गाजीपुर के पत्रकारों ने पेड न्यूज से विरत रहने की खाई कसम

जिला प्रशासन ने गाजीपुर के पत्रकारों को दिलाई पेडन्यूज से विरत रहने की शपथ। तमाम कवायदों के बावजूद पेडन्यूज पर लगाम लगा पाने में खुद को असफल देख जिला प्रशासन ने पत्रकारों को पेड न्यूज से विरत रहने की प्रतिबद्धता हेतु शपथ दिलाई। जिला मुख्यालय स्थित रायफल क्लब में आयोजित इस शपथ समारोह में जहां जिले के तमाम पत्रकार शामिल रहे वहीं कई वरिष्ठ पत्रकारों ने खुद को इस पूरे कार्यक्रम से दूर रखा।

जनसंदेश टाइम्‍स गाजीपुर में भी नही टिक पाए राजकमल

जनसंदेश टाइम्स गाजीपुर के ब्यूरोचीफ समेत कई कर्मचारियों ने दिया इस्तीफा। लम्बे समय से अनुपस्थित चल रहे राजकमल राय के स्थान पर अविनाश प्रधान को पुनः ब्यूरो प्रमुख का कार्यभार सौंपा गया। इसके पहले अविनाश प्रधान को हटाकर राजकमल राय को ब्यूरोचीफ बनाया गया था। किन्तु इनकी कार्यप्रणाली से नाराज कई जनप्रतिनिधियों की मंशानुरूप संस्थान से दिये जा रहे अत्याधिक दबाव के चलते राजकमल राय अपने कई साथियों के साथ जनसंदेश टाइम्स से किनारा कर लिया। जनसंदेश टाइम्स छोड़ने के बाद ये लोग किसी गाजीपुरखबरडाटकाम नामक न्यूज वेबसाईट को लांच करने में जुटे है। राजकमल राय बहुत लम्बे समय तक दैनिक जागरण से जुड़े रहे हैं।

सोनभद्र के जिला निर्वाचन अधिकारी की मुख्य निर्वाचन आयुक्त से शिकायत

पेड न्यूज पर अंकुश लगाने की भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग की कोशिश पर सोनभद्र के जिला निर्वाचन अधिकारी पानी फेर रहे हैं। चुनाव आयोग शिकायत का संज्ञान ले चुका है लेकिन जिला निर्वाचन अधिकारी अखबार मालिक को पेड न्यूज मॉनिटरिंग कमिटी के सदस्य पद से हटाने के लिए तैयार नहीं हैं जबकि यह अखबार ना ही सोनभद्र से प्रकाशित होता है और ना ही इसका मालिक और संपादक सोनभद्र जिले का पत्रकार है। सोनभद्र में ‘पेड न्यूज मॉनिटरिंग कमेटी’ के सदस्य के रूप में स्वंतत्र नागरिक/पत्रकार की श्रेणी में योग्य व्यक्ति का चयन नहीं करने की शिकायत पर जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा उचित कार्रवाई नहीं किए जाने के संबंध में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिखा गया पत्रः

प्रेषक,

शिव दास प्रजापति,                                                                                                                   पत्रकार,
ग्राम-तिनताली, पोस्ट- तेन्दू,
जिला- सोनभद्र, राज्य- उत्तर प्रदेश-231216
मोबाईल- 9198383943/9910410365
ई-मेलः thepublicleader@gmail.com  

सेवा में,
मुख्य निर्वाचन आयुक्त

भारत निर्वाचन आयोग, निर्वाचन सदन,
अशोका रोड, नई दिल्ली-110001

विषयः सोनभद्र में ‘पेड न्यूज मॉनिटरिंग कमेटी’ के सदस्य के रूप में स्वंतत्र नागरिक/पत्रकार की श्रेणी में योग्य व्यक्ति का चयन नहीं करने की शिकायत पर जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा उचित कार्रवाई नहीं किए जाने के संबंध में।

महोदय,
             अवगत
कराना है कि भारत निर्वाचन आयोग और भारतीय प्रेस परिषद के निर्देशानुसार लोकसभा चुनाव-2014 के दौरान सभी जिलों में ‘मीडिया सर्टिफिकेशन ऐण्ड मॉनिटरिंग कमिटी ऑन सर्टिफिकेशन ऐण्ड पेड न्यूज (एमसीएमसी)’ का गठन किया जाना अनिवार्य है। इसके गठन के संदर्भ में भारत निर्वाचन आयोग ने 26 फरवरी 2014 को पत्रांक संख्या-491/पैड न्यूज/2014 के माध्यम सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी किया था लेकिन जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने अपने यहां इस कमिटी का गठन 17 फरवरी, 2014 को ही कर दिया था। भारत निर्वाचन आयोग के पत्रांक संख्या-491/पैड न्यूज/2014 के मुताबिक पेड न्यूज की जांच के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमिटी (एमसीएमसी) का गठन किया जाएगा जिसमें डीपीआरओ/जिला सूचना अधिकारी/समकक्ष सदस्य सचिव होंगे (संलग्नक-1)। इसके अलावा कमिटी में एआरओ, जो एसडीएम स्तर के नीचे न हों, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का एक अधिकारी तथा स्वतंत्र नागरिक/पत्रकार बतौर सदस्य शामिल होंगे। अगर भारतीय प्रेस परिषद ने पत्रकार की संस्तुति नहीं की है तो जिला निर्वाचन अधिकारी जिले के किसी पत्रकार अथवा स्वतंत्र नागरिक को बतौर सदस्य नामित कर सकते हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने उक्त आदेश का उल्लंघन करते हुए एमसीएमसी कमिटी का गठन उप जिला निर्वाचन अधिकारी मनी लाल यादव की अध्यक्षता में गठित कर दिया जबकि वह प्रभारी जिला सूचना अधिकारी के रूप में भी कार्यरत हैं। इस वजह से कमिटी में सदस्य सचिव का पद ही नहीं है। इतना ही नहीं जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार पांच सदस्यीय कमिटी की जगह छह सदस्यीय कमिटी का गठन कर दिया जिसमें रॉबर्ट्सगंज तहसील के उप-जिलाधिकारी राजेंद्र प्रसाद तिवारी, आकाशवाणी ओबरा के कार्यक्रम अधिकारी/कार्यक्रम प्रमुख, सहायक मनोरंजन कर आयुक्त रामजीत पांडेय, हिन्दी न्यायाधीश, सोनभद्र के संपादक (वास्तव में हिन्दी दैनिक ‘न्यायाधीश’ का प्रकाशन सोनभद्र जिले से नहीं होता है। इस अखबार का प्रकाशन इलाहाबाद से होता है और इसके स्वामी, मुद्रक, प्रकाशक और संपादक रघुवीर चंद जिंदल हैं। वह सोनभद्र में संपादक/जिला प्रतिनिधि/तहसील प्रतिनिधि/मान्यता प्राप्त पत्रकार आदि के तौर पर एक पत्रकार के रूप में भी पंजीकृत नहीं हैं।), पी0ओ0 डूडा, सोनभद्र बी.के. निगम बतौर सदस्य चयनित किए गए हैं (संलग्नक-2)। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने एमसीएमसी में सदस्य के रूप में चयनित किए जाने वाले स्वतंत्र नागरिक/पत्रकार श्रेणी में भारतीय प्रेस परिषद और भारत निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज कर दिया। भारतीय प्रेस परिषद ने 7 मार्च 2014 को जारी अपने प्रेस रिलीज संख्या-पीआर/15/13-14-पीसीआई में पेड न्यूज और संपादकीय नीति को स्पष्ट किया है कि संपादकीय और प्रबंधकीय विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों का स्पष्ट विभाजन होना चाहिए। साथ ही संपादक की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए (संलग्नक-3)। इसके बावजूद जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने पत्रकार/स्वतंत्र नागरिक की श्रेणी में इलाहाबाद से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘न्यायाधीश’ के स्वामी, मुद्रक, प्रकाशक और संपादक रघुवीर चंद जिंदल को सदस्य के रूप में चयनित किया। संपादकीय सामग्रियों और अखबार के प्रतियों के प्रसार को लेकर रघुवीर चंद जिंदल हमेशा सवालों के घेरे में रहे हैं। इसके लिए एक महीने में प्रकाशित उनके अखबार की प्रतियों का अवलोकन भी किया जा सकता है। इसके अलावा रघुवीर चंद जिंदल सोनभद्र में बतौर पत्रकार कार्य भी नहीं करते हैं। इन हालातों में उनका चयन भारतीय प्रेस परिषद के दिशानिर्देशों का खुलेआम उल्लंघन है। इस संबंध में मैंने 22 मार्च 2014 को ई-मेल के माध्यम से जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तर प्रदेश, मुख्य चुनाव आयुक्त, नई दिल्ली आदि को अवगत कराया था (संलग्नक-4)। इसका संज्ञान लेते हुए मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तर प्रदेश ने जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र को मामले की जांच करने और सही व्यक्ति का चयन करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे लेकिन अभी तक जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र ने रघुवीर चंद जिंदल को एमसीएमसी से नहीं हटाया है। इसके लिए वह विधानसभा चुनाव-2012 में एमसीएमसी के गठन को आधार बना रहे हैं जबकि प्रार्थी ने 10 फरवरी, 2012 को भी रघुवीर चंद जिंदल के गैर-वैधानिक चयन की शिकायत आयोग से की थी लेकिन उस समय उसपर कोई कार्रवाई नहीं की गई (संलग्नक-5)। इसका नतीजा यह रहा कि विधानसभा चुनाव-2012 के दौरान जिले में पेड न्यूज का एक भी मामला सामने नहीं आया। वास्तव में पत्रकार/स्वतंत्र नागरिक के रूप में जिस व्यक्ति का चयन पेड न्यूज की निगरानी के लिए किया जा रहा है, उसे पेड न्यूज के मामले से कोई लेना देना नहीं है। इससे यह प्रतीत होता है कि जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र जानबूझकर पूर्व में की गई गलती को दोहरा रहे हैं। साथ ही वह भारत निर्वाचन आयोग तथा भारतीय प्रेस परिषद के दिशा-निर्देशों की अवहेलना कर रहे हैं। असल में यह सब जिले में जिला सूचना अधिकारी की नियुक्ति पिछले करीब 10 सालों से नहीं होने की वजह से हो रहा है। इस विभाग में पूर्ण रूप से लिपिक की तैनाती भी नहीं है। विभाग के सभी कार्यों की देखरेख उर्दू अनुवादक सह लिपिक नेसार अहमद करते हैं जिसकी वजह से पत्रकारों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वह प्रशासन की नीतियों के प्रचार-प्रसार में रुचि लेने की जगह लाइजनिंग में ज्यादा समय जाया करते हैं (संलग्नक-6 का अवलोकन करें जिसमें दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर में विभाग के एक कर्मचारी द्वारा लाइजनिंग किए जाने का आरोप है)। इससे पत्रकारों को चुनाव प्रक्रिया की समुचित जानकारी नहीं हो पाती है। इसे लेकर पत्रकार संगठन जिला सूचना अधिकारी की नियुक्ति किए जाने की मांग भी कई बार कर चुके हैं। इसके बावजूद जिला प्रशासन पूर्व की गलतियों को सुधारने के लिए तैयार नहीं है। अगर जिला निर्वाचन अधिकारियों और चुनाव आयोग द्वारा इसी प्रकार से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने का वादा किया जाता है तो फिर जनता के लाखों रुपये पेड न्यूज मॉनिटरिंग के नाम पर क्यों खर्च किए जा रहे हैं? क्या चुनाव आयोग और उसके प्रतिनिधि के रूप में काम करने वाले जिला निर्वाचन अधिकारी भारतीय संविधान और उसके तहत निर्मित विधियों के ऊपर हैं? अगर ऐसा ही है तो फिर वे जनता के बेशकीमती समय और धन को क्यों बर्बाद किया जा रहा है?

अतः श्रीमान् जी से निवेदन है कि जनहित में उक्त प्रकरण की जांच भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग के प्रतिनिधि खुद करें और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी अथवा कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई कर उपयुक्त व्यक्ति का चयन एमसीएमसी में करने की कृपा करें जिससे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा साकार हो सके।

दिनांकः   26-04-2014                                                                                                                                                                           
शिव दास प्रजापति

प्रतिलिपिः

(1) अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद, नई दिल्ली।
(2) मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तर प्रदेश।
(3) जिला निर्वाचन अधिकारी, सोनभद्र।
(4) प्रेक्षक, रॉबर्ट्सगंज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र।
(5) श्री अनिल चमड़िया, प्रमुख, मीडिया स्टडीज ग्रुप, नई दिल्ली।
(6) निदेशक, इलेक्शन वॉच, नई दिल्ली।
(7) संपादक, भड़ास4मीडिया.कॉम।
(8)
संपादक, द हूट.कॉम।
(9) संपादक, जनसत्ताएक्सप्रेस.नेट।
(10) संपादक, हस्तक्षेप.कॉम।
(11) अध्यक्ष, प्रेस क्लब, नई दिल्ली।
(12) ओमर राशिद, संवाददाता, द हिन्दू।
(13) सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख।
(14) अन्य

The cult of cronyism : Who does Narendra Modi represent and what does his rise in Indian politics signify?

Who does Narendra Modi represent and what does his rise in Indian politics signify? Given the burden he carries of the 2002 anti-Muslim massacres, it is tempting to see the Gujarat chief minister’s arrival on the national stage as a watershed moment in the escalation of communal politics. Certainly the cult-like following he has amongst the sangh parivar faithful and a wider section of the Hindu middle class is due to the image he has of a leader who knows how to “show Muslims their place”. For these supporters, his refusal to do something so simple – and tokenistic — as express regret for the killings that happened under his watch is seen not as a handicap but as further proof of his strength.

And yet, Modi’s rise and rise has less to do with his Hindutva credentials and appeal than his secular critics would like to believe. Modi is where he is today – on the cusp of power — not because the country is becoming more communal but because the Indian corporate sector is becoming more impatient. Every opinion poll that shows him inching towards power sets off a bull run on the Bombay Stock Exchange.  In a recent dispatch for the Financial Times, James Crabtree noted the exceptional gains notched up by Adani Enterprises – the company’s share price has shot up by more than 45 per cent over the past month compared to the 7 per cent rise registered by the Sensex. One reason, an equities analyst told the FT, is that investors expect a government headed by Modi to allow Adani to expand his crucial Mundra port despite the environmental complications involved. “So the market is saying that, beyond the simple proximity of Mr Adani and Mr Modi, these clearances may no longer be so hard to get under a BJP regime,” the analyst is quoted as saying.

The word ‘clearances’ sounds benign but what it really signifies is Modi’s willingness to accommodate the desire of capital to expand in any way it wants – horizontally, across land and field, vertically, above and below the earth, and laterally, in terms of accommodating the demands of foreign investors, including for the opening up of the insurance and retail sectors.   And if environmental rules, livelihoods, farmsteads or community interests intervene, they must perforce make way with the vigorous backing and assistance of the government. It is this promise of ‘decisiveness’ that has made Modi such an attractive proposition for Indian – and global — big business today.

How and why the country’s top businessmen switched allegiance from the ‘indecisive’ Congress to Narendra Modi is a story that reflects the inner rhythms of life at the base of Indian politics. But it is also a cautionary tale about the deep crisis that rent-seeking and cronyism have engendered in the Indian economy now that the immediate gains made possible from liberalization have reached their natural limit. For all the changes that neo-liberal policies and the end of the ‘license-permit raj’ were meant to usher in, the level of rent that can be earned by companies that are close to the government has reached astronomical levels. As N.S. Siddharthan of the Madras School of Economics argues, “Under the existing business environment, the path to amass wealth is not through manufacturing but through exploitation of resources under government ownership.” Even if some of the estimates generated by the Comptroller and Auditor General in his reports on the 2G spectrum and coal scans appear to be on the high side, it is evident that the preferential allotment of resources has become a huge source of profit for companies that might otherwise earn only a ‘normal’ rate of return through their brick-and-mortar ventures. These resources include not just coal or spectrum or iron ore but, most crucially, land and water too. And here, the poster boy for the brave new world that Modi represents is Gautam Adani, whose emergence as a major businessman closely mirrors the rise of the Gujarat Chief Minister himself.

At the January 2009 ‘Vibrant Gujarat’ summit, two of India’s biggest industrialists, Anil Ambani, who was locked in battle with Mukesh Ambani over the issue of gas pricing, and Sunil Mittal, chose openly to bat for Modi as Prime Minister. “Narendrabhai has done good for Gujarat and [imagine] what will happen if he leads the nation,” Anil Ambani was quoted as saying. “Gujarat has seen progress in all the fields under his leadership. Now, imagine what will happen to the country if he gets the opportunity to lead it … Person like him should be the next leader of the country.” Mittal, head of the Bharti Group with major interests in telecoms, had this to say: “Chief Minister Modi is known as a CEO, but he is actually not a CEO, because he is not running a company or a sector. He is running a state and can also run the nation.” Tata, who was present at the event, also sang Modi’s praises. “I have to say that today there is no state like Gujarat. Under Mr Modi’s leadership, Gujarat is head and shoulders above any state.” Again, the question of ‘clearances’ took pride of place.  The Economic Times reported: “A state, Mr Tata gushed, would normally take 90 to 180 days to clear a new plant but, ‘in the Nano case, we had our land and approval in just two days.’”

Two years later, at the 2011 Vibrant Gujarat meet, the prize for florid rhetoric went to Mukesh Ambani: “Gujarat is shining like a lamp of gold and the credit goes to the visionary, effective and passionate leadership provided by Narendra Modi. We have a leader here with vision and determination to translate this vision into reality.” In 2013, it was again the turn of his estranged brother. “Anil Ambani hailed chief minister Narendra Modi as the King among Kings,” the Economic Times reported, and requested the audience to give the CM a standing ovation. “The audience readily relented.” Others who spoke included a who’s who of top industrialists.  If there was no repeat of the ‘Modi for PM’ chant this time around, it was only because India Inc had already made its choice clear.

Looking back, a major turning point in this evolving matrix of business and political interests was surely the Niira Radia tapes drama of 2010. Coming close on the heels of the CAG’s dramatic exposé of the 2G scam, the Radia tapes brought out into the open the inner connections between big business, politicians, policymaking and even the media. With the Supreme Court now joining the CAG in seeking to stop the loot of public resources, it became clear that the era of easy “clearances” was now coming to an end. It was around this time that corporate India started accusing the Congress-led Manmohan Singh government – which they had strongly backed, and profited from, until then — of “policy paralysis”, “drift” and “indecisiveness.”

Since his name had figured in the Radia tapes, it was only natural that Ratan Tata should lead the charge. Warning that India was in danger of becoming a ‘banana republic’, the head of one of the country’s largest conglomerates hit out at the government for failing to maintain a conducive climate for industry.  He was soon joined by Deepak Parekh, the influential head of HDFC bank, who raised the spectre of capital flight since land acquisition and mining leases were becoming more difficult. “Talk to businessman after businessman”, the Times of India reported, “and one of the first things he’ll tell you, off the record, is, ‘The government’s come to a halt. Bureaucrats, bankers, everybody’s scared to take decisions.’ The next thing he’ll tell you: ‘We are now looking at investing abroad rather than in India’.” Sharad Pawar, the business-friendly Union Agriculture Minister, also lent his voice to this chorus of protest.

It is a fact that outward investment from India has been growing steadily, except for a fall in the slump year of 2009-10. Companies invest abroad for a wide variety of reasons. Some look for resources like coal or oil to feed their industries at home, others for technology or a means of more easily accessing protected markets. Domestic constraints on profitability can also be a factor. As Harun R. Khan, Deputy Governor of the Reserve Bank of India has noted, “There exists a school of thought which apprehends that overseas investment by Indian corporates is at the cost of on-shore investment. One of the discernible reasons acting as an obstacle for companies to undertake on-shore investment could be the policy and procedural constraints.” But domestic investment is also constrained by supply bottlenecks, especially in infrastructure, and domestic demand, which, in turn, are functions of public investment and expenditure, investor confidence, and the poor dispersion of income, which affects the spending power of the population.

As long as the Indian economy was maintaining a high rate of growth during the first term of the Manmohan Singh government, the biggest Indian companies were able to enjoy both “normal” profitability and a “crony premium.” But the joint effect of the 2008 global slowdown  on inflation, and interest rates, and the blow that Radiagate, the CAG, public opinion, and a more vigilant judiciary have delivered from 2009 onwards has fatally compromised this cosy revenue model. The arraignment of the Sahara group by the Securities and Exchange Board of India and the jailing of its boss, Subrata Roy, by the Supreme Court on contempt charges is perhaps the most dramatic example of how the terrain for big business is changing. To be sure, Manmohan Singh and Finance Minister P. Chidambaram were aware of the brewing disquiet in the corporate sectorand tried to tackle the problem at the easier end by creating the Cabinet Committee on Investment and making rent-friendly changes in key ministries like Petroleum and Natural Gas and Environment and Forests.  But this has not been enough to restore the confidence of India Inc in the Congress party’s ability to restore the status quo ante.

It is hardly surprising that this is the time the name of Narendra Modi as a potential Prime Minister of India enters public discourse in a determined fashion. Egged on by corporate sponsors as well as by the personal preferences of their proprietors, big media swung into action to take the process of “normalizing” Modi to its logical conclusion. Barely nine years earlier, the Gujarat Chief Minister and the massacres he failed to prevent were universally acknowledged by the media as having played a key role in the defeat of the National Democratic Alliance government at the Centre in 2004. The problem was how to convince the same urban middle class India, which is repelled by the spectre of communal violence, that the solution to India’s problems lies in Modi’s leadership. This is how the myth of the ‘Gujarat model of development’ came in handy. “Today people are talking about the China model of development in Gujarat,” Anand Mahindra of Mahindra and Mahindra told the 2013 Vibrant Gujarat summit. “But the day is not far when people will talk about Gujarat model of growth in China.”

Enough has been said and written about the statistical legerdemain that underlies Modi’s fanciful claims as an administrator who has transformed Gujarat. But in praising their Leader in this way, Corporate India is making an inadvertent admission: that what they admire the most about Modi is his love for the “Chinese model.” What is this model? It is one in which “clearances” for land, mines and the environment don’t matter. It is one in which awkward questions about gas pricing are never asked, let alone answered.  Unlike the growing public support for strong institutional action against corruption that lies at the root of the visible disenchantment with the Congress, Corporate India is not interested in an end to “corruption” as such. Cronyism and rent-seeking have become an integral part of the way our biggest companies do business – a sort of ‘capitalism with Indian characteristics’ – and they are looking to Modi to run this system in a decisive, stable and predictable manner. What they want is a Leader who will manage contradictions and institutional obstacles as and when they emerge. The communalism of the hordes who follow the Modi cult is an added attraction for his corporate backers, provided the Leader is able to keep his flock in check. This is something Atal Bihari Vajpayee and even L.K. Advani were not always capable of doing. Narendra Modi is a more decisive and strong-willed man. He can be counted upon to keenly calibrate their deployment whenever a crisis requires a diversion.

Postscript: As this issue was going to press came news that N.K. Singh, the bureaucrat-turned-politician, who is heard on the Radia tapes trying to influence the course of a parliamentary debate on a matter concerning Reliance, has joined the Bharatiya Janata Party.

Siddharth Varadarajan, formerly Editor of The Hindu, is a Senior Fellow at the Centre for Public Affairs and Critical Theory, New Delhi

साभार- एसवरदराजन डाट काम
 

देश में अब भी करोड़ों ऐसे लोग हैं जो अरविन्द केजरीवाल को ईमानदार सम्भावना मानते हैं

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे पहले कभी नहीं देखा! 67 में जनता पहली बार निराश हुई थी और छह राज्यों से काँग्रेस साफ़ हो गयी थी! फिर 1977 और 1989 भी देखा, समझा और भुगता! ये सब बड़ी-बड़ी आशाओं के चुनाव थे. बड़े बदलावों की आशाओं के चुनाव! वे आशाएँ अब निराशा के कफ़न ओढ़ इतिहास के ताबूत में दफ़न हैं. वैसे चुनाव कोई भी हों, कैसे भी हों, छोटे हों, बड़े हों, वह आशाओं के चुनाव ही होते हैं. वोट या तो किसी निराशा के विरुद्ध होते हैं या किसी नयी आशा के तिनके के साथ!

लेकिन यह पहला चुनाव है, जहाँ युद्ध आशाओं और आशंकाओं के बीच है! एक तरफ़ बल्लियों उछलती, हुलसती गगनचुम्बी आशाएँ हैं, दूसरी तरफ़ आशंकाओं के घटाटोप हैं! पहली बार किसी चुनाव में देश इस तरह दो तम्बुओं में बँटा है! और पहली बार ही शायद ऐसा हो रहा है कि नतीजे आने के पहले ही आशावादियों ने नतीजे घोषित मान लिये हैं! वैसे तो चुनावों के बाद अकसर कुछ नहीं बदलता, लेकिन यह चुनाव वैसा चुनाव नहीं है कि कुछ न बदले! अगर सचमुच वही आशावादी नतीजे आ गये, तो देश इस बार ज़रूर बदलेगा! आशाओं का तो कह नहीं सकते कि जियेंगी या हमेशा की तरह फिर फुस्स रह जायेंगी. लेकिन आशंकाओं के भविष्य को देखना दिलचस्प होगा! सिर्फ़ अगले पाँच साल नहीं, बल्कि अगले पचास साल का देश कैसा होगा, कैसे चलेगा और संघ-प्रमुख मोहन भागवत के ‘परम वैभव’ की भविष्यवाणी सच हो पायेगी या नहीं!

और ‘परम वैभव’ का स्वप्न सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही दुःस्वप्न नहीं है. अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते. कर्नाटक की बीजेपी सरकार के दौर में ‘पश्चिमी संस्कृति’ के विरुद्ध श्रीराम सेने और हिन्दू वेदिके की ‘नैतिक पहरेदारी’ ने कैसे लोगों का जीना दूभर कर दिया था. उन्हीं प्रमोद मुतालिक को बीजेपी में अभी-अभी शामिल कराया गया था, हो-हल्ला मचा तो फ़िलहाल चुनाव के डर से उन्हें दरवाज़े पर रोक दिया गया. और यह तो तय है कि अगर ‘आशावादी नतीजे’ आ गये तो चुनाव के बाद बीजेपी वही नहीं रहेगी, जो अब तक थी! बीजेपी की ‘ओवरहालिंग’ होगी, यह तो कोई बच्चा भी दावे के साथ कह सकता है! लेकिन वह ओवरहालिंग कैसी होगी, इसी से तय होगा कि कैसे दिन आनेवाले हैं? और ‘पश्चिमी संस्कृति’ से ‘भारतीय संस्कृति’ का ‘रण’ होगा या नहीं?

और इस चुनाव के बाद काँग्रेस भी बदलेगी! नतीजे तय करेंगे कि काँग्रेस को आगे का रास्ता कैसे तय करना है? काँग्रेस का भविष्य क्या होगा? काँग्रेस कई बार बड़े-बड़े झंझावातों के दौर से गुज़री, टूटी, बँटी, बनी, पिटी, और फिर धूल झाड़ कर खड़ी हो गयी. लेकिन अबकी बार? बड़ा सवाल है! काँग्रेस में राहुल गाँधी के अलावा प्रियंका की कोई भूमिका होगी क्या? और होगी तो किस रूप में? वैसे ही, जैसे अभी है, पर्दे के पीछे महज़ चुनावी खेल की कप्तानी या फिर राहुल के शाना-ब-शाना? यह सवाल आज के पहले महज़ एक अटकल से ज़्यादा नहीं था, लेकिन आज यह एक वाजिब सवाल है! इसलिए कि बीच मँझधार में जब से प्रियंका ने चुनावी कामकाज की कमान सम्भाली है, तबसे पार्टी में कुछ-कुछ बदला-सा तो दिखा है! क्या काँग्रेस इस तरफ़ आगे बढ़ना चाहेगी? कठिन डगर है! चुनाव बाद शायद काँग्रेस भी इस पर चर्चा करने को मजबूर होगी और हम भी!

और इस चुनाव में एक और बड़ी बात शायद पहली बार होने जा रही है. वह है चुनाव के बाद राष्ट्रीय पटल पर एक नये राजनीतिक विकल्प की सम्भावना का उदय! इस पर भले ही अटकलें लग रही हों कि आम आदमी पार्टी कितनी सीटें जीत पायेगी, दहाई का आँकड़ा पार कर पायेगी या नहीं, वग़ैरह-वग़ैरह. सीटें उसे मिलें या न मिलें, लेकिन इतना तो तय है कि देश के राजनीतिक विमर्श में उसकी उपस्थिति गम्भीरता से दर्ज हो चुकी है. बीजेपी और काँग्रेस के बाद वह अकेली ऐसी पार्टी है जो क्षेत्रीय सीमाओं और आग्रहों से मुक्त है. हालाँकि उसके नेतृत्व के अपने ज़िद्दी आग्रहों के चलते ‘आप’ ने एक बहुत बड़े राजनीतिक अवसर और अपने लाखों समर्थकों को रातोंरात गँवा दिया, फिर भी देश में अब भी करोड़ों ऐसे लोग हैं जो अरविन्द केजरीवाल को एक ईमानदार सम्भावना मानते हैं और इसीलिए उनके अराजकतावाद, अनाड़ीपन, अड़ियल अहंकार को भी बर्दाश्त करने को तैयार हैं. ऐसा इसलिए कि ये लोग काँग्रेस और बीजेपी में न तो ईमानदारी का कोई संकल्प पाते हैं और न ही उन्हें इन पार्टियों से किसी ईमानदार बदलाव की कोई उम्मीद है.

इसलिए देश के इतिहास में पहली बार हो रहे आशाओं और आशंकाओं के इस चुनावी मंथन के नतीजे चाहे जो भी हों, इसकी एक उपलब्धि तो ‘आप’ है ही. कमज़ोर हो रही काँग्रेस की जगह ‘आप’ अपने आपको पेश कर सकती है, बशर्ते कि वह अपनी बचकानी ज़िदों, भावुक जल्दबाज़ियों, अटपट कलाबाज़ियों और अड़-बड़ बोलियों से बच सके! बशर्ते कि उसके पास कोई स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि हो, कोई आर्थिक-सामाजिक रूपरेखा हो, स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य हों और निर्णय लेने के लिए कोई कुशल विवेकशील तंत्र हो. अरविन्द केजरीवाल मानते हैं कि दिल्ली में सरकार से हट कर उन्होंने बड़ी ग़लती की. वैसे यह उनकी पहली ग़लती नहीं थी. मुख्यमंत्री का एक ग़लत बात के लिए धरने पर बैठना भी कम बड़ी ग़लती नहीं थी! उन्होंने ऐसी कम ग़लतियाँ नहीं की हैं, वरना ‘आप’ शायद आज ही बड़ी ताक़त बन चुकी होती! उनके पास बड़ी धाकड़, विविध प्रतिभासम्पन्न, प्रबन्ध-कुशल समर्पित और बड़ी अनुभवी टीम है. उस टीम को सामूहिक फ़ैसला लेने दें तो ‘आप’ से उम्मीद की जा सकती है! वरना……

वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी के ब्लाग 'रागदेश' से साभार.

सुरेंद्र मिश्र ने नवभारत मुंबई और आदित्य दुबे ने सामना हिंदी से इस्तीफा देकर नई पारी शुरू की

नवभारत, मुंबई के प्रमुख संवाददाता सुरेंद्र मिश्र ने संस्थान से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने अपनी नई पारी अमर उजाला के साथ शरू की है. श्री मिश्र अमर उजाला के मुंबई ब्यूरो में बतौर प्रमुख संवाददाता कार्य करेंगे. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के रहने वाले मिश्र पिछले 9 वर्षों से नवभारत में राजनीतिक बीट पर कार्य कर थे. इसके पहले वे पंजाब केसरी व आज अखबार में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. एक साल के भीतर नवभारत (मुंबई) को चार लोग छोड़ चुके हैं. सूत्रों के अनुसार प्रबंधन के लापरवाहीपूर्ण रवैए की वजह से नवभारत के पुराने लोग लगातार नौकरी छोड़ कर जा रहे हैं.

मुंबई से प्रकाशित सामना (हिंदी) के उप संपादक आदित्य दुबे ने यहां से इस्तीफा दे दिया है. दुबे हाल ही में मुंबई से हिंदी और अंग्रेजी में लांच हुए दैनिक एब्सल्यूट इंडिया में चीफ रिपोर्टर बनाए गए हैं. आदित्य पिछले 15 सालों से शिवसेना के मुखपत्र सामना (हिंदी) के साथ थे. उन्होंने अपना कैरियर नवभारत (मुंबई) से शुरू किया था. मुंबई की हिंदी पत्रकारिता में आदित्य क्राईम व राजनीतिक बीट के रिपोर्टर के रूप में पहचाने जाते हैं. वे भोजपुरी में दो फिल्में भी बना चुके हैं.

आजमगढ़ः संप्रदायिकता नहीं, जातीय वर्चस्व की जंग में मुलायम

मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हो सकते हैं, समाचार माध्यमों में इस इस तरह की अटकलें पहले से ही थीं परन्तु हर बार पार्टी की ओर से इसका खण्डन किया जाता रहा। मंथन इस बात पर चल रहा था कि सपा के इस क्षेत्र में खिसकते जातीय आधार पर कैसे काबू पाया जाए? ऐसे में सपा द्वारा यह कहना कि सांप्रदायिकता के खिलाफ आजमगढ़ में मुलायम सिंह चुनाव मैदान में हैं, यह महज एक शिगूफा है, जिसे क्षेत्र का मुसलमान समझ रहा है।

 
गौरतलब है कि आजमगढ़ में कभी मुलायम के सिपहसालार रहे रमाकांत यादव पिछली लोकसभा में भाजपा के टिकट पर निर्वाचित हुए थे और यह साबित कर दिया था कि स्थानीय यादव मतदाताओं का बड़ा वर्ग उनके साथ है। इससे पहले भी दो बार सपा के कद्दावर यादव नतोओं को इस मामले में उनके सामने मुंह की खानी पड़ी थी। अपने इस जातीय आधार को पार्टी में वापस लाने का सपा नेताओं का हर प्रयास विफल साबित हो रहा था। अब यह समस्या मात्र आजमगढ़ तक सीमित नहीं रह गई थी। इसी राह पर चलते हुए एक तरफ गाजीपूर में एकता मंच गठबंधन की तरफ से प्रत्याशी बन कर आए डीपी यादव और दूसरी तरफ जौनपूर में पार्टी से बगावत करके चुनावी रण में कूद पड़ने वाले केपी यादव ने भी सपा की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। कुल मिला कर सपा के लिए यह पूरा इलाका ’चिन्ता क्षेत्र’ में तबदील होने लगा था।

जातिवाद की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी को उसके उसी हथियार से सपा के इन पूर्व यादव क्षत्रपों ने इस चुनाव में पार्टी के घोषित और अघोषित भावी प्रत्याशियों को हाशिए पहुंचा दिया था। इन परिस्थितियों में अवश्यकता थी इस क्षेत्र में किसी ऐसे बड़े नेता की, जो इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो और आसपास के क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सके। जाहिर सी बात है इसके लिए सपा प्रमुख से ज्यादा उपयुक्त और कौन हो सकता था।

दूसरी तरफ सपा शासन में होने वाले दंगों और अखिलेश सरकार द्वारा उससे निपटने के संदिग्ध तौर तरीकों से मुसलमान वोटर भी नाराज है। इस स्थिति में मुसलमानों को साथ लाने का एक ही मंत्र बचा था और वह था-अपने आपको भाजपा का विकल्प बना कर पेश करना, जिसका इस पूरे क्षेत्र में सपा दूर से भी कोई संकेत नहीं दे पा रही थी। मोदी के वाराणसी से प्रत्याशी बनते ही सपा के रणतीतिकारों को लगा कि उनकी यह समस्या भी हल हो गई। मुलायम सिंह के आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ यह प्रचारित किया जाने लगा कि पूर्वांचल में मोदी के प्रभाव को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया गया है, लेकिन शायद समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया के लिए यह राह उतनी आसान साबित न हो।

आजमगढ़ में बसपा बनाम भाजपा की जंग अब मुलायम सिंह के प्रत्याशी बनने के बाद बसपा बनाम सपा तो होती दिखाई दे रही है, लेकिन ’मुसलमान सपा के साथ नहीं आया तो भाजपा जीत सकती है’ वाली सपा की पसंदीदा स्थिति यहां अभी नहीं है और उसके उत्पन्न होने की कोई संभावना भी कम है। वैसे तो पूरे प्रदेश में जातियों के राजनीतीकरण पर आधारित राजनीति स्थापित हो चुकी है, लेकिन पूर्वांचल की जलवायु इसके लिए अधिक अनुकूल साबित हुई है। इस क्षेत्र में पिछड़ी तथा अनुसूचित जातियों के राजनीतिकरण ने छोटे-छोटे राजनीतिक दलों की संख्या हर चुनाव में बढ़ाई है। आजमगढ़ लोकसभा में यादव मतदाता का अनुपात सबसे अधिक लगभग 21 प्रतिशत है जबकि मुसलमान 19 प्रतिशत, हरिजन लगभग 16 प्रतिशत और क्षत्रिय वोटों की संख्या 8 प्रतिशत है। बाकी मतदाताओं में बड़ी संख्या अति पिछड़ा वर्ग और अन्य दलितों की है, जिनकी पहचान किसी एक दल के वोटर के रूप में नहीं है। ऐसे में इस चुनाव में मुसलमान मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। लेकिन यह स्थिति भी किसी भी तरह समाजवादी पार्टी सुप्रीमों के पक्ष में जाती नजर नहीं आती।
 
यदि यह मान लिया जाए कि भाजपा हार जीत की लड़ाई से बाहर हो गई है तो मुसलमानों को कई टुकड़ों में बंटने से रोक पाना मुश्किल हो जाएगा। अगर भाजपा की जीत की दावेदारी बरकरार रहती है तो यह उसी हालत में सम्भव होगी जब यादव मतदाताओं का एक वर्ग अपने क्षेत्रीय क्षत्रप के साथ खड़ा हो। इसका दूसरा अर्थ होगा मुलायम सिंह की दावेदारी का कमजोर होना। ऐसी हालत में मुसलमान इस आशंका के बावजूद कि चुनाव पश्चात सपा के मुकाबले में बसपा की राजग के साथ चले जाने की सम्भावना अधिक है, लामबंद होकर बसपा के साथ जा सकता है। कुल मिला कर जहां तक मुस्लिम मतदाताओं का सवाल है, यह दोनों ही परिस्थितियां मुलायम के खिलाफ जाती नजर आती हैं। इस प्रकार की किसी प्रतिकूल स्थिति से बाहर निकलने के लिए अति पिछड़ों और गैर हरिजन दलितों का एक बड़ा भाग शेष रह जाता है, जिस पर सभी पार्टियों साथ साथ प्रदेश के सत्ताधारी दल की निगाह भी अवश्य होगी। चनावी दंगल के अंतिम चरण में आजमगढ़ एक बड़ा अखाड़ा बनने वाला है यह तो निश्चित है, लेकिन सपा रणनीतिकारों की योजना कितनी सफल होती है इसमें राजनीतिक विश्लेषकों दिलचस्पी जरूर रहेगी।

मसीहुद्दीन संजरी
ग्राम व पोस्ट-संजरपुर
जिला आजमगढ़
उत्तर प्रदेश
मोबाइल नम्बर-8090696449

 

लाख रुपए दीजिए, न्यूज़ चैनल आईडी और जिले की कमान लीजिए

देहरादून में मीडिया की अड्डेबाज़ी अब भू माफियाओं ने सम्हाल ली है। कलम को गिरवी रखने का खेल तो काफी समय से चल रहा था लेकिन अब न्यूज़ चैनल की आईडी बेच कर लाखों में पत्रकार बनाने का खेल भी शुरु हो गया है। इसके चलते ईमानदारी से पत्रकारिता करने वाले खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं। ख़बर है कि देहरादून में कुछ दिनों पूर्व शुरू हुए न्यूज़ चैनल राष्ट्र ख़बर ने जिस तेज़ी से ग्राउंड बनाना शुरु किया था उसी तेज़ी से चैनल ने कमाई करने की छूट भी अपने यहां के पत्रकारों को देनी शुरु कर दी। लोकसभा चुनाव का मौसम था तो लगे हाथ कुछ लोगो ने मीडिया का चोला पहन कर धन उगाही का सपना देख लिया था। लेकिन सपना पूरा होने से पहले ही इस न्यूज़ चैनल की हकीकत लोगों के सामने आ गयी।

रुद्रपुर निवासी अर्पित राज कक्कड़ ने देहरादून पुलिस को दी गयी अपनी शिकायत में कहा है की रुद्रपुर में राष्ट्र खबर न्यूज़ चैनल का ब्यूरो चीफ बनाने के लिए, खुद को चैनल का मालिक बताने वाले जयपाल चौधरी, गौरव शर्मा, मुकेश शर्मा ने उससे एक लाख रूपए की मांग की थी जिसको उसने पूरा भी किया। फिर देहरादून में उसे बताया गया कि अब राष्ट्र ख़बर ने देहरादून के न्यूज़ चैनल वॉइस ऑफ़ नेशन को खरीद लिया है। इसलिए अब उसे नई शर्तों को अनुसार कार्य करना होगा जो अर्पित को स्वीकार नहीं था। अर्पित राज का कहना है की न्यूज़ चैनल हर महा एक लाख रूपया मांग रहा था और देहरादून में कई जगह पर अवैध कारोबार को अंजाम दे रहा है। अर्पित ने उक्त तीनों लोगों पर ऑफिस बुला कर उससे मारपीट करने, सादे कागज़ पर दस्तख़त लेने, लैपटॉप और सोने की चैन छीनने का आरोप भी लगाया है।

वहीं वॉयस ऑफ नेशन के मनीष वर्मा का कहना है की उनके न्यूज़ चैनल का किसी भी अन्य चैनल से कोई समझौता नहीं हुआ है। कुछ लोग न्यूज़ चैनल को खरीद लेने की बात कह रहे है जो पूरी तरह गलत है। जयपाल चौधरी से फ़ोन पर बात की गयी तो उन्होंने कहा की उनके द्वारा न्यूज़ चैनल वॉयस ऑफ नेशन की नयी ज़िमेदारी संभाली गयी है और उनका राष्ट्र खबर से कोई लेना देना नहीं है। उनके द्वारा अर्पित राज के खिलाफ पुलिस में शिकयत की गयी है।

कुल मिलाकर देहरादून में न्यूज़ चैनल की आड़ में जिलों में रिपोर्टर बनने का खेल लगातार जारी है। जिन लोगों को न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर बनाया जा रहा है उनको मीडिया की कोई जानकारी नहीं है। इस कारण मीडिया बदनाम हो रहा है और इस तरह के मामले पुलिस के लिए भी सिरदर्द बने हुए है।

 

देहरादून से नारायण परगईं की रिपोर्ट

पलवल में पत्रकार और उसके परिजनों को हत्या के प्रयास में फंसाने की साज़िश का पर्दाफाश

पलवल में व्यापारी पर हुए जानलेवा हमले के मामले का खुलासा जिला पुलिस कप्तान राकेश कुमार आर्य ने पत्रकार वार्ता के दौरान किया। घटना की साजिश रचने और अंजाम देने वालों को भी पत्रकारों के समक्ष पेश किया गया। पुलिस ने इस मामले में व्यापारी के तीन साथियों को भी गिरफ्तार किया है, जबकि व्यापारी को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। एसपी ने कहा की व्यापारी ने योजना के तहत दूसरे लोगों को फंसाने के लिए चाक़ू मारने की साजिश रचि थी। इसमें और भी लोगों का हाथ होने की सम्भावना बतायी गई है। मामले में आरोपी बने वैश्य समाज के प्रधान और पत्रकार ओमप्रकाश गुप्ता, उनके बेटे और भाई को निर्दोष बताया गया है। इस तरह का झूठा मामला पलवल में पहली बार उजागर हुआ है। यह मामला हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और युपीए अध्यक्षा श्रीमति सोनिया गांधी और राहुल गांधी की चौखट तक पहुंच भी पहुँच गया था।

पलवल में गत 17 अप्रैल को थाना पुलिस कैम्प में मोहित बजाज के बयान पर संजय गुप्ता के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में संजय गुप्ता को पुलिस ने अदालत में पेश किया गया था। एसपी राकेश आर्य ने बताया की अदालत ने उन्हें जमानत दे दी लेकिन यह जमानत मोहित बजाज को हजम नहीं हुई और इसने अपने साथियों के साथ मिलकर वैश्य समाज के प्रधान ओमप्रकाश, उनके बेटे संजय गुप्ता और उनके भाई चंदीराम गुप्ता को फंसाने की साजिस रची और 18 अप्रैल को शाम 7 से 8 बजे के बीच दोबारा मोहित को चाकू मारने का मामला बनाया गया। इन्होंने हंगामा करना शुरु कर दिया और इसका विरोध करके बाजार को बंद करा दिया गया। एसपी राकेश आर्य ने खुलासा करते हुए कहा की इस विरोध से पुलिस पर दबाब बनाया गया और पुलिस को बदनाम करने की कोशिश की गई। मोहित बजाज को षडयंत्र के तहत एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया जिसको डाक्टरों ने जायदा सीरियस कहते हुए आईसीयु में वार्ड में रखा गया और किसी भी पुलिस अधिकारी और इससे नहीं मिलने दिया गया। पुलिस ने इन लोगों द्वारा की गई शिकायत पर इस मामले में संजय गुप्ता, ओमप्रकाश गुप्ता व चन्दीराम गुप्ता सहित 5 लोगों के खिलाफ 19 अप्रैल को सुशील उर्फ रिंकू पुत्र रामलाल बजाज के बयान पर एफआईआर नंबर 176 को आईपीसी की धारा 148-149-323-324-307-506-195ए-120बी के तहत हत्या करने के प्रयास के साथ मारपीट का मामला दर्ज किया गया। इस मामले में पुलिस ने संजय गुप्ता को गत 22 अप्रैल को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया। अदालत ने उन्हें नीमका जेल भेज दिया। और पुलिस ने मामले की गहनता से जाँच में जुट गई।

जिला पुलिस कप्तान राकेश कुमार आर्य ने पत्रकार वार्ता के दौरान बताया कि गत 18 अप्रैल को सरकारी अस्पताल में कुछ युवक मोबाइल पर फोन पर बात कर लोगों को एकत्र कर रहे थे। वे बात करते समय जिस तरह की भाषा का प्रयोग रहे थे उसे लेकर पुलिस उनके पीछे लगी हुई थी। कुछ युवकों की कॉल डिटेल और जवाहर नगर मार्किट के दुकानदारों द्वारा दी गई जानकारी पर पुलिस ने कुछ युवकों को हिरासत में लिया। हिरासत में की गई पूछताछ के दौरान पुलिस ठोस नतीजे पर पहुंची। एसपी राकेश कुमार आर्य ने बताया कि गत 17 अप्रैल को हई वारदात में संजय गुप्ता को जमानत मिल गई। जमानत मिलने के बाद मोहित बजाज आशीष गौतम महेन्द्र सिंह व विकास ग्रोवर ने साजिश रची।

साजिश के तहत मैडिकल स्टोर संचालक विकास ग्रोवर ने सर्जीकल ब्लेड दिया। महेन्द्र ने मोहित बजाज को पकड़ा और आशीष गौतम ने ब्लेड से कट मार दिया। कट मारने के बाद अफवाह फैला दी की मोहित बजाज को संजय गुप्ता आदि ने चाकू घोंप दिया है। और मोहित को पलवल के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन अस्पताल के डॉक्टर पर राजनेताओं ने दबाब बनाकर मेडिको-लीगल-रिपोर्ट को बदलवाया गया। बजाज की कॉल डिटेल के आधार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। षडयंत्र रचने वाले मोहित बजाज से और भी खुलासे होने की सम्भावना है। एसपी राकेश आर्य ने कहा की इस साजिश को रचने में कुछ पुलिसकर्मियों औऱ पत्रकारों का भी हाथ होने की सम्भावना है। उन्होनें कहा कि साजिश में शामिल किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। पलवल में इस तरह के सैकड़ों झूठे मामलों में पहली बार इस तरह का मामला उजागर हुआ है।

 

पलवल से पत्रकार ऋषि भारद्वाज (इण्डिया न्यूज चैनल) की रिपोर्ट।

बच्चों का भविष्य संवारना छोड़ नेताओं का चाटुकार और मीडिया का दलाल बना शिक्षामित्र

चित्रकूट कार्यालय : समाजसेवा एवं पत्रकारिता का लबादा ओढने वाला एक शिक्षा मित्र इन दिनों एक राजनेता की चाटुकारिता एवं मीडिया की दलाली के लिए सुर्खियों में है। नेताओं से पत्रकारों को मैनेज करने का ठेका लेने वाला यह कथित शिक्षामित्र बिना नियमित स्कूल जाये वेतन लेकर जहां शिक्षक के पवित्र पेशे को कलंकित कर रहा है। वहीं एक गैर राजनैतिक संगठन का स्वयंभू अध्यक्ष बनकर यह शिक्षामित्र फर्जी बयानबाजी कर अधिकारियों को भी गुमराह कर उन्हे अपने प्रभाव में लेकर दलाली करने का काम कर रहा है।

गरीब बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए सरकार द्वारा गांव-गांव तैनात किये गये अधिकांश शिक्षामित्र जहां पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे है वहीं जिला मुख्यालय से सटे एक गांव में तैनात कामचोर शिक्षामित्र समाजसेवा और पत्रकारिता का लबादा ओढकर राजनेताओं की चाटुकारिता एवं मीडिया की दलाली के लिए सुर्खियों में है। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों का करीबी रिश्तेदार बताकर विद्यालय में तैनात स्टाफ पर धौंस जमाकर बिना पढाये मानदेय लेने वाला यह शिक्षामित्र जहां शिक्षक के पवित्र पेशे के साथ गद्दारी कर रहा है वहीं असलीयत बताने की बजाय अपने को समाजसेवी और एक तथा कथित पत्रकार संगठन का अध्यक्ष बताकर यह शिक्षामित्र खुलेआम दलाली करने का काम कर रहा है।

इन दिनों यह शिक्षामित्र लोकसभा का चुनाव लड़ रहे एक प्रत्याशी के लिए मीडिया मैनेजमेंट का ठेका लेकर चर्चा में है। अपने समर्थित प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए उक्त शिक्षामित्र अखबारों से जुडे कुछ एक रंगीन मिजाजी दोयम दर्जे के मीडिया कर्मियों को शराब और कबाब का इंतजाम करने के कारण भी खासा सुर्खियों में है। इसके अलावा गैर राजनैतिक संगठन के माध्यम से पृथक बुंदेलखंड राज्य निर्माण के आंदोलन का राग अलापने वाला यह शिक्षामित्र बीते विधानसभा चुनाव में टिकट लेने के बाद बुंदेलखंड कांग्रेस नाम के एक क्षेत्रीय दल को भी एन मौके पर धौका देने के लिए चर्चा में रहा है। समाजसेवा और पत्रकारिता का लबादा ओढकर अपने मूल कार्य के साथ विश्वासघात करने वाले उक्त शिक्षामित्र के विरूद्ध ग्रामवासियों द्वारा भी कई बार विभागीय अधिकारियों से कार्रवाई की मांग की जा चुकी है।

भड़ास को भेजे गए एक पत्र पर आधारित.
 

मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बन गए तो उन्हें समाजवादी पार्टी को शुक्रिया कहना भूलना नहीं चाहिए

Vikas Mishra : बात 1990 की है। इलाहाबाद के सलोरी मुहल्ले में सालाना उर्स था मजार पर। बहुत मजा आ रहा था। कव्वाल झूम झूमकर गा रहे थे। हारमोनियम पर पैसे भी चढ़ रहे थे। बीच बीच में अचानक कोई भीड़ में से उठता झूमने लगता और लोग उसे उठाकर मजार पर लाकर उसका सिर वहां पटकते थे। वो शांत हो जाता था। ऐसा सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ हो रहा था। हर तीन-चार मिनट में कोई झूमने लगता था। मैंने लोगों से पूछा-ये क्या हो रहा है। बताया गया कि उसे 'झाल' आ गया है। ये झाल उस पर आता है, जिस पर मजार वाले बाबा खुश होते हैं।

दूसरी रात गया तो वहां मुहल्ले के शुक्ला जी भी गए थे। खूब पैसे लुटा रहे थे, अचानक ही वो जोर जोर से झूमने लगे। चार पांच लोगों ने पकड़ा, लेकिन शायद उन पर बड़ा झाल आ गया था। किसी तरह उन्हें मजार पर लाया गया सिर मजार से छुवाया गया। बड़ी मुश्किल से शुक्ला जी शांत हुए, बेहोश भी हुए, फिर होश में आए। अगले दिन मैंने उनसे पूछा-शुक्ला जी क्या हुआ था अचानक। मैं जानना चाहता था कि 'झाल' आने पर कैसा महसूस होता है। वो होश में थे या नहीं। शुक्ला जी बोले- काहे का झाल। मुसलमानों को आ सकता है तो हमें क्यों नहीं आ सकता। सब मक्कड़ करते हैं, हमने भी किया। खैर शुक्ला जी पर आए झाल का चमत्कार दो हफ्ते के भीतर हुआ। उनका भतीजा सभासदी का चुनाव जीत गया। करीब करीब सारे मुस्लिम वोट उन्हें ही मिले थे।

हमारे चैनल के एक वरिष्ठ संवाददाता कई महीने पहले समाजवादी पार्टी के एक मुस्लिम नेता और सांसद प्रत्याशी का इंटरव्यू लेकर आए थे। इंटरव्यू के बाद उस नेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा-भाई मैं तो चाहता हूं कि मेरे खिलाफ वरुण गांधी उतर जाए, तभी मैं जीत सकता हूं। हमारे साथी ने पूछा- अब ये कौन सी गणित है। नेता जी बोले- भाई आप मुल्लाओं को नहीं जानते। जब तक इनके पिछवाड़े पर लात नहीं पड़ती, जब तक इन्हें डर नहीं लगता, ये इकट्ठे नहीं हो सकते। वरुण आएगा तो 'सालों' की फटेगी। एकजुट होकर वोट करेंगे। हमारे संवाददाता ने उस नेता की सोच को लेकर बड़े ताज्जुब के साथ ये दास्तान सुनाई थी।

मुस्लिम वोट की तिकड़म की दो दास्तान हमने सुनाई। चुनाव करीब आते ही मुस्लिमों के रहनुमा तरह-तरह का भेष तरह-तरह का ऑफर लेकर आ जाते हैं। कितने धूर्त, कितने मक्कार, कितने बेचारे हैं ये। सबसे बड़ी बात मुस्लिमों को ये कितना बेवकूफ समझते हैं। केजरीवाल गंगा में नहाने जाएंगे तो तौलिया हरे रंग की ही होगी, मुस्लिम इलाके में जाएंगे तो टोपी पर इबारत उर्दू में लिखी होगी, बिना ये जाने बूझे कि इलाके के लोग उर्दू जानते भी हैं या नहीं। राजनाथ सिंह, नीतीश कुमार टोपी पहनकर मुस्लिमों को टोपी पहनाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। आजम खां सेना में भी हिंदू-मुस्लिम कर रहे हैं। शहीदों और कारगिल विजेताओं पर सांप्रदायिकता की टार्च मार रहे हैं। मोदी भी मुस्लिम वोट के लिए लार टपका रहे हैं, फर्क ये है कि वो कंबल ओढ़कर घी पीना चाह रहे हैं।

नामांकन के दिन अपनी बात की शुरुआत ही उन्होंने बुनकर भाइयों से की। बीच में गुजरात के उन मुस्लिमों के करोड़पति बनने की कहानी सुनाई, जो पतंगबाजी के बिजनेस में थे। मुस्लिम वोट बैंक-हिंदू वोट बैंक के खांचे बनाने की कोशिशें पहले भी होती थीं, लेकिन ये चुनाव जितना सांप्रदायिक हो रहा है, उतना कभी नहीं हुआ। गिरिराज सिंह मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेज रहे हैं, जैसे उनके बाप का राज हो। प्रवीण तोगड़िया मुस्लिमों को हिंदू मुहल्ले में प्रॉपर्टी न खरीदने देने का फतवा जारी कर रहे हैं।

आजम खां ऐसे बोलते हैं जैसे बाबर-हुमायूं मुस्लिमों की देखभाल का जिम्मा इनके खानदान को सौंप गए हों। कम से कम यूपी में समाजवादी पार्टी और बीजेपी की पूरी कोशिश है कि वोटों का ध्रुवीकरण हिंदू-मुस्लिम के तौर पर हो जाए। केजरीवाल इन्हें नहीं कहते, लेकिन मुझे तो लगता है कि बीजेपी-मुलायम ही सही मायने में मिले हुए हैं। अगर बीजेपी को यूपी में सबसे ज्यादा सीटें मिलीं, अगर नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बन गए तो उन्हें समाजवादी पार्टी को शुक्रिया कहना भूलना नहीं चाहिए।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

बेहूदा अमेरिका खुद के अलावा शेष सबको चोर या बे-ईमान समझता है!

पंकज कुमार झा :  होंगे अमेरिकन अमीर. हम अपने घर में उनसे ज्यादा सुखी और संतुष्ट हैं. चोट्टों का अहंकार तो देखिये. भाई का काफी आग्रह था एक बार घूमने आने का. यहाँ एक मित्र को बताया तो वे भी काफी जिद्द करने लगे. अंततः तय किया कि चलो हो ही आया जाय एक बार. हालांकि मेरी ऐसी कोई विशेष रूचि कभी नहीं रही. भारत को ही ढंग से देख लिया जाय तो इस जीवन के लिए काफी है. पर फिर भी प्लान किया है. लेकिन वीजा की प्रक्रिया देख कर सर पीटने का मन कर रहा है. बेहूदा अमेरिका खुद के अलावा शेष सबको चोर या बे-ईमान समझता है क्या?

ढेर सारी कागज़ी कारवाई आदि तक तो ठीक था. अब जो वहाँ मेज़बान होंगे उनसे भी इन्हें इन्विटेशन का पत्र चहिये. वो भी छः-सात पेज का. अभी इन्विटेशन वाला फ़ार्म देखा. न केवल खुद का सारा विवरण इन्हें दे मेज़बान, बल्कि इनकम का प्रूफ तक सारा रिटर्न समेत. जबकि जाना मुश्किल से दो हफ़्तों के लिए हैं. सोच रहा हूँ रद्द कर दूं यात्रा. आखिर आप किसी को ये कैसे कह सकते हैं कि अपने आय आदि की सारी जानकारी इस तरह मुझे भेज दो.

अमरीका माय फूट.

भाजपा से जुड़े पत्रकार पंकज कुमार झा के फेसबुक वॉल से.

प्रोफेसर कौशल किशोर और इंडिया टीवी के खिलाफ बनारस में मुकदमा

वाराणसी : आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने गुरुवार की रात न्यूज चैनल के कार्यक्रम में उन पर हमला करने के आरोप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कौशल किशोर तथा उनके समर्थकों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करायी है।

भेलूपुर पुलिस थानाध्यक्ष वीके सिंह ने शनिवार को यहां बताया है कि भारती ने कल एक तहरीर देकर शिकायत की थी कि गुरुवार की रात एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी का विरोध और अरविंद केजरीवाल की तारीफ करने पर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कौशल किशोर और कई अन्य लोगों ने उन पर हमला कर दिया।

उन्होंने बताया कि भारती की तहरीर पर कौशल किशोर एवं अन्य के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। सिंह ने यह भी बताया कि बिना अनुमति कार्यक्रम का आयोजन करने के आरोप में टीवी चैनल इंडिया टीवी के खिलाफ आईपीसी की धारा 144 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
 

नोएडा में मीडिया कर्मी अंकित गुप्ता के घर चोरी

नोएडा : शहर के पॉश सेक्टरों में शामिल सेक्टर-15ए में बदमाशों ने मीडिया कर्मी के घर चोरी की वारदात को अंजाम दिया। बदमाश घर से लाखों रुपये कीमत का सामान चोरी कर ले गए। मीडियाकर्मी ने चोरी की शिकायत कोतवाली सेक्टर-20 पुलिस से की है।

सेक्टर-15ए में किराये के मकान में अंकित गुप्ता रहे हैं। वह मूलरूप से अंबाला कैंट के रहने वाले हैं। कुछ दिनों पहले उनका परिवार अंबाला चला गया था। घर पर अंकित अकेला रह गया था। शुक्रवार दोपहर को वह घर का ताला लगाकर सेक्टर-16ए फिल्म सिटी में अपने न्यूज चैनल के आफिस चले गए थे। देर रात वापस लौटे, तो घर का ताला टूटा था और अंदर सारा सामान फैला था। घर से एलइडी, लैपटॉप, टेबलेट, यूएस डालर, सौ चांदी के सिक्के व अन्य सामान चोर चोरी कर ले गए। कोतवाली पुलिस ने मौका मुआयना कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस सेक्टर के प्रवेश द्वारों पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज खंगाल रही है।  (साभार- दैनिक जागरण)
 

वरिष्ठ पत्रकार सरोज मित्तल का मुंबई में निधन

मुंबई : आजादी के बाद देश में महिलाओं के अधिकारों और उनकी असमान सामाजिक स्थिति को उजागर करने वाली प्रमुख पत्रकार सरोज मित्तल का कल तीसरे पहर साढे चार बजे मुंबई के बांद्रा स्थित आवास पर निधन हो गया। उनकी उम्र 73 साल थी। वे साठ के दशक में देश में उभरी महिला पत्रकारों की पहली पीढ़ी में शुमार थीं। उन्होंने महज 20 साल की उम्र में ही देश में महिलाओं की प्रतिनिधि पत्रिकाओं फेमिना और ईव्ज वीकली में महिलाओं के मुद्दों पर लिखना शुरू कर दिया था।

उसके बाद साल 1962 में वे बंबई से प्रकाशित प्रमुख हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स में महिलाओं के पन्ने की प्रभारी बन गईं। श्रीमती मित्तल लगभग 50 साल पत्रकारिता में सक्रिय रहीं। उन्होंने फेमिना से लेकर मनोरमा, साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, कादंबिनी, सरिता, मुक्ता, गृहशोभा, मेरी सहेली आदि में निरंतर यात्रा वृत्तांत, महिलाओं-युवाओें और अन्य सामयिक मुद्दों पर लेखन किया। अलबत्ता पिछले दो साल से अल्झीमर रोग से ग्रस्त हो जाने के कारण उनकी कलम विराम पा गई थी। श्रीमती मित्तल के परिवार में उनके पति और वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार मित्तल और एक बेटा एवं बेटी तथा नाती-पोते हैं।
 

दलित बहन-बेटियों पर की गई टिप्पणी से उजागर हुआ रामदेव का कुलषित चरित्र

रामदेव नाम का ढोंगी बाबा असल में घिनौने चरित्र का और रुग्ण मानसिकता का शिकार है जो दूसरों का उपचार करने की बात करता है लेकिन उसका स्वयं का मस्तिष्क विकृत हो चुका है। जिसे दलित समाज की बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार करने में शर्म नहीं आती, उसे इंसान कहना ही इंसान को गाली देना है। जो पुरुष एक औरत की इज्जत लूटता है तो उसको फांसी की सजा की मांग की जाती है। रामदेव ने तो देश की करोड़ों दलित बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर दिया है, अब रामदेव को कितनी बार फांसी पर लटकाया जाना चाहिये, इस बारे में भी देश के लोगों को सोचना होगा। अन्यथा ये भी साफ कर देना चाहिये कि इस देश में दलित स्त्रियों की इज्जत का कोई मूल्य नहीं है!

बाबा के नाम से अपने आप को सबसे बड़ा देशभक्त, ईमानदार और संत घोषित करने वाले स्वयंभू योग गुरू रामदेव का कालाधन, भ्रष्टाचार और हिन्दुत्व के बारे में असली चेहरा सारे संसार के सामने प्रकट हो गया है। राजस्थान के अलवर लोकसभा प्रत्याशी महन्त चॉंदनाथ को कालाधन के बारे में मंच पर बात करने से रोकने का बयान सारा संसार देख चुका है। जिससे उनकी काले धन की मुहिम के नाटक का पर्दाफाश हो चुका है। यदि रामदेव में जरा भी शर्म होती तो इस घटना के बाद वे जनता के सामने मुंह भी नहीं दिखाते, लेकिन जिन लोगों का काम देश के भोले-भाले लोगों को मूर्ख बनाना हो, उनको शर्म कहां आने वाली है? जो व्यक्ति शुरू से ही योग और प्राणायाम के नाम पर जनता के धन को लूटकर अपने नाम से ट्रस्ट बनाकर उद्योगपति बनने का लक्ष्य लेकर घर से बाहर निकला हो उससे इससे अधिक आशा भी क्या की जा सकती?

काले धन को विदेशों से देश में लाने की बढ़ चढ़कर बात करने वाला स्वयं काले धन के बारे में छुप-छुपकर बात करने की सलाह देता हो और फिर भी खुद को बाबा और देशभक्त कहलवाना चाहता हो, इससे अधिक निन्दनीय और शर्मनाक कुछ भी नहीं हो सकता।

काले धन के साथ रामदेवा का काला चेहरा सामने आये कुछ ही दिन बीते हैं कि रामदेव का कलुषित चारित्रिक भी देश ने देख लिया है। अब तो सारी हदें पार करते हुए रामदेव ने सम्पूर्ण दलित समाज की बहन-बेटियों की इज्जत को तार तार कर दिया है। रामदेव का कहना है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दलित बस्तियों में हनीमून मनाने जाते हैं। इससे पता चलता है कि रामदेव नाम का ढोंगी बाबा असल में कितने घिनौने चरित्र का और कितनी घटिया रुग्ण मानसिकता का शिकार है। जो दूसरों का उपचार करने की बात करता है, उसका स्वयं का मस्तिष्क कितना विकृत हो चुका है। जिसे दलित समाज की बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार करने में शर्म नहीं आती, उसे इंसान कहना ही इंसान को गाली देना है।

जो पुरुष एक औरत की इज्जत लूटता है तो उसको फांसी की सजा की मांग की जाती है। रामदेव ने तो देश की करोड़ों दलित बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर दिया है, अब रामदेव को कितनी बार फांसी पर लटकाया जाना चाहिये, इस बारे में भी देश के लोगों को सोचना होगा। अन्यथा ये भी साफ कर देना चाहिये कि इस देश में दलित स्त्रियों की इज्जत का कोई मूल्य नहीं है!

रामदेव कितना बड़ा जालसाज है, इस बात का केवल एक ही बात से परीक्षण हो चुका है कि पांच वर्ष पहले तक रामदेव हर बीमारी का इलाज योग के जरिये करने की बात करता था और आज वही रामदेव हर बीमारी का इलाज करने हेतु खुद ही दवा बनाकर बेच रहा है। लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश के भोले-भाले लोग ऐसे चालाक ढोंगी बाबाओं के चंगुल से आसानी से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं।

आसाराम का सच बहुत पहले ही देश और दुनिया के सामने आ चुका है। अब रामदेव का कलुषित चेहरा भी सबके सामने आ ही चुका है। दलितों की बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार करने वाला रामदेव आज भी सार्वजनिक रूप से बाबा बनकर घूम रहा है तो ये दलितों की सदाशयता है। अन्यथा तो ऐसे व्यक्ति का अंजाम तो कुछ और ही होना चाहिये था। दलितों की बहन-बेटियों और औरतों को रामदेव ने क्या वैश्या समझ रखा है कि कोई भी उनके साथ कभी भी आकर हनीमून मनाने को आजाद हो? रामदेव को ऐसी घटिया गाली देने से पहले हजार बार सोचना चाहिये था, लेकिन सोचते वहीं हैं, जिनकी कोई सदाशयी सोच हो। जिस रामदेव का एकमात्र लक्ष्य लोगों को मूर्ख बनाना हो उसे सोचने और शर्म करने की कहां जरूरत है?

इतनी घटिया टिप्पणी के बाद भी दलित समाज आश्‍चर्यजनक रूप से चुप है, ये भी दलितों के लिये अपने आप में शर्म की बात है। अन्यथा ऐसे घटिया व्यक्तव्य के बाद तो रामदेव नाम के ढोंगी का ढोंग सदैव को नेस्तनाबूद हो जाना चाहिये था। अभी तक तो रामदेव को जेल में होना चाहिये। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि देश के स्वघोषित भावी प्रधानमंत्री से गलबहियां लड़ाने वाले रामदेव को कोई भी छूने की कोशिश कैसे कर सकता है, आखिर सारे मनुवादियों का साथ जो उनके पीछे है। अन्यथा रामदेव की खुद की औकात ही क्या है? रामदेव का मनुवादी, कलुषित और कुरूप चेहरा देश और दुनिया के सामने है। अब इस देश से सहिष्णु, निष्पक्ष और सामाजिक न्याय की व्यवस्था में विश्‍वास रखने वाले देश के बुद्धिजीवियों, स्त्री हकों के लिये सड़कों पर आन्दोलन करने वालों, दलित नेताओं, स्त्रियों के हकों के लिये बढ़चढ़कर लड़ने वाले और लड़ने वालियों सहित, देश के कथित स्वतन्त्र एवं समभावी मीडिया के लिये भी यह परीक्षा की सबसे बड़ी घड़ी है कि वे रामदेव को जेल की काल कोठरी तक पहुंचाने में अपनी-अपनी भूमिकाएं किस प्रकार से अदा करते हैं! अब देखना यह भी होगा कि इस देश में दलित अस्मिता की खुलेआम धज्जियां उड़ाने वाले अपराधी रामदेव का अन्तिम हश्र क्या होता है?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
#09875066111

बनारस, धर्म निरपेक्षता और वामपंथ

बनारस से भाजपा प्रत्याशी के रूप में नरेन्द्र मोदी के चुनाव लड़ने की बात के सामने आते ही धर्म निरपेक्ष बौद्धिकों के द्वारा प्रतिरोध का उठना स्वाभाविक था। नरेन्द्र मोदी का बनारस से चुनाव लड़ने के पीछे भाजपा का मकसद अयोध्या के बाद बनारस को आधार बनाकर उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकीकरण की प्रक्रिया को तेज करना, हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण तथा देश में सांप्रदायिकता की राजनीति को आगे बढ़ाना था। उसी वक्त से ही धर्म निरपेक्ष व प्रगतिशील समाज के बीच इस विचार का जोर पकड़ना शुरू हो गया कि मोदी को शिकस्त देने के लिए उनके खिलाफ धर्म निरपेक्ष दलों को एकजुट होकर लड़ना चाहिए।

 
इस दौरान आप के नेता अरविन्द केजरीवाल ने यह घोषित किया कि यदि नरेन्द्र मोदी बनारस से चुनाव लड़ते हैं तो वे स्वयं बनारस से उनके विरुद्ध लड़ना पसन्द करेंगे और गुजरात के कॉरपोरेटपरस्त ‘मोदी मॉडल’ की असलियत से लोगों को परिचित करायेंगे। अपनी इसी योजना के तहत केजरीवाल 25 मार्च को बनारस आये। मीडिया की उपेक्षा के बावजूद बेनियाबाग की उनकी सभा को सफल कहा जाएगा क्योंकि अरसे बाद उस मैदान में इतनी भीड़ जुटी थी। दूसरी बात केजरीवाल का बनारस में मोदी समर्थकों द्वारा जिस अलोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया गया, स्याही व अण्डे फेके गये, उससे साफ था कि भाजपा ने केजरीवाल को अपने लिए चुनौती माना था। इसी सभा में केजरीवाल ने बनारस से चुनाव लड़ने की घोषणा की।
 
धर्म निरपेक्ष बौद्धिकों तथा प्रगतिशील लेखकों व संस्कृतिकर्मियों की ओर से अरविन्द केजरीवाल की इस घोषणा का आमतौर पर समर्थन किया गया और फेसबुक तथा अन्य माध्यमों से जो विचार सामने आये उसका निचोड़ यही था कि अपने को धर्म निरपेक्ष कहने वाले दल यदि बनारस में मोदी को हराना चाहते हैं तथा फासीवादी खतरे के प्रति उनकी चिन्ता वाजिब है तो उन्हें अपनी दलीय महत्वकांक्षाओं से ऊपर उठकर केजरीवाल का समर्थन करना चाहिए या सेकुलर दलों की ओर से संयुक्त प्रत्याशी उतारा जाना चाहिए ताकि बनारस फासीवाद का नहीं सेकुलरवाद की जीत का गवाह बने। इस संबंध में हिन्दी लेखकों व संस्कृतिकर्मियों के संगठनों-प्रलेस, जलेस, जसम व इप्टा की पहल की चर्चा करना प्रासंगिक होगा जिन्होंने इसी मकसद से अप्रैल के आरंभ में बनारस में बैठक की तथा इस संबंध का प्रस्ताव पारित किया। साहित्यकारों के संगठनों की सांप्रदायिक फासीवाद के विरुद्ध यह सांस्कृतिक पहल वाम व लोकतांत्रिक दलों को मशाल दिखाने वाली थी।
 
लेकिन बनारस में ऐसा संभव नहीं हो पाया और कथित धर्म निरपेक्ष दलों के ‘भाजपा विरोध’ और ‘सेकुलरवाद’ की पोल खुल गई। देखते ही देखते दलों ने अपने प्रत्याशी घोषित करने शुरू कर दिये। ज्ञात हो कि सीपीएम ने कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ ग्यारह दलों के जिस तीसरे मोर्चे की रचना की थी, उसकी ओर से भी बनारस में सेकुलर प्रत्याशी को लेकर कोई गंभीर कोशिश नहीं दिखाई दी। तीसरा मोर्चा भी अपना संयुक्त प्रत्याशी उतारने में असफल रहा। सीपीएम भी उसी राह पर बढ़ चली और उसने भी अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता हीरालाल यादव बनारस से पार्टी के उम्मीदवार बनाये गये। इस तरह बनारस में मोदी के खिलाफ धर्म निरपेक्ष व वाम दलों द्वारा गैरकांग्रेसी संयुक्त प्रत्याशी उतरे, इस जन भावना को गहरा धक्का लगा और मोदी को इस तरह की संयुक्त चुनौती नहीं दी जा सकी। इसने यह भी प्रमाणित कर दिया कि फासीवाद के विरुद्ध धर्म निरपेक्ष व वाम दलों की एकता की बुनियाद कितनी कमजोर तथा संकीर्ण हितों पर आधारित है।
 
कभी बनारस में वामपंथी दलों का मजदूरों, किसानों, गरीब-गुरबा वर्गों के बीच अच्छा काम काज व इन पर खासा प्रभाव था। 1967 के चौथे राष्ट्रीय आम चुनाव में बनारस लोकसभा सीट से सीपीएम प्रत्याशी सत्यनारायण सिंह ने जीत हासिल की थीं। उदल सीपीआई के लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने कोलअसला विधानसभा सीट से अपनी जीत का कीर्तिमान स्थापित किया था। लेकिन यह सब गुजरे जमाने की बात है। तब से गंगा में बहुत पानी बह चुका है। आज वामपंथ का वह जन आधार खिसक चुका है। 60 व 70 के दशक में बनारस में वामपंथ की जो प्रतिष्ठा थी, वह बरकरार नहीं रही।
 
ऐसे में सीपीएम द्वारा कामरेड हीरालाल यादव मोदी को कितनी चुनौती दे पायेंगे, यह प्रश्न बना रह जाता है। यहां कामरेड यादव की क्षमता, कर्मठता और जन समर्पण की भावना पर किसी किस्म के संदेह की जरूरत नहीं है। मूल बात सेकुलर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की है क्योंकि बनारस में कामरेड यादव की अधिकतम निर्भरता अपनी पार्टी के कैडर वोट पर है। इस वोट से मोदी को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती। इसीलिए सीपीएम द्वारा प्रत्याशी चयन को भी प्रश्नांकित किया जा रहा है। इस संदर्भ में आलोचक वीरेन्द्र यादव का यह विचार उचित जान पड़ता है कि बनारस से सीपीएम को अपने प्रत्याशी बदलने के बारे में विचार करना चाहिए और उसे ऐसा प्रत्याशी देना चाहिए जिसकी राष्टीय छवि हो। उनके विचार से यहां से सीताराम येचुरी या वृंदा करात या सुभाषिनी सहगल को पार्टी द्वारा प्रत्याशी बनाया जाता जो सेकुलर मतदाताओं के धु्रवीकरण में ज्यादा सफल होते।
 
अब सीपीएम द्वारा बनारस में अपने इस कदम को फासीवाद के विरुद्ध वाम एकता का प्रतीक तथा वामपंथ की स्वतंत्र राजनीतिक पहल व दावेदारी कहा जा रहा है। उनकी अपेक्षा है कि सारे वामपंथी संगठन, धर्म निरपेक्ष समाज व प्रगतिशील बुंद्धिजीवी उनका समर्थन करे। सुनने में यह अच्छा लग रहा है। उनकी अपेक्षा भी उचित प्रतीत होती है। लेकिन कई सवाल भी उठ रहे हैं। वे जिस वाम एकता व वामपथ की स्वतंत्र दावेदारी की बात कर रहे हैं, वह अवसरवाद और परिणामवाद से संपूर्ण संबंध विच्छेद की मांग करती है। देखने में यही आ रहा है कि स्वतंत्र दावेदारी की बात करने वाले वामपंथी अवसरवाद से वैचारिक संघर्ष के लिए तैयार नही है। बनारस में भी वे अपने अवसरवाद को ही विस्तार दे रहे हैं। यह उनका अवसरवाद ही है कि भले उत्तर प्रदेश में वामपंथियों के बीच एकता न हो लेकिन बनारस में यह एकता जरूर बन जाए।
 
जहां तक मेरी जानकारी है भाकपा, माकपा, माले व अन्य वामपंथियों के बीच उत्तर प्रदेश में एकता के लिए कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई। उत्तर प्रदेश में सारी ताकत मुलायम सिंह के साथ मोर्चा बनाने, उनसे तालमेल में गया। सारा पसीना  धर्म निरपेक्ष मोर्चे के लिए बहाया और हासिल के नाम पर शून्य। वे तो ऐसे तीसरे मोर्चे के रचनाकार रहे है जिसकी ड्राइविंग सीट पर वे मुलायम या जयललिता या नीतीश को बिठाते रहे और स्वयं महज पीछे से गाड़ी ढकेलने वाले बने रहना चाहते हैं। जैसे पिछले चुनाव में मायावती को बिठाया था। आखिरकार क्या हुआ उनके तीसरे मार्चे का? चुनाव आते आते उनके इस मोर्चे की हवा ही निकल गई। सारा कुछ बिखर गया।
 
यह सही है कि सरकार की नव उदारवादी नीतियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ वामपंथ के नेतृत्व में ही संघर्ष हुआ है, हो रहा है। पिछले साल 21 व 22 फरवरी को आजादी के बाद की सबसे बड़ी हड़ताल का नेतृत्व वामपंथियों ने ही किया। सवाल है कि वह एकता जो नवउदारवादी नीतियों के विरुद्ध बनी, वह एकता चुनाव जैसे राजनीतिक संघर्ष में क्यों बिखर गई ? क्या ‘वामपंथ’ इस पर विचार करने को तैयार है? उत्तर प्रदेश जहां वामपंथ अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है, ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं कि वामपंथी दल अन्य संघर्षशील लोकतांत्रिक ताकतों के साथ एकताबद्ध होते। कम से कम बिहार व उत्तर प्रदेश में तो वे एक साथ मिलकर कांग्रेस व भाजपा का मुकाबला करते। संभव है चुनाव में उन्हें कामयाबी नहीं मिलती लेकिन इससे वामपंथी कतारों व संघर्षशील जनसमुदाय में अच्छा संदेश जाता, वहं नवउदारवाद और फासीवाद से लड़ने का ही नहीं बल्कि वामपंथ के पुनर्जीवन का भी आधार बनता। लेकिन हमारे ‘वामपंथ’ की सारी ताकत अवसरवादियों के साथ एकता बनाने में गई। ऐसे में बनारस में वामपंथ की एकता और उसकी स्वतंत्र दावेदारी का राग बेसुरा सा लगता है।

 

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच
लखनऊ

पत्रिका ने छह संपादकों को जबरन मैनेजर बनाया, अन्य 15 नामों की सूची तैयार

पत्रिका ने अपने ही छह पत्रकारों के हाथ की कलम छीन ली है। उनके हाथ काट दिए हैं। उन्हें जबरन मैनेजर बनाया जा रहा है, जबकि उनकी इस तरह के काम की ना तो मंशा है और ना ही वे इसे करना चाहते हैं। पत्रिका ने बीकानेर के संपादक सुनील जैन और अजमेर के संपादक दौलत सिंह चौहान को कुछ दिन पहले ही संपादक के पद से हटा कर इन शाखाओं का मैनेजर बना दिया था। नौकरी करनी थी, इसलिए मजबूरी में वे प्रबंधन के इस फैसले पर चुप रहे। इसके बाद पत्रिका ने गत २४ मार्च को भीलवाडा के संपादक जयप्रकाश सिंह, कोटा के संपादक संदीप राठौड और पाली के संपादक राकेश गांधी को उनके पदों से हटा दिया और उन्हें एक महीने तक भोपाल में मैनेजर बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। अब इन्हें पत्रिका में कहा गया है कि किसी भी सूरत में संपादक का काम नहीं करना है। पत्रकारिता को मार दो और मैनेजर बन जाओ, सर्कुलेशन बढ़ाओ, विज्ञापन लाओ।

कहा जाता है कि पत्रिका के संस्थापक श्री कर्पूर चंद कुलिश पत्रकारों की बड़ी इज्जत करते थे। वर्तमान संपादक गुलाब कोठारी के लिए भी अभी तक यही कहा जाता था। लेकिन गुलाब जी के होते हुए भी पत्रकारों का खतना कर जबरन उन्हें मैनेजर बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ऐसे 15 संपादकों की सूची तैयार है, जिनकों जबरन मैनेजर बनाया जाना तय है। यह काम लोकसभा चुनाव के बाद होगा। जिन लोगों को संपादकों से मैनेजर बनाया है उन्हें अभी तो राजस्थान में ही पोस्टिंग देने का आश्वासन दिया है। शायद अन्य किसी अखबार में आज तक ऐसा नहीं हुआ होगा। कि पत्रकारों को मैनेजर बनाया जा रहा है। नौकरी जाने के डर से सब चुप हैं।

 

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

तनूजा शंकर डीडी नेशनल में चैनल एडवाइजर बनीं, श्रीकांत प्रत्यूष नक्षत्र न्यूज के मैनेजिंग एडिटर बने

खबर है कि डीडी नेशनल में तनूजा शंकर ने चैनल एडवाइजर के पद पर ज्वाइन किया है. तनूजा पत्रकारिता के अलावा शिक्षण, रंगमंच, फिल्म आदि क्षेत्रों से भी जुड़ी हुई हैं. वे कई न्यूज चैनलों में काम कर चुकी हैं. दूरदर्शन के कायापलट के इस दौर में तनूजा को कई जिम्मेदारियां दी गई हैं.

उधर, पटना से खबर है कि श्रीकांत प्रत्यूष ने नक्षत्र न्यूज चैनल के साथ नई पारी शुरू की है. उन्होंने मैनेजिंग एडिटर के रूप में ज्वाइन किया है.  श्रीकांत प्रत्यूष इससे पहले जी न्यूज़ में हुआ करते थे. जी न्यूज में वे करीब 18 वर्षों से बिहार के प्रभारी के रूप में कार्यरत थे. पिछले दिनों इन्होंने जी न्यूज से इस्तीफा दे दिया. श्रीकांत बहुधंधी आदमी हैं. खुद का प्रोडक्शन हाउस तो चलाते ही हैं, अपना एक निजी न्यूज़ चैनल पीटीएन न्यूज, नवबिहार, सन्मार्ग हिंदी दैनिक का प्रकाशन भी करते हैं.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाएं.

सितारगंज में अमर उजाला और श्री न्यूज़ के पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज

उत्तराखंड से खबर है कि अमर उजला के सितारगंज रिपोर्टर यामीन मालिक के खिलाफ सितारगंज कोतवाली में मुकदमा दर्ज़ किया गया है. शिकायतकर्ता अफरोज का कहना है कि उनकी दुकान के पास राजा और यामीन के भाई मोइन  का किसी बात को लेकर विवाद हो गया था. मोईन ने अपने भाई यामीन को फोन कर मौके पर बुला लिया.

आरोप है कि यामीन सहित कई लोगो ने मिलकर राजा पर हमला कर दिया. हमले में राजा को काफी चोटे आई हैं. पुलिस ने अमर उजला के पत्रकार यामीन अंसारी, उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की सितारगंज इकाई के महामंत्री व  श्री न्यूज़ के पत्रकार यामीन मालिक, मोईन के खिलाफ मुकदमा कायम किया है.

उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की सितारगंज इकाई ने एस डी एम को पत्र देकर पुलिस कार्रवाई का विरोध किया है और कहा है कि इस मामले की जांच जरूरी है. संडे पोस्ट के आकाश नगार का कहना है कि सितारगंज में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की चौकड़ी पत्रकारों पर फर्जी मामले दर्ज कराती रही है. पहले दि संडे पोस्ट के संवाददाता रवि रस्तोगी इसका शिकार हुए. इसके बाद एक अखबार चलाने वाले पत्रकार अकुंर ढल और अब न्यूज चैनल के पत्रकार भाई यामीन मलिक के खिलाफ फर्जी मामला दर्ज किया गया है.

गाजीपुर पुलिस को चुनाव में मीडियाकर्मियों से भी खतरा!

गाजीपुर के कासिमाबाद से खबर है कि शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव कराने के लिए थाना पुलिस ने बहादुरगंज नगर पंचायत के सभी प्रमुख समाचार पत्रों से जुड़े पत्रकारों पर भी धारा-107/116 की कार्रवाई करते हुए उन्हें पाबंद कर दिया। पाबंद हुए पत्रकारों में अशोक राय, कुतुबुद्दीन खां, मो. यूनुस, राजेश मौर्य, संतोष गुप्त प्रमुख हैं।

इस संबंध में चौकी प्रभारी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि थानाध्यक्ष घनश्याममणि त्रिपाठी की तरफ से कार्रवाई हुई होगी, इस बात की जानकारी उन्हीं को होगी। कासिमाबाद एसओ घनश्याममणि का कहना है कि यह मामला पुलिस चौकी क्षेत्र का है, हमें इस संबंध में कुछ मालूम नहीं है। कुल मिलाकर एसओ और चौकी प्रभारी भले ही एक-दूसरे पर कार्रवाई का ठीकरा फोड़ रहे हो, लेकिन पुलिस की इस तरह की कार्रवाई से पत्रकारों में गहरी नाराजगी है। (साभार- अमर उजाला)

बाबा रामदेव : मूतने से लेकर हनीमून तक…

कुछ तो सोचकर बोलो बाबा…  बड़ी हैरानी हो रही है आजकल बाबा रामदेव की बात सुनकर…  बाबा रामदेव को मैने खूब कवर किया उनके आन्दोलन के दौरान… बातें तो उनकी पहले भी  लोगोँ को चुभती थीं लेकिन मर्यादा मे रहतीं थीं लेकिन आजकल जाने बाबा को क्या हो गया है… शुक्रवार को लखनऊ मे कह डाला कि राहुल गांधी तो हनीमून  मनाने के लिये दलित के घर जाता है…. अगर वो किसी दलित की बेटी से शादी कर लेता तो वो भी दौलतमंद हो जाती…. अब बताइये बाबा के इस अनमोल वचन का क्या अर्थ निकाला जाये?

चलिए एक बार को मै भूल जाता हूँ कि मै एक पत्रकार  हूँ और मुझे आदत है तिल का ताड़  बनाने क़ी… लेकिन आप भी सोचकर बताइये दलित के घर हनीमून बनाने के इस बयान का क्या अर्थ निकाला जाये? अभी कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू मे आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल पर हमला करने के जोश मे बोल गये कि ''जितनी भीड़ केजरीवाल को सुनने  बनारस की रैली मे आयी थी न , उतनी भीड़ तो तब आ जाती है जब मैं मूतने के लिये गाड़ी से उतरता हूँ''

हद्द हो गयी भाई , माना आपकी केजरीवाल से नहीं बनती या आपकी और केजरीवाल की विचारधारा अलग है लेकिन इस तरह के शब्द एक योगगुरु के मुख से शोभा देते हैं ? योगी वो होता है जो अपनी इन्द्रियोँ को अपने वश में करके समाज मे एक आदर्श प्रस्तुत करता है लेकिन आप समाज के सामने ये कैसे उदाहरण रख रहे हैं? माना कि आपका समर्थन बीजेपी को है और कांग्रेस हो या फिर आम आदमी पार्टी ये सब आपके निशाने पर रहेंगीं… लेकिन ये विरोध भी कैसा अगर भाषा और शब्द मर्यादा की सीमा रेखा ही लांघ जाये !!

बाबा रामदेव……. देश और दुनिया मे आपके  बहुत से  शिष्य और अनुयायी हैँ जो आपको आदर्श मानकर आपकी इज़्ज़त करते हैं … ऐसी इज़्ज़त जो कोइ रातों रात नहीं कमाई , जाने कितनी मेह्नत और त्याग के बाद ये दिन देखने को मिला है आपको इसलिए आपसे गुज़ारिश है कि……. कुछ तो सोचकर बोलो बाबा…

एनडीटीवी में कार्यरत पत्रकार शरद शर्मा के फेसबुक वॉल से.

हे टाइम्स आफ इंडिया वालों, श्रद्धा में बह रहे मीडिया में तथ्य बह जाएं तो क्या आश्चर्य?

Dinesh Dadsena : लगता है कि बनारस में कारपोरेट मीडिया/भाजपा समर्थित कथित 'सुनामी' के सबसे पहले शिकार ख़ुद पत्रकार हो गए हैं और यह 'सुनामी' उन्हें पूरी तरह बहा ले गई है. सबूत चाहिए तो कल टीवी पर और आज के अखबारों में बनारस में नमो के नामांकन की रिपोर्टिंग पढिए. जिस श्रद्धा और भक्ति से रिपोर्टिंग की गई है, उसमें सबसे पहले तथ्यों को अनदेखा किया गया है.

उदाहरण के लिए आज के टाइम्स आफ इंडिया और इकनामिक टाइम्स की रिपोर्ट पढ़िए. एक ही संस्थान के दो अखबारों के रिपोर्टों में तथ्यों में फ़र्क़ है. उनकी तुलना बाक़ी अख़बारों की रिपोर्टों से कीजिए तो उन सबके बीच तथ्यों का फ़र्क़ साफ़ दिखने लगता है.

अगर मलदहिया से मिंट हाउस,नदेसर की दूरी गूगल मैप के मुताबिक़ १.७ किमी है, उसे २ किमी भी मान लिया जाए और उसे पूरी तरह लोगों से भरा हुआ भी मान लिया जाए तो उसमें ४० हज़ार से ज़्यादा लोग नहीं होंगे. वह लाखों और कुछ अख़बारों/चैनलों में ३ लाख तक कैसे पहुँच गई? थोड़ा सा गणित का इस्तेमाल कीजिए,आपको वहाँ पहुँची भीड़ का अंदाज़ा लग जाएगा. यह ज़रूर 'सुनामी' का ही असर है! श्रद्धा में बह रहे मीडिया में तथ्य बह जाएँ तो क्या आश्चर्य ?

http://timesofindia.indiatimes.com/videos/news/2-lakh-people-gather-for-Modis-roadshow-in-Varanasi/videoshow/34155944.cms

लंदन निवासी दिनेश डडसेना के फेसबुक वॉल से.

अपराध करते हुए पकड़वाने के लिये गुप्त रूप से किया गया स्टिंग ऑपरेशन अवैधानिक और अनैतिक है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी व्यक्ति को अपराध करते हुए पकड़वाने के लिये उसका गुप्त रूप से किया गया स्टिंग ऑपरेशन अवैधानिक और अनैतिक है। अत: स्टिंग ऑपरेशन करने को वैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। केवल यही नहीं आश्‍चर्यजनक रूप से सुप्रीम कोर्ट स्टिंग ऑपरेशन करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने और उनके खिलाफ मुकदमा चलाने को वैधानिक करार दे चुका है! जिसका सीधा और साफ सन्देश यही है कि आने वाले समय में सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को रिश्‍वत लेते, गैर कानूनी काम करते और भेदभाव करते हुए गुप्त रूप से कैमरे में कैद करने अर्थात् स्टिंग ऑपरेशन करने वालों के विरुद्ध तो निश्‍चित रूप से कार्यवाही होगी, लेकिन जिन लोगों को स्टिंग ऑपरेशन में पकड़ा जायेगा, उनको मासूम-निर्दोष मानते हुए और ये मानकर कि उनको गुप्त रूप से तथा अनैतिक तरीके से फंसाया गया, उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जायेगी।

आखिर इस प्रकार के निर्णय से सुप्रीम कोर्ट सन्देश क्या दे रहा है? विशेषकर तब जबकि इस देश की नौकरशाही का अभी तक का यह इतिहास रहा है कि यदि किसी न्यायिक निर्णय से नौकरशाही के किसी कृत्य या कुकृत्य को संरक्षण मिलता प्रतीत भी हो रहा हो, तो नौकरशाही द्वारा ऐसा निर्णय पूरी निष्ठा के साथ लागू किया जाता है, जबकि इसके विपरीत सूरत में अर्थात् जनहित को संरक्षण प्रदान करने वाला और नौकरशाही के कुकृत्यों को उजागर करने वाला कोई सटीक और सुस्पष्ट न्यायिक निर्णय भी यह कहकर लागू नहीं किया जाता है कि वह निर्णय तो एक प्रकरण विशेष के लिये है।

ऐसे हालातों में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय क्या-क्या गुल खिलायेगा, ये तो आने वाले समय में ज्ञात हो ही जायेगा, लेकिन यह निर्णय भ्रष्टाचार और अत्याचार के विरुद्ध समाज के हित में कार्य करने वाले लोगों, संगठनों और मीडिया के लिये भयावह तस्वीर अवश्य दिखला रहा है। यही नहीं यह निर्णय मीडिया को परोक्ष रूप से नियन्त्रित करता हुआ भी दिख रहा है। ऐसे में अब हमें निरपेक्ष भाव से इस बात की चर्चा करनी होगी और चिन्तन भी करना होगा कि कानून की व्याख्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित किये जाने वाले निर्णयों का न्यायिक औचित्य भी सिद्ध होना चाहिये, अन्यथा पिछले कुछ निर्णयों को देखें तो न्यायिक निर्णय भी प्रशासनिक निर्णयों की तरह नाइंसाफी और मनमानी को बढावा देने वाले ही प्रतीत हो रहे हैं।

पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट के बड़े ही अजीब निर्णय सामने आ रहे हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है-सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा हड़ताल करने को असंवैधानिक करार देने वाला निर्णय। लेकिन हास्यास्पद स्थिति ये है कि अपने इस निर्णय को स्वयं सुप्रीम कोर्ट ही लागू नहीं करने देता है।

पहला मामला-हड़ताल करना असंवैधानिक, लेकिन आरक्षित वर्ग के हितों के विरुद्ध की जाये तो वैधानिक : उच्च चिकित्सा के शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के अभ्यर्थियों को केन्द्र सरकार द्वारा आरक्षण प्रदान किये जाने के निर्णय का अनारक्षित वर्ग के रेजीडेण्ट डॉक्टरों द्वारा विरोध किया जाता है। निर्णय को रुकवाने के लिये हड़ताल का सहारा लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आधार मानकर केन्द्र सरकार रेजीडेण्ट डॉक्टरों की हड़ताल अवधि को अनुपस्थित मानकर उनका वेतन काट लेती है, जिसे रेजीडेण्ट डॉक्टरों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो बदले हालातों में सुप्रीम कोर्ट की राय भी बदल जाती है और अब सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आता है कि केन्द्र सरकार इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है कि वह हड़ताल करने वाले रेजीडेण्ट डॉक्टरों का वेतन नहीं दे रही?

दूसरा मामला-आरक्षित वर्ग के संरक्षण को बाधित करने के लिये की गई हड़ताल पर कोर्ट मौन : भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में पहले दिन से साफ शब्दों में लिखा हुआ है कि नियुक्तियों और पदों पर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों को आरक्षण प्रदान किया जायेगा। लेकिन इस सुस्पष्ट प्रावधान की अपने हिसाब से व्याख्या करते हुए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों को पदौन्नति में आरक्षण प्रदान करने को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैधानिक ठहरा दिया जाता है। पदौन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक करार देने वाले सुप्रीम कोर्ट के सामाजिक न्याय विरोधी निर्णय को ठीक करने के लिये केन्द्र सरकार ने संविधान में संशोधन करने का विधेयक संसद में प्रस्तुत ही किया था कि इसके पारित होने से पूर्व ही उत्तर प्रदेश के राज्य कर्मचारियों द्वारा इसके खिलाफ हड़ताल कर दी गयी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा हड़ताल करने को संविधान विरोधी ठहराये जाने के उपरान्त भी सम्पूर्ण न्यायपालिका द्वारा इस बारे में किसी प्रकार का संज्ञान तक नहीं लिया गया।

तीसरा मामला-कानून में द्वितीय विवाह करने पर पाबंदी, लेकिन ऐसा करने वाली की अवैध पत्नी को अनुकम्पा नियुक्ति देना वैध : सरकारी कर्मचारी द्वारा विवाहित होते हुए दूसरी औरत से विधि-विरुद्ध विवाह कर लेने को परोक्ष रूप से संरक्षण प्रदान करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्णय दिया गया कि दूसरा विवाह कर लेने वाले लोक सेवक की मृत्यु के बाद उसकी दोनों विधवा बीवियों की सहमति से मृतक के सेवानिवृत्ति के लाभ एवं अनुकम्पा नियुक्ति के हक दोनों के बीच बांट दिये जावें। जबकि भारतीय संसद ने आज तक ऐसा कोई कानून नहीं बनाया हुआ है।

चौथा मामला-विवाहित पुरुष द्वारा अपनी अवैध दूसरी पत्नी को गुजारा भत्ता दिया जाये, बेशक विधिवत वैवाहित पत्नी और बच्चों का बजट गड़बड़ा जाये : एक वैवाहिक मामले में सुप्रीम कोर्ट कहता है कि धोखे से विवाह करने वाले पुरुष द्वारा दूसरी पत्नी को गुजारा भत्ता दिया जावे, बेशक पहली विवाहिता पत्नी और उससे जन्मे बच्चों के पालन पोषण पर इसका दुष्प्रभाव ही क्यों ना पड़े। इस प्रकार कानून की नजर में एक अवैध और शून्य विवाह के आधार पर किसी पुरुष की बनने वाली दूसरी बीवी की तो सुप्रीम कोर्ट चिन्ता करता है, लेकिन कानून तौर पर विवाह रचाने वाली पहली पत्नी व उसके बच्चों के आर्थिक अधिकारों के हनन की कोई परवाह नहीं करता है। जबकि भारत की संसद की और से अभी तक ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया है।

पांचवा मामला-पत्नी को थप्पड़ और लात मारो तो चलेगा, लेकिन यदि बात करना बन्द किया तो तलाक : एक हाई कोर्ट कहता है कि बहू को सास और पति द्वारा थप्पड़ और लातें मारना अत्याचार और क्रूरता नहीं हैं। ऐसा तो सभी परिवारों में होता ही रहता है। अत: यह सामान्य बात है। इसलिये इसे क्रूरता मानकर तलाक की अर्जी स्वीकार नहीं की जा सकती है। जबकि एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट कहता है कि पति-पत्नी द्वारा आपस में बातचीत नहीं करना भी क्रूरता है और इस आधार पर तलाक मंजूर करना उचित है।

छठा मामला-भ्रष्ट नौकरशाहों का स्टिंग ऑपरेशन करोगे तो जेल में डाल दिये जाओगे : स्टिंग ऑपरेशन को अवैधानिक ठहराने का नवीनतम निर्णय है। जिससे भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले देशभक्त लोगों को दबाने में सरकारी कर्मचारियों और अफसरों को असंख्य मौके मिलेंगे। सबसे दु:खद बात तो ये है कि जब भी कोई सरकारी कर्मचारी-अधिकारी ऐसे किसी मामले को स्टिंग ऑपरेशन करने वाले के विरुद्ध या अन्य किसी के विरुद्ध कोर्ट में ले जाता है तो ऐसे मामले की पैरवी सरकारी खर्चे पर सरकारी पैनल के वकील द्वारा की जाती है, जबकि स्टिंग ऑपरेशन करने वाले को स्वयं मुकदमा लड़ना होता है, बावजदू इसके कि उसका इसमें कोई व्यक्तिगत हित नहीं होता है।

सुप्रीम कोर्ट आखिर चाहता क्या है? इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के ऊपरोक्त और अनेकानेक अन्य निर्णय ये सोचने को विवश कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट आखिर चाहता क्या है?

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' से संपर्क 09875066111 के जरिए किया जा सकता है.

पत्रकार को धमकाकर जोशी ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर किया आघात: झा

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी द्वारा इंटरव्यू के दौरान जी न्यूज के पत्रकार सुमित अवस्थी को धमकी दिये जाने की घटना की इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन (आईएफडब्ल्यूजे) के राष्ट्रीय सचिव कृष्णमोहन झा ने कड़ी निंदा की है। श्री झा ने कहा है कि मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता खुद को लोकतंत्र का सजग प्रहरी बताते हुए मूल्यों और मुद्दों के संदर्भ में खुद के अग्रणी होने का दावा करते हैं लेकिन साक्षात्कार के दौरान पत्रकार को सरेआम धमकी देकर जोशी ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर जिस तरह आघात किया है उससे उनकी तानाशाही व अहंकरी प्रवृत्ति बेनकाब हो गई है।

श्री झा ने कहा है कि पत्रकार को बेवजह धमकी देने के बजाय यदि जोशी अपनी पार्टी में व्याप्त भारी अंतर्विरोध व गतिरोध को दूर करने व अपनी चुनावी संभावना को मजबूत बनाते तो यह उनके लिये हितकर होता लेकिन पत्रकार को धमकाकर जोशी ने लोकतंत्र में खुद व उनके जैसे नेताओं की गरिमा को खत्म करने का ही काम किया है। श्री झा का कहना है कि प्रभावी पत्रकारिता तो पत्रकारों का कर्मसिद्ध अधिकार है तथा राष्ट्र व सामाजिक सरोकारों के संदर्भ में अपने अपेक्षित कर्तव्यों के पालन में भी पत्रकार अग्रणी रहते हैंए ऐसे में उनकी कार्यपद्धति की दशा व दिशा निर्धारित करने का हक मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को नहीं है।
 

सूचना आयुक्त ने वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता को जेल भिजवाया

सूचना का अधिकार कानून के इतिहास में सम्भवतः यह पहली घटना होगी जब सूचना आयुक्त ने आरटीआई कार्यकर्ता को अपने कक्ष से धक्के मार कर न केवल बाहर निकलवा दिया बल्कि पुलिस द्वारा पिटवाया और रिपोर्ट दर्ज करा कर रात के 10 बजे घर से गिरफ्तार भी करवा दिया।

दिनाकं 25 अप्रैल को सूचना आयोग में माननीय अरविन्द बिष्ट (टाइम्स आफ इंडिया के संपादक, मान्यता प्राप्त पत्रकार) के कक्ष में अशोक कुमार गोयल की अपील पर सुनवाई की तारिख थी जिसमें अशोक कुमार गोयल स्वयं उपस्थित हुए। मामले में पुनः तारिख दिये जाने का विरोध श्री गोयल ने यह कहते हुए किया कि मामला सन् 2011 से लम्बित चल रहा है और सम्बन्धित विभाग लगातार टालमटाले कर रहे हैं। अतः सम्बन्धित जन सूचना अधिकारी के खिलाफ अधिनियम में प्रदत्त प्रावधानों के मुताबिक दण्डात्मक आदेश पारित किया जाए। लेकिन माननीय आयुक्त महोदय केवल तारिख देकर मामले को टरकाना चाहते थे। जिसका श्री गोयल ने विरोध किया।

वॉयस ऑफ मूवमेंट में छपी खबर
वॉयस ऑफ मूवमेंट में छपी खबर

श्री गोयल की यही हरकत माननीय विष्ट साहब को बुरी लग गर्इ और उन्होने बाहर बैठे एसआई कमला कांत त्रिपाठी को बुला कर श्री गोयल को धक्के मार कर बाहर निकालने का आदेश दिया। साहब का आदेश पाते ही एसआई कमला कांत त्रिपाठी अपने पुलिसिया रौद्र रूप में आ गये और ब्लड प्रेशर, शुगर के मरीज 60 वर्षीय अशाके कुमार गोयल को घसीटते हुए चेम्बर से बाहर ले गये और जमकर ठोंक पीट डाला तथा तलाशी के नाम पर जेब में रखे हजारों रूपयों को कब्जे में ले लिए। मार खाकर श्री गोयल घर आ गये और जरिए ईमले शासन-प्रशासन को अपनी शिकायत भेजते हुए रपट दर्ज कर कार्यवाही करने की गुहार लगाई।

खबर है कि इसकी भनक लगते ही रात में ही माननीय विष्ट साहब ने पुलिस को खटखटा दिया और रात 10.00 बजे हजरतगंज की पुलिस श्री गोयल के चिनहट के गणेशपुर-रहमानपुर स्थित घर पर धमक गई। बताते हैं कि लगभग आधा दजर्न पुलिस ने घर में घुस कर न केवल उनकी पत्नि से अभद्रता की बल्कि श्री गोयल को उनके लड़के सहित हजरतगजं कोतवाली लाकर लॉकअप में डाल दिया। सबेरे श्री गोयल की तबीयत खराब होने पर पुलिस उन्हें पास के अस्पताल ले गई जहां डॉक्टरों ने आईसीसीयू में ले जाकर एक्सपर्ट डाक्टर को दिखाने को कहा लेकिन पुलिस ने उन्हें एक्सपर्ट डाक्टरों को दिखाने के बजाय पनु: लॉकअप में डाल दिया।

माननीय चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रटे की अदालत में पुलिस द्वारा पेश किये जाने पर श्री गोयल के अधिवक्ता ने उनके स्वास्थ्य, उम्र आदि का हवाला देकर जमानत पर रिहा करने का अनुरोध किया। लेकिन माननीय न्यायाधीश महोदय ने श्री गोयल शनिवार को पेश करने कर आदेश देते हुए जेल भेज दिया। बताया जा रहा है कि जहां माननीय श्री अरविन्द विष्ट साहब प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया माननीय मुलायम सिहं यादव के समधि हैं तो वहीं पूरी पुलिसिया कार्यवाही को अंजाम देने वाले हजरतगंज कोतवाली प्रभारी अशोक कुमार वर्मा जी माननीय युवा मुख्यमंत्री अखिलेश जी के करीबी दोस्त हैं। सम्भवतः इसी कारण देर रात तक एसएसपी साहब को इस वारदात की कोई जानकारी नहीं होने पाई। वाकई में इस प्रकरण में पुलिस की तत्परता को देख कर आश्चर्य होता है कि आखिर इतनी काबिल पुलिस के रहते प्रदेश में क्यों लगातार काननू -व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती जा रही है? शायद इसका जबाव यही होगा कि हल्लाबोल राज में पुलिस का नहीं गुंडे बदमाशों का शासन चलता हैं जिसकी रखवाली पुलिस करती है।

 

महेन्द्र अग्रवाल। संपर्कः newskootchakra@gmail.com

अरे मूर्ख रामदेव, तुमने सच बोलकर संघियों-भाजपाइयों की ठगी पर पानी फेर दिया!

