कोई इतना असंवेदनशील या कोई कौम इतनी ‘मुर्दा’ कैसे हो सकती है!

Dilnawaz Pasha : कितनी अजीब बात है कि राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में लिखा होता है, "बेग़ुनाह मुसलिम नौजवानों को रिहा किया जाएगा." पहले ये तो बताओ कि जो बेग़ुनाह हैं उन्हें गिरफ़्तार करने की तुम्हारी मजबूरियाँ क्या हैं? जिन्होंने ग़लत गिरफ़्तारियों को अंजाम दिया उनके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाइयाँ की गईं? 
 
और सिर्फ़ मुसलमान बेग़ुनाहों को ही क्यों रिहा किया जाए? तुम ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाते जिसमें कोई भी बेग़ुनाह जेल में न जाए? ज़ाहिर है तुम्हारे ये घोषणा पत्र वोट बैंक की राजनीति से ज़्यादा कुछ नहीं है. 
 
पहले तुम बेग़ुनाहों को गिरफ़्तार करोगे और फिर उन्हें रिहा करने के नाम पर वोट माँगोगे. और इस बीच उन बेग़ुनाहों की ज़िंदगी के जो साल ज़ाया हो जाएंगे, उनके परिवार जिस पीड़ा से गुज़रेंगे उसका हिसाब तुम 'हर्ज़ाने' में दोगे. 
 
समझ नहीं आता कि कोई इतना असंवेदनशील या कोई कौम इतनी 'मुर्दा' कैसे हो सकती है!
 
पत्रकार दिलनवाज पाशा के फेसबुक वाल से

Workers of ‘Daikin plant’, Neemrana are on strike for last 53 days

846 workers of Daikin plant in Neemrana, Rajasthan are on strike for last 53 days asserting their right to form union and demanding the reinstatement of 125 fellow workers who have been terminated by the management for being part of the process of union formation. Daikin Air-conditioning India Pvt. Ltd., a100% Japanese owned enterprise, is a part of Daikin Industries Ltd,  world’s no. 1 Air-conditioner manufacturing company with 60 production base units and 182 consolidated subsidiaries worldwide.
 
The Neemrana plant is the sole production unit of Daikin in India. It is located over 40 acre area beside National Highway-8, in the ‘Japanese Park’ of RIICO Industrial Complex in Neemrana at distance of 25-30 km from IMT Bawal and 97 km from Gurgaon. The plant was established in 2008 and the production started in 2009. Current annual production capacity of this unit is 20000 VRV (Variable Refrigerant Volume) units and 1800 chiller units with an annual net sale of Daikin in Indian market being Rs. 1200 crores, whereas the current global net sales is 15,234 million USD. Compared to this heavy profile of the company The working condition is too oppressive with heavy workload and the precarious rights and facilities given to the workers which has been made the precondition for foreign investment in the ‘Japanese Park’ in this new and fast developing industrial belt. Permanent workers presently get Rs. 7200 in hand, whereas trainees get Rs. 4700. There is no Dearness allowance, bonus given to the workers is also shown as part of their salary.
 
When the workers realized that without collective struggle the situation would not change, they came together and decided to form their union. They took the signatures of 116 workers and applied for union registration on 6th May 2013 through AITUC. When the management came to know about the process of union formation, they started to pressurize the workers who signed earlier for union registration to give a written statement declaring that they did not support any union in the plant. When the workers did not agree, the management started terminating workers, both permanent and trainee, without any show-cause or enquiry from 21 June, 2013. The workers got the registration of the union, “Daikin Air-conditioning Kamgaar Union”, on 31 July, 2013. At that very night 42 workers were terminated. On 2nd August, workers submitted their demand notice demanding 75% salary hike, DA, residential allowances, medical facilities, conveyance facilities, better canteen facilities, bonus etc. Among the 39 demands that they made, two of them were the demands to abolish contract system and to make the contract workers permanent and the facilities of maternity leave and crèche for female workers. 
 
The management responded to these demand by terminating more workers and in this process altogether 125 workers were terminated till 8th October. The workers declared strike from 21st October, 2013 demanding the reinstatement of all terminated workers and a settlement of their just demands. In response, company management suspended another 56 workers accusing that they were involved in the destruction of company properties during the period of strike. However, the management were forced to participate in a tripartite negotiation 9th November in the presence of DLC, Alwar and ALC, Jaipur. The workers turned down the management’s proposal when it was said that 89 workers among 125 would remain terminated and the remaining would face domestic enquiry under suspension. On 14th November in another round of tripartite meeting the management initially proposed that 50% of the total terminated and suspended workers would be taken back and the remaining workers would face enquiry, but they did not mention any concrete time frame when the remaining workers would be taken back. Thereafter few more negotiations took place but ended without any concrete outcome. 
 
Workers were firm on their position that as no terminated or suspended worker did any wrong, there was no right of the management to punish them. The brave workers are in sit-in demonstration 100 metre away from the company gate for last 53 days. The workers also reached to the nearby villages for support and many from the villages around came in support of the workers in a solidarity meeting held on 26th November. One crucial aspect of this struggle is the continuous assertion of unity of contract, trainee and permanent workers vis-à-vis the management and local administration. Manohar, a worker leader and the President of the Daikin Air-conditioning Kamgaar Union, said in a strong voice,“Against the attack of the management, our strength is our organization and unity. We are also trying to reach to the other unions and workers of Gurgaon-Manesar- Dharuhera-Bawal-Neemrana industrial belt and we already got some supports. Whatever happens, we will continue  for our just demands.”

एक वो नवाब साहब थे, एक ये नवाब साब हैं

Nadim S. Akhter : जो लोग ज्ञान झाड़ रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल वाली आम आदमी पार्टी सरकार नहीं चला पाएगी, ये लोग डर गए हैं, सो सरकार नहीं बना रहे, अरविंद की सीमा यहीं तक है, आगे वे फेल हैं, वगैरह-वगैरह, वे अपने ज्ञान-बुक की तावीज बनाकर गले में डाल लें. जादू-टोना से बच जाएंगे.
 
तिलिस्म तो जनता ने तोड़ दिया है, आम आदमी पार्टी को अप्रत्याशित सीटें देकर. अपना मैनडेट देकर. वह भी घाघ राजनीतिक पार्टियों के लाख प्रोपेगंडा और घात के बावजूद. सब चारों खाने चित हैं. इसलिए हे विचार वीरों!! अपने ज्ञान का सामान खुद के पास रखो. फेसबुक पर मत बांटो. पोल खुल जाती है. समझा करो.
 
जिस दड़बे के आदमी हो, उसी में पड़े रहो. परिवर्तन तुम्हें कभी नहीं दिखेगा. तुम लोग उस नवाब से कम नहीं, जो रियासत-सत्ता गंवाने के बाद भी सिंहासन पर बैठा हुआ था. अंग्रेज भी हैरत में थे कि नवाब साहब, सब भाग गए. आप क्यों नहीं भागे??!!
 
नवाब साहब ने कहा- अरे, कमबख्त, जूता पहनाने वाली कनीज भाग गई, पैर में जूते नहीं हैं. क्या खाक भागते नंगे पांव!!!
 
नवाब साहब की बात सुनकर अंग्रेज अफसर भी एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे और मन ही मन बोले. वाकई में ये आदमी असली नवाब है. नवाब हो तो ऐसा. ये हिंदुस्तान में ही हो सकता है.
 
तो इस देश की सत्ता के असली नवाबों, तुम यूं ही कुर्सी-संस्थान-फेसबुक पर बैठकर ज्ञान बघारते रहो. अपनी कनीजों को पुकारते रहो. जनता तुम्हें तुम्हारी असली जगह जल्द पहुंचाएगी. जय हो.
 
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से

चीन सरकार की विदेशी पत्रकारों को बाहर निकालने की तैयारी

चीन के सरकारी अधिकारियों ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए चीन में व्यापार संबंधी खबरों को कवर करने वाली एजेंसी ब्लूमबर्ग और अखबार न्यूयार्क टाइम्स के लगभग दो दर्जन पत्रकारों का वीजा रोक रखा है. ये पत्रकार अभी चीन में ही रह रहे हैं. चीन के इस कदम से ये चर्चा तेज हो गई है कि चीन विदेशी पत्रकारों को देश से बाहर करने की योजना बना रहा है.
 
चीन के मौजूदा नियमों के अनुसार हर साल देश में रह रहे विदेशी पत्रकारों को इस वक्त अपने प्रेस कार्ड को विदेश मंत्रालय से और वीजा को पुलिस से अलग-2 नवीनीकरण कराना होता है. 
 
माना जा रहा है कि चीन के शीर्ष नेताओं और अधिकारियों की सम्पत्तियों और उनके कारोबारी रिश्तों से जुड़ी खबरें भेजने के लिए सरकार इन पत्रकारों से नाराज है. इन समाचार संगठनों ने चीन के बड़े नेताओं से जुड़ी खबरें काफी खोजबीन करके प्रकाशित की थीं. इनमें पूर्व प्रधानमंत्री वेन जियोबाओ और मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसी कद्दावर राजनैतिक हस्तियां भी शामिल थीं.
 
न्यूयार्क टाइम्स में पिछले महीने छपी वेन जियाबाओ और अमेरिकी बैंक जेपी मार्गन चेज के रिश्ते पर खबर आने के बाद विदेश मंत्रालय ने अपने यहां न्यूयार्क टाइम्स के सभी पत्रकारों के प्रेस कार्ड के नवीनीकरण पर रोक लगा दी थी, साथ ही जिन पत्रकारों के प्रेस कार्ड मंत्रालय जारी कर चुका था उनके पासपोर्ट बिना वीजा की अवधि बढ़ाये वापस कर दिए. इन पत्रकारों की वीजा अवधि दिसम्बर में समाप्त हो रही है और अगर इन्हें वीजा नहीं मिलता है तो इन्हें चीन छोड़ना पड़ेगा.
 
मीडिया जगत में इस समय बड़ी हैरानी है कि ऐसे समय में जब चीन के रिश्ते पूरी दुनिया के साथ सुधर रहे हैं और चीन की छवि दुनिया के सामने एक उदारवादी देश की बन रही है क्या चीन इस दो बड़े अमेरिकी समाचार संगठनों को अपनी गतिविधियां बंद करने के लिए कहेगा?
 

अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी फर्जीवाड़े में गिरफ्तार

अमेरिका में भारतीय वाणिज्य दूतावास में तैनात भारत की उप महावाणिज्य दूत देवयानी खोबराडगे को फर्जी दस्तवेज पर एक भारतीय नागरिक को काम पर रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. देवयानी पर अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि देवयानी ने अपने घर में एक घरेलू नौकर के वीजा आवेदन के लिए अमेरिकी विदेश विभाग के सम्मुख नकली दस्तावेज तैयार कर प्रस्तुत किए थे.
 
अमेरिका में इस तरह की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ीं हैं. बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों को नकली वीजा पर रखा जाता है. इन तरह काम करने वाले लोगों को बहुत कम वेतन दिया जाता है तथा इनका शोषण किया जाता है. अवैध रूप से रहने के कारण ये लोग डरे होते हैं और मालिकों के शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते हैं.
 
मैनहट्टन के संघीय वकील प्रीत बरार ने बताया कि अमेरिका में घरेलू नौकर के रूप में काम कर रहे विदेशी नागरिकों को भी शोषण के विरुद्ध वही अधिकार प्राप्त हैं जो अमेरिकी नागरिकों को प्राप्त हैं. उन्होंने बताया कि वीजा पाने के लिए झूठ बोला गया, गलत दस्तावेज प्रस्तुत करके सुरक्षा को धता बताया गया ताकि घरेलू नौकर को वीजा मिल सके और उसका मनमाना शोषण किया जा सके. अमेरिका सरकार इस तरह के फर्जीवाड़े और व्यक्तियों के शोषण को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है.

आज राज्यसभा में पेश होगा लोकपाल बिल, कांग्रेस और भाजपा दोनो सहमत

आखिर अब लगने लगा है कि शायद अब लोकपाल बिल पास हो जाये. आम आदमी पार्टी की सफलता से डरी सहमी भाजपा और कांग्रेस पहली बार लोकपाल पर सहमत नजर आ रही हैं. आज राज्यसभा में सरकार लोकपाल बिल पेश करेगी. अगर सब ठीक रहा तो इस बार लोकसभा बिल पास कर दिया जायेगा.
 
प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायणस्वामी आज उच्च सदन में चर्चा के लिए लोकपाल बिल पेश करेंगे. इस पर सदन में चर्चा के लिए छह घंटे का समय रखा गया है. चर्चा के बाद बिल पर मतदान होगा. पूर्व आईपीएस अधिकारी और अन्ना आंदोलन की सक्रिय सदस्य किरण बेदी ने भी ट्वीट कर सभी दलों से इसका समर्थन करने को कहा है. राज्य सभा की सेलेक्ट कमेटी की सिफारिशों को करीब-2 मांग लिए जाने के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनो ने इस पर सहमति जता दी थी. किरण बेदी ने कहा कि अन्ना ने भी इस बिल को अपनी स्वीकृति दे दी है.
 
वहीं समाजवादी पार्टी का कहना है कि वह सदन में इस बिल का विरोध करेगी. पार्टी नेता रामगोपाल यादव ने कहा है कि पार्टी किसी भी सूरत में इस बिल का समर्थन नहीं करेगी. सपा के इस रूख से सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं लेकिन अगर अन्य दलों का समर्थन मिला तो बिल के पास होने में कोई मुश्किल आने की आशंका नहीं है.
 
उधर अन्ना हजारे पिछले चार दिनों से जनलोकपाल को लेकर रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठे हुए हैं. अन्ना ने कहा है कि जब तक जनलोकपाल बिल पारित नहीं कर दिया जाता उनका अनशन जारी रहेगा. अन्ना ने बिल पास नहीं करने पर अपनी नाराजगी जताते हुए प्रधानमंत्री, यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी और मु्ख्य विपक्षी दल बीजेपी के नेता अरुण जेटली को चिठ्ठी लिखी है.
 
अन्ना ने अपनी चिठ्ठी में कहा है कि बिल पास करने का बार-बार झूठा आश्वासन देकर मुझे और देश के साथ धोखा किया गया है. अन्ना ने कहा कि कांग्रेस के इसी व्यवहार के कारण चारों राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस की हार हुई है और पार्टी ने यही रुख अपनाया तो आने वाले लोकसभा चुनावों में भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ेगा.

कशिश न्यूज के चैनल हेड रविन्द्र भारती को लीगल नोटिस

यशवंत जी, मेरा नाम राज वर्मा है और मैं कशिश न्यूज रांची में वर्ष 2011 से में शेखपुरा जिले में स्ट्रिंगर के रूप में कार्यरत हूं. 2013 के सितम्बर माह में कशिश न्यूज़ में कार्यरत इनपुट इंचार्ज राकेश सिन्हा ने मुझे फोन किया और कहा कि आप कशिश न्यूज छोड़ दें अब वहां से दूसरा लड़का काम करेगा. मेरा खुद भी कशिश न्यूज में काम करने का मन नहीं था क्यूंकि वहां पैसे के नाम पर कुछ दिया नहीं जाता था. चैनल की तरफ से महीने में बमुश्किल हजार या दो हजार रूपये मिलते थे.
 
मैने राकेश सिन्हा से चैनल छोड़ने के लिए हामी भर दी और उनसे बकाया राशि की मांग की. राकेश ने मुझे बताया था कि मेरा सारा हिसाब जोड़कर पेमेंट कर दिया जायेगा लेकिन आज तक एक पैसा पेमेंट नहीं दिया गया. जब मैंने राकेश से पेमेंट के लिए बात की और उन्हें याद दिलाया तो राकेश ने पेमेंट देने से इंकार कर दिया.
 
इसके बाद मैने चैनल में कई दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों से इस बारे में बात करने की कोशिश की पर कोई मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हुआ. अंततः बाध्य होकर मैने चैनल हेड रविन्द्र भारती और राकेश सिन्हा को लीगल नोटिस भेजा है और 15 दिनों के भीतर पेमेंट की मांग की है. यदि नियत समय पर मुझे पेमेंट नहीं दिया गया तो मैं कशिश न्यूज के खिलाफ कोर्ट में परिवाद भी दायर करूंगा. 
 
एक तरफ ये चैनल दूसरों के हक की लड़ाई और न्याय की मुहिम चलाने के बड़े-2 दावे करते हैं वहीं दूसरी तरफ अपने ही यहां काम कर रहे कर्मचारियों का हक भी नहीं दिया करते. ये चैनल अपने यहां काम कर रहे स्ट्रिंगरों का सिर्फ शोषण करना जानते हैं. सारे चैनलों का यही हाल है.
 
राज वर्मा
 
शेखपुरा, बिहार
 
संपर्क-09204034189
 
चैनल हेड को भेजे गए लीगल नोटिस की स्कैन कॉपी नीचे दी जा रही है-

न्यूज एक्सप्रेस के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ बने विनोद कापड़ी

अंततः विनोद कापड़ी ने सांई प्रसाद ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. उन्हें सांई प्रसाद मीडिया ग्रुप का सीईओ और एडिटर-इन-चीफ बनाया गया है. इस संबंध में सांई प्रसाद ग्रुप द्वारा इंटर्नल मेल जारी कर दिया गया है.
 
भड़ास ने बहुत पहले ही बता दिया था कि इंडिया टीवी से निकाले जाने के बाद विनोद कापड़ी की सांई प्रसाद ग्रुप के मालिकों से बात चल रही है. आज मेल जारी होने के बाद सब कुछ स्पष्ट हो गया.  बताया जाता है कि निशांत चतुर्वेदी चैनल हेड बने रहेंगे. एसएन विनोद जैसे वरिष्ठ संपादक विनोद कापड़ी के अधीन काम करने के लिए तैयार हो गए हैं.
 
उधर विनोद कापड़ी के साई प्रसाद ग्रुप ज्वाइन करने पर भड़ास4मीडिया के सीईओ यशवंत सिंह ने साई प्रसाद ग्रुप को मेल जारी कर सूचित कर दिया है कि साई प्रसाद ग्रुप के साथ भड़ास का कंटेंट और ब्रांड सपोर्ट का जो एग्रीमेंट चल रहा है उसे 31 दिसम्बर को खत्म कर दिया जाएगा क्यूंकि विनोद कापड़ी जैसे शख्स को इस ग्रुप का हिस्सा बनाये जाने के बाद इस कंटेंट और ब्रांड सपोर्ट एग्रीमेंट को आगे बढ़ा पाना मुश्किल है.

 

अमर उजाला वाराणसी से एक साथ पांच इस्तीफे, गोरखपुर से भी एक

अमर उजाला वाराणसी में हाहाकार मचा हुआ है. संस्थान से एक साथ पांच लोगों ने इस्तीफा दे दिया है. कुछ और लोग भी जाने की तैयारी में हैं. खबर है कि छोड़कर जाने वाले सभी लोग हिन्दुस्तान पटना में गये हैं. अमर उजाला को बड़ा झटका सीनियर कर्मी और काम्पैक्ट के इंचार्ज हेमन्त श्रीवास्तव के जाने से लगा है.
 
इस्तीफा देने वाले अन्य लोगों में सीनियर सब एडिटर और जौनपुर ब्यूरो चीफ विनोद पाण्डेय, उजाला वाराणसी में जनरल डेस्क संभाल रहे अजीत सिंह भी हैं. इसके अतिरिक्त दो जूनियर सब एडिटर शैलेश सिंह और आलोक त्रिपाठी ने भी अमर उजाला को अलविदा कह दिया है. कुछ और लोग भी जल्द ही छोड़कर जाने वाले हैं. अपुष्ट सूत्रों से खबर है कि रवीन्द्र वर्मा ने भी इस्तीफा दे दिया है.
 
वहीं अमर उजाला गोरखपुर से भी एक इस्तीफे की खबर है. वहां से विनयमणि त्रिपाठी ने इस्तीफा देकर हिन्दुस्तान पटना में ही ज्वाइन कर लिया है.
 

उज्जवल कुमार का दैनिक भास्कर से इस्तीफा, हिन्दुस्तान पहुंचे

दैनिक भास्कर जमशेदपुर में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे उज्जवल कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने हिन्दुस्तान पटना के साथ अपनी नई पारी की शुरूआत की है. उन्हें यहां सीनियर सब एडिटर की जिम्मेवारी मिली है. उज्जवल कुमार पिछले पांच महीने पहले ही भास्कर में आए थे. 
 
उज्जवल कुमार भास्कर के पूर्व आई नेक्स्ट में डिप्टी चीफ रिपोर्टर और प्रभात खबर पटना में कॉपी एडिटर तथा रिपोर्टर का भी काम कर चुके हैं. एम. फिल. की पढ़ाई करने के लिए पिछले साल आई नेक्स्ट से नौकरी छोड़ कर वर्धा चले गए थे. 
 
भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं

दैनिक हिन्दुस्तान के कारनामे के कारण शर्मिंदा हुई बिहार सरकार

पटना से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान के एक कारनामे के कारण बिहार सरकार को बिहार विधान परिषद में शर्मिंदगी उठानी पड़ी। हालत यह हो गयी कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सदन में खेद व्यक्त करना पड़ा और यहां तक कहना पड़ा कि आजकल आउटसोर्सिंग का जमाना है। लेकिन फ़िर भी जो भूल हुई है वह बहुत गंभीर है और सरकार इस पूरे मामले की जांच करवायेगी। दरअसल यह पूरा मामला बिहार सरकार के सूचना एवं प्रकाशन विभाग और दैनिक हिन्दुस्तान के संयुक्त प्रयास से बिहार के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रकाशित एक विशेष पत्रिका से जुड़ा है। इस मामले को मंगलवार को परिषद में भाजपा के विधान पार्षद हरेन्द्र प्रताप पांडेय ने उठाया।
 
गैरसरकारी संकल्प के रुप में श्री पांडेय ने संविधान सभा के सदस्य रहे स्व सच्चिदानंद सिन्हा के बक्सर स्थित पैतृक गांव में आदमकद प्रतिमा लगवाने की मांग की। लेकिन इससे पहले उन्होंने शर्त रखी कि इसका जवाब केवल मुख्यमंत्री ही दें तो वे अपना प्रस्ताव सदन में रखेंगे। श्री पांडेय के इस कथन पर हालांकि सत्ता पक्ष के सदस्यों द्वारा टोका टाकी हुई लेकिन जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सहमति दे दी तब श्री पांडेय सदन को यह कहकर सकते में डाल दिया कि सूचना एवं प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका में स्व सच्चिदानंद सिन्हा का नाम है और उनके नाम पर जो तस्वीर प्रकाशित की गयी है वह लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सचिव रहे सच्चिदानंद सिन्हा की है।
 
श्री पांडेय के इस खुलासे के बाद सदन में कुछ देर के लिये शांति छा गयी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यकीन दिलाने के लिए पत्रिका की प्रति श्री पांडेय ने खुद जाकर दी। बाद में पत्रिका पलटने के बाद श्री कुमार ने स्वीकार किया कि यह एक बड़ी चूक हुई है और इस मामले की सरकार जांच करवायेगी। वैसे इस पूरे मामले में दिलचस्प यह रहा कि दैनिक हिन्दुस्तान के जिस पत्रकार ने उक्त पत्रिका के लिए मसाले जुटाये थे, वे भी प्रेस दीर्घा में मौजूद थे। जब यह सब हो रहा था तब उनके चेहरे का भाव सारी कहानी बिना कहे ही बता रही थी। 
 
पटना से नवल कुमार की रिपोर्ट

श्री न्यूज छोड़ इंडिया न्यूज पहुंचे अजीत त्रिपाठी

श्री न्यूज में प्रोड्यूसर के पद पर काम कर रहे अजीत त्रिपाठी ने इंडिया न्यूज के साथ जुड़कर अपनी नई पारी शरू की है. यहां भी उन्हें प्रोड्यूसर बनाया गया है. अजीत त्रिपाठी ने सात महीने पहले ही श्री न्यूज से जुड़े थे. अजीत इसके पहले समाचार प्लस और न्यूज 24 में प्रोड्यूसर के पद पर काम कर चुके हैं. वे यूएनआई से भी जुड़े रहे हैं.
 
भड़ास तक सूचनाएं भेजने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं

महेश भट्ट जैसे लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर धब्बे की तरह हैं

महेश भट्ट जैसे लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर ऐसे धब्बे की तरह हैं जिनको अगर कोई और देश होता तो ज़रा बर्दाश्त नहीं करता। ताजा मामला संजय दत्त का है जिनकी हिमायत में महेश उतरे है. पहली बात तो जघन्य अपराध करने के बाद भी नेता-अभिनेता अपनी पहुंच के बल पर जल्द ही आजाद हो जाते हैं या भारतीय कानून की कमजोरियों का फायदा उठाते हैं. ऐसा नहीं होता तो देशद्रोह जैसे आरोप के बाद भी संजय दत्त सजायाफ्ता होने के बाद समय-समय पर तफरीह के लिए जेल से बाहर नहीं आ पाते। सलमान पर चिंकारा हिरन के शिकार मामले की सुनवाई कब से चल रही है लेकिन फैसला नहीं आ पा रहा है अब तो उन्होंने मामले की पुनः सुनवाई की अर्जी भी लगा दी है.
 
महेश भट्ट का खुद का बेटा हेडली से सम्बन्धों को लेकर पहले ही आरोपित है फिर वे संजय की वकालत कैसे कर सकते हैं. खुलेपन के नाम पर आजादी के नाम पर जैसी फ़िल्में महेश भट्ट आज बना रहे है वैसी फ़िल्में सिर्फ एक विकृत दिमाग का आदमी ही बना सकता है. एक विलायती पोर्न एक्टर को हीरोइन बना कर बॉलीवुड में नंगेपन का नाच और भारतीय युवा पीढ़ी को गर्त में धकेलना महेश भट्ट का ही कारनामा है.
 
अपनी ही बेटियों के किस लेते हुए भद्दे फोटो प्रकाशित कराना सिर्फ महेश भट्ट ही कर सकते हैं. पिछले ५-७ साल में महेश और भट्ट परिवार ने जैसी फ़िल्में बनाई है उनसे युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति भूल कर भटकाव के रास्ते पर ही बढ़ रही है जिसका पूरा श्रेय भट्ट और ऐसे ही दूसरे पैसे के लालची फिल्मकारों को है.
 
लेखक हरिमोहन विश्वकर्मा से vishwakarmaharimohan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.

ये अन्ना हजारे को क्या हो गया है? कुछ करते क्यों नहीं, उन्हें समझाओ भाई

Nadim S. Akhter : जरा पता लगाइए कि अन्ना हजारे कब अनशन तोड़ रहे हैं. उनके आसपास की मंडली उन्हें क्या सलाह दे रही है. अन्ना भी बुरी तरह एक्सपोज हुए हैं. आम आदमी पार्टी की जीत के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कह रहे थे कि यहां लोकतंत्र कहां है??
 
अरे भाई, लोकतंत्र नहीं है तो क्या मदारी का ठीया है??? अजब-गजब बात करने लगे हैं अन्ना. कह रहे थे कि मैं किसी पक्ष या पार्टी के साथ नहीं जाऊंगा. अच्छी बात है. ये आपकी लाइन रही है, आप इस पर कायम रहिए.
 
लेकिन ये तो अन्ना को सोचना ही होगा कि यदा-कदा-सर्वदा टाइप के अनशन से क्या जनलोकपाल बिल वो पास करवा लेंगे?? तब तो हुआ नहीं, जब सड़क पर जनता उतर गई थी और अन्ना अंतरराष्ट्रीय फलक पर छा गए थे. अब जब रालेगण की जनता भी उनके अनशन से नदारद है, तब सरकार उनकी बात पर क्यों झुकने लगी भला?? अन्ना की जो थोड़ी बहुत खबर मीडिया में दिख रही है, वह इसलिए कि उनके चेले अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव में धमाका कर डाला है. तभी महाराष्ट्र में बुरे नतीजों से डरे सीएम ने अपने एक मंत्री को अन्ना के गांव भेजकर उन्हें अनशन तोड़ने के लिए कहा, खानापूर्ति के लिए. यह दिखाने के लिए कि हम अन्ना का ख्याल करते हैं और कहीं गुस्साई जनता लोकसभा चुनाव में वहां भी कांग्रेस-एनसीपी का बैंड ना बजा दे.
अन्ना की दिक्कत ये है कि अब वे अव्याहारिक बात करने लगे हैं. लोगों और सरकार को झकझोरने के लिए एक समय अनशन ठीक था. वह हो भी गया सफलतापूर्वक. लेकिन आगे अब और क्या?? उसी ढपली को लेकर कितना पीटा जाए, वह फट गया है अब. सो नई रणनीति बनानी होगी. और जब आप लोकतंत्र में जीते हैं, इस पर विश्वास करते हैं तो लोकतंत्र को गंदा क्यों कहते हैं?
 
लोकतंत्र गंदा नहीं है, राजनीति गंदी है. और इसे मैला हम-सब ने मिलकर किया है. तो आइए ना अन्ना, आप लोकतंत्र को सुधारने के लिए राजनीति की दशा-दिशा बदलने का साहस क्यों नहीं दिखाते?? और जब अरविंद केजरीवाल ने यह साहस दिखाया तो आप ने उसे सपोर्ट करने की बजाय पाजामे का नाड़ा ढीला करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. आखिर क्यों??? कौन हैं वे लोग, जो आपके आसपास अचानक से मंडराने लगे हैं, आंदोलन के बाद. मधुमक्खी बनकर चिपक गए हैं, पहले कहां थे ये लोग??
 
सो अन्ना, दूसरों की सलाह पर मत जाइए, अपनी अक्ल लगाइए. अभी आमरण अनशन एक बार फिर शुरु किया है, कुछ दिन बाद तोड़ भी देंगे. उनकी सलाह जब मिलेगी तो?? आपका अनशन का ये बंदूक अब मिसफायर हो रहा है. कोई संज्ञान नहीं ले रहा. क्यों अपनी भद्द पिटवा रहे हैं अन्ना जी???!! मैं आज भी मानता हूं कि देश की जनता आपसे प्यार करती है और आपमें अपना नैतिक बल देखती है. वो इसलिए कि आपने अपने विचार को आचार व व्यवहार में भी ढाला.
 
सो अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल कीजिए. आप ये कह रहे हैं कि अनशन करेंगे, लोगों को जगाएंगे…किसे जगाएंगे आप. उन लोगों को जो एक बार जगे थे, फिर सो गए. दिल्ली के बाद मुंबई में आए ही नहीं, जुटे ही नहीं. अपनी रणनीति बदलिए अन्ना. आजादी मिलने से पहले भी भारतीयों ने चुनाव लड़ा था और सरकार बनाई थी. गांधी जी ने ये नहीं कहा था कि हम तो सत्य और अहिंसा पर चलने वाले लोग, आजादी मिलने के बाद ही चुनाव लड़ेंगे और सरकार बनाएंगे. जितना स्कोप मिला था गांधीजी को, उन्होंने उसका भरपूर इस्तेमाल किया और करवाया. प्रत्यक्ष और अपरोक्ष रूप से. अपने गुरु महात्मा गांधी से ही कुछ सीख लीजिए अन्ना. वरना दुनिया तो बड़े-बड़ों को बिसरा चुकी है. गांधी यानी बापू को भी. जय हो.
 
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से

पीके तिवारी समेत महुआ के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज

मुंबई : भोजपुरी टीवी चैनल महुआ के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा की शिकायत पर मुंबई पुलिस ने धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया है. शत्रुघ्न सिन्हा ने महुआ चैनल के अधिकारियों पर गेम शो के बनी करोड़पति की मेजबानी के दौरान उन्हें और चैनल पर आए दूसरे फिल्मी और राजनीतिक हस्तियों के साथ 1.75 करोड़ रूपये की धोखाधड़ी का आरोप लगाया है.
 
इस शो को शत्रुघ्न सिन्हा ने होस्ट किया था जिसमें अतिथियों के रूप में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा, धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी, गोविंदा और सोनाक्षी सिन्हा जैसी हस्तियां पहुंची थी. सिन्हा की शिकायत के अनुसार चैनल ने इन मेहमानों के द्वारा जीती गई पुरस्कार की राशि का भुगतान आज तक नहीं किया गया. इनमें से कई मेहमान इस शो में चैरिटी के लिए राशि इकठ्ठा करने आए थे.
 
सिन्हा की शिकायत पर मुम्बई पुलिस की अपराध शाखा ने महुआ मीडिया प्राइवेट लिमिटेड, इसके सीएमडी पीके तिवारी, सीईओ युवराज भट्टाचार्य, वाइस प्रेसीडेंट त्रिनंजन मैती और जनरल मैनेजर पंकज तिवारी के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (विश्वास में लेकर धोखा देना) और 120 बी (षणयंत्र) का मामला दर्ज किया है.
 
एडवोकेट मोनेश प्रेम के अनुसार ये प्रोग्राम बिग सिनर्जी मीडिया लिमिटेड की द्वारा महुआ चैनल के लिए निर्मित किया गया था जिसके लिए अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा से इसकी मेजबानी करने के लिए चैनल द्वारा 2011 में बात की गई थी. इसमें अभिनेता चैनल के अधिकारियों के कहने पर फिल्मी और राजनीतिक हस्तियों को बुलाया था. इन लोगों ने चैनल में आने के लिए कोई फीस नहीं ली थी और इनसे ये वादा किया गया था कि इन्हें पुरस्कार की राशि ही प्रदान की जाएगी.
 
आने वाले प्रतिभागियों के रूप में धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी, यशवंत सिन्हा, गोविन्दा और सोनाक्षी सिन्हा प्रत्येक ने 25-25 लाख रूपये जीते थे. सिन्हा ने अपनी शिकायत में कहा है कि उनके द्वारा बार-2 याद दिलाये जाने के बावजूद चैनल ने किसी को भी एक पैसा नहीं दिया. अभिनेता ने ये भी कहा कि चैनल ने उनके पारिश्रमिक से 25 लाख रूपये का टीडीएस काटकर उन्हें भुगतान किया था लेकिन वह राशि भी आयकर विभाग को जमा नहीं की गई.

यूपी में सपा लोस चुनाव के बाद ‘इन्नोवा+अल्टो’ पार्टी बन जाएगी

Yashwant Singh : यूपी में समाजवादी पार्टी का वही हाल लोकसभा चुनाव में होना है जो दिल्ली में विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी का हुआ. पूछिए कैसे? मैं समझाता हूं. मुजफ्फरनगर कांड का घाव इतना गहरा है कि मुसलमान किसी हालत में सपा को वोट नहीं देने वाला. बसपा को मुस्लिम वोट. मोदी का पिछड़ी जाति का होना यूपी के पिछड़ों में एक अघोषित अंडरकरंट है. सो, सपा का ट्रेडीशनल वोट बैंक लोकसभा चुनाव में टूट रहा है. मोदी के नाम पर भाजपा को पोलराइजेशन मिल रहा है. ऐसे में अगर बसपा और भाजपा ने कसकर वोट खींच लिए तो सपा के पास क्या बचेगा, बाबाजी का ठुल्लू 🙂

अपने 75वें जन्मदिन पर लोकसभा की 75 सीट यूपी वालों से मांगने वाले नेताजी अगर सांसदों की संख्या में दहाई में पहुंचा गए तो तय मानिए ये एक करिश्मा होगा. पिछड़ों और मुस्लिमों के बगैर उत्तर प्रदेश में सपा है क्या… कुछ भी नहीं… दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के विधायकों की संख्या अगर एक इन्नोवा में बैठने वालों के बराबर है तो यूपी में सपा के सांसदों की संख्या एक इन्नोवा और एक अल्टो से ज्यादा की नहीं होगी…

आप अगर पूछेंगे कि आम आदमी पार्टी का क्या रोल होने वाला है यूपी में, तो बताऊंगा कि ये पार्टी सीटें ज्यादा नहीं ला पाएगी, हां, वोटरों को अचंभित जरूर करेगी. दिल्ली जैसे ज्यादा पढ़े लिखे और रेशनल-डेमोक्रिटेक नागरिकों के इलाके में आम आदमी पार्टी का जोर चला क्योंकि उसने इसी दिल्ली की धरती पर न सिर्फ संघर्ष किया बल्कि दिल्ली के एक एक मुद्दे, एक एक गली कूचे को छाना. दिल्ली से बाहर आम आदमी पार्टी के लिए इस बार का लोकसभा चुनाव राष्ट्रव्यापी संगठन खड़ा करने का रिहर्सल भर होगा. यूपी और बिहार की जनता अभी जातिवाद, सवर्णवाद, धर्मवाद आदि वादों के खोल से बाहर नहीं निकली है और न निकलने के मूड में है क्योंकि गांवों में आमतौर पर जीवन अब भी सबका ठीकठाक ही चल रहा है… जय हो…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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मुश्किलों से घिरी सपा सरकार अब मीडिया से पंगा ले रही!

महिला एंकर ने की फांसी लगाकर जान देने की कोशिश

झारखंड के एक लोकल न्यूज चैनल 'न्यूज लाइन' की एक महिला एंकर ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. घटना कल शाम की है. संयोगवश घर वालों ने देख लिया और तुरंत उसे फंदे से उतारकर बेहोशी की हालत में धनबाद के केन्द्रीय अस्पताल में भर्ती कराया. जहां चिकित्सकों ने तत्काल इलाज कर उसे मौत के मुंह से बचा लिया. युवती फिलहाल आईसीयू में भर्ती है.
 
अस्पताल प्रशासन द्वारा सूचना मिलते ही सराय ढेला पुलिस तुरन्त अस्पताल पहुंच गई. लड़की के आईसीयू में भर्ती होने के कारण पुलिस उसका बयान नहीं दर्ज कर सकी. इस संबंध में युवती के रिश्तेदार ने कहा कि उसने एसएससी की परीक्षा दी थी जिसमें वह असफल हो गई थी. इस कारण वह तनाव में थी. वहीं लड़की की मां ने इस बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया. युवती के परिजनों की खामोशी के कारण गिरिडीह में तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं.
 
बताया जा रहा है कि चैनल 'न्यूज लाइन' गिरिडीह के एक उद्योगपति का है. उनकी झारखंड तथा दूसरे राज्यों में कई फैक्ट्रियां हैं. चैनल की एक बड़े नेता के साथ काफी नजदीकी भी बताई जा रही है. युवती कई सालों से चैनल में एंकर के तौर पर काम कर रही थी.
 
इस संबंध में जब भड़ास4मीडिया ने चैनल से जुड़े पुनुकांत से बात की तो उन्होंने कहा कि चैनल से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है और इस सम्बन्ध में चैनल के मालिक बाबूलाल से बात की जा सकती है. बाबूलाल से अभी तक कोई सम्पर्क नहीं हो पाया है.
 
इस सम्बन्ध में अगर आप के पास कोई जानकारी हो तो bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज कर भड़ास को सूचित कर सकते हैं.

मुश्किलों से घिरी सपा सरकार अब मीडिया से पंगा ले रही!

Yashwant Singh : मुजफ्फरनगर दंगे की हकीकत अफसरों की जुबानी सुनाकर आजतक वालों ने जो नेक काम किया, उससे चिढ़ी यूपी सरकार (असल में चिढ़ते मियां आजम खान हैं लेकिन लगता है कि पूरी सरकार चिढ़ गई है क्योंकि सपा सरकार को मुस्लिम वोट बैंक की खास चिंता रहती है और इसी चक्कर में इस बार मुजफ्फरनगर में घनचक्कर हो गया है, जो संभाले नहीं संभल रहा और एक एक कर नए नए रायते फैलते जा रहे हैं ऊप्पी में) ने अब आजतक वालों को सबक सिखाने की कसम खा ली है… यानि अब मीडिया से पंगा…

मीडिया को भर भर पेट ठोस माल (प्लाट, धन, टैबलेट, लैपटाप, मकान, दुकान, अनुदान आदि इत्यादि) खिलाने वाले नेता जी कितनी देर तक पंगा लिए रह पाएंगे, ये भी देखने लायक बात होगी.. आखिर मन से वो मुलायम जो ठहरे… मीडिया का मालिक हो या मीडिया का पत्रकार… नेताजी को इन पर कभी गुस्सा नहीं आता क्योंकि वो जानते हैं मीडिया का रोल… सो, नहीं खोदेंगे अपनी खोल… बस, देखते जाइए… हांय हूंय फूंय करने के बाद ये आजतक को दंड देने का सपाई पटाखा फुस्स हो जाएगा… सो, डोंट वरी… बी हैप्पी…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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तेजपाल से आगे : कार्पोरेट न्यूज मीडिया के अंदर का मवाद बाहर आने दीजिए

इस बार यह स्तंभ बहुत तकलीफ और मुश्किल से लिख रहा हूँ. कारण, ‘तहलका’ के प्रधान संपादक तरुण तेजपाल खुद अपनी ही एक महिला सहकर्मी पत्रकार के साथ यौन हिंसा और बलात्कार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं और न्यूज मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं. खुद ‘तहलका’ के सम्पादकीय नेतृत्व और प्रबंधन पर इस मामले को दबाने, रफा-दफा करने और तथ्यों के साथ तोड-मरोड करने के अलावा अपनी पीड़ित पत्रकार के साथ खड़े होने के बजाय तरुण तेजपाल का बचाव करने के आरोप लग रहे हैं.

यही नहीं, तेजपाल अपने बयान बदल रहे हैं, पीड़ित पत्रकार को झूठा ठहराने और उसके चरित्र पर ऊँगली उठाने में लग गए हैं. वे ‘तहलका’ की तेजतर्रार पत्रकारिता की आड़ लेकर खुद को षड्यंत्र का शिकार साबित करने की भी कोशिश कर रहे हैं. इस बीच, ‘तहलका’ के कुछ पत्रकारों ने भी इस्तीफा दे दिया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि पीड़ित पत्रकार की शिकायत न सिर्फ बहुत गंभीर है बल्कि गोवा पुलिस के मामला दर्ज कर लेने के बाद तेजपाल को कानून का सामना करना ही पड़ेगा. वे इससे बच नहीं सकते हैं और न ही ‘तहलका’ सहित किसी को भी उन्हें बचाने की कोशिश करनी चाहिए. कानून को बिना किसी दबाव के काम करने देना चाहिए.

इसके लिए जरूरी है कि न्यूज मीडिया इस मामले की नियमित, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील रिपोर्टिंग करे. यही नहीं, यह मामला समूचे न्यूज मीडिया के लिए भी एक टेस्ट केस है क्योंकि जो न्यूज मीडिया (‘तहलका’ समेत) यौन हिंसा खासकर ताकतवर और रसूखदार लोगों की ओर से किये गए यौन हिंसा के मामलों को जोरशोर से उठाता रहा है, उसे तेजपाल के मामले में भी उसी सक्रियता और साफगोई से रिपोर्टिंग करनी चाहिए.

निश्चय ही, इस रिपोर्टिंग का उद्देश्य यह होना चाहिए कि सच सामने आए, यौन हिंसा की पीड़िता को न्याय मिले और अपराधी चाहे जितना बड़ा और रसूखदार हो, वह बच न पाए. लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि यौन हिंसा के मामलों की रिपोर्टिंग में पूरी संवेदनशीलता बरती जाए. जैसे पीड़िता की पहचान गोपनीय रखी जाए और बलात्कार के चटखारे भरे विवरण और चित्रीकरण से हर हाल में बचा जाए. उसे सनसनीखेज बनाने के लोभ से बचा जाए.

लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि न्यूज मीडिया में ठीक इसका उल्टा हो रहा है. इस मामले को जिस तरह से सनसनीखेज तरीके से पेश किया जा रहा है और ‘भीड़ का न्याय’ (लिंच मॉब) मानसिकता को हवा दी जा रही है, उससे सबसे ज्यादा नुकसान न्याय का ही हो रहा है. यही नहीं, न्यूज मीडिया की रिपोर्टिंग और चैनलों की प्राइम टाइम बहसों से ऐसा लग रहा है कि यौन उत्पीडन और हिंसा के मामले में खुद न्यूज मीडिया के अन्तःपुर में सब कुछ ठीक-ठाक है और एकमात्र ‘सड़ी मछली’ तेजपाल हैं. हालाँकि सच यह नहीं है और न्यूज मीडिया के अन्तःपुर में ऐसे कई तेजपाल हैं.

सच पूछिए तो तेजपाल प्रकरण इस मामले भी एक टेस्ट केस है कि कितने अखबारों और चैनलों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन और हिंसा के मामलों से तुरंत और सक्षम तरीके से निपटने और पीडितों को संरक्षण और न्याय दिलाने की सांस्थानिक व्यवस्था है? क्या न्यूज मीडिया ने इसकी कभी आडिट की? सच यह है कि इस मामले में पहले सुप्रीम कोर्ट के विशाखा निर्देशों और बाद में कानून बनने के बावजूद ज्यादातर अखबारों और चैनलों में कोई स्वतंत्र, सक्रिय और प्रभावी यौन उत्पीडन जांच और कार्रवाई समिति नहीं है या सिर्फ कागजों पर है.

क्या तेजपाल प्रकरण से सबक लेते हुए न्यूज मीडिया अपने यहाँ यौन उत्पीडन के मामलों से ज्यादा तत्परता, संवेदनशीलता और सख्ती से निपटना शुरू करेगा और अपने संस्थानों में प्रभावी और विश्वसनीय व्यवस्था बनाएगा? इसपर सबकी नजर रहनी चाहिए. दूसरे, तेजपाल के बहाने खुद ‘तहलका’ पर भी हमले शुरू हो गए हैं. उसकी फंडिंग से लेकर राजनीतिक संपर्कों पर सवाल उठाये जा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या तेजपाल के अपराध की सजा ‘तहलका’ और उसमें काम करनेवाले कई जुझारू और निर्भीक पत्रकारों को दी जा सकती है?

यह भी कि क्या वे सभी अखबारों और चैनलों की फंडिंग और राजनीतिक संपर्कों की ऐसी ही छानबीन करेंगे? निश्चय ही, ऐसी छानबीन का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन यह चुनिंदा नहीं होनी चाहिए. एक मायने में यह मौका भी है जब कारपोरेट न्यूज मीडिया के अंदर बढ़ती हुई सडन सामने आ रही है. उसका घाव फूट पड़ा है. जरूरत उसे और दबाकर उसके अंदर के मवाद को बाहर निकालने की है. इसके बिना उसके स्वस्थ होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

('तहलका' के 15 दिसंबर के अंक में प्रकाशित आनंद प्रधान की टिप्पणी)

आठ फीसदी मनुष्य आनुवांशिक (जीन) कारणों से समलैंगिक होते हैं

Balendu Swami : ‎समलैंगिकता‬ को गैर कानूनी ठहराने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला अफसोसजनक है! धार्मिक रुढियों से ग्रस्त देश में आप और क्या आशा रख सकते हैं और इन्हीं धार्मिक रुढियों की वजह से हमारे देश में समलैंगिक सम्बन्धों को अक्सर 'अप्राकृतिक' कहा जाता है! जबकि हर संस्कृति और सभ्यता में यह हजारों वर्षों से चला आ रहा है और आधुनिक (मेडिकल रिसर्च) वैज्ञानिक कहते हैं कि 8% मनुष्य आनुवांशिक (जीन) कारणों से समलैंगिक होते हैं, और स्वभावतः प्राकृतिक रूप से उन्हें समलिंगी के प्रति ही आकर्षण होता है!

अब बताइये कि जब यह जन्मजात उनके DNA (जीन) में है तो फिर कैसे अप्राकृतिक हो गया! रामदेव, शंकराचार्य, मुस्लिम इमाम और पोप जैसे बहुत से धार्मिक मूर्ख कहते हैं कि यह एक बीमारी है! सिवाय धार्मिक फर्नाटिकों के कभी किसी डाक्टर ने इसे बीमारी नहीं कहा! परन्तु धर्मान्धों को वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता नहीं होती! उनके लिए तो धरती चपटी है! हालाँकि धार्मिक हमेशा अपने धर्म को और उसकी मूर्खतापूर्ण परम्पराओं को हमेशा वैज्ञानिक बताते जरुर नज़र आयेंगे! असल में समलैंगिकता अप्राकृतिक नहीं बल्कि प्राकृतिक काम इच्छाओं का दमन अप्राकृतिक है.

वात्स्यायन भी 'कामसूत्र' में गुदा मैथुन और मुख मैथुन की बात कहते हैं! दुनिया को 'कामसूत्र' जैसा ग्रन्थ उपहार में देने वाले देश में यह कौन निर्धारित करेगा कि मैथुन का कौन सा प्रकार प्राकृतिक है अथवा अप्राकृतिक? आप अपने बिस्तर पर सेक्स कैसे कर रहे हैं, क्या इसका निर्देश अब कोर्ट से लेंगे!

भाजपा नेता ने समलैंगिकता के विषय में बालिग़ व्यक्ति के अधिकार के हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी! इसी पार्टी के लोग अन्धविश्वास के खिलाफ कानून का भी विरोध करते हैं! इस मानसिकता के लोगों को अगर सत्ता की शक्ति मिली तो पता नहीं ये कहाँ ले जायेंगे देश को! जो मित्र विकास की बात कहकर इनके प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखते हैं उन्हें सोचना चाहिए कि ये विकास नहीं सत्यानाश कर देंगे! इस विषय पर पूर्व अनुभव के आधार पर संघी मानसिकता के लोगों से निवेदन है कि वो यहाँ उल्टी न करें, धार्मिक मूर्खों के प्रति मेरी सहनशीलता अब और भी कम हो गई है, धन्यवाद!

प्रगतिशीलता के पक्षधर बालेंदु स्वामी के फेसबुक वॉल से.

राहुल गांधी के खिलाफ प्रत्याशी का ऐलान, नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवारी पर ‘आप’ चुप क्यों?

Virendra Yadav : अभी राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी घोषित नहीं हुयी है लेकिन 'आप' पार्टी ने राहुल के विरुद्ध कुमार विश्वास की उम्मीदवारी का ऐलान कर दिया है .नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की घोषित उम्मीदवारी के बावजूद अभी तक 'आप' ने उनके विरुद्ध उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है .क्यों ? क्या इसलिए कि जो 'आप' के मतदाता हैं उनमें अधिकांश नरेंद्र मोदी को पी एम के रूप में देखना चाहते हैं ?

    Dhananjay Shukla ये तो है

    Mohan Shrotriya कुछ तो है ! क्या पता अरविंद अपनी उम्मीदवारी का धमाके के साथ ऐलान कर दें !

    Biswajit Chakraborty sachai kab tak chupega, result milega agar 2bara chunao ho to
 
    Sushil Krishnet kuchh to gorakhdhandha hai
 
    Ashok Kumar Pandey Aage aage dekhiye, adhik hoshiyaron ke hashra hamne dekhe hain
   
    Upendra Prasad बिल्कुल सही कहा आपने. दिल्ली विधान सभा चुनाव प्रचार में भी आम आदमी पार्टी के लोगों ने मोदी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला. मोदी और केजरीवाल दोनों- सही या गलत- बदलाव के प्रतीक बन गए हैं. ऐसे बहुत लोग हैं, जो मोदी और केजरीवाल दोनों को एक साथ पसंद करते हैं. दोनों में से किसी एक को चुनना उनके लिए मुश्किल है.
    
