नेताओं की भाषा में आयी गिरावट की वजह लूट की संस्कृति और बढ़ता राजनीतिक अपराधीकरण है

संसद और विधानभाओं में माननीय सदस्यों द्वारा आपस में गाली-गलौच, मार-पीट की घटनाएं कई बार सामने आने के बाद, ऐसा लगता है कि इन दिनों देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपशब्दों और गालियों की बौछार का मौसम सा चल रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही, केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश में अपने संसदीय क्षेत्र फरूर्खाबाद में एक जनसभा के दौरान नरेन्द्र मोदी को 2002 के गुजरात दंगों को रोकने में नाकाम रहने के लिए नपुंसक कह डाला। उनके इस अपशब्द पर मचा बवाल अभी शांत भी नहीं हुआ था कि, कुछ ही देर बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता व बसपा के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने नरेन्द्र मोदी को ’हैवान’ और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को ’सियासी भूखा भेडि़या’ तक कह डाला। आम आदमी पार्टी के बारे में उन्होंने यह भी कहा कि वह ’न पिद्दी न पिद्दी का शोरबा’ जैसी है। इसके बाद जिस राजनैतिक दल के शब्दकोश में जो भी आलोचनात्मक शब्द रेकार्ड में थे, सब खंगाल डाले गये। यही नहीं, इस घटना के बाद कई नेताओं के चरित्र प्रमाणपत्र बयां करते पोस्टर दिल्ली की सड़कों पर बहुतायत में नजर आने लगे।

वैसे भी, नरेन्द्र मोदी के विरोध में विपक्षी नेताओं द्वारा इस्तेमाल की गयी आपत्तिजनक भाषा का यह कोई पहला मामला नहीं है। विरोधी नेताओं की आलोचना में अपशब्दों की भरमार के कई शर्मनाक उदाहरण पहले भी मिले हैं। सलमान खुर्शीद के अलावा दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर और जयराम रमेश नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विवादित और आपत्तिजनक बयानबाजी करते रहे हैं। कभी अय्यर ने मोदी को कांग्रेस मुख्यालय में चाय की गुमटी लगाने के लिए कहा, तो जयराम रमेश ने मोदी को ’भस्मासुर’ तक कह डाला। बेनी प्रसाद वर्मा मोदी को ’गुजरात का आदमखोर’ बता चुके हैं। दिग्विजय सिंह मोदी को ’फासिस्ट’ की पदवी से नवाज चुके हैं। रेणुका चैधरी मोदी को ’मोगैम्बो’ तो राशिद अल्वी उन्हें ’यमराज’ तक कह चुके हैं।

राजनीतिक बयानबाजी में अपशब्दों का महायुद्ध यहीं खत्म नहीं होता। मोदी के अपमान से तिलमिलाई भाजपा ने कांग्रेस पर पोस्टर वार शुरू करवा दिया। मोदी पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के विरोध में दिल्ली की एक संस्था ’भगत सिंह क्रान्ति सेना’ ने पूरी दिल्ली में एक पोस्टर लगा दिया है जिसमें, कांग्रेस के दागदार नेताओं को लेकर सलमान खुर्शीद से कई सवाल किए गए है। पोस्टर में यौन शोषण में फंसे कांग्रेसी नेताओं को लपेटा गया है। हरियाणा से कांग्रेसी नेता गोपाल कांडा, हाल ही में दिल्ली में यौन शोषण के बाद एफआईआर का सामना कर रहे उत्तराखंड के मंत्री हरक सिंह रावत, राजस्थान के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा और सीडी कांड में फंसे अभिषेक मनु सिंघवी की तस्वीरें भी पोस्टर पर दी गई हैं।

गौरतलब है कि कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति इस किस्म की राजनीति को कतई प्रात्साहित नहीं करेगा, और राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर सलमान खुशीद के बयान पर घोर आपत्ति जाहिर कर यह बता भी दिया कि आलोचनाओं में शालीन भाषा का ही इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन, हालात बताते हैं कि अभी सब कुछ इतनी जल्दी बदलने नहीं जा रहा है। यह कटु सत्य है कि इस तरह की शब्दावली अब भारतीय राजनीति का एक सामान्य चरित्र सा बनती जा रही है। देश की राजनैतिक पतनशीलता का पहिया, जो पहले बड़ी धीमी गति से घूमता हुआ पतन के गर्त में जा रहा था, इन दिनों बड़ी तेजी से पतन की मैराथन कर रहा है। बहरहाल, यह सब देश के राजनैतिक ताने-बाने के लिए कतई शुभ लक्षण नही है, लेकिन किसी एक दल को इस भाषायी पतनशीलता के लिए जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता। अपशब्दों के इस महाभारत में तकरीबन सारे दलों के बीच गाली-गलौच युक्त भाषा के विशेषज्ञ बैठे हैं। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? तथा आने वाले आम चुनाव में इन सबका आम आदमी तथा अभावग्रस्त बहुसंख्यक आवाम की बेहतरी के सवालों पर होने वाली बहसों पर क्या असर पड़ेगा?

राजनीतिक परिदृश्य के लिए यह बेहद निराशाजनक है कि देश के तकरीबन समस्त राजनैतिक दल आम आदमी के सवालों, उसकी बेहतरी, शिक्षा, रोजी, चिकित्सा पर बहस करने के बजाय अब व्यक्ति और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द केन्द्रित हैं। लोकसभा के आम चुनाव सामने हैं और राजनैतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का जो दौर चल रहा है, उससे यह साबित होता है, कि किसी भी दल के पास आम आदमी और उसकी बेहतरी का कोई विजन ही नही है। वे सम्मिलित रूप से यह चाहते हैं कि आवाम की बेहतरी के असली सवाल किसी भी तरह से राजनीति की सतह पर आने ही न पाएं क्योंकि, उनका जवाब देश के किसी भी राजनेता के पास नही है। और इस तरह से राजनीति ने आपसी सहमति से गैर-प्रासंगिक सवालों का एक जाल सा बुन डाला है। यह स्तरहीन बातें और घटिया किस्म की आलोचना-प्रत्यालोचना केवल इसी जाल की एक छोटी सी प्रतिकृति है।

दरअसल राजनीतिक परिदृश्य में कोई भी चीज अचानक उपस्थित नहीं होती। राजनेताओं में भाषायी गिरावट की सामान्य वजहों में देश की उदारीकृत अर्थव्यवस्था और उससे उपजी लूट की संस्कृति, काले धन का समाज पर बढ़ता प्रभाव तथा राजनीति का तेजी से बढ़ता आराधीकरण जिम्मेदार है। यह कटु सत्य है कि आज देश के तकरीबन समस्त राजनैतिक दलों ने जन सेवा के आभाषी चोले का निर्ममता से परित्याग कर दिया है। विशुद्ध लाभ की राजनीति में जनसरोकार के सवाल गायब हो चुके हैं। उनकी देश, समाज और मतदाता के प्रति जिम्मेदारी खत्म हो चुकी है। और इसके बाद राजनीति में केवल नेताओं के खुद के लाभ के लिए अधिकतम अराजकता और अपराध का माहौल ही शेष बचता है। यह अराजकता भाषा और कृत्य में अब साफ-साफ देखी जा सकती है।

गौरतलब है कि उदारीकरण के बाद लागू हुई नयी आर्थिक नीतियों ने जहां पूंजीपति-नेता-नौकरशाही के गठजोड़ को मजबूत कर लूट की एक नयी संस्कृति का जन्म दिया, वहीं राजनीतिक सिपहसलारों में देश की आवाम का जिम्मेदार प्रतिनिधि बनने की लालसा का खात्मा भी कर दिया। अब नेताओं के सारे कृत्य रुपया कमाने और किसी भी तरह संपत्ति अर्जन के इर्द-गिर्द घूमने लगे हैं। इस गठजोड़ से उपजी संस्कृति ने सबसे पहले नेताओं में भाषायी शालीनता का गला घोंटा। जो इस नये परिदृश्य में अडजस्ट नहीं हो सके वे व्यवस्था द्वारा खुद ही नेपथ्य में कर दिये गये। इसके बाद जो दौर आया उसमें, नेता कुछ भी बोल सकते हैं, कर सकते हैं। आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त अराजकता राजनीति में प्रतिबिंबित हो चुकी थी और नेताओं के शब्दों द्वारा वह आम जनमानस में भी दिखाई पड़ने लगी। आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त अराजकता से ही सामाजिक क्षेत्र में अराजकता फैलती है और वह व्यक्तियों के सामान्य कृत्य में दिखने लगती है। जो आर्थिक ढांचे में जितना ऊपर है उसकी अराजकता उतनी ही ज्यादा दिखाई देती है। उदारीकरण के बाद आ रही अनियंत्रित पूंजी और व्यक्तिगत लाभ की राजनीति से बने गठजोड़ ने स्थिति को भयावह बना दिया है।

अब सवाल यह है कि क्या इस भाषाई अराजकता को रोका जा सकता है? वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में, जहां केवल खुद के लाभ के लिए नेता चुनाव लड़ते हों, सारे राजनैतिक काम करते हों, उन्हें ऐसी अराजकता से कैसे रोका जा सकता है। आज राजीनिति में अपराधियों और गुंडे किस्म के नेताओं का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है। इन नेताओं की सामान्य भाषा ही अभद्र होती है। संभलकर बोलना इनके लिए काफी असहज होता है। अभद्र भाषा ही इनकी स्वाभाविक भाषा है। फिर इसे बोलने से इन्हे कैसे रोका जा सकता है?

कुल मिलाकर अब हमें नेताओं की इन अभद्र भाषाओं को स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि इनकी भाषायी अराजकता का मूल अर्थव्यस्था की खामियां और अधिकतम लूट की स्थापित हो चुकी संस्कृति है। बिना इसे बदले इनसे शालीनता की आशा व्यर्थ है। लेकिन अफसोस यह है कि इस संस्कृति को बदलने का कोई जमीनी आंदोलन नहीं चल रहा है। देश का लोकतंत्र सिसक रहा है लेकिन नेताओं को इसकी परवाह ही कहां है?
 
हरे राम मिश्र
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार
द्वारा- मोहम्मद शुऐब एडवोकेट
110/46 हरि नाथ बनर्जी स्टरीट
लाटूश रोड, नया गांव ईस्ट, लखनउ उ0प्र0
मो- 7379393876

अभी कुछ दिन और तिहाड़ में सोएंगे सहारा श्री

सहारा ग्रुप के मुखिया सुब्रत रॉय को अभी कुछ दिन और जेल में रहना होगा। सहारा का मामला आज जस्टिस केएस राधा कृष्णन और जेएस खेहर की विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था, लेकिन आज जारी हुई विचार सूची से उसे हटा दिया गया। सुनवाई कि अगली तारीख को ले कर अभी कोई फैसला नहीं हो पाया है।

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत को आदेश दिया था कि वो निवेशकों का पैसा वापस करने के लिए एक ठोस प्लान पेश करें। जानकारों का कहना है के सुब्रत रॉय की ओर से कोई नया प्रस्ताव पेश नहीं करने के चलते आज मामले की सुनवाई को विचार सूची से हटाया गया है।

खबर है के सुब्रत रॉय के वकील जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जेएस खेहर की बेंच से अपील करेंगे कि मामले पर जल्द सुनवाई की जाए।   
 

काबुल में स्वीडिश पत्रकार की गोली मार कर हत्या

काबुल 11 मार्च। अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में आज सुबह एक रेंस्तरां के बाहर खड़े स्वीडन के पत्रकार की अज्ञात बंदूकधारी ने गोली मार कर हत्या कर दी। पुलिस और प्रत्यक्षदर्शियों ने यह जानकारी दी। स्वीडन दूतावास ने उसकी पहचान नील्स हार्नर, 52, के रूप में की है। नील्स स्वीडिश रेडियों के दक्षिणी एशिया के कॉरेसपॉन्डेन्ट थे, वे अभी हाल ही में काबुल आए थे। नील्स ब्रिटिश एंव स्वीडन का नागरिक थे।

स्वीडिश रेडियो महानिदेशक सिल्ला बेंकों ने बताया नील्स बहुत ही काबिल और अनुभवी  पत्रकार  थे। उनके साथ आज जों कुछ हुआ वह दुर्भाग्य पूर्ण है। यह स्वीडिश रेडियों निगम के इतिहास की सबसे दुखद घटना है। काबुल पुलिस प्रमुख के प्रवक्ता हश्मतुल्लाह स्तानेकजई ने बताया कि अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार गोली लगने के बाद इस पत्रकार को एक अस्पताल में ले जाया गया जहां उसने दम तोड़ दिया।

रेस्तरां के बाहर खड़े एक गार्ड ने बताया कि यह पत्रकार इस रेस्तरां के बाहर अपने ड्राइवर और एक दुभाषिए के साथ खड़ा था और इसी दौरान पश्चिमी वेशभूषा में उसके पास एक व्यक्ति आया और बहुत ही नजदीक से उसे गोली मार दी। उधर पुलिस प्रमुख कर्नल नजीबुल्लाह शमसोर ने बताया कि इस मामले में दो संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। इस बीच तालिबान के प्रवक्ता ने बताया कि इस घटना में उनके संगठन का हाथ नहीं है और इस मामले की जांच कराई जा रही है।

घटना ने एक बार फिर अफगानिस्तान में काम कर रहे विदेशी पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा कर दिया है।

पिंकसिटी प्रेस क्‍लब जयपुर में शुरू हुईं चुनावी तैयारियां

जयपुर। पिंकसिटी प्रेस क्‍लब जयपुर के वार्षिक चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई है। चुनाव 29 मार्च 2014 को होंगे। चुनाव संपन्‍न कराने के लिए एलएल शर्मा को मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी बनाया गया है। शर्मा दूसरी बार मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी बनाए गए हैं।

एलएल शर्मा पिंकसिटी प्रेस क्‍लब के चार बार और राजस्‍थान पत्रकार परिषद के एक बार अध्‍यक्ष रह चुके हैं। उनकी गिनती राजस्‍थान में दबंग और निष्‍पक्ष पत्रकारों में की जाती है। शर्मा ऐसे पहले व्‍यक्ति है, जिनको अध्‍यक्ष जैसे पदों पर चुनाव लड़ने के बाद भी क्‍लब की साधारण सभा में मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है। पिछली बार के चुनाव में शर्मा ने चुनावी प्रक्रिया में काफी परिवर्तन किए थे। इस बार भी उनसे काफी उम्‍मीदें हैं।

 

भड़ास4मीडिया को भेजे गए पत्र पर आधारित।
 

आज़म की भैंस की आलेचना यानी उप्र सरकार की आलोचना, आईपीएस को कारण बताओ नोटिस

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा कबीना मंत्री आज़म खान के भैंसों के चोरी हो जाने की घटना के बाद दिया एक बयान सरकार को बहुत नागवार लगा है। आज़म खान की भैंसों की चोरी और बरामदगी के बाद श्री ठाकुर ने कुछ चैनलों पर कहा था कि मंत्रीजी की भैंस की तत्काल बरामदगी से आशा का बड़ा संचार हुआ है, लेकिन यह कष्ट का विषय है कि 2011 में चोरी गयी उनके बच्चे की साइकल और 2013 में उनसे ठगे गए 5000 रुपये में एफआइआर दर्ज होने के बाद अब तक गोमतीनगर थाने की पुलिस ने उनसे पूछताछ तक नहीं की।

अमिताभ ठाकुर के इस बयान को शासन की आलोचना की श्रेणी में मानते हुए डीजीपी कार्यालय ने श्री ठाकुर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। नोटिस में कहा गया है कि उन्होंने बिना राज्य सरकार की अनुमति के जो बयान दिया है वह अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली के नियम 7 और 17 का उल्लंघन है।

अतः डीजीपी कार्यालय ने इस कथित “नियम विरुद्ध कृत्य” के लिए उनसे एक सप्ताह में स्पष्टीकरण माँगा है। जबकि यह साफ़ दिखता है कि अमिताभ ठाकुर ने मात्र एक सही बात कही थी और पुलिस द्वारा ताकतवर और गैर-ताकतवर लोगों के बीच किये जा रहे भेदभाव को सामने रखा था।

 

 

संपादक साहब, प्रसून पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांक लीजिए

मीडिया एक कीचड़ बन चुका है और इस कीचड़ के हम्माम में सब नंगे हैं. पुण्य प्रसून बाजपेयी और अरविंद केजरीवाल की कथित सेटिंग की खबर पर कई चैनल पिले पड़े हैं. ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि एक पत्रकार ने "आप" के लिये सारी पत्रकार बिरादरी की इज़्ज़त उतरवा दी… साथ ही ये भी कि किस तरह से सैटिंग के जरिये नेताओ की आवाज़ जनता तक पहुँचाई जाती है.

इन्हीं चैनलों में से एक चैनल के संपादक साहब के बारे में बताता हूं. वो कभी एक चैनल में "सहारा" पाये हुए थे और उसके ब्यूरो चीफ़ हुआ करते थे. मैं उनकी टीम में बतौर संवाददाता था. मुझे हरियाणा चुनाव कवर करने के लिये भेजा गया. वहां मैंने "भजन लाल, बंसी लाल, देवीलाल" के उत्तराधिकारियों पर "लालो के लाल" नाम से प्रोग्राम बनाया जिसमें बताया कि अजय चौटाला (देवीलाल का पोता), कुलदीप बिश्नोई (भजनलाल का बेटा) और सुरेंद्र सिंह (बंसीलाल का बेटा) में से सबसे कमज़ोर सुरेंद्र सिंह हैं.

उस खबर के बाद मेरे ब्यूरो चीफ़ साहब ऐसा बिलबिलाये कि मुझे सुरेंद्र सिंह के पास भिवानी माफ़ी मांगने भेज दिया और माफी न मांगने की सूरत में नतीजे भुगतने के लिये तैयार रहने को कहा. हम भी पहुँच गये भिवानी. अलबत्ता माफ़ी तो नहीं मांगी लेकिन सुरेंद्र सिंह से सरेआम बीच बाज़ार में जलील होकर जरूर आया. अपने साथ लेकर आया अपने ही ब्यूरो "चीप" की सैटिंग गैटिंग का कच्चा चिठ्ठा.

तो इसलिये, "संपादक" साहब हो हल्ला मचाने से पहले अपनी गिरेबान में ज़रुर झांक लें. एक उंगली प्रसून की तरफ़ हैं तो बाकि उंगलियां आपकी अपनी तरफ हैं….दूध के धुले ना बनें…

वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ के फेसबुक वॉल से साभार।

कांग्रेस ने दिल्ली की पत्रकार सुचरिता मोहंती को लोकसभा का टिकट दिया

कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने 194 उम्मीदवारों की जो पहली लिस्ट जारी की है उसमें दिल्ली की पत्रकार सुचरिता मोहंती का भी नाम है। सुचरिता को ओडिशा में जगन्नाथ पुरी से टिकट मिला है। सुचरिता बिजनेस जर्नलिस्ट हैं। नेशनल हेरल्ड से अपना करियर शुरू करने वाली सुचरिता के पास पत्रकारिता का करीब 28 साल का लंबा तजुर्बा है। वह फाइनेंशियल एक्सप्रेस और इकनॉमिक टाइम्स में वरिष्ठ पदों पर रहीं हैं। उन्होंने सीआईआई और पीएचडी चेंबर ऑफ कॉमर्स के साथ भी काम किया है। उनके पति प्रियरंजन दास भी जाने-माने बिजनेस जर्नलिस्ट हैं। वह टाइम्स ऑफ इंडिया में इकनामिक एडीटर, डीएनए में डिप्टी एडीटर और फाइनेंशियल क्रॉनिकल में मैनेजिंग एडीटर रहे हैं।

सुचरिता के लिए राजनीति का यह पहला अनभाव है। पुरी उनके पिता की सीट है। उनके पिता बृजमोहन मोहंती करीब छह बार वहां से कांग्रेस के सांसद रहे हैं। उनका 1999 में देहांत हो गया था। वह इंदिरा गांधी के निकट सहयोगी रहे थे। आपातकाल के बाद जब ज्यादातर नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया था, तब ओडिशा में उन्होंने ही कांग्रेस का झंडा उठाए रखा था। वह केंद्र में कई वर्षों मंत्री भी रहे।
 

स्टिंग के दौरान शक होने पर कर्नाटक के मंत्री ने TV9/NEWS9 के पत्रकारों को अपने गुण्डों से पिटवाया

बंगलूरू। कर्नाटक के बाहुबली नेता और ऊर्जा मंत्री डीके शिवकुमार पर स्टिंग करने गए TV9/NEWS9 के दो पत्रकारों को मंत्री द्वारा अपने गुंडों से पिटवाने और पुलिस के हवाले कर देने का मामला सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार TV9/NEWS9 के दोनों पत्रकार, जिसमें एक महिला पत्रकार है, एक मामले में डीके शिवकुमार पर स्टिंग ऑपरेशन करने उनके घर गए हुए थे। पैसों के लेनदेन पर हो रही बातचीत के दौरान मंत्री को शक हो गया के उनका स्टिंग किया जा रहा है। मंत्री ने तुरंत अपने गुंडों को बुलवा कर दोनों को को पकड़वा लिया। मंत्री के गुंडों ने दोनो के साथ मारपीट की और दुर्व्यवहार किया। इसके बाद मंत्री ने पुलिस को बुला कर दोनों को उनके हवाले कर दिया।

मंत्री ने पुलिस में शिकायत की है के ये दोनों पत्रकार उन्हें रिश्वत देने कि कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने महिला पत्रकार को रिमांड होम भेज दिया तथा उसके साथी पत्रकार को पूरी रात हवालात में रखा। चूँकि मामला सरकार के बाहुबली मंत्री का है इसलिए पुलिस भी मीडिया की सुनने को तैयार नहीं है। चैनल के वकील काउन्टर कंप्लेंट करना चाहते थे लेकिन पुलिस उनकी सुन नहीं रही थी। बाद में पुलिस कमिश्नर के कहने पर चार घंटे बाद चैनल कि तरफ से काउन्टर कंप्लेंट लिखी गयी।

कर्नाटक में डीके शिवकुमार कि छवि एक बाहुबली और भ्रष्ट नेता कि है। चैनल का कहना है कि मंत्री के खिलाफ कई बिज़निसमैन द्वारा शिकायत कि गयी थी के मंत्री जी काम करने का मोटा पैसा मांगते हैं। इन्ही शिकायतों के आधार पर ये स्टिंग ऑपरेशन प्लान किया गया। इसके लिए चैनल की टीम द्वारा एक लन्दन बेस्ड फेक सोलर पॉवर कंपनी EnerGO POWER बनायीं गई। मंत्री को या किसी और को शक न हो इस लिए इस कंपनी की एक वेबसाइट भी बनायीं गयी थी।

मंत्री शिवकुमार से एक सोलर पॉवर प्लांट के सिलसिले में मीटिंग तय हुई थी। जिस पर बात करने के लिए दोनों पत्रकारों को मंत्री ने अपने घर बुलाया था। मंत्री सोलर पॉवर प्लांट का काम करने के लिए मोटी रकम की डिमांड कर रहे थे लेकिन 5 लाख रूपया पेशगी के तौर पर लेने को तैयार हो गए थे। डील पर बातचीत के दौरान मंत्री को शक हो गया के उनका स्टिंग किया जा रहा है और उन्होंने अपनी गर्दन फंसती देख दोनों पत्रकारों को पकड़वा दिया।

कल शाम मंत्री शिवकुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स कर महिला पत्रकार का नाम उजागर कर दिया। चैनल का कहना है के ऐसा करना अनएथिकल है। चैनल का कहना है कि ये किसी मीडिया चैनल द्वारा किया गया न तो पहला ऑपरेशन है न ही आखिरी। चूँकि डीके शिवकुमार रिश्वत के मामले में फंस रहे थे इसलिए उन्होंने उल्टा चैनल के पत्रकारों पर ही केस कर दिया। चैनल ने कहा है के वो भविष्य में भी सरकार में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करता रहेगा।  

चैनल द्वारा जारी ईमेल

Dear All,

We at TV9/NEWS9 had conducted a sting operation to expose corruption in Karnataka. Our team posed as owners of EnerGo Power and met the Energy Minister of Karnataka, Mr DK Shivakumar, who demanded a hefty bribe for sanctioning a solar power plant. On Monday, our undercover reporters, comprising of a team head and a female journalist went to meet Mr DK Shivakumar with Rs 5 lakh. But Mr Shivakumar sensed it, and caught our team. The team was badly beaten, abused and manhandled. One of the journalists was a female reporter, but Mr DK Shivakumar's goons spared no thought while manhandling them. After that, they handed them over to the police.

In a press conference in the evening, Mr DK Shivakumar even went to the extent of NAMING THE FEMALE JOURNALIST, which is totally unethical.

This was not the first sting operation by any media channel, and definitely, it's not going to be the last. We had conducted the sting operation keeping public interest in mind. But Mr DK Shivakumar slapped a case against us only as retaliation. He has shot the messengers who were on an endeavour to expose corruption.

Please find a press release by NEWS9 and TV9 attached with this mail.

                                            चैनल द्वारा जारी प्रेस रिलीज़

 

भड़ास तक अपनी बात पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल करें या नीचे बॉक्स में कमेंट करें।

पिछली साल ही ख़त्म हो गए थे एनडीएमसी पार्किंग ठेके, अब हो रही अवैध वसूली

नई दिल्ली नगर पालिका परिषद के तहत चलने वालीं 16 पार्किंग लॉट से पार्किंग ठेकेदार पिछले एक सप्ताह से अवैध रूप से वसूली कर रहे हैं। इस गोरखधंधे में उनके साथ प्रवर्तन विभाग के अफसर भी मिले हुए हैं। जानकारी के मुताबिक पिछले सप्ताह ग्रुप पांच के पार्किंग कांट्रेक्टर ने इन पार्किंगों को आगे चलाने से इनकार कर दिया था। इस ग्रुप में बाराखंबा रोड और जनपथ इलाके की कुल 14 पार्किंग आती हैं। उस पार्किंग ठेकेदार पर लाइसेंस फीस के रूप में एनडीएमसी के करोड़ों रुपये बकाया हैं। मजेदार बात यह है कि अपनी चिट्ठी दे कर वह पार्किंग ठेकेदार अपनी आगे की देनदारी से तो बच गया, लेकिन वह अभी भी वहां आने वाले लोगों की पर्ची अवैध रूप से काट कर पैसा अपनी जेब में रख रहा है।

नई दिल्ली इलाके में पार्किंगों को कुल पांच ग्रुपों में बांटा गया हैं। इनमें से केवल ग्रुप वन की पेमेंट अप-टू-डेट हैं। बाकी के पार्किंग कांट्रेक्टरों पर कमेटी का करीब आठ करोड़ से ज्यादा का बकाया हो चुका है। सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली के पांच पार्किंग ग्रुप बने हैं। ग्रुप वन कनॉट प्लेस के इनर और आउटर सर्कल का है। उसमें 37 पार्किंग हैं। ग्रुप टू में कनॉट प्लेस के आसपास की पार्किंग आती हैं। इसमें 16 पार्किंग हैं। ग्रुप तीन में नई दिल्ली का साउथ वेस्ट इलाका है। इसमें 14 पार्किं आती हैं। ग्रुप चार इंडिया गेट के आसपास का इलाका है। इसमें 18 पार्किं लॉट हैं। इसी तरह ग्रुप पांच में बीके रोड और जनपथ का इलाका आता है। उसमें 16 पार्किंग हैं।

आरोप है कि यहां तैनात अफसरों की मेहरबानी से पिछले 11 महीने के दौरान पार्किंग माफिया पर करीब आठ करोड़ का बकाया हो चुका है, लेकिन उनके डिफाल्टर होने के बावजूद हमेशा की तरह मिलने वाली एक्सटेंशन जारी है। आरोप है कि आला अफसर अपने निजी हितों की खातिर पार्किंग ठेकेदारों से मिले हुए हैं और एनडीएमसी को चूना लगवा रहे हैं। ऐसे हालात में कानूनी प्रक्रिया अपनाकर भी उन लोगों से इस आठ करोड़ की वसूली आसान नहीं है। ऐसा घोटाला कुछ पार्किंग ठेकेदार एमसीडी में कर चुके हैं। अनुमान है कि कुल डिफाल्टर अमाउंट करीब आठ करोड़ से ज्यादा हो चुका है।

सूत्रों के अनुसार, एनडीएमसी इलाके में पार्किंग के ठेके 31 मार्च, 2013 को ही खत्म हो चुके हैं। चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने की खातिर टेंडर करने के बावजूद उसे खोला नहीं गया है। इससे एनडीएमसी को लाखों रुपये महीना का नुकसान हो रहा है। हालात यह है कि लोग पार्किंग करने के लिए भुगतान करते हैं, तो पूरा का पूरा पार्किंग ठेकेदारों की जेब में जा रहा है।

हैरानी की बात यह है कि कनॉट प्लेस इलाके का पार्किंग टेंडर दो बार हो चुका है। उस टेंडर में डिफाल्टर ठेकेदारों ने हिस्सा नहीं लिया था। इस वजह से उसे अब दोबारा कैंसिल करने की तैयारी चल रही है। इस संबंध में सालाना प्रेस कान्फ्रेंस में एनडीएमसी चेयरममैन जलज श्रीवास्तव ने स्वीकार किया था कि कुछ पार्किंग कांट्रेक्टर लाइसेंस फीस नहीं दे रहे हैं। लेकिन इस संबंध में कार्रवाई कराने में वह भी असफल साबित हुए। अफसर नई योजना की बात तो करते हैं, लेकिन पुराना पैसा कैसे वसूला जाएगा, इसका कोई एक्शन प्लान एनडीएमसी के पास नहीं है।

 

दिल्ली से पीयूष जैन की रिपोर्ट। संपर्क astroguruji@gmail.com

औरंगाबाद के एमवीआई ने न्यूज़ कवर कर रहे इंडिया न्यूज़ और इंडिया टीवी के पत्रकारों से मार-पीट की

औरंगाबाद, बिहार। शहर के महाराजगंज रोड स्थित एचडीएफसी बैंक के पास चुनाव कार्य के लिए वाहनो को पकड़ रहे औरंगाबाद के मोटर यान निरीक्षक(एमवीआई) केके त्रिपाठी दो इलेक्ट्रॅनिक मीडियाकर्मियों से भिड़ गए। एमवीआई द्वारा वाहनों की धरपकड़ के लिए किये जा रहे कार्य की इंडिया न्यूज़ के पत्रकार धीरज पाण्डेय एवं इंडिया टीवी के प्रियदर्शी किशोर श्रीवास्तव द्वारा न्यूज कवरेज के लिए वीडियोग्राफी की जा रही थी। इस दौरान जैसे ही एक वाहन आया उसे एमवीआई द्वारा रोका गया। रोके जाने पर वाहन से उतरते ही चालक ने वाहन के अंदर मौजूद महिला मरीज की ओर इशारा किया और डॅक्टर द्वारा रेफर किए गए कागजात दिखाते हुए वाहन को नहीं रोके जाने का आग्रह किया, लेकिन एमवीआई उनका आग्रह सुनने के बजाय दादागिरी दिखाते हुए उल्टा-सीधा कहने लगे। इस दौरान वाहन जब्ती की कवरेज कर रहे पत्रकार धीरज पाण्डेय ने एमवीआई की इस हरकत को अपने कैमरे में  कैद कर लिया। कैमरे में अपनी हरकत के कैद होने का जैसे ही भान एमवीआई को हुआ वे पत्रकार से भिड़ पड़े और उन्होंने धीरज पाण्डेय को जोर से धक्का दिया जिससे वह सड़क पर गिर पड़ा। सड़क पर गिरते ही एमवीआई धीरज पाण्डेय पर पिल पड़े।

इस बीच एमवीआई के वाहन चालक ने दूसरे पत्रकार को टक्कर मारने की कोशिश की जिसमें वह बाल-बाल बचा। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची नगर थाना की पुलिस ने तात्कालीक तौर पर एमवीआई के वाहन को जब्त कर लिया हैं। इस मामले में पत्रकार धीरज ने नगर थानाध्यक्ष को एमवीआई के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने हेतु प्रार्थना पत्र दिया है। आवेदन में धीरज ने उपरोक्त धटना का जिक्र करते हुए कहा है कि एमवीआई सड़क पर गिरने के बाद उसके सीने पर चढ़कर उसकी गर्दन दबा रहे थे तथा उन्होंने उसके कैमरे को सड़क पर पटककर तोड़ दिया। साथ ही देख लेने की भी धमकी भी दी हैं।  

गौरतलब है कि एमवीआई केके त्रिपाठी औरंगाबाद में अपनी तैनाती के वक्त से ही विवादास्पद रहे हैं और पूर्व में भी वाहन मालिकों द्वारा उन पर चालको के साथ मारपीट करने एवं अन्य तरह के मुकदमें दर्ज कराये जा चुके है। इतना ही नहीं एमवीआई पर मुफ्फसिल थाना में वाहन चेकिंग के दौरान एक ट्रक चालक को स्टेयरिंग से खींचकर वाहन से फेंकने पर विपरीत दिशा से आ रहे ट्रक से कुचलकर मौत होने के मामले में हत्या की प्राथमिकी भी दर्ज है।

उत्‍तर-पूर्वी दिल्‍ली से लोकसभा चुनाव लड़ रहे मशहूर समाजशास्‍त्री प्रो. आनंद कुमार का समर्थन करें

मशहूर समाजशास्‍त्री प्रो. आनंद कुमार उत्‍तर-पूर्वी दिल्‍ली से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. लोकतंत्र के हक में राजनीति में पढ़े-लिखे और अनुभवी व्‍यक्तियों की जरूरत को देखते हुए हमें पार्टीलाइन से बाहर जाकर भी उनका समर्थन करना चाहिए.

इनकी राजनीतिक यात्रा का आरंभ 1964 में समाजवादी राष्ट्र नायक डॉ. राममनोहर लोहिया की प्रेरणा से हुआ और इन्हें 70 के दशक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का मार्गदर्शन मिला. समाजवादी आंदोलन, जे.पी. आंदोलन, आपातकाल विरोधी प्रतिरोध से लेकर लोकशक्ति अभियान, समाजवादी अभियान, लोक राजनीति मंच, जे.पी. फाउंडेशन और जनलोकपाल आंदोलन के सक्रिय व लोकप्रिय कार्यकर्ता के रूप में इन्होंने विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मोर्चों पर अपनी सक्रिय भागीदारी की है. इन्हें राजनारायण, चंद्रशेखर, कर्पूरी ठाकुर, रविराय, मधु दंडवते, मधु लिमये, अर्जुन सिंह भदौरिया, सरला भदौरिया, किशन पटनायक, रामधन, कृष्णकांत, जनेश्वर मिश्र, ब्रजभूषण तिवारी और मोहन सिंह जैसे नेताओं का सहयोगी बनने का सुअवसर मिला.

इन्होंने बी.एच.यू., जेएनयू और शिकागो विश्वविद्यालय में उच्च् शिक्षा प्राप्त् की. इन्होंंने बी.एच.यू., जेएनयू के अलावा संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, ऑस्टि्या, अर्जेंटीना और फ्रांस में भी अध्यापन किया है. छात्र आंदोलन में सक्रिय आनंद कुमार बनारस और जेएनयू के छात्र संघों के अध्य्क्ष चुने गए. फिर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के राष्ट्रीय अध्य्क्ष के रूप में विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय रहे. ये पिछले तीन दशक से देश के प्रतिष्ठित विश्वाविद्यालय – जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और हाल ही में इनको सर्वसम्मरति से ‘भारतीय समाजशास्त्र परिषद’ का राष्‍ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है.

जेएनयू के शिक्षक गंगा सहाय मीणा के फेसबुक वॉल से.

जी न्यूज वाले चम्पादक जी ने आज प्रसून जी से पुराना बदला चुकता कर लिया…

Mayank Saxena : ये चौधरी साहब वही हैं न, जिन्होंने मुझे चम्पादक सीरीज़ शुरू करने के लिए मजबूर किया था.. तो इन चम्पादक जी ने आज प्रसून जी से पुराना बदला चुकता कर लिया… क्यों नौकरी छोड़ आए थे उसके विरोध में… हैं भई…

बाकी जो बात हो रही है, उसे कक्षा 10 का बच्चा भी सुनेगा तो समझ जाएगा कि करप्शन जैसी कोई बात नहीं हो रही है… कई बड़े पत्रकार हैं, जो आज तक संसद और राजनैतिक पार्टियों के दफ्तरों की रिपोर्टिंग सिर्फ इसलिए करते हैं कि उनके सम्बंध नेताओं से अच्छे रहें…. बाइट लेने से पहले उसे जम कर चलाने का वादा करते हैं… और कैसी भी बाइट की तारीफ ऐसे करते हैं मानों वो इतिहास में दर्ज होने वाली हो…

ज़ी न्यूज़ के ही एक पुराने धुरंधर हैं, जो अब मंत्री जी के चैनल में हैं… कांग्रेस मुख्यालय के बेहद करीबी रहे हैं… जनार्दन द्विवेदी पर चप्पल फेंतने वाले को बिना पुलिस और सुरक्षाकर्मी का इंतज़ार किए ख़ुद ही मारने पहुंच गए थे… लगा था कि कांग्रेस प्रवक्ता के निजी बाउंसर हों…

एक और चैनल के प्रधान सम्पादक हैं, जिनके एनडीए कार्यकाल के दौरान बीजेपी के सूचना प्रसारण मंत्री अब दिवंगत से बड़े नज़दीकी रिश्ते थे, साहब डीडी भी पहुंच गए थे… हेड हो कर… अब ऐसे चैनल में हैं, जिसका मालिक कांग्रेस से बीजेपी वाया मोदी लहर पहुंच गया है…

खूब पत्रकारिता की है और डंके की चोट पर दावा कर सकता हूं कि एक पैसे की बेईमानी-कमाई कभी नहीं की… इसलिए दावा ये भी करता हूं कि केजरीवाल कितना ही बेहूदा-अहंकारी-तानाशाह हो, लेकिन प्रसून जी बेईमान नहीं हैं… ये ही प्रसून जी जब मोदी की लहर की बात कर रहे थे, एक महीने पहले तक तो अच्छे थे… ख़ैर जाने दीजिए, मुझे कौन सा संघी और आपी पैसा दे रहे हैं… जिनको दे रहे हैं वो लड़ें और मरें… अपन सूखी रोटी खा कर और आंसू पी कर ही खुश हैं…

बाकी बस इतना समझिए कि दलाल और चोर पत्रकार कोई और हैं, उनके बारे में आप को कभी पता भी नहीं चलेगा…!!!

तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.


Rajat Amarnath : ज़ी न्यूज़ के सुधीर चौधरी आज पुण्य प्रसून बाजपाई की पत्रकारिता पर सवाल उठा रहे हैं… शायद सुधीर चौधरी अपना वो समय भूल चुके हैं जब उनकी गिरफ्तारी पर प्रसून ने प्रबंधन के दबाव में कुछ देर के लिए तो 'आपातकाल' घोषित कर दिया लेकिन तत्काल संभले और इस एक शब्द कहने के बदले ज़ी न्यूज़ से नौकरी छोड़ बैठे थे… आज इसी जी न्यूज पर बदले की भावना के तहत प्रसून की इज़्ज़त प्याज़ के छिलकों की तरह उतारी जा रही है… समय समय की बात है… कुछ डील होटल में होती हैं… तो कुछ नेताओ के घरों पर… हम सारे पत्रकार मोहरे भर हैं… कभी मालिक की जेब भरने के लिये इस्तेमाल होते हैं… तो कभी TRP के लिये…

वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ के फेसबुक वॉल से.


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html

इसे भी पढ़ें…

केजरी ने जब कहा प्राइवेटाइजेशन पर बात नहीं करेंगे तो पुण्य ने तुरंत टापिक बदल दिया!

केजरी ने जब कहा प्राइवेटाइजेशन पर बात नहीं करेंगे तो पुण्य ने तुरंत टापिक बदल दिया!

मुकेश अंबानी वाली मीडिया कंपनी नेटवर्क18 की वेबसाइट फर्स्ट पोस्ट डॉट कॉम पर केजरी-पुण्य वीडियो विवाद पर राहुल रोशन नामक एक सज्जन का लंबा एनालिटिकल लेख प्रकाशित हुआ है. वेबसाइट अंग्रेजी में है इसलिए लेख भी अंग्रेजी में है. अंबानी की मीडिया कंपनी जिस वेबसाइट को चलाती हो, उस पर केजरीवाल या पुण्य प्रसून बाजपेयी की प्रशंसा तो होगी नहीं, खासकर तब जब कोई नया विवाद खड़ा किया गया हो और उसमें घी-तेल डालकर आग जलाने की तैयारी हो.

सो, इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख में बड़े करीने से यह साबित किया गया है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी ने नेता के मनमुताबिक इंटरव्यू की दिशा मोड़ दी और नेता के लिए मुश्किल होते इंटरव्यू को आसान बना दिया. मतलब कि केजरीवाल जब प्राइवेटाइजेशन जैसे सवाल पर असहज हो रहे थे तो ब्रेक के दौरान केजरीवाल ने इस टापिक को छोड़कर किसी और टापिक पर सवाल पूछने को कहा तो पुण्य ने न सिर्फ तुरंत मान लिया बल्कि केजरीवाल के वोट बैंक के हिसाब से उन्हें सलाह भी दे दिया कि चलो अब हाशिए के अस्सी फीसदी लोगों पर बात करते हैं.

फर्स्ट पोस्ट वाले आर्टकिल में ये भी बताया गया है कि जो वीडियो वायरल हुआ है केजरी-पुण्य से संबंधित, वो असल में दो पार्ट में है, जिसे एक साथ कंपाइल किया गया है. वीडियो के शुरुआती हिस्से में जो केजरी-पुण्य संवाद है, वह इंटरव्यू के दौरान लिए गए ब्रेक के बीच का है. यही हिस्सा सबसे संवेदनशील है. इस हिस्से के बाद जब ब्रेक के बाद फिर से असल इंटरव्यू शुरू होता है तो अरविंद केजरीवाल के लिए आसान पिच रखने के वास्ते पुण्य प्रसून ने अपने सुझाए व उनके द्वारा माने गए सलाह के हिसाब से गरीबों पर केंद्रित सवाल पूछना शुरू कर दिया.

वायरल हुए पुण्य केजरी वीडियो का दूसरा हिस्सा वो है जब इंटरव्यू खत्म हो गया. फर्स्ट पोस्ट वाले राहुल रोशन के आर्टकिल में सवाल उठाया गया है कि आखिर मोदी भी तो करण थापर से ऐसी ही फिक्सिंग करके इंटरव्यू को आसान करा सकते थे… सवाल उठाया गया है कि क्या केजरीवाल और पुण्य प्रसून इंटरव्यू प्लान या फिक्स कर रहे थे?

संक्षेप में कहें तो कुल मिलाकर फर्स्ट पोस्ट वाले लेख का सार ये है कि इसमें एक बड़ा जेनुइन-सा सवाल उठाया गया है.. वो ये कि जितनी आसानी से केजरीवाल के हिसाब से पुण्य प्रसून ने मुश्किल होते इंटरव्यू को मनमुताबिक सवाल पूछकर आसान बना दिया, ऐसी ही कुछ सेटिंग गेटिंग नरेंद्र मोदी भी करन थापर से कर लिए होते तो क्या दिक्कत थी…

गुरु, जाने या अनजाने में गल्ती हुई है तो फिर सवाल उठेंगे ही… और, खासकर उनसे सवाल ज्यादा पूछे जाते हैं जो खुद को नैतिकता, सरोकार, मिशनरी टाइप पत्रकार साबित करते हुए कुछ ज्यादा ही अहंकार व ऐंठन से अकड़ जाते हैं और खुद को दूसरों से बित्ता भर ज्यादा धरती से उठा हुआ पाते हैं… इसीलिए कहते हैं कि पांव हमेशा धरती पर दबा कर रखना चलना चाहिए ताकि कभी ठोकर लगे तो सीधे आसमान नजर न आए, जमीन का सहारा मिल सके जिससे दुबारा खड़ा होने में दिक्कत न हो. 

वैसे, हर कोई मेरी तरह थोड़े ही है कि खुद को खुलेआम शराबी, कबाबी, शबाबी, लुच्चा, लफंगा, जुआड़ी, मजनू, मवाली, रंगदार, हरामी, बदमाश, दलाल आदि इत्यादि घोषित किए रखे ताकि 'बुरे' दिन आएं तो किसी को सवाल उठाने का मौका न मिले और न मुझे जवाब देने की जहमत उठानी पड़े… हा हा हा.. cool

वैसे मैंने अपनी निजी राय एक अलग पोस्ट में लिखकर दे दी है कि यह सब मोदी परस्त कार्पोरेट मीडिया और भाजपा की मिलीजुली साजिश का नतीजा है ताकि देश में तेजी से लोकप्रिय हुए ईमानदार नेता अरविंद केजरीवाल और देश के कुछ चुनिंदा ईंमानदार व सरोकारी पत्रकारों में से एक पुण्य प्रसून बाजपेयी को जनता की नजरों में बदनाम किया जा सके. मेरी निजी राय पढ़ने के लिए बिलकुल नीचे जाएं. 

बात हम लोग कर रहे थे फर्स्ट पोस्ट वाले आर्टकिल की. उसे पूरा आप भी पढ़िए. कापी पेस्ट करके यहीं पढ़ने को दे रहे हैं. अंबानी की वेबसाइट वाले इस आर्टकिल पर करीब एक हजार कमेंट्स आए हैं. एक कमेंट में मीडिया विशेषज्ञ एएस रघुनाथ (AS Raghunath) गंभीर सवाल उठाते हैं: ''Is it not another Neera Radia version of Tell-me-what-do-I-tell-them story? Or a Veer Sanghvi sexing up the story to suit Neera?''

-यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


Media fixing: Why ‘leaked’ video of Kejriwal, journalist is a big deal

by Rahul Roushan

A video has been “leaked” on YouTube that shows an off-the-record chit-chat between AAP leader Arvind Kejriwal and Aaj Tak journalist Punya Prasun Vajpayee. The chit-chat happened while shooting an interview that was recorded after Kejriwal resigned from the Post of Chief Minister of Delhi last month.

While some are calling it an 'exposé', others are shrugging it off saying 'big deal'.

Well, if not an exposé, it does expose a few things.

First of all, let’s be clear what the video shows.

It shows Kejriwal deliberating and discussing about his interview in a friendly manner with the journalist. No big deal really.

The last part of the clip shows Kejriwal asking the journalist to play up some portions of the interview that he thinks would resonate with the masses. The journalist agrees saying that the particular portion was krantikaari (revolutionary) and would get a lot of 'reactions'.

Maybe the journalist agreed out of 'courtesy' and didn’t actually play it up? Unless we have proof that the portion – Kejriwal comparing his resignation with martyrdom of Bhagat Singh – was indeed played up again and again by the journalist and the channel. But even if the portion was played up, maybe it was due to the journalist 'genuinely' agreeing with the politician’s point of view?

Maybe he thought it was 'important' to play it up. No big deal yet. Umm… yeah, no big deal yet. The boundaries between journalism and activism have been blurred by many 'respected' people in the industry. So, no big deal.

Also, please note that the leaked video contains two parts, separated by a jump cut. The first portion is an 'off the record' chit-chat between Arvind Kejriwal and Punya Prasun Bajpai during a 'break' in the interview.

The second part of the leaked video is when the interview is over and Kejriwal asks Bajpai to play up the interview which is what most news reports are talking about.

But what about the first part?

In the first part, Kejriwal is telling the interviewer that he is not comfortable discussing privatisation as it would alienate the middle class, whose votes he wants. So the interviewer virtually says, "Fine, let’s drop this topic. And let’s talk about the 80 percent of the population, where the ‘vote bank’ lies.” To which Kejriwal says, “Absolutely. I had forgotten to talk about that!”

And this is exactly the sequence of the final version of the interview. First up, Kejriwal is talking about private companies and their nexus with governments, and then the discussion shifts to the problems of the poor people.

When a journalist is told by a politician that he doesn’t want to debate a particular issue as that may hurt his electoral politics, should the journalist change the topic of discussion?

Is it a big deal yet?

Were Kejriwal and Bajpai 'fixing' or 'planning' the interview? Is there any difference between the two? Are all media interviews 'fixed' or 'planned'?

If that is the case, then why did Rahul Gandhi screw up so badly in his interview with Arnab Goswami? Why didn't Narendra Modi fix his interview with Karan Thapar. And what about the scores of other interviews where politicians have walked out in the middle, including Kejriwal himself (on NewsX). What went wrong in these cases?

Frankly, it’s not a big deal depending on what expectations you set from a journalist and a politician.

The media can’t always be antagonistic to the political class. They have power, and their relationships need to be built. Off the record, some pleasantries, and sometimes more than those (e.g. in this leaked clip, “strategies for electoral success”), are exchanged. I leave it to the viewer to decide on what the expectations of a journalist should be.

But what about the expectations from Mr. Kejriwal? He has been telling everyone that journalists covering any negative news about him are either “paid” or have come to some settlement with Congress/BJP. We guess it would be fair to assume that he wouldn’t pay anyone as he disapproves of such behaviour.

The leaked video doesn’t prove anything was paid, but “setting”? Draw your own conclusions.

साभार- फर्स्ट पोस्ट


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

आजतक वाले दीपक शर्मा ने पुण्य प्रसून को victim of circumstances बताया

xxx

भड़ास वाले यशवंत ने वीडियो विवाद को मोदी परस्त कार्पोरेट मीडिया और भाजपा की मिलीजुली साजिश का नतीजा बताया

आजतक वाले दीपक शर्मा ने पुण्य प्रसून को victim of circumstances बताया

Deepak Sharma :  …पत्नी नौकरी नहीं करेगी…  बच्चे कान्वेंट स्कूल में नही पढ़ेंगे… घर में मेड खाना नहीं बनाएगी… गाज़ियाबाद की एक सोसाइटी के छोटे से मकान में ही रहेंगे…

कुछ दिन पहले ही की बात है, पिताजी बेहद बीमार थे, मुझे फोन आया… कोई सरकारी डाक्टर है जानने वाला… मैंने कहा- हां सफदरजंग अस्पताल में है, आप चिंता न करिये, सब इंतज़ाम करवा दूँगा….

कुछ और पहले की बात. मां बाप को बनारस दर्शन करने जाना था… कहने लगे कहीं रुकने का इन्तजाम हो सकता है… मैंने कहा अपने मित्र हैं बनारस में… आपको ना ऑटो करने की ज़रूरत है ना होटल की… मेरे तो मां बाप रहे नहीं… मैं कराता हूँ व्यवस्था…

एक दिन फोन खराब हो गया… मैंने कहा- पंडितजी, इतने बड़े पत्रकार हैं, फोन तो ढंग का रख लीजिए… एक आई फोन इस्तेमाल करने से किसी स्कैम में नही फंस जायेंगे. कुछ दिन बाद उनके हाथ में मैंने एक ढंग का फोन देखा… तो बोले- बंधु सही कहते हैं आप, इससे वीडियो भी लिया जा सकता है…

एक आदमी जो अल्जाइमर से लड़ते बूड़े बाप को रोज अपने हाथ से खाना खिलाता हो और पिछले कई महीनो से तीमारदारी के वजह से दिल्ली के बाहर ना निकला हो… एक आदमी जिसे मैंने बीवी के साथ घर में खाना बनाते देखा हो… एक आदमी जो पांच सितारा संस्कृति से परहेज़ करता हो… एक आदमी जो आपनी सादगी के लिए हमारे चैनल में जाना जाता हो, आज मीडिया का सबसे बड़ा दलाल बताया जा रहा है

मित्रों प्रसून वाजपई को आप वीडियो क्लिप और प्रेस क्लब में आम आदमी की मीटिंग में ली गयी फोटो से जान रहे हैं. एक्सक्लूज़िव खबर ब्रेक करने के नशे में प्रसून मीटिंग में घुसे थे और कुर्सी पर बैठे… बाद में योगेन्द्र यादव के ऐतराज़ पर उन्हें कमरे से बाहर निकलना पड़ा… तब तक फोटो खिंच चुकी थी. कुछ ऐसा ही उन्होंने केजरीवाल से इंटरव्यू लेने में गलती की…

केजरीवाल उनसे बेहद नाराज़ थे… उनका आरोप था की बेहद अहम वक्त पर प्रसून ने एक्सिट पोल में "आप" को दिल्ली विधान सभा चुनाव में सिर्फ ६ सीटें दी. केजरीवाल का दूसरा आरोप था कि प्रसून प्रो मोदी हैं और एक के बाद एक "आप" पर मोर्चा खोल रहे हैं. जिस दिन प्रसून ने ३ घंटे कांग्रेस नेता अरविन्द सिंह लवली का स्टिंग दिखाया तब केजरीवाल ने अपने कुछ मित्रों से कहा कि ये "आप" को बदनाम करने की साजिश है. केजरीवाल ने प्रसून के खिलाफ ट्वीट भी किया और उन पर बेवजह मोदी का पक्ष लेने का इलज़ाम लगाया.