Arvind Shesh : रामदेव ने राहुल गांधी पर हमला करने बहाने दलित समाज को जिस तरह ज़लील किया है, वह आरएसएस और भाजपा के सामाजिक दर्शन की ही अभिव्यक्ति है। गड़बड़ सिर्फ यह हो गई कि रामदेव नाम के इस मूर्ख बाबा ने इतना भी ध्यान रखना जरूरी नहीं समझा कि चुनाव चल रहे हैं और उसकी इस मूर्खता का नुकसान उसके भाजपाई मालिकों को हो सकता है। अभी संघी और सबकी ठगी का दौर चल रहा है, उसमें रामदेव ने एक तरह से कूड़ा कर दिया है।

लेकिन अब एक बात!!! मूर्ख रामदेव के मुंह से क्या यह बात अचानक निकल गई! ऐसी बातें दो मुख्य वजहों से बोली जाती हैं। एक, ध्रुवीकरण के मकसद से और दूसरे, कोई चीज हासिल करने की मंशा में नाकाम रहने पर हताशा में अपने सिर का बाल नोचते हुए पागलों की तरह चीखते हुए।

रामदेव का बयान दरअसल फ्रस्टेटियाए हुए उसके मालिकों की हताशा को रिप्रेजेंट करता है। आरएसएस और भाजपा को समझ में आ गया है, उत्तर प्रदेश में उसकी फर्जी लहर को औकात दिखाने में राज्य के दलितों ने सबसे बाजी मार ली। जैसे आरएसएस ने अपने "कोर वोटर" को पिछले छह महीने में पूरी तरह अपने साथ किया है, उसी तरह उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे इलाकों में दलित वोटरों ने ठोस तरीके से तय कर लिया है कि उसे हर हाल में नरेंद्र मोदी और उसके मूलाधार आरएसएस-भाजपा के खिलाफ खड़ा होना है। इसलिए रामदेव की मूर्खता को आरएसएस की खीझ समझिए।

लेकिन जिस तरह रामदेव ने दलित समाज की तमाम महिलाओं के सम्मान पर हमला किया है, उसके बदले अगर सार्वजनिक रूप से उसकी पिटाई की जाए, उस पर थूका जाए और उसे जेल में ठूंस दिया जाए तो यह भी बहुत कम होगा। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि आरएसएस और भाजपा के सामाजिक दर्शन में स्त्रियों और दलितों के लिए यही जगह है और रामदेव ने उसे ही सिर्फ जाहिर किया है। और आरएसएस जानता है कि उसके ब्राह्मणवाद की रीढ़ के रूप में ओबीसी नरेंद्र मोदी या रामदेव ही उसके असली एजेंडे का घोड़ा बनेंगे…! सुनो रामदेव और नरेंद्र मोदी… तुम जगन्नाथ के रथ को सिर्फ कंधा दे सकते हो, जगन्नाथ नहीं हो सकते… तुम सिर्फ सीढ़ियां हो सकते हो, जिस पर पांव रख कर लोग छत पर जाते हैं…! तुम्हारी औकात यही है…!

पत्रकार अरविंद शेष के फेसबुक वॉल से.

मशहूर कवि दुष्यंत कुमार ने धर्मयुग के संपादक को जो कविताएं लिख भेजीं, उसे आप भी पढ़ें

Vivek K Gupta : मशहूर कवि दुष्यंत कुमार की धर्मयुग के संपादक को लिखी ये कविता आज की परिस्थिती में भी कितनी प्रांसगिक है…दुष्यंत कुमार जी की लेखनी को शत शत प्रणाम, दुष्यंतजी के सहारे ही कम से कम पसीजिए तो हुजूर……

पत्थर नहीं हैं आप तो पसीजिए हुज़ूर ।
संपादकी का हक़ तो अदा कीजिए हुज़ूर ।

अब ज़िंदगी के साथ ज़माना बदल गया,
पारिश्रमिक भी थोड़ा बदल दीजिए हुज़ूर ।

कल मयक़दे में चेक दिखाया था आपका,
वे हँस के बोले इससे ज़हर पीजिए हुज़ूर ।

शायर को सौ रुपए तो मिलें जब ग़ज़ल छपे,
हम ज़िन्दा रहें ऐसी जुगत कीजिए हुज़ूर ।

लो हक़ की बात की तो उखड़ने लगे हैं आप,
शी! होंठ सिल के बैठ गए ,लीजिए हुजूर ।

विवेक के. गुप्ता के फेसबुक वॉल से.

पहाड़ी और ब्राह्मण वोट के लिए राजनाथ सिंह ने एनडी तिवारी के चरणों में सर झुका दिया

Sanjay Sharma : राजनाथ सिंह मोदी की हालत खराब करना चाहते थे पर खुद फंस गए. कभी कल्वे जब्बाद के घर जा कर टोपी पहन कर अपने सामने मोदी जी के खिलाफ बयान दिलवा रहे हैं तो कभी लाल जी टंडन की चरण वंदना कर रहे हैं. आज तो हद कर दी उन्होंने. एनडी तिवारी के घर पहुंच गए. चरणों में सर झुका दिया कि शायद पहाड़ी और ब्राह्मण वोट मिल जाये.

राजनाथ जी, एन डी तिवारी के चरित्र का रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है. चार चार महिलाओं के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़े जाने के बाद आंध्र प्रदेश के राज भवन से बाहर किये गए थे. बुढ़ापे में उसी तरह बाप बने हैं जिस तरह आपके मोदी जी अभी-अभी दूल्हा बने हैं. अरे अध्यक्ष जी, गाज़ियाबाद छोड़ कर भागते नहीं तो यहाँ से अच्छी हालत होती ..हर बार नयी सीट कब तक खोजेंगे ..यहाँ तो हालत ख़राब ही हो रहे है रोज.

लखनऊ के पत्रकार संजय शर्मा के फेसबुक वॉल से.
 

कहीं सहारा बनारस और कानपुर की यूनिट न बंद हो जाये!

सहारा में काम करने वालों की हालत पतली होती जा रही है। सेलरी न मिलने से परेशान चल रहे सहाराकर्मियों का भविष्य खतरे में दिख रहा है। सुना जा रहा है कि बनारस और कानपुर यूनिट को बंद करने की तैयारी चल रही है। इसके पीछे अनुमान है कि एक तो खर्च अधिक और आमदनी कम होना और ऊपर से मजीठिया लागू किये जाने का कोर्ट का आदेश।

मजीठिया लागू न करने के लिए सहारा कई तरह के प्रयास कर रहा है। लेकिन ये साजिशें ही कहीं उसी पर भारी न पड़ जाये। ढेर सारे लोग वर्षों से महज 3 से 5 हजार पर काम इसलिए कर रहे हैं कि कभी सहाराश्री का दिल पिघले और उनको भी स्टाफर कर दिया जाये। ऐसा होना तो दूर इनको वेतन न देकर और इनकी उपस्थिति गुप्त रख कर किसी नयी साजिश की ओर इशारा किया जा रहा है।

वर्षों से काम कर रहे सहाराकर्मियों को इंतजार है तो बस उच्चतम न्यायालय के आदेश का जो मजीठिया को सभी शर्तों के साथ लागू करवाये। सहारा के अंदर असमंजस का दौर जारी है। एक ओर जहां स्ट्रिंगर्स अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं वहीं स्टाफर्स की हालत पतली है।  उनको कई गुना काम करना पड़ रह है। उनको ट्रांसफर का भी भय सताने लगा है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

एनएन यूपी उत्तराखंड ने महज दो महीने में दो नम्बर की कुर्सी पर कब्ज़ा जमा लिया!

यशवंत जी प्रणाम , भाई आपने हमेशा मेरी खबर को प्रकशित किया है इसके लिए आपका तहेदिल से धन्यवाद।  न्यूज़ नेशन के नए नवेले चैनल एन एन यूपी उत्तराखंड ने महज दो महीने और कुछ दिन में ही दो नम्बर की कुर्सी पर कब्ज़ा जमा लिया है.

इस सफलता पर चैनल हेड रंजीत कुमार को प्रबंधन द्वारा मेल से बधाई प्रेषित की गई है. कम समय में मिली इस सफलता के बारे में चैनल हेड रंजीत कुमार ने बताया की यह सब टीम की मेहनत का नतीजा है. साथ ही चैनल का फॉर्मेट इस प्रकार है की इसमे खबरों के आलावा और किसी तरह का प्रोपगंडा नहीं है.

यूपी उत्तराखंड की स्थानीय खबरों को विश्वनीयता और प्रमुखता के साथ दिखाए जाने से दर्शक उनसे जुड़ रहा है. चैनल जिस रफ़्तार से टीआरपी में आगे बढ़ रहा है वो दिन दूर नहीं जब नंबर वन की कुर्शी पर होंगे.  

NN UP UK Top-lines for Wk 16’14 (13th April-19th April)

CS 15+ Yrs, Uttar Pradesh/UK

1. Regional news viewership remained constant.

2. NN UP/UK is ranked # 2 with 27.3 % share which in last week was 18.2 %.

3. Z Sangam is No # 1 with 36.4 % share in Wk16.

4. Reach of NN UPUK is 2.23 Mn which in last week was 2.02 Mn- Gain of 10.7 %.

5. Z Sangam has highest reach of 2.8 Mn in Wk16.

6. TSV for NN UPUK has risen from 19 mins to 25 mins- Gain of 31 %.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मजीठिया पाने की जंग लंबी है, लेकिन लड़ना हमें ही होगा, आइए जानें कैसे लड़ें

मित्रों, मैं भी आपकी ही तरह एक पत्रकार हूं, जो देश के एक तथाकथित प्रतिष्ठित समाचार पत्र के लिए काम कर रहा है। आज किसी भी समाचार पत्र के दफ्तर जाएं, सभी साथी एक कॉमन विषय पर चर्चा करते मिलेंगे। कहीं खुलेआम, तो कहीं दबे स्वर में। वह विषय है, क्या मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों का हमें लाभ मिलेगा? अगर मिलेगा तो कब मिलेगा? कैसे मिलेगा? कितना मिलेग? अगर, नहीं मिलेगा तो क्यों नहीं मिलेगा? क्या चारा है अखबार मालिकों के पास? ऐसा कैसे हो सकता है कि ना मिले? आप ट्रेनी हों या संपादक? दिल पर हाथ रख कर पूछिये कि क्या इन विषयों पर अपने साथियों से चर्चा नहीं हो रही इन दिनों?

लेकिन, साथ ही एक और कॉमन सी बात उभर कर सामने आ रही है कि हमारे यहां मजीठिया लागू नहीं हो रहा है। कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया है हमारे मालिकों ने। हमारे वरिष्ठ जो कभी हमारे ही तरह मुफलिसी भरी जिंदगी से गुजरे हैं आज मालिकों के हाथ में कुछ हजार की अतिरिक्त पगार के लिए खिलौने की तरह खिलाये जा रहे हैं। निराशा होती है। मन में असंतोष जागता है। गुस्सा आता है। हम आखिर में मन को समझाते हैं कि हम कर भी क्या सकते हैं। रोजी-रोटी का सवाल है। लोन की इन्स्टॉलमेंट का सवाल है। बच्चों की स्कूल फीस का सवाल है। मकान के किराये का सवाल है। घर में अनाज जुटाने का सवाल है। केबल वाले को मासिक बकाया देने का सवाल है। दवा-दारु पे खर्च का सवाल है। मोबाइल खर्च। इंटरनेट खर्च। सप्ताहांत होने वाले खर्च। बिजली बिल। फलाना बिल। ढिमकाना बिल। इन सब के बारे में सोच कर हम चुप हो जाने का फैसला करते हैं। मन को समझाते हैं कि किसी भी तरह गुजारा तो हो रहा है। जिंदगी कट तो रही है। आपका ऐसा सोचना गलत नहीं है। हम सभी के साथ ऐसा हो रहा है और अगर कोई कहे कि उसे नौकरी गंवाने का डर नहीं तो वह गलत कह रहा है।

तो क्या हमारे पास कोई रास्ता नहीं है? क्या हम सरकार के फैसले और इस धरती पर मौजूद सबसे बड़े न्यायालय के निर्देश को न मानने वाले मुनाफाखोर मालिकों और उसके टट्टू संपादकों की मनमानी मानने को मजबूर हैं? नहीं। ऐसा नहीं है। अपने अधिकार को हासिल करने की हमारी लड़ाई लंबी और मुश्किल जरूर है लेकिन इसे लड़ना हमें ही है। कोई और आकर हमें हमारे हक दिला दे ऐसा नहीं होने वाला। अब बड़ा सवाल उठता है कि हम अपनी नौकरी बचाए रखते हुए इस कठिन लड़ाई को कैसे लड़ें। मेरे विचार से इसके लिए हमारे पास रास्ते हैं। मैं यह गारंटी नहीं ले सकता है कि ये सफल होंगे लेकिन हमें इन्हें आजमाना होगा। मैं एक-एक कर सभी विकल्पों को रख रहा हूं। आप सब इन पर विचार करें। फिर हम मिलजुल कर नई रणनीति तैयार करेंगे।

1)   सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नाम पत्र

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मजीठिया मामले पर सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने फैसला दिया है उसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश ने की है। वह कुछ दिनों में रिटायर होने वाले हैं। लेकिन, हमें इससे हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। व्यक्ति रिटायर हो रहा है, पद नहीं। हम सब ज्ञात-अज्ञात (अपनी इच्छानुसार) रहते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखें। इसमें हम अपनी पुरानी सैलरी स्लिप और अप्रैल महीने की सैलरी स्लिप लगा कर भेंजें और बतायें कि हमें मजीठिया नहीं दिया गया। अगर सैलरी स्लिप देना बंद कर दिया जाता है तो पहले के महीनों के और नये महीने का बैंक स्टेटमेंट पत्र के साथ भेजें। अगर हजारों पत्रकार-गैर पत्रकार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखते हैं तो इसका असर जरूर होगा।

2)  लेबर कोर्ट में गुमनाम रहते हुए अपने नियोक्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था है। इस पर विचार करें।

3)  किसी भी तरह की शिकायत, चाहे वह मुख्य न्यायाधीश को पत्र के माध्यम से की जा रही हो या लेबर कोर्ट में गुमनाम रहते की जा रही हो उसमें अपने संपादक को भी आरोपी बनाएं। चंद हजार रुपये अतिरिक्त लेकर अपने जमीर को बेचने वाले ये संपादक हमारी राह में मालिकों से भी बड़ा रोड़ा हैं। इन्हें हर हाल में सबक सिखाया जाना जरूरी है। अगर मालिकों को जेल भेजना है तो साथ में उन्हें पंखा झेलने के लिए इन चमचे संपादकों को भी जेल भेजना होगा। जैसे राजस्थान पत्रिका जयपुर हो तो आशुतोष, भुवनेश जैन, भास्कर का नेशनल आइडिएशन न्यूज रूम हो तो कल्पेश याग्निक, हिंदुस्तान दिल्ली हो तो शशि शेखर, अमर उजाला मेरठ हो तो राजीव सिंह, प्रभात खबर हो तो हरिवंश, अनुज सिन्हा जैसे संपादकों के खिलाफ भी शिकायत की जानी चाहिए. दुनिया भर के सामने महान बनने वाले ये संपादक कितने दोयम दर्जे के इंसान हैं यह दुनिया के सामने आना चाहिए।

4)  फ्लेक्स पर विज्ञापन – किसी शहर में बड़े फ्लेक्स पर कुछ दिन विज्ञापन देने का खर्च कुछ हजार रुपये आता है। हर शहर के पत्रकार चंदा जमा कर ऐसा कर सकते हैं। उस विज्ञापन पर लिखा हो कि जो अखबार अपने कर्मचारियों के हितों का ध्यान नहीं रखता क्या वह पाठकों के हितों का ध्यान रखेगा। उसमें वजाप्ता अखबार के नाम दिये जायें। जब तक ये फ्लेक्स हटाये जायेंगे तब तक हजारों लोग इससे वाकिफ हो चुके होंगे। ऐसा पंपलेट छपवाकर भी किया जा सकता है। और इन पंपलेटों को अखबार के माध्यम से ही लोगों तक पहुंचाया भी जा सकता है। इन पंपलेटों पर पाठकों से अपील की जा सकती है कि वह अपने अखबार से पूछें कि क्या वह अपने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत अपने पत्रकारों के हितों का ध्यान रख रख रहा हैं?

5)  गूगल एडवडर्स के माध्यम से वेबसाइटों पर यह विज्ञापन डाला जा सकता है कि कैसे देश के अखबार अपने कर्मचारियों का शोषण कर रहे हैं।

6)  पत्रकार समाज में मौखिक रूप से इन बातों का प्रचार-प्रसार कर सकते हैं और अपने मालिकों व संपादकों की वास्तविक छवि (जो कि वाकई घिनौनी है) को समाज के सामने रख सकते हैं।

मित्रों ये चंद उपाय मेरे जेहन में सरसरी तौर पर आये हैं। आप भी इन पर विचार करें और जनसत्ता, भड़ास और फेसबुक के माध्यम से कोई एक राय बनाकर आगे की रणनीति तय करें। इन बेहद बुद्धिमान बन रहे मालिकों को बुद्धिमानी के साथ ही मात दिया जा सकता है और इसके लिए अपनी पहचान जाहिर करना भी जरूरी नहीं है। इनके बीच रहकर इनके अभिमान और घमंड के सर को कलम करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। हम ऐसा अपनी नौकरी को बचाये रख कर भी कर सकते हैं। हमें इस तरह काम करना होगा कि हमारे बगल की कुर्सी पर बैठा साथी भी न जान पाये कि हम भी इस अभियान में शामिल हैं। भले ही वह भी इसमें शामिल क्यों न हो। आइए अलग-अलग रहते हुए भी इस कॉमन काउज (साझा लक्ष्य) के लिए गुमनाम रहते हुए एकजुट हुआ जाये और मालिकों की ईंट से ईंट बजा दी जाये।

आपका ही एक साथी
 

मीडिया की नजर में मौत की कीमत मोबाइल

यूं तो लखनऊ में हर दर्जे का पत्रकार मौजूद है, सबकी अपनी अलग पहचान है, कोई काम से जाना जाता है … कोई काम कम अपने नाम से ज्यादा जाना जाता है. तो किसी के चर्चे सरे बाजार हुआ करते हैं … लेकिन आजकल एक बहुत मजबूत टाइप खबर फैली हुयी है जो सौ फीसदी सही है … क्योकि आँखों देखी जो है … आलाधिकारियों तक इसके चर्चे है … मामला अपराध से जुड़ा है तो पुलिस अधिकारी भी बहुत मजे से चटखारे लेकर चर्चा कर रहे हैं कि आखिर हम तो लेने देने में बदनाम हैं लेकिन सबकी खबर लिखने छापने वाले आजकल खूब जुबानी हेडलाइन में छाये हुए हैं …  होना भी चाहिए … क्योकि आजमगढ़ से लखनऊ आकर बीडीएस करने आई प्रिया की मौत मामले में राजधानी लखनऊ के पत्रकारों ने मोबाइल के लिए खुद को बेंच दिया …

मामला कैरियर डेंटल कालेज में पढ़ने वाले मंसूर की मासूका की मौत का है …  मासूम महबूबा मंसूर की मोहब्बत में फंसकर मौत को गले लगा लिया …  कैरियर कॉलेज में पढ़ने वाली प्रिया से छह महीने से मधुर सम्बन्ध था … लेकिन मंसूर के मंसूबों को समझने में नाकाम प्रिया ने मजबूर होकर हमजा प्लाजा में अपने कमरे में मौत को गले लगा लिया … इसमें पुलिस ने मंसूर को दोषी मानते हुए आरोपी बना दिया और मीडिया मैनेज करने वाले प्रबंधन ने महंगा वाला मोबाईल पत्रकारों को बंटवा दिया …  

मोबाइल पाने वालों ने पहले होटल में जाकर दारु मुर्गे की पार्टी उड़ाई और चलते वक्त मोबाइल पाकर तोंद में हाँथ फेरते हुए निकले … मोबाइल आधा दर्जन हिंदी अखबारों के पत्रकारों मिला … जबकि एक मोबाइल अंग्रेजी अख़बार के पत्रकार को नसीब हुआ … सुना है बाकियों की आँखों में ये खटक रहा है … प्रबंधन और पत्रकारों के बीच सेटिंग कराने वाला चैनल का तथाकथित पत्रकार जिसकी ककहरा से लाठी चली है… इसी सूत्रधार ने बड़ी चालाकी से पूरे मामले को दबाने और निपटाने का काम किया है … सुनने में तो यहां तक आया है कि इस पत्रकार का भी बड़ा काला कारोबार है …

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

राजनाथ और राजकमल ने जनसंदेश टाइम्स से इस्तीफा दिया, डा. रविशंकर बने आकाशवाणी बनारस के केंद्राध्यक्ष

बनारस से खबर है कि जनसंदेश टाइम्स से राजनाथ तिवारी ने इस्तीफा दे दिया है. वे सिटी टाइम्स वाराणसी से जुड़ गए हैं. राजनाथ को सिटी टाइम्स का संपादक बनाए जाने की चर्चा है. सिटी टाइम्स अखबार को शैलेंद्र मणि ने शुरू किया है जो पहले जनसंदेश टाइम्स और दैनिक जागरण में संपादक रह चुके हैं. यह अखबार फिलहाल लखनऊ और इलाहाबाद से छप रहा है. जनसंदेश टाइम्स से कई लोगों के सिटी टाइम्स में जाने की संभावना है.

उधर, जनसंदेश टाइम्स, गाजीपुर से सूचना है कि राजकमल राय ने इस्तीफा दे दिया है. बीच चुनाव इस्तीफा देने के कारणों का पता नहीं चल पाया है. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन के अत्यधिक दबाव और कुछ नेताओं द्वारा बदला लेने की मानसिकता के कारण राजकमल राय को हटना पड़ा. उनके साथ उनकी पूरी टीम ने इस्तीफा दे दिया है.

वाराणसी से सूचना है कि प्रसार भारती ने आकाशवाणी के उप निदेशक डा. रविशंकर को वाराणसी का केंद्राध्यक्ष बनाया है. निवर्तमान केंद्राध्यक्ष बीआर जायसवाल पहले की भांति तकनीकी अनुभाग का कार्य देखेंगे.  कार्यभार ग्रहण करने के बाद डा. रविशंकर ने कहा कि आकाशवाणी की पहुंच 98 फीसद क्षेत्रों में है. नए श्रोता बनाने के लिए आधुनिक पद्धति अपनाई जाएगी.
 

कलयुग के महाभारत में काशी कैसे कुरुक्षेत्र बन गयी

गंगा और बुनकर। एक काशी के आस्तित्व की पहचान तो दूसरा प्रतीक और रोजी रोटी। नरेन्द्र मोदी ने बनारस में पर्चा भरते वक्त इन्ही दो मुद्दों को उठाया। लेकिन इन दोनों मुद्दों के साए में अगर बनारस का जिक्र होगा और वह भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर तो फिर आने वाले वक्त में काशी के भाग्य बदलेंगे या काशी देश की सत्ता परिवर्तन भर का प्रतीक बनकर रह जायेगा। हो जो भी लेकिन सच यही है कि बुनकर मजदूर बन चुका है और गंगा किसी बरसाती नाले में तब्दील हो चली है। दरअसल, गंगा की अविरल धारा अब गंगोत्री से काशी तक सिर्फ लोगों के जहन में ही बहती है। शहर दर शहर, गांव दर गांव। सौ पचास नहीं बल्कि ढाई हजार गांव इसी गंगा पर पूरी तरह आश्रित है और गंगा सिर्फ मां नहीं बल्कि आधुनिक दौर में जिन्दगी भी है। रोजगार है। कारखाना है। उद्योग है। सरकारी योजनाओं को समेटे है गंगा। लेकिन बिगड़े बच्चों की तरह गंगा को मां मानकर भी किसी ने गंगा के उस सच को नहीं देखा जिसके दायरे में गंगा का पानी पीने लायक नहीं बचा और सैंट्रल पौल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड को कहना पड़ा कि कन्नौज, कानपुर, इलाहबाद और काशी में तो गंगा नहाने लायक तक नहीं है।

 
गंगोत्री
से बंगाल की खाड़ी तक देश के 42 सासंद गंगा किनारे के क्षेत्र से ही चुने जाते हैं। अपने सासंद को चुनने वाले इन 42 लोकसभा क्षेत्रों के करोड़ों वोटरों के लिये सब कुछ गंगा ही है। लेकिन गंगा किसी के लिये कभी मुद्दा नहीं बनी। ऐसा भी नहीं है कि राजनेताओं या सरकारों के पास पैसे की कमी है। 1985 में गंगा एक्शन प्लान शुरु हुआ तो विश्व बैंक से लेकर गंगा के लिये काम करने वाले एनजीओ ने अपनी थैली खोल दी। 2011 में 7 हजार करोड़ तो विश्व बैंक से आ गया। करीब 10 हजार करोड़ की मदद पर सहमति दुनिया भर के एनजीओ और सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों से आ गयी। लेकिन काम सिर्फ कागज़ों पर ही रेंगता रहा। 896 करोड़ रुपये सीवेज के लिये दिये गये। कानपुर में बहते कूड़े को गंगा में गिरने से रोकने के लिये 145 करोड़ रुपये दिये गये। लेकिन सिवाय संसद से विधानसभा में गंगा सफाई को लेकर गूंज और निराशा के आगे बात कभी बढ़ी नहीं।

गंगा के पानी को टिहरी में पठारो से रोक कर भविष्य के गर्भ में प्रकृतिक से खिलवाड़ का रोना भी रोया गया। लेकिन मुनाफे और गंगा तक से कमाई के लोभ ने कभी राजनेताओ के दिल को डिगाया नहीं। लेकिन पहली बार कोई पीएम पद का उम्मीदवार काशी पहुंचकर जब इस भावुकता से बोला कि गंगा ने बुलाया है तो ही काशी आना हुआ तो शाय़द पहली बार राजनीति भी गंगा नहा गई। तो क्या गंगा की तस्वीर मोदी के सत्ता में आने के बादल सकती है। यकीनन कोई भी ठान लें तो गंगा फिर उसी अविरल धारा के साथ जिन्दगी का गीत सुनाती हुई बह सकती है। तो पहला सवाल क्या साबरमति के लाल ने आजादी दिलायी और अब काशी को गंगा लौटाकर मोदी भी गंगा के लाल तो हो ही सकते है। वही बुनकरों को लेकर जिस तरह नरेन्द्र मोदी ने मार्केटिंग का सवाल उठाया उसने झटके में बनारस के करीब डेढ़ लाख बुनकरो की दुखती रग पर हाथ रख दिया। क्योंकि बनारस की पहचान सिल्क साड़ी भी है।

मुगलिया सल्तनत तक बनारस के बुनकरों के हुनर पर रश्क करती थी। लेकिन ऐसा क्या हो गया कि मुगलिया सल्तनत की तरह हुनरमंद बुनकर भी अस्त हो गये। अग्रेजों ने मुगलों को खोखला बना दिया तो चीन के सिल्क ने बुनकरो की कमर तोड़ी। बीते 10 बरस में बनारस के 175 से ज्यादा बुनकरों से आत्महत्या कर ली। बुनकरों के हुनर को चुनौती मशीन ने दी। फिर मशीन भी बिजली की किल्लत में बैठ गई। हथेलियो पर रेंगते हुनर पर पेट की भूख भारी पड़ी और देखते देखते सिर्फ बनारस में 20 हजार से ज्यादा परिवार मजदूरी में लग गए। खेती से लेकर शहर में बड़ी-बड़ी अट्टलिकाओ की चमक दमक बरकरार रखने के लिये ईंट और सीमेंट की बोलिया उठाते मजदूरो को रोक कर आज भी पूछ लीजिये हर पांच में एक बुनकर ही निकलेगा। बनारस के जिस राजा तालाब पार बस्ती में एक वक्त करघो का संगीत दिन रात चलता रहता था। वही बस्ती अब सुबह होते ही मजदूरी के लिये निकलती दिखायी पड़ती है। कैसे हुनर लौटेंगे। कैसे पुश्तैनी काम दुबारा बनारस की गलियो में बिखरी पड़ी बस्तियों के आसरे दुबारा पुरानी रंगत में लौटेगा। भरोसा अब भी किसी को नहीं होता ।
 
ढाई बरस पहले राहुल गांधी ने सरकारी पैकेज देकर बुनकरो की भूख मिटायी थी। लेकिन चुनाव जीता समाजवादी पार्टी ने और सीएम होकर भी बुनकरों के जख्म में मलहम ना लगा सके अखिलेश यादव। अब पीएम पद के दावेदार मोदी ने हुनरमंद हाथों को दोबारा संवारने के लिये आंखो में सपने जगाये है। सवाल सिर्फ इतना है कि सत्ता की होड़ के साथ ही सपनो को जोड़ा गया है। जिसे बनाना या तोड़ना सिर्फ बनारस के हाथ में नहीं। तय देश को करना है। क्योंकि समूचे देश में ही हर हुनरमंद सियासी चालों तले बार बार ठगा गया है। और मजदूर बनकर जीने को अभिशप्त हो चला है। सपना टूटें नहीं उम्मीद तो की ही जा सकती है। लेकिन जिस तरह पर्चा भरने को ही सियासी ताकत का प्रतीक बना दिया गया । उसमें अगले 18 दिन तक यह मुद्दे मायने रहेंगे भी या नहीं यह देखना भी दिलचस्प होगा। क्योंकि महाभारत 18 दिन ही चला था। और जब युद्द खत्म हुआ तो युद्दभूमि में मौत से भी भयावह सन्नाटा था। घायल और मरे लोगों से पटे पडे युद्द भूमि के आसमान पर चील कौवे मंडरा रहे थे।

लेकिन बनारस की राजनीति के अक्स में क्या काशी 2014 के चुनाव का एक ऐसा युद्द स्थल बन रहा है जो महाभारत से कम नहीं है तो फिर मौजूदा वक्त में देश की राजनीतिक सत्ता की दौड़ में जिस जुनुन के साथ बनारस की गलियों में जन सैलाब उमड़ा। केजरीवाल के साथ सफेद टोपिया और लहराते सफेद झंडो के बाद मोदी के साथ केसरिया रंग से बनारस पटा गया। गगन भेदी नारों के बीच जनसैलाब लोकतंत्र की उस राजनीति को ही हड़पने को बेताब दिखा। जिसमें कोई मुद्दा मायने भी रखता हो या बहस की भी गुंजाइश हो। और अगर मोदी को ताकत जनसैलाब से मिली तो भी गंगा या बुनकर की त्रासदी चुनावी तंत्र में क्या मायने रखती है। हर किसी को चुनावी जीत के लिये अगर भीड़ ही चाहिये तो फिर जीतने के लिये हर हथकंथे को न्याय युद्द ही मान कर लड़ा जा रहा होगा । उसमें केजरीवाल इमानदारी या व्यवस्था परिवर्तन का नारा लगाये और मोदी गंगा की सौगन्ध खाने लगे तो फर्क किसे पड़ता है।
 
हां, लोकतंत्र का पर्व झटके में बनारस को एक ऐसे सियासी कुरुक्षेत्र में तब्दील करने को आमादा है, जहां महाभारत की आहट दिखायी देने लगी है। मोदी के पर्चा दाखिल करने के ठीक 18 दिन बाद वोटिंग होनी है। और 18 दिन चले महाभारत के बाद के दृश्य को अंधा युग ने बाखूबी खींचा है- टुकडे टुकडे हो बिखर चुकी मर्यादा/ उसको दोनो ही पक्षों ने तोड़ा/ पांड्व ने कुछ कम..कौरव ने कुछ ज्यादा / यह रक्तपात अब समाप्त होना है/ यह अजब युद्द है। नहीं किसी की भी जीत/ दोनो पक्षों को खोना ही खोना है।
 
लेकिन वह अंधा युग था। अब कलयुग है। जहा हर किसी को कुछ पाना ही पाना है। तो इंतजार कीजिये अगले 18 दिन के महाभारत का जिसकी मुनादी काशी में हो चुकी है।

 

वरिष्ठ पत्रकार पु्ण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से साभार।
 

बाल श्रमिक की फोटो लेने पर पत्रकार अखिलेश से होटल मालिक ने की मारपीट

सिवनी । बस स्टैंड बरघाट में शिव होटल के संचालक संजय सूर्यवंशी ने एक पत्रकार के साथ हाथापाई कर दी। पत्रकार ने होटल में काम करने वाले नाबालिगों की फोटो लेने का प्रयास किया था। बरघाट थाने में इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज करवा दी गई है। पत्रकार अखिलेश दुबे समाचार संग्रहण हेतु बरघाट गए हुए थे। बस स्टैंड पर उन्होंने शिव होटल में बाल श्रमिकों को कार्य करते देखा। उन्होंने अपने कैमरे से इसकी तस्वीर लेना चाहा। तभी होटल संचालक संजय सूर्यवंशी ने उन्हें गालियां बकते हुए उनके साथ मारपीट की।

शिव होटल के संचालक द्वारा पूरी तरह गुण्डागर्दी का रूख अख्तियार करते हुए पत्रकार अखिलेश दुबे को जमकर धमकाया गया। बाद में अखिलेश दुबे द्वारा इसकी सूचना अनुविभागीय अधिकारी पुलिस मोहन सिंह पटेल सहित बरघाट थाने को दी गई। बरघाट थाने में अखिलेश दुबे की रिपोर्ट पर धारा 294, 323 आईपीसी के तहत अपराध पंजीबद्ध कर घायल पत्रकार को मुलाहजे के लिए चिकित्सालय भेजा गया। मौके पर चिकित्सक द्वारा अखिलेश दुबे का परीक्षण कर अपने प्रतिवेदन में उन्हें सिवनी रिफर कर दिया गया। सिवनी में अस्पताल चौकी में कोई कर्मचारी उपस्थित न हो पाने से वे जिला चिकित्सालय में इलाज नहीं करवा पाए। बरघाट पुलिस द्वारा कराए गए मेडिकल परीक्षण में चिकित्सक ने पत्रकार अखिलेश दुबे के शरीर पर चोटों के निशान देखे हैं जिनका उन्होंने अपने प्रतिवेदन में उल्लेख भी किया है।

पुलिस सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि इस संबंध में जब पुलिस द्वारा हॉटल संचालक से पूछताछ की गई तो हॉटल संचालक द्वारा कहा गया कि बच्चा अपने पिता की जूठी प्लेट उठा रहा था, जबकि पत्रकार अखिलेश दुबे द्वारा बनाए गए वीडियो में बच्चे द्वारा लगातार जूठी प्लेटें उठाए जाने और टेबिल साफ करना साफ दिखाई दे रहा है। मजे की बात तो यह है कि फोटो और वीडियो में मौके पर कुछ पुलिस कर्मी भी बैठे दिखाई दे रहे हैं। पत्रकार के साथ फोटो खींचने पर हुए विवाद की खबर सिवनी में मीडिया जगत को लगते ही तल्ख प्रतिक्रियाएं आरंभ हो गई हैं। पत्रकार अखिलेश दुबे ने कहा है कि वे शुक्रवार को इसकी शिकायत जिला कलेक्टर भरत यादव, पुलिस अधीक्षक बी.पी.चंद्रवंशी सहित प्रदेश शासन और भारतीय प्रेस परिषद को करेंगे।

पत्रकार श्याम लाल यादव के घर चोरी

पत्रकार श्याम लाल यादव के घर चोरी होने की खबर है. वे गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित सेक्टर-5 में रहते है. श्याम लाल यादव के फ्लैट को चोरों ने निशाना बनाते हुए लाखों के माल पर हाथ साफ कर दिया. श्यामलाल अपने परिवार के साथ 22 अप्रैल को प्रतापगढ़ में अपने रिश्तेदार की तेरहवीं में गए थे.

बृहस्पतिवार देर शाम उन्हें चोरी की सूचना मिली जिसके बाद वह यहां पहुंचे. चोरों ने घर से हजारों की नकदी, सोने-चांदी के आभूषण, न्यूयार्क से लाया गया डिजिटल कैमरा सहित कीमती सामान चुराया है. इसी के साथ चोरों ने उनकी बेटी के मनी बैक, श्याम लाल को मिले पत्रकारिता के पुरस्कार व अन्य सामान को भी हानि पहुंचाई.
 

शादाब मुज्तबा, सुनील नायर और विक गुंडोत्रा के बारे में सूचनाएं

न्यूज 24 के आउटपुट हेड शादाब मुज्तबा ने आज तक ज्वाइन कर लिया है. वे आजतक से ही सात साल पहले न्यूज24 में आए थे. शादाब ने सुप्रिय प्रसाद के साथ न्यूज 24 तब ज्वाइन किया था, जब वो न्यज 24 के लिए अपनी टीम तैयार कर रहे थे. शादाब आज तक से उनके साथ आने वाले लोगों में आखिरी थे औरे वापस लौटने वालों में भी शादाब सबसे आखिरी हैं. शादाब ने नई पारी के बारे में फेसबुक पर लिखा है– ''अजीत अंजुम जी की अगुवाई में न्यूज 24 ने सबकुछ दिया.. नाम.. जिम्मेदारी.. काम करने की आजादी.. बॉस और सुपर बॉस तक सीधी पहुंच। सात साल ठाठ से अच्छे और बहुत अच्छे लोगों के साथ काम किया ..कहते हैं कि जिंदगी बदलाव मांगती है सो बदलाव ने आज अपना हक वसूल लिया। आजतक के साथ मैं पहले भी चार- पांच साल तक काम कर चुका था और सात साल बाद फिर सुप्रिय सर की टीम में शामिल हो गया।''

इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और सर्कुलेशन हेड के रूप में सुनील नायर को नियुक्त किया है. नायर मुंबई से अपना कार्यभार संभालेंगे और वह इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के सीईओ जॉर्ज वर्गीस को रिपोर्ट करेंगे.  इस ग्रुप के साथ यह उनकी दूसरी पारी है. नायर नेटवर्क18 से एक्सप्रेस ग्रुप में आए हैं.

गूगल की सोशल नेटवर्किंग साइट ‘गूगल प्लस’ के प्रमुख विक गुंडोत्रा ने कंपनी छोड़ने की घोषणा कर दी. गुंडोत्रा ने इस बात की जानकारी अपने गूगल प्लस पेज पर दी. गुंडोत्रा ने तीन साल पहले गूगल की सोशल नेटवर्किग साइट गूगल प्लस का लॉन्च किया था.  गुंडोत्रा ने कहा, ‘मैं करीब आठ साल बाद गूगल को छोड़ने की आज घोषणा कर रहा हूं. मैं भाग्यशाली हूं क्यों कि मैंने वास्तव में गूगल के प्रतिभाशाली लोगों के साथ काम किया’. उन्होंने गूगल को छोड़ने का कोई कारण नहीं बताया और न ही उन्होंने अपने भविष्य की योजना के बारे में कुछ कहा. आईआईटी मद्रास से पासआउट गुंडोत्रा पिछले 8 साल से गूगल में काम कर रहे थे. गूगल से जुड़ने से पहले गुंडोत्रा माइक्रोसॉफ्ट में काम करते थे.

 
 

Sahara withdraws case against ‘Mint’ journalist’s book

Mumbai: Sahara Group, which obtained a stay from the Calcutta high court in December on the publication of Mint journalist Tamal Bandyopadhyay’s book Sahara: The Untold Story and filed a Rs.200 crore defamation suit against the author and his publisher Jaico Publishing House, has withdrawn the case following an amicable settlement.

The book, which Bandyopadhyay wrote in his individual capacity, will now be released in May, a Jaico official said. Following the settlement, the book will incorporate a disclaimer issued by Sahara which says, “The book at best can be treated as a perspective of the author with all its defamatory content, insinuations and other objections, which prompted us to exercise our right to approach the court of law… By getting the opportunity to put forward our objections in the form of a disclaimer…in the best tradition of Sahara and our respect for a journalist’s freedom, we are…withdrawing the case we had filed against the publication of the book.”
This is Bandyopadhyay’s second book. His first book, A Bank for the Buck, tracing the growth of HDFC Bank Ltd into India’s most valuable bank, was a non-fiction best seller.

Sahara Group chief Subrata Roy and two directors have been in judicial custody in New Delhi’s Tihar jail since 4 March, after being arrested on 28 February on a non-bailable warrant issued by the Supreme Court for failing to attend a hearing related to contempt proceedings initiated by the Securities and Exchange Board of India (Sebi).

Sebi initiated the proceedings on grounds that they hadn’t heeded court orders to reimburse investors money to the tune of Rs.20,000 crore owed by two Sahara Group firms that raised the money through a scheme the market regulator later ruled was illegal.
The Supreme Court has set bail for Roy and the two other directors at Rs.10,000 crore, half of that sum through a bank guarantee. On Monday, the Supreme Court reserved its order on their bail application and agreed to consider an offer by Sahara Group to pay Rs.3,000 crore within three days and an additional Rs.2,000 crore by 30 May. It offered to give bank guarantees of Rs.5,000 crore by 20 June.

Sahara has filed a defamation case in a Patna court against Mint’s editor and some reporters over the newspaper’s coverage of the company’s dispute with Sebi. Mint is contesting the case.

साभार- लाइव मिंट डाट काम

सुनील जी की कर्म स्थली केसला में 5 मई को अस्थि विसर्जन

सुनीलजी की कर्म स्थली केसला में (इटारसी से २० किमी) ५ मई को उनकी अस्थियों का विसर्जन  उनके निवास स्थान पर स्थित जलाशय में किया  जाएगा.  इस दिन उनके और उनके साथी जनारायण और किशनजी की याद में एक सम्मेलन भी रखा है. इस सम्मलेन में उनके काम को आगे बढ़ाने के बारे में विचार होगा. आप लोग ५ मई सुबह या ४ मई की रात तक केसला पहुंचें. स्थानीय साथियों का हौसला बढ़ाएं.  केसला इटारसी स्टेशन से २० किमी दूर है. अपने आने और जाने के समय की  सूचना दें. अपने साथ ओढने के लिए चादर ले आएं,  यहाँ हल्की-फुल्की व्यवस्था रखेंगे.

सुनील आधुनिक युग के गांधी थे. जो कहा, वही जिया.   ३४ साल पहले, १९८० में  अपने राजनैतिक गुरु किशन पटनायक के साथ समता संगठन में जुड़  'वैकल्पिक राजनीति'  का सपना देखा. जब शहर का बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता इसे समझने और अपनाने को तैयार नहीं था, तब वो अपने साथी  राजनारायण के साथ इस प्रयोग को करने के लिए १९८४ से स्थायी रूप से केसला आकर रहने लगे. १९९० में राजनारायण और २००४ में किशनजी की मृत्यु हो गई.  और भी कई साथियों ने कई कारणों से उनका साथ छोड़ा, लेकिन वो अपने पथ पर अविरल चलते रहे. उनकी तमन्ना थी, लोकसभा चुनाव के बाद देश के बदलते राजनैतिक हालत को लेकर देश के जनसंगठन एक बार फिर एक हों. इस बात को लेकर वो अपने अंतिम दिनों तक बैचैन थे.  इस पत्र को उनसे जुड़े साथियों तक प्रसारित  करें.

अनुराग मोदी  

sasbetul@yahoo.com

09425041624

fagram 07869717160

rajendra 0942447101
 
अग्रेसित :

किसान आदिवासी विस्थापित एकता मंच।

सिंगरौली, मध्य प्रदेश।  

प्रेस विज्ञप्ति

भारत सरकार का दावा- रक्षा सौदों में हो रहे आत्मनिर्भरता के गंभीर प्रयास

भारत सरकार ने यह दावा किया है कि वह रक्षा सौदों में पूर्ण आत्म-निर्भरता के लिए गंभीरता से कार्य कर रही है। आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा अपने पीआईएल में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दिए आदेश के सन्दर्भ में भेजे सुझावों के जवाब में रक्षा मंत्रालय ने उन्हें अवगत कराया है कि नवीनतम रक्षा अधिप्राप्ति प्रक्रिया (डीपीपी)-2013 में बाई (इंडियन) तथा बाई एंड मेक (इंडियन) श्रेणी को बाई (ग्लोबल) श्रेणी से प्राथमिकता दी गयी है। इसी प्रकार बाई एंड मेक (इंडियन) श्रेणी को सरल बनाया गया है ताकि रक्षा उत्पादों के अवांछनीय आयात पर रोक लगाई जा सके।

मेंटेनेंस ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमटीओटी) का काम अब सार्वजनिक उपक्रम की जगह किसी भी भारतीय कंपनी को सौंपा जा सकता है।

डॉ. ठाकुर द्वारा एक स्वतंत्र आयोग बनाए जाने के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए हाल में रक्षा राज्य मंत्री की अध्यक्षता में रक्षा मंत्री उत्पादन कमिटी (आरएमसीपी) का गठन किया गया है जिसमे डिफेन्स सेवा, डीआरडीओ, सार्वजनिक उपक्रम तथा सम्बंधित उद्योग के प्रतिनिधियों को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के पुनरीक्षण तथा देश में रक्षा उत्पादन बढाने के उपयोगों के बारे में सुझाव देने का दायित्व सौंपा गया है। साथ ही मंत्रालय द्वारा पूर्व में इस सम्बन्ध में सौंपे रिपोर्ट का भी अध्ययन किया जा रहा है।

 

प्रेस नोट

सूचनाः ओमेक्स बिल्डर वापस नहीं कर रहा आरडब्लूए को आईएफएमएस मनी

ओमेक्स बिल्डर ने अपनी ओमेक्स हाईट विभूति खण्ड योजना में काफी धांधली की है। बिल्डर यहां की रेजीडेण्ट वेलफेयर एसोसियेशन को आईएफएमएस मनी वापस नहीं कर रहा है। मार्च 2010 से जून 2011 तक उसने मेसर्स सानवी को मेन्टीनेन्स एजेन्सी नियुक्ति किया था। जुलाई 2012 से एसोसियेशन को मेन्टीनेन्स का कार्य सौंप दिया गया था लेकिन आईएफएमएस मनी रूपये 4.5 करोड़ नहीं वापस किये। जुलाई 2012 से अबतक करीब दो वर्ष होने जा रहा है लेकिन ओमेक्स आईएफएमएस मनी वापस करने का नाम नहीं ले रहा है। पहले बिल्डर ने कई शर्तें रखी ऐसोसियेशन ने सारी शर्तें मान ली, एफीडेविट भी साइन कर दिया अब बिल्डर द्वारा नियुक्त एजेन्सी सानवी कम्पनी द्वारा फ्लैटों में गलत पुराने मेन्टीनेन्स बिल भेजे जा रहे हैं। मेसर्स सानवी के श्री अमित बन्सल का मो0नं0 09711800560 है।

    
ओमेक्स हाईट गोमती नगर योजना में 540 फ्लैट है। कई वर्षों से लोग इसमें रह रहे हैं। फ्लैट में रहने वाले लोगों ने ओमेक्स हाईट एपार्टमेन्ट ओनर्स एसोसियेशन के नाम से सोसायटी बना रखी है। फ्लैट खरीदते समय बिल्डर ने लोगों से 85 से 90 हजार रूपये प्रति फ्लैट आईएफएमएस मनी जमा कराया था। एसोसियेशन को मेन्टीनेन्स हैण्डओवर करते समय आईएफएमएस मनी वापस होनी थी।

एसोसियेशन के सचिव डीसी दीक्षित ने बताया कि आईएफएमएस मनी के ब्याज का इस्तेमाल लिफ्टों की एएमसी, फायर फाईटिंग सुरक्षा, ट्रांसफार्मर तथा जेनेरेटर के मेन्टीनेन्स इत्यादि में खर्च किया जाना होता है जिसका बजट सालाना करीब 20 लाख है। रुटीन मेन्टीनेन्स जैसे सफाई, सुरक्षा, जिम, स्वीमिंग पूल, क्लब, हॉर्टीकल्चर इत्यादि के लिए प्रत्येक फ्लैट मालिक एक रूपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से आरडब्लूए को जमा करता है जिससे यह खर्च चलतें हैं। किशोर गोयल जो कि ओमेक्स के रिजलन हेड हैं का फोन नं0 9935092314 है।

बिल्डर ने एसोसियेशन को बिना बताये एपार्टमेन्ट का कई बार नक्शा बदलवाया। यह एपार्टमेन्ट एक्ट 2010 का उल्लंघन है।

डीसी दीक्षित
सचिव,

ओमेक्स हाईट एपार्टमेन्ट ओनर्स एसोसियेशन,
मो. 09918324373, 09415900950
ईमेलः erdcdixit@yahoo.in

 

प्रेस विज्ञप्ति (दिनाकः 23-04-2014)

रॉबर्ट बढेरा की संपत्ती पर अमेरिकी अखबार के खुलासे के निहितार्थ

पिछले कई दशकों में देखा गया है कि किस तरह दुनिया भर में अमेरिकी हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिकी सरकार, प्रेस और पूरा समाज एकजुट होता रहा है। लोकतंत्र का झंडाबरदार बना घूमने वाला अमेरिका शेष विश्व में कैसे अपनी कठपुतली सरकारें बनवाता है, यह देखा-सुना सच है। सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने में माहिर अमेरिकी समाज के दोहरे मानक हैं, अपने लिए कुछ और तथा दूसरों के लिए कुछ और। उनका अपना मतलब हल हो जाना चाहिए, बाकी दुनिया जाये भाड़ में। मानवता, नैतिकता, आदर्श, सिद्धांत आदि सब का प्रयोग सिर्फ और सिर्फ वे अपने ही हित में किस तरह करते हैं, या फिर महज कागजी चीज के तौर पर इनकी अनदेखी-अनसुनी कर इन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है, इसका अनुभव पूरी दुनिया आये दिन करती रहती है।

 
विगत दस वर्षों में भारत में कांग्रेसनीत सरकार से यथासंभव लाभ कमाने के बाद अब नरेन्द्र मोदी के रूप में नये चेहरे को अपने देशवासी धन्नासेठों की तिजोरियां भरने को मुफीद मानने वाले अमेरिकी प्रेस ने इधर भारतीय लोकसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस की ही बधिया उधेड़ डाली है। ताकि उसके इस नये प्रहार का लाभ मोदी और भाजपा को मिल सके।
 
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घटनाक्रम के अनुसार अमेरिकी अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ द्वारा सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट बढेरा की संपत्ति के बारे में किये गये सनसनीखेज प्रहार ने कांग्रेस के लिए असहज स्थित में पैदा कर दी है। फलस्वरूप कांग्रेस को फजीहत से बचने और भाजपा को घेरने की नीयत से गुजरात में उद्योगपति अडाणी को नरेंद्र मोदी की ओर से कौड़ियों के भाव कथित तौर पर जमीन देने के मामले को अपनी ढाल बनाना पड़ा है।

हालांकि बढेरा की संपत्ति की बहुत ही कम समय में हुई बेतहाशा वृद्धि को लेकर भारत में बहुत पहले ही काफी हो-हल्ला मच चुका है, फिर भी इस अमेरिकी अखबार ने ठीक लोकसभा चुनावों के दौरान एक बार फिर से लोगों की याद ताजा करने के इरादे से लिखा है कि सोनिया गाँधी के दामाद ने पिछले एक दशक में रियल एस्टेट का साम्राज्य खड़ा कर लिया है, जबकि उनके पास इसका कोई अनुभव भी नहीं था। वॉल स्ट्रीट जर्नल की बढेरा को लेकर चर्चित खबर में कहा गया है कि पिछले दस सालों के दौरान कांग्रेस की सरकार केंद्र में रही, इस दौरान बढेरा ने व्यापक पैमाने पर जमीन खरीदी। अखबार का कहना है कि उनके पास हाइस्कूल तक की योग्यता भी नहीं थी और न ही प्रॉपर्टी कारोबार का कोई अनुभव।

खबर विदेशी अखबार में होने की वजह से मीडिया में छाई रही। कांग्रेस हाइकमान के निकट सम्बंधी का मसला होने के कारण पार्टी के लिए इसका जवाब देना भी आसान नहीं रहा। इसलिए पार्टी की तरफ से मैदान में उतरे कानून मंत्री तथा वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने रॉबर्ट बढेरा कुछ ही समय में करोड़ों-अरबों में कैसे खेलने लगे इसके तथ्यों पर स्पष्टीकरण देने के बजाय सिर्फ इतना भर कहा कि कानून अपना काम करेगा और यदि किसी के पास कोई सबूत है तो वह सामने लाये। इसके साथ ही उन्होंने आक्रमण को बचाव का बेहतर विकल्प मानने की नीति पर चलते हुए यह भी कहा कि गुजरात में उद्योगपति अडाणी को मोदी ने कौड़ियों के दाम जो जमीन दी है, उसके सारे सबूत हमारे पास हैं।

सिब्बल ने आरोप लगाया कि गुजरात में जमीन और शराब का अवैध कारोबार वैसे हो रहा है, जैसे कर्नाटक में खदान का काला धंधा हो रहा है। उन्होंने कहा कि गुजरात में कुल हानि 30 हजार करोड़ की है जिसमें अवैध शराब के कारण तीन हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान भी शामिल है। उन्होंने मोदी से पूछा कि क्या अवैध शराब मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी। अखबार के खुलासे पर ज्यादा बोलने से परहेज करते हुए कांग्रेस ने मोदी और अडाणी के व्यापारिक रिश्तों को ज्यादा उछालकर अपना बचाव करने की कोशिश भर की है। पार्टी के डेमेज कन्ट्रोल मैनेजरों का कहना है कि भाजपा अगर इस मामले को आगे भी तूल देना जारी रखती है तो इसके बाद ही पार्टी के दिग्गज मैदान में उतरेंगे। फिलहाल उसकी तरफ से बढेरा पर ज्यादा नहीं बोलने की रणनीति बनी है।

सिर्फ दसवीं पास रॉबर्ट बढेरा कैसे खेलने लगे करोड़ों-अरबों में, 42 मिलियन डॉलर की है कुल संपत्ति; राजस्थान के कोलायत में 2,000 एकड़ जमीन 7 करोड़ में खरीदी, कैसे रचा गया गोरखधंधा

‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट बढेरा के बारे में एक सनसनीखेज खबर राजस्थान के कोलायत इलाके से प्रकाशित करते हुए खुलासा किया है कि कैसे दसवीं पास बढेरा ने सत्ता में संपर्क का फायदा उठाकर अरबों रुपये का रियल एस्टेट का साम्राज्य खड़ा कर लिया, जबकि उन्हें इस काम का कोई तजुर्बा तक नहीं था। अखबार के अनुसार, वर्ष 2004 से 2007 तक बढेरा का व्यवसाय बेहद मामूली था और वह सस्ती ज्वैलरी का निर्यात करते थे। इसके बाद 2007 में उन्होंने 2,000 डॉलर (लगभग एक लाख रुपये) के बहुत मामूली निवेश से स्काइलाइट हॉस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड नामक एक कंपनी बनाई। केवल एक वर्ष बाद ही 2008 में कंपनी ने गुड़गाँव में 3.5 एकड़ कृषि भूमि 1.3 मिलियन डॉलर में खरीदी (!) हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने आनन-फानन 18 दिन के अंदर ही इसको कृषि से व्यावसायिक भूमि उपयोग की अनुमति दे दी, फलस्वरूप जमीन बेशकीमती हो गई। अगले चार साल में रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ. ने बढेरा को खासी रकम दी और कंपनी की बैलेंस शीट में इसे एडवांस बताया।

अखबार लिखता है कि पाकिस्तान की सीमा से सटे राजस्थान के कोलायत इलाके के ग्रामीणों को साल 2009 अब भी याद है, जब काले रंग की स्कॉर्पियो गाड़ी में सवार दरमियाने कद का एक शख्स वहाँ पहुँच कर ग्रामीणों से जमीन का मोलभाव करता है। यह शख्स बिना किसी हीला-हवाली के गाँववालों को उनकी जमीन के मुँहमाँगे दाम का हाथोंहाथ नगद भुगतान कर देता है। भू-राजस्व के रिकॉर्ड के अनुसार सैकड़ों एकड़ जमीन की खरीदारी करने वाला यह शख्स कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद और प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट बढेरा हैं। जमीन की खरीदारी के दौरान ही केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी कि सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन दिया जायेगा। जबकि 2011 में राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस की राज्य सरकार ने भी ऐसा ही ऐलान कर दिया।

भू-राजस्व के दस्तावेज बताते हैं कि तीन साल के अल्पकाल में ही इस जमीन की कीमत में छह गुना की अप्रत्याशित वृद्धि हो गई। बढेरा ने तब 2,000 एकड़ जमीन लगभग सात करोड़ रुपये में खरीदी थी। अखबार ने अपनी जाँच में पाया कि 44 वर्षीय बढेरा को रियल एस्टेट का पहले कोई अनुभव नहीं था। वर्ष 2012 में उन्होंने 12 मिलियन डॉलर की रियल एस्टेट संपत्ति बेची। अब भी उनके पास 42 मिलियन डॉलर की संपत्ति है। इस पर मचे बवाल पर सावधानी बरतते हुए राज्य सरकार के अधिकारी बस इतना ही कहते हैं कि वे जाँच कर रहे हैं कि कहीं जमीन खरीद में कोई गड़बड़झाला तो नहीं है।

मामले पर बढेरा के प्रवक्ता का कहना है कि चुनाव के समय इस तरह की हायतौबा मचती ही है, जमीन की खरीदारी में कोई गड़बड़ नहीं है लेकिन चुनाव में यह मुद्दा जरूर है। हालांकि बढेरा अभी तक किसी सरकारी जाँच में दोषी नहीं पाये गये हैं। हरियाणा सरकार ने एक भूमि सौदे की जाँच के बाद उन्हें क्लीन चिट भी दे दी है लेकिन इंडिया अगेंस्ट करप्शन की राय है कि मामले की जाँच फिर से होनी चाहिए। हालांकि मुद्दा जरूर महत्वपूर्ण है परन्तु यह भी विचारणीय है कि अमेरिकी अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने इसे ठीक चुनावों के समय ही क्यों उजागर किया। पिछले दो-तीन सालों से वह चुप्पी साधे रहा और जैसे ही भारत में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ न केवल तीव्र हुईं बल्कि दो चरण का मतदान हो भी चुका तब अखबार को सोनिया गाँधी के दामाद राबर्ट बढेरा के जमीन से जुड़े प्रकरण की यक-ब-यक याद आ गई। अखबार ने ‘स्टोरी’ के लिए जो समय चुना उससे उसकी मंशा साफ झलकती है।

 

श्याम सिंह रावत। संपर्कः ssrawat.nt@gmail.com
 

इतनी आसान नहीं दलित वोटों में सेंधमारी

नरेन्द्र मोदी के अम्बेडकर प्रेम के निहितार्थ

अखिल हिन्दूवादी मजबूत राष्ट्र के निर्माण का सपना दिखाकर भारतीय जनता पार्टी सदैव बहुसंख्यक हिन्दूओं के भावात्मक मुद्दों की राजनीति करती रही है। लेकिन इस राजनैतिक एजेंडे के बल पर लगभग 27 दलों के गठबंधन के सहारे पहले 13 दिनों और बाद में 13 महिनों के लिए अपना राज्याभिषेक करवाकर वह पिछले दस सालों से केन्द्र की सत्ता से वनवास भोग रही है। कुर्सी से दूरी की पीड़ाएँ एवं सत्ता पाने की भाजपा की छटपटाहट अब पूरी शिद्दत से सामने आ रही है। इसी के चलते नेतृत्व के स्तर पर इस बार उसने सवर्ण हिन्दू कैंडिडेट के स्थान पर अन्य पिछड़ा वर्ग से सम्बद्ध नरेन्द्र मोदी को आगे किया है। जाति के आधार पर अन्य पिछड़ा लेकिन वफादारी के स्तर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संध का कट्टर हिन्दूवादी सच्चा सिपाही।

सत्ता प्राप्ति के लिए ब्राह्मणवादी संघ और भाजपा ने अपनी आंतरिक कलह के बावजूद भी अपनी नजरों से सही हीरे की खोज कर ली है। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के तुरन्त बाद ही इस नायाब हीरे ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। जनता को भावनात्मक मुद्दो के आधार पर उकसाकर, अवसर के अनुकूल उनके प्रतीकों का राजनैतिक इस्तेमाल मोदी की जानी-पहचानी प्रविधि है। इसकी शुरूआत मोदी ने सरदार पटेल की सबसे बड़ी लौह-प्रतिमा बनवाने की घोषणा के साथ की।

गौरतलब है कि कॉरपोरेट घरानों द्वारा संरक्षित एवं पोषित श्री नरेन्द्र मोदी चाहते तो इस प्रतिमा का निर्माण सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातु से भी करवा सकते थे। या मूर्ति-निर्माण में अधिकांशतः प्रयुक्त कांस्य धातु का भी प्रयोग किया जा सकता था। लेकिन ऐसा करके वह राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जाना सम्भव नहीं था जो संघ और भाजपा अपने विश्वस्त सिपाही मोदी से चाहते थे। मोदी ने इस भव्य प्रतिमा के निर्माण के लिए उन तमाम मेहनतकश हाथों में चलने वाले औजारों का एक घिसा हुआ लौह का टुकड़ा दान देने की अपील की ताकि एकीकृत भारत के निर्माता लौह पुरूष सरदार पटेल की सर्वाधिक ऊँची लौह-प्रतिमा बन सके। प्रतिमा निर्माण के लिए मेहनतकश हाथों के लौह का एक टुकड़ा वस्तुतः मेहनतकश ओ.बी.सी. वर्ग का एक वोट था जिसके आधार पर भाजपा सत्ता पर काबिज होना चाहती थी। खैर प्रतिमा निर्माण की मोदी की यह महत्वाकांक्षी परियोजना अभी शुरू नहीं हो पाई है इसलिए ओ.बी.सी. वोट-बैंक भी उनके खाते में आ गया होगा उसे भाजपा का अधूरा व असंगत सपना ही समझा जाना चाहिए।

भावनात्मक मुद्दों की राजनीति करने वाली कोई भी पार्टी या व्यक्ति अपना प्रायोजित ईमानदार एवं नैतिकतावादी ऐजेंडा ही सामने लाती है जिसमें खुद के अलावा तमाम दूसरे लोगों के पापी होने का अभियोजन पत्र भी शामिल रहता है। 14 अप्रैल को बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की 123वीं जयन्ती पर नरेन्द्र मोदी ने ऐसा ही फरमाया। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर को उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का प्रतीक पुरूष बताते हुए कहा कि "कांग्रेस विगत 60 वर्षों से बाबा साहब का अपमान करती आ रही है। कांग्रेस ने हमें कोई कानून नहीं दिया है। सारे कानून हमारे संविधान निर्माता बाबा साहब की देन है। यदि एक चाय बेचने वाला आज प्रधानमंत्री बनता है तो यह बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की देन है। ऐसे महान व्यक्ति को कांग्रेस ने भारत रत्न नहीं दिया। उनको भारत रत्न उनकी पार्टी की सरकार ने दिया है।’’

श्री नरेन्द्र मोदी की इस बात से कोई प्रतिबद्ध दलित-चिंतक भी असहमत नहीं हो सकता कि दलितों और पिछड़ों को मानवोचित जरूरी कानूनी अधिकार दिलाने का श्रेय केवल और केवल बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर और उनके संघर्ष को है। लेकिन सवाल उठता है कि बाबा साहब का संघर्ष किसके विरोध में था? आज दलित और पिछड़ा समाज किस व्यवस्था या विचारधारा के कारण शोषित, पीड़ित एवं अपमानित है? जाहिर है कि दलितों व पिछड़ों के शोषण और अपमान के लिए हिन्दूवादी वर्ण व्यवस्था जिम्मेदार है और बाबा साहब का समूचा संघर्ष इसी व्यवस्था व विचार के विरोध में खड़ा है। वर्तमान भारत की दलित राजनीति में इस हिन्दूवादी वर्णव्यवस्था की घोषित नुमाइंदगी विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित भाजपा करती है। जिसके प्रतिनिधि चेहरे नरेन्द्र मोदी है। तब नरेन्द्र मोदी किस मुँह बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की प्रशंसा कर दलित वोट-बैंक को पाने की अपेक्षा रखते है? बाबा साहब अम्बेडकर का संसद एवं सार्वजनिक राजनीति में घोर विरोध करने वाले नरेन्द्र मोदी के आदरणीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी किस दल के सदस्य थें? दलितों और पिछड़ों को जरूरी मानवाधिकार एवं प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करने वाले मण्डल आयोग के खिलाफ कमण्डल की राजनीति करके दंगे फैलाने वाले लोग किस दल या विचारधारा के सदस्य थे? क्यों भाजपा के घोषण पत्र में मजबूत हिन्दूवादी राष्ट्र का नाम देखकर ही दलित समुदाय की रूह काँप जाती है?

14 अप्रैल को ही मोदी की सजातीय विचाराधारा के अरविन्द केजरीवाल को भी बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की याद आ गई। उन्होंने भी 65 वर्ष बाद अम्बेडकर के संविधान के फॉलो न होने की स्थिति पर अपना अफसोस जाहिर किया। उनसे भी पूछे जाने ही जरूरत है कि जब दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर उनका जरूरी प्रतिनिधित्व एवं न्यूनतम जीवन स्तर को सुनिश्चित करने के प्रयास हो रहे थे तब आप ’आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक श्री रविशंकर के साथ ’यूथ फॉर इक्वलिटी’ की मुहिम चलाकर क्या अम्बेडकरवाद को ही मजबूत कर रहे थे? आम-आदमी के नाम पर राजनीति करने वालों के यहाँ आम-आदमी कौन है और किसी दलित, पिछड़े या स्त्री को उनकी पार्टी में क्या स्पेस है इस पर अधिक कहने की जरूरत नहीं है।

नरेन्द्र मोदी जहाँ अपने भाषणों में लच्छेदार और अलोकतांत्रिक भाषा प्रयोग के लिए कुख्यात हैं उतने ही ऐतिहासिक तथ्यों के विकृतिकरण और उनकी असंगत प्रस्तुती के लिए भी। मुझे लगता है कि भाषा-प्रयोग कि दृष्टि से यह चुनाव आज तक का सर्वाधिक भ्रष्ट और लिजलिजा चुनाव है। स्थान और अवसर विशेष की जरूरतों के अनुसार नरेन्द्र मोदी अपनी लच्छेदार भाषा में अपने परिष्कृत इतिहास ज्ञान का परिचय भी देते रहते है। कभी वे तक्षशिला को बिहार में बताते है तो कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 1930 में लंदन में मरा हुआ बताते है। कभी चन्द्रगुप्त मौर्य को गुप्त वंश का मशहूर शासक बताते हैं तो कभी सिकन्दर को गंगा नदी के किनारे से भगा दिया गया बताते है और भगत सिंह को अण्डमान जेल में फाँसी दिया गया कहते है। ऐसी ही गलती उन्होंने 14 अप्रैल को भी कर दी। उन्होंने खुद की पार्टी की सरकार द्वारा अम्बेडकर को 'भारत रत्न’देने की बात कह दी। इतना सच अवश्य है कि वी.पी. सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन था। लेकिन अम्बेडकर को भारत-रत्न देने वाली वहीं वी.पी. सिंह सरकार जब दलितों को मजबूत कर रही थी तो कमण्डल और रथयात्रा के साथ वी.पी. सिंह की सरकार गिराने वाले भी तो मोदी ही की पार्टी के थे।

प्रसंगवश एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम ’प्राइम टाईम’ में उत्तर-प्रदेश की बसपा रैली का रविश का एक कवरेज मुझे याद आ रहा है। जिसमें दलित महिलायें दिन में कठोर मजदूरी करने के बाद शाम को रैली में शामिल होते हुए अपने घरों से थैले में खाना लाना नहीं भूलती है। वे जानती हैं कि जिस पार्टी की रैली में वे शामिल होने जा रही है उसे कॉरपोरेट घरानों का समर्थन हासिल नहीं है। जिसकी बदौलत रैलियों में बिसलेरी का पानी व पाँच सितारा होटलों का खाना उपलब्ध होता है। रविश द्वारा मोदी की लहर के बारे में पूछे जाने पर वे स्पष्ट जबाव देती है कि 'उनका व उनके वर्ग का कल्याण केवल बहन जी से ही सम्भव है।’ आज के दिन दलित वोटर इतना सजग है कि वह अपना हित और राजनीतिक ताकत समझता है। केवल अम्बेडकर जयन्ती पर बाबा साहब का नाम ले लेने वालों के साथ वह नहीं जाने वाला है। यह बात नरेन्द्र मोदी व केजरीवाल को समझ लेनी चाहिए। उदित राज और रामविलास पासवान के साथ आ जाने से यह समझने की भूल मोदी को नहीं करनी चाहिए कि उन्होंने दलित वोटर को भी साथ लिया है। उदित राज और पासवान रास्ता भूले हुए लोग है जिनकी शीघ्र घर-वापसी की प्रतिक्षा आज भी उनके दलित बन्धुओं को है।

अनिता सिंह
मो- 8447787065
ई-मेलः-singhdharmveeranita1981@gmail.com

 

‘येन केन प्रकारेण’ चुनाव जीतने की लालसा, खर्चीले चुनावों की जनक है

एक टी वी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के दौरान यह पता चला कि चुनावों में पैसे का कितना योगदान है और इसके दम पर क्या कुछ नहीं किया जा सकता। डमी प्रत्याशी खड़ा करके किसी जीतने वाले प्रत्याशी के वोट किस तरह काटे जा सकते हैं। इसमें निर्दलीयों और छोटी -छोटी पार्टियों की क्या भूमिका होती है, यह तथ्य सामने आता है। कॉर्पोरेट लॉबिंग का क्या मतलब है और बड़ी पार्टियां किसके इशारों पर चलती हैं, यह भी स्पष्ट हो जाता है। अतः यह अनुमान लगन कठिन नहीं कि भारत में, भ्रष्टाचार का मुख्य सूत्र, भारत की राजनीतिक व्यवस्था के भीतर है। यदि यहां भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कोई भी सार्थक पहल की जाती है तो उसमें अवश्य ही राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव एक अत्यावश्यक आधार होगा।

किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। राजनीतिक दलों की 'येन केन प्रकारेण' चुनाव जीतने की लालसा, खर्चीले चुनावों की जनक है। एक अनुमान के अनुसार आज विधानसभा की एक सीट के लिए 1 से 5 करोड़ रुपए तक की राशि खर्च करनी पड़ती है। लोकसभा की एक सीट के लिए 5 से 25 करोड़ तक के खर्च का अनुमान है। यह अनुमान ग्रामीण, अर्द्धशहरी तथा बड़े शहरों के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। यह पैसा कहाँ से आता है और कौन देता है, वह क्यों देता है यह गंभीर चिंता का विषय है। इतना चुनावी खर्च आखिर किसलिए? भ्रष्टाचार की तह में बस यही एक पहेली है जो इस तरह के कर्मों का पर्दाफाश कराती है।
 
हाल में राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली को सूचना का अधिकार, कानून के दायरे में लाने की आवाज उठी तो सभी राजनीतिक दल अपने सारे मतभेद भुलाकर इस बात पर एकजुट हो गए कि ऐसा नहीं होना चाहिए। स्पष्ट था कि राजनीतिक दल अपनी कार्यप्रणाली को विशेष रूप से वित्तीय लेन-देन को जनता के समक्ष नहीं लाने देना चाहते थे। तब इन पर कैसे अंकुश लगाया जाये? ऐसे राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाने का एक अति साधारण उपाय है कि इनके वित्तीय लेन-देन को चुनाव आयोग के समक्ष प्रत्येक तिमाही अथवा छमाही अवधि के बाद प्रस्तुत करना अनिवार्य बना दिया जाए और ऐसा न करने वाले राजनीतिक दलों के मुख्य अधिकारियों को दंडात्मक प्रावधान का सामना करना पड़े।

कम्पनियों के गठन और संचालन पर जिस प्रकार कम्पनी कानून के प्रावधान प्रत्येक कम्पनी के लिए वित्तीय खातों को कम्पनी बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाते हैं और न करने वाली कम्पनी के डायरैक्टरों पर दंडात्मक कार्रवाई की तलवार लटकी रहती है, हालांकि कॉर्पोरेट-राजनीतिक गठजोड़ इसे कमजोर करने में अपनी भूमिका निभाता है फिर भी राजनीतिक दलों के अपकृत्यों को नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग को भी ऐसे ही अधिकार दिए जाने चाहिए। भारत में राजनीतिक दलों की व्यवस्था, चुनाव आयोग के कितने नियंत्रण में है इसका आकलन जन प्रतिनिधित्व कानून की केवल एक धारा-29 से लगाया जा सकता है।

इस धारा-29 में नया राजनीतिक दल गठित करने के लिए चुनाव आयोग को पूर्ण विवरण सहित एक आवेदन दिया जाता है जिसमें मुख्य कार्यालय तथा पदाधिकारियों और सदस्यों की संख्या का विवरण दिया जाना होता है। इसी धारा में यह प्रावधान है कि कोई भी राजनीतिक दल व्यक्तिगत नागरिकों या कम्पनियों से दान स्वीकार कर सकता है। इसी धारा में यह प्रावधान है कि हर राजनीतिक दल का कोषाध्यक्ष चुनाव आयोग को अपने दल की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जिसमें उन व्यक्तियों या कम्पनियों के नाम शामिल करने आवश्यक होंगे जिन्होंने क्रमश: 20,000 और 25,000 रुपए से अधिक दान विगत वर्ष में दिया हो। इस धारा-29 में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है जिसमें राजनीतिक दल द्वारा वित्त के संबंध में अनियमितता बरते जाने पर सजा या जुर्माने आदि की कोई आपराधिक व्यवस्था हो।

इसी कमी का लाभ उठाते हुए भारत के सभी राजनीतिक दल पूरी तरह से परदे के पीछे  रहकर इस तरह की हेरा-फेरी करने में सफल हो जाते हैं ताकि उनके वित्तीय लेन-देन जनता के सामने न आ पाएं। जाहिर है ऐसी स्थितियों में भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता। यह राजनीतिक व्यवस्था इसकी संरक्षक है। इसलिए इस व्यवस्था में बदलाव अत्यंत आवश्यक है तभी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण संभव है।

 

शैलेन्द्र चौहान। संपर्क: पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद – 201014
 

आवश्यक है चुनावों की वित्त पोषण प्रणाली का पारदर्शी होना

अपने घर से लेकर बाहर तक मैं चुनावों के दौरान अक्सर यह बात सुनता हूं कि हारने वाले उम्मीदवार को मत देकर लोगों ने मत ख़राब कर दिया। या चुनावों के बाद वे पछताते हुए पाये जाते हैं कि उन्होंने जिसे वोट दिया था वह तो हार गया और उनका वोट बरबाद हो गया। आखिर यह कैसी मानसिकता है? क्या तुलसीदास ने इसीलिए लिखा था 'समरथ को नहीं दोस गुसाईं'। इस मानसिकता का उत्स कहाँ है? यदि गौर से इस बारे में सोंचा जाये तो हम देखते हैं कि हम सांस्कृतिक गुलामी से कभी मुक्त नहीं हो पाये। कभी राजाओं, नबाबों की गुलामी, उनके कारिंदों, जमीदारों, जागीरदारों की गुलामी, तो कभी उच्च वर्ण की गुलामी, या फिर पुरुषवर्चस्व की गुलामी। अंग्रेजों की गुलामी, प्रशासनिक अमले की गुलामी, और भारतीय राजनेताओं की गुलामी। और सर्वोपरि धन की गुलामी।

समाज में हर स्तर पर अनेकों भेद-विभेद हैं जो हमें बलशाली के इशारों पर विवश करते हैं, उसकी ओर आकर्षित करते हैं। उसका चरित्र और मानसिकता वहां गौण होती है उसकी शक्ति और प्रभाव प्रधान। उसके गुण अवगुण सब उसकी इस सामर्थ्य में छुप जाते हैं। चाहे भले ही वह अव्वल दर्जे का अपराधी ही क्यों न हो। जब मैं उन्हें समझाता हूँ कि चुनाव कराये ही इसलिए जाते हैं कि हम अपनी पसंद के प्रत्याशी को वोट करें वह हारे या जीते। अन्यथा चुनावों की क्या जरुरत है? जो बलशाली और पैसेवाला व रसूखदार प्रत्यासी हो उसी को जीता हुआ मान लिया जाये। ये पैसे का खर्च, समय की बरबादी, बेबजह का हो हल्ला, आरोप-प्रत्यारोप, गाली गलौज और बिना मतलब के तनाव आदि से बच जाये। विपक्ष की कोई आवश्यकता ही न रहे। जीतने वाला जो चाहे करे- सही-गलत, अच्छा-बुरा तब तो सब जायज होगा।

लोग ये बात सुनते हैं और यह मान भी लेते हैं कि चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है इसलिए सबको अपने अपने हिसाब से वोट डालने की आजादी है। इस तरह 'नोटा' विकल्प का तो कोई औचत्य ही नहीं है। अब संयोग से एक समझदारी भरा प्रश्न भी होता है कि चुनावों में बारी-बारी से हार-जीतकर चाहे किसी भी नाम वाली पार्टी की सरकार बनें, आखिरकार सत्ता व ताकत पर कब्जा तो कुछ ही 'माननीयों' का रहता है यह क्यों? तंत्र और व्यवस्था तो बदलती नहीं। यह भी स्पष्ट है कि इंसाफ के हक़ में जनता से उठने वाली हर सामूहिक आवाज को कुचलने के लिये सभी पार्टियों के नेता अपने सभी मनमुटाव, मतभेद, दुश्मनी भुलाकर सगे भाइयों की तरह तुरन्त एका कर लेते हैं। और विरोध करने वाले जागरूक लोगों को धमका कर झूठे मुकदमों में फंसाकर, जेलों में ठूंसकर, वक्त जरुरत हत्यायें कराकर, सुरक्षाबलों का नाजायज, गैरकानूनी इस्तेमाल कर, दंगे और  सामूहिक कत्ले आम तक करा देते हैं।

किसी भी आम आदमी को नक्सली, माआवादी, आतंकवादी या उग्रवादी का ठप्पा लगाकर जबरन मुजरिम बना लेते हैं। आज तो यही देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी हैं, व सबसे बड़ा सवाल भी। असल में मौजूदा भारतीय राजनीति में सब कुछ जायज है और सब कुछ क्षम्य। दिन रात झूठ बोलें फिर तुरत बदल जाऐं कहें क़ि उनकी बात को गलत तरीके से तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। चौराहे पर जाकर किसी को भी झूठे ही बदनाम कर दें और फिर माफी मांग लें तो आपका अपराध माफ। माफी मांगने से किया गया अपराध ‘न किया हुआ’ हो जाता है। यह सब ऐसा ही है जैसे कि आप पापकर्म भी करिए और गंगास्नान करके उस पाप से मुक्त भी हो जाइए। असल में हमारी प्रदूषित और भ्रष्ट चुनावी दौड़ को पैसा चलाता है जैसे रेस के घोड़े को पैसे का पर्याय माना जाता है।

वर्तमान में चल रहे ‘ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल सर्कस’ में छुटभैया नेता, जनसेवक, बड़े नेता और उनकी अपनी-अपनी पार्टियां चुनावों के लिए पैसा जुटाती हैं क्योंकि पैसा जुटाने का इससे बेहतर समय और क्या हो सकता है? फिर सत्ता में आने पर पांच वर्षों तक अकूत कमाई का जरिया बनता है, विपक्ष में रहने पर भी कुछ तो हाथ लग ही जाता है। यूं तो सरकार ने गत वर्षों में पार्टी के पैसों को विनियमित करने के लिए विधेयक लाने का प्रयास किया ताकि चुनावों के दौरान और अन्य समय में पार्टी के व्यय तथा उनके वितरण पर नजर रखी जा सके और इस राशि का नियमित लेखा-जोखा बनाया जा सके और उन लेखाओं को लेखा परीक्षा के लिए उपलब्ध कराया जा सके। यदि पार्टियां अपनी चुनाव विवरणी में इसकी गलत जानकारी देती हैं तो उनकी मान्यता समाप्त करने की धमकी भी दी गई किन्तु इस सबके बावजूद चुनावों की लागत बढ़ती गई।

यदि चुनाव के वित्त पोषण के लिए पारदर्शी प्रणाली होती है तो इससे सबसे बड़ा नुक्सान नेताओं को होगा और सबसे बड़ा लाभ आम लोगों को होगा। जब तक यह सुनिश्चित नहीं किया जाता है कि चुनाव के लिए पैसा कानूनी स्रोतों से प्राप्त हुआ है तब तक चुनावों में काले धन और निहित स्वार्थों के कुप्रभाव को कम करने की आशा नहीं की जा सकती है। राजनीति और उद्योगों के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। कम्पनियों द्वारा दिया गया दान पार्टियों को चुनावों के लिए मिली राशि का एक अंशमात्र है। आज पार्टियां एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह कार्य करती हैं और उनके धन के स्रोत रहस्यमय हैं। ऐसी स्थिति में एक अच्छे जन प्रतिनिधि का चुनाव बहुत ही मुश्किल है तब मास्टर एंड फॉलोवर की गहरी पैठी मानसिकता से आम जान को निजात कैसे मिल सकती है? हमारे इस असंगत लोकतंत्र को अब इस व्याधि से मुक्त किया जाना आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य है।

 

शैलेन्द्र चौहान। संपर्क : पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद – 201014 (उ.प्र.), मो.न. 07838897877

भगाणा पीड़ितों की लड़ाई देश में उत्‍पीड़न से मुक्ति की लड़ाई में तब्‍दील होः स्‍वामी अग्निवेश

नई दिल्‍ली: भगाणा सामूहिक बलात्‍कार पीड़ितों के लिए गुरूवार (24 अप्रैल) को जंतर-मंतर पर कैंडिल मार्च का अयोजन किया गया। मार्च में बड़ी संख्‍या में महिला संगठनों के लोग, जेएनयू के छात्र व बुद्धिजीवियों समेत लगभग 50 सामाजिक संगठनों के लोगों ने भाग लिया। मार्च के पूर्व आयोजित सभा में 27 अप्रैल को गृह मंत्री सुशील शिंदे के आवास का घेराव का फैसला लिया गया। कार्यक्रम के आयोजको ने इसके लिए दिल्‍ली के अलावा विभिन्‍न प्रदेशों के जागरूक व संवेदनशील लोगों को भी दिल्‍ली पहुंचने का आह्वन किया है।

 
सभा को संबोधित करने आये स्‍वामी अग्निवेश ने संघर्ष के लिए दिल्‍ली के लोगों के इतनी बड़ी संख्‍या में जुटने को लेकर हर्ष प्रकट करते हुए कहा कि यह लड़ाई इस देश में उत्‍पीड़न से मुक्ति की लड़ाई में तब्‍दील हो सकती है। जेएनयू के प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने सामुहिक बलात्‍कार की इस घटना को बेहद खौफनाक बताते हुए कहा कि न्‍याय यह लडाई लंबी चलेगी, लेकिन कोई कारण नहीं है कि इसमें हमें सफलता न मिले। जेएनयू के ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंट फोरम के अध्‍यक्ष जितेंद्र यादव ने अन्‍ना हजार के आंदोलन से इसकी तुलना करते हुए कहा कि उनका उद्देश्‍य आरंभ से ही राजनीतिक था, लेकिन आज देश का दलित-पिछड़ा समुदाय आज यहां राजनीति के लिए नहीं बल्कि न्‍याय की गुहार लगाने के लिए जुटा है। जेएनयूएसयू के अध्‍यक्ष अकबर चौधरी ने कहा है जेएनयू के छात्र-छात्राएं इस आंदोलन को कतई झुकने नहीं देंगे।

 

संपर्क: जितेंद्र यादव #09716839326, जगदीश काजला #09812034593

राजनीति का नया ‘अभिषेक’

आसान जीत की ओर बढ़ रहे अभिषेक सिंह का राजतिलक लगभग तय है लेकिन इसके बाद खुद को साबित करने की चुनौती मुंहबांये खड़ी है. अब तक राजनांदगांव से खुद को दाँव पर लगाने वालों की सच्चाई यह है कि राजनीतिक रोटियां सेंकने के सिवाय वे कोई खास चमत्कार नहीं कर सके अत: परिवार से लेकर जनता-जनार्दन तक में आशा की यह डोर बंधी है कि शुक्ल-युग का अवसान होने के बाद देश के राजनीतिक-शीर्ष पर युवा छत्तीसगढिय़़ा की जो कमी राज्य महसूस कर रहा है, अभिषेक इसे भरने में कामयाब होंगे, ठीक राहुल गांधी, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह.

जादुई स्पर्श लिए मुस्कान और अदाभरी शालीन चुप्पी के साथ अभिषेक सिंह जब चुनाव-प्रचार के लिये घर से निकलते हैं तो छह फीट से अधिक की काया वाले इस शख्स से हाथ मिलाने को लोग बेताब हो उठते हैं. बुढ़ापा ओढ़े दो शख्स के बीच खड़ी एक नन्हीं बिटिया के सर पर बाबा हाथ फेरते हैं और बुजुर्गों से कहते हैं, 'इस क्षेत्र की सेवा करना चाहता हूं. आपका आर्शीवाद चाहिये. जोश से भरी युवाओं की टोली नारे लगाती है और काफिला आगे बढ़ जाता है. लेकिन कांगे्रस-जोकि विपक्षी चुनौती के तौर पर सामने है-के झण्डे-बैनर देखना मुश्किल पड़ रहा है. इसकी वजह साफ करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं, 'जनमत का दबाव या सत्ता के लोभ का असर कह लीजिये, विद्रोह और विरोध की हर चिंगारी जलने से पहले ही बुझ गई.

लेकिन राजा-रजवाड़ों के प्रभुत्व वाले इस शहर में ऐसा कब नहीं हुआ? सत्ता का तो चरित्र ही यही है. क्षेत्र का संसदीय इतिहास गवाह है कि राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह से लेकर रानी पद्मावती देवी, शिवेंद्र बहादुर सिंह, मोतीलाल वोरा, राजा देवव्रत सिंह, डॉ. रमनसिंह और मधुसूदन यादव तक में मात्र यादव ही तो थे जो महल बनाम हल की लड़ाई जीतकर संसद पहुंचे और अब यह नारा कांग्रेस प्रत्याशी कमलेश्वर वर्मा लगा रहे हैं. अभिषेक पर अप्रत्यक्ष प्रहार करते हुए वे कहते हैं, 'मतदाता चाहकर भी महल के प्रत्याशी (अभिषेक सिंह) से नहीं मिल पायेंगे. अभिषेक इसके जवाब में मौन साध लेते हैं.

पन्द्रह लाख से ज्यादा की आबादी वाले राजनांदगांव लोकसभा में चुनावी बिसात सज चुकी है. हाथों में मुद्दे और आरोपरूपी तलवार के साथ मोहरे मैदान में हैं और पार्टी के दिगगज रणनीतियों के साथ एक-दूसरे को धराशायी करने में लगे हैं. तस्वीर साफ है कि गुजरे विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस चार-चार सीटें जीतकर बराबरी पर रही थीं और यदि कांग्रेस ने वर्तमान की तुलना में मजबूत प्रत्याशी उतारा होता तो अभिषेक को गहरी चुनौती से जूझना पड़ता लेकिन अब खुला खेल फर्रूखाबादी हो चला है. राजनीतिक पंडितों का आंकलन है कि जब प्रदेश की राजनीति में नई जमात दहाड़ रही है तब अभिषेक ने धमाकेदार एण्ट्री मारी है.

लडखड़़ाहटों के साथ ही सही, अभिषेक ने अपने राजनीतिक कैरियर की शानदार शुरूआत की है. कुछ अभिषेक को पैराशूट कैंडीडेट मान रहे हैं मगर वे गफलत में हैं. विरोधी तर्क देते हैं कि उनका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और सिर्फ एक ही योगयता है कि वे मुख्यमंत्री के सुपुत्र हैं. इसे बचाव में वरिष्ठ पत्रकार विजय कानूगा कहते हैं, 'ऐसे लोगों के लिये सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को याद करना चाहिये जिन्होंने कम अनुभव के बावजूद पिता की विरासत संभाली और राजनीति में सफल हुए. आप देखिएगा, अभिषेक की जीत एक लाख से ज्यादा मतों से होगी.

दरअसल राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र पर बाबा की नजर तीन साल पहले लग गई थी. सीट तय होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के सलाहकार विवेक सक्सेना को वहां का प्रभार सौंपा गया जिन्होंने दिन-रात एक करके स्थानीय समीकरणों को साधा, रास्ते की रूकावटों को साफ किया, असंतुष्टों को मनाया और सरकारी मशीनरी को झोंकते हुए विकास की गंगा बहा दी. इलाका चमन हो चुका है और यहां के सडक़ मार्ग से गुजरते वक्त आप इसका नजारा बखूबी देख सकते हैं.

गुजरे विधानसभा चुनाव में बाबा की नेतृत्व-क्षमता को परखने का वक्त था सो पर्दे के पीछे रखते हुए उन्हें राजनांदगांव सीट का चुनाव संचालक बनाया गया. पूरे दो महीने तक अभिषेक ने जिस सूझबूझ से चुनाव संचालन किया और पिताश्री को पैंतीस हजार से ज्यादा की लीड से विजयश्री का वरण कराया, उसने भाजपा संगठन, आम आदमी और पिता का दिल जीत लिया. इस सफलता के बाद इस बात पर मुहर लग गई थी कि अगला लोकसभा चुनाव अभिषेक ही लड़ेंगे. ऐसा नहीं है कि वर्तमान सांसद मधुसूदन यादव की टिकट काटने से पार्टी और संगठन में खदबदाहटें नहीं हुईं लेकिन उसे जादू की झप्पी के साथ बेहद खामोशी से दफन कर दिया गया. सुना है कि इस कुर्बानी के बदले मधुसूदन को लालबत्ती से नवाजते हुए युवा आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

अब जबकि अभिषेक सांसद बनने की ओर हैं तब एक बड़ा सवाल जेहन में यह है कि वे लम्बी राजनैतिक पारी खेलेंगे या देवव्रत सिंह और मधुसूदन यादव जैसे युवा चेहरों की तरह अगले चुनाव तक फुस्स हो जायेंगे. अंचल का दुर्भागय कह लीजिये कि राजपरिवार के आश्रय में पल-बढ़ रहा राजनांदगांव आज भी देश में पहचान के लिये मोहताज है. अगले पांच साल बाद तय होगा कि बाबा ने खुद का राजनैतिक धरातल किस कदर मजबूत किया है? फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के संसदीय फलक पर जो युवा चेहरे जमे हैं, उनमें तरूणाई तो गायब सी हो गई है. भाजपा के दिनेश कश्यप, कांग्रेस के देवव्रत सिंह और कुछ हद तक दुर्ग की सरोज पाण्डे को छोड़ दें तो अभिषेक सिंग के रास्ते में ज्यादा अवरोध नहीं है. वे अपने पिता की तरह ही छुपे रूस्तम साबित हो सकते हैं क्योंकि सियासी शालीनता और परिपक्वता के मुकाबले अभिषेक सबसे बीस ही नजर आते हैं. मगर फिर भी बाबा को जंग खाई मुरझाई सोच को तिलांजलि देकर आगे बढऩा होगा. पिता का आभामण्डल-जो इनके इर्द-गिर्द बना है-को तोडक़र खुद की देशव्यापी छवि बनाने की चुनौती है. मन में आशा के फूल खिले हैं कि अभिषेक उस शून्य को जरूर भरेंगे जो शुक्ल-युग के अवसान के बाद देश की राजनीति में छत्तीसगढ़ के लिये पैदा हो गया है. हमारी शुभकामनाएं साथ हैं.

 

लेखक अनिल द्विवेदी राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।

विकीलीक्स का खुलासा- सुब्रमण्यम स्वामी ने इंदिरा गांधी की चुनावी रणनीति व स्वास्थ्य से संबंधित सूचनाएं अमेरिकी खुफिया एजेंसी को दी थीं

: Subramanian Swamy gave US Political Intelligence on Indira Gandhi's election strategy and health : WikiLeaks latest cable reveals BJP's Subramanian Swamy's relations with US Intelligence Agencies and how he passed secret information about serious issues that concern our country to US Intelligence agencies. BJP has been vaguely accusing AAP of being a CIA Agent or a Pak Agent, whenever AAP raises issues of corruption by BJP.

Now after this revelation about Subramanian Swamy who has been leading the BJP troll brigade with baseless accusations on AAP, can BJP still be trusted? Will BJP take any action against Mr Swamy or atleast clarify their stance on him.

https://twitter.com/wikileaks/status/459413045597724672

Here is the link to Wikileaks cable :

https://wikileaks.org/plusd/cables/1977STATE024965_c.html#efmAglAj9

आम आदमी पार्टी के एफबी वॉल से.


दो तात्कालिक कमेंट…

Ashish Sagar Dixit : CIA का एजेंट Dr. Subramanian Swamy … wikileaks just revealed Subramanian Swamy relations with US Intelligence Agencies. He gave the USA intelligence on Indira Gandhi's election strategy!

Meenu Jain : लो जी , केंद्र की मोदी सरकार के धर्मपरिवर्तन विभाग के मंत्री सुब्रह्मण्यम स्वामी सीआईए के एजेंट निकले . इंदिरा सरकार की गोपनीय खबरों की दलाली किया करते थे. यह रहा विकिलीक्स का नया खुलासा. अगर विकिलीक्स यही खुलासा कोंग्रेस या केजरीवाल के बारे करता तो सारे टीवी न्यूज़ चैनल अब तक धरती पाताल एक कर देते . सबको सांप सूंघ गया लगता है.

सागरिका घोष को मोदी की आलोचना करने वाले ट्वीट न करने की हिदायत!

Brijesh Singh : कई मीडिया संस्थानों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि कैसे वहां मोदी की आलोचना का स्थान खत्म हो रहा है. मीडिया जगत से जुड़े लोग बताते हैं कि कैसे मोदी के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखने के कारण टीवी 18 समूह के अंग्रेजी समाचार चैनल सीएनएन आईबीएन में वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष पर लगातार दबाव बना हुआ है. उन्हें मोदी की आलोचना करने वाले ट्वीट न करने की हिदायत तक दी गई है.

स्क्रॉल डॉट इन वेबसाइट से बातचीत में सागरिका बताती भी हैं कि कैसे मोदी समर्थकों के कारण इंटरनेट पर मोदी की आलोचना करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है और कैसे धीरे-धीरे यह असहिष्णुता इंटरनेट के बाहर भी फैल रही है. वे कहती हैं, ‘पहले भी मैंने कई मौकों पर कांग्रेस और गांधी परिवार की आलोचना की है, लेकिन कभी मुझे किसी ने जान से मारने, गैंग रेप करने या नौकरी से निकालने की धमकी नहीं दी.’

सूत्र बताते हैं कि मोदी के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखने वाले आईबीएन लोकमत के संपादक निखिल वागले पर भी प्रबंधन का दबाव है. वागले ने हाल ही में ट्विटर पर टिप्पणी भी की थी- ‘इंदिरा गांधी ने आपातकाल के समय पत्रकारों को डराने धमकाने काम किया. लेकिन वे सफल नहीं हो पाईं. आरएसएस और मोदी को इतिहास से सबक लेना चाहिए. पत्रकारों को धमकाना बंद करिए नहीं तो यह दांव उलटा पड़ जाएगा.’

अंग्रेजी अखबार द हिंदू के पूर्व संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के संस्थान छोड़ने के पीछे भी मोदी का हाथ होने की अपुष्ट खबरें मीडिया जगत में आती रहीं. छह फरवरी को ट्विटर पर उनकी टिप्पणी आई- आपातकाल के समय में जब मीडिया मालिकों को झुकने के लिए कहा गया तो वे रेंगने लगे. इसी तर्ज पर आदेश पाकर कई मीडिया मालिकों ने फिर रेंगने की शुरुआत कर दी है जबकि आदेश देने वाला अभी सत्ता में आया भी नहीं है.’

उदाहरण और भी हैं. अंग्रेजी पत्रिका ओपन के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल को मैनेजमेंट द्वारा संस्थान छोड़ने के लिए कहने के पीछे भी मोदी फैक्टर बताया गया. चर्चा है कि मैनेजमेंट बल द्वारा अपने लेखों में मोदी की आलोचना से नाराज था. गुजरात में मोदी की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर देशद्रोह का मुकदमा करने से लेकर तमाम तरह से उन्हें प्रताड़ित करने के उदाहरण भरे पड़े हैं. यानी भविष्य के लिए आशंकाओं की तादाद आशाओं से ज्यादा है.

तहलका में सीनियर करेस्पांडेंट के रूप में कार्यरत पत्रकार बृजेश सिंह के फेसबुक वॉल से.

नरेंद्र मोदी के बनारस यात्रा के उड़नखटोले खर्च को लेकर अफलातून अफलू ने दर्ज कराई शिकायत

Aflatoon Afloo : उड़कर आना-जाना ! जब किसी दल का नेता जहाज या हेलिकॉप्टर से चुनाव प्रचार में आता है तो आम तौर पर यह खर्च 'दल द्वारा किए गए खर्च' में दिखाया जाता है। इस बार चुनाव आयुक्त ने स्पष्ट किया था कि यदि उम्मीदवार ऐसे किसी उड़न खटोले से आए नेता के साथ आया होगा तो उस खर्च का एक हिस्सा उम्मीदवार के चुनाव खर्च में जोड़ा जाएगा।

कल नामांकन के लिए नरेन्द्र मोदी का आना-जाना कितने का हुआ? यदि कहा जाएगा कि वे भाजपा के किसी 'स्टार-प्रचारक' के साथ पधारे थे (स्टार प्रचारक उनके साथ नहीं 😉 ) तब भी जो खर्च हुआ वह कितना हुआ आयोग बताएगा। ये है वो संदेश जो शिकायत दर्ज कराने के बाद प्राप्त हुआ…

Welcome AFLATOON DESAI
Your complaint has been registered with us Your Complaint has been registered and marked to the concerned District Election Officer.  Please note down your complaint ID for future references : UP/40/390/300542  Complaint Detail has been sent to you via SMS on your registered Mobile No.

बनारस के नेता और एक्टिविस्ट अफलातून अफलू के फेसबुक वॉल से.

AAP candidate sent to jail for protesting against Police Action

AAP candidate from Nainital, Balli Singh Cheema along with AAP volunteers were Jailed for merely protesting against Police action as their campaign vehicle was seized for allegedly carrying an extra speaker.

Why is to that candidates and supporters of parties with political muscle get away with hate speeches, poll rigging, physical attacks and all sort of serious violations while an AAP candidate is in jail for merely carrying an extra speaker?

http://indiatoday.intoday.in/story/aap-candidate-balli-singh-cheema-arrested-nainital-lok-sabha-constituency-uttarakhand/1/357302.html

Aam Aadmi Party के FB वॉल से.

दैनिक जागरण जींद के चीफ रिपोर्टर योगेंद्र गुप्ता का निधन, पत्रकार पंकज कर्मवाल को पितृशोक

खबर है कि दैनिक जागरण जींद के चीफ रिपोर्टर योगेंद्र गुप्ता का आज निधन हो गया.  वे पिछले तीन महीने से गुड़गांव के मेदांता हास्पिटल में भर्ती थे. एक सड़क हादसे में बुरी तरह जख्मी होने के बाद मेदांता में उनका इलाज चल रहा था. युवा पत्रकार योगेंद्र गुप्ता को बचाया नहीं जा सका. उनके निधन पर जागरण के पत्रकारों, शुभचिंतकों और पत्रकार संगठनों ने शोक व्यक्त किया है.

आज समाज, अंबाला अखबार के सीनियर सब एडिटर पंकज कर्मवाल के पिता किशन राम जी का निधन हो गया है. सड़क हादसे के कारण किशन राम जी की जान गई. वे पिचहत्तर साल के थे. उनका अंतिम संस्कार पैतृक गांव अंबाला के नाहरा में किया गया. स्थानीय स्तर पर राजनीति में सक्रिय किशन राम जी के सड़क हादसे में निधन पर आज समाज के संपादक अजय शुक्ल ने दुख व्यक्त किया है.

अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण के लिए रायपुर के युवा पत्रकार बिकास कुमार शर्मा का चयन

रायपुर। पत्रकारिता के अंतरराष्ट्रीय स्तरीय विशेष प्रशिक्षण के लिए शहर के युवा पत्रकार बिकास कुमार शर्मा का चयन अमेरिकी संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट (आइसीएफजे) ने किया है। प्रशिक्षण शिविर का आयोजन 28 अप्रैल से 2 मई तक नेपाल की राजधानी काठमांडू में होगा।

‘रोडब्लॉक्स एलोंग द न्यू सिल्क रोड’ नामक इस कार्यक्रम में दक्षिण एशियाई देशों- भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका एवं बांग्लादेश के 25 चयनित युवा पत्रकरों को मल्टीमीडिया प्रशिक्षण दिया जायेगा और साथ-साथ चयनित पत्रकारों द्वारा दक्षिण एशियाई देशो में बंधुआ मजदूरी, नारी उत्थान, युवा विकास सहित अन्य सामाजिक विषयों पर अपना प्रस्तुतीकरण देंगे।

शर्मा कार्यक्रम में मध्य भारत में बंधुआ मजदूरों की बदहाल स्थिति के ऊपर अपना प्रस्तुतीकरण देंगे। कार्यक्रम का आयोजन आईसीएफजे और नेपाल प्रेस इंस्टीच्यूट मिलकर कर रहे हैं। सभी 25 पत्रकारों का चयन डेढ़ माह से चल रहे ऑनलाइन ट्रैनिंग सह असेसमेंट टेस्ट के बाद किया गया। गौरतलब है की बिकास वर्त्तमान में अंग्रेजी दैनिक 'द हितवाद', रायपुर में उप संपादक सह संवाददाता के रूप में कार्य कर रहे हैं।

रामविलास पासवान की पहली पत्नी राजकुमारी देवी का इंटरव्यू लेने में सफल हुए युवा पत्रकार आयुष कुमार (देखें वीडियो)

नरेंद्र मोदी की पत्नी को पत्रकारों द्वारा खोज निकालने का दूरगामी असर ये हुआ कि खुद मोदी को अब चुनाव नामांकन के दौरान लिखना पड़ा कि वे शादीशुदा हैं और उनकी पत्नी हैं. एक अन्य नेता राम विलास पासवान की पहली पत्नी राजकुमारी देवी को इस बात का मलाल है कि उनका नाम पहली पत्नी के रूप में पासवान ने नामांकन के समय नहीं भरा.

रामविलास की पहली पत्नी के बारे में लोग कम जानते हैं लेकिन उनका इंटरव्यू कर डाला युवा पत्रकार आयुष कुमार ने.  आयुष कुमार ने भड़ास को एक पत्र भेजकर विस्तार से पूरा प्रकरण बताया है, साथ ही इंटरव्यू का वीडियो भी भेजा है. दोनों को यहां पब्लिश-ब्राडकास्ट किया जा रहा है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया
 


कौन समझेगा राजकुमारी देवी का दर्द…

दोस्तों, ये राजनेता भी अजीब होते हैं। अपने फायदे के लिए कुछ भी कर लेते हैं। ये अपने शौक के लिए शादी कर लेंगे और मन भर जाने पर तुरंत छोड़ भी देंगे। ऐसा ही कुछ काम किया है लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने। रामविलास पासवान की दो पत्नियाँ हैं, ये सभी जानते हैं। परन्तु पहली बार हम उस घर तक पहुंचे जहाँ पहली पत्नी राजकुमारी देवी एकांतवास कर रही हैं। एक ओर जहाँ पासवान की दूसरी पत्नी रीना पासवान दिल्ली से पटना तक पासवान के संग ऐशो आराम की जिंदगी बिता रही हैं, वहीं बिहार के छोटे से गाँव में रह रहीं राजकुमारी देवी एकांतवास में जी रही हैं। अजीब लगता है एक राजनेता का यह व्यवहार देख कर। जो राजनेता सबको साथ ले कर चलने की बड़ी-बड़ी बातें करता है वो अपने परिवार को ही साथ लेकर न चल सका।

बिहार का एक छोटा – सा गाँव शहरबन्नी, जहाँ आजादी के इतने वर्षों बाद भी बिजली, सड़क, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, वहां अपनी जिंदगी गुजार रही हैं राजकुमारी। काफी मुश्किलों के बाद जब हम शहरबन्नी पहुंचे तो हमने अपने अथक प्रयासों की वजह से राजकुमारी देवी से मिलने मे सफलता पा ही ली। कड़कती धूप में जब हम उनके घर पहुंचे तो हमने कई बातें कीं उनसे, वो सभी बातें  आप youtube पर देख-सुन सकते हैं। पूरे इंटरव्यू के दौरान राजकुमारी देवी की बातों से यह स्पष्ट हो गया कि  वो पासवान जी से बहुत प्यार करती हैं। हालाँकि, उन्हें इस बात का दुःख है कि पहली पत्नी के रूप मे उन्हें पासवान जी से जो प्यार और अपनत्व मिलना चाहिए था वो न मिल पाया।

इंटरव्यू का पहला भाग

Ram Vilas Paswan wife interview first part

https://www.youtube.com/watch?v=5PEycYgmg5I

इंटरव्यू का दूसरा भाग

Ram Vilas Paswan Wife interview second part

https://www.youtube.com/watch?v=6wl97s21Xbs

आपका
आयुष कुमार
ayush.online24@gmail.com

सेटिंग-गेटिंग-फिटिंग-एडजस्टिंग…

तरह-तरह के सेटिंग-गेटिंग के खेल के लिए मशहूर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एक बार फिर एक प्राध्यापक महोदय आंख बंद-डिब्बा गायब का जुगाड़ सेट कर रहे हैं. प्राध्यापक महोदय, नाट्य विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. दो साल पहले संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली से डिपुटेशन पर आये थे. अकादमी में प्रोग्राम अधिकारी थे, वर्धा के परिसर में आये तो सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बन गये थे. जब वे अचानक आकर इस पद पर विराजमान हुए थे तब भी अंदरखाने में कानाफूसी हुई थी कि नाट्य कला विभाग में जब यह पद ही सृजित नहीं हुआ था, उससे संबंधित कोई विज्ञापन ही नहीं निकला था तो फिर कहां से आकर विराजमान हो गये थे.

खैर! यह बात दबी जुबान में ही होती रही थी और कानाफूसी में ही यह बात दम भी तोड़ दी थी तब.  क्योंकि प्राध्यापक महोदय उत्तर प्रदेश के एक बडे यादव नेता, से स्वजातीय आधार पर गहरे रिश्ते रखते हुए हाईलेवल जुगाड़ से वर्धा में पहुंचे थे और तत्कालीन कुलपति दारोगाजी भी उत्तरप्रदेश के उन नेता के प्रति साफ्ट कार्नर रखते थे, सो किसी के चिल्लाने से भी कुछ नहीं बिगड़नेवाला था. प्राध्यापक महोदय ने भी तुरंत कुलपति महोदय का ऋण उतार दिया था. प्राध्यापक महोदय ने हिमालय हेरिटेज रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के सौजन्य से आठ अगस्त 2013 को हिमालय साहित्य सृजन सम्मान दिलवा दिया. खूबसूरत सिक्किम राज्य की राजधानी गंगटोक में. बताया जाता है कि जो उपरोक्त सोसाइटी है, उसके संचालन में प्राध्यापक महोदय की ही अहम भूमिका है. पटना से पीएचडी किये, मधेपुरा में पढ़ाये लिखाये, दिल्ली में प्रोग्राम अधिकारी रहे, दो सालों से वर्धा में हैं लेकिन संस्थागत तौर पर गहरा प्रेम सिक्किम से भीरखते हैं. तत्कालीन कुलपति महोदय गदगद भाव से हिमालय साहित्य सृजन सम्मान लेने पहुंचे थे सिक्किम. उसके बाद एक रेणु सम्मान भी बिहार से लेते आये थे.

अब इस बार की कहानी यह है कि प्राध्यापक महोदय का डेपुटेशन पीरियड इस साल पांच अप्रैल को खत्म हो चुका है. उन्हें वर्धा विश्वविद्यालय परिसर से मोहब्बत हो गयी है. वे इसे छोड़कर जाना नहीं चाहते. वहीं जमे हुए हैं. वर्धा का दरबार उन्हें छोड़ना ना पड़े, इसके लिए फिर से एक बार वे जुगाड़ लगा रहे हैं. सूचना है कि वे विश्ववविद्यालय में नये-नये आये कुलपति गिरिश्वर मिश्र पर डोरे डालने में दिन-रात उर्जा लगा रहे हैं और उसमें उन्हें तेजी से सफलता भी मिलती हुई दिख रही है. पहलेवाले कुलपति साहित्य के थे, सो प्राध्यापक महोदय ने उन्हें साहित्य सृजन सम्मान देने के लिए गंगटोक की वादियों में बुला लिया था. अभी जो कुलपति हैं, उनका वास्ता साहित्य की बजाय मनोविज्ञान से है, इसलिए इस बार उन्हें विशेष तौर पर भूटानबुलाने के लिए प्राध्यापक महोदय पिछली बार की तरह अंतरराष्ट्रीय हिमालय दिवस का इंतजार नहीं कर रहे हैं. यानि अगस्त आने तक का इंतजार नहीं कर रहे.

