तो उसके बाद भी ब्रिजेश सिंह के भतीजे सतीश सिंह हत्याकांड से लेकर कावारिया बवाल तक की कवरेज करते हुए चैनल को आगे रक्खा। कावारिया बवाल में खुद छुट्टी पर था तथा इलाहाबाद हाई कोर्ट में काम के बाद ट्रेन से लौट रहा था तो रास्ते में जानकारी हुई कि कछवा में बवाल हो गया है। मैं ट्रेन छोड़कर 7-8 किलोमीटर पैदल चलकर घटना स्थल पर पहुंचा और अपने कैमरा मैन को बुलाया तथा कुछ बवाल के शाट्स अपने मोबाइल से बनाया। तब तक मेरा कैमरामैन भी पहुंच गया और हमने शाट्स बनाये। ओवी बैन से विजुवल ब्रेक कराया। इसका परिणाम रहा कि जी न्यूज चैनल ने किसी अन्य चैनल से 2 घंटे पहले विजुवल ब्रेक किया। उसी दौरान पुलिस ने लाठी चार्ज किया और मैं अकेले कवरेज कर रहा था। काफी शाट्स बना लिए थे लेकिन उसी दौरान पुलिस के अधिकारियों की नजर मुझ पर पड़ी जिसका परिणाम रहा कि अधिकारियों ने मुझे पीटकर कैमरा छीन लिया। मैंने एसाइनमेंट डेस्क पर फ़ोन करके बताया लेकिन दुर्भाग्य ये कि चैनल के किसी भी व्यक्ति का एक सहानुभूति काल भी नहीं आई।

विगत 16 तारीख को मेरी खबरें रोक दी गई। जब मैंने पता किया तो मुझे जानकारी हुई कि डेन नेटवर्क के एमएसओ धर्मेन्द सिंह "दीनू" की शिकायत पर रोका गया है। पुनः दिनांक 31.08.2013 को खबरें शुरू की गई। खबर के शुरू करने के बाद ही डेन नेटवर्क ने चैनल का प्रसारण बंद कर दिया गया। इस सम्बन्ध में मैं बताना चाहता हूं कि ये एक अपराधी है और इनके तीनों भाइयों पर गुंडा एक्ट, गैंगेस्टर के साथ मिर्जापुर, जौनपुर, चंदौली वाराणसी में मुकदमे दर्ज हैं। इनके तीनों भाइयों ने मेरे मामा की NH 2 पर करोड़ों की कीमती जमीन फर्जी रजिस्ट्री करा ली थी जिसके सम्बन्ध में मेरे ममेरे भाई ने FIR कराया था।

पुलिस ने विवेचना के बाद चार्ज शीट न्यायालय में दाखिल किया है जिसमें ट्रायल शुरू होने वाला है। ये लोग उस मुकदमे में सुलह समझौते के लिए दबाव बना रहे थे। पैसे से लेकर धमकी तक दी थी। जब मैं नहीं माना तो इन लोगों ने चैनल बंद कर दिया है और मुझे हटाने के लिए चैनल पर दबाव बना रहे हैं। इस स्थित में चैनल के हर निर्णय मुझे सहर्ष स्वीकार होगा। लेकिन सबसे बड़ा दुखद ये रहा कि आज जब मैं ऑफिस गया तो ब्यूरो इंचार्ज अमित सिंह ने कहा कि ''राम सुंदर जी, दीनू आपको हटाने के लिए बार-बार मुझे धमकी दे रहा है, मुझे डर लग रहा है, जब तक चैनल दीनू से समझौता नहीं कर लेता, तब तक आप अपनी खबरें बाहर से ही भेज दिया करिये।'' मैं सुनकर अवाक् रह गया। मुझे बेहद आत्मग्लानि हुई कि जिस अपराधी की हिम्मत नहीं होती है हमसे बात करे, उससे हमारे ब्यूरो को डर लगता है।

ऐसी स्थिति में तो चैनल में काम करना बेहद कठिन है। अगर चैनल को मेरी वजह से व्यावसायिक नुकसान हो रहा है तथा वाराणसी ब्यूरो में गुंडों के आतंक से प्रभावित हो रहा है तो इसे मेरा स्पष्टीकरण नहीं त्यागपत्र समझा जाय, और स्वीकृति का एक मेल ही सही दे दिया जाय ताकि चैनल स्वस्थ्य वातारण में वाराणसी में काम कर सके।

राम सुन्दर मिश्र

स्ट्रिंगर

वाराणसी

जी न्यूज (यूपी-उत्तराखंड)
 

हिन्दुस्तान की गलत खबर से रद्द हुआ छात्रा का नामांकन!

श्रीनगर (उत्तराखंड)। हिन्दुस्तान के श्रीनगर प्रभारी की गलत न्यूज से एचएनबी गढवाल विवि के बिड़ला कैंपस से छात्रसंघ चुनाव में विश्वविद्यालय प्रतिनिधि (यूआर) के लिए चुनाव लड़ रही एक मात्र महिला प्रत्याशी संगीता बडोनी का नामांकन रद्द कर दिया गया. हिंदुस्तान अखबार में गलत कैप्शन के साथ तस्वीर का प्रकाशन कर दिया गया जिसको संज्ञान लेकर मुख्य चुनाव अधिकारी ने नामांकन रद्द किया.

गढ़वाल विवि में यूआर प्रत्याशी के पांच नामांकनों में चार नामांकन विभिन्न शिकायतों पर मुख्य चुनाव अधिकारी प्रो एसएस देव ने रद कर दिये थे. इसमें संगीता बडोनी का निर्विरोध निर्वाचन तय था. किंतु हिन्दुस्तान पेपर ने एक न्यूज प्रकाशित की थी, जिसमें लिखा था संगीता बडोनी क्लास गैदरिंग करती हुईं. न्यूज पेपर की कटिंग के साथ दर्शन दानू द्वारा संगीता बडोनी की शिकायत की गई, जिसमें क्लास गैदरिंग की पुष्टि थी, जिससे चुनाव अधिकारी ने हिन्दुस्तान समाचार पत्र का संज्ञान लेते हुए संगीता बडोनी का नामांकन रदद कर दिया. नामांकन रद होने से हिन्दुस्तान समाचार पत्र की श्रीनगर में बड़ी किरकिर हुई है. हर मौहल्ले व गली में हिन्दुस्तान अखबार के कारण संगीता का नामांकन रदद होने की चर्चा चलती रही.
 

दैनिक भास्कर, झारखंड की तीनों यूनिटों को मिले संपादक

दैनिक भास्कर, धनबाद के संपादक बसंत झा को रांची का संपादक बिना दिया गया है. धनबाद में राकेश पाठक को संपादक बनाया गया है. रांची में डीएनई संजय सिंह को जमशेदपुर का संपादक बनाकर भेजा जा रहा है. ये जानकारियां एक मेल के जरिए दी गई है. बताया जाता है कि धनबाद से रांची जा रहे बसंत ने अपने पीछे राकेश पाठक को संपादक बनवा दिया है.

भड़ास तक अपने संस्थान की गोपनीय जानकारियां bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं. मेल भेजने वाले का नाम पता हमेशा गोपनीय रखा जाएगा.

सुप्रिय प्रसाद : दुमका से दिल्ली तक… तुम ही तुम हो

Amarendra Kishore :  ज़िंदगी में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं जब मेरी भाषा और शैली मेरी सोच, संवेदना और सृजनशीलता के सामने जवाब देने लगती है। आज अपने संस्थान के एक संगी सुप्रिय प्रसाद के बारे में लिखते हुए सालों बाद मेरी शब्द सम्पदा और शैली खुद को कमजोर महसूस कर रही है। मतलब सुप्रिय की उपलब्धि मेरी सोच, शैली और शब्द से बहुत आगे है।

आज हम सोचने को जरूर मजबूर हैं कि कार्य शैली के किस गुर ने सुप्रिय को इतना सफल और नामवर बनाया। एक प्रसंग याद करता हूँ कि १९९५ में दैनिक राष्ट्रिय सहारा के उप संपादक (प्रशिक्षु) पद की जांच परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना हम सहपाठियों केलिए खबर थी। मगर वह उसकी असफलता नहीं थी और न ही योग्यता बल्कि जो भी हुआ वह उस युग का एक दस्तक था जो युग सुप्रिय के नाम लिखा जाना था।

यह विचित्र संयोग है कि झारखण्ड से आयी दो हस्तियाँ लोकमानस में अपना विशिष्ठ स्थान बनाकर देश, दुनिया और समाज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं– पहला रांची के महिंदर सिंह धोनी और दूसरा दुमका शहर के सुप्रिय प्रसाद। आईआईएमसी से पत्रकारिता करने के बाद सुप्रिय प्रसाद ने क़मर वहीद नक़वी के अधीन एक ट्रेनी के तौर पर आजतक ज्वाइन किया था। तब आजतक एसपी सिंह के निर्देशन में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला एक बुलेटिन भर था। आज की तारीख में टीवी टुडे ग्रुप के चारों चैनलों- आजतक, तेज, हेडलाइंस टुडे और दिल्ली आजतक की जिम्‍मेदारी सुप्रिय के कंधे पर है। इसे कहते हैं सफलता।

करीब २० साल पहले झारखंड के एक कस्बानुमा शहर दुमका के टीन बाज़ार से बतौर स्ट्रिंगर पत्रकारिता का अपना सफ़र शुरू करने वाले सुप्रिय आज हिन्दी टीवी पत्रकारिता के उन चार संपादकों (आशुतोष, दीपक चौरसिया और अजीत अंजूम ) में शुमार हैं जिनके नाम से चैनल का रुतबा है। तभी तो टीवी की दुनिया में कहा जाता है कि सुपिय्र केवल टीआरपी मास्‍टर ही नहीं बल्कि तकनीक के भी जानकार हैं। अपनी टीम से कैसे काम लिया जाता है, इसको भी वे भली-भांति जानते हैं। इससे आगे यह भी कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि सुप्रिय की उपलब्धियां जानने केलिए कोई सर्च इन्ज़िन तलाशने की जरूरत नहीं बल्कि फिलवक्त आजतक जो भी है उसमें सुप्रिया की निष्ठां, इमानदारी और कर्मठता है। आजतक का इतिहास सुप्रिय का इतिहास है।

सुप्रिय प्रसाद
सुप्रिय प्रसाद
जनसंचार संसथान की एक घटना याद आती है। दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी श्री मुकुल अग्रवाल आये थे– खोजी पत्रकारिता पढ़ाने और अभ्यास करवाने। विषय था "विमान खरीद सौदे में दलाली"– हमें उस दलाली का पर्दाफाश करना था। उस अभ्यास में जो टीम अव्वल रही, उसकी अगुआई सुप्रिय कर रहे थे। सुप्रिय खबरों को जाननेवाला और उसकी एहमियत समझनेवाला इंसान है। इसी वजह से वह हिन्दी टीवी पत्रकारिता का सबसे सफल और सिद्ध संपादक है। वह खबर को जीवन मानता है, जीवन का कोई हिस्सा नहीं। समय के साथ खबरें कैसे अपना रंग बदलतीं हैं, ढंग बदलतीं हैं और अपना तर्ज़ बदलतीं हैं, कोई सुप्रिय से पूछे। उसके लिए खबरों का ट्रीटमेंट पूजा है, इबादत है। इसके बावजूद सुप्रिय की पत्रकारिता से जुडी कई ख्वाहिशें हैं, ढेरों मन्नतें हैं, जिसे वह पूरा करना चाहते हैं। हम मित्रों की दुआ है कि वे तमाम ख्वाहिशें सुप्रिय के कदम चूमे और मन्नतें उसके सिर चूमे। 

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट यूं हैं…

Ratnessh Srivastwa Supriya ko all the best wishes.
 
Manoj Khandelwal सुप्रिय प्रसाद is a man of down to earth . so sober in nature . I met with him in a brief meeting with lSurendra pratap singh some 20 yrs ago . proud to be an IIMCian .
 
Amrita Maurya Really the quality of Supriya cant be defined in words, he is unparalleled. Like you Amarendra I have so many good memories with him. He is very hard working and dedicated since beginning. Hats off to you Supriya. In the above mentioned task of "Wiman -sauda" where Supriya-team got top place, my team didnt got even penetrate the fencing of Dalals. He had been too enthusiastic and passionate about TV journalism, one day when Raghawachari Sir came into class Supriya complaint him that he had not taught us even the alphabet ' R' of his name, in TV journalism and Sir literally surprised to listen his straight words: this kind of thirst he had for TV journalism. Supriya works 48 hours per-day in 24 hours(that we all have) as i seen. I met him so many times when he used to make the cassette of Aaj Tak Half an Hour Prog for DD2 , it's a long distance he covered in a short spam just because of hard work. And recently I met him in Delhi few months back, just after his promotion, I found him as simple, sober and loving as he was in those days. Supriya we are proud of you and think HIGHLY OF YOU. Keep going on…..
 
Nalin Chauhan He is a asset for Journalism and kohinoor of our batch.
 
Dheeraj Vashistha सौभाग्य से सुप्रिय सर के साथ मुझे भी काम करने का मौका मिला है.. न्यूज़ रुम की शोर के बीच वो बुद्धत्व जैसी शांति लिए नज़र आते हैं… वो जानते हैं कि ठंडे दिमाग के साथ काम को गर्मजोशी से कैसे किया और करवाया जाता है.. वो प्रेरणा के स्तोत्र हैं.. उनके प्रति आदर और प्रेम हैं..
 
Amit Pandey अपने नाम के अनुरूप सुप्रिय है सुप्रिय प्रसाद, अमरेंद्र जी झारखण्ड निर्माण के पहले से पत्रकारिता कर रहे सुप्रिय जी को बिहार के खनिज, पहाड़, उधोग की तरह सिर्फ "झारखण्ड के दुमका" से न बताये, बल्कि बृहद बिहार के दुमका से बताये। ऐसे लोग अपने घर परिवार के साथ प्रदेश के भी गौरव होते है।
 
Ankit Srivastava supriya prasad ko jab bhi television par dekhta hu to lagta hai ki jamin se juda hua koi vyakti hmari baato ko rakh rha hai.
 
Vibha Rani Ankit g maine to kabhi Supriyo Prasad ko tv pr nhi dekha. Inki uplabdhi achhi hai aur lekh bhi umda hai. Lekh jaari rakhe.
 
Vikas Mishra सुप्रिय के साथ नौ महीने का साथ आईआईएमसी में और करीब सात साल का साथ प्रोफेशनल सहयोगी के तौर पर रहा है। सुप्रिय को एक बात असाधारण बनानी है और वो है उनका साधारण होना। सब कुछ नेचुरल है। गुस्सा, प्यार, डांट, फटकार, शाबासी… ये सब बिना सोचे समझे निर्बाध रूप से आता है। दिल में किसी के लिए कुछ बुरा रखते नहीं और ऑफिस पॉलिटिक्स से कोई नाता नहीं है। प्लानिंग बेजोड़ है। सुप्रिय की जैसे शादी ही टीवी पत्रकारिता से हुई है। बेडरूम में भी आधा दर्जन टीवी है, जिस पर हर वक्त न्यूज चैनल चलता रहता है। मोबाइल पर भी आजतक चलता है। सुप्रिय बेजा वक्त खराब करने वाली किसी भी एक्टिविटी से नहीं जुड़े हैं। नाइट पार्टियां, सेमीनार, बौद्धिक जुगाली, कॉलम राइटिंग, सोशल नेटवर्किंग, शराब-सिगरेट- गुटखा, गुटबंदी वगैरह से सदा दूर हैं। दफ्तर में कौन क्या करता है, क्या कर सकता है, ये वो बखूबी जानते हैं और सबकी क्षमता के हिसाब से सबको काम सौंपते हैं। कौन सा विजुअल कब आया, कब चला सब सुप्रिय को याद रहता है। दस साल का रनडाउन का इतिहास लिखत पढ़त में सुप्रिय के पास मौजूद है। बहुत कुछ है जो विलक्षण है। इतना बिजी रहने के बावजूद सुप्रिय को इसका ख्याल रहता है कि फलाना आदमी बेरोजगार है, उसके लिए कुछ करना है। इस पद पर इतनी इंसानियत बचा ले जाना सुप्रिय की सबसे बड़ी सफलता है। सुप्रिय जितने बढ़िया मैनेजिंग एडिटर हैं, उतने ही बढ़िया इंसान भी हैं। हम सभी के लिए सुप्रिय गर्व का विषय हैं।
 
Manoranjan Singh Singh bhut accha bhai j may abhi pakur me hu
 
Vikas Mishra एक वाकया बताता हूं। वी़डियोकॉन टावर में दफ्तर था। रात साढ़े दस का शो था मेरा, सब तैयार तैयार था। सुप्रिय बोले कि निकलोगे, मैंने कहा कोई खास बात। सुप्रिय बोले आज गाड़ी नहीं है मेरे पास, तुम मुझे घर छोड़ते हुए निकल जाना। मैंने सोचा चलो इसी बहाने बहुत दिन बाद सुप्रिय से आधे घंटे-चालीस मिनट इत्मिनान से बात तो होगी। खैर जैसे गाड़ी बढ़ी, सुप्रिय मोबाइल पर आजतक देखने लगे। दस मिनट चला ब्रेक आया। तब पहली आवाज आई- और सब कैसा चल रहा है। यार कुछ नया सोचो, बढ़िया प्रोग्राम लांच करने हैं। खैर ब्रेक खत्म और सुप्रिय मोबाइल पर फिर आजतक देखने में मशगूल। ब्रेक आया तो ऑफिस में फोन करके 11 बजे के बुलेटिन में क्या हेडलाइन लोगे, इसकी पूछताछ। मैंने गुस्से में गाड़ी तेज कर दी। सुप्रिय ने फोन रखा, बोले- बड़ी जल्दी आ गए हम लोग। पूरे रास्ते एक बार भी ठीक से बात नहीं हो पाई। दफ्तर में भी यही होता है। पांच मिनट इत्मिनान से बात करने का मुहूर्त कई बार दो दो महीने बाद निकल पाता है।
 
Vikas Mishra अमरेंद्र, एक चीज करेक्ट कर लो, न कर पाओ तो भी मैं क्लीयर कर दूं कि सुप्रिय के पास आजतक, तेज और दिल्ली आजतक के हेड हैं। हेडलाइंस टुडे के मैनेजिंग एडिटर राहुल कंवल हैं।
 
Amrita Maurya Thanks to share the qualities of Supriya that resides within him till date, what we realised in our student-life.
 
S.a. Asthana कर्मठता के आगे सफलता को झुकना ही पड़ता है विकाश जी ! सुप्रिय को ढेरो शुभ कामनाये !
 
Amarendra Kishore भाई विकास! जानकारी केलिए शुक्रिया।

Alok Kumar लगन का नाम सफलता है। सुप्रिय सफलता की यह चाभी सम्हालकर रखते हैं।

‘फूट डालो राज करो’ की राजनीति के उस्ताद हैं मुलायम, यही फार्मूला बेटे को सिखा रहे

: दंगों के बाद तेजी से होता है वोटों का ध्रुवीकरण : साम्प्रदायिक अनिवार्यता की स्वीकार्यता का बढ़ता ग्राफ : लखनऊ : उत्तर प्रदेश के अमन-चैन को किसकी नजर लग गई है। इस सवाल का जबाव प्रत्येक शांति पसंद नागरिक जानना चाहता है। सपा के डेढ़ वर्ष के शासनकाल में   करीब 50 बार साम्प्रदायिकता की आग में और अनेकों बार मजहबी तनाव में राज्य की जनता झुलस चुकी है। दर्जनों लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं। सैकड़ों घायल अस्पतालों में पड़े हैं। कारोबार का नुकसान अलग हो रहा है। उत्तर प्रदेश के बिगड़े हालातों के कारण उद्योगपति भी यहां पैसा लगाने से परहेज कर रहे हैं। कोई इस बात की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है कि क्यों रह-रहकर लोग खून के प्यासे हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश को सरकार की नाकामयाबी की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

विपक्ष समाजवादी सरकार को बदनाम करने के लिये सूबे की आबो हवा में साम्प्रदायिकता का जहर घोल रहा है या फिर सरकार के नाकारेपन से प्रदेश बार-बार दंगों की आग में झुलस रहा है। यह यक्ष प्रश्न बन गया है। सबसे दुख की बात यह है कि ऐसे मौकों पर जनता के जख्मों पर लेप लगाने की बजाये नेतागण आरोप-प्रत्यारोपों की ‘मंडी’ सजा कर बैठ जाते हैं। अपने ऊपर तो जिम्मेदारी लेते नहीं। अधिकारियों के पेंच कसे नहीं जाते। सवाल यह उठता है कि जब दंगे की संभावना मात्र से एक आईएएस को निलंबित किया जा सकता है तो फिर उस सरकार को भी तो कुछ सजा मिलनी चाहिए जिसके राज में दंगों की बाढ़ आई हुई है। यह कहकर सरकार अपने दामन के दाग धो नहीं सकती है कि यह विपक्षियों की साजिश है। हालात ऐसे ही बने रहे तो समाजवादी सरकार के लिये अपना कार्यकाल पूरा करना मुश्किल हो जायेगा। दुख की बात यह भी है कि मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के जिलों में फैले दंगें थम भी नहीं पाये हैं और इसी बीच मिर्जापुर, श्रावस्ती, आगरा आदि कुछ जिलों मे भी दो समुदायों के बीच गरमा-गरमी की खबरें डरा रही हैं।

मुजफ्फरनगर की हिंसा ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये। जिला स्तर के कुछ अधिकारियों का निलंबन या फिर तबादला करके सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती है। मुख्यमंत्री समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव जिनके पास गृह मंत्रालय भी है, वह ऐसे मौकों पर क्या कर करते रहते हैं। डीजीपी देवराज नागर, एडीजी लॉ एंड आर्डर अरूण कुमार मुजफ्फरनगर ने दंगा प्रभावित इलाके का दौरा किया था, सब कुछ ठीकठाक होने की बात कही जा रही थी, लखनऊ में बैठे मुख्य सचिव जावेद उस्मानी भी सरकार के सुर में सुर मिला रहे थे। केन्द्रीय गृह मंत्रालय पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार को सचेत कर चुका था कि छोटी-छोटी घटनाएं बड़े तनाव की वजह बन रही हैं, लेकिन दिल्ली की गद्दी के लिये उतावले सपा नेताओं ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के हालात से निपटने की बजाये अन्य राज्यों में सपा को मजबूती प्रदान करने के लिये दौरे कर रहे थे। अक्सर देखने में यह आया है कि उनकों जहां होना चाहिए होता है वह वहां नहीं दिखते हैं। यह स्थिति इस लिये आती है क्यों कि उनके ऊपर बैठे ‘सुपर सीएम’ राजनीति के मैदान में उनके आका हैं।

तमाम साम्प्रदायिक हिंसा की वारदातों या फिर किसी कौम पर अत्याचार की घटना के बाद राजनेता मरहम लगाने के नाम पर वोटों के धु्रवीकरण का खेल शुरू करते हैं। अयोध्या विवाद के बाद ऐसा ही धु्रवीकरण सपा-भाजपा के बीच देखने को मिला था, जिसकी धमक कई वर्षों तक सुनायी दी थी। दलितों पर अत्याचार के नाम बसपा भी दलित वोटरों को अपने पक्ष में लामबंद करती रही है। अब तो साम्प्रदायिक हिंसा को राजनीति शास्त्र के पाठ की उपमा दी जाने लगी है। अब तो राजनैतिक पंडित और बुद्धिजीवी शार्टकर्ट में वोटों के ध्रुवीकरण के लिये साम्प्रदायिक अनिवार्यता की स्वीकार्यता की थ्योरी जरूरी बताने लगे हैं। नौकरशाही भी जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन करने के बजाये नेताओं के नाकारेपन का भरपूर फायदा उठा कर अपनी नौकरी चला रही है। पीड़ित को इंसाफ और गुनाहगार को सजा का फार्मूला सपा राज में बेईमानी हो गया है, जिस राज्य का मुखिया इंसाफ और सजा का पैमाना अपराधी या फिर भुक्तभोगी की जात-बिरादरी देख कर तय करता हो, वहां की जनता का भगवान ही मालिक हो सकता है। ऐसे राज्य सुलगते ही रहते हैं। जब उपद्रवी सेना के जवानों पर भी हमला करने की ताकत करने लगे, उपद्रवी खुले आम सुरक्षा कर्मियों के सामने असलहे लहरायें तो हालात की गंभीरता को समझा जा सकता है। सरकारी नाकामी या फिर वोट बैंक की राजनीति ही है जिसके चलते दंगें की आग गांवों तक पहुंच गई, जबकि पूर्व में ऐसा शायद ही कभी देखने को मिला हो। सरकार एक पक्ष मात्र बन कर रह गई है।

अफसोस की समाजवादी सरकार बसपा राज के भ्रष्टाचार का तो खूब ढिंढोरा पीटती है, लेकिन बसपा राज में कानून व्यवस्था, साम्प्रदायिक दंगों या तनाव के समय उसके द्वारा उठाये जाने वाले कड़े कदमों की तरफ उसका ध्यान कभी नहीं जाता है। बसपा राज में साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए तो इसकी एक मात्र वजह थी, तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का ऐसे मौकों पर निष्पक्ष होकर पुलिस को सख्ती के साथ पेश आने की छूट देना था। वह जिलाधिकारी और एसएसपी जैसे बड़े अधिकारियों को जरा से घटना होने पर ही अर्दब में ले लेती थीं। यही वजह थी उस समय छोटी-छोटी घटनाओं को निपटाने में भी अधिकारी एड़ी-चोटी का जोर लगा देते थे। बात पुरानी नहीं है, बसपा राज में उच्च न्यायालय का बाबरी मस्जिद/रामजन्म भूमि के संद्रर्भ में अहम फैसला आया था, लेकिन कहीं कोई हिंसा नहीं फैली। उस समय दहशत का आलम यह था कि फैसला आने के समय लोग घरों में किसी अनहोनी के डर से कैद हो गये थे, लेकिन सरकार की मुस्तैदी के चलते जनजीवन पूरी तरह से सामान्य रहा। कहीं कोई कर्फ्यू नहीं लगा। यही फैसला आज आया होता तो क्या हालात होते, यह सोचा और समझा जा सकता है। समाजवादी सरकार की नाकामी ही है जो कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी समाजवादी सरकार के मुकाबले बसपा सरकार की तारीफ करने को मजबूर हो गये। प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी को भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैले साम्प्रदायिक तनाव के बाद अखिलेश सरकार के खिलाफ केन्द्र को लिखना पड़ गया। राज्यपाल ने दंगों के लिये पूरी तरह से राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। बसपा सुप्रीमों को लगता है कि ऐसे दंगे भाजपा और सपा की राजनैतिक सांठगांठ से ही होते हैं।

वैसे, केन्द्र पहले ही इस बात पर नाराजगी जता चुका था कि उत्तर प्रदेश में छोटी-छोटी घटनाओं को समय रहते नही निपटाये जाने के कारण बाद में साम्प्रदायिक हालत बिगड़ जाते हैं। ऐसा ही कुछ मुजफ्फरनगर के कवाल में भी हुआ था। स्कूली लड़की से छेड़छाड़ और उसके बाद दो गुटों में हुए झगड़े को समय रहते सुलटा लिया जाता तो ऐसा नहीं होता, लेकिन पुलिस ने एक तरफा और वह भी गैर वाजिब कार्रवाई करके दूसरे समुदाय की नाराजगी मोल ले ली। एक के बदले दो लाशे गिराने के जुनून ने सब कुछ तबाह कर दिया। जो सरकार महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे करती हो उसके निजाम में महिलाओं-लड़कियों की आबरू से खिलवाड़ किया जाये, उनका डर के मारे सड़क पर निकलना मुश्किल हो जाये, ऐसी सरकार को सरकार नहीं एक पक्ष ही कहा जा सका है। अब, बसपा, राष्ट्रीय लोकदल सहित सम्पूर्ण विपक्ष राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहा है।

संभावना यह भी जताई जा रही है कि दंगों की आड़ में 2014 के लोकसभा चुनाव के लिये विभिन्न दलों के राजनैतिक आकाओं द्वारा चुनावी बिसात बिछाई जा रही है। सीधे तौर प्रदेश में हिंसा के लिये अखिलेश सरकार ही जिम्मेदार है, लेकिन भाजपा भी इस मौके को अपने हित में भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। वह समाजवादी सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाकर घेर नहीं है। पहले 84 कोसी परिक्रमा पर रोक के बहाने भाजपा ने सपा सरकार को घेरा, अब मुजफ्फरनगर और अन्य कुछ जिलों में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के बहाने वह सरकार को घेर रही है। भाजपा नेताओं पर दंगा भड़काने का अरोप लगाया जाने और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किये जाने के सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं। भाजपा से इत्तर है कांग्रेस और बसपा की परेशानी है। भाजपा तो यह मान कर चलती है कि उसके हाथ मुस्लिम वोट नहीं लगने वाला है, इसीलिये वह हिन्दू हितों के नाम पर सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती है, लेकिन कांग्रेस और बसपा को मुस्लिम वोटों की भी दरकार रहती है,इस लिये वह तुष्टिकरण जैसे शब्द चाहकर भी इस्तेमाल नहीं कर पाती है। यही कारण है कांग्रेस और बसपा को प्रदेश में राजनैतिक नुकसान होते दिखता है।

बहरहाल, जो भी हो मरना और तड़पना आम आदमी को पड़ रहा है। सभी दलों के नेता और जनप्रतिनिधि अपने-अपने घरौंदों में महफूज थे।दिन के उजाले में विभिन्न दलों के नेताओं द्वारा अखबारी बयानबाजी करके संवेदना जताई जाती हैं तो शाम को दंगों से फायदे-नुकसान का लेखा-जोखा खंगाला जाता है। मुजफ्फरनगर शहर के समाजवादी विधायक चितरंजन स्वरूप इस समय राज्य सरकार में मंत्री हैं। जिले में जब नफरत की आग फैली तो वह कोसों दूर वाराणसी में थे। पूर्व डीजीपी श्रीराम अरूण पूरे घटनाक्रम पर काफी निष्पक्ष तरीके से अपनी बात रखते हुए कहते हैं, नौकरशाह हों या खाकी वर्दी वाले सरकार का रूख जानते हैं। जहां काम करने वालों को सजा और नाकारा अधिकारियों को पनाह दी जाती हो वहां के हालात तो कुछ ऐसे ही होंगे। हालात यह हैं कि साम्प्रदायिक दंगों या अन्य अपराधिक वारदातों के समय पुलिस और प्रशासन सरकार की तरफ ताकते रहते हैं। ऐसे मौकों पर किसी तरह की कार्रवाई करके जेल जाने या निलंबित होने से बचने (जैसा की आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल) के लिये अधिकारी मूक दर्शक बने रहना बेहतर समझते हैं।

अखिलेश सरकार अमन-चैन के मोर्चे पर नाकाम हो रही है या फूट डालो राज करों की अंग्रेजो शैली को आगे बढ़ा रही है यह तो वह ही जानें, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह भी कुछ ऐसी ही राजनीति करा करते थे। जिस तरह मुख्यमंत्री बनते ही अखिलेश यादव ने प्रदेश को दंगों की आग में झोंक दिया ठीक इसी तरह उनके पिता मुलायम ने भी सन् 1990-91 में यूपी को दंगों की आग में झोंक दिया था। एक साथ प्रदेश के 45 जिलों में कर्फ्यू लगा था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और खासकर मुंजफ्फरनगर में जिस प्रायोजित तरीके से अफवाहें फैलाई गयी और पुलिस द्वारा दंगाइयों को माहौल को विषाक्त करने का पूरा मौका दिया गया उससे यह साफ है कि दंगे सरकार की मंशा के मुताबिक ही हुए हैं।

पिछड़ा समाज महासभा के एहसानुल हक मलिक और भागीदारी आंदोलन के पीसी कुरील और भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोइद अहमद कहते हैं कि सपा सरकार के डेढ़ वर्षों के शासनकाल में जिस तरह से दंगे दर दंगे उत्तर प्रदेश में लगातार हो रहे हैं और सरकार जिस तरह से इन दंगों को रोक पाने में लगातार विफल साबित हो रही है, इस बात की ओर इशारा है कि सपा सरकार प्रदेश की सांप्रदायिक ताकतों के आगे न केवल नतमस्तक हो चुकी है बल्कि इन दंगों की आड़ में हो रहे धार्मिक और जातीय धु्रवीकरण को अपने चुनावी लाभ के बतौर देख रही है। इन दंगों ने यह साबित कर दिया है कि प्रदेश की कानून और व्यवस्था चलाने वाले पुलिस अफसरों पर से सरकार का नियंत्रण एकदम खत्म हो गया है। मुजफ्फर नगर मे जो भी हो रहा है उसकी पृष्ठभूमि अचानक नहीं बनी लिहाजा इतने बड़े पैमाने पर हुए इस जन संघार को प्रायोजित करने में किन किन की भूमिका है इसकी सीबीआई जांच कराई जाए।

समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता, खाद्य रसद एवं कारागार मंत्री राजेन्द्र चौधरी जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही आते हैं, मुजफ्फरनगर में अशांति फैलाने वाले तत्वों की करतूत निदंनीय बताते है। वहॉ एक टी0वी0 पत्रकार सहित निर्दोष लोगों की मौत बहुत दुःखद है। समाजवादी पार्टी की सरकार सांप्रदायिक शक्तियों पर अंकुश लगाने और शांति तथा सद्भावना बनाए रखने को कृत संकल्प हैं। समाजवादी सरकार को निशाना बनाकर कांग्रेस, बसपा और भाजपा के जो नेता अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं वे प्रदेश की छवि खराब करना चाहते हैं।

समाजवादी पार्टी के अन्य नेता कहते हैं मुजफ्फरनगर में जो कुछ घटा है, उसके पीछे वे दल हैं जो राज्य सरकार की विकास योजनाओं से चिढें है और उन्हें अपनी जमीन खिसकती नजर आती है। उन्हें अपनी साजिश में सफल नहीं होने दिया जाएगा। कानून अपना काम करेगा। अपनी राजनीतिक रोटियॉ सेंकने के लिए विपक्षी भोले भाले नागरिकों को गुमराह करने की कोशिश न करें। किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती ।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

दिल की पेन ड्राइव में न जाने कितनी अनुभुतियां समाईं : ममता कालिया

प्रख्‍यात कथा लेखिका ममता कालिया सोमवार को अपनी रचना यात्रा के साथ अपने ही शहर में अपनों से मुखातिब हुईं। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय की ‘मेरी शब्‍दयात्रा’ कार्यक्रम के तहत उन्‍होंने पूरी विनम्रता और साफगोई के साथ अपनी रचना यात्रा के साथ रचना प्रक्रिया को भी साझा किया। मेरे दिल के पेन ड्राइव में राग-विराग एवं रचना संघर्ष सब कुछ ठसाठस भरा है। यह तो ऐसी शब्‍दयात्रा है जिमें रचनाकार कभी पास तो कभी फेल होता है। उन्‍होंने अपनी प्रिय कहानी ‘सुलेमान’ का पाठ भी किया।

उन्‍होंने कहा कि, कहानी लिखना एकाकी साधना है। इसमें बहुरंगी दुनिया से अपने को काटकर निर्वासित कर लेना होता है। यथार्थ से एक ज़ायज दूरी भी जरूरी है। सिर्फ कल्‍पना और भावना को क़ागज पर उतारने ही नहीं समय के सवालों, सरोकारों से जूझने के लिए लिखना शुरू किया। कभी सुबह के अखबार के साथ कोई कहानी चली आई तो कभी किसी अन्‍य घटना के साथ। एक साथ दिमाग में पांच-पांच कहानियां, तीन-तीन उपन्‍यास साथ आकार लेते रहे। रचनाकर्म के बीच उपन्‍सास महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसके लिए स्‍व से निकलकर पर में प्रवेश जरूरी है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्‍ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा, ममता की रचनाओं में वैविध्‍य है। पात्रों को गढ़ना कोर्इ उनसे सीखे। जीवन की तरह ही उनकी रचनाओं में सहजता पारदर्शी रूप में दिखती है। एक उपन्यास को पूरा करके, दूसरे पर काम करना, उसके लिए अंतरवस्‍तु को गढ़ना, किसी पीड़ादायी प्रक्रिया से कम नहीं है। जिस तरह ममता समन्‍वय स्‍थापित करती हैं, वैसा अन्‍य लेखकों में दुर्लभ है। विशिष्‍ट अतिथि वरिष्‍ठ कथाकार एवं ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने कहा, ममता के बहाने एक बार फिर स्‍मृतियां ताजा हुईं और इलाहाबाद की गलियों में घूमना भी। कथा लेखिका अनीता गोपेश ने बतौर रचनाकार नहीं बल्कि अच्‍छे इंसान के रूप में उनकी शख्सियत की खूबियों को साझा किया। स्‍मृतियों को सहेजते हुए कहा, ममता जी जितनी निश्‍छल हैं, उतनी ही उदार हैं। उन्‍होंने पूरी साफगोई, ईमानदारी से जिया और रचा। शुरूआत में श्री दूधनाथ सिंह ने शाल, गुलदस्‍ता प्रदान कर सम्‍मानित किया। क्षेत्रीय केंद्र के सत्‍य प्रकाश मिश्र सभागार में कार्यक्रम का संयोजन, संचालन और धन्‍यवाद ज्ञापन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।

अतिथियों का स्वागत असरार गांधी, नंदल हितैषी, नीलम शंकर एवं सहायक क्षेत्रीय निदेशक यशराज सिंह पाल, ने किया।  गोष्ठी में प्रमुख रूप से जियाउल हक, बुद्धिसेन शर्मा, श्रीप्रकाश मिश्र, हरीशचन्द्र पाण्डेय, बद्रीनारायण, असरफ अली बेग, हरिश्‍चन्द्र अग्रवाल, अजित पुष्‍कल, सुधांशु उपाध्याय, श्रीरंग, जयकृष्‍ण राय तुषार, फज़ले हसनैन, मेवाराम, मीनू रानी दुबे, विवेक सत्यांशु, नीलम शंकर, रमेश ग्रोवर, कीर्ति सिंह, रतीनाथ योगेश्‍वर, अनिल रंजन भौमिक, अशोक सिद्धार्थ, पूर्णिमा मालवीय, रमाकान्त राय, अंशुल त्रिपाठी, देवेश श्रीवास्तव, रविकांत, यास्मीन सुल्ताना, संध्या नवोदिता, सुरेन्द्र राही, एहतराम इस्लाम, कृष्‍णमोहन,, सम्पन्न श्रीवास्तव, सुधीर सिंह, धनंजय चोपड़ा, प्रवीण शेखर, शैलेन्द्र कपिल सहित तमाम साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्‍तुति

क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद

बृहत् समांतर कोश की पांच हजार प्रतियां छपी

भारतीय प्रकाशन जगत में एक चमत्कारी घटना थी स्वाधीनता के स्वर्ण जयंती वर्ष संबंधी समारोहों के अंतर्गत नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा समांतर कोश का सफल प्रकाशन. अरविंद कुमार के समांतर कोश ने आधुनिक भारत को पहला संपूर्ण विश्वस्तरीय थिसारस मिला था. इसे बनाने में उन्होंने अपने जीवन के पूरे बीस साल होम दिए थे. बीस साल की लगन और मेहनत के बाद 1996 मेँ प्रकाशित भारत के पहले थिसारस की दोनों खंड. इस का पहला सैट तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकर दयाल शर्मा को भेँट किया गया था. 1800 पेजों वाले उस कोश का 5,000 (पाँच हज़ार) प्रतियों का पहला संस्करण हाथोंहाथ बिक गया. छह महीने बीतते न बीतते इस की पुनरावृत्ति की 10,000 (दस हज़ार) प्रतियाँ छापी गईं. अब तक उस की छह पुनरावृत्तियाँ हो चुकी हैं.

