यदि वोट देने का पैमाना विकास है तो फिर बिहार में नीतीश को वोट क्यों नहीं?

मैं स्पष्ट कर दूं कि बिहार के एक ऐसे इलाके से आता हूं जहां विकास की लौ अब पहुंचनी शुरु हुई है। 2007 से मैं बिहार में नहीं रहता लेकिन इन सात सालों में जो कुछ भी परिवर्तन दिखा उसमें नीतीश कुमार का अक्स सामने आता है। सोचता हूं कि वो वहीं बिहार है जहां गड्ढ़े को सड़क कहा जाता था, ये वही स्कूल है जिसके छत नहीं होते थे, ये वही अस्पताल है जहां दवाएं तो दूर डॉक्टर नजर नहीं आते थे, ये वही पगडंडियां हैं जहां सैकड़ों बच्चियां साइकिल चला रही हैं।

मैं ऐसा दावा नहीं कर रहा कि बिहार बहुत विकास किया है लेकिन कोई भी इंसान बिना किसी दुर्भावना से दिल पर हाथ रखकर कहे कि, जो मैंने कहा वो गलत है। क्योंकि कोई ऐसा विभाग नहीं मिलेगा जहां विकास की किरण हल्की-फुल्की नहीं पहुंची। विकास की किरण कहने का मतलब ये नहीं कि अपेक्षित विकास हुआ है बल्कि ये है कि जहां कुछ भी नहीं था वहां कुछ दिखाई देने लगा है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली की सुविधाएं अब लोगों तक पहुंचनी शुरु हुई हैं। बिहार के किसी इलाके की मुख्य सड़क आप देख लें सही मिलेंगे। शिक्षा में तो बिहार ने इबारत लिख दी है। ग्रामीण इलाके की लड़कियां सड़कों पर हजारों की संख्या में साइकिल से स्कूल जाती मिलेंगी। सात साल पहले राजधानी पटना की सड़कों पर कुछ ही लड़कियां साइकिल चलाती दिखती थीं। स्वास्थ्य सेवाओं में प्राथमिक स्तर पर सुधार हुआ है। प्रखंड लेवल के स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टर की कौन कहे फ्री में दवाईयां मिलती हैं। रोजगार की बात करें तो बहुत तो नहीं लेकिन नीतीश ने सार्थक प्रयास किए हैं। लगभग ढाई से तीन लाख लोगों को शिक्षामित्र और कई नौजवानों को बिहार सरकार में कॉन्ट्रेक्ट पर नौकरियां मिली हैं। जो महिलाएं चार दिवारी से बाहर नहीं निकलीं थी वो आज प्रखंड प्रमुख, मुखिया, जिला परिषद और स्कूलों में पढ़ाती हैं।

उदाहरण के तौर पर मैं कई ऐसे अनुभव से दो चार हुआ हूं। एक बार एक लड़की को देखा तो अपनी मां को वो साइकिल पर पीछे बिठाकर उसे अस्पताल दिखाने ले जा रही थी। एक बार मैं घर पर था तो देखा कि एम्बुलेंस खड़ी है। मुझे सचमुच आश्चर्य हुआ कि मैं वहीं गांव में हूं। फिर पता चला कि पड़ोसी के घर प्रेग्नेंट महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ये एम्बुलेंस आई है। ये जानने के बाद दिलचस्पी और बढ़ी और पूछा तो गांववालों ने बताया कि एक कॉल करें आपके घर एम्बुलेंस आ जाएगी। मेरे गांव में 18 घंटे बिजली रहती है। जब पढ़ते थे उस समय जिला मुख्यालय आरा में 10 घंटे बिजली नहीं रहती थी।

ये सच है कि इसे माकूल विकास नहीं कहेंगे लेकिन हम उस प्रदेश की बात कर रहे हैं, जहां ये पहले दूज का चांद दिखने के समान था। कुछ लोग कहते हैं कि ये सारा काम केन्द्र प्रायोजित है। मैं मानता हूं कि है, लेकिन क्या इससे पहले केन्द्र प्रायोजित योजनाएं नहीं चलती थी। कुछ लोग कहते हैं कि नीतीश कुमार अहंकारी हैं, होंगे लेकिन आम जनता को क्या चाहिए? हां, नीतीश  सरकार ने भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा पाया। आज भी सरकारी महकमें में वहीं हालात हैं जो पहले थे। इस मामले में भी सार्थक प्रयास किए गए। कई भ्रष्टाचारियों की संपत्ति सरकार ने जब्त की है, फिर हालात नहीं सुधर रहे हैं। इसके लिए सरकार के साथ-साथ आमजन को भी आगे आना होगा।

कहते हैं कि राजनीति में कुर्सी की सियासत होती है और इसके लिए हर कोई दांव चलता है। इसलिए मैं ये नहीं कहता कि नीतीश दूध के धुले हुए हैं। बीजेपी से गठबंधन तोड़ने की बात हो या बिहार के विशेष राज्य के दर्जे की बात हो। इसमें नीतीश की राजनीति साफ नजर आती है लेकिन अगर वोट देने का पैमाना सचमुच में विकास है तो फिर नीतीश कुमार की पार्टी को वोट क्यों नहीं? ये चुनाव इस बात को भी प्रमाणित करेगा कि बिहार की राजनीति जाति, धर्म से निकलकर विकास पर आ टिकी है या नहीं। 16 मई को आपका जनादेश देश के सामने होगा कि कौन जीता? विकास की राजनीति या फिर वहीं…

अजय कुमार सिंह
प्रोड्यूसर, श्रीन्यूज, दिल्ली
मोबाइल नंबर-9711749356

 

सोनिया गांधी ने किया चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन

कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी 4 अप्रैल को अपने चुनावी दौरे में सरकारी उपक्रम एनटीपीसी के हैलीकॉप्टर का इस्तेमाल कर खुले आम न केवल चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया है बल्कि अपने राजनीतिक रसूख की दबंगई कर सरकारी साधन व पैसों का दुरुपयोग किया है। चुनाव आयोग को मामले को संज्ञान लेकर तत्काल चुनाव प्रचार में सरकारी साधनों के इसेतेमाल पर सख्त अंकुश लगाना चाहिए तथा इस्तेमाल करने वाले प्रत्याशी का नामांकन रद्द कर देना चाहिए।

फोटो दिनांक 4 अपेरैल को रामगढ़ के बाज़ार टाड़ स्थित सिद्धू-कान्हू मैदान में चुनावी सभा में हेलीकॉप्टर के उतरते समय की है।

महेन्द्र अग्रवाल
newskootchakra@gmail.com

सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में दायर निवेशकों की रकम वापसी का प्रस्ताव वापस लिया

नई दिल्ली: सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में दायर निवेशकों की रकम वापसी का अपना प्रस्ताव वापस ले लिया है। सहारा ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि वह सेबी को तत्काल 2500 करोड़ देने को तैयार है और 2500 करोड़ की दूसरी किस्त वह तीन हफ्ते में दे देगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय की जमानत के लिए शर्त रखी थी कि सहारा 5000 करोड़ रुपये सेबी के पास जमा कराये और 5000 करोड़ की बैंक गारंटी भी दे। लेकिन सहारा का कहना था कि इस समय उसके पास 10,000 करोड़ रुपए नहीं हैं। इस कारण सहारा ने सुप्रीम कोर्ट के सामने उपरोक्त प्रस्ताव रखा था।

साथ ही सहारा ने सुप्रीम कोर्ट के 4 मार्च के उस फैसले के खिलाफ याचिका दायर कर रखी है, जिसके तहत सहारा प्रमुख और दो निदेशकों को जेल भेज दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट 9 अप्रैल को करेगा।
 

अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे है अजीत सिंह

देश के राजनैतिक परिदृश्य में कुछ चेहरे और उनके कृत्य हमेशा से ही आवाम के लिए बेहद दिलचस्प रहे हैं। राष्ट्रीय लोक दल के मुखिया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट अस्मिता के वाहक चैधरी अजीत सिंह इस देश के राजनैतिक परिदृश्य में एक ऐसी ही शख्सियत रहे हैं जिन्होंनें, विचारधारा से हटकर किसी भी दल के साथ गठबंधन करने और, उस गठबंधन को अपने हित के लिए कभी भी खत्म करने में कतई गुरेज नहीं किया। अगर पिछले लोकसभा चुनाव की ही बात की जाए तो, उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन भाजपा गठबंधन के चुनाव हार जाने के बाद वे कांग्रेस का दामन थाम कर केन्द्र में मंत्री बन गए। अपने गढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस बार का आम चुनाव वे कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ रहे हैं लेकिन, अतीत के अनुभवों को देखते हुए यह दावे से नही कहा जा सकता कि चुनाव के बाद उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता किस दल के साथ जाकर हाथ मिला लेगी।

गौरतलब है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली और मुजफ्फरनगर जिलों में हाल ही में भूमिहीन और गरीब मुसलमानों के खिलाफ हुई भीषण सांप्रदायिक हिंसा के बाद उपजे सामाजिक और राजनैतिक उथल-पुथल के बीच पहले से ही लगातार सिमटते जा रहे  जनाधार को बचाने की कोशिशों में लगे रालोद सुप्रीमो चैधरी अजीत सिंह इन दिनों अपने जाट वोट बैंक को संगठित करने का मैराथन प्रयास कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि इस चुनाव में जाट और ठाकुर मतदाताओं को अपनी ओर किसी भी कीमत पर रखा जाए। शायद यही वजह है कि उन्होंने कभी मुलायम सिंह के करीबी रहे अमर सिंह और अभिनेत्री जया प्रदा को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है ताकि, पश्चिम के ठाकुरों में यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी एक ठाकुर चेहरा भी जातीय प्रतिनिधि के बतौर रखती है। यही नहीं, भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत, जिन्हें दंगे के बाद, पहले भाजपा से प्रत्याशी बनाए जाने की चर्चा थी, को अमरोहा से टिकट देकर अपने बिखर रहे जाट वोट बैंक को जातिवादी अस्मिता और किसान हितैषी होने के नाम पर रोकने की कोशिश की है। लेकिन अफसोस यह भी है कि दंगा पीडि़त मुसलमानों की नाराजगी को दूर करने का कोई नुस्खा अब तक अजीत सिंह खोज नही सके हैं।

यहां यह ध्यान देने लायक है कि चैधरी चरण सिंह के समय में जाट-मुसलमान एकता का नारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद के अस्तित्व की एक असली वजह था। लेकिन हालिया हुए दंगों के बाद जिस तरह से मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ और जाटों से उन्हे गहरा अविश्वास हो गया, उससे जाट-मुस्लिम एकता का पूरा ताना बाना ही भरभराकर टूट गया। चूंकि अब तक पश्चिम में रालोद एक बड़ी ताकत थी, लिहाजा इस जाट-मुस्लिम एकता के टूट जाने के बाद अजीत सिंह का अस्तित्व पहली बार दांव पर लग गया है। अजीत सिंह की सारी छटपटाहट अपने इसी अस्तित्व को बचाने के इर्द गिर्द घूम रही है। जाटों पर आरक्षण का दांव खेलना इसी का एक प्रयास भर है। और बाहर से ऐसा लगता है कि अजीत सिंह ने जाटों को अपने पक्ष में कर भी लिया है।

लेकिन, राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजीत सिंह द्वारा मुसलमानों के बीच से रालोद के खिसक चुके जनाधार को वापस पाने के लिए चाहे जितने प्रयास अजीत सिंह द्वारा किए जाएं, यह लगभग साफ हो चुका है कि अब पश्चिम का मुसलमान अजीत सिंह के साथ कतई जाने वाला नही है। चंूकि दंगों की त्रासदी और उस पर अजीत सिंह की चुप्पी को लेकर मुसलमानों को जितनी पीड़ा है, उसे पाटने के लिए अजीत सिंह को लंबा वक्त चाहिए। लेकिन चुनाव सिर पर हैं और अब ऐसा कुछ भी कर पाना अजीत सिंह के बस में नहीं है लिहाजा, अब उनका पूरा ध्यान केवल जाट मतदाताओं को संगठित करने पर ही लगा हुआ है। उनकी कोशिश है कि भाजपा ने जाटों और ठाकुर मतदाताओं के बीच दंगे के दौरान और उसके बाद सेंधमारी की जो कोशिशें की थीं, को प्रभावहीन बनाया जा सके। मौजूदा परिदृश्य इस बात का संकेत दे रहा है कि भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के बीच कुछ खास नही करने जा रही है। अजीत सिंह ने भाजपा के मंसूबों पर फिलहाल पानी फेर दिया है।

जहां तक कांग्रेस के साथ अजीत सिंह के गठबंधन का सवाल है, जहां तक मेरा आकलन कहता है यह कांग्रेस के लिए ज्यादा लाभदायक रहेगा। ऐसा माना जा रहा है कि जिन इलाकों में रालोद चुनाव नही लड़ रही है वहां के जाट मतदाता कांग्रेस को वोट कर सकते हैं। रालोद जाटों से दिए गए आरक्षण के नाम पर कांग्रेस के लिए इन इलाकों में वोट मागेंगी। भारतीय किसान यूनियन की पश्चिम के आम किसानों में आज भी पैठ है और ऐसा माना जा रहा है कि अगर राकेश टिकैत या नरेश टिकैत कांग्रेस के पक्ष में वोट की अपील करेंगे तो जाट वोट कांग्रेस की झोली में आ सकते हैं। जहां तक पश्चिम के मुसलमानों की बात है दंगे के बाद उनका वोट गैर भाजपा और गैर सपा के पक्ष में ही जाएगा। उन्हें कांग्रेस से भी कुछ नाराजगी है, लेकिन फिर भी वे कांग्रेस को वोट दे सकते हैं। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जाट और दलित मुसलमानों के वोट पा सकती है जो उसे काफी फायदा पहुंचा सकता है। अजीत सिंह पश्चिम की 25 लोकसभा सीटों में से केवल आठ पर लड़ रहे हैं, बाकी पर कांग्रेस लड़ रही है ऐसे में यहां पर फायदा कांग्रेस को ही ज्यादा होता हुआ दिख रहा है। पश्चिम में कांग्रेस मजबूत हो कर उभर सकती है।

गौरतलब है कि दंगों के बाद भारतीय किसान यूनियन के नेताओं का अचानक राजनीति में आना कई गंभीर सवाल तो खड़े करता ही है, भाकियू के भविष्य पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता और महेन्द्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत ने भले ही जाट अस्मिता बचाने के नाम पर अजीत सिंह के साथ हाथ मिलाया है लेकिन ऐसी खबरें पहले से ही आ रही थीं कि महेन्द्र सिंह टिकैत के वारिस भाजपा के टिकट पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे में यहां पर सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इन दंगों के मार्फत इन दोनों भाइयों की चुनावी समर में कूदने की कोई रणनीतिक तैयारी तो नही थी। चूंकि राकेश और नरेश टिकैत जाटों की सबसे शक्तिशाली खाप के प्रतिनिधि हैं और उनके प्रभाव क्षेत्र में एक बड़ा वोट उनकी अपनी खाप का ही है। ऐसे में यह सवाल जरूर उठेगा कि उन्होंने राजनीति में पदार्पण का यही समय क्यों चुना? चूंकि दंगा रोकने के लिए इन दोनों भाइयों ने भी सिवाय तमाशा देखने के कुछ नहीं किया, लिहाजा क्या यह मानना गलत होगा कि इस दंगे में इन दोनों भाइयों की भी रणनीतिक संलिप्ता थी। आखिर महेन्द्र सिंह टिकैत के इन वारिसों ने दंगा रोकने के लिए क्या किया? बहरहाल, राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह ने अमरोहा से राकेश टिकैत को लोकसभा प्रत्याशी बनाकर एक तीर से दो निशाने साध दिए हैं। राष्ट्रीय लोकदल जहां राकेश को अमरोहा से चुनाव लड़ाकर किसानों के सबसे बड़े संगठन भकियू में अपनी पकड़ मजबूत करना चाह रहा है। वहीं मुजफ्फरनगर दंगों के बाद अजित सिंह से नाराज चल रहे जाट समुदाय को जाट अस्मिता और रिजर्वेशन के नाम पर खुश करने की कोशिश भी की है। वेस्ट यूपी में बदले सियासी समीकरण में सभी दलों का ध्यान जाट व मुस्लिम वोट पर ही है।

पश्चिमी यूपी के सम्भल, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, सहारनपुर, बुलंदशहर की सीट जाट बाहुल्य है। इसीलिए पश्चिमी यूपी में जाटों और किसानों में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत को अजीत सिंह ने अमरोहा से प्रत्याशी बनाया है। लेकिन, अब सवाल यह है कि पहली बार मुसलमान रालोद को बड़े पैमाने पर वोट नही करने जा रहा है और एक बड़ी आबादी के अचानक साथ छोड़ देने के बाद पहली बार अजीत सिंह का भविष्य ही दांव पर नही लग गया है। अब देखना यह है कि अजीत सिंह की यह चुनावी रणनीति कितनी कामयाब होती है और कितने दिन तक वह कांग्रेस के लिए वफादार साथी बने रह सकेंगें। यही नहीं, सवाल अब भारतीय किसान यूनियन के भविष्य का भी है क्योंकि सिर्फ जातिवादी राजनीतिक अस्मिता लंबे समय तक राजनीति के मैदान में टिकाए नहीं रख सकती। ऐसा लगता है कि अब अजीत सिंह के साथ भारतीय किसान यूनियन भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने राजनीति के मैदान में आ गया है और अगर अजीत सिंह का सफाया होता है तो इसे भी डूबने से कोई बचा नहीं पाएगा। अब अजीत का अस्तित्व भारतीय किसान यूनियन के अस्तित्व का भी निर्धारण करेगा।
 
हरे राम मिश्र
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार

निवास- द्वारा- मोहम्म्द शुऐब एडवोकेट
110/46 हरिनाथ बनर्जी स्टरीट
लाटूश रोड नया गांव ईस्ट
लखनउ (उप्र)
मो-07379393876

राजगढ़ के डीएम ने दो मीडियाकर्मियों को जिला बदर किया

मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के  कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी आनंद कुमार शर्मा ने आज दो मीडिया कर्मियो के खिलाफ़ जिला बदर के आदेश जारी कर दिए है। मध्यप्रदेश राज्य सुरक्षा अधिनियम के तहत यह कार्रवाही की गई है। जारी आदेश के मुताबिक आपराधिक गतिविधियों में लगातार लिप्त रहने, समाज विरोधी गतिविधियां घटित करने, अधिकारियो और आम जनता को भयभीत एवं आतंकित करने के कारण मीडिया कर्मी अनूप सक्सेना और लखन जाटव निवासी राजगढ़ को 6 माह के लिए राजगढ़ जिले और इससे लगे सीमावर्ती जिले गुना, शाजापुर, आगर मालवा, भोपाल, सीहोर, विदिशा जिले की सीमाओ के बाहर चले जाने के आदेश पारित किये है।

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

साधना न्यूज और जिया न्यूज के मालिकाना हक में बदलाव

दो न्यूज चैनलों के मालिकाना हक में बदलाव की अपुष्ट सूचना है. साधना न्यूज के मालिक अब तक दिनेश गुप्ता और मयंक गुप्ता हुआ करते थे. कहा जा रहा है कि अब इसके मालिक राकेश गुप्ता हो गए हैं जो पहले से ही साधना नामक धार्मिक चैनल संचालित कर रहे हैं. दिनेश गुप्ता और राकेश गुप्ता भाई भाई हैं. दिनेश गुप्ता के जिम्मे साधना न्यूज नामक रीजनल न्यूज चैनल हुआ करते थे तो राकेश गुप्ता साधना नामक धार्मिक चैनल चलाया करते थे. अब खबर आ रही है कि दिनेश गुप्ता ने साधना न्यूज को राकेश गुप्ता के हवाले कर दिया है.

उधर, जिया न्यूज के बारे में खबर मिल रही है कि इसे भी साधना वाले राकेश गुप्ता ने टेकओवर कर लिया है. कई तरह के लफड़ों, विवादों, बवालों से घिरे जिया न्यूज की हालत सुधरते न देख इसके मालिक रोहन जगदाले ने इसे बेचना का फैसला कर लिया. जिया न्यूज का अपना कोई लाइसेंस नहीं था. यह साधना वालों से लिए गए किराए के लाइसेंस पर संचालित होता था. यही कारण है कि साधना वालों ने ही इस चैनल यानि जिया न्यूज को खरीद लिया है.

एसएन विनोद एंड कंपनी के बारे में पता चला है कि ये लोग तीन तीन महीने की सेलरी पर अड़े हुए हैं. जिया न्यूज प्रबंधन ने इन्हें तीन महीने की सेलरी देने की बात सैद्धांतिक तौर पर मान लिया है. जिया न्यूज का आफिस फिलहाल बाउंसरों के हवाले हैं. एएनआई की फीड पर चैनल चल रहा है. कोई भी लाइव प्रोग्राम नहीं चल रहा. जेपी दीवान से लेकर नवीन कुमार तक चैनल से कार्यमुक्त हो चुके हैं या होने की प्रक्रिया में हैं. कहा जा सकता है कि जिया न्यूज का भी वही हश्र हुआ जो एक जमाने में वायस आफ इंडिया न्यूज चैनल का हुआ था.

अगर आपको भी न्यूज चैनलों या अखबारों के अंदरखाने चल रहे उठापटक के बारे में कोई जानकारी हो तो भड़ास तक इसे bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं. मेल भेजने वाले का नाम गोपनीय रखा जाएगा.

कोयला घोटाले में लिप्त प्रतिष्ठान के हेलीकॉप्टर से सोनिया गांधी कर रहीं चुनाव प्रचार

: सोनिया ने एनटीपीसी का हेलीकॉप्टर तो रीता ने हाईकोर्ट के वाहन का किया इस्तेमाल : घोटाले के उडऩखटोले पर उड़ते हुए रोकेंगे भ्रष्टाचार! : घोटाले के उडऩखटोले पर विचरण करते हुए सोनिया-राहुल और उनकी कांग्रेस पार्टी भ्रष्टाचार रोकेगी। चुनाव आचार संहिता का छोटा-मोटा उल्लंघन तो चलता रहता है। आरोप-प्रत्यारोप भी चलते रहते हैं। लेकिन यह खबर आचार संहिता के छोटे-मोटे उल्लंघन या आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा नहीं है। यह गम्भीर अपराध है, जिस पर चुनाव आयोग को ध्यान देना चाहिए। वैसे, इसकी कोई उम्मीद नहीं है, फिर भी भारतवासियों को उम्मीद करने और नाउम्मीद हो जाने की आदत है।

अब यह साबित हो रहा है कि कांग्रेसनीत सरकार में पिछले दस साल के दौरान जो महाघोटाले हुए उसकी बड़ी धनराशि को चुनाव पर खर्च होना था और घोटाले में जो नेता, नौकरशाह, विभाग, उद्योगपति और दलाल लिप्त थे, उन्हें चुनाव के दरम्यान कांग्रेस के लिए कंधा लगाना था। तभी कोयला घोटाले काएक प्रमुख अभियुक्त सरकारी उपक्रम एनटीपीसी कांग्रेस के प्रचार-प्रसार में जुटा पड़ा है। उसके हेलीकॉप्टर सोनिया गांधी के चुनाव प्रचार अभियान में जोर-शोर से लगे हुए हैं! चुनाव प्रचार में नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन (एनटीपीसी) के हेलीकॉप्टर का सोनिया गांधी द्वारा इस्तेमाल किए जाने की तस्वीर हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। विचित्र विडम्बना है कि कोयला घोटाले या अन्य प्रमुख घोटालों में लिप्त लोग और पूंजी प्रतिष्ठान भी चुनाव में कांग्रेस की मदद में सुविधाएं बिछा रहे हैं, जो उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल में लूटे।

एनटीपीसी, जिसका हेलीकॉप्टर कांग्रेस के चुनाव प्रचार में धूल-गर्द उड़ा रहा है, वह कोयला घोटाले का प्रमुख अभियुक्त है। यह ज्यादा दिन की बात भी नहीं है, लेकिन कांग्रेसियों की धृष्टता पर आश्चर्य है। अभी चार जनवरी को ही एनटीपीसी और उसकी सखा-संस्था एनएसपीसीएल के खिलाफ सीबीआई ने मुकदमा दर्ज किया है। कोल-ब्लॉक का आवंटन होने के बावजूद एनटीपीसी विदेशों से घटिया कोयला महंगे आयातित दर पर खरीद रहा था। सीबीआई ने एनटीपीसी के जिन दो आला अधिकारियों को मुख्य अभियुक्त बनाया है, वे दोनों सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के ऊंचाहार स्थित एनटीपीसी प्रतिष्ठान के शीर्ष अधिकारी हैं। इनमें से एक एके श्रीवास्तव ऊंचाहार प्रतिष्ठान के प्रमुख हैं और दूसरे उमाशंकर वर्मा उसी प्रतिष्ठान में डिप्टी मैनेजर हैं। ये अधिकारी इंदौर, कोलकाता और इंडोनेशिया की कम्पनियों के साथ आपराधिक साठगांठ करके घटिया कोयले का आयात कर रहे थे। सीबीआई ने दूसरा केस भी एनटीपीसी की सहायक संस्था एनटीपीसी सेल पावर कारपोरेशन लिमिटेड (एनएसपीसीएल) के शीर्ष अफसरों और कुछ कम्पनियों पर ठोका है। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से घटिया कोयला भी सोनिया के संसदीय क्षेत्र स्थित ऊंचाहार एनटीपीसी में ही गिर रहा था। मात्र दो साल की अवधि में इन लोगों ने मिल कर 116 करोड़ सात लाख 94 हजार 162 रुपए का घपला कर दिया।

यह तो सीधा घपला था जिस पर सीबीआई को सीधे एफआईआर दर्ज करानी पड़ी। कोयला घोटाले में जिंदल और टाटा जैसे तमाम पूंजीपति घरानों के साथ मिल कर भी एनटीपीसी ने जो गोरखधंधे फैलाए, उसकी जांच सीबीआई कर ही रही है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि घोटाले के दायरे में फंसे प्रतिष्ठान के हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल सोनिया गांधी क्यों कर रही हैं? कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ही नाम क्यों आया, सोनिया का क्यों नहीं? एनटीपीसी के हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन से अधिक गम्भीर है और यह बड़े घोटाले से जुड़े होने का सूत्र है। चुनाव आयोग की पहल पर इसके भीतरी परदे भी उठ सकते हैं। आयोग को इस उल्लंघन की सूचना दी जा चुकी है, लेकिन आयोग की कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एनटीपीसी के हेलीकॉप्टरों का चुनाव प्रचार में जो इस्तेमाल कर रही हैं उस पर चुनाव आयोग को जवाब-तलब करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी वजह से आम नागरिकों के बीच अब आम चर्चा होती है कि चुनाव आयोग को आचार संहिता के 'बड़े' उल्लंघन नहीं दिखते। एनटीपीसी से भी चुनाव आयोग यह नहीं पूछ रहा कि सरकारी उपक्रम होते हुए उसने अपने हेलीकॉप्टर राजनीतिक इस्तेमाल के लिए कैसे दे दिए? एनटीपीसी ने आदर्श चुनाव आचार संहिता का ध्यान रखते हुए इसके लिए क्या आयोग से इजाजत ली थी? या किसके आदेश से एनटीपीसी प्रबंधन ने अपने हेलीकॉप्टर कांग्रेस को चुनाव प्रचार के लिए दे दिए?

बहरहाल, केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत आने वाले 'डिपार्टमेंट ऑफ एडवर्टाइजिंग एंड विजुअल पब्लिसिटी' (डीएवीपी) द्वारा भी केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर धुआंधार खर्च किया गया। इस पर भी किसी ने आपत्ति नहीं उठाई। इन विज्ञापनों और प्रचार-प्रसार में सोनिया और राहुल गांधी कैसे शामिल हैं, जब इनके पास कोई सरकारी पद नहीं है? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इस पर चुनाव आयोग का ध्यान भी नहीं है। डीएवीपी से पूछा गया कि विज्ञापनों में सोनिया गांधी की फोटो लगाने का क्या कोई सरकारी आदेश है? विभाग ने कहा इसकी सूचना उपलब्ध नहीं है। कितना फूहड़ और गैर-जिम्मेदाराना जवाब है यह! आरटीआई कार्ययोद्धा महेंद्र अग्रवाल ने डीएवीपी से यह भी पूछा कि क्या सोनिया गांधी किसी सरकारी या संवैधानिक पद पर आसीन हैं? इस सवाल पर डीएवीपी ने कहा कि सोनिया गांधी यूपीए अध्यक्ष हैं और आदेश की प्रति विभाग में उपलब्ध नहीं है। प्रचार-प्रसार पर हुए अंधाधुंध खर्चे का विवरण देने से भी विभाग ने कन्नी काट ली। सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी और डीएवीपी के आला अधिकारियों को भी यह पता होगा कि यूपीए का अध्यक्ष कोई सरकारी या संवैधानिक पद नहीं है। लेकिन नियम-कानून और लोकतांत्रिक मर्यादा की बातें केवल मनीष तिवारी जैसे प्रवक्ताओं के 'बक-राज' (बकवास-राजनीति) के लिए रह गई हैं।

अंग्रेजी में बहुत बोला जाता है 'लास्ट बट नॉट द लीस्ट'… यानी आखिरी है, पर कम नहीं। तो लीजिए आज की इस खबर का आखिरी हिस्सा भी देखते चलिए जो अंतिम तो है, पर बहुत दमदार है। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी को कोयला घोटाले के अभियुक्तों का हेलीकॉप्टर इस्तेमाल करने में परहेज नहीं तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और लखनऊ संसदीय सीट की उम्मीदवार रीता बहुगुणा जोशी को हाईकोर्ट की अधिकृत गाड़ी का चुनाव प्रचार में इस्तेमाल करने में क्या और क्यों परहेज हो? रीता बहुगुणा जोशी ने हाईकोर्ट के वाहन को ही अपने प्रचार कार्य में झोंक दिया और हाईकोर्ट ने भी जोशी की खैरख्वाही में संवैधानिक मर्यादा का ध्यान नहीं रखा। केंद्र में सरकार कांग्रेस की तो सरकारी विभाग और न्यायालय सब उनके। चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की धृष्टता देखिए कि हाईकोर्ट की जिप्सी पर आगे बाकायदा 'हाईकोर्ट' लिखा है और उसी गाड़ी के पीछे कांग्रेस प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी के प्रचार के पोस्टर भी बाकायदा चस्पा हैं। भई, भारतीय लोकतंत्र की वाह बोलिए… सुन रहे हैं न वीएस सम्पत साहब और उमेश सिन्हा साहब!

लखनऊ से प्रकाशित वायस आफ मूवमेंट अखबार में प्रकाशित संपादक प्रभात रंजन दीन की खबर.

मीडिया कर्मियों को दिलाउंगा जीवन बीमा : मनोज तिवारी

नई दिल्ली : फिल्म एक्टर, भोजपुरी गायक और उत्तर पूर्वी दिल्ली से भाजपा प्रत्याशी मनोज तिवारी ने विशेष रूप से शनिवार शाम क्राइम रिपोर्टर्स एसोसिएशन से मुलाकात की। उन्होंने पत्रकारों से उनकी समस्याओं पर गहन चर्चा की। इसके बाद उन्होंने ऐलान किया कि वह क्राइम रिपोटरों का बीमा करवाने का प्रयास करेंगे। तिवारी ने कहा कि पत्रकार कई तरह की परेशानियों का सामना कर जनता तक खबरें पहुंचाते हैं। उनका जीवन हमेशा जोखिम भरा होता है।

पत्रकारों की जीवन सुरक्षा के लिए बीमा होना अति आवश्यक  है। तिवारी ने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं और इसकी रक्षा करना देश के सभी नागरिकों का कर्तव्य होना चाहिए। इसलिए अगर में चुनाव जीतता हूं तो संसद में जाकर इस मुद्दे को गंभीरता से उठाऊंगा। तिवारी ने कहा कि मुझे जब से प्रत्याशी बनाया गया है तब से मैं उत्तर पूर्वी दिल्ली में घूम रहा हूं। इस क्षेत्र में बहुत सारी समस्याएं है। ट्रैफिक बदहाल है। अस्पतालों की स्थिति बद से बदतर है। क्षेत्र में अनेकों कॉलोनियों में पानी की पाईप लाइन तक नहीं। क्षेत्र की कॉलोनियों से विकास तो कोसों दूर है। असुविधाओं में जीते-जीते लोग भूल गए हैं कि सुविधाएं क्या होती हैं। बच्चों के लिए पार्क नहीं हैं, खेल-कूद के लिए कोई बड़ा स्टेडियम नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में भी नॉर्थ-ईस्ट सबसे पिछड़ा हुआ है। मनोज तिवारी ने सभी क्राइम रिपोर्टर्स से कहा कि वह उनसे कभी भी मुलाकात कर सकते हैं, वह हमेशा उनके लिए उपस्थित रहेंगे।
 

तीन दलित राम बने भाजपा के हनुमान : आनंद तेलतुंबड़े

बाबासाहेब आंबेडकर का झंडा ढोने का दावा करने वाले तीन दलित रामों ने – रामदास आठवले, राम विलास पासवान और राम राज (हालांकि उन्होंने कुछ साल पहले अपना नाम बदल कर उदित राज कर लिया था), सत्ता के टुकड़ों की आस में पूरी बेशर्मी से रेंगते हुए अपनी ठेलागाड़ी को भाजपा के रथ के साथ जोत दिया है. इनमें से पासवान 1996 से 2009 तक अनेक प्रधानमंत्रियों – अटल बिहारी बाजपेयी, एचडी देवेगौड़ा, आईके गुजराल और मनमोहन सिंह – के नेतृत्व में बनने वाली हरेक सरकार में केंद्रीय मंत्री (रेलवे, संचार, सूचना तकनीक, खनन, इस्पाद, रसायन एवं उर्वरक) रहे और उन्होंने खुद को एक घाघ खिलाड़ी साबित किया है.

उनको छोड़ कर बाकी के दोनों राम हाल हाल तक भाजपा के सांप्रदायिक चरित्र के खिलाफ गला फाड़ कर चिल्लाते रहे थे. आठवले की रीढ़विहीनता तब उजागर हुई जब केंद्र में मंत्री बनने की उनकी बेहिसाब हसरत पूरी नहीं हुई और 2009 के लोकसभा चुनावों में वे हार गए. उन्होंने कांग्रेस के अपने सरपरस्तों पर अपने ‘अपमान’ का इल्जाम लगाना शुरू किया, जिन्होंने उन्हें सिद्धार्थ विहार के गंदे से कमरे से उठा कर महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री के रूप में सह्याद्रि के एयरकंडीशंड सूइट में बिठाया था. लेकिन कम से कम डॉ. उदित राज (हां, उन्होंने प्रतिष्ठित बाइबल कॉलेज एंड सेमिनरी, कोटा, राजस्थान से डॉक्टरेट किया था!)  ने जिस तरह से अपने भाजपा-विरोधी तर्कसंगत रुख से कलाबाजी खाई है, वह हैरान कर देने वाला है.

एक मायने में, भारतीय लोकतंत्र के पतन को देखते हुए, दलित नेतृत्व की ऐसी मौकापरस्त कलाबाजियां किसी को हैरान नहीं करती हैं. आखिरकार हर कोई ऐसा ही कर रहा है. तब अगर दलित नेता ऐसा करते हैं तो इसकी शिकायत क्यों की जाए? आखिरकार, उनमें से अनेक अब तक कांग्रेस में रहते आए हैं, तो अब वे भाजपा में जा रहे हैं तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? हो सकता है कि भाजपा और कांग्रेस में बहुत थोड़ा ही फर्क हो, लेकिन असल में चिंतित होने की वजहें उनके पेशों और उनके बारे में जनता की अवधारणा में निहित हैं. कांग्रेस के उलट, भाजपा एक विचारधारा पर चलने वाली पार्टी है. इसका विचारधारात्मक आधार हिंदुत्व है, जिसमें शब्दों की कोई लफ्फाजी नहीं है, यह फासीवाद की विचारधारा है जिसे साफ तौर से आंबेडकर की विरोधी विचारधारा के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि उपयोगिता भाजपा से भारत के संविधान के प्रति वफादारी की मांग करती है या फिर आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों को लुभाने की मांग करती है, लेकिन उनका विचारधारात्मक रवैया उन सबके खिलाफ है. इसलिए दलित नेताओं को आंबेडकर का जयगान गाते हुए उनके साथ गद्दारी करने की इस घटिया हरकत को देखकर गहरा दुख होता है.
आंबेडकर की विरासत

हालांकि आंबेडकर ने हिंदू धर्म में सुधारों के विचार के साथ शुरुआत की थी जिसका आधार उनका यह खयाल था कि जातियां, बंद वर्गों की व्यवस्था हैं [कास्ट्स इन इंडिया]. यह घेरेबंदी बहिर्विवाह और अंतर्विवाह के व्यवस्था के जरिए कायम रखी जाती है। व्यवहार में इसका मतलब यह था कि अगर अंतर्विवाहों के जरिए इस व्यवस्था से मुक्ति पा ली गई तो इस घेरेबंदी में दरार पड़ जाएगी और जातियां वर्ग बन जाएंगी। इसलिए उनकी शुरुआती रणनीति यह बनी थी कि दलितों के संदर्भ में हिंदू समाज की बुराइयों को इस तरह उजागर किया जाए कि हिंदुओं के भीतर के प्रगतिशील तत्व सुधारों के लिए आगे आएं। महाड में उन्होंने ठीक यही कोशिश की है। हालांकि महाड में हुए कड़वे अनुभव से उन्होंने नतीजा निकाला कि हिंदू समाज में सुधार मुमकिन नहीं, क्योंकि इनकी जड़ें हिंदू धर्मशास्त्रों में गड़ी हुई थीं। तब उन्होंने सोचा कि इन धर्मशास्त्रों के पुर्जे उड़ाए बगैर जातियों का खात्मा नहीं होगा [एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट]। आखिर में, अपनी मृत्यु से कुछ ही पहले उन्होंने वह तरीका अपनाया जो उनके विचारों के मुताबिक जातियों के खात्मे का तरीका था: उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। इतना वक्त बीत जाने के बाद, आज इस बात में कोई भी उनके विश्लेषण के तरीके की कमियों को आसानी से निकाल सकता है। लेकिन जातियों का खात्मा आंबेडकर की विरासत के केंद्र में बना रहा। इस दौरान उन्होंने जो कुछ भी किया वह दलितों को सशक्त करने के लिए किया ताकि वे उस जाति व्यवस्था के खात्मे के लिए संघर्ष कर सकें, जो उनकी निगाह में ‘स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे’ को साकार करने की राह में सबसे बड़ी रुकावट थी। चूंकि मार्क्सवादियों के उलट वे यह नहीं मानते थे कि इतिहास किसी तर्क के आधार पर विकसित होता है, कि इसकी गति को कोई नियम नियंत्रित करता है, इसलिए उन्होंने वह पद्धति अपनाई जिसे व्यवहारवाद कहा जाता है। इसमें उनपर कोलंबिया में उनके अध्यापक जॉन डिवी का असर था।

व्यवहारवाद एक ऐसा नजरिया है जो सिद्धांतों या विश्वासों का मूल्यांकन, व्यावहारिक रूप से उन्हें लागू करने में मिली कामयाबी के आधार पर करता है। यह किसी विचारधारात्मक नजरिए को नकारता है और सार्थकता, सच्चाई या मूल्य के निर्धारण में बुनियादी कसौटी के रूप में व्यावहारिक नतीजों पर जोर देता है. इसलिए यह मकसद की ईमानदारी और उसको अमल में लाने वाले के नैतिक आधार पर टिका होता है। आंबेडकर का संघर्ष इसकी मिसाल है। अगर इस आधार से समझौता कर लिया गया तो व्यवहारवाद का इस्तेमाल दुनिया में किसी भी चीज़ को जायज ठहराने के लिए किया जा सकता है। और आंबेडकर के बाद के आंदोलन में ठीक यही हुआ। दलित नेता ‘आंबेडकरवाद’ या दलित हितों को आगे ले जाने के नाम पर अपना मतलब साधने में लगे रहे। भारत की राजनीति का ताना-बाना कुछ इस तरह का है कि एक बार अगर आप पैसा पा जाएं तो आप अपने साथ जनता का समर्थन होने का तमाशा खड़ा कर सकते हैं। एक बार यह घटिया सिलसिला शुरू हो जाए तो फिर इसमें से बाहर आना मुमकिन नहीं। इसी प्रक्रिया की बदौलत एक बारहवीं पास आठवले करोड़ों रुपए की संपत्ति जुटा सकता है, और उस आंबेडकर की विरासत का दावा कर सकता है जो बेमिसाल विद्वत्ता और दलितों-वंचितों के हितों के प्रति सर्वोच्च प्रतिबद्धता के प्रतीक हैं। करीब करीब यही बात दूसरे रामों और उनके जैसे राजनीतिक धंधेबाजों के बारे में भी कही जा सकती है। उनका सारा धंधा आंबेडकर और दलित हितों की तरक्की के नाम पर चलता है।
दलित हित क्या हैं?

अपने निजी मतलब को पूरा के लिए बेकरार ये सभी दलित हितों की पुकार मचाते हैं. दलित नेताओं में यह प्रवृत्ति तब भी थी जब आंबेडकर अभी मौजूद ही थे. तभी उन्होंने कांग्रेस को जलता हुआ घर बताते हुए उसमें शामिल होने के खिलाफ चेताया था. जब कांग्रेस ने महाराष्ट्र में यशवंत राव चह्वाण के जरिए दलित नेतृत्व को हथियाने का जाल फैलाया तो आंबेडकरी नेता उसमें जान-बूझ कर फंसते चले गए. बहाना यह था कि इससे वे दलित हितों की बेहतर सेवा कर पाएंगे. उन्होंने जनता को यह कहते हुए भी भरमाया कि आंबेडकर ने नेहरू सरकार में शामिल होकर कांग्रेस के साथ सहयोग किया था. भाजपा उस हजार चेहरों वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक धड़ा है, जो हिंदुत्व पर आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पैरोकारी करता है. उसने संस्कृति और धर्म का यह अजीब घालमेल जनता को भरमाने के लिए किया है. यह भाजपा अंबडकरियों के लिए सिर्फ एक अभिशाप ही हो सकती है. असल में अनेक वर्षों तक यह रही भी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. आरएसएस ने समरसता (समानता नहीं बल्कि सामाजिक सामंजस्य) का जाल दलित मछलियों को फंसाने के लिए फेंका और इसके बाद अपनी सख्त विचारधारा में थोड़ी ढील दी. दिलचस्प है कि दलित हितों के पैरोकार नेता, शासक वर्ग (और ऊंची जातियों) की इन पार्टियों को तो अपने ठिकाने के रूप में पाते हैं लेकिन वे कभी वामपंथी दलों पर विचार नहीं करते हैं, जो अपनी अनगिनत गलतियों के बावजूद उनके स्वाभाविक सहयोगी थे. इसकी वजह सिर्फ यह है कि वामपंथी दल उन्हें वह सब नहीं दे सके, जो भाजपा ने उन्हें दिया है.