    Dhananjay Shukla केजरीवाल गिरेंगे दायें ही।
     
    Shashank Dwivedi आप लोगों ने केजरीवाल से इतनी जल्दी ,इतनी ज्यादा उम्मीदें क्यों लगा रखी है ..उन्हें थोड़ा समय तो दीजिए काम करने के लिए ,हर समय आलोचना ठीक नहीं..  

    Upendra Prasad बिल्कुल सही कहा आपने. दिल्ली विधान सभा चुनाव प्रचार में भी आम आदमी पार्टी के लोगों ने मोदी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला. मोदी और केजरीवाल दोनों- सही या गलत- बदलाव के प्रतीक बन गए हैं. ऐसे बहुत लोग हैं, जो मोदी और केजरीवाल दोनों को एक साथ पसंद करते हैं. दोनों में से किसी एक को चुनना उनके लिए मुश्किल है.

    मोदी कहां से चुनाव लड़ेंगे, अभी यही पता नहीं. मुझे लगता है कि आम आदमी पार्टी हिन्दी राज्यों से ही अपना उम्मीदवार खड़ा करेगी, जहां अन्ना का आन्दोलन तेज था.
 
    Vivek Vk Jain isliye ki modi ka electn me khade hone cnfrm nhi h…
 
    Ranjit Kumar Sinha आप भी सदा आलोचना करते रहते हैँ..  
   
    Amit Chaudhary Ise kahte hai Overconfidance
 
    नूतन यादव शायद यही बात होगी मन में कहीं
 
    Yogendra Yadav विरोध करने का तरीका तो इसी प्रकार का संदेह उत्पन्न कर रहा है
   
    Faisal Anurag Aap bjp me buniyadi fark nai.waqt ese jald saabit kateaga.ek chunaavi jeet kaa yaisa unmmaad to mahanth ne v nahi dikhayya tha jab we hostel se sidhe cm aawaas pahunche the.
    
    Rajeeva Upadhyay अर्थात आपके अनुसार "आप" और भा ज पा में अंदरूनी साथ-गांठ है. धन्य है आपका राजनितिक आंकलन.See Translation
     
    Shamshad Elahee Shams वीरेंद्र सर …नरभक्षी के खिलाफ खुजलीवाल खुद चुनाव लडेगा …See Translation
     
    Asrar Khan यादव जी अभी तो मोदी ने अपनी उम्मीदवारी ही नहीं घोषित की है कि वे कहाँ से लड़ेंगे …इसलिए आप पार्टी वालों पर सवाल उठाना वाजिब नहीं है …./ वैसे वंशवाद और फासिज्म दोनों ही हमारे लिए बहुत घातक हैं इनके खिलाफ यदि कोई लोकप्रिय व्यक्ति लड़ने की बात करता है तो वह स्वागत योग्य है …

आलोचक और साहित्यकार वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

बादशाहत जाते ही फेसबुक पर प्रकट हो जाने वाले ये लोग

Nadim S. Akhter : फेसबुक पर मैंने एक चलन नोटिस किया है. जब तक लोग कामयाब रहते हैं, पद पर रहते हैं, उनकी हुकूमत होती है, तो वे फेसबुक से नदारद होते हैं. पता नहीं, कभी इधर झांकते भी हैं या नहीं लेकिन वे क्या सोच रहे हैं-कर रहे हैं, नहीं बताते. जब तक शहंशाही है, अपने दड़बे में दुबके रहते हैं. लेकिन, लेकिन, जैसे ही बादशाहत जाती है, तो अचानक से बंधु फेसबुक पर प्रकट होने लगते हैं. बताने लगते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं. और भेड़चाल देखिए, फेसबुक पर चेले-चपाटे भी तुरंत जयकार करने लगते हैं. ये नहीं पूछते कि महोदय, अब तक आप कहां थे?? अचानक से दर्शन कैसे, वह भी बिना हमारी किसी तपस्या के!!!?

सार ये है कि अपनी अक्ल लगाओ. जो फेसबुक पर नहीं हैं या नहीं आना चाहते, यह उनकी निजी पसंद-नापसंद है. लेकिन फेसबुक पर चांद की तरह दिखने और गायब हो जाने की अवसरवादिता ठीक नहीं लगती. इस दुनिया का कोई भी कितना ही महान आदमी क्यों ना हो, इतना बिजी नहीं है कि फेसबुक पर कुछ लिखने या शेयर करने का वक्त ना मिलता हो.

टि्वटर को ही देख लीजिए. वहां कोई लोग सक्रिय हैं और लगातार रहते हैं क्योंकि सोशल मीडिया की दुनिया में भी एलीट और सर्वहारा की खाई खोद दी गई है. टि्वटर इलीट टाइप का माध्यम है, आप वहां एक-दूसरे को फॉलो करते हैं, मित्र नहीं बनाते, सो फॉलो करने का ये concept इन स्वनामधन्य टाइप को लोगों को सूट करता है. वो वहां दिख जाएंगे, हमेशा..लेकिन फेसबुक पर तब आएंगे जब शंटिंग में पड़े हों. बाकी सब तो मोहमाया है. जय हो.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

कुमार विश्वास के खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतरेंगे गिन्नीज ऋषि!

22 गिन्नीज वर्ल्ड रिकार्ड बनाकर गिन्नीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाने वाले निरंकारी कालोनी दिल्ली के निवासी 72 वर्षीय गिन्नीज ऋषि ने घोषणा की है कि 2014 में आने वाले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास के खिलाफ वो अपना नामांकन भरेंगे।
 
गिन्नीज ऋषि का कहना है कि वो लोगों से अपील करेंगे कि जनता स्वयं उन्हें अपना वोट ना दे ताकि वो जीरो वोट का वर्ल्ड रिकार्ड बना सके बल्कि सभी लोग ज्यादा से ज्यादा नोटा बटन का इस्तेमाल करे। गिन्नीज ऋषि ने यह भी घोषणा की कि यदि आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास किसी तरह अपनी जमानत भी बचा पाये तो वो उन्हें रूपये 99,999=99 का ईनाम देंगे। 
 
अपनी तरह की पेशकश करने वाले गिन्नीज ऋषि इससे पहले भी जीरो वोट का वर्ल्ड रिकार्ड बनाने के लिए भारत के राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन कर चुके हैं और दिल्ली नगर निगम के लिए धीरपुर इलाके से निगम पार्षद का चुनाव भी लड़ चुके हैं।

मोदी और केजरीवाल : ये आठ समानताएं…

Utkarsh Sinha : मोदी और केजरीवाल में कई तथ्यात्मक समानताएं दिखती हैं….

1. दोनों का ही उभार मीडिया के सहयोग से हुआ…

2. दोनों ही धूमकेतु की तरह उभरे…

3. दोनों ने आगे बढ़ने के किये अपने नेताओं को पटका (मोदी ने केशुभाई पटेल, हिरेन पंड्या से शुरू कर आडवाणी तक को गिराया… और केजरीवाल ने अग्निवेश से शुरू कर अन्ना तक को साइड किया)

4. दोनों के प्रचार में व्यक्तिवाद झलकता है (पोस्टर देखिये एको अहम् द्वितिओ नास्ति!)

5. दोनों की बातें हवाई किस्म की होती हैं…

6. दोनों को ही एक ही किस्म की जनता का समर्थन है…

7. दोनों के समर्थक असहमत होने पर कटखने हो जाते हैं…

8. दोनों के उभार और वृद्धि से देश की कार्पोरेट लॉबी को कोई दिक्कत नहीं… lol

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट उत्कर्ष सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर बनेंगे सिद्धार्थ वरदराजन!

एक कानाफूसी भड़ास तक पहुंची है. वो ये कि सिद्धार्थ वरदराजन इंडिया टुडे के नए एडिटोरियल डायरेक्टर बनाए जा रहे हैं. बताया जाता है कि वो सोमवार को ज्वाइन करेंगे. फिलहाल इस कानाफूसी की आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हो पा रही है.

अगर आपके पास इस बारे में कोई जानकारी हो तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करके भड़ास के कान में धीरे से बताएं. (कानाफूसी)
 

अमर उजाला मेरठ संस्करण आज 28वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है…. एक किस्सा…

Jitendra Dixit : अमर उजाला मेरठ संस्करण आज 28वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 1989-90 में अखबार से जुड़ा। अमृत प्रभात का लखनऊ संस्करण बंद होने के बाद नौकरी की तलाश में मेरठ पहुंचा। स्व. अतुल माहेश्वरी जी से संक्षिप्त बातचीत के बाद नौकरी मिल गयी। ना कोई लिखित परीक्षा और ना ही साक्षात्कार की औपचारिकता। कह सकते हैं कि दस मिनट की बातचीत में ही एक-दूसरे को जान-समझ लिया। भरोसे के साथ एक ही सेवा शर्त- अमर उजाला के लिए आप काम कीजिए, आपकी चिंता अमर उजाला करेगा। उसी क्षण जीवनपर्यंत अमर उजाला से जुड़े रहने का स्व संकल्प-सा ले लिया।

तब का एक छरहरा नौजवान आज वृद्ध और विकलांग हो चुका है। संतोष है कि अखबार के साथ जो रिश्ता जुड़ा वह निर्बाध अभी तक कायम है। तब योगेंद्र दुबे जी संपादकीय प्रभारी थे। उन्हें ही रिपोर्ट करना था। बड़ी-बड़ी लाल डोरे वाली आंखें, बेतरतीब दाढ़ी, गले में ओसो वाली माला, एकदम मस्त मलंग। परिचय की औपचारिकता के बाद दोस्ताना अंदाज में बातचीत। सबसे पहले ध्यानवीर सिंह धीरज से संबद्ध किया गया। उन्हीं से संपादन सीखने का अवसर मिला। बीते सत्ताइस सालों में सब कुछ एकदम बदल गया। प्रोफेशनलिज्म के नाम पर विकसित कार्यसंस्कृति में अपनत्व तिरोहित हो चुका है। अखबार ने उल्लेखनीय प्रगति की। तब मात्र चार स्थानों आगरा, बरेली, मेरठ और मुरादाबाद से ही छपता था। आज पूरी हिंदी पट्टी में १८ संस्करणों के साथ अमर उजाला छा गया है।

प्रगति में यदि कुछ खो सा गया है तो वह रिश्तों की गर्मजोशी और समर्पण का भाव। तब संपादक व संपादकीय कर्मियों में एक परिवार सा रिश्ता था। बहस- विवाद होते थे, पर कोई किसी से दूरी नहीं रखता था। शिकवे-शिकायतें रहती थी पर टीम भावना पर उसका असर कभी दिखायी नहीं देता था। काम के मूल्यांकन में पूरी पारदर्शिता थी। क्षमता का बेहतर इस्तेमाल था। बेहतर काम सामने आने की गारंटी थी। मालिक और कर्मचारी सब एक परिवार की तरह बंधे थे। सुख-दुख में सब भागीदार रहते थे। अब ऐसा नहीं लगता। वही दिखता है जो देखना होता है। गाड फादरिज्म के इस दौर में आगे बढऩे के उपाय करने पड़ते हैं, सेल्फ मैनेजमेंट और लाइजन के बिना यथास्थिति तोडऩा कठिन हो चुका है। उस समय की टीम के कुछ गिने-चुने साथी ही बचे हैं।

आज सालगिरह के मौके पर जश्र का माहौल है। अपनी आंखों के सामने २७ साल के शानदार सफर का सिंहावलोकन है। अमर उजाला के नवोन्मेष्क आ. अतुल जी, नौनिहाल जी, केशव जैन साहब, संतोष वर्मा जी, विनीत पारिक, रूपकिशोर, अमरपाल जैसे साथी हमेशा के लिए दूर चले गये। उन सबका नमन। श्रद्धांजलि। बाजारवाद- कारपोरेट संस्कृति के तमाम दुष्प्रभाव, उतार-चढ़ाव के बाद भी प्रबंध निदेशक राजुल माहेश्वरी जी के कुशल नेतृत्व में अभी भी अमर उजाला बहुत कुछ दूसरे अखबारों से भिन्न है। पुराने कर्मचारियों के प्रति संवेदनशील है। शायद इसी वजह से हम भी आज इस सालगिरह के जश्र में खुद को शामिल पा रहे हैं।

अमर उजाला, मेरठ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

आम आदमी पार्टी मूलतः विचारहीन पार्टी है

Yashwant Singh : आम आदमी पार्टी मूलतः विचारहीन पार्टी है. विचार के नाम पर कोरी भावुकता है, कि हम सब(चोरों)को जेल भेज देंगे… टाइप की. कांग्रेस-भाजपा के करप्शन, दोगलापन और चिरकटुई से उबे हुए हम लोगों ने एक नई पार्टी और नए नेता पर जरूर दांव लगा दिया लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी समझ-बूझ कर रखिए. विचारहीनता अंततः कारपोरेट और बड़े लोगों के पक्ष में ही जाकर बैठती है.

आजकल का यूथ न संघी होना चाहता है और न ही कामरेड बनना चाहता है और न ही संघियों-कामरेडों की ट्रेडीशनल दुकानों, मठों, पंथों, संप्रदायों से जुड़ना चाहता है. वो सहजता और समझदारी चाहता है. पर राजनीति के अपने तरीके होते हैं. वहां सहजता और समझदारी अंततः हराममियों की साजिशों के मकड़जाल में बेमौत मर जाया करती हैं. इसलिए राजनीति की दुनिया की हरमजदगी में देर-सबेर सबको इसी नशे-लहर से थोड़ा-बहुत तर-बतर होना पड़ता है. केजरीवाल ने अपने लिए विचारधारा का एक फ्लेक्सबल झूला बना लिया है, जो संघियों से लेकर कम्युनिस्टों तक झूलता रहता है.

किसी एक केजरीवाल के ठीक होने, ईमानदार होने, विजनरी होने से सिस्टम नहीं बदलता, बस कुछ दिनों के लिए थरथरा कर भ्रष्टाचार के पुराने पलस्तर झाड़-गिरा सकता है लेकिन करप्शन तो कोई एक मोनोलिथक, एक जगह पर पड़ी हुई चीज नहीं जिसे पकड़ा और गंगा में डाल कर ये कहते हुए हाथ झाड़ लिया कि हमेशा के लिए काम खत्म. नई स्थितियों में नए किस्म के भ्रष्टाचारी पैदा होंगे. कांग्रेस-भाजपा के भ्रष्टाचारी बड़े भदेस और थेथर किस्म के हैं. आम आदमी पार्टी के शासन के भ्रष्टाचारी हमारे-आप जैसे प्रवचन देने वाले और सड़क छाप दिखने वाले होंगे. करप्शन नामक बीमारी नई दवाई के हिसाब से इम्युनिटी, रेजिस्टेंस डेवलप करने की क्षमता से लैस है, खासकर तब जब शासन करने वालों के पास सिर्फ नारे हों, भावुकता हो और ढेर सारी बातें हों.

ये सब जब लिख रहा हूं तो कइयों को लग सकता है कि आखिर यशवंत जी ने अपने सुर क्यों बदल दिए, चुनाव नतीजे आने के बाद , आम आदमी पार्टी की इतनी भव्य जीत के बाद… तो बंधु, इसका भी जवाब ले लीजिए. अपन काम होता है बेचारों को, संघर्षशीलों को, सड़कछाप वालों को, विपक्षियों को, विरोधियों को सपोर्ट करना और उन्हें सफलता दिलाना. सफलता दिलाकर अपन फिर तलाशने लगते हैं कोई सड़क छाप, कोई जेनुइन, कोई संघर्षरत. अब जब आम आदमी पार्टी ने अपने संक्षिप्त व तेज सियासी सफर में जबरदस्त मजबूती, नाम, मुकाम पा लिया है तो अपना काम है कि इस पार्टी का भी पोस्टमार्टम शुरू किया जाए ताकि अपन सब के पास इस पार्टी, इस मिशन, इस विजन को लेकर एक सेकेंड पर्सपेक्टिव, अल्टरनेट पर्सपेक्टिव भी रहे, जिससे कभी ये पार्टी राह से भटके तो हम सबों को सुसाइड न करना पड़े, पता रहे कि ऐसा होने की संभावना/आशंका इस पार्टी के नेचर में निहित थी…

यह सब लिखते हुए कहना चाहूंगा कि कांग्रेस-भाजपा की राजनीति और इसके बुड्ढे-भ्रष्ट नेता मुर्दाबादा… आम आदमी पार्टी और इसके नेता जिंदाबाद… अभी तो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस भाजपा सपा बसपा सभी को सबक सिखाकर 'आप' को जिताना है जिससे राजनीति के ट्रेडीशनल हरामियों को हताश कर नए किस्म के शरीफ, हमउम्र व हमारे-आप जैसे घरों से निकले हरामियों को आगे बढ़ाया जाए…

है न मजेदार बात…
नहीं…
गंदी बात गंदी बात गंदी बात गंदी बात…
और
लुंगी डांस लुंगी डांस लुंगी डांस लुंगी डांस…

जय हो… 🙂

    Yashwant Singh वीरेंद्र यादव को भी जरूर पढ़ें.. बेहद विचारणीय सवाल उठाए हैं… http://bhadas4media.com/…/16417-2013-12-09-11-49-58.html 'आप' के मतदाता ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को क्यों नहीं जिताया?   

    Saira Qureshi Jai ho   

    Maheshkumar Pandey आप पार्टी की जीत पर मुस्लिमो को भरोसा नही था और वे आप पार्टी क वोट देना अपने वोट वेस्ट करना समझते थे
     
    Hareprakash Upadhyay गंदी बात गंदी बात गंदी बात गंदी बात…
     
    Dushyant Rai अच्छा है . .यशवंत ने भाग निकलने के लिए एक दरवाज़ा आज ही खोल लिया . . . राजनीति के खेल निराले मेरे भैया . . .अब अगर कांग्रेस आप को बिना शर्त समर्थन दे तब . . . क्या उसको नकारने पर आप पर पलायनवाद का आरोप नहीं लगेगा . . .?
     
    Pramod Kumar aaj ka warg to the point hona chahta hai, jisko aap represent karti hai ,ek nayi rajniti ki shuruaat hui hai, thoda bharosa abhi rakhe ismen aur support karen. jab yah lakchya se bhatakna shuru ho tab ja kar iski aalochna karen.
     
    Shailesh Tiwari badhiya hai. Padh kar maza aa gaya. JAi ho.
     
    Sunil Mishra jai ho fakkadi ki …
     
    Vinayak Vijeta kejriwal bhi ramvilash paswan ke padcinnhon par chal rahe hai..unki bhi isthti ramvilash paswan wali hi hai..jinka ye 2005 ke feb. me bihar me hue election me 29 seat jitne wali ljp ka ye aparocch nara tha ki ,HUM TO DUBENGE SANAM TUMKO BHI LE DUBENGE , aaj dekhiye ramvilash ki kya halat hai.
     
    राकेश कुमार सिंह लोगों को वही सरकार मिलती है जिसके वे पात्र होंते है." (राजनितिक विचारक Alexis Tocqueville ने कहा थाThe People get the government the deserve)
 
    Anil Pandey Correct
 
    Himanshu Pathak और ना ही आप की तरह सोच रखता है
   
    Javed Anis बहुत ही सटीक और संतुलित
    
    Santosh Singh "विचारहीनता अंततः कारपोरेट और बड़े लोगों के पक्ष में ही जाकर बैठती है. आजकल का यूथ न संघी होना चाहता है और न ही कामरेड बनना चाहता है और न ही संघियों-कामरेडों की ट्रेडीशनल दुकानों, मठों, पंथों, संप्रदायों से जुड़ना चाहता है. वो सहजता और समझदारी चाहता है. पर राजनीति के अपने तरीके होते हैं. वहां सहजता और समझदारी अंततः हराममियों की साजिशों के मकड़जाल में बेमौत मर जाया करती हैं"…बहुत खूब..सहमत!
     
    Aryan Ojha sahi hai, aap ke sath sath AAP ki bhi niyat saaf hai, lekin is saaf niyati ke sath awshyakta ek sambal aur wistrit drishtikod ki bhi hogi, ek bat to tay hai, koi bhi dal apne moolbhut agende ko nahi badal pata,, haan modified jaroor kar deta hai,,, dekhte hai – नाऊ भाई कै बार ।
     
    Jayesh Agarwal स्टेटस पढ़ कर एक शब्द आया दिमाग में…. "गिरगिट"
     
    Yashwant Singh जयेस अग्रवाल भाई. गिरगिट भी प्राणी है, और मैं भी. मुझे आपत्ति नहीं.
     
    Shailendra Mishra मेरे काव्य संग्रह चिंगारी से
    एक एक पग ही दुनिया मे इतिहास बदलते रहता है
 
     डा. शैलेन्द्र मिश्रा की क़लम से
    ———
    सदियों से देखा है हमने, मानव को लड़ते पग पग पर
    हर जीत अधूरी रहती है,हर त्याग अधूरा रहता है।
    ——
    इंसानों की इस दुनिया में , हर न्याय अधूरा रहता है,
    हर ख़ुशी अधूरी रहती है, संघर्ष अधूरा रहता है ।
    ——-
    कुछ सपने देखे गौतम ने, कुछ गाँधी ने, अंबेडकर ने,
    सपनों की इस दुनिया में हर स्वप्न अधूरा रहता है ।
    ———
    दुनिया को हिलते देखा इतिहास ने अपनी आँखों से,
    हर लेनिन का, हर जे पी का अरमान अधूरा रहता है ।
    ——–
    इंसाफ़ को ढूँढा हमने बहुत दुनिया के हर एक मज़हब मे ,
    धर्मों की इस दुनिया में हर धर्म अधूरा रहता है ।
    ——–
    पर दुनिया को बढ़ने के लिए ये आधी जीत ही काफ़ी है,
    इस आधी जीत के पहिये से इन्साँ तो बढ़ते रहता है ।
    ——-
    गर एक क़दम ही काफ़ी हो तो दुनिया फिर रूक जायेगी,
    इसी लिए इस दुनिया में हर कदम अधूरा रहता है
    ——
    पूरी जीत के चक्कर में मायुस न होना, बैठ न जाना
    एक एक पग ही दुनिया मे इतिहास बदलते रहता है ।
    
    Sanjay Rahamatkar 2 बार हिसार और 1 बार मथुरा से सांसद रहे चौधरी मनीराम बागङी अपने भाषणोँ मेँ कहते थे कि "किसानो तुम्हारे खेतोँ मेँ कैसी फसल हुई अबकी बार?" अच्छी नहीँ हुई ना! हो भी कैसे सकती है!!! जब दूध मेँ से घी निकाल लोगे तो क्या बचेगा?? बिना दम की छाछ/लस्सी बचेगी ना! उसी तरह जब सरकार पानी मेँ से बिजली निकाल लेती है तो पिछे क्या बचेगा??? इसीलिए फसल कम होती है!!" और जनता मनीराम बागङी को वोट दे देती थी।
 
    Vivek Rai अरे भाई गिरगिट नहीं कलम का साधुवाद … उ वासेपुर में एक गाना था न " कह के लेंगे , सबकी लेंगे "
 
    Sanjeev Mishra असल मित्र वही होता है जो अच्छाईयो के साथ साथ बुराई पर भी ध्यानाकर्षण कराये। वरना चापलूस होता है।
   
    Jitendra Choubey Jordar.. Bahut khoob
    
    Mukund Hari Shukla यशवंत जी, यदि आप सामान्यतः विचारहीन पार्टी बोलते तो शायद सहमति हो सकती थी लेकिन मूलतः विचारहीन पार्टी बोलियेगा तो सहमति संभव नहीं। फिर भी विरोध का अर्थ आपके विचारों का असम्मान न समझें।
     
    Alok Tripathi aate jate huye main ab pe nazar rakhta hun,naam yashwant bhai hai mera sabki khabar kakhta hun………
     
    Chandan Srivastava अपन काम होता है बेचारों को, संघर्षशीलों को, सड़कछाप वालों को, विपक्षियों को, विरोधियों को सपोर्ट करना और उन्हें सफलता दिलाना. सफलता दिलाकर अपन फिर तलाशने लगते हैं कोई सड़क छाप, कोई जेनुइन, कोई संघर्षरत. ये सिद्धांत तो आपका जानते हैं हम. रही बात "आप" की तो भईया जो परसेप्शन आप आज कर रहे हैं उसका अह्सास हम मे से बहुत लोगों को पहले से था. "आप" के पास राजनीति का कोई सकारात्मक सिद्धांत नही है सिवाय फलां बेईमान है- फलां गुंडा है. ये नकारात्मक राजनीति है. आने वाले समय मे "आप" को भी अहसास हो जाएगा.
 
    आशीष सागर दीक्षित दमदार दस्तक
 
    Mahendra Agrawal sahamat hai
   
    Anand Agnihotri सही फरमाया
    
    Sachin Sh आप बिल्कुल सही है यशवंत जी, सबसे बड़ा कारण ही यही की हम समस्या तो बताते है लकिन इलाज़ कोई नही बता पता. कोई इलाज़ हो बताओ आख़िर करे क्या, कहा जाए, मोदी की गोद मे जा कर सो जाए या राहुल के सिर पे जा कर नाचे.
 
    Shantanu Arya आज पहली बार मैंने आपकी पोस्ट ऊपर से नीचे तक पूरी पढ़ी…. आपके जहां मे छुपी असलियत इस तरह बाहर निकलेगी मुझे नहीं पता था फिर भी आप पत्रकार है ओर आपका काम हमेशा एसा ही होगा जिससे लगे की आपकी दिशा सही है… भले ही तरुण तेजपाल ने कितने ही रेप किए हो पर वो लिखता हमेशा बलात्कार के खिलाफ रहा है धाराए भी लोगो को समझता रहा है पर खुद पर जब लगी तब जाके अब खुद को समझ आने लगा है
 
    Pradeep Sharma लुंगी डांस नहीं साहब सबको झाड़ू डांस करबा दिया है दादा
 
    Amit Kumar Pandey ABP NEWS "AAP" ko rakhe aage.
   
    Mohd Tarique Anwar ye hui na baat…
    
    Pashyanti Shukla बहुत मुश्किल है डगर पनघट की यशवंत साहब..
     
    Anil Dixit Wahh… 100 aana sach
     
    Hemant Pillai ABCD padh li bahut achhchhi bat karli bahut ab karni tere naal gandi gandi baat
     
    Ashok Kamble bhaiji dhire chalna rajniti me jara sambhalna…….
     
    Jagdish Yadav kathni ke bad karni dekhna hai phir jhadu kisi ki bapauti nahi hai, fir se laga degi janta
     
    Vivek Dutt Mathuria '' पहले आप तो पहले आप ''
     
    Amit Kumar Pandey Suli Upar Sej Piya Ki……
     
    Trilochan Rakesh बहुत बढ़िया ।
    इफ़लास के मारे हुए बच्चे हैं,
    पहली वार…
    मेले में जा रहे हैं,
    खिलौनों से डर न जायँ !!
    
    Jai Prakash Tripathi सही विवेचन है
     
    Radheyshyam Singh vivechana to pahle bhi hui thi.
     
    Meetu Mee fish..!! hum log kahin bhi satisfy nhi ho sakte….khud mei hum mei dum nhi….koi dum lekar aa jaye…to usme bhi santushti nhi hai…..waise aapne woi likha hai jiske liye sab pehle se prepared hai aur jiski waja se "AAP" par utna bharosa na dikhaate hue…logo ne BJP ko bahumat dila diya… vote sharing ho gyi….sabko ye pata hai ki jung mei ye "khiladadi" abhi naya hai… Delhi abhi door hai…par kam se kam logo ne bhi kuch dum dikhaya…..mauka diya kraanti laaney ka….ab to okhli mei sar diya hai….moooslo se kya darna..?
     
    Akhilesh Akhil uttam kahani.
     
    Nevil Clarke Achanak yeh virodh ke swar kyon?
     
    Vasant Joshi Bilkul sahi likha hai Yashwantji.
 
    Harishankar Singh apke vichar ashtir kyun ho gye, AAP ko lekar… pahale advocacy ab ninda?

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

अपने समलैंगिक बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले इन पैरेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि….

Manisha Pandey : फरवरी, 2011 में फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल और अमोल पालेकर की पूर्व पत्नी चित्रा पालेकर के नेतृत्व में 19 पैरेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. वे लोग अपने लेस्बियन और गे (समलैंगिक) बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे. आपको याद है कि तब श्‍याम बेनेगल और चित्रा ने सुप्रीम कोर्ट में क्‍या कहा था। उन्‍होंने कहा था, ''हमारे बच्चे अपराधी नहीं हैं. हम अपने बच्चों को बहुत करीब से जानते हैं और वे दुनिया के सबसे अच्छे बच्चे हैं.”

इस देश के किसी भी समझदार और संवेदनशील व्‍यक्ति ने ये उम्‍मीद नहीं की थी कि 2 जुलाई, 2009 को दिए दिल्ली हाइकोर्ट का ऐतिहासिक फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट के महज दो जजों की बेंच किसी मुहल्‍ले की कचहरी जैसा कोई स्‍टेटमेंट देगी। अगर सुप्रीम कोर्ट इस भाषा में बात कर सकता है तो हमारा मुल्‍क कितना समझदार, आधुनिक और लोकतांत्रिक हुआ है, इस बारे में थोड़ा शांत दिमाग से सोचने की जरूरत है।

हर संवेदनशील और ऐसे दिल-दिमाग का इंसान कि जिसके खिड़की-दरवाजे खुले हुए हैं और जहां ताजी धूप और हवा के आने-जाने का रास्‍ता है, सुप्रीम कोर्ट को अचरज से देख रहा होगा और निराश होगा।
इस मुल्‍क में कोई रहे हो कैसे।
और न रह सके और जाए तो कहां जाए?

Manisha Pandey : चित्रा पालेकर ने अपने उस अनुभव के बारे में लिखा है, जब एक शाम अचानक उनकी बेटी शाल्‍मली ने अमोल और चित्रा के सामने ये खुलासा किया कि वो होमोसेक्‍सुअल है। पहली बार तो उन्‍हें सदमा ही पहुंचा था। ये क्‍या कह रही है। शाल्‍मली लेस्बियन है। जिसे पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाना कहते हैं, कुछ वैसा ही महसूस हुआ था उस दिन उन्‍हें। लेकिन उसके बाद जिंदगी के 23 साल खुद उस माता-पिता के ग्रो होने, ज्‍यादा संवेदनशील और समझदार बनने की कहानी है, जिन्‍हें उनकी बेटी ने रिश्‍तों और जिंदगी को देखने की एक नई संवेदनशील नजर दी।

चित्रा ने उसके बाद होमोसेक्‍सुअल्‍स पर काफी किताबें पढ़ीं और उन्‍हें समझ में आया कि लोग अलग हो सकते हैं, उनकी चॉइस अलग हो सकती है। लेकिन इस वजह से वो अपराधी नहीं हो जाते। वो जो भी चाहते हैं, वो होना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है और हमें उनके इस हक की इज्‍जत करनी चाहिए। लेकिन एक सामंती और लट्ठमार देश से किस हक, आजादी और इज्‍जत की उम्‍मीद करना भला। लाठी तानकर बाप जो बोले सही, वही सही। और कुछ नहीं सही।
सुप्रीम कोर्ट भी बोले, वही सही,
जो अब्‍बाजान बोले, सही,
जो खाप बोले, सही,
जो चर्च बोले, सही,
जो मौलाना साहब बोले, सही,
जो रामदेव बोले सही।

Manisha Pandey : मैं किसी गे लड़के को पर्सनली नहीं जानती। ऐसा कोई मेरा दोस्‍त नहीं। लेकिन मैं दो लेस्बियन लड़कियों को बहुत करीब से जानती हूं और बिना किस शक और पूर्वाग्रह के ये कह सकती हूं कि वो दुनिया के सबसे बेहतरीन इंसानों में से एक हैं। बहुत जहीन, बहुत मानवीय, संसार की हजारों मुहब्‍बत से भरी हुई। बुखार में पूरी रात मेरे सिरहाने बैठकर ठंडे पानी की पट्टियां रखने वाली। मुझसे उन्‍हें बदले में क्‍या मिलेगा, इस बात की रत्‍ती भर परवाह किए बगैर मुझे प्‍यार करने वाली, मेरा ख्‍याल रखने वाली। और सबसे बढ़कर एक शानदार कपल। एक आदमी और एक औरत आपसी संदेहों, मनमुटावों और झगड़ों से ऊपर उठकर क्‍या रहेंगे, जैसे वो दोनों रहा करती थीं, करती हैं। और इस देश के जाहिलों की जमात कह रही है कि वो अनैतिक, अमानवीय और असंवैधानिक हैं। मूर्खों, जाकर अपने दिमाग का इलाज कराओ कहीं।

इंडिया टुडे हिंदी में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

भड़ासी पोल-खोल के बाद विनोद कापड़ी का कुबूलनामा

इंडिया टीवी से विदा किए जा चुके विनोद कापड़ी के बारे में जब भड़ास पर पोल खुली कि वे न्यूज एक्सप्रेस चैनल में रोजी रोटी तलाश रहे हैं तो उन्हें भी मजबूरी में अपनी हालिया स्थिति बयान करनी पड़ी, पूरे फिल्मी ड्रामे व इमोशन्स के साथ. विनोद कापड़ी ने फेसबुक पर इंडिया टीवी से नाता टूट जाने की अघोषित सच्चाई को घोषित कर दिया है.

करियरवादियों और बेरोजगारों की इस दुनिया में कोई संपादक टाइप आदमी कहीं से विदा होता है तो माना जाता है कि वो जल्दी ही किसी नई जगह संपादक बन जाएगा. सो, उसके पीछे सैकड़ों की भीड़ …बधाई, शुभकामना, मिस यू सर, गो अहेड, जल्द ही नया धमाका शुरू करें… टाइप डायलाग मारते चल पड़ती है. विनोद कापड़ी के इंडिया टीवी से हट जाने संबंधी फेसबुक स्टेटस पर ऐसे ही कमेंट्स की भरमार है. विनोद कापड़ी जल्द ही बताने वाले हैं अपने फेसबुक वॉल पर कि वो न्यूज एक्सप्रेस ज्वाइन कर चुके हैं. फिलहाल इंडिया टीवी से हटने संबंधी विनोद कापड़ी का फेसबुकी स्टेटस नीचे पढ़िेए.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Vinod Kapri :  आज वो पल आ ही गया, जिसने आंखें नम कर दी! दो घंटे पहले, इंडिया टीवी का 6 साल पुराना साथ छोड़ दिया! जीवन के कुछ फैसले बहुत मुश्किल भरे होते हैं और ये फैसला यकीन मानिए अब तक का सबसे मुश्किल फैसला था। 300 लोगों की जिस टीम के साथ दिन रात ख़बरों को खाया, पिया और जीया, ऐसे लोगों से दूर होना मेरे लिए खुद किसी बड़े सदमे से कम नहीं है। आफिस से निकला और घर आते हुए सभी चेहरे एक-एक कर आँखों के सामने घूमने लगे। गाड़ी की रफ्तार के साथ दूरियाँ बढ़ती जा रही थीं, स्टियरिंग पर रखे हाथ काँप रहे थे, और लगातार यही सोच रहा था कि ज़िंदगी या वक्त ठहरता क्यों नहीं है? कार का पहिया समय के चक्र की तरह आगे बढ़ता गया और मेरी अपने ही लोगों से दूरियाँ।

मैं नहीं जानता कि जिन लोगों के साथ मैंने काम किया वो मेरे बारे में क्या सोचते हैं लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि इंडिया टीवी में जिन लोगों के साथ मैंने काम किया उनके बिना मेरा वजूद कुछ भी नहीं था। वो सब लोग नहीं होते तो मैं इंडिया टीवी में कुछ भी नहीं कर पाता। आज उन सभी लोगों को मैं दिल से धन्यवाद कहना चाहता हूँ और आभार जताना चाहता हूँ। 6 साल का वक़्त कम नहीं होता। इंडिया टीवी आज जहाँ से जहाँ तक पहुँचा है ये सब उसी टीम की मेहनत, जोश, जुनून और ज़िद का नतीजा है। मैं तो सिर्फ़ एक बहुत छोटा सा ज़रिया था।

मुझे यक़ीन है वो सब लोग उस जज़्बे को बनाकर रखेंगे। जब से घर आया हूँ कई फ़ोन और SMS आए, दिल डूब जाता है जब दूसरी तरफ़ से रोती या सुबकती हुई आवाज़ सुनता हूँ। मुझे सच में नहीं पता था कि आप लोग इतना ज़्यादा प्यार करते हैं। पता होता तो क़तई आप से दूर नहीं जाता। काश SMS और फ़ोन काल्स के तौर पर मिला वो प्यार मैं बाँट पाता और वो नम आँखें साझा कर पाता। ऐसे सभी दोस्तों को कहना चाहता हूँ कि इस वक़्त सिर्फ़ आप ही नहीं रो रहे, मुझे भी अपना ही हिस्सा मानिए। अंत में उन सभी लोगों से हाथ जोड़कर माफ़ी चाहूँगा जिन्हें मैंने जाने अंजाने ठेस पहुँचाई हो या जिनके लिए कुछ नहीं कर पाया। आप सभी मेरे दिल में बसते हैं और ताउम्र मेरे साथ रहेंगे। जल्द ही मिलते हैं बहुत छोटे से ब्रेक के बाद। तब तक अपना ख़्याल रखिएगा और मुझे याद ज़रूर कीजिएगा।

विनोद कापड़ी के फेसबुक वॉल से.


मूल खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

'न्यूज एक्सप्रेस' चैनल में नौकरी खोज रहे हैं विनोद कापड़ी!

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तो इसलिए विनोद कापड़ी को बाहर कर खुद प्राइम टाइम की एंकरिंग कर रहे हैं रजत शर्मा!

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कापड़ी की फिल्म में 'मिस टनकपुर' एक भैंस है

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कमर वहीद नकवी इंडिया टीवी से जुड़े, कापड़ी की विदाई की खबर सच

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'इंडिया टीवी' से विनोद कापड़ी की चलाचली की बेला, अब फिलिम लाइन जाने की चर्चा

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यशवंत ने विनोद कापड़ी – साक्षी जोशी को समर्पित की अपनी पहली किताब 'जानेमन जेल'

रजत शर्मा में अब वो बात नहीं, इंडिया टीवी नंबर तीन पर खिसका

वो कहते हैं न कि बनाने में बहुत मेहनत की जरूरत होती है और बिगाड़ने में वक्त नहीं लगता. कभी न्यूज के दम पर अपनी मजबूत पकड़ दर्शकों में बनाने वाले इंडिया टीवी की इमेज जबसे भूत-प्रेत झूठ-मूठ हवा-हवाई कामेडी-फिल्मी टाइप न्यूज चैनल की बनी तबसे इसके संजीदा व समझदार दर्शक इससे दूर जाने लगे.

रजत शर्मा ने झूठ के बल पर इंडिया टीवी को टीआरपी में खूब आगे करवाए रखा पर जब उन्हें यह एहसास हुआ कि उनका न्यूज चैनल बेहद अगंभीर किस्म का हो गया है तो वे पत्रकार कम, कलाकार ज्यादा किस्म के कापड़ी टाइप लोगों को चैनल से बाहर निकाल खुद को आगे कर दिया. साथ ही आजतक के नए पुराने मोहरों को भारी मात्रा में भर लिया. पर पिटे हुए लोगों से जादू की गुंजाइश नहीं की जा सकती. और काठ की हांड़ी दुबारा आग पर नहीं चढ़ती.

रजत शर्मा ने खूब जोर लगा लिया, पर नंबर एक बनना दूर, अपनी नंबर दो की कुर्सी भी नहीं बचा पाए. एबीपी न्यूज ने इंडिया टीवी को पीट दिया है. 49वें हफ्ते की टीआरपी में इंडिया टीवी नंबर तीन की पोजीशन पर खिसक चुका है. कहा जा रहा है कि बहुत जल्द दीपक चौरसिया के हाथों रजत शर्मा की हार होने वाली है. झूठ-मूठ, हवा-हवाई, कामेडी-फिल्मी, सेक्स-संत, नकली स्टिंग, चीप बकवास, झूठी खबरों आदि फार्मूलों के बल पर इंडिया न्यूज शीघ्र ही इंडिया टीवी को मात दे सकता है.

इंडिया टीवी को गंभीर व पोलिटिकल चैनल बनाने के चक्कर इसकी स्थिति माया मिली न राम वाली हो गई है. टीआरपी चार्ट में इंडिया टीवी के ठीक बाद इंडिया न्यूज है. सबसे बुरी स्थिति आईबीएन7 की हो गई है. एक से बढ़कर एक धुरंधर यहां पर चैनल टीआरपी के मामले में टाप टेन में नौवें पायदान पर पहुंच गया है. पतन के मामले में यह चैनल सहारा वालों के समय से होड़ करता दिख रहा है. आईबीएन7 को कल के चैनल न्यूज नेशन ने पछाड़ रखा है. टीआरपी का पूरा हिसाब किताब यहां देखें…

WK 49 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:
Aaj Tak 15.4 dn 0.6
ABP News 14.6 up 1.2
India TV 13.1 dn 0.5
India news 9.7 up 1.1
ZN 9.7 dn 0.1
News 24 8.4 dn 0.3
News Nation 7.9 up 0.8
NDTV 6.7 dn 0.1
IBN 6.0 dn 0.1
Samay 3.6 dn 0.2

 


Tg CS M 25+ABC
Aaj Tak 15.0 dn 1.2
ABP News 14.7 up 2.4
India TV 13.9 same
India news 10.0 up 1.0
ZN 9.9 dn 0.2
NDTV 8.0 same
News24 7.7 up 0.2
News Nation 7.1 dn 0.3
IBN 6.3 dn 0.1
Samay 3.0 dn 0.2

ब्लैकमेलिंग करने वाले पत्रकारों के नाम सार्वजनिक किए जाने की मांग

देहरादून : 'जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड' ने पुलिस महानिदेशक को राजधानी क्षेत्र में कथित रूप से कार्यरत कई कथित पत्रकारों द्वारा ब्लैकमेलिंग के मामले में ज्ञापन दिया. जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड के प्रदेश अध्यक्ष जय सिंह रावत ने कहा कि इस तरह की चर्चाएं न केवल पत्रकारिता के पेशे के लिये बल्कि पूरे समाज और देश के लिये घातक हैं. अगर समाज के पथ प्रदर्शक ही पथभ्रष्ट हो जांय तो समाज कहां जायेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है.
 
उन्होंने कहा कि ताजा सेक्स स्कैंडल में पुलिस द्वारा बार-बार मीडिया के कुछ लोगों के ब्लैकमेलिंग में शामिल होने के संकेत दिये जा रहे हैं मगर ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है. अगर यह सच है तो यह मामला बहुत ही गम्भीर है. उन्होंने पुलिस महानिदेशक से अनुरोध किया है कि अगर सचमुच मीडिया के कुछ लोग ब्लैकमेलिंग और सेक्स स्कैंडल में शामिल हैं तो उनके नामों को सार्वजनिक किया जाय और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाय. उन्होंने कहा कि जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड पुलिस या किसी के भी द्वारा पत्रकारों के उत्पीड़न और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के खिलाफ अवश्य है मगर अपराधियों और ब्लैकमेलरों के साथ कतई नहीं है. 
 
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के महान पेशे का सम्मान अवश्य होना चाहिये मगर ब्लैक मेलिंग का नहीं. वैसे भी कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता. पुलिस भी कानून से ऊपर नहीं होती. उन्होंने पुलिस महानिदेशक से मांग की कि अगर इस कांड में या ब्लैक मेलिंग में किसी पत्रकार का हाथ नहीं है तो वह भी स्थिति स्पष्ट की जाय. इस सैक्स स्कैंडल और ब्लैकमेलिंग कांड के बाद चली चर्चाओं से पत्रकारिता के पावन पेशे की गरिमा को भारी ठेस पहुंच रही है, जो कि समाज के हित में भी नहीं है.
 
उन्होंने पुलिस महानिदेशक से अनुरोध किया है कि बिना समय गंवाये इस मामले में स्थिति स्पष्ट की जाय. अगर कोई दोषी है तो उसे तत्काल कानून के हवाले किया जाय और अगर इसमें मीडिया से जुडे लोगों की कोई भूमिका नहीं है तो उसे भी सार्वजनिक किया जाय. लेकिन पत्रकारों के बारे में पुलिस विभाग में किसी भी तरह की कानाफूसी बन्द की जाय.

झारखंड में पत्रकारों पर पुलिस ने भांजी लाठियां

गढ़वा : थाना परिसर में घटना को कवर करने गये मीडिया कर्मियों की पुलिस ने जमकर पिटाई कर दी. पुलिस की इस बर्बरतापूर्ण कार्रवाई में पत्रकार चंदन कुमार, धर्मेन्द्र कुमार, लव कुमार, अभिमन्यु, प्रताप आदि को गंभीर चोटें आईं. घटना से गुस्साए पत्रकार पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर अड़ गए. एसडीपीओ हीरालाल रवि ने पत्रकारों के साथ वार्ता कर मामला सुलझाने की कोशिश की लेकिन बात बनी नहीं.
 
बुधवार दोपहर को सदर थाना में वनांचल डेंटल कॉलेज के 35-40 छात्र कॉलेज प्रबंधन के विरुद्ध छात्रों को मिलने वाली राशि के गबन के मामले की शिकायत लेकर पहुंचे थे. इस पर वहां मौजूद कुछ पत्रकारों ने इन छात्रों की जब तस्वीर लेनी चाही तो छात्र पत्रकारों पर भड़क उठे और पत्रकारों को धमकाने लगे. इसी बीच कुछ छात्रों ने पत्रकार लव कुमार का कैमरा छानकर मेमोरी कार्ड निकाल लिया और उनका नोट पैड भी फाड़ डाला. 
 
छात्रों के द्वारा किए गए इस अभद्र व्यवहार की सूचना दूसरे पत्रकारों को मिलते ही जिला मुख्यालय के और भी पत्रकार थाना परिसर पहुंच गए. पत्रकारों ने इसकी शिकायत थानाध्यक्ष से की तथा उनसे मामले में कार्रवाई करने को कहा. इसी बीच थानाध्यक्ष और पत्रकारों में नोकझोंक शुरू हो गई. बस इतने में थानाध्यक्ष ने पत्रकारों को पीटने का आदेश दे दिया और थाना परिसर में मौजूद पुलिस कर्मियों ने पत्रकारों को दौड़ा-2 कर पीटना शुरू कर दिया.
 
पुलिस द्वारा पत्रकारों की पिटाई की विभिन्न पार्टियों और संगठनों ने भर्त्सना की है. निंदा करने वालों में भाजपा नेता अलख नाथ पांडेय, कांग्रेस के अलख निरंजन चौबे, पूर्व जिप अध्यक्ष सह माले नेत्री सुषमा मेहता, अभाविप के मुन्ना कुमार, रितेश चौबे, झाविमो के रिंकू तिवारी, झामुमो नेता मिथलेश कुमार ठाकुर, परेश तिवारी आदि शामिल हैं.

अमर उजाला, दैनिक जागरण से दो-दो विकेट गिरे, सभी पहुंचे न्यायसेतु

अमर उजाला हिमांचल को बड़ा झटका लगा है. खबर है कि हिमांचल के सबसे बड़े जिले कांगड़ा के प्रभारी शशि भूषण पुरोहित ने अमर उजाला का साथ छोड़ दिया है वहीं अमर उजाला चंडीगढ़ से पंजाब डेस्क इंचार्ज देवेन्द्र गुलारिया ने भी संस्थान को अलविदा कह दिया है.
 
वहीं पत्रकारों के संकट से जूझ रहे जागरण में कार्यरत लुधियाना जागरण की जिम्मेवारी संभाल रहे नितिन उपमन्यु और पटियाला जागरण का कार्यभार देखने वाले दिनेश शर्मा ने संस्थान को अलविदा कह दिया है.
 
खबर है कि ये सभी लोग हिमांचल प्रदेश के हमीरपुर जिले से शुरू होने जा रहे नए हिन्दी दैनिक न्यायसेतु की टीम का हिस्सा बन गए हैं. देवेन्द्र गुलारिया को समाचार संपादक का जिम्मा सौंपा गया है, जबकि शशि भूषण पुरोहित को मंडी संसदीय क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है. नितिन उपमन्यु को उप समाचार संपादक बनाया गया है, जबकि दिनेश शर्मा को चीफ सब एडिटर की जिम्मेवारी दी गई है.
 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल के जरिए भेज सकते हैं.

सेबी को सरकारी गुंडा कहने पर सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को लताड़ा

बाजार नियामक सेबी को 'सरकारी गुंडा' बताने वाले सहारा के विज्ञापन पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए सहारा को चेतावनी दी है. कोर्ट ने बुधवार को कहा कि बाजार नियामक सेबी एक सरकारी निकाय है और केवल अपना काम कर रहा है. अदालत ने सहारा समूह से उन समाचार पत्रों में माफीनामा छापने को कहा है जिनमें ये विज्ञापन छापे गए थे.
गौरतलब है कि निवेशकों के 20000 करोड़ रूपये वापस करने के मामले में बाजार नियामक सेबी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार सहारा की सम्पत्तियों की जांच कर रहा है. जिस पर सहारा समूह ने सेबी के खिलाफ विज्ञापन छापकर कहा था कि सेबी सरकारी गुंडा है और उसे परेशान कर रहा है. इससे पहले सहारा प्रमुख सुब्रत राय ने इस मामले को राजनीति से प्रेरित बताया था.
 
जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जेएस खेहर की खंडपीठ ने सहारा के इस विज्ञापन पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि आप इस मामले को हल्के में ले रहे हैं. समूह अदालत को धैर्य खोने पर मजबूर ना करे. इससे आपको कुछ हासिल नहीं होगा. आप के खिलाफ पहले ही अवमानना का मामला चल रहा है और ऐसा करके आप अपनी मुश्किलें और बढ़ा रहे हैं. कोर्ट ने कहा कि सेबी हमारे आदेशों का पालन कर रहा है और आप उसके बारे में जो कह रहे हैं वो अप्रत्यक्ष रूप से हमारे बारे में कह रहे हैं.
 
सहारा समूह के वकील ने कोर्ट की इस टिप्पणी पर कोर्ट से माफी मांग ली. समूह ने अपनी 20000 करोड़ रूपये की 71 सम्पत्तियों के दस्तावेज सेबी को सौंपने पर सहमति जताई. 
 
वहीं कोर्ट ने सहारा के वकील की अर्जी खारिज कर दी जिसमें कहा गया था कि सहारा को विदेश यात्रा की अनुमति दी जाए. कोर्ट ने कहा कि ये हालत आपकी ही बनाई हुई है. अगर आपने तय समय पर सेबी को दस्तावेज सौंप दिए होते तो ये नौबत ही नहीं आती. न्यायालय ने समूह के बैंक खातों पर लगी रोक हटाने की अर्जी भी खारिज कर दी. इस मामले की अगली सुनवाई 9 जनवरी को की जाएगी.

धारा 377 आईपीसी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर विचार

Amitabh Thakur : आज अप्राकृतिक सेक्स से सम्बंधित धारा 377 आईपीसी के विषय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्णय पर दिन भर काफी शोर-शराबा होता रहा. कई लोग जिनकी व्यक्तिगत अलग प्रकार की व्यक्तिगत पसंद है द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश की काफी खुली निंदा की गयी है. 
 
लेकिन यह उचित होता कि इस आदेश की आलोचना करने के पूर्व इसे पढ़ा गया होता और इसे इसकी सम्पूर्णता में देखा गया होता. 
 
