कानपुर में सरकारी गुंडा बनी पुलिस, डाक्‍टरों के बाद मीडियाकर्मियों पर तोड़ी लाठियां

: कई प्रेस फोटोग्राफरों को आई गंभीर चोट : कई डाक्‍टर भी घायल : कानपुर में एक छोटी सी घटना ने विकराल रूप धर लिया. पहले सत्‍ता के मद में चूर सपा विधायक के लोगों ने जूनियर डाक्‍टरों से मारपीट किया. इसके बाद विधायक की सहयोगी बनकर पुलिस ने सारी हदें पार करते हुए जूनियर व सीनियर डाक्‍टरों के अलावा मीडियाकर्मियों पर भी जमकर हमला बोला. एक दर्जन से ज्‍यादा प्रेस फोटोग्राफरों को गंभीर चोटें आई हैं. एसएसपी के आदेश के बाद कानपुर की पुलिस सरकारी गुंडा बन गई और जो भी मिला उसको लाठियों से जमकर पीटा.

बताया जा रहा है कि मेडिकल कालेज से जुड़े हैलेट अस्‍पताल के पास कुछ जूनियर डाक्‍टर दवा खरीदने गए थे. इसी बीच किसी बात को लेकर डाक्‍टरों की एक उम्रदराज व्‍यक्ति से विवाद हो गया. बात बढ़ने पर जूनियर डाक्‍टरों ने उक्‍त व्‍यक्ति को थप्‍पड़ मार दिया. वहीं पास में सपा विधायक इरफान सोलंकी अपने गनर के साथ खड़े थे. मामला सुलटाने की बजाय विधायक ने अपने गनर को आदेश दिया कि जूनियर डाक्‍टरों को उनकी औकात बताओ. गनर एक जूनियर डाक्‍टर को थप्‍पड़ रसीद कर दिया. इसके बाद जूनियर डाक्‍टर भी गुस्‍से में गनर को पीट दिया. गनर ने हवाई फायर कर दिया. इसके बाद जूनियर डाक्‍टर हास्‍टल में भाग गए.

बताया जा रहा है कि इसके बाद इरफान सोलंकी के समर्थक तथा कुछ पुलिसकर्मी हैलट अस्‍पताल पहुंचे तथा हवाई फायरिंग करने के साथ दूसरे जूनियर डाक्‍टरों को पीटना शुरू कर दिया. इसकी सूचना जब हास्‍टल के जूनियर डाक्‍टरों को मिली तो उन्‍होंने भी विधायक समर्थकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. दोनों तरफ से ईंट-पत्‍थर चले तथा जमकर हवाई फायरिंग हुई. इसके बाद एसएसपी यशस्‍वी यादव बड़ी भारी फोर्स के साथ हैलेट अस्‍पताल पहुंचे तथा जूनियर डाक्‍टरों पर लाठी चार्ज करा दिया. पुलिस ने हवाई फायरिंग भी की.

फायरिंग से घबराए जूनियर डाक्‍टर जब हास्‍टल में भागे तो भारी पुलिस बल वहां भी घुस गई. एसएसपी के खुले आदेश से मदमस्‍त पुलिस जूनियर व सीनियर सभी डाक्‍टरों को गिरा गिराकर मारने लगी. यहां तक कि हास्‍टल में पड़े सामानों को भी पुलिस ने तहस नहस कर दिया. जो भी मिला पुलिस ने बिना किसी कारण के उसे पीटना शुरू कर दिया. इस घटना की जानकारी जब मीडियाकर्मियों को मिली तो तमाम अखबारों के फोटोग्राफर मौके पर पहुंचे तथा फोटो पुलिस की गुंडागर्दी की फोटो खिंचने लगे.

बताया जा रहा है कि फोटोग्राफरों को फोटो खिंचते देख एसएसपी बौखला गया. उसने पुलिस वालों को इन पर भी हमला करने का इशारा कर दिया. अपने आका का इशार मिलते ही पुलिसवाले कुत्‍तों की तरह फोटोग्राफरों पर टूट पड़े. लाठी चार्ज में आई नेक्‍स्‍ट के अभिनव, दैनिक जागरण के आशु अरोड़ा, अमर उजाला के धीरेंद्र जायसवाल, ओपी वाधवानी, संजीव शर्मा, हिंदुस्‍तान के गजेंद्र सिंह, वैभव शुक्‍ला समेत कई अखबारों के एक दर्जन से ज्‍यादा फोटो जर्नलिस्‍ट गंभीर रूप से घायल हो गए. किसी के हाथ पैर में चोट आई तो किसी का सिर फट गया. कई मीडियाकर्मियों को फ्रैक्‍चर भी हुआ है.

सत्‍ता के मद में चूर विधायक के समर्थन में सरकारी गुंडा बनी पुलिस की इस कार्रवाई से कानपुर की मीडिया में जबर्दस्‍त रोष है. पत्रकारों ने पुलिस की इस एकतरफा कार्रवाई की निंदा करते हुए एसएसपी तथा दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ दंडात्‍मक कार्रवाई करने की मांग की है. बताया जा रहा है कि कानपुर के मीडियाकर्मी तथा डाक्‍टर संघर्ष का रास्‍ता अपनाने की तैयारी कर रहे हैं. अब देखना है कि प्रशासन पूरे मामले का निष्‍पक्ष जांच कराकर दोषियों को सजा दिलाता है या फिर एकतरफा कार्रवाई करते हुए डाक्‍टरों तथा मीडियाकर्मियों को ही प्रताडि़त करता है.

दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को फांसी पर लटकने में सौ फीसदी आरक्षण मिलता है

अब तक का ऐतिहासिक सत्य ये है कि इस देश में आजादी के बाद जितने लोगों को फंसी की सजा दी गई है उनमें कुछेक मामलों को हटा दें तो अधिकतर फांसी की सजा पाने वालों में दलित, पिछड़े, जनजाति और अल्पसंख्यक समाज के लोग ही शामिल रहे हैं। खासकर बिहार जैसे राज्य के जेलों में बंद फांसी की सजा पाने वाले लोगों की सूची को गौर से देखें तो कहा जा सकता है कि फांसी की सजा समाज के गरीब और दलितों के लिए ही मुकर्रर की दी गई है। लगता है इन वर्गों के लिए फांसी में 100 फीसदी का आरक्षण है। हम इस मसले पर विस्तार से चर्चा करेंगे लेकिन इससे पहले देश की राजनीति पर एक नजर।

समाज बांटों और राजनीति करो। अब तक देश में ऐसा ही होता आ रहा है। जाति को उभारो और वोट बनाओ। आरक्षण की राजनीति करो और चुनाव में कूद पड़ो। कुछ न कुछ तो मिलेगा ही। इस बार नहीं मिला तो आगे मिलेगा। देश में राजनीति करने की यह एक बड़ा अस्त्र होते जा रहा है। 90 के बाद आरक्षण की राजनीति आगे बढ़ी तो कई राज्यों में क्षत्रपों का जन्म हुआ। उनकी राजनीति भी चल निकली। चुनाव फिर सामने है और आरक्षण की राजनीति फिर कुंलाचे मार रही है। कोई महिला आरक्षण को लेकर हंगामा करने की तैयारी कर रहा है तो कोई मुसलमानों को सच्चर कमेटी के अनुसार आरक्षण देने की तैयारी में जुटा हुआ है। कोई सवर्णों को रिझाने के लिए सवर्ण आयोग  बना रहा है तो कोई जाटों के आरक्षण से लेकर तमाम क्षेत्रों में आरक्षण देने के मसले पर राजनीतिक तैयारी कर रहा है।

अब आर्थिक मसले पर आरक्षण देने की बात भी सामने आ गई है। चुनाव सामने है और वोट के लिए चाहे देश भाड़ में ही क्यों न चला जाए आरक्षण जरूरी है। लेकिन हम यहां एक ऐसी अनहोनी आरक्षण की बात कर रहे हैं जहां सौ फीसदी आरक्षण पहले से ही जारी है और इस आरक्षण को लेकर किसी के मन में कोई टीस नहीं है। चूकि मामला वोट का नहीं है इसलिए जानते हुए भी इस आरक्षण के तरफ से हमारे नीति निर्माताओं ने अपनी आंखें फेर रखी हैं। यह आरक्षण है फांसी का। आपको बता दें कि देश के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद अब तक जितने लोगों को फांसी की सजा दी गई है उनमें  कुछ मामलों को छोड़कर अधिकतर फांसी की सजा दलितों, पिछड़ी जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों को ही दी गई है। देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी इस आरक्षण को बांटने की कोशिश नहीं की है। चूंकि यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इस मसले पर बोलने को तैयार नहीं हैं। लेकिन जनता की आवाज को बुलंद करने वाले भला कैसे चुप रह सकते हैं? मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रभात कुमार शांडिल्य गोबर्धन पर्वत की तरह इस सामाजिक मुद्दे को अकेले अपने सिर पर लेकर देशब्यापी अलख जगाने में लगे हुए हैं।
 
भारतीय कानून प्रक्रिया में हत्यारों और जघन्य अपराध करने वालों के लिए फांसी की सजा मुकर्रर की गई है। अंग्रेजों का बनाया यह कानून आज भी हमारे देश में जारी है। यह बात ओर है कि अंग्रेजों के ज़माने में सभी भारतीय एक ही तराजू पर तौले जाते थे। इतना जरूर था कि अंग्रेजों के जमाने में अभियुक्तों को संदेह का लाभ देकर मामले से बरी कर देने, रिहा कर देने या कम अथवा हल्की सजा देने जैसी बेइमानी की जाती थी और गुलाम भारतीयों की मजबूरी थी कि वे इस प्रकार के नाइंसाफी के खिलाफ किसी तरह की आवाज नहीं उठा पाते थे। किंतु आजादी के बाद स्थिति बदल गई। जिस प्रकार का नाजायज लाभ अंग्रेजों को मिला करता था, अब उस पर सवर्णों का एकाधिकार हो गया है। यह बात इसलिए कही जा रही है कि आजादी के बाद बिहार समेत पूरे देश में फांसी की सजा पाने वालों दो चार मामलों को छोड़ दिया जाए तो  जो तस्वीर सामने आती है आंखें खोलने वाली है। बिहार की जेलों में 2 साल पहले तक 69 ऐसे कैदी बंद थे जिन्हें विभिन्न अदालतों ने फांसी की सजा दे रखी है। फांसी की सजा पाए ये सभी लोग दलित, पिछड़ी, जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। लेकिन पहले हम आपको ले चलते हैं भागलपुर केंद्रीय जेल जहां फांसी की सजा पाए 36 लोग मौत का इंतजार कर रहे हैं। इनके बारे में आगे हम चर्चा करेंगे और कानून की राय भी जानेंगे लेकिन सबसे पहले इनकी सूची पर एक नजर-

नाम                         जाति                   रहनेवाले
हरिबल्लभ सिह        यादव                   मधेपुरा
भूमि मंडल                यादव                    मधेपुरा
विनोद मंडल             यादव                    मधेपुरा
चंद्रदेव मंडल             यादव                    मधेपुरा
अर्जुन भुनी               पिछड़ी जाति         मधेपुरा
दुखो शर्मा                 हजाम                    मधेपुरा
जगवीण सहनी         मलाह                  मधेपुरा
शिवेश मंडल            यादव                    मधेपुरा
वैद्नाथ शमा्र           हजाम                  मधेपुरा
बिंदेश्वरी मंडल         यादव                   मधेपुरा
उपेंद्र मंडल               यादव                    मधेपुरा
जालिम मंडल           यादव                   मधेपुरा
फूनो शाह                  मुसलमान            समस्तीपुर
मो0 एहसान शाह      मुसलमान            समस्तीपुर
रामसमुन तहतो       पिछडी जाति          समस्तीपुर
सिधेसर राय            यादव                     समस्तीपुर
विनोद प्रसाद           पिछडी जाति           समस्तीपुर
मिथिलेश ठाकुर       हजाम                   समस्तीपुर
मनोज राय              यादव                    समस्तीपुर
रघुनाथ सहनी          मल्लाह                समस्तीपुर
अशोक कुमार गुप्ता   बनिया                 समस्तीपुर
प्रभात कुमार रय       यादव                   समस्तीपुर
महेंद्र यादव               यादव                   भागलपुर
दुर्गा मंडल                पिछडी जाति         भागलपुर
शमशूल                   मुसलमान            भागलपुर
मनोज सिंह              पिछडी जाति         गया

बीर कुंर पासवान       दुसाध                  गया
कृष्णा मोची              चमार                  गया
नंदलाल मोची           चमार                  गया
धमेंद्र सिंह                दुसाध                  गया
शोभित चमार           चमार                 रोहतास
करे सिंह                                             बेगुसराय
नरेश यादव               यादव                 गोड्डा
मोे0 गयासुदीन      मुसलमान          भोजपुर
नौशाद आलम          मुसलमान          अररिया
 
भागलपुर
जेल में बंदी बना कर रखे गए ये सभी फांसी की सजा पाए लोग गरीब और भूमिहीन है। ये देश के आयकर दाताओं में शामिल नहीं है। इनके घर की हालत आप देखें तो इनके पास न खाने को अनाज है और न ही पीन को पानी। तन ढकने के लिए कपड़े की व्यवस्था भी इनके घर वाले नहीं कर पाते। न इनके पास राशन कार्ड है और न ही किसी पार्टी के लोगों को चंदा देने की स्थिति में हैं। इनमें से कइयों के नाम न तो मतदाता सूची में है न ही कइयों ने कभी मतदान किया है। इनमें केवल पांच वीर कुंवर पासवान, कृष्णा मोची, नंदलाल मोची, धमेंग्र सिंह और शोभित चमार की फांसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखा है। इनमें से कइयों ने दया याचिका के लिए राष्ट्पति से भी फरियाद कर रखी है, लेकिन पिछले दिनों एक चैंकाने वाली खबरें भी सामने आई। बिहार में फांसी की सजा पाए जिन लोगों ने दया याचिका की गुहार लगाई है उनके बारे में न तो राज्य सरकार को कोई जानकारी है और न ही केंद्र सरकार को। पहले चार कैदियों को गया टाडा कोर्ट ने तथा पांचवें अभियुक्त को रोहतास जिले की अदालत ने फांसी की सजा दी है। अन्य 31 के मामले उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में पुष्टि के लिए लंबित है। फांसी की सजा पाए कुल 69 कैदियों में से 67 ऐसे हैं जो अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़ी जातियों से आते हैं या धार्मिक, भाषाई या क्षेत्रीय अल्पसंख्यक की श्रेणी से आते हैं। फांसी की सजा पाए ये वे लोग जिनका मुकदमा लड़ने के लिए पैसे के अभाव में सही वकील नहीं मिल सके। लगता है कि फांसी की सजा में इन समुदायों को शत प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है। भले ही यह आरक्षण अघोषित और अलिखित हो तथा कतिपय पूर्वाग्रहों एवं परम्पराओं से प्रेरित हों। और हां देश के दूसरे राज्यों की स्थिति कोई अलग हो यह बात भी नहीं है।

आगे बढ़ें, उससे पहले आपको बता दें कि आजाद भारत में 58 से ज्यादा लोगों को अबतक फांसी पर लटकाया गया है। सबसे ताजा घटना अफजल गुरू को फांसी की है। इससे पहले 14 अगस्त 2204 को पश्चिम बंगाल की अलीपुर सेंट्ल जेल में हत्या और बलात्कार के आरोपी धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी। इसके बाद अभी तक किसी को फांसी की सजा नहीं मिली है। इसके पहले बंगाल में ही 1993 में कार्तिक शील सुकुमार बर्मन को हत्या के मामले में फांसी दी गई थी ।बिहार में 1995 में सुरेशचंद्र नामक ब्यक्ति को फांसी दी गई थी। इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह और केहर सिंह को 6 जनवरी 1989 को फांसी दी गई थी। दिल्ली में संजय चोपड़ा और गीता चोपड़ा भाई बहन के हत्यारे रंगा और बिल्ला को सूली पर चढ़ाया गया था। 1983 में पंजाब में मच्छी सिंह, कश्मीर सिंह और जागीर सिंह को हत्या के मामले में फांसी दी गई थी। असम में अनिल फूकन को फांसी मिली थी। दक्षिण भारत के सिरियल किलर शंकर पिल्लई को फांसी दी गई थी। आंध्रा में किष्टा गौड़ और भूमैय्या नक्सली को फांसी मिली थी। दोनेा आदिवासी थे। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे तथा नारायण दत्तात्रेय आप्टे को 15 नवंबर 1949 को पंजाब के अंबाला जेल में फांसी दी गई। ये दोनों आदिवासी, अछूत और अल्पसंख्यक नहीं थे। आप इसे अपवाद कह सकते हैं। इसी श्रेणी में धनंजय चटर्जी के मामले को आप रख सकते हैं।

अब जरा नए मुकदमों पर नजर डालें। राजीव गांधी के हत्यारे जेल में हैं। अभी हाल में ही इन आपराधियों की मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास में बदल दिया है। इस आजीवन कारावास की सजा को अब तमिलनाडू की जयललिता सरकार रिहाई में बदलने की तैयारी में है। यह बात और है कि अभी सुप्रीम कोर्ट ने राजीव गांधी के हत्यारे की रिहाई पर रोक लगा दी है लेकिन यह भी कि यह रोक कब तक बरकरार रहती है, इस पर आगे की राजनीति टिकी हुई है। असम का दास मामला और भुल्लर का मसला भी निपट गया है। दोनों को उम्र कैद की सजा हो गई है। ये तमाम मामले राजनीति से प्रेरित हैं। मामला इतना ही नहीं है। कुछ मामले तो ऐसे हैं जिनमें जुर्म एक है और सजा अलग-अलग। बिहार के जेलों में बंद उम्रकैदियों और फांसी की सजा पाए लोगों का अध्ययन करें तो आपको यकीन हो जाएगा कि गरीबों के साथ क्या होता है? उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत की फांसी के फैसले को सही ठहराया था। निचली अदालत ने हत्या के जुर्म में जीता सिंह, कश्मीरा सिंह और हरबंश सिंह को फांसी की सजा दी थी। महामहिम से भी क्षमादान नहीं मिला। फांसी की तिथि, स्थान और समय निश्चित हो गया। निर्धरित समय पर केवल जीता सिंह को फांसी पर लटकाया गया। शेष दो अभियुक्तों को किसी कारण से उस समय फांसी नही दी गई। दोनों अभियुक्तों ने एक बार फिर पनुर्विचार याचिका दायर की। कश्मीरा सिंह की फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया और हरबंश सिंह को क्षमा देकर मुक्त कर दिया गया। दोष एक  किन्तु सजा के क्रियान्वयन में तीन तरह का व्यवहार । यह पर्याप्त आधार बनता है कि न्याय की तराजू में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। इसी मसले पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके पीएन भगवती ने कहा था कि ‘दिस इज़ ए क्लासिक केस, व्हिच इलेस्ट्रेट्स दि जुडिशियल वैगरीज़ इन द इंपोजिशन आफ डेथ पेनाल्टी।' अर्थात मृत्युदंड दिए जाने के मामले में कानूनी अहं को प्रदर्शित करने का यह शास्त्रीय उदाहरण है।
 
देश में मृत्युदंड के विरोध में अब आवाजें उठने लगी है। 2005 में अपना पद भर ग्रहण के पहले ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाईके सब्बरवाल ने मृत्युदंड को भारतीय दंड संहिता से हटाने की बात कही थी। इसे उन्होने सामाजिक और राजनैतिक मामला बताते हुए कहा था कि इसके लिए भारतीय संसद ही सक्षम है और उसे यह तय करना होगा कि मृत्युदंड के प्रावधान को भारतीय दंड संहिता में रखा जाए या उसे हटाया जाए। वरिष्ठ वकील एस नारीमन का मानना है कि मृत्युदंड को समाप्त किया जाना चाहिए। इस पर ज्यादा राजनीति करने की जरूरत नहीं है। लेकिन सबसे बड़ी बात पूर्व राष्ट्पति कलाम की है। कलाम ने गरीब, असहाय और बूढे लोगों की फांसी सजा को कम करने की बात सरकार से कही थी। यह कोई मामूली बात नही है। और इसका श्रेय भी प्रभात शांडिल्य को ही दिया जा सकता है।

देश की संसद को अब यह तय करना है कि जो संसद देश के गरीबों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को लेकर आए दिन कानून बना रही है और उनकी हिफाजत के लिए योजना पर योजन बना रही है उनकी 100 फीसदी फांसी की सजा पर गंभीरता से सोंचे। हालाकि यह आसान काम नही है लेकिन इस पर पहल तो की ही जा सकती है। और जिन दलितों और पिछड़ों आदिवासियों को फांसी के नाम पर सजा मिली हुई है उस मामले को गंभीरता से परखने की भी जरूरत है। मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रभात शांडिल्य कहते हैं कि ‘अब समय आ गया है कि देश से फांसी की सजा समाप्त हो जाएगी। जिस तरह से फासीं की सजा के विरोध में लोग जागरूक हो रहे है। ऐसे में अब इस तरह की सजा पर रोक लग जाएगी और लगनी भी चाहिए। राजीव के हत्यारे की सजा पर जिस तरह की राजनीति शुरू हुई है इसके पीछे राजनीति चाहे जिस तरह की हो लेकिन इतना तय है कि फासीं की सजा की कहानी ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी।’ कवि दुष्यंत ने ठीक ही कहा था कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो। देश का कानून अब इस मसले पर आगे क्या कुछ करता है उसे देखना होगा लेकिन अगर धीरे-धीरे फांसी की सजा पर रोक लग जाती है तो गरीबों का बड़ा कल्याण होगा।

 

लेखक अखिलेश अखिल से संपर्क उनके ईमेल mukheeya@gmail.com पर किया जा सकता है। उनका ब्लॉग पता है http://mukheeya.blogspot.in/2014/02/blog-post_6673.html

दैनिक नवज्योति के मुख्य फोटोग्राफर राजीव संगर का निधन

जयपुर से खबर है कि दैनिक नवज्योति के मुख्य फोटोग्राफर राजीव संगर का गुरुवार रात साढे 10 बजे निधन हो गया. वे बीमार चल रहे थे. उनके निधन पर मीडियाकर्मियों ने उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थन की और परिवारजनों को दुख सहन करने की असीम शक्ति देने का अनुरोध ईश्वर से किया.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

सहारा का संकट और मीडिया की नैतिकता… अखबार व चैनल क्यों कर रहे पूरे मामले को अंडरप्ले?

सुब्रत राय मीडिया की बोलती बंद करने का फंडा खूब जानते हैं. वे बड़े-बड़े अखबारों को बड़े-बड़े विज्ञापन देकर उनकी आर्थिक भलाई करते हैं तो बड़े-बड़े अखबार भी सुब्रत राय व सहारा के बड़े-बड़े मुद्दों-संकटों को छोटा-मोटा मान कर इसे अंडरप्ले करते रहते हैं. न्यूज चैनल वाले भी सहारा के खरबों के साम्राज्य के आगे सलामी बजाने की मुद्रा में रहते हैं क्योंकि सहारा के मैनेजर सबको बढिया ढंग से साधते रहने के लिए कुख्यात हैं.

जनता का पैसा, सहारा की धंधेबाजी, सेबी की सख्ती, सुप्रीम कोर्ट का न्याय और सुब्रत राय की गिरफ्तारी… ये सब मिलाकर इतना बड़ा मामला बनता है कि इस पर गंभीर और बड़ी बहस होनी चाहिए. लेकिन न्यूज चैनल वाले चुप्पी साधे हुए हैं. अल्ल बल्ल सल्ल टाइप की बातें दूसरे मुद्दों पर हो रही है लेकिन सहारा और सुब्रत राय का प्रकरण हाशिए पर है. केवल टाइम्स नाऊ पर अरनब गोस्वामी सहारा के फ्राड और सुब्रत राय की गिरफ्तारी के मामले को लेकर लाइव डिबेट करा रहे हैं.

बताया जाता है कि इस मसले पर सूचनात्मक खबरें एबीपी न्यूज, न्यूज24, इंडिया टीवी, सीएनएन-आईबीएन और पी7न्यूज पर चली लेकिन सहारा को लेकर बड़ी डिबेट किसी अन्य न्यूज चैनल पर नहीं हुई. माना जा रहा है कि अखबार वाले भी इस मुद्दे को अंडरप्ले करेंगे क्योंकि सहारा की तरफ से लगातार बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों में छपवाए जा रहे हैं और अखबारों के मालिकों-संपादकों-मैनेजरों को तरह-तरह से मैनेज किया जा रहा है. कार्पोरेट की गुलामी खुशी-खुशी करने वाले मीडिया हाउसेज ऐसे जनहित के मुद्दों पर क्यों चुप्पी साध जाते हैं, इसके कारणों को हर कोई समझदार आदमी समझ सकता है. दुर्भाग्य है कि जनता के पैसे को लूटकर खरबों रुपये इकट्टा करने वाली फ्राड कंपनियां पैसे के बल पर शासन, प्रशासन के साथ-साथ मीडिया को भी मैनेज करने में कामयाब हो जाती हैं.

सोशल मीडिया और न्यू मीडिया के लोगों को चाहिए कि वे सहारा प्रकरण को लगातार फ्लैश करें ताकि आम जन जान सके कि अब सहारा में पैसा लगाना सुरक्षित निवेश नहीं है क्योंकि सुब्रत राय की गिरफ्तारी के बाद इस ग्रुप के भरभराकर गिरने की आशंका प्रबल हो उठी है. सहारा के पतन के बाद इसी माडल पर फल-फूल रहीं दूसरी चिटफंड कंपनियों के पतन की भी शुरुआत होगी.

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com या +91 9999330099 के जरिए किया जा सकता है.

मोदी नहीं हैं तुरूप का इक्का

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मुसलमानों से भाजपा से हुई जानी-अनजानी गलतियों के लिए सिर झुकाकर माफी मांगने की बात कहकर चुनावी बेला में माफी की राजनीति को आगे बढ़ाया है। पूर्व में सोनिया गांधी 84 के सिख विरोधी दंगों के लिए माफी मांग चुकी हैं, तो मुलायम सिंह यादव कल्याण सिंह को सपा में लाने की गलती के लिए मुसलमानों से क्षमा मांग चुके हैं।

मुलायम सिंह को मुसलमानों ने माफ भी कर दिया था। अब देखना यह है कि मुजफ्फरनगर दंगों के लिए वह कब माफी मांगेगे? बहरहाल, भाजपा को यह पता है भारत में मुसलिम एक सियासी ताकत हैं, जिन्हें नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि वह देश की ऐसी सौ सीटों की पहचान करती है, जहां मुसलिम 30 प्रतिशत या उससे अधिक हैं। यदि इन सौ सीटों पर भी मुसलिमों ने एकजुट होकर उसके खिलाफ वोट कर दिया, तो उसका ह्य272 प्लसह्ण मिशन तो धराशायी हो ही जाएगा, वह 200 के आसपास सीटें लाने से भी वंचित हो सकती है।

भाजपा की यही सबसे बड़ी चिंता है कि यदि नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए मुसलिम एकजुट हो गए तो क्या होगा? हमें याद रखना चाहिए कि देश में जब भी सत्ता परिवर्तन हुआ है, उसमें सभी वर्गों की भागीदारी रही है। आजादी के बाद 1977 और 1989 में गैर कांग्रेसवाद के नाम पर क्रमश: जनता पार्टी और जनता दल सत्ता में आए थे। यह जानते हुए भी कि जनसंघ, जो आज की भाजपा है, का जनता पार्टी में विलय हो गया था, तब भी मुसलमानों ने जनता पार्टी को वोट दिया था। इसी तरह 1989 में जनता दल को जिताने में दूसरे वर्गों के साथ मुसलमानों का भी अहम योगदान रहा था।

जनता दल ने भाजपा से बाहर से समर्थन लेकर सरकार बनाई, तब भी मुसलमानों को ऐतराज नहीं हुआ था। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के बहाने जिस तरह से भाजपा ने सांप्रदायिक एजेंडा चलाया था, वह अभूतपूर्व था। 1992 में बाबरी मसजिद के टूटने और देश के कई शहरों में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों के बाद मुसलमानों और भाजपा के बीच फासला बहुत अधिक हो गया। 2002 के गुजरात दंगों के बाद तो दूरियां इतनी ज्यादा बढ़ गर्इं कि उन्हें किसी तरह की माफी शायद ही खत्म कर सके।

राजनाथ सिंह मुसलमानों से यह क्यों कह रहे हैं कि यदि भाजपा से गलती हुई है, तो वह उनसे माफी मांग लेंगे? यह तो खुद भाजपा को देखना है कि उससे कब और कहां ऐसी चूकें हुई हैं, जिससे देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग उससे ऐसा छिटका कि किसी भी तरह उसके पास आने के लिए तैयार नहीं है।

1925 में वजूद में आए आरएसएस, फिर जनसंघ, आज की भारतीय जनता पार्टी और तमाम पूरे संघ परिवार की कवायद देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाकर हिंदुओं का वोट बैंक तैयार करने की रही है। लेकिन इस देश का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना इतना मजबूत है कि वह तमाम कोशिशों के बाद भी छीजा नहीं। यही वजह रही कि भाजपा 188 सीटों से कभी आगे नहीं बढ़ सकी। इससे पता चलता है कि उसकी नीतियों को मुसलिम ही नहीं, देश के अन्य वर्ग भी पसंद नहीं करते। ऐसा न होता, तो वह 90 के दशक में ही 272 प्लस का आंकड़ा छू चुकी होती।

नब्बे का दशक भाजपा का सुनहरा दौरा था, जो अब शायद ही कभी वापस आए। दरअसल, 1986 में बाबरी मसजिद का ताला खुलने से लेकर मुजफ्फरनगर दंगों तक संघ परिवार, भाजपा के पक्ष में हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश करता रहा है। अगर राजनाथ सिंह भाजपा की गलती ही पूछते हैं, तो उनकी हालिया सबसे बड़ी गलती तो यही है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद वे मुसलिम दंगा पीड़ितों का हाल जानने नहीं गए। किसी राहत शिविर में उन्होंने कदम रखा। हां, दंगों के आरोपियों को भाजपा के मंच से सम्मानित किया गया। जब भाजपा ऐसा करेगी, तो मुसलमान भाजपा को वोट क्यों देगा?

अगर भाजपा वास्तव में देश के सभी नागरिकों को समान समझती, जैसा वह दावा करती है, तो उसकी राजनीति मुसलिम विरोध पर ही क्यों टिकी है? लोकसभा और विधान सभाओं में उसने कितने मुसलमानों को टिकट दिया है? ऐसा क्यों हैं कि उसके पास मुसलमानों के नाम पर सिर्फ दो चेहरे ही होते हैं? क्या उसे पूरे मुसलिम समुदाय से चंद काबिल मुसलिम नहीं मिलते, जिन्हें वह लोकसभा या विधान सभाओं में भेज सके? भाजपा को अपनी मुसलिम नीति में बदलाव लाने की जरूरत है, जिसमें वह चाहकर भी बदलाव नहीं कर सकती। उसने अपना चरित्र कुछ ऐसा बना लिया है कि है कि उससे बाहर आने पर उसे डर लगता है कि उसका वजूद इतना भी नहीं रहेगा, जितना आज है।

राजनाथ सिंह के बयान से प्रकाश जावेडकर का किनारा करना इसकी पुष्टि करता है। भाजपा भले ही अन्य राजनीतिक दलों को छदम धर्मनिरपेक्ष कहकर उनकी आलोचना करे, लेकिन सच यही है कि भारत जैसे देश में सभी को साथ लेकर ही सत्ता का शिखर छुआ जा सकता है। बसपा ने दलितों के साथ सभी को जोड़ा तो 2007 में उसने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। भाजपा सोचे कि वह क्यों पिछले दस साल से वनवास में रही है? भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि मोदी का चेहरा तुरूप का इक्का नहीं है, जिसको चलकर हर हाल में बाजी जीती जा सकती है।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं.

साप्ताहिक ‘जागरुकता मेल’ से जुड़े इंदु शेखावत

सीनियर जर्नलिस्ट इंदु शेखावत ने अपनी नई पारी हिंदी साप्ताहिक 'जागरुकता मेल' के साथ शुरु की हैं। 16 पेज वाले इस कलर हिंदी साप्ताहिक का गत 25 फरवरी को विमोचन किया गया था। इंदु शेखावत इसके समाचार संपादक के रूप में संपादन का कार्यभार  संभालेंगे।

इंदु शेखावत ने गत वर्ष जुलाई में डीएलए छोड़ दिया था। इससे पहले वे हिंदुस्तान और अमर उजाला में लंबी पारी खेल चुके हैं।

 

नौकरी से निकाले गए प्रभात खबर के फोटोग्राफर ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दी

झारखंड के मोकामा से खबर है कि फोटोग्राफर राजीव ने आत्महत्या कर ली है. सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जीआरपी ने ट्रेन से कटे एक शव को बरामद किया है. बाद में उसकी पहचान राजीव कुमार के रूप में हुई जो पांच रोज पहले तक फोटोग्राफर के रूप में प्रभात खबर, रांची में कार्यरत था.

सूत्रों के मुताबिक नौकरी चले जाने के बाद से राजीव काफी अवसाद में था. यह नहीं पता चल पाया है कि राजीव को नौकरी से निकाला किस आधार पर गया.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

हरिभूमि अखबार का भोपाल संस्करण जल्द, कई डिपार्टमेंट में भर्तियों के लिए विज्ञापन

हरिभूमि अखबार जल्द ही भोपाल संस्करण शुरू करने जा रहा है. इसके लिए समूह को मीडियाकर्मियों की जरूरत है. संपादकीय, कंप्यूटर, प्रोडक्शन और विज्ञापन विभाग में कई बंदों की जरूरत है. इसको लेकर हरिभूमि अखबार की तरफ से विज्ञापन प्रकाशित कराया गया है. इच्छुक लोग शीघ्र आवेदन करें. संपूर्ण विवरण नीचे दिए गए विज्ञापन में है…

bhadas4media@gmail.com

पत्रकार के घर बिना वारंट घुसी पुलिस, महिलाओं से किया दुर्व्यवहार

रायपुर, 27 फरवरी 2014। वरिष्ठ पत्रकार रामकुमार परमार के अमलेश्वर स्थित आवास में गुरूवार की सुबह बगैर सर्च वारंट आजाद चौक पुलिस ने प्रवेश करते हुए  घर की तलाशी ली और महिलाओं से दुर्व्यवहार किया। पुलिस को किसी प्रकरण में श्री परमार के पुत्र की तलाशी थी लेकिन पुत्र के घर में नहीं होने की जानकारी देने के बाद भी जिस प्रकार का रवैया रायपुर जिले की पुलिस दल ने दुर्ग जिलें में कार्रवाई करने के नाम पर अपनाया, रायपुर प्रेस क्लब ने कड़ी निंदा की है। इस संबंध में गृहमंत्री को शिकायत पत्र सौंपते हुए उचित कार्रवाई की मांग की गई है।

गौरतलब है कि श्री परमार का निवास ग्राम अमलेश्वर दुर्ग जिले में आता है लेकिन कुम्हारी थाना क्षेत्र के अंतर्गत कोई कार्यवाही करने से पहले आजाद चौक रायपुर पुलिस ने वहां से पुलिस दल लेना जरूरी नहीं समझा और सीधे सुबह 6 बजे घर में प्रवेश करते हुए तलाशी के नाम पर पत्रकार परमार व घर की महिलाओं से दुव्र्यवहार किया। जब उन्होने पुलिस को जानकारी दी कि वे एक अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार हैं और यदि किसी मामले में उनके पुत्र से भी पूछताछ करनी है तो बगैर सर्च वारंट घर के भीतर कैसे घुस सकते हैं। इसके बाद भी वे नहीं माने।
 
एएसआई हीरालाल शुक्ला व उनके सह-पुलिस कर्मियों के इस कृत्य की शिकायत गृहमंत्री श्री पैकरा से करते हुए पूरे घटनाक्रम की जानकारी दे दी गई है। रायपुर प्रेस क्लब अध्यक्ष बृजेश चौबे, महासचिव विनय शर्मा, उपाध्यक्ष के.के. शर्मा, संयुक्त सचिव कमलेश गोगिया, विकास शर्मा, कोषाध्यक्ष सुकांत राजपूत सहित सभी प्रेस क्लब सदस्यों ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए उचित कार्यवाही की मांग की है।

बिकाश कुमार शर्मा
bikashksharma@gmail.com

मालिक जेल में लेकिन चैनल बिज़ी है ‘पैकेज’ के खेल में

नई दिल्ली, 27 फरवरी। चुनावी मौसम आते ही क्षेत्रीय खबरिया चैनल डील करने पर उतर आए हैं। नेताओं और पार्टियों से डील ये कि पैकेज फाइनल करो, तभी खबर दिखाई जाएगी। अगर बात बन गई तो ठीक यानि पार्टी या नेता ने पैकेज मान लिया तो खबर प्रसारित कर दी जाएगी अन्यथा खबर नहीं दिखेगी। हरियाणा के एक क्षेत्रीय चैनल की तो 'हकीकत' आज सामने आ गई। इस चैनल ने पैकेज की डीलिंग के लिए दो नेताओं से संपर्क किया और जब बात नहीं बनी तो कवरेज के लिए भी टीम नहीं भेजी और खबर भी नहीं दिखाई।

ये दोनों नेता आज ही दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की मौजूदगी में भाजपा में शामिल हुए। इनमें से एक पूर्व मंत्री एवं इंडिया बुल्स के चेयरमैन समीर गहलौत की मां कृष्णा गहलौत और दूसरा नाम है रमेश दलाल, जिन्होंने अपनी हरियाणा स्वतंत्र पार्टी का ही भाजपा में विलय कर दिया है। इन दोनों नेताओं की लाइव कवरेज के लिए यह डील पकाने की कोशिश की जा रही थी। यह चैनल हरियाणा का पहला क्षेत्रीय न्यूज चैनल है और आजकल खुद को नंबर वन की पायदान पर होने का लगातार दावा कर रहा है जबकि हकीकत यह है कि यह किसी भी रैंकिंग में नहीं है। क्या करें चैनल का मालिक जेल में है और पीछे से नौकर यह गुल खिला रहे हैं।
 
बेशक से अभी लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं हुई तो लेकिन हरियाणा के इस क्षेत्रीय न्यूज चैनल ने तो लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक का पूरा पैकेज तैयार कर पार्टी और नेताओं से संपर्क साधना शुरू कर दिया है। दिल्ली के साउथ एक्स जैसे पाश इलाके से संचालित हो रहे इस चैनल की इस करतूत का थोड़ा बहुत आज यहां खुलासा कर रहा हूं। दरअसल हरियाणा की पूर्व मंत्री कृष्णा गहलौत, कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई हैं, जबकि रमेश दलाल ने अपनी हरियाणा स्वतंत्र पार्टी का ही विलय भाजपा में कर दिया है। इन दोनों नेताओं के भाजपा में शामिल होने की खबरों के साथ ही हरियाणा का यह चैनल सक्रिय हो गया कि किसी तरह दोनों नेताओं को अपने पैकेज के जाल में फंसाया जाए। इसके लिए एक दिन पहले बाकायदा जाल फैलाया गया ताकि किसी तरह दोनों फंस जाए। दोनों नेताओं के नजदीकियों को लाइव कवरेज के पैकेज का महत्व समझाया गया। साथ ही यह दावा भी किया गया कि हरियाणा के दूसरे क्षेत्रीय चैनलों के दिल्ली स्थित संवाददाता भी उनके प्रभाव में हैं। इसलिए पैकेज फाइनल करने में ही समझदारी है। यह पैकेज दो लाख रूपए का था। यानि अगर फाइनल होता तो दो लाख रूपए के बदले चैनल की एक टीम भाजपा मुख्यालय भेजी जाती और फिर वहां 5-7 मिनट का लाइव कवरेज दिखा दिया जाता। दिखता भी या नहीं, पता नहीं। पर दोनों नेताओं के यहां से ना हो गई, ऐसे में चैनल की ओर से डील करने वाले इस डीलर ने धमकी दे डाली कि फिर तो न्यूज कवरेज के लिए भी टीम नहीं भेजी जाएगी। एक-दो और चैनल से भी न्यूज के लिए टीम न भेजने की गुहार लगाई गई। हुआ भी ऐसा ही। इस चैनल की कोई टीम वहां नहीं आई, जबकि हरियाणा के राजनीतिक हलकों में यह आज की सबसे बड़ी खबरों में से एक थी। हालांकि ज्यादातर क्षेत्रीय चैनलों ने अपनी टीम कवरेज के लिए भेजी और इस खबर को बेहतर ढंग से प्रसारित भी किया। पर इस चैनल की पोल खुल गई।

इस चैनल के संपादकीय विभाग की जिम्मेदारी आजकल दो मार्केटियर टाइप लोगों ने संभाल रखी है। इनकी योजना पूरे हरियाणा भर में अपना जाल फैलाकर ज्यादा से ज्यादा नेताओं और पार्टियों को अपने जाल में फंसाने की है। लाखों-करोड़ों का खेल यह दोनों खेलने की तैयारी में हैं। अब ये पता नहीं कि सारा माल चैनल के खाते में जाएगा या फिर इन दोनों की जेब में। हालांकि दूसरे चैनल भी कोई दूध के धुले नहीं हैं लेकिन अभी इस चैनल की पोल खुलनी शुरू हुई है। हो सकता है आने वाले दिनों में किसी और की खुले। इसलिए सावधान रहना, पता लगते ही धमाका होगा।

दीपक खोखर
09991680040
Khokhar1976@gmail.com

इलना का दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष कुमार विजय फ्रॉड के केस में गिरफ्तार

दिल्ली प्रेस के मुखिया परेश नाथ द्वारा संचालित इलना(इंडियन लैंग्वेज न्यूजपेपर्स एसोसिएशन) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष कुमार विजय उर्फ विजय कुमार गुप्ता को पुलिस ने एक प्लॉट पर अवैध कब्जे और बिल्डर से अवैध धन उगाही के आरोप में गिरफ्तार किया है। आउटर दिल्ली की पुलिस को इस शातिर की काफी समय से तलाश थी। कुमार विजय उर्फ विजय कुमार गुप्ता सेटेलाइट रिर्पोटर नाम से एक लोकल पेपर संचालित करता है। इस शातिर ने अपना अखबार भी जाली पते के नाम से पंजीकृत कराया है। अखबार में पता यूपी के भोपुरा का अंकित है, जबकि वह दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-24 में रहता है। एसएचओ राजेश कुमार ने प्रेसवार्ता में संवाददाताओं को बताया की यह आदमी खुद को वरिष्ठ पत्रकार बताकर इलाके के लोगों को धमकाता था। इसने दो शादियां की हैं, एक पत्नी गाजियाबाद में रहती है। लेकिन दोनों पत्नियों को यह बात पता नहीं थी।

 
आरोपी कुमार विजय पर धारा 420 के अलावा कई संगीन धाराएं लगाई गई हैं। वह इस समय तिहाड़ के जेल नंबर-4 में बंद है। इसके दो साथी अभी फरार है। इस शातिर के कारनामों की कहानी जब पुलिस से दिल्ली प्रेस के अध्यक्ष परेश नाथ को पता चली तो वह भी दंग रह गए। उन्होंने तुरंत इस आदमी से सारे संबंध तोड़ दिए और अपने दफ्तर में इसके घुसने पर पाबंदी लगा दी। मालूम हो कि दिल्ली प्रेस से जितनी भी प्रत्रिकाएं प्राकशित होती हैं उनका नेतृत्व परेश नाथ जी ही करते हैं। कुमार विजय उर्फ विजय कुमार गुप्ता अपने हर गलत धंधों में परेश नाथ का नाम लेता था, जबकि उनको किसी बात की भनक तक नहीं थी। एमसीडी कार्यालयों में इस आदमी का आतंक था। ये हर किसी की शिकायत करता था और आरटीआई का उपयोग ब्लैकमेलिंग के लिए करता था। मकसद सिर्फ पैसे की उगाही करना होता था। आरोपी ने अब तक कई लोगों को चूना लगाया है। पुलिस आरोपी से धीरे-धीरे सभी राज उगलवा रही है।

इंडियन लैंग्वेज न्यूजपेपर्स एसोसिएशन लघु अखबारों के हितों के लिए काम करती है। इसमें सैकड़ों लघु अखबारों के संपादक जुड़े हैं। लेकिन कुमार विजय ने संस्थान का जिस तरह से नाम बदनाम किया है उससे सभी सदस्य दंग हैं।

विमल
पीआरओ, इंडियन लैंग्वेज न्यूज़पेपर्स एसोसिएशन,
ईमेलः devivimlesh2@gmail.com

 

दैनिक जागरण की असंवेदनशील पत्रकारिता, मूक जानवरों को आतंक का पर्याय बताया…

Payal Chakravarty : दैनिक जागरण के संवाददाताओं की अल्प जानकारी की दाद देनी पड़ेगी… बिना किसी कानूनी जानकारी के खबरें छापना तो कोई इनसे सीखे… यही नहीं, छोटी सी बात को बड़ी करके गंभीर समस्या के तौर पर दर्शाना महज पाठकों को गुमराह करने जैसा है..

जागरण के पटना संस्करण की ये खबर देखिए…जहां सड़क के बेजुबान कुत्तों को जहर देकर मारने के लिए कहा गया है..जबकि खबर लिखने वाले पत्रकार को ये पता होना चाहिए कि कुत्तों की नसबंदी कराने, एबीसी ऑपरेशन जैसे अन्य ऑप्शन भी मौजूद हैं जिससे उनकी तादाद को कंट्रोल किया जा सकता है.. लेकिन एमसीडी की लापरवाही के खामियाजे में मूक जानवर को जहर देकर मारने तक की असंवेदनशील बात कही गई है..

इस पत्रकार को मैं ये बताना चाहती हूं कि मैं भी एक पत्रकार होने के नाते ये जानती हूं कि एकतरफा पत्रकारिता के कोई मायने नहीं होते… जब तक उसमें दोनों पक्षों के वर्जन न हों…क्यों इस खबर में किसी पशु संस्था पेटा या पीएफए का वर्जन नहीं लिया गया… क्या जागरण वाले लोगों को ये बताना जरूरी नहीं समझते कि पशु संस्थाएं सरकारी मदद के साथ और सरकारी मदद के बिना भी हर दिन हजारों पशुओं का मुफ्त स्टेरलाइजेशन कराती हैं.. और अगर एमसीडी ऐसा नहीं कर रही है तो पशुओं को जहर देकर मारना कहां तक जायज है? ऐसी भड़काऊ खबर लिखने वाले पत्रकार और खबर को आगे बढाने वाले संपादक के खिलाफ सख्त लीगल एक्शन लिया जा सकता है..

जानवरों के संरक्षण के लिए सक्रिय युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार पायल चक्रवर्ती के फेसबुक वॉल से.

सहारा क्यू शॉप और सहारा क्रेडिट सोसाइटी के जरिए किए जा रहे पूंजी निवेश की जांच हो

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने सहारा इंडिया द्वारा सहारा क्यू शॉप तथा सहारा क्रेडिट सोसाइटी के माध्यम से किये जा रहे पूँजी निवेश की जांच की मांग की है. भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड (सेबी) तथा कोरपोरेट मालों के मंत्रालय को भेजी अपनी शिकायत में उन्होंने कहा है कि सहारा इंडिया द्वारा सहारा क्यू शॉप के साथ सहारा क्रेडिट कोआपरेटिव सोसाइटी नामक संस्था के जरिये नियमविरुद्ध तरीके से पूँजी निवेश कराये जाने की गंभीर शिकायतें बतायी जा रही हैं, जिसके तहत सहारा ई शाइन, सहारा ए सेलेक्ट, सहारा माइनर, सहारा एम बेनिफिट जैसे अनेक स्कीम बाजार में हैं.

शिकायत के अनुसार यह सोसाइटी कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के यहाँ पंजीकृत है और देश के क़ानून के विपरीत पूँजी निवेश करा रही है. पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा इंडिया रियल एस्टेट कारपोरेशन लिमिटेड तथा सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन लिमिटेड के मामलों में यह स्पष्ट कर दिया है कि इस प्रकार जमा किया गया धन प्रतिभूति अनुबंध (नियमन) अधिनियम 1956  की धारा 2(एच) में परिभाषित “प्रतिभूति” के अंतर्गत माना जाएगा और ये पैसा निवेश कराते समय सहारा ने कंपनी अधिनियम की धारा 56, 73, 117ए, 117बी तथा 117सी का उल्लंघन करने के साथ सेबी (डीप) गाइडलाइंस 2000 तथा सेबी (इशू ऑफ़ कैपिटल एंड डिसक्लोजर रिक्वायरमेंट्स) रेगुलेशन 2009 के प्रावधानों के विपरीत काम किया. श्री अमिताभ तथा डॉ नूतन के अनुसार उसी प्रकार की सम्भावना सहारा क्यू शॉप और क्रेदिर सोसाइटी के मामलों में भी है, जिसके बारे में उन्होंने 02 जनवरी को शिकायतें भेजी थीं पर अभी तक उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है और यदि शिकायतों पर समय रहते कार्यवाही नहीं हुई तो तमाम असहाय निवेशकों के साथ भारी अन्याय होने की सम्भावना रहेगी.

Copy of the letters—

The Chairman,
Securities and Exchange Board of India (SEBI),
Mumbai 400051

Subject- Enquiry and necessary action as regards various serious allegations against Sahara India and its subsidiaries  
 
Dear Sir,

Kindly refer to our Lt No-AT/Sahara/03 Dated- 02/01/2014 where we, Petitioner No 1, Amitabh Thakur, a UP Cadre IPS officer and Petitioner No 2, Dr Nutan Thakur, a social activist presented certain facts related to the alleged improper and illegal acts of Sahara India and its various subsidiaries/group companies.

That the first fact enumerated was that while Sahara Q shop scheme was already there where the money was allegedly being collected in an improper manner and which needed a thorough enquiry, regarding which the petitioners have already moved the Hon’ble Allahabad High Court, Lucknow Bench in Writ Petition No 7955 of 2013 (M/B) (Amitabh Thakur and another vs SEBI and others), after inaction on the part of SEBI, Sahara India is now collecting public money through a new scheme known as Sahara Credit cooperative society, which has schemes like Sahara E shine which is allegedly a 8 year deposit/money collection scheme at 12% rate of return and Sahara A select which is a one year deposit scheme at 10% rate of interest. It also has a daily scheme called Sahara Minor which is a one year deposit scheme where one can deposit as less amount as Rs. 10 to 20 per day with an interest return and a returning scheme called Sahara M Benefit which is a monthly recurring scheme with 8% interest rate and money returned after 5 years. As per the information made available to us, Sahara Credit Cooperative society has registration with the Agriculture department, Ministry of Agriculture, Government of India and is collecting money in a manner against the rule of law as regards collection of public money.

That it was also prayed that Sahara India Commercial Corporation Limited has Rajat Yojana and Swarn Yojana which allegedly was announced as a 10 year time period investment with 10% rate of return where after 4 years money could be taken back, where it was allegedly said that there would be a draw every month and a quarterly draw but till date no investor all over India is said to have been given any house as was promised in the scheme, despite the 10 year period having got completed.
    That it was also alleged that the Bank account for all the subsidiary companies and affiliates of Sahara India, floated in different names, use only one Account, in the name of Sahara India, which is not as per the provisions of law
    That the petitioners had also provided as a copy of the transactions/vouchers by Sahara India from Makanpura office, Vadodara, Gujarat as regards Sahara India Real Estate and Sahara India Housing where money has been allegedly returned to the investors through Account payee cheque but 15% rate of interest as directed by the Hon’ble Supreme Court has not been given, while at the same time TDS has been deducted which is not correct
    That a specific example of Thakkar family was been cited where Branch Manager of Nyaya Mandir branch Sri Bishwajit P Singh had made payment to the Thakkars who had invested money in Sahara Real Estate through his own personal bank account on 21/11/2012, though the same is being shown as having been returned as early as May 2012 and this incorrect documentation has also been submitted before the Hon’ble Supreme Court itself
    That the complaint had also presented many specific examples like that of Sri Rameshbhai B Kalwar, Sri Sanjay Parmar, Sri Indravadan Rathode and his wife Ms Tara I Rathode etc
    That it was prayed by the petitioners that the purpose of this complaint was to apprise of the facts and documents and to get the matter enquired as per the provisions of law because this matter concerns the interests of investors to Sahara India and all its subsidiary and allied companies all over India including Lucknow where the applicants reside.
    That the applicants also made it clear that they have nothing personal against Ms Sahara India and/or its subsidiaries and the only purpose to present this complaint was to get all these facts enquired so that the interest of the investors are saved
    That to the best of the petitioners’ knowledge, no action has been taken in the petitioners complaint so far
    That in wake of the recent happenings related with Sahara India, the petitioners’ complaint assume great significance as regards the interests of millions of investors who have invested their hard-earned money in many Sahara companies, which have a great possibility of having been undertaken against the law of the land, thereby jeopardizing the interests of these investors.
    That this is because as explained by SEBI in its final order through its whole-time member (WTM) on 23/06/2011 where SEBI examined the nature of OFCDs issued by Saharas and came to the conclusion that OFCDs issued would come within the definition of “securities” as defined under Section 2(h) of Securities Contracts (Regulation) Act, 1956.
    That this is because SEBI also found that those OFCDs issued to the public were in the nature of Hybrid securities, marketable and would not fall outside the genus of debentures. SEBI also found that the OFCDs issued, by definition, design and characteristics intrinsically and essentially, were debentures and the Saharas had designed the OFCDs to invite subscription from the public at large through their agents, private offices and information memorandum. SEBI concluded that OFCDs issued were in fact public issues and the Saharas were bound to comply with Section 73 of the Companies Act, in compliance with the parameters provided by the first proviso to Section 67(3) of the Companies Act. SEBI took the view that OFCDs issued by Saharas should have been listed on a recognized stock exchange and ought to have followed the disclosure requirement and other investors' protection norms
    That SEBI also held that Saharas were not justified in raising crores and crores of rupees on the premise that that OFCDs issued by them, were by way of private placement. SEBI, therefore, found that the Saharas had contravened the provisions of Sections 56, 73, 117A, 117B and 117C of the Companies Act and also various clauses of the Securities and Exchange Board of India (Disclosure and Investor Protection) Guidelines, 2000 Guidelines.
    That SEBI also held that SHICL had not complied with the provisions of Regulations 4(2), 5(1), 5(7), 6, 7, 16(1), 20(1), 25, 26, 36, 37, 46 and 57 of the Securities and Exchange Board of India (Issue of Capital and Disclosure Requirements) Regulations, 2009 Regulations.
    That having found so, SEBI directed Saharas to refund the money collected under the Prospectus dated 13.3.2008 and 6.10.2009 to all such investors who had subscribed to their OFCDs, with interest.
    That Saharas, aggrieved by the above mentioned order of SEBI, filed Appeal Nos. 131 of 2011 and 132 of 2011 before the Securities Appellate Tribunal and the Tribunal passed a common order on 18.10.2011, where it endorsed the views expressed by SEBI
    That aggrieved by the said order of the Tribunal, SIRECL filed C.A. No. 9813 of 2011 and SHICL filed C.A. No. 9833 of 2011 before the Hon’ble Supreme Court under Section 15Z of the SEBI Act where the Hon’ble Supreme Court almost fully endorsed the orders of SEBI and the Tribunal
    That it does not need any iteration that what held true for SIRECL and SHICL hold true in no less measure for the various schemes mentioned by the petitioners in their complaints dated 02/01/2014 as regards Sahara Credit cooperative society and Sahara India Commercial Corporation Limited
    That it is also prayed that any further delay in holding enquiry in this matter and not taking the required action in these cases would go against the interests of millions of helpless investors and would definitely be against public interest.
    That hence the applicants pray once again to kindly get the various facts enumerated in the complaint dated 02/01/2014 enquired immediately, so as to take all necessary actions as per the provisions of law, to bring the desired regulation and order in the financial market, thus saving the innocent investors.