९ और १० दिसम्बर को मैंने केजरीवाल से इंटरव्यू लेने की कोशिश की पर उन्होंने मना कर दिया. उनका आरोप था कि विधान सभा चुनाव में आजतक ने "आप" को बहुत डेमेज किया है. मैंने समझाया- ऐसा कुछ भी नही. बहरहाल उसके बाद मैं फिर कभी केजरीवाल से नही मिला. दरअसल खोजी पत्रकार के लिहाज़ से मुझे इंटरव्यू की बहुत दरकार भी नहीं है… और, मैं नेताओं की परवाह भी नही करता. लेकिन एंकर की नौकरी बिना डिबेट के, गेस्ट और नेताओं के इंटरव्यू के, नहीं चलती. बरखा, अर्नब, राजदीप सभी केजरीवाल के करिश्मे का इंटरव्यू कर रहे थे… लेकिन प्रसून को शायद ये मलाल ज़रूर रहा कि वो कजरी बाबू को दो साल से जानते थे पर मौके पर वन टू वन इंटरव्यू नहीं कर पा रहे थे. इसकी वजह महीनों से दोनों के बीच संवादहीनता थी जो एक्सिट पोल पर और बढ़ गयी थी.

केजरीवाल विवादों में फंसते जा रहे थे और सोमनाथ भारती को लेकर किये गए धरने ने उनकी लोकप्रियता को बड़ा झटका दिया था. इत्तिफाक से प्रसून धरने का जायजा लेने रेल भवन पहुंचे. भीड़ के नाम पर वहाँ ५०० लोग मौजूद थे. यहीं केजरीवाल और प्रसून टकराए. केजरीवाल ने प्रसून से कहा- अरे आप इधर कैसे. संवादहीनता टूटी तो प्रसून ने जवाब दिया कि अरे भाई अब तो आप इंटरव्यू के लिए भी मना कर देते हैं. मुझे लगता है कमज़ोर होते हुए केजरीवाल को देश के एक बड़े एंकर के इस सवाल ने एक मौका दिया… जी हाँ, मौका दिया संवाद स्थापित करने का. केजरीवाल इंटरव्यू के लिए राज़ी हो गए…. प्रसून को उस वक्त देश की राजनीति का एक बड़ा चेहरा कैमरे के आगे खड़ा मिल गया…. टीआरपी ठीक ठाक थी… और एक के बाद एक दो बड़े इंटरव्यू प्रसून ने कर डाले… बाकी जो हुआ उसे अंग्रेजी में victim of circumstances कहते हैं. उस पर बहुत कुछ लिखना मैं नहीं चाहता.

मुझे भरोसा है वक्त आने पर प्रसून बता देंगे कि वो केजरीवाल के कितने करीब हैं. यही अब प्रसून की अग्निपरीक्षा है.

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

पानी सहेजने की कला और उसके महत्व को बताती पुस्तक ‘भागीरथी’ का विमोचन

बाड़मेर/ सीकरः लक्ष्मणगढ़ स्थित मोदी इस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी एंड साइंस में आयोजित, युवा लेखक अशोक सिंह राजपुरहोत की पुस्तक 'भागीरथी' के विमोचन समरोह में बोलते हुए वॉटर मैन राजेन्द्र सिंह ने कहा कि राजस्थान में पानी हमेशा से ही आम जनता के लिए किसी जंग से कम नहीं रहा है। यहां के जीवट ग्रामीणों ने पानी सहेजने की अपनी कला से पुरे विश्व को सीख दी है लेकिन वर्तमान में इस राज्य में पानी के अपव्यय की घटनाओ ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे में जल बचत की बातों को करीने से सजाकर लोगो के सामने पेश करने की युवा लेखको की  कोशिशें सराहनीय है। इस अवसर पर मोदी इस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी एंड साइंस के वाइस चांसलर प्रोफेसर एनवी सुब्बारेड्डी ने कहा कि आज समाज बदलाव चाहता है और यह बदलाव युवा लेखक ही कर सकते है। इस मौके पर मोदी इंस्टीट्यूट के डीन प्रोफ़ेसर सतीश शास्त्री ने कहा कि बाड़मेर-जैसलमेर पानी को लेकर हमेशा देश में एक काले पानी के इलाके की तरह रहे हैं। लेकिन इसी बाड़मेर-जैसलमेर में परम्परागत पेयजल स्रोतो के संरक्षण के लिए जो प्रयास वर्तमान समय में होने चाहिए वह नहीं हो रहे हैं। भागीरथी पुस्तक के सम्पादक अशोक सिंह राजपुरोहित और सह-संपादक प्रवीण बोथरा ने इस पुस्तक को लेकर दर्शकों के सामने अपनी बात रखी और मौजूद दर्शको के सवालों के जवाब भी दिए।

रेगिस्तानी बाड़मेर के लिए पानी हमेशा से ही जीवन में एक परेशानी के रूप में रहा है। जिले भर में पानी को लेकर हुए कामों के साथ-साथ इससे हमारे अतीत के नाते को एक साथ बयां करती है पुस्तक भागीरथी। बाड़मेर में जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग कि सीसीडीयू इकाई में कार्यरत अशोक सिंह राजपुरोहित इस पुस्तक के सम्पादक है और वरिष्ठ पत्रकार चन्दन सिंह भाटी, मदन बारुपाल और प्रवीण बोथरा ने इस पुस्तक में सह-संपादक का काम बखूबी अंजाम दिया है।पुस्तक मौजूदा जन प्रतिनिधियो के पानी पर विचारों को भी पाठको के सामने रखती है। पुस्तक में डाक्टर दीपक आचार्य, जफर खान सिंधी, किशोर जाखड़, भुवनेश जैन, उदय पुरोहित, पूनम सिंह राठोर, कन्हैया लाल डलोरा, चन्दा यश ठाकुर, सुरेश जाटव, विनोद विश्नोई और दुर्गसिंह राजपुरोहित समेत एक दर्जन के करीब लेखको के लेख संकलित हैं।

 

पुस्तक के लिए अशोक राजपुरोहित से ashok.bmr@gmail.com पर संपर्क करें।

वीडियो पर ‘आजतक’ का बयान- इंटरव्यू बिना छेड़छाड़ दिखाया गया, साजिशन छवि खराब की जा रही

Aaj Tak statement on the malicious video

New Delhi, March 10, 2014  :  A video clip showing an Aaj Tak anchor in conversation with Arvind Kejriwal is being circulated as part of a motivated campaign to malign Aaj Tak's reputation as an independent channel, which fearlessly broadcasts the truth. The Kejriwal interview was aired live in full on February 14 on all platforms of the India Today Group.

In the conversation, Arvind Kejriwal is asking the anchor to highlight parts of the interview. The India Today Group wishes to categorically state that no part of the interview was edited by our network. The entire interview was telecast live.

Even during the repeat broadcast the entire content of the interview was carried unedited. Aaj Tak has maintained its lead as the most watched news channel in India for 13 years by upholding the highest standard of journalistic integrity. India Today Group does not believe that media should take sides or choose favourites.  The India Today Group has subscribed to this philosophy for the last 38 years. Here is link for the full interview as aired live on the channel and on all our platforms.

http://aajtak.intoday.in/video/exclusive-interview-of-kejriwal-after-resignation-1-754952.html
 


केजरी-पुण्य वीडियो प्रकरण परर भड़ास के एडिटर यशवंत की प्रतिक्रिया जानने के लिए यहां क्लिक करें…

केजरी-पुण्य वीडियो : घबराए मोदी खेमे का फुसफुसिया पटाखा… खेल लो खेल लो टीवी वालों…

भड़ास वाले यशवंत ने वीडियो विवाद को मोदी परस्त कार्पोरेट मीडिया और भाजपा की मिलीजुली साजिश का नतीजा बताया

Yashwant Singh : पुण्य प्रसून बाजपेयी और अरविंद केजरीवाल के वीडियो को बेवजह तूल दिया जा रहा है…. यह भाजपा और कार्पोरेट मीडिया की मिलीजुली साजिश का हिस्सा है… चैनलों में जो डिबेट होते हैं, उसमें ब्रेक के दौरान जाने कौन कौन सी बातें होती हैं.. मुझे याद है… एक बार एक डिबेट के दौरान ब्रेक हुआ तो एक कांग्रेस परस्त कवि ने मुझसे कहा कि ''यशवंत जी, इतना काहे दौड़ाते हो… थोड़ा समझा करो.. कांग्रेस का नमक खाया है तो हलका फुलका उनके पक्ष में तर्क देने ही पड़ेंगे…''

व्यंग्य कविताएं सुनाने वाले उस कवि की यह बात सुन हम सभी हंस पड़े… लेकिन अगर वो बातचीत अगर रिकार्ड करके यूट्यूब पर डाल दिया जाता तो उन कवि महोदय का बैंड बज जाता… ऐसे ही हम सब आप निजी जीवन में ढेरों ऐसी बातें करते हैं जो संभवतः पब्लिक प्लेटफार्म पर नहीं कर सकते…. लखनऊ के पत्रकार संजय शर्मा जी ने सही लिखा है अपने वॉल पर कि नेताओं के इंटरव्यू के बाद जब चलने का दौर होता है तो अक्सर नेता और पत्रकार ऐसी ही बातें करते हैं जो केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी करते दिख रहे हैं वीडियो में…. कि ये वाला ज्यादा अच्छा कहा… वो वाला ज्यादा प्रामिनेंटली दिखाना चाहिए… आपका ये वोटबैंक है… आपका पार्टी लाइन के मुताबिक ये हिट जाएगा…

देखें वीडियो:

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html

ये सब आपसी बातचीत है… ये जायज है…

नाजायज वो है जो मोदी ने किया था करण थापर के साथ… कैमरा बंद करवाकर कहने लगे कि आप तो मेरे दोस्त हैं, ऐसे सवाल क्यों पूछ रहे हैं… ये एक तरह से धमकी और प्रलोभन दोनों हुआ…

देखें वीडियो:

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/778/interview-personality/paani-dena-re-1-narendra-modi-and-karan-thapar.html

केजरीवाल ने पुण्य प्रसून बाजपेयी से ये तो नहीं कहा कि आप ये सवाल मत पूछो… वो सवाल मत पूछो… उन्होंने इंटरव्यू खत्म होने पर पूरे इंटरव्यू के परफारमेंस पर बात की… सफाई दी कि इस मसले पर कम क्यों बोला और उस मसले पर ज्यादा क्यों बोला.. पुण्य प्रसून का ये कहना भी कोई गलती नहीं कि इस हिस्से को दिखाने से आपको ज्यादा वाहवाही मिलेगी…

प्रेस कांफ्रेंसों, इंटरव्यूज आदि में नेताओं की बात सुनकर, उनकी हां में हां मिलाकर या उनके लड़ झगड़कर पत्रकार जब अपने आफिस लौटता है तो वही दिखाता लिखता है जो उसे उचित लगता है.. मैं यहां आजतक या पुण्य प्रसून बाजपेयी या अरविंद केजरीवाल का बचाव नहीं कर रहा… बस केवल इतना कह रहा कि यार इन्हें फंसाने के लिए कोई सालिड स्टिंग लाओ… ये बच्चों सा लालीपाप, झुनझुना लाकर किसे बेवकूफ बना रहे हो.. हां, कुछ कमजोर हृदय वालों / वालियों को झटका जरूर लग सकता है जो मानते हैं कि बड़े पत्रकारों, बड़े नेताओं को 24×7 लगातार परम आदर्श स्थिति में गदा लिए जड़वत मूर्तिवत मनुष्येतर बने रहना चाहिए…

अब जब कि न्यूज चैनलों ने भी पुण्य प्रसून और अरविंद केजरीवाल के वीडियो पर खेलना शुरू कर दिया है तो कहना पड़ेगा कि इस बार का लोकसभा चुनाव वाकई मीडिया के बल पर लड़ा जा रहा है और मीडिया के ही बल पर छवियां निर्मित व नष्ट की जा रही हैं.. एक तरफ परंपरागत मीडिया है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया… दोनों एक दूसरे पर तगड़ी नजर रखे हुए हैं और एक दूसरे का घृणावत प्रेम और प्रेमवत घृणा के द्वंद्वात्मक नजरिए से विश्लेषण किए पड़े हैं.. इसमें एक अच्छा पहलू भी है… आगे से किसी को यह घमंड नहीं होना चाहिए कि वो महान है इसलिए उसे विवाद कभी छू ही नहीं सकता.. अब महानता निरपेक्ष नहीं रही.. महानता भी सापेक्ष है…

ओम थानवी जी ने एक सच्ची बात कही है अपने वाल पर… आप हमेशा निष्पक्ष नहीं रह सकते… जब चीजें बिगड़ रही हों तो आपको उन लोगों को सपोर्ट करना चाहिए जो बनाने की तरफ अग्रसर हों… मैं खुलकर कहूंगा कि अगर पुण्य प्रसून जैसे पत्रकार अरविंद केजरीवाल के प्रति साफ्ट कार्नर रखते हैं तो ये खराब बात नहीं है… हालांकि वीडियो में ऐसा कोई साफ्ट कार्नर नहीं दिख रहा है.. वीडियो में तो इंटरव्यू खत्म होने के बाद एक दूसरे की औपचारिक मुंहदेखी 'क्रांतिकारी क्रांतिकारी' टाइप की बातें हो रही हैं… नेता अपनी बात रख रहा है, सफाई दे रहा है और पत्रकार अपने नजरिए के हिसाब से उसे बता रहा है, सलाह दे रहा है… और इसी प्रक्रिया में इंटरव्यू के बाद वाला नितांत निजी किस्म वेज संवाद खत्म हो रहा है… इसमें कुछ भी अनैतिक या नान-वेज नहीं है… 

भाजपा और कांग्रेस जैसी करप्ट, सांप्रदायिक, अवसरवादी और एलीटों की पक्षकार पार्टियों से हटकर कोई केजरीवाल जैसे व्यक्ति का सपोर्ट करता है, इनके प्रति साफ्ट कार्नर रखता है तो ये बेहद सहज और मानवीय है.. पत्रकारिता का तकाजा भी यही है कि हम आम जन के प्रति अपनी पक्षधरता रखकर अपनी राजनैतिक सोच-समझ को आगे बढ़ाएं… जब राजनीति झूठ, मक्कारी, फ्राड, हिप्पोक्रेसी से लिथड़ी पड़ी हो तो कुछ एक केजरीवालों को इसमें घुसाना जरूरी है ताकि अंदर की असलियत सामने तो ले आए…

इंडिया टुडे के कानक्लेव में केजरीवाल ने जितनी दबंगई से भाजपा के दामाद और कांग्रेस के दामाद की असलियत बयान कर दोनों पार्टियों के बीच 'दामाद घोटाले' पर चुप्पी साधने का खुलासा किया वह दिल छू लेने वाला था… ऐसा साहस मोदी या राहुल सात जनम में भी न दिखा पाएंगे… सच में इन लोगों को राजनीति करना केजरीवाल ही सिखाएगा… और, मजेदार है कि केजरीवाल के हो-हल्ले में बदहवास हो गए भाजपाई इतने अधीर हो चले हैं कि अब साजिश के नाम पर ऐसे टूटपूंजिया वीडियो सामने ले आ रहे हैं जिसमें शुरुआती फुरफुरी तो है लेकिन पटाखा फूटने से पहले ही फुस्स हो जाता है… अब भाजपा को मान लेना चाहिए कि इस केजरीवाल नामक आदमी ने 'मोदी मिशन 2014' को वाकई ठिकाने लगा दिया है… अभी चुनाव में वक्त है.. तैयार रहो… आम आदमी पार्टी वाले जवाबी हमले के लिए 'राकेट लांचर' ले कर आ रहे हैं… तब न कहना कि हाय, इसने तो ऐन मौके पर इतना बड़ा कबाड़ा कर दिया…

जैजै 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


केजरी-पुण्य वीडियो पर आजतक की तरफ से जारी बयान पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 

Aaj Tak statement on the malicious video


ये भी पढ़ें:

केजरीवाल-पुण्य प्रसून वाले वीडियो में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे गलत कहा जाए…

xxx

इस वीडियो के आधार पुण्य प्रसून को बिका कहना या पक्षकार कहना गलत बात है

xxx

जो पत्रकार ऐसे संकट की घड़ी में तटस्थ रहेगा, वो अपने दायित्व से बच रहा : ओम थानवी

एसपी गोंडा ने एक दिन में किए 26 तबादले, चुनाव आयोग में शिकायत

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने लोक सभा चुनावों की घोषणा के ठीक पहले एसपी गोंडा के रूप में नियुक्त किये गए उदय शंकर जायसवाल द्वारा तैनाती के 24 घंटे के अंदर ही 10 थानों और 4 पुलिस चौकियों में फेरबदल करने के सम्बन्ध में चुनाव आयोग को शिकायत भेजी है।

शिकायत में कहा गया है कि श्री जायसवाल की एसपी गोंडा के पद पर 28 फ़रवरी को तैनाती हुई और उन्होंने 01 मार्च को काम संभाला और उन्होंने इसके अगले ही दिन अपने दो आदेशों के जरिये 26 इंस्पेक्टर तथा सब-इंस्पेक्टर का तबादला कर दिया। यह मानवीय रूप से असंभव है कि कोई भी एसपी एक दिन में ही अपने मातहतों और जिले के बारे में इतनी जानकारी हासिल कर ले, जिससे यह स्पष्ट है कि ये ट्रांसफर एसपी द्वारा स्व-विवेक के आधार पर नहीं बल्कि अन्य लोगों के निर्देशों पर किये गए हैं, जो आगामी चुनावों पर गलत प्रभाव डालेंगे।
 
अतः उन्होंने निष्पक्ष चुनावों के मद्देनज़र इन सभी ट्रांसफरों की समीक्षा करा कर इनके सम्बन्ध में अग्रेतर निर्णय लिए जाने का अनुरोध किया है।
 

चुनाव आयोग को भेजा गया पत्र

To,
 The Chief Election Commissioner
 and other Election Commissioners,
 The Election Commission of India,
 New Delhi

 
Subject– Transfer of 26 Sub Inspectors/Inspectors by a Superintendent of Police immediately the next date of his joining.
 
Sir,
       I, Dr. Nutan Thakur, a RTI activist, working in the field of transparency and accountability in governance, present before you a case where very clear and blatant misuse of authority has been made by a police officer in an instance which has a very direct bearing on the forthcoming Lok Sabha elections and which thus needs your immediate attention.
 
The case belongs to district Gonda in Uttar Pradesh. Sri Uday Shankar Jaiswal, IPS, was posted as Superintendent of Police, Gonda through his transfer order dated 28/02/2014. He joined his new assignment on 01/03/2014.
 
But what is really serious and startling is the fact that immediately after joining his new assignment, on the very next date, Sri Jaiswal transferred 26 Sub Inspectors and Inspectors in Gonda districts. These transfers were made through two separate transfer orders, where transfer order ST-T-3-2014 dated 02/03/2014 transferred 4 Inspectors and 6 Sub Inspectors, including two police outpost in-charges. The other transfer order No ST-T-4-2014 dated 02/03/2014 transferred 7 Inspectors and 9 Sub Inspectors. This transfer order affected officer-in-charges of police stations Kotwali Nagar, Kotwali Dehat, Itiyathok, Motiganj, Chhapia, Kaudiya, Khodade, Kharagupur, Manakapur and Tarabganj. At the same time, this transfer also affected two police outpost in-charges.
 
What this means is that Sri Jaiswal made such transfers immediately the next date of his joining his new assignment where not were 26 senior police officers of the districts were transferred, 10 police stations and 4 police outposts also got affected.
 
I need not delve into the issue of importance of the role of Sub Inspectors and Inspectors in the process of elections, particularly as regards the extremely pivotal role played by the officer in charge of police stations.
 
While
it is true that these transfers were made 3 days prior to the actual date of announcement of elections by the Election Commission and the imposition of the Model code of conduct, but at the same time, it can be easily seen that this does not take away the authority, power and duty of the Election Commission as stated in Article 342(1) as regards the superintendence, direction and control of the conduct of the forthcoming elections, which the Hon’ble Supreme Court, through innumerable number of decisions, has made it very clear to be extremely wide ranging.
 
Thus, from the power bestowed upon the Commission, it is quite apparent that it has an authority and duty to look into the transfers made almost in immediate vicinity of expected date of announcement of polls, especially in light of the fact that the officer issuing the transfer order had joined the district only one day before and thus, naturally cannot be said to be having any requisite personal information, knowledge, assessment and intelligence about the abilities, capabilities, needs, requirements and performance of all these police officers he transferred.
 
It
can also be safely understood that if Sri Jaiswal made such transfer orders only a day after having joined the office, it would have been made solely on the basis of information provided by others. Thus whatever transfer orders were made were made solely in the basis of secondary information because it is humanly impossible for any SP to come to have even reasonable amount of information about the performance of his subordinates within one day of his joining the office and the needs of various police stations, thereby making an assessment and judgement about which police officer will be suitable for which police station. It is also equally true that even at the most fastest pace, any SP will need not less than a fortnight to make such an evaluation as regards the ability and performance of his subordinates and the requirements of the police stations under his charge.
 
Thus, any such assessment and evaluation made by Sri Jaiswal immediately the next day of his joining shall necessarily be based on secondary information emanating either by his superior officers or from other extraneous sources, including the political entities. If Sri Jaiswal’s decision was based on the intelligence, information and instructions of his superior officers, it will have reasonable sense but if it was based solely and purely on extraneous information, then it will definitely not be considered reasonable in any manner and would be termed completely unacceptable and unreasonable because any transfer orders made by a SP who joined his office only one day ahead, in the last minutes before announcement of date of elections, solely on the instructions/directions/suggestions of political persons is something which will be completely against the spirit of level-playing field as envisaged by the Election Commission and as reinforced again and again by the Hon’ble Supreme Court.
 
What
it means is that despite the fact the above mentioned transfers were made before the date of announcement of elections, but the entire set of events make these transfers extremely suspicious and dubious, which seem to need an immediate assessment on the part of the Election Commission, for the cause of free and fair elections that the Commission is so much adhered to. This is because if these transfer orders are not evaluated and a definite decision made in this regards about whether to continue the transferred officers in their place or to make any reasonable reassessment about them including any further transfers (if required), then the very concept of free and fair elections in Gonda will get defeated because of all the facts and circumstances discussed and enumerated above.
 
I
make it clear that I am not a member of any political party and whatever facts I have presented and whatever prayers I have made are solely for the larger public cause, as a worker in the field of transparency and accountability.
 
Lt No- NT/ECI/Gonda                                                                 
dated  -09/03/2014
Attached- copy of  2 transfer orders.

Yours

Dr. Nutan Thakur                                                                                                                  5/426, Viram Khand, GomtiNagar, Lucknow.                                                           #94155-34525                                                                                                                                                                                                                                        
                                                                      
Copy to- 1. Sri Umesh Sinha, Chief Election Officer, Uttar Pradesh, Lucknow
                2. Principal Secretary (Home), Uttar Pradesh, Lucknow
                3. Director General of Police, Uttar Pradesh, Lucknow

IBN7 के रिपोर्टर ने पर्यटक का बटुआ उड़ाया

चम्बा, हिमाचल प्रदेश। खुद को आईबीएन7 औऱ डे एंड नाईट चैनल का रिपोर्टर बताने वाले व्यक्ति पर गुजरात से डलहौज़ी घूमने आये पर्यटकों ने पैसे हड़पने का आरोप लगाया है। हुआ यूं की मुबई से हिना ट्रेवल्स से डलहौज़ी घूमने आये कुछ पर्यटक जब बर्फ का आनंद ले रहे थे तभी किसी पर्यटक का पर्स बर्फ में गिर गया। वहीं उनकी तस्वीरें खींच रहे उक्त रिपोर्टर को वो पर्स मिल गया। वह रिपोर्टर उस पर्स को पुलिस स्टेशन में जमा करवाने की बात कह कर वहाँ से खिसक गया। जब मामला डलहौज़ी पुलिस स्टेशन पहुंचा तो उक्त रिपोर्टर ने बड़ी मुश्किल के बाद पर्यटक को पांच हज़ार रुपये लौटा दिए।

डलहौज़ी प्रेस क्लब(पंजीकृत) उक्त रिपोर्टर के खिलाफ कड़ी कारवाई करने जा रहा है। यह रिपोर्टर पहले भी ब्लैकमैलिंग के मामले में भी चर्चा में रहा है तथा कई बार इन मामलों में इसकी पिटाई भी हो चुकी है। पंजाब केसरी से भी इन्ही मामलों की वजह से इस रिपोर्टर को निकाला गया था।

 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

केजरीवलवा ठोंकले रह ताल… तूहीं जितबे बजउले रह गाल…

Yashwant Singh : बनारस को जो लोग हिंदुत्व का गढ़ और भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित सीट मानकर चल रहे हैं उन्हें बताना चाहूंगा कि बनारस वाले जैसा दिखते हैं, वैसा होते नहीं… याद करिए उन दिनों को जब आडवाणी हिंदू रथ पर सवार होकर देश भर में सांप्रदायिकता की आग फैला रहे थे.. तब बनारसियों ने आडवाणी और उनके रथ को लेकर ऐसी ऐसी कविताएं, मुहवारे, गाने, कविताएं बनाए थे कि सुन कर हंसते हंसते लोट पोट हो जाएं…

ये अजीब मिजाज का शहर है… मोदी अगर यहां से लड़ गए और उनके मुकाबले केजरीवाल खड़े हो गए तो लिख कर ले लीजिए… केजरीवाल जीतेंगे… बनारसी गुरुओं की आत्मा बड़ी मौलिक होती है… वो हीरों को पहचान लेते हैं.. वो धोखे को दूर से तड़ लेते हैं.. भांति भांति के 'ठगों' को पैदा करने वाली काशी नगरिया के निवासियों को ठगना आसान नहीं… दिन भर मौलिक चिंतन करते रहने वाले बनारसियों को पता है कि केजरीवाल वो घोड़ा है जो भाजपा और कांग्रेस जैसे पैदाइशी राजनीतिबाज और घोटालेबाज दलों के राजपाठ में सेंध लगाकर कुछ नया आड़ोलन, हलचल, लहर पैदा कर सकता है…. और कर भी रहा है…. सच में, अगर परम आदरणीय केजरीवाल भाई साहब साल भर से राजनीति में न रहते तो ये चुनाव कितने बोरिंग होते …

हर हर महादेव..

दो लाइन बनारसी अंदाज में…

आवे द ससुरा इ मोदिया के
भगा देवल जाइ खोदिया के
केजरीवलवा ठोंकले रह ताल
तूहीं जितबे बजउले रह गाल

गुरु, इ हमार मौलिक रचना बा, दाद खाज खुजली वाल तक का इंतजार रहेगा 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

8 PM JOURNALISM : ये हमारा दाग है

Deepak Sharma : बरसों पहले जब 8 PM WHISKY लॉन्च कि गई तो एक बिजनेस ट्रेनी पत्रकार के तौर में इसकी लांच पार्टी में मौजूद था. शराब की एक बोतल गिफ्ट में मिली थी जो मैंने पड़ोस के एक बिजली मिस्त्री मित्र को सप्रेम भेंट कर दी. बड़े आदमी से रिश्वत ली और आम आदमी के हाथ में आगे बड़ा दी. ये पत्रकारिता से रोमांस के दिन थे.

मित्रों पत्रकारों का एक बड़ा धड़ा रोज शराब पीता है और मुफ्त की पीता है.

रात के आठ बजते ही जब अर्नब गोस्वामी जैसे पत्रकार न्यूज़ बुलेटिन की तयारी कर रहे होते हैं उस वक्त शीशे पर प्रेस लिखी हुई बहुत सी कारें विधायकों, सांसदों और मंत्रियों के बंगले में दाखिल होती हैं.

ये 8 PM JOURNALISM है.

ये ऐसा जर्नलिज्म है जो देश के कई होनहार राजनीतिक पत्रकारों, ब्यूरो प्रमुख और संपादकों के चरित्र लील गया. ये ऐसा जर्नलिज्म है जहां देश के दो मुख्तलिफ पेशे या यूँ कहे कि मिशन एक दूसरे से हम प्याला होकर जनता की नज़रों में खुद को गिराते चले गए.

मित्रों, नेताओं से, सरकारों से, पत्रकारों का संवाद ज़रूरी है…लेकिन मर्यादाओं की सीमा में. पत्रकारिता और दलाली साथ साथ नही चल सकती . सच तो ये है कि असली और सच्ची पत्रकारिता जनता के करीब और नेताओं से दूर रहकर ही की जा सकती है. बस बीट के रिपोर्टर इसके अपवाद हो सकते हैं.

कमर वाहिद नकवी, अर्नब गोस्वामी, सुप्रिया प्रसाद, राम कृपाल, उदय शंकर, दिबांग, अनिरुद्ध, सतीश के सिंह, एनपी सिंह (और भी) ऐसे पत्रकार रहे या हैं जिन्होंने नेताओं की गोद ठुकराई है. जिन्होंने 8 PM JOURNALISM को खुद से बेदखल रखा. काश ये गिनती ज्यादा होती….तो आप सब सोशल मीडिया पर हम जैसे पत्रकारों को शायद दलाल ना कह पाते.

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

इंडिया टुडे आयोजन में केजरीवाल… अंगरेजीपसंद लोगों के बीच खांटी हिंदीवाल… दो टूक सवाल-जवाब (देखें वीडियो)

Om Thanvi :  इंडिया टुडे आयोजन में केजरीवाल। अंगरेजीपसंद लोगों के बीच खांटी हिंदीवाल। दो टूक सवाल-जवाब। घोटाले ही नहीं, मरने वाले गरीबों की बात करना, अपने बन्दों की हिंसा के लिए माफी मांगना, मोदी की धज्जियाँ उड़ाना …

यहाँ पहुँचने के लिए हवाई जहाज पर जो भी खर्च हुआ होगा, आयोजकों का तो वसूल हो गया! जहाज पर हाय-तौबा मचा रहे लोगों को लगता है पता था कि यह किसी तरह यहाँ पहुँच गया तो सब पर भारी पड़ेगा और गुजरात का ताजा-ताजा दौरा खंगाल रखेगा!

देखें वीडियो…

http://www.youtube.com/watch?v=Yx5AhY8Q_GI

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

मोदी की चुप्पी में रहस्य की गांठें हैं, जिन्हें वे कभी खोल न पाएंगे, खोलेंगे तो और उलझ जाएंगे : ओम थानवी

जो पत्रकार ऐसे संकट की घड़ी में तटस्थ रहेगा, वो अपने दायित्व से बच रहा : ओम थानवी

Om Thanvi : पत्रकारिता में जब-तब निष्पक्षता या तटस्थता की सीख बहुत सुनने को मिलती है। निष्पक्षता का मतलब निष्क्रिय या बे-पेंदे ढुलमुल रहना नहीं हो सकता। कभी पक्ष रखना भी निष्पक्षता का ही एक रूप होता है, बशर्ते वह निस्स्वार्थ हो और न्याय के हक में हो। न्याय कानूनी अर्थों में नहीं, नैतिक अर्थों में।

ऐसे ही विरोध करना भी एक तरह की वाजिब पक्षधरता है। जैसे पहले कभी कहा था, आप पीटने वाले और पिटने वाले में दोनों के साथ नहीं हो सकते; ऐसी घड़ी में न्यायपूर्ण आचरण के लिए आपको अपना स्टैंड चुनना होगा। भले कोई कहे कि आप एक के पक्ष में या दूसरे के विरोध में खड़े हैं।

इमरजेंसी के आततायी दौर में जो लोग विरोध में बोले नहीं, बाद में पछताए। जिन्होंने स्टैंड लिया (जैसे कि इंडियन एक्सप्रेस ने), उन्हें उनसे भी मान मिला जो चुप थे। आज छिछली राजनीति सांप्रदायिकता और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के साथ कुटिल गठजोड़ का भयावह पैगाम लेकर मंडरा रही है। उससे भी बड़ी चुनौती है विकल्प की तलाश। विकल्पों को लेकर मुख्तलिफ राय हो सकती हैं। मगर पत्रकार, लेखक और अन्यथा मुखर बुद्धिजीवी अगर ऐसे संकट की घड़ी में भी "तटस्थ" रहते हैं, तो अपने दायित्व से बचते हैं। भले गाली अभी कुछ की झोली में पड़ रही हो, लेकिन जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी इतिहास। (अपराध जानबूझ नहीं लिख रहा।)

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

केजरीवाल-पुण्य प्रसून टेप में कुछ भी गलत नहीं है…

Sanjay Sharma : मैंने अब तक सैकड़ों इंटरव्यू किये होंगे… मुझे याद नहीं आ रहा कि किसी भी नेता ने यह ना कहा हो कि- ''कैसा रहा? बढ़िया छापना…''. हम भी कहते हैं कि- ''बहुत अच्छा रहा…''. और किसी खास अंश का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि यह आपने बहुत बढ़िया बोला.. और यह भी कई बार कहा है कि इसका यह अंश बहुत अच्छा रहा, इसको बढ़िया करके छापेंगे… इसमें गलत क्या है…

यह हमारे ऊपर है कि लिखते समय या दिखाते समय हम कितनी ईमानदारी से उसे दिखाते हैं… पुण्य प्रसून जी की ईमानदारी पर वही सवाल उठा सकते हैं जिनको इस सिस्टम से सिर्फ यही चाहिए कि सिर्फ उनकी ही जय जयकार हो…

सबसे खतरनाक बात यह कि हिटलर की मानसकिता के लोग लगातार मीडिया पर हमला कर रहे हैं.

यह एक साजिश है लोकतंत्र के हर हिस्से को कमजोर करने की.

बीजेपी के नेता इस इंटरव्यू पर बहुत हल्ला कर रहे हैं.. मैं मोदी जी का करन थापर के साथ का एक इंटरव्यू लगा रहा हूँ.. कुछ सवालों के बाद ही मोदी जी कैमरा बंद करवा देते हैं और कहते हैं कि ऐसे सवाल क्यों पूछ रहे हो, हम तो आपको दोस्त मानते हैं… क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि मोदी जी चाहते हैं कि उनके मित्र बन जाओ पर सवाल ना पूछो… इसीलिए मोदी जी ने आज तक कोई इंटरव्यू नहीं दिया जबकि राहुल जैसे शख्स तक ने इंटरव्यू दे दिया… कितने खतरनाक लोग हैं कि रिपोर्टर के कैमरामैन तक उनकी पहुँच है जो उनको इंटरव्यू के टेप तक दे देता है…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/778/interview-personality/paani-dena-re-1-narendra-modi-and-karan-thapar.html

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा के फेसबुक वॉल से.


Yashwant Singh : वीडियो में कोई गलत बात नहीं है.. ये लोग पैसे की लेनदेन की बात तो कर नहीं रहे… केवल यही हो रहा है कि क्या दिखाना चाहिए, क्या नहीं दिखाना चाहिए .. किस पर बोलना चाहिए, किस पर नहीं बोलना चाहिए … ये सब रुटीन होता है भाई… चैनलों में जब ब्रेक होता है तो डिबेट कर रहे लोग आपस में ऐसी बातें करते रहते हैं.. इस वीडियो को लेकर हल्ला कर रहे लोग कुछ ज्यादा ही इन्नोसेंट हैं या फिर इरादतन केजरीवाल और पुण्य प्रसून के पीछे पड़ गए हैं…

वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

इस वीडियो के आधार पुण्य प्रसून को बिका कहना या पक्षकार कहना गलत बात है

इस वीडियो के आधार पुण्य प्रसून को बिका कहना या पक्षकार कहना गलत बात है

Awadhesh Kumar : आजकल एक वीडियो चल रहा है जिसमें आज तक के श्री Punya Prasoon Vajpayee और Sri Arvind kejarival की इंटरव्यू के बाद या बीच की अनौपचारिक बातचीत है। इससे यह साबित किया जा रहा है कि पत्रकार मिलीभगत से काम कर रहे हैं। मेरे वाल पर भी ब्रेकिंग न्यूज के नाम से इसे लगाया गया है। इसी तरह एक तस्वीर पुण्य प्रसून वाजपेयी जी की आम आदमी पार्टी के नेताओं के साथ चल रही है। उसमें यह नहीं बताया जाता कि कहां कि तस्वीर है, किस समय की है, प्रसंग क्या है?

कोई नेता यदि कह रहा है कि इसे चलाइए और हम कहें कि हां इसे खूब चलाएंगे तो इसे कई नजर से देखा जा सकता है। नेता अपने इंटरव्यू के बारे में ऐसा अनुरोध करते हैं और उनका जवाब गोलमटोल दिया जाता है। कई बार चलाने का अनुरोध बाद में भी आता है। इससे यह साबित होता है कि केजरीवाल में प्रचार भूख है और वे अन्य नेताओं और पार्टियों से अलग नहीं हैं। कोई पत्रकार अपने काम में पक्षकार न बने यह आदर्श स्थिति है। लेकिन अगर बन गया तो वह धोखेबाज हो गया ऐसा मैं नहीं मानता। अगर वह उस विचार को देशहित में मानता है और इस कारण समर्थन करता है तो इसमें बुराई नहीं है। निजी हित, या संकुचित स्वार्थ से ऐसा करना निंदनीय है। इसलिए यह विचार करना होगा कि पुण्य प्रसून वाजपेयी किन कारणो से आप और केजरीवाल का समर्थन कर रहे हैं।

लेकिन ऐसा नहीं होता कि हम किसी नेता या पार्टी की किसी मुद्दे या प्रसंग पर आलोचना करते हैं तो उससे निजी दुश्मनी या विरोध हो जाता है। इसी तरह हम किसी मुद्दे या प्रसंग पर किसी नेता या पार्टी का समर्थन करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे हमारे दोस्त ही हो गए। व्यक्तिगत जान पहचान और संबंध मनुष्य का स्वभाव है। यह पत्रकारों के साथ भी होता है। कई बार ब्रेक में या कार्यक्रम के बाद नेता पूछते हैं कि मैंने अमुक बात बोली वो ठीक था या नहीं और हम लोग उसका उत्तर देते हैं। कई बार सुझाव भी देते हैं कि आपको यह बोलना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि हम बिक गए या बेईमान हो गए। यह एक स्वाभाविक स्थिति है।

पत्रकार यदि हर समय पत्रकार ही हो जाए तो फिर वह मनुष्य नहीं रहेगा। वह अपने प्रति, अपने परिवार दोस्तों के प्रति भी संवेदनहीन हो जाएगा। पत्रकार को तो संवेदनशील होना ही चाहिए। उसे स्पंदनशील भी होना चाहिए। उसे अपने पेशेवर काम और व्यक्तिगत संबंधों में अंतर करने की कला आनी चाहिए। हम किसी पर लेख, टिप्पणी या बहस में हमला करते हैं, लेकिन उसके बाद सहज वातावरण में बातचीत होती है, हम साथ में नाश्ता करते हैं…समीक्षा भी करते हैं। कई बार किसी पार्टी के कार्यालय में या नेता के घर जाते है तो उनके साथ बैठते हैं और किसी बात पर राय भी दे देते हैं। देश के मुद्दों पर चर्चा करते हैं। यह जीवन की स्वाभाविक स्थिति है।

हमारे देश में आजादी के संघर्ष से लेकर आधुनिक समय तक अनेक बड़े नेता हुए हैं जो पत्रकार भी रहे हैं। पत्रकार के राजनीतिक रुप से सक्रिय होने या राजनीति में आ जाने या किसी राजनीतिक विचार का पक्षधर होना किसी भी दृष्टि से अनैतिक या गलत नहीं है। हां, उसे यह अवश्य ध्यान रखना होगा कि जब वह समाचार दे रहा हो तो उस पर हाबी न हो जाए। उस समय वह निरपेक्ष हो।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


इसे भी पढ़ें…

केजरीवाल-पुण्य प्रसून वीडियो : ये कोई स्टिंग नहीं है, रॉ फुटेज का आखिरी का संयोगवश रेकॉर्ड हो गया हिस्सा है

xxx

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की साख पर बट्टा लगाने वाले इस वीडियो / स्टिंग की सच्चाई क्या है?

xxx

आजतक के एडिट रूम से वीडियो को लीक करा के मोदी की तकनीकी सेना के पास पहुंचाया गया

ज़ी न्यूज़ पर केजरी-प्रसून के संबंध में जारी वीडियो क्लिप्स पर चर्चा चल रही है

पंकज कुमार झा : ज़ी न्यूज़ पर केजरी-प्रसून के संबंध में जारी वीडियो क्लिप्स पर चर्चा चल रही है. अपने पुराने कर्मचारी से शायद हिसाब चुकता करेगा आज यह चैनल….दिलचस्प. पुण्य प्रसून और केजरीवाल का अन्तरंग वीडियो कल से नेट पर वायरल हो रहा है. शायद एक लंबे साक्षात्कार के बाद की बातचीत को इसमें चुपके से फिल्मा लिया गया है. इसमें मोटे तौर पर प्रसून निर्देश लेते दिख रहे हैं कि क्या दिखाया जाय और किसे कितना दिखाया जाय.

इस क्लिप्स ने सबूत भले दे दिया हो लेकिन कोई नई बात नही है इसमें. अन्य बड़े कहे जाने वाले मीडिया पेशेवरों की तरह ही प्रसून का चरित्र भी शुरू से खराब रहा है. अभी कुछ दिन पहले ही एक फोटो भी नेट पर खूब जारी हुआ था जिसमें आआपा की कोर टीम के साथ अकेले में गलबहियां कर 'अनैतिक संबंध' का पाप बटोर रहे थे पुण्य. इससे पहले भी छत्तीसगढ़ की एक संदिग्ध रिपोर्टिंग कर गोयनका पुरस्कार कबार चुके हैं ये. मुझे तब भी पूरी आशंका थी और आज भी है कि नक्सलियों द्वारा दिए गये इनपुट को अपने शब्दों में उतार सीधे स्टोरी कर ली गयी थी तब भी.

फिर पुण्य ही क्यूँ? आशुतोष ने ढके-छुपे 'व्यवसाय' करने के बाद अब खुलेआम लाइसेंसी 'धंधा' शुरू कर दिया है. इससे पहले एक टेप में आपने वीर संघवी को नीरा के तलवे चाटते सुना ही होगा. बरखा दत्त किस तरह राडिया की नौकरी कर रही थी ये भी उसी टेप से ज़ाहिर हुआ था. और भी दर्ज़नों देह तब भी वस्त्रहीन हुए ही थे. कुछ दिन पहले ही सौ करोड़ की 'फिरौती' वसूलते भी एक ऐसे ही दुकानदार को और देखा था आपने, जेल भी गए थे बेचारे. तो आखिर क्या किया जाय? कुछ भी मत कीजिये. बस इस मुख्यधारा कहे जाने वाले बिचौलियों पर भरोसा करना छोड़ दीजिये. कोर्पोरेट मीडिया की खबर को बस विज्ञापन समझिये. और कोई बात नहीं. हाँ… सोशल मीडिया किस तरह मुख्यधारा मीडिया के रूप में स्थापित हो इसकी जुगत भिड़ाते रहिये. आज न कल ज़रूर सफल होंगे.

आआपा के अस्तित्व में आने से भी मीडिया के बहुत सारे सारे चेहरे बे-नकाब हुए हैं. इसे एक उपलब्धि ही समझिये. दो पैसे की हाड़ी गयी, कुत्ते की जात पहचानी गयी.

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े पत्रकार पंकज कुमार झा के फेसबुक वॉल से.


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


इसे भी पढ़ें…

केजरीवाल-पुण्य प्रसून वीडियो : ये कोई स्टिंग नहीं है, रॉ फुटेज का आखिरी का संयोगवश रेकॉर्ड हो गया हिस्सा है

xxx

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की साख पर बट्टा लगाने वाले इस वीडियो / स्टिंग की सच्चाई क्या है?

xxx

आजतक के एडिट रूम से वीडियो को लीक करा के मोदी की तकनीकी सेना के पास पहुंचाया गया

इलाहाबाद में कैनविज टाइम्स के क्राइम रिपोर्टर को छात्रनेता ने पीटा

कैनविज टाइम्स, इलाहाबाद के ब्यूरो ऑफिस के क्राइम रिपोर्टर अनुराग तिवारी होली के विज्ञापन के लिए सीएमपी डिग्री कॉलेज के महामंत्री के पास गए. इस दौरान पैसों को लेकर अनबन होने के कारण कॉलेज के महामंत्री और उनके साथ कुछ अन्य छात्र नेताओं ने कैनविज टाइम्स के संवाददाता की जमकर धुनाई कर दी.

बता दें कि इलाहाबाद के ब्यूरो ऑफिस में खबरों पर कम और विज्ञापन पर अधिक जोर दिया जाता है. संवाददाता को ही विज्ञापन लाने की जिम्मेदारी होती है. इन्हीं सब मामलों की वजह से ऑफिस से आधे दर्जन से अधिक लोगो में यहां से भाग चुके हैं.

आप अपनी राय, टिप्पणी, प्रतिक्रिया, खबर, सूचना, जानकारी भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

नवजोत सिद्धू MH1 से और नीरज पटेल News Nation से जुड़े

वरिष्ठ पत्रकार नवजोत सिद्धू MH1  से जुड़ गयी हैं. वो मेनिजिंग एडिटर बनी हैं. चैनल की सारी जिम्मेदारी उन्हें दी गयी है. नवजोत सिद्धू पिछले बारह साल से मीडिया में काम कर रही हैं. इससे पहले वो आजतक, ANI, PTC, हिंदुस्तान टाइम्स, प्रज्ञा और जनता टीवी में भी कार्यरत रही हैं. नवजोत सिद्धू एंकर भी रही हैं. उन्हें पुरस्कार भी मिल चुका है.

न्यूज नेशन न्यूज चैनल से खबर है कि यहां नीरज पटेल ने इनपुट में एसोसिएट प्रोड्यूसर के बतौर ज्वाइन किया है…आईआईएमसी नई दिल्ली से पास आउट नीरज इससे पहले हिन्दुस्तान, अमर उजाला और इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित मैग्जीन में सेवाएं दे चुके हैं…. अपनी बेबाक शैली और तेजतर्रार पत्रकारिता के लिए जाने वाले नीरज अपने तेवर के कारण आगरा के पत्रकारिता जगत में खासे चर्चा में रहे हैं.. रिपोर्टिंग के दौरान भ्रष्टाचार से जुड़े कई खुलासे किए है….

आप अपनी राय, टिप्पणी, प्रतिक्रिया, खबर, सूचना, जानकारी भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

कानपुर के डीआईजी और आईजी को भी तत्काल हटाएं : हाईकोर्ट

लखनऊ : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आज राज्य सरकार द्वारा अब तक आईजी ज़ोन तथा डीआईजी रेंज, कानपुर को नहीं हटाये जाने के पर गहरी नाराजगी जताते हुए आदेशित किया कि उनके साथ इस मामले से जुड़े अन्य सभी पुलिसकर्मी को तत्काल कानपुर से हटाया जाये. जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस डी के उपाध्याय की बेंच ने यह आदेश डॉक्टरों की हड़ताल के बारे में स्वतः संज्ञान में लिए तथा सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल की सुनवाई के समय दिया.

आज वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी उत्तर प्रदेश मेडिकल एसोसियेशन की तरफ से उपस्थित हुए और उन्होंने अवकाशप्राप्त जस्टिस आर एम चौहान को न्यायिक जांच आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने पर ऐतराज़ जाहिर किया. कोर्ट ने आदेशित किया कि कोई भी मेडिकल छात्र अपनी बात न्यायमित्र जे एन माथुर के माध्यम से कोर्ट के सम्मुख रख सकता है. मामले की अगली सुनवाई बुधवार 12 मार्च को होगी.

 

विधायक स्तर के नेता के यहां बड़े-बड़े संपादक, ब्यूरो चीफ अपने पैरों पर चलकर क्यों पहुंचे

संपादक स्तर के लोग अपने स्तर का खास ध्यान रखते हैं और स्तरीय कार्यक्रम में ही शिरकत करते हैं. प्रधानमंत्री के दौरे से लेकर मुख्यमंत्री के दौरे तक में संपादक या ब्यूरो चीफ दिख जाते हैं.. इससे कम पर नाक भौं सिकोड़ते हैं. पर ये संपादक और ब्यूरो चीफ लोग केवल विधायक स्तर के नेता के कार्यक्रम में अपने पैरों पर चलकर पहुंच जाएं तो सोचना पड़ता है कि माजरा क्या है.

बहुत बड़ा मामला न हो तो संपादक और ब्यूरो चीफ लोग कदम बाहर नहीं निकालते. लेकिन कांग्रेस से विद्रोही हुए एक विधायक स्तर के नेता के एक सम्मेलन को कवर करने संपादकों और वरिष्ठ ब्यूरो चीफ लाइन में हों.. छोटे स्तर के रिपोर्टर इन नेताजी के गेस्ट को एटेंड करें… तो फिर ये अदा बेसबब नहीं गालिब, कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है…

चलिए बता ही देते हैं. ये संपादक और ब्यूरो चीफ लोग इस नेता जी के अखबार व टीवी चैनल में काम करते हैं, इसलिए मजबूरी में, नौकरी चलाने बचाने के वास्ते आए. हाल में कांग्रेस छोड़ने वाले हरियाणा के अंबाला के विधायक और प्रदेश के मुख्यमंत्री के करीबी विनोद शर्मा ने रविवार को पार्टी छोड़ने के बाद हरियाणा के कु़रुक्षेत्र में सम्मेलन करके शक्तिप्रदर्शन किया. इसे कवर करने संडे गार्डियन जैसे अखबार के चंडीगढ के स्थानीय संपादक संजय शर्मा, इंडिया न्यूज हरियाणा चैनल के संपादकीय सलाहकार केबी पंडित और आज समाज अखबार अंबाला के प्रकाशन स्थल के ब्यूरो प्रमुख रवि जसवाल नेता जी के पंडाल में पेन कापी लेकर बैठे नजर आए. उधर छोटे मोटे रिपोर्टर बेचार गेस्ट लोगों को चाय पानी पिलाते नजर आए… भाई हो क्यों न? आज समाज अखबार और इंडिया न्यूज हरियाणा सीधे तौर नेता जी के घर के हैं. दोनों के हेड के तौर पर उनके सुपुत्र हैं. संडे गार्डियन जैसे अखबार की फ्रेन्चाइजी उनके पास है.