तो फिर दलित हितों का वह कौन सा हौवा है, जिसके नाम पर ये लोग यह सारी करतब करते हैं? क्या वे यह जानते हैं कि 90 फीसदी दलितों की जिंदगी कैसी है? कि भूमिहीन मजदूरों, छोटे-हाशिए के किसानों, गांवों में कारीगरों और शहरों में झुग्गियों में रहने वाले ठेका मजदूरों और शहरी अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक सेक्टर में छोटे मोटे फेरीवाले की जिंदगी जीने वाले दलित किन संकटों का सामना करते हैं? यहां तक कि आंबेडकर ने भी अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त में यह महसूस किया था और इस पर अफसोस जताया था कि वे उनके लिए कुछ नहीं कर सके. आंशिक भूमि सुधारों के पीछे की पूंजीवादी साजिशों और हरित क्रांति ने गांवों में पूंजीवादी संबंधों की पैठ बना दी, जिसमें दलितों के लिए सुरक्षा के कोई उपाय नहीं थे. इन कदमों का दलित जनता पर विनाशकारी असर पड़ा, जिनके तहत अंतर्निर्भरता की जजमानी परंपरा को नष्ट कर दिया गया. देहातों में पहले से कायम ऊंची जातियों के जमींदारों को बेदखल करके उनकी जगह लेने वाले, सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी शूद्र जातियों के धनी किसानों द्वारा क्रूर उत्पीड़न के लिए दलितों को बेसहारा छोड़ दिया. ब्राह्मणवाद का परचम अब उन्होंने अपने हाथों में ले लिया था. बीच के दशकों में आरक्षण ने उम्मीदें पैदा कीं, लेकिन वे जल्दी ही मुरझा गईं. जब तक दलितों को इसका अहसास होता कि उनके शहरी लाभान्वितों ने आरक्षणों पर एक तरह से कब्जा कर रखा है, कि नवउदारवाद का हमला हुआ जिसने आरक्षणों को पूरी तरह खत्म ही कर दिया. हमारे राम इन सब कड़वी सच्चाइयों से बेपरवाह बने रहे और बल्कि उनमें से एक, उदित राज, ने तो आरक्षण के एक सूत्री एजेंडे के साथ एक अखिल भारतीय संगठन तब शुरू किया, जब वे वास्तव में खत्म हो चुके थे. जनता को आरक्षण के पीछे छिपी शासक वर्ग की साजिश को दिखाने के बजाए, वे शासक वर्ग की सेवा में इस झूठे आसरे को पालते-पोसते रहने को तरजीह देते हैं. क्या उन्हें यह नहीं पता कि 90 फीसदी दलितों की जरूरतें क्या हैं? उन्हें जमीन चाहिए, सार्थक काम चाहिए, मुफ्त और उचित और बेहतर शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य की देखरेख चाहिए, उनकी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी ढांचे चाहिए और जाति विरोधी सांस्कृतिक व्यवस्था चाहिए. ये हैं दलितों के हित, और अफसोस इस बात है कि किसी दलित राम द्वारा उनकी दिशा में बढ़ना तक तो दूर, उनको जुबान तक पर नहीं लाया गया है.
भाजपाई राम के हनुमान

यह बात एक सच्चाई बनी हुई है कि ये राम दलित हितों के नाम पर सिर्फ अपना फायदा ही देखते हैं. उदित राज इनमें से सबसे ज्यादा जानकार हैं, अभी कल तक संघ परिवार और भाजपा के खिलाफ हर तरह की आलोचनाएं करते आए हैं जो अगर कोई देखना चाहे तो उनकी किताब ‘दलित्स एंड रिलिजियस फ्रीडम’ में यह आलोचना भरी पड़ी है. उन्होंने मायावती को बेदखल करने के लिए सारी तरकीबें आजमा लीं और नाकाम रहने के बाद अब वे उस भाजपा की छांव में चले गए हैं, जो खुद उनके ही शब्दों में दलितों का सबसे बड़ा दुश्मन है. दलितों के बीच उनकी जो कुछ भी थोड़ी बहुत साख थी, उसका फायदा भाजपा को दिलाने के लिए वे हनुमान की भूमिका अदा कर रहे हैं. दूसरे दोनों राम, पासवान और आठवले ने उदित राज के उलट भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होने का फैसला किया है. वे दलितों में अपने छोटे-मोटे आधारों के बूते बेहतर सौदे पाने की कोशिश कर रहे हैं: पासवान को सात सीटें मिली हैं, जिनमें से तीन उनके अपने ही परिवार वालों को दी गई हैं, और आठवले को उनकी राज्य सभा सीट के अलावा एक सीट दी गई है. बीते हुए कल के कागजी बाघ आठवले नामदेव ढसाल के नक्शे-कदम पर चल रहे हैं, जो बाल ठाकरे की गोद में जा गिरे थे. उस बाल ठाकरे की गोद में, जो आंबेडकर और आंबडेकरी दलितों से बेहद नफरत करता था. ये काबिल लोग अपने पुराने सहयोगियों द्वारा ‘दलितों के अपमान’ (अपने नहीं) को भाजपा के साथ हाथ मिलाने की वजह बताते हैं. आठवले का अपमान तब शुरू हुआ जब उन्हें मंत्री पद नहीं मिला. उन्हें तब शर्मिंदगी नहीं महसूस हुई जब उन्होंने दलितों द्वारा मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम आंबेडकर के नाम पर रखने के लिए दी गई भारी कुर्बानी को नजरअंदाज कर दिया और विश्वविद्यालय के नाम को विस्तार दिए जाने को चुपचाप स्वीकार कर लिया था. और न ही उन्हें तब शर्मिंदगी महसूस हुई जब उन्होंने दलित उत्पीड़न के अपराधियों के खिलाफ दायर मुकदमों को आनन-फानन में वापस ले लिया. ये तो महज कुछ उदारण हैं, पासवान और आठवले का पूरा कैरियर दलित हितों के साथ ऐसी ही गद्दारी से भरा हुआ है.

अब वे भाजपा के राम की सेवा करने वाले हनुमान की भूमिका निभाएंगे. लेकिन यह मौका है कि दलित उनके मुखौटों को नोच डालें और देख लें कि उनकी असली सूरत क्या है: एक घटिया बंदर!

लेखक आनंद तेलतुंबड़े के उपरोक्त लेख का हिंदी अनुवाद किया है ब्लागर और एक्टिविस्ट रेयाज उल हक ने. हाशिया ब्लाग से साभार.

धन्य हैं मोदी जी आप… सुभाष चंद्रा जी आप भी…

Sanjaya Kumar Singh : आज ज़ी न्यूज पर मोदी की रैली लाइव देख-सुन रहा था और इस बारे में पहले लिख चुका हूं, “भाषण बहुत ही घटिया और स्तरहीन था। ऊबाऊ ऊपर से। दोहराव इतना ज्यादा कि क्या कहने।” ज़ी न्यूज पर मोदी की खास बातें हाईलाइट की जा रही थीं, एक समय मुझे लगा नवीन जिन्दल के चुनाव क्षेत्र की रैली मैं ज़ी न्यूज पर क्यों सुन रहा हूं।

फिर ध्यान आया कि लाइव में चैनल क्या कर सकता है – और मैंने चैनल नहीं बदला। अब पता चल रहा है कि मोदी के प्रेरणास्रोत वहीं थे मंच पर। धन्य हैं मोदी जी आप, सुभाष चंद्रा जी आप भी। एक अदद टिकट ले ही लेते। जिन्दल से लड़ाई में लेवल प्लेइंग फील्ड तभी होगा जब आप सांसद बन जाएंगे। टिकट लेना चाहें तो उन्हें कौन रोक सकता है। मीडिया और राजनीति का घालमेल अच्छा नहीं होता है, पर अपने यहां जमाने से चला आ रहा है। ऐसे में नैतिकता आदि की बात करना आजकल वैसे ही फिजूल है।

मेरी चिन्ता तो मालिकानों की इस सक्रियता के बीच नौकरी करने वालों की आजादी और नैतिकता को लेकर रहती है। हमलोग बात उसी पर ज्यादा करते हैं, मालिकान तमाम कारणों से बच जाते हैं या कहिए छोड़ दिए जाते हैं। पत्रकारों और मीडिया संस्थान चलाने वालों के लिए राज्य सभा का टिकट तो वैसे भी भारी या बड़ी रिश्वत है।

प्रभाष जोशी सत्ता विरोधी अखबार में थे, राम नाथ गोयनका सत्ता विरोधी थे ही। आज की स्थिति में वो भाजपा समर्थक ही माने जाते। पर उन दिनों जब वे अपनी पूरी आजादी का उपयोग करते, भाजपा के खिलाफ लिखते या बाकायदा मोर्चा खोलते तो यह अफवाह फैल जाती या फैला दी जाती थी कि प्रभाष जी राज्य सभा में जाना चाहते हैं। एक दफा तो यह हवा भी उड़ी थी कि भाजपा ने शीर्ष स्तर पर अपने मुख्यमंत्रियों से पूछा था कि प्रभाष जी का कोई काम नहीं होने से वो नाराज हैं क्या। यानी पत्रकार है तो इधर या उधर ही रहेगा।

प्रभाष जी अब नहीं रहे तो हम कह सकते हैं कि उन्हें जाना ही नहीं था या वे नहीं गए। वरना लार टपकाने वाले तो बहुत हैं। और हरिवंश जी अपने तमाम आदर्शों को लेकर भी राज्यसभा में गए ही। लोकसभा चुनाव लड़कर जीतने और जनादेश लेने के बारे में प्रभाष जी कहते ही थे कि हम रोज जनादेश लेते हैं तभी बिकते और पढ़े जाते हैं। इसलिए, लोकसभा में जाने को मैं बुरा नहीं मानता भले ही वहां पांच साल में एक ही बार जनादेश लेना होता है। टिकट तो झुकाव या पसंद बताता है, जो ठीक भी है।

उपरोक्त स्टेटस वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने अपने फेसबुक वॉल पर 2 अप्रैल को अपडेट किया. भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

मनु पंवार एबीपी न्यूज से इंडिया टीवी पहुंचे, प्रमोद और मृदुल नई हिंदी मैग्जीन से जुड़े

एबीपी न्यूज से इस्तीफा देकर मनु पंवार इंडिया टीवी पहुंच गए हैं. मनु पंवार व्यंग्य लेखन में भी माहिर हैं. वे इन दिनों इंडिया टीवी में दिलचस्प प्रोग्राम 'वोट यात्रा' के प्रोड्यूसर हैं. इस शो को बॉलीवुड के कॉमेडियन हेमंत पांडे एंकर कर रहे हैं. शो का आइडिया इंडिया टीवी के एडिटोरियल डायरेक्टर कमर वहीद नकवी (जो पहले आज तक के बॉस थे) का है. वोट यात्रा के 15 से ज्यादा एपीसोड प्रसारित होने हैं जोकि देश के अलग-अलग इलाकों में शूट हुए हैं. आधे घंटे का ये शो इंडिया टीवी पर प्राइम टाइम में शाम 8.30 बजे आता है. इसे अगले दिन सुबह 11.30 बजे रिपीट भी किया जा रहा है.

बिहार से हिन्दी मासिक पत्रिका टाइम टु टाइम की लांचिंग की तैयारी हो रही है. इस पत्रिका का संपादक प्रमोद कुमार सिंह और ब्यूरो प्रमुख मृदुल मयंक को बनाया गया है. मृदुल मयंक इसके पहले फेम इंडिया मासिक पत्रिका के विशेष संवाददाता थे.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अजय दयाल हिंदी पायनियर से इस्तीफा देने के बाद ‘इंडिया इमोशंस डाट कॉम’ के संपादक बने

आदरणीय, यशवंत भाईसाहेब, प्रणाम! मैंने साढ़े तीन बरसों की नौकरी के बाद पिछले दिनों हिन्दी पॉयनियर से त्यागपत्र दे दिया है। बरसों बाद कुछ छोड़ देने से दिल व्यथित है लेकिन कुछ नया करने को लेकर मन पुलकित भी हो रहा है। व्यथित इसलिए हूं कि प्रिंट मीडिया की निरंतर 19 बरसों की नौकरी के बाद अब मैं इससे मुक्त हो रहा हूं। …और पुलकित इसलिए कि 'इंडिया इमोशंस डाट कॉम' के संपादक के रूप में मैं वेब-जर्नलिज़म की एक नई दुनिया में प्रवेश कर रहा हूं।

दिलो-दिमाग में उमड़-घुमड़ रहा विचारों का संगम मुझे एक नई मंजिल की ओर धकेल रहा है। इन बरसों में मैंने विभिन्न समाचार-पत्रों में अलग-अलग भूमिकाओं का निष्ठा एवं इमानदारी से निर्वहन किया। कभी रिपोर्टिग तो कभी डेस्क और कभी इन दोनों क्षेत्रों में बतौर प्रभारी कार्य करते हुये मैंने पत्रकारिता को जिया हरपल और आत्मसात किया। मैंने हर संभव कोशिश की कि मेरी कलम से कुछ भी नापाक, तनिक भी अन्याय न होने पाये।

वैसे तो मेरा जन्मस्थान इलाहाबाद है लेकिन वाराणसी में पिताजी की पोस्टिंग के दौरान हाईस्कूल करते हुये अखबारों में लेटर्स-टू-एडिटर लिखकर मैंने अखबारों से जो दिल लगाया तो बाद में इसके भीतर मैं समाता ही चला गया। दैनिक जागरण लखनऊ में बतौर प्रशिक्षु करियर शुरू करने के उपरान्त हिंदुस्तान, स्वतंत्र भारत, जनसत्ता एक्सप्रेस और पॉयनियर जैसे पड़ावों पर चलते-ठहरते मैं खट्टे-मीठे अनुभवों का लुत्फ उठाता आगे बढ़ता रहा। मैं उन सभी वरिष्ठों, सहयोगियों, मित्रों का तहे दिल से शुक्रगुजार हूं जो मेरा आज भी निरन्तर साथ दे रहे हैं। आप की ही वजह से मुझे कभी पीछे पलटकर देखने की जरूरत महसूस नहीं हुई।

मुझे पूरा विश्वास है कि हम ऐसे ही मिलकर तरक्की के पथ आगे बढ़ते रहेंगे, पहले की तरह एक दूसरे का साथ निभाते रहेंगे क्योंकि मैंने न रास्ता छोड़ा है, न सफर, न साथी बस माध्यम बदल लिया है जिसका नाम है 'इंडिया इमोशंस डाट कॉम'। ये न्यूज वेबसाइट दुनियाभर के तमाम देशों में निवासरत हिंदुस्तानियों को भावुकता की एक डोर में पिरोने के लिए सक्रिय 'इंडिया इमोंशंस फाउंडेशन' की एक पहल है।

यशवंत भाई मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि अपने मुझे पत्रकारिता की इस दिशा में आने से पहले कुछ मूलमंत्र दिये।

धन्यवाद

अपका छोटा भाई

अजय दयाल

ajay.s.dayal@gmail.com

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यूपी का एक मंत्री दलाल टाइप पत्रकारों की मान्यता कराता है

उत्तर प्रदेश का एक मंत्री दलाल टाईप पत्रकारों की मान्यता भी करवाता है। चूंकि चुनाव सिर पर है, ऐसे में इस मंत्री की तूती बोलती है प्रदेश में। चुनाव बाद सबको पता है कि वह भगा दिया जाएगा। इसी वजह से यह मंत्री पत्रकारों के साथ अपने व्यवहार खराब नहीं करना चाहता। यही वजह है कि इस मंत्री ने सूचना विभाग में फोन कर कई लोगो को मान्यताएं दिलवाई हैं।

इस मंत्री के फोन घनघनाते ही सूचना विभाग में हड़कम्प मच गया। आनन-फानन में विभाग के कर्मचारियों ने बिना कागजात पूरे हुए भी मान्यता देने में ही भलाई समझी जबकि जिन लोगों को मान्यता दी गयी उनका प्रमाण भी लखनऊ का नहीं है। लेकिन मंत्री के रसूख के आगे सब बेबस नज़य आये। सूचना के अधिकारियों द्वारा बताई गई गुपचुप बातचीत के आधार पर यह बाते सामने आयी है।  इतना ही नहीं इस मंत्री से अब मकान भी एलाट कराने की होड़ मची हुई है। अब मकान के खेल में भी मंत्री राज्य संपत्ति विभाग को फोन घनघनाने वाला ही था कि आम चुनाव की आचार संहिता का हवाला देते हुए मंत्री ने दलाल टाईप पत्रकारों से पल्ला छुड़ाया। अब असल खेल चुनाव बाद देखा जाएगा। (कानाफूसी)

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

Mr.Roy, let me tell you what the country gave you…

"This is the best award the country has given me" said Subrata Roy. I am surprised, Mr.Roy, that you have a grouse against India. Let me tell you what the country gave you:

– This country enabled you to grow from a net worth of Rs.2,000 to Rs.15,80,00,00,00,000.

– This country's judicial system enabled you to be a contemnor for 15 months, of no less than the apex court, with no action taken.

– This country's administration allowed you to be a state guest and travel by Mercedes, after being arrested.

– This country allowed you to raise deposits from 8 crore investors, without any checks and balances.

– This country allowed you to employ 12 lac workers without any corresponding provident fund deposits.

– This country enabled you to harass an Enforcement Directorate officer investigating you.

– This country enabled you to continue your partying ways, while the senior citizens who paid up to buy one of the Sahara City Homes in 100 cities are waiting for their homes.

– This country enabled you to deride and question the supreme court judgements through your full page newspaper ads.

– This country enabled you to deride the most honest officer, Mr.Abrahim of SEBI who built a watertight case against you.

– This country enabled you to survive, grow and prosper for 37 long years, whereas your entity should have been dead long back.

Mr. Roy, You are a beneficiary of this system, a creation of this system, a billionaire because of this system. You have exploited my countrymen and have only taken from this country. What you gave back is peanuts – a few Bollywood movies and a cricket team that would have survived without you. Please stop cribbing, because this country is what made you. In any other country, you would be still be on your lambretta scooter, mobilising deposits or cooling your heels as a state guest, long back.

sahara ka sach

saharakasach@gmail.com

भोला पांडेय, उमा शंकर चौरसिया और संदीप वर्मा के बारे में सूचनाएं

हिंदुस्तान पलवल से खबर है कि यहां नियुक्त ब्यूरो प्रमुख भोला पांडेय ने फरीदाबाद में अमर उजाला ज्वाइन कर लिया है. पलवल में अब हिंदुस्तान अखबार में विनोद शर्मा रह गए हैं. 

उमा शंकर चौरसिया ने समाचार प्लस चैनल यूपी-उत्तराखंड में आउटपुट डेस्क पर बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर ज्वाइन किया है. वे एक साल तक सुदर्शन न्यूज में आउटपुट डेस्क पर कार्यरत रहे.

मुजफ्फरपुर में कशिश न्यूज़ स्ट्रिंगर संदीप वर्मा को चैनल से कार्यमुक्त कर दिया गया है. संदीप वर्मा पर कई तरह के आरोप थे.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

मोदी की रैली में बीबीसी की दो महिला पत्रकार भीड़ में घिरीं

अलीगढ़ में नरेन्द्र मोदी की चुनावी जनसभा को कवर करने पहुंची बीबीसी न्यूज की यूनिट पर जान की बन आई। जनसभा में जैसे ही नरेन्द्र मोदी मंच पर संबोधन के लिये पहुंचे, बीबीसी न्यूज की दो महिला पत्रकार भीड़ में घिर गयी। हजारों की भीड़ में घिरी पत्रकार पर मोदी की नजर पड़ी तो एक महिला रिपोर्टर को सुरक्षा घेरा डी के अन्दर कर लिया लेकिन दूसरी सहयोगी महिला पत्रकार भीड़ में गुम हो गयी।

मोदी का भाषण खत्म हो गया लेकिन रिपोर्टर नहीं मिली। घंटों पुलिस ने भी पत्रकार को तलाशा लेकिन कामयाबी नही मिली। आखिरकार बीबीसी की पत्रकार मंच पर पहुंच गयी। मंच से भाजपाईयों को महिला पत्रकार को सकुशल मंच तक पहुंचाने की अपील करनी पड़ी। काफी देर बाद पत्रकार को मंच तक लाया गया तब जाकर बीबीसी यूनिट ने राहत की सांस ली।


 

कर्मचारियों का हक मारना चाहते हैं अखबार मालिक

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरूप वेतन और एरियर देने का वक्त जैसे-जैसे करीब आता जा रहा है, प्रिंट मीडिया के मालिकान इससे बचने की तरकीब बैठाने में बेहद खामोशी से जुट गए हैं। मजीठिया मंच को ऐसी जानकारी मिली है कि कई अखबार मालिक खासकर जागरण समूह ऐसे समय पर पुनर्विचार याचिका (रिव्‍यू पिटिशन) दाखिल करने वाले हैं, जब सुनवाई लटक सकती है और तब तक मुख्‍य न्‍यायाधीश और सरकार बदल जाएंगे।

मालिकों को यकीन है कि तब नई परिस्थितियों में वे अपनी मनमानी करने का कोई न कोई रास्‍ता भी जरूर निकाल लेंगे, लेकिन मजीठिया मंच ऐसा हरगिज नहीं होने देगा। मंच ने अगली लड़ाई के लिए कमर कस ली है। इसके लिए मंच ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सत्‍यापित कॉपी प्राप्‍त कर ली है। साथ ही विधि विशेषज्ञों से विचार-विमर्श कर लिया गया है। अब मंच की ओर से वरिष्‍ठ वकीलों के जरिये सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने में कोई देर नहीं की जाएगी।

मजीठिया मंच से जुड़ने वाले सभी पत्रकार, गैरपत्रकार और प्रिंट मीडिया कर्मचारी व पूर्वकर्मचारी साथियों को मंच ने बधाई दी है और कहा है कि जिस उत्‍साह से लोगों ने एकजुटता दिखाई है, उससे अब यह लगने लगा है कि सभी लोग मालिकों की कर्मचारी विरोधी नीतियों का मुहतोड़ जवाब देने के लिए तन, मन और धन से तैयार हैं। यह एक उत्‍साहवर्धक जानकारी है कि अन्य कारोबारों में उतर चुके कई पूर्व पत्रकारों ने अपनी ओर से मजीठिया मंच को आर्थिक सहयोग देने की पेशकश की है।

इतना ही नहीं, अपने कथित संपादकों और प्रबंधन के दबाव के बावजूद फेसबुक पर कुछ ही दिनों में देश के विभिन्‍न भागों से लगभग 500 पत्रकार और गैर-पत्रकार मजीठिया मंच से जुड़ चुके हैं। मंच ने लोगों की इस एकजुटता और बड़ी संख्या में मिल रहे अनुरोधों के मद्देनजर दैनिक जागरण के अलावा अन्‍य समाचार पत्रों के मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों के लिए भी दरवाजा खोल दिया है। अब किसी भी अखबार का पत्रकार अथवा गैर पत्रकार कर्मचारी फेसबुक के माध्‍यम से मजीठिया मंच से जुड़ सकता है और अपने संस्‍थान में शोषण और उत्‍पीड़न की जानकारी शेयर कर सकता है।
मंच से जुड़ने के लिए majithia.manch@rediffmail.com ईमेल करें या मोबाइल नंबर +91-9810159532 पर कॉल करें। हमसे फेसबुक https://www.facebook.com/majithia.manch पर जुड़ें। हमारा ट्विटर आइडी है:- @majithiamanch
 

बारह मई तक ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल और चुनावी सर्वेक्षण पर रोक

चुनाव आयोग ने सभी मीडिया हाउसों को निर्देश दिया गया है कि वे 7 अप्रैल से 12 मई तक न तो एक्जिट पोल, न ही ओपिनियन पोल और न ही किसी भी तरह के चुनावी सर्वेक्षण का प्रकाशन कर सकेंगे. इस बाबत सभी जिलों के रिटर्निंग अधिकारियों को निर्देश भेज दिया गया है. गुड़गांव से खबर है कि जिले की सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी भी कोई सर्वेक्षण नहीं करा पाएंगे. इस संबंध में गुड़गांव लोकसभा क्षेत्र के रिटर्निंग अधिकारी व डीसी शेखर विद्यार्थी ने आदेश जारी किए हैं, जो उन्हें भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से मिले थे.

उन्होंने सभी मीडिया हाउसेज, प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और रेडियो एफएम के प्रतिनिधियों से अपील की है कि वे 7 अप्रैल को सुबह 7 बजे से 12 मई को शाम 6:30 बजे तक किसी भी तरह के एग्जिट पोल, ओपिनियन पोल या अन्य किसी तरीके से चुनावी सर्वेक्षण का प्रकाशन न करें. उन्होंने लोकसभा चुनाव में खड़े उम्मीदवारों से अपील की है कि वे चुनाव प्रचार के लिए इस अवधि के दौरान किसी भी तरह का चुनावी सर्वेक्षण न कराएं, क्योंकि लोकसभा चुनाव-2014 के आम चुनावों के चलते भारत निर्वाचन आयोग ने इन सभी पर प्रतिबंध लगा दिया है.

यशवंत की पहाड़ यात्रा : भयों से पार, भयों के पार (कुछ तस्वीरें, कुछ वीडियो)

पहाड़ यात्रा-1 : भाग निकला बेसुरी दिल्ली से… गर्मियों भर पहाड़ों पर ठीहा… आध्यात्मिक अनुभूति के वास्ते… आत्मिक शांति के लिए… आज दोपहर पहुंच गया… इधर अदभुत शांति है, असीम सुंदरता है… मौन में ढेर सारे स्वर और रंग हैं… हर कुछ में एक सात्विक एहसास, ध्यान धारण सा आनंद… लोग गिने चुने, बस इतने कि शोर शब्द अप्रासंगिक है…

मन तुलना करने लगा है….

शहरों में उफनाए-अफनाए पड़े रहने वाले हम… ब्रह्मांड से एकाकार हो जाने की राह दिखाने वाली आंखें अब तक मुंदी रहने के कारण अपने खोल खांचे हाय हाय भागमभाग में रिपीट होकर नष्ट हो जाने की होड़ लगाए हैं हम… मनुष्यता की तरक्की के इतिहास का असली अध्याय लिखा जाना बाकी है… शायद वो लिखा भी न जाए क्योंकि हमने अभी तक लोभ, लालसाओं, शासन, शासकों, संसाधनों, स्वार्थों, परिवारों, देशों, समाजों, आक्रमणों, युद्धों, सत्ताओं, सिस्टमों और इनके जरिए जिन अच्छे बुरे के पर्सपेक्टिव का निर्माण हुआ, उसको ही इतिहास मानते बताते पढ़ते कहते सुनते आए हैं…

बेकार हैं सारी किताबें, सारे ज्ञान, सारे मानदंड जो ब्रह्मांड, प्रकृति और चरम उदात्तता को अनुभूत कर सकने और इससे एकाकार हो जाने की पहली, आखिरी व बुनियादी समझ न दे सकें… मुझे लगने लगा है अब तक जो जिया, बस यूं ही जीता चला आया… जैसे किसी ने झोंक दिया हो और तमाम भयों-आकांक्षाओं-दबावों को लिए यूं ही जोर जोर से जबरन अनजाने जीता चला आया… अब कुछ कुछ समझ में आ-सा रहा है…

बहुत कुछ कहना चाह रहा लेकिन यह भी लग रहा कि जो कहने लगा वह महूसस करने की यात्रा में रुकने लगा…. जो कहा नहीं जा सके, महसूस कर आनंदित हुआ जा सके, उसे कैसे कहा जा सकता है… यह भी सोच रहा… जिन जिन ने कहने की कोशिश की और जो जो कहा उसे हमने आपने नोट किया, किताब में डाला फिर कोर्स में बदला फिर रट्टा लगवा कर मुर्दा बना डाला… ना.. कुछ नहीं कहा जा सकता… कुछ नहीं बताया जा सकता… जिसमें भाव होगा, चाह होगी, सवाल होगा, तड़प होगी, बेचैनी होगी, साहस होगा, भागने का मन करेगा, तलाशने को तड़पेगा वो जानने लगेगा, वो पढ़ लेगा बिना पढ़े… तो दोस्तों, बतियाएंगे कहेंगे लिखेंगे लेकिन तब जब मन करेगा… अभी तो बस इतना कि नई यात्रा पर आया हूं.. पुराना छोड़ आया हूं.. दरअसल मैं भाग आया हूं…


पहाड़ यात्रा-2 : पहाड़ पर कल दो अजीब घटनाएं हुईं मेरे साथ. बस पर बैठकर जब दूरस्थ एक पहाड़ी गांव जा रहा था तो बस के विंडो सीट और घाटी साइड की ओर बैठा मैं नीचे खाई की गहराई देख सिहर सिहर जा रहा था. बस ड्राइवर था कि लगातार चालीस-पैंतालीस की स्पीड पर बस चला रहा था और मोड़ दर मोड़ को इस तेजी से पार कर रहा था कि बेहद पतली सड़क से बस के फिसलकर नीचे गिर जाने का डर, भय मेरे मन-मस्तिष्क पर छाता जा रहा था. पैरों में सिहरन सी हो रही थी.

मैं खुद को कमजोर पाने लगा. सोचने लगा, क्यों कहता हूं कि मैं अब भावनाओं से उपर उठने लगा हूं, दुखों-सुखों सम भाव की सी स्थिति पाने लगा हूं. सही बात तो ये है कि मैं अब भी भावनाओं द्वारा संचालित हो रहा और दुख-सुख बहुत तगड़े से अपने गिरफ्त में लिए हुए हैं. मैं बस में बैठे ही बैठे यह सोचता रहा कि अगर बस लुढ़क गई तो मैं कैसे खुद को बचाउंगा. मैंने सिर पर लगी टोपी को कसकर दबाकर सिर पर गहरे तक टाइट कर बिठा लिया ताकि एक्सीडेंट की स्थिति में सिर को बचाया जा सके… पर बस में बैठे बाकी लोग मस्त. गाते बतियाते… वे सभी लोकल लोग थे. बस नवाखाल से तूनाखाल जा रही थी. दूरी करीब पंद्रह से बीस किलोमीटर के बीच. जिला पौढ़ी में. हिमालय बचाओ आंदोलन के लिए चल रही पदयात्रा को देर से ज्वाइन करने आए हम लोग समीर रतूड़ी और दीप पाठक के मार्गदर्शन के हिसाब से चल रहे थे.

आखिरकार जब बस तूनाखाल रुकी तो सांस में सांस आई. मैं गहरे चिंता, सोच में डूब गया. लगा, मुझे कोई परीक्षा देनी है. भयों से मुक्ति की परीक्षा. इसीलिए मुझसे एक तगड़ा टेस्ट लिया गया. मैं पहले भी कई बार पहाड़ों पर गया हूं. खुद ड्राइव करके कार से भी गया हूं. पर इतनी उंची पहाड़ी और इतनी पतली सड़क पर बस में यात्रा इतनी स्पीड के साथ कभी नहीं की थी. मुझे बार-बार बस के ड्राइवर पर गुस्सा आए. लग रहा था कि जैसे वो पिये हुए हो. हालांकि ये नतीजा मेरा भयभीत मन निकाल रहा था. बाद में उससे बातचीत की तो समझ आया कि वो बिलकुल पिये नहीं है और वह ऐसा ही बस जमाने से चलाता आया है. जब मेरा भय चरम पर था तो बस में बगल में बैठी बुजुर्ग स्थानीय महिला से पूछा- आपको डर नहीं लग रहा नीचे देख कर? वो मुस्करायीं. थोड़ी देर बाद स्थानीय बोली से मिक्स हिंदी में बोल पड़ीं- कैसा डर, बचपन से यही देखते आए हैं, हम सब यहीं के हैं. पर मैंने उन्हें साफ-साफ बता दिया कि मुझे बहुत डर लग रहा देख कर. वो मुस्कराहट से आगे बढ़कर हंसने तक लगीं. मैं भी उनकी भोली सी हंसी मुस्कराहट और आंखों में मेरे प्रति खूब उत्सुकता देख हंस पड़ा. वो मेरे बारे में देर तक पूछती बतियाती रहीं.

पदयात्रा की खबर अमर उजाला में : पढ़ने के लिए उपरोक्त न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें


तूनाखाल पर बस तीन दुकानें. चाय वाला खिलाने के नाम पर मैगी पकाना खिलाना जानता. यही खाए, चाय पिए. फिर तीन किसी आगे बसे इसोटी गांव की ओर चल पड़े, जहां हिमालय बचाओ आंदोलन की टीम के साथी समीर रतूड़ी, दीप जोशी व अन्य गांव वालों के साथ मीटिंग कर रहे थे. पैदल चलते हुए हम लोगों को दो तीन स्थानीय किशोर बच्चों ने बड़े अदब से नमस्ते किया. बहुत अच्छा लगा. पहाड़, हरियाली, एकांत, शांति देख मन गदगद था और अभी चढ़े भय के बुखार से निजात पा चुका था. बाद में जब गांव की मीटिंग में पहुंचे तो नेतृत्वकारी साथियों ने स्वागत परिचय चाय पानी कराकर बैठक में बिठा लिया. समीर रतूड़ी ने महिलाओं, पुरुषों, युवकों को एकत्र करने के बाद खड़े होकर संबोधित करने लगे. गढ़वाल रेंज से पलायन, विस्थापन, सरकारी लूट, गांवों की उपेक्षा, खत्म होती खेती, स्थानीय संसाधनों के उपयोग उपभोग से स्थानीय लोगों को दूर रखने की सरकारी नीतियों, ग्रामीणों की निराशकारी व निष्क्रिय मानसिकता आदि पर लंबी बात रखी. एक जुट होने को कहा. आने वाले जन प्रतिनिधियों और सरकारी अफसरों से चार सवाल पूछने को कहा ताकि उन्हें गांवों के बारे में सोचने को मजबूर होना पड़े. वे लोग चार पन्ने का एक परचा भी बांट रहे थे.

मैं समीर के संबोधन का वीडियो बना रहा था कि आठ नौ मिनट बाद एक फोन आया और वीडियो रिकार्डिंग का काम बीच में रुक गया. और जब तक दुबारा आन करता, मोबाइल डिस्चार्ज हो चुका था. समीर करीब आधे घंटे तक बोले. वे लोग मलेथा गांव (पौढ़ी जिला) से 23 मार्च को पदयात्रा पर निकले. कच्चे-गंवई रास्तों से पैदल चलते हुए बारह-तेरह बड़ी पहाड़ियों को पार कर चुके हैं. 18 अप्रैल को यात्रा गैरसैंण पहुंचकर एक बड़े आयोजन के साथ खत्म होगी. (समापन के दिन वाले आयोजन में शिरकत करने के लिए आप भी आमंत्रित हैं, इसके लिए समीर रतूड़ी से संपर्क 09536010510 पर कर सकते हैं).

गढ़वाल इलाके में किसी ने इतनी बड़ी पहली बार पदयात्रा की है. गांव में मीटिंग खत्म करने के बाद जब हम सब पद यात्रा करते हुए अगले गांव की तरफ बढ़े तो रास्ते में पिछले रास्तों के अनुभवों पर समीर रतूड़ी और दीप पाठक अपने अपने अनुभव, दुख-सुख बताने लगे. कब खाने मिलने में दिक्कत हुई, कब रास्ता भूल गया, कब बाघ का खतरा सामने मंडराता दिखा, कब लगा कि अब नहीं चल पाएंगे, कब-कब निराश हुए, कहां कहां अपनी इस यात्रा पर गर्व महसूस हुआ…. ढेर सारी बातें. दीप पाठक रास्ते में पड़ रहे घासों, पेड़ों, फलों आदि के बारे में बताते जाते, पहचान कराते जाते, खिलाते जाते. बिच्छू घांस से लेकर माल्टा, आड़ू, बुरांश तक का वर्णन. दूसरी आफत, भय से सामना उस समय हुआ जब एक खड़ी पहाड़ी पार करने के लिए सामने थी. नब्बे डिग्री चढ़ाई वाले उबड़ खाबड़ मोड़दार रास्ते पर चढ़ने के पांच मिनट बाद ही सांस धौंकनी की तरह चलने लगी. मैं बैठ गया. ऐसा तीन चार दफे हुआ. बैठा, फिर चल पड़े. समीर और दीप इस सबसे आदी थे, पक चुके थे. हम लोग नए थे.

इतना तेज हांफना और दिल का धड़कना हो रहा था कि जैसे अब हार्ट अटैक यहीं पड़ने वाला है. हाथ से सीने के बाएं तरफ जोर से दबाए मैं तब चौंका जब दीप पाठक ने अपना टेक मेरे हवाले कर दिया. बोले- आराम से इससे टेक लेते हुए चढ़ें. थोड़ी मदद मिलेगी. और सच में उस टेक ने काम किया. पर धौंकनी चलना, हांफना, पसीने से भीगना, तेज-तेज सांसें आना बंद न हुआ. मन में कुछ देर के लिए पश्चाताप होने लगा- कहां आकर फंस गया. लेकिन तभी लगा. यही तो परीक्षा है. अपने पुराने रुटीन और पुरानी स्टाइल से मुक्ति पाए बगैर नए को कैसे जान समझ सकते हैं. शायद ये परीक्षा है. इस तरह दूसरे भय से मुक्ति पाने की लड़ाई लड़ते, हांफते बिलकुल उपर उस जगह पहुंच ही गए जहां रात गुजारनी थी. अब जब इस वक्त यह सब लिख रहा हूं, सामने उपर धार विशाल… दूर तक पहाड़-हरियाली… नीचे घाटी… व्यापक… बहुत नीचे.. सामने वाले पहाड़ पर धूप पहले आया. इधर वाले पर बाद में आया. कुछ देर पहले. रात में खाना किसी के घर खाया और सोने किसी दूसरे के घर पहुंचा. रहना खाना सब फ्री. पूरे चलते रहना है, जो गांव पड़े, वहां मीटिंग कर सबको समझाते बताते रहना है.

आज के दिन जब हम लोग 9 बजे यहां से निकलेंगे तो पूरे दिन करीब 11 किमी चलना है पैदल. इसमें चढ़ाई उतराई दोनों शामिल है. मैं मानसिक रूप से खुद को तैयार कर रहा हूं. कल छोटी सी चढ़ाई पर जो हाल हुआ, उसकी कल्पना कर थोड़ा नर्वस भी हूं कि 11 किमी भला मैं कैसे चल सकूंगा…. लेकिन वो कहते हैं न, सबसे पावरफुल चीज है आपका विल पॉवर, सबसे पॉवर फिल होता है कनविक्शन… सबसे पॉवरफुल होता है जूनून… देह तो माटी है. मन से इसे जिंदा, मुर्दा, मजबूत, कमजोर बनाता मानता है. वो है न, मन के हारे हार है, मन के जीते जीत. कल यात्रा के दौरान ही समीर ने राजीव नयन बहुगुणा से फोन पर बात कराया. मैं हांफते हुए बस कुछ ही लाइनें बोल पाया. चढ़ाई में एक बात और मुझे बताई गई. कम से कम मुंह खोलिए ताकि ताकत बनी रहे, सांस कम फूले, नाक से सांस लें. मतलब, चढ़ाई के दौरान मौन रहना है. मौन बहुत ताकत देता है.

इस घाटी में कुछ है, कोई ताकत है, जो अदृश्य है, जिसे मैं महसूस कर रहा हूं, जो मुझे यहां बुलाए है, घुमाए है. यहां जमीन लोग बेचने को तैयार हैं, खरीदार नहीं. पचास हजार रुपये में एक बीघा जमीन दे रहे हैं. लेने वाला कोई नहीं. उत्तराखंड का सबसे गरीब और सबसे दुर्भाग्यशाली इलाका है ये, समीर बताते हैं. यहां के लोगों को कोई फायदा नहीं मिला उत्तराखंड बनने का. कई कई घरों पर ताले हैं, घर टूट रहे हैं क्योंकि पूरा परिवार दिल्ली या मुंबई या चंडीगढ़ या मेरठ या देहरादून शिफ्ट हो चुका है, यहां नहीं रहते और न रहेंगे. वो भी बेचने को तैयार हैं अपना घर, औने पौने दामों पर. मुझे कुछ साथी कह रहे हैं, ले लो, बस जाओ. मैं भी सोच में पड़ गया हूं. यहां 2जी नेट कनेक्शन मजे में चल रहा है. क्या दिक्कत है, बस जाते हैं यहीं. सोच रहा हूं. पर अभी जल्दी क्या है, हर तरफ घूम लेता हूं, बाद में लास्ट में फाइनल किया जाएगा कि कहां बसना है. सोच रहा हूं. और, क्या बसना, क्या उजड़ना… फकीर बनो, आज यहां कल वहां. कुछ न रखो. कुछ न बसाओ. कुछ न उजाड़ो. चलते रहो. सोच रहा हूं.


जिनके घर रात रुके, उन्होंने सुबह नाश्ता करा कर बड़े प्यार से विदा किया, यह कहते हुए कि- फिर आना तुम लोग…

चलते चलते जब पैर थक जाएं तो कहीं पर भी हम लुढ़क जाएं…

एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ जाने की खुशी…


पहाड़ यात्रा-3 : उंचाई पर बस से चलने के दौरान गहरी खाई देखकर मौत का भय और पहाड़ पर पैदल चढ़ाई के दौरान हांफते हुए हार्ट फेल होने का भय .. इन दो भयों का जिक्र किया था पिछली पोस्ट में.. अब इन दो भयों के भागने की जानकारी दे रहा हूं. ऐसा संभव हो पाया लगातार पहाड़ के पास रहने, पहाड़ को जानने-समझने और उसके रंग में रंग जाने के कारण. हिमालय बचाओ आंदोलन की पदयात्रा में कई दिन साथ रहने और बीहड़ रास्तों पर लगातार पैदल चढ़ाई उतराई के कारण पहाड़ की उंचाई व खाई से भय भागता रहा. जब पहाड़ से दिल्ली लौट रहा था तो पहाड़ काटने, डराने को नहीं बल्कि अपना बिछड़ा भाई लगने को बेताब दिख रहा था… मन ही मन वादा करके लौटा कि अगली बार हिमालय के और करीब जाउंगा.. उन कंदराओं, गुफाओं, योगियों के पास जिनका जीवन दर्शन अलग, अलहदा है… इस बार की यात्रा ने पहाड़ से अजनबीपन को खत्म किया. पहाड़ के गांव, लोग, गलियां, चढ़ाई, उतराई, बोली, संस्कृति, स्नेह, संस्कृति सबसे रुबरु हुआ… भीषण एक्सरसाइज के कारण फिजिकली पहले से काफी फिट पा रहा हूं. हृदय के जो कुछ ब्लाकेज, रोड़े रहे होंगे, सब तीव्र गति ब्लड पंपिंग के कारण खत्म हो चुके होंगे. नशा पत्ती से रिलेशन रखने के जो साइड इफेक्ट दिख रहे थे, वो सब साइडलाइन हो चुके हैं. बोले तो, रुटीन और उबाऊ जीवन से अलग हटकर कुछ दिन बेहद नया और अदभुत जीवन जीकर जीने के प्रति लालसा, ललक को बढ़ा पाया. यात्रा के दौरान कई मजेदार तो कई सांस थामने वाले प्रसंग हुए.. इनमें से कुछ की वीडियोग्राफी भी की है… देखेंगे तो लगेगा कि आप भी संग-संग यात्रा कर रहे हैं… मजा न आए तो पैसे वापस… लिंक ये हैं…

Pahaad waale Baba (1) : बोल बकरा बोल…
https://www.youtube.com/watch?v=LRYV0fYXwFs


Pahaad waale Baba (2) : मुंड दर मुंड, हैं इरादे प्रचंड
https://www.youtube.com/watch?v=3xZvTZc4O-s


Pauri Journey (1) : घने जंगल में उंचाई से उतरना
https://www.youtube.com/watch?v=1aKLaI-vAP4


Pauri Journey (2) : पहाड़ की गोद में आराम
https://www.youtube.com/watch?v=js814WdDCis


Pauri Journey (3) : हंसी-मजाक के बाद लंबी चढ़ाई
https://www.youtube.com/watch?v=j-uihThWoFA


नाश्ते में पहाड़ी व्यंजन… चाय के साथ मड़ुवे की रोटी और हरी चटनी…


लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संपादक हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है. 