Lt No-AT/Sahara/03       Yours,
Dated- 28/02/2014
      (Amitabh Thakur) (Nutan Thakur)
        5/426, Viram Khand,
        Gomti Nagar,  
        Lucknow- 226010
        # 94155-34526, 94155-34525
        email- amitabhthakurlko@gmail.com  
        nutanthakurlko@gmail.com

Copy to-
1. The Principal Secretary, Office of the Prime Minister of India, New Delhi
2. The Secretary, Ministry of Corporate Affairs, Government of India, New Delhi
3. The Secretary, Ministry of Consumer Affairs, Government of India, New Delhi
4. The Secretary, Ministry of Agriculture, Government of India, New Delhi

 

 

To,
The Chairman,
Securities and Exchange Board of India (SEBI),
Mumbai 400051

Subject- Enquiry and necessary action as regards various serious allegations against Sahara India and its subsidiaries  
 
Dear Sir,

    Petitioner No 1, Amitabh Thakur, a UP Cadre IPS officer, also active as regards issues of transparency and accountability in public life and Petitioner No 2, Dr Nutan Thakur, a social activist present certain facts in their individual capacity particularly in light of the facts and documents presented by Sri Indravadan Rathod from Vadodara, who previously worked in Sahara India as an agent along with his wife, but later got completely disenchanted and disillusioned as regards Sahara India due to its alleged dubious activities became a whistle-blower.
    That these acts relate to the alleged improper and illegal acts of Sahara India and its various subsidiaries/group companies.
    That the first fact enumerated to us is that after Sahara Q shop scheme through which Sahara India allegedly converted majority of the money it was supposed to refund as  per order dated 31/08/2012 of the Hon’ble Supreme Court in Sahara India Real Estate Company vs Securities & Exchange Board Of India (SEBI, for short) & others (Civil Appeal No. 9833 of 2011) as regards Sahara India Real Estate Corporation Limited and Sahara Housing Investment Corporation Limited, Sahara India is now collecting public money through a new scheme known as Sahara Credit cooperative society. This has schemes like Sahara E shine which is allegedly a 8 year deposit/money collection scheme at 12% rate of return and Sahara A select which is a one year deposit scheme at 10% rate of interest. As per the information made available to us, Sahara Credit Cooperative society has registration with the Agriculture department, Ministry of Agriculture, Government of India and is collecting money in a manner against the rule of law as regards collection of public money. It has also been said that despite repeated requests by Sri Rathode and even directions issued by the Ministry, the required information has not been provided.
    That in Sahara Q shop registered with the Registrar of Companies, Kanpur amount being collected, no mention is being made as regards the security amount and the maturity date. (copy enclosed)
    That as regards Sahara India Commercial Corporation Limited, there are Rajat Yojana and Swarn Yojana which allegedly was announced as a 10 year time period investment with 10% rate of return where after 4 years money could be taken back. It was allegedly said that there would be a draw every month and a quarterly draw. Since date no investor all over India is said to have been given any house as was promised in the scheme, despite the 10 year period having got completed. (Enclosed)
    That it has also been told to us that the Bank account for all the subsidiary companies and affiliates of Sahara India, floated in different names, use only one Account, in the name of Sahara India, which is not as per the provisions of law
    That Sri Rathode has provided as a copy of the transactions/vouchers by Sahara India from Makanpura office, Vadodara, Gujarat as regards Sahara India Real Estate and Sahara India Housing where money has been allegedly returned to the investors through Account payee cheque but 15% rate of interest as directed by the Hon’ble Supreme Court has not been given, while at the same time TDS has been deducted which is not correct (copy enclosed)
    That a specific example of Thakkar family (Sri Kanubhai R Thakkur, Ms Sudhaben K Thakkar, Ms Dipali M Thakkar, Ms Saraswati K Thakkar) has also been cited where Branch Manager of Nyaya Mandir branch Sri Bishwajit P Singh had made payment to the Thakkars who had invested money in Sahara Real Estate  21/11/2012 where Sri Rathode has himself been a witness. Since money invested in Sahara Real Estate was allegedly not been returned but was being transferred to Sahara Q shop and the Thakkars were insisting for getting their money paid back instead of getting it transferred to Sahara Q shop, hence allegedly to get the original documents related with Sahara Real Estate released in the wake of the Hon’ble Supreme Court order, the Branch Manager at Nyaya Mandir paid the money through his own personal bank account in November 2012 though the same is being shown as having been returned as early as May 2012. As per Sri Rathode, this incorrect documentation of having returned money to the Thakkars as early as May 2012 while actually returning it on 21/11/2012 has also been submitted before the Hon’ble Supreme Court itself (copy enclosed)
    That as regards Sahara Credit Cooperative, another company of Sahara India for collecting money, it is said that there is a daily scheme called Sahara Minor which is a one year deposit scheme where one can deposit as less amount as Rs. 10 to 20 per day with an interest return. There is also a returning scheme called Sahara M Benefit which is a monthly recurring scheme with 8% interest rate and money returned after 5 years. As per Sri Rathode, this scheme is against the provisions of law where money is being collected against the lawful provisions.
    That Sri Sanjay Parmar, an employee of Sahara India had asked for balance sheet of Sahara India credit cooperative society Limited for the years 2010-11 to 2012-13 by the Ministry of Agriculture to which the Ministry provided the Balance sheet for 2010-11 while as per Sri Parmar’s version, he was called in office on 29/11/2013, threatened in the office and forced to write that he does not need it which he had to do being a Sahara employee. He has now sent a complaint dated 05/12/2013 of the same to Sri D N Thakur, Director (Coop), Department of Agriculture, Govt of India. (copy enclosed)
    That there is also a specific complaint of Sri Rameshbhai B Kalwar r/o 71, Rajdhani society, tarani Vasaria road, Vadodara, Gujarat dated 05/12/2013 where he has alleged non-payment of money in Silver year Labh Yojana which he bought on 06/09/2003 (copy enclosed)
    That another complaint by Sri Rathode dated 24/10/2013 as regards Sahara India Real Estate Limited has also been presented to Ministry of Corporate Affairs but it seems to be still lingering due to non-cooperation by Sahara India Real Estate despite directions of the Office of Registrar, Kanpur dated 31/10/2013 (copy enclosed)
    That similarly a complaint by Ms Tara I Rathode forwarded by Kanpur ROC to Mumbai ROC through their letter dated 31/10/2013 is also unattended so far. (copy enclosed)
    That Sri Rathode has provided as documents as regards a few of these allegations which we annex with this complaint.
    That the purpose of this complaint is to apprise you of the facts and documents presented to us and to get the matter enquired as per the provisions of law because this matter concerns the interests of investors to Sahara India and all its subsidiary and allied companies all over India including Lucknow where the applicants reside.
    That the applicants also make it clear that they have nothing personal against Ms Sahara India and/or its subsidiaries and the only purpose to present this complaint to get all these facts enquired so that the interest of the investors are saved, being jeopardized presently as the various documents seem to suggest and state.
    That hence the applicants pray that after having enquired into the matter appropriate action as per the provisions of law may kindly be taken to bring the desired regulation and order in the financial market, thus saving the innocent investors.

Lt No-AT/Sahara/03       Yours,
Dated- 02/01/2014
      (Amitabh Thakur) (Nutan Thakur)
        5/426, Viram Khand,
        Gomti Nagar,  
        Lucknow- 226010
        # 94155-34526, 94155-34525
        email- amitabhthakurlko@gmail.com  
        nutanthakurlko@gmail.com

Copy to-
1. The Principal Secretary, Office of the Prime Minister of India, New Delhi
2. The Secretary, Ministry of Corporate Affairs, Government of India, New Delhi
3. The Secretary, Ministry of Consumer Affairs, Government of India, New Delhi
4. The Secretary, Ministry of Agriculture, Government of India, New Delhi

Enclosure- All the relevant documents as regards various complaints mentioned specifically
 

रवींद्र शाह स्मृति व्याख्यान में बोले वक्ता- वर्तमान पत्रकारिता पर कार्पोरेट कल्चर पूरी तरह हावी है (देखें तस्वीरें)

: पत्रकार रवींद्र शाह को याद किया गया : इंदौर। पत्रकारिता का आवरण और कलेवर बदल गया है। वर्तमान में पत्रकारिता पर कॉर्पोरेट कल्चर पूरी तरह हावी है। मीडिया अब टर्नओवर वाली कंपनी बन गया है। समाज से जुड़े सरोकार अब पत्रकारिता में दिखाई नहीं देते हैं। न्यू मीडिया के लिए भारत अब सिर्फ एक बाजार है। मीडिया में आए इन्हीं परिवर्तनों से सोशल साइट्‍स के रूप में नए मीडिया का उदय हुआ है।

ये विचार मीडिया से जुड़े वक्ताओं ने स्व. पत्रकार रवीन्द्र शाह की याद में 'पत्रकारिता- कॉर्पोरेट कल्चर- न्यू मीडिया' विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में व्यक्त किए। पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि मीडिया के स्वरूप में बदलाव आ रहा है और अब अखबारों का एकाधिकार खत्म हो गया है। न्यू मीडिया के नाम पर सोशल साइट्‍स जैसा प्लेटफार्म लोगों को मिल गया है। उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया के इस दौर में देश में कई हिस्सों में ऐसी समस्याएं हैं, जो देश के सामने नहीं आ पाती हैं। न्यू मीडिया केजरीवाल का इलेक्ट्रॉनिक एडिशन है।

श्रीवर्धन त्रिवेदी ने कहा कि पत्रकारिता का आवरण, कलेवर बदल गया है। व्यावसायिक जरूरतों ने कॉर्पोरेट कल्चर को बढ़ावा दिया है। हर तरह के मीडिया पर दबाव बड़ा है। पछाड़ने की प्रतियोगिता के घालमेल ने मीडिया के स्वरूप को बदल दिया है। कॉर्पोरेट कल्चर का मीडिया में आना बुरी बात नहीं हैं, लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए। इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए। उन्होंने सोशल मीडिया के बारे में कहा कि यह आत्ममुग्‍धता का क्षेत्र है। इससे लोगों की निजता खत्म हुई है।

भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह ने कहा कि आजकल मीडिया पैसा पैदा करने की मशीन बन गया है। मीडिया टर्नओवर बढ़ाने वाली कंपनी हो गया है। कॉर्पोरेट घरानों के इस क्षेत्र में आने से पत्रकारिता करने वाले पत्रकार मैनेजर बन गए हैं। कॉर्पोरेट मीडिया के दौर में पत्रकारिता बिकाऊ है। उन्होंने कहा कि मीडिया भ्रष्ट नहीं हुआ है, उसे भ्रष्ट किया गया है। न्यू मीडिया के नए स्वरूप में सोशल मीडिया सामने आया है जिसने कॉर्पोरेट मीडिया को कठघरे में खड़ा किया है। सोशल मीडिया से हर आदमी पत्रकार बन गया है। सच बोलने वाले ही पत्रकारिता को बचाएंगे।

डॉ. प्रवीण तिवारी ने कहा, बदलते मीडिया में अच्छी चीजें भी हैं और बुरी भी। जनता से जुड़े सरोकार अब मीडिया में नजर नहीं आते हैं। चैनलों, अखबारों की देश में बाढ़ आ रही है। मीडिया इंडस्ट्री में अच्छी चीज यह है कि युवाओं को अवसर मिल रहे हैं। नकारात्मक पहलू यह है कि बिना कॉर्पोरेट कल्चर के आज मीडिया चल नहीं सकता। अभिनेता पदमसिंह ने कहा कि मीडिया में कॉर्पोरेट कल्चर से आ रही परेशानियों का हल भी मीडिया से जुड़े लोगों को निकालना होगा।

कार्यक्रम की शुरुआत में भैरूसिंह चौहान ने कबीर गीत प्रस्तुत किए तथा सामाजिक संस्था परितृप्ति के सामाजिक कार्यों को वीडियो फिल्म द्वारा प्रस्तुत किया गया। सभी वक्ताओं ने रवीन्द्र शाह को इनोवेटिव और कर्मशील पत्रकार बताया। 2012 में एक कार्यक्रम में रवीन्द्र शाह द्वारा कहे गए आखिरी शब्दों की वीडियो क्लिप भी दिखाई गई। विचार गोष्ठी में राजीव शाह ने ‍विषय की परिकल्पना पेश की। दीपक चौरसिया की ओर से देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की छात्रा श्रुति को पहला रवीन्द्र शाह स्मृति पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके लिए उन्हें 10 हजार रुपए और स्मृति चिन्ह दिया गया। कार्यक्रम का संचालन संजय पटेल ने किया। (साभार : वेबदुनिया)

सुब्रत रॉय गिरफ्तार, सीजेएम कोर्ट में होंगे पेश

दो दिन कि लुका-छुपी के बाद आज सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय को लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया है। खबर है कि सुब्रत रॉय ने आज सुबह सहारा शहर में पुलिस को बुलाकर आत्मसमर्पण किया। लखनऊ के ट्रांस-गोमती क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि राय को गिरफ्तार कर लिया गया है और उन्हें आज ही सीजेएम कोर्ट में पेश किया जाएगा।

इससे पहले रॉय के वकील जेठमलानी ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस राधाकृष्णन कि बेंच के सामने दरख्वास्त की कि रॉय के खिलाफ जारी गैर ज़मानती वारंट को वापस ले लिया जाए। उन्होंने कहा कि उनकी बात को जस्टिस राधाकृष्णन और जस्टिस केहर कि बेंच के सामने सुना जाए लेकिन जस्टिस राधाकृष्णन ने, जो उस समय जस्टिस सेन के साथ बेंच में थे, ऐसा करने से मना कर दिया। इसके बाद रॉय के पास आत्मसमर्पण के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं बचा था।

मैं फरार नही हूं, सहारा से निकाले गए पत्रकार कर रहे बदनामः सुब्रत रॉय

सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय ने आज सुबह मीडिया और जजों के नाम एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है के वो फरार नहीं हैं। कल जब पुलिस उन्हें ढूंढ रही थी तो वे अपनी मां के इलाज के सिलसिले में और एक वकील से मिलने लखनऊ के बाहर गए हुए थे। उन्हें परिवार द्वारा पता चला के पुलिस उनके घर आयी थी और उसके बाद से पूरे देश का मीडिया उनके पीछे पड़ा हुआ है।

रॉय ने कहा है कि वे ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो क़ानून से भागे। उन्होंने 2012 के सुप्रीम कोर्ट के दो आदेशों का हवाला देते हुए कहा के कोर्ट ने उनके खिलाफ कोई निर्देश नहीं दिया है(ये अलग बात है कि उन्होने 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी ग़ैर-ज़मानती वारंट के आदेश का जिक्र नहीं किया)।

मीडिया को कोसते हुए रॉय ने कहा के उन्हें बहुत क्षोभ है कि कुछ नेगेटिव माइंडेड पत्रकार जिन्हे कुछ समय सहारा के निकाल दिया गया था, वे मीडिया में उनके खिलाफ विषवमन कर रहे हैं। वे एक ऐसे बेटे का चरित्र हनन कर रहे हैं जो अपनी वृद्ध और बीमार माँ कि सेवा कर रहा है।

रॉय ने कहा के बहुत से लोगों ने उन्हें सलाह दी है कि अस्पताल में भर्ती हो जाओ, जैसा के और लोग अदालत से बचने के लिए करते हैं। लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें ऐसी ड्रामेबाज़ी पसंद नहीं है। उन्होंने लखनऊ पुलिस को सूचित कर दिया है कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कार्यवाही करे।

उन्होंने कहा कि वो लखनऊ में ही हैं और अपने दोनों हाथ जोड़ कर माननीय जजों और  माननीय सुप्रीम कोर्ट से अपील कर रहे हैं के उन्हें 3 मार्च तक घर में नज़रबंद कर उनकी बीमार माँ के पास ही रहने दिया जाए।

अंत में सब कुछ माननीय जजों के ऊपर छोड़ते हुए उन्होंने कहा के अगर वे उन्हें आज ही दिल्ली बुलाते हैं तो वे चले जायेंगे। उन्हें जो भी करने का निर्देश दिया जायेगा वो उसका बिना शर्त पालन करेंगे।

 

गैर-जमानती वारंट रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे सुब्रत रॉय

नई दिल्ली: सहारा समूह के मुखिया सुब्रत रॉय के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट की तामील करवाने के लिए पुलिस लखनऊ में उनके घर पहुंची। बुधवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था।

वहीं, आज सुब्रत रॉय अपने खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और उन्होंने 4 मार्च को न्यायालय में हाजिर होने का आश्वासन दिया। उन्होंने न्यायालय में बुधवार को पेश नहीं होने के लिए बिना शर्त माफी मांगी है।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बुधवार को सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी के लिए गैर- जमानती वारंट जारी किया था, क्योंकि निवेशकों का 20 हजार करोड़ रुपये नहीं लौटाने के कारण लंबित अवमानना के मामले में सहारा प्रमुख न्यायिक आदेश के बावजूद न्यायालय में पेश नहीं हुए थे।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की खंडपीठ ने बुधवार को कहा था, हमने मंगलवार को ही राय को व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट देने से इनकार कर दिया था। वह आज भी पेश नहीं हुए हैं और हम गैर-जमानती वारंट जारी कर रहे हैं, जिसकी तामील 4 मार्च तक होनी है।

इस मामले की सुनवाई शुरू होते ही रॉय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने न्यायाधीशों को सूचित किया कि सुब्रत रॉय अपनी 95-वर्षीय मां के खराब स्वास्थ्य की वजह से कोर्ट में पेश होने में असमर्थ हैं। इस पर न्यायाधीशों ने कहा, इस कोर्ट के हाथ बहुत लंबे हैं। मंगलवार को ही हमने व्यक्तिगत पेशी से छूट देने का आपका अनुरोध ठुकराया था। हम गैर-जमानती वारंट जारी करेंगे। यह देश की सर्वोच्च अदालत है।

न्यायाधीशों ने कहा, हमने आपसे कहा था कि हम व्यक्तिगत पेशी से आपको छूट देने के पक्ष में नहीं हैं। यदि अन्य निदेशक पेश हो सकते हैं तो फिर आप क्यों नहीं? कोर्ट ने निवेशकों को 20 हजार करोड़ रुपये लौटाने के आदेश पर अमल नहीं किए जाने के कारण 20 फरवरी को सहारा समूह को आड़े हाथ लेते हुए सुब्रत रॉय के साथ ही सहारा इंडिया रियल इस्टेट कार्प लि और सहारा इंडिया हाउसिंग इन्वेस्टमेन्ट कार्प लि के निदेशकों रवि शंकर दुबे, अशोक राय चौधरी और वंदना भार्गव को समन जारी किए थे। (एनडीटीवी)

आईपीएस के नियम विरुद्ध ट्रांसफर मामले में कैट ने सरकार से मांगा जवाब

केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण(कैट) की लखनऊ बेंच ने आज आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा आईजी अभियोजन से आईजी नागरिक सुरक्षा के पद पर हुए ट्रांसफर के विरुद्ध दायर याचिका में केंद्र और राज्य सरकार से जवाब माँगा और अंतरिम प्रार्थना के विषय में अपना आदेश सुरक्षित कर लिया।

बहस के दौरान केंद्रीय और राज्य सरकार के अधिवक्ताओं ने कहा कि वे इस मामले में अपना प्रतिशपथ पत्र प्रस्तुत करेंगे, जिस के बाद न्यायिक सदस्य नवनीत कुमार ने केस की सुनवाई होने तक याची को अभियोजन विभाग में रखे जाने सम्बंधित अंतरिम प्रार्थना पर अपना आदेश सुरक्षित कर लिया, जो सोमवार को सुनाया जाएगा।

याचिका में श्री ठाकुर ने कहा है कि उन्हें 30 जनवरी को बिना सिविल सर्विस बोर्ड का गठन किये तथा बिना कोई कारण बताये 15 दिन में अभियोजन विभाग से हटा दिया गया जो 28 जनवरी 2014 को संशोधित आईपीएस कैडर रूल्स 1954 के नियम 7 के खिलाफ है।

 

डॉ. नूतन ठाकुर, # 094155-34525

आरटीआई में हुआ खुलासा, राजनैतिक दलों को लगभग मुफ्त में मिले सरकारी आवास

राज्य संपत्ति विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा आरटीआई कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर को प्रेषित सूचना से साफ़ जाहिर होता है कि राज्य सरकार ने राजनैतिक दलों को लगभग मुफ्त में सरकारी आवास आवंटित किये हैं। प्राप्त सूचना के अनुसार 7, माल एवेन्यू स्थित कांग्रेस कार्यालय को जल कर सहित प्रति माह मात्र 2428 रुपये का किराया देना पड़ता है। 19ए, विक्रमादित्य मार्ग स्थित समाजवादी पार्टी दफ्तर का किराया 2425 प्रति माह है जबकि 6ए, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग स्थित समाजवादी युवजन सभा कार्यालय का मासिक किराया 2525 है।

38डी, मेजर बैंक्स रोड स्थित जनता दल कार्यालय का मासिक किराया 2026 रुपये, विधान सभा मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी दफ्तर का किराया 4849 रुपये, 9बी त्रिलोकी नाथ रोड स्थित लोक दल कार्यालय का किराया 2046 और विधान सभा मार्ग स्थित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दफ्तर का मासिक किराया 2008 रुपये प्रति माह है। यहाँ तक कि विलुप्त हो चुकी लोकतान्त्रिक कांग्रेस पार्टी का आवंटन निरस्त होने के बाद भी विधान सभा के निकट एक सरकारी भवन पर कब्जा है, जिसका किराया 2425 रुपये प्रति माह है।

इनके विपरीत लखनऊ के इन प्राइम लोकेशन्स में एक छोटे से 2 बेड रूम फ्लैट को किराया 10-15 हजार रुपए से कम नहीं है, जबकि 2000 वर्ग फीट के एक छोटे स्वतंत्र आवास का किराया एक लाख रुपये प्रति माह से ऊपर होता है।
 

बीमार मां को अपनी ढाल बना रहे ‘बे’सहाराश्री

भारत में हर धनवान ये समझता है कि वह यहाँ के नियम-कानूनों से ऊपर है। कुछ दिन पहले तक आसाराम को भी ऐसा गुमान था, सो कानून ने उन्हें उनकी हैसियत दिखा दी। इन दिनों ऐसा ही गुमान सहारा श्री को लग रहा है, सो न सिर्फ कानून उनको उनकी सही जगह दिखाने की तैयारी है बल्कि उनकी सारी 'श्री' भी खतरे में है लेकिन फिर भी ये श्री मान नहीं रहे है। फर्क इतना है कि अब उनकी आवाज में शेर की दहाड़ नहीं बकरी का मिमियाना है। आज के सारे अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन के जरिये उन्होंने स्वयं को निर्दोष साबित करने की कोशिश करते हुए जनता बल्कि अपने निवेशकों के सामने मासूमियत दिखाई है और सारा दोष फिर से सेबी पर डाला है। विज्ञापन के अंत में कहा गया है जनहित में जारी।

सुप्रीम कोर्ट कह चुकी है कि सहारा श्री इतना बड़ा गोलमाल करके केवल इसलिए बचे है कि कोर्ट जनता का हित देख रही है वरना उन जैसों की सही जगह जेल में ही है। फिर भी वे जनहित का वास्ता दे रहे हैं। अदालत से हाजिरी माफ़ी की अपील कर रहे है। उनका ये भी कहना है कि कानून ऐसी कम्पनियों के साथ रहता है जो रातोंरात उड़ जाती है जबकि वे व्यापार कर रहे है। वे ये नहीं बता रहे है कि जनता से ५-६ सालों में डबल पैसा वापस करने की बात कह कर जिन योजनाओं के लिए उन्होंने पैसा लिया था उसे वहाँ लगाया ही नहीं। आज भी वे क्यू शॉप के नाम पर पैसा उगाह रहे है और उनकी अधिकाँश क्यू शॉप केवल कम्पनी के कर्मचारियों के दम पर खड़ी हैं। वे 12 लाख लोगों के कम्पनी से जुड़े होने की बात कर रहे है लेकिन ये भी कड़वा सच है कि आज ३ करोड़ लोगो की मेहनत का २४ हजार करोड़ रुपइया भी अधर में है और अभी ऐसे कितने ही घोटाले सामने आना बाकी है।
 
वे यह भी नहीं बताते कि आज वे पर्ल्स, सम्रद्धि जीवन, साईं प्रसाद, के एम जे, परिवार डेरी जैसे हजारों ठग विद्या में निपुण लोगों के रोल मॉडल है जिनका निशाना ही भारत के गरीब और अत्यंत गरीब तबके के लोगों की जमा पूंजी है। सबसे निंदनीय तथ्य तो ये है कि सहारा श्री तमाम आदर्शों और भारतीय मान्यताओं को धता बता कर अपनी माँ को ही आधार बना रहे हैं, अपनी रक्षा के लिए।

सुप्रीम कोर्ट अगर भारत की जनता से न्याय करना चाहता है तो उसे सुब्रत राय़ जैसे लोगों को सही जगह दिखा कर भारत की जनता के पैसे की लूट पर अंकुश लगाना ही होगा, भारत की न्याय व्यवस्था को चुनौती देने वाले भारत में कम ही है और सुब्रत राय उनमें से एक है.………

 

लेखक हरिमोहन विश्वकर्मा से vishwakarmaharimohan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है।

 

सूचना मांगना पत्रकार को पड़ा महंगा, पुलिस ने झूठे मुकदमें में फांसा

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में आरटीआई के तहत सूचना मांगना तथा मानवाधिकार आयोग में पुलिस उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराना एक पत्रकार को इतना महंगा पडा कि पुलिस ने उसे झूठे मुकदमें में फंसाकर उसका उत्पीड़न शुंरू कर दिया। यूपी पुलिस इसके पहले भी पोल खोले जाने से नाराज होकर या बड़े लोगों के दबाव में फर्जी फंसाती रही है। बिजनौर पुलिस के उत्‍पीड़न का विरोध करते हुए पत्रकारों ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

जानकारी के अनुसार थाना नूरपुर क्षेत्र के पुलिस उत्पीड़न के शिकार वरिष्ठ पत्रकार ने थाना कांठ के अतंर्गत ग्राम कुमखिया में एक प्राइवेट कालेज में शिक्षक व वरिष्ठ लिपिक पद पर कार्य किया था। स्कूल प्रबंधक जितेंद्र सिंह की ओर से निर्धारित मानदेय न देने तथा मांगने पर सबक सिखाने की धमकी दी थी, जिसके बाद पीडित द्वारा 19 जून को पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की गई थी। इसके बाद मानदेय न मिलने पर बिजनौर कोर्ट में वाद दायर किया गया।

तीन दिसम्बर को मानवाधिकार आयोग में पुलिस की एक पक्षीय कार्यवाही की शिकायत दर्ज कराई गई। बाद इसके थाना कांठ पुलिस आरटीआई के तहत संबधित विद्यालय तथा पुलिस से मानदेय संबंधी प्रार्थना पत्रों पर जांच संबंधी सूचनाएं मांगने पर पत्रकार कमलजीत सिंह नूर का उत्पीड़न करने पर लगी। संस्था प्रबन्धक द्वारा शासन-प्रशासन की किसी भी जांच से बचने के लिए पुलिस से मिलकर कमलजीत सिंह के खिलाफ थाना कांठ में दिनांक 5 अक्टूबर 13 को मुकदमा दर्ज करा दिया गया।

दर्ज एफआईआर का प्रतिवादी पक्ष को पता नहीं चला तथा पुलिस ने एकतरफा विवेचना कर कमलजीत सिंह नूर व उनके परिवार का उत्पीड़न शुरू कर दिया। इस संबंध में क्षेत्रीय पत्रकार पिछले सप्ताह वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मुरादाबाद से मिलकर उन्हें सही स्थिति से अवगत कराते हुए इस मैटर की किसी अन्य थाने से निष्पक्ष जांच की मांग कर चुके हैं। एक बार फिर स्थानीय पत्रकारों ने पुलिस की कार्रवाई पर रोष व्यक्त करते हुए इस प्रकरण की शिकायत कर उच्च स्तरीय जांच तथा दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

घर पर नहीं मिले सुब्रत राय, बैरंग लौटी गोमतीनगर पुलिस

: कोर्ट की अवमानना पर जारी हुआ था एनबीडब्ल्यू : लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना के दोषी सहारा इंडिया के प्रमुख सुब्रत राय के खिलाफ जारी नान बेलेबल वारंट (एनबीडब्ल्यू) को तालीम कराने के लिए गुरुवार को लखनऊ की गोमतीनगर पुलिस उनके आवास पर पहुंची, लेकिन सुब्रत राय घर पर नहीं मिले।

एसपी ट्रांसगोमती हबीबुल हसन ने बताया कि लखनऊ के गोमतीनगर में सहारा शहर में सुब्रत राय रहते हैं। पुलिस की टीम सहारा शहर के बाहर ही है। उनके स्टॉफ ने बताया है कि सुब्रत राय इस समय सहारा शहर में नहीं हैं। उनकी लोकेशन का भी अभी कुछ पता नहीं चल पाया है। जानकारी के अनुसार सुब्रत रॉय ने गिरफ्तारी वारंट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वे चार मार्च को जरूर कोर्ट के समक्ष पेश होंगे।

गौरतलब है कि बुधवार को समन के बावजूद कोर्ट में पेश न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताते हुए सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। अदालत ने उन्हें गिरफ्तार कर चार मार्च को सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने आदेश सहारा के खिलाफ दाखिल सेबी की अवमानना याचिका पर जारी किया। बाजार नियामक सेबी ने निवेशकों के 20,000 करोड़ रुपये वापस करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाते हुए सुब्रत राय और सहारा की दो कंपनियों के निदेशकों के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की है।

20 फरवरी को शीर्ष अदालत ने सहारा प्रमुख व तीन अन्य निदेशकों को 26 फरवरी को निजी तौर पर कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया था। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति जेएस खेहर की पीठ को उनके वकील ने बताया कि सहारा की दो कंपनियों के तीन निदेशक अशोक राय चौधरी, रवि शंकर दुबे व वंदना भार्गव कोर्ट में पेश हुए हैं। मगर सुब्रत राय मां की बीमारी के कारण पेश नहीं हो सके। इन्‍होंने इस आशय का विज्ञापन भी कई अखबारों में प्रकाशित करवाया है।

बसपा प्रत्‍याशी ने चंदौली के पत्रकारों को बांटी नगदी!

हिंदुस्‍तान के प्रधान संपादक शशि शेखर 26 फरवरी की सुबह लोगों को 'वोट की चोट का अर्थ' समझा रहे थे. अपने 'आओ राजनीति करो अभियान' की सफलता का गुणगान कर रहे थे. इसी दिन एक जगह उनके अखबार के एक ब्‍यूरोचीफ के बिकने की तैयारी चल रही थी. पेड न्‍यूज पर मातम करके पेड न्‍यूज छापना हिंदुस्‍तान की पुरानी नीति रही है. पिछली बार भी विधानसभा चुनाव के दौरान हिंदुस्‍तान, बनारस में माफिया डॉन ब्रजेश सिंह का पेड न्‍यूज छापने पर कई लोगों की बत्‍ती गुल हुई थी. इसके बाद भी हिंदुस्‍तानियों ने स‍बक नहीं लिया. हालांकि इस बार हिंदुस्‍तान समेत कई अखबारों के ब्‍यूरो चीफ और पत्रकार पैसा पाकर संबंधित प्रत्‍याशी के पक्ष में माहौल बनाने को तैयार हुए हैं.

मामला चंदौली जिले का है. चंदौली लोकसभा सीट से बसपा ने धनबली अनिल मौर्या को प्रभारी घोषित किया है. यानी एक तरह से प्रत्‍याशी बनाया है. अनिल मौर्या लंबे समय से चुनाव की तैयारियों में जुटे हुए हैं. अखबारों को बड़े-बड़े विज्ञापन पहले से ही देते रहे हैं. इस बार उन्‍होंने पत्रकारों को ही ओबलाइज करने की तैयारी की. इसके लिए दिन चुना गया 26 फरवरी, जिस दिन सुबह हिंदुस्‍तान के प्रधान संपादक शशि शेखर वोट की चोट का अर्थ समझा रहे थे. जगह चुना गया मुगलसराय और चंदौली के बीच स्थित चौपाल सागर. समय तय किया गया दिन के एक बजे. खिलाने-पिलाने से लेकर गिफ्ट और नगदी देने की तैयारी की गई.  

बसपा प्रभारी अपने नियत समय से चौपाल सागर पहुंचे. इसके बाद दैनिक जागरण के प्रभारी विजय सिंह जूनियर भी विज्ञापन प्रभारी नन्‍हें मुगल और फोटोग्राफर के साथ चौपाल सागर पहुंचे. आज अखबार के ब्‍यूरोचीफ शिव पूजन व पत्रकार गनपत राय, राष्‍ट्रीय सहारा के ब्‍यूरोचीफ आनंद सिंह भी पहुंच गए. सवा बजे तक हिंदुस्‍तान और अमर उजाला के ब्‍यूरोचीफ नहीं पहुंचे तो इंतजार करने वालों की धड़कन बढ़ गई. इंतजार के दर्द को कम करने के लिए पनीर पकौड़े का दौर शुरू हुआ. पत्रकार बंधु जमकर पनीर पकौड़ा तोड़ने लगे. इसी बीच लगभग पौने दो बजे के आसपास हिंदुस्‍तान के ब्‍यूरोचीफ प्रदीप शर्मा भी मौके पर पहुंच गए.

इसके बाद मौर्या जी के पक्ष में लंबी-लंबी फेकने का दौर चलने लगा. पत्रकार चौपाल सागर में ही अनिल मौर्या को जिताने लगे. उन्‍हें जातीय समीकरण समझाने लगे. अखबार में उनके लिए गुडी गुडी लिखने के कसमे वादे भी खाने लगे. दो बजे के आसपास अमर उजाला के ब्‍यूरोचीफ अजातशत्रु चौबे भी अपने दो साथियों अमित द्विवेदी और शमशाद के साथ पहुंचे. इसके बाद शुरू हुआ खाने का दौर. पत्रकार बंधु जमकर खाना पीना खाए. जब चलने लगे तो ब्‍यूरोचीफ लोगों को एक-एक लिफाफा थमाया गया, जबकि उनके साथ गए चिंटू-पिंटू को गिफ्ट पैकेट दिए गए. इसमें महंगे टी सेट और अन्‍य सामान थे. सूत्रों ने बताया कि ब्‍यूरोचीफों को जो लिफाफे दिए गए उसमें नगद ग्‍यारह-ग्‍यारह हजार रुपए थे.

लिहाफा थामने के बाद खुशी मन से सभी ने अपनी अपनी जेबों में रख लिया. किसी ने भी उसे वापस करने की हिमाकत नहीं की, किसी ने भी मुंह पर मारने की हिम्‍मत नहीं की. सभी लोग खुश होकर मौर्या की वाहवाही करते हुए अपने कामों पर लौट आए. हालांकि गलती यह हो गई कि यह काम चोरी छिपे करने की बजाय सरेआम होने से भेद खुल गया. चूंकि इस मामले की कोई खबर अखबार में भी नहीं प्रकाशित हुई, लिहाजा यह भी कहने को नहीं बचा कि प्रत्‍याशी ने प्रेस कांफ्रेंस या ऐसा कुछ कार्यक्रम किया था. अब माल और गिफ्ट लेने वाले भेद खुलने के बाद मुंह छिपाते फिर रहे हैं. ऐसी घटनाएं पहले भी होती थी, लुके और छिपे लेकिन अब तो यह दस्‍तूर बन गया है. (कानाफूसी)

पटना ब्यूरो ऑफिस खाली करके भागे पीके तिवारी, स्ट्रिंगरों का पैसा बकाया

करीब एक महीने पहले राँची के महुआ न्यूज़ के ब्यूरो ऑफिस से सारा सेट-अप पटना लाया गया था। हालांकि वहाँ के स्ट्रिंगरों ने काफी विरोध किया था। पर पी.के तिवारी के चमचे झारखण्ड के स्ट्रिंगरों को आश्वासन की पोटली थमाकर सेट-अप लाने में कामयाब हो गये। ये बात बिजली कि रफ़्तार से बिहार भी पहुँच गयी और पटना और उसके आस-पास के इलाके के दर्जनभर स्ट्रिंगर महुआ न्यूज़ के पटना ब्यूरो ऑफिस पहुँच गये, साथ ही बिहार के कई जिलों के स्ट्रिंगर अपने हक़ के लिए पटना के लिए कूच कर गये। मौके कि नज़ाकत को देखते हुए तिवारी के लोगों ने तत्काल पटना ब्यूरो ऑफिस को खाली करने का काम रोक दिया और यहाँ के स्ट्रिंगरों से उनके बकाया मानदेय के भुगतान के लिए एक सप्ताह का समय लिया गया।

अब तीन सप्ताह बीत चूके थे पर ना तो किसी स्ट्रिंगर को पैसा मिला, न ही कोई जवाब। हां, ये बात जरूर फ़ैल गयी थी कि महुआ न्यूज़ का पटना ब्यूरो ऑफिस 28 फ़रवरी को खाली किया जाएगा। पुरे बिहार के स्ट्रिंगरों ने तैयारी कर ली थी कि इस बार वो किसी कि कुछ नही सुनेंगे, जब तक उनका पैसा नही मिलेगा वो पटना से सेट-अप नहीं ले जाने देंगे। 27 फ़रवरी यानि आज पुरे बिहार के स्ट्रिंगर पटना में इकट्ठा होने वाले थे। 26 फ़रवरी को एक स्ट्रिंगर पटना गया और ब्यूरो ऑफिस पहुंचा तो पता चला की 24 फ़रवरी को ही रातो-रात पीके तिवारी के चमचे पटना ऑफिस खाली कर सारा सेट-अप लेकर चोरों तरह दिल्ली भाग गए। इस दौरान पीके तिवारी, जीबी मॉल वाले चिटफंडिए चमचे के साथ पटना में ही था। अब सारे स्ट्रिंगरों ने मन बना लिया है कि वो पीके तिवारी से अपने रूपये नही मांगेंगे बल्कि उसके खिलाफ जबरदस्त मुहिम चलाकर उसे झुकने को मजबूर कर देंगे। अब क्या होगा स्ट्रिंगरों का अगला कदम इसे बेहद गोपनीय रखा गया है।

 

मधुबनी से अभिजीत कुमार की रिपोर्ट। संपर्कः mr.reporter25@gmail.com

लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा जैसे व्यक्तित्व का मिलना कठिन है

लखनऊ, 25 फरवरी। आज का दौर प्रचार का दौर हैं। हालात ऐसी है कि दो चार रचनाएँ क्या छपीं, लेखक महान बनने की महत्वाकांक्षा पालने लगते हैं। अनिल सिन्हा इस तरह की महत्वकांक्षाओं से दूर, काम में विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे, साहित्य की राजनीति से दूर। इसीलिए उपेक्षित भी रहे। अनिल सिन्हा अत्यन्त सक्रिय रचनाकार थे। इनके जीवन में कोई दोहरापन नहीं था। जो अन्दर था, वही बाहर। आज के दौर में ऐसे रचनाकार का मिलना कठिन है।

लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा को याद करते हुए यह विचार जाने माने कवि भगवान स्वरूप कटियार ने व्यक्त किये। वे अनिल सिन्हा की तीसरी पुण्यतिथि के अवसर पर आज, जन संस्कृति मंच की ओर से लेनिन पुस्तक केन्द्र, लालकुंआ में आयोजित कार्यक्रम ‘हमारी यादों में अनिल सिन्हा’ में बाल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने की। उन्होंने कहा कि अनिल सिनहा में सांस्कृतिक सजगता थी। वे किसी रचना पर विचार करते समय उसमें संघर्ष किस रूप् में अभिव्यक्त हो रहा है, इस पर ध्यान देते थे।

जसम के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि अनिल सिन्हा विविध विधाओं में दक्ष रचनाकार थे। कहानी, आलोचना, पत्रकारिता, कला समीक्षा आदि क्षेत्रों में काम किया। वे उन लोगों में थे जिन्होंने लखनऊ ही नहीं बल्कि प्रदेश में क्रान्तिकारी वाम धारा के सांस्कृतिक आंदोलन का सूत्रपात किया। उनके रचना कर्म में हमें प्रखर व जनपक्षधर दृष्टि मिलती है। उनके जीवन से यह सीखा जा सकता है कि अभाव में रहते हुए भी कैसे अपने आत्म-सम्मान के साथ जिया जाय। उन्होंने अपने आत्म-सम्मान से कभी समझौता नहीं किया।

आलोचक रवीन्द्र कुमार सिन्हा का कहना था कि जनजीवन की कठिनाइयों व आंदोलनों में तपकर ही कोई रचनाकार बनता है। इन आंदोलनों में तपकर ही अनिल सिन्हा के रचनात्मक व वैचारिक व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था। लेखन व पत्रकारिता के साथ ही अनिल सिन्हा की चित्रकला व संगीत में भी गहरी रूचि थी। कवि बीएन गौड़ ने अनिल सिन्हा को याद करते हुए कहा कि अनिल सिन्हा ने गलत को कभी स्वीकार नहीं किया। उनकी खूबी यह भी थी कि अपने विरोध को भी बड़ी शालीनता से दर्ज कराते थे।

इस मौके पर गिरि संस्थान के प्रोफेसर व समाज विज्ञानी हिरण्मय धर ने अनिल सिन्हा को सामाजिक सरोकारों के लिए याद किया और पटना से लेकर लखनऊ तक, उनके साथ की यादों को साझा किया। उनका कहना था कि अनिल सिन्हा हमें प्रेरित करते थे कि उन लोगों पर समाज वैज्ञानिक के रूप् में काम किया जाना चाहिए जो असंगठित हैं। यही लोग आज सबसे ज्यादा शोषण का शिकार हो रहे हैं। नवउदारवाद के दौर ने तो संगठित क्षेत्र को असंगठित कर दिया है। इस पूरी परिघटना को समझना जरूरी है।

अनिल सिन्हा के व्यापक दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि वे जिस पारिवारिक परिवेश से आये थे, वह सामंती व धार्मिक जकड़न भरा था। उन्होंने इस जकड़न के खिलाफ संघर्ष करके अपने को आधुनिक व प्रगतिशील बनाया था। महिलाओं के प्रति उनका नजरिया साफ था और महिला आंदोलन को कैसे सुदृढ़ किया जाय तथा उसमें महिलाओं की भागीदारी कैसे बढ़े, इस पर उनका जोर रहता था।

कार्यक्रम में कथाकार प्रताप दीक्षित, देवनाथ, राम कठिन सिंह, आदियोग, ओपी सिनहा, के शुक्ला, विमला किशोर, आदि ने भी अपने विचार रखे।

 
कौशल किशोर
संयोजक, जन संस्कृति मंच,
लखनऊ।
मो- 9807519227

मोदी की जय जय करने वाली अमेरिकन सर्वे एजेंसी प्‍यू रिसर्च सेंटर भी बेनकाब

नमस्‍ते। आज सुबह-सुबह वॉशिंगटन स्थित प्‍यू रिसर्च सेंटर नाम की एक सर्वे एजेंसी की खबर सब जगह प्रकाशित हुई है जिसमें नरेंद्र मोदी को 78 फीसदी भारतीयों द्वारा प्रधानमंत्री की पसंद बताया गया है। यह सर्वे करने वाली एजेंसी का इतिहास बहुत संगीन है। मैंने विस्‍तार से इस सर्वे के पीछे की राजनीति पर कुछ तथ्‍यात्‍मक बातें रखी हैं और आप सब को भेज रहा हूं। फाइल अटैच है।

कृपया इस संगीन मामले को देखें और अपने-अपने माध्‍यमों में जितनी जल्‍दी हो सके प्रकाशित करें। देश में किए जा रहे तमाम ओपिनियन पोल पर तो न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस ने खुलासा कर ही दिया, लेकिन इस विदेशी एजेंसी पर कोई नहीं बोलने वाला है। इसे प्रकाशित करने का आपका यह कदम जनहित में होगा।

सादर

अभिषेक श्रीवास्‍तव


बारह बरस से भटकती रूहें और एक चुनाव सर्वे: प्‍यू रिसर्च सेंटर का ओपिनियन पोल

अभिषेक श्रीवास्‍तव

इतिहास गवाह है कि प्रतीकों को भुनाने के मामले में फासिस्‍टों का कोई तोड़ नहीं। वे तारीखें ज़रूर याद रखते हैं। खासकर वे तारीखें, जो उनके अतीत की पहचान होती हैं। खांटी भारतीय संदर्भ में कहें तो किसी भी शुभ काम को करने के लिए जिस मुहूर्त को निकालने का ब्राह्मणवादी प्रचलन सदियों से यहां रहा है, वह अलग-अलग संस्‍करणों में दुनिया के तमाम हिस्‍सों में आज भी मौजूद है और इसकी स्‍वीकार्यता के मामले में कम से कम सभ्‍यता पर दावा अपना जताने वाली ताकतें हमेशा ही एक स्‍वर में बात करती हैं। यह बात कितनी ही अवैज्ञानिक क्‍यों न जान पड़ती हो, लेकिन क्‍या इसे महज संयोग कहें कि जो तारीख भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक कालिख की तरह यहां के फासिस्‍टों के मुंह पर आज से 12 साल पहले पुत गई थी, उसे धोने-पोंछने के लिए भी ऐन इसी तारीख का चुनाव 12 साल बाद दिल्‍ली से लेकर वॉशिंगटन तक किया गया है?

मुहावरे के दायरे में तथ्‍यों को देखें। 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्‍टेशन पर साबरमती एक्‍सप्रेस जलाई गई थी जिसके बाद आज़ाद भारत का सबसे भयावह नरसंहार किया गया जिसने भारतीय राजनीति में सेकुलरवाद को एक परिभाषित करने वाले केंद्रीय तत्‍व की तरह स्‍थापित कर डाला। ठीक बारह साल बाद इसी 27 फरवरी को 2014 में नरेंद्र मोदी की स्‍वीकार्यता को स्‍थापित करने के लिए दो बड़ी प्रतीकात्‍मक घटनाएं हुईं। गुजरात नरसंहार के विरोध में तत्‍कालीन एनडीए सरकार से समर्थन वापस खींच लेने वाले दलित नेता रामविलास पासवान की दिल्‍ली में नरेंद्र मोदी से होने वाली मुलाकात और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन; तथा अमेरिकी फासीवाद के कॉरपोरेट स्रोतों में एक प्‍यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी किया गया एक चुनाव सर्वेक्षण, जो कहता है कि इस देश की 63 फीसदी जनता अगली सरकार भाजपा की चाहती है। प्‍यू रिसर्च सेंटर क्‍या है और इसके सर्वेक्षण की अहमियत क्‍या है, यह हम आगे देखेंगे लेकिन विडंबना देखिए कि ठीक दो दिन पहले 25 फरवरी 2014 को न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस नामक एक कांग्रेस समर्थित टीवी चैनल द्वारा 11 एजेंसियों के ओपिनियन पोल का किया गया स्टिंग किस सुनियोजित तरीके से आज ध्‍वस्‍त किया गया है!  ठीक वैसे ही जैसे रामविलास पासवान का भाजपा के साथ आना पिछले साल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीदवारी के खिलाफ नीतिश कुमार के एनडीए से निकल जाने के बरक्‍स एक हास्‍यास्‍पद प्रत्‍याख्‍यान रच रहा है।

न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस ने तो तमाम देसी-विदेशी एजेंसियों के सर्वेक्षणों की पोल खोल ही दी थी, लेकिन आज आए प्‍यू के पोल की स्‍वीकार्यता देखिए कि सभी अखबारों और वेबसाइटों ने उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है और कहीं कोई आपत्ति का स्‍वर नहीं है। दरअसल, ओपिनियन पोल की विधि और तकनीकी पक्षों तक ही उनके प्रभाव का मामला सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पीछे की राजनीतिक मंशा को गुणात्‍मक रूप से पकड़ना भी जरूरी होता है। इसलिए सारे ओपिनियन पोल की पोल खुल जाने के बावजूद आज यानी 27 फरवरी को गोधरा की 12वीं बरसी पर जो इकलौता विदेशी ओपिनियन पोल मीडिया में जारी किया गया है, हमें उसकी जड़ों तक जाना होगा जिससे कुछ फौरी निष्‍कर्ष निकाले जा सकें।

एक पोल एजेंसी के तौर पर अमेरिका के प्‍यू रिसर्च सेंटर का नाम भारतीय पाठकों के लिए अनजाना है। इस एजेंसी ने मनमाने ढंग से चुने गए 2464 भारतीयों का सर्वेक्षण किया है और निष्‍कर्ष निकाला कि 63 फीसदी लोग भाजपा की सरकार चाहते हैं तथा 78 फीसदी लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। विस्‍तृत जानकारी किसी भी अखबार की वेबसाइट से ली जा सकती है, लेकिन हमारी दिलचस्‍पी पोल पर से परदा उठाकर उसके पीछे छुपे चेहरों को बेनक़ाब करने की है।

ध्‍यान दें कि सवा अरब के देश में महज़ ढाई हज़ार लोगों के इस सर्वेक्षण को जारी करने की तारीख चुनी गई 27 फरवरी, जिस दिन रामविलास और मोदी दोनों अपने जीवन का एक चक्र पूरा करने वाले हैं। क्‍या कोई संयोग है यह? कतई नहीं।

प्‍यू रिसर्च सेंटर वॉशिंगटन स्थित एक अमेरिकी थिंक टैंक है जो अमेरिका और बाकी दुनिया के बारे में आंकड़े व रुझान जारी करता है। इसे प्‍यू चैरिटेबल ट्रस्‍ट्स चलाता और वित्‍तपोषित करता है, जिसकी स्‍थापना 1948 में हुई थी। इस समूह में सात ट्रस्‍ट आते हैं जिन्‍हें 1948 से 1979 के बीच सन ऑयल कंपनी के मालिक जोसेफ प्‍यू के चार बेटे-बेटियों ने स्‍थापित किया था। सन ऑयल कंपनी का ब्रांड नाम सनोको है जो 1886 में अमेरिका के पेनसिल्‍वेनिया में बनाई गई थी। इसका मूल नाम पीपुल्‍स नैचुरल गैस कंपनी था। कंपनी के मालिक जोसेफ प्‍यू के सबसे बड़े बेटे जे. हॉवर्ड प्‍यू (ट्रस्‍ट के संस्‍थापक) 1930 के दशक में अमेरिकन लिबर्टी लीग की सलाहकार परिषद और कार्यकारी कमेटी के सदस्‍य थे और उन्‍होंने लीग को 20,000 डॉलर का अनुदान दिया था। यह लीग वॉल स्‍ट्रीट के बड़े अतिदक्षिणपंथी कारोबारियों द्वारा बनाई गई संस्‍था थी जिसका काम अमेरिकी राष्‍ट्रपति रूज़वेल्‍ट का तख्‍तापलट कर के वाइट हाउस पर कब्‍ज़ा करना था। विस्‍तृत जानकारी 1976 में आई जूलेस आर्चर की पुस्‍तक दि प्‍लॉट टु सीज़ दि वाइट हाउस में मिलती है। हॉवर्ड प्‍यू ने सेंटिनेल्‍स ऑफ दि रिपब्लिक और क्रूसेडर्स नाम के फासिस्‍ट संगठनों को भी तीस के दशक में वित्‍तपोषित किया था।

प्‍यू परिवार का अमेरिकी दक्षिणपंथ में मुख्‍य योगदान अतिदक्षिणपंथी संगठनों, उनके प्रचारों और प्रकाशनों को वित्‍तपोषित करने के रूप में रहा है। नीचे कुछ फासिस्‍ट संगठनों के नाम दिए जा रहे हैं जिन्‍हें इस परिवार ने उस दौर में खड़ा करने में आर्थिक योगदान दिया:

1. नेशनल एसोसिएशन ऑफ मैन्‍युफैक्‍चरर्स: यह फासीवादी संगठन उद्योगपतियों का एक नेटवर्क था जो न्‍यू डील विरोधी अभियानों में लिप्‍त था और आज तक यह बना हुआ है।

2. अमेरिकन ऐक्‍शन इंक: चालीस के दशक में अमेरिकन लिबर्टी लीग का उत्‍तराधिकारी संगठन।

3. फाउंडेशन फॉर दि इकनॉमिक एजुकेशन: एफईई का घोषित उद्देश्‍य अमेरिकियों को इस बात के लिए राज़ी करना था कि देश समाजवादी होता जा रहा है और उन्‍हें दी जा रही सुविधाएं दरअसल उन्‍हें भूखे रहने और बेघर रहने की आज़ादी से मरहूम कर रही हैं। 1950 में इसके खिलाफ अवैध लॉबींग के लिए जांच भी की गई थी।

4. क्रिश्चियन फ्रीडम फाउंडेशन: इसका उद्देश्‍य अमेरिका को एक ईसाई गणराज्‍स बनाना था जिसके लिए कांग्रेस में ईसाई कंजरवेटिवों को चुनने में मदद की जाती थी।

5. जॉन बिर्च सोसायटी: हज़ार इकाइयों और करीब एक लाख की सदस्‍यता वाला यह संगठन कम्‍युनिस्‍ट विरोधी राजनीति के लिए तेल कंपनियों द्वारा खड़ा किया गया था।

6. बैरी गोल्‍डवाटर: वियतनाम के खिलाफ जंग में इसकी अहम भूमिका थी।

7. गॉर्डन-कॉनवेल थियोलॉजिकल सेमिनरी: यह दक्षिणपंथी ईसाई मिशनरी संगठन था जिसे प्‍यू ने खड़ा किया था।

8. प्रेस्बिटेरियन लेमैन: इस पत्रिका को सबसे पहले प्रेस्बिटेरियन ले कमेटी ने 1968 में प्रकाशित किया, जो ईसाई कट्टरपंथी संगठन था।

जोसेफ प्‍यू की 1970 में मौत के बाद उनका परिवार निम्‍न संगठनों की मार्फत अमेरिका में  फासिस्‍ट राजनीति को फंड कर रहा है:

1. अमेरिकन इंटरप्राइज़ इंस्‍टीट्यूट, जिसके सदस्‍यों में डिक चेनी, उनकी पत्‍नी और पॉल उल्‍फोविज़ जैसे लोग हैं।

2. हेरिटेज फाउंडेशन, जो कि एक नस्‍लवादी, श्रम विरोधी, दक्षिणपंथी संगठन है।

3. ब्रिटिश-अमेरिकन प्रोजेक्‍ट फॉर दि सक्‍सेसर जेनरेशन, जिसे 1985 में रीगन और थैचर के अनुयायियों ने मिलकर बनाया और जो दक्षिणपंथी अमेरिकी और ब्रिटिश युवाओं का राजनीतिक पोषण करता है।

4. मैनहैटन इंस्टिट्यूट फॉर पॉलिसी रिसर्च, जिसकी स्‍थापना 1978 में विलियम केसी ने की थी, जो बाद में रीगन के राज में सीआइ के निदेशक बने।

उपर्युक्‍त तथ्‍यों से एक बात साफ़ होती है कि पिछले कुछ दिनों से इस देश की राजनीति में देखने में आ रहा था, वह एक विश्‍वव्‍यापी फासिस्‍ट एजेंडे का हिस्‍सा था जिसकी परिणति ऐन 27 फरवरी 2014 को प्‍यू के इस सर्वे में हुई है। शाह आलम कैंप की भटकती रूहों के साथ इससे बड़ा धोखा शायद नहीं हो सकता था। यकीन मानिए, चौदहवीं लोकसभा के लिए फासीवाद पर अमेरिकी मुहर लग चुकी है।

(समकालीन तीसरी दुनिया के मार्च अंक में प्रकाशित होने वाले एक बड़े लेख का अंश)


लेखक अभिषेक श्रीवास्तव प्रतिभाशाली और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे वैकल्पिक पत्रकारिता और सरोकारी पत्रकारिता को लेकर हमेशा सजग और सक्रिय रहते हैं. उनसे संपर्क 08800114126 या guru.abhishek@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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आठवें हफ्ते की टीआरपी से एक बात तो पक्की हो गई है कि इंडिया न्यूज ने जी न्यूज वाला नंबर चार का स्थान परमानेंट रूप से कब्जा लिया है. इस हफ्ते नंबर वन पर मौजूद आजतक की टीआरपी में जोरदार गिरावट आई है. 2.7 अंक गिरकर आजतक 19.1 पर आ गया है. फिर भी यह नंबर दो पर मौजूद एबीपी न्यूज से बहुत आगे है.