वे नये कुलपति को जल्दी से जल्दी सोसाइटी के सौजन्य से बुलाकर वहां उन्हें विशेष सम्मान दे देना चाहते हैं ताकि किसी तरह डेपुटेशन का एक्सटेंशन बढ़ जाए. अब इसके लिए सोसाइटी की ओर से एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन हो रहा है. लोक संस्कृति पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार की योजना है लेकिन मुख्य अतिथि के तौर पर मनोविज्ञानी कुलपति को आमंत्रित किया गया है. सूचना के अनुसार कुलपति महोदय जाने को तैयार हैं. सूचना के अनुसार कुलपति महोदय को सिर्फ मुख्य या विशिष्ट अतिथि के तौर पर बुलाकर इतना ही सम्मान देने की योजना भर नहीं है बल्कि वहां पहुंचने के बाद सरप्राइज के तौर पर किसी खास सम्मान से सम्मानित करने की योजना भी बना चुके हैं प्राध्यापक महोदय. अभी बताया नहीं जा रहा, क्योंकि अभी बताने से दाल में काला जैसा शोर हो सकता है लेकिन विश्वविद्यालय परिसर में यह बात फिर कानाफूसी के तौर पर तैरने लगी है कि प्राध्यापक महोदय ने सेटिंग-गेटिंग कर दी है, अब एक्सेटेंशन के टेंशन से भी उन्हें मुक्ति मिल जाएगी. क्योंकि नये कुलपति वहां जायेंगे, सम्मान पायेंगे और जब तक लौटेंगे तब तक प्राध्यापक महोदय इस विशेष आयोजन, विशेष मान-सम्मान के बदले फाइल लेकर खड़े रहेंगे. विश्वविद्यालय के एक बड़े खेमे का मानना है कि नये मनोविज्ञानी कुलपति प्राध्यापक महोदय के जाल में नहीं फंसेंगे. प्राध्यापक महोदय मंद-मंद मुस्कान के साथ कहते फिर रहे हैं कि जायेंगे क्यों नहीं. नार्थ-ईस्ट की बात है. अंतरराष्ट्रीय सेमिनार की बात है. विशेष मान-सम्मान की बात है.

भड़ास को मिले एक पत्र पर आधारित.

रायगढ़ नवभारत के नाम पर दलाली

नवभारत की पहचान आजादी की लड़ाई से लेकर अब तक एक विश्वासनीय अखबार के रूप में रही है। लेकिन कुछ जगह अब इस  विश्वास को कैश कराया जाता है। जहां यह खेल खुलेआम चल रहा है वह है नवभारत का रायगढ़ एडीशन। अभी यहां ब्यूरो चीफ प्रमोद अग्रवाल को बनाया गया है जो सिर्फ अपने मतलब का समाचार बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं और अच्छे समाचार रोक देते हैं। समाचारों को अपने हिसाब से कैश करने का प्रयास करता है।

जैसे यदि शहर में एक बड़े निजी अस्पताल (संजीवनी अस्पताल) में छग नर्सिंग होम एक्ट के तहत कार्यवाही हुई तो इसे लास्ट पेज के बाॅटम में छोटी जगह पर लगाया गया जबकि बार एसोसिएशन के चुनाव की खबर प्रमुखता से लगाई गई। चुनाव में ऐसा कुछ खास नहीं था जो चर्चा का विषय बने। इसी तरह राइस मिलरों पर कार्यवाही 4 दिन पहले हुई लेकिन फालोअप उसका 4 दिन बाद लगा वह भी प्रथम पेज पर लीड समाचार के रूप में।

आदिवासियों की जमीन पर उद्योग का कब्जा बार-बार यह समाचार विभिन्न तरीकों से पेश किया गया और लीड समाचार के रूप में लेकिन नीयत कुछ और थी। लारा एनटीपीसी में भूमि घोटाले का प्रमुख दोषी कलेक्टर है जिसके रहते खरीद फरोस्त पर रोक लगाने के लिए धारा 4 प्रकाशित हुई। फिर भी उसे के इशारे पर एक जमीन के सैकड़ों टुकड़े हुए तब प्रशासन मौन था। फिर जांच के नाम पर भू स्वामियों से और वसूली जबकि सच्चाई यह है कि जांच के आदेश के बाद भी मुआवजे बंटे। लेकिन कलेक्टर की चापलूसी कर बार-बार भूमि घोटाले को उठाना और कलेक्टर को दोषी ना बताना। आदि शामिल है।

अंदर का बड़ा सच

सामान्यतः देखने में ये लीड समाचार एक बेवकूफी पूर्ण चुनाव कहे जा सकते है लेकिन इसके पीछे का असली कारण हैरान कर देने वाले है। दरअसल प्रमोद का बड़ा भाई प्रहलाद राय चक्रधर बाल सदन (अनाथालय) का सचिव था और 3 सितंबर 2013 को एक नाबालिक लड़की से दुष्कर्म का प्रथम आरोपी था तब से यह फरार था और 12 फरवरी 2014 को न्यायालय में सरेंडर किया। इसे देखते हुए पूर्व में ही वकीलों की जी हजूरी चालू थी। इसलिए बार एसोसिएशन के चुनाव को प्राथमिकता दी गई जबकि यह अंदर के पेज का समाचार होना चाहिए और अन्य अखबारों में इसे प्राथमिकता नहीं दी गई।

इसी तरह राइस मिलरों  की  मिली भगत से करोड़ों के धान की फर्जी खरीदी का समाचार इसलिए लगाया गया कि  राइस मिलरों से इस मुद्दे पर पैसे लेकर सेटिंग की जा सके। इसमें कामयाब भी हुआ और प्रमोद, पत्रिका के ब्यूरो चीफ प्रवीण त्रिपाठी, क्रांतिकारी प्रेस के मालिक रामचंद्र शर्मा के बीच 50 हजार रूपए का बंटवारा हुआ। तीन प्रेस की जुगलबंदी और रह रहकर एक दूसरे द्वारा फालोअप लेना एक ब्लैकमेलिंग का तरीका है। आदिवासियों की जमीन के नाम से जिन उद्योगों का नाम आया वे प्रेस का मुंह बंद करने के लिए कुछ राशि तो जरूर देगे।  इसलिए बार बार इस मुद्दे को उछाला गया और अब भी रहकर उछाला जा रहा है।  

उन्हीं का समाचार क्यों लगा

अब वेलेनटाइन डे पर बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष जेम्स फिलिप व आईबीसी के ब्यूरो चीफ अविनाष पाठक के सफल प्रेम कहानी की खबर नवभारत सुरूचि में आल एडीषन में लगी। कारण बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष ही नाबालिग से रेप मामले की रिपोर्ट लिखाई और बार-बार संपर्क करने पर उनका समझौते से जवाब ना था। लेकिन समाचार छपने के बाद वे नरम हो गई। और अविनाश पाठक भी समाचार कवर ना करें इसलिए उन्हें प्राथमिकता दी गई। कुल मिलाकर कहे तो हर समाचार के पीछे एक सुनियोजित चाल होती है जिसका एक अपना मतलब होता है। इस तरह एक बैनर का फायदा निजी उपयोग में किया जा रहा है। नवभारत के नाम का ही असर है कि सरेंडर के बाद 14 फरवरी से आज तक दुष्कर्म का आरोपी प्रहलाद राय अग्रवाल आज भी बिना किसी गंभीर बीमारी के ना होते हुए भी अस्पताल में भर्ती है।

क्या है परंपरा

चूंकि रायगढ़ में मारवाड क्षेत्र के व्यापारी निवास करते है और वे हर क्षेत्र में कब्जा बनाए रखना चाहते है। पहले तो सफल भी हुए एक समय था जब भास्कर में अनील रतेरिया ब्यूरो चीफ हुआ करते थे जबकि लिखना एक शब्द नहीं आता। नवभारत में प्रमोद अग्रवाल का भी यही हाल था।  भास्कर ने शिकायत के बाद अनील को व नवभारत ने भी प्रमोद अग्रवाल को निकाला।  और नवभारत में दिनेष मिश्रा को ब्यूरो चीफ बनाया लेकिन वे खुद को प्रेस से ऊपर मानने लगे और अपना विकल्प किसी और को नहीं जानते थे। उन्हें हटाकर फिर प्रमोद को लाया गया। अब फिर वही खेल जारी है। जब प्रमोद अग्रवाल को नवभारत से हटाया गया तो इस्पात टाइम एक बड़े पैकेज में ज्वाइन किए और तीन साल में 35 लाख का विज्ञापन दिए जिसमें 25 लाख रूपए सरकारी थे। यह विज्ञापन जनसंपर्क विभाग को 10 से लेकर 20 प्रतिशत कमीशन पर दिए गए। लिए गए।  अर्थात् जनसंपर्क विभाग द्वारा निर्धारित कोटे से ज्यादा विज्ञापन पैसे देकर लिए गए।  लेकिन रायपुर में इस्पात टाइम को जबरदस्त घाटा हुआ और प्रेस बंद कर दिया गया साथ ही प्रिटिंग मशीन हटा ली गई। अब रायगढ़ शहर में नवभारत का प्रसार 2900 है जबकि इस्पात टाइम का प्रसार 300 कापी है। मतलब साफ है नवभारत की एक पुराने पाठकों में पहचान है और विज्ञापन भी खुद चलकर आता है। किसी व्यक्ति विशेष के रहने या ना रहने पर असर नहीं पड़ता।

किसका कितना असर

रायगढ़ में पेपरों की समीक्षा करें तो शहर में सबसे ज्यादा प्रसार भास्कर का 7000 कापी। नवभारत का 2900, हरिभूमि का 1900, पत्रिका का 2000 लेकिन कापी 5600 उतरती है। लोकल अखबार केला प्रवाह का 6500 कापी रायगढ़ शहर में बंटता है। जबकि नई दुनिया महज 500 कापी है। विज्ञापन देखे तो दैनिक भास्कर का 1 करोड़ 25 लाख सालाना विज्ञापन आय है नवभारत की 70 से 80 लाख, हरिभूमि की 30 से 35 लाख, केलो प्रवाह की 90 लाख रूपए सालाना आय है। लेकिन कम खर्च में ज्यादा आय के हिसाब से नवभारत बेहतर है। कारण पुराने पाठकों का प्यार व ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच।  लेकिन अब पत्रकारिता में दलाली नवभारत के साख पर बट्टा लगा रही है। वैसे भी विज्ञापन प्रभारी को कभी समाचार की कमान नहीं देनी चाहिए। यदि विज्ञापन प्रभारी इतने योग्या होते है दो अलग विभाग बनाने की जरूरत नहीं होगी। विज्ञापन के आदमी को समाचार पर हस्तक्षेप से रोकना चाहिए। 

एक पत्रकार के भेजे खत के अनुसार.

फेसबुक ने पत्रकारिता के फील्ड में लगाई एक और छलांग, FBNewswires सेवा लांच

जनपत्रकारिता का पर्याय बन चुके फेसबुक ने पत्रकारिता के फील्ड में एक और छलांग लगाई है. फेसबुक ने FBNewswires लांच किया है. ये ऐसा प्लेटफॉर्म होगा जिससे कोई भी रीयल टाइम न्यूज कंटेंट, रिलेटेड फोटो, वीडियो पा सकेगा. फेसबुक ने इसे एक ऑनलाइन न्यूज कंटेंट का खजाना बताया है. फेसबुक ने इस सर्विस को न्यूज कॉर्पोरेशन स्टोरीफुल के साथ पार्टनरशिप में उतारा है. इस FBNewswires के जरिए फेसबुक उन कंटेट को प्रोवाइड कराएगा जिसे सोशल मीडिया पर पोस्ट या शेयर किया गया हो.

FBNewswires सोशल साइट्स से न्यूज सोर्स की जांच करके कंटेंट प्रोवाइड कराएगा. इन सोशल साइट्स में ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम  जैसी साइट्स शामिल होंगी. अपनी इस पहल के जरिए फेसबुक खुद को इंस्टेंट न्यूज सर्विस के तौर पर पोज़िशन करने में लगा हुआ है. ऐसा करके ट्विटर को कड़ी टक्कर देने की तैयारी में है फेसबुक. इसका पता https://www.facebook.com/FBNewswire है.  न्यूज़वायर टूल मेंबर्स द्वारा शेयर किए गए फोटो, विडियो जैसे फेसबुक कॉन्टेंट को पत्रकारों को शेयर और एम्बेड करने में मदद करेगा.

फेसबुक इसके लिए न्यूज़ कॉर्प के स्टोरीफुल मीडिया टूल के साथ मिल कर काम कर रही है, ताकि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर न्यूज़ और विडियो के कॉपीराइट को पहचाना और मैनेज किया जा सके. एफबी न्यूज़वायर की घोषणा करते हुए फेसबुक में डायरेक्टर ऑफ न्यूज़ ऐंड ग्लोबल मीडिया पार्टनरशिप के ऐंडी मिशेल ने कहा, 'अब फेसबुक पर न्यूज़ को किसी भी वक्त से ज्यादा ऑडियेंस मिल रहे हैं और पत्रकार व ग्लोबल मीडिया ऑर्गनाइजेशंस भी इसका जरूरी हिस्सा हैं.' फेसबुक ने न्यूज़वायर का ट्विटर अकाउंट @FBNewswire भी शुरू किया है.

संजीव श्रीवास्तव जी फोकस न्यूज़ की गलतियों पर ध्यान दीजिए

हिन्दी न्यूज चैनलों में गुणवता और स्क्रीन एलर्टनेस में गिरावट दिखना अब आम हो गया है। मसलन, थके हुए विजुअल्स, हेडलाइन्स कुछ और हेडलाइन्स-विजुअल्स कुछ और। कामचलाऊ शब्दों का उपयोग। एंकरिंग का मतलब बिना किसी भाव भंगिमा के सिर्फ टीपी पढ़ना। ग्राफिक्स पैकेजिंग में भारी झोल आदि-आदि। सिर्फ एक-दो चैनलों को छोड़ गुणवत्ता में ऐसी गिरावट सभी चैनलों की स्क्रीन पर आमतौर पर देखने को मिल जाती है। मैं हमेशा चैनलों को वॉच करता रहता हूं और जहां गलतियां दिख जाती हैं वहीं पर मेरी आंखें रुक जाती हैं।

फोकस न्यूज को वॉच कर रहा था। टेक्सट प्लेट पर चल रहा टेक्सट वकील साहब के फोनो प्लेट के पीछे जाकर छिप जा रहा था। इतना ही नहीं कहीं संवैधानिक तो कहीं संविधानिक लिखा आ रहा था। अक्सर ऐसी गलतियां तभी होती हैं जब आपकी टीम गंभीर और एलर्ट की अवस्था में बिल्कुल नहीं हो और मार्गदर्शन करने वाले की पैनी नजर स्क्रीन पर नहीं हो।

मैं कोई आलोचना नहीं कर रहा हूं, बल्कि हिन्दी चैनलों के प्रति मेरा आत्मिक लगाव रहा है। संजीव श्रीवास्तव जी को मैं नहीं जानता, मगर उनका नाम गंभीर पत्रकारिता करने वालों में शुमार किया जाता है और इस लिहाज से मुझे उनके प्रति एक सम्मानभाव भी है और इसी भावना से मेरी उनसे गुज़ारिश भी है कि स्क्रीन पर जा रही गलतियों पर ध्यान दें।

 

एक दर्शक द्वारा भेजा गया पत्र।

मजीठिया से बचने के लिए फॉर्म पर कर्मचारियों के दस्तखत ले रहा पंजाबी जागरण प्रबंधन

दैनिक जागरण समूह के पंजाबी जागरण अखबार के कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड भूल जाने के लिए बोल दिया गया है। सूचना  है कि आज (शुक्रवार) सभी रिपोर्टरों और कर्मचारियों को एक फॉर्म पर दस्तखत करने के लिए हेड ऑफिस जालंधर बुलाया गया है। जागरण के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि पंजाब में कोई भी अखबार मजीठिया वेज बोर्ड नहीं देगा इसलिए पंजाबी जागरण के कर्मचारी भी किसी खुशफहमी में न रहें।

कुछ कर्मचारियों ने जब पंजाबी जागरण के संपादक से कहा कि वेज बोर्ड देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, तो संपादक का जवाब था- अरे गुस्सा ना करो। सुप्रीम कोर्ट और प्रेस कौंसिल सब जगह इन्हीं के बंदे बैठे हैं। बस एक दो हफ्ते का शोर शराबा है, उसके बाद सब ठंडा पड़ जाएगा।

 

भड़ाक को भेजे गए पत्र पर आधारित।

दैनिक नवज्योति से गौरव श्रृंगी और सुदर्शन न्यूज से नवीन चौहान का इस्तीफा

कोटा के पत्रकार गौरव श्रृंगी 1 मई से राजस्थान पत्रिका के भीलवाड़ा संस्करण के साथ अपनी नई पारी की शुरुआत करेंगे. वे पिछले दो साल से कोटा दैनिक नवज्योति अखबार में बतौर रिपोर्टर अपनी सेवाएं दे रहे थे. इस दौरान उन्होनें कई एक्सक्लूसिव खबरें दी. पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होनें मार्च 2012 में ही कदम रखा था. 
सुदर्शन न्यूज में पिछले एक साल से कार्यरत नवीन चौहान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और वीआईपी न्यूज में असाइनमेंट हैड की जिम्मेदारी संभाली है. नवीन तमाम संस्थाओं में कार्य कर चुके हैं और रिपोर्टर से लेकर एंकर तक का कार्य नवीन संभाल चुके हैं. 

टोटल टीवी और खबरें अभीतक न्यूज चैनल के संवाददाता ओमप्रकाश गुप्ता की असलियत

पलवल से टोटल टीवी और खबरें अभीतक न्यूज चैनल के संवाददाता ओमप्रकाश गुप्ता पर जानलेवा हमले के तहत मुकदमा दर्ज… आरोपी फरार… फिर भी टोटल टीवी और खबरें अभीतक पर चल रही हैं आरोपी के नाम से खबरें… पलवल जवाहर नगर कैप मार्किट के व्यापारी पर दोबारा हमला करने के मुख्य आरोपी संजय गुप्ता को अदालत ने 14 दिन के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया है… आरोपी संजय गुप्ता को अलग-अलग 2 मामलों में दूसरी बार पेश किया गया क्योंकि दुकानदार मोहित बजाज पर 18 अप्रैल की सायं को दोबारा चाकू से कातिलाना हमला हुआ… 
 
हमले के आरोप में संजय गुप्ता, ओमप्रकाश गुप्ता और चन्दीराम गुप्ता सहित 5 लोगों के खिलाफ विभिन्न अपराधिक धाराओं में 19 अप्रैल को दूसरा मामला दर्ज किया गया… संजय गुप्ता को पुलिस ने गिरफ्तार किया था… अदालत ने संजय गुप्ता को दफा 307, 120 बी व अन्य अपराधिक धाराओं में 14 दिन के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया है… वहीं आरोपी टोटल टीवी, खबरें अभीतक का संवाददाता ओमप्रकाश गुप्ता और उसका भाई चंदी राम गुप्ता इस मामले में अभी भी फरार हैं… पुलिस आरोपियों की तलाश में जुटी हैं और जल्द ही पुलिस को सभी आरोपियों की गिरफ्तारी होने की उम्मीद है… लेकिन फिर भी जानलेवा हमले के आरोपी ओमप्रकाश गुप्ता के नाम से खबरें अभीतक और टोटल टीवी पर पलवल से लगातार खबरें चलाई जा रही हैं जबकि संवाददाता पर धारा 307 के तहत पलवल के कैंप थाने में 19 अप्रैल से मुकदमा दर्ज है…
 
एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मजीठिया के चलते सहारा में हस्ताक्षर रजिस्टर हटाया गया!

सहाराश्री के मुसीबतों के चलते भी सहारा के कुछ अधिकारी अपनी कारगुजारी से बाज नहीं आ रहे हैं। राष्ट्रीय सहारा कानपुर आफिस में जहां पिछले माह से स्ट्रिंगर्स को वेतन नहीं दिया जा रहा है वहीं 18 अप्रैल से हस्ताक्षर रजिस्टर भी हटा लिया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि मजीठिया के चलते सहारा में यह किया जा रहा है।
 
कई लोगों ने तो आफिस आना ही बंद कर दिया है तो कइयों ने कहीं और जाब तलाशना शुरू कर दिया है। एक बात तय है कि जब सहारा को दुआवों की जरूरत है ऐसे में इन स्ट्रिंगर्स की वह बददुवाएं ले रहा है. 
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

न्यूज़ नेशन से जी न्यूज पहुंचे रितेश आनंद

न्यूज़ नेशन में बतौर एसोसिएट प्रोड्यूसर कार्यरत रितेश आनंद ने न्यूज़नेशन को अलविदा कह दिया है. रितेश ने अपनी नई पारी की शुरुआत ज़ी न्यूज़ में बतौर प्रोड्यूसर की है. 
न्यूज़ नेशन से पहले रितेश आनंद आजतक में काम कर चुके हैं और आजतक की ही मीडिया इंस्टीट्यूट से पास आउट हैं. रितेश अपनी स्क्रिप्ट और शानदार वॉयस-ओवर के लिए जाने जाते हैं.
 

केंद्र में भाजपा की सरकार आई तो जागरण नहीं देगा मजीठिया!

खबर है कि दैनिक जागरण ने मजीठिया नहीं देने का मन बना लिया है.यह अखबार भी अपने इंप्लाइज को सिर्फ इनक्रीमेंट थमा कर चुप्पी साध लेगा. खबर ये भी है कि जागरण प्रबंधन ने शीर्ष स्तर पर मीटिंग करके तय किया है कि अगर 16 मई को बीजेपी की सरकार केंद्र में बनती है तो जागरण में किसी को भी मजीठिया नहीं दिया जाएगा. सुनने में आया है कि नोएडा में जो मशीन आपरेटर प्रोडक्शन में काम करते हैं उन्होंने बगावत कर दिया है. उनका कहना है कि मजीठिया मिलेगा तो काम करेंगे अन्यथा नहीं करेंगे.
 
जागरण की परंपरा रही है कि यहां जो भी बगावत करता है उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. दैनिक जागरण इतना कमीना है कि आज भी जितने भी वेतन आयोग बने, उनकी रिपोर्ट इसने अपने यहां लागू नहीं की. लगता है मजीठिया का भी यही हाल करेंगे जागरण वाले. लेकिन इस बार मजीठिया का मसला सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा है इसलिए अगर कोई जागरण कर्मी सुप्रीम कोर्ट चला गया तो इन्हें डंडा पड़ेगा और इन्हें सुब्रत राय की तरह अकल आएगी.
 
एक जागरणकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 
 

India tv is not a neutral channel and it was never to be

: Somnath bharti and goons : These elections are going to make us believe that still India is not open for debates. We want to force people to step into our shoes or face consequences. India tv is not a neutral channel and it was never to be. The incident show signs of downfall of democracy and upliftment of violence. Sometimes I think Bapu was the only non-violent person we had in our history. As we see in normal routime life too.

There is kind of noise in society which works as silent poison or sparkle that can become fire in no time. Every member of Modi bhakti movement whether paid or non-paid is trying hard for a cover drive with no timing at all. The shots may give them runs but its like no “matter how they come”. The liberals as we think of ourselves have waited, are waiting and will wait for that peaceful country we have a dream of, but to no rescue as the incidents like these keep reminding me of how violently we celebrate festival, win, or anything like the way we can make noise to let others know, more than we are happy by that.

Law and order situation was bad in our country in last ten years or so, but it will improve with Modi or BJP coming to power is like believe in aliens’ existence. If we really want to make criminals out of parliament than we should not produce or make criminals on the name of hype and force. Otherwise we would soon be at the same place where we were 20 odd years back.

Thanks!

Sameer

ndirectme@gmail.com

कुछ आपको भी कहना है? हां… तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

मियां और कम्युनल

Shahid Khan : मियां सब से ज़्यादा कम्युनल हैं! कम्युनल हुये तो सालों साल मोहम्मद ज्योति बासु जीतते रहे! एक बार फिर कम्युनल हुये तो ममता बानो जीतने लगीं! पहले कभी कम्युनल हुये तो सैयद नेहरु जीतने लगे! फिर कम्युनल हुये तो इंदिरा बेगम जीतने लगीं! एक बार कम्युनल होके वो मोहम्मद राजीव अंसारी को भी जिता चुके हैं!

कभी कम्युनल होते हैं तो शेख अचुत्यानंदन जीत जाते हैं तो कभी मौलाना मुलायम तो कभी बेगम माया तो कभी मिर्ज़ा लालू! सुना है कि पंचायत चुनावों में वो मियां मोदी के लिये भी कम्युनल हो जाते हैं! अबकी बार कम्युनल हो गये तो अब्दुल-जलील केजरीवाल भी जीत ही जाएँगे! बहुत कम्युनल हैं मियां.. हर घड़ी 'मुल्लों' को जिताते रहते हैं! कभी कभी तो नितीश नकवी को भी जिता देते हैं!

शाहिद खान के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स यूं हैं…

Riyaz Hashmi : मेरी नज़र में Shahid Khan साहब का यह व्यंग्य हालात पर सटीक वार कर रहा है। अपनी बात को कहने का यह भी एक सलीक़ा है। वाह शाहिद भाई वाह।

Syed Shahroz Quamar : Ham Aah Bhi Karte Hain To Ho Jaate Hain Badnaam/ Wo Qatl Bhi Karte Hain To Charcha Nahin Hota..

Abhinav Gupta आप भी गज़ब कम्युनल हो /पटना से अपडेट करके मार ज्ञान के चक्षु खोल देते हो /
 
Irfan Siddiqui गजब …लूट लिए आप तो !

Muhammad Shadab ये जो आपने शहद में करैला लपेट के मारा है ना.. मज़ा आ गया.
 
Vandna Tripathi Gazab ho shahid, rulaate bhi ho to hansaa hansaa kar…
 
Abdullah Aqueel Azmi आपने कह कर ले लिया… लाजवाब पोस्ट इस लिये दो बार शेयर करुंगा…

Umashankar Singh कभी मेरे लिए भी कम्यूनल हो जाएँ मियाँ साहब, मैं भी सेकुलर उमाशंकर से कम्यूनल उमरशेख़ हो जाना चाहता हूँ See Translation

Shashi Bhushan Singh बहुत कम्युनल

Shah Alam कभी कम्युनल हुए तो शेख अटल बिहारी जीत गए, कभी हुए तो मोलवी नितीश जीते

Ashim Mukherjee Pandit Shahid ne Zabardast post likha hai

Syed Mohammad Raghib I fully agree….BABA aap ek mast sa Akhbar pakad lo part time wala…

Haidar Ali Gajabe ghuma ghuma k bhigoye hai sir

Deep Sandesh Theekha aur gahra Tanj….

Masroor Anjum Shahid bhai share karne layaq post hai…. isliye maine kar diya….

सफेद-कुर्ते पाजामे में पुतले की तरह लग रहे मोदी और बनारस में नामांकन

Avinash Das : रहस्य में सर्वाधिक आकर्षण होता है. बीएचयू के बाहर लंका चौराहे पर महामना पं मदन मोहन मालवीय की मूर्ति पर मोदी को सुबह नौ बजे आना था, पर वो ढाई घंटे बाद आये. उनका हेलीपैड बीएचयू के प्रांगण में तैयार किया गया था.

उत्सुक लोगों की विकराल भीड़ को जवानों ने नियंत्रित कर रखा था. तमाम छतों से मीडियाकर्मी हटा दिये गये, फिर भी बीएचयू गर्ल्स हॉस्टल की छत पर लड़कियां जमी रहीं. सफेद-कुर्ते पाजामे में पुतले की तरह लग रहे मोदी आये, तो उन्होंने न सिर्फ जमीन पर धूप में तप रही भीड़ का अभिवादन किया, बल्कि गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियों को भी हाथ जोड़ कर याचक की तरह देखा.

बमुश्किल पांच मिनट वहां खड़े रहने के बाद वे उतरे. फूलों से लदी उनकी कार उन्हें लेकर हैलीपैड की तरफ चल दी. वहां से वे काशी विद्यापीठ की तरफ उड़ चले. लंका से करीब चार-पांच किलोमीटर दूर. हम वहां पहुंच नहीं पाये, क्योंकि शहर के तमाम रास्ते बंद कर दिये गये थे. केवल पैदल यात्रा संभव थी. पर हमारी गाड़ी गली-कूचों से होते हुए किसी तरह कचहरी रोड पहुंची. मीडिया की गाड़ी होने के बावजूद हमें कई फर्लांग पहले से पैदल चलने के लिए कहा गया. वह एक सुनसान रास्ता था, जो विवेकानंद की प्रतिमा तक पहुंचता था. यहां भी पुलिस की गोल घेरेबंदी थी, जिसके बाहर लोगों-समर्थकों की विशाल भीड़ रह रह कर नारे लगा रही थी. नारा वही था – "हर हर मोदी, घर घर मोदी". तमाम विवादों के बाद भी इस नारे से कोई परहेज नजर नहीं आ रहा था. मोदी यहां तक रोड शो करते हुए आये. वे लहुराबीर से चले थे.

यहां भी बमुश्किल पांच मिनट वे विवेकानंद जी के बगल में खड़े होकर हाथ हिलाते रहे. छतों दीवारों पर खड़े लोगों ने उन पर फूलों की बारिश करनी चाही, पर मोदी इतने दूर थे कि फूल उन तक पहुंचने के बजाय सड़क पर बिछ जा रहे थे. उन्हीं फूलों को रौंदते हुए मोदी नामांकन के लिए कचहरी में घुस गये.

(हादसा : मेरा मोबाइल आज गेस्ट हाउस में रह गया था. संग ले आता तब भी शायद तस्वीर नहीं उतार पाता. पुलिस वाले तमाम लोगों पर तीखी नजर रखे हुए थे और कोई जेब में भी हाथ डाले चल रहा था, तो उसे हाथ बाहर निकाल कर चलने का निर्देश दे रहे थे.)

पत्रकार और फिल्मकार अविनाश दास के फेसबुक वॉल से.


Shahid Khan : मोदी जी, हवाई 'दहाज' में उड़ी-उड़ी अईलें! हुवां से कुदक्का मार लग्ज़री गाड़ी में ढुकी गईलें! तीन सौ मीटर सरकलें! फेर हुवां से 'हेलीकपटर' में सटसटाई के घुंसी गईलें! फेर सवा किलोमीटर उड़लें! फेर यूनिवर्सिटी के मैदान में गर्दा उड़ाई के कूदी गईलें! हुवां से अब खुल्ला-गाड़ी में मूंड़ी निकाल पब्लिक ओरी मुंह करी हाय-बाय करत हव्वन… आउर अपना के फ़क़ीरचंद चायवाला बतावत हव्व्न! राजेन्द्रघाट से कैमरामैन पांड़े जी संग हम खावं साहेब, बनरसिया न्यूज़! रहीं सब के आगा! कर दिहीं सबके पाछा!

शाहिद खान के फेसबुक वॉल से.

मुझे दुःख है कि सुनील भाई के निधन की खबर अखबारों में नहीं आयी

Vimal Kumar : मुझे दुःख है कि जाने-माने एक्टिविस्ट सुनील भाई के निधन की खबर अखबारों में नही आयी. एक आध में आयी हो तो कह नहीं सकता. मैंने भी खबर चलायी थी. हमारा मीडिया इतना असंवेदनशील और दलाल किस्म का है कि समझ में नहीं आता . कई लेखकों के जीने मरने की खबर भी नहीं देता लेकिन मोदी और राहुल का बकवास रोज़ दिखाता रहता है.

मीडिया मानसिक रूप से दिवालिया हो चुका. है. आजादी के नाम पर मनमर्जी करता रहता है. केवल ताक़तवर और सनसनी ख़बरों में उसकी दिलचस्पी है. सत्ता के इर्द गिर्द घूमता रहता है.

यूएनआई के वरिष्ठ पत्रकार और कवि विमल कुमार के फेसबुक वॉल से.
 

जाने-माने कवि और ‘आप’ प्रत्याशी बल्ली सिंह चीमा गिरफ्तार कर लिए गए

Rising Rahul : एक जनकवि का मुकदमा… पहला आरोप…  दरअसल वो मोदी से ज्‍यादा आतंक नहीं फैला रहे थे। वो अमित शाह की तरह नरमुंड नहीं तलाश रहे थे। वो सोनिया राहुल की तरह अरबों रुपयों का घोटाला ढंकने के लिए भगवान को नहीं याद कर रहे थे। वो तो बस अपने साथ चल रहे भूखे साथियों को अपनी खेती के पैसे से खाना खिला रहे थे और खुद भी खा रहे थे। … इस आरोप में जनकवि को गिरफ्तार कर लिया गया। बात इतनी सी ही नहीं है, आरोप भी एक नहीं है…

दूसरा आरोप…  दरअसल उनके पास मोदी जितना बड़ा जुलूस नहीं था। दरअसल उन्‍हें किसी मां गंगा ने नहीं, लड़ सकने की, मशाल आगे लेकर चलने की मूलभूत ईमानदारी ने खींचा था। दरअसल वो बात करना चाहते थे, मोदी की तरह बात बेबात पर भागना नहीं। दरअसल वो कॉमरेड भी हैं और दरअसल अपनी बात कहने के लिए गलती से उन्‍होंने जीप पर दो लाउडस्‍पीकर लगा लिए थे। इस आरोप में उस बल्‍ली सिंह चीमा को गिरफ्तार कर लिया गया जिसकी आवाज अब हमेशा गूंजेगी।

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के…

पत्रकार राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से.


Sharad Shrivastav : जाने-माने कवि और नैनीताल से 'आप' पार्टी के प्रत्याशी बल्ली सिंह चीमा आज गिरफ्तार कर लिए गए। जिस जीप से वो प्रचार कर रहे थे उस पर 2 लाउड स्पीकर लगे हुए थे और अनुमति सिर्फ एक लाउड स्पीकर की थी। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करके 14 दिन के लिए न्यायिक हिरासत मे जेल भेज दिया। जय लोकतन्त्र, जय सरकार, जय पुलिस और जय हो ऐसे चुनावों की।

http://timesofindia.indiatimes.com/Home/Lok-Sabha-Elections-2014/News/AAP-candidate-arrested-in-Nainital-sent-to-14-days-judicial-custody/articleshow/34081381.cms

शरद श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

जियो टीवी के खिलाफ शिकायत की समीक्षा के लिए बनायी गयी कमेटी

इस्लामाबाद : चर्चित टीवी एंकर हामिद मीर पर जानलेवा हमले का आरोप आईएसआई पर मढने के लिए जियो टीवी का लाइसेंस रद्द करने की रक्षा मंत्रालय की शिकायत की समीक्षा के लिए पाकिस्तान के मीडिया नियामक ने एक तीन सदस्यीय कमेटी बनायी है. सैयद इस्माइल शाह, परवेज राठौड और इसरार अब्बासी की कमेटी जियो के खिलाफ आवेदन पर गौर करेगी और मामले के बारे में पाकिस्तान इलेक्ट्रानिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी (पीईएमआरए) बोर्ड को अवगत कराएगी.

डॉन न्यूज की खबरों के मुताबिक, पीईएमआरए अधिकारियों ने कहा है कि जियो समाचार के खिलाफ आरोपों की प्रकृति बेहद गंभीर हैं. इसके बावजूद चैनल को स्पष्टीकरण का पूरा मौका दिया जाएगा. रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की मंजूरी के बाद पीईएमआरए अध्यादेश 2002 की धारा 33 और 36 के तहत मीडिया नियामक के समक्ष शिकायत दर्ज करायी गयी.

कराची में शनिवार को जियो टीवी के चर्चित एंकर मीर पर हमले के बाद विवाद पैदा हो गया था. हमले के ठीक बाद मीर के भाई ने चैनल पर आकर दोष मढा था कि हमला आईएसआई के 'कुछ तत्वों' और इसके प्रमुख की कारस्तानी है. बयान के मुताबिक, मंत्रलय ने अथॉरिटी को कुछ प्रासंगिक सबूत भी दिए कि कैसे मीडिया ग्रुप खुफिया एजेंसी की छवि को धूमिल कर रहा है.
 

हामिद मीर पर हमले के विरोध में पाकिस्तानी पत्रकार ने पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ पर जूता फेंका

लाहौर से खबर है कि पाकिस्तान के लोकप्रिय समाचार एंकर हामिद मीर पर हुए जानलेवा हमले के विरोध में एक पाकिस्तानी पत्रकार ने आज पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ की ओर जूता फेंका। पर्ल कॉंटिनेंटल होटल में शरीफ दक्षिण एशिया श्रम सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे जिसमें दक्षेस देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। उसी दौरान पत्रकार ने उनपर जूता फेंका। हालांकि सुरक्षा अधिकारियों ने पत्रकार को सभागार से बाहर निकाल दिया। पत्रकार इमदाद सधीर एक सिंधी प्रकाशन आवाज वेब टीवी से जुड़े हुए हैं।

शरीफ की ओर जूता फेंकते हुए सधीर चिल्लाए, आपकी सरकार ने हामिद मीर के हमलावरों को गिरफ्तार करने के लिए कुछ नहीं किया है। जूता मुख्यमंत्री के सामने जाकर गिरा। हालांकि शरीफ इस बात से नाराज नहीं हुए और कहा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। एक पत्रकार के काम के लिए पूरे पत्रकार समुदाय पर तोहमत नहीं लगायी जा सकती। उन्होंने कहा कि सरकार ने मीर पर हुए हमले की निंदा की है। उन्होंने पत्रकार को छोडने का भी आदेश दिया।

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बलिया में अनोखा नामांकन : गधे पर लोकतंत्र (देखें वीडियो)

लोकसभा के इस चुनावी रेस में कोई हेलीकाप्टर तो कोई चार्टेड प्लेन से दौड़ रहा है ….पर यूपी के बलिया लोकसभा सीट से निर्दल प्रत्याशी के रूप में पर्चा भरने आये नवीन राय उर्फ़ चुन्नू राय ने तो देश के सभी प्रत्याशियों को पीछे छोड़ दिया । जी हां, नवीन राय गधे पर सवार होकर बलिया कलेक्ट्रेट तक नामांकन करने पहुंचे। उनके रोड शो में कुल 14 गधे थे।

निर्दल प्रत्याशी नवीन राय उर्फ़ चुन्नू राय का कहना है कि जब देश के लोकतंत्र को गधे पर सवार  कर दिया गया है तो वो खुद इस पर बैठ गए तो क्या दिक्कत। नवीन राय उर्फ चून्नू राय के मुताबिक इस चुनाव में महंगाई बढाने वाले हों या फिर महंगाई का रोना रोने वाले, सभी लोग चुनाव में बेतहाशा खर्च कर जनता को गधा बना रहे हैं। इसलिए उन्होंने गधे पर सवार होकर नामांकन करना बेहतर समझा।

नवीन राय उर्फ़ चुन्नू राय (निर्दल प्रत्याशी , बलिया लोकसभा सीट) की गधे की सवारी और बयान के लिए इन वीडियो लिंक्स पर क्लिक करें:

अनोखा नामांकन : गधे पर लोकतंत्र (पार्ट एक)
https://www.youtube.com/watch?v=6xl8ZOcR1yQ

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अनोखा नामांकन : गधे पर लोकतंत्र (पार्ट दो)
https://www.youtube.com/watch?v=PSuTFMzcJ_I

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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जियो न्यूज टेलीविजन को ‘कारण बताओ’ नोटिस

इस्लामाबाद:  पाकिस्तानी इलेक्ट्रानिक मीडिया रेगुलेशन एथारिटी ने कल जियो न्यूज को कारण बताओ नोटिस जारी किया। जियो न्यूज के विरूद्ध आरोप है कि उसने गुप्तचर एजेन्सी इंटर सॢवसेज इंटेलिजेन्स (आई.एस.आई) को बदनाम कर राष्ट्रीय हित के विरूद्ध काम किया है। रेगुलेटरी एथारिटी ने जियो न्यूज चैनल से 6 मई तक कारण बताओ नोटिस का जवाब मांगा है। इसके पहले मंगलवार को रक्षामंत्रालय ने एथारिटी को चैनल के विरूद्ध कार्रवाई के लिए लिखा।

रक्षा मंत्रालय ने लिखा है कि चैनल ने जो आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित की है वह राष्ट्रीय संस्था को बदनाम करने वाली है अत: उसका लाइसेन्स रद्द किया जाना चाहिए। नोटिस जारी करने का निश्चय तीन सदस्यीय समिति ने किया।
 

दौसा में मतदान के दौरान हिंसा में चार पत्रकार घायल

दौसा। राजस्थान के दौसा जिले में लोकसभा चुनावों ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया। इसके चलते जिले की महवा तहसील में ग्रामीण और पुलिस बल आमने-सामने हो गए। ग्रामीणों ने पुलिस पर पत्थर बरसाए, वहीं पुलिस को लाठीचार्ज और फायरिंग करनी पड़ी। वहीं सिकराय तहसील में मतदान दल पर भेदभाव के आरोपों के बाद मतदान रोक दिया गया। हालांकि बाद में सुरक्षा में बढ़ोत्तरी के बाद पुन: मतदान शुरू हो गया।

महवा तहसील के सांठा गांव में फर्जी मतदान को लेकर दो गुट आमने-सामने हो गए। इस पर पुलिस ने दखल दिया। गुस्साएं ग्रामीणों ने पुलिस पर पथराव किया। पुलिस को बचाव में लाठीचार्ज करना पड़ा, साथ ही हवाई फायरिंग भी करनी पड़ी। ग्रामीणों ने पुलिस की 3 गाडियों को आग के हवाले कर दिया। इस दौरान कुछ ग्रामीणों ने कवरेज कर रहे चार मीडियाकर्मियों के कैमरे और लैपटॉप भी छीन कर क्षतिग्रस्त कर दिया। इस दौरान 4 पत्रकारों को चोटें आई। इन्हें महवा के अस्पताल में भर्ती कराया गया। पथराव में कुछ लोगों को चोटें आई हैं। सूचना मिलने पर अतिरिक्त जाब्ता भेजा गया। वहीं सिकराय तहसील के हिंगोली बूथ पर ग्रामीणों ने मतदान दल पर पक्षपात का आरोप लगाया और विरोध जताया। इस पर मतदान रोक दिया गया। वहां पर मतदान दल बदला गया।
 

रिफत जावेद के पर करते, संजय ब्रागटा की बल्ले-बल्ले, सरबोजीत और नवीन झुनझुनवाला को नई जिम्मेदारी

टीवी टुडे ग्रुप के चारों चैनलों के मैनेजिंग एडिटर इनपुट रिफत जावेद का काम अब संजय बरागटा को दिया गया है. संजय बरागटा अभी तक 'दिल्ली आज तक' को संभाल रहे थे. रिफत जावेद की भिड़ंत ढेर सारे पत्रकारों से हुई थी. कई रिपोर्टरों और सीनियरों से उनके तनाव की खबरें आ रही थीं. ये नहीं पता चल पाया है कि रिफत जावेद को पूरी तरह टीवी टुडे ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है या उन्हें कोई नई जिम्मेदारी दी गई है.

जी इंडिया ऐंटरप्राइजेज़ लिमिटेड ने हिन्दी एंटरटेनमेंट चैनल्स जी टीवी, जी अनमोल, स्माइल, 9x और जी टीवी एचडी के लिए सरबोजीत चटर्जी को सीनियर वाइस प्रेजिडेंट, मार्केटिंग नियुक्त किया है.  चटर्जी को मीडिया मार्केटिंग और कंटेंट का 13 साल का अनुभव है. वह डीएनए में सीनियर वाइस प्रेजिडेंट- मार्केटिंग के पद पर नियुक्त थे.

बीबीसी ग्लोबल न्यूज लिमिटेड ने इंडियन ऑपरेशंस के लिए नवीन झुनझुनवाला को सीओओ के पद पर नियुक्ति किया है. ये कंपनी बीबीसी के न्यूज ऑपरेशंस, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज और bbc.com/news का संचालन करती है.  भारत में कंपनी की व्यापारिक जरूरतों के लिए पिछले साल यह पद बनाया गया था. नवीन कई सालों से टर्नर इंटरनेशनल इंडिया के साथ जुडे हुए थे.

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भास्कर में बड़े पैमाने पर छंटनी की तैयारी, डीएनए और बिजनेस भास्कर के कई एडिशन बंद होंगे

दैनिक भास्कर समूह ने भले ही अपने कर्मियों को इनक्रीमेंट का लेटर दे दिया है लेकिन ढेर सारे कर्मचारियों के गले  पर छंटनी की तलवार भी लटका रखा है.  डीएनए अखबार और बिजनेस भास्कर अखबार के कई एडिशन बंद होने की सूचना से सैकड़ों पत्रकार और मीडियाकर्मी परेशान हैं. ये लोग अब नई नौकरी खोज रहे हैं. डीएनए और बिजनेस भास्कर के कुछ संस्करणों को बंद करने का फैसला किया है. इससे इन समाचार पत्रों में काम कर रहे सैकड़ों कर्मचारियों में निराशा का माहौल है.

बिजनेस भास्कर अखबार 2008 में शुरु हुआ था जिसके कई संस्करण दिल्ली में बैठकर निकाले जा रहे थे. यह अखबार व्यवसायिक तौर पर सफल नहीं हो पाया तो भास्कर प्रबंधन ने इस टीम के संपादकीय सहयोगियों को जयपुर कार्यालय में बैठाने का फैसला किया. नौकरी बचाने के चक्कर में कई कर्मचारियों ने जयपुर जाकर काम करने में ही भलाई समझी. लेकिन, अब अखबार बंद किए जाने की खबरों के चलते कर्मचारियों में भारी निराशा है.

डीएनए का इंदौर संस्करण 2011 में शुरु हुआ और इसे भी इस माह के अंत तक बंद किए जाने की खबर है. बाकी संस्करण बंद होगें या नहीं यह फैसला अभी प्रबंधन ने नहीं लिया है लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि ग्रुप में बड़े पैमान पर छंटनी की तैयारी हो चुकी है. इससे दैनिक भास्कर में काम कर रहे कर्मचारियों में निराशा है. एक तरफ भास्कर समूह कई नए संस्करण लाने की तैयारी कर रहा है तो दूसरी ओर समूह के कुछ प्रकाशनों को बंद करने की रणनीति कर्मचारी समझ नहीं पा रहे हैं.

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Why India TV not broadcasting the footage of the attack?

On the India TV panel was Kaushal Kishore Mishra, a BJP member and professor from Benaras Hindu University. Mishra was the most enthusiastic on the panel and, egged on by a vociferous crowd, seemed to be on a roll. About 20 minutes into the discussion, Somnath Bharti said something that contained the word Modi. Mishra stood up from his chair, visibly agitated and furious, and asked Bharti to keep quiet. It was then that another member on the panel – presumably representing AAP, since he asked Mishra to let Bharti speak – intervened.

That was the flash point – the crowd (more than 100 in number by then) erupted with slogans of “Maaro Maaro” (Hit him, hit him). Within seconds, the crowd unleashed itself on the panelist who had dared to stand up to Mishra. Soon, Bharti too was surrounded and pinned down by the crowd – now completely possessed. The cries of “Maaro Maaro” turned into “Maaro Kaato” (Hit hit, cut him up).

Bhupendra Chaubey, CNN-IBN’s National Affairs Editor, who happened to be in the crowd, plunged himself into the mob and tried rescuing Bharti who was more football than human by now, but found himself pinned down as well. Sensing serious trouble, Abhay Tripathi, a reporter with CNN-IBN, dragged Bharti away and somehow managed to push him inside the nearest car – which happened to be the one I had hired for the day.

The frenzied crowd followed close behind. Just as the car was beginning to move, the mob smashed the driver’s windowpane, injuring him in the face. To the driver’s credit though, he managed to keep his foot on the accelerator and flee with Somnath Bharti. The crowd, refusing to relent even then, flung bricks and stones at the fleeing car. In the process, they broke the rear windshield of the car. Thankfully my belongings which were in the car weren’t pilfered. So we can give the crowds full points for causing only bodily harm and indulging in vandalism, but not theft.

At the Bhelupur police station, Station House Officer (SHO) SK Singh told Newslaundry that India TV didn’t have permission from the district administration or the police to organise any kind of event on the ghats. Singh said, “In fact all news channels have been given written intimation not to organise any shows on the ghats. We’ll report this to the Election Commission and move charges against India TV.”

The question is, why is India TV – which had organised the panel discussion – not broadcasting the footage of the attack? Because it was flouting rules by organising a panel discussion where it didn’t have permission to do so? Or is it because it shows BJP in a bad light? The channel’s bashfulness in telecasting such dramatic footage is totally out of character, going by the sensational footage it usually passes off as news. The only channel showing any footage of the attack on Bharti is CNN-IBN.

http://ibnlive.in.com/videos/467142/news-360-aaps-somnath-bharti-beaten-up-by-bjp-wokers-in-varanasi.html

We called Chairman and Editor-In-Chief of India TV, Rajat Sharma, to ask him why they had organised a panel discussion on the ghats when it wasn’t allowed, whether security was provided, why they weren’t playing the footage, and what they had done to control the mob? He asked us to call him tomorrow. We then contacted Anita Sharma, Senior Executive Editor at India TV who asked us to mail her our questions. She still hasn’t sent us her response. As she does, we shall update this article.

It’s commendable that Bhupendra Chaubey stepped into the mob to help Bharti. If anyone’s seen a mob in action in India, you’d realise how impressive it is that he decided to intervene instead of standing back and protecting himself. What’s not so commendable is that at the time of the incident, three channels – Times Now, IBN 7, Zee News – apart from India TV had their OB vans parked next to the ghats, preparing for broadcast. This was in direct violation of the rules put down by the police. In short, the media was a partner in crime in this reprehensible affair – one that will be remembered as a blotch on this election.

(Unless you are a proponent of the logic which is visible on Twitter, which believes in an eye for an eye.) About the other partner in crime in this incident, the less said the better.

Arunabh Saikia का लिखा और newslaundry.com में छपा उपरोक्त विश्लेषण पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… The mob, the media & Somnath Bharti

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भास्कर समूह ने मजीठिया नहीं, इनक्रीमेंट दे दिया

खबर है कि दैनिक भास्कर वालों ने अपने पत्रकारों को मजीठिया तो नहीं दिया लेकिन दस से सोलह फीसदी तक का इनक्रीमेंट दे दिया है. भास्कर ग्रुप में कार्यरत लोगों को इनक्रीमेंट का लेटर दिया जा रहा है. किसी का दस फीसदी तनख्वाह बढ़ी है तो किसी की सोलह से बीस फीसदी.

मजीठिया के आधार पर भास्कर वाले सेलरी देंगे या नहीं, ये पता नहीं चल पाया है. बताया जा रहा है कि भास्कर के मालिकान भोपाल में लंबी बैठकें कर रहे हैं जिसमें मजीठिया को लेकर रणनीति फाइनल की जा रही है.

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सतीश के. सिंह फिर लौटे लाइव इंडिया, बने एडिटर इन चीफ

कई न्यूज चैनलों की यात्रा करने के बाद सतीश के. सिंह अंततः लौट के पुराने घर आ गए. समृद्धि जीवन नामक एक विवादित चिटफंड कंपनी द्वारा संचालित लाइव इंडिया ग्रुप के वे एडिटर इन चीफ बने हैं. इस समूह के एडिटर इन चीफ पद से एनके सिंह ने इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि ग्रुप के मालिकान अपने घर की निजी शादी समारोह का लगातार लाइव प्रसारण अपने चैनल पर कर रहे थे. कई अन्य मुद्दों पर विवाद और विरोध के बाद एनके सिंह ने सरोकारी पत्रकारिता के पक्ष में झंडा बुलंद करते हुए इस्तीफा दे दिया. तबसे लाइव इंडिया को नए एडिटर इन चीफ की तलाश थी.

सतीश के. सिंह पहले भी लाइव इंडिया के एडिटर इन चीफ रह चुके हैं. वे और उनकी टीम लाइव इंडिया से इस्तीफा देकर नवीन जिंदल के चैनल फोकस और हमार गई थी. वहां से हटने के बाद सतीश के. सिंह न्यूज एक्सप्रेस से जुड़े. उसके बाद उन्हें डीडी न्यूज की तरफ से आफर मिला. अब जाकर उन्होंने नई पारी की शुरुआत फिर से लाइव इंडिया के साथ की है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में लाइव इंडिया में कई नए लोग ज्वाइन करेंगे और कई पुराने लोग बाहर हो सकते हैं.

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सोनिया गांधी के इशारे के बाद अमरिंदर ने दिया था टाइटलर पर बयान!