यात्रा की कुछ और तस्वीरें यशवंत के फेसबुक पेज पर जाकर देख सकते हैं, क्लिक करें:

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यशवंत का लिखा एक पुराना यात्रा संस्मरण भी पढ़ सकते हैं, क्लिक करें..

मसूरी में भीख मांगते देखे गए यशवंत

प्रेस क्‍लब में मोदी के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाने वाले अपने स्‍टैंड पर कायम रहेंगे!

Deepak Sharma : HATE MODI ..but do not under rate him. आप अपनी ही बात कहना चाहें और दूसरे की बात सुनना ना पसंद हो तो ये किसकी प्रॉब्लम है? आप खुद की सोची समझी दुनिया में जी रहे हों तो फिर संवाद की जगह कहाँ बचती है? दरअसल ये लक्षण बताते हैं कि आप तटस्थ नहीं हैं. दुर्भाग्य से आप टीवी एंकर हैं और इससे बड़ा दुर्भाग्य ये कि मैं आपको जानता हूँ.

एक टीवी एंकर मुझसे बहस करने लगे की मोदी को बनारस में छींके आ जायेंगी और शायद वो हार जायेंगे. उन्होंने कहा की मोदी की हवा निकल चुकी है और बनारस में वो मुंह की खाने वाले हैं. मित्रों हो सकता है मोदी सरकार ना बना पाएं…लेकिन वो बनारस में मुंह की खा जायेंगे ऐसा मुझे नहीं लगता. बहरहाल मैं इस एंकर की भड़ास सुनता रहा जब तक उनकी स्काच और मेरी पेप्सी खत्म नहीं हो गयी.

मैं एकतरफा बहस में नहीं पड़ता. एक ही लकीर पीटने वाले फकीर मुझे रास नहीं आते. आपको भी एक तरफ़ा बहस में नहीं पड़ना चाहिए. एकतरफा मतलब एकपक्षीय. मतलब असंतुलित. अंग्रेजी में मतलब BIASED. जो पत्रकार मोदी से नफरत करते हैं उनसे मुझे परहेज नहीं. गुजरात दंगों के लिए मोदी की आलोचना करना पत्रकार का धर्म है. लेकिन २४ घंटे मोदी को कोसना भी धर्म नहीं हो सकता. ऐसे पत्रकार जो दिल्ली के प्रेस क्लब और मीडिया सेंटर में बैठकर मोदी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला रहे हैं, उनसे मेरा कहना की अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो उस वक्त भी वो अपने स्टैंड पर कायम रहे.

धर्म निरपेक्ष पत्रकारों से मेरा अनुरोध है कि पहले तो वो मोदी की पराजय सुनिश्चित करें और अगर फिर भी मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनका बहिष्कार करें. कांग्रेस शासन में मोदी को गाली और मोदी के सत्ता में आने के बाद नमो नमो …ये दोहरा चरित्र होगा. सनद रहे कथनी और करनी में फर्क …चरित्र को तिरस्कृत कर देता है.

आजतक के वरिष्‍ठ पत्रकार दीपक शर्मा के एफबी वॉल से साभार.

दैनिक भास्‍कर, अजमेर के 18वें स्‍थापना दिवस पर कई कर्मचारी सम्‍मानित

अजमेर : दैनिक भास्कर अजमेर संस्करण का 18वां स्थापना दिवस रविवार को भास्कर परिसर में आतिशबाजी के साथ धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम में भास्कर समूह से जुड़े लोगों के साथ आमंत्रित अतिथियों ने भाग लिया। यूनिट हेड जीके पांडे ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया इस दौरान भास्कर कर्मचारियों को उनके साल भर में किए गए उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में महिलाओं और बच्चों के लिए कई प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। इसमें 5 से 10 साल के बच्चों के लिए कुर्सी रेस का आयोजन किया गया। महिलाओं के लिए भी कुर्सी रेस आयोजित की गई। समारोह में कठपुतली के खेल ने मौजूद लोगों को रोमांचित कर दिया। समारोह में रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जगदीश सिंह सिकरवाल ने स्थापना दिवस पर भास्कर के तीन वरिष्ठ कर्मियों डिप्टी न्यूज एडिटर बृजेश शर्मा, चीफ फोटो ग्राफर मुकेश परिहार और एचआर एक्जीक्यूटिव विदुषी सक्सेना को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।

इनके अलावा संपादकीय विभाग से आरिफ कुरैशी, अरविंद अपूर्वा, अनिल आईनानी, प्रोडक्शन विभाग से भगवान मीणा, मोहित शर्मा, अकाउंट्स डिपार्टमेंट से दुर्गालाल, एसएमडी से हीरालाल रावत, एचआर से हिम्म्मत सिंह और मार्केटिंग से मुकेश गुप्ता और विजय सैन को शील्ड देकर सम्मानित किया।

कनाट प्लेस में अखबारों-पत्रिकाओं की फुटपाथीय दुकान और मोदी-केजरीवाल पर छिड़ी आम-खास में बहस महान

Shailesh Bharatwasi : आज की शाम। कनॉटप्लेस में अख़बारों-पत्रिकाओं की एक फुटपाथीय दुकान। 6-7 लोग जिसमें से दो इस दुकान को चलाते हैं, एक व्यक्ति ऑटो चलाता है, एक कनॉट प्लेस में ही फुटपाथ पर 100 रुपये वाली शर्ट बेचता है। 1-2 शायद अख़बार-पत्रिका खरीदने पहुँचे हैं। सब यही चर्चा कर रहै हैं कि इस बार वोट किसको दें। तमाम बहस के बाद इनका निष्कर्ष यही है कि केजरीवाल बहुत ईमानदार आदमी है। उसे ही देना चाहिए।

इतनी देर में एक कार आकर रुकती है।

कार के भीतर से ही एक आदमी बोलता है कि क्या देश में फिर से राष्ट्रपति शासन लगवाना है? तुम्हारे केजरीवाल ने दिल्ली को बदलने के बजाय देश बदलने क्यों भागा? बहुत लोभी निकला।

बाकी 7 लोगों ने कहा कि केजरीवाल को ये लोग काम नहीं करने दे रहे थे।

कार वाला तैश में आ गया। कार से बाहर आ गया। कहा- उसको काम करने से किसने रोका था? वो काम करना ही नहीं चाहता था।

विपक्ष ने बोला- सबसे बड़ी प्रॉब्लम भ्रष्टाचार है। उसका खतम होना ज़रूरी है, वो केंसर है। और वो केंसर केवल 'आप' ही खतम कर सकती है।

कारवाला बोला- तुम्हारा केजरीवाल केंद्र में सरकार बना लेगा क्या? कितने सीटें आएँगी?

लोग बोले- 50 तो आएँगी ही।

कारवाला बोला- 5 नहीं आएँगी। और मान लो पचास आ भी गई तो क्या केजरीवाल प्रधानमंत्री बन जाएगा?

लोग बोले- मालूम है, नहीं बन पाएगा, लेकिन ईमानदार आदमी विपक्ष में बैठेगा तो पक्षवाला दबाव में अच्छा काम करेगा। आप बताओ, किसको वोट देना चाहिए?

कारवाला बोला- देखो भाई। मैं भी देश की चिंता करता हूँ । मुझे मालूम है कांग्रेस भी चोर है, बीजेपी भी। देश को गर्त में जाने से एक ही आदमी बचा सकता है। वो है मोदी। और कोई नहीं। बोलो भारत माता की…

किसी ने जय नहीं बोला।

लोग बोले- मोदी तो अंबानी का आदमी है। वो आएगा तो महँगाई और बढ़ेगी।

बहस लगभग घंटों चली। कारवाला यह कहते हुए गया कि मैं आम आदमी नहीं हूँ। आप जैसे लोग आम आदमी हैं। अच्छा आदमी चुनोगे तो अपना भला करोगे, मेरा क्या जाएगा, किसी को भी वोट दो।

हिंदयुग्म प्रकाशन के निदेशक और चर्चित ब्लागर शैलेष भारतवासी के फेसबुक वॉल से.

नोएडा में महिला पत्रकार पायल शर्मा से हुई लूट, बदमाश गिरफ्त से बाहर

नोएडा में मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने एक महिला पत्रकार का हजारों रुपए और पर्स लूट लिया. लुटेरों ने सेक्टर-25 में इस घटना को उस समय अंजाम दिया जब महिला पत्रकार रिक्‍शा पर सवार होकर अपने घर जा रही थी. कोतवाली सेक्टर-20 पुलिस ने इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कर ली है. अब तक कोई आरोपी अरेस्‍ट नहीं हुआ है. 

जानकारी के अनुसार सेक्टर-56 स्थित डी ब्लॉक की रहने वाली पायल शर्मा एक मीडिया हाउस में कार्यरत हैं. शनिवार रात वह अपनी दोस्त श्वेता सिंह के साथ सेक्टर-18 मार्केट में किसी काम से गई थीं. काम खतम करने के बाद वह लगभग साढ़े नौ बजे रिक्शे से सेक्‍टर 56 स्थिति अपने घर लौट रही थी. सेक्टर-25 में स्थि‍त बाल भारती स्कूल के सामने जैसे ही पहुंची कि मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने उनका पर्स लूट लिया. पायल जब तक मदद के लिए पुकारती या कुछ समझ पाती बदमाश फरार हो गए.  

इस घटना के बाद पायल ने तत्‍काल पुलिस कंट्रोल रूम को 100 नंबर पर कॉल किया, लेकिन बदमाश पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके. पुलिस मौके पर पहुंचकर जांच पड़ताल भी की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. पुलिस को दी गई शिकायत में पायन ने बताया है कि उनके पर्स में आठ हजार रुपये, पैन कार्ड, एटीएम कार्ड व मोबाइल सहित अन्य महत्वपूर्ण कागजात थे. पायल का कहना है कि मार्केट से ही बदमाश उनका पीछा कर रहे थे. पुलिस का कहना है कि आसपास में लगे सीसीटीवी की फुटेज मंगाई जा रही है, जल्‍द ही बदमाशों को अरेस्‍ट कर लिया जाएगा.

बनारस, रामबदन पटेल और दिल्ली वाली पार्टी

Kumar Sauvir : दिन में तो काशी भड़भड़िया और बकवादी बन जाती है। आपको अगर जब कभी वाराणसी से बात करना हो तो उससे मस्‍त टाइम होता है रात का। तब काशी दिल खोल कर बतियाती है, पूरी खामोशी के साथ। खाली सड़कों से गंगा की से बहती हवाओं के झोंके किसी अभिन्‍न प्रेयसि के दुपट्टे और उसके बालों की लटें आपके गालों को रह-रह कर सहलाते रहेंगी। और यही तो होता है कि काशी का भीतरी अनुभव।

बीती रात करीब सवा ग्‍यारह बजे काशी को घूमने निकल पड़ा मैं। हालांकि रिक्‍शा पर चढ़ना मैं मानवता के खिलाफ समझता हूं, लेकिन एक अधेड़ रिक्‍शेवाले ने पूरे आग्रह के साथ कहा:- चलीं।

मैं बैठ गया। करीब दो घण्‍टे तक सन्‍नाटे को चीरता काशी को महसूस किया। दो बार गर्म दूध, तीन चाय और एक बार लस्‍सी का कुल्‍हड़ इसी रिक्‍शेवाले के साथ जिया। आखिरकार मैदागिन के चौराहे पर स्थिापित मन्दिर की सीढि़यों पर आसन लगा दिया।

बातचीत का दौर शुरू हो गया। पता चला कि रिक्‍शेवाला रामबदन पटेल है और रामनगर का रहने वाला है और रोजाना तीस रूपये का किराया देकर काशी पहुंचता है। तीन बेटी समेत छह लोगों का परिवार है। रोजाना रिक्‍शा का किराया 60 रूपया और करीब 400 रूपयों की आमदनी।

चुनाव पर बात शुरू हुई।

पटेल ने कहा:- जीतेगा तो मोदी ही। मुलायम जैसे लोगों ने तो जी ही खट्टा कर दिया है। कांग्रेस तो जहां से आयी थी, वहीं चली जाएगी।… मैं ? मैं तो वही दिल्‍ली वाली पार्टी को वोट दूंगा। अरे वही पार्टी जो नयी बनी है ना, उसी को। पता है कि वह जीत नहीं पायेगी, लेकिन कम से कम वह बात तो ठीक कर रही है। बाकी लोग तो हमेशा भरभण्‍डा-सरभण्‍ड-खरबण्‍डल करने में जुटे रहते हैं। कुछ नहीं किया इन लोगों ने। हमको क्‍या, हमें तो हमेशा रिक्‍शा ही चलाना है, तो कम से कम अपनी दिल की बात तो सुन-कर लें।

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

दीपक चौरसिया ने इंडिया न्यूज पर ‘आप’ का फर्जी प्रवक्ता बिठा रखा है… शेम शेम

India News पर केजरीवाल और 'आप' की खिंचाई चल रही है. मंच पर 'आप' की टोपी पहने जो व्यक्ति बैठा है वह शिवसेना का प्रभात वालिया है. जंतर-मंतर पर दर्जनों प्रदर्शन शिवसेना के लिये कर चुका है. पता चला है कि यह प्रभात वालिया कई बार तिहाड़ आ-जा चुका है धोखाधड़ी के मामलों में. इंडिया न्यूज चैनल बीजेपी के लिये फर्जी विरोध फर्जी विद्रोह और फर्जी खबरें गढ़ता रहता है.

'आप' की ओर से एक फर्जी प्रवक्ता प्रभात वालिया भी बैठाया जाता है जिसका नाम अधिकृत प्रवक्ताओं की नेट पर मौजूद लिस्ट में नहीं है. उसे यह भी नहीं मालूम कि कंधमाल के प्रत्याशी का टिकट तीन दिन पहले ही वापस लिया जा चुका है. इसी इंडिया न्यूज चैनल पर विधानसभा चुनाव में वोटिंग से ठीक पहले एक फ़र्ज़ी स्टिंग और अन्ना की चिट्ठी जारी की गई थी.

लगता है दीपक चौरसिया देश का सबसे बड़ा फर्जी पत्रकार और इंडिया न्यूज चैनल देश का महा फ्रॉड न्यूज चैनल का खिताब बटोरने की रेस में सबसे आगे हैं. फिलहाल तो दीपक चौरसिया को इंडिया न्यूज चैनल पर फर्जी प्रवक्ता बिठाने के लिए सभी को मिलकर शेम शेम कहना चाहिए…

फेसबुक से.

पूर्वी दिल्ली के तीन प्रत्याशी राजमोहन गांधी, महेश गिरि और संदीप दीक्षित पेड न्यूज के घेरे में

दिल्ली मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने लोकसभा चुनाव में पेड न्यूज की लिस्ट जारी की है। खास बात यह कि लिस्ट में सिर्फ पूर्वी दिल्ली संसदीय सीट के तीनों प्रमुख दलों के उम्मीदवारों का नाम शामिल हैं। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार राजमोहन गांधी के नाम से सबसे ज्यादा तीन बार खबरें प्रकाशित हुई हैं। वहीं, खर्च की राशि के मामले में भाजपा प्रत्याशी सबसे आगे है।

कार्यालय ने जांच में पाया कि आप प्रत्याशी ने तीन बार पेड न्यूज प्रकाशित करवाईं। विज्ञापन के स्पेस के आधार पर इसका पूरा खर्च 48,755 रुपये बैठता है। वहीं, भाजपा प्रत्याशी महेश गिरि ने दो बार इस तरह की खबरें प्रकाशित करवाईं। इनका कुल खर्च 63,475 रुपये है। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी संदीप दीक्षित पर एक बार का खच्र 12,815 रुपये है। निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक, दिल्ली भर में पेड न्यूज के छह मामले पाए गए हैं। इनमें प्रत्याशी पेड खबरें प्रकाशित करने के दोषी हैं। लिहाजा इसे प्रत्याशी के चुनाव खर्च में जोड़ा जाएगा।
 

समाचार प्लस चैनल में वाइस प्रेसीडेंट (न्यूज आपरेशन) बने ऋषि दत्त तिवारी

ऋषि दत्त तिवारी ने न्यूज एक्सप्रेस चैनल से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने नई पारी की शुरुआत समाचार प्लस न्यूज चैनल के साथ की है. उन्हें यहां वाइस प्रेसीडेंट न्यूज आपरेशन बनाया गया है. ऋषि कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. लखनऊ निवासी ऋषि दत्त तिवारी ने अपनी नई ज्वायनिंग के बारे में फेसबुक के जरिए अपने जानने-चाहने वालों को सूचित कर दिया है.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

मोदी के खिलाफ ‘द इकोनॉमिस्ट’ के संपादकीय पर भड़के सुब्रमण्यम स्वामी

तिरुवनंतपुरम। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने लंदन की पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिखे संपादकीय पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने इसे भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार दिया है।

स्वामी ने पत्रकारों से कहा कि विदेश मंत्रालय तुरंत इस मामले को ब्रिटिश हाई कमीशन के सामने उठाए और उससे सफाई मांगे। चूंकि पत्रिका की रिपोर्ट सीधे भारत के आंतिरक मामलों में हस्तक्षेप है इसलिए यह जरूरी है। इकोनॉमिस्ट के संपादकीय में कहा गया है कि मोदी का प्रधानमंत्री होना भारत के लिए ठीक नहीं होगा। इस पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए स्वामी ने कहा कि एक विदेशी पत्रिका भारत के आंतरिक मामलों में फैसला कैसे कर सकती है।

मूल खबर:

द इकोनोमिस्‍ट ने लिखा – क्या कोई नरेंद्र मोदी को रोक सकता है?

कर्नाटक के वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकार रंगनाथराव राघवेन्द्र को “गोइन्का हिन्दी साहित्य सम्मान”

जैन ग्रप ऑफ इंस्टिट्यूशन्स के चेयरमैन डॉ. चेनराज रॉयचंद जी की अध्यक्षता में गुलबर्गा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार कमला गोइन्का फाउण्डेशन द्वारा घोषित इक्कीस हजार राशि का "पिताश्री गोपीराम गोइन्का हिन्दी कन्नड़ अनुवाद पुरस्कार" से डॉ. काशीनाथ अंबलगे जी को उनकी अनुसृजित कृति "सुमित्रानंदन पंत अवरा कवितेगळू" के लिए पुरस्कृत किया गया।

संग-संग "गोइन्का कन्नड़ साहित्य सम्मान" से धारवाड़ की सुप्रसिद्ध कन्नड़ साहित्यकार एवं कर्नाटक साहित्य अकादमी की नवनिर्वाचित अध्यक्ष प्रो. मालती पट्टणशेट्टी जी को नवाजा गया। कर्नाटक के वरिष्ठ हिन्दी सेवी श्री रंगनाथराव राघवेन्द्र निडगुंदि जी को "गोइन्का हिन्दी साहित्य सम्मान" से सम्मानित किया गया। इसी अवसर पर साहित्येतर क्षेत्र के सम्मान "दक्षिण ध्वजधारी सम्मान" से कर्नाटक की सिरमौर प्रतिष्ठित समाज-सेवी धर्मस्थला की श्रीमती हेमावती वी. हेगडे जी को सम्मानित किया गया।

पुरस्कार समारोह दिनांक 6 अप्रैल को 'भारतीय विद्या भवन' बेंगलुरु में आयोजित था। इस समारोह के मुख्य अतिथि कार्पोरेशन बैंक (मेंगलुरु) के सहायक महाप्रबंधक डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल जी थे। समारोह का संचालन डॉ. आदित्य शुक्ल जी ने किया।

पुरस्कार समारोह के अंत में एक अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। जिसमें कवि सम्राट श्री आशकरण अटल जी के संग-संग श्री सुभाष काबरा, श्री श्याम गोइन्का, श्री मुकेश गौतम, पूरण पंकज तथा बेंगलूरु के ख्याति प्राप्त कवि डाॅ. आदित्य शुक्ल ने अपनी कविताओं से बेंगलुरू के साहित्य-रसिकों को मंत्र-मुग्ध किया।

 

(प्रेस विज्ञप्ति)
 

सुब्रत राय को बेसहारा छोड़ गई उनकी ‘सेलीब्रिटी ब्रिगेड’

आसाराम बापू और सुब्रत राय सहारा के मामले में एक गजब की समानता देखी गई। वह यह कि अपने-अपने क्षेत्र के इन दोनों दिग्गजों पर जब कानून का शिकंजा कसना शुरू हुआ, तो दोनों ने पहले इसे काफी हल्के में लिया। उनके हाव- भाव से यही लगता रहा कि इनकी नजर में ऐसी बातों का कोई महत्व नहीं है। उनके प्रताप से कानून की सारी कड़ाई धरी रह जाएगी। लेकिन कमाल देखिए कि एक बार ये कानून के शिकंजे में फंसे तो फिर इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता फिलहाल इन्हें या इनके कुनबे को नहीं सूझ रहा। कुछ ऐसा ही हाल 1990 के दशक में फिल्म अभिनेता संजय दत्ता का रहा था। मुंबई दंगों के दौरान घर में अवैध असलहा रखने के मामले में कानून ने जब संजय को गिरफ्त में लेना शुरू किया, तब  शुरू में संजय बिल्कुल बेपरवाह नजर आते रहे। पुलिस, अदालत औऱ जेल आदि उन्हें किसी फिल्म की शूटिंग जैसा लगता रहा।

आज भी चैनलों पर कभी- कभी उस दौर के फुटेज दिखाई देते हैं, तो साफ नजर आता है कि तब के अपेक्षाकृत दुबले-पतले संजय दत्त किस तरह लापरवाही से इधर-उधर आ-जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई सामने आते ही संजय का जो हाल हुआ उसने उनके बूढ़े पिता को काफी रुलाया। अब सहारा प्रकरण में सुब्रत राय सहारा का हश्र सचमुच हैरान करने वाला है। ताजा प्रकरण के जरिए ही कई चैनलों पर सुब्रत राय की शानदार पार्टियों के फुटेज चले, जिसमें फिल्म से लेकर राजनीति औऱ खेल से लेकर विभिन्न क्षेत्रों की कई प्रतिष्टित हस्तियां उनकी पार्टी में शामिल होकर काफी गौरवान्वित नजर आईं। इससे पहले दाऊद इब्राहिम की पार्टियों में भी ऐसा नजारा देखा जा चुका है।

बेशक सेलीब्रिटीज किसी के साथ ऐसा रिश्ता खास तौर पर उपकृत होने के बाद ही बनाते हैं। अन्यथा देखा गया है कि जनजीवन में बेहद आत्मीयता व सम्मान के साथ सभा-समारोह में बुलाए जाने पर भी ऐसे लोग किस तरह बात-बेबात नाक-भौं सिकोड़ते रहते हैं, औऱ पूरी उपस्थिति के दौरान ऐसा साबित करते हैं कि उनके कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन लोगों ने संबंधितों को अपना जीवन सुधारने का मौका दिया है। लेकिन  निवेशकों का पैसा लौटाने के मामले में सुब्रत राय की गिरफ्तारी के बाद से यही  ब्रिगेड जिसमें से शत-प्रतिशत ऐसी ही प्रवृत्ति के लोग शामिल हैं, बिल्कुल खामोश है। आज जब राय लगातार हिरासत में है, और उनके इस दुष्चक्र से बाहर निकलने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। लगता है सुब्रत राय की सेलीब्रिटी ब्रिगेड ने उनसे दूरी बना कर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है।

ताजा घटना भी चकाचौंध पसंद करने वालों के लिए एक सबक के समान है कि सेलीब्रिटीज़ किसी के नहीं होते। उसे सिर्फ पैसे औऱ पावर से मतलब होता है। यह जिसके पास होता है, सेलीब्रिटीज़ भी उन्हीं के बगल में खड़े होना पसंद करते हैं। यह विडंबना गांव-कस्बे से लेकर राज्यों व देश तक समाज के हर क्षेत्र में फैली हुई है। सामान्य जीवन यापन में भी देखने को मिलता है कि किस तरह किसी के अचानक सफलता हासिल करने पर समाज के हर वर्ग के लोग उसके बगल खड़े होने में गर्व महसूस करते हैं। लेकिन किन्ही कारणों से उसके दुर्दिन शुरू होते ही लोग तत्काल  उससे मुंह भी फेर लेते हैं। कथित सफलता के ऐसे शिखर की सच्चाई शायद सुब्रत राय को अब तक समझ आ गई होगी। इससे बेहतर तो समाज के निचले स्तर के वे लोग हैं, जिन्हें मुसीबत में उनके जानने वाले यूं असहाय नहीं छोड़ते, और जितना संभव हो पाता है, उनका साथ निभाने का प्रयास करते हैं।

 

लेखक तारकेश कुमार ओझा दैनिक जागरण से जुड़े हैं। संपर्कः भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 खड़गपुर(प. शिचम बंगाल) पिन: 721301 जिला प. शिचम मेदिनीपुर। मो. 09434453934

न्यूज इंडिया राजस्थान से जुड़े दिनेश कुमार डांगी

दिनेश कुमार डांगी अब अपनी नई पारी न्यूज इंडिया राजस्थान में खेलेंगे। इस चैनल में उन्होंने बतौर रिपोर्टर ज्वाइन किया है। दिनेश इससे पहले पत्रिका टीवी और भास्कर टीवी में काम कर चुके हैं।

 

चुनावी बिसात पर सजी मोहरें और हिन्दू राष्ट्र का सपना

16वीं लोकसभा के लिये चुनाव की सरगर्मी अपने चरम पर है और 7 अप्रैल से मतदान की शुरुआत भी हो चुकी है। इस बार का चुनाव इस दृष्टि से अनोखा और अभूतपूर्व है कि समूची फिजा़ं में एक ही व्यक्ति की चर्चा है और वह है नरेंद्र मोदी। भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी जिन्हें बड़े जोर-शोर से प्रधानमंत्री पद के लिये आगे किया गया है। इनके मुकाबले में हैं कांग्रेस के राहुल गांधी और एक हद तक ‘आम आदमी पार्टी’ के अरविंद केजरीवाल। केजरीवाल ने अभी कुछ ही दिनों पहले अपनी पार्टी बनायी है और देखते-देखते उनकी हैसियत इस योग्य हो गयी कि वह राष्ट्रीय राजनीति में जबर्दस्त ढंग से हस्तक्षेप कर सकें। कांग्रेस और भाजपा के बीच भारतीय राजनीति ने जो दो ध्रुवीय आकार ग्रहण किया था उसे तोड़ने में ‘आप’ ने एक भूमिका निभायी है और दोनों पार्टियों के नाकारापन से ऊबी जनता के सामने नए विकल्प का भ्रम खड़ा किया है।

केजरीवाल पूरी तरह राजनीति में हैं लेकिन एक अराजनीतिक नजरिए के साथ। उनका कहना है कि वह न तो दक्षिणपंथी हैं, न वामपंथी और न मध्यमार्गी। वह क्या हैं इसे उन्होंने ज्यादा परिभाषित न करते हुये लगभग अपनी हर सभाओं, बैठकों और संवाददाता सम्मेलनों में बस यही कहा है कि वह प्रधानमंत्री बनने के लिये नहीं बल्कि देश बचाने के लिये चुनाव लड़ रहे हैं। जिस तरह से सुब्रत राय शैली में चीख-चीख कर वह अपने देशभक्त होने और बाकी सभी को देशद्रोही बताने में लगे हैं उससे उनकी भी नीयत पर संदेह होता है। वैसे, आम जनता की नजर में अपनी कार्पोरेट विरोधी छवि बनाने वाले केजरीवाल ने उद्योगपतियों की एक बैठक में कह ही दिया कि वह पूंजीवाद विरोधी नहीं हैं और न पूंजीपतियों से उनका कोई विरोध है। उनका विरोध तो बस ‘क्रोनी कैपीटलिज्म’ से है। बहरहाल, इस टिप्पणी का मकसद मौजूदा चुनाव को लेकर लोगों के मन में पैदा विभिन्न आशंकाओं पर विचार करना है।

समूचे देश में इस बार गजब का ध्रुवीकरण हुआ है। अधिकांश मतदाता या तो मोदी के खिलाफ हैं या मोदी के पक्ष में। चुनाव के केंद्र में मोदी हैं और सभी तरह के मीडिया में वह छाए हुये हैं। जिस समय इंडिया शाइनिंग का नारा भाजपा ने दिया था या जब ‘अबकी बारी-अटल बिहारी’ का नारा गूंज रहा था उस समय भी प्रचार तंत्र पर इतने पैसे नहीं खर्च हुये थे जितने इस बार हो रहे हैं। जो लोग मोदी को पसंद करते हैं वे भाजपा के छः वर्ष के शासनकाल का हवाला देते हुये कहते हैं कि क्या उस समय आसमान टूट पड़ा था? पूरे देश में क्या सांप्रदायिक नरसंहार हो रहे थे? क्या नागरिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया था? नाजी जर्मनी की तरह क्या पुस्तकालयों को जला दिया गया था और बुद्धिजीवियों को देश निकाला दे दिया गया था? ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ था। फिर आज इतनी चिंता क्यों हो रही है? तमाम राजनीतिक दलों की तरह भाजपा भी एक राजनीतिक दल है और अगर वह चुनाव के जरिए सत्ता में आ जाती है तो क्या फर्क पड़ने जा रहा है? किसी के भी मन में इस तरह के सवाल उठने स्वाभाविक हैं। हालांकि जो लोग यह कह रहे हैं वे भूल जा रहे हैं कि उसी काल में किस तरह कुछ राज्यों की पाठ्यपुस्तकों में हास्यास्पद पाठ रखे गये और ईसाइयों को प्रताड़ित किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी ने भले ही ‘राजधर्म’ की बात कह कर अपने को थोड़ा अलग दिखा लिया हो पर केंद्र में अगर उनकी सरकार नहीं रही होती तो क्या नरेंद्र मोदी इतने आत्मविश्वास से गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम कर सकते थे? तो भी, अगर सचमुच कोई राजनीतिक दल चुनाव के जरिए जनता का विश्वास प्राप्त करता है (भले ही चुनाव कितने भी धांधलीपूर्ण क्यों न हों) तो उस विश्वास का सम्मान करना चाहिए।

लेकिन यह बात राजनीतिक दलों पर लागू होती है। मोदी के आने से चिंता इस बात की है कि वह किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के रूप में नहीं बल्कि राजनीतिक दल का लबादा ओढ़कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे फासीवादी संगठन के प्रतिनिधि के रूप में चुनाव मैदान में है। 1947 के बाद से यह पहला मौका है जब आर.एस.एस. पूरी ताकत के साथ अपने उस लक्ष्य तक पहुँचने के एजेंडा को लागू करने में लग गया है जिसके लिये 1925 में उसका गठन हुआ था। खुद को सांस्कृतिक संगठन के रूप में चित्रित करने वाले आर.एस.एस. ने किस तरह इस चुनाव में अपनी ही राजनीतिक भुजा भाजपा को हाशिए पर डाल दिया है इसे समझने के लिये असाधारण विद्वान होने की जरूरत नहीं है। लाल कृष्ण आडवाणी को अगर अपवाद मान लें तो जिन नेताओं को उसने किनारे किया है वे सभी भाजपा के उस हिस्से से आते हैं जिनकी जड़ें आर.एस.एस. में नहीं हैं। इस बार एक प्रचारक को प्रधानमंत्री बनाना है और आहिस्ता-आहिस्ता हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा पूरा करना है। इसीलिये मोदी को रोकना जरूरी हो जाता है। इसीलिये उन सभी ताकतों को किसी न किसी रूप में समर्थन देना जरूरी हो जाता है जो सचमुच मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोक सकें।

इस चुनाव में बड़ी चालाकी से राम मंदिर के मुद्दे को भाजपा ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। अपनी किसी चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी ने यह नहीं कहा कि वह राम मंदिर बनाएंगे। अगर वह ऐसा कहते तो एक बार फिर उन पार्टियों को इस बात का मौका मिलता जिनका विरोध बहुत सतही ढंग की धर्मनिरपेक्षता की वजह है और जो यह समझते हैं कि राम मंदिर बनाने या न बनाने से ही इस पार्टी का चरित्र तय होने जा रहा है। वे यह भूल जा रही हैं कि आर.एस.एस की विचारधारा की बुनियाद ही फासीवाद पर टिकी हुयी है जिसका निरूपण काफी पहले उनके गुरुजी एम.एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ पुस्तक में किया था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि ‘भारत में सभी गैर हिन्दू लोगों को हिन्दू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी और हिन्दू धर्म का आदर करना होगा और हिन्दू जाति और संस्कृति के गौरवगान के अलावा कोई और विचार अपने मन में नहीं लाना होगा।’ इस पुस्तक के पांचवें अध्याय में इसी क्रम में वह आगे लिखते हैं कि ‘वे (मुसलमान) विदेशी होकर रहना छोड़ें नहीं तो विशेष सलूक की तो बात ही अलग, उन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा, उनके कोई विशेष अधिकार नहीं होंगे-यहां तक कि नागरिक अधिकार भी नहीं।’

भाजपा के नेताओं से जब इस पुस्तक की चर्चा की जाती है तो वह जवाब में कहते हैं कि वह दौर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का था और उस परिस्थिति में लिखी गयी पुस्तक का जिक्र अभी बेमानी है। लेकिन 1996 में तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आधिकारिक तौर पर इस पुस्तक से पल्ला झाड़ते हुये कहा कि यह पुस्तक न तो ‘परिपक्व’ गुरुजी के विचारों का और न आरएसएस के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है। यह और बात है कि इस पुस्तक के प्रकाशन के एक वर्ष बाद ही 1940 में गोलवलकर आरएसएस के सरसंघचालक बने। काफी पहले सितंबर 1979 में समाजवादी नेता मधु लिमये ने अपने एक साक्षात्कार में गोलवलकर की अन्य पुस्तक ‘बंच ऑफ थाट्स’ के हवाले से बताया था कि गोलवलकर ने देश के लिये तीन आंतरिक खतरे बताए हैं-मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट।

गोलवलकर की पुस्तक ‘वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ 1939 में लिखी गयी थी लेकिन आज नरेन्द्र मोदी के मित्र और भाजपा के एक प्रमुख नेता सुब्रमण्यम स्वामी गोलवलकर के उन्हीं विचारों को जब अपनी भाषा में सामने लाते हैं तो इसका क्या अर्थ लगाया जाय। 16 जुलाई 2011 को मुंबई से प्रकाशित समाचार पत्र डीएनए में ‘हाउ टु वाइप आउट इस्लामिक टेरर’ शीर्षक अपने लेख में उन्होंने ‘इस्लामी आतंकवाद’ से निपटने के लिये ढेर सारे सुझाव दिये हैं और कहा है कि अगर कोई सरकार इन सुझावों पर अमल करे तो भारत को पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र बनाया जा सकता है। अपने लेख में उन्होंने लिखा है कि ‘इंडिया यानी भारत यानी हिन्दुस्तान हिन्दुओं का और उन लोगों का राष्ट्र है जिनके पूर्वज हिन्दू थे। इसके अलावा जो लोग इसे मानने से इनकार करते हैं अथवा वे विदेशी जो पंजीकरण के जरिए भारतीय नागरिक की हैसियत रखते हैं वे भारत में रह तो सकते हैं लेकिन उनके पास वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए।’

गौर करने की बात है कि गोलवलकर और सुब्रमण्यम स्वामी दोनों इस पक्ष में हैं कि जो अपने को हिन्दू नहीं मानते हैं उनके पास किसी तरह का नागरिक अधिकार नहीं होना चाहिए। अपने इसी लेख में सुब्रमण्यम स्वामी ने सुझाव दिया कि काशी विश्वनाथ मंदिर से लगी मस्जिद को हटा दिया जाय और देश के अन्य हिस्सों में मंदिरों के पास स्थित अन्य 300 मस्जिदों को भी समाप्त कर दिया जाय। उन्होंने यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने की मांग करते हुये कहा है कि संस्कृत की शिक्षा को और वंदे मातरम को सबके लिये अनिवार्य कर दिया जाय। भारत आने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की समस्या के समाधान के लिये उनका एक अजीबो-गरीब सुझाव है। उनका कहना है कि ‘सिलहट से लेकर खुल्ना तक के बांग्लादेश के इलाके को भारत में मिला लिया जाय’।

आप कह सकते हैं कि सुब्रमण्यम स्वामी को आर.एस.एस या नरेंद्र मोदी से न जोड़ा जाय। लेकिन जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में एक अत्यंत सांप्रदायिक लेख लिखने और ‘हेडलाइंस टुडे’ चैनल के पत्रकार राहुल कंवल को बेहद आपत्तिजनक इंटरव्यू देने के बाद ही उन्हें दोबारा भाजपा में शामिल कर लिया गया और जैसा कि वह खुद बताते हैं, उनके सुझाव पर ही पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया। राहुल कंवल को उन्होंने जो इंटरव्यू दिया था उसमें उन्होंने कहा कि ‘भारत में 80 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं। अगर हम हिन्दू वोटों को एकजुट कर लें और मुसलमानों की आबादी में से 7 प्रतिशत को अपनी ओर मिला लें तो सत्ता पर कब्जा कर सकते हैं। मुसलमानों में काफी फूट है। इनमें से शिया, बरेलवी और अहमदी पहले से ही भाजपा के करीब हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि मुसलमानों का समग्र रूप से कोई एक वोट बैंक है। आप खुद देखिए कि पाकिस्तान में किस तरह बर्बरता के साथ शिया लोगों का सफाया किया गया। हमारी रणनीति बहुत साफ होनी चाहिए। हिन्दुओं को एक झंडे के नीचे एकजुट करो और मुसलमानों में फूट डालो।’ यह इंटरव्यू 21 जुलाई 2013 का है। इसी इंटरव्यू में उन्होंने आगे कहा है कि ‘अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो निश्चित तौर पर अयोध्या में राममंदिर का निर्माण होगा। इस मुद्दे पर पीछे जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। हम कानूनी रास्ता अख्तियार करेंगे और मुसलमानों को भी मनाएंगे। मंदिर का मुद्दा हमेशा भाजपा के एजेंडे पर रहा है।’

डीएनए में प्रकाशित लेख के बाद हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों के अंदर तीखी प्रतिक्रिया हुयी क्योंकि सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी डॉक्टरेट की उपाधि हॉर्वर्ड से ली है और वहां वह अभी भी एक पाठ्यक्रम पढ़ाने जाते हैं। हॉर्वर्ड अकादमिक समुदाय ने स्वामी के लेख को अत्यंत आक्रामक और खतरनाक बताते हुये इस बात पर शर्मिंदगी जाहिर की कि उनके विश्वविद्यालय से जुड़ा कोई व्यक्ति ऐसे विचार व्यक्त कर सकता है। विश्वविद्यालय ने फौरी तौर पर यह भी फैसला किया कि इकोनॉमिक्स पर जिस समर कोर्स को पढ़ाने के लिये स्वामी वहां जाते हैं उस कोर्स को हटा दिया जाय। बाद में एक लंबी बहस के बाद अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वामी के उस लेख वाले अध्याय पर पर्दा डाल दिया गया लेकिन इस विरोध को देखते हुये डीएनए अखबार ने अपनी वेबसाइट पर से स्वामी के लेख को हटा दिया।

किसी राजनीतिक दल के रूप में भाजपा के आने अथवा भाजपा के किसी प्रत्याशी के प्रधानमंत्री बनने से भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! लेकिन यहाँ मामला कुछ और है।

अभी जो लोग नरेन्द्र मोदी को लेकर चिंतित हैं उनकी चिंता पूरी तरह वाजिब है।

 

लेखक आनंद स्वरूप वर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व विदेश नीति के एक्सपर्ट हैं। समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक हैं। प्रस्तुत लेख 'समकालीन तीसरी दुनिया' अप्रैल 2014 के अंक में संपादकीय के रूप में छप चुका है।
 

इंडिया टीवी का जर्नलिस्ट निकला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता

नवी मुंबई। अभी तक टीवी व प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकारों पर पेड न्यूज़ लिखने का आरोप कुछ लोग लगाते रहे हैं। हालांकि इसकी कहीं भी पुष्टि नहीं हो पाई है। पर देश में सबसे अधिक टीआरपी वाले प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनेल इंडिया टीवी (श्री रजत शर्माजी जिसके एडीटर हैं) की तरफ से नवी मुंबई, पनवेल व रायगढ़ क्षेत्र से न्यूज़ भेजने वाला गोपाल शाह नामक उनका टीवी जर्नलिस्ट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में सामने आया है। विभिन्न सूत्रों से यह भी पता चला है और खुद इस संवाददाताता ने देखा है कि गोपाल शाह अपनी टाटा इंडिगो कार पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता का लेबल लगाकर पूरे शहर में घूमता है। इसके अलावा वह खुद का अपना परिचय इसी रूप में देता है व साथ में इंडिया टीवी का टीवी जर्नलिस्ट बताते हुए सबको कहता है कि मैं अब इंडिया टीवी में परमानेंट हो चुका हूँ।

रविवार छह अप्रैल को महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित मराठी दैनिक लोकमत के मुंबई मेन एडीशन के चौथे पेज पर "जयंत पाटलांचे तीन 'एक्के'! " नाम से एक बड़ी खबर छपी है(http://www.epaper.lokmat.com/epapermain.aspx)। इसी खबर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी द्वारा रायगढ़ के अलीबाग संसदीय क्षेत्र से सुनील शाम तटकरे को प्रत्याशी के रूप में खड़ा किया गया है। इस खबर के बीच में एक बड़ी सी फोटो भी छपी है जिसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी सुनील शाम तटकरे व एक अन्य समर्थक के साथ इसी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता व इण्डिया टीवी तथा लेमन टीवी के टीवी जर्नलिस्ट गोपाल शाह(चेक्स वाली शर्ट व जींस पैंट पहने) भी पार्टी प्रत्याशी के साथ प्रचार करते हुए दिखाई दे रहा है। गोपाल शाह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता व इंडिया टीवी के टीवी जर्नलिस्ट के रूप में दोनों जिम्मेदारी एक साथ पूरी कर रहे हैं। गोपाल शाह के खुलेआम इस राजनैतिक कार्य व समर्थन से न सिर्फ पत्रकारों व उनके संगठनों में भारी रोष व्याप्त हो गया है बल्कि गोपाल शाह की पत्रकारिता की नीयत पर भी संदेह के बादल छा गए हैं। ऐसा नहीं है कि इस खबर में छपी फोटों में ही गोपाल शाह नजर आ रहे हैं। अगर इस खबर को पूरा पढ़ा जाए तो उसमें गोपाल शाह का एक स्टेटमेंट भी बतौर राकांपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में छपा है। मराठी में छपा राकांपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल शाह का यह बयान इस प्रकार से है- "राष्ट्रवादी कॉग्रेस पार्टी हा निवडणूक आयोगाकडे नोंदणीकृत अधिकृत राजकीय पक्ष असून, त्याचे राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश कुमार आहेत. नॅशनलिस्ट काँग्रेस पार्टी आमच्या पक्षाच्या नावाचा गैरवापर करीत आहे. आता त्यांना तो करता येणार नाही आणि जर केला तर तो गुन्हा ठरेल, अशी भूमिका राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टीचे राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल साहा यांनी सांगितले. या पक्षाने राज्यात चार उमेदवार रिगणात उतरवले आहेत. ठाण्यात संजीव नाईक यांच्या विरोधात विनोद गंगवाल, मुंबईत प्रिया दत्त व पूनम महाजन यांच्या विरोधात शीतलकुमार जैन, कल्याणमध्ये एक, असे साहा यांनी सांगितले।"

ध्यान रहे कि रायगढ़ से अलीबाग सीट से शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की तरफ से यहाँ रायगढ़ जिले के पालक मंत्री व महाराष्ट्र के सीनियर कैबिनेट मिनिस्टर सुनील तटकरे खड़ा किया गया है। इस सीट पर एनसीपी व शेतकरी कामगार पक्ष (शेकाप) के बीच बहुत तनातनी है। ऐसे में शरद पवार के सुप्रीमो वाली एनसीपी के मराठी अनुवाद "राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी" के नाम से नयी पार्टी का रजिस्ट्रेशन कराने के बाद इसी नाम की पार्टी से एनसीपी मिनिस्टर सुनील तटकरे के हूबहू नाम वाले सुनील तटकरे (दोनों के पिता का नाम अलग है) को चुनाव में खड़ा कर दिया गया है।

बता दें कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश कुमार हैं तथा उनके ऊपर डीआरआई के दो मामले दर्ज हैं। इसके साथ ही यहाँ यह भी बता दें कि खुद गोपाल शाह को किसी मामले में खारघर पुलिस स्टेशन में 8 घंटे तक बिठा दिया गया था तथा कुछ लोगों के अनुरोध के बाद उसे वहाँ से छोड़ा गया था। इसके अलावा हाल ही में कोपरखैरणे पुलिस स्टेशन में एक घर खाली कराने के मामले में गोपाल शाह ने खुद को इंडिया टीवी का टीवी जर्नलिस्ट बताते हुए पुलिस पर दबाव डालते हुए एक महिला से उसका घर जबरन खाली कराने की कोशिश की थी पर उलटे पुलिस ने ही गोपाल शाह को पूछताछ के लिए रोक लिया था व सूत्रों का कहना है कि अंत में जब गोपाल शाह ने कोपरखैरणे के असिस्टेंट पुलिस इन्स्पेक्टर सूर्यवंशी को लिखित माफीनामा दिया तभी उनको पुलिस स्टेशन से जाने दिया गया। अब लोकसभा के इस चुनावी माहौल में राज्य के कैबिनेट मिनिस्टर सुनील तटकरे के खिलाफ खड़े किये गए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की तरफ से उनके ही नाम वाले सुनील शाम तटकरे नामक प्रत्याशी की ओट में बड़े पैमाने पर रूपए ऐंठने की कोशिश करने की आशंका गोपाल शाह पर एनसीपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया है। इससे और किसी का नुकसान भले ही हो या न हो, पर इंडिया टीवी जैसे प्रतिष्ठित टीवी न्यूज़ चैनल की साख पर जरूर आंच आने की संभावना अन्य दलों के लोगों ने जताई है।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

द इकोनोमिस्‍ट ने लिखा – क्या कोई नरेंद्र मोदी को रोक सकता है?