नंबर दो और तीन पर मौजूद एबीपी न्यूज व इंडिया टीवी में आपसी जंग कायम है लेकिन रजत शर्मा लाख कोशिश करके भी नंबर दो पर नहीं पहुंच पा रहे हैं. इंडिया न्यूज को इस हफ्ते भी टीआरपी में ठीकठाक फायदा हुआ है. आईबीएन7 की स्थिति ठीक होती नहीं दिख रही है. पूरा चार्ट यूं है….

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हिन्दुस्तान तकसीम हुआ पाकिस्तान बना, लेकिन कुछ पुरानी किताबों में रेखाएं एक हैं

किताबें यूं तो बोल नहीं सकती लेकिन शब्द बोलते हैं… इसलिए वो भी। यह आदत भी ठीक नहीं थी कि किसी पेज का पता याद रखना होता, तो कभी बीच से, कभी हाशिए पर उसे मोडं दिया करता था। शायद बहुत से पाठक ऐसा ही करते हों। याद है कि बीती बार कुछ ऐसा करके, कई दिनों तक भूल गया था। किताब अभी और पढ़ी जानी है…एक कहानी उसी मोड़ पर खड़ी रही जहां छोड़ आया था। समझ नहीं पाया शायद, लेकिन अपनी भी एक अधूरी कहानी छोड़ आया था। आज जब लौट रहा हूं तो अजनबी सा महसूस हो रहा है। कहानी तो इंतजार में थी… अब उसे आगे पढ़ा जाना है। उस पेज को अनफोल्ड किया…ताज्जुब होता है उन हर्फों पर, कितने सब्र से बैठे रहे। वहीं मिले जहां उन्हें होना था। पेज से किताब का एक खूबसूरत रिश्ता होता है। जनम-जनम के साथ की तरह। आप यह भी देखें कि पेज से शब्द व वाक्यों का भी एक नाता तो है। दो सामानांतर को एक दूसरे के लिए इस तरह जीते कम देखा था। चूंकि अब फिर से पढ़ने लगा था…एक तीसरी चीज भी साथ हो गयी थी। जमाने से शिकायत नहीं कि उसने पेज को नंबर से याद रखा, लेकिन जिस तरह का नाता हमारा कायम हुआ वो आदमियों सा था। दोस्त का दोस्त से, सरीखा रिश्ता।

 
कोई रिश्ता बनाकर मुतमईन होना नहीं अच्छा
मुहब्बत आखिरी दम तक आजमाती है…

 
किताबों के साथ बढ़िया फील होता है। किसी की होकर खुद को सुपुर्द कर दिया करती है। पढ़ने-लिखने वाले थोड़े इंसान ही हैं…उसे उसके जैसा प्यार लौटा देते है। एक तरह से प्यारा सा बंधन कह सकते हैं। इन्हें करीब से देखकर हैरान हूं कि कोई साथी क्या इस क़द्र भी साथ निभा सकता है! बेपरवाह ही हूं कि कभी कुछ किताबें खो भी जाया करती हैं। क्या कोई उसे यहां से मांग ले गया था? हो सकता है। कहना होगा कि सुंदर किताब थी…अफसोस संभाल कर रख ना सका। अब तो सिर्फ वो वरक ही बाक़ी रहा जो शायद कट कर निकल गया था। किताब की झलक ग़र किसी को देखनी हो, तो वो यही था…पाठ से जुदा होकर उसे ठीक नहीं लगा था… युं ही कमरे में मारा फिरता है। इतना ज़्यादा अकेला नहीं रह सकता। आओ एक ख्वाब सजाएं…किसी के साथ जीने लगा है…अब वो आवारा नहीं, सिर्फ भीड़ में तन्हा रह रहा है। दूसरी किताब के पन्नों के बीच पड़ा है। किसी खूबसुरत किताब का कोई एक पन्ना खो जाए तो खालीपन बनने लगता है। पुरानी से पुरानी किताब को संभालकर रखना किसी जिंदा दास्तान को संभाल रखने बराबर होता है। तकनीक ने कंटेंट से उस तरह का रिश्ता थोडा बदल दिया…लेकिन उसके संरक्षण की आदत खत्म नहीं की।
 
यह सोच लिया कि किसी को आवाज़ नहीं देनी मोहसिन
कि अब मैं भी तो देखूं…कोई कितना है तलबगार मेरा।

 
कुछ अजीब सी हैं यह किताबें भी…प्यार सिखाना तो समझा जा सकता लेकिन नफरत भी? जोड़ना भला होता है, फिर उसी को तोडने की बातें? एक जोड़ रही तो दूसरी मोड़ रही। कोई किसी को महान बताती तो कोई और को…ठहर यह ख्याल आया कि अरे किताब नहीं उसे लिखने वाला, प्रसार करने वाला ज्यादा जिम्मेदार होता है। किताबें तलबगार को वही रोशनी या राह दे रहीं जिस कामना से उसे वो उसका चुनाव करता है। कबीर की साखियां…ग़ालिब और मीर के दीवान तो यही पढ़े थे। वाल्मिकी –तुलसीदास की रचनाएं कोई भूला सकेगा भला? याद आ रहा कि रसखान कृष्ण भक्ति के दीवाने थे। सुना था फराज़ को ग़ालिब व कैफी से दिली मुहब्बत थी…पढ़ा भी यही। हिन्दुस्तान जब तकसीम हुआ पाकिस्तान बन गया…दोस्तों कुछ पुरानी किताबों में रेखाएं एक हैं।
 
आता है याद मुझको गुजरा हुआ ज़माना…वो बाग़ की बहारें वो शब का चहचहाना
आज़ादियां कहां वो अब अपने घोंसले की…अपनी खुशी से आना, अपनी खुशी से जाना।

 
कहानियां-कविताओं के साथ जीना बेशुमार जिंदगियों के साथ जीना है। किताब का धारक या तलबगार तय करे कि किताब से कौन सी निस्बत है। क्या उसकी रूचि कहती है? तलाश करें नग़मा मिलेगा, किस्सा-कहानी अदब और अदीबों की दुनिया यहीं सांस लेती है। एक कहानी हर पल बन रही…लिखी जा रही। एक अधूरी रह जाती है। क्या यह बदली भी जा सकती थी…दूसरा रुख ले सकती थी? बहुत सी कहानियां को अनुभव कर…उसे उस तरह देख कर तब्दील करने का मन होता है। मुकम्मल कहानियों की उम्मीद नहीं होती, मिल जाए तो स्वागत है। रचना की दुनिया फिर भी अधूरी रह जाए तो ठीक होता है…क्योंकि शायद पाठक को थोडा प्यासा छोड़ देना ही रचनात्मकता का कारण है। कहानी का आदमी से एक वास्ता होता है…बहुत बार उसमें अपनी ही कहानी नजर आती है। उसके पात्रों में पाठक खुद का अक्स पा लेता है। युं तो हररोज ही एक कहानी घट रही, लेकिन लेखक की नज़र से ओझल चीजें सृजन से बाहर हो जाया करती है। एक मामूली सी दिखने वाली घटना को भी रचना में शामिल करने की क्षमता लेखक को सक्षम बनाती है। कहानियों से गुजरते हुए हम उन घटनाओं के समक्ष रहते हैं जो किसी ने देखी थी। देर से सही रचना के माध्यम से पाठक भी उसको देख पाता है। कह सकते हैं कि अनदेखी-अनजान दुनिया से रूबरू कराने में किताब सरीखा सृजनात्मक माध्यम कमाल हैं।
 
बड़ा करम है यह मुझ पर, अभी यहां से ना जाओ…बहुत उदास है यह घर,
अभी यहां से ना जाओ, यहां ना था कोई दिन-भर, अभी यहां से ना जाओ।

 
सभी तरह की किताबों से एक ही जगह मिलने के लिए पुस्तक मेला व पुस्तकालय की तामीर हुई थी। मेला में अपनी पसंद की किताब तलाश करना एक जिज्ञासु काम कहा जा सकता है। लेकिन आयोजक मेले में आने वालों को पुस्तकों से जुड़ी बहुत सी बातों से भी रूबरु करा देता है। अब का पुस्तक मेला एक सकारात्मक सांस्कृतिक मूवमेंट का रुप ले चुका है। पत्रकारिता-रंगमंच-टेलीविजन-सिनेमा के जरिए किताबें हमसे बहुत करीब हो चुकी हैं।
 
दोस्तों तर्क़-ए-मुहब्बत की नसीहत है फुजुल
और ना मानो तो दिल-ए-ज़ार को समझा देखो…

 
समाज-देश के हित में एक विमर्श हमेशा से जरूरी रहा है। जिस व्यक्ति ने पुस्तक नहीं पढ़ी हो उसे भी धारा का साझेदार बनाने में मेला सफल रहा है। किसी सुपरिचित लेखक से संवाद करने का अवसर रोज नहीं हुआ करता। मेले का शहर-दर-शहर आयोजन कर नेशनल बुक ट्रस्ट सरीखा संस्थान करीब-करीब यह कर सका है। पुस्तक मेले को केवल पब्लिसिटी का पैरोकार नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह महज बाहरी आवरण है। वो सृजन-संवाद-रचनात्मकता का सारथी है। पुस्तक मेला किताबों को उसके पाठक तक पहुंचाने का एक दिलचस्प नेटवर्क हैं।

 

लेखक सैयद एस. तौहीद से संपर्क passion4pearl@gmail.com पर किया जा सकता है। 

दस सुझाव………और बदल जायेगी आम आदमी की दशा।

बहुत जल्दी होने जा रहे लोक सभा के चुनाव इस बार काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं। भजपा और कांग्रेस के लिए जीवन और मरण का प्रश्न है। तमाम तरह के आरोपों और बातों के बीच अभी तक ख़ास मुद्दे उभरकर नहीं  आये हैं। मोदी-मोदी और राहुल-राहुल से देश का भला नहीं होगा। अब सीधे-सीधे मुद्दे पर आना ही होगा, और यदि किसी दल के लिए देश और प्रदेश फतह करना जरुरी है तो प्रदेश के लिए भी कुछ करना जरुरी है, यह किसी को समझाने की जरुरत नहीं है। देश के आम आदमी को खैरात नहीं उसका अधिकार चाहिए।

ज्यादा लम्बी बात करने के बजाये मुद्दे पर रहना जरुरी है। मैं ये दस सुझाव देना चाहता हूँ, जब आम आदमी की बात हो रही है तो आम आदमी की बात सुनी भी जानी चाहिए:-

1– उत्तर प्रदेश का विभाजन चार हिस्सों में(पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) किया जाए।

2– इन चार क्षेत्रों में हाई कोर्ट की बेंच भी तत्काल स्थापित की जाये।

3– सभी क्षेत्रों में आरक्षण का आधार केवल और केवल आर्थिक हो।

4– सरकारी सेवाओं की तरह निजी क्षेत्र में भी पेंशन देने के लिए कानून बने, जो सिर्फ नाम के लिए न हो। जिन कर्मचारियों ने न्यूनतम पांच साल पीए में अंशदान किया हो उनको पेंशन की गारंटी मिले।
 
5– आयकर में छूट की न्यूनतम सीमा पांच लाख हो और जनप्रतिनिधयों समेत किसी भी क्षत्र को इससे कोई छूट न हो। आखिर इनको इसकी जरूरत क्या है? आयकर का सरलीकरण करके सीधे कर की व्यवस्था हो, हज़ार तरह की छूटें केवल कर चोरी और घूसखोरी का माध्यम हैं।

6– सत्तर प्रतिशत तक अंक पाने वाले छात्रों का शिक्षा ऋण माफ़ हो।

7– पूरे देश में सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में मतदान अनिवार्य हो और मतदान के लिए न्यूनतम एक हफ्ते का समय संसद और विधान सभाओं के लिए न्यूनतम एक माह का समय।

8– देश में केंद्रीय स्तर पर और राज्यों में चुनाव आयोग के बजाये जनाधिकार आयोग बनाया जाये जो केवल यह सुनिश्चित करे कि कब कौन सा चुनाव होगा और किस-किस ने वोट डाला या नहीं। आयकर निदेशालय की तर्ज़ पर यह एक मतदाता का हिसाब रखे की क्यों और किसने वोट नहीं दिया।
 
9– बिजली, पानी, गैस, पेट्रोल और दैनिक जरूरतों की वस्तुओं पर देश भर में कर की दरे सामान हों।

10– देश के प्रत्येक मतदाता का यह सुनिश्चित होने पर कि उसने लोकसभा और विधान सभा के अलावा अपने यहाँ के स्थानीय चुनाव में हिस्सा लिया है न्यूनतम दो लाख रूपए का जीवन बीमा और स्वास्थय बीमा अनिवार्य कर दिया जाए।

 

लेखक आशीष अग्रवाल बरेली के वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनसे संपर्क ईमेल asheesh_agr64@yahoo.co.in पर किया जा सकता है।
 

तीन चौथाई अभ्यर्थी नहीं दे पाए लखनऊ दूरदर्शन की लिखित परीक्षा

पिछले दिनों लखनऊ दूरदर्शन ने अपनी समाचार सेवा के विभिन्न पदों हेतु आवेदन आमंत्रित किए थे। ये स्थायी पद नहीं थे, संविदा के थे और पहले भी इस प्रकार की भरती हुई हैं, लेकिन पत्रकारिता में जिस प्रकार की अनिश्चय की स्थिति है, बहुत सारे संस्थान के युवा पत्रकार साथियों ने इस पद हेतु आवेदन किया था। संस्थान सरकारी है तो वेतन भी बुरा नहीं था, इसका भी आकर्षण था लेकिन ऐसे साथियों के पैरों तले जमीन तब खिसक गई जब उन्हें पता चला कि लिखित परीक्षा हो गई है और अब साक्षात्कार होने हैं। वास्तव में बड़ी संख्या में आवेदकों को यह जानकारी ही नहीं मिल सकी कि लिखित परीक्षा कब होनी है। ऐसे में नाराज इन साथियों को किसी षड़यंत्र की बू आ रही है।

 
इस सम्बन्ध में जब कुछ आवेदकों ने लखनऊ दूरदर्शन के निदेशक(समाचार) आरपी सरोज से सम्पर्क किया तो उन्होंने बताया कि परीक्षा की सूचना लखनऊ दूरदर्शन की वेबसाइट पर उपलब्ध थी। दूरदर्शन के समाचार में भी इस बारे में जानकारी दी गई थी। उन्होंने स्वीकार किया है कि मेल या फोन से इस सम्बन्ध में सूचना नहीं दी जा सकी थी। खुद सरोज बताते हैं कि आवेदन भरने वालों की संख्या एक हजार से अधिक थी, जबकि परीक्षा में करीब 250 शरीक हो सके अर्थात् एक चौथाई। नाराज आवेदकों का कहना है कि अगर सूचना वेबसाइट पर दी जानी थी तो इसकी पूर्व सूचना होनी चाहिए थी या आवेदन पत्र में इसका उल्लेख होना चाहिए था। उनकी शिकायत जायज लगती है।

 

(पत्रकार आलोक पराड़कर की फेसबुक वॉल से)

बयान के लिए माफी मांगें शिंदे, महाराष्ट्र के पत्रकारों ने जताया विरोध

सुशील कुमार शिंदे ने रविवार को सोलापुर में युवक कांग्रेस की एक जनसभा को संबोधित करते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कुचल डालने की बात कही थी। इसका समूचे महाराष्ट्र मे जोरशोर से विरोध हो रहा है। महाराष्ट्र के सोलह पत्रकार संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रही संस्था 'पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती' के अध्यक्ष एसएम देशमुख ने कल रात जारी एक प्रेस विज्ञप्ती में सुशील कुमार शिंदे के बयान का विरोध करते हुऐ उन्हें पत्रकारों से माफी मांगने के लिए कहा। देशमुख ने कहा कि सुशील कुमार शिंदे देश के गृहमंत्री हैं और उन्हे बोलते समय अपनी पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए।

इस बीच आज महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में पत्रकारों ने सुशील कुमार शिंदे के बयान के विरोध में प्रदर्शन किये। नगर और सातारा में पत्रकारों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन दे कर अपना विरोध प्रकट किया। सातारा में कांग्रेस के कार्यालय के सामने ही पत्रकारों ने नारेबाजी की। बीड और अन्य शहरों से भी पत्रकारों के विरोध प्रदर्शन की खबर है।

कुछ दिन पहले ही औरंगाबाद के सांसद चंद्रकांत खरे ने पत्रकारों को धमकी देते हुए कहा था कि 'चुनाव के बाद तुम्हे देख लुंगा।' अब सुशीलकुमार शिदे ने धमकी दी है। महाराष्ट्र में पहले ही पत्रकोरों के उपर बढ़ते हमलों से पत्रकारिता एक जोखिम भरा काम हो गया है। अब तो राजनेता भी पत्रकारों को धमकियां देने लगे हैं। इससे महाराष्ट्र के पत्रकारिता जगत मे काफी गुस्सा है।

 

Patrakar halla virodhi kruti samiti mumbai <phvksm@gmail.com>

न्यूज एक्सप्रेस के जोरदार स्टिंग पर बाकी मीडिया चुप्पी क्यों साध गया?

Surendra Grover : जिस तरह ‪‎न्यूज़ एक्सप्रेस‬ पर ‎ऑपरेशन प्राइम मिनिस्टर‬ के ज़रिये Vinod Kapri ने ‎सी-वोटर‬ को नग्न किया है, इसके लिए न्यूज़ एक्सप्रेस की टीम बधाई की पात्र है.. मगर एक बात समझ नहीं आ रही कि ‎मीडिया‬ इस पर पर चुप्पी क्यों साध गया..

अरे भाई, आप लोग उपेक्षा कर दोगे तो आप को जनता उपेक्षित कर देगी.. इससे यह भी ज़ाहिर हो रहा है कि चुप्पी साधे बैठा मीडिया बरसों से ‎सर्वे‬ के नाम पर पूरे देश को मूर्ख बनाता चला आया.. कोई टीवी चैनल एग्जिट पोल के नाम पर किसी अवांछित को भावी प्रधानमंत्री बतौर पहली पसंद बताता रहा तो हर अखबार एक ही सर्वे को अपने अपने हिसाब से खुद को नम्बर वन साबित करता रहा.. जय हो..

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र ग्रोवर के फेसबुक वॉल से.

न्यूज एक्सप्रेस का स्टिंग और ‘एडिटर ऐट लार्ज’ का जिक्र

पंकज कुमार झा : एक जगह ज़रा पक्षपाती दिखे Vinod Kapri जी. इस स्टिंग में सी-वोटर के यशवंत देशमुख के मुंह से दो संपादकों का नाम निकला. इसे बीप कर दिया गया. बाद में सफाई दी गयी कि चूंकि उन संपादकों से बात नहीं की गयी है अतः उनका नाम बीप किया गया है. ज़ाहिर है जितने लोगों का नाम इस स्टिंग में आया है, उन सबसे बात नहीं की गयी होगी. हालांकि आप चाहें तो कुछ कड़ियां जोड़ सकते हैं.

बार-बार उस स्टिंग में 'एडिटर ऐट लार्ज' पदनाम का जिक्र है. जहाँ तक मुझे ध्यान आ रहा है यह पद केवल टीवी टुडे नेटवर्क में है. राहुल कंवल हैं इस पद पर. संयोग से सी-वोटर का आजतक से टाई-अप भी था अभी तक. इस स्टिंग के बाद इस करार को निलंबित किया गया है टुडे द्वारा. तो एडिटर ऐट लार्ज वही तो नहीं थे? हो सकता है अपना कयास गलत हो. अगर ऐसा हुआ तो खेद जताते हुए ये पोस्ट वापस ले लिया जाएगा. लेकिन तथ्य फिलहाल इसी ओर इशारा कर रहे हैं.

भाजपा से जुड़े पत्रकार पंकज कुमार झा के फेसबुक वॉल से.

सूचना विभाग के नौ अधिकारी उपनिदेशक तथा सहायक निदेशक पदों पर प्रोन्नत

लखनऊ : उत्तर प्रदेश सरकार ने सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के नौ अधिकारियों को प्रोन्नति प्रदान की है। प्रोन्नत अधिकारियों में श्री सर्वेंश कुमार दुबे (सहायक निदेशक), प्रेम लाल (सहायक निदेशक) तथा सुरेश चन्द्र (सम्पादक) को उप निदेशक के पद पर प्रोन्नति दी गयी है। इसी तरह चार सूचना अधिकारियों को सहायक निदेशक के पद पर प्रोन्नत किया गया है, जिनमें श्री अवधेश कुमार, डा0 मधु ताम्बे, श्री सुधीर कुमार तथा श्री प्रमोद कुमार शामिल हैं।

इसके अलावा श्री रवीन्द्र नाथ मिश्र (फिल्म अधिकारी) को निर्माता फिल्म तथा प्रभारी (कंप्यूटर) श्री दिनेश सहगल को नियोजन एवं मूल्यांकन अधिकारी (सहायक निदेशक स्तर) के पद पर पदोन्नति की गयी है। ये सभी अधिकारी अपने वर्तमान तैनाती स्थल पर ही कार्य करते रहेंगे।

बिहार में दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक को विधानसभा के सचिव ने बतायी औकात

लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत पत्रकारों का काम केवल सूचना ग्रहण करना और उन्हें जन सामान्य के बीच सुलभ कराना होता है। परंतु कुछ पत्रकार अपवाद सरीखे होते हैं। ऐसे ही एक पत्रकार अरूण पांडे हैं जो पटना में दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं। उन्होंने पत्रकारिता को किनारे रख विधायी प्रक्रिया में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर रहे थे। लेकिन बिहार विधानसभा के सचिव ने उन्हें उनकी औकात बताते हुए कहा कि पांडे जी आज तो प्रेस से हैं न आप मत बोलिए।

दरअसल हुआ यह कि मंगलवार को राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद अपने दल के विधायकों के साथ पैदल मार्च कर विधानसभा पहुंचे थे। विधानसभा के अध्यक्ष उदयनारायण चौधरी पहले ही मैदान खाली कर गये थे। इसलिए राजद सुप्रीमो को सचिव के कक्ष में जमना पड़ा। इसी क्रम में राजद सुप्रीमो सचिव को अपनी भाषा में दल बदल कानून और विधायकों के सशरीर उपस्थित होने का महत्व बता रहे थे। इस बीच उनके निर्देश पर वे नौ विधायक जिनके दल छोड़ने की बात कही गयी थी, ने हस्तलिखित आवेदन राजद के पक्ष में विधानसभा के सचिव को दिया। विधायकों ने पावती की मांग की। इस पर सचिव ने कुछ आनाकानी करने का प्रयास किया। इसी मुद्दे पर अरूण पांडे टपक पड़े। कहने लगे कि आवेदन की पावती जरूर मिलनी चाहिए। इस पर विधानसभा के सचिव ने उन्हें गौर से देखा और पूछा – पांडे जी, आप तो प्रेस से ही हैं न? सवाल सुनकर पांडे जी बंगले झांकने लगे और चुपचाप बैठ गये।

पटना से 'अपना बिहार डाट ओआरजी' के संपादक नवल कुमार की रिपोर्ट.

दीपक चौरसिया ने रवीन्द्र शाह की स्मृति में शुरू कराया पुरस्कार, इंदौर में आयोजन आज

वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया ने स्व. रवींद्र शाह की स्मृति को जिंदा रखने के लिए उनके नाम पर एक पुरस्कार शुरू करा दिया है. 'स्व. रवींद्र शाह स्मृति पत्रकारिता प्रतिभा प्रोत्साहन पुरस्कार' हर वर्ष इंदौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के टापर छात्र या छात्रा को दिया जाएगा. इसके तहत दस हजार रुपये नगद और प्रमाण पत्र दिया जाएगा. पुरस्कार इसी वर्ष से प्रारंभ कर दिया गया है और आज इंदौर में रवींद्र शाह की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कार दिया जाएगा.

इंदौर के जाल सभागार में अपरान्ह तीन बजे कबीर भजन होगा. उसके तुरंत बाद चार बजे से मुख्य कार्यक्रम 'कारपोरेट मीडिया बनाम न्यू मीडिया' पर विमर्श होगा.  कार्यक्रम में कई जाने-माने लोग शिरकत करेंगे. श्रीवर्धन त्रिवेदी, राजपाल यादव, यशवंत सिंह, राजीव शर्मा समेत दर्जन भर मेहमान इंदौर पहुंच रहे हैं. विजय मनोहर तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे. दीपक चौरसिया ने आयोजन के लिए अपना रिकार्डेड संदेश भेजा है. आयोजन 27 फरवरी 2014 को जाल ऑडिटोरियम इंदौर में अपरान्ह तीन बजे प्रारंभ होगा. आयोजन समिति के मुख्य कार्यकर्ता राजेंद्र चौहान हैं जिनसे मोबाइल नंबर 09827023451 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.


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उत्तर प्रदेश के चुनावी कवरेज में उस दिन मैं मैनपुरी में था। शिवरात्रि  का दिन था। व्रत रखा था। मुलायमसिंह यादव के गांव सैफई से लौटते हुए ड्राइवर से मैंने कहा कि किसी शिव मंदिर ले चले। प्राचीन भीमसेन मंदिर में गया। लौटकर गाड़ी में बैठा ही था कि इंदौर से एक मित्र का फोन आया। शाम करीब साढ़े पांच का वक्त था। सूचना दी कि रवींद्र शाह का एक्सीडेंट हो गया है। जरा पता करो मामला क्या है? मैंने दिल्ली में धीरेंद्र पुंडीर को फोन लगाया। बिजी मिला। दूसरा नंबर डायल करता इसके पहले ही दो एसएमएस आ गए। इससे बुरी खबर कोई हो नहीं सकती थी कि रवींद्र शाह इंदौर से भोपाल के बीच एक सड़क हादसे में दुर्घटना स्थल पर ही मौत की नींद सो गए।

यह लिखते  हुए अब तक भी यकीन नहीं आ रहा है कि रवींद्रजी नहीं रहे। हादसे के चार दिन पहले ही फोन पर बात हुई थी। उत्तर प्रदेश की अपडेट उन्होंने ली थी। इंदौर जाने के बारे में बताया था। यह भी तय हुआ था कि अगर कवरेज के दौरान मैं बदायुं और संभल के आगे आता हूं तो एक दिन गाजियाबाद भी पहुंचूंगा। वहीं मुलाकात करेंगे। रह-रहकर उनका चेहरा मेरी आंखों में कौंध रहा है। मैं अपने मोबाइल को बार-बार देख रहा हूं। लग रहा है कि अभी फोन बजेगा। रवींद्रजी की आवाज सुनाई देगी। हकीकत यह है कि उनकी आवाज अब कभी सुनाई नहीं देगी। 17 साल के रिश्तों की अनगिनत यादें ताजा हो रही हैं। इस दरम्यान वे जैसे थे, वैसे ही रहे। सदाबहार। सुदर्शन। सक्रिय। खुशमिजाज। तरोताजा।

1993। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के दूसरे बैच से पास होकर निकला था। इंदौर का नईदुनिया भोपाल में दैनिक नईदुनिया के नाम से छपने लगा था। यह मेरे पत्रकारीय सफर का पहला पड़ाव था। नईदुनिया इंदौर से भूपेंद्र चतुर्वेदी तब स्वदेश में कार्यकारी संपादक बनकर आए थे। हम प्रेस कॉम्पलैक्स के नीलम रेस्टॉरेंट में अक्सर मिलते थे। भूपेंद्रजी ने मुझे इंदौर धकेला। कहते थे कि अगर इस लाइन में गंभीरता से आए हो तो नईदुनिया जरूर जाओ। नईदुनिया की छवि तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसी थी। मैं सोचता था कि मुझ जैसे नौसिखिए को वहां कहां गुंजाइश होगी। पहले कुछ साल रियाज करें। फिर वहां जाएं। लेकिन भूपेंद्रजी ने मेरा इंदौर का टिकट कटाकर ही दम लिया। इंदौर मेरे लिए अजनबी शहर था।

उन्होंने मुझे रवींद्रजी से मिलने को कहा, जो तब नईदुनिया को छोड़कर फ्रीप्रेस के पहले संपादक हो चुके थे। उनसे पहला सामना वहीं हुआ। जुलाई 1994। वे उसी लुक में हमारी आखिरी मुलाकात तक बने रहे। एक बार पत्रकारिता विवि के जनसंपर्क विभाग की प्रमुख देवेंदर कौर उप्पल ने किसी समारोह में कहा था कि रवींद्र को वे बरसों से ऐसा ही देख रही हैं। सदाबहार। वे वाकई सदाबहार थे।

इंदौर में जब मैं उनसे मिला, तब तक फ्रीप्रेस के अंदरुनी हाल अच्छे नहीं रहे होंगे। मैं रवींद्रजी के भरोसे दैनिक नईदुनिया में कभी न लौटने की कसम खाकर निकला था। गलत मुहूर्त रहा होगा। फ्रीप्रेस में मंगल प्रवेश पर ग्रहण लग गया। तीन-चार दिन उनके दफ्तर गया। उन्हें भी अहसास था कि बंदा उनके भरोसे सड़क पर है। मैं भी समझ गया कि माजरा गड़बड़ है। न मैंने पूछा कि कब ज्वाइन करूं। न उन्होंने कहा कि यार गलत आ गए। अनादिकाल से मेरी पीढिय़ों में कोई मीडिया में रहा नहीं था सो यहां की सुनिश्चित अनिश्चितताओं का कोई अनुभव नहीं था। वे हर मुलाकात में मुझे उत्साहित करते। कहते कि कोई रास्ता निकालते हैं। नईदुनिया के दफ्तर बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग की ओर आखिरी धक्का उन्होंने दिया।

इससे पहले कि वहां चयन होता, दैनिक भास्कर में मुझे चुन लिया गया। तब श्रवण गर्ग स्थानीय संपादक थे। रवींद्रजी ने ही मुझे उनके पास भेजा था। डूबते को ताकत से उभरते भास्कर में यह बड़ा सहारा था। मुझे बिजनेस पेज पर काम मिला, जिसमें मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं थी। एकाध महीने बाद ही नईदुनिया से बुलावा आ गया। मैं बुरे वक्त में सहारा देने वाले श्रवणजी को नाराज छोड़कर भारी मन से नईदुनिया में ज्वाइन हो गया। रवींद्रजी ने भी राहत की सांस ली। सीख दी कि जल्दबाजी में फैसले मत करना। डटकर काम करना। नईदुनिया की लाइब्रेरी से रिश्ता बनाना।

हिंदी फ्रीप्रेस एक उम्दा अखबार था। लोगों को इसे मालवे का जनसत्ता कहते सुना। लेकिन अक्सर अच्छी चीजों की उम्र लंबी नहीं होती। मुझे याद नहीं यह अखबार कब बंद हुआ। रवींद्रजी भी इंदौर में नहीं रहे। न ही मेरा उनसे कोई संपर्क रहा। वे मुझे एक किनारे पहुंचाकर अपने लिए दूसरे किनारे की तलाश में निकल गए। जब वे वेबदुनिया के संपादक होकर आए तो कभी-कभार किसी कार्यक्रम में उनसे आमना-सामना होने लगा। मुस्कराकर पूछते, 'कैसा चल रहा है?' हमने उनमें कोई बदलाव नहीं देखा। पहनावे के प्रति बेपरवाह रहने वाले पत्रकारों से अलग रवींद्रजी की खास पसंद उनके आकर्षक लिबास से भी झलकती थी। उम्र का असर करीने से सजी दाढ़ी में कभी झांकते नहीं देखा।

2002। साल के आखिर में एक दिन वेबदुनिया से उनके जाने की सूचना मिली। वे फिर एक नए किनारे की तलाश में इंदौर से निकल गए। अब की बार दिल्ली। सहारा समय न्यूज चैनल में उनके होने की खबर तब हुई, जब एक साल के भीतर मुकेश कुमारजी ने मुझे भी मध्यप्रदेश चैनल के लिए चुना। रवींद्रजी इनपुट हेड थे। वे नोएडा दफ्तर में। हम इंदौर ब्यूरो में। उनका घर इंदौर में ही था। अक्सर आते। हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। साथ काम करने का यह पहला अनुभव था। चैनल सितंबर 2003 में लांच हुआ। ऑन एयर होने के पहले लाइव प्रसारण के एक ट्रायल में रीगल चौराहे पर ओबी वैन, कैमरा, लाइट्स के बीच प्रकाश हिंदुस्तानी और रवींद्र शाह सितारों की तरह घिरे थे।

24 घंटे के पहले सेटेलाइट रीजनल न्यूज चैनल से दर्शकों का यह पहला परिचय था। नौ साल नईदुनिया में गुजारने के बाद मेरे लिए भी यह एक और नईदुनिया थी, जहां लिखना कम और दिखना ज्यादा था। 2004। दिग्विजयसिंह की दस साल की कांग्रेस सरकार को उमा भारती ने उखाड़ फेंका था। चुनाव से बड़े इम्तहान में आने की बारी अब उमा भारती की थी। एक हजार मेगावॉट बिजली की इंदिरा सागर परियोजना में बांध अपनी पूरी ऊंचाई तक बनकर तैयार था। तीस जून हरसूद शहर के खात्मे की तारीख तय थी। चैनल ने इस डूब को टेलीविजन पर लाइव प्रसारित करने की योजना बनाई। रवींद्रजी हिंदी फ्रीप्रेस के दिनों में सरदार सरोवर इलाके पर कई चर्चित रिपोर्टिंग करा चुके थे। चैनल हेड मुकेश कुमार भी मध्यप्रदेश मूल के ही थे। मुझे हरसूद जाने का हुक्म हुआ। नोएडा से भुवनेश सेंगर आए। एक ओबी वैन समेत तीन कैमरा यूनिट हरसूद के इलाके में घूमने लगीं।

देश ने पहली बार करीब डेढ़ महीने तक एक शहर के डूबने की दास्तान को टीवी पर लाइव देखा। हरसूद से लौटकर मैं सो नहीं पाया। यह एक तकलीफदेह अनुभव था। हम हजारों परेशानहाल परिवारों को बुरे हाल में छोड़कर लौटे थे। हम उनकी आखिरी शवयात्राओं और शादियों में शामिल हुए। हमने पीढिय़ों से साथ रहते आए संयुक्त परिवारों को तिनका-तिनका बिखरते देखा। सरकारी तंत्र की बेरहमी। उजड़ते औरतों-बच्चों की बेबसी। जड़ों से कटने की पीड़ा। यह बलि विकास की खातिर थी। हरसूद के हजारों किरदारों के चेहरे। मैं मूलत: प्रिंट मीडिया का हूं। मैं जानता था कि टीवी का यह कवरेज ज्यादा दिनों तक लोगों को याद नहीं रहेगा। ऐसे हालातों में रिपोर्टिंग के मौके बार-बार नहीं आते। एक बार रवींद्रजी इंदौर आए तो मैंने कुछ लिखने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह काम फौरन कर देना चाहिए। ब्यूरो प्रमुख प्रकाश हिंदुस्तानी ने मेरा शेडयूल कुछ ऐसा तय किया कि मैं बिना अवकाश लिए हरसूद के डूबने की दास्तान इत्मीनान से लिख सकूं।

ढाई महीने में डायरी की शक्ल में लिखा एक दस्तावेज लेकर मैं दिल्ली गया। रवींद्रजी ने मुझे चार बड़े प्रकाशकों का रास्ता बताया। मैं सबके पास गया। स्क्रिप्ट दिखाई। ज्ञानपीठ प्रकाशन में तब प्रभाकर श्रोत्रिय थे। नया ज्ञानोदय के एक अंक में वे इस किताब से एक कवर स्टोरी छाप चुके थे। उनसे भी मिला। सबने इसे पसंद तो किया, लेकिन छापने के नाम पर हाथ खड़े किए। समस्या यह थी कि यह न तो कहानी थी, न कविता, न उपन्यास। यह साहित्य की किसी श्रेणी में नहीं थी। इसे पढ़ता कौन? किसी ने कहा कि स्क्रिप्ट दे जाइए, विचार करेंगे। नवंबर 2004 में मुझ जैसे नए नवेले लेखक की शर्त यह थी कि यह किताब हर हाल में जून 2005 के पहले छपकर बाजार में आनी चाहिए, क्योंकि हरसूद के विस्थापन का सिलसिला खत्म नहीं हुआ था।

आखिरकर मैं राजकमल प्रकाशन के एमडी अशोक महेश्वरी से मिला। रवींद्रजी उन्हें इस किताब के बारे में बता चुके थे। उन्होंने तीन दिन के भीतर तय किया कि किताब राजकमल से आएगी और मेरी शर्त के मुताबिक जून के पहले आएगी। एग्रीमेंट साइन होते वक्त रवींद्रजी नोएडा से आए। मुझे बधाई दी। राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशन पूर्व की औपचारिकताओं के लिए स्क्रिप्ट की एडिटिंग का काम रवींद्रजी को ही सौंपा। मैं इंदौर लौटकर अपने काम में लग गया। होली की छुट्टियों में जब रवींद्रजी इंदौर आए तो एक दोपहर मुझे फोन किया। बोले कि तुरंत नीचे आओ। इंदौर में एबी रोड पर इंडस्ट्री-हाऊस के छठवें माले पर स्थित चैनल के ऑफिस से उतरकर मैं बाहर आया। वे कार में बैठे थे। एक बड़ा सा लिफाफा मुझे दिया। मैंने पूछा कि क्या है? वे बोले कि खोलकर देखो। तुम्हारे काम की चीज है। मैंने बेसब्री से खोला। हरसूद 30 जून की पांच कॉपियां मेरे हाथ में थीं। वे बधाई देकर चले गए। कहा कि अपन फोन पर बात करते हैं।

मैं ऑफिस में लौटा। घंटों तक किताब को उलट-पलटकर देखता रहा। मेरे पैर जमीन पर नहीं थे। हरसूद का कवरेज आंखों में जिंदा हो उठा था। वह अमानवीय विस्थापन दस्तावेज में दर्ज हो चुका था। मेरे लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव था। अगले तीन महीनों में दिल्ली में दो आयोजन हुए। एक में कमलेश्वर, प्रभाष जोशी, सुरेंद्र मोहन, राहुल देव, अजय उपाध्याय, आनंद प्रधान, वर्तिका नंदा समेत मीडिया की कई हस्तियों ने शिरकत की। किताब पर बोला। लिखा। अननिगत अखबारों और पत्रिकाओं में समीक्षाएं छपीं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने इस पर नाटक लिखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र अवार्ड के लिए चयन हुआ।

मैं देश के करीब एक दर्जन विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में इस कवरेज पर बोलने के लिए बुलाया गया। हरसूद वालों की आखिरी आवाज इस किताब में हमेशा के लिए कैद चुकी थी। उनका विस्थापन गुमनाम नहीं हुआ था। 30 जून 2005 को हरसूद के हजारों विस्थापित नागरिकों ने अपने शहर की पहली बरसी मनाने का फैसला लिया। खंडहरों में तब्दील हो चुके हरसूद में इस किताब को बाकायदा दफनाने का निर्णय हुआ। रवींद्र शाह दिल्ली से रामबहादुर राय, राहुल देव समेत मीडिया और पर्यावरण से जुड़े कई कार्यकर्ताओं के साथ हरसूद आए। गीतकार विट्ठलभाई पटेल पहुंचे। 1984 में जिस जगह हरसूद को बचाने का संकल्प स्तंभ मेधा पाटकर की ऐतिहासिक रैली में स्थापित किया गया था, उसके बगल में यह किताब एक ताबूत में रखकर दफना दी गई। मैं एक बार फिर हरसूद में कवरेज के लिए मौजूद था। हम विस्थापन को साल भर से कवर कर ही रहे थे। इस बीच चैनल प्रमुख मुकेश कुमार सहारा समय को अलविदा कह चुके थे। किताब के संपादन में रवींद्रजी ने कुछ हिस्सों पर कैंची चलाई थी। इसमें कई ऐसे नाम शामिल थे, जिन्होंने हरसूद के लाइव कवरेज में कई स्तरों पर योगदान दिया था। मैं उनसे कभी पूछ नहीं पाया कि इतनी सख्त एडिटिंग की जरूरत क्या थी?

धीरे-धीरे सहारा समय की ओपनिंग टीम के ज्यादातर खिलाड़ी बाहर जाते गए। मैं भी मार्च 2006 में दैनिक भास्कर में आ गया। रवींद्रजी कुछ समय जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में रहकर एस-वन चैनल में चले गए। फिर आजाद न्यूज चैनल। आउटलुक हिंदी में एसोसिएट एडिटर बने तो सालों बाद कुछ सुकून में देखे गए। मैं दो साल पहले भास्कर के नेशनल न्यूज रूम में आने के बाद कई दफा स्टोरी के लिए दिल्ली गया। सफदरजंग में गेस्ट हाऊस के पास ही उनका दफ्तर था। हम रात को घंटा-आधा घंटा टहलते। स्टोरीज और किताबों पर बात करते। इंदौर की यादें ताजा करते। अन्ना के आंदोलन के समय अगस्त में रामलीला मैदान गया। एक दिन अन्ना की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। हम साथ ही गए। लोदी रोड के इंडो-इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक सेमिनार में हमारे भाषण एक ही सत्र में थे।

रिश्तों के लिहाज से रवींद्रजी का भरोसा भीड़ में नहीं था। बहुत थोड़े लोग ही उनके इनर-सर्कल में रहे। उन्होंने चेले नहीं दोस्त बनाए। नए साथियों को वक्त-जरूरत मौके दिए। मौके नहीं दे पाए तो हौसला दिया। अच्छे पत्रकार बहुत हैं। रवींद्रजी उस दुर्लभ प्रजाति के पत्रकार थे, जो अच्छे इंसान पहले थे। उनकी बातचीत के विषयों में कवरेज, स्टोरी, किताबें और शख्सियतें ज्यादा हुआ करती थीं। निराशा और नकारात्मकता के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी। दस सालों के दरम्यान वे दिल्ली की भीड़ में चुपचाप अपनी जगह बनाते हुए कई उतार-चढ़ावों से होकर गुजरे। मुश्किल दौर में भी मैंने उन्हें कभी उतरी शक्ल में नहीं देखा। वे हमेशा ही ऊर्जा से भरे और
तरोताजा रहे। धार्मिक कर्मकांड, पूजा, कर्मफल की अवधारणा और ज्योतिष में उनका भरोसा नहीं था। न ही जिज्ञासा। लेकिन कभी इन चीजों की निंदा या आलोचना नहीं की। मीडिया की उस बिरादरी में वे कभी नहीं रहे, जो फायदों के जायज-नाजायज टुकड़ों की खातिर सरकारी दरवाजों के आगे दुम हिलाती है। मकान, प्लाट, कॉलोनी, हाऊसिंग सोसायटी, लाइसेंस, ट्रांसफर छाप कर्मवीरों से उनकी कुंडली कभी नहीं मिली।

वे पाक दामन से पत्रकारिता में रहे। चैन से बैठना उनकी फितरत नहीं थी। इसलिए बार-बार ठिकाने बदले। जड़ें पत्रकारिता के सिवा कहीं नहीं फैलाईं। न किसी शहर में। न किसी संस्थान में। उनका भरोसा शुरुआत में था, शिखरों में नहीं। वे उन पत्रकारों में से थे, जो खुद को कई बार शून्य तक लेकर गए। जोखिम लेने की आदत थी। इसलिए जब आउटलुक में गए तो मैंने उन्हें ज्ञापन सौंपा कि यहीं धूनी रमा लीजिए। भटके बहुत। सत्य की अनुभूति अब यहीं कीजिए। वे बहुत खुश थे। चैनलों में चिल्लपों ज्यादा है। नए चैनलों में जरूरत से ज्यादा। एस-वन और आजाद में उनकी शांति भंग ही रही। सफदरजंग के नए दफ्तर में वे समाधि के भाव से स्टोरी में जुटे दिखाई दिए। वे चैनलों में रहे, लेकिन पहचान के लिए परदे के मोहताज नहीं थे। परदे के पीछे रहकर उन्होंने पहचान बनाई। दस साल दिल्ली में टिकने के बाद जो जगह
उन्होंने बनाई, वह अगले दस साल उनके करियर को एक अलग आभा देती। शायद कुदरत को ही यह मंजूर नहीं था कि यह शख्स चैन से बैठे।

पच्चीस साल के पत्रकारीय जीवन के अनुभवों पर उनका एकमात्र आलेख हमने दो साल पहले माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि के दस्तावेज के लिए लिखवाया-'क्या भूलूं क्या याद करूं'। तब वे आजाद न्यूज चैनल में संपादक थे। उन्होंने लिखा कि रज्जू बाबू हिंदी पत्रकारिता का अश्वमेध करना चाहते थे। लेकिन नवभारत टाइम्स के माध्यम से प्रयास करने के बावजूद सफल नहीं हुए। यह कम दरअसल किसी ने किया तो वे सुधीरजी हैं। दैनिक भास्कर के प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल। जयपुर इस अश्वमेध का आरंभ बिंदु माना जाना चाहिए। रवींद्रजी का यह आलेख उनकी पत्रकारिता के साक्षी पांच शहरों के सफरनामे पर केंद्रित है। इसमें पत्रकारिता में तेजी से आए बदलावों और उनके साथ उनके हमकदम होने की शानदार झलक है।

उत्तरप्रदेश की 40 दिन की यात्रा से लौटकर इंदौर गया। रवींद्रजी के घर। उनकी बुजुर्ग मां से मिला, जिनकी सेहत देखने के लिए वे दिल्ली से आए थे। बच्चों से मिला, जिनसे वे बेइंतहा प्यार करते थे। तीन पुलिया के उस घर में पहले रवींद्रजी की मौजूदगी में ही आता रहा। इस दफा गुलाब के फूलों की माला में उनका मुस्कराता हुआ चेहरा सामने पाया। मुझे फिर यकीन नहीं आया कि यह सच है। वे इंदौर के थे। कुछ मित्रों ने शिकायत की कि इंदौर के अखबारों ने सड़क हादसे की खबर तक उनकी मृत्यु को सीमित रखा। सिर्फ प्रवीण शर्मा ने हैलो हिंदुस्तान में अलग से याद किया। भुवनेश सेंगर ने दिल्ली से फोन पर बताया कि नोएडा की श्रद्धांजलि सभा में उन्हें याद करने कई लोग इकट्ठा हुए। मध्यप्रदेश के अखबारों में जगह भले ही कम हो, रवींद्रजी दोस्तों के दिलों में ज्यादा बड़ी जगह रखते हैं। यह अखबार से ज्यादा स्थाई और शाश्वत है। अगर मैनपुरी में उनकी मौत की मनहूस खबर न आई होती तो मुमकिन है कि मैं संभल से एकाध दिन का वक्त निकालकर गाजियाबाद में इंदिरापुरम के उनके घर जरूर जाता। हम नोएडा से होकर ही दिल्ली साथ जाते। वे फिर किसी किताब का जिक्र करते या किसी स्टोरी पर बात करते। मैं जानता
हूं कि अब यह बात कभी नहीं होगी!

लेखक विजय मनोहर तिवारी दैनिक भास्कर के रोमिंग एडिटर हैं.


रवीन्द्र शाह की द्वितीय पुण्य तिथि पर इंदौर में 27 फरवरी को आयोजन

न्यूज का पहला ज्ञान और रिपोर्टिंग का ‘र’ मैंने शाह सर से ही सीखा

रवीन्द्र शाह सर…आज हमारे बीच भले ही न हों पर उनकी यादें आज भी हमारे दिल में तरो-ताजा हैं। दरअसल, मैं शाह सर के प्रिय शिष्यों में से एक था। वो जब भी कोई काम या महत्वपूर्ण फैसला लेना होता उसमें मुझे भी शामिल किया करते थे। शाह सर मीडिया में ऐसे व्यक्ति थे जो हमेशा दूसरों की मदद करते थे। मुझे वो पल भी याद हैं जब वो एसवन न्यूज चैनल से आजाद चैनल चले गये, फरि भी हमारे जैसे कई लोगों को उन्होंने अपने स्तर से मदद की। मैं उस दौरान आर्थिक संकट के जूझ रहा था। इस संकट से निपटने का मार्ग उन्होंने दिखाया।

मीडिया में शाह सर जैसे विरले लोग ही होंगे जो उनकी तरह आगे बढ़ कर दूसरों की मदद करते हों। शाह सर जितने तन के खूबसूरत थे उतने ही मन के भी खूबसूरत थे। न्यूज का पहला ज्ञान और रिपोर्टिंग का ‘र’ मैंने शाह सर से ही सीखा। मैं शाह सर के घर अक्सर एडिटोरियल डिस्कशन को लेकर आया जाया करता था। जब भी मैं उनके घर जाता था वो मुझ जैसे जूनियर रिपोर्टर को अपने हाथों से खाना बना कर खिलाते थे। वो खुद खाना बनाने के शोकीन थे। अलग-अलग तरीके के व्यंजन बनाना उनकी हॉबी थी। यह सारी बातें मैं इसलिए बता रहा हूं कि जो व्यक्ति अपने से जुडे़ लोगों को इस हद तक सपोर्ट करता था, वो व्यक्ति कितने बड़े दिल वाला होगा। आज हमारे बीच वो नहीं हैं, पर जिस मंच पर जब भी मैं उनके साथ गया हूं, वहां मैं आज जब दोबारा पहुंचता हूं तो वो सारे पल वैसे ही जीवंत हो जाते हैं और लगता है कि शाह सर यहीं हैं और उनका मार्ग दर्शन वैसा ही मिल रहा है।

‘खूब गये परदेश, कि अपना दीवार-ओ-दर भूल गये

शीश महल ने ऐसा घेरा, मिट्टी का घर भूल गये

उसकी गलियों से जब लौटे अपना भी घर भूल गये’

लेखक जितेन्द्र बहादुर सिंह सम्प्रति सहारा समय में वरिष्ठ रिपोर्टर के बतौर कार्यरत हैं.