इस काम के लिए अरविंद कुमार को अनेक साहित्यिक पुरस्कार और सम्मान प्रदान किए गए. महाराष्ट्र हिंदी अकादेमी का महाराष्ट्र भारती अखिल भारतीय हिंदी सेवा पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन का डाक्टर हरदेव बाहरी सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान का सुब्रह्मन्य भारती पुरस्कार, और 2011 में हिंदी अकादेमी (दिल्ली) का सर्वोच्च शलाका सम्मान. अब सतरह साल की मेहनत के बाद आया है इस का बृहत् संस्करण. बृहत् समांतर कोश के आगमन के साथ अब हुआ है वैसा ही एक और चमत्कार. आज विश्व भर में फैला हिंदी समाज और संसार में दूसरे नंबर की भाषा हिंदी तेज़ी से बदल और बढ़ रहे हैं. नित नई तकनीकों के प्रादुर्भाव से नई शब्दावली आ रही है. नए वैश्विक सांस्कृतिक और भौगोलिक संदर्भ हम से जुड़ रहे हैं. भारत में रहने वाले हिंदी साहित्यकारों और समाचारपत्रों का ध्यान नए विषयों की ओर जा रहा है, तो विदेशों में बसे भारतवंशी नए अनुभवों पर पर लिख रहे हैं. बदलते और आगे बढ़ते हिंदी वालों को चाहिए था एक भारत-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय थिसारस जो यह सब आत्मसात कर सके.

इसके लिए समांतर कोश के डाटा का गहन पुनरीक्षण किया गया. कुछ आर्थी कोटियोँ मँस पर्यायोँ की अत्यधिक भरमार थी, जैसे ‘शिव’ के लिए समांतर कोशमेँ 700 पर्यायथे. वे कम किए गए. (कम करने का मतलब है कि अनेक शब्दोँ को प्रकाशित होने वाली सूची मेँ से निकाल दिया गया. न कि उन्हेँ डाटा मेँ से निकाल दिया गया. इस समय हमारे डाटा मेँ शिव के कुल पर्यायोँ की संख्या 2,519 है.) डाटा मेँ कई शीर्षक बहुत छोटे थे, उन्हेँ अन्य शीर्षकोँ मेँ सम्मिलित किया गया. अब शीर्षकोँ की कुल संख्या 1100 से घट कर 988 रह गई.

शीर्षक तो कम किए, लेकिन कई नई अर्थी कोटियाँ सम्मिलित की गईं. हमारी अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओँ को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संदर्भों मेँ दिखाने के लिए कई नए उपशीर्षक बनाए गए. इस प्रकार समांतर कोश के 23,759 से उपशीर्षकोँ से बढ़ कर अब बृहत् समांतर कोश मेँ 25,562 उपशीर्षक हैँ. पहले अभिव्यक्तियोँ की संख्या कुल 1,60,850 थी. अब वे 2,90,477 हैँ. एकदम 1,803 उपशीर्षकोँ और 1,39,627 अभिव्यक्तियोँ की वृद्धि!

पिछले सतरह सालों की मेहनत के बाद बना यह बृहत् समांतर कोशइसी दिशा में सफल प्रयास है.इस में 988 शीर्षकों के अंतर्गत 25,562 उपशीर्षकोँमें 2,90,477अभिव्यक्तियाँहैं.समांतर कोशमें उपशीर्षकों के परस्पर संबद्ध तथा विपरीत क्रौस रैफ़रेंस नहीं थे.परिणामस्वरूप किसी किसी अभिव्यक्ति से संबद्ध या विपरीत शब्द उस के आस पास नहीं मिलते थे.उदाहरणार्थ-गणित ज्योतिष से फलित ज्योतिष बहुत दूर था. ऊपर नीचे पन्ने पलट कर भी पाठक भाग्य बताने वाली ज्योतिष तक नहीं पहुँच सकता था. इस का हल करने के लिए पुनरीक्षण की प्रक्रिया मेंबृहत् समांतर कोश मेँ 62,371 क्रौस रैफ़रेंस सम्मिलित किए गए हैँ.

समांतर कोश में वायुमंडल के पर्याय मात्र दिए गए थे. उन में एक पर्यावरण भी था.बृहत् में वायुमंडल के विभिन्न स्तरतो बताए ही गए हैं, पर्यावरण पर अपनेआप में स्वतंत्रख़ासी सामग्री भी है—
वायुमंडल – ध्वनिवाही आकाश, परिमंडल, पर्यावरण, फिजाँ, वातावरण, वियत, विहायस, वेष्टन, शब्दवाही आकाश, हवा.
क्षीण वायुमंडल – पतली पर्वतीय हवा, पतली हवा.
वायुमंडल स्तर (सूची) – आउटर वान ऐलन लेयर, आयन मंडल, इनर वान ऐलन लेयर, ई लेयर, उच्च वायुमंडल, ऐक्सोस्फ़ियर, ऐफ़-1लेयर, ट्रोपोपौज़, ट्रोपोस्फ़ियर, डी लेयर, थर्मोस्फ़ियर, निम्न वायुमंडल, मीज़ोपौज़, मैसोस्फ़ीअर, वान ऐलन लेयर, सल्फ़ेट लेयर, स्ट्रैटोपौज़, स्ट्रैटोस्फ़ियर.
उच्च वायुमंडल – इतर स्तर, उच्च वायुमंडल, विषम स्तर.
निम्न वायुमंडल – निम्न वायुमंडल, समस्तर.
आयन मंडल- आयनस्फ़िर, विद्युदणु मंडल, विद्युन्मंडल.
स्ट्रैटोस्फ़ियर – ओज़ोन आवरण, ओज़ोन पट्टी, समताप क्षेत्र, समताप मंडल.
मीज़ोपौज़ – मध्य सीमा, मैसोस्फ़ियर और थर्मोस्फ़ियर के बीच क्षेत्र.
स्ट्रैटोपौज़ – समताप सीमा, स्ट्रैटोस्फियर और मैसोस्फ़ियर के बीच क्षेत्र.
ऐक्सोस्फ़ियर – परामंडल, बहिर्मंडल, बाह्य मंडल, बाह्य वायुमंडल.
ट्रोपोपौज़ – क्षोभ सीमा, ट्रोपोस्फियर और स्ट्रैटोस्फ़ियर के बीच क्षेत्र.
थर्मोस्फ़ियर – ताप मंडल, तापवृद्धि मंडल, बाह्य वायुमंडल, मैसोपौज़ के ऊपर वाला क्षेत्र.
मैसोस्फ़ियर – मध्य मंडल, मध्य वायुमंडल, स्ट्रैटोपौज़ के ऊपर वाला क्षेत्र.
पर्यावरण – परिवेश, पृथ्वी पर जीवन संरक्षक परिदशा, फिजाँ, माहौल, वातावरण, हवापानी, हालात.
पर्यावरणरक्षा – परिरक्षण, पर्यावरण परिरक्षा, प्रकृति रक्षा, संरक्षण.
पर्यावरणप्रेम – पर्यावरणवाद.
पर्यावरणवादी – ग्रीन, पर्यावरण प्रेमी, प्रदूषणविरोधी.

इसी प्रकार की जानकारी मिलती है पोषव्यों के बारे में—
पोषव्य सं न्यूट्रीऐंट, पुष्टिकर पदार्थ, पोषक आहार, पोषक तत्त्व, पोषक द्रव्य.
पोषव्य (सूची) सं अमीनो अम्ल, ऐनज़ाइम, कार्बोहाइड्रेट, कैलरी, ग्लूकोस, प्रोटीन, सूक्ष्म पोषव्य.
अमीनो अम्ल सं अमीनो ऐसिड, आधार एकक, मूल एकक.
ऐनज़ाइम सं अनुयूषम, आयूषम, किण्वज, किण्वाणु, ख़मीर, प्रकिण्व.
ऐनज़ाइम (सूची) सं आर्गीनेज़, इनुलेज़, एस, ऐक्सोपैप्टिडेस, ऐनज़ाइम, ऐमिलेज़, और्गीनेज़ (विकल्प), काइनेज़, ज़ाइमेज, ट्रिपसिन, न्यूक्लिएज़, पैनक्रिएटिन, पैपेन, पोलिमरेज़, प्लाज्मिन, रैडक्टेज़, लाइसोज़ोम, हायालुरोनिडेज.
पैपसिन सं जठरिन, पाचकिन, पाचव्य, पाचिन.
लैक्टेस सं दुग्धेस, स्तन्य (प्राप्तिस्थानानुसार).
कार्बोहाइड्रेट सं अंगारोद्केट, अंगारोस, कार्बोद्केट (रूढ़ीकृत), शर्करव्य.
कैलरी सं खाद्य पदार्थ से उत्पन्न ऊर्जा.
ग्लूकोस सं फल रस में उपलब्ध शर्करा, मधुरव्य, मधुरोस.
शर्करोस सं इक्षु शर्करा, कार्बोहाइड्रेट, ग्लूकोस शूक्रोस आदि, घुलनशील मिष्ठ द्रव्य, शक्कर, शर्करव्य, शर्करा, शूक्रोस, सेक्कारोस.
शर्करोस (सूची) सं चुकंदर शर्करोस, जुआर शर्करा, फ्रक्टोस, मधु शर्करा, मधुशर्करा, माल्टोस, मैन्नोस, मैपल शूगर, लैक्टोस.
चुकंदर शर्करोस सं चुकंदरव्य, चुकंदर शर्करव्य, चुकंदर शर्करा, चुकंदरोस, बीट शूगर.
लैक्टोस सं दुग्ध शर्करा, दुग्धोस, मिल्क शूगर.
फ्रक्टोस सं फलव्य, फल शर्करव्य, फल शर्करा, फल शर्करोस, फलोस, लेव्यूलोस.
मधुशर्करा सं क्षौद्रजा, मधुव्य, माधवी, शुभ्रिका, सितजा.
मैपल शूगर सं मैपल शर्करा, मैपिल शर्करा, मैपिल शर्करोस, मैपिल शूगर.
माल्टोस सं अंकुरोस, जौ शर्करा, माल्ट शूगर, यवव्य, यव शर्करा, यवोस.
जुआर शर्करा सं जलबिंदुजा, पिंड शर्करा, यवनाल शर्करा, हिमशर्करा.

अरविंद कुमार का कहना है कि विश्व भर में फैला हिंदी समाज और संसार में दूसरे नंबर की भाषा हिंदी तेज़ी से बदल और बढ़ रहे हैं. नित नई तकनीकों के प्रादुर्भाव से नई शब्दावली आ रही है. नए वैश्विक सांस्कृतिक और भौगोलिक संदर्भ हम से जुड़ रहे हैं. भारत में रहने वाले हिंदी साहित्यकारों और समाचारपत्रों का ध्यान नए विषयों की ओर जा रहा है, तो विदेशों में बसे भारतवंशी नए अनुभवों पर पर लिख रहे हैं. बदलते और आगे बढ़ते हिंदी वालों को चाहिए था एक भारत-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय थिसारस जो यह सब आत्मसात कर सके.

समांतर कोश मेँ केवल भारतीय देवी देवताओँ के नाम और पर्याय थे. बृहत् समांतर कोश मेँ बच्चोँ का प्यारा सांता क्लौस तो है ही. और भी बहुत कुछ है—जैसे उदाहरण के तौर पर अभारतीय देवता अपोलो (ग्रीस), आमोन रे (मिस्र), एलगाबाल (हिब्रू), टाइटन (ग्रीस), फाइटोन (ग्रीस), फीबुश (ग्रीस), र (मिस्र), शमल (शाम), शोल (रोम), सूर्य देवता हाइपेरियोन औरहेलियोस (ग्रीस). और भी बहुत से ऐसे देवीदेवता बृहत् समांतर कोश मेँ हैँ. इस का एक लाभ यह है कि यदि आप मिथकीय मान्यताओँ पर कुछ लिख रहे हैँ, बनी बनाई जानकारी आप को तत्काल मिल जाएगी.

पूरी दुनिया मेँ क़दम बढ़ाते आज हम भारतीयोँ का, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण करने के रास्ते पर तेज़ी से बढ़ती हिंदी का और हिंदी वालोँ का, साबक़ाअनेक अल्पपरिचित संदर्भों से पड़ता है. इसलिए अनेक अंतर्सांस्कृतिक शृंखलाएँ हमारी अपनी शब्दावली से इस संस्करण मेँ परस्पर संबद्ध करते पिरोई गई हैँ. देखिए—.
स्वर्गसं अक्षय लोक, अगिर, अजर लोक, अदन, अपरलोक, अमरधाम, अमरपुर, अमर लोक, अमरालय, अमरावती, अमृत लोक, आनंद लोक, इंद्रपुरी, इंद्रलोक, ऊर्ध्वलोक, कैलास, ख़ुदा का घर, गार्डन आफ़ ईडन, जन्नत, जन्नते अदन, तरीष, ताविष, त्रिदशालय, त्रिदिव, त्रिविष्टप, दिव्यलोक, देवता लोक, देवभूमि, देवलोक, देवसदन, देवागार, देवालय, द्यावा, द्यु, द्युलोक, नाक, निसर्ग, नेमतकदा, पुण्यलोक, प्रमोद लोक, फ़िरदौस, बहिश्त, बाग़े क़ुदूस, बाग़े बिहिश्त, मंदर, मंदार, रहस, रोद, विष्टप, वीरमार्ग, वैकुंठ, शक्रलोक, सातवाँ आसमान, सुखधाम, सुखलोक, सुखाधार, सुरग, सुरधाम, सुरपुर, सुरलोक, सुरवास, सुरवेश्म, सुरसदन, सुरेंद्र लोक, सोनापुर, सोमधारा, स्वर्, स्वर्गद्वीप, स्वर्गधाम, स्वर्गलोक, हैवन.
बाग़े अदनसं अदन, अदन बाग़, अद्न, आदम पहला आवासस्थान, आदम हौवा उपवन, ईडन, गार्डन आफ़ ईडन, जन्नते अदन, बाग़े बिहिश्त.
ग्रीक स्वर्गसं ओलिंपस पर्वत, ओलिंपिक पर्वत, देवता वासस्थान, देवलोक, माउंट ओलिंपस.
ऐलीसियम क्षेत्रसं आनंद लोक, एलीसियम, ऐलीसियम, ऐलीसियम फ़ील्ड्स, मृत्यूपरांत स्वर्ग, सुखधाम, सुखलोक.
यहूदी स्वर्गसं ज़ायन, ज़ीयन, साइयो (हिब्रू), सायन, सेणयोन.
सातवाँ स्वर्गसं उच्चतम स्वर्ग, जन्नतुल फ़िरदौस, जन्नतुल मावा, लांतव

आप लेखक या पत्रकार हैं और स्पेन पर लिख रहे हैं तो उसके बारे में कुछ अतिरिक्त जानकारी आपकी रचना को रोचक बना देगी. मसलन यह कि अरब लोग उसे ‘अंदलुस’ कहते थे,कभी उसे 'इबीरिया’ कहा जाता था, लैटिन में उसे 'श्पानिया' कहते हैँ. ‘हिस्पानिया’ इसी का एक अन्य रूप है, और स्पेन के लोग अपने देश को ' ऐस्पान्या’ कहते हैं. स्पेन का नाम आते ही ‘बुलफ़ाइटिंग’ खेल की याद आना स्वाभाविक है, जो अभी ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा फ़िल्म मेँ दिखाया भी गया था. अतः स्पेन से सबंद्ध कोटियों में इस जानलेवा खेल का संदर्भ दिया गया है.

पूरी दुनिया की सैर करने वालों में आज हिंदुस्तानियों की गिनती सब से ऊपर मानी जाती है. अब अगर आप सैर सपाटे के लिए लोकप्रिय पहाड़ी देश स्विट्ज़रलैंड जा रहे हैं तो यह जानना लाभप्रद साबित हो सकता है कि यूरोप की भिन्न भाषाओं में इस देश के अन्य नाम क्या हैं- ‘श्फ़ीट्स’ (जरमन), ‘सुईस’ (फ़्रांसीसी), ‘स्वित्सेरा’ (इतालवी), ‘हेलवेशिया’ (लैटिन).इसे ‘स्वीज़रलैंड’ और‘स्वीस’भी कहा जाता है.

बढ़ती आर्थिक सामर्थ्य के आधार पर भारत की गिनती आज नई सदी मेँ संसार को प्रभावित करने वाले मुख्य देशों मेँ की जाती है. इस से देश का और हिंदी का दायित्व बढ़ जाता है. समय की माँग है कि हमारे भाषाई संसाधन समय की आवश्यकताओं को पूरा करें. इसलिएबृहत् समांतर कोशथिसारसों के दायरे को बढ़ा कर उसे मिनी ऐनसाइक्लोपीडिया या विश्वकोश के स्तर तक ले जाता है औरसब प्रकार के विषयों की संक्षिप्त जानकारी देने वाला संदर्भ ग्रंथ बन जाता है. अंतरिक्ष से भूगर्भ तक, पूर्व से पश्चिम तक, प्राचीन से नवीन तक, विदा से स्वागत तक सभी विषयोँ को समेटता यह महाकोश आज के हमारे वैश्विक समाज का दर्पण बन जाता है.

अरविद कुमार से अगर कोई बात करना चाहता है तो उन्हें 09716116106 पर फ़ोन कर सकता है. उन्हें बधाई दे सकता है. सी-18 चंद्रनगर, गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश के पते पर उन्हें चिटठी लिख सकता है. उन्हें samantarkosh@gmail.com पर भी चिट्ठी लिख सकता है.

पत्रकारों को बीमा और मुआवजा देगा ‘राष्ट्रीय पत्रकार एकता मंच’

पत्रकारों पर हो रहे हमलों के बाद पहली बार देश में एक ऐसे संगठन की शुरुआत हो रही है, जो देशभर के सभी पत्रकारों चाहे वो स्टाफ रिपोर्टर हो या कैमरामैन हो या फिर स्ट्रिंगर, सभी को राहत देने का काम करेगा। राष्ट्रीय पत्रकार एकता मंच नाम से गठित इस संगठन की खास बात ये है कि इसके सदस्यों को केवल सौ रुपये वार्षिक सदस्यता सहयोग करना होगा जिसकी एवज में संगठन की और से उस सदस्य को दो लाख रुपये का बीमा मिलेगा। साथ ही अगर किसी कवरेज के दौरान हमले या घटना में किसी स्ट्रिगंर का कैमरा आदि क्षतिग्रस्त होगा तो राष्ट्रीय पत्रकार एकता मंच उसे नया कैमरा देने या फिर मुआवजा देने का काम भी करेगा।

ये संगठन उन पत्रकारों और स्ट्रिगंरों के हक की आवाज़ उठाने वाला ये देश का पहला संगठन होगा, जिनका साथ चैनल, साथी पत्रकार और दूसरे संगठन नही देते हैं। इस संगठन का मकसद देश भर के स्ट्रिंगरों और स्वतंत्र पत्रकारों को संगठित कर उनकी आवाज़ बुलंद करना है। चाहे वो प्रिन्ट मीडिया से हों या इलेक्ट्रोनिक मीडिया से। आईये बुलंद किजीऐ अपनी आवाज़… हमारे साथ…..। राष्ट्रीय पत्रकार एकता मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन कर लिया गया है। आप सभी से अपील है कि इस संगठन से जुड़कर अपनी सुरक्षा और पत्रकार एकता को मज़बूत करने का काम करें। पत्रकार हित में एक और फैसला।

राष्ट्रीय पत्रकार एकता मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल मित्तल एवं कार्यकारिणी ने पत्रकारों के हित में एक अहम फैसला और कर लिया है। अब बीमा योजना के अलावा किसी भी घटना में कवरेज के दौरान घायल होने वाले पत्रकार एवं छायाकार को इलाज के लिये भी मदद दी जायेगी। साथ ही नौकरी से हटाये गये पत्रकार, छायाकार और स्ट्रिंगर को तीन माह तक सहयोग देने का काम भी राष्ट्रीय पत्रकार एकता मंच करेगा। राष्ट्रीय पत्रकार एकता मंच की सदस्यता के लिये तुरन्त सम्पर्क करें। 

श्री राहुल मित्तल
राष्ट्रीय अध्यक्ष
124, 125, 126 जय प्लाज़ा
अबूलेन, मेरठ।
फोन- 0121-4029768, 4050068
फैक्स- 0121-2643197
मोबाइल- 9837000068, 9760000068

श्री सलीम सैफी
राष्ट्रीय महासचिव
मोबाइल- 9412201528, 8954002233

श्री परवेज़ सागर
राष्ट्रीय संयुक्त सचिव।
मोबाइल- 9412130696
ईमेल- mail@parvezsagar.in

प्रेस विज्ञप्ति

एक जिद, जो देश के पत्रकारों के लिए नजीर बन गई

नई दिल्ली : कहते हैं कि अगर देश को बदलना है और विकास करना है तो अच्छे काम को लेकर जिद करो। जिद करने से एक साहस मिलता है और यह साहस ही जीत दिलाता है। कुछ ऐसी ही जिद राजधानी के मीडियाकर्मियों ने भी की। इस जिद ने न केवल मीडिया को दुष्कर्म संबंधी मामलों की अदालती कवरेज का अधिकार दिलाया, बल्कि उनकी जिद देशभर के पत्रकारों और अदालतों के लिए एक नजीर बन गई।

वसंत विहार सामूहिक दुष्कर्म मामले में हर पहलू को लेकर मीडिया द्वारा की गई पड़ताल से दिल्ली पुलिस तिलमिला उठी थी। पुलिस किसी भी तरह से इस मामले को लेकर मीडिया में आने वाली खबरों को रोक देना चाहती थी। इसके लिए पुलिस ने इस्तेमाल किया दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 327(2) के प्रावधान का। इसकेतहत किसी भी अखबार में दुष्कर्म संबंधी मामलों की रिपोर्टिग नहीं की जा सकती जिससे कि पीड़िता की पहचान सुरक्षित की जा सके।

पुलिस ने 3 जनवरी को साकेत कोर्ट के महानगर दंडाधिकारी सूर्य मलिक ग्रोवर की अदालत में अर्जी दायर कर सीआरपीसी की धारा 327 के तहत मीडिया रिपोर्टिग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। अदालत ने अर्जी पर फैसला सुनाते हुए 5 जनवरी को मीडिया रिपोर्टिग पर प्रतिबंध लगा दिया। दैनिक जागरण संवाददाता सहित 14 मीडियाकर्मियों के समूह ने दिल्ली उच्च न्यायालय की वकील मीनाक्षी लेखी के माध्यम से अपने अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर 10 जनवरी को एक याचिका उच्च न्यायालय में दायर कर दी। न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने 22 मार्च को अपना फैसला मीडियाकर्मियों के हक में सुनाया। 

(दैनिक जागरण में प्रकाशित पवन कुमार की रिपोर्ट)

दुनिया में सबसे ज्यादा न्यूज चैनल भारत में

हिसार : आज दुनिया में सबसे ज्यादा न्यूज चैनल भारत में है और हर वर्ष इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे मनोरजन व मीडिया उद्योग की भावी क्षमता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यह बात पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के मास कम्यूनिकेशन विभाग के प्रोफेसर डॉ. एनएस जौहल ने जीजेयू के संचार, प्रबंधन एवं तकनीकी विभाग में आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी के दौरान कही। वे विभाग में आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी मीडिया के बदलते आयाम विषय पर बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। संगोष्ठी की अध्यक्षता मीडिया अध्ययन संकाय के डीन एवं विभागाध्यक्ष प्रो. मनोज दयाल ने की।

उन्होंने कहा कि विश्व आज जिस संक्रमण के दौर से गुजर रहा है उससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है और मीडिया तो इसका अपवाद हो ही नही सकता। उसी कारण मीडिया व मनोरजन के क्षेत्र में तेजी से बदलाव आ रहा है। उन्होंने बताया जैसे-जैसे पाठक जागरूक होगा वैसे-वैसे पूंजीवादी शक्तिया स्वयं ही ध्वस्त हो जाएंगी, क्योंकि वर्तमान में सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए मीडिया की समाज में अहम भूमिका है।

मुख्य वक्ता प्रो. जौहल ने बताया कि वर्तमान समय में पत्रकारिता में नैतिक मूल्यों का समावेश होना बेहद जरूरी है। देश में टीवी चैनल्स से लेकर समाचार पत्र तेज गति से विकास कर रहे है। आज देश में लगभग 800 टीवी चैनल के लाइसेंस जारी हो चुके है जो कि विश्वभर में एक रिकार्ड है। एसोसिएट डा. विक्रम कौशिक ने मीडिया के आधुनिक ट्रेंडस पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि सोशल मीडिया आज न केवल युवाओं में अपितु हर वर्ग के लोगों में लोकप्रिय हो रहा है। इस अवसर पर वरिष्ठ प्राध्यापक मिहिर रजन पात्रा, डॉ. सुशील कुमार सिंह, प्रदीप कुमार, बलजिन्द्र कौर, कोमल रानी, ज्योति आदि मौजूद रहे। (दैनिक जागरण)

जानिए, ट्रक वालों से उगाही का रेट देश के किस हिस्से में कितना चल रहा है

हमारे एक चाचा हैं, नाम है मुंशीलाल पर हम उन्हें दद्दू कहते हैं। कुल चार साल मुझसे बड़े हैं लेकिन चाचा हैं सगे सो चाचागिरी कभी-कभी दिखा देते हैं। दद्दू ट्रक चलाते हैं। जब मूड आया तो नौकरी कर ली जब जी चाहा घर बैठ गए। चाची खूब खिसियाईं, रोई, पीटीं पर दद्दू पर असर नहीं। हारकर चाची ने खेती बटाई पर उठाई और खुद ही घर संभाल लिया। दो बेटियां ब्याह दीं और एक बेटा भी। बस एक बेटा बचा है। किस्साकोताह यह कि एक बार मैने चाचा से कहा कि मुझे भी अपने साथ ट्रक पर ले चलो। करीब बारह साल पहले चाचा आ गए कोलकाता और वहां के जनसत्ता में बतौर संपादक मेरा नाम छपा देखकर वे अपने भतीजे से मिलने आ गए।

रात को मैं उन्हें घर ले गया। चाचा बोले चाहो तो मेरे साथ चलो अभी तो कानपुर से माल लेकर यहां आया हूं अब इंफाल जाऊँगा फिर वहां से देखूंगा कहां का माल मिलेगा। मैंने कहा चलिए। चाचा का ट्रक हावड़ा के किसी ट्रांसपोर्ट कंपनी में खड़ा था। वे मुझे अपने साथ ले गए और रात को बड़ा बाजार आकर माल उतारा। रास्ते में हावड़ा ब्रिज पर उन्होंने वहां खड़े हवलदार को पांच का एक सिक्का दिया। मैंने कहा कि अरे यहां तो कम्युनिस्ट राज है यहां रिश्वत नहीं चलती। चाचा ने कहा कम्युनिस्ट राज है इसलिए पांच रुपये मुलायम सिंह का राज होता तो 50 रुपये और दिल्ली, हरियाणा व पंजाब में रेट मिनिमम सौ रुपये का है। यह दस्तूर है हम हर रेड लाइट पर दे देते हैं। फिर कोई झंझट नहीं चाहे जितना माल लादो चाहे जितनी बार रेड लाइट जंप करो। नार्थ ईस्ट के राज्यों में यह रेट पांच से दस रुपये के बीच ही था। पर नगालैंड में नगा आदिवासी भी हाथ दे देता तो दद्दू उसे भी पांच रुपये पकड़ा देते।

मैंने पूछा कि इन्हें क्यों देते हो? बोले यह नगाओं का दस्तूर है। अगर वो हाथ दे दे तो पांच रुपये पकड़ा दो वर्ना अगर उसने कहीं धावा बोल दिया तब फिर खैर नहीं। तब नृपेन दा के अगरतला में रेट बीस रुपये का था और अरुणाचल में 25 रुपये। अभी पिछले दिनों चाचा ट्रक लेकर दिल्ली आ गए। जा रहे थे मुंबई के पास, बोले चलोगे? मैंने कहा अभी आप जाइए, फिर अगली दफे चलूंगा। लेकिन उत्सुकतावश मैंने ट्रैफिक वालों के रेट पूछ लिए। दद्दू ने बताया कि अब यूपी का भरोसा नहीं रह गया है। गाजियाबाद में तो रेट सौ का है पर अगर नोएडा गए तो रेट दिल्ली वाला लगेगा यानी दो सौ रुपये, हरियाणा तथा राजस्थान के बहरोड तक यही रेट है। आगे फिर वही सौ रुपये।

मोदी के गुजरात में रेट दो सौ रुपये है और महाराष्ट्र में सौ रुपये पर मुंबई में दो सौ रुपये। दद्दू ने कहा कि आजकल पंजाब का रेट पांच सौ चल रहा है पर बाकी देश में हालात इतने खराब नहीं हैं। एक दिलचस्प बात बताई कि बिहार में रेट आजकल यूपी से ज्यादा है लेकिन बंगाल में अभी भी पांच के सिक्के से काम चल जाता है। मैंने पूछा कि माणिक सरकार बाबू के त्रिपुरा में? दद्दू ने बताया कि वहां रेट अब पचास रुपये का हो गया है। दद्दू ने एक बात और बताई कि यूपी व बिहार में गाड़ी ओवरटेक करने के लिए कोई अगर दो बार लगातार डिपर दे तो समझ जाओ कि यह लौंडा वीआईपी है और साइड दे दो। मैंने पूछा कि ये लौंडा वीआईपी क्या होता है तो दद्दू ने बताया कि किसी वीआईपी की बिगड़ैल संतान या कोई बोर्ड का चेयरमैन अथवा राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त फोकटिया मंत्री।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण जायसवाल नहीं रहे

सुलतानपुर : उत्तर प्रदेश में सुलतानपुर जिले के वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण जायसवाल का मंगलवार को निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। जायसवाल मूलत शिक्षक थे। उन्होंने 1970 में पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा और लगभग चार दशक तक विभिन्न समाचार पत्रों की सेवा की। वह कई पत्रकार संगठनों के सदस्य रहे तथा आपातकाल के दौरान जेल गये। आर्यसमाजी जीवन जीते हुए वह विभिन्न विद्यालयों की प्रबंध समिति के सदस्य रहे।

महात्मा गांधी स्मारक इंटर कॉलेज के शिक्षक रहे रामकृष्ण जायसवाल लखनऊ व कानपुर से प्रकाशित कई पत्र-पत्रिकाओं व समाचार एजेंसियों के जिला प्रतिनिधि रहे। इमरजेंसी के दौरान डेढ़ साल तक जेल में रहे, उन्हें लोकतंत्र रक्षक सेनानी का दर्जा मिला। आरएसएस के वाराणसी स्थित विश्व संवाद केंद्र के प्रभारी रहे। आर्यसमाज के संस्थापक के रूप में पांच दशक तक वैदिक विचारधाराओं का प्रचार किया। उन्होंने मंगलवार सुबह दस बजे शहर के बाटा गली स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। करीब आधा दर्जन शैक्षिक संस्थाओं में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। रुद्रनगर मुहल्ले में बुजुर्ग शायर आनंद कुंवर की अध्यक्षता में शोकसभा हुई। इसमें रविशंकर, ऊषा श्रीवास्तव, जयंत त्रिपाठी, डॉ.ओंकारनाथ द्विवेदी, कमल श्रीवास्तव एडवोकेट, डॉ.मन्नान सुल्तानपुरी, डॉ.विशुन नारायण, शत्रुनय मिश्रा, विनोद अग्रहरि आदि मौजूद रहे। वहीं मानव कल्याण जीवन संस्थान के संस्थापक जगदीश अग्रहरि, कमल श्रीवास्तव ने भी शोक व्यक्त किया। कहाकि ऐसे बिरले पुरुष कम मिलते हैं। इनके आदर्शो से हमे प्रेरणा लेनी चाहिए।
 

खोजी पत्रकार पुष्प को सफलता, सुप्रीम कोर्ट ने स्टिंग वाली सीडी की सीबीआई जांच की अर्जी को हरी झंडी दी

नई दिल्ली। गुजरात के पूर्व गृहराज्यमंत्री और तुलसीराम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ कांड के आरोपी अमित शाह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। साथ ही एक स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें बचाने की कोशिश करते दिख रहे बीजेपी के दो नेताओं पर भी शिकंजा कस सकता है। जिस खोजी पत्रकार ने ये स्टिंग ऑपरेशन किया था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की इजाजत दे दी है कि वो इस मामले की सीबीआई जांच की अर्जी दाखिल कर सके। पत्रकार का आरोप है कि अमित शाह ने इस केस में मिली जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है और इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए।

गौरतलब है कि खोजी पत्रकार पुष्प कुमार ने छह महीने पहले एक स्टिंग ऑपरेशन किया था। इसमें दिखाया गया है कि पार्टी के सांसद भूपेंद्र यादव एक खोजी पत्रकार से मिलकर इस बात की डील करते हैं कि पत्रकार तुलसीराम प्रजापति की मां नर्मदा बाई से एक सादा वकालतनामा हस्ताक्षर करा लाए ताकि वो इस केस में अपनी मर्जी का वकील रखकर उसे मैनेज कर सकें। वे इस स्टिंग ऑपरेशन में इसके लिए पैसे के लेनदेन और इंदौर में नर्मदा बाई की सुरक्षा के ठेके का जिक्र भी कर रहे हैं।

खोजी पत्रकार के स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया है कि बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर इस पूरी साजिश का हिस्सा हैं। वे दावा कर रहे हैं कि उन्होंने इस ऑपरेशन की जानकारी नरेंद्र मोदी को दे दी है और मोदी ने कहा है कि हमें अमित शाह को ही रिपोर्ट करना है। स्टिंग के तीसरे किरदार बीजेपी में आरएसएस के नुमाइंदे और पार्टी के संगठन महामंत्री रामलाल हैं। रामलाल को पूरी जानकारी है कि अमित शाह को बचाने की कोशिशें कहां तक पहुंची हैं। वो खोजी पत्रकार को भरोसा भी दिलाते हैं कि प्रकाश जावड़ेकर उनका सहयोग करेंगे।

स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया है कि कैसे बीजेपी की ये तिकड़ी मोदी की सहमति के साथ तुलसीराम प्रजापति का केस लड़ रही उसकी मां नर्मदा बाई को पटाकर उनसे एक वकालतनामा लिखवा रही है ताकि वो इस केस में अपना वकील खड़ा कर सकें। मतलब आरोपी अमित शाह का वकील मजबूती से केस लड़कर उन्हें बचाने में लगे और उसके खिलाफ लड़ रहा नर्मदा बाई का वकील केस को कमजोर कर उन्हें हराने में। इस स्टिंग का हवाला देते हुए कांग्रेस ने कहा है कि मामला गंभीर है और इसलिए इसकी जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए। पार्टी ने आरोप लगाया है कि स्टिंग ऑपरेशन से ये साफ हो गया है कि कानूनी प्रक्रिया में दखल देकर नरेंद्र मोदी के खास अमित शाह को बचाने की कोशिश हो रही है और चूंकि ये पूरा मामला मोदी की देखरेख में चल रहा था, इसलिए उन्हें अपने पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है।

दूसरी ओर बीजेपी ने इसे कांग्रेस की मोदी के खिलाफ एक और साजिश बताया और पुष्प कुमार के पिछले रिकॉर्ड का हवाला देते हुए उनकी मंशा पर सवाल उठाया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने पुष्प कुमार को इस बात की इजाजत दे दी है कि वो मामले की सीबीआई जांच की अर्जी दाखिल कर सकते हैं जिसमें सीडी में दिख रहे बीजेपी नेताओं और अमित शाह की भूमिका की जांच की मांग की जाए।

गौरतलब है कि तुलसी प्रजापति को 28 दिसंबर 2006 को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया था। ये मुठभेड़ बनासकांठा के छपरी गांव में हुई थी। तुलसीराम प्रजापति की मां नर्मदा देवी ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की सीबीआई जांच कराने की अपील की थी। जिसके बाद अप्रैल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। जांच के बाद सीबीआई ने सितंबर 2012 में तुलसी प्रजापति मुठभेड़ मामले में अपनी चार्जशीट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी।

चार्जशीट में मुठभेड़ को फर्जी ठहराते हुए सीबीआई ने इसे परफेक्ट मर्डर बताया। सीबीआई के मुताबिक तुलसी की हत्या सोची-समझी साजिश का हिस्सा थी। सीबीआई ने इस साजिश का पहला आरोपी अमित शाह को बनाया। शाह पर हत्या, आपराधिक साजिश रचने, फर्जी दस्तावेज तैयार करने जैसे आरोप लगाए गए। चार्जशीट के मुताबिक शाह ने अपनी सत्ता का गलत इस्तेमाल किया।

सीबीआई के मुताबिक तुलसीराम को इसलिए मारा गया क्योंकि वो सोहराबुद्दीन और कौसर बी की हत्या का सबसे अहम गवाह था। कॉल डिटेल्स के आधार पर सीबीआई ने पाया कि तुलसी को दबोचने के लिए शाह ने करीब 380 फोन कॉल किए थे। अमित शाह ने ये कॉल आईपीएस अफसर राजकुमार पांडियन और डी जी वंजारा को किए थे। सीबीआई का आरोप है कि शाह ने जांच की दिशा भटकाने के लिए अफसरों पर दबाव भी बनाया।

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई ने कहा था कि अमित शाह एक फिरौती रैकेट में सरगना हैं। सीबीआई ने कहा कि ये गिरोह नेता-पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ से चल रहा है। सीबीआई के मुताबिक तुलसी प्रजापति की मौत एक राजनीतिक हत्या थी, जिसे पूरी साजिश के साथ अंजाम दिया गया। (आईबीएन7)

सपा सरकार के खिलाफ दिल्ली में यूपी भवन के सामने प्रदर्शन बारह को

Shahnawaz Malik : उत्तर प्रदेश के अमन चैन में सुनियोजित तरीक़े से सेंध लगाने वाली समाजवादी पार्टी के खिलाफ यूपी भवन पर विरोध प्रदर्शन का फैसला लिया गया है। फिरक़ापरस्ती और ऐसी ताक़तों के खिलाफ यह प्रदर्शन इसलिए भी ज़रूरी है ताकि धरती पुत्र और उनके बेटे का असली चेहरा लोगों के सामने आए। क्योंकि सत्ता के कारख़ाने तक पहुंचने के लिए पिता-पुत्र ग़रीब-गुरबों का लहू पीने पर आमादा हैं। अगर इन्हें नहीं रोका गया तो चुनाव से पहले लाशें गिरने का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।

सत्ता के गलियारों तक पहुंचने के लिए ये शॉर्टकट अन्य राजनीतिक दल भी बेझिझक अपनाएंगे। लिहाज़ा अगर आप सांप्रदायिकता और ऐसी ताक़तों के विरोध में हैं तो अपनी आवाज़ बुलंद करें।

Join #ProtestDemo @ UP Bhawan, Delhi #2PM, #12September #Thursday #UPRiots Organised by #AmanEktaManch

पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.