यहां बता दूं कि जो संपादक स्तर के लोग यहां प्रेस दीर्घा में बैठे नजर आए, वो जब नेता जी के अधीन नहीं थे, तो वो शाही रिपोर्टिंग किया करते थे… संजय शर्मा टाइम्स आफ इंडिया में या तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की खबरें करते थे या फिर तीन तीन राज्यों को प्रभावित करने वाले मामलों के लिए बाहर निकलते थे… रैली कवर करने का अध्याय तो उनका मुद्दत पहले बंद हो गया था… केबी पंडित अरसे पहले हिंदुस्तान के विशेष संवाददाता होते हुए सीएम की रैली भी जल्द से कवर करने न जाते थे… रवि जसवाल बहुत सीनियर है, बूढे हो गए हैं…

लेकिन सवाल नेता जी का था न… दूसरा पहलू भी देखें… आज इन मीडिया संस्थानों में होते हुए भी ये सीनियर लोग दूसरे नेताओं के कार्यक्रम में तो ऐसे नहीं जाते… बेचारे मीडिया संस्थान के मार्केटिंग वाले गेट पर खड़े मेहमानों को रास्ता बता रहे थे… इंडिया न्यूज हरियाणा वाले सुबह से शाम तक लाइव कवरेज करते रहे… और किसी चैनल ने नहीं किया… उधर नवीन जिंदल ने अपने चैनल के रिपोर्टरों को कहा कि छोड़ो विनोद शर्मा की रैली और मेरी कार्यकर्ता मीटिंग को कवर करने आओ… अंत में नेता जी का नखरा देखो… अपनी आधी अधूरी बात मंच से कहकर मीडिया के सवालों का जवाब देने से मना कर दिया…

तहलका फेम पत्रकार आशीष खेतान को ‘आप’ ने नई दिल्ली सीट से उतारा

लोकसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी की तरफ से 60 उम्मीदवारों की चौथी सूची जारी की गई है जिसमें खोजी पत्रकार आशीष खेतान को नई दिल्ली सीट से उम्मीदवार बनाया गया है. खेतान तहलका के पत्रकार रह चुके हैं.  आशीष खेतान ने तहलका के बाद गुलेल डॉट कॉम की स्थापना की और बीते दिनों में कई स्टिंग किए. नई दिल्ली सीट को लेकर चर्चा थी कि यहां से अरविंद केजरीवाल चुनाव लड़ सकते हैं.

आशीष खेतान की घोषणा के साथ ही आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के सात लोकसभा सीटों में से छह के नाम का एलान कर दिया है जिनमें छह में से तीन पत्रकार हैं. आशुतोष चांदनी चौक से उम्मीदवार हैं तो जरनैल सिंह पश्चिमी दिल्ली से. दक्षिणी दिल्ली से आम आदमी पार्टी ने कर्नल देवेंद्र सहरावत को प्रत्याशी बनाने की घोषणा की है.

उत्तर प्रदेश में पीलीभीत से राजीव अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया जा रहा है, जबकि आंवला से नरेश सिंह आप पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ेंगे. 'आप' की ओर से बरेली सीट पर सुनील कुमार खड़े होंगे, जबकि लखीमपुर से इलियास आज़मी को टिकट दिया गया है. फूलपुर सीट से कांग्रेस ने क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को प्रत्याशी बनाया है, और अब आम आदमी पार्टी ने उस सीट पर शिमला श्री को टिकट दिया है. मौजूदा केंद्रीय गृहराज्य मंत्री आरपीएन सिंह की सीट कुशीनगर से 'आप' ने अखंडप्रताप सिंह को प्रत्याशी बनाया है.

हरियाणा में कांग्रेस नेता तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा की सीट अम्बाला से 'आप' ने एसपी सिंह को उम्मीदवार बनाया है. घोषित की गई शेष तीन सीटों – फरीदाबाद, करनाल और भिवानी – से क्रमशः पुरुषोत्तम डागर, परमजीत तथा ललित अग्रवाल को टिकट दिया गया है. पंजाब की संगरूर सीट से जाने माने कॉमेडियन भगवंत मान को टिकट दिया गया है. आज जारी की गई सूची में उत्तर प्रदेश की 38, कर्नाटक की 13, हरियाणा की चार, पंजाब की तीन तथा दिल्ली की दो सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा की गई है.

दिल्ली टाइम्स (टीओआई) वालों की गैर-जिम्मेदारी… ‘क्वीन’ फिल्म की कहानी गलत बता दी…

Parul Jain:  how irresponsible Delhi times (Times of India) is. today on page no 6 (must see must do), brief story of queen is given. where it is written that rani's wedding cancelled due to a car accident of her fiance which is totally wrong.

Parul Jain : 'क्वीन', 2014 में अभी तक रिलीज़ फिल्मों में ये फ़िल्म 'क्वीन' है। एक गुड गर्ल के कॉंफिडेंट गर्ल बनने की कहानी। विकास बहल ने हूबहू दिल्ली को परदे पर उतार दिया है। हर किरदार के कपडे, यहाँ तक की फुटवियर पर भी पूरा ध्यान दिया है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म के एक सीन में जब शादी से एक दिन पहले रानी विजय से मिलने आती है तो पैरों में हवाई चप्पल पहने होती है। फ़िल्म सच्चाई के काफी करीब है।

हर लड़की रानी के किरदार में कहीं न कहीं अपने आप को पायेगी। विकास और उनकी टीम ने फ़िल्म के छोटे से छोटे पहलु पर खास ध्यान दिया है , फिर चाहे वह रानी के पिता और छोटे भाई का विजयलक्ष्मी के प्रति आकर्षण हो या फिर रानी का एम्स्टर्डम के रेस्टॉरेंट ऑनर के प्रति आकर्षण। कुल मिला कर फ़िल्म बिलकुल भी मिस करने लायक नहीं है। a must watch.

पत्रकार पारूल जैन के फेसबुक वॉल से.

केजरीवाल और पुण्य प्रसून के बीच ‘सेटिंग’ वाले वीडियो को लेकर अखबारों में भी छपी खबरें

अरविंद केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी में आफ द रिकार्ड बातचीत वाले वीडियो के लीक हो जाने व सोशल मीडिया पर वायरल हो जाने के बाद इससे संबंधित खबरें अखबारों में भी चटखारे लेते हुए छपी है. नवभारत टाइम्स, प्रभात खबर, दैनिक जागरण सहित कई अखबारों की यह खबर सुर्खियां बनी है… अखबारों में क्या छपा है, इसे जानने के लिए नीचे दी गई खबरें पढ़ें…

नवभारत टाइम्स

सामने आया केजरीवाल की 'मीडिया से सेटिंग' का विडियो

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अरविंद केजरीवाल अक्सर मीडिया पर पक्षपाती होने का आरोप लगाते हैं, लेकिन एक ऐसा विडियो सामने आया है, जिसमें वह खुद मीडिया से 'सेटिंग-गेटिंग' करते दिख रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह विडियो केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू के बाद का है। यूट्यूब पर इस 1 मिनट के विडियो को 'अरविंद केजरीवाल ऐंड पुण्य प्रसून बाजपेयी एक्सपोज्ड' नाम से अपलोड किया गया है और इसे खूब देखा जा रहा है।

न्यूज एंकर पुण्य प्रसून बाजपेयी से ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में केजरीवाल उन्हें बता रहे हैं कि इंटरव्यू के कौन से हिस्से को महत्व देना है और बार-बार दिखाना है। केजरीवाल इसमें कहते दिखाए गए हैं कि मैं निजीकरण के खिलाफ नहीं बोलना चाहता। इसके जवाब में वाजपेयी उन्हें सलाह दे रहे हैं, 'हाशिए पर जो 80% समाज है, इस पर आप आ जाइए न। देश में असल वोट बैंक तो यही है ना।' जवाब में अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं, 'हां, मैं यह बोलना भूल गया। इस पर बोलूंगा मैं।' इसके बाद केजरीवाल कह रहे हैं, 'वह वाला ज्यादा चला दीजिएग।' जवाब में न्यूज एंकर कहते हैं, 'अरे वो चलेगा। बहुत क्रांतिकारी है। भगत सिंह वाले पर तो बहुत प्रतिक्रया आएगी।'

इस विडियो को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है। खास बात यह है कि इसे उसी दिन अपलोड किया गया है जिस दिन केजरीवाल ने मीडिया के एक हिस्से पर उनके खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगाया था।


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


प्रभात खबर…

केजरीवाल की परेशानी बढ़ी पहले वीडियो जारी अब पिता पर घोखाधड़ी का आरोप

नयी दिल्लीः आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल विवादों में घिरते जा रहे हैं एक ओर जहां केजरीवाल का विवादस्पद वीडियो जारी हुआ है वहीं उनके पिता पर धोखाधड़ी का आरोप लगा है. यूट्यूब पर एक वीडियो जारी हुआ है इसमें केजरीवाल को मीडिया से सेटिंग करते हुए दिखाया गया है, तो दूसरी ओर  केजरीवाल के पिता पर रिश्तेदारों से फर्जी कागजात की मदद से जमीन हड़पने का आरोप लग रहा है. अरविंद की  बुआ का बेटा होने का दावा करने वाले रामविलास ने केजरीवाल के पिता पर आरोप लगाया है  कि वह अपने परिवार के साथ हरियाणा के झज्जर जिले के बहादुरगढ़ में इलाके में रहते हैं .उनके नाना मंगलचंद ने मां सीता देवी को जमीन लिखी थी.

भिवानी जिले के सिवानी में उनके परिवार की 1 लाख 28 हजार गज जमीन थी, जिसमें से उनके हिस्से में 16 हजार गज जमीन थी. रामविलास ने आरोप लगाया कि गोविंद राम को जनरल पावर ऑफ अटार्नी बनाया गया था लेकिन उन्होंने इसका गलत इस्तेमाल करते हुए कागजों में हेराफेरी कर जमीन हड़प ली. केजरीवाल पर लग रहे इस तरह के आरोपों पर आम आदमी पार्टी के पास भी कोई जवाब नहीं है पार्टी ने कहा है कि हर बात के लिए जवाब देना जरूरी नहीं.

गौरतलब है कि केजरीवाल अक्सर मीडिया पर पक्षपाती होने का आरोप लगाते आये हैं. लेकिन इस वीडियो के सामने आने के बाद उनका एक और रूप सामने आ गया है. बताया जा रहा है वीडियो केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू के बाद का है. वीडियो यूट्यूब में खूब देखा जा रहा है. एक मिनट के इस वीडियो को 'अरविंद केजरीवाल ऐंड पुण्य प्रसून बाजपेयी एक्सपोज्ड' नाम से यूट्यूब पर अपलोड किया गया है.

न्यूज एंकर से बातचीत में केजरीवाल उन्हें बता रहे हैं कि इंटरव्यू के कौन से हिस्से को महत्व देना है और बार-बार दिखाना है. केजरीवाल इसमें कहते दिखाए गए हैं कि मैं निजीकरण के खिलाफ नहीं बोलना चाहता. इसके जवाब में न्‍यूज एंकर उन्हें सलाह दे रहे हैं, 'हाशिये पर जो 80% समाज है, इस पर आप आ जाइए न. देश में असल वोट बैंक तो यही है ना.' जवाब में अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं, 'हां, मैं यह बोलना भूल गया. इस पर बोलूंगा मैं.' इसके बाद केजरीवाल कह रहे हैं, 'वह वाला ज्यादा चला दीजिएग.' जवाब में न्यूज एंकर कहते हैं, 'अरे वो चलेगा. बहुत क्रांतिकारी है. केजरीवाल के इस वीडियो को तेजी के साथ सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है. फेसबुक पर इस वीडियो को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया भी आने लगी है.


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


हरिभूमि

केजरीवाल का मीडिया से सेटिंग की बात करते हुए एक वीडियो आया सामने

नई दिल्ली. आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल का एक ऐसा विडियो सामने आया है, जिसमें वह खुद मीडिया से सेटिंग करते दिख रहे हैं। केजरीवाल जो हमेशा मीडिया पर पक्षपाती होने का आरोप लगाते हैं। उनका यह विडियो दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू के बाद का है। यूट्यूब पर इस एक मिनट के विडियो को 'अरविंद केजरीवाल ऐंड पुण्य प्रसून बाजपेयी एक्सपोज्ड' नाम से अपलोड किया गया है और जिसे खूब देखा जा रहा है।
 
पुण्य प्रसून बाजपेयी से ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में केजरीवाल उन्हें बता रहे हैं कि इंटरव्यू के कौन से हिस्से को महत्व देना है और बार-बार दिखाना है। केजरीवाल इसमें कहते दिखाए गए हैं कि मैं निजीकरण के खिलाफ नहीं बोलना चाहता। इसके जवाब में वाजपेयी उन्हें सलाह दे रहे हैं, 'हाशिए पर जो 80% समाज है, इस पर आप आ जाइए न। देश में असल वोट बैंक तो यही है ना।' जवाब में अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं, 'हां, मैं यह बोलना भूल गया। इस पर बोलूंगा मैं।' इसके बाद केजरीवाल कह रहे हैं, 'वह वाला ज्यादा चला दीजिएगा' जवाब में न्यूज एंकर कहते हैं, 'अरे वो चलेगा। बहुत क्रांतिकारी है। भगत सिंह वाले पर तो बहुत प्रतिक्रया आएगी।'
 
इस विडियो को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है। खास बात यह है कि इसे उसी दिन अपलोड किया गया है जिस दिन केजरीवाल ने मीडिया के एक हिस्से पर उनके खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगाया था।


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


दैनिक जागरण

केजरीवाल का वीडियो लीक: ऑफ द रिकॉर्ड जारी हुआ बयान

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को मीडिया को कोसने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। एक मीडिया हाउस ने वीडियो क्लीप जारी की है, जो केजरीवाल के ऑफ द रिकॉर्ड इंटरव्यू का हिस्सा है। वीडियो में केजरीवाल एंकर से कह रहे हैं कि साक्षात्कार के किस खास हिस्से को प्रमुखता से टीवी पर दिखाना है। केजरीवाल ने रविवार को कहा था, मीडिया मेरे साथ पक्षपात कर रहा है। मेरे खिलाफ चीजों को ज्यादा दिखाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा था, मैंने नरेंद्र मोदी द्वारा किसानों की जमीनें लेकर अदानी ग्रुप को दिए जाने की बात कही थी, जो किसी टीवी चैनल ने नहीं दिखाई। वहीं मेरे सरकारी मकान का विवाद दिनभर चैनलों पर चलता रहा।

वीडियो केजरीवाल के साक्षात्कार के बाद वाले हिस्से का है, जिसमें वे एंकर से कह रहे हैं कि फलाना हिस्सा अच्छा है, कृप्या आप उसे ज्यादा दिखाना। एंकर ने केजरीवाल से कहा, हां वो भगत सिंह वाला हिस्सा अच्छा है, उस पर खूब प्रतिक्रियाएं आएंगी।


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


इसे भी पढ़ें…

केजरीवाल-पुण्य प्रसून वीडियो : ये कोई स्टिंग नहीं है, रॉ फुटेज का आखिरी का संयोगवश रेकॉर्ड हो गया हिस्सा है

xxx

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की साख पर बट्टा लगाने वाले इस वीडियो / स्टिंग की सच्चाई क्या है?

xxx

आजतक के एडिट रूम से वीडियो को लीक करा के मोदी की तकनीकी सेना के पास पहुंचाया गया

नक्सलियों से लड़ते हुए मारे गए सिपाही को माले वाले दीपांकर भट्टाचार्य ने शहीद करार दिया!

Samar Anarya : भाकपा माले लिबरेशन के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य 'नक्सलियों' से लड़ते हुए 'शहीद' हो गए सिपाही के लिए सम्मान और मुआवजा मांग रहे हैं. जियो, मधु किश्वर की दलालों को पोलित ब्यूरो में रख और पंहुचते भी कहाँ तुम. बाकी ये बता दो कि लिबरेशन के 'अंडरग्राउंड' होने के दिनों में उसके हथियारबंद दस्ते के हाथों मारे गए पुलिस वालों को लिए भी 'शहीद' का दर्ज मांगोगे या नहीं? और अगर उनके लिए माँगा तो जान दे आये अपने कामरेडों को क्या कहोगे?

बतौर एक मार्क्सवादी मानवाधिकार कार्यकर्ता मैं दोनों तरफ की हिंसा के खिलाफ हूँ क्योंकि मरते दोनों तरफ से सर्वहारा ही हैं. इसीलिए लगातार पुलिस वालों पर एम्बुश और माओवादियों की असली/फर्जी मुठभेड़ों में हत्या का विरोध करता रहा हूँ. इस विषय पर जागरण के लिए लिखे एक लेख का लिंक http://www.mofussilmusings.com/2013/05/blog-post_30.html भी लगा रहा हूँ. पर सब कुछ के बाद एक राजनैतिक विचारधारा के लिए लड़ रहे लोगों के खिलाफ राज्य दमन का हिस्सा बन रहे पुलिस कर्मी को शहीद कहना? उफ़….

आप भी पढ़ें खबर, दैनिक जागरण में प्रकाशित…


शहीद नेहाल को मिले सम्मान व मुआवजा

http://www.jagran.com/bihar/katihar-11139398.html

संवाद सूत्र, आजमनगर (कटिहार) : बिहार की सरकार दायित्वों (निकम्मी)का निर्वहन नहीं कर रही है। देश की खातिर नक्सलियों से लोहा लेने के दौरान अपनी जान गंवाने वाले शहीद नेहाल आलम के शोक संवेदना में दो शब्द भी व्यक्त नहीं करना इस सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाती है। उक्त बातें भाकपा माले के राष्ट्रीय सचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने शहीद नेहाल के गांव दमदमा में बुधवार को परिजनों से मिलने के बाद कही। उन्होंने कहा कि बिहार के अल्पसंख्यक नौजवान पर आतंकवादी का ठप्पा लगाकर परेशान किया जा रहा है। शहीद नेहाल आलम के नक्सली विस्फोट में ड्यूटी के दौरान शहीद होने पर बिहार सरकार अगर सही सम्मान दिलाने एवं परिजनों की मदद नहीं करती है तो भाकपा माले आगे भी लड़ाई जारी रखेगी। इस अवसर पर पूर्व विधायक महबूब आलम, जुही महबूबा, असगर अली, उमेश यादव, सिकंदर आलम, सोहराब अली, काजी नजरूल, मो. नसीम, गुलजार आलम, मो. काजीम, खिदीर बख्स, शमसूल हक, मो. यासीन, मो. मेराजुल, मो. आतिफ, मो. सहाबुद्दीन आदि उपस्थित थे।


अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' उर्फ समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.

रामगोपाल यादव की भड़ास : चुनाव तक समाचार न देखें, सिर्फ पिक्चर व गाने सुनना

लखनऊ। टूंडला में सपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं सासद प्रो. रामगोपाल यादव शनिवार को फिर मंच से मीडिया पर बरसे। जनसभा में उन्होंने जनता और कार्यकर्ताओं को चुनाव तक टीवी तथा अखबार से दूर रहने की सलाह दी। सपा प्रत्याशी अक्षय यादव के कार्यालय के शुभारंभ समारोह में उन्होंने कहा कि चैनल रुपए लेकर किसी को भी आगे पीछे कर देते हैं। मीडिया के मालिक व वरिष्ठ पत्रकार हमारे आदमी नहीं हैं। इसलिए चुनाव तक सिर्फ पिक्चर व गाने सुनना।

रामगोपाल ने कार्यकर्ताओं से कहा कि आपको हतोत्साहित करने को झूठी खबरें चलाएंगे। डॉक्टरों की हड़ताल पर मुलायम सिंह के बयान का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि हर रोज लखनऊ में औसतन दस- बारह लोग इलाज के दौरान मरते हैं। इसमें नई बात कौन सी है, लेकिन मीडिया ने सपा सरकार को बदनाम करने के लिए झूठी खबरें दिखाई। साथ ही नेताजी के बयान को भी गलत दिखाया।

पत्रकार ओमप्रकाश चौरसिया का निधन : साथ छूट जाता है, यादें रह जाती हैं

एक और पत्रकार साथी ओम प्रकाश चौरसिया का साथ छूट गया. कोलकाता के अस्पताल में कैंसर का इलाज कराने के दौरान उनकी मौत हो गयी. हाल में हमने अपने कई पुराने साथियों को खोया है. चाहे शशिकांत हों, राजीव हों, बुद्धदेव हों या धर्मेद्र हों, मौत की हर खबर के बाद मन विचलित होता रहा. मन में अनेक सवाल उठते रहे. कैसे देखते-देखते जीवन खत्म हो जाता है. इस बार भी यही सवाल उठ रहे हैं. ओमप्रकाश का मेरा 25 सालों से ज्यादा का संबंध था. गुमला में वह रहते थे. रात हो या दिन, सुविधा हो या नहीं, काम पर कोई फर्क नहीं दिखा. जज्बेवाले पत्रकार. कभी शिकायत नहीं की. सीमित संसाधन में काम के बल पर आगे बढ़ने का तेवर.

संवेदनशील पत्रकार और उससे बेहतर इंसान. 17 साल पहले ओमप्रकाश की खबर हमने छापी थी कि कैसे परमवीर चक्र विजेता शहीद अलबर्ट एक्का की विधवा अभाव में जी रही हैं. यह खबर छपने के बाद कार्यक्रम कर सहायता राशि जमा की गयी थी. एक बड़ी राशि अलबर्ट एक्का की विधवा को दी गयी थी. जैसे ही अ़ोमप्रकाश की मौत की खबर मिली, 17 साल पहले छपी अलबर्ट एक्का वाली रिपोर्ट आंखों के सामने से गुजरने लगी. यानी व्यक्ति का काम बोलता है. व्यक्ति चला जाता है, पर उसके काम याद आते हैं. दुनिया का कटु सत्य है कि एक न एक दिन तो हर व्यक्ति को यहां से जाना है. कोई इस धरती का स्थायी बाशिंदा नहीं है. जो व्यक्ति समाज-देश के लिए जितना अच्छा  करता है, उसे उतना ही याद किया जाता है.

धार्मिक ग्रंथ भी तो यही संदेश देते हैं. कर्म की प्रधानता. अच्छा कर्म करो, दूसरों को पीड़ा न दो, बेहतर इंसान बनो, दूसरों की सहायता करो. मां-पिता, परिवार, समाज के प्रति अपना दायित्व निभाओ. ये सारी बातें हर कोई जानता है. वह यह भी जानता है कि इस धरती पर हर कोई खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है. आप भले ही लखपती हों, करोड़पति हों या अरबपति, आप एक पैसा भी साथ नहीं ले जा सकते. धन-दौलत, नाते-रिश्ते सब यहीं छूट जाते हैं.  फिर भी गलती पर गलती करता है. पाप करता है. अनैतिक तरीके से धन जमा करता है. भौतिक चकाचौंध में इस बात को मनुष्य भूल जाता है कि  वह किस्मतवाला है, क्योंकि उसने मनुष्य जाति में जन्म लिया है. ईश्वर ने उसे कुछ करने का अवसर दिया है. काश! इस अवसर का मनुष्य लाभ उठा पाता और इसका सही-सही उपयोग कर पाता. काश! देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे भ्रष्ट राजनेता-अफसर ईश्वर की लीला को थोड़ा भी समझ पाते.

लोग याद तो अच्छे और बुरे दोनों व्यक्तियों को करते हैं. जो अच्छा काम करते हैं, उन्हें बेहतर कामों के लिए लोग याद करते हैं. उनकी कमी खलती है. जो गलत काम कर दुनिया से जाते हैं, लोग उन्हें भी याद करते हैं. साथ ही यह कहना भी नहीं भूलते- चलो, अच्छा हुआ कि चला गया, वरना कितनों की जिंदगी और बर्बाद कर देता. अब इंसान को तय करना है कि वह किस रूप में याद करना पसंद करता है.

व्यक्ति जब साथ होता है तो उसका महत्व पता नहीं चलता. यही तो हर इंसान की कमजोरी है. जमाना तेजी से बदल रहा है. परिवार टूट रहे हैं. बुजुर्ग माता-पिता अकेले में किसी तरह जिंदगी के दिन काटते हैं. अकेलापन खलता है. अच्छे पदों पर बैठे बेटों को मां-पिता की सेवा की चिंता नहीं रहती. जब वही माता-पिता दुनिया से विदा ले लेते हैं, तब मां-पिता याद आने लगते हैं. उनका महत्व पता चलता है. लेकिन तब तक काफी विलंब हो गया होता है. पछताने से मां-पिता, मित्र लौटते नहीं हैं. ईश्वर किसी को धरती पर भेजने के पहले उसकी जिंदगी-मौत तय कर देता है. यह इंसान की कमजोरी है जो उस समय को पढ़ नहीं पाता. यह समय अनंत नहीं होता है. कब किसका बुलावा आ जाये, कोई नहीं जानता. बेहतर है कि समय का उपयोग अच्छे काम में करें. अगर साधन है, तो उसे अच्छे काम में लगायें. समाज/परिवार या देश के भले में उसका उपयोग करें. इतिहास याद करेगा. पछतावा नहीं रहेगा.

लेखक अनुज सिन्हा हिंदी दैनिक प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक हैं.

मीडिया पर दलाल होने का इल्ज़ाम लगाने वालों के लिए कुछ बातें

Mayank Saxena : पत्रकारिता के पिछले 8 साल के अनुभव में न जाने कितने लोग मिले जो चिरौरी करते थे कि कहीं से एक फ़र्ज़ी प्रेस कार्ड बनवा दो…कई ऐसे लोग मिले जो चैनल का स्टीकर चाहते थे, गाड़ी पर लगाने के लिए…कई ऐसे लोग मिले, जिन्होंने क्रेडिट कार्ड और इंश्योरेंस बेचते हुए भी गाड़ी पर प्रेस लिखवा रखा था…ऐसे तमाम लोग मिले जो कहते रहे, "यार तुम्हारे साथ के लोगों ने फ्लैट बुक करवा लिया…गाड़ी ले ली…कैसे पत्रकार हो.."

ऐसे लोग भी मिले जो नेताओं से काम करवाने के एवज में मोटी धनराशि का प्रस्ताव देते रहे… मज़े की बात ये है कि आज इनमें से लगभग सभी मिल कर मीडिया को बेईमान कहते हैं…हर बात पर मीडिया के चरित्र की बात करते हैं… जाने दो भाई, कभी लाइन में लग कर रेल का टिकट तो लिया नहीं…मीडिया को सिखाने निकले हो…सबकी असलियत जानते हैं हम!

xxx

Nitin Thakur : कारपोरेट के दबाव में मीडिया कुछ दिखाने और कुछ छिपाने की कोशिश करता ही होगा… मगर इस मुल्क में संत कौन है ये भी बता दीजिए… मीडिया पर दलाल होने का इल्ज़ाम लगाने वाले उन पार्टियों के लोग या समर्थक हैं जो फोर्ड, अड़ानी, अंबानी, 2जी, जीजाजी की फंडिंग पर जीती हैं। ये नेता भी तो देशसेवा के नाम पर मुटिया रहे हैं फिर मीडिया तो विशुद्ध व्यापार है ही और वो भी डंके की चोट पर। जाइए पहले अपने नेताजी को "दलाल" कहिए..उसके बाद कूदफांद मचाइएगा देशभक्तजी!

पत्रकार मयंक सक्सेना और नितिन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

पढ़ने में समय देने में भारतीय दुनिया भर में सबसे आगे हैं

Shailesh Bharatwasi : हम ख़ामख़ाह रोते हैं कि हिंदुस्तानियों में पढ़ने का कल्चर नहीं है। देखिए किसी सर्वेक्षण कंपनी के अध्ययन के अनुसार पढ़ने में समय देने में भारतीय दुनिया में सबसे आगे हैं। इस रपट के अनुसार भारतीय औसत रूप से 1 सप्ताह में 10 घंटे 42 मिनट का समय किताब पढ़ने को देते हैं। टीवी देखने, इंटरनेट सर्फ करने से भी अधिक पढ़ते हैं।

इस रिपोर्ट में ये नहीं लिखा है कि भारत के लोग क्या पढ़ते हैं। बस ये लिखा है कि सप्ताह में कम-से-कम 10 घंटे से अधिक पढ़ते हैं और ये आँकड़े किस सेम्पल-साइज़ पर बने हैं, ये भी नहीं पता। लेकिन इसका उल्लेख अलग-अलग अख़बारों में पिछले 2-3 दिनों से आ रहा है। 

पूरी रपट यहाँ देखिए-

http://www.dnaindia.com/lifestyle/report-indians-read-the-maximum-followed-by-thailand-and-china-survey-1966651

हिंदयुग्म प्रकाशन के कर्ताधर्ता शैलेश भारतवासी के फेसबुक वॉल से.  
 

दुनिया का कालापन उजागर करने वाले मीडिया हाउसेस के हाथ खुद काले हो गए हैं

Vaibhav Agrawal : पत्रकारिता की जब बात करते हैं, तो भारतीय फिल्मों का वो सीन याद आता है, जिसमें खादी का कुरता पहने और एक बैग लटकाए हर जगह सच की तलाश में घूमता कलम का सिपाही… अपने घर की प्रेस से अखबार छाप कर, दुनिया को सच बताता है और काले धंधे करने वाले उसके पीछे पड़ जाते हैं… लेकिन टीवी समाचार चैनल आने के बाद पत्रकारिता की दुनिया भी अब ग्लैमर और चकाचौंध से भरपूर हो गयी है..

इसमें केवल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही नहीं, बल्कि अभी देखें किस तरह तरुण तेजपाल की पत्रिका ने गोवा में पंचतारा होटल में थिंक फेस्ट का आयोजन किया, जिसमें एक महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी हुई.. करोड़ों रुपए खर्च कर ऐसे आयोजन करना मीडिया कम्पनियों के नए शौक बन गए हैं…  ऐसे में मात्र एक शो के लिए, एक मीडिया ग्रुप द्वारा एक राजनीतिक हस्ती को अपने खर्चे पर चार्टर्ड प्लेन से बुलाना, इस बात का सबूत है कि पैसा अब मीडिया हाउस के हाथ का मैल बन चुका है… लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कहाँ से आ रहा है यह पैसा? क्या वाकई दुनिया का कालापन उजागर करने वाले मीडिया हाउसेस के हाथ खुद काले नहीं हैं?

वैभव अग्रवाल के फेसबुक वॉल से.

‘कामेडी नाईट विद कपिल’ को टक्कर देने के लिये आया दीपक चौरसिया का नया शो!

भारतीय टीवी इंडस्ट्री बड़ी प्रगतिशील है और इसके प्रोग्राम भी एक अलग प्रभाव रखते हैं. इसी में 'कामेडी नाईट विद कपिल' का कुछ अलग ही अंदाज है. इसी को टक्कर देने के लिये आ गया है एक नया शो जो कि टीवी सीरियलों के चैनल पर नहीं बल्कि समाचार चैनल पर है. ये शो इन्डिया न्यूज पर है जिसका नाम है चुनावी नाइट विद दीपक चौरसिया. वैसे ये 'इन्डिया न्यूज' चैनल समाचारों के लिये है लेकिन इसमें समाचार के नाम पर कुछ नहीं है, सिर्फ पैसा कमाना और सुपारी पत्रकारिता है.

अब इसमें एक और कार्यक्रम प्रारभ्म हुआ है जो कि पूर्णतया कामेडी नाइट विद कपिल के तर्ज पर है. बिल्कुल वैसा ही स्टेज और माहौल है जैसा कपिल के शो में है. इस शो में अन्तर सिर्फ इतना है कि ये न्यूज चैनल पर है. इस तरह के चैनल, शो और पत्रकारों की पत्रकारिता को देखकर लगता है कि आज इस तरह के चैनल सिर्फ धन्धा करते हैं. इन्डिया न्यूज चैनल पत्रकारिता के नाम पर भारतीय मीडिया मे एक बदनुमा दाग है. ये उन पत्रकारों की पत्रकारिता को भी बदनाम कर रहा है जो सत्य, पत्रकारिता के नियम व उसूलों को आज भी जीवित किये हैं.

सौरभ राजपूत
saurabhkumar525@gmail.com
झीझक
कानपुर देहात
यूपी


इस शो पर पत्रकार मयंक सक्सेना अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं….

Mayank Saxena :  इंडिया न्यूज़ पर एक बेहद वाहियात कार्यक्रम…असफल ह्यूमर…खराब कॉपी…व्यंग्य की गुंजाइशों की निर्ममता से हत्या करते हुए…एक कम उम्र की लड़की से फूहड़ मूर्खताएं करवाता हुआ…संभवतः टीवी न्यूज़ का सबसे घटिया वर्तमान शो… चुनावी नाइट्स विद दीपक… (अमां आप लोगों के पास कुछ नया नहीं है क्या???)

सीरिया में संघर्ष में पत्रकार की मौत

दुबई : सीरिया के पूर्वी शहर देइर अल जोर में सरकारी सैनिकों और विपक्षी लडाकुओं के बीच हुए संघर्ष में एक सीरियाई पत्रकार की मौत हो गई.  एक क्षेत्रीय प्रसारक अल मयादीन ने अपनी वेबसाइट पर बताया कि कल सरकारी सैनिकों और लड़ाकुओं के बीच हुए संघर्ष में उनके कैमरामैन उमर अब्दुल कादिर को गर्दन में गोली लगी. उमर को तुरन्त अस्पताल ले जाया गया जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

उमर की बहन ने कहा कि जब उसके भाई की मौत की खबर आई तो हमारा परिवार उमर का २७वां जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहा था. मीडिया के अधिकारो के लिए काम करने वाले न्यूयार्क के एक संगठन कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट ने दिसंबर में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि वर्ष २०१३ में सीरिया पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक स्थान साबित हुआ है. पिछले वर्ष सीरिया में कम से कम २९ पत्रकार मारे गये थे.

आजतक के एडिट रूम से वीडियो को लीक करा के मोदी की तकनीकी सेना के पास पहुंचाया गया

Avinash Das : यह इंटरव्यू के तुरत बाद का दृश्‍य है। ऑफ कैमरा अनौपचारिक वार्ता करते हुए अरविंद केजरीवाल और पुण्‍यप्रसून वाजपेयी माइक्रोफोन के तार अलग करते हुए खड़े होते हैं। अरविंद पूछ रहे हैं कि उन्‍होंने इस मुद्दे पर क्‍यों बोला और बाकी मुद्दों पर क्‍यों नहीं बोला। पुण्‍य कहते हैं कि ये वाला हिस्‍सा हम डालेंगे, वह ज्‍यादा क्रांतिकारी है। वगैरा-वगैरा। क्‍योंकि तब तक माइक्रोफोन कनेक्‍ट था और कैमरा भी रोलिंग मोड में था, फुटेज आजतक के एडिट रूम तक पहुंच गया।

वहां से वह मोदी की तकनीकी सेना के पास पहुंचाया गया और फिर सिपाहियों की वॉल पर इस वीडियो की आवाजाही शुरू हो गयी। मुझे यह देख कर मजा आ रहा है कि गुजरात दौरे से लौटने के बाद जिस तरह से केजरीवाल ने मोदी की कलई खोली, उससे बौखलाये मोदी भक्‍तों को यह वीडियो राहत के रूहअफ्जा की तरह मिल गया।

पत्रकार, ब्लागर और फिल्मकार अविनाश दास के फेसबुक वॉल से.


वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html


इसे भी पढ़ें…

केजरीवाल-पुण्य प्रसून वीडियो : ये कोई स्टिंग नहीं है, रॉ फुटेज का आखिरी का संयोगवश रेकॉर्ड हो गया हिस्सा है

xxx

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की साख पर बट्टा लगाने वाले इस वीडियो / स्टिंग की सच्चाई क्या है?

मीडिया केजरी से इतना बेचैन क्यों?

Sheetal P Singh : सचमुच में Kejriwal चुभ रहा है। india news, Zee news, Zee business, India TV, ABP news आदि आदि सिर्फ़ केजरीवाल की आलोचना की ख़बरों, प्रायोजित बहसों, नक़ली मुक़दमों और कार्टूनों से 24 घंटा बिताते लगते हैं। अज्ञात कारणों से 'आजतक' इनका विलोम है। NDTV बैलेंस रहने की कोशिश करता है। समाचार प्लस और न्यूज़ नेशन TATA SKY पर नवागंतुक हैं सो कोई टिप्पणी नहीं।

ऐसा क्यों है? UP Bihar में "आप" कोई ताक़त नहीं है। MP, Rajasthan में भी कुछ ख़ास नहीं। दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में ज़रूर 'आप' उपस्थित है। गुजरात में ताक़त नहीं पर नींद उड़ाने की ताक़त है। बाक़ी देश में है भी, नहीं भी है। पर चैनल परेशान हैं। अख़बार बेचैन हैं। सत्ता के दलाल ऐक्टिव हैं और भत्ते के दलाल हाथ साफ़ कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर ज़रूर केजरीवाल पुरज़ोर उपस्थित हैं। यहाँ मोदी के असली और भाड़े वाले समर्थकों और आपियन्स में हर चाक चौराहे पर आमना सामना है। क्षेत्रीय दल ग़ायब हैं। वाम इक्का दुक्का और कांग्रेस क्लास बंक कर ग़ायब है यहाँ। इस फ़्रंट पर तो मोदी बनाम केजरी ही है।

इसीलिये आपसे समझना चाहता हूँ कि मीडिया केजरी से इतना बेचैन क्यों?

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

केजरीवाल-पुण्य प्रसून वीडियो : ये कोई स्टिंग नहीं है, रॉ फुटेज का आखिरी का संयोगवश रेकॉर्ड हो गया हिस्सा है

Mayank Saxena : आज तक, पुण्य प्रसून वाजपेयी और अरविंद केजरीवाल वाला वीडियो देखा…इस में कोई शक़ नहीं कि वीडियो असली है…कम से कम प्रसून जी की आवाज़ बेहद ढंग से पहचानता हूं…फोन से लेकर सामने तक लेकिन सवाल कुछ और हैं… पहला सवाल ये कि आखिर वीडियो किसी अंदर के कर्मचारी ने ही लीक किया है, क्योंकि ये रॉ फुटेज का हिस्सा है…तो कम से कम आज तक प्रबंधन को जांच तो करनी ही चाहिए…

दूसरा सवाल ये है कि संभवतः ये एक पुराने इंटरव्यू का हिस्सा है, तो फिर ये अब सामने क्यों आया… पहले क्यों नहीं… तीसरा सवाल कि इसे सामने लाने और फेसबुक पर ट्रेंड करवाने के पीछे क्या नीयत है… चौथा सवाल कि क्या पुण्य प्रसून जी जैसे सीनियर पत्रकार (कम से कम 7 साल से तो मैं जानता हूं) को ये भी नहीं जानकारी है कि कैमरा रोल होते वक्त…और लेपल माइक बिना निकाले किसी भी तरह की ऑफ द रेकॉर्ड बातचीत नहीं करनी चाहिए…

पांचवा और आखिरी सवाल कि आखिर कौन सी ऐसी बातचीत हो गई जो इतनी विवादित है…तमाम एंकर और संवाददाताओं के नेताओं या अतिथियों से ये संवाद सामान्य हैं कि ये चलाना है…और ठीक से चलाना है…कई बार एंकर इस तरह की चर्चा करते हैं…अगर ये चर्चा इंटरव्यू के पहले की होती तो ये फिक्स माना जा सकता था…ये चर्चा इंटरव्यू के बाद की है…और क्या साक्षात्कार के बाद दो लोग निजी मित्र नहीं हो सकते…राजीव शुक्ला (कांग्रेस) और रविशंकर प्रसाद (बीजेपी) क्या संसद के बाहर साले-बहनोई और बिज़नेस पार्टनर नहीं हैं? क्या केजरीवाल और प्रसून जी के बीच कोई पैसे के लेनदेन की बात हुई?

एक और अंतिम बात…ये कोई स्टिंग नहीं है…रॉ फुटेज का आखिरी का संयोगवश रेकॉर्ड हो गया हिस्सा है…जो बाहर आया, अच्छी बात है…कम से कम कुछ सवाल जवाब होंगे…कुछ सच सामने आएंगे…लेकिन इसके इस तरह ट्रेंड करवाए जाने के पीछे कुछ तो गड़बड़ है…

कोई ऐसा खास खुलासा नहीं है इस में… ये तब सनसनीखेज़ होता जब ये बात इंटरव्यू से पहले की होती… साक्षात्कार के बाद बात करने से क्या फ़र्क पड़ता है…कुछ भी बोला हो… ये वीडियो बीजेपी के किसी समर्थक पत्रकार के ज़रिए बाहर आया है… अब ऑफ द रेकॉर्ड सहज बातचीत का फुटेज कैसे बाहर निकला… इसकी जांच आज तक को करवानी चाहिए… वैसे प्रसून जी के कई दुश्मन हैं वहां…

Anyways…मज़ा आया…

वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें..

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html

पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.


मूल खबर…

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की साख पर बट्टा लगाने वाले इस वीडियो / स्टिंग की सच्चाई क्या है?


इसे भी पढ़ें…

आजतक के एडिट रूम से वीडियो को लीक करा के मोदी की तकनीकी सेना के पास पहुंचाया गया

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की साख पर बट्टा लगाने वाले इस वीडियो / स्टिंग की सच्चाई क्या है?

Yashwant Singh :  अरविंद केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी का एक कथित स्टिंग सामने आया है. इसमें कुछ आफ द रिकार्ड बातें हो रही हैं कि क्या दिखाना है, क्या नहीं दिखाना है. कौन वोट बैंक है और कौन नहीं है. किस पर बात करनी है और किस पर बात नहीं करनी है. किस पर फोकस करना है, किस पर नहीं करना है. यह वीडियो यूट्यूब पर किन्हीं सिद्धार्थ शर्मा ने 'अरविंद केजरीवाल एंड पुण्य प्रसून बाजपेयी एक्सपोज्ड' नाम से डाल रखा है.

इन महोदय के यूट्यूब एकाउंट में एकमात्र यही वीडियो डला है. यानि ये एकाउंट सिर्फ यही वीडियो डालने के लिए बनाया गया है. वीडियो में बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट भी दिया गया है. वीडियो का शुरुआती हिस्सा देखने के बाद अरविंद केजरीवाल का चेहरा गायब हो जाता है. केवल उनका हाथ हिलता दिखता रहता है. यह सीन थोड़ा शक पैदा करता है कि अगर स्टिंग किया गया है तो वह लगातार आना चाहिए. कैसे अचानक चेहरे से सिर्फ हाथ पर कैमरा आ गया. खैर, सच्चाई क्या है, यह तो पुण्य प्रसून बाजपेयी और अरविंद केजरीवाल ही बता सकते हैं लेकिन इस वीडियो के सामने आने से दोनों की साख पर काफी बट्टा लग रहा है… आप भी ये वीडियो देख सकते हैं, नीचे दिए गए फोटो या लिंक पर क्लिक करके..

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/785/interview-personality/kejriwal-aur-punya-prasun-ka-sting-sach-ya-jhooth.html

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


ये भी पढ़ें…

ये कोई स्टिंग नहीं है, रॉ फुटेज का आखिरी का संयोगवश रेकॉर्ड हो गया हिस्सा है

कई मौतों के जिम्मेदार हैं ये टीआरपीबाज़ चैनल

पत्रकारिता से जुड़कर उसपे ही सवाल खड़े करना कोई समझदारी भरा कदम नहीं है, लेकिन अपनी दिल की भड़ास न निकालना भी खुद के प्रति भड़ास पैदा करता है। पिछले कई सालों से मीडिया में कुछ ऐसा हो रहा है जिस पर गौर करें तो मन में तमाम प्रकार के सवाल उठने लाज़मी है। लोगों को विवादों के कटघरे में खड़ी करने वाली मीडिया आज खुद विवाद का प्रयाय बनती दिख रही है। जिन खबरों को पढ़कर या सुनकर हम अपने दिन की शुरूआत करते हैं, वहीं खबरें लोगों के आमजीवन पर क्या असर डालती है, क्या इसके बारे में हमने कभी विचार किया है? आजकल हत्या और आत्महत्या की वारदातें अखबार और चैनलों के माध्यम से हमें रोज पढ़ने और सुनने को मिलती है, ऐसे में ये बात सोंचने पर विवश करती है कि क्या देश में हो रहे आत्महत्या और हत्या की जिम्मेदार मीडिया नहीं है।

कुछ दिन पहले ही राहुल गांधी को चुंबन लेने वाली महिला के बारे में हमने अखबार में ख़बर थी। इस घटना को मीडिया ने इतना दिखाया कि खबर से संबंधित कोई भी व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो सकता है, शायद इसी का परिणाम रहा हो कि उसके अगले दिन यह खबर आई कि औरत के पति ने उस महिला के साथ-साथ खुद को भी जला कर खत्म कर लिया। भले ही इस खबर की पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, इस पर संशय अब भी बरकरार है। लेकिन खबर को मीडिया द्वारा अधिक तवज्जो देने से उस महिला के परिवार पर नकारात्मक असर पड़ा होगा, इस संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता।

इससे लगभग एक महिने पहले की एक और घटना याद आती है जब सुनंदा पुष्कर की संदिग्ध मौत हुई थी, उसके ठीक एक रात पहले टीआरपीबाज चैनलों ने सुनंदा पुष्कर, केंद्रीय मंत्री शशि थरूर और साथ में महिला पाकिस्तानी पत्रकार के बीच, उनके संबंधों को लेकर मिर्च-मसाले के साथ जो विजुअल और शब्दों का खेल खेला वो काफी हास्यास्पद होने के साथ काफी चिंताजनक भी था। शशि की डेढ़ इश्किया, पति पत्नि और वो जैसे हेडिंग के साथ खबर चलाने का मतलब टीआरपी बटोरने के अलावा और क्या हो सकता है। दुर्भाग्यवश खबर चलने के अगले दिन ही दक्षिणी दिल्ली स्थित लीला होटल के कमरा नं. 345 में सुनंदा की लाश मिली, हालांकि अभी इसकी जांच हो रही है कि ये हत्या का मामला है या आत्महत्या का लेकिन किसी भी मीडिया संस्थान ने मामले को बेमतलब तुल देने की गलती पर अफसोस भी व्यक्त नहीं किया।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रुप में तटस्थ मीडिया इतनी लापरवाह हो गई है कि उसे इस बात का अंदाजा तक नहीं की उनके द्वारा प्रकाशित व दिखाए गई खबरों का आमजन या उस खबर से संबंधित व्यक्ति पर सकारात्मक असर होगा या नाकारात्मक। क्या प्रेस की आजादी का यही सही इस्तेमाल है कि टीआरपी बढ़ाने और पैसे कमाने के लिए लोगों को मानसिक तौर पर इस बात के लिए उकसाएं कि वे हत्या और आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाएं। हालांकि इन सारे आरोपों को खारिज करने वाले लोग मीडिया के पक्ष में ये दलील दे रहें है कि यही मीडिया जब आरुषी हत्याकांड में सज़ा दिलवाती है तो लोग तारीफ करते हैं, यही मीडिया जब आईपीएल  फिक्सिंग का परत दर परत खुलासा करती है, तो लोग वाह-वाही करते हैं। यही मीडिया जब केजरीवाल जैसे आम आदमी को खास बना देती है तो लोग उस आम आदमी में खुद को ढूंढने का प्रयास करने लगते हैं। लेकिन यही मीडिया जब राहुल गांधी को कथित रूप से चुंबन देना जिसे कहा जाए तो लोग ऐसी खबरों पर टिप्पणी या सवाल क्यों करते है।

चलिए मान लेते हैं कि मीडिया ने ढेर सारे ऐसे कार्य किये हैं जो समाज और व्यवस्था के हित में हो लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हम मीडिया की गलतियों को नजरअंदाज करें। लोग टिप्पणी क्यों ना करे, आखिर लोकतंत्र की पहरेदार कही जाने वाली मीडिया ने गलती की है, और ऐसा गलतियां तो रोज होती है.. और जहां जनमाध्यमों की सोंच टीआरपी और विज्ञापन तक सीमित हो वहां हम जन की सोंच बदलने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। आजकल शाम में टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों में भी नयापन देखने को नहीं मिलता, ऐसा लगता है जैसे मुद्दों की कमी के साथ ये बहसें राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के लिए बस एक प्रचार का माध्यम बन के रह गई है। आजकल की टीवी पत्रकारिता तो खबरों को बढ़ाचढ़ा कर दिखाना और उन्हीं खबरों में लोगों को उलझन में डालने को टीआरपी का नुस्खा मानते हैं।

आखिर ऐसा क्या कारण है कि अफसरों और नेताओं के भ्रष्टाचार पर हंगामा खड़ा करने वाले न्यूज चैनलों पर बड़ी कंपनियां, या यूं कहे कि विज्ञापनदाताओं की भ्रष्ट नीतियों पर कोई खबर तक नहीं चलती जैसे कार्पोरेट जगत मे रामराज हो। मतलब साफ है, अखबार और चैनल विज्ञापनदाताओं को अपना रखवाला मान रखा है जिसके दबाव में मीडिया की कार्यप्रणाली चल रही है। कलम की धार में आए इस फिंकेपन से पूरी मीडिया की विश्वसनियता पर बड़ा संकट मंडराता दिख रहा है। और ये संकट बड़ा इसलिए है क्योंकि आजादी में महत्वपूर्ण भुमिका निभाने वाली पत्रकारिता आर्थिक मामले में भी भले ही संपन्नता की ओर बढ़ रही है कि लेकिन गुणवत्ता के मामले में गिरावट लागातार जारी है। समाज का दर्पण कही जाने वाली इस मीडिया को खुद दर्पण देखने की जरुरत है। एसे में इस बात की भी दरकार है कि अपने इतिहास से प्रेरणा लेते हुए मीडिया अपने खबरों के असर को समझते हुए अपनी लक्ष्मणरेखा खुद तय करे। इसी में जन और माध्यम दोनों का कल्याण निहित है।

 

लेखक किसलय गौरव से उनके ईमेल kislaygaurav@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
 

पुलिस अधीक्षक ने कहा ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए मेरा स्टैनो पैसे मांगे तो मुझे बताएं

वर्ष 2012 में पुलिस अधीक्षक, जौनपुर के पद पर श्रीमती मंजिल सैनी ने अपने आशुलिपिक के भ्रष्टाचार से तंग आकर दिनांक 19.12.2012 को जनपद के सभी अधिकारियों/ थाना प्रभारियों को पत्र भेज कर कहा कि 'मेरे संज्ञान में आया है कि मेरे द्वारा जितने भी स्थानान्तरण/ नियुक्ति जनहित में या अन्य कारणों से किया जा रहा है, उसके लिए मेरे आशुलिपिक/ स्टेनो द्वारा अनावश्यक रूप से कर्मचारियों से अनुचित पैसे की मांग की जा रही है, जो कदापि अनुचित है तथा भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। मैं स्पष्ट करना चाहॅूंगी कि यदि किसी कर्मचारियों को इस तरह से प्रताड़ित किया जाता है तो मुझे व्यक्तिगत रूप से अथवा मेरे सीयूजी मोबाइल पर अवगत करायें। भविष्य में इस तरह मेरे स्टेनों द्वारा अनावश्यक रूप से प्रताड़ित किया जाता है तो मुझे तत्काल अवगत कराया जाय। कृपया सम्मेलन करके अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अवगत करा दें।'

 
पुलिस अधीक्षक के आदेश से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आशुलिपिक द्वारा किस स्तर पर भ्रष्टाचार किया गया, जिसके परिणाम स्वरूप उक्त पत्र निर्गत करने हेतु पुलिस अधीक्षक बाध्य हुई होंगी। इस आशुलिपिक के सम्बन्ध में इस जनपद में एक वर्ष पूर्व से नियुक्त किसी भी अधिकारी/ कर्मचारी से पता किया जा सकता है। उक्त आदेश निर्गत होने के उपरान्त भी आशुलिपिक में कोई सुधार न आने पर माह फरवरी 2013 में उक्त आशुलिपिक को गोपनीय कार्यालय से हटा दिया गया। नवागन्तुक पुलिस अधीक्षक, जौनपुर के आने के तत्काल बाद उक्त आशुलिपिक अपनी जुगाड़ और सिफारिश के दम पर पुनः उसी स्थान पर पहुंच गया। एक इमानदार अधिकारी द्वारा हटाये गये आशुलिपिक को किन कारणों से पुनः पदस्थापित किया गया इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
 