रवीन्द्र शाह की द्वितीय पुण्य तिथि पर इंदौर में 27 फरवरी को आयोजन

वर्तिका नन्दा की नजर से रवीन्द्र शाह

कभी भी अचानक रवीन्द्रजी का फोन आ जाया करता था और पहला सवाल हाल पूछने का नहीं बल्कि यह होता था कि क्या कर रही हो। मेरा जवाब भी हमेशा एक ही होता था – काम।। बस, काम ही प्रमुख सूत्र था बात का भी और शायद यह बड़ी वजह रही कि मैं उनके बारे में वो तमाम बुनियादी बातें भी नहीं जानती थी जो दो परिचित लोग जान सकते हैं। हरसूद 30 जून पर जनसत्ता में कुछ साल पहले मैनें एक लेखा लिखा। तब मैं न तो विजय मनोहर तिवारी को जानती थी और न ही रवींद्र शाह को। मुझे किताब कहीं मिली, मैनें उसे पढ़ा और बस उस पर लिख दिया। बाद में शायद हिंद भवन में उसका लोकार्पण हुआ तो मैनें पहली बार उन्हें देखा पर फिर शायद एक-दो साल कोई मुलाकात नहीं हुई पर हां, हवा में यह जरूर पता चलता रहा कि इस भागती दिल्ली में कोई रवींद्र शाह भी है जिसमें काम का जज्बा है।

उनसे आखिरी मुलाकात उनकी मौत से ढाई दिन पहले हुई। मेरी किताब थी हूं रहूंगी उसी दिन छप कर आई थी। मैं उस समय एफसीसी के बाहर गाड़ी पार्क ही कर रही थी जब उनका फोन आया। इस बार उन्होंने यह नहीं पूछा कि क्या कर रही हो बल्कि यह पूछा कि कहां हो। मैनें कहा फारेन क्लब तो उन्होंने कहा-वहीं रूकना। मैं अभी आ रहा हूं।

मैं वहां रूकी भी।  थोड़ी देर बाद वहां पर एक कार्यक्रम था। मैं वहां किरण कपूर से मिलना चाहती थी। थोड़ी देर में रवीन्द्र जी आए। क्लब के मेन रूम में ही एक-दो और पत्रकार साथियों के साथ उनसे मुलाकात हुई और कुछ ही मिनटों में वे चले भी गए।

जाने से पहले उन्होंने पता नहीं क्या सोचकर मुझे कहा कि बाहर की सड़क पर बहुत से गढ्ढे हैं, वहां कार ध्यान से पार्क किया करो। उनके जाने के 15 मिनट बाद मेरी गाड़ी वाकई उसी जगह एक गढ्ढे में फंसी भी जिसे मैं मुश्किल से निकलवा पाई। यह एक संकेत था।

उनके बारे में तीन बातें खास थी – एक तो उन्हें पत्रकारिता से इतर तमाम साहित्यिक समारोहों की भी पूरी जानकारी रहती थी, दूसरे, उन्हें लोगों की पहचान थी और तीसरे, उनमें लोगों को आपस में जोड़ने की गजब की क्षमता भी।

इन तीनों क्षमताओं की झलक मैनें हर बार देखी। रोटरी का प्रोग्राम था फरवरी में। मेरा उसी दिन आगरा में भी कार्यक्रम था। मैं वहीं से सीधे अशोका होटल पहुंची और वहां भी देखती रही कि किस खूबसूरती से वे लोगों को आपस में जोड़ते हैं।

वे नहीं रहे, इसकी सूचना मुझे इंडिया टुडे के सुधीर गोर ने दी। मुझे कुछ समझ में ही नहीं आया। विश्वास नहीं हुआ। किसी ऐसे का जाना जिसे आप जानते हों, अंदर तक छीलता है। रवींद्र जी को मैनें एक सजग पत्रकार और कर्मठ इंसान के तौर पर देखा था। मुझे लगा था कि अभी उनकी यात्रा एक तरह से शुरू ही हुई है। लेकिन कई बार जिसे हम शुरूआत समझते हैं, वहां किसी अंत की लिखावट छप चुकी होती है।

काश, इस लिखावट को मिटा कर फिर से कुछ नया लिखा जा सकता

काश।।।।।।।।

वर्तिका नन्दा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों लेडी श्रीराम कॉलेज में मीडिया शिक्षिका के बतौर कार्यरत हैं.


रवीन्द्र शाह की द्वितीय पुण्य तिथि पर इंदौर में 27 फरवरी को आयोजन

रवीन्द्र शाह की स्मृति : शाह सर के साथ अपनों का पराये जैसा सलूक उनकी मौत के बाद भी जारी है…

रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड में ऋषि वशिष्ठ और भरत संवाद के माध्यम से तुलसी दास ने कहा है, ‘हानि-लाभ, जीवन मरण यश-अपयश विधि हाथ।’ जिस सन्दर्भ में यह चौपाई लिखी गई है वह शाह सर के जीवन पर भी शब्दशः ठीक उतरती है। कम उम्र में ही 'फ्री प्रेस' का संपादक बन जाना उनके लिए यश का नहीं, अपयश का कारक बन गया। लाभ की स्थिति में रह कर भी हमेशा हानि उनके हिस्से में रही। अखबार हो या कोई न्यूज चैनल वो नियमित काम के साथ-साथ, बहुत कुछ फ्रीलांस भी करते थे। उस फ्रीलांस से जो आमदनी होती उसको वो जरूरतमंद मित्रों और परिचितों की मदद करते रहते। जो वापस कर देता तो ठीक, नहीं करता तो ठीक।

हां, वो समय पर टोकना नहीं भूलते थे। कहने का अभिप्राय यह कि शाह सर अपने घर-परिवार से लेकर मित्र परिचितों के बारे में गंभीरता से सोचते उनकी मदद करते या करने की कोशिश करते। यहां तक कि वो उन लोगों की भी मदद करने में जुट जाते थे, जो पहले कभी उन्हें आर्थिक, सामाजिक और चारित्रिक तौर पर भी नुकसान पहुंचा चुके होते थे। ऐसे एक दो नहीं कई लोगों को मैं और वो मुझे अच्छी तरह जानते हैं। जहां तक मेरी जानकारी है शाह सर का उधार दिया गया अधिकांश पैसा वापस नहीं हुआ। जब वो अमन ग्रीन में फ्लैट बुक करा रहे थे तो तो उन्होंने कुछ लोगों से मदद को कहा भी…फिर उन्होंने एक बैंक से कर्जा लिया। शाह सर के साथ केवल मांगने वालों ने बेईमानी नहीं कि जिन लोगों के चैनलों-अखबारों और पत्रिकाओं के लिए उन्होंने रात दिन एक कर दिया उन लोगों ने भी शाह कर के साथ बेइमानी की। एस वन चैनल पर उनका डेढ़ लाख बकाया है। विजय दीक्षित ने आज तक वो पैसा नहीं दिया।

आजाद चैनल के मालिक वालया साहब अरब पति हैं। उन्होंने भी लगभग एक लाख रुपया नहीं दिया। शाह सर ने दर्जनों मेल लिखे। चक्कर काटे लेकिन बकाया पैसा नहीं मिला। एक पत्रिका 'वाह मध्य प्रदेश' के लिए तो उन्होंने कई महीने कमर तोड़ मेहनत की। खुद लिखा कई और लोगों से लिखवाया। 'वाह मध्य प्रदेश' की साज-सज्जा, अवधारणा से लेकर प्रिंटिंग पब्लिशिंग और विज्ञापन जुटा कर दिए। शाह सर के हिस्से में क्या आया, लोगों की गालियां। आउटलुक ज्वाइन करने के बाद शाह सर में नई रंगत भर गयी थी। स्थायित्व का भाव चेहरे पर चमक बन कर लौट रहा था। कई बड़ी स्टोरियों पर काम कर रहे थे। जीवित होते तो भारतीय पत्रकारिता में उनके नाम का डंका बज रहा होता।

एसवन मृत प्रायः था। इसलिए अपने कुछ  प्रोजेक्ट्स में उन्होंने मुझे शामिल कर रखा था। धीरेंद्र पुण्डीर से भी वो अपनी स्टोरीज साझा करते या परामर्श करते थे। टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी को भी उन्होंने कुछ अच्छी स्टोरीज दी…..।

मेरी बातें कुछ लोगों को बुरी लग सकती हैं मगर शाह सर के साथ पराये लोग तो परायों जैसा सलूक करते ही थे, उनके कुछ अपने भी परायों जैसा सलूक करते रहे… शाह सर के साथ अपनों का पराये जैसा सलूक उनकी मौत के बाद भी जारी है…

बहरहाल, शाह सर से मेरा परिचय दिल्ली के ग्रीन पार्क में हुआ था। यहां किसी गेस्ट हाउस में उनका अस्थाई डेरा था। यह परिचय नितांत औपचारिक और सीमित रहा। समय की लहरों ने मुझे उठाकर हिमाचल की वादियों में फैंक दिया। निरंतरता के अभाव में विस्मृति की धूल सम्बंधों पर जमती चली गयी। सोलह दिसम्बर 2006 को पॉप्स (मेरे पिताश्री) कैंसर से जीवन का संघर्ष हार गये। मुझे हिमाचल की वादियों से ऊब होने लगी। उस समय दैनिक जागरण के मुख्य कर्ता-धर्ता निशिकांत ठाकुर से भेंट हुई। उनके मृदुल बात-व्यवहार और ‘कथित पक्के आश्वासन’ की डोर ने कुछ ऐसा उलझाया कि कई महीने उलझा रह गया। मेरे पास दिल्ली में रह कर संघर्ष करने के अलावा कोई उपाय न था। अतुल दयाल से निरंतर सम्पर्क में था।

नौकरी की खोज में अतुल दयाल एक बार फिर मेरे सारथी बने। वो मुझे रवीन्द्र शाह के पास ले गये। रवीन्द्र शाह के सामने आते ही मैं कुछ ठिठका। कुछ याद आया, मगर अपरिचित बने रहने में भलाई समझी। यह किस्सा एस वन न्यूज चैनल में नौकरी हासिल करने का है। एस वन में उस वक्त भी काम कम और राजनीति ज्यादा थी। रवीन्द्र शाह को ऐसे लोगो की आवश्यकता थी जो आंख-नाक-कान खोल कर काम कर सकें। रवीन्द्र शाह का उद्देश्य एस वन को न्यूज चैनल के इतिहास का एक उदाहरण बनाना था। कुछ भीतरी लोगों को यह सब बर्दाश्त न था। एस वन में उस समय तक किसी की नियुक्ति आसान बात नहीं थी।

मेरा साक्षात्कार हुआ। वेतन बताया गया और कहा गया कि दो-तीन दिन बाद नियुक्ति पत्र तैयार हो जायेगा। आपको फोन पर सूचना दी जायेगी। इसलिए दिल्ली छोड़ कर कहीं मत जाइएगा। फोन की घंटी बजी तो जरूर लेकिन तीस दिन बाद। बुझे हुए मन से हैलो बोला- उधर से आवाज आयी- एस वन चैनल से रवीन्द्र शाह बोल रहा हूं। आप का एक महीने पहले इंटरव्यू हुआ था। आपने कहीं और ज्वाइन कर लिया या आप एस वन चैनल में काम करना चाहेंगे?

अंधा क्या चाहे, दो आंखे। रवीन्द्र शाह की आवाज सुन कर ऐसी ही अनुभूति हुई, फिर दिमाग में कौंधा, पहली बार बुलाकर तो एक महीने बाद याद आयी है। दोबारा बुलाकर कब याद आयेगी पता नहीं। यही सब कुछ सोचते हुए मैंने कहा, जी शाम तक आपको पक्का बता दूंगा। मैंने राय साहब (श्री राम बहादुर राय) और मौलाना (श्री इक़वाल रिज़्वी) को फोन पर दोनों से परामर्श किया। दोनों का परामर्श लगभग एक जैसा था। मैंने कुछ देर बाद ही रवीन्द्र शाह को फोन किया और एस वन चैनल पहुंचने का समय मांगा…कुछ घर्षण-अपघर्षण के साथ एस वन में सेवा शुरू कर दी।

अतुल दयाल उस समय एस वन के प्रोग्रामिंग में अच्छे पद पर थे। चैनल में उनकी बात का प्रभाव था। पहले दिन ही मुझे एस वन की कैंटीन ले जाकर उन्होंने मुझे बताया कि रवीन्द्र जी पिछले एक महीने से मेरी नियुक्ति के लिए चैनल प्रबंधन से संघर्ष कर रहे थे। प्रबंधन के कुछ वरिष्ठों को मेरी नियुक्ति पर बिना कोई ठोस कारण आपत्ति थी। अतुल दयाल ने बताया कि चैनल के चेयरमैन के सामने रवीन्द्र जी ने मेरी नियुक्ति पर आपत्ति करने वाले वरिष्ठों से कारण पूछा। परिणाम, चेयरमैन को मेरी नियुक्ति पर सहमति देनी पड़ी।

उस दिन से रवीन्द्र शाह मेरे लिए ‘शाह सर’ थे। एस वन में हमारी तिकड़ी बन गयी। रवीन्द्र सर, अतुल दयाल और मैं दोपहर को साथ ही भोजन करते। रवीन्द्र सर को जिस दिन मालूम हुआ कि मैं लहसुन-प्याज नहीं खाता हूं, उस के अगले ही दिन से उनके टिफिन बॉक्स से लहसुन-प्याज गायब हो गया। अतुल एस वन छोड़ कर स्वप्न दा के साथ चले गये तो अरुण तिवारी ने प्रोग्रामिंग में ज्वाइन किया। अब तिकड़ी में अतुल की जगह अरुण तिवारी ने ले ली। घनिष्टता और घनिष्ट हुई तो एक दिन मौका देख कर शाह सर को ग्रीन पार्क की याद ताजा करवाई। उस दिन के बाद से हम लोग चैनल की चर्चा के साथ-साथ घर परिवार की चर्चाएं भी करने लगे। एक दूसरे के सुख-दुख और सलाह-मश्विरा में शामिल होने लगे।

ऐसी ही चर्चाओं के बीच कुछ बातें ऐसी होती जिनसे अहसास होता था कि शाह सर के चेहरे की मुस्कराहट के पीछे कुछ खास गम छुपे हैं। उनसे पूछा कैसे जाये, बस इसी मौके की तलाश रहती थी। ऑफिस में सम्भव ही नहीं था…और घर जाने की फुर्सत नहीं मिलती थी।

किराये के एक छोटे से कमरे की साज-सज्जा, किताबो का सलीके से रखा होना। दरवाजे और खिड़कियों के पर्दे…रसोयी का सामान और तो और कपड़े पहनने का उनका ढंग कुछ चुगली करता था। नोएडा के सेक्टर 24 से घर बदल कर सेक्टर 31 पहुंचे तो मुझे लगा अब कुछ सुराग मिलेगा। नहीं मिला। सेक्टर 31 से इंदिरापुरम के पत्रकार विहार पहुंचे तो वहां भी मेरा जासूसी दिमाग घर के भीतर और बाहर कुछ न कुछ खोजने की कोशिश करता रहता… और सभी कोशिशें नाकाम रहतीं। उनसे मिलने वाले सभी लोगों पर निगाह रखी मगर, जो मैं खोज रहा था कभी नहीं मिला। हालांकि अब तक हम लोग अपने पेशे के अलावा निजी-पारिवारिक जीवन की सभी बातें साझा करते थे। शाह जी के पिता श्री गंगजी शाह, बहन श्रीमति भावना भी कई बार आये। सब सामान्य, लेकिन उस सामान्य में भी आसामान्य दिखायी देता।

एस वन के हालात निरंतर गिरते जा रहे थे। शाह सर आजाद के बाद आउट लुक पहुंच गये। मैं उसी एस वन को ढो रहा था। इंदिरापुरम के पत्रकार विहार का घर बड़ा और अच्छा था। इस घर की देखभाल, शाह सर की खुद की देखभाल कौन कर रहा था। हर हफ्ते-पखबाड़े के बाद सभी चीजें नयी सी लगती थीं। मुझे काफी देर बाद समझ में आया। मैं अक्सर सुराग के नज़दीक होता था, मगर शाह सर ऐसा चकमा देते थे कि मेरा खुद से विश्वास उठ जाता था। यह सब कुछ मैं इसलिए बता पा रहा हूं कि हम लोग अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए भी एक दूसरे से लगातार मिलते रहते थे।

मीडिया से जुड़े कुछ प्रोजेक्ट अपनी जिम्मेदारी और नाम पर लेकर वो मुझ जैसे लोगों में बांट दिया करते थे। मुझ जैसे एक दो नहीं कई लोग बेकारी और बेरोजगारी के समय में शाह सर की ओर ताकते रहते थे। शाह सर ने कुछ लोगों को तो अपने खाते से तो कुछ कुछ लोगों की शादी ब्याह तक का सामान अपने क्रेडिट कार्ड से जुटाया। यह बात अलग है कि वो सबके सब तोता चश्म निकले।

शाह सर इंदौर से जब भी वापस आते तो कुछ पुरुष साथी जो उनको अपना सबसे नज़दीकी होने का दावा करते थे, अपने लिए भेंट उपहार की अपेक्षा रखते थे। ठीक वैसे ही महिला साथियों की चाहत रहती थी। बिना किसी भेद-भाव के शाह सर के पिटारे से हर किसी को कुछ न कुछ मिलता ही था। मुझे लौंगिया सेव बहुत पसंद थे।

शाह सर, एक-दो दिन के लिए इंदौर जाते हैं। घर-परिवार, माता-पिता से मिलते होंगे। दोस्तों से बतियाते भी होंगे… फिर उन्हें हर किसी के बारे में इतना सोचने और हर किसी की पसंद-नापसंद का ध्यान कैसे रहता है। पसंद-नापसंद का ध्यान रहना माना जा सकता है, लेकिन वो सारा सामान खरीदना और इंदौर से दिल्ली तक लाना…यह मुझे खटकता रहता था। इस कबायद में क्या शाह सर का आशी (बेटा) या बेटू (बेटी कनुप्रिया) मदद करते हैं या मीना भाभी (उनकी पत्नी) करती हैं ? आशी और बेटू के लिए तो वो खुद ही परेशान रहते थे। आशी और बेटू को क्या पसंद है, क्या लाना है, क्या ले जाना है, ये सारे जोड़-घटाओ लगाते हुए मैं खुद देखा करता था।

आशी और बेटू से फोन पर बात करते हुए भी सुना था। मां से बात होती थी। भावना दी से और पिता जी से भी बात-चीत सुनी थी। मगर, मीना भाभी किसी दृश्य में कभी न देखी न सुनी। फिर वो कौन है जिसका फोन आते ही शाह सर के चेहरे पर चमक आ जाती थी। जिससे वो आधी रात को भी अधिकारात्मक और आदेशात्मक लहजे में बात करते और सुनते थे। ये और ऐसे न जाने कितने प्रश्न मेरे मस्तिष्क पटल पर घूमते रहते थे।

आशी-बेटू, पिता जी और भावना दी से कई बार मिलना हुआ। मीना भाभी से पहली मुलाकात तब हुई जब शाह सर को डेंगू हुआ। सेक्टर 11 के मेट्रो हॉस्पीटल में भर्ती थे वो। आउटलुक में उनकी मीटिंग हो चुकी थी। ज्वाइनिंग के ऐन दिन डेंगू हो गया। नीलाभ जी ने स्थिति को समझा और जब वो ठीक हो गए, तब ज्वाइनिंग करवा ली। मीना भाभी आयीं चार दिन ठहरीं और चली गयीं। उनके बाद कौन आया था। जिसने उनकी सेवा-सुश्रा की।

अस्पताल में तो शाह सर का ध्यान रखने वाले ढेरों थे। वो कौन था जिसकी सोच शाह सर के इरादे तय करती थी। वो कौन था जो शाह सर के निर्णयों पर प्रभाव डालता था ? वो कौन था जिसके साथ शाह कर अपने अन्तर्मन की व्यथा-कथा साझा करते थे ? वो कौन था जो शाह सर के तरीके और सलीके में झलकता था ? उस शख्स को आकांक्षा जानती थी। बारास्ता आकांक्षा, वंदना को भी मालूम था उस शख्स का नाम वर्षा सुरवे !!! अपनी जानकारी में नाम आने के बाद, मैं  जब भी मौका मिलता तहकीकात शुरू कर देता। शाह सर से सीधे सवल-जवाब।

शाह सर और वर्षा सुरवे के सम्बंध कैसे और किस सीमा तक हैं, सम्बंधों में स्वार्थ किसका है, सम्बंधों पर पारिवारिक सहमति है भी या नहीं, बिना सहमति के सम्बंधों की वैधानिकता क्या है और क्या सम्बंधों को सामाजिक स्वीकारोक्ति मिलेगी और बच्चे इन सम्बंधों पर क्या सोचते हैं? कई महीनों में जाकर इन सारे सवालों का जवाब मिला।

लब्बो-लुवाब यह कि मीना जी से प्रेम विवाह के बावजूद शाह सर के जीवन में जो रिक्तता और अभाव था उस रिक्तता और अभाव को वर्षा सुरवे ही दूर करती थीं। तो फिर, वर्षा सुरवे का भी अपना कोई स्वार्थ रहा होगा ? वर्षा सुरवे का स्वार्थ शाह सर की खुशी थी। इंदौर के स्थानीय अखबारों से व्यवसायगत जीवन शुरू करने वाली वर्षा शिक्षिका बन गयीं। वर्षा सुरवे का शाह सर के जीवन पर इतना प्रभाव था कि वो चाहती तो नोएडा दिल्ली के उन फ्लैट-प्लाट में नॉमिनी बन जाती जिनके बारे में मीना भाभी को कुछ भी पता न था। वो चाहती तो इंदौर की किसी भी सम्पत्ति की हिस्सेदार बन जाती। सारे कागजातों की फाइल वर्षा सुरवे ही तैयार करती और उन्हें संभाल-संजो कर रखती थीं।

यहां तक कि शाह सर की किताबें, पेन-पेंसिल और पर्सनल नोटबुक भी वर्षा संभाल संजो कर रखती थी। वर्षा प्रायः हर पखबाड़े और छुट्टियों में तो अक्सर इंदौर से दिल्ली ऐसे चली आती थीं। अकाल, काल का ग्रास बनने से कोई दस-बारह दिन पहले शाह सर के कई अभिन्न मित्र सपरिवार मिले थे। शाह सर के साथ उस पारिवारिक सम्मिलन में वर्षा सुरवे ही थी। मित्रों के परिवारिक समारोह में वर्षा ही शाह सर के साथ जाती थी। उन समरोहों के फोटो ग्राफ्स कभी किसी को दिखा कर वर्षा सुरवे ने अपना अधिकार शाह सर पर जताने की कोशिश की ? कभी नहीं। वर्षा सुरवे ने तो शायद ही किसी को वो फोटोग्राफ्स दिखाये हों…लेकिन मुझे दिखाये थे… शाह सर ने अटठारह फऱवरी दो हजार बारह दिल्ली से आखिरी बार विदा होते हुए।

यूं तो इंदौर को मध्य प्रदेश की संस्कारिक और सांस्कृतिक राजधानी कहलाने का गौरव हासिल है…लेकिन वर्षा सुरवे और शाह सर के सम्बंधों पर सांस्कृतिक राजधानी के सुसंस्कृत जन मान्यता देने के बजाय जाने कसते रहे। मेरी तहकीकात जारी रही। माता-पिता, बहन और भाई की सहमति थी। वर्षा जब चाहती अधिकार कर सकती थी। शाह सर को विवश कर सकती थी अधिकार देने के लिए। पारिवारिक, समाजिक और आर्थिक अधिकार के लिए विवश कर सकती थी। चल-अचल सम्पत्ति में अधिकांश भी मांग सकती थी। जब वो ऐसा कर सकती थी तो क्यों नहीं किया ? प्रश्न यह कल भी था और आज भी है…!

उत्तर तो शाह सर के शब्दों में ही अच्छा होता…या वर्षा खुद देना चाहें… वर्षा किसे उत्तर दे, जो उससे पूछने का साहस करे…लोग उत्तर नहीं मांगते, सिर्फ ताने मार सकते हैं। शाह सर के साथ सम्बंधों के नामित नाम के अभाव में वर्षा सुरवे को कोई सिर्फ वर्षादी, वर्षाजी या कोई वर्षा मैम कहकर पुकारता है…और वर्षा सुरवे है कि अपना नाम ही भूल गयी है। वो नहीं भूली है तो तर्पण करना नहीं भूली है। वो नहीं भूली है तो शाह सर के सरोकारों को जीवित रखना।

लेखक राजीव शर्मा कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. राजीव से संपर्क 09968329365 के जरिए किया जा सकता है. रवींद्र शाह पर राजीव शर्मा का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं… 

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चुनाव सर्वेक्षण की हेरा-फेरी और पाबंदी के तर्क

ओपिनियन पोल करने वाली कपंनियां पहली बार इस तरह कठघरे में खड़ी हुई हैं। मीडिया और संपूर्ण पत्रकारिता की निंदा में लगे लोगों को यह ध्यान रखना होगा कि जो सच आपने देखा, उसे भी एक टीवी चैनल के पत्रकारों की टीम ने ही उजागर किया। चुनाव सर्वेक्षण और उसका गोरखधंधा जिस तरह से हमारे लोकतंत्र और मीडिया का एक सच है, उसी तरह उसका भंडाफोड़ करने वाला स्टिंग ऑपरेशन भी एक सच है।

सर्वेक्षण करने वाली कई कंपनियां हमारे यहां सक्रिय हैं, जिनके काम की ईमानदारी और नैतिकता पर हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं। कभी नीयत पर प्रश्न उठते रहे हैं और कभी बाजार की स्पर्धा में मुनाफा कमाने के लिए किसी भी हद तक चले जाने की प्रवृत्ति पर। जवाब में ये कंपनियां अपनी साख की बात करती हैं। साख की सतर्कता टीवी के ताजा खुलासे में भी झलकती है। इनमें ज्यादातर कंपनियों ने 2-3 प्रतिशत तक ही मार्जिन देने या 10 को 13 सीट दिखा देने तक की बात की। कुछ ने पूरे सर्वेक्षण में दो तीन को बेहतर दिखाने के आग्रह को भी ना-नुकर के बाद स्वीकार किया। यह भी कहा कि हमारी साख का प्रश्न है, इसलिए हम एकदम एकपक्षीय नहीं दिखा सकते। हालांकि कुछ ने मन-माफिक परिणाम दिखाने की बात स्वीकार कर ली, उसके तरीके भी बताए।

सर्वेक्षण में हेराफेरी एक तरह का पेशेवर अपराध है। यह हेराफेरी भले ही मामूली हो, लेकिन इससे अपराध छोटा नहीं हो जाता। यह खुलासा हमें इसलिए ज्यादा भयभीत करता है, क्योंकि चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राणवायु हैं और उसे विकृत करना लोकतंत्र के प्रति अपराध है। यह अपराध चाहे धन के लिए हुआ हो या अन्य किसी कारण से। जो जीतने वाला है, उसे हारने वाला और जो हारने वाला है, उसे जीतने वाले बता देते हैं, तो इसका असर मतदाताओं पर पड़ता है, और पार्टियों पर भी। और शायद चुनावी गठजोड़ पर भी। लेकिन सिर्फ इस आधार पर जनमत सर्वेक्षणों को प्रतिबंधित करने की मांग से सहमत होना कठिन है। भ्रष्टाचार, बेईमानी, चालबाजी का अर्थ उस विधा का गला घोंट देना नहीं है। अपराध करने वाले को सजा देना जरूरी है, लेकिन जनमत सर्वेक्षण पर रोक अंत में लोकतंत्र के लिए भारी साबित हो सकती है।

सर्वे पर पाबंदी की बात कई बार चुनाव आयोग ने की है, लेकिन उसके पीछे कोई ठोस तर्क नहीं रहा। न्यायालय भी इसकी संभावना को नकार चुका है। दुनिया के सभी सफल लोकतंत्रों में ऐसे सर्वे होते हैं। व्यक्तियों या कुछ संगठनों की बुराई को पूरी प्रक्रिया की बुराई मान लेना बहुत बड़ी गलती होगी। जरूरी यह है कि सर्वेक्षण और उसे करने वाली कंपनियों के लिए मानक बनाए जाएं। योग्यता तय हो, रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था हो, ताकि अपराध साबित होने पर मान्यता रद्द की जा सके। पूर्ण पाबंदी का तर्क तो पूरी तरह लोकतंत्र विरोधी है।

लेखक अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कंवल भारती को प्रमोद रंजन का उत्‍तर : मोतियाबिंद का इलाज करवाएं कंवल भारती

Pramod Ranjan : कंवल भारती जी ने गत 25 फरवरी, 2014 को अपने फेसबुक वॉल पर मेरे बारे में एक बेहूदा टिप्‍पणी की है। बाद में यह टिप्‍पणी भडास फॉर मीडिया पर भी दिखी। कंवल भारती ने लिखा कि ''प्रमोद रंजन जैसे भाजपा समर्थक पत्रकार को प्रेमकुमार मणि जैसे लेखक से कोई शिकायत नहीं है, जो बिहार में नितीश कुमार का दामन पकड़कर एमएलसी बनते हैं, सत्ता का उपभोग करते हैं और अब नितीश कुमार को छोड़ कर लालू यादव का दामन थामे हुए हैं. वे उन्हें प्रखर चिंतक कहते हैं. लेकिन कांग्रेस से जुड़े कँवल भारती उनकी आँखों में इसलिए चुभते हैं, क्योंकि मैंने फारवर्ड प्रेस का बहिष्कार कर दिया है. वे उदित राज से मेरी तुलना करने लगे हैं. वह यही नहीं जानते कि उदित राज और कँवल भारती में क्या अंतर है? उन्हें मालूम होना चाहिए की मैं न राजनेता हूँ, न कोई संगठन चलाता हूँ, और न मेरी कोई खवाइश MP, MLA बनने की है, जैसी कि उदित राज और प्रेमकुमार मणि की है. कांग्रेस से जुड़ने के बाद भी राहुल गाँधी की आलोचना करने की जो हिम्मत मैंने दिखायी है, वह हिम्मत क्या प्रेमकुमार मणि लालू की और उदित राज मोदी की आलोचना करके दिखा सकते हैं? कभी नहीं दिखा सकते, क्योंकि वे राजनीतिक स्वार्थों के व्यक्ति हैं. ऐसे लोग, जो मेरे बारे में कुछ नहीं जानते, मेरी आलोचना करके सिर्फ मुंह की ही खा सकते हैं. मैं कांग्रेसी परिवार से हूँ, मेरे पिता भी कांग्रेसी थे. मेरा परिवार तब से कांग्रेसी है, जब उसका चुनाव निशान ‘दो बैलों की जोड़ी’ हुआ करता था. मैं कांग्रेस से जुड़कर भी कभी अँधा कांग्रेसी नहीं बन सकूँगा. मेरा मुकाबला न उदित राज कर सकते हैं और न प्रेमकुमार मणि. मेरी ज़मीन लोकतंत्र और सामाजिक परिवर्तनवादी आंदोलनों की है, जो मेरे लेखन में पूरी निर्भीकता से हमेशा रहेगी.''

मैंने उनके वॉल पर ही उसका उत्‍तर दिया तो वे चुप्‍पी साध गये। अगर मेरे उत्‍तर के बाद भारती लगता कि उन्‍होंने जो लिखा वह गलत था, तो वे इसे स्‍वीकार करते और माफी मांगते। लेकिन उनकी कुंठा, उन्‍हें ऐसा नहीं करने देगी। यहां यह जान लेना भी आवश्‍यक होगा कि मैंने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा था कि '' कंवल भारती कांग्रेस में, उदित राज भाजपा में। यह सूचना यह भी बताती है कि बहुजनों के क्षेत्रीय दल अपने योग्‍य लोगों को जगह देने में असफल हुए हैं। इन दलों में विचारधारा और सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर भारी पाखंड चल रहा है। उदित राज को मेरे शुभाकामनाएं। मुझे उम्‍मीद है कि वे जहां भी रहेंगे, बुद्ध की शिक्षाओं को याद रखेंगे।''  इसका मर्म समझने की वजाय वह मुझे भाजपा समर्थक बताते हुए अनाप-शनाप लिख गये।  बहरहाल, कोई और होता तो मुझे स्‍पष्‍टीकरण देने की आवश्‍यकता न पडती लेकिन कंवल भारती एक लेखक रहे हैं, इसलिए मेरे लिए उनकी बातों का उत्‍तर देना आवश्‍यक हो गया है, ताकि कम से कम सनद रहे।

प्रिय कंवल भारती जी, आपकी टिप्‍पणी को कई बार पढा। आपकी तरह आवेश में मैं भी कुछ कह सकता था। लेकिन, इस तरह की मूर्खता मैं अपने लिए श्रेयकर नहीं समझता। सिर्फ आपकी बातों का उत्‍तर दे रहा हूं।

1. आपका कांग्रेस में जाना मेरी आंखों में नहीं चुभ रहा है। अपने मोतियाबिंद का इलाज करवाएं।

2. भाजपा समर्थक जैसा बेहूदा आरोप लगा कर आप क्‍या साबित करना चाहते हैं? यानी, आपको लगता है कि जो कांग्रेस में नही है, वह भाजपायी है। आपकी बुद्धि को क्‍या हो गया है?

3. आपने फारवर्ड का कथित तौर पर वहिष्‍कार इसलिए किया था क्‍योंकि आपका एक लेख मैंने छापने से इंकार कर दिया था तथा दूसरे के बारे कहा था कि छपने में देर हो सकती है। राजनेताओं को जब टिकट नहीं मिलता या कुर्सी छीन जी जाती है कि वे कहते हैं कि 'जाति' का अपमान हो गया। इसी तरह, आपने आरोप लगाये कि फारवर्ड प्रेस दलितों की नहीं, ओबीसी की पत्रिका है और भाजपा के हाथों बिक गयी है। इसी कारण, दलित होने के कारण आपको प्रकाशित नहीं कर रही है। उस समय यही सब आपने खुद को एक प्रतिबद्ध एक आम्‍बेडकरवादी मार्क्‍सस्टि जतलाते हुए फेसबुक पर लिखा था। उसके एक महीने बाद आप कांग्रेस मे शामिल हो गये।

4. फारवर्ड प्रेस क्‍या – आप 'हंस' समेत लगभग 10 साहित्‍यक-वैचारिक पत्रिकाओं का पहले भी वहिष्‍कार कर चुके हैं। जिस भी पत्रिका के बारे में आपको लगता है कि वह आपको पर्याप्‍त भाव नहीं दे रही, उस पर आप कोई न कोई आरोप मढ कर वहिष्‍कार कर देते रहे हैं।

5 . महोदय, आप नाखून कटवाकर शहीद कहलाने का शौक पालने वालों में से हैं।

6. मेरे द्वारा कंवल भारती और उदित राज की तुलना करने में कोई निंदा का भाव नहीं था। वैसे आप बताएंगे कि उदित राज और कंवल भारती की राजनीति में कौन सा मौलिक अंतर है? प्रेमकुमार मणि के नाम को इस बहस में घसीट कर आपने इसे और नीचे लाने की कोशिश की है। उसका उत्‍तर मैं आपके वॉल पर दे चुका हूं।

7 . खानदानी कांग्रेसी महोदय, हमारे मन में आपके लिए सम्‍मान आम्‍बेडकरवादी लेखक होने के कारण रहा है, न कि कांग्रेस या किसी भी पार्टी में जाने के कारण। कम से कम अभी राजनीति में आपकी औकात एक चिरकुट छुटभैये नेता से ज्‍यादा नहीं है। कौन आपको एमपी/एमएलए बना रहा है, जिसकी दुहाई आप दे रहे हैं?

8. वैसे भी, मैं आपके आलोचकीय विवेक का कभी कायल नहीं रहा। आप चिरकुट टाइप के चापलूस लोगों में से रहे हैं, जिसने उदभ्रांत जैसे कवि के कथित महाकाव्‍य 'त्रेता युग' पर सिर्फ इसलिए एक मोटी किताब लिखी क्‍योंकि वे दूरदर्शन के बडे पद पर थे। उद्भ्रांत जी प्‍यारे व्‍यक्ति हो सकते हैं लेकिन आपको उन्‍हें इस सदी का महान कवि साबित करते हुए शर्म नहीं आयी?

9. मैंने अपने व्‍यक्तिगत अनुभव से यह भी देखा है कि आप निहायत ही कुंठाजन्‍य आवेग में व्‍यक्तिगत स्‍तर पर चीजों को देखते और समझते हैं।

10 . आप उद्भ्रांत जैसों को ही सर्टिफिकेट बांटते रहें। मुझे आपके प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है।

प्रमोद रंजन के फेसबुक वॉल से.

पत्रकारिता विश्वविद्यालय में सांध्‍यकालीन पाठयक्रमों में प्रवेश 5 मार्च 2014 तक

भोपाल । माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय द्वारा संचालित सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में प्रवेश 5 मार्च 2014 त्तक दिए जाएंगे। विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक सत्र 2014 में वैब संचार, वीडियो प्रोडक्‍शन, पर्यावरण संचार, भारतीय संचार परम्पराएँ, योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार, फिल्म पत्रकारिता एवं डिजिटल फोटोग्राफी जैसे विषयों में सांध्यकालीन पी.जी. डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। पाठ्यक्रम विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के साथ-साथ नौकरीपेशा व्यक्तियों, सेवानिवृत्त लोगों, सैन्य अधिकारियों तथा गृहिणियों के लिए भी उपलब्ध होंगे।

विश्वविद्यालय द्वारा सात सम्भावनाओं से भरे क्षेत्रों में सांध्यकालीन पी.जी.डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। विश्वविद्यालय का सांध्यकालीन वैब संचार पाठ्यक्रम अखबारों के ऑनलाईन संस्करण, वैब पोर्टल, वैब रेडियो एवं वैब टेलीविजन जैसे क्षेत्रों के लिए कुशलकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है। वीडियो कार्यक्रम के निर्माण सम्बन्धी तकनीकी एवं सृजनात्मक पक्ष के साथ स्टुडियो एवं आउटडोर शूटिंग, नॉनलीनियर सम्पादन, डिजिटल उपकरणों के संचालन आदि के सम्बन्ध में कुशल संचारकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से वीडियो प्रोडक्शन का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। पर्यावरण आज समाज में ज्वलंत विषय है। पर्यावरण के विविध पक्षों की जानकारी प्रदान करने एवं इस क्षेत्र के लिए विशेष लेखन-कौशल विकसित करने के उद्देश्य से पर्यावरण संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। योग, स्वास्थ्य और आध्यात्म के क्षेत्र में व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने तथा इस क्षेत्र के लिए कुशल कार्यकर्ता को तैयार करने के उद्देश्य से योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। भारतीय दर्शन एवं प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों में मौजूद संचार के विभिन्न स्वरूपों की शिक्षा एवं वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में उनके सार्थक उपयोग की दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय संचार परम्पराओं में सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। सिनेमा के विविध क्षेत्रों में रिपोर्टिंग, फिल्म समीक्षा एवं फिल्म लेखन की दृष्टि से फिल्म पत्रकारिता का पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। फोटोग्राफी के विविध आयामों से परिचित कराने तथा कौशलपूर्ण डिजिटल फोटोग्राफी सिखाने के उद्देश्‍य से डिजिटल फोटोग्राफी का पाठ्यक्रम उपलब्‍ध हैं। प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिये 15 स्थान निर्धारित किये गये हैं।

पाठ्यक्रमों में प्रवेश स्नातक परीक्षा में प्राप्त अंकों की मेरिट के आधार पर दिया जायेगा। पाठ्यक्रमों की अवधि एक वर्ष है। प्रत्येक पाठ्यक्रम का शुल्क 10,000 रुपये रखा गया है जो विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित किश्तों में देय होगा। प्रवेश हेतु विवरणिका एवं आवेदन पत्र विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर में 150/- रुपये (अ.ज./अ.ज.जा. के लिए 100/- रुपये) जमा कर प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रत्‍येक अतिरिक्‍त आवेदन का शुल्‍क 50 रुपये निर्धारित है।  इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.mcu.ac.in से विवरणिका एवं आवेदन पत्र डाउनलोड कर निर्धारित राशि के डी.डी. के साथ आवेदन जमा किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए टेलीफोन नम्बर 0755-2553523 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

(डा. पवित्र श्रीवास्तव)
निदेशक, प्रवेश

प्रेस विज्ञप्ति

स्ट्रिंगरों को पैसा नहीं दे रहे ‘आई विटनेस न्यूज’ वाले

प्रिय यशवंत जी सादर प्रणाम,  मेरा नाम सरूप सिंह है और मैं फरीदाबाद में रहता हूँ। मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि हम भड़ास 4 मीडिया के पाठकों को ये जानकारी देने कि कृपया करें कि जो लोग दुकानों के रूप में न्यूज़ चैनल खोल कर बैठे है और आने वाले चुनावों को लेकर अपने जाल में अंशकालिक रिपोर्टर्स (स्ट्रिंगर्स) से काम लेकर उनको पैसा नहीं देते और फ्रैंचाइज़ी के नाम पर अपनी दुकानदारी चल रहे हैं, उन पर नकेल कैसे कसी जा सकती है.

ऐसा एक चैनल हरियाणा में भी अभी अभी खुला है. उसका नाम है आई विटनेस न्यूज़ जो कि स्ट्रिंगर्स का पैसा नहीं दे रहा है. इस चैनल की शिकायत कहां की जा सकती है. देश भर में इस तरह के सैंकड़ों चैनल है जो इस तरह का गोरखधंधा कर रहे हैं और जो लोग मीडिया की चकाचौंध से इस ओर आते हैं उनका शोषण होता है.  

सरूप सिंह
फरीदाबाद
sarup.singh@ymail.com

नीरा राडिया की कंपनी के खिलाफ मुकदमे की हरी झंडी

गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआइओ) ने कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया की वैष्णवी समूह की कंपनियों के खिलाफ कंपनी कानून के उल्लंघन के सिलसिले में मुकदमा चलाने की तैयारी शुरू कर दी है. कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने इसकी हरी झंडी दे दी है. इस समूह ने रविवार को कॉरपोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट से हस्तक्षेप की मांग की. साथ ही पायलट से आग्रह किया है कि जांच एजेंसी पूरी जांच प्रक्रिया का पालन कर रही है या नहीं इसकी जांच करने का आदेश दें.

एसएफआइओ ने हाल ही में कथित उल्लंघनों को लेकर अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट पेश की है. इसमें वैष्णवी समूह की कुछ कंपनियों के महत्वपूर्ण वित्तीय और अन्य ब्योरे नहीं सार्वजनिक करने और बगैर उचित प्रक्रिया का पालन किए लेन देन शुरू करने का आरोप लगाया है. साथ ही एसएफआइओ ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय से अभियोजन प्रक्रिया शुरू करने की स्वीकृति मांगी थी. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जांच एजेंसी को मुकदमा चलाने की अब अनुमति मिल चुकी है और मामले में कौन सी दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है इस पर विचार किया जा रहा है. इस बीच वैष्णवी कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन ने रविवार को पायलट को पत्र लिखा है. कंपनी ने एसएफआइओ की रिपोर्ट की प्रति भी मांगी है.
 

पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल की चौथी किताब ‘मोदी मंत्र’ का विमोचन 28 फरवरी को

वरिष्ठ टीवी पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल की चौथी किताब "मोदी मंत्र" का विमोचन 28 फरवरी को दोपहर 3 बजे होगा। विमोचन समारोह दिल्ली के मशहूर जगह कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में होगा। हरीश की किताब मोदी मंत्र मुख्यतया नरेंद्र मोदी के विकाम मॉडल पर आधारित है। वैसे तो इन दिनों नरेंद्र मोदी पर किताबों की बाढ़ सी आई हुई है, लेकिन इस किताब की खासियत ये है कि इसकी प्रस्तावना खुद नरेंद्र मोदी ने लिखी है।

किताब में न सिर्फ नरेंद्र मोदी के विजन और मिशन को दर्शाया गया है, बल्कि अब तक गुजरात में किए गए उनके कार्यों का लेखाजोखा भी पेश किया गया है। इसके अलावा लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल ने किताब में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की 101 वजहें भी गिनाई हैं। मोदी की जिंदगी से जुड़े हर छोटे से छोटे प्रसंग, उनपर पैदा हुए विवादों को आधार बनाकर उसे इस किताब में समेटने की कोशिश की गई है। जिन्हें भी नरेंद्र मोदी को समझने में जरा भी दिलचस्पी है, उन्हें इस किताब को जरूर पढ़नी चाहिए। इसके अलावा बीजेपी के जो तमाम दिग्गज टेलीविजन न्यूज चैनलों में डिबेट में जाते हैं, उन्हें भी ये किताब पढ़नी चाहिए ताकि अपनी बातों को तथ्यों के साथ पेश कर सकें।

हरीश चंद्र बर्णवाल की इससे पहले तीन और किताबें आ चुकी हैं। इसमें पहली किताब गजल संग्रह, दूसरी न्यूज चैनलों की भाषा पर और तीसरी कहानी संग्रह पहले ही आ चुकी है। मोदी मंत्र किताब के लेखक से आप सीधे उनके ईमेल या फोन (9810570862) पर संपर्क कर सकते हैं। उनका ईमेल आईडी है – hcburnwal@gmail.com

ओपिनियन पोल का पोल-खोल कार्यक्रम

यह करीब पंद्रह दिन पहले की बात है। दिल्ली से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर नोएडा से सटे बुलंदशहर जिले में एक सर्वे एजेंसी इडिया टीवी के लिए चुनावी सर्वे कर रही थी। पूछने पर उन्होंने यही बताया था। सर्वे करने वाले नाटे कद के दो लोग थे, यदि उन्हें बच्चा कहा जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा। उन दोनों की उम्र 17 से 19 साल के बीच की रही होगी। वह दोनों चौराहे के किनारे स्थित चाय की दुकान पर बैठकर चाय की चुस्कियों का मजा ले रहे पत्रकारों से सवाल पूछकर अपने फार्मों को तेजी से भर रहे थे, उनमें अधिकांश स्थानीय पत्रकार अपने परिचित थे।

सड़क से गुजरते समय संयोग से हम भी वहां पहुंच गए। मौका देखकर उन्होंने फार्म में लिखे हुए कुछ सवाल हमारी ओर भी दाग दिए। हमने भी विनम्रतापूर्वक कुछ सवालों के जवाब देने की कोशिश की। लेकिन, उन युवाओं को देखकर हमारे मन में भी कुछ प्रश्न पूछने की जिज्ञासा हुई। हमारा पहला प्रश्न था, आपका खाना-खर्चा तो चल जाता है ना? दोनों लड़कों ने मुस्कराकर जवाब दिया कि बस पार्ट टाइम जॉब है, वैसे ग्रेजुएशन चल रहा है।

दूसरा अहम सवाल था, जिसका उत्तर उन्होंने बेहद ईमानदारी के साथ दिया कि आप गांवों में सर्वे करने क्यों नहीं जाते हैं? उन्होंने बताया कि हमें हिदायत दी गई है कि स्थानीय पत्रकारों से ज्यादा आंकड़े लिए जाएं। उन्हीं के अनुमान ज्यादा ठीक होते हैं। आम नागरिकों से मिलकर समय खराब करने की जरूरत नहीं है। आम नागरिकों को
ज्यादा कुछ नहीं पता होता है। वे तो वही जानते हैं जो मीडिया बताता है। गांव बगैरा में जानने की जरूरत नहीं।

यह है मीडिया के चुनावी अनुमानों की हकीकत जिसे आज न्यूज एक्सप्रेस ने और बेहतर तरीके बताने की कोशिश की है। न्यूज एक्सप्रेस का इरादा या पर्दे का पीछे का सच कुछ भी रहा हो लेकिन भविष्य में सकारात्मक परिणाम आने और इस विषय पर गंभीर बहस होने की उम्मीद की जा सकती है।

आशीष कुमार
रिसर्च स्कॉलर
पत्रकारिता एवं जनसंचार
09411400108

असित नाथ तिवारी ने जी न्यूज और पुनीत कुमार चौधरी ने सुदर्शन न्यूज छोड़ा

ज़ी न्यूज़ को एक और झटका लगा है. असित नाथ तिवारी ने ज़ी न्यूज़ से नाता तोड़ लिया है. वो यहां एसोसिएट प्रोड्यूसर पद पर थे. असित अभी कहां गए हैं, ये नहीं पता चल पाया है. असित इससे पहले प्रकाश झा के मौर्य टीवी में एंकर्स इंचार्ज हुआ करते थे. असित ने महुआ और सहारा में भी काम किया है. 

पुनीत कुमार चौधरी पिछले 3 साल से सुदर्शन न्यूज़ के पत्रकार हैं. पुनीत कुमार चौधरी ने पोलिटिकल बीट के साथ साथ अपराध जगत की खबरों को भी कवर किया. ताजी सूचना है कि पुनीत ने सुदर्शन न्यूज़ से इस्तीफा दे दिया है. बताया जाता है कि एक खबर को लेकर मैनेजमेंट के गैर-जिम्मेदाराना रवैये के कारण उन्होंने इस्तीफा दिया.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

Zee Media office in Jaipur attacked by Karni Sena over ‘Jodha Akbar’

New Delhi: An armed mob attacked the Zee Media office here and destroyed property and valuables on Monday. Protesters belonging to an outfit called the `Karni Sena` launched an attack over alleged misrepresentation of `Rajputs` portrayed in the TV show `Jodha Akbar` aired on the Zee TV channel.

Armed with assault weapons and daggers, the protesters raised slogans and destroyed property and valuables inside the premises. Police personnel stood in silence while the vandalism took place and barely made an effort to dispel the vandals. The incident has yet again raised questions on the security of media personnel in the city.

‘4रियल न्यूज’ की एंकर शशि तुषार शर्मा को एवार्ड

चैनल '4रियल न्यूज' की प्राइम टाइम एंकर शशि तुषार शर्मा को साल 2014 का बेस्ट फीमेल एंकर अवार्ड से नवाजा गया… फिक्की ऑडिटोरिय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया ने शशि को 8वें मीडिया एक्सिलेंस अवार्ड से सम्मानित किया…. शशि तुषार शर्मा ने इस कामयाबी के पीछे अपनी मेहनत और लगन के साथ साथ अपने परिवार का हाथ बताया…

इससे पहले भी शशि तुषार शर्मा को हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा राजीव गांधी अवार्ड से नवाज़ चुके हैं।  इस चैनल से पहले शशि न्यू़ज नेशन, आजतक और लाइव इंडिया में काम कर चुकी हैं।


मीडिया  फेडरेशन  ऑफ़  इंडिया ने फिक्की ऑडिटोरियम में 8th मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड का जो आयोजन किया उसमें नवजोत सिंधु को बेस्ट रीजनल एडिटर का  अवार्ड दिया गया. जनता टीवी को बेस्ट रीजनल टीवी का अवार्ड मिला.

प्रेस को वेश्या कहना!

