इनसाइट मीडिया अवार्ड्स से नवाज़े गए 22 मीडियाकर्मी

भोपाल, मध्य प्रदेश। इनसाइट टावा न्यूज़ नेटवर्क की ओर से आयोजित एक भव्य समारोह में बाईस प्रतिभा संपन्न और अनुभवी लोगों को सम्बंधित क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए इनसाइट मीडिया अवार्ड्स 2014 से पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर मध्य प्रदेश के संस्कृति एंव पर्यटन मंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इनसाइट टी.वी. न्यूज नेटवर्क के प्रधान संपादक राजेश भाटिया ने बताया कि इनसाइट मीडिया अवार्ड 2014 में बेस्ट एडीटर प्रिंट मीडिया का अवार्ड देवेश कल्याणी (संपादक प्रदेश टुडे) को, बेस्ट रीजनल न्यूज पेपर का अवार्ड राजेश सिरोठिया (चीफ एडिटोरियल डायरेक्टर अग्निबाण) को, बेस्ट प्रिंट मीडिया रिपोर्टिंग (हिन्दी) के लिए मनीष दीक्षित (राजनैतिक संपादक दैनिक भास्कर) और दूसरा दीपेश अवस्थी (विशेष संवाददाता पत्रिका) को, बेस्ट प्रिंट मीडिया रिपोर्टिंग (अंग्रेजी) का अवार्ड सुचांदना गुप्ता (विशेष संवाददाता टाइम्स ऑफ़ इण्डिया) को दिया गया।

बेस्ट रीजनल इलेक्ट्रानिक मीडिया रिपोर्टिंग का अवार्ड अतुल पाठक(रिपोर्टर ज़ी न्यूज म.प्र.,छ.ग.) और दूसरा अवार्ड अजय त्रिपाठी स्टेट ब्यूरो चीफ (ईटीवी म.प्र.,छ.ग.) को दिया गया। बेस्ट रेडियो जाकी के लिए पारूल (94.3 माय एफएम) को, बेस्ट आनलाइन वेब मीडिया के लिए अवधेश बजाज(संपादक बिच्छू डाटकाम) को, बेस्ट इलेक्ट्रानिक मीडिया-कैमरामेन के लिए इरशाद खान(कैमरामेन आज तक) को, बेस्ट प्रेस-फोटोग्राफर का अवार्ड प्रवीण वाजपेयी(हिन्दुस्तान टाइम्स) को, बेस्ट एडवरटाइजिंग एजेंसी का अवार्ड सुशील अग्रवाल(मैनेजिंग डायरेक्टर मध्या एडवरटाइजिंग) को, और बेस्ट मार्केटिंग एक्सपर्ट अवार्ड ललित खरे(मार्केटिंग मैनेजर सहारा, म.प्र., छ.ग.) को दिया गया।

बेस्ट एंकर-टी.वी. का अवार्ड शरद द्विवेदी (संपादक बंसल न्यूज) को, बेस्ट गवर्मेंट मीडिया पीआरओ का अवार्ड ताहिर अली (डिप्टी डायरेक्टर जनसम्पर्क संचालनालय) को दिया गया। मैन आफ द मीडिया का अवार्ड शिवअनुराग पटेरिया (वरिष्ठ पत्रकार) को दिया गया, बेस्ट क्रिटिक आरटीआई एक्टिविस्ट का अवार्ड अजय दुबे (संस्थापक प्रयत्न एनजीओ) को दिया गया। बेस्ट अपकमिंग रिपोर्टर का अवार्ड प्राची मजुमदार (स्वतंत्र पत्रकार हिन्दुस्तान टाइम्स) को दिया गया, फीमेल फेस आफ द मीडिया का अवार्ड दीप्ति चैरसिया (ब्यूरो चीफ इंडिया न्यूज) को दिया गया, बेस्ट इलेक्ट्रानिक मीडिया रिपोर्टिंग (नेशनल) प्रवीण दुबे वरिष्ठ विशेष संवाददाता (न्यूज 24) को दिया, फेस इन द मीडिया का अवार्ड अमृता सोलंकी, सब-इंस्पेक्टर म.प्र. पुलिस को दिया गया।

समारोह में वरिष्ठ पत्रकार श्री अनुराग उपाध्याय द्वारा रचित पुस्तक तरकश का विमोचन मुख्य अतिथि की उपस्थिति में किया गया। इस अवसर पर देश के वर्तमान परिदृश्य और मीडिया विषय पर एक सेमीनार का भी आयोजन किया गया था। सेमीनार के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार वैद प्रताप वैदिक तथा मनोज श्रीवास्तव, प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश शासन, थे। विषय पर प्रकाश डालते हुए वेद प्रताप वैदिक ने कहा कि देश का वर्तमान परिदृश्य अत्यंत शोचनीय है। राजनीतिक उथल-पुथल अपने चरम पर है, ऐसे में पत्रकार बंधुओं को अपने दायित्व का बोध गंभीरता से करना होगा। उन्होंने सभी प्रमुख राजनीतिक दलों पर प्रहार करते हुए कहा कि जो वर्षों पुराने हैं उन पर भरोसा नहीं रहा जो नए आए हैं उनके पास अनुभव नहीं हैं। उन्होंने आम आदमी पार्टी का हवाला देते हुए कहा कि कुछ दिन पहले तक दिन-रात इन्हें खबर में दिखाया जाता था लेकिन अब कहाँ हैं वे खबरें। हमें किसी के प्रति विचार बनाने से पहले स्वयं विचार अवश्य कर लेना चाहिए।

इस विषय पर अपनी भावना व्यक्त करते हुए श्री मनोज श्रीवास्तव ने मीडिया के चरित्र पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कुछ दिन पहले तक फ्रीडम आफ प्रेस की बात होती थी इन दिनों फ्रीडम फार प्रेस की चर्चा होती है। पहले जो उत्तर देने वाला हुआ करता था, वह ज्यादा विद्वान् और प्रज्ञावान समझा जाता था। आज जो सवाल पूछता है वह ज्यादा आक्रामक होता है, जबकि जवाब देने वाला सकुचाया हुआ ही रहता है। इस अवसर पर उपस्थित संस्कृति एंव पर्यटन मंत्री श्री सुरेन्द्र  पटवा ने इनसाइट मीडिया अवार्ड से सम्मानित समस्त लोगो को बधाई देते हुए मीडिया को तटस्थ रहने की गुजारिश की। इस अवसर पर इनसाईट मीडिया नेटर्वक के प्रधान संपादक श्री राजेश भाटिया ने भविष्यगत कई महत्वपूर्ण योजना की घोषणा भी की।

Rajesh Bhatia
Editor
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मीडिया से कभी नेता डरते थे, अब मीडिया के कठपुतली बनने का खतरा

Vikas Mishra : मदारी जिस तरह बंदर नचाता है, उसी तरह राजनीतिक पार्टियां मीडिया को नचाने में लगी हैं। एक बड़ा रंगमंच सजा है। जनता न्यूज चैनल देखकर कहती है कि यही सबसे बड़ी ताकत है। हम इस सिस्टम के भीतर बैठे हैं, हम देख रहे हैं मीडिया की ताकत की सच्चाई को। जो मजा दे रहा है, जिसे देखकर मजा मिल रहा है, उसे दिखाया जा रहा है। अगर पत्रकार हैं तो दिल पर हाथ रखकर बोलिए- क्या शोएब इकबाल, विनोद बिन्नी, रामबीर शौकीन के गिराए केजरीवाल सरकार गिरनी थी..? ये तीन थे, पांच भी होते तो भी कुछ नहीं उखड़ना था।

तीनों आए, हीरो बन गए, दो ने आज केजरीवाल से सेटिंग कर ली। सबकी चांदी हो गई, लेकिन आम आदमी पार्टी ने जमकर मीडिया का फायदा उठाया, प्राइम टाइम में सरकार पर संकट छाया रहा। अखबार सुबह इसी से रंगे थे, किसी ने नहीं सोचा कि जब तक बीजेपी या कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाती, ये सरकार गिर नहीं सकती। यही नहीं इन तीन तिलंगों के पॉलिटिकल स्टंट को आधार बनाकर आम आदमी पार्टी ने बीजेपी-कांग्रेस दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया कि ये सरकार गिराने की साजिश हो रही है। सच तो ये है कि कोई भी पार्टी इस वक्त केजरीवाल सरकार को गिराने का संकट मोल नहीं लेना चाहती। केजरीवाल के अलावा उनकी सरकार को कोई और गिरा ही नहीं सकता।

सभी राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से मीडिया का फायदा ले रहे हैं। मोदी कूड़ा बोलें, करकट उगलें, लेकिन उनका हर भाषण लाइव कटता है। उससे पहले किसने बोला, बाद में कौन बोला, पता नहीं। राहुल गांधी, सोनिया गांधी बोलती हैं तो भी लाइव कटता है। बाकी खबरें स्वाहा हैं। आजम खान की भैंस को जितना पुलिस ने खोजा, उससे ज्यादा मीडिया ने खोजा।

नेताओं की औकात देखिए, पहले तो नखरे दिखाते हैं, फिर खुद तय करते हैं कि क्या पूछा जाएगा और क्या नहीं। तब इंटरव्यू तय होता है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी, नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू के लिए हर मीडिया हाउस के अप्लीकेशन बरसों से लगे हैं, जिसके हाथ इंटरव्यू लग गया वो सबसे बड़ा खिलाड़ी। लालू यादव जैसे नेता, जिन्हें अदालत से बाकायदा सजा मिल चुकी है, वो बड़ी शान से बताते हैं कि फलां-फलां बड़े पत्रकार ने फोन किया था, मैंने इंटरव्यू नहीं दिया।

देश के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान- भारतीय जनसंचार संस्थान से मैंने पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया था। पहला सबक था जो जैसा है, वैसा ही वर्णन करना है, अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ना है। दूसरा सबक- निरपेक्ष रहना है। तीसरा सबक- चौकन्ना रहना है कि कहीं कोई अपनी खबर प्लांट तो नहीं करना चाहता। चौथा सबक…पांचवा सबक..छठां सबक..। तमाम सबक अगर भूलेंगे नहीं तो इस रफ्तार में चलना मुमकिन नहीं। निरपेक्षता बेमानी हो चुकी है। विरोध होगा तो ऐसा कि नरक में ढकेलने के लिए नए नए मुहावरे गढ़ लिए जाएंगे। समर्थन होगा तो सिर पर ही नहीं आसमान पर चढ़ा देंगे। कैसी निरपेक्षता, कहां की निरपेक्षता।

मीडिया के दफ्तर में संपूर्ण भारत है। राष्ट्रवादी हैं, नक्सलवादी हैं, वामपंथी हैं, दामपंथी हैं। जिसके हाथ जो लग गया, अपना एजेंडा जुड़ गया। साफ दिखता है। रिमोट से चैनल बदलकर देख लें। कहीं केजरीवाल को गाली पड़ रही होगी, कहीं ताली पड़ रही होगी। कहीं मोदी ठोंके जा रहे होंगे, कहीं मोदी की बम बम हो रही होगी। हम इससे निराश नहीं है, दुखी भी नहीं हैं, मेरी सोच दकियानूस नहीं है, फिर भी लगता है कि कुछ सोचना पड़ेगा, वरना जिस मीडिया के नाम से बड़े-बड़े नेताओं की धोती गीली हो जाती थी, वो मीडिया इनकी कठपुतली न बन जाए।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

क्या पी7न्यूज के बुरे दिन शुरू हो गए हैं!

चर्चा है कि पी7न्यूज चैनल के प्रबंधन ने चैनल के वरिष्ठों को कह दिया है कि चैनल को खुद चलाओ. यानि कंपनी अब चैनल चलाने के लिए पैसे नहीं देगी, खुद चैनल के जरिए पैसे निकालो और इसे चलाओ. इन दिनों चैनल के अंदर हालात ऐसे हैं कि एक के बाद एक इस्तीफों की झड़ी लग रही है. वैसे तो पिछले चार सालों में इस चैनल के इनपुट हेड के तौर पर कई दिग्गज आये और वक़्त के साथ इस चैनल को अलविदा भी कहते गए लेकिन जबसे 2011 से चैनल में सहारा परिवार से लोग आये तो चैनल के बुरे दिन शुरू हो गए.

एम्प्लाइज चाह कर भी अपना मुंह नहीं खोल सकते. मैनेजमेंट इन दिनों एक के बाद एक तुगलकी फरमान जारी कर रहा है. असाइनमेंट की लगभग पूरी टीम जो चैनल की शुरुआत से जुडी थी वह सब दीपक चौरसिया के चैनल इंडिया न्यूज़ जा चुकी है. पिछले साल एसाइनमेंट से डिप्टी एसोसिएट प्रोड्यूसर प्रशांत मिश्रा ने जैसे ही इंडिया न्यूज़ में बतौर एसाइनमेंट हेड ज्वाइन किया, वैसे ही वह सबसे पहले पी7न्यूज के रिपोर्टर राकेश सिंह रॉकी को ले गए. इसके बाद तो मानो बाढ़ आ गयी. फिर एक एक करके प्रशांत मिश्रा के सभी करीबी इंडिया न्यूज़ की दहलीज़ पर दस्तक देने पहंच गए.  प्रशांत मिश्रा ने पी7न्यूज के पूरे एसाइनमेंट को खाली कर उसे अनाथ कर दिया. विनय भंडारी, रशीद, दिगंत कुमार, सचिन तिवारी जैसे लोगों ने इंडिया न्यूज़ का दामन थाम लिया.

खबर यह भी है कि चैनल कई जगह बंद है. चैनल के अंदर करीब करोड़ों के गबन की चर्चाएं हैं. आरोप है कि गबन को उपर बैठे कई लोगों ने ही अंजाम दिया है. इस बाबत चैनल के अंदर खलबली मची हुई है. टाइम से सेलरी भी नहीं आ रही है. जो सेलरी 7 तारीख तक आती थी अब वो 15 तारीख से लेकर 25 तारीख के बीच टुकड़ों में आने लगी है.  पिछले 5 महीने से चैनल की यही हालत है. अभी हाल ही में चैनल ने 'हरियाणा एक्सप्रेस' के नाम से एक रीजनल चैनल भी खोल डाला. चैनल ने पहले ही अपना एमपी छत्तीसगढ़ रीजनल चैनल खोला हुआ है. चैनल ने दिल्ली एनसीआर को बंद करके हरियाणा एक्सप्रेस पर्ल्स एनसीआर में तब्दील कर दिया है.

चैनल के हालात यह हो चुके हैं कि चैनल ने दिल्ली और मुम्बई को मिलाकर अपनी दो ओबी वैन्स को हटा दिया है.  शूट पर जाने वाली गाड़ियों के लिए तेल की कमी पड़ने लगी है और जिस पेट्रोल पंप से तेल डलता था उसने लाखों बकाया होने के कारण तेल देने से मना कर दिया. फिलहाल यहां काम कर रहा हर एम्प्लाई डरा हुआ है. सब सोच रहे हैं कि आखिर चैनल का क्या होगा? बेचारे रिपोर्टर दिन भर फील्ड में जान देते हैं और चैनल कहीं दिखता नहीं. न्यूज़ नेशन और न्यूज़ एक्सप्रेस जैसे नए चैनल्स टाटा स्काई पर दिखने लगे लेकिन पी7न्यूज बद से बदतर होता चला गया.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘आप’ से चुनाव लड़ने को जज साहब ने लिया वीआरएस

देवरिया 6 फरवरी। अन्ना को अपना आदर्श मानने वाले एवं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार खास तौर पर न्यायपालिका में फैली बुराईयों को समाप्त करने की नीयत से एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है। सेवा निवृत्ति का आदेश मिलते ही न्यायिक अधिकारी ने आम आदमी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। न्यायिक अधिकारी का कहना है कि वह देवरिया को अपना कर्मभूमि बनाएंगे तथा यदि पार्टी ने उन्हे चुनाव लड़ने का मौका दिया तो देवरिया लोकसभा से चुनाव भी लड़ सकते हैं।

 
देवरिया जिले में अपर जिला एवं संत्र न्यायाधीश के पद पर तैनात रह चुके अरूण कुमार त्रिपाठी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद गुरूवार को आम आदमी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। अभी एक सप्ताह पूर्व तक श्री त्रिपाठी परिवार न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर विराजमान थे। लेकिन माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय और महामहिम राज्यपाल के यहां से वीआरएस की स्वीकृति मिलते ही न्यायिक अधिकारी ने जज का चोला छोड़कर आम आदमी के रूप में खुद को प्रस्तुत कर दिया।
 
पीटीआई/भाषा से गुरूवार को वार्ता करते हुए उन्होने कहा कि अन्ना और अरविन्द केजरीवाल में कोई मतभेद नहीं है। असल में अरविन्द केजरीवाल अन्ना के सिद्धान्तों को मूर्तरूप प्रदान कर रहे हैं। एक प्रश्न के जबाब में उन्होने कहा कि दिल्ली में लाल डोरा में उनका एक छोटा सा मकान है जहां उनके बच्चे रहते हैं। जब अन्ना राम लीला मैदान में लोगों के अन्दर भ्रष्टाचार से लड़ने का जोश पैदा कर रहे थे तो उन्होने उनके भाषण को सुना। तभी से उनके मन में न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार से लड़ने की इच्छा जागृति हुई और उन्होने अन्ततः इसे अंजाम दे दिया। न्यायपालिका के क्षेत्र में 28 वर्ष तक अपनी सेवा दे चुके श्री त्रिपाठी ने बताया कि अधीनस्थ रह कर कभी कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।

इटावा जिले के मूल निवासी पूर्व न्यायिक अधिकारी श्री त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 2009 में जब वे एटा जिले में तैनात थे तो वहां के एक जज की शिकायत उच्च न्यायालय में की थी। लेकिन बाद में न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार की वजह से उस जज को दोष मुक्त कर दिया गया। इस घटना से वे अत्यन्त दुःखी हुए।

 

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट। संपर्क: 9454918198

विवेक वशिष्ठ, जगदीप शुक्ला और मयंक तिवारी की नई पारी

पत्रकार विवेक वशिष्ठ साई टीवी से जुड़ गये हैं. बताया जाता है कि उन्हें चैनल हेड बनाया गया है. विवेक वशिष्ठ पिछले बारह साल से मीडिया में काम कर रहे हैं. इससे पहले वो मंगल कलश टीवी, कात्यायनी टीवी में भी कार्यरत रहे.

दैनिक जागरण, मेरठ में कार्यरत जूनियर सब एडिटर जगदीप शुक्ला ने बीते दिनों इस्तीफा देकर बरेली में अमर उजाला अखबार ज्वाइन कर लिया. जगदीप जागरण में जनरल डेस्क, यूपी डेस्क, इनपुट डेस्क पर काम कर चुके हैं. अमर उजाला में वे सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं.

भास्कर टीवी बालाघाट के ब्यूरो हेड मयंक तिवारी ने भास्कर इस्तीफा दे दिया है. वो जल्द नई पारी की शुरुआत रायपुर में किसी प्रादेशिक चैनल के साथ करेंगे.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

हरिराम पांडेय के संपादकीय लेख संकलन ‘कही-अनकही’ का लोकार्पण

कोलकाता: पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम. के. नारायणन ने मंगलवार 4 फरवीर 2014 की शाम 38वें अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले में सन्मार्ग के स्टॉल पर हरिराम पांडेय लिखित सन्मार्ग के संपादकीय लेखों के संकलन 'कही-अनकही' का लोकार्पण किया। इसमें 2013 में प्रकाशित संपादकीय लेख हैं। अपनी बेबाक, तटस्थ, पारदर्शी तथा संवेदनशील लेखन के लिए श्री पांडेय पत्रकारिता की दुनिया में अलग से पहचाने जाते हैं। बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी, प्रख्यात हिन्दी आलोचक डॉ. नामवर सिंह, डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी, कवि केदारनाथ सिंह सहित विभिन्न साहित्यकार भी उनके सम्पादकीय के मुरीद रहे हैं।

डॉ. अभिज्ञात की रिपोर्ट।
 

 

Women achievers conferred with ‘Indian Woman Power Awards’

New Delhi: Indian Woman Power Awards were conferred on 20 women achievers from various fields in a glittering function organised by Seemapuri Times Magazine on 29th January 2014 at the constitution club, New Delhi . The awards were conferred by Mr. Harish Rawat, then former union minister, Govt.of India/ Chief Minister of Uttarakhand. The awards were presented to those women who are working tirelessly for a good & strong Nation building.

The Awardees include Shallu Jindal-Distinguished Kuchipudi Dancer & Social Contributor, Zahabiya Khorakiwala-Managing Director Wockhardt Group of Hospitals, Shail Kapoor-President,Kashi Jewellers, Dolly Ahluwalia-Indian Costume Designer and Film Actress, Aditi Balbir-Co Founder & Chief Financial Officer V Resorts, Nita Mehta-An Indian Celebrity Chef, Author,Restaurateur, Bharti Taneja-An Internationally Acclaimed Cosmetologist, Lipika Sud-India's Leading Interior Designer, Ex.Lt.Rita Gangwani-Personality Architect, Srimathy Kesan-Director,SpaceKidz India, T. Anita-Fitness Expert, etc.

Indian Woman Power Awards are meant to recognize the selfless and dedicated inspiring feats of women leaders from the field of business, politics, social welfare, sports, education, culture, journalism, technology, acting, singing, dancing etc.

 

V.K.Mishra
News Editor,
Seemapuri Times

मियां और महावीर को साथ बैठाने की बेवकूफी

जैन समाज को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा मिल गया। जैन समाज के बहुत सारे लोग इससे खुश हैं। जो लोग खुश हो रहे हैं, खुशी व्यक्त कर रहे हैं, और खुशी का पैगाम पसार रहे हैं, उनको खुश होने का हक भी है। क्योंकि वे नहीं जानते कि जैन समाज को अल्पसंख्यक बनाकर कांग्रेस ने एक तीर से कितने निशाने साध लिए हैं। वे यह भी नहीं जानते कि जैन समाज को मिले इस दर्जे से समाज का कोई भला नहीं होना है। क्योंकि जैन समाज का जो भला होना था, वह तो उसकी अपनी मेहनत, अपनी ताकत और अपने बल बूते पर हो चुका। उसे फायदे के नाम पर कुछ नहीं मिलेगा। क्योंकि वह एक सक्षम समाज है। यह दर्जा ठीक वैसा ही है, जैसे सिख भी अल्प संख्यक हैं और उनको किसी भी तरह का कोई सरकारी फायदा अल्पसंख्यक होने के कारण नहीं मिलता।

जैन समाज के अल्पसंख्यक घोषित होने के बाद जिस तरह से कुछ सामाजिक बंदर बहुत बहुत उछलकूद कर रहे हैं, उनको जरा पूछिये कि उनकी खुशी का कारण क्या है, तो उनके पास कोई जवाब नहीं है। उनको तो बस, सरकार की मेहरबानी की खबर पर खुश होने का बहाना चाहिए था। लेकिन असल बात यह है कि जैन समाज सदियों से अपने दम पर अपने भविष्य का निर्माता तो रहा ही है, वह दूसरो समुदायों का भविष्य भी गढ़ता रहा है। इसलिए वह कभी किसी भी सरकार की मेहबानियों का मोहताज नहीं रहा है।

असल बात यह है कि जैन समाज का एक बहुत बड़ा प्रबुद्ध वर्ग शुरू से ही नहीं चाहता था कि समाज को अल्पसंख्यक होने का सरकारी दर्जा मिले। क्योंकि इस दर्जे के मिलने के बाद अब राजनीतिक रूप से जैन समाज को उस वर्ग के साथ बैठना पड़ेगा, या अधिकारिक रूप से उनके साथ गिना जाएगा, जिनके साथ दिखने में भी जैन समाज को हर तरह का एतराज हमेशा से रहा है। इस पर बहुत से हिंदू भी नाखुश हैं। क्योंकि जैनों को मुसलमानों की तरह अल्पसंख्यक की मान्यता देकर कांग्रेस सरकार ने जैन समाज की उच्च धार्मिक मान्यताओं को तो मुसलमानों की बराबरी में खड़ा किया ही है, हिंदुओं की एकता को भंग कर दिया है और वृहत्त हिंदू जनसंख्या को कम कर दिया है। हम सबको कांग्रेस सरकार के इस षड़यंत्र को समझना चाहिए कि मनमोहन सिंह की सरकार ने हिंदु समाज के सबसे सक्षम वर्ग जैन समाज को हिंदुओं से काटकर मुसलमानों के समकक्ष खड़ा कर दिया है। महावीर के अनुयायियों को अब मुसलमानों के साथ गिना जाएगा, यह किसी भी जैन को सहज स्वीकार्य नहीं हो सकता।

देश के जाने माने लेखक – चिंतक डॉ. वेद प्रताप वैदिक मानते हैं कि जैन धर्म हमारी दुनिया में हिदू धर्म से भी पुराना है। जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर 2500 साल से भी ज्यादा समय पहले हुए थे। तब हिंदू धर्म नाम की कोई चीज़ भारत में नहीं थी। जिसे आज हिंदू धर्म के नाम से हम जानते हैं, उसके मंदिर, मूर्तियां, पूजा-स्थल आदि दो हजार साल से ज्यादा पुराने कहीं नहीं मिलते। यानी जैन संप्रदाय हिंदू संप्रदाय से कम से कम 500 साल से भी ज्यादा पुराना है।  वैदिक मानते हैं कि जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जा देना वोट कबाड़ने का सबसे सस्ता तरीका है, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा कभी नहीं हो सकता। क्योंकि जहां तक वोट देने का सवाल है, जैन एक प्रबुद्ध समाज है और वह मुसलमानों की तरह भेड़चाल नहीं चलता। इस समाज में हर व्यक्ति अपना निर्णय स्वयं करता है। इसलिए कांग्रेस ने थोक वोटों के लालच में यह जो कदम उठाया है। लेकिन इससे उसे निराशा ही हाथ लगेगी, क्योंकि जैन समाज सदा से ही कांग्रेस के विरोध में ज्यादा रहा है। और वोट पाने के लिए कांग्रेस की जिस करह की करतूत रही हैं, जैन समाज उसका समर्थन कभी कर ही नहीं सकता।

ऐसी आम धारणा है कि अल्पसंख्यक समाज को उनके स्कूल-कालेजों, अस्पतालों, धर्मशालाओं, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों आदि को स्वायत्ता मिलती है। सरकारी हस्तक्षेप कम से कम होता है। सरकारी प्रावधान के अनुसार उनकी हर योजना पर 15 प्रतिशत सरकारी मदद मिलेगी। लेकिन इस तरह की मदद लेने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। बाबू साहब के सामने हाथ जोड़ने पड़ते हैं, और सरकारी अफसरों और नेताओं को रिश्वत देनी पड़ती है। मतलब, कि 15 प्रतिशत में से कुछ प्रतिशत तो पहले से लगाना पड़ता है। इतनी सी सरकारी भीख के लिए कोई भी स्वाभिमानी समाज किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। जो जैन समाज हमेशा से दाता रहा है, दान कते मामले में जैन समाज की दुहाई दी जाती है वह 5 – 10 टक्के के लिए किसी के सामने क्या हाथ फैलाएगा। जैन समुदाय देश का सबसे अधिक उद्यमी और स्वाभिमानी समुदाय है। उसमें पढ़े लिखे लोगों की भी कोई कमी नहीं है। जैन समाज किसी भी मदद का मोहताज़ नहीं है। सरकार द्वारा जैन समाज को मिले इस नए दर्जे के बाद जो लोग बहुत उछल कूद कर रहे हैं, उनसे जरा पूछिये कि देश के 11 राज्यों में तो जैन समाज को पहले से ही अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है, वहां किसी ने क्या तीर मार लिया।

दरअसल, जैन समाज को अल्पसंख्यक बनाकर खुश करने के पीछे की साजिश को समझिये। मिलने वाला कुछ भी नहीं है, उलटे महावीर को मुसलमानों के साथ बिठाने की साजिश है। मुर्ग – मुसल्लम वालों के साथ हमारा पानी पीने का भी व्यवहार नहीं है, अब वे हमारी बराबरी में बैठेंगे, विभिन्न राजनीतिक दलों के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठों में मुसलमान नेताओं की अध्यक्षता में जैन काम करेंगे। जैन समाज के अल्पसंख्यकीय मामलों में उनका दखल होगा, वे जैन समाज को लोगों के भी नेता होंगे, क्योंकि जैन भले ही अल्पसंख्यक है, लेकिन अल्पसंख्यकों में तो मुसलमान ही बहुसंख्यक हैं। कांग्रेस सरकार ने बहुत सोंच समझकर जैन समाज को मुसलमानों के मातहत खड़ा होने का यह खेल तैयार किया है। फिर भी कुछ लोगों को अपने अल्पसंख्यक होने पर खुशी है, तो फिर उनके दिमाग के दिवालियेपन का भगवान ही मालिक है। ऐसे बंदरों को खुश होने दीजिए, क्योंकि उनको समझ नहीं है। लेकिन जो लोग समझदार हैं, उनको अपने आप को महावीर का अनुयायी होने के कारण मुसलमानों के साथ बैठने से बचना चाहिए।    

जैन समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग पहले ही सरकार की इस चाल को समझ रहा था, क्योंकि अल्पसंख्यक होने की वजह से उसे जो फायदे मिलने हैं, उसके लिए मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चैन्नई, हैदराबाद, पुणे, अहमदाबाद, जयपुर, जैसे बड़े शहरों में तो कोई भी सहज स्कोप नहीं है। क्योंकि यहां पहले से ही जिनको यह र्दजा मिला हुआ था, वे सारे फायदे चट करके बैठ गए हैं। जैन समाज के लिए पीछे कुछ बचा नहीं है। आप ही बताइए, मुंबई में अगर जैन समाज को किसी स्कूल, किसी कॉलेज या किसी शैक्षणिक संस्थान के लिए कोई जमीन चाहिए तो कहां मिलेगी। आप इन पंक्तियों को याद रखना, जैन समाज को अल्पसंख्यक होने की वजह से स्कूल वगैरह के लिए आनेवाले दस सालों में भी अगर कोई जमीन मुंबई में मिल जाए, तो कहना। इस तरह के सारे फायदे तो मुसलमान लोग पहले से ही ले चुके, महावीर के अनुयायियों के लिए बाकी कुछ बचा नहीं है। भूखे नंगों की पूरी बारात जब सारा भोजन करले, तो उसके बाद किसी के खाने के लिए पीछे बचता क्या है, कोई बताएगा ? 

 

                                                                     लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं।

लखनऊ क्राईम-ब्रान्च में तैनात सिपाही पर बलात्कार का आरोप

देवरिया, 5 फरवरी। उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के दामन पर एक और दाग लग गया है। देवरिया जिले के रहने वाले एक सिपाही के खिलाफ एक युवती ने दुराचार करने का आरोप लगाया है। युवती का यह भी आरोप है कि वर्तमान समय में सिपाही लखनऊ में क्राईच ब्रान्च में तैनात है जो गन्दे-गन्दे एवं धमकी भरे एसएमएस भेजकर युवती तथा उसके परिजनों को परेशान कर रहा है। इस मामले को लेकर पिछले कई महीने से युवती परेशान थी। लेकिन उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। वह कई बार कोतवाली थाने गई थी, लेकिन थाने की पुलिस उसे सिर्फ आश्वासन दे रही थी और उधर आरोपी सिपाही युवती का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था।

थाने में सुनवाई न होने पर युवती के परिजन पुलिस अधीक्षक रवि शंकर छवि से बुधवार को मिले। पुलिस अधीक्षक ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अपने मातहतों को तत्तकाल मुकदमा दर्ज कर आवश्यक कार्यवाही करने का आदेश दिया। कोतवाली थाने में इस सम्बन्ध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा कर युवती को मेडिकल के लिए भिजवा दिया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कोतवाली थाने के रामगुलाम टोला मुहल्ला निवासी युवती वर्ष 2012 में गोरखपुर में रहकर इण्टरमीडिएट की पढ़ाई कर रही थी कि उसी दौरान जुबेर अहमद सिद्दिकी पुत्र अलाउद्दीन सिद्दिकी से उसकी जान पहचान हो गई। देवरिया जिले का रहने वाला अहमद सिद्दिकी इस समय, सम्भवतः, क्राईम-ब्रान्च लखनऊ में तैनात है। युवती के मुताबिक वर्ष 2012 में एक दिन आरोपी ने गोरखपुर के होटल 'उपवन' में युवती को बुलाया और कोल्ड ड्रिंक में नशे की गोली मिलाकर पिला दी, जिससे वह बेहोश हो गई। युवती का कहना है कि उसकी बेहोशी का फायदा उठा अहमद सिद्दिकी ने उसके साथ दुराचार किया। उसके बाद से, इस वर्ष जनवरी माह तक अहमद सिद्दिकी उसका लगातार शोषण करता रहा है। इसी दौरान आरोपी ने उसके शैक्षणिक प्रमाण पत्र भी रख लिए और अश्लील वीडियो क्लिप बनाकर उसे ब्लैकमेल करता रहा।
    
युवती का कहना है कि अब भी आरोपी उसे मिलने के लिए बुलाता है और नहीं मिलने पर मोबाईल फोन से गन्दे गन्दे एसएमएस भेजता है तथा पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी देता है। आरोपी सिपाही के गन्दे एवं भददे एसएमएस अत्यन घृणित और अश्लील हैं जिनका जिक्र तक नहीं किया जा सकता। फिलहाल कोतवाली पुलिस ने विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है तथा आरोपी सिपाही की गिरफ्तारी की तैयारी कर रही है। 

 

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट। संपर्क: 9454918198

बोकारो में हुआ हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘नया सृजन’ का विमोचन

हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय प्रचार-प्रसार की मंशा से बोकारो से एक पत्रिका 'नया सृजन' का प्रकाशन आरंभ किया गया है। पत्रिका का विमोचन इस वसंत-पंचमी की संध्या को हिन्दी के मुर्धन्य साहित्यकारों और विचारकों के हाथों हुआ। पत्रिका के संपादक वेंकटेश शर्मा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि पत्रिका के बहाने दुनिया भर के हिन्दी प्रेमियों को एक मंच पर लाना और परस्पर विचार-विनिमय के लिए मंच तैयार करना ही इस पत्रिका का उद्देश्य है। इस क्रम में किसी वाद के विवाद में न पड़ कर हर हिन्दी प्रेमी एकजुट हों और अपना स्नेह-सहयोग, आशीर्वाद दें तो हिन्दी के इस विश्वव्यापी अभियान को संबल मिलेगा।

कलाकेन्द्र सेक्टर-2 में आयोजित इस समारोह में समाजसेवी और विचारक जगन्नाथ साही ने इस अवसर पर कहा कि हिन्दी भारतीयता की भावना से ओत-प्रोत भाषा है और इसकी सेवा राष्ट्र की सेवा है। वहीं कवयित्री और डीपीएस की निदेशक डॉ. हेमलता एस मोहन ने कहा कि साहित्य लोगों की सोच को परिवर्तित करता है और अच्छाइयों की ओर प्रेरित करता है। समाजसेवी और चिंतक सरयू राय, रेलवे में एसपी और कवि प्रशांत कर्ण और जिप अध्यक्ष मिहिर सिंह ने भी हिन्दी के लिए किये जा रहे इस प्रयास की सराहना की। मौके पर उपस्थित शिक्षाविद् व चिन्मय विद्यालय के प्राचार्य अशोक कुमार सिंह ने भी अपने विचार रखे। अतिथियों का स्वागत नरेन्द्र कुमार राय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पूर्णेन्दु पुष्पेश ने किया।
 
इस अवसर पर एक कवि-सम्मेलन का आयोजन भी किया गया जिसकी अध्यक्षता डॉ. जगन्नाथ साही ने और संचालन डॉ. परमेश्वर भारती ने किया। कवि सम्मेलन में डॉ. हेमलता एस मोहन, भावना वर्मा, कस्तूरी सिन्हा, ज्योति वर्मा, उषा झा, डॉ. रंजना श्रीवास्तव, डॉ. राम सागर सिंह, डॉ. सुखनंदन सिंह सदय, प्रषांत कुमार कर्ण, श्यामल सुमन, महेश मेहंदी, राम नारायण उपाध्याय, त्रिलोकी नाथ टंडन, आकाश खूंटी, शिवनाथ प्रमाणिक, प्रदीप कुमार दीपक, अरुण पाठक, राजीव कंठ आदि ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध कर दिया।
 

चूरू के कुमार अजय को साहित्य अकादमी का ‘युवा पुरस्कार’

चूरू, 5 फरवरी। भारत सरकार की साहित्य अकादमी की ओर से बुधवार को जोधपुर में आयोजित समारोह में राजस्थानी के चर्चित लेखक कुमार अजय को युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नामचीन कवि, आलोचक नंदकिशोर आचार्य के मुख्य आतिथ्य में आयोजित समारोह में अकादेमी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अजय को ताम्रफलक व पचास हजार रुपए का चैक देकर सम्मानित किया।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने इस मौके पर कहा कि रचनात्मकता उम्र की मोहताज नहीं होती है और बहुत से व्यक्तियों ने छोटी सी उम्र में ही अद्भुत कृतियों का सृजन कर साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने प्रसन्नता जताई कि आज सभी भाषाओं के युवा बेहतरीन लेखन कर रहे हैं, जिससे साहित्य के एक बेहतर भविष्य का शुभ संकेत मिलता है।

इस मौके पर नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि सच्चा लेखक वही है जो अपनी अनुभूतियों के जरिए सत्य का अन्वेषण करते हुए अपने सत्य को बरामद करता है और उसे अभिव्यक्त करता है। अनुभव की प्रक्रिया से गुजरे बिना लेखन में गहराई संभव नहीं है। साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवास राव ने आभार जताया।

घांघू (चूरू) के युवा लेखक कुमार अजय को इस मौके पर उनकी पहली काव्य कृति ‘संजीवणी के लिए यह पुरस्कार दिया गया। पुरस्कार पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अजय ने कहा कि राजस्थानी जैसी समृद्ध साहित्य परम्परा वाली भाषा के लिए सम्मानित होना अत्यंत गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी को मिल रही यह साहित्यिक मान्यता अब संवैधानिक मान्यता का मार्ग प्रशस्त करेगी। उन्होंने कहा कि पुरस्कार से मिले दायित्व को मैं समझता हूं और एक लेखक होने के नाते समय की चुनौतियों के सामने डटकर खड़ा रहने का संकल्प लेता हूं।

इस मौके पर साहित्य अकादेमी राजस्थानी परामश मंडल के संयोजक डॉ. अर्जुन देव चारण, ख्यातनाम साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी, मशहूर शायर शीन काफ निजाम, कुमार अजय के पिता परमेश्वर लाल, रमाकांत शर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं गण्यमान्य नागरिक मौजूद थे। समारोह में भारत की विभिन्न 21 भाषाओं के साहित्यकारों को युवा पुरस्कार दिए गए। हिन्दी के लिए अर्चना भैसारे को मिला पुरस्कार।

 

दुलाराम सहारन की रिपोर्ट। संपर्क: drsaharan09@gmail.com
 

बिहार विधानसभा की प्रेस सलाहकार समिति में सिर्फ तीन गैर-सवर्ण

बिहार विधान सभा की प्रेस सलाहकार समिति एक महत्वपूर्ण समिति है। यही समिति पत्रकारों से जुड़े मामलों को देखती है। समिति के सभापति स्वयं विधानसभा के अध्यक्ष होते हैं, जबकि कोई पत्रकार समिति का उपाध्यक्ष होता है। इस प्रतिष्ठापूर्ण समिति में सदैव से सवर्ण पत्रकारों का आधिपत्य रहा है, जबकि मीडिया में बड़ी संख्या में दलित व पिछड़ी जाति के पत्रकार भी हैं। लेकिन उनको कभी सम्मानजनक प्रतिनिधित्व प्रेस सलाहकार समिति में नहीं मिला।

वर्तमान प्रेस सलाहकर समिति में 28 लोग हैं, उसमें से मात्र तीन गैर-सवर्ण हैं। इस दिशा में अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने कोई पहल नहीं की और न मीडिया कंपनियों ने प्रेस सलाहकार समिति के लिए किसी गैर-सवर्ण पत्रकार का नाम सुझाया। वैसी स्थिति में अध्यक्ष के भी हाथ बंध जाते हैं। यह विडंबना है कि 1990 के बाद से विधानसभा के सभी अध्यक्ष दलित व पिछड़ी जातियों के ही रहे हैं, इसके बाद भी प्रेस सलाहकार समिति का चेहरा नहीं बदला और न बदलने के लक्षण ही दिखते हैं। लेकिन मीडिया में सक्रिय दलित व पिछड़े वर्ग के पत्रकार भी अपने प्रतिनिधित्व व सम्मान की बात उठाने लगे हैं। वैसी स्थिति में उम्मीद की जा सकती है कि शायद विरोध के स्वर के बाद प्रेस सलाहकार समिति का चेहरा व चरित्र भी बदले।

बिहार से आई एक चिट्ठी पर आधारित.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अन्ना हज़ारे ने कहा पूरे देश में पत्रकार सुरक्षा कानून की ज़रूरत है

महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर बढ़ते हमलों पर वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए राज्य में पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग की है। पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति ने इस मांग को लेकर जिला इन्फॉरमेशन ऑफिसों का घेराव करने का निर्णय लिया है। समुचे महाराष्ट्र मे 17 फरवरी को यह आंदोलन हो रहा है। इस आंदोलन का भी अन्ना हजारे जी ने समर्थन किया है।पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति के अध्यक्ष एस.एम. देशमुख के नेतृत्व मे एक प्रतिनिधि मंडल ने कल रालेगण सिद्धि मे अन्ना हजारे की मुलाकात की, आधे घंटे की बातचीत मे एस. एम. देशमुख ने महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर बढ़ते हमलों का सारा ब्यौरा अन्ना हजारे को दिया।

पत्रकारों के उपर बढ़ते हमलों की बात सुनकर अन्ना दुखी हो गये। यह क्या हो रहा है? ऐसा सवाल करते हुए उन्होने कहा कि लोकतंत्र में मीडिया अपना काम निर्भीक तरीके से कर सके इसके लिए अच्छे माहौल का निर्माण करने की जरूरत है। इसलिए केवल महाराष्ट्र में ही नहीं समुचे देश मे पत्रकार सुरक्षा कानून की जरूरत है। लेकिन पत्रकारों के उपर हमले करने वाले ज्यादातर राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता हैं। इसलिए कोई भी दल इस कानून को बनाने की पहल नहीं कर रहा है। यह स्पष्ट करते हुए अन्ना ने 17 फरवरी को हो रहे पत्रकार आंदोलन का समर्थन किया और जल्द से जल्द कानून बनाने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल में किरण नाईक, शरद पाबळे, सुनील वांळूज, संदीप खेडेकर समेत समिति के अन्य सदस्य सामिल थे।

 

Patrakar halla virodhi kruti samiti, Mumbai. Email: phvksm@gmail.com

सचिन को छापने-दिखाने में कारोबारी फायदा है, साएनआर राव को कौन जानता है

श्रीगंगानगर। सदियों से दुनिया की तरक्की में योगदान दे रहा विज्ञान आज क्रिकेट के सामने बौना हो गया है। ऐसे भी कह सकते हैं कि मीडिया ने विज्ञान को क्रिकेट से हरवा दिया है। आज मीडिया क्रिकेट को विज्ञान की तुलना में अधिक महत्व दे रहा है। उस विज्ञान की उपेक्षा की जा रही है जिसका तरक्की में सबसे अधिक योगदान होता है। मीडिया के  वर्तमान आधुनिक स्वरूप में भी विज्ञान का योगदान है ना कि क्रिकेट का। वैज्ञानिक सीएनआर राव और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया। लेकिन मीडिया ने जिस प्रकार से सचिन को प्रमुखता दी उससे तो ऐसे लगता है जैसे श्री राव का उनके सामने कोई अस्तित्व ही नहीं है। श्री राव की तुलना में सचिन की ये बड़ी-बड़ी फोटो। खबरों में उनसे बड़े अक्षरों में नाम। अखबारों में भी श्री राव से पहले सचिन का नाम लिखा गया मानो सचिन के सामने वे तो कुछ हैं ही नहीं।

एक क्रिकेटर को वैज्ञानिक की तुलना में इतनी अहमियत! जितना श्री राव को विज्ञान का अनुभव होगा उतनी उम्र होगी सचिन की। दो चार साल आगे पीछे से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ऐसे में कौन चाहेगा वैज्ञानिक बन देश और विज्ञान की सेवा करना। सब के सब क्रिकेटर बनना पसंद करेंगे। तब कैसे कौन करेगा खोज? कैसे होंगे अनुसंधान? कैसे आगे बढ़ेगा विज्ञान? कैसे और कौन करेगा सृजन? सब का सब रुक जाएगा जहां है वहीं। जड़ हो जाएगा विकास का काम, साथ में विज्ञान। जिस देश का राष्ट्रपति वैज्ञानिक रह चुका हो। उस देश के मीडिया में विज्ञान की एक खेल के सामने इतनी तौहीन! वह भी उस खेल के सामने जिसे पूरी दुनिया के देश खेलते तक नहीं। जबकि विज्ञान तो दुनिया के हर कौने में है। विज्ञान के बिना तो कुछ भी संभव नहीं। विज्ञान और वैज्ञानिक तो पुरातन है और क्रिकेट और क्रिकेटर कल के। कैसी विडम्बना है कि मीडिया विज्ञान, वैज्ञानिक और उनकी उपलब्धियों को क्रिकेट से छोटा मान रहे हैं।

आज देश का महान वैज्ञानिक उस खिलाड़ी के सामने मीडिया में छोटा हो गया जिसका समाज, देश और दुनिया के लिए ऐसा कोई योगदान नहीं जिसे ज़माना, धरती रहने तक याद रख सके। कोई खिलाड़ी उस खेल के लिए  महान हो सकता है। उसके समर्थक उसे भगवान भी कहें तो किसी को क्या आपत्ति है, लेकिन वह किसी भी सूरत में वैज्ञानिक से बड़ा नहीं हो सकता। क्योंकि वैज्ञानिक की खोज अनंत काल तक दुनिया को रास्ता दिखती है। नई खोज आगे बढ़ाने के लिए काम आती है। जबकि एक क्रिकेट खिलाड़ी के रिकॉर्ड किस के काम आएंगे! वे केवल कागजों में रहेंगे। अधिक से अधिक उस समय उनका जिक्र हो जाएगा जब कोई उसकी बराबरी करेगा या आगे निकलेगा। वे किसी खिलाड़ी के लिए तो प्रेरणा हो सकते हैं पूरी दुनिया के लिए नहीं। जबकि विज्ञान, वैज्ञानिक और उसके अनुसन्धानों से इंसान, समाज, देश और दुनिया पता नहीं कहां से कहां तक ले जाने की प्रेरणा तो देते हैं। विकास के नए-नए मार्ग उपलब्ध करवाते हैं। इसके बावजूद पता नहीं मीडिया को क्या हो गया जिसने विज्ञान, वैज्ञानिक की तुलना में क्रिकेट और क्रिकेटर को कवरेज में इतनी अधिक प्रमुखता दी। शायद उसका कारोबारी फायदा विज्ञान, वैज्ञानिक और श्री राव की बजाए क्रिकेट, क्रिकेटर और सचिन को प्रमुखता देने मे अधिक था। आज कथावाचक राधा कृष्ण शास्त्री की कही एक बात याद आ गई….उन्होने गंगानगर में कथा के दौरान कहा था, परिवारों में दो-दो बच्चे ही हुए तो फिर संत, वैज्ञानिक और सैनिक कहां से आएंगे? बेशक उन्होने यह बात किसी और संदर्भ में कही थी लेकिन बात बहुत सटीक है। समाज, देश और मीडिया में क्रिकेटर को वैज्ञानिक की तुलना में इतना अधिक महत्व मिलेगा तो फिर कोई क्यों बनेगा वैज्ञानिक।

 

लेखक गोविंद गोयल राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं, उनसे संपर्क ईमेल gg.ganganagar@yahoo.com द्वारा किया जा सकता है।

पॉलिटिकल स्टंट है गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग

सोशल मीडिया के जमाने का चलन है कि बड़े लोग मुद्दों को उछालते हैं और छोटे लोग उस पर बहस करते हैं। उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने जो आरक्षण पर बहस छेड़ी है, हम उस पर बहस करने के लिए तैयार हो गये हैं। होना भी चाहिये, हो सकता है खुद जनार्दन द्विवेदी के लिए यह मामला उतना गंभीर नहीं रहा होगा, मगर गांव-गिरांव के हम जैसे लोगों के लिए यह मसला साधारण नहीं है। माननीय महोदय के द्वारा उपलब्ध कराये गये इस मौके का हम बहस करने के लिए इस्तेमाल जरूर करेंगे और कोशिश करेंगे कि इस बहस का कोई सार्थक नतीजा सामने आये।

अभी कुछ ही दिन पहले मैं अपने गांव धमदाहा गया था, एक पारिवारिक उत्सव में भागीदारी करने के लिए। उस दौरान बचपन के एक सहपाठी से मुलाकात हुई। सहपाठी पिछड़ी जाति से संबंधित था और ऑटो चलाया करता था। हम उसी की ऑटो से गाड़ी पकड़ने पूर्णिया जा रहे थे। दोस्त से पारिवारिक मसले पर बातें होने लगी। मुझे याद आया कि मेरा वह मित्र पढ़ने लिखने में ठीक-ठाक था, मुझे आश्चर्य हुआ कि पढ़ाई-लिखाई में औसत से बेहतर होने के बावजूद उसे आरक्षण का लाभ क्यों नहीं मिला। उसने बताया कि उसकी आर्थिक क्षमता पटना में रहकर कोचिंग करने की नहीं थी, लिहाजा उसे आरक्षण वर्ग में रहने के बावजूद आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया। वह काफी बिफरा हुआ था। उसका कहना था कि आरक्षण का मसला सिर्फ अमीर और सामर्थ्यवान पिछड़ों और दलितों का है। वह कह रहा था, तुम देखो अपने गांव में किसको-किसको आरक्षण का लाभ मिला है? ये वही लोग हैं जिनके पास पहले से काफी जमीन थी। जिनके परिवार में नौकरी करने वाले लोग पहले से थे। यादवों और कुरमियों को छोड़कर किसी और जाति को आरक्षण का लाभ मिला है क्या, देख कर बताओ। वह कह रहा था कि यादवों में भी कई उपजातियां हैं, जो गरीब हैं, दूध बेचती हैं और कुछ और छोटा-मोटा धंधा करती हैं, उनके बच्चे आज क्या कर रहे हैं? कोई मेरी तरह टैंपो चला रहा है, तो कोई किसी छोटे-मोटे डॉक्टर के क्लीनिक में कंपाउंडर है। कई लोग तो हलवाही ही कर रहे हैं। उसने कहा कि देखो अपने यहां धानुख जाति भी ओबीसी है। उसके कितने लोग सरकारी नौकरी में हैं। एक भी नहीं हैं। आरक्षण ने हम लोगों को क्या दिया? सिर्फ बदनामी कि हमलोग आरक्षण श्रेणी में हैं।

दोस्त की बातों ने मेरी आंखें खोल दीं। अगड़ी जाति समूह का होने के बावजूद मंडल आंदोलन के वक्त मैंने पिछड़ों के आरक्षण का समर्थन किया था और यह समर्थन अभी भी जारी है। मगर उक्त जिन पिछड़ों के हालात बदलने का हमने सपना देखा था, वे लोग तो आज भी वहीं हैं। उसी मोड़ पर। पिछड़ों में उन्हीं लोगों को आरक्षण का लाभ मिला है जिनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति कमोबेश हम लोगों जैसी ही है। पटना में जब हम पढ़ाई करते थे तो वे भी हमारी तरह ही पढ़ाई करते थे। एक जैसे कमरों में रहते थे, एक जैसे कोचिंग में पढ़ते थे और उनके घर से भी उतना ही पैसा आता था जितना हमारे घर से। बाकी, जो लोग हमारे खेतों में बटेदारी करते थे और हैं, जो नाई, बढ़ई और कुम्हार का काम करते थे। जो हल चलाते थे और जो मछली पकड़ते थे। उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? वे आज भी अपने मां-बाप के पेशे को ही आगे बढ़ा रहे हैं, अगर बदले भी तो सिर्फ इतना कि कुछ लोगों ने चाय-पान की दुकान खोल ली, तो कोई रिक्शा-टैंपो चलाने लगा। अधिकतर लोग दिल्ली-पंजाब जाने लगे हैं। आखिर इन लोगों को आरक्षण का लाभ क्यों नहीं मिला। जबकि हम देखे हैं कि आरक्षित श्रेणी वाले कई परिवारों में एक ही घर में दस-दस लोग सरकारी नौकरी में हैं। हमनें क्या उन्हीं के लिए आरक्षण के जरिये हालात बदलने का सपना देखा था?

इन हालातों को देखकर मैं जनार्दन द्विवेदी को सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि अभी आरक्षण को आर्थिक आधार पर करने का वक्त नहीं आया है। मगर आरक्षित समूह की आंतरिक संरचना को समझने और उसकी विसंगतियों को दूर करने का वक्त जरूर है। कमोबेस यही हालात एससी-एसटी वर्ग का है। कुछ जातियां, कुछ परिवार इसका लाभ लेकर सामान्य श्रेणी के लोगों को टक्कर देने लायक हो गये हैं, मगर बड़ी आबादी आज भी हाशिये पर है। जाति जनगणना के सामने आने के बाद ऐसे कई तथ्य सामने आयेंगे कि आरक्षण का लाभ कहां तक पहुंचा और किस तरह के लोग आज भी डार्क एरिया में हैं? मगर यह समझना सबसे जरूरी है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ, क्यों विसंगतियों को दूर करने के लिए बनी इस नीति ने समाज में विसंगतियों को घटाने के बदले बढ़ा दिया है। क्योंकि पिछड़ों में सिर्फ कुरमी-यादव और दलितों में सिर्फ पासवान जाति के लोगों को इस आरक्षण नीति का लाभ मिला, शेष दसियों जातियां हाशिये पर ही छूट गयीं। बेहतर आर्थिक स्थिति की वजह से कैसे पूरी आरक्षण व्यवस्था को कुछ जातियों ने हाई-जैक कर लिया.