ये  वो पत्र है जिसे अमन एकता मंच की तरफ से जारी किया गया है…

Dear friends

It has been more than a week that Western part of Uttar Pradesh is witnessing uninterrupted communal violence. Dozens of people have lost lives, and many families are fleeing from the area. The Government is not showing any political will to take action and stop the violence. The administration and Government are only playing blame game.

There are many political interests that are trying to outdo others. The result is that the violence that started from Muzaffar Nagar has now spread into others cities, towns and villages. If violence is not halted immediately, the whole state will be engulfed into hatred and violence. We the undersigned met today at 5.00 p.m. at Triveni to take stock of the situation and formulate strategy for our interventions. We decided:

• To hold a demonstration in front of Uttar Pradesh Bhavan on 12th of September at 2.00 p.m. sharp. After the meeting all of us will sit together to decide further actions.

• Banners and placards will be made for the event at U.P. Bhavan. The main responsibility for banners and placards is with Institute for Social Democracy ( ISD) and Khurshid Anwar will ensure that they are material is ready before the events.

• Anyone can send slogans before 12.00 tomorrow

• The campaign will run under Aman Ekta Manch ( AEM) that came into existence in 2002.

• The logistics part of AEM will be handled from Institute for Social Democracy ( ISD)

• All of us will circulate the message for event to be held on 12th, the Thursday.

Those who attended today’s meeting:

  1. Tanveer Fazal
     
  2. Himnshu Kumar
     
  3. Ahmad Sohaib
     
  4. Mansi
     
  5. Bhasha
     
  6. Atul chaurasiya
     
  7. Ali Javed
     
  8. Arjumand Ara
     
  9. Shanawaz Malik
     
  10. Manisha Pandey
     
  11. Nalin
     
  12. Ankit Agrawal
     
  13. Aftab Alam
     
  14. Asad Ashraf
     
  15. Imran Ali
     
  16. Poorva Bhardwaj
     
  17. Laraib Akram
     
  18. Apoorvanad
     
  19. Khurshid Anwar

मुलायम आखिरी दांव में पीएम की बाजी लूटना चाहते हैं, इसके लिए लाशों पर राजनीति से परहेज़ नहीं

Deepak Sharma : ड्रेकुला पालिटिक्स जानते है आप? नहीं जानते तो आगे पढिये. आपको याद ना आये तो यह घटनाएं और ऐसी कई और घटनाएँ पहले गूगल पर सर्च कर लीजिए.

१) रामपुर तिराहा कांड. उत्तराखंड आंदोलनकारियों पर अंधाधुंध फायरिंग.

२) पूर्वी यू पी में डाला सीमेंट फैक्ट्री. अपने चहेते उद्योगपति को सरकारी फैक्ट्री पर कब्ज़ा दिलाने के लिए मासूम मजदूरों पर गोलियाँ बरसाईं.

३) अयोध्या जा रहे सैकड़ों कारसेवकों पर गोलीबारी.

४) और अब अलग अलग शहरों में दंगों के वक्त पुलिस फायरिंग..

फेहरिस्त लंबी है मित्रों.

मुलायम सिंह यादव की सरकार में गोली दुर्भाग्यवश या गलती से नहीं चलती. बल्कि सरकारी बन्दूक से निकली हर गोली के पीछे कोई ना कोई वजह होती है और अधिकतर गोलीकांडों में राजनीतिक लाभ छुपा होता है. मिसाल के तौर पर मुलायम उत्तराखंड राज्य के पक्ष में कभी नहीं रहे क्यूंकि इन पहाड़ों में मुस्लिम-यादव समीकरण का अभाव था. मुलायम जानते थे की उत्तराखंड अलग होगा तो समाजवादी पार्टी का फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा. इसलिए रामपुर तिराहा कांड हुआ. चुन चुन कर मासूमों को पुलिस फायरिंग में ढेर किया गया..

कारसेवकों पर गोली चलाने के पीछे भी वोटों का ध्रुवीकरण था. इसका लाभ मिला मुलायम को जब उन्होंने १९९३ में दुबारा अपनी सरकार बनाई. कारसेवकों के छलनी सीने से मुलायम को नया राजनीतिक जीवनदान मिला. और अब यूपी में दंगा दंगा खेला जा रहा है. मकसद है कि लोकसभा चुनाव आते आते राज्य में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण इतना ज़बरदस्त कर दिया जाय की मुस्लिम कांग्रेस और बीएसपी में ना बंट कर सीधे सपा की सायकिल पर सवार हो. मुलायम सिंह अपने आखरी दांव में पीएम की बाजी लूटना चाहते हैं और इस लूट में उन्हें लाशों के ढेर पर राजनीत करने से परहेज़ नहीं है. वे राजनीत को नई परिभाषा, नया नाम दे रहे हैं. ड्रेकुला पालिटिक्स.

मित्रों इस श्रृंखला में बेबाक बातचीत होगी क्यूंकि दंगों के सन्दर्भ में फेसबुक पर ही अब श्वेत पत्र ज़ारी करना है.

आजतक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

मीडिया चौपाल-2013 : वेब संचालक, ब्लॉगर्स, सोशल मीडिया संचालक और आलेख-फीचर लेखकों का भोपाल में दो दिनी जुटान 14 से

प्रिय साथी,  संचार क्रांति के इस वर्तमान समय में सूचनाओं की विविधता और बाहुल्यता है. जनसंचार माध्यमों (मीडिया) का क्षेत्र निरंतर परिवर्तित हो रहा है. सूचना और माध्यम, एक तरफ व्यक्ति को क्षमतावान और सशक्त बना रहे हैं, समाधान दे रहे हैं, वहीं अनेक चुनौतियां और समस्याएँ भी पैदा हो रही हैं. इंटरनेट आधारित संचार के तरीकों ने लगभग एक नए समाज का निर्माण किया है जिसे आजकल "नेटीजन" कहा जा रहा है. लेकिन मीडिया के इस नए रूप के लिए उपयोग किये जाने वाली पदावली – नया मीडिया, सोशल मीडिया आदि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. लेकिन एक बात पर अधिकाँश लोग सहमत हैं कि "मीडिया का यह नया रूप लोकतांत्रिक है. यह लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा दे रहा है. मीडिया पर से कुछेक लोगों या घरानों का एकाधिकार टूट रहा है.

आपको स्मरण होगा कि पिछले वर्ष 12 अगस्त, 2012 को "विकास की बात विज्ञान के साथ- नए मीडिया की भूमिका" विषय को आधार बनाकर एक दिवसीय "मीडिया चौपाल-2012" का आयोजन किया गया था. इस वर्ष भी यह आयोजन किया जा रहा है. कोशिश है कि "मीडिया चौपाल" को सालाना आयोजन का रूप दिया जाए. गत आयोजन की निरंतरता में इस वर्ष भी यह आयोजन 14-15 सितम्बर, 2013 (शनिवार-रविवार) को किया जा रहा है. यह आयोजन मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा स्पंदन (शोध, जागरूकता और कार्यक्रम क्रियान्वयन संस्थान) द्वारा संयुक्त रूप से हो रहा है. इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य विकास में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को बढ़ावा देना है. इस वर्ष का थीम होगा- "जन-जन के लिए विज्ञान, जन-जन के लिए मीडिया". इसी सन्दर्भ में विभिन्न चर्चा-सत्रों के लिए विषयों का निर्धारण इस प्रकार किया गया है- 1. नया मीडिया, नई चुनौतियां (तथ्य, कथ्य और भाषा के विशेष सन्दर्भ में) 2. जन-माध्यमों का अंतर्संबंध और नया मीडिया, 3. विकास कार्य-क्षेत्र और मीडिया अभिसरण (कन्वर्जेंस) की रूपरेखा, 4. आपदा प्रबंधन और नया मीडिया, 5. आमजन में वैज्ञानिक दृष्टि का विकास और जनमाध्यम.

"मीडिया चौपाल-2013" में सहभागिता हेतु अभी तक 1. श्री आर. एल. फ्रांसिस (नई दिल्ली) 2. श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी (नई दिल्ली), 3. श्री अनिल पाण्डेय (द संडे इंडियन, नई दिल्ली), 4. श्री यशवंत सिंह (भड़ास डाटकॉम, नई दिल्ली), 5. श्री संजीव सिन्हा (प्रवक्ता डाटकॉम, नई दिल्ली), 6. श्री रविशंकर (नई दिल्ली), 7. श्री संजय तिवारी (विस्फोट डाटकॉम, नई दिल्ली), 8. श्री आशीष कुमार अंशू, 9. श्री आवेश तिवारी, 10. श्री अनुराग अन्वेषी 11.श्री सिद्धार्थ झा, 12. श्री भावेश झा, 13. श्री दिब्यान्शु कुमार (दैनिक भास्कर, रांची), 14. श्री पंकज साव (रांची), 15. श्री उमाशंकर मिश्र (अमर उजाला, नई दिल्ली), 16. श्री उमेश चतुर्वेदी (नई दिल्ली), 17. श्री भुवन भास्कर (सहारा टीवी, नई दिल्ली), 18. श्री प्रभाष झा (नवभारत टाईम्स डाटकॉम, नई दिल्ली), 19. श्री स्वदेश सिंह (नई दिल्ली), 20. श्री पंकज झा (दीपकमल,रायपुर), 21. श्री निमिष कुमार (हिन्दी इन डाटकॉम, मुम्बई), 22. श्री चंद्रकांत जोशी (हिन्दी इन, मुम्बई), 23. श्री प्रदीप गुप्ता (मुम्बई), 24. श्री संजय बेंगानी (अहमदाबाद), 25. श्री स्वतंत्र मिश्र (शुक्रवार साप्ताहिक, नई दिल्ली) 26. श्री ललित शर्मा (बिलासपुर), 27. श्री बी एस पाबला (रायपुर), 28. श्री लोकेन्द्र सिंह (ग्वालियर), 29. श्री सुरेश चिपलूनकर (उज्जैन), 30. श्री अरुण सिंह (लखनऊ), 31. सुश्री संध्या शर्मा (नागपुर), 32. श्री जीतेन्द्र दवे (मुम्बई), 33. श्री विकास दवे ( कार्यकारी संपादक, देवपुत्र, इंदौर), 34. श्री राजीव गुप्ता  (नई दिल्ली) 35. सुश्री वर्तिका तोमर, 36. ठाकुर गौतम कात्यायन पटना, 37. अभिषेक रंजन 38. श्री केशव कुमार 39. श्री अंकुर विजयवर्गीय (नई दिल्ली) 40. जयराम विप्लव (जनोक्ति.कॉम, नई दिल्ली), 41. श्री कुंदन झा (नई दिल्ली), 42. सुश्री सीत मिश्रा (नई दिल्ली), 43. वागीश झा  बिजनेस स्टैंडर्ड, नई दिल्ली), 44. सुश्री आशा अर्पित (चंडीगढ), 45. सुश्री संध्या शर्मा (नागपुर), 46. श्री सुशांत झा (नई दिल्ली), 47. ऋषभ कृष्ण सक्सेना (बिजनेस स्टैंडर्ड, नई दिल्ली), 48. श्री अरुण सिंह (लखनऊ), 49. श्री शिराज केसर, 50. सुश्री मीनाक्षी अरोड़ा (इंडिया वाटर पोर्टल, नई दिल्ली) 51. श्री आदित्यराज कॉल (टाइम्स नाऊ, नई दिल्ली), 52. श्री पुष्कर पुष्प (मीडिया खबर डाटकाम, नई दिल्ली), 53. श्री अनुराग पुनेठा (पी 7 चैनल, दिल्ली), ने अपनी सभागिता की सूचना दी है.

भोपाल से 1. श्री रमेश शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार), 2. श्री गिरीश उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार), 3. श्री दीपक तिवारी (ब्यूरो चीफ, न वीक), 4. सुश्री मुक्ता पाठक (साधना न्यूज), 5. श्री रवि रतलामी (वरिष्ठ ब्लॉगर), 6. श्रीमती जया केतकी (स्वतंत्र लेखिका), 7. श्रीमती स्वाति तिवारी (साहित्यकार), 8. श्री महेश परिमल (स्वतंत्र लेखक), 9. श्री अमरजीत कुमार (स्टेट न्यूज चैनल), 10. श्री रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति (पीपुल्स समाचार), 11. श्री राजूकुमार (ब्यूरो चीफ, न संडे इंडियन), 12. श्री शिरीष खरे (ब्यूरोचीफ, तहलका), 13. श्री पंकज चतुर्वेदी (स्तंभ लेखक), 14. श्री संजय द्विवेदी (संचार विशेषज्ञ), 15. श्रीमती शशि तिवारी (सूचना मंत्र डाटकॉम), 16. श्री शशिधर कपूर (संचारक), 17. श्री हरिहर शर्मा, 18. श्री गोपाल कृष्ण छिबबर, 19. श्री विनोद उपाध्याय, 20. श्री विकास बोंदिया, 21. श्री रामभुवन सिंह कुशवाह, 22. श्री हर्ष सुहालका, 23. सुश्री सरिता अरगरे (वरिष्ठ ब्लॉगर), 24. श्री राकेश दूबे (एक्टिविस्ट), श्री दीपक शर्मा (प्रतिवाद डाटकाम) आदि रहेंगे ही.

इस चौपाल में प्रो. प्रमोद के. वर्मा (महानिदेशक, म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद), श्री मनोज श्रीवास्तव (प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन), प्रो. बृज किशोर कुठियाला (कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल), श्री राममाधव जी (अखिल भारतीय सह-संपर्क प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), 2. श्रीमती स्मृति ईरानी (वरिष्ठ भाजपा नेत्री), श्री जयदीप कार्णिक (वेब दुनिया, इंदौर), श्री अजय ब्रह्मात्मज (वरिष्ठ पत्रकार, मुम्बई) के उपस्थित रहने की भी संभावना है.

कुछ और भी नाम हैं जिन्होंने आमंत्रण स्वीकार कर सहभागिता के लिए प्रयास करने का आश्वासन दिया है- श्री चंडीदत्त शुक्ल (मुम्बई), श्री प्रेम शुक्ल (सामना, मुम्बई), श्री लालबहादुर ओझा (नई दिल्ली), प्रो. शंकर शरण (स्तंभकार, नई दिल्ली) श्री नलिन चौहान (नई दिल्ली), श्री हितेश शंकर (संपादक, पांचजन्य, नई दिल्ली).

चर्चा के लिए चिन्हित विषयों पर आप तैयारी से आयेंगे तो यह आजोजन और भी सार्थक हो सकेगा. अपने विशिष्ट वक्तव्य का विषय बताएं तो सत्रों की रचना में सुविधा होगी.  इस पत्र के बाद अब आगे की सूचनाएं भेजी जायेंगी. कोशिश हो कि आप सभी की भागीदारी से मीडिया के बारे में एक सार्थक चिंतन व विमर्श हो सके. इसमें आपका सहयोग अपेक्षित है.

सादर,

(अनिल सौमित्र)

संयोजक

स्पंदन (शोध, जागरूकता एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन संस्थान)

anilsaumitra0@gmail.com

खंडूड़ी की गलती दोहरा रहे बहुगुणा

देहरादून। भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री रहे भुवन चन्द्र खडूड़ी को जिन गलतियों के कारण जनता के कोप का भाजन बनना पड़ा था इस समय कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी उन्हीं गलतियों को दोहरा रहे हैं। इतना तो तय है कि व्यक्तिगत जीवन में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा कितने ही साफ सुधरे क्यों न हों लेकिन राजनीतिक धरातल पर उनकी मिट्रटी पलीत  करने में सलाहकार कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

उनका हर कदम आम जनता को चिढ़ाने का ही काम कर रहा है। थोड़ी सी भी राजनीतिक समझ रखने वाले लोग जानते हैं कि मुख्यमंत्री के पद पर बैठा हुआ व्यक्ति स्वयं कोई निर्णय नहीं लेता। यहां तक कि कई बार अपने बारे में भी निर्णय लेना उनके बस में नहीं होता। उनके हरेक निर्णय में या तो उनके सलाहकारों का दिमाक होता है या फिर उनके सहयोगियों का, जिसमें विधायक, पार्टी के नेता या मंत्री मंडल की जिद शामिल होती है। इसी को अगर दूसरे रूप में कहें तो मुख्यमंत्री एक मैनेजर होता है जिसको पार्टी आलाकमान से लेकर अपने आसपास के लोगों को मैनेज कर सरकार की गाड़ी को किसी भी तरह से धकियाना होता है।

यहां मुख्यमंत्री बहुगुणा द्वारा पूर्व सीएम भुवन चन्द्र खंडूड़ी वाली गलती की चर्चा इसलिए की जा रही है क्योंकि दोनों का राजनीतिक कद अच्छा-खासा था मगर दोनों ने ही अपने दिमाक से कभी राजनीतिक निर्णय नहीं लिये। मसलन खंडूड़ी को उनके मीडिया सलाहकार ने हमेशा ऊंचे ख्वाब दिखाये थे। उन्हें बताया गया कि राजनीति में बने रहना है तो दिल्ली में छवि सुधारो। इसके लिए काम भी राज्य में नहीं बल्कि दिल्ली दरबार में ही करने होंगे। अगर काम न भी करो तो गुणगान दिल्ली में तो होना ही चाहिए। उनके कानों में ढूंसा गया कि राज्य से निकलने वाले अखबारों की कोई औकात नहीं होती। उनकी छपाई या तो छापेखानों तक ही  सीमित रहती है या फिर जिला या सूचना विभाग की निरीक्षा शाखा तक पहुंचकर दम तोड़ देती है। कुछ एक अखबार पोस्टआफिस के माध्यम से गांवों तक पहुंचते हैं मगर गांवों में साक्षरता नहीं है इसलिए उनको पढ़ा नहीं जाता। लिहाजा इन छोटे-मोटो अखबारों पर सरकार को ध्यान नहीं देना चाहिए। इसलिए जितना भी सरकार एक करोड़-दो करोड़ या पांच करोड़ खर्च करना चाहें उसे राष्ट्रीय अखबरों में खर्च कर देना चाहिए। ताकि सरकार की छवि दिल्ली, महाराष्ट्र व गुजरात में अच्छी बनी रहे। फिर सीएम का निर्णय जब दिल्ली से ही होना है तो कपकोट, भरोड़ी, गैरसैंण, खिर्सू, घेस और देवाल जैसे क्षेत्रों की जनता को बताने की क्या जरूरत है। खंडूड़ी ठहरे आर्मी बु़ि़द्ध वाले, उन्होंने वैसा ही किया जैसा सरकारी तनख्वा पाने वाले मीडिया मैनेजरों ने उन्हें समझाया। इसी का परिणाम था कि लंबे अंतराल के बाद ओय पंचायत चुनाव में इसका रिजर्ट भी आ गया। भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। उस समय उन्हें बचाने के लिए न तो दिल्ली दरबार से कोई नेता आया न महाराष्ट्र और ना गुजरात से। उनकी इस मीडिया पालिसी का इतना बढ़ा असर हुआ कि आने वाले चुनाव में खंडूड़ी है जरूरी भी जनता को फालतू लगने लगा। इस दौरान जिन मीडिया मैनेजरों ने खंडूड़ी को नेशनल अखबारों को करोड़ों का विज्ञापन देकर झाड़ में चढ़ाया था वे अपना काम करके सैटल हो चुके थे। मगर बेचारे खंडूड़ी अब पार्टी के लिए जरूरी नहीं रहे।

अब बात सीएम बहुगुणा की। पिछले दिनों मुख्यमंत्री बहुगुणा ने भी कुछ उसी प्रकार की गलतियों को दोहराया। मसलन सूचना विभाग के अपर निदेशक डा़ अनिल चंदोला के हल्द्वानी स्थानान्तरण और दिल्ली में आपदा पर किचकिच। चंदोला की मीडिया वर्ग में अच्छी खासी पकड़ मानी जाती है इसलिए उन्हें वापस बुलाना मजबूरी बन गया। मगर आपदा प्रबंधन को लेकर न्यूज चैनलों और दिल्ली में बेहद खर्चीले सेमीनार करवाकर सरकार क्या जताना चाहती है यह न तो उत्तरकाशी के आपदा पीड़ितों को पता है न बागेश्वर की जनता समझ सकी। राज्य की जनता को समझ नहीं आ रहा है कि क्षेत्रीय समाचार चैनलों में पेड न्यूज के माध्यम से राहत की बातें बताकर आखिर बहुगुणा सरकार क्या जताना चाहती है। सीएम भी जानते होंगे कि टेलीवीजन या अखबार में गेहूं, चावल और दाल के विज्ञापन देने से गरीब जनता की भूख नहीं मिटाई जा सकती है। इसके बावजूद पिछले एक साल से लगातार इस तरह की गलतियों का दोहराव किया जा रहा है। सरकार दावे भले ही कितने कर ले मगर इतना तो तय है कि सरकार के सलाहकारों को लगता है कि मुख्यमंत्री बहुगुणा की छवि अभी कुछ बची हुई है। प्लान बनाया जा रहा है कि अब इसे पूरी तरह से कैसे धूमिल किया जाए। क्योंकि लोकसभा चुनाव आने वाले हैं भाई!

संतोष फुलारा
बागेश्वर

अड़तालीस घंटे के भीतर पत्रकार पर हमले के दो आरोपी धराए

5 सितंबर की रात दो मीडिया कर्मियों पर पिस्तौल दिखाकर जानलेवा हमला करने व 10 हजार रुपए छीनने के आरोप में पुलिस ने दो मुख्य नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। घटना के 48 घंटे के भीतर एसपी नागेंद्र चौधरी के निर्देश पर थाना प्रभारी विनय कुमार राम के नेत्रृत्व में एएसआई दशरथ यादव दल बल के साथ शनिवार रात हांसीपहाड़ी इलाके से दोनों आरोपियों को धर दबोचा। गिरफ्तार दोनों आरोपियों में चंदन ओझा और प्रेम सिंह उर्फ पकोई शामिल है।

घटना में शामिल एक अन्य आरोपी संतोश महतो कि गिफ्तारी के लिए पुलिस छोपमारी कर रही है। सोमवार को दोनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया है। गोरतलब है कि 5 सितंबर की रात लगभग 9 बजे पत्रकार पंकज मिश्र और शंकर यादव बाइक पर सवार होकर धनबाद से लौट रहे थे। हांसीपहाड़ी पुलिया के निकट नशे में धुत उक्त ओरापियों ने पत्रकारों की बाइक रोकी और पिस्तौल दिखाकर पहले शंकर यादव पर हमला किया और बाद में 10 हजार रूप्ए छीने थे। मीडिया कर्मी का नाम आते ही उक्त हमलावर भाग खड़े हुए थे। तब से पुलिस उनकी तलाश कर रही थी।

बता दें की शनिवार रात पत्रकारों पर हमला करने के आरोपी चंदन सिंह और प्रेम सिंह उर्फ पोकाई गिरफ्तारी से पूर्व सीमा से सटे पश्चिम बंगाल के जोरबाड़ी और आमलादही में कई लोगों के साथ मारपीट भी की थी। जहां अमलादही में लोगों ने उनकी जमकर धुनाई भी की है।

दया शंकर शुक्ल ‘सागर’ ने यूं जीते मकाऊ के जुआघर में छप्पन हजार रुपये

इस वक्त मैं दुनिया के सबसे बड़े जुआघर में हूँ। होटल के इस कसीनो में कोई दो हजार मेजों पर जुआ चल रहा है। मकाऊ में सुबह के पाँच बजे हैं और कसीनो खचाखच भरा है। रात भर जुआ चला और अब भी चलेगा। ये खेल 24 घंटे चलता है। करोडों रुपये का दांव लगता है। दुनिया भर के धनकुबेर हारते हैं लेकिन उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं होती। यहाँ सब जुआरी नहीं हैं, कुछ मेरे तरह दर्शक भी हैं। यहाँ दर्शक बनने पर कोई मनाही नहीं है क्योंकि चालाक कसीनो वाले जानते हैं ये दर्शक भी थोड़ी देर में जुआ खेलने पर मजबूर हो जायंगे। और मेरे साथ यही हुआ। पहले दो दिन मैं यहाँ सिर्फ़ दर्शक था।

तीसरे दिन सब खेल कुछ समझ में आया तो लगा किस्मत पर दांव लगाया जा सकता है। मैंने अपने मित्र ली यान से पूछा कि कैसा रहेगा। वह मुस्कुराया और चीनी में कुछ बोला मैंने पूछा इट-मीन्स। उसने अंग्रेजी में इसका मतलब बताया की दुनिया का कोई जुआघर आपको जीतकर नहीं जाने देता । जुआ घर से मकाऊ तुम्हें जीत के जाने नहीं देगा। थोड़ी देर के लिए आप जीत भी जाए लेकिन अंततः आपको हारना है । पर मैं तय कर चुका था। खेलने के लिए आपके पास हांगकांग डालर होने चाहिए। मैंने अमेरिकी डालर का जो फारेक्स प्लस प्री पेड कार्ड बनाया था वह यहां नहीं चलता क्योंकि इस कार्ड पर आपका नाम नहीं होता। दूसरा विकल्प था मैं एटीएम का इतेमाल करूँ। जुआघर में तमाम एटीएम हैं। लेकिन एटीएम या मेरे कार्ड को स्वीकार नहीं किया। बेशक ये मेरी नहीं बल्कि एचडीएफसी बैंक की विश्‍वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। लेकिन मैं खुशकिस्मत था की मेरे एटीएम ने काम नहीं किया। देखिये आगे क्या हुआ।

मेरे पर्स में 100 हांगकांग डालर के दो नोट थे। यानी करीब दो हजार रूपये। किस्मत आजमाने के लिए इससे शुरुआत हो सकती थी। कम से कम कहने को हो जाता की हमने भी मकाऊ के कसीनो में दांव लगाया। हालाँकि मैं जानता था इस पैसे से मैं दो दांव से ज्यादा नहीं खेल सकता लेकिन शुरुआत हो सकती है। हो सकती है उस खेल में डालर या तो दोगुना होता है उस खेल का नाम 'बकाए' है। इस खेल में डालर या तो दोगुना होता है या फिर सारा पैसा डूब जाता है। सिर्फ एक मिनट का खेल है। मेज पर दो विकल्प हैं। 'बैंकर' और 'प्लेएर'। आपको अनुमान लगाना है कि 'बैंकर' जीतेगा या 'प्लयेर'। अगर आपको लगता है कि 'बैंकर' जीतेगा तो मेज पर जहाँ 'बैंकर' लिखा है वहां 100 डालर का एक सिक्का रख दीजिये। आप चाहे तो 100 डालर के दस या सौ सिक्के भी रख सकते हैं।

अगर आपको लगता है कि इस बार प्लयेर जीतेगा तो सिक्के प्लयेर वाले खाने पर रखिये। जुआ खिलाने वाला एक मशीन से 'बैंकर' और प्लयेर के लिए ताश के 3 -3 पत्ते निकालेगा। ये पत्ते आपको स्क्रीन पर दिखेंगे। वह एक बटन दबाएगा। अगर प्लयेर जीता तो दांव पर लगाये गए आपके सिक्के अपनी जगह मौजूद हैं। अब खेल खिलने वाला या वाली उतने ही सिक्के के दोगुने सिक्के वहीँ रख देंगे। ये सारे सिक्के आपके। यानि 100 डालर के बदले 200 डालर। 1000 डालर के बदले 2000 डालर। 20,000 डालर कि जगह 40,000 डालर। यानी दिमाग लगाने कि कोई गुंजाइश नहीं। एक या दो। मैंने प्लयेर पर 200 डालर लगाये थे और एक मिनट में मेरे पास 400 डालर थे। मूल धन 200 डालर मैंने जेब में रखे और जीते हुए 200 डालर को इस बार 'बैंकर' के खाने पर रख दिया। मशीन ने 3 -3 पत्ते निकाले। बटन दबाया। 'प्लयेर' के खाने में अन्य 5 खिलाडियों के सारे सिक्के मेज के नीचे छुपे डिब्बे में गिर गए।

'बैंकर' के खाने पर मेरे 200 डालर और बैंकर पर दांव लगाने वाले 7 और खिलाडियों के सिक्के मुस्करा रहे थे। क्योंकि हम सब जीते थे। अब मेरे पास 600 डालर थे। मैंने अपने आप से कहा बस इतना काफी है, अब दूसरा खेल समझा जाय। बगल की मेज पर कई हिंदुस्तानी जुआ खेल रहे हैं। इस खेल का नाम रूलेट है। ये दुनिया भर के कसीनो का लोकप्रिय खेल है। इससे पहले ये खेल मैंने किसी फिल्म में देखा था। एक कटोरा आकर मशीन में गेंद घूमती रहती है। वह जिस नम्बर पर रूकती है वह नम्बर जीत जाता है। उस नम्बर पर आपने जितने डालर लगाये हैं उससे 36 गुना डालर आपको मिलेंगे। उस नम्बर के आसपास के नम्बरों पर अगर आपने दांव लगाया है तो आपको 8 गुना पैसा मिलेगा। इवन और आड़ नम्बर पर भी पैसा लगा सकते हैं। इसमें आपका पैसा दोगुना हो जायेगा। इसी तरह से सारे खेल चलते रहते हैं। इस खेल में सबकुछ आपकी किस्मत पर है।

रोचक खेल था। समझ में भी आ गया। मैंने अपनी जेब से 100 -100 के डालर के 6 सिक्के अलग-अलग खेलो में लगा दिए। मैंने पहला दांव 21 नंबर पर लगाया था क्योंकि ये मेरी जन्मतिथि है। इसमें लगे थे 200 डालर। बाकि 400 डालर अलग खेलों पर। कटोरानुमा छोटी-सी मशीन में वो छोटी-सी गेंद घूमी और 15 ,18 ,19 नंबर पर अटकी हुई 21 पर आकर रूक गई। जुआ खिलाने वाली लड़की ने 7200 डालर गिन कर मेरे सामने रख दिए। मेज के आसपास बैठे अन्य जुआरियों की जैसे चीख निकल गई। अब मैं सात हजार डालर का मालिक था। यानी करीब 56,000 रूपये। एक घंटे के खेल में मैं 2000 से कहल शुरू कर 56,000 रूपये जीत चुका था। पर ज्यादातर लोग मेरी तरह खुशकिस्मत नहीं। मुझे वहां एक भी हिंदुस्तानी ऐसा नहीं दिखा जिसका चेहरा ख़ुशी का दमक रहा हो। मैं वहां अकेला हूँ, जो खुश हूँ।

सुबह के सात बज गए हैं। मैं रात भर यही खेलता रहा। नींद का दूर-दूर तक कोई निशान नहीं। मैं कसीनो में घूमता रहा। जो खेल थोडा भी समझ में आता खेल लेता। कभी हारता कभी जीतता। सच पूछिए तो हारने के लिए मेरे पास मेरा कुछ नहीं था। वह सारे हांगकांग डालर इसी कसीनो ने मुझे दिए थे। और एक वक्त ऐसा आया जब मेरी जेब में सिर्फ 200 डालर बचे थे। बाकी सब मैं हार चुका था। अब मैं भी उन्हीं हारे हुए लोगों की भीड़ के बीच शामिल हूँ।

56,000 रूपये हारने का दुःख है। इस फ्री के पैसे से मैं अपने मित्रों के लिए कई सारे गिफ्ट लेकर लौट सकता था। पर अब नहीं। मुझे अपने चीनी मित्र की बात याद आई- 'जुए में आप कभी नही जीतते, हमेशा गवांते हैं'। और ये सही है। पर इस अनुभव ने मुझे अंतररास्ट्रीय स्तर का जुआरी जरूर बना दिया। ये कोई फ़ख्र करने की बात कतई नहीं है लेकिन अनुभव एक ऐसी चीज है जो आप खरीद नहीं सकते, न किसी जुए में जीत सकते हैं। ये बड़ी कीमती चीज है। खासतौर से तब जब इसके लिए आपको कोई कीमत न चुकानी पड़े।

लेखक दयाशंकर शुक्ल 'सागर' हिंदुस्तान, इलाहाबाद के प्रभारी संपादक हैं.

उपेक्षा और आर्थिक तंगी का जिक्र करते हुए शोक सभा में रो पड़े वरिष्ठ पत्रकार डा. दामोदर वर्मा

Arun Sathi : मार्मिक पल… जब वरिष्ठ पत्रकार शोक सभा में रो पड़े….. बरबीघा के श्री नवजीवन अशोक पुस्तकालय में यूपी में आईबीएन7 पत्रकार राजेश वर्मा की हत्या पर शोक सभा का आयोजन किया गया था। इसमें सभी पत्रकार जुटे और अपनी अपनी वेदना रखी। इस इस शोक सभा में बोलते बोलते वरिष्ठ पत्रकार डा. दामोदर वर्मा रो पड़े।

उनके आंसू तब छलक पड़े जब उन्होंने अपने जैसे ग्रामीण पत्रकारों की उपेक्षा और अपनी आर्थिक तंगी के बीच समाचार भेजने के संघर्ष का जिक्र किया। डा. वर्मा दैनिक हिन्दुस्तान में पिछले 35 साल से रिपोर्टर हैं। वे अपने अध्यक्षीय संबोधन में बीच में ही रोते हुए बैठ गए। उन्होंने कहा कि कैसे 10 रुपये प्रति न्यूज पर काम करते हुए पत्रकारिता के लिए संघर्ष किया जा रहा है और फिर किसी प्रकार का दुखद पल आने पर मीडिया घराना उनकी सुध तक नहीं लेता। और तो और, जिस समाज के लिए एक पत्रकार सर्वस्व न्योछावर कर देता है वहीं समाज जरूरत पड़ने पर उनके लिए कुछ नहीं करता….

अरुण के फेसबुक वॉल से.