‘ए डीटर्स गिल्ड’  ने जनरल वी.के. सिंह और अरविंद केजरीवाल की आलोचना की है। गिल्ड ने दोनों सज्जनों द्वारा की गई पत्रकारों की निंदा को अनुचित बताया है और कहा है कि वे अपने शब्दों पर ध्यान दें। सचमुच इन दोनों सज्जनों ने पत्रकारों के खिलाफ प्राणलेवा शब्दों का प्रयोग किया है। जनरल सिंह ने उन पत्रकारों को, जिन्होंने जनवरी 2012 को फौज की टुकड़ियों की हलचल पर लिखा था, ‘प्रेस्टीट्यूट’ कह दिया। याने उनकी तुलना अंग्रेजी के शब्द ‘प्रास्टीट्यूट’ से कर दी।

यह ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द सचमुच बड़ा मारक है। इसकी ध्वनि और इसका अर्थ इतनी गहरी मार करते हैं कि प्रेस में काम करने वाला कोई भी पत्रकार तिलमिला उठे, यह स्वाभाविक है। ‘एडीटर्स गिल्ड’ इस शब्द की निंदा नहीं करती तो क्या करती? आप किसी सती-साध्वी को वेश्या कह दें तो क्या वह चुप बैठेगी? सारे पत्रकार इसशब्द से बौखला उठें तो कोई आश्चर्य नहीं।

लेकिन यहां प्रश्न यह भी है कि क्या जनरल सिंह ने सभी पत्रकारों को वेश्या कहा है? बिल्कुल नहीं! उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार के उन पत्रकारों के लिए ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द का प्रयोग किया है, जिन्होंने उन पर तख्ता-पलट का संदेह व्यक्त किया था। उनका आरोप था कि जनरल सिंह की सेवा-निवृत्ति का मामला जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय में आने वाला था, उसी दिन उन्होंने सेना की कुछ टुकड़ियां दिल्ली रवाना कर दी थीं। उसके कारण नेताओं के पसीने छूट गए थे। इस खबर का खंडन रक्षा मंत्रालय और रक्षा मंत्री, दोनों ने कर दिया था। लेकिन इस खबर के कारण उस अखबार के संपादक की जीवन-भर की प्रतिष्ठा पर बादल-से छा गए थे।

वास्तव में यह एक बुरा हादसा था। वह संपादक और वे पत्रकार अपनी व्यावसायिक योग्यता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन किन्हीं विश्वसनीय सूत्रों की वजह से वे गुमराह हो गए होंगे। वह खबर इतनी बड़ी थी कि वे उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे। अब डेढ़-दो साल बाद उसी अखबार ने उसी खबर को दुबारा छापा और कुछ नए प्रमाण भी दिए। रक्षा मंत्री ने दुबारा जमकर खंडन किया लेकिन जनरल साहब चिढ़ गए। उन्होंने ‘प्रेस्टीट्यूट’ कह दिया। जनरल का खिसियाना भी स्वाभाविक था। खिसियाट में कही बात को जी से लगाना ठीक नहीं।

वैसे भी कई प्रोफेसर लोग पत्रकारिता को दुनिया का सबसे ‘पुराना धंधा’ कहते हैं। इसका मतलब वही होता है, जो जनरल सिंह ने कहा है। इसी प्रकार अरविंद केजरीवाल ने भी पत्रकारिता के विरुद्ध अपनी भड़ास निकाली है। कुछ अखबारों और टीवी चैनलों को अंबानी ने खरीद लिया है, यह आरोप अरविंद ने लगा दिया है। यह असंभव नहीं है लेकिन इसका प्रमाण क्या है? बिना प्रमाण के ऐसी बातें कह देने से अपनी ही प्रामाणिकता पर संदेह पैदा हो जाता है। जब मीडिया ‘आप’ के गीत गा रहा था, तब तो अरविंद ने कुछ नहीं कहा। इसमें शक नहीं कि नेताओं की तरह मीडिया के भी कुछ लोग खरीदे और बेचे जा सकते हैं लेकिन सभी पत्रकारों को एक ही झाड़ू से बुहारने का काम कोई अनाड़ी नेता ही कर सकता है। मुझे विश्वास है कि जनरल सिंह और अरविंद ज्यों-ज्यों सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ते जाएंगे, धीरे-धीरे अपने शब्द-चयन में सावधानी बरतते जाएंगे।

लेखक वेद प्रदाप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

भाजपा के ‘दलित कार्ड’ ने बढ़ा दी राजनीतिक हलचल

भाजपा नेतृत्व ने लोकसभा के लिए 272 प्लस का अपना अंक गणित पूरा करने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ की उस्तादी भी तेज कर दी है। कई राज्यों में जातीय और सामाजिक समीकरण अपने पक्ष में करने के लिए क्षत्रपों पर ‘दोस्ती’ के डोरे डाले जा रहे हैं। भाजपा नेतृत्व की इस रणनीति में मीडिया सर्वेक्षण खासे मददगार साबित हो रहे हैं। क्योंकि, लगातार सर्वेक्षणों में यही कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी की चुनावी मुहिम तेजी से निर्णायक दौर में पहुंच रही है।

इन सर्वेक्षणों में ये भी संकेत मिल रहे हैं कि इस बार कांग्रेस नेतृत्व वाला यूपीए गठबंधन काफी फिसड्डी रहने वाला है। यहां तक कि यूपीए का आंकड़ा 100 के अंदर सिमट सकता है। कांग्रेस के बारे में तो यह अनुमान है कि पार्टी को अब तक की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह के आकलन से तमाम छोटे दलों ने सत्ता में भागीदारी के लिहाज से भाजपा से गठबंधन के लिए बातचीत शुरू की है। इस संदर्भ में जाने-माने दलित नेता राम विलास पासवान का बदला हुआ राजनीतिक पैंतरा इन दिनों खास चर्चा में आ गया है।

पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के प्रमुख हैं। अपने गृह प्रदेश बिहार की चुनावी राजनीति में पासवान की दशकों से खास भूमिका रहती आई है। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें जरूर बड़ा झटका लगा था। उनकी पार्टी इस चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। यहां तक कि हाजीपुर संसदीय सीट से पासवान खुद बुरी तरह पराजित हो गए थे। बाद में, वे राजद प्रमुख लालू यादव की मदद से किसी तरह राज्यसभा में पहुंचे। पासवान ने 2000 में लोजपा बनाई थी। दलितों और वंचित वर्गों के बीच पासवान की पार्टी का एक मजबूत वोट बैंक रहा है। पासवान, तमाम खूबियों के बावजूद राजनीतिक अवसरवाद के लिए भी बदनाम रहे हैं। इसी के चलते वे केंद्र में 1989 से लेकर 2009 तक लगातार सत्ता में रहे। चाहे, सरकारें किसी भी दल की रही हों।

वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी केंद्रीय मंत्री थे। 2002 में उन्होंने गुजरात के दंगों को मुद्दा बनाते हुए सरकार से इस्तीफा दे दिया था। उस दौर में धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत की दुहाई देते हुए उन्होंने कहा था कि उनके कहने के बावजूद नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को बर्खास्त नहीं किया गया। ऐसे में, वे एनडीए की राजनीति से अलग हो रहे हैं। 2004 में वे यूपीए के गठबंधन में भाजपा की रीति-नीति को कोसते हुए आ गए थे। सो, मनमोहन सरकार में मलाईदार विभाग के मंत्री रहे। 2009 में चुनाव हारे, तो मंत्री बनने का मौका नहीं मिल पाया। लेकिन, इस बार बिहार में वे कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए उतावले घूमते रहे हैं।

इस सिलसिले में कई बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात भी कर चुके हैं। बीच में, वे कोशिश कर रहे थे कि कांग्रेस, लालू यादव की जगह जदयू के नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से चुनावी हाथ मिला ले। लेकिन, पासवान की ये कोशिशें कामयाब नहीं हुईं। ऐसे में, यही तय हुआ कि कांग्रेस का गठबंधन लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के साथ होगा। इस गठबंधन का कोई औपचारिक ऐलान हो पाता, इसके पहले ही तीनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर किचकिच शुरू हुई। सूत्रों के अनुसार, बिहार की 40 संसदीय सीटों में से पासवान ने अपनी पार्टी के लिए 10 सीटें मांगी थीं। जबकि, राजद और कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें 5 सीटों से ज्यादा देने को तैयार नहीं हो रहा था। इसी को लेकर पासवान नाराज थे। पासवान कई दिनों से तुनके चल रहे थे।

इस बीच पासवान पर भाजपा नेतृत्व ने मेल-मिलाप के डोरे डाले। पासवान के करीबी सूत्रों के अनुसार, मोदी की चुनावी मुहिम का व्यापक असर बिहार में भी देखा गया है। इस जमीनी सच्चाई का आकलन करके लोजपा ने भाजपा से   गठबंधन करने की कोशिशें तेज कीं। पिछले दिनों पासवान के बेटे एवं लोजपा संसदीय बोर्ड के प्रमुख चिराग पासवान ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद ही लोजपा और भाजपा में चुनावी गठबंधन की बातचीत आगे बढ़ी। बताया जा रहा है कि पासवान ने भाजपा से अपनी पार्टी के लिए 8 सीटें मांगी हैं। इन्हीं सीटों को लेकर बातचीत निर्णायक दौर में हैं। पासवान, जमुई संसदीय क्षेत्र से अपने बेटे चिराग को लड़ाना चाहते हैं। जबकि, अपने भाई पूर्व सांसद रामचंद्र पासवान को समस्तीपुर से खड़ा करना चाहते हैं। इन्हीं सीटों को लेकर बातचीत फंसी हुई है।

लोजपा के वरिष्ठ नेता सूरजभान ने मीडिया में खुलकर दावा कर दिया है कि दोनों दलों के बीच गठबंधन की बात निर्णायक दौर में पहुंच गई है। एक-दो दिन के अंदर ही इसका औपचारिक ऐलान हो जाएगा। लेकिन, पासवान के बेटे चिराग ने यही कहा है कि अभी गठबंधन के बारे में अंतिम फैसले की स्थिति नहीं आई। जब चिराग से नरेंद्र मोदी की राजनीति के संदर्भ में सवाल किए गए, तो उन्होंने यही कहा कि अब इतने वर्षों बाद मोदी के संदर्भ में गुजरात के दंगों को याद करने का कोई औचित्य नहीं रहा। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में गठित विशेष जांच दल (एलआईटी) ने मोदी को ‘क्लीनचिट’ दे दी है। ऐसे में, मोदी की आलोचना का कोई औचित्य नहीं है। पासवान के बेटे ने यह भी कह दिया है कि लोजपा के लिए कोई पार्टी अछूत नहीं है। राजनीति में हमेशा सभी संभावनाएं बनी ही रहती हैं। इस तरह की टिप्पणियों से चिराग पासवान ने एक तरह से गठबंधन की बातचीत की पुष्टि कर ही दी है।

यह अलग बात है कि राम विलास पासवान मीडिया को टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं हुए। राजद प्रमुख लालू यादव ने पासवान के नए राजनीतिक खेल की संभावनाओं पर यही कहा है कि जब तक लोजपा आधिकारिक रूप से कोई ऐलान नहीं करती, तब तक वे भला इस पर टिप्पणी क्या करें? इसी के साथ लालू अपने को रोक नहीं पाए। उन्होंने कह ही दिया कि यदि पासवान सांप्रदायिक ताकतों से हाथ मिलाते हैं, तो अपनी बची राजनीतिक साख को भी खो देंगे। वे सवाल करते हैं कि नरेंद्र मोदी को दंगाई नेता कह कर पासवान वाजपेयी सरकार से अलग हुए थे। अब क्या 12 सालों में मोदी के सारे पाप धुल गए हैं? केंद्रीय राज्यमंत्री एवं एनसीपी के नेता तारिक अनवर ने इस मामले में यही कहा है कि यदि पासवान अपना पैंतरा बदलकर भाजपा से गठबंधन करते हैं, तो यह देश की राजनीति के लिए बड़ा दुखद होगा। क्योंकि, संघ परिवार की राजनीति कभी भी वंचित वर्गों और अल्पसंख्यक वर्गों के हित की नहीं हो सकती। ऐसे में, क्या गठबंधन महज सत्ता में हिस्सेदारी के लिए किया जा रहा है? ऐसे सवाल पासवान से जरूर पूछे जाएंगे।

पिछले दिनों ही महाराष्ट्र की राजनीति में दलित कार्ड की रणनीति के तहत भाजपा ने भारतीय रिपब्लिकन पार्टी (अठावले) के नेता रामदास अठावले से हाथ मिला लिया है। महाराष्ट्र की दलित राजनीति में अठावले की खास भूमिका रहती है। भाजपा ने समर्थन देकर अठावले को राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश व बिहार की राजनीति में दलित वोट बैंक की खास अहमियत मानी जाती है। संघ नेतृत्व की दिलचस्पी रही है कि इस चुनावी दौर में इन प्रदेशों के मजबूत दलित नेताओं के साथ भाजपा की दोस्ती हो जाए। इसी के तहत पहले अठावले को जोड़ा गया। अब कद्दावार नेता पासवान पर डोरे डाले जा रहे हैं। सोमवार को चर्चित दलित नेता उदित राज तो सीधे भाजपा में ही शामिल हो गए। वे भारतीय राजस्व सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। 2003 में उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा देकर इंडियन जस्टिस पार्टी का गठन किया था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में उदित राज दलित राजनीति का मंथन करते रहे हैं। तमाम दलित सवालों पर वे राष्ट्रव्यापी आंदोलन भी करते रहे हैं। वे भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सामने भाजपाई बने हैं। उदित राज का कहना है कि मोदी ने गुजरात में सफल विकास मॉडल देकर यह उम्मीद जगाई है कि उनके नेतृत्व में देश प्रगति के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ेगा। उन्होंने उम्मीद जाहिर की है कि भाजपा के राज में दलितों और वंचित वर्गों का सबसे ज्यादा उत्थान होगा। जबकि, कांग्रेस ने इन वर्गों को केवल वोट बैंक के रूप में ही भुनाया है। इसीलिए उन्होंने भाजपा के साथ आने का फैसला किया है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि उदित राज के जरिए पार्टी उत्तर प्रदेश में बसपा के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। क्योंकि, प्रदेश के कई जिलों में उदित राज की पार्टी का काफी मजबूत तानाबाना रहा है।

उदित राज बड़े जोशीले नेता हैं। लेकिन, वे भाजपा और पूरे संघ परिवार को हाल तक सांप्रदायिक कुनबा करार करते रहे हैं। यही कहते रहे हैं कि संघ परिवार की राजनीति वंचित वर्गों और अल्पसंख्यक वर्गों के हित की कभी नहीं हो सकती। मीडिया साक्षात्कारों में उदित राज, नरेंद्र मोदी को सांप्रदायिक जहर फैलाने वाला खतरनाक नेता कहते रहे हैं। वे कई बार यह भी कह चुके हैं कि मोदी के अंदर तानाशाही वाली प्रवृत्ति है। यदि ऐसे नेता कभी देश की राजनीति में आगे आए, तो लोकतंत्र के लिए खतरा बढ़ेगा। लेकिन, भाजपाई बनने के बाद अब उदित राज के तेवर बदल गए हैं। वे कांग्रेस की वंशवादी राजनीति को ‘कैंसर’ करार कर   रहे हैं। कह रहे हैं कि देश इस पार्टी से मुक्त होगा, तो ही कल्याण संभव है। राजनीतिक हल्कों में पासवान के संभावित पैंतरे के बारे में भी कई तरह की बातें की जा रही हैं। क्योंकि, वे भी भाजपा को घोर सांप्रदायिक पार्टी करार करते आए हैं। मोदी की राजनीति को तो वे पानी पी-पीकर कोसते रहे हैं। यहां तक कि मीडिया साक्षात्कारों में वे भाजपा को ‘भारत जलाओ पार्टी’ तक कहते रहे हैं। इंतजार कीजिए की पासवान अगले कुछ दिनों में ही किन लफ्जों में भाजपा और मोदी का ‘कीर्तन’ करते नजर आते हैं!

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

गिरफ्तार होंगे सुब्रत रॉय, गैर-जमानती वारंट जारी

सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत रॉय सहारा किसी भी वक्त गिरफ्तार हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय के खिलाफ गैर जमानती वॉरंट जारी किया है। मामला निवेशकों के पैसे लौटाने में आनाकानी का है। आज सहारा की ग्रुप कंपनियों के 3 डायरेक्टरों के साथ उन्हें भी सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होना था लेकिन वो नहीं पहुंचे। इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय सहारा के खिलाफ ये कठोर फैसला लिया है। हम आपको बता दें कि डिबेंचर के जरिए सहारा ने 24,000 करोड़ रुपए जुटाए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सहारा ने अभी तक सेबी के पास करीब 5,000 करोड़ रुपये ही जमा कराए हैं। इस मामले में सहारा ने काफी आनाकानी है और अब मामला सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी तक पहुंच चुका है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय सहारा को 4 मार्च तक पेश होने को कहा है। गैर-जमानती वारंट के तहत पुलिस सुब्रत रॉय सहारा को गिरफ्तार करेगी। पुलिस सुब्रत रॉय सहारा को 4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में पेश करेगी। सेबी-सहारा मामले में अगली सुनवाई अब 4 मार्च को होगी। हालांकि कानून के कुछ जानकारों के मुताबिक अब सुब्रत रॉय सहारा को जमानत नहीं मिल पाएगी। वहीं सुब्रत रॉय के वकील ने अदालत के सामने दलील दी है कि उनके मुवक्किल के मां की तबीयत बहुत खराब है और उनका अपनी मां के पास रहना जरूरी है।

वरिष्ठ वकील एच पी रनीना का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर उम्मीद के मुताबिक आया है। अब सुब्रत रॉय सहारा की किसी भी वक्त गिरफ्तारी हो सकती है। संभव है कि 4 मार्च तक सुब्रत रॉय सहारा को जेल में रहना पड़े। 4 मार्च की पेशी के बाद ही सुब्रत रॉय सहारा गैर-जमानती वारंट के खिलाफ अपील कर सकते हैं। एचपी रनीना के मुताबिक सुब्रत रॉय सहारा के पास अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कोई न्यायिक विकल्प नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुब्रत रॉय सहारा की निजी संपत्तियों को भी सील किया जा सकता है।

वहीं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील माजिद मेमन का कहना है कि सुब्रत रॉय हिरासत में लिए जाएंगे और 4 मार्च तक उन्हें हिरासत में रखा जाएगा। लेकिन सुब्रत रॉय के वकील उन्हें 4 मार्च से पहले कोर्ट ले जाए और वारंट रद्द करने की अपील कर सकते हैं। वकील को खुद कोर्ट में वारंट पर 4 मार्च तक रोक लगाने की अर्जी देनी होगी। साथ ही 4 मार्च को सुब्रत रॉय को खुद बिना बुलाए आने का भरोसा देना होगा।

गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के नाम रवीश कुमार की खुली चिट्ठी

आदरणीय भारत वर्ष के गृहमंत्री शिंदे जी

प्रणाम

आपने खंडन करने से पूर्व अपने एक बयान में कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बैठे−बिठाए बड़े पैमाने पर खुराफाती काम होते हैं। चूंकि मेरे पास खुफिया विभाग है यह काम कहां से करवाए जा रहे हैं मैं जानता हूं क्योंकि मैं सब कुछ देख रहा हूं उन पर चुपचाप नकेल लगवाने का काम मैं करवा रहा हूं। हाल के तीन−चार महीनों में इनही में से कुछ लोगों ने मानो एक मुहिम ही छेड़ रखी थी। ऐसी दुष्प्रचारक प्रवृत्तियों को उखाड़ निकालने का काम हम कर रहे हैं।

इस बयान का सुधार आपने इस तरह से किया कि आपने सोशल मीडिया के बारे में यह बात कही है। सरल हिन्दी में मैट्रिक पास कोई भी विद्यार्थी इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया में प्रयुक्त वर्णाक्षरों का भेद समझ सकता है। अगर आपने सोशल मीडिया के बारे में भी यह कहा है तो सच बोलने के लिए बधाई। आपके ही सूचना−प्रसारण मंत्री इन दिनों विज्ञापन दे रहे हैं कि उन्होंने सूचनाओं को आजाद करने के लिए क्या−क्या कदम उठाए हैं। शायद आपसे बात कर विज्ञापन देते तो खुफिया विभाग के इस शानदार काम का जिक्र भी उसी विज्ञापन में आ जाता। ऐसी उपलब्धि आपको मुबारक।

पत्रकारों का पीछा इन दिनों तमाम दल कर रहे हैं। पहले भी करते रहे हैं। सबके पास खुफिया विभाग तो नहीं है लिहाजा आप से अपील करता हूं कि बता दें कि यह काम आप ही अकेले कर रहे हैं या और भी कई दल कर रहे हैं। इस तरह के बयानों से ऐसा प्रतीत होता है कि आप मीडिया को डरा रहे हैं। सोशल मीडिया को डरा रहे हैं। यह आपके भीतर का डर बोल रहा है। आपको गृहमंत्री की जिम्मेदारी दी गई है आप पत्रकारों के घर टेलीफोन की चिंता छोड़ दीजिए। एक नागरिक के नाते गुजारिश तो कर ही सकता हूं, क्योंकि मेरे पास आप पर नजर रखने के लिए कोई खुफिया विभाग नहीं हैं।
 
आप बड़े हैं इसलिए फिर से प्रणाम सर,
रवीश कुमार
एंकर
इलेक्ट्रानिक मीडिया


मूल खबर:

गृहमंत्री शिंदे ने दी खिलाफत वाले TV चैनल्स को ‘कुचलने’ की धमकी, बाद में पलटे

पुणे। केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कुचलने की धमकी देने वाला बयान सामने आया है। गृह मंत्री ने यह विवादित बयान रविवार शाम अपने लोकसभा क्षेत्र शोलापुर में आयोजित कांग्रेस युवा मेले के दौरान दिया। अपने संबोधन में शिंदे ने आरोप लगाया कि पिछले चार महीने से टीवी चैनलों का एक धड़ा उनके और उनकी पार्टी के बारे में खबरों में छेड़छाड़ कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर तत्काल इस तरह की खबरों को नहीं रोका गया तो ऐसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कुचल दिया जाएगा।

उन्होंने कहा, “मेरे अधीन खुफिया विभाग आता है। मुझे पता है कि इस तरह की चीजें कौन कर रहा है। मुझे पता है कि क्या हो रहा है। इसके पीछे कुछ ताकतें हैं।” शिंदे का बयान राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया द्वारा कराये गए ऐसे चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की पृष्ठभूमि में आये हैं जिनमें आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की पतली हालत का पूर्वानुमान लगाया गया है। शिंदे का बयान मीडिया में आने के बाद वह अपने बयान से पलट गए। शिंदे ने कहा यह बात सोशल मीडिया के बारे में कही थी न कि टीव चैनलों के बारे में।

मीडिया विरोधी कमेंट पर पर्रिकर के खिलाफ गुस्सा, माफी की मांग

गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर की मीडिया के खिलाफ की गई टिप्पणी का मामला अब भारतीय प्रेस आयोग के पास पहुंच चुका है। कांग्रेस के प्रवक्ता सुनील कवथांकर ने बुधवार को प्रेस आयोग से की गई शिकायत में एक कार्यक्रम के दौरान रविवार को मीडिया के खिलाफ पर्रिकर की 'गैरजिम्मेदाराना और घृणित' टिप्पणी को प्रेस की आजादी पर हमला बताया है। शिकायत में कहा गया है कि अत्यंत शिक्षित मुख्यमंत्रियों में से एक पर्रिकर की संवाददाताओं की निष्ठा के खिलाफ इस प्रकार की घृणित और अपमानजनक टिप्पणी से प्रेस की आजादी के प्रति उनके लापरवाह और अविवेकी नजरिए को प्रदर्शित करता है।

इसमें कहा गया है कि इससे उनकी राजनीतिक सूझबूझ पर संदेह पैदा होता है और यह उनके जैसी कदकाठी के राजनेता के लिहाज से मेल नहीं खाता। शिकायत में कहा गया है कि गोवा में प्रेस अत्यंत सक्रिय है और राज्य में जो कुछ घटित हुआ या हो रहा है उसकी जिम्मेदारी के साथ खबर दी गई है, क्योंकि ऐसा करना समाज के हित में था। एक सार्वजनिक समारोह में पर्रिकर ने कहा था कि एक रिपोर्टर का वेतन क्या है, एक समाचार वाचक कितना उपार्जित करता है? शायद 25000 रुपये। इनमें से अधिकांश स्नातक हैं। वे महान विचारक..बुद्धिजीवी नहीं हैं। वे वही लिखते हैं जैसा वे समझते हैं। पर्रिकर ने यह भी कहा कि गोवा में पेड न्यूज के भी उदाहरण हैं जहां लोगों से पैसे लेकर लिखे। गोवा में विपक्ष के साथ ही साथ पत्रकार संघ ने भी पर्रिकर की आलोचना की और उनसे माफी मांगने के लिए कहा। पर्रिकर ने हालांकि कहा है कि उन्हें गलत संदर्भ में उद्धृत किया गया है।

गोवा में पत्रकारों और विपक्षी पार्टियों ने मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर से सार्वजनिक माफी की मांग की है। उनका कहना है कि पर्रिकर ने जो बयान दिया था वह मीडिया को नीचा दिखाने और इसे धमकाने वाला था। गोवा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (जीयूजे) ने बयान जारी कर रविवार शाम एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पत्रकारों के शिक्षा और वित्तीय स्थिति पर पर्रिकर द्वारा उठाए गए सवाल को लेकर उन्हें फटकार लगाई है।

गौरतलब है कि पर्रिकर ने सार्वजनिक समारोह में मीडिया और विपक्ष को लेकर बयान दिया था। जीयूजे के महासचिव एश्ले डो रोजैरियो ने कहा कि जीयूजे इस बयान को अपराध मानते हुए मुख्यमंत्री से सार्वजनिक माफी की मांग करता है। ऐसा पहली बार नहीं है कि जब पर्रिकर ने गोवा में मीडिया और इसकी कार्यशैली पर अनुचित और अपमानजनक प्रहार करते हुए निराधान और अप्रमाणित बयान दिया है।

पर्रिकर ने रविवार को एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि एक संवाददाता की तनख्वाह कितनी है? एक समाचार वाचक कितना कमाता है? शायद 25000 रुपये। वे ज्यादातर स्नातक होते हैं। वे महान चिंतक बुद्धिजीवी नहीं होते। वे वही लिखते हैं जो वो समझते हैं। मुख्यमंत्री ने यह दावा भी किया था कि राज्य में पेड न्यूज बढ़ रहा है और लोग पैसा लेकर लिखते हैं।

जीयूजी ने पर्रिकर से मांग की है कि वह या तो स्पष्ट रूप से सामने आएं और उन पत्रकारों और समाचार पत्रों का नाम बताएं जो उनके अनुसार पेड न्यूज में लिप्त हैं या फिर वह आरोप को साबित करने तक चुप रहें। इधर विपक्षी पार्टियों कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने भी पर्रिकर पर अलोकतांत्रिक व्यवहार करने और मीडिया को भयभीत करने का आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना की है।

केजरीवाल और वीके सिंह की मीडिया विरोधी बयानबाजी पर एडीटर्स गिल्ड नाराज

नई दिल्ली : अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी मुसीबत में फंस गई है क्योंकि संपादकों की संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने उसके खिलाफ नोटिस जारी कर दिया है। गिल्ड ने कहा कि जो लोग मीडिया के बूते अपनी पहचान बनाने में सफल हुए हैं, आज वही इसके खिलाफ हो रहे हैं। केजरीवाल के अलावा गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक धड़े को कुचलने की चेतावनी देकर सनसनी फैला दी है। ऐसा महसूस होता है कि राजनेता मीडिया की ताकत को भूल गए हैं, जिनके बलबूते वह आज कुर्सी पर दिखाई दे रहे हैं।

अरविन्द केजरीवाल एवं पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह द्वारा मीडिया पर हमले की पृष्ठभूमि में एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने नाराजगी जताते हुए सार्वजनिक हस्तियों द्वारा अपने क्रियाकलाप की कवरेज या अपनी आलोचना से असंतुष्ट होकर बिना प्रमाण वाले आरोप लगाये जाने पर आपत्ति जतायी। गिल्ड ने राजनीतिक नेताओं एवं सार्वजनिक हस्तियों से अपील की कि मीडिया की आलोचना, उस पर सवाल उठाते हुए या उसका खंडन करते समय वे भ्रष्ट इरादों का अस्पष्ट एवं प्रमाणहीन आरोप नहीं लगाये। साथ ही वे सार्वजनिक बहस को शालीन एवं तार्किक दायरे में बनाये रखें।

गिल्ड ने यहां एक बयान में कहा कि यह बात चिंता में डालने वाली है कि जनरल वीके सिंह जैसा व्यक्ति सरकार को चिंता में डालने वाली सेना यूनिटों की गतिविधियों के बारे में खबर लिखने वाले पत्रकारों के लिए प्रेस्टीच्यूटस शब्द का इस्तेमाल करता है। बयान में कहा गया कि भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख से इस तरह की टिप्पणी की उम्मीद नहीं की जाती। गिल्ड ने कहा कि यह बात भी परेशान करने वाली है कि अरविन्द केजरीवाल ने उनकी आलोचना करने वाले मीडिया पर भ्रष्ट इरादे रखने का आरोप लगाया है।

उन्होंने मीडिया पर आरोप लगाया कि उस पर यह दबाव डाला जा रहा है कि केजरीवाल को नजरंदाज किया जाये। इन आरोपों को लगाते समय केजरीवाल ने इनके समर्थन में कोई विशिष्ट ब्यौरे या सामग्री मुहैया नहीं करायी। आम आदमी पार्टी के नेता एवं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल ने हरियाणा के रोहतक में एक रैली के दौरान मीडिया पर हमला बोला था।

 

तीन पत्रकारों पर हमला

श्रीनगर। जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा के लालपुरा में हिंसा के दौरान दो पत्रकार घायल हो गए हैं। इस घटनाक्रम में एक दर्जन गाड़ियां क्षतिग्रस्त हो गईं। पथराव से बचने के लिए थाने में शरण लेने जा रहा एक फोटो पत्रकार और एक टीवी पत्रकार घायल हो गया। उग्र भीड़ ने तीन संतरी पोस्ट भी फूंक दिए। प्रदर्शनकारी सोमवार को दर्दपुरा लोलाब में सेना के साथ मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों की पहचान की मांग कर रहे थे। उनका कहना था कि गांव से चारा लेने गए सात लोग घर नहीं लौटे हैं। बाद में पत्रकारों को भारी सुरक्षा के बीच थाने से बाहर लाया गया। पत्रकारों के जाने के बाद प्रदर्शनकारी भी वहां से चले गए।

उधर, मोरिंडा से खबर है कि स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकार व उसके भाई पर कुछ व्यक्तियों ने तेजधार हथियार से हमला कर दिया। घटना गांव में शिवरात्रि संबंधी करवाए जा रहे जागरण को लेकर हुई है। स्थानीय सरकारी अस्पताल में उपचाराधीन नजदीकी गांव अमराली के पत्रकार गगन शुक्ला व उसके भाई वरूण शुक्ला ने बताया कि नगर निवासियों व ग्राम पंचायत द्वारा महा शिवरात्रि के मौके पर 28 फरवरी को जागरण करवाया जा रहा है जिसकी तैयारियों में वे लगे हुए थे। वहीं गांव के कुछ लोग जागरण रोकने की ताक पर थे। बीती रात वे जागरण संबंधी क्षेत्र में निमंत्रण देने उपरांत अपने गांव स्थित घर के बाहर कार खड़ी कर रहे थे। इसी दौरान पीछे से 8-10 व्यक्तियों ने उन पर तेजधार हथियारों से हमला कर गंभीर रूप से घायल कर फरार हो गए। स्थानीय प्रेस क्लब के सदस्यों ने उक्त घटना की निंदा करते हुए जिला पुलिस प्रमुख से हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्यवाई करने की मांग की है।

पालतू तोते ने खोला पत्रकार की बीवी के कत्ल का राज (देखें वीडियो)

लखनऊ : आपने सड़क किनारे बैठे ज्योतिषी को तोते की मदद से भविष्य बताते देखा होगा लेकिन किसी तोते के बताने पर कोई हत्यारा पकड़ा जाए, तो यह अनूठी घटना होगी. यूपी के आगरा में ऐसा ही मामला सामने आया है. यहां बल्केश्वर में पत्रकार विजय शर्मा की पत्नी नीलम शर्मा की हत्या के मामले में ऐसा ही हुआ. हत्या का आरोपी भांजा आशुतोष उर्फ आशू पुलिस की गिरफ्त में है.

पत्रकार की पत्नी नीलम को पशु-पक्षियों से गहरा लगाव था. उनके घर में पालतू तोता मिट्ठू भी नीलम को इतना चाहता था कि वह उनके साथ ही खाना खाता था. विजय शर्मा के छोटे भाई अजय ने बताया मिट्ठू के लगाव को इससे भी समझ जा सकता है कि 20 फरवरी की रात नीलम की हत्या के बाद कई दिन तक वह बिना खाए-पिए गुमसुम रहा. मिट्ठू घरवालों को नाम लेकर पुकारता है. हत्या के बाद जब भी आशू आता, मिट्ठू पिंजरे में जा दुबकता. फिर गुमसुम हो जाता. पर तोता पहले ऐसा नहीं करता था. घरवाले उससे पूछते कि मिट्ठू उस रात घर कौन आया था, तो वह खामोश ही रहता.

अजय शर्मा ने बताया कि पहले वह छेड़ने के लिए कहे गए अपशब्दों को जवाब में दोहराया करता था. वह अब यह चुहल भी न करके चुप ही रहता है. 21 फरवरी को उन्होंने शक के दायरे में आए आरोपियों के नाम लेकर पूछा, 'मिट्ठू नीलू को किसने मारा. अन्य नामों पर मिट्ठू चुप रहा पर आशू का नाम लेते ही बोलने लगा- 'मारा, मारा'. इस पर घरवालों का आशू पर शक पक्का हो गया. घरवालों ने पुलिस को बताया कि जहां नीलम को चाकू मारा गया तोते का पिंजरा वहीं पास में टंगा था. आशू को हिरासत में लेकर पूछताछ हुई तो हत्या के राज से पर्दा उठ गया गया. (साभार- आजतक)

वफादार तोते को देखने सुनने के लिए यहां क्लिक करें:

http://www.youtube.com/watch?v=achgTWoEwYc

मैनेजर से नेता बने निशिकांत ठाकुर बोले- मातृभूमि की सेवा के लिए राजनीति में आया

मैनेजर से नेता बने निशिकांत ठाकुर ने सहरसा में बुधवार को व्यवहार न्यायालय में अधिवक्ताओं से मिलकर भाजपा के लिए आर्शीवाद मांगा. ठाकुर ने कहा कि देश के लोग आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व कानूनी बदलाव चाहते हैं. श्री ठाकुर ने कहा कि मैं देशभर में घूमने के बाद यह दावे के साथ कह सकता हूं कि देश के वर्तमान परिपेक्ष्य में नरेन्द्र मोदी ही सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री हो सकते हैं.

जनसंपर्क के दौरान अधिवक्ताओं ने श्री ठाकुर का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए उन्हें भरपूर सहयोग देने का भरोसा दिया. अधिवक्ताओं से बातचीत के क्रम में श्री ठाकुर ने दर्जनों अधिवक्ताओं के साथ न्यायालय परिसर स्थित एक चाय की दुकान में चाय की चुस्कियां भी ली. इस दौरान अधिवक्ताओं ने नमो टी का नारा लगाया. मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के संबंध में पूछने पर कहा कि प्रत्याशी तय करना और चुनाव लड़ाना पार्टी नेतृत्व का काम है. ठाकुर ने कहा कि पत्रकारिता में रहते हुए संस्थान के साथ देश व समाज की बेहतरी के लिए मैंने हर मुमकिन प्रयास किया. अब मेरी इच्छा अपनी मातृभूमि की सेवा करने की है.
 

प्रतापगढ़ में कवरेज से लौट रहे पत्रकार की सड़क हादसे में मौत

प्रतापगढ़ : सामूहिक विवाह कार्यक्रम की कवरेज लौट रहे एक पत्रकार की सड़क हादसे में मौत हो गई। घटना रविवार देर रात की है। उधर, पत्रकार की बाइक को टक्कर मारने के बाद अनियंत्रित होकर पलटी मैजिक को पुलिस ने कब्जे में ले लिया है। मानिकपुर थाना क्षेत्र के लाटतारा गांव निवासी रमेश मौर्य (34) पुत्र शिवशंकर मौर्य माता-पिता के इकलौते बेटे थे। रविवार को रात लगभग सवा बारह बजे कुंडा में राजा भैया यूथ ब्रिगेड के तत्वावधान में आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम का कवरेज कर घर वापस लौट रहे थे।

मवई रेलवे क्रासिंग से आगे बढ़ने पर मानिकपुर थाना क्षेत्र के देशराज इनारा गांव के पास लखनऊ से आ रही मैजिक रमेश को टक्कर मारते हुए पलट गई। हादसे में रमेश ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। इस बीच मैजिक चालक वहां से भाग निकला। थोड़ी ही देर में लखनऊ जा रहे एमएलसी अक्षय प्रताप सिंह, बाबागंज विधायक विनोद सरोज मौके पर पहुंचे और एंबुलेंस बुलाकर सीएचसी कुंडा भेजा। यहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। घटना की जानकारी होते ही परिजनों में कोहराम मच गया। सुबह पोस्टमार्टम के बाद शव घर ले जाया गया। वहां से कुछ देर बाद मानिकपुर स्थित राजघाट पर अंतिम संस्कार कर दिया गया। यहां कौशांबी सांसद प्रतिनिधि नंदलाल मौर्य, मीडिया प्रभारी सत्येंद्र सिंह, सीओ कुंडा सुकरामपाल तोमर, सीेएचसी कुंडा के प्रभारी डॉ. नीरज सिन्हा, पीएचसी बाबागंज के प्रभारी डॉ. राजीव सिंह, बाबाराज सिंह, शानू, मानिकपुर एसओ समेत क्षेत्र के तमाम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य मौजूद रहे। इधर, मानिकपुर पुलिस ने मैजिक को कब्जे में लेने के साथ ही चालक पर मुकदमा दर्ज किया।

सड़क हादसे में युवा पत्रकार रमेश मौर्य की हुई मौत पर पत्रकार शोक व्यक्त किया है। वरिष्ठ पत्रकार एसएस खान, कृष्णानंद त्रिपाठी, अमरेश मिश्र, राजितराम द्विवेदी, विष्णुधर दुबे, अश्वनी सिंह, अशोक सिंह, धर्मेद्र सिंह, हरिकेश मिश्र, संजय श्रीवास्तव, मुकेश चतुर्वेदी, विवेक पांडेय, ओम सिंह, अमितेंद्र श्रीवास्तव, धर्मेद्र सिंह, राजीव पांडेय, बृजेश मिश्र, सुनील यादव, सुलभ श्रीवास्तव, शिवमोहन शुक्ल, मनोज तिवारी, दिनेश सिंह, राजन शुक्ला, गिरीश त्रिपाठी, मनोज रावत, संजीव पांडेय, संदीप ओझा, आशुतोष खरे, वरूण श्रीवास्तव आदि ने शोक संवेदना व्यक्त की है।

 

पत्रकार विवेक भटनागर को पितृशोक

नई दिल्ली: दैनिक जागरण नोएडा में मुख्य उप संपादक विवेक भटनागर के पिता कैलाश चंद्र भटनागर का सोमवार दोपहर गाजियाबाद के इंदिरापुरम शक्तिखंड स्थित आवास पर निधन हो गया। वह 85 वर्ष के थे, अंतिम संस्कार मंगलवार को हिंडन तट पर किया जाएगा।

चकबंदी अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त कैलाश चंद्र भटनागर मूलरूप से अमरोहा के रहने वाले थे। शोकाकुल परिवार में दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं।

 

पत्रकार से बदसलूकी पर वर्थिगटन गिरफ्तार

न्यूयॉर्क : अभिनेता सैम वर्थिगटन को मैनहट्टन में एक फोटोपत्रकार पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वेबसाइट 'डेलीमिरर डॉट को डॉट यूके' के मुताबिक, 37 वर्षीय वर्थिगटन पर एक पत्रकार पर हमला करने के बाद मामला दर्ज कर लिया गया। पत्रकार ने वेस्ट विलेज के कबीहोल बार में उनकी मॉडल प्रेमिका लारा बिंगेल को कथित रूप से धक्का दिया था।

न्यूयॉर्क पुलिस विभाग के लेफ्टिनेंट जॉन ग्रिम्फेल ने सोमवार को वर्थिगटन की गिरफ्तारी की पुष्टि की। ग्रिम्फेल ने कहा, "फोटोपत्रकार ने लारा को धक्का दिया और उसके बाद वर्थिगटन ने उसे मुक्का रसीद कर दिया। घूसे की वजह से पत्रकार की नाक पर चोट आई। अभिनेता पर हमला करने का मामला दर्ज कर लिया गया है। उन्होंने फोटोपत्रकार को घूसा मारा था।"

वर्थिगटन को जमानत मिल गई, लेकिन बुधवार को अदालत में पेश होंगे। फोटो पत्रकार को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। उस पर हमला करने, लापरवाही और उत्पीड़न का मामला दर्ज किया गया है।

मजीठिया मंच अब फेसबुक व ट्विटर पर भी

मजीठिया मंच ने फेसबुक और ट्विटर पर अपना एकाउंट शुरू कर दिया है। बड़ी संख्‍या में लोग मंच से जुड़ रहे हैं। मंच ने उत्‍पीड़न के शिकार कर्मचारियों से अपील की है कि वे मायूस न हों। मजीठिया मंच उनका भी साथ देगा। बता दें कि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार एरियर के लिए दैनिक जागरण के पूर्व कर्मचारियों और संस्‍थान में तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल जारी है।

कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का मन बना रहे हैं, तो जागरण प्रबंधन मामले को यह कह कर ठंडे बस्‍ते में डालना चाहता है कि जो कुछ होगा, कानपुर से निर्देश मिलने के बाद ही होगा। उधर, वर्तमान में नौकरी कर रहे लोगों का उत्‍पीड़न जारी है। कानपुर से खबर है कि वहां कुछ लोगों को डिमोट कर दिया गया है, ताकि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अधिक सैलरी देने से बचा जा सके।

नई दुनिया के सूत्रों का कहना है कि जागरण समूह विखंडित होकर छोटे-छोटे समूहों में विभाजित हो रहा है। इस प्रकार मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन देने में फायदा उठाने की चंठई की जा रही है। नोएडा से खबर है कि वहां तरह-तरह से कर्मचारियों का उत्‍पीड़न किया जा रहा है। किसी न किसी बहाने किसी का वेतन काटा जा रहा है तो किसी को आए दिन फोर्स लीव पर भेजा जा रहा है। इस बात से कर्मचारियों में असंतोष की आग धधक रही है, जो कभी भी विस्‍फोट का कारण बन सकती है। प्रबंधन है कि उसे मुनाफाखोरी की तिकड़म से ही फुरसत नहीं है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि अब 1992 का इतिहास दुहराने का समय आ गया है।

उधर, मजीठिया मंच ने पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों से धैर्य बनाए रखने की अपील की है। उसने कहा है कि कर्मचारियों को कभी भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया है और केंद्र सरकार भी पैनल गठित करने की अधिसूचना जारी कर कर्मचारियों के साथ खड़ी है। जिन कर्मचारियों का उत्‍पीड़न किया जा रहा है, वे भी मजीठिया मंच से जुड़ सकते हैं, ताकि भविष्‍य में उन्‍हें भी कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार किया जा सके।

मजीठिया मंच अब फेसबुक और ट्विटर पर उपस्थित है। यही वजह है कि बड़ी तेजी से लोग मजीठिया मंच से जुड़ने लगे हैं। कर्मचारी वहां अपनी परेशानी शेयर कर सकते हैं। कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श कर उन्‍हें गाइड करने का पूरा प्रयास किया जाएगा। दैनिक जागरण की रणनीति का गहन अध्‍ययन करने के बाद ही मजीठिया मंच का गठन किया गया है, ताकि आंदोलन को किसी भी स्‍तर पर विफल होने से बचाया जा सके।

सिविल सर्विस बोर्ड के गठन बिना किया तबादला, कैट में चुनौती

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आईजी अभियोजन से आईजी नागरिक सुरक्षा के पद पर हुए अपने ट्रांसफर को कैट की लखनऊ बेंच में चुनौती दी है। केंद्र सरकार ने 28 जनवरी 2014 को आईपीएस कैडर रूल्स 1954 के नियम 7 में संशोधन करते हुए यह व्यवस्था की है कि आईपीएस अफसरों का ट्रांसफर सिविल सर्विस बोर्ड की संस्तुति पर ही किया जायेगा और दो साल से पहले किये गए ट्रांसफर में उसके स्पष्ट कारण बताये जायेंगे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी लोक प्रहरी द्वारा दायर पीआईएल में 18 फ़रवरी के अपने निर्णय में इसकी पुष्टि की थी।

याचिका में श्री ठाकुर ने कहा है कि उन्हें 30 जनवरी को बिना सिविल सर्विस बोर्ड का गठन किये तथा बिना कोई कारण बताये अभियोजन विभाग से हटा दिया गया। जबकि उन्होने मात्र 15 दिन पहले ही वहां का कार्यभार संभाला था। अतः श्री ठाकुर ने अपने ट्रांसफर को निरस्त करने की प्रार्थना करते हुए पुनः अभियोजन विभाग में तैनात किये जाने की प्रार्थना की है।

 

डॉ. नूतन ठाकुर

वेज बोर्ड प्रस्‍तावों के कार्यान्‍वयन पर नजर रखने के लिए कमेटी गठित

केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के कार्यान्‍वयन पर नजर रखने के लिए एक कमेटी गठित की है। वेज बोर्ड की सिफारिशें न्‍यायमूर्ति जीआर म‍जीठिया ने की थी, जिसे सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने पिछले 7 फरवरी को सही ठहराया था। मंत्रालय के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने 'द हिंदू' को बताया कि अधिसूचना की प्रतियां प्रदेशों/ केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को पहले ही भेज दी गई हैं और उन्‍हें कहा गया है कि वे श्रम विभाग, नियोक्‍ताओं और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों की तीन पार्टी कमेटियों का गठन कर कार्यान्‍वयन पर नजर रखें।

द हिंदू में छपी खबरः

Panel to monitor implementation of wage board proposals

The Union Labour Ministry has set up a committee to monitor the implementation of recommendations made by the Justice G.R. Majithia wage board for newspaper employees that were upheld by the Supreme Court on February 7.

A senior Ministry official told The Hindu that copies of the notifications had already been sent to the labour departments of State/Union Territory governments and they were asked to monitor their implementation by appointing tripartite committees (consisting of representatives of the labour department, employers and employees).

 

Majithia Manch. Email: majithia.manch@rediffmail.com

लाइव इंडिया से एनके सिंह, प्रदीप सिंह, मुकेश कुमार और प्रबल प्रताप सिंह का इस्तीफा

लाइव इंडिया न्यूज चैनल में हड़कंप मचा हुआ है. सारे दिग्गजों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया. एडिटर इन चीफ और वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह, लाइव इंडिया अखबार के संपादक प्रदीप सिंह, लाइव इंडिया मैग्जीन के संपादक मुकेश कुमार और लाइव इंडिया चैनल के हेड प्रबल प्रताप सिंह ने अपना अपना इस्तीफा प्रबंधन को सौंप दिया है.

उपरोक्त खबर सूत्रों द्वारा दी गई सूचना पर आधारित है. हालांकि जब भड़ास ने प्रबल प्रताप सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने खुद के इस्तीफे से इनकार किया और कहा कि … ''मैंने तो इस्तीफा नहीं दिया है, जिसने दिया हो वो जाने''.

उधर, सूत्रों का कहना है कि लाइव इंडिया के मालिकों के घटिया सोच, बर्ताव और व्यवहार को लेकर संपादकों के बीच काफी समय से तनाव था. चिटफंड के कारोबार को संचालित करने वाले लाइव इंडिया के मालिक अपने धन के गुमान में इतने मदहोश रहे कि उन्होंने अपने मीडिया हाउस को अपने परिजनों के शादी ब्याह के लाइव टेलीकास्ट के लिए घटिया माध्यम बना डाला. इसी सब को लेकर हुई बहस विवाद के बाद संपादकों ने इस्तीफा दे दिया.

‘सीएसडीएस’ और खुद राजदीप सरदेसाई भी कोई दूध के धुले नहीं है

मैंने भी अपने कैरियर की शुरुआत एक सर्वे एजेंसी से ही की थी. यह कोई विशेष बात है भी नहीं. पत्रकारिता के काफी छात्र शुरुआत में यही करते हैं. उस समय के हिसाब से पैसे भी ठीक-ठाक मिल जाते हैं और थोड़ा अनुभव भी मिल ही जाता है. आज न्यूज़ एक्सप्रेस पर दिखाए जाने वाले सर्वे में किस एजेंसी और दल पर निशाना साधा गया है ये तो नहीं जानता लेकिन सर्वे के नाम पर किस तरह की दलाली होती है उसका प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं.

शायद जिस सर्वे एजेंसी की बात होगी इसमें उनका काम निहायत गैर-पेशेवर और पैसे के लिए कुछ भी दिखा सकने वाले लोग हैं इसमें कोई संदेह नहीं. लेकिन राजदीप सरदेसाई जिस 'सीएसडीएस' को पहले ही क्लीन चिट दे रहे हैं वह संस्था और खुद राजदीप भी कोई दूध के धुले बिलकुल नहीं है. सीएसडीएस के ठेकेदार को आप टीवी पर बहसों में देख लीजिए, सीधे तौर पर अक्सर कांग्रेस के प्रवक्ता और भाजपा के कांग्रेस से भी ज्यादा विरोधी दिखेंगे. दलाल किस्म के प्राणी लगेंगे आपको.

सीएसडीस और राजदीप (IBN7 ) का एक सर्वे छत्तीसगढ़ चुनाव में सबसे पहले आया था. लोग हंस कर लोट-पोट हो रहे थे. प्रदेश के राजनीति की सामान्य समझ रखने वाले कोई दसवीं के छात्र भी उस सर्वे को देख कर सर ही पीट लेता. उस सर्वे के अनुसार भाजपा को 71 सीट दी जा रही थी और दोनों मुख्या दलों में वोट का अंतर 12 प्रतिशत बताया जा रहा था. जबकि छग में जीत और हार का फैसला 1 से भी कम प्रतिशत का होता है.

छत्तीसगढ़ के निर्माण से लेकर आज तक के यही आंकड़े हैं. तो टीवी चैनलों में चाणक्य नज़र आ रहे इन दलालों को इतनी सामान्य सी समझ तो है नहीं और ऐसे दिखाते रहेंगे जैसे तमाम चीज़ें इन्हें ही पता. पक्ष में होते हुए भी उस समय भाजपा ने इस सर्वे का विरोध किया था और कहा था कि ऐसा परिणाम कभी छग में हो ही नहीं सकता. भाजपा के लोग अति आत्मविश्वास में आ जाय इसलिए ऐसा सर्वे दिखाया गया था. शायद यह पहली बार रहा होगा जब जिसके पक्ष में सर्वे था उसी ने विरोध किया था. तो सीएसडीएस के खेल को भी समझना ही होगा.

लेखक पंकज कुमार झा भाजपा से जुड़े हैं और पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हैं.

प्रमोद रंजन जैसे भाजपा समर्थक पत्रकार को प्रेमकुमार मणि से कोई शिकायत नहीं पर कंवल भारती से है

Kanwal Bharti : प्रमोद रंजन जैसे भाजपा समर्थक पत्रकार को प्रेमकुमार मणि जैसे लेखक से कोई शिकायत नहीं है, जो बिहार में नितीश कुमार का दामन पकड़कर एमएलसी बनते हैं, सत्ता का उपभोग करते हैं और अब नितीश कुमार को छोड़ कर लालू यादव का दामन थामे हुए हैं. वे उन्हें प्रखर चिंतक कहते हैं. लेकिन कांग्रेस से जुड़े कँवल भारती उनकी आँखों में इसलिए चुभते हैं, क्योंकि मैंने 'फारवर्ड प्रेस' का बहिष्कार कर दिया है. वे उदित राज से मेरी तुलना करने लगे हैं.

वह यही नहीं जानते कि उदित राज और कँवल भारती में क्या अंतर है? उन्हें मालूम होना चाहिए की मैं न राजनेता हूँ, न कोई संगठन चलाता हूँ, और न मेरी कोई खवाइश MP, MLA बनने की है, जैसी कि उदित राज और प्रेमकुमार मणि की है.

कांग्रेस से जुड़ने के बाद भी राहुल गाँधी की आलोचना करने की जो हिम्मत मैंने दिखायी है, वह हिम्मत क्या प्रेमकुमार मणि लालू की और उदित राज मोदी की आलोचना करके दिखा सकते हैं? कभी नहीं दिखा सकते, क्योंकि वे राजनीतिक स्वार्थों के व्यक्ति हैं. ऐसे लोग, जो मेरे बारे में कुछ नहीं जानते, मेरी आलोचना करके सिर्फ मुंह की ही खा सकते हैं. मैं कांग्रेसी परिवार से हूँ, मेरे पिता भी कांग्रेसी थे. मेरा परिवार तब से कांग्रेसी है, जब उसका चुनाव निशान ‘दो बैलों की जोड़ी’ हुआ करता था. मैं कांग्रेस से जुड़कर भी कभी अँधा कांग्रेसी नहीं बन सकूँगा. मेरा मुकाबला न उदित राज कर सकते हैं और न प्रेमकुमार मणि. मेरी ज़मीन लोकतंत्र और सामाजिक परिवर्तनवादी आंदोलनों की है, जो मेरे लेखन में पूरी निर्भीकता से हमेशा रहेगी.

जाने-माने दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

मीडिया को ब्लैकमेल कर मुफ्त प्रचार पाते केजरीवाल

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी के बाद अब राहुल गांधी से भी पूछा है कि उनकी हवाई यात्राओं का खर्च कहां से आता है। नरेन्द्र मोदी की ही तरह राहुल गांधी भी केजरीवाल की इस चिट्ठी का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हैं, जवाब नहीं देंगे और फिर केजरीवाल कहेंगे देखा, जायज स्रोत से होता तो बताते, बताने लायक नहीं है इसलिए नहीं बताया आदि और इस तरह वे अपने अभियान में लगे रहेंगे।

दूसरों को जनता की नजर में बदनाम करते हुए अपनी ईमानदारी चमकाते रहेंगे। यह सोची समझी योजनाबद्ध शरारत है और स्थितियां ऐसी हैं कि कोई इस शैतानी को रोक नहीं पा रहा है। जिसे बदनाम किया जा रहा है वह जेब से पैसे खर्च कर अदालत जाए और अदालत से जब तक कार्रवाई नहीं होगी तब तक यह चंदे के पैसे वाला भोंपू बजता रहेगा। यह अरविन्द केजरीवाल या यूं कहिए कि आम आदमी पार्टी की रणनीति है। और इतनी कामयाब कि विदेशी चंदे से ज्यादा का विज्ञापन पार्टी को मुफ्त में हो रहा है और इसका खर्च दिखाने की भी जरूरत नहीं है। विरोधियों को मुफ्त में बदनाम कर रहे हैं सो अलग।

पार्टी ने रविवार को रोहतक से अपने लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत की। इसमें आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के साथ-साथ कांग्रेस, उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मुकेश अंबानी के एजेंट हैं और दोनों उनकी दो जेब में हैं। पहले की ही तरह केजरीवाल ने ये आरोप बिना किसी आधार के लगाए हैं और कोई सबूत भी नहीं दिया है। फिर भी यह खबर मीडिया में प्रमुखता के साथ आई। दरअसल केजरीवाल इसी तरह आरोप लगाते रहते हैं और राजनीतिज्ञों के साथ-साथ मीडिया को भी गालियां देते हुए अपना स्वार्थ साध रहे हैं। मीडिया भी आरोपों से बचने के लिए, आरोपित अखबार / चैनल समूह से अलग रहने और दिखने के लिए निराधार आरोपों को भी प्रमुखता देता है। ना दे तो मीडिया बेईमान, प्रमुखता दे तो केजरीवाल का काम हो गया। और मीडिया में इतनी ईमानदारी नहीं है कि अरविन्द केजरीवाल के आरोपों से लापरवाह रहे। ना ही उसकी साख ऐसी है कि इसका कोई असर ना हो।

अभी तक की उनकी राजनीति और प्रचार से यह साबित हो चुका है कि उनके पास करने के लिए कुछ खास नहीं है और सिर्फ आरोप लगाकर वे लोकप्रियता बटोर रहे हैं तथा अपनी साख बना रहे हैं। खुद चंदे से अपना खर्च चलाने वाले केजरीवाल जानते हैं कि मीडिया को कैसे नियंत्रित रखना है। इसीलिए, एक मामले में उनकी प्रेस कांफ्रेंस की खबर प्रकाशित प्रसारित करने वाले मीडिया संस्थानों को अंबानी ने कानूनी नोटिस भिजवाया तो केजरीवाल ने अंबानी से कहा था कि मीडिया को नोटिस ना भेजें आरोप उन्होंने लगाए हैं इसलिए चाहें तो उन्हें नोटिस भेजे। मीडिया ने इसे भी खूब हवा दी। और आम लोगों ने भी इसे उनकी बहादुरी और ईमानदारी माना था पर इसके पीछे की उनकी चाल को भांपने से रह गया। इसीलिए केजरीवाल अपने अलावा सबको बेईमान बताते हैं और यह साबित करने में लगे हैं कि वे अकेले ईमानदार हैं।

मीडिया शत प्रतिशत ईमानदार नहीं है इसलिए बेईमान होने के आरोपों से बचने के लिए केजरीवाल के आरोपों को बिना जांचे-परखे प्रचारित-प्रसारित कर रही है और इसका उन्हें भरपूर लाभ मिल रहा है। क्योंकि केजरीवाल को उन्हीं की शैली में कोई और जवाब नहीं दे रहा है। केजरीवाल ने जो स्थिति बनाई है उससे देश में स्वस्थ, मजबूत और ईमानदार मीडिया की जरूरत और महत्त्व समझ में आ रही है। यह भी समझ में आने लगा है कि मीडिया ईमानदार नहीं हो, उसकी साख न हो तो क्या कुछ कैसे हो सकता है। राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस बात पर मीडिया वालों को भी विचार करने की जरूरत है। क्योंकि देश में कानून ऐसे नहीं हैं कि इस तरह के आरोप लगाने वालों को तुरंत रोका जा सके। जब तक यह संभव होगा ऐसा व्यक्ति काफी नुकसान कर चुका होगा।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता समेत कई अखबारों में प्रमुख पदों पर काम कर चुके हैं. काफी वक्त से स्व-उद्यमी हैं और अनुवाद का काम संगठित तौर पर करते हैं. उनसे संपर्क anuvaadmail@gmail.com या 09810143426 के जरिए किया जा सकता है.