इसकी सबसे बड़ी वजह है कि हमारे देश की राजनीति ने आरक्षण को बहसों से परे बना दिया है। जैसे ही आरक्षण का मसला उठता है कि कई लोगों की भावनाएं आहत होने लगती हैं। बहस बहस नहीं रह जाती, वह सिर-फुटौव्वल में बदल जाती है। हम एक सुर में कहते हैं कि समाज के एक बड़े तबके के साथ हजारो सालों से अन्याय हुआ है, उसका प्रतिकार आरक्षण के जरिये ही हो सकता है, इसलिए इस पर कोई बहस नहीं की जा सकती। मगर क्या इसकी सफलता-असफलता पर विचार भी नहीं किया जा सकता। सरकार अपनी तमाम योजनाओं के प्रभाव का आकलन किसी बाहरी एजेंसी से करवाती रही है। अगर उसने हर दस साल में ही आरक्षण की सफलता-असफलता का आकलन कराया होता तो ये घाव पहले ही नजर आ जाते और इसका समाधान निकाला जा सकता था। मगर आरक्षण को राजनीतिक तौर पर ऐसा नंगा तार मान लिया गया है, जिसे छूना मौत को दावत देना है।

इसका नतीजा यही निकलता है कि इस नीति का सारा लाभ कुछ समृद्ध जातियों ने हासिल कर लिया है और पिछड़े और पिछड़ गये हैं। वे हताश हैं, अपनी स्थितियों से समझौता करने के लिए मजबूर हैं। सरकार सोंचती है कि उसने आरक्षण की सुविधा देकर उनके लिए सारा इंतजाम कर दिया है। इस लिहाज से देखें तो सबसे बड़ी जरूरत यह है कि आरक्षण की सफलता-असफलता का आकलन कराया जाये। यह पता लगाने की कोशिश की जाये कि किन जातियों को आरक्षण से बहुत कम या नहीं के बराबर लाभ मिला। इसके बाद समीक्षा करके ऐसी नीति बनायी जाये कि इस व्यवस्था का लाभ हर वंचित समुदाय के लोगों को मिले और आरक्षण की व्यवस्था का जो सामाजिक न्याय का सपना था वह ठीक से पूरा हो। अलग-अलग जातियों के लिए जगह निर्धारित करके भी यह विवाद खत्म किया जा सकता है। इसके अलावा यह भी सोचा जा सकता है कि किन जातियों-उपजातियों ने इस व्यवस्था का समुचित लाभ ले लिया है और उन्हें इस व्यवस्था से बाहर जाने की जरूरत है। कई जातियां जो तमाम पिछड़ा समुदाय की पैरोकारी करती हैं, वे वालिंटियरली खुद को इस व्यवस्था से बाहर कर उदाहरण पेश कर सकती हैं, ताकि अत्यंत पिछड़ी जातियों को अधिक लाभ मिल सके। कई जातियों के लिए तय किया जा सकता है कि अगर वे बीपीएल श्रेणी में हों तभी उन्हें आरक्षण का लाभ मिले।

जहां तक गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात है, मैं आज भी इसके खिलाफ हूं। आरक्षण गरीबी उन्मूलन की व्यवस्था नहीं है, यह सामाजिक न्याय है। सदियों से जिन जातियों को पिछड़ा रखने का अन्याय किया गया, उन्हें न्याय देना है। सवर्णो ने हमेशा प्रिविलेज का लाभ उठाया है, वे अगर गरीब हैं तो अपनी कमजोरी की वजह से। उन्हें किसी ने गरीब होने के लिए मजबूर नहीं किया। उनके लिए दूसरी कई योजनाएं हैं, उन्हें उसका लाभ लेना चाहिये। गरीब सवर्णो को आरक्षण देने की मांग एक पॉलिटिकल स्टंट से अधिक कुछ भी नहीं।

 

लेखक पुष्यमित्र के ब्लाग 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' से साभार।

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में कोर्ट में जीत को लेकर सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रियाएं

Zafar Irshad : बधाई…हम सुप्रीम कोर्ट में केस जीत गए, मजीठिआ वेज बोर्ड का चार साल बाद, और हम पत्रकार भी अब बिरयानी खा सकेंगे कभी कभी…आज दिल बहुत खुश है, नाचने का मन कर रहा है, लेकिन किसके साथ नाचूं..?…शुक्रिया हमारी यूनियन के नेताओं का जिन्होंने 4 साल तक कोर्ट के चक्कर लगाये, और हम गरीब पत्रकारों को दोगुना सैलरी तो दिलवाई ही साथ ही साथ पिछले चार साल का बकाया एरिअर भी…बधाई सुप्रीम कोर्ट को भी जिसने हम गरीब पत्रकारो की आवाज़ सुनी…. (पीटीआई कानपुर में कार्यरत पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.)

Yashwant Singh : बहुत देर से सुप्रीम कोर्ट ने मीडियाकर्मियों को न्याय दिया.. देर का न्याय अक्सर अन्याय होता है… इसी देरी के कारण मीडिया मालिकों को हजारों मीडियाकर्मियों को स्थायी नौकरी से निकालने का वक्त मिल गया या फिर इन मीडियाकर्मियों को कांट्रैक्ट पर काम करने के लिए मजबूर करने की कवायद शुरू कर दी… बहुत सारे लोग उम्मीद लिए लिए रिटायर हो गए… बहुत सारे लोगों ने पैसे के अभाव बहुत सारी मुश्किलें झेलीं… पर आज सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड को ओके कर दिया.. चार किश्तों में एरियर देना होगा, साल भर में और उसी दिन से वेज बोर्ड लागू माना जाएगा जिस दिन केंद्र सरकार ने इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की थी… अखबारों, मैग्जीनों, न्यूज एजेंसियों आदि में कार्यरत पत्रकार व गैर-पत्रकार मित्रों को मेरी तरफ से बहुत-बहुत शुभकामनाएं… (भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से)

Jitendra Dixit : सुप्रीम कोर्ट ने वेतन बोर्ड की सिफारिशों को चुनौती देने वाले विभिन्न अखबारों की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि संशोधित वेतन 11 नवंबर 2011 से लागू होगा, जिस दिन केंद्र ने सिफारिशों को अधिसूचित किया था. सिफारिशें अप्रैल 2014 से कार्यान्वित होंगी और सभी बकाया राशि का भुगतान एक साल के भीतर चार किश्तों में करना होगा. (अमर उजाला, मेरठ में कार्यरत जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से)


मूल खबरें:

मजीठिया वेज बोर्ड : मीडियाकर्मी जीते, मालिकों ने मुंहकी खाई

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मजीठिया वेतनमान 11 नवंबर 2011 से देना होगा, साल भर में 4 किश्तों में एरियर दें : सुप्रीम कोर्ट

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पीटीआई के मजीठिया वेज बोर्ड की खबर रिलीज करते ही देश भर के मीडियाकर्मियों में हर्ष

पीटीआई के मजीठिया वेज बोर्ड की खबर रिलीज करते ही देश भर के मीडियाकर्मियों में हर्ष

सुप्रीम कोर्ट में आज फैसले का दिन था. पहले से तय था कि आज मजीठिया आयोग की सिफारिश को लेकर चल रहे मुकदमे में फैसला आएगा. सब लोग टकटकी लगाए इंतजार कर रहे थे. कोर्ट ने ज्यों ही मीडियाकर्मियों के पक्ष में फैसला सुनाया, सबसे पहले न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया ने खबर रिलीज कर दी. चार टेक में रिलीज खबर में कोर्ट के फैसले की खास-खास बातों को बताया गया.

ये है पीटीआई की तरफ से जारी खबर…

SC upholds validity of Majithia wage board

PTI

New Delhi, February 7, 2014

In a victory for working journalists and newspaper employees, Supreme Court on Friday upheld the validity of the Majithia wage board, saying that its recommendation are based on genuine consideration.

It also dismissed newspaper organisations’ challenge to the constitutional validity of the working journalists and newspaper employees act.

An apex court bench headed by Chief Justice P. Sathasivam also upheld the procedure adopted by the Majithia wage board, holding that the variations pointed out in procedure was not grave in nature.

The court also upheld the independence of the two members, holding that their mere association to the government did not attribute any bias or independence to them.

The court held that the wage board will be implemented from Nov 11, 2011 when it was notified by the government and the arrears from Nov 11, 2011 to March 2014 will be paid to the employees in four equal instalments spread over a period of one year and the revised pay scales under the recommendation of Majithia wage board comes into force from April 2014.


उपरोक्त खबर की हिंदी में खास-खास बातें इस प्रकार हैं…

सर्वोच्च न्यायालय ने पत्रकारों और समाचार पत्रों के गैर पत्रकार कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को वैध ठहराया. उनका कहना है कि इसकी सिफारिश उचित विचार-विमर्श पर आधारित है.  इसके साथ ही न्यायालय ने समाचार पत्रों द्वारा संस्था में कार्यरत पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों के कानून की संवैधानिक वैधता को दी गई चुनौती को भी खारिज कर दिया है.

न्यायालय के आदेश के अनुसार यह वेतन आयोग 11 नवंबर 2011 से लागू होगा जब इसे सरकार ने पेश किया था और 11 नवंबर 2011 से मार्च 2014 के बीच बकाया वेतन भी पत्रकारों को एक साल के अंदर चार बराबर किस्तों में दिया जाएगा. इसके साथ ही मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश के अनुसार अप्रैल 2014 से नया वेतन लागू किया जाएगा.


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सुप्रीम कोर्ट ने अखबारों और समाचार एजेंसियों के पत्रकारों-गैर पत्रकारों के लिए मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफारिशों को लागू करने के आदेश देते हुए कहा है कि संशोधित वेतन 11 नवंबर 2011 से लागू होगा और सभी बकाया राशि यानि एरियर का भुगतान साल भर में चार किश्तों में करना होगा. अप्रैल 2014 से नया वेतनमान के हिसाब से सेलरी मिलने लगेगी.

ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को 11 नवंबर 2011 को अधिसूचित किया था. पर मीडिया मालिक लोग कोर्ट चले गए और इसे चैलेंज कर दिया. तबसे सब कुछ लटका पड़ा था. मीडियाकर्मी टकटकी लगाए वर्षों से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे थे. आज सुप्रीम कोर्ट ने मालिकों के खिलाफ फैसला देकर देर से ही सही, पत्रकारों के पक्ष में न्याय किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने वेतन बोर्ड की सिफारिशों को चुनौती देने वाले विभिन्न अखबारों की याचिकाओं को खारिज कर दिया है. संशोधित वेतन 11 नवंबर 2011 से लागू होगा जिस दिन केंद्र ने सिफारिशों को अधिसूचित किया था. कोर्ट ने कहा कि सिफारिशें अप्रैल 2014 से कार्यान्वित होंगी और सभी बकाया राशि का भुगतान एक साल के भीतर चार किश्तों में करना होगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने का आदेश दे दिया है. इस तरह मीडियाकर्मियों की जीत हुई और मालिक लोग हार गए. हालांकि मालिकों ने बड़ी चालाकी से कई वर्षों तक कोर्ट के चक्कर में वेज बोर्ड की सिफारिशें लटकाकर अरबों रुपये बचा लेने में भी सफलता हासिल कर ली है. कई अखबारों ने तो अपने परमानेंट इंप्लाइज तक को हटा दिया या कांट्रैक्ट पर कर दिया ताकि उन्हें वेज बोर्ड के हिसाब से बढ़ा हुआ वेतनमान और एरियर न देना पड़े.

बावजूद इसके, अखबारों में कार्यरत ढेर सारे मीडियाकर्मी कोर्ट के इस फैसले से लाभान्वित होंगे. अखबारों और न्यूज एजेंसियों में काम करने वाले पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला बड़ी राहत लेकर आया है. सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने वेतन बोर्ड की सिफारिशों को चुनौती देने वाले विभिन्न अखबारों की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि संशोधित वेतन 11 नवंबर 2011 से लागू होगा, जिस दिन केंद्र ने सिफारिशों को अधिसूचित किया था. सिफारिशें अप्रैल 2014 से कार्यान्वित होंगी और सभी बकाया राशि का भुगतान एक साल के भीतर चार किश्तों में करना होगा.

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पत्रकारिता विश्वविद्यालय मे सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्रारम्भ

भोपाल । माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय द्वारा संचालित सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्रारम्भ हो गया है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार सांध्यकालीन पाठ्यक्रमों में आवेदन करने की अंतिम तिथि 19 फरवरी 2014 निर्धारित की गई है। विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक सत्र 2014 में वैब संचार, वीडियो प्रोडक्‍शन, पर्यावरण संचार, भारतीय संचार परम्पराएँ, योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार, फिल्म पत्रकारिता एवं डिजिटल फोटोग्राफी जैसे विषयों में सांध्यकालीन पी.जी. डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। पाठ्यक्रम विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के साथ-साथ नौकरीपेशा व्यक्तियों, सेवानिवृत्त लोगों, सैन्य अधिकारियों तथा गृहिणियों के लिए भी उपलब्ध होंगे।

विश्वविद्यालय द्वारा सात सम्भावनाओं से भरे क्षेत्रों में सांध्यकालीन पी.जी.डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। विश्वविद्यालय का सांध्यकालीन वैब संचार पाठ्यक्रम अखबारों के ऑनलाईन संस्करण, वैब पोर्टल, वैब रेडियो एवं वैब टेलीविजन जैसे क्षेत्रों के लिए कुशलकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है। वीडियो कार्यक्रम के निर्माण सम्बन्धी तकनीकी एवं सृजनात्मक पक्ष के साथ स्टुडियो एवं आउटडोर शूटिंग, नॉनलीनियर सम्पादन, डिजिटल उपकरणों के संचालन आदि के सम्बन्ध में कुशल संचारकर्मी तैयार करने के उद्देश्य से वीडियो प्रोडक्शन का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। पर्यावरण आज समाज में ज्वलंत विषय है। पर्यावरण के विविध पक्षों की जानकारी प्रदान करने एवं इस क्षेत्र के लिए विशेष लेखन-कौशल विकसित करने के उद्देश्य से पर्यावरण संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। योग, स्वास्थ्य और आध्यात्म के क्षेत्र में व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने तथा इस क्षेत्र के लिए कुशल कार्यकर्ता को तैयार करने के उद्देश्य से योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं आध्यात्मिक संचार का सांध्यकालीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। भारतीय दर्शन एवं प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों में मौजूद संचार के विभिन्न स्वरूपों की शिक्षा एवं वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में उनके सार्थक उपयोग की दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय संचार परम्पराओं में सांध्यकालीन पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। सिनेमा के विविध क्षेत्रों में रिपोर्टिंग, फिल्म समीक्षा एवं फिल्म लेखन की दृष्टि से फिल्म पत्रकारिता का पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। फोटोग्राफी के विविध आयामों से परिचित कराने तथा कौशलपूर्ण डिजिटल फोटोग्राफी सिखाने के उद्देश्‍य से डिजिटल फोटोग्राफी का पाठ्यक्रम उपलब्‍ध हैं। प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिये 15 स्थान निर्धारित किये गये हैं।

पाठ्यक्रमों में प्रवेश स्नातक परीक्षा में प्राप्त अंकों की मेरिट के आधार पर दिया जायेगा। पाठ्यक्रमों की अवधि एक वर्ष है। प्रत्येक पाठ्यक्रम का शुल्क 10,000 रुपये रखा गया है जो विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित किश्तों में देय होगा। प्रवेश हेतु विवरणिका एवं आवेदन पत्र विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर में 150/- रुपये (अ.ज./अ.ज.जा. के लिए 100/- रुपये) जमा कर प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रत्‍येक अतिरिक्‍त आवेदन का शुल्‍क 50 रुपये निर्धारित है।  इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.mcu.ac.in से विवरणिका एवं आवेदन पत्र डाउनलोड कर निर्धारित राशि के डी.डी. के साथ आवेदन जमा किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए टेलीफोन नम्बर 0755-2553523 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

डा. पवित्र श्रीवास्तव

निदेशक

प्रवेश

प्रेस विज्ञप्ति

भारत दूत में एनई बने आरआरएस सोलंकी

वरिष्‍ठ पत्रकार आरआरएस सोलंकी ने बनारस में भारत दूत ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें यहां पर समाचार संपादक बनाया गया है. सोलंकी कुछ समय पहले ही दैनिक जागरण से रिटायर हुए थे. अब वे भारत दूत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की जिम्‍मेदारी निभाएंगे.

सन 1979 में नार्दन इंडिया पत्रिका से अपने करियर की शुरुआत करने वाले सोलंकी लंबे समय तक दैनिक जागरण को इलाहाबाद, बनारस, मेरठ और बरेली में अपनी सेवाएं दी. इसके अलावा वे जनवार्ता, स्‍वतंत्र भारत, अंग्रेजी पायनियर, जेवीजी टाइम्‍स को भी विभिन्‍न स्‍थानों पर कार्यरत रहे. अमर उजाला के साथ भी मेरठ और बरेली में जुड़े रहे. हिंदुस्‍तान, बनारस के साथ भी लंबे समय तक काम किया.  

शामली में खनन माफियाओं ने मीडियाकर्मियों पर की फायरिंग, बंधक बनाया

शामली के झिंझाना से खबर है कि बुधवार को यमुना का सीना चीर रहे रेत माफियाओं ने यमुना नदी का पानी लाल कर दिया. खनन माफियाओं ने दो पुलिस वालों की मौजूदगी में ग्रामीणों, मीडियाकर्मियों व भाकियू नेताओं पर जमकर फायरिंग कर दी. घटना में सैकड़ों अवैध हथियार खुलेआम चले, लेकिन पुलिस लाइन से गार्द में लगे दोनों सिपाही आंखे बंद कर पूरा खेल देखते रहे.

कई वर्षो से रेत खनन को लेकर चल रहा खूनी खेल बंद होने का नाम नहीं ले रहा. बुधवार को गांव बिड़ौली सैदान में किसानों ने एक पंचायत आयोजित की थी. इसमें भारतीय किसान यूनियन के नेता विनोद निर्वाल समेत काफी लोग मौजूद थे. पंचायत कर रहे किसानों का आरोप था कि सत्ताधारी नेता व प्रशासन के इशारे पर रेत माफिया जबरदस्ती जेसीबी मशीनों से हमारे खेतों से रेत खनन कर रहे हैं. इसकी शिकायत मंगलवार को एसपी शामली अनिल राय से भी की गई थी. पंचायत में किसानों ने भाकियू नेताओं से मौके पर जाकर खनन दिखाने की बात कही.

इस दौरान इलेक्ट्रानिक मीडिया से शामली से पत्रकार शरद मलिक, वरुण पंवार, पंकज व राहुल राणा व मेरठ से प्रकाशित दो अखबारों (दैनिक जागरण नहीं) के पत्रकार मौके पर कवरेज करने पहुंच गए. यमुना नदी में किसान व भाकियू नेताओं के पहुंचते ही माफियाओं ने अवैध तमंचों व बंदूकों से हमला बोल दिया. रेत माफियाओं ने पत्रकारों के कैमरे छीनकर बंधक बना लिया, साथ ही सभी की तलाशी लेकर नगदी लूट ली. कुछ पत्रकार जान बचाकर निकलने कामयाब रहे, जबकि कुछ को बंधक बना लिया गया.

माफियाओं की हुई फायरिंग में सोनू पुत्र वकील निवासी मोहब्बतपुर बागपत को ट्रैक्टर से कुचल कर घायल कर दिया, जबकि अब्बास पुत्र नजर अली निवासी बिड़ौली सैदान के पैर में गोली लग गई. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान शामली पुलिस लाइन से गार्द में लगे दोनों सिपाही मौजूद रहे. घंटों बाद पहुंची पुलिस मौके पर पहुंची. इस दौरान एसपी अनिल राय भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने पत्रकारों को मुक्त कराकर उनकी कार दिलाई. पत्रकार शरद मलिक की तरफ से एक दर्जन नामजद व साठ अज्ञात के खिलाफ तहरीर दे दी गई थी, जबकि घायलों को ऊन पीएचसी पर भर्ती कराया गया था. शामली से आए पत्रकारों में से कुछ दहशत के चलते घंटों तक गन्ने के खेत में छिपे रहे. मौके पर चल रही फायरिंग से चारों तरफ दहशत का माहौल था. ग्रामीणों व पत्रकारों ने खेतों में छिपकर बमुश्किल जान बचाई.

पत्नी पीड़ित चार हजार पति लापता…. आईआईटी में लगातार आत्महत्याएं….

Sanjay Tiwari : पति सताए तो कानून बचाए लेकिन पत्नी सताए तो पति कहां जाए? पढ़कर भौचक्क हूं कि अकेले जबलपुर में बीते पांच साल में पत्नी की प्रताड़ना से परेशान करीब साढे चार हजार पति लापता हो गये जिसमें ज्यादातर अब नर्मदा के किनारे सन्यासी होकर जीवन बिता रहे हैं।

हमारे देश के वित्त पोषित धूर्त बुद्धिजीवी हों कि सरकार, वे कभी इस नजरिए से नहीं सोच पाते कि वे जो इलाज करते हैं उससे बीमारी कितनी बढ़ जाती है और आखिरकार उस बीमारी का वह औरत खुद कितना शिकार होती है। जो खबर पढ़ी उसमें औरतें खुद अपने पतियों को तलाश रही हैं लेकिन पति लापतागंज के वासी हो गये हैं। अमेरिका और यूरोप से आयात किये जा रहे कानून केवल पति पत्नी को ही परेशान नहीं कर रहे हैं बल्कि परिवार और समाज का भी सत्यानाश कर रहे हैं।

दिल्ली के वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

Zafar Irshad : आखिर क्यों करते है आईआईटी जैसे प्रसिद्ध इंस्टीट्यूट के छात्र आत्महत्या? लास्ट 35 दिन में यह दूसरी प्रतिभा का क़त्ल था… कल फिर एक होनहार बीटेक कंप्यूटर साइंस के छात्र ने आत्महत्या कर ली… कर्नाटक का रहने वाला मंजूनाथ अपने घर का इकलौता बच्चा था… वो गरीब तो था ही साथ में पैर से विकलांग भी था…

आईआईटी का कहना है कि वो डिप्रेशन का शिकार था… इतने बड़े संस्थान के अधिकारी ऐसा बयान दे कर पल्ला नहीं झाड़ सकते है… हमने एक आरटीआई डाली थी इस मसले पर, जो जवाब मिला था कि लास्ट 7 साल में 11 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं यहाँ… आखिर सरकार इस और ध्यान क्यों नहीं देती है, कि हमारे देश की अनमोल प्रतिभा यूँ फांसी पर लटक जाए या ज़हर खा लें…कुछ करो सत्ता में बैठे हुए लोगो, यूँ प्रतिभा को अकाल मौत न मरने दो प्लीज…

कानपुर के पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.

राज्यमंत्री के नाचने को मीडिया द्वारा मुद्दा बना देना गलत बात

Jitendra Dixit : निजी जीवन में मीडिया की दखलंदाजी को लेकर गाहे-बगाहे चिंता जताया जाना वाजिब है। हर बात को बतंगड़ बनाना कहां तक उचित है? कल खबरिया चैनलों ने एक विवाह पार्टी में डांस देखने को लेकर प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री की खिंचाई की। अरे, शादी-विवाह के मौके पर नाच-गाना कोई नयी बात नहीं है। वहां शोकगीत तो नहीं होंगे।

एक तरफ ये चैनल फिल्मी नाचने-गाने वालों की छोटी-छोटी बात प्रसारित कर उन्हें युवाओं का ऑइकन बनाने में दिन-रात लगे रहते हैं तो दूसरी ओर डांस कर पेट पालने वाली बाला के थिरकने को अश्लीलता का सर्टिफिकेट दे देते हैं। अरे भाई, मंत्री भी समाज से हैं। शादी-विवाह के मौके पर उसे भी निजी जिंदगी जीने का हक है। नाच देखना कोई बुराई नहीं, फिर क्यों आसमान उठाते हो।

मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार जीतेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

हमारा मीडिया निष्पक्ष है! सच्चीमुच्ची!!

Nadim S. Akhter :  सच है, इस देश में मीडिया निष्पक्ष है. नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार रोजाना 11 रुपये से ज्यादा कमाने वाले को अमीर करार देती है, गरीबों का मजाक उड़ाती है लेकिन मीडिया की चुप्पी हमें चौंकाती नहीं. कोई नहीं पूछता कि कांग्रेस के रशीद मसूद तो 5 रुपये वाली थाली ले आए थे, नरेंद्र मोदी 5 रुपये का ढोकला कहां से लाएंगे ??? हां, जब कांग्रेस वाली केंद्र सरकार के योजना आयोग ने ऐसा बेतुका आंकड़ा दिया था, गरीबों का उपहास किया था तो मीडिया ने आसमान सिर पर उठा लिया था. खबर खूब बिकी थी.

गुजरात के हजारों किसान सरकार द्वारा जबरन जमीन हड़पने और मुआवजा नहीं दिए जाने को लेकर प्रदर्शन करते हैं, सड़क पर उतरते हैं लेकिन राष्ट्रीय मीडिया में इस पर बहस नहीं होती. खबर गायब कर दी जाती है. लेकिन केजरीवाल सरकार अगर बिजली-पानी के दाम घटाती है तो कई दिनों तक उसके परिणामों पर चर्चा चलती रहती है.

भ्रष्टाचार को लेकर बड़े-बड़े सम्पादक टीवी स्क्रीन पर उपदेश देते दिखते हैं लेकिन जब भ्रष्टाचार के आरोप में पार्टी छोड़ने को मजबूर हुए येदियुरप्पा दोबारा बीजेपी ज्वाइन करते हैं तो ये खबर हेडलाइन नहीं बनती. मोदी की सरकार एक महिला की जासूसी कराती है, पूरी सरकारी मशीनरी के सहयोग से. बहुत कम मीडिया संस्थानों को इसमें आम नागरिकों की निजता का हनन मालूम पड़ता है. वो इस खबर को कैम्पेन बनाकर इंसाफ की दुहाई नहीं देते. चुप्पी साध लेते हैं. बुलेट की स्पीड से खबर निकल जाती है, फिर किसी को कुछ याद नहीं.

आदर्श घोटाले पर हेडलाइन बनाने वाले मीडिया को कांग्रेस के एक ताकतवर नेता के जमीन घपले पर सांप सूंघ जाता है. इस पूर्व पत्रकार कम नेता महोदय ने मुंबई में एक जमीन कौड़ियों के भाव ले ली लेकिन उसका इस्तेमाल नेक काम में करने की बजाय मुनाफा कमाने के लिए किया. यहां भ्रष्टाचार खबर नहीं बनती, खबर मैनेज हो जाती है. बाद में मंत्री महोदय धीरे से जमीन से पीछा छुड़ाकर पतली गली से कट लेते हैं. उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर नहीं किया जाता, मीडिया इसे मुद्दा नहीं बनाता.

ऐसे कई उदाहरण हैं, ये मानने के लिए कि इस देश का मीडिया निजी हाथों में जाकर पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष है. हम भारत के नागरिकों को मुगालते में रहने की तो आदत हो गई है, खुशफहमी में जीने में हर्ज ही क्या है. मुआं ये मीडिया ना होगा तो क्या सरकार नहीं चलेगी, लोकतंत्र नहीं चलेगा, देश नहीं चलेगा??? सम्राट अशोक और अकबर महान के समय भी तो मीडिया नहीं था, ना खबर बनती थी, ना छपती थी और ना ही दिखती थी. तो क्या उनका राजकाज नहीं चला?? जनता सुखी नहीं थी???

खामोख्वाह आप भी मीडिया के होने और उसके फल-प्रतिफल पर राय बनाए बैठे हैं. जो अखबार में नहीं छपता, टीवी पर नहीं दिखता, वह सोशल मीडिया पर छाता है. यहां किसी सम्पादक- रिपोर्टर और मीडिया संस्थान चलाने वाले किसी धनकुबेर की जरूरत नहीं पड़ती. यहां जनता ही आपस में खबरें बांटती और उसका छिद्रान्वेषण करती है. सबकुछ live.

भारत के छोटे शहरों और गांवों-कस्बों तक इंटरनेट की ताकत जाने दीजिए. फिर देखिएगा ये वैकल्पिक माध्यम क्या करता है. फिलहाल तो बिना किसी हू-हा के हम ये मानने के लिए तैयार हैं कि इस देश का मीडिया निष्पक्ष,पारदर्शी, संतुलित और संयमित है. सच में.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

फ्रीजर में आशुतोष महाराज और चैनलों पर उबाल

Awadhesh Kumar :  आसाराम बापू के बाद ऐसा लग रहा है जैसे हमारे कुछ टीवी चैनलों के टीआरपी के लिए आशुतोष महाराज मिल गए हैं। अलग-अलग तरीके से ताबड़तोड़ खबरें, बहस…..इस तरह चल रहीं हैं मानो इस समय देश के लिए सबसे बड़ा मुद्दा वही हो। किसी साधु का शरीर डीप फ्रीजर में रखा हो और उसकी सांसे बंद हो, ह्दय के धड़कन रुके हुए हों तो आम तौर पर उसे मृत या साधुओं के लिए ब्रह्मलीन हुआ माना जाएगा। डॉक्टर उन्हें मृत घोषित कर रहे हैं और पंजाब सरकार ने भी यही कहा है। लेकिन उनके भक्त कह रहे हैं कि वे समाधी की अंतिम अवस्था में हैं जहां शरीर की सारी क्रियाएं रुक जातीं हैं।

मेरा मानना है कि अगर उनके भक्त यह कह रहे हैं कि हमें उनके समाधि अवस्था से वापस आने की प्रतीक्षा करनी है तो तत्काल उसमें बाधा डालने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसे अभियानों से उन पर दबाव बढ़ता है। आखिर यह बात समझ से परे है कि तत्काल फैसला कराने पर उतारु क्यों हैं ये लोग? कुछ समय प्रतीक्षा करने में समस्या क्या है? अगर वे ब्रह्मलीन हो गए हैं तो फिर कुछ दिनों बाद एक संन्यासी की तरह उनका अंतिम संस्कार हो सकता है। लेकिन चैनलों के कारण ऐसा माहौल बन गया है मानो अगर उनका अंतिम संस्कार नहीं हुआ तो प्रलय आ जाएगा।

इस प्रसंग से योग की अंतिम अवस्था समाधि पर गंभीर चर्चा हो सकती थी। लेकिन चैनलों पर ऐसे लोग आ रहे हैं जिनमें ज्यादातर समाधि का अनुभव तो छोड़िए…पातंजलि योगसूत्र या गीता में श्रीकृष्ण के उपदेशों केा भी ठीक से न पढ़ा या समझा है। अगर योग पर समाधि पर मनुष्य के शरीर का आधुनिक विज्ञान से परे आध्यात्मिक वर्गीकरण पर, शरीर के चक्रों पर, प्राण पर ….गंभीर चर्चा होती तो इससे सारे श्रोताओं को लाभ होता। पर इन्हें लगता है कि इससे टीआरपी नहीं मिलेगी। तो भला क्यों चर्चा की जाए। इसलिए बहस और रिपोर्टें इतने छीछले, अनावश्यक, आपत्तिजनक एवं जुगुप्सा पैदा करने वाले हैं कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति विद्रोह कर जाए।

जिस आश्रम का व्यापक विस्तार हो और उसमें संपत्ति हो तो कई प्रकार के संदेह पैदा होते हैं। इस बारे में हम कुछ भी नहीं कह सकते लेकिन किसी चैनल में अभी तक ऐसी खबरें नहीं दिखाईं हैं जिनसे वाकई ऐसी आशंका की पुष्टि हो। अचानक आशुतोष महाराज के परिवार को तलाश लिया गया है जिस वे वर्षों पहले त्याग चुके हैं। उनका बेटा कह रहा है कि आशुतोष महाराज से जब वह मिला तो उनने कहा कि वे अब पूरे विश्व के लिए हैं, इसलिए उनसे मिलने की कोशिश न करे।

आशुतोष महाराज की जिन्दगी हम नहीं जानते। पर किसी अंदर वैराग्य कई कारणों से और किसी समय पैदा हो सकता है। कोई घर की समस्या से न जूझ पाने के कारण पलायन करने के बाद किसी समय संन्यासी हो सकता है। ऐसे हजारों उदाहरण उपलब्ध हैं। इसीलिए कहा गया है कि किसी साधू का भूत नहीं देखना चाहिए। हमारे उन चैनलों को यदि यह लगेगा कि इससे टीआरपी बढ़ाने के लिए दर्शक मिलेंगे तो वे जानते समझते हुए भी सामान्य मर्यादा, आध्यात्मिकता, सनातन धर्म की विशेषताओं को तार-तार करने में नहीं हिचकेंगे। यही कारण है कि टीवी चैनल अनेक अच्छी खबरें दिखाते हैं, सार्थक बहस भी करते हैं, पर ऐसी हरकतों से जनता के अंदर उनके प्रति सम्मान का क्षय होता है और पत्रकारों के प्रति जो श्रद्धा भाव होता था वह भी खत्म हो चुका है। पता नहीं कुछ प्वाइंट की टीआरपी से ये बाहर निकलकर देश की करोड़ों आबादी तक पहुंचने वाले मुद्दों की ओर अग्रसर क्यों नहीं होते!

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

अरुण कानपुरी का एक मेल, ‘प्रभात खबर’ और पुष्प रंजन को बधाई

भड़ास पर अरुण कानपुरी के निधन की खबर पढ़कर मैं स्तब्ध रह गया.

KAASH YE KHABAR JHUTHI HOTI !

Last week ARUN SE DER RAAT BAAT HUI THI.

1990 KE Dainik Jagran WALE SAATHI KO AKHIRI SALAM !!

-Pushpranjan

9971749139

———- Forwarded message ———-
From: arun kanpuri akanpuri@yahoo.com
To: pushp ranjan pushpr1@rediffmail.com

Date:
Subject: Re: Re: Greetings
''नए साल में आर्थिक व्यूह रचना रचेगा भारत!'' नामक शीर्षक से लिखा गया आपका यह लेख बहुत तथ्य परक और सारगर्भित है. अमेरिका के आका बराक ओबामा की पेशानियों पर खिचीं हुई लकीरों को बहुत ही बारीकी से आपने पढ़ा और विश्व के आर्थिक जगत की कोख में अभी क्या पल रहा है, उसका पूरा का पूरा ‘अल्ट्रासाउंड’ पूरे आलेख को पढ़ते समय मेरी आंखों के सामने आ गया. यह सवाल भी उठा-‘नमो-नमो’ की जो गूंज विश्व में गई है, वह 2014 के लोकसभा चुनाव में अभी तक पूरी तरह से सवालिया बनी हुई! ऐसे में जबकि अमेरिका जो कि विश्व भर में अलग-अलग देशों के साथ वहां के हालातों के अनुसार खेल खेल रहा है तो दावोस में होने वाले आर्थिक सम्मेलन में भारत आई.टी के क्षेत्र में क्या रणनीति बनाकर अपना प्रतिनिधित्व करेगा, इसको लेकर यूरोप देश असमजंस की स्थिति में ही रहेंगे. आपका आलेख को मौजूदा सरकार के रणनीतिकारों को भी पढ़ना चाहिए ताकि वे इस बारे में अभी कुछ होमवर्क कर ले तो बेहतर होगा.

आपको और प्रभात खबर को बधाई.

अरुण कानपुरी
ब्यूरो प्रमुख दिल्ली.
टर्निंग इंडिया.

On Wednesday, 1 January 2014 8:53 PM, pushp ranjan pushpr1@rediffmail.com wrote:

Dear Arun,

It was nice to see your reply. How are you my dear?

Pl. see one article in attachment.

Best,

Pushp

On Wed, 01 Jan 2014 19:09:52 +0530 wrote

नववर्ष 2014 आप-सबके लिए मंगलमय हो.

सूरज अब बच्चा है क्षितिज की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से इस गुजर जाने दो,

दोपहर को देखते हैं कौन इसकी ओर आंख उठा कर देखता है.

असीम दीक्षित

शुभेच्छु
अरुण कानपुरी

09811067362

On Wednesday, 1 January 2014 6:26 PM, pushp ranjan wrote:

आपको सपरिवार नव – वर्ष की मंगल कामनाएं !!

खुशियाँ हों, गीत – संगीत हो –

सादर स-स्नेह,

Pushpranjan

9971749139


मूल खबर:

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कानपुर का हार्ट अटैक से निधन

चैनल में पैसे का लेन-देन और हंगामा

गुड़गांव : हरियाणा के कांग्रेसी विधायक हैं रघुबीर कादियान और उनका एक हरियाणा का क्षेत्रीय न्यूज चैनल है 'आई विटनेस'। इसका संचालन गुड़गांव से होता है। दो दिन पहले चैनल का हेड आफिस हंगामे का केंद्र बन गया। जमकर बवाल हुआ। बताते हैं कि चैनल के एक जूनियर स्टाफ ने इनपुट से जुड़े किसी बड़े अधिकारी का ही गला पकड़ लिया और जमकर गाली-गलौच की। मामला किसी स्ट्रिंगर के पैसे के लेन-देन से जुड़ा हुआ था।

ये इनपुट अधिकारी चाहते थे कि जूनियर स्टाफ मेंबर उस स्ट्रिंगर को आफिस से भगा दे क्योंकि कहीं वह हेड की पोल न खोल दे। इसी बात को लेकर इस हेड ने अपने जूनियर को गाली दे दी। बस फिर क्या था उसने भी तपाक जवाब दिया और नौबत गला पकड़ने तक आ गई। जवाब भी उसी हेड के जवाब में ही दिया। काफी देर तक यह हंगामा चलता रहा। भई हंगामा क्यों हो, जिस कादियान साहिब का यह चैनल है, वह हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं और अध्यक्ष के तौर पर हंगामे देखने-सुनने की आदत रही है। अब उसी के चैनल का स्टाफ भी तो उन्हीं का अनुसरण करेगा।

दरअसल चैनल के इस इनपुट के अधिकारी महोदय और हरियाणा के किसी जगह के एक स्ट्रिंगर के बीच पैसों का लेन-देन हुआ। अब किसने किसको दिए, यह तो पता नहीं लेकिन वह स्ट्रिंगर चैनल की एक बड़ी अधिकारी के पास शिकायत लेकर पहुंच गया। यह भनक इन हेड को लग गई और उन्होंने अपने जूनियर पर दबाव बनाया कि वह उस स्टिंगर को वहां से भगा दे, जब उस जूनियर ने इंकार कर दिया तब वह हेड महोदय गाली-गलौच पर उतर आए। फिर क्या था जूनियर ने अपने ही स्टाइल में जवाब दिया। बताते हैं कि उसने हेड महोदय का गला ही पकड़ लिया। काफी देर तक यह हंगामा चलता रहा।

गुड़गांव से दीपक खोखर की रिपोर्ट.

अखिलेंद्र प्रताप सिंह की प्रेस कांफ्रेंस और दिनकर कपूर से मुलाकात

Yashwant Singh : प्रेस क्लब आफ इंडिया में आज दिनकर कपूर से मुलाकात हुई. हम दोनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान एक साथ सीपीआईएमएल (लिबरेशन) के होलटाइमर बने. फिर अलग-अलग मोर्चों पर काम करने के लिए अलग-अलग इलाकों की ओर रवाना किए गए. बाद में मैं तो जाने कब पार्टी से कार्यमुक्त होकर मीडिया वाला फिर भड़ास वाला बन गया लेकिन दिनकर भाई ने रास्ता नहीं बदला, हां पार्टी बदल ली. सीपीआईएमएल (लिबरेशन) में जब एक बड़ी फूट हुई तो अखिलेंद्र, लालबहादुर आदि के साथ दिनकर ने भी अलग रास्ता चुना और आजकल ये सभी लोग आईपीएफ यानि आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के बैनर तले कार्यरत हैं.

दिनकर से मुलाकात बहुत दिनों बाद हुई. मौका था प्रेस क्लब आफ इंडिया में कामरेड अखिलेंद्र के प्रेस कांफ्रेंस का. जनलोकपाल के दायरे में कारपोरेट घरानों को भी लाने की मांग को लेकर अखिलेंद्र आज से जंतर मंतर पर दस दिनी उपवास पर बैठ रहे हैं. इसी को लेकर उन्होंने अपनी बात प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से पत्रकारों के साथ शेयर की. दिनकर ने प्रेस रिलीज बनाने से लेकर पत्रकारों को बांटने तक का पूरा काम संभाल रखा था. दिनकर आज भी सोनभद्र के गरीबों-मजदूरों के बीच काम करते हैं और उनके हक के लिए उन्हें संगठित करते हैं व लड़ते हैं. दिनकर भी हम सभी की तरह आईएएस बनने का सपना लेकर इलाहाबाद पढ़ने गए थे लेकिन हो गए कामरेड. दिनकर इलाहाबाद पढ़ने आने से पहले जौनपुर के एक कालेज के छात्रसंघ के निर्वाचित अध्यक्ष थे.

प्रेस क्लब आफ इंडिया में यशवंत सिंह और दिनकर कपूर


प्रेस कांफ्रेंस करते दीपक मलिक, अखिलेंद्र प्रताप सिंह, आनंद स्वरूप वर्मा और एडवोकेट चौहान.


दिनकर कपूर की उर्जा, जोश, साहस को देखकर मैं काफी प्रभावित रहता था. आज मेरा मन दिनकर के प्रति ज्यादा सम्मान से भर गया क्योंकि ऐसे दौर में जब हर कोई अपने आराम और अपने स्वार्थ के लिए जी रहा है, दिनकर जैसे लोग खुद की बजाय समाज और देश की बेहतरी के लिए पूरा जीवन लगाए हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढाई करते हुए सीपीआईएमएल (लिबरेशन) के स्टूडेंट विंग आइसा यानि आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन में कार्यरत रहे मेरे समकालीन कई छात्र नेताओं, कल्चरल एक्टिविस्टों से आज प्रेस क्लब में मुलाकात हुई. इनमें से ज्यादातर पत्रकार हैं या इसी मीडिया के इर्दगिर्द के दायरों में हैं. अफजल, महेंद्र, अरविंद, दिनकर को देखकर इलाहाबाद के दिन ताजा हो गए. गोपाल राय भी अपने साथ उन दिनों हुआ करते थे. रंजन श्रीवास्तव भी थे. ढेर सारे साथियों के नामों-कामों की चर्चा चली. कुल मिलाकर प्रेस क्लब आफ इंडिया ने काफी पुरानी यादों को सहेजने का मौका दिया.

दिनकर ने अखिलेंद्र के दस दिनी धरने के संबंध में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस को लेकर हिंदी और अंग्रेजी में जो प्रेस रिलीज जारी किया, वह इस प्रकार है….

आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह की नई दिल्ली प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता का प्रेस नोट…  

कारपोरेट घरानों को लोकपाल के दायरे में लाए बिना लोकपाल अथवा कथित जनलोकपाल कानून कमजोर, इससे महा घोटालों पर रोक नामुमकिन… 

  • काम के मौलिक अधिकार, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक बिल पारित कराने, कारपोरेट द्वारा कृषि योग्य भूमि की खरीद पर रोक समेत जनमुद्दों पर 7 फरवरी से दस दिवसीय उपवास का ऐलान…
  • प्रकाश करात, एबी वर्धन, न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर समेत जनांदोलन के प्रतिनिधि होंगे शामिल…

नई दिल्ली, 6 फरवरी 2014 : कारपोरेट घरानों को लोकपाल कानून के दायरे में लाए बिना भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल अथवा कथित जनलोकपाल कानून कमजोर और अपर्याप्त है, ऐसे कमजोर कानून से देश में हो रहे महाघोटालों पर रोक लगना असम्भव है। आज प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कारपोरेट घरानों व एनजीओं को लोकपाल के दायरे में लाने के लिए जंतर-मंतर पर 7 फरवरी को अपराहन 1 बजे से दस दिवसीय उपवास करने का ऐलान किया। इसके बारें में जानकारी देते हुए अखिलेन्द्र ने बताया कि इस उपवास कार्यक्रम को देश की तमाम लोकतांत्रिक, प्रगतिशील व इंसाफपसंद ताकतों का समर्थन हासिल है और पहले दिन सीपीआई (एम) के महासचिव का0 प्रकाश करात, सीपीआई के पूर्व महासचिव का0 ए0 बी0 वर्धन, न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर और सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव डा0 प्रेम सिंह समेत जनांदोलन के प्रतिनिधि इसमें शरीक होंगे।  इस उपवास में उ0 प्र0, बिहार, झारखण्ड़, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखण्ड़, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, कर्नाटक समेत विभिन्न राज्यों से प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।  

उन्होंने कहा कि कारपोरेट घरानों ने पूरे राजनीतिक तंत्र को भ्रष्ट कर दिया है। राजनीतिक व नौकरशाही तंत्र से गठजोड़ कायम कर वह हमारे प्राकृतिक संसाधनों व सरकारी खजाने समेत बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदा की लूट में लिप्त है। सच तो यह है कि यही कारपोरेट घराने देश में भ्रष्टाचार की गंगोत्री है लेकिन इन्हें लोकपाल के दायरे में नहीं रखा गया है। इसी तरह फोर्ड फांउडेशन जैसी साम्राज्यवादी एजेंसियों के फंड से संचालित एनजीओ हमारे राष्ट्रीय जीवन में भ्रष्टाचार के खतरनाक स्रोत हैं। उनकी बढ़ती घुसपैठ के हमारे स्वंतत्र नीति निर्णयों तथा सुरक्षा के लिए गम्भीर निहितार्थ हैं। लेकिन एनजीओ कारोबार भी लोकपाल के दायरे के बाहर है।

उन्होंने बताया कि इसके साथ ही रोजगार के अधिकार को नीति निर्देशक तत्व की जगह संविधान के मूल अधिकार में शामिल करने, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक बिल को संसद से पारित कराने, कृषि योग्य भूमि के कारपोरेट खरीद पर रोक लगाने, कृषि लागत मूल्य आयोग को वैधानिक दर्जा देने, राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति व सर्वागीण जनपक्षीय खनन नीति बनाने, कारपोरेट पर टैक्स बढ़ाने, शिक्षा-स्वास्थ्य-कृषि समेत जनहित के मदों पर खर्च बढ़ाने, राष्ट्रीय वेतन नीति बनाने, महंगाई रोकने के लिए वायदा कारोबार पर रोक लगाने, ठेका व दिहाड़ी श्रमिकों को नियमित करने, अति पिछड़ों, पिछड़े-दलित मुसलमानों, आदिवासियों के सामाजिक न्याय के अधिकार, हिफाजत, इंसाफ, जम्हूरियत और कानून का राज स्थापित करने समेत आम नागरिक की जिदंगी के लिए महत्वपूर्ण सवालों को उपवास के माध्यम से उठाया जायेगा।

उन्होंने कहा कि बैगर जनपक्षिय नीतियों को लागू किए और लोकतंत्रिक अधिकारों व सामाजिक न्याय की गारंटी के सुशासन की बात महज दिखावा है। आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट एक रेडिकल तथा समावेशी जन एजेण्ड़ा पर तमाम जनतांत्रिक ताकतों को एकताबद्ध करने वाला व्याप्क राजनीतिक मंच है। हम अपने पदाधिकारियों में पचास फीसदी महिलाओं और कुल मिलाकर पच्चहत्तर फीसदी दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों समेत समाज के वंचित तबकों को नेतृत्वकारी पदों पर लाने की सागंठनिक दिशा पर काम कर रहे है ताकि सही मायने में एक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण हो सके। इसी के तहत प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और जनांदोलनों में सक्रिय डा0 सुलभा ब्रहमे को आइपीएफ का राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व आइजी व दलित चितंक एस आर दारापुरी और प्रो0 निहालुद्दीन अहमद को राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया है। हमारे इस आंदोलन को भारत सरकार के पूर्व वित व वाणिज्य सचिव एसपी शुक्ला, पूर्व सचिव के0 बी0 सक्सेना, पीएस कृष्णनन, प्रख्यात अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी का समर्थन हासिल है। पत्रकार वार्ता में अर्थशास्त्री डा0 जया मेहता भी उपस्थित रही।                                                                  

द्वारा जारी
दिनकर कपूर
सदस्य
राष्ट्रीय संयोजन समिति
आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ)


Press Note issued in the press conferenceaddressed by Akhilendra Pratap Singh, National Convener, All India Peoples Front at Press club, New Delhi…

Without bringingCorporate Houses within the ambit of Lokpal, the Lokpal Act or so-called JanLokpal Act is hollow, incapable to stop mega-scams

  • Declaration of10-day long fast from Feb. 7 at Jantar -Mantar on peoples issues includingFundamental Right to Work, passage of Anti-Communal Violence Bill, banningpurchase of Agricultural land by Corporate Houses
  • Prakash Karat,AB Bardhan, Justice Rajendra Sachhar, Seniorjournalist Kuldip Nayar, Senior leaders of Socialist Party and leaders of otherpeoples movements will join the programme

New Delhi, Feb. 6, 2014: Without bringing corporate houses within the ambit ofLokpal Act, the anti-corruption Lokpal Act or so-called Jan Lokpal Act isweak and inadequate. Such weak Act can never stop megascams in the country.Akhilendra Pratap Singh, National Convener, All India Peoples Front, declaredin a press conference at Press Club to sit on fast on Feb. 7 for 10 days atJantar Mantar demanding to bring corporate houses and NGOs under the ambit ofLokpal Act. Briefing about his fast, Mr. Singh said that his initiative issupported by various progressive, democratic and justice-loving forces. On thefirst day, CPI(M) General Secretary Com. Prakash Karat, veteran CPI leader Com.AB Bardhan, JusticeRajendra Sachhar, Senior journalist Kuldip Nayar, Socialist Party GeneralSecretary Dr. Prem Singh and leaders of other peoples movements will join thefast programme. Representatives from UP, Bihar, Jharkhand, Haryana, Delhi,Maharashtra, Tamilnadu, Karnataka and other parts of the country willparticipate in the programme.

He alleged that the corporate houses havecorrupted the entire polity of the country. In collusion with corruptpoliticians and bureaucrats, the corporates are busy looting our preciousnational wealth including our natural resources and the public exchequer. Infact, these corporate houses are the fountain-source of corruption in thecountry. Yet, they are not in the ambit of Lokpal. Similarly, the NGOs fundedby Ford Foundation like imperialist agencies are dangerous source of corruptionin our national life. Their increasing infiltration has serious implicationsfor our sovereign policy decision making as well as security. However theentire NGO business, too, is out of the ambit of Lokpal.

He said that the vital issues of common man`slife like inclusion ofRight to work in Fundamental Rights of theConstitution instead of Directive Principles, passage of anti-Communal violenceBill in the Parliament, banning corporate purchase of agricultural land,constitutional status to Agricultural Costs and Prices Commission, Nationalland-use policy and comprehensive pro-people mining policy, steeper taxes oncorporate houses and enhancing public expenditure on people`s welfare includingeducation, health and agriculture, formulation of National Wage policy, banningfutures trading to check rising prices, regularisation of contract and dailywage workers, ensuring social justice for extremely backward classes,backward-dalit Muslims, tribals, ensuringsafety and security, justice anddemocracy as well asrule of law will be raised prominently through thefast.

He asserted that without implementingpro-people policies and ensuring democratic rights as well as social justice,all talk of good-governance is merely an eyewash. All India Peoples Front is abroad political platform uniting various democratic forces on a radical andinclusive peoples agenda. Our organisational orientation is to bring among ouroffice-bearers, 50% women and all in all 75% leadership from deprived sectionsincluding dalits, tribals, backwards and minorities so that a truly democraticsociety is built. Dr. Sulabha Brahme, renowned economist and activist is ourNational President while SR Darapuri, dalit thinker and ex- IG Police as wellas Prof. Nihaluddin Ahmad are our National Spokespersons. Our movement enjoyssupport from SP Shukla, ex- Finance Secretary,Government of India; KB Saxenaand PS Krishnan, Ex-Secretaries, Government of India; renowned economistAmit Bhaduri. Economist Dr. Jaya Mehta was also present in the pressconference.

Dinkar Kapoor

Member

NationalConvening Committee

AIPF


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

रघु, भुवनेश, अजीत, आशीष, सुशील, मनोज, वीओएम के बारे में सूचनाएं

रघु आदित्य ने राजस्थान से जल्द ही शुरू होने वाले न्यूज चैनल 'न्यूज इंडिया' ज्वाइन कर लिया है. उन्हें एक्जीक्यूटिव एडिटर का पद दिया गया है. दैनिक भास्कर समूह के बीटीवी में रघु कार्य कर रहे थे. रघु के अलावा भुवनेश तिवाड़ी ने भी 'न्यूज इंडिया' का दामन थाम लिया है. भुवनेश अभी सिटी न्यूज में काम कर रहे थे. 'न्यूज इंडिया' के टेक्निकल डिपार्टमेंट में अजीत सिंह और आशीष नागर ने ज्वाइन किया है.

उधर, पत्रकार विशाल शर्मा के बारे में खबर है कि उन्होंने ईटीवी, राजस्थान से इस्तीफा दे दिया है. विशाल 'फर्स्ट इंडिया' न्यूज़ चैनल के साथ जुड़ रहे हैं. एक अन्य जानकारी के मुताबिक जयपुर के पत्रकार राहुल गौतम ने पंजाब केसरी ज्वाइन किया है.

गुड़गांव से प्रसारित होने वाले हरियाणा केंद्रित न्यूज चैनल 'ख़बरें अभी तक' से सुशील खरे और मनोज तिवारी जुड़ गए हैं. खरे इसके पहले दैनिक हिन्द-वतन, राष्ट्रीय सहारा अखबार और डायलॉग इंडिया मैग्जीन, समाचार प्लस न्यूज़ चैनल उत्तराखंड में काम कर चुके हैं. मनोज तिवारी अमर उजाला, दैनिक जागरण, न्यूज़ एक्सप्रेस आदि में काम कर चुके हैं.

लखनऊ से प्रकाशित वॉयस ऑफ़ मूवमेंट गुरुवार से दो दिन के लिए बंद कर दिया गया है. यह बात गुरुवार की सुबह की है जब कर्मचारियों को कॉल करके ऑफिस आने को मना किया गया. कहा जा रहा है कि वॉयस ऑफ़ मूवमेंट में प्रभात रंजन दीन और उनकी टीम की एंट्री होने वाली है. इस बात का खुलासा आगामी 10 फरवरी तक हो जायेगा. आशंका यह भी जताई जा रही है कि पुराने स्टाफ को हटा दिया जाएगा. 

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कारवां, असीमानंद, मीडिया और माता

Abhishek Srivastava : कारवां पत्रिका में असीमानन्‍द पर कवरस्‍टोरी को छपे छह दिन हो गए, लेकिन मीडिया में इसे उठाने की सुध आज जगी। टीवी वाले या तो वाकई पढ़ते-वढ़ते नहीं हैं, या फिर माता के निर्देश का इंतज़ार करते हैं।

दिल्ली के पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. इस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

Pawan K Shrivastava : मैं भी यही सोच रहा था
 
Ashok Dusadh : हमको तो पहला वाला सही लग रहा है . बाद में उठाने का मसला यह है के पहले उठाने के खतरे के दायें -बाएं देख लिया जाता है फिर निश्चिंत होने पर उसे पटल पर लाया जाता है.
 
Sandeep Verma : फेसबुक पर घूमना शुरू कर दी थी. हिम्मत ही नहीं थी चुप बनाये रखते.
 
अवनीश राय : दोनो ही बात सही है।
 
Ashish Maharishi : maharaz agency se kal aai thi
 


आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान के फेसबुक वॉल से…

Anand Pradhan : मालेगांव, अजमेरशरीफ, मक्का मस्जिद से लेकर समझौता ब्लास्ट तक मामलों में गिरफ़्तार असीमानंद के पीछे कौन है? यह बहुत बड़ी गुत्थी है? वास्तविक खोजी पत्रकारिता में दिलचस्पी रखनेवाले किसी भी पत्रकार या अख़बार/न्यूज़ चैनल के लिए यह बहुत आकर्षक स्टोरी आइडिया है लेकिन अफ़सोस है कि अब तक किसी ने गंभीरता और सक्रियता से इसकी पड़ताल नहीं की। क्यों? बताने की ज़रूरत नहीं है। 'कारवैन' पत्रिका को बधाई कि उसने इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की है। अब यह बाक़ी अख़बारों/न्यूज़ चैनलों की ज़िम्मेदारी है कि इसकी आगे पड़ताल करें और सच्चाई को सामने ले आएँ। वैसे असीमानंद और उनके साथियों में इन बम ब्लास्ट और लोगों को मारने के विचार कहाँ से आए हैं, यह किसी से छुपा नहीं हैं। सच यह है कि किसी को असीमानंद के पीछे खड़े सांप्रदायिक घृणा के विचार और साथियों की पहचान करनी है तो वह भगवा सांप्रदायिक फासीवाद की राजनीति ही है।

‘हिंदुस्तान’ अखबार से दबा कर पैसा कमा रही हैं शोभना भरतिया, जरा देखें मुनाफे के आफिसियल आंकड़े

अखबार अब धंधा हो गए हैं और इनका आखिरी मकसद टर्नओवर को बढ़ाना है. इसी फंडे पर चलते हुए सारे बड़े अखबारों का मुनाफा लगातार बढ़ता जा रहा है. इसी अनुपात में सत्ता और सिस्टम के घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार, कुनीतियों, अराजकता को उजागर करने की क्षमता लगातार घटती जा रही है. मुनाफा बढ़ने और ताकत घटने के बीच रिश्ता है.