नैनीताल के जिस आश्रम में आसाराम ने साधना की, उसे भी हड़पने की कोशिश की थी

नाबालिग लडकी के यौन शोषण के आरोप में जोधपुर सेंट्रल जेल में पश्चाताप साधना कर रहे आसाराम ने अपने चोला बदल के शुरूआती दिनों में नैनीताल के स्वामी लीला शाह आश्रम में ध्यान -साधना की थी। आज से करीब तिरेपन -चौवन साल पहले 1959-60 के आसपास आसाराम का नैनीताल के स्वामी लीला शाह आश्रम में आना शुरू हुआ था। वह आसूमल के आसाराम में बदलने का शुरूआती दौर था। तब आसूमल उर्फ़ आसाराम का हर साल गर्मियों का तकरीबन एक महीना स्वामी लीला शाह के नैनीताल के आश्रम में ही गुजरता था।

इस दौरान वे आश्रम में मौजूद सुरई के पेड़ के नीचे आसन लगा साधना किया करते थे। कभी-कभार उनका स्वामी लीला शाह के एक भक्त वीरभान सागर के साथ कुश्ती अखाडा भी लगता था।  आसाराम का गर्मियों में एक महीने के लिए नैनीताल आने का यह दौर करीब सात-आठ साल तक चला। पर आसूमल उर्फ़ आसाराम के रहन-सहन, खान-पान, चटकीले पहनावे और उनकी रुचियों को लेकर स्वामी लीला शाह की नापसंदगी के चलते कुछ सालों बाद उनका नैनीताल आना बंद हो गया था।

नैनीताल से करीब चार किलोमीटर दूर हनुमानगढ़ी मंदिर के पास बेहद खूबसूरत पहाड़ी चोटी में जाने-माने सिंधी संत स्वामी लीला शाह का आश्रम है। स्वामी लीला शाह ने हनुमानगढ़ मंदिर बनने से बहुत पहले 1940 के दशक में यह आश्रम बनाया था। स्वामी लीला शाह गर्मियों में करीब तीन महीने इसी आश्रम में रह कर योग साधना किया करते थे। 1959-60 में स्वामी लीला शाह में दूसरे  भक्तों के साथ आसाराम का भी इस आश्रम आने का सिलसिला शुरू हुआ। कई दशकों तक स्वामी लीला शाह आश्रम के प्रबन्धक रहे गणेश दत्त भट्ट के मुताबिक स्वामी लीला शाह तपस्वी संत थे। उन्हें दिखावे से कोसों दूर एकांत में योग और साधना करना पसंद था। वे आडम्बर से बहुत दूर रहते थे। स्वामी लीला शाह किसी से और खासकर महिलाओं से अपने चरण स्पर्श करना भी पसंद नहीं करते थे। यहाँ तक कि आश्रम परिसर में महिलाओं का रात्रि विश्राम भी वर्जित था। गणेश दत्त भट्ट बताते हैं कि स्वामी लीला शाह स्वयं बारह आना मीटर कीमत का गाडा पहनते थे और बोरे में ही आसन लगाते थे। जबकि आसूमल से आसाराम बनने के जुगत में लगे आसाराम को राजशी पहनावा और खान-पान प्रिय था। स्वामी लीला शाह को आसाराम की यह रुचियाँ, आदतें और चाहत नहीं भाती थीं। लिहाजा स्वामी लीला शाह को आसाराम सुहाते नहीं थे। स्वामी लीला शाह 4 नवंबर 1973 को आदिपुर कच्छ, गुजरात स्थित अपने मूल आश्रम गांधीधाम में पंचतत्व में विलीन हो गए। उसके बाद कई मौकों पर आसाराम ने अपने को स्वामी लीला शाह का शिष्य बताया। जबकि गणेश दत्त भट्ट का कहना है स्वामी लीला शाह के भक्तों की तादात करोड़ों में थी और आज भी उनके असंख्य साधक हैं। पर उन्होंने अपने जीवनकाल में किसी को भी शिष्य का दर्जा नहीं दिया।

1959-60 के दौर में आसाराम को साधना के साथ कुश्ती लड़ना बेहद पसंद था। उनका स्वभाव शुरू से ही पहलवानों सा था। स्वामी लीला शाह आश्रम के करीब रहने वाले महेश भट्ट के मुताबिक लीला शाह आश्रम में स्वामी लीला शाह के एक भक्त वीरभान सागर के साथ अक्सर आसाराम कुश्ती लड़ा करते थे। चूँकि तब आसाराम एक बेहद हट्टी-कट्टी और मजबूत काया के मालिक थे। लिहाजा कुश्ती का हर दांव आसाराम के हक में ही जाता था। जब आसूमल की आसाराम के रूप में देश-विदेश में पहचान कायम हो गई। आध्यात्मिक और धर्म गुरु के रूप में उनका सिक्का दौड़ने लगा। आसाराम ने देश में सैकड़ों आश्रम और दर्जनों गुरुकुल बना लिए। इसके वावजूद वे नैनीताल के स्वामी लीला शाह आश्रम को भुला न सके। वे अक्सर अपने पुराने जान-पहचान वालों से नैनीताल स्थित स्वामी लीला शाह आश्रम की खैरियत पूछा करते थे। जून 1999 में आसाराम के भक्तों ने नैनीताल संकीर्तन यात्रा निकाली। इस यात्रा में हिस्सा लेने आए उनके ज्यादातर अनुयायी स्वामी लीला शाह आश्रम में टिके। देश भर में कई जगहों में सरकारी-गैर सरकारी जमीनों में अवैध कब्जों के लिए मशहूर आसाराम के भक्तों की नीयत यहाँ भी डोल गई। आसाराम के साधकों ने नैनीताल के स्वामी लीला शाह आश्रम में जबरन कब्जा जमाने की कोशिशें की। आसाराम के साधकों की इन करतूतों के खिलाफ स्वामी लीला शाह आश्रम ट्रस्ट को पुलिस में शिकायत दर्ज करानी पड़ी। पुलिस के आला अधिकारियों के प्रभावी हस्तक्षेप के चलते आसाराम के भक्तों को निराश होना पड़ा था। नतीजन आध्यात्मिक गुरु आसाराम की बेशुमार सम्पतियों की लिस्ट में स्वामी लीला शाह आश्रम, नैनीताल नाम की यह सम्पत्ति जुड़ने से बच गई।

लेखक प्रयाग पाण्डे उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

अब संत ही बन गए हैं शोषक

जिन्हें जनता सिर आंखों पर बिठाती है। बापू, महाराज, महाप्रभु, जगद्गगुरु से संबोधित करके पूजती है। जो खुद को धर्म का नुमांइदा बताकर सनातन धर्म का ढोल पूरी दुनिया में पीटते फिरते हैं,ऐसे ‘‘संत’’  भी नारियों के शोषक बन गए। पूरी दुनिया को यह त्याग, तप, संयम, नियम और वैराग्य की शिक्षा देते हैं और खुद  ‘सेक्स’ के गहरे गर्त में गिर जाते है। महिला भक्तों को अपनी कामेच्छा पूर्ति का साधन बनाते हैं। भेद खुलने पर मीडिया द्वारा बदनाम करने की साजिश बताते हैं।  ऐसे संत तो पशुओं से बदतर हैं। भक्त ईश्वर की जगह ऐसे धूर्त साधुओं की पूजा करते हैं और असली भगवान भूल जाते है।

ऐसे संत मीडिया द्वारा अपनी श्रेष्ठता का प्रचार प्रसार करवाते हैं और नारी के सामने नग्नता का गंदा खेल खेलते है। बदनाम होने पर उसी मीडिया को निशाना बनाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जो मीडिया उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचा सकती है वह गिरा भी सकती है।  आखिर नारी में ऐसा क्या आकर्षण है जिसे देखकर बड़े-बड़े वैरागियों का मन डोल जाता है? आज के दौर में नामी गिरामी धर्मगुरुओं की पोल खुल रही है। कभी अनुष्ठान के नाम पर आसाराम नारियों की अस्मत से खिलवाड़ करते हैं तो कभी कृपालु महाराज प्रेमदान के बहाने बेडरूम में रंगरेलियां मनाते हैं। तो कभी नित्यानंद झाड़-फूंक के नाम पर उनकी इज्जत से खिलवाड़ करते है। समझ में यह नहीं आता कि यह बाबा लोग अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए धर्म का लबादा क्यों ओढते हैं।

जिस धर्म की वह जनता को दुहाई देते है वही धर्म एक पिता को अपनी बेटी तक से एकांत में मिलने की इजाजत नहीं देता। धर्म की अपनी मनमर्जी से व्याख्या करने वाले  ऐसे संत न जाने कितने लोगों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाते है। महिलाओं को दुर्गा का दर्जा देने वाले क्यों उनकी अस्मिता से खिलवाड़ करते है? मंच पर तो बड़ी शान से कहते है कि ‘‘यत्र नार्यस्तु पूजयंते,रमंते तत्र देवता’’ उनके यह विचार आखिर कहां गुम हो जाते हैं। तुलसीदास जी ने मानस में ठीक ही लिखा है ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे।’’ दूसरों को उपदेश देने वाले इस कलिकाल में बहुत है लेकिन उसको आचरण में उतारने वाले एकाध ही होते है। संत कबीर ने परमात्मा की प्राप्ति के संबंध में ठीक ही लिखा है कि ‘‘चलन-चलन सब कोई कहे,विरला चले ही कोय,एक कंचन अरू कामिनी घाटी दुर्लभ होय।’’ कंचन यानि धन  संपत्ति और कामिनी यानि स्त्री, इन घाटियों को कोई विरला ही पार कर पाता है। हमारे कुछ कलयुगी गुरू तो शायद यही सब पाने के लिए धर्म की दुहाई देते हैं।

रेखा मिश्रा दीक्षित
सब एडीटर
हरिभूमि प्रेस
रायपुर

एक था ‘तहलका’ : पोस्टर ब्वाय तरुण तेजपाल और मीडिया का बाजार

Yashwant Singh : तरुण तेजपाल बिजूका की तरह टंगे हुए हैं.. उनके पैर न धरती पर हैं और न ही आसमान में.. वे पोस्टर ब्वाय बन चुके हैं.. अतीत में की गई कुछ सरोकारी पत्रकारिता के लिए अब उन्हें टंगने, पोस्टर पर चिपकने का लायसेंस मिल चुका है… ऐसे पोस्टर ब्वाय पत्रकारिता में कई हैं, कई आए और कई गए… ये पोस्खुटर ब्वाय खुद को पत्रकारिता का बहुत बड़ा नाम बताते हैं… संतोष भारतीय को याद करिए… राहुल देव को याद करिए.. दीपक चौरसिया को याद करिए…

ढेरों ऐसे कथित पत्रकार हैं जो खुद के पोस्टर छपवाते हैं और खुद को बड़ा ब्रांड बताते हैं.. ऐसे लोगों का सच एक है कि ये बड़े असुरक्षित और बड़े चालाक लोग हैं… ये सरोकार और बाजार की मिक्सिंग के एक्सपर्ट लोग हैं… ये कंटेंट और पूंजी के फ्यूजन से नया सुर बनाने वाले उस्ताद हैं… बाजार ऐसे ही प्रयोगधर्मी लोगों को चाहता है… बाजार आपकी क्रांतिकारिता को खरीदता है.. उसे ब्रांड बनाता है.. उसे बेचता है… उससे पूंजी के खेल, पूंजी के प्रवाह को गतिमान करता है और फिर एक दिन आपको चुका हुआ ब्रांड मानकर साइड में कर देता है, आपका हिस्सा देकर… फिर नए ब्रांड तलाशने गढ़ने में लग जाता है…

पत्रकारिता के इन पोस्टर ब्वाय लोगों को बाजार की तरफ से कई काम दिया जाता है… जैसे, जनता को मूर्ख बनाना, भरमाना, लुभाना, उन जैसा बनने का सपना दिखाना, उनके नाम पर दांव लगाना, उन्हें बड़ा मानना, उन्हें खास मानना, उन्हें भरोसेमंद मानना.. ये पोस्टर ब्वाय लोग जनता की आंखों को भरमाने और अपने आदमकद पोस्टरों को दिखाकर अपना कद बढ़ाने की कोशिश करते हैं.. पर दुर्भाग्य से जब इनके पोस्टर / बैनर / होर्डिंग भूलुंठित होते हैं तो कोई भी आम आदमी उसे ठीक करने, उठाने, सुधारने नहीं जाता क्योंकि आम आदमी जैसे आपकी कथित उंचाई को आंक लेता है और चुप रहता है, आपके खेल को बूझता रहता है, वैसे ही आम आदमी आपके चारों खोने चित्त होने के भी सच को जानता है और दोनों ही अवस्थाओं में आपकी चिरकुटई को मन ही मन नमन करता है, फिर इगनोर करता है…

जनता के हिस्से में हमेशा एक नया अविश्वास आता है.. जनता के हिस्से में हमेशा एक नया छल आता है.. जनता के हिस्से में हमेशा एक नई उदासी आती है.. बाजार अपने ग्राहकों को ललचाता रहता है… बाजार अपने ग्राहकों को ललचाने के लिए भरोसेमंद छलनाओं को आगे करता रहता है… जनता ग्राहक है, कंज्यूमर है.. जनता के बीच से निकलकर पोस्टर ब्वाय लोगों को बाजार पसंद करता है अपना दूत बनाने के लिए .. ताकि जनता के बीच जनता का आदमी होने का संदेशा जाए और बाजार में जनता का भरोसा कायम रहे… बाजार बहुत शातिर होता है और बहुत सरल भी….. वह अपने दमदार आलोचकों, तगड़े विरोधियों को अपने साथ बिठा लेता है.. अपना आदमी बना लेता है..

दीपक चौरसियाओं, संतोष भारतीयों जैसों के पोस्टरों-बातों पर काफी समय से किसी को भरोसा नहीं पर तरुण तेजपालों से उम्मीद थी.. लेकिन उन्हें भी तो अपना मीडिया हाउस चलाना, बढ़ाना और छा जाना है… सो, उनके बढ़ने, फलने-फूलने के अपने तरीके हैं… पर अंततः सबकी मंजिल एक है…. बाजार की लय गति ताल के साथ थिरकना और बाजार से अधिकतम खींच कर अपने साथ जोड़ना…

बाजार से टकराने वाले जब बाजार की गोद में बैठते हैं तो एक शेर याद आता है…


जब तक बिका न था, कोई जानता न था
तुमने खरीद कर अनमोल कर दिया…

पोस्टर देखिए.. लिखा है… तहलका- चरण और रमन के प्रदेश में…

मैसेज साफ है. तहलका को अपना बाजार पता है.. तहलका को अपने क्लाइंट पता हैं.. तहलका को पूंजी और पावर के स्रोत पता हैं.. तहलका को अपने बाजार के टारगेट आडियेंस पता हैं.. ये अलग बात है कि वे इन्हें भुनाएगा उस कंटेंट के दम पर जिन्हें चरण और रमन के प्रदेश के आम आदमियों के बीच से पैदा किया जाएगा… और, वातानूकिलत करके प्रकाशित किया जाएगा… कंटेंट में वैसे तो बहुत तेज ओज दिखेगा, लेकिन जो कंटेंट नहीं दिखेगा वही वो स्पेस होगा जो चरण और रमन अनुकूलित होगा… और इसी स्पेस में बाजार होता है.. जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ रहे आदिवासियों वाले इस प्रदेश का बहुत बड़ा बजट मीडिया अनुकूलन पर खर्च किया जाता है.. पेड न्यूज पर खर्च किया जाता है… और यह सब बड़े सुनियोजित ढंग से करते कराते हैं रमन सिंह… पर रमन सिंह एक्सपोज नहीं होंगे क्योंकि वो तहलका के छत्तीसगढ़ प्रवेश के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं, मुख्य वक्ता हैं..

चलिए, आज शाम फिर थोड़े छले जाने का एहसास करते हैं, फिर थोड़ी उदासी की चादर ओढ़ते हैं, फिर थोड़ा अविश्वास पनपाते हैं…और इन सबको मिक्स कर फिर थोड़ा काकटेल बनाते हैं, हाशिए का काकटेल.. चीयर्स दोस्तों…


लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. फेसबुक पर यशवंत से जुड़ने / लाइक करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं…

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लगता है 'तहलका' सब शर्म लिहाज घोल कर पी गया है…

प्रयाग पांडेय की किताब का उनकी गैरमौजूदगी में हुआ पिथौरागढ़ में विमोचन

पिथौरागढ़। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। समूचा उत्तराखंड राज्य आंदोलन अपनी व्यापकता और आवेग की दृष्टि से बेजोड़ रहा है। आंदोलन में समाज के सभी वर्गों की प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी के लिहाज से इस आंदोलन ने विश्व के सभी जन आंदोलनों को कहीं पीछे छोड़ दिया था। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में समाज के प्रत्येक वर्ग की व्यापक और प्रत्यक्ष भागीदारी रही। यह विश्व का अकेला ऐसा आंदोलन था, जिसे सबसे ज्यादा बौद्धिक समर्थन हासिल हुआ।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन में समाज का कोई भी हिस्सा निष्क्रिय नहीं रहा। ऐतिहासिक दृष्टि से सदियों पुराने और एक विस्तृत आंदोलनात्मक आयाम वाले उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नब्ज टटोलना और चन्द पृष्ठों में लिपिबद्ध करना बेहद श्रमसाध्य एवं दुष्कर कार्य है पर नैनीताल के वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पाण्डेय ने ‘देवभूमि का रण’ नामक किताब में इस असंभव कार्य को बखूबी अंजाम दिया है। प्रयाग पाण्डेय ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन को न केवल राष्ट्रीय राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है वरन् उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास को एकदम नए ऐतिहासिक संदर्भों में देखने की कोशिश की है। राज्य निर्माण के बाद कई पुस्तकें राज्य आंदोलन के इतिहास पर आईं हैं लेकिन लेखक की विश्वदृष्टि के लिहाज से यह पुस्तक एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गई है। सामाजिक आंदोलनों के लिए यह एक महत्वपूर्ण किताब है। जनगीतों ने इस पुस्तक को अधिक रोचक और आंदोलन के दौर से लोगों का सीधा साक्षात्कार करा दिया है।’’

नगर पालिका सभागार में ‘देवभूमि का रण’ किताब का विमोचन करते हुए वक्ताओं ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि लेखक ने जिस विश्वदृष्टि से उत्तराखंड राज्य के आंदोलन को लिपिबद्ध किया है वह पुस्तक लेखन की एक नई विधा से भी लोगों को रूबरू कराता है। यह प्रयोग हिन्दी साहित्य के लिए भी एक अदभुत देन है। किताब का विमोचन संयुक्त रूप से मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में आमंत्रित वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं राज्य आंदोलनकारी श्रीमती के0डी0 लुईस, डॉ0 अशोक कुमार पंत, चन्द्रशेखर कापड़ी, नगर पालिका अध्यक्ष जगत सिंह खाती, उप जिलाधिकारी नरेश दुर्गापाल, पुलिस उपाधीक्षक राजीव मोहन, स्वाधीनता सेनानी संगठन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बसेड़ा, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित लेखक राजेश मोहन उप्रेती, लेखक दिनेश भट्ट, उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिलाध्यक्ष जगदीश कलौनी आदि ने किया। इस मौके पर आयोजित विचार गोष्ठी में कोतवाल जी0पी0 बौठियाल, पत्रकार सुशील खत्री, बृजेश तिवारी, टीम संस्था के निदेशक योगेश पाठक, आकाशदीप संस्था के निदेशक संजय चौहान, विप्लव भट्ट, मुकुल पाठक, शबनम खान, मातृ शिशु परिवार कल्याण महिला कर्मचारी एसोसिएशन की संरक्षक श्रीमती देवकी मर्तोलिया, माया मेहता, सावित्री खड़ायत, उमा ततराड़ी, भावना शर्मा, हरी कन्याल, निर्मला देवी समेत भारी संख्या में लोग मौजूद थे। समारोह का संचालन श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिलाध्यक्ष जगदीश कलौनी ने एवं अध्यक्षता नगर पालिका के चेयरमैन जगत सिंह खाती ने की।

लेखक की गैर मौजूदगी में हुआ समारोह

पिथौरागढ़। शायद ऐसा पहले कभी हुआ हो। किसी लेखक की पहली किताब का विमोचन हो और वह स्वयं विमोचन समारोह में मौजूद न हो। उत्तराखंड राज्य आंदोलन पर लिखी गई पुस्तक ‘देवभूमि का रण’ के साथ यही हुआ। पुस्तक के लेखक प्रयाग पाण्डेय इस समारोह में न आ सके किंतु  उनकी गैर मौजूदगी में इस पुस्तक का भव्य विमोचन हुआ। इस दौरान वक्ताओं ने पुस्तक में लिखे जनगीतों के माध्यम से आंदोलन की यादें ताजा कर दीं। जनगीतकार प्रकाष चंद्र जोषी ‘शूल’ ने अपनी रचनाओं के माध्यम से उत्तराखंडी समाज के समक्ष खड़ी चुनौतियों पर प्रहार किए। समारोह में लेखक के मौजूद न रहने पर भी विमोचन की भव्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वक्ताओं ने पुस्तक के सभी सहयोगियों के प्रति एक अच्छी पुस्तक के प्रकाशन हेतु अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं।

केएन शांत कुमार बने पीटीआई के नये अध्यक्ष, महेंद्र मोहन उपाध्यक्ष चुने गए

नयी दिल्ली : दो प्रख्यात मीडिया हस्तियों के एन शांता कुमार एवं महेंद्र मोहन गुप्त को आज प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया का क्रमश: अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष निर्वाचित किया गया. पीटीआई की 65वीं वार्षिक आम बैठक के बाद हुई पीटीआई निदेशक मंडल की बैठक में बेंगलूर स्थित प्रिंटर्स (मैसूर) प्राइवेट लिमिटेड के वरिष्ठ संपादक एवं फोटो पत्रकार शांत कुमार एवं जागरण समूह के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक गुप्त को सर्वसम्मति से निर्वाचित किया गया. शांता कुमार प्रमुख कन्नड़ दैनिक प्रजावाणी के संपादक हैं. साथ ही वह डेक्कन हेराल्ड, प्रजावाणी, सुधा एवं मौर्या के प्रकाशक प्रिंटर्स (मैसूर) के निदेशक हैं. वह तमिल दैनिक दिनामलार के प्रकाशक आर लक्ष्मीपति के बाद पीटीआई के अध्यक्ष बने हैं.

कुमार लंबे समय से मीडिया उद्योग से जुड़े रहे हैं. वह इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) की कार्यकारिणी परिषद के 15 से अधिक वर्ष तक सदस्य रहे हैं. वह ऑडिट ब्यूरो ऑफ सरकुलेशन (एबीसी) के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हैं. कुमार की फोटोग्राफी विशेषकर खेल फोटोग्राफी में काफी रुचि रही है. उन्होंने फोटो पत्रकार के रुप में पिछले सात ओलंपिक खेलों को कवर किया है. मीडिया उद्योग में लंबे समय से जुड़े गुप्त राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं. वह देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के प्रमुख हैं. वह आईएनएस और इंडियन लेंग्वेजेस न्यूजपेपर एसोसिएशन (आईएलएनए) के अध्यक्ष रह चुके हैं. वह संवाद समिति यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) के भी अध्यक्ष रह चुके हैं.

कुमार एवं गुप्त के अलावा पीटीआई निदेशक मंडल में विनीत जैन (टाइम्स ऑफ इंडिया), विजय कुमार चोपड़ा रिपीट विजय कुमार चोपड़ा (हिंद समाचार), एन रवि (द हिंदू), अवीक कुमार सरकार (आनंद बाजार पत्रिका), होर्मुसजी एन कामा (बांबे समाचार), एम वी वीरेंद्र कुमार (मातृभूमि), रियाद मैथ्यू (मलयालम मनोरमा, संजय नारायण (हिन्दुस्तान टाइम्स) एवं शेखर गुप्ता (इंडियन एक्सप्रेस) शामिल हैं.समाचारपत्र उद्योग से इतर निदेशकों में प्रोफेसर ई वी चिटनीस, न्यायमूर्ति एस पी भरुचा और फाली एस नरीमन शामिल हैं.
 

डाक्टरों की गुंडई को अब मिला करारा जवाब, एसएसपी यशस्वी यादव ने किया सराहनीय कार्य

कानपुर : कहते हैं कि वक्त की हर शै गुलाम.. यह जुमला डाक्टरों के उपर देर से ही सही, पर सही उतरा क्योंकि यह शहर बहुत अर्से से डाक्टरों की गुंडई का दंश झेल रहा था लेकिन डाक्टरो की ताकत के आगे हमेशा खाकी घुटने टेकती रही है। अगर शहर के केवल एक ही सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में पिछले तमाम सालों में डाक्टरों द्वारा की गई गुंडई की घटनाओं का जिक्र करें तो इस शहर में डाक्टरों की गुंडई का परिदृश्य स्पष्ट हो जायेगा। हैलट अस्पताल शहर का सबसे बडा़ सरकारी अस्पताल है जहां दूर दूर से लोग इलाज कराने आते हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या गरीबों की होती है जो बड़े बड़े नर्सिंग होम में अपना इलाज नहीं करा सकते। लेकिन इन गरीब और मजलूमों के साथ जिस तरीके से यहां के डाक्टर पेश आते हैं, वह नाकाबिले बर्दाश्त है।

किसी को आपरेशन के नाम पर, किसी को इलाज के नाम पर और किसी को दवा के नाम पर रोज ठगा जाता है। लेकिन हालात का मारा गरीब इन धरती के भगवान कहे जाने वाले डाक्टरों का हर दंश हर शोषण रो रोकर सहता है लेकिन उफ तक नहीं करता। लेकिन हद तो तब हो जाती है जब इलाज की लापरवाही की किसी घटना की शिकायत यदि भूले भटके कोई तीमारदार भी करता है तो उसे भी डाक्टरों की बदसलूकी का शिकार होना पड़ता है। हम अगर पिछले पांच सालों की ही घटनाओं का खुलासा करें तो पायेंगे कि पिछले पांच सालों में तीन दर्जन से अधिक ऐसी घटनायें हुई जिनमें डाक्टरों की लापरवाही से मरीज की हालत खराब होने पर या मृत्यु होने पर तीमारदार और डाक्टरों के बीच घमासान हुआ।

इस घमासान में आधे से अधिक बार तो डाक्टरों और तीमारदारो के बीच सरफुटव्वल का खुला संग्राम हुआ और इन संग्रामों में हर बार डाक्टरों की गुंडई खुलकर सामने आई। पुंखराया के पास गौरीकरण में रहने वाले विवेक पान्डे अपनी मां का इलाज कराने हैलट आये हुए थे। गलत वीगो लग जाने के कारण विवेक की 78 वर्षीय मां के हांथ से खून बहने लगा। जाहिर है कि कोई बेटा अपनी मां का खून नहीं देख सकता। मां के खून को देखकर विवेक ने जरा उंची आवाज में डाक्टर से शिकायत क्या कर दी कि डाक्टर साहिब अपने व्यवसाय की सारी मर्यादाये भूल गये और विवेक को कंटाप रसीद कर दिया। जवान विवेक अचानक हुई अपनी बेईज्जती को बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने डाक्टर से यह कह दिया कि आपने यह करके ठीक नहीं किया है। बस इतना कहना था कि वो डाक्टर साहिब ने फिर विवेक को थप्पड जड़ दिया। इस बार विवेक से जब न रहा गया और उसने भी डाक्टर को थप्पड़ का जवाब थप्पड़ से देने का प्रयास किया तभी वहां कयामत आ गई।

उस समय वहां उपस्थित वार्ड के सारे वार्ड ब्वाय और नर्से तरन्त इक्टठा हो गये और उन्होने मामले को खत्म कराने का प्रयास नहीं किया बल्कि मामले को और भड़काने का प्रयास किया और आते ही विवेक पर थप्पड और घूंसो की बरसात करना चालू कर दिया। जब तक विवेक सम्हलता तब तक उसे मार मार कर बेदम कर दिया और उसे लाद कर बाहर गैलरी में फिकवा दिया। इस मार में विवेक की आधा दर्जन से अधिक पसलिया टूट गईं और विवेक दर्द के मारे वहीं पड़ा पड़ा चिल्लाता रहा लेकिन किसी ने भी उसका इलाज नहीं किया। मारपीट में एक वार्ड ब्वाय ने उसका मोबाईल तक छीन लिया। बेचारा विवेक फोन करके अपने किसी रिश्तेदार तक को नहीं बुला पाया। काफी देर बार उसने जब एक आदमी से फोन करने की प्रार्थना की तब उसके मोबाईल से विवेक ने अपने घर वालों को इस घटना की जानकारी दी।

विवेक का बडा़ भाई अजीत जो कि पूर्व ग्राम प्रधान है दो दर्जन गांव वालों को लेकर हैलट पहुंचा। उसने जब डाक्टर से थप्पड़ मारने का कारण पूछा तो डाक्टर ने अजीत से भी अभद्रता की लेकिन डाक्टर को इस बात का अंदाज नहीं था कि अजीत के साथ काफी लोग भी हैं। लिहाजा डाक्टर की अभद्रता पर अजीत के सब्र का पैमाना टूट गया और अजीत ने अपने साथ आये हुए सभी लोगों को वहां बुला लिया। थोड़ी देर बाद वह अस्पताल का वार्ड नहीं बल्कि लडाई का मैदान बन गया। डाक्टर ने भी तमाम जूनियर डाक्टरों को वहां बुला लिया और ग्रामीणों और डाक्टरों में जमकर लाठी, डंडे और हाकियां चली। कुछ देर पहले तक दो दर्जन ग्रामीण जो कि डाक्टरों पर भारी पड़ रहे थे डाक्टरों की बडी संख्या के आगे दुम दबाते नजर आये।

एक एक ग्रामीण को चार चार डाक्टरो ने तब तक मारा जब तक वह बेदम नहीं हो गया। ये घटना तो एक बानगी भर है। पिछले पांच सालो में तीन दर्जन से अधिक घटनायें इस बात का सबूत है कि डाक्टर जिन्हे इस धरती का भगवान कहा जाता है अपनी इंसानियत अपना धर्म और अपनी संवेदनशीलता पूरी तरह से भूल चुके हैं। इन डाक्टरों की गुंडई का ये आलम है कि कलम और चिकित्सा के यंत्र चलाने वाले इनके हाथ किसी का सर फोड़ने में भी नहीं झिझकते। यहां तक कि ये खुलेआम पुलिस से भी टकराते है और अजूबा ये कि हर बार पुलिस को ही पीछे हटना पड़ता है। ऐसी ही एक मुठभेड़ में घायल हुए एक दरोगा ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पुलिस इन डाक्टरों की गुंडई बर्दाश्त करने के लिये मजबूर हो गई है क्योकि इलाज में लापरवाही के कारण आये दिन तीमारदारो और डाक्टरों में झगड़ा होता है। पुलिस जब बीच में पड़ती है तो तीमारदार तो डर जाते है लेकिन ये डाक्टर पुलिस से भी भिड़ जाते हैं और उन पर भी हमला कर देते हैं। अगर पुलिस कानूनी कारवाई करने का प्रयास करती है तो फौरन उपर से फोन आ जाता है और पुलिस कोई कानूनी कारवाई नहीं कर पाती। कभी कभी उपर से सरकार भी यदि सख्त कदम उठाना भी चाहती है तो यह ब्रम्हास्त्र चला देते हैं और इनके ब्रम्हास्त्र के आगे सरकार भी घुटने टेंक देती है। इनका ब्रम्हास्त्र यह है कि यह हड़ताल पर बैठ जाते है। इनके हड़ताल पर बैठने से इलाज न मिल पाने के कारण दर्जनो गरीब मरीज मरने लगते हैं जिसके कारण मजबूर होकर सरकार को इन डाक्टरो की गुंडई के आगे नतमस्तक होना पड़ता है।

हर बार यही होता आ रहा है इसलिये इन डाक्टरों की नाफरमानियां इतनी बढ़ गई है कि ये सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी प्राईवेट प्रैक्टिस करते हैं, सरकारी अस्पतालों में भी मरीजों से आपरेशन की फीस वसूलते हैं और विरोध करने पर यह खुलकर मरीजों और तीमारदारों का सर भी फोड़ते हैं। क्या ऐसे डाक्टरों को आम जनमानस इज्जत की नजर से देखेगा। क्या ऐसे डाक्टरों को कोई धरती का भगवान कहेगा। एक न एक दिन पाप का घड़ा भरता ही है और हद होने पर उसके आगे विस्फोट होना तय है। और यही हुआ भी। न जाने कहां से एस0एस0पी0 यादव के अन्दर इतनी हिम्मत आ गई कि उन्होने वो कर दिखाया जो पिछले दर्जनो सालो से कोई एस0एस0पी नहीं कर पाया।
मोटी रकम लेकर फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने के आरोप में जिला अस्पताल उर्सला के चिकित्सा अधीक्षक डा0 शैलेन्द्र तिवारी, ई0एम0ओ0 डा नासिर हुसैन के0पी0एम0 अस्पताल के डा0 डी0के0 श्रीवास्तव और एक वार्ड ब्वाय को गंभीर धाराओ में गिरफ्तार करने के आदेश पर अपनी मुंहर लगा दी। एक चैनल से जुडे पत्रकार विपिन गुप्ता ने फर्जी मेडिको लीगल बनाने के इस फर्जीवाडे का स्टिंग आपरेशन किया था और इसके वीडियो फुटेज एस0एस0पी यशस्वी यादव को दिखाये थे जिसके बाद एस0एस0पी0 यशस्वी यादव ने यह सख्त कारवाई की। इस पुलिसिया कारवाई के बाद शहर के सरकारी अस्पताल के साथ साथ प्राईवेट नर्सिंग होम के डाक्टर भी लामबंद हो गये। भविष्य में अपनी भूल सुधार करने की बात तो दूर है आई0एम0ए0 का एसोसिएशन एस0एस0पी0 का हटवाने के लिये डी0जी0पी0 से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक गया लेकिन एस0एस0पी0 का बाल बांका तक नहीं कर सका।

वजह एकदम साफ थी क्योंकि सी0डी0 में डाक्टरों की घूसखोरी के पुख्ता प्रमाण थे जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता था। इसीलिये डाक्टरों पर सिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली बात चरितार्थ हो रही थी। डाक्टर जब एस0एस0पी0 का कुछ नहीं बिगाड पाये तो साफ सुथरी छवि वाले टी0वी0 पत्रकार विपिन गुप्ता के पीछे पड़ गये जिन्होने उक्त सी0डी0 के घूसकांड को अपने चैनल में भी दिखाया था। मेडिको लीगल का यह खेल दरअसल जितनी मोटी रकम उतने गहरे जख्म का खेल है। पैसे के दम पर डाक्टर हल्की चोटो का गहरा और गहरी चोटो को हल्का दिखाने का खेल करते है। सरकार से मोटी मोटी तन्खाहे उठाने वाले और सरकारी रोक के बावजूद धड़ल्ले से प्राईवेट प्रेक्टिश करने वाले ये डाक्टर सफेद को काला और काले को सफेद करने का खेल तो खूब खेलते है लेकिन ये वह कसम भी भूल जाते है जो इन्हें डाक्टर बनने के बाद खिलाई जाती है। कसम में डाक्टरों से कहलावाया जाता है कि मैं अपने कर्तव्य का पालन बड़ी ईमानदारी से करूंगा और गरीब और अमीर के इलाज में कोई भेद नहीं करूंगा लेकिन नोटों की गड्डियों की महक के आगे ये डाक्टर सब भूल जाते हैं। नोटों की महक के आगे इन्हें न ही कोई कसम याद रहती है और न ही गरीबो के आंसू। दरअसल कानून में चोट की प्रवृति ही मुकदमे मे लगाई जाने वाली धाराएं तक करती है। ऐसे में मामूली मारपीट का शिकार व्यक्ति भी चाहता है कि उसके जख्म कुछ ज्यादा ही बढा चढा कर दिखा दिये जाये ताकि वह अपने विरोधी के खिलाफ गंभीर धाराये लगवा सके।  

मेरा दर्द न जाने कोई

हम यहां उन लोगो के दर्द को बयान कर रहें है जो कि डाक्टरो के गलत मेडिको लीगल के शिकार हुए है। हालाकि ऐसे लोगो की संख्या बहुत बडी है जिनमे सबका उल्लेख हमारे लिये प्रकाशित करना संभव नहीं है लेकिन हम यहां कुछ लोगो के उदाहरण दे रहे है जिससे इस खेल की स्याह तस्वीर को समझा जा सकता है।

मनोज मिश्रा

वाई ब्लाक किदवई नगर निवासी मनोज मिश्रा का झगडा प्रमोद कपूर से हो गया था। श्री मिश्रा का गुनाह सर्फ इतना था कि उन्हें यह नहीं अच्छा लगता था कि कोई लड़का लड़की को छेड़े, इसलिये श्री मिश्रा ने प्रमोद कपूर जो कि घर के पास स्थित सुभाष इंटर कालेज में पढता था, को रोका तो करोड़पति बाप की इकलौती संतान प्रमोद उनसे लड़ने लगा इस पर मनोज ने उसका दो चार थप्पड़ जड़ दिये। दोस्तों के सामने हुई बेज्जती को प्रमोद बर्दाश्त नहीं कर पाया और घर से जो हजारों रुपये जेबखर्च के लिये मिलते हैं उसको लेकर पहुंच गया उर्सला के डाक्टर के पास और पैसे के दम पर 324 की रिपोर्ट बनवा कर मनोज के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुंच गया लेकिन मनोज का भाग्य अच्छा था कि क्षेत्र का चौकी इंचार्ज जब जांच करने आया तो वह मनोज का क्लास फेलो निकल आया। उसने अपनी जांच में मेडिको लीगल को फर्जी पाया और मामले को रफा दफा कर दिया।

डा0 जे0एस0 सचान

बर्रा निवासी डाक्टर सचान पेशे से डाक्टर हैं। मालिक इनसे इनकी क्लीनिक खाली कराना चाहता था। डाक्टर सचान की पहचान क्षेत्र में बहुत शरीफ और गरीबो की मदद करने वाले इंसान के रूप में होती है क्योंकि वह गरीबो से अपनी फीस तक नहीं लेते है। डा0 सचान अपने क्लीनिक के लिये कही और जगह देख रहे थे लेकिन उनको जगह मिल नहीं पा रही थी। एक दिन कम पढा लिखा जाहिल मकान मालिक उनसे लड बैठा और अश्लील गालियां देने लगा। क्लीनिक में ही बैठा डा सचान के भतीजे को उसकी गालिया बर्दाश्त नहीं हुई और उसने मकान मालिक को थप्पड जड दिये। मार खाकर खिसियाया हुआ मकान मालिक घर गया और ब्लेड से अपने हांथों से कई जगह अपने शरीर पर जख्म बना लिये और गलत मेडिको लीगल बनवा कर डा सचान के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी। डाक्टर सचान को जेल जाना पड़ा जिसकी कसक उनके दिल में आज भी है और एक डाक्टर होने के बावजूद भी वह डाक्टरों के इस गलत मेडिको लीगल खेल की जमकर आलोचना करते है।  

अवनीश तिवारी

बाबूपुरवा कालोनी, किदवई नगर, निवासी अवनीश तिवारी एच ब्लाक किदवई नगर शनिदेव मंदिर के बगल में लगभग 35 वर्षो से चाय का होटल चला रहे है। शनिदेव मंदिर के चढावे की वसूली करने वाला राम किशोर तिवारी जिसने छोटी सी बटिया रखकर बहुत बडी सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया है की नीयत बगल के इस चाय के होटल को भी कब्जियाने की थी इसलिये वह बहुत सालो से अवनीश तिवारी और उनके चाचा दयाराम को होटल खाली करने लिये दबाव बना रहा था

लेकिन वो कामयाब नहीं हो पा रहा था। रात दिन नषे में धुत्त रहने वाला राम किषोर एक दिन नषे में अवनीष तिवारी के होटल पहुंचा और अवनीष से लडने लगा और उनके होटल की ईटे गिरा दी। अवनीष और दयाराम ने जब विरोध किया तो नषे की अधिकता में खुद ही अपना सर फोड लिया और मेडिका लीगल करा लाया। जिस पर दयाराम और अवनीष को जेल की हवा खानी पडी।  

मोहन लाल गुप्ता

घाटमपुर के रहने वाले मोहन लाल का झगड़ा गांव के ही दबंग ठाकुरों से था। वो मोहन लाल की जमीन बंदूक की दम पर जोतते थे। मोहन लाल बनिया थे। पैसे के अकारण नुकसान जब न देख सके तो उन्हाने भी ठाकुरो की इस दबंगई का विरोध किया । ग्रामीणो ने किसी तरह मामले को आगे बढने से रोका। लेकिन पैसे के दम पर उन दबंग ठाकुरो ने गलत मेडिको लीगल कराकर 308 की गंभीर धारा मोहन लाल के उपर लगवा दी और उसे जेल भिजवा दिया। महीने भर बाद बडी मुश्किल से हाईकोर्ट से मोहन लाल छूट पाये लेकिन आठ वर्षो बाद भी आज तक वह जेल जाने की त्रासदी को भुला नहीं पाये है।

कानपुर से मोहित दीक्षित की रिपोर्ट.