इस के अतिरिक्त स्थानान्तण का एक नमूना है दिनांक 14.02.2014 को जौनपुर के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार 'खाकी को शर्मसार कर जमीन पर पड़ा रहा।' इस समाचार का असर यह रहा कि इस उप-निरीक्षक(बनारसी सिंह यादव) को जनपद जौनपुर की एक महत्वपूर्ण पुलिस चौकी धनियामऊ थाना बक्शा का प्रभारी बना दिया गया। इस चौकी पर निश्चित रूप से एक कर्मठ एवं मेहनती उ.नि. का होना आवश्यक है। इस उ.नि. के चौकी प्रभारी के रूप में नियुक्त किये जाने से यह स्पष्ट पता चलता है कि पुलिस-प्रशासन का अपराध नियंत्रण की ओर ध्यान नहीं है बल्कि कहीं और है।

पुलिस विभाग का प्रथम कर्तव्य होता है कि वह अपराध एवं अपराधियों पर नियंत्रण बनाये रखें। इस कर्तव्य को पूर्ण करने के लिए आवश्यक हो जाता है कि किस अधिकारी/ कर्मचारी को किस स्थान पर नियुक्त किया जाय जहां उसके द्वारा अपने कर्तव्यों के साथ विभाग की छवि को धूमिल न करें, परन्तु इस प्रकार की नियुक्ति से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने अधिकारों का सदुपयोग किया जा रहा है या दुरूपयोग? साथ ही मीडिया द्वारा किसी प्रकरण को उठाये जाने पर किस प्रकार का असर पड़ रहा है। यह बिन्दु भी विचारणीय है। इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय है कि जनपद में ही अपराध एवं अपराधियों के प्रति अच्छी भूमिका निभाने वाले उ.नि. लाइन हाजिर या किसी थाने पर द्वितीय अधिकारी के रूप में नियुक्त किये गये है।

 

लेखक मधुकर तिवारी से संपर्क उनके ईमेल drmadhukartiwari@gmail.com पर किया जा सकता है।
 

बिहार के दलितों की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार हैं लालू, पासवान और नीतीश कुमार

15 अगस्त 2007 और 15 अगस्त 2013 के बीच क्या संबंध है। निश्चित तौर पर यह भारत देश की आजादी की तिथि है, लेकिन बात जब बिहार राज्य की हो तो, यह मामला दलित, अतिपिछड़ों व पिछड़ों की हकमारी के दिन के तौर पर इतिहास में दर्ज हो चुका है। और इसका पूरा श्रेय राज्य के सुशासन बाबू व सामाजिक व समता मूलक विकास के पक्षधर नीतीश कुमार को जाता है। सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति से उपजे और पेशे से, इंजीनियर नीतीश कुमार ने 2004 में सत्ता प्राप्ति के तीन साल बाद ही वर्ष 2007 में सामाजिक न्याय को वोट बैंक में तब्दील करते हुये दशकों से उपेक्षित दलित जातियों को महादलित समुदाय में विभाजित करते हुये, उन्हें एक दूसरे के सामने अधिक लाभ व कम लाभ के कुछ लोक-लुभावन वादों के साथ जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। वहीं दूसरी ओर 2013 में ऐसे ही मौके पर लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के संसदीय क्षेत्र सासाराम के शिवसागर प्रखंड के बड्डी में राष्ट्रध्वज फहराने को लेकर राजपूतों व रविदास समुदाय के दो सदस्यों के बीच हिंसात्मक विवाद में रविदास समुदाय की एक महिला समेत दो लोग मारे गए।
 
महादलित फार्मूला
 
24 नवंबर
2005, जब राज्य ने करीब डेढ़ दशक के लंबे अराजक वनवास के बाद करवट ली और इसकी कमान भाजपा-जदयू गठबंधन के सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार के हाथों में आयी तो यह सवाल प्रमुखता से उठा था, कि क्या नीतीश सरकार में सामाजिक न्याय को एक नया आयाम मिलेगा या परंपरागत तरीके से वादों, घोषणाओं व कुछेक लोक-लुभावन योजनाओं के खिचड़ी से यह सरकार भी अपना काम करते रहेगी। हालांकि सरकार के शुरुआती एक दो साल राज्य के लिए सकून दायक रहें, लेकिन सरकार के अंदर बैठे कुछेक ब्राहमणवादी नेताओं ने सोशल इंजीनियरिंग का महादलित फार्मूला लागू करवाया, इसके तहत सरकार ने दलित नेता व लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान की जाति दुसाध व पासवान को छोड़ चर्मकार, पासी, डोम, हलखोर, मुसहर आदि को महादलित समुदाय में शामिल कर राज्य में जातिय ध्रुवीकरण को ध्वस्त करते हुये, कुर्मी, कोयरी, भूमिहार व महादलित फार्मूला लागू किया।
 
कर्पूरी फार्मूला
 
राज्य
में जनता पार्टी के,1977-80, शासन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़े वर्गो के लिए पहली मर्तबा आरक्षण लागू किया था। हालांकि ठाकुर को पता था कि प्रभावकारी जातियों के लोग अत्यंत पिछड़ों को सरकारी सेवा में पनपनें नहीं देंगे, इसलिए उन्होंने आरक्षण दो सूचियों के आधार पर लागू किया। ताकि दबी-कुचली जातियों के बहुसंख्यक पिछड़े भी सरकारी सेवा में आ सकें। आरक्षण की पहली सूची में अत्यंत पिछड़ों की कुल 108 जातियां व दूसरी सूची में अन्य पिछड़ा वर्ग में यादव, कोइरी, बनिया व कुर्मी समेत कुल 38 जातियां शामिल की गयी थीं। सनद् रहे कि कर्पूरी ठाकुर के इस फार्मूलों का उस दौर में सर्वणों ने जोरदार विरोध किया था, लेकिन उनके तमाम प्रयास इस फार्मूले को बदलने में सफल नहीं हो सके। हालांकि कर्पूरी फार्मूलों को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किये जाने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने 1992 में दोनों सूचियों को खत्मकर पिछड़ों के लिए 27 फीसद आरक्षण की व्यवस्था करनी चाही, ताकि दबंग पिछड़ी जातियां मसलन यादव, कुर्मी, कोयरी व बनिया का सरकारी सेवा में कब्जा हो सके, लेकिन इस साजिश को अति पिछड़ों ने बूरी तरह से खारिज करते हुये आंदोलन करने की धमकी दे डाली। हालांकि लालू प्रसाद ने कर्पूरी फार्मूलों में शामिल दोनों सूचियों, में दो-दो फीसद आरक्षण बढ़ोत्तरी यानी सरकारी सेवा में  अत्यंत पिछड़ों के लिए 14 व अन्य पिछड़ों के लिए 12 फीसद की नयी व्यवस्था के साथ बनाये रखा।
 
राज्य में दलित आबादी

राज्य सरकार के द्वारा 2010-11 में जारी आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, सूबे में दलित जातियों की आबादी 1 करो.ड 30 लाख से पार कर गयी है। कुछ वर्ष पूर्व ही महादलित वर्ग में शामिल की गयी रविदास जाति 31.41 प्रतिषत के साथ अभी भी दलित जातियों में आबादी के मामले में पहले पायदन पर है, वहीं 30.94 प्रतिशत के साथ पासवान दूसरे पायदान पर है। जबकि मुसहर समुदाय की आबादी 16.22 प्रतिशत है। रिर्पोट के मुताबिक पासी 5.46, धोबी 4.97 व भुइंया जाति की आबादी कुल दलित आबादी की 4.37 प्रतिशत है. जबकि बांतर 0.78, बाउरी 0.02, भोगता 0.10, भूमिज 0.02, चौपाल 0.77, हलालखोर 0.03, दबगर 0.03, डोम 1.19, घासी 0.01, हारी 1.40, कंजर 0.01, कुरियार 0.05, लालबेगी 0.01, नट 0.03, पान 0.03, रजवार 1.64, तूरी 0.26 और जेनरिक जातियों की आबादी 0.021 प्रतिशत बतायी गयी है। उल्लेखनीय है, कि सूबे में मुस्लिम समुदाय की अति पिछड़ी जातियों की आबादी 11 फीसद है।
 
हिंसा के आसान शिकार
 
दलित
दशकों से राज्य में होने वाले किसी भी हिंसा के सबसे आसान शिकार बनते आ रहे हैं। विषेशकर जातीय अस्मिता के नाम पर दलितों के साथ जितना अमानुषीय कृत्य राज्य में पूर्ववर्ती व वर्तमान सरकारों के कार्यकाल में हुआ है, वह सामाजिक न्याय के सभी दावों को पूर्णतः खोखला साबित करता है। इनमें 11 जुलाई 1996 को भोजपुर जिले के सहार थाना के बथानी टोला में 21 दलितों की हत्या, 1997 में अरवल का लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार जहां 57 दलितों की हत्या। इसी तरह 11 मई 1998 को भोजपुर जिले के नगरी बाजार नरसंहार में 11 दलित व पिछड़ा वर्ग के लोगों की हत्या और 16 जून 2000 को जहानाबाद के मियांपुर में 32 दलितों की हत्या प्रमुख है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है, कि उपरोक्त सभी मामलों के करीब-करीब सभी आरोपी पटना उच्च न्यायालय द्वारा साक्ष्य के अभाव में बरी किये जा चुके हैं।
 
पार्टी यानी जाति
 
जननायक
कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री काल के दौरान पहली मर्तबा सूबे में सामाजिक न्याय सही अर्थो में मूर्त रुप ले सका था। अत्यंत पिछड़ी जाति से आने वाले कर्पूरी ठाकुर ने अत्यंत पिछड़ों व अति पिछड़ों की बहुसंख्यक आबादी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर जातिय अस्मिता का बोध कराया। हालांकि इसके बाद वर्ष 1980 में राज्य में गैर कांग्रेसवाद की जगह कांग्रेस की वापसी हुई, और इसके मुखिया बने डॉ. जगन्नाथ मिश्र, जिनके मंत्रीमडल में मात्र एक स्थान अति-पिछड़ों को मिला। 1977-85 के दौरान अत्यंत पिछड़े वर्ग से धानुक, नोनिया और नाई जाति के एक-एक प्रतिनि को लोकसभा में स्थान मिला। जेपी आंदोलन की उपज बिहार के तीन महारथी, क्रमशः पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जेपी के सपनों के उलट जाति की राजनीति का सबसे गंदा खेल खेला है। उक्त तीनों नेताओं ने सूबे की अत्यंत पिछड़ी, अतिपिछड़ा व दलित समुदाय को अपने-अपने जाति के आगे करीब-करीब बौना ही रखा है, जहां लालू प्रसाद ने राज्य में मुसलिम-यादव गठजोड़ कर सत्ता का सुख भोगा, वहीं रामविलास पासवान ने अपने को दलित जाति यानि दुसाध व पासवान तक हीं सीमित रखा, जबकि नीतीश कुमार ने इन दोनों से एक कदम आगे बढ़ते हुये दलित को महादलित में विभाजित कर दिया और राज्य में दलित को ही दलित के आगे लड़ाई के लिए खड़ा कर दिया। सवाल यह है, कि राज्य में दलितों को लेकर सामंती सोच आज भी जस की तस क्यों बनी हुई है, क्यों संविधान निर्माता डॉं. भीमराव अंबेदकर के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को स्वीकार करने में नेता सही मायनों में रुचि नहीं ले रहे हैं। हालांकि उम्मीद लगातार बनी हुई है, कि निश्चित तौर पर सूबे में सामाजिक न्याय का सपना नेताओं के भाषणों, इतिहास के पन्नों व बौद्धिक जुगाली करने वाले अकादमिक जगत के सभी दायरों को ध्वस्त करते हुये स्थापित होगा। दिनकर की इस पंक्ति का सवेरा जरुर आयेगा…..
लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी जरुर, आंसू के कण बरसाता चल।

 

लेखक आशीष स्वतंत्र पत्रकार हैं और फारवर्ड प्रेस(गया, बिहार) के संवाददाता हैं। संपर्कः 09570985972, ashish.kahenge@gmail.com

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों का विरोध कर रहे हैं PTI के छह निदेशक

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने के मुद्दे पर विचार विमर्श के लिए प्रेस ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया के 15 निदेशकों की एक बैठक शुक्रवार को बुलाई गई थी। उसमें सिफारिशों को लागू करने का विरोध करने वाले छह निदेशक अनुपस्थित रहे। सूत्रों का कहना है कि वेज बोर्ड को लेकर मालिकों में भी खींचातानी चल रही है। इसी प्रकार दैनिक जागरण की कानपुर यूनिट से सूचना है कि वहां के मालिकान मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन नोएडा यूनिट से खबर है कि वहां का प्रबंधन सिफारिशों को लागू करना चाहता है। पिछले दिनों इंडियन न्‍यूज पेपर सोसाइटी के अध्‍यक्ष रवींद्र कुमार ने मजीठिया वेज बोर्ड की खिल्‍ली उड़ाने वाला बयान जारी किया था, जिस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और उनके खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग की गई थी। उधर मजीठिया मंच ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि समाचार पत्र उद्योग में शीर्ष पदों पर विराजमान लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे तो मंच अपने सदस्‍यों के साथ संयुक्‍त रूप से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्‍मान न करने वालों के खिलाफ आरपार की लड़ाई शुरू करेगा।

 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

उपेक्षित साहित्यकारों और विलुप्त अनुवादित रचनाओं को मुख्यधारा में लाएगी ‘भाषान्तर’ वेबसाइट

हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए एक नई वेबसाइट 'भाषान्तर' की शुरुआत की गई है। वाबसाइट ने चर्चित साहित्यकारों, लेखकों, कवियों के साथ ही उपेक्षित रचनाकारों का भी एक वृहद डेटाबेस तैयार किया है। इस संबंध में भाषान्तर परिवार की ओर से कहा गया है कि "हम कुछ हिंदी प्रेमियों एवं सांस्कृतिक-कर्मियों ने मिलकर तय किया है कि हिंदी साहित्य को इंटरनेट की मुख्यधारा में प्रस्तुत किया जाय। अपने इस प्रयास के अन्तर्गत हम हिंदी के प्रमुख साहित्यकारों के साथ-साथ उन दुर्लभ लेखकों/ कवियों की प्रकाशित/ अप्रकाशित रचनाएँ भी शामिल करेंगे, जो काल-कवलित हो चुके हैं और जिन्हें हिंदी जगत ने लगभग भुला ही दिया है। हमारा प्रयास रहेगा कि हिंदी के उन उपेक्षित रचनाकारों को भी इंटरनेट पर प्रस्तुत किया जाय जिनकी रचनाओं की ओर हिंदी के आलोचक कोई ध्यान नहीं देते हैं। साथ ही हम भारतीय लोक साहित्य एवं बाल साहित्य को भी इंटरनेट पर सुरक्षित करने की कोशिश करेंगे। हिंदी में विदेशी साहित्य का लगातार अनुवाद हो रहा है किन्तु वह अनुवाद एक बार प्रकाशित होने के बाद पुनर्प्रकाशन के अभाव में विलुप्त हो जाता है, हम उसको भी संरक्षित करने का प्रयास करेंगे। यह सब कठिन बहुत है पर आप सभी का साथ होने से सब मंगल होगा, ऐसा हमें विश्वास है।"

http://www.bhashantar.org

डॉ. अबनीश सिंह चौहान। संपर्कः abnishsinghchauhan@gmail.com

 

आऱटीआई में हुआ खुलासा, मायाराज के मुकाबले अखिलेशराज में महिलाओं का उत्पीड़न बढ़ा

प्रत्येक महिला दिवस पर सरकारों द्वारा इस बात का ज़ोर-शोर से प्रचार किया जाता है कि वे महिलाओं के उत्पीड़न से निपटने और महिलाओं के लिए भय मुक्त वातावरण बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठा रहीं हैं। हमने उप्र सरकार के नारों की ज़मीनी हक़ीक़त को जानने के लिए उप्र राज्य महिला आयोग के आंकड़ों के विश्लेषण करने का निर्णय लिया, जिससे पता चल सके कि महिला के विरुद्ध हो रहे अपराधों की वास्तविक स्थिति क्या है और इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

इस संदर्भ में हमले दिनांक 16.12.2013 को RTI के माध्यम से उप्र राज्य महिला आयोग से 11 बिन्दुओं पर सूचना मांगीं थी। हमले आयोग से जानना चाहा कि अखिलेश सरकार के प्रथम 21 महीनों में और मायावती सरकार के अंतिम 21 महीनों के दौरान कितने केस रिपोर्ट हुए, कितने केसों का निस्तारण हुआ और कितने केस एफआईआर में परिवर्तित हुए।

आयोग द्वारा दिनांक 17.01.2014 को पत्र संख्या 5364 के माध्यम से भेजी गई सूचना से पता चलता है कि अखिलेश सरकार के राज में आयेग के पास आने वाले महिला उत्पीड़न के केसों में 23% की वृद्धि हुई है। आंकड़े बताते हैं कि अखिलेश सरकार के 21 महीनों में आयोग के पास 49265 केस आए जिनमें, 27% निस्तारण की दर से मात्र 13429 केस ही निस्तारित किए गए। जबका मायावता सरकार के अंतिम 21 महीनें में आयोग के पास 40060 केस रिपोर्ट हुए थे जनमें से 28952 केसों का निस्तारण किया गया। स्पष्ट है कि मायावती सरकार में आयोग 72% की दर से केसों का निस्तारण कर रहा था। हम ये भी कह सकते हैं कि अखिलेश सरकार में आयोग द्वारा महिला उत्पीड़न के केसों के रिस्तारण में 54% की कमी आयी है।

आम तौर पर लोगों के ये मानना है कि महिला आयोग अपराध पीड़ित महिलाओं का आखिर तक साथ देता है। लेकिन उप्र राज्य महिला आयोग की स्थिति इसके ठीक विपरीत है। ये आयोग न तो अपराध पीड़ित महिलाओं की एफआईआर ही लिखवा पाता है औऱ ना ही इस प्रकार का कोई रिकॉर्ड ही रखता है जिससे पता चले कि कितने मामलों में एफआईआर लिखी गई। स्पष्ट है कि उप्र राज्य महिला आयोग एक सफेद हाथी है जो राज्य की पीड़ित महिलाओं की मदद न कर पाता है और न ही ऐसा करने में कोई दिलचस्पी लेता है। वास्तव में ये आयोग राज्य खज़ाने पर एक भार है।

जल्दी ही हम एक कैंपेन शुरू करने जा रहे हैं। हमारी मांग है कि उप्र राज्य महिला आयोग एक निश्चित समय सीमा के अन्दर अपने पास आने वाली शिकायतों का निस्तारण करे और इस बात की पूरी जानकारी रखे कि उसके द्वारा पुलिस को भेजे जा रहे मामलों में एफआईआर लिखी जा रही है य़ा नहीं।

हम चाहते हैं कि अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह की सलाह मानते हुए चाटुकारों के चंगुल से बाहर निकलें और एक प्रोफेशनल इंजीनियर, जो वो हैं, की तरह काम करें, जिसकी अपेक्षा राज्य की जनता उनसे करती है।

Urvashi Sharma
Contact 9369613513
Right to Information Helpline 8081898081
Helpline Against Corruption   9455553838
http://yaishwaryaj-seva-sansthan.hpage.co.in/
http://upcpri.blogspot.in/

 

पत्रकार से मारपीट मामले में मानवाधिकार आयोग ने पुलिस महानिदेशक से मांगा जवाब

बराड़ा, हरियाणा। राष्ट्रीय समाचार पत्र 'सच कहूं' से जुड़े पत्रकार संदीप कुमार से मारपीट के मामले का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने प्रदेश पुलिस महानिदेशक श्रीनिवास वशिष्ठ को जांच का जिम्मा सौंपा है और छह हफ्तों में जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपने को कहा है। इससे पूर्व डीसीपी अंबाला ग्रामीण नाज़नीन भसीन द्वारा सौंपी गई जांच रिपोर्ट से आयोग ने संतुष्ट नहीं था। आयोग ने माना कि इससे पहले हुई जांच में पत्रकार की ओर से पेश किए गए कंई अहम सबूतों को दरकिनार कर दोषी पुलिस कर्मियों को पाक-साफ साबित करने की कोशिश की गई थी। जबकि पत्रकार के साथ मारपीट हुई है। आयोग की इस जांच से पत्रकार ने दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हो पाने की उम्मीद जताई है।

 
उधर, मामले में संलिप्त दोषी पुलिस कर्मियों को हाल ही में मिली पदोन्नित के बारे में संदीप कुमार ने कहा कि दोषियों पर लगे संगीन आरोपों की अनदेखी करते हुए पुलिस प्रशासन द्वारा दिया गया ये प्रोत्साहन कहीं न कहीं अंदरखाने की मिली-भगत की ओर इशारा करता है। वे इसके खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
 
गौरतलब है कि 17 अगस्त 2012 को राष्ट्रीय समाचार पत्र 'सच कहूं' से जुड़े पत्रकार संदीप कुमार को पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में रखकर मारपीट की थी। उनको झूठे केस में फंसाने के लिए उसके हाथ में जबरन तलवार पकड़ा कर फोटो भी खींची थी। पत्रकार से इस प्रकार से दुर्व्यवहार के चलते स्थानीय मीडिया कर्मियों ने पुलिस की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की थी। पीड़ित पत्रकार के द्वारा इस मामले की शिकायत प्रैस कांसिल ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, सीएम व डीजीपी हरियाणा को की गई थी। इसके साथ ही राज्य भर की मीडिया ने तत्कालीन कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष चौ. फूल चंद मुलाना व तत्कालीन पुलिस कमिशनर अंबाला से मिलकर उन्हें पुलिस वालों की इस गुंडागर्दी के बारे अवगत कराया था। जिसके चलते पुलिस कमिशनर ने तुरंत प्रभाव से बराड़ा थाना के लगभग सभी कर्मचारियों का तबादला कर दिया था लेकिन स्थानीय मीडिया कर्मियों ने इस कार्रवाई को नाकाफी बताते हुए दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग की थी।
 
पत्रकार के साथ मारपीट करने में तत्कालीन थाना प्रभारी सुरेश कुमार, एएसआई सुन्दर लाल, ड्राईवर कुलदीप व बल्विन्द्र, जीत सिंह, एएसआइ मान सिंह, विश्वबंधु, सीटी नसीब सिंह, एएसआई चरण सिंह व अमरपाल आदि मुख्य आरोपी थे। आरोपी एसएचओ सुरेश कुमार व उसकी पत्नी कांस्टेबल संगीता पर गत नवंबर माह में अंबाला के पड़ाव थाना में एएसआई कर्ण सिंह को आत्महत्या के लिए उकसाने का एक और संगीन मामला भी दर्ज है। जिसके चलते सुरेश कुमार अपनी पत्नी सहित भूमिगत है व कोर्ट ने उसके खिलाफ वारंट निकाले हुए है। सुरेश कुमार पहले से ही एक शराब कारोबारी से पैसे छीनने के आरोप में सस्पैंड चल रहा था।

हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष एडवोकेट बलजीत सिंह ने आयोग के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि आयोग के प्रति उनकी पूरी निष्ठा है। उन्होने डीजीपी हरियाणा से भी इस मामले में पूर्ण निष्पक्षता बरते जाने की उम्मीद जाहिर करते हुए मांग की है कि सभी दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि यह मामला प्रैस की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। देश के चौथे स्तंभ मीडिया पर हमला किसी भी कीमत पर बर्दाशत नहीं किया जाएगा।
 
संदीप सांतरे
संवा़ददाता, सच कहूँ,
बराड़ा/मुलाना, अम्बाला।
#9996634311

पैसा जिसके बाप मैनेज करते हैं, वो तमाम फ्लॉप के बाद भी चलते रहते हैं : नवाजुद्दीन सिद्दीकी

Avinash Das : गुरुवार को धग [DHAG] के प्रीमियर में नवाज [Nawazuddin Siddiqui] मिल गये थे। हमने साथ फिल्‍म देखी और तय हुआ कि एक दिन अच्‍छे से बैठते हैं। फिर आज हम मिले और आधे दिन के साथ में उन्‍होंने मुझे फिल्‍म इंडस्‍ट्री की पॉलिटिक्‍स के बारे में विस्‍तार से बताया। संघर्ष करके खुद को साबित करने वाले अभिनेताओं को यह इंडस्‍ट्री आज भी हाशिये पर ढकेलने के मूड में रहती है।

नवाज ने बताया कि फैन फॉलोइंग के हिसाब से अर्जुन कपूर, प्रतीक बब्बर जैसों के मुकाबले मनोज वाजपेयी या इरफान या हम जैसों को चौराहे पर खड़े कर दो – लोग हमें पूछते हैं। लेकिन हमें लेकर कोई कंपनी 25, 30, 40 करोड़ की फिल्‍म नहीं बनाती है। इसके पीछे की राजनीति समझो। पैसा जिसके बाप मैनेज करते हैं, वो तमाम फ्लॉप के बाद भी चलते रहते हैं। हमें साइड में रखते हैं कि तुम तो साइड मैटेरियल हो। नवाज ने और भी कई किस्‍से बताये।

शायद मुझे नहीं बताना चाहिए, लेकिन टार्गेटेड नाम-गाम छुपा कर इतना बता देता हूं कि एक शानदार निर्देशक के पिछले तीन दशकों के समृद्ध अतीत का जिक्र करते हुए नवाज ने बताया कि वे अपना नया प्रोजेक्‍ट कॉरपोरेट के दबाव में एक ऐसे अभिनेता के साथ कर रहे हैं, जिसको एक्टिंग नहीं आती। क्‍यों? क्‍योंकि कॉरपोरेट को ऐसा स्‍टार चाहिए, जो उनके इशारे पर काम करे। सलमान, आमिर और शाहरुख अब स्‍वतंत्र हो गये हैं। अपना स्‍टेक मांगते हैं।

आमतौर पर इंटरव्यू में अभिनेता इस तरह की बातचीत नहीं करते। नहीं बताते। या कोई उनसे उनके अभिनय से इतर बाकी अंतर्कथाओं में दिलचस्‍पी नहीं दिखाता। कोई दिखाता है, तो वे टाल जाते होंगे कि पता नहीं उनकी किसी बात का इस्‍तेमाल और असर कैसा हो जाए।

मनोज भाई [Manoj Bajpayee] का शुक्रिया कि उन्‍होंने फिल्‍म इंडस्‍ट्री के बारे में ज्ञानवर्द्धन के लिए अपने घर का अनौपचारिक माहौल दिया। खाना भी खिलाया, बेसन का लड्डू भी खिलाया और चाय भी पिलायी।

पत्रकार और फिल्म समीक्षक अविनाश दास के फेसबुक वॉल से.

मोदी की चुप्पी में रहस्य की गांठें हैं, जिन्हें वे कभी खोल न पाएंगे, खोलेंगे तो और उलझ जाएंगे : ओम थानवी

Om Thanvi : इंडिया टुडे वाले अपनी गर्ज से अपने आयोजन के लिए अपने भाड़े के विमान से केजरीवाल को जयपुर से दिल्ली लाए। पूछने पर यह बात केजरीवाल ने साफ भी कर दी। फिर भी बतंगड़ जारी है। कोई पाखंडी कह रहा है, कोई झूठा, कोई बेईमान।

यह मोदी को आड़ देने की कुचेष्टा है, जिन्हें इसका जवाब अभी देना है कि उद्योगपति अडानी के विमान का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में वे कैसे कर रहे हैं। इसका भी कि अम्बानी के गैस-काण्ड पर उनका क्या रुख है और आगे क्या रहेगा। उनकी चुप्पी में रहस्य की गांठें हैं, जिन्हें वे कभी खोल नहीं पाएंगे। खोलेंगे तो और उलझ जाएंगे।

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

भोपाल प्रेसपूल के बंगलों पर पत्रकारों और मीडिया हाउसों का अनधिकृत कब्जा, हाई कोर्ट ने दिए कार्यवाही के आदेश

भोपाल। पत्रकार कोटे के सरकारी मकानों के आवंटन में होने वाली गड़बड़ी और रिटायर हो जाने, तबादला हो जाने, पत्रकारिता छोड़ देने और यहां तक की मृत्यु हो जाने पर भी मकान खाली न कराए जाने को लेकर हाईकोर्ट जबलपुर मे दायर जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली डबल बेंच ने सरकार को 30 अप्रैल तक कार्रवाही के निर्देश दिए हैं। पिटीशनर श्रीप्रकाश दीक्षित ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान को पत्र लिख कर याचिका के मुददों पर दलीय हितों से उपर उठ कर बिना भय और पक्षपात के ईमानदारी से कार्रवाई का आग्रह किया है। यह भी उल्लेखनीय है की सीएजी की आडिट टीम ने इस कोटे से आवंटित 187 मकानों मे से अधिकांश को अनधिकृत कब्जा घोषित कर करोंडों रूपए की वसूली के निर्दश दे रखे हैं।

यह जनहित याचिका जनसंपर्क विभाग से बतैर संयुक्त संचालक रिटायर हुए श्रीप्रकाश दीक्षित ने डेढ वर्ष से भी अधिक पहले दायर की थी। हाईकोर्ट ने इसे मंजूर कर सरकार को चार सप्ताह मे जवाब देने के निर्देश दिए थे। जब एक वर्ष बीत जाने पर भी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया तब पिछले महीने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एएम खानविलकर और न्यायाधीश केके लाहौटी की डबल बेंच ने यह आदेश पारित किया की अपात्र लोंगों को सरकारी मकानों के आवंटन को लेकर याचिका मे उठाए गए मुददों का प्रकरण-दर-प्रकरण परीक्षण कर शीघ्र आवश्यक निर्णय लें। सरकार को यह भी निर्देश दिए गए हैं की इन निर्णयों की जानकारी पिटीशनर को 30 अप्रैल तक प्रषित करें।
 
हाईकोर्ट ने कार्रवाई की जवाबदारी प्रमुख सचिव, गृह को सौंपी है। श्री दीक्षित ने दस्तावेजों के साथ फैसले की सूचना प्रमुख सचिव, गृह को औपचारिक रूप से दे दी है। यह जानते हुए की मीडिया से जुडे इस मामले पर कार्रवाई मुख्यमंत्री की हरी झंडी मिलने के बाद ही हो पाएगी श्री दीक्षित ने इस फैसले के बारे मे एक पत्र द्वारा मुख्यमंत्री को भी अवगत करा दिया है। यह पत्र उन्होने मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव को सौंपा है। श्री दीक्षित ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया है की पत्रकार कोटे के आवासों के आवंटन के बारे मे खुद सरकार ने जो नियम बना रखे हैं उनमे से एक का भी पालन अब तक के किसी भी मुख्यमंत्री ने नहीं किया हैं। यह जानकारी गृह विभाग और जनसंपर्क विभाग ने सूचना के अधिकार के तहत प्रदान की है।
                                             
प्रेसपूल के मकान अधिकतम तीन साल तक के लिए ही एलाट किए जाते हैं। इसके बावजूद दशकों से पत्रकार इनमे विराजमान हैं। नियम है कि आवास आवंटन के लिए पत्रकारों की वरिष्ठता सूची बनाई जाएगी जो कभी नहीं बनी। नियम के मुताबिक एक उच्चस्तरीय कमेटी इस सूची के पत्रकारों मे से आवंटन के लिए चयन करेगी, लेकिन एक बार भी कमेटी बना कर मकान एलॉट नहीं किए गए। यह भी नियम है की जनसंपर्क विभाग से परामर्श के बाद ही आवंटन आदेश जारी किए जाएंगे। परामर्श की बात तो जाने दें इस विभाग के पास तो उन पत्रकारों की सूची तक नहीं है जिन्हे प्रेसपूल के आवास आवंटित हैं। प्रेसपूल के लिए डेढ सौ मकानों का कोटा है जबकि एलाट 187 हैं। सारी गडबडियां पत्रकारों के आवास आवंटन की शक्तियां केवल मुख्यमंत्री के हाथों मे केन्द्रित हो जाने से हो रही हैं। परिणाम यह है की आवंटन का पैमाना सीएम की व्यक्तिगत पसंद नापसंद तक सीमित हो कर रह गया है। पात्र, अपात्र और कृपा-पात्र की पहचान की कोई जरूरत नहीं समझी जाती है। यहां तक की आपकी मृत्यु के बाद भी परिजन आवास पर कब्जा बनाए रख सकते हैं।

प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता रहे श्री ललित श्रीवास्तव की मृत्यु हुए आठ साल हो गए पर समाचार भारती के संवाददाता के नाते अब भी बंगला एलाट है। श्री राज भारद्वाज और ज्ञानप्रकाश बाली को मरे भी सालों हो गए पर दोनो को बंगला एलाट है। पिछले चुनाव में शिवराजसिंह, महेन्द्रसिंह कांग्रेस प्रत्याशी थे। बीजेपी के कद्दावर नेता कैलाश सारंग के नाम भी पत्रकार कोटे से पुराने भोपाल मे बडा मकान एलाट है। युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे बंसीलाल गांधी भी दशकों से पत्रकार के रूप मे बंगला कबाडे हुए हैं। बीजेपी की सरकार आई तो इसके प्रवक्ता बिजेश लूणावत को पत्रकार कोटे से बंगला मिल गया। इनमे से बंसीलाल गांधी, महेन्द्र सिंह चैहान, जीपी बाली, नीरज मिश्र, एसएस अस्थाना, नर्बदा प्रसाद त्रिपाठी और सुरेन्द्र सिंघवी आदि से मकान खाली कराने की ढीली-ढाली कार्रवाई की गई तो वे हाईकोर्ट से स्टे ले आए। स्टे को भी बरसों हो गए पर उसे वैकेट कराने की हिम्मत सरकार अब तक नहीं जुटा पायी है।

जनहित याचिका और उसके जरिए हुए इस खुलासे के बाद की सीएजी की टीम ने पत्रकारों से करोंडों रूपए की वसूली निकाली है, सरकारी मकानों का सुख भोग रहे मीडिया के लोगो ने मुख्यमंत्री पर दबाव बनाना प्रारंभ किया। विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार ने चुनाव से एक महीने पहले नियमों मे संशोधन कर अनधिकृत आधिपत्य की अवधि की वसूली बाजार दर की दुगुनी राशि के बजाय सामान्य दर से करने का प्रावधान कर दिया है। इसका लाभ पत्रकारों के अलावा अन्य अशासकी आवंटियों को भी होगा जिनमे बडी संख्या नेताओं की है। अकेले प्रेसपूल के 187 मकानों पर 31-8-11 तक 14 करोड़ की वसूली निकाली गई थी जो अब 20 करोड़ रूपए से अधिक हो गई है।
                                 
प्रेसपूल के मकानों के लिए यह संशोधन किया गया है की पत्रकार आवास के लिए जनसंपर्क आयुक्त को आवेदन प्रस्तुत करेंगे जो उन्हें अपने मत के साथ गृह सचिव को प्रेषित करेंगे। अब प्रेसपूल के मकानों का कोटा भी 150 से बढ़ा कर 230 कर दिया गया है। जिन पत्रकारों के खुद के अथवा परिवार के किसी सदस्य के नाम भोपाल और कोलार पालिका मे निजी मकान हैं उन्हें सरकारी मकान नहीं मिल सकेंगे।
                               
सरकार द्वारा किए गए संशोधन के परिप्रेक्ष्य मे मांग की गई है की मीडिया के आफिसों और अखबार मालिकों आदि को छूट प्रदान न की जाए। इस समय 18 शासकीय बंगले मीडिया आफिसों को एलाट हैं। इनमें बिड़ला का अखबार हिंदुस्तान टाईम्स, जी न्यूज चैनल, पीटीआई ओर यूएनआई, नई दुनिया, लोकमत, स्टेटसमैन और फ्री प्रेस जैसे बडे ग्रुप, नवीन दुनिया जबलपुर, स्वदेश इंदौर, अमृत संदेश रायपुर, अवंतिका उज्जैन चैथा संसार इंदौर, अमृत मंथन और प्रजामित्र जैसे गुमनाम तथा विश्व संवाद केन्द्र और हम समवेत जैसे अनजान संस्थान शामिल हैं। इनमें से अधिकांश बंगले मालिकों और उनके कारिंदों द्वारा गेस्ट हाउस के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
                                 
प्रेसपूल के मकानों की मानिटरिंग न होने के कारण अनेक पत्रकार रिटायर हो जाने पर भी सरकारी मकानों में जमे हैं। अनेक पत्रकार तबादले पर चले गए पर मकान नहीं छोड़ा और जुगाड़ लगा कर फिर वापस भोपाल आ गए। मकान के लोभ में कई पत्रकारों ने अपना कैरियर चैपट कर लिया। कुछ पत्रकार अपने निजी मकान मे चले गए हैं पर सरकारी मकान पर कब्जा बरकरार है। ऐसे ही एक पत्रकार ने सरकारी मकान पर अपनी कई दुकानों के बोर्ड लटका दिए हैं।

                         दैनिक पत्रिका, भोपाल में 23.12.2012 को छपी ख़बर
                                     
श्रीप्रकाश दीक्षित द्वारा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान को भेजा गया पत्र
                                                   
26फरवरी, 2014
माननीय मुख्यमंत्री जी,
मध्यप्रदेश।

विषयः- पत्रकार कोटे के मकानों की अराजक स्थिति ।
संदर्भः- मेरी जनहित याचिका पर हाईकोर्ट जबलपुर का आदेश।  

मान्यवर,
       निवेदन
है की प्रेसपूल से एलॉट किए गए सरकारी मकानों को लेकर भोपाल मे लगभग अराजक स्थिति है। इस कोटे के मकानों के आवंटन के लिए बनाए गए एक भी नियम का कभी भी पालन नहीं किया गया है। प्रदेश के गृहमंत्री शासकीय सेवकों को आवंटित मकानों की तो हमेशा मानिटरिंग करते रहे हैं और बेदखली के निर्देश संबंधी प्रेसनोट अखबारों मे छपवाते रहे हैं, पर इस कोटे के मकानों की मानिटरिंग का साहस वे कभी नहीं जुटा पाए? इस कोटे की आड़ मे मकानों की खूब बंदरबांट होती रही है। बिडला आदि मीडिया ग्रुप को पत्रकार के नाम पर आफिस के लिए बंगले एलाट किए गए हैं। नेताओं को पत्रकार बना कर सरकारी मकानों का सुख दिलाया जा रहा है।

मीडिया से जुडे विभाग से रिटायर होने के बाद मैने इस बारे मे सूचना के अधिकार से जानकारी हासिल कर डेढ बरस पहले हाईकोर्ट मे जनहित याचिका दायर की थी। सरकार से इस याचिका पर कोई जवाब देते नहीं बना। इस पर कोर्ट ने पिछले महीने एकतरफा आदेश पारित कर दिया है। आदेश मे याचिका में उठाए गए मुददो पर आवश्यक कार्रवाई कर 30-04-2014 तक मुझे अवगत कराने की जवाबदारी प्रमुख सचिव, गृह को सौंपी गई है।
        
मैं अच्छी तरह जानता हूं की मीडिया से जुडे इस संवेदनशील मुददे पर कोई भी फैसला आपके ही दरबार में होना है। इसलिए औपचारिक रूप से प्रमुख सचिव, गृह का दस्तावेजों के साथ सूचित करने के बाद इस पत्र द्वारा आपसे विनती कर रहा हूं की याचिका में मेरे द्वारा उठाए प्रत्येक मुददे पर दलीय हितों से परे होकर बिना भय और पक्षपात के पूरी ईमानदारी से कार्रवाई करने की कृपा करें।

भवदीय

श्रीप्रकाश दीक्षित
एचआईजी-108,गोल्डन वैली हाईटस
आशीर्वाद कालोनी के पीछे,कोलार रोड
भोपाल-462042  
मोबाईल-9893268142

कांग्रेस के भोगी नेताओं एनडी, सुरजेवाला, सिंघवी की लिस्ट में अब हुड्डा का भी नाम!

Shravan Kumar Shukla : एनडी, सुरजेवाला, सिंघवी, हुड्डा… लंबी लिस्ट है कांग्रेस के भोगियों की! कांग्रेस पार्टी में योगियों और भोगियों की लंबी लिस्ट है. इस पार्टी में योगी तब हुआ करते थे जब आजादी की लड़ाई चल रही थी. आजादी मिलते ही योगी सब एक एक कर भोगी बनते गए या फिर कांग्रेस से किनारे होते चले गए. एनडी तिवारी के भोग के लंबे किस्से हैं.

बुढ़ापे में अब जाकर उन्होंने रोहित शेखर को बेटा माना. जब एनडी एक राज्य में राज्यपाल थे तो उनके बेडरूम में किसिम किसिम की बालाएं घुसा करती थीं और एक दफे तो इनका स्टिंग भी हो गया. इस वीडियो के चैनलों पर चलने के बाद एनडी को राज्यपाल की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा. लखनऊ में एक महिला को जबरन पकड़ कर नाचने वाला किस्सा नया ही है.

ऐसे ही हरियाणा के बुजुर्ग सुरजेवाला का एक वीडियो जारी हुआ था जिसमें वो एक नाबालिग के साथ संभोगरत हैं. कहा जाता है कि ये वीडियो उनके ही कांग्रेस पार्टी के विरोधियों ने शूट करा लिया था और सुरजेवाला को ठिकाने लगाने के लिए इस्तेमाल किया. हालांकि अब बुजुर्ग सुरजेवाला काफी बुजुर्ग व बीमार हैं पर उनके चर्चे आज भी तब तब होते हैं जब जब कांग्रेस के रसिया नेताओं की चर्चा चल पड़ती है.

इन बुजुर्ग सुरजेवाला पर कांग्रेस को इतना यकीन है कि पार्टी ने उनकी विरासत उनके युवा बेटे को सौंप दी और उन्हें प्रमोशन देते हुए हरियाणा के दायरे से बाहर निकालकर राष्ट्रीय राजनीति में ला दिया है और राष्ट्रीय प्रवक्ता बना दिया है. अभिषेक मनु सिंघवी की सेक्स सीडी भी मार्केट में आई तो हाहाकर मच गया. कांग्रेस में उनका भाव गिरा. उनसे पद व कार्यभार छीन लिए गए.

हुड्डा का मामला नया चर्चा में आया है. हरियाणा के सीएम की दूसरी शादी खूब चर्चा में है. कोई इसे राजनीतिक विवाद बता रहा है तो कोई इसे सच्ची कहानी कह रहा है. सच क्या है, ये तो हुड्डा ही जानें लेकिन ये जरूर है कि जिन लोगों से जनता सदाचार और नैतिकता की उम्मीद करती है वे अपने निजी जीवन में इतने लंपट, खोखले, दुराचारी, अनैतिक होते हैं कि उनकी सच्चाई बाहर आने पर हमको आपको सभी को लगता है कि … अरे… ये मेरा नेता तो बड़ा कमीना निकला… लीजिए, कांग्रेस के इन भोगी नेताओं के कुछ वीडियो देखिए…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/703/other-mix/senior-congress-leader-sex-video.html

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/595/man-and-struggle/abhishek-manu-singhvi-sex-cd.html

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/756/man-and-struggle/nd-tiwari-ki-harkat.html

युवा पत्रकार श्रवण कुमार शुक्ला के फेसबुक वॉल से.


संबंधित खबरें…

एनडी तिवारी की तरह भूपिंदर सिंह हुड्डा की भी है नाजायज औलाद!

xxx

युवा कांग्रेसी नेता के वरिष्ठ कांग्रेसी पिता का सेक्स वीडियो मीडिया में घूम रहा

xxx

नाबालिग लड़की के साथ सेक्स कर रहे हैं बुजुर्ग कांग्रेसी नेता! (देखें तस्वीरें)

xxx

सत्ता और धन आते ही नेता मदांध और कामांध हो जाते हैं

xxx

बिन ब्याही सिंगर मां बनी, कांग्रेसी नेता का कारनामा!

xxx

नए सेक्स स्कैंडल के कारण चर्चा में हैं हरक सिंह रावत!

xxx

यूपी में भी सेक्स सीडी कांड, 71 वर्षीय सपा नेता को चाहिए 'चूजा' (सुनें बातचीत)

xxx

राघवजी के नाम रवीश कुमार का पत्र

xxx

Abhishek Manu Singhvi Sex CD (8) : सुप्रीम कोर्ट के अहाते में बैठकर सेक्स करने वाले सिंघवी को सजा मिले

xxx

भाजपा नेता राघव जी अपने नौकर से करते थे दुराचार, सीडी सामने आने के बाद मंत्री पद से इस्तीफा

स्याही पोतने वाले को योगेंद्र यादव ने लिखित रूप से माफ कर दिया

Mayank Saxena :  योगेंद्र यादव ने अभी ट्वीट कर के कहा है कि उन्होंने संसद मार्ग थाने में बाक़ायदा प्रार्थनापत्र दिया है कि स्याही फेंकने वाले व्यक्ति के खिलाफ न तो एफआईआर दर्ज की जाए और न ही उसे हिरासत में लिया जाए…फिलहाल वो मेट्रो में हैं और लोगों से मिलने गुड़गांव जा रहे हैं…

Yogendra Yadav @AapYogendra

Went to Parl Street police station. Gave written request not to detain the attacker or register a case.

कुछ भी कहिए, Yogendra Yadav की विनम्रता और सादगी क़ायल करने वाली है…जो है सो है!

xxx

अब सोचिए जिसने योगेंद्र यादव के स्याही मली, वो उनके बारे में कितना जानता होगा…न तो वो आदमी कभी किसी के खिलाफ निजी हमला करता है…न लो चीखता है…न अशोभनीय बयान देता है…बेहद विनम्र आदमी…सादा आदमी…और तार्किक आदमी… ज़ाहिर है कि ऐसे शख्स पर हमला करने वाला किसी प्रकार की अंधश्रद्धा-अंधभक्ति से प्रेरित…उकसाया गया…या फिर धन के लिए ऐसा करने वाला हो सकता है…आप अगर बीजेपी से घृणा करें तो गोविंदाचार्य के चेहरे पर स्याही नहीं मलेंगे न…आप अगर कांग्रेस से नफ़रत करें तो भी मीरा कुमार को गाली नहीं बक सकते हैं…सीपीएम को गाली बकने वाले भी सोमनाथ दा को कैसे गरिया देंगे… ठीक वैसे ही आप से नफ़रत हो भी योगेंद्र यादव के चेहरे पर स्याही पोतना किसी समझदार आदमी का काम नहीं था…अब वो किस पार्टी का समझदार समर्थक है, ये तो पार्टियां ही तय करें…क्योंकि सारी जनता इमोशनल फूल नहीं होती है…!!!

पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.


मूल खबर…

होली है.. सुब्रत राय के बाद अब योगेंद्र यादव के चेहरे पर स्याही

दैनिक जागरण का कमाल, बिना एफआईआर शिक्षक की दर्शा दी गिरफ्तारी

फर्रूखाबाद। कानपुर से प्रकाशित दैनिक जागरण समाचार पत्र ने कमाल कर दिया है। नंबर एक की तेज रफ्तार के कारण फर्रुखाबाद के 27 फरवरी के संस्करण में गलत समाचार प्रकाशित कर दिया गया। पेज नंबर 3 पर बैनर शीर्षक ''प्रधानाचार्य ने जारी कर दिये फर्जी नियुक्ति पत्र'' वाले समाचार में कोतवाली फतेहगढ़ तिर्वा कालौनी निवास प्रधानाध्यापक सत्यप्रकाश श्रीवास्तव की गिफ्तारी की खबर के साथ ही उनका फोटो छाप दिया है।

शहर कोतवाली के वरिष्ठ उपनिरीक्षक हरिश्चन्द्र वर्मा ने बताया कि शिक्षक सत्यप्रकाश के विरुद्ध कोई एफआईआर दर्ज नहीं है तो उनकी गिरफ्तारी का सवाल ही नहीं। शिकायती पत्र के आधार पर शिक्षक से पूछताछ की जा रही है। अखबार में गलत समाचार प्रकाशित किया गया है।

बुलंदशहर में अमर उजाला नेताओं-अफसरों की तरफदारी कर रहा!

बुलंदशहर : यहां नेताओं और अफसरों की गोदी में बैठ गया है 'अमर उजाला'… निष्पक्षता का ढिंढोरा पीटने वाले अमर उजाला की हालत बुलंदशहर में ठीक नहीं है… यहाँ ये नेताओं और अफसरों की गोदी में फल फूल रहा है.. ये कोई पत्रकार या आम आदमी नहीं कह रहा, बल्कि इसकी खबरें ही इसकी पोल खोल रही हैं… यहां पर ये नंबर एक होने का दावा भी करता है…

मामला एक: मामला बुलंदशहर सपा जिलाध्य्क्ष हिमायत अली के बेटे अफजल अली के अस्पताल में हंगामे का है. इसने डॉक्टर के साथ गाली गलौच भी की. हिंदुस्तान और दैनिक जागरण ने तो ढंग से लिखा लेकिन अमर उजाला ने काफी हल्के शब्दों में लिखकर या ये कहें खबर दबाकर अपनी निष्पक्षता की पुंगी बजा दी. अंतिम दिन तो सभासद की बैठक ऐसी छापी जैसे कल्याण सिंह ने भाषण दिया हो.

मामला दो:  ये मामला रविवार 2 मार्च का ही है.. एक निलम्बित कर्मचारी को सवेतन बहाली दी गयी. जागरण ने तो मामला तान दिया. इससे हड़कम्प भी मचा. वही हिंदुस्तान और अमर उजाला ने खबर को छुआ तक नहीं.. शनिवार शाम तक हल्ला ये हो गया था कि हिंदुस्तान और अमर उजाला में खबर पर डील हो गयी है.. सुबह जब अखबार पढ़ा तो हकीकत सामने आ गयी..