खैर, इस पर प्रवचन फिर कभी. नीचे लाइवमिंट डाट काम पर प्रकाशित वो खबर दे रहे हैं जिसको पढ़कर आपको साफ साफ समझ में आएगा कि हिंदुस्तान अखबार को संचालित करने वाली कंपनी को आफिसियली कितना मुनाफा हुआ है. ध्यान रखिए, शोभना भरतिया हिंदुस्तान टाइम्स की भी मालकिन हैं और इस अंग्रेजी अखबार को एचटी मीडिया नामक कंपनी संचालित करती हैं. हिंदुस्तान अखबार को जो हिंदी का अखबार है, हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड नामक कंपनी संचालित करती है. नीचे जो खबर है वह हिंदुस्तान हिंदी दैनिक के मुनाफे से संबंधित है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


Hindustan Media Ventures net profit rises 38%

Revenue increases 18% to Rs199 crore in the December quarter

New Delhi: Hindustan Media Ventures Ltd (HMVL), publisher of the Hindi daily Hindustan, reported a 38% increase in net profit for the quarter ended December, on the back of increased advertising revenues and higher circulation.

Net profit rose to Rs 28.8 crore from Rs 20.8 crore a year earlier, the company said on Thursday. Revenue increased 18% to Rs199 crore from Rs168.5 crore. HMVL is a unit of HT Media Ltd which publishes Mint and Hindustan Times.

Advertising revenue for the paper rose 16% to Rs 137.5 crore from Rs 118.2 crore. Circulation revenue rose 18% to Rs 45.9 crore in the quarter from Rs 39 crore a year earlier.

Commenting on the results, HMVL chairperson, Shobhana Bhartia said, “Our pricing initiatives and improved traction in advertising revenues across markets have resulted in the highest ever top-line in any quarter.”

The recently published readership survey commissioned by the Media Research Users Council (MRUC) and the Readership Studies Council of India (RSCI), and carried out by research firm Nielsen saw Hindustan become the second largest daily with a readership of 14.25 million, overtaking the Hindi daily Dainik Bhaskar, published by DB Corp. Ltd. The field work for the survey was conducted between July and December 2013.

“The latest IRS results have been quite encouraging, with Hindustan emerging as the second largest daily in the country. We are now a clear No.2 in Uttar Pradesh and No.1 in Uttarakhand, while maintaining our dominance in Bihar and Jharkhand,” Bhartia added.

“The results are pretty much in line with the industry growth rate,” said an analyst who did not wish to be identified. DB Corp. saw an increase in advertising revenue of 12% in the quarter ended December, while Jagran Prakashan Ltd which publishes Dainik Jagran, saw an increase in advertising revenue of 15% in the same period.

“If one looks at advertising revenue, the national advertisers have been facing the brunt of the slowdown; regional newspapers are better positioned to get business from local advertisers who are still relatively buoyant”, he added.

(साभार: लाइवमिंट डाट काम)


और ये है मनीकंट्रोल डाट काम में प्रकाशित खबर….

हिंदुस्तान मीडिया का मुनाफा 38% बढ़ा

वित्त वर्ष 2014 की तीसरी तिमाही में हिंदुस्तान मीडिया का मुनाफा 38 फीसदी बढ़कर 29 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2013 की तीसरी तिमाही में हिंदुस्तान मीडिया का मुनाफा 21 करोड़ रुपये रहा था। वित्त वर्ष 2014 की तीसरी तिमाही में हिंदुस्तान मीडिया की बिक्री 16.2 फीसदी बढ़कर 186 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2013 की तीसरी तिमाही में हिंदुस्तान मीडिया की बिक्री 160 करोड़ रुपये रही थी।

सुदर्शन टीवी चैनल नोएडा में अपनी विशाल इमारत में हुआ शिफ्ट

Roy Tapan Bharati : सुरेश चव्हाण टीवी न्यूज चैनल में अब जाना-पहचाना नाम है। 41 साल के चव्हाण मूलतः साईं बाबा के नगर शिरडी के रहने वाले हैं। उनसे मेरा संबंध उनके टीवी चैनल पर पैनल डिस्कशन में शिरकत की वजह से बना। चव्हाणजी कुछ अलग किस्म के हैं और वह अपने टीवी को अपने तरीके से चला रहे हैं। उनके रग-रग में राष्ट्रवाद का खून है और वह हर पल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजरिए से सोचते हैं। उनका मंत्र है, सुदर्शन टीवी को ही नहीं, भारत को भी अव्वल बनाना है। उनके 'बिंदास बोल' टीवी प्रोग्राम के प्रशंसक देश ही नहीं विदेश में बसे भारतीय भी हैं।

करीब आठ साल पहले उन्होंने सुदर्शन न्यूज़ टीवी चैनल शुरू किया और आज सफलता के सोपान पर चढ़ते हुए इस चैनल ने आज 6 फरवरी से अपना प्रशासनिक दफ्तर और स्टूडियो नोएडा के सेकेटर-57 स्थित नई इमारत में शुरू किया। बहुत सारे गणमान्य लोगों के साथ मैं भी इस टीवी की इमारत के लोकापर्ण समारोह में शामिल था। साथ में मित्र पत्रकार विजय प्रकाश भी थे।

''राष्ट्रवाद, संस्कृति, सरोकार, भारतीयता और मूल्यों को जन -जन तक पहुंचाने की सुदर्शन टीवी की पहल प्रशंसनीय हैं।'' ये बातें टीवी चैनल 'सुदर्शन' के नवनिर्मित अत्याधुनिक कार्यालय के लोकार्पण कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहीं। नोएडा के सेक्टर 57 स्थित सुदर्शन टीवी के प्रेक्षागृह में लोकार्पण कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ हुआ। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी के हाथों नवनिर्मित भवन एवं परिसर का लोकार्पण संपन्न हुआ।

भाजपा नेता नितिन गडकरी, कांग्रेस नेता कैप्टेन सतीश शर्मा, एनसीपी नेता एवं केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल की प्रमुख उपस्थिति में स्वामी रामदेव, चर्चित तांत्रिक चंद्रा स्वामी आदि ने सुदर्शन चैनल को अपनी शुभकामनाएं दीं। भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी, आर्ट ऑफ़ लिविंग के श्री श्री रविशंकर, भैयू जी महाराज, आचार्य बालकृष्ण ने भी अपनी शुभककामनाएं दीं।

कार्यक्रम का आरंभ वंदे मातरम से हुआ। इसके बाद सभी गणमान्य अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की। सुदर्शन न्यूज़ चैनल के चेयरमैन एवं प्रधान संपादक सुरेश खंडेराव चव्हाणके जी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर सुदर्शन न्यूज़ चैनल के चेयरमैन और प्रधान संपादक सुरेश चव्हाण जी ने सबका अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि गौरक्षा कि तरफ उनका विशेष ध्यान है। उन्होंने कहा कि देश में गौमाता की रक्षा हमारे लिए प्रमुख मुद्दा है।

वरिष्ठ पत्रकार राय तपन भारती के फेसबुक वॉल से.

अंशुमान तिवारी का जागरण से इस्तीफा, अजय प्रकाश और आशीष महर्षि का भास्कर में तबादला

तीन सूचनाएं हैं. सबसे बड़ी दैनिक जागरण से. कभी दैनिक जागरण के नेशनल ब्यूरो में काफी वरिष्ठ पद पर रहे अंशुमान तिवाठी को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी रास नहीं आई और उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. महीनों पहले अंशुमान को दैनिक जागरण उत्तर प्रदेश का प्रभारी और स्टेट ब्यूरो का चीफ बनाकर लखनऊ भेजा गया था. यह जिम्मेदारी उन्हें रामेश्वर पांडेय के रिटायर होने के बाद दी गई थी. पर अंशुमान ने दैनिक जागरण में अपनी लगातार उपेक्षा के कारण त्रस्त होकर करीब 18 साल की लंबी पारी को विराम देने का फैसला कर लिया. देखना है कि अंशुमान त्रिपाठी अब कब व कहां नई पारी की शुरुआत करते हैं.

उधर दैनिक भास्कर से तबादलों की सूचना है. दिल्ली में वेब सेक्शन में कार्यरत आशीष महर्षि को भोपाल भेजा गया है. इसके पहले आशीष भास्कर में ही जयपुर में हुआ करते थे. इसी तरह अजय प्रकाश का तबादला जयपुर से दिल्ली कर दिया गया है. अजय प्रकाश फीचर सेक्शन में कार्यरत हैं.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.

मीडियाकर्मियों के मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आज

आज वो दिन है जब मीडियाकर्मियों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से फैसला सुनाया जाएगा. इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में अखबारों के मालिक ले गए और कई तरह के बहाने बनाकर वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू किए जाने से रोके रखा. इस बीच हिंदुस्तान, लोकमत समेत कई अखबारों ने अपने यहां से स्थायी कर्मचारियों को बुरी तरह परेशान करके निकाल दिया या दूर दराज ट्रांसफर कर दिया या फिर उन्हें कांट्रैक्ट पर रख लिया.

इस तरह कोर्ट में सुनवाई होने की आड़ में मीडिया मालिकों ने अपना उल्लू सीधा कर लिया और कर्मचारियों को दिए जाने वाले अरबों रुपये हड़प लिए. मजीठिया वेजबोर्ड को लागू किए जाने का इंतजार करते करते मीडियाकर्मियों की आंखें पथरा गई हैं. आज अगर सुप्रीम कोर्ट फाइनल फैसला सुना भी देता है तो इसे देर से मिला न्याय माना जाएगा. फिर भी, यह न्याय भी ढेर सारे मीडियाकर्मियों के चेहरे को रोशन करेगा, यह तय है. न्यूज एजेंसी आईएएनएस ने फैसला सुनाए जाने को लेकर खबर रिलीज की है, जो नीचे दिया जा रहा है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


Supreme Court to rule on validity of newspaper employees' wage board on Friday

New Delhi | Agency: IANS

The Supreme Court will on Friday pronounce its verdict on the validity of the Justice GR Majithia Wage Board for Working Journalists and other Newspaper Employees that has been challenged by several newspaper organisations including their joint body Indian Newspapers Society (INS).

A bench of Chief Justice P. Sathasivam, Justice Ranjan Gogoi and Justice Shiva Kirti Singh would deliver their judgment on the challenge to the wage board by INS, Bennett Coleman Co. Ltd., Press Trust of India, United News of India, the Hindu, Indian Express Ltd., the Tribune Trust, Rajasthan Patrika P. ltd., Jagran Prakashan Ltd and others.

While contesting the legality of the constitution of the wage board, the newspaper organizations have contended that government had manipulated its composition to ensure that newspapers remained subservient to it and appointed its own labour secretary as the secretary to the wage board.

Contending that Justice Majithia Wage Board was no wage board in the eyes of law, the court was told that it was not validly constituted because the government never appointed three independent people as required under the provisions of law.

The newspaper organisations and their association had even challenged the validity of the Working Journalist and Other Newspaper Employees (Condition of Service) and Miscellaneous Provision Act, 1955.

However, the newspaper employees organisation had contested the claim of the newspaper employers organisations contending that the board was set up under the provisions of the 1955 act and its validity was not in question.

The employees' side was represented by the Federation of PTI Employees Union and other organisations. (साभार- आईएएनएस)


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वरिष्ठ पत्रकार एसएन विनोद बने जिया न्यूज के सीईओ और एडिटर इन चीफ

खबर है कि वरिष्ठ पत्रकार एसएन विनोद ने नई पारी की शुरुआत कर दी है. वे जिया न्यूज के सीईओ और एडिटर इन चीफ बनाए गए हैं. सूत्रों के मुताबिक जिया न्यूज प्रबंधन ने एसएन विनोद को चैनल को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी सौंपी है. उन्हें फ्री हैंड दिया गया है यानि वे किसी को भी रख निकाल सकते हैं और चैनल को दुरुस्त करने के लिए कोई भी बदलाव कर सकते हैं.

चैनल से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई तरह की परेशानियों से जूझ रहे जिया न्यूज के दिन फिरने के आसार दिख रहे हैं. एसएन विनोद इसके पहले न्यूज एक्सप्रेस के महाराष्ट्र चैनल के संपादक हुआ करते थे. कई अखबारों और चैनलों के संस्थापक व संपादक रह चुके एसएन विनोद देश के जाने-माने पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. अपनी बेबाकबयानी और तेवरदार रुझान के कारण एसएन विनोद जहां जाते हैं वहां अपनी खास छाप छोड़ जाते हैं.

रांची, पटना, दिल्ली, नागपुर, मुंबई समेत कई शहरों में काम कर चुके एसएन विनोद कई भाषाओं के जानकार हैं. न्यूज एक्सप्रेस में विनोद कापड़ी के सीईओ और एडिटर इन चीफ के रूप में आ जाने के बाद एसएन विनोद ने कापड़ी के अधीन काम करने की बजाय इस्तीफा दे देना उचित समझा. उनके इस रुख की पत्रकारिता जगत में काफी चर्चा रही. देखना है कि एसएन विनोद जिया न्यूज को मझधार से निकाल कर अच्छे न्यूज चैनलों की लिस्ट में शामिल करा पाते हैं या नहीं.

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बेनी बाबू के दिए दर्द से नहीं उबर पा रहे लखनऊ के कई पत्रकार

लखनऊ : बेनी बाबू के मोबाइल, कैश और बैग ने लखनऊ की पत्रकारिता को गरम कर रखा है. होटल ताज में आयोजित कार्यक्रम में बैग पाने के लिए दर्जनों पत्रकार लाइन में लगे रहे. शर्म हया को ताक पर रखकर. इतना करने के बाद भी बेनी बाबू ने इन लोगों को छोटा सा बैग थमाकर अरमानों पर पानी फेर दिया. कई दिनों तक यह मामला सचिवालय के प्रेस रूम और तमाम जगहों पर गरमा गरम बहस का मुद्दा बना रहा.

लखनऊ के वे पत्रकार तो दुखी हुए ही जिन्‍हें बड़ा या छोटा कोई बैग नहीं मिला, लेकिन सबसे ज्‍यादा दुखी वे पत्रकार नजर आए जो वहां पहुंचने के बाद भी नगदी वाला बैग नहीं लहा पाए. कई शातिर पत्रकार बंधु तो नगदी भी लिए, मोबाइल भी लिए, दो-दो लोगों के वास्‍ते लिए और बेनी बाबू को अपने अपने अखबारों में बेइज्‍जत भी किया. पर अब इस मामले से अलग एक और भी खबर सामने आ रही है.

एक पत्रकार बंधु, जिन पर माया सरकार में सौंदर्यीकरण में दलाली खाने का आरोप है, बताते फिर रहे हैं कि खुद को जर्नलिस्‍टों का नेता कहने वाले एक बड़े पत्रकार बेनी बाबू से 25 बैंग लिए हैं. इन बैंगों में कैश, मोबाइल भी शामिल है. दलाली खाने के आरोपी पत्रकार बताते फिर रहे हैं कि कई किताबें लिखने वाले ये पत्रकार महोदय खुद को पत्रकारों का बड़ा नेता बताकर बेनी बाबू को अर्दब में लिया है. उन्‍हें आश्‍वस्‍त भी किया है कि वे सभी 25 डग्‍गा बड़े पत्रकारों तक पहुंचा देंगे.

अब पत्रकार महोदय की बातों में कितनी सच्‍चाई है यह तो वे ही जाने, लेकिन लखनऊ की मीडिया हलकों में दोनों पत्रकारों की दलाली की किस्‍सागोई नमक मिर्च लगाकर सुनाई-बताई जा रही है. हालांकि ये दोनों ही पत्रकार मोटी चमड़ी के माने जाते हैं, लिहाजा इनके ऊपर किसी बात का असर होगा कहना मुश्किल है. हां, लखनऊ के पत्रकारों ने हार नहीं मानी है. उन्‍हें उम्‍मीद है कि बेनी बाबू ने नहीं दिया तो क्‍या हुआ, अभी तो लोकसभा चुनाव बचा ही है. (कानाफूसी)

कैनविज टाइम्‍स को धोखा देने वाली टीम ने वॉयस ऑफ मूवमेंट ज्‍वाइन किया

: पुराने मीडियाकर्मी को काम करने से मना किया गया : लखनऊ : कुछ दिन पहले प्रभात रंजन दीन लगभग तीस लोगों की टीम के साथ कैनविज टाइम्‍स को ठप करके निकल गए थे. दीन के चलते कैनविज टाइम्‍स दीन हीन स्थिति में पहुंच गया. टीम के जाने के अगले दिन अखबार भी प्रकाशित नहीं हुआ. लखनऊ में इस बात की जबर्दस्‍त चर्चा रही. अखबारों में वीर रस लिखने वाले दीन के नैतिकता पर उंगली उठी. उनकी पीठ में छूरा घोंपने की आदतों पर भी लोग चर्चा करते दिखे. इस बार दीन ने दो दर्जन मीडियाकर्मियों को दीन दुखी बना दिया है.

प्रभात अपनी पूरी टीम के साथ लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक छोटे अखबार वॉयस ऑफ मूवमेंट पहुंच गए हैं. कैनविज से धोखेबाजी करने वाली पूरी टीम ने उनके साथ यहां ज्‍वाइन कर लिया है. लेकिन सबसे बुरी खबर यह है कि दीन यहां पहुंचने के साथ ही अखबार का प्रकाशन कर रहे लगभग दो दर्जन कर्मचारियों के पेट पर लात मार दी है. संपादक सुर्कीत को भी बाहर कर दिया गया है. बताया जा रहा है कि यह अखबार एक पुलिसकर्मी का पुत्र प्रकाशित करता है.

सूत्रों का कहना है कि दीन ने पुलिसकर्मी के इस पुत्र को लंबे चौड़े सब्‍जबाग दिखाए हैं. इसी सब्‍जबाग के चलते इस अखबार का मालिक प्रखर कुमार सिंह ने अपने लगभग दो दर्जन मीडियाकर्मियों को काम पर आने से मना कर दिया है. बताया जा रहा है कि सभी कर्मियों को पिछले दो महीने से सैलरी भी नहीं मिली है. सूत्रों ने बताया कि मैनेजमेंट ने हटाए गए सभी कर्मचारियों को रविवार की सुबह आने को कहा है. समझा जा रहा है कि इसी दिन इन लोगों से बातचीत की जाएगी.

पत्रिका ने लिखा – आईआरएस की सर्वेक्षण पद्धति सर्वश्रेष्ठ!

नई दिल्ली। एमयूआरसी ने मंगलवार को इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी को लिखे एक पत्र में विस्तार से बताया है कि क्यों वर्तमान सर्वेक्षण पद्धति सर्वश्रेष्ठ है।

नया सर्वेक्षण

आबादी : सर्वेक्षण में आबादी के अनुमान का आधार 2011 की जनगणना रही। 2001-11 के बीच कई शहरों की सीमाओं और आबादी में काफी परिवर्तन आया है।

डाटा कलेक्शन मैथडोलॉजी : सभी साक्षात्कारों में डुएल स्क्रीन कंप्यूटर असिस्टेड पर्सनल इंटरव्यू का प्रयोग। इसमें एक साथ दो कंप्यूटर स्क्रीन की सहायता से पाठक का इंटरव्यू लिया जाता है -एक स्क्रीन पर डाटा फीड होता है तो दूसरी स्क्रीन पर यह सब पाठक देख सकता है। इंटरव्यू के तुरंत बाद इसे "लॉक" कर दिया जाता है, इसके बाद इसमें फेरबदल संभव नहीं होता।

साक्षात्कार अवधि : हर इंटरव्यू की अवधि 30 मिनट रही। इसमें भी 50 हजार से भी ज्यादा की ऑडियो रिकॉर्डिग सुरक्षित। कौन से 50 हजार इंटरव्यू रखे जाएंगे यह पूर्व तय नहीं था।

मीडिया उपभोग के नए पैमाने : मीडिया उपभोग के लिए एक विशेष समय सीमा का प्रयोग – उदाहरण के लिए समाचार पत्र के लिए एक माह की सीमा अवधि रखी गई।

सैंपल साइज : वर्तमान पाठक सर्वेक्षण में सैंपल साइज काफी बड़ी – लगभग 235000 घर (हाउसहोल्ड) थे। इसमें शहरी भारत से 160000 घर तथा ग्रामीण भारत से लगभग 75000 घर रहे, जो किसी एक क्षेत्र में केंद्रित नहीं वरन सारे देश में फैले हुए थे।

पुराना सर्वेक्षण

सर्वेक्षण में आबादी के अनुमान का आधार 2001 की आबादी रही। यह सर्वेक्षण मुख्यत: पेपर एडिड पर्सनल इंटरव्यू पर ही आधारित रहे। केवल कुछ ही डाटा कलेक्शन में डीएस-सीएपीआई का प्रयोग किया गया था। डाटा रिकॉर्ड करने के बाद डाटा फीडिंग में फेरबदल संभव। इंटरव्यू की अवधि 90 मिनट रही। इतनी लंबी अवधि इंटरव्यू लेने और देनेवाले, दोनों के लिए काफी थकाऊ होती थी। ऑडियो रिकॉर्डिग भी कम। मीडिया उपभोग के लिए ऎसी किसी समय अवधि की प्रयोग नहीं किया गया था। इसके पूर्व के सर्वेक्षणों में सैंपल साइज अपेक्षाकृत कम थी। (पत्रिका)

रीडरशिप में पोल खुलने से नाराज 18 मीडिया समूह आईआरएस से अलग हुए

नई दिल्ली। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी की कार्यकारी समिति की ओर से सर्वसम्मति से इंडियन रीडरशिप सर्वे (आइआरएस-2013) को खारिज करने के बाद दैनिक जागरण समेत कई प्रमुख अखबारों ने खुद को आइआरएस से अलग कर लिया है।

दैनिक जागरण के अलावा जिन अन्य प्रमुख अखबारों ने आइआरएस से अलग होने के पत्र भेज दिए हैं उनमें दैनिक भास्कर समूह, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह, द इंडिया टुडे समूह, द हिंदू समूह, द आनंद बाजार पत्रिका समूह, द ट्रिब्यून, दिनाकरन समूह, मिड-डे, लोकमत समूह, मलयाला मनोरमा समूह, आउटलुक समूह, द स्टेट्समैन समूह, अमर उजाला, बर्तमान समूह, आज समाज, साक्षी मीडिया समूह, डीएनए समूह और नई दुनिया भी शामिल हैं।

प्रमुख अखबारों ने यह कदम मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (एमआरयूसी) की ओर से आइआरएस के हास्यास्पद नतीजे वापस न लेने के फैसले के बाद उठाया। देश के सभी राज्यों में सभी भाषाओं के अखबारों पर किए गए इस सर्वे में सैकड़ों हैरान कर देने वाली विसंगतियां हैं। कुछ चुनिंदा इस तरह हैं:

पंजाब-हरियाणा

सर्वेक्षण के मुताबिक पंजाब में कुल संख्या के 33 फीसद (10 लाख 20 हजार) पाठक घट गए हैं। पंजाब केसरी की रीडरशिप में 43 फीसद गिरावट बताई गई है और द ट्रिब्यून के पाठकों की संख्या आधी कर दी गई है। इसके उलट हरियाणा में हरिभूमि के पाठकों की तादाद में 390 फीसद उछाल दिखाया है, जो 2012 के दौरान राज्य में कहीं दिखाई ही नहीं देता था।

उत्तर प्रदेश

कानपुर में अग्रणी अखबार की हर प्रति के 2.6 पाठक के मुकाबले हिंदुस्तान को 10 से ज्यादा लोग पढ़ने की बात कही गई है। वाराणसी में दैनिक जागरण का सर्कुलेशन हिंदुस्तान के मुकाबले दोगुने से ज्यादा है, फिर भी वहां हिंदुस्तान के पाठकों की संख्या अग्रणी अखबार से कहीं ज्यादा दिखाई गई है। मेरठ में दैनिक जागरण हिंदुस्तान के मुकाबले सौ फीसद आगे है, लेकिन सर्वे में पाठकों की संख्या के मामले में उसे हिंदुस्तान से महज 18 फीसद बढ़त पर रखा गया है। सर्कुलेशन के लिहाज से आगरा में हिंदुस्तान तीसरे नंबर पर है और वह अमर उजाला का दो तिहाई ही है, लेकिन उसके पाठकों की संख्या अग्रणी अखबार से 43 फीसद ज्यादा दिखाई गई है। अलीगढ़ में सर्कुलेशन के मामले में जागरण हिंदुस्तान से 38 फीसद आगे है, लेकिन उसकी पाठक संख्या में महज नौ फीसद बढ़त दिखाई गई है। इलाहाबाद में अमर उजाला सर्कुलेशन में तो हिंदुस्तान से 44 फीसद आगे है, लेकिन रीडरशिप में हिंदुस्तान 16 फीसद बढ़त हासिल किए हुए है।

उत्तराखंड

सर्वेक्षण में उत्तराखंड के अग्रणी अखबार अमर उजाला के मुकाबले हिंदुस्तान को 30 फीसद ज्यादा सर्कुलेशन के साथ पहले पायदान पर दिखाया गया है। इस राज्य में हिंदुस्तान का महज एक प्रिंटिंग सेंटर है, जबकि अन्य प्रमुख अखबारों के दो-दो प्रिंटिंग सेंटर हैं। हिंदुस्तान की 20 लाख प्रतियों को पढ़ने वालों की तादाद अप्रत्याशित तौर पर एक करोड़ 40 लाख बताई गई है।

महाराष्ट्र और गुजरात

महाराष्ट्र की स्थिति कुछ ज्यादा ही हास्यास्पद है। नागपुर के अग्रणी अंग्रेजी अखबार हितवाद का प्रमाणित सर्कुलेशन 60 हजार है, लेकिन सर्वे में इसे एक भी पाठक नहीं दिया गया है। यहां साकाल और लोकमत के पाठकों में भी अविश्वसनीय कमी दिखाई गई है।

दिल्ली-मुंबई

मुंबई में अखबारों की पाठक संख्या में 20.3 फीसद उछाल दर्शाया गया है, जबकि हर मामले में आगे बढ़ रही दिल्ली में पाठकों की संख्या 19.5 फीसद घटी बताई गई है।

गुजरात-मध्यप्रदेश

गुजरात में पिछले आइआरएस सर्वे में गुजरात समाचार को राज्य का अग्रणी अखबार बताया गया था। इस बार सर्वे में उसके पाठकों की संख्या सात लाख छह हजार घटा दी गई है, जबकि संदेश के पाठकों की संख्या में पांच लाख 23 हजार की वृद्धि बताई गई है। मध्य प्रदेश में नई दुनिया के 24 फीसद पाठक घटा दिए गए हैं, जबकि उसके सर्कुलेशन में शानदार बढ़ोत्तरी हुई है। राज्य में पत्रिका के पाठकों की पिछली संख्या 18 लाख में 135 फीसद का उछाल बताया गया है और आंकड़ा 44 लाख से ऊपर निकल गया है, जबकि अखबार ने कोई नया संस्करण शुरू नहीं किया है।

तमिलनाडु

तमिलनाडु में हिंदू की पाठक संख्या करीब आधी होकर 6.1 लाख रह गई है, जो पहले 10.7 लाख थी। दिनाकरन ने भी कथित तौर पर 14 लाख पाठक खोए हैं। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में हिंदू बिजनेस लाइन की पाठक संख्या चेन्नई के मुकाबले तीन गुनी बताई गई है। (जागरण)

कर्नाटक मीडिया एकेडमी अवार्ड की घोषणा, कई पत्रकार सम्मानित

बेंगलुरु। गुरुवार को कर्नाटक मीडिया एकेडमी अवार्ड 2012 और 2013 की घोषणा मीडिया एकेडमी के अध्यक्ष एमए पोनप्पा द्वारा की गई। यह अवार्ड कर्नाटक सरकार की ओर से दिया जाता है। वेबसाइट वनइंडिया-कन्नड़ के चीफ एडिटर एसके शाम सुंदर, टाइम्स ऑफ इंडिया के एचएस बालाराम और मनीपाल मीडिया नेटवर्क के डा. सतीश यू पाई को अवार्ड से सम्मानित किया जायेगा। अन्य पत्रकारों में, उदयवाणी के रवि हेगड़े, विजय कर्नाटका की सुगाता श्रीनिवास, डेक्कन हेराल्ड की आशा कृष्णास्वामी, वरिष्ठ पत्रकार सदाशिव शेनॉय को भी यह अवार्ड दिया जाएगा। सम्मानित होने वाले पत्रकारों में शाम सुंदर एक मात्र वेब जर्नलिस्ट हैं।

यह अवार्ड फरवरी के तीसरे सप्ताह में राजभवन में आयोजित सम्मान समारोह में दिया जाएगा। समारोह में राज्यपाल एचआर भारद्वाज, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया समेत कई मंत्री उपस्थित होंगे।

संसद सत्र आज से, सरकार के लिए आसान नहीं है ‘अपनों’ को संभालना!

15वीं लोकसभा का समापन सत्र आज से शुरू होने जा रहा है। सरकार ने तैयारी की है कि इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पास करा लिए जाएं। उसने अपने तईं विपक्ष से भी भरपूर समझदारी बनाने की कसरत कर ली है। भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों को पास कराने के लिए मुख्य विपक्षी दल भाजपा नेतृत्व तो राजी है। लेकिन, सरकार को समर्थन देने वाली पार्टी सपा ने कई ‘किंतु-परंतु’ के सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे ज्यादा आफत तो आंध्र के कांग्रेसी सांसदों के पाले से ही आ रही है।

तेलंगाना के मुद्दे पर यहां राज्य के सांसद दो धड़ों में बंट गए हैं। सरकार ने आंध्र को बांटकर नया तेलंगाना राज्य बनाने का प्रस्ताव किया है। इसको लेकर सीमांध्र और तेलंगाना क्षेत्र के सांसद एक-दूसरे के खिलाफ जूझने को तैयार हैं। यहां तक कि कांग्रेस के सांसद भी इस मुद्दे पर आलाकमान को ठेंगा दिखाने पर उतारू हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने नाराज अपने सांसदों को मनाने के लिए काफी कोशिशें कीं। लेकिन, बात नहीं बनी। ये सांसद नहीं चाहते हैं कि इस सत्र में तेलंगाना का विधेयक लाया जाए। वैसे भी, आंध्र प्रदेश विधानसभा ने यह विधेयक बगैर पास किए हुए केंद्र को लौटा दिया है। इससे भी कांग्रेस की राजनीतिक किरकिरी पहले से ही बढ़ गई है।

लेकिन, प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि कुछ भी हो, सरकार अपने तेलंगाना संकल्प को पूरा करके रहेगी। तकनीकी रूप से यह अल्पकालिक सत्र शीतकालीन सत्र का ही विस्तार है। इसमें सरकार का 39 विधेयक पास कराने का लक्ष्य है। संसदीय मामलों के कार्यमंत्री कमलनाथ ने सोमवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में उन्होंने यही अपील भी की कि विपक्ष, सभी विधेयकों को पास कराने में अपना रचनात्मक सहयोग दे। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भ्रष्टाचार निरोधी आधा दर्जन विधेयकों को पारित कराने के लिए खास जोर देते रहे हैं। इन प्रस्तावित विधेयकों को लेकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा को भी ऐतराज नहीं है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सरकार को यही आश्वासन दिया है कि उनकी पार्टी तो इन विधेयकों के बावत अपना समर्थन देगी। लेकिन, संसद में व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही होगी। दरअसल, भाजपा नेतृत्व को आशंका है कि तेलंगाना के मुद्दे पर कांग्रेस के सांसद ही संसद के दोनों सदनों में बाधा पहुंचाएंगे। क्योंकि, शीतकालीन सत्र के पहले दौर में भी तेलंगाना मुद्दे की तकरार के चलते काम बाधित रहा था।

सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को सुझाव दिया है कि इस समापन सत्र में सरकार को केवल लेखा अनुदान वाले वित्तीय विधेयक ही पारित कराने चाहिए। बाकी कामकाज अगली सरकार के लिए छोड़ देना चाहिए। क्योंकि, राजनीतिक नैतिकता का तकाजा भी यही है। लेकिन, संसदीय मंत्री कमलनाथ ने कह दिया है कि सरकार लेखा अनुदान तो 17 फरवरी को ही पेश करेगी। इसके पहले कई और जरूरी विधेयक पास कराने का एजेंडा है। उल्लेखनीय है कि यह सत्र 21 फरवरी तक चलना है। कुल 12 कार्य दिवसों में कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने का एजेंडा है। सरकार ने इस सत्र में कई विवादित विधेयक भी पास कराने का लक्ष्य रखा है। जबकि, इनमें से कुछ विधेयकों के मामले में सरकार के समर्थक दलों को भी घोर ऐतराज रहा है।

ऐसे विधेयकों की श्रेणी में महिला आरक्षण का भी मुद्दा है। यह विधेयक दशकों से लंबित रहा है। यूपीए सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद राज्यसभा में इसे पारित कराया था। लेकिन, भारी विवाद के चलते लोकसभा में इसे पारित कराने की पहल, पहले नहीं की गई। उल्लेखनीय है कि इस विधेयक के मसौदे को लेकर कई दलों को घोर ऐतराज रहा है। सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले राजद, सपा व बसपा को भी ऐतराज है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह तो अल्टीमेटम भी दे चुके हैं कि यदि मौजूदा स्वरूप में   इस विधेयक को लोकसभा में पारित कराने की कोशिश की गई, तो वे विरोध के लिए तमाम सीमाएं भी तोड़ सकते हैं। मुलायम सिंह जैसे सहयोगियों की नाराजगी के डर से ही कांग्रेस नेतृत्व पहले इस मुद्दे पर पहल करने की हिम्मत नहीं दिखा सका। अब समापन सत्र में इस विधेयक के प्रति अपनी आस्था दिखाकर कांग्रेस महज खानापूर्ति की कवायद करती दिखाई पड़ रही है। लेकिन, राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि इस मुद्दे को लेकर सियासी विवाद काफी तूल पकड़ सकता है।
इस सत्र में सरकार संप्रदायिकता विरोधी एक विधेयक लाने की तैयारी में है। इसको लेकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा को खास ऐतराज रहा है। इस विधेयक के कई मसौदों पर विपक्ष के कुछ और दलों को भी आपत्तियां रही हैं। लेकिन, चुनावी मौके पर अल्पसंख्यक ‘कार्ड’ के रूप में इस विधेयक को इस्तेमाल करने की कार्य योजना समझी जा रही है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का आकलन है कि यदि भाजपा को छोड़कर दूसरे सभी सेक्यूलर दल इसके लिए राजी हो जाएं, तो बात बन सकती है। इससे संसद में भाजपा अलग-थलग भी पड़ जाएगी। भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक संसद में पास हो चुका है। अब यह कानून लागू भी हो चुका है। इस कानून को और कारगर रूप देने के लिए कुछ अन्य कानूनी उपाए करना जरूरी माना गया है। इसी के लिए सरकार छह विधेयक पास कराने की तैयारी में है। इनमें से दो विधेयक लोकसभा में पहले ही पास हो चुके हैं। अब इन्हें राज्यसभा में पास कराने की चुनौती है। दो लंबित विधेयक संसद की स्टेंडिग कमेटी के पास है। इस बार भ्रष्टाचार विरोधी दो और नए विधेयकों को पास कराने का एजेंडा है। इन्हें कैबिनेट की मंजूरी पहले ही मिल चुकी है।

रेहड़ी-पटरी वालों को जीवन-यापन का खास कानूनी अधिकार दिलाने के लिए सरकार एक विधेयक इस बार हर हालत में पास कराना चाहती है। कांग्रेस ने इस विधेयक को चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल की तैयारी भी शुरू की है। खास तौर पर राहुल गांधी इसके लिए प्रयासरत रहे हैं। वे पिछले दिनों रेहड़ी-पटरी वालों से संवाद करते रहे हैं। यह विधेयक काफी दिनों से लंबित है। 2012 में लोकसभा में यह पारित हो चुका है। अब इस बार राज्यसभा से पारित कराने की बारी है। इस विधेयक को लेकर भाजपा को भी कोई खास आपत्ति नहीं है। इस समापन सत्र में विकलांगों को ज्यादा कानूनी सहूलियत देने के लिए एक विधेयक प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री ने संकल्प जाहिर किया है कि इस बार यह विधेयक जरूर पारित हो जाएगा।

15वीं लोकसभा में महज 165 विधेयक ही पारित किए जा सके हैं। 5 साल के कार्यकाल को देखते हुए यह रिकॉर्ड सबसे खराब माना जा रहा है। संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ इस संदर्भ में कहते हैं कि विधाई कार्यों के मामले में इतने खराब रिकॉर्ड के लिए विपक्ष ज्यादा जिम्मेदार है। क्योंकि, संसद के हर सत्र में हंगामा ही किया जाता रहा। इससे सरकार को कामकाज करने का बहुत कम अवसर मिल पाया। 15वीं लोकसभा के ही 126 विधेयक लंबित पड़े हैं। राज्यसभा में भी ऐसे लंबित विधेयकों की संख्या 72 है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली कहते हैं कि मनमोहन सरकार ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए विपक्ष को दोषी करार करना ज्यादा सुविधाजनक समझा है। जबकि, यह तरीका पूरी तरह से गैर-जिम्मेदारी वाला है। हकीकत यह है कि तमाम बड़े घोटालों को दबाने के लिए सरकार का अड़ियल रुख ही संसद में हंगामे की मुख्य वजह बना है। जेटली को लगता है कि सरकार की इस नाकामी और काहिली का जवाब चुनाव में जनता ही देगी।

सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी का मानना है कि सरकार जल्दबाजी में कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना बहस के पास कराना चाहती है, जो कि हर दृष्टि से गलत है। येचुरी कहते हैं कि महिला आरक्षण जैसे जरूरी विधेयक को सरकार ने एक मजाक जैसा बना रखा है। यदि यूपीए सरकार का राजनीतिक संकल्प दृढ़ होता, तो इस विधेयक को पहले ही पास कराने की कोशिश की जाती। अब तो चलते-चलते महज औपचारिकता के लिए सरकार एक राजनीतिक स्वांग करने जा रही है। इसी से पता चलता है कि सरकार के राजनीतिक एजेंडे कितने गैर-ईमानदार रहे हैं? सरकार ने भले दर्जनों विधेयकों को पास कराने का लक्ष्य बना रखा हो, लेकिन भाजपा ने भी सरकार को घेरने के लिए तमाम तैयारी कर ली है। खास तौर पर बहुचर्चित ‘अगस्टा वेस्ट लैंड’ हेलीकॉप्टर खरीद मामले में सरकार को घेरने की तैयारी है।

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज कहती हैं कि इस घोटाले में पिछले दिनों ही कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां आई हैं। इनसे पता चला है कि इस घोटाले के तार शीर्ष स्तर तक जुड़े रहे हैं। जिम्मेदार विपक्ष के नाते हम लोग संसद में सरकार से जवाब मांगेंगे। यदि सरकार अड़ियल रुख अपनाएगी, तो हंगामे की जिम्मेदारी हमारी नहीं, सरकार की ही होगी। मंगलवार को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने भी सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में भी कई विपक्षी दिग्गजों ने साफ-साफ कह दिया है कि यदि कांग्रेस अपना चुनावी एजेंडा ही आगे बढ़ाना चाहेगी, तो वे भला मूकदर्शक क्यों रहेंगे? विपक्षी नेताओं ने सवाल किया कि क्या तेलंगाना के मुद्दे पर सरकार अपने सांसदों पर लगाम लगा सकेगी? इस पर मीरा कुमार भी दो टूक ढंग से कोई जवाब नहीं दे पाईं। भाजपा ने तो शुरुआती दौर से ही हेलीकॉप्टर खरीद घोटाले पर राजनीतिक रार ठानने की रणनीति बना ली है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

राहुल और मोदी दोनों उल्टी अंग्रेजी में ही करते हैं

Nadim S. Akhter : 3 दिसंबर 2013 को मैंने नरेंद्र मोदी के एक इंटरव्यू का लिंक शेयर किया था, जिसमें मोदी, करण थापर के शो -डेविल्स एडवोकेट- में गुजरात दंगों का जिक्र आने के बाद संभल नहीं पाए. उनका कंठ-गला सूख गया, पीने के लिए एक ग्लास पानी मांगने लगे और करण थापर से अपनी दोस्ती की -दुहाई- देते हुए इंटरव्यू को खत्म करने का एकतरफा ऐलान कर दिया. करण, मोदी को समझाते रहे लेकिन नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने माइक-वाइक निकाला और चलते बने.

तब मुझे भी नहीं पता था कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी एक दिन एक अंग्रजी चैनल के एक -बड़े- पत्रकार को ठीक इसी तरह एक -exclusive interview- देंगे और गैरों की जुबान-भाषा के मार्फत अपने देश के लोगों तक पहुंचने की, उनसे संवाद स्थापित करने की कोशिश करेंगे. नरेंद्र मोदी बीजेपी की तरफ से और राहुल गांधी कांग्रेस की ओर से (अघोषित) देश के अगले प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्टेड हैं. लेकिन अफसोस, दोनों को ही ये नहीं मालूम कि हर साल 15 अगस्त को लाल किले से भारत देश का प्रधानमंत्री देश को हिन्दी में संबोधित क्यों करता है!!! अंग्रेजी में क्यों नहीं बोलता??? कोई तो वजह रही होगी.

इससे पहले भी नरेंद्र मोदी ने गुजरात दंगों के बारे में जो -कुत्ते का बच्चा/ कार के नीचे आ जाता है- टाइप का बेहूदा बयान दिया था, वह किसी भारतीय मीडिया को नहीं, विदेशी मीडिया (अंग्रेजी) -रॉयटर्स- से बातचीत में दिया था. पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट होने के बाद आज तक मोदी ने किसी भारतीय टीवी चैनल (इसे अंग्रेजी का न्यूज चैनल पढ़िए) को face to face इंटरव्यू देना गवारा नहीं समझा . हिन्दी के न्यूज चैनल्स तो वैसे भी इनके लिए किसी गिनती में नहीं आते. वही हाल और वही ढर्रा अब राहुल गांधी ने अपनाया है. Times Now को -विशेष साक्षात्कार- देकर. वैसे मोदी और राहुल का दोहरा चरित्र देखिए.

जब मोदी-राहुल जनसभा करते हैं तो हिन्दी में बोलते हैं. जब राहुल कांग्रेस की -राजसभा- में पीएम से आम आदमी के लिए 9 की बजाय 12 सिलिंडर मांगते हैं तो हिन्दी में बोलते हैं. गंजों को कंघा बेचना जैसी कहावत भी सुनाते हैं. लेकिन वही राहलु गांधी जब इस देश के लिए अपने विजन की बात करते हैं, तो अंग्रेजी में बकते हैं. अंग्रेजी चैनल को इंटरव्यू देते हैं, अंग्रेजी में. और राहुल समेत पूरी कांग्रेस पार्टी ये मान लेती है कि अंग्रेजी में बोले गए उनके बोलवचन-संदेश देश की जनता तक पहुंच गए. ये जानते हुए कि न्यूज देखने वाले दर्शक वर्ग में हिन्दी चैनलों की तुलना में अंग्रेजी चैनलों की दर्शक संख्या लगभग नगण्य है. फिर भी ये लोग अंग्रेजी में ही बोलेंगे. धन्य हैं ये राजनेता. राहुल भी और मोदी भी.

दरअसल राहुल और मोदी का यह आचरण ये बताने के लिए काफी है कि आचार-विचार-व्यवहार में ये दोनों कितने सामंती-इलीट और चूजी हैं. हमारे यहां एक अजीबोगरीब कहावत है. खाए भतार का और गाए यार का. यही हाल राहुल-मोदी का भी है. खाते हैं हिंदी की और गुण गाते हैं अंग्रेजी का. उत्तर भारत हो या दक्षिण, जनसभा में, पब्लिक से संवाद में, हिन्दी में बोलेंगे लेकिन जब तथाकथित exclusive interview टाइप की चीज देनी होगी-बात करनी होगी तो अंग्रेजी मीडिया में जाकर vomiting करेंगे, उल्टी करेंगे. दुर्गंध फैलाएंगे. वो कहते हैं ना. समय बड़ा बलवान होता है. राहुल जी और मोदी जी, हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. आप अंग्रेजी से अपना लाड़-प्यार यूं ही बनाए रखें. आप दोनों को 15 अगस्त के दिन लाल किले की प्रचीर से हिन्दी में देश को संबोधित करने का गौरवशाली लम्हा नसीब नहीं होने वाला है. हमें मालूम है कि आप दोनों को हिन्दी बोलने में दिक्कत होती है क्योंकि you walk English, you talk English and you VOMIT in English. जय हो.

देखें मोदी का इंटरव्यू…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/778/interview-personality/paani-dena-re-1-narendra-modi-and-karan-thapar.html

कई अखबारों-न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके तेजतर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

बेनी गिफ्ट प्रकरण की सतर्कता आयोग से जांच की मांग

लखनऊ स्थित आरटीआई कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने लगभग 1000 स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को राष्ट्रीय इस्पात उपभोक्ता काउंसिल में कथित गलत नामांकन की केंद्रीय सतर्कता आयोग से जांच कराये जाने की मांग की है. आयोग के अध्यक्ष प्रदीप कुमार और प्रधानमंत्री को भेजी अपनी शिकायत में उन्होंने कहा है कि मंत्रालय की नियमावली के अनुसार इस काउंसिल में लौह एवं इस्पात, गृह निर्माण और सम्बंधित उद्योगों से सदस्य बनाए जाने का नियम है.

पर यहाँ ऐसे तमाम सदस्य जिनका इस उद्योग से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है, केवल इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को आगामी लोक सभा चुनावों में मदद करने के लिए नामित कर कीमती उपहार दिए गए बताये जाते हैं. डॉ ठाकुर ने इसे आधिकारिक शक्ति का स्पष्ट बेजा प्रयोग बताते हुए इन नामांकन तथा उपहारों के सम्बन्ध में जांच कराये जाने और गलत प्रक्रिया अथव अनियमितता पाए जाने पर नामांकन रद्द करने तथा उपहार का पैसा स्वीकृतकर्ता अधिकारी की जेब से वसूले जाने की मांग की है.

बेटे को मरता नहीं देख सकते मां-बाप, परिवार ने की इच्छामृत्यु की मांग

सीहोर, मध्य प्रदेश। शासन की तमाम स्वास्थ्य योजनाएं एक मासूम का इलाज नही करवा पा रही है। मजबूर माता-पिता को अपने बच्चे के इलाज के लिए मदद मांगनी पड़ रही है। लेकिन बीमारी का इलाज इतना मंहगा है कि अब लोगों की मदद भी कम पड़ रही है। मदद के सभी दरवाजे बंद देख, बेहद मजबूर औऱ निराश माता-पिता ने अपने परिवार सहित अपनी जीवनलीला समाप्त करने का मन बना लिय़ा है। मासूम की मां ने 22 फरवरी को परिवार सहित आत्मदाह करने के लिए आवेदन जिला-कलेक्टर को दिया है।

                                        अपने माता-पिता और बहन के साथ विष्णु
अपने बड़े बेटे को खो चुके, हाउसिंग बोर्ड कालोनी निवासी जयप्रकाश शर्मा का सात वर्षीय बेटा विष्णु प्रायमरी इंमोडेन्सरी सिंड्रोम नामक बीमारी से जन्म से पीड़ित है। इस बीमारी में व्यक्ति के शरीर में सफेद रक्त कणिकाएं बनना बंद हो जाती हैं। उन्होनें बताया कि अब तक विष्णु के इलाज के लिए वह अपनी जमीन, घर और पत्नी के गहने व अन्य कीमती सामान बेच चुके हैं। विष्णु का बड़ा भाई जो इसी बीमारी से पीडित था, इलाज न मिलने के कारण इस दुनिया से चला गया। पीड़ित विष्णु के पिता जयप्रकाश शर्मा ने बताया कि बेटे के उपचार के लिए हर महीने 30 हजार रूपए के इंजेक्शन लगते हैं। उन्होनें बताया कि भोपाल के कुछ समाजसेवियों ने मदद कर कुछ महीनों के लिए इंजेक्शनों का इंतजाम करवा दिया था। लेकिन अब आगे के इलाज के लिए उनके पास कुछ भी नहीं बचा है।

पीड़ित विष्णु के पिता ने बताया बेटे के इलाज के लिए उन्हें महीने में एक बार चंडीगढ़ जाना पड़ता है। प्रायमरी इंमोडेन्सरी सिंड्रोम बीमारी के स्थायी इलाज में 25 लाख रुपए का खर्च आता है। इतनी राशि परिवार के लिए जुटाना मुमकिन नहीं है। विष्णु की बीमारी का स्थायी इलाज होने में अभी सात साल का लंबा इंतजार करना होगा। इस बीमारी से निजात एक आपरेशन के बाद ही संभव है और यह आपरेशन 14 साल या उससे अधिक की उम्र में ही किया जा सकता है। विष्णु की उम्र अभी सात साल है। विष्णु को अभी सात साल और  इंजेक्शनों के सहारे रहना होगा लेकिन अब परिवार के पास इंजेक्शन खरीदने के पैसे नहीं हैं। विडबना यह है कि जैसे—जैसे विष्णु की उम्र बढ़ेगी, इंजेक्शन का डोज़ भी बढ़ता जाएगा। आगामी सालों में प्रतिमाह एक लाख रुपए इंजेक्शन का खर्च आएगा। मंहगे इलाज के चलते परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई है। ऐसे में विष्णु का जीवन बचाना मां बाप के लिए असंभव हो गया है। वे अपने बेटे को तिल—तिल कर मरता हुआ नहीं देखना चाहते, इसलिए उन्होंने पूरे परिवार के साथ इच्छामत्यु की मांग की है।  

पीड़ित परिवार ने राज्य सरकार से भी मदद की गुहार की है। जिलाधिकारी ने बताया उनके पास पीड़ित परिवार का आवेदन आया था। इस आवेदन की जांच एसडीएम को सौंपी गई थी। एसडीएम की जांच के बाद शासन स्तर से पीड़ित परिवार को हर संभव मदद मुहैया कराने के प्रयास किए जाएंगे।

 

लेखक आमिर खान सीहोर(मध्य प्रदेश) के पत्रकार है।

गाजीपुर में बदहाल हाईवे के खिलाफ वर-वधु और बारातियों ने किया सत्‍याग्रह

वर्षों से बदहाल नेशनल हाईवे से बेजार एक नवविवाहित वर-वधू ने बरातियों समेत सड़क दुरुस्त करने की मांग को लेकर गाजीपुर मे सत्याग्रह किया। मामला सुहवल क्षेत्र के ताड़ीघाट बारा मार्ग के नेशनल हाईवे 24 का है। अपनी तरह के इस अनूठे सत्याग्रह मे नवविवाहित वर-वधू और बरातियों ने सड़क पर बैठ कर शासन प्रशासन से नेशनल हाईवे तत्काल दुरुस्त करने की मांग की। वर-वधू के इस सत्याग्रह को लेकर जहां पूरे इलाके मे चर्चा रही, वहीं क्षेत्रीय विधायाक और प्रदेश सरकार के पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह जल्द ही सड़क को दुरुस्त करा देने का दम भर रहें हैं। गाजीपुर के सदर कोतवाली क्षेत्र के कैथवलिया मे रहने वाले द्वारिकानाथ के बेटे शिवानंद की बारात सुहवल क्षेत्र के नवली गांव मे गई हुई थी। विवाह के बाद वर-वधू बारातियों समेत वापस लौट रहे थे, लेकिन नेशनल हाईवे 24 की बदहाली के चलते कार मे बैठे शिवानंद और उनकी पत्नी पूजा परेशान हो गये। दूल्हा-दुल्हन की कार कई बार सड़क के गढ्ढों मे फंस गई। वर्षों से नेशनल हाईवे का यही हालत देखते आ रहे शिवानंद ने अपनी पत्नी से सलाह मशविरा किया और बरातियों समेत सड़क दुरुस्त कराने की मांग को लेकर सत्याग्रह पर बैठ गये। नेशनल हाईवे के निर्माण की मांग को लेकर बरातियों समेत सड़क पर सत्याग्रह कर रहें नवविवाहित वर-वधू के इस प्रदर्शन को लेकर पूरे इलाके मे चर्चा बनी रही वहीं क्षेत्रीय विधायक और प्रदेश सरकार के पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह ने नेशनल हाईवे जल्द ही दुरुस्त कराने का दावा किया है। नवविवाहित वर-वधू के इस अनूठे सत्याग्रह से वर्षों से बदहाल नेशनल हाईवे की मार झेल रहे इलाके के लोगों को आंदोलन की एक नई राह मिली है, ये अलग बात है कि सड़क निर्माण की मांग को लेकर प्रदर्शन करने वाले दूल्हा दुल्हन के इस सत्याग्रह का असर जिम्मेदार अफसरों और नेताओं पर कितना पड़ता है। —-गाजीपुर से के.के.की रिपोर्ट

200Cr ‘Hindustan’ Advt. Scam: SC to decide on Shobhana Bhartia’s SLP

New Delhi: “My Lord, this is the first case of the serious economic offence of the powerful media house of the country.The Munger Deputy Police Superintendent and the Police Superintendent in Bihar have submitted their Supervision Reports No.01 & 02 and have held that all allegations against the named accused persons including the petitioner,Shobhana Bhartia, in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011, are prime-facie true.The Hon’ble High Court at Patna has also rejected the petition of the petitioner and has directed the Munger police to complete the police investigation within three months from the receipt of the court order.Then,the petitioner, Shobhana Bhartia moved the Hon'ble Supreme Court.

Your Honour, I pray to reject the  Special Leave Petition(Criminal) No. 1603 of 2013. That’s the end of my argument,”  the senior lawyer of Munger(Bihar), ShriKrishna Prasad argued  before the Bench of  the Hon’ble Mr.Justice H.L.Dattu and the Hon”ble Mr.Justice S.A. Bobde in the Supreme Court on January 13,2014. Mr.Prasad concluded his argument the same day.

The senior lawyer of Munger(Bihar) ShriKrishna Prasad on January 13,2014, appeared in the Supreme Court and argued the case on behalf of the Respondent No.02, Mantoo Sharma in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603 of 2013.

The Respondent No.02,Mantoo Sharma of Munger(Bihar)  was also present in person in the court-room in the Supreme Court while his lawyer, ShriKrishna Prasad was arguing his case. It is worth mentioning that  the petitioner, Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S The Hindustan Times Limited(New Delhi) had filed the S.L.P (Criminal) N0.1603 of 2013, praying the court to quash the Munger Kotwali P.S Case No. 445 of 2011.

The content of  the Munger Kotwali P.S Case No.445 of 2011:–On the basis of a Munger court complainant No.—993©/2011 of the complainant,Mantoo Sharma, S/O Late Ganesh Sharma, resident-Puraniganj,P.S- Kasim Bazar, Dist.-Munger, an F.I.R has been lodged against (1) the Principal accused Shobhana Bhartia (Chairperson, Hindustan Publication Group,( Hindustan Media Ventures Limited,Head Office:18-20, Kasturba Gandhi Marg,New Delhi,(2)  Shashi Shekhar, Chief Editor, Hindustan Media Ventures Limited, Newspapers Group, New Delhi,(3) Aakku Srivastawa, Acting Editor, Patna Edition,(4) Binod Bandhu,Deputy Regional Editor, Bhagalpur edition and (5) Amit Chopra,Printer & Publisher,M/S Hindustan Media Ventures Limited,Lower Nathnagar Road, Parbatti,Bhagalpur.All of them have been accused of violating different provisions of the Press & Registration of Books Act, 1867, printing and publishing Bhagalpur and Munger editions of Dainik Hindustan ,using  the wrong Registration No. and obtaining the  government advertisements of the Union and the State governments in crores in the Advertisement Head by presenting the forged documents of registration.