Om Thanvi : कल 'द इकोनोमिस्ट' के बहुचर्चित लेख पर बात हुई थी। मैंने लिखा था काश कोई इसका अनुवाद कर देता। दो मित्रों ने तुरंत कर भेजा। एक मित्र का सन्देश था कि कि वे भी भेज रहे हैं। वे कृपया मेहनत न करें, मित्रवर मनोज खरे Manoj Khare का उम्दा अनुवाद मिल गया है। समाजी सरोकार वाले तमाम मित्रों की ओर से उनका आभार।

क्या कोई नरेंद्र मोदी को रोक सकता है?

(सम्भव है वे भारत के अगले प्रधानमंत्री बन जाएं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि वे इसके योग्य हैं।)

कौन भारत में होने वाले आम चुनावों के संभावित परिणामों के बारे में नहीं सोच रहा है? सात अप्रैल से शुरू होने वाले चुनाव में मुंबई के करोड़पतियों के साथ-साथ अशिक्षित ग्रामीणों और झोपड़पट्टियों में रहने वाले गरीब-वंचित लोगों को भी अपनी सरकार चुनने का बराबर का हक होगा। नौ चरणों में पांच सप्ताह से ज्यादा चलने वाले मतदान में लगभग 81.5 करोड़ नागरिक अपने मत का प्रयोग करेंगे जो कि इतिहास में एक सबसे बड़ा सामूहिक लोकतांत्रिक कार्य होगा। लेकिन कौन भारत के राजनीतिज्ञों के दुर्बल, गैरजवाबदेह और अनैतिक चरित्र की निंदा नहीं करता? समस्याओं से आकंठ डूबा देश कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में बनी गठबंधन सरकार के अधीन दस वर्षों के दौरान मझदार में पहुंच गया है, जिसका कोई खेवनहार नहीं है। वृद्धि-दर घटकर लगभग आधी- 5 प्रतिशत के आस-पास रह गई है, जो कि प्रति वर्ष नौकरी करने के लिए बाजार में उतरने वाले करोड़ों युवा भारतीयों को रोजगार देने की दृष्टि से बहुत कम है। सुधार अधूरे रह गए हैं, सड़कें और बिजली उपलब्ध नहीं है। बच्चों की पढ़ाई- लिखाई नहीं हो पाती है। जबकि विडंबना यह है कि नेताओं और अफसरों द्वारा ली जाने वाली रिश्वत का आंकड़ा कांग्रेस के शासन-काल में चार से बारह बिलियन डॉलर के बीच पहुंच गया है।

भारतीय लोगों की नजर में राजनीति का मतलब है- भ्रष्टाचार। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी को भारत का अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। लेकिन वे अपने कांग्रेस पार्टी के प्रतिद्वंद्वी नेता राहुल गांधी से ज्यादा अलग नहीं हैं। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रदौहित्र राहुल गांधी इस तरह पदग्रहण करने को तैयार बैठे हैं, मानो यह उनका दैवी अधिकार हो। जबकि मोदी पहले चाय बेचने वाले थे जो कि महज अपनी योग्यता के बलबूते ऊपर तक पहुंचे हैं। लगता है मिस्टर गांधी अपने ही मानस को नहीं समझते। यहां तक कि वे नहीं जानते कि उन्हें सत्ता चाहिए या नहीं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी का कामकाज दर्शाता है कि उन्होंने आर्थिक विकास किया है और वे विकास को धरातल पर उतार सकते हैं। राहुल गांधी के गठबंधन पर भ्रष्टाचार की कालिख पुती हुई है। जबकि तुलनात्मक रूप से मोदी साफ-सुथरे हैं। इस तरह प्रशंसा के लिए काफी कुछ है। फिर भी यह पत्रिका नरेंद्र मोदी को भारत के सर्वोच्च पद के लिए अपना समर्थन नहीं दे सकती।

मोदी की दुर्भावना

कारण शुरू होता है गुजरात में 2002 में मुसलमानों के विरूद्ध हिंदुओं के उन्मादी दंगों से, जिनमें कम से कम एक हजार लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे। अमदाबाद और आसपास के कस्बों-गांवों में चला हत्याओं और बलात्कार का दौर, एक ट्रेन में सवार 59 हिंदू तीर्थयात्रियों की मुसलमानों द्वारा की गई हत्या का बदला था। नरेंद्र मोदी ने 1990 में अयोध्या स्थित पवित्र-स्थल पर एक यात्रा का आयोजन करने में सहायता की थी, जिसके परिणामस्वरूप दो वर्ष बाद हिंदू-मुसलमान झड़पों में 2000 लोगों को जान गवांनी पड़ी थी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक आजीवन सदस्य हैं जो कि एक हिंदू राष्ट्रवादी समूह है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लक्ष्य के प्रति समर्पित होने के कारण ही उन्होंने जीवन भर के लिए ब्रह्मचर्य अपनाया और अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काने वाले शर्मनाक भाषण दिए। 2002 में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और उन पर जनसंहार होने देने या समर्थन करने तक के आरोप लगे।

मोदी के बचावकर्त्ता और उनके अनेक समर्थक, खासकर वे जो कारोबारी अभिजात्य वर्ग के हैं, दो बातें कहते हैं। पहली, बार-बार की गई जांच-पड़तालों में जिसमें प्रशंसनीय स्वतंत्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा कराई गई जांच भी शामिल है, ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी पर कोई आरोप लगाया जा सके। और दूसरी बात वे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने अब खुद में बदलाव लाया है। उन्होंने निवेश आकर्षित करने और हिंदू-मुसलमानों को समान रूप से फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अथक कार्य किया है। वे कहते हैं कि एक सुसंचालित अर्थव्यवस्था में देश भर के गरीब मुसलमानों को मिलने वाले भारी लाभ के बारे में सोचिए।

दोनों आधार पर यह अत्यंत उदार नजरिया है। दंगों के बारे में बैठायी गई जांच निष्कर्षहीन रहने का एक कारण यह है कि ज्यादातर सबूत या तो नष्ट हो गए थे या जानबूझ कर नष्ट कर दिए गए थे। और अगर 2002 में तथ्य अस्पष्ट और धुंधले थे तो नरेंद्र मोदी के विचार भी अब भी वैसे ही हैं। जो कुछ हुआ उसका स्पष्टीकरण देते हुए माफी मांग कर वे नरसंहार को अपने से पीछे छोड़ सकते थे। पर उन्हें दंगों और नरसंहार के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देना भी गवारा नहीं है। पिछले वर्ष दी गई एक दुर्लभ टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि उन्हें मुसलमानों की पीड़ा पर उसी तरह का दुःख है, जैसा दुःख चलती कार के नीचे किसी कुत्ते के पिल्ले के आ जाने से होता है। शोर-शराबा मचने पर उन्होंने कहा कि उनका तात्पर्य सिर्फ इतना था कि हिंदू सभी प्राणियों का ध्यान रखते हैं। मुसलमानों और उग्र हिंदुओं ने इससे अलग-अलग संदेश ग्रहण किए। अन्य भाजपा नेताओं से अलग, नरेंद्र मोदी ने मुसलिम ढंग की टोपी पहनने से मना कर दिया और 2013 में उत्तर प्रदेश में हुए दंगो की निंदा नहीं की, जिसके ज्यादातर पीड़ित मुसलमान थे।

दो में कम बुरा

''डॉग-व्हिसिल पॉलिटिक्स'' हर देश में निंदनीय है, जिसमें ऐसी द्विअर्थी भाषा का प्रयोग होता है, जिसका आम जनता के लिए एक मतलब होता है तो किसी अन्य उप-समूह के लिए दूसरा। लेकिन भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा उभरती रही है। विभाजन के वक्त, जब ब्रिटिश भारत विभक्त हुआ था तब लगभग 1.2 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे और सैकड़ों मारे गए थे। 2002 के बाद में सांप्रदायिक हिंसा काफी कम हो चुकी है। लेकिन अभी भी सैकड़ों घटनाएं होती रहती हैं और प्रतिवर्ष दर्जनों जानें जाती हैं। कभी-कभी, जैसा कि उत्तर प्रदेश में हाल में हुआ, हिंसा खतरनाक स्तर पर होती है। चिंगारी बाहर से भी भड़क सकती है। मुंबई में 2008 में भारत आतंकवादियों के भयानक हमले का शिकार बना जो कि परमाणु-अस्त्रों से लैस पड़ोसी देश पाकिस्तान से आए थे। पाकिस्तान भारत के लिए हमेशा चिंता का कारण रहा है।

मुसलमानों के भय को समाप्त करने से इंकार करके मोदी उस भय को खुराक देते हैं। मुसलिम-विरोधी मतों को मजबूती से थाम कर वे इस भय को खाद-पानी देते हैं। भारत विभिन्न तरह के धार्मिक आस्थाओं, धर्मावलंबियों और विद्रोही लोगों का आनंदमय, लेकिन कोलाहलपूर्ण देश है। इनमें स्तंभकार दिवंगत खुशवंत सिंह जैसे श्रेष्ठ लोग भी हैं जो सांप्रदायिक घृणा से होने वाली क्षति के बारे में जानते हैं और उससे दुःखी रहते हैं।

नरेंद्र मोदी दिल्ली में अच्छी शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन देर-सबेर उन्हें सांप्रदायिक खून-खराबे या पाकिस्तान के साथ संकट की स्थिति से दो-चार होना पड़ेगा। और कोई नहीं जानता, कम से कम वे आधुनिक लोग जो आज मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं, कि मोदी क्या करेंगे या मुसलमानों की मोदी जैसे विभाजनकारी व्यक्ति के प्रति कैसी प्रतिक्रिया होगी। अगर नरेंद्र मोदी हिंसा में अपनी भूमिका स्पष्ट करते और सच्चा पश्चाताप जाहिर करते तो हम उनका समर्थन करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया। उचित नहीं होगा कि उन जैसा शख्स जो लोगों को बांटता आया है, विस्फोट के मुहाने पर बैठे भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री बने। राहुल गांधी के नेतृत्व में कोई कांग्रेस सरकार बने इसके आसार हमें आशाजनक नहीं लगते। लेकिन हमें फिर भी कम गड़बड़ी वाले विकल्प के रूप में भारतीय जनमानस को इसकी अनुशंसा करना चाहेंगे।

अगर कांग्रेस जीतती है, जिसकी संभावना न के बराबर है, तो उसे अपने आप को फिर से नया करना पड़ेगा और देश का सुधार करना होगा। राहुल गांधी को चाहिए कि वे राजनीति से पीछे हट कर आधुनिकतावादियों को आगे लाएं और अपनी आत्मविश्वासहीनता को एक गुण के रूप में स्थापित करें। ऐसे लोग वहां बहुत हैं और आधुनिकता ही वह चीज है, जिसे भारतीय मतदाता ज्यादा से ज्यादा चाहते हैं। अगर भाजपा की जीत होती है, जिस की संभावना ज्यादा है, तो उसके गठबंधन सहयोगियों को मोदी को छोड़ किसी अन्य नेता को प्रधानमंत्री बनाने पर जोर देना चाहिए।

फिर भी वे नरेंद्र मोदी को ही चुनें तो? हम उनके भले की कामना करेंगे और हमें खुशी होगी अगर वे भारत को आधुनिक, ईमानदार और सम्यक सुशासन प्रदान कर हमें गलत साबित कर देंगे। लेकिन अभी तो नरेंद्र मोदी को उनके रिकार्ड के आधार पर ही जांचा जा सकता है, जो अब भी सांप्रदायिक घृणा से जुड़ा हुआ है। वहाँ कुछ भी आधुनिक, ईमानदार और सम्यक नहीं है। भारत को इससे बेहतर नेतृत्व मिलना चाहिए। (समाप्त)

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं जनसत्‍ता के संपादक ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.

जी ने लांच किया पंजाब-हरियाण-हिमाचल चैनल

टीआरपी में लगातार हिचकोले खाते जी मीडिया कॉरपोरेशन ने जी पंजाब हरियाणा हिमाचल चैनल की लांचिंग शुक्रवार को की. इसे कुरुक्षेत्र से शुरू किया गया है. चैनल की लांचिंग के बाद कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आलोक अग्रवाल ने कहा कि जी मीडिया समूह की शुरुआत में पंजाब की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए 18 अक्टूबर 1999 में की गई थी. जी मीडिया समाचार जगत में अग्रदूत रहा है तथा इसने विभिन्न राज्यों की जरूरतों की पूर्ति के लिए कई क्षेत्रीय चैनल लांच किए हैं.

जी समूह इस चैनल के माध्‍यम से पंजाब-हरियाणा-हिमाचल की समस्‍याओं को शासन-प्रशासन के सामने लाएगा. यह चैनल हरियाणा के कंटेंट पर विशेष प्रोग्रामिंग एवं समाचार बुलेटिंस का प्रसारण करेगा. जी पंजाब-हरियाणा-हिमाचल संपादक संजय वोहरा ने कहा कि हमारा यह निरंतर प्रयास रहा है कि हम इन सभी तीन राज्यों के दर्शकों को उनकी संबद्ध भाषाओं में जरूरतों की पूर्ति करें तथा उन मुद्दों को अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान करें, जिसके विषय में अभी तक कुछ भी नहीं सुना और कहा गया है.

कंपनी का कहना है कि इस चैनल का उद्देश्य क्षेत्रीय उपस्थिति को बढ़ावा देना और हरियाणा में व्यापक पहुँच सुनिश्चित करना है. इसके साथ ही स्थानीय समाचारों की प्रासंगिकता का निर्माण करना और क्षेत्रीय समाचार बाजारों के महत्व में बढ़ोतरी करना भी है.

सामना के पूर्व संपादक बाल ठाकरे के खिलाफ अपील खारिज

मुंबई : बंबई हाईकोर्ट ने 1998 में सामना के तत्‍कालीन संपादक व शिवसेना संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे को मानहानि के मुकदमे से बरी करने के खिलाफ दायर समाजवादी पार्टी नेता अबु आसिम आजमी की अपील खारिज कर दी है. कोर्ट में जब यह मामला पेश किया गया तो सपा नेता आजमी पेश नहीं हुए. इसके चलते न्‍यायमूर्ति मृदुला भटनागर ने आजमी की अपील खारिज कर दी. आजमी इसके पहले भी कई तारीखों पर कोर्ट के सामने पेश नहीं हुए थे.

शिवसेना के मुखपत्र सामना ने 1 जुलाई 1998 को एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सपा नेता 1993 बम विस्फोट मामले में आरोपी हैं और उन्होंने धन बल से सुप्रीम कोर्ट से जमानत हासिल कर ली है. इस पर आजमी ने सामना के तत्कालीन संपादक ठाकरे, कार्यकारी संपादक संजय राउत और मुद्रक सुभाष देसाई के खिलाफ मजिस्ट्रेट की अदालत में मानहानि का मामला दायर किया था.

आजमी के उपस्थित न होने पर अदालत ने कहा कि शायद अपीलकर्ता को मामला आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं है क्योंकि ठाकरे का निधन हो चुका है और इससे कोई मकसद पूरा नहीं होगा. इसलिए यह अपील खारिज की जाती है.

समाचार प्लस (यूपी-उत्तराखंड) से जुड़े विकास शर्मा

ख़बर है कि विकास शर्मा ने समाचार प्लस (यूपी-उत्तराखंड) के साथ बतौर एंकर-प्रोड्यूसर नई पारी की शुरुआत की है। ऑल इंडिया रेडियों, एफएम रेडियो, डीटीएच की हिंदी प्रसारण सेवा और गोल्ड दिल्ली में रेडियो जॉकी रहे विकास टोटल टीवी, टीवी100 और जनता टीवी में बतौर एंकर काम कर चुके हैं। विकास 2011 से 2012 तक इंडिया न्यूज़ में प्राइम टाइम एंकर भी रहे हैं।

 
 

पटना की गलियों तक सिमटा भास्कर, नये ठिकानों की तलाश में कई जिला संवाददाता

दैनिक भास्कर के बिहार में आने और उसके लांच होने के बाद यहां की पत्रकारिता जगत में काफी उथल-पुथल की स्थिति बन गई थी। कई मीडिया हाउसों के लोग इधर से उधर गये थे। पटना में अखबारों की कीमत भी घटी। कई जिलों के हिन्दुस्तान और जागरण के ब्यूरो प्रभारियों ने दैनिक भास्कर का दामन थाम लिया था। लेकिन आज वे खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। कारण है दैनिक भास्कर का सिर्फ राजधानी पटना में ही सिमट कर रह जाना।

राजधानी पटना में काफी धूमधाम के साथ दैनिक भास्कर की लांचिंग की गई थी। लेकिन लांचिंग के तीन माह बाद भी दैनिक भास्कर राजधानी पटना की गलियों से निकलकर अन्य जिलों तक अपनी पहुंच नहीं बना पाया है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि भास्कर को बिहार से जो उम्मीदें थीं उसमें वह सफल नहीं हो पाई है। अब तो यहां की पत्रकारिता जगत में यह भी कयास लगाये जा रहे हैं कि जब चुनाव के वक्त भास्कर पटना के अलावा अन्य जिलों में अपनी पहुंच बनाने का प्रयास भी नहीं कर रहा है तो हो सकता है कि यह अखबार राजधानी पटना तक ही सिमट कर रह जाए।

ऐसे में कई जिलों के भास्कर संवाददाता अपने लिए नये ठिकाने की तलाश में जुट गए हैं। ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव समाप्त होते-होते भास्कर के कई जिला संवाददाता अपने पुराने घर में वापसी कर सकते हैं।

 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।
 

पीएमओ ने कहा वाड्रा डीएलएफ की सूचना माँगना ग़ैरकानूनी और आरटीआई का दुरुपयोग है

प्रधानमंत्री कार्यालय रोबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ से जुड़े आरोपों के बारे में कोई भी सूचना तो नहीं ही देना चाहता, वह इस सूचना मांगने को गैरकानूनी, क़ानून का दुरुपयोग और आरटीआई एक्ट का बेज़ा इस्तेमाल भी समझता है।

 
लखनऊ स्थित आरटीआई कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने डीएलएफ-वाड्रा प्रकरण में अपने द्वारा भेजी शिकायत और इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर पीआईएल के सम्बन्ध में 06 फ़रवरी 2013 को पीएमओ से कुछ सामान्य किस्म की सूचनाएँ मांगी थीं।

पीएमओ द्वारा लगातार मना करने पर उन्होंने केन्द्रीय सूचना आयोग को शिकायत भेजी जिस पर सूचना आयोग ने पीएमओ से लिखित उत्तर माँगा। इस पर पीएमओ के उपसचिव एसई रिजवी ने 03 अप्रैल 2014 को भेजे 15 पन्नों के अपने लम्बे उत्तर के साथ 48 पन्नों में कुल 18 संलग्नक भेजते हुए एक बार फिर सूचना देने से मना कर दिया है।

पीएमओ ने सूचना नहीं देने के लिए अरविन्द केजरीवाल बनाम सीपीआईओ मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय का सहारा लेने के अलावा इसे व्यक्तिगत और वैश्वासिक नातेदारी में दी गयी सूचना बताते हुए आरटीआई एक्ट तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की विभिन्न धाराओं का भी उल्लेख किया है और यह सूचना मांगने के लिए डॉ ठाकुर पर खासी नाराजगी जाहिर की है।

पीएमओ द्वारा भेजा गया आरटीआई का जवाब

 

क्या केजरीवाल इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा पायेंगे?

'आधार कार्ड परियोजना के खिलाफ क्यों खामोश हैं कारपोरेट के खिलाफ जिहादी केजरीवाल?'
'केजरीवाल के साथ जनांदोलनों के चेहरे तो हैं, लेकिन उनके मुद्दे सिर से गायब क्यों हैं?'

क्या सच में केजरीवाल में है इतना दम है कि वे इस चुनाव में वाकई महत्वपूर्ण किरदार निभा पायेंगे? जिस तरह से उन्हें दिल्ली का मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा, उससे उनकी राजनीतिक साख को बट्टा लग गया है तो दूसरी ओर उन्होंने भ्रष्टाचार के मसले उठाते हुए कारपोरेट राज को बेपर्दा करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में सवाल तो उठा दिया लेकिन उन्होने आर्थिक सुधारों के बारे में, विनिवेश और विदेशी पूंजी निवेश के जरिये बेदखल हो गयी अर्थव्यवस्था के बारे में मौन साध रखा है।

जनांदोलनों के तमाम चमकते चेहरे आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। यह निश्चय ही भारतीय राजनीति में निर्णायक मोड़ है कि डूब देश की प्रवक्ता मेधा पाटेकर महानगर मुंबई से चुनाव मैदान में हैं तो बस्तर में आदिवासी अस्मिता का चेहरा सोनी सोरी आप उम्मीदवार है। अब सवाल यह है कि उन मुद्दों के बारे में केजरीवाल खामोश क्यों हैं, जिन्हें लेकर ये तमाम आंदोलन होते रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों की बंदरबांट पर चुनिंदा कंपनियों के खिलाफ आवाज उठाने से ही जल जंगल जमीन के हक हकूक बहाल नहीं हो जाते। जो लोग आप के मोर्चे से देश में आम आदमी का राज कायम करना चाहते हैं, उनके सरोकार पर भी वही सवाल उठाये जाने चाहिए जो अस्मिता राजनीति के झंडाबरदारों के खिलाफ उठाये जा रहे हैं। उनके उन बुनियादी मुद्दों पर उस आम आदमी पार्टी का क्या कार्यक्रम है, इसका तो खुलासा होना चाहिए।

बतौर दिल्ली के मुख्यमंत्री नागरिक और मानवाधिकार बहाल करने में अरविंद ने क्या कुछ पहल की, उससे उनकी रुझान के बारे में अंदाजा मिल सकता है। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के मातहत करने की उनकी जंग को नाजायज नहीं कहा जा सकता। इस लड़ाई में दिल्ली की जनता भी उनके साथ खड़ी थी। सड़क पर जब वे अराजकता का नारा बुलंद कर रहे थे, तब भी मीडिया और राजनीति में हंगामा बरप जाने के साथ कारपोरेट समर्थन सिरे से गायब हो जाने के बाद भी जनता उनके साथ खड़ी थी।जबकि बिजली पानी की समस्याएं दूर करने की कोई स्थाई पहल नहीं की उन्होंने, सब्सिडी मार्फत वाहवाही लूटने की कोशिश ही की। जाहिर सी बात है कि मौजूदा हालात में वे लोकपाल बिल दिल्ली विधानसभा से समर्थक कांग्रेस के प्रबल विरोध के बावजूद किसी भी सूरत में पास नहीं करा सकते थे। कारपोरेट कंपनियों के खिलाफ एफआईआर तो उन्होंने दर्ज करा दी लेकिन सरकार छोड़ कर भाग जाने से वह लड़ाई भी अधूरी रह गयी।

सबसे बड़ा करिश्मा केजरीवाल कारपोरेट आधार परियोजना को रद्द करने की मांग करके कर सकते थे। पहले ही बंगाल विधानसभा ने आधार विरोधी प्रस्ताव पास किया हुआ था, दिल्ली विधानसभा में हालांकि ऐसे किसी प्रस्ताव की गुंजाइश तो थी नहीं, लेकिन वे मांग  तो कर ही सकता थे। तेल और गैस घोटाले में रिलायंस के खिलाफ जिहाद करने वाले अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट की मनाही के बावजूद जारी आधार अभियान पर कोई ऐतराज नहीं है, बाकी आईटी कंपनियों के मुकाबले इंफोसिस की अबाध उड़ान में उन्हें कोई भ्रष्टाचार नजर नहीं आया। बिना संसदीय अनुमोदन के जरुरी सेवाओं के लिए आधार की बायमैट्रिक अनिवार्यता से उन्हें नागरिक और मानवादिकार हनन का कोई मामला नहीं दिखा, यह अचरज की बात है। तो अगर उनकी रिलायंस विरोधी जंग को कारपोरेट कंपनियों की अंदरुनी लड़ाई मान लिया जाये, इसके लिए केजरीवाल किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते।

ईमानदारी की बात तो यह थी कि दिल्ली को अनाथ छोड़ने के बजाय वे लोकसभा चुनाव दिल्ली से ही लड़ते और मैदान में डटे रहते। दूसरे राजनेताओं की तरह महज हंगामा खड़ा करने के लिए काशी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा होकर साझा उम्मीदवार के विकल्प को ख़त्म नहीं करते। अब तो वे यह भी कहने लगे हैं कि गैस की कीमतें कम कर दी जाये तो वे भाजपा का समर्थन भी कर सकते हैं। ठीक यही सौदेबाजी अस्मिता राजनीति भी कर रही है। मान लीजिये, अगर साढ़े तीन सौ से ज्यादा सीटों पर लड़कर पंद्रह बीस सीटें आप निकाल लें तो बहुमत से पीछे रह जाने वाली भाजपा किसी भी कीमत पर जनाजदेश अपने हक में करने की गरज में उनकी हर शर्त मान लें तो क्या वे राजग खेमे में नजर आयेंगे पासवान, उदितराज से लेकर मायावती, जयलिलता, नवीनपटनायक, चंद्रबाबू नायडू, शरद पवार, मुलायम और लालू के साथ यह बड़ा सवाल है। तो आप किस परिवर्तन की बात कर रहे हैं। राजनीतिक जमीन तैयार किये बिना कहीं से भी किसी को भी चुनाव मैदान में उतारकर किस तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप करने जा रहे हैं केजरीवाल, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।

मसलन, बंगाल में कोलकाता, बैरकपुर और रायगंज में जिन उम्मीदवारों को खड़ा कर दिया है आपने, बंगाल में कोई उन्हें नहीं जानता। न बंगाल में आप का संगठन है। मई तक कितने और उम्मीदवार आप के बंगाल से होंगे, यह पहेली बनी हुई है।

 

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के ‘नवाब शाहाबादी’ अंक का विमोचन 6 अप्रैल को

इलाहाबाद। साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के नवाब शाहाबादी अंक का विमोचन 6 अप्रैल को अपराह्न तीन बजे महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्याल के परिसर में किया जाएगा, इस अवसर पर मुशायरे का भी आयोजन किया गया है। मीडिया प्रभारी अजय कुमार ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि बुद्धिसेन शर्मा करेंगे, मुख्य अतिथि वरिष्ठ शायर एम.ए. क़दीर होंगे। हसैनन मुस्तफ़ाबादी, डॉ. असलम इलाहाबादी, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, शिवपूजन सिंह, अख़्तर अज़ीज़, जयकृष्ण राय तुषार, मंजरी शुक्ला, संजय सागर, नरेश कुमार ‘महरानी’, डॉ.विक्रम, सागर होशियारपुरी, तलब जौनपुरी, शैलेंद्र जय, विमल वर्मा, रविनंदन सिंह, शादमा ज़ैदी शाद, अनुराग अनुभव, संजू शब्दिता, अमित कुमार दुबे, रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ शिवाशंकर पांडेय, शकील ग़ाज़ीपुरी और सलाह ग़ाज़ीपुरी आदि कलाम पेश करेंगे।
                                                                                 
अजय कुमार,  मीडिया प्रभारी
साहित्यिक संस्था एवं त्रैमासिक पत्रिका
प्रधान कार्यालय: 123ए/1 हरवारा, धूमनगंज, इलाहाबाद – 211011
मोबाईल नं0: 09889316790, 09807707042

 

प्रेस नोट

मकान कब्जाने के लिए डॉक्टर को धमका रहे डीबी स्टार जबलपुर के संपादक

जबलपुर में सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाले दैनिक भास्कर के डीबी स्टार के संपादक गंगा पाठक औऱ उनके सहयोगी पर मकान कब्जाने के लिए गुंडागर्दी करने का आरोप लगा है। मामले जबलपुर के डॉ. बेहरे दंपति का है जिन्होने गंगा पाठक पर उनका मकान कब्जाने की नियत से धमकी देने का आरोप लगाते हुए पुलिस अधीक्षक से लिखित में शिकायत की है। डॉ. सुरेंद्र बेहरे ने शिकायत में कहा है कि गंगा पाठक की धमकियों औऱ दवाब के कारण उनकी पत्नी डॉ. सुषमा बेहरे की तबीयत बिगड़ी औऱ उन्हे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। पत्रिका अखबार ने 5 अप्रैल के अंक में इस प्रकरण के बारे में खबर छापी है।

 

एक पाठक द्वारा भड़ास को भेजा गया पत्र।

 

दुनिया की श्रेष्ठतम महिला राजनीतिज्ञ रही हैं इन्दिरा गांधी

'पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को भारत की जेल में दबोचा……..निराश निक्सन इन्दिरा गांधी को बिच, यानी कुतिया कहता था'

भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो पूरी दुनिया में अगर कोई लाजवाब राजनीतिज्ञ रहा है, तो वह थीं, बिला-शक, इन्दिरा गांधी। हां हां, मुझ पर गालियां-लानत भेजने के बाद जब थक जाएं तो सोचियेगा कि मैं क्‍या लिख-कह रहा हूं।

आप देख लीजिए ना, पन्ने उलट लीजिए इतिहास की। आप पायेंगे कि भूख और सम्‍मान के भारी संकट से जूझ रहे भारत की जनता को इन्दिरा गांधी ने ही दुनिया के सामने अपना सिर और छाती तान कर चलने का शऊर सिखाया था। मुझे याद है कि हर साल अप्रैल की शुरूआत तक पूरे देश में दुग्‍ध-उत्‍पादन पूरी तरह ठप हो जाता था। मिठाई की दूकानें सन्‍नाटे में आ जाती थीं। ऐसी दुकानों में अगर कोई सामान बनता था, वह केवल नारियल से बनी मिठाई ही हुआ करती थीं। तब चना-बेसन हेय समझा जाता था, लेकिन इन्दिरा गांधी के श्‍वेत-क्रान्ति यानी दूध-क्रान्ति ने भूखे-नन्‍हें बच्‍चों को कटोरा भर दूध पिलाने की कवायद छेड़ी थी। इसके पहले आस्‍ट्रेलिया और अमेरिका की पीएल-84 योजना के तहत दूध के पाउडर के बोरे हर सरकारी अस्‍पतालों में बांटे जाते थे। प्रयास केवल इन्दिरा गांधी का ही। हां, श्‍वेत-क्रान्ति के साथ ही साथ बजरंगबली यानी हनुमान जी की कृपा से ही बेसन के लड्डू मन्दिरों में चढ़ने शुरू हो गये और चना-बेसन की कीमतें आसमान पर चढ़ने लगीं।

अब यही हालत थी अन्‍न-संकट पर। पूरा देश भूख से बिलबिला रहा था। पीएल-84 के तहत जो गेहूं भारत में दान में भेजा जा रहा था, वह लाल-छोटा था और स्‍वाद-हीन भी। इन्दिरा जी ने ही हरित-क्रान्ति का बिगुल बजाया और जल्‍दी ही देश में अन्‍न बेहिसाब उपजने लगा। यह दीगर बात है कि इन प्रयासों की रूपरेखा तब के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्‍त्री जी ने ही बनायी थी, लेकिन उसे साकार किया था इन्दिरा जी ने ही। वरना हम लोग अभी तक भूख और कुपोषण से ही बिलबिला रहते।

सन-61 और 65 के युद्ध में भारत को जबर्दस्‍त करारी शिकस्‍त मिली थी। पूरी दुनिया हम पर हेय दृष्टि से देखता था। हम असहाय और अकर्मण्‍य माने-समझे जाते थे। लेकिन इन्दिरा जी ने घुटने नहीं टेके, बल्कि देश को उठ खड़ा कर दिया। बांग्लादेश के मसले पर इन्दिरा का जो तेवर रहा, उसकी सानी पूरे इतिहास में भी नहीं है। उसके बाद का किस्सा शिमला-समझौता का था, जिसमें जुल्फिकार भुट्टो ने भारत पहुंच जाकर अपने घुटने टेक लिये थे और शर्मिंदगी से सिर झुकाये हुए भुट्टो ने भारत से समझौता किया और बदले में एक लाख बन्दी पाकिस्तानी सैनिकों को जेल से छुड़ाया।

आज राम-राम का गगनभेदी नारे लगा रहे लोगों को यह अहसास हो भी होगा कि बांग्‍लादेशी मासले पर जब इन्दिरा गांधी निपट रही थीं, उस वक्‍त अमेरिकी सरकार ने अपनी नौसेना का सातवां बेड़ा हिन्‍द महासागर की ओर रवाना कर दिया था। उस वक्‍त सातवां बेड़ा पूरी दुनिया में अपनी ताकत और किसी भी देश को नेस्‍तनाबूत करने को लेकर किसी हैवान-शैतान से ज्‍यादा आतंक-मय माना जाता है। हिन्‍द महासागर की ओर इस सातवां के बेडा की रवानगी से ही पूरी दुनिया दहल गयी थी, लेकिन भारत की धाक की कीमत पर इंदिरा गांधी ने कोई भी समझौता नहीं किया। उसी के बाद से इंदिरा के रवैये के चलते दुनिया भर में अमेरिका का सातवां बेड़ा बिलकुल मजाक-माखौल बन गया। अमेरिकी सरकार अपनी ही बगलों में झांकने लगी।

लेकिन इसके बाद इन्दिरा गांधी बिलकुल तानाशाह हो गयीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में राजनारायण के खिलाफ मुकदमा हारने के बाद उन्होंने इमर्जेंसी लगवा दिया। इतना ही नहीं, अपने हारे हुए मुकदमे के उस रे नामक जज को सुप्रीम कोर्ट का सर्वोच्च जज बनवा दिया और इस प्रक्रिया में न जाने कितने जजों की सीनियारिटी को लात मार दिया। इसी रे नामक जज ने तीन जजों वाली बेंच में इंदिरा गांधी के पक्ष में अपना इकलौती राय दी थी। नतीजा, कम से कम दो जजों ने इस्तीफा दे दिया था।

इसके बाद आइये सन-80 में बनी इन्दिरा गांधी की नयी सरकार पर। इंदिरा ने भिण्डरावाले को पाला, नतीजा भिण्डरावाला बेलगाम हो गया और उल्टे इन्दिरा गांधी पर ही भौंकने लगा। इन्दिरा गांधी ने जवाब देते हुए स्वर्णमन्दिर पर सेना भेज दी और भिण्डरावाला को मार डाला। लेकिन उसका असर उलटा हुआ। सेना में सिखों ने रिवोल्ट किया और फिर बाद में इन्दिरा गांधी के सिख अंगरक्षकों ने प्रधानमंत्री आवास पर ही इन्दिरा की गोली मार कर मार डाला।

इसके बाद आइये कांग्रेसियों के चरित्र पर। उधर इन्दिरा की हत्या से भड़के कांग्रेसियों ने देश के प्रमुखों पर सिखों पर बेहिसाब जुल्म ढाये। अगर इसी को शासन कहा जाता है तो यकीनन सर्वाधिक शर्मनाक था। इसके बाद मुसलमानों का तुष्टिकरण और उसके बाद जो बेईमानी-लूट-व्यभिचार का जो दौर शुरू हुआ वह उससे भी बेहूदा निकला। हां, हां, व्यभिचार। नवें दशक के बाद से इंदिरा गांधी की कांग्रेस में औरत भोग्या ही बन गयी। नजीर, आंध्रप्रदेश का राजभवन। इसके पहले सन-82 में छात्र कांग्रेसियों ने नागपुर सम्मेलन के लिए पूरी ट्रेन बुक करायी थी और जितनी लूट-बलात्कार हो सकती थी, हो गयी थी।

देश में समानता की बात जोरों पर चल रही थी कि अचानक इन्‍हीं नवजात कांग्रेसियों ने इस अधिकार पर कुठाराघात कर दिया। नजीर बन गयीं शाहबानो, जो तलाक के मामले में अपना हम चाहती थी। सु्प्रीम कोर्ट ने इस पर शाहबानो के हक में फैसला कर दिया, लेकिन मुसलमानों को खुश करने के लिए राजीव गांधी और उनके नौटंकी-पार्टी ने शाहबानो-सरीखी सारी महिलाओं की आजादी का हर रास्‍ता कत्‍ल कर दिया। इतना ही नहीं, बेर्इमानी और भ्रष्‍टाचार की जो दावानली बाढ़ कांग्रेस ने बहायी, उसने सारी नैतिकता और इंसानियत को हमेशा-हमेशा के लिए खत्‍म कर दिया।

शुचिता और स्‍वच्‍छता की गंगा को भी इन कांग्रेसियों ने गंदे नाले में ड़ुबो दिया। दो साल पहले दिल्‍ली के मावलंकर भवन में उदयन शर्मा पर आयोजित एक समारोह की मुझे खूब याद है, जब प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी ने भाषण दिया कि:- पत्रकारों से तो मैं बहुत डरती रही हूं। लेकिन यह सारे पत्रकार मेरे दोस्‍त हैं। दरअसल, यह लोग खूब ठोंकते हैं। इन लोगों ने तो मुझे भी कई-कई बार जमकर ठोंका, मगर उनकी हर ठुकाई से मेरा दिल खुश हो जाता रहा है।

खैर, अन्‍त में मैं इतना जरूर कहूंगा कि समझ के स्तर पर राहुल-सोनिया अभी भी लाजवाब हैं। यह न होते तो यह देश न जाने कब का बिलाय जाता। अब देखना यह है कि यह देश कब तक बिलाय जाता है। बस।

इति श्री इन्दिरा गांधी और कांग्रेस कथा-2

 

कुमार सौवीर यूपी के वरिष्‍ठ तथा तेजतर्रार पत्रकार हैं।

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इसीलिए कांग्रेस के सामने मैं अपना शीश झुकाता हूं     http://bhadas4media.com/article-comment/18845-kumar-sauvir-congress-kanpur.html
 

वेज बोर्ड को लेकर एकजुट हो रहे बस्तर के पत्रकार

नक्सली हिंसा के लिए चर्चित छत्तीसगढ के बस्तर संभाग में कार्यरत् पत्रकार अपने अधिकारों के लिए आंदोलन के मूड में है। खबर है कि मजिठिया आयोग की सिफारिशों पर कोर्ट से आदेश पारित होने के बाद विभिन्न समाचार पत्र समूहों में वर्षों से कार्यरत् पत्रकार अपना अधिकार पाने के लिए बेचैन है। उचित पारिश्रमिक के लिए पत्रकार एकजुट होकर आंदोलन करने के मूड में दिख रहे है। खबर यह भी है कि कोर्ट के आदेश को धता बताते कुछ मीडिया समूह आदेश से बचने नई-नई तरकीब इजाद कर रहे है। मगर फैसला आने के बाद बस्तर में पत्रकार इस मसले पर गंभीर हैं और प्रबंधन पर वेज बोर्ड की अनुशंसा लागू करवाने दबाव भी बना रहे हैं।