यशवंत जी, आप पत्रकारिता में निष्पक्ष नीति रखते हैं। पत्रकारिता में आपके हिम्मत को बयां करती स्टोरीज मैं पढ़ता रहता हूं, इसलिए एक लेख भेज रहा हूं जो हाल में विवादित अमरिंदर सिंह द्वारा जगदीश टाइटलर पर दिए बयान के यथार्थ को दर्शाता है। यशवंत जी, मुझे ये कहने और मेरे विश्वस्त सूत्रों से जानकारी के मुताबिक सच बताने में गुरेज नहीं कि अमरिंदर सिंह का जगदीश टाइटलर पर बयान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इशारे पर था। ज्यादा लंबी बात नहीं करनी, आप इंडिया टुडे की उस रिपोर्ट को पढ़े होंगे, जिसमें सोनिया गांधी ने खुद कैप्टन अमरिंदर सिंह को फोन किया था। याद दिला देता हूं। इस खबर को ‘आज तक’ ने भी चलाया था।
21 मार्च की शाम 5 बजे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक फोन किया था। उन्होंने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री से कहा, ''अमरिंदर, मैं चाहती हूं कि आप अमृतसर से चुनाव लड़ें. मुझे लगता है कि इस काम के लिए आप सबसे सही व्यक्ति हैं। आपको कुछ भी चिंता करने की जरूरत नहीं। मैं हर तरह से आपकी मदद करूंगी.” सड़क के रास्ते दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नेशनल हाइवे-1 पर अपनी गाड़ी किनारे खड़ी की और तुरंत हां कर दी। लेकिन वे अचानक किए गए इस फोन से काफी हैरान थे। सोनिया गांधी का इस तरह अनुरोध करना असामान्य बात थी, खासकर तब, जब उन्होंने तीन हफ्ते पहले उनसे मुलाकात करके लोकसभा चुनाव लडऩे की अनिच्छा जता दी थी और सोनिया ने अपनी सहमति भी दे दी थी। 
 
दो दिन पहले 19 मार्च को सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने जब अमरिंदर से इस संभावना पर चर्चा की थी तो उन्होंने चुनाव लडऩे से मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें सोनिया की मंजूरी मिल चुकी थी। उन्होंने कुछ टीवी इंटरव्यू में भी अपनी अनिच्छा जता दी थी। इस फोन के करीब घंटे भर बाद राहुल ने भी उन्हें मोबाइल पर संदेश भेजा: ''धन्यवाद, आप खड़े होंगे और लड़ेंगे।” खुद अमरिंदर सिंह की ओर से इस बात की पुष्टि इंडिया टुडे के रिपोर्टर को की गई थी कि सोनिया वह सब कुछ कर रही हैं, जो पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उनसे उम्मीद की जाती है।
 
अब आइए अमरिंदर सिंह के उस बयान पर जो उन्होंने जगदीश टाइटलर पर दिया था। असल में वो बयान भी सोनिया गांधी के इशारे पर था। कांग्रेस अध्यक्ष के इशारे पर वो प्लांड-वे में था। सोनिया गांधी राजनीतिक पारे को समझना चाह रही थीं। जगदीश टाइटलर के प्रति लोगों खासकर सिखों की भावना को टटोलने के लिए इस बार उन्होंने अमरिंदर सिंह को चुना। वो देखना चाह रही थीं, एक सिख अगर खुद हल्की आहट से जगदीश टाइटलर को सेफ करना चाहे तो क्या हो सकता है। कांग्रेस का दांव फिर उल्टा पड़ा। अमरिंदर सिंह खुद सिख समुदाय से हैं, सिखों को इससे फर्क नहीं, लेकिन टाइटलर जैसे विवादित नेता का बचाव वो हरगिस बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। 
 
यशवंत जी, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी का फॉर्मूला इतनी दूर कौड़ी खेलने का था, जिससे टाइटलर को फिर से मैदान में लाया जा सके। अगर एक सिख के इस बयान पर सिखों का इतना प्रदर्शन नजर नहीं आता तो कांग्रेस आलाकमान का अगला कदम होता कि टाइटलर को सामने लाया जाए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
 
सबसे पहले तो एक सिख होकर कैसे कैप्टन साहब ने ऐसी बातें स्वीकार की, मुझे इस पर ताज्जुब होता है। मेरे एक विश्वस्त सूत्र जो खुद कांग्रेस के एक बड़े नेता हैं, ने मुझे पूरी असलियत बताई। मैंने जब कहा कि ऐसा भी तो हो सकता है कि यह अमरिंदर की निजी राय हो तो उनका जवाब भी बड़ा चौंकाने वाला था। उन्होंने इंडिया टुडे के उस रिपोर्ट को सामने रखा और कहा कि भाई साहब, जो आदमी पंजाब का मुख्यमंत्री रहा हो। जिसे खुद सोनिया गांधी ने फोन कर चुनाव मैदान में उतरने के लिए आमंत्रण दिया हो और कहा कि मैं आपके लिए हर कुछ करने को तैयार हूं, आप बस मेरे इशारे पर चलिए। जिसे खुद राहुल गांधी मैसेज कर थैंक्यू कहते हों, वो अमरिंदर सिंह ने ऐसे ही इतने बड़े मुद्दे पर ऐसे ही नहीं कह दिया, जबकि वो जानता है कि उसके खिलाफ अरुण जेटली जैसे लोग हैं जो टक्कर दे सकते हैं। गुरु पेंच को समझिए।
 
Om Prakash
 
om-prakashprakashom@outlook.com

‘इंडिया टीवी’ का मोदी ने किया उद्धार, टीआरपी ‘आजतक’ के बराबर

इसे कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम. मोदी से अनैतिक डील कर अच्छा खासा माल कमाने वाले इंडिया टीवी ने मोदी के फिक्स इंटरव्यू के कारण टीआरपी में भी अच्छी खासी छलांग लगाई है. रजत शर्मा की फिक्स अदालत में मोदी से पूछे गए फिक्स सवाल वाले कार्यक्रम को चुनाव के वक्त इंडिया टीवी पर इतनी बार दिखाया गया और इसे आलोचकों व प्रशंसकों दोनों ने इतनी बार देखा कि यह कार्यक्रम इंडिया टीवी के लिए बंपर टीआरपी की सौगात लेकर आया. 
आजतक जो कभी टीआरपी के मामले में नंबर दो चैनल एबीपी न्यूज से इतना आगे था कि दोनों तुलना दूर दूर तक नहीं की जा सकती थी, वही आजतक आज इंडिया टीवी से नंबर वन की पदवी छिन जाने के खतरे से रूबरू है. मोदी की आंधी में इंडिया टीवी ने एबीपी न्यूज को नंबर तीन पर धकेल दिया और खुद आगे बढ़ते हुए आजतक के बराबर पहुंच गया. सोलहवें हफ्ते की पूरी टीआरपी इस प्रकार है…
 
WK 16 2014, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:
 
Aaj Tak 16.6 dn 3.2
India TV 16.2 up 2.2
ABP News 14.6 up 0.8
ZN 8.6 dn 0.1
India news 8.4 up 0.1
News Nation 8.2 same
NDTV 7.4 dn 0.2
News24 7.2 up 0.3
IBN 5.8 up 0.4
Samay 3.0 up 0.3
Tez 2.6 dn 0.3
DD 1.4 dn 0.2
 
Tg CS M 25+ABC
Aaj Tak 17.3 dn 3.3
India TV 16.8 up 2.8
ABP News 13.5 same
ZN 9.6 up 0.4
India news 8.6 up 0.1
NDTV 8.1 dn 0.5
News Nation 7.9 up 0.1
News24 6.2 up 0.2
IBN 5.6 up 0.2
Samay 2.9 up 0.3
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टीवी शो के दौरान सोमनाथ भारती की हुई पिटाई, सीएनएन-आईबीएन वालों ने बचाया

वाराणसी में भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच का चुनावी घमासान हिंसा में बदलता दिख रहा है। आज एक टीवी कार्यक्रम में आप नेता सोमनाथ भारती पर हमला बोल दिया गया और जमकर उनकी पिटाई की गई। आरोप लगा है बीजेपी कार्यकर्ताओं पर। सोमनाथ अस्सी घाट पर टीवी शो में शामिल होने आए थे। यहीं पर कुछ लोगों ने शो के दौरान ही सोमनाथ की जमकर पिटाई कर दी। उनकी कार पर भी हमला किया गया और शीशे चकनाचूर कर दिए गए। साथ उनके ड्राइवर की भी पिटाई की गई।

उधर, सोमनाथ ने इस मामले में मामला दर्ज कराने से इनकार कर दिया है। सोमनाथ ने कहा कि जो भी हुआ उससे में हिल गया हूं। मुझे बचाने के लिए सीएनएन-आईबीएन का शुक्रिया। अगर मुझे न बचाया होता तो मेरी मौत भी हो सकती थी। मैंने कोई एफआईआर नहीं दर्ज कराई है क्योंकि हमारी नीति माफ करने की है। वाराणसी में नरेंद्र मोदी बीजेपी उम्मीदवार हैं और उन्हें आप संयोजक अरविंद केजरीवाल चुनौती दे रहे हैं। इसे लेकर दोनों दलों के बीच तल्खी का दौर चल रहा है।

बताते हैं कि भारती को बचाने में स्थानीय लोगों और कुछ पत्रकारों को भी चोटें आई हैं। भेलूपुर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर उपद्रवियों को खदेड़ा और सोमनाथ भारती को सुरक्षित निकाला। आप नेता ने भेलूपुर थाने पर पहुंच गए थे मगर संयोजक अरविंद केजरीवाल के निर्देश पर उन्होंने प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई।

अस्सी घाट पर बुधवार की शाम एक टीवी चैनल का टॉक शो चल रहा था। घाट पर भाजपा और आप समर्थकों की भीड़ लगी हुई थी। आप नेता सोमनाथ भारती ने बताया कि टॉक शो के दौरान भाजपा समर्थक ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगा रहे थे। जवाब में आप कार्यकर्ताओं ने भी ‘अभी तो शीला हारी है, अब मोदी की बारी है’ का नारा लगाया। इस पर भाजपा समर्थक बिफर पड़े और आप समर्थकों पर हमला बोल दिया। सोमनाथ भारती बीचबचाव करने गए तो उनपर भी हमला बोल दिया गया।

सोमनाथ के मुताबिक, भीड़ से बचने के लिए वह सीढ़ियों की तरफ भागे तो गिर पड़े। पीछे से आए उपद्रवियों ने उनपर लात-घूसों से हमला कर दिया। स्थानीय लोगों और पत्रकारों ने बीचबचाव किया और सोमनाथ भारती को भीड़ से बाहर निकाला। अस्सी घाट पर मौजूद अमित कुमार गुप्ता की टैक्सी में सोमनाथ ने शरण ली तो गुस्साए उपद्रवियों ने कार पर पथराव कर इसे क्षतिग्रस्त कर दिया।

सूचना पाकर इंस्पेक्टर भेलूपुर वीके सिंह मौके पर पहुंच गए। पुलिस फोर्स देखते ही हंगामा कर रहे लोग तितर-बितर हो गए। पुलिस ने सोमनाथ भारती को वहां से निकाला और थाने ले आई। थाने पर मुकदमा दर्ज कराने की तैयारी चल रही थी कि पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोमनाथ भारती को मना कर दिया। केजरीवाल ने कहाकि वह मुकदमा दर्ज कराने के पक्ष में नहीं हैं। हमला करने वाले भटके हुए बच्चे हैं। उन्हें अपनी गलती का खुद ही अहसास हो जाएगा।

ISI ने कहा, Geo TV बंद करो

पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी ISI ने कहा है कि वहां के लोकप्रिय टीवी समाचार चैनल जियो टीवी को बंद कर दिया जाए. यह आग्रह उसने पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय से किया जिसने सरकार से दरख्वास्त की है कि वह इस चैनल को बंद करे. पाकिस्तानी वेबसाइट दन्यूज.कॉम ने इस्लामाबाद से खबर दी है कि ISI की शिकायत पर रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को वहां के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी से कहा है कि वह इस टीवी न्यूज चैनल के खिलाफ कार्रवाई करे क्योंकि उसने जासूसी एजेंसी के खिलाफ आरोप लगाए हैं.

गौरतलब है कि Geo TV के संपादक हामिद मीर पर कराची में अज्ञात बंदूकधारियों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाई जिससे वे बुरी तरह जख्मी हुए और उन्हें आईसीयू में दाखिल कराना पड़ा. उन्होंने आरोप लगाया कि आईएसआई उन्हें मरवाना चाहती है क्योंकि उन्होंने उसके खिलाफ खबरें दिखाई थी. वेबसाइट ने बताया कि रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने इसके लिए अनुमति दी है. पाकिस्तान में इस तरह का एक ऑर्डिनेंस 2002 में लागू किया था जिसके तहत जासूसी एजेंसी या फौज के खिलाफ खबरें दिखाने या छापने पर पाबंदी है.

रक्षा मंत्रालय ने चैनल के मैनेजमेंट के खिलाफ ऐसे आरोप लगाने पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है. उसने कहा कि जासूसी एजेंसी की छवि खराब करने का काम किया जा रहा है. रक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा है कि न्यूज चैनल ने ISI के डायरेक्टर जनरल ज़हीरुल इस्लाम के खिलाफ आरोप लगाकर आचार संहिता का उल्लंघन किया है. उसने कहा है कि चैनल के मैनेजमेंट और संपादकीय टीम पर आईएसआई के खिलाफ खबरें दिखाने पर कार्रवाई की जाएगी. उनसे सख्ती से निबटा जाएगा.

Geo TV के खिलाफ पाक की शिकायत पर अमेरिकी मीडिया चिंतित

जियो न्यूज चैनल के खिलाफ पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय द्वारा देश की मीडिया नियामक प्रधिकरण में की गई शिकायत को लेकर चिंता जताते हुए एक शीर्ष अमेरिकी मीडिया संस्था ने सुरक्षा सेवाओं से संयम बरतने को कहा है। कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपेजे) के एशिया कार्यक्रम समन्वयक, बॉब डिएट्ज ने कहा, हमने पाकिस्तान मीडिया इलेक्ट्रॉनिक प्राधिकरण से कहा है कि इस दुर्भावनापूर्ण शिकायत पर कार्रवाई नहीं करें। हमने पाकिस्तान की सुरक्षा सेवाओं से कहा है कि मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचाने और संयम बरतें। उन्होंने कहा, आईएसआई मीडिया में इन आरोपों के खण्डन के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उसे कवरेज को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथॉरिटी (पीईएमआरए) से पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने अपनी शिकायत में जियो की मूल कंपनी इंडिपेंडेंट मीडिया कापरेरेशन पर आरोप लगाया था। इसने आरोप लगाते हुए कहा था कि, आईएसआई और इसके अधिकारियों की एकता को कम करने के लिए और इसकी छवि को खराब करने के लिए झूठे और निन्दात्मक अभियान संचालित किया जा रहा है। 19 अप्रैल को तालिबान और आईएसआई के आलोचक, जियो टीवी के एंकर हामिद मीर की हत्या के प्रयास के बाद पाकिस्तान की सेना, खुफिया समुदायों और मीडिया के बीच तनाव तेजी से बढ़ गया है।

समा टीवी के पत्रकार शहजाद इकबाल की हत्या

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मियांवाली जिले में अज्ञात बंदूकधारियों ने एक स्थानीय टीवी पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार, समा टीवी के पत्रकार शहजाद इकबाल को मियांवाली कस्बे में चार हथियारबंद लोगों ने पकड़ लिया और उस पर अंधा-धुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी। इकबाल को अस्पताल में ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में कराची में जियो टीवी के मशहूर एंकर और पत्रकार हामिद मीर को अज्ञात लोगों ने गोली मार दी थी। हमले में संयोग से हामिद मीर की जान तो बच गई, पर वे जख्‍मी हो गए। मीर को तालिबान और अन्य आतंकी संगठनों से जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं।
 
 

सहारा कर्मचारियों के भत्‍तों में भी जबर्दस्‍त कटौती, असमंजस का दौर

: कर्मचारियों से जबरिया वसूली से भी नहीं मिलेगी सुब्रत को राहत : पांच हजार से लेकर पांच लाख रूपये वसूला जा रहा है सहाराकर्मियों से :  लखनऊ : सहारा इंडिया के मुखिया को उनके मौजूदा कारागारी-जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए दस हजार करोड़ रूपयों की रकम जुटाने की बहु-प्रचारित कवायदें भी अब सहारा इंडिया की अन्‍य योजनाओं की तरह ही हवा-हवाई हो चुकी हैं। हालांकि इस काम के नाम पर सहारा इंडिया के प्रबंधकों ने भारी-भरकम रकम जमकर जबरिया उगाहा है।

जानकारों का कहना है कि  हर सेवक यानी चपरासी-कार्यकर्ता से पांच हजार, सहायक यानी क्‍लर्क से दस हजार, प्रबंधक से पचीस हजार, वरिष्‍ठ प्रबंधक से पचास हजार और महाप्रबंधक और उससे ऊपर के अधिकारियों से एक से लेकर पांच लाख रूपयों की जबरिया उगाही की गयी है। उगाही करने वालों ने रकम देने वालों से दावा किया है कि यह रकम पिछले पौने दो महीनों से दिल्‍ली के तिहाड़ जेल में बन्‍द सुब्रत राय की जमानत के लिए जुटाया जा रहा है। लेकिन खबर है कि काफी कोशिशों के बावजूद जमानत की रकम जुटा पाने में नाकाम रहा है। बावजूद इसके, वसूली का अभियान चल रहा है। इतना ही नहीं, कम्‍पनी ने अपने कर्मचारियों के भत्‍तों में भी जबर्दस्‍त कटौती कर दी है।

आपको बता दें कि यह रकम सहारा इंडिया के कर्मचारियों की सहकारी समिति-कम्‍पनी में वसूली गयी है। यह समिति सहारा इंडिया के प्रबंधकों ने ही खड़ी की है। भोपाल में पंजीकृत इस सहकारी समिति-कम्‍पनी अब सहारा इंडिया के बड़े अधिकारियों के हाथों में है और यह वसूली अभियान सुब्रत राय की जमानत के लिए की जा रही है। सहारा के एक कर्मचारी ने अपना नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर आश्‍चर्य और क्षोभ व्‍यक्‍त किया कि इतनी बड़ी रकम वसूली के बदले में उनके अधिकारियों ने दो अधपन्‍ना पकड़ा दिया है। लेकिन इसके बदले में क्‍या-क्‍या मिलेगा, इस बारे में कोई चर्चा-ब्‍योरा तक इस अधपन्‍ने में दर्ज नहीं है। हालांकि मौखिक तौर पर इन कर्मचारियों से कहा गया है कि उन्‍हें यह रकम तीन बरस में दो-गुना होकर वापस की जाएगी।

हैरत की बात यह है कि शुरूआती दिनों में तो कर्मचारियों के वेतन से यह वसूली हुई, लेकिन जल्‍दी ही अब उसे नकद लिया जा रहा है। अब तक किसी भी कर्मचारी ने इस वसूली से इनकार नहीं किया है, वजह यह कि हर कर्मचारी बहुत अच्‍छी तरह से जानता-समझता है कि इस वसूली से इनकार करने वालों का अंजाम क्‍या होगा।

उधर खबर है कि सहारा इंडिया प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों के भत्‍तों में भारी-भरकम कटौती का अभियान छेड़‍ दिया है। आपको बता दें कि सहारा और उसके आनुषांगिक संगठनों के कर्मचारियों को वेतन तो बहुत कम होता है, जबकि भत्‍ते वेतन से ज्‍यादा। अब इन भत्‍तों की कटौती से कर्मचारियों में आर्थिक संकट पैदा हो गया है।

लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट. संपर्क 09415302520

पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथारिटी को जियो टीवी के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश

इस्लामाबाद : आईएसआई की शिकायत पर पाकिस्तान रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथारिटी (पेमरा) को निर्देश दिया है कि वह जियो टेलीविजन नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करे। जियो टेलीविजन नेटवर्क ने पिछले दिनों पाक पत्रकार हामिद मीर पर हुए हमले के लिए आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया था। सरकारी सूत्रों के मुताबिक पेमरा अध्यादेश 2002 की धारा 33 के तहत मीडिया नियामक को अपनी शिकायत दर्ज कराई है। इससे पहले इस शिकायत को पाक रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने स्वीकृति दे दी थी।

अपने आवेदन में चैनल प्रबंधन के खिलाफ आईएसआई और इसके डीजी लेफ्टिनेंट जनरल जहिरूल इस्लाम पर आरोप लगाने पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। शिकायत के साथ मंत्रालय ने मीडिया नियामक को वे साक्ष्य भी उपलब्ध कराए हैं, जो इस चैनल समूह द्वारा लगातार आईएसआई की छवि को दागदार बनाने के लिए किए जाते रहे हैं।  उधर, जियो न्यूज चैनल के खिलाफ पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय द्वारा देश की मीडिया नियामक प्राधिकरण में की गई शिकायत को लेकर चिंता जताते हुए एक शीर्ष अमेरिकी मीडिया संस्था ने सुरक्षा सेवाओं से संयम बरतने को कहा है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के एशिया कार्यक्रम समन्वयक, बॉब डिएटज ने कहा कि हमने पाकिस्तान मीडिया इलेक्ट्रॉनिक प्राधिकरण से कहा है कि इस दुर्भावनापूर्ण शिकायत पर कार्रवाई नहीं करें। हमने पाकिस्तान की सुरक्षा सेवाओं से कहा है कि मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचाने और संयम बरतें। उन्होंने कहा कि आईएसआई मीडिया में इन आरोपों के खण्डन के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उसे कवरेज को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथॉरिटी (पीईएमआरए) से पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने अपनी शिकायत में जियो की मूल कंपनी इंडिपेंडेंट मीडिया कारपोरेशन पर आरोप लगाया था। इसने आरोप लगाते हुए कहा था कि आईएसआई और इसके अधिकारियों की एकता को कम करने के लिए और इसकी छवि को खराब करने के लिए झूठे और निन्दात्मक अभियान संचालित किया जा रहा है। 19 अप्रैल को तालिबान और आईएसआई के खिलाफ मुखर जियो टीवी के एंकर हामिद मीर की हत्या के प्रयास के बाद पाकिस्तान की सेना, खुफिया समुदायों और मीडिया के बीच तनाव तेजी से बढ़ गया है।

अनुराधा प्रसाद का ‘इतिहास गवाह है….’

इन दिनों 'न्यूज 24' पर एक प्रोग्राम प्रसारित हो रहा है…नाम है 'इतिहास गवाह है..' नाम तो बहुत ही गंभीर है…मगर इसमें एंकर की प्रस्तुति प्रोग्राम के विषय-वस्तु से बिल्कुल ही अलग-थलग दिखाई पड़ती है….मानों ब्लैक कॉस्टयूम में, उजले मोतियों में गुंथी माला पहन एंकर निर्मल बाबा के प्रोग्राम की एंकरिंग करने जा रही हों….

स्क्रिप्ट इतनी हल्की कि जैसे गंगा की कहानी और गटर की जुबानी…. अनुराधा प्रसाद से गुजारिश है कि अपने प्रोग्राम की व्यापकता और गंभीरता को समझें….टीआरपी की चाहत के लिए जरूरी होता है कि दर्शकों के बीच असर पैदा किया जाए….

सुशील कुमार

मीडियाकर्मी

09350475644

sushil.kumar.tv@gmail.com

लोकसभा चुनाव में हो रहे अपार सम्मान से पत्रकारों के छलक आए आंसू

फर्रुखाबाद व कन्नौज में 2 दिग्गज चुनाव के मैदान में हैं। एक हैं विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद तो दूसरी हैं उप्र के मुख्यमंत्री की पत्नी डिंपल यादव। फर्रुखाबाद व कन्नौज के पत्रकार बड़ी उम्मीद के साथ चुनाव में लगे पड़े थे की कुछ न कुछ तो बड़ा मिलेगा। फर्रुखाबाद के हालत तो बड़े ही मजेदार थे ज्यादातर पत्रकार सोंच रहे थे किसी भी प्रत्याशी ने कुछ किया नहीं है। पिछले 5 साल तक सलमान ने भी कुछ नहीं किया तो अब चुनाव में जरूर कुछ न कुछ मिलेगा। वहीं फर्रुखाबाद में जब चुनाव के एक दिन रह गया तो फिर क्या सलमान खुर्शीद ने जिले के चुनिंदा वरिष्ठ पत्रकारों को माइक्रोमैक्स का एक मोबाइल दे दिया। डिब्बा पैक होने की वजह से पत्रकार बड़े खुश दिखे। खोला तो निकला मंहगा वाला मोबाइल। अब तो फर्रुखाबाद के पत्रकारों के ख़ुशी के आसू रोके नहीं रूक रहे हैं। वहीं कन्नौज में डिम्पल यादव ने सभी वरिष्ठ पत्रकारों को 50000 रूपये के सम्मान ने नवाजा है।

 

फर्रुखाबाद से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

साथी, भगणा की लड़कियां अब भी आपकी राह देख रहीं हैं!

कल दोपहर में हरियाणा भवन, दिल्‍ली पर भगणा बलात्‍कार पीड़ितों के आंदोलन का बहिष्‍कार करने वाले इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया संस्‍थानों के दफ्तर से शाम को आंदोलनकारियों को फोन आया कि वे आंदोलन का 'बहिष्‍कार' नहीं कर रहे। ख़बर दिखाएंगे। संभवत: उनका फैसला मीडिया संस्‍थानों में खूब पढ़े जाने वाले भड़ास फॉर मीडिया व अन्‍य सोशल साइटस पर इस आशय की खबर प्रसारित होने के कारण हुआ।

जंतर मंतर पर धरना पर अपने परिवार के साथ भगाणा की दलित लडकियां

जानते हैं भागणा के लगभग 100 गरीब दलित परिवरों की इन महिलाओं, पुरूषों, बच्‍चों के साथ दिल्‍ली पहुंचने के पीछे क्‍या मनोविज्ञान रहा है? उन्‍हें लगता है कि यहां का मीडिया उनका दर्द सुनाएगा और दिल्‍ली उन्‍हें न्‍याय दिलाएगी। उन्‍होंने निर्भया कांड के बारे सुन रखा है। उन्‍हें लगा कि उनकी बच्चियां को भी दिल्‍ली पहुंचे बिना न्‍याय नहीं मिलेगा। यही कारण था कि वे अपनी किशोरावस्‍था को पार कर रही गैंग-रेप पीड़ित चारों लड़कियों को साथ लेकर आए। अन्‍यथा चेहरा ढक कर घर से बाहर निकलने वाली इन महिलाओं को अपनी बेटियों की नुमाईश के कारण भारी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है।

जानता हूं, ऊंची जातियों में पैदा हुए मेरे पत्रकार साथी एक बार फिर कहेंगे कि हमने तो उनकी खबर नहीं रोकी। इस आंदोलन में जितनी भीड़ थी, उसके अनुपात में उन्‍हें जगह तो दी ही।

लेकिन साथी! क्‍या आपका दायित्‍व इतना भर ही है? क्‍या खबर का स्‍पेस सिर्फ भीड़ और बिकने की क्षमता पर निर्भर करना चाहिए? क्‍या मीडिया का समाज के वंचित तबकों के प्रति कोई अतिरिक्‍त नैतिक दायित्‍व नहीं बनता? क्‍या अपनी छाती पर हाथ रख कर आप बताएंगे कि अन्‍ना आंदोलन के पहले ही दिन जो विराट देश व्‍यापी कवरेज आपने दिया था, उस दिन कितने लोग वहां मौजूद थे? क्‍या निर्भया की याद में कैंडिल जलाने वालों की संख्‍या कभी भी भगाणा के आंदोलनकारियों से ज्‍यादा थी?

जब भगणा के आंदोलनकारियों को धरने पर बैठे चार दिन हो गये और आपने कोई कवरेज नहीं दी तो उन्‍हें लगा कि शायद निर्भया को न्‍याय जेएनयू के छात्र-छात्राओं के आंदोलन की वजह से मिला। वे 19 अप्रैल को जेएनयू पहुंचे और वहां के छात्र-छात्राओं से इस आंदोलन को अपने हाथ में लेने के लिए गिड़गिड़ाए। 22 अप्रैल को जेएनयू छात्र संघ (जेएनएसयू) ने अपने पारंपरिक तरीके के साथ जंतर-मंतर और हरियाणा भवन पर जोरदार प्रदर्शन किया। लेकिन क्‍या हुआ? कहां था 'आज तक', 'एवीपी न्‍यूज', 'एनडीटीवी'? सबको सूचना दी गयी, लेकिन पहुंचे सिर्फ हरियाणा के स्‍थानीय चैनल, और उन्‍होंने भी आंदोलन के बहिष्‍कार की घोषणा कर आंदोलनकारियों के मनोबल को तोड़ा ही।

साथी, चुनाव का मौसम है। हरियाणा में कांग्रेस की सरकार है। भगाणा के चमार और कुम्‍हार जाति के लोग पिछले दो साल से जाटों द्वारा किये गये सामाजिक बहिष्‍कार के कारण अपने गांव से बाहर रहने को मजबूर हैं। धनुक जाति के लोगों ने बहिष्‍कार के बावजूद गांव नहीं छोड़ा था। यह चार बच्चियां, जिनमें दो तो सगी बहनें हैं, इन्‍हीं धुनक परिवारों की हैं, जिन्‍हें एक साथ उठा लिया गया तथा इनके साथ दो दिन तक लगभग एक दर्जन लोग इनके साथ गैंग-रेप करते रहे। यह सामाजिक बहिष्‍कार को नहीं मानने की खौफनाक सजा थी। एफआईआर, धारा 164 का बयान, मेडिकल रिपोर्ट आदि सब मौजूद है। ऐसे में, क्‍या यह आपका दायित्‍व नहीं था कि आप कांग्रेस के बड़े नेताओं से यह पूछते कि आपके राज में दलित-पिछड़ों के साथ यह क्‍या हो रहा है? किस दम पर आप दलित-पिछडों का वोट मांग रहे हैं?

आप मोदी के 'पिछड़ावाद' की लहर पर सवार भाजपा के वरिष्‍ठ नेताओं की बाइट लेते कि पिछले चार-पांच सालों से हरियाणा से दलित और पिछड़ी लड़कियों के रेप की खबरें लगातार आ रही हैं लेकिन इसके बावजूद आपकी राजनीति सिर्फ जाटों के तुष्टिकरण पर ही क्‍यों टिकी हुईं हैं? आप अरविंद केजरीवाल से पूछते कि भाई, अब तो बताओ कौन है आपकी नजर में आम आदमी? अरविंद केजरीवाल तो उसी हिसार जिले के हैं, जहां यह भगणा और मिर्चपुर गांव है। लेकिन क्‍या आपने कभी 'आम आदमी पार्टी' को हरियाणा के दलितों से लिए आवाज उठाते देखा। जबकि उनके हरियाणा के मुख्‍यमंत्री पद के संभावित उम्‍मीदवार योगेंद्र यादव यह कहते नहीं थकते कि दिल्‍ली में उन्‍हीं सीटों पर उनकी पार्टी को सबसे अधिक वोट मिले जहां गरीबों, दलितों और पिछड़ों की आबादी थी। आप क्‍यों नहीं उनसे पूछते कि दलित-पिछड़ों के वोटों का क्‍या यही इनाम आप दे रहे हैं? बात-बात पर आंदोलन करने वाला दिल्‍ली का आपका कोई भी विधायक क्‍यों जंतर-मंतर नहीं जा रहा? क्‍यों आपने महान प्रोफेसर आनंद कुमार ने जेएनयू में 19 अप्रैल को इन लड़कियों को न्‍याय दिलाने के लिए बुलायी गयी सभा में शिरकत नहीं की, जबकि उन्‍हें बुलाया गया था और वे वहीं थे।

साथी, अब भी समय है। भगणा की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर अब भी आपकी राह देख रही हैं।

 

(प्रमोद रंजन की फेसबुक वॉल से)

 

एबीपी न्‍यूज़ के घोषणा पत्रः ‘लगे रहो नमो भाई आरएसएस’

एबीपी न्‍यूज के घोषणा पत्र में 'लगे रहो नमो भाई आरएसएस' कुछ खास बातेंः

1. व्‍यंग और विनोद जीवन से खत्‍म हो गया तो जीवन कहां रह जाएगा।
मतलब
– चुनावी रैलियों पर शहजादा व जीजा की बात कही जा रही है केवल व्‍यंग व विनोद के भाव से कही जा रही है।

2. शरद पावर से ही नहीं, बल्‍कि मेरी लालू प्रसाद से भी अच्‍छी दोस्‍ती है, लेकिन वैचारिक मतभेद हो सकते हैं।
मतलब
– आप घोटालेबाजों को, यूपीए सरकार में शामिल सहयोगियों को दोस्‍त बना सकते हैं, लेकिन सत्‍ता लेने की बात आएगी तो जनता को उनके खिलाफ फुसलाकर सत्‍ता छीनना चाहेंगे। ऐसे दाउद से भी दोस्‍ती की जा सकती है, वैचारिक मतभेद अलग रखकर।

3.घोषणा पत्र प्रोग्राम के प्रारूप को तोड़ा गया, केवल तीन प्रश्‍न पूछने वाले दिखायी पड़े, वहां से पत्रकारों, बुद्धिजीवियों का जमवाड़ा गायब ?
मतलब
– नरेंद्र मोदी जनता के सवालों के जवाब देने से डरते हैं, या यह भी इंटरव्‍यू शर्तों के आधार पर दिया गया।

4. आक्रामक रवैया केवल रणनीति का हिस्‍सा
मतलब – मतलब, जनता को मूर्ख बनाने के लिए तीन महीनों की लम्‍बी फिल्‍म। फिल्‍म खत्‍म होने के बाद अमिताभ बच्‍चन, धर्मेंद्र, अमजद खान, संजीव कुमार एक साथ एन्‍जॉय करते हैं। 'लगे रहो नमो भाई आरएसएस'।

 

लेखक कुलवंत हैप्‍पी युवारॉक्‍स डॉट कॉम के संचालक हैं। वे दैनिक जागरण, पंजाब केसरी दिल्‍ली, सीमा संदेश, वेबदुनिया, याहू, जानो दुनिया न्‍यूज चैनल समेत की बड़े मीडिया समूहों के साथ अलग अलग पदों पर कार्य चुके हैं। संपर्कः 9904204299

मजीठिया का लाभ न मिलने से निराश दैनिक भास्कर ग्रुप के एक मीडियाकर्मी का पत्र

दैनिक भास्कर ग्रुप में पिछले एक वर्ष से काम कर रहे एक साथी ने मेल लिख कर भड़ास से अपनी पीड़ा साझा की है। एमबीए डिग्रीधारी और साढ़े तीन वर्षों का तजुर्बा रखने वालो इस साथी को मात्र 11200/- रुपए मिलते हैं जबकि उसने एमबीए की पढ़ाई के लिए बड़ा लोन भी लिया था। उसे बड़ी उम्मीद थी कि मजीठिया लागू होगा और उसके वेतन में बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन सभी कुछ उसकी उम्मीदों के विपरीत हो रहा है। पढ़िए भड़ास को भेजा गया पत्रः

Dear,

As you are aware that big media houses like-Hindustan (Hindi), Punjab Kesari etc. are generating specific methods to escape from huge monetary loss.

Giant media groups like-Dainik Bhaskar, Rajasthan Patrika had created parallel agencies and most of employees are not on the pay role of Dainik Bhaskar, Patrika etc. while these employees are working under these agencies as per legal considerations.So, if any person file a writ against these news papers, will be defeated by law.

This is such an insane.Its totally harassment of talents, while such groups generate good profits by these talents.

I am working with Dainik Bhaskar Group from last one year and have total 3.5 years of work experience, also have done MBA from top institute of Bangalore where my salary is surprising (It's only Rs. 11200/- monthly) which is not even sufficient monthly expanses for me alone.I am carrying big compromise, taken edu loan of Rs. 6300000 for MBA.You know, I have achieved my yearly target in first 2 quarters which is approx. 50 times of my salary and now on a growth of 100+% even after excellent growth i have nothing as appreciation and motivation.But still I have to continue my job here.What to do????

See, I just wanted to give you a situation that what is ground realty about such big groups where front line employees get pissed.

Thank you

 xyz


पत्र भेजने वाले ने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

बंद होगा भास्कर समूह का ‘डीएनए’ अख़बार, कर्मचारियों के सामने रोज़ी का संकट

इंदौर। दैनिक भास्कर समूह का इंग्लिश अख़बार डीएनए 29 अप्रैल को बंद होने जा रहा है। ऐसे में 54 कर्मचारियों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। डीएनए के अचानक बंद करने का कारण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है। सूत्रों के अनुसार हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मजीठिया लागु किया जाना इसका भी एक कारण हो सकता है।

डीएनए इंदौर की शुरुवात जून 2011 में हुई थी। पिछले महीने ही करीब 20 से अधिक कर्मचारियों ने विभिन्न विभागों में जॉइनिंग की थी, जिसमे भोपाल, जयपुर, दिल्ली और बेंगलुरु के लोग शामिल है। कुछ लोग तो भास्कर मैनेजमेंट को देखते हुए परिवार सहित इंदौर में बस गए थे और कुछ किसी तरह किराये के मकान में रहकर गुजर बसर कर रहे थे। ऐसे में डीएनए इंदौर का बंद होना यहाँ के कर्मचारियों के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। यहाँ के कर्मचारियों में भास्कर मेजमेंट के प्रति भरी आक्रोश है।

सूत्रों के अनुसार डीएनए के जयपुर और अहमदाबाद संस्करण भी बंद हो सकते हैं।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।
 

नवीन जिन्दल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से की ज़ी न्यूज़ के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की शिकायत

नई दिल्ली, 23 अप्रैल। कुरुक्षेत्र से 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी नवीन जिन्दल ने जी न्यूज, उसके चेयरमैन सुभाष चंद्रा और भारतीय जनता पार्टी के कुरुक्षेत्र से प्रत्याशी राजकुमार सैनी के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व कानून, आदर्श चुनाव आचार संहिता और भारतीय दंड संहिता का घोर उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। जिन्दल ने कहा है कि जी न्यूज ने प्रचार की अवधि समाप्त होने के बाद भी उनके खिलाफ मनगढ़ंत खबरें खूब चलाईं। इस चैनल के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी के लिए मंच से वोट मांगे और मेरे एवं मेरी पार्टी कांग्रेस के खिलाफ दुष्प्रचार में जी मीडिया के सभी चैनलों का इस्तेमाल किया। अपने तथ्यों के पक्ष में सभी प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने जी मीडिया, चेयरमैन सुभाष चंद्रा और भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

 
नवीन जिन्दल ने आज निर्वाचन सदन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त वी. सम्पत से मुलाकात कर उन्हें 7 पेज का शिकायतपत्र सौंपा और प्रमाण दिया कि 10 अप्रैल को हुए कुरुक्षेत्र संसदीय क्षेत्र के चुनाव में जी मीडिया के चैनलों और भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी ने मिलकर तमाम कायदे-कानून ताक पर रख दिए। उन्होंने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3ए), 123 (4), 125, 126, 130 व भारतीय दंड संहिता की धारा 171 जी, 171 एच और 505 (2) के साथ-साथ आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर चुनाव जैसी महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल उड़ाया। जी मीडिया के चैनलों द्वारा मेरे खिलाफ अभियान छेड़ दिया गया और चुनावी कायदे-कानून को ताक पर रखकर बेशुमार बेसिर-पैर की खबरें प्रसारित की गईं। जिन्दल ने कहा कि वह जी मीडिया के खिलाफ 18 मार्च को भी शिकायत दाखिल कर चुके हैं और उसकी अलोकतांत्रिक हरकतों से चुनाव आयोग को अवगत करा चुके हैं। उन्होंने कहा कि जी समूह मीडिया कारोबार की आड़ में मुझसे और मेरी कंपनी जेएसपीएल से 100 करोड़ रुपये की नाजायज वसूली की कोशिश में एक स्टिंग ऑपरेशन में पकड़ा गया है जिस कारण वह मेरी छवि खराब करने पर तुला हुआ है और नियमित रूप से मेरे खिलाफ मनगढ़ंत और बेबुनियाद खबरें चला रहा है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने जी न्यूज के संपादकों और चेयरमैन सुभाष चंद्रा के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया है।
 
नवीन जिन्दल
ने शिकायतपत्र में लिखा है कि सुभाष चंद्रा ने 1 अप्रैल को इनेलो प्रत्याशी बलबीर सैनी के समर्थन में प्रचार किया लेकिन 3 अप्रैल को वह भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी के मंच से वोट की अपील करते नजर आए। सुभाष चंद्रा ने हरियाणा के अन्य क्षेत्रों में भी भाजपा के लिए प्रचार किया और उनकी पूरी कवरेज जी मीडिया के चैनलों ने की। इसके अलावा उन्होंने प्रेस नोट जारी कर भाजपा के लिए वोट भी मांगे जो सीधे-सीधे पेड न्यूज के दायरे में नजर आता है।
 
जिन्दल
ने आरोप लगाया कि जी मीडिया के चैनलों ने आईबीएसपी प्रत्याशी कांता आलडिय़ा का वह संवाददाता सम्मेलन 5 अप्रैल को करीब 25 बार दिखाया जिसमें उनके खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाए गए थे। इसके प्रसारण में तथ्यों की पड़ताल भी नहीं की गई। इसी तरह 7 अप्रैल को कांता आलडिय़ा के आरोप बिना जांच-पड़ताल किए 29 बार प्रसारित किए गए।  

जिन्दल ने आयोग से मांग की कि वह जी मीडिया और राजकुमार सैनी की दुरभिसंधि की विस्तृत जांच कराए क्योंकि 8 अप्रैल को प्रचार की समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जी मीडिया के चैनलों ने कांग्रेस पार्टी और उनके खिलाफ मनगढ़ंत व बेबुनियाद खबरों का अभियान चलाए रखा और 32 मिनट 28 सेकंड का कार्यक्रम मेरे खिलाफ प्रसारित किया। इनके पीछे मुख्य मकसद कुरुक्षेत्र के मतदाताओं की निगाह में मेरी छवि खराब करना था जो चुनाव आचार संहिता का सरासर उल्लंघन है।
 
जिन्दल ने आरोप लगाया कि कुरुक्षेत्र के मथाना और कैथल के चूहड़ माजरा की खबरों से जी न्यूज की दुर्भावना स्पष्ट हो जाती है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि जी मीडिया के रिपोर्टर रवि त्रिपाठी ने उन पर कोयला खान आवंटन मामले में आरोप तय करा दिया जबकि अभी इस मामले में सीबीआई प्राथमिकी दर्ज कर जांच ही कर रही है।

नवीन जिन्दल ने कहा कि 10 अप्रैल को मतदान के दिन जी मीडिया के चैनलों ने लगातार मेरे खिलाफ फर्जी, बेबुनियाद, मनगढ़ंत और मनमाना खबरें चलाईं व दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को भी लंबे समय तक दरकिनार रखा जिसमें कहा गया था कि मेरा पक्ष लिये बगैर जी मीडिया कोई खबर प्रसारित नहीं कर सकता। मेरा पक्ष तब चलाया गया जब मतदान समाप्त होने को था।

जिन्दल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जी मीडिया और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी राजकुमार सैनी के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की है।
 

मजीठिया से बचने के लिए ‘आज समाज’ की चाल, कर्मचारियों से वापस मांगे नियुक्ति पत्र

सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के बाद मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने से बचने के लिए अखबार मालिक तरह-तरह के टोटके आजमा रहे हैं। इस संबंध में भड़ास पर दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, पंजाब केसरी द्वारा मजीठिया से बचने के लिए की जा रही कोशिशों की खबरें पहले ही प्रकाशित हो चुकीं हैं। अब खबर आ रही है कि 'आज समाज' अखबार भी मजीठिया से बचने के लिए कुछ पैंतरेबाजी कर रहा है। आज समाज ने अपने सभी कर्मचारियों से उनके पुराने नियुक्ति पत्र वापस करने के लिए कहा है। प्रबंधन का कहना है कि इनके स्थान पर नए नियुक्ति पत्र कर्मचारियों को दिए जाएंगे। प्रबंधन द्वारा उठाए गए इस कदम से सभी कर्मचारी सतर्क हो गए हैं।

आज समाज में इन दिनों एक मेल की खूब चर्चा है जिसके माध्यम से सभी कर्मचारी एक-दूसरे को प्रबंधन के नए आदेश के प्रति सतर्क कर रहे हैं। पढ़ें मेलः   

"साथियो ,
              मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतनमान लेने की मुहीम छेड़ दी गई है। प्रबंधन ने पुराने अप्वाइंटमेंट लेटर मांग के नए लेटर देने शुरू कर दिए हैं। आप पुराने लेटर न दें। न ही नए लेटर लें और न ही किसी दस्तावेज में हस्ताक्षर करें।"

 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

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कर्मचारियों को इनपुट-आउटपुट के फेर में फंसा मजीठिया की काट ढूंढ रहा जागरण http://bhadas4media.com/article-comment/18439-dj-input-output-majithia.html

मजीठिया से बचने के लिए अपने पत्रकारों को 'शौकिया-पत्रकार' बना रहा 'हिन्दुस्तान' http://bhadas4media.com/article-comment/19081-hindustan-journos-sign-agreement.html

पंजाब केसरी भी अपने कर्मचारियों से ले रहा 'शौकिया पत्रकारिता'  करने का शपथपत्र http://bhadas4media.com/article-comment/19100-punjab-kesari-taking-affidavits.html

क्या लखनऊ से सपा के लोकसभा प्रत्याशी अभिषेक मिश्रा आईआईएम में प्रोफेसर थे?

लखनऊ से सपा के लोकसभा प्रत्याशी अभिषेक मिश्रा के नाम के आगे 'प्रोफेसर' लिखे पोस्टर, बैनर, पर्चे सभी जगह दिखाई दे रहे हैं। अभिषेक मिश्रा स्वयं को देश की प्रतिष्ठित संस्था आईआईएम अहमदाबाद का भूतपूर्व प्रोफेसर बताते आये हैं। पर हकीकत में अभिषेक मिश्रा आईआईएम अहमदाबाद में कभी प्रोफेसर रहे ही नहीं हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि कैसे अभिषेक मिश्रा सरीखे व्यक्ति जनता के समक्ष झूठे तथ्य रखकर अपने आप को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं और कभी विधान सभा पहुंच जाते हैं तो कभी लोक सभा के प्रत्याशी बनकर वोट मांगते दिखाई देते हैं। सारा सिस्टम मूकदर्शक बना मात्र तमाशा देखता रहता है, पर करता कुछ भी नहीं है।

एक आरटीआई के जवाब में आईआईएम अहमदाबाद से प्राप्त प्रपत्रों के अनुसार अभिषेक मिश्रा 27 फरवरी 2007 से 01 अक्टूबर 2009 तक की अल्प अवधि के लिए आईआईएम अहमदाबाद में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे हैं न कि प्रोफेसर। अब सवाल यह है कि जब अभिषेक मिश्रा आईआईएम अहमदाबाद में कभी प्रोफेसर रहे ही नहीं हैं तो लखनऊ में लोकसभा चुनाव में अभिषेक मिश्रा को प्रोफेसर बताने वाले पोस्टर, बैनर, पर्चे बांटना या बंटवाना क्या जनता के साथ की जा रही धोखाधड़ी नहीं है? क्या चुनाव आयोग को इस मामले में अभिषेक मिश्रा को अयोग्य घोषित कर उनके खिलाफ धोखाधड़ी का आपराधिक मामला दर्ज नहीं कराना चाहिए?
 
आईआईएम अहमदाबाद, और उत्तर प्रदेश शासन से सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर संजय शर्मा और मेरे द्वारा दायर आरटीआई से प्राप्त प्रपत्रों से अभिषेक मिश्रा की डॉक्ट्रेट डिग्री पर भी संशय उत्पन्न हो रहा है। आईआईएम अहमदाबाद और उत्तर प्रदेश शासन के पास अभिषेक मिश्रा की डॉक्ट्रेट डिग्री नहीं है और चुनाव आयोग ने अभी तक हमारी आरटीआई का जवाब नहीं दिया है।
 
अभिषेक मिश्रा के सम्बन्ध में आईआईएम अहमदाबाद में दायर आरटीआई द्वारा प्राप्त प्रपत्रों से आईआईएम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह भी लग रहे हैं जो आईआईएम और अभिषेक मिश्रा के मध्य दुरभिसन्धि होने की पुष्टि कर रहे है।

उर्वशी शर्मा
मोबाइल- 9369613513

आरटीआई में प्राप्त प्रपत्रों को डाउनलोड करने के लिए इन वेब लिंक्स पर क्लिक करें:

http://upcpri.blogspot.in/2014/04/rti-by-urvashi-sharma-reveals-abhishek.html

http://upcpri.blogspot.in/2014/04/rti-by-activist-sanjay-sharma-casts.html
 

अमीषा पटेल की कवरेज को गए पत्रकार की जेब कटी

इलाहाबाद: फिल्म अभिनेत्री अमीषा पटेल की कवरेज के लिए पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार शिव त्रिपाठी का जेबकतरों ने बटुआ उड़ा दिया। शिव त्रिपाठी एक डेली न्यूज पेपर से जुड़े हैं। सोमवार को वह शाहगंज एरिया में सभा की कवरेज के लिए पहुंचे थे। इस दौरान किसी ने उनकी जेब काट कर बटुआ निकाल लिया। पर्स में कुछ कैश, दो एटीएम कार्ड, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस था। उन्होंने इस चोरी की रिपोर्ट शाहगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज करायी है।

 

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालयः विद्यार्थियों को नहीं मिली छात्रवृत्ति, कुलसचिव को ज्ञापन

भोपाल 22 अप्रैल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के विद्यार्थियों ने पिछले 2 वर्षो से छात्रवृत्ति न मिलने के कारण कुलसचिव चंदन सोनाने को ज्ञापन सौंपा। ज्ञात हो कि प्रशासनिक लापरवाहियों के चलते पिछले 2 वर्षो से विश्वविद्यालय के अनुसुचित जाति, अनुसूचित जन जाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को छात्रवृत्ति नही मिल पायी है। जिसके चलते कई छात्रों अपने शिक्षण कार्य को निरंतर चला पाना संभव नही हो पा रहा है। जिसके कारण आज पूनः कुलसचिव महोदय को छात्रवृत्ति के संबंध में ज्ञापन सौंपा गया इसके पूर्व भी कई बार आवेदन प्रतिवेदन किये जा चुके है। किन्तु छात्रवृत्ति अभी तक किसी छात्र-छात्रा को प्राप्त नहीं हुई है।

कुलसचिव ने ज्ञापन स्वीकार कर आश्वासन दिया है कि जल्द ही सभी आरक्षित वर्गों के विद्यार्थियों तक छात्रवृत्ति पहुंचा दी जायेगी। इस संबंध में छात्रों ने कहा है कि यदि समस्या का समाधान जल्द नहीं किया गया तो छात्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

भवदीय
खुमेंन्द्र
#9993705564

अनिवार्य मतदान की व्यवस्था पर ज़रूरी है व्यापक बहस

कुछ साल पहले आज की अपेक्षा कम मतदान होता था, इससे चिंतित इंतजामिया ने लोगों को प्रेरित करने के लिए अभियान चलाने प्रारंभ किए। आज सरकार से लेकर हर राजनीतिक दल, हजारों स्वयंसेवी संगठनों सहित मीडिया और बाजारवाद के तमाम मंच लोगों को वोट जरूर डालने के प्रति जागरूक कर रहे हैं। मतदान को राष्ट्र, समाज हित में और पुनीत कर्तव्य बता रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने विगत दिनों अहमदाबाद में कहा है कि चुनाव के बाद केंद्र में उनकी सरकार बनी तो देश में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की जायेगी। उन्होंने सुझाया है कि वोट नहीं देनेवालों को दंडस्वरूप अगले चुनाव में मतदान के अधिकार से वंचित करने की व्यवस्था बनायी जा सकती है।

उल्लेखनीय है कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार एवं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी अनिवार्य मतदान के पक्षधर हैं। यही क्यों देश में, तमाम विचारक, व्यवस्था के सभी अंगों से जुड़े बहुतेरे लोगों का विचार है कि वोट न देने वाले को कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

गुजरात अकेला राज्य है, जहां अनिवार्य मतदान विधेयक को विधानसभा से पारित किया गया है। इससे पहले आडवाणी देश में बहुदलीय संसदीय प्रणाली की जगह अमेरिका की तरह राष्ट्रपति शासन प्रणाली की वकालत भी कर चुके हैं। दूसरी ओर कई विश्लेषकों की राय में आडवाणी का यह विचार ‘मजबूत केंद्र और अनुशासित जनता’ के दक्षिणपंथी सोच से प्रेरित है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए हर मतदाता की राजनीतिक जिम्मेवारी है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग करे, लेकिन अहम सवाल यह भी है कि क्या उसे मतदान के लिए मजबूर किया जाना उचित होगा? इतना ही नहीं, भारत जैसे विशाल राज्य में वोट नहीं देनेवालों की पहचान कर उन्हें दंडित करने की प्रक्रिया काफी जटिल और खर्चीली भी होगी।

धन्नासेठ और उनके परिवार वाले आमतौर पर वोट डालने नहीं जाते। वे मतदान करने को अपनी हेठी समझते हैं। उन्हें लगता है कि वे आम लोग नहीं हैं, वह विशेष लोग हैं। और मतदान करना और अन्य कानूनी प्राविधानों का पालन करना आम आदमी का काम है। आडवाणी या ऐसे ही लोग क्या कुमार मंगलम बिड़ला या ऐसे ही अन्य धन्नासेठों को मतदान न करने पर अदालत में खड़ा देखने का बयान देखने की हिम्मत दिखा सकेंगे? विडंबना देखिये कि उसी सभा में आडवाणी यह भी कहते हैं कि मौजूदा आम चुनाव के परिणाम तो मतदान से पहले ही लोगों द्वारा तय कर दिये गये हैं। ऐसे में उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि जब परिणाम पहले ही तय हो सकते हैं, तो सबको मतदान के लिए मजबूर करने की जरूरत क्या है?