सत्यनारायण के अनुज का असामयिक निधन

भोपाल : रायसेन जिले में दैनिक भास्कर समूह में कार्यरत पत्रकार सत्यनारायण याज्ञवल्क्य के अनुज विमलनारायण याज्ञवल्क्य का भोपाल के एक अस्पताल में असामयिक निधन हो गया. करीब एक माह पहले इनका न्यूरो संबंधी आपरेशन बैंगलोर में हुआ था और तबसे निरंतर चिकित्सकीय देखरेख में थे.

32 वर्षीय विमल तकनीकी मामलों के खासे जानकार थे. ये नईदुनिया-जागरण समूह के विदिशा ब्यूरो में सीनियर रिपोर्टर सपन याज्ञवल्क्य के चाचा थे और भाई कमल याज्ञवल्क्य व भी पत्रकार हैं. इनके परिवार के अधिकांश सदस्य पत्रकारिता करते हैं.
 

सेबी, सहारा क्यू शॉप को हाई कोर्ट द्वारा नोटिस जारी

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा सहारा क्यू शॉप अग्रिम/बॉण्ड जारी किये जाने की जांच कराये जाने हेतु याचिका मे इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आज सेबी और सहारा क्यू शॉप लिमिटेड को नोटिस जारी किया. जस्टिस देवी प्रसाद सिंह एवं जस्टिस अशोक पाल सिंह की बेंच ने भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के अधिवक्ताओं को भी इस बारे मे अब तक की गयी कार्यवाही के सम्बंध मे जानकारी प्राप्त कर कोर्ट को सूचित करने के निर्देश दिये। मामले मे अगली सुनवाई 08 अक्टूबर को होगी।

अमिताभ और नूतन के अनुसार उन्होंने दो सहारा क्यू शॉप अग्रिम ख़रीदे थे जिसमे उन्हें सहारा क्यू शॉप कर्मचारियों द्वारा बताया गया था कि उन्हें 6 साल बाद 1000 रुपये के बदले 2335 रुपये मिलेंगे. इसके अलावा एक स्कीम चार्ट दिया गया था जिसमे 6 साल बाद 1000 रुपये के 2354 रुपये हो जाने की बात थी. लेकिन इस बॉण्ड की सामान्य शर्तें और नियम के अनुसार यह योजना मात्र सामान खरीदने के लिए अग्रिम धनराशि है.

इस विरोधाभास के कारण और सहारा इंडिया रियल एस्टेट कंपनी बनाम सेबी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये निर्णय के परिप्रेक्ष्य में याचीगण ने सेबी, कोरपोरेट मामलों के मंत्रालय और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय को सहारा क्यू शॉप के जरिये किये जा रहे धन संग्रह की जांच करा कर निवेशकों के हितों की रक्षा किये जाने की मांग की थी पर कोई कार्यवाही नहीं होने पर उन्होंने यह रिट याचिका दायर किया है.

ललित उपमन्यु, सम्मी कुमार, एपी जैन, रिंकू व्यास, धर्मेश, हरीश के बारे में नई सूचनाएं

इंदौर। दैनिक भास्कर इंदौर संस्करण के न्यूज एडीटर ललित उपमन्यु ने सोमवार को दैनिक भास्कर को अलविदा कह दिया है। उपमन्यु ने कल ही दैनिक दबंग दुनिया में प्रभार संभाल लिया। पिछले दिनों दैनिक भास्कर में अपने दामाद के साथ हुए घटनाक्रम के बाद उपमन्यु वहां असहज महसूस कर रहे थे।

इंदौर से खबर है कि डीजी केबलनेट में कुछ नई आमद हुई है. प्रसिद्ध केबल ऑपरेटर अतुल प्रकाश जैन को हेड ऑपरेशन बनाया गया है. सिटी केबल से रिंकू व्यास एवं धर्मेश नीमा की वापसी हुई है. इन्हें मैनेजर ऑपरेशन बनाया गया है. उधर सिटी केबल की सिटी न्यूज के स्टेट हेड हरीश फतेहचंदानी ने बीटीवी-हेथवे में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ हेड के रूप में कार्यभार ग्रहण कर लिया है. 

पत्रकार सम्मी कुमार ने अपनी पारी एनडीटीवी इंडिया के साथ शुरू की है. इससे पहले वो BAG फिल्म और लाइव इंडिया में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. साथ ही कई टीवी चैनल और प्रोडक्शन हाउस में भी क्रिएटिव के तौर पर अपनी सेवाए दे चुके हैं.

मुसलमानों के खिलाफ कोई रिपोर्ट किसी भी हालत में नहीं ली जाये!

: मुजफ्फरनगर दंगों का असल कारण : मुजफ्फरनगर के दंगों के बारे में कई तरह की बातें हो रही है लेकिन कोई असल समस्या पर बात नहीं कर रहा है. दंगो का मूल कारण जो है उस पर कोई बात नहीं हो रही है. दंगों के पीछे जो मूल घटना रही वो पूरी तरह से विधि-व्यवस्था सम्बंधित घटना थी- छेड़खानी की. लेकिन एक विधि-व्यवस्था की सामान्य सी घटना ने भयावह साम्प्रदायिकता का रूप ले लिया और ऐसा क्यूँ हुआ इसके पीछे का कारण आज़म खान प्रोत्साहित यूपी पुलिस के बीच प्रसारित मौखिक लेकिन बाध्यकारी वो निर्देश है जिसमे पूरे यूपी में थाना-प्रभारियों को सख्त ताकीद है की मुसलमानों के खिलाफ कोई रिपोर्ट किसी भी हालत में नहीं ली जाये. इसकी पुष्टि यूपी पुलिस का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा अधिकारी करता है.

ये बात मीडिया में भी आई लेकिन सांकेतिक और दबे-छुपे रूप में. मुजफ्फरनगर में भी छेड़खानी की घटना के बाद इस घटना की थाने में रिपोर्ट करने की कोशिश हुई। थाना-प्रभारी ने इस आदेश का हवाला देते हुए रिपोर्ट दर्ज करने से साफ़ मना कर दिया। यंही से विधि-व्यवस्था की एक घटना ने सांप्रदायिक रंग लेना शुरू किया। छेड़खानी की जो घटना हुई थी वो कोई सामान्य छेड़खानी नहीं थी। ये "attemp to rape" सरीखी ही थी। लिहाज़ा पुलिस के इस रवैये से पहले से गुस्से में दहक रहे लोग और भड़क गये। लोगों ने कानून अपने हाथों में ले लिया और मुख्य आरोपी को स्वयं पीटने लगे. इसी में उसकी मौत हो गयी। अगले दिन उस युवती के दोनों भाइयों की हत्या कर दी गयी। पुलिस ने इस सम्बन्ध में भी कोई मामला दर्ज करने से मना कर दिया क्यूंकि आरोपी इस बार भी मुस्लिम थे. लेकिन पुलिस ने भीड़ द्वारा मारे गए आरोपी  मुस्लिम युवक के सिलसिले में पीड़ित युवती के परिज़नों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था। पुलिस के खुलेआम इस भेदभाव पूर्ण रवैये ने जो सांप्रदायिक चिंगारी भड़काई उसका परिणाम आज सबके सामने है। इस देश में धर्म-निरपेक्षता की परिभाषा तुरंत बदलने की आवशयकता है वरना सिर्फ साम्प्रदायिकता ही शेष रहेगी। 

लेखक अभिनव शंकर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं.

अखिलेश को बौना साबित करने में जुटीं हैं आईएएस अधिकारी अनीता सिंह?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव वैसे तो पूर्ण बहुमत की सरकार के मुखिया हैं। अखिलेश यादव में कार्य एवं निर्णय लेने की क्षमता है और उनका व्यक्तित्व मृदुभाषी एवं शालीन है लेकिन इसके बावजूद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बीते 18 महीनों में कुछ प्रकरणों में उनकी जो किरकिरी हुई है, उसकी वजह साफ तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय की प्रभावशाली आईएएस अफसर अनीता सिंह बनी हुई हैं।

अनीता सिंह यूं तो मुख्यमंत्री की सचिव हैं लेकिन सूत्रों के मुताबिक अनीता सिंह मुख्यमंत्री के किसी भी आदेश को दरकिनार करने में माहिर हैं और तो और वह मुख्यमंत्री को कई बार प्रेस कान्प्रेंस या अन्य सार्वजनिक मौकों पर नजर अंदाज कर न मौजूद होकर अपनी हनक दिखा रही हैं। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक अनीता सिंह बीते कई महीनों से मुख्यमंत्री से संवाद विराम किये हुए हैं। जिसके चलते वह स्वयं कई अहम फैसले स्वयं ले लेती हैं, जो मुख्यमंत्री की जानकारी में नहीं होते हैं। जिसके कारण मुख्यमंत्री को अक्सर किरकिरी का सामना करना पड़ता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले तो अफसरों ने मुख्यमंत्री से सही स्थिति छुपा कर मुख्यमंत्री को गुमराह किया गया। पहली वारदात के बाद ही मुख्यमंत्री ने हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में तैनात अक्षम अधिकारियों को हटाने ही नहीं बल्कि उन्हें सस्पेंड करने का मन बना लिया था लेकिन सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह ने इस प्रकरण को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए किसी भी अधिकारी के खिलाफ तबादले तक कि कार्रवाई नहीं होने दी। दरअसल पश्चिमी उप्र में कमिश्नर, डीएम, आईजी, डीआईजी से लेकर दरोगा तक सभी की नियुक्ति अनीता सिंह की अनुकम्पा से हुई है, जिसमें मुख्यमंत्री की कोई भी राय शामिल नहीं है। ऐसे में वह कैसे अपने ही द्वारा तैनात अधिकारियों को दण्डित करतीं। इससे साफ पता चलता है कि उत्तर प्रदेश का शासन अनीता सिंह के हाथों में है और मुख्यमंत्री अपनी ही सचिव के शासन तंत्र के आगे बेबस हैं।

सिर्फ यही नहीं मार्च 2012 में अखिलेश यादव नेतृत्व में सरकार बनने के साथ ही इस खेल की बानगी दिखनी षुरू हो गई थी। जब युवा मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने अपनी पसंद के अधिकारियों की तैनाती करनी चाही लेकिन मुख्यमंत्री के बजाय उनकी सचिव अनीता सिंह के मनमाफिक अफसर शासन में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हो गये और मुख्यमंत्री की शासन तंत्र पर पकड मजबूत होने से पहले ही ढीली हो गई। इसकी सबसे बड़ी बानगी आईएएस संजय अग्रवाल की मुख्यमंत्री कार्यालय से 12 घंटे के अंदर हुई विदाई।

मालूम हो कि मुख्यमंत्री ने आईएएस संजय अग्रवाल को प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया था लेकिन मुख्यमंत्री का यह फैसला अनीता सिंह को नहीं भाया और अनीता सिंह की नाराजगी के चलते संजय अग्रवाल महज 12 घंटे के अंदर मुख्यमंत्री कार्यालय से हटा दिये गये। सूत्रों के मुताबिक थानों से लेकर डीजीपी और बाबू से लेकर प्रमुख सचिव नियुक्ति तक की तैनाती में जहां मुख्यमंत्री की मंशा के विपरीत महज अनीता सिंह के पसंद के अफसरों की तैनाती हुई और मुख्यमंत्री के आदेश सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गये।

यही नहीं, जानकारी के मुताबिक अनीता सिंह मुख्यमंत्री के राजधानी में होने या बाहर होने के दौरान कई महत्वपूर्ण फाइलों पर 'मुख्यमंत्री ने अनुमोदन किया' मुख्यमंत्री के संज्ञान के बगैर लिख कर आदेश कर देती हैं। बाद में इसकी जानकारी होने पर मुख्यमंत्री ने ऐसे फैसलों का कई बार प्रतिवाद किया लेकिन मुख्यमंत्री, अपनी सचिव अनीता सिंह के फैसलों को वापस नहीं करा पाने में सफल नहीं हो सके।

इस तरह के आदेश का अनीता सिंह मुख्यमंत्री पद की गरिमा से खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आ रही हैं। ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन सबसे अंजान हैं। पिछले 18 महीनों से देष के सबसे बड़ी सूबे की कमान संभाल रहे अखिलेश यादव कई मौकों पर प्रेस कांप्रेंस और मीटिंगों के दौरान अपनी नाराजनी साफ जाहिर कर चुके थे। बावजूद इसके अनीता सिंह ने जिस तरह शासन में महत्वपूर्ण पदों जिसमें प्रमुख सचिव गृह और प्रमुख सचिव नियुक्ति पर अपनी लॉबी के अफसरों को तैनात कर रखा है उससे मुख्यमंत्री के आदेश बेअसर साबित हो जाते है।

सत्ता के करीबी जानकार तो यहां तक बताते हैं कि आज जिलों से लेकर शासन तक के आला अधिकारी जहां अनीता सिंह के एक फोन पर ष्सिर के बल’ खड़े होने को तैयार रहते हैं, वहीं मुख्यमंत्री आवास और स्वमं मुख्यमंत्री द्वारा किए गये फोन को ये अफसर नजरअंदाज कर देते हैं। इसकी वजह साफ है मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश हैं कि आईएएस एवं पीसीएस अफसरों की नियुक्ति की फाइल अनीता सिंह के जरिए ही मुख्यमंत्री तक अनुमोदन के लिए पहुंचेगी। इस आदेश की आड़ में शासन के अधिकारियों को साफ पता है कि अनीता सिंह ही किसी की नियुक्ति या तबादला करवा सकती हैं। इसलिए जब-जब मुख्यमंत्री अधिकारियों को नसीहत देते हैं, अधिकारी मुख्यमंत्री को नजरअंदाज कर अनीता सिंह की सरपरस्ती में अहम पोस्टिंग पा जाते हैं।

यहां पर सवाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पैरोकारी या विरोध का नहीं है बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जिस तरह एक आईएएस अफसर मुख्यमंत्री को नजरअंदाज कर अपने इशारे पर शासन सत्ता चला रही है और मुख्यमंत्री को हर मुद्दे पर बौना साबित करने की कोशिश हो रही है उससे कई संवैधानिक खतरे पैदा होने की आशंका है। मुख्यमंत्री जहां प्रदेश की जनता के प्रति जवाबदेह हैं वहीं वे जनता के नुमाइंदे हैं। आम जनता हो या विधानसभा मुख्यमंत्री अपनी सरकार की कार्यशैली के लिए संवैधानिक तौर पर जिम्मेदार हैं। फिर महज एक आईएएस अफसर कैसे इस पूरी संवैधानिक व्यवस्था को नजरअंदाज कर अपना राज कायम किए हुए है।

बहरहाल, जिस तरह पश्चिमी उप्र में हुई हिंसा के बाद समीक्षा बैठक के नाम पर मुख्यमंत्री को एक बार फिर बौना साबित करने की कोशिश की गयी, उससे फिलहाल उप्र के हालात सुधरते नजर नहीं आ रहे हैं। मुख्यमंत्री मुजफ्फरनगर में हुई हिंसा के बाद डीएम, एसएसपी समेत कई थानेदारों को सस्पेंड कर कड़ी कार्रवाई का मन बना चुके थे, लेकिन अनीता सिंह ने एक बार फिर अपने प्रभाव से उन अक्षम एवं गैर जिम्मेदार अधिकारियों का बचाव कर महज तबादला करके उनका बचाव किया वहीं मुख्यमंत्री के लिए एक नई चुनौती पेश कर दी है।

मैं इससे कतई नहीं डरता कि एक प्रभावशाली आईएएस अफसर अनीता सिंह इन बातों से नाराज होकर मेरा दमन कर सकती है अथवा करवा सकती हैं। अपने आईपीएस पति या अपने अधीनस्थों के जरिए मुझे जेल भेज सकती है अथवा मेरी हत्या तक करवा सकती है। डरना मेरी फितरत में नहीं, अन्याय और तानाशाही के विरूद्ध मैं हमेशा ही खड़ा होता रहा हूं, चाहे बीएसपी सरकार में प्रभावशाली अफसर विजयशंकर पाण्डे की तानाशाही को चुनौती देना हो या मौजूदा सरकार में अनीता सिंह का कार्यशैली का खुलासा करना हो, मैं असत्य एवं अन्याय के विरूद्ध चुप नहीं बैठ सकता। यदि मैं चुप बैठ जाता तो यूपी में हुए एनआरएचएम घोटाले, सीएमओ हत्याकाण्ड जैसे मामलों की सीबीआई जांच के लिए न्यायालय को दखल नहीं देना पड़ता और व चीनी मिलों की बिक्री एवं मनरेगा घोटाले पर न्यायालय का दरवाजा न खटखटाता। हालांकि यहां मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि मेरी व्यक्तिगत रूप से आईएएस अधिकारी श्रीमती अनीता सिंह से कोई वैमन्यता या दुराव नहीं है लेकिन उनकी कार्यशैली का विरोध करना मेरा धर्म बनता है और यही सच्ची पत्रकारिता है।

इसी क्रम में मेरी माननीय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी से अपील है कि उप्र की जनता ने सिर्फ और सिर्फ आप पर विश्वास जाहिर करते हुए समाजवादी पार्टी को अपने जन्म के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत प्रदान किया। लेकिन आज आपकी ही विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगने लगे हैं। ऐसे में आपको सतर्क एवं सचेत होते हुए उप्र की जनता को भयमुक्त एवं विकासशील राज्य बनाने के लिए कड़े निर्णय लेने होंगे। इस राह में भले ही कोई भी आड़े आये, आपको उसका दमन करने के लिए मन कड़ा करना ही होगा।

लेखक सच्चिदानंद ‘सच्चे’ लखनऊ से प्रकाशित उर्दू दैनिक ‘जदीद अमल’ के संवाददाता हैं. सच्चे से संपर्क sachchey4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

नागपुर में सहारा समय न्यूज चैनल का फर्जी पत्रकार गिरफ्तार

कई लोगों को ठगने और ब्लैकमेल करने वाला फर्जी पत्रकार नागपुर पुलिस की गिरफ्त में आ गया है. यह व्यक्ति खुद को सहारा समय न्यूज चैनल का सब एडिटर बताता था. इसने कई सफेदपोशों को एक्सपोज करने की धमकी देकर उन्हें ब्लैकमेल किया. इसकी शिकायत जब सहारा समय प्रबंधन से की गई तो सहारा समय की तरफ से ही पुलिस में एक शिकायत दर्ज करा दी गई कि कोई व्यक्ति खुद को सहारा समय का पत्रकार बता कर दूसरे लोगों को धमका रहा है.

पुलिस ने शिकायत के बाद जांच व छानबीन शुरू की. और आखिरकार उस फर्जी पत्रकार को पकड़ लिया गया जिसका नाम विश्वनाथ चक्रबर्ती है. यह वेस्ट बंगाल का रहने वाला है. वह नागपुर में पिछले आठ नौ दिनों से है और कई रसूखदार लोगों को टारगेट किए हुआ था. विश्वनाथ इसके पहले कई वर्षों तक मुंबई में था जहां उसने कई लोगों को सफलतापूर्वक ब्लैकमेल किया. विश्वनाथ के पास से फर्जी आईडी कार्ड और विजिटिंग कार्ड वगैरह बरामद किए गए हैं. विश्वनाथ कई शहरों में जाया करता था और खोजी पत्रकारों का नाम लेकर लोगों को ब्लैकमेल करता था. सहारा समय के ब्रांड नाम का दुरुपयोग करने और दूसरों को ब्लैकमेल करने के आरोप में विश्वनाथ को गिरफ्तार करने के बाद उसे जेल भेजा जा रहा है.
 

संघ परिवार का ‘महामंथन’ : मोदी का रास्ता साफ, लेकिन तुनके रहे आडवाणी!

भाजपा और संघ नेतृत्व के बीच दो दिन तक समन्वय मंथन चलता रहा। इस महामंथन की कवायद के बाद गुजरात के बहुचर्चित मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का रास्ता साफ हो गया है। यह तय कर लिया गया है कि 20 सितंबर के पहले भाजपा का संसदीय बोर्ड ‘पीएम इन वेटिंग’ के तौर पर मोदी के नाम पर मुहर लगा देगा। यह अलग बात है कि तमाम मनुहार के बावजूद बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी, मोदी के मुद्दे पर तुनके ही रहे। यद्यपि, उन्होंने मंत्रणा बैठकों में हिस्सेदारी की। लेकिन, वे तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी के मुद्दे पर ‘आम राय’ से सहमत नहीं हुए। उन्होंने यही तर्क रखा कि चार विधानसभा चुनावों के बाद मोदी का फैसला किया जाए, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन, उन्हें जल्दबाजी में यह फैसला करना ठीक नहीं लग रहा। आडवाणी को इस बात का भी रंज रहा कि पार्टी के कुछ जिम्मेदार नेता अंदर ही अंदर उनके खिलाफ विरोध का माहौल तैयार करा रहे हैं। यह तौर तरीका ठीक नहीं है।

पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी की गिनती पार्टी के दिग्गज नेताओं में होती है। ऐसे में, संघ और भाजपा नेताओं की पूरी कोशिश रही कि मोदी के मुद्दे पर आडवाणी राजी हो जाएं। इसके लिए तमाम कवायद की गई। बैठक में संघ के एक बड़े नेता ने आडवाणी के योगदान का जमकर गुणगान किया। इसका समर्थन सभी लोगों ने किया। कोशिश यही रही कि इस ‘गुणगान’ से ‘लौह पुरुष’ का दिल कुछ पिघल जाए। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। सूत्रों के अनुसार, वे बैठक में जरूर उपस्थित रहे, लेकिन ज्यादातर मुद्दों पर उन्होंने चुप्पी साधना ही बेहतर समझा। इस तरह से वे लगातार यही संकेत देते रहे कि मोदी के मुद्दे पर जो तैयारी चल रही है, उससे वे सहमत नहीं हो पा रहे हैं।

दरअसल, अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से खास तौर पर चार राज्यों के चुनाव काफी महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के चुनाव में सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के ऐन पहले होने जा रहे ये चुनाव ‘सेमीफाइनल’ जैसे होंगे। ऐसे में, इन चुनाव परिणामों का खास असर लोकसभा के चुनाव पर पड़ना लाजमी माना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों मीडिया में इस आशय की खबरें आई थीं कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस बात के लिए ‘लॉबिंग’ कर रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के पहले मोदी के नाम का ऐलान न हो। क्योंकि, मोदी का नाम ऐलान होने से राज्य की 30 अल्पसंख्यक बाहुल्य सीटों पर पार्टी को भारी नुकसान हो सकता है। इसके चलते चुनावी रणनीति को भारी झटका लगने का जोखिम है। मुख्यमंत्री चौहान ने कई दिनों पहले दिल्ली से लेकर नागपुर तक ‘लॉबिंग’ की थी। उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी कहा था कि मोदी के नाम का ऐलान मध्य प्रदेश के चुनाव परिणाम आने का बाद ही किया जाए, तो अच्छा रहेगा।

यह अलग बात है कि जब इस आशय की खबरें मीडिया में प्रसारित हुईं कि चौहान, मोदी के रास्ते का रोड़ा बनने जा रहे हैं, तो चौहान ने साफ-सफाई वाला बयान भी जारी किया था। इसमें उन्होंने कह दिया था कि वे पीएम उम्मीदवारी के लिए मोदी के नाम का विरोध नहीं कर रहे हैं। इस तरह की बातों में कोई दम नहीं है। लेकिन, भाजपा सूत्रों का दावा है कि चौहान ने जमकर ‘लॉबिंग’ की थी। आडवाणी और सुषमा स्वराज ने संघ और भाजपा की समन्वय बैठक में बाकायदा चौहान की आपत्तियों का उल्लेख किया है। इसी आधार पर यह कहा गया कि यदि मोदी के नाम का ऐलान होने के बाद विधानसभा चुनाव में रणनीतिक तौर पर नुकसान हो गया, तो इसके लिए क्या किया जाएगा? सूत्रों के अनुसार, इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर किसी ने नहीं दिया। लेकिन, डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने अपनी चर्चा में कई बातें साफ-साफ कह डालीं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जब पूरा संघ परिवार मोदी के मुद्दे पर सहमत है, तो किसी को अंदेशे के टोटकों पर अटकने की   जरूरत नहीं है। राजनीति में हमेशा जोखिम की गुंजाइश रहती है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि अंदेशे से इतना डरा जाए कि उचित फैसला ही न किया जाए। यह बात उनके गले नहीं उतर रही।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने चर्चा के दौरान चाणक्य नीति का भी जिक्र करके कहा कि जनभावनाएं जिस नेता के पक्ष में उभरी हैं, उसको लेकर ‘किंतु-परंतु’ में ज्यादा उलझने की जरूरत कहां है? सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली के कुछ कटाक्षों को लेकर आडवाणी खेमा काफी नाराज भी हुआ। बताया जा रहा है कि मोदी के पक्ष में जेटली ने एक तेज-तर्रार वकील की तरह तमाम तर्क दे डाले। यहां तक कह डाला कि इस फैसले के बीच जो लोग रोड़े डाल रहे हैं, उन्हें पार्टी क्या जमाना भी माफ नहीं करेगा। इस तरह की टिप्पणियों पर जोरदार बहस की भी नौबत आई। लेकिन, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि मोदी के मुद्दे पर भाजपा के दिग्गजों में मनभेद पैदा न हों। दो दिन की समन्वय बैठक में संघ और भाजपा के अलावा संघ परिवार के सभी 13 घटकों के प्रतिनिधियों ने हिस्सेदारी की। भाजपा के दो नेताओं को छोड़कर शायद ही किसी ने मोदी के गुणगान से परहेज किया हो।

17 सितंबर को मोदी का जन्मदिन है। कुछ लोगों की यह राय भी रही कि जन्मदिन के अवसर पर ही मोदी को उम्मीदवारी का बड़ा ‘उपहार’ दिया जाए। उल्लेखनीय है कि 20 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में कोई शुभ काम की शुरुआत नहीं की जाती। ऐसे में, दबाव है कि 19 सितंबर के पहले ही मोदी के मुद्दे पर फैसला हो जाए। मोदी के एक करीबी माने जाने वाले महासचिव ने अनौपचारिक चर्चा में संकेत दिए हैं कि 14 सितंबर को मोदी के नाम का ऐलान हो सकता है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 13 सितंबर को ही संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाने का मन बनाया था। लेकिन, मोदी के ज्योतिष सलाहकारों ने कहा है कि 5 का अंक गुजरात के मुख्यमंत्री के लिए ज्यादा शुभ रहता है। ऐसे में, अच्छा रहेगा कि 14 तारीख को ही बड़ा फैसला ले लिया जाए।

हालांकि, संसदीय बोर्ड की बैठक की तारीख अभी औपचारिक रूप से तय नहीं हुई है। लेकिन, पार्टी अध्यक्ष की तरफ से संसदीय बोर्ड के सदस्यों को अनौपचारिक रूप से कह दिया गया है कि वे लोग 13 और 14 सितंबर को दिल्ली में ही रहने का कार्यक्रम रखें, तो अच्छा है। इस संकेत से यही समझा जा रहा है कि मोदी के एजेंडे पर ही इन तारीखों में संसदीय बोर्ड की बैठक होगी। यह भी तैयारी कर ली गई है कि यदि किसी ने विरोध की जिद ही कर ली, तो मोदी पर फैसला बहुमत से करा लिया जाएगा। इस आशय के संकेत आडवाणी खेमे को दे दिए गए हैं। संघ प्रवक्ता एमजी वैद्य ने समन्वय बैठक के समापन के बाद मीडिया से यही कहा है कि सोमवार को मोदी के मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई है। क्योंकि, इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं को ही फैसला करना है। संघ का इस बारे में जो नजरिया है, उसे शनिवार को ही पार्टी नेतृत्व को बता दिया गया था।

15 सितंबर को हरियाणा के रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों की एक बड़ी रैली आयोजित की गई है। इसमें मुख्य अतिथि की हैसियत से मोदी को न्यौता दिया गया है। इस रैली में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह सहित सेना के डेढ़ दर्जन मेजर जनरल रैंक के पूर्व अधिकारी भी होंगे। इस रैली के आयोजकों में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव कैप्टन अभिमन्यु सिंह भी हैं। उनका दावा है कि इस रैली में पूर्व सैनिकों की ऐतिहासिक भीड़ जुटेगी। कोशिश की जा रही है कि मोदी, इस रैली में ‘पीएम इन वेटिंग’ की हैसियत से ही हिस्सेदारी करें। जाहिर है इसके लिए जरूरी है कि 14 सितंबर को संसदीय बोर्ड मोदी के नाम पर मुहर लगा दे। संघ और भाजपा समन्वय समिति की बैठक में रामजन्म भूमि, धारा-370 व सामान्य नागरिक संहिता जैसे विवादित मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

इन मुद्दों पर आडवाणी और सुषमा जैसे नेताओं ने यही कहा कि गठबंधन राजनीति के जमाने में खांटी और विवादित मुद्दों को सिर पर लादकर चलना संभव नहीं है। इसको लेकर संघ के एक-दो नेताओं ने काफी नाराजगी भी जताई। लेकिन, स्पष्ट रूप से यह तय नहीं हो पाया कि इन मुद्दों को लेकर क्या करना है? बाद में, संघ नेताओं ने यही कहा कि व्यवहारिक कारणों से भाजपा इन मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे में भले शामिल न करे, लेकिन इस तरह की बातें भी न करे कि उसका इन मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि, ऐसा करने से संघ परिवार के दूसरे घटकों का हौसला टूटता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के ताजा दंगों से सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है। इन दंगों में 31 लोग मरे हैं। इसकी भी अनौपचारिक चर्चा बैठक में हुई। संघ के नेताओं ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं को बहुसंख्यकों के पक्षधर भूमिका में रहना चाहिए। ताकि, सपा जैसे दलों का राजनीतिक छद्म सेक्यूलर खेल बिगड़ सके।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

पत्रकार वह है जो आठ सौ शब्दों में…

Purushottam Agrawal :  कृतज्ञ स्मरण करता हूँ राजेन्द्र माथुर का जिनसे बहुत कुछ सीखा, एक यह कि "पत्रकार वह है जो आठ सौ शब्दों में अमिताभ-रेखा रोमांस की स्टोरी लिखने में भी समर्थ हो, और प्रधानमंत्री की राजनैतिक असफलता का विश्लेषण भी और गोडोल थ्योरम का महत्व भी…." और एक यह भी कि "पुरुषोत्तमजी हम अखबार निकालते हैं इतिहास का जर्नल नहीं, लेख आप कल दे देते तो अखबार के काम का था, अब इसका ऐतिहासिक महत्व ही रह गया है.."

"शेर की सवारी के खतरे" उन्हीं का लिखा मुखपृ़ष्ठ संपादकीय था… याद आते हैं डॉ. कमल वशिष्ठ जिन्होंने थियेटर की दीक्षा दी। जिन दिनों ग्वालियर में थियेटर उन्नीसवीं सदी के अंदाज में चल रहा था, वशिष्ठजी ने हम कुछ नौजवानों को साथ लेकर समकालीन थियेटर की शुरुआत की थी। पहला नाटक था ललित सहगल का ‘हत्या एक आकार की’ मैंने ‘आकार’ के हत्यारे की भूमिका निभाई थी… उसके बाद ‘पगला घोड़ा’ और कई और नाटक..

जेएनयू आने पर बंसी कौल के निर्देशन में मणि मधुकर के रस-गंधर्व में काम किया था, उसके बाद से अब तक तो बस दर्शक का ही संबंध रहग गया है थियेटर से…लेकिन आगे की कौन जाने… हो सकता है कि….

पुरुषोत्तम अग्रवाल के फेसबुक वॉल से.

एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन का उत्तर प्रदेश के सांप्रदायिक दंगों का उत्तेजक कवरेज

Tejendra Sharma :  बी.बी.सी. लन्दन के भूतपूर्व संपादक विजय राणा का कहना है कि आमतौर पर सांप्रदायिक दंगों को कवर करते हुए मीडिया के लिये एक आचरण कोड स्थापित किया गया है कि समुदायों की पहचान नहीं बताई जाती। जब मैंने श्रीनिवासन जैन की रिपोर्ट देखी तो मैंने पाया कि इस वरिष्ठ पत्रकार ने इस कोड की सिरे से परवाह नहीं की। वे अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि मुसलमानों ने दो जाट लड़कों को मार डाला और उसके बाद से जाट मुसलमानों की हत्या कर रहे हैं और मुसलमानों के घर जलाए जा रहे हैं।

श्रीनिवासन जैन आगे यह भी कहते हैं कि मुसलमान अपने घरों से पलायन कर रहे हैं। उन्होंने शरणार्थी शिविर जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया। विजय राणा के अनुसार यह रिपोर्ट उत्तेजना पैदा करने वाली है और प्रशासन के कार्य को और अधिक कठिन बनाएगी क्योंकि इससे आम आदमी में अधिक आक्रोश उत्पन्न होगा। श्रीनिवासन जैन एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और उन्हें समझना चाहिये कि ऐसे संवेदनशील समय में हमें लोगों के ग़ुस्से को ठण्डा करना होगा ना कि आग में घी डाल कर उसे भड़काया जाए। श्रीनिवासन जैन की रिपोर्ट का मक़सद क्या है समझ में नहीं आता। यह रिपोर्ट मैनें भी देखी है और मैं विजय राणा से पूरी तरह सहमत हूं।

तेजेंद्र शर्मा के फेसबुक वॉल से

फेसबुक पर सक्रिय ‘फेक एनकाउंटर विशेषज्ञ’ फेंकू नेता की भक्तमंडली दंगों की आग को हवा दे रही

Ashutosh Kumar : दो साल पुराने विदेशी वीडियो… फेक न्यूज़- क्लिपों… और दूसरी बेशुमार फेक- सामग्री का प्रचार करके कौन दंगों की आग को लगातार हवा दे रहा है? फेसबुक पर जांच कर के देख लीजिये… ये उसी फेक -एनकाउन्टर विशेषज्ञ फेंकू नेता की भक्तमंडली है. खैर, ये मंडली तो जो है सो है ही. हमारी 'लेखक'- मंडली में भी कुछ लोग हैं जो 'क्रिया-प्रतिक्रिया' , 'आत्मरक्षा ', मुसलमान -होते -ही -हिंसक हैं' जैसे दंगाई मुहावरों को उछालने में लगे हैं.

''मेरे सम्प्रदाय वाले तो स्वाभाविक रूप से अच्छे बच्चे हैं. तुम्हारे वाले जन्मजात बदमाश हैं'' — यही वह मूल विचारधारा है जो हिटलर, जिन्ना और मोदी की राजनीति का आधार है. अवाम को उल्लू बना कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए जिसका फायदा उठाने से कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियां भी नहीं चूकतीं.

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और साहित्यकार आशुतोष कुमार के फेसबुक वॉल से.


Balendu Swami – "भाजपा का यह यह पेज दंगे भड़काने का काम कर रहा है, मैंने इस पेज का व्यवसायिक विज्ञापन भी फेसबुक पर देखा है. इसी पेज ने फोटोशॉप में यह फोटो बनाई है..

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=587194188011093&set=a.370607759669738.87990.370597503004097&type=1&theater

कृपया इस पेज की रिपोर्ट करें और मांग करें कि इसे फेसबुक से हटाया जाये और इसके एडमिन को तुरंत दंगा भड़काने के जुर्म में गिरफ्तार किया जाए. असली फोटो के साथ इनकी करतूत यहाँ देखी जा सकती है:

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10151718068528439&set=a.10151717415053439.1073741831.99335478438&type=1&theater

मुझे क्षमा करियेगा परन्तु अब मैं इंसानी खून के प्यासे मोदी भक्तों को टोलरेट नहीं कर पाऊंगा."

बालेंदु स्वामी के फेसबुक वॉल से.

यूपी में सपा और भाजपा के बीच घिनौना गठजोड़ हो चुका है : कमर वहीद नक़वी

Qamar Waheed Naqvi : उत्तर प्रदेश से अब तक जो भी ख़बरें सामने आयी हैं, उनसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि वहाँ समाजवादी पार्टी और बीजेपी में घिनौना गँठजोड़ हो चुका है, ताकि 2014 के चुनाव में दोनों को फ़ायदा पहुँच सके. मुज़्फ़्फ़रनगर में जिस तैयारी के साथ और जितने सुनियोजित तरीक़े से दंगा भड़काया गया, जिस प्रकार एक फ़र्ज़ी वीडियो को गाँव-गाँव तक फैलने दिया गया, जिस प्रकार दोनों ओर के दंगाई तत्वों को लगातार आम लोगों को भड़काते रहने की छूट दी गयी, जिस प्रकार सरकार का पूरा तंत्र सब कुछ देखते हुए भी जानबूझ कर सब कुछ अनदेखा करता रहा, उसके बाद भी अगर किसी को समझ न आये कि दंगों की साज़िश के पीछे कौन है और यह साज़िश रचने का उद्देश्य क्या है, तो फिर ऐसी 'मासूमियत' पर क्या कहा जाय.

1. क्या यह अकारण है कि सपा सरकार के एक साल के शासन में उत्तर प्रदेश में सौ से ज़्यादा छोटे-बड़े दंगे हो जाते हैं? जो उत्तर प्रदेश इतने दिनों से बिलकुल शान्त था, वहाँ अचानक दंगों की बाढ़ क्यों आ गयी? हो सकता है कि आपका जवाब हो कि यह अखिलेश सरकार की विफलता और निकम्मेपन के कारण हो रहा है. जी नहीं, यह एक डिज़ाइन के तहत हो रहा है. कैसे? अगला बिन्दु देखिए.

2. मुलायम सिंह यादव अचानक आडवाणी के गुण गाने लगते हैं, सुषमा स्वराज और आडवाणी को मुलायम अच्छे लगने लगते हैं! मुलायम संकेत देते हैं कि बीजेपी अगर साम्प्रदायिकता की राजनीति छोड़ दे तो उसे वह समर्थन दे सकते हैं! (यह बयान तो मीडिया के लिए था, इसकी असलियत आप भी समझते होंगे).

3. वरुण गाँधी के विरूद्ध कोई आरोप प्रमाणित नहीं होता. सारे सरकारी अफ़सर, पुलिसवाले और सारे गवाह अदालत में पलट जाते हैं, सारे सबूत रातोंरात ग़ायब हो जाते हैं!

4. 84 कोसी परिक्रमा की नूरा कुश्ती सौहार्दपूर्वक सम्पन्न हो जाती है.