हिंदी न्यूज चैनलों के दो नवीन कुमारों ने संस्थान बदला

एक नवीन कुमार आजतक न्यूज चैनल में हैं. एक नवीन कुमार जी न्यूज में हैं. आजतक वाले नवीन कुमार लिखने और बोलने के उस्ताद हैं. यानी उनकी स्क्रिप्ट और उनकी संवाद अदायगी अदभुत है. जी न्यूज वाले नवीन कुमार क्राइम की खबरों और इनवेस्टीगेटिव स्टोरीज में बेजोड़ हैं. ग्रह-नक्षत्रों की जाने क्या चाल हुई कि दोनों नवीन कुमारों ने एक ही दिन अपना-अपना संस्थान छोड़ा और दूसरे संस्थानों में ज्वाइन कर लिया.

आजतक वाले नवीन कुमार ने विनोद कापड़ी की न्यूज एक्सप्रेस वाली टीम में हिस्सा बनना पसंद किया तो जी न्यूज वाले नवीन कुमार ने एसएन विनोद की जिया न्यूज वाली पारी के सारथी बनना कुबूला. आजतक में नवीन कुमार का पद एसोसिएट एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर का था तो जी न्यूज में नवीन कुमार का पद एडिटर क्राइम का था. आजतक वाले नवीन कुमार न्यूज एक्सप्रेस में डिप्टी एक्जीक्यूटिव एडिटर कम एंकर होकर गए हैं तो जी न्यूज वाले नवीन कुमार जिया न्यूज में मैनेजिंग एडिटर के पद पर पहुंचे हैं. दोनों नवीन कुमारों ने भड़ास से बातचीत में सत्य और निष्ठा के साथ यह कुबूल किया है कि उन्होंने पाला बदल लिया है और नई पारी की शुरुआत कर दी है.

विनोद कापड़ी और न्यूज एक्सप्रेस ने पैसे लेकर राजनीतिक भविष्यवाणी करने वालों की पोल खोल दी

Yashwant Singh :  विनोद कापड़ी ने बड़ा खुलासा कर डाला … आपरेशन प्राइम मिनिस्टर में दिखा रहे हैं कि किस तरह सर्वे करने वाली बड़ी व प्रतिष्ठित एजेंसीज पैसे लेकर एक बड़ी पार्टी को दो सौ सीटें लोकसभा की दिला रही हैं… राजनीति की नब्ज टटोलने वालों की कमजोर नस पर विनोद कापड़ी और न्यूज एक्सप्रेस ने हाथ रख दिया है..

इस आपरेशन में यह भी बताया गया है कि सर्वे करने वाली एजेंसीज से कुछ संपादकों की भी मिलीभगत रहती है जो पोलिटिकल पार्टी के पैसे से सर्वे करवाने के बाद अपनी मीडिया कंपनी को पैसे दिलाकर उस फर्जी सर्वे को जोर शोर से अपने चैनलों पर दिखाते हैं… जनता को राजनीतिक हवा का रुख बताने में पैसा किस कदर प्रभावकारी भूमिका निभा रहा है, यह सामने लाकर बड़ा जरूरी काम किया है विनोद कापड़ी ने … उन्हें और न्यूज एक्सप्रेस की पूरी टीम को मेरी तरफ से बधाई है..

जो अच्छा काम करे उसकी तारीफ बनती है…

आप भी इस वक्त न्यूज एक्सप्रेस चैनल देखें और सर्वे का सच जान लें.

विनोद कापड़ी ने आज शाम चार बजे प्रेस कांफ्रेंस कर 'आपरेशन प्राइम मिनिस्टर' के बारे में विस्तार से बताया और इस आपरेशन को 67 साल का सबसे बड़ा खुलासा करार दिया. सर्वे करने वाली एजेंसियों द्वारा पैसे लेकर सीटें घटाने-बढाने के खेल के सामने आने के बाद प्रतिक्रियाओं का तांता लग गया है. पूर्व संपादक आशुतोष और 'आप' नेता केजरीवाल ने इस खुलासे के लिए न्यूज एक्सप्रेस टीम को बधाई दी है. केजरीवाल ने बाकायदा ट्वीट करके इस खुलासे को चौकाने वाला बताया. केजरीवाल ने कहा कि ऐसी एजेंसियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने चाहिए. आशुतोष का कहना है कि राजनीतिक पार्टियां पैसे के बल पर ओपिनियन पोल को बदल देती हैं, ये शर्मनाक है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

सुब्रत रॉय होंगे कोर्ट में पेश, नहीं मिली छूट

नई दिल्ली, 25 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट ने आज सहारा समूह प्रमुख सुब्रत रॉय के न्यायालय में 26 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से हाज़िर होनो से बचने के लिए दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया। सुब्रत राय की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कहा कि उनके क्लाइन्ट बकाया रकम का भुगतान करेंगे, उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने से मोहलत दी जाए। इस पर जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जेएस केहर की बेंच ने कहा "यह सिर्फ कोर्ट के सम्मान का मामला नहीं है, बल्कि कई जज और वकील इसमें मिले हुए हैं। हमारे आदेश का पालन नहीं हो रहा है।" इसी के साथ, बेंच ने सुब्रत रॉय की अर्जी खारिज कर दी।

20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की इसी बेंच ने न्यायालय के आदेश के बावजूद निवेशकों का 20,000 करोड़ रुपये नहीं लौटाने के लिए सहारा समूह के खिलाफ कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। बेंच ने रॉय और समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एसआईआरईसी) और सहारा इंडिया हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन (एसएचआईसी) के निवेशकों रविशंकर दुबे, अशोक रॉय चौधरी और वंदना भार्गव को व्यक्तिगत रूप से 26 फरवरी को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया था।

कल्पतरु की काली कहानी, आखिर कोई कार्रवाई क्यों नहीं!

उत्तर प्रदेश मथुरा की चिटफंड कंपनी केबीसीएल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु) देश के विभिन्न हिस्सों में छोटे निवेशकों को करोड़ों रुपये का चूना लगा रही है। यह मामला अकेले उत्तर प्रदेश का नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के अलावा पांच राज्यों में केबीसीएल इंडिया लिमिटेड के फर्जीवाड़े की आशंका है जो खासकर गरीबों को अपना निशाना बना रही है। इसके पुख्ता सबूत हैं इसलिए जनहित में प्रार्थना है कि कृपया केबीसीएल इंडिया लिमिटेड की जांच कर, ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करें ताकि कोई धोखाधड़ी का शिकार न हो। तत्काल इसके बैंक खातों के संचालन पर रोक व चल-अचल संपत्ति कुर्क कराकर इस खेल को रोकने की कृपा करे।

जानकारी के अनुसार अनुमानित ठगी 5 हजार करोड़ रुपये की हो सकती है। देश में लोग जितनी तेजी से समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं, उतनी तेजी से यहां ठग व दलालों का गिरोह भी फैल रहा है। केबीसीएल इंडिया लिमिटेड पैसे दोगुने करने के नाम पर लोगों को चूना लगा रही है। यह कंपनी गाय, भैंस, जमीन और फिक्सड डिपॉजिट के नाम पर लोगों को चूना लगा रही है। रातोंरात अमीर बनने का ख्वाब दिखाने वाली कंपनियों की धोखाधड़ी जारी है। यह ठगी का तगड़ा माध्यम है और इसकी रोकथाम के लिए जरूरी है कि बड़े स्तर पर कार्रवाई हो।

मथुरा की चिटफंड कंपनी केबीसीएल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु) ने खुद को शासन-प्रशासन से बचाने के लिए मीडिया में भी पैर जमाने की कोशिश की है। केबीसीएल इंडिया लिमिटेड ने कल्पतरू एक्सप्रेस अखबार शुरू किया है। मीडिया की आड़ में केबीसीएल इंडिया लिमिटेड को चिटफंड का अवैध कारोबार करने का लायसेंस मिल गया है। अब मीडिया को ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। आज न जाने कितने समाचार पत्रों और पत्रिकाओं सहित, टीवी चौनल्स में कई चिटफंड कंपनियों का पैसा लगा है या फाइनेंस का वही माध्यम प्रमुख है। अब मीडिया को ढाल की तरह इस्तेमाल किये जाने वालों की कमी नहीं रही है। इससे आम लोगों का विश्वास मीडिया से उठता जा रहा है।

इस चिटफंड कंपनी केबीसीएल इंडिया लिमिटेड में आज भी धड़ल्ले से लोगों का पैसा इन्वेस्ट कराया जा रहा है और इस रकम का बड़ा हिस्सा जोखिम भरे कारोबार में लगाया जा रहा है। एजेंटों के जरिए कंपनी ने करोड़ों रुपए इकट्ठा किया है। एजेंटों के जरिए केबीसीएल इंडिया लिमिटेड की नयी ब्रांचें खोली गई है। जाहिर सी बात है कि एक स्थानीय एजेंट जो जमा जुटाने के लिए 25 फीसदी कमीशन कमा रहा है, लोगों में आसमानी लक्ष्य का विश्वास जगाता है। इनमें से ज्यादातर एजेंट गैर पंजीकृत चिटफंडों से जुड़े होते हैं जिन्हें दोस्ताना और नजदीकी कर्जदाता माना जाता है और ये ही लोगों को लूट रहे हैं।

पूरी तरह साफ हो चुका है कि रुपए जमा करने पर दोगुना और चौगुना रकम देने का झांसा देकर हजारों करोड़ रुपए वसूले गये है। जाहिर सी बात है कि जब निजी और सरकारी बैंक 8-10 फीसदी ब्याज पर एफडी दे रहे हैं, तो कोई चिटफंड कंपनी जमाधन को आखिर कैसे दोगुना और चौगुना कर सकती है? चिटफंड कंपनी केबीसीएल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु) रकम दोगुनी होने का लालच देकर निवेशकों की संख्या बढ़ा रही है। पहले इस चिटफंड कंपनी ने जनता को बेवकूफ बनाकर पैसे जमा कराये, फिर उस पैसे से अखबार, चैनल खोले और आज दलाली करके केबीसीएल इंडिया लिमिटेड को प्रामाणिक बनाने का खेल चल रहा है।

यहां यह बता देना लाजिमी होगा कि पिछले दिनों मध्यप्रदेश में ग्वालियर जिला प्रशासन द्वारा करोड़ों का धोखाधड़ी करने वाली मथुरा की इस चिटफंड कंपनी के खिलाफ कार्यवाही कर सील कर दिया था पर इस केबीसीएल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु) की शाखाएं आज भी उत्तरप्रदेश में डंके की चोट पर संचालित हो रही है। वही कल्पतरु उत्तर प्रदेश में संचालित हो रही है जिसके खिलाफ पुलिस ने मध्य प्रदेश में कार्यवाही की थी। ग्वालियर के इंदरगंज थाने की पुलिस ने केबीसीएल इंडिया लिमिटेड के 17 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। मध्य प्रदेश में केबीसीएल इंडिया लिमिटेड के मालिक और एमडी श्री जयकृष्ण सिंह राणा की गिरफ्तारी के लिए सरकारी तौर पर ईनाम घोषित किया गया है। पुलिस को श्री जयकृष्ण सिंह राणा की तलाश है। कम्पनी के मालिक जयकृष्ण सिंह राणा उत्तरप्रदेश के आगरा और मथुरा में रह रहा है लेकिन पुलिस और प्रशासन उसको अब भी पकड़ने में नाकाम है।

सच्चाई यह है कि चिटफंड कंपनी केबीसीएल इंडिया लिमिटेड इन भोले-भाले लोगों के ही नहीं इस देश के भविष्य से भी खिलवाड़ कर रही है। सच कड़वा है कि भोले-भाले निर्धन लोगों की खून पसीने की जिन्दगी भर की कमाई एशोआराम, अय्याशियों, मंहगी गाड़ियों और रंगरेलियों मे उड़ाई जा रही है। लाखों रुपए खर्चकर बार गर्ल्स बुलाई जाती है। बदनसीबी इस बात की भी है कि अगर ईमानदारी से खोजे जाएं तो सारे सुबूत मौजूद हैं लेकिन आम जनता की शिकायत सुनने और उस पर अमल न किया जाना समझ के बाहर की बात है।

देश के विभिन्न हिस्सों व मथुरा जिले में करोड़ों-अरबो का कारोबार करने वाली चिटफंड कंपनी केबीसीएल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु) ने अपने अखबार के कुछ पत्रकारों और लोगों को ही अपना माईबाप बनाकर उन्हे कंपनी एक मुश्त मोटी रकम दे रही हैं, जिससे कंपनी के हौसले बुलंद है। आमतौर पर ऐसे मामलों में ऐसा ही होता है। व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि शिकायतकर्ता पुलिस, प्रशासन और कंपनी के बीच उलझकर रह जाता है। अगर अब भी कोई उचित कदम नहीं उठाया तो यह कंपनी लाखों लोगों को अपनी ठगी का शिकार बनाने में सफल हो जाएगी।

यह आर्थिक धोखाधड़ी कितनी गंभीर है, अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश में हाईकोर्ट ने इस तर्क के साथ मामले की जांच सीबीआई को सौंपी कि मध्यप्रदेश राज्य सरकार प्रकरण की पड़ताल में सक्षम नहीं है। राज्य के पास इतने संसाधन और अधिकार नहीं हैं कि वह देश के दूसरे प्रदेशों में सक्रिय फर्जी चिटफंड कंपनियों के खिलाफ जांच कर सकें। इंसाफ की खातिर यही बेहतर होगा कि जांच सीबीआई से कराई जाए। पुलिस, प्रशासन या कोर्ट ने इसे क्लीन चिट दिया या इस कंपनी ने स्वत ही खुद को बेदाग मान लिया। इस कंपनी से गांव का आम आदमी से लेकर जिला मुख्यालय का लखपति भी अच्छी खासी चपत लेने जा रहा है।

वर्तमान में के बी सी एल इंडिया लिमिटेड Kalptaru Buildtech Corp. Ltd. के रूप में रियल स्टेट में बिल्डर बन गई है तथा बड़े ही गुपचुप तरीके से चुरमुरा में निवेशकों को अलॉट की गई जगह को दोबारा बेचा जा रहा है। कभी रुपए दूने करने के नाम पर तो कभी जमीन के प्लाट, बंगले देने के नाम पर कल्पतरु लोगों की गाढ़ी कमाई उड़ा रही हैं। केबीसीएल इंडिया लिमिटेड लोगों से कम समय में जमा राशि दुगुनी करने के नाम पर और नियम विरुद्ध तरीके से सेविंग, माइक्रो फाइनेंस, चेन सिस्टम, फ्लैट, प्लॉट आदि में लोगों की गाढ़ी कमाई निवेश करवा रही है। निवेशकों की तादाद करीब 5 लाख है। सहारा को भी कोर्ट की वजह से अच्छी खासी रकम निवेशकों, जमाकर्ताओं को लौटाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

सभी सुबूत, कागजात, गोपनीय जानकारी और दस्तावेज संलग्न हैं। गौरतलब है कि क्या ये शिकायतें दो-चार दिन में अचानक पैदा हो गई हैं? नहीं, सच तो यह है कि इससे पहले इन शिकायतों को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। कुल मिलाकर ऐसी धोखाधड़ी के पीछे सरकारी लापरवाही का योगदान ही अधिक है साथ ही भारत में आर्थिक जागरुकता की कमीं भी इसका एक महत्वपूर्ण कारण प्रतीत होता है। आयकर विभाग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कई व्यवसायी भी काले धन को इन कंपनियों में जमा करके दोगुना करने के लालच में रहते हैं। ऐसा ही एक बड़ा वर्ग पुलिस में एफआईआर तक दर्ज करवाने से खौफ खाता है क्योंकि उन्हें मामला दर्ज करवाने पर आय स्रोत सार्वजनिक होने का डर सताता है।

इस चिटफंड कंपनी ने राजस्थान में भी लोगों को कम समय में जमा राशि दुगुनी करने के नाम पर धोखाधड़ी की है। चिटफंड कंपनी केबीसीएल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु) द्वारा पैसा देश के बाहर भी गया है। केबीसीएल इंडिया लिमिटेड हवाला कारोबार में भी लिप्त है। किसी भी नान-बैंकिंग कंपनी को आर्थिक लेनदेन करने का अधिकार नहीं है। इस कंपनी ने आरबीआई में अपना पंजीयन नहीं करवाया है। कल्पतरु ग्रुप के कारोबार में वह पैसा लगा हैं जो कि चिटफंड कंपनी के बी सी एल इंडिया लिमिटेड के जरिए इकठ्ठा किया गया हैं। धन परिचालन योजनाएं इनामी चिट और धन परिचालन स्कीम (पाबंदी) अधिनियम 1978 के अंतर्गत प्रतिबंधित हैं इसलिए मेरी जनहित में प्रार्थना है कि कृपया कड़ा रुख अख्तियार कर इस चिटफंड कंपनी की धोखाधड़ी को रोका जाए तथा उत्तरप्रदेश के मथुरा जिला के फरह मे स्थित गावं चुरमुरा की भूमि कुर्क कराकर, कंपनी के कर्ताधर्ताओं और संचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की कृपा करें, साथ ही कंपनी के दूसरे व्यवसाय, प्लांट व दफ्तरों पर तालाबंदी की कार्रवाई के आदेश देने की कृपा करे।

इनके गलत कारोबार के चलते पूरा उद्योग बर्बाद हो रहा है जो समाज के निचले स्तरों से जुड़ा होने के चलते चमत्कारिक काम कर सकता था। चिटफंड कंपनियों का कारोबार अवैध है अत जनहित में उन्हें तत्काल प्रभाव से बंद करा दिया जाना चाहिए इसलिये आप से जनहित में गुजारिश है कि कृपया जालसाज कंपनी के बी सी एल इंडिया लिमिटेड की निष्पक्ष जांच करवाकर, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें ताकि कोई धोखाधड़ी का शिकार न हो। के बी सी एल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु)के मुख्यालय गावं चुरमुरा मे, निवेशकों को अलॉट की गई जगह को दोबारा बेचा जा रहा है। कृपया इस पर तुरंत स्टे लगाकर धोखाधड़ी को रोका जाए। जब मूल्य आम जनता के हित से जुड़े है तो यह मामला बेहद गम्भीर रूप से चिन्ताजनक और विचारणीय बन जाता है। उसे देखना समझना अब जरूरी हो गया है। देश के राज्यों में मुकद्दमे में कल्पतरु कंपनी की ओर से पैरवी के दौरान मुख्य तथ्यों को हमेशा छिपाया गया है।

भोले-भाले ग्रामिणो, बेरोजगारो को ना-ना प्रकार की स्क्रीम बताकर उनके दिलो-दिमाग में लोभ लालच का बीज अंकुरित करके चिटफंड कंपनी के बी सी एल इंडिया लिमिटेड (कल्पतरु) उन्हें ठगने का काम कर रही है। किस तरह रिजर्व बैंक के नियमों में मौजूद कमियों का फायदा उठाते हुए हर गली-कूचे में लाखों की संख्या में निवेशकों को चूना लगाने वाले इस घोटालेबाज कंपनी ने हजारों करोड़ का घोटाला किया है। मामला आज सबके संज्ञान में है। यदि एक मामले में पुलिस कार्रवाई कर दे तो कई अन्य छिपे मामले भी तत्काल सामने आ जाएंगे। संभव है, कुछ लोग इन महाठगों के जाल से बच जाएं। देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता। अगर सही कदम नहीं उठाए गए तो देश की भोली जनता जबरदस्त घाटा झेलेगी।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए जीरापुर सम्मेलन में कई पत्रकार सम्मानित

राजगढ़ जिले के जीरापुर में पत्रकार सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब के प्रदेशाध्यक्ष संतोषकुमार गंगेले ने कहा कि पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना गया है लेकिन देश के किसी भी कानून में पत्रकारों को विशेष का दर्जा नहीं दिया गया है। उन्होनें कहा कि गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब का गठन केवल इसलिए किया है की पत्रकारों को विशेष दर्जा मिल सके। इस संगठन में पत्रकार निस्वार्थ भाव से जुड़ें और निशुल्क सदस्यता लें। नवभारत के जिला ब्यूरो प्रमुख गोविंद बड़ोने ने कहा कि आंचलिक स्तर के पत्रकारों को शासन द्वारा केई सहायता प्रदान नहीं की जाती है जबकी वे ही छोटे-छोटे गांवों से समाचार खोजकर लाते हैं जिससे प्रशासन को पता चलता है कि उसकी योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रही हैं या नहीं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि क्षेत्रीय विधायक हजारीलाल दांगी तथा विशेष अतिथि कलेक्टर आनन्द शर्मा थे। कार्यक्रम को नपाध्यक्ष दिनेश पुरोहित, पूर्व नपाध्यक्ष गोकरण वर्मा, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ज्ञानसिंह गुर्जर ने भी संबोधित किया।

 
उत्कृष्ट और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए नवभारत के गोविंद बड़ोने, दैनिक जागरण के कमल, पत्रिका के भानु ठाकुर, दैनिक भास्कर के सतेन्द्र भारिल्ल, सहारा समय के तनवीर वारसी और ईटीवी के ओम व्यास को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम में मंचासीन अतिथियों में गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब के संभागीय अध्यक्ष माखन विजयवर्गीय, संभागीय महामंत्री गजराजसिंह मीणा, भोपाल जिलाध्यक्ष दीपक बिड़ला, राष्ट्रीय हिंदी मेल ब्यूरों के गोपाल माहेश्वरी राही, तनवीर वारसी, ओम व्यास, श्रीनाथ दांगी, कमल खस प्रमुख रूप से उपस्थित थे। वहीँ जिले भर से आये पत्रकारों में मुकेश सेन, विनोद शर्मा, अलीमबाबा, गिरिराज किशोर गुप्ता, रामबाबू सक्सेना, पीसी चन्द्रावत, अजय साहू, रमाकांत शर्मा, राजेश भारती, देव नागर, रोशनखत्री, ओम गुप्ता, पंकज शर्मा, मनीष शर्मा, ओम राठोर, शमशेरखान, मोहन गुप्ता, राकेश भानपुरा, अजय टेलर, रामु जमींदार, योगेश भावसार, वसीमखान, राजेश राठौर, बीएल गुर्जर, मनीष राठौर, रवि टेलर, चन्दन सिंगी, शरद भावसार, पवन सोनी, कमलेश शर्मा सहित अन्य गणमान्य नागरिक और जनप्रतिनिधि मोजूद थे। कार्यक्रम के आयोजक गणेशशंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब जिलाध्यक्ष दिनेश जमींदार ने सभी का आभार व्यक्त किया एवं संचालन राधेश्याम पुरबिया ने किया। कार्यक्रम के अंत में सहभोज का आयोजन हुआ।

Makhan Vijayvargiya
Rajexpress correspondent
Sarangpur Pachore
Mo: 9300010003
Email: rajexpress.pachore@gmail.com

जॉय मुखर्जी में एक चाकलेटी मेटिनी हीरो की सभी खूबियां थी

गुज़रे जमाने के चाकलेटी अभिनेता ‘जय मुखर्जी’ का जन्म मशहूर शशधर मुखर्जी के परिवार में हुआ था, पिता शशधर व माता सती देवी के परिवार में जय, देब तथा शोमु मुखर्जी को मिलाकर तीन संतानें थी। पिता ‘फिलमिस्तान स्टुडियो’ के मालिक व संचालक थे। हजारों प्रसंशक आज भी उन्हें साठ दशक के चाकलेटी हीरो के रुप में याद करते हैं, विशेष कर ‘लव इन शिमला’ के किरदार ‘देव’ के लिए। दिलकश जय (जॉय) जल्द ही जवां दिलों की धड़कन बन गए, एक चाकलेटी मेटिनी हीरो की सभी खूबियां उनमें थी। फ़ैशन व वेशभूषा के मामले में शम्मी कपूर की परंपरा को एक तरह से विस्तार दिया।

 
‘लव इन शिमला’ के साथ हालांकि वह रातों रात स्टार बन गए, बाद में यह बात सामने आई कि वो पहली पसंद नहीं थे। उस समय के कुछ उभरते सितारे भी इस रोल के दावेदार थे। हिन्दी सिनेमा के कुछ बेहतरीन फिल्में मसलन शागिर्द, लव इन टोकियो, एक मुसाफ़िर एक हसीना को आज भी याद किया जा सकता है। जय सरीखा क्युट फेस बहुत कम नजर आता है। आलोचक उन्हें एक पक्षीय किरदारों में सिमटा हुआ पाते हैं, लेकिन शायद यह एक तरफा आकलन था। हिन्दी सिनेमा में शहरों के बेकग्राउंड से फिल्में तो बहुत बनी…फिर भी जय मुखर्जी की फिल्मों की बात जुदा थी। कुछ युं मानो उनकी फिल्में शहरों से मिला रही थी। शिमला से टोकियो का सफर हमेशा कहां देखने को मिलता है?
 
‘लव इन शिमला’ की कहानी में सोनिया(साधना) चाचा जनरल राजपाल सिंह(किशोर साहू) के परिवार के साथ रहती है। चाची(शोभना सामर्थ) और शीला(अजरा) उससे भेदभाव करते हैं, हरेक मौके पर एक किस्म का सौतेला व्यवहार उसे सहना पड़ता है। शीला और चाची सोनिया को हरेक मौके पर अपमानित करने की फिराक में रहती हैं। जनरल राजपल के मन में सोनिया के लिए स्नेह है, लेकिन पत्नी के पराए व कटीले व्यवहार पर कुछ नहीं बोलना चाहते। सोनिया को बचाने के बजाए वह अक्सर पत्नी व बेटी का साथ देते नज़र आते हैं, सिवाए दादी (दुर्गा खोटे) के सोनिया का घर पर कोई हमदर्द नहीं था। दादी के मन में सोनिया के लिए बहुत स्नेह था, शीला के जुल्मों का विरोध वही कर पाती थी।
 
देव मेहरा(जय मुखर्जी) और शीला कॉलेज के दोस्त हैं। शीला को देव की बेशुमार दौलत से प्यार है…उसी की खातिर देव से एक रिश्ता बनाती है। मंगनी के बाद देव और शीला का विवाह होने वाला है। रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए देव जेनरल राजपाल सिंह के यहां जाने का मन बनाता है। देव को लेकर सोनिया शीला से एक शर्त तय करती है, सोनिया ने शर्त मे दांव लगाया कि वो देव को शीला से जीत लेगी। शीला को सोनिया की शर्त की परवाह नहीं, उसे भरोसा रहा कि सोनिया ऐसा नहीं कर सकेगी।
 
शीला के झूठे प्यार के बाहर देव एक दिन सोनिया से रुबरु होता। पहली नज़र से ही वो सोनिया का कायल हो जाता है, सिंह परिवार ने देव के स्वागत के लिए ‘डांस कंपीटीशन’ का आयोजन किया है। सभी उसमें शामिल होने को रेडी हैं…सोनिया को घर में ही रहना है। ऐसे में वह मदद के लिए दादी मां पास जाती है, दादी मां को विश्वास है कि किसी लड़के का दिल जीतना एक खास किस्म के इमेज की मांग करता है। पार्टी में जाने के लिए वो सोनिया का ‘मेकओवर’ करना जरूरी समझती है। चेहरे से चश्मा हटा कर नया लुक देकर दादी उसे बदल देती है। सोनिया में खूबसुरत युवती ना होने के गलत भाव को खत्म करने में वह शायद सफल हो।
 
अब सोनिया की खूबसुरती काबिले तारीफ हो चुकी है, शीला से प्यार की जंग आधी जीतने के लिए यह काफी था। बाक़ी काम शीला का अति व्यवहार कर देता है, मुकाबले में वह देव को डांस पार्टनर रुप में नहीं लेकर बडी भूल कर गयी। देव को चुनने के बजाए वह प्रोफेशनल डांसर्स को ओर जाती है, शीला को कड़ा जवाब देते हुए देव सोनिया को ‘डांस’ फ्लोर पर लाता है। अंतत: देव और सोनिया मुकाबला जीत जाते हैं। कुछ ऐसे ही अंदाज़ में दोनो कहानी में बार-बार मिलते हैं, पहली नज़र का जादू धोखा नहीं रहा। देव-सोनिया के बीच एक सुंदर सा रिश्ता कायम हो चुका था। मंगेतर को दूसरे का होता देख शीला का आत्म-विश्वास जाता रहा, सोनिया अपनी शर्त जीतने के बहुत करीब थी।
 
जय को अपने समय की नामी नायिकाओं के साथ काम करने का अवसर प्राप्त हुआ था। साधना(लव इन शिमला-एक मुसाफिर एक हसीना), आशा पारेख(फिर वही दिल लाया हूं) सायरा बानो (शागिर्द) इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। आपने साधना की प्रतिद्वन्दी आशा पारेख के साथ बहुत सी फिल्में की,  तीन हिट फिल्में ‘फिर वही दिल लाया हूं (नासिर हुसैन) प्रमोद चक्रवर्ती की ’जिददी’ और ‘लव इन टोकियो’का यहां जिक्र किया जा सकता है। लेकिन सभी नामी नायिकाओं के साथ काम करते हुए ऐसा नहीं हुआ, मसलन सायरा बानो के साथ भी एक से अधिक बार नजर आए जिसमें दूर की आवाज़, साज़ और आवाज़, यह जिंदगी कितनी हसीन है का नाम लिया जा सकता है। लेकिन यह फिल्में शागिर्द की तरह सफल नहीं रहीं। फिर वैजयंतीमाला के साथ ‘इशारा’ भी नहीं चल सकी। आपने वहीदा रहमान-नूतन-नंदा के साथ भी काम किया।
 
प्रमोद चक्रवर्ती की ज्यादातर फिल्मों में ‘विदेशी मुल्कों’ की भव्यता को कहानी का हिस्सा दिखाया गया, जो उनकी कामयाबी का एक वजह रहीं। सचिन भौमिक की पटकथा में ‘टोकियो’ शहर को निखरने का पूरा स्पेस मिला यहां देखने को मिला था। शंकर-जयकिशन का बेजोड़ संगीत, हसरत जयपुरी की शायरी, शैलेन्द्र की कविताई ने ‘लव इन टोकियो’ को कमाल का बना दिया था। कहानी बांबे के अमीर युवक अशोक(जय मुखर्जी) से शुरू होती है। अशोक की मंगनी बिगड़ी शहजादी सरिता(लता बोस) से जबरदस्ती की जाती है। अशोक की माता गायित्री देवी (ललिता पवार) को नहीं पता कि ‘सरिता’ सिर्फ अशोक की दौलत से प्यार है, रिश्ते से नाखुश अशोक अपने मित्र महेश(महमूद) की मदद से सरिता के जाल से बच निकलता है। लेकिन अशोक की मुश्किले खत्म नहीं हो रहीं, जापान में बसे बड़े भाई का अचानक निधन हो गया। दरअसल भाई ने किसी जापानी लडक़ी से शादी कर ली थी, रिश्ते से एक लड़के का जन्म हुआ। गायत्री देवी अकेले पड़े चीकु को स्वदेश लाने के लिए अशोक को जापान भेजती है।
 
मां-बाप
के बाद अब चीकु की देखभाल वहां कौन कर रहा? यह स्पष्ट नहीं हुआ। अशोक के वहां आने पर चीकु भारत वापस ना आने की जिद कर लेता है। अशोक बालक को मनाने की पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन सब तरकीब बेकार ही निकली। मुसीबत यह कि अशोक की नज़र से बच ‘चीकु’ वहां से निकल कर आशा( आशा पारेख) पास निकल लिया। अब हमें संकेत मिला कि चीकु की देखभाल कौन करता था। अशोक व आशा की कहानी यहीं सांस ले रही थी। शंकर-जयकिशन की सुंदर कम्पोजीशन भी ‘लव इन टोकियो’ को खास बनाती है। गानों की फेहरिस्त में ‘मुझे तुम मिल गए हमदम सहारा हो तो ऐसा हो’ फिर रफी की दिलकश आवाज़ ‘अए मेरे साहिबे खुदा’ खास कहे जा सकते हैं।
 
सत्तर दशक मे ढलते कैरियर में जान फूंकने की कोशिश में एहसान-अनजान-पुरस्कार सरीखा फिल्में को किया। दुर्भाग्यवश यह सभी प्रयास विफल रहे…एक बार मुस्कुरा दो से हांलाकि सफलता जरूर मिली लेकिन अब वह दौर बाक़ी ना था। रोमांटिक राजेश खन्ना के उदयीमान सफर से बहुत से रोमांटिक नायकों का समय थोड़ी मुश्किल में पड़ गया था, दूसरे की फिल्मों में अब काम मिलने की आशा नहीं रही थी। खुद को सिनेमा में एक बार फिर आजमाते हुए जय ने ‘हमसाया’ का निर्माण किया। हमसाया में जय का डबल रोल था, प्रोजेक्ट में शर्मिला टैगोर व माला सिन्हा भी थी । टीवी धारावाहिक ‘अए दिल-ए-नादान’ में वो आखिरी बार नजर आए थे।

 

सैयद एस. तौहीद, संपर्कः passion4pearl@gmail.com

अन्ना हज़ारे चले, ममता के आंचल की छांव तले

जी हां, आप के सामने जो सवाल खड़ा है वो कोई कोरी बकवास नहीं है। बल्कि हक़ीक़त है। अन्ना की छवि एक साफ़ और ईमानदार समाज सुधारक की है जिस पर वो लीपा-पोती करने में जुटे हैं, नहीं तो उनको क्या पड़ी है ममता का आँचल पकड़ने की। क्या अन्ना ममता बनर्जी के बारे में नहीं जानते हैं, कि दीदी यूज-एंड-थ्रो की नीति पर चलती हैं। अगर नहीं तो जान लें, वर्ना दीदी इनको भी यूज किये हुए कंडोम की तरह किसी कूड़ेदान में फेंक देंगी। कुछ लोगों का नाम गिनवा दे रहा हूँ अन्ना चाहे तो पता लगा लें और फिर भरोसा करें।

आप लोगों को शायद पता नहीं होगा जब ममता बनर्जी बंगाल में युवा कांग्रेस की अध्यक्षा थीं उस वक़्त इनकी तानाशाही से प्रदेश कांग्रेस के नेता इस कदर नाखुश थे की इनको पार्टी में दरकिनार कर दिया गया था। पंकज बनर्जी उस वक़्त इनके सबसे बड़े मददगार के रूप में सामने आए, उन्होने ममता को हौसला दिया, बाद में सुदीप बंदोपाध्याय आये, इन लोगों ने तृणमूल कांग्रेस को रोपा। बाद में पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित पांजा  भी ममता के साथ आए।

आज पंकज बनर्जी किस हाल में हैं ये किसी को पता नहीं। सुदीप शायद अपना अतीत नहीं भूले होंगे जब उन्हें ममता को बुरा-भला कहते हुए कांग्रेस में वापस जाना पड़ा। वे आज समझौते की बेहतर ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं। अजित पांजा रोते कलपते ममता की उपेक्षा और यूज एंड थ्रो  की राजनीति का शिकार होकर दुनिया से विदा हो गए। इस तरह के कई उदहारण हैं। ताज़ा उदहारण विजय उपाध्याय का है। सिंगुर मुद्दे पर ममता के रिकार्ड अनशन में उनकी पार्टी के नेता भाग खड़े हुए, लेकिन विजय अंत तक ममता के साथ अनशन में शामिल रहे। विजय समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़कर ममता का साथ निभाते आ रहे हैं, लेकिन आज भी ये हाशिए पर हैं।  

जाहिर सी बात है जिस ईमानदारी के आधार पर अन्ना ममता को देश की बागडोर देना चाहते हैं वो जरा ममता के परिवार के लोगों और मुकुल राय सारिखे नेताओं की घोषित और अघोषित संपत्ति पर नज़र डालें और तय करे की ईमानदारी की परिभाषा क्या हो। अगर अन्ना इसमें चूकते हैं तो केजरीवाल की तरह इनको भी एक बड़ा झटका लगाने जा रहा है क्यूंकि ममता ममता हैं उनकी नीति है यूज एंड थ्रो।

 

लेखक नवीन कुमार रॉय से संपर्क ईमेल cneb.kol@gmail.com द्वारा किया जा सकता है।

बीजी वर्गीज़ ने राष्ट्रहित में बलात्कारी सैनिकों को बचाने के लिए कहा था

वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीज़ को जम्मू-कश्मीर के एक रिटायर्ड नौकरशाह सैय्यद मोहम्मद यासीन ने एक बयान दे कर विवादों में घसीट लिया है। मोहम्मद यासीन 23 साल पहले कुपवाड़ा के डिप्टी कमिश्नर थे जहाँ सेना के जवानो ने 13 से 60 वर्ष कि 32 महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया था। बीजी वर्गीज़ प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा घटना की जांच के लिए भेजी गयी टीम के अध्यक्ष थे। टीम ने जांच के बाद सेना के जवानों को क्लीन-चिट दे दी थी।

रविवार को, एक सेमीनार में अपनी तेईस साल लम्बी ख़ामोशी तोड़ते हुए मोहम्मद यासीन ने कहा के प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की टीम ने उन्हें राष्ट्रहित में सैनिकों को बचाने के लिए कहा था। मोहम्मद यासीन ने आगे बताया कि उन्होंने बीजी वर्गीज़ से कहा 'आपकी आर्मी ने जो कूनान-पोशपोरा में किया, क्या आप उसपे शर्मसार नहीं हैं?' ये सुन कर वर्गीज़ नाराज़ गए और उन्होंने मोहम्मद यासीन और उनके परिवार को धमकी दी। मोहम्मद यासीन ने कहा के विशेष सचिव ने भी उनपर केस ख़त्म करने के लिए दवाब डाला था। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मन कर दिया, इसके बाद उन्हें परेशान करने के लिए उनका बार-बार तबादला किया गया।

रेमन मेगासेसे पुरस्कार से सम्मानित और अपनी गम्भीर लेखनी के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीज़ हिन्दुसतान टाइम्स के संपादक रह चुके हैं। सिक्किम अधिग्रहण को लेकर इंदिरा सरकार की आलोचना करने के कारण बिड़ला के स्वामित्व वाले हिन्दुसतान टाइम्स से उन्हे निकाल दिया गया था।      
 

वीरेंद्र, दीपक, अरुण, परवेज, उत्तम, साहेब, मनोहर और पप्पू के बारे में सूचनाएं

जबलपुर से खबर है कि दैनिक भास्कर के विशेष संवाददाता वीरेंद्र तिवारी को प्रबंधन ने न्यूज एडिटर के पद पर प्रमोशन दिया है. तिवारी को जबलपुर सेंट्रल डेस्क की कमान सौंपी गई है.  पिछले चार सालों से दैनिक भास्कर इंदौर में विशेष संवाददाता रहे तिवारी को तीन माह पहले ही इंदौर ब्यूरो हेड बनाया गया था.

मेरठ से मिली सूचना के मुताबिक दैनिक जनवाणी मेरठ में क्राइम रिपोर्टिंग कर रहे दीपक सिरोही ने अमर उजाला रोहतक की राह पकड़ ली है. दीपक गाजियाबाद के निवासी हैं. दीपक ने दैनिक जागरण बागपत से 2007 में करियर की शुरुआत की थी.

जनसंदेश टाइम्स प्रबंधन ने अरुण कुमार सिंह को यूपी के कुशीनगर का जिला प्रभारी बनाया है. इसके पूर्व अरुण स्वत्रंत्र चेतना, अमर उजाला, दैनिक जागरण में अपनी सेवा दे चुके हैं. कुशीनगर जनपद के कप्तानगंज जनसंदेश कार्यालय में बतौर प्रभारी तैनात अरुण को अब जनसंदेश कार्यालय कुशीनगर का जिला प्रभारी बनाया गया है. 

झारखण्ड के गिरिडीह में न्यूज़11 से चार साल से जुड़े परवेज आलम ने चैनल को अलविदा कह दिया है. परवेज अब 'जी पूरविया' चैनल से जुड़ गए हैं. 

दिल्ली से मिली सूचना के मुताबिक कुमार उत्तम ने एचटी मीडिया ज्वाइन किया है. वे अभी तक द पायोनियर दिल्ली के स्पेशल करेस्पांडेंट हुआ करते थे.

चैनल वन न्यूज़ में लंबी पारी खेलने के बाद आर्यन न्यूज बिहार-झारखंड से जुड़े मोहम्मद साहेब अली ने अब ज़ी न्यूज़ के साथ अपना नया आगाज किया है. 

प्रभात खबर मोतिहारी में कार्यरत कंपोजर मनोहर कुमार एवं संवाददाता पप्पू कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. मनोहर कुमार को दिसंबर 2012 का वेतन नहीं मिला था तो पप्पू भी असंतुष्ट चल रहे थे. इसके पहले भी एक संवाददाता शानुराज ने प्रभात खबर का दामन छोड़ जागरण ज्वाइन किया था.

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उत्तराखंड में ‘आप’ की उम्मीद बढी, नेगी और कंचन ने थामा पार्टी का दामन

दिल्ली में सरकार जाने के बाद 'आप' पार्टी के लिए उत्तराखंड से एक अच्छी खबर है. दो कद्दावर लोगों ने पार्टी का दामन थामा. इसमें एक यहां के प्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी, तो दूसरी शख्सियत उत्तराखंड राज्य की पहली महिला डीजीपी रहीं कंचन चौधरी हैं. हालांकि इन दोनों का यहां की राजनीति से सीधे जुडाव नहीं रहा है लेकिन इन दोनों का ही अपने अपने क्षेत्रों में खासा दबदबा है. खासतौर से नेगी अपने गीतों के माध्यम से पहले भी राजनैतिक दलों व राजनेताओं को सबक सिखा चुके हैं.

माना जा रहा है कि 'आप' पार्टी राज्य की पांचों लोकसभा सीटों पर अपना प्रत्याशी मैदान में उतारेगी. फिल्वक्त तक किसी भी प्रत्याशी के नाम की घोषणा नहीं हुई है लेकिन पूर्व सांसद टीपीएस रावत, फिल्म स्टार हेमन्त पांडे का 'आप' से चुनाव लड़ना लगभग तय माना जा रहा है. नरेन्द्र सिंह नेगी के पार्टी में आने के बाद अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि वो चुनाव लड़ेंगे या नहीं. यदि वो चुनाव लड़ते हैं तो गढवाल संसदीय सीट पर उनकी दावेदारी होगी. हालांकि टीपीएस रावत भी पूर्व में गढवाल से सांसद रह चुके हैं. उनको पार्टी कहां से चुनाव लड़ाती है, इस पर भी स्थिति साफ नहीं हो पाई है. हेमंत पांडे का नैनीताल से चुनाव लड़ना तय है. इस स्थिति में यह भी संभावनाएं हैं कि नेगी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करें.

आप के कार्यकर्ता अशोक चौधरी का कहना है कि पार्टी पूरी ताकत के साथ लोकसभा चुनाव लडेगी. राज्य में पार्टी संगठन को मजबूत बनाने के लिए काम किया जा रहा है. चौधरी का मानना है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के अधार पर आगे की रणनीति तय की जायेगी.

देहरादून से वरिष्ठ पत्रकार बृजेश सती की रिपोर्ट.

तो क्या हरिश्चन्द्र चंदोला युद्ध पत्रकार नहीं हैं?

कई युद्धों को रणभूमि में जाकर देश व विदेश के कई अखबारों में विवरण लिखने वाले भारतीय पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला का नाम विकीपीडिया वेबसाइट में युद्ध पत्रकारों की सूची में दर्ज नहीं है। यह बिडंबना है कि जिस पत्रकार ने सन् १९६८ से लकर १९९३ के बीच हुए युद्धों व क्रांतियों को घटना स्थल पर जाकर लिखा हो वो युद्ध पत्रकारों की श्रेणी में नहीं है।

हालांकि इस वेबसाइट में १९वीं से लेकर २१वीं शताब्दी के विश्व के १५९ पत्रकारों का उल्लेख किया गया है, लेकिन इसमें एक भी भारतीय युद्ध पत्रकार के नाम का उल्लख नहीं है। उल्लेखनीय है कि हरिश्चन्द्र चंदोला इकलौते भारतीय पत्रकार हैं, जिन्होंने देश व देश के बाहर कई युद्धों को कवर किया। इससे संबधित उनके लेख न केवल भारतीय बल्कि विदेश के कई समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुए हैं।

पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला का सुमार भारत के प्रमुख युद्ध पत्रकारों में किया जाता है। उन्होंने भारत में नागा छापामारों के बीच में विवरण लिखने के अलावा २५ सालों तक विदेशी भूमि में रहकर कई युद्धों का युद्ध भूमि में जाकर विवरण लिखा। सन् १९६८ से लेकर १९९३ के बीच हुए लगभग सभी युद्धों को उन्होंने कवर किया। अमेरिका – वियतनाम युद्ध को उन्होंने लगातार सात सालों तक दयुद्ध समाप्त होन तक½ कवर किया। वकायदा इसके लिए उन्हें अमेरिकी सेना की ओर से मिलने वाला प्रेस कार्ड भी उपलब्ध कराया गया था। इस प्रेस कार्ड को मैंकफी कार्ड के नाम से जाना जाता था। इस युद्ध को कवर करते हुए दो बार ऐसे मौके भी आये जब मौत उनके करीब से होकर गुजरी। ईरान ईराक युद्ध को भी उन्होंने सन् १९८० से ८८ तक कवर किया। लगातार आठ सालों तक हुए इस युद्ध का विवरण उन्होंने घटना स्थल पर जाकर लिखा। ईराकी सेना द्वारा मस्टर्ड गैस के प्रयोग की उनकी खबर न केवल भारतीय अखबरों में, बल्कि उनकी रिपोर्ट विदेशी पत्रों में छपी।

हरिश्चन्द्र चंदोला के साथ ईरान ईराक युद्ध को कवर करने वाले ब्रिटिश युद्ध पत्रकार चाल्र्स गलास ने द इंडिपेन्डेस समाचार पत्र में उनकी पत्रकारिता पर एक बड़ा लेख भी लिखा। अपने इस लेख में उन्होंने इस युद्ध का उल्लेख करते हुए लिखा कि जब उनके साथ के सारे पत्रकार अपने अपने वतन वापस जा चुके थे तब यह भारतीय पत्रकार ईरान के शरणार्थी शिविर में यह जानने के लिए पहुंचा था कि वहां रह रहे शरणार्थियों की क्या स्थिति है। उन्होंने लिखा कि हरिश्चन्द्र चंदोला ने अपने लेख में लिखा कि कैसे शरणार्थी सूखे खजूर व ब्रेड पर गुजर बसर कर रहे हैं। चार्ल्स ने लिखा कि हरिश्चन्द्र चंदोला आडम्बरहीन व्यक्ति हैं, जो युद्ध के मैदान व प्रेस वार्ताओं में विनीतभाव से अपना काम करते हैं। उनका मानना है कि चंदोला १९ वीं व २० वीं सदी के प्रमुख युद्ध पत्रकारों, ग्रेंट, बिलियम हाबर्ड,रसेल हिचर्ड व ल्यूमनी के दर्जे के पत्रकार हैं।

हरिश्चन्द्र चंदोला ने १९९१ में अमेरिका के ईराकी हमले, ईराक का कुवेत पर आक्रमण के साथ ही कई देशों की जनक्रांतियों पर भी कलम चलाई। उन्होंने कांगो कइंगा की लडाई,वियतनाम चीन युद्ध,इंडोनेशिया में सैनिक शासन की स्थापना के साथ ही इजरायल के लेबनान पर हमले की भी घटना स्थल पर जा कर रिपोर्टिंग की।

सन् १९५४ में उन्हें अपनी दूसरी तिब्बत यात्रा के दौरान तीन माह तक चीनी सैनिकों द्वारा युद्ध बंदी की ताह गरगुंशा सैनिक छावनी में रखा गया। कई जांच पडताल के बाद उन्हें चीनी सैनिकों ने रिहा किया। कई दिनों की पैदल यात्रा के बाद वो भारत वापस आये। यहां आने के बाद उन्होंने भारत तिब्बत सीमा पर हो रहे बदलावों पर खबरें लिखीं, जो भारतीय पत्रों के अलावा विदेशी समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई। चंदोला ने अपने लेखों में लिखा कि कैसे नीली वर्दीधीरी चीनी सैनिक सीमा पर सड+क निर्माण कर रहे हैं। हालांकि उनकी इन खबरों का भारत सरकार ने इस वक्त संज्ञान नहीं लिया।

युद्ध की रिपोटिंग करते हुए पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला दो बार मौत के मुंह से निकले। एक बार जब वो अमेरिकी सेना की बखतरबंद गाडी में वियतनाम की तरफ जा रहे थे कि तभी सामने से गोलावारी होने लगी, किसी तरह गाडी से उतर कर उन्होंने जान बचाई। इसी तरह एक बार वो अल्जीरियन संघर्ष के दौरान तार घर से बाहर आ रहे थे कि उसी दौरान फ्रासिसी सैनिकों ने गोलावारी शुरू कर दी, कुछ ही मिनटों में पूरी सड+क, खून से लाल हो गई। हरिश्चन्द्र ने दीवाल से लिपटकर किसी तरह अपनी जान बचाई।

देहरादून से बृजेश सती की रिपोर्ट. संपर्क: ९४१२०३२४३७

इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार ने राजमोहन गांधी को पांच लाख रुपया पहुंचाया था

Daya Sagar : तब राजमोहन गांधी मद्रास (अब चैन्‍नई) में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक हुआ करते थे। वीपी सिंह चाहते थे कि अमेठी में राजीव गांधी के खिलाफ महात्मा गांधी के वारिस को लड़ाया जाए। वैसे सच पूछिए तो असली गांधी बनाम नकली गांधी का ये आइडिया इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका जी का था। जनता दल से टिकट तय हो गया। संपादक पद से इस्तीफा देकर राजमोहन गांधी पहली बार राजनीति के पथरीले मैदान में उतरे।

आमतौर पर अमेठी का मौसम बहुत रुखा होता है। धूल, अंधड़ और गर्मी ने राजमोहन गांधी को हिला दिया था। पढ़ने लिखने वाले आदमी थे। राजनीति की जमीनी हकीकत से वह कतई नावाकिफ थे। सुबह थोड़ी देर जनसम्पर्क करते फिर शाम को थोड़ी देर के लिए वोट मांगने निकलते थे। अंधेरा होने से पहले अपने होटल के कमरे में लौट आते।

लखनऊ के इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र को हुक्म मिला था कि वह चुनाव के लिए राजमोहन गांधी को 5 लाख रुपया पहुंचा दें। जहिर है ये रुपया दिल्ली से आया था। पत्रकार मित्र अमेठी पहुंचे। राजमोहन गांधी बोले- बाकी सब तो ठीक है पर यहां एक बड़ी दिक्कत है। पत्रकार मित्र ने पूछा क्या? गांधी बोले- यहां कहीं कॉफी नहीं मिलती।

पत्रकार मित्र चौंके।

1989 के उस जमाने में इस इलाके में काफी मिलना सचमुच बहुत मुश्किल काम था। खैर उन्होंने सुल्तानपुर की मार्केट से नेस कैफे का एक डिब्बा मंगवा दिया। नेस कैफे का डिब्बा देखकर गांधीजी भड़क गए। बोले- ओ.. नो…नो.. वो सीड वाली कॉफी चा‌‌हिए। कॉफी बीन्स। हम मद्रास में वही काफी पीते हैं।

खैर लखनऊ के पत्रकार भी कम जुझारू नहीं होते। उन्होंने लखनऊ के मशहूर काफी हाउस से काफी बीन्स मंगाए। तब जाकर राजमोहन गांधी अमेठी से चुनाव लड़ पाए। और चुनाव ऐसे लड़े कि कांग्रेस विरोधी लहर में भी उनकी जमानत जब्त हो गई। राजीव गांधी ने उन्हें तब करीब दो लाख वोटों से हराया था। इसके बाद राजमोहन गांधी का राजनीति से ऐसा मोह भंग हुआ कि पूछिए मत। अब केजरीवाल उन्हें ढूंढ कर फिर लाए हैं। खुदा खैर करे।

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राजमोहन गांधी का भारत की नई राजनीति में स्वागत है। मैं उन्हें उतना नहीं जानता जितना उनके पिता देवदास गांधी को जानता हूं। यह भी जानता हूं कि राजमोहन गांधी बहुत प्रेम करने वाले दंपति की संतान हैं। केजरीवाल को जब उन्हें टोपी पहनाते देखा तो देवदास गांधी की प्रेम‌कथा याद आ गई। बहुत दिलचस्प है। और शायद बहुत कम लोगों को पता हो। ये वो दिन थे जब देश में भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी को लेकर तनाव चल रहा था।

बापू अपने छोटे बेटे देवदास और राजा राजगोपालाचारी अपनी छोटी बेटी लक्ष्मी के प्रेम को लेकर चिंतित थे। एक गुजराती वैश्य और दूसरी मद्रासी ब्राह्मण। इस अंतरजातीय विवाह के लिए न गांधीजी तैयार थे और न राजाजी। इस मोर्चे पर भी बापू की लड़ाई जारी थी। उन दिनों गांधी के संग रह रही मीरा ने अपनी डायरी में लिखा- ‘एक तरफ यह महान राजनीतिक नाटक चल रहा था तब एक शांत और गंभीर प्रणय व्यापार भी परदे के पीछे चल रहा था।’

बहुत विचार के बाद तय हुआ कि दोनों के प्रेम की स्थिरता की परीक्षा ली जाए। उपाय ये निकला कि दोनों पांच साल अलग रहें। प्रेम होगा तो जिंदा रहेगा। सिर्फ शारीरिक आकर्षण हुआ तो प्रेम समय के साथ अपने आप विदा हो जाएगा। दोनों युवा प्रेमी इस पांच साल की जुदाई के लिए राजी थे। लक्ष्मी पांच साल के लिए अपने पिता के साथ मद्रास जाने वाली थीं। इससे पहले देवदास की इच्छा थी कि वह उन्हें एक बार देख पाएं उससे बातचीत कर सके। गांधीजी और राजाजी कार्यसमिति की बैठकों में व्यस्त थे। रह गईं बा। उनके खून में अभी भी पुराने ढंग की कट्टरता मौजूद थी। लेकिन देवदास से उन्हें बहुत लगाव था। वह उनका उदास चेहरा देख नहीं सकती थीं।

मीरा ने लिखा – ‘चूंकि देवदास जानते थे कि बा को उन दोनों को अकेले में एक साथ छोड़ना पसंद नहीं होगा। इसलिए उन्हें तरकीब सूझी कि जब तक वायसराय भवन में चर्चाएं चलें तब तक दोनों बापू के खाली बरामदे में बैठें। मुझसे कहा गया कि मैं पास वाले कमरे में रहूं। और दरवाजा खुला रखा जाए। यह प्रबंध बा ने मान लिया। दोनों युवा प्रेमी एक दूसरे के आमने सामने बैठ गए। उनकी पीठें बरामदे के खंभों से लगी थीं।’

खैर जैसा कि जाहिर था ये प्रेमी युगल पांच साल इंतजार नहीं कर सकता था। आखिर में गांधी और राजगोपालचारी इन दोनों को झुकना पड़ा। उन्हें दोनों की शादी करानी पड़ी।

अमर उजाला से जुड़े पत्रकार दयाशंकर शुक्ल 'सागर' के फेसबुक वॉल से.