 

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र।
 

पीएम, पूर्व पीएम और उनके परिवार को एसपीजी सुरक्षा के खिलाफ पीआईएल

स्पेशल सिक्यूरिटी ग्रुप अधिनयम 1988 को संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत होने के कारण विधिविरुद्ध घोषित करने और एसपीजी सुरक्षा मात्र आवश्यकता के अनुसार प्रदान किये जाने हेतु सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक पीआईएल दायर किया गया है।

पीआईएल के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स ने लगातार यह कहा है कि सरकारी सुरक्षा मात्र किसी पद के साथ नहीं दी जानी चाहिए, भले ही वह पद कितना भी बड़ा हो। इसे हर व्यक्ति-विशेष के अलग-अलग आकलन के बाद ही दिया जाना चाहिए। और मात्र पूर्व प्रधानमंत्री या इनके परिवार के सदस्य होने के कारण नहीं दिया जा सकता क्योंकि इनमे कुछ लोग अवांछनीय हो सकते हैं अथवा उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं हो सकती है। इसी प्रकार इस सीमित समूह के बाहर के लोगों को उनकी जरूरत के बाद भी यह सुरक्षा नहीं दिया जाना पूर्णतया गलत है।

अतः इसे भेदभावपूर्ण और मनमाना बताते हुए याची ने एसपीजी एक्ट को विधिविरुद्ध करार देने और एसपीजी सुरक्षा प्रत्येक मामले में सम्यक आंकलन के बाद मात्र आवश्यकता के अनुरूप प्रदान किये जाने की प्रार्थना अदालत से की है।

 

इसीलिए कांग्रेस के सामने मैं अपना शीश झुकाता हूं

'केवल नेता ही नहीं, कांग्रेस के कार्यकर्ता तक संवेदनशील रहे हैं, आज के दौर में तो केवल लूट-खसोट में मशगूल हैं कांग्रेसी। ज्यादातर लुच्चेा-लफंगों की जमात बन गयी है कांग्रेस'

लखनऊ: तारीख की तो ठीक-ठाक याद तो नहीं है, लेकिन हल्का-सा याद है कि यह करीब सन-73 के आसपास की बात होगी। या हो सकता है कि सन-74 ही रहा होगा। तब हवाई हमलों का दौर का भले न रहा हो, लेकिन उसकी आशंकाएं लगी रहती थीं। रात में हवाई जहाज उड़ते थे, और उसी वक्तस तेज सायरन बजा करता था। हल्ला मच जाता था कि हर आदमी अपने घर की सारे लालटेन-ढिबरी-चूल्हे वगैरह बुझा दे, वरना पुलिस पकड़ लेगी।

उसी दौर की बात है। मैं दूसरी या तीसरी बार घर से भाग कर कानपुर चला गया था। कई ढाबों-होटलों में खटते हुए अपना बचपन खोता-खरोंचता-मसलता रहा। हमारी ही तरह की सैकड़ों हजारों बच्चों की ही तरह, जो अपने घर से भाग कर कानपुर पहुंचते हैं और सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर जीआरपी वाले उन्हें प्यार से ट्रेन से उतार कर थाने के पास बिठाते हैं। अगली सुबह ही कानपुर भर के होटल-ढाबे मालिक कप-प्लेट-बर्तन धुलवाने के लिए नौकर खोजने यहां पहुंचते हैं और ऐसे बच्चों की एक महीने की पगार का पैसा पुलिसवालों की जेब में ठेल कर इन बच्चों को हासिल कर लेते हैं। लेकिन इसके बाद इन बच्चों को कभी भी पगार नहीं मिलती। अगर किसी बच्चे ने पैसे की ज्यादा मांग की तो उसे मार-पीट कर नौकरी से निकाल दिया जाता है और इसी के साथ यह बच्चे और होटल-ढाबा मालिक लोग फिर नये मुर्गे फंसाने के लिए रेलवे स्टेशन पर जम जाते हैं।

खैर, बहुत कष्टकारी हैं यह यादें। आपको जल्दी-जल्दी असल बात तक पहुंचा देता हूं, ताकि आप बोर न हों और आपका टाइम भी न खोटा हो सके। तो भइया, कई नौकरियों के बाद जिस नौकरी पर मैं लगा, वह कानपुर के हालसी रोड पर बना एक बड़ा होटल था। होटल का नाम था कंचन होटल। अरे सेंट्रल रेलवे स्टेशन के बाहर घंटाघर चौराहे से जब आप जैसे ही परेड की ओर बढेंगे, यहां बादशाही नाका चौराहा मिलेगा। इसके एक फर्लांग बाद दाहिनी ओर एक चार मंजिला होटल था कंचन होटल। इसके बाद कुली बाजार चौराहा और फिर मूलगंज चौराहा होते हुए नई सड़क और आखिरकार परेड बाजार। तो यहां मुझे मसालची की नौकरी मिली थी।

मसालची का काम मतलब, सारे भांड़े-बर्तन मांजना-धोना के अलावा फर्श-सीढी व बारामदा वगैरह का पोंछा लगाना जैसा काम। पैसा मिलता था 15 रूपये महीना। मालिक तो मालिक ही होता है ना, इसीलिए वह कभी-कभार ही किसी से मिलता था। उनका बेटा अक्सर अपने जूते पालिश कराने के लिए हम लोगों में से किसी का दायित्व सौंप देता था। इनाम मिला करता था कभी दस-बीस या फिर चवन्नी। चूंकि मालिक ने तय कर दिया था कि हर महीने के पगार मत लिया करो, वरना चोरी हो जाएगी। इसीलिए हम लोगों को समझा दिया गया था कि जब भी घर वापस जाना होगा, सारा पैसा मालिक अदा कर देगा। लेकिन कसम से कहता हूं, कि मैंने अपने उस दौर में कभी भी अपनी पगार का पैसा मालिक के हाथों से नहीं हासिल किया। जब भी पैसा की बात होती थी तो किन्हीं न किन्हीं आरोप में हम जैसे कर्मचारी को नौकरी पर निकाल दिया जाता था।

हां, कुक, वेटर, वगैरह सीनियर कर्मचारियों का पैसा हजम कराने की हैसियत ही किसी मालिक में नहीं होती थी। लेकिन हम जैसे लोग अक्सर पिट ही जाते थे। सीनियर कर्मचारी लोगों का व्यवहार हम लोगों पर तो इंद्र की बारिश की तरह बहुत मिलती थी। कभी-कभी यह लोग हम लोगों बख्शीश भी दे दिया करते थे, लेकिन मालिक के बारे में कोई भी चूं तक नहीं करता था। एक दिन की बात है, तब के एक मशहूर भजन गायक नरेंद्र चंचल इस होटल में आये थे। पूरा होटल समारोह टाइप सज गया था। शायद हजारों की भीड़ जुट गयी थी। मैं अपनी प्रवृत्ति के चलते चंचल के पास पहुंचने की कोशिश में लगा था। इसी प्रक्रम में कई बार सीनियरों ने मुझे झंपडि़या भी दिया, लेकिन मैं भी परले का बेशर्म। सौ-सौ जूतों खाय, चित्तर में एक न लेना, वाली इस्टाइल थी मेरी।

आखिर में मैनेजर ने मुझे बुरी तरह पीट दिया। अपमान का आवेग आंसुओं की राह से निकल पड़ा। तय कर लिया कि अब इस होटल में काम नहीं करूंगा। अगले ही दिन मैंने अपना जी कड़ा किया और मैनेजर से कह दिया कि मेरा हिसाब कर दिया जाए, मैं अपने देस जाना चाहता हूं। (हम लोगों को पता था कि घर का असली पता बता दिया तो होटल और पुलिसवाला और परेशान करेगा। इसीलिए हम जैसे लोग अपना देस शब्द ही दोहराया करते थे। मजे की बात यह कि हम लोगों के इस गुप्त-ज्ञान का भान हर होटल-ढाबे मालिक को ही नहीं, सारे जीआरपी तक को पता था। खैर, मेरी इस ख्वाहिश सुन कर मैनेजर ने मुझे होटल मालिक के पास भेजा। मगर वहां पगार मिलना को दूर, मैं बुरी तरह लतिया दिया गया। जोरदार पिटाई हुई थी। पैसा झांट नहीं मिला।

मैं रोता-बिलखता हुआ कुली बाजार चौराहे के पास बैठ गया। जाहिर है कि मैं तब अपनी किस्मत को ही कोस रहा था। सुबह का समय था, भूख से पेट कुलबुला रहा था। सोचा, कि बेकार में ही बवाल ले लिया। अरे नाश्ता-भोजन करने के बाद यह करम करता तो यह नौबत तो नहीं आती। लेकिन इस दुनिया में भलेमानुस भी होते हैं। एक अधेड़ ने मेरी हालत देखी तो पसीज गया। पूछने पर सारा माजरा मैंने बयान कर दिया। इस अधेड़ ने मुझे एक चाय पिलायी और साथ में एक पावरोटी भी। इसी बीच सने सलाह दी कि यह साला होटल वाला अक्सर कोई न कोई झंझट करता है और तुम जैसे बच्चों को पीटता-लूटता है। अब तो तुम लोग सीधे अध्यक्ष जी के पास ही पहुंच जाओ तो तुम्हारी सारी दिक्कत दूर हो जाएगी। उस अधेड़ ने अध्यक्ष जी का नाम और उनके घर का रास्ता समझा दिया और चला गया।

मैं अध्य‍क्ष जी के घर के पास पहुंच गया। मुझे उन अध्यक्ष जी के नाम की तो याद नहीं है, लेकिन इतना तय है कि उनका घर कुली बाजार के करीब दो-तीन फर्लांग अंदर बायीं हुआ था। अध्य‍क्ष जी पूजा से निकले ही थे। कई लोग पहले से मौजूद कुर्सियों पर बैठे हुए थे। मैं कुचला-मरोड़ा कपड़ा पहने हुए दरवाजे के पास ही जमीन पर पालथी मार कर बैठ गया। अध्यक्ष जी का अंदाज लाजवाब और भव्य रहा। मैं वहां सकपका गया या फिर उनके सामने पिघल गया, अचानक बुरी तरह फफक कर रोने लगा। लेकिन मुझे रोता देख कर अध्यक्ष जी द्रवित होते हुए बोले:- “क्या। बात है बेटा, क्यों रो रहे हो।" मैंने पूरी बात, सैंकडों हिचकियों के बीच, बता दी। गजब धैर्य में था इस शख्स में। उसने मेरी सारी बातें पूछीं ही नहीं, खोद-खोद कर पूछीं। लगातार वह मेरे गालों और बाहों पर अपने हाथ थपथपाते जा रहे थे।

इसी बीच न जाने उन्होंने कौन सी मिठाई मुझे खिलायी, पानी का ग्लास दिया और फिर बोले: “मेस्टन रोड जानते हो ना बेटा। वहीं पर कांग्रेस का दफ्तर है। वहीं पर एक घंटे बाद वहीं पहुंच जाना। मैं वहीं पर मिलूंगा। और हां, रोना-धोना मत। अच्छे बच्चों की तरह हंसो, हां इसी तरह। “मैं वाकई रोते-रोते हंस पड़ा। (यकीन मानिये कि आज इस समय जब यह लाइनें लिख रहा हूं, ठीक उसी तरह की रूलाई मेरी आंखों से बरस रही है, जैसे कुली बाजार में अध्यक्ष जी के घर में उनके सामने हो रही थी।)
 
यह शहर कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यालय था। मैं वहीं जम गया। दर्जनों लोग पहले सही मौजूद थे, अध्य्क्ष जी पहुंचे और मुझे अपने पास बुलाया। दो अन्य कार्यकर्ताओं को इशारा करके बुलाया और मेरी सारी बातें उन्होंने खुद ही सुनाते हुए कहा कि इसकी समस्या का समाधान कर दिया जाए। टोपी-कुर्ता-धोती वाले उन कार्यकर्ताओं ने मुझे साथ लिया और सीधे कंचन होटल तक पहुंचे। पैदल ही पैदल। मैनेजर को जैसे ही पता चला उसने उन लोगों को सीधे मालिक के पास पहुंचा दिया। मुझे भी वहीं पर बुलवाया गया। मैं बुरी तरह सहमा हुआ था, दो-तीन घंटा पहले हुई जोरदार पिटाई का असर होना लाजिमी था। बातचीत शुरू हो गयी।

कांग्रेस-जन :- “आपने इस बच्चे की पगार नहीं दी ?"
होटल-मालिक:- “अरे यह तो पक्का चोर है।“
कांग्रेस-जन :- “क्या आपने या किसी और ने उसे कभी चोरी करते हुए रंगेहाथों पकड़ा ?”
होटल-मालिक:- “इतना तो याद नहीं है अब।“
कांग्रेस-जन :- “उसने चोरी भी की और कई बार की, और कमाल की बात है कि सात महीने से यह बच्चा आपके होटल में भी काम करता रहा है। फिर आज अचानक आपको उसकी चोरी की याद कैसे आ गयी ?"
होटल-मालिक:- “इसने मेरा बहुत नुकसान किया है। कई क्राकरी तोड़ी है। मैं तो सिर्फ यह सोच कर चुप रहा कि बच्चा है।"
कांग्रेस-जन :- “कितना नुकसान किया है इसने ?"

मालिक ने आनन-फानन कुछ हिसाब बताने की कोशिश की। लेकिन उसके चेहरे से झूठ तो उबल ही रहा था। न जाने कैसे करीब शायद 33 रूपये के नुकसान का दावा किया होटल मालिक ने। लेकिन इन कांग्रेसियों ने सख्त तेवर दिखाये और साफ कहा कि बच्चा समझ कर होटल मालिक इस बच्चे को मूर्ख मत बनाये। आप अपराध कर रहे हैं, और अगर ऐसी शिकायतें अध्यक्ष जी तक पहुंचती जाएंगी तो आप पर संकट आ सकता है।
 
इन कांग्रेसियों ने जोड़ कर बताया कि मेरी पगार 105 रूपया है और नुकसान करीब 33 रूपयों का है। तय हुआ कि इनमें 18 रूपयों का नुकसान होटल मालिक सहन करेगा और पांच रूपयों का नुकसान मेरे हिस्से में आयेगा। बिजली की तरह हिसाब-किताब हुआ और मुझे आनन-फानन नकद 85 रूपयों का भुगतान मिल गया। गजब का गणितीय-हिसाब लगा दिया वहां बैठे-बैठे इन दोनों कांग्रेसियों ने। भावावेश में मैंने उन कांग्रेसियों का लपक कर पैर छू लिया। न जाने क्या हुआ कि मेरे झुके हुए सिर को उन्होंगने थामा और फिर अपने सीने से लगा लिया।

उसके बाद उन्हीं लोगों के साथ मैं कांग्रेस अध्यक्ष जी के कार्यालय पर पहुंचा, लेकिन पता चला कि दोपहर की ट्रेन से ही अध्यक्ष जी दिल्ली से रवाना हो गये हैं। अब दस-पांच दिन बाद ही उनसे भेंट हो सकेगी। लेकिन हा दुर्भाग्य, उसके बाद अध्यक्ष जी से कभी भी भेंट नहीं हो सकी। हां, लेकिन आप लोग इतना तो अंदाज लगा ही सकते हैं कि अगर आज के दौर के अध्यक्ष या कार्यकर्ता होते तो उनकी क्रिया-विधि क्या और कैसी होती।

इति श्री महान कांग्रेसी कथा।

 

कुमार सौवीर यूपी के वरिष्‍ठ तथा तेजतर्रार पत्रकार हैं।
 

जी न्‍यूज का पतन जारी, इंडिया टीवी की टीआरपी में उछाल

तेरहवें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. आजतक लगातार नम्‍बर वन बना हुआ है, जबकि एबीपी न्‍यूज ने भी दूसरे स्‍थान पर खूंटा गाड़ रखा है. लंबे समय से तीसरे स्‍थान पर चल रहे इंडिया टीवी ने इस बार दूसरे नंबर से नजदीकी बढ़ाई है. इस सप्‍ताह न्‍यूज नेशन की टीआरपी थोड़ी गिरी है, इसके बावजूद वो इंडिया न्‍यूज को पछाड़कर चौथे स्‍थान पर बना हुआ है. जी न्‍यूज का पतन लगातार जारी है. इसकी टीआरपी लगातार दूसरे सप्‍ताह भी गिरी है. यह चैनल छठवें स्‍थान पर है. 

न्‍यूज24 के भी नीचे जाने का सिलसिला जारी है. कभी चौथे नंबर पर रहा चैनल अब सातवें नंबर की सवारी कर रहा है. इसके बाद आईबीएन7, सहारा समय, तेज और डीडी का नंबर है. टीआरपीबाज संपादक का चैनल न्‍यूज एक्‍सप्रेस टॉप 12 में भी नहीं है. नीचे इस सप्‍ताह की टीआरपी….

WK 13 2014, (0600-2400)

Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 19.1 up 0.6
ABP News 14.1 same
India TV 13.3 up 1.8
News Nation 9.0 dn 0.4
India news 8.8 up 0.3
ZN 8.4 dn 1.4
News24 7.5 dn 0.8
NDTV 6.9 same
IBN 5.1 dn 0.3
Samay 3.2 dn 0.1
Tez 2.8 up 0.1
DD 1.9 up 0.3

Tg CS M 25+ABC

Aaj Tak 19.0 up 0.5
ABP News 13.8 dn 0.3
India TV 13.4 up 2.4
ZN 9.1 dn 1.5
News Nation 9.0 dn 0.2
India news 8.6 up 0.5
NDTV 7.8 dn 0.4
News24 7.0 dn 0.6
IBN 5.2 dn 0.3
Samay 2.9 same
Tez 2.4 same
DD 1.7 same

विकास ने जनता टीवी एवं संजय ने जिया न्‍यूज ज्‍वाइन किया

एमएच1 न्‍यूज से खबर है कि विकास राज तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एसोसिएट प्रोडयूसर के पद पर कार्यरत थे. विकास ने अपनी नई पारी जनता टीवी के साथ शुरू किया है. उन्‍हें यहां पर प्रोडयूसर बनाया गया है. उन्‍हें चैनल में शिफ्ट इंचार्ज बनाया गया है साथ ही वे यहां हरियाणा में हो रहे लोकसभा चुनाव तथा आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव डेस्क को भी हेड करेंगे.

एमएच1 न्‍यूज से पहले वे हमार टीवी से जुड़े हुए थे. इसके पहले भी उन्‍होंने कई अखबारों को अपनी सेवाएं दी हैं. दिल्‍ली की आईपी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता करने वाले विकास पत्रकारिता की कई शिक्षण संस्‍थानों में गेस्‍ट फैकल्‍टी के तौर पर पढ़ाते भी रहे हैं. डेस्‍क और फील्‍ड की रिपोर्टिंग में समान पकड़ रखने वाले विकास एजुकेशन आधारित न्‍यूज पोर्टल करियर हेडलाइंस डॉट काम का संचालन भी करते हैं. 

जिया न्‍यूज से खबर है कि संजय सिंह ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें लखनऊ में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट बनाया गया है. संजय इसके पहले महुआ न्‍यूज लाइन से जुड़े हुए थे. महुआ न्‍यूज लाइन बंद होने के बाद वे फ्रीलांसिंग कर रहे थे. 

जिया न्‍यूज का कार्यालय बाउंसरों के हवाले!

जिया न्‍यूज की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. खबर आ रही है कि मालिकान अब इस चैनल को लंबा चलाने के मूड में नहीं है. इसको बेचने या फिर बंद किए जाने पर विचार किया जा रहा है. खबर आ रही थी कि चैनल के कार्यालय को बंद कर दिया गया है. कार्यालय में प्राइवेट बाउंसरों को लगा दिया गया है, लेकिन एडिटर इन चीफ कम सीईओ एसएन विनोद ने इस तरह की किसी भी बात को बेबुनियाद बताया है.

जितने ताम-झाम से जिया न्‍यूज को लांच किया गया था, यह चैनल उतनी ही बुरी तरह धराशायी होता नजर आ रहा है. इसके बारे में रोज नई नई खबरें मार्केट में आ रही हैं. बताया जा रहा है कि पेमेंट न होने की दशा में वीडियोकान डीटीएच ने भी सात अप्रैल से चैनल बंद होने की बात कह चुका है. आज खबर आ रही है कि प्रबंधन चैनल को बंद करने की तैयारी कर रहा है. कर्मचारियों को एक महीने का वेतन दिए जाने की बात कही गई है. कुछ कर्मचारियों ने बताया कि चैनल में बाउंसर भी लगाए गए हैं.

हालांकि इस संदर्भ में जब एसएन विनोद से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि यह बिल्‍कुल गलत जानकारी है. कहीं कोई बाउंसर नहीं लगाया गया है. चैनल अब भी रन कर रहा है. मालिकान स्‍तर पर जो चल रहा हो, वो अलग बात है, लेकिन अभी तक चैनल बंद होने की कोई संभावना नहीं है. कुछ लोग इस तरह की अफवाह फैलाकर मामले को बेवजह तूल दे रहे हैं. मेरे इस्‍तीफा देने की भी फर्जी अफवाह फैलाई जा रही है, जबकि अब भी मैं इस चैनल से जुड़ा हुआ हूं.

अफ़ग़ानिस्तान में पुलिस अधिकारी ने महिला पत्रकारों को गोली मारी

अफ़ग़ानिस्तान में एक अफ़ग़ान पुलिस अधिकारी ने दो विदेशी महिला पत्रकारों को गोली मार दी। पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के खोस्त कस्बे में यह घटना ऐसे समय हुई है जब शनिवार को अफ़ग़ानिस्तान में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों के लिए संभावित तालिबानी ख़तरे के मद्देनज़र देश में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है।

गोली लगने से एसोसिएटेड प्रेस की फ़ोटोग्राफ़र अंजा नीडरिंगहौस(48) की मृत्यु हो गई है, वहीं रिपोर्टर कैथी गैनन(60) की हालत गंभीर है और उनका इलाज किया जा रहा है। दोनों ही महिला पत्रकार समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस से जुड़ी हुई थीं। यह हमला उस समय हुआ जब दोनों पत्रकार अफ़ग़ान सेना और पुलिस के दस्ते के साथ चल रही एक कार में बैठी थीं।

हमला करने वाले पुलिस अधिकारी से पूछताछ की जा रही है।

11 मार्च को क़ाबुल में ही ब्रिटिश पत्रकार नील्स होर्नर की भी गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। (बीबीसी)

कालेधन के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरेंगे मोदी

महज चार दिनों बाद ही मतदान के चरणों की शुरुआत होने जा रही है। भाजपा नेतृत्व की कोशिश है कि ऐन वक्त पर मतदाताओं के दिल और दिमाग में यह बात अच्छी तरह से बैठा दी जाए कि सत्ता में नरेंद्र मोदी आ गए, तो देश की तस्वीर बदल जाएगी। कांग्रेस की सत्ता में कालेधन का जाल बहुत विस्तृत हो गया है। लाखों करोड़ रुपए की रकम काले धन के रूप में विदेशी बैंकों में जमा है। यह जमा रकम गलत तरीके से कमाई गई है। इसी काली अर्थ व्यवस्था ने ही देश में कई तरह के आर्थिक संकट खड़े किए हैं। यदि भारी बहुमत से मोदी आते हैं, तो यह गारंटी समझी जाए कि एक साल के भीतर यह धन वापस आ जाएगा। इस खजाने से गरीबों और वंचितों के लिए कारगर कल्याणकारी योजनाएं शुरू की जाएंगी। ताकि, पूरे देश में खुशहाली आ जाए। इन निर्णायक चुनावी क्षणों में मोदी जोर-शोर से यह राजनीतिक ‘सपना’ बेचने में जुट गए हैं। वे जगह-जगह चुनावी रैलियों में यह बताना नहीं भूलते कि विदेशों में जमा काले धन से कांग्रेस के आला नेताओं के तार जुड़े हुए हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम कई मौकों पर इस मुद्दे पर सफाई दे चुके हैं। बजट के दौरान भी उन्होंने उल्लेख किया था कि सरकार ने कालेधन को वापस लाने के लिए किस तरह की ताबड़-तोड़ कोशिशें की हैं?

उल्लेखनीय है कि 2009 के चुनावी अभियान में लालकृष्ण आडवाणी ने भी काले धन को कांग्रेस के खिलाफ एक निर्णायक मुद्दा बनाने की कोशिश की थी। इस चुनाव में एनडीए के ‘पीएम इन वेडिंग’ आडवाणी ही थे। उनके रणनीतिकारों को लग रहा था कि अरबों का विदेशों में पड़ा काला धन वापस लाकर वे लुंज-पुंज अर्थतंत्र में एक नई जान डाल देंगे। इसी चक्कर में भाजपा के नेताओं ने काले धन के आंकड़े को मनमाने ढंग से प्रचारित किया था। इस तरह का सपना बेचने की कोशिश की थी, मानो विदेश से यह पैसा आ गया, तो देश का हरेक गरीब भी कम से कम लखपति तो जरूर बन जाएगा। बताने की कोशिश की गई थी कि कैसे इतने धन से देश के हर गांव तक पक्की सड़क पहुंच सकती है और हर गांव को 24 घंटे बिजली मुहैया कराई जा सकती है? इस मुद्दे के बहाने यूपीए सरकार को घेरने की कोशिश हुई थी। लेकिन, 2004 की तरह ही इस चुनाव में भी भाजपा ने सियासी हार का स्वाद ही चखा था।

2009 की चुनावी हार के बाद ही भाजपा की राजनीति में आडवाणी को हाशिए पर डालने की मुहिम तेज हो गई थी। इसके साथ ही भाजपा में संघ नेतृत्व का हस्तक्षेप बढ़ता गया। संघ की कृपा से ही मोदी को ‘पीएम इन वेटिंग’ बनने का मौका मिला। जबकि, आडवाणी और उनकी लॉबी ने पूरी ताकत लगा दी थी कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न घोषित किया जाए। पिछले दो महीनों में मोदी का कद काफी बढ़ गया है। अब तो हालात ये हैं कि मोदी की छवि के मुकाबले पार्टी का कद बौना लगने लगा है। मीडिया सर्वेक्षणों में बताया जा रहा है कि देश के बड़े हिस्से में मोदी की चुनावी लहर चल पड़ी है। इसके चलते ही कांग्रेस का राजनीतिक मनोबल एकदम टूट गया है। एक हद तक यह जमीनी हकीकत भी मानी जा रही है। जयराम रमेश जैसे कांग्रेस के चर्चित नेता खुलकर कहने भी लगे हैं कि इस बार चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं होने जा रहा है। क्योंकि, केंद्र सरकार का संवाद आम जनता से ठीक ढंग से नहीं हो पाया। इसका बड़ा नुकसान कांग्रेस को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

कांग्रेस के सहयोगी दल एनसीपी के प्रमुख शरद पवार पिछले दिनों ही कह चुके हैं कि इस बार चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती है। उन्होंने भी आशंका जताई है कि कांग्रेस को काफी बड़ा चुनावी धक्का लग सकता है। क्योंकि, महंगाई जैसे मुद्दों पर देश की जनता में नाराजगी है। हमारी सरकार लोगों को ठीक से यह नहीं बता पाई है कि आखिर, महंगाई पर नियंत्रण किन वजहों से नहीं हो पाया है? इसके चलते यूपीए सरकार को ही आम आदमी गुनहगार मानने लगा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जयराम रमेश और पवार जैसे नेताओं की ये टिप्पणियां यूपीए की हताशा की झलक दे ही रही हैं। इससे भाजपा नेतृत्व के हौसले काफी बढ़ गए हैं। उनकी कोशिश है कि चुनावी लोहा अभी गर्म है, ऐसे में इस दौर में इतने जोरदार प्रहार किए जाएं कि कांग्रेस का रहा-सहा हौसला भी पस्त हो जाए। नवादा (बिहार) की चुनावी रैली में मोदी ने काले धन का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। उन्होंने बिहार के लोगों से अपील कर डाली कि वे सत्ता में आएंगे, तो हर हाल में विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस ले आएंगे। इसका उपयोग गरीबों की जिंदगी संवारने में लगाएंगे। उन्होंने इशारों-इशारों में ही काले धन की अर्थ व्यवस्था के लिए सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को कोसा। यह सवाल किया कि जब स्विस बैंक अमेरिका को उन लोगों की सूची दे सकता है, जिन्होंने अवैध ढंग से उनके यहां पैसा जमा किया है, तो भारत सरकार ऐसी सूची क्यों नहीं हासिल कर पाई? वे कटाक्ष करते हैं कि यह सूची इसीलिए नहीं आई, क्योंकि काला धन जमा करने वालों में उनके ही तमाम लोग हैं।

इस संदर्भ में वित्तमंत्री पी. चिदंबरम पहले ही कह चुके हैं कि उनके मंत्रालय ने कई बार स्विस सरकार पर दबाव बनाया कि वह स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा धन का ब्यौरा दे और जिनके खाते हैं, उनकी सूची दे दे। जी-20 जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी उन्होंने स्विस सरकार पर दबाव डालने के लिए कई बार मुद्दा उठाया है। लेकिन, जवाब यही मिला कि अमेरिका सरकार को जो डाटा मिला है, वह ‘चोरी’ का है। ऐसे में, इस तरह के गैर-सरकारी डाटा को वे किसी और देश को नहीं दे सकते। इसके बाद भी सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों से दबाव बनाने में लगी है। ऐसे में, भाजपा नेताओं का यह आरोप सरासर गलत है कि विदेश से काले धन को वापस लाने के मुद्दे पर यूपीए सरकार गंभीर नहीं रही। उन्होंने सवाल किया है कि छह साल तक केंद्रीय सत्ता में एनडीए सरकार भी रही है। लेकिन, उस दौर में यह सरकार विदेशों में पड़ी ब्लैक मनी क्यों नहीं ला पाई थी? इसका भी जवाब भी मोदी जैसे नेताओं को देना चाहिए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा भाजपा ने केवल चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। सच्चाई यह है कि कई राज्यों में भाजपा सरकारों में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इसी भ्रष्टाचार की संस्कृति से काले धन का जाल फैलता है। मणिशंकर ने आरोप लगाया कि तमाम कॉरपोरेट घराने मोदी-मुहिम के समर्थन में हैं। यह हकीकत है कि ये लोग अरबों रुपए का काला धन भाजपा की चुनावी मुहिम में लगा रहे हैं। ऐसे में, कॉरपोरेट घरानों के समर्थन से सत्ता की कुर्सी का सपना देखने वाले मोदी भला कितना कुछ कर पाएंगे? भाजपा सूत्रों के अनुसार, इस दौर में काले धन का मुद्दा बाबा रामदेव को खुश करने के लिए भी उठाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि योगगुरु इस मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन चला चुके हैं। उन्होंने पिछले दिनों भाजपा नेतृत्व पर दबाव बनाया है कि काले धन के मुद्दे को चुनाव में जोर-शोर से उठाया जाए। क्योंकि, ऐसे मुद्दों से कांग्रेस की राजनीतिक घेराबंदी करना ज्यादा आसान होगा।

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।
 

जिंदल के पैंतरे से परेशान जी समूह ने लिखा पत्रकारिता का इतिहास

नवीन जिंदल के खिलाफ कोर्ट में मात दर मात खा रहा जी समूह और उसके संपादक परेशान हैं. सुधीर चौधरी द्वारा नवीन जिंदल और ग्रुप के कई लोगों पर किए गए मानहानि समेत कई मुकदमों को विभिन्‍न अदालतों ने खारिज कर दिया है. इससे परेशान समूह अब अपनी वेबसाइट पर पत्रकारिता के इतिहास से लेकर भूगोल तक की चर्चा कर रहा है. आप भी पढ़े जी की वेबसाइट पर प्रकाशित कहानी नुमा दर्द….

भ्रष्‍टतंत्र और मीडिया : लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ पर ही निशाना क्‍यों?

आजादी मिलने से लेकर अभी तक मीडिया को लेकर सोच में काफी बदलाव आया है। मीडिया पहले समाज सेवा के तौर पर देखा जाता था धीरे-धीरे बिजनेस बन गया और बिजनेस होते हुए भी लोकतंत्र के चौथे पिलर के तौर पर मीडिया अहम भूमिका निभाता रहा। हालांकि कई मौके ऐसे भी आए हैं जब मीडिया पर निष्पक्ष नहीं होने के आरोप लगे हैं औऱ क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में आई है लेकिन क्या ऐसा अचानक हुआ है और क्या इसके लिए सिर्फ मीडिया ज़िम्मेदार है? मीडिया की निष्‍पक्षता पर गैरजरूरी सवाल उठाए जा रहे हैं। सच्‍चाई से बौखलाया भ्रष्‍टतंत्र हमेशा मीडिया को ही निशाना क्‍यों बनता है? मौजूदा हालात में ऐसे सवाल उठाना जरूरी हो गया है।

ये माना जाता है कि मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए ऐसे में किसी मीडिया हाउस के मालिक का किसी पार्टी विशेष के पक्ष में आने पर सवाल खड़े होना लाजिमी है लेकिन इसके साथ कुछ और सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए। ये सवाल उठने चाहिए कि आखिर इसकी वजह क्या है? आखिर क्या वजह है जिसने ऐसे हालात बनाए और ऐसा करने के लिए किन ताकतों ने मजबूर किया।

किसी आम आदमी से भी पूछकर देख लीजिए आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि देश में करप्‍शन और कुशासन (पुअर गवर्नेंस) ने संवैधानिक संस्थानों तक की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया है। ऐसा लगता है कि मीडिया भी प्रतिष्‍ठानों (एस्‍टेब्लिशमेंट) के दबाव में घुटने टेक चुका है और ऐसे में जब एस्‍सेल ग्रुप के चेयरमैन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी तब उन्हें तरह तरह से परेशान करने की कोशिश की गई। अक्टूबर 2012 को एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और उनके चैनल के दो संपादकों के खिलाफ दिल्ली के एक थाने में FIR दर्ज करा दी गई और इसके बाद भी उन्हें और उनके ग्रुप को परेशान करने की कोशिशें जारी रहीं।

मौजूदा सरकार की कारगुजारी ने एक बार फिर राजीव गांधी और इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के बीच चले संघर्ष की याद ताजा करा दी है। रामनाथ गोयनका ने शुरुआती दौर में राजीव गांधी को एक इमानदार व्यक्ति होने के नाते खुले तौर पर समर्थन किया था लेकिन बाद में राजीव गांधी कुछ गलत लोगों के चंगुल में फंस गए और कुछ ऐसे काम शुरु कर दिए जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे जिसके बाद राम नाथ गोयनका ने राजीव गांधी की आलोचना शुरू कर दी। बताया जाता है कि रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद पैदा होने के केंद्र में रिलायंस ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन स्वर्गीय धीरु भाई अंबानी की अहम भूमिका रही। धीरु भाई अंबानी की गलत सलाहों की वजह से रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद इतने गहरे हो गए कि राजीव गांधी ने रामनाथ गोयनका द्वारा संचालित इंडियन एक्सप्रेस की दिल्ली और मुंबई में स्थित टावर्स को टेकओवर करने की भी विफल कोशिश की थी।

इसके खिलाफ प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, रामनाथ गोयनका ने भी खुले तौर पर राजीव गांधी और उनके प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सभी गैर कांग्रेसी दलों को लामबंद करके कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई। ये भी सच है कि जिस समय रामनाथ गोयनका, राजीव गांधी, उनकी पार्टी और उनकी सरकार से लड़ रहे थे उस समय भी देश की मीडिया बिरादरी (मीडिया फ्रेटरनिटी) या तो चुप थी या फिर तटस्थ थी। रामनाथ गोयनका इस लड़ाई में कई बार अलग-थलग भी पड़ते नज़र आए लेकिन उन्होंने अपने उस संघर्ष को निर्णायक अंत (लॉजिकल इण्‍ड) तक पहुंचाया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एस्‍सेल ग्रुप के चेयरमैन और भारत में निजी क्षेत्र में टीवी चैनल शुरू करने के जनक सुभाष चंद्रा का दिया गया वक्तव्य एक बार फिर राम नाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच चले लंबे संघर्ष की याद को ताजा करता है।

स्वभावत: सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए अपने व्यावसायिक कारोबार को आगे बढाने के हिमायती सुभाष चंद्रा की बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की जनसभा में जाकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की अपील तमाम सवालों को जन्म देती है। यहां ये विचार करना जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अराजनैतिक व्यक्तित्व वाले सुभाष चंद्रा एक राजनेता की तरह सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल करने की अपील कर रहे हैं और इससे भी ज्यादा जरूरी सवाल ये है कि देश की मीडिया बिरादरी क्यों मूकदर्शक बनकर महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण की स्थिति को आत्मसात किए हुए है।

अक्टूबर 2012 से लेकर अब तक जेडएमसीएल ग्रुप को किसी ना किसी बहाने मौजूदा सरकार क्या इसीलिए टार्गेट करती रही कि इस ग्रुप के चैनलों ने राष्ट्रीय और प्राकृतिक संपदा की लूट को प्रमुखता और प्रभावी तरीके से देश की जनता के सामने उजागर किया? क्या मीडिया का रोल सिर्फ और सिर्फ सरकार और सत्ता में बैठे लोगों के लिए भोंपू का रह गया है। सच उजागर करना क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है और सच उजागर करने की मुहिम में शामिल मीडिया घराने के साथ मीडिया बिराददी को लामबंद नहीं हो जाना चाहिए। ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब खोजना एक स्वस्थ लोकतंत्र और मीडिया की विश्वसनीयता
के लिए भी बेहद जरूरी है।

मीडिया को लोकतंत्र के चौथे पिलर के तौर पर देखा जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती है और देश की आज़ादी के बाद से अब तक मीडिया ये भूमिका निभाता भी रहा है। मीडिया के इतिहास में इमरजेंसी के काले अध्याय की बावजूद मीडिया ने अपनी मजबूती कभी नहीं खोई और कई मामलों मे देश और समाज के लिए अहम भूमिका भी निभाई है। देश को आजादी मिलने के बाद मीडिया के स्वरूप और इसके दायरे में एक बड़ा बदलाव आया। मीडिया के लिए हालात अब उतने मुश्किल नहीं थे जितने आज़ादी से पहले थे। समाचार-पत्रों को आजादी तो मिली ही थी साथ ही साथ साक्षरता दर भी बढ़ रही थी।

इसका नतीजा ये हुआ कि बड़ी संख्या में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। साथ ही रेडियो और टेलीविजन के विकास के लिए भी कदम उठाए गए जिनकी वजह से मीडिया जगत में बड़ा बदलाव देखा गया। अब मीडिया सच को ज्यादा ताकत और जिम्मेदारी के साथ लोगों के सामने ला रहा था। 1947 से लेकर 1975 तक का दौर मीडिया के लिए विकास का दौर था लेकिन 1975 में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बेड़ियां डाल दी गईं। इंदिरा गांधी उस वक्त प्रधानमंत्री थीं और विपक्ष भ्रष्टाचार और कमजोर आर्थिक नीतियों को लेकर उनके खिलाफ सवाल उठा रहा था। अपने खिलाफ बढ़ रहे विरोध को दबाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का एलान करके मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी। मीडिया की आजादी छीनी जा चुकी थी।
करीब 19 महीनों तक चले आपातकाल के दौरान भारतीय मीडिया को घुटने टेकने पर मजबूर किया गया। उस समय जिन अखबारों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उनकी वित्तीय सहायता रोक दी गई।

ये ऐसा दौर था जब पत्रकार चाहकर भी खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहे थे। इमरजेंसी के दौरान अखबारों में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां ही ज्यादा नजर आती थी। सेंसरशिप के विरोध के तौर पर सम्पादक अखबारों में सम्पादकीय खाली छोड़ दिया करते थे। 1977 में जब चुनाव हुए तो मोरारजी देसाई की सरकार आई और उन्होंने प्रेस पर लगी सेंसरशिप को हटा दिया। इसके बाद अखबारों में आपातकाल के दौरान छिपाई गई बातों को छापा गया। बात चाहे आजादी से पहले की हो या आजादी के बाद की मीडिया अपना काम पूरी ताकत से करता रहा है। 1977 के बाद भी मीडिया लगातार चुनोतियों के बावजूद अपना काम बखूबी करता रहा है। जेसिका लाल का मामला हो या नीतीश कटारा का केस या फिर हाल में देश को झकझोर देने वाला निर्भया गैंगरेप केस इन मामलों में मीडिया ने अपनी भूमिका जिस तरीके से निभाई है वो सबके सामने है।

इसके अलावा प्रियदर्शिनी मट्टू, रिजवानुर रहमान, शिवानी भटनागर, रुचिरा गिरहोत्रा जैसे मामले या सुकना भूमि घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, आईपीएल में भ्रष्टाचार, ये सारे खुलासे मीडिया की वजह से ही संभव हो सके. ये सारे ऐसे मामले हैं, जिनमें मीडिया ने जनता की आवाज़ कार्यपालिका और न्यायपालिका तक पहुंचाई और सफलतापूर्वक कई निर्णयों को बदलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज़ादी के बाद ही क्यों, मीडिया ने आज़ादी की लड़ाई में भी अहम भूमिका निभाई। इतने साल पहले टीवी के बारे में सोचा नहीं जा सकता लेकिन उस वक्त जो अखबार निकलते थे आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारी पैंफलेट, पोस्टर्स, हैंडबिल्स के जरिए सूचना फैलाने का काम किया करते थे। शायद इसके बिना इतनी बड़ी लड़ाई कामयाब ही नहीं हो पाती।

1816 में गंगाधर भट्टाचार्य ने बंगाल गजट का प्रकाशन किया। इसके बाद कई दैनिक, साप्ताहिक व मासिक पत्रों का प्रकाशन शुरु हुआ जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों की जमकर आलोचना की। राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता के जरिये सोशल ऱिफॉर्म को बढ़ावा दिया। ब्राह्मैनिकल मैगजीन के माध्यम से उन्होंने ईसाई मिशनरियों के साम्प्रदायिक षड्यंत्र का विरोध किया तो संवाद कौमुदी के जरिये उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। जेम्स बकिंघम ने वर्ष 1818 में कलकत्ता क्रोनिकल का संपादन करते हुए अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें देश निकाला दे दिया।

हिन्दी में पहला अखबार लाने का क्रेडिट पंडित जुगल किशोर शुक्ला को जाता है। इन्होंने 1826 में उदन्त मार्तण्ड पत्र निकाला और अंग्रेजों की नीतियों की जमकर आलोचना की। अंग्रेजों ने इस अखबार के खिलाफ साम दाम दंड भेद सभी अपना लिए लेकिन जुगल किशोर शुक्ला ने आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए भी पत्रकारिता के जरिए देश के लिए काम करते रहे। इसके बाद अंग्रेज़ों प्रेस पर पाबंदी लगाने के लिए तमाम तरह के कानून बनाने शुरू कर दिए।

1857 की क्रांति के बाद गैगिंग एक्ट लाया गया जिसके तहत प्रेस पर ऐसा कोई भी न्यूज़ मैटीरियल छापने पर पाबंदी लगा दी गई जो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हो। पूरी कोशिश की गई कि 1857 की क्रांति की खबरें ना फैलें। उस दौरान स्वतंत्रता आंदोलन के नेता अजीमुल्ला खां ने दिल्ली से पयामे आजादी पत्र निकाला जिसमें ब्रिटिश कुशासन की जमकर आलोचना की गई। ब्रिटिश सरकार ने ना सिर्फ इस पत्र को बंद करने की कोशिश की बल्कि इस अखबार की प्रति रखने वाले को भी टॉर्चर किया।

अंग्रेज सरकार ने इसके बाद वर्नाकुलर एक्ट लाकर प्रेस की आज़ादी को छीनने की कोशिश की जिसके तहत प्रेस को सरकार के खिलाफ कुछ भी छापने की आज़ादी नहीं थी कुछ भी छापने से पहले अखबारों को ना सिर्फ सारी स्टोरीज़ दिखानी होती थीं बल्कि एक बॉन्ड भी साइन करना होता था। हालांकि इस एक्ट के खिलाफ पूरे देश की मीडिया एकजुट हो गई और तब तक इसका विरोध करती रही जब तक सरकार ने एक्ट वापस नहीं लिया। फिर धीरे धीरे दी हिन्दू, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका, द ट्रिब्यून जैसे कई समाचार पत्र सामने आए… लोकमान्य तिलक ने समाचार पत्र मराठा और केसरी के जरिए राष्ट्रवाद की भावना को और भड़काने का काम किया।

गांधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से पूरे समाज को एकजुट किया और आज़ादी की लड़ाई को एक नई दिशा दी। नवभारत, नवजीवन, हरिजन, हरिजन सेवक, हरिजन बंधु, यंग इंडिया जैसे कई अखबार गांधी के विचारों को आम लोगों तक पहुंचाने का काम करते थे। आजादी की लड़ाई के दौर में अकबर इलाहाबादी ने कहा था, “खींचों ना कमानो को, ना तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।“

ये वो वक्त था जब प्रेस की कलम की ताकत अंग्रेजों के तोप और तलवार पर भारी पड़ती थी। आज़ादी की लड़ाई में ये ताकत बहुत काम आई। आज भी मीडिया के पास उतनी ताकत है जो देश को और ताकतवर बना सके, कमी सिर्फ एकजुटता और जज्बे की है। साभार : जी न्‍यूज

चाटुकारिता या पत्रकारिता : वासिंद्र ने सुभाषचंद्रा की तुलना रामनाथ गोयनका से की

जी समूह के दो संपादक सुधीर चौधरी और समीर आहलुवालिया खबरों का दबाव बनाकर जिंदल ग्रुप से सौ करोड़ रुपए का विज्ञापन वसूलने की कोशिश में लगे थे, जिंदल ने स्टिंग करा दिया. मामला पुलिस के पास पहुंचा, पुलिस को आरोपों में दम दिखा, ब्‍लैकमेलिंग करने के आरोप में उसने जी समूह के दोनों संपादकों को अरेस्‍ट किया.