इस आदेश को पढने के बाद मैं धारा 377 आईपीसी के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करता हूँ क्योंकि निर्णय में साफ़ कहा गया है कि पुलिस और कोर्ट के सामने मामले तभी आते हैं जब बिना मर्जी के बलपूर्वक अप्राकृतिक कृत्य किया जाता है जिन मामलों में कोर्ट स्वाभाविक तौर पर पीड़ित, चाहे वे बच्चे हों या महिलायें, को न्याय दिलाने को कृत-संकल्प होते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वे नहीं समझते कि कोर्ट सहमति से किये अप्राकृतिक कृत्य के मामलों में भी ऐसा ही कठोर रुख अख्तियार करेंगी. 
 
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि धारा 377 आईपीसी किसी समूह को आपराधिक नहीं घोषित करता है बल्कि यह मात्र कुछ कार्यों को अपराध बताता है. 
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मात्र उसके द्वारा जोर-जबरदस्ती से बिना मर्जी किये गए अप्राकृतिक कृत्य पर कड़ी कार्यवाही कराये जाने का प्रयास है और यह स्वागत योग्य है. 
 
अतः यह शायद उचित होता कि वे सारे लोग जो विधिक रूप से “अप्राकृतिक कृत्य” कहलाने वाले कार्य सहमति से कर रहे हैं इस आदेश को मानवाधिकार हनन का मामला बताते हुए इसकी निंदा करने की जगह इसे तमाम अन्य लोगों के मानवाधिकार रक्षा का निर्णय बताते क्योंकि ऐसे कानून के अभाव में तमाम लोगों पर यौन अपराध की संभावना बढ़ेगी ही. 
 
इस निर्णय को इसकी पूर्णता में देखने पर यह ज्ञात होगा कि यह आदेश तमाम पुरुषों, बच्चों और महिलाओं को अवांछनीय तथा अनुचित अप्राकृतिक यौन आक्रमण से बचाने का कार्य करेगा, अतः इस तरह के कार्यों से जुड़े लोगों को आत्मकेंद्रित होने के स्थान पर वृहत्तर सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की भी जरूरत है.
 
पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वाल से

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष कोछड़ का निधन

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष कोछड़ का आज सुबह देहान्त हो गया. वे 70 वर्ष के थे. श्री कोछड़ पिछले काफी दिनों से बीमार चल रहे थे और उनका अमृतसर के एक अस्पताल में इलाज चल रहा था. सुभाष कोछड़ सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हुए थे. वे सामाजिक संस्था सती लक्ष्मी देवी समिति से पिछले बीस वर्षों से जुड़े हुए थे.
 
बटाला श्रमजीवी पत्रकार संघ ने सुभाष कोछड़ के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए शोकसभा की. इस शोकसभा में संगठन के अध्यक्ष प्रदीप लूथरा, अवनीत तेजा राकेश रेखी महासचिव राजिंदर दर्दी व अन्य ने श्रो कोछड़ को श्रद्धांजलि दी.
 

हिन्दुस्तान, कानपुर प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई का नोटिस

हिन्दुस्तान प्रबंधन कानपुर द्वारा निकाले गए चारों पीड़ित कर्मियों संजय दूबे, पारस नाथ शाह, नवान कुमार एवं अंजनी प्रसाद  के मामले की सुनवाई में लेबर कमिश्नर द्वारा बार-बार बुलाये जाने के बावजूद प्रबंधन की तरफ से किसी के ना आने से लेबर कमिश्नर ने सख्त नाराजगी जताई है. लेबर कमिश्नर ने कर्मचारियों की अपील पर हिन्दुस्तान प्रबंधन को अपना पक्ष रखने के लिए 6 दिसम्बर उपस्थित रहने को कहा था. लेबर कमिश्नर के द्वारा नोटिस भेजने के बाद भी प्रबंधन की तरफ से कोई नहीं आया.
 
लेबर कमिश्नर ने एचटीमीडिया कानपुर प्रबंधन को पत्र लिखकर इस तरह से कर्मचारियों को परेशान करने और श्रम आयुक्त द्वारा बार-बार बुलाये जाने के बावजूद प्रबंधन की तरफ से किसी के उपस्थित ना होने पर सख्त ऐतराज जताया है. श्रम आयुक्त ने पत्र में पूछा है कि बार-बार आदेशों का उल्लंघन करने के लिए क्यूं ना आपके खिलाफ दण्डात्मक कार्रवाई की जाय.
 
लेबर कमिश्नर द्वारा भेजे नोटिस को हिन्दुस्तान प्रबंधन ने लेने से ही इंकार कर दिया था जिसके बाद नोटिस को स्पीड पोस्ट से भेजा गया. उसके बावजूद भी मैनेजमेंट की तरफ से कोई भी अधिकारी श्रम आयुक्त के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ था. प्रबंधन द्वारा बार-बार श्रम विभाग के आदेशों की अवहेलना करने के कारण श्रम आयुक्त ने जल्द ही मामले को लेबर कोर्ट में प्रस्तुत करने को कहा है.
 
श्रम आयुक्त द्वारा हिन्दुस्तान को भेजा गया नोटिस-

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हिंदुस्तान अखबार के 22 छोटे कर्मियों का दूर-दराज तबादला… (देखें लिस्ट) …उत्पीड़न चालू है…

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मोती बी.ए. न्यू मीडिया सम्मान से सम्मानित होंगे डॉ. सौरभ मालवीय

आगामी 21 दिसंबर 2013 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन नया मीडिया मंच द्वारा किया जा रहा है. उक्त कार्यक्रम में नया मीडिया के विस्तार एवं ग्रामीण अंचलों में इसकी जरुरत पर तमाम राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों का वक्तव्य होना है. 
 
उक्त आयोजन में दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्वं संपादक श्री शंभूनाथ शुक्ल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी वरिष्ठ स्तंभकार एवं टीवी पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी सहित संपादक श्री पंकज झा, श्री यशवंत सिंह, श्रीमती अलका सिंह (रेडियो पत्रकार), श्री संजीव सिन्हा आदि वक्ता उपस्थित रहेंगे. कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी देवरिया एवं आईपीएस श्री अमिताभ ठाकुर उपस्थित होंगे. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार आचार्य रामदेव शुक्ल करेंगे. 
 
उक्त कार्यक्रम के माध्यम से नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता की तमाम संभावनाओं को टटोलने का प्रयास किया जाएगा. कार्यक्रम के दौरान ही पत्रकारिता एवं अध्यापन के क्षेत्र में नया मीडिया पर अपने उल्लेखनीय उपस्थिति के लिए देवरिया की माटी से आने वाले पांच गणमान्यों को 'मोती बी.ए. नया मीडिया सम्मान' से सम्मानित किया जाएगा. इसी क्रम में देवरिया के डॉ सौरभ मालवीय की नया मीडिया पर सशक्त उपस्थिति को देखते हुए उन्हें सम्मानित किए जाने की सूचना कार्यक्रम के सह-संयोजक शिवानन्द द्विवेदी सहर ने दी.

दसवीं ‘विकास संवाद मीडिया लेखन फैलोशिप’ के लिए आवेदन आमंत्रित

भोपाल। वर्ष 2014 के लिए दसवीं विकास संवाद मीडिया लेखन फैलोशिप की घोषणा कर दी गई है। इस साल प्रदेश के चार पत्रकारों को सामाजिक मुद्दों पर लेखन के लिए फैलोशिप दी जाएगी। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 10 जनवरी, 2014 है।
 
इस वर्ष की फैलोशिप ‘पोषण की सुरक्षा और कुपोषण’ विषय पर दी जाएगी। आवेदक को अपना प्रस्ताव और कार्य योजना को मध्यप्रदेश के किसी एक अंचल (मालवा, महाकोशल, चम्बल, मध्य क्षेत्र, बघेलखंड, बुंदेलखंड) में रहने वाले 'किसी एक' आदिवासी/दलित या अन्य वंचित तबकों में (पिछली फेलोशिप अध्ययन में शामिल हो चुके भील, कोरकू, बैगा और गोंड समुदाय को छोड़कर) पोषण और खाद्य सुरक्षा (बच्चों के सन्दर्भ में) की स्थिति पर केंद्रित रखना होगा। यह फैलोशिप छह माह के लिए होगी। यह चारों फैलोशिप हिन्दी व अंग्रेजी के प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के लिए है।  
 
आवेदन करते समय पत्रकार को अपना बायोडाटा, अपनी पांच ताजा प्रकाशित खबरें और चुने गए विषय पर लगभग 1000 शब्दों में प्रस्‍ताव देना होगा। पत्रकारों का चयन वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक चयन समिति करेगी।
 
इस चयन समिति में वरिष्ठ पत्रकार श्री नीलाभ मिश्र, श्री गिरीश उपाध्याय, सुश्री अन्नू आनंद, सुश्री श्रावणी सरकार, श्री जयराम शुक्ला, श्री अरुण त्रिपाठी तथा ज्यूरी सदस्य सचिव की भूमिका में वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान शामिल होंगे। फैलोशिप के दौरान पत्रकार को सम्बंधित विषय पर 15 खबरें और 5 आलेख लिखने होंगे। विषय से संबंधित एक विस्तृत रिपोर्ट भी अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना होगा। इसके साथ ही माह में कम से चार दिन के क्षेत्रभ्रमण की भी बाध्यता होगी।
 
फैलोशिप से संबंधित विस्तृत जानकारी और आवेदन पत्र ई-7/226, अरेरा कालोनी स्थित विकास संवाद कार्यालय से भी लिए जा सकते हैं। आवेदन फार्म और प्रपत्र विकास संवाद की वेबसाइट www.mediaforrights.org से भी डाउनलोड किये जा सकते हैं।
 
राकेश दीवान/ प्रशांत दुबे
 
संपर्क– 09424467604, 09826066153, 09425026331
 
प्रेस विज्ञप्ति

जनसंदेश टाइम्स से हरेप्रकाश उपाध्याय ने दिया इस्तीफा

जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ से खबर है कि प्रधान संपादक के करीबी और जनसंदेश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हरेप्रकाश उपाध्याय संस्थान से अलग हो गये हैं. खबर आ रही है कि हरे प्रकाश ने सुभाष राय से मतभेद के चलते संस्थान से इस्तीफा दे दिया है. कुछ ऐसी भी सूचना आ रही है कि प्रबंधन ने उन्हें हटाया है. सुभाष राय ने जनसंदेश से जुड़े सभी कर्मचारियों को संदेश भेज कर सूचित किया है कि अब सभी लेख और सूचनाएं हरेप्रकाश के बजाय सीधे उनके मेल पर भेजी जाय.
 
हरे प्रकाश जनसंदेश के प्रधान संपादक सुभाष राय के काफी करीबी माने जाते रहे हैं. जब सुभाष राय ने जनसंदेश छोड़ा था तो हरे प्रकाश ने उनके साथ संस्थान से अलग हो गये थे फिर वे सुभाष राय के साथ ही संस्थान में वापस आये थे. जनसंदेश से अलग होने के बाद उन्होंने सुभाष राय के साथ मिलकर समकालीन सरोकार नामक पत्रिका निकाली थी जो अभी भी निकल रही है.
 
इस संदर्भ में जब भड़ास4मीडिया ने हरे प्रकाश ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि संस्थान से इस्तीफा देने की खबर गलत है और वे अभी संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं.

तरुण तेजपाल 12 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजे गए

पणजी : तहलका के प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को गोवा जिला न्यायालय ने आज 12 दिेनों के लिए न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया है. तेजपाल की चार दिनों की पुलिस रिमांड की अवधि आज समाप्त हो रही थी. तेजपाल पर उनकी महिला सहकर्मी ने यौन शोषण का आरोप लगाया था जिसके बाद उन्हें 30 नवम्बर को गिरफ्तार किया गया था जिसके बाद से तेजपाल को पुलिस रिमांड में भेज दिया गया था.
 
आज तेजपाल को दस दिन की पुलिस रिमांड अवधि खत्म होने पर गोवा पुलिस ने ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट क्षमा जोशी के समक्ष प्रस्तुत किया. पुलिस ने तेजपाल की जमानत का विरोध करते हुए कहा कि तेजपाल बाहर रहने पर पीड़िता और गवाहों पर दबाव बना सकते हैं. वे ऐसा पहले भी कर चुके हैं. पुलिस की दलीलें सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने तेजपाल को 12 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजने का आदेश दे दिया. तेजपाल को वास्को की सदा सब जेल में रखा जाएगा.
 
तेजपाल पर अपनी महिला सहकर्मी के साथ यौन शोषण के मामले में आईपीसी की धारा 354-ए, 376 और 376 (2) के तहत मामला दर्ज किया गया है. तेजपाल पर 341 (अनुचित अवरोध) और 342 (अनुचित रोक) के तहत भी मामला दर्ज किया गया है. पुलिस इससे पहले पीड़िता, तहलका की मैनेजिंग डायरेक्टर शोमा चौधरी और तीनों गवाहों के बयान दर्ज कर चुकी है.

बुंदेली भाषा को हिंदी साहित्य में उचित स्थान दिलाने की कोशिशें तेज

बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह मुकाम नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। अब उसे वाजिब स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश शुरू हो गई है। हिंदी के चिंतकों न बुंदेली की गहरी जड़ें खोजने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसी माह तीन और चार दिसंबर को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में देश के हिंदीचिंतकों और दिशा निर्धारकों का संगम हुआ। 
 
तारीख के लिहाज से यह अद्वितीय मौका था। पहली बार देश के विचारकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति के रचनासेवियों और उनके बहुमूल्य कार्यों को हिंदी साहित्य के इतिहास में उचित स्थान दिलाने की कोशिश समग्रता से की है। यह सब संभव हो पाया है विज्ञान के उच्चकोटि के विद्वान और हाइटेक अध्येता तथा हिंदी के हितचिंतक बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय के भागीरथ प्रयासों के चलते। इसकी अनुगूंज भारतीय हिंदी परिषद के इकतालीसवें अधिवेशन में पास एक विशेष प्रस्ताव में भी सुनाई पड़ी। इस प्रस्ताव में हिंदी परिषद के कर्ताधर्ताओं न खुले मन से यह बात स्वीकार की कि हालांकि प्रो. पाण्डेय विज्ञान के विशेषज्ञ हैं लेकिन भारतीय भाषाओं और संस्कृति से उनका गहरा लगाव है। उनके विशेष प्रयासों और आग्रह के कारण ही भारतीय हिंदी परिषद का 41वां अधिवेशन बुंदेलखंड की हृदयस्थली झांसी में आयोजित किया गया। 
 
काबिलेगौर बात यह है कि भारतीय हिंदी परिषद की स्थापना सन 1942 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष डा. धीरेंद्र वर्मा और तत्कालीन कुलपति सर अमरनाथ झा के प्रयासों से हुई। सन 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापकता, विस्तार तथा गहनता इन तीनों तथ्यों से यह तय हो चुका था कि देश निश्चित रूप से शीघ्र ही स्वतंत्र होगा। इस अवधारणा को केंद्र में रखते हुए भारतीय मनीषियों ने स्वतंत्र देश के विविध सामाजिक संदर्भों से जुड़े भावी भारत के विकास के लिए योजनाएं निर्मित करने का संकल्प शुरू कर दिया था। यह संदर्भ राष्ट्रभाषा हिंदी के उन्नयन तथा उच्च शिक्षा के संकल्पों से भी जुड़ा। इस संस्था का संबंध उच्च शिक्षा संबंधी हिंदी की समस्याओं से रहा है। यह बराबर इसके लिए संघर्ष करती रही है। यह संस्था देश के सभी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापकों से जुड़ी हुई है। इसमें सामयिक और स्थायी लगभग दो हजार विद्वान सदस्य हैं। यह परिषद उच्चस्तरीय अध्यापन की समतुल्यता. स्तरीयता तथा राष्ट्रीय हितबद्धता को ध्यान में रखकर काम करती है। इसका दूसरा स्तरीय दायित्व हिंदी शोध कार्य को व्यवस्थित करके उसे उत्कृष्टता प्रदान करना है ताकि हिंदी शोध की दिशा स्खलित न होने पाए। हिंदी परिषद का संकल्प पूरी तरह से इस संदर्भ से जुड़ा है कि भारतीय समाज रचना की व्यवस्था कैसे संतुलित हो जिससे शैक्षिक प्रशासनिक एवं लोक व्यवस्था के स्तर पर हिंदी को अपेक्षित गौरव प्राप्त होता रहे।
 
भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन का मूल संदर्भ इस बार बुंदेलखंडी भाषा तथा साहित्य के सर्वांग मूल्यांकन का रहा। इसे तय करवाने में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय की अहम भूमिका रही। इसकी तस्दीक अधिवेशन के दौरान परिषद के शीर्ष पदाधिकारियों ने अपने संभाषण में की। 
 
यहां आए हिंदी के विद्वानों ने यह तथ्य स्वीकार किया कि भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन में उन्होंने बुंदेली भाषा के साहित्यिक विश्लेषण के साथ साथ ऐतिहासिक एवं सामयिक मान्यताओं से जुड़े तथ्यों का एकत्रीकरण और उस पर मंथन इसलिए कर रहे हैं ताकि हिंदी की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि का सही आकलन हो सके। उन्होंने बताया कि संपूर्ण हिंदी साहित्य के आदिकाल से लेकर आज तक लगभग एक हजार से अधिक बुंदेलखंडी कवि हैं जिनसे जुड़ा इतिहास केवल विवरणात्मक है। जहां तक बात रही बुंदेलखंडी शब्द की तो यह चौदहवीं सदी का है। यहां अधिवेशन में आए चिंतकों के मन को यही सवाल मथता रहा कि ईसा की चौदहवीं शती से स्थापित इस ऋषिभूमि यानी बुंदेलखंड की भाषा को क्या नई भाषा कह सकते हैं। कारण यह कि इस भाषा के प्रारंभ का कोई साक्ष्य नहीं जिसके आधार पर वे यह कह सकें कि यह प्राचीन भाषा है।
 
भारतीय हिंदी परिषद के अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह का मानना है कि यजुर्वेदकाल में बुंदेलखंड क्षेत्र का नाम यर्जुहोतो था। आगे चलकर इसका नाम युज्रहोता पड़ा। इसका कारण यह था कि यहां ऋषिगण निवास करते थे। वे निरंतर चिंतन साधना में लगे रहते थे। आगे के कालखंड में यह क्षेत्र जुझौती कहलाया। इसका विवरण सातवीं सदी के चीनी यात्री युवान चांग ने दियी है। बाद में इसे जुझारखंड तथा और बाद में इस नगरी को विंध्यखंड कहा गया। कालांतर में यही नाम बुंदेलखंड पड़ा। बुंदेलखंड नाम 14वीं सदी में महाराज हेमकरण बुंदेला ने दिया।     
 
हिंदी के विद्वानों का मानना है कि मध्यकालीन भाषा क्षेत्र में हिंदी के तीन रूप रहे। पहला ब्रजभाषा तथा हिंदी पश्चिम भारत दूसरा मध्यदेशीय अवधी तथा हिंदी मध्य का भारत तथा तीसरा भोजपुरी का बिहारी भाषा पूर्व का भारतीय क्षेत्र। ब्रजभाषा तथा बिहार क्षेत्रों की भाषा का सर्वेक्षण तथा सांस्कृतिक विकासक्रम का सर जार्ज ग्रियर्सन से लेकर सुनीति कुमार चटर्जी तक व्यापक रूप से मूल्यांकन हो चुका है। अवधी भाषा के विकास पर भी यह कार्य डा.बाबूराम सक्सेना कर चुके हैं। हम मध्यप्रदेश को बुंदेली. बघेली. छत्तीसगढ़ी भाषाओं में बांट रहे हैं किंतु इसकी भाषिक रूप.रचना एवं साहित्यिक संदर्भों का जब तक सही मूल्यांकन नहीं किया जाता तब तक भाषिक सर्वेक्षण तथा साहित्यिक विश्लेषण का पक्ष अधूरा रहेगा।
 
विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए यहां बुंदेलखंड विश्वविद्यालय परिसर के विभिन्न सभामारों में दो दिनों तक चल गोष्ठियों में हिंदी हितचिंतकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति से जुड़े पक्षों पर विचार मंथन किया। विद्वानों ने शोधपत्र पेश किए। इन्हें अहम दस्तावेज के रूप में सहेजा जाएगा। विश्वविद्यालय ने शोधपत्रों को एक पत्रिका के रूप में सहेजने का निर्णय लिया है। बुविवि के कुलपति ने पत्रिका के प्रकाशन पर आने वाले संपूर्ण खर्च को वहन करने का निर्णय लिया है।   
 
अब हिंदी के विद्वानों में यह उम्मीद जगी है कि बुंदेलखंड के लोक साहित्य और संस्कृति को हिंदी साहित्य के इतिहास में वह वाजिब स्थान मिल सकेगा जिसकी वह हकदार है। उनका मानना है कि हाइटेक भगीरथ के प्रयास रंग लाएंगे।           
 
उमेश शुक्ल
 
प्रवक्ता-
जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय.झांसी.  
मोबाइल 9452959936
 

टीवी पत्रकार पर हमले के मामले में मानवाधिकार आयोग ने भेजा एसएसपी को नोटिस

लखनऊ स्थित टीवी पत्रकार मोहसिन हैदर के साथ लखनऊ पुलिस के कर्मचारियों द्वारा किये गए आपराधिक हमले की सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा की गयी शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान ले लिया है.
 
सहायक निबंधक (विधि) ने इस शिकायत पर एसएसपी लखनऊ को नोटिस जारी करते हुए उनसे छः सप्ताह में मामले पर रिपोर्ट मांगी है. आयोग ने इस शिकायत की प्रति एडीजी, मानवाधिकार, युओई को प्रेषित करते हुए कहा है कि यदि छः सप्ताह में रिपोर्ट नहीं प्राप्त होती है तो आयोग इस सम्बन्ध में अपने स्तर से कार्यवाही करेगा.
 
डॉ ठाकुर ने चौक थाने के सब इन्स्पेक्टर रुमा यादव तथा आरक्षी सुनील यादव और सियाराम यादव द्वारा मोहसिन हैदर और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के साथ किये गए अकारण गाली-गलौज और मारपीट को मानवाधिकार उत्पीडन की एक गंभीर घटना बताते हुए तत्काल कार्यवाही की मांग की थी.
 
आयोग के द्वारा पुलिस को भेजा गया पत्र-

सुधाकर शर्मा, प्रमोद मिश्रा, शोएब और केके सक्सेना के बारे में सूचनाएं

बदायूं से खबर है कि तहसील बिसौली में अमर उजाला से हटाए गए सुधाकर शर्मा को जागरण में प्रभारी बनाया गया है. वहीं बिसौली में ही जागरण देख रहे प्रमोद मिश्रा अमर उजाला पहुंच गए हैं.
 
उधर बरेली से खबर है कि तहसील बहेड़ी में शोएब को हिन्दुस्तान का प्रभारी बनाया गया है. वे हिमांशु पांडेय की जगह लेंगे. शोएब इसके पहले अमर उजाला में काम कर चुके हैं जहां उन्हें आरोपों के चलते अमर उजाला ने बाहर कर दिया था. 
 
बरेली में ही केके सक्सेना ने दैनिक जागरण से इस्तीफा देकर कैनिवज टाइम्स ज्वाइन कर लिया है. केके लंबे समय से जागरण से जुड़े थे. वह बदायूं के जिला प्रभारी भी रह चुके हैं.
 
भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

जितेन्द्र ज्योति ने हिन्दुस्तान छोड़ा, भास्कर से जुड़े

हिन्दुस्तान पटना से खबर है कि जितेन्द्र ज्योति ने हिन्दुस्तान का दामन छोड़कर दैनिक भास्कर के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्हें जल्दी ही हिन्दुस्तान नोएडा से हिन्दुस्तान पटना के भागलपुर ब्यूरो में भेजा गया था लेकिन कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी. 
 
जितेन्द्र हिन्दुस्तान पटना के इकलौते वरिष्ठ संवाददाता थे. वे हिन्दुस्तान के नोएडा ब्यूरो के इंचार्ज रहे हैं. इसके पहले जितेन्द्र सहारा पटना में चीफ करेसपांडेंट और हिन्दुस्तान पटना में कार्यालय संवाददाता के तौर पर काम कर चुके हैं.
 
भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को गैर कानूनी माना

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाइकोर्ट के उस फैसले को गैरकानूनी करार दिया है जिसमें समलैंगिकों के सहमति से बनाये गए यौन सम्बन्धों को सही माना गया था. जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस जेएस मुखोपाध्याय की पीठ ने हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ योगगुरू रामदेव, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य के द्वारा दायर याचिका पर ये फैसला दिया.
 
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि हाईकोर्ट का फैसला कानूनी दृष्टि से गलत है. कोर्ट ने माना कि आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिकता एक अपराध है और संविधान में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है कि धारा 377 को रद्द किया जा सके. कोर्ट ने महाधिवक्ता से कहा कि अगर सरकार चाहे तो कानून में संशोधन करवा सकती है.
 
इससे पहले हाइकोर्ट ने 2009 में समलैंगिक सम्बन्धों पर अपने फैसले में कहा था कि धारा 377 के अंतर्गत समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध घोषित करना समलैंगिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है. इस फैसले का जहां एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया था वहीं कई व्यक्तियों और सामाजिक संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था.
 

पुतिन ने रूस की सरकारी समाचार एजेंसी बंद की

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने सरकारी न्यूज एजेंसी आरआईए नोवोस्ती को भंग कर दिया है. आरआईए रूस की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी थी और इसके जिम्मे रूस की सभी सरकारी नीतियों और जनजीवन की हलचलों को कवर करना तथा देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुधारने की जिम्मेदारी थी. पुतिन का ये कदम रूसी मीडिया पर उनके नियंत्रण बढ़ाने के तौर पर देखा जा रहा है.
 
रूस ने इसकी जगह अब एक नई एजेंसी के गठन का आदेश दे दिया है. क्रेमलिन की वेबसाइट पर दिये गए विवरण के अनुसार इसकी जगह रेसिया सेगोदनया (रसिया टुडे) नई न्यूज एजेंसी होगी जो रूस की सभी सरकारी नीतियों को कवर करेगी. पुतिन ने दिमित्री किसलयेव को रसिया टुडे का प्रमुख बनाया है. खास बात यह है दिमित्री की छवि रूस में समलैंगिकता के विरोधी के तौर पर है. 

अदालत के सामने आज पेश किए जाएंगे तरुण तेजपाल

पणजी : तहलका के प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को बुधवार को अदालत के सामने पेश किया जाएगा। उनकी चार दिवसीय पुलिस हिरासत की अवधि समाप्त हो चुकी है। तेजपाल को उनकी महिला सहकर्मी के साथ कथित दुष्कर्म करने के आरोप में 30 नवंबर को गिरफ्तार किया गया था।

उन्हें पहले छह दिनों के पुलिस हिरासत में भेजा गया था, जिसके बाद इसकी अवधि चार दिन और बढ़ा दी गई थी। तेजपाल पर भारतीय दंड संहिता की धारा 354-ए (यौन उत्पीड़न), 376 (दुष्कर्म) और 376 (2)(के) (पुरुष द्वारा उसके संरक्षण में पद का दुरुपयोग करते हुए किसी महिला के साथ दुष्कर्म) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

उन पर धारा 341 (अनुचित अवरोध) और धारा 342 (अनुचित रोक) के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। पुलिस पीड़ित पत्रकार, तीन गवाहों और तहलका की पूर्व प्रबंध संपादक शोमा चौधरी का बयान दर्ज कर चुकी है। सूत्रों ने बताया कि जांचकर्ता अभी तेजपाल को तोड़ने और उनसे अपराध कबूल करवाने में नाकाम रहे हैं। तेजपाल ने कथित रूप से पूछताछ के दौरान जांचकर्ताओं को बताया है कि पीड़िता और उनके बीच चीजें सहमति से हुई थीं। (एजेंसी)

मीडिया के खिलाफ एकजुट दिखे सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद

मीडिया के खिलाफ जनप्रतिनिधियों और नेताओं के मन में कितना मलाल है यह यूपी विधानसभा की कार्रवाई के दौरान देखने को मिला. आज तक चैनल पर मुजफ्फरनगर दंगों पर किए गए स्टिंग के जांच के लिए बनाई गई समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सदन के समक्ष पेश की. इसमें चैनल को रा फुटेज न देने तथा अन्‍य आरोप लगाते हुए अवमानना का आरोपी बताया गया. सदन ने इसे स्‍वीकार करते हुए आजतक, हेडलाइंस टुडे, सुप्रिय प्रसाद तथा चैनल के लिए स्टिंग करने वाले चैनल के रिपोर्टर तथा कैमरामैन को अवमानना के तहत दोषी पाया तथा कार्रवाई का प्रस्‍ताव पास किया.

खैर, यह तो रहा स्टिंग के बारे में सदन की कार्रवाई. पर दूसरा पक्ष यह रहा कि इस मामले पर भाजपा को छोड़कर सारा पक्ष-विपक्ष एकजुट दिखा. बसपा, कांग्रेस, रालोद समेत सभी दल सदन में चौथे स्‍तंभ के खिलाफ नजर आए. सपा के सबसे बड़े विरोधी बसपा के नेता स्‍वामी प्रसाद मौर्य का गुस्‍सा मीडिया के खिलाफ पूरी तरह झलका. वे स्टिंग में दोषी बनाए गए आजम खान के पक्ष में खुलकर बोलते दिखे. कांग्रेस के नेता प्रदीप माथुर एवं रालोद के नेता ठाकुर दलबीर सिंह ने भी मीडिया को अपने हद में रहने की नसीहतें दीं.

हां, इस दौरान इस मामले का भाजपा ने खुलकर विरोध किया. भाजपा विधायक दल के नेता हुकुम सिंह एवं प्रदेश अध्‍यक्ष डा.लक्ष्‍मीकांत बाजपेयी ने इसे एकतरफा कार्रवाई मानते हुए संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट आने तक इंतजार करने की बात कही. उन्‍होंने जांच समिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भाजपा का सदस्‍य नहीं था, इसके बावजूद समिति अंतरिम रिपोर्ट पेश कर रही है. भाजपाई वेल में आकर अपना विरोध भी दर्ज कराया, लेकिन बहुमत साथ नहीं होने के चलते उनकी मांग दब गई.

मंत्री अंबिका चौधरी तो स्टिंग को ही फर्जी बता दिया. इस मामले से साफ दिखा कि हर प्रकार के गलत सही काम करने वाले नेता मीडिया से कितने खफा हैं. वे मीडिया को किस हद तक पालतू बनाकर रखना चाहते हैं. कुछ चाटूकार टाइप के पत्रकार स्‍वलाभ के लिए ज्‍यादातर भ्रष्‍ट नेताओं की दल्‍लागिरी करते हैं. इसके चलते भी मीडिया की गरिमा गिरी है. खासकर मीडिया में दबदबा रखने वाले एक खास जाति के दल्‍ले पत्रकारों ने पत्रकारिता को यूपी में बेच डाला है. लखनऊ में ही पत्रकारों के कई ऐसे नाम हैं जो सियासी हलकों में दल्‍लों के रूप में पहचाने जाते हैं. इनकी हर सरकार से बनती है. इन्‍हीं दल्‍लों की वजह से पत्रकारिता की गरिमा कम हो रही है और पत्रकार और मीडिया नेताओं के निशाने पर आ रही है. 

2जी मामले में उपेंद्र राय और सुबोध जैन को भी अवमानना की नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2जी स्पेक्ट्रम जांच में कथित रूप से हस्तक्षेप करने के आरोप में सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय के अलावा दो पत्रकार उपेंद्र राय और सुबोध जैन के खिलाफ अवमानना कार्यवाही के लिए नोटिस जारी किया है। निवेशकों को धन लौटाने के मामले में अदालत की नाराजगी झेल रहे सुब्रत राय के लिये यह नई परेशानी है। इसके साथ ही सहारा समूह की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है।

करोड़ों रुपए के 2जी मामले की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय के जांच अधिकारी राजेश्वर सिंह की अवमानना याचिका पर अदालत ने राय को नोटिस जारी करते हुये कहा कि यह याचिका विचार योग्य है। सर्वोच्च अदालत निवेशकों का धन लौटाने के शीर्ष अदालत के न्यायिक आदेशों पर अमल नहीं करने के कारण पहले ही सुब्रत राय के विदेश जाने पर रोक लगा चुका है। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस केएस राधाकृष्णन की पीठ ने जांच अधिकारी को कथित रूप से धमकी देने और ब्लैकमेल करने वाले सहारा समूह के दो पत्रकारों उपेन्द्र राय और सुबोध जैन को भी नोटिस जारी किए हैं।

पीठ ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी राजेश्वर सिंह के आरोप बहुत ही गंभीर हैं। साथ ही अदालत ने राय और उनके कर्मचारियों की इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि अवमानना याचिका विचार योग्य नहीं है। क्योंकि यह अटार्नी जनरल की मंजूरी के बगैर दाखिल की गयी है। पीठ ने कहा कि संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट स्‍वतंत्र है इसके अधिकार को अवमानना कानून के तहत सी‍मित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने सहारा इंडिया न्यूज नेटवर्क और उसकी सहयोगी कपंनियों को सिंह को सुबोध जैन की ओर से भेजे गये 25 सवालों से संबंधित कोई भी कार्यक्रम प्रकाशित या प्रसारित करने पर रोक लगा दी थी। सुबोध जैन ने सिंह को 25 सवाल भेजकर उनसे जवाब मांगा था जो निहायत ही निजी प्रकृति के थे। इसके अलावा सहारा समूह के अखबार तथा चैनलों में भी राजेश्‍वर सिंह के खिलाफ कई खबरें प्रकाशित और प्रकाशित की गई थीं।

स्टिंग करने वाले आज तक चैनल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्‍ताव

लखनऊ : यूपी विधानसभा ने मुजफ्फरनगर दंगों पर सनसनीखेज स्टिंग दिखाने वाले टीवी चैनल आज तक के चैनल हेड सुप्रिया प्रसाद को अवमानना के लिए जिम्मेदार ठहराया है। मंगलवार को यूपी विधानसभा में स्टिंग ऑपरे‌शन की जांच के लिए बनाई गई कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी। न्यूज चैनल के एक्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्टर, रिपोर्टर और कैमरामैन के खिलाफ मंगलवार को राज्य विधानसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पारित किया गया।

कमेटी के अध्‍यक्ष सतीश निगम ने विधानसभा में अं‍तरिम रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि आज तक के चैनल हेड/ईडी सुप्रिया प्रसाद को संसदीय समिति की कार्यवाही में ‌अवरोध उत्पन्न करने और सदन की अवमानना व विशेषाधिकार की अवहेलना करने के लिए प्रथम दृष्टया दोषी माना जाता है। उनके खिलाफ सुसंगत नियमों के अंतर्गत कार्यवाही की जाए। इतना ही नहीं, उन्हें मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े स्टिंग के रॉ फुटेज और शूटेड मेटेरियल जांच कमेटी के सामने पेश करने का निर्देश दिया जाता है।

कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में यह भी कहा है कि टीवी ‌टुडे नेटवर्क की ओर से जांच के दौरान जिस तरह से पत्राचार किया गया है, वह असंवै‌धानिक है। आज तक के जवाबों को समिति ने सदन की गरिमा के खिलाफ भी बताया है। कमेटी ने कहा है‌ कि इस वजह से भी सदन की अवमानना और विशेषाधिकार का प्रश्न उठता है। कमेटी ने सदन को बताया कि आज तक/हेडलाइंस टुडे से बार-बार अनुरोध करने के बावजूद शूटेड मेटेरियल नहीं दिया गया। न ही कवरेज करने वाले पत्रकार और कैमरामैन को ही समिति के सामने पेश किया गया। इसे कमेटी ने जांच में अवरोध डालना बताया है।

अब सुप्रिया प्रसाद को सदन में आकर अपना पक्ष रखना होगा और सदन पर उन संसदीय कार्यवाही भी कर सकता है। इसके पहले बीजेपी के लक्ष्मीकांत वाजपेयी और हुकुम सिंह ने जांच समिति के गठन प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस बारे में चूंकि संसद की भी एक समिति जांच कर रही है इसलिए विवादित फुटेज विधानसभा की इस समिति को नहीं दी गई। भाजपा ने चैनल के खिलाफ एकपक्षीय कार्रवाई बताते हुए विरोध किया, लेकिन विपक्षी दलों ने बहुमत के आधार पर कार्रवाई के प्रस्‍ताव को पास कर दिया।

सोनभद्र पुलिस द्वारा प्रताड़ित पत्रकार ने की मुख्यमंत्री से शिकायत

सोनभद्र से निकलने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र कूटचक्र के सम्पादक महेन्द्र अग्रवाल ने मुख्यमंत्री से पत्र लिखकर अनपरा के थानाध्यक्ष द्वारा वहां के एक पत्रकार के साथ मिलकर उन्हें प्रताड़ित करने की शिकायत की है। महेन्द्र अग्रवाल ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में लिखा है कि वे पिछले कई दिनों से सोनभद्र के एक पत्रकार सुल्तान शहरयार की कथित जालसाजियों के खिलाफ कूटचक्र में लिखते रहे हैं। जिसकी वजह से उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है।
 
अपने खिलाफ खबरे छपने से नाराज सुल्तान शहरयार खान ने अनपरा के थानाध्यक्ष वीरेन्द्र कुमार यादव के साथ मिलकर उन्हें फर्जी मुकदमे में फंसा दिया और उनके खिलाफ गिरफ्तारी का दबाव बना रहे हैं। जिसकी वजह से वे दहशत में हैं और सोनभद्र से बाहर रह रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पुलिस की ज्यादतियों से संरक्षण देने की मांग की है.
 
महेन्द्र अग्रवाल के द्वारा मुख्यमंत्री को भेजा गया पत्र दिया जा रहा है-
 
माननीय मुख्य मंत्री
उ0प्र0 शासन, लखनऊ
विषय – अनपरा सोनभद्र पुलिस द्वारा माफिया पत्रकारों के साथ गठजोड़ कर फर्जी मुकदमा में फंसाने, माफिया, जालसाज कथित पत्रकार सुल्तान शहरयार खॉ के खिलाफ लम्बित अनेकों शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं करने, संरक्षण देने के सम्बन्ध में
 
सन्दर्भ – पूर्व शिकायत पत्र संख्या 2378 दिनांक 24-09-2013, पत्र संख्या 2250 दिनांक 22-04-2013, पत्र संख्या 2196 दिनांक 08-03-2013, पत्र संख्या 2124 दिनांक 19-12-2012
 
माननीय महोदय,
आपका ध्यान अपने पूर्व सन्दर्भित शिकायत पत्रों की ओर आकृष्ट कराते हुए अत्यधिक खेद के साथ अवगत कराना हैं कि ‘भय तथा माफिया मुक्त शासन’ देने की आपकी महत्वाकांक्षी घोषणाओं की आपकी ही पुलिस के कथित कर्मठ तथा कर्तव्यनिष्ठ अनपरा थानाध्यक्ष विरेन्द्र कुमार यादव धज्जियॉ उड़े रहे हैं। जालसाजी, ठगी करने वाले, टैक्स चोर सफेदपोश माफियाओं की पोल खोलने, करोड़ों रूपयों के टैक्स चोरी का पर्दाफाश कर सरकार को राजस्व का फायदा कराने वाले प्रार्थी (सम्पादक कूटचक्र साप्ताहिक समाचार) को आपके शासनकाल में अवैध धनउगाही कर निरकुंश हो चुके सफेदपोशों द्वारा लगातार उत्पीड़ित किया जा रहा हैं। इसी क्रम में आपका ध्यान अनपरा सोनभद्र के कथित पत्रकार (बिना किसी अखबार से जुड़े, ठगी, जालसाजी कर धनउगाही के बूते देश-विदेश घुमने वाले सुरक्षा के लिए खतरा बने) सुल्तान शहरयार खॉ के काले कारनामों, जालसाजी, ठगी के साथ-साथ फोन से जान-माल की धमकी देने, झूठी शिकायत करने, जाली लेटरपैड पर फर्जी हस्ताक्षर बनाकर भ्रमित करने वाला पत्र भेजने आदि के सम्बन्ध में उपरोक्त सन्दर्भित पत्रों द्वारा अवगत कराने, श्रीमान पुलिस महानिदेशक, श्रीमान प्रमुख सचिव गृह, श्रीमान प्रमुख सचिव सूचना आदि को भी सन् 2010 से लगातार दर्जनों पत्र लिखने, आपके निर्देश के बावजूद भी अनपरा जिला सोनभद्र की पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही नहीं करने, संरक्षण व शह देने के कारण मनबढ़ सुल्तान शहरयार खॉ की झूठी तहरीर पर थानाध्यक्ष अनपरा ने दिनांक 06-12-2013 को रपट संख्या 654/13 लिखकर मुझे फर्जी मुकदमें में न केवल फॅसा दिया है बल्कि जबरन गिरफ्तार करने के लिए ऐसा दहशत फैलाया कि मुझे अनपरा छोड़ कर भागना पड़ गया।
 
सुल्तान शहरयार खॉ द्वारा पहले तो माननीय अल्पसंख्यक आयोग में मेरे खिलाफ शिकायत पत्र दिया जो जॉचोपरान्त झूठी तथा पेशबन्दी की पाये जाने तथा किराया का लाखों रूपया बकाया होने पर अनपरा विद्युतगृह प्रशासन द्वारा अवैध तरीके से कब्जा किये टूरूम फील्डहास्टल के कमरे की बिजली लाइन काट देने पर दिनांक 28-06-2013 को मो0 नम्बर 9559194007 से जान-माल की धमकी दिया जिसकी शिकायत मैने थानाध्यक्ष अनपरा से किया तथा लिखित शिकायत पुलिस महानिदेशक सहित आलाधिकारियों से किया, जिस पर आज तक स्थानीय पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं किया। इसी बीच में सुल्तान शहरयार खॉ द्वारा मेरे समाचार पत्र का जाली लेटरपैड बनाकर फर्जी हस्ताक्षर कर श्रीमान निदेशक सूचना को भ्रमित करने वाला पत्र भेजा, जिसकी लिखित शिकायत पत्र संख्या 2378 तथा पत्र संख्या 2379 दिनांक 24-09-2013 श्रीमान जी की सेवा में तथा श्रीमान पुलिस महानिदेशक से किया। कोई कार्यवाही नहीं किये जाने पर शिकायत पत्र संख्या 2392 दिनांक 21-10.-2013 सीधे श्रीमानथानाध्यक्ष अनपरा सोनभद्र को लिखते हुए उसकी प्रतिलिपि श्रीमान पुलिस महा निदेशक, डीआईजी लखनऊ व मीरजापुर, पुलिस अधीक्षक सोनभद्र को प्रेषित किया। अत्यधिक खेद की बात हैं कि पुलिस के आलाधिकारियों के निर्देश पत्र व अनुस्मरण पत्र पहुंचने के बावजूद भी अनपरा पुलिस द्वारा आज तक सुल्तान शहरयार खॉ के खिलाफ कोई वैधानिक कार्यवाही नहीं किया गया बल्कि थाने में बैठा कर शह और संरक्षण दिया जाता हैं जिसके कारण दिनांक 06-12-2013 को अनपरा पहुंचने पर तत्काल ही
 
थानाध्यक्ष महोदय दहशत फैला कर साजिशन पत्रकारिता की आड़ में टैक्स चोरी तथा नकली उत्पादों का व्यापार करने वाले, ठेकेदारी करने वाले सफेदपोशों के कथित दबाव में सुल्तान शहरयार खॉ द्वारा तीन बार बदली गई फर्जी तथा झूठी तहरीर ‘घर में घुस कर मारपीट करने’ का आरोप लगाते हुए बैक डेट में मेरे खिलाफ फर्जी मुकदमा संख्या 654/13 दर्ज कर अपनी कर्मठता, कर्तव्यपरायणता का बेहतरीन उदाहरण तो पेश किया ही हैं साथ ही सपा शासन में पुलिसिया तांडव के लगातार लग रहे आरोपों में अपना नाम भी लिखवा लिया हैं। श्रीमान थानाध्यक्ष के खिलाफ स्थानीय जनता की तमाम शिकायतें अलग
से आपकी सेवा में आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित करूंगा।
 
सविनय निवेदन हैं कि वर्तमान पदस्थ थानाध्यक्ष विरेन्द्र कुमार यादव को तत्काल स्थानान्तरित करते हुए पेशबन्दी में फर्जी तथा झूठे तहरीर पर अनावश्यकरूप से दबाव बनाने के लिए साजिशन दर्ज किये गए रपट संख्या 654/13 को निरस्त करने, जालसाज माफिया सुल्तान शहरयार खां तथा पत्रकारिता की आड़ में टैक्स चोरी वगैरा करने वाले सफेदपोशों के खिलाफ लम्बित शिकायतों को दर्ज कर वैधानिक कार्यवाही करने, गिरफ्तार कर जेल भेजने का स्पष्ट आदेश जारी करने का कष्ट करें अन्यथा ये लोग प्रार्थी तथा उसके परिवार को किसी भी हद तक जाकर अपूरणीय क्षति पहुंचा सकते हैं जिसकी भरपाई करना असम्भव हो।
 
प्रतिलिपि- सूचनार्थ एंव त्वरित कार्यवाही हेतु आग्रह के साथ-
1- माननीय अध्यक्ष, राज्य मानव अधिकार, लखनऊ
2- श्रीमान प्रमुख सचिव गृह, उ0प्र0 शासन, लखनऊ- शिकायत संख्या पीजी 05363838/लो.शि.2/2013
3- श्रीमान पुलिस महा निदेशक, उ0प्र0, लखनऊ
4- श्रीमान अपर पुलिस महा निदेशक लॉ एण्ड आर्डर, उ0प्र0, लखनऊ
5- श्रीमान पुलिस उप महा निरीक्षक, मीरजापुर रेंज, मीरजापुर
6- श्रीमान पुलिस अधीक्षक, सोनभद्र
 
आपका-
 
महेन्द्र अग्रवाल
 
326-ए, प्रिंस काम्पलेक्स, हजरतगंज, 
लखनऊ-226001
मो-9415376117 
ईमेल- newskootchakra12@yahoo.com

मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश

भोपाल। आर्थिक अपराध ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने मध्य प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया के खिलाफ अदालत में चालान पेश कर दिया है। उनके खिलाफ डाक शुल्क में छूट पाने के लिए एक पत्रिका का रजिस्ट्रेशन नंबर इस्तेमाल करके शासन को करीब दो लाख रुपये का नुकसान पहुंचाने के मामले में केस दर्ज किया गया था. बीस साल पहले शलभ भदौरिया और विष्णु विद्रोही ने म.प्र. श्रमजीवी पत्रकार संघ का पंजीयन कराया था जिसमें डाक शुल्क देने से बचने के लिए उन्होंने दूसरी पत्रिका के रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल किया था. बाद में शिकायत मिलने पर जांच की गई जिसमें ब्यूरों ने आरोपों को सही पाया था.
 
राज्य आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो ने भोपाल में 23-02-2013 को प्रकरण क्रमांक 05/06 के तहत ये मामला दर्ज हुआ था. प्रकरण को गुलाबसिंह राजपूत थाना प्रभारी राज्य आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो भोपाल ने दर्ज कराया तथा शलभ भदौरिया और विष्णु वर्मा विद्रोही को आरोपी बनाया गया. इसकी विवेचना पुलिस अधीक्षक सुधीर लाड़, ब्यूरो इकाई भोपाल ने 30-10-2007 को पूरी की. जांच में श्रमजीवी पत्रकार मासिक पत्रिका के आरएनआई प्रमाण पत्र क्र. 3276/72 को तेलगू की पाक्षिक पत्रिका राजमुन्दरी का पाया गया था.
 
इस फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर शलभ भदौरिया एवं स्व. विष्णु वर्मा विद्रोही ने पत्रिका का डाक पंजीयन कराकर जनवरी 2003 से अगस्त 2003 तक 34,755 रु. का अवैध आर्थिक लाभ प्राप्त किया, बुक पोस्ट की दरों में वृद्धि के कारण ये राशि बढ़कर 1,40,625 हो गई. ब्यूरो ने प्रथम दृष्टया इसे अपराध मानते हुए भादवि की धारा 120बी, 420, 467, 468, 471 के अन्तर्गत मामला दर्ज किया. जब्त किये गये दस्तावेज तथा शलभ भदौरिया और विष्णु वर्मा द्वारा दी गई सूचनाओं और गवाहों के बयानों से इसे सही पाया गया.
 
जनसम्पर्क विभाग की सख्ती दिखाते हुए समस्त समाचार पत्र को विज्ञापन नीति के अनुपालन के लिये आर.एन.आई. प्रमाण पत्र मांगे तब श्रमजीवी पत्रकार मासिक पत्र के प्रमाण पत्र की प्रति विष्णु वर्मा द्वारा दी गई. 15 मई 2005 को जांच में पाया गया कि वर्ष 1999 से 2003 तक शलभ भदौरिया श्रमजीवी पत्रकार समाचार पत्र के प्रधान संपादक के पद पर थे. शलभ भदौरिया द्वारा ही कार्यालय कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी भोपाल, प्रवर अधीक्षक डाक घर भोपाल में भी हस्ताक्षरित दस्तावेज प्रस्तुत किये गए. इस तरह फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर आर्थिक लाभ प्राप्त किया गया साथ धोखाधड़ी कर शासन को 1,74970 रूपये का नुकसान पहुंचाया गया. मामला सम्पूर्ण दस्तावेजों एवं जांच रिपोर्ट के साथ तत्कालीन भोपाल पुलिस अधीक्षक (ईओडब्ल्यू) के द्वारा महानिदेशक आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को वर्ष 2007 में भेजा जा चुका है जिसे माननीय न्यायायिक दण्डाधिकारी महोदय जिला भोपाल को प्रस्तुत किया गया है.

 

आकाशवाणी की मुफ्त एसएमएस समाचार सेवा लांच

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आल इंडिया रेडियो की मुफ्त एसएमएस सेवा लांच कर दी है. इस सेवा के तहत पंजीकृत मतदाताओं को उनके मोबाइल पर खबरों की सुर्खियां निःशुल्क प्रदान की जाएंगी. आल इंडिया रेडियों का संचालन सरकार की प्रसारण इकाई प्रसार भारती द्वारा किया जाता है.
 
इस सेवा के पंजीकरण के लिए आल इंडिया रेडियो के श्रोता मोबाइल पर AIRNWS, फिर स्पेस देकर अपना नाम लिखकर उसे 08082080820 पर एसएमएस भेज सकते हैं अथवा उसी नंबर पर मिसकाल दे सकते हैं. इस सेवा से अब आप कहीं भी खबरों से जुड़े रह सकते हैं.

हाई कोर्ट चीफ जस्टिस की टिप्पणी से व्यथित छात्र ने उन्हें भेजा खुला पत्र

इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच के चीफ जस्टिस धनञ्जय यशवंत चंद्रचूड तथा एक अन्य जज की टिप्पणियों से व्यथित कक्षा बारह के छात्र आदित्य ठाकुर ने उन्हें एक खुला पत्र भेज कर अपना ऐतराज़ जताया है.

आदित्य ने अपनी बहन तनया ठाकुर के साथ डॉ सीएनआर राव को भारत रत्न दिए जाने के फैसले को चुनौती दी थी जिसे चीफ जस्टिस और जस्टिस डी के अरोरा की बेंच ने 05 दिसंबर को खारिज कर दिया. आदेश में यह भी कहा गया कि आदित्य को इस मामले की अल्प अथवा शून्य जानकारी है और यह पीआईएल दायर करने में उनका इस्तेमाल किया गया है.