यह आडवाणी की तानाशाही सोच को प्रतिबिंबित करता है। राइट टू रीकॉल का सवाल उठाते ही राजनीतिकों को पसीना आ जाता है। अगर अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की जानी जरूरी लगती है तो फिर यह व्यवस्था भी लागू होनी चाहिए कि जो जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार के समय किए गये वादे पूरे नहीं करता है, जनभावनाओं की उपेक्षा करता है उसे हटाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। नेता और नेताओं या व्यवस्था को संचालित करने वाली आर्थिक शक्तियों का संकट निरंतर बढ़ रहा है इसलिए वे विभिन्न बहानों से इस व्यवस्था को दुरुस्त बताने का अभियान चलाए हुए हैं और इसे बनाएं रखने के लिए तमाम बहाने बना रही हैं साथ ही जनता को तमाम जकड़बंदियों में डालने के प्रयास में हैं। यही नहीं वे जनता के मन में तमाम तरह के विभ्रम भी पैदा कर रही हैं। येन-केन-प्रकारेण यही व्यवस्था व्यवस्थापकों के लिए मुफीद है और कोई जनपक्षीय व्यवस्था उनके लिए घातक है। तमाम समस्याओं में जकड़ी जनता कहीं इसके खिलाफ विद्रोह न कर दे, इसकी फिक्र व्यवस्था को बहुत अधिक है।

इंटरनेशनल पॉलिटिकल साइंस रिव्यू द्वारा 2011 में 36 देशों में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक जिन देशों में मतदान अनिवार्य है, वहां औसत मतदान 85.7 फीसदी, जबकि अन्य देशों में 77.5 फीसदी था। मौजूदा आम चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में भी मतदान प्रतिशत में वृद्धि हो रही है। और फिर मतदान में अपेक्षाकृत कम भागीदारी उन्हीं तबकों की हो रही है, जो विकास का अधिक लाभ हासिल कर रहे हैं। ऐसे में लोकतंत्र की खामियों का उपचार कठोर कानूनों से नहीं, बेहतर शासन के जरिये ही हो सकता है। और देश को आजाद हुए सात दशक होने वाले हैं, व्यवस्था और राजनीतिज्ञ अपने काम-काज से जनता को सहमत नहीं कर पाए हैं। इसलिए अनिवार्य मतदान जैसा कोई भी फैसला लेने से पहले इसकी खूबियों एवं खामियों पर राष्ट्रव्यापी बहस जरूरी है। और इस बहस में केवल अनिवार्य मतदान ही नहीं खराब जनप्रतिनिधि को हटाने की भी आसान व्यवस्था हो। जितनी तरह की सीखें जनता को दी जाती हैं उतनी जनप्रतिनिधियों, अफसरों को आखिर क्यों नहीं दी जातीं ? जनता को इस सोचना चाहिए।

 

अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, (लेखक-पत्रकार), गदरपुर (ऊधम सिंह नगर) उत्तराखंड। मो. 09897791822
 

चुनावों के पीछे की चालबाज़ियां: आनंद तेलतुंबड़े

मौजूदा चुनावी प्रक्रिया, इसके जातीय पहलू और जनता के हितों के अनुकूल एक मुनासिब चुनावी प्रणाली के विकल्पों पर आनंद तेलतुंबड़े का विश्लेषण. अनुवाद: रेयाज उल हक
 
कुछ ही दिनों में सोलहवें आम चुनावों की भारी भरकम कसरत पूरी हो जाएगी. और इसी के साथ भारत के सिर पर लगे दुनिया के सबसे महान कार्यरत लोकतंत्र के ताज में एक और हीरा जड़ जाएगा, जबकि यहां रहने वाले ज्यादातर लोग बेचारगी और छीन ली गई आवाजों के साथ अपने वजूद के संघर्ष में फिर से जुट जाएंगे. लोकतंत्र के कुछ महीने लंबे नाच के आखिर में चुने हुए प्रतिनिधि बच जाएंगे जो अपने करोड़ों के निवेश पर पैसे बनाने के धंधे में लग जाएंगे. इस गरीब देश को चुनावों की इस प्रक्रिया की जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसकी तुलना सिर्फ अमेरिका से ही हो सकती है (ऐसा कहा गया है कि भारतीय राजनेता 2012 के पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में खर्च की गई 7 बिलियन डॉलर की राशि के बरअक्स 5 बिलियन डॉलर खर्च करने वाले हैं) और इस पूरी प्रक्रिया में वे सब साजिशें और छल-कपट किए जाते हैं, जिनकी कल्पना कोई इन्सान कर सकता है. जाहिर है कि तब इन सबकुछ को सिर्फ मुट्ठी भर अमीरों के निजाम और अपराधों के जरिए ही कायम रखा जा सकता है. चूंकि हकीकत में ऐसा ही होता रहा है, इसलिए इस पर गौर करना होगा कि भारत की खामियों को तलाशते हुए चुनावों की इस प्रक्रिया की पड़ताल जरूरी है.
 
जनता के साथ धोखा

उदारवादी ढांचे में प्रत्यक्ष लोकतंत्र मुमकिन नहीं है. चुनावों का मकसद लोकतंत्र को चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधियों को चुनना है. हालांकि लोगों की पसंद राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों और कुछ निर्दलियों तक सीमित होती है, जिनमें से ज्यादातर तो मुख्य राजनीतिक दलों के चुनावी गुना-भाग में मदद करने के लिए कठपुतली उम्मीदवार के रूप में खड़े होते हैं. यही वजह है कि बिना किसी काम का सबूत दिए, चुनाव दर चुनाव समान लोगों का समूह चुना जाता रहा है. यह पूरी प्रक्रिया [बाकियों के] भीतर दाखिल होने की रुकावट के रूप में काम करती है. मिसाल के लिए, लोक सभा के उम्मीदवार को अधिकतम 75 लाख रुपए खर्च करने की इजाजत है, यह खर्च सिर्फ मुख्यधारा के राजनीतिक दल ही उठा सकते हैं. लेकिन असली खर्च तो इससे कई गुना ज्यादा होता है. अगर चुनावों में कोई भारी पूंजी लगाने का जोखिम उठाता है, तो सैद्धांतिक रूप से इस निवेश पर उसे फायदा भी होना चाहिए. चूंकि इसका [कानूनन] कोई फायदा नहीं है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के रूप में सामने आता है. इसने राजनीति को टिकटों के बड़े कारोबार में बदल दिया है, जिसमें बेजोड़ मुनाफा है और यह सब लोगों की नजरों से छुपा हुआ होता है. नेता सामंत बन जाते हैं और निर्वाचन क्षेत्र उनकी जागीर, जिसकी किलेबंदी बाहुबल और धनबल से होती है.
 
एक
एनजीओ एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के सौजन्य से चुनावों में हिस्सा लेने वाले नेताओं के बारे में जानकारी अब सरेआम है. नेता चुनाव आयोग को जो हलफनामे जमा करते हैं, एडीआर ने उनमें से जानकारियां जुटा कर उन्हें इस तरह पेश किया है कि लोग समझ सकें. हालांकि ये आंकड़े नेताओं द्वारा खुद कबूल किए जाते हैं और इसकी गुंजाइश ज्यादा है कि उन्हें बहुत घटा कर बताया जाता होगा लेकिन इसके बावजूद इन आंकड़ों से यह उजागर होता है प्रतिनिधियों में करोड़पतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. पंद्रहवीं लोकसभा चुनावों में 1205 करोड़पति उम्मीदवार थे, जिनमें से 300 से ज्यादा संसद में पहुंचे. अपराधों के आंकड़े भी उनकी बढ़ती हुई दौलत के साथ बढ़ते जाते हैं और ये सभी दलों में मौजूद हैं.

दो मुख्य दलों कांग्रेस और भाजपा से जुड़े करोड़पति सांसदों की संख्या 2004 में क्रमश: 29 और 26 थी, जो 2009 में बढ़ कर 42 और 41 हो गई. ये उस जनता, उस व्यापक बहुसंख्या के प्रतिनिधि थे जो 20 रुपए रोज पर गुजर करती है! हरेक चुनाव में उनकी बेपनाह दौलत के बढ़ने की दर इससे भी अधिक दिलचस्प है. एडीआर और नेशनल इलेक्शन वाच (एनइडब्ल्यू) ने अपने विश्लेषण में पाया कि फिर से चुनाव लड़ रहे 317 उम्मीदवारों की दौलत 1000 प्रतिशत बढ़ गई थी. ये दरें तो कॉरपोरेट दुनिया में भी नहीं सुनी जाती हैं. एक औसत क्षमता का इंसान, जो ऊपर से गरीबों की सेवा में लगा हो, यहां बेहतरीन फंड प्रबंधकों को मात दे देता है! आम मामलों में ऐसे सबूत आयकर और भ्रष्टाचार-निरोधक अधिकारियों के कान खड़े कर देते हैं, लेकिन इन दौलतमंदों के राजनीतिक रिश्ते उन्हें ऐसे दुनियावी खतरों से बचाए रखते हैं. यहां इस दौलत के स्रोतों के बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा रहा है, जबकि यह जानी हुई बात है कि पूरी मशीनरी जनता के नाम पर कॉरपोरेट घरानों और दूसरे धन्ना सेठों के लिए काम करती है.
 
चुनावों की पद्धति

जब भारत आजाद हुआ, तो नए शासकों के सामने सबड़े बड़ी चुनौती जनता की वे उम्मीदें थीं, जो आजादी के संघर्ष के दौरान पैदा हुई थीं. ये उम्मीदें क्रांति के बाद के रूस (सोवियत संघ) द्वारा हासिल की गई शानदार तरक्की, दूसरे विश्व युद्ध के बाद की कल्याणकारी तौर-तरीकों और पड़ोसी चीन में क्रांति जैसी घटनाओं से कई गुना बढ़ गई थीं. सत्ता हस्तांतरण के दौरान भड़की सांप्रदायिक उथल पुथल, रियासतों के रूप में मौजूद 600 राजनीतिक इकाइयों का भारत के भीतर एकीकरण, देश के कुछ इलाकों में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हथियारबंद संघर्षों और निचली जातियों के उभार ने एक साथ मिल कर नए शासकों के सामने एक भारी चुनौती पेश की थी. उन्होंने जो गणतांत्रिक संविधान बनाया था, उसमें इन उम्मीदों की झलक थी. हालांकि वास्तविक अर्थों में, सत्ता हासिल करने वाली कांग्रेस पार्टी, बुर्जुआ हितों की प्रतिनिधित्व करती थी और उसे बड़ी कारीगरी से उसे बढ़ावा भी देना था.

एक तरफ जनता की उम्मीदों को पूरा करने का दिखावा करने की जरूरत और दूसरी तरफ वास्तव में पूंजी के हितों को बढ़ावा देने से एक तनाव पैदा हुआ. यह तनाव इसकी एक के बाद एक बेईमानी भरी कार्रवाइयों की श्रृंखला में भी दिखा. समाजवादी दिखावे के लिए पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की गई लेकिन भीतर ही भीतर बंबई योजना को अपनाया गया था-जिसे तब के देश के आठ शीर्ष पूंजीपतियों ने बनाया था. या फिर भूमि सुधारों की शुरुआत की गई, लेकिन इसमें सुनिश्चित किया गया कि उन पर इस तरह अंकुश बना रहे कि व्यापक देहातों में सहयोगी के रूप में धनी किसानों का एक वर्ग बनाया जा सके. या फिर भूख खत्म करने के नाम पर देहातों में पूंजीवादी संबंधों के प्रसार के लिए हरित क्रांति को आगे बढ़ाया गया. ये महज कुछेक मिसालें हैं. लोकतंत्र को चलाने के लिए राजनीतिक रूप से एक ऐसी पद्धति जरूरी थी, जिससे उन्हें सत्ता पर पूरा नियंत्रण हासिल होता.
 
सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजयी घोषित करने वाली चुनावी [एफपीटीपी-फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम] व्यवस्था शासक वर्ग की राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने वाली ऐसी ही पद्धति थी. यों यह व्यवस्था औपनिवेशिक शासन से विरासत में अपनाई गई थी, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश रह चुके दूसरे सभी देशों में हुआ था. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था जो भारत को अपने हालात के मुताबिक एक बेहतर पद्धति को अपनाने के लिए इसे छोड़ने से रोकता. आज हम खुद को जिन बुराइयों से घिरा हुआ पाते हैं, उनमें से ज्यादातर इसी एफपीटीपी व्यवस्था से पैदा हुई हैं. असाधारण रूप से ऐसी विविधता भरे राज्यतंत्र में होने वाले चुनावों में एक अकेले विजेता का होना बहुसंख्यक तबके के समर्थन के बिना नहीं हो सकता था.

इसका नतीजा यह हुआ कि समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को बहुसंख्यक तबके के हितों के साथ समझौता करना पड़ा, जिसने इन समूहों को मिला लिए जाने [को-ऑप्शन] और दूसरी धांधलियों का रास्ता खोल दिया. देश में हितों की विविधता अभी भी अनेक दलों को आगे ले आ सकती है, जो बुनियादी रूप से प्रतिस्पर्धी एफपीटीपी चुनावों को और भी बदतर बना देगी, जिसके साथ साथ बढ़ी हुई दर के साथ भारी खर्चे बढ़ते जाएंगे जिन्हें बड़े कारोबार पूरा करेंगे. इसी में जातियों, समुदायों, धर्म वगैरह जैसी मौजूदा खामियों और बेशक बाहुबल का बेरोकटोक इस्तेमाल भी बढ़ेगा. दलगत सीमाओं से ऊपर उठ कर, अनिवार्य रूप से यह सभी शासक वर्गों के मुट्ठीभर लोगों की शक्ति संरचना में रूप में विकसित हो गया है, जिसकी अनेक तरीकों से हिफाजत की जाती है और जिसकी सर्वोच्च ताकत पुलिस और फौज है.
 
एक वैकल्पिक मॉडल

क्या चुनावों की इस पद्धति का कोई विकल्प नहीं था? देश में शक्ल ले रहा विविधतापूर्ण राज्यतंत्र चुनावों के एक अलग मॉडल की तरफ इशारा करेगा. इसे हम आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कह सकते हैं. यह वो व्यवस्था है जो ज्यादातर यूरोपीय लोकतंत्रों और उन अनेक दूसरे देशों में अपनाई जाती है जिनका लोकतांत्रिक रेकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. हालांकि व्यावहारिक रूप में आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था की अनेक किस्में हैं. लेकिन बुनियादी रूप से ये दलों या सामाजिक समूहों के लिए मतदान की व्यवस्था देती हैं (न कि किसी व्यक्ति को वोट देने के), जो अपने मतों के हिस्से के अनुपात में प्रतिनिधित्व पाते हैं. मिसाल के लिए दलित भारत में 17 फीसदी हैं लेकिन हरेक निर्वाचन क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के कारण वे एफपीटीपी व्यवस्था में कभी भी स्वतंत्र रूप से नहीं चुने जाते, आरक्षित सीटों पर भी नहीं.

आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था संसद और विधान सभाओं में उनकी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करेगी और यह उन्हें अपने जनाधार का विस्तार करने वाली शक्ति भी मुहैया करा सकती है. आज जिसे थोड़े नरम शब्दों में बहुजन कहा जाता है, उसका निर्माण इसी प्रक्रिया के जरिए मुमकिन था. सामाजिक पहचान की जगह वर्गीय चेतना लेगी और पूरी राजनीति को वर्गीय धुरी पर केंद्रित करेगी. इस व्यवस्था में कोई गलाकाट मुकाबला भी नहीं होगा, क्योंकि हरेक समूह को तर्कसंगत रूप से उनके हिस्से का प्रतिनिधित्व मिलेगा. इसके बजाए मुकाबला संसद के भीतर होने लगेगा, जिसे बहुसंख्यक जनता के हितों में नीतियां बनानी होंगी. एफपीटीपी व्यवस्था में, एक बार चुनाव हो जाने के बाद, नीतिगत मामलों पर संसद में बहस के लिए प्रेरणा देने वाली कोई ताकत नहीं होती. जनता पर असर डालने वाली सरकार की ज्यादातर भौतिक नीतियां (जैसे कि आपातकाल लागू किया जाना और नवउदारवादी आर्थिक सुधार) पर संसद में कभी बहस ही नहीं हुई.
 
एफपीटीपी चुनावों में सैद्धांतिक खामी यह है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को आधे मतदाताओं का वोट भी मुश्किल से ही मिला होता है. यह खामी आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में इस तरह दूर हो जाती है कि यह समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को उनकी उचित हिस्सेदारी देता है. एफपीटीपी चुनावों में गहन मुकाबले के नतीजे में भारी खर्चे होते हैं और उसके बाद भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी होती है, जिन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में दूर किया जा सकता है. सबसे अहम बात यह कि भारत के संदर्भ में, यह शासक वर्गों द्वारा जनता को जातियों और समुदायों में बांटने के बुरे मंसूबों पर लगाम लगाती है. मिसाल के लिए, दलितों के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत नहीं रह जाएगी और इस तरह दलित होने के ठप्पे की भी जरूरत नहीं रहेगी.

इस तरह राजनीति में से जातियों का बोलबाला भी खत्म हो जाएगा. हालांकि कोई भी व्यवस्था किसी को अपने समुदाय से अलग होकर उसे समुदाय हितों के खिलाफ काम करने से नहीं रोक सकती, लेकिन आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था समुदाय को उसकी उचित हिस्सेदारी देकर इसकी ढांचागत गुंजाइश को खत्म कर सकती है. दलित पूना समझौते के जरिए गांधीवादी ब्लैकमेल पर बरसों से अफसोस जताते आए हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि यह समझौता एफपीटीपी व्यवस्था पर टिका था. पूना समझौता आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता खो देगा. इसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि जातियों की पहचान को बनाए रखने की जरूरत भी खत्म हो जाएगी और इसी तरह खत्म हो जाएंगी वे सारी तकलीफदेह मुश्किलें भी, जो इस जरूरत से पैदा हुई हैं.
 
सचमुच, भारत को इससे भारी फायदा होगा, लेकिन क्या शासक वर्ग को इसकी परवाह होगी?

 

आनंद तेलतुंबड़े

मोदी को कट्टर ही बनाए रखना चाहते हैं मदनी

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना मदनी के इस कथन ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि मैं तिलक नहीं लगा सकता तो मोदी भी टोपी क्यों पहनें। उनकी बात बहुत ही तार्किक, सीधी-सीधी गले उतरने वाली और वाजिब लगती है। इसी से जुड़ी हुई ये बात भी सटीक महसूस होती है कि जब मुस्लिम इस्लाम के मुताबिक अपनी रवायत पर कायम रखता है और उसे बुरा नहीं माना जाता तो किसी हिंदू के अपने धर्म के मुताबिक चलते हुए मुस्लिम टोपी पहनने को मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। कुछ ऐसा ही मसला दोनों धर्मों के धर्म स्थलों को लेकर है। मुस्लिम मंदिर नहीं जाता तो  इसे सहज में लिया जाता है, मगर कोई हिंदू मस्जिद अथवा दरगाह से परहेज रखता है तो उसे कट्टर क्यों माना जाना चाहिए। मगर सच ये है चंद हिंदुओं को छोड़ कर अधिसंख्य हिंदुओं को दरगाह, गिरिजाघर अथवा गुरुद्वारे में माथा टेकने में कोई ऐतराज नहीं होता।

अजमेर के संदर्भ में बात करें तो यह एक सच्चाई है कि देशभर से यहां आने वाले मुस्लिम जायरीन का एक प्रतिशत भी तीर्थराज पुष्कर नहीं जाता। जाता भी है तो महज तफरीह के लिए। दूसरी ओर देशभर से आने वाला अधिसंख्य हिंदू तीर्थयात्री दरगाह जरूर जाता है। अनेक स्थानीय हिंदू भी दरगाह में माथा टेकते देखे जा सकते हैं। तो आखिर इसकी वजह क्या है?

इसी सिलसिले में दरगाह में बम विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार असीमानंद के उस इकबालिया बयान पर गौर कीजिए कि बम विस्फोट किया ही इस मकसद से गया था कि दरगाह में हिंदुओं को जाने से रोका जाए। दरगाह बम विस्फोट की बात छोड़ भी दें तो आज तक किसी भी हिंदू संगठन ने ऐसे कोई निर्देश जारी करने की हिमाकत नहीं की है कि हिंदू दरगाह में नहीं जाएं। वे जानते हैं कि उनके कहने को कोई हिंदू मानने वाला नहीं है। वजह साफ है। चाहे हिंदू भी ये कहें कि ईश्वर एक ही है, मगर उनकी आस्था छत्तीस करोड़ देवी-देवताओं में भी है। बहुईश्वरवाद के कारण ही हिंदू धर्म लचीला है। हिंदू संस्कृति स्वभावगत भी उदार प्रकृति की है। और इसी वजह से हिंदू धर्मावलम्बी कट्टरवादी नहीं हैं। उन्हें शिवजी, हनुमानजी और देवी माता के आगे सिर झुकाने के साथ पीर-फकीरों की मजरों पर भी मत्था टेकने में कुछ गलत नजर नहीं आता। रहा सवाल मुस्लिमों का तो वह खड़ा ही बुत परस्ती के खिलाफ है। ऐसे में भला हिंदू कट्टरपंथियों का यह तर्क कहां ठहरता है कि अगर हिंदू मजारों पर हाजिरी देता है तो मुस्लिमों को भी मंदिर में दर्शन करने को जाना चाहिए। सीधी-सीधी बात है मुस्लिम अपने धर्म का पालन करते हुए हिंदू धर्मस्थलों पर नहीं जाता, जब कि हिंदू इसी कारण मुस्लिम धर्म स्थलों पर चला जाता है, क्यों कि उसके धर्म विधान में देवी-देवता अथवा पीर-फकीर को नहीं मानने की कोई हिदायत नहीं है।

बहरहाल, ताजा मामले में मौलाना मदनी ने नरेन्द्र मोदी को सुझाया है कि वे भी मुस्लिमों की तरह अपने धर्म के प्रति कट्टर बने रहें। उन्हें शायद इसका इल्म नहीं है कि मुसलमान भले ही बुत परस्ती के विरुद्ध होने के कारण तिलक नहीं लगाएगा, मगर सभी धर्मों को साथ ले कर चलने वाला हिंदू खुद के धर्म का पालन करते हुए अन्य धर्मों का भी आदर करता है। कदाचित इसी कारण हिंदूवादी संघ की विचारधारा से पोषित भाजपा के नेता भी दरगाह जियारत कर लेते हैं। पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने तो धर्मनिरपेक्षता के नाते बाकायदा मुस्लिम टोपी पहन कर दिखाई थी। इसे वोटों के गणित से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। अलबत्ता संघ से सीधे जुड़े लोग परहेज करते हैं। मोदी भी उनमें से एक हैं, जिन्होंने एक बार टोपी पहनने से इंकार कर देश में एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। स्वाभाविक बात है कि वोटों के ध्रुवीकरण की खातिर उन्होंने ऐसा किया। हालांकि बाद में जब बहुत आलोचना हुई तो यह कह कर आरोप से किनारा किया कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, मगर पालन अपने धर्म का करते हैं, टोपी पहन कर नौटंकी नहीं कर सकते।

और ऐसा भी नहीं है कि पूरा मुसलमान कट्टर है। अजमेर के संदर्भ में बात करें तो पुष्कर की विधायक रहीं श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ तीर्थराज पुष्कर सरोवर को पूजा करती रही हैं, ब्रह्मा मंदिर के दर्शन करती रही हैं। भले ही इसे हिंदू वोटों की चाहत माना जाए, मगर धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने मुस्लिम को भी कुछ लचीला तो किया ही है। इसके अतिरिक्त भारत में रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमान पर हिंदू संस्कृति का असर सूफी मत के रूप में साफ देखा जा सकता है। कट्टर मुस्लिम दरगाह में हाजिरी नहीं देते, जबकि अधिसंख्य मुस्लिम दरगाहों की जियारत करते हैं। इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान तक के कई मुस्लिम दरगाह जियारत करने आते हैं। सवाल ये उठता है कि मोदी के टोपी न पहनने का समर्थन करने वाले मौलाना मदनी मुस्लिमों को दरगाह जाने से रोक सकते हैं?

 

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर राजनीतिक विश्लेषक हैं। दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों  में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश  सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

न्यूज़ फर्स्ट टीवी से जुड़े सलीम सैफी

न्यूज़ फर्स्ट टीवी के साथ वरिष्ठ पत्रकारों का जुड़ना जारी है। ताज़ा कड़ी में वरिष्ठ टीवी पत्रकार सलीम सैफी ने न्यूज़ फर्स्ट टीवी को ज्वाइन किया है। उन्हें न्यूज़ फर्स्ट टीवी में एडिटर स्पेशल एसाइनमेंट बनाया गया है। इससे पहले वो इसी पद पर समाचार प्लस चैनल के साथ जुड़े हुए थे। सलीम सैफी के पास टीवी का लंबा अनुभव है। वो आज तक समेत कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। सलीम सैफी से पहले वरिष्ठ पत्रकार रवि शर्मा भी बतौर कार्यकारी संपादक संस्थान के साथ जुड़ चुके हैं। वो दैनिक जागरण, अमर उजाला और जनवाणी समेत कई अख़बारों में अहम पदों पर काम कर चुके हैं। उनके पास लगभग 25 साल का अनुभव है।

न्यूज़ फर्स्ट डॉट टीवी भारत का सबसे पहला लाइव इंटरनेट न्यूज़ चैनल है। इस चैनल को गौरी मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ला रहा है। इंटरनेट का ये लाइव टीवी चैनल जल्द ही लॉंच होने जा रहा है। डॉ. ललित भारद्वाज इस चैनल के प्रबंध संपादक और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। ये समूह पहले से ही राष्ट्रीय मासिक पत्रिका दि सिटी इंडिया और साप्ताहिक समाचार पत्र विशिष्ठ समाचार का प्रकाशन कर रहा है।

समूह ने चंदन प्रताप सिंह को न्यूज़ डायरेक्टर और चैनल हेड बनाया है। वो लगभग 23 सालों से मीडिया में हैं और ज़ी,स्टार समेत कई बड़े चैनलों में अहम पदों पर काम कर चुके हैं। अर्जुन को कंपनी का डायरेक्टर ऑपरेशन्स और टेक्निकल बनाया गया है। वो भी लगभग एक दशक से मीडिया में सक्रिय हैं। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इस समूह के साथ कई और वरिष्ठ पत्रकार जुड़ेंगे।
 

23 अप्रैल को होगा भारत भास्कर अवॉर्ड का आयोजन

रायपुर। भारत भास्कर अवॉर्ड का आयोजन 23 अप्रेल को वृन्दावन हॉल में शाम 6 बजे होगा। इस आयोजन में छत्तीसगढ़ की 11 अलग अलग विधाओं के लोगों को सम्मानित भी किया जाएगा। दैनिक भारत भास्कर की वेब साइट http://www.bharatbhaskar.com भी इसी आयोजन का हिस्सा होगा। वेब साइट के समाचार सम्पादक आशीष मिश्रा हैं। भारत भास्कर के प्रधान सम्पादक संदीप तिवारी और प्रबंध सम्पादक अहफ़ाज़ रशीद ने आज इस बात की जानकारी दी।

श्री तिवारी और रशीद ने बताया कि इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन होंगे. अध्यक्षता वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ डॉक्टर सुशील त्रिवेदी करेंगे। विशेष अतिथि के रूप में चेतन इंडस्ट्रीज़ के वॉइस प्रेसिडेंट श्री एस. के. शर्मा और शिक्षाविद व समाजसेवी डॉक्टर राकेश सॉलोमन उपस्थित रहेंगे। दैनिक भारत भास्कर की वेब साइट इसी मौके पर एक रॉक बैण्ड समर रेन द्वारा छत्तीसगढ़ी और हिन्दी गीतों को नए अंदाज़ में पेश किया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मशहूर शायर मुमताज करेंगे। संदीप तिवारी और अहफ़ाज़ ने बताया कि पत्रकारिता पुरस्कार हर वर्ष स्वर्गीय देवेन्द्र कर की स्मृति में होगा। यह पुरस्कार इस वर्ष वरिष्ठ पत्रकार श्री जयशंकर प्रसाद शर्मा "नीरव" को प्रदान किया जा रहा है. अन्य अवॉर्ड भी सम्बंधित गतिविधियों से जुड़े उन लोगों की स्मृति में होगा जो आज हमारे बीच नहीं हैं।

फ़ोटो जर्नलिज़्म पुरस्कार स्वर्गीय एस. अहमद की स्मृति में वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट श्री विनय शर्मा को प्रदान किया जाएगा। फिल्म और रंगमंच का पुरस्कार स्वर्गीय हबीब तनवीर की स्मृति में वरिष्ठ निर्देशक श्री जलील रिज़वी को दिया जाएगा। स्वर्गीय कुलदीप निगम स्मृति पुरस्कार छत्तीसगढ़ के इकलौते पपेटियर श्री विभाष उपाध्याय को प्रदान किया जाएगा। अन्य पुरस्कार इस तरह से होंगे – स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा स्मृति हिन्दी साहित्य पुरस्कार श्री संजय अलंग को , स्वर्गीय हरि ठाकुर स्मृति छत्तीसगढ़ी साहित्य पुरस्कार सुशील भोले को , समाज सेवा के लिए बढ़ते कदम के संस्थापक स्वर्गीय अनिल गुरुबक्षाणी स्मृति पुरस्कार श्री फैज़ खान को, छत्तीसगढ़ में संगीत की अलख जगाने वालीं स्वर्गीय अनिता सेन स्मृति पुरस्कार श्री शरद अग्रवाल को, कला और अभिनय के लिए पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म के निर्माता स्वर्गीय विजय पाण्डे स्मृति पुरस्कार वरिष्ठ कलाकार शिवकुमार दीपक को, इ. टी. वी. के कैमरामेन स्वर्गीय संजय दास स्मृति इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पुरस्कार माधवी श्रीवास को और खेल विधा के लिए स्वर्गीय विजय हिन्दुस्तानी स्मृति पुरस्कार फुटबॉल की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सुप्रिया कुकरेती को प्रदान किया जाएगा।

 

विज्ञप्ति
 

शशिशेखर इन दिनों पाठक परिवार को उपकृत करने में लगे हैं

दैनिक 'हिन्दुस्तान' के सम्पादकीय पृष्ठ पर पिछले काफी दिनों से अमितांशु पाठक और उनके भाई किंशुक पाठक के लेख नियमित तौर पर चित्र के साथ छप रहे हैं। तमाम जाने-माने लेखकों, पत्रकारों को उनसे ईष्या हो सकती है क्योंकि ये युवा स्तम्भकार हिन्दुस्तान के सभी संस्करणों में प्रमुखता से छपते हैं। अमितांशु पाठक का परिचय स्वतंत्र पत्रकार के रूप में दिया होता है गोया वे जाने-माने पत्रकार रहे हों। जानकार बताते हैं कि वे कुछ समय तक 'नई दुनिया' के लिए वाराणसी से फीचर आदि लिखते थे। वाराणसी में उनके काफी ठाठ रहे हैं। वे बड़ी बड़ी गाड़ियों में चलते और पुलिस-प्रशासन में उनकी हनक भी थी लेकिन कानाफूसी के अनुसार, मायावती के शासनकाल में महत्वपूर्ण पद पर रहे एक पुलिस अधिकारी ने उनके साथ कुछ ऐसा व्यवहार किया कि वे लम्बे समय तक नेपथ्य में चले गए। अब वे इन स्तम्भ के साथ प्रकट हुए हैं।

 
सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी योग्यता है जिसके बूते 'हिन्दुस्तान' जैसे प्रतिष्ठित अखबार में वे और उनके भाई स्तम्भकार के रूप में प्रमुखता से छप रहे हैं। यह योग्यता है वाराणसी के पुराने और पत्रकार राममोहन पाठक के बेटा होने की। बताते चलें कि हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशिशेखर के पुराने मित्र हैं राममोहन पाठक और 'आज' एवं 'अवकाश' के दिनों में दोनो का काफी साथ रहा है तो शशिशेखर न सिर्फ राममोहन पाठक का स्तम्भ छाप रहे हैं बल्कि उनके दोनों बेटों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। आखिर शशि जी से बेहतर यह कौन जान सकता है कि योग्यता किसी मतलब की नहीं होती और अन्ततः सम्बन्ध ही काम आते हैं। तमाम योग्य लोगों को दाएं-बाएं कर और अन्ततः नवीन जोशी को भी हाशिए पर लगाकर उन्होंने योग्यता को उसकी औकात बता ही दी है। तो शशि जी इन दिनों अपने पुराने सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए पाठक परिवार को उपकृत करने में लगे हैं।

अब अमितांशु के लेखन के कुछ उदाहरण भी देख लें। 'फिर उसी मोड़ पर खड़ी है वाराणसी' (2 अप्रैल 2014) में वह लिखते हैं-'वाराणसी की दिक्कत यह है कि उसे पिछले कुछ समय से स्थानीय सांसद मिले ही नहीं हैं। इसे लेकर यहां कई बार अब और नहीं, बाहरी नहीं का नारा भी बुलंद हुआ है।' लेकिन अगर हम तथ्यों पर जाएं तो पाते हैं कि हाल के मुरली मनोहर जोशी से पहले लम्बे समय तक यहां स्थानीय सांसद रहे हैं। जोशी के पहले कांग्रेस के राजेश मिश्र सांसद थे जो स्थानीय थे । शंकर प्रसाद जायसवाल लगातार तीन चुनावों 1996, 1998, 1999 में विजयी हुए और सांसद बने। राजेश मिश्र ने उन्हें 2004 में हराया था।

संभव है कि 1996 से 2009 में जोशी के जीतने के पहले के स्थानीय सांसदों के करीब 13 वर्षों के कार्यकाल को अमितांशु 'पिछले कुछ समय' के रूप में न देख पाते हों। शंकर प्रसाद से पहले श्रीचन्द्र दीक्षित और अनिल शास्त्री जरूर बाहरी रहे, हालांकि अनिल शास्त्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे हैं, लेकिन उनसे पहले श्यामलाल यादव और कमलापति त्रिपाठी भी स्थानीय रहे। तो काशी की पीड़ा यह नहीं कि उसे स्थानीय सांसद नहीं मिले, विडम्बना यह रही कि स्थानीय सांसदों ने भी अपने नगर की सुध नहीं ली। लगता है कि अमितांशु को पापा ने ठीक से बताया नहीं।

 

(वाराणसी से एक पत्रकार की रिपोर्ट)

जंतर मंतर और हरियाणा भवन पर जेएनयू छात्रों का प्रदर्शन

नई दिल्‍ली : मंगलवार को दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भगाणा की गैंग-रेप पीड़ित ल‍ड़कियों को न्‍याय दिलाने के लिए जोरदार प्रदर्शन किया तथा हरियाणा भवन पहुंच कर अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। इस अवसर जेएनयू छात्र संघ के नेताओं ने हरियाणा व केंद्र सरकार विरोधी नारे लगता तथा खाप पंचायतों की संस्‍कृति को ध्‍वस्‍त करने की बात कही।

 
इस अवसर पर सर्व समाज संघर्ष समिति के अध्‍यक्ष वेदपाल सिंह तंवर ने कहा कि गत 23 मार्च, 2014 को रात आठ बजे इन चार लडकियों को गांव के दबंग समुदाय के लोगों ने कार से में उठा लिया तथा लगातार दो दिनों एक दर्जन से अधिक लोग इनके साथ गैंग रेप करते रहे। काफी जद्दोजहद के बाद 25 मार्च को मामले की एफआईआर दर्ज हो सकी और भारी विरोध के कारण पुलिस ने इनमें 5 लोगों को गिरफ्तार किया है लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के कारण आरोपी दबंग सरपंच तथा अन्‍य आरोपी अभी भी खुले घूम रहे हैं।

तंवर ने कहा कि यह सिर्फ एक गांव का मामला नहीं है। हरियाणा में दलित-पिछडी महिलाओं के साथ लगातार गैंग-रेप और अन्‍य प्रकार के उत्‍पीडन की घटनाएं हो रही हैं। वहां हमारी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। जाट बिरादरी की संख्‍याबल, बाहुबल तथा धनबल के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी स्‍थानीय स्‍तर पर हमारी सुध नहीं लेती। प्रशासन पूरी तरह इसी दबंग बिरादरी के कब्‍जे में है। उन्‍होंने रेप के आरोपियों को फांसी देने तथा पीड़ित लड़कियों को 15-15 लाख रूपये मुआवजा देने की मांग की। तंवर ने कहा कि चुंकि पहले से ही सामाजिक बहिष्‍कार झेल रहे भगाणा गांव के दलित परिवारों की ये गैंग-रेप पीड़ित लडकियां अब अपने गांव भी नहीं लौट सकतीं, इसलिए सरकार इनके निकटवर्ती शहर में पुनर्वास की व्‍यवस्‍था करे व उच्‍च शिक्षा का खर्च वहन करे व बालिग होने पर सरकारी नौकरी दिये जाने का आश्‍वासन दे।

Vedpal Singh Tanwar
(M)- 09813200043

 

ओपी श्रीवास्तव ने मेरी कीमत लगाने की जुर्रत की थी… बावजूद इसके ओपी के व्यवहार से बेहद प्रभावित हुआ था

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग सात)

फिर मैं समझ गया अपनी ही केंचुल में सिमटे वामपंथियों का चरित्र

हम लोगों ने छेड़ दी फैसलाकुन जंग, आमरण अनशन शुरू

ताजा-ताजा बने चचा-भतीजा के बलुआ रिश्तों की पींगों का अन्‍तर्भाव

ज्यादातर वामपंथियों में होता है खुद के प्रति श्रेष्ठतम सम्मान का पाखण्ड

लखनऊ: वैसे आपको एक बात बताऊंगा जरूर, कि ओपी श्रीवास्तव के व्यवहार से बेहद प्रभावित हुआ था। बावजूद इसके कि उन्होंने मेरी कीमत लगाने की जुर्रत की थी। लेकिन उन जैसे व्यक्ति से उससे ज्या‍दा और क्या हो सकता था। माना कि वे सहारा इंडिया के दूसरे नम्बर की हैसियत रखते थे, लेकिन पहले दर्जे वाली हैसियत वाले सुब्रत राय के कोसों-योजनों दूर निचले पायदान पर ही तो। जो कुछ भी उन्होंने मुझसे कहा उससे ज्यादा वे कर भी तो नहीं सकते थे, यह मैं खूब जानता था। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने अपना श्रेष्ठ्तम प्रदर्शन किया, मेरे सन्दर्भ में। यकीन मानिये, कि मैं सहारा इंडिया में ओपी श्रीवास्तव और बाद के विवेक सहाय जैसे लोग सहारा इंडिया के पाप-कुण्ड के अक्षुण-निष्पाप आत्मा हैं। वे वाकई सोचते और करते थे, बिना किसी ढिंढोरा मचाये हुए। हां, सुब्रत राय नामक जैसा फोबिया उन लोगों पर अगर हावी रहता था, तो उसमें हैरत या अचरज क्यों? उन्होंने अगर मुझे एक लाख रूपयों की रिश्वत की पेशकश की थी, तो भी उसमें उनका प्रोफेशनलिज्म ही तो था। हां, इतना जरूर था कि चूंकि मैं उस आन्दोलन का सर्वाधिक मजबूत पहरूआ था, इसलिए उन्होंने मुझे खरीदने का प्रस्ता‍व रखा। अब इसमें हमारे आंदोलन को तबाह करने की मंशा थी, इसलिए मैंने उसे खारिज कर दिया था। लेकिन जो शैली उन्होंने अपनायी उसका तो मैं आज तक मुरीद हूं।

खैर, ओपी श्रीवास्तव के घर के लौटते ही मैं कीर्ति प्रेस के बाहर बने धरना स्थल पर पहुंच गया। अरे हां, आपको बताना भूल गया हूं कि इसके पहले ही हम लोगों ने राजधानी के मजदूर आंदोलन को अपने आंदोलन से खींचकर लाने की कवायद छेड़ थी। हमारा आंदोलन अच्छा-खासा हो चुका था। बिला-शक, सुब्रत राय और सहारा इंडिया प्रबंधन ने हमारे आंदोलन की तीव्रता को महसूस करके ही ओपी श्रीवास्त‍व के घर मुझे साजिशन बुलाया था। वे चाहते थे कि अगर कुमार सौवीर इस आंदोलन से टूट जाएंगे तो शान-ए-सहारा के श्रमिक आंदोलन को आसानी से बिखेरा-कुचला जा सकेगा।
 
हां, तो धरना स्थल पर मैंने श्याम अंकुरम को अलग बुलाया और ओपी श्रीवास्तव के साथ हुई सारी बातचीत का ब्योरा तफ्सील से दे दिया। लेकिन यह बात सुनते ही श्याम अंकुरम बिलकुल हत्थे से उखड़ गया। उसने बाकायदा मुझे गंदी गालियां दीं और मुझे दलाल साबित करने लगा। उसका ऐतराज था कि जब तुम श्रमिकों के साथ हो और नेतृत्व कर रहे हो, तो तुम ओपी श्रीवास्तव के घर क्यों गये? उसका आरोप था कि तुम मूलत: दलाल हो और हमेशा दलाली ही करते रहोगे।

अब मैं क्या करता? श्याम मुझे समझने की कोशिश ही नहीं कर रहा था और जो आरोप वह मुझ पर लगा रहा था, वे बेहूदा है और यह भी कि मैं कुछ भी हो, मैं दलाल नहीं हो सकता। लेकिन दो दिनों तक श्याम अंकुरम ने मुझे जबर्दस्त प्रताड़ना दी। लेकिन चूंकि मैं उससे प्यार करता था, मजदूरों का नेता था और मेरी किसी प्रतिकूल हरकत श्रमिक आंदोलन को ठेस पहुंचा सकती थी, इसलिए मैं उसके ऐसे सारे आरोपों को कांधे की धूल की तरह झाड़ता रहा। हालांकि उसके बाद भी उसने मेरे खिलाफ लगातार वमन किया। कभी बेईमान, भ्रष्ट तो कभी साम्प्रदायिक तक करार दे दिया। मेरे पीठ पीछे तो कभी मेरे सामने भी। सरेआम भी कई बार किया।

उसके शब्द–बाण इतने तीखे और विषभरे होते थे, कि कोई भी तिलमिला जाए। लेकिन मैं हर बार उसकी ऐसी अभद्रताओं को लगातार भूलने की कोशिश करता रहा। न जाने क्या कारण था कि जब उसे मेरी आवश्यकता होती थी, उसका व्यवहार बहुत आत्मीय हो जाता था, लेकिन बाकी वक्त में उस पर ज्यादा पढ़े होने का आडम्बर छाया रहता था। वह तो मैंने बाद में समझा कि यह ज्यादातर नव-वामपन्थियों का चरित्र है। खुद को श्रेष्ठ‍ और बाकी लोगों को तुच्छ‍ मानने का पाखण्ड। दरअसल, ऐसा करके ये लोग खुद को श्रेष्ठतम साबित करते रहते थे। आखिरकार मैंने तंग आकर अंतिम रूप से सम्बन्ध खत्म कर दिये। लेकिन यह तो काफी बाद की बात है। उस पर बातचीत बाद में करूंगा।

खैर, शान-ए-सहारा के आंदोलन को लेकर उमाशंकर मिश्र और शिवगोपाल मिश्र वगैरह बड़े नेताओं से हम लोगों की सक्रियता बढ़ने लगी। कीर्ति प्रेस की गेट-मीटिंग लगातार होने लगी। और आखिरकार एक दिन हम लोगों ने ऐलान कर दिया कि कीर्ति प्रेस के गेट पर 18 जून-85 से अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो जाएगा और तब तक अगर मांगें स्वीकार नहीं की गयीं तो तीन जुलाई-85 से आमरण अनशन किया जाएगा। तय हुआ कि आमरण अनशन पर श्याम अंकुरम बैठेगा और मैं पूरे आंदोलन का नेतृत्व करूंगा।

18 जून-85 को कीर्ति प्रेस के बाहर जन-सैलाब उमड़ पड़ा। हम लोगों ने राजधानी लखनऊ के श्रमिक आंदोलन पर जो एकजुटता दिखायी थी, उनकी मदद की थी उसका बदला इन श्रमिकों-मजदूरों ने हमारे आंदोलन को बाकायदा संजीदगी वाली हमदर्दी के साथ अदा किया था। इतना ही नहीं, रोजाना सुबह-सुबह शहर भर के श्रमिक हमारे आंदोलन में हवन करने आ जाते थे। कुछ तो स्थाई तौर पर अपना डेरा डाल चुके थे। कहने की जरूरत नहीं कि अपनी सफलता को देख कर मैं मन ही मन कुप्पा हो चुका था। बावजूद इसके कि शान-ए-सहारा के प्रबंधन और सहारा इंडिया के सुब्रत राय ने इस बारे में मेरे खिलाफ स्पष्ट तौर पर कड़ा मन बना रखा था। लेकिन श्रमिकों की जबर्दस्त एकता और एकजुटता ही उनकी सख्ती के खिलाफ हमारी मजबूती बढ़ाती रही थी।

दो जुलाई-85 की शाम को तय हो गया कि तीन जुलाई से शुरू होने वाली अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर श्याम अंकुरम बैठेगा और मेरी भूमिका इस आंदोलन को दूसरे श्रमिकों के संगठनों से सम्पर्क करने और हमारे आंदोलन को मजबूत करने की होगी। ऐन दिन सुबह दस बजे के करीब हमारी गेट मीटिंग के चलते हजारों श्रमिकों का रेला उमड़ने लगा। ढोल-मंजीरा और क्रान्तिकारी गीतों से पूरा सुंदरबाग गूंजने लगा। शहर के मानिन्द श्रमिकों ने हम लोगों के आंदोलन की सफलता की कामना की और करीब दोपहर बारह बजे श्याम अंकुरम अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठ गया।

उधर सहारा इंडिया और शान-ए-सहारा के दर्जनों वरिष्ठ अधिकारियों ने कीर्ति प्रेस पर जमावड़ा जमाया और कई दौर में जमकर दावतें उड़ायीं। जाहिर है कि उनकी यह हरकतें हम लोगों के आंदोलन की खिल्ली उड़ाने के लिए ही थी। लेकिन इसके अलावा हम कर ही क्या सकते थे। हां, केवल इतना ही कर सकते थे कि उनकी इस कमीनगी को हम उनके खिलाफ अपने हथियार की धार की ऊर्जा के तौर पर तब्दील कर दें। और हम लोगों ने यही किया। पहले दिन का आमरण अनशन बेमिसाल रहा। देर रात तक करीब दो-ढाई हजार श्रमिक हमारे आंदोलन से जुड़े रहे, लेकिन हम लोगों ने चाय की एक घूंट तक नहीं पी। आनन्द स्वरूप वर्मा जी हालांकि अभी तक शान-ए-सहारा से अलग हो चुके थे, और हम लोगों के आंदोलन के साथ थे। मगर खुलेआम नहीं।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

सहारा प्रबंधन ने मुझे दी थी एक लाख की रिश्वत वाली पेशकश

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग छह)

सहारा इण्डिया के पाप-कुण्ड में केवल ओपी और सुबोध ही निष्पाप दिखे

देर रात तक चकल्लस और क्रांतिकारी गीतों और नाटकों का रिहर्सल

लखनऊ: हमारे अखबार में एक विज्ञापन प्रतिनिधि हुआ करता था केके श्रीवास्तव। थोड़ा घमण्डी, लेकिन कम से कम मुझसे और अचिन्त्य अधिकारी से खुला हुआ था। कारण यह कि जब वह एच-रोड वाले मकान में आया, तब तक हम लोग आफिस बंद होने के बाद खूब मस्तीन किया करते थे। बाथरूम में तो गजबै कार्रवाइयां हुआ करती थीं। अचिन्त्य जब यहां आया तो सबसे पहले मैंने उसे सम्पूर्ण नंगा किया। फिर श्याम अंकुरम का नम्बर आया। एक नया क्लर्क भर्ती हुआ अभय श्रीवास्तव। वह भी गोरखपुर का था। रेल कालोनी में उसके पिता रहते थे। वह भी यहां नंगा हो गया। इसके बाद तो तय यह हुआ कि दफ्तर का काम निबटने के बाद से पूरे परिसर में हम लोग केवल नंगे ही रहते थे। चार के चारों नंगे।

बस इसी बीच एक फिर नया नमूना केके श्रीवास्तव वहां धड़ाम की तरह पहुंच गया। बस फिर क्या  था। उसे भी नंगा कर दिया गया। शुरूआत तो उसे अपने बड़े होने का बड़ा घमण्ड था, लेकिन जब जबरिया नंगा किया गया तो काफी डायल्यूट हो गया। उसके बाद से वह भी हमारी ही तरह नंगा ही रहने लगा। लेकिन कुछ भी इतना होने के बावजूद वह ओहदे के स्तर पर हम लोगों को किसी चपरासी से ज्यादा नहीं समझता था। हां, मेरे प्रति उसका व्यवहार दूसरे अन्य के अपेक्षाकृत ज्यादा घनिष्ठ था।

शान-ए-सहारा का आंदोलन अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचने लगा था। श्रमिक जगत में हम लोगों के नाम के डंके बजने लगे थे। इसी बीच अचानक केके श्रीवास्ताव ने एक दिन मुझे टोका। बोला:- "कहां रहते हो सौवीर। मैं न जाने कब से तुम्हें  खोज रहा हूं। चलो, मेरे एक चाचा जी हैं, तुमसे कुछ जरूरी बात करना चाहते हैं। चलो, अभी चलो।" और बिना पूरी बात किये उसने अपना स्कूटर स्टार्ट किया और फर्राटा का गन्तव्य सीधे अलीगंज के सेक्टर-बी में कोहली पैथॉलॉजी के सामने स्थित एक मकान तक पहुंचा। केके श्रीवास्तव ने इस मकान की घण्टी बजायी। कोई नौकर दरवाजा खोलकर बाहर झांका और केके श्रीवास्तव को देखते हुए दरवाजा पसार कर हम लोगों को पूरे सम्मान के साथ अन्दर ले गया।

रवैये से पता तो चल ही गया कि केके श्रीवास्तव के इन चाचा के यहां उसकी खासी पूछ है। मैंने टेबुल पर पड़ी मैग्जी‍न के पन्ने पलटना शुरू किया कि अचानक केके श्रीवास्तव हड़बड़ा कर खड़ा हो गया। साफ लगा कि घर का मालिक पहुंच गया था। मैं भी उठा लेकिन इस शख्स को देखते ही मैं हैरत में आ गया। केके श्रीवास्तव के यह चाचा कोई और नहीं, साक्षात ओपी श्रीवास्तव ही थे। सहारा इंडिया में सुब्रत राय के बाद के दूसरे नम्बर के निदेशक। हालांकि मेरी समझ में ओपी श्रीवास्तव का व्यवहार हमेशा सुलझे हुए शख्स की ही तरह होता रहा था, इसलिए इस अचानक हुई मुलाकात से कोई खास हड़कम्प मैंने खुद में नहीं समझी। लेकिन एक झिझक तो हो ही गयी। आखिर वह बहुत बड़े ओहदेदार थे और मैं सम्पादकीय विभाग के सबसे छोटे पायदान पर लटका हुआ शख्स। तुर्रा यह कि आजकल मैं बर्खास्तशुदा भी था।

केके श्रीवास्तव ने लपक कर ओपी श्रीवास्तव का चरण-स्पर्श किया और फिर जबरिया मुझे झुकाकर मेरे हाथों को उनके चरणों पर स्पर्श करा दिया। मेरी हल्की भी सही, मगर झिझक को तोड़ा ओपी श्रीवास्तव जी ने। बोले:- "अरे आराम से बैठो, यह मिठाई खाओ। न न, शर्माओ मत। जैसे यह केके श्रीवास्तव मेरा भतीजा है, ठीक उसी तरह मैं भी तुम्हारा चाचा हूं।" और अपनी ही बात पर ओपी श्रीवास्तव जी जोरदार ठहाके लगाने लगे। मैंने भी हंसने की कोशिश की। ऐसे मौकों पर, जब सबसे बड़ा आदमी हंस रहा हो, तो हम जैसे लोगों का न हंसना भी तो अभद्रता हो जाती है ना। बात भले चूतियापन्थी की हो।

अगली बात भी ओपी जी ने ही की। बोले:- "क्या चल रहा है आजकल।" वक्ती तौर पर तो मैं हल्का झिझका था, लेकिन था तो मैं गजब का ही खिलन्दड़, बोला:- "बस, वही आन्दोलन, सहारा इंडिया के खिलाफ ही चल रहा है।" चाचा ने कुछ सोचा, फिर बोले:- "बेटा, मैं तुम को बहुत प्या‍र करता हूं। बहुत सम्मान देता हूं तुम लोगों के हौसलों को। अगर यह गर्मी न हो, तो इंसान कभी भी इंसान न बन पाये। लेकिन जरा यह भी तो समझो कि इससे तुम्हें मिलेगा क्या? केवल परेशानियां और दुश्वारियां ही तो!

चाचा ने अपनी बातें जारी रखीं:- "देखो सौवीर, तुम जवान हो, समझदार हो, मेहनती हो, जोश भी है तुमने, कुछ कर डालने का माद्दा है तुममें। तो फिर उसका इस्तेमाल भी तो करो। चलो, माना कि यह जवानी का जोश तुम पर चढ़ा हुआ है। यह आन्दोलन-फान्दोलन से क्या मिलेगा तुम्हें? इससे रोटी तो नहीं मिल सकती है ना? बताओ ना? खुद भी भूखे रहोगे और अपने साथियों को भी भूखा रखोगे? क्या यही जिन्दगी होगी तुम्हारी? मैं समझता हूं कि अब मैं तुम्हें सही लाइन पर खड़ा कर दूं। मैंने तय किया है कि मैं तुम्हा्रे लिए एक प्रेस खुलवा दूं। न न, पैसे के लिए तुम्हें परेशान नहीं होना पड़ेगा। मैं हूं ना अभी। तुम्हारा चाचा अभी जिन्दा है बेटा, इसीलिए कह रहा हूं कि तुम जाओ और अपना एक नया प्रेस खड़ा करो। दूसरों के भड़काने पर मत चलो। अरे कितना खर्चा लग जाएगा एक प्रेस खड़ा करने में? 70-80 हजार? अरे 90 हजार या इससे भी ज्यादा, बताओ ना? अरे चलो, माना कि इसके लिए एक लाख रूपयों की जरूरत पड़ेगी, तो हो। मैं हूं ना। चाचा के रहते कुछ मत सोचना। मैं दूंगा यह रकम। हां, हां, अपनी जेब से दूंगा। सहारा इंडिया के खाते से नहीं। वहां से तो दे भी नहीं सकता। बड़े साहब ( सुब्रत राय ) इसकी इजाजत ही नहीं देंगे। तुम्हें बताऊं कि वे तुमसे बहुत नाराज हैं। तुम्हारी हरकतों से उनका दिल ही टूट गया है। खैर, उन्हें तो अब पता भी नहीं चलना चाहिए कि मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रहा हूं। बिलकुल अपने स्तर पर रखना।"

"और यह मेरी एक सलाह है तुम्हें। सलाह क्या, समझो तुम्हारे चाचा तुम्हें हुक्म दे रहे हैं और अब भतीजे को अपने चाचा का आदेश मानना ही पड़ेगा कि तुम इन हड़तालियों से हट जाओ। बिलकुल हट जाओ। जाओ, अपना भविष्य सम्भालो। और जब भी कभी तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेगी, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा। तो आज और अभी से ही यह हड़ताल की बात भी तुम्हारी दिमाग में नहीं आनी चाहिए। हट जाओ इन लोगों से। यह लोग तुम्हारी जिन्दगी खराब कर देंगे। यह लोग तो खुद को भुखमरा करने के लिए पैदा होते हैं, तुम्हें भी भूखा मार कर खत्म कर देंगे। तो, मानोगे ना मेरी बात?"