ब्‍लैकमेलिंग के आरोपों में बुरी तरह फंसे जी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा जोड़ तोड़ गुणा-गणित से जेल जाने से बच गए. वे मोदी के मंच पर भी दिखे. उन्‍हीं के चैनल के एक संपादक वाशिंद्र मिश्र ने उनकी तुलना अपने वेबसाइट पर रामनाथ गोयनका से कर दी है. अब आप ही तय करें इसे क्‍या कहा जाना चाहिए… नीचे वाशिंद्र का जी न्‍यूज पर प्रकाशित लेख.


भ्रष्ट तंत्र बनाम मीडिया

माना जाता है कि मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए। ऐसे में किसी मीडिया हाउस के मालिक का किसी पार्टी विशेष के पक्ष में आने पर सवाल खड़े होना लाजिमी है, लेकिन इसके साथ कुछ और सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए। ये सवाल उठने चाहिए कि आखिर इसकी वजह क्या है। आखिर क्या वजह है जिसने ऐसे हालात बनाए और ऐसा करने के लिए किन ताकतों ने मजबूर किया।

किसी आम आदमी से भी पूछकर देख लीजिए, आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि देश में CORRUPTION और POOR GOVERNANCE ने संवैधानिक संस्थानों तक की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया है। ऐसा लगता है कि मीडिया भी Establishment के दवाब में घुटने टेक चुकी है और ऐसे में जब ESSEL GROUP के चेयरमैन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी तब उन्हें तरह-तरह से परेशान करने की कोशिश की गई।

2 अक्टूबर 2012 को एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और उनके चैनल के दो संपादकों के खिलाफ दिल्ली के एक थाने में FIR दर्ज करा दी गई और इसके बाद भी उन्हें और उनके ग्रुप को परेशान करने की कोशिशें जारी रही। मौजूदा सरकार की कारगुजारी ने एक बार फिर राजीव गांधी और इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के बीच चले संघर्ष की याद ताजा करा दी है। रामनाथ गोयनका ने शुरुआती दौर में राजीव गांधी को एक इमानदार व्यक्ति होने के नाते खुले तौर पर समर्थन किया था लेकिन बाद में राजीव गांधी कुछ गलत लोगों के चंगुल में फंस गए और कुछ ऐसे काम शुरू कर दिए जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे। इसके बाद रामनाथ गोयनका ने राजीव गांधी की आलोचना करनी शुरू कर दी।

बताया जाता है कि रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद पैदा होने के केंद्र में रिलायंस ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन स्व. धीरु भाई अंबानी की अहम भूमिका रही। धीरु भाई अंबानी की गलत सलाहों की वजह से रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद इतने गहरे हो गए कि राजीव गांधी ने रामनाथ गोयनका द्वारा संचालित इंडियन एक्सप्रेस की दिल्ली और मुंबई में स्थित टावर्स को भी टेकओवर करने की विफल कोशिश की थी। इसके खिलाफ प्रतिक्रिया स्वभाविक थी, रामनाथ गोयनका ने भी खुले तौर पर राजीव गांधी और उनके प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सभी गैर कांग्रेसी दलों को लामबंद करके कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई।

ये भी सच है कि जिस समय रामनाथ गोयनका राजीव गांधी, उनकी पार्टी और उनकी सरकार से लड़ रहे थे उस समय भी देश की media fraternity या तो चुप थी या फिर तटस्थ थी। रामनाथ गोयनका इस लड़ाई में कई बार अलग-थलग भी पड़ते नज़र आए लेकिन उन्होंने अपने उस संघर्ष को logical end तक पहुंचाया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में essel group के चेयरमैन और भारत में निजी क्षेत्र में TV चैनल शुरू करने के जनक सुभाष चंद्रा का दिया गया वक्तव्य एक बार फिर रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच चले लंबे संघर्ष की याद को ताजा करता है।

स्वाभावत: सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए अपने व्यावसायिक कारोबार को आगे बढाने के हिमायती सुभाष चंद्रा की बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की जनसभा में जाकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की अपील तमाम सवालों को जन्म देती है। यहां ये विचार करना जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अराजनैतिक व्यक्तित्व वाले सुभाष चंद्रा एक राजनेता की तरह सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल करने की अपील कर रहे हैं और इससे भी ज्यादा जरूरी सवाल ये कि देश की media fraternity क्यों मूकदर्शक बनकर महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण की स्थिति को आत्मसात किए हुए है।

अक्टूबर 2012 से लेकर अब तक ZMCL ग्रुप को किसी ना किसी बहाने मौजूदा सरकार क्या इसीलिए टार्गेट करती रही कि इस ग्रुप के चैनलों ने राष्ट्रीय और प्राकृतिक संपदा की लूट को प्रमुखता और प्रभावी तरीके से देश की जनता के सामने उजागर किया? क्या मीडिया का रोल सिर्फ और सिर्फ सरकार और सत्ता में बैठे लोगों के लिए भोंपू का रह गया है। सच उजागर करना क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है और सच उजागर करने की मुहिम में शामिल मीडिया घराने के साथ MEDIA FRATERNITY को लामबंद नहीं हो जाना चाहिए। ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब खोजना एक स्वस्थ लोकतंत्र और मीडिया की विश्वसनीयता के लिए भी बेहद ज़रूरी है।

वासिंद्र मिश्र
संपादक, ज़ी रीजनल चैनल्स

आधारहीन खबरें लिखने के आरोप में वीकली का संपादक अरेस्‍ट

सिवनी। मध्यप्रदेश के सिवनी में कोतवाली थाना पुलिस ने दैनिक अखबारों के संपादकों के खिलाफ आधारहीन खबरें प्रकाशित करने के मामले में एक साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक को कल गिरफ्तार किया।

पुलिस सूत्रों ने आज यहां बताया कि एक साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक संजय उर्फ बंटी बघेल के विरुद्ध तीन दैनिक समाचार पत्रों के संपादकों और एक प्रादेशिक समाचार पत्र के प्रतिनिधि के द्वारा बीते माह 19 मार्च को आधारहीन खबरें प्रकाशित करके संपादकों की छवि धूमिल करने तथा अवैध रुप से राशि मांगने की शिकायत दर्ज कराई थी।

MJ— who has broken out of the most trying of personal circumstances

New entrants to the court of Mobashar Jawed Akbar are unlikely to accuse the scholar journalist of modesty. But then his achievements aren’t modest either. MJ, as he is popularly known, was in his early twenties when he became the editor of Sunday magazine.

Sure of his superiority, he wore it on his sleeve. But hours before the BJP named him national spokesperson this Tuesday, the man with the shining moustache sounded humble—perhaps like the class 11 boy who had dropped in long years ago at a well-known columnist’s office at Junior Statesman in Calcutta to submit a short story for publication and addressed him as ‘sir’. The other man who could have offered some light on that now-recessive trait of MJ died last week—Khushwant Singh, who hired the Presidency College, Calcutta, alumnus as a trainee journalist at The Illustrated Weekly of India.

In the House of Saffron, expectations are high that MJ, who no doubt has friends in high places, will play a pivotal role in hardselling Narendra Modi to the world. But the 63-year-old author of best- selling books such as Nehru: The Making of India and India: The Siege Within, says in a self-effacing tone, “That is very kind of you, but I know I am a small cog in a wheel.” Efforts are on to project Modi, the BJP’s prime ministerial aspirant, as a visionary like former Prime Minister AB Vajpayee, and the part ‘this new philosopher’ in the court of the BJP czar will play, party insiders say, is ‘crucial’.

Seated in his spartan Maharani Bagh office, MJ dwells at length on development aimed at uplifting the poor. As a new member of the party where ideas are increasingly preferred over ideology, he comes across as focused, opinionated, sometimes dismissive and yet kind and humorous. Not inclined to tolerate “empty talk”, he wouldn’t hesitate to snap at you for what he feels are perfunctory questions. What particularly irks him are stereotypical questions hurled at him over his switching sides to the BJP from being a fellow traveller of the Congress. He was a spokesperson for the Congress some 24 years ago when his friend, the late Prime Minister Rajiv Gandhi, was at the party’s helm.

So MJ, one of Indian journalism’s greatest stylists, wants to focus on tangibles, not “boring” stuff.

FIGHTING POVERTY

MJ Akbar, whose grandfather was a Hindu, was born in “a small basti near a jute mill” in West Bengal’s Hooghly district in 1951. Now, when he visits his birthplace, the impoverished and decrepit Telinipara, it hurts him deeply to see that nothing has changed for the poor. It is a forlorn locality where, they say, if a worker smiles once a fortnight he is considered lucky.

Hard-nosed and quick-witted, MJ— who has broken out of the most trying of personal circumstances and set high professional standards—puts the blame for this abject poverty of the “other India”, that of the poorest of poor, on policies pursued by a party he once represented briefly in Parliament. The Congress party of 1989, the year MJ was elected MP, is no longer the same, he notes; it has degenerated. The UPA Government of Manmohan Singh, which was in power for the past 10 years, has dashed the hopes of the poor, he declares. “All aspirations have been kicked down a dark hole. We need a national recovery mission. And somebody has to lead that mission,” he notes, referring to the BJP campaign spearhead. He vows to work towards ensuring that the rewards of development go first to the poor. “I really believe that we are going to see a development decade ahead,” he says.

For MJ, the process of writing is very important. He sees every book as self education. Then it becomes another step in an eternal enquiry, he says. In the process, over the years, the top-notch editor has also learnt to appreciate what he terms ‘visible reality’—and to understand what works and what doesn’t. Well-travelled within and outside India, he has been a regular visitor to Gujarat’s hinterland since the late 1970s. Road connectivity was poor and power supply erratic—infrastructure facilities in the state were as bad as they were in the rest of northern and eastern India. Lately though, MJ has seen some quick changes in the state.

“I hope I have some common sense,” says MJ who has faith in the ‘Gujarat model of development’ championed by Modi, which has kicked up a storm with renowned economists such as Jagdish Bhagwati and Arvind Panagariya lapping it up as a ‘role model’ and Nobel laureate Amartya Sen trashing it. While he doesn’t pass judgment on either Professor Sen or Bhagwati, he is glad that Gujarat is now a “generator-free” state. MJ asks naysayers to question why Gujarat has no market for power generators. “Why? You can [also] take a look at the infrastructure of its cities. You can take a look at the spread of [Gujarat’s] education system. You can take a look at the status of jobs offered to minorities,” says this fan of Amitabh Bachchan, the Bollywood superstar who happens to be a brand ambassador for the state. MJ wants Modi-baiters to take a look at the “figures produced by the Government of India” to dispel their doubts. “Truth cannot become a convenient truth,” says MJ.

WHY HE WAS WRONG ABOUT MODI

For someone who has founded and edited several publications such as The Telegraph, The Asian Age and others, MJ exudes an avuncular aura. And his columns and reports are mind-tinglingly good, yet he knows only too well that attributing finality to journalistic commentaries is a sin that deserves no mercy. Not that he ever condoned sloppy reporting. He was, on the other hand, a terror in the newsroom, a stickler for perfection and a conjurer of the snappiest of headlines. Sankarshan Thakur, one of his protégés at The Telegraph, writes in an article titled "The Tailor of Telinipara", with much admiration, “Believe me, this man could bleed you from orifices you did not know existed—such was the daily tyranny of distinctions you lived under.”

Like most editors, he too had attacked Modi over the Gujarat riots of 2002. In a profession where reacting to immediate circumstances is the name of the game, it is often easy to err. Such hazards are par for the course, because “while fiction is about contemporary life, journalism is about temporary life”, he says.

Rajiv Gandhi’s former buddy wants to thank the UPA Government for exonerating Modi. “In 10 years they have answered every question raised by me and many others. The whole effort of the past 10 years was not to find the guilty, but to link one man called Narendra Modi to that guilt. That is the only objective for which the police, lawyers, courts and turncoats, bureaucrats—all of them were used,” he says angrily. “If this investigation [of the Gujarat riots] had been done by an NDA Government, you may not have found it credible,” he thunders. “So whatever I wrote [against Modi] was wrong. And time has proved it to be,” MJ explains with a guffaw intended at sweetening his outbursts.

Cartoons may have appeared portraying him talking of Modi doing Jesus-like tricks such as walking on water, but MJ, who has authored books such as The Shade of Swords, Riot After Riot, Blood Brothers, says what struck him deeply about Modi are his rare leadership qualities— he says some of those were on full display at his 27 October Patna rally hit by serial blasts. When bombs were bursting in Patna at that rally, it was a threat to the audience, but there was also a threat to Modi. And at that moment it is not usually the “head” that takes charge of your senses, it is the “heart and the nerve”. Modi could have been emotional at that point. Instead, he was cool, focused and composed. He said something that resonates with MJ: Hindus must decide whether they want to fight Muslims or they want to fight poverty, and Muslims must decide whether they want to fight poverty or fight Hindus. MJ admits that it was the Patna address that blew his mind. He dismisses talk of him being a rank opportunist who veered towards the BJP, favourites to win this year’s polls, explaining that he prefers to “shrug and carry on” because in a democracy like India nobody can stop anyone from saying what they like. “Now, the most important thing is to live with my mirror and be true to myself,” he says raising the timbre of his voice as he speaks, stressing the words ‘mirror’ and ‘true’, and ending in a low growl.

Long ago, when MJ joined the Congress party, there was a similar outcry and he can’t forget the beast his announcement unleashed. How can a promising young editor join a dispensation scarred by the Bofors scandal? So sceptics asked. There was stardom then. Now MJ seeks an opportunity to give back to society.

Unlike the likes of the great writer and rhetorician Christopher Hitchens who shifted his loyalty from the Left to the Right overnight citing the 9/11 New York attacks, our own chronicler of the history and plight of minorities in the Subcontinent describes his transition as a gradual one. Not that he didn’t wish to be as blessed as St Paul on the road to Damascus (who was converted through divine intervention on his way), MJ says with a scholarly flourish. MJ’s journey has often been tough: he has won laurels for his sparkling prose but has also been stung by the actions of certain people whom his former mentor Kushwant Singh referred to as those “with less breeding and more money”.

ABOUT FORGING AHEAD

As a Congress MP from Kishanganj in Bihar between 1989 and 1991, he had seen first-hand how welfare schemes work, and believes such “positive discrimination” is right and necessary. “Do you think the West survives without social- welfare schemes? If they didn’t have it, there would be insurrection on the streets. But what people need are jobs. Welfare schemes operate only as a social net. The primary objective therefore has to be on legitimate ways of creating employment,” states MJ.

Having learnt Public Service 101 at the grassroots, MJ is profoundly excited about Modi’s plan to build 100 new cities. “It means jobs down the line and the priority of the next government should not be just jobs, but jobs for the poorest. The curse of poverty has to end in 10 years and that can be done by making the economy of the country meaningful for those at the bottom. And that is the great challenge,” says he. The man is also attracted by the idea of rebuilding India’s east—his home turf—which has fallen far behind in development as well as on human development indices. “It is in such areas that we need to focus on. Modi has many such great ideas. I am only giving an example of the imaginative thinking on the horizon,” MJ says, adding that the country should look at international relations with a fresh mind.

MJ’s last book was on Pakistan. He is a voracious reader too, and falls back on Mahatma Gandhi and various other leaders of the freedom struggle for intellectual inspiration. At his bedside, he keeps books by Agatha Christie and PG Wodehouse; he reads Christie when he is happy and Wodehouse when he is pensive.

In Tinderbox: The Past and Future of Pakistan, he concluded that Pakistan is a jelly state—which will not collapse, but will remain unstable. In the face of dynamic geopolitics, he has often warned against India’s stagnant foreign policy. MJ faults the Manmohan Singh Government for miscalculations on dealing with the neighbours, especially Pakistan. His policy was very much a part of a continuum and one of its underpinnings, regrettably, was emotional rather than practical, MJ points out. “I think we drifted along, propelled by a stagnant flow of understanding. We can’t afford it anymore,” says the author who says he has exhausted the sequence of books that dealt with the state of Muslims in the Subcontinent and the world. He adds, “We have to understand the nature of the adversary… tactical battles and strategic battles.”

MJ is well-read, caustic, defiant and outspoken. He is also an ideasmith who loves books but finds James Joyce’s Ulysses unreadable. He is copy fiend who spikes clichés. He also has strong views on India’s foreign-policy front: India’s challenges are numerous, especially because “the war zone of tomorrow” lies between the Brahmaputra and the Nile. “Very much at our doorsteps,” says this music aficionado who enjoys songs in Hindi, Urdu and Bhojpuri when he is not gorging on books on history. A Dev Anand fan, he stopped “worshipping” actresses after he began to see them in real life, confides this father of two—Prayaag and Mukulika—and husband of former journalist Mallika Joseph whom he met at the Illustrated Weekly. “I can only go back to actresses I have never seen in real life. There is Madhubala. I also like Vyjayanthimala,” MJ says, gesturing with folded hands.

For those familiar with the tessellated polish of his style, maybe the best of him is yet to emerge—as a public servant and an apostle of Modi’s development mantra. साभार : ओपेन

केवी में डीएनए की महिला पत्रकार को बनाया गया बंधक

इंदौर. पत्रकारों पर हमले और अभद्रता की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है। इंदौर के संयोगितागंज थाना क्षेत्र में स्थित केंद्रीय विद्यालय में गुरुवार को ऐसी ही घटना घटी। केवी के अध्‍यापक एवं कर्मचारियों ने अंग्रेजी अखबार डीएनए की रिपोर्टर को घंटों तक बंधक बनाए रखा। महिला पत्रकार की शिकायत पर पुलिस ने केवी की वाइस प्रिंसिपल और कई पुरुष कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।

महिला पत्रकार श्रुति माहवाहा दोपहर में स्कूल में कोर्स के बारे में जानकारी लेने गई थी। वे स्कूल के एक अधिकारी हरिओम कौशिक से अनुमति लेकर वहां पहुंची थी। उन्होंने ही वाइस प्रिंसिपल और स्टॉफ के अन्य सदस्यों से मिलवाया था। वहां उन्हें एक संविदा शिक्षिका के साथ पांचवीं कक्षा में भेजा गया। महिला पत्रकार ने कुछ किताबों के फोटो खींचे तो स्कूल स्टॉफ ने उनसे सवाल- जवाब शुरू कर दिया। उन्हें वाइस प्रिंसिपल के चैंबर में ले जाया गया और आईडी कार्ड मांगा गया।

पुलिस को की गई शिकायत में श्रुति ने बताया है कि वे आईडी कार्ड लेकर नहीं आई थीं। पर उन्‍होंने कहा कि वे शिक्षा विभाग के अधिकारियों से इस संदर्भ में बात करवा सकती हैं, लेकिन उनकी कोई बात नहीं सुनी गई। इस बीच श्रुति ने वाइस प्रिंसिपल के बयान रिकॉर्ड करने की कोशिश की तो उन्होंने पुरुष कर्मचारी को मोबाइल छीनने के आदेश दिए। पुरुष कर्मचारी ने श्रुति का पीछा किया और दौड़ाया।

श्रूति ने बताया कि इतना ही नहीं पार्किंग एरिया में उसे 7-8 पुरुष कर्मचारियों ने घेर लिया। वे बदतमीजी करने लगे। मोबाइल छीनने की कोशिश करने लगे। लगभग एक घंटे तक उन्‍हें बंधक बनाकर वहीं रोके रखा गया। बाद में श्रुति ने अपने ऑफिस कॉल किया तब उनलोगों ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने उन्‍हें केवी के कर्मचारियों से मुक्‍त कराया। संयोगितागंज पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ बंधक बनाने और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में आईपीसी 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया है।

आफगानिस्‍तान में जर्मन फोटोजर्नलिस्‍ट की हत्‍या, कनाडा की पत्रकार घायल

काबुल : अफगानिस्तान में शनिवार को होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव से ठीक एक दिन पहले दो विदेशी महिला पत्रकारों पर हमला हुआ है. हमला करने का आरोप एक पुलिसकर्मी पर लगा है. खोस्त में हुए इस हमले में जर्मनी की फोटो जर्नलिस्‍ट मारी गयी हैं और कनाडा की पत्रकार बुरी तरह जख्मी हुई हैं. मारी गई महिला फोटो जर्नलिस्‍ट को प्रतिष्ठित पुलित्‍सर पुरकार मिल चुका है.

जर्मनी की आन्या नीडरिंगहाउस और कनाडा की कैथी गैनन समाचार एजेंसी एपी के लिए काम कर रही थीं. आन्या नीडरिंगहाउस नामी युद्ध फोटोग्राफर थीं और उन्हें अफगानिस्तान के उस इलाके और दूसरे विवादित इलाकों का सालों कवरेज करने का अनुभव था. वे 2002 से एपी के लिए काम कर रही थीं. उन्हें और उनकी टीम को इराक युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए पुलित्सर पुरस्कार मिला था.

गंभीर रूप से घायल कैथी गैनन को अस्पताल में भर्ती किया गया है. दोनों पत्रकारों पर हमला पाकिस्तान की सीमा से लगे एक छोटे से शहर खोस्त के पुलिस मुख्यालय में हुआ. हमले के काफी समय बाद तक हमलावर की पहचान को ले कर अटकलें लगती रहीं. लेकिन अब खोस्त के गवर्नर के प्रवक्ता ने कहा कि हमला वाकई एक पुलिसकर्मी ने ही किया. रॉयटर्स से बात करते हुए मोबारिज जदरान ने कहा कि नकीबुल्लाह खोस्त के तनाई जिले का पुलिसकर्मी है. उसी ने दो विदेशी पत्रकारों पर गोलियां चलाईं. इसमें एक की मौत हो गयी और एक घायल हुई है.

समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार वारदात जिले के पुलिस मुख्यालय में हुई है. न्यूयॉर्क के एपी मुख्यालय ने अब तक हमले की पुष्टि नहीं की है. वारदात की पृष्ठभूमि स्पष्ट नहीं है. दोनों रिपोर्टर राष्ट्रपति चुनाव की रिपोर्टिंग कर रही थीं और शुक्रवार को ही खोस्त पहुंची थीं. तालिबान ने पहले ही इस बात की धमकी दी थी कि धमाकों और लोगों पर हमलों से चुनावों को भंग करने की कोशिश की जाएगी. पिछले महीने तालिबान ने राजधानी काबुल में हमला करके समाचार एजेंसी एएफपी के वरिष्ठ पत्रकार सरदार अहमद की हत्‍या कर दी. इस हमले में अहमद के परिवार के तीन सदस्‍यों समेत 11 लोगों की मौत हो गई थी. 11 मार्च को हुए एक और हमले में स्वीडन के पत्रकार नील्स हॉर्नर की मौत हो गई थी.

फोटो जर्नलिस्‍ट रेपकेस : तीन आरोपियों को मौत, एक को आजीवन कारावास की सजा

मुंबई : मुंबई की एक अदालत ने शुक्रवार को पिछले साल शहर के सुनसान शक्ति मिल्स में अलग-अलग घटनाओं में दो फोटो पत्रकार एवं एक अन्‍य युवती से सामूहिक बलात्कार के दोषी पाए गए तीन आरोपियों को मौत तथा एक आरोपी को आजीवन करावास की सजा सुनाई गई। इस मामले में अदालत ने बलात्कार के कई मामले में दोषी पाए जाने से जुड़े नए कानून के तहत पहली बार सजा सुनाई।

अभियोजन पक्ष ने बलात्कार के मामले में फिर दोषी पाए गए विजय जाधव, कासिम बंगाली और सलीम अंसारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (ई) के तहत मृत्युदंड की मांग की थी। प्रधान न्यायाधीश शालिनी फानसाल्कर जोशी ने मौत की सजा सुनाते हुए कहा कि इन तीनों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। हालांकि फैसला सुनाने से पहले अदालत ने विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम की दलीलों पर विचार किया। निकम ने कहा था कि कि जिन परिस्थितियों में अपराध किया गया है, उसके लिए दोषियों को अधिकतम सजा मिलनी चाहिए।

अदालत ने गुरुवार को इन तीन आरोपियों को बलात्कार के कई मामलों में दोषी ठहराए जाने से जुड़ी आईपीसी की धारा के तहत दोषी ठहराया। इस धारा के तहत अधिकतम मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है। देश में इस संशोधित धारा के तहत पहली बार सजा सुनाई गई। इस धारा को वर्ष 2012 में दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद जोड़ा गया था। मुंबई में सामूहिक बलात्कार की दो घटनाएं दो महिलाओं – एक टेलीफोन आपरेटर और एक फोटो पत्रकार से जुड़ी हैं। ये घटनाएं पिछले साल मध्य मुंबई में स्थित शक्ति मिल्स परिसर में कुछ हफ्तों के अंतराल में हुई थीं।

पिछले साल जुलाई में 18 साल की टेलीफोन आपरेटर जबकि अगस्त में 22 वर्षीय फोटो पत्रकार से सामूहिक बलात्कार किया गया था। फोटो पत्रकार का विजय जाधव, कासिम बंगाली, सलीम अंसारी, सिराज रहमान और एक नाबालिग लड़के ने बलात्कार किया था। दोनों मामलों में शामिल तीन दोषियों को मृत्युदंड की सजा दी गई जबकि फोटो पत्रकार बलात्कार मामले में सिराज को आजीवन कारावास की सजा मिली।

डीएम साहब, हमका पत्रकार बना देईं

पत्रकारों के भौकाल से कुछ लोग इस कदर प्रभावित हो जाते है कि उसी भौकाल के लिए पत्रकार बनने की जद्दोजहद में जुट जाते है। ऐसे लोगों का पत्रकारिता से कोई वास्ता नही होता। उनके लिए ‘‘पत्रकार’’ शब्द सिर्फ स्वार्थ सिद्धि का पर्याय नजर आता है। उसी भौकाल के लिए ऐसे लोग तमाम अखबारों या न्यूज चैनलों में हर तरह के जुगाड़ लगाकर इन्ट्री लेना चाहते हैं। लेकिन गाजीपुर में एक शख्स ने नए तरिके से अपने नाम के साथ ‘‘पत्रकार’’ शब्द जोड़ने की कवायद शुरू की है। गाजीपुर के सुग्‍गन सिंह यादव ने बाकायदा जनता दर्शन में जिलाधिकारी महोदय को लिखित प्रार्थना पत्र देकर खुद को पत्रकार बनाने की गुहार लगाई है। जिसपर डीएम साहब ने जिला सूचना अधिकारी को कार्यवाही हेतु निर्देशित भी किया, किन्तु सरकारी कार्यालयों के परापम्परागत तरीकों के चलते पिछले अक्टूबर से इनका आवेदन निस्तारित होने की राह देख रहा है। आज भी ये महाशय आला अधिकारियों और सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। सुग्‍गन ने बताया कि ‘‘थाना हो या अस्पताल या फिर कचहरी, हर जगह पत्रकारों की सुनवाई प्राथमिकता पर होती है। मेरे भी कई काम कचहरी में फंसे हैं, थाने का दरोगा फरियाद करने पर भगा देता है, दुर्घटना होने पर अस्पताल से मेडिकल बनवाना भी टेढ़ी खीर है। इसलिए ऐसी समस्याओं के निराकरण के लिए पहले पत्रकार बनना जरूरी है। इसीलिए मैने डीएम साहब से गुहार लगाई है, लेकिन इतने महिनों के बाद भी मेरे प्रार्थना पत्र पर कोई कार्यवाही नही हुई। ऐसा ही चलता रहा तो मैं धरने पर बैठने को मजबूर हो जाउंगा।’’ अब देखना है कि जिला प्रशासन से सुग्‍गन सिंह यादव कबतक अपनी मांग पूरी करा पाते हैं।– गाजीपुर से के0के0 की रिपोर्ट, 9415280945

मुनाफे के लालच में अपने स्कूल की किताबों का लेखक बन गया चौथी पास कोयला व्यापारी

Pradeep Mishra: इन्दौर में एक कोयले औऱ ट्रांसपोर्ट का व्यसायी है नाम है पुरषोत्तम अग्रवाल। इनकी शैक्षिक योग्यता मात्र चौथी क्लास है। पिछ्ले कुछ वर्षो से ये शहर में, अपने पैसे के बल पर तीन स्कूल संचालित कर रहे है। अग्रवाल पब्लिक स्कूल, चमेली देवी पब्लिक स्कूल पार्ट एक और पार्ट दो। चमेली देवी पब्लिक स्कूल पार्ट दो, नर्सरी से 5वीं क्लास तक है। ये, यशवंत प्लाज़ा बिल्डिंग जो रेलवे स्टेशन के पास है, उसकी तीसरी मंज़िल की दुकानो व गलियारे मे चलाया जा रहा है। जहां न खेलने का मैदान है, ना ही प्रकतिक हवा व प्रकाश की व्यवस्था है। ये तीनो स्कूल सीबीएसई से मान्यता पात्र हैं।

 
स्कूल में पढ़ाई जाने वाली किताबों और कॉपियों के धंधे मे 400 प्रतिशत से ज़्यादा मुनाफ़ा दिखने की वजह से, एक सोंची समझी योजना के तहत ये लालची व्यापारी खुद लेखक भी बन गया है। जबकि वह सिर्फ चौथी क्लास तक ही पढ़ा है। इसने एलबीफ पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड के नाम से एख कंपनी खोली है औऱ नर्सरी से 8वीं तक की पाठ्य पुस्तकों का स्वयं को लेखक व प्रकाशक बता कर पूरे देश मे बेचने का जाल बनाया है।

कोढ़ में खाज वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए जो पाठ्य पुस्तकें निकाली उनमे ग़लत, भ्रामक और अर्थ का अनर्थ सिखाने वाले तथ्यों और पाठों का समावेश किया गया। जब एक मासिक पत्रिका ने इसका खुलासा किया तब इस लालची व्यापारी ने किताबों को फाड़कर फेकने के बजाए हर किताब के पहले पन्ने पर एक स्लिप चिपका दी की किताब में ये-ये ग़लत जानकारी हैं। कृपया इसकी जगह ये पढ़े। इस मूर्ख आदमी को कोई ये बताए की 2री, 3री, 4थी, 5वीं क्लास के अबोध बच्चों को तेरी ग़ल्तियों की स्लिप देखने का ध्यान रहेगा। और इस चैथी कक्षा पढ़े लालची व्यापारी की कितबें खरीदना कम्पल्सरी है। शर्म आनी चाहिए इस प्रशासन, सरकार और स्कूली शिच्छा विभाग तथा पालको को जो इस स्कूली शिच्छा के लालची व्यापारी कोशह दे रहे हैं। उसके खिलाफ कोई कारवाई करने के बजाए उसके सामने नतमस्तक होकर तलवे चाट रहे है। इसकी कंपनी का नाम तो होना चाहिए लर्न बाइ फूल एंड फ्राड(एलबीएफ)।

 

इंदौर के पत्रकार प्रदीप मिश्रा के फेसबुक वॉल से।
 

बस्तर को संविधान के दायरे में लाने के लिए सोनी सोरी को चुनाव में सफलता दिलाना जरुरी

सोनी सोरी का प्रचार अभियान समय के साथ साथ सघन होता जा रहा है। उन्हें विभिन्न जनजातीय समाजों के समर्थन के साथ साथ राष्ट्रीय स्तर पर जाने पहचाने चेहरों का सहयोग भी मिल रहा है। डॉक्टर सुनीलम के आज लौट जाने के बाद बस्तर लोकसभा क्षेत्र में स्वामी अग्निवेश का पहुँचाना सोनी सोरी और उनकी टीम को उत्साहित कर रहा है। साथ ही, मानवाधिकार हनन के गम्भीर मामलों के खिलाफ संघर्षरत सोनी सोरी के पक्ष में विभिन्न क्षेत्रों से मिलती चुनावी मदद से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का असहज होना नुकसानदेह है।

 
 

सोनी सोरी के पक्ष में बस्तर लोकसभा क्षेत्र के कोंडागांव, चित्रकोट, दंतेवाड़ा आदि विधानसभा क्षेत्रों में सघन प्रचार का काम चलता रहा। प्रचार से मिलते नतीजों से यह आकलन किया जा सकता है कि इस बार आदिवासी समाजों का मन बदल रहा है। कमल और पंजे के पारम्परिक निशानों से आजिज आ कर अब वह यह सोचने लगा है कि नेता और उनकी स्थितियां तो तेजी से बदल रही हैं और अगर कुछ यथावत है तो वह बरसों से लगातार बिगड़ती उनकी परिस्थितियां, जो कि निकट भविष्य में पारम्परिक पार्टियों के वायदो से निखरती नज़र भी नहीं आती। ऐसे में सोनी सोरी इस चुनाव में एक मज़बूत त्रिकोणीय संघर्ष की परिस्थितियां पैदा कर दें, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।
 
बहरहाल जगदलपुर में प्रेस वार्ता के पहले स्वामी अग्निवेश ने सोनी सोरी के साथ नारायणपुर क्षेत्र में सघन जन संपर्क में हिस्सा लिया। इस दौरान बोलते हुए सोनी सोरी ने कहा कि वे अपने घोषणा पत्र में लिखित सभी मुद्दों पर लगातार संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध हैं। चुनाव के सम्भावित नतीजों को दरकिनार करते हुवे उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वे वायदों कि राजनीति में यकीन नहीं रखतीं। उन्होंने कहा कि नतीजा चाहें जो भी हो वे बस्तर कि आम जनता को राज्य के दमन और माओवादियों की बन्दूक दोनों से ही सुरक्षा दिला के रहेंगी तथा अब तक हुई तमाम घटनाओं में राज्य और माओवादियों की संलिप्तता की निष्पक्ष जाँच करा कर दोषियों को सजा दिलाना उनके लिए प्राथमिक मुद्दा है। आदिवासियों के लिए बनाये गए कन्या छात्रावासों में लड़कियों के साथ होते अन्याय के खिलाफ बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह आदिवासी अस्मिता का सवाल है जिस पर एक मजबूत आंदोलन की ज़रुरत है।
 
सोनी सोरी के साथ प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए स्वामी अग्निवेश ने कहा कि बस्तर को भारतीय संविधान के दायरे में लाने के लिए सोनी सोरी को चुनाव में सफलता दिलाना जरुरी है। पैसा कानून, वनाधिकार कानून और संविधान की 5वीं अनुसूची आदि का हवाला देते हुए स्वामी अग्निवेश ने कहा कि कार्पोरेट जगत के पक्ष में रहते हुए इन कानूनों की अवहेलना की जा रही है।
 
इस बीच कई समाचार एजेंसियों का जमावड़ा बस्तर में बना हुआ है। आगामी दिनों में सुकमा, दंतेवाड़ा और जगदलपुर, नारायणपुर बस्तर आदि विधानसभाओं में प्रचार अभियान चलाने का निर्णय हुआ है।

 

जनादेश न्यूज़ नेटवर्क।

कोबरा पोस्ट का नया खुलासाः पूर्वनियोजित साजिश थी बाबरी मस्जिद विध्वंस

आम चुनाव के शुरू होने से ठीक पहले 'कोबरा पोस्ट' द्वारा बाबरी मस्जिद से जुड़ा एक नया स्टिंग ऑपरेशन सामने लाया गया है। कोबरा पोस्ट के स्टिंग के सामने आने के बाद से राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। इस स्टिंग में दिखाया गया है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस योजना पहले से बनाई गई थी। इसकी जानकारी बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं थी। बीजेपी इस स्टिंग औऱ इसके जारी करने की टाइमिंग का खुलकर विरोध कर रही है। वहीं विरोधी पार्टियों का कहना है कि इस स्टिंग में कुछ नया नहीं है।

ऑपरेशन जन्मभूमि:- कोबरपोस्ट उस षड्यंत्र की तह मे जाता है और उन लोगों से मिलता है जो दिसंबर 1992 मे हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के पीछे थे और यह पाता है की यह एक पूर्वनियोजित साजिश थी ।
कोबरपोस्ट राम जन्मभूमि आंदोलन के उन नेताओं को बेनकाब करता है जिन्होंने षड्यंत्र रच कर 6 दिसंबर 1992 को सोलहवी शताब्दी के एक विवादित ढांचे को धूल मे मिलाने मे सफलता प्राप्त की ।एक ऐसी साजिश जिसे इतने साल बीत जाने के बाद भी सी बी आई जैसी खुफिया एजेंसी भी ना सुलझा पायी।

नयी दिल्ली: अपने एक बड़े इन्वैस्टिगेशन मे कोबरपोस्ट ने 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पीछे की साजिश और इस साजिश को अंजाम देने वाले लोगों को बेनकाब किया है। ऑपरेशन  जन्मभूमि मे की गयी इस तहकीकात की दौरान इस षड्यंत्र मे शामिल लोगों ने कोबरपोस्ट के सामने परत दर परत विध्वंस की योजना का खुलासा किया है। कोबरपोस्ट के खुलासे से यह बात साबित हो जाती है की बाबरी विध्वंस किसी उन्मादी भीड़ का काम नहीं था बल्कि यह एक सोची समझी रड़नीति के तहत की गयी कार्रवाई थी। इसकी योजना इतनी गुप्त रखी गयी थी की आज तक किसी भी सरकारी एजन्सि को इसकी कोई भनकी नहीं लग पायी है। बतौर मिसाल वर्षों की छानबीन के बावजूद सी बी आई को उन सभी चालीस लोगों के खिलाफ अकाट्य प्रमाण नहीं मिल पाये हैं जिन्हे उसने अपनी चार्ज शीट मे अभियुक्त करार दिया है।

कोबरपोस्ट के एसोशिएट एडिटर के॰ आशीष ने राम जन्म भूमि आंदोलन मे अगली पांत के नेता रहे 23 लोगों से मुलाक़ात की। ये सभी लोग बाबरी मस्जिद के विध्वंस मे शामिल रहे हैं। इनकी भूमिका या तो साजिशकर्ता के रूप मे थी या उस साजिश को अमली जामा पहनाने मे इनकी भूमिका थी। आशीष ने इन लोगों से एक लेखक के रूप मे मुलाक़ात की जो इनसे अयोध्या आंदोलन पर अपनी प्रस्तावित पुस्तक के बारे मे जानकारी चाहता था। आशीष ने बजरंग दल, वीएचपी और बीजेपी के चंपत राय बंसल, रामजी गुप्ता, प्रकाश शर्मा, रमेश प्रताप सिंह, विनय कटियार, जयभान सिंह पवेया, धर्मेंद्र सिंह गुर्जर, बी एल शर्मा प्रेम, ब्रिज भूषण शरण सिंह, साध्वी उमा भारती, कल्याण सिंह और लल्लू सिंह से बातचीत की। उसके बाद शिवसेना के जय भगवान गोयल, पवन पांडे, संतोष दुबे, सतीश प्रधान और मोरेश्वर सावे से बातचीत की और फिर हिंदु संत समाज के स्वामी सचिदानंद साक्षी महाराज, महंत राम विलास वेदांती, साध्वी रितमबरा, महंत अवैद्यनाथ, आचार्य धर्मेंद्र और स्वामी नृत्य गोपाल दास से बात की।
इनमे से 15 लोगों को लिब्रहान आयोग ने दोषी ठहराया है तो वहीं सी बी आई ने इनमे से 19 लोगों को अपनी चार्जशीट मे आरोपी बनाया है।  हैरानी की बात यह है की सीबीआई ने बी एल शर्मा, महंत अवैद्यानाथ, महंत नृत्य गोपाल दास और महंत राम विलास वेदांती जैसे महत्वपूर्ण किरदारों को अपनी जांच और चार्ज शीट का हिस्सा नहीं बनाया है। कुल मिला कर बाबरी विध्वंस के मामले मे 40 लोगों पर सीबीआई कोर्ट मे मुकदमा चल रहा है, जिनमे से 32 लोगों को एफ आई आर नंबर 92/197 मे साजिश को अंजाम देने वाले लोगों के रूप मे शुमार किया है। बचे 8 लोगों को एफ आई आर नंबर 92/198 साजिश कर्ता के रूप मे आरोपी बनाया गया है।