विमल झा, रविशंकर, कविता, अविनाश, प्रदीप, विशाल, अरविंद, भूपेंद्र के बारे में सूचनाएं

दैनिक भास्कर में कार्यरत रहे विमल झा ने अब लाइव इंडिया की मैग्जीन में डिप्‍टी एडिटर पद पर ज्‍वाइन किया.  टाइम्स नाउ से रविशंकर ने इस्तीफा देकर भास्कर न्यूज ज्वाइन किया है. उन्हें एडिटर नेशनल अफेयर्स बनाया गया है.  कविता चौहान इंडिया टीवी से इस्तीफा देकर सहारा समय के साथ जुड़ गई हैं.

गोरखपुर के पत्रकार अविनाश चतुर्वेदी ने नई पारी दैनिक जागरण जालंधर में बतौर सीनियर रिपोर्टर शुरू की है. वे फौज से इस्तीफा देकर पत्रकारिता में आए. अमर उजाला, काम्पैक्ट और आई नेक्स्ट में रिपोर्टिंग इंचार्ज का काम कर चुके हैं.

आर्यन टीवी से ग्राफिक्स एडिटर प्रदीप कुमार, वीटी एडिटर विशाल राज मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया है.  भारत समाचार न्यूज चैनल एम.पी.सी.जी. में रीवा सम्भाग का सम्भागीय ब्यूरो प्रमुख राहुल अरविन्द शर्मा को नियुक्त किया गया है.

भास्कर न्यूज़ में भूपेंद्र प्रताप सिंह ने सीनियर वीडियो एडिटर के पद पर ज्वाइन किया है. भूपेंद्र इससे पहले आजाद न्यूज, न्यूज24, फोकस टीवी में काम कर चुके हैं.

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कल्पतरू की धंधेबाजी से खफा होकर सुभाष ने दिया इस्तीफा, नवभारत टाइम्स से जुड़े

इटावा से पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुभाष त्रिपाठी इस बार देश के सबसे बड़े हिन्दी दैनिक समाचार पत्र नवभारत टाइम्स में शामिल हो गए हैं. सुभाष इटावा कि पत्रकारिता में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. आज, स्वतन्त्र भारत, हिंदुस्तान, कैनविज टाइम्स, कल्पतरू टाइम्स आदि अखबारों में वे काम कर चुके हैं.

समाजवादी पार्टी के गढ़ कहलाने वाले इटावा व इसके आसपास के पांच-सात जिलों में उनका कोई सानी नहीं रहा है. सुभाष ने अखिलेश यादव का बचपन में एक इंटरव्यू लिया था. सुभाष त्रिपाठी से कल्पतरू के मालिकों ने पत्रकारिता के अतिरिक्त अपने कामों के लिए जब जोर डाला तो उन्होंने उस अखबार के चीफ रिपोर्टर पद से इस्तीफा दे दिया.

पत्रकारिता को मालिकों के व्यवसाय का अस्त्र बनाने से इंकार करने का खामियाजा उन्होंने जीवन भर उठाया. अपने पत्रकारिता जीवन में शुचिता को अपना असलहा बनाये रखने वाले त्रिपाठी को इटावा, मैनपुरी, औरैया, जालौन, एटा, फिरोजाबाद की राजनीतिक और अन्य ख़बरों के प्रस्तोता के रूप में नवभारत टाइम्स में शामिल किया गया है.

इटावा से अरविंद की रिपोर्ट.

राज्यसभा टीवी की कृति मिश्रा और पंजाब केसरी के डा. राजीव पत्थरिया को एवार्ड

मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित आठवें मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड समारोह के दौरान राज्य सभा टीवी में कार्यरत पत्रकार कृति मिश्रा को बेस्ट फीमेल जर्नलिस्ट आफ द इयर से सम्मानित किया गया.

इसी कार्यक्रम में पंजाब केसरी के वरिष्ठ पत्रकार डा. राजीव पत्थरिया को हिमाचल के सर्वश्रेष्ठ पत्रकार पुरस्कार से सम्मानित किया है. 

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अमृतसर में पत्रकार के परिवार पर चढ़ा दी कार, कई घायल

अमृतसर से खबर है कि थाना सिविल लाइन के नजदीक शनिवार रात नशे में धुत इंडिका कार सवार ने पत्रकार रंजीत कुमार और उसके परिवार को टक्कर मार दी.  हादसे में रंजीत, उनकी पत्नी और एक वर्ष का बेटा घायल हो गए हैं. पत्नी की हालत नाजुक बनी हुई है. थाना सिविल लाइन पुलिस ने कार नंबर के आधार पर अज्ञात वाहन चालक के खिलाफ हत्या प्रयास का केस दर्ज कर लिया है.

अस्पताल में दाखिल पत्रकार रंजीत कुमार ने बताया कि शनिवार रात वह पत्नी और एक वर्षीय बेटे के साथ बाइक पर जा रहे थे. सर्किट हाउस के नजदीक थाना सिविल लाइन के सामने पहुंचे तो इंडिका कार में सवार चालक ने गलत साइड पर आकर उन्हें टक्कर मार दी. हादसे में पूरा परिवार घायल हो गया. पत्नी के सिर पर गहरी चोट लगी है. उनकी हालत खतरे में है.

अमेरिकी रेडियो पर जानी-मानी आवाज बन चुकी हैं मधुलिका सिक्का

अमेरिका के एनपीआर रेडियो पर एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम का संचालन करनेवाली भारतवंशी मधुलिका सिक्का अमेरिकी रेडियो पर एक जानी-मानी आवाज बन चुकी हैं. सिक्का इस रेडियो शो के कार्यक्रमों की मुखिया की जिम्मेदारी निभा रही हैं और वह यहां एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के पद पर नियुक्त हैं. सिक्का वर्ष 2006 में बतौर सुपरवाइजिंग सीनियर प्रोड्यूसर एनपीआर में आयी थीं, पर जल्द ही वह यहां शीर्ष पर पहुंच गयीं.

सिक्का को अब तक चार बार एमी पुरस्कार और तीन बार दक्षिण एशियाई जर्नलिस्ट एसोसिएशन पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. उन्होंने एबीसी, सीबीएस और एनबीसी के साथ भी काम किया है. नयी दिल्ली में जन्म लेने के बाद सिर्फ तीन माह की उम्र में ही उन्हें लंदन आना पड़ा क्योंकि यहां उनके पिता भारतीय विदेश सेवा के कर्मचारी होने के नाते बतौर राजनयिक तैनात थे. सिक्का ने 1985 में लंदन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीति विषयों में स्नातक डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने 1987 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स और पॉलिटिक्स में मास्टर्स डिग्री हासिल की. शादी के बाद वह अमेरिका आकर बस गयीं. भारत यात्र के दौरान उनकी संगीत के प्रति दिलचस्पी जगी, जिसके बाद उन्होंने एक सितार खरीदा और फिर वॉशिंगटन डीसी में अपने लिए एक शिक्षक भी खोजा.
 

जेल में तेजपाल के कमरे से मोबाइल फोन बरामद

पणजी : वास्को के पास स्थित सादा उप-जेल से जेल अधिकारियों ने नौ मोबाइल फोन जब्त किए जिनमें से एक तहलका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल की कोठरी से मिला. सहायक जिलाधिकारी गौरिश शंख्वल्कर ने यहां संवाददाताओं को बताया कि सादा उप-जेल में आज सुबह औचक निरीक्षण किया गया.

उन्होंने कहा, हमें नौ मोबाइल फोन मिले, उनमें से एक तेजपाल की कोठरी से बरामद हुआ. हालांकि जेल अधिकारियों ने यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या मोबाइल फोन तेजपाल के पास था. उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि तेजपाल के साथ कोठरी में और कौन हैं. शंख्वल्कर ने कहा कि मामले की विस्तृत जांच की जा रही है जिससे सच सामने आ जाएगा. कनिष्ठ सहयोगी का बलात्कार करने के आरोप में तेजपाल सादा उप-जेल में बंद हैं. उनकी जमानत याचिका पर चार मार्च को बंबई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ में सुनवायी होनी है.
 

चैनल मालिक अरूप चटर्जी के खिलाफ कुर्की जब्ती प्रक्रिया शुरू करने के आदेश

Gunjan Sinha : मेरे द्वारा दायर चेक बाउंस केस में आरोपी न्यूज़11 के मालिक अरूप चटर्जी के लगातार गैर हाज़िर रहने और गैर जमानती वारंट के बावजूद गिरफ्तार करके पेश नहीं किये जाने पर रांची की एक अदालत ने एक फरवरी को श्री चटर्जी के खिलाफ Cr P C की धारा 82 के तहत कुर्की जब्ती की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई ४ अप्रैल को है। श्री चटर्जी रांची पुलिस को मिल नहीं रहे हैं। किसी को मालूम हो तो रांची के एस एस पी को बताएं कि वे कहाँ हैं।

    Chandra Bhushan Solanki Mangal tower news 11 ranchi ka office to roj aata hai aarup..
 
    Sudhir Kr Sir ek cheque mera v bounce kiya hai…. Wo salary cheque hai company wala de nhi rha hai kya kru
 
    Asit Nath Tiwari रांची पुलिस से ज्यादा उनके बारे कौन जानता है सर…
   
    Chandra Bhushan Solanki Aarup ke khilaf kolkatta se chandigarh tak m 100 case pending hai…ye lat ka bhoot hai bat se nahi sunega..
     
    Ratan Tirkey Jaldi ho
 
    Prakash Chandra sir aap media ke liye bahut kaam kiye hai ab aap ko mediakarmi ke liye kaam karna chahiye mediakarmi ka bahut shoshan ho raha hai… plz aap kuch sochiye….baithiye nahi….
    
    Shachindra Jha NEWS 11 ka maalik chor …?
     
    Ajay Kumar न्यायपालिका की अवहेलना क्यूँ और कैसे हो रही है
     
    Sudhir Kr @prakash chandra Journalist ka shoshan nhi koi kr sakta walki journalist khud shoshan karwate hai
    
    Sudhir Kr Aur waise v Prakash Chandra jee aap jinhe bol rhe hai kuchh krne ke liye be v kuchh ukhar nhi sakte……!!!!!!! Sorry is trh ke shawd istemal krne ke liye lekin ye sachh hai……..!!!!!
     
    Amarnath Prasad Arup chatterjee kab tak bhagega ……ab usake antim din aa gaye hai …main dua karta hoon .zaldi usake karmoin ki saza mile ..
     
    Sanjay Jha dalal kavhe police ko nahi milte hai chatarjeeya ko khogna hoga police media ke nam se darte hai police vhe choor hai
     
    Rahul Deo Solanki SIR MAPHIYA KO KHOJNA MUSHKIL TO HOTA HAI PAR POLICE CHAH LE TO BIL SE NIKAL LEGI
     
    Gunjan Sinha सुधीर जी, आपसे कभी परिचय / मुलाकात हुई हो ऐसा याद नहीं आता, फिर इतना गुस्सा आपने कहाँ से जमा कर लिया ? आपने सॉरी कह कर अपने शब्द और समझ सीमा पर खुद ही माफ़ी मांग ली है तो उसपे कुछ नहीं कहूंगा और न पत्रकारों के लिए कुछ कर पाने या न कर पाने का दावा करूँगा लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि हक़ के लिए मुझसे जो बन पड़ा उतना लड़ा हूँ और आगे भी लड़ूंगा। बाकी आप जैसे भविष्यवक्ता जानें।
     
    Sudhir Kr Sir waisi ladai kis kam ki jisse dusro ko aajtak koi faida hi na hua ho…… Aur rhi aaple ladne ki to….. Aapne lda apne liye…. Aur apno ke liye….. Shoshit patrakaro ke liye lad rhe hote to….. Aapke sawd itne kamjor nhi hote……. Jitne news 11 wale ke liye hai
 
    Gunjan Sinha सुधीर जी, मेरे पास अपनी विरुदावली सुनाने लायक कुछ नहीं है लेकिन शर्मिंदा होने लायक भी शायद बहुत नहीं है।See Translation
 
    Sanjay Jha gunjan bhaiya kaya karna hai batayiya faisala ho jayaga
   
    Sanjay Jha jo lato ke bhoot hote hai wae bato se nahi mante hai yeh jeeban darsan hai
    
    Sudhir Kr Sir kahane ke liye to bahut kuchh hai lekin aapko kuchh v kahane ke liye mere pass ek v sawd nhi mil pa rha hai……. Kyun ki agar ek patthar bich sadak pr pda pda logo se ye kh rha ki mujhhe side kr do to koi nhi uski madad karega………lekin agar us patthar ki wajah se kisi ko thokar lag jaye to…. Use uthakar turant wo aadmi side kr deta hai…… Aisa kyu……. Ye puri kahani Gunjan Sinha sir aapke reply pr hai….. Aap samajhe aur btaye ki main sahi hun ya galat………??????
 
    Sanjay Jha kahani se jeevan nahi chalta hai bhaiye
 
    Sudhir Kr Lekin jindagi pr kahani likhi ja sakti hai
   
    Ashutosh Kumar Pandey सुधीर कुमार जी………हो सकता है आप मीडिया..इसमें होनेवाले शोषण,स्पाईनल बोन में गुदगुदी…साईकोफंटगिरी के बारे में ज्यादा जानते हो। लेकिन शायद आप गुंजर सर के फ्रेंड लिस्ट में होने के बाद भी आप उन्हें जानते नहीं हैं। जिस मीडिया में आप दूसरों के फायदे वाले काम नहीं होने का रोना रो रहे हैं। आप पता लगा लिजिए…मैं दावे के साथ कहता हूं…..टीवी पत्रकारिता में संवेदना,गरीबी,मजलूमों की लड़ाई,उनकी बात,उनका दर्द सिर्फ गुंजन सर के जमाने में ही क्षेत्रिए टीवी पत्रकारिता में दिखा। आज वह किसी पोस्ट पर न होते हुए भी…..अमूल्य धरोहर हैं…यह शुक्र मनाईए कि फेसबुक के जरिए आपने लिखा तो बहुत कुछ लेकिन बीना जाने……….आपका उत्तर भी सर ने दिया है….उसे दो तीन बार पढ़ लिजिएगा तो उनकी सादगी,सच्चाई और पत्रकारिता के प्रति संवेदना का अंदाजा आपको हो जाएगा। आप जिन जगहों पर उबकाई करने नहीं जा सकते वहां वह बीना चप्पल के जाकर स्टोरी करके लाते थे….कीचड़,आंधी,पानी….जबकि वे चाहते तो उनके एक फोन पर दरभंगा के कुश्सेशवर स्थान से स्टोरी आ जाती…..दूसरी बात……उन्होंने टीवी पत्रकारिता में बहुत ऐसे लोगों को रचा है जो आज भी एक सीमा तक ही किसी को बरदास्त कर पाते हैं……….यह उनकी ही देन है कि कई लोग सिर्फ किसी के बोलने का अंदाज सही नहीं था इसलिए नौकरी छोड़ दी……..हो सकता है आप मुझसे ज्यादा जानते हो………..लेकिन फलदार वृक्ष ऐसा झुक जाता है…जिसका फल कोई बच्चा भी आराम से तोड़ ले……..जिसपर फल ही नही…..उसकी सुखी लकड़िया कई घरों का अलावा तो बन सकती हैं……….अनाज और रोटी नहीं…..क्योंकि लकड़ियों आग पैदा होगी……और उस आग पर पकने वाली रोटी तैयार करने का माद्दा टीवी की दुनियां में गुंजन सर के पास है……….सदैव रहेगा……..रहा सवाल उस अरूप/कुरूप के चेक का……..तो सर पैसे के लिए……..वैसे लोगों और सिस्टम के लिए लड़ रहे हैं…………।

    Upendra Chandan मै आशुतोष जी से सहमत हु
 
    Sudhir Kr Sir main do bat kahna chahunga…… 1>> sayad aapne gunjan sir ke post pr. Kiye gaye sare comment ko nhi padha hai agar aapne padha hota to sayad merry dwara likhi gai kahani ka matlab samajh jate……. bat rhi ladne ki to uska faida sirf unhe hi mila….. Aur unke apno ko…… Agar har kisi k liye ladte to ….!!!! Aap khud samaj sakte….. Ki kyu aaj patrakaro se jyada ptrakarita shoshit hai…….!!!!!!!

    Vishad Kumar Face book Par Mil Jayenge

    Anup Sinha SIR SAMAN TAMIL KAWAIEYA … TABHI 82 KURKITAMIL HOGA FIR 83 SKONDAL HOGA …. FIR  
 
    Rajesh Krishna Pryatne dhirah griiyan langhantiih.
 
    Sudhir Kr Upendra Chandan jee aap kisi se sahamat ho jo sachchhai maine kaha…… Sach kadwa hota hi hai…..
   
    Prabal Mahto Ranchi Police sharif police hai… criminals se unka kya wasta… arip chatarjee ko to koi criminal hi dhundh sakta hai.. aapki badnasibi aapke dost bhi sharif hain…
     
    Prem Kumar Friends of Gunjan sir. Ye cheque Ki ladai pratikatmak hai. Ek patrakar se malik bane arup ka kurup chehara dikhane ka sangharsh hai. Jit sangharsh ki hogi Shubhkamna nahi pura samarthan hai.
     
    Ved Prakash mujhe pata hai sir…
     
    Upendra Chaudhary पिछले एक दशक में ज़्यादातर ऐसे ही अतार्किक चेहरे पत्रकारिता के लिए तर्क और शर्त गढ़ते रहे हैं.कंटेन्टलेस से ओत-प्रोत ये चेहरे कंटेन्ट लिखवाते पढ़वाते रहे हैं, संपादकीय प्रबंधन क्षमता से दूर का रिश्ता नहीं होने के बावजूद ये प्रबंधक कहलाते रहे हैं,प्रशासनिक क्षमता के नाम पर उनकी भाषा गालियों से शुरू होती है और अश्लीलता पर ख़त्म होती है,मगर लगातार आतंक में पसरी फैली होती है. बड़े अजीब 'चेहरे' वाले इन भस्मासुरों को जाति-धर्म और क्षेत्र के नाम पर किसी न किसी बड़ी पत्रकारिता वाले 'शंकर' का वरदान-अभयदान मिलता रहा है.आख़िरकार भस्मासुरी का शिकार तो सबको होना है,चाहे 'शंकर' हों या उनके 'गणेश' या फिर पत्रकारिता के 'दरवेश'.
     
    Ved Prakash Upendra Chaudhary सर जी… न आपकी भाषा बदली है, न आपकी शैली… उम्मीद है आप भी वैसे होंगे (mast n bindas), जैसा मुझसे आखिरी मुलाकात के वक्त तकरीबन 5 या 6 साल पहले थे…
   
    Mukesh Chaudhary midia gharano n patrakaro k sath sirf anyay hi kiya hai
 
    Arun Tiwari 25 ko dhanbad aayega. khabar pakki hai.

वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

जी न्यूज समेत कई चैनलों का लाइसेंस रद्द कराना चाहते हैं नवीन जिंदल!

जिंदल और जी का झगड़ा चरम पर है. जी ग्रुप वाले जी न्यूज व जी बिजनेस न्यूज चैनलों के जरिए लगातार नवीन जिंदल व उनकी कंपनियों पर धावा बोलते रहते हैं तो नवीन जिंदल भी जी ग्रुप को डैमेज करने के लिए लगातार सक्रिय हैं. उन्होंने अब धन उगाही करने वाले चैनलों के लाइसेंस रद्द करने की मांग पिछले दिनों लोकसभा में की. कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने बीते दिनों लोकसभा में उन टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द करने की मांग उठायी, जो पेड न्यूज के जरिये कथित रूप से धन उगाही करते हैं.

शून्यकाल के दौरान नवीन जिंदल ने कहा कि टीवी चैनल चलाने के लाइसेंस का कुछ लोग धन उगाही के लाइसेंस के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि गलत कार्य में संलग्न ऐसे चैनलों के लाइसेंस रद्द किये जायें. उन्होंने कहा कि साल भर पहले इस मुद्दे पर सूचना प्रसारण मंत्रालय ने एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया था लेकिन लगता है कि अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

उल्लेखनीय है कि धन उगाही के कथित प्रयास के लिए जी न्यूज चैनल के साथ जिंदल का विवाद चल रहा है. उद्योगपति सांसद जिंदल ने कहा कि इस तरह का मीडिया हमारी इज्जत के साथ खिलवाड करता रहा है चाहे उनके पास सबूत का अभाव ही क्यों न हो. जिंदल ने कहा कि पुलिस जब बंदूक का लाइसेंस देती है, तो कड़ी शर्तों के साथ देती है और जब इन शर्तों का उल्लंघन होता है तो वह लासेंस वापस ले लेती है. जिन्दल की बात का कई सदस्यों ने मेजें थपथपाकर समर्थन किया.
 

थोड़ा-थोड़ा कर के मरता इलाहाबाद का एक रेडियो स्टेशन!

Puneet Kumar Malaviya : मित्रों, बड़े भारी मन से ये post लिख रहा हूँ.. ज्ञानवाणी इलाहाबाद देश का पहला सम्पूर्ण शैक्षिक FM रेडियो है… IGNOU द्‌वारा नोडल एजेंसी के रूप में देश भर में 37 रेडियो स्टेशनों का एक बड़ा नेटवर्क संचालित किया जा रहा है… FM 107.4 Mhtz पर… 07 नवम्बर 2001 को स्थापित इलाहाबाद देश का पहला केंद्र है और मैं इसका पहला उद्‌घोषक / कम्पियर… इलाहाबाद में IIIT को partner institution के रूप में चुना गया और स्थापना इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नेहरू साइंस सेंटर के एक कक्ष में हुई.

अब तक ज्ञानवाणी इलाहाबाद पर लगभग 5000 घण्टों से भी अधिक कार्यक्रम जिनमें 1500 से अधिक live फ़ोन-इन, परम्परागत विषयों, औपचारिक / अनौपचारिक शिक्षा, जन अभिरुचि, संगीत, विधि, पत्राचार एवं दूरस्थ शिक्षा, प्रौढ़ व सामाजिक सरोकारों से जुड़े सैकड़ों विषयों व पाठ्‌यक्रमों पर यहाँ से कार्यक्रम निर्मित व प्रसारित किए गए हैं… छात्र समूहों मेँ यह कार्यक्रम ख़ासे लोकप्रिय हैं जिसका पता उनके फ़ोन के ज़रिए चलता है.. पर अब इलाहाबाद वि0वि0 को IIIT इलाहाबाद ने लिखकर किराए पर लिए गये नेहरू साइंस सेंटर को 20 मार्च 2014 तक पूरी तरह खाली कर देने का वायदा किया है…

ऐसे में एक माह से भी कम समय में शहर में कोई उपयुक्त जगह ढूँढना, वहाँ नये प्रसारण योग्य स्‌टूडियो का निर्माण कर पाना टेढ़ी खीर है.. इसीलिए 8 फ़रवरी को शार्ट सर्किट से मशीनें जल जाने के बाद से 8 घण्टों की जगह केवल 4 घण्टों के दिल्ली के प्रसारण को रिले किया जा रहा है.. स्थानीय प्रसारण के लाभ से छात्र वंचित हैं… मेरा आप सबसे अनुरोध है कि अपने स्तर पर इलाहाबाद वि.वि. के अधिकारियों से निवेदन करें कि वे व्यापक छात्र हित में मात्र एक कक्ष में चल रहे ज्ञानवाणी इलाहाबाद रेडियो केंद्र यथावत चलने दें…

पुनीत कुमार मालवीय के फेसबुक वॉल से. संपर्क: missing.me.f@gmail.com

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पत्रकारों, नौकरशाहों, समाजसेवियों को मदनमोहन वर्मा सम्मान से नवाज़ा

देहरादून, 16 फरवरी। नगर निगम के प्रेक्षागृह में जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट देहरादून के तत्वाधान में, उत्तराखंड में आई आपदा के दौरान जान की बाज़ी लगाकर राहत कार्य करने वाले अनेक आईएएस, आईपीएस, राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों और समाजसेवियों को सूबे के मुख्यमंत्री हरीश रावत के हाथों स्वर्गीय मदनमोहन वर्मा सम्मान प्रदान किया गया। श्री रावत ने मध्य प्रदेश के जीतेन्द्र सोनी को यह सम्मान, इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में, खोजी पत्रकारिता में विशेष योगदान के लिए प्रदान किया। इसके अतिरिक्त आईएएसई डीम्ड विश्व-विद्यालय के चांसलर कनकमल दूगड़ को लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान तथा सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वरी पाठक और सद्भावना सेवा संस्थान के चेयरमैन अनिल सिंह को उत्कॄष्ट सम्मान से नवाजा गया। अनिल सिंह समूचे हिंदुस्तान में निशुल्क एम्बुलेंस सेवा प्रदान कर रहे है तथा उत्तराखंड में आपदा रहत के लिए उन्होंने विशेष रूप से अपनी टीम लगा रखी थी। श्री दूगड़ को जर्नलिस्ट एसोसिएशन की पहल पर उनके हारमनी प्रोजेक्ट के लिए मुख्यमंत्री के हाथों एक लाख रुपये का चेक भी प्रदान किया गया। भारतीय क्रिकेट टीम के गेंदबाज़ मोहम्मद शमी के पिता तौफ़ीक़ अहमद ने एक लाख रुपये का चेक आपदा रहत कोष के लिए मुख्यमंत्री हरीश रावत को सौपा।

उत्तराखंड में आयी भीषण आपदा के वक़्त राहत कार्य करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले स्वर्गीय अजय अरोड़ा और स्वर्गीय बुधिसिंह को भी मरणोपरांत सम्मानित किया गया। उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री तहसीन मुनव्वर को सम्मानित किया गया। श्री मुनव्वर उर्दू पत्रकारिता के इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट दोनों ही विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर माने जाते है। वे लेखक, एक्टर और गीतकार भी है। उनकी शायरी को पूरी दुनिया में सराहा जाता है। वे चार रेलमंत्रियों के सलाहकार भी रह चुके है। गढ़वाल रेंज के पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंजाल(आईपीएस ), दिलीप जावलकर(आईएएस), वीबीआरसी पुरुषोत्तम(आईएएस), देहरादून के एसपी शहर नवनीत भुल्लर, एसपी देहात मणिकांत मिश्रा, किच्छा के विधायक राजेश शुक्ल, पत्रकार रवींद्र श्रीवास्तव और हनुमंत राव, समाजसेवी लाता सिंह, गायक नरेंद्र सिंह नेगी, राजपाल बिष्ट, देवेन्द्र सिंह रावत और विक्रम सिंह को भी सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा स्वर्गीय मदनमोहन वर्मा की तस्वीर पर माल्यार्पण कर एवं दीप प्रज्जवलित कर किया। स्वर्गीय वर्मा के व्यक्तित्व का परिचय देते हुए वयोवृद्ध समाजसेवी अविनाश कुमार गुप्ता ने कहा कि बिहार के सिताबदियारा में जन्मे वर्मा जी नैनीताल की तराई के शेर थे। वह लोकनायक जयप्रकाश नारायण के पौत्र थे तथा फ़िरोज़ गांधी के अभिन्न मित्र भी थे। दोनों ने नेशनल हेराल्ड में साथ-साथ काम किया था। 1957 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ संपूर्णानंद ने गोविन्दबल्लभ पंत की सलाह पर उन्हें पत्रकारिता छोड़कर नैनीताल की तराई को आबाद करने के लिए किच्छा भेजा। स्वर्गीय वर्मा ने तराई के जंगलों में जंगली जानवरों और मच्छरों के बीच रहकर उस जंगली क्षेत्र को अपने सहयोगियों कि मदद से आबाद किया। भूमिहीनों को जमीन आवंटित कर कृषि के क्षेत्र में एक नई धारा का प्रतिपादन किया। आचार्य नरेंद्र देव के शिष्य श्री वर्मा समरस समाज के निर्माण हेतु प्रयास करते हुए महज 40 वर्ष की अवस्था में इस दुनिया को अलविदा कह गए। वह स्वतंत्रता सेनानी भी थे तथा 15 वर्ष की अल्पायु में अंग्रेजो का विरोध करने पर जंल में डाल दिए गए थे। आज़ादी के बाद उन्होंने पत्रकारिता को अपना पेशा चुना लेकिन उनकी नियति में समाजसेवा लिखी थी। मुख्यमंत्री रावत ने अपने उदबोधन में श्री वर्मा को याद करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। मंच पर मुख्यमंत्री के अतिरिक्त देहरादून के महापौर विनोद चमोली, किच्छा के विधायक राजेश शुक्ला, स्वर्गीय वर्मा के पुत्र रविकांत वर्मा, टीम इंडिया के क्रिकेटर मोहम्मद शमी के पिता तौफ़ीक़ अहमद, जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल गम्भीर, मुख्य संयोजक अखिलेश व्यास, संस्थापक एवं पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के प्रबंध निदेशक राकेश भाटी और कार्यक्रम अध्यक्ष राष्ट्रीय सहारा के संपादक दिलीप चौबे उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान प्रेक्षागृह नौकरशाहों, समाजसेवियों और पत्रकारों से खचाखच भरा हुआ था। कार्यक्रम का संचालन डॉ सुरेन्द्र पाठक ने किया।

 

कुबूल अहमद की रिपोर्ट। संपर्कः kuboolmedia@gmail.com

औरंगाबाद प्रशासन से नाराज़ पत्रकारों ने जिला सूचना अधिकारी के विदाई समारोह का बहिष्कार किया

औरंगाबाद के पत्रकारों ने आज सिन्हा सोशल क्लब में बैठक की। बैठक के माध्यम से पत्रकारों ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए  कहा कि जिला प्रशासन मीडिया का दुरूपयोग न करे। बैठक की अध्यक्षता कर रहे नव बिहार के सम्पादक और यूएनआई एवं आकाशवाणी के संवाददाता कमल किशोर ने कहा कि जिला प्रशासन सिर्फ अपने फायदे के लिए पत्रकारो का इस्तेमाल करता है। जिला प्रशासन सरकार की नजरों में बने रहने के लिए मीडिया द्वारा सिर्फ उतनी ही खबरों को प्रसारित करवाता है जिससे उसकी स्थिति मजबूत बनी रहे। प्रशासन जिले के विभिन्न विभागों की अद्यतन रिपोर्ट पत्रकारों को मुहैया नहीं कराता है। इसके लिए संघ के द्वारा जिलाधिकारी को एक आवेदन भी दिया गया था, परन्तु जिलाधिकारी ने उस पर कोई कार्यवाही नहीं की। बैठक के माध्यम से जिलाधिकारी की इन गतिविधियों का पूरा लेखा-जोखा सरकार तक भेजने का निर्णय लिया गया। साथ ही यह आह्वान किया गया कि खबरें प्रकाशित तो होंगी परन्तु उसमे न तो जिलाधिकारी एवं अन्य अधिकारियो की तस्वीरें होंगी और न ही उनके नाम।

संगठन की मजबूती के लिए सदस्यता अभियान चलाने पर जोर दिया गया और इसके लिए पूरे प्रखंड के पत्रकारों को जोड़ने के लिए एक कमेटी बनाई गई है। आगामी 10 मार्च तक सारे पत्रकारों को संघ का सदस्य बनाने का निर्णय लिया गया है। इस संगठन से जुड़ने वाले सभी पत्रकारों को एक परिचय पत्र उपलब्ध कराया जाएगा और उनके अधिकारो के लिए जहाँ तक हो सके लड़ाइयाँ लड़ी जाएंगी। जो पत्रकार इस संगठन से अलग रहेगा उसके बारे में कभी कोई विचार नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही वैसे पत्रकार जो पत्रकारिता की मर्यादा को कलंकित कर रहे है उसके विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए प्रमाण के साथ उनके ब्यूरो प्रमुख एवं संपादक को अवगत कराया जाएगा। इतना ही नहीं किसी भी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति का बहिष्कार किया जाएगा।

संगठन का मुख्य उद्देश्य पीत पत्रकारिता को रोकना एवं इसके गिरते हुए स्तर को सुधारना है। समय-समय पर देश के नामी-गिरामी पत्रकारों के द्वारा पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओ एवं उससे जुडी बारीकियो के लिए सेमीनार का आयोजन कर इस क्षेत्र में उन्नति के मार्ग प्रशस्त किये जायेंगे। आज बैठक में शामिल सारे पत्रकारों ने जिला सूचना एवं जन संपर्क अधिकारी के विदाई समारोह का बहिष्कार किया। बैठक में शामिल पत्रकारो में वरिष्ठ पत्रकार रवि सिंह, प्रभात खबर के ब्यूरो गोपाल सिंह, दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख सनोज पाण्डेय, राष्ट्रीय सहारा के ब्यूरो प्रमुख गणेश प्रसाद, इंडिया टीवी से किशोर प्रियदर्शी, आज तक से अविनेश कुमार, इंडिया न्यूज़ से धीरज पाण्डेय, पी7 से आकाश कुमार, सहारा समय से संतोष कुमार, साधना न्यूज़ से वेद प्रकाश रॉय, लाइव इंडिया से अमित कुमार, ज़ी पुरवैया से मनीष कुमार सहित कई अन्य पत्रकार शामिल थे।  

धीरज पाण्डेय
औरंगाबाद(बिहार)
मो. 9931075733, 9122937999

​केजरीवाल बोले, मीडिया वालों थोड़ी शर्म करो

: चुनावी रैली में मीडिया पर निकाली खूब भड़ास : अंबानी के बहाने मीडिया रहा निशाने पर : सिर्फ टाइम्स आफ इंडिया को सराहा : रोहतक, 23 फरवरी। अरविंद केजरीवाल को अब मीडिया अपना सबसे बड़ा दुश्मन दिखता है। इसलिए उन्हें जब भी मौका मिलता है तो वे शुरू हो जाते हैं मीडिया के खिलाफ बड़बड़ाना। आज भी उन्हें वह मौका मिल गया। दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद केजरीवाल पहली बार अपनी चुनावी रैली को संबोधित करने हरियाणा पहुंचे। रविवार को वे हरियाणा की राजनीतिक राजधानी कहे जाने वाले रोहतक में थे। उन्होंने लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की हुड्डा के गढ़ से शुरूआत की। पर यहां केजरीवाल ने राजनीति से ज्यादा मीडिया को कोसने में ज्यादा समय अपना व्यतीत किया।

केजरीवाल ने मुकेश अंबानी के बहाने मीडिया पर खूब भड़ास निकाली। उनका भाषण ज्यादातर अंबानी पर ही केंद्रित रहा। अब अंबानी का जिक्र हो और मीडिया की बात न हो, ऐसा हो नहीं सकता। आजकल हालत यह है कि हर दूसरे-तीसरे मीडिया घराने में अंबानी की हिस्सेदारी है। केजरीवाल एक बार शुरू हुए तो फिर थमे ही नहीं। एक बार तो ऐसा लगा कि जैसे उन्हें दौरा पड़ा हो। बाकी सब भूल वे कभी अंबानी और फिर मीडिया, फिर अंबानी और कभी मीडिया को ही कोसते रहे। पर एक बात और बता दूं, वो ये कि केजरीवाल ने सिर्फ टाइम्स आफ इंडिया यानि टीओआई की तारीफों के ही पुल बांधे। बांधे भी क्यों न, इसी अंग्रेजी अखबार ने जो एक सर्वेक्षण आम आदमी पार्टी के पक्ष में दिखाया था। इसलिए मिस्टर केजरीवाल ने बाकी सबको नहीं बख्शा। पर वे यह भूल गए कि चाहे अन्ना आंदोलन हो या फिर दिल्ली में उनका मुख्यमंत्रित्वकाल, उन्हें जो प्रचार मिला, वह शायद ही किसी को मिला हो और वह भी इसी मीडिया की बदौलत था, जिसे वह पानी पी पी कर कोस रहे हैं।  

अरविंद केजरीवाल मंच पर पहुंचे तो पहले तो इधर-उधर की बातें की लेकिन कुछ ही मिनट बाद सीधे प्वाइंट पर आ गए। बात मुकेश अंबानी से शुरू की और खत्म भी उन्हीं पर हुई। बोले अंबानी की एक जेब में कांग्रेस और दूसरी में भाजपा। दो मुखौटे हैं राहुल और मोदी। इसके बाद तो ताबड़तोड़ मीडिया पर हमला बोलना शुरू कर दिया। जो एक बार शुरू हुए तो फिर रूकने का नाम ही नहीं लिया। वे बोले कि अंबानी ने कई टीवी चैनल्स और अखबार खरीद लिए हैं। कई मीडिया संस्थानों को पैसे दिए हैं, वो इसलिए कि आने वाले तीन माह में जब लोकसभा चुनाव होने हैं, केजरीवाल को बदनाम करो। आगे उन्होंने दिल्ली के अंग्रेजी अखबार का हवाला दिया कि इस अखबार के मालिक के तो खुद गैस के कुंए हैं। फिर बोले मीडियो को भी ठीक करना पड़ेगा। अपनी रैली में मौजूद कार्यकर्ताओं से बोले कि फोन उठाकर मीडिया संस्थान के पास फोन करना कि आप लोग देश के साथ गद्दारी कर रहे हो।

अब बात सर्वेक्षण की केजरीवाल ने की। कहा कि टीवी चैनल्स आजकल सर्वे दिखा रहे हैं कि मोदी की 230 सीट आएंगी, जब चुनाव आएगा तो दिखाएंगे कि 272 का आंकड़ा छू लिया। लेकिन जब दिल्ली में विधानसभा का चुनाव हुआ था तब सभी मीडिया संस्थानों ने कहा था कि तीन या चार सीट ही आएंगी, पर आई 28। ये मीडिया संस्थान पैसे खाकर सर्वे दिखाते हैं। खुद का उदाहरण देकर केजरीवाल बोले कि मेरे से पूछते हैं कि कितने बेडरूम के फ्लैट में रहेंगे, पर क्या कभी मोदी और राहुल से पूछा है यह।

अब बात जब खुद के पक्ष में सर्वेक्षण की आई तो केजरीवाल ने टाइम्स आफ इंडिया का उदाहरण दिया। इस सर्वेक्षण में बताया गया था कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार रहते हुए भ्रष्टाचार में कमी आई। इस सर्वे पर खुशी जताते हुए दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि मीडिया वाले कहते हैं सरकार चलानी नहीं आती, अरे दिल्ली की जनता खुश है तो फिर उन्हें क्या दिक्कत है। मीडिया वालों थोड़ी शर्म करो। और इसी के साथ केजरी का मीडिया को कोसने का सिलसिला खत्म हुआ। अपने भाषण का समापन उन्होंने हरियाणा में अपने आगामी चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ किया।

रोहतक से पत्रकार दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क: 09991680040, khokhar1976@gmail.com

मैनेजमैंट गुरू का मिस-मैनेजमैंटः प्लैनमैन मीडिया नहीं दे रहा अपने एम्प्लॉई की सैलेरी

मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी अन्यथा कारणों से हमेशा सुर्खियां में रहते हैं। ताज़ा मामला उनके प्लैनमैन मीडिया प्रा. लि. के एक कर्मचारी शशि रंजन का है। प्लैनमैन मीडिया 'द सन्डे इंडियन' नाम की मैगज़ीन निकालता है। शशि इसके सब्सक्रिप्शन विभाग में वर्ष 2010 से काम कर रहे हैं। उनका कहना है के प्लैनमैन मीडिया द्वारा वर्ष 2013 में उनकी सैलरी नियमित रूप से नहीं दी गयी। वर्तमान में उनकी सैलरी का काफी पैसा कंपनी ने बिना वजह रोक रखा है। बिना पैसों के वे आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहे हैं।

शशि को जनवरी, फरवरी और मार्च 2013 की सैलरी 7 पोस्ट-डेटेड चेक्स के माध्यम से दी गयी थी। जबकि उनकी सैलरी हर माह एक मुश्त मिलनी चाहिए थी। इसके बाद तो हद ही हो गयी। अप्रैल, मई और जून कि सैलरी उन्हें क्रमशः 9 जुलाई, 10 अक्टूबर और 5 नवम्बर को मिली। इसके बाद से उन्हें कोई सैलरी नहीं दी गयी।

अक्टूबर 2013 में शशि ने अपने एचओडी मि. गुरुदास मालिक ठाकुर और एचआर हेड मिज़ मृदु सिंह झाला और ग्रुप एडिटर मि. ए संदीप को अपनी लंबित सैलरी के विषय में मेल किया और पूछा के जब उन्हें सैलरी नहीं मिल रही है तो वो लगातार ऑफिस क्यों व कैसे आयें। इस दौरान शशि गुरुदास मालिक और मृदु सिंह से मिलते रहे। कुछ समय बाद दोनों ने शशि से कहा कि उनकी सैलरी रिलीज़ कर दी गयी है और वो काम पर आ सकते हैं।

शशि का कहना है कि उन्हें जो भी काम दिया गया वो उन्होंने पूरा किया। लेकिन नवंबर महीने में गुरुदास मालिक और मृदु द्वारा उनसे कहा गया के उनके पास सैलरी रिलीज़ करने के अधिकार नहीं हैं। उन्होंने शशि को अकाउंट विभाग से संपर्क करने को कहा। इसके बाद से शशि लगातार 11 फरवरी 2014 तक अकाउंट विभाग से संपर्क करते रहे लेकिन फण्ड न होने कि बात कह कर उन्हें टरकाया जाता रहा। इतना सब होने के बाद अकाउंट विभाग ने उन्हें फिर से गुरुदास मालिक, मृदु सिंह और ए संदीप से संपर्क करने को कहा।

प्लैनमैन मीडिया के अधिकारीयों और विभागों के चक्कर लगाते-लगाते शशि परेशान हो गए हैं। आज उनके पास इतने भी पैसे नहीं हैं के वो सैलरी की लड़ाई लड़ने के लिए प्लैनमैन मीडिया के और चक्कर लगा सकें।  घर का खर्च भी जैसे-तैसे चल रहा है। शशि ने हिम्मत नहीं हारी है, वे सबसे पूछ रहे हैं के उन्हें अपनी मेहनत का पैसा प्लैनमैन मीडिया से निकलवाने के लिए क्या करना चाहिए।

शशि रंजन द्वारा भेजा गया ईमेल 

Dear All,
              I
am a employee of Planman Media Pvt Ltd. I am working here since July'2010 as subscription executive.  He paid my 3 three month salaries (Jan'13, Feb'13 and March'13) as 7 post dated cheques. After  that  they paid my Apr'13 month's salary on 9th July'13, May'13 month's salary on 10th Oct'13 and  Jun'13 month's salary on 05th Nov'13. After that they are not paying any salaries. In the month of Oct'13 I mailed to our HOD (Mr. Gurudas Malik Thakur) and HR. HEAD (Ms. Mridu Singh Jhala) and  Group Editor (A Sandeep) for my pending salaries and please suggest how I come to the office on regular basis and I regular follow up personally  with Gurudas malik thakur and mridu. First they assured to me salary has been released on regular basis and come to office for work. Whenever they called me I have completed my duties. But in the month of Nov '13 they said to me that they don't have any power regarding releasing of salary. Please follow up with account department. After that I follow up with account department by phone till 11 th feb'14 but every time they give me excuse  fund is not available in accounts and as soon funds will be available we will release your salary  and on 11th feb'14 he said please follow up with your Head Gurudas Malik Thakur and Mr.  A Sandeep.  Now I do not understand what I should do. I have no money for spending for recovery with Planman Media Pvt. Ltd. Please suggest what I should to do in this situation. Kindly suggest what I should have to do for my Hard earn money.

Please contact at my mob : 8802420591 or reply on shashi.181481@gmail.com for suggestion and help.
 
Regards

Shashi Ranjan
Subscription Department
Planman Media Pvt. Ltd

प्रगति ग्रुप बिल्डर की मनमानी, सुनिए मेरठ के इन बंसलजी की राम कहानी

Sir, This is to inform you that in may 2010 i book a flat in noida extension devika gold homz project.but after loan approval insted of accepting payment builder have cancel my flat without any reason sir builder have deducted 1.20 lakh from my principal amount although builder is earning 15 lakh on every cancellation.

if i could not get the home i never build my own home in my life and i am residing on rent. kindly look into the matter very seriousely.

thanks
regards
vinay bansal
vinay_bansal59@rediffmail.com


From: vinay_bansal59@rediffmail.com
Sent: Mon, 09 Sep 2013 22:19:24 +0530
To: archana.udupa@pragatigroup.in, anil.sharma@pragatigroup.in, info@pragatigroup.in, arjun.chauhan@finlace.com
Subject: regarding issue noc to bank for loan rembursement

To
MD
Pragati Group
Sir
This is to inform you that,I have booked my flat for my own residential purpose a three years back because i don't have even parental house also and i am living in rented house.presently i am running out of liquidity because just two month back i lost my job in zuventus i have spent my all savings in these two month.a few days ago i joined another compnay Delcure Life sciences.

Sir this has came to your knowledge that initially i booked my flat in 15.00 lac. Rs.At the time of agreement flat cost exceeds from 15.0 lac to 18 lac. which was not in my limit but i have accepted that.

Sir in the month of Feb-12 when Noida extension was blocked completely i have trust on you . And i have taken personnel loan for making payment of 2.10 lac.Because i was confident that time you would deliver me own house.

Now my home loan is approved and i am seeing towards you with high hope .you will fullfill my dream of getting my own house. Sir kindly understand my situation, i am running out of liquidity,Kindly give me rebate from the imposed intrest.if any type of concession is not possible from your side .then kindly save my house my loan is approved and add the required amount int basic cost.or if possible in 6 month or at the time of possession i will pay you in cash. Three year before when nothing was there i have seen a dream of my house with you.Do not break it.

Thanks
Regards

VINAY BANSAL

6, JUBLEE GANJ

MEERUT CANTT.

M-8171161300


MADAM/SIR,

I HAVE ALREADY INTIMATE YOU ,MY LOAN IS APPROVED IN THE MONTH OF JULY ONLY NOC IS REQUIRED FROM YOUR SIDE TO RELASE THE PAYMENT FROM BANK.

YOU ARE REQUESTED KINDLY RELASE NOC AS SOON AS POSSIBLE.
THANKS

REGARDS
VINAY BANSAL


Sir, On Monday i visited to the devika corporate office and met with Mr Krishna,i request him to release NOC for loan reimbursement as soon as possible and they should make a demand from bank because my loan is already approved.
thanks
Regards
Vinay Bansal


SIR/MADAM, This is to inform you on may2010 i book my flat that time broker have assured me if i would book my flat i need not to pay any amount in 2 years because builder will not commenced construction before that period that time my flat costs apex 15 lac Rs.

In Feb 2011 builder have singed allotment latter with me,and flat cost exceeds to apex 18 lac according to that latter one have fails to pay down payment plan of flexi plan in that condition construction linked plan will be applicable.

In 24 Oct 2011 due to farmars agitation all construction work was stopped there. in nov2011 compnay have sent me a demand latter with zero intrest. In 15 Nov.2011 compnay have issued a emotional appeal to pay 10% more,in that time i have paid 2.5 lac rs to the company.

rest of the payment would be paid by home loan but that time project was not approved. In march 2013 i have received demand latter with 2.83 lac intrest and finally 15 July i have received a cancellation latter.

Sir this is to inform you before three years i have seen a dream of my own house with devika that time supertach was offering 2bhk in 7 lac at meerut now everybody get the possession and that flat costs 40 lac.

Sir i have been associated with you for a long time even i have also suffer a lot.a buyer and builder relationship should be genuine because builder fulfils our desire of our dream house.that relationship should be long lasting. Sir i request u kindly provide noc to my bank (although my loan is already approved) so that i can pay my demanded amount.

thanks
regards
vinay bansal

सुप्रीम कोर्ट को सुब्रत राय पर पहले ही सख्ती दिखानी चाहिए थी

भारत की न्याय व्यवस्था के बारे में मशहूर है कि वह 100 गुनहगारों को छोड़ सकती है किन्तु एक निर्दोष को गुनहगार साबित नहीं करना चाहती। चाहे संजय दत्त मामला हो या राजीव गांधी या फिर सहारा सुप्रीमो सुब्रत राय का। हालांकि सारे मामले अलग है और एक दूसरे से उनकी तुलना नहीं की जानी चाहिए किन्तु न्याय व्यवस्था का मसला है, इसलिए ऐसा आंकलन किया जाना यथोचित लगता है।

तमाम रास्ते अपना कर जनता के धन के दुरूपयोग मामले में अब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने सहारा के विरुद्ध सही रास्ता अख्तियार किया है। ये तो अदालत पहले ही कह चुकी थी कि सुब्रत राय के काम तो जेल जाने लायक है लेकिन जनता का फंसा हुआ पैसा निकलवाने के लिए उनके साथ नरमी बरती जा रही है। जनता के पैसे के दम पर इतरा रहे सुब्रत राय ने अदालत की इस नर्मी का गलत मतलब लगाया और हठधर्मिता पर अड़े रहे। अब जाकर कोर्ट ने सेबी से कह दिया है कि सहारा की सम्पत्तियां बेच कर अगर 20000 करोड़ रूपये में से जो भी धन वसूला जा सकता है उसको वसूल कर जनता को लौटाया जाए।

देखा जाए तो अगर सहारा के विरुद्ध इस तरह की कार्यवाही हो गई तो फिर ऐसी ही गतिविधियों में लगी कम्पनियों की कारगुजारियों पर भी लगाम लग सकती है। ऐसी कंपनियां जो रियल स्टेट से लेकर पशुपालन और कृषि, आलू और मसाले जैसे कितने ही ऊलजुलूल कामों में जनता का पैसा लगवा कर उसे 5-6 साल में दुगुना करके लौटाने का झांसा जनता को देतीं हैं और उसकी गाढ़ी कमाई को हजम करने की जुगत में लगी रहती हैं।

बताते चलें कि जस्टिस केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने सेबी को कहा कि वह निवेशकों के पैसे की वसूली के लिए सहारा की प्रॉपर्टी क्यों नहीं बेच देती। सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को सहारा पर भरोसा नहीं करने की हिदायत देते हुए आदेश को लागू करने का निर्देश दिया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना के मामले में सहारा प्रमुख सुब्रत राय और तीन निदेशकों के खिलाफ समन जारी कर 26 फरवरी को अदालत में पेश होने के आदेश दिया है।

 

लेखक हरिमोहन विश्वकर्मा से vishwakarmaharimohan@gmail.com  के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है।

Resolution in favour of the Civil and Democratic rights of North-East People

: Resolution adopted by All India Peoples Front at Jantar-Mantar, on Feb 15, 2014 during AIPF National Convenor  Akhilendra Pratap Singh`s 10-day long fast for Rule of Law, Justice as well as Safety and security of the people and other pro-people issues : We strongly condemn yesterday`s brutal lathicharge on the north-east youth demanding justice against racist assaults in National Capital. We are  extremely shocked  to witness that fatal racist assaults on the life and dignity of  our north-east compatriots, brothers and  sisters continue unabated.

We condemn in the strongest possible  terms at our command, the  insensitivity and abject failure of the government in fulfilling its constitutional responsibility to defend its citizens, the people from north-east residing in the national capital. In this regard we welcome Delhi High Court verdict on Arunanchal  Pradesh resident  Nido Tania`s murder and frequent attacks on north-east people in Delhi instructing the government to take every necessary step to protect them.

We express our fullest solidarity with your struggle for justice and convey our heart-felt condolences to the bereaved family of Nido Tania in this hour of grief. We firmly believe that every Indian, be it from Hindi-Urdu speaking area, from south, central, north-east or Kashmir, he/she has every right to live with dignity. Any act or administrative action which is against this Fundamental right in the Constitution, is undemocratic. The attacks on north-east people in Delhi are extremely painful and in order to stop them, it is necessary that in north-east, too, citizen`s rights and dignity is respected and restored. It is noteworthy that violation of the democratic rights and brutal repression has continued unabated in entire north-east including Manipur and Nagaland. It is for the democratic rights of the people that Erom Sharmila  is sitting on fast for the last 12 years.