मामला तीन: हुआ ये कि उप जिलाधिकारी और कुछ सपाईयों के बीच झड़प हो गयी… मामला मीडिया में प्रचारित भी हो गया… झगड़े की पूरी वीडियो क्लिप उप जिलाधिकारी ने बनायी… पूरा विवरण भी दिया… चूँकि मामला सपाईयों का था तो अमर उजाला में ये खबर दब गयी…

बुलंदशहर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पूंजी > शक्ति : मीडिया > बिक्री : संपादक > मैनेजर : मालिक > सुपर पावर : पत्रकारिता > टांय टांय फिस्स : (रवींद्र शाह स्मृति प्रसंग)

मुद्रित शब्दों के प्रति अपनी गहरी आस्था, अपने सामाजिक सरोकार, पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और आने वाले समय की आहट को पहले से पहचानने की क्षमता रखने वाले हमारे समय के समृद्ध पत्रकार रवीन्द्र शाह को गुजरे दो साल हो गये। कभी न अस्त होगा ‘रवि’ कार्यक्रम के जरिये लगातार दो साल से मित्रगण रवीन्द्र शाह स्मृति प्रसंग के जरिये ऐसा कुछ कर रहे हैं जो रवि को पसंद था। 27 फरवरी शिवरात्रि के दिन इंदौर के जॉल आडिटोरियम में ‘पत्रकारिता, कार्पोरेट कल्चर, न्यू मीडिया’ पर विमर्श हुआ। भेरू सिंह चौहान के कबीर के भजनों के बाद प्रारंभ हुए इस विमर्श के प्रारंभ में रवीन्द्र शाह का मृत्यु पूर्व के कुछ दिन पहले का एक ऑडियो दिखाया गया जिसमें रवीन्द्र शाह कह रहे हैं-

''आज भले ही ढेरो न्यूज पोर्टल और न्यूज चैनल आ गए हों, लेकिन छपे हुए शब्दों की ताकत आज भी कायम है। लोग भले ही पहली बार खबर वेबसाइट पर देखें या टीवी न्यूज पर, परंतु वास्तविक खबर के लिए वे अखबार पर विश्वास करते हैं। जब तक मीडिया की क्रेडिट और साख बरकरार रहेगी, मीडिया किसी भी रूप में सामने आए, इससे कोई फर्क नही पड़ेगा। हमें इस साख को बनाए रखने के लिए काम करना पड़ेगा।''

रवीन्द्र शाह की इस बात को विजय मोहन तिवारी, यशवंत सिंह, श्रीवर्द्धन त्रिवेदी ने आगे बढाया। रवीन्द्र शाह ने अपनी असामयिक मृत्यु 21 फरवरी 2012 के करीब एक माह पूर्व रायपुर में संगवारी समूह जो सोशल मीडिया ‘फेसबुक’ पर एक बडा विचार समूह है, के वार्षिक पुरस्कार समारोह में 'नये मीडिया और निजता' को लेकर बहुत ही चौकाने वाले संकेत दिये थे।

रवीन्द्र शाह से अपनी गहरी मित्रता, आत्मीयता के चलते मेरा जुड़ाव दिन प्रतिदिन बढता गया और मृत्यु के बाद भी यह बना हुआ है। रवि के कारण तीन साल से फरवरी इंदौर की होकर रह गई है। इस बार कार्पोरेट कल्चर और सोशल मीडिया पर गोष्ठी में बोलने के लिए बाकायदा एक परचा तैयार किया जो समयाभाव के कारण पढा नहीं जा सका। वो पर्चा यहां रख रहा हूं ताकि मीडिया के बड़े आडियेंस तक यह पहुंच सके।

सुभाष मिश्रा

प्रशासनिक अधिकारी, पत्रकार, रंगकर्मी

संपर्क: aajkijandhara@gmail.com


पत्रकारिता, कार्पोरेट कल्चर, न्यू मीडिया

-सुभाष मिश्रा-

हम जिस दौर में मीडिया की बात पर कर रहे हैं, वह दौर पूरी तरह से बाजार आधारित व्यवस्था का दौर है। बड़ी पूंजी के जरिये मीडिया नियंत्रित हो रहा है। बड़े-बड़े समूह का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमारे मीडिया पर कब्जा है। इसी समय एक और मीडिया हमारे सामने है, जिसे हम सोशल मीडिया या वैकल्पिक मीडिया भी कहते हैं। इस मीडिया ने अरब देशों में सामाजिक जागरूकता के लिए जो काम किया है उसे हम 'अरब स्प्रिंग' या 'अरब बसंत' के नाम से जानते हैं।

इसी मीडिया ने अमेरिका में वालस्ट्रीट पर कब्जा किया हुआ है। वालस्ट्रीट से आशय नये माध्यम की वह स्क्रीन है जिसे सब देखते हैं। हमारे देश के अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान इसकी ताकत को लोगों ने महसूस किया। इस मीडिया में लोगों ने परिर्वतन की ताकत को महसूस किया। इसे प्रतिरोध का मीडिया भी कहा जा रहा है। ये मीडिया बिना बड़ी पूंजी के निवेश के परिर्वतन का कारगर हथियार के रूप में हमारे सामने है। जिनको लगता है की हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए उचित माध्यम नही मिल रहा है, वे सभी लोग सोशल मीडिया की वॉल पर अपनी अभिव्यक्ति को उजागर कर रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिये आज बहुत बड़ा लोकतांत्रिक स्पेस बना है। इसमें कोई भी आकर भागीदारी कर सकता है। जो व्यक्ति सड़क पर आकर प्रदर्शन नही कर सकता, वो व्यक्ति भी सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात रख सकता है। सोशल मीडिया से डेमोक्रेटिक स्पेस बना है। सोशल मीडिया के दुरूपयोग को लेकर भी इन दिनों काफी बात हो रही है। किसी प्रकार का कोई अंकुश या एडिट समीक्षा, चयन नहीं होने के कारण बहुत सारे लोग इसका मनमाना उपयोग कर रहे हैं। इलेक्ट्रानिक, वेब, सोशल मीडिया के आने के पहले भी हमारे यहां परंपरागत सोशल मीडिया था जो गीत-संगीत, नुक्कड़ नाटक, ताीज-त्यौहार पर होने वाले जनजुड़ाव से हमें जोड़ता था। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक द्वारा प्रारंभ गणेशोत्सव इसकी सबसे जीती-जागती मिसाल है।

हम जिस समय में जी रहे हैं, उस समय में ऐसा कुछ भी ग्लोबल नही है जो स्थानीयता लिए न हो। कल तक के सारे जमीनी संघर्ष अब जमीन पर नहीं होकर संस्कृति खासकर पापुलर सांस्कृतिक क्षेत्रों में तय होते हैं, मीडिया तय करता है। मीडिया यथार्थ (सच) का निर्माण भी करता है इसी तरह परिदृश्य में उसको नष्ट भी करता है। जब वह एक यथार्थ का निर्माण कर रहा होता है तो दूसरी तरफ उसे नष्ट कर रहा होता है। यथार्थ को नष्ट करना ही उसका उद्देश्य नहीं है, बल्कि एक भ्रामक यथार्थ निर्मित करके वह पाठकीय/दर्शकों की सोच भी अप्रभावित रखना चाहता है।

मालिक और नौकर (पत्रकार) की मानवीय सरोकारों की पक्षधरता अलग-अलग है। मालिक छद्म मानवीय या छद्म मानवीय सरोकारों को वास्तविक की तरह प्रस्तुत करता है। किसी बड़े कारपोरेट के बड़े फायदे के लिए शासन या किसी दूसरे घराने के खिलाफ मानवीय सरोकार का इस्तेमाल अंतत: सरोकारों के खिलाफ ही जाता है। जब तक एक जागरूक नागरिक इस मानवीय सरोकार के छल के समझने लगता है तो नव्य मीडिया और नागरिक संबंधो में विभाजन पैदा होता है। इन दिनों नव्य मीडिया का परंपरागत भरोसा नये जागरूक नागरिक से खत्म होता जा रहा है। हमे संबंधों के इस अंतर्द्वंद्व को समझना होगा। इस बाजार समय में औद्योगिक घरानों ने पूंजी को शक्ति में बदला है इसलिए मीडिया को खरीदने, बनाने और बदलने की तरकीबें और हिम्मत पैदा की है और सफलता भी हासिल की है। इसलिए इस बाजार समय में संपादक मैनेजर में तब्दील हो गया है। शक्ति या पावर मालिक के पास चला गया है। क्योंकि अब जरूरत विचार को पैदा करने या फैलाने में नहीं उसकी खरीद फरोख्त की रह गई है। मैनेजर का काम विचार की प्राथमिकता हो सकता है लेकिन व्यवसाय के लिए मालिक की व्यवसायिक बौद्धिक क्षमता ही उपयोगी है।

जहां तक सोशल मीडिया का सवाल है वहां यह बात गौर करने योग्य है की ‘सोशल मीडिया के साथ एक दिक्कत यह है कि वह आंदोलन को बड़ा और खड़ा तो कर लेता है, लेकिन वह नारे में तब्दील हो जाता है, विचार के अभाव में। विचार के बगैर आंदोलन भीड़ में तब्दील होता है। विचार के साथ आंदोलन सार्थक परिणाम तक पहुंचता है। गांधी के विचार के साथ आंदोलन शुरू करने वाले अन्ना के पास विचार नहीं सिर्फ इक्का-दुक्का मांग और नारे का आंदोलन था। ऐसे आंदोलन की उम्र ज्यादा नहीं होती ।

मीडिया की भूमिका और छबि निरंतर बदल रही है क्योंकि उसकी पक्षधरता पूंजी के सरोकार तय कर रहे हैं। इसलिए कई बार मीडिया किसी एक की छबि बड़ा बनाती है तो पक्षधरता बदलते ही वह बड़ी छबि को नष्ट करने पर भी उतारू हो जाता है। केजरीवाल आंदोलन और तहलका प्रकरण इसके ताजा उदाहरण हैं।

एक तरफ मीडिया यथार्थ का या सच का निर्माण भी करने लगा है और दूसरी तरफ परोक्ष  में वह उसको नष्ट भी करता है, क्योंकि उसके लिए उसके हित सर्वोपरि हैं। मीडिया की स्थापना में भी अब बडी पूंजी अपरिहार्य हो गई है। खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में। ऐसे में प्रखर बौद्धिक पत्रकार या संपादक अपनी अनिवार्यता प्रमाणित तो करते हैं लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर। और अपनी क्षमता और ज्ञान का निजी मूल्य हासिल करके सामूहिक  शक्ति को कमजोर करते हैं। जो मीडिया ज्यादा लचीला होगा और सामान्य नागरिक की चेतना में बदलाव से बचता है और खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के खटकरम जानता है वही केन्द्र में रहता है। इसलिए ऐसे मीडिया घराने अपने बौद्धिक छल, वर्गीयहित ओर पूंजीपति घराने या शासक वर्ग से गठबंधन को छिपाने में कामयाब हो जाते हैं, वे एक कथित पावन छवि के साथ प्रस्तुत होते हैं, लोकप्रिय होते हैं।

सुभाष मिश्र प्रशासनिक अधिकारी के रूप में छत्तीसगढ़ में पदस्थ होने के साथ साथ एक रंगकर्मी और पत्रकार के रूप में भी बेहद सक्रिय रहते हैं. उनसे संपर्क aajkijandhara@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


संबंधित खबर…

रवींद्र शाह स्मृति व्याख्यान में बोले वक्ता- वर्तमान पत्रकारिता पर कार्पोरेट कल्चर पूरी तरह हावी है (देखें तस्वीरें)

समाचार पत्रों और न्यूज़ एजेंसियों के संगठन ने की मजीठिया वेज लागू करने की मांग

समाचार पत्रों और न्यूज़ एजेंसियों के संगठन 'कंफेडेरेशन ऑफ न्यूज़ पेपर एंड न्यूज एम्प्लॉईज़ ऑर्गेनाइज़ेशन(CNNAEO)'ने समाचार पत्रों और न्यूज़ एजेंसियों के कर्मचारियों के वेज पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने की मांग की है। CNNAEO ने इंडियन न्यूज़ पेपर सोसाइटी(INS) के अध्यक्ष रवीन्द्र कुमार के उस बयान की आलेचना की है जिसमें उन्होने कहा था कि न्यूज़ पेपर इंडस्ट्री के सामने अस्तित्व का संकट है और उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित 'इच्छा मृत्यु' की आवश्यकता नहीं है।

CNNAEO के महासचिव एमएस यादव ने एक बयान में कहा कि INS द्वारा सुप्रीम केर्ट के 7 फरवरी के आदेश की आलोचना उसकी वेज पुनरीक्षण विरोधी नीति के दर्शाता है। जब-जब वेज पुनरीक्षण की बात की जाती है तब-तब INS द्वारा न्यूज़ पेपर इंडस्ट्री के सामने अस्तित्व के संकट की बात उठाई जाती है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने 7 फरवरी के निर्णय में मजीठिया वेज बोर्ड की अधिसूचना को सही ठहराया था।
 

शशि शेखर के चेले ने पीसीएस अधिकारी के धड़ पर अपना चेहरा चिपका कर अपने ही अखबार में छाप लिया फोटो!

वाह रे हिन्दुस्तान। एक तरफ देश के इस प्रमुख अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर जी अखबार के पहले पन्ने पर ईमानदारी और सिद्धांतों की दुहाई वाले लेख लिख रहे हैं तो दूसरी तरफ आगरा में हिन्दुस्तान को संभालने वाले उनके चेले बेईमानी का रिकार्ड तोड़ रहे हैं। आगरा की मीडिया में इन दिनों हिन्दुस्तान के सिटी चीफ मनोज मिश्रा की करतूत सुर्खियों में है। मामला थोड़ा पुराना जरूर है लेकिन शशि शेखर के हाल ही में प्रकाशित लेख के बाद चर्चा का विषय बन गया है।

बीते दिनों महाकवि गोपालदास नीरज फाउंडेशन के तत्वावधान में गायत्री कप का आयोजन कराया गया था। इसमें प्रशासन और दैनिक हिन्दुस्तान की टीम के बीच मैच हुआ था। हिन्दुस्तान की टीम ने प्रशासनिक अधिकारियों को हरा कर जीत दर्ज की। मैच के अंत में विजेता और उप विजेता टीम का ग्रुप फोटो हुआ। हिन्दुस्तान के सिटी चीफ मनोज मिश्रा इस मौके पर मौजूद नहीं थे। मैच के अगले दिन हिन्दुस्तान के पेज नंबर आठ पर 'सेमीफाइनल में पहुंचा हिन्दुस्तान' शीर्षक से खबर तीन कालम में फोटो के साथ प्रकाशित हुई तो अखबारी जगत के अलावा प्रशासनिक अधिकारों के यहां भी चर्चा का केन्द्र बन गई।

मैच स्थल पर नजर न आने वाले सिटी चीफ अपने ही अखबार में मैच की खबर के साथ लगे फोटो में एडीएम सिटी के बगल में खड़े नजर आ रहे थे। मनोज मिश्रा ने संपादक पुष्पेन्द्र शर्मा को विश्वास में लेकर अखबार के सिद्धांतों का मान-मर्दन कर खबर में लगे फोटो में खुद को फिट कराया था। मनोज मिश्रा ने एक पूर्वांचल निवासी पीसीएस अधिकारी के चेहरे पर अपना चेहरा चिपकवाया था। इस काम को अंजाम दिया था उनके चहेते फोटोग्राफर ने। जिस पीसीएस अधिकारी के चेहरे की जगह मनोज मिश्रा के चेहरे को लगाया गया था उसने पत्रकारों से इसकी चर्चा भी की थी। हिन्दुस्तान के एक रिपोर्टर ने संपादक पुष्पेन्द्र शर्मा को इसकी जानकारी दी तो संपादक ने उल्टा उसकी क्लास ले ली। इसके बाद संपादक के खौफ से यह मामला दब गया। मनोज मिश्रा पुष्पेन्द्र शर्मा के लिए वही स्थान रखते हैं जो शशि जी के लिए पुष्पेन्द्र शर्मा का स्थान है।

देखें असली और नकली तस्वीरें…

फोटो- परिचय : एम 1 यह ओरजनिल फोटो है। जो प्लेयर बैठे हैं और जो खड़े होकर विजय के प्रतीक चिहृन विक्टर का प्रदर्शन कर रहे हैं वह हिन्दुस्तान की टीम है। बाकी जो लोग खड़े हैं उनमें एडीएम सिटी व अन्य अधिकारी हैं। कैप लगाकर विजयी मुद्रा में बैठे हिन्दुस्तान के रिपोर्टर अमित पाठक के ठीक पीछे हाथ में ब्लैक कैप लिए खड़े हैं वह वो पीसीएस अधिकारी हैं जिनका चेहरा हटाकर मनोज मिश्रा ने अपना चेहरा फिट करवाकर अखबार में अपना फोटो छपवाया।


यह फोटो दैनिक हिन्दुस्तान में खबर के साथ प्रकाशित है। कैप लगाकर बैठे अमित पाठक के ठीक पीछे माथे पर तिलक और चश्मा लगाकर जो सज्जन खड़े हैं वही हिन्दुस्तान के सिटी चीफ मनोज मिश्रा हैं। इनकी गर्दन को ध्यान से देखिए, धड़ से मैचिंग नहीं है। दोनों फोटो देखकर साफ पता चल रहा है कि कट और पेस्ट का कमाल है। दूसरी पहचान यह है कि हिन्दुस्तान के बाकी खिलाड़ी की टीशर्ट के कालर सफेद हैं और इनका कालर काला है। तीसरा सबूत यह है कि माथे पर लगा ताजा टीका बता रहा है कि मंदिर से निकलते समय खिंचवाये गये फोटो के चेहरों को इस्तेमाल किया गया है। आप ही बताइये पूरा मैच हो जाए और खिलाडी के माथे का टीका पसीने में छूटे भी नहीं, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। जहां मैच हुआ वहां दूर-दूर तक कोई मंदिर नहीं जिससे ये कहा जाए कि जीत के बाद मंदिर पर मत्था टेककर आए होंगे। यदि ऐसा होता तो हिन्दुस्तान के एक दो खिलाडियों के चेहरे पर भी टीका नजर आता।


हिन्दुस्तान में कुछ दिन पहले पेज नंबर आठ पर छपी खबर और फोटो


उपरोक्त खबर आगरा से भड़ास के एक शुभचिंतक ने मेल किया है. अगर खबर से जुड़े या हिंदुस्तान अखबार से जुड़े किसी पात्र, चरित्र, व्यक्ति, अधिकारी को कुछ कहना है तो वे अपनी बात, प्रतिक्रिया, वर्जन भड़ास तक bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

बिजली चोर दोस्त को बचाने के लिए विजिलेंस टीम से लड़ गए देवरिया के पत्रकार

गोरखपुर, 8 मार्च। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के पत्रकारों ने एक बिजली चोर को छुड़वाने के लिए बिजली विभाग की विजिलेन्स विभाग के अधिकारियों के साथ गाली गलौज की और बिजली चोर को छुड़ाकर अपने साथ लेते गए। बिजली चोर देवरिया के वाणिज्य कर विभाग में बाबु के पद पर तैनात है। चर्चा है कि इस मामले में विजिलेन्स विभाग के अधिकारी पत्रकारों के खिलाफ भी सरकारी कार्य में बाधा डालने की कार्यवाही करने की तैयारी कर रहे है और बकायदा झगड़ा करने वाले पत्रकारों की वीडियो रिकार्डिग भी की है।

 
प्राप्त जानकारी के अनुसार शुकवार को गोरखपुर से बिजली विभाग की विजीलेन्स विभाग की टीम इन्सपेक्टर दुबे के नेतृत्व में देवरिया गयी थी। वहां सूचना मिलने पर वह देवरिया में वाणिज्यकर विभाग में लिपिक के पद तैनात हदय शंकर मिश्र के कोतवाली थाना अन्तर्गत ग्राम सोनू घाट के पास दूसरे निर्माणाधीन मकान पर पहुंच गई। हदय शंकर मिश्र का एक मकान पहले से ही साकेत नगर में है। टीम को जाचं करने पता चला कि  हदय शंकर मिश्र एक वर्ष से बिजली की चोरी कर रहे थे और उन्होने किसी प्रकार का कोई कनेक्शन नहीं ले रखा था।

बताते है कि बिजली चोर मिश्र ने वीजिलेन्स टीम द्वारा पकड़े जाने की सूचना अपने जान-पहचान वालों तथा कुछ पत्रकारों को दी। उसके बाद वो अपने एक ठेकेदार तथा श्री टाईम्स समाचार पत्र के पत्रकार सुरेन्द्र कुमार सिंघल की सिविल लाईन रोड स्थित दुकान पहुंच गए। सूचना मिलते ही चार पांच पत्रकारों का एक गुट कोतवाली थाने पहुंच गया और वहां एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी कर रहे वीजिलेन्स विभाग के कर्मचारियों के साथ गाली गलौज किया।
 
शुकवार की शाम को कोतवाली गेट के बाहर पत्रकारों और वीजिलेन्स विभाग की यह लड़ाई करीब एक घन्टा तक चली तथा वहां तमाशबीनों की काफी भीड़ इकटठा हो गई। आरोपों प्रत्यारोंपों के दौर का आखिरकार समापन तब हुआ जब वीजिलेन्स विभाग के इन्सपेक्टर दुबे ने चार हजार रूपया शमन शुल्क जमाकर मामले का निपटारा किया। हांलाकि  दुबे के इस निर्णय से उनके साथ आए और एफआईआर पर आमादा अन्य विभागीय कर्मचारियों ने इसका खुलेआम कड़ा प्रतिरोध किया।
 
टीम के लोग या तो एफआईआर या दस हजार रूपया शमन शुल्क जमा करवाने पर अड़े थे। लेकिन इन्सपेक्टर दुबे की वजह से सबको झुकना पड़ा। दीवान बीर बहादुर सिंह ने यहां तक कह दिया कि दुबे जी के वजह से विभाग का नाम बदनाम हो रहा है।

बाद में सेल टैक्स विभाग का कमीशनखोर एवं काफी बदनाम बाबू हदय शंकर मिश्र पत्रकारों को चाय पान कराने अपने साथ लेता गया। पता चला है कि जो पत्रकार बिजली चोर बाबू के लिए लड़ाई लड़ रहे थे उनमें से सभी स्वनामधन्य पत्रकार है जिनका पीत पत्रकारिता और दलाली करना ही मुख्य पेशा है।

देवरिया के उक्त पत्रकारों के इस कृत्य की चारों ओर निन्दा हो रही है। लोगों का कहना है पत्रकारों को एक ईमानदार व्यक्ति के लिए लड़ना चाहिए न कि सेल टैक्स विभाग के बेइमान और बिजली चोर बाबू के लिए।

 

भड़ास4मीडिया को भेजे गए मेल पर आधारित। भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं या नीचें बॉक्स में कमेंट कर सकते हैं।

डा. मत्स्येंद्र प्रभाकर ‘सिटी टाइम्स’ से जुड़े

लखनऊ में डा. मत्स्येंद्र प्रभाकर ने हिन्दी दैनिक 'सिटी टाइम्स' में बतौर कार्यकारी सम्पादक ज्वाइन कर लिया है. इस अखबार के मुख्य कर्ता-धर्ता और सम्पादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी हैं. यह समाचार पत्र 'सिटी टाइम्स' जिसे एम.सी.आई.-5 मीडिया कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड ने कुछ महीने पहले ही अधिग्रहीत किया था.

अभी तक तीन राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और दिल्ली में अपनी पहुंच रखता है. लखनऊ के अलावा गोरखपुर, इलाहाबाद, देहरादून और दिल्ली से एकसाथ प्रकाशित होने वाले 'सिटी टाइम्स' के अगले पड़ाव शीघ्र ही वाराणसी, कानपुर और फैज़ाबाद होंगे. सिटी टाइम्स का लखनऊ में सान्ध्य संस्करण भी प्रकाशित होता है. इसका अपना उर्दू रोज़नामा और मासिक पत्रिका भी इसी नाम प्रकाशित होती से है और शीघ्र ही पाक्षिक पत्रिका भी सभी के सामने होगी.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

सांप्रदायिक और कश्मीर विरोधी है अखिलेश सरकारः रिहाई मंच

लखनऊ 07 मार्च 2014। रिहाई मंच ने मेरठ स्थित स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वलिद्यालय में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों पर गत दिनों भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान, पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने के आरोप में दर्ज मुकदमें को उत्तर प्रदेश पुलिस के सांप्रदायिक और कश्मीर विरोधी मानसिकता का उदाहरण करार दिया है। मंच ने मुकदमा दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारियों के निलंबन की मांग की है।
 
रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि विश्वविद्यालय के कुलपति मंजूर अहमद का बयान सामने आ जाने के बाद कि, उन्होंने पुलिस में इस संदर्भ में कोई शिकायत ही दर्ज नही कराई थी तब, यह साबित हो जाता है कि कश्मीरी मुसलमानों के प्रति सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के तहत पुलिस ने उनके ऊपर यह मुकदमा दर्ज किया था। यही वजह है कि बाद में उन्हें देशद्रोह के इस मुकदमें को हटाना पड़ गया।
 
अधिवक्ता व रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस कश्मीरी मुसलमानों के प्रति किस हद तक सांप्रदायिक द्वेष रखती है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान या दुनिया के किसी भी मुल्क के पक्ष में नारे लगाना देशद्रोह के दायरे में नहीं आता लेकिन, अपनी सांप्रदायिक जेहेनियत और युवकों का करियर बिगाड़ने के उतावलेपन में उन्होंने इस तरह का आरोप मढ़ दिया जो कहीं तकनीकी आधार पर नहीं टिक सकता।

उन्होंने कहा कि इससे पहले भी आजमगढ़ के जमीयत-उल-फलाह मदरसे में पढ़ने वाले दो कश्मीरी छात्रों वसीम बट्ट और सज्जाद बट्ट को अखिलेश सरकार ने ही अलीगढ़ स्टेशन से आतंकी बताकर ट्रेन से उतार लिया था। यह साबित करता है कि कश्मीरी मुसलमानों को लेकर अखिलेश सरकार का रवैया पिछली बसपा सरकार से अलग नहीं है। बसपा सरकार के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश पुलिस ने नरेन्द्र मोदी की तर्ज पर मुख्यमंत्री मायावती को मारने की साजिश रचने के नाम पर चिनहट में 23 दिसंबर 2008 को दो गरीब कश्मीरी शाल विक्रेताओं को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था।
 
द्वारा जारी
शाहनवाज आलम, राजीव यादव
प्रवक्ता रिहाई मंच
09415254919, 09452800752

प्रेस क्लब में महिला दिवस पर तंबोला खेला जाएगा!

Mrinal Vallari : दिल्ली के "सशक्तीकृत" पत्रकारों की "भलाई" के लिए (…)ख्यात सबसे "सशक्तीकृत" इलाके में आसपास ही हैं दो कद्दावर संस्थाएं- प्रेस क्लब और महिला प्रेस क्लब। महिला प्रेस क्लब ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्वसंध्या पर आमिर खान को बुलाया जो आजकल टीवी पर एक नई "क्रांतिकारी" लाइन बघार रहे हैं कि "महिलाएं कॉक्रोच से डरती हैं और पुरुष बॉस से डरते हैं।" खैर, "क्रांतिकारी" मार्केटियर आमिर खान से मैं इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं कर सकती।

लेकिन "सशक्तीकृत" प्रेस क्लब ने महिला दिवस पर अनोखा "सशक्तीकरण" कार्यक्रम रखा है। वहां कपड़े, गहनों और चादरों की दुकानें सजी हैं, तंबोला खेला जाएगा। चलिए, पत्रकारों ने तो मान लिया कि महिलाओं की इससे ज्यादा कोई समस्या अब नहीं रही… सिवाय इसके कि "…सजना है मुझे सजना के लिए!" लेकिन प्लीज, "महान" पत्रकारों! जब मुजफ्फरनगर दंगों की कब्र पर सैफई में बॉलीवुड कलाकार आकर ठुमके लगाएं, डांस करें तो स्यापा मत फैलाना… अपनी छाती मत कूटना। अपने स्टैंड लेने की जगह पर कहां खड़े हैं आप सब, यह अब दिखता है!

दिल्ली की पत्रकार मृणाल वल्लरी के फेसबुक वॉल से.

यशस्वी यादव को अफगानिस्तान भेजा जाए डेपुटेशन पर

Kartikeya Mishra : शाबास यशस्वी यादव.. आपके शानदार नेतृत्व में कानपुर पुलिस ने दिखा दिया कि उत्तर प्रदेश पुलिस में पौरुष की कोई कमी नहीं| मुज़फ्फरनगर दंगे चूँकि खूंखार और दुर्दांत डॉक्टरों ने नहीं कराये थे, इसलिए पुलिस ने समय से कार्रवाई नहीं की| अब भी समय है कि हमारी दरियादिली को हमारी कायरता और अकार्यकुशलता समझने वाले चेत जाएँ.. बाई द वे.. सुना है कि अमेरिका इस साल के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान से वापस लौटने वाला है| भेजा जाय यादव जी को डेपुटेशन पर..

http://bhadas4media.com/article-comment/18180-2014-03-03-12-15-10.html

धन्यवाद Yashwant Singh

सीआईएसएफ में Deputy Superintendent of Police के पद पर कार्यरत कार्तिकेय मिश्रा के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आईं कई टिप्पणियों में से तीन पठनीय टिप्पणियां इस प्रकार हैं…

Rajiv Mishra : Professor tak ko in jahilo aur kasayiyo ne nahi baksha. In Ka mukhiya kumbhkarn ki nid so raha hai. Krurta aur barbarta ki parakashtha hai.

Ashutosh Singh : batia to aap ki sahi h…….pr dhayan dijiyega khi akhileswa aap k upar makoka n laga de..sir

Prashant Tripathi : नूतन ठाकुर जो खुद आईपीएस की पत्नी हैं और जनहित के मुद्दों पर याचिकाएं दायर करती रहती हैं, उन्होंने मेडिकल कॉलेज की स्थिति का जायजा लेने के बाद एसएसपी यशस्वी यादव की बर्बरतापूर्ण कार्रवाई के विरुद्ध मानवाधिकार अध्यक्ष को लिखा है. इसके बावजूद दैनिक हिंदुस्तान जैसे अखबार विधायक द्वारा बना कर दी गई रिपोर्ट को ही प्रकाशित कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश में गुंडागर्दी सारी हदें पार कर चुकी है. नेता कुछ भी करने के लिए स्वतन्त्र हैं. एसएसपी यशस्वी यादव ने यह सिद्ध कर दिया कि सत्ता का वरदहस्त उनके ऊपर हो तो उनके जैसे अफसर हिटलर और मुसोलिनी को भी पीछे छोड़ सकते हैं..

होली है.. सुब्रत राय के बाद अब योगेंद्र यादव के चेहरे पर स्याही

माहौल पूरा होलियाना हो चुका है. क्या सुब्रत राय और क्या योगेंद्र यादव. जनता जनार्दन सभी को रंगने में लगी है. ताजी सूचना के मुताबिक आम आदमी पार्टी के नेता और गुड़गांव से लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार योगेंद्र यादव के चेहरे पर एक शख्स ने तब स्याही रगड़ दी जव वे मीडिया से बात कर रहे थे. वो शख्स पीछे से आया और योगेंद्र यादव के चेहरे पर स्याही पोत दी. स्याही रगड़ते हुए भारत माता की जय कह रहे इस शख्स को आम आदमी पार्टी के समर्थकों ने पकड़ा, पीटा और संसद मार्ग पुलिस को सौंप दिया.

पुलिस का कहना है कि आरोपी का नाम सागर भंडारी है और यह आम आदमी पार्टी का ही कार्यकर्ता है. भंडारी ने दावा किया है कि वह आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता है और उसने यह हरकत अपने गुस्से का इजहार करने के लिए की है. इस बारे में योगेंद्र यादव ने कहा कि जब आप राजनीति करने निकलते हैं, बड़ी बड़ी शक्तियों से लड़ने निकलते हैं तब कुछ कीमत चुकाने के लिए तो आपको तैयार रहना ही चाहिए. जिसने यह सब किया, ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे.

इस दौरान योगेंद्र यादव बार-बार अपने समर्थकों को शांत कर रहे थे और कह रहे थे कि शांत रहें, मुझे इस बात की कोई शर्म नहीं है. उन्होंने मीडिया से कहा, 'आप देख रहे हैं कि मैं तो देख भी नहीं पाया, कौन था, कहां से आया. अचानक पीछे से कोई आया और उसने चेहरे पर कुछ लगा दिया. एक बार फिर आम आदमी पार्टी के साथ वही हुआ है.'


स्याही से रंगे सहाराश्री की शकल देखने के लिए यहां क्लिक करें…

सहाराश्री के मुंह पर स्याही : हां, इस संसार में कहीं ना कहीं न्याय है

पत्रकार नेता हेमंत तिवारी को पत्रकारिता और पत्रकार कम, सत्ता-सिस्टम व नेता ज्यादा सूट करते हैं

यूपी में एक पत्रकार नेता है. नाम है हेमंत तिवारी. जब पत्रकारों पर दुख पड़ता है या पत्रकारों का मसला होता है तो ये अक्सर दाएं बाएं नजर आते हैं और मोर्चा संभालने से परहेज करते हैं. पर अगर सत्ता सिस्टम और नेता को इनकी जरूरत पड़े तो फौरन हाजिर हो जाते हैं. मायावती के जमाने में हेमंत तिवारी मायावती को अपने हाथों केक खिलाते हुए माया के जन्मदिन की फोटो अपने सरकारी आवास पर लगाकर रखते थे ताकि इनके घर आने जाने वालों को इनके ताकत, रसूख के बारे में पता चल सके.

सत्ता से माया गईं तो वो तस्वीर भी उतर गई. देखते ही देखते हेमंत तिवारी ने सपा से नजदीकियां बना ली. कुछ ही समय बाद ये सपा के बड़े नेताओं के इर्दगिर्द नजर आने लगे. मुलायम, शिवपाल, अखिलेश आदि के इर्दगिर्द जब हेमंत तिवारी के खड़े होने वाली तस्वीरें छपने छपाने लगीं तो हेमंत का मार्केट रेट फिर हाई हो गया. सपा नेताओं के साथ की फोटो इनके घर की शोभा बढ़ाने लगी. सत्ता के नजदीक रहते रहते अक्सर ये सत्ता मद में चूर हो जाया करते हैं और देर रात किसी को भी सड़क पर गालियां देने लगते हैं. ऐसे कई वाकये हुए जिसमें इन्होंने कभी किसी पुलिस वाले को तो कभी किसी छात्र नेता को तो कभी किसी निर्दोष को गालियां दी और हंगामा खड़ा किया. पर पत्रकारों का कथित नेता होने और मंत्रियों-अफसरों से नाभि नाल का रिश्ता रखने के कारण इनके सौ खून माफ हो जाया करते हैं.   

पिछले दिनों कानपुर में पुलिस ने बड़े पैमाने पर डाक्टरों और पत्रकारों को पीटा. दर्जन भर से ज्यादा मीडियाकर्मियों को गंभीर चोटें आईं. लखनऊ के पत्रकारों सिद्धार्थ कलहंस, संजय शर्मा आदि ने बयान जारी कर इस पुलिसिया उत्पीड़न की भर्त्सना की और प्रदेश सरकार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बनाया. लेकिन हेमंत तिवारी का कोई बयान नहीं आया. बल्कि उनकी कुछ तस्वीरें ऐसी सामने आईं जिससे पता चलता है कि उन दिनों ये महाशय मुख्यमंत्री अखिलेश के करीबी बनकर एक समारोह की शोभा बढ़ा रहे थे.

सबसे बाएं फ्रेंच कट दाढ़ी में सपा का प्रचार मैटेरियल हाथ में लिए हुए जो शख्स दिख रहा है वही कथित पत्रकार नेता हेमंत तिवारी है


बात किसी एक  हेमंत तिवारी की नहीं है. ये एक ट्रेंड है. ये एक प्रवृत्ति है. ऐसे कई लोग हैं जो पत्रकारों का नेता बनकर सत्ता सिस्टम के करीब पहुंच जाते हैं और पत्रकार जगत की तरफ से ठेका लेने लग जाते हैं. वे ऐसा दर्शाते हैं कि अगर उन्हें खुश नहीं रखा गया तो पूरा मीडिया जगत नाराज हो जाएगा. कई बार ये लोग इसी चक्कर में विरोध प्रदर्शन भी सत्ता के किसी एक धड़े के खिलाफ करते हैं क्योंकि उस धड़े ने इन लोगों को ओबलाइज नहीं किया होता है या इगनोर रखा होता है. मार्केट में मैसेज जाता है कि देखो ये कितना बड़ा पत्रकार नेता है जो सत्ता से लड़ने जा रहा है लेकिन सच्चाई जानने वाले ठीक से जानते हैं कि ये विरोध प्रदर्शन सिर्फ मार्केट सत्ता सिस्टम में अपनी पकड़ दबदबा बनाए रखने के लिए है, किसी पत्रकार या पत्रकारिता जगत के हित के लिए नहीं.

तो ऐसे हेमंत तिवारियों से सावधान रहने की जरूरत है. बात किसी एक हेमंत तिवारी की नहीं है इसलिए दूसरा उदाहरण भी यहां दिया जा रहा है. खुद को पत्रकारों का बड़ा नेता बताने वाले के. विक्रम राव की भी बोलती बंद है. समाजवादी पार्टी के एहसानों तले दबे ये महाशय गाहे बगाहे मंच पर मुलायम अखिलेश के साथ तो दिख जाते हैं लेकिन जब मामला पत्रकारों पर पुलिस अत्याचार का हो तो ये इसलिए चुप्पी साध जाते हैं क्योंकि सत्ता सिस्टम के एहसानों लाभों उपकारों के बोझ तले दबे ये बोलेंगे तो इनकी आवाज सरकार के खिलाफ मान ली जाएगी.

हेमंत तिवारी, के. विक्रम राव जैसे दर्जनों अवसरवादी पत्रकार नेता और पत्रकार संगठन हैं. इनका मकसद किसी पत्रकार या पत्रकारिता की हित नहीं बल्कि अपनी दुकान चलाने चमकाने की रहती है. इसलिए कल के दिन ये लोग जब पत्रकारों और पत्रकारिता को लेकर बड़ी बड़ी बातें करते नजर आएं तो आप एक सवाल सामने दाग सकते हैं कि जब कानपुर में दर्जन भर से ज्यादा पत्रकारों को पीटा गया था तब आप लोगों की बोलती क्यों बंद हो गई थी.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

नौसेना पनडुब्बी हादसे पर युवा संसद में जमकर हंगामा

भोपाल। रूस निर्मित पनडुब्बी आईएनएस सिंधुरत्न हादसे पर बहस के दौरान युवा संसद में जमकर हंगामा हुआ। रक्षामंत्री के जवाब से विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। विपक्ष ने रक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग की। महंगाई, कृषि और महिला अपराध के मामले भी विपक्ष ने जोर-शोर से उठाए। खास बात यह रही कि तमाम अवरोध के बाद भी युवा संसद की कार्रवाई चलती रही। आखिर में नए राज्य तेलंगाना के गठन पर सरकार की ओर से लाए गए विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। यह नजारा था माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (एमसीयू) के सभाकक्ष का, जहां युवा संसद का आयोजन किया गया। इसमें विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

पं. कुंजीलाल दुबे राष्ट्रीय संसदीय विद्यापीठ की ओर से एमसीयू में आयोजित युवा संसद में छात्रों ने सरकार और विपक्ष की भूमिका निभाई। मॉक संसद के प्रश्नकाल में नौसेना हादसा, बढ़ती महंगाई, रुपये की घटती साख, बलात्कार और महिला अपराध के साथ ही कई राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस की गई। विपक्षी सांसद ने हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारतरत्न नहीं देने और हॉकी की अनदेखी कर क्रिकेट को प्राथमिकता देने पर विरोध दर्ज कराया। उन्होंने इस संबंध में खेलमंत्री से पूछे गए प्रश्न के जवाब से असंतुष्ट विपक्षी सांसदों ने जमकर हंगामा मचाया। शून्यकाल में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में छात्र वैभव मिश्रा ने सरकार पर तीखा हमला किया। अपने भाषण में नेता प्रतिपक्ष ने सरकार की नाकामयाबियों को उजागर किया। सरकार पर विपक्ष की अनदेखी करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने ब्रेन-ड्रेन एक्ट बनाने का आग्रह सरकार से किया। इसके बाद प्रधानमंत्री की भूमिका में छात्र अभिषेक मिश्र ने सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला। सरकार की भविष्य की योजनाओं के संबंध में सदन को अवगत कराया। साथ विपक्ष के आरोपों का भी जवाब दिया। लेकिन प्रधानमंत्री के जवाब से भी विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ।

ध्वनि मत से तेलंगाना विधेयक पारित

युवा संसद में सरकार की ओर से नए राज्य तेलंगाना के गठन का प्रस्ताव रखा गया। इस मसले पर सदन में जमकर हंगामा हो गया। विपक्षी सांसद अध्यक्ष की आसंदी तक पहुंच गए। विपक्षी सांसदों ने जमकर नारेबाजी की और तेलंगाना के गठन का विरोध किया। अध्यक्ष के हस्तक्षेप के बाद विपक्षी सांसद शांत हुए। तेलंगाना विधेयक पर मतदान कराया गया। आखिर में इसे ध्वनि मत से स्वीकार कर लिया गया।

लोकतंत्र सुरक्षित है: एलसी मोटवानी

युवा संसद की कार्रवाई को देखने के लिए संसदीय कार्य विभाग के अपर सचिव एलसी मोटवानी, अवर सचिव एमके राजौरिया, सरोजनी नायडू कन्या महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. एसके पारे, पं. कुंजीलाल दुबे राष्ट्रीय संसदीय विद्यापीठ के उप संचालक बीआर शर्मा मौजूद थे। विश्वविद्यालय की ओर से जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी भी इस दौरान मौजूद थे। युवा संसद की तैयारी में अतिथि विद्वान मयंक शेखर मिश्रा और प्रोडक्शन निदेशक आशीष जोशी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस मौके पर श्री मोटवानी ने कहा कि युवा संसद में युवाओं का उत्साह और ज्ञान देखकर सुकून है कि अभी भारत में लोकतंत्र सुरक्षित है। आने वाले समय में इसे जागरूक युवा और समृद्ध बनाएंगे। डॉ. पारे ने भी इस मौके पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

इन्होंने निभाई युवा संसद में भूमिका

पूर्णिमा तिवारी (लोकसभा अध्यक्ष), आकाश देशमुख (महासचिव लोकसभा), हिमांशु शुक्ला (मार्शल), रूद्र प्रताप सिंह (रिपोर्टर), अभिषेक मिश्र (प्रधानमंत्री), अविनाश त्रिपाठी (गृहमंत्री), शिवानी जैन (वित्त मंत्री), शुभम द्विवेदी (कृषि मंत्री), दीपल सिंह भदौरिया (महिला एवं बाल विकास मंत्री), हितेश शर्मा (रक्षा मंत्री), वैभव शर्मा (खेल मंत्री), प्रियंका पाण्डेय (सांसद), दुर्गेश कुमार (सांसद), पुष्पेंद्र सिंह तोमर (सांसद), सूर्या त्रिपाठी (सांसद), विकास कुमार (नवनिर्वाचित सांसद), वैभव मिश्रा (नेता प्रतिपक्ष), आरजू स्निग्धा (सांसद), कविता भदौरिया (सांसद), रणधीर परमार (सांसद), पूर्णेंदु त्रिपाठी (सांसद), यतीश वाकणकर (सांसद), सुशांत शुक्ला (सांसद), कोमल बड़ोदकर (सांसद)।

 

प्रेस विज्ञप्ति, द्वारा, लोकेन्द्र सिंह। संपर्कः lokendra777@gmail.com

हरीश रावत ने धोखाधड़ी की है, झूठ बोला है, मुकदमा दर्ज करें

सेवा में, थानाध्यक्ष, थाना धारचूला, जिला- पिथौरागढ़ : विषय- 10 माह बाद भी बाढ़ सुरक्षा कार्य षुरू नहीं होने के कारण आरोपी के खिलाफ प्रथम सूचना दर्ज किये जाने के संदर्भ में : महोदय, वर्ष 2013 में 16 व 17 जून को आयी भीषण आपदा के बाद धारचूला तहसील के अंतर्गत धौलीगंगा, काली नदी और गोरी गंगा किनारे स्थित गांव खतरे की चपेट में आ चुके हैं। इन गांवों के सैकड़ों आवासीय भवन नदी में बह चुके हैं और सैकड़ों आवासीय भवन अभी भी खतरे में हैं। गोरी गंगा, धौली गंगा और काली नदी के किनारे बसे इन गांवों को बचाने के लिय सिंचाई विभाग द्वारा बाढ़ सुरक्षा का कार्य शुरू होना था।

बाढ़ सुरक्षा कार्य के लिये प्रथम चरण की निविदा एक माह पूर्व स्वीकृत की जा चुकी है और द्वितीय चरण के बाढ़ सुरक्षा के कार्यों की निविदा इस बीच प्रकाशित की गयी है। तीसरे चरण के बाढ़ सुरक्षा कार्य का सर्वे सिंचाई विभाग द्वारा चल रहा है। दस माह से राज्य सरकार लगातार झूठ बोल रही है कि उसने पुननिर्माण के लिये बजट जारी कर दिया है। हकीकत यह है कि आपदा के दस माह बाद भी बाढ़ सुरक्षा कार्य के लिये कोई बजट उपलब्ध नही हो पाया है, जिस कारण सिंचाई विभाग बाढ़ सुरक्षा का कार्य शुरू नहीं हो पाया है। दो माह के बाद नदियों का जलस्तर बढ़ जायेगा और नदी किनारे स्थित सैकड़ों परिवारों के आवासीय भवन खतरे में पड़ जायेंगे।

राज्य सरकार के मुखिया होने के नाते प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री हरीश रावत ने जनता के साथ धोखाधड़ी की है, झूठ बोला है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आने से पूर्व संविधान की जो शपथ ली थी उसका उल्लंघन किया है। इस मामले में दोषी श्री हरीश रावत के खिलाफ कानून की मुख्य धाराओं में मुकदमा दर्ज करते हुए नदी किनारे बसे सैकड़ों परिवारों को न्याय देने का कष्ट करें।
धन्यवाद।

जगत मर्तोलिया

जिला सचिव
भाकपा माले, पिथौरागढ़
ग्राम सुरिंग
पट्टी – तिकसैन, तहसील मुनस्यारी
जिला – पिथौरागढ़
 

यशवंत व्यास और अमर उजाला के रास्ते अलग, राजेंद्र गुप्ता और राजीव पांडे की नई पारी

चर्चा है कि यशवंत व्यास अब अमर उजाला से सक्रिय रूप से नहीं जुड़े हुए हैं. अमर उजाला अखबार से उन्हें पहले ही हटा दिया गया था. उन्हें मैग्जीन निकालने और चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी. मैग्जीन निकालने चलाने के लिए बनाई गई कंपनी में यशवंत व्यास को हिस्सेदार भी बनाया गया. ताजी सूचना के मुताबिक यशवंत व्यास अमर उजाला से अलग हो चुके हैं. मैग्जीन निकालने की प्रक्रिया से थोड़ा बहुत ही संबंध बना हुआ है उनका. सूत्रों का कहना है कि वे जयपुर में सेटल हो गए हैं. उनकी नई पारी के बारे में पता नहीं चल सका है. यशवंत व्यास को जब इस बारे में फोन किया गया तो उन्होंने फोन पिक नहीं किया. 

सतना से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'मध्य प्रदेश जनसंदेश' में राजेंद्र गुप्ता ने बतौर सीनियर सरकुलेशन मैनेजर नई पारी की शुरुआत की है. राजेंद्र अमर उजाला समेत कई बड़े अखबारों में कई पदों पर काम कर चुके हैं.

अमर उजाला हल्द्वानी में कार्यरत वरिष्ठ उप संपादक राजीव पांडे ने अमर उजाला को बाय-बाय बोल दिया है. राजीव पांडे 9 मार्च को जालंधर में दैनिक भास्कर ज्वाइन करेंगे. रिपोर्टिंग और डेस्क का अनुभव रखने वाले राजीव अमर उजाला के साथ पिछले करीब पांच साल से जुड़े रहे हैं. हल्द्वानी से पूर्व राजीव अमर उजाला में ही देहरादून में कार्यरत रहे हैं.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

प्रगति मेहता चुनाव लड़ेंगे, लक्ष्मी एंकर बनीं, अनेहस शाश्वत व अमिताभ मिश्र की नई पारी

लोकसभा चुनाव के लिए हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर संस्करण में कार्यरत ज्वाइंट न्यूज एडिटर प्रगति मेहता को भी टिकट मिला है. लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने लोकसभा चुनाव में उन्हें उतारने का फैसला किया है. प्रगति बिहार की मुंगेर लोकसभा सीटे से चुनाव लड़ेंगे. प्रगति अमर उजाला के नोएडा ब्यूरो में भी काम कर चुके हैं. हिंदुस्तान गया संस्करण की लांचिंग में उन्हें वहां का संपादकीय प्रभारी बनाया गया था. वे हिन्दुस्तान, पटना में प्रिंसिपल करेस्पांडेंट के रूप में काम कर चुके हैं. ज्ञात हो कि 2014 के लोस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने आईबीएन7 के पूर्व मैनेजिंग एडिटर आशुतोष और दैनिक जागरण के नेशनल ब्यूरो में कार्यरत रहे पूर्व पत्रकार जरनैल सिंह को लोकसभा का टिकट दिया है.

एसिड अटैक की शिकार लक्ष्मी को न्यूज एक्सप्रेस चैनल ने एक शो का एंकर बनाया है. आज आठ मार्च महिला दिवस के दिन से एसिड फाइटर लक्ष्मी न्यूज एक्सप्रेस पर बतौर एंकर नजर आएंगी.  लक्ष्मी चैनल के एक कार्यक्रम 'उड़ान' को होस्ट करेंगी. शो शनिवार को रात दस बजे न्यूज एक्सप्रेस पर प्रसारित होगा और इसका पुन: प्रसारण रविवार को सुबह दस बज व शाम आठ बजे किया जाएगा. अमरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा ने हाल में ही लक्ष्मी को "इंटरनेशनल वूमन ऑफ करेज" अवार्ड से नवाजा था. 

सतना से प्रकाशित मध्य प्रदेश जनसंदेश टाइम्स के साथ अमिताभ मिश्र और अनेहस शाश्वत ने नई पारी की शुरुआत की है. अमिताभ मिश्रा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई शहरों में विभिन्न अखबारों के लिए बड़े पदों पर काम कर चुके हैं. उन्हें ज्वाइंट एडिटर बनाया गया है. अनेहस शाश्वत पत्रकारिता की लंबी पारी के बाद अध्यात्म की दुनिया में चले गए थे लेकिन उन्होंने फिर से पत्रकारिता जगत में वापसी की है. उन्हें असिस्टेंट एडिटर बनाया गया है. मध्य प्रदेश जनसंदेश टाइम्स के ग्रुप एडिटर राजेश श्रीनेत हैं. अखबार का भोपाल संस्करण भी जल्द शुरू करने की योजना है.

65 सालों में किसी पत्रकार का नाम इतिहास में दर्ज नहीं हुआ है : गुलाब कोठारी

जयपुर। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का कहना है कि मीडिया से काफी उम्मीदें हैं, लेकिन अब समझौते होने लगे हैं। पत्रकारों को सरकारों द्वारा सुविधाएं दी जा रही हैं। एक अच्छा पत्रकार संत से बड़ा होता है। संत एक संप्रदाय का होता है और पत्रकार सबका। दोनों समाज के लिए काम करते हैं। पहले मीडिया अंकुश लगाने का काम करता था, आजादी से पहले पत्रकारों के नाम गिनाए जाते थे और अब 65 सालों में किसी पत्रकार का नाम इतिहास में दर्ज नहीं हुआ है। आज पत्रकार श्रमजीवी कहलाना पसंद करते हैं, बुद्धिजीवी नहीं। आज के युवा को संकल्प लेना है कि वह बीज बने, फल चाहे किसी को भी मिले।

लोकतंत्र की हालत पर प्रहार करते हुए कोठारी ने कहा, लोकतंत्र के सपने चूर-चूर हो गए हैं। नेता राजा की तरह काम कर रहे हैं। गरीब की चिंता किसी को नहीं है। आरक्षण के नाम पर जातिवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर सब नेता इस पर एक राय हैं। लोकतंत्र की 65 साल की यात्रा पर मंथन करना होगा, देखना पड़ेगा कि क्या लोग समृद्ध हुए हैं? आजादी के समय नीतियां नीचे वालों को देखकर बनती थीं, लेकिन अब उल्टा हो रहा है।

नौकरशाही और न्यायपलिका आज अप्रभावी नजर आती है। विधायिका में वंशवाद गहराता चला गया। इंदिरा गांधी इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंगूठा दिखाकर कुर्सी पर काबिज रही।…आज क्षेत्रीय दल पूरी तरह एक व्यक्ति के कब्जे में (वन मैन शो) हैं। आजादी के इतने वर्षों बाद भी रोटी-पानी का अभाव है। हम किसके भरोसे भविष्य देख रहे हैं। आज जो हो रहा है, वह किसी अत्याचार से कम नहीं है। जनता की चिंता करने वाला कोई नहीं, घोटालों को दबाने की कोशिश हो रही है। नई पीढ़ी पंगु होती जा रही है, लेकिन किसी के आंख में आंसू तक नहीं है। सब अपने काम में व्यस्त हैं। आज लोकतंत्र के इतने टुकड़े हो गए हैं कि आगे इसका एक होना दूर का सपना नजर आता है।

सत्ता का नशा सब जगह घर कर गया है। जनता का सेवक शब्द गायब हो गया है। चुने हुए लोग शासक बन गए हैं। मतदाता की लाचारी है कि दो में से एक को चुनना है, जो कम बेईमान हो। चुनाव प्रक्रिया में बहुत सारी विसंगतियां है। नोटा एक तरह से मजाक है। ज्यादा वोट मिलने के आधार पर खराब व्यक्ति भी जीत जाता है।

For a Just, Equitable & Pluralistic Information Order

: STATEMENT ON INTERNATIONAL WOMEN’S DAY, 2014 : On this International Women’s Day the Delhi Union of Journalists and the DUJ Gender Council commit ourselves once again to upholding the dignity, rights and freedoms of all women and particularly those of women journalists in the print, broadcast and electronic media.