 
आदित्य ने अपने पत्र में कहा है कि वह सुनवाई के दिन चीफ जस्टिस के सामने उपस्थित तक नहीं हुआ था और अपनी अनुपस्थिति में ही अपने बारे में इस तरह के निष्कर्ष निकाल लिए जाने से बेहद आहत है. उसने कहा है कि वह ना सिर्फ पीआईएल में प्रस्तुत बातों को पूरी तरह समझता है बल्कि उसने अपनी मर्जी से यह पीआईएल दायर किया था. तथागत अवतार तुलसी सहित तमाम बाल प्रतिभाओं का उदाहरण देते हुए उसने चीफ जस्टिस से कहा कि किसी भी व्यक्ति को मात्र कम उम्र का होने के नाते कम नहीं आंका जाना चाहिए.
 
नीचे आदित्य के द्वारा चीफ जस्टिस को भेजे खुले पत्र का पाठ दिया जा रहा है-
 
To,
The Hon’ble Chief Justice,
Hon’ble Allahabad High Court, Lucknow Bench, 
Lucknow
 
Subject- An Open letter in disagreement with your words used for me in order dated 05/12/2013 in Writ Petition No- 11368 of 2013 M/B
 
Dear Sir,
            I am Aditya Thakur, a student of Class XII in the Police Modern School, Gomti Nagar, Lucknow. I, along with my elder sister, Tanaya Thakur had filed a Public Interest Litigation (PIL) No- 11368 of 2013 M/B to cancel or to withdraw the Award of Bharat Ratna to Dr. C.N.R. Rao for reasons stated in the PIL. The PIL was dismissed by the bench consisting of you and Justice Devendra Kumar Arora on 05/12/2013 saying that such public interest petitions, which are filed only for the purpose of seeking publicity, must be discouraged and dealt with, with a firm hand.
 
In the order, among other things, you also said- “The second petitioner is a minor aged about 15 years. The petitioner, who appears in person, states that the petition was drafted with the help of her mother Dr. Nutan Thakur. Dr. Nutan Thakur is habituated of filing public interest petitions before this Court and it is surprising that a minor, who has little or no knowledge of any of the issues of the proceedings leading to the conferment of Bharat Ratna on an eminent Scientist, has been used to present a public interest petition” and that-“Be that as it may, the first petitioner who is a law student, has absolutely no knowledge of the work or of the achievements of Dr. C.N.R. Rao.”
 
It is these words which have extremely hurt me to force me to write this Open letter to you. The truth is that I was not even present before you on the date of hearing and yet you concluded that I have “little or no knowledge of any of the issues” in the PIL and that I have been “used” to file this PIL by my mother.
 
I don’t even know on what basis you arrived at such conclusions even in my absence. I am completely bewildered and definitely shattered to hear you say that I did not file this PIL on my sweet will but was used by my mother to file it. It has hurt me to know that you concluded on your own that I have been used by others to file this PIL because I, being a minor, would not be having any knowledge about the matter.
 
With due regards to your position and authority, I want to say that at the age of 15, I have sufficient knowledge, information and outlook about things around me. I not only fully understood the issue raised by us in the PIL but I also fully agreed with. What is more, I am willing to get these claims of mine tested at any place, at any time. I was and am still of the firm opinion that as per the facts on records and as facts presented in the PIL, Dr CNR Rao was wrongly and incorrectly awarded the Bharat Ratna. Each and every word written in the PIL, though not exactly written by me, had my full personal approval which I had done only after fully understanding and agreeing to the matter. Hence to conclude that just because I am a boy of 15 and so I can’t have any understanding of such things is a definite and direct insult to me and my wisdom.
 
I hope you agree that it is not a nice thing to demean an individual just because of his age and if such a thing is done by a man of the stature of the Chief Justice of the High Court, it becomes even more serious.  Again, if such a thing is done in open Court in the absence of the person commented against and gets recorded in public document, it is very painful and humiliating
 
I was not able to present myself before you on the day of hearing only because I had to attend some important Class, otherwise I would have definitely appeared before you along with my elder sister. Hence, I would like to say that demeaning my intellect and intellectual abilities merely on the basis of being slightly young has really pained me and I feel truly hurt by this.
It kindly needs to be seen that the issue raised in the PIL was not about the quality of Sri Rao as a scientist but it was about Bharat Ratna awarded to Dr Rao. Thus the question in the PIL was whether Dr Rao has been rightly given the Bharat Ratna or not. We had presented many facts which make it clear that Bharat Ratna to Dr Rao was not correct. But the order seems to have shifted the focus from this issue to whether I or my sister know about Dr Rao and his works or not. Hence it was sad to see from the order that on one hand Dr Rao was being defended and on other, I along with my sister were being denigrated as having little or no knowledge about the subject matter, though the fact is that along with my sister I had full knowledge and comprehension about what we were presenting.
 
As you might yourself be knowing, young age does not mean that a person would necessarily be of low understanding. There are hundreds of examples of persons who did world class works at very young age. Here I present only a handful of such examples. The World Record of youngest computer expert has been achieved by Mr Wasik Farhan Roopkotha (seven-year-old) from Dhaka, Bangladesh. The World Record of ‘Youngest to climb the Mount Everest’ has been achieved by Mr Temba Tsheri Sherpa (16 years and 14 days) from Dolkha, Nepal. The World Record of ‘Youngest Professional Singer’ has been achieved by Ms Atithi Gautam K.C (3 years) from Katmandu, Nepal. World record of speaking maximum languages at teen age has been achieved by 16 year old Mr Timothy Doner from New York, US. Ms. Saara Vishnoei (Delhi, India) has made drawing with the message of ‘Save Girl Child’ at the age of Six years. Mr Krishen Shrikanth from Banglore, India made a world record of Youngest Director by directing the movie at the age of 9. Mr Susant Pattnaik from Odisha, India has been recognized as the youngest inventor and social Entrepreneur at a young age of 17 years. Mr Tathagat Avatar Tulsi (born 9 September 1987) completed high school at the age of 9, earned a B.Sc. at the age of 10 and a M.Sc. at the age of 12
 
I do not regard myself in the league of the above truly great child prodigy but am nevertheless reasonably intelligent. Hence I would strongly urge that to unilaterally conclude on your own that I, being a minor, was used for this PIL and have little or no understanding was definitely incorrect and demeaning to me. These comments hurt me to such an extent that I decided to write this Open letter to you to make its points public and to vent my inner feelings.
 
My purpose of writing this letter is not to challenge your wisdom and authority but solely to present my inner pains and to request you to kindly refrain from making conclusions about a young person’s abilities without adequate facts on records. I do apologize for anything in the letter that you might find inappropriate.
 
Dated- 10/12/2013 
 
(Aditya Thakur)
 
5/426, Viram Khand, 
Gomti Nagar, Lucknow
# 094155-34525
  


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भारत रत्न के खिलाफ दायर पीआईएल खारिज

पत्रकारिता और राजनीति में फिर से आम आदमी

पत्रकारिता में आम आदमी के जिक्र करने के पूर्व मैं साहित्य से बात आरम्भ करता हूं. साहित्य का ही एक हिस्सा पत्रकारिता है इसीलिए पत्रकारिता की एक परिभाषा यह भी दी जाती है कि पत्रकारिता जल्दी में लिखा गया साहित्य है. साहित्य में जो संवेदनशीलता और जीवन-मूल्यों की बात होती है, वही पत्रकारिता में भी होती है. 
 
साहित्य से पत्रकारिता इस मायने में भिन्न है कि पहले साहित्य में वर्तमान की तिक्तता से अलग कल्पना-लोक में विचरण करने की परम्परा थी. बाद में पहली बार प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों और कहानियों के जरिये आम आदमी के सुख-दुख, हर्ष, विषाद, करूणा और भावना का चित्रण किया. इस क्रम में कफन, पॉवपूजी, शतरंज के खिलाड़ी, ठाकुर का कुआं, पंच परमेश्वर, आदि कहानियों एवं कर्मभूमि, सेवा सदन आदि उपन्यासों की चर्चा की जा सकती है. उनकी कृतियों में धरती की गन्ध और आम आदमी की जिन्दगी को अत्यन्त महत्वपूर्ण और मूल्यवान समझा गया है. 
 
पत्रकारिता में प्रारम्भ से ही सामान्य जन की बात की जाती रही है. आजादी के पूर्व पत्रकारिता राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रजन के प्रति प्रतिबद्ध थी. बाद में भी पत्रकारिता ने व्यवसायीकरण की दिशा में अग्रसर होने के बावजूद आम आदमी से मुंह नहीं मोड़ा.
 
आजादी के पूर्व तो राजनीति आम आदमी और राष्ट्र की ओर उन्मुख थी, लेकिन आजादी के बाद साहित्य और राजनीति दोनों दिगभ्रांत हो गये. कुछ समय बाद साहित्यकार संभल गये और साहित्य में नये सिरे से, खासकर कहानियों और कविताओं में, आम आदमी केन्द्र बिन्दु में आ गया. कविताओं में निराला, धूमिल, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचनशास्त्री आदि कवियों ने आम आदमी को ही केन्द्र में रखकर कविताएं लिखीं, जिनमें उनके जीवन दुख-दर्द, पीड़ा-कसक, व्यथा-वेदना की अभिव्यक्ति हुई है. कहानियों में नई कहानी का आन्दोलन चलाकर मोहन राकेश, कमलेश्वर एवं राजेन्द्र यादव ने प्रेमचन्द की मशाल लेकर आम आदमी के हृदय के स्पंदन को सूक्ष्मता के साथ चित्रित किया. माहेन राकेश की कहानियां मिस पाल, मलबे का मालिक, आम आदमी की जिन्दगी संवेदना को छूती है. कमलेश्वर ने कस्बे का आदमी, पानी की तस्वीर आदि कहानियों में आम आदमी की यंत्रणाओं, पीड़ाओं और संघर्षों की तलाश की है. राजेन्द्र यादव ने भी अपनी कहानियों में आम आदमी को हमेशा केन्द्र में रखकर इन्सान की आत्मा को पहचानने की कोशिश की है. 
 
अब मैं राजनीति और पत्रकारिता पर आता हूं. पत्रकारिता ने तो हमेशा ही अन्धेरों, उलझनों और यन्त्रणाओं के बीच आम आदमी के छटपटाते सपनों को अपनी खबरों में रखा और जहां भी उसके पांव चट्टानों-काटों से लहूलुहान हुए, उन पर मलहम लगाया. उन्हें पथरीले और कंटीले रास्तों से हटाकर सपाट राह दिखाई.
 
लेकिन राजनीति जब आजादी के बाद भटकी तो भटकती ही गयी इसके रास्ते पेंचदार होते गये. भ्रष्टाचार का अंगदी पांव, छल और जनता को खोखला आश्वासन राजनीति की पहचान बन गयी. धूर्तता और छल से राजनेता मालामाल होने लगे, अपनी तिजोरीं भरने लगे, भाई भतीजा वाद करने लगे और अपने को उस ऊंचे स्थान पर प्रतिष्ठापित कर दिया, जहां आम आदमी का पहुंचना मुश्किल था. बाहुबलियों ने चुनाव जिताने का ठेका लेना शुरू कर दिया. अब पहली बार 'आप' ने राजनीति को संवारने, सुधारने का काम किया और आजादी के पहले राजनीति का जो रूप था, उस रूप को पुनः धारणकर आम आदमी के कन्धे पर चलने लगी. यह करिश्माकर दिखाया अरविन्द केजरीवाल ने. दिल्ली में आम आदमी के बल पर आम आदमी ने उम्मीदवार के रूप में जो सफलता हासिल की उससे नया इतिहास रचा गया. इस नये इतिहास का नया अध्याय तब पूरा होगा जब दिल्ली के साथ पूरे देश में आम आदमी के कन्धों पर सवार होकर आप राजनीति के रास्ते पर अपना सफर पूरा करेगी. अभी तो इसके सफर की शुरूआत और एक मोड़ ही है, मन्जिल तक पहुंचना अभी बाकी है. 
 
              लेखक अमरेन्द्र कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क 123.amrendrakumar@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अशोक बाजपेयी के हुलफुल्लेपन के अंतर्राष्ट्रीय दुष्परिणाम

मुझे लोक या आंचलिक भाषाओं का मरजीवड़ा कहलाए जाने की कोई पछाँही बीमारी नहीं है किन्तु कभी-कभी कथित बोली-बानियों के कुछ शब्द कतिपय सन्दर्भविशेषों में बहुत कारगर हो उठते हैं. हमारे बुंदेलखंड में अतिरिक्त या मूर्ख उत्साहीलालों के लिए ‘हुलफुल्ला’ विशेषण चलता है और शायद उसी अर्थ में ‘हुड़ुकलुल्लू’ को भी हिंदी में कई, विशेषतः युवा, लेखकों ने अंगीकार किया है. इधर एक ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण हादसा पेश आया है कि यह दोनों शब्द बहुत याद आ रहे हैं.
 
हिंदी जगत को स्मरण होगा कि मित्रवर अशोक वाजपेयी ने (‘कभी-कभार’,9 जून) उसे सूचित किया था कि वह इस ‘’रवीन्द्रनाथ ‘गीतांजलि’ नोबेल-पुरस्कार शती-वर्ष’’ के उपलक्ष्य में ‘सैयद हैदर रज़ा प्रतिष्ठान’ के तत्वावधान में एक विश्व कविता समारोह करने जा रहे हैं जिसके लिए उन्होंने भारत के राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री से आर्थिक सब्सिडी मांगी है. उनके द्वारा आयोज्य इस वैश्विक अनुष्ठान में कितने देशों से कौन-से कवि-कवयित्रियाँ आनेवाले थे यह अशोक ने ज़ाहिर नहीं किया था – शायद इसलिए भी कि वे स्वयं इतने विदेशी भागीदारों को या तो जानते न थे या अनेक कारणों से उनके नाम तय नहीं कर पाए थे. 
 
चूंकि मेरे लिखे पर उचित ही व्यापक रूप से ध्यान नहीं दिया जाता इसलिए यह कैसे कहूं कि उसी हिंदी जगत को यह भी स्मरण होगा कि अगले ही रविवार (16 जून) को मैंने अशोक के प्रस्तावित विश्व काव्य मेले का रवीन्द्रनाथ के बहाने विरोध किया था और यह सवाल उठाए थे कि किसी जीवित, संपन्न चित्रकार को अमर और समृद्धतर बनाए जाने के उद्देश्य से खड़े किये गए निजी ट्रस्ट या फाउंडेशन द्वारा आयोजित किसी अंतर्राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन को कोई भी सरकार आर्थिक मदद क्यों देगी. विशेषतः तब जबकि उसी सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा सौ प्रतिशत पोषित एक ऐसी अकादमी भी मौजूद है (अब पिछले कई वर्षों से वह मिनिस्ट्री और वह अकादमी कैसी है और उनके मंत्री/अध्यक्ष/सचिव आदि कैसे रहते चले आए हैं यह एक अलग बहस है) जिसका काम ही ऐसी साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना है और जिसका कार्यालय पिछली आधी सदी से ऐसे भवन में है जिसका नाम कवि रवीन्द्र पर ही है? ऐसे किसी भी जलसे पर एक करोड़ रुपए से कम क्या खर्च होगा. अशोक में सब ऐब होंगे पर उनमें कंजूसी शामिल नहीं है, उनके यहां पैसा शराब की तरह बहाया जाता रहा है और इतनी बड़ी रक़म सरकार द्वारा किसी निजी प्रतिष्ठान के सीईओ को कैसे सैंक्शन की जा सकती है, भले ही वह ‘अधिकारी’ उसी मंत्रालय में एक वरिष्ठ आइ ए एस अफ़सर रहकर रिटायर क्यों न हुआ हो ?
 
लेकिन रज़ा फाउंडेशन के पैसे और पद,अपने पूर्व-आइ ए एस होने के आत्म-विश्वास और अपनी निजी प्रतिभा के ‘हुब्रिस’ से मुग्ध अशोक ने इस विश्व-काव्यायोजन के प्रयोजन हेतु  ‘पी आर’ तथा प्रतिभा-आखेट के लिए एक ‘यूरोप-टूअर’ बना ही डाला और वहाँ विभिन्न देशों, राजधानियों-महानगरों, साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की यात्राएँ कीं. मित्रों और पूर्व-परिचितों से भी मिले. उन्हें यकीन था कि उनके प्रतिष्ठान को सरकारी अनुष्ठान-राशि मिल जाएगी और उन्होंने दाएं-बाएं आश्वासन और निमंत्रण बांटने शुरू कर दिए.
 
अब जब कोई ऐसा ‘सेल्फ-फिनान्स्ड’ व्यक्ति यूरोप में सही ‘नेम-ड्रॉपिंग’ सहित अपनी कर्नल ब्लिम्प-नुमा, ’सूडो-ऑक्सब्रिज’ इंग्लिश बोलता हुआ इतने आत्म-गौरव से लबरेज़ घूमता है तो आमतौर पर भरोसा हो जाता है कि इस तरह के विज़िटिंग-कार्ड वाला, इतना डाइनैमिक 70-वर्षीय ‘अधेड़’ आदमी ‘फ्रॉड’ तो नहीं हो सकता. यूं भी अशोक ‘फ्रॉड’ नहीं हैं. उन्हें अपने आयोजन पर इतना विश्वास था कि उन्होंने सबको इसी दिसंबर की तारीख भी दे दी. लिहाज़ा उनके दावतनामों या तज़वीज़ों पर फ़ौरन यकीन किया गया, कुछ लोगों ने टिकट भी बुक कर लिए और कुछ संस्थाएं अपनी-अपनी सरकारों से अपने कवियों के लिए ग्रांट लेने की अर्ज़ियां भी देने लगीं. यूरोप में इन बातों को बहुत संजीदगी से लिया जाता है और महीनों पहले योजनाएं बनानी पड़ती हैं.
 
यह ठीक-ठीक मालूम नहीं हो पाया है कि अशोक ने रज़ा फाउंडेशन की ओर से कितने और कौन से कवियों और देशों को निमंत्रण या प्रस्ताव दिए. सिर्फ़ दो प्रमाणित जानकारियां हैं कि एक छोटे-से देश की बड़ी काव्य-प्रतिभा को उन्होंने पक्की चिट्ठी दी और दूसरे एक छोटे-से मुल्क से कहा कि वह दो कवियों को भेजने की तैयारियाँ कर ले, ख़त पहुंचा दिया जाएगा.
 
इधर दैवदुर्विपाक से कुछ ऐसा हुआ कि शायद अशोक का महत्वाकांक्षी प्रस्ताव राष्ट्रपति या/और प्रधानमंत्री कार्यालय से होता हुआ संस्कृति मंत्रालय के तार्किक गलियारों तक पहुंचा जहां वह सिद्धांततः तो मान लिया गया किन्तु इस तरमीम के साथ कि सारा कार्यान्वयन साहित्य अकादमी अपनी सुविधा से करेगी, पूरा विशेष बजट उसी को मिलेगा, वही जवाबदेह होगी, एक उच्चस्तरीय स्टियरिंग कमेटी ज़रूर बनेगी जिसमें संस्कृति मंत्रालय के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ अशोक वाजपेयी (हिंदी), सीताकांत महापात्र (ओड़िया), के. सच्चिदानंदन (मलयालम), सितांशु यशस्चंद्र (गुजराती) आदि होंगे. अशोक के निमंत्रण जिन कवियों को भेजे जा चुके हैं उनके सम्मान की यथासंभव रक्षा की जाएगी किन्तु अन्य कवियों और मुल्कों की उनकी फ़ेहरिस्त को रद्द माना जाएगा.
 
यह सत्यापित नहीं हो पाया है किन्तु सुना है कि मंत्रालय में ऐसी अफ़वाह है कि उपरोक्त पहले तीन कवियों का एक गुप्त महत्वाकांक्षी एकल एजेंडा स्वयं को विश्व मंच पर नोबेल पुरस्कार के भारतीय उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करने का भी हो सकता है, इसलिए एक विचित्र किन्तु सत्य शर्त यह भी लगा दी गई है कि कमेटी के कवि-सदस्य प्रस्तावित विश्व-काव्य-मंच पर स्वेच्छा से अपनी कविताएं नहीं पढ़ेंगे. यूं भी जहां इस सम्मेलन में चालीस विदेशी कवियों के पहुंचने की आशंका है वहां भारत को सिर्फ़ दस का कोटा अलॉट है जिसके लिए राशन की दूकान पर केरोसीन की आमद जैसी फ़ौज़दारी होगी.
लेकिन यूरोप में अशोक की अदूरदर्शी, ग़ैरज़िम्मेदाराना, आपत्तिजनक, लगभग आपराधिक गतिविधियों के दुष्परिणाम उन कवियों और देशों को झेलने पड़ रहे हैं जिन्होंने रज़ा फाउन्डेशन के इस नुमाइंदे पर विश्वास कर लिया. जिस प्रतिभागी को वह दिसंबर का पत्र दे आए थे उसे अब अकादमी का 4-9 फरवरी का निमंत्रण मिला है, जब उसे दक्षिण अमेरिका के एक बड़े कविता-समारोह में जाना ही है और इधर उसने दिसंबर का दो व्यक्तियों का भारत का टिकट ले रखा था. अशोक अब अपनी लज्जा ढांपने के लिए उसे दिल्ली से कहीं बहुत दूर किन्हीं संदिग्ध जेबी भगिनी-संस्थाओं के सामने कविता पढ़ने भेज रहे हैं लेकिन स्वाभाविक है कि वह बेहद नाराज़ और परेशान है. इतने बड़े काव्य-व्यक्तित्व के साथ यह सरासर धोखाधड़ी है. अशोक ने उनसे कोई क्षमा-याचना भी नहीं की है.
 
यह मामला तो एक व्यक्ति के साथ था लेकिन दूसरे में तो अशोक ने एक राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थान के साथ दुर्व्यवहार किया है. अव्वल तो यह समझना मुश्किल है कि उन्होंने भले ही कविता में समृद्ध किन्तु अपेक्षाकृत एक छोटे देश को दो निमंत्रणों का प्रलोभन क्यों दिया क्योंकि उस पैमाने पर तो शायद जर्मनी और फ्रांस सरीखे देशों से उन्होंने दस-दस कवि बुलाए होंगे. उस संस्थान ने अपने मंत्रालय से दिसंबर की भारत-यात्रा के लिए दो कवियों के वास्ते अनुदान लेने की कार्रवाई शुरू कर दी लेकिन जब अशोक ने उनसे सारे संपर्क तोड़ लिए तो घबरा कर उन्होंने पूछताछ शुरू की और उन्हें पता चला कि साहित्य अकादेमी अशोक की लिस्ट के कवियों को आमंत्रित कर चुकी है और उनके देश से कोई नाम नहीं है. इस संस्थान ने अपनी साख खोई हो या ना खोई हो, यह उनके राष्ट्रीय साहित्य की अवमानना तो है ही. पता नहीं वह किसको क्या जवाब दे रहे होंगे.
 
इस बात की औपचारिक जांच होनी चाहिए कि अशोक ने किस आधार पर किन कवियों और देशों को निमंत्रित किया था. साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय को न केवल इन तथ्यों को उजागर करना चाहिए बल्कि सैयद हैदर रज़ा, अशोक वाजपेयी और रज़ा ट्रस्ट के जेबी ट्रस्टियों से प्रभावित देशों और विदेशी कवियों से लिखित, सार्वजनिक क्षमा-याचना करवानी चाहिए. भारत के विदेश मंत्रालय और भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् (आइ.सी.सी.आर.) को इस घटना को एक उदाहरण बना कर दिल्ली-स्थित सारे दूतावासों को एक गश्ती-पत्र लिख कर चेताना चाहिए कि वे और उनके सम्बद्ध संस्थान इस तरह के निमंत्रणों और उन्हें देने वाली संस्थाओं की पूरी जांच कर लिया करें. इस विश्व कविता समारोह में तो ऐसा पत्र बंटवाना ही चाहिए ताकि वह कवियों के माध्यम से ही सारे देशों और अंतर्राष्ट्रीय साहित्य-बिरादरी में प्रसारित हो जाए. अशोक की विचारहीन अहम्मन्यता से विदेशों मे पहले से ही पिटी हुई भारत की छवि पर एक और दाग लगा है. इधर भारत में कई ‘भाषा’ या ‘विश्व साहित्य' और फिल्मादि समारोह कुकुरमुत्तों की तरह सर उठा रहे हैं जिनके प्रच्छन्न उद्देश्य एकदम प्रकट हैं. यह सही है कि उनसे सम्बद्ध अत्यंत संदिग्ध और दुर्बुद्धि स्त्री-पुरुषों के लिए कई दरवाज़े खोल दिए गए हैं लेकिन दिग्भ्रमित उत्साह में सैयद हैदर रज़ा और अशोक वाजपेयी के नाम भी उन उचक्के माफ़ियाओं के साथ जुड़ने के मोहताज क्यों दिखें?
 
लेखक विष्णु खरे वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

चौबे से छब्बे बनने के चक्कर में कहीं दुबेजी बनकर न रह जाए ‘आप’

‘आप’ पार्टी ने जो चमत्कार दिल्ली में किया है, वह अन्य प्रांतों में पहले भी हो चुका है। आंध्र में 1983 में ‘तेलुगु देशम’ और असम में ‘अगप’ ने 1985 में इतनी सीटें और वोट प्राप्त कर लिए थे कि अनुपात की दृष्टि से देखा जाए तो वे ‘आप’ से भी आगे निकल गई थीं। इन दोनों पार्टियों के पास ऐसे सुनिश्चित और उत्तेजनात्मक मुद्दे थे कि उनके कारण उनकी विजय होनी ही थी। लेकिन ‘आप’ बिना किसी खास मुद्दे के ही इतनी सीटें और वोट ले आई। इसका मूल कारण था, जनता की थकान। 
 
जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार और भाजपा की भेड़चाल से ऊब गई थी। यदि यही ‘आप’ राजस्थान में लड़ लेती तो शायद अपनी सरकार बनाने में भी सफल हो जाती। लेकिन दिल्ली में हुई उसकी जीत ने उससे बहुत-सी आशाएं पैदा कर दी हैं। सबसे पहले तो उसे सारे भारत में फैलना होगा। कम से कम शहरों में तो वह अब आसानी से अपने पांव जमा ही सकती है। दूसरा, उसे यह तय करना होगा कि वह एक चुनावबाज़ पार्टी बनेगी या कोई परिवर्तनकारी पार्टी बनेगी? यदि सत्ता-परिवर्तन ही उसका लक्ष्य बन गया तो तेलुगु देसम और अगप की तरह वह कांग्रेस की कार्बन कॉपी बन जाएगी।
 
दिल्ली में पैदा हुई ‘आप’ दिल्ली में ही अपनी कब्र सजा लेगी। जरुरी यह है कि वह व्यवस्था-परिवर्तनवाली पार्टी बने। वोट लेने में उसने अद्भुत महारत दिखाई है। क्या जनता की मांगों के लिए उतने ही जोरदार तरीके से वह लड़कर भी दिखाएगी? जो रुप कांग्रेस का आजादी के पहले था और समाजवादी पार्टी का डॉ. लोहिया के जीवित रहते था, क्या वह रुप ‘आप’ का बन सकता है? तीसरा, अब वह प्रतिपक्ष में बैठेगी तो क्या दिल्ली में फिर से चुनाव नहीं होंगे? अगर होंगे तो ‘आप’ कहीं चौबे से छब्बे बनने के चक्कर में दुबेजी बनकर न रह जाए? चौथा, क्या यह संभव नहीं है कि ‘आप’ सरकार से बाहर रहकर भाजपा को समर्थन दे और उससे अपने घोषणा-पत्र के प्रावधानों को यथासंभव लागू करवाए? वह एक रचनात्मक प्रतिपक्ष की आदर्श भूमिका क्यों न निभाए? पांचवा, वह चाहे तो कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बना सकती है लेकिन तब लोकसभा के चुनाव में उसकी भूमिका धूमिल हो सकती है। 
 
चुनाव के पहले और बाद के माहौल में जमीन-आसमान का फर्क होता है। चुनाव के बाद दुश्मन को भी गले लगाकर उसका दम निकाला जा सकता है लेकिन उसके लिए जबर्दस्त दमगुर्दे की जरुरत है। अब दिल्ली में दुबारा चुनाव होंगे या कोई सरकार बनेगी, यह तय करने का अधिकार सिर्फ ‘आप’ को है। भाजपा को टेका लगाकर ‘आप’ दिल्ली में खुद को ‘रचनात्मक विपक्ष’ बना ही सकती है, साथ-साथ वह अगले आम चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर सबल विपक्ष की तरह भी उभर सकती है। उसे जो भी कदम अगले दो-तीन दिन में उठाना है, वह बहुत फूंक-फूंक कर उठाना है। यह बड़ा नाजुक समय है।
 
लेखक डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

रामविलास पासवान वाली स्थिति ना हो जाए अरविंद केजरीवाल की

दिल्ली में सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से महज सात पायदान दूर रहे आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा न तो किसी को समर्थन देने और न किसी से समर्थन लेने का अडिग फैसला और दिल्ली की जनता को एक बार फिर मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने की उनकी मंशा उन्हीं पर भारी पड़ सकती है। अरविंद चाहते तो वह बिना शर्त कांग्रेस या बीजेपी के समर्थन से सरकार बना सकते थे पर उन्होंने ऐसा न करने का फैसला लेकर दिल्ली को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेल शायद अपने और अपनी पार्टी के पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली है। 
 
कहीं ऐसा तो नहीं कि केजरीवाल ने अपनी पार्टी को सरकार में आने पर दिल्ली की जनता से प्रति परिवार प्रतिदिन 700 लीटर पीने का पानी और वर्त्तमान से आधे दर पर बिजली देने का जो वादा किया था उसे पूरा ना करने की सम्भावना को देखते हुए उन्होंने सरकार बनाने का फैसला नहीं किया क्योंकि दिल्ली के लिए ही क्या ये किसी राज्य में सरकार बनाने वाले किसी दल के लिए संभव नहीं हैं. 
 
भारत के लोकतांत्रिक राजनीतिक इतिहास में यह 70 के दशक से ही देखा जा रहा है कि जिस दल या उसके नेता ने देश या किसी राज्य को अपनी हठधर्मिता के कारण मध्यावधि चुनाव की आग में धकेला उसका हश्र क्या हुआ। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ‘आप’ का भी हश्र कहीं लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान की तरह न हो जाए जिन्होंने बिहार में फरवरी-2005 के चुनाव के बाद ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर काम कर अपने 29 निर्वाचित विधायकों और अपने ‘बंगले’ की चाबी लेकर गायब हो गए। बाद के मध्यावधि चुनाव चुनाव में स्थिति स्थिति यह हुई कि रामविलास अपने बंगले के चौकीदार भी ना रह सके। राजद से अलग होकर लड़े और बिहार के 29 विधानसभा क्षेत्रों में जीत का परचम लहराने वाले रामविलास अगर उस वक्त नीतीश कुमार को समर्थन दे देते तो बिहार में ना तो राष्ट्रपति शासन लगता ना ही बिहार के लोगों को आठ माह बाद मध्यावधि चुनाव का दंश झेलना पड़ता। अक्टूबर-2005 में हुए मध्यावधि चुनाव में जहां रामविलास पासवान को 10 सीटों पर तो 2010 के चुनाव में महज 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा उसमें भी उनके तीन विधायक बाद में जदयू में शामिल हो गए। 
 
मध्यावधि चुनाव से आजिज जनता का मूड बदलने में देर नहीं लगता इसका उदाहरण इंदिरा गांधी के जमाने से देखा जा रहा है वो भी तब जब इतनी महंगाई नहीं थी। 1974 में बिहार से शुरू हुए छात्र आंदोलन के बाद तत्कालीन र्प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में आपातकाल लगाया तो जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरे देश में जोरदार आंदोलन चला और जनता पार्टी की नींव पड़ी। 1977 में हुए 6वें लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी 298 सीटें जीतकर सत्ता में आई। यहां तक कि इस चुनाव में इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी दोनों अपने संसदीय क्षेत्र से चुनाव हार गए थे और कांग्रेस अपने छह सहयोगी पार्टियों के साथ महज 153 सीट पर ही सिमट कर रह गई थी। पर इसी जनता पार्टी ने जब ढाई साल बाद यानी 1980 में देश की जनता पर मध्यावधि चुनाव का बोझ डाला तो जनता ने फिर से कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों को 353 सीट से विजेता बना अपार बहुमत देकर यह संकेत दिया कि जनता चुनाव का ज्यादा बोझ बर्दाश्त नहीं कर सकती। इस चुनाव में जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल महज 31 और चरण सिंह की अगुवाई वाली जनता पार्टी (सेक्युलर)और उनके सहयोगी दल महज 41 सीट पर सिमट कर रह गए थे। 
 
जिस तरह दिल्ली में ‘आप’ को 28 सीटें दिलाने में युवाओं की बड़ी भूमिका रही कभी इसी तरह 1977 में जनता पार्टी को देश की सत्ता में लाने की युवाओं की भूमिका थी पर इन्हीं युवाओं ने 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए हुए मध्यावधि चुनाव में पासा पलट दिया था। अरविंद केजरीवाल ने शायद भारत के राजनीतिक इतिहास और यहां के मतदाताओं के मन और मूड का पूरी तरह अध्ययन नहीं किया है। जिन मुद्दों के खिलाफ मतदाताओं ने उनकी पार्टी को वोट दिया संभव है सरकार न बनने और मध्यावधि चुनाव की नौबत की स्थिति तक वो मुद्दे खत्म हो जाएं और मतदाता का मूड बदल जाए। अरविंद केजरीवाल की हठधर्मिता से जहां कांग्रेस को कुछ फायदा मिल सकता है वहीं बीजेपी को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। अगर दिल्ली में फिर से चुनाव की स्थिति बनी तो इसका सबसे ज्यादा घाटा अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को ही उठाना पड़ सकता है।
 
लेखक विनायक विजेता वरिष्ठ पत्रकार हैं.

देवरिया में न्यू मीडिया संगोष्ठी में पांच लोग होंगे सम्मानित

आगामी 21 दिसंबर को देवरिया स्थित जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन नया मीडिया मंच द्वारा किया जा रहा है. उक्त कार्यक्रम में नया मीडिया के विस्तार एवं ग्रामीण अंचलों में इसकी जरुरत पर तमाम राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों का वक्तव्य होना है. उक्त आयोजन में दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्वं संपादक श्री शंभूनाथ शुक्ल, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह, संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ स्तंभकार एवं टीवी पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी सहित संपादक श्री पंकज झा, श्री यशवंत सिंह, श्रीमती अलका सिंह(रेडियो पत्रकार) श्री संजीव सिन्हा, श्री लतांत प्रसून, श्री आशुतोष कुमार सिंह, आदि वक्ता उपस्थित रहेंगे. 
 
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी देवरिया एवं आईपीएस श्री अमिताभ ठाकुर सहित पटना मंडल के आईजी श्री अरविन्द पाण्डे भी उपस्थित होंगे. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार आचार्य रामदेव शुक्ल करेंगे. उक्त कार्यक्रम के माध्यम से नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता की तमाम संभावनाओं को टटोलने का प्रयास किया जाएगा. मुंबई से आ रहे पत्रकार आशुतोष कुमार सिंह द्वारा प्रोजेक्टर स्लाइड के माध्यम से नया मीडिया के उल्लेखनीय कार्यों की प्रस्तुति की जायेगी. 
 
कार्यक्रम के दौरान ही पत्रकारिता एवं अध्यापन के क्षेत्र में नया मीडिया पर अपने उल्लेखनीय उपस्थिति के लिए देवरिया की माटी से आने वाले पाँच गणमान्यों को मोती बीए नया मीडिया सम्मान से सम्मानित किया जाएगा. भोजपुरी साहित्य एवं लेखनी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती को, लंबे समय तक पत्रकारिता के अनुभव को देखते हुए दैनिक जागरण के पत्रकार श्री संजय मिश्र को, देवरिया की माटी के डॉ सौरभ मालवीय को, नया मीडिया पर सशक्त उपस्थिति को देखते हुए संत विनोबा पीजी कॉलेज के रीडर डॉ जय प्रकाश पाठक को एवं पत्रकारिता में युवा चेहरा राजीव कुमार यादव को इस सम्मान से नवाजा जाएगा. दोपहर 2 बजे से शुरू होकर शाम 5 बजे तक चलने वाले इस आयोजन के संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी एवं कार्यक्रम के सह-संयोजक शिवानन्द द्विवेदी सहर ने उक्त सूचना दी. कार्यक्रम के संयोजक अंग्रेजी के चर्चित ब्लोगर प्रवीन शुक्ल पृथक हैं. कार्यक्रम के स्थानीय संयोजन में पवन मिश्र, रामकुमार, विद्यानंद पाण्डे, दिलीप मल्ल, राहुल तिवारी, रामदास, संतोष उपाध्याय सहित तमाम लोग जुड़े हुए हैं. 
 
शिवानन्द द्विवेदी सहर
 
सह-संयोजक
 
मो.-09716248802
 
प्रेस रिलीज

‘आप’ ना तो हाशिये की आवाज है और ना अपने मौजूदा स्वरुप में बन सकती है

ये सही बात है कि 'आप' ने दिल्ली में कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है और यथास्थितिवाद के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश का बड़ा फायदा उसको जरूर मिला है. लेकिन जैसा कि कुछ विद्वान् लोग कह रहे हैं, क्या उसके खाते में जो तथाकथित जनअसंतोष की लहर है उसको एक सही राजनीतिक दिशा दे दी जाये तो भारतीय राजनीति का मौजूदा स्वरुप बदलने में और फासीवादी शक्तियों के उभार को रोकने में मदद मिल जायेगी? 
 
यहां सवाल महज स्थापित सत्ता-ध्रुवों के खिलाफ 'आप' के समर्थन-विरोध का नहीं है, सवाल देश की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव का है. हो सकता है कि अपने कुशल चुनावी प्रबंधन, जनता के एक हिस्से के आदर्शवादी रुझान और फौरी बदलाव की आकांक्षाओं की लहरों के सहारे 'आप' मौजूदा सत्ता संरचना में कुछ सेंध लगाने में सफल हो जाये, पर क्या वो वाकई सामाजिक-राजनितिक बदलाव की ताकत बन सकती है? क्या कोरे रूमानी आदर्श के सपनों के अलावे उसकी कोई ठोस विचारधारा है? क्या उसने बदलाव के लिए आवश्यक कोई जमीनी संघर्ष किया है? क्या ये कुछ अजीब नहीं कि 'आप' के समर्थकों में से ऐसे लोगों की तादाद काफी है जो मोदी को पीएम देखना चाहते हैं? तो क्या ऐसे लोग वाकई देश और समाज को बदलते देखना चाहते हैं? और अगर ये बदलाव है तो उसकी दिशा क्या होगी? 
 
मेरा साफ़ तौर पर मानना है कि आप के अधिकांश समर्थकों में निम्न मध्य वर्ग के कुछ हिस्से के अलावा मध्य वर्ग का वो हिस्सा है जो अपने वर्गीय/जातीय/आर्थिक हितों को सुरक्षित रखते हुए ही कोई बदलाव चाहता है उसकी कीमत पर नहीं। ये कुछ ऐसा ही है जैसे बिना वर्गीय/जातीय ढांचे पर चोट पहुंचाए दलितों/वंचितों/आदिवासियों/शोषितों के लिए सामाजिक न्याय और समता की बात करना। 'आप' की अहम जीत के बावजूद मेरे लिए ये मान पाना मुश्किल है कि वो वाकई किसी महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक बदलावों की वाहक बनेगी या फिर भारतीय राजनीति में कुछ क्रांतिकारी परिवर्तनों की पटकथा लिखेगी क्योंकि 'आम आदमी पार्टी' उतनी भी 'आम' नहीं। इस परिघटना को सरल तरीके से देखने के बजाय मुख्तलिफ सामाजिक प्रवृत्तियों की विचार-प्रक्रिया और वस्तुगत आधारों पर उसका गहन विश्लेषण करना जरूरी है. खासकर वामपंथ के लिए. और उन वामपंथियों के लिए तो और भी जो 'आप' की जीत से मुग्ध होकर उसको आम जनता की जीत बताने पर तुल गए हैं. और यहां तक कि देश के तमाम दबे-कुचले हाशिये के लोगों की आवाज बनने की जिम्मेदारी से बचते हुए इसी में खुद की जीत देखने लगे हैं. लेकिन यह समझना होगा कि तमाम जरूरी और जमीनी मुद्दों पर बहसों के बगैर कुछ मुद्दों पर लोकप्रिय सुधारवादी पहलकदमी के जरिये ठोस परिवर्तन की बात नहीं हो सकती। 
 
वामपंथ जिन मुद्दों पर लड़ता रहा है, सत्ता-संरचना के पिरामिड में वो पहले भी हाशिये पर थे और आज भी हैं. क्योंकि असल में वे विचार नवउदारवादी पूंजीवाद की समर्थक सरकारों व कॉर्पोरेट महाकायों के स्वाभाविक गठजोड़ और उनकी सफलता में अपना बेहतर भविष्य देख रहे समाज के दस फीसदी प्रभुवर्गों द्वारा हाशिये पर धकिया दिए गए करोड़ों लोगों की ही आवाज हैं। लेकिन, सच यही है कि वास्तविक बदलाव तभी होंगे जब हाशिये के लोगों की तस्वीर बदलेगी और अफ़सोस कि 'आप' न तो हाशिये की आवाज है और न ही अपने मौजूदा स्वरुप में बन सकती है, भले ही वो कुछ सीटों पर चुनावी जीत हासिल कर ले।
 
लेखक मित्ररंजन पत्रकार एवं सोशल एक्टिविस्ट हैं. इनसे mitraaranjan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.

हिन्दुस्तान में सागर मिश्रा, कृष्ण कुमार का म्युचुअल ट्रांसफर

हिन्दुस्तान में दो लोगों का आपस में म्युचुअल ट्रांसफर किया गया है. नई दिल्ली से सब एडिटर सागर मिश्रा वाराणसी चले गये हैं उनकी जगह लेने के लिए वाराणसी में काम कर रहे कृष्ण कुमार को नई दिल्ली भेजा गया है. सागर मिश्रा ने ही प्रबंधन से वाराणसी जाने की इच्छा जताई थी.

 
भड़ास तक कोई भी सूचना भेजने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

तेजपाल की सजा तहलका को भी मिलनी चाहिए

तहलका के समूचे प्रकरण पर जब आप उनमें काम कर रहे पत्रकारों के नज़रिए से देखते हैं तो आपको दो तरह की अतियों का सामना एक साथ करना होता है. दोनों अतियां विरोधाभाषी और अतार्किक ही दिखेंगी आपको. एक विचार यह कि सभी ‘सरोकारी’ पत्रकारों को कंपनी छोड़ देना था तो दूसरा ये कि तेजपाल के अपराध की सज़ा संस्थान को क्यूं मिले? पहली बात का जबाब यही है कि आपको किसी व्यक्ति के (चाहे वह बॉस ही क्यूं न हो) अपराध की सज़ा खुद को देने की ज़रूरत नहीं है. जब तक महीने का तनख्वाह आपके खाते में आती रहे तब तक बने रहिये नौकरी पर. 
 
वैसे भी अभी मीडिया इंडस्ट्री मंदी के दौर से गुजर रहा है. बड़ी-बड़ी दुकानों में सैकड़ों की संख्या में कार्मिकों की छटनी हो रही है तो ऐसे में कोई रिस्क लेने की जरूरत नहीं है. ज़ाहिर है आपके पास खुद की बैंटेले कार तो होंगी नहीं ना ही तेजपाल की तरह आपका कारोबार पोंटी चड्ढा से लेकर खनिज के धंधेबाजों तक पसरा होगा. शोमा ने कभी आपको कहा भी नहीं होगा कि उसके महल में से कोई हिस्सा आपको मिलने वाला है. मोटे तौर पर आप सभी ठीक-ठाक फीस के पैसे भर मध्यवर्गीय घरों के, छोटे-छोटे शहरों के भारी बोर दोपहर से झोला उठाये वाया माखनलाल, आइआइएमसी और जामिया समेत अन्य संस्थानों से डिग्री-डिप्लोमा हासिल कर रोजी-रोटी की तलाश में निकले होंगे. कुछ अपवादों को छोड़कर 70 के दशक के फ़िल्मी हीरो की तरह ढेर सारी जिम्मेदारियां भी हो सकती हैं आपकी. तो निश्चित रूप से बने रहिये. दुनिया बदल देने की कोई खुशफहमी पाले बिना, कुछ इसी तरह जैसे पीठ पर लैपटॉप लादे अन्य एमबीए या आईटी संस्थान के पेशेवर लगे हैं अपने धंधे में. हां, अगर सच में आपको लग रहा हो कि तहलका में काम कर आप कोई क्रान्ति कर रहे हैं, आपके बॉस सच में कोई मसीहा या फरिश्ता रहे हैं इस पेशे के, तो विनम्र निवेदन यही कि गांव-कस्बे के अपने घर में कुत्ते-बिल्ली पाल लें, मुगालते मत पालें.
 
दूसरे सवाल का जबाब ज़रा लंबा होगा और इस लेख का आशय ही दूसरे सवाल का जबाब खोजना है. आपका कहना ये है कि तरुण तेजपाल की सज़ा तहलका को क्यूं मिले? इसका जबाब देने से पहले उलटा सवाल है आपसे. क्या बंगारू लक्ष्मण के किये की सज़ा आज तक आप लोग भाजपा को नहीं दे रहे हैं. क्या कांग्रेस का अब ये अघोषित नारा नहीं है कि ‘चाहे जितना भी खाओ तेजपाल से पचाओ?’ क्या उस स्टिंग के समय से आजतक कभी भी आपने किसी को कहते सुना कि लक्ष्मण की सज़ा भाजपा को क्यूं दी जा रही है. इसके उलट उस समय भाजपाध्यक्ष को एक लाख पकड़ा दिया जाना मानो कांग्रेस के लिए जन्म-जन्मांतर तक भ्रष्टाचार करने का लाइसेंस थमा दिया जाना साबित हुआ. हर उस मौके पर जब-जब कांग्रेस द्वारा उस एक लाख रूपये से करोड़ों गुने ज्यादा का भ्रष्टाचार किया गया, उसका एक ही जबाब होता था कि भाजपा ने भी एक लाख लिया था. जब भी वो 1.76 लाख करोड के टू जी में रंगे हाथ पकड़ा गया उसका यही तर्क. सारे 122 लाइसेंस रद्द हुए फिर भी यही बात. कनिमोझी-राजा-कलमाड़ी सारे जेल हो आये फिर भी जनता के दिमाग में ठूस-ठूस कर बैठा दिया गया कि ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ हैं और कांग्रेस की दुकान चलती रही. अपन अक्सर यह कहते हैं कि अकेले तेजपाल ने कांग्रेस का इतना भला कर दिया जितना नेहरू और इंदिरा गांधी तक ने नहीं किया होगा. 
 
अब जब बात चल ही निकली है तो ज़रा स्टिंग के बारे में भी कुछ विमर्श हो जाए. अपना शुरू से यह मानना रहा है कि अगर कहीं कोई अपराध हो रहा हो और उसे आपने गुप्त तरीके से फिल्मा लिया तो निश्चय ही आप पत्रकारिता के उच्च मानदंडों पर खड़े उतरे हैं. लेकिन इसके उलट अगर आप खुद किसी अपराध को प्रायोजित करें तब ज़ाहिर है किसी के हाथ में खेल रहे होते हैं आप. अगर आपने किसी ऐसे मामले में लुभाया किसी को जिससे उसका दूर-दूर तक नाता नहीं हो और जब वो आपके द्वारा झूठ बोल-बोल कर थमाए गए नोटों को स्वीकार कर लिया तो उसे फिल्माकर अगर आपने ये समझा कि सच में आपने कोई कीर्तिमान स्थापित कर लिया है तो इसका नैसर्गिक दंड आपको आज न कल मिलना ही है. भारतीय वांग्मय तो इसी बात की गवाही देता है कि अगर आपने किसी को अपराध करने को उकसाया-लुभाया तो पहले आप दंड के भागी बनेंगे, फिसल ‘जाने’ वालों पर बाद में सोचा जाएगा. रामायण का उद्धरण याद कीजिये. मारीच नाम का राक्षस सोने का मृग बन कर सीता को लालच देता है. जबकि उस समय भी यह सामान्य मान्यता थी कि सोने का हिरन हो ही नहीं सकता. लोभ में आ जाती हैं सीता और राम जाते हैं उसका शिकार करने. आपने गौर किया होगा कि सीता को डगमगा जाने की सज़ा भले बाद में भोगनी पड़ी हो लेकिन मारा सबसे पहले ‘मारीच’ ही जाता है. बंगारू प्रकरण में मारीच नाम के राक्षस की भूमिका में यही तरुण तेजपाल थे. यह तो हुई धन की बात. लोग मोटे तौर पर दो ही चीज़ों के लिए भ्रष्ट होते हैं. एक धन और दूसरा ‘काम’ के लिए. उसका भी एक उदाहरण है कि जब महादेव का ताप भंग करने कामदेव पहुचा तो क्षण भर के लिए स्त्री पर मोहित हो जाने का दंड भले ही महादेव को तपस्या भंग हो जाने के रूप में भुगतना पड़ा हो आगे लेकिन जल कर भस्म तो सबसे पहले कामदेव ही हुआ था. नकली रक्षा सौदे में वेश्याओं तक की मदद लेकर तरुण तेजपाल कामदेव भी हो गए थे. यानी अगर उन प्रसंगों की कसौटी पर बंगारू स्टिंग को कसें तो मारीच और कामदेव का मिला-जुला रूप होने के बावजूद तरुण को दंड के बदले ढेर सारे पुरस्कार ही मिले लेकिन लक्ष्मण-रेखा बिना लांघे भी बंगारू बियाबान में चले गए.
 
आप सबसे पहले बंगारू स्टिंग का समय याद कीजिये. उस समय केन्द्र में राजग का शासन था. लक्ष्मण के पास तो क्या खुद भाजपा के पास भी रक्षा मंत्रालय नहीं था. जिस रक्षा मंत्रालय को हथियार आदि खरीदना होता है उसके मंत्री भारतीय राजनीति के चुनिंदे ईमानदार चेहरे में से एक जार्ज फर्नांडिस के पास था. आप अन्य चीज़ों के लिए भले फर्नांडिस की भूमिका के बारे में चर्चा कर सकते हैं लेकिन कम से कम आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप उन पर कभी कोई तटस्थ व्यक्ति नहीं लगा सकता. (हालांकि उनके कार्यकाल में ही कथित ‘ताबूत घोटाला’ भी सामने लाया गया था लेकिन उसमें वे बेदाग़ निकले थे. वह कथित घोटाले का विषय महज़ इतना था कि कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों के शव लगातार आ रहे थे. उसके लिए ताबूत कम पड़ रहे थे तो बिना टेंडर के अपेक्षाकृत महंगे दरों पर ताबूत खरीद लिया गया था. ज़ाहिर है आपके पिता या पुत्र की लाश आंगन में रखा हो तो आप कफ़न के कपड़े के लिए दस दूकान में जाकर मोल-तोल नहीं करते.) तो ऐसे में आप एक दलित और तुलनात्मक रूप से कम शातिर नेता के पास एक नकली कंपनी बना कर जाते हों. उसमें नकली कंपनियों के नकली दलाल शामिल हों. सौदे नकली हों और तब आप पार्टी फंड के नाम पर एक लाख रुपया उस आदमी को पकड़ा दें जिसने अभी तक ढंग से चीज़ों को समझा भी नहीं हो, और उसके बाद अपनी इस हरकत को छिपे कैमरे में कैद कर आप तहलका मचा दें और इसे सदी का सबसे बड़ा ‘वाटरगेट’ साबित कर दें, मूर्ख ही होंगे वो लोग जो इसे साहसिक पत्रकारिता कहें. 
 