The order of the Patna High Court:The Hon”ble Justice Anjana Prakash of  the Patna High Court  on Dec 17, 2012, has directed  the Munger police investigating officer to expedite  the investigation and conclude the same within a periof of three months from the date of the receipt of  this order  in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012.

Rs.200 crore  Hindustan Advertisement  Scam: Mantoo Sharma tells Supreme Court the main reason of economic offence on part of the petitioner, Shobhana Bhartia :In the world famous Rs.200 crore  Dainik Hindustan Govt. Advertisement Scam, the Respondent No.02, Mr.Mantoo Sharma, in his counter-affidavit to the Supreme Court(New Delhi) in the Special Leave Petition(Criminal) No.1603 of 2013( filed by the petitioner, Shobhna Bhartia,the Chairperson of M/S The Hindustan Times Limited.M/S H.T.Media Limited.M/S Hindustan Media Ventures Limited(New Delhi), has tried  his best to explain  the main reason behind this economic offence on large scale for a decade, committed by the petitioner and her  editors and publisher.

The content  of Mr. Mantoo Sharma’s counter-affidavit in this matter,submitted to the Supreme Court(New Delhi) is given in the orginal form  here so that the internet readers could know the depth of the economic offence of this powerful corporate print media house of India.

TERMS AND CONDITIONS OF ADVERTISEMENT POLICY OF UNION GOVERNMENT IN INDIA

The Union Government through the Directorate of Advertising & Visual Publicity(D.A.V.P),Information & Broadcasting Ministry,Government of India,New Delhi,approves "the Govt. Advertisement Rates" and releases "the Union Govt. advertisements" to newspapers in bulkevery year after fulfilling the certain conditions such as
(1) The Newspaper must have ''the Certificate of Registration'' and ''The Registration  Number',
(2) The Evidence of uninterrupted publication of the newspaper for 36 months(three years) regularly,
(3) The Certificate of Audit Bureau of Circulation regarding the circulation of the newspaper,etc.
(4) There must be a minimum of seventy five thousand of circulation of the newspaper.

 TERMS AND CONDITIONS OF ADVERTISEMENT POLICY OF BIHAR GOVERNMENT

The Bihar govt. also through the Information & Public Relation Department(IPRD), Patna, approves the "Govt. Advertisement Rate" and releases the "State Government Advertisements" in bulk to newspaperseither directly or through different district stategovt.offices every year in all districts of Bihar. The Information & Public RelationDepartment(IPRD),Patna,Bihar enlists the eligiblenewspapers for the "State Govt. Advertisements" onthefollowing terms and conditions such as
(1) the Newspaper must have "The Certificate of Registration" from the office of the  Press Registrar,New Delhi,
(2) the number of sold Hindi daily newspaper must be a minimum of 45 thousand per day,
(3) the newspaper must have obtained " the Approved D.A.V.P Rate".etc.

DAINIK HINDUSTAN NOT ENTITLED TO PUBLISH ADVERTISEMENTS FROM AUGUST ,03, 2001 TO JUNE 30, 2011

Under the terms and conditions of the Advertisement Policies of the Union Govt. and the  Bihar Govt. as well, the new Bhagalpur and Munger publications/editions of Dainik Hindustan were not entitled to get and publish the Government Advertisements from the Union Government and the Bihar Government as well as both publications/editions had completely failed to comply with the mandatory provisions of the Press & Registration of Books Act,1867 and the Registration of Newspapers(Central) Rules, 1956 and the statutory rules and regulations of Advertisement Policies.The statutory provisions ofAdvertisement Policies include obtaining "the Certificateof Registration" & "the Registration Number" from  the Press Registrar,New Delhi.

EVEN AFTER REGISTRATION,BOTH PUBLICATIONS WERE NOT ENTITLED TO GET AND PUBLISH GOVERNMENT ADVERTISEMENTS FOR THREE YEARS

Under the terms and conditions of the Advertisement Policies of D.A.V.P(New Delhi) and I.P.R.D (Patna,Bihar),the new Bhagalpur and Munger publications/editions of Dainik Hindustan were not entitled to get the govt advertisements from the union govt. and the state govt. for three years from August, 03, 2001 to July 31,2004,even though they would have obtained 'the Certificates of Registration'' and ''the Registration Numbers'' because there must have been an uninterrupted publication of the daily Hindi newspaper forthree years regularly even after obtaining the "Certificate of Registration" and the "Registration Number" from the office of the Press Registrar,New Delhi as per terms and conditions of the Advertisment Policy of the D.A.V.P,New Delhi.

Thus, when the company completes three yours publication regularly even after obtaining “the Certificate of Registration” & “the Registration Number”, it will ,then, be eligible only to apply for “the DAVP Advertisement Rate” and “DAVP Advertisements.”

It is also crystal clear that the Bihar Govt will consider enlisting any Hindi newspaper for the release of the "State Govt. Advertisements" if that newspaper gets the "D.A.V.P Approved Advertisement Rate" from the DAVP, New Delhi as per one of the three main termsandconditions of the I.P.R.D,Patna,Bihar .

MAIN REASON BEHIND THE ECONOMIC OFFENCE

To compensate the possible gross loss of income in the head of the publication of the advertisements of the union government and the Bihar government in the wake of a new publication/edition, the publisher/owner as well as the editors fraudulently induced the officials of the D.A.V.P(New Delhi) and I.P.R.D(Patna,Bihar) to deliver the advertisements of the union government and the Bihar govt. respectively to the illegal and unauthorised Bhagalpur and Munger publications of Dainik Hindustan for wrongful gain from August, 03 ,2001 to June 30, 2011 by wrongly presenting the Bhagalpur and Munger publications/editions as "Registered Newspapers" before the Govts. in Delhi and Patna. The Bhagalpur and Munger publications of Dainik Hindustan went into circulation/publication among readers and advertisers without the "Certificates of Registration'' and ''Registration Numbers''.But to cheat the officials ofD.A.V.P(New Delhi),I.P.R.D(Patna,Bihar) and private advertisers,too,the publishr/owner and the editors of Dainik Hindustan of Bhagalpur and Munger editions continued printing on the "Print-line" on the last  page of the newspaper the "Registration No.44348/1986" from August 03,2001 to June 30,2011, thus falsely and dishonestly presenting the newspaper to be "a lawfully registered newspaper".In reality, the truth is that the "printed Registration No.44348/1986" has been officially allocated to the Patna publication/edition of Dainik Hindustan from the office of the Press Registrar,New Delhi in 1986,some 15 years ago before the start of the new printing and publications of Bhagalpur and Munger editions of Dainik Hindustan in the year 2001 last. The documentary evidences of forgery and cheatings in the printing of the Patna Publication Registration No.44348/1986 on the "Print-line of theBhagalpur and Munger publications/editons of Dainik Hindustan by such a powerful media house is a serious economic offence which has never been heard in thepast hundred years in the world. "Thus,the company plundered the government exchequer upto about two hundred crores during the period.

 

Writer ShriKrishna Prasad is Sr. Advocate from Munger(Bihar). He can be contacted @ 09470400813

वायकॉम18 ला रहा है नया म्यूज़िक चैनल ‘Pepsi MTV Indies’

वायकॉम इंक. और नेटवर्क18 के ज्वाइंट वेंचर वायकॉम18 ने आज अपने नए 'इंडी' म्यूज़िक चैनल के नाम की घोषणा की। पेप्सिको  इंडिया द्वारा प्रायोजित इस चैनल का नाम है 'Pepsi MTV Indies'। चैनल उभरते हुए कलाकारों और संगीत की विभिन्न विधाओं को एक बड़ा प्लैटफार्म उपलब्ध कराएगा। म्यूज़िक के साथ ही चैनल स्वतंत्र फिल्में, कला, हास्य-व्यंग आदि को भी लोगों के घरों तक पहुंचाएगा।

चैनल फरवरी में लॉन्च किया जाएगा। यह हाई-डेफिनिशन पिक्चर क्वालिटी और डॉल्बी 5.1 सराउन्ड साउन्ड के साथ सभी अग्रणी डिजिटल केबल प्लैटफॉर्म्स पर उपलब्ध रहेगा। इसके साथ ही चैनल अपनी वेबसाइट भी लॉन्च करेगा, जो यूज़र फ्रैन्डली होगी। वेबसाइट पर विडियो देखना आसान होगा साथ ही यूज़र्स उस पर अपनी प्ले-लिस्ट भी बना सकेंगे। कंपनी ने मोबाइल यूज़र्स तक अपनीं पहुंच बढ़ाने के लिए एक 'यूनिक डिस्कवरी एप्प' भी बनाया है जो सभी एन्ड्रॉयड और आईओएस प्लैटफॉर्म्स पर उपलब्ध रहेगा।

वायकॉम18 के ग्रुप सीईओ सुधान्शू वत्स ने कहा कि ये चैनल युवाओं को ध्यान में रख कर लॉन्च किया जा रहा है। इस क्षेत्र में ग्रोथ की बहुत सम्भावनाएं हैं।

चुनाव का टाइम है, नेताजी लाख रुपया महीना देंगे तभी छपेंगे

चुनाव के दौरान पेड न्यूज प्रकाशित और प्रसारित करने के मीडिया के रवैये के खिलाफ पिछले 6-7 साल से तूफान मचा हुआ है। 2007 के उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव में इसकी चर्चा शुरू हुई। इस कुरीति से मतदाता व जनवादी तबके तो परेशान नहीं दिखे लेकिन पत्रकार और उनकी महंती का शौक रखने वाले इस क्षेत्र के दिग्गज आपे से बाहर होते गये। पत्रकार संगठनों के सम्मेलनों में बगुला भगतों ने इस मुद्दे पर गला फाड़-फाड़ कर आसमान को जैसे सिर पर उठा लिया। चुनाव आयोग ने इसके बाद न्यूज छापने पर तमाम तरह की पाबंदियां लगा दीं। वैसे तो गंगा अभी भी घोषित रूप से पवित्र नदी है लेकिन कानपुर में इसकी वास्तविकता क्या है सभी जानते हैं। किसी गंदे नाले से ज्यादा गंदगी कानपुर में है, इस बात से सभी परिचित हैं। इसी तरह चुनाव आयोग की पाबंदियों के बाद मीडिया संस्थाओं के संचालकों के बैकफुट पर आ जाने से पत्रकारिता की गंदगी साफ हो जाने जैसे फतवे जारी किये जा रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इस बार लोकसभा चुनाव की दुदंभि बजने के पहले ही पेड न्यूज धड़ल्ले से छपना शुरू हो गयी है।

लखनऊ में इस्पात उपभोक्ता परिषद की बैठक के बहाने उत्तरप्रदेश की राजधानी के पत्रकारों को केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा द्वारा कीमती तोहफे बांटने की खबर अपवाद नहीं है। हालत यह है कि जालौन जैसे छोटे जिलों में आधा दर्जन के करीब पत्रकारों को कुछ पार्टियों के घोषित उम्मीदवारों ने 25 से 50 हजार रुपये महीने अपने जन संपर्क के समाचार छापने के लिये बांध दिये हैं। वैसे यह गत दिसम्बर तक का रेट था। पता चला है कि कतिपय पत्रकारों ने नये वर्ष के पहले दिन इन नेताओं के घर जाकर अल्टीमेटम दे दिया था कि अब चुनाव में महज 3-4 महीने बचे हैं, इसलिए अब वे एक लाख रुपये महीने से कम नहीं लेंगे। इस कारण उम्मीदवार पत्रकारों से अपने ऊपर तरस खाने की गुहार लगा रहे हैं फिर भी वे 75 हजार रुपये महीने पर आ गये हैं जबकि पत्रकार एक लाख रुपये से कम लेने को तैयार नहीं हैं। पता चला है कि आखिर में नेताओं को सरेंडर करना ही पड़ा। नतीजा यह है कि अखबारों के स्थानीय पन्नों पर खबरें गायब हो गयी हैं। नेताजी का थोबड़ा और उनके कालम डेढ़ कालम के बोर प्रवचन छपना शुरू हो गया हैं। अगर विज्ञापन के रूप में अखबार इतना स्पेस बेचता तो हर दिन नेताजी को 10 से 15 हजार रुपये देने पड़ते। एडवरटोरियल का रेट तो कामर्शियल विज्ञापन से कई गुना ज्यादा रखा गया था, इस कारण पूरे अभियान भर में तीन-चार से ज्यादा एडवरटोरियल छपवाने की हिम्मत सामान्य उम्मीदवार में नहीं हो सकती थी। इन दिनों अखबारों से हर रोज प्रत्याशियों की कन्वेसिंग हो रही है। वैसे इतना दैनिक कन्वेसिंग कवरेज महीने भर में 6-7 लाख रुपये का पड़ता। अब मात्र एक लाख रुपये में काम सधा जा रहा है।
 
भारत का चुनाव आयोग त्रेता के भगवानजी से कम नहीं है। उनके राज की चाहे जितनी तारीफ की जाती हो लेकिन सही बात यह है कि उनका राजकाज बड़ा ढीला था। रावण तो काल को पाटी पर बांधकर रखता था। यानि उसके राज में अकाल मौत असंभव थी, जबकि भगवानजी का प्रबंधन स्वास्थ्य एवं चिकित्सा जैसे मूलभूत क्षेत्र में भी इतना लचर हो गया था। इसका अंदाजा तब हुआ जब 12 वर्ष के एक ब्राह्मण बालक की उपचार न हो पाने के कारण हुई मौत के बाद बवंडर खड़ा हो गया। दरअसल भगवानजी भोले थे। उन्होंने अपने मातहतों के भरोसे राजकाज छोड़ दिया था जबकि खुद भेष बदलकर सड़कछाप लोगों की बातें सुनते रहते थे ताकि अंदाजा लगे कि लोग उनके राज के बारे में क्या कह रहे हैं। उनके इस छुईमुई स्वभाव का लोगों ने फायदा उठाया। एक उठाईगीर ने सीता मइया जैसी सच्चरित्रता, अग्नि परीक्षा दे चुकी भगवानजी की पत्नी के बारे में पिनक में कुछ कह दिया और भगवानजी इतने विचलित हो गये कि उन्होंने सीता मइया के गर्भवती होने की भी परवाह नहीं की। उन्हें अपने भाई लक्ष्मण से निर्जन लेकिन खूंखार जानवरों से भरे जंगल में छुड़वा दिया। चुनाव आयोग भी आत्मविश्वास के साथ अपना काम करने की बजाय उठाईगीरों की बातें सुनकर फैसला लेता है।

2007 के चुनाव में एक बहुप्रसारित अखबार का जिला संवाददाता बना। इस बात से परिचित था कि चुनाव के दौरान पैसे लेकर उम्मीदवारों के जनसंपर्क को छापने का रिवाज कई वर्षों से चल रहा है। ऐसे समाचारों में उम्मीदवार के समर्थकों के नामों की भरमार होती है। ऐसी खबर को केवल उम्मीदवार व उसके समर्थक ही पढ़ते हैं जबकि आम पाठक ऐसी खबरों की भरमार हो जाने पर अखबार फेंकने लगते हैं। यह रिवाज बदलने की मैं अपनी तरफ से कोशिश करता तो उम्मीदवारों का जबर्दस्त कोपभाजन बनता। मैं सोच रहा था कि टकराव की नौबत न आये तो ज्यादा अच्छा हो। इस बीच अखबार के प्रबंधन का आदेश आया कि किसी उम्मीदवार के जनसंपर्क की खबर तब तक नहीं छपेगी जब तक वह एडवरटोरियल के रेट पर जितना स्पेस उसकी खबर को मिले उतना पेमेन्ट देने को तैयार नहीं होता। रेट इतने ज्यादा थे कि उम्मीदवारों की घिग्घी बंध गयी। मुझे इस चुनाव में फालतू की न्यूज नहीं छापनी पड़ेगी जिससे मुझे बड़ी तसल्ली हुई। 2007 का उस अखबार में पहला चुनाव था जिसमें खांटी समीक्षायें निर्वाचन क्षेत्र का इतिहास आदि वास्तव में पाठकों के साथ न्याय करने वाली खबरें छापी गयीं। मैंने एडवरटोरियल छपवाने में कोई योगदान नहीं किया इसके लिये प्रबंधन ने मेरे खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की। दूसरी ओर अखबार की आंतरिक बैठक में प्रबंधन के इस फैसले को अपने लिये मैंने सुकूनदेह क्या बता दिया मेरी बिरादरी ही मुझ पर बिगड़ पड़ी। संपादकीय कक्ष के चंद लोगों को छोड़कर सभी ने मुझसे गहरी नाराजगी जतायी क्योंकि चुनाव में जिला संवाददाता जो कमाई करता था उसके टुकड़े ऊपर तक के लोगों को पहुंचते थे।

चुनाव आयोग की गलती यह है कि उसने बेवजह के मुद्दे पर दिमाग लगाया। पेड न्यूज से लोकतंत्र का कुछ नहीं बिगड़ रहा था क्योंकि ऐसी न्यूजें छपी ही बहुत कम थीं। पेड न्यूज तब खतरनाक हो जाती है जब पैसे लेकर किसी दूसरे का चरित्र हनन करने वाला समाचार, सर्वे में कमजोर को बढ़ा चढ़ाकर और ताकतवर को पिद्दी साबित करने का षड्यन्त्र किया जाये। मैं जिस अखबार में था उसमें एडवरटोरियल के लिये जो मर्यादायें तय की गयी थीं उसमें यह किया जाना संभव ही नहीं था। अंतर केवल इतना है कि पेड न्यूज के खिलाफ तब माहौल बनाया गया जब इसका पैसा मालिकान अपनी जेब में डालने लगे जबकि आज पहले की तरह फिर पत्रकारों की जेब में पैसा जा रहा है तो शांति है। इसी कारण पहले से ज्यादा पेड न्यूज छापने की शुरूआत हो गयी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मीडिया की साख मालिक से जुड़ी नहीं होती। भले ही मीडिया संस्थान में पत्रकार का दर्जा नौकर का हो लेकिन उसके आचरण से मीडिया की साख नापी जाती है। उसे पैसा मिलता है तो वह मन लगाकर गलत खबरें गढ़ता है। मालिक को पैसा मिलेगा तो उसके दबाव में किसी के पक्ष में पत्रकार द्वारा लिखी गयी खबर में मजा नहीं आ सकता।
 
आज संपादक की कुर्सी पर बैठे लोग बेहतर अग्रलेख लिखने की योग्यता भले ही न रखते हों लेकिन जिलों और तहसीलों के संवाददाताओं से वसूली में उन्हें महारत हासिल है। इसी कारण स्थानीय पत्रकारों की इमेज ट्रैफिक के सिपाही से ज्यादा लुटेरे की बन गयी है। वह बेरोजगारों की, अंधो और लंगड़ों की न्यूज भी पैसा लेकर प्रकाशित व प्रसारित करते हैं। पिछले कुछ सालों में पत्रकारिता में जो अंधा युग आया है वह पहले कभी नहीं था। इस समय ग्लोबलाइजेशन का जमाना है जिसे दूसरे शब्दों में एकरूपता का जमाना कहा जाना चाहिये। इस जमाने में सबके पैर एक जैसे करने के लिये बड़े पैरों की कटाई छंटाई का नारा दे दिया गया है। हर आदमी को अपने जीवन स्तर के उत्थान की दौड़ में शामिल हो जाना चाहिये। यह ग्लोबलाइजेशन की सृष्टि का अनिवार्य नियम है। पर कुछ पेशे ऐसे हैं जहां सुख सुविधा भोगिता का प्रवेश हो जायेगा तो उनकी पहचान ही मिट जायेगी। पत्रकारिता का पेशा भी उसमें एक है। लेकिन मूल रूप से जिनका चरित्र पत्रकार का नहीं है, वे मीडिया में पैठ कर चुके हैं। यह मारीच तो चाहेंगे ही कि उन्हें अफसर और नेता से ज्यादा आरामतलब जिंदगी हासिल हो। भले ही इसके लिये उन्हें पत्रकारिता की पहचान मिटानी पड़े। मीडिया आज छद्म के रूप में अवशेष है जिसमें लहरों से भी पैसा कमा लेने का हुनर रखने वालों की तूती बोल रही है। बहरहाल भले ही घोषित रूप से मीडिया लोकतंत्र का कोई स्तंभ न हो लेकिन लोकतंत्र की प्रक्रियायें संचालित करने में मीडिया की अहम भूमिका है। जिसकी यदि विश्वसनीयता और पहचान मिट गयी और जिसने निष्पक्षता की बजाय बिकाऊ चोला ओढ़ लिया तो लोकतंत्र भी नहीं बचेगा।

 

लेखक केपी सिंह उरई(जालौन) के वरिष्ठ पत्रकार हैं। संपर्क: 09415187850

नीरा राडिया ने बुक कराया था बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के लिए कमरा

बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी केशव एन नंबूदरी को दिल्ली के महरौली इलाके के होटल में तीस साल की महिला के यौन उत्पीड़न के आरोप में मंगलवार को गिरफ्तार किया गया। पुजारी के साथ रह रहे उसके रिश्तेदार को सोमवार को ही गिरफ्तार कर लिया गया था। पुलिस ने बताया कि नंबूदरी जिस कमरे में ठहरा था उसे पूर्व कारपोरेट दलाल नीरा राडिया ने बुक करवाया था। वह दो फरवरी को अपने रिश्तेदार के साथ केरल से दिल्ली पहुंचा था और राडिया के ड्राइवर के परिचय-पत्र के आधार पर होटल के कमरे में दाखिल हुआ। शीतकाल में मंदिर बंद होने के बाद वह केरल चला गया था। मई में मंदिर का द्वार खुलने से पहले उसे मार्च में बदरीनाथ लौटना था।

उत्तराखंड की महिला ने आरोप लगाया कि सोमवार को नंबूदरी ने उसे फोन कर होटल में मिलने के लिए बुलाया। महिला के मुताबिक, उसने होटल में मिलने को टालने की कोशिश की लेकिन पुजारी के बहुत जिद करने पर वह चली गई। महिला ने पुलिस को बताया कि होटल पहुंचने पर पुजारी उसे कमरे में ले गया। होटल के कमरे के अंदर पहले से एक व्यक्ति मौजूद था। पुजारी ने उससे कहा कि वह बाहर जाए और दरवाजा बंद कर दे।

महिला ने आरोप लगाया कि कमरे के अंदर सिगरेट के जले हुए टुकड़े थे। कमरे में शराब की बू भी आ रही थी। उसके बाद पुजारी ने उसे एक गिलास पानी देने को कहा। जब वह उसे पानी का गिलास देने आगे बढ़ी तो उसने उसके साथ छेड़खानी शुरू कर दी। महिला की शिकायत के बाद नंबूदरी और उसके रिश्तेदार विष्णु प्रकाश को गिरफ्तार कर लिया गया। कहा जा रहा है कि महिला गर्भवती है। सूत्रों के मुताबिक, संस्कृत भाषा में पीएचडी नंबूदरी ने कहा कि होटल के कमरे में उसने शराब पी थी। नंबूदरी की कई राजनेताओं, फिल्मी सितारों और कारोबारियों से अच्छी जान-पहचान है। पीड़िता के परिवार से उसकी पुरानी पहचान थी। उसके पिता और पति के साथ वह पिछले 13 सालों से संपर्क में था।

पुजारी ने आरोप लगाया कि महिला उससे मिलने की जिद कर रही थी, लेकिन उसके पास ज्यादा वक्त नहीं था। सूत्रों के मुताबिक, आरोपी ने कहा कि पीड़िता ने सोमवार को जब उसे फोन किया तो वह मिलने के लिए राजी हो गया। नंबूदरी के मुताबिक, महिला के अपने पति के साथ कुछ मतभेद थे और वह उससे इस मामले में मशविरा चाह रही थी। उसने दो दिन पहले महिला को बार-बार फोन कर परेशान करने के लिए फटकार भी लगाई थी। उसने तो सोमवार को भी उससे मिलने से इनकार कर दिया था। लेकिन उसके जिद के कारण राजी हो गया।

नंबूदरी और विष्णु प्रसाद को सोमवार को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट श्रेया अरोड़ा मेहता के सामने पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 18 फरवरी तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया क्योंकि पुलिस ने उनसे हिरासत में पूछताछ करने की मांग नहीं की। दिल्ली पुलिस ने बताया कि केशव और विष्णु की हिरासत उन्हें नहीं चाहिए क्योंकि उन्होंने पहले ही मामले से जुड़ी अहम चीजें जब्त कर ली हैं और अब इस मामले में किसी और की गिरफ्तारी नहीं करनी है।

पुलिस ने अदालत को बताया कि दोनों व्यक्ति गिरफ्तारी के समय नशे में थे। पुलिस ने कहा कि उनकी पहचान को लेकर कोई विवाद नहीं है। अरोपियों के खिलाफ आइपीसी की धारा 342 और 354 के तहत मामला दर्ज किया गया है। उधर, बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के प्रमुख गणेश गोदियाल ने कहा कि गिरफ्तारी की खबर की पुष्टि के तुरंत बाद उन्हें प्रसिद्ध मंदिर के मुख्य पुजारी पद से निलंबित कर दिया गया है।  गोदियाल ने कहा कि जब तक अदालत उन्हें सभी आरोपों से बरी नहीं कर देती, नायब रावल वीसी ईश्वर प्रसाद मंदिर के मुख्य पुजारी का पद संभालेंगे।

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उमा भारती को राहुल गांधी अधेड़ क्यों लगते हैं (देखें वीडियो)

उमा भारती पिछले दिनों मध्य प्रदेश के सीहोर गईं. वहां गणेश जी का दर्शन किया और फिर राजनीतिक बयानबाजी की. उन्होंने राहुल गांधी को अधेड़ कह दिया… उमा भारती को केजरीवाल सबसे बड़े भ्रष्ट नजर आते हैं… उमा भारती गणेश जी की पूजा करने के तुरंत बाद परनिंदा शुरू कर देती हैं..

क्यों, कैसे… जानिए इन दो वीडियो को देखकर..

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https://www.youtube.com/watch?v=wp00peZTvps

सीहोर से आमिर खान की रिपोर्ट.

बलिया में मुस्लिम महिला लापता, सीएम अखिलेश के यहां से फोन आने पर जागी पुलिस (देखें वीडियो)

यूपी पुलिस का हाल बुरा है. बलिया में पुलिस वाले सोते रहे. कोई लापता हो जाए, कोई गायब हो जाए तो बला से. पर जब सीएम अखिलेश यहां से फोन आया तो पुलिस वालों को ड्यूटी याद आ गई. लगे खोजने तलाशने और दर-दर पूछने कि इस गायब महिला को कहीं देखा है…

मंत्री जी की भैंस खो जाए तो पुलिस दिन रात एक कर देती है. पर कोई आम आदमी गायब हो जाए तो पुलिस को कोई चिंता नहीं… यूपी पुलिस तभी चिंतित होती है जब उपर से आदेश आ जाता है… फिलहाल बलिया पुलिस पूरी सरगर्मी से लापता मुस्लिम महिला की तलाश कर रही है.. देखिए पूरी कहानी, इन तीन वीडियोज के जरिए…

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https://www.youtube.com/watch?v=o4Ez-qN82SI

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https://www.youtube.com/watch?v=l9NGBkwcNIg

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https://www.youtube.com/watch?v=AT62NER_EkI

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

जब दिल बड़ा करके ‘एबीपी न्यूज’ ने ‘आज तक’ का नाम अपनी स्क्रीन पर फ्लैश किया… (देखें तस्वीर)

Nadim S. Akhter : टीआरपी रेटिंग वाली टेलिविजन पत्रकारिता के इस दौर में एबीपी न्यूज चैनल का यह कदम सराहनीय, प्रशंसनीय और अनुकरणीय है. कल न्यूज चैनल -आज तक- ने पहले से ही बदनाम दिल्ली पुलिस की पोल-खोल करके उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को एक बार फिर उजागर किया और स्टिंग ऑपरेशन में ये दिखाया कि कैसे दिल्ली पुलिस का सिपाही से लेकर एसएचओ तक हरे-लाल नोटों की खातिर वर्दी और उस पर जड़े सितारों को बेचने के लिए तैयार बैठा है. खरीद सको तो खरीद लो. पांच सौ-हजार रुपये में ही आप कानून को खरीद सकते हैं, ये जानकर देश को तो शर्म आई लेकिन मुझे नहीं लगता कि दिल्ली पुलिस को आई होगी.

खैर, बात हो रही थी एबीपी न्यूज की. आमतौर पर ये देखा जाता है कि अगर किसी हिन्दी न्यूज चैनल ने कोई स्टिंग किया है तो प्रतिद्वन्द्वी हिन्दी न्यूज चैनल उस स्टिंग और उससे जुड़ी खबर को लगभग नजरअंदाज कर देता है. अगर बहुत मजबूरी हुई, खबर बड़ी हो गई तो खबर दिखा देता है, टिकर-पट्टी स्क्रीन पर चला देता है लेकिन ये स्टिंग किस हिन्दी न्यूज चैनल ने किया है, ये बात प्रतिद्वन्द्वी हिन्दी न्यूज चैनल नहीं बताता. हां, अगर अंग्रेजी न्यूज चैनल का स्टिंग है तो हिन्दी न्यूज चैनल उस अंग्रेजी चैनल का नाम बता देते हैं. अंग्रेजी न्यूज चैनल भी बड़ा स्टिंग होने पर आमतौर पे अपने प्रतिद्वंदी अंग्रेजी न्यूज चैनल का नाम नहीं बताते.

अगर स्टिंग ऑपरेशन करने वाला चैनल हिंदी का है तभी अंग्रेजी न्यूज चैनल, संबंधित न्यूज चैनल का नाम बताते हैं, फ्लैश करते हैं. कारण साफ है. टीआरपी की इस रेस में सभी न्यूज चैनलों को ये डर होता है कि बड़ी खबर ब्रेक करने वाले या स्टिंग दिखाने वाले चैनल का नाम अगर वो बताएंगे (खासकर अगर संबंधित चैनल से टीआरपी में उसकी प्रतियोगिता है), तो दर्शक प्रतियोगी चैनल पर शिफ्ट हो जाएंगे, जहां वह खबर-स्टिंग दिखाया जा रहा होगा.

सो कोई चैनल ये रिस्क नहीं लेता. खबर भले दिखा-बता दे, चैनल का नाम तो कतई नहीं बताता. अमूमन तो ये होता है कि अगर कोई चैनल किसी खास समय पर कोई बड़ा प्रोग्राम या शो लेकर आ रहा है तो प्रतियोगी चैनलों में इस बात की खदबदाहट होती है कि ठीक उसी समय पर कौन सा प्रोग्राम-शो हम दिखाएं ताकि दर्शक हमारे चैनल पर आएं-बरकरार रहें, उधर शिफ्ट ना हों. लेकिन कल एबीपी न्यूज ने इस परम्परा को तोड़ा है. एक नई लकीर खींची है. -आज तक- न्यूज चैनल से इसकी सीधी प्रतियोगिता है, टक्कर है, फिर भी दिल बड़ा करके एबीपी न्यूज ने ना सिर्फ -आज तक- के स्टिंग का तुरंत संज्ञान लिया बल्कि ये भी बताया कि ये स्टिंग -आज तक- न्यूज चैनल ने किया है. स्क्रीन पर -आज तक- चैनल का नाम भी फ्लैश किया, इस बात की परवाह किए बिना कि संबंधित स्टिंग-खबर देखने के लिए कहीं उसके दर्शक -आज तक- चैनल पर शिफ्ट ना हो जाएं. प्रिंट में भी कई बार मुझे यही ट्रेंड दिखता है.

बड़ी खबर ब्रेक करने पर उसी भाषा का प्रतियोगी अखबार या तो संबंधित खबर को गोल कर जाता है या फिर उस खबर के फॉलोअप में खबर ब्रेक करने वाले अखबार को क्रेडिट नहीं देता. ये आपसी प्रतिद्वंद्विता का मामला होता है. लेकिन -आज तक- न्यूज चैनल को क्रेडिट देकर उसका नाम अपने चैनल पर फ्लैश करने वाला एबीपी न्यूज का यह कद व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह बहुत अच्छा लगा. भाई हम तो खबरों के कारोबार में हैं. सो अगर दूसरा मीडिया संस्थान कोई बड़ी खबर ब्रेक करता है, तो उसे दिखाने में क्या हर्ज है. और साथ में अगर अपने न्यूज चैनल/अखबार में उस खबर के लिए प्रतिद्वंद्वी का नाम भी बता दिया जाए तो सोने पे सुहागा. कहना ही क्या. बतौर एक दर्शक और पाठक हम उम्मीद करेंगे कि आगे से दूसरे न्यूज चैनल और अखबार भी दिल बड़ा करके बड़ी खबर ब्रेक करने वाले मीडिया संस्थान के नाम को अपनी खबर में जगह देंगे, खासकर तब, जब संबंधित मीडिया संस्थान से खबरों के मामले में उसकी सीधी टक्कर हो. आप भी देखिए, किस तरह एबीपी न्यूज ने -आज तक- के नाम को अपनी स्क्रीन पर फ्लैश किया. नीचे ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी पर निगाह डालिए.

कई अखबारों-न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके तेजतर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


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रिश्वतखोर दिल्ली पुलिस पर स्टिंग करने के लिए 'आजतक' को बधाई

राजगढ़ में पत्रकार से अभद्र व्यवहार करने पर पुलिस उप निरीक्षक लाइन हाजिर

राजगढ़ (म. प्र.) : पुलिस अधीक्षक सुशांत कुमार सक्सेना ने पत्रकार के साथ अभद्र व्यवहार करने के आरोप में एक पुलिस उप निरीक्षक को तत्काल प्रभाव से पुलिस लाइन राजगढ़ हाजिर कर दिया है। अनुविभागीय अधिकारी पुलिस जयराज कुबेर के अनुसार जिले के पचोर पुलिस थाना में पदस्थ पुलिस उप निरीक्षक विजय वर्मा ने भोपाल से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र के संवाददाता पंडित रमाकांत शर्मा को २६ जनवरी की दोपहर पचोर के गांधी चौक पर रोक कर अभद्र व्यवहार किया था।

इसके बाद गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब के संभागीय अध्यक्ष माखन विजयवर्गीय के नेत्तृत्व में पत्रकारों ने अनुविभागीय अधिकारी पुलिस  जयराज कुबेर को एक ज्ञापन देकर पुलिस उप निरीक्षक विजय वर्मा को पचोर पुलिस थाना से तुरंत हटाने की मांग की थी और पुलिस थाना के सामने पत्रकारों द्वारा धरना देने की चेतावनी दी थी।

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

नभाटा, गुड़गांव से अलख राम सिंह का इस्तीफा

गुड़गांव। नवभारत टाइम्स ग्रुप के गुड़गांव ऑफिस में पत्रकारों का आवागमन का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. इस सप्ताह एनबीटी का एक और पत्रकार ब्यूरो चीफ की तानाशाही से परेशान होकर अलविदा कह गया. नाम है अलख राम सिंह. इन्होंने लगभग 6 महीने पहले गुड़गांव ऑफिस में ज्वॉइन किया.

इससे पहले पिछले 15 साल से कार्यरत सीनियर पत्रकार बीपी पाण्डे को अचानक ग्रुप से हटा दिया गया. गुड़गांव में नवभारत टाइम्स 15 जुलाई 2010 को लांच हुआ था और ब्यूरो की तानाशाही के चलते दीपक अहूजा व अनिल भारद्वाज चले गए. बलराज दायमा, हरेंद्र नागर, राम खटाना, संदीप दूबे, आशीष पाण्डे, प्रवेश शर्मा, फोटोग्राफर भगवत प्रसाद आदि भी नवभारत टाइम्स छोड़कर जा चुके हैं. 

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अब पत्रकार भी करने लगे हुड्डा की जय हो

रोहतक : ये सीएम सिटी के कुछ सो काल्ड पत्रकार बाज नहीं आएंगे। इन्हें मौका मिलना चाहिए चमचागिरी का, बस शुरू हो जाते हैं। सीएम सिटी के इसलिए कहता हूं कि हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा रोहतक से ही हैं। अपने दौरे में जब भी वे पत्रकारों से रूबरू होते हैं तो कोई कुछ मांगता है तो कोई कुछ। अब तो सरेआम जय हो के नारे भी लगाने शुरू कर दिए हैं इन्होंने।

अब इन्हें शर्म भी नहीं आती। शर्म भी किसलिए आएगी, पूरे बेशर्म हैं और पत्रकार तो कहलाने लायक हीं नहीं हैं। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि अधिकतर पत्रकार नौकरी तो लालालों की करते हैं लेकिन सुविधाएं सरकार से मांगते हैं। वहां तो हिम्मत नहीं होती और जोर सरकार पर चलाते हैं। अब यहां प्रस्तुत है रोहतक के चमचागिरी करने वाले पत्रकारों का पुराण या फिर गाथा जो भी कहो।

हुड्डा जब भी रोहतक शहर में होते हैं तो कुछ सो काल्ड पत्रकारों का यह लगातार प्रयास रहता है कि किसी तरह मुख्यमंत्री से रूबरू हुआ जाए। इसके लिए वे सतत प्रयास में रहते हैं। उनका यह प्रयास खबर के लिए न होकर व्यक्ति तौर पर नंबर बनाने या फिर सीधे कहूं तो चमचागिरी करने के लिए होता है। मुख्यमंत्री पिछले दो दिन से शहर में थे। वे एक फरवरी को जब रोहतक आए थे तब प्रेस कांफ्रेंस करने की बात कह गए थे। ऐसे में कल शाम ही डीपीआरओ आफिस की ओर से तमाम पत्रकारों को प्रेस कांफ्रेंस की सूचना दी गई। समय तो सुबह 11 बजे का निर्धारित किया गया था लेकिन बहुत से तो साढ़े दस बजे ही जाकर जम गए। जैसे तैसे प्रेस कांफ्रेंस का सिलसिला चला।

जैसे सवाल हुए, वैसे ही जवाब मिले। असर कमाल तो प्रेस कांफ्रेंस के बाद पकौड़ा पार्टी में हुई। यहां इन सो काल्ड पत्रकारों से डिमांड चार्टर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। कोई मीडिया सेंटर के लिए जगह मांग रहा था तो कोई टोल टैक्स में छूट। कोई साथ फोटो खिंचवाने पर जुटा था तो कोई किसी ओर माध्यम से खुद की मौजूदगी का अहसाय करवा रहा था। आखिर में एक सो काल्ड पत्रकार ने तो हद ही कर दी। उसने हुड्डा साहब की जय हो का ही नारा लगा दिया। हालांकि बाकी किसी ने उसका साथ नहीं था। आगे देखो किस हद तक उतरते हैं ये सो काल्ड। आगे भी रहेगी नजर और इसी तरह सारी बातें सार्वजनिक होंगी।

रोहतक से युवा पत्रकार दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क: 09991680040

भूखंड के लिए उदयपुर के पत्रकार धरने पर

उदयपुर से खबर है कि नगर विकास प्रन्यास से लंबे समय से भूखंडों की मांग कर रहे पत्रकार आज कलेक्ट्रेट के सामने धरने पर बैठे. इस संबंध में न्यायालय में चल रहा वाद भी खत्म हो गया है, लेकिन यूआईटी सचिव आरपी शर्मा की हठधर्मिता के कारण पत्रकारों को उनका जायज हक नहीं मिल पा रहा है. इसी कारण पत्रकारों को धरने पर बैठना पड़ा. यह धरना पत्रकार संघर्ष समिति की तरफ से दिया जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि पत्रकारों द्वारा एक साल पहले १४४ भूखंडों के आवेदन किए गए थे. इस पर यूआईटी ने १०२ पत्रकारों को भूखंड आबंटित किए. इसी बीच कुछ पत्रकारों द्वारा न्यायालय से स्टे ले लिया गया, जिससे प्रक्रिया रोकनी पड़ी. इसके बाद एक माह पूर्व पत्रकारों ने स्टे उठा लिया.  इसके बावजूद यूआईटी आबंटन की कार्रवाई शुरू नहीं कर रही है. इस संबंध में जिला कलेक्टर और यूआईटी चेयरमैन आशुतोष पेढणेकर और यूआईटी सचिव डॉ. आरपी शर्मा को कई दफा भूखंड आबंटन करने का निवेदन किया गया, लेकिन कार्रवाई शुरू नहीं हो पाई. 

इस पर लेकसिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष मनु राव पत्रकारों के प्रतिनिधि मंडल के साथ कलेक्टर से मिले और उनसे पत्रकारों के भूखंड के संबंध में दिए गए जवाब से असंतोष जताते हुए धरने पर बैठने की चेतावनी दी. इस पर आज कलेक्ट्री के सामने मनु राव के नेतृत्व में पत्रकार कपिल श्रीमाली, जयप्रकाश माली, भूपेंद्रसिंह चूंडावत, डॉ. रवि शर्मा, प्रकाश मेघवाल, घनश्यामसिंह, अजय आचार्य, सुनील गोठवाल सहित कई पत्रकार धरने पर बैठे. यह तीन दिवसीय धरना है. उसके बाद कुछ पत्रकार आमरण अनशन पर बैठेंगे. उदयपुर के पत्रकारों को अधिकारियों द्वारा फिर एक बार धोखा दिया जा रहा है.

जिन श्रमजीवी पत्रकारों को लॉटरी द्वारा भूखड आवंटित हुए थे उन भूखंडों पर अब यूआईटी के अधिकारी अब फुटबॉल का खेल खेल रहे है और कोर्ट के आदेशों के बाद भी कोर्ट की अवहेलना करते हुए. पत्रकारों को धोखा दिया जा रहा है, और पत्रकारों को उनका अधिकार "भूखंड" आवंटित नहीं किये जा रहे हैं. यूआईटी सेक्रेटरी अपने निजी अहम् के चलते १४० पत्रकारों से उनकी जीवन भर की पूंजी की अमानत में खयानत कर रहे है.

बीना शुक्ला की लड़ाई, भड़ास वालों की गिरफ्तारी और जागरण के बनिये मालिक

Yashwant Singh : दैनिक जागरण, कानपुर में कार्यरत रही एक महिला मीडियाकर्मी अपने यौन शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है. पुलिस, प्रशासन, कोर्ट हर जगह चक्कर काट रही हैं. पर आरोपी आज भी जागरण में बड़े ठाठ से नौकरी कर रहे हैं. महिला पर ही दबाव पड़ रहा है कि वह केस वापस ले ले, मुंह बंद रखे… पीड़िता महिला मीडियाकर्मी बीना शुक्ला (इन्हें अपना नाम सार्वजनिक होने से कोई आपत्ति नहीं है) ने आज एक टेप जारी किया है. इस टेप में जागरण के एक कर्मी, जो अहम गवाह है, से बातचीत है. बीना की लड़ाई को कोई मीडिया हाउस नहीं लड़ रहा क्योंकि आरोपी जागरण जैसे मीडिया हाउस में कार्यरत हैं और प्रबंधन से संरक्षित हैं… ऐसे में बीना ने फेसबुक, सोशल मीडिया के लोगों से अपील की है कि वे आगे आएं और उनके मसले को उठाएं…

दैनिक जागरण की इसी बीना शुक्ला यौन शोषण प्रकरण की खबर छापने के कारण दैनिक जागरण वालों ने मेरे पर और भड़ास के तत्कालीन कंटेंट एडिटर Anil Singh पर फर्जी मुकदमा कर दिया था और मेरे जेल जीवन को लंबा बढ़ा दिया था, यानि जमानत न होने देने का इंतजाम कर दिया. साथ ही कंटेंट एडिटर को भी उठवा कर जेल में डलवा दिया. फिर घर पर छापे डलवाए ताकि सब कोई इतना डर जाए, घबरा जाए कि फिर से मीडिया हाउस के खिलाफ खबर छापने के बारे में सोचने तक की हिम्मत न कर सके…

पर ये क्या.. ये भड़ास तो अब भी जारी है और निशिकांत ठाकुर से लेकर संजय गुप्ता तक की बैंड बजाई भी जारी है.. जाओ चोरों, अब किसी पेशेवर अपराधी को सुपारी दे देना हम भड़ासियों को निपटाने के लिए.. क्योंकि तुम जैसे डरपोक लोग सिवाय पुलिस-प्रशासन और अपराधियों की मदद लेने के अलावा कर भी क्या सकते हैं… क्योंकि तुम लोगों ने सिर्फ चोरी करना सीखा है और चोरी करने के रास्ते में जो रोड़ा बने उसे निपटा देने का तरीका जाना है…

पर ध्यान रखना… तुम लोगों को औकात में एक दिन सोशल मीडिया वाले ही लाएंगे क्योंकि अब मीडिया तुम लोगों की बपौती नहीं रह गई है.. मीडिया का विकेंद्रीकरण हो चुका है और अब सोशल मीडिया ही मॉस मीडिया बन चुका है.. तुम लोग अब सिर्फ और सिर्फ पेड व दलाल मीडिया बन गए हो… लगे रहो पैसे बटोरने और टर्न ओवर बढ़ाने में… जब तुम लोग अपने संस्थान की एक पीड़ित, यौन शोषित महिला को न्याय मिलने में रोड़े अटका सकते हो तो मुझे यकीन है कि पैसे के लिए तुम लोग एक दिन अपने घर की बहन-बेटियों की इज्जत सरेआम नीलाम करने से नहीं हिचकोगे… क्योंकि, बनियों के लिए किसी का मान-सम्मान, आत्मसम्मान और जीवन का मुद्दा कोई मसला नहीं होता.. उनका एक मुद्दा होता है.. ज्यादा से ज्यादा मुनाफा और ज्यादा से ज्यादा लूट… उम्मीद करते हैं फेसबुक के साथी इस प्रकरण को आगे बढ़ाएंगे और बीना शुक्ला को न्याय दिलाने में मदद करेंगे… मूल खबर ये है…

http://bhadas4media.com/print/17660-2014-02-05-08-48-04.html
जागरण में यौन शोषण की शिकार महिला मीडियाकर्मी ने जारी किया टेप (सुनें)

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

दैनिक जागरण में यौन शोषण की शिकार महिला मीडियाकर्मी ने जारी किया एक टेप (सुनें)

बीना शुक्ला दैनिक जागरण, कानपुर की मीडियाकर्मी रही हैं. उनके साथ जागरण में ही कार्यरत चार वरिष्ठों ने यौन शोषण किया. बीना ने पहले दैनिक जागरण के मालिकों से लिखित शिकायत की. पर मालिकों ने चुप्पी साध ली और बीना को ही टर्मिनेट करने का फरमान जारी कर दिया. जब दैनिक जागरण के मालिकों ने कोई कार्रवाई नहीं की और न ही कोई जांच बिठाई तो वे पुलिस के पास गईं. पुलिस के छोटे बड़े सभी अधिकारियों ने मामला दैनिक जागरण का देखकर शिकायत को ठंढे बस्ते में डाल दिया. मजबूरन बीना को कोर्ट जाना पड़ा.

कोर्ट के आदेश के बाद दैनिक जागरण, कानपुर के 4 मीडियाकर्मियों के खिलाफ कानपुर शहर के काकादेव थाने में मुकदमा दर्ज हुआ. जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर हुई है, उनके नाम हैं- डीजीएम नितिन श्रीवास्तव, प्रोडक्शन हेड प्रदीप अवस्थी, फोरमैन संतोष मिश्रा और फीचर विभाग के दिनेश दीक्षित. डीजीएम नितिन श्रीवास्तव आजकल दैनिक जागरण, नोएडा में कार्यरत है. बीना ने लेबर कोर्ट में भी जागरण के खिलाफ मुकदमा किया है. उन्होंने गलत तरीके से खुद को टर्मिनेट किए जाने के खिलाफ लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. बीना शुक्ला का साफ आरोप है कि पुलिस-प्रशासन जागरण प्रबंधन के इशारे पर आरोपियों को बचाने में लगा हुआ है. दैनिक जागरण के भीतर का मामला होने के कारण कोई दूसरा मीडिया हाउस इसे प्रकाशित नहीं कर रहा है.

बीना ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में साफ कहा कि उन्हें अपनी पहचान उजागर होने से कोई दिक्कत नहीं. वह खुलकर अपनी बात कहना, रखना, बताना चाहती हैं. वह न्याय चाहती हैं. वह वर्षों से लड़ रही हैं पर उन्हें कहीं से कोई सपोर्ट नहीं मिल रहा है. पुलिस वाले जांच के नाम पर जागरण प्रबंधन के इशारे पर आरोपियों को बचाने में जुटे हैं. बीना शुक्ला ने आज एक टेप जारी करते हुए बताया कि इस टेप में दैनिक जागरण, कानपुर में कार्यरत एक मीडियाकर्मी से बातचीत है जिसके सामने ही उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया था. बीना शुक्ला का कहना है कि सारे प्रमाणों के बावजूद पुलिस-प्रशासन के लोग दैनिक जागरण में कार्यरत आरोपियों को छू तक नहीं रहे हैं.

अगर आप भी बीना शुक्ला की मदद करना चाहते हैं, उनकी कहानी लिखना या प्रकाशित या जानना चाहते हैं तो उनसे सीधे संपर्क beenshukla@gmail.com के जरिए कर सकते हैं. बीना ने सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर, वेब, ब्लाग आदि) के लोगों से खासकर अपील की है कि उनके प्रकरण को हर कोई उठाए ताकि उन्हें न्याय मिल सके. कार्पोरेट मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया के प्रभाव में जांच गलत दिशा में मोड़ने पर आमादा पुलिस-प्रशासन को रास्ते पर लाने के लिए भी यह जरूरी है कि हर स्तर पर मसले को उठाया जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.

बीना शुक्ला ने यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से भी अपील की कि दैनिक जागरण वालों के प्रभाव से कानपुर के पुलिस-प्रशासन को मुक्त कराने के निर्देश दिए जाएं और आरोपियों की फौरन गिरफ्तारी की जाए. बीना शुक्ला का कहना है कि आरोपी एक प्रभावशाली मीडिया हाउस में काम करते हैं और इस मीडिया हाउस का प्रबंधन आरोपियों के साथ मिला हुआ है, इसलिए ये लोग विविध तरीके से दबाव डालकर, साजिश रचकर पूरे मामले को गलत दिशा में मोड़ना चाहते हैं ताकि पीड़िता को न्याय न मिल सके और आरोपियों को बचाया जा सके. नीचे ये वो टेप है जो बीना शुक्ला ने कानपुर के पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को सौंपने के साथ-साथ भड़ास4मीडिया को दिया ताकि पूरी बातचीत आम हो सके जिससे कोई भी किसी स्तर पर इस जरूरी सुबूत (टेप) को लापता न कर दे.


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नामवर जी बड़ा काम कर रहे हैं, साहित्य सेवा में पप्पुओं, लवलियों और पोंटियों को शामिल कर कहे हैं

Abhishek Srivastava : तो लीजिए साहेबान, साहित्‍य की दुनिया में जला है नया चिराग जिसमें तेल की जगह शराब है। शराब व्‍यवसायी और रियल एस्‍टेट के सरताज मरहूम पोन्‍टी चड्ढा की वेव कंपनी हिंदुस्‍तान टाइम्‍स अखबार के सहयोग से प्रस्‍तुत करती है दिल्‍ली लिटरेचर फेस्टिवल 2014…! इस मेले की शुरुआत श्री राजेंद्र यादव को श्री नामवर सिंह द्वारा श्रद्धांजलि से होगी।

अदभुत संयोग! इसके बाद तमाम किस्‍म की बहसों में आप कुसुम अंसल से लेकर विश्‍वनाथ त्रिपाठी तक कई हिंदीजीवियों को पाएंगे। फिर अंत में महान पत्रकार बरखा दत्‍त इस मौसम के सबसे बड़े लेखक, भ्रष्‍टाचार के क्रूसेडर और सबसे ईमानदार मानव अरविंद केजरीवाल से उनकी पुस्‍तक ''स्‍वराज'' पर चर्चा करेंगी। एंट्री मुफ्त, मुफ्त, मुफ्त…

डिसक्‍लेमर: इस बार किसी को टैग नहीं करूंगा क्‍योंकि देख रहा हूं आजकल आवाजाही के लोकतंत्र को बड़ी ठेस पहुंच रही है। किसी को दुख पहुंचाने की मेरी कोई मंशा नहीं है। वैसे भी, अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं- बापू ने कहा था।

प्रतिभाशाली और जनसरोकारी पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं..

Sanjay Tiwari : नामवर जी बड़ा काम कर रहे हैं. पप्पुओं, लवलियों, और पोन्टियों को साहित्य की सेवा में शामिल कर कहे हैं. साहित्य में पोन्टी की पूंजी और पप्पू के प्रभाव का विरोध बंद करें कॉमरेड लोग……नामवर जी बड़ा काम कर रहे हैं.

Palash Biswas बहुत खूब अभिषेक।आयोजकों स‌े कहो कि डा.अमर्त्य स‌ेन को बुलाकर उनसे स‌ंस्कृत में राजेद्र यादव,नामदेव धसाल और ओम प्रकाश बाल्मीकि को श्रदधांजलि दिलवा दें।एबीएआईएसएफ मार्का क्रांति हो जायेगी। अपने वीर भारततलवार जी और मधु किश्वर जी को भी बुला स‌कते हैं।

Ranjit Verma बहुत भयानक समय आ चुका है। मुक्तिबोध ने जिन आलोचकों, कवियों और बुद्धिजीविओं को रात के अँधेरे में देखा था डोमा उस्ताद के साथ वे सब अब दिन के उजाले में निकल आये हैं।

पुण्य प्रसून का ‘आप’ से बड़ा याराना दिखता है!

दीपक शर्मा जी ने आजतक पर दिल्ली पुलिस का असली चेहरा यानि भ्रष्ट चेहरा बेनकाब किया. दिल्ली के कई थानों में रिपोर्टर ने ख़ाकी को खुफ़िया कैमरे में कैद करने के लिए रुपये भी लुटाए. दिल्ली के बॉर्डर एरियाओं तक ख़ाकी का टेस्ट परखा गया. टेस्ट कहीं निगेटिव निकला तो ज्यादातर जगह पॉजिटिव आया.  स्टिंग को ऑन एयर करने से पहले (और बाद तक) हर बार की तरह (लेकिन आज कुछ ज्यादा ही) पुण्य प्रसून वाजपेयी मंद-मद मुस्कुराते नज़र आए. स्टिंग चलने लगा.. ख़ाकी बेनकाब होना शुरू हो गई…वाजपेयी जी की मुस्कुराहट और दोगुनी हुई…. वाजपेयी ख़ाकी के दामन पर लगे दागों को एक-एक कर दिखाते रहे और सवाल दागते रहे…

कुछ ऐसा ही नज़ारा आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के एक दो-दिन बाद आजतक पर दिखाए गए स्टिंग 'ऑपरेशन केजरीवाल' के समय दिखा. केजरीवाल की सरकार बनी. सत्ता की कुर्सी वही रही, पर बैठने वाले बदले… अफ़सर बदले… कर्मचारी बदले. अफ़सर-कर्मचारियों के दिलों में केजरीवाल और उसके आम आदमी का डर बैठा. डर को टटोलने के लिए आजतक फिर सरकारी विभागों में घूमा.. दौड़ा.. और कर्मचारी-अफ़सरों के दिलों का एक्स-रे किया कि उनके दिलों में केजरीवाल का डर बैठा या नहीं. हर बार की तरह कुछ पास हुए तो कुछ फेल. इस बीच फाईलों के फाड़े जाने की बात भी सामने आई (जो स्टिंग में दिखी). स्टिंग ऑन एयर हुआ. केजरीवाल ने स्टिंग देखा. तुरंत अफ़सरों-कर्मचारी को सस्पेंड किया (जो जाय़ज था). मनीष सिसौदिया को तुरंत लाईव पर लिया गया… सिसौदिया ने आजतक को बधाई दी…साथ में अपनी प्रतिक्रिया भी दी और फिर हर बार की तरह एक लंबी डिबेट.