5. प्रदेश के जिन इलाक़ों में बीस-पच्चीस साल से कोई तनाव नहीं हुआ था, वहाँ ख़ूनी दंगे होने लगते हैं.

6. लखनऊ में 17 साल बाद शिया-सुन्नी एक बार फिर एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं.

7. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश जानबूझ कर 'गोल टोपी' पहन कर मीडिया के सामने आते हैं और दंगों पर चिन्ता जताते हैं. साम्प्रदायिक दंगों के बाद कोई मुख्यमंत्री ऐसी ख़ास टोपी पहन कर सामने आता है तो वह मुसलमानों और हिन्दुओं को क्या सन्देश देना चाहता है?

ज़ाहिर-सी बात है कि इतनी सारी चीज़ें यों ही अचानक नहीं हो जातीं. सपा चाहती है कि मुसलमान उसके साथ गोलबन्द हो जायें और ग़ैर-यादव, ग़ैर-दलित हिन्दू बीजेपी के साथ चला जाये. इससे दोनों को फ़ायदा होगा. कैसे? यादवों व मुसलमानों को गोलबन्द कर सपा जितनी ज़्यादा से ज़्यादा सीटें 2014 में जीतेगी, उतना ही वह नयी सरकार के गठन को प्रभावित करने की स्थिति में होगी. कुछ ज़्यादा सीटें आ गयीं तो मुलायम अपने प्रधानमंत्री बनने का दावा भी पेश कर सकते हैं. इस स्थिति में न भी पहुँच सके, तो नयी सरकार के गठन में भरपूर सौदेबाज़ी वह करना चाहते हैं.

उधर, बीजेपी के लिए सीटें जिन राज्यों से बढ़ सकती हैं, वे हैं उत्तर प्रदेश, बिहार व राजस्थान, जहाँ उसके पास काफ़ी कम सीटें हैं. जैसे उत्तर प्रदेश से उसके पास सिर्फ 10 सीटें हैं. बिहार में 12 और राजस्थान में 4. राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निकम्मेपन के कारण बीजेपी काफ़ी आश्वस्त दिखती है. लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार को लेकर उसका दम फूल रहा है, इसलिए दोनों राज्यों में अचानक दंगे होने लगे!

बहरहाल, बीजेपी उत्तर प्रदेश से जितनी ज़्यादा सीटें जीत पायेगी, वह दिल्ली के लक्ष्य के उतना ही क़रीब पहुँचेगी. इस बात को लेकर बीजेपी के अन्दर भी किसी को मुग़ालता नहीं कि पार्टी इतनी सीटें ला सकेगी कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन जायें, लेकिन बीजेपी में सब यह मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा, जिसकी ज़मीन ऐसे दंगों से तैयार की जा रही है और इससे बीजेपी को लगता है कि उसकी सीटें काफ़ी बढ़ सकती हैं. अगर इतनी सीटें आ गयीं कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन सकें तो ठीक, वरना बीजेपी कोई और 'सर्वमान्य' नेता पेश करे और सरकार बनाये. ऐसे में उसे सहयोगी दलों की ज़रूरत पड़ेगी, तो नीतिश की जगह मुलायम क्या बुरे हैं? वक़्त आ गया है कि जनता इस घिनौनी राजनीति को समझे.

लेखक कमर वहीद नक़वी वरिष्ठ पत्रकार और आजतक न्यूज चैनल के पूर्व न्यूज डायरेक्टर हैं.

जब मेरठ के दंगों के दौरान हम पत्रकारों ने कर्फ्यू में निकाला था जुलूस

मेरठ के बारे में यह एक ऐसी घटना है जिसे याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बात 1987 की है। मेरठ में दंगा हो गया और कर्फ्यू लग गया। कर्फ्यू लगे दो दिन हो गए। डी. एम. ने केवल दो स्थानीय संपादकों को पास दिए,  बाकी पत्रकारों को पास देने से मना कर दिया। इस पर विचार करने के लिए मैंने कुछ पत्रकारों को अपने आफिस बुलाया। जागरण से अभय गुप्ता और ओ. पी. सक्सेना, अमर उजाला से सुनील छइंया और हरि जोशी के अलावा एक हिंदुस्तान के पत्रकार जिनका नाम याद नहीं आ रहा, के अलावा चार पांच अन्य पत्रकार समस्या पर विचार करने के लिए सिर जोड़ कर बैठे।

काफी विचार विमर्श के बाद तय पाया कि आज अगर डी. एम. कर्फ्यू पास नहीं जारी करते तो डी. एम. की मीटिंग का बहिष्कार कर दिया जाए। यह भी तय पाया कि जैसे ही मैं बहिष्कार का नारा दूं, सब एक साथ खड़े हो जाएं और मीटिंग से बाहर आ जाएं। शाम के तय समय पर मीटिंग हुई। पत्रकारों ने पास की मांग की तो डी. एम. ने साफ इंकार कर दिया। उनके इंकार करते ही मैं खड़ा हो गया और कहा कि जब आप हमारी बात मानने को तैयार नही हैं तो हम इस मीटिंग का बहिष्कार करते हैं। मेरे यह कहते ही आठ दस पत्रकार एक साथ खड़े हो गए तो दो को छोड़ कर बाकी भी खड़े हो गए और बाहर आ गए। बाद में वह दो भी बाहर आ गए मगर हमारे पास न आ कर अपने रास्ते चले गए।

बाहर आते ही पहला भाषण अभय गुप्ता ने डी. एम की तानाशाही के विरोध में दिया। और भी कई लोग बोले। मेरा नम्बर आया तो अनजाने ही मैंने कह दिया कि अगर डी. एम पास नहीं दे रहे तो हम बिना पास ही कर्फ्यू ग्रस्त क्षेत्र का दौरा करेंगे। सब उस समय जोश में थे। अतः यह प्रस्ताव सर्वसममति से पारित हो गया। लगभग साठ पत्रकार थे। सब खड़े हो गए और जुलूस बना कर कर्फ्यू ग्रस्त इलाके की ओर प्रस्थान कर दिया। पहले सब लिसाड़ी गेट थाने पर आए। पुलिस कर्मी हक्का बक्का हो कर देख रहे थे। थाने में एक डी. एस. पी. बैठे थे।

आबिद नाम के एक फोटोग्राफर ने उन्हें कंधा पकड़ कर झकझोरा और कहा कि हमें गिरफ्तार करें, हम कर्फ्यू तोड़ कर आए हैं। डी. एस. पी. किंकर्तव्यविमूढ देखता रहा। वहां से चल कर सभी पत्रकार कर्फ्य वाले इलाके में प्रवेश कर गए। भारी पुलिस बल मौजूद था मगर सब मुंह बाए देखते रहे। गली में जुलूस देख कर लोग भी अपने घरों के दरवाजों पर खड़े हो कर तमाशा देखने लगे। सबको यही डर सता रहा था कि पता नहीं कब लाठी चल जाए मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ और लगभग एक घंटा कर्फ्यूग्रस्त इलाकों में घूम कर हम सब बच्चा पार्क आ गए। यहां एक छोटी-सी सभा भी हुई और तय पाया कि कल सुबह दस बजे सब यहीं मिलते हैं।

जोश में प्रदर्शन तो कर दिया मगर हम कुछ लोग काफी परेशान भी थे। नभाटा के आफिस में मैं अभय गुप्ता और कई लोग बैठे और तय पाया कि रात में अपने घर न सोया जाए। रात में गिरफतारी हो सकती है। आखिर कर्फ्यू में प्रदर्शन करना कोई मामूली अपराध तो नहीं था। खैर, रात शांति पूवर्क बीत गई। सवेरे जब तक पत्रकार बच्चा पार्क पहुंचते, सूचना विभाग का अमला वहां पहुंच चुका था। सूचना विभाग वालों ने बताया कि आप सब अपने-अपने पास ले लें। इस सूचना पर सभी पत्रकार बहुत प्रसन्न हुए। थोड़ी दूर पर ही सूचना विभाग का कार्यालय था। सब वहां पहुंच गए और कई ने तो अपने लिए ही नहीं, अपने मित्रों और रिश्तेदारों के लिए भी पास ले लिए।

इस प्रदर्शन को लेकर पहली गाज सूचना अधिकारी पर गिरी। घटना के तीसरे दिन ही उनका तबादला हो गया। दूसरी गाज गिरी डी. एम. पर। एक सप्ताह के भीतर उनको भी हटा दिया गया। और तीसरा शिकार मैं बना। सारे प्रशासन को पता चल गया था कि बहिष्कार और प्रदर्शन की योजना मेरे आफिस में बनी थी। मेरठ से लेकर दिल्ली और लखनउ तक प्रदर्शन की चर्चा थी। मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के संज्ञान में मामला आया तो उन्होंने अपने दूत दिल्ली दौड़ा दिए। मुख्यमंत्री के दूतों ने कार्यकारी संपादक एस. पी. सिंह से फरियाद की और मेरी हरकतों के बारे में बताया तो मुझे भी दिल्ली से बुलावा आ गया मैं गया।

एस. पी. ने प्रदर्शन को बहुत बड़ा रिस्क बताया और कहा कि आप लोगों को यह रिस्क नहीं लेना चाहिए था, कुछ भी हो सकता था। मुझे कहा कि अब आपका वहां रहन उचित न होगा। मैं भी ऐसा ही मान रहा था, सो अगले दिन मेरठ में पत्रकारों को पता चला कि मैं भी जा रहा हूं। मेरे जाने के बाद दंगों में इजाफा हो गया तो नए डी.एम. ने पत्रकारों के पास निरस्त कर दिए। पत्रकार पहले की तरह हंगामा करने लगे तो डी. एम. ने लाठीचार्ज करा दिया जिसमें कई पत्रकार चोटिल हो गए। मेरे पास कुछ मित्रों के फोन आए तो मैंने कहा कि वह काठ की हांडी थी, एक बार चढ गई, यही बहुत था, उसे दोबारा चढाने का प्रयास नहीं करना चाहिए था। उसके बाद दंगों की हाशिमपुरा और मलियाना में पी. ए. सी. द्वारा जो खूनी इबारत लिखी गई, वह दंगों के इतिहास का एक काला अध्याय है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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मनीकंट्रोल डाट काम में भी छंटनी, कई पत्रकारों को जाने के लिए कह दिया गया

नेटवर्क18 के कई मीडिया वेंचर्स में से एक मनीकंट्रोल डाट काम में भी छंटनी की जा रही है. इस बिजनेस और फाइनेंस न्यूज पोर्टल से कम से कम आधा दर्जन रिपोर्टरों को इस्तीफा देने के लिए प्रबंधन ने कह दिया है. इन लोगों से जिस कागज पर साइन कराया गया है उस पर लिखा हुआ है कि वे परसनल कारणों से इस्तीफा दे रहे हैं. बताया जाता है कि मनी कंट्रोल डाट काम के लिए अलग से कोई टीम नहीं रहेगी.

इस ग्रुप के जो न्यूज और बिजनेस चैनल हैं, उसकी ही टीम इस वेबसाइट के लिए कंटेंट जनरेट करने के लेकर उसे एडिट करने व पब्लिश करने का काम करेगी. मनीकंट्रोल डाट काम के एडिटर संतोष नायर पहले फर्स्टपोस्ट डाट काम के एडिटर आर. जगन्नाथन को रिपोर्ट करते थे. अब नायर को कह दिया गया है कि वे टीवी वाले बासेज को रिपोर्ट करें. ज्ञात हो कि नेटवर्क18 की कंपनी टीवी18 ब्राडकास्ट की तरफ से इसके कई चैनलों सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन7, सीएनबीसी-टीवी18, सीएनबीसी आवाज आदि से करीब चार-पांच सौ लोगों को इकट्ठे हटा दिया गया. उसके बाद फिर वेब और अन्य डिवीजन्स में भी छंटनी की गई.
 

सर्वेक्षण में फेल रहे बहुगुणा

देहरादून : आई फोर इण्डिया ने देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सर्वेक्षण कर जनता से उनकी राय मांगी है। उत्तराखण्ड के संदर्भ में प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इस सर्वेक्षण में बनाई गई चार श्रेणी में से तीन में फेल ही नजर आए हैं। सर्वेक्षण में सरकार और प्रशासन की श्रेणी में विजय बहुगुणा फेल हुए हैं, आपदा प्रबंधन में विजय बहुगुणा को 1.84 अंक मिले, जबकि गरीबी कम करने के मामले में उन्हें 1.08 अंक मिले, मूल्यों के निर्धारण में उन्हें 1.76 अंक मिल पाए, जबकि सरकारी विभागों की स्थिति में उन्हें 1.95 अंक मिल पाए।

वहीं प्रदेश के विकास की गति में प्रदेश पिछड़ा नजर आया है, इस श्रेणी में पर्यटन क्षेत्र में मुख्यमंत्री को केवल 1.97 अंक मिल पाए, जबकि रोजगार के क्षेत्र में सरकार फिसड्डी साबित हुई है इस श्रेणी में मुख्यमंत्री को 1.81 मिला है, वहीं प्रदेश की सड़कों की हालत और सड़कों के विस्तारीकरण में 1.83 ही अंक मिल पाए, कुला मिलाकर प्रदेश में विकास की गति बहुगुणा काल में न्यूनतम स्तर पर आ गई। राज्य में यातायात प्रबंधन में मुख्यमंत्री को 2.06 अंक मिल पाए, जबकि व्यवसायिक शिक्षा में 2.23 और नए व्यवयास तलाशने की दिशा में मुख्यमंत्री 2.03 अंक ही पा सके।

प्रतिष्ठा की दृष्टि में भी राज्य के मुख्यमंत्री कमजोर ही नजर आए हैं, सर्वेक्षण में पार्टी के घोषणापत्र को लागू करने में मुख्यमंत्री नाकाम रहे हैं। वहीं सामप्रदायिक सदभाव बनाने में मुख्यमंत्री को 2.92 अंक ही मिल पाए, जबकि पिछड़े क्षेत्र को आगे बढ़ाने की दशा में किए जा रहे कार्यों पर भी मुख्यमंत्री को 2.15 अंक ही मिल पाए हैं। वहीं महिला सशक्तिकरण में राज्य खास प्रगति नहीं कर पाया है, इसमें मुख्यमंत्री 2.36 अंक ही प्राप्त कर सके हैं, जबकि जनता के सुझावों और टिप्पणियों पर मुख्यमंत्री खरे नहीं उतरे, यहंा भी मुख्यमंत्री को 2.42 अंक मिले। गड़बड़ी और घोटालों के मामले में मुख्यमंत्री आगे रहे हैं, इसके नियंत्रण में भी सरकार विफल रही है और इस श्रेणी में मुख्यमंत्री को 2.29 अंक ही मिल पाए।

दैनिक आवश्यकताओं की श्रेणी में विद्युत की उपलब्धता पर मुख्यमंत्री फिसड्डी साबित हुए हैं, विद्युत आपूर्ति की दशा में मुख्यमंत्री 2.50 अंक से उपर नहीं बढ़ पाए। जनता को शुद्ध पानी उपलब्ध कराने की दशा में मुख्यमंत्री को कोई सफलता हासिल नहीं हुई है, यानि जनता आज भी पानी के लिए प्यासी है और जहां पानी उपलब्ध है, वह पीने योग्य नहीं। वहीं जन यातायात की दशा में भी मुख्यमंत्री 2.50 अंक से नीचे ही हैं, वहीं स्वच्छता की श्रेणी में मुख्यमंत्री निम्न स्तर पर रहे। प्रदेश में साक्षरता अधिक होने के बावजूद प्राथमिक शिक्षा में प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रदेश को गर्त की ओर ले जाते दिखाई दिए हैं, इस श्रेणी में राज्य को 2.59 अंक मिले, वहीं प्रदेश की प्राथमिक स्वास्थ्य की स्थति बेहद चिंताजनक बताई गई है, वह भी अपने न्यूनतम स्तर 2.33 के अंक पर है। कुल मिलाकर प्रदेश को लेकर जो सर्वेक्षण आई फोर इण्डिया ने किया उसमें मुख्यमंत्री और उनका मंत्रिमण्डल फिसड्डी ही साबित हुआ है और औसतन अंकों से वे काफी नीचे नजर आए।

लेखक राजेंद्र जोशी उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

बारूद कभी जख्म का मरहम नहीं होती…

जिस मुजफ्फरनगर की आग की लपटें मेरठ के गांवों तक और शामली  तक पहुंच गई है अंतराष्ट्रीय स्तर पर यह शहर उर्दू के मशहूर शायर, अशोक साहिल, खालिद  जाहिद मुजफ्फरनगरी, और मरहूम  मुजफ्फर रज्मी कैरानवी  के नाम से जाना जाता है। अपनी शायरी के द्वारा पुल बनाने के लिये जाना जाता है काबा और काशी को नजदीक लाने वाले शायर अशोक साहिल के इस शहर में लोग आपस में लड़ रहे हैं ये कोई बाहर से आये लोग नहीं हैं ये वही लोग हैं जिनके पुरखों ने कभी अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये थे जिन्होंने गुलाम भारत की आजादी की लड़ाईयां कांधे से कांधा मिलाकर लड़ीं थीं। मगर आज उनके वंशज सियासी मदारियों के चक्कर में आकर एक दूसरे की जान के दुश्मन बने हुऐ हैं।

कहने को चारों ओर से अम्न और शान्ती की दुआऐं की जा रहीं हैं मगर इनका कुछ सरफिरों पर कोई असर देखने को नहीं मिल रहा है। सियासी मदारी बारूद के ढेर को चिंगारी दिखाखर पीछे से हवा कर रहे हैं ताकी ये शौले भड़कते ही रहे हैं आपसी भाईचारे की दीवारें रोज टूटती रहें, और उनका सियासी कारोबार चलता रहे किसी का हिंदू के नाम पर तो किसी का मुस्लिम के नाम पर। जब इस बारे में मश्हूर शायर हाफिज खालिद जाहिद मुजफ्फरनगरी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि “ ये कैसा दौर मेरे शहर को देखने को मिला है ये वही सानिहा है जिससे लम्हों की खता सदियों तक भी माफ नहीं होती, ये वही खताऐं हैं जिनसे सदियों पुराने आपसी भाई चारे, आपसी सदभाव में दरारें आ जाती हैं, सुना है लोग नाखून बढ़ने पर नाखून काटते हैं उंगलियों को नहीं काटते, लेकिन ये कैसे लोग हैं जो नाखूनों के साथ – साथ उंगलियों को भी तराश रहे हैं। ” इतना कहते ही उनका गला रुंध जाता है थोड़ी देर रुकने के बाद वे आगे कहते हैं कि जब किसी घर में आपस में भाईयों में झगड़ा होता है तो यकीनन वो घर फिर काटने को दौड़ता है, ऐसे माहौल में उसमें जी नहीं लगता बस यही दुआ हर दम रहती है कि काश इस घर की खुशी लौट आयें वो पुराना भाईचार फिर से कांयम हो जाये। दंगाईयों से मुखातिब होकर वे कहते हैं –

तेजी से तबाही की तरफ दौड़ने वालो, तलवार से दुश्मन की जबीं खम नहीं होती
अंजाम कभी जंग का अच्छा नहीं होता, बारूद कभी जख्म का मरहम नहीं होती।

वास्तविकता तो यही है बारूद  कभी किसी के जख्म का मरहम नहीं बने, लेकिन फिर भी उस बारूद का इलाज तो मुमकिन है जो बंदूक के माध्यम से इंसानी जिस्म को तार तार कर देता है, मगर उस बारूद का क्या किया जाये जो सियासी लोगों  ने सांप्रदायिकता के रूप  में युवाओं की रगों में  भर दिया है ? और अभी तक ये खेल जारी है जिसकी बदौलत कभी मुजफ्फरनगर से उठने वाली चिंगारी शौला बन जाती है तो कभी सीतापुर, मुरादाबाद, मेरठ, अलीगढ़, बनारस, लखनऊ, इत्यादी शहर जलने सुलगने लगते हैं। अशोक साहिल भी इसी शहर के हैं, फिलहाल वो शहर से बाहर थे मैंने जब उनसे फोन पर बात की तो उन्होंने रुंधे हुऐ गले के साथ कहा, भाई मेरे शहर का मौसम ऐसा कभी नहीं रहा है, इस बार ये खिजा अपने पीछे तबाहियों के न जाने कितने निशानात छोड़ जायेगी, हिंदू मुस्लिम की बात करने पर वे कहते हैं कि उन्होंने तो बस इंसान ही रहने की कसम खाई है उन्हें हिंदू मुसलमान कौन समझेगा। ये वही अशोक साहिल थे जो अक्सर अंतराष्ट्रीय स्तर पर होने वालो मुशायरों में कहा करते हैं, कि..

काबा और काशी को कुछ नजदीक लाने के लिये
मैं गजल कहता हूं सिर्फ पुल बनाने के लिये।

हमेशा शायरी में पुल  बनाने वाले शायर के शहर  का जलना, और उस जलते शहर से मासूमों की चीखों का आना  वैसा ही है जैसे किसी डूबने  वाले की चीखें आतीं हैं, और वे कानों में जम जाती हैं  कठोर से कठोर इंसान का भी दिल उस वक्त पिघल जाता है।  यहां से करीब तीस किलो मीटर की दूरी पर आलमी शौहरत याफ्ता शायर डॉ. नवाज देवबंदी रहते हैं, वे दो जुमलों में अपनी बात खत्म कर देते हैं बहुत अफसोसनाक है कि अब शहर की आग गांव तक पहुंच रही है, अभी तक गांव इस सांप्रदायिकता  की आग से महफूज थे लेकिन  इस बार सियासत ने कुछ ऐसा  खेल खेला है कि जिससे गांव में चौपालों पर बैठकर  हुक्का गुड़गुड़ाते लोगों  के जहन भी चाक हो गये हैं। पंजाब के जालांधर से कुछ  ही दूरी पर बसे मुजफ्फरनगर से उठने वाली लपटों की आंच जालांधर के रहने वाले खुशबीर सिंह शाद को भी गर्मी का तपिश का एहसास दिला रही हैं वे कहते हैं कि मुजफ्फरनगर की घटना ने उनको सदमा पहुंचाया है, जिस एकता को चौधरी चरण सिंह ने सींचकर यहां तक लाये थे उस एकता को सियासी लोगों ने एक पल में ढ़ेर कर दिया। वे कहते हैं कि इस बार चली इस पागल हवा ने जाने कितने चरागों को बुझा दिया है, और इस शेर के गुनगुनाते हुऐ अपनी बात खत्म करते हैं कि

देव कामत पेड़ सब लरजे रहे सहमे रहे
जंगलों में चीखती फिरती रही पागल हवा।

सवाल ये है कि आखिर हमेशा एक साथ रहने वाले, एक दूसरे के दुख सुख में  बराबर साथ निभाने वाले एक दूसरे की जां के दुश्मन क्यों बन जाते हैं ? वो क्यों भूल जाते हैं कि ‘रामलीला’ में राम का किरदार भी ‘मुस्लिम’ लड़के ही निभाते हैं, रावण के पुतले भी मुस्लिमों के यहां बनते हैं, और मुस्लिम क्यों भूल जाते हैं कि ईद पर खरीदारी तो सेठ जी के यहां से ही होती है। ये सच है कि सियासी लोगों ने जख्म दिये हैं मगर अभी हालात ऐसे भी नहीं हैं कि उनके इलाज किसी के पास न हो, जब मुजफ्फरनगर से वापस दिल्ली आ रहा था तो वे रास्ते भी सुनसान पड़े थे जहां जश्न का माहौल रहता था, फिर अपने सवाल किया कि सांप्रदायिकता कि सियासत और मज्हबी आताताईयों ने इस जन्नत कहे जाने वाले मुल्क को क्या बना दिया ? सोचना हम सबको है आखिर जिम्मेदारी सबकी है ? एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने से कोई फायदा नहीं है फायदा तो तब है जब गौरव के जख्म पर सुहेल पट्टी बांधे। आखिर हम आपस में हैं तो एक ही देश के नागरिक एक ही आंगन बच्चे एक ही क्यारी के फूल महक अलग है तो क्या हुआ मगर खूबसूरती तो सबके साथ रहकर ही आती है। 

लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9927972718 या 9716428646 के जरिए किया जा सकता है.

आपने पर कतर दिए मेरे, अब मेरी कैद क्‍या रिहाई क्या

: इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र में जुटे ख्‍यातनाम कवि : सांझा संस्‍कृति के शहर इलाहाबाद में महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के क्षेत्रीय  केंद्र इलाहाबाद के सत्‍य  प्रकाश मिश्र सभागार में  जब शहर के तमाम ख्‍यातनाम कवि और शायर काव्‍य पाठ के लिए जुटे तो शाम कवितामय हो गई। भीष्‍म साहनी और फिराक गोरखपुरी की स्‍मृति को समर्पित काव्‍य संध्‍या में सभी कवि और शायरों ने अपनी सर्वोत्‍तम कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम की शुरूआत भीष्‍म साहनी की प्रगतिशील चेतना और फिराक गोरखपुरी के सांझा संस्‍कृति के पैरोकार होने को रेखांकित करने से हुई।

उनकी स्‍मृति को और जाग्रत करने के लिए प्रो. अली अहमद फातमी ने उनकी एक नज्‍म पढ़ी। युवा शायर और ‘गुफ्तगू’ पत्रिका के संपादक इम्तियाज़ गाजी ने अपनी रचनाएं प्रस्‍तुत करते हुए सबका ध्‍यान आकृष्‍ट किया। उनकी पंक्तियां थी – ‘जिसका दुश्‍मन नहीं कोई, उससे बच के रहा कीजिए।’ युवा कवियित्री संध्‍या नवोदिता ने अपनी दो विचारोत्‍तेजक कविताएं प्रस्‍तुत की। अपनी ‘देश देश’ कविता में देश को संबोधित करते हुए उस पर आसन्‍न संकटों को मार्मिक ढ़ंग से प्रकट किया, उनकी दूसरी कविता देश के मुखिया की चुप्‍पी पर केंद्रित थी। युवा कवि अंशुल त्रिपाठी ने ‘क्‍या कहूं उनसे’, ‘यास्‍मीन’, ‘पिघलती हुई दुनिया’, ‘एक अदीब के घर’ शीर्षक कविताएं पढ़कर खूब प्रशंसा पाई। ‘अनहद’ पत्रिका के संपादक युवा कवि संतोष चतुर्वेदी ने ‘हमारी धरती’, ‘जिंदगी’, ‘अनोखा रंग है पानी का’ प्रस्‍तुत की। जिसमें उनकी पढ़ी गई कविता जो पानी पर केंद्रित थी खूब सराहा गया। वरिष्‍ठ नवगीतकार यश मालवीय ने अपनी रचनाओं से सबका ध्‍यान आकृष्‍ट किया। उन्‍होंने ‘इन दिनों’ शीर्षक से रचना पढ़ी।

उनकी पक्तियां थी- ‘बॉंधता है घड़ी लेकिन बीमार है, यह हमारे दौर का फनकार है’। वरिष्‍ठ कवि नंदल हितैषी ने ‘सही जगह’, ‘धार’ शीर्षक कविताएं पढ़ कर समाज पर करारा तंज कसा। उनकी रचनाओं में मारक व्‍यंग्य ध्‍वनियां थी। प्रसिद्ध गज़लकार एहतराम इसलाम ने खूब वाहवाही बटोरी उन्‍होंने अन्‍त में एक शेर पढ़ा ‘आपने पर कतर दिए मेरे, अब मेरी कैद क्‍या, रिहाई क्‍या’ जिसे बार-बार श्रोताओं ने सुनना चाहा। पेशे से वकील और बुजुर्ग शायर एम.ए. कदीर ने ‘भगदड़’ नाम से नज़्म प्रस्‍तुत की। उन्‍होंने कहा- ‘हालांकि आधियों ने मचाई उथल-पुथल, चीजें पहुंच गई अपने मकाम पर’। वरिष्‍ठ शायर सुरेश कुमार ‘शेष’ ने अपनी प्रस्‍तुति की शुरूआत में एक शेर कहा ‘ अब तो कदम-कदम पर यहां राम भक्‍त हैं, अब कोई देश भक्‍त रहे तो कहां रहे।’ जिसे श्रोताओं ने जमकर सराहा। गोष्‍ठी के अन्‍त में वरिष्‍ठ नाटककार एवं कवि अजित पुष्‍कल ने अपनी कविता पढ़ी जिसकी पक्तियां थी- ‘कवि जब चुप रहता है सुलगता है सौरमंडल की आंच में तपता है शब्‍द।’

गोष्‍ठी की अध्‍यक्षता उर्दू के ख्‍यातनाम आलोचक ए.ए. फातमी  ने की। उन्‍होंने अपने अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में  कहा कि गोष्‍ठी में पढ़ी गई सभी  रचनाएं उम्‍दा थी, जो आज के हालात पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं, प्रेरणा देती हैं। इस तरह के आयोजनों से हम अपने शहर की सांझा संस्‍कृति और शायर,कवि, अदीबों की रचनाओं से रूबरू होते हैं। आयोजन के लिए उन्‍होंने हिंदी विश्‍वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय और केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया का शुक्रिया अदा किया। गोष्‍ठी की शुरूआत में सभी कवि शायर, अदीबों का परिचय प्रो. संतोष भदौरिया ने दिया। स्‍वागत सहायक क्षेत्रीय निदेशक डॉ. यशराज सिंह पाल और असरार गांधी ने किया।

काव्‍य पाठ के दौरान  प्रमुख्‍य रूप से सुरेन्‍द्र राही, नीलम शंकर, अविनाश मिश्र, अनिल रंजन भौमिक, वीनस केसरी, शाहनवाज़ आलम, सम्‍पन्‍न श्रीवास्‍तव, सौरभ पाण्‍डेय, विपिन श्रीवास्‍तव, सत्‍येन्‍द्र सिंह, अमरेन्‍द्र, रोहित सिंह सहित शहर के तमाम काव्‍य प्रेमी उपस्थित थे।

प्रस्‍तुति : क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद

दैनिक जागरण, लखनऊ के लोकल इंचार्ज से तंग आकर कई युवा पत्रकारों ने दिया इस्तीफा

दैनिक जागरण, लखनऊ से कुछ दिनों पहले लोकल इंचार्ज से परेशान होकर निशांत ने इस्तीफा दे दिया और अमर उजाला ज्वाइन किया. इसी कड़ी में ताजी सूचना के मुताबिक रजनीश रस्तोगी ने जागरण से इस्तीफा देकर हिंदुस्तान लखनऊ के साथ नई पारी की शुरुआत की है. लोकल इंचार्ज अजय श्रीवास्तव से तंग आकर कुछ महीने पहले आई नई रिपोर्टर निधि सिंह ने भी इस्तीफा दे दिया है.

bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज कर अपनी बात, सूचना, उपलब्धि, नई पारी, इस्तीफा, सम्मान को भड़ास के साथ शेयर कर सकते हैं.

सात्विक जीवन जीने वाले इस 37 साल के नौजवान पत्रकार की किडनी फेल होने से मौत हो गई

Riyaz Hashmi : मन बेहद दुखी है और बहुत उदास भी। यकायक खबर मिली कि मेरे प्रिय पत्रकार साथी सत्येंद्र पांडेय नहीं रहे। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और इनके परिजनों को दुख की इस घड़ी को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। 2010 की ही तो बात है, जब मेरा स्थानांतरण दैनिक जागरण देहरादून स्टेट ब्यूरो में हुआ था। सत्येंद्र भी स्टेट ब्यूरो में ही थे।

मैं देहरादून में नया था, लेकिन सत्येंद्र ने एक साथी नहीं, बल्कि बड़े भाई की तरह मुझे मान दिया। सचिवालय से लेकर विधानसभा तक तमाम अफसरों, नेताओं से मेरी मुलाकात कराई और एक हफ्ते में ही मजबूत नेटवर्क बनाने में मेरी मदद की। 2012 में दैनिक जागरण के यूपी ब्यूरो लखनऊ में सत्येंद्र का तबादला हुआ था और यहां से उन्हें इलाहाबाद उप-ब्यूरो में हरिशंकर मिश्र के साथ भेजा गया था।

मेरा छह महीने बाद ही 2011 के शुरू में देहरादून से मेरठ तबादला हो गया। इत्तेफाक से जिस दिन सत्येंद्र अपना सामान इलाहाबाद ले जा रहे थे तो मैं देहरादून में था। अनायास ही फोन मिलाया और सत्येंद्र के घर चला गया। इस मुलाकात के बाद हमारी फोन पर ही बातें हुईं। सात्विक जीवन व्यतीत करने वाले इस 37 साल के नौजवान की किडनी फेल होने से मौत हो गई। दिल मान नहीं रहा है, वही हंसता हुआ चेहरा… बार-बार आंखों के सामने घूम रहा है। तुम्हें भुलाया नहीं जा सकेगा सत्येंद्र, तुम याद आते रहोगे।

वेस्ट यूपी के वरिष्ठ पत्रकार रियाज हाशमी के फेसबुक वॉल से.

नेताजी अपने ही बेटे की राह में कांटा बने हुए हैं

Shambhunath Shukla :  कल रात NDTV के प्राइम टाइम में मुजफ्फर नगर पर चर्चा हुई। रवीश कुमार ने इस कार्यक्रम में मुझे भी बुलाया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर मंडल में मैने काफी पत्रकारिता की है। जब जनसत्ता में था तब यूपी, बिहार, एमपी व राजस्थान का प्रभारी रहते हुए और जब अमर उजाला के मेरठ संस्करण का संपादक रहा तब भी।

इस इलाके को यूपी की लखनऊ में बैठी सरकारें शुरू से ही इस्तेमाल करती आई हैं। यहां की समस्या को गंभीरता से कभी लिया नहीं गया। यह एक ऐसा इलाका है जहां अगर पोलेटिकल पार्टियां आम लोगों के बीच सांप्रदायिकता का जहर न घोलें तो शायद दोनों मजहब के लोगों को अलग-अलग करना मुश्किल हो जाएगा। एक जैसे सरनेम और एक जैसी रवायतें तथा एक जैसा पहरावा।

दोनों मजहब के लोग अपने नाम के आगे त्यागी, तोमर, मलिक, राणा, चौहान, गौड़, कसाना तथा भड़ाना लिखते हैं। एक दूसरे के यहां शादी-विवाह, मुंडन-कनछेदन में शरीक होते हैं। दरअसल यहां अभी आर्य समाज के आने के पहले तक एक भाई हिंदू और दूसरा मुस्लिम होता था। कोई अलगाव नहीं और कोई दुराव-छिपाव नहीं। पर अब वहां अचानक एक लड़की को छेड़े जाने को लेकर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ दिया गया। यह किसी को नहीं पता कि 27 अगस्त को कबाल में जिन दो लड़कों में झगड़ा हुआ वह हुआ किस बात पर था। कोई बहन उन लोगों के यहां है भी या नहीं। ऊपर से फेसबुक, ट्विटर और फर्जी वीडियो ने आग लगा दी। सरकार इस पर अंकुश लगाने के बजाय संप्रदायों के तुष्टीकरण में लग गई तो क्या होना था?

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यकीनन क्लीन छवि वाले और इस तरह की सांप्रदायिकता से दूर साफ सुथरे इंसान हैं लेकिन उनके पिता और चाचागण राजनीति से खेलने वाले राजनीतिक। पता नहीं क्यों नेताजी अपने ही बेटे की राह में कांटा बने हुए हैं। बसपा से अपनी खुन्नस निकालने के लिए वे भाजपा को राजनीतिक लाभ पहुंचा रहे हैं। पर इस चक्कर में वे अपना क्रीमी लेयर वाला ओबीसी और मुस्लिम वोट बैंक खोते जा रहे हैं। साथ ही बेटे का राजनीतिक भविष्य भी। धन्य हो नेताजी! आपन तेज संभारौ आपै!

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

लगता है ‘तहलका’ सब शर्म लिहाज घोल कर पी गया है…

Abhishek Srivastava : ये देखिए, हमारे समय की सबसे ज़रूरी तस्‍वीर.. छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री रमन सिंह के साथ तहलका के संपादक तरुण तेजपाल और उनकी टीम। बताते हैं कि जिसे छत्‍तीसगढ़ में तहलका की फ्रैंचाइजी मिली है, वह एस्‍सार कंपनी का अधिकारी है।

यह सच हो या झूठ, लेकिन यह इकलौती तस्‍वीर सोनी सोरी नाम की आदिवासी महिला के साथ सबसे बड़ा अन्‍याय है- एसपी अंकित गर्ग और छत्‍तीसगढ़ सरकार द्वारा किए अन्‍याय से भी बड़ा- जिसे बेचकर तहलका ने अपनी छवि को लगातार चमकाया था और आज अपनी समूची क्रांतिकारिता को उसने राज्‍य के हाथों गिरवी रख दिया है। धंधा करने में भी एक लिहाज होता है। लगता है तहलका सब शर्म लिहाज घोल कर पी गया है। जियो शोमा चौधरी, जुग-जुग जियो तेजपाल जी…

    Chandan Kumar सर रोटी किसे नहीं चाहिए. यह अलग बात है कि किसी का काम सूखी रोटी से चल जाता है, तो किसी को कुछ और चाहिए…
 
    Sushant Jha देखिये, आप 'सरोकार' की आलोचना करते जा रहे हैं। कहीं आप दक्षिण तो नहीं हो गए हैं..
 
    Rahul Kumar तहलका बिक गया है या नहीं, इस निष्कर्ष पर तहलका के कंटेंट से पहुंचिए, फोटो में शोमा और तरुण किसके साथ खड़े हैं, इससे नहीं.
 
    Mahtab Alam ओ वुमनिया की जगह ओ तहलका सुने ! http://www.youtube.com/watch?v=PBqaM8txf9I

    Akash K. Prasad दुर्भाग्यपूर्ण! सोनी सूरी के केस के लिए मीडिया में बस तहलका से ही एक उम्मीद थी. अब तो वो भी न रही…
 
    Mahtab Alam ye bhi dekha jay: http://kafila.org/2011/10/12/everybody-loves-a-good-war-tehelka-and-essar-bobby-kunhu/
 
    Mohammad Anas पत्रिका चलाने के लिए विज्ञापन ज़रूरी होता है,सरकार के पास पैसा जनता का है रमन सिंह का पुश्तैनी नहीं ।तहलका का साथ रमन सिंह को चाहिए वह भी विज्ञापन तक ही ,तहलका को रमन सिंह या अंकित गर्ग नहीं और यह तहलका की ख़बरों में आसानी से देखा जा सकता है ।
 
    Mahtab Alam aur ye bhi: http://kafila.org/2011/11/03/an-open-letter-to-tarun-tejpal-hartman-de-souza/
 
    Rahul Kumar @ akash – आप बहुत अधीर हैं, किसी ने कहा और आप मान गए कि अब सोनी सूरी मीडिया से गायब हो जाएगी… उम्मीद रखिए… तहलका एक मात्र ऐसी संस्था है जो विज्ञापन के प्रभाव या लोभ में आकर खबरें हजम नहीं करती…
 
    Mahtab Alam @Rahul- sir aap upar wala post padh lijiyega aur ye bhi, sara bharam door ho jayega: http://blogs.wsj.com/indiarealtime/2011/11/11/food-for-thought-thinkfests-bitter-aftertaste-2/

    भूपत शूट तहलका और रमन सरकार का तालमेल हैं. तहलका को धन चाहिए, जो विज्ञापन से मिलता हैं और रमन को एक और प्रचार का अलग घोड़ा !
 