इसके अलावा इस मामले में ये भी उल्लेखनीय बात है कि कुछ दिन पहले ही अटल जी द्वारा परमाणु परीक्षण के बाद दुनिया ने भारत पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाया हुआ था. ज़ाहिर है हथियार की खरीदी का कोई सौदा उस समय संभव ही नहीं था. लेकिन आपने एक इतनी बड़ी साजिश को अंजाम देने को भी ‘पत्रकारिता’ कहना मुनासिब समझा लेकिन बिना किसी अपराध के, बिना किसी सौदे के, कैग के शब्दों में कहूं तो बिना राजकोष को कोई नुक्सान पहुचाए भी भाजपा सदा के लिए भ्रष्टाचारी दल बन गयी जबकि कांग्रेस कुछ समय पहले के ही असली बोफोर्स सौदे में असली कमीशन खाने के बाद भी कभी आपके स्टिंग के निशाने पर नहीं आया. हाल ही में एक किताब में यह खुलासा हुआ है कि राजीव गांधी ने संस्थागत रूप से यह तय किया था कि रक्षा सौदे में दलाली का पैसा सीधे कांग्रेस के फंड में ट्रांसफर किया जाएगा और इसे पैसे से दल का काम काज चलाया जाएगा. यूपीए के पहले कार्यकाल की समाप्ति तक सोनिया गांधी ने सीबीआई पर दबाव डाल कर इसी सौदे का क्वात्रोकी से जब्त 62 करोड रुपया भी डी-फ्रीज़ कराया तब भी आपको किसी स्टिंग की ज़रूरत नहीं महसूस महसूस हुई. वीपी सिंह को उस समय सेंट किट्स नामक द्वीप में एक नकली खाता खोल कर बदनाम किया गया उस पर भी शायद ही आपने ध्यान दिया होगा. लेकिन एक नकली रक्षा सौदा भारत के सभी घोटालों पर भारी पड़ता रहा. और उसको अंजाम देकर तरुण तेजपाल सबसे करेजियस पत्रकार बने रहे. कभी सांसदों के हाथ में पांच हजार की रकम थमा कर दर्जनों लोगों का कैरियर चौपट कर दिया गया लेकिन असली सौदे में प्रमाण के साथ झामुमो सांसदों को कांग्रेस द्वारा करोड़ों की रकम देकर खरीदने का मामला सामने आया था, पैसे भी बैंक के संसद की शाखा में ही जमा ही होना पाया गया था. तब के प्रधानमंत्री को सज़ा भी निचली अदालत द्वारा दिया गया था लेकिन बाद में भी कभी उन मामलों की तफ्शीश करने की जरूरत आपको इसलिए नहीं हुई क्यूंकि वे सारे कांग्रेस के खिलाफ के मामले थे. 
 
उसके बाद तो खैर यमुना लगातार गंदी होती गयी. कभी राडिया टेप आया जिसमें एक कोर्पोरेट दलाल कैबिनेट का पोर्टफोलियों तक तय करते हुए पाई गई थी. टू जी, कोयला, कॉमनवेल्थ, आदर्श, रेल, से लेकर क्या-क्या नहीं हुआ. सारे आरोप लगभग सही पाए गए. कोयला घोटाले की फाइल तक चोरी हुई. सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र को दो टूक विश्वासघाती कहा. खुद प्रधानमंत्री के सचिव (कोयला) रहे व्यक्ति ने पीएम को दोषी माना लेकिन कांग्रेस की साझीदारी में पत्रिका चलाते हुए, पोंटी चड्ढा के साथ सेक्स क्लब बनाते हुए, खनिज माफियाओं के होटल में कथित थिंक फेस्ट चलाते हुए, उसकी खबरों को दबाते हुए भी आपको कभी इतने बड़े-बड़े मामलों में पड़ने की कभी कोई ज़रूरत महसूस नहीं हुई. ज़माने बाद आपके सहोदर अनिरुद्ध बहल की नींद खुली भी तो ऐसे ही एक नया प्रायोजित स्टिंग कर ऐसे मामले को सामने लाया गया जिसमें कांग्रेस के विरोधी भाजपा और ‘आप’ को बदनाम किया जा सके कि वो करोड़ों खर्च कर आईटी के माध्यम से कांग्रेस की छवि खराब करती है. हालांकि इस मामले में भी आप सुविधाजंक ढंग से राजस्थान के सीएम का साबित हुआ स्कैंडल भूल गए जिसमें तुर्की से लाखों लाईक खरीदे गए थे. 
 
तो तहलका में कार्यरत पत्रकार बंधुओं से यही कहना चाहूंगा कि हज़ारों ऐसे तर्क हैं जिसकी कसौटी पर आपको तहलका को कसने की ज़रूरत है. निश्चित ही आप सभी अपने पद पर बने रहे लेकिन खुद के बारे में कोई सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स मत पालें. अगर तहलका को ढेर सारे पुरस्कार भी मिल गए हैं तो इसे भी उसी नज़रिए से देखें जैसे देशद्रोह के अपराध में हाई कोर्ट तक से सजायाफ्ता विनायक सेन को कई पुरस्कार मिल जाते हैं और साथ ही कांग्रेस जिसे योजना आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं में मनोनीत भी कर देती है. या जैसे कि सैकड़ों सरोकारी और प्रतिभावान साहित्यकारों के मौजूद रहते एक उपन्यास लिख कर अरुंधती राय को बुकर मिल जाता है. मित्रों, आपलोग बिलकुल भी दोषी नहीं हैं लेकिन कोई महापुरुष भी नहीं है न ही आपकी पत्रिका कोई माधवराव सप्रे या महात्मा गांधी के समय की पत्रकारिता है. बस सब इमानदारी से अपनी नौकरी बचाए रहिये और वैसे ही आनंदित होइए जैसे अन्य क्षेत्रों के प्रोफेशनल अपना काम करके मस्ती करते हैं. शुभ कामना. 
 
लेखक पंकज झा पत्रकार और बीजेपी नेता है. वर्तमान में वे भाजपा के छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखपत्र दीपकमल पत्रिका के संपादक के रूप में कार्यरत हैं. पंकज से jay7feb@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.


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तिरूपति से पशुपति तक प्रचंड पराजय के बाद माओवाद

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पत्रकारिता की मेरी पहली पारी और वो कांग्रेसी संपादक

 

नामवर जी के लिए अच्छा यही है कि संन्यास ले लें

दूसरी परम्परा के उद्घोषक, प्रतिगामी विचारपोषकों के विरुद्ध देश के कोने-कोने तक पहुंच प्रगतिशीलता का परचम फहराने वाले डॉ. नामवर सिंह अब क्या ‘शव साधक’ बन गए हैं. आनंद मोहन व पप्पू यादव जो हिंदी क्षेत्र ही नहीं, संपूर्ण देश में सामाजिक सद्भाव के शत्रु, रक्तपात, अपराध और दबंगई के पर्याय माने जाते हैं को महिमामंडित करने वालों की कतार में नामवर जी का पुरोहित बन जाना, आश्चर्य से ज्यादा पीड़ादायक है.
 
जब उम्र के कारण या प्रसिद्धि के शिखर तक जा पहुंचने की वजह से अहंकार जनित संस्कार के कारण वे सही निर्णय ले पाने में असमर्थ हो गए हैं तब अच्छा यही होगा कि वे संन्यास ले लें. नामवर बनने में उनकी अपनी योग्यता और क्षमता को नकारा नहीं जा सकता है लेकिन सच यह भी है कि कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ ने उन्हें इस लायक बनने में भरपूर सहयोग प्रदान किया. भारतीय साहित्य में ध्रुवतारा बनने की बजाय इस तरह के कारनामें से कहीं वे अनगिनत तारों में एक की संज्ञा ना ले लें.
 
इतिहास ‘सीकरी’ की ओर मुखातिब साहित्यकारों से निर्मित नहीं हुआ है. लोभ-लाभ, यश, दंभ से मुक्त चिंतकों ने ही इतिहास रचा है. क्या नामवर जी इसे, यानी अपनी ही चिंतनधारा को भूल गए या तिलांजलि दे दी है? ऐसा तो नहीं माना जा सकता है कि ‘भारत रत्न’ पाने की चाह में सचिन तेंदुलकर की तरह वह भी सर्वव्यापक बनकर उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रचारक के वेश में खरबपतियों की कतार में अपना नाम शुमार कराना चाहते हैं. यह दुःखद एवं निंदनीय है.
 
राजेन्द्र राजन
 
संरक्षक
 
विप्लवी पुस्तकालय, गोदरगावाँ
 
मो.- 09471456304/09263394316

Bhartia is a daredevil economic offender : Sharma tells Supreme Court

New Delhi : The Respondent No.02, Mantoo Sharma, in his counter-affidavit to the Supreme Court of India in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603/2013, has told the court that the principal accused in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011, Shobhana Bhartia, Chairperson of M/S The Hindustan Times Limited, New Delhi, is a daredevil economic offender in the media world. In the support of his assertion, Mr.Sharma has annexed the enquiry-report of the Munger District Magistrate, Mr.Kuldeep Narayan that was sent to the Patna High Court. 
 
He has told the Supreme Court that the daredevil act of economic offence of such a big corporate media house of India has been proved and it has stunned everyone in law that the company bas been still illegally publishing the Munger edition of Dainik Hindustan without "the Certificate of Registration" and "The registration Number" under the P.R.B Act even after the lodging of this F.I.R with Munger Kotwali police station about one year and eight months earlier.
 
I here quote the true assertion of Mr.Mantoo Sharma that has been placed before the Supreme Court of India.
 
DAREDEVIL ACT OF ECONOMIC OFFENCE OF OWNER/ PUBLISHER OF DAINIK HINDUSTAN IN
 
CASE OF MUNGER EDITION/ PUBLICATION
 
"The owners/publishers continued printing ''Registration No..- Applied For'' in the Bhagalpur and
 
Munger publications/editions of Dainik Hindustan from July 01,2011 to April 16, 2012.And from April 17,2012,the company began printing new and separate "Registration No.BIHHIN/2011/41407" in the Bhagalpur and Munger publications /editions.But, the owner/publisher didn't comply the rules of the PRB Act in the case of the Munger publication/edition till filing of this counter-affidavit in this Hon’ble Court. In support of this statement, the enquiry-report of the Munger Collector that was sent to the Hon'ble High Court of Patna in Bihar in connection with this case is mentioned here for perusal.
 
D.M’S REPORT TO HON’BLE HIGH COURT EXPOSES UNAUTHORISED PUBLICATION AND CIRCULATION OF MUNGER EDITION OF DAINIK HINDUSTAN IN MUNGER
 
The Munger Collector,vide office letter No.1448/legal,dated 27/09/12,to the Honourable High Court,Patna ,in response to a direction of the Patna court in the Cr.Misc.No. 2951/2012(Shobhana Bharatiya Vs State of Bihar & others),has clearly stated –
 
"……….Today monring,Hindustan newspaper had been obtained from Munger town(Munger edition) and nearby Lakhisarai town(East Bihar edition).Both the newspapers indicate same editor,same publisher and
 
printer,same local editor,same phone number and same R.N.I .No. The RNI No. is also same as what can be seen on Bhagalpur edition .This way, it appears that on same registration, same R.N.I No., different content is being published ,printed and circulated in different districts. Since the content is
 
different,so they should be treated as different newspapers ,and should have different R.N.I's No. Here RNI No.is same.This way it has been found that in Bhagalpur,Munger and Lakhisarai, different newspaper contents are being circulated bearing same registration details…..It is evident that not only news content is different ,but also some govt. advertisement is published in one newspaper ,and not in the others.For example, on page No.06 of newspaper ,circulated in Lakhisarai (East Bihar edition), advertisements of Planning Dept.bearing Advertisement No. PR-7332(planning)/12-13 has beenpublished,but not in Munger edition, circulated in Munger town." Thus, the daredevil act of economic offence of such a big corporate media house of India has been proved and it has stunned everyone in law that the company hasbeen still illegally publishing the Munger edition of Dainik Hindustan without ''the Certificate of Registration'' and "the Registration Number'' under the P.R.B Act even after the lodging of this F.I.R with Munger Kotwali police station about one year and 8 months earlier.Thus,the Munger edition of Dainik Hindustan has been still illegally obtaining and publishing the advertisements of the Union and the Bihar governments in bulk .This action of the company proves its daredevil act of economic offence .
 
The chief economic offenders are the chairperson, the chief editors and the publisher/owner respectively of such a powerful newspaper industry of India."
 
Named accused persons in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): In the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011 in Bihar, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi)Shobhana Bhartia, the Chief Editor,Dainik Hindustan, Shashi Shekhar(New Delhi), the Regional Editor,Dainik Hindustan,Patna edition, Akku Srivastawa, the Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition,Binod Bandhu and the Publisher, ,M/S Hindustan Media Ventures Limited( Nw Delhi), Amit Chopra, have been accused of receiving the government money to the tune of about rupees two hundred crores illegally and fraudulently by obtaining and printing the advertisements of the Union and Bihar governments in the name of illegally printed and published Munger and Bhagalpur editions of Dainik Hindustan for a decade continuously in Bihar.
 
The Munger police ,meanwhile, have submitted the Supervision Report No.01 and the Supervision Report No.-02 and have found all allegations "prima-facie true" against all the named accused persons including the principal accused Shobhana Bhartia (New Delhi) under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code. The historical order of the Patna High Court : The Hon’ble Justice of the Patna High Court, Justice Anjana Prakash, in her order, dated Dec 17,2012, in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012, refused to interfere in the police investigation and directed the Munger (Bihar) police to complete the investigation in the Kotwali P.S Case No. 445/ 2011 within the three months from the date of the order.
 
ShriKrishna Prasad,
 
Advocate
Mob-09470400813


सम्बन्धित खबर…

Office of Press Registrar has flouted the orders of C.I.C in illegal publication

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Mantoo Sharma submits to Court 'List of Important Dates' in Govt. Advt Scam

मासिक पत्रिका ‘सुजाता’ का प्रकाशन मेरठ से प्रारंभ

देश की महिला मासिक पत्रिकाओं के बीच एक नाम और जुड़ गया है-सुजाता। लंबे समय से पत्रकारिता में जुड़ी रहीं ऋचा जोशी ने मेरठ से हिंदी मासिक 'सुजाता' का प्रकाशन प्रारंभ किया है। 'अपनी सी कहे-अपनी सी लगे' स्‍लोगन के साथ महिलाओं की ये पत्रिका बाजार में पंहुच रही है और इसे आंशिक तौर पर www.sujataonline.com पर भी पढ़ा-देखा जा सकता है। दस रुपये मूल्‍य की ये पत्रिका छपाई और कागज की गुणवत्‍ता के साथ स्‍तरीय रचनाओं से सबको आकर्षित करती है।
 
'सुजाता' के प्रकाशन का सपना जुझारु पत्रकार रहे स्‍व. वेद अग्रवाल ने 1959 में देखा था। उसके बाद ये पत्रिका पाठकों तक पहंची और लोकप्रिय भी हुई लेकिन स्‍व. वेद अग्रवाल की लंबी बीमारी के बाद स्‍वर्गवास हो जाने के बाद से इसका प्रकाशन स्‍थगित था। अब ऋचा जोशी ने इसे फिर से पाठकों तक पहंचाने का बीड़ा उठाया है। ऋचा लंबे समय तक प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यमों के लिए पत्रकारिता करती रहीं हैं और इन दिनों वह महिलाओं के संगठन 'उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच' की महासचिव हैं। महिला सरोकारों से जमीनी स्‍तर तक जुड़ी ऋचा जोशी इस पत्रिका को आमजन तक पहंचाने और लोकप्रिय बनाने के लिए प्रयत्‍नशील हैं।

न्यूज रूम में ही पत्रकार ने भाजपा की जीत का जश्न मना डाला

बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी में एक पत्रकार हैं ऋषभ कुमार सक्सेना, संघी हैं तो भाजपाई तो होंगे ही. चलिए यहां तक तो ठीक है लेकिन जनाब ने बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादकीय कक्ष में ही भाजपा की जीत का जश्न मना डाला. जैसे ही भाजपा की जीत की खबर आने लगी पत्रकार महोदय सबको जा-जाकर बधाई देने लगे और पूरे स्टाफ में सबको जबरन मिठाई बांटी.
 
पत्रकार महोदय इतने पर ही नहीं रुके, इस जश्न की फोटो फेसबुक पर भी अपलोड की और कैप्शन लिखा "भाजपा की प्रचंड जीत पर आप भी हमारे साथ जश्न मनाइए." ऐसा लग रहा था जैसे किसी अखबार का न्यूज रूम ना होकर पार्टी कार्यालय हो जहां पार्टी की जीत के बाद जश्न शुरू हो जाता है.
जब अखबार के दफ्तर में ही पत्रकार महोदय इस तरह से पार्टीबाजी करेंगे तो उनसे स्वच्छ पत्रकारिता की उम्मीद तो बेमानी है साथ ही उस अखबार और संस्थान पर भी सवाल खड़े होते हैं. आखिर बिजनेस स्टैंडर्ड के न्यूज रूम में घंटों तक एक राजनीतिक पार्टी की जीत का जश्न कैसे मनाया जाता रहा.
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगे और अरविन्द केजरीवाल उप राज्यपाल बनें

Sanjaya Kumar Singh : जनादेश तो अरविन्द केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए ही है। सीटें थोड़ी कम रह गईं तो क्या हुआ। और अरविन्द केजरीवाल तोड़-फोड़ कर सरकार बनाएंगे नहीं, भाजपा बनाएगी तो उसे जीने नहीं देंगे। दोबारा चुनाव कराना जनादेश का अपमान होगा।

ऐसे में केंद्र की कांग्रेस सरकार को चाहिए (आगे बचे रहना है तो) कि जनादेश का सम्मान करते हुए दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाए और अरविन्द केजरीवाल को उप राज्यपाल बना दे। कांग्रेस की ओर से पश्चाताप भी हो जाएगा, जनादेश का सम्मान भी और जो लोग कह रहे हैं कि केजरीवाल कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते इसीलिए विपक्ष में बैठने की बात कर रहे हैं उसका भी पता चल जाएगा। – एक आम आदमी की सलाह।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

 

बी. वेंकट राव बने सहारा के न्यूज चैनलों के ग्रुप एडिटर

गवर्नेंस नाऊ मैग्जीन के एडिटर बी. वेंकट राव ने नई पारी की शुरुआत कर दी है. उन्होंने डूबते बेसहारा सहारा का दामन थाम लिया है. उन्हें सहारा मीडिया के न्यूज चैनलों का ग्रुप एडिटर बनाया गया है. बताया जाता है कि बी. वेंकट राव को सहारा प्रबंधन ने अपने यहां इंट्रोड्यूस कर दिया है.

वेंकट के बारे में कहा जाता है कि वे सींसियर व कमिटमेंट वाले शख्स हैं. वे अपने अधीनस्थों के साथ बेहद फ्रेंडली एप्रोच रखते हैं. वेंकट फ्री प्रेस जर्नल, द इंडियन एक्सप्रेस (अहमदाबाद और मुंबई), टाइम्स आफ इंडिया के एडिटर रह चुके हैं. उन्होंने इंडिया टुडे ग्रुप के आफ्टरनून न्यूजपेपर टुडे को लांच कराया. स्टार टीवी में एडिटर रहे. जी टीवी में ग्रुप एडिटर रहे.

भड़ास तक अपनी बात, जानकारी bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

Office of Press Registrar has flouted the orders of C.I.C in illegal publication

New Delhi : The Respondent No.02, Mantoo Sharma, in his Counter-Affidavit to the Supreme Court of India in the Special Leave Petition(Criminal) No.1603 of 2013, has told the court that the office of the Press Registrar, the Government of India, New Delhi, has arbitrarily flouted the orders of the Central Information Commission (New Delhi) in matters relating to the illegal publication of fifty editions of Dainik "Hindustan" in Bihar and Jharkhand for five years .
 
The related part of Mantoo Sharma's counter-affidavit is given below in the original form:
 
ORDERS OF CENTRAL INFORMATION COMMISSION (NEW DELHI) FLOUTED
 
"The Central Information Commission(C.I.C) (New Delhi), vide its order dated December 08, 2008, in the case No.CIC/OK/A/2008/885/AD (ShriKrishna Pd Vs Central Public Information Officer, office of the Press Registrar, New Delhi), passed an order directing the CPIO to hold an immediate enquiry into the matter of publication of Dainik Hindustan under one title 'Hindustan' from 38 districts of Bihar and 12 of Jharkhand with different editors stationed at each of 50 districtsand with different news items from each district allegedly violating the rules of Press & Registration of Books Act.The CIC also directed the CPIO(office of the Press Registrar,New Delhi) to conduct the enquiry with consultation with the District Magistrates and submit the enquiry report within one month of the receipt of this order.
 
PUBLISHERS/OWNERS PROVE THEIR FORGERY, FRAUD AND CHEATINGS WITH THEIR PRINTED DOCUMENTS PUBLICLY
 
But, the order of the C.I.C,New Delhi has not been complied till this day by the CPIO(the office of the Press Registrar,New Delhi) under the influence of the powerful corporate media house.The office of Press Registrar(New Delhi) only wroteletters to the District Magistrates of Patna,Bhagalpur and Muzaffarpur to hold an enquiry into the matter.When the process of enquiry began ,the owners/publishers of Dainik Hindustan removed the "Patna Registration Number—RNI No.44348/1986" from its Print Line and started printing and publishing "RNI No.- Applied for" on the Print-line of the Bhagalpur and Munger editions/publications of Dainik Hindustan from July 01, 2011.Even when the Company continued printing and publishing the Registration Number –RNI No.-Applied For, the Union and the Bihar Governments didn’t stop releasing the government advertisements to the Bhagalpur and Munger editions of Dainik Hindustan. This action of the Union Government and the Bihar government show the involvement of government officials and concerned ministers in this government advertisement scam.At the same time, this action of theowners/publishers of the company has publicly exposed their acceptance of offences of forgery, fraud and cheatings in the printed form , and it is unusual in the history of economic offences of the media – world.
 
Such documentary evidences in this matter need more and more thorough probe by powerful investigating agencies of the country like C.B.I orCAG to expose yet other economic offences relating to such other Government Advertisement Scams in other districts of Bihar and in other states viz Jharkhand, Delhi etc.
 
Thus, the company has openly and publicly accepted in print its forgery, fraud and cheatings in respect of the printing and publication of the "Registration No.44348/1986" (allotted to the Patna edition) on the "Print-line" of the Bhagalpur , Munger,Lakhisarai,Jamui, Sheikhpura, Banka, Khagaria, Begusarai and Muzaffarpur publications/editions of Dainik Hindustan for more than a decade."
 
Named accused persons in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): In the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011 in Bihar, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi)Shobhana Bhartia, the Chief Editor,Dainik Hindustan, Shashi Shekhar(New Delhi), the Regional Editor,Dainik Hindustan,Patna edition, Akku Srivastawa, the Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition,Binod Bandhu and the Publisher, ,M/S Hindustan Media Ventures Limited( Nw Delhi), Amit Chopra, have been accused of receiving the government money to the tune of about rupees two hundred crores illegally and fraudulently by obtaining and printing the advertisements of the Union and Bihar governments in the name of illegally printed and published Munger and Bhagalpur editions of Dainik Hindustan for a decade continuously in Bihar.
 
The Munger police ,meanwhile, have submitted the Supervision Report No.01 and the Supervision Report No.-02 and have found all allegations "prima-facie true" against all the named accused persons including the principal accused Shobhana Bhartia (New Delhi) under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code. The historical order of the Patna High Court : The Hon’ble Justice of the Patna High Court, Justice Anjana Prakash, in her order, dated Dec 17,2012, in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012, refused to interfere in the police investigation and directed the Munger (Bihar) police to complete the investigation in the Kotwali P.S Case No. 445/ 2011 within the three months from the date of the order.
 
ShriKrishna Prasad
 
Advocate
 
M-09470400813

 

जनमित्र सम्मान से नवाजे गए वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत

नई दिल्ली। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्रता दिवस एवं अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस की पूर्व संध्या पर नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में जनसंदेश टाइम्स, वाराणसी के उप समाचार संपादक विजय विनीत को जनमित्र अवार्ड से नवाजा गया. यह सम्मान पत्रकारिता के माध्यम से प्रदेश के अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने और मानवाधिकार उल्लंघन रोकने के क्षेत्र में किए गए अतुलनीय प्रयास के लिए दिया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में देश की नामचीन हस्तियां उपस्थित थीं.
 
कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हाल में आयोजित सम्मान समारोह में 'रिस्पेक्ट सर्वाइवर एंड एबालिश टार्चर' नामक पुस्तक का विमोचन भी किया गया. पीपुल्स विजिलेंस कमेटी आन ह्यूमन राट्स (पीवीसीएचआर) एवं ह्यूमन राट्स ला नेटवर्क (एचआरएलएन) के संयुक्त तत्वावधान में संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किया गया, जिसमें उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक मुस्लिमों के मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों और सांसदों ने हिस्सा लिया. 
 
संवाद कार्यक्रम में कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले हो रहे हैं. यह संगठित हिंसा, पुलिसिया अत्याचार, भेदभाव और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र पर खतरा है. पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू और ईसाई समुदाय पर एवं भारत में मुसलमान और ईसाई समुदाय पर हमले आज कुछ सांप्रदायिक शक्तियों के राजनीतिक हथियार बन चुके हैं.
 
भारत की साझा संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता की परंपरा को मजबूत करने की दिशा में भारत में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक समुदाय पर पुलिसिया अत्याचार एवं सांप्रदायिक हिंसा के रूप में होने वाले हमलों पर मानवाधिकार जननिगरानी समिति एवं ह्यूमन राइट ला नेटवर्क पिछले तीन सालों में संयुक्त रूप से करीब 1500 मामलों पर सघन विश्लेषण कर चुके हैं. साथ ही उन तथ्यों के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है. 
 

देश में क्या करेंगे, पहले बंगाल में ही भाजपा से मुकाबला कर लें कामरेड

हाल के विधानसभा चुनावों में माकपा के लिए बुरी खबर है कि बंगाल, केरल और असम के बाहर बाकी भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए राजस्थान विधानसभा में उसके जो तीन विधायक थे, वे अब नहीं हैं। तीनों सीटें माकपा ने भाजपा से हारकर गंवा दी हैं। हालांकि माकपा को शर्म आयेगी नहीं।
 
हाल तो यह है कि पश्चिम बंगाल में बुरे चुनाव परिणाम का सामना कर रही माकपा अन्य राज्यों में भी सीट हासिल करने में असफल रही है। चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम में माकपा पूरी तरह से पस्त हो गयी है। दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश में माकपा एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पायी है। इन राज्यों में कुल 51 सीटों पर माकपा ने उम्मीदवार खड़ा किया था। इनमें से एक भी सीट पर माकपा जीत नहीं पायी है। कई सीटों पर माकपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी है। 2008 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में माकपा ने तीन सीटों पर जीत हासिल की थी। माकपा ने राजस्थान के 38 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा किया था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पायी। राजस्थान में चार बार के माकपा विधायक व माकपा केंद्रीय कमेटी के सदस्य आमरा राम भी इस चुनाव में पराजित हुए हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में माकपा ने आठ सीटों पर उम्मीदवार खड़ा किया था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पायी। छत्तीसगढ़ में माकपा ने चार सीटों पर उम्मीदवार खड़ा किया था, लेकिन एक भी उम्मीदवार जीत नहीं पाये।
 
अपने आखिरी गढ़ हावड़ा में उसके मेयर ममता जायसवाल को भाजपा उम्मीदवार ने ही परास्त किया और हावड़ा नगर निगम चुनावों में भाजपा से माकपा आगे निकल नहीं पायी। बंगाल में माकपाई जनाधार की हालत यह है कि बहुत तेजी से भाजपा माकपा की जगह लेने लगी है। देश में संघ परिवार के क्या मुकाबला करें कामरेड, बंगाल में ही भाजपा का मुकाबला कर लें तो मानें।
 
गौरतलब है कि 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद माकपा के शीर्ष नेतृत्व ने निर्णय किया था कि बंगाल के बाहर माकपा की शक्ति बढ़ानी होगी। राजस्थान व अन्य प्रदेशों में ज्यादा जोर दिया जायेगा, लेकिन परिणाम शून्य ही रहा है।
 
दिल्ली में माकपा ने तीन सीटों द्वारका, करावल नगर व शाहदरा से उम्मीदवार खड़ा किये थे, लेकिन इन तीनों सीटों पर माकपा की पराजय हुई है। सबसे निराशानजक बात यह है कि प्रत्येक सीट पर माकपा के उम्मीदवार प्रथम पांच उम्मीदवारों में भी स्थान नहीं बना पाये हैं, जबकि माकपा के महासचिव प्रकाश करात तथा पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी दोनों ही दिल्ली के बाशिंदे हैं।
 
बंगाल के जिन मुसलमानों ने अपनी आंखों के तारे से ज्यादा मुहब्बत और यकीन भारतीय वामपंथ पर न्यौछावर किया, वे अब वाम संहारक ममता बनर्जी को नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं।
 
इससे बड़ी खबर तो यह है कि अब बंगाल में मोहम्मद सलीम के अलावा कोई दूसरा नेता अगर मुसलमान चेहरा बचा है तो वे बाकी बचे उलबेड़िया के पराजित सांसद हन्नान मोल्ला है। जिस हन्नान मोल्ला के साथ माकपा ने किसान सभा की कमान बंगाल के तेभागा मशहूर किसान नेता रेज्जाक अली मोल्ला को सौंपी थी, वे किनारे हो गये हैं।
 
गनीमत हैं कि रज्जाक ने औपचारिक तौर पर माकपा छोड़ी नहीं है। बीमारी की वजह बताकर पार्टी से फिलहाल छुट्टी ले ली है। बीमार और बूढ़े कामरेडों को वामपंथ इतनी जल्दी छुट्टी पर नहीं भेजता। जिलों में अब भी अनेक बूढ़े और अतिशय बीमार कामरेड सचिव पद का कार्यभार ढोने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें छुट्टी नहीं दी है पार्टी ने। याद करें कि कामरेड ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने वाली माकपा ने ही मुख्यमंत्रित्व से रिहाई के उनके अनुरोध को कितनी बार ठुकराया और अपनी आजादी के लिए कामरेड बसु को कितने पापड़ बेलने पड़े।
 
जाहिर है कि जबकि बंगाल समेत बाकी देश में मुसलमानों में माकपा की कोई साख बची नहीं है, ऐसे संगीन संकट काल में कामरेड रज्जाक अली मोल्ला को माकपा ने छुट्टी कैसे दे दी है। वैसे कामरेड मोल्ला के बागी आईपीएस अफसर नजरुल इस्लाम के साथ मधुर संबंध बताये जाते हैं और दोनों के बीच लंबे समय से कुछ पक भी रहा है।वह खिचड़ी भी बहुत संभव है कि सलोकसभा चुनावों से पहले ही आम जनता को परोस दी जाने वाली है। सब्र कीजिये और इंतजार भी।
 
गौरतलब है कि कामरेड रज्जाक मोल्ला विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद जनाधार वापसी के लिए सांगठनिक कवायद के तहत एकाधिकारवादी वर्चस्व तोड़ने और नेतृत्व में सभी समुदायों के नये चेहरों को सामने लाने की पेशकश की थी, जिसे पार्टी नेतृत्व ने पत्रपाठ खारिज कर दिया।अब पार्टी नेतृत्व और संगठन दोनों से मोहभंग के बाद मोल्ला नई राह बनाने के पिराक में हैं और इसीलिए य़ह अवकाश।
 
जाहिर है कि सरदर्द का सबब बन गये मोल्ला से छुटकारा पाने का इस नायाब मौके को कामरेडों ने यूं ही जाने नहीं दिया। अब सवाल है कि ईमानदार कामरेडों से छुटकारा पाने वाली माकपा को आम जनता भी छुटकारा देने में कोई कोताही नहीं बरत रही।
 
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास की रिपोर्ट

 

जीतने के बाद पहला इंटरव्यू देने के लिए केजरीवाल को बरखा दत्त ही मिली थीं!

Yashwant Singh :  सुना है केजरीवाल ने दिल्ली जीतने के बाद पहला इंटरव्यू राडिया कांड में शामिल रहीं कुख्यात पत्रकार बरखा दत्त को दिया है… गांव में होने के कारण मैं टीवी से दूर हूं लेकिन एक साथी ने जब फोन करके यह जानकारी दी तो मुझे लगा कि केजरीवाल को ऐसा करने से बचना चाहिए था.. कार्पोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया की परम मित्र बरखा दत्त से केजरीवाल को बचना चाहिए था…

ये वही बरखा दत्त हैं जिन्हें अन्ना आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने हूट कर इंडिया गेट से भगा दिया था.. अरे इंटरव्यू ही देना था तो पहले रवीश कुमार को देते… पुण्य प्रसून बाजपेयी को देते… कई और प्रखर, ईमानदार पत्रकार हैं, उन्हें देते… पर ये क्या? ऐसी विवेकहीनता क्यों?? मुझे लगता है कि इस मसले पर आप को भी अपनी राय देनी चाहिए, बोलना चाहिए… आम आदमी पार्टी से हम लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं… अगर वो एक कदम भी गलत चलते हैं तो उस पर सवाल तो उठाया ही जाना चाहिए… खासकर हम सोशल मीडिया वालों, न्यू मीडिया वालों को.. जिन्होंने केजरीवाल एंड कंपनी से बिना परिचय के ही, बिना किसी अनैतिक समझौते के ही दिल खोलकर सपोर्ट किया….

    Ayush Kumar 100% Sahi,1st Interview ke liye Ravish Sir thik hote.
 
    Anil Sakargaye kya pata ,,,,,,,,, barkha ka man bhi badal gaya ho ,,,?
 
    Akash Vatsa शायद, ये खबर गलत है…सबसे पहले अरविन्द ने निशांत चतुर्वेदी (न्यूज़ एक्सप्रेस) को इंटरव्यू दिया है।
   
    Prashant Gaurav aam admi party ki ek ek pal ki jawab-dehi banti hai…aur unhe dena padega….
    
    Deepak Sharma Kya baat hae yashwant u highlight real issue
    
    Virender Yadav yes unhe yesa nahi karna chahiye
     
    Deepak Sharma Yashwant this is one of your best posts … We support kejriwal for his honesty  But kejriwal should also support honest journalists
 
    Ashutosh Sharma बिल्कुल सहमत। जैसे कि अब तक हर काम जनता से पूँछ पूँछ कर करते आयें हैं खास कर महत्वपूर्ण निर्णय, उसी तरह उनको इस विषय में भी सावधानी बरतनी चाहिए। हो सकता है इस मुद्दे को अरविन्द जी ने बहुत हल्के में लिया हो लेकिन ऐसे कुछ 'हलके कदम' उनको भविष्य में भारी भूल साबित हो सकते हैं। अपने हर क्रिया कलाप पर उनको तीखी निगाह रखनी ही चाहिए और किसी पर भी ओवर कान्फिडेंस, न बाबा न। एक गन्दी मछली या एक गलत निर्णय 'आप'की नीव हिला सकता है। तौकीर रजा वाला प्रकरण भी इसी तरह हमारी समझ में नहीं आया था
 
    शशांक शेखर Nahi nishant chaturvedi ko diya
    
    Avinash Vidrohi jo maine dekh wo ibn 7 pe aashutosh ne liya tha shyd sbse pehle vrkha dutt ka uske baad aaya tha
    
    Sanjay Maurya nai bhai nishant chturvedi ,ashutosh kumar and shard sharma then bharkha dut
     
    Akash Vatsa निशांत चतुर्वेदी ने जो इंटरव्यू लिया था वो रात को साढ़े आठ में ऑन एयर हुआ…NDTV पर रात को साढ़े नौ बजे ऑन एयर हुआ ।
     
    Deepak Sharma I tried and contacted arvind bhai for two days For an interview But i was refused… Felt bad
 
    Hemant Yerpude अन्ना हज़ारे के आंदोलन के ही कारण दिल्ली मे अरविंद जी को अपर समर्थन मिला था , अन्ना की इमेज का पूरा ही लाभ आप पार्टी ने उठाया भी , और अन्ना हज़ारे जी ने कहा था की अरविंद को मेरा आशीर्वाद नहीं हे मे उसे अपने मंच पर भी नहीं आने दूंगा परंतु रिज़ल्ट आने के बाद इन सर्वसममाननीय व्यक्तित्व ने पलटी खाई हे और अपनी गरिमा को ध्वस्त किया हे इससे स्वयं अन्ना और केजरीवाल को नुकसान होगा ,यदि केजरीवाल वापस अन्ना के साथ जाते हे तो …..!!!!!!
    
    Lokesh Rawat what rubbish is this ..
     
    Srikant Saurav यशवंत भईया, साध्य पवित्र हो तो साधन नहीं देखा जाता. और घृणा पाप से हो पापी से नहीं. शायद इसीलिए केजरीवाल ने बरखा को नजरंदाज करना उचित न समझा हो.
    
    Santosh Kumar १००% सही बात , हम सभी लोगों का भी यही ख्याल है , उनके इर्द गिर्द ऐसे दागी लोगो का रहना सही नहीं है , चाहे वो कोई भी हो..
     
    Chandramauli Pandey सहमत, ठीक कह रहे है।।
     
    Shashank Singh Bilkul sahi kaha aapney .. Barkha jaiso ka to bahiskarkarna chahiyey tha …
    
    Abbhay Pratap Singh http://khabar.ibnlive.in.com/news/113190/12 ibnwale keh rahe ashutosh ne liya pehla interview ye kya kam hai dutt sahiba se ….

    Shailendra Mishra पहला इंटरव्यू बरखा दत्त को नही दिया था, इतना तो तय है । लेकिन अगर दीपक शर्मा जी जैसे अच्छे पत्रकार को समय नही दिया गया तो ये ग़लत है । मैं तो अभी मेल से अरविंद जी को एक विरोध पत्र भेजुँगा ।
 
    चन्द्र मणि चौहान भाई चूँकि अब जीत चुकें हैं सत्ता का स्वाद तो रंग दिखायेगा ही : कदम कदम फूंक फूंक कर रखना पड़ता है सार्वजानिक जीवन में : और शायद बरखा दत्त वही है जो भारतीय प्रधान मंत्री को देहाती औरत कहते हुए खिल खिला कर हंस रही थी :
   
    Manoj Yadav sahmat hain
    
    Shah Faisal Sahi hai… Koyle ke sath se dag hi lagta hai
     
    Srikant Saurav Deepak Sharma, भाई आप व आपके चैनल पर भगवा लेबल चिपका है. इसीलिए इंटरव्यू देने में आपको नजरंदाज कर बरखा दत को आपसे मुफीद समझा गया. जैसा कि मैं समझता हूं.
     
    Chandrabhushan Pandey punyapradun ki prakharta aur nispaksta aiwam patrakarita ka star usi din khul gaya jis din ek tathya hin jhuthe video ko le kar chilla chilla kar "AAP EXPOSED" ka danka hafto pita EC ki clearance aane ke baad bhi, yashvant ji yahi maap dand hai prakhar ptrakar ka
     
    Deepak Sharma Thanks shailendraji… Waise mujhe inkaar karne se mera kejriwal kee saadhna ke prati prem kam nhi hota
 
    Kalyan Kumar यदि अहंकार में आकर ऐसी गलतियाँ करते रहे तो अर्श से फर्श पे पहुंचते देर नहीं लगेगी….
 
    Prabodh Kumar Kaliyoug ke prabhao se koun bacha hai . Ab to yahi sub dekhna hai .
   
    Pawan Kumar भाई जब आम आदमी है तो आम आदमी के पत्रकारो को इंटरव्यु दीजिए…भला बरखा दत ,लोग शशि थरुर .सोनिया गाँधी जैसे लोगो का इंटरव्यु लेने के लिए बने हुए है
     
    Deepak Sharma Shrikantji aap sahi keh rahe honge lekin interview nahi mila to koi baat nhi… Arvind me desh bhakti hae aur vo mujhe pasand hae
 
    Abdul Noor Shibli yashwant bhai ko dete
 
    Prakash Pandey deepak sir ji ki baat hi alag hai
   
    Anurag Jagdhari Ravish Kumar ?… ek report me kuchh din pahle AAP karykaraon ka uphas kar rahe the..kal dheere dheere unke munh se raunak gayab hoti rahi…
     
    Ashish Kumar Anshu jeetene ke baad HINDI walon ko kaun puchhta hai?
     
    Danish Khan boss kon kitne pani me iska kya pata barkha datt ho ya koi or kitne patrkar dudh ke dhule he sabjante he ab kejriwal bechara kya ye dhundta firega ki kon imandar he kon beiman he pehle desh se ye bhrashtachar hatne do baki in chutya logo ka khud safaya ho jayga
     
    Raj Karwasra आपा राष्ट्रवाद को मान्यता नहीं देती शायद यही कारण है कि केजरीवाल भारत माता की जय नहीं बोलते… वन्दे मातरम् नहीं बोलते… मंच से भारत माता का चित्र हटवा दिया गया था… कांग्रेस में भी बिलकुल ऐसा ही सेकुलरिज्म है…
 
    Harnam Singh Verma Arre bhai Barkha St Stepohens ki padhi huwi hai aur moti khaal ki hai!
 
    Deepak Uniyal @Deepak Sharma sir but 2 days before he was busy and didn't give interview to any one else..U should contact him now
   
    राजन सिंह अब जिसे इंटरव्यू दिया इसका अर्थ ये नहीं कि वह उसकी गलती को भी नजरअंदाज कर रहे।इस हिसाब से तो बरखा ही क्या उस चैनल का ही बहिष्कार करना पड़ेगा जिसने बरखा को बनाए रखा।यह व्यवहारिक नहीं होगा।
     
    Pawan Marken Mr. Raj Karwasra Apne kabhi Arvind ji ka bhashan suna hai wo sabse pehle Bharat mata ke udghosh se he start karte he.Par ye behro ko sunaai nahi deta pehle apne kaan ka ilaaz karwao phir batt karna…!!!
     
    Chandralok Singh Patel sir pura mamala mai nahi janata. par ye jarur kahuga bade lakhya mai chhoti2 bate nazar aandaz karni chahiye.
     
    Arun Sathi हाँ देख रहा था सुबह में…बरखा अंग्रेजी बखार रही थी औ केज्रिबाल ……हिंदी में ..
     
    Shashwat Swatantra I agreed
     
    KaliKant Jha Yashwant Singh Nishant Chaturvedi को सबसे पहला इंटरव्यू दिए अरविन्द केजरीवाल
     
    Madhusudan JI Kejariwl ji ke pass koi bhi jayega to kya ve milane se parahej karenge fir to aam aadami party bhi to. dusaro ki tarah kahalayegi unche log unchi soch honi hi chahiye.
     
    Ashok Singh Rawat mitra just wait and watch …….. abhi to wo apni puri aukat deekhani hain usa……..
     
    Rps Gautam Your opinion & suggestions not needed by AAP
     
    Sumit Chauhan सबसे पहले निशांत जी को ही दिया आज 9और 10 बजे रात को चलेगा न्यूज़ एक्सप्रेस पर
     
    Aditya Raj Somani kya barkha datt par koi arop siddh hua hai? kal ko main uth kar aap par arop laga dun to kya arvind kejrival ko aap se bhi baat nahi karni chahiye? thoda logically sochiye…………..yadi is desh ke samvidhan or nyaypalika me bharosa rakhte hain to
     
    Dori Yadav juyst wait fir more.
     
    Ram Dayal Rajpurohit आप ही की पार्टी है जनाब ,
    
    Prem Prakash वाजिब सवाल है. वाजिब फोरम पर उठाया जाना चाहिए..
     
    Alok Tripathi Deepak bhai aap to achche hain.ho sakta hai isliye na diya ho, ki Aajtak ne exit poll me arvind kejriwal ko nakar diya tha
     
    Raj Shekhar Sharma "खासकर हम सोशल मीडिया वालों, न्यू मीडिया वालों को.. जिन्होंने केजरीवाल एंड कंपनी से बिना परिचय के ही, बिना किसी अनैतिक समझौते के ही दिल खोलकर सपोर्ट किया…." चिंता न करें, इसके दुष्परिणाम भी आप लोग ही भोगेंगे चूँकि थोड़े समय के अंदर ही मीडिया के ऊपर से भी लोगो को विश्वास उठ जायेगा । वैसे सत्य कहने के लिए आपको साधूवाद
   
    Samir Burman शायद, ये खबर गलत है…सबसे पहले अरविन्द ने निशांत चतुर्वेदी(न्यूज़ एक्सप्रेस) को इंटरव्यू दिया है।
    
    Chaitanya Alok रवीश ?
    
    Silky Agrawal पर उन्होंने तो कल रात शरद सिंह को इंटरव्यू दिया था न? मैंने देखा था कल।
     
    Rajender Kumar Sharma Mr Gautam arrogance for any reason is self damaging.. Suicidal.. Only peoples associating with AAP ideology will have such objections.. Their views might not be acceptable, but that doesn't mean a person who has contributed to the cause can be and should be ridiculed for putting up an unpleasant review.. YOU ARE FREE TO SAY THAT MY OPINION IS NOT NEEDED.
    
    Gopal Krishan Chhibbar rajniti mai imandari ore aadrsh ka sanjog nahi milta ,,,,,,
     
    Deepu Naseer Yashwant Singhमुझे इस तंगदिली की वजह समझ नहीं आ रही.
     
    Gujjar Lokesh आपकी बात में दम है .लेकिन हो सकता है उन्होंने पहले विरोधियो को चित्त करने का प्रोग्राम बना लिया हो .अपने तो अपने है ही .
     
    Vikas Kumar may be because aam aadmi party believes that Ravish, sharad, nidhi kulpati…whose photo aam aadmi party posted for honest journalism….supported him with honesty…a reicprocal gesture to the editor of ndtv
     
    Deepak Khokhar मेरी जानकारी के अनुसार तो कल रात आईबीएन 7 पर पहला इंटरव्यू आया था। यानि चुनाव परिणाम की रात को, हो सकता है बरखा वाला इंटरव्यू बाद में हो। मैने तो कल रात को ही पहली बार आईबीएन पर देखा था। अगर यह गलत जानकारी है तो दुरूस्त करें।
     
    Lovesh Sharma first interview telecast on ibn7 with ashutosh…
     
    Aashish Jain Aashu sirf Raveesh hi aise patrkar hain jinhe pahla interview dena tha..
     
    Rajeev Singh Ranu सत्ता के करीब है … तो ब्यपारिक घरानों से सेटिंग के लिए सब "गणीत गुणा" वाला दलाल चाहिय ।
 
    Ravi Shankar  Yashwant Singh: Kejriwal did give an interview to Barkha Dutt, am not sure if that was his first one after becoming an MLA.. I also know very well about Barkha Dutt and her misdeeds.. However, I don't see any wrong done by Kejriwal in giving an interview to her.. For me, if he would have denied such an interview, he would have been criticized of being a new democratically elected leader and having "preferences" to journalists.. So, it was rather a safe route to give her an interview, and use the platform to voice his opinions on that occasion which he, anyways, rightfully, did (I have watched that interview yesterday itself, it's available online).. I also understand your opinions here as you are part of the same fraternity as Barkha Dutt is, but on opposite ends!
 
    Pradeep Sharma कहा हो आप साहब मजा नी आ रहा आप बिन
 
    Alok Rai कितना बच की चलियेगा महाराज… सब त उहे हैं !! 'टारगेट ' देकर कर तो काम लिया जा रहा है खबरिया चैनल में.
   
    Pankaj Mishra २४ कैरेट गोलग कहाँ ढूंढें
    
    Prem Arora यशु भाई यह मत भूलिए कि आपने ही आप को जितवाने की अपील की थी. मनीष सिसोदिया भाई भी जीते और आप कि जीत तो आप की ही जीत है..आप अरविन्द को कॉल कर समझा सकते हैं…वैसे आपका अंदाज़ा एक दम सही निकला…यशु भाई और आम आदमी पार्टी कोई दो रूप नहीं है…में बुधवार को डेल्ही आ रहा हूँ…आप कब तक आ जाओगे?
    प्रेम

    Sachin Choudhary  aise logon ko to khas taur par interview dena chahiye taki unhe pata chale ki is desh ke dalali ke alawa bhi kuch imandaari aur imandar log bache hain .. sahi kiya kejriwal ne
 
    Tp Singh aise patrakaro se kejriwaal ko bachana hoga warna alag hone ka dambh na bharey ?
 
    Devesh Sharma सही कहा यशवंत भाई आपने…
   
    Ashish Verma bahut khub unhe aise logo se bach kar rahna padega.
    
    Lalit Verma आदरणीय यशवंत जी , मुझे लगता है अगर आपको भी एक माइक दे दिया जाए और सभा के अंतिम छोर पर मौजूद आदमी…. जिसे आप देख भी नहीं पा रहे हैं….तो आप माइक को अपने मुंह के पास कुछ इस तरह संतुलित करेंगे कि आपकी आवाज़ दूर तक पहुंचे …बिना इसकी फ़िक्र किए कि आपसे पहले उस माइक को शक्ति कपूर ने पकड़ा था या मनु शर्मा ने …..आपको उस माइक से तबतक कोई गुरेज़ न होगा जबतक माइक में छिपा स्पाई कैमरा स्वयं आपके मुहं के भीतर की लाइव-कमेंटरी करने लगे और बताने लगे कि आपके दांत सुरती खाने से कितने खराब हो गए हैं ? Moral of the story is………..पत्र पर लिखे सन्देश को पढ़िए ,रंग ,बू ,आकर-प्रकार का सन्देश से सीधा सरोकार नहीं होता ??
     
    Deepak Acharya kejariwal ne aaj tak logo ki galtiyo ko ujagar kr k apane ko sahi dikhaya h, ab mauka h ki janta unaki galtiya ginana shuru kr de….
     
    Gaurav Arora Deepak Sharma – Sir Khushi tab hogi jab aaj ke baad koi bhi politician jab bhi kisi Barkha datt ja Deepak Chor -siya jaise journalist ko interview dega … tab bhi aap aise hi post daalnge aur khuleaam unko criticize karenge. Aur usse bhi jayada khushi tab hogi jab apko pta chal jayega ki kisi patarkaar ne galat kiya tab aap uske baare mein usi tra news dikhaynge jaise Aasaram ke khilaaf dikha rahe hein !!1
    
    Ahmad Raza maine pahle hi aapatti jata di hai..
 