दोनों स्टिंगों के बीच एक समानता नज़र आती है. वो है मुद्दे की.. यानि सब्जेक्ट की. दोनों ही सब्जेक्ट में प्रत्यक्ष न, परोक्ष ही सही…'आप' दिखी है. पहले स्टिंग में, केजरीवाल के गद्दी संभालने के बाद उनके डर को नापने के लिए स्टिंग किया गया. स्टिंग ऑन एयर हुआ और तुरंत बाद केजरीवाल द्वारा भ्रष्टों को कैमरें पर सस्पेंड करने की लाईव घोषणा की गई… परिणामस्वरुप आजतक ने तो अपनी पीठ थपथपाई ही लेकिन उससे कहीं ज्यादा क्रेडिट केजरीवाल सरकार को मिला..
तब पुण्य प्रसून वाजपेयी के अलावा आईबीएन7 वाले आशुतोष ने भी केजीरीवाल सरकार और उसके फैसले का गुणगान किया और मौका लगते ही ख़ास से आम बन गए. ख़ास से आम बनने के बाद मालूम हुआ कि आशुतोष का आप के प्रति गुणगान करना नमक हलाली था

आज के स्टिंग की पृष्ठभूमि में भी कहीं न कहीं 'आप' ही शामिल है. क्योंकि पिछले दिनों जब सोमनाथ भारती और दिल्ली पुलिस के बीच विवाद जन्मा तो केजरीवाल ने पुलिस के ख़िलाफ कार्रवाई को लेकर राष्ट्रपति भवन के पास अनशन किया था. केजरीवाल ने देश की जनता को अनशन में शामिल होने के लिए आह्वान किया.  हज़ारों की संख्या में आप समर्थक अनशन में शामिल हुए. सुबह से दोपहर हुई…दोपहर से शाम और शाम से रात…ठंड और कोहरे के बीच केजरीवाल को कवर करने के लिए मीडिया का तांता लगा रहा. पर रात के समय कोई भी केजरीवाल को न दिखा सका. तभी प्रसून वाजपेयी ने अनशन से आजतक का अपना 10 बजे वाला कार्यक्रम लाईव ऑन एयर किया.

मीडिया का जमावड़ा लगातार आप समर्थकों को तो अपने कैमरों पर चमका रहा था लेकिन कोई भी केजरीवाल को न दिखा पा रहा था. तब प्रसून ने अपनी मंद-मंद मुस्कान के बीच उस तरफ का रुख़ किया जिधर केजरीवाल अपनी नीले रंग की वेगनआर कार के पास सड़क किनारे रजाई-गद्दे डाले सो रहे थे. हालांकि आप समर्थकों ने शुरुआत में वाजपेयी जी को भी केजरीवाल के पास जाने से रोका लेकिन वाजपेयी जी की मंद-मंद मुस्कान ने न जाने ऐसा कौन-सा जादू किया कि आप समर्थक पीछे हटते गए और वाजपेयी आगे केजरीवाल की तरफ बढ़ते गए. वाजपेयी ने रजाई में से आधा चेहरा निकले केजरीवाल को, कैमरपर्सन को इशारा देते हुए कैमरे में कैद करवाया और फिर अरविंद केजरीवाल की तारीफों के पुल बांधते हुए समर्थकों के झुंड से बाहर निकले…. और फिर क्या था.. वाजपेयी जी के लगातार केंद्र सरकार से सवाल पे सवाल और केजरीवाल सरकार की प्रशंसा का पेड़ उगना शुरू.

पिछले दिनों फेसबुक पर आप की कोर टीम के साथ पुण्य प्रसून वाजपेयी की एक तस्वीर नज़र आई. तस्वीर में वाजपेयी भी उसी अंदाज में दिखाई दिये जिसी अंदाज में कुछ समय पहले आशुतोष नज़र आयें थे. अब सारे समीकरणों का ठीक से विश्लेषण किया जाए तो वाजपेयी के ख़ास से आम बनने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. वरना अपने बाणरुपी सवालों को छोड़ने वाले दोनों दिग्गज पत्रकार आप पार्टी को यूं ही हल्के में न बख्शते.. और न ही आजतक केजरीवाल का गुणगान करता क्योंकि आजतक का नाम किसी पार्टी विशेष से जोड़ा जाता रहा है.

अगर वाजपेयी भी आप में शामिल होते हैं तो ‘आप’ को आम आदमी पार्टी कम पत्रकार पार्टी कहना ज्यादा उचित लगेगा. क्योंकि मनीष सिसोदिया, शाज़िया इल्मी, राखी बिड़ला और आशुतोष समेत कई पत्रकार पार्टी में है. अब एक सवाल और है कि पत्रकारों का इस तरह से पत्रकारिता छोड़ राजनीति में जाना, पत्रकारिता का हाशिये पर चले जाना है या फिर राजनीतिक लालसा…?

लेखक रहीसुद्दीन 'रिहान' दिल्ली के युवा पत्रकार हैं. उनसे संपर्क rahisuddin5353@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार शंकर प्रसाद चौधरी का निधन

कोलकाता : वरिष्ठ पत्रकार शंकर प्रसाद चौधरी का लंबी बीमारी के बाद यहां निधन हो गया। वह 79 वर्ष के थे और उनके परिवार में उनकी पत्नी हैं। परिवार के सूत्रों ने कहा कि चौधरी लंबे समय से कई बीमारियों से पीड़ित थे और उन्होंने कल अंतिम सांस ली। चौधरी 90 के दशक के मध्य में यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई) के कोलकाता ब्यूरो से मुख्य संवाददाता पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

पेड न्यूज माफिया निशिकांत ठाकुर ने भाजपा ज्वाइन कर ‘आप’ को निपटाने की सुपारी ली!

Yashwant Singh : भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और पेड न्यूज के लिए कुख्यात रहा निशिकांत ठाकुर 'राजनीति' अब खुलकर करेगा. सूचना मिली है कि यह शख्स गाजे-बाजे के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गया. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसे भाजपा की सदस्यता दिलाई. संभव है कि यह चुनाव वगैरह भी लड़ ले और जीत भी जाए. आप समझ सकते हैं कि भ्रष्ट राजनेताओं और मीडिया माफियाओं के बीच कितना तगड़ा नेक्सस है. दोनों एक दूसरे को प्रोटेक्ट करते हैं और एक दूसरे को गाहे-बगाहे मदद करते हैं. कभी खुल कर तो कभी छिप कर.

निशिकांत ठाकुर के नेतृत्व में ही दैनिक जागरण में एनसीआर से लेकर हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल तक में उगाही होती थी. कई सारे पत्रकारों ने लिखित रूप से आरोप लगाए. प्रेस काउंसिल से लेकर कहां-कहां तक कंप्लेन की. पर सियासी और मीडिया संरक्षण के कारण इस पेड न्यूज माफिया के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. दिल्ली-एनसीआर,  हिमाचल, कश्मीर, हरियाणा, पंजाब में हर जगह पर निशिकांत ने अपने खास आदमियों को बिठाया. भरसक कोशिश की कि उसके परिजन, दूर-नजदीक के रिश्तेदार बड़े पदों पर काबिज रहें ताकि बाहर का भेदी लंका न ढावे और घर का भेदी मिल-बांट कर खावे. बिल्डरों, नेताओं, अफसरों से तगड़ी सांठगांठ रखने वाला निशिकांत ठाकुर उन लोगों से खासकर खार खाता जो उसके गोरखधंधे पर सवाल उठाते या उसे उजागर करते. यही वजह है कि वह भड़ास से भी चिढ़ा रहता है. भड़ास ने निशिकांत ठाकुर और इसके गिरोह के कारनामों को समय-समय पर सप्रमाण उजागर किया है और आगे भी करेगा, इसलिए निशिकांत ठाकुर ने फर्जी मुकदमों के जरिए भड़ास और इससे जुड़े लोगों को प्रताड़ित परेशान करने में कोई कोर कसर न छोड़ी.

पर उपर वाले की लाठी ऐसी पड़ी कि इसे लाख प्रयास के बावजूद दैनिक जागरण से बड़े आबरू होकर बाहर जाना पड़ा. जो लोग प्राण जाने तक जागरण से इसके जुड़ाव की बात करते थे, वे झूठे साबित हुए. एक्सटेंशन और पुनर्नियुक्ति की सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं. अब तो निशिकांत के चेले चापड़ों को भी द्रुत गति से दैनिक जागरण से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. ऐसे में भागते भूत की लंगोटी वाले मुहवारे की तर्ज पर खुद को रसूखदार और प्रभावशाली दिखाने के लिए इसने राजनीति की राह पकड़ी है, भाजपा के नेताओं को अपनी कथित अहमियत समझाकर.

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी को पेड न्यूज का यह माफिया मुबारक.

अब लोगों को यकीन हो चला है कि करप्शन के मामलों में भाजपा सही मायने में कांग्रेस की बी-टीम है. ऐसा अगर न होता तो निशिकांत ठाकुरों को भाजपा में जगह नहीं मिलती.

दैनिक जागरण मूलतः सवर्ण, सामंती, ब्राह्मणवादी और परंपरावादी सोच का अखबार है और इसी सोच-लाइन पर चलने वाली पार्टी है भारतीय जनता पार्टी. ये दोनों (मीडिया और पार्टी) स्वभाव से दलितों, पिछड़ों, गैर-हिंदुओं, प्रगतिशीलों, तार्किकों और लोकतांत्रिक सोच के लोगों के विरोधी हैं और इनसे जलन रखते हैं. यही कारण है कि समय-समय पर दैनिक जागरण ने दलितों-पिछड़ों की प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों और इसके नेताओं के खिलाफ अभियान चलाया. कभी मायावती के बारे में अपशब्द प्रकाशित किया तो कभी मुलायम-अखिलेश के खिलाफ इसलिए अभियान चलाया कि इसके मालिक को सपा ने दुबारा राज्यसभा में नहीं भेजा. समय समय पर इसने मुस्लिमों के खिलाफ अनाप-शनाप खबरों, अफवाहों का प्रकाशन किया. यही काम भारतीय जनता पार्टी का भी रहा है. मुजफ्फरनगर दंगों में भाजपा और दैनिक जागरण की जुगलबंदी का विश्लेषण कर सच्चाई को आप जान-समझ सकते हैं.

आजकल भारतीय जनता पार्टी और दैनिक जागरण, दोनों ने आम आदमी पार्टी को निपटाने का अभियान चला रखा है. जागरण के मालिकों ने अंदरखाने अपने पत्रकारों को साफ आदेश दे रखा है कि केजरीवा को फोड़ दो. माना जा रहा है कि केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के एक बड़े अभियान के तहत निशिकांत ठाकुर को भारतीय जनता पार्टी में लाया गया है. अब निशिकांत ठाकुर सुपारी पत्रकारिता के तहत भाजपा में रहते हुए अपने मीडिया के लिंक का इस्तेमाल कर आम आदमी पार्टी और इसके नेताओं के खिलाफ बड़े नकारात्मक अभियानों को मूर्त रूप देंगे, दिलाएंगे.

जै हो तेरी निशिकांत ठाकुर…

उम्मीद करते हैं कि भाजपा की नेतागिरी करते हुए और 'आप' को निपटाने की साजिशें रचते हुए तुम अपने दिल को सही-सलामत रखने के लिए दिन में कुछ घंटे रोजाना-सो लिया करोगे ताकि लंबे समय तक 'राजनीति' कर सको, कभी मीडिया में रहकर, कभी सियासी दंगल में उतरकर.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: 09999330099


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लंबे समय तक मीडिया से जुड़े रहे निशिकांत ठाकुर ने मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें सदस्यता दिलाई। इस मौके पर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव जेपी नड्डा भी मौजूद थे। बिहार में जन्मे निशिकांत ठाकुर ने अपने जीवन की नई पारी शुरू की है। हालांकि, इससे पहले वह कभी सक्रिय राजनीति में नहीं रहे, लेकिन 'दैनिक जागरण' समूह में विभिन्न दायित्व निभा चुके ठाकुर का सामाजिक दायरा काफी बड़ा रहा है।

लगभग साढ़े तीन दशक की सेवा के बाद पिछले माह उन्होंने जागरण से अवकाश प्राप्त किया। इससे पहले वह लंबे समय तक हिमाचल प्रदेश, हरियाणा व पंजाब संस्करण के स्थानीय संपादक रहे। इसके अतिरिक्त वह दिल्ली, एनसीआर और जम्मू-कश्मीर के साथ जागरण के कई संस्करणों के प्रकाशक व मुद्रक भी रहे। उन्होंने जागरण समूह के मुख्य महाप्रबंधक के रूप में भी अपनी लंबी सेवाएं दीं।

दो कहानियां : जो पत्थर छोड़ने का साहस करते हैं वही मसीहा बनते हैं…. आखिरी काम…

Sanjay Sinha : पता नहीं क्यों, लेकिन आज सुबह से ही मन कर रहा था कि कोई मेरी कहानी सुनाता। मैंने तो न जाने कितनी कहानियां लिखीं, कितनी कहानियां लिखूंगा । लेकिन क्या कहीं कोई मेरी कहानी भी लिख रहा है? मैं जानता हूं, आप सब मेरी कहानियां लिख रहे हैं। बेशक आप उन्हें कागज़ पर नहीं उकेर रहे लेकिन आपने अपने दिल में मेरी ढेरों कहानियां उकेरी हैं, जब कभी आपसे मिलूंगा तो आप सब मुझे मेरी कहानी ज़रूर सुनाएंगे। आख़िर ज़िंदगी है भी क्या, चंद यादें और कुछ कहानियां। आइए आज आपको मुरुगेसन की कहानी सुनाता हूं। मुरुगेसन की चर्चा मैंने इस बार जबलपुर में Amit Chaturvedi से की थी, और उन्होंने कल मुझसे अनुरोध किया कि मैं उसकी कहानी आप सबको सुना दूं।

बात 2001 की है। अप्रैल का महीना था, और उस सर्द गर्मी में मैं अपनी पत्नी और छोटे से बेटे के साथ पहुंचा था अमेरिका के डेनवर शहर। शहर में उस दिन भयंकर बर्फ गिर रही थी, और उस अनजान से शहर में समझ में नहीं आ रहा था कि कहां से शुरुआत की जाए।

लोग अजनबी और शहर अजनबी। किसी तरह ठंड में कांपते हुए हम पास के डिपार्टमेंटल स्टोर तक गए ताकि खाने का कुछ जुगाड़ हो सके, और वहां से खाने-पीने का कुछ सामान लेकर अपने मोटल के लिए निकले। मोटल पहुंचने से पहले मुझे रास्ते में एक हिंदुस्तानी लड़का दिखा। मैं लपक कर उसके पास पहुंचा और अपना परिचय दिया। उसने मेरी ओर अनजान और उदास भाव से देखा और जाहिर किया कि उसे हिंदी समझ में नहीं आती, वो तमिलनाडु का है। और बातचीत अंग्रेजी में होने लगी।
उसने अपना परिचय दिया, मैं मुरुगेसन।

मैंने मुरुगेसन से कुछ देर वहीं बर्फ के बीच खड़े होकर बात की, और फिर उसे अपने मोटल में निमंत्रित किया। उसने बताया कि वो भी उसी मोटल में ठहरा है। और वो हमारे कमरे तक चला आया। मेरी पत्नी हैरान हो रही थी कि अभी अपने खाने का जुगाड़ नहीं है और मैं किसे पकड़ लाया हूं भोजन पर?

बातचीत होती रही, किसी तरह मेरी पत्नी ने कुछ पकाया और हमने खाया।

मुरुगेसन अपने कमरे में चला गया। अगले दिन मुझे मुरुगेसन फिर मिला, फिर उसके अगले दिन भी, और उसके अगले दिन भी। और मेरा दोस्त बन गया।
एक दिन मुरुगेसन मुझे एक पुस्तक बतौर उपहार दे गया।

पहला अध्याय पढ़ा –

समदंर में पत्थर से सट कर बहुत से कीड़े रहा करते थे। उन कीड़ों का जन्म वहीं होता, वो वहीं मर जाते। वो कभी पत्थर नहीं छोड़ते, इस डर से नहीं छोड़ते कि समंदर की तेज लहरें उन्हें डुबो देंगी। एक दिन एक छोटे से कीड़े ने अपने बुजुर्ग से पूछा कि हम इस पत्थर को छोड़ते क्यों नहीं? हम पानी के इस संसार की सैर क्यों नहीं करते?

बुजुर्ग कीड़े ने उसे समझाया कि ऐसी गलती नहीं करना। हमारा जन्म हुआ है, इन पत्थरों के साथ चिपक कर जीने के लिए। अगर तुम इसे छोड़ दोगे तो डूब कर मर जाओगे। लेकिन वो छोटा कीड़ा नहीं माना। उसने कहा मुझे तो ये पत्थर छोड़ना ही है। और उसने पत्थर छोड़ दिया।

कई दिनों बाद, यूं ही समंदर की सैर करता हुआ वो छोटा कीड़ा उसी पत्थर के करीब से गुजर रहा था कि वहां पत्थर से चिपके हुए हजारों कीड़े चिल्लाने लगे," अरे ये देखो, ये हमारी तरह का कीड़ा है जो पानी में तैर रहा है।"

उस छोटे से कीड़े ने कहा कि हां, मैं वही कीड़ा हूं जिसे तुमने कहा था कि पत्थर छोड़ोगे तो डूब कर मर जाओगे। लेकिन देखो मैं नहीं डूबा। तुम भी पत्थर छोड़ दो। आओ मेरे साथ इस विशाल संसार की सैर करो।

तब उस बुजुर्ग कीड़े ने चिल्ला कर कहा, नहीं-नहीं, तुम पैदा होते ही हमसे अलग थे। तुम जब पैदा हुए थे तब आसमान में सितारे चमक रहे थे। तुम आम कीड़ा नहीं थे, तुम खास कीड़ा थे…तुम मसीहा थे। तुम्हें कुछ नहीं हुआ, लेकिन अगर हमने इस पत्थर को छोड़ दिया तो हम सब मर जाएंगे। छोटे कीड़े ने बहुत समझाया, लेकिन वो नहीं माने।

छोटे कीड़े ने कहा कि मसीहा कोई होता नही, मसीहा हम बनाते हैं…जरुरत मसीहा बनाने की नहीं, पत्थर को छोड़ने के साहस की है।

खैर, मुरुगेसन वहां एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। उसके साथ ढेरों और भारतीय वहां काम करते थे।

एक दिन मुरुगेसन मेरे पास आया और बताया कि उसने नौकरी छोड़ दी है, भारत वापस जा रहा है। उसने ये भी कहा कि उसके साथ काम करने वाले ढेरों भारतीय उसे समझा रहे हैं कि भारत में कुछ नहीं रखा है। यहां ज़िंदगी कितनी अच्छी है।

मैंने पूछा कि तुम करोगे क्या? मुरुगेसन ने कहा कि कुछ अपनी पसंद का करना है। यहां ऐसे जीवन काटने से कुछ नहीं होगा। और मुरुगेसन चला गया।

मैं खुश था कि वो अपनी पसंद का कुछ करेगा, फिर भी उसके बिना मैं उदास था।

मुरुगेसन ने अपना काम शुरु कर दिया। उसने चेन्नई में अपना ऑफिस खोला। मुझे फोन पर बताया कि अपना काम कर रहा है, लेकिन अभी बहुत छोटे स्तर पर है। एक दिन मैंने भी उससे कहा कि सब छोड़ो, चले आओ वापस अमेरिका। सचमुच भारत में संघर्ष की ज़िंदगी है।

पर मुरुगेसन नहीं माना।

धीरे-धीरे उसका काम चलने लगा। चेन्नई के बाद बैंगलोर, चंडीगढ़, गुड़गांव… कई जगह ऑफिस खोलने लगा। और एकदिन मुरुगेसन ने फोन पर बताया कि वो अमेरिका में अपना दफ्तर खोल रहा है।

मुरुगेसन फिर अमेरिका आया, उसने दफ्तर खोला। बहुत बड़ा दफ्तर।

अब ज्यादा क्या बताऊं? मुरुगेसन की कंपनी इस समय अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट और एप्पल जैसी कंपनियों के साथ मिल कर बहुत बड़ा कारोबार कर रही है। भारत, सिंगापुर, अमेरिका में उसके कई दफ्तर हैं। उसे भी शायद ही पता हो कि कितने हजार मिलियन डॉलर की उसकी कंपनी बन गई है। खैर, बात ये नहीं कि उसकी कंपनी में कितने हजार कर्मचारी काम करते हैं, और कितना टर्नओवर है। बात ये है कि पिछले दिनों मुरुगेसन अमेरिका से दिल्ली आया था, खास तौर पर मुझसे मिलने। वो बहुत खुश था। मन लायक काम कर रहा था। उसकी आंखों में अजीब सी चमक थी, बहुत सी खुशियां थीं।

साल भर पहले मैं भी अमेरिका गया था। अमेरिका के सियाटेल शहर में उसका दफ्तर देख कर हैरान था।

आज जब कभी मैं किसी से मुरुगेसन की चर्चा करता हूं, तो इस बात की चर्चा ज़रूर करता हूं कि जो पत्थर छोड़ने का साहस करते हैं, वही मसीहा बनते हैं। वर्ना उसके साथ अमेरिका में रह रहे ढेरों भारतीयों में क्या कमी थी? आज उनमें से बहुत सारे तो मुरुगेसन की कंपनी में ही काम करते हैं, और जब कभी मुरुगेसन उनके सामने पड़ जाता होगा तो कहते होंगे कि तुम अलग थे, बचपन से ही अलग। तुम जब पैदा हुए थे तब सितारा चमका था, तुम मसीहा हो…मसीहा।

Sanjay Sinha : कल मुरुगेसन की कहानी लिखते हुए सोचा नहीं था कि उससे हुई मुलाकात का जिक्र आपको इतना उत्साहित कर देगा। जाहिर है आज मुझे मुरुगेसन के माता-पिता की दिल्ली यात्रा के प्रसंग को लिखना चाहिए था, आज वो प्रासंगिक होता। लेकिन आंख देर से खुली, क्योंकि जाग कर भी जागने का मन नहीं था। सारी रात मुझे छोड़ गए अपने भाई को सपने में देखता रहा, उसके साथ बिताए तमाम पल यूं ही याद आते रहे। हर पल बिस्तर पर मेरे साथ उसके होने का अहसास होता रहा। और मैं इसी उधेड़-बुन में रहा कि जाग जाऊं या अपने अहसास को यूं ही जीता रहूं।

और यूं ही लेटे लेटे मुझे याद आया कि मेरे भाई ने मुझे एक कहानी सुनाई थी, राजा और शिल्पकार की। पहले कहानी सुनाता हूं फिर आगे की चर्चा करूंगा।

किसी राज्य में एक शिल्पकार हुआ करता था। बहुत बढ़िया शिल्पकार। उसी ने उस राज्य के राजमहल को बनाया था। उस शिल्पकार की तारीफ दूर-दूर तक हुआ करती थी, लेकिन शिल्पकार को लगता था कि राजा उससे बहुत स्नेह नहीं करता और ना ही उसे उसकी मेहनत का पूरा मेहनताना मिलता है। ऐसे में वो मन ही मन निराश रहने लगा और एक दिन उसने तय किया कि वो इस राज्य को छोड़ कर किसी और राजा के पास चला जाएगा।

उसने ऐसा ही किया। उसने राजा को बताया कि वो कहीं और जाना चाहता है। राजा ने उसे रोकने की समझाने की कोशिश की, लेकिन शिल्पकार नहीं माना। आखिर में राजा ने कहा कि ठीक है तुम चले जाओ, लेकिन जाने से पहले यहां एक छोटा सा महल और बना जाओ। शिल्पकार मान गया।

शिल्पकार ने काम शुरू कर दिया, लेकिन उसके मन में था कि अब यहां रहना ही नहीं, तो ज्यादा दिमाग क्या लगाना? उसने महल को जैसे-तैसे बे-मन से बना दिया, और राजा के पास पहुंच गया कि महाराज आपके कहे मुताबिक एक छोटा सा महल बना दिया है।

राजा बहुत खुश हुआ और उसने शिल्पकार से कहा कि मैं तुमसे बहुत स्नेह करता हूं। अब क्योंकि तुमने जाने का मन बना लिया था, इसलिए मैंने ये छोटा महल तुमसे बनवाया ताकि तुम्हें जाते हुए बतौर उपहार दे सकूं।

शिल्पकार को काटो तो खून नहीं। उसने तो चलते हुए यूं ही जैसे तैसे, बेमन से काम कर दिया था। मन ही मन सोच में पड़ गया कि काश उसने अपना आखिरी काम भी मन लगा कर किया होता। अगर उसे पता होता कि ये महल राजा उसके लिए बनवा रहा है तो इसमें पूरा मन और समय लगाया होता।

इतनी कहानी सुनाने के बाद मेरे भाई ने कहा था कि हमें अपना आखिरी काम भी दुरुस्त करना चाहिए, क्या पता वो हमारे ही गले पड़ जाए!

आज सोच रहा हूं तो बहुत से संदर्भ याद आ रहे हैं। कई बार अपने किए को हम जानबूझ कर ऐसा कर देते हैं जो नहीं करना चाहिए। और अक्सर उसे भुगतते भी खुद ही हैं।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

‘जनसत्ता’ छोड़कर ‘जी न्यूज’ गया तो बॉस खुश करने का फार्मूला मिला

Sanjay Sinha : जनसत्ता छोड़ कर ज़ी न्यूज़ ज्वायन कर चुका था। कागज़-कलम और कम्यूटर की जगह कैमरा और वीडियो मशीन पर काम करने लगा था। रिपोर्टिंग में था, रोज शूट करके लाता। बॉस को बताता कि ये शूट किया, वो शूट किया, इस तस्वीर को देखिए, उस तस्वीर को देखिए… लेकिन बॉस मेरे दिखाए विजुअल से खुश नहीं होते। बहुत परेशान रहता कि बॉस को कौन से विजुअल दिखाऊं कि उनका दिल जीत सकूं।

बहुत मेहनत करता। कई तरह के प्रयोग करता, कैमरे से खेलता, लेकिन बात बनती ही नहीं थी। उसमें भी सबसे दुखद बात ये थी कि मेरे शूट किए विजुअल को मेरा एक जूनियर उसी बॉस को दिखाता और बॉस उसे देख कर कहते, 'वाह! यही वो विजुअल है जो मैं चाहता था।'

मैं बहुत हैरान होता कि आखिर मेरे दिखाने और बताने में क्या कमी रह जाती है? और मेरा वो जूनियर ऐसा कौन सा जादू करता है जो उसके दिखाए विजुअल को वाहवाही मिलती है।

बहुत परेशानी के बीच एकदिन अपने उस जूनियर को मैं चाय पिलाने ले गया। बातचीत में उससे पूछना चाहा कि यार जिस सीन को मैं दिखलाता हूं उस पर बॉस खुश नहीं होते, कभी वाह नहीं कहते, लेकिन तुम जो विजुअल दिखाते हो उसे देख कर उनके मुंह से निकलता है वाह! आखिर तुमने कौन सी घुट्टी पिला रखी है, जो तुम्हें वाहवाही मिलती है और मुझे नहीं।

मेरा जूनियर थोड़ा झेंपता रहा। बात टालने की कोशिश करता रहा, फिर उसने बहुत मन मार कर सच बता दिया।

आईए आपको बिना लाग लपेट के उस सच को बता देता हूं-

मेरा जूनियर मुझे बता रहा था कि सर आप बहुत शानदार स्टोरी करके लाते हैं। लेकिन आप अपनी कहानियां जब बॉस को दिखा रहे होते हैं तो आपका ध्यान विजुअल और कहानी पर होता है, जबकि मैं जब वही विजुलअल बॉस को दिखाता हूं तो मेरा ध्यान बॉस के चेहरे पर होता है। बॉस विजुअल देख रहे होते हैं, और मैं उनकी आंखें।
जिस तस्वीर पर मैं बॉस की आंखों में चमक देखता हूं, वहीं रुकता हूं और कहता हूं कि सर यही है वो खास विजुअल। और बॉस मान जाते हैं, कि हां यही है वो खास विजुअल…और मुझे मिल जाता है वाह!

तो सर कल से आप भी अपना ध्यान कहानी और तस्वीर से ज्यादा बॉस की निगाहों पर केंद्रित कीजिए। बॉस की पसंद को पहचानिए, उनकी आंखों की चमक को पढ़ना सीखिए, और देख लीजिएगा कि आपको वाहवाही मिलती है या नहीं?

बहुत संक्षेप में समझाए गए इस फॉर्मूले को मैंने कई बार इस्तेमाल किया। और जब-जब किया वाह-वाह सुना।

आज की इस कहानी का अर्थ इतना ही है कि बॉस की आंखों को अगर आप पढ़ने लगे तो फिर नौकरी में हां, हां है…और अगर सिर्फ अपने काम पर मुग्ध होते रहे तो ना – ना है। आजमा कर देखिए, दादी-नानी के नुस्खे की तरह कारगर होगा।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

जनसत्ता का वो कौन सीनियर था जिसने शेखर झा की मौत पर संजय सिन्हा का लेख नहीं छापा?

Sanjay Sinha : बॉस पर लिखना आसान काम नहीं है। एक तरह से मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की तरह है। खास तौर पर तब जब Sanjaya Kumar Singh ने मेरे बॉस होने का मुझे अहसास करा दिया है। लेकिन फिर लगता है कि सर ओखल में देने के बाद मूसल की परवाह नहीं करनी चाहिए। ऐसे में मैं बतौर बॉस कैसा हूं, इस बारे में मैं क्यों चिंता करूं?

मैं तो अपने पुराने वरिष्ठ को याद कर रहा हूं, उनकी आंखों की चमक को बयां करने जा रहा हूं। आईए आज आपको एक ऐसे वरिष्ठ से मिलाता हूं जिनके बारे में मैं इसलिए टिप्पणी नहीं कर रहा कि वो बुरे थे, और ना ही इसलिए कर रहा हूं कि वो अच्छे थे। वो जो भी थे अद्भुत थे। अगर फिल्मी भाषा में उन्हें मुझसे कहने का मौका मिलता तो मेरे लिखे पर वो यही कहते, "मुन्ना, लिखना बच्चों का खेल नहीं है…।"

मैं जनसत्ता में उपसंपादक बन चुका था, और 'वो' मानने को तैयार ही नहीं थे कि हमारे जैसे तुच्छ उपसंपादक की संपादकीय पन्ने पर लिखने लायक कोई राय भी हो सकती है। वो दुनिया जहान के लोगों से लिखवा लेते, लेकिन घर की मुर्गी उनके लिए दाल बराबर भी नहीं थी। लेकिन उनकी एक खासियत थी। वो लिखने के लिए कभी मना नहीं करते, और ना ही ये कहते कि नहीं छापूंगा। लेख ले लेते, और कुछ दिनों तक टहलाते और फिर कहते कि अरे यार तुम्हारा लेख पता नहीं कहां रख दिया, मिल ही नहीं रहा। जब चार बार ऐसा हो गया तो मुझे बुरा लगने लगा, लेकिन थे मुझसे बहुत सीनियर ऐसे में कहता भी क्या और करता भी क्या?

उन्हीं दिनों इंडियन एक्सप्रेस के हमारे एक साथी शेखर झा की दिल्ली में ही आईटीओ के पास एक सड़क हादसे में मौत हो गई। उनकी मौत से मैं बहुत व्यथित हुआ और मैंने एक लेख लिखा कि आज सिर्फ शेखर झा नहीं मरा है, आज उसके माता-पिता, उसकी पत्नी और उसकी एक छोटी बेटी भी मर गई है। शेखर की उम्र बहुत कम थी। उन दिनों दिल्ली में 'लाल बसों' का कहर था, ऐसे में मैंने लिखा कि पुलिस रिकॉर्ड में बेशक एक मौत दर्ज है, लेकिन हकीकत में शेखर जैसों की मौत के बाद उनके बूढ़े मां-बाप को, उनकी पत्नी को और दुधमुही बेटी को भला ज़िंदा कौन मान सकता है?

मैं चाहता था कि लेख जनसत्ता के संपादकीय पन्ने पर छप जाए इसलिए मैंने उन संपादक जी से बात की। उन्होंने कहा लिख दो। लिख कर ले गया तो बहुत भावुक होते हुए उन्होंने लेख रख लिया। लेकिन चार दिन बीत गए, लेख पुराना पड़ने लगा तो मैं उनके पास चला गया। बहुत देर तक वो इधर-उधर की बातें करते रहे, फिर मेरे याद दिलाने पर उन्होंने सारे कागज छान मारे, लेकिन लेख नहीं मिला। उन दिनों हाथ से लिखा जाता था, कोई फोटो कॉफी करा कर रखता नहीं था, और उस 'बॉस जी' ने मुंह हिला कर बोल दिया कि यार कहीं उड़ गया तुम्हारा लेख।

मुझे कुछ सूझा ही नहीं। भाग कर अपने टेबल तक गया, पांच-छह पेपरवेट उठा कर लाया और उनके सामने रख दिया। उन्होंने पूछा कि ये क्या है? मैंने सपाट भाव में कहा कि सर पेपरवेट।अब कागज़ इससे दबा कर रखिएगा, ताकि उड़े नहीं। वो चुप रह गए। लेकिन लेख ना मिला, ना छपा। खैर, मोबाइल फोन बाजार में आ गए थे और मैं प्रिंट से निकल कर इलेक्ट्रानिक में जा चुका था। एकदिन मैंने एक फोन का विज्ञापन देखा- ये नोकिया के किसी फोन का विज्ञापन था, जिसमें एक नौजवान हाथ में स्मार्ट सा फोन लिए नौकरी पाने की उम्मीद में इंटरव्यू के लिए एक दफ्तर में पहुंचता है। इंटरव्यू लेने वाला बॉस जब उसके हाथ में उस 'नए' फोन को देखता है तो उसे लगता है कि अगर इसे नौकरी मिल गई तो इस फोन के बूते दफ्तर की सारी लड़कियां इसी की दीवानी हो जाएंगी, ये बहुत लोकप्रिय हो जाएगा, और हो सकता है कि ये बॉस बन जाए और उनकी नौकरी चली जाए। जाहिर है स्मार्ट फोन की जलन में उन्होंने कहा, "सॉरी, अभी जगह नहीं है।"

आधे मिनट के इस विज्ञापन के बहुत मायने थे। मैं समझ रहा था कि बात फोन की नहीं है, बात ये है अगर आप अपने बॉस से ज्यादा स्मार्ट होंगे तो आप उसकी आंखों में खटक सकते हैं, और तब उन आंखों में रिश्ते तलाशने का मंत्र मेरे पास नहीं। हां, मैं ये कह सकता हूं कि अच्छा काम करने वालों से हर बॉस जले जरुरी नहीं, लेकिन अगर कोई जले तो यही सोच कर खुश होना चाहिए कि जब एक 'बल्ब' जलता है तो कितनी रोशनी होती है, जाहिर है जब कोई आदमी आपसे जलेगा…तो यकीनन आपकी ज़िंदगी भी रौशन होगी।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

बिहार डायरी बिफोर इलेक्शन : परवीन अमानुल्ला की चोट सुशासन बाबू के लिेए ‘गहरी’ है

Sushant Jha : परवीन अमानुल्ला की चोट सुशासन बाबू के लिेए 'गहरी' है। किसी नजदीकी का सुशासन से भरोसा टूटा है जो मियां-बीवी दोनों ने मिलकर जताया था! अब पाटलिपुत्र की गलियों में कानाफूसी है कि परवीन, बीजेपी का दामन थाम सकती है-उनके पति पहले ही सचिव बनकर केंद्र सरकार में जा चुके हैं! उनके पति अफजल अमानुल्लाह, नीतीश के खास थे और इसीलिए बिहार के मुख्य सचिव थे।

लगता है सत्ता की ऊंचाई से अमानुल्लाह दंपत्ति ने मौसम में हो रहे बदलाव का 'वास्तविक अनुभव' कर लिया है-वैसे भी दिल्ली में बेहतरीन विभाग का सचिव कौन नहीं बनना चाहता-जहां घास काटने का मंत्रालय भी कई राज्यों से ज्यादा बजट रखता है! वैशाली के मेरे एक साहित्यिक मित्र ने लिखा है कि चिडियों की चहचहाहट से ऐसा लगता है कि वसंत आ चुका है !

(बिहार डायरी बिफोर इलेक्शन)

सुशांत झा के फेसबुक वॉल से.

सोशल मीडिया नहीं, मास मीडिया कहिए जनाब

इस हफ्ते फेसबुक के दस साल पूरे होने का जश्‍न मनाया जा रहा है. फेसबुक की इंडिया चीफ कृतिगा रेड्डी का कहना है कि यह साल एफबी इंडिया के लिए अहम होगा. रेड्डी मानती हैं कि भारत मार्क जकरबर्ग की उम्‍मीदों पर खरा उतरेगा. 42 साल की रेड्डी चाहती हैं कि सोशल मीडिया की जगह इसे मास मीडिया कहा जाना चाहिए. खासकर भारतीय कंपनियां फेसबुक को सोशल मीडिया नहीं, बल्कि मास मीडिया प्लैटफॉर्म के रूप में देखें.

मार्क जकरबर्ग भारत का एक प्रमुख बाजार मानते हैं. भारत में एफबी के करीब 9 करोड़ 30 लाख यूजर्स हैं. दिसंबर 2013 तक के आंकड़ों के अनुसार, इनमें से 7 करोड़ 50 लाख यूजर्स मोबाइल के जरिए एफबी पर थे. अमेरिका के बाद भारत इसका दूसरा सबसे बड़ा यूजर बेस है. मोबाइल प्लैटफॉर्म को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की एफबी की योजना को देखते हुए लग रहा है कि भारत में इसे सही मंच मिल गया है.

चार साल पहले जब रेड्डी ने कंपनी ज्‍वॉइन किया था उस समय भारत में इसके यूजर 80 लाख थे. भारत में हर महीने एफबी से करीब 20 लाख लोग जुड़ रहे हैं. यह 9 भाषाओं में अपनी सेवा दे रही है. रेड्डी के सामने अगला लक्ष्‍य इसके यूजर बेस को 10 करोड़ तक पहुंचाना है. रेड्डी ने कहा कि मुझे पता है कि अब से 18 महीने बाद मीडिया लैंडस्केप अलग होगा और इस बदलाव को रफ्तार देने में फेसबुक की अहम भूमिका होगी. उन्होंने कहा कि तमाम कंपनियां और ब्रैंड्स इस प्लैटफॉर्म को अपनाएंगे.
 

जब जब होवे दंगे की बात… तब तब पानी मांगत जात! (देखें दो वीडियो)

Yashwant Singh :  राहुल गांधी का अर्नब गोस्वामी ने जो इंटरव्यू लिया, उसमें राहुल का परफारमेंस सही नहीं रहा.. यहां तक कि उनसे वाड्रा जमीन घपले का सवाल नहीं पूछा गया, जिसके कारण माना गया कि इंटरव्यू प्रायोजित था.. पर जिसने भी वो इंटरव्यू देखा, उसने कहा कि अर्नब काफी आफेंसिव थे और राहुल मिमियाते हुए जवाब दे रहे थे.. मुझे भी ऐसा ही लगा…

इस थर्ड ग्रेड परफारमेंस के बावजूद मैं राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी से ज्यादा नंबर दूंगा क्योंकि मोदी एक नहीं बल्कि दो-दो बार लाइव रणछोड़ साबित हुए… करण थापर से इंटरव्यू के दौरान दंगों के सवाल पर न सिर्फ पानी मांगा बल्कि भाग खड़े हुए… विजय त्रिवेदी से बातचीत के दौरान दंगों के सवाल पर पानी मांगा और मुंह फेरकर फाइल पलटने लगे…

जब जब होवे दंगे की बात
तब तब पानी मांगत जात!

देखिए 'पानी देना रे' सिरीज के दो इंटरव्यू…

पानी देना रे… (पार्ट-1)

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/778/interview-personality/paani-dena-re-1-narendra-modi-and-karan-thapar.html

पानी देना रे… (पार्ट-2)

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/779/interview-personality/paani-dena-re-2-narendra-modi-and-vijay-trivedi.html

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

प्रकाशकों ने विज्ञापनदाताओं से की आईआरएस 2013 पर भरोसा न करने की अपील

देश के 18 प्रमुख समाचार पत्र प्रकाशकों ने एक संयुक्त बयान जारी कर पिछले सप्ताह जारी किए गए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2013(आईआरएस) के नताजो की भर्त्सना की है। प्रकाशकों का कहना है कि सर्वे का नतीजों में चौंकाने वाली ग़ल्तियां हैं। इन 18 प्रकाशकों में शामिल हैं: द टाइम्स ऑफ इंडिया, जागरण, भास्कर, इंडिया टुडे, आनंद बाज़ार पत्रिका, लोकमत, आउटलुक, डीएनए, साक्षी, द हिन्दू, द ट्रिब्यून, अमर उजाला, बर्तमान पत्रिका, आज समाज, मिड डे, द स्टेट्समैन, नई दुनिया और दिनकरन।

प्रकाशकों ने कहा ये सर्वे लम्बे समय से प्रचलित और ऑडिट किए हुए प्रसार आंकड़ों के विपरीत है। उन्होनें कहा कि सर्वे में गल्तियों की भरमार है लेकिन वे कुछ की तरफ ही ध्यान आकर्षित करा रहे हैं। सभी राज्यों की रीडरशिप आंकड़ों में भारी उलट-फेर हुआ है। जहां पंजाब नें पिछले एक साल में अपने एक-तिहाई पाठक खो दिए वहीं हरियाणा में 17 फीसदी पाठकों की बढ़ोत्तरी हुई है। आंध्र प्रदेश के सभी प्रमुख समाचार पत्रों के प्रसार और पाठक संख्या में 30 से 65 फीसदी की कमी आई है।

इसी तरह शहरों के स्तर पर भी असमानता देखी जा सकती है। मुंबई में अंग्रेज़ी पाठकों की संख्या 20.3 फीसदी बढ़ी है, वहीं दिल्ली में(जो कि हर मापदण्ड पर तेजी से बढ़ता हुआ शहर है) पाठकों की संख्या 19.5 फीसदी कम हुई है। नागपुर का प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र हितवाद जिसकी प्रमाणिक प्रसार संख्या 60,000 है, इस सर्वे से अनुसार उसका अब कोई पाठक ही नहीं है। इसी प्रकार हिन्दू बिज़नेस लाइन के, मणिपुर में चेन्नई के मुकाबले तीन गुना अधिक पाठक हैं।

प्रकाशकों ने सभी विज्ञापनदाताओं और मीडिया ऐजेन्सीज़ से सर्वे के नतीजों पर भरोसा न करने की अपील की। उन्होने सर्वे करने वाली संस्थाओं आरएससीआई और एसआरयूसी से तुरन्त अपने सर्वे को वापस लेने के लिए कहा। प्रकाशकों ने भविष्य में ऐसे सर्वों पर रोक लगाने की अपील की, यदि ऐसे सर्वे करना जारी रहा तो स्थापित समाचार पत्रों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचेगा।
 

तहलका पीड़िता का आरोप, ईमेल के ज़रिए किया जा रहा बदनाम

तहलका पत्रिका के संपादक तरुण तेजपाल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार ने गोवा पुलिस से शिकायत की है। पीड़िता का कहना है कि ईमेलों के माध्यम से उसकी पहचान उजागर करने और उसे बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। इसके बाद गोवा पुलिस की एक टीम ने मुंबई जा कर पीड़िता के बयान लिए।

पीड़िता ने कहा कि तहलका के सर्वर में मौजूद तस्वीरों को उसकी सहमति के बिना अवैध तरीके से मीडिया के वरिष्ठ लोगों समेत समाज के कई सदस्यों को ईमेल से भेजा दिया गया है। उसने कहा कि मेरे रूप, मेरे हावभाव और मेरी शिकायत की सच्चाई के बारे में कई दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों के साथ इस ईमेल को पूरी तरह संदर्भ से काट कर दिखाया जा रहा है।

पीड़िता का कहना है कि ईमेल में, घटना के अगले दिन तरुण तेजपाल के साथ उसके कुछ फोटोग्राफ्स हैं, जिन्हे दिखा कर यह बताने का प्रयास किया जा रहा है उसके के हावभाव बिल्कुल सामान्य थे। पीड़िता ने बताया कि उसे हॉलीवुड के एक अभिनेता की मेहमान-नवाज़ी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वो हिम्मत रखते हुए बस अपना काम कर रही थी लेकिन अब इसका ग़लत मतलब निकाला जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि ईमेल कई लोगों के पास से होता हुआ पिछले बुधवार पीड़िता की मां के पास पहुंचा। गोवा पुलिस ने ईमेल की एक कॉपी उसके स्त्रोत की पहचान करने के लिए ले ली है।                    

                                         

 

पत्रकार लोकेंद्र पाराशर की मां का निधन

ग्वालियर के वरिष्ठ पत्रकार लोकेंद्र पाराशर की माताजी श्रीमति सुशीला देवी पाराशर का गत शनिवार रात को  निधन हो गया। वे 65 वर्ष की थीं। उनका अंतिम संस्कार रविवार को गृहग्राम रिछैरा मऊछ (नयागांव) में किया गया। उनकी चिता को मुखाग्नि उनके पति लक्ष्मण प्रसाद पाराशर ने दी। अंतिम संस्कार में क्षेत्र के कई गणमान्यजन शामिल थे। उनके निधन पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सांसद नरेंद्र सिंह तोमर, राज्यसभा सदस्य प्रभात झा, प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी, अशोक अर्गल, मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया, महिला बाल विकास मंत्री माया सिंह, मंत्री लालसिंह आर्य सहित कई पत्रकारों ने संवेदना व्यक्त की है।

 

चंचल और दयानंद पांडेय की फेसबुकिया भिड़ंत चर्चा में है इन दिनों, आप भी आनंद लें

चंचल कांग्रेस में हैं. कभी बीएचयू में हुआ करते थे. कांग्रेस पार्टी है. बीएचयू विश्वविद्यालय है. चंचल में कई और भी है. कलाकार. साहित्यकार, रंगकर्मी. पेंटर. पत्रकार. स्तंभकार. कई सारे डाइमेंशन्स समेटे हुए हैं. जौनपुर के रहने वाले हैं. बनारस उनकी रगों में है. इन दिनों दिल्ली में हैं. उनकी मुंबई पर लिखी गई एक पोस्ट को लेकर दयानंद पांडेय ने कुछ तथ्यगत आपत्तियां जताई और चंचल को हांकू टाइप आदमी करार दिया. दयानंद पांडेय भी पत्रकार हैं. साहित्यकार हैं. निर्दल बताते हैं खुद को. गोरखपुर को जीते हैं. इन दिनों लखनऊ में हैं. तो इन दो के बीच जो बौद्धिक घमासान हुआ, उसका आचमन ढेर सारे लोगों ने किया. कई तो इधर-उधर पार्टी बनाकर बम बरसाने लगे, जैसे कोई फाइनल वॉर शुरू हुआ हो. तो आप भी आनंद लें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

Chanchal Bhu : आरहा हूँ बम्मई ! बहुत अखर रहा है ,धर्मवीर भारती ,राही मासूम रजा ,गणेश मंत्री जी नहीं रहे . बहुत याद आते हैं ये लोग जब उस शहर का रुख करता हूँ . कितनी गप्पें ,कितनी बाते , ……../ ७ को मुम्बई जाना हो रहा है . एक सेमीनार में भाग लेने . बहुत दिनों बाद पुराने मित्र प्रभात खबर के संपादक भाई हरिवंश भी हैं . विश्वनाथ सचदेवा जी का कल जन्मदिन था ,बधाई तो दिया है अगर मिल गए कहीं ,जो कि हम कोशिश करेंगे तो पार्टी जरूर ले लूंगा . संजय पुगलिया ,आलोक जोशी जी सब को खबर कर दे रहा हूँ ,बाद में यह मत कहियेगा कि कमबख्त बताया नहीं यूँ ही बैरन वापस चलागया . फिल्म के बहुत से दोस्त हैं . राजबब्बर को पता है .घर पर बैठुंगा कुछ देर चकल्लस होगी .नादिरा जी के ठहाके सुनेगे . कुक्कू ,बच्चू . जूही और बेटे से मिलूंगा . भाई रणजीत कपूर , अनुपम श्याम , ……. सब एक जगह एक साथ . इसी शहर में हमारी एक बहन है भामा . कोशिश करूँगा कि मिल लूं . हमारे गाँव की एक बेटी है वीना मुखर्जी .. मौक़ा मिला तो सब से मिलना चाहूँगा . हमारा गाँव वहाँ पसरा पड़ा है . किसे चाह नहीं होती कि उनसे न मिलाजाय . ९ की सुबह वापसी .

Dayanand Pandey :  एक हैं चंचल बी एच यू। फेंकने के मामले में बड़े-बड़े फेंकुओं को भी पानी पिलाने में सिद्धहस्त। इतने कि कई बार मोदी भी पानी मांगें। बताइए भला धर्मवीर भारती भी उन से गप्प लड़ाते थे ! कांग्रेस की चमचई की धुर अलग तोड़े रहते हैं। लोग-बाग उन की जम कर धुलाई भी खूब करते रहते हैं। पर वह फेंकने के फेर में इतने बेफ़िक्र रहते हैं कि लोग लाख लपेटते रहें उन की सद्दी-मंझा खत्म ही नहीं होती। पतंग है कि उड़ती ही जाती है। तिस पर अपनी बात को चटक करने के लिए थोड़ा देशज की भी छौंक लगाए रहते हैं। तो भी मन करता है कि उन्हें बलबीर सिंह रंग की यह कविता भेंट कर दूं:

जिस तट पर प्यास बुझाने से अपमान प्यास का होता हो,
उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा रह जाना बेहतर है।

लेकिन आत्म-मुग्धता और अहंकार के मारे चंचल बी एच यू को यह कविता भाएगी नहीं, न ही सुहाएगी। वह तो फेंकने में भी काका यानी राजेश खन्ना और राज बब्बर की परिक्रमा करते नज़र आते हैं। सब देख रहे थे की शीला दीक्षित हार रही हैं,लेकिन यह सावन के अंधे अंदाज़ में उन की विजयघोष करते हुए कोर्निश बजाते रहे थे तब। अब शीला का नाम नहीं लेते। आज कल राहुल और सोनिया की परिक्रमा लगाते हैं अपने फ़ेंकू अंदाज़ में। और लोग हैं कि उन की धुलाई करते रहते हैं। लेकिन चंचल जी चेहरा साफ करने के बजाय आइना साफ करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। वह रह-रह कर जार्ज और राजनारायण भी बुदबुदाते रहते हैं। लेकिन कभी जार्ज से मिलने नहीं जाते। उन के स्वास्थ्य की खबर नहीं लेते। और कांग्रेस की कोर्निश बजाते रहते हैं बिना राजनारायण की आत्मा की परवाह किए। राज्य सभा की चाह पूरी होगी कि नहीं, वह ही जानें पर कांग्रेस में उन को कोई पूछने वाला है नहीं, यह क्या वह भी नहीं जानते? जो भी हो उन के अपमान की प्यास का अंत हाल-फ़िलहाल तो दिखता नहीं। अभी तो वह राजा का बाजा बजा में न्यस्त और पस्त हैं।

Chanchal Bhu : ये भाई ! यहाँ फेस बुक पर एक एक उपन्यासकार है दया नन्द पांडे . उसे वह हर पोस्ट नागवार लगती है जिसमे किसी बड़े आदमी का नाम आ जाता है . आज जब हमने बम्मई पर पोस्ट लिखा तो उसे हैरानी हुई . लगा हमें फेकू कहने . हमें हँसी आयी . 'गिरोह ' का छद्म रंगरूट बहुत वक्त दिया हम पर लिखने के लिए . हमें लगा कि यह शख्स बीमार है . इतनी नकारात्मक सोच ? इसके पहले भी एक पोस्ट इसने हम पर लिखा था आज फिर इसे दौड़ा पड़ा . हमने इससे कहा कि दोस्त किसी मनो चिकित्सक को दिखा दो . गोरखपुर और जौनपुर में कोइ बुनियादी फर्क नहीं है . आप गोरखपुर में पैदा हुए और हम जौनपुर में . पैदा होने के पहले हम दोनों से नहीं पूछा गया था कहाँ पैदा होगे ? हो गए तो हो गए . इसमें क्या कुंठा ? आप काशी विश्व विद्यालय से खुंदक खा गए .इसलिए कि यहाँ दाखिला नहीं मिला . इसमें हम क्या कर सकते थे . अलबत्ता हमारे जमाने में आये होते तो निश्चित दाखिला मिल जाता . यह भी आपको फेकना लग रहा होगा . लेकिन ऐसा हुआ है किसी से भी दरियाफ्त कर लीजिए . दोस्त आप कलम बाज होकर दिल्ली पहुंचे . सारिका ,पराग ने घास नहीं डाला तो हम क्या करते . दिनमान की तो बात ही और थी . आप घूम कर लखनऊ जा गिरे हम तो गाँव तक आ गए . आप जिस मर्ज से गुजर रहे हैं उसका इलाज है . अपनी पोस्ट पर जाइए और देख लीजियेगा . अगर पिछलीबार की तरह मिटाया न होगा तो .

Siddharth Kalhans थोक के भाव लुगदी लिखता रहता है कौन गाते नही.. कौन गांव की मुनमुन…किसको फेंकू कहता है। खुद ही जाने किस किस के संबंधों की बातें बघारता है। आजकल पत्रकारित न कर कंपनी की मैगजीन देखता है सालों से। इसका ईलाज कोई बंगाली डाक्टर के चांदसी दवाखाने में हो सकता है

Dayanand Pandey चंचल जी, उस प्रबुद्ध मनोचिकित्सक का नाम भी सुझा दीजिए। फिर हम दोनों ही साथ चले चलते हैं। अपनी-अपनी कुंठा और मनोविकार को जंचवा लेते हैं। इलाज का खर्च भी हमारे जिम्मे रहेगा। रही बात भारती जी की तो मैं उन की बतौर लेखक बहुत इज़्ज़त करता हूं। अंधा युग, कनुप्रिया, सूरज का सातवां घोड़ा और मुनादी के लिए उन्हें सैल्यूट करता हूं। उन के संपादक रुप का भी आदर करता हूं। उन की बंगलादेश की रिपोर्ट भी मन में है। भारती जी के समय में मैं भी छपा हूं धर्मयुग में। लेकिन रही बात उन के साथ गप्प मारने की तो यह आप की तीरंदाज़ी है,फेंकना है, कुछ और नहीं। अरविंद कुमार जो तब के दिनों माधुरी के संपादक थे, उन से धर्मवीर भारती के अंदाज़े बयां पूछ लीजिए। रवींद्र कालिया भी हैं। उन के साथ धर्मयुग में काम कर चुके हैं। कालिया जी से भी बात कर लीजिए। उन की एक कहानी काला रजिस्टर है बांच लीजिए। धर्मयुग का ही काला रजिस्टर है वह। हरिवंश जी हैं, उन से जांच लीजिए। आलोक मेहरोत्रा हैं, हमारे पड़ोसी हैं,लखनऊ में, धर्मयुग में काम कर चुके हैं, बात कर लीजिए। कन्हैयालाल नंदन की आत्मकथा बांच लीजिए। नंदन जी ने धर्मयुग में जितनी यातना भुगती है, धर्मवीर भारती के हाथों, उतनी यातना शायद अपने किडनी के इलाज और डायलिसिस में भी नहीं पाई। धर्मवीर भारती कितना किस से गप्प मारते थे जान लीजिएगा। रही बात सुषमा जी की तो वह धर्मयुग में तब ट्रेनी हो कर गई थीं, भारती जी के बारे में उन से भी दरियाफ़्त कर लीजिए। पता पड़ जाएगा आप को कितना और किस से गप्प करते थे भारती जी। गणेश मंत्री की सादगी से भी आप परिचित नहीं होंगे। फेंकने और आत्मश्लाघा की कला में आप निष्णात हैं, यह हमीं नहीं, सभी लोग कहते हैं। आप अपनी पोस्टों पर आई प्रतिक्रियाओं को भी कभी बांच लिया कीजिए। आप क्या कर रहे हैं, पता चल जाएगा। आप कांग्रेस में रहिए या कहीं और यह आप की अपनी सुविधा है। पर यह जो अंधों की तरह राजा का बाजा बजा रहे हैं आप उस पर ज़रा शर्म कीजिए। किन्नर कभी गोरखपुर या कहीं भी राजनीति नहीं करते, वह गुस्सा जाहिर करते हैं लोगों का सिस्टम के खिलाफ़। लेकिन आप की बौखलाहट मुझ से किन्नर राजनीति का संग साथ करवा देती है, तो इस का क्या करें? क्या सिर्फ़ इस लिए कि मैं ने पूर्व मेयर किन्नर अमरनाथ पर एक पीस लिख दिया इस लिए? और एक बात यह भी अपनी जानकारी में रख लीजिए कि मैं स्वयंभू उपन्यासकार नहीं हूं। उपन्यास लिखने के लिए बहुत श्रम करना पड़ता है। आप की तरह लफ़्फ़ाज़ी कर के उपन्यास नहीं लिखे जाते। मेरे सात उपन्यास हैं। जिन पर राजेंद्र यादव जैसे संपादक ने हंस में चार पन्ने की संपादकीय भी लिखी है। हाइकोर्ट में कंटेंप्ट आफ़ कोर्ट भुगता है। ए्क उपन्यास पर गोरखपुर के महंत और माफ़ियायों की धमकी भुगती है। और भी तमाम बातें हैं। उदय प्रकाश दिनमान के समय के मेरे मित्र हैं, यह सही है। लेकिन मैं आज तक किसी बास या संपादक के आगे-पीछे नहीं घूमा, मित्र के पीछे-पीछे घूमने की तो बात ही क्या ! आप ने महिलाओं से मित्रता की बात कही है। अच्छी बात है। मेरी अच्छी मित्र हैं बहुत सारी महिलाएं भी। खैर छोड़िए मेरे लिए इतना ही काफी है कि आप हमारे फ़ेसबुकिया मित्र हैं और कि सब कुछ के बावजूद लोकतांत्रिक भी। बात सुनने की सलाहियत भी रखते हैं। अब बताइए कि कब चलें आप के प्रबुद्ध मनोचिकित्सक के पास। खर्च-बर्च मेरा ही रहेगा। लेकिन इलाज ज़रुरी है। अब यह उस प्रबुद्ध मनोचिकित्सक पर मुन:सर है कि इलाज वह मेरा करेगा कि आप का, कि दोनों का ! और अंत में आप की सुविधा के लिए आप के प्रिय मारियो मिरींडा का एक कैरीकेचर आप को समर्पित कर रहा हूं जो आप की मनोदशा दिखाने के लिए काफी है।

Chanchal Bhu दोस्त हमने इसका जवाब लिखा था ,वह कहाँ गया?