अपनी तहकीकात के दौरान आशीष ऑपरेशन जन्मभूमि के इन मुख्य किरदारों से मुलाक़ात करने के लिए उत्तर प्रदेश के  अयोध्या, फैजाबाद, टांडा, लखनऊ, गोरखपुर, मथुरा और मुरादाबाद, राजस्थान के जयपुर, महाराष्ट्र के औरंगाबाद और मुंबई, और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जैसे शहरों मे गए। इत्तेफाक से इस गुप्त योजना को ऑपरेशन जन्मभूमि का नाम इन्ही षड्यंत्रकारियों से मिला था कोबरपोस्ट ने अपने इस खुलासे के लिए इस नाम को अपना लिया।

कोबरपोस्ट की तहकीकात मे जो बातें उभर कर सामने आई हैं उनमे से कुछ इस प्रकार हैं:-

बाबरी विध्वंस का षड्यंत्र दो उग्र हिंदुवादी संगठनो विश्व हिन्दू परिषद और शिव सेना ने अलग अलग रचा था।
इन दोनों संगठनो ने 6 दिसंबर से काफी समय पहले अपनी कार्ययोजना के तहत अपने कार्यकर्ताओं को इस मकसद के लिए प्रशिक्षण दिया था।
आरएसएस के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का एक आत्मघाती दस्ता भी बनाया गया था जिसको बलिदानी जत्था भी कहा गया।
विहिप की युवा इकाई बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने गुजरात के सरखेज मे इस मकसद के लिए एक महीने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया था। दूसरी ओर शिवसेना ने भी अपने कार्यकर्ताओं के लिए ऐसा ही एक प्रशिक्षण कैंप भिंड मोरेना मे आयोजित किया था।
इस प्रशिक्षण मे लोगों को पहाड़ियों पर चड्ने और खुदाई करने का प्रशिक्षण देने के साथ साथ शारीरिक व्यायाम भी कराया जाता था।
6 दिसंबर को विवादित ढांचे को तोड़ने के मकसद से छैनी, घन, गैंती, फावडा, सब्बल और दूसरी तरह के औजारों को ख़ासी तादाद मे जुटा लिया गया था।
6 दिसंबर को ही लाखो कारसेवकों को एक संकल्प भी कराया गया था। इस संकल्प मे विवादित ढांचे को गिरा कर उसकी जगह एक भव्य राम मंदिर बनाने की बात कही गयी थी। राम कथा मंच से संचालित इस संकल्प मे आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, गिरि राज किशोर और आचार्य धर्मेंद्र सहित कई जाने माने नेता और संत लोग थे। यह संकल्प महंत राम विलास वेदांती ने कराया था। कहा जाता है की संकल्प के होते ही बाबरी मस्जिद को तोड़ने का काम शुरू कर दिया गया था।
विहिप के नेताओं ने बाबरी विध्वंस के मकसद से कुछ दिन पहले अलग अलग अंचलों के 1200 संघ कार्यकर्ताओं को मिला कर एक सेना का गठन किया था। इस गुप्त सेना का नाम लक्ष्मण सेना था। इस सेना को सभी सामान उपलब्ध कराने और दिशानिर्देश का जिम्मा राम जी गुप्ता को सौपा गया था। इस सेना का नारा जय शेशावतार था।
दूसरी ओर शिवसेना ने भी इसी तर्ज पर अयोध्या मे अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं की एक सेना बना रखी थी। इसका नाम प्रताप सेना था। इसी सेना ने शिवसेना के बाबरी मस्जिद विध्वंस के अभियान को जरूरी सामान और सहायता उपलब्ध कराई थी।
आरएसएस, विहिप और बजरंग दल के नेताओं ने विध्वंस से एक दिन पहले अयोध्या के हिन्दू धाम मैं एक गुप्त मीटिंग की थी। इस मीटिंग मे अशोक सिंघल, विनय कटियार, विष्णु हरी डालमिया, मोरो पंत पिंगले और महंत अवैध्यनाथ ने शिरकत की थी। इसी बैठक मे दूसरे दिन होने वाली कारसेवा के दौरान बाबरी मस्जिद को गिराने का फैसला किया गया था।
आरएसएस और बीजेपी ने भी एक गुप्त बैठक हनुमान बाग मे की थी। इस मीटिंग मे आरएसएस के एच वी शेषाद्री समेत उस समय अयोध्या मे मौजूद विनय कटियार, उमा भारती और एल के आडवाणी जैसे नेताओं ने भाग लिया था।
इधर शिवसेना ने बाबरी विध्वंस से एक महीने पहले दिल्ली के नॉर्थ एवेन्यू मे एक गुप्त बैठक की थी। इस बैठक मे जय भगवान गोयल, मोरेश्वर सावे, आनन्द दिघे समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सेदारी की थी। इस बैठक मे अयोध्या कूच से पहले पूरी रणनीति तय की गयी थी। बाला साहब ठाकरे और राज ठाकरे दोनों इन सारी गतिविधियों के दौरान इन नेताओं से संपर्क मे थे।
अगर पारंपरिक तरीके कामयाब नहीं हो पाते तो शिवसेना ने बाबरी मस्जिद को डायनमाईट से उड़ाने का फैसला भी किया था।
•पारंपरिक औजारों के अलावा बजरंग दल की बिहार की टोली ने बाबरी को गिराने के लिए पेट्रोल बमो का भी इस्तेमाल किया था।
स्थानीय प्रशासन ने अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी निभाने के बजाय उन्मादित कार सेवकों को बाबरी ढांचे को ध्वस्त करने के लिए उकसाया और इस काम मे उनकी मदद भी करी। जैसे पी ए सी के जवानो को ये कहते सुना गया की इस “सरदर्द” को हमेशा के लिए खत्म कर दो।
बाबरी विध्वंस के बाद वहाँ से कई पुरातन महत्व की चीजों को चुपचाप निकाल लिया गया। जैसे शिवसेना के नेता पवन पांडे के पास 1528 के शिलालेख के दो टुकड़े मौजूद हैं, जिसमे मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद के निर्माण की घोषणा की थी। पवन पांडे अब इन दो टुकड़ों को बेचना चाहते हैं।

लक्ष्मण सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम जी गुप्ता का कहना है कि उनकी सेना को एक स्पष्ट  निर्देश दिया गया था की जैसे ही वो तीन बार जय शेशावतार का नारा लगाएंगे उस सेना के सभी लोग कारसेवकों की भीड़ का फायदा उठा कर बाबरी पर हमला बोल देंगे। इसके बाद अगर कोई भी नेता उनसे रुकने के लिए कहता है तो वो नहीं रुकेंगे जब तक की बाबरी का काम तमाम ना हो जाए।
कोबरपोस्ट की पड़ताल मे दो महत्वपूर्ण किरदारों का नाम भी उभर कर आया है जिन्होने बाबरी विध्वंस मे अपने तरीके से भूमिका निभाई। इनमे से एक कल्याण सिंह हैं जो बाबरी विध्वंस के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। कोबरपोस्ट को कम से कम दो महत्वपूर्ण नेताओं ने ये खुलासा किया है कि कल्याण सिंह को अयोध्या मे चल रहे हर घटनाक्रम की जानकारी थी। वो अच्छी तरह से जानते थे की दिसंबर 6 को क्या होगा। महंत राम विलास वेदांती के अनुसार उन्हे दिसंबर 5 की रात को ही दो टूक शब्दों मे बता दिया गया था कि ढांचा तोड़ दिया जाएगा। वेदांती कहते हैं “पाँच दिसंबर की रात को ही कल्याण सिंह के पास समाचार भेज दिया गया था और उसमे ये कहा गया था की यदि आवश्यकता पड़ती है तो ढांचा भी तोड़ दिया जाएगा आपको क्या भूमिका निर्वाह करनी है विचार कर लीजिए।“ सिर्फ यही नहीं साक्षी महाराज का भी दावा है की वो कल्याण सिंह को अयोध्या मे चल रहे घटनाक्रम की मिनट दर मिनट जानकारी दे रहे थे। इसके बावजूद भी कल्याण सिंह ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

ऐसा कहा जाता है कि कल्याण सिंह दिसंबर 6 की सुबह अपना त्यागपत्र देने पर आमादा हो गए थे लेकिन उन्हे अयोध्या से मुरली मनोहर जोशी और शेषाद्री ने तब तक इस्तीफा ना देने के लिए माना लिया जब तक कि कारसेवक बाबरी ढांचे को ज़मींदोज़ ना कर दे। इन नेताओं को ये डर था कि अगर मुख्यमंत्री ने समय से पहले इस्तीफा दे दिया तो उत्तर प्रदेश मे तत्काल राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाएगा और तत्काल सेना बुला ली जाएगी तो ऐसे मे भारी संख्या मे कारसेवक मारे जाते।

बाबरी विध्वंस मे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव का हाथ होने की बार बार आशंका जताई जाती रही है। कोबरपोस्ट की पड़ताल मे यह आशंका सही साबित हुई है। विनय कटियार, बी एल शर्मा, संतोष दुबे, साक्षी महाराज और महंत राम विलास वेदांती जैसे राम जन्म भूमि आंदोलन के शीर्ष नेता बड़ी बेबाकी से नरसिंह राव की भूमिका को स्वीकारते हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए दो बार द्रढ़ प्रयास हुआ था। एक 1990 मे और दूसरा 1992 मे पहली कोशिश पुलिस की कार्रवाही के कारण कामयाब नहीं हो पायी। पुलिस की कार्रवाई मे कई कारसेवकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। मगर साक्षी महाराज उन कारसेवकों की मौत के लिए आंदोलन के कुछ नेताओं को दोषी ठहराते हैं जो आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कारसेवकों की बलि देना चाहते थे। साक्षी महाराज कारसेवकों की मौत के लिए अशोक सिंघल को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं “तो मेरे सामने अशोक सिंघल जी ने कहा महाराज कुछ लोग नहीं मरेंगे तो आंदोलन ऊपर नहीं उठेगा तो आप आज्ञा दो जाने की तो अशोक सिंघल जी ने कहा … वामदेव जी ने कहा बच्चे मरेंगे तो बहुत काम खराब हो जाएगा …बोले महाराज जब तक नहीं मरेंगे तब तक कुछ होगा नहीं आंदोलन तभी बढ़ेगा।”
 
साक्षी की तरह साध्वी उमा भारती विनय कटियार को कोठारी बंधुओं की मौत के लिए जिम्मेदार मानती है। 30 अक्टूबर 1990 के घटनाक्रम को याद करते हुए उमा भारती कहती हैं, “जो लोग मरे थे वो विनय की गलती से …. गलती भी नहीं वो भगदड़ मची वो गली छोटी थी …गलती मतलब वो भाग गया छोड़कर भाग गया।”

इस तरह के आरोप अयोध्या षड्यंत्र को एक नया आयाम देते हैं और इस आंदोलन के शीर्ष नेताओं की नियत को लेकर सवाल खड़े करते हैं। क्या वाकई वे युवा कारसेवकों की अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों की बेदी पर बलि चढ़ाना चाहते थे।

इसी तरह बजरंग दल के एक और अग्रणी नेता धर्मेंद्र सिंह गुर्जर आंदोलन के पूरे नेत्रत्व की नियत पर सवाल खड़े करते हैं, “ये सब बेवकूफ बनाने वाली बातें हैं इसीलिए तो हमारा देश बेवकूफ बनता आ रहा है … पहले हम जवानी की जोश मे थे … जुनून मे थे एक जुनून था गुजर गया … लोगों ने उपयोग किया और छोड़ दिया यूज करके।”

हिन्दुत्व और उसके नेत्रत्व का यह निर्मम चेहरा कोबरपोस्ट रिपोर्टर की एक और मुलाक़ात मे उभर कर आता है। इस मुलाक़ात के दौरान रिपोर्टर ने महंत अवैध्यनाथ को विनोद वत्स जैसे उत्साही कारसेवक के बलिदान की याद दिलाई। विनोद वत्स के बूढ़े माता पिता बदहाली का जीवन जी रहें हैं। महंत अवैध्यनाथ का जो कहना था वो वाकई शर्मनाक है, “सब को मरना है तुमको भी है मुझे भी मरना है मृत्य को कौन रोक सकता है।“ उसके बूढ़े निराश्रय माँ बाप के लिए महंत अवैध्य नाथ का भी यही दर्शन है, “वो भी मरेंगे उनको भी मरना है।”

कोबरपोस्ट की पड़ताल एक और सच्चाई को फिर से स्थापित करती है कि इस झगड़े की बुनियाद मे 1949 की एक घटना है जब रामलला की मूर्ति को गुपचुप तरीके से बाबरी मस्जिद मे स्थापित कर दिया गया था। इस घटना के चश्मदीद गवाह कोई और नहीं बल्कि रामजन्म भूमि आंदोलन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बी एल शर्मा प्रेम हैं। शर्मा का कहना है कहना है कि वो तब अयोध्या मे मिलिट्री पुलिस मे एक वारंट आफिसर के रूप मे तैनात थे। यह सब उनकी आँखों के सामने हुआ। तब अयोध्या के पुजारी रामचंद्र दास उनकी यूनिट मे बराबर आया जाया करते थे एक दिन राम चन्द्र दास ने उन्हे बताया कि रामलला अमुक दिन ऐसे प्रकट होंगे। तो वहाँ अपने साथियों को लेकर आना। शर्मा के अनुसार रामलला का प्रकट होना कोई दैवीय चमत्कार नहीं था। उनका कहना है, “अरे जी काहे के प्रकट होने वाले… प्रकट किया है … वो तो महाराज का काम था न रामचंद्र परमहंस।“ राम जन्म भूमि आंदोलन इसी झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया था। (प्रैस विज्ञप्ति)

कोबरपोस्ट टीम
नयी दिल्ली
4 अप्रैल, 2014
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मोदी के मंच से बोले सुभाष चंद्राः ‘यो ज़ी चैनल भी समझो थारा ही सै’

कुरुक्षेत्र, हरियाणा। गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी की रैली में 'ज़ी न्‍यूज' के मालि‍क सुभाष चंद्रा मोदी के साथ मंच पर बैठे। उन्‍होंने ठीक उस शहर में मोदी के साथ मंच साझा कि‍या, जो उनके वि‍रोधी कांग्रेस सांसद व उद़योगपति नवीन जिंदल का लोकसभा क्षेत्र है। इस बहाने सुभाष चंद्रा ने अपना रोना रोया कि कैसे उन्‍हे झूठे मामले में एक सेठ और राजनेता ने फंसाया है। ऊपर से ये भी कहा भाइयों कुछ और मत समझना, मैं कोई राजनीति‍क आदमी नहीं हूं।

 मोदी को मंच पर बैठे सुभाष चंद्रा(बांए से प्रथम)

चंद्रा ने मंच से हरि‍याणवी बोली में कहा भाइयों 'मैं भी हरि‍याणा का सूं, यो ज़ी चैनल भी समझो थारा ही सै।' बोले 'मेरे भाइयों मैंने तो हरि‍याणा का नाम पूरे संसार में रोशन कि‍या है। लेकि‍न एक षडयंत्र के तहत कांग्रेस सांसद नवीन जि‍दल ने मेरे खि‍लाफ झूठी एफआईआर दर्ज करा दी और कांग्रेस ने उसका साथ दि‍या। ये मत समझना कि मैं कोई राजनीति‍क आदमी हूं जो आज इस मंच पर बैठने आ गया। दरअसल मैं भ्रष्‍टाचार का सताया हुआ था और आहत था इसलि‍ए एक उम्‍मीद की कि‍रण देख इस मंच पर आ गया।
 
अब मोदी को देखने आए दर्शक तो उखड़ गए, वो कहने लगे कि आए तो थे बंसत राग सुनने, ये राग भैरवी कहां चल पड़ा। लोग चि‍ल्‍लाए तो चंद्रा समझ गए और बोले बस केवल दो मि‍नट दि‍ल का दर्द हरि‍याणा वालों के साथ सांझा कर लेने देा, फि‍र चला जाउंगा। आखि‍री गीत दर्द का सुनालूं तो चलूं।
 
जनता देख रही थी कि एक मीडि‍या मालि‍क दबी जुबान से मोदी मंच पर बैठा था और दूसरी तरफ पंजाब केसरी के मालि‍क अश्विनी तो उनके लोकसभा प्रत्‍याशी खुले रूप से ही बैठे थे। बाबू ये पब्‍लि‍क थी जो कह रही थी कि यार मीडि‍या मालि‍क अब तो खुलकर ही राजनेताओं के मंच पर आ गए। मैच फि‍क्‍स है। अब इसका ज्‍यादा प्रमाण लेने की जरूरत नहीं। और हास्‍यपद स्थिति तब हुई जब दैनि‍क जागरण ने रैली में अपना भाजपा प्रेम दि‍खाने के लि‍ए चंडीगढ से कई लोग भेज दि‍ए वो भी बहुत सीनि‍यर।
 
और अंत में रैली में पत्रकारों के साथ भी बुरी बनी। मोदी को देखने आई भीड़ बेकाबू हो गई। मोदी के भाषण से कि‍सी को कुछ नहीं लेना देना था। हजारों लोग मोदी की नजदीक से अपने मोबाइल में फोटो खींचने भाग खड़े हुए। आगे बैठे थे बेचारे पत्रकार। लोगों ने पत्रकारों की कुर्सियां तक फेंक डालीं। पत्रकारों के कंधो पर पांव रख दि‍ए। नौबत ये आ गई एक दल पत्रकारों के बड़े टेबल पर खड़ा हो गया। उधर कांग्रेस राज में पुलि‍स ने मोदी की रैली में व्‍यस्‍था न रखने की कसम खाई थी। भीड पंडाल के उपर चढ़ गई। आखि‍र पत्रकारों ने भाग कर जान बचाई। मजबूरी कवरेज की भी थी। बेचारे पत्रकार भाग कर पंडाल के बाहर वाले पल्‍लू में छुपे और वहां बैठकर खबर लि‍खी।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

राडिया की फोन पर पकड़ी गई बातचीत की प्रारंभिक जांच के लिए रतन टाटा और सायरस मिस्त्री से सीबीआई करेगी पूछताछ

सीबीआई कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया की फोन पर पकड़ी गई बातचीत की प्रारंभिक जांच के सिलसिले में टाटा संस के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा व मौजूदा प्रमुख सायरस मिस्त्री से पूछताछ करेगी। सीबीआई सूत्रों ने कहा कि एजेंसी टाटा व मिस्त्री से स्पष्टीकरण मांगेगी। राडिया की फोन टैपिंग मामले में एजेंसी ने दो प्रारंभिक जांच में टाटा समूह का नाम शामिल किया है।

सूत्रों ने कहा कि दोनों से जल्द इस पर स्पष्टीकरण मांगा जाएगा। सीबीआई के कदम के बारे में पूछे जाने पर टाटा संस के प्रवक्ता ने कहा, ‘हमारे पास इस बारे में कोई सूचना नहीं है। हमें इसके बारे में पता नहीं है।’ यह मामला टाटा मोटर्स द्वारा तमिलनाडु सरकार को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन योजना के तहत लो-फ्लोर बसों की आपूर्ति से संबंधित है। फिलहाल इसकी जांच सीबीआई की चेन्नई शाखा द्वारा की जा रही है।

सूत्रों ने कहा कि झारखंड के सिंहभूम जिले के अनकुआ में टाटा स्टील को लौह अयस्क खदान के आवंटन की भी जांच हो रही है। उन्होंने कहा कि एजेंसी को अभी तक अपनी जांच में किसी तरह की गड़बड़ी के बारे में पता नहीं चला है। लेकिन टैप की गई बातचीत में चूंकि इन सौदों की बात आई है इसलिए टाटा व मिस्त्री से कुछ मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा जाएगा। सूत्रों ने बताया कि टीवी चैनल के एक पत्रकार व एक प्रमुख समाचार पत्र समूह के वरिष्ठ कार्यकारी से एजेंसी पहले ही पूछताछ कर चुकी है। साथ ही एजेंसी ने रिलायंस, यूनिटेक और टाटा मोटर्स के कार्यकारियों से भी पूछताछ की है। आयकर विभाग द्वारा पकड़ी गई राडिया की बातचीत से निकलकर सामने आए कथित भ्रष्टाचार के मुद्दों पर सीबीआई ने 14 प्रारंभिक जांच मामले दर्ज किये हैं।

पिछले साल न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने 23 मुद्दों की पहचान की थी जो कि शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त टीम द्वारा राडिया की नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों, कॉरपोरेट जगत की हस्तियों व पत्रकारों के साथ टैप की गई वार्ता के विश्लेषण के आधार पर तय किए गए थे। अदालत ने एक मुद्दा खान विभाग के मुख्य सतर्कता अधिकारी को भी जांच के लिए भेजा था। जबकि एक अन्य मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया था।

पीठ ने कहा था, ‘नीरा राडिया और उसके सहयोगियों की विभिन्न व्यक्तियों के साथ हुई बातचीत से लगता है कि निहित स्वार्थी तत्वों ने सरकारी अधिकारियों से अपने पक्ष में काम करवाने के लिये भ्रष्ट तरीकों का इस्तेमाल किया और ऐसा लगता है कि इसके लिये उन्हें अलग से प्रतिफल प्राप्त हुआ।’

वसुंधरा सरकार ने जिस डील को घोटाला कहा था उसे कोर्ट में फेयर का सर्टीफिकेट दे दिया

Nitin Thakur : देखिए साब… मैं कहता रहता हूँ कि देश को एक 5 हज़ारा क्लब चलाता है। अब बानगी देखिए । भीलवाड़ा में जिंदल ग्रुप ने तत्कालीन सीएम गहलोत से सांठगांठ कर किसानों की जमीनें कब्जा लीं। किसानों में आक्रोश था और उसे भुनाने की नीयत से बीजेपी ने उनका पक्ष लिया। भाजपा ने गहलोत सरकार को इस मामले में खूब घेरा। इसे सूबे का सबसे बड़ा घोटाला घोषित कर दिया। हाय-तौबा मचा दी।

आखिरकार किसानों ने वसुंधरा को वोट दिए। वसुंधरा की सरकार भी बन गई। लड़ाई कोर्ट में चल ही रही थी। अब सबसे काम की बात… आपको मालूम है कि मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में इस सरकार ने क्या बयान दिया??? वसुंधरा की सरकार ने जिस डील को घोटाला करार दिया था उसे अदालत में "फेयर" का सर्टीफिकेट दे दिया। अब जाओ किसान भाइयों..ले लो ज़मीन वापस!!

युवा राइटर नितिन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

एकदम छोटी-सी स्कर्ट में उर्मिला को देख हम लोग सकपकाए कि पिताजी क्या सोच रहे होंगे

Sanjay Sinha :  जिस साल आमिर खान और उर्मिला मातोंडकर की फिल्म 'रंगीला' आई थी, मेरे पिताजी जीवित थे। मैं, मेरी पत्नी, मेरा बेटा, छोटे भाई का परिवार और पिताजी, सब साथ गए थे बड़ौदा के उस सिनेमा हॉल में 'रंगीला' देखने। पीछे का टिकट नहीं मिला था, इसलिए आगे की सीट पर हमने बैठ कर 'रंगीला' नाइट शो में देखी। उर्मिला मातोंडकर का गाना आया, एकदम छोटी सी स्कर्ट में उर्मिला को देख कर हमलोग थोड़ा सकपका गए कि पिताजी क्या सोच रहे होंगे।

पूरी फिल्म देखने के बाद पिताजी ने पूछा कि वो लड़की कौन थी। मैंने कहा उर्मिला मातोंडकर। तो पिताजी ने कहा कि अच्छी एक्टिंग की है। हमारी सांस में सांस आई कि पिताजी ने ज्यादा टोका टाकी नहीं की… खैर, पिताजी बड़ौदा में छोटे भाई के पास कुछ दिन और रह कर दिल्ली आने वाले थे। मैं अपनी पत्नी और बेटे के साथ अगले दिन शाम को दिल्ली वापस चला आया था। हमारी वापसी के तीसरे दिन बड़ौदा से छोटे भाई की पत्नी ने फोन किया कि पिताजी को बुखार हो गया है, उन्हें पास के नर्सिंग होम में भर्ती करा दिया है। मेरा छोटा भाई बड़ौदा से अहमदाबाद टूर पर गया था, और उसकी पत्नी को जितना समझ में आया उसने कर दिया।

मुझे जरा चिंता हुई। मैंने डॉक्टर का नंबर लिया और उस नर्सिंग होम में डॉक्टर से बात की। डॉक्टर ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, उन्हें बुखार है, ठीक हो जाएगा। मैंने पूछा कि आपने खून जांच की होगी, क्या निकला? डॉक्टर ने कहा कि नहीं, अभी तो पानी चढ़ा रहा हूं, कल खून की जांच के लिए भेजूंगा। मेरे मन में खटका हुआ। खैर, मैंने फिर छोटे भाई की पत्नी को फोन किया तो उसने बताया कि सब ठीक है। एक दिन और बीता और तीसरे दिन छोटा भाई बड़ौदा लौट आया था। आते ही वो पिताजी के पास गया। पिताजी ने उससे बात कि और कहा कि संजय को बुला दो।

भाई ने मुझे फोन किया। मैंने कहा कि कल सुबह की फ्लाइट से चला आउंगा। उन दिनों शायद सिर्फ इंडियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट दिल्ली से बड़ौदा जाती थी, या फिर अहमदाबाद से बड़ौदा जाना पड़ता था। रात में एक बार फिर फोन किया। तो पता चला कि खून जांच की रिपोर्ट आ गई है। डॉक्टर ने फाल्सीफेरम मलेरिया बताया है। मैं रात भर सपने में पिताजी को देखता रहा। पिताजी मुझे बुला रहे थे। चार दिन पहले उनसे मिल कर आया था। उनके साथ मैंने रंगीला फिल्म देखी थी। और आज पिताजी फिर मुझे बुला रहे हैं, यकीनन पिताजी परेशान हैं। सारी रात जागे हुए सोता रहा। सोते हुए जागा रहा।

सुबह-सुबह कनॉट प्लेस गया, नौ बजे टिकट काउंटर खुला। अहमदाबाद का हवाई टिकट मिला। टिकट लिया। दस बजे वापस लौटते हुए आईटीओ पुल के पास मुझे पता नहीं क्यों लगा कि पिताजी सामने खड़े हैं, और कह रहे हैं कि देर कर दी बेटा। मैं बहुत उदास होकर घर पहुंचा, तो पत्नी फोन पर बात कर रही थी, और रो रही थी। मैंने उससे पूछा कि पिताजी नहीं रहे क्या? तो वो सुबक पड़ी।
मैं भागा-भागा अहमदाबाद गया, वहां से टैक्सी लेकर बड़ौदा पहुंचा।

पिताजी की लाश घर आ चुकी थी, बर्फ की सिल्ली पर रखी थी। यकीन नहीं हो रहा था कि चार दिन पहले उर्मिला को नाचते देख कर मुस्कुराते हुए पिताजी अब नहीं है, सदा के लिए नहीं है। मृत्यु के बाद की औपचारिकता के बाद मैं उस नर्सिंग होम में उस 'डॉक्टर' से मिलने गया, जिससे मैंने फोन पर बात की थी। डॉक्टर ने कहा कि खून जांच के लिए दो दिनों के बाद भेजा। उसके पास खून जांच की सुविधा नहीं थी, जाहिर है किसी और पैथोलॉजिकल लैब में भेजा, जिससे उसका कमीशन बंधा था। रिपोर्ट अपने समय पर आई। फिर डॉक्टर ने 'लैरियम' नामक टैबलेट लिखा। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मैंने फाल्सीफेरम मलेरिया के बारे में बहुत पढ़ा। ये मलेरिया का एक जानलेवा रूप है। इस बीमारी के होने पर अगर 'लैरियम' नामक टैबलेट समय पर मिल जाता तो पिताजी सौ फीसदी बच जाते। लेकिन देश के किसी 'डमडम डिगाडिगा' छाप मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री पाए उस डॉक्टर को मलेरिया के इस रूप के बारे में कुछ पता ही नहीं था। इस बीमारी में मलेरिया के जीवाणु तय समय पर दवा न मिलने पर किडनी, दिमाग और फेफड़ा पर अटैक करते हैं। पिताजी की किडनी फेल होने लगी थी, शरीर सूजने लगा था तब भी डॉक्टर 'बुखार-बुखार' कहता रहा। फिर फेफड़ा पर संक्रमण हुआ, और फिर दिमाग पर। उसके बाद 'लैरियम' टैबलेट दें, या कुछ और पिताजी नहीं बच सकते थे।

डॉक्टर मेरे सामने खड़ा था, और कह रहा था सॉरी, मैं नहीं बचा पाया। उफ! एक हत्यारा मेरे सामने खड़ा था, और मैं कुछ नहीं कर सकता था। करता भी क्या? हमारे देश में कोई भी राजनेता, उद्योगपति 20-25 लाख रुपए लेकर किसी को अपने 'डमडम डिगाडिगा' कॉलेज से डॉक्टर बना सकता है। और वहां से डॉक्टरी की डिग्री लेकर वो डॉक्टर चौड़ा होकर आपको सॉरी कह सकता है। सिर्फ बताने के लिए बता रहा हूं कि उसी साल पिताजी की मौत के बाद मेरी सासु मां जब बड़ौदा से लौटीं तो उन्हें बुखार हो गया। मैंने अपने एक डॉक्टर मित्र को फोन किया तो उसने कहा कि क्योंकि वो बड़ौदा से आई हैं, इसलिए शक है कि कहीं फाल्सीफेरम मलेरिया ना हो, इसलिए आप इन्हें फलां डॉक्टर को दिखा दें। सासु मां को लेकर मैं उस बुजुर्ग डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने कांपते हाथों से मेरी सास की नब्ज टटोली और कागज पर लिखा- 'लैरियम।'

मैंने पूछा कि 'लैरियम' क्यों? तो उसने कहा कि इन्हें फाल्सीफेरम मलेरिया है। खून जांच बाद में कराइएगा। पहले ये टैबलेट दीजिए, नहीं तो देर हो जाएगी। मैंने वहीं से लैरियम टैबलेट लिया, सासु मां ने एक-एक गोली दो बार खाईं और अस्सी की उम्र में टनाटन हमारे साथ हैं। खूब फिल्में देखती है, और मस्त रहती हैं. जब मेरे पिताजी 'डममडम डिगा डिगा' कॉलेज के हथ्थे चढ़े थे तब 60-62 साल के रहे होंगे। सोचता हूं कि आज होते तो हमारे साथ किसी सिनेमा हॉल में बैठ कर कंगना रनाउत की नई फिल्म 'क्वीन' देखते और कहते कि लड़की हो तो ऐसी हो…!

डॉक्टर ने तो एक बार 'सॉरी' कहा था, मैं हर रोज पिताजी से सॉरी कहता हूं कि काश, आप दिल्ली में होते और उस बुजुर्ग डॉक्टर ने आपकी नब्ज देखी होती, जो सारी ज़िंदगी गले में स्टेथस्कोप लटकाए एक स्कूटर पर घूमता रह गया। ना उसके पास डमडम डिगाडिगा में पढ़ने के लिए कभी 25 लाख हुए और ना कभी नर्सिंग होम खोल कर 25 लाख कमाने की चाहत हुई।

टीवी टुडे ग्रुप से जुड़े वरिष्ठ पत्रका संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

तेजपाल के पक्ष में लिखने पर मनु जोसेफ औऱ सीमा मुस्तफा की प्रेस काउंसिल में शिकायत

वरिष्ठ पत्रकारों मनु जोसेफ और सीमा मुस्‍तफ़ा द्वारा तरुण तेजपाल प्रकरण में लिखे गए हालिया लेखों की शिकायत कुछ लोगों ने 'नेटवर्क ऑफ वुमन इन मीडिया' की तरफ ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया(पीसीआई) में की है। पीसीआई को लिखे पत्र में कहा गया है कि सीमा मुस्तफा का 'द सिटिज़न' में लिखा गया लेख “Alleged victim’s testimony in the Tarun Tejpal case at variance with CCTV footage” और मनु जोसेफ का 'आुटलुक' का लेख “What the elevator saw” आरोपी तेजपाल के पक्ष में लिखे गए प्रतीत होते हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जनभावनाओं को प्रभावित करने के लिए ये जानबूझ कर किया गया प्रयास है जिससे कि पीड़िता के आरोपों को हल्का किया जा सके। दोनो ही लेखों में घटना के एक महत्वपूर्ण साक्ष्य, सीसीटीवी फुटेज, को लेकर एक ही तरह का केस तेजपाल के पक्ष में बनाने की कोशिश की गई है। जबकि इस विषय में ट्रायल कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि उस सीसीटीवी फुटेज को देखना, दिखाना और उसके विषय में लिखना ग़ैर-कानूनी है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आरोपी तेजपाल का केस कोर्ट में लड़ा जाना चाहिए, मीडिया में नहीं। सभी ने इस विषय में पीसीआई के अध्यक्ष जस्टिस काटजू से हस्तक्षेप की मांग की है।

पढ़िए पूरा पत्रः

Dear Justice Katju,
 
The Network of Women in Media, India is deeply concerned about what appears to be a renewed media campaign that threatens the course of justice in the sexual assault and rape case involving the former editor of Tehelka, Tarun Tejpal.
 
In this connection we would like to call the attention of the PCI to two recent articles on the subject in two publications, The Citizen and Outlook. The article in the former, headlined “Alleged victim’s testimony in the Tarun Tejpal case at variance with CCTV footage” which originally appeared under the byline of senior journalist Seema Mustafa, was later credited, on 31 March evening, to ‘Citizen Bureau’. [This piece has by now been removed altogether]. The article in the latter, headlined “What the elevator saw” is by senior journalist Manu Joseph.
 
While ostensibly seeking to set the record straight, both articles are clearly biased in favour of the accused and seem to be a deliberate attempt to adversely influence public opinion against the complainant. Indeed, these articles appear to follow the familiar Standard Operating Procedure to silence women in cases of sexual violence, and bolster the impunity of perpetrators.
 
Further,
both build their identical cases on the basis of CCTV footage that is not meant to be in the public realm. There is a trial court order that clarifies that it is illegal to show, see and write about the footage, which is one of several items of evidence in an ongoing court case dealing with charges of rape. It must be emphasised that the CCTV grab is just one piece of evidence, among many others, in the case. By presenting poor quality visuals as clinching evidence of innocence or guilt, credibility or implausibility – of the accused or the accuser – the articles fall short of journalistic standards and ethics. Any pre-trial article that does not analyse all the evidence related to the case is clearly prejudicial and unfair.
 
In addition, putting this footage – and detailed descriptions of it – into the public domain is a violation of the legal and ethical restrictions on reporting on cases of sexual violence, which aim to protect the privacy and dignity of victims and survivors by maintaining confidentiality and protecting their identities.
 
The articles also quote from the e-mail in which the young journalist informed her editor about her experience and asked for appropriate action to be taken by the company. This was a private communication between an employee and her supervisor, providing details that do not belong in the public sphere, and ought to be used, if at all, only with the author’s written consent.
 
To make matters worse, the articles also mention Tejpal’s references to “sexually potent conversation” and “highly erotic stories” as if these are incontrovertible facts. The article in The Citizen claims that “The Citizen is not repeating these, as while she has not denied the conversation, it is outside the realm of this report.” This apparently principled stand is belied by the fact that the article clearly suggests that the complainant told “highly erotic stories” to the accused, thus attempting to build the case for a consensual sexual encounter, when in fact the complainant has clearly stated in no uncertain terms that she did not consent, which means that any sexual act committed on her amounts to rape.
 
While commenting on a matter that is now in the courts, journalists would do well to acquaint themselves with the new Criminal Law (Amendment) Bill, 2013. The interpretations of the visuals made in the two articles are not in accordance with the new provision (Explanation 2) on consent, which specifically states that lack of physical resistance is not enough to prove consent. Secondly, according to Sec. 53A in the Indian Evidence Act, for cases of all sexual offences, evidence of the character of the victim or of such person’s previous sexual experience with any person shall not be relevant on the issue of such consent or the quality of consent. Also, the new Proviso added to Sec. 146 of the Evidence Act states that in rape trials the “general immoral character or previous sexual experience” of the victim is not relevant and that, to determine the question of consent, it is not permissible to adduce evidence or to put questions in the cross examination of the victim about the “general immoral character or previous sexual experience” of the victim (whether to prove consent or the quality of consent).
 
The article in The Citizen also makes apparently contradictory and confusing references to what the so-called CCTV footage records and does not record. In the absence of CCTV confirmation of alleged amicable chatting, the piece cites “a hotel staffer” who was “apparently” “passing by,” “saw the two chatting and has given a statement to this effect.” Such hearsay touted as ‘evidence’ is against all norms and ethics of professional journalism.
 
As media professionals we are shocked and disturbed by these articles by senior journalists which appear to be part of an orchestrated campaign to prejudice the ongoing case and discredit the young journalist who accused her boss of sexual violence that amounts to rape under the new amendment passed in April 2013.
 
Clearly, the controversy over when a legitimate and ethical, if aggressive, pursuit of truth in the interest of justice turns into an illegitimate, unprincipled trial by media that can result in miscarriage of justice raises troublesome questions to which there are no easy answers, but certainly call for serious reflection. Senior members of the profession, who serve as examples to younger media practitioners, need to be particularly conscious about the grave consequences of thoughtless or irresponsible journalism, even if well-intentioned.
 
We reiterate that the case against Tarun Tejpal must be fought in court, not in the media, and certainly not through illegal or unethical means. We would also like to highlight the fact that the news media are meant to speak truth to power, not to misuse power on behalf of the powerful against the powerless.
 
We trust that the Press Council of India will immediately look into this matter and take appropriate action, including censuring the concerned publications, demanding an apology and preventing the circulation of such unethical pieces of journalism.
 
With kind regards and thanks for your attention,
 
Yours faithfully,
 
The undersigned, on behalf of the Network of Women in Media, India
 
Ammu Joseph, Bangalore
 Geeta Seshu, Mumbai
 Sameera Khan, Mumbai
 Laxmi Murthy, Bangalore
 Sharmila Joshi, Mumbai
 Rajashri Dasgupta, Kolkata
 Kalpana Sharma, Mumbai
 Sandhya Taksale, Pune
 Gita Aravamudan, Bangalore
 Kamayani Bali Mahabal, Mumbai
 Kaumudi Gurjar, Pune
 Pushpa Achanta, Bangalore
 Ramlath Kavil, Mumbai/Berlin
 Ranjita Biswas, Kolkata
 Rupa Chinai, Mumbai
 Sandhya Srinivasan, Mumbai
 Swapna Majumdar, New Delhi
 Vasanthi Hariprakash, Bangalore
 Vidya Venkat, New Delhi
 Gauri Vij, Mumbai
 And others.

पत्रकारिता के नीरा राडिया काल में ‘निष्पक्षता’

नत्थी पत्रकारिता के खतरे  

न्यूज चैनल– ‘आज तक’ के एंकर-पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल के बीच ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर न्यूज मीडिया और चैनलों पर सुर्ख़ियों में है। अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ भाजपा नेताओं से लेकर कुछ न्यूज चैनल तक एंकर-पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी पर पत्रकारिता की नैतिकता (एथिक्स) और मर्यादा लांघने का आरोप लगा रहे हैं। इस ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत में वाजपेयी की केजरीवाल से अति-निकटता और सलाहकार जैसी भूमिका को निशाना बनाते हुए उनकी निष्पक्षता पर ऊँगली उठाई जा रही है।

आरोप लगाया जा रहा है कि वाजपेयी आम आदमी पार्टी की ओर झुके हुए हैं और चैनल के अंदर आप के प्रतिनिधि/प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वाजपेयी भी आशुतोष जैसे कई पत्रकार-संपादकों की तरह हैं जो चैनल/अखबार में आम आदमी पार्टी के पक्ष में काम कर रहे हैं, खबरों के साथ तोड़-मरोड़ कर रहे हैं और पार्टी के अनुकूल जनमत बनाने के अभियान में शामिल हैं।

इस कारण केजरीवाल के साथ उनका इंटरव्यू ‘फिक्सड’ और पी-आर किस्म का है जिसका मकसद केजरीवाल की सकारात्मक छवि गढ़ना है और जिसमें शहीद भगत सिंह तक को इस्तेमाल किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या वाजपेयी और केजरीवाल की ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत सिर्फ एक स्वाभाविक सौजन्यता/औपचारिकता या हद से हद तक एक तरह का बड़बोलापन है या फिर इसे पत्रकारीय निष्पक्षता और स्वतंत्रता के साथ समझौता माना जाए?