    Mayank Chaturvedi bilkul sahi kaha
 
    Hemant Tyagi JO SAMAAN BARKHA DUTT PAR HAI VO AAP AUR HAM PAR NAHI Yashwant Singh BHAI JI
   
    Avinash Yadav Yadav actually kejriwal aur barkha dutt chor-chor mausarey bhai hai..daagdar itihas hai kejriwal ka…jara khoji patrakarita kijiye…cong leader digvijay singh ke roz bhejey gaye 10 sawalon ka aajtak jawab nahi de paaye..kejriwal….
     
    Indu Shekhawat agree
     
    Pappu Nakhat rajniti ke rang me rang gaye hai app ke kejriwal
     
    Nevil Clarke Yash bhai, agar yeh sahi hei to dukh ki baat hei kyonki Barkha jaisi dalal patrakar se duri banai jani chahiye aur is bare mei Kejariwal ka spashtikaran appekshit hei. Sadhuwad aapko yeh baat hamare awdhan mein lane ke liye
     
    Diwakar Singh कहीं ये "आम आदमी पार्टी" आम पार्टीयों के तरह तो नहीं?
     
    Nadim S. Akhter आपसे सहमत.
     
    Mustejab Khan खबर तो ये भी है की दीपक चौरसिया भी केजरीवाल पे एपिसोड तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं
     
    Qamar Abbas Zaidi abhi tak to waise nazar nahiN aate
     
    Dinesh Raj Sharma avinash g satta hasil krne se pahle BJP v maryada purshotam hoti thi satta ka swad sb kuch bulla deta hai
     
    Vivek Rai ये भी एक आम पार्टी है

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

‘न्यूज एक्सप्रेस’ चैनल में नौकरी खोज रहे हैं विनोद कापड़ी!

: कानाफूसी : भड़ास ने जो संभावना जताई थी, वही हुआ. इंडिया टीवी से विनोद कापड़ी की नौकरी पूरी तरह जा चुकी है. भैंस से रेप की घटना पर एक डाक्यूमेंट्री बनाने के हल्ला-गुल्ला के बाद इन दिनों फिर से वे रोजी रोटी के चक्कर में चैनलों के चक्कर काट रहे हैं. ताजी सूचना ये है कि विनोद कापड़ी आजकल में पुणे शहर के आसपास देखे गए हैं. वे साईं प्रसाद मीडिया के मालिकों से मीटिंग बैठक में लगे हुए हैं. कुछ शर्तों को लेकर बात अभी बाकी है.

कोई कह रहा है कि ग्रुप एडिटर के पद पर आएंगे और उनके अंडर में एसएन विनोद जैसे बुजुर्ग पत्रकार काम करेंगे. चूंकि निशांत चतुर्वेदी न्यूज एक्सप्रेस में आने से ठीक पहले विनोद कापड़ी के अंडर में इंडिया टीवी में काम कर रहे थे इसलिए उन्हें फिर से कापड़ी के अधीन होने में कोई मलाल नहीं होगा. सात-आठ लाख रुपये महीने की सेलरी पर नौकरी कर चुके विनोद कापड़ी को साईं प्रसाद प्रबंधन इतनी सेलरी देकर किसलिए न्यूज एक्सप्रेस चैनल का ग्रुप एडिटर बनाएगा, इसको लेकर कई किस्म के कयास हैं.

कुछ लोगों के मुताबिक वो न्यूज एक्सप्रेस को टीआरपी में नंबर वन बना देंगे. वहीं कुछ का कहना है कि वे न्यूज एक्सप्रेस को धंधा रेवेन्यू बिजनेस खूब दिला देंगे. कुछ ये भी कह रहे हैं कि साईं प्रसाद मीडिया प्रबंधन ने जिस मकसद से न्यूज चैनल शुरू किए हैं, उसमें आक्रामक व टीआरपीबाज पत्रकारिता के लिए कोई खास स्पेस नहीं है. इसलिए टीआरपी के लिए साईं प्रसाद मीडिया के मालिक इतना बड़ा व खर्चीला दांव नहीं खेलेंगे. रही बिजनेस रेवेन्यू धंधा की बात तो अब तक विनोद कापड़ी के करियर में इस किस्म का डायरेक्ट कोई काम नहीं रहा है इसलिए नहीं कहा जा सकता कि यह सब करने कराने के लिए उन्हें लाया जा रहा है.

विनोद कापड़ी के नए जॉब को लेकर आप के पास भी कोई सूचना जानकारी हो तो उसे भड़ास तक पहुंचाएं, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

अलीगढ में पत्रकारों को संगठित करने की मुहिम तेज

खबरों को खोजने, कुछ अलग लिखने और सबसे पहले ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने के चक्कर में अलग-थलग चल रहे अलीगढ़ में पत्रकारों ने अब संगठित होने का प्रयास शुरू कर दिया है. सब कुछ ठीक ठाक रहा तो जल्द ही अलीगढ़ में भी पत्रकारों का मजबूत संगठन होगा. इसी प्रयासों की शुरुआत सोमवार को इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया से जुड़े प्रतिनिधियों ने बैठक करके की. तस्वीर महल स्थित पार्क में हुई बैठक में पत्रकारो ने प्रतिस्पार्धात्मक समय में पत्रकारों के बीच बढ़ रही दूरियों को कम करने पर कारगर कदम उठाने की बात कही.
 
इस मौके पर पत्रकारो ने कहा कि अधिकारी से लेकर कर्मचारी वर्ग तक के संगठन हैं और वह संगठन समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते हैं. फिर पत्रकार खुद क्यूं संगठित नहीं हो सकता. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े प्रतिनिधियों को कई बार शोषण और मुश्किलों से जूझना पड़ता है लेकिन उसकी आवाज उठाने के लिए आगे आने वालो की संख्या कम होती है. संगठन का उद्देश्य होगा कि वह पत्रकारों के अधिकारों के संरक्षण, सुविधाओं और सम्मान के प्रति संघर्षरत रहे. इस संगठन का चुनाव जल्द कराकर विधिवत शुरआत की जायेगी. इस मौके पर जी न्यूज़ से प्रवीण कुमार, एएनआई से देवेन्द्र, इण्डिया न्यूज़ से महेश जादौन, पी7 से पंकज शर्मा, समाचार प्लस से अनिल चौधरी, न्यूज़ २४ से अंशुल राघव, रियल न्यूज़ से सुन्दर सिंह तोमर, सुदर्शन से आतिफ, आज से जितेन्द्र शर्मा समेत दर्जनों पत्रकार मौजूद रहे.
 
अलीगढ़ से प्रवीण कुमार की रिपोर्ट

पत्रकार जासी जोसेफ को एआईसीजे ने किया सम्मानित

मुम्बई : भारतीय कैथोलिक पत्रकार संघ (एआईसीजे) ने रविवार 8 दिसंबर को अपनी स्वर्ण जयन्ती मनाई. इस अवसर पर महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग की उपाध्यक्ष जानेट लारेंस डिसूजा ने वरिष्ठ कैथोलिक पत्रकार जासी जोसेफ को गोल्डेन जुबली पुरस्कार से सम्मानित किया. डिसूजा ने कहा कि जोसेफ ने एक निर्भीक कैथोलिक पत्रकार के रूप में खोजी पत्रकारिता द्वारा नीति परिवर्तन, व्यवस्था सुधार और सरकारी प्रशासन को बेहतर बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है.
 
गौरतलब है कि जोसेफ की खोजी रिपोर्टों ने कई सरकारी अधिकारियों को जेल पहुंचाया था और कई को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया था. इनकी रिपोर्टों की वजह से सैन्य छानबीन का रास्ता भी खुला था. 
 
पुरस्कार ग्रहण करने के बाद धन्यवाद देते हुए जासी जोसेफ ने कहा कि गोल्डेन जुबिली समारोह सम्मान को वे तहकीकाती कहानियों का नहीं ‘अच्छी रिपोर्ट’ का सम्मान कहना पसंद करेंगे. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार की घटनाओं के बढ़ने से खोजी पत्रकारिता आसान बनती जा रही है. उन्होंने कहा कि मैं आशा व्यक्त करता हूं कि सौ साल बाद लोगों को भ्रष्टाचार की कहानियों के लिए नहीं बल्कि सकारात्मक कहानियों के लिए पुरस्कृत किया जायेगा.
 
जोसेफ सिर्फ एक कैथोलिक पत्रकार की वजह से ही नहीं जाने जाते हैं. पिछले साल उन्हें भारत का पुलित्जर माने जाने वाले रामनाथ गोयनका एक्सलेंस पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. प्रेम भाटिया ट्रस्ट ने सन् 2011 में जोसेफ को बेस्ट पोलिटिकल रिपोर्टर के लिए चुना था और मुम्बई अंडरवर्ल्ड की रिपोर्टिंग के लिए ज्योति डे के साथ संयुक्त रूप से पुरस्कृत किया गया था. ज्योति डे को 11 जून को गोली मार दी गई थी. (वेटिकन रेडियो)

एनडीटीवी पर प्रतिबंधित दवा की दुकान सजाकर बैठा है फर्जी डॉक्टर मुनीर खान

पिछले महीने एनडीटीवी ने एक डॉक्टर मुनीर खान की चमत्कारिक दवा के बारे में खबर चलाई थी. जिसमें बताया गया था कि ये गलत दवा है तथा इसे मार्केट में रोकने पर प्रतिबंधित कर दिया गया है. इस समय एनडीटीवी खुद ही उसी दवा को अपने चैनल पर ही प्रमोशनल फीचर में चला रहा है. ताज्जुब हो रहा है कि कैसे कोई चैनल जिस दवा के गलत होने की खबर चलाई थी उसी के विज्ञापन को अपने ही चैनल पर चला रहा है.
 
दो साल पहले टीवी पर फिल्म अभिनेत्री तबस्सुम एक स्वघोषित साइंटिस्ट और डॉ मुनीर खान की एक दवा बाडी रिवाइवल का प्रचार किया करती थीं. डॉक्टर साहब का दावा था कि इस दवा से कैंसर और एचआईवी का इलाज संभव है. बस क्या था लोग टूट पड़े. 100 मिली की एक बोतल पंद्रह-पंद्रह हजार में बेंची थी. जब लोगों ने दवा ले ली तब पता चला कि ये तो ठगी थी.
 
बड़ी संख्या में लोगों ने मुनीर खान के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की शिकायत शुरू कर दी. 143 लोगों ने खान के खिलाफ शिकायत की थी जिसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने जांच शुरू कर दी थी. मुनीर खान को गिरफ्तार भी किया गया. जांच शुरू हुई तो मुनीर खान के एक से एक फर्जीवाड़े की कहानियां सामने आने लगीं थीं.
 
प्रवर्तन निदेशालय और पुलिस ने जांच में पाया कि मुनीर खान तो डॉक्टर ही नहीं था. जांच में पाया गया कि उसने एक फर्जी इंस्टीट्यूट से सिर्फ दो महीने में साढ़े तीन हजार रूपये में डिग्री सर्टिफेकट बनवाई थी. उसने जिस दवा का इतना प्रचार किया उस दवा का उस दवा को किसी अधिकृत मेडिकल संस्थान से मान्यता नहीं प्राप्त थी. इस दवा को लोगों के लिए हानिकारक मानते हुए इसे जब्त करने के आदेश दे दिया गया था. इस खबर को पीटीआई के हवाले से एनडीटीवी ने भी चलाया था.
 
अभी पिछले 3 दिसम्बर को रात में मैने एनडीटीवी चैनल ट्यून किया तो ये देखकर दंग रह गया कि उसी प्रतिबंधित दवा 'बाडी रिवाइवल' के प्रोग्राम को एनडीटीवी चैनल पर प्रमोशनल फीचर के तहत रात में चलाया जा रहा था. वो तो मुझे पिछली खबर याद थी इसलिए मेरा ध्यान तुरन्त इस पर चला गया लेकिन कितने लोग हैं जो सारी बात याद नहीं रखते और इन चैनलों पर भरोसा करके बुरी तरह इन गलत दवाओं के दुष्प्रभाव के शिकार हो जाते हैं. 
 
एक तरफ तो ये चैनल ऐसी फ्रॉड को जनता के सामने लाकर पहले अपनी विश्वसनीयता कायम करते हैं कि हम कितनी सरोकारी पत्रकारिता कर रहे हैं और दूसरी तरफ ऐसे ही लोगों के साथ मिलकर इसी विश्वास का फायदा उठाते हैं. अपनी कमाई करने के चक्कर में ये इस बात का भी ख्याल नहीं रखते कि वो किसी की जान से खेल रहे हैं.
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

नई दुनिया ने मंत्री जी को हारा और जीता दोनों दिखा दिया

नई दुनिया इंदौर ने ऐसी गलती की है कि क्या कहें. अक्सर पहले पेज पर सही होता है पर नई दुनिया ने पहले पेज पर गलत खबर लगाई है और अंदर के पन्ने पर सही खबर लगाई है. इस बार मध्य प्रदेश के चुनाव में कई मंत्री चुनाव हारे हैं. अब ये खबर बड़ी थी तो अखबार ने हारने वाले मंत्रियों की सूची उनके नाम और विधान सभा क्षेत्र सहित पहले पेज पर प्रकाशित की. इसमें जैतपुर से जयसिंह मरावी को हारा हुआ बताया गया है जबकि मरावी चुनाव जीते हैं.
वहीं इसी अखबार के अंदर के पन्ने पर सभी जीतने वाले नेताओं की सूची दी गई है जिसमें जयसिंह मरावी को विजयी बताया गया है. अब इस गलती पर क्या कहा जाय. लगता है कि डेस्क पर बैठे लोग जब चुनाव के समय खबरों की पुष्टि किए बिना छाप देते हैं तो आम जनता की खबर तो ना जाने कैसे छाप देते होंगे. लगता तो ऐसा ही है कि डेस्क पर खबरों की बिना प्रूफ रीडिंग किए ही लगा दिया जाता है.

दिल्ली की राजनीति में हुए इस ऐतिहासिक बदलाव के हम सब साक्षी हैं

अरविन्द केजरीवाल की रामलीला मैदान में जनता के सामने लोकपाल बिल को पास करने की मुराद तो पूरी नहीं हो सकी पर इस व्यक्ति ने दिल्ली की राजनीति में एक बड़ा बदलाव जरुर किया है, कांग्रेस की चूलें हिला कर रख दी है। 15 साल के सशक्त शासन को जड़ों से उखाड़ कर फेंक दिया है। बेशक केजरीवाल की आम आदमी पार्टी सरकार नहीं बना सकी पर उसने चुनाव में अपनी भूमिका के दर्शन उन सभी दलों को करा दिए जो अब से पहले केजरीवाल को बच्चा बता रहे थे। इससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में भी केजरीवाल राजनैतिक दलों को चुनौती देने वाले हैं। 
 
आज वापस एक बार फिर लगने लगा है कि हम वाकई लोकतंत्र के निवासी हैं, जहां जनता का जनता के लिए और जनता के द्वारा शासन होता है। जो पहचान इससे पहले खो सी गए थी आज हमने वो वापिस हासिल की है। जनता ने कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को यह दिखा दिया है कि आँखे बंद तो रह सकती है पर ज्यादा दिन तक नहीं। आज जनता ने यह साफ़ कर दिया है कि उनके मत में कितना दम है। और एक आम आदमी क्या कर सकता है। 
राजधानी दिल्ली में जहां कांग्रेस ने 15 साल लोगों का खून चूसा और उसे विकास का नाम दिया गया, वहां पहली ही बार में एक आम पार्टी ने (जिसे अस्तित्व में आये केवल एक साल ही हुआ है) उसे यह एहसास कराया कि शासन इस तरह से नहीं होता जिस तरह से आप कर रहे हैं, और जनता वाकई सब जानती है, और सही समय आने पर अपना बदला भी ले लेती है। 
 
ये साफ़ तौर पर दिल्ली की जनता का कांग्रेस पर गुस्सा है जो उसने जगत जाहिर किया है। 15 सालों से दिल्ली की जनता के सीने में जल रहे ज्वालामुखी का फटना यह दर्शाता है कि हमें एक सुशासन चाहिए, कुशासन नहीं। भाजपा के जीतने के पीछे चाहे जो भी कारण रहे हों, मगर आम आदमी पार्टी को देखकर तो ये साफ़ हो जाता है कि ये उसी की जीत है, भाजपा की नहीं।
 
नेताओं से भरे इस देश में आज आम आदमी पार्टी ने यह भी साबित कर दिया कि एक आम आदमी फिर चाहे वह रिक्शे वाला हो या ऑटो वाला, चाय वाला हो या निजी क्षेत्र में नौकरी करने वाला तीसरे दर्जे का मज़दूर सभी चुनाव में भाग लेकर जीत सकते हैं और जनता के प्रतिनिधि बन सकते हैं। आज उस चलन का भी अंत हो गया जिसने राजनीति को चारों ओर से इस तरह से समेट रखा था कि चुनाव केवल वो ही लोग लड़ सकते हैं जो पैसे वाले हैं जिनका समाज में रुतबा है, जिनसे लोग खौफ खाते हैं, जो समाज को केवल गुमराह करते हैं उनका भला नहीं। और ये बड़ा बदलाव उस खौफ से चुप्पी तोड़ने का संभल है, जो लोगों ने दर्शाया है।   
 
दिल्ली की सत्तर सीटों में से 28 सीटें हासिल करना वो भी बिना किसी राजनीतिक विरासत के अपने आप में एक बुलंद उपलब्धि है। जो केजरीवाल ने हासिल की है। कांग्रेस जो पूर्वी दिल्ली से पिछले 15 सालों से पूर्ण बहुमत हासिल कर रही थी आज वहाँ कहीं तक भी नहीं दिखाई दी। आम आदमी पार्टी ने पूर्वी दिल्ली की सीटों पर कब्जा किया और बता दिया की पिछड़े इलाकों में कांग्रेस का क्या अस्तित्व है। इसे साफ़ जाहिर हो गया है कि अपने घोषणा पत्रों में जो वादे किए गए थे वो कांग्रेस ने पूरे नहीं किए और भी कई मुद्दे हैं जिनके कारण आज कांग्रेस ने अपनी स्वतंत्रता से चली आ रही प्रथा को नेस्तोनाबूद कर लिया। और शायद आने वाले 2014 के लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़े। बीजेपी की जीत का श्रेय साफ़ तौर पर मोदी को देने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। मोदी की लहर का असर बाकी राज्यों की भांति दिल्ली पर भी दिखा और बीजेपी ने तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। अब देखना यह है कि क्या बीजेपी अपनी इस जीत को बनाये रखती है या पहले की भांति ही दिल्ली में अपने गलत बयानों से मार खा जाती है।
 
अब केजरीवाल के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि अब क्या? सरकार तो बन नहीं पायी तो क्या बीजेपी का कहा सब कुछ मान लिया जाएगा या एक सशक्त विपक्ष की भांति 'आप' दिल्ली में कार्य करेगी, और भी कई सवाल खड़े हो जाते हैं कि क्या बीजेपी लोकपाल को पास करेगी, जो कांग्रेस की भांति ही उसका विरोध कर चुकी है जिसकी सांठ-गांठ के कारण ही लोकपाल को पास नहीं किया गया था,(जब अन्ना अनशन पर बैठे थे और तब ही आम आदमी पार्टी की नींव रखी गयी थी।) अब क्या होगा वो तो आगे आने वाले समय में ही पता चलेगा। पर आप की ये 28 सीटें केजरीवाल के लिए बड़ी और महत्त्वपूर्ण चुनौतियां भी साथ लाई हैं, जिस जनता ने केजरीवाल पर भरोसा जताया है वो काम चाहेगी तो क्या करेगी आप? भाजपा के दबाव में कार्य करेगी या अपनी बातों पर अटल रहेगी? जब भी किसी दल ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया है उसने विपक्ष को अनदेखा जरुर किया है, अभी हाल ही की हरियाणा विधान सभा से विपक्ष को बाहर कर देना सभी के सामने आया था जब प्रमुख विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोकदल को सदन से निष्कासित कर दिया गया था और विभिन्न बिलों को पास किया गया था। अब क्या गारंटी है कि दिल्ली में भी यह दोहराया नहीं जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो क्या करेगी आप?
 
वहीं अगर वर्तमान स्थिति पर नज़र दौड़ाएं तो लगता है कि दिल्ली में किसी भी पार्टी की सरकार नहीं बन पायेगी, क्योंकि यहां मामला त्रिशंकु हो गया है और ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाएगा, तो क्या आप भाजपा और आप पुनः चुनावों में अपनी स्थिति बरकरार रख पाएंगे या किसी एक पार्टी को बहुमत मिलेगा, या दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन के बाद सरकार बनेगी और हर्षवर्धन या केजरीवाल में से एक को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा परन्तु ऐसी स्थिति में तो भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई देता है गठबंधन के बाद भी आप को क्या मिलने वाला है? सीटे तो भाजपा के पास ज्यादा हैं। इसके अलावा भाजपा अल्पमत की सरकार बना सकती है अगर बाकी पार्टियों से ये आश्वासन मिले कि सरकार उनके द्वारा नहीं गिराई जायेगी। जो भी लगता है दिल्ली में अभी और उठापटक होने वाली है, जिससे प्रभावित केवल आम आदमी होगा, अब चुनाव हो या न हो, सरकार भाजपा की बने या आप की या फिर राष्ट्रपति शासन लागू हो परन्तु दिल्ली की जनता ने एक बड़ा बदलाव अपनी आंखों से देखा है जिसके साक्षी हम सब हैं।
 
लेखक अश्वनी कुमार से akp.ashwani@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

प्रभुदत्त दूबे बने खबर भारती के बयूरो हेड, एसपी यादव दबंग दुनिया से जुड़े

खबर भारती भोपाल से खबर है कि सीनियर रिपोर्टर प्रभुदत्त दूबे को प्रबंधन ने मध्य प्रदेश का बयूरो हेड बना दिया है. प्रभुदत्त अब तक ये जिम्मेदारी सम्भाल रहे अनूप सक्सेना की जगह लेंगे. बताया जा रहा है कि सीनियर रिपोर्टर प्रभुदत्त दुबे को चुनाव में अच्छा काम करने का ईनाम मिला है. चुनाव में प्रभुदत्त दुबे ने अपने आपको प्रबंधन के सामने साबित किया और बदले में प्रबंधन ने बढ़ाकर और प्रमोशन देकर चैनल का नया बयूरो हेड बनाया है.
 
मुंबई से खबर है कि एसपी यादव ने हमारा महानगर से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने दबंग दुनिया में जुड़कर बतौर चीफ सिटी सब एडिटर अपनी नई पारी शुरू की है.
 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

वो मदारी कौन, जो खेल रहे थे ब्लैकमेलिंग का खेल?

देहरादून । उत्तराखण्ड सचिवालय में तैनात जेपी जोशी प्रकरण में आखिर वो मदारी कौन थे, जो पर्दे के पीछे से ब्लैकमेलिंग का खेल खेल रहे थे। भले ही पुलिस ने इस प्रकरण में एक आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया हो, लेकिन इस प्रकरण का मास्टर माइण्ड अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। वहीं कांग्रेस की महिला नेत्री रितु कण्डियाल की भूमिका भी इस मामले में संदिग्ध नजर आ रही है। वहीं इस खेल के कुछ कथित पत्रकारों का भी घिनौना चेहरा इस प्रकरण में सामने आने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। 
 
जेपी जोशी ने पुलिस को दिए अपने बयान में साफ तौर से कहा है कि कांग्रेस नेत्री रितु कण्डियाल ने ही मामले को रफा-दफा करने की एवज में तीन करोड़ रूपये की पेशकश की थी, लेकिन जेपी जोशी को जिन लोगों ने पैसे के लिए फोन किया, उनके पत्ते अभी नहीं खुल पाए हैं कि यह फोन कॉल करवाने वाले वो मदारी कौन थे, जो पर्दे के पीछे से ब्लैकमेलिंग का खेल खेल रहे थे। 
 
उत्तराखण्ड की राजनीति में सैक्स स्कैंडल का तड़का हमेशा से ही सुर्खियों में रहता आया है। एनडी तिवारी, हरक सिंह रावत सहित कई अन्य नेताओं के स्कैंडल भी समय-समय पर उजागर होते रहे हैं और सचिवालय में तैनात कई अधिकारियों पर भी ब्लैकमेलिंग के जरिए धन की मोटी वसूली की जा चुकी है। उत्तराखण्ड में मीडिया की चादर ओढ़कर कुछ दलाल मदारी ब्लैकमेलिंग का खेल पिछले काफी समय से खेल रहे हैं और इनके निशाने पर अब तक कई राजनेताओं के साथ-साथ अधिकारी भी आए हैं, लेकिन जेपी जोशी प्रकरण में बनाई गई सेक्स सीडी का गठजोड़ किसके इशारे पर अंजाम दिया गया, इसकी परतें अभी पुलिस उधेड़ने में जुटी हुई है। पुलिस को जो जानकारी हासिल हुई है, उनमें कई चौंकाने वाले मोबाईल नंबर भी जांच के दायरे में चल रहे हैं और अभी कई चेहरों से नकाब उतरना बाकी है। इस प्रकरण में कांग्रेस की महिला नेत्री रितु कण्डियाल दुबई से वापस लौट आई हैं और पुलिस रितु कण्डियाल से पूछताछ करने के बाद इस मामले से कई लोगों का पर्दाफाश कर सकती है। 
 
बीते दिनों उत्तराखण्ड के पुलिस महानिदेशक बीएस सिद्धू ने इस प्रकरण में मास्टर माइण्ड की तलाश पुलिस द्वारा किए जाने की बात कही थी, लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस अभी तक उस आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है, जिसके इशारे पर इस प्रकरण को अंजाम दिया गया। माना जा रहा है कि आने वाले कुछ दिनों में इस प्रकरण से ऐसे मदारियों के चेहरों से नकाब उतर सकते हैं, जो पर्दे के पीछे से बैठकर ब्लैकमेलिंग का खेलने में जुटे थे। इन मदारियों के द्वारा तीन करोड़ रूपये की पेशकश भी जेपी जोशी से की गई थी, जो पुलिस को पूछताछ में खुद जेपी जोशी ने बयां की है।
 
लेखक राजेन्द्र जोशी उत्तराखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

ज्योतिषी जी के अखबार में छपती है चोरी की खबर

वाराणसी। महोदय शहर के मानिंद ज्योतिषी है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर की भविष्यवाणियां करते रहते हैं। कितनी बारिश होगी, कैसी ठंड पड़ेगी से लेकर कौन सी फिल्म हिट होगी, सब कुछ इनके भविष्यवाणी के दायरे में है। इनका विज्ञापन आपकी समस्याओं के हल की गांरटी देता है। ज्योतिष में हाथ आजमाते-आजमाते इन दिनों 'भारत एकता टाइम्स' नाम से अखबार निकाल निकाल रहे हैं। लेकिन हाथ देखकर भाग्य बांचने का दावा करने वाले महोदय का अखबार चोरी की खबर लगाने लगा और महोदय को पता ही नहीं चला। 
 
हुआ कुछ यूं कि वाराणसी से ही प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक अखबार 'गांडीव' ने शहर में हुए डिप्टी जेलर हत्याकांड को लेकर अपने अखबार में 26 नवम्बर को 'कितने हाथों से गुजरती है सुपारी, मारने वाला कौन' शीर्षक से समाचार का प्रकाशन किया। इसी समाचार को 'भारत एकता टाइम्स' ने अपने 5 दिसम्बर के अंक में 'अपराधियों के नये नेटवर्क के आगे पुलिस बेबस' शीर्षक के साथ प्रकाशित कर दिया। चालाकी देखिए खबर को प्रकाशित करने वाले ने इन्ट्रो में चार लाइन अपनी तरफ से चस्पा कर पूरी खबर को छाप मारा। 
 
चोरी की इस खबर को छापते हुए शर्म तक नहीं आयी कि इस हरकत को कम से कम पत्रकारिता तो नहीं कहते। अखबार का स्लोगन है- "अखबार नहीं आंदोलन हैं’’। भविष्यवेत्ता महोदय चोरी की खबरों से आंदोलन नहीं चलता। हां अखबार के नाम पर भौकालबाजी जरूर चलती है, वो भी कुछ दिनों। किसी ने सच ही कहा है- "आज तो सच्चाई से कागज का घर भी छिन गया, ऐसे-वैसे लोग अखबारों के मालिक हो गये।" इसे कहते है चिराग तले अंधेरा यानि दुनियां पर नजर पर खुद के अखबार में चोरी की खबर।
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

C Voter के यशवंत को ‘आप’ के बारे में गलत आंकलन के लिये माफी मांगनी चाहिये

Sheetal P Singh : हालांकि ये कभी नहीं सुधरेगा, पर C Voter के यशवंत को आप के बारे में गलत आकलन के लिये माफ़ी मांगनी चाहिये…

Sheetal P Singh : आप" ने तीसरे के स्पेस की प्रामाणिकता साबित कर दी । मोदी और राहुल में देश को बाँट कर सीमित कर देने के " कारपोरेट" भाष्य को आइना दिखा दिया केजरीवाल ने…

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

‘आप’ के मतदाता ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को क्यों नहीं जिताया?

Virendra Yadav : 'आप' और केजरीवाल की सबसे बड़ी सीमा उनकी विचारधारा विहीनता और 'नो आईडियालोजी ' का नारा है. राजनीतिक तंत्र 'न वाम न दक्षिण' की विचारधारा विहीनता से नहीं चलता है. हाँ, इससे म्युनिसिपलटियों को जरूर चलाया जा सकता है, मेट्रोपालिटन दिल्ली को भी चलाया जा सकता है.

'आप' को देश की वृहत्तर राजनीति में आने और विकल्प निर्माण में शामिल होने के लिए यह स्पष्ट करना होगा कि देश के विकास की अवधारणा में वे मोदी के बरक्स कहाँ खड़े हैं? कार्पोरेट के साथ या हाशिये के समाज के साथ. वंचित वर्गों को विशेष अवसर दिए जाने पर उनकी पार्टी क्या सोचती है?

उन्हें मोदी की विचारधारा के बरक्स अपनी स्थिति को स्पष्ट करना होगा और यह सब करने के बाद भी क्या वह मतदाता उनके साथ होगा जिसकी पसंद आज मोदी हैं? …. क्या शाजिया इल्मी तब भी हारती जब वो मुस्लिम नहीं होती? 'आप' के मतदाता ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को क्यों नहीं जिताया? क्या इसलिए कि इस मतदाता की पसंद दिल्ली में केजरीवाल और लालकिले पर मोदी देखने की थी? इन प्रश्नों को स्थगित नहीं किया जाना चाहिए. फिलहाल 'न वाम न दक्षिण' का विचार अरविन्द केजरीवाल की जुबानी जान लीजिये -"Kejriwal says AAP refuses to be guided by ideologies and that they are entering politics to change the system: "We are aam aadmis. If we find our solution in the Left we are happy to borrow it from there. If we find our solution in the Right, we are happy to borrow it from there."

साहित्यकार वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

औरों को भी ‘आप’ से सीखना होगा, खोल में सिमटे रहने की आदत छोड़नी होगी

Ambarish Rai : देश कांग्रेस और भाजपा का विकल्प चाहता है… दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने यह कमी पूरी की. बिना किसी उलझावपूर्ण सैद्धांतिक बहसों क़े सीधे साधे तरीके से महंगाई और भ्रस्टाचार के खिलाफ सफल जनगोलबंदी कर ली मगर तमाम जटिल प्रश्नों पर अभी भी उन्हें अपना रुख साफ करना है.

उन्होंने दिल्ली की राजनीति में सेंटर टू द लेफ्ट की जगह भरने की कोशिश किया है. औरों को भी इससे सीखना होगा. सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के साथ चुनावी रणनीति का भी प्रश्न हल करना होगा और अपनी ही खोल में सिमटे रहने की आदत छोड़नी होगी.

कामरेड रहे अंबरीश राय के फेसबुक वॉल से.

महात्मा गांधी ने नमक तो केजरीवाल ने पानी को मुद्दा बना डाला

Yogesh Kumar Sheetal : नमक जैसी चीज को राष्ट्र का मुद्दा बना देने वाले महात्मा गांधी के पास आत्मबल था. केजरीवाल ने पानी को मुद्दा बना डाला. RTI के माध्यम से पानी के निजीकरण के पीछे की कहानी सबके सामने लाई और साबित किया कि भाजपा और कांग्रेस की जनविरोधी नीतियां एक हैं और किस तरह दोनों पार्टियां तंजानिया, कोलंबिया, फिलिपिंस आदि देशों में विश्व बैंक के इस खेल को जानकर भी अनदेखा कर रही है.

लेकिन सामाजिक न्याय को मुद्दा आप नहीं बना रहे हैं तो इसलिए कि आपके पास न आत्मबल है न ही समर्पण. बावजूद कई ऐसे लोग हैं जो नेपथ्य से सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं. बेचारों को यह भी नहीं पता है कि उनके काम का श्रेय आप जैसे लोग लेते जा रहे हैं. काम उनका, नाम आपका.

युवा पत्रकार योगेश कुमार शीतल के फेसबुक वॉल से.

जियो डा. कुमार विश्वास!

Atul Kanakk : लोगों ने उसकी प्रतिभा से आक्रांत होकर उसके खिलाफ सामूहिक लामबद्व कर ली, लेकिन उसने एक बार कुछ ठान लिया तो फिर अपने पथ पर आगे बढ़ता गया। षड्यंत्रों ने उसे स्नेह सने स्टिंग के व्यूह में फँसाना चाहा तो कुंठाओं ने उसके खिलाफ अनर्गल प्रलाप किये। लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचने की कीमत कुमार विश्वास ने अनेक आत्मीय मित्रों की कुंठाओं को चुपचाप सहकर चुकाई। लोग उसकी विराट उपलब्धियों में क्षुद्रताओं की अनुशंसा तलाशते रहे और प्रेम का यह कवि अपनी निष्ठाओं और अपनी मान्यताओं के प्रति प्रबिद्वताओं का जीवन जीता रहा।

जब चुनाव की सगुबुगाहट प्रारंभ हुई तो कुछ बड़ी राजनीतिक पार्टियों के बड़े बड़े नेताओं ने उससे अपने पक्ष में सभाऐं करने के लिये संपर्क किया। वह चाहता तो अवसर का लाभ लेकर रूपया भी खूब कमा सकता था और अपने लिये किसी शानदार पद का रूतबा भी तय कर सकता था। आखिर पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह उसे भी तो करना है। लेकिन वह मित्रों और समाज के प्रति अपनी निष्ठाओं के साथ खड़ा रहा। …..तब जबकि वह स्वयं कहीं से चुनाव नहीं लड़ रहा था। उसकी लोकप्रियता को देखते हुए चुनाव जीतना उसके लिये कठिन नहीं होता। लेकिन वह व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर विराट का हित देखने की सामथ्र्य रखता है और इसीलिये उसकी प्रेम कविताऐं दिल को छूती हैं। अन्ना के आंदोलन में वह नाम कमाने या पैसा कमाने के लिये शामिल नहीं हुआ था।

आम आदमी के लिये सुख के नये रास्ते कमाने की मंशा से सक्रय हुआ था। दूसरों के सुख के प्रति यह बेचैनी ही उसे प्रेम का सच्चा कवि बनाती हैं। मैनें देखा है कि किस तरह उसके खिलाफ लगातार दुष्प्रचार करने वालों के साथ खड़े लोग जब संकट में पड़े तो वह सूचना मिलते ही उनकी मदद के लिये अगली ही फ्लाइट या रेल से रवाना हो गया। वाग्देवी के वरदान को प्राप्त व्यक्ति की वाणी क्या चमत्कार कर सकती है, यह उसने कवि मंचों पर भी दिखाया और राजनीतिक सभाओं में। उसकी वाणी शब्द के ब्रह्म होने के प्रति हमारी आस्था को और मज़बूत करती है।

तुम्हारा प्रेम हम सबको गौरवान्वित करता है………. जियो कुमार।

अतुल कनक के फेसबुक वॉल से.

इनमें से भाकपा माले (लिबरेशन) तो अन्ना हजारे के आन्दोलन में शरीक भी हुई थी… फिर यह नतीजे?

Samar Anarya : बजिंदर सिंह — कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया– 637 वोट– तिमारपुर
रोहतास — कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया(एम एल) — 337वोट — नरेला
मुन्ना यादव — कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया(एम एल) — 172वोट — वजीरपुर
रामरूप — कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया(एम एल) — 203 वोट — कोंडली
विनोद कुमार — कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया(एम एल) — 146 — पटपड़गंज

…. इनमें से भाकपा माले (लिबरेशन) तो अन्ना हजारे के आन्दोलन में शरीक भी हुई थी. फिर यह नतीजे? यह पार्टीगत खांचों से ऊपर सोचने का समय है कि हम कहाँ चूक रहे हैं. यह विचारधारा के बतौर हाथ बाँधने का समय है साथी.

Samar Anarya : All the candidates of all communist parties put together have polled less votes than even a losing candidate of newly born AAP in Delhi. And these parties include CPI ML Liberation which has joined hands with Anna Hazare/Arvind Kejriwal led 'movement' against corruption.
Why? Ask the leadership.

Samar Anarya : सुना है कि तमाम कम्युनिस्ट पार्टियों के महासचिवों/पोलित ब्यूरो सदस्यों ने 'आप' को चुनाव जीतने की बधाई दी है. सुना तो ये भी है कि उनकी पार्टियों ने खुद भी चुनाव लड़ा था.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.

पढ़िए, इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत क्या कहते हैं ‘आप’ की जीत पर…

Rana Yashwant : मैं तमाम आपत्तियों के बावजूद दांते और मार्क्स का हमेशा से कायल रहा। दांते में एक अजीब सा दंभ था – तुम अपनी राह चलते चलो, लोग चाहे कुछ भी कहें और मार्क्स को वाहवाही और लफ्फाजी से नफरत थी। दांते और मार्क्स में मौलिकता थी, सोच के पीछे मजबूत तर्क हुआ करता था और दोनों निर्भीक थे। वर्ना पोपशाही के दौर में क्रांतिकारी विचारों का अलख जगाने की हिम्मत वही कर सकता था जो जान पर खेलने का साहस रखता हो।

आम आदमी पार्टी का दिल्ली में प्रदर्शन जान पर खेलने जैसा साहस नहीं लेकिन खेलने के लिये जान देने के जुनून तक पहुंचने का नशा सा दिखा। लोकशाही में जनता के फैसले का सम्मान करना स्वस्थ व्यवस्था का जितना पोषण करता है उससे कहीं ज्यादा आत्मचिंतन और आत्मशुद्दि की संभावना पैदा करता है। बहतु सारी वजहों से मैंने आम आदमी पार्टी को उम्मीदों की पार्टी के रुप में नहीं देखा, लोकशाही के पहरुआ और आम आदमी की लाठी के रुप में नहीं माना । ऐसा मानना भी जल्दबाजी होगी। लेकिन दिल्ली में इस पार्टी ने जैसा प्रदर्शन किया है उसने अपने बारे में एक बार तसल्ली से सोचने की जरुरत जरुर पैदा की है।

जिस जमात और जिस जमीन के लोगों ने इस पार्टी की कमान थामी औऱ जिस तरह से लोगों का भरोसा जीता उससे दो बातें साफ होती हें । एक ये कि लोकशाही में पोपशाही जैसे युग के बने रहने को पत्थर की लकीर मानकर बैठना सही नहीं औऱ दूसरा ये कि हौसला बुलंद हो तो नामुमकिन कुछ भी नहीं। आपके कुछ फैसलों पर लोग सवाल कर सकते हैं करेंगे भी लेकिन वो फैसले आपके तर्क और मौजूदा तथ्यों के आधार पर होते हैं। इसको किसी औऱ रुप में समझना गलत होगा। हां, उन फैसलों से कहीं बड़े फैसले जनमत से पैदा हो रहे हों तो आपका सोचना लाजिमी हो जाता है । लिहाजा मैं खुद भी बहुत सारे मामलात पर सोचने लगा हूं। आम आदमी पार्टी ने लोकशाही के मूल रुप में आम आदमी का भरोसा जरुर पैदा किया है, जो इस देश में अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ ही लगता रहा । आप को मेरी ढेरों शुभकामनाएं।

राणा यशवंत के फेसबुक वॉल से.

अरविन्द केजरीवाल जरा संभल के चलना, मूर्ति मत बनना

Sachin Kumar Jain : आप के नाम एक पाती…. जैसा हमारे समाज में होता है; एक ठीक-ठाक इंसान मिलता है, तो उस एक इंसान को मूर्ति बना कर सिंहासन पर बिठा दिया जाता है. उसकी पूजन की जायेगी. उसका इतना प्रक्षाल किया जाएगा कि वह अपने होने का मकसद ही भूल जाएगा; दूसरा खेल होता है जब सलाहकार, समीक्षक और कुछ करीबी लोग व्यक्ति को संस्था से बड़ा बनाने में जुट जाते हैं. ऐसा होते ही "आप" की दशा और दिशा बदला जायेगी.

अरविन्द केजरीवाल जरा संभल के चलना! मूर्ति मत बनना; तुम्हारे होने का सबब मिट जाएगा. जरा अपने आस-पास भी नज़र डालना; आप अब न तो निकट दृष्टिदोष झेल पाएंगे और न ही दूर दृष्टिदोष; जरा नज़रें जांचते रहना; बाकी सब ठीक ही होगा.

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट सचिन कुमार जैन के फेसबुक वॉल से.

आज अरविंद का जुनून सबके लिए सबक बन गया है… मेरा सलाम, बधाई और शुभकामनाएं

Annu Anand : किसी भी बदलाव की पहली सीढ़ी जनून है. यह बात सच हो गई. दस साल पहले २००३ में दिल्ली से बस के रास्ते ब्यावर जाते हुए Arvind Kejriwal ने मुझसे कहा था कि वो पूरी तरह से अपनी सरकारी नौकरी छोड़ कर देश में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करना चाहते हैं तो मैंने इसे एक क्रांतिकारी युवा का फितूर माना.

मैंने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी. उस समय मुझे लगा कि सरकारी दफ्तरों के नकारापन और भ्रष्टाचार से आतंकित सूचना के अधिकार का एक बेहद ईमानदार सिपाही भावुकता में बह रहा है. लेकिन आज अरविंद का जुनून सबके लिए सबक बन गया है. मेरा सलाम, बधाई और भविष्य के लिए ढेरों शुभ कामनाएं.

वरिष्ठ पत्रकार अन्नू आनंद के फेसबुक वॉल से.

किरण बेदी और बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना

Nadim S. Akhter : एक कहावत सुनी है आपने. बेगानी शादी में, अब्दुल्ला दीवाना. किरण बेदी कुछ उसी तरह का काम कर रही हैं. पहले तो लाख मान-मनौव्वल पर वह -राजनीति नहीं करने- की अपनी जिद पर अड़ी रहीं. शुचिता वाली सोच. लेकिन अब जब आम आदमी पार्टी को आशातीत सफलता मिल गई है तो किरण बेदी परेशान हैं. कैसे अपनी उपयोगिता दिखाएं. सो उन्होंने बीजेपी और -आप- के बीच मध्यस्थता करने का ऐलान कर दिया ताकि दिल्ली की जनता को दोबारा चुनाव में ना जाना पड़ जाए.

वाह. किरण जी, वाह. आप तो ऐसी ना थीं. साथ आंदोलन किया था तो -आप- यानी आम आदमी पार्टी को जानती-समझती भी होंगी कि क्यों यह पार्टी चुनाव लड़ के आई?? जब जानती हैं कि -आप- किसी भी राजनीतिक पार्टी से हाथ नहीं मिलाएगी, कल रात से केजरीवाल-योगेंद्र यादव समेत -आप- के तमाम नेता ये बात कह रहे हैं तो फिर ये कैसे सोच लिया कि आप -आप- और बीजेपी के बीच सरकार बनाने के लिए मध्यस्थता करेंगी???

दाल में कुछ काला है या पूरी दाल काली है…कहीं ये अरविंद केजरीवाल का गेम बजाने का गेमप्लान तो नहीं.???? राजनीति और जंग में सब जायज है. लेकिन केजरीवाल भी कच्चे खिलाड़ी नहीं. कुछ और सोचिए किरण जी. थोड़ा ठोस और बेहतर. हाजमोला टाइप के विचार पासे की तरह फेंकेंगी तो दांव उल्टा भी पड़ सकता है. जय हो.

युवा पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


Balendu Swami : किरण बेदी ने सलाह दी है कि आप को भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए! मिसेज बेदी बाबा रामदेव की भक्त हैं, भाजपा से उनका प्रेम किसी से छुपा नहीं है! केजरीवाल को अन्ना और बेदी जैसे लोगों से सम्मानजनक दूरी बनाकर रखनी चाहिए, अन्यथा इन्होंने केवल नुक्सान ही किया है और आगे भी करेंगे!

बालेंदु स्वामी के फेसबुक वॉल से.

केजरीवाल भी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं, कुछ और सोचिए किरण जी

एक कहावत सुनी है आपने. बेगानी शादी में, अब्दुल्ला दीवाना. किरण बेदी कुछ उसी तरह का काम कर रही हैं. पहले तो लाख मान-मनौव्वल पर वह -राजनीति नहीं करने- की अपनी जिद पर अड़ी रहीं. शुचिता वाली सोच.
 
लेकिन अब जब आम आदमी पार्टी को आशातीत सफलता मिल गई है तो किरण बेदी परेशान हैं. कैसे अपनी उपयोगिता दिखाएं. सो उन्होंने बीजेपी और -आप- के बीच मध्यस्थता करने का ऐलान कर दिया ताकि दिल्ली की जनता को दोबारा चुनाव में ना जाना पड़ जाए.
 
वाह. किरण जी, वाह. आप तो ऐसी ना थीं. साथ आंदोलन किया था तो -आप- यानी आम आदमी पार्टी को जानती-समझती भी होंगी कि क्यों यह पार्टी चुनाव लड़ के आई?? जब जानती हैं कि -आप- किसी भी राजनीतिक पार्टी से हाथ नहीं मिलाएगी, कल रात से केजरीवाल-योगेंद्र यादव समेत -आप- के तमाम नेता ये बात कह रहे हैं तो फिर ये कैसे सोच लिया कि आप -आप- और बीजेपी के बीच सरकार बनाने के लिए मध्यस्थता करेंगी???
 
दाल में कुछ काला है या पूरी दाल काली है…कहीं ये अरविंद केजरीवाल का गेम बजाने का गेमप्लान तो नहीं.???? राजनीति और जंग में सब जायज है. लेकिन केजरीवाल भी कच्चे खिलाड़ी नहीं. कुछ और सोचिए किरण जी. थोड़ा ठोस और बेहतर. हाजमोला टाइप के विचार पासे की तरह फेंकेंगी तो दांव उल्टा भी पड़ सकता है. जय हो.
 
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से

सुब्रत राय को सुप्रीम कोर्ट का अवमानना नोटिस

सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा दिन ब दिन सहारा पर कसता ही जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने 2जी केस में दखल देने के लिए सहारा के कर्ताधर्ता सुब्रत राय पर अवमानना नोटिस जारी कर दिया. नोटिस जारी करते हुए कोर्ट ने उनसे पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना का केस क्यूं ना चले. कोर्ट ने चार सप्ताह में इस पर जवाब दाखिल करने को कहा है.
 
 इसके पहले कोर्ट ने सहारा प्रमुख सुब्रत राय के साथ-2 कंपनी के तीन अन्य निदेशकों वंदना भारद्वाज रविशंकर दुबे और अशोक भारद्वाज के देश से बाहर जाने पर रोक लगा दी थी. कोर्ट के आदेशानुसार अब सहारा से जुड़ी कोई भी कंपनी अचल संपत्तियों की बिक्री नहीं कर सकेगी.
 
गौरतलब है कि कोर्ट के आदेश के बावजूद अभी तक सहारा ने निवेशकों का एक भी पैसा नहीं लौटाया है. कोर्ट ने 28 अक्टूबर को आदेश देते हुए कहा था कि सहारा ने सुप्रीम कोर्ट और सेबी से बार-2 सच छुपाया है और उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कंपनी से बीस हजार करोड़ की संपत्ति के मालिकाना हक के दस्तावेज तीन सप्ताह में सौंपने का आदेश दिया था. दस्तावेज ना सौंपने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने सहारा के विदेश जाने पर रोक लगा दी थी.

क्योंकि आम आदमी पार्टी उतनी भी आम नहीं

Mitra Ranjan : ये सही बात है कि ''आप'' ने दिल्ली में कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है और यथास्थितिवाद के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश का बड़ा फायदा उसको जरूर मिला है. लेकिन जैसा कि कुछ विद्वान् लोग कह रहे हैं, क्या उसके खाते में जो तथाकथित जनअसंतोष की लहर है उसको एक सही राजनीतिक दिशा दे दी जाये तो भारतीय राजनीति का मौजूदा स्वरुप बदलने में और फासीवादी शक्तियों के उभार को रोकने में मदद मिल जायेगी? यहाँ सवाल महज स्थापित सत्ता-ध्रुवों के खिलाफ 'आप' के समर्थन-विरोध का नहीं है, सवाल देश की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव का है.

हो सकता है अपने कुशल चुनावी प्रबंधन, जनता के एक हिस्से के आदर्शवादी रुझान और फौरी बदलाव की आकांक्षाओं की लहरों के सहारे 'आप' मौजूदा सत्ता संरचना में कुछ सेंध लगाने में सफल हो जाये, पर क्या वो वाकई सामाजिक-राजनितिक बदलाव की ताकत बन सकती है ? क्या कोरे रूमानी आदर्श के सपनों के अलावे उसकी कोई ठोस विचारधारा है? क्या उसने बदलाव के लिए आवशयक कोई जमीनी संघर्ष किया है? क्या ये कुछ अजीब नहीं कि आप के समर्थकों में से ऐसे लोगों की तादाद काफी है जो मोदी को पीएम देखना चाहते हैं? तो क्या ऐसे लोग वाकई देश और समाज को बदलते देखना चाहते हैं?

और अगर ये बदलाव है तो उसकी दिशा क्या होगी?मेरा साफ़ तौर पर मानना है कि आप के अधिकांश समर्थकों में मध्य वर्ग का वो हिस्सा है जो अपने वर्गीय /जातीय /आर्थिक हितों को सुरक्षित रखते हुए ही कोई बदलाव चाहता है उसकी कीमत पर नहीं। ये कुछ ऐसा ही है जैसे बिना वर्गीय/जातीय ढांचे पर चोट पहुंचाए दलितों /वंचितों /आदिवासियों /शोषितों के लिए सामाजिक न्याय और समता की बात करना।

"आप" की अहम् जीत के बावजूद मेरे लिए ये मान पाना मुश्किल है कि वो वाकई किसी महतवपूर्ण सामाजिक-आर्थिक बदलावों की वाहक बनेगी या फिर भारतीय राजनीती में कुछ क्रांतिकारी परिवर्तनों की पटकथा लिखेगी क्योंकि आम आदमी पार्टी उतनी भी आम नहीं। इस परिघटना को सरल तरीके से देखने के बजाय वस्तुगत आधारों पर उसका गहन विश्लेषण करना जरूरी है. खासकर वामपंथ के लिए. और उन वामपंथियों के लिए तो और भी जो ''आप '' की जीत से मुग्ध होकर उसको आम जनता की जीत बताने पर तुल गए हैं.और यहाँ तक कि देश के तमाम दबे-कुचले हाशिये के लोगों की आवाज बनने की जिम्मेदारी से बचते हुए इसी में खुद की जीत देखने लगे हैं…

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मित्र रंजन के फेसबुक वॉल से.