We pledge to struggle for fair wages, decent terms of employment, safe working conditions and a gender just environment at the workplace.  We applaud our women colleagues for successfully negotiating space within media over the past decades and reaching many milestones.  We urge that they dedicate themselves to creating a media that is free, equal and just in its portrayal of the role of women in society.

As journalists, both women and men, we pledge to work to build democracy, peace, equality and harmony in our plural and diverse nation. We pledge to struggle against poverty and social discrimination.  We commit ourselves to the empowerment of all Indian women.

Sujata Madhok
President

S.K. Pande
General Secretary

PRESS RELEASE

Jagjit Kaur is still denied of Justice

A women of Punjab, Jagjit Kaur who is protesting at Jantar-Mantar since 14 months has done extremely angry today and burnt the edifices of CM-Punjab Prakash Singh Badal, DCM-Punjab Sukbeer Singh Badal, PM Manmohan Singh, HM Sushil Kumar Shinde, UPA President Sonia Gandhi, BJP PM Candidate Narendra Modi and the accused IPS-Naunihal Singh at the site of her protest at Jantar Mantar with hundreds of youth in Delhi.

The rape and assault victim Jagjit Kaur is demanding for the lodging of FIR and the arrest of the accused IPS Naunihal Singh who has raped and assaulted her in 2010, when she had come to the accused for complaining a fraud of Rs 40,000 with her. She told the media person that she has become tired of requesting and complaining to the officers and politicians since 3 year. For lodging an FIR, she has protested 2 Year in Punjab, fasted from 12 January 2013 to 27 February 2013 at Jantar Mantar, and protesting here since then.

She has generated many rallies and discussions, participated in the protest for the demand of justice in Nirbhaya/Damini rape case, approaches several news channels and media persons and almost every institution established for complaint redressal and to help women, but she is still denied of Justice. She told that she has shared her pain with UPA President Sonia Gandhi and Rahul Gandhi, Prakash Singh Badal, Narendra Modi, Shushil Kumar Shinde but still…she cried and gone dejected and asked that what should she do? Whether, she has to embrace violence and become a terrorist or has to left the hope of Justice? Jagjit Kaur has said that she will continue her struggle and fight till she get the Justice.

Link:

http://www.youtube.com/watch?v=0U_MQfTFK9Q

http://www.youtube.com/watch?v=4PoxibWmR-o

http://www.youtube.com/watch?v=qdY8-URpEvQ

http://www.youtube.com/watch?v=JcKQECvtUhY

http://www.youtube.com/watch?v=NJzQCPke4qA

http://www.youtube.com/watch?v=Li00gXtB5cg

http://www.youtube.com/watch?v=pq_cu3vTChE

http://www.youtube.com/watch?v=pq_cu3vTChE

http://www.youtube.com/watch?v=1-2WP6qPzLo

http://www.youtube.com/watch?v=WO2cZX6SuxU

http://www.youtube.com/watch?v=Vwtu0BgAR6E

http://www.youtube.com/watch?v=OtCAhPVy3BY

यौन अपराधों के विरुद्ध आमिर खान की मुहिम से जुड़ें, नीचे दिए नंबर पर मिस कॉल करें

Hello everyone, I just saw the first episode of "STAYAMEV JAYATE". The topic of the episode was regarding Rape Cases and incidents of sexual harassment in India. I know, We all are busy in our daily routine life. But still, we all are afraid about our mother, sister, daughter and Wife's security. Please give a miss call on 18001032301. This number is to create 'One Stop Center' in every city of India to help rape victims.

So if you care for your loved ones, please share this number. We all use messaging services to exchange many top chain massages and mails. So just for humanity, I would request all readers to forward this number to as many peoples as you can.

Just one miss call for change and betterment of our country. Do give a call. It just takes a while to do a good thing. You will also get a SMS regarding your registration. SATYAMEV JAYATE…

Regards

Ashwani Verma

Amar Ujala Publication Ltd.

Gorakhpur

ashwani.verma24@yahoo.com

International Women’s Day: Celebrating Power or Weakness?

Like other valuable days dedicated like celebrating love as in Valentine’s Day or for cancer patients as in World’s Cancer Day, The International Women’s Day celebrates the true spirit of womanhood. Conventionally, celebrating Women’s Day has been symbolised as the reflection of progress and a call for change.  It’s the extraordinary occasion to delight the moments of those brave women who make a striking move to revolutionize something in the society.

But are we celebrating Women’s Day for any good? Has women still got her long lasting rights? In a country like India, gender inequality is preceded not only by gender bias but also by the mounting rape cases, one rape in 20 minutes every day.  At times, we are proud of triumphs achieved by women who feature strong and powerful character in the various sectors. On the other side, there is complete darkness. American feminist, Gloria Steinem’s lacerated remarks to Indian society is a bell for women living by conventional rules and availing modern facilities.

The darkness lures the clandestine effect that lies in the male centric society in India that allows men and women to come on the same social plane, but the tangential forces of the social hierarchy succeed to sideline women. This is nothing new. Then when the change will come? Can the Women’s Day bring newness to the Wasteland of India’s social and political system? Theresa May, Home Secretary of US duly emphasised that along with celebrating women’s achievement, we must think of the problems women face sadly throughout.

Another issue that still lurks ghastly in our society is the ever forgetting incident of Nirbhaya’s rape in 16th December 2013 that has opened a lot of public discourse and protests for nothing. The major lot of the society immediately rolled on the heels poking on the dressing style of the ‘modern girl’. To an utter despair, do girls of less than 15 and 10 years of age have to mind their dresses too? “This is high time to become alert to check out for those scorpions because these days you cannot even trust your uncle too”, says Content Strategist, Nazneen Sultana.

Reportedly, the rape cases have increased to 1330 in 2013 as opposed to 706 in 2012 and 10% of the rapists are strangers. Molestation has gone up to 2844 from 727 in 2013. If you don’t think these as numbers, then let’s come forward and nail it hard. Smarika Khari, PR Manager says, “This is the most heinous crime in the world. Why these beasts in the society don’t think that we also have the right to live? There should be strict law against them so that nobody will dare to do such things and we can come outside and breath freely.”

It’s all about the attitude that needs to be changed. Considering women as the gem of our society, Arti Gairola, Social Media Expert says, “They say that rape cases usually happen due to girls trolling late night and wearing short dresses. After the16th December rape, we have noticed that less than 15years of girls are being kidnapped and raped brutally. Does the same statement of dressing sense fit here too? The main reason is cheap mentality that allows the criminal to act more without any fear. No woman is safe in the country.”

By: Arti Gairola

Email: seoartigairola@gmail.com

पाकिस्तानी हैकरों ने मेरठ की सुभारती यूनिवर्सिटी की वेबसाइट हैक की

मेरठ की स्वामी विवेकानंद सुभारती यूनिवर्सिटी की वेबसाइट को पाकिस्तानी हैकरों ने हैक कर लिया है। जैसे ही ये खबर फैली कि कुछ कश्मीरी स्टूडेंट्स को एशिया कप क्रिकेट में भारत पर पाकिस्तान कि जीत की ख़ुशी मानाने के चलते ससपेंड कर दिया गया है, तो पाकिस्तान के हैकर्स ने यूनिवर्सिटी कि वेबसाइट सुभारती डॉट ऑर्ग के होम पेज को हैक कर लिया। हैकर्स ने वाबसाइट पर पाकिस्तान का झंडा लहराकर भारत विरोधी तमाम बातें लिखीं हैं।

                                सुभारती यूनिवर्सिटी की हैक्ड वेबसाइट का स्क्रीन-शॉट

हैकर्स ने इसे बदले कि कार्यवाही बताया है। “Feel the power of Haxors Crew.” संदेश के साथ हैकर्स ने लिखा है कि भारत की कमज़ोर सुरक्षा इस हमले को महसूस करे, हम सो रहे हैं पर मरे नहीं हैं।
 
बताते चलें कि सुभारती यूनिवर्सिटी द्वारा 66 कशमीरी स्टूडेंट्स को सस्पेंड करते हुए उन पर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज कराया गया था। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री के दखल के बाद मुक़दमा वापस ले लिया गया था।

पत्रकार राजेश्वर लाठर को मिली पीएचडी की उपाधी

रोहतक। पत्रकार राजेश्वर लाठर को पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में शोध के लिए पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई है। उनके शोध का विषय 'समाचारों का प्रबंधन' था। उन्हें यह उपाधि राजस्थान के झुझनूं स्थित सिंघानिया विश्वविद्यालय की ओर से उनका शोध पूरा होने पर दी गई। विश्वविद्यालय के कुलसचिव अनिल कुमार यादव और शोध विभाग के डीन डॉ. सुमेर सिंह ने राजेश्वर लाठर को डिग्री देते हुए उनको इस उपलब्धि पर बधाई दी। कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल्स में उनके शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने अपनी इस उपलब्धि का श्रेय अपने शोध निर्देशक डॉ. सुबोध कुमार, अपने पत्रकार साथियों, संपादकों और परिजनों को दिया।

प्रदेश भर से मीडिया कर्मियों और सामाजिक संस्थाओं ने राजेश्वर लाठर को इस उपलब्धि पर बधाई दी है। गौरतलब है कि पत्रकार राजेश्वर लाठर कई वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उन्होंने जीन्द से अपना पत्रकारिता करिअर शुरू किया था। वे वीर अर्जुन, पंजाब केसरी, दैनिक गंगापुत्र टाइम्स, दैनिक हरिभूमि, दैनिक भास्कर जैसे समाचार पत्रों में पत्रकार के रूप में और संपादकीय विभाग में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वे समय-समय पर अपनी लेखनी के जरिये सामाजिक, राजनीतिक और शिक्षा आदि से संबंधित विषयों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। 

वो दर्द को रस मानते हैं, देखें किस तरह मारेंगे मुझे

मेरे पास मेरे क़त्ल के तरीकों के इतने आफरों की बाढ़ आ गयी है कि मैं हैरान हूँ। मतलब, अतीत में मरने के तरीके इतने जोर-शोर से प्रचारित नहीं किये गये थे वरना तरीके मौजूद तो थे ही, इसके बोनान्जा आफर खपाने के लिए कितने ही लोगों को नरक से गुज़ारा गया।

मसलन, मैं चौरासी के दंगों की तरह गले में जलता टायर डाल कर नरकाग्नि का आनन्द लेते हुए मरूं, रातों-रात छोड़ी गयी गैस में घुटकर तड़प कर मरूं, या उन्नीस सौ बानवे की तरह तलवार से कटना और त्रिशूल भोंका जाना पसंद करूं। या दो हज़ार दो की तरह रेलगाड़ी के डिब्बे में लगाईं आग से तड़प कर मरूं या अपने ही घर में सारे दरवाज़े खिड़कियाँ बंद कर बाहर पेट्रोल छिड़क कर लगाई गयी ब्लास्ट आग में तड़पना पसंद करूँ।

घर में पानी भर कर करेंट दौड़ाने का भी आफर है, त्रिशूल घोंप कर बड़ी कुशलता से अंदर की नन्ही जान को भी मुफ्त मारने का आफर है। इलेक्ट्रिक चेयर का विकल्प भी खुला है। तलवार से काट फेंकने का तो खैर पुराना आफर भी अभी पड़ा ही है।
 
मरने की तड़प का मजा कई गुना बढ़ाने के लिए मुझे मोबाइल फोन, लैंडलाइन फोन वगैरह भी देने का आफर है कि उस आग से बचाने की खातिर मैं चाहे जिस मंत्री, प्रधानमन्त्री, दमकल, डाक्टर को फोन कर सकूं पर फोन नही उठाया जाएगा यह गारंटी है।
 
अब तो और नए आफरों की उम्मीद है। सुन रहे हैं कि गैस चैंबर बनवाये जायेंगे। हर शहर में हमारे जैसों के लिए पक्की व्यवस्था की जायेगी की प्राण जाएँ तो दुनिया इसे सैकड़ों साल तक नजीर के तौर पर याद रखे। वो कहते हैं कि हमारे जैसों की मौत को ऐतिहासिक बनायेंगे, ऐसी मौत देंगे कि देखने वालों की रूह तक काँप जायेगी।
 
मगर
मुझमें डर समाया है। वो तो मेरी खातिर नए-नए तरीके दिन रात ईजाद कर रहे हैं। वो दर्द को रस मानते हैं, मैं वीभत्स की कल्पना में हूँ। मरना तो तय है पर कोई ऐसा आफर आये जिससे मरने में दर्द सबसे कम हो, तो बताना।

 

कवि और सोशल एक्टिविस्ट संध्या नवोदिता के फेसबुक वॉल से साभार।
 

पत्रकार से मुलायम के घटिया बोल- क्या तुम्हारे परिवार में कोई मरा है

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में डॉक्टरों की हड़ताल के कारण हुई मरीजों की मौत पर जब मुलायम सिंह यादव से पत्रकारों द्वारा सवाल पूछे गए तो वो मीडिया पर भड़कते हुए सपा सुप्रीमो ने कहा कि क्या तुम्हारे परिवार का या कोई मीडियाकर्मी मरा है.

सपा विधायक और जूनियर डॉक्टरों के बीच संघर्ष के बाद पिछले छह दिन से चली आ रही डॉक्टरों की हड़ताल प्रदेश शासन द्वारा एस्मा लगाए जाने और हाईकोर्ट के आदेश के बाद समाप्त हो गई है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन कानपुर के अध्यक्ष ने कहा कि आईएमए ने अपनी हड़ताल वापस ले ली है और हम काम पर हैं. उधर, गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कालेज कानपुर के प्रिंसीपल का कहना है कि आज से सभी फैकल्टी अपने-अपने विभागों में आ गए हैं और धीरे-धीरे मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था सामान्य हो रही है.

मिस्र में पत्रकारों को पिंजरे में बंद कर कोर्ट में किया गया पेश (देखें तस्वीर)

मिस्र के अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी का समर्थन करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए अल जजीरा के पत्रकार की बुधवार को कोर्ट में सुनवाई हुई. इस मामले में अल जजीरा के पत्रकार फादेल फहमी और ऑस्ट्रेलियन रिपोर्टर पीटर ग्रेस्टी समेत 20 लोगों को आरोपी बनाया गया है, जिनमें से आठ हिरासत में हैं. इन पर प्रतिबंधित संगठन ब्रदरहुड के समर्थन और गलत रिपोर्ट दिखाने का आरोप है.

बुधवार को हुई सुनवाई में छह प्रतिवादी कैदी की सफेद यूनिफॉर्म पहने कटघरे में बंद कोर्ट में पेश हुए. इनमें ऑस्ट्रेलियन रिपोर्टर पीटर ग्रेस्टी और कनाडियन रिपोर्टर मोहम्मद फादेल फहमी भी थे. फहमी अल जजीरा के ब्यूरो चीफ थे, जिन्हें ग्रेस्टी के साथ दिसंबर में गिरफ्तार किया गया था.

अल जजीरा के रिपोर्टर फहमी ने सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया कि उन्हें यातनाएं दी जा रही हैं और चिकित्सा सुविधाएं भी नहीं मिल रहीं. उनका दायां कंधा पिछले 10 हफ्तों से टूटा हुआ है और इसके बाद भी उन्हें जमीन पर सोना पड़ रहा है. उन्होंने कनाडियन एंबेसी की जिम्मेदारी पर कोर्ट से खुद की रिहाई की अपील की. उन्होंने भरोसा दिलाया कि वो देश नहीं छोड़ेंगे. वहीं, फहमी के पिता ने अपने बेटे को निर्दोष बताया है. उन्होंने कहा कि जेल प्रशासन फहमी के ऑपरेशन की अनुमति नहीं दे रहा.
 
सुनवाई के दौरान सुरक्षा अधिकारियों ने बचाव पक्ष के वकील से कहा कि वो मीडिया से नहीं जुड़े हैं इसलिए उनके लिए अल जजीरा मुबाशर मिस्र और अल जजीरा इंग्लिश में फर्क करना मुश्किल है.  लेकिन फहमी जिस चैनल के साथ काम कर रहे थे, उसने गलत खबरें दिखाईं. चैनल ने ब्रदरहुड का समर्थन किया, इसलिए ये ब्रदरहुड का सदस्य है. इस हाईप्रोफाइल मुकदमे को सैन्य समर्थित सरकार के दौर में मीडिया की आजादी के परीक्षण के तौर पर देखा जा रहा है. मामले की अगली सुनवाई अब 24 मार्च को होगी.

पत्रकार चंद्रिका राय हत्याकांड की जांच सीबीआई करेगी

सीबीआई ने मध्य प्रदेश के पत्रकार चंद्रिका राय और उनके तीन परिजनों की दो साल पहले हुई हत्या के मामले में प्रकरण दर्ज किया. इस मामले में राज्य पुलिस ने मृतक के चालक के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था. राय, उनकी पत्नी दुर्गा, पुत्र जलज राय और बेटी निशा राय की 17-18 फरवरी, 2012 को हत्या कर दी गयी थी. स्थानीय पुलिस ने मृतक के चालक को गिरफ्तार कर लिया था और 26 मई, 2012 को उसके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था.

पत्रकार के रिश्तेदारों की याचिका पर कार्रवाई करते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सीबीआई को मामले में जांच संभालने का निर्देश दिया था और चालक के खिलाफ चल रहे मुकदमे पर रोक लगा दी. एजेंसी की प्रवक्ता कंचन प्रसाद ने यहां कहा, ‘‘राय के परिवार के सदस्यों ने मामले में सीबीआई जांच के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में गुहार लगाई थी. उच्च न्यायालय ने आरोपी के खिलाफ चल रहे मुकदमे पर रोक लगा दी और सीबीआई द्वारा नये सिरे से जांच के लिए आदेश पारित किया.’’

स्वतंत्र पत्रकार राय अनेक हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में लिखते थे. वह जबलपुर क्षेत्र में अवैध कोयला खनन का मुद्दा उठाते रहते थे. अपने लेखों में उन्होंने अवैध कोयला खनन में स्थानीय भाजपा नेताओं के शामिल होने का आरोप लगाया था.

मोदी का गुजरात माडल : सपनों की सियासत

एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है। गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी यही करते हैं। वे अच्‍छे वक्‍ता है। वे बखूबी जानते हैं कि इस देश की बदहाली को लेकर आम लोगों के मन में कितना गुबार है। वे इसी गुबार को हवा देते हैं। उनके लिए सपना बुनते हैं, उनके सपनों को हवा देते हैं। देश में 81.5 करोड़ वोटर हैं। इनमें से 47 फीसदी युवा हैं। आबादी का 44 फीसदी हिस्‍सा शहर में रहता है। मोदी दोनों तबके मोदी की बड़ी ताकत हैं।

मोदी इनके सपनों को कुछ इस तरह पंख लगाते हैं, मानों वे भगवान का अवतार हों। उनके हाथ में जादुई छड़ी हो, जिसे घुमाते ही बदहाली खुशहाली में बदल जाएगी। उनके हर शब्‍द को कॉर्पोरेट घरानों से संचालित मीडिया हाथों-हाथ लेता है। सोशल मीडिया पर इन शब्‍दों को अपने हिसाब से परिभाषित किया जाता है। और फिर मोदी खुद अपनी इमेज चमकाने के लिए 2007 से एपीसीओ वर्ल्‍डवाइड की सेवाएं ले रहें हैं। ध्‍यान रखें कि यही कंपनी विश्‍व बैंक को भी अपनी सेवाएं देती है। वही विश्‍व बैंक, जिसके बार में कहा गया था कि उसने मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने एजेंट के बतौर पीएम की कुर्सी थमाई, ताकि वह अपने एजेंडा को आगे बढ़ा सके। सोशल मीडिया और मुख्‍यधारा की मीडिया में इस पीआर कंपनी के तेवर बेहद आक्रामक हैं। तकनीकी रूप से सक्षम होने के कारण एपीसीओ शहरी युवाओं के पसंदीदा ट्विटर और व्‍हाट्स एप जैसे माध्‍यमों से फर्जी तथ्‍यों, वीडियो और खोखले संदेशों के जरिए मोदी के पक्ष में जनमानस बनाने का काम करती है। कोई नहीं जानता कि इस पूरे प्रचार कार्य के लिए पैसा कहां से आ रहा है। जब आम आदमी पार्टी अपनी वेबसाइट पर चंदे का हिसाब देती है तो उस पर अमेरिकी फंडिंग का आरोप लगाया जाता है, सीआईए का एजेंट बताया जाता है। किसको पता कि भाजपा को चंदे में अमेरिकी मल्‍टीनेशनल कंपनियों का कितना योगदान है।

लेकिन ये सवाल कोई नहीं पूछेगा, क्‍योंकि हमारी कौम के सपनों में कभी देश अहम नहीं रहा। बहुत छोटे-छोटे सपने। सड़क, पानी, बिजली, टैक्‍स, रोजगार, सुरक्षा, भोजन, आवास। ये आम शहरी वर्ग के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ते हैं। सपने इससे आगे इसलिए नहीं बढ़ पाते, क्‍योंकि आजादी के 68 साल बीतने के बावजूद ये जरूरतें पूरी नहीं हो पाई हैं। अब तक की सारी सरकारें इन्‍हें पूरा करने में नाकाम रही हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों इसके लिए जिम्‍मेदार है। नेहरू के जमाने में देश के विकास को औद्योगिक आत्‍मनिर्भरता की पटरी पर आगे बढ़ाते हुए कृषि को गुजारे का साधन बनाकर जिस संतुलन की पंचवर्षीय योजना तैयार की गई, वह 1991 के आर्थिक सुधारों के आगे टूटकर बिखर गई। बीते दो दशकों में हम अपने घर के बजाय ‘बाहर’ पर ज्‍यादा निर्भर हुए हैं। उदारीकरण ने बाजार खोले हैं। नीतियां बदली हैं और इसी का नतीजा है कि पूंजी बड़ी तेजी से कुछ औद्योगिक घरानों तक सिमट रही है। नतीजतन मझोले घरेलू उद्योगों की कमर टूट गई है। वे अब बड़े औद्योगिक घरानों के गुलाम बन चुके हैं।

उदारीकरण के पिछले दो दशकों में भ्रष्‍टाचार के जितने बड़े मामले सामने आए हैं, उतने आजादी के बाद के साढ़े चार दशकों में भी नहीं दिखे। एक अनुमान के अनुसार, फिलहाल देश के सकल घरेलू उत्‍पाद का 50 फीसदी कालाधन है। इसका सबसे बड़ा हिस्‍सा उन्‍हीं कॉर्पोरेट्स के हिस्‍से है, जो इस समय देश की नीतियों को संचालित कर रहे हैं, क्‍योंकि पूंजी उनके ही पास है। सुप्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक (22 अप्रैल, 2013) को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ”इस चुनाव में कॉरपोरेट का उम्मीदवार वह व्यक्ति होगा जिसे इस रूप में देखा जाएगा कि वो ‘कुछ कर सकता है’ (केन डिलिवर) …और इसमें यह भी शामिल होगा कि समय आने पर यदि जरूरत पड़ी तो वह सेना की भी सहायता लेकर झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे स्थानों पर लोगों के विद्रोह का दमन कर सकता है। जहां कॉरपोरेट की नजर में जंगलों और पहाड़ों में तुरंत उपलब्ध समृद्धि (कोल्ड कैश) के अंबार लगे हैं।” कॉरपोरेट की बढ़ती ताकत के बारे में राजनीतिक विज्ञानी क्रिस्टोफ जैफरलॉट का कहना है- अन्य जगहों की तरह ही भारत में निजी क्षेत्र रोल मॉडल बन गया है। मध्यवर्ग के लोग सोचते हैं कि राष्ट्र-राज्य को एक कंपनी की तरह चलाया जाना चाहिए।… मजेदार बात यह है कि यह विमर्श भ्रष्टाचार के मामलों में निजी क्षेत्र की भूमिका को नजरअंदाज कर देता है। (आउटलुक 22 अप्रैल, 2013)

इस भयावह हालात के बावजूद जब भाजपा, मोदी और बाबा रामदेव जैसे नेता स्‍विस बैंकों में पड़े काले धन को वापस लाने का दावा करते हैं तो असल में वे लोगों को ऐसा सब्‍जबाग दिखाते हैं, जिसे खड़ा करना उनके बूते से बाहर की बात है। ऐसा करके वे देश में बड़े कॉर्पोरेट घरानों की तिजोरी में ठूंसे पड़े कालेधन को छिपाने की कोशिश करते हैं। देश के नीति-निर्धारक इस बात को बखूबी जानते हैं कि उदारीकरण के रास्‍ते पर इतना आगे बढ़ने के बाद अब पीछे लौटना नामुमकिन है। लेकिन किसी के पास देश के संतुलित विकास का कोई मॉडल नहीं है। यहां तक कि मोदी के पास भी नहीं। फरवरी के आखिरी हफ्ते में मोदी ने देश में सरकार चलाने का एक अजीबोगरीब फॉर्मूला पेश किया। एक सम्‍मेलन में उन्‍होंने कहा कि केंद्र सरकार ऐसी हो कि वह राज्‍यों के सीएम की टीम के साथ मिलकर काम करे। यानी मोदी अगर पीएम बनते हैं तो उनकी अगुवाई में 28 राज्‍यों (दिल्‍ली को मिलाकर 29) की टीम देश के विकास की नीतियां तय करेगी और खुद मोदी एक न्‍यासी (ट्रस्‍टी) की तरह काम करेंगे। हमारे संविधान का अनुच्‍छेद 263 संघ-राज्‍य परिषद की बात करता है।

मोदी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि उनके फॉर्मूले में योजना आयोग जैसी संस्‍था का वजूद क्‍या होगा ? यह भी कि फिर केंद्रीय मंत्रिपरिषद का क्‍या काम ? असल मामला केंद्र और राज्‍यों के अधिकारों का है। करों में राज्‍यों के हिस्‍से को लेकर राजनीति होती है। अब तो बात राज्‍यों को विशेष दर्जे पर आ गई है। मोदी यह दावा नहीं करते कि उनके और 29 सीएम की टीम के शासन में इन मुद्दों पर कोई पक्षपात नहीं होगा। मोदी की कार्यशैली को जो जानते हैं, उन्‍हें पता है कि उन्‍हें शक्‍ति का विकेंद्रीकरण पसंद नहीं। वे ताकत अपने हाथ रखना चाहते हैं। यानी सभी सीएम को उनके आगे दबकर रहना होगा। मध्‍यप्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्‍यों के सीएम को भी, जिन्‍हें कूनो अभयारण्‍य के लिए शेर देने की बात पर मोदी आज तक ठेंगा दिखाते रहे हैं। एक और बात जवाबदेही की है। मोदी के शासन मॉडल में न्‍यासी के बतौर पीएम पूरे देश के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन जिम्‍मेदारी का निर्वहन सीएम की टीम करेगी। यह परस्‍पर विरोधाभासी है।

सवाल यह है कि इस विरोधाभास के बाद भी देश के तकरीबन सभी बड़े कॉर्पोरेट घराने मोदी को ही पीएम की कुर्सी पर क्‍यों देखना चाहते हैं। जबकि मौजूदा मनमोहन सरकार ने भी तो कॉर्पोरेट घरानों की खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वजह साफ है। यूपीए सरकार की दोनों पारियों में मिली-जुली सरकार की व्‍यवस्‍था में प्राकृतिक संसाधनों को अपने फायदे के लिए इस्‍तेमाल करने की कॉर्पोरेट घरानों की कोशिशें अपेक्षित रूप से सफल नहीं हो सकीं। एक के बाद एक लगातार घोटालों के सामने आने से सरकार बार-बार झुकती रही। इसे नीतिगत लाचारी कहें या संवैधानिक संस्‍थाओं का दबाव, केंद्र सरकार खुलकर फैसले नहीं ले सकी।

मनमोहन सरकार इसे मिली-जुली सरकार की मजबूरी बताती रही। लेकिन गुजरात में इसका बिल्‍कुल उल्‍टा हुआ। मोदी सरकार ने अडाणी समूह की समुद्र तट से लगी 5 करोड़ वर्गमीटर जमीन 10-32 रुपए के भाव से दी, जबकि बाजार दर 1500 रुपए प्रति वर्गमीटर थी। टाटा मोटर्स को साणंद में नैनो प्‍लांट के लिए 1100 एकड़ जमीन 400 करोड़ रुपए से ज्‍यादा की रियायत के साथ तोहफे में पेश की गई। दाहेज (दक्षिण गुजरात), धोलेरा (अहमदाबाद जिला) और मांडल (बेचराजी – उत्‍तर गुजरात) में विशेष निवेश क्षेत्र के लिए 50 फीसदी जमीन गुजरात टाउन एंड प्‍लानिंग व अर्बन डेवलपमेंट एक्‍ट 1976 का उल्‍लंघन करते हुए बाजार दर से 2 से 3 गुना कम दाम पर दी गई। गुजरात की 20 प्रतिशत जमीन तटीय इलाकों में है। यहां सेज और मुंद्रा बंदरगाह के लिए 10 हजार हेक्‍टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया। नतीजतन मछुआरों के 56 गांव उजड़ गए। गुजरात के वित्‍तीय लेन-देन पर नजर रखने वाले महालेखाकार नियंत्रक की हालिया रिपोर्ट में जमीन आवंटन और भ्रष्‍टाचार के विभिन्‍न मामलों में 16,706.19 करोड़ की हेराफेरी पाई गई है। लेकिन कभी किसी ने इन पर सवाल नहीं उठाए, जबकि यूपीए सरकार की हर नीति को लेकर सवाल उठाए गए और यही बात कॉर्पोरेट घरानों को मोदी के पक्ष में जम रही है।

दरअसल मोदी के पास साबित करने को कुछ नहीं है। 2002 के दंगों का दाग अभी भी उनके दामन से धुला नहीं है। वे विकास की बातें करते हैं, पर खुद उनके प्रदेश में विकास के आंकड़े कुछ और ही सच्‍चाई बयां करते हैं। गुजरात देश का सबसे ज्‍यादा औद्योगिक प्रदेश है। गुजरात की 10 फीसदी विकास दर को मोदी समर्थक आदर्श मानते हैं। हालांकि, इस विकास ने गुजरात को प्रदूषित भी बना दिया है। खुद गुजरात सरकार के आंकड़े बताते हैं कि राज्‍य में 10 लाख शिक्षित युवा बेरोजगार हैं। एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि बीते 12 साल में गुजरात में रोजगार की बढ़ोतरी सिफर रही है। मोदी राज में 30 सितंबर 2012 तक गुजरात का कर्ज 1,38,987 करोड़ रुपए हो चुका है, जो 1995 में महज 10 हजार करोड़ था। सरकार के बजट में इस रकम के 2015-16 तक दोगुना हो जाने का अनुमान लगाया गया है। आइए क्रमवार तरीके से देखते हैं कि मोदी के गुजरात मॉडल का सच क्‍या है –

स्‍वास्‍थ्‍य –
देश के बाकी राज्‍यों के मुकाबले गुजरात में डॉक्‍टरों की 31 फीसदी ज्‍यादा कमी है। इस मामले में यूपी और एमपी ही गुजरात से ऊपर हैं। सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र स्‍तर पर 1272 विशेषज्ञ डॉक्‍टरों के खाली पड़े पदों के मुकाबले केवल 76 पद ही भरे जा सके हैं। इसका असर शिशु और मातृ मृत्‍यु दर पर पड़ा है। वलसाड, पंचमहाल, साबरकांठा, दाहोद में हालात बेहद खराब हैं। इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्‍ट्रेशन के आंकड़े बताते हैं कि गुजरात में केवल 43 प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे सामान्‍य वजन के हैं। ऑफिस ऑफ रजिस्‍ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार जहां देश में 2004-20012 के दौरान मातृ मृत्‍यु दर में कमी का आंकड़ा 29 प्रतिशत हुआ, वहीं गुजरात में यह 24 फीसदी ही रहा। पांच साल से कम उम्र के 44.6 प्रतिशत बच्‍चे कुपोषित हैं, 70 प्रतिशत में खून की कमी है। 1990-95 में गुजरात स्‍वास्‍थ्‍य पर खर्च 4.25 प्रतिशत हुआ करता था, जो 200-2010 के बीच घटकर 0.77 प्रतिशत रह गया है। कुपोषित बच्‍चों के मामले में गुजरात देश में 15वें और एनीमिया प्रभावित बच्‍चों के मामले में 16वें नंबर पर है। खून की कमी की शिकार महिलाओं की बात करें तो गुजरात का स्‍थान देश के 20 राज्‍यों में सबसे नीचे है।

स्‍वच्‍छता –
2011 की जनगणना से पता चला कि गुजरात के 2.28 करोड़ ग्रामीण खुले में शौच करने पर मजबूर हैं। Key indicators of drinking water, sanitation, hygiene and housing conditions of India (दिसंबर 2013) 42 फीसदी ग्रामीण और 26 फीसदी शहरी लोगों के घरों तक साफ पेयजल नहीं पहुंचता।

खाद्य सुरक्षा –
एनएसएसओ के आंकड़ों को लेकर प्रो. हिमांशु के एक अध्‍ययन में पाया गया है कि राशन प्रणाली में भ्रष्‍टाचार 2009-10 से 2011-12 तक 45 प्रतिशत से बढ़कर 69 फीसदी हो गया है। लोग राशन लेने से कतराते हैं। 2012 में राशन लेने वालों का आंकड़ा 2009 में 26 से घटकर 22 प्रतिशत ही रह गया है। राशन के अनाज का प्रति व्‍यक्‍ति औसत उपयोग 0.6 किलोग्राम है।

शिक्षा –
मोदी गुजरात को नॉलेज हब बनाने का ख्‍वाब दिखाते हैं। लेकिन असर (ASER) का सर्वे कहता है कि क्‍लास 6-8 के केवल 68 प्रतिशत बच्‍चे क्‍लास 2 का पाठ ठीक से पढ़ पाते हैं, जबकि क्‍लास 5-7 के  करीब 27 प्रतिशत बच्‍चे साधारण गणित के सवालों को हल कर पाए। मोदी सरकार का कन्‍या केलवणी अभियान 11-14 साल की 6.6 फीसदी लड़कियों को स्‍कूल नहीं भेज पाया है। इससे ज्‍यादा उम्र यानी 15-16 साल की 30 प्रतिशत लड़कियां स्‍कूल नहीं जातीं, जो राष्‍ट्रीय औसत 17.2 फीसदी से कहीं ज्‍यादा है। 2001 से 2011 के बीच राष्ट्रीय साक्षरता दर 9.2 प्रतिशत के हिसाब से ब़ढी है, लेकिन गुजरात में दशक के हिसाब से साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से नीचे, मात्र 8.89 प्रतिशत है। यही हाल उच्च शिक्षा का है।

गरीबी-
गुजरात में 2001 तक गरीबी 32 फीसदी थी, जो 2011 में बढ़कर 39.5 प्रतिशत हो गई। यानी राज्‍य के प्रत्‍येक 100 लोगों में 40 गरीब हैं। एनएसएसओ के आंकड़े भी कहते हैं कि 2004 से 2010 के बीच देश के बाकी राज्‍यों के मुकाबले गुजरात में गरीबी में सबसे कम यानी 8.6 प्रतिशत गिरावट आई।

मोदी चाहे ट्रेन में चाय बेचते रहे हों या कैंटीन के ठेकेदार, वे उस मदारी की तरह हैं जो लोगों को लच्‍छेदार बातों में उलझाकर विस्‍मृत कर देता है। वे मजमा लगाते हैं, ठिठोली करते हैं, लोगों को झूठे सपने दिखाते हैं। लालू प्रसाद यादव जैसे देश के उन तमाम नेताओं की तरह, जिनके पास अपना कोई विजन नहीं है। वे देश की किस्‍मत बदलने की बात करते हैं, पर उनमें ठोस तथ्‍यों के आधार पर तर्क गढ़ने की क्षमता नहीं है। हो भी कैसे। उनका तो पूरा अतीत ही नाकामियों भरा रहा है। सांप्रदायिकता की आड़ में सत्‍ता की दो पारियों में मैदान जीतना देश की किस्‍मत बदलने का पर्याय कतई नहीं हो सकता। (संदर्भ : रोजी-रोटी अधिकार अभियान और जनवादी विचार आंदोलन : नई दिल्‍ली)

सौमित्र रॉय

शोधकर्ता,

सामाजिक कार्यकर्ता

संपर्क : soumitraroy3@gmail.com


सौमित्र राय का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं:

मीडिया घरानों की साख को भुना रहे कॉर्पोरेट घरानों के लिए पत्रकारिता का कोई मूल्‍य नहीं

लैपटाप चोर प्रोफेसर को सोशल मीडिया ने पकड़वाया

दिल्ली के एक प्रोफेसर ने बेंगलुरु में एक एमएनसी एक्जीक्युटिव का लैपटॉप उड़ा लिया. लेकिन सोशल मीडिया के कारण पकड़ में आ गया. अब उसे गिरफ्तार किया जाएगा और मुकदमा चलेगा. एक अंग्रेजी न्यूजपेपर के मुताबिक दिल्ली के एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने बेंगलुरु एयरपोर्ट में एक लैपटॉप पड़ा देखा और उन्होंने उसे उठा लिया. इसके बाद वह दिल्ली चले आए. जिस व्यक्ति का वह लैपटॉप था, उसने वहां तैनात सीआईएसएफ से शिकायत की.

एमएनसी एक्जीक्युटिव ने बताया कि 22 फरवरी को उसका लैपटॉप सिक्योरिटी चेक के बाद से उस एरिया से गायब हो गया. सीआईएसएप कर्मियों ने सीसीटीवी फुटेज से उस लैपटॉप की खोज की तो उन्हें पता चला कि एक व्यक्ति ने उस लैपटॉप को उठा लिया है. सीसीटीवी फुटेज में एक व्यक्ति उस लैपटॉप को अपने बैग में रखता दिखाई दिया. उस व्यक्ति के मूवमेंट को ध्यान से देखा गया तो पता चला कि वह किस फ्लाइट को पकड़ रहा है.

सीआईएसएफ ने उस एयरलाइंस से सभी 129 यात्रियों की सूची मांगी. उनमें से तीन पर संदेह था. उन सभी के नाम गूगल में डाले गए. फिर उनके नाम और अन्य डिटेल लिंक्डइन में मैच कराए गए. इससे पता चल गया कि किस यात्री ने लैपटॉप उठाया था. सीआईसीएफ के एक्सपर्ट ने तमाम सबूतों के साथ उस प्रोफेसर से पूछताछ की तो उसने लैपटॉप चुराना स्वीकार कर लिया. सीआईएसएफ ने उस प्रोफेसर के घर से लैपटॉप बरामद कर लिया. उस पर चोरी का आरोप लगाया गया है. अब बेंगलुरु पुलिस की एक टीम उसके घर पहुंचकर उसे गिरफ्तार करेगी.

तरूण तेजपाल की जमानत अर्जी पर सुनवाई जारी

होटल की लिफ्ट में अपनी सहयोगी महिला पर यौन हमला करने के आरोपी तहलका के संस्थापक संपादक तरूण तेजपाल की जमानत याचिका पर बम्बई उच्च न्यायालय बंद कमरे में सुनवाई जारी रखे हुए है। अदालत की गोवा पीठ के सामने बहस हुई। पीठ में 50 वर्षीय पत्रकार की जमानत याचिका विचाराधीन है। तेजपाल फिलहाल सदा उप जेल में है।

चूंकि अदालत की कार्यवाही आम जनता और मीडिया के लिए प्रतिबंधित है सूत्रों ने बताया कि तेजपाल की पैरवी कर रहे बचाव पक्ष के वकील ने दिन में जिरह की, जो दोपहर बाद तक जारी रही। बचाव पक्ष की दलीलें पूरी होने के बाद लोक अभियोजक सुरेश लोतलीकर करीब 3 बजे जिरह के लिए खड़े हुए। 50 वर्षीय पत्रकार पर आरोप है कि उन्होंने पिछले वर्ष नवंबर में गोवा में तहलका के एक समारोह के दौरान एक आलीशान होटल की लिफ्ट में अपनी एक कनिष्ठ सहयोगी का यौन शोषण किया। गोवा अपराध शाखा ने उनके खिलाफ बलात्कार, शील हरण और यौन शोषण के आरोपो में आरोप पत्र दाखिल किया है।

जेल से नहीं निकल पाए सुब्रत राय, पैसे लौटाने की योजना खारिज

सहाराश्री सुब्रत राय को अभी जेल में ही दिन बिताने होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने निवेशकों के 20 हजार करोड़ रुपए लौटाने के लिए सहारा समूह की तरफ से पेश किए गए प्रपोजल को आज ठुकरा दिया. कोर्ट ने कहा कि सहारा को कोई सम्मानजनक प्रपोजल पेश करना होगा. सहारा समूह के सुपर बॉस सुब्रत राय को अभी मंगलवार तक तिहाड़ जेल में ही रहना होगा क्योंकि न्यायालय इस मामले में अब 11 मार्च को ही आगे विचार करेगा. 

शीर्ष अदालत ने इस बात पर अप्रसन्नता व्यक्त की कि विशेष पीठ को उसके मामले पर विचार के लिये बैठना पड़ा लेकिन उसने कोई ठोस प्रस्ताव पेश नहीं किया. न्यायालय ने कहा कि यह तो पीठ का अपमान है. न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ की पीठ के समक्ष सहारा समूह ने कहा कि वह तीन दिन के भीतर 2500 करोड़ रुपए का नकद भुगतान करने के लिये तैयार है. समूह ने आश्वासन दिया कि शेष 14,900 करोड़ रुपए का भुगतान पांच किस्तों में जुलाई, 2015 के अंत तक कर दिया जायेगा.

सेबी ने भी इस प्रस्ताव का विरोध करते हुये कहा कि सहारा समूह को 17,400 करोड़ नहीं बल्कि 34 हजार करोड रुपए का भुगतान करना है. सेबी का कहना था कि समूह 17,400 करोड रुपए का भुगतान करने के लिये तैयार हो गया था. इस पर न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘यह सही प्रस्ताव नहीं है और प्रस्ताव सम्मानजनक होना चाहिए.’’ न्यायमूर्ति खेहड़ ने कहा, ‘‘आपने हमे एकत्र (विशेष पीठ) किया और फिर आप कह रहे हैं कि आप धन देने की स्थिति में नहीं है. यह हमारा अपमान है. यह उचित नहीं है. आपको हमें एकत्र नहीं करना चाहिए था यदि आपके पास उचित प्रस्ताव नहीं था.
 

सहारा क्रेडिट को. सोसायटी से निवेशकों को खतरा, पीआईएल दायर कर जांच की मांग

सहारा क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी लिमिटेड द्वारा कथित रूप से की जा रही अनियमितताओं के सम्बन्ध में आज इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक पीआईएल दायर की गई है। आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने इस पीआईएल में कहा है कि सहारा क्रेडिट का पंजीयन बहु-राज्य सहकारी सोसायटी अधिनियम 2002 के अंतर्गत पंजीयन संख्या यूपी 35 पर किया गया है। सहकारी संस्थाओं का उद्देश्य, समान उद्देश्य वाले व्यक्तियों द्वारा अपने संसाधनों का एक साथ उपयोग कर कुछ सामूहिक हितों की सिद्धि करना होता है।

इसके विपरीत सहारा क्रेडिट द्वारा सहारा ई शाइन, सहारा ए सेलेक्ट, सहारा माइनर, सहारा एम बेनिफिट तथा सहारा यू गोल्डन जैसी स्कीमों के माध्यम से पूँजी निवेश किया जा रहा है। इनमें से प्रत्येक स्कीम सहारा इंडिया के कार्यकर्ताओं के जरिये संचालित की जा रही है, जिनमे डिपोजिट की समयावधि, ब्याज दर आदि की बातें कही गयी हैं।  

याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह जनता के पूँजी निवेश के लिए बनाए गए क़ानून से बचने का एक तरीका जान पड़ता है। इससे निवेशकों के हितों को वास्तविक खतरा है। अतः उन्होंने इस सम्बन्ध में जांच करा कर पूँजी निवेश के सम्बन्ध में देश में प्रचलित समस्त कानूनों का पूर्ण अनुपालन कराये जाने हेतु आदेश किये जाने की न्यायालय से प्रार्थना की है।

 

अमिताभ ठाकुर और डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल को इस लिंक पर पढ़ा जा सकता हैः http://amitabhandnutan.blogspot.in/2014/03/copy-of-pil-regarding-sahara-credit.html
 

‘समाचार प्लस’ पर ‘कानपुर कांड’ के जोरदार कवरेज से डाक्टर हुए प्रसन्न

यूपी में हुए कानपुर कांड का कवरेज कई रीजनल न्यूज चैनलों ने अपने-अपने तरीके से किया. जी न्यूज यूपी-यूके ने जहां इस पर पंचायत लगाई और सभी पक्षों को सामने बिठाकर लाइव दिखाया, वो प्रशंसनीय रहा. इससे काफी कुछ स्पष्ट हो गया. समाचार प्लस यूपी-यूके चैनल ने भी जोरदार कवरेज किया. इस कवरेज को कानपुर में सैकड़ों डाक्टरों ने एक साथ बैठकर देखा और तालियां बजाई.

नीचे पहले वो लिंक जिसमें डाक्टर बैठकर समाचार प्लस देख रहे हैं और तालियां बजा रहे हैं.

http://www.youtube.com/watch?v=EmccVoH4reo

और, ये वो दो लिंक है जिसका प्रसारण समाचार प्लस पर किया गया. इनमें कानपुर कांड के सभी पक्षों को मुखर होकर दिखाया गया है. प्रदेश सरकार और पुलिस को कठघरे में खड़ा किया गया है. 

1-

http://www.youtube.com/watch?v=0CKVSlkT6v0

2-

http://www.youtube.com/watch?v=mtr1u9Z9wkA


इसे भी पढ़ें:

जनसरोकारी पत्रकारिता के लिए समाचार प्लस चैनल की टीम सम्मानित

xxx

'समाचार प्लस' चैनल की एक्सक्लूसिव खबर से हरक सिंह रावत की गद्दी बची

 

शारधा, पर्ल और अब सहारा के हश्र से सबक लें निवेशक

जो लोग चिटफंड स्टायल की कम्पनियों में अपनी मेहनत की कमाई को बैंकों के मुकाबले जल्द दुगुना देखना चाहते थे, उनके लिए आने वाला वक्त मुसीबतों का कारण बन सकता है। क्योंकि रिजर्व बैंक की सख्ती, कम्पनी मंत्रालय की सतर्कता और सबसे बढ़कर अदालतों की सक्रियता के कारण चिटफंड कंपनियों लिए अब जनता से धन उगाहना आसान नहीं रह गया है। इन कम्पनियों की कार्यशैली को देखते हुए ऐसा होना उनके साम्राज्य के ख़त्म होने जैसा है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष देश की ऐसी सबसे बड़ी कम्पनी जो जनता की जमा राशि के बलबूते ही तरक्की कर रही थी, के मुखिया सुब्रत राय ने बार-बार कहा कि उनके पास जनता को लौटाने के लिए धन नहीं है और वो अब जनता का धन अपनी सम्पत्तियां बेच कर ही दे पायेगी। सम्पत्तियों का आंकलन सेबी पहले ही कर चुकी है और परिणाम चौंकाने वाले हैं, क्योंकि सहारा ने दूसरी चीजों की तरह इस मामले में भी अदालत और सेबी को गुमराह करने की भरपूर कोशिश की थी। कहीं-कहीं तो कौड़ियों की जमीनों को हजारों करोड़ की बना कर पेश किया है। जो सहारा चंद दिन पहले तक अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर अपने अरबों के साम्राज्य का दंभ दिखा रही थी, अदालत पहुँचते ही वो दरअसल कितनी खोखली थी और उसका चक्रवर्ती मालिक कितना कमजोर ये चंद मिनटों में ही सबके सामने उजागर हो गया। अब कोर्ट और सेबी की सख्ती से हो सकता है निवेशकों के धन का अधिक नुक्सान न हो, लेकिन सहारा का तिलिस्म तो टूट ही गया।

पर्ल्स पर भी कसा शिकंजा

सहारा के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी चिट फंड शैली में काम करने वाली और अपने को रियल स्टेट बताने वाली कम्पनी के पाँव कितने जमीन पर है ये भी सामने आ रहा है। सीबीआई ने इस कम्पनी के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ रुपहले सपने दिखाकर जनता से लगभग 45 हजार करोड़ रुपए उगाहने के मामले में केस दर्ज किये है। वैसे इस कम्पनी के खिलाफ ऐसी शिकायतें नई नहीं है। यदाकदा इसके घोटाले सामने आते रहे है। मध्य प्रदेश में तो इस कम्पनी सहित ऐसी सभी कम्पनियों पर अब पूर्णतया प्रतिबंध है और ऐसी कम्पनियों के खिलाफ मामले दर्ज करने के बाद अधिकतर संचालक जेलों की हवा खा रहे है। सभी के खिलाफ सीबीआई जांचें अलग से लंबित हैं। पर्ल्स की सम्पत्तियां भी सीज करने की तैयारी है, ऐसे में इस कम्पनी के निवेशकों का भविष्य भी अँधेरे में है।

जेल में है शारधा के संचालक

कोलकाता में लम्बे अर्से से जनता की मेहनत की कमाई हड़पने वाली चिटफंड संपनी शारधा के मालिक भी अब जेल में है और पब्लिक अपने जमा पैसे लगभग खो ही चुकी है। सहारा की ही तरह ठाठ-बाट के साथ रहने वाले, राजनीतिक और सामाजिक रसूख रखने वाले शारधा के मालिक धमक मीडिया से लेकर फ़िल्मी गलियारों तक थी, लेकिन अब वे जेल में है और उनका रसूख गायब है। ममता बनर्जी ने निवेशकों को आंशिक धन वापसी कर बाकियों को लॉलीपॉप पकड़ा दी है।

एक समय था जब रामविलास पासवान के साले की मालिकी वाली जेवीजी सहित कुबेर, अपैक्स, गोल्डन फारेस्ट, अलकनंदा, नीलांचल, परसराम पुरिया, एनबी प्लांटेशन जैसी दो दर्जन कम्पनियां जनता का हजारों करोड़ रुपए डकार कर नौ-दो-ग्यारह हो गई थीं। निवेशकों ने इस बात से कोई सबक नहीं लिया और एक बार फिर ऐसे निवेशकों का उससे कई गुना धन दांव पर है।

 

लेखक हरिमोहन विश्वकर्मा से vishwakarmaharimohan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है।

हिंदी दैनिक ‘सच कहूं’ को दर्जनों मीडियाकर्मियों की जरूरत, करें आवेदन

हिंदी अखबार 'सच कहूं' में वैकेंसी है. संपादकीय से लेकर विज्ञापन विभाग तक में काफी लोगों की जरूरत है. अखबार की तरफ से एक विज्ञापन जारी कर मीडियाकर्मियों से बायोडाटा भेजने को कहा गया है. दिल्ली-नोएडा एडिशन के लिए सीनियर सब एडिटर और जूनियर सब एडिटर की पांच पोस्ट हैं.

दिल्ली में विधानसभा स्तर पर संवाददाता के लिए करीब 50 पद हैं. प्रसार, विज्ञापन, मार्केटिंग में सहायक प्रबंधक चाहिए. साथ ही यूपी के कई जिलों में संवाददाता और विज्ञापन प्रतिनिधि की आवश्यकता है. बायोडाटा sachkahoon2013@gmail.com पर भेजें.