    Mohammad Anas भाई फिर इस तरह से तो हो चुकी पत्रकारिता … थोड़ी बहुत लचक मटक सब जगह होती है ,हम इंसान भी पुरी तरह से बेहतर नहीं .कम से कम तहलका के साथ ऐसा बर्ताव तो न ही करें आप लोग  

    Akash K. Prasad हाँ राहुल जी बिलकुल उम्मीद रखे हुए हैं हम तो! बस रमन सिंह को इनके साथ में देखकर थोडा शॉक में आ गए…
 
    Mahtab Alam is photo ke sath background me ye gana sunana achcha rahega : http://www.youtube.com/watch?v=WlfXDBu6AOg
 
   राकेश कुमार सिंह किसी के साथ खड़ा होकर फोटो खिचवा लेने से वह उसका अनुयायी या गुलाम नहीं हो जाता, छत्‍तीसगढ़ में तहलका की फ्रैंचाइजी मिलने से क्या तहलका की धार कुंठित हो जाएगी कभी नहीं आज की तिथि में तहलका जैसा निर्भीकता किसी के पास नहीं है। आपने "ये देखिए हमारे समय की सबसे ज़रूरी तस्‍वीर" तो देख ली किन्तु रास्त्र गौरव /शान से जुड़े रूपये के प्रतीक चिन्ह चयन में व्यापक भ्रस्ताचार को उजागर करने वाली न्यूज़ शायद नहीं पढी है। दिसम्बर १ ० इस मुद्दे पर लडाई चल रही थी बाद में डेल्ही हाई कोर्ट में ३ याचिकाए चली किसी ने लॉ न्यूज़ रिपोर्टिंग नहीं की जिसने शुरू की तुरंत चुप हो गया, बड़े से बड़े चैनलों के हाथ पाँव फूल गए किन्तु तहलका ने इसे छापा डंके की चोट पर जो तहलका को "किसी परिधि" में बंधा हुआ मानते है वह खबर पढ़े और अपनी धारणा पर पुनर्विचार करे। और इंतना ही नहीं जिस मीडिया घराने को स्वतंत्र मानते हो उनके मुखिया से पूछ लीजीयेगा की इस खबर की खबर आपको थी की नहीं। पढिये साहसिक खबर और तहलका का आभार जतायिए–राहुल कोटियाल की रिपोर्ट "तहलका" http://www.tehelkahindi.com/index.php?news=1726
        
    Vishnu Sharma shameful act. I am feeling betrayed. What to do next?
     
    Salman Rizvi तहलका का शुरुआत से पाठक हूँ जबसे वो शुरू हुयी है और छत्तीसगढ़ और रमन सिंह के ऐड उसमे बराबर आया करतें हैं ये कोई नयी बात नहीं है/लेकिन मैंने कभी न देखा की इससे तहलका ने कभी भी ख़बरों में कोई कमी रखी हो सच्चाई को लेकर! ये शायद एक हिस्सा भर है उनके छत्तीसगढ़ को लेकर!
    
    Mahtab Alam Salman Rizvi sahab, upar maine kuch link post kiye hain.
     
    Salman Rizvi जी भाई गौर किया मैंने/See Translation
     
    Mahtab Alam aur bhi bahut sari cheezen hain.
     
    Salman Rizvi भाई सभी को देख रहा हूँ/ हा हा हा/…
 
    Ranjit Verma kuchh log krantikari chhavi banate hi isliye hain taki bazaar se achchhi keemat vasool saken… ye kisi bhi dhara ke lag sakte hain… facebook ke aane ke baad yeh kaam aur aasan ho gaya hai… hing lage na fitkari aur rang chokha
   
    Abhishek Srivastava Ranjit Verma हींग नहीं हर्र… परंपरा में ज़रा सा लटपट विश्‍वसनीय से विश्‍वसनीय विचार को लटपटा सकता है।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

दैनिक जागरण का पत्रकार मोटरसाइकिल चोरी में उत्‍तराखंड पुलिस के हत्‍थे चढ़ा

पीलीभीत से खबर है कि गजरौला से दैनिक जागरण के लिए रिपोर्टिंग करने वाले महेंद्र कुमार को उत्‍तराखंड पुलिस अरेस्‍ट करके ले गई है. महेंद्र पर मोटरसाइकिलों की चोरी करने का आरोप है. बताया जा रहा है कि कुछ आरोपियों के पकड़े जाने के बाद उत्‍तराखंड की हल्‍द्वानी पुलिस के हाथ महेंद्र तक पहुंचे हैं. पुलिस महेंद्र को पकड़कर उत्‍तराखंड ले गई है। उनसे पूछताछ के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी. हालांकि हर बार की तरह दैनिक जागरण महेंद्र को अपना पत्रकार मानने से भी इनकार कर रहा है.

इस संबंध में पीलीभीत में दैनिक जागरण के ब्‍यूरोचीफ प्रसून से बात की गई तो उन्‍होंने महेंद्र के उत्‍तराखंड पुलिस की गिरफ्त में होने की सूचना मिलने की बात तो मानी लेकिन साथ यह भी जोड़ दिया कि दैनिक जागरण से उसका कोई संबंध नहीं है. यह अखबार का मामला नहीं है. हालांकि सूत्रों ने बताया कि महेंद्र गजरौला से जागरण के लिए रिपोर्टिंग करते रहे हैं. पुलिस सूत्रों का कहना है कि शक है कि महेंद्र मोटरसाइकिल चोर गिरोह से भी जुड़े हुए हैं. पर पूरे मामले की सच्‍चाई जांच के बाद सामने आएगी.

इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं कि दैनिक जागरण के पत्रकार अवैध कामों में पकड़े जाते हैं तो जागरण प्रबंधन अपना पल्‍ला झाड़ लेता है. इसके पीछे कारण यह होता है कि दैनिक जागरण प्रबंधन अपने ज्‍यादातर रिपोर्टरों और संवाद सूत्रों को लिखित प्रमाण पत्र नहीं देता है, इसलिए उन्‍हें पराया बताना में उसे कोई परेशानी नहीं होती है.

प्रबल प्रताप सिंह ‘लाइव इंडिया’ न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर बने

वरिष्ठ पत्रकार प्रबल प्रताप सिंह लाइव इंडिया न्यूज चैनल में बतौर मैनेजिंग एडिटर जुड़ने  वाले हैं. उन्हें लाइव इंडिया ग्रुप से जुड़ने को लेकर आधिकारिक पत्र प्राप्त हो चुका है. सूत्रों  के मुताबिक प्रबल कल मैनेजिंग एडिटर का कार्यभार संभाल लेंगे. इसके पहले प्रबल  आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हुआ करते थे. युद्ध के मोर्चों पर रिपोर्टिंग के  कारण चर्चित हुए प्रबल प्रताप सिंह के बारे में माना जाता है कि वे पत्रकारिता के प्रत्येक  क्षेत्र पर भरपूर पकड़ रखते हैं.
प्रबल के लाइव इंडिया न्यूज चैनल ज्वाइन करने के बाद  इस चैनल की किस्मत बदलने की संभावना है. इसके पहले सतीश के. सिंह एडिटर इन चीफ हुआ करते थे जिन्होंने पिछले दिनों इस्तीफा देकर नवीन जिंदल के पाजिटिव मीडिया ग्रुप के साथ बतौर एडिटर नई पारी शुरू की. सतीश के. सिंह के इस्तीफे के बाद से ही प्रबल प्रताप सिंह के लाइव इंडिया ज्वाइन करने की चर्चाएं थी पर उन दिनों यह सूचना कनफर्म नहीं हो पा रही थी. आज पूरे दिन प्रबल के लाइव इंडिया न्यूज चैनल ज्वाइन  कर लेने की चर्चाएं रहीं और शाम होते होते उनके करीबी लोगों ने उनके कल पद भार  संभालने की पुष्टि कर दी. 

आर्थिक तंगी से परेशान कैमरामैन ने जान देने की कोशिश की, हालत गंभीर

जानकारी मिली है कि कैमरामैन बालादत्त धानी ने बीती रात आत्महत्या करने की कोशिश की. उन्हें गंभीर हालत में गाज़ियाबाद के यशोदा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है. उनकी हालत गंभीर बतायी जाती है. सूत्रों के मुताबिक़ आर्थिक तंगी और घरेलू दिक्कतों की वजह से बालादत्त धानी आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठाने को मजबूर हुए.
उनके परिवार में तीन छोटे बच्चे हैं. उन्हें फिलहाल आर्थिक मदद की सख्त जरुरत है. कैमरामैन धानी पी 7 न्यूज़ चैनल में कार्यरत रहे हैं. विस्तृत जानकारी का इंतज़ार किया जा रहा है.
 

पत्रकार प्रज्ञा पाठक के जीपी मास मीडिया संस्थान की शुरुआत बारह से

पत्रकार प्रज्ञा पाठक अब उद्यमिता की तरफ कदम बढ़ा चुकी हैं. वे जीपी मास मीडिया नामक एक संस्थान शुरू करने जा रही हैं. इसका शुभारंभ 12 सितंबर को किया जाएगा. यह संस्थान नोएडा के सेक्टर छह में है. प्रज्ञा जीपी ग्रुप की सर्वेसर्वा हैं और यह ग्रुप मीडिया संस्थान के अलावा कई अन्य क्षेत्रों में कदम बढ़ाने को तैयार है. प्रज्ञा पाठक की तरफ से 12 सितंबर के आयोजन के लिए जो विज्ञप्ति जारी की गई है, वह इस प्रकार है…

महोदय,

आपको बताते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि जी पी ग्रुप अब मीडिया जगत में प्रतिभाओं को निखारने के लिए प्रयासरत है। इसी को ध्यान में रखते हुए जी पी ग्रुप अब जी पी मास मीडिया नाम से मीडिया संस्थान का शुभारम्भ करने जा रहा है। इसके लिए 12 सितम्बर की तिथि निर्धारित की गई है। जी पी मास मीडिया की इस नई शुरूआत में आपका सानिध्य और आशीर्वाद मिले। इसी आशा के साथ जी पी मास मीडिया चाहता है कि 12 सितम्बर को आप इस शुभारम्भ में उपस्थित होकर हमारा मार्गदर्शन करें।

पता-
एनईए आडिटोरियम
बी110ए, सेक्टर 6
नोएडा

समय – साढ़े बारह बजे

दर्शनाभिलाषी
प्रज्ञा पाठक
डायरेक्टर
जीपी मास मीडिया

भक्‍त पत्रकार और नरेंद्र मोदी की काल्‍पनि‍क मुलाकात

पाठकों की सुवि‍धा के लि‍ए पत्रकार का नाम हम महर्षि रख लेते हैं। महर्षि ने दो दि‍न पहले ही फेसबुक पर घोषणा कर दी थी कि मोदी आ रहे हैं, बहुत दि‍नों बाद उनसे मि‍लना हो रहा है। (हालांकि मोदी की ओर से उन्‍हें टाइम नहीं दि‍या गया था, इसलि‍ए डर भी लग रहा था कि मोदी उनका हाल आसाराम वाला न कर दें)

भाषण के बाद जब मोदी मंच से नीचे उतरे तो महर्षि साहब सीढ़ी की रेलिंग कि‍सी तरह से थामे उड़ रहे थे। (उड़ इसलि‍ए रहे थे क्‍योंकि मोदी के बाकी समर्थकों को भी मोदी का आर्शीवाद लेना था और वो उन्‍हें धकि‍याए जा रहे थे) बहरहाल, जैसे ही मोदी मंच से नीचे उतरे, महर्षि साहब धड़ाम से उनके पैरों में जा गि‍रे। हल्‍ला मच गया।

मोदी का पीआरओ महर्षि जी को पहचानता था, सो तुरंत बाकि‍यों को उनके ऊपर से धक्‍का मार मारकर हटाया और उन्‍हें उठाकर उनकी झाड़ पोंछ की। उन्‍हें बताया कि अरे, आप तो पतकार हैं, आपके मि‍लने का खास इंतजाम कि‍या गया है। वहां ढोकला भी खाने को मि‍लेगा टोमेटो सास और प्‍लास्‍टिक वाली चम्‍मच के साथ। पतकार जी के मुंह में पानी आ गए और चश्‍मा ठीक करते, बटन बंद करते हुए वो फटाफट मीटिंग रूम की तरफ भागे, लेकि‍न भाग नहीं पा रहे थे क्‍योंकि कि‍सी समर्थक ने लंगड़ी मारकर उनकी चप्‍पल तोड़ दी। राम राम करते मीटिंग रूम में पहुंचे और आधा कि‍लो ढोकला मोदी के आने से पहले से सूत दि‍ए। हालांकि बाद में उन्‍हें याद आया कि अरे, उनका तो गणेश चतुर्थी का व्रत है। जीवन में ऐसी भूल उनसे पहली बार हुई। उन्‍होंने सोचा, खैर, आज साक्षात दर्शन हो रहे हैं तो व्रत भंग होना कोई बड़ी बात नहीं। आधा घंटा इंतजार कराने के बाद आखि‍रकार मोदी कमरे में आए। आगे पढ़ें महर्षि मोदी संवाद:-

मोदी के पैरों में गि‍रते हुए महर्षि: नमस्‍कार सर।
मोदी: अरे, उठि‍ए उठि‍ए, आप की जगह तो दि‍ल में है। और नमस्‍कार वैसे भी खड़े होकर कि‍या जाता है।
महर्षि: ही ही ही ही, अरे सर, क्‍या कहें, हम गंगा कि‍नारे वाले हैं ना, तनि‍क नरभसा गए थे। वैसे सर, आपका भासण बहोत अच्‍छा रहा। आपका जो भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों कहने का इस्‍टाइल है, इसपर हम इस्‍पेसल कवरेज करने जा रहे हैं। ऐसे जोसीले तरीके से भासण की सुरुआत कोई नहीं करता। हमने तो ईएनटी इस्‍पेसलि‍स्‍ट को आपके दो दर्जन भासण सुनाकर पता लगाया है कि आपकी 40 फीसदी ऊर्जा मेरे भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों में नि‍कलती है। इसीलि‍ए, वहां से जोस आ जाता है।

मोदी: ह ह ह ह। नाम क्‍या बताया आपने अपना।
महर्षि: सर महर्षि सर।
मोदी: महर्षि या सर महर्षि सर। या फि‍र ये दोनों।
महर्षि: आपके लि‍ए सिर्फ महर्षि। सर वैसे इंटरव्‍यू मैनें लेना है आपका।
मोदी: अरे वो तो हो जाएगा महर्षि जी। और बताइये, घर में सब कुशल मंगल। कहां कहां काम कि‍या है आपने।
महर्षि: बस सर, सब आपकी कृपा है। हमने तो घाट घाट, घर घर का पानी पि‍या है। पढ़ाई यूपी में की तो काम कि‍या एमपी और महाराष्‍ट्र में। ननि‍हाल ठहरा राजस्‍थान में तो सभी जगह की पॉलि‍टि‍क्‍स में हाथ तंग है। सॉरी सॉरी, पॉलि‍टि‍क्‍स में अपना हाथ है।
मोदी: हमारे साथ काम करेंगे महर्षि जी। (क्‍वेश्‍चन मार्क इसलि‍ए नहीं है क्‍योंकि ये आदेश टाइप में दि‍या गया था।)
महर्षि: ही ही ही ही…सरजी। (हीहीहीही करने पर महर्षि जी का थोड़ा थूक भी मोदी के चप्‍पल पर गि‍र गया जि‍से महर्षि ने लपककर अपना कुर्ता फाड़कर साफ कि‍या।)
महर्षि: सर, दि‍न में तो नौकरी करनी होती है। हम रात में आपका सारा प्‍लान बनाकर दे देंगे। और आपको अपने यहां पूरा स्‍पेस भी देंगे सर। ऑल एडीशन। मैं सर लोगों से बात कर लूंगा। पता नहीं क्‍यूं कांग्रेस के पीछे लगे रहते हैं ये लोग।
मोदी: ठीक है, अपना बायोडाटा भेज देना। देखेंगे। नेक्‍स्‍ट.
महर्षि: अरे सर, इंटरव्‍यू…
मोदी: नेक्‍स्‍ट प्‍लीज..
महर्षि: सर, एक ऑटोग्राफ तो दे दीजि‍ए।
मोदी: अरे भगाओ यार इसको। सारा ढोकला खा गया और चप्‍पल खराब कर दी।
कमरे से नि‍कलते हुए महर्षि: ही ही ही ही, सर भी बड़े मजाकि‍या हैं। (संपादक को फोन करते हुए- सर बहोत अच्‍छा इंटरभ्‍यू रहा। मुझे तो उन्‍होंने अपनी पूरी प्‍लानिंग बता दी।)

(डि‍स्‍क्‍लेमर: पूरी वारदात, आई मीन मुलाकात का कि‍सी जीवि‍त या मृत पतकार से कोई लेना देना नहीं है। वैसे जो ले या दे रहे हों, वो दि‍ल पर ले या दे सकते हैं।)


लेखक राहुल पांडेय युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके बजार ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

मुंबई से हिंदी-अंग्रेजी में लांच होगा ‘अब्सलूट इंडिया’ अखबार, द्विजेन्द्र तिवारी संपादक और अजय गर्ग आरई

मुम्बई। जैसे जैसे चुनाव समीप आ रहे हैं, देश में नए अख़बार और न्यूज़ चैनलों की बाढ़ आ रही है। मुंबई में हिंदी और अग्रेजी का एक नया अख़बार आ रहा है। पिछले दिनों इस अख़बार के हिंदी और अंग्रेजी एडिशन के लिए नवभारत टाइम्स और मुम्बई मिरर में वैकंसी निकली गयी थी। इन दिनों दोनों अखबारों के लिए इन्टरव्यू चल रहे हैं। हालाँकि विज्ञापन में अख़बार का नाम नहीं दिया गया था।

भड़ास को मिली जानकारी के अनुसार इस अख़बार का नाम 'अब्सलूट इंडिया' होगा। हमारा महानगर के संपादक रहे द्विजेन्द्र तिवारी इस अख़बार के प्रधान संपादक होंगे जबकि स्थानीय संपादक के रूप में नई दुनिया से आये अजय गर्ग की नियुक्ति की गयी है।

इस अख़बार के मालिक 'अब्सलूट स्पा व सलून' वाले हैं। कनाडा, सिंगापूर के अलावा भारत में 'अब्सलूट स्पा' की कई शाखाये हैं। यह 14 पेज का पूरा रंगीन अख़बार होगा। सूत्रों के अनुसार नवभारत मुंबई व हमारा महानगर से बड़ी सख्या में लोग 'अब्सलूट इंडिया' में जा रहे हैं। इस समाचार पत्र का स्तरीय सामग्री देने पर पूरा जोर होगा। 'अब्सलुट इंडिया' का प्रकाशन दशहरे पर शुरू होने वाला है। फिलहाल मुंबई में हिंदी के 9 दैनिक अख़बार निकलते हैं। पर लोकल न्यूज़ कवरेज बेहद कमजोर होने के बावजूद नवभारत टाइम्स का एकक्षत्र राज्य है। इसलिए मुंबई में एक अच्छे हिंदी अख़बार के लिए पर्याप्त जगह है।

इस बीच खबर है कि लोकमत समाचार भी लोकसभा चुनाव से पहले मुंबई से अपना प्रकाशन शुरू करेगा। महाराष्ट्र में 6 एडिशन के साथ लोकमत समाचार राज्य का नंबर एक हिंदी दैनिक बना हुआ है। इसी साल लोकमत समाचार ने जलगाव व पुणे एडिशन लांच किया है। अब बारी मुंबई की है। मराठी दैनिक तरुण भारत भी जल्द मुंबई से अपना प्रकाशन शुरू करेगा। दूसरी और मुंबई से दबंग दुनिया का प्रकाशन अधर में लटक गया है। दो माह पहले इसके लिए भर्ती हुई थी। पर अभी तक इस अख़बार का प्रकाशन शुरू नहीं हो सका। वैसे भी इस अख़बार ने जो सम्पादकीय टीम तैयार की है। उसकी वजह से दबंग दुनिया को लेकर मुंबई के हिंदी पत्रकारों में कोई उत्साह नहीं है।

आनंद हुड्डा बने ‘खबरें अभी तक’ के चैनल हेड

गुड़गांव : विनोद मेहता के जाने के बाद 'खबरें अभी तक' चैनल को नया प्रमुख मिल गया है। हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार आनंद हुड्डा इसके चैनल हेड और कार्यकारी संपादक की भूमिका में नजर आएंगे। वे पहले इस चैनल के साथ बतौर विशेषज्ञ जुड़े हुए थे। उन्होंने गुड़गांव में यह जिम्मेदारी संभाल ली है। आनंद हुड्डा दो दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता में हैं। मूलरूप से रोहतक के रहने वाले हुड्डा को हरियाणा का पहला न्यूज बुलेटिन लाने का सौभाग्य हासिल है। हरियाणा दर्पण नाम से यह न्यूज बुलेटिन जैन टीवी पर प्रसारित होता था। संभवत यही ऐसा पहला न्यूज बुलेटिन था, जो हरियाणा पर आधारित था।

इसी परंपरा पर चलते हुए आज हरियाणा पर केंद्रित करीब एक दर्जन न्यूज चैनल चल रहे हैं। आनंद हुड्डा ने वर्ष 1989 में रोहतक में रहते हुए रोहतक पोस्ट नाम से अपना सांध्य दैनिक भी चलाया। किन्हीं कारणों के चलते इस सांध्य दैनिक का प्रकाशन बंद हो गया था। फिर दोबारा वर्ष 1998 में इसका प्रकाशन शुरू हुआ। हुड्डा रोहतक प्रेस क्लब के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने 1991 पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल की। वे एडवोकेट भी हैं। वर्ष 1994 में उन्होंने जी टीवी से टीवी पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा। वे सिटी केबल हरियाणा के निदेशक भी रहे। उन्होंने टोटल टीवी में भी अपनी पत्रकारिता का दमखम दिखाया।

नई जिम्मेदारी संभालने से पहले आनंद हुड्डा इसी चैनल में सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते थे। चैनल को भी जब भी कभी आवश्यकता होती थी वे समय-समय पर विभिन्न मुद्दों का बहुत ही बारीकी से विश्लेषण करते थे। पत्रकारिता और सामाजिक जीवन में सक्रिय रहने के साथ-साथ हुड्डा की राजनीति में विशेष रूचि रही है। एक समय ऐसा था जब वे हरियाणा की राजनीति में तेजतर्रार युवा नेता के तौर पर जाने जाते थे। 

दीपक खोखर की रिपोर्ट.

डंके की चोट पर बोलने का दावा करने वाले अब डरपोक क्यों हो गए!

डंके की चोट पर बोलने का दावा करने वाला आईबीएन7 न्यूज़ चैनल डरपोक हो गया है जो अपने मुजफ्फर नगर के शहीद हुए पत्रकार को स्ट्रिंगर कहकर उसका भद्दा मजाक कर रहा है.  यूपी के मुजफ्फर नगर जिले में अपनी संस्था आईबीएन7 नेशनल न्यूज़ चैनल के लिए कुर्बानी देने वाले शहीद पत्रकार भले ही अपने संस्थान आईबीएन7 के लिए डंके की चोट पर काम करने का दावा करता रहा हो लेकिन मुजफ्फर नगर दंगे की एक्सक्लूसिव व सनसनीखेज कवरेज करने के चक्कर में इमानदार और तेजतर्रार पत्रकार को उसकी अपनी ही संस्था आईबीएन सेवेन ने स्ट्रिंगर और फ्रीलांस जर्नालिस्ट कहकर उसका और उसके जैसे तमाम ईमानदार और संस्था के प्रति जिम्मेदार पत्रकारों के साथ भद्दा मजाक किया है.

एक तरफ मुजफ्फर नगर प्रसासन उसे आईबीएन7 के संवाददाता का दर्जा दे रहा है तो आईबीएन7 वाले उसकी बहादुरी का भद्दा मजाक उड़ा रहे हैं. और तो और, अभी तक न तो संस्थान का कोई जिम्मेदार अधिकारी उस शहीद पत्रकार की खोज खबर लेने पहुंचा है और ना ही उसके परिवार को किसी तरह की आर्थिक सहायता देने का ऐलान.

यूपी सरकार ने उसके परिवार को कुछ मदद दिलाने का आश्वासन जरूर दिया है. कवरेज करते करते दंगे और खबरों के लिए ऐसे ही न जाने कितने पत्रकार अपनी जान गंवाकर न्यूज़ चैनल की टीआरपी बढाते हैं. जिस टीआरपी पर चैनल के एसी में बैठे लोग सिर्फ मुनाफेबाजी के सिवाय कुछ और नहीं देखते. 

ऐसे मुनाफेबाज लोगों से मेरी अपील है कि उन्हें भी ऐसे फील्ड में जाकर कवरेज करनी चाहिए जैसे प्रदेश के कई जिलो के नाम मात्र एक पत्रकार जो कैमरामैन बन जाता है, और वो ही पत्रकार बन जाता है और जरूरत के समय ड्राइवर के अलावा खबरें पहुंचाने से लेकर चैनल का सबसे कमजोर और लाचार व्यक्ति माना जाता है… जिसको ये चैनल वाले सेलेक्टेड खबरों में से कुछ खबरों का पैसा काटने के बाद लम्बे समय तक गिड़गिड़ाने के बाद मामूली रकम भेजते हैं जो सिर्फ गाड़ी के पेट्रोल में ही खर्च हो जाता है…

ये चैनल के बड़े अधिकारी अपने जिले के पत्रकार को स्टिंगर, सहयोगी और इन्फार्मार के अलावा कोई दर्जा नहीं देते जिससे कही कोई पत्रकार उनकी संस्था पर क्लेम न कर दे… सोचो जब एक राजधानी के टीवी पत्रकार को एसी वाली कार दी जाती है, आने जाने का खर्चा दिया जाता है, सहयोगी दिया जाता है, ड्राइवर दिया जाता है, कैमरा मैन दिया जाता है और जिले का स्ट्रिंगर भी उन्हीं के साथ कर दिया जाता है. इसके साथ ही उनको मोटी पगार भी दी जाती है. उसके बाद भी जिला का स्टिंगर ही एक्सक्लूसिव खबरें देता है, जो कहीं भी किसी वक्त बिना जान की परवाह किये चल देता है… ऐसे लोगो का नाम आईबीएन7 जैसे चैनल सिर्फ स्ट्रिंगर और फ्रीलांसर लिखकर सबके अपने साथियों के साथ ये भद्दा मजाक कर रहे हैं..

अमित वर्मा

amit verma

amitvermalko0786@gmail.com

कैमरामैन ने पत्रकार राजेश वर्मा की मौत के एक-एक पल को अपने कैमरे में कैद किया है!

मीडिया के एयर कंडीशन्ड स्टूडियो में भांग पीकर हिस्टीरियाई अंदाज में चिल्लाने वाले दलालों मठाधीशो को ये नहीं भूलना चाहिए कि जिन खबरों को ये मसाला मारकर चाशनी में डुबाकर सारा दिन स्टूडियोज में खेलते रहते हैं और बाकी वक्त किसी महिला एंकर को अपनी आंखों से नापते जोखते रुदालिया करते रहते हैं, वो खबर किसी दूर दराज के स्ट्रिंगर राजेश वर्मा जैसे लोग अपनी जान की बाजी लगाकर लाते हैं..

इन राजेश वर्माओं को नोयडा के आलिशान स्टूडियो में किसी आसाराम की तरह मठाधीश बने राजदीप सरदेसाई या आशुतोष जैसे लोगों की तरह भारी भरकम सेलेरी और हर खबर पर नफा नुकसान बताकर राजनीतिक लोगों से वसूली जाने वाली दलाली में हिस्सा नहीं मिलता… उन्हें तो बस उसी खबर पर पैसे मिलते हैं जिसे चैनेल टेलीकास्ट करता है ..

ताज्जुब की बात है की जिस चैनेल के पत्रकार को दंगाईयों ने खबर कवर करते समय मार डाला वो उस खबर को वो चैनेल सिर्फ एक स्क्राल दिखाकर खत्म कर देता है? सूत्रों में पता चला है कि कैमरामैन ने पत्रकार राजेश वर्मा की मौत के एक-एक पल को अपने कैमरे में कैद किया है, किस तरह मुस्लिम दंगइयों ने उन्हें गोली मारी …लेकिन चर्चा है कि चैनल में मठाधीशो ने उस फुटेज की पूरी कीमत उसे न दिखाने के लिए समाजवादी पार्टी से वसूली है…

जितेन्द्र प्रताप सिंह

jp20024@gmail.com

भास्कर रीजनल मार्केटिंग, पंजाब से जसवंत सहारन और रवींदर पाल सिंह ने इस्तीफा दिया

लगभग छह वर्षों से दैनिक भास्कर, अमृतसर के साथ जुड़े और रीजनल हेड मार्केटिंग के पद पर कार्यरत जसवंत सहारन ने संस्थान को अलविदा कह दिया है. उन्होंने लुधियाना में दैनिक जागरण के साथ नई पारी की शुरुआत की है. जसवंत श्रीगंगानगर के रहने वाले हैं.

उन्होंने वर्ष 2003 में भास्कर के साथ ही करियर की शुरुआत की थी. अमर उजाला जम्मू और दैनिक जागरण जालंधर के बाद उन्होंने वर्ष 2008 में भास्कर, लुधियाना से जुड़ गए थे. सूचना यह भी है कि जसवंत के साथ बटाला से रवींदर पाल सिंह ने भी भास्कर को इस्तीफा दे दिया है. इससे भास्कर रीजनल मार्केटिंग को दोहरा झटका लगा है. चर्चा है कि कई और लोग भास्कर रीजनल मार्केटिंग से जल्द ही इस्तीफा दे सकते हैं.

भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com का सहारा ले सकते हैं.

 
 

दैनिक जागरण, दिल्ली के आईटीओ आफिस के कई रिपोर्टरों का दायित्व बढ़ा, ट्विटर-एफबी छिना

दैनिक जागरण के दिल्ली स्थित आईटीओ आफिस से खबर है कि यहां कई रिपोर्टरों के कार्य का दायित्व बढ़ा दिया गया है. इन्हें अब लोकल रिपोर्टिंग की जगह स्टेट ब्यूरो में ले लिया गया है. ये अब स्टेट लेवल की रिपोर्टिंग का काम करेंगे. सूत्रों के मुताबिक प्रदीप कुमार सिंह, पवन कुमार, मृदुलिका झा को लोकल से हटाकर स्टेट ब्यूरो में कर दिया गया है. एक अन्य सूचना के मुताबिक आईटीओ आफिस से प्रबंधन ने सभी कंप्यूटरों से फेसबुक और ट्विटर हटा दिया है.

रिपोर्टरों ने ये भी कहा कि कई लोकल नेताओं और दिल्ली पुलिस आदि की विज्ञप्तियां, जानकारियां इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए मिलती हैं, इसलिए इसे बैन न किया जाए, पर प्रबंधन ने एक न सुना. मुख्यालय से आए आदेश का हवाला देकर फेसबुक और ट्विटर समेत कई वेबसाइटों को बैन कर दिया गया है. यहां तक विकीपीडिया को भी रिपोर्टर लोग नहीं खोल सकते. इन साइटों को प्रतिबंधित करने के लिए कंप्यूटर में एक अलग किस्म का साफ्टवेयर इंस्टाल किया गया है.
 

सत्य हमेशा व्याख्याओं पर निर्भर करता है : प्रियदर्शन

आगरा। ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ के हर माह आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की सातवीं शृंखला के अंतर्गत एनडीटीवी-इंडिया के वरिष्ठ संपादक प्रियदर्शन ने कहा कि भाषा हमारे सरोकार से बनती है और सरोकार कोई भारी शब्द नहीं, यह चीजों और स्थितियों के साथ हमारे जुड़ाव से पैदा होता है। इसके बिना खबर बेजान और मृत हो जाती है। सरोकारी पत्रकारिता के लिए मूल शर्त है कि सामने का समाज आपको आंदोलित करता हो।

उन्होंने कहा कि यह बुनियादी बात है कि आपके शब्दों को ताकत और अर्थ कहां से मिलता है। हर शब्द की एक छवि होती है। जैसे हम अगर कहते हैं कि बालकनी में लड़की उदास है, तो हर व्यक्ति के भीतर एक अलग लड़की होगी और उसकी उदासी भी अलग-अलग होगी। निर्मल वर्मा कहते थे कि गरीबी और दरिद्रता में अंतर है। गरीबी में स्वाभिमान है, जबकि दरिद्रता में एक ओछापन है। पत्रकारों से समय के नये विमर्शों से जुड़ने का आग्रह करते हुए उन्होंने पाउलो फ्रेरे का उदाहरण देते कहा कि पाउलो गरीब शब्द का उपयोग नहीं करना चाहते, वे इसकी जगह ‘उत्पीड़ित’ शब्द का प्रयोग करना चाहते हैं। यह शब्द व्यवस्था  के उत्पीड़न के बारे में बताता है।

शब्दों के निहितार्थों पर बात करते उन्होंने आगे कहा कि लोहिया शब्दों को मांजने की बात करते थे। भाषा की बहुत सी तहें होती हैं। हम मां से जिस आत्मीय भाषा में बात करते हैं उसी में पिता से नहीं करते। शब्द  हमारे संबंधों के स्तरों के बारे में बताते हैं। लिखने में सहज भाषा के प्रयोग पर बल देते उन्होंने कहा कि भाषा को सहज होना चाहिए, सरल नहीं। इस संदर्भ में उन्होेंने कविवर भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियां उद्धृत कीं- जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख और इसके बाद हमसे बड़ा तू दिख। उन्होंने कहा कि हमारी भाषा में हमारे पुरखे बोलते हैं और कई बार हम उनके पूर्वाग्रहों को भी साथ लिए चलते हैं। जिनमें हमारे लैंगिक पूर्वाग्रह भी शामिल हैं। हमें उससे जूझना चाहिए।

कुछ उदाहरण देते उन्होंने कहा कि नये विमर्श में इस पर विचार हो रहा कि ‘हिस्ट्री’ शब्द, ‘ही स्टोरी’ ही क्यों  हो, वह शी स्टोरी भी तो हो सकती है। कैमरामैन की जगह ‘कैमरापर्सन’ क्यों ना कहा जाए। चर्चित कवि धूमिल ने कभी लिखा था- जिसकी पूंछ उठायी, मादा पाया। पर आज इस पर विचार हो रहा कि धूमिल का यह ढंग न्यायपूर्ण नहीं। संवेदना के अस्मितावादी दौर से हम बाहर आ चुके हैं। आज स्त्री पहली बार भाषा में समाज में अपने तौर-तरीकों के साथ आ रही है और आज उस पर ज्यादा हमले भी हो रहे हैं।

स्त्री पर लिखने के तरीके पर चोट करते उन्होंने कहा कि यह गलत तरीका है कि हम लिखते हैं कि उसकी इज्जत तार-तार कर दी या लूट ली। जिसने अपराध किया इज्जत उसकी जानी चाहिए। ऐसी खबरें लिखते समय हमें सतर्क और संवेदनशील होना चाहिए। ‘विधवा’ शब्द के इस्तेमाल का विरोध करते उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी राजीव गांधी की विधवा नहीं पत्नी हैं। पुरुषों को अगर ‘विधुर’ नहीं बोलते तो स्त्री को क्यों बोलेंगे। बलात्कार शब्द पर भी विचार की मांग करते हुए उन्होंने कहा, पश्चिम में इसे अब रेप सर्वाइवर कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि सत्य हमेशा व्याख्याओं पर निर्भर करता है। वह इस पर निर्भर करता है कि आप उसे कहां से देख रहे हैं।

भाषा में चले आ रहे पूर्वाग्रहों पर बोलते उन्होंने कहा कि देशभक्ति की आड़ में राष्ट्रवाद का पूर्वाग्रह भी बढ़ा है, जबकि देश हमें अपनी जमीन और गांवों से जोड़ता है यूरोप में भी कंट्रीसाइड कहा जाता है गांव को। देशों के बीच युद्ध को भी अंध राष्ट्रवाद की नजर से ना देखने की सलाह देते उन्होंने कवि, पत्रकार रधुवीर सहाय की पंक्तियां याद कीं- सीमा के इस पार पड़ी थीं लाशें, सीमा के उस पार पड़ी थीं लाशें। देश के मसले नेताओं और अफसरों के दिमाग से नहीं तय किए जाने चाहिए बल्कि उन्हें  एक पत्रकार की तथ्यपरक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। हमारे अवचेतन में बनता देश असली देश से अलग होता है।

राष्ट्रवाद के इस प्रसंग पर ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ के समूह संपादक पंकज सिंह ने विचारक, कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर को याद करते कहा कि गांधी से अपनी बहस में टैगोर ने राष्ट्रवाद के खतरों की ओर इशारा किया था। हमें भी देशभक्ति और राष्ट्रवाद में फर्क करना होगा। उन्होंने गांधी की उस ‘ताबीज’ का जिक्र किया जिसमें गांधी ने अंतिम आदमी को ध्यान में रखने की बात कही है। हमारे सारे क्रियाकलाप और विचारशीलता के केन्द्र में अंतिम पीड़ित मनुष्य होना चाहिए और तब हमसे कभी गलती नहीं होगी। कार्यक्रम के अंत में ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ के कार्यकारी संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि प्रियदर्शन ने अपनी बातों से पत्रकारिता का जो खाका खींचा है वह एक मुकम्मल कोलाज है। एक पत्रकार समाज की प्रयोगशाला का वैज्ञानिक है, जिसे सचेत होना चाहिए।

पत्रिका प्रबंधन पत्रकारों को राजस्थान सरकार से नहीं लेने दे रहा फ्री का लैपटॉप

: पत्रिका को अब पता लगा, यह सरकार की अखबारों को प्रभावित करने की चाल है : विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पत्रकारों को खुश करने की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मुहिम राजस्थान पत्रिका के मालिकों को रास नहीं आ रही है। यह और बात है कि यह दोगली नीति पत्रकारों को उनके खिलाफ ही खड़ा होने के लिए उकसा रही है। दोगली कैसे यह आप आगे समझ जाएंगे। गहलोत ने पत्रकारों के लिए पेंशन, इलाज और प्लॉट के बाद लैपटॉप बांटने की नीति अपनाई है। इसकी घोषणा गहलोत पिछले बजट में कर चुके थे। पहले चरण में राज्य सरकार से अधिस्वीकृत पत्रकारों को लैपटॉप बांटना तय हुआ। सबसे पहला नंबर जयपुर का आया। अगले चरण के लिए जनसंपर्क अधिकारियों से उनके जिले के अधिस्वीकृत पत्रकारो की सूची मंगवा ली गई है।

लैपटॉप की कीमत 30 से 35 हजार रुपए है। पहली खेप में शनिवार को जयपुर के 31 पत्रकारों को लैपटॉप थमा दिए गए। राजस्थान पत्रिका प्रबंधन को जैसे ही इस सूची की जानकारी हुई, उनका पारा चढ़ गया। बड़ा गंभीर मामला था। सरकार अगर मुफत में कुछ दे रही है तो जाहिर है यह गहलोत की अखबारों को प्रभावित करने की कुचाल है। अगर पत्रकारों को लैपटॉप मिल गए तो वे चुनाव में जैसा गहलोत चाहेंगे वैसा कवरेज करेंगे। दूसरे शब्दों में ऑब्लाइज हो रहे हैं तो ऑब्लाइज भी करेंगे। गहन विचार विमर्श के बाद नीति की आड में फरमान जारी कर दिया गया। पत्रिका का कोई पत्रकार सरकार का लैपटॉप नहीं लेगा। जो लेगा उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। यह फरमान सामने आता तब तक एक पत्रकार बेचारा लैपटॉप ले आया। बेचारा इसलिए क्योंकि जैसे ही प्रबंधन को पता लगा उसे सख्त हुक्म दे दिया गया कि तुरंत वापस जमा करवाकर आओ और जमा करवाने की रसीद लाकर यहां जमा करवाओ।

आनन-फानन खबर जयपुर के पूरे पत्रकार जगत में फैल गई। मामला अभी राजस्थान पत्रिका तक ही सीमित था परंतु रविवार को दैनिक भास्कर में इसकी सबसे ज्यादा चर्चा रही। भास्कर के पत्रकारों को यह डर सता रहा है कि कहीं भास्कर प्रबंधन भी सोमवार को पत्रिका जैसा आदेश जारी नहीं कर दे। पिछले तीन महीने से फ्री लैपटॉप की आस लगाए बैठे, पत्रकारों की इच्छाओं पर यह कुठाराघात ही है। अपने बच्चों को लैपटॉप देने का वादा कर चुके हैं। अब निभाने का वक्त आया तो सेठ लोग टांग अड़ा रहे हैं। इधर अभी प्लॉट भी सभी को नहीं मिले हैं। कई लाइन में हैं। यह आशंका भी हो रही है कहीं इसी आड में अब प्लॉट के लिए भी प्रबंधन मना नहीं कर दे। कुछ दिलेर किस्म के पत्रकारों का मानना है कि प्लॉट तो लेकर रहेंगे, इसके लिए नौकरी जाती हो तो जाए। जाहिर है प्लॉट की कीमत ही इतनी होती है कि उसे बेचकर ही एक अच्छा बैंक बैलेंस खड़ा किया जा सकता है।

भास्कर-पत्रिका का शायद ही ऐसा कोई पत्रकार हो जो पत्रिका प्रबंधन के इस फैसले के हक में हो। यह और बात है कि वह दबाव में चुप रह जाए। वजह साफ है राजस्थान पत्रिका हो या दैनिक भास्कर या फिर दैनिक नवज्योति या और कोई अखबार, कोई ऐसा नहीं है जिसने राजस्थान के हर बड़े शहर में प्राइम लोकेशन पर अखबार के नाम पर सरकार से रिजर्व की रिजर्व कीमत यानि मामूली रियायत पर जमीन नहीं ली हो। भैरों सिंह शेखावत हो या वसुंधरा राजे या फिर अशोक गहलोत। सभी ने अखबारों को कई तरह से जमकर ऑब्लाइज किया है।

एक ने नाम मात्र की कीमत में जमीन दी तो दूसरे ने यह छूट दे दी कि इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा किसी को भी कॉमर्शियल उपयोग के लिए किराए पर दिया जा सकता है। हाल यह है कि अखबार का दफतर तो थोड़ी सी जगह में है परंतु बैंक, बीमा जैसी दूसरी कंपनियों के दफतर उनमें खुल गए हैं। कुछ ने तो दुकानें बनाकर शॉपिंग कॉम्पलैक्स बना डाला है। भैरों सिंह शेखावत और राजस्थान पत्रिका का तालमेल तो राजस्थान में बेमिसाल रहा है। जयपुर की प्राइम लोकेशन पर स्थित पुरानी भव्य इमारत केसरगढ़ ही पत्रिका को दे दी गई। बाद की सरकारों ने भी कुलिश स्मृति वन, जनमंगल ट्रस्ट आदि के लिए सरकारी संसाधन, रियायतें, अनुदान दिए। पता नहीं कैसे तब अखबार सरकारों से प्रभावित नहीं हुए ?