By the so-called democratic governments, be they in centre or states, the inhuman treatment towards them continues. It is shameful in a civilized society. We urge the central government that if it is really serious in creating consciousness for the protection of life and dignity of north-east people living in Delhi, including those from Manipur, Arunanchal and Nagaland, then it must restore the democratic rights of the north-east people, stop the atrocities by military and paramilitary forces on the civilian population in the entire north-east region under black laws and take initiative for respectful termination of Erom Sharmila`s fast.

Dear Brothers and Sisters of North-East, We want to assure you that in your battle for dignity, justice and equality against racism as well as civil and democratic rights against state repression, you are not alone. We firmly stand with you in this moment of grief and crisis. And fighting together, shoulder to shoulder, we will ultimately be able to make India a really democratic and inclusive society and nation where every Indian will be able to live with dignity and equal rights irrespective of race, religion, caste or creed.

Let the peoples power be victorious!

Long live North-East  People`s battle for Dignity, Democracy and  Development!!

PR

न्यूज नेशन का यूपी-उत्तराखंड रीजनल न्यूज चैनल लांच

रंजीत कुमार के नेतृत्व में न्यूज नेशनल चैनल का रीजनल न्यूज चैनल 'एनएन यूपी-उत्तराखंड' 19 फरवरी को शाम साढ़े पांच बजे लांच हो गया. एनएन यूपी उत्तराखंड के साथ ही यूपी उत्तराखंड के क्षितिज पर एक और नए चैनल का अवतरण हो गया. न्यूज़ नेशन के इस रीजनल चैनल की तैयारियां काफी समय से चल रही थी.

चैनल हेड रंजीत कुमार ने बताया कि चैनल को बिना बिना टेस्ट सिग्नल पर ले जाये सीधा ही ऑन एयर कर दिया गया है. यह चैनल चैंनलो की भीड़ से हटकर होगा. राज्य के कोने-कोने से लाइव कवरेज के साथ यह लोगों से सीधा जुड़ेगा और जनता की हर छोटी-बड़ी आवाज को उठाएगा. चैनल का कलेवर और फ्लेवर जनता से सीधे जुड़ने वाला है. बुधवार को काउंटडाउन के साथ ही शाम साढ़े पांच बजे चैनल की धमाकेदार लांचिंग की गई. लांचिंग शो की एंकरिंग अजय शर्मा द्वारा की गई.
 

तीन चैनलों शगुन टीवी, वरदान टीवी, सीएनईबी उर्फ हमरा एम टीवी का शटर गिरा

चैनल आते तो हैं धूम धड़ाके और हल्ला-गुल्ला के साथ लेकिन जाते हैं बेहद चुपचाप. कुल तीन चैनलों के बंद होने या बिकने के लिए तैयार पड़े होने की सूचनाएं मिली हैं. पहला है शगुन टीवी. शादी बियाह के इस चैनल के कर्ताधर्ता अनुरंजन झा हुआ करते हैं. बताया जा रहा है कि यह चैनल नहीं चला और बंद हो गया है. ये वही अनुरंजन झा हैं जिन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए सुपारी पत्रकारिता के तहत जोड़तोड़ वाला स्टिंग किया था. देखना है कि झा साहब का अब आगे का क्या प्रोग्राम है.

दूसरा चैनल वरदान टीवी है. इस आध्यात्मिक चैनल को आचार्य रामगोपाल शुक्ला ने लांच कराया था. चैनल में पैसा कई लोगों ने लगाया और इसका फेस शुक्ला जी को बनाया गया. चैनल ने शुरुआत में अच्छा प्रदर्शन किया. पर धीरे धीरे चैनल में आंतरिक कलह शुरू होने लगा और चैनल घाटे में चला गया. इसके बाद इसे बंद करना पड़ा. इस चैनल का सेटअप बिकने के लिए तैयार है.

तीसरा चैनल है सीएनईबी. सीएनईबी न्यूज चैनल का नाम बदलकर इसे 'हमरा एम' नामक भोजपुरी म्यूजिक चैनल में तब्दील कर दिया गया था. यह म्यूजिक चैनल चला भी. लेकिन ताजी सूचना के मुताबिक इसके संचालक चिटफंड के अपने कारोबार में इस कदर फंस गए हैं और कई विवादों से घिर गए हैं कि वे चैनल चलाने जैसे काम से तौबा करना चाहते हैं. सो कई महीने से चैनल का संचालन ठप पड़ा है और इस चैनल का सेटअप भी बिकने को तैयार है.

अगर उपरोक्त सूचनाओं में कोई कमी बेसी लगे तो भड़ास को बताएं. भड़ास तक अपनी बात, सुख-दुख, सूचना, सीक्रेट, रिएक्शन शेयर करने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

आशीष मिश्रा साधना न्यूज में मैनेजिंग एडिटर बने, प्रखर मिश्रा भी जुड़े

खबर है कि कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके पत्रकार आशीष मिश्रा साधना न्यूज में मैनेजिंग एडिटर बन गए हैं. आशीष अभी हाल फिलहाल तक जिया न्यूज में कार्यरत थे. उसके पहले वे न्यूज एक्सप्रेस और वायस आफ इंडिया चैनलों में थे. वे नवभारत टाइम्स अखबार में लंबे समय तक रहे हैं. साधना न्यूज में काफी दिनों से मैनेजिंग एडिटर का पद खाली था.

इस चैनल की कुख्याति के कारण यहां कोई ठीकठाक पत्रकार ज्वाइन नहीं करना चाहता. साधना न्यूज का प्रबंधन का पूरा ध्यान रेवेन्यू पर रहता है, और इस काम में पूरी एडिटोरियल टीम को झोंक दिया जाता है. इस वजह से पत्रकार न तो पत्रकारिता कर पाते हैं और न ही बिजनेस. यही कारण है कि साधना न्यूज में वरिष्ठ पत्रकारों के लिए आयाराम गयाराम की स्थिति रहती है. कुछ ही वक्त में साधना न्यूज में एनके सिंह, एसएन विनोद, अंशुमान त्रिपाठी आदि आए और गए. अब आशीष मिश्रा ने कमान संभाली है. ऐसा माना जा रहा है कि साधना न्यूज मैनेजमेंट लोकसभा चुनाव को सामने देखते हुए कुछ साखदार पत्रकारों को जोड़ने की कवायद कर रहा है ताकि नेताओं व राजनीति को ठीक से साधकर पर्याप्त इलेक्टोरल बिजनेस किया जा सके. साधना न्यूज के साथ प्रखर मिश्रा भी जुड़ गए हैं. बताया जा रहा है कि वे सीनियर पोलिटिकल एडिटर बनाए गए हैं.

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इंदौर में मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी समेत पांच पर चेक बाउंस का केस

इंदौर से खबर है कि यहां की जिला कोर्ट ने मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी समेत पांच के खिलाफ चेक बाउंस का केस दर्ज करने का आदेश दिया है. मामला इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग एंड मैनेजमेंट (आईआईपीएम) की विजिटिंग फैकल्टी को भुगतान का है. अरिंदम चौधरी समेत पांचों आरोपी आईआईपीएम में डायरेक्टर हैं. ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट आशुतोष शुक्ल ने यह आदेश मोनिका भाटिया की शिकायत पर दिया है.

मोनिका ने आईआईपीएम, इसके डायरेक्टर अरिंदम और मलय चौधरी, सेंटर फॉर वोकेशनल एंड एंटरप्रेन्योरशिप स्टडीज नई दिल्ली, इसके डायरेक्टर प्रसून शंकर मजूमदार, रजत थरेजा व दीपक कुमार झा को पक्षकार बनाया है. मोनिका ने चेक बाउंस का केस पेश करते हुए शिकायत किया था कि वह आईआईपीएम इंदौर में विजिटिंग फैकल्टी थी. संस्थान ने सितंबर 2013 से जनवरी 2014 के बीच 2750 रुपए के तीन चेक (कुल लगभग आठ हजार रुपए) दिए थे. लेकिन पर्याघ्त राशि नहीं होने की वजह से चेक बाउंस हो गए. कोर्ट ने निगोशिएबल इस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत केस कायम करते हुए आरोपियों को 23 अप्रैल 2014 को अदालत में सुनवाई के लिए हाजिर होने के आदेश दिए.

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छत्तीसगढ़ सरकार का विज्ञापन और 24*7*365 के मायने

Suresh Kumar Bijarniya : छत्तीसगढ सरकार का एक विज्ञापन आजकल मीडिया में छाया हुआ है। छत्तीसगढ का गुणगान किया जा रहा है। दरअसल मुद्दा ये नहीं है कि विज्ञापन सही है या गलत। मुद्दा ये है कि  विज्ञापन के एक हिस्से में बतलाया गया है कि छतीसगढ़ में बिजली आपूर्ति सारे वक़्त (Round The Clock) रहती है (24*7*365 electricity supply – as told in advt) अब 24*7 का मतलब तो ये होता है कि पूरे हफ्ते हर वक़्त (Round The Clock) बिजली रहती है।

24*7*365 का मतलब शायद कहीं ये तो नहीं हो सकता कि 24 घंटे सातों दिन और 365 सप्ताह। शायद नहीं।  अगर 24*365 होता तो सही रहता। हो सकता है कि मुझे समझ थोड़ा कम आया हो। कोई मुझे 24*7*365 का मतलब समझा सकता है क्या?

सुरेश कुमार बिजारनियां

twitter.com/S_K_Bijarniya

Assistant Professor,

Department of Electrical Engineering,

Jaipur National University

Jaipur

Rajasthan

+91-9509274442


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तहसीन मुनव्वर को उर्दू पत्रकारिता में योगदान के लिए एवार्ड

उर्दू पत्रकारिता में विशेष योगदान के लिए तहसीन मुनव्वर को स्वर्गीय मदन मोहन वर्मा मेमोरियल एवार्ड 2014 प्रदान किया गया. यह एवार्ड उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने हाथों प्रदान किया. कार्यक्रम का आयोजन जर्नलिस्ट एसोसिएशन आफ इलेक्ट्रानिक एंड प्रिंट उत्तराखंड संगठन की तरफ से 16 फरवरी को देहरादून में किया गया.

तहसीन मुनव्वर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं और वे उर्द पत्रकारिता के साथ-साथ समान भाव से हिंदी पत्रकारिता में भी सक्रिय रहते हैं. तहसीन मुनव्वर कई हिंदी, उर्दू अखबारों व पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते हैं. साथ ही साथ रंगमंच से जुड़कर अभिनय और पटकथा लेखन का भी कार्य अंजाम देते हैं.


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फिरोजाबाद में हिंदुस्तान के मीडियाकर्मी अमित उपाध्याय पर जानलेवा हमला

फिरोजाबाद जनपद के हिंदुस्तान के जिला प्रतिनिधि अमित उपाध्याय पर कुछ दबंगों ने हमला कर घायल कर दिया. इस दौरान पास खड़ी पुलिस मूकदर्शक बनकर पूरी घटना को देखती रही. अमित दोपहर को स्टेट बैंक की मुख्य शाखा में हिन्दुस्तान का पैसा जमा करने जा रहे थे. वहीं बैंक के पास ही खड़े तीन दबंगों ने इनको पकड़ लिया और जम कर पिटाई कर दी. इनके पास से पैसे और सामान भी छीन लिया.

घायल अमित को अस्पाताल ने जाया गया. आक्रोशित मीडियाकर्मियों ने थाना उत्तर का घिराव किया. पुलिस ने एक अपराधी को गिरफ़्तार कर लिया है. लापरवाही बरतने पर दो सिपाहियों को निलंबित और छह को लाइन हाजिर कर दिया गया है. मीडियाकर्मियों ने बाकी आरोपियों की भी गिरफ्तारी की मांग की है. सभी आरोपी यादव समाज से हैं और यूपी सरकार के नेताओं से इनको संरक्षण मिल रहा है.

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बेहतरीन है ‘HIGHWAY’, ये मूवी नहीं देखी तो क्या देखी!

Tara Shanker : इतनी बेहतरीन मूवी बनाने के लिए एक दिली सलाम बनता है आपको इम्तियाज़ अली! अपने ही घर में किसी लड़की को क्यूँ घुटन हो सकती है? क्यूँ चाहिए उसे बेख़ौफ़ आज़ादी? प्रकृति के पास जाकर क्यूँ किसी को सबसे अधिक सुकून मिलता है? क्यों कोई वीरा अपने घर में इतना घुटन महसूस करती है कि अपने किडनैप होने को भी वो आज़ादी के मानिंद देखती है?

इन सब सवालों के जवाब के लिए HIGHWAY ज़रूर देखें! ज़रूर देखें इसलिए कि समाज में तह तक पसरी चाइल्ड अब्यूज की समस्या को इससे बेहतर पेश करना बहुत मुश्किल है! इम्तियाज़ को इस बात के लिए भी सलाम बनता है कि जिस वीरा के इर्द-गिर्द पूरी मूवी बुनी गयी है उस किरदार के लिए आलिया भट्ट जैसी नयी एक्टर को लेकर किरदार के साथ बाकायदा न्याय करने की हिम्मत दिखाई है! मूवी का अंत जितना बेजोड़ हो सकता है, उतना है! एक भी सीन ऐसा नहीं जो अपनी जगह दुरुस्त न हो! सिनेमेटोग्राफी उम्दा है….संगीत प्रिय है! रणदीप हुडा कम से कम बोलकर अधिक से अधिक प्रभावित कर गए! आलिया की बिना मेकअप बेहतरीन अदाकारी! पांच में से पांचो स्टार! मतलब ये मूवी नहीं देखी तो क्या देखी!

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Abhishek Srivastava : देख आइए मित्रों Highway … खूबसूरत फिल्‍म है। पैसा वसूल। Highway का सबसे बढि़या और सटीक रिव्‍यू… http://www.rediff.com/movies/review/review-an-extraordinary-alia-on-a-dream-highway/20140221.htm

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Mohammad Anas : फिल्म Highway को नहीं देखा तो क्या देखा!

जेएनयू के शोध छात्र तारा शंकर, पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.
 

न्यूज एक्सप्रेस पर होने वाला है बड़ा खुलासा ‘OPERATION PRIME MINISTER’

न्यूज एक्सप्रेस चैनल पर जल्द ही एक बड़ा खुलासा होने वाला है. OPERATION PRIME MINISTER नाम से. इस आपरेशन के लिए सात रिपोर्टर लगाए गए हैं जिनमें दो महिला रिपोर्टर हैं. न्यूज एक्सप्रेस का दावा है कि यह दशक सबसे बड़ा खुलासा होगा. इसका प्रसारण जल्द ही न्यूज एक्सप्रेस चैनल पर होगा. इस आपरेशन से संबंधित प्रोमो चैनल ने लांच कर दिया है.

इसी के साथ विनोद कापड़ी के नेतृत्व में न्यूज एक्सप्रेस चैनल नए अवतार में सामने आएगा. एक तरह से चैनल की री-लांचिंग की जाएगी. न्यूज एक्सप्रेस को केबल नेटवर्क्स के अलावा TATA sky 471, Dish tv 561, Videocon 310 पर भी देखा जा सकता है. इस आपरेशन से संबंधित चैनल का प्रोमो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

http://www.youtube.com/watch?v=Ba8ikXv6Os4

एटा से प्रकाशित लघु पत्रिका ‘चौपाल’ का लोकार्पण

दिल्ली। प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में, एटा से प्रारंभ हुई हिन्दी की लघु पत्रिका 'चौपाल' के प्रवेशांक का लोकार्पण हुआ। मूर्धन्य आलोचक नामवर सिंह, शीर्ष कवि केदारनाथ सिंह, आलोचक खगेन्द्र ठाकुर और विख्यात लेखक काशीनाथ सिंह द्वारा यह लोकार्पण किया गया। राजकमल प्रकाशन के मंच पर आयोजित लोकार्पण समारोह में केदारनाथ सिंह ने कहा कि किसी एक कृति पर पत्रिका का पूरा अंक केंद्रित करना साहित्य के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने चौपाल के सम्पादक को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने प्रवेशांक में ही यह उपलब्धि अर्जित कर ली है।


 

नामवर सिंह ने कहा कि लघु पत्रिकाओं का अधिकाधिक प्रसार साहित्य को व्यापक बनाता है। उन्होंने इस अंक में युवा आलोचकों द्वारा किये गए मूल्यांकन को भी सराहनीय बताया। उपन्यासकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि मेरे लिए यह सचमुच भावुक क्षण है जब इतनी बड़ी संख्या में युवा और वरिष्ठ आलोचकों ने मेरे एक उपन्यास को चर्चा के योग्य समझा। विदित हो कि चौपाल का प्रवेशांक काशीनाथ सिंह के सम्मानित उपन्यास 'रेहन पर रग्घू' पर केंद्रित किया गया है। आयोजन में जलेस के राष्ट्रीय महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, आलोचक खगेन्द्र ठाकुर, कवि पंकज सिंह, कवि सदाशिव श्रोत्रिय, बनास जन के सम्पादक पल्लव सहित अनेक लेखक-पाठक उपस्थित थे।

अंत में 'चौपाल' के सम्पादक कामेश्वर प्रसाद सिंह ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए पत्रिका के जन्म की कहानी भी बताई। उन्होंने अपने जनपद एटा के प्रसंग भी सुनाए। संचालन कर रहे जामिया मिलिया इस्लामिया के शोधार्थी अज़हर खान ने पत्रिका के स्वरूप की जानकारी दी। राजकमल प्रकाशन के निदेशक अशोक महेश्वरी ने अपने नए महत्त्वपूर्ण प्रकाशनों की जानकारी दी।

कामेश्वर प्रसाद सिंह
सम्पादक, चौपाल,
एटा।
kameshwarprasadsingh60@gmail.com

मीडिया के साथी इस वैदिक विद्वान के ब्रह्मांड उत्पत्ति से संबंधित बातों-दावों पर गौर करें

Yashwant Singh : एक भारतीय वैदिक विद्वान ने ब्लैक होल्स को लेकर स्टीफन हाकिंग के बदले विचार पर उन्हें पत्र लिखा है… यह पत्र मेरे पास भी आया है.. इसे पढ़कर मैं हैरत में पड़ गया.. अपने देश में इन विषयों पर लोग काम कर रहे हैं और दावे से कई बातें कह रहे हैं लेकिन उस पर बहस के लिए, कवरेज के लिए, शोध के लिए किसी के पास वक्त नहीं… लोग राजनीति राग गाने में लगे हैं या फिर अपने निजी दुख-सुख में…

भड़ास पर आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक जी का स्टीफन हाकिंग को लिखा पत्र प्रकाशित कर दिया है… मैंने अग्निव्रत जी से अनुरोध किया है कि वे दिल्ली में आकर प्रेस कांफ्रेंस करें… ये अदभुत मामला है… संभव है, हम आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक की कई बातों से सहमत न हों लेकिन ये एक बहस शुरू करने का मौका तो दे ही रहे हैं… अग्निव्रत ने जो लिखा है, उसका एक पैरा पढ़ें:

‘‘यह माना जाता है कि ब्लैक होल के निकट टाइम रुक जाता है। इस कारण यह मानना होगा कि ब्लैक होल के बाहरी भाग और उसके अन्दर कोई क्रिया नहीं होगी, क्योंकि बिना समय के कोई क्रिया वा हलचल नहीं हो सकती, परन्तु यह माना जाता है कि ब्लैक होल में गुरुत्वाकर्षण बल अत्यधिक होता है, इससे गुरुत्वीय तरंगें तो उत्पन्न होंगी ही। तब ब्लैक होल पर क्रिया व हलचल सिद्ध हो ही गयी। ब्लैक होल पर रेडियेषन विद्यमान होते ही हैं, भले ही वे बाहर उत्सर्जित नहीं हो सके। स्टीफन हॉकिंग स्वयं रेडियेशन का उत्सर्जन मानते हैं, जिन्हें हॉकिंग रेडियेशन नाम दिया जाता है। तब क्रिया व गति स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। तब, कैसे कहा जाता है कि ब्लैक होल पर समय और गति रुक जाती है।’’

पूरा पत्र ये है:

हिंदी में पत्र

http://old1.bhadas4media.com/vividh/18013-2014-02-22-19-52-20.html

अंग्रेजी में पत्र

http://old1.bhadas4media.com/vividh/18011-a-letter-to-stephen-hawking.html


ड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. इस स्टेटस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं:

Mukund Hari ऐसे अनुसंधानकर्ताओं और चिंतकों को देश के सामने लाना चाहिए।

Poojāditya Nāth हमारे पूरे पब्लिक डिस्कोर्स से अनुसंधान और विज्ञान ग़ायब हैं…
 
Arvind Chotia बिल्कुल सही कहा यशवंतजी। खबरों के लिए किसी के पास टाइम नहीं है। गोसिप ही बिकती है आजकल टीवी पर।

Gaurav Mishra Yashwant Singh@ aur jyada jankari kahan se le sakta hu swami ji ke is vichar ke bare me. please samay nikal ker is comment ka reply kr de. aur swami ji ke is subject per vicharo ko aage lane ke liye kosis honi chaye
 
Yashwant Singh गौरव जी. स्वामी जी को मैंने मेल भेजा है कि वो दिल्ली आएं. उनकी प्रेस काफ्रेंस कराई जाए.
 
Gaurav Mishra यशवंत जी, कोई लेख पहले भी प्रकाशित हुआ है स्वामी जी का, अगर हाँ तो लिंक दे सर. Social media और Web media से ही ऐसे चीज़ आगे ला सकते है हम लोग, सभी को कोशिस करनी चाहिए!!
 
अभिनव आलोक ऐसे अनुसंधानकर्ताओं को अपना पेपर किसी जर्नल को भेजना चाहिए। वैज्ञानिक अनुसंधानों से जुड़ा हुआ हूँ और समझता हूँ कि यहाँ माहौल कमो -बेस पारदर्शी है। अगर आपकी बात में दम है , उसको साबित करने के लिए जरूरी सबूत और तर्क हैं तो उसको जरूर नोटिस किया जाता है। आप उन्हें उनके शोध पत्रों को किसी वैज्ञानिक जर्नल में भेजने की सलाह दें। मीडिया में हवा खड़ा करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।

Yogesh Garg देखना Ajeet Sharma जरा क्या मामला है , लेटर मैं पढ़ चुका हूँ ये भी मुझे वो सचिन शर्मा के पुष्पक विमान जैसा मामला लगता है ।
 
Shivani Kulshrestha यर्जुवेद के ,ॐ हिरण्यगर्भ समव्रतताग्रे भूतसस्य, जो ये श्लोक है ये भूगोल की वर्तमान थ्योरी को चेँज करता है। इसमेँ भी बहुत से राज छिपे है।

Yashwant Singh योगेश भाई. पत्र में जिस एक भारतीय खगोलशास्त्री और उनके विचार का उल्लेख किया गया है, एक जिस भारतीय किताब का उल्लेख किया गया है वो सब देखकर एनालाइज किया जाना चाहिए कि क्या भारतीय विद्वानों ने स्टीफन हाकिंग की पुरानी थ्योरी को पहले ही खारिज कर अपनी बात रख दी थी जिसे स्टीफन हाकिंग अब खारिज कर रहे हैं…

Yogesh Garg यशवंत जी मैं भौतिकी से स्नातक हूँ और जिसे टैग किया है वो मैटर फिजिक्स में पी एच डी है , हम पहले इसे समझ ले फिर कुछ कह पाएंगे

Yashwant Singh योगेश जी. यही मैं भी कहना चाह रहा हूं कि पूरे प्रकरण को समझना, एनालाइज किया जाना चाहिए.. .नतीजे निकालने की जल्दबाजी के पक्ष में मैं भी बिलकुल नहीं हूं… कई बार लोग अपने धार्मिक आग्रहों दुराग्रहों और अतीतजीविता के कारण वर्तमान खोजों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं.. इसका मैं सख्त विरोधी हूं… और, ज्यादातर यही देखा गया है कि धर्मों ने साइंस को हमेशा अपने से कमतर माना या कमतर साबित करने की कोशिश की… इस पोंगापंथ का भी मैं विरोधी हूं….

अभिनव आलोक यह मामला धर्म का है ही नहीं , यह पूरा वैज्ञानिक मसला है। । इस पर वैज्ञानिक ढंग से ही बात संभव है। । विज्ञानं में मेरे ख्याल से अभी तक धर्म के साथ संवाद स्थापित करने की कोई परम्परा नहीं है। . यहाँ सबकुछ विशुद्ध सबूतों -अवलोकनों पर आधारित होता है। । विरोधी विचार भी होते हैं यहाँ मगर दोनों के पास कुछ न कुछ सबूत -तर्क होतें हैं। ।

Yogesh Garg इस लेख में इन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है जो एक भौतिकी से ग्रेजुएशन करने वाला सामान्य छात्र न जानता हो या जो प्रश्न इन्होंने पूछे हैं वो जानने की जिज्ञासा न उठी हो… जिनेवा के सर्न में बोसान कण की खोज के बाद कुछ धार्मिक जीवों ने उसका ठेका लेने का प्रयास भी किया है.. असल में उस कण का नाम भी God damn particle था.. इसकी खोज ही इसलिए की गई की ईश्वर की सृष्टि की रचना को खंडन कर उसे भौतिकी के नियम पर समझाया जा सके.. पर मीडिया के अतिवादियों को बेचने को मसाला मिला तो ये गॉड पार्टिकल हो गया.. इन्होंने किसी धार्मिक साहित्यिक/ पुरातात्विक संदर्भ का हवाला नहीं दिया है जो इनकी धारणा को स्पष्ट करता हो.. इस लेख में ये भविष्य काल पर ही बात करते हैं जैसे कि….

"मैं मूल कण को स्पष्ट करूंगा "

"मैं इस विषय पर फाइनमैन से बहुत आगे जाकर लेख लिख सकूंगा।"

"अनादि मूल पदार्थ से लेकर तारों के निर्माण के विषय में भी विस्तार से लिख सकूंगा।"

bla bla bla …

ये ऐसा है जैसे पंडित जी का हनुमान चालीसा से अनपढ़ गाँव में फेरे पड़वा देना ।

Yogesh Garg @yashwant भाई इसे पढ़िये और आनंद लीजिये ,

"एक बार विदेश से कोई बोटनिस्ट ( वनस्पति वैज्ञानिक ) आया। उनका एक जगह भाषण होना था। मुझे बताया गया कि यह 'फासिल ' का विशेषज्ञ है , यानि चट्टानों के बीच दबे हुए पौधे या जंतु के पाषाणरूप हो जाने का। मैंने उसका भाषण सुना और मेरे भीतर हलचल होने लगी। वह पश्चिम के वैज्ञानिको के नाम ही लेता रहा और विदेशो के 'फासिल' दिखाता रहा। उसके बाद मैं बोलने को खड़ा हो गया। मैंने कहा – आज हमने एक महान 'बाटनी ' का भाषण सुना। (बाद में मुझे बताया गया कि वह बॉटनिस्ट कहलाता है ) मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या प्राचीन भारत में 'बाटनी ' नहीं ? अवश्य थे। हम भूलते जा रहे है। भगवन राम एक महान 'बाटनी ' थे। और अहिल्या एक फासिल थी। महान बाटनी रामचंद्र ने अहिल्या फासिल का पता लगाया। वे आज के इन बाटीनियो से ज्यादा योग्य थे। ये लोग तो फॉसिल का सिर्फ पता लगाते है और उसकी जांच करते है। महान बॉटनी राम ने अहिल्या को फिर से स्त्री बना दिया। ऐसे ऐसे चमत्कारी बॉटनी हमारे यहाँ हो गए है। हम विश्व गुरु हैं। हमें कोई कुछ नहीं सिखा सकता।

इस पर भी खूब तालियाँ पिटीं और विदेशी विशेषज्ञ भी मान गए कि हमें कोई कुछ नहीं सिखा सकता
–आदरणीय परसाई जी

Yashwant Singh योगेश भाई, सहमत हूं.

Yogesh Garg एक और …
ज्ञान विज्ञान किसके पास है?
– सिर्फ़ आर्यों के पास
उसके बाहर कहीं ज्ञान विज्ञान तो नही है?
– कहीं नही।
इन हजार सालों मे मनुष्य जाति ने कोइ उपलब्धि की। ?
– कोइ नही। सारी उपलब्धि हमारे यहां हो चुकी थी।
क्या अब हमें कुछ सीखने की जरूरत है?
– कतई नही, हमारे पूर्वज थे विश्व के गुरु थे।
संसार मे सबसे महान कौन ?
हम, हम, हम, हम, हम
—–
-परसाई जी की जय हो

अभिनव आलोक वैसे यह संभव है कि आभास कुमार मित्र के वैज्ञानिक शोधों को तब उतना महत्त्व न मिला हो और अब हाकिंग्स द्वारा वैसी ही बात की गयी हो। मगर इसका वेदों इत्यादि से कोई भी सम्बन्ध स्थापित करना बुद्धिमानी नहीं है

Yogesh Garg http://www.vaidicscience.com/books/eitraybrahmanvigyan.pdf इनकी एतरेय ब्राह्मण पुस्तक पढ़कर आप सिर धुन लेंगे । कोशिश करके देखिये …यही वजह है की इनका विदेश से कोई वैज्ञानिक जवाब नहीं देता … मुझे तो ये आत्ममुग्ध टाइप के लोग लगते है जिनहे किसी किस्म की सनक सवार है । बुलाये इन्हे दिल्ली और कीजिये प्रेस कान्फ्रेंस देखते है कैसे ये ' ब्लेक हाल को इस पुस्तक से समझा सकते है , ए के मित्रा जी तो बार्क में वैज्ञानिक रहे है पर ये महाशय तो उनके कंधे पर अपनी किताब रखकर खुद को हांक रखे है।

Kapil DEv AttRi sir inki bato me kuch nhi dikh rha……………….. Ye prsn physics pdhne wale hr students ke man me aate h……… ye koi aisi baat nhi ki pahli baar inhone hi socha hoga aisa……………….. To thik rhega agr ye े प्रेस कान्फ्रेंs na bulaye to@ Yashwant singh

Ashok K Ram इस पत्र में सवाल बहुत कुछ स्पष्ट नही हो रहा है। पर एक बात सत्य है कि वैदिक परम्पराओं के लोग थोड़ा बहुत विज्ञानं को जानकर उसपर चैलेंज करते हैं, जब उनको अतिरिक्त ज्ञान होता है तो फिर मुह फाड़ने लगते। प्रताप नारायण मिश्र का उप बोर्ड में 'बात" एक लेख है। उसमें गंगा में नहाने से पहले पानी को माथे पर लगाने का वैज्ञानिक कारण बताते हैं। कहते हैं पहले पैर से छूने ने नीचे की गर्मी ऊपर दिमाग में चढ़ जाती है । अब उन्हें therodynamics के नियम उनको कौन समझाए कि ऊष्मा गर्म से ठण्ड की ओर चलती है। यानि सिर की गर्मी पैरों से होकर गंगा जल में जाएगी।

Ajit Harshe "ईश्वर बिना नियम सृष्टि की उत्पत्ति व संचालन नहीं कर सकता।" …और उसके बाद उन्हीं नियमों पर चलने के लिए मजबूर होता है… अर्थात सृष्टि की उत्पत्ति करने के बाद ईश्वर मर जाता है, अपनी शक्ति खो देता है…

Ashok Singh Rawat ara murkho so called intellectuals prampita ko janna hee gyan hain………. aur jis science ki bait aajkal vigyanik kar raha hain us sa kahee guna aga ka vigyan ved ma hai ….. jarurat is bait ki hain usko smajhna hain fir logo ka jan kalyan ma karya kar na hain……………

Atul Singh Ludicrous!

Alka Bhartiya kuch fund adi bhi mil sakta hain lekin fund den wale EU hain is liye mushkil ho sakti hai vais shdho ke liye fund dte hain voh. TATA faundation me bhi ty kare apna paper submit kare

Pradeep Sharma इण्डिया मेँ सोचने पर पाबन्दी थोडे है नाश हो इस मीडिया का जिसने हमारी सोचने की शक्ति पर कब्जा कर लिया है.और दे श मेँ लोग निठ्ठले बनकर सिर्फ मोदी के बारे मे सोच रहे है

Rakesh Mishra Pravasi Yashwant bhai aap bade jigyasu hain. Aur jigyasa bhi brahmrup hai. Janhit me Baba ki booty mar ke apke sath baithna hi padega. Aadi se anant ki charchaon ke madhya me jivan, prakriti aur brahmand ki vimaon ko tay karne ya mapne wali avdharnao aur unke sthapakon aur unki mool preranaon ko samajhna avashyak hai. Udaharan ke taur par darwin ke `survival of the fittest` ke propaganda par duniya me bahut sa bhram failaya gaya. Aj uska khandan ho chuka hai lekin humare beech uska koi jikra nahi hai. Thik usi prakar gulami ke british lootraj me churayi gayi prachin bhartiy sanhitaon ki shodh se bahut se bahut si advance technologies banayi gayi jinse aaj hindustan ki econoics me buy, beg, borrow ki parampara jari hai… Aur 'khata na bahi, jo kahi wo sahi' ki parampara pe chal rahi bhartiy patrakarita uski charan ya das tak ban baithi hai. Bharat sarkar ke lagbhag 200 shodh sansthano ki reporting kis akhbar me nazar ati hai…?

फेसबुक पर चल रही बहस में हिस्सा लेने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: Debate on FB

विश्व पुस्तक मेले में हुआ ‘आपदा का कफन’ का विमोचन

उत्तराखंड में आई दैवी आपदा से प्रेरित पुस्तक ‘आपदा का कफन’ पीड़ित युवती की संघर्ष गाथा का विमोचन विश्व पुस्तक मेला नई दिल्ली में हुआ है। पत्रकार धीरेंद्र नाथ पांडेय द्वारा लिखित इस पुस्तक का विमोचन साहित्यकार राजकिशोर ने किया। आपदा से जैसे मुद्दे पर अधारित उपन्यास लिखने का साहस  है। इस तरह का ट्रेंड भारत में नहीं है। लेकिन विदेशों में है। अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हुए हमले पर न जाने कितनी किताबें विदेशों में लिखी गई लेकिन भारत-पाक विभाजन या फिर चीन या पाक युद्ध पर चंद किताबें ही लिखी गई। उस पर भी उपन्यास तो अंगुलियों पर गिनने लायक ही है। इसलिए इस किताब से लेखक के साहस का परिचय मिलता है। लेखक धीरेंद्र नाथ पांडेय मूल रूप से पत्रकार है इसलिए उनसे इस तरह की उम्मीद की जा सकती है।

 
समीक्षा करते हुए मुझे लगा कि आपदा पर आधारित ‘आपदा का कफन’ पुस्त की कई विशेषताएं हैं साथ ही इसमें कई कमियां भी हैं। पहले इस पुस्तक की विशेषताओं पर चरचा करते हैं। पुस्तक दर्शनीय है। जाहिर है जो दर्शनीय होगा उसे एक बार पढ़ने की इच्छा तो होगी ही। वैसे बता दूं कि यह पठनीय भी है। ज्योति पब्लिर्सस और डिस्टब्यूटर्स द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की कीमत 165 रुपया है। कीमत से लगता है कि यह पुस्तक आम पाठक के लिए लिखी गई है। क्योंकि आज-कल ऐसी पुस्तकों की कीमत 300 से 400 रुपये तक होती है। जो सिर्फ सरकारी खरीद के लिए ही लिखी जाती हैं।

अब आते हैं कवर पेज पर। इसका कवर पेज आपदा को सही रूप में परिभाषित करता है। आपदा ग्रस्त केदारनाथ मंदिर की तस्वीर स्केच रूप में है। मंदिर के आसपास पड़े पत्थरों से लगता है कि जब आपदा आई होगी तो कितनी भयानक होगी। टाइटल लिखने क अंदाज भी शानदार है। कवर पेज जैकेट नुमा है। कवर पेज के बैक में पुस्तक की थीम है- यह जिंदगी की अग्नि परीक्षा ही तो है कि जिस बेटी के तन को ढंकने के लिए बाप ने मौत से अपनी जिंदगी का सौदा किया आज वही बेटी बाप के कफन के लिए अपने तन का सौदा कर रही है। यह थीम बहुत ही मार्मिक है और पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। जैकेट के पिछले पेज पर केदारघाटी की भौगोलिक स्थिति है साथ ही दैवी आपदा से संबंधित संक्षिप्त जानकारी दी गई है। इसकी प्रस्तुति भी शानदार है। कुल मिलाकर कवर जैकेट दर्शनीय और पठनीय है।

अब आते हैं अंदर के पेज पर। अंदर के पेज पर टाइटल एक नए लुक में नजर आता है। वहीं अगले पेज पर शिव की मूर्ति की जल में डूबते हुए एक फोटो प्रकाशित की गई है। फोटो अति सुंदर है साथ इस फोटो से लगता है कि इंसान ही नहीं भगवान भी इस आपदा से नहीं बच पाए। प्रस्तुतिकरण बढ़िया है। इस पुस्तक को अग्रसारित करने वाले भी एक पत्रकार हैं नाम है शेषमणि शुक्ल। शुक्ल जी दैवी आपदा के समय केदारघाटी का दौरा किया था। निश्चित रूप से उनके विचार भी किताब की सत्यता को प्रमाणित करते हैं। वहीं प्राक्कथन में लेखक ने बड़ी सहजता से स्वीकर किया है कि यह एक काल्पिनिक किताब है, लेकिन इसमें सच्चाई ज्यादा दिखती है। क्योंकि जिन हादसों का जिक्र लेखक कर रहे हैं उसके इर्दगिर्द ही कहानी गढ़ी गई है।

लेखक का कहना है कि इस पुस्तक में हिंदुस्तान पाकिस्तान बंटवारे और मुज्जफरनगर दंगे का दर्द महसूस किया जा सकता है। लेखक का यह दावा सही प्रतित हो रहा है। जिस तरह मुज्जफरनगर दंगे के शिविर में रहने वाले लोगों के साथ जो कुछ घटा उसका एक अंश पुस्तक में नजर आ रहा है। एक बात और लेखक ने कई लोगों को धन्यवाद किया है कुछ को नाम से तो कुछ को बिना नाम लिए। आज कल लेखों में इस तरह की सहृदयता कम ही नजर आती है। अब आते हैं कहानी पर। पुस्तक की कहानी आपदा के दौरान के उस दर्द को उजागर करती है जो खबरों में नहीं झलकी। लेखक ने उन सच्चाइयों को उजागर करने की कोशिश की है जो अखबारों और न्यूज चैनल तक पहुंचते पहुंचते दम तोड़ देती हैं। यह एक ऐसे परिवार की कहानी है जो आपदा से पहले लखपति था लेकिन उसके बाद सड़क पर आ जाता है। बेटा खत्म हो जाता है धंधा चौपट हो जाता है और पूरा परिवार सरकारी मेहरबानियां पर शिविर में पहुंच जाती है। जहां सिर्फ दो वक्त दाल रोटी मिलती है। लेखक ने यहां यह दर्शाने की कोशिश की है कि किस तरह सरकारी कर्मचारी और अधिकारी आपदा के समय में भी सरकारी धन का दुरुपयोग कर खुद ऐश करते हैं वहीं पीड़ित दाने-दाने को मोहताज होते हैं।

भ्रष्ट हो चुके सरकारी तंत्र के बारे में लेखक जो संदेश देना चाह रहा है उसे देने में वह काफी हद तक सफल रहा है। किताब मार्मिक है। भावनाओं और संवेदनाओं को मिलकार जो पटकथा लेखक ने लिखी है वह दिल को झकझोर रहा है। कहानी कहीं से भी टूटती नजर नहीं आती है। एक बेबस बाप की लचारी और लोक लाज के डर के साथ ही उसका संघर्ष वहीं एक अबला बेटी को परिवार के प्रति समर्पण भाव और उसका बलिदान इस पुस्तक की जान है। धन के पीछे भागने वालों के लिए भी इस पुस्तक में एक संदेश है।  

अब आते हैं इसकी कमियों पर। इस पुस्तक में कई जगह पत्रकारिता का झोल भी नजर आता है। मसलन सरकारी कर्मचरियों की ओर से की गई बदसलुकियों की व्याख्या कुछ अधिक है। अक्सर ऐसा होता नहीं है। वहीं अंध विश्वास को दर्शता एक ताबीज। ताबीज बेचने के बाद बाप की मौत होने से अंधविश्वास को बढ़वा मिलता है जो एक नाकारात्मक पक्ष है। वैसे कुल मिलकार यह पुस्तक पठनीय है।

प्रस्तुति

डा. जितेंद्र सिन्हा
एचओडी, मास कम्यूनिकेशन,
साईं कॉलेज, देहरादून। 

आईबी के सूचना संकलन कार्य में दखल नहीं दे सकतीं अदालतें

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आज कहा कि केंद्र और राज्य सरकार को इंटेलिजेंस ब्यूरो(आईबी) तथा राज्य अभिसूचना विभाग द्वारा कथित राजनैतिक अभिसूचना संकलन में दुरुपयोग रोके जाने के सम्बन्ध में निर्देश देने की उनकी अपनी सीमायें हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस डीके अरोरा की बेंच ने यह आदेश आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल में किया। बेंच ने कहा कि संविधान ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता का स्पष्ट विभाजन कर रखा है। अदालतों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह संतुलन किसी स्थिति में बिगड़े नहीं।

बेंच ने कहा कि उनके लिए कार्यपालिका को यह निर्देश देना बहुत दुष्कर है कि वे किस प्रकार की अभिसूचनाओं का संकलन करें या ना करें। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार कार्यपालिका को यह भी निर्देश नहीं दिया जा सकता है कि वे चुनाव सम्बंधित सूचनाएं एकत्र नहीं करें क्योंकि चुनाव कार्य पर नियंत्रण निर्वाचन आयोग का कार्य है। अदालत के लिए यह निर्णय करना बहुत मुश्किल है कि कब चुनाव सम्बंधित अभिसूचना व्यापक राष्ट्रहित का प्रश्न बन जाए।

केंद्र और राज्य सरकार के अधिवक्तागण ने पीआईएल की पोषणीयता पर यह कहते हुए सवाल खड़े किये कि याचीगण ने पिछले चार सालों में 121 पीआईएल किये हैं, जिस पर कोर्ट ने कहा कि अधिक संख्या में पीआईएल दायर करने मात्र से किसी व्यक्ति की नीयत पर शंका नहीं की जा सकती।

‘बनास जन’ के ‘ओमप्रकाश वाल्मीकि’ विशेषांक का लोकार्पण

नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेले में हिंदी की लघु पत्रिका 'बनास जन' के ओमप्रकाश वाल्मीकि पर प्रकाशित विशेषांक का लोकार्पण हुआ। शब्दसंधान प्रकाशन के तत्वावधान में हुए एक संक्षिप्त आयोजन में युवा आलोचक और दलित लेखन को समर्पित डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने इस अंक का लोकार्पण किया। डॉ. तिवारी ने इस अवसर पर कहा कि बनास जन ने एक जरूरी काम को ठीक समय पर किया है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। डॉ. तिवारी ने अंक में भँवरलाल मीणा द्वारा लिए गए सुदीर्घ साक्षात्कार को उपलब्धि बताया।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे कोलकाता से आये वरिष्ठ आलोचक शम्भुनाथ ने कहा कि अपने समय के सही सवालों से टकरा कर ही कोई लघु पत्रिका सार्थक हो सकती है।  इस अवसर पर राजस्थान से आये वरिष्ठ कवि सदाशिव श्रोत्रिय, संवेद के सम्पादक किशन कालजयी, पक्षधर के सम्पादक विनोद तिवारी, चौपाल के सम्पादक कामेश्वर प्रसाद सिंह, कथन की सम्पादक संज्ञा उपाध्याय, युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय सहित बड़ी संख्या में लेखक और पाठक उपस्थित थे। अंत में बनास जन के सम्पादक पल्लव ने सभी का आभार मानते हुए कहा कि इस अंक को प्रकाशित कर बनास जन की पूरी टीम गहरे संतोष का अनुभव कर रही है।

गणपत तेली
सम्पादन सहयोगी,
बनास जन।

बदले विचार पर स्टीफन हॉकिंग को एक भारतीय वैदिक विद्वान का पत्र

आदरणीय श्रीमान् स्टीफन हॉकिंग

डीएएमटीपी

सेन्टर फॉर मैथमेटिकल सायंस

विलबेरफोर्स रोड

कैम्ब्रीज सीबीएस ओडब्ल्यूए

(यू.के.)

विषय- ब्लैक हॉल पर आपके परिवर्तित विचार।

महोदय!

उपर्युक्त विषयार्न्तगत निवेदन है कि विभिन्न माध्यमों से आपके ब्लैक होल विषय में परिवर्तित विचार जाने। नेचर न्यूज में 24 जनवरी 2014 को ‘स्टीफन हॉकिंग: देयर आर नो ब्लैक होल्स’ लेख पढ़ा। सर्वप्रथम सत्य को स्वीकार करने पर आपको हार्दिक बधाई।

क्या आपको स्मरण है कि मैंने 29.8.2013 को एक ई-मेल करके ब्लैक होल तथा बिग बैंग मॉडल पर आपसे एवं संसार के अन्य वैज्ञानिकों से 12 प्रश्न पूछे थे। ब्लैक होल तथा इवेन्ट होराइजन विषयक मेरा प्रश्न इस प्रकार था-

‘‘यह माना जाता है कि ब्लैक होल के निकट टाइम रुक जाता है। इस कारण यह मानना होगा कि ब्लैक होल के बाहरी भाग और उसके अन्दर कोई क्रिया नहीं होगी, क्योंकि बिना समय के कोई क्रिया वा हलचल नहीं हो सकती, परन्तु यह माना जाता है कि ब्लैक होल में गुरुत्वाकर्षण बल अत्यधिक होता है, इससे गुरुत्वीय तरंगें तो उत्पन्न होंगी ही। तब ब्लैक होल पर क्रिया व हलचल सिद्ध हो ही गयी। ब्लैक होल पर रेडियेषन विद्यमान होते ही हैं, भले ही वे बाहर उत्सर्जित नहीं हो सके। स्टीफन हॉकिंग स्वयं रेडियेशन का उत्सर्जन मानते हैं, जिन्हें हॉकिंग रेडियेशन नाम दिया जाता है। तब क्रिया व गति स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। तब, कैसे कहा जाता है कि ब्लैक होल पर समय और गति रुक जाती है।’’

महोदय! मैं जानना चाहता हूँ कि क्या आपने अपना विचार परिवर्तित करते समय इस पत्र पर भी ध्यान दिया था, उसी दिन 29.8.2013 को आपके टेक्निकल असिस्टेंट मि. जोनाथन वर्ड ने मुझे पत्र लिखा था, जिसमें मेरे पत्र का उत्तर देने में आपकी असमर्थता दर्शायी थी। आपने नवीनतम लेख में ब्लैक होल के स्थान पर जिस फायर वाल की चर्चा की है तथा इवेन्ट होराजन के स्थान पर एपरन्ट होराइजन की चर्चा की है, वह वस्तुतः भारतीय खगोलशास्त्री प्रो. ए.के. मित्रा (बी.ए.आर.सी.) के विचार हैं।

उन्होंने ये विचार आपसे पूर्व अनेक प्रकाशित पत्रों में विस्तार से व्यक्त किये हैं तथा उनके लेख आपकी अपेक्षा काफी विस्तृत एवं स्पष्ट हैं परन्तु आपके विचार अति संक्षिप्त व अस्पष्ट हैं। उनके ब्लैक होल पर कई लेख मेरे पास हैं। अतः आपके नवीनतम विचारों पर उनका दावा उचित है। आश्चर्य है कि आपने अपने लेख में उनके नाम का उल्लेख तक नहीं किया। मैंने तो ब्लैक होल तथा इवेन्ट होराजन पर गम्भीर प्रश्न ही खड़े किये थे, तब मेरी चर्चा करना तो आवश्यक नहीं था परन्तु डॉ. मित्रा ने तो ब्लैक होल के विकल्प के रूप में विस्तृत थ्यौरी प्रस्तुत की है, तब उनके नाम का उल्लेख होना चाहिए था।

आपने अपने पूर्व मत को क्यों परिवर्तित किया, इसके लिए आपके लेख में कोई तर्क नहीं है तथा फायर वाल वाला सिद्धान्त की सिद्धि भी आपने नहीं की है, केवल मान लिया है। इस कारण आपका लेख वैज्ञानिक दृष्टि से विशेष उपयोगी प्रतीत नहीं होता। आपकी पुस्तक ‘ग्राण्ड डिजायन’ की भी यही स्थिति है। कृपया इस कथन के लिए क्षमा करें। अस्तु।

महोदय! मैंने 19.4.2006 को अपने पत्रांक 798 के द्वारा आपको अपनी पुस्तक ‘बेसिक मैटेरियल कोज ऑफ दी क्रियेशन’ जिसकी फॉरवर्ड डॉ. ए.के. मित्रा ने ही लिखी थी, आपको भेजी थी। इस पुस्तक में ब्लैक होल एण्ड बिग बैंग मॉडल के शून्य आयतन में अनन्त द्रव्यमान एवं अनन्त ऊर्जा के होने का विस्तार से खण्डन किया था। इससे पूर्व अगस्त 2004 में डॉ. मित्रा ने अपने ब्लैक होल विषयक लेख में भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया था। उस समय आपने अपनी पुस्तक 'ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' में बिग बैंग की चर्चा में शून्य आयतन में अनन्त द्रव्यमान की बात कही है। 16.12.2004 में येरूशलम विष्वविद्यालय में आपके व्याख्यान में बिग बैंग के समय आयतन शून्य नहीं माना है बल्कि एक पॉइन्ट लिखा है। उस पॉइन्ट के आयतन की बात नहीं की है। जुलाई 2010 में डिस्कवरी टी.वी. चैनल पर इस पॉइन्ट का आयतन ऐटम के बराबर माना है।

महोदय! मैं जानना चाहता हूँ कि आपके इन विचारों में परिवर्तन के पीछे डॉ. मित्रा के लेख अथवा मेरी पुस्तक का कुछ योगदान है वा नहीं?

महोदय! आपने अपनी पुस्तक ‘ग्राण्ड डिजायन’ में ईश्वर के अस्तित्व का खण्डन करके भौतिकी के नियमों से सृष्टि उत्पत्ति की बात की है। इसका खण्डन हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध है परन्तु यह वीडियो अभी हिन्दी भाषा में उपलब्ध है।

महोदय! ईश्वर के नियम ही भौतिकी के नियम हैं जैसा कि रिचर्ड पी. फाइनमैन ने स्वीकार किया है। ईश्वर की सत्ता वर्तमान भौतिकी के नियमों से ही सिद्ध हो जाती है। ईश्वर बिना नियम सृष्टि की उत्पत्ति व संचालन नहीं कर सकता।

  • मेरा निवेदन है कि आप अपनी बिग बैंग थ्यौरी पर भी पुनर्विचार करें। आषा है आप कभी न कभी इसकी असत्यता को भी स्वीकार करेंगे। जिस ईष्वर को आप नकारते हैं, वही ईष्वर आपको दीर्घायु प्रदान करे, जिससे आप अपने बिग बैंग मॉडल की भूलों को भी स्वीकार कर मेरे शोध कार्य के पूर्ण होने पर उस पर भी विचार कर सकें। मुझे इस समय विष्वास है कि मैं निम्न विषयों पर संसार के विज्ञान को कुछ विषेष दिषा दे सकूंगा-
  • बल की अवधारणा जो आज अत्यन्त अस्पष्ट व अपूर्ण है। जिस पर प्रख्यात अमरीकी वैज्ञानिक रिचर्ड पी. फाइनमैन के डायग्राम्स को विष्वभर में अत्यन्त प्रामाणिक माना जाता है। मैं इस विषय पर फाइनमैन से बहुत आगे जाकर लेख लिख सकूंगा।
  • जिन्हें संसार आज मूल कण मानता है, उनके मूल कण न होने तथा इनके निर्माण की पूर्ण प्रक्रिया को बहुत विस्तार से स्पष्ट कर सकूंगा। वर्तमान विज्ञान इस विषय में विचार भी नहीं कर पा रहा है अथवा कर रहा है।
  • ब्लैक होल के स्थान पर डॉ. मित्रा साहब के इ.सी.ओ. मॉडल से मेरा ऐतरेय विज्ञान भी सहमत है। मैं इस विषय में विचार लिख सकूंगा।
  • सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को वर्तमान किसी भी सिद्धान्त से आगे ले जाकर विस्तार से अनादि मूल पदार्थ से लेकर तारों के निर्माण के विषय में भी विस्तार से लिख सकूंगा।
  • डार्क इनर्जी जिसे बिग बैंग के लिए उत्तरदायी माना जाता है, के दूसरे स्वरूप जिसमें बिग बैंग नहीं बल्कि अनेक विस्फोट सदैव होते रहते हैं, सृष्टि की हर क्रिया में उसकी भूमिका को दर्शा सकूंगा। मेरी डार्क इनर्जी वर्तमान विज्ञान द्वारा कल्पित डार्क इनर्जी से भिन्न होगी।
  • वर्तमान विज्ञान में कल्पित वैक्यूम इनर्जी के रूप में एक अन्य लगभग सर्वव्यापक ऊर्जा के स्वरूप को बतला सकूंगा।
  • सृष्टि विज्ञान, खगोल विज्ञान एवं कण भौतिकी के अनेक रहस्यमय बिन्दुओं पर प्रकाश डाल सकूंगा।
  • इन सब कार्यों के लिए ईश्वर नामक चेतन सर्वव्यापक व सर्वज्ञ, निराकार व सर्वषक्तिमती सत्ता को भी सिद्ध कर सकूंगा।
  • वेद मंत्र ईश्वरीय रचना है, ये मंत्र कुरान, बाइबिल आदि किसी भी अन्य ग्रन्थ के समान नहीं है। इसे भी सिद्ध कर सकूंगा। 

आशा है आप व संसार के वैज्ञानिक इन बिन्दुओं पर भी अभी से विचार करना प्रारम्भ करेंगे। इसी आशा के साथ… विशेष आदर के साथ…

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

अध्यक्ष, श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास

आचार्य, वेद विज्ञान मन्दिर