कलम की आजादी की आंशिक चिंता के बाद जमकर चली दारू

यशवंत भाई, कलम की आजादी की चिंता करने के लिए कई राज्यों से पंजाब के तरनातरन में सैकड़ों पत्रकार इकट्ठे हुए। बस कलम की आजादी को लेकर कुछ एक देर आंशिक चिंता जताई, उसके बाद बस ऐसा लगा कि जैसे ये दारू की पार्टी के लिए ही कार्यक्रम था। नेशनल काउंसिल आफ इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन की दसवीं स्टेट कान्फ्रेंस में पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ के पत्रकार शामिल हुए। यहां एक बेन्कवेट हाल में आज 6 मार्च से तीन दिवसीय कार्यक्रम शुरू हुआ।

आज दोपहर को थोड़ी बहुत पत्रकारिता की चिंता हुई। उसके बाद बस यही हलचल थी कि भाई दारू वाला पंडाल लग गया क्या? कितनी शराब आई है? कौन कौन से ब्रांड की आई है? इस बीच कई पत्रकारों ने कहा कि भाई थोड़ा शर्म तो करो अभी तो दोपहर बाद की चाय का वक्त ही हुआ है। दूसरे बोले छोड़ न यार कमाल कर दिया, दिन ढलते ही शराब का काम शुरू कर सकते हैं, बुराई ही क्या है? बस दिन ढला ही था कि जाम पे जाम खड़क गए। फिर नियम की दुहाई देने वाले पत्रकारों ने इतनी भारी मात्रा में शराब के तलाब में गोते लगाने के लिए एक्साइज की परमिशन भी नहीं कराई हुई थी।

यशवंत भाई मैं यहां पत्रकारिता की मान मर्यादा की धज्जियां उड़ते हुए एक गवाह के तौर पर देख रहा था। बस अभी जाम मेज पर सजे ही थे कि लगभग नब्बे प्रतिशत प्रतिभागी पत्रकार शराब पर ऐसे टूट कर पड़े कि बस आज नहीं तो कभी नहीं? मुझे ऐसे लगा कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता की चिंता के नाम पर ये कोरा ड्रामा था ये तो मनोरंजन कार्यक्रम था वो भी शराब में डूबने का। काहे का पत्रकारिता सम्मेलन? ये कोरे धोके हैं। मैं इस रिपोर्ट के साथ आप को जाम खडकने वाली इस शाम की फोटो भी भेज रहा हूं।

एक भड़ास प्रेमी हरियाणा के प्रतिभागी पत्रकार ने मुझे फोन पर ये डिटेल डिक्टेट की और मैं अब इसे आपके सुपुर्द कर रहा हूं।

आपका नियमित सहयोगी

सोनू

Access by Women to Public Services: Perception & Experience

: CMS-INDIA CORRUPTION STUDY 2013 : The ninth round of the CMS-India Corruption Study (CMS-ICS 2013) specifically focussed on access of women to certain basic and essential public services. Women constitute around 49 percent of India’s population (Census 2011); play a greater role in managing the household affairs than their counterpart and therefore, directly or indirectly are subject to far more negative consequences of ineffective governance – not only individually, but at household level. 

This 2013 study focused on eight public services namely, Drinking Water, Electricity, Public Distribution System (PDS), Public Health/Hospital care, Housing, Municipal, Police and Judiciary. The data collection for CMS-ICS 2013 was carried out between April and September 2013. The states covered are Bihar, Chhattisgarh, Delhi, Karnataka, Madhya Pradesh, Maharashtra, Punjab and Rajasthan. From each state, a sample of around 300 households was covered. From each selected household, an adult female member was interviewed.

KEY FINDINGS

Usage of Public Services:
Majority of women during the last one year had interacted with at least half of the eight public services covered in this round.
On an average, she or any member of the family had interacted with around four services; with highest in Maharashtra (5 nos.) followed by Bihar, Karnataka and MP (4 each).
In PDS and Public health/hospital services, in 60 percent cases, the women respondent herself has interacted with the service provider of these pubic services – at least once during the last twelve months.
Among the most interacted services include, Electricity (77%) followed by PDS (60%), Water Supply (51%) and Public health/Hospital services (49%). Other public services, which are mainly Need-based services, had comparatively lesser interaction: Police (29%), Municipal (26%), Judiciary (22%) and Housing (18%).

Experienced Corruption at Household level

In CMS-ICS 2013, more than half of the women (56%) shared that she or any member of the household experienced corruption at least once during the last 12 months. On a comparative note, in 2008 round, the percentage of women who reported experiencing corruption in public services was around 44 percent.

 

Among those who were asked for a bribe, 66% women shared that either she or any member of the family experienced the demand for a bribe at least once during the last 12 months, while another 24% came across such situation twice.

8 out of every 10 households, who were asked to pay bribe, had no option and paid bribe to avail the desired public service.

Women respondents shared that in five out of eight public services, between 20 and 25% of their families had to pay bribe or use influence to avail the services.

In all the states, except Bihar and Delhi, nearly two-third or more of the women reported experiencing corruption either by them or any of their family members while interacting with the public services covered in CMS-ICS 2013.

In Delhi and Rajasthan, compared to 2008, the percentage of women reporting ‘experienced’ corruption in public services was almost twice.
Could not Pay, Could Not Avail the Service at Household level
Around 5 percent of the women informed that their families were denied services because they could not pay a bribe.
Highest service denial rate was in Karnataka (8%) and Madhya Pradesh (7%) despite the Right to Public Services Act in place.
Bribe Amount Paid and Reasons for Paying Bribe at Household level
State wise highest amount as bribe in any of the public services is Bihar (INR 10000-Housing); Chhattisgarh (INR 30000-Police verification for Job); Delhi (INR 10000- for Police Verification); Karnataka (INR 10000-Police for removal of name as accused); Madhya Pradesh (INR 5000 in Housing for Transfer of Ownership); Maharashtra (INR 400000 for Job in Police); Punjab (INR 5000 for House registration) and Rajasthan (INR 6000 –Electricity for restoring connection).
On an average, the households have paid as low as INR 10 in PDS shops to get their ration or as OPD patient in public health facilities and as high as INR 400 thousand (4 lakh) for a job in Police department.

Women’s Perception about Corruption – in Public Services in General

Similar to the study findings on experience of corruption, more than 67% of the women opined that level of corruption in general has ‘Increased’ in Public Services in the last 12 months.
No significant difference in perception of women belonging to different socio-economic classification (SEC) was noticeable.
In Delhi and Rajasthan, perception about increase in corruption level in public services could be one of the reasons for change of political party in power in the two states where elections were held after the survey for this round of CMS-ICS was conducted.
Similarly in Chhattisgarh, the incumbent political party coming back to form government could be correlated with lesser percentage opining increase in corruption in public services in the state. In Madhya Pradesh, however, despite the opinion about increase in corruption in public services, the incumbent government was voted back to power.
Two out of every three women perceive an ‘increase’ in the corruption level in the Police services. Electricity (56%) and PDS (50%) were the other two public services in which half or more of the women opined an increase in corruption level during the last twelve months prior to the survey.

About CMS ICS

CMS has been conducting regular studies on corruption capturing both experience and perception at household levels since 2001. The uniqueness of CMS-ICS is its methodology. It captures peoples’ Perception (P) and Experience (E) with Public Services and further Estimates (E) the amount paid as bribe by common citizens of India to avail basic and essential public services. It is pertinent to mention that CMS-ICS is a self-initiated initiative and not sponsored by any funding agency.

Press Note. March 7, 2014

जगदंबिका पाल और रामकृपाल यादव ने पाला बदला

लोकसभा चुनाव आते ही टिकट के चक्कर में और जीतने की संभावना को देखकर नेताओं ने पाला बदलना शुरू कर दिया है. कांग्रेस से जगदंबिका पाल ने इस्तीफा दे दिया है तो लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को रामकृपाल यादव ने टाटा बाय बाय बोल दिया है. जगदंबिका पाल के बीजेपी में शामिल होने की संभावना है. पाल यूपी में एक दिन के लिए मुख्यमंत्री रह चुके हैं. पाल पूर्वी यूपी के डुमरियागंज से सांसद हैं. उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. साथ ही पार्टी भी छोड़ने की घोषणा कर दी.

पाल बीजेपी से जुड़ सकते हैं पर उन्होंने पत्ते नहीं खोले हैं. पाल ने कहा कि न तो अब कांग्रेस पार्टी में संवाद हो पा रहा है, न ही सीनियर नेताओं को सही सम्मान मिल पा रहा है, ऐसे में उन्हें लगता है कि पार्टी को उनके जैसे नेताओं की जरूरत नहीं रह गई है. पाल का कहना है कि पार्टी ने मेरा इस्तेमाल किया, पर बदले में कुछ नहीं दिया.

उधर, पटना से खबर है कि राजद के महासचिव और प्रमुख लालू प्रसाद के करीबी रामकृपाल यादव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि वे पाटलीपुत्र सीट से टिकट न मिलने से नाराज थे. उनके भाजपा में शामिल होने और इसी सीट से चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही है. लालू ने अपनी बेटी मीसा भारती के पाटलीपुत्र सीट से लड़ने की घोषणा की. इसी के बाद यह घटनाक्रम हुआ. राजद के एक अन्य वरिष्ठ नेता और विधान परिषद में दल के नेता गुलाम गौस ने पश्चिम चंपारण से टिकट नहीं मिलने पर नाराज दिखे. उन्होंने कहा कि समर्पित कार्यकर्ताओं, खासकर मुस्लिम समुदाय के, की अनदेखी की गयी है, मैं पश्चिम चंपारण से चुनाव लड़ने पर अडिग हूं, भले ही निर्दलीय.

पत्रकार ओपी यादव को मिला मारवाड़ी इंडिया प्राइड अवार्ड

नई दिल्ली, 6 फरवरी। दूरदर्शन न्यूज, नई दिल्ली में कार्यरत वरिष्ठ पत्राकार ओपी यादव को हैदराबाद में आयोजित एक राष्ट्रीय सेमीनार और सम्मान समारोह में 'मारवाड़ी इंडिया प्राइड अवार्ड' से सम्मानित किया गया। प्रवासी मारवाडियों की संस्था शाइनिंग इंडिया न्यूज और एक मुलाकात सर्वे एजेंसी द्वारा आयोजित इस समारोह के विशिष्ठ अतिथि आंध्र प्रदेश सरकार के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री मंडावा वेंकटेश्वर राव, पूर्व सिंचाई मंत्री टी नागेश्वर राव व पूर्व चीफ सरकारी व्हिप वेंकट रमन्ना रेड्डी ने ओपी यादव को मारवाड़ी सम्मान का प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया। पुरस्कार देने के बाद पूर्व मंत्री श्री टी नागेश्वर राव ने यादव को बधाई देते हुए उनके द्वारा राष्ट्रीय एकता के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।

राजस्थान के मूल निवासी  ओपी यादव को यह पुरस्कार मीडिया के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रवासी राजस्थानियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है। पुरस्कार मिलने पर प्रतिक्रिया देते हुए ओपी यादव ने कहा कि प्रवासी राजस्थानियों की सेवा के लिए पुरस्कार मिलना मेरे लिए गौरव की बात है। इससे मारवाड़ी भाइयों की निष्ठापूर्ण सेवा के प्रति मेरी जिम्मेदारी और जवाबदेही पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी है।

समारोह में हैदराबाद में रहने वाले मारवाड़ी व्यापारियों के हितों का विशेष ध्यान रखने के लिए आंध्र प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री ए रामानारायण रेड्डी सहित विधानसभा सदस्यों के कानाबाबू, अहमद बलाला , डी सुधीर रेड्डी, ए राजेन्द्र, जी वेंकट रेड्डी और केटी रामाराव को सम्मानित किया गया।

नौकरी छोड़ रहे लोगों को रोकने के लिए ज़ी मीडिया ने बदली अपनी एचआर पॉलिसी

ज़ी मीडिया में अब राजा बाबू के साथ ज्यादा टाइम तक लोग काम नहीं कर पा रहे हैं, तो गीतांजलि को इंस्ट्रक्शन देकर इस मेल(नीचे पढ़ें) को निकला गया। सुना है कि राजा बाबू को चेयरमैन साहब से 2 महीने का टाइम मिला है, चैनल को ऊपर लाने का। तो इससे गुस्सा होकर 5 डेज वर्किंग तो जनाब पहले ही कर चुके है, पर कंटेंट कंहा से लायेंगे। अपने न्यूज़ एंड एनालिसिस को देखकर ही खुश होते रहतें हैं। ऑफिस में बात-चीत चल रही है कि बस इलेक्शन तक का वेट कर लो, उसके बाद तो शायद ज़ी के दिन ठीक हो जायेंगे क्योकि वो अब इलेक्शन टाइम तक ही ज़ी में हैं।

Dear Colleagues,

It has been decided to amend an existing clause in the Appointment terms/HR Policy with immediate effect.

The below mentioned clause now stands suspended till further notice:-

“During your probation, the appointment is terminable by giving three(3)/seven(7) days notice on either side”. Upon confirmation, either party will be entitled to terminate the contract of employment by giving one/three months notice or basic pay in lieu of notice.”

The above mentioned clause will stand replaced by the below mentioned clause till further notice:-

1. It is now mandatory for Probationers to serve a minimum of 30 days notice period from date of resignation, before they can be relieved by concerned department and HR, failing which clearance/experience certificate from ZMCL shall not be given.

2. Also for Regular (confirmed) employees upon submission of their resignation, “pay in lieu of notice period” will not be accepted. They need to serve a mandatory 30 days notice period or to the maximum stipulated notice period from his/her date of resignation. Failing which they will not be relieved by HR and no clearance/ experience certificate shall be issued by ZMCL.

This is being implemented with immediate effect and is applicable to all Probationers and Regular employees of ZMCL.

Rest all terms and conditions of Appointment Letter remains unchanged.

Thank you
Geetanjali

 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए ईमेल पर आधारित।

लाइव इंडिया के ‘आपरेशन खाकी’ का असर : दिल्ली पुलिस के करप्ट पांच कर्मी नपे

: Press Relese of Operation Khaki : Dear friends, This is about the great expose done by Live India news channel on Delhi police. "Operation khaki" The sting operation did by our channel live india shows how some corrupt police officials are not only promoting the business of flesh trade but also are the part of this ugly nexus.

The special investigation team of Live india got a lead that a huge business of flesh trade is running in posh localities in delhi under the supervision of Delhi police officials. Live indias team randomly contacted the officials of various police stations and to our surprise 5 cops including a Sub inspector an beat officers agreed to our praposal of running a sex racket in the area that comes under their jurisdiction.

Cops also gave their guarantee to provide security to the ugly business against a monthly bribe. operation Khaki shows how the cops are facilitating girls in placing them to centeres of flesh trade. Operation Khaki by Live India is an eye opener for the Administration and other political parties.

The 5 tainted cops who agreed to help the undercover reporter of Live india to set up and establish a sex racket in their jurisdictions are –

1.     Si Rang lal, Thana amar colony

2.     Beat officer Anil Thana amar colony

3.     Beat officer Rajkumar, Thana safdar jung enclave.

4.     Cons. Raj beer choudhry, Complaint cell Dcp office south zone.

5.     Cons. Jagdish, Vip duty of Mr. Huda singh.

After this expose Delhi Police came in action and have suspended all the five officials. An enquiry has also been set up and the investigation is given to the vigillence department. you tube link of the story

http://youtu.be/fSgdjFVsJmE

http://youtu.be/fSgdjFVsJmE<

https://email.liveindia.tv/owa/redir.aspx?C=6f7e60845c814a338a92602421422c84&URL=http%3a%2f%2fyoutu.be%2ffSgdjFVsJmE

Vipul Chauhan

लखनऊ के सूचना विभाग में लगी कमाल की आग, धुआं तक नहीं

: बड़े अफसर के दफ्तर वाली आग पर पानी फेंक रहे हैं बड़े-बड़े पत्रकार :

लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट

आप इंडिया टीवी देखते हैं ना। हां, तो फिर ठीक है। उप्र सूचना विभाग में इसी तर्ज में आग लगी है। रहस्यमयी आगजनी। आग भयावह थी। पूरा दफ्तर भस्म हो गया। सारा सामान भस्मीभूत हो गया। अलमारी में रखी फाइलें तक फुंक गयीं। कमरे में रखा कम्यूटर-टीवी तक राख हो गया। लेकिन कमरे के पर्दे पर कोई भी शिकन तक नहीं हुई। दरवाजा भी पूरी तरह सुरक्षित रहा।

अब सूचना निदेशालय के कमरों से लेकर बाहर चाय-पकौड़ी की दूकानों और शौचालयों तक पर यह चर्चा शुरू हो गयी है कि आखिर यह कैसी सीमित, लेकिन भयावह आग थी। बहस-मुबाहिसों में यह भी पूछा-जाना जा रहा है कि इस आगजनी ने किसका पेट संतुष्ट कर दिया। जाहिर है कि आग चाहे कोई भी हो, हमेशा किसी न किसी का पेट बुझाती जरूर है। फिर ऐसे में यह पूछना लाजमी है कि सूचना विभाग की इस आग के दम पर किसका तवा गरम हुआ, किसकी रोटी सिंकी और कौन-कौन लोगों-अफसरों के पेट के बीच यह रोटी बंट गयी।

यह हादसा करीब एक हफ्ता पुराना है। अचानक लोगों को पता चला कि सूचना विभाग के एक बड़े अफसर के कमरे में आग लग गयी है और इस घटना में यह साहब का दफ्तर पूरी तरह फुंक गया है। आग ने इस कमरे में रखी मेज-कुर्सी और उस पर रखी फाइलों को तो अपने आगोश में ले लिया था, साथ ही कमरे में रखे कम्यूटर और टीवी तक को राख बना डाला था। इतना ही नहीं, इस कमरे की अलमारियों में रखी फाइलें भी आग की भेंट चढ़ गयी थीं।

यह आग बेहद रहस्यमय थी। आप कह सकते हैं कि यह बेहद नियंत्रित या फिर बाकायदा प्रयोजित थी। कारण यह कि यह जितनी जल्दी फैली, उतनी ही तेजी से खत्म हो गयी। चूंकि यह विभाग के एक चर्चित अफसर का मामला था, इसलिए आनन-फानन उस पर पानी फेंकने की कवायद शुरू हो गयी। अब सूचना विभाग के बड़े अफसर इस आगजनी को दबाने में जुटे हैं, जबकि सूचना विभाग से विज्ञापन हासिल करने वाले पत्रकारों ने इस आग को छिपाने-दबाने का अभियान छेड़ दिया है। लेकिन अब यह सवाल तो भड़क ही उठने लगा है कि आखिरकार इस आग में आखिरकार ऐसा क्या बर्बाद हुआ, जिसे बड़े अफसरों ने आनन-फानन धो-साफ करा दिया। पूर्वांचल के एक माध्यम श्रेणी के अखबार के एक मालिक का सवाल है कि इस आगजनी की जांच तो तत्काल होनी चाहिए, वरना सूचना विभाग अब जल्दी ही आगजनी विभाग बन जाएगा।

कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

‘जानेमन जेल’ फ्लिपकार्ट पर भी

पिछले साल आनलाइन सर्वाधिक बिकी कुछ किताबों में एक 'जानेमन जेल' अब फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध है. आप अब बेहद आसानी से इस किताब को अपने पास मंगा सकते हैं. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और किताब बुक करें.

http://www.flipkart.com/janeman-jail-hindi/p/itmdrmkhguxjhmev?pid=9789381394526

अगर आप खुद नहीं बुक कर पा रहे हैं तो भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की जेल यात्रा की पहली किताब 'जानेमन जेल' को घर बैठे मंगाने के लिए आप किताब का नाम Jaaneman Jail, अपना नाम, पूरा पता पिन कोड सहित और अपना मोबाइल नंबर लिखकर 09873734046 पर SMS कर दें. किताब कुछ ही दिनों में आपके हाथ में होगी. मूल्य सौ रुपये से कम है और छूट के साथ उपलब्ध है.

मुंबईकरों ने पहचानी सस्ती जेनरिक दवाइयों की महत्ता

मुंबई शहर अपने आप में एक ब्रांड है। यहाँ रहने वाले लोग भी ब्रांडेड हैं। उनके कपड़े, गाड़िया सब के सब ब्रांडेड हैं, यहाँ तक की उनकी सोच भी ब्रांडेड हो गयी है। जाहिर सी बात है कि ये तथाकथित ब्रांडेड लोग दवाइयां भी ब्रांड देखकर खरीदते हैं। लेकिन जब जेनरिक मेडसिन के बारे में इन्हें जानकारी मिली तो उन्हें जेनरिक पर भरोसा हुआ और ब्रांड का मोह भंग हो गया। और इस शुभ कार्य में कड़ी का कार्य प्रसिद्ध पर्यावरणविद दंपति नूसरत खत्री और अफजल खत्री ने किया। उन्होंने “स्वस्थ भारत विकसित भारत” अभियान चला रही संस्था प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह को मुंबई के मालाड स्थित रहेजा टिपको हाइट्स के क्लब हाउस में जेनरिक मेडसिन पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया।

व्याख्यान सुनने पहुंचे लोगों के मन में जेनरिक दवाइयों को लेकर तरह-तरह के भ्रम थे। वे ब्रांड से इतर कुछ समझने के लिए शुरू में तैयार नहीं थे लेकिन जैसे-जैसे आशुतोष कुमार सिंह ने उनके मन के अंदर के भ्रम को दूर किया, उन्हें लगा कि दवाइयों में ब्रांड की जरूरत नहीं है। आशुतोष कुमार सिंह ने अपने व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया की इस देश को गुणवत्तायुक्त सस्ती दवाइयों की जरूरत है न की ब्रांडेड दवाइयों की। इस मौके पर प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान के चेयरमैन मनोज सिंह राजपूत ने अपनी संस्था द्वारा चलाए जा रहे स्वस्थ भारत विकसित भारत अभियान के बारे में लोगों को बताया। इस व्याख्यान को आयोजित कराने में रहेजा सोसाइटी के संजय रुंगटा, हेमेन्द्र मेहता, सुधीर तिवारी, पराग जर्दोश सहित अल्का अग्रवाल की प्रमुख भूमिका रही। इस व्याख्यान के बाद आम लोगों के मन में एक ही सवाल था कि आखिर ये जेनरिक स्टोर सरकार खोल क्यों नहीं रही है।  

Afzal hussain
Media Incharge
Pratibha Janani Seva sansthan
Email- pjssmumbai@gmail.com

रायपुर में आयोजित कला-विमर्श संगोष्ठी में कलाकारों ने खूब निकाली भड़ास

शायर का नाम याद नहीं, पर शेर मौजूं है, ‘‘दोनों दल पूरी तैयारियों के साथ आये, हम गर्दन लेकर वो आरियों के साथ आये।’’ छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग ने जब कलाकारों से संवाद का मन बनाया होगा तो पता नहीं उनकी मनः स्थिति ठीक यही थी या नहीं, पर आयोजन के नजारे कुछ ऐसे ही थे। मौका था संस्कृति विभाग द्वारा दिनांक 5 मार्च 14 को रायपुर में आयोजित कला-विमर्श संगोष्ठी का, जिसमें राज्यभर के कलाकारों-संस्कृतिकर्मियों को आपसी चर्चा के लिये आमंत्रित किया गया था। भारतीय रेल की मेहरबानी से इन पंक्तियों का लेखक गोष्ठी में पूरे एक घंटे की देरी से पहुंचता है, तब तक आयोजन का उद्घाटन सत्र लगभग खत्म हो चुका होता है और मंच पर पद्मभूषण तीजनबाई अपनी सुपरिचित भाव-भंगिमा में नज़र आ रही थीं। संस्कृति विभाग के राहुल सिंह धन्यवाद ज्ञापित करते नजर आते हैं। राहुल पुरातत्व विभाग से ताल्लुक रखते हैं पर उनका कैमरा डिस्कवरी वालों की तरह हमेशा मौके की तलाश में रहता है और बेचारे खूबसूरत पक्षियों को पता ही नहीं चलता कि उनकी छवि बगैर कापीराईट के किसी ने चुरा ली है। कैमरों में लिप्त रहने के कारण राहुल की नजर थोड़ी पैनी है और शायद उन्हें कलाकारों के मूड का थोड़ा-बहुत अंदेशा रहा होगा, लिहाजा उन्होंने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए प्रारंभ में ही यह कह दिया था कि प्रत्यक्षतः कलाकारों से जुड़े हुए होने के कारण संस्कृति-विभाग को दीगर सरकारी विभागों की तरह नहीं देखा जा सकता पर इसके बावजूद यह है तो सरकारी विभाग ही और इसकी अपनी कुछ सीमायें भी हैं।

लोक एवं जनजातीय कलाओं पर पहले सत्र की चर्चा की शुरूआता पीसी यादव करते हैं। ठेठ छत्तीसगढ़िया बोली और लहजा भी वही। कानों में रस घोलने वाली जुबान। बगैर लाग-लपेट के वे कहते हैं कि सबसे पहला काम तो यही है कि कलाकारों की शिनाख्त कर ली जाये। कुछ लोग महज आइडेंटिटी कार्ड के भरोसे कलाकार बने घूम रहे हैं और इन्हें बाकायदा मान्यता भी मिल रही है। बाहर के कुछ आदमी शहरों में आकर लोक कला मंच बना लेते हैं, जिन्हें न तो ‘लोक’ की समझ है न ‘कला’ की, पर वे मंच का उपयोग बखूबी समझते हैं और इन्हें जमकर दूहते हैं। यहाँ के लोग सरल हैं। कोई आये तो अपना मन खोलकर रख देते हैं। पर यह रवायत अब तन खोलने की परिपाटी के रूप में परिवर्तित हो रही है और बाजार इसी काम में लगा हुआ है।

सुपरिचित साहित्यकार सतीश जायसवाल कहते हैं कि इस समय हम संकीर्णता और अतिक्रमण के दो पाटों के बीच हैं। लोक-कला के क्षेत्र में हमारी संपदा प्रचुर है पर इसका दोहन राजधानी के आस-पास के लोग कर रहे हैं और खुलेपन के नाम पर विकृत चरित्र सामने आ रहे हैं। ‘‘टुरी (लड़की) आँख मारे’’ हमारी कला का चरित्र नहीं है। वे मशवरा देते हैं कि कला व कलाकारों की शिनाख्त के लिये एक सुनिश्चित प्रक्रिया अपनायी जाये जो केवल सरकारी-तंत्र द्वारा न हो, बाहर के राज्यों के कलाकर्म के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया जाये और भरसक संस्कृति की निश्छलता को महज मनोरंजन-कर्म बनने से रोका जाये। हबीब तनवीर के नाटकों के कलाकार, पद्मश्री गोविंद राम निर्मलकर के हवाले से अशोक तिवारी ने कहा कि ‘‘नाचा ला बचाओ, भाषा ला बचाओ।’’ उन्होंने कहा कि कला व संस्कृति बाजार की नहीं, समाज की चीजें हैं। ये जीवन का सहज अंग हैं पर जब ये जीवन में नजर न आकर महज मंच पर दिखाई पड़ें तो विकृति आना स्वभाविक है। इन्हें बचाने की जिम्मेदारी सरकार से ज्यादा समाज की है। सरकार की भूमिका महज एक फेसिलिटेटर की है पर सरकार को भी यह सोचना होगा कि उसकी प्राथमिकतायें क्या हैं? हमें इंटरनेशल स्टेडियम की आवश्यकता नहीं है। संस्कृति का हमारा बजट 100 रूपये में महज 70 पैसा है जो संस्कृति के प्रति सरकार के नजरिये को इंगित करता है। उन्होंने एक ‘‘छत्तीसगढ़ी कल्चरल यूनिवर्सिटी’ की स्थापना का भी सुझाव दिया।

इस सत्र के बाद ‘शास्त्रीय और ललित कलाओं’ तथा ‘रंगकर्म और सिनेमा’ पर दो पृथक सत्र भोजनावकाश के बाद होने थे। लेकिन जब से अपने जीवन के विविध क्षेत्रों में मैनेजमेंट के सिद्धातों ने दखल देना शुरू किया है, ‘इंट्रेक्टिव सेशन’, ‘फीडबैक’ और ‘रेस्पास’ जैसे शब्द धड़ल्ले से सुनाई पड़ने शुरू हुए हैं। इसी के फेर में अध्यक्ष महोदय ने माइक श्रोता-कलाकारों की ओर थमाया और चूंकि हरेक हिंदुस्तानी गुसलखाने में जाते ही गवैया हो जाता है और माइक मिलते ही वक्ता हो जाता है, संगोष्ठी का नजारा वही हो गया जो हम इन दिनों संसद के सदनों, विधानसभाओं और टीवी चेनलों की बहस में देखते हैं। हमारे यहाँ संवाद की सबसे लोकप्रिय पद्धति एकपक्षीय संवाद की है, जिसमें वक्ता बोलकर चला जाता है और श्रोता पीठ-पीछे उसे गरियाते है। परिणाम चाहे जो हों, पर यह पद्धति वक्ता की सेहत से लिहाज से दुरूस्त होती है। जब भी इस प्रक्रिया को द्विपक्षीय बनाया जाता है, संवाद अचानक कलह में तब्दील हो जाता है, चूंकि यह विमर्श कलाकारों के बीच था, इसलिए तल्खियों के बावजूद इसमें गजब की खूबसूरती थी, काव्यात्मक भाषा थी और लहजा सुरीला था।

‘‘उन्हें शौके-इबादत है, गाने की आदत भी, दुआएं उनके मुँह से निकलती हैं ठुमरियां होकर’’ की तर्ज पर लोकगीत ‘‘सास गारी देवे’ की गायिकाओं जोशी बहनों में से एक ने सुरीले कण्ठ से "गेंदा फूल" फेंकने का काम शुरू किया। कहा कि कैसे-कैसे लोगों को आपने कमेटियों में बिठा रखा है? जिन्हें कला की कोई समझ नहीं है, वे तय कर रहे हैं कि कलाकार कौन है, किन्हें सम्मानित करना है ओर किन्हें पुरस्कृत करना है। बाहर के कलाकार लाखों रूपयों का पारिश्रमिक लेकर जाते हैं और स्थानीय कलाकारों की सरासर उपेक्षा की जाती है।

वरिष्ठ रंगकर्मी निसार अली ने मंच के नीचे से ही पूरा भाषण दे दिया। कहा कि संस्कृति विभाग के पास नाचा मंडली के लिये महज सात हजार रूपये नहीं है। बिंबात्मक भाषा में एक बड़े कलाकार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े कलाकार भी बड़े इसलिये हुए कि वे नौकरशाहों की पूँछ खटखटाते रहे और इस प्रक्रिया में उनकी अपनी पूँछ झड़ गयी। आडिटोरियम तो दूर, यहाँ नाटक करने वालों के लिये रिहर्सल की जगह भी नहीं है। फिर उन्होंने राजेश जोशी की कविता ‘मारे जायेंगे’ भी उद्धृत की। ऐसे में भला दूसरे श्रोता कैसे पीछे रहते? उन्होंने दुष्यंत कुमार का सहारा लिया। प्रतीकों-बिंबों के साथ कविता की छटा तब तक छायी रही, जब तक प्रत्यक्ष रूप से रूपये-पैसों का जिक्र नहीं आ गया। अर्थ-शास्त्र सदैव काव्य-शास्त्र ओर नीति-शास्त्र पर भारी पड़ता है, लिहाजा बिंबात्मक विमर्श का सिलसिला ‘आप तो नजदीक से नजदीकतर आते गये’ की तर्ज पर मूर्त होता गया और सीधे नाम लेकर कहा जाने लगा कि फलां को इतने पैसे दिये गये और अमुक को महज इतने ही मिले। एक कलाकार ने कहा कि ‘भाई जो बाहर के कलाकार आते हैं, उनसे तुलना करो, आपस में क्यों लड़ते हो?’ किसी ने कहा कि जया जादवानी ने मूल हिंदी लेखन का अनुवाद सिंधी में करवाया और उस भाषा के मौलिक लेखन का पुरस्कार हड़प लिया।

बस्तर से आये रंगकर्मी सत्यजीत भट्टाचार्यजी ने कहा कि यदि छत्तीसगढ की कलाओं से बस्तर की कला को हटा दिया जाये तो क्या बचेगा? लेकिन इस आयोजन में बस्तर से गिने-चुने कलाकारों को ही बुलाया गया। उन्होंने कहा कि अब सरकार के आयोजनों में बस्तर की तुरही तो दिखाई पड़ती है पर तुरही के पीछे के चेहरे धीमे-धीमे गायब कर दिये गये हैं। इप्टा के रंगकर्मी सुभाष मिश्र ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा कि यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान कुछ लोगों के लिये रोजगार तो उत्पन्न कर सकते हैं पर वे उस संस्कृति में दखल नहीं दे सकते जो पूरी तरह से बाजार के कब्जे में चली गयी हो। उन्होंने कहा कि यह भी देख लेना चाहिये कि कला व संगीत का इतना बड़ा विश्वविद्यालय पहले से खैरागढ़ में है पर उसने आज तक कितने ऐसे कलाकारों को जन्म दिया है जिन्हें राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली हो। पड़ोसी राज्य झारखंड का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सबसे पहले तो यही किया जाना चाहिये कि जो लोग राज्य भर में संस्कृति-कर्म में जुटे हुए हैं, पहले उनके पते-ठिकाने जुटाकर उन्हें सूचीबद्ध किया जाये। अन्यथा यही होगा कि 17 सालों से मुक्तिबोध नाट्य समारोह कहते हुए भी यदि हमें मदद की जरूरत होगी तो हमें संस्कृति विभाग के समक्ष याचक के रूप में जाना होगा।

सुभाष मिश्र ने अगले सत्र में ‘रगकर्म और सिनेमा’ विषय पर एक विस्तृत पर्चा भी रखा। संस्कृति मंत्री पूरे समय तक मंच पर नहीं थे। चुनाव की तारीखों की घोषणा के मद्दे-नजर वे मंच से नीचे उतर आये थे। पता नहीं कलाकारों की तीखी टिप्पणियां वे सुन पाये या नहीं, पर सूत्रों के अनुसार अपनी मित्र-मंडली में उन्होंने कहा कि अच्छा हुआ कि कलाकारों ने खाँस-खँखार लिया। थू-थू भी कर ली। उनके अवरूद्ध कण्ठ खुल गये हैं और अब संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। इस आयोजन का मकसद भी यही था।

 

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं.  उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

RUSSIA TODAY चैनल की न्यूज़ एंकर ने ऑन एयर इस्तीफा दिया

मॉस्को द्वारा फंडेड न्यूज़ चैनल RUSSIA TODAY की न्यूज़ एंकर लिज़ व्हाल ने रूसी सरकार के यूक्रेन में हस्तक्षेप के चलते बुधवार को ऑन एयर न्यूज़ कास्ट के दौरान इस्तीफा दे दिया। व्हाल ने कहा कि वो एक ऐसे मीडिया संगठन के साथ काम नहीं कर सकतीं जो रूस द्वारा एक स्वतंत्र राष्ट्र में किए जा रहे हस्तक्षेप की खबरों को 'व्हाइटवॉश' कर दे। व्हाल रशिया टुडे के लिए वॉशिंगटन से रिपोर्टिंग करती हैं। न्यूज़ कास्ट में बोलते हुए उन्होनें कहा कि ' मुझे अमरीकी होने पर गर्व है औऱ मैं सत्य के प्रसार में विश्वास रखतीं हूं, और इसीलिए इस न्यूज़ कास्ट के बाद मैं इस्तीफा दे रही हूं।' इससे पहले मंगलवार को रशिया टुडे की एक और न्यूज़ एंकर एब्बे मार्टिन ने अपने चैनल की लाइन से विपरीत स्टैण्ड लेते हुए रूस द्वारा यूक्रेन में किए जा रहे हस्तक्षेप को गलत ठहराया था। एब्बे मार्टिन ने कहा था कि रूस ने यूक्रेन में जो किया वो ग़लत है।

                        लिज़ व्हाल                                                           एब्बे मार्टिन
रशिया टुडे ने व्हाल द्वारा उठाए गए कदम को 'सेल्फ प्रोमोशनल स्टंट' बताते हुए उन्हे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। चैनल ने कहा कि यदि किसी पत्रकार की अपने संगठन की एडिटोरियल लाइन से मतभिन्नता है तो इस मसले को एडिटर के साथ बात कर के सुलझाना चाहिए। यदि तब भी समस्या का समाधान नहीं होता है तो एक प्रोफेशनल की तरह संगठन को छोड़ देना चाहिए, न कि अपने फायदे के लिए इस्तीफे को एक शो बना देना चाहिए।

भास्कर वालों ये विधायक जी का नहीं पत्रकार विनाद शर्मा का फोटो है

खबरों कि दुनिया में स्पीड का बहुत महत्व है। स्पीड न हो तो खबरों की दौड़ में आप पीछे रह जाएंगे। इस तेज़ी के कारण अक्सर गलतियां हो जाया करती हैं। वेबसाइट bhaskar.com हो तो  फिर कहना ही क्या।

bhaskar.com ने आज सुबह अपनी वेबसाइट पर अम्बाला सिटी से कांग्रेस विधायक एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री विनोद शर्मा के कोंग्रेस छोड़ने कि खबर प्रकाशित की, लेकिन खबर के साथ फोटो लगाई वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा की। खबर सुबह प्रकाशित हुई थी लेकिन अभी तक भास्कर ने अपनी गलती को सुधारा नहीं है।

खबर  को इस लिंक पर देखें: http://www.bhaskar.com/article/HAR-AMB-vinod-sharma-left-congress-4541466-NOR.html

 

एक पाठक द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित।

नेता जी, आपके बेटा जी को नसीहतों की नहीं, रहनुमाई की जरूरत है

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव की सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। इससे पहले भी कई बार वह सरकार को नसीहतें दे चुके हैं। यह कहना मुश्किल है कि क्या वास्तव में मुलायम सिंह यादव सरकार से नाराज हैं या लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने की पूर्व संध्या पर वह नसीहत देकर उस गुस्से को कम करना चाहते हैं, जो लोगों में सपा सरकार के प्रति बढ़ता जा रहा है। यह सवाल इसलिए भी वाजिब है क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर सरकार पर छींटाकशी की है। ऐसा नहीं है कि मुलायम सिंह यादव अखिलेश से मुलाकात नहीं करते होंगे। जो नसीहतें उन्होंने सार्वजनिक तौर पर दी हैं, वे घर पर भी दी जा सकती थीं। बहरहाल, हकीकत क्या है, यह मुलायम सिंह जानते होंगे, या अखिलेश, लेकिन सच यह है कि सपा सरकार से जो उम्मीदें प्रदेश की जनता ने लगाई थीं, वे मिट्टी में मिलती नजर आ रही हैं।

सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही है। यदि मुलायम सिंह यह कहते हैं कि दो साल में जैसा काम होना होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ, तो वह इसमें भी गड़बड़ करते लगते हैं। काम हुआ ही कहां है? जो हुआ भी होगा, खराब कानून व्यवस्था और मुजफ्फरनगर दंगों के नीचे दबकर रह गया। भले ही आज अखिलेश यादव अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करते रहें, लेकिन ऐसे काम नहीं हुए, जो जनता को दिखाई देते। मुलायम सिंह जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में जो भी वोट मिलेगा, वह प्रदेश सरकार के कामकाज के आधार पर ही मिलेगा, लेकिन कहीं कुछ काम हुआ हो तो वोट भी मिलेगा। सपा सरकार की सबसे ज्यादा फजीहत मुजफ्फरनगर दंगों में हुई। दंगा होने पर जब तक सरकार ने यह सोचा कि क्या करना चाहिए, तब सपा सरकार के दामन पर ऐसा दाग लग चुका था, जिसे वह हर कोशिश से साफ करने में नाकाम रही है। दंगा पीड़ित राहत शिविरों पर उनके मंत्रियों की बयानबाजी ने रही सही कसर पूरी कर दी। अब हालत यह है कि सपा से उसका समर्थक मुसलिम तो छिटक ही रहा है, अन्य जातियां भी किनारा करने लगी हैं।

तल्ख हकीकत यही है कि सपा सरकार के शपथ ग्रहण करने के दिन से ही उसके बदमिजाज कार्यकर्ताओं ने जो हरकतें शुरू की थीं, वे आज तक जारी हैं। यह कहा जा सकता है कि मीडिया का एक वर्ग सपा के छुटभैये नेता की छोटी हरकत को भी बड़ी बताकर प्रकाशित करता है, लेकिन सपा सरकार के कुछ बड़े नेताओं की हरकतें भी बड़ी हैं। हालिया उदाहरण कानुपर के विधायक इरफान सोलंकी का है। डॉक्टरों से उनका उलझना और उन्हें पुलिस से पिटवाना बड़ी गलत हरकत है। उस पर भी तुर्रा यह कि सपा विधायक के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। नतीजा यह होता है कि डॉक्टरों का विरोध उत्तर प्रदेश की सीमा पार करके पूरे देश में फैलने लगता है। डॉक्टरों की हड़ताल की वजह से जिन मरीजों की जानें गर्इं, उनका जिम्मेदार कौन है? सपा सरकार या हड़ताली डॉक्टर? अगर लोग आज यह सवाल कर रहे हैं कि आजम खान की भैंसे चोरी होने पर प्रदेश की पुलिस इतनी सक्रिय हो सकती है, तो आम जनता के मामलों में क्यों नहीं हो सकती, सही कर रहे हैं।

अपनी सरकार को नसीहत देने वाले मुलायम सिंह यादव को किसने रोका है इरफान सोलंकी के खिलाफ कार्रवाई करने को? सच तो यह है कि सपा सरकार के मंत्री, विधायक और हाल ही में बनाए गए दर्जा प्राप्त मंत्रियों की पूरी फौज बेलगाम हो गई है। यह इंतहा थी कि एक दर्जा प्राप्त मंत्री मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों के राहत शिविरों में पहुंच कर अपना स्वागत करा आए। जैसे इतना ही काफी नहीं था, स्वागत की तस्वीरों को अपनी फेसबुक वॉल पर भी अपलोड कर दिया। दंगा पीड़ितों से अपना स्वागत कोई बेदिल इंसान ही करा सकता है। किसी भी मंत्री या विधायक के कार्यालय या निवास पर चले जाएं, वहां का नजारा देखने पर नहीं लगता कि यह समाजवादी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले मंत्री या विधायक हैं।

दरअसल, सपा के मंत्रियों और विधायकों को लगता है कि वे न जाने के लिए आए हैं, इसलिए वे वह सब कुछ कर रहे हैं, जिससे सपा की साख को बट्टा लग रहा है। सच वही है, जो मुलायम सिंह यादव ने अपनी नसीहत में कहा है कि सरकार चापलूसों से घिर गई है। सरकार के चारों ओर चापलूसों का घेरा इतना कड़ा है कि आम कार्यकर्ता सरकार से कटकर रह गया है। चापलूसी के इस घेरे को तोड़ना ही होगा, जिसे मुलायम सिंह यादव तोड़ सकते हैं या खुद अखिलेश यादव, जिन्होंने युवा होते हुए ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे यह लगे कि युवा बदलाव लाने में सक्षम हैं। एक तरह से देखें, तो हम बसपा सरकार का ‘एक्शन रिप्ले’ देख रहे हैं। बसपा सरकार से त्रस्त होकर ही उत्तर प्रदेश की जनता ने सपा को पूर्ण बहुमत से सत्ता सौंपी थी। दो साल आते-आते बसपा अपनी हार का बदला लोकसभा चुनाव में लेती नजर आ रही है। अब जब लोकसभा चुनाव का ऐलान हो गया है, तो नसीहतों की नहीं, रहनुमाई की जरूरत है और वह भी मुलायम सिंह यादव की। ऐसा नहीं हुआ तो जनता मुलायम सिंह से यह जरूर सवाल करेगी-
'तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि काफिला क्यूं लुटा,
मुझे रहजनों से गरज नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।'

 

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। संपर्कः sarimindia@gmail.com

अमर उजाला गाजीपुर ने फोटो किसी की और नाम किसी और का छापा

प्रदेश के अग्रणी दैनिक हिंदी समाचार पत्र अमर उजाला, गाजीपुर के लंका मैदान मे आगामी 10 मार्च से तीन दिवसीय विराट किसान मेले का आयोजन कर रहा है। इस वृहद कार्यक्रम को लेकर अमर उजाला की टीम हफ्तों से तैयारियों मे जुटी हुई है। अपने आयोजन को लेकर अमर उजाला के गाजीपुर संस्करण मे खबरे और लेख नियमित प्रकाशित हो रहे है। आयोजन मे लोगो की ज्यादा से ज्यादा भागेदारी को लेकर भी अखबार प्रयत्नशील है। किसान मेला के आयोजन को लेकर समाज के विभिन्न वर्गो, राजनीतिकों और अधिकारियों के विचार भी अखबार में प्रकाशित किया गया। इसी कड़ी मे अमर उजाला के गाजीपुर संस्करण मे 05 मार्च को भी खबर छापी, लेकिन इसे तकनीकी गलती कहें या स्थानीय ब्यूरो कार्यालय की घोर लापरवाही, अखबार मे प्रकाशित खबर के साथ जनपद के महत्‍वपूर्ण लोगों की छपी चार फोटो के साथ उनके नाम पूरी तरह गलत प्रकाशित हुये हैं। जिन चार लोगो के फोटो खबर के साथ छापे गये है, वे जिले के चर्चित चेहरों मे शुमार है, बावजूद इसके अखबार मे फोटो के साथ सभी के नाम गलत छापे गए है। इस गलती को लेकर जिले के मीडिया गलियारे मे लगातार चर्चाओं का दौर जारी है। अमर उजाला की इस कमी को लेकर मीडियाकर्मी चुटकी भी ले रहे हैं।

न्यूज़24 ने 9 बजे के न्यूज़ शो की बलि अपने मीडिया संस्थान के कार्यक्रम ‘मंथन’ के नाम पर चढा दी

Rahul Pandey :  माना कि ये किसी शादी का फंक्शन नही बल्कि एक मीडिया संस्थान के कार्यक्रम में क्या क्या हुआ इसे बताया जा रहा है पर प्राइम टाइम में 9 बजे रात को इस तरह अपने मीडिया संस्थान को प्रचारित करना न्यूज़ चैनल पर कहां तक जायज़ है. न्यूज़24 ने 9 बजे के न्यूज़ शो की बलि अपने मीडिया संस्थान के कार्यक्रम 'मंथन' के नाम पर चढा दी.

इलाहाबाद विवि के छात्र राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से.

विधायक इरफान सोलंकी पर एफआइआर दर्ज कर डीजीपी स्वयं पर्यवेक्षण करें : हाईकोर्ट

उत्तर प्रदेश में डॉक्टरों की हड़ताल के बारे में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल में आज इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही पर गहरी नाराजगी जताते हुए हड़ताल के सम्बन्ध में गठित न्यायिक समिति से पुलिस की भूमिका की विशेष रूप से जांच किये जाने के आदेश निर्गत किये.

मुख्य न्यायाधीश डॉ धनञ्जय यशवंत चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली बेंच ने पुलिस द्वारा इस मामले में अकारण बल प्रयोग को गंभीर बताते हुए उस पर गहरी आपत्ति प्रकट की. उन्होंने डॉ ठाकुर द्वारा प्रस्तुत दो यूट्यूब वीडियो लिंक के आधार पर कहा कि इसे देख कर प्रथमद्रष्टया ऐसा लगता है कि पुलिस ने बिना वजह बल प्रयोग किया. कोर्ट ने ख़ास कर एक प्रोफ़ेसर और कुछ छात्रों को पुलिस द्वारा चारों तरफ से घेर कर मारने की घटना पर कड़ा ऐतराज़ दर्शाया.

कोर्ट ने कहा कि जांच में जो भी पुलिस अधिकारी दोषी पाया जाया है, उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जाए. साथ ही पुलिस कार्यवाही में घायल हुए लोगों को अतिशय बल प्रयोग के लिए दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के वेतन से मुआवजा प्रदान किया जाये. कोर्ट ने सुबह सुनवाई के समय यह आदेश दिए कि दो बजे प्रमुख सचिव गृह अनिल कुमार गुप्ता और प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा बी एस भुल्लर कोर्ट के सामने उपस्थित हो कर पूरी स्थिति से अवगत कराएं.

कोर्ट में इन अधिकारियों ने बताया कि डॉक्टरों की हड़ताल ख़त्म हो गयी है. उनकी बात सुनने के बाद आदेशित किया कि यदि कोई भी मेडिकल का छात्र सपा विधायक अथवा पुलिसवालों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराना चाहता है, उनकी एफआइआर तत्काल दर्ज की जाए. साथ ही यह भी आदेश दिए कि इस सभी मुकदमों का पर्यवेक्षण डीजीपी स्वयं करेंगे.  कोर्ट ने यह कहा कि इस प्रकार की घटनाओं का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है और सरकार को ऐसे सभी मामलों में बहुत चौकन्ना रहना चाहिए. अगली सुनवाई 10 मार्च को नियत की गयी है.

ज़मानत पर छूटे कांडा का दिनभर गुणगान करता रहा हरियाणा न्यूज़

गुड़गांव, 5 मार्च। गोपाल कांडा जेल से बाहर क्या आए, हरियाणा न्यूज पूरी तरह से गुणगान में जुट गया। गुणगान करें भी क्यों न, भई मालिक जो जेल से बाहर आ गए हैं। हरियाणा न्यूज पर दिन भर इस तरह से कांडा की शान में स्पेशल पैकेज चलते रहे, जैसे कि वे आंदोलन की लड़ाई लड़ते जेल में गए हों और अब जीत हासिल कर लौटे हों। गीतिका शर्मा सुसाइड मामले में आरोपी हैं कांडा। हरियाणा की सिरसा विधानसभा सीट से मौजूदा विधायक हैं और जेल जाने से पहले हरियाणा सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे हैं। कांडा को कल ही दिल्ली की कोर्ट से जमानत मिली है।

वैश्य समुदाय के इस दबंग नेता ने गीतिका शर्मा मामले में किस तरह दबंगई दिखाई है, यह सभी जानते हैं। चुनाव आयोग ने बुधवार को ही लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा की है। नेशनल के साथ-साथ हरियाणा के भी सभी क्षेत्रीय चैनलों पर यह सबसे बड़ी खबर रही लेकिन हरियाणा न्यूज के लिए तो कांडा की रिहाई किसी दिवाली से कम नहीं है। सुबह से ही हरियाणा न्यूज की विशेष कवरेज जारी रही। शुरूआत गुड़गांव से हुई, जहां कांडा ने पहले शीतला माता मंदिर में मत्था टेका और फिर झज्जर, रोहतक, हिसार होते हुए अपने घर यानि सिरसा पहुंचे। रास्ते में गोपाल कांडा का जबरदस्ती स्वागत कराने के इंतजाम किए गए थे। वे रास्ते में जिन शहरों से होकर गुजरे, वहां उनके चमचों ने फूलमालाओं से अपने इस बहादुर आका का स्वागत किया। भई उनके लिए तो बहादुर हैं, जो बहादुरी का काम उन्होंने किया था, उसी मामले में जेल में बंद थे, इसलिए रिहा होने के बाद स्वागत तो बनता ही है ना।

हरियाणा में किसी और चैनल या अखबार ने तो कांडा के स्वागत समारोह में कोई खास रूचि नहीं दिखाई लेकिन हरियाणा न्यूज की टीम सुबह से ही गुड़गांव पहुंच गई थी। कांडा की महानता की गाथा जनता को सुनाने के लिए। फिर क्या था जब भी टीवी चैनल खोलो, इस खबर के अलावा कोई खबर नहीं थी। विशेष प्रस्तुति के जरिए यह प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही थी कि कांडा जैसा वीर हरियाणा में पैदा ही नहीं हुआ और जेल से लौटने के बाद हरियाणा की जनता उनके लिए बावली होती जा रही है। अब हरियाणा न्यूज के कर्मचारी भी क्या करते, मालिक जो जेल से रिहा हुए हैं, इसलिए कवरेज में किसी प्रकार की कमी नहीं रहनी चाहिए। कांडा ने जेके जैन नामक एक व्यक्ति से हरियाणा न्यूज खरीदा था। हां, एक बात जरूर कहूंगा कि अगर हरियाणा न्यूज भी कांडा की गाथा न गाए तो फिर कौन गाएगा। फिर तो कांडा के लिए चैनल चलाने के लिए क्या मायने। पर इतना तो ध्यान रख लेते कि जनता की प्रति भी थोड़ी बहुत जिम्मेदारी है। एक आध और खबर को भी अपने बुलेटिन में जगह दे देते।

 

दीपक खोखर। संपर्कः 09969180040

पत्रकारपुरम से आस-पास की करोड़ों की ज़मीन हथियाना चाहते हैं वीआईपी पत्रकार

वाराणसी। सुना ही नहीं देखा और कर्इ बार झेला भी है कि मंत्री से लेकर वीवीआर्इपीयों के लिए आम रास्ता किस तरह खास हो जाता है कि उस पर से गुजरने की जुर्रत हम मिनटों से लेकर घंटो तक नहीं कर सकते। लेकिन किसी खास सड़क का प्रयोग केवल पत्रकार ही करेंगे और उस पर से कोर्इ गुजरेगा नहीं ऐसा पहली बार सुन रहा हूं। ये सड़क बनारस के शिवपुर में प्रदेश शासन के सहयोग से वीडीए द्वारा विकसित की गयी पत्रकारपुरम कॉलोनी की सड़क है। यहां रहने वाले एक खास किस्म के पत्रकारों के गोल ने इस हवा को बनाने में कोर्इ कसर बाकी नहीं रख छोड़ी हैं। पत्रकारपुरम के बगल में ही रहने वाले लोग इस बात से परेशान है कि अगर ऐसा हुआ तो वो करेंगे क्या?