पत्रकारों की पीड़ा इसलिए भी वाजिब है कि पिछले नगर पालिका और पंचायत चुनावों में पत्रिका और भास्कर ने पेड न्यूज के लिए विज्ञापन या मार्केटिंग से ज्यादा संपादकीय विभाग का इस्तेमाल किया था। पत्रकारों को ही नेताओं से सौदा करने के लिए आगे किया गया। पत्रकारों ने ही खबरें और फोटो इस तरह छापी कि वे खबर जैसी ही लगे ना कि विज्ञापन जैसी। राजस्थान पत्रिका ने तो अपने ज्यादातर संस्करणों में संपादक नामक संस्था को खत्म ही कर दिया है। संपादक को ही प्रबंधक बनाकर विज्ञापन, मार्केटिंग और सर्क्युलेशन का जिम्मा दे दिया गया है। ना रहेगा प्रबंधक ना होगा संपादक से टकराव। एक आदमी को जब विज्ञापन और सर्क्युलेशन के टार्गेट पूरे करने है तो फिर खबरें उसकी प्राथमिकता कैसे रहेंगी ?

कुछ अखबारों ने अभी से आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए अपने खास पत्रकारों को इशारा कर दिया है। काम तो करना है पर इस तरह करना है कि काम भी हो जाए और नाम भी खराब ना हो। सीधा सा मतलब है नेताओं से अभी से संपर्क बनाओ। टिकट मिलते ही रकम लेनी शुरू करो और किसी को पता भी मत लगने दो। पत्रकारों को यह चुनावी नीति बता दी गई है, क्या अब यह संभव है कि जिन नेताओं से पत्रकार को मामूली रकम का लैपटॉप नहीं लेने दिया जा रहा हो उन्हीं से खुद के लिए बाद में लाखों रुपए एकत्रित करवा लिए जाएंगे।

मीडिया मालिकों को भड़ासी सलाह: ये जो नेता हैं, अफसर हैं, जज हैं और जनता में भी बहुत से हैं, ये गले तक मीडिया की हरकतों से भरे बैठे हैं। ‘मीडिया ट्रायल’, ‘ब्लैक मेलर’, ‘पेड न्यूज’ जैसे कई नए शब्द उनके जेहन में गहरी जडे़ं जमा चुके हैं। कुछ तो पीठ पीछे ‘मीडिया आतंकवाद’ शब्द भी काम में लेने लगे हैं। सब झपटने को तैयार बैठे हैं। ‘जिंदल-जी न्यूज’ धारावाहिक आप देख ही चुके हैं। ‘स्टिंग ऑपरेशन’ और ‘हिडन कैमरों’ से ये भली भांति परिचित हैं। हर ब्रेकिंग न्यूज, स्कूप, एक्सक्लुसिव तभी सामने आ पाता है जब उसके भीतर के राजदार ही उसे पत्रकारों को मुहैया करवाते हैं। इसलिए हे मीडिया मुगलों जो करो सोच समझकर करना। आपके राजदार पत्रकारों की नाराजगी कहीं आपके लिए भारी नहीं पड़ जाए ?   

लेखक राजेंद्र हाड़ा वरिष्ठ वकील, पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं. इनसे संपर्क 09549155160 या 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.


क्लिक करें– भड़ास पर राजेंद्र हाड़ा

अखिलेश यादव के नाम खुला पत्र

उत्तर प्रदेश एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा है|  इस भेद- भाव की दीवार ने इस बार पश्चमी उत्तर प्रदेश को चुना है| ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है की आखिर बार बार क्यों उत्तर प्रदेश में ही ये हिंसा हो रही है जबकि अखिलेश सरकार बार बार इससे निपटने में विफल है| अखिलेश जी चुनाव जितने के बाद जब आपकी ताजपोशी मुख्यमंत्री के रूप में हुई थी तो सूबे की जनता को आपसे बहुत उम्मीद थी| आपकी सरकार पहली बार पुरे बहुमत से सत्ता में आई थी| 

लोग बसपा सरकार के भ्रष्टाचार से तंग आ गए थे| विकल्प के तौर पर आप जनता का भरोषा जितने में कामयाब रहे| आप युवा हैं युवाओं को खासकर आपसे बहुत उम्मीद थी| पर अफ़सोस की जिस दिन चुनाव के रिजल्ट( परिदाम) घोषित हुए उसी रात आपके कार्यकर्ताओं ने हिंसा और उत्पात मचाना शुरू कर दिया| पत्रकारों को बंधक बना लिया गया| फिर आपकी पार्टी को दिए हुए वोटों पर जनता को तुरंत एक बार फिर अपनी गलती का एहसास हो गया| आप खुश थे क्युकी आपके पास अब पांच साल का मौका था| अब कोई कुछ नही करता आपका| पर याद रहे अखिलेश जी जिन्दा कौमे पांच साल तक इंतज़ार नही करती| आप अपने पिताजी की मानसिकता से अलग हटकर काम किये| आपने आधुनिकता को सही भांपा और छात्रों को लैपटॉप और टेबलेट दिए|

लेकिन जब सारे धर्म और संप्रदाय को साथ लेकर चलने की बात आई तो आप विफल हो गए| आप पर जिआउल हक के मर्डर केस में रजा भैया को बचाने का आरोप लगा| आपने उनकी पत्नी और घर के सदस्यों को मुआवजे के साथ नौकरी दी| लेकिन इलहाबाद में एक हिन्दू पुलिस अधिकारी मारे गए तो आपका कोई भी नुमाइंदा वहां सुध लेने तक नही गया मुआवजे और नौकरी की बात ही छोडिये| विवादों से आपका नाता जुड़ गया| इस बिच कई सारे आरोप आप पर और पार्टी पर लगते रहे| जब सरहद पर सैनिक अपनी जान गवां कर देश की रक्षा में लगे थे तो आपके पिताजी इटावा में नर्तकियों के नाच देखने में मशगुल थे| एक विशेष समुदाय को खुश रखने के लिए आपने एक ईमानदार अधिकारी दुर्गा नागपाल को निलंबित कर दिया| जिसकी वजह से एक बार फिर पुर देश में आपकी भद पिट गयी|  

चौरासी कोशी परिक्रमा को रोककर आप एक बार फिर अपने रानीतिक मनसूबे में कामयाब हो गए| लेकिन आप ये सांप्रदायिक हिंसा रोकने में क्यों गलत साबित हो जा रहे हैं| बार-बार हो रहे इस हिंसा ने आप पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं| आपके चाचा कहते हैं हम उत्तर प्रदेश को गुजरात नही बनने देंगे| अफ़सोस आपने इसे उत्तर प्रदेश भी नही छोड़ा| आप एक राज्य नही चला सकते फिर देश चलने का सपना क्यों पाल बैठे हैं| अखिलेश जी कृपा करके ये घ्रिडा की राजनीति बंद करिए और राजधर्म निभाते हुए उत्तर प्रदेश को सांप्रदायिक हिंसा का राज्य कहने से बचा लीजिये वरना द्वेष के इस आग में ये देश जल जाएगा|

नितेश कुमार त्रिपाठी

Nitesh kumar Tripathi

niteshtripathi2828@gmail.com

रमेश नाचीज़ के ग़ज़ल संग्रह ‘अनुभव के हवाले से’ का इलाहाबाद में विमोचन

इलाहाबाद। अकबर की शायरी में आज का समाज बोलता है। अकबर ने अपने दौर में समाज में होने वाली बुराइयों को पहले ही पहचान लिया था, वो सारी चीज़ें आज हमारे सामने आ रही हैं। इसलिए उनकी शायरी को आज के दौर में रेखांकित किये जाने की ज़रूरत है।

यह बात उर्दू साहित्य के मशहूर आलोचक प्रो.अली अहमद फातमी ने कही। रविवार को साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में ‘अकबर इलाहाबादी स्मृति समारोह’ का आयोजन किया गया। इस दौरान रमेश नाचीज़ के ग़ज़ल संग्रह ‘अनुभव के हवाले से’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम ने किया। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष मूलचंद्र सोनकर, डा. नफीसा बानो, डा. फखरुल करीम और गुरु प्रसाद मदन विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।

मूलचंद्र सोनकर ने कहा कि रमेश नाचीज की यह किताब दलित साहित्य के क्षेत्र में एक योगदान है, इसे गंभीरता पढ़कर इस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। नाचीज ने जगह-जगह अपनी शायरी में दलित चेतना को बेहतरीन ढंग से उकेरा है। डा. फखरुल करीम ने कहा कि अकबर अंग्रेजी तालीम के खिलाफ नहीं थे, बल्कि वे अंग्रेजी तहजीब के खिलाफ थे। उनका मानना था कि हमें अपनी तहजीब को नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि यही हमारी असली पहचान है। वाराणसी से आयीं डा. नफीसा बानो ने कहा कि अकबर ने अपनी शायरी में ज़माने की तस्वीर खींची है और बिगड़ती तहजीब पर करारा प्रहार किया है, इसलिए हम उन्हें समाज सुधारक शायर भी कह सकते हैं।

गुरु प्रसाद मदन का कहना था कि रमेश नाचीज ने अपनी शायरी में उन चीजों का जिक्र किया है, जिसमें दलितों के भोगे हुए सच का बयान किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एहतराम इस्लाम ने रमेश नाचीज की पुस्तक और अबकर इलाहाबादी की शायरी को रेखांकित करते हुए कई बात कही। कार्यक्रम के शुरू में रमेश नाचीज़, फरमूद इलाहाबादी और रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ ने अपना कलाम पेश किया।

इस मौके पर संजय सागर, अजय कुमार, अनुराग अनुभव, हसनैन मुस्तफाबादी, राजकुमार चोपड़ा, अजामिल, रविनंदन सिंह, डा. सुरेश चंद्र द्विवेदी, सलाह गाजीपुरी, सुरेश कुमार शेष, नुसरत इलाहाबादी, एन.के. रावत,जयकृष्ण राय तुषार, अजीत शर्मा ‘आकाश’,विनय शर्मा बागी, कविता उपाध्याय, सबा खान, सुषमा सिंह, तलब जौनपुरी,केशव सक्सेना, शैलेंद्र जय आदि मौजूद रहे।

अजय कुमार की रिपोर्ट

अखबार नहीं घुसने दिया तो दैनिक जागरण वालों ने मुजफ्फरनगर के डीएम को तानाशाह लिखा

कुछ लोगों का कहना है कि दैनिक जागरण एकपक्षीय खबरें छापता है और खासकर हिंदुओं की भावनाओं को भड़काने का काम करता है, इसलिए इस अखबार पर दंगों के दौरान पाबंदी पूरी तरह उचित है. इस पाबंदी से बौखलाए दैनिक जागरण के लोगों ने मुजफ्फरनगर के डीएम को तानाशाह करार दिया है और अखबार न बेचे देने को मीडिया पर सेंसरशिप के विशेषण से नवाजा है.. ये वो खबर है जो दैनिक जागरण की वेबसाइट पर फ्लैश हुई है…

तानाशाह डीएम मुजफ्फरनगर ने मीडिया पर लगाई 'सेंसरशिप'

मुजफ्फरनगर : पुलिस-प्रशासन की नासमझी से दंगे की आग में जल रहे मुजफ्फरनगर में अब डीएम कौशलराज शर्मा पूरी तरह तानाशाही पर उतर आए है। दंगा नियंत्रण के हर मोर्च पर विफल साबित होने वाले जिला प्रशासन ने रविवार को अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पूरे शहर में समाचार पत्रों के वितरण पर पाबंदी लगा दी। इतना ही नही डीएम ने पूरे जिले के उपद्रवग्रस्त इलाकों में मीडिया के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी है। हाल फिलहाल मीडिया पर ऐसी पाबंदी देखने में नही आई है। डीएम के इस अबूझ निर्णय पर आम नागरिकों के साथ-साथ पूरे मीडिया समूह में जबरदस्त नाराजगी है।

डीएम के अकर्मण्यता से पूरे जिले में फैली दंगे की आग को देखकर शायद अब पुलिस और प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए है। उपद्रवग्रस्त स्थानों पर सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों को उतारने के बावजूद बेकाबू हो रहे इस दंगे में अब प्रशासन को यह नही सूझ रहा है कि अगला कदम क्या उठाया जाए। कवाल की घटना के एक पखवाड़ा के बाद भी हाथ पर हाथ धरे पुलिस प्रशासन के इस निकम्मेपन का नतीजा यह है कि आज पूरा जिला यहां तक की गांव की गलियां हिंसा के दवानल में समा गई हैं। प्रशासन एक जगह स्थिति संभालता नही है, कि दो अन्य स्थानों में उपद्रव शुरू हो जाता है। पूरे जिले में मारकाट और खून खराबा चल रहा है। फौज बेशक तैनात है, लेकिन हालात इतने संगीन है कि प्रशासन का गला सूखा हुआ है।

शायद अपनी प्रशासनिक विफलता का यह नतीजा देख डीएम मीडिया पर खीज उतारने में लग गए है। लोकतंत्र में सूचना पाने के संवैधानिक अधिकार को डीएम खुलेआम रौंदने पर आमादा है। हद तो तब हो गई जब रविवार सुबह तमाम समाचार पत्रों के वितरण पर प्रशासन ने पाबंदी लगा दी। अखबार से लदे वाहनों को पुलिस ने जिले की सीमा में प्रवेश करते ही अपने कब्जे में ले लिया।

इसके बाद तमाम कोशिशों के बाद डीएम अखबार के वितरण पर सहमत नही हुए। पूरे शहर के किसी इलाके में किसी भी समाचार पत्र का वितरण नही होने दिया। निश्चित तौर पर जिला प्रशासन के इस कदम को खुद की नाकामी छिपाने की एक अलोकतांत्रिक साजिश माना जा रहा है। जिले में तमाम उपद्रव और हिंसा की वारदातें हुई हैं, लेकिन अब तक ऐसा नाकारा प्रशासन मुजफ्फरनगर की जनता ने नही देखा है कि सूचना पाने के अधिकार से ही उसे वंचित कर दिया गया हो। माना जा रहा है कि प्रशासन अखबार के वितरण पर पाबंदी लगाकर दंगे की वीभत्सता और खुद के नाकारा पन को ढकने की कोशिश कर रहा है। डीएम से इस बाबत बातचीत करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि शहर में दंगा-फसाद हो रहा है, बाद में बात करूंगा।

मुजफ्फरनगर में चिंगारी क्यों बनी शोला?

मुजफ्फरनगर के कवाल में 27 अगस्त को हुई मामूली घटना पर एक युवक की हत्या और उसके बाद दो युवकों को मार देने की घटना इतनी बड़ी नहीं थी कि पुलिस और प्रशासन उससे नहीं निपट सकता था। न जानें क्यों धीरे-धीरे सुलगती आग को शोला बनने का इंतजार किया गया, जिसका नतीजा यह है कि आज मुजफ्फरनगर ही नहीं, उसके आसपास का क्षेत्र जंग का मैदान बन गया है। सेना बुलानी पड़ी है। हालात बहुत संगीन हैं।

पूरे घटनाक्रम को देखने पर पता चलता है कि कुछ ताकतें हर हाल में चाहती थीं कि ऐसा ही हो, जैसा हुआ है। इसमें न गलती आम हिंदुओं की है, न मुसलमानों की और न ही उन जाटों की, जिन्हें राजनीतिक दलों ने इस्तेमाल किया और वे हो गए। इस पूरे प्रकरण का शर्मनाक पहलू यह है कि सभी राजनीतिक दलों के नेता, जो धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाए घूमते हैं, हिंदू और मुसलमान में बंट गए। दुखद तो यह भी है कि मुजफ्फरनगर में वे अमन पसंद घरों में दुबके रहे, जो गोष्ठियों में सांप्रदायिक सदभाव में बड़े-बड़े भाषण देते हैं।

सवाल यह है कि हिंदुओं और मुसलमानों की पंचायत से इतर तीसरी पंचायत अमन पसंद लोगों की क्यों नहीं हुई? क्या इससे यह पता नहीं चलता कि हिंदुओं और मुसलमानों में कट्टर लोगों का प्रभाव ज्यादा हो गया है और अमन पसंद ताकतें कमजोर हो गई हैं? किसी कांग्रेस, सपा, बसपा और रालोद के नेता को क्यों किसी ऐसी पंचायत का हिस्सा बनना चाहिए, जो विशुद्ध रूप से सांप्रदायिक आधार पर बुलाई गई हो? कवाल में जिस मुसलिम युवा की हत्या हुई थी, उसके हत्यारों को कानून सजा देता। हत्या का बदला लेने के लिए खुद कानून हाथ में लेकर दो भाइयों के हत्यारों को भी सजा देने का हक कानून को ही है। खुद ही इंसाफ करने के लिए हत्याओं का दौर चलेगा, तो फिर कानून नाम की चीज का मतलब ही क्या रह जाता है।

30 अगस्त को मुजफ्फरनगर के मीनाक्षी चौक पर राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर मुसलमानों की भीड़ जुटती है। प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है। हद यह है कि पंचायत में अधिकारी खुद ज्ञापन लेने आते हैं। उसके अगले दिन ही भाजपा नंगला मंदोड़ में 36 बिरादरियों की पंचायत करती है, इसमें भी विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता जुड़ते हैं। 5 सितंबर को हुआ मुजफ्फरनगर बंद आग को थोड़ा और सुलगा देता है। उसके बाद देहात में जगह-जगह होती वारदातें हालात को संगीन बनाती जाती हैं, लेकिन पुलिस-प्रशासन की नींद नहीं टूटती। 7 सितंबर को नंगला मंदोड़ में फिर 36 बिरादरियों की पंचायत का ऐलान होता है।

हैरत होती है यह देखकर कि चौरासी कोसी परिक्रमा को हर हाल में न होने देने का संकल्प पूरा करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार नंगला मंदोड़ की पंचायत रोकने के लिए ठोस कदम उठाती नजर नहीं आती। नतीजा यह होता है कि एक लाख के लगभग लोग, नंगला मंदोड़ पहुंच जाते हैं। बहुत लोगों के हाथों में हथियार भी होते हैं। क्या पुलिस-प्रशासन को पंचायत में जाते लोगों के हाथों में वे हथियार नजर नहीं आए, जिन्हें मीडिया ने अपने कैमरों में कैद किया? पंचायत के बाद जो कुछ होता है, वह हमारे सामने है। पंचायत से लौटते लोगों पर हमले होते हैं। सांप्रदायिकता की आग देहात में पहुंच जाती है।

पूरे घटनाक्रम को देखने पर एहसास होता है कि सब कुछ जानबूझकर होने दिया गया। ऐसा लगता है, जैसे सब कुछ सोची-समझी साजिश के तहत अंजाम दिया गया हो।  देहात में सिर उठाती सांप्रदायिकता का उभार कुछ संकेत देता है, जिसे समझना बहुत जरूरी है। भले ही कुछ लोग कहें कि मुजफ्फरनगर के हालात को 2014 के चुनाव से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, लेकिन उससे जुड़ाव से इंकार भी नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दलों की तमाम कोशिशों के बाद भी हमारे देहात हमेशा सांप्रदायिक धु्रवीकरण से बचे रहे हैं। जब भी शहरों में दंगा हुआ, देहात शांत रहे हैं। दंगा होने पर शहरों में जा बसे लोग अपने-अपने गांवों में शरण लेते रहे हैं। देहात का यह सांप्रदायिक सद्भाव उन राजनीतिक दलों को रास नहीं आता, जो चुनाव में शहरी क्षेत्र से जीतते हैं, लेकिन देहात में हारते रहे हैं। संभवत: उन दलों की कोशिश है कि अबकी बार देहात में भी सांप्रदायिक धु्रवीकरण करा दिया जाए, जिससे देहात में शिकस्त न खानी पड़े।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत ने हिंदुओं और मुसलिमों के बीच एक नया रिश्ता कायम किया था, जो उनके जीते-जी जारी रहा। मेरठ में 1987 के दंगों के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई बन चुकी थी। ऐसे में 1988 में भारतीय किसान यूनियन ने मेरठ में किसानों की मांगों को लेकर लंबा धरना दिया था। उस धरने में मुसलिम किसानों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उस दौर में एक बार फिर सांप्रदायिक सद्भाव का दौर शुरू हुआ था। अफसोस की बात है कि चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत के वारिस अपने बुजुर्गोें की विरासत संभाल कर नहीं रख पाए। 7 सितंबर की नंगलामोड़ की पंचायत भारतीय किसान यूनियन की विचारधारा के एकदम विपरीत थी। टिकैत बंधु उत्तेजित भीड़ का मिजाज भांपने में नाकाम रहे।

टिकैत बंधुओं के आंसू जो कहते हैं, उसका मर्म भी बहुत गहरा है। इस पंचायत के बाद हालात विकट होते गए। इसे वक्त का तकाजा कह लें या पश्चाताप, अब अमन पसंद लोगों और वास्तविक धर्मनिरपेक्ष लोगों को इस हिंसा को बढ़ने से रोकने के लिए आगे आना चाहिए। चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत को बचाना बहुत जरूरी है। सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन इस बीच हम जो कुछ खो देंगे, उसकी वापसी बहुत मुश्किल से होगी। इस बीच प्रशासन का दिमागी दिवालियापन देखिए कि उसने मुजफ्फरनगर में अखबार नहीं बंटने दिए। न्यूज चैनल भी बंद करा दिए। इसका कितना नुकसान होगा, शायद इसका अंदाजा प्रशासन को नहीं है। अफवाहें फैलेंगी, जो हालात सामान्य नहीं होने देंगी। कभी-कभी अफवाह भी बड़ा हादसा करा देती है। उत्तर प्रदेश सरकार का तो लगता है इकबाल की खत्म हो गया है।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क saleem_iect@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

टीवी टुडे नेटवर्क में पुराने लोगों की छंटनी के बाद अब भर्ती का दौर, कई लोग आए (देखें लिस्ट)

टीवी टुडे नेटवर्क में नये चेहरों की भर्ती होने लगी है। एक तरफ तो प्रबंधन छंटनी और कॉस्ट कटिंग का नाम लेकर लोगों को निकाल रहा है वहीं दूसरी तरफ आए दिन नयी भर्तियां भी की जा रही हैं। HR की तरफ से एक मेल जारी कर नए लोगों की ज्वायनिंग के बारे में जानकारी दी गई है। ये हैं, दीपक मेनन, सीमी पाशा, कुमारजीत सेनगुप्ता, मनोहर रेड्डी, अपर्ना पसालकर और साखी देशपांडे. इनके बारे में डिटेल जानकारी इस प्रकार है…

Deepak Menon has joined us as Deputy Editor (Output) – Editorial Headlines Today, Noida. He has done PG Diploma in Journalism from University of Kerala and has worked with companies like CNN IBN, News X and ETV News. In his free time, he loves to watch movies and read books.
 
Seemi Pasha has joined us as Associate Editor (Anchor) – Editorial Headlines Today, Noida. She has done M.A in Mass Communication from  AJK Mass Communication Research Centre and has worked with CNN IBN. In her free time, she loves to watch movies and read books.
 
Kumarjit Sengupta has joined us as Senior Producer (Production) – Editorial Headlines Today, Noida. He has done Bachelors In Science from University of Calcutta and has worked with companies like Walt Disney, Times Now ,NDTV and Bloomberg TV. In his free time he loves to listen to music and watch movies.
 
Manohar Reddy Koppula has joined us as Cameraman – Production, Hyderabad. He has done Bachelors In Arts from Hyderabad University and has worked with  Gemini TV. Manohar Reddy is also an alumni of TVTN. In his free time, he loves watching cricket.
 
Aparna Pasalkar  has joined us as Senior Manager – Ad Sales Headlines Today (Branded Content), Mumbai. She has done Masters in Marketing Management from Pune University and has worked with companies like Bloomberg TV,ET NOW & HT Media. In her free time, she loves trekking.
 
Sakhi Deshpande has joined us as Reporter – Editorial Headlines Today (Entertainment), Mumbai. She has done Diploma In Broadcast Journalism from  Asian College of Journalism and has worked with ET NOW. In her free time, she loves to attend classical music concerts.

Dr. Anil Singh : It gives us immense pleasure to announce the appointment of Dr. Anil Singh who joins us in the capacity of Executive Editor–Special Projects, reporting to Supriya Prasad Anil comes with more than 15 years of rich experience in journalism with organizations like Star News and Zee News. His last assignment was with Star News as Executive Editor. He is also an alumni of TVTN and we are delighted to welcome him home again. Anil writes extensively on wide aspects of India’s Foreign Policy, Internal Security, Insurgency, Military and Media, State Politics and Strategic Affairs. With a Ph.D degree in International Politics from the University of Delhi, he started his career as a Lecturer in Political Science and moved, subsequently, to broadcast journalism. He is also a member of Indian Institute of Public Administration, Institute of Defence Analysis, and the United Service Institution. Do join us in welcoming Anil on board. We wish him well for a successful career with the India Today Group.

नईदुनिया मुंबई से अजय का इस्तीफा, दबंग दुनिया जाएंगे ललित उपमन्यु!

दबंग दुनिया के छोटे से कार्यकाल के बाद पंकज मुकाती ने प्रभात खबर पटना में बतौर रेजीडेंट एडिटर ज्वाइन किया है। पंकज दबंग से पहले अमर उजाला इलाहाबाद के संपादक थे। वहां से इस्तीफा देकर उन्होंने दबंग ज्वाइन किया था। खबर है कि दबंग दुनिया से महेश लिलोरिया का हनीमून पीरियड भी खत्म हो गया है। उन्हें भोपाल भेजे जाने की तैयारी है। उनकी जगह भास्कर से साइड लाइन किए गए ललित उपमन्यु को संपादक बनाए जाने की खबर है।

नईदुनिया के मुंबई ब्यूरो से अजय गर्ग के इस्तीफा देने की खबर है। अजय की गिनती मल्टी टैलेंटेड जर्नलिस्ट में होती है। वो बॉलीवुड में भी बतौर लेखक सक्रिय हैं। अजय दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान के साथ भी लंबी पारी खेल चुके हैं।

भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com का सहारा ले सकते हैं.

पत्रकारिता के इस प्लांटवादी दौर में कोई भी पत्रकार सुरक्षित नहीं है

Alok Nandan : प्लांटवादी का मीडिया का का एक खतरनाक चेहरा यह भी है कि वह जमीनी स्तर पर लोगों से हाड़तोड़ काम तो लेता है लेकिन उसकी जिम्मेदारी नहीं लेता…राजेश वर्मा आन स्पाट मारा गया…एक पत्रकार के लिए निसंदेह एक शहीद की मौत है यह….प्लांटवादी मीडिया उसकी मौत को रुटीन मौत की तरह लिया… वह भी काफी थूथू के बाद….

पत्रकारिता के इस प्लांटवादी दौर में कोई भी पत्रकार सुरक्षित नहीं है…और स्टींगर जैसे जंतु तो कैसे जी रहे हैं उन्हें भी पता नहीं है….क्या इन सब चीजों को लेकर एक राष्ट्रीय आंदोलन की जरूरत नहीं है? है बिल्कुल है…अब तय करना पत्रकारों का काम है कि इसका स्वरूप क्या होगा…इसका उद्देश्य क्या होगा…और इसमें भागीदारी किनकी होगी….? इतना तो तय है कि प्लांटवादी दौर में सबकुछ दुरुस्त नहीं है…

पत्रकार आलोक नंदन के फेसबुक वॉल से.

यूपी में अखिलेश सरकार के राज में अब तक तीस सांप्रदायिक दंगे, कहां है तीस्ता, अरुंधती, शबनम हाशमी, संदीप पांडे, अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव…?

संजीव सिन्हा : उत्तर प्रदेश में 30 सांप्रदायिक दंगे। सौ से अधिक लोगों की हत्या। ये कैसा समाजवाद? मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव प्रशासन को संभालने में पूरी तरह विफल। उन्हें मुख्यमंत्री पद से अविलंब बर्खास्त करो। कहां बिल में छुपे हैं साम्प्रदायिकता विरोधी अभियान के कर्ता-धर्ता? कहां है तीस्ता, अरुंधती, शबनम हाशमी, संदीप पांडे, अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव…….. ? क्यों नहीं कोई हस्ताक्षर अभियान चल रहा है और शांति मार्च निकल रहा है?

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Mayank Saxena : क्या संविधान में किसी पंजीकृत और राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी पर प्रतिबंध का प्रावधान है? अगर है तो सपा और भाजपा को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर देना चाहिए…ध्रुवीकरण की राजनीति बहुत हो गई…अमित शाह के आते ही सपा भी लगता है कि बीजेपी की स्ट्रैटेजी का फ़ायदा लेने में जुट गई है…बांटो और राज करो…

संजीव सिन्हा और मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

आईबीएन के शहीद रिपोर्टर के परिजनों के लिए इंडिया टीवी के कापड़ी और समाचार प्लस के उमेश पैसा जुटा रहे, आईबीएन वाले आशुतोष और राजदीप चुप्पी साध रहे

Yashwant Singh : विनोद कापड़ी, उमेश कुमार समेत कई पत्रकार साथियों ने स्व. राजेश वर्मा के परिजनों की मदद के लिए कोष जुटाने का अभियान शुरू कर दिया है लेकिन जिस चैनल के पत्रकार थे राजेश वर्मा, उस चैनल के संपादक लोग- राजदीप और आशुतोष – चुप्पी साधे हुए हैं…

अजब दौर है न.. जिसको जो करना चाहिए, वो वही काम नहीं करता…हर चीज अपनी जगह से खिसक गई लगती है.. अफसर जनता का सेवक नहीं बल्कि जनता पर शासन करने का काम करता है… नेता जनता के लिए नहीं बल्कि अपनी कुर्सी और अपने कुनबे के लिए हर पल सक्रिय रहता है… पत्रकार आम जनता के लिए नहीं बल्कि अपना और अपने परिजनों का पेट भरने के लिए पत्रकारिता करता है… सरकार का गठन शासन चलाने के लिए नहीं बल्कि कुशासन पैदा करने के लिए लिए होता है… अदालतें न्याय कम, अन्याय ज्यादा करती दिखती हैं… जेलों में सुधार कार्य कम, अपराध कार्य ज्यादा होते हैं… सिर्फ पैसे कमाने वालों को हम बुरा मानते हैं लेकिन हर कोई पैसे पाने के लिए परेशान दिखता है.. इसमें कुछ और जोड़िए, बढ़ाइए, बताइए…
 
        Vivek Narayan Singh आशुतोष अपना मनपसन्द काम चें चें(चेंचें ट्वीटर का हिन्दी रूपान्तरण है बकौल श्री ओम थान्वी) कर रहे हैं।
   
        S.a. Asthana यशवंत भाई कहने का आशय यह है की – सब के सब विवेक शुन्य , भाव शुन्य और संवेदना शुन्य होकर रह गए है !
    
        Kumar Ashish ab patrakarita house k andar karni hogi yashvant bhai…marne k baad parivar ko koi nahi dekhta hai.
     
        Brijesh Chauhan abhi kuch dino pehle rajdeep ne 52 crore ka banglow lia hai.patrakarita me itna paisa aata hai kya yaswant ji.
      
        Dhirendra Kumar pura bharat pareshan hai…koi samajh nahi paa raha ki ho kya raha hai nd hona kya chahiye
       
        Pravin Priya Mulle ki goliyo se mare hai na koi nahi bolega yahi kaam agar hindu karte to sare secular media k log vidhwa vilap karne lag jate.
        
        Raakesh Pathak Ye yakeenan asamvedansheelata ki had hai, kam se kam ashutosh aur rajdeep jaise editors se to aisi ummeed na thi. Sharmnaak.
         
        Niharika Neelkamal Arora poori jindgi mein maine rajdeep aur ashutosh jaise shareef insaan nahi dekhe,ye log to devta hai devta, ptaa nahi kyu log unhe koste gariyaate rehte hai
   
      विपिन दिवाकर Paisa Jutaane se Kuch Nahi Hoga Aiisa Kaam Karo Ki Aage se Aisa Kuch Nahi Hoga……

        Gujarat 10 Saal Se Ek Bhi Danga Nahi Hau….
 
        Vijay Mishra Baba ये है बिकते कलम और गिरते बाज़ार की सच्चाई ??
 
        Tushar Sharma कलयुग के लक्षणों में रजा ही अपनी प्रजा का भक्षण करेगा या रजा प्रजा के लिए बन्ने वाली जिम्मेदारियों से मुह चुराएगा… IBN7 में आजकल कलयुग का प्रभाव चरमोत्कर्ष पर है….
   
        Sunil Mishra Journalist koi bhi apna-apna kam nhi karta….isliye paise kaam karte hai…jab paise kaam karte hai to koi apna kaam nhi karta….kul milakar kaam ka mahaul kam h…
     
        Mayank Saxena कौन आशुतोष? जो टीवी पर बहुत बोलते हैं, वही क्या?
      
        Varun Singh Ham apke sath hai

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत के फेसबुक वॉल से.