Dayanand Pandey चंचल जी, अब आप की भाषा भी अब अभद्र हो गई है। इस तू तकार की भाषा में मैं तो बात करने की आदत है नहीं है मेरी। आप ने जवाब मेरी पोस्ट पर लिखी थी, वहीं है।

Chanchal Bhu दोस्त पाडे जी . आप दूसरी बार चिहुंक रहे हैं . यह आपकी मानसिक कुंठा है जो मनोविकार में तब्दील हो चुकी है .कृपया आप किसी प्रबुद्ध मनो चिकित्सक को दिखाइए . हम जितनी भी बार किसी वजनदार की बात करते हैं आप अपना कद नापने लगते हैं . क्यों कि आप अपने आपको ;उपन्यासकार ' घोषित कर गिरोह की तरफदारी में लगे हुए हैं . अब तक हम चुप रहे .लेकिन अब ज़रा बात हो जाय .हम तीन महीने बम्मई में रहे . कार्टून और कैरीकेचर की ट्रेनिंग के लिए . मारियो मिरांडा (अगर आप इस नाम से वाकिफ होंगे तो आप को फिर एक झटका लगेगा इस फेकने पर ) के साथ . यह मेहरबानी भारती जी की ही थी . उन दिनों 'धर्मयुग में गणेश मंत्री , शुषमा पारासर भी रही . भारती जी के बारे में आप निहायत घटिया राय रखते हैं . वो अपने स्टाफ के साथ जिस अनुशासन से रहते थे वही वह नहीं थे .अगर आप पढ़ेते भी हैं तो उन्ही दिनों हमारी एक कहानी धर्मयुग में छपी है उसे के बहाने ,उसी के साथ भारती जी ने हमें राही साहब से मिलवाया था . आपको क्यों चिढ़ होती है उसकी वजह से हम वाकिफ हैं . जब आप उदय प्रकाश के साथ पीछे पीछे घूमते थे और दिन भर दिनमान के दफ्तर में बैठे रहते थे तब हम पत्रकारिता से विदा लेने की सोच रहे थे . हे बिप्रालोचक इलाज कराओ . आप कुछ फ़िल्मी लोगों का साक्षात्कार लिख कर इतरा रहे हो उनके साथ जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजरा है लेकिन वह कोइ मायने नहीं रखता . अपनी सोच को ऋणात्मक सोच से बाहर निकालो दोस्त नहीं तो कुंठा में ही बहुत कुछ गंदगी मचाओगे . गोरखपुर में केवल जनखे ही राजनीति नहीं करते . कुछ और भी लोग है और होंगे कुछ दूर उनके भी साथ चलो . अगर आपको ऐतराज है कि हम कांग्रेस के साथ क्यों हैं तो आप ही बता दीजिए कि कहाँ रहूँ ? अब आपको खुल कर बोलने में भी शर्म आयेगी कि मोदी के साथ चलो .क्यों कि कही न्कहीन से आपको अपना चेहरा भी बचाए रखना है . दोस्त फेकना होता तो हम भी मोदी की तरह फेकते कि क्लिंटन को चाय पर बुलाया है . हमारे सच को फेकना लगा तो हम गिरीश कर्नाड की बात रखना चाहते हैं -तुम्हारे तो मंसूबे में ही कंगाली है . विपर यह कंगाली छोड़ो कुछ सकारात्मक सोचो किसी अच्छी लड़की से दोस्ती कर लो अकल खुल जायगी .

Chanchal Bhu दोस्त दयानंद पांडे ! एक बात पर गंभीरता से सोचना , बार बार व्यक्तिगत व्यक्तियों पर ही क्यों उलझ जाते हो . यह अपने आप से पूछना . सुधरने की उम्मीद है अभी भी …

Chanchal Bhu हमने तू तकार नहीं की दोस्त . दोस्त ही बोलता रहा हूँ . आपकी टप पूरी पोस्ट ही ग्रीना से भरी है . फिर भी हम पढ़ रहे हैं . अगर हम कहे कि आप जिन पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की जीवनी पढ़ कर फेल होते रहे हैं ,हम उनके साथ उनके घर में रहे हैं तो हम फेकू हैं ? फेकू किस साहित्य से उपजा है ? भाषा की अपनी तमीज होती है . हमें भी आलोचना की है लेकिन भाषा की लाज बचाते हुए . पांडे जी भाषा की बदतमीजी हमें भी आती है लेकिन हम यह जानते हैं कि इसे केवल हम दो जन ही नहीं पढ़ रहे हैं . एक बार अपनी सोच को देख लो दोस्त . .. आप दूसरी बार इस औकात पर आये है . विश्वविद्यालय का मजाक उडाया आपने

Dayanand Pandey आप विषयांतर करने के आदी है चंचल जी। बात आम की हो रही होती है, आप बबूल गिनने लगते हैं। अपनी यह पोस्ट एक बार फिर से बांचिए। यह तू तकार की भाषा से लदी-फदी है कि नहीं, देख लीजिए। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़ कर क्यों फेल होगा मैं या कोई और भला? यह सब आप की अपनी कल्पनाएं और कुतर्क हैं, कुछ और नहीं। पहले पूरा पढ़िए फिर उस पर टिप्पणी कीजिए तो गुड लगेगा। लेकिन आप का दोष है भी नहीं। आप तो या तो तू तकार जानते हैं या फिर फेंकना या फिर राजा का बाजा बजाना !

Dayanand Pandey और हम कोई फ़ासिस्ट नहीं हैं कि किसी की लिखी बात मिटा दें। आप ने मेरी वाल पर जब भी, जो भी लिखा है, सब कुछ बदस्तूर पड़ा हुआ है। हम ने कभी किसी विश्वविद्यालय को बदनाम नहीं किया कभी। आप को यह ज़रुर बताया था, याद कीजिए कि जिस बी एच यू के आप पढ़े हुए हैं, मैं वहां परीक्षक हूं। सो उस विश्वविद्यालय को मैं भी प्यार करता हूं, इज़्ज़त करता हूं। लेकिन आप तो कौवा कान ले गया की तर्ज़ पर बात करने के आदी हैं, तो आखिर कहेंगे भी क्या?

Dayanand Pandey सिद्धार्थ कलहंस के मन में भी देखिए कि मेरे लिए कितना जहर भरा हुआ है, और कि चंचल जी को यह जहर बहुत पसंद आया है। सिद्धार्थ कलहंस खुद क्या हैं, यह फिर कभी लेकिन अभी तो देखिए कि क्या लिख रहे हैं मेरे लिए, 'थोक के भाव लुगदी लिखता रहता है कौन गाते नही.. कौन गांव की मुनमुन…किसको फेंकू कहता है। खुद ही जाने किस किस के संबंधों की बातें बघारता है। आजकल पत्रकारित न कर कंपनी की मैगजीन देखता है सालों से। इसका ईलाज कोई बंगाली डाक्टर के चांदसी दवाखाने में हो सकता है !' अदभुत है ! जाहिर है कि सिद्धार्थ कलहंस या तो बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं या फिर इस से कोसों दूर है ! इन की शब्दावली पर खास ध्यान दीजिए और चंचल जी, आप अपनी पसंद की दाद लीजिए !

Dayanand Pandey चंचल जी, आप मुझे लेखक मानिए यह किसी डाक्टर ने आप से नहीं कहा। आप हमारे लेखन को कूड़ा मान लीजिए यह आप की अपनी सुविधा और अपनी पसंद है।आप मुझे घटिया लेखक कंबोज आदि के खाने में भी डाल दीजिए। यह आप का अपना विवेक है। लेकिन कुतर्क मत कीजिए, न अभद्र भाषा में बात कीजिए। यह तू तकार ठीक नहीं है। असहमत होना और बात है, तू तकार करना बिलकुल दूसरी। मुद्राराक्षस से मैं मिलता ही रहता हूं जब-तब। आज से नहीं, १९७८ से जब मैं विद्यार्थी था, गोरखपुर में तब से। उन का स्नेह मुझे हमेशा से मिलता रहा है।

Sanjay Sharma यहाँ तो कुछ व्यक्तिगत अदावत लगती है आप लोगों की ।

Chanchal Bhu संजय जी अदावत भी नहीं है , हम दोनों में से एक 'खिसक ' गया है . लेकिन हम दोनों नहीं तय कर पा रहे है . आब आपै बताओ ..

Chanchal Bhu हम तो लौट आये हैं . आप जिस शहर में हैं वहीं इलाज हो जायगा . मुद्राराक्षस से मी लीजिए . आपने रवीन्द्र कालिया , कन्हैलाल नंदन याँ जिनका भी सब के सब धर्मयुग में थे हमने जो लिखा है उसे देख लें . अनुशासन दफ्तर तक और दफ्ताएर के साथ ही रहा .आप सात लिखें याँ सत्तर हम गिनती नहीं गुणात्म तथ्य और कथ्य पर कह रहे हैं . रानू कम्बोज वगैरह आपसे ज्यादा लिखे हैं क्या करूं लेखक मान लूं ?

Praween Singh Koti Chanchal Bhu sir,यदि आप को याद हो तो एक बात साझा करदूं ,आप ने एक बार मुझे बताया था की राजनीति दो तरह की होती है.1 पुरषार्थ की और दूसरी ,यदि? अपना कद ही छोटा हो तो राजनीति को ही बौना बना दो जैसा की बी.पी.सिंह ने किया..तीसरी बात आप ने कहा की मैं दही बेचने वाला नहीं जिसे खरीदना हो खरीदे …चौथे ये दयानंद जी हैं जो इस फार्मूले को साहित्य और पत्रकारिता में गुसा दिए हैं खुद की राजनैतिक महत्वा कांक्षा केलिए ..सत्य इनको भी पता है पर गल्दोदाई भी तो कोई चीज है..जब भी आप इन जैसे को उत्तर देते हैं तो आप के तमाम पाठक ये सोचने लगते हैं की मुझमें भी तो कुछ साहित्यिक समझ है ये मुझे उत्तर क्यूँ नहीं देते …?और यहीं पे दयानंद जैसे लोग जीत जाते हैं . जिनको विश्वविद्यालय की परम्परा नहीं मिली तो वो चौकेंगे ही..@ramadheen singh sir(आज तक वो राजनाथ जी को राजनाथ ही कहते हैं आज तक क्यूँ राजनाथ कहते हैं? )इनके लिए वो भी आश्चर्य का विषय होगा |क्यूँ की एक लेख में इन्हों ने बताया था कि किसतरह ये अटल जी के करीबी थे..जो की इनके जीवन पर्यंत कभी संभव न हुआ..एक बात रामाधीन सर का कोड करूंगा …ये जो भी है ADC और CMP टाइप का है ये विश्वविदालयी परम्परा को जानता ही नहीं..

Dayanand Pandey चंचल बी एच यू जी, वैचारिक विमर्श में टट्टुओं की ज़रुरत नहीं होती। न लफ़्फ़ाज़ी की, न ही विलो द बेल्ट जाने की। Praween Singh Koti के मार्फ़त जो काम आप कर रहे हैं या करवा रहें, छाती ठोंक कर खुद सामने आ कर करिए। और खुल कर आरोप लगाइए। मज़ा आएगा। खुली चुनौती दे रहा हूं आप को भी, आप के ट्ट्टुओं को भी कि जो भी आरोप लगाए हैं, उन्हें साबित करें और उसे सार्वजनिक रुप से साझा करें।

Chanchal Bhu गुस्सा क्यों हो रहे हो भाई . शुरुआत तो आपने की . हमने तो महज जवाब दिया . बाकी एक ख़याल आप निकाल दीजिए जो कुछ करना होता है खुद करता हूँ . न्किस्सी से बुलवा सकता हूँ न किसी को रोक सकता हूँ .लेकिन एक बार अपनी भाषा देख लीजिए

Chanchal Bhu गुस्से से बाहर आइये . आज बसंत पंचमी है . किसी महिला मित्र के साथ काफी हाउस जाइए . और यह गुंड इ बंद करिये (चिढा रहा हूँ ,गंभीर मत होइए ) जिस वाल पर आप चढ़ के चले आये और निहायत ही भद्दी भाषा में .वा स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित है .

Dayanand Pandey हा हा ! गुस्सा नहीं हो रहा चंचल जी, आप को आप के दर्पण में देख रहा हूं, लोगों को दिखा रहा हूं। कि आप कितने पानी में हैं। देख रहे हैं लोग कि आप अपनी छात्र राजनीति के दिनों और उन्हीं रुग्ण औजारों से मुक्त नहीं हुए हैं। लगे रहिए। और चतुर बउरहिया बने रहिए। आखिर लोगों को आप के इस दस्तरखान का भी तो स्वाद मिलना ही चाहिए। ले रहे हैं लोग। आप तब तक कुछ नया फ़ेंकने का बंदोबस्त कीजिए। गोता नज़र से देखने वाले लोग आप के सारे कार्य-व्यवहार को देख रहे हैं। हम तो मज़ा ले रहे है,आप भी लीजिए। अपने टट्टू से कहिए कि कुछ और अनर्गल करे। क्यों कि वह तो आप से भी बड़का वाला है। बहुत आगे जाएगा वह टट्टूगिरी में। इस लिए भी कि जैसे तर्क और तथ्य अगर आप के पास नहीं है तो वह भी निरा कंगाल है। सुन-सुना कर लिखता है बिचारा !

Chanchal Bhu :  कमबख्त ऐसे भी लोग अपने को साहित्यकार कहते हैं ?

Chanchal Bhu : आज मन बहुत खराब है .

Chanchal Bhu कल एक बदतमीज सांझ रही . एक बेडौल अक्ल से टकरा गया . बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ .

रिश्वतखोर दिल्ली पुलिस पर स्टिंग करने के लिए ‘आजतक’ को बधाई

Yashwant Singh : दिल्ली पुलिस का या यूपी पुलिस का स्टिंग करने में ज्यादातर चैनलों और ज्यादातर पत्रकारों की फटती है क्योंकि मीडिया मालिकों और इनके पालतू पत्रकारों को डर होता है कि कहीं किसी मामले में पुलिस वाले डंडा न कर दें… सो, ये लोग उतनी ही पत्रकारिता करते हैं जितने में सब पीआर-लायजनिंग-दुआ-सलाम सब कायम रह सके… ऐसे में आजतक वालों को बधाई. खासकर Deepak Sharma को. दिल्ली पुलिस रिश्वतखोरी पर शानदार स्टिंग को लेकर मुंबई वाले वरिष्ठ पत्रकार Pankaj Shukla अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं:

''Punya Prasun Bajpai दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर शायद कन्फ्यूज़ हैं। दिल्ली पुलिस का एंटी करप्शन ब्यूरो दिल्ली सरकार को रिपोर्ट करता है। ये बात Deepak Sharma ने साफ करके अच्छा किया। और, भ्रष्टाचार को लेकर उनका Manish Sisodia से सीधा सवाल निशाने पर है।''

पंकज के इस स्टेटस पर आसिफ खान का एक जोरदार कमेंट आया है जिसे पढ़कर मैं अपनी हंसी न रोक सका…

Asif Khan : बाजपेई जी अक्सर कंफ्यूज ही से नज़र आते हैं। अजीब अजीब शब्दों को अजीबोगरीब अंदाज़ से पेश करने के चक्कर में बात को बेबात कर देते हैं…. 'दरसल' बात 'मुद्दे' की करना चाहते हैं मगर मुद्दा 'हाशिये' पर चला जाता है और आम आदमी की रोजमर्रा की 'जद्दोजहद' को 'राजनीति' की बिसात पर परखते-परखते इतना लम्बा कर देते हैं कि अगर उनकी सुनने के लिए किसी लघु शंका को रोक हुआ हो तो टेलिविज़न के सामने ही त्यागने को मजबूर हो जाये। इस क्रम बात बदल जाती है। बहार हाल। गुस्ताखी माफ़।

तो ये रही पंकज भाई और आसिफ भाई की क्रिया-प्रतिक्रिया. आपकी क्या राय है. आजतक जैसा साहस इंडिया टीवी या एबीपी न्यूज या इंडिया न्यूज या एनडीटीवी वाले क्यों नहीं दिखाते… लगता है पत्रकारिता का जो थोड़ा बहुत स्पार्क बचा है, वह आजतक में ही है, वरना तो बाकी सब सैकड़ों करोड़ के स्याह सफेद में मशगूल हैं और अपने चेलों-चपाटों-मोहरों को दिन भर चिल्लाने बकने बहसियाने के लिए छोड़े हुए हैं… है ना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

दो सौ करोड़ का ‘हिन्दुस्तान’ विज्ञापन घोटाला : सुप्रीम कोर्ट तय करेगा शशि शेखर समेत कइयों का अखबारी भविष्य

नई दिल्ली। मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्ज लिमिटेड की चेयरपर्सन शोभना भरतिया की ओर से दायर स्पेशल लीव पीटिशन में आने वाले दिनों में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला हिन्दी दैनिक अखबार 'हिन्दुस्तान' के प्रधान संपादक शशि शेखर,  दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण के पूर्व संपादक अकू श्रीवास्तव, भागलपुर संस्करण के संपादक बिनोद बंधु, अखबार से जुड़े अन्य संपादक महेश खरे, विजय भास्कर, विश्वेश्वर कुमार आदि के अखबारी भविष्य को तय करेगा। इन दिनों इस बड़े अखबारी विज्ञापन घोटाले की सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है।

बिहार के मुंगेर के वरीय अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद 13 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति एचएल दत्तू की दो सदस्यीय पीठ के समक्ष रिस्पान्डेन्ट नं0-02 मन्टू शर्मा की ओर से बहस पूरी कर चुके हैं। स्मरणीय है कि बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय स्थित कोतवाली में दैनिक हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर, अकू श्रीवास्तव, बिनोद बंधु भारतीय दंड संहिता की धरा 420, 471, 476 जालसाजी-धोखाधड़ी और प्रेस एवं रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट 1867  की धाराएं 8(बी) 14 और 15  के अन्तर्गत नामजद अभियुक्त हैं। इस कांड के सूचक सामाजिक कार्यकर्ता मंटू शर्मा हैं।

पुलिस अनुसंधान के क्रम में दैनिक हिन्दुस्तान के अन्य संपादकों क्रमशः महेश खरे,  बिजय भास्कर, विश्वेश्वर कुमार आदि की मिलीभगत का मामला इस 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान सरकारी विज्ञापन घोटाला में सामने आया है। विश्वेश्वर कुमार वर्तमान में दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर संस्करण में बतौर स्थानीय संपादक कार्यरत हैं। इस 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान सरकारी विज्ञापन घोटाला में मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्ज लिमिटेड की चेयरपर्सन शोभना भरतिया और प्रकाशक अमित चोपड़ा भी नामजद प्रमुख अभियुक्त हैं।

एडवोकेट और जर्नलिस्ट श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. संपर्क: 09470400813

डा. रोशन जैकब का गोंडा से तबादला और दुर्गाशक्ति नागपाल प्रकरण से सबक

आखिरकार मंगलवार को गोंडा की डीएम डा. रोशन जैकब का तबादला हो गया। वाराणसी जिले के मूल निवासी व 28 नवम्बर 2012 से कृषि उत्पादन आयुक्त के स्टाफ आफिसर रहे 2000 बैच के आईएएस अजय कुमार उपाध्याय को गोंडा का नया डीएम बनाया गया है। उल्लेखनीय है कि 15 अक्टूबर 2012 को दूसरी बार जिलाधिकारी के रूप में गोंडा की डीएम का कार्यभार सम्हालने वाली डा. जैकब का सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेताओं से कई बार टकराव हुआ।

डा. जैकब को हटाने के लिए शासन में कई बार पुरजोर कोशिशें भी हुईं किन्तु उनके अच्छे कार्यों के चलते दो फाड़ में बंटी समाजवादी पार्टी का एक धड़ा हमेशा उनके लिए ढाल बनकर खड़ा हो जाता था। कैसरगंज से पार्टी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बगावत के बाद राज्य मंत्री विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह को लोकसभा का प्रत्याशी बनाए जाने पर पार्टी ने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित होने में आने वाली अड़चनों के बारे में जानकारी ली, तो पहले से ही डीएम को हटाए जाने की मांग कर रहे धड़े ने अपनी पुरानी मांग दोहरा दी। किन्तु मतदाता सूची के पुनरीक्षण के चलते भारत निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के तबादले पर रोक से उनका आसानी से हटाया जाना संभव न था।

सूत्र बताते हैं कि ऐसी दशा में शासन ने चुनाव आयोग को तीन अधिकारियों के नाम का पैनल भेजकर गोंडा में नए डीएम को तैनात किए जाने की अनुमति मांगी। इसकी भनक मिलते ही डीएम ने जिले में खाद्यान्न व खनन माफियाओं के विरुद्ध जोरदार अभियान छेड़ दिया। उधर, जनवरी माह के दूसरे सप्ताह में आयोग ने अजय कुमार उपाध्याय के नाम को हरी झंडी दे दी। सूत्र बताते हैं कि आयोग से अनुमति लेने के बाद भी शासन ने निर्णय लिया कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ अभियान छेड़े प्रदेश के एकमात्र कलेक्टर को हटाया जाएगा तो फिर कहीं सरकार की दुर्गाशक्ति नागपाल के प्रकरण जैसी किरकिरी न हो जाय। इससे बचने के लिए थोक में होने वाले तबादलों तक इंतजार किया गया। आखिरकार मंगलवार को किए गए 53 आइएएस अधिकारियों के स्थानांतरण सूची में इनका भी नाम शामिल करते हुए हटा दिया गया।

गोंडा के वरिष्ठ पत्रकार जानकी शरण द्विवेदी की रिपोर्ट.

कॉर्पोरेट मालिकों ने अपने चैनलों से कहा है मोदी विरोध से बचें

झाड़ू लेकर घूमने वाले केजरीवाल और उनके साथियों को इस बात की कोई उम्मीद ही नहीं थी कि वह पहले ही चुनाव में दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो जाएंगे। आम आदमी पार्टी(आप) अभी मात्र एक वर्ष पहले ही अस्तित्व में आई है। भले ही यह बीजेपी और कांग्रेस की सोची समझी रणनीति रही हो कि आप को दिल्ली के तख़्त पर बिठाकर चारों ओर से घेर लिया जाये और आप अभिमन्यु की तरह इस चक्रव्यूह में फंस तो जाये पर निकले परास्त होकर ही। इस नई पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा से लेकर सभी क्षेत्रीय दलों तक में एक बेचैनी सी पैदा कर दी है। आप आगामी चुनाव में क्या भूमिका निभाएगी यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना ज़रूर है कि शुरुआत में ही पार्टी ने एक भी नेता और उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे बिना भारत का राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया है। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार डॉ. हर्षवर्धन मुख्यामंत्री न बन पाने के कारण बुरी तरह बौखलाए हुए हैं। वे हर दिन कुछ भी ऊल-जलूल प्रतिक्रिया देते पाये जाते हैं।

अभी तक सभी पार्टियों के बड़े नेता आप से बहुत कुछ सीखने के लिए उतावले थे। अब सिर्फ एक महीने के कार्यकाल में केजरीवाल सरकार को हर वक्त बहुत बुरी तरह से उनकी असफलताओं का आभास कराते हैं लेकिन आजादी के छियासठ साल तक भारतीय राजनीति को, गन्दगी के इस मुकाम तक पहुँचाने में अपनी भूमिका नहीं देख पाते। केजरीवाल और उनके मंत्रियों को तो कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है, इन्हें तो लम्बा अनुभव है लेकिन इन्होनें तो आम आदमी को पहले ही रसातल में पहुंचा दिया है फिर भी सीना चौड़ा करके घूम रहे हैं। न कहीं कानून है, न जीवन स्तर सुधारने की कोशिश, न सिविक-सेंस विकसित करने की कोई इच्छा। जो चल रहा है सब ठीक है क्योंकि इन्होने तो धन से अपने कोठरे भर रखे है। इन्हें जनता की क्या परवाह। इनकी कारगुजारियां संदेह से परे कतई नहीं हैं। उसका एक उदहारण है कि पिछले हफ़्ते दिल्ली में जब आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने मंत्रिमंडल के मंत्रियों के साथ संसद के पास सड़क पर धरना दिया था, तो उन्हें शुरुआत में मीडिया में ज़बर्दस्त कवरेज मिली और मीडिया का रवैया पूरी तरह सकारात्मक रहा लेकिन धरना जैसे ही दूसरे दिन में दाखिल हुआ लगभग सारे ही टीवी चैनल अचानक केजरीवाल और उनके धरने के विरोधी हो गए। दाल में कुछ काला तो है ही तभी तो मीडिया का विरोध इतना अचानक, सामूहिक और स्पष्ट था कि ख़ुद केजरीवाल ने संवाददाताओं से पूछा कि मीडिया को अचानक क्या हो गया।
 
अब
केजरीवाल को, मीडिया हर तरफ से लपेट रहा है। उनकी खिंचाई कर रहा है। मोदी के प्रति अब भारतीय मीडिया ने अपने तेवर बदल लिए हैं। आप के उभार से मोदी का प्रभामंडल आच्छादित हो गया था लेकिन घुटे हुए राजनीतिबाजों ने उसे पलटना शुरू कर दिया है। लगभग सभी कॉर्पोरेट घराने इसमे मोदी के साथ हैं। लगभग हरेक टीवी चैनल पर अचानक समाचारों और विश्लेषणों में मोदी की ओर झुकाव दिखने लगा है। सुना जाता है कि कई कॉर्पोरेट मालिकों ने अपने चैनलों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि वे मोदी के विरोध से बचें और मोदी विरोधी विश्लेषकों और विशेषज्ञों को चर्चा में कम शामिल करें। मोदी उन्हें एक खुली अर्थव्यवस्था के वाहक और सुधारवादी नेता नज़र आते हैं। देश की एक प्रमुख पत्रिका ने अपने एक लेख में लिखा है कि पिछले कुछ हफ़्तों में कम से कम पांच प्रमुख संपादकों को तटस्थ रहने या मोदी विरोधी विचारों के कारण उनके पदों से हटा दिया गया है। यही नहीं टीवी चैनलों पर अचानक ऐसे विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों की संख्या बढ़ गई है जिनकी विचारधारा भाजपा और मोदी की विचारधारा से मेल खाती है।  
 
नरेंद्र मोदी तो अधिकांश अंग्रेजी मीडिया को गुजरात दंगों के सन्दर्भ में उनके रुख को लेकर शक की नज़र से देखते रहे हैं। मीडिया के प्रति उनका रवैया बेहद अहंकारपूर्ण रहा है। अभी तक तो वह पत्रकारों से बचते रहे हैं।  मोदी केवल उसी पत्रकार को साक्षात्कार देते रहे हैं जिसे वे चाहते हैं। साक्षात्कार से पहले वह पत्रकार से सारे सवाल भी मांगते हैं और पत्रकार को यह भी समझा दिया जाता है कि इनमें कौन से सवाल पूछे जाएंगे और कौन से नहीं। भारत के एक प्रमुख पत्रकार ने कुछ साल पहले एक साक्षात्कार के दौरान जब मोदी से गुजरात दंगों के बारे में सवाल किया तो वे बेहद नाराज हो गए और उठकर चले गए। इसके बाद किसी भारतीय पत्रकार ने आमतौर पर उनसे दंगों के बारे सवाल करने का साहस नहीं किया। अब भी भारतीय मीडिया अपने इस रवैये पर कायम है। यह बात ध्यान देने की है कि शायद ही कभी भारत के किसी कॉरपोरेट हाउस ने धार्मिक नरसंहार, जातिवाद या अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे पर कभी कोई स्टैंड प्रभावित लोगों के पक्ष में लिया हो। वो इन मुद्दों पर हमेशा ही चुप्पी साधे रहते हैं। क्या इन घरानों की कोई नैतिक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बनती, सिर्फ पैसा कामना ही इनका एक मात्र लक्ष्य है? क्या ये भारत के नागरिक नहीं है। राष्ट्रवाद का जो हल्ला मचाया जाता है क्या ये उस परिधि में नहीं आते ? जाहिर है सब कुछ मैनेज हो गया है और इस देश की सियासत अब फिर उसी रास्ते पर चल निकली है जैसी पिछले छियासठ वर्षों से चल रही है।

 

लेखक शैलेन्द्र चौहान से संपर्क: पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद – 201014

पढ़ाई में सख्ती जरूरी है, लेकिन इतनी नहीं कि छात्र को जान गंवानी पड़े

कुछ ब्लैक बोर्ड, चॉक के टुकड़े और छुट्टी की घंटी किसी स्कूल की जरूरत हो सकती हैं, लेकिन परिचय और पहचान नहीं। उसका परिचय वे विद्यार्थी होते हैं जो वहां से अर्जित ज्ञान को समाज में अभिव्यक्त करते हैं। यह एक सामान्य तथ्य है कि स्कूलों में विद्यार्थियों की सोच और समझ काफी हद तक शिक्षकों से प्रभावित होती है। इस मामले में मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं कि मुझे बहुत अच्छे शिक्षकों का मार्गदर्शन मिला। हालांकि उनमें से कोई भी लंदन, न्यूयॉर्क या पेरिस से नहीं आए थे। वे सभी आस-पास के गांवों से हैं। उनमें से ज्यादातर के पढ़ाने का तरीका काबिले तारीफ रहा है। लेकिन मुझे कुछ ऐसे शिक्षकों से भी पढ़ने का अवसर मिला है जो हमारे दुर्भाग्य से शिक्षक बन गए थे। अगर वे शिक्षक नहीं बनते तो भी देश में शिक्षा के क्षेत्र को कोई नुकसान नहीं होता। अगर वे आतंकवादियों व डकैतों का रिमांड लेने या फांसी की सजा पाए कैदियों को फंदे पर लटकाने की नौकरी करते तो वहां उनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल होता।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे स्कूलों, खासतौर से गांव के सरकारी स्कूलों में बच्चों की बेरहमी से पिटाई होती है। यहां मैं सब शिक्षकों को जालिम नहीं बता रहा हूं और न ही सब स्कूलों को मार-पीट का अड्डा। मैं बच्चों को डांट और होमवर्क न करने पर पापा को बुलाने की हिदायत को भी गलत नहीं मानता, लेकिन यह कहां तक सही है कि किसी बच्चे को इस हद तक पीटा जाए कि उसे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़े। अपने स्कूली दिनों में मुझे एक ऐसे शिक्षक से पढ़ने का अवसर मिला था जो किसी बच्चे को तब तक पीटते थे जब तक कि वो अधमरा न हो जाए। उन शिक्षक महोदय की पिटाई से अब तक किसी बच्चे की जान नहीं गई। आप चाहें तो इसे उनकी दया या मेहरबानी समझ सकते हैं। गांव के स्कूलों में घोर अंधेरगर्दी है। यहां मानवाधिकार किस चिड़िया का नाम है, यह कोई नहीं जानता। न तो वे शिक्षक जो पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ते और न ही वे बच्चे जो आए दिन पिटते हैं।

प्रार्थना सभा में तोड़ दी चूड़ियां

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पुरुष अध्यापक ही पीटने में अव्वल हैं। कुछ अध्यापिकाएं भी पिटाई के मामले में किसी से कम नहीं होतीं। मैं एक अध्यापिका को जो जानता हूं, जिनका खासा खौफ था। कुछ साल पहले तक मेरे जिले में लड़कियों की कम उम्र में शादियां करने का प्रचलन था। ऐसे में स्कूलों में उन छात्राओं की काफी तादाद होती जो चूड़ियां पहनकर स्कूल आतीं। एक बार उन अध्यापिका ने प्रार्थना सभा में उन छात्राओं को अलग पंक्ति बनाने के लिए कहा जो चूड़ियां पहनकर आई थीं। उनके हुक्म का पालन हुआ और कुछ ही देर बाद वे हाथ में एक छड़ी लेकर आईं।उन्होंने सभी छात्राओं से हाथ आगे करने के लिए कहा और छड़ी से सभी चूड़ियां तोड़ दीं। चूंकि गांवों में ऐसे शिक्षकों के खिलाफ कोई भी बोलने की हिम्मत नहीं करता, लिहाजा कुछ ही दिनों में मामला ठंडा हो गया। इस बात को करीब एक महीना बीत गया। एक दिन चूड़ियां फोड़ने वाली उन अध्यापिका के पति की मौत हो गई। उन्हें उन छात्राओं के दुख का अहसास उस दिन हुआ।

आज जब मैंने रांची के पास स्थित मंदार शहर के निवासी सुजित मुंडा की खबर पढ़ी तो वह प्रार्थना सभा याद आ गई। सुजित न तो कोई उग्रवादी था और न ही उस पर किसी सरकार ने इनाम घोषित कर रखा था। वह सिर्फ आठ साल का एक बच्चा था। उसके शिक्षक (?) ने उसे इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। यह पहला मामला नहीं है और निश्चित रूप से अंतिम भी नहीं होगा। हमारे शिक्षक वेतन-भत्तों और काम के घंटे कम करने के लिए आए दिन आंदोलन करते हैं। वे ज्यादा से ज्यादा आराम और आसानी पसंद करते हैं लेकिन वे बच्चों की इस प्रकार घातक पिटाई के मामले में बिल्कुल उदासीन हैं। तब कोई शिक्षक सड़कों पर नहीं उतरता, क्योंकि मुर्दे किसी का वेतन नहीं बढ़वा सकते। मेरा मानना है कि पढ़ाई में कुछ सख्ती तो जरूरी है लेकिन यह इतनी भी जरूरी नहीं है कि किसी को अपनी जान गंवानी पड़े। बेहतर होगा कि सरकार स्कूल में बच्चों के अधिकारों के लिए भी कोई कानून बनाए और यदि कोई भूला-बिसरा कानून है भी तो कम से कम हर क्लास में लिखकर उसका जिक्र तो कीजिए। और सबसे ज्यादा जरूरी है कि ऐसे जालिम शिक्षकों के लिए किसी स्कूल में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ताकि कोई छड़ी किसी से जिंदा रहने का हक न छीने।

 

लेखक राजीव शर्मा को उनके ब्लॉग ganvkagurukul.blogspot.com पर भी पढ़ा जा सकता है।

आयाराम गयाराम मुख्यमंत्रियों के चलते नौकरशाही हो रही बेलगाम

01 फरवरी 2014 को केंद्र सरकार में जल संसाधन मंत्री हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए। इस तरह 13 सालों में सत्तारूढ होने वाले वे आठवें मुख्यमंत्री हैं। 08 दिसम्बर को चार राज्यों के विधान सभा चुनावों में सूपड़ा साफ़ होने के बाद कांग्रेस में जो बेचैनी और उथलपुथल हुई, उसकी पदचाप दबे पाँव उत्तराखंड में भी सुनाई दे रही थी। उक्त चुनाव परिणामों के बाद दिल्ली व छत्तीसगढ़ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बदले गए और चर्चाओं के गर्म बाजार में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की विदाई तय बतायी जाने लगी थी। उत्तराखंड में ऐसी चर्चा होना कोई नयी बात नहीं है। बल्कि राज्य के बनने से लेकर आज तक, बीते तेरह सालों में ऐसी चर्चाएं आम तौर पर होती ही रही हैं। यही वजह है कि इन तेरह सालों में राज्य ने आठ मुख्यमंत्री बदलते देखे। मुख्यमंत्री बनाओ, मुख्यमंत्री हटाओ का यह खेल राज्य बनने के साथ ही शुरू हो गया था।

नौ नवम्बर 2000 को जब राज्य बना और भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार बनी तो मुख्यमंत्री के तौर पर नित्यानंद स्वामी के नाम की घोषणा होते ही भाजपा के भीतर से विरोध के स्वर भी उठाना शुरू हो गए। भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक ने तो मंत्री पद की शपथ तक लेने से इनकार कर दिया। बाद में इन्होने शपथ तो ली पर नित्यानंद स्वामी को हटाने का अभियान भी अंदरखाने चलता रहा। भाजपा के लोग ही प्रचारित करते रहे कि नित्यानंद स्वामी तो हरियाणा के मूल निवासी हैं। और आखिरकार नित्यानन्द स्वामी की मुख्यमंत्री पद से विदाई हो गयी। वे मुख्यमंत्री पद पर एक साल भी नहीं रह पाए थे कि भाजपा की अंदरूनी उठापटक के चलते उन्हें हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह कामचलाऊ सरकार थी।

बाकी काम इसने चलाया हो ना चलाया हो पर दो मुख्यमंत्री जरूर चला दिए और साथ ही चला दी मुख्यमंत्रियों के आया राम-गया राम होने की परम्परा। 2002 में राज्य की विधानसभा का पहला चुनाव हुआ। कांग्रेस को बहुमत मिला। एनडी तिवारी मुख्यमंत्री बनाये गए। तिवारी के नाम के ऐलान के साथ ही देहरादून में कांग्रेसियों ने उनके पुतले जलाए। उस समय हरीश रावत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी थे। पांच साल के कार्यकाल में तिवारी की मुख्यमंत्री पद से विदाई की चर्चाएँ गाहे-बगाहे चलती रही। वे खुद भी बीच-बीच में पद छोड़ने का शिगूफा छोड़ते रहते और उन्हें राज्यपाल से लेकर उपराष्ट्रपति तक बनाये जाने के अफवाहनुमा चर्चाएँ भी राजनीतिक गप्पबाजों की महफ़िल से अखबार-टीवी के समाचारों तक उड़ती रहती।

2007 में विधानसभा का दूसरा चुनाव हुआ। उत्तराखंड क्रांति दल और निर्दलियों के समर्थन से भाजपा ने सरकार बनायी और भुवनचन्द्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा राज्य की पाँचों लोकसभा सीटें हार गयी। खंडूड़ी मुख्यमंत्री पद से हटाये गए और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ मुख्यमंत्री बनाये गए। खंडूड़ी के मन में मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने की टीस, निशंक सरकार पर कुम्भ आदि कई मामलों में घोटालों के आरोप, देश में चलने वाले भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन और भाजपा के भीतर के उठापटक पृष्ठभूमि के कारण विधानसभा चुनावों के 6 महीने पहले सितम्बर 2011 में भुवन चन्द्र खंडूड़ी पुनः मुख्यमंत्री पद पर आरूढ़ हुए। विधानसभा चुनाव के बाद मार्च 2012 में उत्तराखंड क्रांति दल, बसपा और निर्दलियों के सहारे कांग्रेस ने सरकार बनाई। मुख्यमंत्री के तौर पर विजय बहुगुणा के नाम की घोषणा होते ही कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी खुलकर सामने आ गए। तब केंद्र में मंत्री हरीश रावत के समर्थक विधायक तो कई दिन तक विधान सभा में शपथ ग्रहण में तक नहीं गए। पहले पहल हरक सिंह रावत भी बागी तेवर अख्तियार किये रहे,बाद में उन्होंने मंत्री पद की शपथ ले ली। हरीश रावत को काबू में करने के लिए उनके समर्थकों को मंत्री पद, विधानसभा अध्यक्ष का पद और राज्यसभा की सदस्यता दी गयी। ऊपर से सब शांत हो गया। लेकिन हालिया नेतृत्व परिवर्तन ने साफ़ कर दिया कि उपरी तौर पर सब सामन्य होने का अहसास महज एक दिखावा था।

उत्तराखंड के तेरह सालों में मुख्यमंत्रियों बनने-बदलने की उपरोक्त दास्तान साफ़-साफ दर्शाती है कि राज्य में अब तक बना कोई एक भी मुख्यमंत्री ऐसा नहीं हुआ, जिसकी सर्वस्वीकार्यता रही हो। हर बार मुख्यमंत्री के नाम के ऐलान के साथ जो झगड़ा-रगड़ा शुरू होता है, वह सरकार का कार्यकाल ख़त्म होने पर ही निपटता है। राज्य में अब तक सत्ता की अदला-बदली कांग्रेस और भाजपा की बीच ही होती रही है। इस तरह देखें तो एक किस्म की स्थिरता है। देश के बाकी राज्यों में यदि कहीं सरकारें अस्थिर होती हैं तो इसलिए कि वहां किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता और जोड़तोड़ की सरकार बनती है। उत्तराखंड में कांग्रेस तथा भाजपा की सरकारों में शामिल रहे निर्दलीयों या उक्रांद या बसपा ने कभी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश नहीं की। बल्कि ये कांग्रेस-भाजपा की अंदरूनी उठापटक है जो मुख्यमंत्री की कुर्सी को हमेशा डांवांडोल किये रहती है।

लेकिन सवाल है कि ऐसा होता क्यूँ है? दरअसल कांग्रेस-भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है। यहाँ दिल्ली में बैठा हुआ ऊपर का नेतृत्व(जिसे ये हाईकमान कहते हैं) वही सब कुछ है। विधायक दल का नेता चुनना विधायकों का अधिकार है। लेकिन चुनाव होते ही विधायकों के इस अधिकार को हाईकमान बंधक बना लेता है और इन विधायकों से यह बयान भी दिलवा देता है कि “हाईकमान जिसे नेता चुन लेगा, वह हमें मंजूर होगा”। तो जाहिर सी बात है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए विधायकों का समर्थन नहीं, हाईकमान का वरदहस्त ज्यादा आवश्यक है। उत्तराखंड में अब तक जितने भी मुख्यमंत्री बने, वे विधायकों द्वारा चुने हुए विधायक दल के नेता नहीं बल्कि हाईकमान के कमान से निकले हुए तीर थे, जिनमें या तो धार थी ही नहीं और जो थी, उसे भोथरा करने में उनके ही “अपनों” ने कोई कसर नहीं छोडी। इसलिए यह तय है कि हाईकमान के कमान से छोड़े गए तीर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक तो पहुँच जायेंगे परन्तु बाकि ये किसी काम के साबित ना होंगे।

राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर लगातार मचे रहने वाली इस रार को के पीछे एक वजह कांग्रेस-भाजपा के नेताओं की अति महत्वाकांक्षा भी है। इन पार्टियों में जनहित की राजनीति करने के लिए तो कोई भर्ती होता नहीं है। बल्कि ये तो कारोबार है, जिसमे लोग निवेश करते हैं तो सूद-ब्याज सहित निवेश वापस तो चाहते ही हैं, साथ ही सत्ता का डिविडेंड भी चाहते हैं। इसलिए इन पार्टियों में हालत यह है कि हर विधायक मंत्री बनना चाहता है और हर बड़ा क्षत्रप मुख्यमंत्री। परन्तु मंत्री बन सकते हैं केवल ग्यारह और मुख्यमंत्री मात्र एक। धंधे में घाटा कौन बर्दाश्त करेगा? सो जूतमपैजार मची रहती है, मुख्यमंत्रियों की कुर्सी डोलती रहती है। मुख्यमंत्री जाए या ना जाए पर आया राम-गया राम का जाप चलता रहता है।

इस अस्थिरता की सर्वाधिक मार तो राज्य की जनता पर ही पड़ती है। जनोन्मुखी विकास, पलायन से निजात, बेहतर शिक्षा रोजगार, स्वास्थ्य के अवसर, जैसे अलग राज्य आन्दोलन के दौरान देखे गए तमाम सपने धराशायी हो गए हैं। जब मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने की कोई गारंटी ना हो तो नौकरशाही का बेलगाम होना लाजमी है। राज्य बनने के बाद अब तक आम तौर पर इस राज्य का सर्वाधिक प्रत्यक्ष लाभ नौकरशाही को ही हुआ है। ऊपर से हिलते-डोलते मुख्यमंत्री के सिंहासन ने तो उनकी पौ बारह ही कर दी है। चौबीसों घंटे अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लगा मुख्यमंत्री नौकरशाही पर लगाम नहीं कस सकता है। नौकरशाही बेलगाम होगी तो आम जनता को अपने काम करवाने  के लिए नाकों चने चबाने पड़ते हैं। मुख्यमंत्री की लगातार डोलते गद्दी नौकरशाहों के लिए मनमानेपन और कामों में लापरवाही की छूट दे रही है। हालत यह है कि केंद्र से आने वाले नीतिगत और विधायी मामलों की जानकारी भी नौकरशाह सरकार तक नहीं पहुंचा रहे हैं, जिसके चलते सरकार की फजीहत होती रहती है। गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक को ईको सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने का राजपत्र भारत सरकार ने दिसम्बर 2012 में जारी कर दिया, लेकिन राज्य सरकार को इसकी जानकारी महीनों बाद अप्रेल 2013 में समाचार पत्रों के जरिये ही हो सकी। जाहिर सी बात है कि यह गजट नोटिफिकेशन नौकरशाही के पास तो पहुंचा ही होगा। या तो नौकरशाही ने केंद्र से आये इस राजपत्र को स्वयं ही नहीं देखा या फिर देखकर भी सरकार तक पहुंचाने की जहमत नहीं उठायी। दोनों ही स्थितियां नौकरशाही की लापरवाही और मनमानेपन को तो उजागर करती है। इसी तरह की स्थिति तब पैदा हुई जब अक्टूबर 2013 में उपलोकायुक्त नियुक्त करने की कोशिश विजय बहुगुणा सरकार ने की ऐन शपथ ग्रहण से पहले मालूम पडा कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के लिए गया लोकायुक्त विधेयक जो उत्तराखंड विधानसभा से 2011 में पारित हुआ था, राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होकर आ चुका था और उसमें उपलोकायुक्त का पद ही नहीं है। यह विधेयक भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद उक्त शपथ ग्रहण की तिथि से डेढ़ महीने पहले ही आ चुका था और इसे सरकारी प्रेस में प्रकाशन हेतु भी भेज दिया गया था, लेकिन सरकार तक इसकी सूचना पहुंचाना नौकरशाही ने जरुरी नहीं समझा। इस बारे में प्रमुख सचिव(विधायी) के.डी.भट्ट का बयान नौकरशाही के मनमानेपन को साफ़ उजागर करता है। सरकार को सूचित ना करने की गलती स्वीकार करने के बजाय उन्होंने कहा कि उपलोकायुक्त की नियुक्ति से पहले विधि मंत्रालय से पूछा ही नहीं गया। साथ ही बेहद बेतकल्लुफ अंदाज में उन्होंने कहा कि भविष्य में इस तरह के प्रकरण सामने आयेंगे तो गजट नोटिफिकेशन से पहले सरकार की जानकारी में लाये जायेंगे।

राज्य में नौकरशाही के मनमानेपन की हालत यह है कि वो खुलेआम सरकार के आदेशों की अवहेलना तक कर लेते हैं। विजय बहुगुणा ने मुख्यमंत्री के अपने कार्यकाल में जब कुछ अधिकारियों के तबादले किये तो उक्त अधिकारियों ने पदभार ग्रहण करने से इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री के आदेशानुसार चमोली के जिलाधिकारी पद पर दीपक रावत की नियुक्ति हुई पर उन्होंने उक्त पद पर जाने से साफ़ इनकार कर दिया। बाद में उनकी यह नियुक्ति निरस्त कर उन्हें कुमाऊं मंडल विकास निगम का महानिदेशक नियुक्त किया गया तो उन्होंने खुशी-खुशी पदभार ग्रहण कर लिया। इसी तरह आईपीएस अधिकारी अभिनव कुमार की नियुक्ति तत्कालीन पौड़ी रेंज(अब यह रेंज समाप्त कर दी गयी है) में डीआईजी के तौर पर की गयी पर उन्होंने देहरादून से बाहर जाने से दो टूक शब्दों में इनकार कर दिया। अब वे डेपुटेशन पर केंद्र में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर के ओएसडी के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसी तरह एक अन्य अधिकारी को एसपी पौड़ी नियुक्त किया गया तो उन्होंने भी आने से इनकार कर दिया। आईएएस और आईपीएस अधिकारियों द्वारा इस तरह खुलेआम मुख्यमंत्री के आदेशों की नाफ़रमानी करने के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि मुख्यमंत्री के स्वयं अगले दिन अपने पद पर रहने की कोई गारंटी नहीं है। कमजोर राजा पर प्यादे आँखें तरेरेंगे ही।
   
ऐसे अस्थिर हालात में राज्य के लिए किसी दीर्घकालीन और सुचिंतित विकास के रोडमैप का बनना भी नामुमकिन है। जिनके लिए राजनीति निवेश कर लाभ कमाने का जरिया है, वे विकास की दीर्घकालीन और जनपक्षधर नीति वैसे भी नहीं सोच सकते। लेकिन चौबीसों घंटे अपनी कुर्सी बचाने के फेर में लगे हुए मुख्यमंत्री से तो ऐसी अपेक्षा करना बेमानी है। विरोधी गुटों को मैनेज करने से लेकर हाईकमान की गणेश परिक्रमा से फुर्सत मिले तो वो कुछ और सोचें। हरीश रावत के नाम के ऐलान से पहले गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज और उत्तराखंड सरकार ने कैबिनेट मंत्री उनकी पत्नी अमृता रावत ने जैसे तीखा विरोध किया, उसने ये  संकेत तो दे ही दिए हैं कि मुख्यमंत्री पद की रस्साकशी आगे भी जारी रहने वाली है।
   
हालांकि
विजय बहुगुणा की नौकरशाहाना कार्यशैली और पिछले साल जून में आई आपदा से निपटने में उनके संवेदनहीन रवैये के चलते जनता में भी उनको लेकर आक्रोश था। इसके अलावा अपने कार्यकाल के दौरान अधिकाँश समय वे दिल्ली में रहे, यहाँ तक कि भीषण आपदा के समय भी वे दिल्ली ही थे और आपदा के बचाव, राहत कार्यों की स्वयं निगरानी करने से बजाय उन्होंने दिल्ली दौरों को ही ज्यादा तवज्जो दी। लेकिन उन्हें हटाये जाने के कारणों में उनका यह जनविरोधी रवैया नहीं बल्कि कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक प्रमुख कारक है। यही बात अन्य मुख्यमंत्रियों पर भी लागू होती है कि उनके शासनकाल में जनता के प्रति संवेदनहीन रुख, सरकारी धन की बंदरबांट आदि तमाम बातें होने के बावजूद जब भी उन्हें हटाया गया तो जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का ठीक से निर्वहन न करने की सजा के तौर पर नहीं हटाया गया बल्कि पार्टी के भीतर विरोधी गुटों को ठीक से मैनेज न कर पाने के लिए ही हटाया गया।
 
लोकतंत्र को इस प्रहसन में 13 साल आठ मुख्यमंत्री और जनता के लिए नतीजा सिफर, यही उत्तराखंड का गणित है।

 

इन्द्रेश मैखुरी

आईएएस अफसर और महिला कर्मी के सम्बन्धों की सीबीसीआईडी जांच की मांग

प्रिय मित्र,
                जैसा कि आप सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में आवास ,सूचना, महिला और बाल कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव पद पर आसीन सदाकांत भारत सरकार की सूचना चुराकर बेचने और जमकर घूस खाने के आरोपी है। सीबीआई ने घोटालेबाजों के विरुद्ध दर्ज एफआईआर में इन महाशय का नाम शामिल कर इनके घर की तलाशी भी ली थी। यह बात अलग है कि अब अखिलेश सरकार और सदाकांत एक दुसरे के साधक-सिद्धक बन अपने-अपने हित साध रहे हैं।

 
सदाकांत जब समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव थे तब ये अनुसूचित जाति के छात्रों की शिक्षा योजना के करोड़ों रुपयों के घोटाले और लाखों के मेस घोटाले के आरोपियों से सांठगांठ कर मेरे विरुद्ध शिकायती पत्र लिखवाया ताकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध मेरी आवाज को दबाया जा सके। यह पत्र मेस घोटाले की मुख्य अभियुक्त महिला को नियमों से परे जाकर अपने कार्यालय में बैठा कर लिखवाया गया था। सदाकांत की इस प्रशासनिक और चारित्रिक अनियमितता के सम्बन्ध में मैंने बीते दिसम्बर में प्रदेश के मुख्य सचिव से शिकायत की थी और इस मामले में इस महिला और सदाकांत के आपसी सम्बन्धों की सीबी सीआईडी जांच की मांग की थी। मुख्य सचिव को प्रेषित पत्र और महिला द्वारा मेरे विरुद्ध लिखे पत्र की स्कैन्ड प्रति संलग्न है। कोई कार्यवाही न होने पर मैंने बीते जनवरी में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को पत्र लिखकर इस महिला और सदाकांत के आपसी सम्बन्धों तथा सदाकांत की इस प्रशासनिक और चारित्रिक अनियमितता के सम्बन्ध में सीबी-सीआईडी जांच की मांग दोहराई है।


 

राज्यपाल महोदय को की गयी शिकायत निम्नानुसार है:
 
 To,
 Sri B. L. Joshi
 Governor-Uttar Pradesh
 Uttar Pradesh Government,Lucknow-226001

 
 Sub.: Request for CB-CID enquiry into administrative and moral irregularities of U.P. Cadre 1983 batch IAS officer Sri Sadakant.
 
Sir,
      You must be aware that above named public servant is an accused of selling confidential national information to earn black money and thus committing the most heinous crime on earth i.e. corruption. There were so strong evidences against Sri Sadakant that CBI was compelled to include his name in the FIR. This shows criminal mindset of this public servant.
 
This Sadakant, while holding the post of Principal Secretary of Social Welfare Department of Uttar Pradesh committed administrative and moral irregularities also and that too by defying all prevailing rules and regulations of the state.
 