इनमें से एक ने तो बकायदे सूचना के अधिकार के तहत जिला ग्राम्य विकास अभिकरण से इस बारे में पूछा तो जवाब मिला कि इस तरह का कोर्इ आदेश है ही नहीं, क्यों कि सांसद-विधायक निधि योजनाओं के तहत बनायी गयी सड़क सार्वजिनक प्रयोगार्थ है। तो फिर सवाल ये खड़ा होता है, इस तरह के माहौल बनाये जाने की वजह क्या है? दरअसल पत्रकारपुरम में रह रहे एक खास किस्म के पत्रकारों के गोल की नजर पत्रकारपुरम से सटी करोड़ो की जमीन पर जा टिकी है। उन्हें लगता है कि इस तरह की हवा बनाकर अगर जमीन के मालिक को अरदब में ले लिया जाये तो उनकी तो लाटरी ही लग जाएगी। इसी के तहत उनकी सारी कवायद जारी है।

                                                 आरटीआई द्वारा प्राप्त सूचना

उधर पिछले 12 जनवरी को दैनिक आज में विकास प्राधिकरण के एक विज्ञापन ने जिसमें कालोनी के चारो ओर दिवाल उठाये जाने और विभिन्न मार्गों पर लोहे के गेट लगाये जाने के टेण्डर के प्रकान से लोग और परेशान हैं। उन्हें लगता है कि अगर ऐसा हुआ तो क्या वो आकाश मार्ग से होकर गुजरेंगे? वैसे बताते चले कि पत्रकारों को आवास के लिये जमीन देने के नाम पर पत्रकारपुरम कालोनी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। बात ये थी कि उन पत्रकारों को आवास के लिए जमीन दी जायेगी जिनके पास  नगर निगम के परिसिमन के अन्दर कोर्इ अपना घर न हो लेकिन नियम को ठेंगा दिखाकर उन पत्रकारों ने भी यहां जमीन हासिल किया जिनके घर बकायदा शहर में है। मामला सिर्फ यहीं तक नहीं रूका कर्इयों ने अपने चेहतो को इस कालोनी में जमीन दिलवायी। और छानबीन करें तो कर्इ पत्रकारों ने तो पहले सब्सिडी के तहत सस्ते में जमीन हासिल की फिर उसे मनमानी कीमतों पर बेचकर मुनाफा कमाया। इनमें एक चर्चित पत्रकार वो है जिनके सिर पर हमेशा एक गोल टोपी हुआ करती है। ये महोदय सरकारी महकमें में अपनी सेंटिग के लिए जाने जाते है। ऐसे ही अन्य कर्इ महोदयों के किस्से है जिनकी हरकतों से पत्रकारिता शर्मसार होने के अलावा कुछ और नहीं होती।

पत्रकारपुरम कालोनी में जमीन आवंटन से लेकर जमीनों को मनमाने कीमतों में बेचने तक तह दर तह अनेक किस्से चिंगारी की शक्ल में दबे पड़े है जो बताने के लिए काफी हैं कि जनसरोकार से जुड़े इस पेशे को किस तरह चंद दलाल पत्रकार अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे है। फिलहाल पत्रकारपुरम कॉलोनी की ज़मीन से सटी ज़मीन पर रहने वाले परेशान हैं, उनका कहना है कहीं उनके लिए आने जाने का रास्ता न बंद हो जाए, पूछने पर कहते भी है, हम लोग क्या करे वो प्रशासन और पत्रकार चाहे तो कछ भी करवा सकते है।

 

लेखक भास्कर नियोगी से संपर्क bhaskarniyogi.786@gmail.com पर किया जा सकता है।

भदोही के पत्रकार सुरेश गांधी को धमका रही पुलिस, मुख्यमंत्री से की शिकायत

संतरविदास नगर। भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी का पुलिस द्वारा उत्पीड़न लगातार जारी है। एक बार फिर पुलिस ने सुरेश गांधी की पत्नी रश्मि गांधी को धमकी दी है कि अगर उन्होनें पुलिस व प्रशासन पर लगाए गए आरोपों को वापस नहीं लिया तो उनके द्वारा दर्ज कराई गए मुकदमें में फाइनल रिपोर्ट लगा दी जाएगी। उनसे कहा गया है कि पुलिस से दुश्मनी मंहगी पड़ेगी, उन पर फरिज़ी मुक़दमें दर्ज़ करा दिए जाएंगे, माफियाओं से मिलकर उनकी परिवार समेत हत्या करावा दी जाएगी साथ ही बच्चों का अपहरण भी करवा दिया जाएगा। पुलिस द्वारा दी गयी धमकी के बाद पत्रकार सुरेश गांधी व उनकी पत्नी ने मुख्यमंत्री समेत राज्यपाल,  डीजीपी, आईजी, डीआईजी, प्रमुख सचिव गृह, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग आदि को रजिस्टर्ड पत्र भेजकर पुलिस की उत्पीड़नात्मक कार्रवाई की शिकायत की है।

इसके अलावा पत्र में कहा गया है कि पत्रकार सुरेश गांधी व उनकी पत्नी रश्मि गांधी द्वारा सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत न्यायालय में दायर याचिका पर न्यायालय के आदेश पर दर्ज़ मुक़दमें की विवेचना भदोही कोतवाली से हटाकर क्राइम ब्रांच को सौंपने की मांग की गयी है। पत्र में कहा गया है कि माफियाओं ने कोतवाल संजयनाथ तिवारी के शह पर पिछले 16 सालों से तिनका-तिनका जुटाई गयी गृहस्थी व विवाह में मिले 25 लाख से अधिक के सामान को लूटा है। पत्र में यी भी कहा गया है कि घटना में कोतवाल के आरोपित होने से भदोही पुलिस द्वारा विवेचना में लीपापोती की जा रही है। पुलिस अपने बचाव में लूटेरे माफियाओं की मदद कर रही है।

मुकदमा दर्ज होने के आठ माह बाद भी पुलिस लूटे गए सामान की बरामदगी नहीं कर सकी है। इस मामले में पीड़ित द्वारा कई बार मुख्यमंत्री, डीजीपी, प्रमुख सचिव गृह, आईजी वाराणसी, राष्टपति, राज्यपाल समेत सभी जिम्मेदार अधिकारियों व एनएचआरसी, प्रेस कौंसिल आदि को पत्र भेज कर उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। पुलिस की इस कार्रवाई से बच्चों की पढ़ाई लिखाई चौपट हो रही है। बता दें कि पूर्व में हुई घटनाओं में प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के नाकामी की खबरें छपने के बाद पहले पीड़ित पर गुंडा एक्ट, जिलाबदर आदि की कार्यवाही कर उसकी पूरी गृहस्थी को बर्बाद कर दिया गया और पीड़ित के मकान मालिक द्वारा दर्ज फर्जी मुकदमें में चार्जशीट लगा की गई।

अब जबकि न्यायालय के आदेश पर आरोपी कोतवाल संजयनाथ तिवारी व मकान मालिक विनोद गुप्ता, सुमित गुप्ता, बीरु गुप्ता व हर्षित गुप्ता आदि पर 156(3) के तहत मुकदमा दर्ज है तो पुलिस न ही आरोपियों की गिरफ्तारी कर रही है और न ही लूट गए सामान की बरामदगी, उल्टे मुकदमें में आरोपित पुलिस सहित प्रशासनिक अधिकारियों के नाम को वापस लेने की धमकी दे रही है।

 

संपर्कःsureshgandhi.aajtak@gmail.com
 

एसपी साहब टहल रहे थे तो पत्रकार ने कहा ‘साहब पांय लागी’, इसलिए पिट गया बेचारा

पांय लागी’ शब्द भारतीय दण्ड विधान की किस धारा के तहत जुर्म माना जायेगा? यह सवाल मेरी दाल-भात-तरकारी में कंकर-बालू की तरह पिछले दो महीनों से मुझे लगातार पीड़ा दे रहा है। इसका जवाब तलाशने के लिए सियासी मोहल्लों के संस्कार और नौकरशाही की शाहाना रवायतों पर भरपूर नजर डाली लेकिन वहां भी ‘पांव छुआई’ संस्कृति का सम्मान और दुलार देखने को मिला। रामायण, गीता, महाभारत जैसे महान ग्रंथों से भी पैर छूकर आशीर्वाद लेने की सीख, संस्कार मिले हैं। आज तो हिन्दुओं के अलावा अल्पसंख्यक समुदाय भी पैर छूने से गुरेज नहीं कर रहा। समूची भारतीय संस्कृति का शिष्ट आचरण ही है अपने से बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेना। पांव छूना अतिसम्मान का परिचायक है। फिर एक पुलिस अधिकारी ‘पांय लागी’ कहने पर किसी को कैसे पीट सकता है? अपने पुलिसवालों से कैसे पिटवा सकता है? समझ से परे है, लेकिन है सच।

घटना कुछ यूं है, 3 जनवरी, 2014 की सुबह सोनभद्र जिले के पुलिस कप्तान अपने पांच सिपाहियों के साथ रौप प्राथमिक विद्यालय के पास मुख्यमार्ग पर ‘मार्निंग वॉक’ पर थे। उसी रास्ते से विनय कुमार यादव ‘दैनिक जागरण’ हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के संवाददाता/अभिकर्ता अपने समाचार-पत्र को बांटते हुए साइकिल से गुजर रहे थे। पुलिस कप्तान को विनय यादव का साइकिल पर सवार होकर पास से गुजरना नागवार लगा। उन्होंने बाकायदा उसकी खुद पिटाई की, अपने सिपाहियों से पिटवाया फिर भी अहं नहीं संतुष्ट हुआ तो विनय यादव को चुर्क चौकी भेज दिया।

पत्रकार पिटा था। एक अभिकर्ता पिटा था। कई लोग उस दिन का अखबार नहीं पा सके, पढ़ सके। स्वाभाविक है, खोजबीन हुई। चश्मदीदों ने कई अखबारवालों को बताया। पत्रकारों की जमात पुलिस चौकी पहुंची फिर ‘दैनिक जागरण’ के ब्यूरोचीफ सहित कई पत्रकार पुलिस कप्तान से मिले तब कप्तान ने पत्रकारों से कहा, ‘यह एसपी साहब पांय लागी कह रहा था।’ यहां गौर करने लायक है कि पत्रकारों ने घटना का विरोध करने की जगह विनय यादव से एक माफीनामा लिखवाकर पुलिस चौकी से छुड़ा लिया। किस बात का माफीनामा लिखाया गया? जबकि विनय यादव को गम्भीर चोटें पैर व आँख पर आई हैं, ऐसा चिकित्सा प्रमाण पत्र में दर्ज है। यहां गौरतलब है कि विनय विकलांग भी है।

पत्रकार का पिटना, वह भी पुलिस से पिटना कोई अनहोनी नहीं है। पत्रकारों की बाकायदा हत्याएं हो रही हैं। पिछले साल देश भर में आठ पत्रकार मारे गए। पिटनेवालों की संख्या खासी है। पीटने वालों में पुलिस, साधु-संत, राजनेता सभी हैं वह भी जो पत्रकारों की लेखनी के मोहताज रहे हैं। वह भी जो मीडिया की गणेश परिक्रमा के लिए जाने गये। कई बार तो महज सवाल पूछने भर से पत्रकार को जेल की सजा भुगतनी पड़ी, मनहानी के मुकदमें तो आम बात है। अखबारों के मुखालिफ फतवे तो आये दिन दिये जाते हें। सरकारें अपनी आलोचना किये जाने पर बेतरह नाराज होती रहती हैं।

उप्र सरकार मीडिया से गाहे-बगाहे इसलिए नाराज हो जाती है कि वह सैफई पर सवाल उठा देता है, वह मुजफ्फरनगर दंगे पर सवाल उठा देता है, वह माधुरी दीक्षित पर सवाल उठा देता है, वह विधायकों, मंत्रियों के दल की विदेश यात्रा पर सवाल उठा देता है। यही नहीं चुनावी दौर-दौरे में भाजपा के ताजा चेहरे मोदी को अखबार के पन्नों व टीवी के पर्दे पर अधिक तरजीह मिलने पर सत्तादल के मुखिया खफा हो जाते हैं। तो स्वस्थ आलोचना अपराध की श्रेणी में दर्ज की जायेगी? यह सवाल बरसों से जस का तस है। इस बीच देश के जगमगाते शहर मुंबई में फोटो-पत्रकार लड़की के साथ बलात्कार हो जाता है। सुकुमा, छत्तीसगढ़ के पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या कर दी जाती है। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान पत्रकारों से बदसलूकी की जाती है। सुल्तानपुर में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में जिले के कप्तान पत्रकार को पीटने व शिकायती फोटो छीनने की बदतमीजी करते हैं। ऐसी सैकड़ों घटनाएं आये दिन पत्रकारों के साथ घटती हैं। गो कि पत्रकार का सच्चाई से अपना काम करना बेहद कठिन है।

पत्रकार, अखबार और आदमी के बीच उम्मीदों का पुल है और अखबार समस्या, पीड़ा, पर्व और सूचना का वेद है। दोनों के बगैर लोकतंत्र की ताकत कमजोर होगी। खासकर तब और भी जब दुर्योधनी ताकतों के लाखों ‘प्रिंट आउट’ सभ्यता की दीवारों पर चस्पा हों। ऐसे हालातों में पत्रकार पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों से, सच से कैसे मुंह मोड़ सकता है? यह सच है कि अखबारों की बड़ी जमात सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है और उनके पत्रकार सरकारी सुविधाओं के मोहताज। जाहिर है, इन हालातों में सरकार के या नौकरशाही के मुखालिफ लिखना या समीक्षा करना कठिन है। छोटी जगहों पर तो हालात और भी तकलीफ देह हैं, वहां अधिकारी, अपराधी और नेता का स्वाभाविक दबाव होता है। इससे भी बड़ा दबाव नये अखबार मालिकों का होता है जो सिर्फ अपने फायदे के लिए प्रेस को परचून की दुकान में तब्दील करने को बाजिद हैं। इनका साथ देने में तमाम छोटे अखबार और उनके संपादक-प्रकाशक भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। फिर पत्रकारों की बिरादरी भी अपने मालिकों के प्रति वफादारी दिखाने में पीछे नहीं है, तब भला आलोचना या सच की बात करना कितना नैतिक है?

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि सच के नातेदारों और आदमी के पैरोकारों की जमात से समाज का भरोसा उठ गया है, भरोसा आज भी बरकरार है, यदि ऐसा नहीं होता तो यह लाइने लिखते समय क़लम की रौशनाई सूख जाती। फिर उसी सवाल पर आते हैं कि पुलिस कप्तान ने विनय यादव को क्यों मारा? क्या वे किसी तनाव में थे या उनका दिमागी संतुलन कुछ क्षणों के लिए बिगड़ गया था? हिंसा पुलिस महकमें का बड़ा हथियार है या रोग? इसकी जाँच होनी चाहिए। इस पर शोध की आवश्यकता है।
    
सरकार को इस ओर गम्भीरता से सोंचने की जरूरत है। हालांकि मुख्यमंत्री उप्र ने पिछले दिनों खुद कहा है कि पुलिस ही बनाती बिगाड़ती हैं सरकार की छवि। पुलिस अपनी छवि सुधारे। इससे भी बड़ा प्रश्न है कि जिले के पत्रकारों ने महज धरना प्रदर्शन और मोमबत्ती जुलूस के बीच विनय की पीड़ा, अपमान और सुरक्षा को दरकिनार कर दिया? तो क्या यह खुद पर हमला कराने का दावतनामा तैयार कर रहे हैं पत्रकार बन्धु? जो भी हो पुलिस कप्तान के हिंसात्मक आचरण को कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

 

लेखक राम प्रकाश वरमा लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक प्रियंका के सम्पादक हैं। उनसे संपर्क editor.priyanka@gmail.com द्वारा किया जा सकता है।

कानपुर मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टरों की दबंगई के मामले नए नहीं है

चलिए मान लेते है कि कानपुर की घटना में पूरी ग़लती सपा विधायक और एसएसपी की थी, फिर भी डॉक्टरो का इमर्जेंसी और ICU की सर्विसेज़ बंद कर देना कही से भी सही नहीं ठहराया जा सकता है। कानपुर मेडिकल कालेज के अस्पतालों में जूनियर डॉक्टरों के द्वारा मारपीट के मामले कोई नए नहीं है। ज़रा पता तो करिये कि पिछले दस सालों में अकेले हैलट हॉस्पिटल में कितनी बार जूनियर डॉक्टरों की तीमारदारों से मारपीट के बाद हड़ताले हुई है। हर बार तो सपा विधायक और एसएसपी नहीं थे वहाँ पर। फिर क्यों डॉक्टर लोग हमेशा ऐसा करते आये हैं?

कानपुर मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टरों की हड़तालों का उत्तर प्रदेश के ही अन्य मेडिकल कॉलेजों BHU और KGMU से तुलना कर लीजिये तो तस्वीर साफ हो जायेगी। वैसे भी पिछले दो दशकों में इस  प्रोफेशन ने अपनी क्रेडिबिलिटी को बहुत ही बुरी तरह धक्का पहुचाया है। जांचो, दवाओ पर कमीशन और परसेंटेज लेना किसी से छुपा नहीं है, जो डॉक्टर सरकारी अस्पतालो में ढूढे नहीं मिलते वही ऊँची फीस पर मंहगे प्राइवेट अस्पतालो में तुरंत हाजिर हो जाते है। IMA के कानपुर चैप्टर की अध्यक्ष और मेडिसिन डिपार्टमेंट मेडिकल कालेज, कानपुर की हेड को मैंने खुद मधुराज हॉस्पिटल के ICU में पांच मिनट आने के लिए 2000 रुपये लेते हुए देखा है।

डॉक्टरों के लिए बने प्रोफेशनल कोड ऑफ़ कंडक्ट की कसौटी पर अगर डॉक्टरों को कसा जाये तो उंगलियो में गिनने भर के लिए डाक्टर मिलेगे जो उनका पालन करते होंगे। खैर इन सब के बावजूद इस मामले में पुलिसिया रवैया बेहद ही बर्बर और आपत्तिजनक रहा है। सरकार को चाहिए कि इस पर एक न्यायिक जाँच करवाये और किसी भी तरह डाक्टरों की हड़ताल को ख़त्म करवाये। क्योंकि इस पूरे मामले में यदि सबसे ज्यादा प्रताड़ित कोई हो रहा है तो वो है आम नागरिक। शायद डॉक्टरों के पास भी उनसे ज्यादा सॉफ्ट टारगेट कोई दूसरा नहीं है। डॉक्टरों ने आम लोगों की जान को अपनी मांगें मनवाने का हथियार बना रखा है, जितनी ज्यादा जाने जायेंगी, सरकार पर उतना ही दबाव बढ़ेगा।

 

लेखक सुमित कुमार से संपर्क उनके ईमेल sumit.umrao4u@gmail.com पर किया जा सकता है।

जनसरोकारी पत्रकारिता के लिए समाचार प्लस चैनल की टीम सम्मानित

जनसरोकारी पत्रकारिता करते हुए समाचार प्लस चैनल ने करोड़ों लोगो के दिलों को छुआ है। कभी किसी अबला की आवाज़ बुलंद करना, तो कभी देश के लिए पकिस्तान में काम करने वाले खुफिया एजेंट की मदद के लिए आवाज उठाने वाले इस चैनल को कभी टीईटी के आंदोलनकारियों ने, तो कभी सपा विधायक की गुड़ाई के विरोध में खड़े डॉक्टरों ने अपना प्रवक्ता माना और अभूतपूर्व प्यार और सम्मान दिया। ऐसे ही प्रदेश सरकार में काफी दिनों से लंबित पड़ी अपनी मांगो को ले कर जब उत्तर प्रदेश सयुंक्त राज्य कर्मचारी संघ ने आंदोलन शुरू किया तो उनके सबसे करीब था, सिर्फ और सिर्फ समाचार प्लस। दिन-रात आंदोलन कर रहे कर्मचारियो के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले इस चैनल को मांगे पूरे होने के बाद सयुंक्त राज्य कर्मचारी संघ ने दिल से धन्यवाद दिया।

संघ ने एक मीडिया सम्मान समारोह का आयोजन कर चैनल के लिए रिपोर्टिंग करने वाली टीम के अमितेश श्रीवास्तव और विशाल वर्मा को सम्मानित किया।
 

भड़ास की खबर पर चंदौली के पत्रकार आनंद सिंह की प्रतिक्रिया

भड़ास4मीडियो पर प्रकाशित ख़बर 'बसपा प्रत्‍याशी ने चंदौली के पत्रकारों को बांटी नगदी!' पर चंदौली के पत्रकार आनंद सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया भेजी है। हम उनकी प्रतिक्रिया का सम्मान करते हुए उसे भड़ास पर प्रकाशित कर रहे हैं। भड़ास की शुरू से ही पॉलिसी रही है कि आने वाली प्रतिक्रियाओं को ससम्मान प्रकाशित किया जाए जिससे कि पाठकों तक सभी पक्षों की बात पहुंच सके।

 

भड़ास4मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने के लिए आप हमें bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं या नीचे बॉक्स में कमेंट कर सकते हैं।

न्यूज एक्सप्रेस की तकीनीकी टीम के संवाद को उर्मिलेश से नहीं जोड़ा जाना चाहिए

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव द्वारा लिखित और भड़ास पर प्रकाशित खबर ''न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस में उर्मिलेश को थप्‍पड़ लगाने की इच्‍छा ऑन एयर कैसे हुई? (देखें वीडियो)'' को लेकर न्यूज एक्सप्रेस चैनल से जुड़े सोर्सेज ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. इनका कहना है कि जिसे गाली बताया जा रहा है, वो दरअसल फ्लोर मैनेजर ने पीसीआर को बोला था जो बैकग्राउंड में सुनाई पड़ गया था. फ्लोर मैनेजर का पीसीआर को यह निर्देश स्टूडियो में goof up के लिए था. बस गड़बड़ ये हुआ कि ये आन एयर चला गया. ये तकनीकी इरर है. इसको मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए.

चैनल से जुड़े सूत्र का कहना है कि उर्मिलेश तो चैनल से बहुत खुश होकर गए. जैसा दुष्प्रचारित किया जा रहा है, वैसा कुछ नहीं हुआ. बहस सतीश जी और उर्मिलेश जी के बीच हुई और ये लाइव डिबेट, बहसों का हिस्सा होता है जिसमें हर कोई अपना मत, अपना विचार रखने के लिए स्वतंत्र होता है. दोनों ही वरिष्ठ पत्रकारों को आन एयर अपनी अपनी बात रखने बोलने का मौका दिया गया. बीच में जिसे थप्पड़ बताया जा रहा है वह इन पत्रकारों से जुड़ा कोई मसला नहीं बल्कि तकनीक मसला है. ये फ्लोर मैनेजर का पीसीआर को स्टूडियो में कुछ चीजों को दुरुस्त करने के लिए दिया गया निर्देश था जो गलती से आन एयर हो गया. ऐसी गल्तियां न्यूज चैनलों में कभी कभार हो जाया करती हैं.  
 

सतीश के. सिंह, कादंबिनी शर्मा और मेहराज दुबे की दूरदर्शन में नियुक्ति!

खबर है कि सतीश के सिंह, कादंबिनी शर्मा और मेहराज दुबे अब सरकारी नौकरी करने वाले हैं. इन तीनों की तैनाती दूरदर्शन में हो गई है. सतीश के सिंह का पद नेशनल चैनल एडवाइजर का है. मेहराज दुबे को डीडी के रीजनल चैनल्स का एडवाइजर बनाया गया है. ऐसा ही कोई बड़ा पद कादंबिनी शर्मा को भी दिया गया है. कादंबिनी और मेहराज अभी एनडीटीवी में कार्यरत हैं. माना जा रहा है कि ये लोग जल्द एनडीटीवी छोड़कर दूरदर्शन को अपनी सेवाएं देंगे.

उधर, इन नियुक्तियों पर कुछ लोगों ने जातिवाद का आरोप लगाया है. ये नियुक्तियां दूरदर्शन महानिदेशक त्रिपुरारी शरण और सूचना सचिव रंजन ठाकुर के नेतृत्व में की गई हैं. ये दोनों ही भूमिहार हैं. नियुक्त हुए तीन में से दो लोग सतीश के सिंह व कादंबिनी शर्मा भी भूमिहार हैं. यह भी चर्चा है कि अजीत राय को दृश्यांतर मैग्जीन के अलावा दूरदर्शन में भी एक बड़ा पद सवा लाख रुपये करीब का दे दिया गया है. अजीत राय भी भूमिहार हैं और त्रिपुरारी शरण के दुलारे माने जाते हैं. इन नियुक्तियों को लेकर मीडिया में कुछ लोगों ने सवाल किया है कि आखिर क्या अब जातिवाद ही पैमाना रह गया है नियुक्तियों के मामले में?

भड़ास को भेजे एक मेल में कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि मीडिया में ब्राह्मणवाद के बाद अब कट्टर भूमिहार वाद का दौर शुरू हो चुका है. न्यूज24 और न्यूज नेशन चैनलों के बाद अब दूरदर्शन भूमिहारों के लिए सबसे बड़ा सेंटर बन चुका है. दलितों, पिछड़ों और अन्य गरीब तबकों, जातियों को मीडिया के मठाधीश अपने यहां बिलकुल स्थान नहीं दे रहे हैं.

आप अपनी राय, टिप्पणी, प्रतिक्रिया भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

हाकी-डंडो, कट्टों से लड़ने वाले डॉक्टर चार लाठी खाए तो पढ़ाकू बच्चे बन गए

ये चित्र, फोटो-पत्रकार अभिनव राजन चतुर्वेदी का है, दैनिक जागरण,जनसंदेश से लेकर कई अखबारो में काम कर चुके हैं। इन्हें और इनके साथियों को अब से दो साल पहले, सितम्बर 2012 में गोरखपुर मेडिकल कालेज के नवोदित डाक्टरों ने मार-मार कर मरणासन्न कर दिया था। कानपुर मेडिकल कालेज में हुए बवाल के बाद डाक्टरों के आंदोलन का जो असर है, उसकी फोटो फेसबुक और अन्य माध्यमों में देख कर अब से दो साल पहले जिला अस्पताल के बेड पर लगभग बेसुध पड़े अभिनव का चेहरा मेरे दिमाग में घूम गया। सवाल ये उठता है कि कहाँ से आ जाते है हर छोटे से हूं-तूं के बाद झुण्ड के झुण्ड डॉक्टर लड़ने मारने को और वो भी हाकी-डंडो और कट्टो से लैस होकर। कितनी असुरक्षा की भावना इनमें होती है कि हर बात पर ये उग्र और आंदोलित हो जाते है।

जब ये पत्रकारों (गोरखपुर में), पुलिस और सत्ताधारी नेताओ (कानपुर में) से इतनी बुरी तरह उलझते है तो आम लोगों से ये कैसे बात करते होंगे। कानपुर में क्या हुआ, ये कोई नही जानता लेकिन गोरखपुर से लेकर पूरे प्रदेश और देश में लाखों मरीजों की जान पर बन आयी है। डॉक्टरों को इससे कोई मतलब नहीं, ये लड़ेंगे, बदला लेंगे। बदला न मिलने तक सबको बिना इलाज़ के मार देंगे। अरे अब से दो साल पहले ही गोरखपुर में भी यदि कोई यशस्वी यादव एसएसपी होता तो स्पष्ट सन्देश दे देता, क्या कसूर था उन पत्रकारो का, सिर्फ फोटो खीचने से मना करने पर न मानने पर जान से मार दोगे क्या? ये भगवान् बनते है, संवेदना तो है नही, चार लाठी खाए तो पढ़ाकू बच्चे बन गए। आज गोरखपुर में भव्य आंदोलन-प्रदर्शन हुआ, पर किसी को इससे मतलब नही कि किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का बाप इलाज़ के बगैर मर गए तो उसका जिम्मेदार कौन होगा। मरीजों से शोषक नही चूषक की तरह व्यवहार करेंगे, संवेदन-शून्य हो कर मरीजो और उनके परिजनो से व्यवहार करेंगे, हर किसी से उलझेंगे लेकिन जब दांव उल्टा पड़ेगा तो इन्सान होने की दुहाई देंगे। अरे अगर वास्तव में असली डॉक्टर हो तो एक स्वर में कहो हर मरीज का इलाज़ होगा, बेहतरीन होगा और इंसानो की लड़ाई में इंसान नही पिसेगा।

 

लेखक अजित कुमार राय से संपर्क उनके मो. 9450151999, 9807206652 या ईमेल ajitrai17@gmail.com पर किया जा सकता है।

एनडी तिवारी की तरह भूपिंदर सिंह हुड्डा की भी है नाजायज औलाद!

मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर एक पत्नी के रहते दूसरी शादी करने और दूसरी शादी से रजत नाम का एक 20 वर्षीय बेटा होने का दावा किया गया है। एनडी तिवारी ने तो आखिरकार अपने जैविक पुत्र को अपना नाम दे दिया तो क्या हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा भी ऐसा कुछ करेंगे। जैसे एनडी तिवारी पितृत्व विवाद में सालों उलझे रहे वैसे ही हुड्डा भी ऐसे ही मामले में फंसते नजर आ रहे हैं।

हुड्डा पर आरोप लगा है कि उन्होंने गैरकानूनी रूप से दूसरी शादी की है और उनका एक बेटा भी है। इसके बाद विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोक दल (इनेलो) के नेताओं ने हुड्डा से इस्तीफा देने की मांग की। आईएनएलडी के जनरल सेक्रेटरी अभय सिंह चौटाला ने कहा कि हुड्डा ने 1992 में देहरादून की महिला से शादी की जबकि उससे पहले ही उनकी शादी हो चुकी थी। चौटाला की मांग है कि इस मामले की जांच कराई जाए और हुड्डा को उनके पद से हटाया जाए ताकि निष्पक्ष जांच हो सके।

हरियाणा के मुख्य विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोकदल के वरिष्ठ नेता एवं ऐलनाबाद विधायक अभय सिंह चौटाला ने राज्य के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने 11 नवम्बर 1992 को नई दिल्ली में दूसरी शादी रचाई थी और उनकी यह पत्नी हुड्डा से उनके बेटे रजत को पितृत्व अधिकार दिलाने के लिए अदालत में गई है। उन्होंने कहा है कि यह उनकी दूसरी शादी है जो बिल्कुल गैरकानूनी तरीके से की गई।

यह आरोप इंडियन नेशनल लोकदल के पार्टी अध्यक्ष अशोक अरोड़ा ने भी कल पत्रकार वार्ता के दौरान लगाया। दोनों नेताओं ने कथित रूप से संबन्धित महिला के देहरादून की अदालत में पेश शपथ पत्र को आधार बनाते हुए यह मामला उठाया। दोनों का आरोप है कि 1988-89 में कांग्रेस विपक्ष में थी, तब हुड्डा ने युवा कांग्रेस कार्यकर्ता शशि से कथित तौर पर कहा कि वह अपनी पत्नी से तलाक लेने जा रहे हैं। उन्होंने 11 नवम्बर 1992 को दिल्ली में शशि से शादी कर ली कहा गया है कि वर्ष 1994 में शशि से पुत्र रजत का जन्म हुआ। आरोप है कि बाद में शशि को जान से मारने की धमकी दी गई।

शशि अजमेर चली गई और अब देहरादून लौट आई हैं, जहां उन्होंने प्रधान न्यायाधीश प्रथम की अदालत में 9 अक्टूबर 2013 को शपथपत्र पेश कर अपने पुत्र को पितृत्व का अधिकार दिलाए जाने की मांग की है। किए गए दावों के मुताबिक 11 नवंबर, 1992 को भूपेंद्र सिंह ने दिल्ली में शशि के साथ बिरादरी के रीति-रिवाज के अनुसार विवाह कर लिया। शशि ने अपनी शिकायत में बताया कि 1 फरवरी, 1994 को भूपेंद्र सिंह से शशि को एक बेटा हुआ जिसका नाम रजत है। महिला शशि की ओर से भूपेंद्र सिंह पर और भी कई आरोप लगाए गए हैं।

सोमवार को हरियाणा विधानसभा में शून्यकाल शुरू होते ही आईएनएलडी के रामपाल माजरा ने यह मामला उठाया, लेकिन स्पीकर कुलदीप शर्मा ने इसे सदन की कार्यवाही से निकाल दिया। दूसरी तरफ, हुड्डा ने इस मामले पर कुछ भी नहीं कहा है, लेकिन उनके समर्थकों की ओर से इसे चरित्र हनन का मामला बताया गया है। अभय चौटाला ने दावा किया कि उनके पास इसका अदालती हलफनामा है, जिसमें देहरादून के प्रेम नगर की रहने वाली शशि ने 13 दिसंबर 2013 को देहरादून फैमिली कोर्ट में 11 नवंबर 1992 को हुए उनके विवाह को बहाल किए जाने की गुहार लगाई है।

चौटाला ने बताया कि शपथ पत्र के मुताबिक, '1988-89 में शशि युवा कांग्रेस की सदस्य थीं और भूपेंद्र सिंह हुड्डा उस समय विपक्षी पार्टी में एक वरिष्ठ नेता थे। भूपेंद्र सिंह ने शशि को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और दोनों का मिलना-जुलना शुरू हो गया। भूपेंद्र सिंह ने विवाह करने का वायदा करके शशि को अपने प्रभाव में लिया और नई दिल्ली के जनपथ होटल में उससे संबंध बनाए। बाद में शशि को पता चला कि भूपेंद्र सिंह शादीशुदा हैं और उनकी पत्नी आशा जीवित है और एक बेटा भी है।

शशि ने अदालत में दायर मामले में कहा कि जब उसने भूपेंद्र सिंह से इस धोखाधड़ी के संबंध में बात की तो राजनीतिक भविष्य का वास्ता देकर और उन्होंने कहा कि आशा से उनका तलाक होने वाला है। उसके बाद भूपेंद्र सिंह ने घरवालों पर दबाव डालकर शशि का विवाह किसी अन्य व्यक्ति के साथ करा दिया, पर वह शादी नहीं चली।

शशि ने अपनी शिकायत में कहा कि भूपेंद्र सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं कर सकता। 11 नवंबर, 1992 को भूपेंद्र सिंह ने दिल्ली में शशि के साथ बिरादरी के रीति-रिवाज के अनुसार विवाह कर लिया। शशि ने अपनी शिकायत में बताया कि 1 फरवरी, 1994 को भूपेंद्र सिंह से शशि को एक बेटा हुआ, जिसका नाम रजत है। याचिका में शशि ने अपना मौजूदा पता प्रेम नगर, देहरादून का दिया है।

अभय सिंह चौटाला ने कहा कि वैसे वह किसी के पारिवारिक मामलों में दखल नहीं देते लेकिन एक विधायक के नाते उनके पास ये दस्तावेज आए हैं, यह बेहद गंभीर मामला है। उन्होंने मांग की कि कांग्रेस तुरंत मुख्यमंत्री हुड्डा को पद से हटाए और सच्चाई सामने लाने के लिए डीएनए टेस्ट कराए।

इन आरोपों का मुख्यमंत्री ने सीधे जवाब नहीं दिया, लेकिन उनके समर्थक और हरियाणा विधानसभा के पूर्व स्पीकर डॉ. रघुवीर सिंह कादियान और विधायक भारत भूषण बत्तरा ने प्रेस गैलरी में पत्रकारों को बताया कि यह सीधे-सीधे मुख्यमंत्री का चरित्र हनन है। महिला ने देहरादून की अदालत में 17 दिसंबर, 2013 को हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत अर्जी दायर की थी। अदालत ने सुनवाई के लिए 24 जनवरी, 2014 तय कर दी। पर इससे पहले ही महिला ने अदालत में पेश होकर शपथ पत्र देकर अर्जी वापस लेने का आग्रह किया। इसे अदालत ने मंजूर करते हुए अर्जी निरस्त कर दी थी। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि महिला विपक्ष के इशारे पर काम कर रही है।


संबंधित खबर…

कांग्रेस के भोगी नेताओं एनडी, सुरजेवाला, सिंघवी की लिस्ट में अब हुड्डा का भी नाम!

REQUEST TO GRACE THE LAUNCH OF MY FORTHCOMING BOOK “THE PRIME MINISTER: DISCOURSES IN INDIAN POLITY”

Dear Sir/Ma’am, I am delighted to inform you that I have written a book called “The Prime Minister: Discourses in Indian Polity” in the backdrop of evolution of Political system and the Prime Minister's Office (PMO) in India. The canvas of the book ranges from the debates of the Constituent Assembly to debates in India's present day Parliament to several contemporary issues involving governance of the Indian state.

As you can very well imagine it’s a high quality research work done on the Indian polity. The book is divided into five chapters; a comprehensive analysis of political thoughts and contemporary issues which the Indian political system are facing. I have also examined the debate over the suitability of Presidential and Prime Ministerial form of government given India's complexities such as diversity, ethnicity, size and scale.

I would like to also take this opportunity to mention that Shri Sushil Kumar Shinde, Hon'ble Minister of Home Affairs, Mr.Shivraj Patil, Hon’ble Governor, Punjab, Mr.Ravi Shankar Prasad, Deputy Leader of Opposition, Rajya Sabha, and Prof.Dinesh Singh, Vice Chancellor, Delhi University have generously agreed to be a part of this book launch ceremony on the 11th of March 2014.  The programme details are as follows:

Date: Tuesday, March 11, 2014

Time: 4.30 pm onwards

Venue: Auditorium, Teen Murti Bhavan, New Delhi

I would be very happy if you could agree to join me on the occasion.

Greatly look forward to getting your consent.

With best wishes

Yours sincerely

Dr. Anil Singh
Executive Editor
TV Today (Aaj Tak)
Mobile:9811157975
Fax: 0120-4807204
Email: anil.singh@aajtak.com

डीएम साहब ने पुचकारा तो मान गए औरंगाबाद के रूठे पत्रकार

औरंगाबाद जिले के पत्रकारों का हाल भी अजीब है, पहले तो आंदोलन करते है, जिलाधिकारी को अल्टीमेटम देते है, फिर कब मान जाते है पता ही नहीं चलता। करीब एक माह पूर्व औरंगाबाद के पत्रकारों ने सूचना भवन में एक आपात बैठक बुलाई थी। बैठक में हिंदुस्तान अखबार को छोड़कर बाकी सभी अखबारो एवं इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। सभी ने एक मत से कहा की औरंगाबाद एसडीओ राजीव रौशन के विदाई समारोह में उन्हें बुलाया नहीं गया और जिलाधिकारी खबरों को लेकर पूरी जानकारी नहीं देते है इसलिए हम लोग खबरों का बहिष्कार करेंगे और जिलाधिकारी के नाम और फ़ोटो नहीं छापेंगे।

उसके बाद लगातार कई बैठकें हुयी और जिला एवं प्रखंड स्तर के पत्रकारों से भी कहा गया की प्रशासन की खबरों का बहिष्कार करें और साथ-साथ चलें। बैठके में संघ बनाने से लेकर कई मुद्दो पर चर्चा हुई। यहाँ तक हुआ की पत्रकारों ने जिला सुचना संपर्क पदाधिकारी बिरेन्द्र शुक्ल के विदाई समारोह का बहिष्कार किया। लेकिन नतीजा रहा वही ढाक के तीन पात। कुछ दिनों पूर्व हसपुरा में हुई 6 मौतों को लेकर डीएम ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स बुलायी तो पत्रकार दौड़ पड़े और जिलाधिकारी के सभाकक्ष में उपस्थित हो गए। जिलाधिकारी ने प्रेस कांफ्रेंस शुरु की तो पत्रकार उनकी बातो को नोट करने लगे। हद तो तब हो गई जब पत्रकारों के सामने नए प्रभारी डीपीआरओ राजेश कुमार ने कहा की सर पत्रकारों की भी कुछ समस्याए हैं, तो पत्रकार अपनी समस्या गिनाने लगे। जिलाधिकारी ने आश्वासन दिया कि पत्रकारों को पूरी जानकारी दी जायेगी। इस पर पत्रकार खुश हो गए और जिलाधिकारी के नाम और फ़ोटो दोनों छापना शुरू कर दिया।

मलाल इस बात का है की कल तक पत्रकार कोई भी निर्णय बैठको में करने का बात कहते थे लेकिन बिना बैठके के नाम और फ़ोटो छापना पत्रकारो के निर्णय और आंदोलन पर सवाल खड़ा करता है।  

धीरज पाण्डेय
औरंगाबाद(बिहार)
मो. 9931075733, 9122937999
dhirajpandey66@gmail.com

महाराष्ट्र में भी खूब ‘सुयश’ रहा है आईपीएस यशस्वी यादव का

जितेंद्र प्रताप सिंह jp20024@gmail.com ने भड़ास को मेल करके सूचित किया है कि बिना बात डाक्टरों और मीडियाकर्मियों की हड्डियां तोड़ने वाले कानपुर के एसएसपी यशस्वी यादव का 'सुयश' महाराष्ट्र में भी खूब रहा है. बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि आज जो यशस्वी यादव कानपुर समेत पूरे देश में विवाद का विषय बना हुआ है, वो असल में महाराष्ट्र कैडर का आईपीएस अधिकारी है.

इन महोदय पर पहले भी कई गंभीर आरोप लग चुके हैं. महिला पुलिस कांस्टेबल ने यौन शोषण का आरोप कई पुलिस अफसरों पर लगाया था और यशस्वी यादव से न्याय की गुहार लगाई थी लेकिन ये जनाब चुप्पी साधे रहे और अपने अधीनस्थ को संरक्षित करते रहे.

जब ये कोल्हापुर में पोस्टेड थे तब महिला पुलिस कांस्टेबलों ने डिपार्टमेंट के अफसरों पर यौन शोषण का आरोप लगाकर पूरे भारत में सनसनी मचा दी थी. केस दर्ज हुआ और अफसरों को पुलिस सेवा से बर्खास्त करने की मांग तक होने लगी. तब महाराष्ट्र सरकार ने यशस्वी यादव को लापरवाह मानते हुए तबादला कर दंडित किया था.

बाद में किस्मत ने अचानक पलटी खाई और यूपी में सपा का शासन आ गया. अखिलेश यादव से अपनी नजदीकी के बल पर यशस्वी यादव का राष्ट्रपति से मिलकर कैडर बदलवाया गया और कानपुर के कप्तान पद पर ताजपोशी कराई गई.

हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर और उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है…

Kolhapur sex scandal: RR cracks down on top cops

HT Correspondent, Hindustan Times 

Mumbai, April 29, 2011

Home Minister RR Patil has transferred superintendent of police (SP) of Kolhapur, Yashaswi Yadav, for being unable to keep an eye on officers involved in the sex scandal in which some women police constables have accused their seniors of rape. Deputy superintendent of police (home) Vijay Parkale and inspector Dnyaneshwar Mundhe have been suspended.

“We have received the interim report by additional superintendent of police, Nashik, Maithili Jha and have acted on it.

The case will be passed on to Pune police chief Meeran Borwankar. The charge sheet will be filed after that and a report will be out in the next 10 days,” Patil said on Friday.

Police constable Yuvraj Kamble, the main accused in the case, charged with raping a woman trainee police constable, has already been arrested and suspended.

Kamble, who was training new recruits, had allegedly invited one of the women constables to his house and promised to give her the question paper of the exam to be held the next morning. When she went to his house, he allegedly raped her.

The scandal came to light when a routine medical test of the women police recruits revealed that two of them were pregnant.

“Tests were performed on 71 girls and one of the two found pregnant was unmarried,” Patil said.

Following this, Kamble was arrested. The woman constable, who was found pregnant, lodged a complaint with the Shahpuri police station of the Kolhapur police unit.

After that, at least 11 women constables – all fresh recruits – alleged that they, too, had been sexually exploited by police instructors when they were undergoing training at Kolhapur’s police training school.

The newly recruited female constables were put through a medical test as it had been decided to send them for training to the police academy in Nagpur.

The test is mandatory for constables before they are sent for such programmes.

साभार- हिंदुस्तान टाइम्स

ये है उपरोक्त खबर का लिंक…

http://www.hindustantimes.com/india-news/kolhapur-sex-scandal-rr-cracks-down-on-top-cops/article1-691333.aspx


एनडीटीवी डाट काम में प्रकाशित खबर और उसका लिंक यूं है…

New cop sex abuse case in Kolhapur

May 25, 2011, Pune:  A Month after a police sex scandal rocked Kolhapur following a woman constable's allegation of rape at the training centre there, a fresh case of sexual harassment has been reported in Chandgad taluka of the district.

In the latest case, a woman constable has accused her immediate senior inspector of sexually harassing her.

Human rights activists say the victim had even written a letter of complaint to the Home Minister R R Patil and the then district superintendent of police after the incident occurred four months ago, but the officials took no note of it.

It was only after protests by Chandgad taluka human right activists against Police Inspector D D Jadhav for the last one month that the accused was asked to hand over his charge to his subordinate officer.

Additional SP Sanjaysinh Yenpure contacted the office of the Director General of Police seeking permission for the immediate transfer of PI Jadhav.

According to sources, Jadhav had allegedly ordered the woman constable to come to his residence in Police Colony in Chandgad at night. When the constable demanded to know the reason behind his order, the officer had allegedly told her: "Being in the force for long, don't you understand why I am calling you to my residence at night?"

Yenpure ruled out registering an offence against the officer. "Jadhav was insisting that the complainant should be in constant touch with him and had also called her to his residence after working hours and had passed lewd remarks. However, a molestation case cannot be registered in this matter," he said.

Human rights activists said the senior officer's behaviour had so shocked the woman constable that she went on to seek justice from the then Kolhapur SP Yashasvi Yadav and Home Minister R R Patil. But as even after four months no action was taken against the officer, she raised the matter with the State Human Rights Commission.

According to Human Right Protection and Civil Liberty activists from Chandgad, the officer was sent on compulsory leave on Friday after being asked to hand over his charge to a subordinate officer. Advocate Santosh Malvikar, a human rights activist, said, "Since no action was taken even after four months of this incident in spite of the victim having written to Home Minister R R Patil and Yashasvi Yadav, we demanded action against the guilty officer by April 29. When even after that nothing happened, we finally went on a hunger strike and even conducted a jail bharo andolan, demanding action against the officer. As an impact of these protests, action was finally taken against the accused police inspector on Friday."

साभार- एनडीटीवी

ये है उपरोक्त खबर का लिंक…

http://www.ndtv.com/article/cities/new-cop-sex-abuse-case-in-kolhapur-108079


संबंधित खबर…

कानपुर कांड : हाईकोर्ट ने एसएसपी यशस्वी यादव को तत्काल हटाने को कहा, न्यायिक जांच के आदेश

न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस में उर्मिलेश को थप्‍पड़ लगाने की इच्‍छा ऑन एयर कैसे हुई? (देखें वीडियो)

Abhishek Srivastava :  विनोद कापड़ी और सतीश के. सिंह के राज में न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस पर पैनल पर बैठे वक्‍ताओं के बारे में क्‍या कहा जाता है, जानना हो तो इस वीडियो को देखें और ठीक 4:39 मिनट पर वरिष्‍ठ पत्रकार Urmilesh जी की आवाज़़ के बैकग्राउंड में अचानक उभरी एक और आवाज़ को सुनें।

लिंक ये है…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/784/media-world/urmilesh-ko-thappad-ki-dhamki.html

करीब घंटा भर पहले हुई इस परिचर्चा में उर्मिलेश जी यूपीए सरकार के किए न्‍यूक्लियर सौदे व मल्‍टीब्रांड रीटेल में एफडीआइ पर सवाल उठा रहे थे और कांग्रेस की नाकामियां गिनवा रहे थे। अचानक इस वीडियो के 4:39 पर पहुंचते ही एक आवाज़ पीछे से आती है, ''ये कौन है यार… पीसीआर में इसको जा के बोलो थप्‍पड़ लगाए।''

यह तकनीकी दुर्घटना थी या जानबूझ कर ऐसा किया गया, इसे समझना हो तो 7:25 पर सतीश के.सिंह का उलझन में सिर खुजलाने के बाद विनोद कापड़ी से निजी संवाद देखें जिसमें वे कहते हैं, ''विनोद, लेकिन मुझे एक लाइन तो बोलना ही पड़ेगा, इन्‍होंने मेरे ऊपर टिप्‍पणी की है'', और फिर वे चंदन यादव को टोकते हुए उर्मिलेश जी को संबोधित करते हुए कहते हैं, ''मैं बार-बार यह कहना चाह रहा हूं कि जर्नलिस्‍ट को जजमेंटल नहीं होना चाहिए… आपकी राय हो सकती है लेकिन थोड़ा संतुलित रहना चाहिए…।''

परिचर्चा में संतुलन बैठाने के नाम पर क्‍या किसी मुखर वक्‍ता को ''थप्‍पड़ लगाने'' की बात अब होगी? दर्शकों की फि़क्र करने का दावा करने वाला न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस क्‍या इंडिया न्‍यूज़ बन जाएगा जहां वाकई एक वक्‍ता दूसरे को थप्‍पड़ जड़ चुका है? और क्‍या जिंदगी भर पत्रकारिता के नाम पर लंठई करने वाले न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस के संपादकद्वय अब यह तय करेंगे कि उर्मिलेश जैसे वेटरन जर्नलिस्‍ट को क्‍या कहना चाहिए और क्‍या नहीं? ऐसे में तो कोई भी आत्‍मसम्‍मान वाला पत्रकार न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस पर जाने से ही कल को परहेज़ करेगा।

कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके सरोकारी और जनपक्षधर पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त आरोपों पर न्यूज एक्सप्रेस चैनल से जुड़े सोर्सेज का कहना है कि जिसे गाली बताया जा रहा है, वो दरअसल फ्लोर मैनेजर ने पीसीआर को बोला था जो बैकग्राउंड