गजब घेराबंदी हो गयी थी मेरी। समझ में नहीं आया कि तत्काल मैं क्या जवाब दूं? अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए आखिरकार बोल ही दिया:- "जी, जैसा आप कहेंगे, वैसा ही करूंगा।" एक ताजा-ताजा जबरिया बने चाचा-भतीजे के खालिस बलुआ रिश्ते से इतने से ज्यादा रस निकल भी तो नहीं सकता था ना। उस घर से निकलने पर जब ताजा हवा के झोंकों ने मेरे दिल-दिमाग को ठण्डा किया तो यही पहला अहसास हुआ कि:- "इतना ही बहुत है यार। बोलो, है कि नहीं"

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

सुब्रत राय ने नौकरी छीनी तो श्रमिक जगत ने हमें सिर-माथे पर लिया

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग पांच)

लखनऊ के श्रमिक आंदोलन का ऐसा जोश अब स्वप्न से परे है

राजकुमार केसवानी ने की थी भोपाल औद्योगिक नर-संहार की भविष्यवाणी

लखनऊ: आज के पत्रकारों को यह अहसास करने का मौका तक नहीं मिला होगा कि इस देश में कोई भीषणतम औद्योगिक नर-संहार भी हो चुका है। जी हां, हम यूनियन कार्बाइड हादसे की बात कर रहे हैं जिसकी भोपाल वाली कीटनाशक दवा बनाने वाली यूनिट में एमआईसी(मिक) यानी मिथाइल आइसो सायनाइड की टंकी रिसने लगी और इस हादसे में करीब चालीस हजार लोगों की मौत हो गयी। इतना ही नहीं, करीब सवा पांच लाख लोगों पर स्थाई तौर विकलांगता का प्रभाव पड़ा।

 
यह हादसा 3 दिसम्बर-84 की रात तब हुआ जब पूरा भोपाल समेत पूरा देश गहरी नींद की आगोश में था। इस हादसे की गम्भीरता का पता तो दो दिन बाद तब पता चला जब सरकारी ऐलान हुआ कि हादसे की रात ही 2259 लोगों ने दम तोड़ दिया था। हैरत की बात तो यह रही थी कि न तो फैक्ट्री प्रबंधन को और न ही सरकार को यह पता तक नहीं था कि यहां गैस रिसाव का इलाज क्या होना चाहिए। करीब चार दिन तक भोपाल श्मशान में तब्दील होता रहा था। उसके बाद ही पता चला कि इस गैस टंकी के रिसाव पर अगर पानी का छिड़काव कर दिया जाए तो उसे थामा जा सकता है। नतीजा, हेलीकॉप्टर से पूरी फैक्ट्री परिसर पर पानी का छिड़काव किया गया।

इसके एक हफ्ते बाद मध्य प्रदेश सरकार ने दावा किया कि इस हादसे में कुल 3787 व्यक्तियों की मृत्यु गैस के रिसाव के परिणामस्वरूप हुई थी। लेकिन गैर सरकारी अनुमानों के अनुसार आठ से दस हजार लोगों की मौत गैस रिसाव के 72 घंटे के भीतर हो गई थी, और लगभग 25,000 व्यक्ति गैस से संबंधित बीमारियों से मर चुके हैं। 40,000 से अधिक स्थायी रूप से विकलांग, अंधे और अन्य गैस व्याधियों से ग्रसित हुए थे, सब मिला कर 5,21.000 लोग गैस से प्रभावित हुए। इस हादसे ने पूरे विश्व को दहला दिया था।

दरअसल यूनियन कार्बाइड की जमीनी हकीकत को पहली बार एक पत्रकार ने खुलासा किया था जिसका नाम था राजकुमार केसवानी ने। वह जनसत्ता का भोपाल रिपोर्टर था। पहले पन्ने के पांच कॉलम बॉटम में छपी इस खबर में राजकुमार केसवानी ने लिखा था कि यहां कभी भी हो सकता है श्रमिकों का नरसंहार, जिसका कारण बनेगी यहां बनने वाली दवा की गैस-टंकी। इस खबर ने देश भर के श्रमिकों का ध्यान आकर्षित किया और फिर तो बवण्डर ही खड़ा हो गया। और फिर अचानक जैसे ही यह हादसा हुआ, श्रमिक जगत में हंगामा खड़ा हो गया। देश में ओद्योगिक असुरक्षा के माहौल के खिलाफ श्रमिकों का गुस्सा स्वाभाविक भी था।

यूनियन कार्बाइड की एक यूनिट लखनऊ में भी थी, मगर यहां जीप नामक टॉर्च और बैटरी बनती थी। यहां भी हजारों कर्मचारी थे और आंदोलन चरम पर था। और भोपाल काण्ड के बाद तो यहां मानो आग ही लगा दी थी। वैसे भी, अक्सर यहां बवाल होता रहता था। गेट मीटिंग्स नियमित होती रहती थी। धरना दिन-रात चलता था। अक्सर भूख-हड़ताल भी चलती थी। दरअसल, यह गढ़ था कर्मचारी असंतोष और उसके खिलाफ उमड़े श्रमिक आंदोलन का।

जैसा कि मैंने कहा, कि यह श्रमिक आंदोलनों का दौर था। हालांकि इसके पहले भी ट्रेड यूनियनों की सक्रियता खूब थी। जहां भी शोषण और अन्याय होता था, यह यूनियनें अपना झण्डा लेकर खड़ी हो जाती थीं। चाहे वह दवा उद्योग रहा हो या फिर फैक्ट्री या बैंक, रेल या प्रिंटिंग उद्योग। बाजार और दूकानों पर भी आंदोलन की आंच थी। श्रमिक आंदोलन के बड़े नेता यहीं जुटते थे। मसलन उमाशंकर मिश्र और उनके सहयोगी शिवगोपाल मिश्र जो आज देश की रेल श्रमिकों द्वारा निर्वाचित प्रमुख हैं और उनका दर्जा केंद्रीय मंत्री का है। बैंक-‍कर्मियों के नेता राकेश का गजब जलवा हुआ करता था। नाटककारों में आत्मजीत हम लोगों के आदर्श थे। क्या् ऐशबाग इं‍डस्ट्रियल एरिया था या फिर नादरगंज, इस्माइलगंज, अमौसी या फिर अपट्रान अथवा मोहन डिस्टलरी का क्षेत्र। यह वह दौर था जहां जिजीविषा हुआ करती थी, दलाली की गुंजाइश नहीं। एक आवाज पर सारे कर्मचारी जुट जाते थे।

28 मई-85 से हम तीनों लोग तो बर्खास्तशुदा हो चुके थे। सो, मैंने और श्याम अंकुरम ने अपना डेरा-डंगर श्रमिक आंदोलन में लगा दिया। ज्यादातर वक्त यूनियन कार्बाइड के गेट पर ही बीतने लगा। श्याम अंकुरम तो अपना ज्यादातर वक्त किताबें पढ़ने में लगाता था, बाकी वक्त् में वह नारकीय, असह्य और भीषण बदबू रिलीज करने में जुटा रहता था। मैं क्रांतिकारी गीतों और नुक्कड़-नाटकों में जुट गया। वहां के प्रमुख श्रमिक नेता थे गंगाप्रसाद जी, विद्युत सिंह जैसे करिश्माई लोग। उनके प्रेम-स्नेह की गंगा, जल्दी ही हम लोगों पर जमकर बरसने लगी। कुछ ही समय भीतर हम लोग लखनऊ के श्रमिक आंदोलन के अपरिहार्य अंग बन गये। हर गेट मीटिंग पर हमारी टोली जुटती थी। नाटक के बाद हम लोग अपनी चादर गेट के सामने बिछा देते थे जिस पर लोगबाग अपनी सामर्थ्य भर पैसा डाल देते थे। लेकिन हम लोगों ने शान-ए-सहारा प्रेस की ड्योढ़ी नहीं छोड़ी थी। सुबह-शाम हम लोग यहां जुटते थे। नियम से।
 
शहर की सारी फैक्ट्रियों के मजदूरों से मिलना-जुलना शुरू हुआ तो बदले में वहां के मजदूर भी हमारे गेट पर जुटने लगे। सारे कम्पोजीटर्स तो हमारे साथ थे ही। हमारे आंदोलन ने इन लोगों का हौसला बढ़ाया था। वैसे भी, वे बेचारे अगर जाते भी तो कहां। उधर हम लोग जब नुक्कड़ नाटकों के बाद जो पैसा जुटाते थे, उससे रोटी-चोखा-भुर्ता हमारे ही प्रेस के गेट पर बनता था। पूरी रात यहीं से संचालित होती थी। देर रात तक चकल्लस और क्रांतिकारी गीतों और नाटकों का रिहर्सल हुआ करता था। शाम उतरते ही हमारा प्रेस मजदूरों का किला बन जाता था। चूंकि हम लोग पूरी तरह शांतिपूर्वक रहते थे, इसलिए पीएसी वालों ने प्रेस बंद होने बाद हम लोगों को मैदान और उसका शौचालय आदि इस्तेमाल करने की इजाजत भी दे रखी थी। सुबह नौ बजे तक हम लोगों को यह परिसर खाली करना होता था। पीएसी की ओर से पूरी सख्ती बरती जा रही थी कि कोई भी साथी मजदूर प्रेस की ओर न जाए।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

28 मई 1985 को सुब्रत राय ने मुझे बर्खास्त कर दिया, मजदूर हितैषी तडि़त कुमार दादा ने जारी कराया आदेश

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग चार)

पारिवारिक संस्था व सर्वहारा की डींग मारते पाखण्डी बुर्जुआ लोग

लखनऊ: अखबार को शुरू हुए दो साल शुरू हो चुके थे। कर्मचारियों में खुसफुसाहट शुरू हो गयी थी कि वेतन बढ़ना चाहिए। सम्पादकीय लोगों में भी चर्चा पकड़ रही थी। कि अचानक अप्रैल-85 को ऐलान हुआ कि सभी कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ गयी है। दिल धकड़ने लगा था। किसी से भी पूछने लगो तो जवाब ही नहीं मिलता था। जिस जिसी से भी पूछता, तो जवाब मिलता कि लेटर मिलने के बाद ही पता चलेगा। आखिरकार एक दिन लेटर मिल ही गया। हालांकि सबको गोपनीय पत्र से सूचित किया था, लेकिन यह बात छुप कहां होती है। दो-एक दिनों में ही पता चला कि तडित दादा का वेतन साढ़े छह हजार, वर्मा जी का साढे चार हजार, सम्पादकीय लोगों का 12 सौ से ढाई हजार के बीच मिला था। मेरा व श्याम की पदोन्नति हो गयी थी और हम लोगों को कॉपी-होल्डर के बजाय सीधे प्रूफ रीडर बनाते हुए 660 रूपया महीना मिलेगा।

लेकिन कम्पोजिंग सेक्शन में मातम पसर गया। उनमें से 5 से लेकर 50 रूपया तक की वेतन-वृद्धि दी गयी थी और कई लोग तो ऐसे थे जिन्हें एक कानी-फूटी दमड़ी तक नहीं दी गयी थी। चूंकि हम लोग इसी कम्पोजिंग सेक्शन में बैठते थे, इसलिए उनका रूदन सबसे हम लोगों ने सुना। कम्पोजीटर्स ही हम लोगों के अभिन्न थे, और उनमें बेहिसाब आक्रोश था। तय हुआ कि चूंकि यह बढोत्तरी अपमानजनक है। आपको सच बताऊं कि कम्पोजिंग सेक्शन वाकई अमानवीय माहौल में बैठता था। बाकी दफ्तर मे तो गर्मियों के दिनों कूलर लगे हुए रहते थे और जाड़ों में हीटर। लेकिन कम्पोजिंग सेक्शन एसबेस्टेस शीट से घिरी छत पर सिमटा हुआ करता था। गर्मी के दिनों में तो यहां बेहोश कर देने वाली गर्मी तड़कती थी जबकि सर्दियों में टेम्पेरेचर बाकी दफ्तर के मुकाबले बेहद कम।
 
उस पर तुर्रा यह कि कम्पोजिंग कर्मचारियों की तनख्वाह कुछ इस तरह बढ़ायी गयी थी मानो भीख दी गयी हो। हालांकि मेरा और श्याम का वेतन दो गुना से भी ज्यादा बढ़ चुका था, लेकिन आक्रोश तो हम लोगों में भी था। प्रश्न केवल यही नहीं था कि हम लोगों की तनख्वाह बढ़ी है, बल्कि समस्या यह थी कि हमारे बाकी साथी भूखों मर रहे थे। अरे सौ-सवा सौ में भी कोई आदमी कैसे अपना परिवार का पेट पाल सकता है? मैं मानता हूं कि इनमें कई कम्पोजिटर्स ऐसे थे जो वाकई गधे थे, लेकिन मैं शपथ ले कर कह सकता हूं कि ज्यादातर कम्पोजीटर्स में ज्ञान, कुशलता, और त्वरा इतनी थी कि शायद खुद वर्मा जी और तडित जी में भी न रही होगी। इन लोगों ने कई बार नहीं, सैकड़ों हजारों बार मुझे इन बड़े पत्रकारों की ऐसी-ऐसी कापी दिखायीं जिससे किसी को भी शर्म आ सकती थी, जिनमें इन कम्पोजीटर्स ने हंस करते हुए उन्हें सुधार लिया था। जी हां, यही था इन छोटे लोगों का बड़प्पन। फिर जब ऐसे छोटे-ओछे लोग अगर भूख के लिए तड़प रहे हों, तो कम से कम हम लोग तो चुप नहीं रह सकते थे। इसीलिए हम लोगों ने तय कर लिया इस वेतन बढोत्तरी के खिलाफ हम लोग विरोध दर्ज करेंगे और जब तक वेतन असंगति बनी रहेगी, कम्पोजिंग सेक्शन के हम सारे लोग अपना वेतन नहीं उठायेंगे।

लेकिन यह क्या? आसमान फट गया। वही लोग जो क्यूबा, रूस, चीन आदि देशों के मजदूर आंदोलनों से लेकर चेग्वेरा-माओ-लेनिन-मार्क्स को आदर्श के तौर पर माना करते थे, वे हम लोगों पर तेल-पानी लेकर पिल पड़े। उनकी नयी शब्दावली में सर्वहारा का मतलब अपने श्रमिकों को पूरी तरह हारा-त्रस्त कर देना ही बन गया था। अब उनका सर्वहारा का अर्थ पूरी तरह बदल चुका था। तडित दादा तो किसी सामन्ती जमीन्दार या उनके शब्दों में कहें तो बुर्जुआ की तरह अपने राजा की रक्षा के लिए हर सच-झूठ साबित करने में जुटे थे। कम्पोजीटर्स के आर्तनाद पर हम लोगों ने जो फैसला किया, उसका पता चलते ही तडित दादा रौद्र-रूप पर आ गये। राम-सीता स्वयंवर-लीला के परशुराम की तरह फरसा-नुमा पेन नचाते हुए बोले:- "तुम, तुम लोग? मेरे ही खिलाफ हो और मेरी ही कब्र खोदने पर आमादा हो तो मैं भी अब तुम लोगों को औकात में खड़ा न कर पाया तो मेरा भी नाम तडित कुमार चटर्जी नहीं।"
 
यकीन नहीं आया कि यह तडित दादा की आवाज है, जिन्होंने अपनी बेरोजगारी के दौर में कविता लिखी थी कि:- "मैं कुत्ता नहीं जो वक्त–बेवक्त अपनी पूंछ हिलाता रहूं।" तडित दादा की नाराजगी कर्मचारियों के रवैये पर तो थी ही, साथ ही वे आनन्द स्वरूप वर्मा के रवैये पर ज्यादा खफा थे। वजह यह कि वर्मा जी ने अपना वेतन बहुत कम समझा था। नतीजा, वर्मा जी ने पहले तो हमारे आंदोलन से दूरी बनाये रखी, क्योंकि उन्हें  अपनी वेतन-वृद्धि बहुत कम लग रही थी और वे चाहते थे कि यह बढ़ोत्तरी कम से कम छह हजार तक हो। सम्पादकीय से जुडे कुछ लोगों ने हम लोगों को खुफिया जानकारियां दी थीं। छन कर जो भी खबरें आयीं, उनसे पता चला कि सुब्रत राय से भेंट करके वर्मा जी ने अपने घर के सारे खर्च का बाकायदा एक परचा लिख कर सौंपा था। उनका कहना था कि इतनी कम वेतन में उनका काम नहीं चल पा रहा है। लेकिन सुब्रत राय ने उस परचे की ओर झांका तक नहीं। बोले: "अगर आपको लगता है कि इतने पैसे से आपका काम नहीं चल पायेगा, तो आप कहीं दूसरी जगह पर काम खोज लीजिए।"

अब यह तो पता नहीं चला कि सु्ब्रत राय से और क्या-क्या बातचीत वर्माजी की हुई, लेकिन एक दिन बाद ही वर्मा जी के घर से जाकर सहारा के कुछ लोग पहुंचे और स्कूटर अपने साथ लेकर चले गये। यह अपमान की पराकाष्ठा थी, हम लोगों को भी यह हरकत बहुत बुरी लगी। और अपनी इसी नाराजगी को हम लोगों ने अपने आंदोलन की ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया।
 
कुछ भी हो, दो-चार दिनों के भीतर हम लोगों के साथ ज्यादातर सम्पादकीय सहकर्मी जुड गये। इसी के साथ ही साथ अगली 28 मई-85 को तडित कुमार दादा ने संस्थान के तीन लोगों को बर्खास्त करते हुए करीब छह लोगों को देश के भिन्न-विभिन्न शहरों पर ट्रांसफर करने का आदेश जारी कर दिया। जिन लोगों को बर्खास्त किया गया था उनमें पहले नम्बर पर था, मेरा यानी कुमार सौवीर का नाम, फिर श्याम अंकुरम और तीसरा नाम था एक कम्पोजीटर सुरेंद्र सिंह। हम लोगों को दफ्तर में आने पर मनाही कर दी गयी। लेकिन हम लोग भीतर जाने लगे। हमारा विरोध बढ़ चुका था, हमारे खिलाफ मैनेजमेंट ने सुब्रत राय को क्या-क्या पट्टी सिखाया-समझाया, पता नहीं। लेकिन अगले पखवाड़ा के भीतर ही सुब्रत राय ने प्रेस के गेट पर ही एक पीएसी का तीन टेंट लगवा दिया, जिसमें करीब तीन दर्जन जवान मुस्तैद रहते थे। साफ संदेश था कि सुब्रत राय अब हम मजदूरों का दमन ही करेंगे। इसके लिए उन्हें चाहे कितनी भी कीमत चुकानी पड़े।
 
पीएसी के यह जवान दिन भर प्रेस के प्रांगण में सावधान-विश्राम करते रहते थे। उनकी राइफलें और उनकी संगीनें लगातार चमकती रहती थीं। सहारा के लोग उनके साथ ही गेट पर रहते थे, और उनकी इजाजत के बिना किसी को भी भीतर जाने की इजाजत नहीं मिलने लगी। यानी जंग शुरू हो गयी।

और यह जंग उस सुब्रत राय नामक शख्स ने छेड़ी, जो अपने संस्थान को कर्मचारियों की एक निजी पारिवारिक संस्था के तौर पर पेश करता और प्रचारित करता रहा था। वह सहारा इंडिया को परिवार बताता था और इस परिवार के सारे सदस्य मेरे इसी परिवार के बच्चे हैं और सुब्रत राय इस परिवार का मुखिया है। इसी परिवार के मुखिया ने अपने ही परिवार के विखण्डन का ताना-बाना बुना और तय कर दिया कि इस परिवार के इन तीन सदस्यों का जीवन तबाह कर देगा। और इसके लिए वह पीएससी तैनात कर इन्हींक पारिवारिक सदस्यों को खण्ड-खण्ड कर चूर-मसल देगा।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

पत्रकारिता के बड़े पदों को छेंके हुए ओछे बौने लोग

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग तीन)

पत्रकरिता में खोखले सुरंग-जीवीयों को करीब से देखा मैंने

मौका मिलते ही पाखण्डी बन जाते हैं आदर्श बघारते लोग

लखनऊ: आपको एक बात बता दूं कि इस पूरे अखबार में सुब्रत राय ने एक बार भी हस्तक्षेप नहीं किया। हां, एक बार सुब्रत राय के नाम से एक पत्र जरूर प्रकाशित हुआ। पूरे दौरान केवल तीन बार ही प्रेस में आये और बारीकी से यहां को देखा-समझा। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह अखबार पूरी तरह शांत रहा था। गुटबाजी और तेल लगाने की परम्परा यहां पनप गयी। मसलन, सन-84 में इंटर की परीक्षाओं के दौर में मेरे दाहिने हाथ पर तेल खौलती कटोरी गिर गयी थी। बड़ा फफोला पड़ गया था। बेहिसाब जलन थी। उसी हालत में मुझे एक राइटर देकर परीक्षा करायी गयी। अगले दिन जब परीक्षा देकर मैं आफिस पहुंचा, तो काम करने के बीच ही मुझे झपकी आ गयी। कि अचानक सुब्रत राय मुआयने पर पहुंचे। मैं कुर्सी की पुश्त पर टेक लगाये हुए था। सुब्रत राय ने कंधे पर हाथ रखा तो मैं जाग गया। चूंकि मैं यहां का पहला कर्मचारी था, इसीलिए वे मुझे खूब पहचानते थे।

मुझसे पूछा: सौवीर, यह सोने की जगह है क्या  ?

मैंने अपने दाहिने हाथ पर पड़े गमछे को हटाया तो सुब्रत राय चौंक पड़े। वहां मौजूद तडित दादा आदि लोगों से कहा कि:- दादा, आप लोग इन लोगों का भी ध्यान रखा कीजिए। जाओ, तुम कुछ दिन की छुट्टी ले लो। मुझे सुब्रत राय की यह शैली मुझे बहुत अच्छी। लगी। लेकिन अभी जब मैं खुश ही रहा था कि अचानक सुपरवाइजर हरीओम कनौजिया ने एक नोटिस थमा दी। इसमें लिखा था कि सुब्रत राय के अचानक मुआयने के मौके पर कुर्सी पर सोते हुए पाये जाने पर आपके खिलाफ क्यों न गम्भीर कार्रवाई की जाए। हैरत की बात यह कि नोटिस तडित दादा की ओर से जारी किया गया था। मैंने जो कुछ भी हुआ था, लिख कर दे दिया और साथ ही लिख दिया कि सुब्रत राय को इस घटना का संज्ञान है और तडित दादा अगर चाहें तो उसकी पुष्टि सुब्रत राय से करा सकते हैं।

मगर हैरत की बात है कि इसके बाद से ही तडित जी और वर्मा जी का व्यवहार मेरे खिलाफ सख्त हो गया। इसके पहले मेरी कई रिपोर्ट्स अक्सर छपी रहती थीं, लेकिन उसके बाद से यह सुविधा बंद हो गयी। नतीजा, मैंने कई प्रमुख घटनाओं की रिपोर्ट्स लिखी और उसे सीधे नवभारत टाइम्स और अमर उजाला जैसे अखबारों में दे दिया। नवभारत टाइम्स में कमर वहीद नकवी और अमर उजाला में थे वीरेन डंगवाल। बेहद आत्मीय शख्सियतें। उस समय नवभारत टाइम्स में फीचर प्रभारी थे कमर वहीद नकवी। वे भी मुझे स्नेह करते थे और मेरी ऐसी सारी रिपोर्ट्स को उन्होंने बाकायदा सम्मान के साथ छापा। आज दैनिक ट्रिब्यून के समूह सम्पादक सन्तोष तिवारी जी तब दिनमान में थे। उन्होंने तो मुझे सांस्कृतिक गतिविधियों का नियमित लेखक बना डाला था।

इसी बीच सन-84 में अचानक बहराइच जिला मुख्यालय स्थित बच्चों की जेल में बच्चों ने आगजनी की थी। इन बच्चों ने इस बच्चा-जेल के कर्मचारियों को जमकर पीटा और जेल तोड़कर भाग गये थे, इसकी खबर मुझे शाम को ही मिल गयी। पता चला कि इस बच्चा‍-जेल का अधीक्षक कोई त्रिपाठी था, जो यहां के बच्चों के साथ समलैंगिक-रिश्ते बनाता था। त्रिपाठी ने जिले के कई बड़े जजों-अफसरों के ऐसे शौक के लिए लड़के मुहैया करा रखे थे। कई बड़े पैसावाले लोग भी इसी त्रिपाठी के लिए यह धंधा कराते थे। मैंने एक अखबारी टैक्सी पकड़ा और सुबह-सुबह बहराइच पहुंच गया। पता चला कि एक फोटोग्राफर ने उसका कवरेज किया था। मैंने उससे रील हासिल कर ली। शाम तक काम किया और अगले सुबह स्क्रिप्ट दादा के हवाले किया। मगर दादा का मूड बिगड़ गया।

बोले: तुम किससे पूछ कर बहराइच गये थे?
मैंने जवाब दिया: कल मेरी छुट्टी थी।
दादा बहुत बिफरे और बोले: मैं एक रिपोर्टर बहराइच भेज रहा हूं और उसकी ही रिपोर्ट छपेगी, तुम्हारी नहीं।

लंच टाइम मैं कमर वहीद नकवी के आफिस पहुंचा। तब वे हस्तक्षेप नामक पेज भी तैयार करते थे। चार-पांच दिन बाद ही यह पेज लगना था, लेकिन उन्होंने गजब दिमाग लगाया और 14 नवम्बर को हस्तक्षेप पेज बनाकर मेरी खबर छाप दी। पेज पर बैनर। मय फोटो। खबर का शीर्षक लगाया: सवाल, जो पूरी शिद्दत के साथ जवाब चाहता है। इतना ही नहीं, श्याम अंकुरम ने एक व्यंग्य लिखा था, उसे हमारे नियंताओं ने बकवास बताते हुए मेज पर फेंक दिया। यह अपमान था, वह परेशान हो गया। मैंने सलाह देकर उसे अमृतप्रभात के विनोद श्रीवास्तव के पास जाने को कहा। मजेदार बात यह कि विनोद जी ने अपने अगले रविवारीय अंक के प्रथम पृष्ठ पर छाप दिया। और उसका पारिश्रमिक उसे 35 रूपया मिला। पैसा की बात उतनी बड़ी नहीं थी, उसका छपा नाम देख कर वह उचककर बजरंग-बली हो गया।

यह बातें हमारे संस्थान में लगातार खटकती जा रही थीं। दरअसल, हम लोग चाहते थे कि हमें भी लिखने का मौका मिले, लेकिन हमें लद्दू-गदहा बनाने पर मजबूर किया जा रहा था। हम पर ऐतराज होने लगा कि हम लोग बाहर के अखबारों में नहीं लिख सकते। मैंने ऐतराज किया कि आखिर क्यों नही लिख सकते हैं। यह तो दादागिरी है कि आप न तो छापेंगे और जब कहीं और छपेगा तो उस पर ऐतराज करेंगे। मगर उनका ऐतराज बना रहा और हमारा रवैया भी उसी तर्ज पर स्टैंड करता रहा। हैरत की बात है कि सम्पादकीय लोगों ने हम लोगों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अक्सर हम लोगों पर आक्षेप लगने लगे तो मैंने भी मोर्चा खोला। इन लोगों की कॉपी चेक लगा और वहां मौजूद भारी गलतियों और ब्लंडर्स को चिन्हित करने लगा। उनकी कापी पर नोटिस लिखने लगा यदि त्रुटियां नहीं सुधारी गयीं तो हम उन्हें यथावत पास कर दिया करेंगे। मगर इन लोगों ने अपना रवैया नहीं बदला, मगर हम लोग सहज ही रहे। इस बात का मुझे गर्व है कि हम लोगों ने कभी भी कोई गलती प्रिंट में जाने नहीं दी। मजेदार बात तो यह है कि हमारे पास आने वाली सारी कॉपी भारी-भरकम त्रुटियों-गलतियों से सराबोर रहती थीं। हा हा हा..

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

दूसरों की मजबूरियां दो कौड़ी में खरीदने सुब्रत राय को महारत है

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग दो)

मुझे गर्व है कि दिग्गजों ने मेरे भविष्य की दिशा तय की

नौकरी मिली तो मछली-भात, और बेरोजागार हुए तो क्रांति-कामी

लखनऊ : साप्ताहिक शान-ए-सहारा अखबार के लिए आफिस खोजने के लिए दो दिनों में ही मैंने सात मकान छान मारे। अपनी टुटी लेडीज साइकिल के बल पर। तडित दादा तो कुछ देर के लिए सुब्रत राय के अलीगंज वाले मकान में कुछ देर के लिए ही आते थे, फिर बाकी अपने घर में ही। दरअसल, खाली वक्त में दादा को मछली की याद सबसे ज्यादा सताती थी ना, इसीलिए। और दादा की खासियत यह है कि वे खाली वक्त तब ही पाते हैं, जब नौकरी उनके हाथ में होती है। नौकरी मिली तो मछली-भात, और जब बेरोजगारी मिली तो क्रान्तिकारिता। लेकिन हम लोगों के प्रति दादा ही नहीं, पूरा परिवार भी स्नेह-प्यार की वर्षा करता था। मैं भी खाली ही था, न घर-बार न परिवार। सो, ज्यादातर वक्ता दादा की सेवा में ही रहता था मैं।

खैर, महानगर के एच-रोड स्थित एक मकान हम लोगों ने खोजा और तय किया। कुल जमा तीन कमरे थे, एक किचन-बाथ सहित। मैंने दादा को दिखाया, फाइनल किया और पजेशन ले लिया। तब तक एक नया जोशीला लड़का भी हम लोगों में जुट गया। नाम था अचिन्त्य अधिकारी। वह बंगाली था। न उसके पास कोई ठिकाना और न मेरा। सो, इसी आफिस में हम दोनों का डेरा पड़ा। तीन महीनों के भीतर सम्पा‍दकीय सहयोगियों का चयन हो गया और उनकी कुर्सियां पड़ गयीं। डमी की तैयारी होने लगी। तब तक श्याम अंकुरम को भी कॉपी-होल्डार के पद पर तैनाती मिल गयी।

इसी बीच हीवेट रोड पर एक नया प्रेस मिल गया सहारा को। नाम था कीर्ति प्रेस। इसके मालिक के पिता ने बेहिसाब मेहनत-निष्ठा के साथ यह प्रेस खड़ा किया था और उसका नाम अपने बेटे के नाम पर रखा था। यह प्रेस प्रिंट-जगत में बहुत बड़ा नाम था। लेकिन इस बंगाली ने उसे तबाह कर दिया। कीर्ति बनर्जी को दुनिया भर के शौक थे, और उसी में कीर्ति की साख बह गयी। फिर उन्होंने सुब्रत राय के यहां नौकरी कर ली और यह प्रेस सहारा ने किराये पर ले लिया। तब तक सुब्रत राय की छवि बन चुकी थी कि वे अपने लोगों की कमियों को कौड़ियों में खरीद लेते हैं।

खास बड़ा था इसका परिसर। अखबार का दफ्तर इसी में खुला। अब तक इसमें आनन्दस्वरूप वर्मा और उर्मिलेश जैसे लोग जुड़ चुके थे। उर्मिलेश तो दिल्ली सम्भाल रहे थे, जबकि आनन्दस्वरूप वर्मा जी लखनऊ पधारे। सहारा ने दादा और वर्मा जी को एक-एक मकान और स्कूटर की सुविधा दे दी थी। इन दोनों का आवास अलीगंज के सेक्टर-डी में ही था। करीब-करीब एक-दूसरे के आसपास ही। वर्मा जी ने अपने नोएडा वाले मकान सहारा को किराये पर गेस्ट हाउस के तौर पर दे दिया था।
 
अब आइये, मैं आपको बताता हूं कि इस अखबार में वेतन-स्ट्रक्चर क्या था। तडित दादा का वेतन ढाई हजार, वर्मा जी का डेढ़ हजार, रिपोर्टर और डेस्क वालों का साढे़ छह से लेकर 12 सौ रूपये तक। इनमें रामेश्वर पाण्डेय, वीरेंद्र सेंगर, कमलेश त्रिपाठी, घनश्याम दुबे, विनय सिंह, दिनेश दीनू, आदियोग वगैरह आदि शामिल थे। उल्लेखनीय है कि तडित दादा ने अपने गोरखपुर के अधिकांश अपने साथी-संगियों को इस अखबार में खपाया था। इनमें आनंदस्वरूप, कमलेश त्रिपाठी, रामेश्वर पाण्डेय और एक दुबे जी थे, जो उनके साथ गोरखपुर के वक्त के साथी रहे थे। तडित दादा ने अपनी बिजूखा नामक अपनी किताब में शायद इन्हीं दुबे जी का जिक्र पूरे सम्मान के साथ लिया है। मेरा दावा है कि उनका यह सलेक्शन पूरी की पूरी मेरिट पर था, सिर्फ दोस्ती या सिफारिश के बल पर नहीं।
 
वजह यही रही कि इन लोगों ने मेरा ज्ञानार्जन भी कराया। खूब कराया। मसलन आनंदस्वरूप वर्मा ने मेरी रूचि को समझा और मुझे कई विदेशी पत्रिका के लेखों का ट्रांसलेशन कराने का जिम्मा दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने फिजी में वहां के राष्ट्रपति महेंद्र चौधरी के मामले पर बारीकी जानकारियां दीं। मसलन, वहां का जेवेल आन्दोलन। अमेरिका में गर्भपात विषयों पर न्यूजवीक जैसी गंभीर पत्रिकाओं पर छपी रिपोर्ट भी उन्होंने अनूदित करायीं। नाथूराम गोडसे ने एक किताब के हाशियों पर कुछ टिप्पणी लिखी थीं। फांसी की कोठरी में बंद गोडसे का जस्टिफिकेशन भरा सवाल था:- ह्वाई आई शॉट गांधी। इस का अनुवाद वर्मा जी ने मुझसे कराया। तीन दिन में मैंने यह अनुवाद कर डाला। वर्मा जी खुश हुए और मेरी मेहनत की बहुत प्रशंस की। उन्होंने उसे कम्पोजिंग के लिए भेज दिया। अगले दिन उसकी कॉपी मिल गयी तो वर्मा जी ने उसे अगले अंक के लिए पास कर दिया। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही तो कहा जाएगा कि दो दिन बाद ही इन्दिरा गांधी की हत्या हो गयी और मेरी मेहनत गोडसी-प्रवृत्ति पर बलि हो गयी।
 
उधर रामेश्वर पाण्डेय ने मुझे हावर्ड फ्रास्ट की किताब पढ़ने की सिफारिश की जिसका नाम था आदि-विद्रोही। मूल ग्लैडियेटर का अनुवाद किया था अमृत राय ने। ऐसे कई मसलों-किताबों पर यह दोनों ही लोग मेरे साथ कुछ न कुछ समय दे देते थे। मुझे गर्व है कि मुझ जैसे होटलों में बर्तन धोने वाले, वेटरी करने वाले और रिक्शा-चालक से अपना पेट भरने वाले शख्स को इन महानतम लोगों ने मुझे स्नेह दिया, दिशा दी। हां, मुझे इस बात का भी खुद पर गर्व है कि मैंने कभी विधिवत स्‍कूलिंग न करने के बावजूद हर सकारात्मक पक्षों से सीखा और समझा। अंग्रेजी को पढ़ना और समझना मेरे लिए बहुत कष्टकारी हुआ करता था, लेकिन वर्मा जी ने मुझे पहली बार मुझे अनुवादक के तौर पर पहचान दिलायी। आपको एक जानकारी देना चाहता हूं कि आज भी मैं अंग्रेजी लिखने की तमीज नहीं रखता हूं।
 
खैर, तो शान-ए-सहारा में मेरा व श्याम अंकुरम में से प्रत्येक का 315, कम्पोजीटर्स का वेतन 90 से लेकर 175 तक। सुपरवाइजर का वेतन था 700 और चपरासी का वेतन 125 रूपये। बस। जीवन इसी में चल रहा था। आपको तो खैर पता ही होगा कि यह वह दौर था जब गोर्बाच्योव और उसके बाद की संततियों तक ने ग्लास्तनोस्त और पेरिस्त्रोइका जैसे शब्दों की भाव-भंगिमा को न खोजा था, न समझा था और न कभी पहचाना था।

दिसम्बर-82 तक यह अखबार शुरू हो गया और अगले साल तक हिन्दी बेल्ट‍ में इसने अपना डंका बजाना शुरू कर दिया। प्रिंट-लाइन में टीके चटर्जी का नाम दो बार छपता था। मगर प्रबन्ध सम्पादक के तौर पर सुब्रत राय के भाई जयब्रत राय का नाम छपता था। संयुक्त सम्पादक थे आनन्द स्वरूप वर्मा और उसके बाद सारे सम्पादकीय व रिपोर्टर्स नाम भी छपता था। हमारा और श्याम का नाम नहीं छपता था।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

सुब्रत राय का इलाज या तो मजदूर होते हैं, या फिर सुप्रीम कोर्ट

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग एक)

श्रमिकों के तेवर के सामने सुब्रत राय की अकड़-फूं निकल गयी

चुटकियों में निपट गया साप्ताहिक शान-ए-सहारा का झंझट

लखनऊ : सुब्रत राय और सहारा इंडिया का यह सिर्फ किस्सा ही नहीं है, एक खबर की मुकम्मल पंच-लाइनें हैं। इसे समझने के लिए आपको देखना होगा कि अपना चेहरा काला करने वाले लोग अपनी हराम की कमाई को फंसते देख कर कैसे चुप्पी साध लेते हैं, जबकि खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को वापस हासिल करने वाला श्रमिक जब अपनी औकात पर उतरता है, तो कयामत की तरह कहर तोड़ देता है। जी हां, मैं सहारा इंडिया और सुब्रत राय के ही बारे में बात कर रहा हूं, जब श्रमिकों के तेवर के सामने सुब्रत राय की अकड़-फूं निकल गयी थी। श्रमिकों ने जब भी, तनिक सी भी तेवर-त्योरी चढ़ायी, सुब्रत राय ने बाकायदा आत्म समर्पण कर दिया।

यह मामला है अप्रैल-85 से लेकर मार्च-86 तक का। लेकिन शुरूआत हुई थी 2 जून-82 से। उस वक्त मैं सहारा इंडिया के शान-ए-सहारा नामक साप्ताहिक अखबार में काम करता था। यहां चपरासी से लेकर सम्पादक तक लोग श्रमिक-हितकारी बुद्धि और जीवट के लोग थे, मगर जब श्रमिकों का गुस्सा भड़का तो सारे दिग्गजों ने अपनी-अपनी पूछें अपनी पिछली टांगों में घुसेड़ लीं। कोई भी सामने नहीं फटका। और जो सुब्रत राय 24 हजार करोड़ की हेराफेरी के आरोप में तिहाड़ जेल में पसीना बहा रहे हैं, वह उस समय हम लोगों के हर कदम पर शीश झुकाया करते थे।

तो, शुरूआत हो गयी 2-जून-82 में। मैंने हाईस्कूाल की परीक्षा दी थी। प्राइवेट। इसके पहले होटल-चाकरी और रिक्शा–चालन वगैरह के बल पर पेट भरने के चक्कर में स्कूल में पढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाया था। खैर, यह लम्बा किस्सा है। उस पर बाद में बातचीत होगी। फुरसत में। मौका मिला और क्षमता हासिल हुई तो बाकायदा किताब छपवा दूंगा यार। खैर…।

मई-82 में हाईस्कूल की परीक्षा दी थी। रिजल्ट आने ही वाला था। इसके पहले में आईपीएफ और उसके बाद जन संस्कृति मंच वगैरह से जुड़ा हुआ था। रवींद्रालय समेत कई थियेटरों में मंच व क्रांतिकारी नुक्कड़-नाटकों में प्रमुख भूमिका निभाता था। जिलों से लेकर दिल्ली तक अपना डमरू बजा चुका था। वगैरह-वगैरह। हमारे नेता थे हमारे मंझले भाई आदियोग, और सहयोगी थे अनिल सिन्हा, सुप्रिय लखनपाल, नीरज सिन्हा, पुच्चन यानी प्रवीण तिवारी, हरीकृष्ण मिश्र, नीरज मिश्र, दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे अतुल सिन्हा भी हमारे साथ थे, जो मूलत: पटना के हैं और पुण्य-आत्मा अनिल सिन्हा के छोटे भाई हैं। पत्रकार अजय सिंह और अनिल सिन्हा जैसे लोग मेरा हौसला बढ़ाते रहते थे। बाद में जुटे गोंडा के श्यारम अंकुरम, चक्रधर और कृष्ण्कान्त धर द्विवेदी, डॉ. एसपी मिश्र, लाल साहब, वगैरह-वगैरह।

इसी आबोहवा में तड़ित कुमार से भेंट हो गयी। तब तड़ित कुमार यानी टीके चटर्जी तब बहुत सरल हुआ करते थे। बंगालियों पर मजाक करने और बंकिमचन्द्र की आनन्द मठ जैसी किताब को कचरा घोषित करने की हैसियत किसी भी बंगाली में नहीं होती, लेकिन तडित दादा अपवाद थे। उनकी किताब बिजूखा बांचिये ना। कविता में उनकी असीमित तिक्तता-तीव्रता थी। इसीलिए मैं आज तक उनका स्मरण पूरी श्रद्धा के साथ करता हूं। मैं मानता हूं कि बाद के वक्त में बेरोजगारी के भय और मुकम्मल बेरोजगारी ने उनके व्यवहार को काफी तोड़ा-मरोड़ा और मसला भी। जमकर। उनकी कविताएं किसी भी बदलाव-कामी युवक की भींगती मसों को मरोड़ सकती थीं।

हजरतगंज में ही हुई थी तडित कुमार जी से भेंट। फुटपाथ पर। साथ में श्याम अंकुरम भी था। गोंडा का रहने वाला यह बागी ठाकुर क्रान्तिकारी चेहरे के साथ था। अराजक बढ़ी दाढी, मुक्तिबोध समेत वामपंथी किताबों का तिलचट्टा, मोहब्बत में मैं उसे मरकस-बाबा कहता था। यानी मार्क्स-बाबा। उसके गले भर तक आक्रोश भरा था, लेकिन पेट हमेशा खराब। भोज्य पदार्थों को प्राण-घातक गैस में तब्दील करने में मानो उसमें अद्भुत महारत थी।
 
चूंकि मैं नाटकों में काम करता रहता था, इसीलिए तडित कुमार जी ने मुझे फौरन पहचान लिया। हम दोनों ही लोग बेरोजगार थे। बातचीत बढ़ी तो दादा ने कहा:- कुमार सौवीर को तो मैं फौरन ले सकता हूं, लेकिन श्याम को अभी तीन-चार महीने का वक्त लगेगा। दरअसल, तडित दादा को एक ऐसा शख्स चाहिए था जो उनके अखबार के आफिस वगैरह खोजने-व्यवस्थित करा सके। मैं गजब का उत्साहित आदमी-नुमा श्रमिक रहा हूं, कभी भी न का नाम मेरी जुबान से नहीं मिलता था, जब तक अगला आदमी बदतमीजी पर आमादा न हो जाए। लेकिन यह सीमा टूटते ही मैं किसी पर भी टूट पड़ सकता हूं। यह आदत अब तक मौजूद है। और यह हुनर श्या़म अंकुरम के पास नहीं था। वह पक्का ठाकुरवादी कम्युनिस्ट था, वह अपनी अक्खड़ई को केवल असह्य बदबू में ही तब्दी‍ल कर सकता था।

दो दिन बाद ही सहारा इंडिया के लालबाग स्थित कमांड आफिस में मेरा साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार वाले कमरे में कई लोग मौजूद थे। उन लोगों ने मुझसे कई बातें पूछीं, मैंने सहजता से जवाब दिया। इसी बीच ओपी श्रीवास्तव नामक एक निदेशक ने खेल के बारे में बात कीं।
मैंने कहा: मैं जूडो खेलता हूं।
सवाल उठा: कैसे खेलते हैं यह खेल?
मैं उठ खड़ा हुआ और बोला: आप सामने आइये, अभी दिखा देता हूं।
श्रीवास्त़व जी सकपका गये। लेकिन कमरे में ठहाके जमकर लगे।

यह मध्य जून-82 की बात है और मैंने 2 जून-82 को सहारा इंडिया के शान-ए-सहारा में ज्वाइन कर लिया। पद था कॉपी-होल्डर। मतलब काम प्रूफ-रीडर का, मगर पद थोड़ा इन्फीरियर। आज के अखबारी जगत ने तो प्रूफ-रीडर के पद की अन्येष्टि कर दी है, लेकिन तब वह दौर भी था जब इण्डिया-टुडे जैसी पत्रिकाओं के प्रिण्ट-लाइन में प्रूफ-रीडर का नाम भी छपता था। खैर, मेरा वेतन तय हुआ 315 रूपया महीना। अपॉइंटमेंट लेटर पर सुब्रत राय का हस्ताक्षर था। बेहद हसीन हस्ताक्षर। जैसे मेरे बचपन की किसी सपनीली मोहब्बत की तरह नाजुक और आकर्षक।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

वाराणसी प्रकरणः पत्रकार ही घोंप रहे अपने साथियों की पीठ में खंजर

वाराणसी: शहर के व्‍यस्‍ततम चौराहे पर पुलिसवालों ने अपनी घायल महिला रिश्‍तेदार को अपने घर ले जाने की कोशिश कर रहे दो पत्रकारों के साथ न केवल अभद्रता की, बल्कि भरे-बाजार उनकी जमकर पिटाई भी कर दी। पत्रकारों के साथ हुए इस हादसे से खफा पत्रकारों ने यह पूरा मामला एसएसपी के सामने पेश किया। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई कार्रवाई शुरू होती, शहर के कुछ दलाल पत्रकारों ने वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के साथ काना-फूंसी की और मामला हमेशा-हमेशा के लिए रद्दी की टोकरी तक चला गया।

यह मामला है काशी का। यहां के दलाल पत्रकारों ने दरअसल काशी की पत्रकारिता के चेहरे पर कालिख पोत डाली है। हैरत की बात है कि यह काम किसी और किसी ने नहीं, बल्कि उनमें से कुछ पत्रकार तो इन्‍हीं पीडि़त पत्रकार के संस्‍थान में बड़े पत्रकार माने जाते हैं।

आपको बता दें कि अभी करीब दस दिन पहले दशाश्‍वमेध घाट की ओर जाने वाले गोदौलिया चौराहे पर यह हादसा हुआ था। हुआ यह कि जनसंदेश टाइम्‍स के रिपोर्टर संदीप त्रिपाठी बुरी तरह से घायल अपनी माता को अस्‍पताल से लौट कर अपने घर ले जा रहे थे। दशाश्‍वमेध घाट निवासी संदीप त्रिपाठी की माता का एक दुर्घटना में पैर बुरी तरह टूट गया था। गोदौलिया चौराहे पर जैसे ही उनकी कार दशाश्‍वमेध घाट की ओर बढ़ी, चौराहे पर खड़े सिपाहियों ने उनकी कार रोकी और अभद्रता करते हुए उन्‍हें वापस लौटने पर दबाव बनाया। जब संदीप त्रिपाठी ने अपनी माता की हालत बताते हुए घर जाने की इजाजत मांगी, तो उन पुलिसवालों ने उन्‍हें बुरी तरह लाठियों से पीट दिया। इसी बीच संदीप के संस्‍थान के चीफ रिपोर्टर राजनाथ त्रिपाठी मौके पर पहुंचे तो इन पुलिसवालों ने उनकी भी पिटाई कर दी।

इस घटना की सूचना पाकर काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी समेत पूरा पत्रकार जगत हक्‍का-बक्‍का हो गया और उन्‍होंने एसएसपी से मिल कर दोषी पुलिसवालों पर कार्रवाई की मांग की। वरिष्‍ठ पत्रकार अत्रि भरद्वाज और आर रंगप्‍पा बताते हैं कि इस शिकायत पर एसएसपी ने कार्रवाई का आश्‍वासन देते हुए कहा कि वे इस पूरे प्रकरण पर चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज को भी देखेंगे।

लेकिन अभी पता चला है कि एसएसपी ने इस मामले को कूड़े टोकरे में फेंक दिया है। कारण यह कि काशी के ही चंद पत्रकारों ने एसएसपी के कान पर यह खबर भर दी कि राजनाथ त्रिपाठी के मामले में कोई मामला ही नहीं बन रहा है। जनसंदेश टाइम्‍स के कई पत्रकारों ने बताया कि दरअसल एसएसपी को कान भरने वाले पत्रकार पुलिस के करीब रिश्‍तों के लिए बदनाम हैं। इतना ही नहीं, राजनाथ त्रिपाठी और संदीप त्रिपाठी के साथ इन पत्रकारों की खुली ठना-ठनी बनी रहती है। पत्रकार बताते हैं कि एसएसपी के साथ ऐसी कानाफूसी करने वाले पत्रकारों में जनसंदेश टाइम्‍स के साथ ही साथ उन लोगों की टोली भी शामिल है जो पत्रकारों के इस गिरोह के हम-प्‍याला बताये जाते हैं। इसीलिए एसएसपी ने अब इस प्रकरण को ठण्‍डे बस्‍ते पर डाल दिया है। हालांकि, कार्रवाई के नाम के लिए जांच का नाटक भी चल रहा है। जबकि इस प्रकरण के लिए जिम्‍मेदार दबंग पुलिसवाले अब तक इसी चौराहे पर धुंधुआ रहे हैं और जमकर वसूली में मस्‍त हैं।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

सुप्रीम कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न की शिकायत पर मुख्य न्यायाधीश का पहला आदेश

सुप्रीम कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने आरोपी अधिवक्ता के सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश पर 6 महीने के लिए पाबंदी लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट की लिंग संवेदीकरण और आंतरिक शिकायत कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में उक्त अधिवक्ता के परिसर में प्रवेश पर एक साल के लिए पाबंदी की अनुशंसा की थी।  

मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि यह पहली और एक मात्र शिकायत है इसलिए मेरे मतानुसार सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश पर 6 महीने की पाबंदी उचित है। ये उक्त अधिवक्ता को सुधरने का मौका देगी और निरोधक का कार्य भी करेगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की यौन उत्पीड़न पर कमेटी का गठन जस्टिस एके गांगुली पर एक इंटर्न द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद किया गया था।
 

ज़ी न्यूज़ ने किए एक तीर से दो शिकार

ज़ी न्यूज़ और नमो की दोस्ती किसी से छुपी नहीं है। कुरुक्षेत्र में 'ज़ी न्‍यूज' के मालि‍क सुभाष चंद्रा ने नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा किया था और कहा था कि 'मैं भी हरि‍याणा का सूं, यो ज़ी चैनल भी समझो थारा ही सै।' ज़ी न्यूज़ और कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा नवीन जिंदल के चलते है।

नमो का हिमायती होने के कारण चैनल अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा था। अचानक मुरली मनोहर जोशी के साथ फिक्स इंटरव्यू न करने की बात कहकर चर्चा में आया जी न्यूज अपनी विश्वसनीयता वापस लाने की कोशिश में है। लेकिन साथ ही साथ, नरेंद्र मोदी को न पसंद करने वाले नेता मुरली मनोहर जोशी का पत्ता काटने की कोशिश कर रहा है, जो वाराणसी छोड़कर कानपुर से चुनाव लड़ रहे हैं।

मोदी की सबसे बड़ी रणनीति है कि बीजेपी की तमाम बड़े लीडर इस बार चुनावों में हार जाएं, लेकिन बीजेपी को बहुमत मिले मिले। आज अगर चुनावी स्थलों पर नजर दौड़ाएं तो विंदिशा में सुषमा स्वराज अकेली पड़ रही है। गांधीनगर में एलके आडवाणी के साथ दूसरे नंबर की नेता आनंदीबेन पटेल नजर नहीं आ रही है। पंजाब के अमृतसर से अरुण जेटली को चुनाव मैदान में उतारकर नवजोत सिंह सिद्धू और उसके प्रशंसकों को नाराज कर, वहां समीकरण बदल दिए।

राजनाथ सिंह लखनऊ से लड़ रहे हैं, लेकिन उनको भी टोपी पहननी पड़ रही है। अटल बिहारी जैसी छवि का प्रचार करवाना पड़ रहा है। राजनाथ सिंह राज ठाकरे के समर्थन को सिरे से खारिज करते हैं तो नरेंद्र मोदी चुप्पी साधे रहते हैं। नरेंद्र मोदी को पता है कि अगर दिल्ली का रास्ता साफ करना है तो बीजेपी के सीनियर लीडरों को किनारे करना होगा। शिवसेना एलके आडवाणी पर ठप्पा लगाती है। जेडीयू भी पुन:समर्थन देने की बात कहती है, लेकिन एलके आडवाणी की अगुवाई में, इसके अलावा सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली एक ही खेमे से आते हैं। जसवंत सिंह रेस से बाहर हो ही चुके हैं।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

मैं बनारस हूं, मेरे मर्म को समझिए

एक बार फिर चुनावी बयार के बीच मैं बनारस हूं। राजनीतिक उपेक्षा और तिरस्कार का शहर बनारस। कहने को सबसे पुराना शहर, सांस्कतिक राजधानी पर सबसे बेहाल और बदहाल। राजनीतिज्ञों के लिए इस बार मैं दिल्ली की सत्ता पाने की पहली सीढ़ी हूं। शोर है, होड़ है, चर्चाए है, विरोधी है, समर्थक हैं। नारे हैं, पोस्टर हैं सबको अपनी बात कहकर आगे निकल जाने की