अजीत खरे को रामेश्वरम हिन्दी पत्रकारिता पुरस्कार

झांसी से दिया जाने वाला 'रामेश्वरम हिन्दी पुरस्कार-2013', हिन्दुस्तान के पत्रकार अजीत खरे को दिया जायेगा. रामेश्वर संस्थान झांसी के अध्यक्ष डॉ. सुधांशु त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 2013 के लिए निर्णायक समिति ने हिन्दुस्तान, लखनऊ के विशेष संवाददाता अजीत खरे को चयनित किया गया है. श्री खरे को यह पुरस्कार 17 दिसम्बर 2013 को राजकीय संग्रहालय सभागार, झांसी में दोपहर 2:30 बजे आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया जायेगा.
 
यह पुरस्कार प्रतिवर्ष नगर के प्रतिष्ठित पत्रकार एवं समाजसेवी स्व पं रामेश्वर दयाल त्रिपाठी की पुण्य स्मृति में हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय, विशिष्ट, महत्वपूर्ण योगदान/लेखन के लिए प्रदान किया जाता है. इसके अन्तर्गत 11 हजार का नगद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान करके सम्मानित किया जाता है.
              
 

वही होगा जो आज हमारे वरिष्‍ठ समाजवादी पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी के साथ हुआ है ‘जनसत्‍ता’ में

Abhishek Srivastava : कछुआ अगर खरगोश की गति से दौड़ना चाहे तो क्‍या होगा? वही, जो आज हमारे वरिष्‍ठ समाजवादी पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी के साथ हुआ है 'जनसत्‍ता' अखबार में। कल चुनाव नतीजा आया और आज नतीजों पर उनका लेख छप गया। अरे भाई, ज़रा ठहर कर सोच लेते तो ब्‍लंडर से बच जाते।

देखिए, ''इन नतीजों के मायने'' शीर्षक वाले लेख के पहले पैरा में अरुण जी क्‍या कहते हैं, ''जो लोग इस चुनाव को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी बनाकर देख रहे थे वे न सिर्फ जनता के साथ छल कर रहे थे बल्कि कॉरपोरेट नीतियों की जीत के लिए एक छद्म और मिथकीय लड़ाई का मंचन कर रहे थे।''

ठीक बात है। कोई दिक्‍कत नहीं।

अब तीसरा पैरा देखिए जो लेख का हाइलाइटर भी है, ''नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी की धारणा वाले इस चुनाव में निश्चित तौर पर मोदी की जीत और राहुल गांधी की हार हुई है। पर वह तो होनी ही थी…।''

अरे! वामपंथियों का तो नहीं पता, लेकिन लगता है समाजवादियों का बौद्धिक राडार इस बार जवाब दे रहा है। सब फेसबुक का असर है। अखबारी लेख में फेसबुक वाली जल्‍दबाज़ी से बचना चाहिए।

युवा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

मीडिया के चुके पुरोधा दलाली में जरूर अप टू डेट हो सकते हैं, लिखने-पढ़ने और जन मानस समझने में बिलकुल नहीं

: पत्रकार नदीम एस. अख्तर का ये लिखा सौ फीसदी सच साबित हुआ… :

हर चर्चित मसले पर फेसबुक पर अपनी बेबाक व गहन विश्लेषणात्मक राय जाहिर करने के लिए मशहूर युवा व तेजतर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के ठीक बाद एक पोस्ट पब्लिश किया था. इसमें उन्होंने जो जो बातें कहीं, वो आज नतीजे आने के बाद सच साबित हुईं. नदीम ने अपने लिखे की तरफ मेरा ध्यान आकृष्ट उन्हीं दिनों करा दिया था लेकिन अपनी व्यस्तता की वजह से इसे भड़ास पर प्रकाशित नहीं कर पाया था.

आज जब इसे पढ़ रहा था तो लगा कि इसे इसलिए प्रकाशित करना चाहिए ताकि मीडिया के चुके हुए पुरोधा इसे पढ़कर जान सकें कि वे दलाली में जरूर अप टू डेट हो सकते हैं, लिखने पढ़ने और जनमानस को समझने में बिलकुल नहीं.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


ओपिनियन और एग्जिट पोल्स पर मत जाइए, अपनी अक्ल लगाइए

-नदीम एस. अख्तर-

एग्जिट पोल्स के सारे आंकड़े दिल्ली विधानसभा चुनाव में फेल हो सकते हैं. एक बड़े चैनल ने आम आदमी पार्टी को सिर्फ 6 सीटें दी हैं और दूसरों ने 20 के अंदर ही रखा है. 16 से लेकर 18 सीट तक. लेकिन मेरा मानना है कि कुछ भी हो सकता है. जैसा मैंने वोटिंग से पहले भी लिखा था कि शीला दीक्षित खुद अपनी सीट से हार सकती हैं. अरविंद केजरीवाल उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं. कांग्रेस की हालत पतली है, ये सब जानते हैं लेकिन बीजेपी के विजय रथ पर आम आदमी पार्टी लगाम लगाती दिख रही है. अब योगेंद्र यादव वोट प्रतिशत में 2.5 प्रतिशत के error के (न्यूज चैनलों के बताए वोट प्रतिशत) आगे-पीछे होने पर आम आदमी पार्टी को बहुमत मिलने की बात भी कर रहे हैं.

सच कहूं तो इस बार के दिल्ली चुनाव ने सबका माथा चकरा दिया है. सारे राजनीतिक पंडित कुछ भी बता पाने में असमर्थ हैं. अगर -आप- के लिए लहर थी, तो उसे कैसे मापा जाए. वैसे कल वोटिंग खत्म होने के ऐन पहले यानी शाम 4:30-5:00 बजे के आसपास दिल्ली के अलग-अलग बूथ्स पर वोटिंग के लिए लोगों की भीड़ -अचानक- जमा हो गई. बताया जा रहा था कि ये आंकड़ा एक लाख के आसपास है और शायद भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ये पहली बार था कि देर रात तक वोटिंग होती रही. चुनाव आयोग ने इसकी इजाजत दे दी.

तो ये लोग कौन थे, जो देर शाम तक वोटिंग के लिए जुटे रहे. इतनी जागरुकता, वो भी वोटिंग के लिए. ये शुभ संकेत है और लोग कह रहे हैं कि देर तक हुई इस वोटिंग का फायदा अरविंद केजरीवाल की पार्टी को होगा. कल टीवी स्टूडियोज में चर्चा के दौरान जिस तरह कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं की बॉडी लैंग्वेज थी, वो बता रही थी कि फीडबैक उन्हें भी है. अरविंद केजरीवाल दिल्ली चुनाव में कोई बड़ा धमाका करने जा रहे हैं. लेकिन निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. ये देखना दिलचस्प होगा कि भ्रष्टाचार और जमी-जमाई राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ लोगों में जो गुस्सा था, वो वोट में बदला या नहीं? और अगर लोगों ने समझ-बूझ कर अपने गुस्से का इजहार किया है तो -आप- की अच्छी-खासी सीटें मिल रही हैं.

लेकिन पेंच तक अटकेगा, जब केजरीवाल की पार्टी को सीटें तो ज्यादा मिल जाएंगी (शायद कांग्रेस के बराबर) पर वह अकेले अपने दम पर सरकार नहीं बना पाएगी. और जैसा कि कल योगेंद्र यादव ने कहा कि हम ना तो सपोर्ट लेंगे और ना देंगे. और अगर हालत ये रही कि -आप- के सपोर्ट के बिना सरकार ना बन सके तो फिर दुबारा चुनाव में जाने के सिवा कोई चारा नहीं होगा…

फिलहाल तो ये सब hypothetical बातें हैं क्योंकि किसी को नहीं पता, क्या होने जा रहा है दिल्ली में. एग्जिट पोल के आंकड़ों पर व्यक्तिगत तौर पर मैं यकीन नहीं करता क्योंकि इसकी sampling और methodology को मैं पर्याप्त नहीं मानता, सही prediction के लिए. एक बात और है. वोट देने के बाद जब कोई व्यक्ति बूथ से बाहर निकलता है और आप उनसे पूछते हो कि किसे वोट दिया, तो इस बात की 50 फीसदी आशंका है कि सामने वाला सच नहीं बताएगा. इसके कई कारण हैं. ऐसे में आपका एग्जिट पोल यहीं पर टांय-टांय फिस्स हो जाता है.

जब मैं inext, (दैनिक जागरण) कानपुर में था तो चुनाव पूर्व यूपी के युवा क्या सोचते हैं, इस पर खुद एक सर्वे करवाया था. एडिटोरियल के सहयोग से. यूपी के अपने सभी एडिशन में 100-100 युवाओं से बात की थी. प्रश्नावली बनाने से लेकर data compilation and analysis, जो कुछ अखबार में छपा, सबकुछ मैंने खुद किया था. इसमें प्रश्नावली बनाने पर मैंने बहुत सावधानी बरती थी ताकि सवाल ऐसा ना पूछा जाए जिससे आप जवाब देने वाले का opinion प्रभावित कर रहे हों. साथ ही सवाल पूछने का क्रम भी ऐसा रखा था कि जवाब देने वाला व्यक्ति किसी सवाल या अन्य फैक्टर से प्रभावित हुए बिना वही बात बताए, जो वह वास्तव में सोच रहा है. कोशिश यही थी. और भी कई बातों का ख्याल रखा गया था. रिजल्ट चौंकाने वाले थे. हमने युवाओं को 18 से 35 आयु वर्ग में अलग-अलग बांटा था और महिला-पुरुष युवा मतदाता का भी अलग खांचा बनाया था. सर्वे के नतीजों को हमने inext में तीन दिनों तक छापा और दैनिक जागरण ने अपने यूपी के सभी एडिशन में इसे एक दिन compile करके छापा. मेरे लिए भी यह नया और रोमांचक अनुभव था. इसमें मुझे मेरे एडिटर इन चीफ आलोक सांवल जी की काफी मदद मिली, जिससे यह सर्वे संभव हो सका.

खैर, तो मैं बात दिल्ली चुनाव और एग्जिट पोल पर कर रहा था. अगर सर्वे की data entry, sampling, compilation and analysis में चूक हो जाए तो रिज्ल्ट किस हद तक प्रभावित हो सकते हैं, इसका मैं एक real example देता हूं. दिल्ली में वोटिंग से पहले -इंडिया टीवी- और -आज तक- ने जो opinion poll दिखाया, उसके नतीजों में जमीन-आसमान का अंतर था. जहां तक मुझे याद है आज तक चैनल आम आदमी पार्टी को महज 8 सीट मिलने का दावा कर रहा था और इंडिया टीवी 18 सीट मिलने का. दोनों चैनलों ने अपने ढंग से सही सर्वे किया होगा लेकिन क्या कारण था कि दोनों के नतीजों में इतना बड़ा अंतर था???!!! 10 सीटों का अंतर काफी बड़ा होता है जिसे ignore नहीं किया जा सकता. कल भी एग्जिट पोल के नतीजों में यही हुआ. आज तक चैनल जहां आम आदमी पार्टी को महज 6 सीटें मिलने की बात कह रहा था वहीं एबीपी न्यूज और दूसरे चैनल AAP के 16-18 सीट मिलने की बात कह रहे थे. अब किसकी बात पर, किसके सर्वे पर यकीन किया जाए. वोटर वही हैं, विधानसभा क्षेत्र वही हैं, मूड या लहर वही है (यानी ये सब constant हैं) लेकिन नतीजे अलग-अलग हैं (variable हैं). अगर हम इसे किसी समीकरण में दिखाना चाहें तो मान लीजिए कि अगर R रिजल्ट है और V वोटर है व उसने किसे वोट दिया, इसे इंगित करता है तो मैथ्स में इसे इस रूप में लिख सकते हैं. R= V into x. ये समझने के लिए सबसे आसान समीकरण मैंने बताया है. तो R & V स्थिर हैं लेकिन x यानी वोटर की राय बदल रही है, जिससे एग्जिट पोल के नतीजे बदल रहे हैं. और यही x को सही से ना मापने की हालत में सीटों में अंतर 8 से 18 तक का हो जाता है, जैसा हुआ. इसमें एक अहम चीज sampling का चुनाव और उसका साइज भी है, जो आपके रिजल्ट में बहुत बड़ा अंतर ला सकता है क्योंकि यह सीधे-सीधे फैक्टर 'X' को प्रभावित कर रहा है. ये एक मोटी-मोटी बात है जो मैंने बताई लेकिन सर्वे एजेंसियां और भी वृहद पैमाने व मापदंड अपनाती हैं, सो अलग-अलग एजेंसियों के सर्वे नतीजों में इतना भारी अंतर देखकर यही लगता है कि कहीं कुछ कमी रह गई है.

इतना ही नहीं, चाणक्य नामकी एक एजेंसी ने तो कल आम आदमी पार्टी को बहुमत मिलने की बात कह दी. तो अब लीजिए. अलग-अलग सर्वे एजेंसियों की मानें तो -आप- को 6 सीट से लेकर 18 सीट या फिर बहुमत मिल सकता है. यानी चित भी आपकी और पट भी आपकी. फिर काहे का आंकलन और काहे का सर्वे. भइया सबकुछ तो आपने ही कह दिया. कम सीटों से लेकर बहुमत मिलने की बात तक. और उस पर तुर्रा ये कि कल टीवी न्यूज चैनलों पर बड़े-बड़े एंकर-सम्पादक टाई-शाई पहने, कोर्ट की पॉकेट में रंग-बिरंगा रुमाल ठूंसे ये बताने-समझाने में लगे थे कि कौन हार रहा है और कौन जीत रहा है. वो ये भी बता रहे थे कि किस चैनल का सर्वे किसे-कितनी सीटें दे रहा है. और हम दर्शक थे कि बस बुड़बक की तरह उन्हें निहारे जा रहे थे और मन ही मन ये बुदबुदा रहे थे कि काश, अगर इतना ज्ञान हमें भी होता तो हम बड़े पत्रकार-सम्पादक बन जाते. हाय….खैर. टीवी का तमाशा रिजल्ट आने तक अभी चलता रहेगा (टीवी की भाषा में कई कारणों से ये जरूरी है) और अभी कई तरह के और ज्ञान मिलते रहेंगे. बतौर एक दर्शक मैं तो बस यही कहूंगा कि Opinion & Exit polls के आंकड़ों पर मत जाइए, अपनी अक्ल लगाइए. रिजल्ट आने दीजिए, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.. जय हो.

आप के टिकट पर एक और पत्रकार राखी विरला भी जीती

आम आदमी पार्टी  के टिकट पर इस बार कई पत्रकार चुनाव जीते हैं. पड़पड़गंज सीट से मनीष सिसोदिया ने जहां जीते हैं वहीं एक और पत्रकार ने मंगोलपुरी सीट से जीत दर्ज की है. पत्रकार राखी विरला ने मंगोलपुरी विधानसभा सीट से आप के टिकट पर चुनाव लड़कर शीला दीक्षित सरकार में मंत्री राजकुमार चौहान को पराजित किया. उन्होंने चौहान पर दस हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की.
 
वहीं 26/11 के मुम्बई हमलावरों के छक्के छुड़ा देने वाले एनएसजी के कमांड सुरेन्द्र सिंह को भी आम आदमी होने का फायदा मिला. आप के प्रत्याशी सुरेन्द्र सिंह ने दिल्ली की कैंट विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के उम्मीद करन सिंह तवर को 455 वोटों से पराजित किया. इसी सीट पर कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही.

Mantoo Sharma submits to Court ‘List of Important Dates’ in Govt. Advt Scam

New Delhi : The Respondent No. 02, Mantoo Sharma, in his counter-affidavit in the Supreme Court of India, has also submitted the 'List of Important Dates' in connection with the Special Leave Petition(Criminal) No.1603 of 2013 in the world famous Rs.200 crore Dainik Hindustan Govt. Advertisement Scam of Bihar. The S.L.P. (Criminal) No.1603 of 2013 has been filed by the Chairperson of M/S The Hindustan Times Limited,New Delhi.And the Supreme Court of India will hear the case on December 16, 2013 next.
 
“The List of Important Dates”, submitted by the Respondent No.02, Mantoo Sharma to the Supreme Court, gives the details of  the commission of serious economic offences on part of the  M/S The Hindustan Times Limited (New Delhi)  in the world famous Rs.200 crore Dainik Hindustan Government Advertisement Scam of Bihar.
 
The content of “The List of Important Dates” in connection with the Munger(Bihar) Kotwali P.S Case No. 445/2011, u/s 420/471/476  of IPC and 8(B),14 & 15 of The Press & Registration of Books Act, 1867, is given below in the original form.:
 
1867- The Press & Registration of books Act, 1867 came in force in India with the objective for Regulation of Printing Presses and Newspapers, for the preservation of copies of Books and Newspapers, printed in India, and for the registration of such books and newspapers.
 
1956— The Union Government in India in 1956, in exercise of the powers  conferred by Section 20-A of the Press & Registration of Books Act, 1867, amended the Prss & Registration of Books Act, 1867, and since then, ‘The  Registration of Newspapers(Central) Rules, 1956 came in existence in India.
 
Both, “The Press & Registration of Books Act, 1867” and “ The Registration of Newspapers(Central) Rules, 1956 are in force in India.
 
02-04-1936– M/S The Hindustan Times Limited ( New Delhi)  set up its printing press in Delhi and  began printing, publishing and circulating  the Hindi daily 'Hindustan' from Delhi after obtaining the “Certificate of Registration” from the Press Registrar under the  provisions of the Press & Registration of Books Act, 1867.
 
The same company “M/S The Hindustan Times Limited (New Delhi), which was later on changed into M/S H.T.Media Limited and M/S Hindustan Media Ventures Limited respectively, set  up its new printing presses at eight new different locations in Utter Pradesh and began printing, publishing  and circulating the same  title Hindi newspaper” Hindustan” after obtaining “ separate Certificates of Registration” and “ Separate Registration Numbers” from the Press Registrar, New Delhi, honouring the provisions of The Press & Registration of  Books Act, 1867 and The Registration of Newspapers(Central) Rules, 1956.
 
1986- The  same company  M/S The Hindustan Times Limited( New Delhi) set  up a  new printing press at Patna in Bihar in 1986 and began printing, publishing and circulating the same title Hindi  newspaper” Hindustan”, also known as the Patna edition/publication of Dainik  Hindustan, after obtaining the “ Separate Certificate of Registration” and “ Separate Registration Number – RNI  No.-44348/1986” from the Press Registrar, New Delhi, honouring the provisions of the “ Press & Registration of Books Act, 1867” and “ The Registration of  Newspapers(Central ) Rules, 1956.’
 
24-03-2001-The same company M/S The Hindustan Times Limited ( New Delhi) set up its new printing press at Muzaffarpur in Bihar in 2001 and illegally began printing, publishing and circulating its Muzaffarpur edition/ publication of Dainik Hindustan without obtaining “ Separate Certificate of Registration” and “ Separate  Registration Number” from the Press Registrar, New Delhi, wilfully  ignoring the provisions of  the Press & Registration of Books Act, 1867. Not only that, the  company also fraudulently and falsely  dared to begin printing the “ Registration  No. RNI No.44348/1986(allotted to the  Patna Edition) on the “ Print-line” of the Muzaffarpur edition/ publication of Dainik Hindustan.
 
03-08-2001- The same company M/S The Hindustan Times Limited ( New Delhi)  set up its new printing press at Bhagalpur in Bihar in 2001 and  illegally began printing, publishing and circulating the Bhagalpur and Munger editions/ publications of Dainik “Hindustan” in Bhagalpur and Munger districts without obtaining “ Separate Certificates of Registration”  and” Separate Registration Numbers” from the Press Registrar, New Delhi.  The Company also fraudulently and falsely began printing  the Registration  No. RNI No. -44348/1986( allotted to the Patna Edition) on the “Print—line” of the Bhagalpur and Munger editions/publications of Dainik  Hindustan.
 
The company M/S The Hindustan Times Limited ( New Delhi), which was later on changed into M/S H.T. Media Limited and now M/S Hindustan Media Ventures  Limited, New Delhi respectively from August 03, 2001 to June 30,2011 continuously, fraudulently and willfully  printed  the “ Registration No. RNI No. 44348/1986( Allocated to the Patna edition of  Dainik Hindustan) on the “ Print-lines” of  the Bhagalpur and Munger editions of  Dainik Hindustan” from August 03,2001 to  June 30,2011.
 
06-09-2005- The Deputy General Manager(Media Marketing),M/S H.T.Media Limited(Patna) Mr. Ravi Bhushan, in his official letter No.7744, dated 06/09/2005, addressed to the Director, Information & Public Relation Department,Govt. of Bihar,Bihar, Patna, tries to force the Bihar Government to issue the Government  advertisements to its unauthorized Bhagalpur and Muzaffarpur editions/publications of Dainik Hindustan, and at the same time, confesses ‘ in print’ that the Bhagalpur and Muzaffarpur printing presses have no 'Certificate of Registration'.
 
22-03-2006- The Secretary, Information and Public Relation Department, Bihar,Patna, Mr.Vivek Kumar Singh(I.A.S), sends an official letter, bearing No. Advt. 48-01/2006-247/IPRD, Patna, to the Press Registrar,New Delhi and asks for an advice on alleged violation of the Press and Registration of Books Act, 1867 in the matter of printing  and publication of Bhagalpur and Muzaffarpur editions of Dainik Hindustan.
 
20-04-2006- The Sectional Officer, in the office of the Press Registrar, New Delhi, Mrs. Purnima Mallick, in response to the official letter of the Secretary, Information & Public Relation  Department, Bihar,Patna, replies, vide letter No. nil, dated 20-04-2006, and clearly says that “ The Company has only got permission to print Dainik Hindustan at Patna.”
 
09-05-2006- The Chief Accounts Controller, Finance (Audit) Department, Bihar,Patna, submits its Audit Report No.-195/2005-06 to the Director, Information and Public Relation Department,Bihar, Patna and directs the officials concerned to ensure the ‘ compliance’ of the ‘ audit-objections’. This is the first internal audit report of the Bihar Government  that exposes the illegal printing and publication of Dainik Hindustan from  new presses at Bhagalpur and Muzaffarpur in Bihar, and recommends to recover more than Rupees one crore from the company as that amount was paid to the company  illegally for the publication of the government advertisement in the unauthorized Bhagalpur and Muzaffarpur editions/ publications of Dainik Hindustan.
 
14-03-2008- On the legal opinion of the then Advocate General of Bihar, the Chief Accounts Controller (CAC), Finance (Audit) Department, Bihar,Patna  mysteriously drops the ‘ particular part’ of the ‘audit-objections’ of the Audit- Report No. 195/ 2005-06 , relating to the violation of the Press & Registration of Books Act, 1867 in the matter of illegal printing and publication of Bhagalpur and Muzaffarpur editions of Dainik Hindustan.
 
08-12-2008- The Central Information Commission ( New Delh)  in the Case No. CIC/OK/A/2008/885/AD (ShriKrishna Prasad Vs CPIO, Registrar of Newspapers for India), directs the CPIO to hold an immediate enquiry into the alleged illegal publication of Dainik Hindustan in 38 districts of Bihar and 12 districts of Jharkhand with consultation with the concerned District Magistrates and submit the ‘ enquiry-report’ within one month of the receipt of the order.
 
30-06-2011- The Company M/S The Hindustan Times Limited, that was later on changed into M/S H.T.Media Limited and now  M/S Hindustan Media Ventures Limited, wrongly and fraudulently printed the Registration No. RNI No. 44348/1986(that is allocated   to the Patna edition of Dainik Hindustan)  on the “Print-lines” of the Bhagalpur and Munger editions/ publications of Dainik Hindustan from August 03,2001 to June 30, 2011. Continuously.
 
01/07/2011- As an enquiry on the order of the Central Information Commission( New Delhi) into the alleged illegal printing and publication of Dainik Hindustan in all 38 districts of Bihar and 12 districts of Jharkhand state, was going on, the company M/S Hindustan Media Ventures Limited ( New Delhi), all of a sudden,  dropped  printing the ‘ Registration No. RNI No. 44348/ 1986’ from the ‘Print-lines’ of the ‘ Bhagalpur and Munger editions/ publications’ of Dainik Hindustan from July 01, 2011. And the, the Company started printing “ Registration  No.—Applied For” on the ‘Print-lines’ of the Bhagalpur and Munger editions / publications of Dainik Hindustan from July 01, 2011 onwards.
 
18-10-2011- A social worker, Mantoo Sharma, files a complaint case No.993©/2011 against the accused persons in the court of Hon’ble Chief Judicial Magistrate,Munger.
 
05-11-2011- The Hon’ble Chief Judicial Magistrate,Munger under section 156(3) of Cr.P.C, directs the Munger police to lodge an F.I.R in this case.
 
18-11-2011- On the order of the Hon’ble court of the Chief Judicial Magistrate,Munger in the Complaint Case No.993©/2011, the Munger Kotwali Police(Bihar) lodges a First Information Report with the Kotwali police station ,bearing the P.S Case No. 445/2011, dated 18/11/2011, against all the named accused persons including the petitioner under sections 8(B),14/15 of the Press & Registration  of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code and begin investigation.
 
21-04-2012- The Deputy Police Superintendent,Munger submits his ‘ Supervision Report No.01’ in the Kotwali P.S Case No. 445/2011 and concludes his findings of investigation and supervision with the remarks” Facts coming in the way of investigation and supervision and documents, obtained, prove that his case is ‘ prima-facie’ true”
 
30-04-2012- The Police Superintendent,Munger also submits  his ‘Supervision Report No.02’ in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011 and fully supports the ‘findings’ of the Deputy Police Superintendent,Munger and directs the Investigating Officer/ Deputy Police Superintendent,Munger to present ‘case diaries’ in this case  after taking a decision on the point of accusation.
 
2011-12- Smt Shobhana Bhartia, Mr.Shashi Shekhar, Aaku Srivastawa, Binod Bandhu, Amit Chopra, all named accused persons in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/ 2011, move the Hon’ble High Court of Patna, filing two separate Criminal Miscellaneous Cases No. 2951/2011 and Case No. 16763/2012, praying to ‘quash’ the Munger Kotwali P.S Case No. 445/ 2011.
 
27/09/2012- The  Munger Collector, in response to a direction  of the Hon’ble High Court of Patna, sends his ‘ enquiry-report’ to the Hon’ble High Court of Patna, confirms  the violation of the provisions of the Press & Registration of Books Act, 1867 in the particular matter of the printing & publication of ‘ Munger and Lakhisarai editions/ publications ‘ till the time of sending the report. He also submits in the Honble High Court of Patna  copies of unauthorised and illegally printed and circulated copies of the Munger and Lakhisarai editions of Dainik Hindustan.
 
17-12-2012- The Hon’ble High Court of Patna in the Criminal Miscellaneous Case Nos-2951/2011 and No. 16763/2012, on December, 17, 2012, passes an order, directing the Munger police  investigating officer  to expedite the police investigation (para -15)  of the order) within three months from the date of receipt of the order.
 
15-01-2013– The main named accused Smt Shobhana Bharatia, Chairperson of the Hindustan Publication Groups, moves the Hon’ble Supreme Court against the order of the Hon’ble High Court of Patna dated 17/12/2012
 
ShriKrishna Prasad,
 
Advocate
 
Mob-09470400813

तरुण तेजपाल पर लगी दो अतिरिक्‍त धाराएं

पणजी : गोवा अपराध शाखा ने महिला सहकर्मी के यौन शोषण के आरोपी तहलका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल की मुश्किलें बढ़ाते हुए उनके खिलाफ अतिरिक्त आरोप लगाए हैं। अपराध शाखा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि तेजपाल के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में अब आईपीसी की धारा 341 और 342 जोड़ी गई हैं। ये धारायें किसी को गलत ढंग से बंधक बनाने से जुड़ी है। तेजपाल से पूछताछ कर रहे अधिकारियों ने कहा कि पीडि़ता, गवाहों के बयानों के बाद और होटल के सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद तेजपाल के खिलाफ अतिक्ति धाराएं लगाई गई हैं।

दर्ज हैं ये मामले : तेजपाल इस समय पुलिस की हिरासत में हैं। उनपर पहले से ही 354-ए (यौन शोषण, शारीरिक संपर्क, अवांछित व्यवहार एवं स्पष्ट यौन प्रस्ताव या किसी तरह का अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर मौखिक प्रवृति का यौन आचरण), 376 (बलात्कार) और 376 (2) (किसी व्यक्ति द्वारा अपने आधिकारिक पद का फायदा उठाते हुए अपने संरक्षण में रह रही महिला के साथ बलात्कार) के तहत मामले दर्ज हैं।

मामले को लेकर कल तेजपाल की पुलिस हिरासत चार दिन और बढ़ाकर 10 दिसंबर तक कर दी गई। तेजपाल पर नवंबर की शुरुआत में गोवा के एक होटल में अपनी कनिष्ठ महिला सहकर्मी का यौन शोषण करने का आरोप है। गोवा पुलिस ने गत 30 नवंबर को उन्हें गिरफ्तार किया था। (एजेंसी)

रवींद्र मौर्या ने की ‘गुंडई’, पीटे गए जनसंदेश टाइम्‍स के दो कर्मचारी

बनारस में स्‍थानीय लोगों से 'गुंडई' करना जनसंदेश टाइम्‍स के कुछ कर्मचारियों के लिए भारी पड़ गया. रविवार को स्‍थानीय लोगों ने जनसंदेश टाइम्‍स के ऑफिस में घुसकर दो कर्मचारियों की जमकर धुनाई की. मारपीट करने वाले लोग भीड़ के हाथ नहीं लगे अन्‍यथा उनकी धुक्‍का फजीहत करने की तैयारी पूरी थी. उग्र भीड लगभग 20 मिनट तक अखबार के ऑफिस को अपने कब्‍जे में कर रखा था. पुलिस को सूचना देने के बाद स्‍थानीय लोग अखबार कार्यालय से बाहर निकले. इस मामले में दो लोगों को पुलिस ने पकड़ा है. अखबार के घायल कर्मचारी को अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है.

जानकारी के अनुसार जनसंदेश टाइम्‍स का एकाउंटेंट अतुल विश्‍वकर्मा कंपनी की गाड़ी लेकर किसी काम से गया था. वापस कार्यालय में आते समय उसकी गाड़ी से किसी बच्‍चे को चोट लग गई. इस बात को लेकर स्‍थानीय लोगों से विवाद हुआ. उसने माफी मांगकर किसी तरह मामला सुलझाया. पर कुछ स्‍थानीय लोगों ने उसके साथ गाली ग्‍लौज कर दी. फिर भी मामला सुलट गया. पर इसी बीच अखबार के एक डाइरेक्‍टर रवींद्र मौर्य को जब इसकी जानकारी हुई तो वे अपने सुरक्षा गार्डों के साथ घटना स्‍थल पर पहुंचे और एक युवक की पिटाई कर दी.

बताया जा रहा है कि जब रवींद्र के इस कारनामे की जानकारी स्‍थानीय लोगों को मिली तो वे उत्‍तेजित हो गए. कम से कम चार दर्जन की संख्‍या में स्‍थानीय लोग जनसंदेश टाइम्‍स के कार्यालय में पहुंचे और सामने दिख गए सुपरवाइजर सुनील मौर्य को पीटना शुरू कर दिया. सुनील की जमकर धुनाई की. हमले में सुनील गंभीर रूप से घायल हो गए. इसके बाद भीड़ के हाथ आईटी का एक ट्रेनी सावन कुमार लग गया. भीड़ ने इसकी भी धुनाई कर डाली. इसके बाद स्‍थानीय लोगों की भीड़ रवींद्र को खोजते हुए पूरे ऑफिस पर कब्‍जा जमा लिया.

बताया जा रहा है कि रवींद्र भीड़ के हाथ नहीं लगे नहीं तो उसकी भी जमकर थुक्‍का फजीहत हो जाती. इस दौरान लगभग बीस मिनट तक अखबार की पूरी बिल्डिंग नाराज भीड़ के कब्‍जे में रही. हालांकि इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस के आने के पहले ही स्‍थानीय लोग मौके से निकल गए. इसके बाद अखबार के घायल कर्मचारियों को अस्‍पताल भेजा गया, जहां उनका इलाज हुआ. पुलिस ने अखबार प्रबंधन की शिकायत के बाद दो लोगों को हिरासत में ले लिया है.

मृदुल त्यागी ने नई दुनिया से नाता तोड़ा, पत्रिका से राजकुमार कंसोरिया का इस्तीफा

नई दुनिया इंदौर से खबर है कि समाचार संपादक मृदुल त्यागी ने नई दुनिया से नाता तोड़ लिया है. वे पिछले जून में आई नेक्स्ट मेरठ से नई दुनिया में आए थे. खबर है कि उन्होंने हिन्दुस्तान आगरा के साथ अपनी नई पारी शुरू की है.
 
उधर पत्रिका से खबर है कि पत्रिका ग्वालियर से राजकुमार कंसोरिया ने इस्तीफा देकर नई दुनिया इंदौर ज्वाइन कर लिया है. 
 
नई दुनिया इंदौर में हालात शायद जागरण से भी जयादा बुरे हो चुके हैं. यही वजह है कि वहां हर महीने लोग नौकरी छोड़कर भाग रहे हैं. नई दुनिया के एचआर और अकाउंट विभाग में भी जबरदस्त छंटनी चल रही है. एचआर विभाग में दो लोग बचे हैं. वहीं अकाउंट में भी एक-एक करके सबको हटाया जा रहा है.
 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

दिल्ली में कांग्रेस आक्रोश की लहर में डूब गई

कांग्रेस की हथेली से दिल्ली इस तरह फिसल जाएगी यह अप्रत्याशित और चौकाने वाली बात है। इसका विश्लेषण राजनीतिक विशेषकों ने पहले कभी नहीं   किया था। यह चौकाने वाली बात इसलिए है कि मुख्यमंत्री रूप में शीला दीक्षित का यहां विवादस्पद नहीं रही है। दिल्ली के नवनिर्माण का जो सशक्त अभियान चलाया था, वह अलग से रेखांकित करने लायक है। कांग्रेस ने अन्य राज्यों में चाहे जैसी भी भूमिका निभायी हो, जनता की आशाओं आकांक्षाओं को भले ही पूरा नहीं किया हो लेकिन शीला दीक्षित के साथ वह अध्याय नहीं खुलता है। 
 
दिल्लीवासियों के अलावा किसी दूसरे प्रदेश को यह गौरव प्राप्त नहीं है कि विकास हर दिशा में हुआ हो। फ्लाईओवर हो या प्रदूषण, दिल्ली की भीड़ को दृष्टि-पथ में रखते हुए वाहनों को नियंत्रित रूप में कम अवधि में एक दूसरे स्थान पर ले जाने की सुविधा मुहैया कराने की बात हो या दिल्ली के सुंदरीकरण की बात हो सारे कार्यों को शीला दीक्षित ने बड़े ही अनुकरणीय ढंग से ऐसे किया था, जो मिसाल बन गए थे। अन्य महानगरों के वासी इस बात  के लिए तरसते रहे कि दिल्ली की तरह उन्हें मेट्रो, वाहनों को तेज गति से ले जाने की सुविधा मिलती। अपने महानगर को सुन्दर और आकर्षक रूप में देखने को मिलता। 
 
इन उपलब्धियों के बावजूद कांग्रेस की जब अप्रत्याशित हार दिल्ली में हुई, तो किसी भी मुख्य मंत्री को अब सोचना पड़ेगा वह कौन-सा हथकंडा अपनाए कि चुनाव में जीत सुनिश्चित कर सके। उसके मन में यह बात जरूर आयेगी कि विकास से वह यह काम नहीं कर सकता। 
 
शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली में कांग्रेस की हार का एक पक्ष यह भी है कि रुपये खर्च कर केवल रईसों के जीवन को सुखी बनाया गया। दूसरा आक्रोश फूटा कांग्रेसी सरकार में महंगाई और भ्रष्टाचार बढ़ने की वजह से। सब जगह कांग्रेस के खिलाफ जो आक्रोश था, वह दिल्ली में भी नजर आया। 
 
               लेखक अमरेन्द्र कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क 123.amrendrakumar@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

Shobhana Bhartia has done manipulation, fraud: Mantoo Sharma tells Court

New Delhi : The Respondent No.02, Mantoo Sharma, in his Counter-Affidavit , to the Supreme Court of India, has accused the Chairperson of M/S The Hindustan Times Limited(New Delhi) of cunningly declaring the Munger and Bhagalpur publications/editions of Dainik Hindustan 'Registered ones',fraudulently printing the Registration Number -RNI No.44348/1986 (that is allocated to the Patna publication/edition of Dainik Hindustan by the Press Registrar, New Delhi) on the Print-lines of the publications/editions of Muner and Bhagalpur, publishing the government advertisements of the Union and the state governments and receiving the payment against the published government advertisements from the government treasury illegally, amounting to Rs.200 crore from August,03,2001 to June 30,2011( a period of nine years and eleven months approximately).
 
Besides, the Respondent No.02,Mantoo Sharma has told the Supreme Court that the petitioner,Shobhana Bharatia has done 'manipulation,' 'fraud,' and ' tampering of document' in the filing of the first 'Declaration' before the District Magistrate,Bhagalpur as documentary evidences show.
 
The Respondent No.02, Mantoo Sharma, says in his Counter- Affidavit in his para no.02 ,
 
"That the petitioner in the S.L.P(Criminal) No. 1603 of 2013, in the para No. 02(a) and 2(b) has clearly admitted her offence that M/S Hindustan Times Limited (New Delhi) began printing a Hindi daily ' Hindustan' from Bhagalpur in Bihar from August ,03, 2001 and filedthe requisite Declarations on 12 October, 2001, 10 June,2010 and 30 June 2011. The petitioner has further annexed the letter of theDistrict Magistrate(Bhagalpur), addressed to the Director, Information & Public Rleations Department,Bihar,Patna, confirming the beginning of the printing of the Hindi daily ' Hindustan' from Bhagalpur from August ,03,2001 and the first 'Declaration' has been received in the office of the District Magistate,Bhagalpur on August, 02, 2001.But ,on perusal of the documents, submitted in the Supreme Court by the petitioner as Annexure -P1, the date of filing thesaid first 'Declaration' is ' Nil' and the date of authentication of the first ' Declaration' by the District Magistrate,Bhagalpur is
 
12 October, 2001.
 
The date of filing 'Declaration' ,being undated , before the District Magistrate, Bhagalpur raises several questions over its genuineness. Thus , there are sharp contradictions in the date of filing the first Declaration before the District Magistrate,Bhagalpur as the petitioner herself, in her petition, says ' October, 12,2001' as the date of filing the first 'Declaration' before the District Magistrate,Bhagalpur, while the District Magistrate,Bhagalpur , in the petitioner's Annexure -P2, mentions 'August ,02,2001' as the date of filing first' Declaration' and theannexed document of first 'Declaration' of the petitioner  as Annexure -P1 is 'undated'.
 
As the petitioner has filed the first undated
 
'Declaration' after the start of the printing ofthe daily ' Hindustan' from the new printing press at Jeevan Sagar Times Private Limited, Lower Nath Nagar Road, Parbatti, Bhagalpur, it is in the total violation of the Section 5(3) and 5- (2-C) of the Press and Registration of Books Act, 1867.Besides, filing the first undated' Declaration' raises the questions over its genuineness.
 
The Section 5 (2-C) of the Press & Registration of Books Act, 1867 clearly states :-
 
"A declaration in respect of a newspaper made under rule 5(2) and authenticated under section 06 shall be necessary before the newspaper can be published.'
 
(Annexure –B)
 
Besides, the Section 5(3) of the Press and Registration of Books Act, 1867 clearly states,
 
"As often as the place of printing or publication is changed, a new declaration shall be necessary."
 
(Annexure – B)
 
It means that the company should have got its Declaration authenticated by the District Magistrate,Bhagalpur before the start of the printing and publication of the Bhagalpur edition/publication ofthe daily' Hindustan' but it was not done ,thus violating the mandatory provisions of the Press and Registration of Books Act, 1867.
 
In this context, I will also like to mention the related
 
content of the Bihar CAC's Report No.-195/ 2005-06 in which the CAC"s report in the petitioner 's Annexure -P3 on page no. 53 in line 22,has mentioned "11-12-2003" as the date of filing the 'first Declaration'before the District Magistrate,Bhagalpur .
 
All these contradictions in the date of filing the 'first Declaration' before the District Magistrate,Bhagalpur clearly show 'manipulation,' 'fraud' and' tampering of document' by the petitioner in a bid to escape the jaws of law.
 
Moreover, only submission of the 'Declaration' before the District Magistrate,Bhagalpur, does now mean that the company M/S Hindustan Times Limited(New Delhi) has got ' the Certificate of Registration' under Section 19 -C of the Press and Registration of Books Act, 1867 and " the Registration Number'' under Section 7(2) of the Registration of Newspapers (Central) Rules, 1956 for the printing / publication of the existing daily' Hindustan' from the new printing press at Bhagalpur.
 
It is important to mention that till the receipt of the" Certificate of Registration" and the " Registration Number" from the office of the Press Registrar, Information & Broadcasting Ministry, New Delhi, the Company, M/S the Hindustan Times Limited, that prints and publishes the existing daily "
 
Hindustan" from the new printing station at Bhagalpur, was not legally entitled to declare its Bhagalpur edition/publication ' a Registered Newspaper' and to claim the publication of the Government Advertisements" from the Union Government and the Bihar Government as well. Besides, the Company , under the circumstances, should have printed " Applied For" at the place of the 'Registration Number' on the 'Print-line of the newspaper.
 
Here, it is also important to mention that the petitioner and others also print, publish and circulate " Munger Edition/Publication'' of the existing daily " Hindustan'' from the same Bhagalpur Printing Press for the readers of the Munger districtin the Munger district with more and more news of the different parts of the Munger district.But the petitioner and others cunningly declared theBhagalpur and Munger editions/publications of the daily 'Hindustan' ' Registered ones" , fraudulently printed the ''Registration Number -RNI No.-44348/1986'' ( that is allocated to the Patna edition of Hindustan) on the''Print-lines'' of the ''Bhagalpur and Munger editions/publications'' of the daily ' Hindustan" from August 03,2001 to June 30, 2011 (a period of nine years and eleven months approximately ) continuously and published the Government Advertisements of the Union Government and the Bihar Government and thus received payment from the government treasury, amounting to about rupees 200 crores.
 
Named accused persons in this world famous forgery and cheating case:
 
On the order of the Hon'ble Chief Judicial Magistrate, Munger, the Munger Kotwali police have lodged an F.I.R against (1) Shobhana Bhartia, Chairperson, M/S Hindustan Publication Group,New Delhi,(2)Shashi Shekhar, Chief Editor, ,Dainik Hindustan, New Delhi, (3) Aaku Srivastawa, Acting Editor, Dainik Hindustan,Patna,(4) Binod Bandhu, Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition under sections 420/471/476 of IPC and Sections 8(B)/14/15 of The Press & Registration of Books Act, 1867. They have been accused of using the wrong Registration Number and getting crores and crores of rupees in the "Advertisement -Head" after obtaining the govt. advertisements from the state as well as the union government by presenting forged documents of "Registration" before the Govt. Advertisement Releasing agencies.(EOM)
 
ShriKrishna Prasad, Advocate
 
Mob-09470400813

पत्रकारिता का यह फार्मेट रहे ना रहे पर पत्रकारिता रहेगी : शैलेश

कल्पतरु एक्सप्रेस द्वारा हर महीने आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की दसवीं शृंखला में शनिवार को श्रोताओं को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज नेशन टीवी चैनल के सीईओ शैलेश ने कहा कि भले ही कल को पत्रकारिता का यह फार्मेट न रहे पर पत्रकारिता रहेगी, खबरों की जरूरत हमेशा रहेगी। उन्होंने कहा कि आज कंटेंट डिलिवरी के लेबल पर बड़े बदलाव हो रहे हैं, आगे न्यूज रहेगी, पेपर नहीं रहेगा। टीवी चैनल रहेंगे पर टीवी सेट नहीं होगा। उसके लिए हमें अपने ड्राइंग रूम में बैठकर खबरों पर निगाह दौड़ाने की जरुरत नहीं रहेगी। इस सब की जगह मोबाइल, टेबलेट लेते जाएंगे।
 
एक सर्वे का जिक्र करते उन्होंने कहा कि यह बिजनेस बस बीस साल रहेगा, बीस साल बाद अखबार नहीं होंगे। ये बदलाव दुनिया भर में हो चुके हैं। यूरोप में अखबार बंद हो रहे हैं। वहां अखबार की कीमत अगर पांच पौंड है तो उसे घर पर मंगाने का कुरियर खर्च पंद्रह पौंड है। नतीजा, लोग नेट पर अखबार पढ़ना पसंद करते हैं। यूरोप के स्टेशनों पर सुबह का पचास पेज का अखबार मुफ्त में मिलता है और उसे भी 99 फीसदी लोग छूना नहीं चाहते। वहां जो अखबार घर पर मंगाते हैं उनके लिए अखबार को भी सुंदर वस्तु की तरह अच्छी पैकेजिंग में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने कहा कि जिस दिन भारत के अखबार और पाठक के बीच से हॉकर हट जाएंगे यहां भी अखबारों की यही स्थिति होगी। पर ऐसा नहीं होगा कि खबरें नहीं होंगी, इसके उलट पत्रकारों का काम कल के मुकाबले बढ़ जाएगा।
 
श्री शैलेश ने कहा कि 4जी आते ही हम सेकेंड्स के भीतर खबरें देख पाएंगे। बदलाव तेजी से आ रहे हैं। आज बड़ी सी ओबी वैन की जगह छोटे बैग पैक ने ले लिया है। उसी में सारी व्यवस्था सिमटी रहती है। अब जोर इस पर होगा कि हम खबरों को कितनी जल्दी और अथेंटिक ढंग से दिखा पाते हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में संपादक, उपसंपादक, संवाददाता आदि बीच के तमाम लेयर खत्म हो जाएंगे और इन सब की जगह एक संपूर्ण पत्रकार ले लेगा जो एक साथ खबरें लाने, उसे टाइप करने से लेकर प्रूफ दुरुस्त करने और भेजने तक का सारा काम अकेले करेगा। इस संदर्भ में भविष्य के पत्रकार का कम ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता जाएगा।  इसके लिए हमें काम करने के पारंपरिक तरीकों से बाहर आना होगा और आगामी समय के अनुरूप खुद को ढालना होगा। पहले हमें टेलेक्स कार्ड मिलता था फिर फैक्स आया अब ई-मेल है कल को कुछ और होगा।
 
उन्होंने कहा कि इन बदलावों के वरक्स अगर कंटेंट के स्तर पर देखा जाए तो उसमें 1990 के बाद से ही बराबर गिरावट आती जा रही है, उसका कोई तय स्वरूप नहीं रह गया है। आज सवाल यह नहीं रह गया है कि खबर क्या है या नहीं है, अब तो जो लोग देखते हैं वही खबर है। 2005 में एस्ट्रोलॉजी ने पहली बार चैनलों में प्रवेश किया फिर तो हर चैनल के अपने-अपने बाबा हो गये और यह होने लगा कि एक पत्रकार को 25 हजार देना होता है और इन बाबाओं को दो-ढाई लाख दे दिये जाते हैं। इसके लिए कोई तैयारी भी नहीं करनी होती, बस बाबा बुलाओ, बैठे-बिठाये टीआरपी हो जाएगी। आज के बाबा भी पंचांग लेकर नहीं आते, कम्प्यूटर लेकर आते हैं और दावा करते कहते हैं कि यह पतरा नहीं कह रहा यह कम्प्यूटर बता रहा। यह सब दरअसल थोपा जा रहा। फिर सास-बहू के चैनल आए, अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि जैसे सलमान खान वर्जिन हैं आदि। कोई मंगल पर आदमी के पांवों के निशान ढूंढ़ रहा और उसके प्रमाण में नासा की तस्वीर दिखा रहा, कोई स्वर्ग की सीढ़ी बता रहा, कोई अपने मरने की झूठी तारीख बता रहा और चैनल उसे अंत तक दिखा रहे और अंत में बात इस पर खत्म हो जा रही कि मृत्यु का ग्रह टल गया, अब मैं नहीं मरूंगा, कोई सर्पेंटाइन रॉक को शेषनाग बता रहा कोई गॉड पार्टिकल को भगवान से जोड़ रहा। 
 
अब इस सब में खबर कहां है, ऐसे फिजूल की बातों पर एक्सपर्ट्स की राय लेने को ही खबर मानने लगी है नई पीढ़ी क्योंकि वह बिक जाएगा, टीआरपी बढ़ जाएगी, यही तरीका होता जा रहा है। सवाल यह है कि हम क्यों मान लेते हैं कि खबर यही है, क्योंकि आज खबर लिखने का तरीका लोग भूलते जा रहे हैं। यह गिरावट का दौर था, जो अब खत्म होने को है। अब लोग इससे बाहर आ रहे हैं। आज पत्रकार को ‘बिटविन द लाइन’ देखना होगा, यह नहीं कि हर बम-ब्लास्ट में दाऊद का हाथ ढूंढ़ लिया। कल और आज के पत्रकारों की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि कल के ‘सेल्फ मेड जर्नलिस्ट’ आज के ‘शो काल’ डिग्रीधारी पत्रकारों से बेहतर थे। न्यूज को आज ‘कवर’ करने की जगह ‘क्रिएट’ किया जा रहा, उससे बचना होगा।
 
इस ‘कवर’ और ‘क्रिएट’ करने के फर्क और खतरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने मथुरा संग्रहालय की एक घटना बताई कि वहां एक पंडा सीधे-सादे लोगों को विक्टोरिया की विशाल मूर्ति का परिचय यह कह दे रहा था कि ये कंस की मामी हैं, जब इस पर सवाल किया गया तो पंडे का जवाब था कि तब क्या यह आपकी मामी हैं। श्री शैलेश ने कहा कि कंटेंट के स्तर पर टेलीविजन ने खबरों को बहुत बिगाड़ा है, फलस्वरूप आज पत्रकारों की लिखने की आदत ही खत्म हो गई है, यह एक भयानक दौर रहा, जिससे हम बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं। 2011-12 से कुछ चैनलों द्वारा सकारात्मक  शुरुआत हो चुकी है। प्रतियोगिता में ही सही हम अब खबरों की ओर लौट रहे हैं। मोबाइल, टैबलेट आदि के विस्तार के साथ ही नये तरह के ‘लाइव’ सामने आ रहे हैं। सोशल नेटवर्क की बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस नेटवर्क से अखबार क्या टीवी भी फाइट नहीं कर पाएगा। पर टीवी की खबरों की अथेंसिटी अखबार जैसी नहीं होती, यह चुनौती रहेगी।
 