As
per documents obtained under RTI,on 29-03-12,Sri Sadakant illegally met one Smt. Shraddha Saxena, an employee of Government G.B.Pant Polytechnic Lucknow run under Social Welfare department and illegally received a representation from her against rule 27A of U.P.Government Servant Conduct Rules (through improper channel). I have come to know through some RTI reply in which it is stated that Smt. Shraddha Saxena took no permission from the Principal of the said Institute and secretly met Sri Sadakant on 29-03-12. The said representation was not sent to Sri Sadakant through proper channel.Moreover the unusual format of representation  creates doubts and leaves clues of some unusual closeness between Sri Sadakant & Smt. Shraddha Saxena, which, on the face of it appears  to be more than a Principal Secretary- employee of an institution under the very department relations.
 
Such
type of favoritism that too by defying prevailing rules of the state ,to a female employee by the highest official of the rank of Principal Secretary besides being anti-social is highly unwarranted, detrimental to governance & Society. This raises doubts on moral integrity of said IAS named SADAKANT and needs thorough investigation by CB-CID to precipitate the truth behind Sri Sadakant’s craziness to take the said representation from Smt. Shraddha Saxena.
 
Please get the matter enquired by CB-CID and take action as per enquiry report.
 
Thanks & Regards.
 
Copy By e-mail to take appropriate action at their end to :
1- Sri Pranav Mukharjee,The President of India,New Delhi
2- Dr. Manmohan Singh,The Prime Minister of India,New Delhi.
3- Sri Akhilesh Yadav, The Chief Minister, Uttar Pradesh, Lucknow.
 
Sincerely Yours
 
( Urvashi Sharma )
 Secretary-YAISHWARYAJ Seva Sansthaan
 F-2286,Rajajipuram,Lucknow-226017
 Mobile : 9369613513, e-mail:rtimahilamanchup@gmail.com

हरीश रावत जी आपको अपनी करनी और कथनी से खुद को साबित करना होगा

प्रतिष्ठा में,
         श्रीयुत हरीश जी रावत
         माननीय मुख्यमंत्री,
         उत्तराखंड शासन, देहरादून।
आदरेय,
       श्री रावत जी सादर नमस्कार।

उत्तराखंड राज्य में मुख्यमंत्री मनोनीत होने पर आपको बधाई। यद्यपि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में यहां पर बधाई देना इसलिये उचित प्रतीत नहीं हो रहा है कि प्राकृतिक आपदा की मार और स्थापना के तेरह वर्षों में कुनीति और अदूरदर्शिता से राजनीतिज्ञों और नौकरशाही के हाथों लुट-पिट चुके इस राज्य में बधाई और उत्सव जैसे शब्द बेईमानी साबित होते हैं। चूंकि वर्ष 2002 के चुनावों से आज तक आपकी अभीप्सा भी थी और सही मायने में आपका हक भी था अतः आपको अब मिले ऐसे सुयोग की व्यक्तिशः बधाई।

     
जैसा
कि आप विज्ञ हैं और मेरी स्मृति के अनुसार मैं नब्बे के दशक से आपके राजनैतिक जनसंघर्षों का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं। उत्तराखंड को एक आदर्श पर्वतीय राज्य के रूप में देखने की टीस का मैं भी हम विचारक हूं, परन्तु राज्य स्थापना के तेरह वर्षों में निराशा का जो कुहासा छाया है उसमें आशा की किरण टटोलना एक दुष्कर कार्य है। परन्तु अपने लंबे और गहन राजनैतिक अनुभवों के बाद आपने चुनौती स्वीकार की है तो इसे राज्य के सुखद भविष्य के रूप में देखना इस राज्य की आशावादिता को मजबूत करता है।
     
यद्यपि यह सब मैं आपके समकक्ष पूर्व महानुभावों को भी लिखना चाहता था, परन्तु लिखने के अवसर इसलिये प्रासंगिक नहीं लगे कि उनमें से तो कुछ तो इतने अनुभवजन्य थे कि उन्हें लिखना उचित प्रतीत नहीं हुआ और बाकी ऐसे थे कि उनके लिए लिखना या न लिखना कोई मायने नहीं रखता।
     
मुझे
याद पड़ता है कि आपकी और मेरी व्यक्तिगत चर्चाओं में आपने कई बार अपनी विपन्न पारिवारिक प्रष्ठभूमि का जो जिक्र किया था वह आज भी मेरा आदर्श है कदाचित इन्ही परिस्थितियों ने आपके संघर्ष को संबल प्रदान किया और मेरी नजर में आपने आशातीत सफलतायें अर्जित की हैं। वस्तुतः उत्तराखंड का वास्तविक आम आदमी (राजनैतिक शब्दावली का आम आदमी नहीं) आज भी विपन्नताओं से जूझ रहा है। इस राज्य के आकाओं ने अंधा बांटे रेवड़ी की तर्ज पर अपने-अपनों की पीढ़ियों का भला कर लिया है परन्तु इस राज्य का आम जन खुद को ठगा-ठगा महसूस कर रहा है। आपने उत्तराखंड को पृथक राज्य की बजाय हिल काउंसिल और केन्द्र शासित राज्य की पुरजोर वकालत की थी काश। ऐसा हुआ होता तो राज्य के भीतर नवधनाढ्य राजनीतिज्ञों की इतनी बड़ी फौज नहीं होती।
     
आपने सत्ता संभाली है तो निश्चित रूप से पतझड़ के बाद बसन्त ऋतु के आगमन बेला में। सच्चाई भी है कि इस राज्य में पतझड़ की वीरानगी जैसी वास्तविक स्थितियां बनी हैं आपकी ताजपोशी उत्तराखंड के लिये वसन्त ऋतु जैसी खुशहाली का सुखद अहसास करा सके ऐसी मेरी अपेक्षा भी है और परमपिता से प्राथना भी।
     
राज्य की दशा और दिशा को सुधारने के लिये मेरा विनम्र आग्रह है कि आपको खुद की करनी और कथनी से हिमांचल का वाई.एस. परमार साबित करना होगा वस्तुतः दुर्भाग्य है कि उत्तराखंड को आज तक परमार नहीं मिल सका। चलो, जब जागो तब सवेरा, हम इसे ही उत्तराखंड राज्य की प्रभात बेला मान लें यहीं से नयी नज़ीर शुरू की जा सकती है परन्तु इस सबके लिये क्षेत्र, जाति, वर्ग और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कड़े व ठोस निर्णय लिये जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। मेरी नजर में राज्य के दीर्घकालिक संपोषित विकास हेतु कतिपय मुख्य बिन्दु निम्नवत हैं-
० राज्य द्वारा संचालित कार्यक्रमों और विकास योजनाओं का ईमानदारी पूर्वक नियमित अनुश्रवण, जो आज तक संभव नहीं हो सका है।
० निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की गतिशीलता को बढ़ाकर राज्यव्यापी किया जाना, प्रायः देखा गया है कि राज्य के मंत्री और दायित्वधारी अपने निर्वाचन क्षेत्र से दून तक ही सीमित हो जा रहे हैं।
० मितव्ययिता, स्वागत समारोहों से दूरी, लाव लश्कर में कमी जनआकांक्षाओं को पूरा भी करेगी और राज्य की समृद्धि भी होगी।
० पर्वतीय राज्य की पर्वतीय और भौगोलिक केन्द्र की स्थाई राजधानी।
० जल, जंगल, जमीन इस राज्य के मुख्य संसाधन आंके जरूर गये हैं परन्तु दुर्भाग्य है कि निवेश-विनिवेश के लिये इनकी एक बाजारू वस्तु के रूप में सौदेबाजी की गयी है, जबकि जन-जंगल-जमीन के साथ जन और जानवर का विनियोग कर राज्य में पांच ‘ज’ आधारित दीर्घकालिक प्रबन्धन की दरकार है।
० राज्य के बड़े बजट से संचालित सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यक्रम जनता का विश्वास खो चुके हैं और उत्तराखंड शिक्षा व स्वास्थ्य माफिया की भेंट चढ़ रही है और जो राशि स्थाई विकास में खर्च होनी चाहिये थी वह सफेद हाथी बन चुके शिक्षा संस्थानों और चिकित्सालयों के अवसंरचनात्मक विकास और संबन्धितों के ऊंचे वेतन और भत्तों में अनावश्यक रूप से खर्च हो रही है।
० सत्ता, नौकरशाही और जनता के बीच आत्मीयता का कोई तारतम्य नहीं है जो कि जनाधारित विकास की कुंजी होता है।
० बेरोज़गारी और पलायन के मुद्दों को समझा ही नहीं गया है। रोजगार के नाम पर सिड़कुल जैसी प्रक्रियायें फौरी तौर पर उद्योगों की आड़ में जमीनें हथियाना ही साबित हो रहा है। रोजगार की आस में युवा वर्ग हताशा और अवसाद में जी रहा है। मोटी कमाई कर रहे राज्य के शैक्षणिक संस्थान अभिभावकों के सांथ-सांथ इन संस्थानों में तैनात कार्मिकों का खुला आर्थिक शोषण कर रहे हैं। राज्य में शिक्षक की योग्यताधारी बेरोजगारों की संख्या एक लाख के आस पास है इतना तो तय है कि इन सबको सरकारी रोजगार नहीं दिया जा सकता परन्तु सरकार के हस्तक्षेप से क्यों न ऐसा हो कि ये संस्थान इन योग्यताधारियों को सम्मानजनक मेहनताने पर रोजगार मुहैया करायें।
० एक आदर्श स्थिति होगी कि यदि अधिकारिक रूप से अनिवार्य कर दिया जाये कि राज्य के राजनीतिज्ञ, नौकरशाह और राज्य कार्मिक अनिवार्य रूप से राज्य के स्वास्थ्य और शिक्षा का ही उपयोग करें तो राज्य प्रदत्त इन सुविधाओं की महत्ता भी साबित होगी और इन सबके प्रति खोया हुआ जनविश्वास फिर से लौट सकेगा।
     
राज्य की स्थिरता और दीर्घकालिकता के लिये मुद्दों और सुझावों की फेरहिस्त बहुत लंबी हो सकती है, परन्तु विपरीत पर्वतीय परिस्थितियों जैसे ही आपके राजनैतिक संघर्षों के आलोक में ऐसे बिन्दु गिनाने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। परन्तु मेरा लेखन धर्म मुझे रोक न सका और अति विश्वास व आशाओं के अतिरेक में यह सब लिख डाला है।
 
अन्यथा न लें आशा-विश्वास और सुझावों का यह क्रम अनवरत चलता रहेगा। वर्ष 1994 के उत्तराखंड आन्दोलन ज्वार में बागेश्वर के सत्ता विरोधी जनाक्रोश में आप द्वारा उद्बोधित पंक्तियां:- बादलों के दरमियां ये कैसी साजिश हुई। मेरा घर मिट्टी का था वहीं सबसे ज्यादा बारिश हुई।।

आपको ही नजर करते हुए विश्वास व्यक्त किया जा सकता है कि अब किसी भी साजिश और बारिश में भी सहजता कायम रह सकेगी। आपके सशक्त, निष्कलंक और यशस्वी सामाजिक-राजनैतिक जीवन की अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ,

सादर,
शुभाकांक्षी

हरीश जोशी
स्वतंत्र पत्रकार,

निवास- ‘स्वातिधाम’ गरूड़
पत्रालय- बैजनाथ, जनपद बागेश्वर, 263641,उत्तराखंड
मोबा. 9411574220, 9675583051
ई मेल- joshiharish1969@gmail.com

करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी में फंसा एनडीटीवी!

एस. गुरुमूर्ति ने एक ट्वीट किया है. इसके जरिए बताया है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने एनडीटीवी के हिस्से में करीब पौने नौ सौ करोड़ रुपये के आसपास की रकम को 'अनएसेस्ड इनकम' घोषित किया है और इस पर टैक्स लगाया जाएगा. गुरुमूर्ति ने इस सूचना के समर्थन में स्क्रिब्ड डाट काम पर अपलोड दर्जनों पन्नों की पीडीएफ फाइल का लिंक दिया है. नीचे गुरुमूर्ति का ट्वीट और दस्तावेज का लिंक दिया जा रहा है…

NDTV to be taxed on Rs 897.27 crores of unassessed income – IT Department

In an order dated 31st December, 2013, the Dispute Resolution Panel (DRP) of the Income Tax department has added Rs 897.27 crores of unassessed income in the books of NDTV for FY 2009-2010.

ये है ट्वीट… क्लिक करें… एस. गुरुमूर्ति ट्वीट

ये है डाक्यूमेंट… क्लिक करें… एनडीटीवी टैक्स चोरी

बद्रीनाथ मंदिर के रावल (पुजारी) छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ्तार, 238 साल की परंपरा टूटी

बद्रीनाथ मंदिर में सन् 1776 में रावल परम्परा की शुरुआत हुई। तब से लेकर अब तक मंदिर में 19 रावलों का इस पद तिलपात्र किया गया। पिछले 238 सालों के इतिहास में यह पहला अवसर है जब भगवान नारायण के मुख्य अर्चक गिरफ्तार हुआ हो और गिरफ्तारी भी किसी ऐसे वैसे मामले में नहीं बल्कि लड़की से छेड़खानी के आरोप में। करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के केन्द्र के मुख्य अर्चक को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का यह अपनी तरह का पहला मामला है।

वैसे अभी तक रावल की ओर से उनका पक्ष सामने नहीं आया है, फिर भी अध्यात्म के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति से ऐसे आचारण की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है। मध्य हिमालय स्थित बद्रीनाथ मंदिर देश के चार धामों में से एक है। इस मंदिर का पुनरुद्धार भगवत्पाद आद्यगुरु शंकराचार्य ने आठवीं सदी में किया था। सनातन धर्म के प्रचार के दौरान यहां आने पर उन्होंने नारद कुंड में पड़ी भगवान नारायण की मूर्ति को अपने तपोवल की ऊर्जा से निकालकर वर्तमान मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया था।

मंदिर में पूजा व्यवस्था सचुारु रहे इसके लिए उन्होंने अपने शिष्य को यहां का मुख्य पुजारी नियुक्ति किया। इसके बाद से ही ज्योतिष्पीठ के आचार्य द्वारा बद्रीनाथ मंदिर की पूजा अर्चना की जाती थी। कालान्तर में प्राकृतिक आपदा या किन्ही कारणों के चलते ज्योतिष्पीठ लगभग 165 सालों तक आचार्य विहीन रहा। मंदिर में पूजा अर्चना विधिवत् जारी रहे, इसके लिए टिहरी के राजा प्रदीप शाह ने सवंत् 1833 में शंकराचार्य के रसोइया गोपाल नम्बूदरी को पूजा के लिए अधिकृत कर दिया। तब से ही बद्रीनाथ मंदिर में रावल परम्परा चली आ रही है। पिछले 238 सालों से इसी स्थापित परम्परा के तहत रावल यहां पूजा अर्चना करते आ रहे हैं।

बद्रीनाथ में रावल की नियुक्ति के बाद कुछ समय तक यहां की व्यवस्था सही ढंग से चलती रही, लेकिन बाद के वर्षों में रावल मनमानी करने लगे और उनके साथ विवाद भी जुडने लगे। इस पर अंकुश लगाने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने स्थनीय लोगों की पहल पर बद्रीनाथ मंदिर के बेहतर प्रबंधन के लिए सन् 1939 में बद्रीनाथ मंदिर एक्ट बनाया। इसमें बाद में केदारनाथ मंदिर को भी जोड़ दिया गया और यह बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति एक्ट बन गया। तबसे इसी एक्ट के अनुसार बदरीनाथ केदारनाथ मंदिरों के अलावा यहां के 45 अन्य पौराणिक महत्व के मदिरों का प्रबंधन किया जाता है। एक्ट के मुताबिक बदरीनाथ मंदिर के रावल मंदिर समिति के वेतनभोगी कर्मचारी हैं। इसके अलावा बदरीनाथ मंदिर के रावल को मंदिर के गर्भगृह में चढावे का कुल सात फीसदी भी मिलता है। इस दोनों को मिलाकर रावल को प्रत्येक यात्रा काल में लाखों रुपयों की आय होती है। पूर्व में रावल मंदिर के कपाट बंद होने के बाद शीतकालीन पूजा स्थल जोशीमठ में ही प्रवास करते थे, लेकिन बाद के वर्षों में रावल तीर्थाटन पर जाने लगे। अब वो मंदिर के कपाट खुलने से एक दो दिन पहले आते हैं। शीतकाल में रावल कहां रहते हैं, क्या करते हैं, इस बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं होती है। जबकि नियमानुसार रावल को शीतकाल में शीतकालीन पूजा स्थल में रहना चाहिए।

जहां तक बदरीनाथ मंदिर के रावल व विवाद का प्रश्र है तो रावल समय समय पर अपने कृत्यों से मंदिर समिति, संतों व स्थानीय लोगों के निशाने पर रहे हैं। बदरीनाथ के रावल का सबसे पहला विवाद सन् १९५८ में सामने आया जब तत्कालीन रावल बासुदेव नम्बूदरी पर मंदिर समिति में ही कार्यरत एक कर्मचारी की पुत्री के साथ छेडछाड का अरोप लगा। उन्हें तब अपने पद से हटना पडा था। हालांकि बाद में सन् १९६२ में उन्हें पुन: रावल बनाया गया था। उसके बाद से रावलों को कोई बडा विवाद सामने नहीं आया। सन् २००० में रावल विष्णु नम्बूदरी व बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष विनोद नौटियाल के बीच अवश्य विवाद हुआ था, जिसके चलते विष्णु नम्बूदरी ने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद ऐसा कोई प्रकरण नहीं हुआ। केशव नम्बूदरी की इस पर नियुक्ति वर्ष २००९ में तब की गई थी, जब पूर्व रावल बदरी प्रसाद नम्बूदरी ने स्वास्थ्य संबधी कारणों से पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन वर्तमान रावल केशव नम्बूदरी के महिला से छेड+ छाड+ करने व दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें गिरलतार करने के बाद एक बार फिर बदरीनाथ मंदिर के रावल की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई है। दिल्ली के होटल में हुई इस घटना के बाद बदरीनाथ के मुख्य अर्चक की परेशानी बढ सकती है।

मिली जानकारी के अनुसार बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ने रावल केशव नम्बूदरी को निलंवित कर,जांच के आदेश दे दिये हैं। लेकिन उनका अब पद पर बने रहना मुश्किल है। खासतौर से इस घटना के बाद शंकराचार्य व धर्माचार्य इस मुद्दे को उठायेंगे। केदारनाथ आपदा के समय ज्योतिष व द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपापंद सरस्वती ने तो उन्हें पद से हटाकर पूजा व्यवस्था पीठ के आचार्य को दिये जाने की मांग कर दी थी। किसी तरह बीच का रास्ता निकाला गया। अब इस ताजे विवाद के बाद एक बार फिर धर्माचार्यों की ओर से इस तरह की मांग उठने की पूरी संभावनाएं हैं। इस सबके बीच दुखद यह है कि आपदा की मार से किसी तरह उवर रहे स्थानीय लागों के लिए यह ख+बर परेशानी बढाने वाली ही है। क्योंकि पिछला यात्राकाल आपदा की भेंट चढ गया और इस बार कपाट खुलने की तिथि के दिन ही मंदिर के रावल का गिरलतार होना, फिर से किसी अनहोनी की ओर ईशारा करता है। इसे महज संयोग माना जाय या विधि का विधान, जिस समय टिहरी राजदरबार में बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने का मुहूर्त तय किया जा रहा था, ठीक उसी समय मंदिर के रावल से पुलिस पूछताछ कर रही थी।

देहरादून से बृजेश सती की रिपोर्ट. संपर्क: ९४१२०३२४३७

बेगुसराय में एनयूजेआई की बलिया शाखा का गठन, सदस्यता अभियान होगा तेज

बेगुसराय। एनयूजेआई की बैठक में बलिया शाखा का गठन किया गया। अनुमंडल के एक दर्जन पत्रकार इस बैठक में शामिल हुए, जिनको जिला संयोजक संतोष कुमार गुप्ता ने एनयूजेआई द्वारा निर्गत पहचान पत्र प्रदान किया। इस मौके पर संतोष गुप्ता ने एनयूजेआई द्वारा बिहार में पत्रकारों के हितों कि रक्षा करने की दिशा में संघ के कार्यों का उल्लेख किया। बैठक में बलिया अनुमंडल में संघ की गतिविधियों को संचालित करने के लिए एक समिति का गठन भी किया गया, जिसमें फरोग-उर-रहमान को सर्वसम्मति अध्यक्ष का प्रभार सौंपा गया।

रहमान जिले में एनयूजेआई के सदस्यता अभियान के प्रभारी भी रहेंगे। इस मौके पर एनयुजेआई के प्रदेश सचिव राकेश प्रवीर ने फ़ोन पर बैठक में मौजूद पत्रकारों से बात की और संघ के गठन पर बधाई दी। बैठक में मो. फरोग-उर-रहमान, राकेश सिंह, जियाउल हक़, कृष्णनंदन कुमार सिंह, कृष्णा कुमार, तारिक़ नैयर, हंसदेव सिंह, मो. आरिफ, अशोक कुमार सिंह, राजीव कुमार शर्मा, अमृत रस्तोगी और अनिल कुमार मौजूद थे। बैठक में सदस्यता अभियान को तेज करने पर विचार विमर्श किया गया।

संतोष कुमार गुप्ता संयोजक
(एनयूजेआई-बेगुसराय)

‘चैनल वन’ के साथ कमलकांत गौरी और मनोज वर्मा की नई पारी

न्यूज चैनल 'चैनल वन' के साथ दो लोगों ने नई पारी की शुरुआत की है. कमलकांत गौरी को न्यूज कोआर्डिनेटर बनाया गया है. कमलकांत गौरी पहले आजाद न्यूज में हुआ करते थे. आजाद न्यूज चैनल बंद हो जाने के बाद कमलकांत ने चैनल वन का रुख किया है.

उधर, मनोज वर्मा अपनी किस्मत आजमाने प्रिंट से टीवी में आ गए हैं. नेशनल दुनिया में कार्यरत रहे मनोज वर्मा ने चैनल वन में पोलिटिकल एडिटर के बतौर ज्वाइन किया है. चैनल वन में पहले से ही मैनेजिंग एडिटर के रूप में नवीन पांडेय कार्यरत हैं. बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनावों को देखते हुए चैनल वन मैनेजमेंट ने अपनी टीम बड़ी की है.

एक अन्य जानकारी के मुताबिक दीपिका शर्मा ने चैनल वन से इस्तीफा दे दिया है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कानपुर का हार्ट अटैक से निधन

गाजियाबाद के वरिष्ठ पत्रकार और कलमकार अरुण कानपुरी का आज सुबह छह बजे देहान्त हो गया. उनका निधन हार्टअटैक के कारण हुआ. अरुण कानपुर की उम्र करीब 57 वर्ष थी. उनका शव आज मंगलवार सुबह उनके कमरे में मिला.

अरुण कानपुर ने नरेंद्र मोहन के समय में दैनिक जागरण में करीब 20 वर्षों तक नौकरी की. अरुण कानपुर की शवयात्रा आज शाम 4 बजे श्याम पार्क एक्स से चली और छह बजे हिंडन के श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

साइकल से सीहोर पहुंचा अमेरिका का टीवी प्रोड्यूसर

सीहोर, मध्य प्रदेश। साइकल से दुनिया नापने निकले अमेरिका के कैलिफेर्निया शहर निवासी, गैरेट ऑस्टिन ग्रैडी आजकल सीहोर में हैं। ऑस्टिन अमेरिका के सीबीएस चैनल में सहायक प्रोड्यूसर हैं। उन्होनें अपनी साइकिल यात्रा 2010 में अमेरिका से शुरू की थी। पिछले साल नवंबर तक वे अपनी साइकिल से 3668 मील (5903 किलोमीटर) की दूरी पूरी कर चुके हैं। अब उनके हांगकांग से लंदन तक का सफ़र जारी है।

                                                   ऑस्टिन का इंटरव्यू करते आमिर

एक विशेष इंटरव्यू में ऑस्टिन ने कहा कि भारत में देखने लायक कई खूबूसरत चीज़ें हैं। उन्होनें खजुराहो और साँची के मंदिरों को काफी अच्छा बताया। भारत के लोगों के बारे में पूछने पर वे बोले के यहां के लोग बहुत अच्छे है, लेकिन उनमें अनुशासन की कमी है। उन्होनें कहा कि लोग कहीं भी गाड़ी का हॉर्न बजा देते हैं, ऐसा करना ग़लत है। लोगों को ट्रैफिक नियमों का पालन करना चाहिए।

ऑस्टिन का कहना है कि अमेरिका में भारतीय टीवी शोज और मूवीज़ काफी प्रसिद्ध हैं। अभिनेताओं में शाहरुख खान लोकप्रिय हैं। ऑस्टिन का साइकिल से अगला पड़ाव मुम्बई है जहां से वे दुबई जाएंगे।
 

 

सीहोर से आमिर खान की रिपोर्ट।

मासूम की हत्या से नाराज़ ग्रामीणों ने एसपी की कार का शीशा तोड़ा

देवरिया 4 फरवरी। 6 वर्षीय मासूम बालक की हत्या से आक्रोशित ग्रामीणों ने पुलिस अधीक्षक पर अपना गुस्सा उतारा। पुलिस के खिलाफ नारेबाजी कर रहे ग्रामीणों ने उनके के साथ धक्का-मुक्की की और चूडि़यां दिखाई। इस घटना में पुलिस अधीक्षक की कार का शीशा टूट गया।

इस सम्बन्ध में पूछे जाने पर पुलिस अधीक्षक रवि शंकर छवि ने बताया कि वे सोमवार की रात्रि में जिले के बनकटा थाने के नोनार पाण्डेय गांव गए थे। वहां ग्रामीण सड़क जाम कर रहे थे। वे लोगों को समझा रहे थे कि उसी बीच कुछ लोगों ने धक्का-मुक्की की और उनकी कार का शीशा तोड़ दिया।

ज्ञात हो कि रविवार को नोनार पाण्डेय के अवधेश गुप्ता द्वारा सूचना दी गई थी कि उनका पुत्र आदित्य, उम्र 6 वर्ष, घर के पास ही खेलने गया था और देर शाम तक घर वापस नही आया। अवधेश गुप्ता ने अपने पुत्र के अपरहण और हत्या की आशंका व्यक्त की थी। लेकिन थाने की पुलिस ने इस मामले में गम्भीरता नहीं दिखाई। इसके बाद सोमवार को गांव के पास स्थित एक तालाब से गायब हुए बालक का शव बरामद हुआ। बालक का शव मिलने के बाद ग्रामीण काफी नाराज हो गए और उन्होने स्थानीय पुलिस पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए सड़क पर जाम लगा दिया। 

 

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट।

एआईआर के डीजी वेंकटेश्वरलू हुए रिटायर, शहरयार सम्हालेंगे कार्यभार

ऑल इंडिया रेडियो को 26 साल तक अपनी सेवाएं देने के बाद डाइरेक्टर जनरल, आर. वेंकटेश्वरलू बीती 31 जनवरी को रिटायर हो गए। वे मात्र तीन महीना ही इस पद पर रहे। वेंकटेश्वरलू ने अपने कैरियर की शुरुआत 1988 में स्टेशन डाइरेक्टर के रूप में की थी। आय स्त्रोतों को बढ़ाने, मानव संसाधन विकास तथा कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में वेंकटेश्वरलू ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

स्थायी नियुक्ति होने तक एफ. शहरयार ऑल इंडिया रेडियो के कार्यकारी डाइरेक्टर जनरल के रूप में कार्य करेंगे। शहरयार अस्थिरता के दौर में रेडियो कशमीर के स्टेशन डाइरेक्टर रह चुके हैं, इसी दौरान उन्होनें भारत-पाक सीमा के निकट पूंछ में लोकल रेडियो स्टेशन की शुरुआत भी की थी।

सात प्रेम कहानियां : स्त्री मन को झकझोर देने वाली कहानियां

प्रेम शब्द से सारी दुनिया परिचित है l यह एक ऐसी अनुभूति है जिस के बिना इंसान को सारा जीवन निरर्थक लगने लगता हैl इस अनुभति के विभिन्न रूप लोगों के जीवन में देखने को मिलते हैं l प्रेम कहीं पूजा है, कहीं तपस्या है l प्रेम के बिना जीवन मरुथल है l इस के बिना इंसान को जीवन की राहें बहुत लंबी लगने लगती हैंl समय-समय पर इसके बारे में कहानियाँ भी लिखी गयी हैं l प्रेम राधा और मीरा ने कृष्ण से किया l प्रेम के उदाहरण लैला-मजनू, शीरीं-फरहाद भी हैं l प्रेम के नाम पर लोगों की गर्दनें भी कट गयी हैंl

कई बार प्रेम लोगों के मरने के बाद भी अमर रहता है l उन की गाथायें गाई जाती हैं l शाहजहाँ का प्रेम मुमताज के लिए ताजमहल के रूप में देखने को मिलता है l स्त्री-पुरुष के संबंधों में प्रेम के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं l अपनी सात प्रेम कहानियों में प्रसिद्ध लेखक दयानंद पांडेय जी ने स्त्री-पुरुष के समकालीन प्रेम संबंधों का विवरण अपनी सरल, सहज सुंदर भाषा-शैली में जिस तरह किया है उसे पढ़ कर पाठक का मन आंदोलित हो उठता है l मन स्त्री-पुरुष के रिश्तों के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर हो उठता है l ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने प्रेम के तमाम पहलुओं पर गहन चिंतन करते हुये इन कहानियों को लिखा है l प्रेम के विभिन्न रंगों में लिपटी इन कहानियों को पाठक तक पहुँचाने की जिम्मेवारी को आपने बखूबी निभाया है l पढ़ कर मन कह उठता है 'काटा प्रेम-कीट ने जिस को, रास न आए फिर कुछ उस को l'

मैत्रेयी की मुश्किलें :

दयानंद जी की पहली कहानी की प्रेमिका मैत्रेयी लोगों पर हावी हो जाने के बारे में बदनाम है l लोग उस से दूर भागते रहते है l तकदीर की मारी ‘भड़भूजे के भाड़’ जैसी मैत्रेयी का अतीत अवसाद से भरा है l पहले के दो विवाह असफल होने के बाद नागेंद्र नाम के प्रेमी से अपने खोए हुए सुख को प्राप्त करना चाहती है l स्वभाव में एक तरफ उदारता की देवी और दूसरी तरफ बच्चों की तरह जिद पर अड़ने की आदत l नागेंद्र से वह बुरी तरह प्रेमासक्त है और एक पत्नी की तरह उस से मान-मनौवल की उम्मीद रखती है l प्रेमी को डर है समाज का पर उसे नहीं l शादी-शुदा प्रेमी मैत्रेयी के चक्कर में हैl मैत्रेयी तो मन से उसे चाहती है पर नागेंद्र का प्रेम एक भँवरे की तरह है l और उस का मन मौका पाते ही अन्य स्त्रियों के लिए भी डावांडोल होता रहता है l ‘ब्यूटी एंड द बीस्ट’ वाली सिचुएशन है l

नागेंद्र के शब्दों में ‘मर्द हूँ और लंपट किस्म का मर्द हूँl विवाहित होने के वावजूद अगर उस के साथ हमबिस्तरी कर सकता हूँ तो बाकी और औरतों से भी राखी नहीं बंधवाई हैl’ लेकिन ये सब जानने के बाद भी मैत्रेयी, जो आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर नहीं है, उन औरतों की तरह असहाय महसूस करती है जो समाज में एक पति के बिना नहीं रह सकतीं l और इसी लिए वह नागेंद्र को अपने सम्मोहन के जाल में फंसा कर अक्सर शादी का जिक्र करती रहती है l उसे उस की पत्नी व बच्चों की कोई परवाह नहीं l वह भी ऐसी स्त्रियों की तरह है जो प्रेमी की पहली पत्नी के संग भी जिंदगी शेयर करने को तैयार हो जाती हैं l ऐसी औरतें बिना पुरुष के समाज में अपने को असुरक्षित समझती हैंl

मैत्रेयी का कहना है ‘दरअसल मुझे लगता है कि बिना बाप की बेटी और पति के औरत की समाज में, परिवार में बड़ी दुर्दशा होती है l' शायद ये कहते हुये वह भूल जाती है कि कभी उसका भी अजय नाम का पति था जो उस की सुरक्षा नहीं कर पाया बल्कि अपने घर वालों के संग मिल कर दहेज को ले कर मैत्रेयी की दुर्गति कर डाली थी l फिर भी अजय उस का पहला प्यार था और मैत्रेयी को उसे भुलाना मुश्किल है l इस समाज में अकेले जीवन व्यतीत करने की वजाय वो जानते हुए भी नागेंद्र जैसे लंपट किस्म के इंसान तक से शादी करने को तैयार रहती है l और भावनात्मक व आर्थिक सुरक्षा की खोज में अपने से काफी बड़ी उम्र तक के पुरुष से शादी कर लेती है l कई बार मैरिज फेल होने पर या कम उम्र में बाप का साया सर से उठ जाने पर औरत के जीवन में जो असुरक्षा की भावना निहित हो जाती है उसे अपनी उम्र से काफी बड़े व्यक्ति से शादी करके पूरी करना चाहती है l ऐसे पतियों को अंग्रेजी में ‘शुगर डैडी’ कहते हैंl दयानंद जी ने इस प्रेम कहानी में बड़ी कुशलता से इन सब पहलुओं का शब्दांकन किया है l

बर्फ़ में फँसी मछली :

इस दूसरी प्रेम कहानी को पढ़ना शुरू करते ही आइडिया होने लगता है कि ये कहानी एक लव मैनियेक के बारे में है l इस के प्रेमी को प्रेम का असली अर्थ ही नहीं पता l उसे हर लड़की से प्यार हो जाता है l शुरू में कभी उसे भी 'लव एट फर्स्ट साइट' हुआ था लेकिन उस लड़की की शादी कहीं और हो जाने से धीरे-धीरे इन का लव हवा हो जाता है l बाद में खुद की शादी करने के बाद भी फुटकर प्यार के किस्से चलते रहते हैं l कुछ लोगों के लिए प्यार एक मृगतृष्णा के समान है, उस के पीछे भागते ही रहते हैं l पता नहीं किन-किन लोगों के बीच अजीब परिस्थितियों में फँस कर भी उन की प्रेमासक्ति नहीं खत्म होती l इस कहानी में भी एक ऐसा ही लव मैनियेक है जो प्यार के पीछे लगातार भागता रहता है l इसे हर स्त्री से प्यार हो जाता है या होता रहता है l प्रेम ना हुआ जैसे एक रोग हो गया l 'तू नहीं तो और सही’ वाली सोच के इस इंसान को प्यार का गूढ़ अर्थ ही नहीं पताl जिस तरह फूड से हद का लगाव रखने वालों को फूड मैनियेक कहा जाता है, उन का मन तरह-तरह के खाने ढूंढ कर खाने को मन करता है और रोज उसी चक्कर में रहते हैं उसी तरह इस कहानी में प्रेम के रसास्वादन से मन ना भरने वाले एक इंसान का ज़िक्र है l और ऐसे लोगों को लव मैनियेक कहना ही सही होगाl

इन लोगों के लिए प्रेम शब्द एक आइसक्रीम या पान तमाखू की तरह है l हर बार जायका लेने के बाद फिर दूसरे फ्लेवर का खाना चाहते हैं l ऐसे इंसान आजीवन प्रेम के पीछे भागते रहते हैं l एक इंसान से प्रेम कर के चैन से नहीं रहना चाहते l दयानंद जी ये कहानी लिखते हुए इस लव मैनियेक के जीवन में कितने और पहलू जोड़ते रहे हैं l जिन में इंटरनेट से जुड़ी प्रेम की दुनिया भी है जिस से तमाम लोग दूर रहना चाहते हैं l केवल ऐसे लोग ही इन साइटों को यूज करते हैं जिन की मानसिकता विकृत हो या जो कैजुएल प्रेम या इस तरह के संबंधों के चक्कर में हों l प्रेम-संबंधों में कहानी का पात्र धीरे-धीरे अन्य देशों की स्त्रियों से जुड़ कर भी अपनी प्रेम-पिपासा नहीं बुझा पाताl एक रशियन लड़की रीमा जो 'बर्फ़ में फंसी मछली' की तरह है इस से बुरी तरह प्यार करने लगती हैl वो जानती है कि रशियन आदमी केवल शरीर के भूखे होते हैं वो सच्चा आत्मिक प्यार करना नहीं जानतेl लेकिन वो बेचारी ये नहीं जानती कि ये लव मैनियेक भी उसे उस तरह का प्यार नहीं दे सकता जिसे वह चाहती हैl

प्रेम-पत्रों के जरिये प्रेम कायम रहता है पर मिलने के पहले ही रीमा की मौत हो जाती है l और अंत में अपने ही कर्मों से बिछे जाल में ये लव मैनियेक भी मछली बन कर फँस जाता है l प्रेम के नाम पर पत्नी के हाथों जो दुर्गति होती है वो अलग l 'ना खुदा ही मिला ना बिसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे' l ऐसे लोग अपनी मानसिकता से मजबूर होते हैं l इस तरह के प्रेम को एक मानसिक रोग कहना ही उचित होगा जिस का इलाज होना चाहिए वरना यदि कोई शादी-शुदा है तो देर-अबेर उस के घरेलू जीवन पर असर पड़ता है l दयानंद जी ने इस कहानी में एक पात्र के माध्यम से प्रेम का ऐसा अस्थिर रूप प्रदर्शित किया है जिस में एक लव मैनियेक अपनी सोच से लाचार है l और ऐसा प्रेम घर-परिवार को उजाड़ देता है l सीख देती हुई इस कहानी का समापन आपने बड़ी खूबी से किया गया है l

फ़ोन पर फ्लर्ट :

फ़ोन पर फ्लर्ट में ऐसे प्रेम संबंध की गंध है जहाँ दयानंद जी की लेखनी ने उन शादी-शुदा औरतों व पुरुषों के प्रेम को उघाड़ा है जो चोरी-छुपे घरवालों की आँखों में धूल झोंक कर किसी से प्रेम-संबंध बना कर आनंद लेते हैं l इस तीसरी कहानी में प्रार्थना नाम की औरत अपने बच्चे की पढ़ाई और अच्छी जिंदगी जीने के सपने बुनती है और शायद किसी अधेड़ उम्र के प्रेमी को अपने शरीर और अदाओं से लुभा कर अपने जाल में फंसाए हुए है l लेकिन वो खुद भी मेहनत कर के पैसे कमाने का जुगाड़ सोचती है l उस के प्रेम संबंध की सब बातें एक दिन किसी से रांग नंबर डायल हो जाने पर वार्तालाप के जरिए पता लगती हैंl प्रार्थना उस व्यक्ति की आवाज़ को अपने प्रेमी की आवाज़ समझ कर इतराते हुए बेबाक उस से काफी देर तक बातें करती रहती है l ये पुरुष भी धोखा दे कर मजा लेने में कम नहीं होतेl

पीयूष मौके का फायदा उठा कर प्रार्थना को अपनी असलियत न बता कर फोन पर ही बातों में फंसा कर उस के बारे में तमाम कुछ जान लेता है l लेकिन वास्तव में ऐसे पुरुष मिलने से डरते हैं कि उन की पोल खुल जाएगी l प्रार्थना को पीयूष की सचाई का पता लगने पर उससे बेरुखाई व नाराजी हो जाती है कि उस दिन फोन पर फ्लर्ट करने वाला उसका प्रेमी नहीं बल्कि पीयूष था l जाहिर है कि दयानंद जी ने ऐसे प्रेम-संबंधों के बारे में बताने की कोशिश की है जिन में औरत केवल एक प्रेमी को ही चाहती है या कहिए कि वफादार होती है l हर किसी को वो मन से नहीं चाह पाती l उस ने फोन पर फ्लर्ट धोखे में किसी को अपना प्रेमी समझते हुए किया था l

एक जीनियस की विवादास्पद मौत :

इस चौथी कहानी में जीनियस, स्मार्ट और खुद्दार विष्णु जी अच्छी नौकरी और इज्ज़त सब को एन्जॉय करते हुए लोगों में धाक जमाए हैं कि उन के मीठे शांत समुंदर जैसे जीवन में बिंदु नाम की एक नमकीन लहर आ जाती है l इस दुनिया में जलने वालों की कमी नहीं l आफिस के लोगों ने बिंदु और विष्णु जी के बारे में तिल का ताड़ बना कर उन के प्रेम के झूठे चर्चों का ऐसा तूफ़ान उठाया कि एक दिन विष्णु जी अपनी अच्छी-खासी नौकरी से ही हाथ धो बैठे l और बीवी बच्चों को लखनऊ में ही छोड़ अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर दूर दिल्ली में जा कर उन्हें छोटी-मोंटी कंसल्टेंसी कर के गुजारे के लिए काम चलाना पड़ा l लेकिन बिंदु तो स्त्री है और पुरुषों का खेला कब रुका है l उस पर अब उस के नए बास ने हावी होना शुरू कर दियाl

एक औरत अपनी इज्ज़त या तो खोए या दाग लगने के पहले कोई और रास्ता टटोले l सो मजबूरन बिंदु ने भी नौकरी पर लात मार कर दिल्ली का ही रास्ता पकड़ा l जहाँ वो विष्णु जी की शरण में आईंl ‘आसमान से गिरे तो खजूर में अटके’ वाली बात हुई l यहाँ भी धक्के खाने पड़े l कुछ औरतें पुरुषों का सहारा लेते हुए छली जाती हैं धीरे-धीरे l और कभी औरत भी मजबूरी में किसी का सहारा पा कर उस का इस्तेमाल करती है और भूल जाती है कि उस पुरुष की जिंदगी में पहले से ही बीवी के रूप में एक औरत है l और वो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उस औरत व उस के परिवार को चोट पहुँचा रही है l बिंदु जी अब बिंदु नहीं रहीं बल्कि विष्णु जी की ज़िंदगी पे इस कदर छा गयीं कि पत्नी व उन में कोई फरक ही नहीं रहा l जिस पत्नी के लिए उन्हों ने अपने घर वालों को छोड़ दिया था किसी दिन अब उस प्रेम को भूल कर बिंदु से उन का लगाव हो गया l और बिंदु एक दिन इतनी स्मार्ट हो गयीं कि उन का प्रेम-वेम सब एक तरफ रह गया l विष्णु जी की पत्नी व बच्चों का कोई ख्याल किए बिना वे उन का सब पैसा गड़प कर गईं साथ में उन को भी खा गईं l मतलब ये कि खुद्दार विष्णु जी अपनी जान से ही हाथ धो बैठे l इसे औरत का प्रेम नहीं बल्कि किसी को प्रेम के झूठे अहसास में रखना कहते हैंl

एक पुरुष को अपने जाल में फंसा कर उस का इस्तेमाल कर के अपना उल्लू सीधा करना कहते हैं l लेकिन औरत की मजबूरी का फायदा उठाने में कभी पुरुष भी पीछे नहीं रहते l बिंदु का प्रेम विष्णु जी के प्रति एक छलावा है जिस में वह अपना स्वार्थ ढूँढती है l वो केवल अपनी आर्थिक व भावनात्मक सुरक्षा के बारे में सोचती है l पैसे की तंगी या फिर परिस्थितियों से मजबूर औरतों की मानसिकता कितनी बदल जाती है कि वो अपने स्वार्थ में अंधी हो कर परवाह नहीं करतीं कि उन के प्रेमी पहले से ही शादी-शुदा हैं l इस तरह की बातें दयानंद जी की इस कहानी के प्रेम-संबंध से साफ विदित होती हैं जिन्हें पढ़ते हुए मन कभी आक्रोश व कभी संवेदनशीलता से भर उठता है l

प्रतिनायक मैं :

ये पाँचवीं कहानी इकतरफा प्रेम की कहानी है जिस में प्रेमी की प्रेमिका को कुछ पता नहीं कि उसे शादी के पहले कोई और लड़का चाहता था l कुछ लोग मन ही मन में किसी को प्यार करते रहते हैं और बताने की हिम्मत नहीं कर पाते l और एक दिन वो जिस से प्यार करते हैं उस की शादी भी हो जाती है l प्यार भी अजीब जगहों व परिस्थितियों में होते हुए सुना है व प्यार करने की कोई खास उम्र भी होना जरूरी नहीं l कभी स्कूल-कालेज के दिनों में पढ़ते हुए तो कभी जान-पहचान के बच्चों में भी एक दूसरे के लिए प्रेम के बीज कब पनपने लगें इस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता l इस कहानी में भी धनंजय बचपन से ही किसी जान-पहचान वालों की बेटी शिप्रा को वह पहली बार देखने पर ही चाहने लगा था यानि ‘लव एट फर्स्ट साइट’ l शिप्रा को देखते ही उस पर रीझ गया l पर संकोच या शर्म जो भी कहो उस के कारण वो उस लड़की को बता ना सका और फिर एक दिन शिप्रा की शादी भी हो गई l 'कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे’ वाली बात हो गईl

खैर, समय बीतता गया पर धनंजय शिप्रा को भूल न सका l वो शिप्रा की याद मन में दफनाए उस की पूजा करता रहा l कई बार देखा-सुना गया है कि ऐसे लोग फिर किसी और से शादी न कर के कुंवारे रहना ही पसंद करते हैं l तो यहाँ धनंजय की भी यही हालत हुई l इतना गहरा आत्मिक प्यार कि शिप्रा की शादी हो जाने के बाद भी वो मन में बसी रही l कल्पना में ही उस से शिकवे-शिकायत करता रहा l कुछ साल बाद एक दिन शिप्रा से मुलाक़ात के दौरान मौका मिलते ही अकेले में इतने सालों से मन का अनकहा गुबार निकाल लिया l शिल्पा लड़की होने के नाते झिझक रही थी l लेकिन ‘अब पछताए का होत जब चिड़ियाँ चुग गयीं खेत’, अब तो बहुत देर हो चुकी थी l शिप्रा ने अपनी तरफ से कुछ कबूल नहीं किया l लेकिन कोई उस से इतना प्यार करता है कि उस के लिए शादी भी ना की इस के अहसास से उस की आँखें भीग जाती हैं l ऐसे केस में अगले जन्म में मिलने के वादे के अलावा और कुछ नहीं सूझता और प्रेमिका के दिए हुए रुमाल को ही प्रेमी सीने से लगाये रहता है l दयानंद जी ने इस कहानी के प्रेम संबंध में समाज की वो झलक दिखाई है जिस में एक पुरुष अपनी प्रेमिका की पावन यादों में ही जीवन व्यतीत कर देता है l कोई उस पर लांछन नहीं लगाता ना ही किसी की उँगली या भौहें उस पर उस तरह उठती हैं जिस तरह एक अकेली स्त्री के साथ होता है l

सुंदर भ्रम :

दो प्रेमियों की कहानियों में अक्सर ही प्रेमी या प्रेमिका के पिता की मृत्यु होने पर या तो वह अपने जीवन की तरफ से उदासीन हो जाते हैं या किसी लक्ष्य को ले कर उस में अपने को गुम कर देते हैं l जैसे कि इस में अनु के साथ हुआ l घर में केवल बेटियाँ हैं तो अनु परिवार का पेट भरने के लिए आगे की पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करने लगती है l ऐसा करते हुए वह जीवन की तरफ से उदासीन हो जाती है l उस का प्रेमी देव अपनी प्रेमिका का यहाँ-वहाँ पीछा करते हुए आहें भरा करता है l उस की मन ही मन में पूजा करते हुए उस के आने-जाने की जगहों पर चक्कर काट कर अपनी टांगें घिसा करता है l कभी-कभी प्यार के जुनून में चिट्ठियाँ लिख कर उन की ढेरी लगाता रहता है l ऐसे प्रेमी मजमून दिल में लिए या कागज के टुकड़ों पर लिख कर ही रह जाते हैं l कागज का वो टुकड़ा प्रेमिकाओं के हाथ में सही समय पर नहीं पहुँच पाता l प्रेमी उन्हें पोस्ट करने से हिचकिचाते हैंl कभी इत्तफाक से मौका आया बात करने का तो या तो हकलाने लगते हैं या नर्वस होते हुए मन में जो कुछ रिहर्स किया होता है वो सब कहना या पूछना ही भूल जाते हैं l और भी हादसे होते रहते हैंl

अगर प्रेमिका को संदेह हो जाता है कि कोई उस का पीछा करता है तो डर से या घबरा कर उस लड़के से कन्नी काटने लगती हैl और प्रेमिकायें कभी अचानक सीन से गायब हो जाती हैं तो प्रेमी चिंता के मारे घुलता रहता है l हर समय घुट-घुट कर जीता है लेकिन बेशर्मी से हर बात की खोज खबर रखता है किंतु डरता भी रहता है कि कहीं मन की बात कह देने से जूते न पड़ें या उसे जेल की हवा न खानी पड़े l और अगर कभी ऐसा हुआ कि प्रेमिका के दीदार ना हो पाए और उस का पता-ठिकाना ना मिल पाए तो प्रेमी घबरा जाता है कि कहीं उस की प्रेमिका की शादी ना हो गई हो l प्रेम-ग्रस्त इंसान क्या-क्या फितूर की बातें नहीं सोचता l यही सब इस कहानी के नायक देव के साथ होता रहा l एक ऐसा प्रेमी जो मन में ही बातें सोच कर छटपटाता रहता है लेकिन अपनी प्रेमिका से कुछ कह नहीं पाताl

उसे अपनी प्रेमिका के आगे कोई भी अन्य लड़की सुंदर नहीं लगती l और उस दीवानेपन में कुछ बदकिस्मत प्रेमी मानसिक संतुलन खो बैठते हैं जैसा कि इस कहानी में भी हुआ l सालों से प्रेम-अग्नि में जलता हुआ वह अपनी हर किस्म की भावनाओं को चिट्ठियों में प्रकट करता रहा l कुछ लोग किसी से प्रेम करते हुये जीवन भर ऐसे ही घुटते रहते हैं l अतीत की यादों के नशे में ही धुत रहते हैं l ये नहीं कि ‘जो बीत गया सो बीत गया, अब आगे की सुधि ले l’ देव कल्पना में ही अनु से इश्क लड़ाते हुए अपनी प्रेम-पीड़ित भावनाओं को चिट्ठियों में लिख कर ढेर लगाता रहा किंतु उन्हें पोस्ट करने की हिम्मत ना कर पाया l जिंदगी के कई साल बीत जाने पर ही वो उन चिट्ठियों को अनु को पोस्ट करने की हिम्मत कर पाता है l दयानंद जी ने अपने निपुण लेखन से प्रेम की अधीरता व पीर दोनों को ही इस कहानी में दर्शाया है l

वक्रता :

इस कहानी के प्रेमी को कालेज के दिनों से ही प्रेम रोग लग गया था l वो एक ही लड़की से प्रेम करता है l कभी-कभी परिस्थितियाँ विपरीत होने पर एक खास प्रेमिका ना मिल पाने पर कुछ लोग विद्रोही बन कर और लड़कियों से भी प्यार का स्वांग रचाने लगते हैं और उन का जीवन नष्ट कर देते हैं l  ऐसा ही इस कहानी के नायक परितोष उर्फ ‘अवनींद्र’ ने किया  'शुरू में तो तुम्हारे प्रतिशोध में कुछ कन्याओं से खेला l उन्हें जी भर कर उलीचा l उलीच-उलीच तबाह करता रहा l कुछ समय बाद पाया कि वह तुम्हारी बिरादर कन्यायें तबाह हुई हों, या ना हुई हों, मैं ज़रूर तबाह हो गया l’ परितोष व पश्यंति दोनों ही अपनी दुनिया में एक दूसरे के लिए प्यार के सदाबहार मंजर में डूबे रहे l परिस्थितियों के बहाव में शादी अन्यत्र हो जाने पर भी एक दूसरे को भूल नहीं पाए l रसिक परितोष की रग-रग में पश्यंति  इतनी समाई थी कि सपने में भी उस का नाम मुँह से निकल जाता थाl

यहाँ तक कि उन दोनों ने अपने बच्चों को भी एक दूसरे का नाम दे डाला l प्रेमी की बेटी पश्यंति  और प्रेमिका का बेटा परितोष हो गया l प्रेमिका ने तो अपने बेटे को अपने प्रेमी के डीलडौल में ढालना चाहा और काफी सफल भी हुई उस में l दोनों के लाइफ पार्टनर के गुज़र जाने के बाद उन का रास्ता साफ हो जाता है किंतु एक दूसरे का अता-पता ना मालूम होने से अपनी-अपनी दुनिया में रहते हुए यादों में ही हिलगे रहते हैं l पर एक दिन किस्मत से वह अपने बच्चों की प्रेम कहानी में उलझ कर अजीब परिस्थितियों में फिर मिलते हैं l पर उन के बच्चे नहीं जानते कि उन के माँ-बाप आपस में कभी प्रेमी रहे थे l और इत्तफाक से एक दिन उन के माँ-बाप जब पार्क में मिलते हैं तो प्रेमिका इतनी मोटी हो चुकी होती है कि प्रेमी परितोष उसे पहचान नहीं पाता l किंतु असली प्रेम में मोटापा से कुछ फर्क नहीं पड़ता l मिलते ही वही प्रेमियों वाले गिले-शिकवे चालू हो जाते हैं l जैसे यहाँ पश्यंति  का शिकायत भरा लहजा 'मैं ठूँठ दीवार बन कर भरभराती गई l कोई नहीं आया मुझे संभालने l तुम भी जाने किस दुनिया में भटक रहे थे l वैसे तुम से मैं ने कोई उम्मीद भी न की थीl’

अकेलापन झेलते हुए और उम्र के इस पड़ाव में जैसा होता है पश्यंति  का भी आत्मविश्वास मजबूत होने की वजाय भरभरा कर ढह रहा था l जिसे उस ने अपनी बातों में जाहिर करने में संकोच नहीं किया l जहाँ सच्चा प्यार होता है वहाँ किसी और से शादी हो जाने पर भी दोनों एक दूसरे को भूल नहीं पाते ये कहानी उस का उदाहरण है l अब दोनों प्रेमी अपने बच्चों के प्रेम के आगे मजबूर हैं किंतु एक तो चाहता है कि बच्चों की शादी हो किंतु दूसरा इसे जीवन में फ़िल्मी किस्म का मोड़ समझ कर उन बच्चों की शादी को राजी नहीं होना चाहता l किंतु प्रेमिका परितोष की माँ की इच्छा का उल्लेख करके खोये हुये संबंध को आगे बढ़ाना चाहती है l जो धागा अब तक छोटा था उसे अब एक नए रिश्ते में बांध कर संजोना चाहती है l वो दोनों तो जीवन साथी नहीं बन सके किंतु अब आपस में प्यार करने वाले इन दोनों बच्चों को वो दर्द ना सहना पड़े जिस से वो खुद गुजर चुके हैं l पश्यंति  का कहना है ’हमारे साथ जो हुआ सो हुआ, अब इन के साथ तो ऐसा वैसा कुछ ना होने दो प्लीज…..!’ इस कहानी में परितोष की पत्नी पर तरस आता है कि अपना फर्ज निभाते हुए एक दिन वह इस दुनिया से ही चली गई l और उस का पति परितोष पति परमेश्वर बन कर भी मन से उसे नहीं चाह सका बल्कि अपनी प्रेमिका की यादों में ही आजीवन डूबा रहा l एक औरत जो ऐसे इंसान की पत्नी होती है उस के अभागे जीवन की बिडम्बना इस कहानी में अप्रत्यक्ष रूप से जाहिर होती है l

दयानंद जी ने हर प्रेम कहानी को एक नए खाके में ढाल कर प्रस्तुत किया है l आप की कहानियाँ 'मैत्रेयी का मुश्किलें', ‘फोन पर फ्लर्ट’ व ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ में काफी समानता है जहाँ प्रेमिकाएं अपने प्रेमी की पत्नी व बच्चों के प्रति हृदय हीन हैं l इन सभी कहानियों को आप ने स्त्री और पुरुष दोनों के मानसिक गठन पर ध्यान देते हुए लिखा है l स्त्री अपने संबंध में मजबूती चाहती है चाहें वो पत्नी हो या प्रेमिका, लेकिन पुरुष की प्रवृत्ति एक भँवरे की तरह है जो केवल फूल की सुंदरता के रसपान के बारे में सोचता है l पढ़ते हुए जिज्ञासु मन कहानी के पात्रों में ऐसा उलझ जाता है कि इन प्रेम संबंधों की समस्याएं पाठक से आंतरिक सवाल और जबाब करने लगती हैं l जैसे कि: क्या वास्तव में मैत्रेयी जैसी प्रेमिका की नागेंद्र जैसे प्रेमी से शादी हो सकती है? क्या वाकई समाज इस की इजाजत दे सकेगा? मैत्रेयी, बिंदु और प्रार्थना जैसी औरतें जिस भावनात्मक सुरक्षा की खोज में हैं क्या उन के प्रेमी लोग उन्हें आजीवन दे सकेंगे?