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने सोशल साइट्स की बाबत कहा कि फेसबुक बिल्कुल छिछोरा माध्यम है, पत्रकारिता नहीं है। अब तो वहां भी लोग पैसे देकर अफवाहें फैला रहे हैं। उससे ज्यादातर निकम्मे लोगों का काम चलता है। कभी-कभार वहां भी कुछ अच्छी शायरी और विचार मिल जाते हैं पर अधिकतर बैठे-ठाले की बातें रहती हैं। शैलेश के वक्तव्य के संदर्भ में उन्होंने कहा कि शैलेश ने निर्ममता से चैनलों के फूहड़पन को सामने रखा। अब तमाम चैनल फूहड़ मनोरंजन दिखा रहे, लतीफा सुना रहे। वह अच्छा लगता है तत्काल। रसगुल्ला अच्छा लगता है पर वह भोजन का विकल्प नहीं हो सकता। एक जमाने में गुलशन नंदा के किताबों की पांच लाख प्रतियां एक साल में बिक जाती थीं पर इससे वे बड़े लेखक नहीं हो पाये। ये लतीफेनुमा खबरें मूल्य नहीं बन सकते। आज हालत यह है कि सारे चैनल ‘पीपली लाईव’ का नत्था ढूंढ़ते रहते हैं। वे कहेंगे कि आप अपनी जगह बने रहिए हम खबरें लेकर वापस आ रहे, यह बहुत बुरा लगता है, यह दर्शकों को बनाना हुआ, ऐसे कब तक बेवकूफ बनाओगे। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने को चैनलों पर परफार्मेंस कहा जा रहा, वे आज परफार्मेंस हायर कर रहे, इस पर सवाल उठना चाहिए।  
पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों की हालत बयां करते श्री थानवी ने कहा कि वहां पत्रकारिता के साथ विज्ञापन, पीआर भी पढ़ाया जा रहा, यह तो चोरी और पुलिसिंग एक साथ सिखाना हुआ। आज अधिकांश पत्रकारिता संस्थान इवेंट मैनेजमेंट पढ़ा रहे हैं कि किसी फंक्शन में तंबू कैसे लगाना है, यह तक सिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि टीआरपी, सर्कुलेशन जरूरी है पर एक सीमा के बाद इस पर जोर देना पत्रकारिता की नैतिकता को बर्बाद करना है। यह तो शब्दों  का व्यापार हुआ, आप जूता क्यों नहीं बेचते? श्री थानवी ने कहा कि प्रिंट कभी खत्म नहीं होगा, यह कम-ज्यादा हो सकता है, अच्छी चीजें कम ही रहती हैं। 
 
शब्द की ताकत को टीवी नहीं पहचानता, अखबार इसे जानते हैं। अब मंडेला के निधन को ही लीजिए, किसी चैनल पर उन पर कुछ भी गंभीर नहीं आ सका जबकि न्यूयार्क टाइम्स ने मंडेला पर अपने ढंग की स्टोरी की, चैनल ऐसा कुछ सामने नहीं ला सके। उन्होंने कहा कि रेडियो को आज तक ढंग से एक्सप्लोर नहीं किया जा सका है, उसके माध्यम से भी बहुत कुछ किया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में कल्पतरु एक्सप्रेस के समूह संपादक पंकज सिंह ने कहा कि आज जिस तरह मीडिया की सांगोपांग व्याख्या हुई और दिग्गजों ने अपने विचार साझा किये वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरक है।

मीडिया से अदृश्य ग्रामीण भारत के सरोकार

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत गांव में बसता है। देश की उन्नति के लिए गांव की उन्नति आवश्यक है। आजादी के दौरान महात्मा गांधी ने अपनी पत्रकारिता के जरिए भी ग्रामीण चेतना को जगाने का काम किया था, जिसके लिए उन्होंने यंग इंडिया, हरिजन, स्वराज जैसे समाचार पत्रों में भी ग्रामीण भारत की वकालत की थी। ग्रामीण भारत की अहमियत को समझते हुए ही आजाद भारत के प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। फौज मे जवान और खेत में किसान की वकालत की। कृषि क्षेत्र में कई क्रान्तिकारी शुरूआतें कीं और फैसले लिए। लेकिन, यही भारत जैसे-जैसे अपनी उम्र के पड़ावों को पार करता गया वैसे–वैसे धुंधला होता गया। 
 
नब्बे के दशक में उदारीकरण की बयार से इन गांवो के नेस्तनाबूद होने की शुरूआत हुई। देश में तमाम विदेशी निवेशकों की आवक हुई। धीरे धीरे कृषि योग्य भूमि को कारखानों और ऊंची बिल्डिंगों ने निगलना शुरू कर दिया, जिसकी परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है।
 
इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहा जाए कि एक और तो सरकार कृषि योग्य भूमि का जबरन अधिग्रहण कर उसे पूंजीपतियों को सौंप देती है, तो वहीं उसके समानांतर कृषि को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम चलाने का दावा करती है, जो महज छलावा है। साथ ही सरकार की तरह मीडिया, जिसकी जिम्मेदारी सरकार के कारनामों को जनता के सामने लाना है वह भी इन्हीं पूंजीपतियों की चरणवंदना में लिप्त है। कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों के मालिक सरकार के सहयोग से प्राकृतिक संपदा से युक्त राज्यों में खादानों के काम में जुट गए हैं।
 
राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे कृषि दर्शन इसकी एक बानगी भर है। निजी समाचार चैनलों ने तो खैर ग्रामीण भारत की ओर से नज़रें हीं फेर रखी हैं। वे तो सिर्फ क्राइम, क्रिकेट और सिनेमा बेचने में ही मगन रहते है। एक अपेक्षा प्रिंट मीडिया से जगती है, लेकिन वो भी सिवाय छलावे के कुछ खास नहीं कर रहे है। वो बहुराज्यीय और बहुस्थानीय संस्करणों की हमेशा बातें तो करते हैं, लेकिन उनके स्थानीय संस्करणों में भी गांवो के लिए कुछ खास नहीं होता है। उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण ले लीजिए। उत्तर प्रदेश में हिंदी के तीन प्रमुख अखबार प्रकाशित होते हैं, जिसमें दैनिक जागरण, हिदुंस्तान व अमर उजाला शामिल हैं। इन तीनों समाचार पत्रों के प्रदेश में जिलेवार ब्यूरों ऑफिस हैं। सभी के जिला संस्करण प्रकाशित होते हैं। वर्तमान में इनका सर्कुलेशन शहरों से ज्यादा गांवों में बढ़ रहा है। लेकिन, इनके पन्नों पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलेगा कि अधिकांश खबरें जिला कार्यालयों की होती हैं। इन अखबारों के तहसीलवार स्ट्रिंगर भी हैं, लेकिन वह केवल अपराध व राजनीतिक स्वागत समारोह की छोटी-बड़ी खबरों को रिपोर्ट करने तक ही सीमित रहते हैं। उन्हें गांव की सड़क, पानी, बिजली, सुरक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं से संबंधित समस्याएं भी दिखाई नहीं देती हैं। वो भी क्या करें ब्यूरों ऑफिस तो जिला स्तर से उगाही के केंद्र बने हुए हैं।
 
आज उत्तर प्रदेश में गन्ना मूल्य व पिराई शुरू करने को लेकर घमासान रहा चल रहा है। एक ओर किसान गन्ने के समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, तो वहीं निजी चीनी मिल मालिक कीमत बढ़ाने को लेकर तैयार नहीं हैं, दूसरी ओर सरकार है कि वह किसानों के मामले में भी राजनीतिक पैंतरेबाजी से बाज नहीं आ रही है। यूपी की कई सहकारी मिलें बंद पड़ी हैं और वो किसानों के बकाया भुगतान कराने में सक्षम नहीं है। चीनी का कटोरा कहा जाने वाला पश्चिमी उत्तर प्रदेश त्राहि-त्राहि कर रहा है, लेकिन मीडिया में कहीं भी इस मसले पर गंभीर रिपोर्टिंग देखने को नहीं मिल रही है।
 
मीडिया में ग्रामीण भारत अगर चर्चा में आया भी है तो वो केंद्र सरकार की वोट बटोरू योजनाएं ही हैं, जिनके विज्ञापनों के सहारे मीडिया अपनी कमाई कर रहा है, फिर चाहे वो मनरेगा हो या फिर ऐसी ही कोई अन्य योजनाएं। ग्रामीण मंत्रालय तो सिने अभिनेत्री विद्या बालन को मंत्रालय का ब्रांड अंबेसडर बनाकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है। इसका जिम्मेदार वो मीडिया भी है जो सर्वसमाज के उजले आइने का दंभ भरता है, लेकिन सच तो यह है कि अब इस आइने पर भी धूल जम चुकी है। इसलिए इस आईने में अब इस देश के गांवों की तस्वीर भी धुंधली नज़र आती है।
 
                      आशीष कुमार पत्रकारिता एवं जनसंचार में शोध कर रहे हैं. इनसे सम्पर्क 09411400108 के जरिए किया जा सकता है.
 

आइए इस जीत का स्वागत करें, ‘आप’ ने एक रास्ता दिखाया है

Shambhunath Shukla : यह जीत उन नवयुवकों की है जो चाहते थे कि राजनीति अब बुड्ढों-ठुड्ढों के हाथ से आजाद हो. यह जीत उनकी है जो चाहते थे कि राजनीति अब मंदिर-मस्जिद की न हो और यह जीत उनकी भी है जो चाहते थे कि अब जाति के नाम पर राजनीति न हो. आइए इस जीत का स्वागत करें. आप ने एक रास्ता दिखाया है.
 
Nutan Thakur : हम सबों को अत्यंत खुले ह्रदय से Aam Aadmi Party को उसके अद्भुत विजय के लिए बधाई देना चाहिए और इसका पूरा श्रेय एक व्यक्ति श्री Arvind Kejriwal को जाता है. यह प्रदर्शन सभी इंसानी सोच से परे था और वास्तव में अत्यंत शानदार है. मैं प्रार्थना करुँगी कि यह पार्टी अपने कहे आदर्शों पर बनी रहेगी. साथ ही भले लोग मुझ पर हंसें, पर व्यक्तिगत स्तर पर मैं आप पार्टी से अलग होने के अपने निर्णय और इसके कारण पर बरकरार हूँ क्योंकि सभी राजनैतिक दलों को (जिनमे अब "आप" भी शामिल है) अपने ऊपर निगाहें रखने के लिए मेरे जैसे हज़ारों अराजनैतिक लोगों की जरूरत है.
 
शम्भूनाथ शुक्ल और नूतन ठाकुर के फेसबुक वाल से

नक्षत्र न्यूज के चैनल हेड परिवेश वात्स्यायन ने दिया इस्तीफा, कर्मचारी स्ट्राइक पर

रांची स्थित झारखंड-बिहार के रीजनल न्यूज चैनल नक्षत्र न्यूज से चैनल हेड परिवेश वात्सायन ने इस्तीफा दे दिया है. परिवेश काफी दिनों से प्रबंधन से नाराज चल रहे थे. इस नाराजगी की वजह प्रबंधन द्वारा चैनल की दुर्दशा पर ध्यान ना देना बताया जा रहा है.
 
नक्षत्र न्यूज में कर्मचारियों को चार महीने से एक पैसा वेतन नहीं दिया गया है जिसकी वजह से कर्मचारी स्ट्राइक पर हैं. कई कर्मचारी इस्तीफा दे चुके हैं और कुछ बकाया भुगतान को लेकर प्रबंधन पर दबाव बना रहे हैं. चैनल की हालत बहुत खराब है और पिछले एक सप्ताह से चैनल कहीं दिख नहीं रहा है.
 
आंदोलन कर रहे लोगों को चैनल हेड परिवेश वात्साययन का पूरा सहयोग मिल रहा था. परिवेश ने झारखंड स्थापना दिवस पर भी प्रबंधन पर कर्मचारियों को वेतन ना देने पर इस्तीफा देने को कह दिया था. लेकिन उस समय प्रबंधन ने उन्हें इस्तीफा देने से रोक लिया था.
 

मध्यप्रदेश की जनता के भाग्य में शायद विपक्षहीन सरकार लिखी है

मध्यप्रदेश की १४वीं विधानसभा का परिदृश्य लगभग साफ़ हो गया है. प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है. यह स्पष्ट हो चला है कि भाजपा ने मध्यप्रदेश को अपना अभेद्य गढ़ बना लिया है. तमाम विधानसभा उपचुनावों के बाद नगरीय निकायों में हुई भारी पराजय और अब विधानसभा चुनाव में मिल करारी शिकस्त मध्यप्रदेश में कांग्रेस की क्षमताओं का आकलन करवाने हेतु पर्याप्त है. 
 
क्षत्रपों की गुटबाजी, निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं में सिर फुटव्वल, केंद्रीय नेतृत्व की प्रदेश से अनदेखी, संगठनात्मक क्षमताओं का ह्रास; कांग्रेस की प्रदेश में दुर्दशा के कारणों पर अच्छा-ख़ासा ग्रन्थ तैयार किया जा सकता है. कई पुराने कांग्रेसी प्रदेश में पार्टी संगठन को बंधवा बनाने की शिकायत १० जनपथ से लेकर ७ रेसकोर्स रोड तक कर चुके थे लेकिन हर बार उन्हें झूठे आश्वासनों से इतर कुछ नहीं मिला. ऐसा प्रतीत हुआ मानो केंद्रीय नेतृत्व भी मध्यप्रदेश में गर्त को प्राप्त कांग्रेसी गति से समझौता कर चुका है. कभी अल्पसंख्यक दांव तो कभी ठाकुरों की सल्तनत, कभी ब्राम्हण वोट पाने की लालसा तो कभी आदिवासियों के प्रति समर्पण का दिखावा, कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में कमोबेश हर वर्ग को छला. यही कारण है कि सर्वहारा वर्ग का कांग्रेस से मोहभंग हो गया. 
कहा जा सकता है कि अल्पकालीन लाभ हेतु दीर्घकालीन नुकसान उठाना शायद कांग्रेस की नियति बन चुका है. हालिया विधानसभा चुनाव के परिणामों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो मध्यप्रदेश में कांग्रेस नाम की पार्टी का अस्तित्व ही नहीं बचा. जरा सोचिए, जिस राज्य में विपक्ष ही अल्पमत में हो वहां वह सरकार पर कैसे हावी हो सकता है? लगभग ९ वर्षों से राज्य की सत्ता से बेदखल कांग्रेस को अब तक तो अपनी गलतियां ढूंढकर उनका इलाज कर लेना चाहिए था, किन्तु नासूर बन चुकी गुटबाजी प्रदेश में कांग्रेस को खुली हवा में सांस तक नहीं लेने दे रही. कभी दिग्विजय सिंह की प्रदेश की सक्रिय राजनीति में वापसी तो कभी सिंधिया के प्रदेश आगमन का हल्ला, कांग्रेस का निचले स्तर का कार्यकर्ता भ्रमित था और इसी उधेड़बुन में वह किसी एक का नहीं हो पाया. न तो उसकी ताकत संगठन के काम आई और न ही नेताओं द्वारा उसका सही दोहन हुआ. शिवराज सरकार पर आरोपों की झड़ी लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने वाले कांग्रेसी वर्ष २०१३ के विधानसभा चुनाव को लेकर भी इतने आत्म-मुग्ध थे कि जीत के भावी दावे को लेकर उनका आत्म-विश्वास सारी हदें पार कर जाता था. 
 
अब जबकि कांग्रेस एक बार फिर कमजोर विपक्ष के रूप में दिखलाई दे रही है; कांग्रेस नेताओं को जनता को यह बताना चाहिए कि जिस भारी जीत का वे चुनाव पूर्व ही उद्घोष करते थे, वह उन्हें किस तरह और क्यों प्राप्त होती? पार्टी की आक्रामकता की धार को कुंद करने में इसी खोखले आत्मविश्वास ने पलीता लगाया है. बड़े नेताओं के समक्ष अपने समर्थकों की भीड़ को इकठ्ठा कर कांग्रेसी यदि यह समझते रहे कि उनकी ताकत बढ़ गई है तो यह उनकी झूठी दिलासा निकली स्वयं के लिए. एक ओर भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता आत्मविश्वास से लबरेज प्रदेश में जीत की हैट-ट्रिक के लिए पार्टी की संगठनात्मक क्षमताओं को आगे बढ़ाने में लगा रहा वहीं कांग्रेस कार्यकर्ता अतिरेक आत्मविश्वास का शिकार हो खुद की भद पिटवा रहा. ऊलूल-जुलूल बयानबाजी से किसी की छवि पर कुठाराघात तो किया जा सकता है किन्तु चुनाव नहीं जीते जा सकते. कांग्रेसी इस तथ्य को जितना जल्दी समझ लेते, उतना अच्छा होता पार्टी के लिए. मगर अफ़सोस कि वरिष्ठ नेताओं के अहम ने पार्टी को फिर वहीं ला खड़ा किया है जहां दिग्विजय सिंह ने उसे छोड़ा था. 
 
फिर ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रोश नहीं था या यहां कथित मोदी फैक्टर चला हो. प्रदेश भाजपा में गुटबाजी भी थी और एंटीइन्कम्बेंसी फैक्टर भी काम कर रहा था. फिर शिवराज-मोदी की तुलना ने भी प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सियासी पारा गरमा दिया था. किन्तु सभी कठिनाइयों को परे करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में पार्टी को जो ताकत दी, उससे खुद राजनीतिक विश्लेषक भी चकित हैं. दरअसल मध्यप्रदेश में खुद में एक ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुके शिवराज सिंह चौहान की छवि ने भाजपा की तमाम कमजोरियों को ढांक लिया. यहां तक कि स्थानीय स्तर पर विधायकों और मंत्रियों की निष्क्रियता को भी शिवराज का सौम्य व्यवहार तथा जनता से उनकी निकटता ने विस्फोटक नहीं होने दिया. भाजपा राज में  मध्यप्रदेश ने दिन दूनी-रात चौगुनी प्रगति की जिसे गाहे-बगाहे केंद्र सरकार ने भी दबे स्वर में स्वीकार किया. शिवराज सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को देश के अन्य कई राज्यों ने भी अपनाया जिससे मध्यप्रदेश की छवि बनी. कांग्रेस के पारम्परिक क्षेत्रों में भी सेंध लगाकर भाजपा और शिवराज ने यह साबित कर दिया है कि जनता का सेवक बनकर ही जनता का बना जा सकता है. यहां तक कि कांग्रेस के कई ऐसे उम्मीदवार जो अपने क्षेत्रों में मजबूत स्तम्भ माने जाते थे, वे भी हार कर घर बैठ गए. सभी ने शिव के राज को नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया. 
 
२००८ में मिले जनादेश से अधिक जनादेश यदि भाजपा और शिवराज को मिला है तो यह स्वीकार करने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि मध्यप्रदेश में विकास और सुशासन का गठजोड़ कांग्रेस पर भारी पड़ा है. देश की वर्तमान विकास दर ६.४८ प्रतिशत से आगे बढ़ते हुए मध्यप्रदेश ने ११.८७ प्रतिशत की जिस विकास दर को छुआ है, वह निश्चित रूप से जनहितैषी सरकार व उसके मुखिया के अथक प्रयासों का सुफल ही है. यहां तक की लोकप्रियता के पैमाने पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी भी शिव के राज की तारीफ करने से खुद को नहीं रोक सके. १० वर्षों के भाजपा शासनकाल में प्रदेश की प्रगति और विकास के मॉडल को पार्टी सुशासन के रूप में कांग्रेस शासित राज्यों में पेश करने की योजना पर कार्य कर रही है. आर्थिक व औद्योगिक निवेश के मामले में भी शिवराज ने देशी-विदेशी निवेशकों को प्रदेश में आने के लिए मजबूर किया. कुल मिलाकर शिवराज की उपलब्धियों और प्रदेश में विपक्षहीनता ने भाजपा की सत्ता वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हालांकि लोकतंत्र में विपक्ष का न होना सत्ताधारी दल की निरंकुशता को बढ़ाता है किन्तु मध्यप्रदेश की जनता के भाग्य में शायद विपक्षहीन सरकार ही लिखी है. मध्यप्रदेश के चुनाव परिणाम निश्चित रूप से कांग्रेस नेतृत्व के लिए सदमा हैं और शिवराज के राजनीतिक भविष्य के लिए संजीवनी. 
 
सिद्धार्थ शंकर गौतम
 
०९४२४०३८८०१
 
पता: श्री राकेश तिवारी, ४५ न्यू बैंक कॉलोनी,
 
पुलिस लाईन के पीछे, देवास रोड, नागझिरी, उज्जैन (म.प्र.)
 
www.vaichaariki.blogspot.in

 

जागरण हल्द्वानी से अखिलेश, सुशील, नाजिम का इस्तीफा, विनय, राहुल की इंट्री

जागरण हल्द्वानी से लगातार लोगों का जाना जारी है. सब एडिटर कमलेश पांडेय ने इस्तीफा दे दिया है. कमलेश ने हिन्दुस्तान गोरखपुर में बतौर सीनियर सब एडिटर अपनी नई पारी शुरू की है. हल्द्वानी से ही सुशील कुमार ने जागरण छोड़कर कैनविज टाइम्स बरेली में बतौर सब एडिटर ज्वाइन किया है. नाजिम निकरानी ने भी कल शाम को जागरण हल्द्वानी से इस्तीफा दे दिया है. जागरण हल्द्वानी में हालात बहुत खराब हैं और जल्द ही कई और लोगों के छोड़कर जाने की खबर है.
 
जागरण हल्द्वानी में कुछ लोगों के आने की भी खबर है. अमर उजाला बहेड़ी को अलविदा कहते हुए विनय शर्मा ने जागरण हल्द्वानी ज्वाइन कर लिया है. राहुल कुमार ने भी जागरण हल्द्वानी के साथ नई शुरुआत की है. इसके पहले वे सहारा गोरखपुर में कार्यरत थे.
 
भड़ास तक कोई भी सूचना पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

न्‍यूज30 चैनल में आरई बने राजकुमार सिंह

न्‍यूज एक्‍सप्रेस, लखनऊ में एडिटर क्‍वार्डिनेशन के पद पर कार्यरत रहे राजकुमार सिंह ने अपनी नई पारी यूपी-उत्‍तराखंड से लांच होने जा रहे चैनल न्‍यूज30 के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें यहां पर स्‍थानीय संपादक बनाया गया है. चैनल ग्रेटर नोएडा से संचालित होगा.

स्वतंत्र भारत, लखनऊ से करियर शुरू करने वाले राजकुमार सिंह हिंदुस्तान, लखनऊ के साथ छह सालों तक जुड़े रहे. इसके बाद इन्‍होंने सहारा समय के साथ इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में कदम रखा. इसके बाद वे न्यूज 24, वीओआई को अपनी सेवाएं दीं. वीओआई के बंद होने के बाद उन्‍होंने बनारस में एनई के रूप में हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन कर लिया था. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे न्‍यूज एक्‍सप्रेस से जुड़ गए थे. लेकिन यहां परिस्थितियां प्रतिकूल होने के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था.

पत्रकार मनीष सिसोदिया बने पड़पड़गंज सीट से विधायक

नई दिल्ली : पत्रकार से नेता बने मनीष सिसोदिया नई दिल्ली की पड़पड़गंज विधान सभा सीट से चुनाव जीत गए हैं. मनीष आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में थे. मनीष सिसोदिया कई वर्षों तक जी न्यूज में काम कर चुके हैं. मनीष अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ चले आंदोलन के प्रमुख चेहरा थे. आम आदमी पार्टी के गठन में भी मनीष की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
 
5 जनवरी 1972 को पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर में जन्में मनीष सिसोदिया ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण प्राप्त किया. वहां से निकलने के बाद मनीष ने जी न्यूज और आल इंडिया रेडियो में कई वर्षों तक काम किया.
 
पत्रकारिता के अलावा मनीष सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं. इसी के चलते उन्होंने अन्ना के आंदोलन के सक्रिय सदस्य बने और राजनीति में चर्चा में आये. वे आरटीआई कार्यकर्ता भी हैं तथा कबीर नामक संस्था चलाते हैं. वे अपना पन्ना हिन्दी मासिक पत्र का सम्पादन कर रहे हैं.
 
मनीष सिसोदिया आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से हैं और पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं. चुनाव जीतने के बाद पत्रकारों को दिये अपने बयान में मनीष ने कहा है कि आप देखेंगे कि आम आदमी पार्टी कैसे आम है. बिना वीआईपी बने कैसे नेता बना जाता है ये हम दिखायेंगे. आम आदमी पार्टी के नेता बिल्कुल आम आदमी जैसे ही होंगे.

 

समाचार प्‍लस से इस्‍तीफा देकर बी टीवी जाएंगे अतुल अग्रवाल

समाचार प्‍लस से एंकर अतुल अग्रवाल ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर के तौर पर चैनल से जुड़े हुए थे. दूसरी खबर यह आ रही है कि प्रबंधन ने उनको खुद ही बाहर जाने को कह दिया है. हालांकि इस खबर की पुष्टि नहीं हो पाई है. बताया जा रहा है कि अतुल भास्‍कर समूह के बी टीवी के साथ एडिटर के रूप में जुड़ने जा रहे हैं. इसके पहले समाचार प्‍लस के अलग अलग विभागों से लगभग एक दर्जन लोग इस्‍तीफा दे चुके हैं. माना जा रहा है कि इन सभी लोगों ने अतुल अग्रवाल की शह पर इस्‍तीफा दिया है. अतुल इन सभी को बी टीवी लेकर जाने वाले हैं.

हालांकि इधर खबर है कि प्रबंधन ने अतुल के कदम का पूर्वानुमान लगाते हुए खाली हुए पदों को तत्‍काल भर दिया है. अतुल अग्रवाल लंबे समय से इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में सक्रिय हैं. वे आईबीएन7, इंडिया न्‍यूज, न्‍यूज एक्‍सप्रेस समेत कई और चैनलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. समाचार प्‍लस से इस्‍तीफा देने के बारे में जब अतुल अग्रवाल से संपर्क किया गया तो उन्‍होंने ऐसी किसी संभावना को खारिज करते हुए कहा कि वे अब भी समाचार प्‍लस के साथ जुड़े हुए हैं. वे कहीं नहीं जा रहे हैं. 

विवेकानंद बने हिंदुस्‍तान, नोएडा में एनई, शशि भूषण जनसेतु जाएंगे

अमर उजाला, कानपुर से खबर है कि विवेकानंद त्रिपाठी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर डीएनई के पद पर कार्यरत थे. विवेकानंद लंबे समय से अमर उजाला से जुड़े हुए थे. इसी साल की शुरुआत में उन्‍हें गोरखपुर से कानपुर भेजा गया था. उन्‍होंने अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें नोएडा में एनई बनाया गया है. वे अमर उजाला के लिए पश्चिमी यूपी में लंबे समय तक काम कर चुके हैं. उन्‍हें नोएडा में सुनील द्विवेदी के स्‍थान पर लाया गया है. सुनील के इलाहाबाद जाने के बाद नोएडा में एनई का पद खाली पड़ा हुआ था. 

अमर उजाला, धर्मशाला से खबर है कि शशि भूषण पुरोहित ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर ब्‍यूरोचीफ के पद पर कार्यरत थे. शशि अपनी नई पारी शीघ्र लांच होने जा रहे अखबार जनसेतु के साथ करने जा रहे हैं. वे मंडी में इस अखबार के साथ अपनी नई पारी शुरू करेंगे. शशि पिछले चार सालों से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. शशि का जाना अमर उजाला के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

यूपी में सूचना आयुक्‍त बनने के लिए हो रहे कैसे कैसे जतन

यूपी में सूचना आयुक्‍त बनने के लिए कई पत्रकार भी हाथ-पैर मार रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि खाली पड़ी आठ सीटों में कम से कम दो सीटों पर पत्रकार कोटे से नियुक्ति होनी है. इसमें एक नाम तो क्‍लीयर है, सारी लड़ाई दूसरे सीट के लिए चल रही है. पत्रकार कोटे से सूचना आयुक्‍त बनने वाले एक सीट पर वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद सिंह बिष्‍ट का नाम तय माना जा रहा है. अरविंद सिंह सपा प्रमुख के समधी हैं, लिहाजा उनकी दावेदारी को लेकर किसी को कोई शंका नहीं है. पर दूसरे सीट को लेकर लखनऊ के कई धुरंधर पत्रकार लाबिंग करने में जुटे हुए हैं.

सूत्र बता रहे हैं कि यहां के तथाकथित बड़े पत्रकार जो हमेशा सत्‍ता से नजदीकी बनाने में विश्‍वास करते रहे हैं या फिर खुद का ऐसा आभामंडल गढ़ चुके हैं कि उनसे बड़ा पत्रकार लखनऊ की धरती पर नहीं है, सूचना आयुक्‍त बनने के लिए मरे जा रहे हैं. खबर है कि सूचना आयुक्‍त बनने की कोशिश में लगे ऐसे ही एक पत्रकार पिछले दिनों व्‍यक्तिगत आयोजन के बहाने होटल ताज में पार्टी दी. लाखों रुपए इस पार्टी पर खर्च हुए. सत्‍ताधारी दल के कई नेताओं और अधिकारियों को इसमें आमंत्रित किया गया. परन्‍तु महाशय को निराशा ही हाथ लगी.

दो चार अधिकारियों को छोड़कर सत्‍ता पक्ष से जुड़ा कोई बड़ा नेता पत्रकार महोदय की पार्टी में नहीं पहुंचा. इससे इनकी सारी मंशा धरी की धरी रह गई. हालांकि इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि इन पत्रकार महोदय की बसपा सरकार से भी बहुत नजदीकी थी. बहनजी के एक खासमखास माने जाने वाले नेता के खास बनकर इन्‍होंने पिछली सरकार में अपना खूब रूतबा बनाया. उसका भरपूर फायदा भी लिया, जबकि किसी दौर में ये नेताजी के भी खास बनते फिरते थे. सत्‍ता के साथ जाने की यही फितरत इस बार इन पर भारी पड़ गई.

सूत्र बता रहे हैं कि सूचना आयुक्‍तों की नियुक्ति के लिए हुई बैठक में बसपा की तरफ से इनके नाम को उठाया गया था. इसका परिणाम यह रहा कि सत्‍ता पक्ष ने इनके नाम को अघोषित तरीके से बैन कर दिया. इसी बैन को हटाने के लिए इन्‍होंने पार्टी दी. पार्टी के बहाने गिले शिकवे दूर करने की रणनीति तय की, लेकिन किसी के नहीं आने से इनकी सारी कोशिशें धरी की धरी रह गई. हालांकि इन्‍होंने अपना प्रयास छोड़ा नहीं है. कोशिश जारी है, पता नहीं कब भाग्‍य पलटा खा जाए, कब नेताजी को दया आ जाए.   

खैर, इनके अलावा भी कई तथाकथित वरिष्‍ठ पत्रकार सूचना आयुक्‍त की दूसरी कुर्सी पाने के लिए हाथ पैर मार रहे हैं. नैतिकता की खाल ओढ़े एक और पत्रकार, जिन पर अपने मकान को किराए पर देकर सरकारी घर का आनंद उठाने के आरोप लग चुके हैं, भी सूचना आयुक्‍त की कुर्सी के पाने के लिए सारे जतन कर रहे हैं. नए पत्रकारों में नैतिकता गालिब करने वाले यह सज्‍जन भी सूचना आयुक्‍त बनने के सपने देख रहे हैं. अब देखना है कि समाजवादी पार्टी की सरकार में पत्रकार कोटे से सूचना आयुक्‍त की दूसरी कुर्सी किस भाग्‍यशाली व्‍यक्ति के नसीब में आती है. (कानाफूसी)

टीआरपी : आजतक की बढ़त कायम, इंडिया न्‍यूज फिसला

48वें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. इस सप्‍ताह में कई महत्‍वपूर्ण बदलाव हुए हैं. एबीपी न्‍यूज दूसरे नम्‍बर से तीसरे स्‍थान पर पहुंच गया है. इंडिया टीवी ने दूसरे नम्‍बर पर वापसी की है. आजतक लगातार नम्‍बर एक पर बना हुआ है. टीआरपी में नुकसान होने के बावजूद फिलहाल उसे चुनौती देने वाला कोई नजर नहीं आ रहा है.

इंडिया न्‍यूज को इस बार बड़ा झटका लगा है. यह चैनल चौथे स्‍थान से फिसलकर छठे स्‍थान पर पहुंच गया है. जी न्‍यूज ने चौथे स्‍थान पर कब्‍जा जमा लिया है. पांचवें नंबर पर न्‍यूज24 की इंट्री हुई है. न्‍यूज नेशन सातवें नम्‍बर पर पहुंच गया है. उसने एनडीटीवी, आईबीएन और समय को पीछे छोड़ा है. डीडी टॉप टेन से बाहर हो गया है. पूरा आंकड़ा ये है….

WK 48 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 16.0 dn 1.1

India TV 13.6 dn 0.2

ABP News 13.4 dn 1.1

ZN 9.9 up 1.3

News 24 8.7 up 1.0

India news 8.7 up 0.2

News Nation 7.0 same

NDTV 6.8 dn 0.2

IBN 6.1 up 0.4

Samay 3.8 dn 0.7

DD 3.8 up 0.6

Tez 2.3 dn 0.2

Tg CS M 25+ABC

Aaj Tak 16.2 dn 0.1

India TV 13.9 same

ABP News 12.3 dn 1.8

ZN 10.1 up 1.2

India news 9.0 dn 0.4

NDTV 8.0 dn 0.5

News24 7.5 up 0.8

News Nation 7.4 up 0.3

IBN 6.4 up 0.3

DD 3.6 up 1.1

Samay 3.2 dn 0.8

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नेताजी ने करवटें बदलते गुजारी कत्ल की रात

राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए शनिवार की रात कत्ल की रात रही। चुनाव नतीजों के एक दिन पहले की रात को कत्ल की रात क्यों कहते हैं, यह तो पता नहीं परंतु इतना पता जरूर है कि राजस्थान विधानसभा के फिलहाल 199 विधानसभा क्षेत्रों से विधायक बनने का सपना देख रहे 2087 उम्मीदवारों को शनिवार की रात शायद ही नींद आई हो। करवटें बदलते पूरी रात उन्होंने अपने को फूल मालाओं से लदा, भीड़ से घिरा और मुंह लड्डुओं भरा देखते गुजार दी। 2087 में तो जीतना सिर्फ 199 को ही है परंतु सपने देखने में क्या है, उसके पैसे थोड़े ही लगते हैं। पैसे तो जहां लगने थे 1 दिसंबर तक लग चुके। और बहुत अच्छे से लगे।
 
एक दिसंबर के बाद का पूरा सप्ताह सभी प्रत्याशियों के लिए बड़ा भारी रहा। टीवी और अखबारों में आ रहे सर्वे, ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल दिल की धड़कनों को घटाते बढ़ाते रहे। शुभचिंतकों, समर्थकों और मित्रों के सर्वे और पोल सब पर भारी रहे। मतदान के दिन के निजी अनुभव, मतदान के बाद जगह-जगह से आ रही पक्ष में मत पड़ने की खबरें, किस बूथ पर एकमुश्त मत पक्ष में गिरे, कहां सिक्सटी फोर्टी का रेशियो रहा और कहां बात फिफटी-फिफटी पर आकर थम गई। विस्तार से सारी आंकड़ेबाजी अपने निजी सर्वे के समर्थन में बताई जा चुकी है। इन निजी ओपिनयन पोल में हार किसी बूथ से नहीं, अगर किसी जले-भुने ने किसी बूथ से हार की आशंका जताई भी तो पलटवार में दो बूथ गिना दिए गए जहां से भरपाई होकर आगे निकल गए।   
 
परिवार के सदस्य और नाते रिश्तेदार जहां अपनी तरक्की की उम्मीदें लगाए रहे वहीं समर्थकों ने अपने ‘प्रिय नेताजी’ के भावी ‘मंत्रिमंडल’ में अपने लिए पद तय कर लिए। पार्षद का चुनाव जीतते ही समर्थक जैसे उसे अगला विधायक घोशित कर देते हैं उसी तरह समर्थकों ने विधायक चुनाव जीतने की उम्मीद के साथ ही उन्हें भावी मुख्यमंत्री का खास बताते हुए मंत्री बनना तय कर दिया है। मंत्री बनने के तर्क भी जता दिए गए। पहली बार जीतेंगे इसलिए नयों के कोटे में मंत्री बनना तय है। महिला है इसलिए महिला कोटे में मंत्री बनना तय है। दो या तीन बार जीतेंगे इसलिए सीनियर कोटे में मंत्री बनना तय है। पहले भी मंत्री रह चुके हैं इसलिए मंत्री तो बनना तय ही है, कोई माई का लाल नहीं रोक सकता। हरेक के अपने तर्क हैं, तर्क भी ऐसे जिनकी कोई काट नहीं। 
 
जितनी मन्नतें और पूजा पाठ टिकट पाने के लिए कीं गई उससे कई गुना मतदान के बाद विधायक बनने के लिए की जा चुकी हैं। ज्योतिषियों ने भी जमकर चांदी कूटी। ऐसे धंधेबाजों की भी चल निकली जो अपने को भगवान के कुछ ज्यादा ही निकट मानते हैं। कौन सी मन्नत किस धाम, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में शर्तिया पूरी होती है, उसका जीवंत चित्रण कर उन दरबारों में नेताजी का मत्या टिकवाने का अभियान पूरा हो चुका है। मित्र मंडली जीत के बाद के जश्न की पूरी प्लानिंग कर चुकी है। जीत की खुशी को कब, कहां, किसके साथ और कैसे बांटना है, सारा खाका दिमाग में तय हो चुका है। बारात सज चुकी है। बाराती तय हो गए हैं। बैंड-बाजा भी तय हो चुका है। अंतर सिर्फ इतना है कि बारात में सब कुछ तय होने के बाद बता भी दिया जाता है परंतु यहां सब कुछ गोपनीय है। 
 
हनुमानों और विभीषणों की पहचान अच्छे से की जा चुकी है। शनिवार की रात उन सभी सिपहसालारों की हाजिरी लगाई गई जिन्हें मतगणना में रहना है। कौन किस टेबल पर रहेगा यह एक बार फिर पुख्ता किया गया। मतगणना के दौरान क्या ध्यान रखना है। अगर किसी तरह का शक-सुबहा हो तो कैसे एतराज करना है। मौखिक एतराज ना मानें तो लिखित में क्या देना है? ऐसी विपदा में कौन सेनापति मदद के लिए कहां मौजूद रहेगा जिससे तत्काल संपर्क करना है, सब कुछ अच्छे से समझा दिया गया है। सभी को सुबह कितने बजे कहां इकट्ठा होना है। किसे कौन लेकर आएगा। किस गाड़ी में कौन-कौन जाएगा। इसक हिदायतें दी चुकी हैं। सुबह सात बजे तक सभी को मतगणना स्थल पहुंच जाना है इसकी सख्त हिदायतों के बाद ‘रात्रिभोज’ और ‘ऑल द बेस्ट’ के साथ सभी ने रवानगी ली है। खासमखास सिपहसालारों को प्रत्याशियों ने रोक लिया। उनसे देर रात तक एक बार फिर सारी आशंकाएं दूर कर ली गई। ‘आप चिंता ना करें’, ‘मैं हूं ना’ के भरोसे के बाद, ‘ध्यान रखना, कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए’, ‘अब आपकी जिम्मेदारी है’ जैसे डॉयलॉग प्रत्याशी के मुंह से एक बार फिर निकले और सभी ने गुडनाइट के साथ विदा ली। प्रत्याशियों के मन में रह-रहकर आशंकाएं उभरती रही, अगर नहीं जीते तो, अगले ही पल आशंका झटक दी जाती रही। अच्छा-अच्छा बोलो, अच्छा-अच्छा सोचा, उपर वाला सब सही करेगा। 
 
इधर प्रशासन भी देर रात तक इंतजामात को अंजाम तक पहुंचाने में जुटा रहा। जैसे अब तक सब ठीकठाक निबटा, कल का दिन भी निबट जाए। रिजल्ट आ जाए और उसके बाद सब कुछ शान्ति से निबट जाए तो गंगा जी नहाएं। 
 
                       लेखक राजेंद्र हाड़ा वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीति एवं मीडिया विश्लेषक हैं. इनसे सम्पर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

अतीक जैसों को उम्मीदवार बनाकर सपा भाजपा का रास्ता आसान कर रही है

Anand Pradhan : समाजवादी पार्टी में अतीक अहमद की वापसी और लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया जाना बताता है कि सपा उत्तर प्रदेश की जनता के जनादेश का अनादर करने पर तुल गयी है। वह देश के बदले हुए मूड को समझने में भी नाकाम हो गयी है। कहाँ है, अखिलेश यादव जिन्होंने विधानसभा चुनावों से पहले डीपी यादव को पार्टी में आने से रोक दिया था? दूसरे, अतीक अहमद जैसों को उम्मीदवार बनाकर सपा भाजपा का रास्ता आसान कर रही है क्योंकि अतीक जैसे उम्मीदवारों को सामने करके भाजपा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करेगी।
 
आनंद प्रधान के फेसबुक वाल से

मुझे संतुष्टि है कि अच्छे लोगों ने मेरी सच्चाई को झुकने नहीं दिया : अमृता सोलंकी

Amrita Solanki : मैने आज तक बहुत से अधिकारियों को सेल्यूट किया पर आज मै अपने पूरे मन से पूरे सम्मान से सेल्यूट करती हूं मेरे मलावर थाने के उन सभी आरक्षकों का जिन्होंने बिना किसी भय के बिना किसी दबाव के मेरे सच में साथ देते हुए बयान दिए!
 
मै उस वाहन चालक भोला प्रसाद का भी धन्यवाद करती हूं जिसे अपनी रोजी रोटी के लिए ६ दिस को फिर गाड़ी चलानी थी चुनाव पर्यवेक्षक की पर उसने इस बात की चिंता नहीं की और बिना भय के बयान दिए! इस पुरे घटनाक्रम के साक्षी ही थे जिन्होंने सब के सामने मेरे स्वाभिमान को बनाये रखा! अब निर्णय कुछ हो मुझे इस बात की संतुष्टि है की अच्छे लोगों ने मेरी सच्चाई को झुकने नहीं दिया……
 
        एक अधिकारी के दुर्व्यवहार से नाराज होकर इस्तीफा देने वाली महिला इंस्पेक्टर अमृता सोलंकी के फेसबुक वॉल से


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चुनाव आयोग के बदतमीज अधिकारी से नाराज महिला इंस्पेक्टर ने दिया इस्तीफा

दुष्कर्म मामला और जजों की दुविधा

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली के बचाव में कैसे-कैसे लोग क्या-क्या बोल रहे हैं? खुद गांगुली कह रहे हैं कि उनकी तुलना तेजपाल से न की जाए। क्यों न की जाए? क्या इसलिए कि तेजपाल पत्रकार है और आप न्यायाधीश हैं? क्या पत्रकार की कोई इज्जत नहीं होती? क्या मान-हानि सिर्फ जजों की ही होती है? अत्याचार या अपराध कोई भी करे, खबर सभी की ली जानी चाहिए। और जो अपने आपको औरों से ज्यादा महत्वपूर्ण समझें, उसकी खबर तो और भी ज्यादा ली जानी चाहिए। भारतीय न्यायशास्त्रों में इसका जोरदार समर्थन हुआ है। यदि महामात्य और उसका भृत्य एक ही तरह का अपराध करें तो महामात्य की सजा उससे कई गुना कठोर होती है।
 
 
गांगुली के मामले में आरोप लगानेवाली विधि-प्रशिक्षु, कन्या को जांच करने वाले तीनों जजों के रवैए ने परेशान और शर्मिंदा किया ही था, अब पूर्व प्रधान न्यायाधीश और महान्यायवादी ने भी ऐसे बयान दे डाले हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से गांगुली का पक्ष लेते हैं। दोनों की राय है कि ऐसे आरोप तो लगते ही रहते हैं। आरोपों का क्या? कोई भी कुछ भी आरोप लगा सकता है।
 
गांगुली आजकल जिस पद पर हैं (बंगाल के मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष), उससे वे इस्तीफा क्यों दें? यानि वे उसकी जांच-रिपोर्ट आने तक अपने पद पर टिके रहें। इन सज्जनों ने यह भी पूछा है कि रिपोर्ट में अगर गांगुली सही-सलामत निकल आते हैं तो फिर उनका क्या होगा? इसमें शक नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के जज और मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष के नाते गांगुली ने अनेक ऐतिहासिक फैसले किए हैं और उनकी दक्षता की छाप उनके सहयोगियों पर अब भी बनी हुई है लेकिन उन पर लगे दुष्कर्म के आरोपों का खंडन उन्होंने जिस दबी जुबान से किया है, उसी ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। 
 
यदि गांगुली या किसी पर भी कोई चरित्र-हनन का इतना गंभीर आरोप निराधार ही लगा दे तो उसकी प्रतिक्रिया कितनी भयंकर हो सकती है, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। चरित्र-हनन तो शरीर-हनन यानि हत्या से भी अधिक जघन्य-कर्म है। यदि यह आरोप निराधार था तो जस्टिस गांगुली ने उस लड़की को कठोर सजा देने की बात इशारे से भी क्यों नहीं कही? वास्तव में कोई उच्च पदस्थ जज ऐसे मामले में उलझ जाए, यह तथ्य सारे जजों को व्यथित करने वाला है। इसीलिए जांच करने वाले जजों ने अपनी जांच में भी जरा सख्ती दिखाई होगी। इसी सख्ती से वह लड़की परेशान हो गई होगी। अब उनके सामने यह दुविधा भी होगी कि उस जांच के नतीजों को सार्वजनिक कैसे करें? यदि गांगुली का दोष पाया गया तो सभी के लिए पसोपेश होगा और यदि गांगुली निर्दोष होंगे तो उस प्रशिक्षु कन्या को सजा दी जाए या नहीं? यदि दी जाए तो क्या दी जाए?
 
लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

आगरा कल्पतरु में एक साथ कई इस्तीफे

आगरा कल्पतरु एक्स्प्रेस से खबर है कि संस्थान से छह पत्रकारों ने इस्तीफे दे दिए गए हैं. जिसमें तरुण, शोएब, धर्मेन्द्र पाराशर व सिटी इंचार्ज दिनेश भदोरिया शामिल हैं. इन लोगों ने प्रधान संपादक को पत्र लिखकर इस्तीफा सौंपा है. अभी इनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है और ये लोग काम पर आ रहे हैं. चर्चा ये भी है कि इस्तीफा प्रबंधन पर दबाव बनाने के लिए दिया गया है.
 
भड़ास तक कोई भी सूचना भेजने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

गुवाहाटी की महिला पत्रकार ने लगाए तेजपाल और शोमा पर आरोप

तहलका की महिला पत्रकार के द्वारा तेजपाल पर यौन शोषण के आरोप लगने के बाद अब तहलका की एक पूर्व पत्रकार ने शोमा चौधरी और तेजपाल पर उसकी शिकायत पर कार्रवाई ना करने का आरोप लगाया है. पीड़िता उद्दीपना गोस्वामी तहलका से 2000 से जुड़ी थी और अब स्वतंत्र पत्रकार हैं.
 
गोस्वामी ने तहलका के गुवाहाटी संवाददाता रतनदीप चौधरी पर आरोप लगाया है कि चौधरी ने उनके पूर्व पति सुमन चक्रबर्ती और तहलका के एक सहकर्मी के साथ मिलकर उनके और उनके भाई के साथ मार पीट की. उन्होंने आरोप लगाया कि चौधरी पिछले कई दिनों से उन्हें परेशान कर रहे थे. 3 मई को वे उनके बेटे के जन्मदिन पर चक्रबर्ती के साथ घर में घुस आए. घर में घुसते ही उन्होंने उन्हें गालियां देनी शुरू कर दी और उनके बेटे को उठा ले जाने की धमकी देने लगे. उनके द्वारा मना किए जाने पर चौधरी ने उन्हें तथा उनके भाई के साथ मारपीट शुरू कर दी जिसका उन्होंने वीडियो भी बना लिया था.
 
गोस्वामी ने इसकी शिकायत शोमा चौधरी और तरुण तेजपाल से करते हुए रतनदीप पर कार्रवाई करने की मांग की थी लेकिन तहलका ने कोई भी एक्शन आरोपी के खिलाफ नहीं लिया और ना ही उन्हें कोई जानकारी दी. गोस्वामी ने बताया कि उन्होंने कई बार इस बारे में सम्पर्क करने की कोशिश की लेकिन शोमा और तेजपाल के द्वारा उन्हें कोई जवाब नहीं दिया गया.

पुष्कर और अजमेर शरीफ में जल स्वच्छता अभियान चलाएंगे : जलजोगिनी

नई दिल्ली : आस्था केंद्रों के सरोवरों की स्वच्छता का अभियान छेड़ने वाली स्वंयसेवी संस्था जलजोगिनी अब राजस्थान के पुष्कर और अजमेर शरीफ में जल स्वच्छता के लिए अभियान चलाएगी। जलजोगिनी के कामकाज के दायरे में दिल्ली और एनसीआर को प्रमुखता से शामिल किया जाएगा। जलजोगिनी के कामकाज का लेखाजोखा पेश करने और भावी दिशानिर्देश तय करने के लिए आयोजित सेमिनार में यह जानकारी जलजोगिनी के संस्थापक सचिव आलोक कुमार ने यह जानकारी दी। जलजोगिनी झारखंड के देवघर में शिवगंगा की स्वच्छता के लिए प्रभावी अभियान छेड़ चुकी है।
 
सेमिनार की शुरूआत अस्मिता थियेटर ग्रुप के नुक्कड नाटक से हुई। जिसमें पानी के प्रति संवेदनशीलता की जरूरत को विचारोत्तेक तरीके से पेश किया गया। मुख्य वक्ता के तौर पर इंडिया टुडे के प्रबंध संपादक दिलीप मंडल ने कहा कि अगर अगला विश्वयुद्ध जल को लेकर होने की बात सही है, तो उससे बचने का एकमात्र विकल्प सामुदायिक प्रयास से जल की स्वच्छता बचाने का प्रयास करना जरूरी है। यह काम जलजोगिनी जैसी संस्था की जागरुकता मुहिम से संभव होता नजर आ रहा है। उन्होंने जल का बाजारीकरण करने के बजाए समाजीकरण की जरूरत जताई।
 
राज्यसभा टीवी के अरविंद कुमार सिंह ने अपने विशद पत्रकारीय अनुभव के हवाले से बताया कि ग्रामीणों के बीच जल की अहमियत शहरी आबादी से ज्यादा है। उन्होंने राजस्थान की महिलाओं में पति से ज्यादा गगरी को सम्हालकर रखने की उक्तियों का हवाला दिया। उन्होंने नदियों की बर्बादी के लिए अदूरदर्शी सरकारी नीतियों को कसूरवार ठहराया। साथ ही पानी की स्वच्छता की गंभीर समस्या से निपटने के लिए जलजोगिनी की तरह और अन्य लोगों से भी आगे आने की जरूरत जाहिर की।
 
केंद्रीय जल आयोग के मुख्य अभियंता आरके जैन ने राष्ट्रीय जल नीति के हवाले से बताया कि जल संरक्षण के प्रति सरकार गंभीर है। संरक्षण के प्रति जागरूकता अभियान को प्रभावी तरीके से जोड़ने की जरूरत है। केंद्रीय जल आयोग के नीति निर्धारकों में शामिल निदेशक आशीष बनर्जी ने बताया कि जलजोगिनी का काम सरकार के कई कार्यक्रमों के सांचे में फिट बैठता है। जलजोगिनी को चाहिए कि अपने अभियान को मूर्तरुप देने में वह सरकार का सहयोग ले। उन्होंने बताया कि जल राज्य का विषय है इसलिए राज्य सरकार से संपर्क करना चाहिए।
गंगा-यमुना को प्रदूषण से बचाने के लिए नुक्कड़ नाटकों के जरिए अलख जगा रहे 'परिधि आर्ट ग्रुप' के अध्यक्ष निर्मल वैद्य ने बताया कि उनका जागरुकता अभियान ढाई लाख परिवारों को प्रभावित कर चुका है। उन्होंने विश्व