क्या मैत्रेयी शादी के बाद एक ‘लंपट’ इंसान के साथ खुश रह सकेगी? और फिर शादी उस के या किसी और के साथ हो भी गई तो बाद में उस के पति का कायर साबित होना व पति की पहली पत्नी व अन्य लोगों का उसपर तमाम तरह से दोषारोपण करना आदि को सहते-सहते जिंदगी और भी भयानक हो जाए, तब क्या होगा? जब वह समाज में इज्जत पाने की बात करती है तो उस पर सवाल उठता है कि क्या इस तरह के प्रेमी से शादी कर के वो समाज की निगाहों में सम्मान पा सकती है? मन कहता है बिलकुल नहीं l क्यों कि तब समाज पीठ पीछे कहेगा कि इस अमुक स्त्री ने किसी का घर उजाड़ कर अपना घर बसाया है l कई बार प्रेम की भूल-भुलैया में पड़ कर प्रेमी लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं l सच्चे प्यार का अर्थ ना समझते हुए कुछ लोग शारीरिक आकर्षण के पीछे भागते हैं l ऐसे प्रेम-संबंधों और शादियों से पुरुष की पहली बीवी व बच्चों के जीवन उजड़ जाते हैं l शादी करते हुए पत्नी को नहीं पता होता कि कब पति जीवन भर के लिए किए वादों को भूल जाए l और प्रेमिकाएं नहीं जानतीं कि कब प्रेमी बदल जाए, कब भँवरा रसपान कर के उड़ जाएl

मैत्रेयी के शब्दों में ‘बातों-बातों में ताजमहल बनवाने वाले बहुतेरे मिलते हैं पर साथ निभाने वाले मर्द शायद इस समाज में नहीं हैं l’ और 'बर्फ़ में फँसी मछली' के लव मैनियेक पर मन सवाल करने लगता है कि उस के जैसे लोग शादी क्यों करते हैं व औरतें क्यों ऐसे लोगों से प्रेम करने लगती हैं? अंतर्मन बिचलित होता है पर प्रेम-सागर में न जाने कितने प्रेमी डूबे हैं और न जाने कितने डूबते रहेंगे l प्रेम इंसान को देश, समाज, जाति, धर्म आदि सभी बंधनों को तोड़ कर अपने पाश में जकड़ लेता है l और दयानंद जी ने अपनी सातों प्रेम कहानियों में बड़ी कुशलता से इस तरह के सभी प्रेम-संबंधों के विभिन्न रूप दिखाए हैं l स्त्री-पुरुष के कानूनी व गैरकानूनी संबंधों का शब्दों में अच्छा चित्रण किया है जहाँ जिंदगी कभी रोती है, कभी मुस्काती है l ऐसे प्रेम-संबंधों से परिवार व समाज पर क्या प्रतिक्रिया होती है ये इन सभी सातों कहानियों से साफ जाहिर होता है l एक बार पढ़ना शुरू करो तो कहानी का अगला मोड़ क्या होगा इस की जिज्ञासा अंत तक बाँधे रहती है l तमाम तरह की प्रेमानुभुतियों से युक्त ये कहानियाँ कभी पाठक को सतर्क करती हैं, कभी नसीहत देती हैं l प्रेम के अस्थिर रूप से विरक्ति व इसका गूढ़ अर्थ समझने को बाध्य करती हैं l जिस शादी को सात जन्मों का बंधन कहते हैं उस पर सोचते हुए एक स्त्री के मन को ये कहानियाँ झकझोर देती हैं l प्रेम के नाजुक धागों के बारे में सोच कर मन कहना चाहता है:

'घर-आँगन रचे प्रेम-रंगोली

प्रेम के रंग में बरसे होली

पावन प्यार की उठे सुगंध

ना मन टूटें और ना संबंध l'   

दयानंद जी के लिए लेखन उन के ही शब्दों में एक 'प्रतिबद्धता' है जिस में सामाजिक समस्यायों की झलक के साथ अनेकों बार इंसान के मन की पीड़ा की चीत्कार उठती रहती है l जीवन-समाज का विपुल अनुभव आप के लेखन को निखारता है l तमाम उपन्यासों, कहानियों और कविताओं के रचयिता वरिष्ठ साहित्यकार दयानंद जी को इन कहानियों के लेखन पर हार्दिक बधाई व शुभकामनायें l आप साहित्य के आकाश पर इसी तरह निरंतर अपने लेखन से ऊँची उड़ान भरते रहें l लेखनी से आप का सरोकार हमेशा बना रहे ऐसी मेरी कामना है।

[ जनवाणी प्रकाशन,दिल्ली से प्रकाशित सात प्रेम कहानियां की भूमिका]

दयानंद पांडेय के ब्‍लॉग सरोकार से साभार.

अमर उजाला कानपुर के वरिष्‍ठ पत्रकार प्रेम दीक्षित की मां का निधन

अमर उजाला कानपुर में कार्यरत वरिष्‍ठ पत्रकार श्री प्रेम दीक्षित की मां श्रीमती सुरेश कुमारी (70) का कल उन्नाव स्थित उनके मायके में हार्ट अटैक हो जाने के कारण निधन हो गया है।  देर शाम उनका पार्थिव शरीर उनके हेमन्‍त बिहार बर्रा, कानपुर स्थित निवास पर लाया गया। शव यात्रा उनके निवास स्‍थान से भैरव घाट पर पहुची जहां पर नगर के प्रबुद्ध जनों, पत्रकारों, समाजसेवियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कार्तिकेय, प्रियंका, अनुरोध, निखिल, अनूप, हितेश, कौशल, अभिनव समेत कइयों ने टीवी टुडे ग्रुप छोड़ा

खबर है कि टीवी टुडे ग्रुप के चैनल आजतक से कार्तिकेय शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है. उनकी रिफत जावेद से खटपट चल रही थी. चर्चा है कि कार्तिकेय न्यूजएक्स चैनल ज्वाइन कर रहे हैं, बतौर एक्जीक्यूटिव एडिटर. एक अन्य जानकारी के मुताबिक दिल्ली आजतक की रिपोर्टर प्रियंका कांडपाल ने रिजाइन कर दिया है. वो इंडिया टीवी में ज्वाइन कर रही हैं. माना जा रहा है कि नकवी जी इंडिया टीवी को मजबूत करने के लिए टीवी टुडे ग्रुप के लोगों से लगातार संपर्क बनाए हुए हैं.

आजतक के एसाइनमेंट डेस्क से भी आजकल नौकरी छोड़ने की होड़ है. टीवीटीएमआई स्टूडेंट अनुरोध कुमार ने इस्तीफा देकर न्यूजएक्स जाने का फैसला किया है. वे एसोसिएट प्रोड्यूसर के पद पर काम करेंगे. इनके जाने के कुछ ही दिनों बाद एसाइनमेंट से निखिल राठौर ने इस्तीफा देकर न्यूज एक्स में प्रोड्यूसर के रूप में जाने का फैसला किया. सुनने में आया है कि इनके पीछे पीछे एसाइनमेंट से तीन चार और इस्तीफे हुए. छोड़ने वालों में पुष्पेंद्र कुमार, अरुणोदय प्रकाश, सचिन सिंह और डिप्टी ईपी अनूप सिन्हा का नाम आ रहा है. बताया जाता है कि अनूप सिन्हा की भी रिफत जावेद से भिड़ंत हुई जिसके कारण उन्होंने छोड़ने का फैसला लिया.

सूत्रों का कहना है कि संजय ब्रागटा की अपने अधीनस्थों से नहीं बन रही है. हितेश जिंदल जो काफी सालों से दिल्ली आजतक में काम कर रहे थे, ने संजय से हुई लड़ाई के बाद रिजाइन कर दिया. आईआईएमसी पासआउट कौशल ने भी दिल्ली आजतक से रिजाइन दे दिया. सुनने में आ रहा है कि संजय ब्रागटा ने इनका जीना हराम कर रखा था. कुछ दिन पहले अभिनव त्रिपाठी ने भी दिल्ली आजतक छोड़ न्यूज24 का दामन थामा.

उपरोक्त जानकारियां भड़ास4मीडिया को अपने अंदरुनी सूत्रों के हवाले से मिली है. संभव है, कुछ तथ्य दाएं बाएं या उपर नीचे हो रहे हों. इसे ठीक कराने के लिए या अपनी बात / रिएक्शन भड़ास तक पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें.

कैनविज टाइम्स से कइयों ने दिया इस्तीफा, प्रकाशन ठप

कैनविज टाइम्स लखनऊ के सहयोगियों ने रविवार की शाम अचानक प्रबंधन का बहिष्कार कर दिया और दफ्तर छोड़ कर बाहर चले गए। इसमें न केवल संपादकीय विभाग के कर्मचारी शामिल हैं, बल्कि सिस्टम विभाग और सर्कुलेशन विभाग और यहां तक कि चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी भी शामिल हैं। ज्ञातव्य है कि कैनविज टाइम्स के प्रधान संपादक प्रभात रंजन दीन ने 21 जनवरी को ही इस्तीफा दे दिया था, लेकिन कम्पनी के चेयरमैन कन्हैया गुलाटी ने उनसे एक फरवरी तक रुकने का आग्रह किया था।

दो फरवरी की शाम को जैसे ही संपादकीय विभाग के सहयोगी काम पर पहुंचे, प्रबंधन के लोगों ने प्रभारी संपादक शंभू दयाल वाजपेयी से उनकी मुलाकात करानी शुरू की और प्रलोभन देने का प्रबंधकीय पैंतरा आजमाया। इस पर संपादकीय सहयोगियों ने विद्रोह कर दिया और कहा कि जब प्रभात रंजन दीन नहीं तो हम सब नहीं रहेंगे। कैनविज टाइम्स के पत्रकारों ने कहा कि पत्रकारों के साथ बुद्धिजीवियों की तरह व्यवहार होना चाहिए। पत्रकार कोई चिट फंड के कर्मचारी नहीं हैं। बहरहाल, प्रबंधन ने पूर्व में अखबार से अक्षमता और अनुशासनहीनता के कारण निकाले गए कर्मचारियों को बुला कर उनके बूते अखबार निकलवाने की कोशिश की, परन्तु वे अपनी दक्षता से डाक एडिशन तक नहीं निकलवा पाए। अंततः शाम के साढ़े आठ बजे ही अखबार के दफ्तर पर ताला पड़ गया।
 

बेनी ने पत्रकारों को बांटे कैश, मोबाइल और सूटकेस

लखनऊ : लोकसभा चुनावों की अधिसूचना इसी महीने जारी होने की संभावना है। इससे ठीक पहले केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने सोमवार को होटेल ताज में एक करोड़ से ज्यादा रुपए कैश बांटा। इस्पात उपभोक्ता परिषद की सदस्यता के नाम पर ज्यादातर पैसा लखनऊ और बाराबंकी के पत्रकारों व मंत्रीजी के संसदीय क्षेत्र के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को दिया गया।

हालांकि कुछ पत्रकारों ने समिति का सदस्य बनने से इनकार कर दिया। इसके अलावा पत्रकारों समेत करीब एक हजार से अधिक लोगों को बेनी ने ट्रॉली सूटकेस और मोबाइल फोन भी दिया।

पिछले दिनों लखनऊ के कई पत्रकारों को दिल्ली स्थित केंद्रीय इस्पात मंत्री के आवास से फोन कर उनका नाम और पता नोट किया गया। पूछने पर बताया गया कि मंत्रीजी के कहने पर उनका पता नोट किया जा रहा है। चार दिन पहले पत्रकारों के घर एक पत्र आया जिसमें उन्हें इस्पात उपभोक्ता परिषद का सदस्य बनने की जानकारी दी गई। दो दिन पहले पत्रकारों को एसएमएस के जरिए जानकारी दी गई कि उन्हें परिषद का सदस्य बनाया गया है।

परिषद की बैठक तीन फरवरी को लखनऊ के फाइव स्टार होटेल में है। बैठक के लिए बनने वाले पहचान-पत्र के लिए वह अपनी दो फोटो साथ लेकर आएं। साथ ही यह भी जानकारी दी गई कि बैठक के बाद इस्पात मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करेंगे। पत्रकार जब कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे, तो वहां हजारों की भीड़ पहले से मौजूद थी। सदस्य बनने के लिए धक्का मुक्की भी जमकर हो रही थी।

पता चला कि उपभोक्ता परिषद का सदस्य बनने के लिए गोंडा और लखनऊ के कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बुलाया गया था। बैठक में शिरकत करने के लिए गोंडा और अन्य शहरों से आने वाले नवनियुक्त सदस्यों को एसी टू के किराए के साथ सात हजार रुपये का डीए और एक हजार रुपए लोकल कन्वेंस का भुगतान किया गया।

स्थिति यह थी कि जिस समय उपभोक्ता परिषद की बैठक चल रही थी, उस समय बैठक में शिरकत करने आए नवनियुक्त सदस्य टीए और डीए के भुगतान के लिए काउंटरों पर भीड़ लगाए थे। और तो और बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस भी खत्म हो गई लेकिन, काउंटर पर भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। टीए और डीए के भुगतान के साथ ही सदस्यों को करीब डेढ़ हजार रुपए कीमत का मोबाइल फोन और एक ब्रीफकेस भी दिया गया। (एनबीटी)

4 फरवरी को राज्यपाल व मुख्यमंत्री की मौजूदगी में होगा नीरज की कृतियों का लोकार्पण

लखनऊ। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान एवं हेल्प यू  एजुकेशन एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में 4 फरवरी को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के मर्करी ऑडिटोरियम में 'लखनऊ की एक शाम, राष्ट्रीय भावनात्मक एकता के नाम' कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस साहित्योत्सव में डॉ. गोपाल दस नीरज की पुस्तकों 'नीरज संचयन' व 'काव्यांजलि' का लोकार्पण गणमान्य अतिथियों कि मौजूदगी में किया जायेगा। इस समारोह कि अध्यक्षता राज्यपाल बीएल जोशी करेंगे। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम कि शुरुआत करेंगे। इस कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यामंत्री अखिलेश यादव मुख्य अतिथि व कैबिनेट मंत्री आज़म खान, शिवपाल यादव व हिंदी संस्थान के कार्यकारिणी अध्यक्ष उदयवीर सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप  में शामिल होंगे। इस साहित्योत्सव में अखिल भारतीय कवी सम्मलेन एवं मुशायरा का भी आयोजन किया गया है जिसमें देश के विख्यात कवि एवं शायर शिरकत करेंगे। स्वागत गीत मिथिलेश लखनवी द्वारा प्रस्तुत किया जायेगा।

 

डॉ. सत्येन्द्र सिंह चौहान

सड़कों पर चाय बेचने को मजबूर आईआईटीटीएम के छात्र

नई दिल्ली। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार कई स्तरों पर काम कर रही है। इसके लिए केंद्र में पर्यटन मंत्रालय भी बना हुआ है। देश की ऐतिहासिक विरासतों और यहां की संस्कृति की जानकारी दुनियाभर में फैले, इसके लिए पर्यटन मंत्रालय द्वारा पांच बड़े शहरों में भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान (आईआईटीटीएम) चलाए जा रहे हैं। इनमें छात्रों को टूरिज्म और मैनेजमेंट की शिक्षा दी जाती है। लेकिन, इन संस्थानों में से कई ऐसे हैं, जहां प्लेसमेंट सेल ठीक तरह से काम नहीं कर रहा है। इसका खामियाजा यहां से पढ़ाई करने वालों को उठाना पड़ रहा है। अब ये छात्र दिल्ली में चाय, मूंगफली बेचकर, कोरियर बॉय व कॉल सेंटर आदि में काम करके अपना गुजारा चला रहे हैं।

इन छात्रों का कहना है कि सरकारी संस्थान होने के बावजूद महंगी फीस देकर उन्होंने आईआईटीटीएम से शिक्षा ली है। लेकिन, बेहतर नौकरी नहीं होने के कारण उन्हें मजबूरन चाय बेचनी पड़ रही है। दर-दर की ठोकरे खाने के बाद शनिवार को ये छात्र आम आदमी पार्टी (आप) के केंद्रीय कार्यलय में अपनी गुहार लेकर पहुंचे। लेकिन, यहां भी उन्हें कुछ खास हाथ नहीं लगा।

कहा जाता है कि भारतीय पर्यटन उद्योग में टूरिस्ट गाइड का रोल देशी-विदेशी मेहमानों को भारतीय संस्कृति व विरासत की सही जानकारी देना है। तभी इन्हें भारतीय संस्कृति का एम्बेसडर भी कहा जाता है। लेकिन, आज के समय में यही ‘एम्बेसडर’ सड़कों पर प्रोफाइल के मुताबिक नौकरी की चाह में खाक छान रहा है। देश में पांच जगहों भुवनेश्वर, ग्वालियर, दिल्ली (नोएडा), नेल्लौर व गोवा में आईआईटीटीएम के संस्थान हैं। इनमें प्रवेश के लिए छात्रों को पहले एंट्रेस एग्जाम लेना होता था। लेकिन इस बार कैट, मेट, जेट व जी-मेट क्लियर करने वाले स्टूडेंट्स को ही एडमिशन मिला। भुवनेश्वर के आईआईटीटीएम कैंपस में प्लेसमेंट सेल की लापरवाही का खामियाजा यहां के छात्रों को उठाना पड़ रहा है। छात्रों का कहना है कि कोई भी बड़ी कंपनी संस्थान में कैंपस इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाई गई। जबकि, निजी कॉलेजों में कंपनियों ने जाकर सैकड़ों बच्चों को रोजगार दिया है।

इन छात्रों का कहना है कि उन्होंने यहां से ‘टूरिज्म एंड ट्रैवल’ और ‘इंटरनेशनल बिजनेस’ का डिप्लोमा किया है। कुछ छात्रों ने तो लोन लेकर भी पढ़ाई की है। अब लोन चुकाना भारी हो रहा है। स्टूडेंट्स ने कहा कि पिछले साल उनके संस्थान में केंद्रीय पर्यटन मंत्री डॉ. के चिरंजीवी भी आए थे। उन्हें भी प्लेसमेंट से जुड़ी समस्याएं बताई गई थीं। उन्होंने भी बेहतर नौकरी का आश्वासन दिया। इसके बावजूद हालत में कोई फर्क नहीं पड़ा। जबकि, सरकार टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। इसके साथ ही बॉलीवुड कलाकारों द्वारा भारतीय पर्यटन का प्रचार कराया जाता हैं।

पहले वोट दो, तब काम होगाः आम आदमी पार्टी (आप) के शासन और उसके क्रियाकलापों की चर्चा देश में खूब हो रही है। इसकी वजह से कोई भी फरियादी अपनी परेशानी लेकर ‘आप’ के दफ्तर पहुंच रहा है। शनिवार को आईआईटीटीएम के छात्र भी अपनी समस्याओं का हल खोजने के लिए ‘आप’ के कार्यालय पहुंचे। लेकिन, इन्हें यहां से कुछ खास प्राप्त नहीं हुआ। रिसेप्शन पर बैठे ‘आप’ के कार्यकर्ता ने कहा कि यह मामला तो केंद्र सरकार का है। इसमें ‘आप’ कुछ नहीं कर सकती। उन्होंने छात्रों से कहा कि पहले वो अपने साथियों को लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोट डालने के लिए प्रेरित करें। अगर, केंद्र में ‘आप’ की सरकार बन जाती है, तो आपका काम हो जाएगा।

 

  लेखक सूरज सोलंकी से संपर्क ईमेल surajsinghsolanki@gmail.com पर किया जा सकता है।

केजरीवाल की ‘हिटलिस्ट’ के जवाब में कई ‘बड़ों’ ने की हल्ला बोलने की तैयारी

आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक एवं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक निशानेबाजी से भाजपा और कांग्रेस दोनों के भीतर हलचल बढ़ा दी है। उन्होंने इन दलों के कई दिग्गज नेताओं को खुलेआम भ्रष्ट करार किया है। इनकी बाकायदा सूची जारी करके इन्हें लोकसभा चुनाव में हराने की ‘सुपारी’ ले ली है। केजरीवाल के इन आक्रामक तेवरों से दोनों दलों में काफी नाराजगी बढ़ी है। इन दलों के कई बड़े नेताओं ने मानहानि के नोटिस भिजवाने शुरू कर दिए हैं। चुनौती दे दी है कि केजरीवाल या तो उन्हें भ्रष्ट साबित करें, या खुद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दें। भाजपा-कांग्रेस के साथ ही सपा जैसे दलों ने भी टीम केजरीवाल की खबर ली है। सपा सरकार के एक कैबिनेट मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि केजरीवाल उनके सुप्रीमो मुलायम सिंह के ‘चरणों’ से भी अपनी तुलना नहीं कर सकते। यदि उन्होंने ‘नेता जी’ के बारे में इस तरह की बातें फिर से कीं, तो सपा के कार्यकर्ता उन्हें सबक सिखा देंगे।

उल्लेखनीय है कि केजरीवाल ने शुक्रवार को कई दलों के दिग्गज नेताओं की सूची जारी करके भ्रष्ट करार किया था। इस सूची को ‘आप’ की ‘हिटलिस्ट’ मानी गई। उन्होंने संकल्प जताया था कि ये नेता लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं, तो ‘आप’ के उम्मीदवार उन्हें चुनावी चुनौती देंगे। पूरी कोशिश रहेगी कि ये लोग संसद में न पहुंच पाएं। इस सूची में यूपीए सरकार के 15 मंत्रियों के नाम भी हैं। इन मंत्रियों में पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल व श्रीप्रकाश जायसवाल आदि के नाम हैं। इसमें कांग्रेस के 14, भाजपा के 4, एनसीपी और डीएमके के 2-2, सपा, बसपा व नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं के भी नाम हैं। यहां तक कि वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी को भी इस सूची में जगह दी गई है। बसपा सुप्रीमो मायावती का भी नाम है।

शुक्रवार को जारी की गई इस ‘हिटलिस्ट’ में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का नाम तो था, लेकिन इसमें कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी और भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी का नाम नहीं रखा गया था। खास तौर पर मोदी का नाम इसमें न होने से ‘आप’ की चुनावी रणनीति को लेकर पार्टी के अंदर भी बहस तेज हुई थी। इसी के चलते शनिवार को पार्टी प्रवक्ता गोपाल राय ने अपनी ‘हिटलिस्ट’ में सोनिया गांधी और नरेंद्र मोदी का नाम जोड़ लिया है। लेकिन, इन दोनों को नई किस्म की श्रेणी में रखा गया है। सोनिया का नाम वंशवाद की राजनीति को बढ़ावा देने के कारण रखा गया है। जबकि, मोदी का नाम सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देने के लिए रखा गया। ‘आप’ के ‘थिंक टैंक’ योगेंद्र यादव ने मीडिया से कहा है कि सोनिया गांधी और नरेंद्र मोदी, महाभ्रष्ट नेताओं की सूची में भले नहीं रखे गए, लेकिन इन दोनों नेताओं ने राजनीतिक शुचिता को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। इनके कृत्य तो भ्रष्टाचार से भी ज्यादा खतरनाक हैं। ऐसे में, पार्टी ने संकल्प किया है कि इन दोनों को भी चुनौती देकर चुनाव न जीतने दिया जाए।

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ टीम केजरीवाल पहले भी घोटाले के आरोप लगा चुकी है। इन्हीं आरोपों के चलते गडकरी पार्टी के दोबारा अध्यक्ष नहीं बन पाए थे। जबकि, इस पद पर लाने की उनकी तैयारियां पूरी हो गई थीं। एक बार फिर टीम केजरीवाल के निशाने पर गडकरी आ गए हैं। उन्होंने चुनौती दी है कि या तो केजरीवाल उन्हें भ्रष्ट साबित करें, वरना सार्वजनिक रूप से माफी मांग लें। गडकरी ने मानहानि का नोटिस भिजवा दिया है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ने कहा है कि यदि दो दिन के भीतर दिल्ली के मुख्यमंत्री ने माफी नहीं मांगी, तो वे अदालत में घसीटेंगे। गडकरी के अलावा पार्टी के महासचिव अनंत कुमार और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को भी भ्रष्टों की सूची में रखा गया है।

केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने ‘डीएलए’ से कहा कि केजरीवाल अपनी गैर-जिम्मेदाराना राजनीति का परचम लहराने लगे हैं। वे दिल्ली सरकार की अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए इस तरह के राजनीतिक स्टंट कर रहे हैं। शायद, वे इस कोशिश में हैं कि राहुल गांधी और कपिल सिब्बल जैसे नेताओं को ‘भ्रष्ट’ करार करें, तो गुस्से में कांग्रेस इनकी सरकार से समर्थन वापस ले लेगी। लेकिन, कांग्रेस ऐसा करने नहीं जा रही है। हमारी कोशिश रहेगी कि दिल्ली की जनता इनका असली चेहरा अच्छी तरह समझ ले। केजरीवाल की दिक्कत यह है कि उन्होंने जनता को तमाम सब्जबाग दिखा दिए हैं, लेकिन वे जानते हैं कि ये वायदे कभी पूरे नहीं किए जा सकते। शायद, इसी के चलते वे अनर्गल आरोप लगाकर लोगों का ध्यान अपनी सरकार के कामकाज से हटाना चाहते हैं।

सिब्बल ने भी केजरीवाल को अल्टीमेटम दिया है कि या तो वे तीन दिन के अंदर माफी मांग लें, वरना मानहानि के मुकदमे के लिए तैयार रहें। राहुल गांधी के कार्यालय ने ‘आप’ की ‘हिटलिस्ट’ पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन, पार्टी के कई नेताओं ने ‘आप’ नेतृत्व को जमकर कोसा है। केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली का भी नाम इस सूची में है। उन्होंने कहा है कि पता नहीं, केजरीवाल इतनी अराजक राजनीति कैसे कर रहे हैं? वे इस इंतजार में हैं कि पार्टी स्तर पर इस बारे में किस तरह की कार्रवाई की रणनीति बनाई जाती है? केंद्रीय गृह मंत्री सुशील शिंदे भी इस ‘हिटलिस्ट’ में हैं। वे तो पहले ही बहुचर्चित धरने के प्रकरण में केजरीवाल को ‘एड़ा’ (पागल) करार कर चुके हैं। उनकी इस टिप्पणी को लेकर राजनीतिक हल्कों में काफी हो-हल्ला भी हुआ था। जब शिंदे से ताजा प्रकरण में सवाल किया गया, तो उन्होंने मुस्कराते हुए यही कहा कि इनके नेता (केजरीवाल) के बारे में तो मैंने पहले ही बता दिया था कि वे किस किस्म (एड़ा) के नेता हैं? ऐसा लगता है कि वे पार्टी को चर्चा में रखने के लिए इस तरह की हरकतें कर रहे हैं।

अखिलेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन केजरीवाल की ‘हिटलिस्ट’ में अपने नेता मुलायम सिंह का नाम आने से खासे नाराज हैं। उन्होंने कह दिया है कि मुलायम सिंह ने अपनी राजनीति में वंचितों और पिछड़े वर्गों के हितों के लिए बड़े संघर्ष किए हैं। ऐसे में, ये कल का नेता (केजरीवाल) ‘हिटलिस्ट’ जारी कर रहा है। जबकि, इस शख्स की तुलना नेताजी के चरणों से भी नहीं की जा सकती। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता एवं केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला का नाम भी ‘आप’ की सूची में है। बुजुर्ग नेता फारुख इस प्रकरण से काफी नाराज हैं। उन्होंने कहा है कि वे इस मामले में केजरीवाल को बख्शने नहीं जा रहे। फारुख के बेटे एवं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ‘आप’ के नेताओं को कश्मीर में चुनाव लड़ने की चुनौती दे दी है। उन्होंने मीडिया से कहा कि केजरीवाल के उम्मीदवार यहां चुनाव मैदान में आएं। वे इन सब की जमानत जब्त करवा कर दिल्ली भेज देंगे। तब पता चल जाएगा कि शिगूफा राजनीति करने का हश्र क्या होता है?

‘आप’ के प्रवक्ता गोपाल राय का मानना है कि उनकी पार्टी ने जिस निडरता से ‘भ्रष्ट’ दिग्गजों की सूची जारी की है, उसको लेकर तमाम बड़े नेताओं की उन्हें नाराजगी तो झेलनी ही पड़ेगी। इसका अंदाजा उनको पहले ही था। जिनके नाम इस सूची में आए हैं, उनका बौखलाना स्वभाविक है। लेकिन, उनकी पार्टी ऐसे नेताओं की धमकियों से डरने वाली नहीं है। क्योंकि, पूरे देश की जनता जानती है कि पिछले 65 सालों में इन तमाम नेताओं ने लोकतंत्र के नाम पर देश को ‘लूटतंत्र’ में बदल दिया है। हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि इस लोकसभा चुनाव से ऐसे लोगों के खिलाफ तेज जनमुहिम शुरू की जाए। उल्लेखनीय है कि ‘आप’ ने दावा किया है कि उसके उम्मीदवार 350 सीटों पर मुकाबला करेंगे। खासतौर पर विभिन्न दलों के दागी किस्म के नेताओं को हराने की मजबूत रणनीति रहेगी। उनकी प्राथमिकता अपनी जीत की बजाए भ्रष्ट किस्म के नेताओं को हराने की ज्यादा रहेगी।

राजनीतिक हल्कों में ‘आप’ की इस आक्रामक रणनीति को लेकर कई तरह के कयास शुरू हुए हैं। यह माना जा रहा है कि केजरीवाल सरकार को इस दौर में दिल्ली में कई तरह की किल्लतों का सामना करना पड़ रहा है। इसकी एक खास वजह यह भी है कि राष्ट्रीय राजधानी को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है। ऐसे में, तमाम छोटे-मोटे मुद्दों पर भी स्थानीय सरकार स्वतंत्र रूप से फैसला नहीं ले पाती। उसके पास पुलिस का नियंत्रण तक नहीं है। जबकि, यहां कानून व्यवस्था की स्थिति लगातार खराब हो रही है। बिजली वितरण कंपनियां भी सरकार के साथ सहयोग नहीं कर रहीं। सरकार ने उनके खातों की आॅडिट का फरमान किया, तो ये कंपनियां कई तरह की दिक्कतें खड़ी कर रही हैं। अल्टीमेटम यहां तक दिया गया कि दिल्ली में 8 से 10 घंटे की बिजली कटौती हो सकती है। फंडिंग प्रकरण पर बिजली कंपनियों और सरकार के बीच ठन गई है। किसी तरह से इस मामले में 10 दिन की मोहलत मिली है। लेकिन, यह संकट इसके बाद और ज्यादा गहरा सकता है।

केजरीवाल बार-बार कह रहे हैं कि उनकी सरकार के खिलाफ भाजपा और कांग्रेस में अंदर ही अंदर सांठगांठ हो रही है। उनकी सरकार पर खतरा है। इसके बावजूद उनकी पार्टी इनके दिग्गजों के खिलाफ मुहिम चला रही है। परिणाम की उन्हें परवाह नहीं है। उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी संसदीय क्षेत्र से ‘आप’ ने अपने चर्चित नेता कुमार विश्वास को मैदान में उतार दिया है। वे क्षेत्र में   घूमकर राहुल की चुनौतियां बढ़ा रहे हैं। मंथन इस बात पर हो रहा है कि मोदी के मुकाबले किसको उतारा जाए? क्योंकि, अभी तय नहीं है कि मोदी एक सीट से लड़ेंगे या दो सीटों से? इसका खुलासा होने के बाद ही रणनीति तय होगी। ‘आप’ के ‘थिंक टैंक’ प्रो. आनंद कुमार का मानना है कि कम से कम अब जनता तो समझ जाएगी कि उनकी पार्टी न कांग्रेस की ‘बी’ टीम हैं और न ही भाजपा की। पार्टी का एक ही लक्ष्य है कि सभी भ्रष्ट नेताओं की विदाई राजनीति से करा दी जाए। इसी संकल्प पर उनकी पार्टी डटी है। भले, इसके लिए कितनी ही ‘कुर्बानी’ देनी पड़े और लांछन सहने पड़ें। लेकिन, इसकी ज्यादा परवाह नहीं है।

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

मीडिया से गायब होते साहित्य को आक्रमक मार्केटिंग नीतियों की ज़रूरत

मीडिया साहित्य को जन-जन के बीच पहुंचाने का सबसे बड़ा जरिया रहा है, लेकिन व्यावसायीकरण की अंधी दौड़ में मुख्यधारा मीडिया ने साहित्य व संस्कृति को लगभग भुला दिया है। निजी टीवी चैनलों व एफएम रेडियो में साहित्य के लिए कोई स्थान नहीं है। साहित्य की गंभीर चर्चा की उम्मीद तो छोड़िए, टीआरपी न दे पाने के कारण कवि सम्मेलनी कार्यक्रम भी टीवी के दृश्यपटल से गायब ही रहते हैं। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में मीडिया ने अपना जबरदस्त विस्तार किया है। मीडिया के विस्तार को यदि मीडिया की तरक्की मान लिया तो निश्चित तौर पर इसे काफी अंक मिल जाएंगे, चाहे अखबरों की बात हो या टीवी व एफएम की सभी का विस्तार हुआ है। आज देशभर में विभिन्न भाषाओं के करीब तीन सौ से ज्यादा समाचार चैनल टीवी पर दिखाए जा रहे हैं। जन सेवा प्रसारण, जिसमें दूरदर्शन, संसद के दोनों चैनल व आकाशवाणी शामिल है, को छोड़कर किसी भी निजी न्यूज चैनल पर साहित्य से संबंधित कोई कार्यक्रम नहीं प्रसारित किया जाता है। भारतीय इलेक्टॉनिक मीडिया में तो भूत-प्रेत, टोना- टोटका, ज्योतिष व अंध विश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम भी साहित्य पर भारी दिखाई देते हैं।

 
यदि साहित्य के दृष्टिकोण से प्रिंट मीडिया की बात की जाए तो समाचार पत्र व पत्रिकाएं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुकाबले कुछ संजीदा दिखाई देते हैं। विभिन्न भाषाओं के राष्ट्रीय समाचार पत्रों में, ज्यादा न सही, कम से कम सप्ताह में एक या आधे पन्ने की साहित्य चर्चा शामिल की जाती है, इसमें पुस्तक समीक्षा, लेखक परिचय, कविता, कहानी व साहित्य विमर्श आदि शामिल होते हैं। यह अलग बात है कि अधिकांश समाचार पत्रों में छपने वाली साहित्य समीक्षा में गहराई का आभाव होता है। पुस्तक समीक्षा में लेखक, विषय व प्रकाशन के अलावा कुछ गंभीर होता ही नहीं है। देश में प्रकाशित होने वाले लगभग सभी राष्ट्रीय समाचार पत्रों का यही हाल है। साहित्य जिम्मेदारी निर्वाहन के मामले में अंग्रेजी के द हिंदु व हिंदी के जनसत्ता अखबार को धन्यवाद दिया जा सकता है। दि हिंदु अखबार में शनिवार को साहित्य से संबंधित छह पेजों का प्रकाशन किया जाता है। वहीं, जनसत्ता में भी गंभीर साहित्य विमर्श देखने को मिल जाता है। वैसे भी, मुख्य धारा मीडिया में गिने जाने वाले अखबारों में साहित्य से ज्यादा बालीवुड, ब्यूटी टिप्स, गैजेट्स, सेलेब्रिटी गॉसिप व चुटकुले ही ज्यादा प्रकाशित होते हैं।
 
अंग्रेजी व हिंदी के अखबारों में छपने वाले साहित्य की पड़ताल करें तो एक और गंभीर समस्या का पता चलेगा। अंग्रेजी के अखबार अंग्रेजी साहित्य के बारे में और हिंदी के अखबार केवल हिंदी साहित्य के बारे में बात करते हैं। अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों की भी कमोबेश यही स्थिति है। अखबारों के इस व्यवहार को देखकर हर साहित्य प्रेमी के मन यह सवाल उठने लाजमी हैं कि साहित्य को संकीर्ण भाषायी खांचे में क्यों बांट दिया गया है? भाषा के आधार पर लोगों को साहित्य के आनंद व ज्ञान से क्यों वंचित रखा जा रहा है? भारतीय संघीय ढ़ाचे की अवधारणा के अनुसार तो परस्पर भाषायी आवाजाही तेज होनी चाहिए थी। साहित्य के जरिए संस्कृतियों का आपसी संवाद बढ़ना चाहिए था, लेकिन हकीकत में इसके ठीक उलटा हो रहा है।
 
साहित्य के साथ मीडिया द्वारा भाषायी भेदभाव के इन हालातों में पाठकों व दर्शकों को दोहरी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पहली मुश्किल है, मुख्यधारा मीडिया से साहित्य गायब है। दूसरी बड़ी मुश्किल है जो पाठक केवल एक भाषा जानता है, उसे दूसरी भाषा के साहित्य से वंचित रहना पड़ता है। वैसे, आजकल के पाठकों में भी साहित्य के प्रति नजरिए में भारी बदलाव आया है। पहले पाठक साहित्य के शब्दों में जीवन और भावनाओं की अभिव्यक्ति तलाशता था, उससे इतर आज का पाठक साहित्य में मनोरंजन अधिक चाहता है। यही कारण है कि आज के साहित्य का व्यावसायीकरण हो गया है। अंग्रेजी साहित्य ने हिंदी या अन्य भारतीय भाषायी साहित्य के मुकाबले इस व्यावसायिक खांचे में खुद को  ज्यादा अनुकूलता के साथ फिट कर लिया है।
 
अंग्रेजी साहित्यकारों के बीच अंग्रेजी का यह कथन बेहद प्रचारित है कि ‘मार्केटिंग इज मेकिंग ऑफ लिटरेचर’। यह उक्ति भारतीय साहित्य के परिपेक्ष्य में भी सही बैठती दिखाई देती है। अमीष त्रिपाठी व चेतन भगत जैसे अंग्रेजी के साहित्कारों ने मार्केटिंग के जरिए खुद को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया। क्योंकि, वर्तमान दौर में सफलता का मानक आर्थिक सफलता है। अंग्रेजी साहित्यकारों को रिकॉर्ड रॉयलटी मिलेनी की खबरें आए दिन मीडिया में आती रहती हैं। अंग्रेजी का साहित्यकार अपने साहित्य के अलावा खुद को भी आइकॉन के रूप में स्थापित करने में विश्वास करता है, जोकि उसके साहित्य की बिक्री व लेखक के भविष्य साहित्यकर्म के लिए भी आवश्यक होता है। इसेक लिए वह मीडिया के इस्तेमाल से भी गुरेज नहीं करता है।

हिंदी या अन्य भाषायी साहित्कार मार्केटिंग करने या करवाने के मामले में पिछड़े हुए दिखाई देते हैं, जिसका खमियाजा उनके साहित्य को भी भुगतना पड़ता है। भाषायी प्रकाशक भी मीडिया के जरिए लेखक व उसके साहित्य को प्रचारित कराने में पीछे रह जाते हैं, वे गोष्ठी व पुस्तक विमोचन कार्यक्रम तक ही खुद को सीमित रखते हैं। मीडिया में प्रचार मामले मे जब तक लेखक व प्रकाशक द्वारा आक्रमक नीतियां नहीं बनाई जाएंगी, कोई बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं की जा सकती है। होना यह चाहिए की प्रकाशकों द्वारा टीवी व एफएम में छोटे-छोटे स्लॉट खरीदे जाएं और उनके जरिए साहित्यकर्म का प्रचार किया जाए। मीडिया को भी इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। साहित्यकर्म भी पत्रकारिता का एक हिस्सा है। निकट भविष्य में ऐसी उम्मीद की जा सकती है। साहित्य भी बिकेगा। नया पाठक वर्ग भी तैयार होगा।

 

लेखक आशीष कुमार पत्रकारिता एवं जनसंचार के रिसर्च स्कॉलर हैं उनसे संपर्क 09411400108 पर किया जा सकता है।

डॉ. नूतन ठाकुर के साथ वकीलों ने की बदसलूकी, मुख्य न्यायाधीश से की शिकायत

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा अधिवक्ता अशोक पाण्डेय के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में जस्टिस डॉ सतीश चंद्रा के लखनऊ से इलाहाबाद बेंच में हुए ट्रांसफर तथा जजों के सम्बन्ध में शिकायत प्रकोष्ठ बनाए जाने सम्बन्धी पीआईएल के बाद उन्हें आज गाली गलौज तथा तीव्र दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। जहां कुछ अधिवक्ताओं ने उन्हें कोर्ट नंबर 2 के बाहर भी धमकी दी वहीँ गेट नंबर 3 के सामने काफी संख्या में अधिवक्ताओं ने उन्हें घेर कर उनसे बदसलूकी की। उन्होंने कहा कि वे किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा बार के मामले में दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं करेंगे और डॉ ठाकुर को कोर्ट परिसर में घुसने नहीं देंगे। बड़ी मुश्किल से कोर्ट सुरक्षाकर्मियों द्वारा डॉ ठाकुर को उनके वाहन तक पहुँचाया जा सका।

डॉ. ठाकुर ने इस की रिपोर्ट भारत के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजी है और कोर्ट परिसर में अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कराये जाने की मांग की है। उन्होंने वजीरगंज थाने में भी एफआइआर के लिए प्रार्थनापत्र दिया है और डीजीपी यूपी को इस सम्बन्ध में शिकायत भेजी है।

डॉ. ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल के अनुसार जस्टिस डॉ. चंद्रा पर लगाए गए दुर्व्यवहार के आरोप की बिना किसी जांच के उन्हें मात्र वकीलों की हड़ताल के कारण ट्रांसफर किया जाना अनुचित है, इससे गलत सन्देश जाएगा, अतः उसे निरस्त किया जाये।

डॉ. ठाकुर द्वारा थाना प्रभारी को लिखा गया पत्र

सेवा में,
 थाना प्रभारी,
 थाना वजीरगंज,
लखनऊ
विषय- मा० इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ बेंच में मेरे द्वारा दायर एक जनहित याचिका संख्या 735/2014 (एम/बी) में आज दिनांक 03/02/2014 को घटित आपराधिक घटना के क्रम में   
 
महोदय,
            कृपया निवेदन है कि मैं डॉ नूतन ठाकुर एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ जो विभिन्न सामाजिक विषयों पर कार्य करती हूँ और इस सम्बन्ध में मा० न्यायालयों में जन हित याचिका भी दायर किया करती हूँ।
मैंने अधिवक्ता श्री अशोक पाण्डेय के साथ दिनांक 29/01/2014 को मा० इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ बेंच में मा० जस्टिस डॉ सतीश चंद्रा के लखनऊ बेंच से इलाहाबाद बेंच में हुए ट्रांसफर और एक न्यायिक शिकायत प्रकोष्ठ के गठन के सम्बन्ध में एक जनहित याचिका संख्या 735/2014 (एम/बी) दायर किया है, जिसकी उस पत्र में किये उल्लेख के अनुरूप आज दिनांक 03/02/2014 सोमवार को सुनवाई हुई। सुनवाई कोर्ट नंबर दो में जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की बेंच के सामने हुई। बहस के दौरान भी शोर शराबा किया गया और सुनवाई में व्यवधान का प्रयास किया गया। कोर्ट में सुनवाई समाप्त होते ही अन्दर कोर्ट में ही एक महिला अधिवक्ता ने नाराजगी भरे स्वर में मुझे कहा कि वैसे तो कोई बात नहीं बनती है, बड़ी मुश्किल से एक मामले में सफलता मिली और उसमे भी ये टांग अड़ाने चली आयीं, इनसे क्या मतलब है?
 
जब मैं कोर्ट नंबर दो से बाहर आई तो कुछ अधिवक्तागण ने कहा है कि बाहर से जो लोग आते हैं और बार के नहीं हैं, उन्हें न्यायालय परिसर में घुसने नहीं देना चाहिए। पता नहीं इन्हें घुसने कैसे देते हैं?
फिर जब मैं गेट नंबर तीन के पास पहुंची और वहां समय लगभग 11.30 बजे एक बेंच पर बैठ कर अपना कुछ काम कर रही थीं तो वहां एक महिला अधिवक्ता, जिन्हें मैं नाम से नहीं जानती पर जिनसे मिलती रही हूँ और जिन्हें देख कर आसानी से पहचान लूंगी, मेरे बगल में आ कर बैठ गयीं। वे मुझे काफी धमकी भरे स्वर में यह पीआईएल करने के लिए दोषी ठहराने लगीं। मैं उनके सामने अपना पक्ष रख ही रही थी कि वहां एक साथ कई सारे अधिवक्तागण आ गए। उनकी संख्या करीब तीस-चालीस की होगी। वे लोग एक साथ क्रुद्ध और आक्रोशित भाषा में मुझे भला-बुरा कहने लगे। एक ने कहा कि आगे से बार के मामलों में नहीं पड़ें। वे सारे लोग शोर-शराबा कर रहे थे और मुझे कई प्रकार से धमकियां दे रहे थे। यह होते ही मुझे चारों तरफ से सुरक्षाकर्मियों ने घेर लिया जिनमे न्यायालय परिसर में तैनात सीआरपीएफ के लोग तथा स्थानीय पुलिसवाले भी थे। इस प्रकार मेरे चारों तरफ सुरक्षाकर्मियों का घेरा था और उसके चारों ओर कई अधिवक्तागण की भीड़ थी जो मेरे तरफ धमकी भरी बातें कर रहे थे। इनमे महिला तथा पुरुष अधिवक्ता दोनों थे। वे लोग ज्यादातर यह कह रहे थे कि ये बाहर की औरत यहाँ हमारे मामले में कैसे चली आई, इसकी हिम्मत कैसे हुई। हम इसे आगे से कोर्ट में घुसने ही नहीं देंगे। हम इसका कोर्ट में घुसना बंद करा देंगे। वे कह रहे थे कि जब ये बार की सदस्य नहीं है तो कोर्ट में आई क्यों और हमारे मामले में किस हैसियत से पड़ी। वे लोग लगातार अनुचित धमकाने वाली बातें कर रहे थे। जब यह सब घटना घट रही थी तो एक पुलिस सब-इन्स्पेक्टर भी मौके पर आये थे, जो संभवतः स्थानीय थाना प्रभारी थे। उन्होंने अपना फोन नंबर 094500-33399 भी दिया था कि आगे से कोई बात हो तो हमें तुरंत बताईयेगा।

करीब बीस-पच्चीस मिनट तक यह सिलसिला चलता रहा. इसके बाद सुरक्षाकर्मी मुझे कोर्ट परिसर से बाहर ले गए. वहां मैं अपने वाहन पर बैठ कर किसी तरह उस स्थान से निकल सकी। चूँकि उपरोक्त कृत्य आपराधिक कृत्य में आता है, अतः मैं आपसे निवेदन करती हूँ कि इस सम्बन्ध में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर अग्रिम आवश्यक कार्यवाही किये जाने की कृपा करें। मैंने इस याचिका के अतिरिक्त भी मा० उच्च न्यायालय में कई सारी याचिकाएं की हुई हैं जिनमे मुझे अक्सर मा० न्यायालय जाना पड़ता है मैं नहीं समझती कि इस घटना से डर के मेरा कोर्ट जाना न्यायहित में किसी भी प्रकार से उचित होगा। जिस प्रकार से मुझे बाहरी व्यक्ति कह कर धमाका गया और कोर्ट परिसर में नहीं घुसने की धमकी दी गयी, वह भी अपने आप में एक गंभीर मामला है। अतः कृपया मेरे द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की गोपनीय तथा/अथवा खुली जांच के आधार पर आवश्यकतानुसार सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की कृपा करें ताकि मैं निर्भीक भाव से कोर्ट परिसर में आ-जा सकूँ और आज जो घटना घटी है, उसकी पुनरावृत्ति ना हो सके।

मैं निवेदन करुँगी कि कृपया इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देने की कृपा करें ताकि पुनः आज घटित घटना की किसी भी प्रकार से पुनरावृत्ति ना हो जाए।

पत्र संख्या- NT/DSC/HC/01                                 
दिनांक-03/02/2014  
भवदीय,                               
                                                
(डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर,
लखनऊ-226010

व्यंगकार प्रेम जनमेजय को मिलेगा साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान

भोपाल, 3 फरवरी। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘व्यंग्य यात्रा’ (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय को दिया जाएगा। सम्मान कार्यक्रम 7 फरवरी 2014 को गांधी भवन, भोपाल में सायं 5 बजे आयोजित किया गया है। आयोजन के मुख्य अतिथि प्रख्यात व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी होंगें तथा अध्यक्षता समालोचक और बुद्धिजीवी विजयबहादुर सिंह करेंगें। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला होंगें तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में लेखक गिरीश पंकज मौजूद रहेंगें।

डा. प्रेम जनमेजय साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने व्यंग्यकार एवं लेखक हैं। वे पिछले नौ वर्षों से व्यंग्य विधा पर केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ का संपादन कर रहे हैं। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी, डा.सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश मानस शामिल हैं। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश(दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर(जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज और सद्भावना दर्पण(रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज को दिया जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिल भारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है।

 

संजय द्विवेदी
कार्यकारी संपादकः मीडिया विमर्श

काली कमाई को सफेद बनाने में जुटा सहारा ग्रुप

सहारा ग्रुप अपनी काली कमाई को सफेद करने के लिए नई चाल चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट का डंडा पड़ते ही सहारा यह बताने में जुट गया है कि 22 हजार करोड़ कहां से आए। सहारा ने गोल्डन यू स्कीम के जरिए एडवांस पैसा लेने के लिए एक फॉर्म निकाला है। फॉर्म को गौर से पढ़ने पर साफ हो जाता है कि यह कवायद संभावित सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखते हुए शुरू की गई है। फॉर्म के आवश्यक निर्देश में साफ लिखा है कि फॉर्म भरने वाले ‘कार्यकर्ता’ मई 2012 से पूर्व के जुड़े होने चाहिए। लेकिन आगे तो सहारा ने दुस्साहस दिखाते हुए कहा है कि फॉर्म में कोई तारीख न दी जाय।

फार्म के दूसरे पेज पर देखें तो “विशेष’ निर्देश का बॉक्स बनाकर लिखा है कि जब कोई अधिकारी पूछे कि एडवांस में पैसा क्यों दिया है तो उसे बताना होगा कि वह संस्था से पहले से जुड़ा हुआ है। यह अधिकारी कौन होगा इसका फैसला तो सुप्रीम कोर्ट करेगा। लेकिन क्या कानूनी रूप से ऐसे दिशा निर्देशों के साथ फंड जुटाने की आजादी ठीक है। सहारा द्वारा जारी किए गए फॉर्म से साफ है कि सहारा की मंशा भीतर से काली है। वह नियमों की दुहाई देते हुए भी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाता है। उसके बाद न्याय व्यवस्था को भी ठेंगे पर रखता है।

सहारा ने दो महीना पहले मीडिया से सवा सौ लोगों को नौकरी से हटाया है। अब वो 56 हजार नौकरी देगा। ऐसा ही झूठा बयान उसने Q शॉप की लॉन्चिंग के वक्त भी दिया था। सहारा-सेबी विवाद के कारण निवेशक सहारा की योजनाओं में पैसा निवेश करने से बच रहे हैं जिससे कंपनी की माली हालत पर बुरा असर पड़ रहा है। इसको देखते हुए सहारा के नीति नियंता मीडिया में विज्ञापन जारी कर ये साबित करने में जुट गए हैं कि सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा है। लेकिन सच्चाई दुनिया जानती है। यह काले कारनामों से बचने के लिए गेम प्लान है।

 

भड़ास4मीडिया को भेजे गए ईमेल पर आधारित।

हुड्डा को पड़ा थप्पड़ तो लोगों ने मनाया ‘थौलोत्सव’

हरियाणा से खबर है कि मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के थप्पड़ पड़ने के बाद वहां के कई इलाकों में 'थौलोत्सव' मनाया गया। हरियाणा के कुछ इलाकों में थप्पड़ को थौल भी कहते हैं। इस थप्पड़ की गूंज जैसे ही लाखों युवाओं के कानों में पहुंची वैसे ही उनके घरों में खुशी की लहर दौड़ गई। सबने फोन कर के एक-दूसरे को बधाइयां दीं। लोग देर रात तक इस घटना का ज़िक्र करते हुए ठाहके लगाते रहे। कुछ लोगों का कहना था कि ये तो होना ही था।

कमल मुखीजा नाम के जिस युवक ने हुड्डा को थप्पड़ मारा, वह उन लाखों हरियाणवी युवाओं में से है जिसे सरकारी नौकरी सिर्फ इसलिए नहीं मिली क्योंकि वो एक जाति विशेष से नहीं हैं या उसके पास कुछ खास जाति विशेष के लोगों से ज्यादा पैसे नहीं हैं। हरियाणा में सरकारी नौकरी पाने के लिए क्षेत्र विशेष के साथ-साथ आपका जाति विशेष से होना भी जरूरी है। कमल मुखीजा गोहाना का रहने वाला है जो हुड्डा के क्षेत्र के नजदीक ही है। लेकिन वह जाति विशेष से नहीं है इसलिए "पैसे देने के बावजूद" उसका इंटरव्यू क्लीयर नहीं हुआ।

हरियाणा में आमतौर पर कहा जाता है कि सरकारी नौकरी में भर्ती तो पर्ची से होती है। यह एक ओपन सीक्रिट है।  कहा जाता है कि विधायकों को कोटा अलॉट होता है। उस अलॉटमेंट के हिसाब से ही विधायक (पैसे लेकर) अपनी-अपनी सिफारिशें भेजते हैं और फिर भर्तियां होती हैं। उसमें भी अगर आप मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र रोहतक-झज्जर से नहीं हैं तो इस बात की प्रबल संभवना है कि आपकी नौकरी न लगे। कुछ दिन पहले लेक्चरर्स की भर्तिया हुईं। रोहतक-झज्जर में की लगभग सारी सीटें भर दी गई हैं, जबकि 'थौल' वाले इलाकों में हजारों सीटें खाली पड़ी हैं।

हरियाणा में लाखों युवक मुखीजा-सिन्ड्रोम से ग्रस्त हैं, इसलिए कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री को अब रोड-शो के दौरान अधिक सावधानी बरतने की ज़रूरत है।  
 

अनंत श्री ने किया दिवंगत रवीन्द्र शुक्ला के काव्य संग्रह का लोकार्पण

लखनऊ। सोशल मीडिया, ब्लाग व पत्र पत्रिकाओं में लेखन, पत्रकारिता व सामाजिक सरोकारो पर अपनी लेखनी चलाने वाले दिवंगत रवीन्द्र शुक्ला द्वारा रचित काव्य संग्रह ‘दरकती है जिन्दगी‘ का लोकार्पण अनन्त श्री द्वारा स्थानीय जयशंकर प्रसाद सभागार, राय उमानाथ बली प्रेक्षाग्रह कैसरबाग में किया गया। ‘एक शाम काव्य, ध्यान और आध्यात्मिक संवाद अनंत श्री के साथ’ नामक इस कार्यक्रम में अनंत श्री जो कि अनंत पथ के संस्थाप