हालाँकि पत्रकारिता के नीरा राडिया और पेड न्यूज काल में पुण्य प्रसून और केजरीवाल की बातचीत काफी शाकाहारी लगती है लेकिन इसमें पत्रकारिता की नैतिकता, मानदंडों और प्रोफेशनलिज्म के लिहाज से असहज और बेचैन करनेवाले कई पहलू हैं। इस बातचीत में वाजपेयी किसी स्वतंत्र पत्रकार और नेता के बीच बरती जानेवाली अनिवार्य दूरी को लांघते हुए दिखाई पड़ते हैं। दूसरे, पत्रकारिता और पी-आर में फर्क है और पत्रकार का काम किसी भी नेता (चाहे वह कितना भी लोकप्रिय और सर्वगुणसंपन्न हो) की अनुकूल ‘छवि’ गढ़ना नहीं बल्कि उसकी सच्चाई को सामने लाना है।

असल में, किसी भी पत्रकारीय साक्षात्कार में पत्रकार-एंकर अपने दर्शकों का प्रतिनिधि होता है और इस नाते उससे अपेक्षा होती है कि वह साक्षात्कारदाता से वे सभी सवाल पूछेगा जो उसके दर्शकों को मौका मिलता तो उससे पूछते। याद रहे कि कोई भी पत्रकारीय इंटरव्यू पत्रकार और साक्षात्कारदाता खासकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय या पद पर बैठे नेता के बीच की निजी बातचीत नहीं है। सच यह है कि जब कोई नेता अपने को इंटरव्यू के लिए पेश करता है तो इसके जरिये वह लोगों के बीच यह सन्देश देने की कोशिश करता है कि वह अपने विचारों/क्रियाकलापों में पूरी तरह पारदर्शी है, कुछ भी छुपाना नहीं चाहता है और हर तरह के सार्वजनिक सवाल-जवाब और जांच-पड़ताल के लिए तैयार है।

ऐसे में, पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह उस नेता से कड़े से कड़े और मुश्किल सवाल पूछे ताकि उसके विचारों/क्रियाकलापों से लेकर उसकी कथनी-करनी के बीच के फर्क और अंतर्विरोधों को उजागर किया जा सके। क्या पुण्य प्रसून वाजपेयी, केजरीवाल से इंटरव्यू करते हुए इस कसौटी पर खरे उतरते हैं? इसका फैसला दर्शकों पर छोड़ते हुए भी जो बात खलती है, वह यह है कि ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत में केजरीवाल कार्पोरेट्स और प्राइवेट सेक्टर के बारे में बात करने से बचने की दुहाई देते नजर आते हैं क्योंकि इससे मध्यवर्ग नाराज हो जाएगा।
 
लेकिन
क्या यह वही अंतर्विरोध नहीं है जिसे इंटरव्यू में उजागर किया जाना चाहिए? यही नहीं, यह और भी ज्यादा चिंता की बात है कि वाजपेयी जैसा जनपक्षधर पत्रकार केजरीवाल को अपनी ‘क्रांतिकारी’ छवि गढ़ने के लिए भगत सिंह के इस्तेमाल का मौका दे।

कहने की जरूरत नहीं है कि यहीं से फिसलन की शुरुआत होती है जब कोई पत्रकार किसी नेता-पार्टी के साथ ‘नत्थी’(एम्बेडेड) दिखने लगता है।

 

वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रधान के ब्लाग 'तीसरा रास्ता' से साभार।
 

पत्रकार संगठनों से अपील है, वे आगे आयें और यूएनआई को मरने से बचायें

यूएनआई और इसकी हिंदी शाखा यूनिवार्ता की हालत खस्ता है। दूसरों की खबर देने वाली यह राष्ट्रीय न्यूज एजेंसी खुद खबरों में हैं। समस्त कर्मचारियों को पिछले आठ महीने से वेतन नहीं मिला है। किराये के मकान में रह रहे कर्मचारियों को मकान मालिकों ने मकान खाली कराने की नोटिस दे दिया है। किराना दुकानदारों ने उधार देना बंद कर दिया है। फीस का भुगतान न करने के कारण बच्चों के स्कूल से नाम कट रहे है। कर्मी धन संकट के कारण बेटियों के हाथ पीले नहीं कर पा रहे हैं लेकिन निष्ठुर प्रबंधन को इसकी कोई चिंता नहीं। हाल ही में चेयरमैन के एक नोटिस से कर्मियों के होश फाख्ता है। नोटिस संलग्न है। यूनियन की क्या हालत है किसी से छिपी नहीं।

    
यूएनआई की स्थापना कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने की थी। आज सारे नेता चुनाव में लाखों-करोड़ों फूंक रहे हैं लेकिन कर्मियों के पेट में लगी आग को शांत करने की दिशा में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं। धन्य हैं कांग्रेस के सूरमा नेतागण।

मेरी विनम्र अपील पत्रकार संगठनों से है। वे आगे आयें और इस संस्था को मरने से बचायें। कर्मचारियों के वेतन भुगतान की दिशा में जुझारू संघर्ष करें। जब बकाया वेतन मिलने के ही लाले पड़े हो तो मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसाओं के आर्थिक फायदे की उम्मीद करना ही बेकार है। एक चुनौती है पत्रकार यूनियनों के समक्ष। देखना है कर्मियों के हित में आन्दोलन का कौन बीड़ा उठाता है।

यूएनआई के चेयरमैन का नोटिस

प्रिय साथियों,
                    यह संवाद अप्रैल 2013 से कर्मचारियों के वेतन के सिलसिले में मेरे कार्यालय को मिले विभिन्न ई मेल के संदर्भ में किया जा रहा है. कुछ पत्रों में मेरे हवाले से वेतन के बारे में बयान दिया गया है जिनका मैं पूरी तरह से खंडन करता हूं. मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि सारी स्थिति से आप सभी को अवगत कराया जाना चाहिए.

सबसे पहले हमें यह मालूम होना चाहिए कि यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया सेक्शन 25 की कंपनी ..अब नए कंपनी अघिनियम के तहत सेक्शन आठ की कंपनी… है जिसका स्वरूप धर्मार्थ संगठन के रूप में है जिसके मुनाफे को शेयरघारकों में भी वितरित नहीं किया जा सकता है. निदेशक मंडल के सदस्य न्यासी के तौर पर काम करते हैं और यथा संभव अपनी क्षमता का इस्तेमाल कंपनी की बेहतरी के लिए करते हैं.

कुछ साथी निदेशक मंडल/शेयर घारकों द्वारा नियुक्त सदस्यों को प्रबंधन के रूप में ले रहे हैं और उन्हें लगता है कि निदेशक मंडल/शेयर घारकों कर्मचारियों के वेतन तथा अन्य खर्च के भुगतान के लिए जिम्मेदारी है. मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह धर्मार्थ संगठन है इसलिए कर्मचारियो पर ही संगठन को आर्थिकरूप से मजबूत बनाने के लिए राजस्व की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी है. आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि यूएनआई के जरिए आर्थिक लाभ अर्जित नहीं होना है इसलिए ज्यादातर शेयर होल्डरों की रुचि इस संगठन को चलाने में नहीं है. शेयर धारकों की इस अरुचित के कारण कंपनी की सालाना आम बैठक में भी कोरम को पूरा करने में दिक्कत आती है. मै जब से कंपनी का चेयरमैन बना हूं निदेशक मंडल के किसी सदस्य ने कभी कंपनी को चलाने के लिए अपने स्तर पर पूरा प्रयास नहीं किया है. यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि निदेशक मंडल की बैठक में शामिल होने के लिए हमने एक पैसा भी नहीं लिया है. यात्रा खर्च जैसा अन्य किसी तरह का खर्च भी नहीं लिया है और निदेशक मंडल की बैठक में अपने खर्च पर आते रहे हैं.

हमने जिन लोगों को कर्मचारियों के वेतन तथा कंपनी के अन्य खर्च की जिम्मेदारी सौंपी थी उन्होंने निराश किया है. निदेशक मंडल ने इसके लिए एक समिति बनाई थी और समिति के सभी 9 सदस्यों को कई बार स्पष्ट रूप से कहा गया था कि संगठन में वेतन और अन्य दैनिक खर्च को जुटाने की जिम्मेदारी संगठन के कर्मचारियों की है. मैं उस वस्तुस्थिति को स्पष्ट करना चाहता हूं कि कंपनी में चाहे लाभ हो या घाटा यह सब यूएनआई और इसके कर्मचारियों का ही है.

निदेशक मंडल ने पिछले दो साल में कंपनी के हित के लिए जो भी कदम उठाए हैं उसका विवरण भी आपके सामने रखता हूं.

1. निदेशक मंडल ने न्यायालय में कंपनी के खिलाफ चल रहे मीडिया वेस्ट प्रा.लि. के मामले को सफलतापूर्वक निबटाया है.यदि ऐसा नहीं हुआ होता तो संगठन को और समस्याओं का समना करना पडता.
2. पिछले एक साल से …इस माह को छोडकर… हर माह कम से कम एक बार कर्मचारियों के वेतन का भुगतान किया गया. निदेशक मंडल व्यक्तिगत पहल करके लगातार यह प्रयास करता रहा है. इस माह के वेतन में देरी निदेशक मंडल के खिलाफ प्रोविडेट फंड का पैसा जमा नहीं करने पर आपराघिक मामला दर्ज होने के कारण हुई है. यह शिकायत उन भटके हुए लोगों ने की है जो यूएनआई को चलते हुए नहीं देखना चाहते हैं. यूएनआई को बचाने के लिए 95 लाख रुपए प्रोविडेंट फंड में जमा कराए गए हैं और यह पैसा कर्मचारियों का ही जमा हुआ है.
3. लंबे समय से निश्चित अवघि के प्रोमशन लंबित पड़े थे उन प्रमोशन को मंजूरी दी गई है.
4. पहले जिन कर्मचारियों ने वीआरएस लिया था उनमें प्रत्येक के खाते में 25000 रुपए जमा कराए गए हैं.
5. संगठन के 9 वरिष्ठ कर्मचारियों की एक समिति बनाई गई थी जिसको निर्णय लेने और यूएनआई की उन्नति के लिए अपनी अनुषंसाएं देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.
6. समाचारों में सुघार लाकर तथा उर्दू वेबसाईट विकसित करने जैसे कई कदम कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए उठाए गए.
7. निदेशक मंडल की सहायता से पिछले एक साल के दौरान वेबसाइट के लिए 70 लाख रुपए से अघिक का राजस्व जुटाया गया हेै.
8. सेक्शन 80 जी के तहत सरकार से मंजूरी हासिल की गई जिसके कारण यूएनआई को यदि कोई चंदा मिलता है तो उस पर कर में छूट मिल सके.
9. संगठन में कई स्तर पर खर्च में बडी कटौती इस तरह से की गई कि इसके संचालन पर इसका कोई विरीत असर नहीं पडे.

अब में आपके सामने संगठन के संचालन के संबंध में उस कड़वी सच्चाई को रखूंगा जिसे प्रत्येक कर्मचारी को व्यक्तिपरक ढंग से न लेकन निश्पक्षता से लेने की जरूरत है.

1. यूएनआई को साल दर साल भारी नुकसान हो रहा है. पिछले तीन साल का घाटा 23.67 करोड रुपए है. हर माह हम घाटे में चल रहे हैं और हमारा भुगतान आय की तुलना में कम है. हर माह हो रहे इस घाटे के कारण पीएफ. सर्विस टैक्स. कई बार वेतन का भुगतान तथा अन्य खर्चो के भगुतान में देरी हो रही है.

2. िदेशक मंडल ने जो 9 सदस्यीय समिति बनाई थी उसने अनुमान दिया था कि वे ग्राहक राजस्व को हर माह कम से कम 25 लाख रुपए बढाएंगे और ब्यूरो को और प्रभावी बनाकर संगठन को आर्थिक मजबूती प्रदान करेंगे लेकिन यह समिति इस उम्मीद पर खरी नहीं उतरी इसलिए उसे भंग करना पडा.

3. ज्यादातर ब्यूरो आफिस धाटे में चल रहे हैं और कंपनी में राजस्व को बढाने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं. यह ब्यूरोचीफ की जिम्मेदारी है कि वह ब्यूरो कार्यालय में वहां होने वाले खर्च से अघिक राजस्व अर्जित करे.

4. कई कर्मचारी अपने निजी लाभ के लिए यूएनआई ब्रांड का इस्तेमाल कर रहे हैं और यूएनआई को इस लाभार्जन के लिए उपयोग कर रहे हैं लेकिन यूएनआई के लिए कुछ भी मदद नहीं कर रहे हैं.

5. संगठन में अनुशासनहीनता तेजी से बढ़ रही है. कुछ कर्मचारी समय पर वेतन नहीं मिलने का हवाला देकर कंपनी को अपना पूरा समय नहीं दे रहे है. उन्हें जरूर यह आत्ममंथन करना चाहिए किं जिस माह उन्हें समय पर वेतन का भुगतान किया जा रहा है क्या उस माह उन्होंने अपना पूरा समय यूएनआई के लिए दिया है.

यह सब तथ्य नोटिस में लाकर मैं उन कर्मचारियों के साथ हूं जो ज्यादा संख्या में हैं. जो हर माह यूएनआई पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं. ऐसे समर्पित कर्मचारियों के लिए यूएनआई का चलते रहना आवश्यक है न कि उन कर्मचारियों के लिए जो अपने निजी स्वार्थ के लिए उसी पेड की षाखा को काट रहे हैं जिस पर वे बैठे हुए हैं. यूएनआई से जुडे हम सभी लोगों को इस सिद्धांत का पालन करना है कि …लोग आते जाते रहेंगे लेकिन यूएनआई को हमेशा चलते रहना है…

अंत में मैं आप सभी से कहूंगा कि अपने निजी पूर्वाग्रहों से उपर उठ और कंपनी के हित को ज्यादा महत्व दें. यूएनाई चलेगी तो हमारें भविष्य की उम्मीद बंधी रहेगी अन्यथा हम इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे.

इसके साथ ही मैं सभी ब्यूरो आफिस के आय व्यय तथा संबद्ध ब्यूरो आफिस के जरिए ग्राहकों से आने वाले लंबित पैसे का विवरण पेश कर रहा हूं. मैं मुख्यालय के वरिष्ठ सहयोगियां ब्यूरो चीफ तथा यूएनआई के सभी सदस्यों से अनुरोध करूंगा कि वे कंपनी की आय बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रयास करें.

आइए हम सब मिलकर फिर से यूएनआई की सफलता के लिए काम करें और उन लोगों के अरमानों पर पानी फेरे जो संगठन से बाहर हैं ओर यूएनआई को नुकसान पहुंचाने के लिए काम कर रहे हैं. मैं यूएनआई में काम रहे सभी कर्मचारियों से अपील करता हूं वे कि किसी भी तरह से उन ताकतों के हाथों में खेलकर उन्हें समर्थन नहीं दें जो यूएनआई के बाहर खड़े होकर इस महान संगठन को बर्बाद करने पर तुले हैं. यह ताकते यूएनआई के खिलाफ काम करके यहां के कर्मचारियों और इस महान संगठन के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं इसलिए किसी भी स्तर पर विघ्वंसक ताकतों का समर्थन नहीं करे और उनके बहकावे में नहीं आएं.

मैं निदेशक मंडल की तरफ से आप सभी को आश्वस्त करता हूं कि यूएनआई को फिर से उसकी पुरानी गरिमा लिाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाएगी लेकिन यह काम सिर्फ यूनाइटेड न्यज आफ इंडिया के हितैशी कर्मचारियों के सहयोग से ही संभव हो सकता है.

घन्यवाद
विश्वास त्रिपाठी
चेयरमैन. यूएनआई निदेशक मंडल

 

पटना से एक पत्रकार की रिपोर्ट।

चुनाव आयोग द्वारा आईएएस, आईपीएस के तबादलों पर दायर पीआईएल में फैसला सुरक्षित

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने चुनाव आयोग के आदेशों पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किये गए तमाम आईएएस तथा आईपीएस अफसरों के ट्रांसफर को रद्द किये जाने हेतु सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल पर आज अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है।

जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस डी के उपाध्याय ने याचीकर्ता के अधिवक्ता अशोक पाण्डेय और चुनाव आयोग के अधिवक्ता मनीष माथुर की बहस सुनने के अपना फैसला सुरक्षित किया।  

याचिका के अनुसार हाल ही में आईएएस कैडर रूल्स तथा आईपीएस कैडर रूल्स में संशोधन करते हुए यह अनिवार्य कर दिया गया कि इन अफसरों के सभी ट्रांसफर केवल सिविल सेवा बोर्ड की संस्तुति पर ही किये जाएंगे। ये ट्रांसफर दो साल की अवधि के बाद ही किये जा सकते हैं और दो साल के पहले किये सभी ट्रांसफर में सम्बंधित अफसर को अपनी बात कहने का अवसर देने के बाद कारण बताते हुए ही ट्रांसफर किये जा सकते हैं।

डॉ. ठाकुर के अनुसार ये नियम चुनाव के समय भी लागू रहते हैं लेकिन हाल में चुनाव आयोग द्वारा इनका पालन किये बिना ही मनमर्जी के और बिना अलग-अलग कारण बताये तमाम अफसरों के ट्रान्सफर के निर्देश जारी कर दिए गए, जिससे आयोग द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग की पूर्ण सम्भावना बन जाती है।

अतः उन्होंने इन सभी ट्रांसफर को निरस्त करते हुए नियमों के अनुसार ही ट्रांसफर किये जाने की मांग की है।
 

बुरा न मानो चुनाव है, बदजुबानी जायज़ है

पिछले कई सालों से परंपरा सी बन गई है कि चुनावी राजनीति में एक-दूसरे के खिलाफ बदजुबानी की जाए। कुछ अंदाज होली के माहौल जैसा हो चला है, मानो कहा जा रहा हो कि बुरा न मानो चुनाव है। पिछले दशकों में स्थानीय नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ कठोर टिप्पणियां उछालते दिख जाते थे। लेकिन, बड़े नेता राजनीतिक शालीनता बनाए रखने का शिष्टाचार जरूर निभा लेते थे। लेकिन, अब कई दलों के बड़े नेता भी बेशर्मी से जुबानी जंग पर उतारू हो रहे हैं। ताजा मामला केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का है। उन्होंने गोंडा की एक चुनावी सभा में एनडीए के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करते वक्त अपना संयम तोड़ दिया।

उन्होंने मोदी पर निशाना साधते हुए कह दिया कि वे संघ के सबसे बड़े गुंडे के रूप में उभरे हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को उन्होंने मोदी का गुलाम करार किया है। इस मौके पर वरिष्ठ नेताओं की शर्मनाक बयानबाजी राजनीतिक वातावरण को जमकर प्रदूषित कर रही है। संघ परिवार के नेता भी बदजुबानी में ज्यादा पीछे नहीं रहे हैं। कई बार इनके नेता भी अभद्र बोल निकालने से बाज नहीं आते। एक-दूसरे के खिलाफ तीखे कटाक्ष करना तो सामान्य राजनीति मानी जाने लगी है। इसके चलते ही कांग्रेस के नेता आम तौर पर मोदी को दंगाई नेता करार करते हैं, तो मोदी कांग्रेस के चुनावी चेहरे राहुल गांधी को ‘शहजादे’ पुकार कर तंज कसने से बाज नहीं आते।

हालात यह हो गए हैं कि यदि किसी प्रतिद्वंद्वी दल के नेता ने कोई सकारात्मक टिप्पणी कर दी, तो वह नेता अपने दल में ही संदेह के घेरे में आ जाता है। ऐसा वाकया भाजपा के महासचिव वरुण गांधी के साथ हो रहा है। वे राहुल के चचेरे भाई हैं। उन्होंने अमेठी के विकास के संदर्भ में राहुल की कुछ तारीफ कर दी, तो भाजपा के तमाम नेताओं को वरुण की राजनीतिक नीयत पर संदेह होने लगा है। क्योंकि, जिस दौर में प्रतिद्वंद्वी पक्ष के लिए गाली-गलौच की भाषा इस्तेमाल की जा रही हो, वहां सकारात्मक टिप्पणी भला, कैसे बर्दाश्त हो सकती है? विडंबना देखिए कि वरुण यदि बड़े भाई राहुल के लिए कोई अमर्यादित जुमला उछालते, तो शायद संघ परिवार में उनकी नीयत पर संदेह नहीं किया जाता।

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

पवारों, कलमाड़ियों, बंसलों, राजाओं, वाड्राओं से त्रस्त एक आम आदमी का राहुल गांधी को पत्र

Mayank Saxena : ये चिट्ठी राहुल गांधी के लिए…. प्रिय राहुल गांधी जी, आप के होर्डिंग और पोस्टर भी देखता हूं, भाषण भी सुनता हूं और आपकी सरकार भी देखी, दिल में कई सवाल उठते हैं और तमाम आक्रोश भी है। आप से सभी कुछ साझा कर देने को जी चाहता है, इसलिए नहीं कि आप कुछ कर सकेंगे बल्कि इसलिए कि आपको पता हो कि जनता सब समझती है। राहुल जी, आज से 10 साल पहले जब कांग्रेस नीत यूपीए सत्ता में आया तो लोगों ने बीजेपी नीत एनडीए की नाकामियों और कारपोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ आपको वोट दिया था। हालांकि बहुमत आपको भी नहीं मिला था लेकिन जनादेश निश्चित तौर पर एनडीए के खिलाफ था।

 
राहुल जी, आप ने भी चुनाव लड़ा और सांसद बन गए, अप्रत्यक्ष तौर से कांग्रेस पर आपकी माता जी का ही नियंत्रण था लेकिन आपकी सरकार भी कारपोरेट के आगे झुकती ही चली गई। कभी मित्तल, कभी अम्बानी, कभी टाटा तो कभी वेदांता के आगे आप ने भी देश की जनता के हक को गिरवी ही रखा। लेकिन आप चुप रहे। 2 जी घोटाले में सिर्फ डीएमके का एक मंत्री ही शामिल नहीं था बल्कि पीएमओ तक को इस घोटाले की जानकारी थी। किस तरह से पीआर एजेंसी और उनके दलाल पत्रकारों की पहुंच प्रधानमंत्री कार्यालय के अंदर तक थी, इस बारे में सीबीडीटी की रिपोर्ट सबकुछ कहती है। वैसे ये आपको नहीं पता क्या?
 
यही नहीं 2008 से देश में अचानक महंगाई बढ़नी शुरू हो गई, आप की सरकार ने मौसम से लेकर विदेशी बाज़ार तक को दोष देना शुरू कर दिया। लेकिन आपकी कराह नहीं सुनी गई। अंततः चुनाव आए, देश ने सिर्फ नरेगा के लिए नहीं, महंगाई कम करने की आखिरी कोशिश के लिए भी आपको वोट दिया लेकिन आप उसके बाद छिप गए। आप भूल गए कलावती और दयावती दोनों को… आप इस कदर भूले कि विदर्भ में बीटी कॉटन से सफेद सोने के शहर को किसानों की कब्रगाह बना डालने वाले जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज को बैंगन के रास्ते वापस ले आए…वो तो भला हो किसान संगठनों, एक्टिविस्टों और आपकी ही सरकार के ईमानदार मंत्री Jairam Ramesh का कि ये बीज अनिवार्य नहीं हुए…
 
लेकिन विदर्भ से बुंदेलखंड के किसानों की दुर्दशा जारी रही और आप न जाने कहां थे…कोयला घोटाला तो चल ही रहा था…साथ-साथ जंगलों से आदिवासियों को विस्थापित भी किया जा रहा था…उन पर गोलियां दागी जा रही थी, उन की औरतों का बलात्कार किया जा रहा था लेकिन आप नहीं थे। देश की जनता भ्रष्टाचार से लेकर यौन हिंसा तक के खिलाफ सड़कों पर थी लेकिन आप नज़र नहीं आते थे राहुल गांधी। असम में जब हिंसा का नंगा नाच हो रहा था, तब भी आप कहां थे माननीय राहुल जी…???
 
राहुल जी, हम में से ज़्यादातर समझदार लोग जानते हैं कि गुजरात का विकास गढ़े गए आंकड़ों पर आधारित है लेकिन ज़रा बताइए तो कि इसका सच सामने लाने के लिए गुजरात कांग्रेस की राज्य कमेटी ने क्या किया…क्या आप मोदी और बीजेपी पर आरोप लगाते वक्त ये ज़िम्मेदारी लेंगे कि आप और आपकी पार्टी चूंकि गरीब और आम आदमी की ज़िंदगी आसान करने में असफल रहे, इसलिए मोदी और धार्मिक साम्प्रदायिक ताकतें आज मज़बूत हुई हैं…
 
क्यों आज आप और आपकी माता जी सेक्युलर ताकतों को जिताने के नाम पर जनता से वोट मांगते हैं, जब उसी जनता के आरोपों का कभी आपने जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा…जब आपकी आंख के सामने कॉमनवेल्थ से लेकर कोयले तक गरीब का पैसा आपके नेता लूटते रहे… आप आज गांधी के रास्ते की बात करते हैं लेकिन आखिर कैसे मुजफ्फरनगर से ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद पटना जला और आप देखते रहे…मिर्चपुर का नाम सुना है राहुल जी…वहां जब दलितों का गांव जलाया जा रहा था…केंद्र और हरियाणा दोनो जगह आप ही की सरकार थी…कभी हो कर आए आप वहां,,,कभी पूछा हुड्डा जी से कि अपने राज्य में वो खाप पर लगाम क्यों नहीं कसते?
 
वो आप ही के नेता और सरकारें थी न जिन्होंने तमाम राज्यों में ज़मीन घोटाले किए, गरीबों की ज़मीनें पूंजीपतियो को बेच दी…लेकिन कुछ तो कहिए राहुल जी… आपको लगता है कि क्या हम नहीं जानते हैं कि महंगाई को शुरुआत में सिर्फ इसलिए नियंत्रित नहीं किया गया कि वालमार्ट जैसी चेन्स के ज़रिए रीटेल में एफडीआई लाई जा सके…लेकिन न तो ये हुआ और न ही उसके बाद महंगाई आपके हाथ में रह गई…लेकिन क्या ये सब भी आपको पता नहीं था…
 
ऐसे में जब आप लगभग हर मौके पर मनमोहन स्टाइल चुप रहे तो अब आप आखिर किस मुंह से वोट मांगने हमारे बीच आए हैं… कोई बात नहीं राहुल जी, लेकिन ये भी आपको पता नहीं होगा कि कोई बिल फाड़ देने और लोगों के बीच जाकर अब ढोंग करने से कुछ नहीं होगा…हो सकता है कि आप दिल से बदलाव चाहते हों लेकिन पिछले 10 सालों में इस देश ने जो भोगा है, उसको लेकर आप और आपकी माता जी अपनी ज़िम्मेदारी से दामन नहीं छुड़ा सकते….
 
इसलिए इस बार बस लोगों के बीच रहिए, उनकी दिक्कतें देखिए…और हां, रॉबर्ट वढेरा की भी जांच करवाइए…जिस दिन आप में ये नैतिक साहस आ जाएगा कि आप अपने जीजाजी के करप्शन के बारे में सख्त हो जाएं…उसी दिन लोगों के सामने फिर से आइएगा…और तब कहिएगा कि आप औरों से अलग हैं…वरना हम जानते हैं कि सब एक जैसे ही हैं…
 
पवारों, कलमाड़ियों, बंसलों, राजाओं, वाड्राओं से त्रस्त एक आम आदमी…जो नहीं चाहता है कि मोदी सत्ता में आएं लेकिन आपके भ्रष्टाचार से भी उतना ही डर लगता है…

 

पत्रकार और एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

रेडियो पर ऐलान-ए-केजरीवाल और राग मोदी….

Vikas Mishra: एफएम सुनना इन दिनों बड़ा मुश्किल हो गया है। चुनावी प्रचार पका रहा है। केजरीवाल साहब का ऐलान सुन रहा हूं। फिर शर्त रख रहे हैं दिल्ली वालों पर कि 50 सीटें दो तब बनूंगा मुख्यमंत्री, फिर नहीं भागूंगा बढ़िया काम करूंगा। केजरीवाल 49 दिनों की सरकार चलाने के बाद भाग खड़े हुए थे, उसकी सफाई में कह रहे हैं कि लाल बहादुर शास्त्री भी ऐसा कर चुके हैं। बड़ी खुशी हुई जानकर कि देश के इतिहास में कोई तो एक नेता हुआ जिससे अपने से तुलना लायक पाते हैं केजरीवाल, शास्त्री जी ही सही। वरना तो केजरीवाल साहब अन्ना, गांधी, नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी को तो अपने चरणों की धूल के बराबर भी नहीं सेटते।

 
केजरीवाल का प्रलाप खत्म होते ही मोदी राग शुरू हो जाता है-हम मोदी को लाने वाले हैं..। पता नहीं ये कौन हैं, जो गा-बजाकर मोदी जी को लाने वाले हैं। मोदी जी जैसे सुपरमैन हैं, सारी समस्याओं को चुटकी बजाकर दूर कर देंगे। भारत विश्वगुरु बन जाएगा। चीन, पाकिस्तान, अमेरिका सब पानी भरेंगे। चैनल बदलता हूं तो फिर मोदी गीत चालू रहता है- मैं देश नहीं मिटने दूंगा। जैसे कोई मिटा रहा है और बचाएंगे मोदी जी। कांग्रेस का भी एक ताल में गीत है- हर हाथ शक्ति हर हाथ तरक्की। अभी व्हाट्स एप पर एक साथी ने हर हाथ शक्ति हर हाथ तरक्की की एक तस्वीर भेजी है। ये नारा सुनकर वो खुराफाती तस्वीर सामने दिखने लगती है। चुनावों की आपाधापी दिल्ली की सड़कों पर नहीं दिखाई दे रही है। टीवी, रेडियो और पोस्टरों पर है। महीने भर तक एफएम पर यही झेलना पड़ेगा। मैं भी झेल रहा हूं, आप भी झेलिए।

 

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से।

मैटर्निटी लीव मांगने पर महिला पत्रकारों को बर्खास्त कर देता है ज़ी न्यूज़

Yashwant Singh: मुंबई से एक वकील मित्र का फोन आया. उन्होंने एक स्वाभिमानी पत्रकार की कहानी बताई. ये महिला पत्रकार दो बरस पहले जी न्यूज में हुआ करती थी. शादी के लिए जब उसने छुट्टी मांगी तो उसे छुट्टी देने में बहुत परेशान किया गया. जब प्रीगनेंट हुई और मैटर्निटी लीव की बात जुबानी की तो उसे टर्मिनेट कर दिया गया. उसने कोर्ट का सहारा लिया. मुंबई में अपने पत्रकार पति के सहयोग से उसने लेबर कोर्ट में जी ग्रुप के खिलाफ मुकदमा किया. तारीख पर तारीख. सुनवाई पर सुनवाई. जी वालों की तरफ से प्रलोभन दर प्रलोभन. पर वह झुकी नहीं. लालच में नहीं आई. हार नहीं मानी.

ताजी सूचना है कि इस मामले में इसी अप्रैल महीने में 11 तारीख को फैसला आने वाला है. यह संभवतः पहला मामला होगा जिसमें मैटर्निटी लीव मांगने पर महिला पत्रकार को बर्खास्त कर दिया गया और उस पत्रकार ने प्रबंधन के खिलाफ पूरे सुबूतों, मेल, दस्तावेज के साथ मुकदमा किया, जिसमें अब फैसला आने वाला है. हालांकि जी ग्रुप से उन लोगों की तो पहली ही छंटनी हो चुकी है या हटाए जा चुके हैं जिन लोगों ने इस महिला पत्रकार को छुट्टी न देने, प्रताड़ित करने और बर्खास्त कराने में बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाई.

इस मामले की पूरी खबर भड़ास पर जल्द ही प्रकाशित कराउंगा. फिलहाल इतनी शुरुआती सूचना शेयर कर रहा हूं ताकि आप को समझ में आ सके कि लड़ना कितना जरूरी होता है. ये धनपशु, ये घराने, ये बड़े-बड़े आफिसों वाले, ये बड़े लोग कहे जाने वाले बैल कितने डरपोक, कमजोर और सतही होते हैं कि इनके सामने कोई भी अगर टाइट होकर, मजबूत इरादा बनाकर और अंत तक लड़ने का मन बनाकर खड़े हो जाएं तो ये दाएं बाएं झांकने लगते हैं और किसी तरह मामले को सेटल कराने में जुट जाते हैं. कई तरह की ब्लैमेलिंग, पेड न्यूज, पीत पत्रकारिता के लिए कुख्यात हो चुके जी न्यूज का नाम इन दिनों मेरी पहाड़ यात्रा के दौरान भी कानों तक पहुंच रहा है.

यात्रा से जुड़े एक साथी बताते हैं कि जी न्यूज वालों की तरफ से फोन आया था, वो खबर दिखाने के बदले ओबलाइज करने के लिए दबाव डाल रहे थे. कोई सूरी नामक प्राणी ने फोन किया था. सोचिए, जो लोग हर खबर से पैसा बनाने की 'कला' को आगे बढ़ाने में लीन हों, क्या उनसे हम किसी सरोकार, मानवीयता या देश-समाज की चिंता करने की बात सोच सकते हैं. ये जो चिंता करने का दावा, दिखावा करते हैं वह इतना खोखला, दयनीय होता है कि आन स्क्रीन पकड़ में आ जाता है. फिलहाल मैं उस महिला पत्रकार को बधाई देना चाहता हूं जिसने जी न्यूज वालों को उनकी औकात पर लाने को मजबूर कर दिया है. मई महीने में जब फैसला आएगा तब पूरी दुनिया जानेगी की भारत में एक ऐसा भी मीडिया घराना है जो देश समाज की चिंता के नाम पर रोज नोट बटोर बटोर कर मोटा होता जा रहा है और अपने ही महिला कर्मियों को मैटर्निटी लीव देने के नाम पर उन्हें बर्खास्त कर देता है.

जैजै

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त स्टेटस पर आईं कुछ टिप्पणियां इस प्रकार हैं…

Dushyant N Sewak : एक स्टोरी और है…. मुझे याद पड़ता है मुंबई की कहानी है और मैंने शायद सोनी टीवी के कार्यक्रम क्राइम पेट्रोल में देखि थी। उसमें यौन शोषण के आरोप में एक महिला पत्रकार अपने संगठन के खिलाफ मुक़द्दमा दायर करती है और जीतती भी है…. लिंक ये है… https://www.youtube.com/watch?v=Kzp-9xopil4

Dhirendra Giri उस महिला पत्रकार को सलाम – प्रेरणादायी * सीखे सारे पत्रकार इस वास्तविक प्रसंग से Yashwant Singh sir आपको भी साधुवाद इस घटना को मीडिया जगत के लोगो तक पहुचाने का

Namrata Das, a journalist joins the media house 'Awaken' as a probationary senio…See more
 
Anjali Rai Bahut krantikari ho gaya ye to…..
 
Vishal Shukla पत्रकार साथी को सलाम,जहाँ एक और आज हम मीडिया में किसी भी तरह नौकरी का जुगाड़ हो जाए, इस कवायद में लगे रहते हैं,इस स्थिति में एेसा जज्बा-काबिले तारीफ है, फिर जी-न्यूज के सुधीर चौधरी जैसे लोग तो पुराने दलाल हैं।
 
Madan Tiwary dikkat hai ki hum ladne ke pahle hi haar maaan lete hai. udaharan hai bhdas, agar aap nahi ladte to kab ka bhadas band ho gaya rahta aur aur ulte aap hi court kachahari ka chakkar lagate . isliye lade jarur, der ho sakti hai jeet nishchit hai. ek aur baaat media karmiyon ki ladai main ladne ke liye taiyar rahta huin yah sandesh bhi jana chaiye.
 
Bipin Chandra Chaturvedi बिल्‍कुल सही, ताकि समझ में आ सके कि लड़ना कितना जरूरी होता है….

Nidar Rahi मजबूत इरादा बनाकर लड़ना जरूरी है ऐसा जज्बा-काबिले तारीफ है………
 
Neh Indwar जी न्‍यूज वालों पर कोयला घोटाले को दबाने के लिए 100 करोड के विज्ञापन मांगने का आरोप लगा था। सुधीर चौधरी काफी दिन अंदर हो कर आए और फिर से ट्रक भर नैतिकता की बातें करते रहे हैं। इस मामले में जी न्‍यूज वालों को अपने न्‍यूज के माध्‍यम से बताना चाहिए कि उनके पास महिलाओं, पत्रकारों के लिए किस प्रकार के अवकाश और अन्‍य सुविधाऍं मौजूद है।
 
Siddharth A Lamba Salam us junun ko.
 
Ajay Kumar Ise Kahte Hai Corporet Ki Dadagiri
 
Manika Sonal Kameene hain ye zee wale…
 
पीसी रॉय दलाली कला में माहिर चौधरीजी के 'जी' घराना के इतने बड़े बड़े चर्चे हैं बाजार में … कईयों का विश्वास डगमगा जायेगा । प्यारे दर्शकों , सहन कर लेना ।See Translation
 
Aslam Siddiqui प्रसूति अवकाश न देने वाले जाएंगे जेल, पहले से है सख्त कानून

चूंकि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट-1961 के अन्तर्गत किसी भी महिला कर्मी, यहां तक कि, किसी दुकान अथवा कोयला खदान अथवा संविदा आदि में भी काम करने वाली महिला को प्रसूति अवकाश का लाभ (सैलरी के साथ) लेने का अधिकार है। यदि प्रसूति अवकाश का लाभ नहीं दिया जाता है तो तो यह कृत्य पूरी तरह गैर-कानूनी होगा एवं इसे न मानने वाले अधिकारी, मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट-1961 के अन्तर्गत एक साल तक की सजा एवं जुर्माने के भागीदार होंगे। इस एक्ट का कड़ाई से पालन कराने की जिम्मेदारी श्रम विभाग की है। मई माह में आने वाला फैसला कोई नया नहीं होगा, वह निश्चित रूप से इस महिला के पक्ष में ही आएगा, क्योंकि पूर्व में ही उच्चतम न्यायालय ने केस सं0 -3एस0सी0सी0 224/2000 में केन्द्र सरकार के माध्यम से समस्त राज्य सरकारों को एवं उच्च न्यायालय इलाहाबाद लखनऊ बेंच ने केस सं0 962/2011 एवं 1206/2012 में महिलाओं को मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट-1961 के अन्तर्गत मातृत्व अवकाश देने के निर्देश दे रखे हैं।
असलम सिद्दीकी
ब्यूरो प्रमुख
पंजाब केसरी
लखनऊ
08127786786

Shivendra Khampariya बहुत ही बिरले पत्रकार होते हैं जो अपने शोषण के किलाफ आवाज़ उठतें हैं कोई कोशिश भी करे तो आम तोर पर कोई साथ नहीं देता लोग अपना पीएफ फार्म साईन नहीं करा पते मैने कई लोगों की इस मामले मे हस्तक्षेप कर मदद की तब उनका काम हो पाया बहरहाल उस महिला पत्रकार को सलाम जिसने लड़ने का माद्दा दिखाया

Laxmikant Hajare Keep it up sister
 
Anjali Dubey that's good sahi kiya usne i respect her.
 
Sharma Sonu zee ke din bhut khrab chal rahey h bhaiya. lagta h ab in nalayko ka ' g' nikal kar hi rahega

फोटो जर्नलिस्‍ट रेप केस: तीनो आरोपी पुनरावृत्तिक अपराध के दोषी पाये गये

मुम्बई के शक्ति मिल परिसर में दो बार सामूहिक दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले कासिम बंगाली, विजय जाधव और मोहम्मद सलीम अंसारी को अदालत ने आईपीसी की धारा 376(ई) के अपराध का भी दोषी पाया है। इस धारा के अंतर्गत आजीवन कारावास, जिसमें व्यक्ति अपना शेष जीवन कारावास में बिताएगा, या मृत्यु दण्ड का प्रावधान है।

आईपीसी में हुए संशोधन के बाद धारा 376(ई) 'पुनरावृत्तिकर्ता अपराधियों के लिए दण्ड' के अंतर्गत सज़ा पाने वाले ये तीनों पहले अपराधी हैं।
 

शगुन चैनल पर भी अपशगुन, कई लोग हुए बाहर

नोएडा : टीवी चैनल शगुन का शगुन आज गड़बड़ा गया। गड़बड़ा क्‍या, सत्‍यानाश हो गया। खबर है कि अनुरंजन झा की जुगाड़-टेक्‍नालॉजी से खड़ा हुआ यह चैनल आपसी बंटवारा के बवाल के चलते बंटाधार हो गया। देर शाम को ही इस चैनल के सारे कर्मचारियों को नोटिस थमा दी गयी कि :- दुकान बंद हो चुकी है, अब कल से आफिस मत आना। कहने की जरूरत नहीं कि इससे इस चैनल के दर्जनों कर्मचारियों पर जबर्दस्‍त बज्रपात हुआ है। हालत इतनी टाइट है कि यह कर्मचारी भुखमरी की शिकार होते जा रहे हैं। वजह यह कि दो महीनों से ही यह चैनल अपने कर्मचारियों को वेतन तक वेतन नहीं दे पाया था।

कई चैनलों को शुरू और बंद करवाने में बाकायदा महारत हासिल कर चुके अनुरंजन झा ने इस चैनल को पैदा करने मेहनत की थी। शगुन के नाम पर यह इंटरमेंट चैनल शुरू हुआ था। इसमें एक बड़े अफसर सीडी चक्रधर का पैसा लगाया गया बताया जाता है। इस चैनल में करीब तीन दर्जन कर्मचारी शामिल किये गये थे। झा और चक्रधर ने कर्मचारियों के सामने खूब हांका था कि यह चैनल जल्‍दी ही चैनल की दुनिया में श्रेष्‍ठतम दर्जा हासिल कर लेगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। बताया जाता है कि इसमें लूट-खसोट के कीड़े बड़ी तादात में घुस गये थे और इस चैनल को देसी शौचालय के सोग-पिट जैसा बना डाला गया था।

कुछ भी हो, झा के इस चैनल में पिछले दो महीनों से चक्रधर ने पैसा देना बंद कर दिया था। हालत पतली ही जा रही थी। अब कल शाम झा ने सारे कर्मचारियों के सथ मीटिंग की और चैनल की बंदी का ऐलान कर दिया। बोले : अगले एक पखवाड़े में सारे कर्मचारियों का हिसाब-किताब हो जाएगा। आप लोग अब आफिस आना बंद कर दें। यह सुनते ही सारे कर्मचारियों पर मानो सांप ही सूंघ गया। कर्मचारियों ने तय किया है कि अगर एक पखवाड़े के भीतर सारे देयों और नोटिस आदि की रकम अदा नहीं की गयी तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उधर पता है कि अनुरंजन ने शगुन की बंदी के पहले ही अपने लिए एक नये चैनल की नाव पकड़ ली है। इस संदर्भ जब चैनल के हेड और सीईओ अनुरंजन झा से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि हां, मैंने टीम छोटी कर दी है। अब यह चैनल रिकार्डिंग मोड में डाल दिया गया है।

कुमार सौवीर की रिपोर्ट. श्री सौवीर यूपी के वरिष्‍ठ तथा तेजतर्रार पत्रकार हैं.

फोटो जर्नलिस्‍ट रेप केस : मुंबई की कोर्ट आज सुना सकती है फैसला

मुंबई : शक्ति मिल में फोटो पत्रकार से सामूहिक बलात्कार के मामले में सुनवाई कर रही सत्र अदालत मामले के तीन दोषियों की सजा की घोषणा आज कर सकती है। एक अन्य सामूहिक दुष्कर्म कांड में भी दोषी ठहराये गये तीनों शख्सों पर बलात्कार के मामले में एक नयी धारा लगाई गयी है जिसमें मृत्युदंड तक की सजा का प्रावधान है।

विशेष सरकारी अभियोजक उज्ज्वल निकम ने कहा कि अदालत ने तीन गवाहों के बयानों की रिकॉर्डिंग पूरी की जिन्हें कल फिर से बुलाया गया था। अंतिम दलीलों पर सुनवाई गुरुवार को शुरू होगी जिसके बाद फैसला आ सकता है। अदालत ने पिछले महीने आईपीसी की धारा 376 (ई) के तहत अतिरिक्त आरोप तय किया था। बार बार बलात्कार करने के अपराध से जुड़े प्रावधान में अधिकतम सजा मृत्युदंड है।

मामले के तीनों दोषी कासिम बंगाली, विजय जाधव और मोहम्मद सलीम अंसारी एक टेलीफोन ऑपरेटर के साथ सामूहिक बलात्कार कांड में भी दोषी करार दिये जा चुके हैं। 18 वर्षीय टेलीफोन ऑपरेटर के साथ पिछले साल जुलाई में शक्ति मिल परिसर में सामूहिक बलात्कार किया गया था। इस घटना के एक महीने बाद 22 अगस्त को फोटो पत्रकार के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना सामने आई। इस बीच अदालत ने एक आरोपी को बंद कमरे में सुना, जिसने कहा था कि वह कुछ कहना चाहता है। तीनों दोषियों को टेलीफोन ऑपरेटर के साथ सामूहिक दुष्कर्म कांड में पहले ही उम्रकैद की सजा दी जा चुकी है। (एजेंसी)

सुधीर चौधरी को कोर्ट में झटका, जिंदल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा खारिज

: जिंदल से जुड़े कार्यक्रमों में एनबीए की गाइड लाइन अनुसरण करने का निर्देश : नयी दिल्ली : राजधानी की एक निचली अदालत ने कांग्रेस सांसद एवं उद्योगपति नवीन जिंदल के खिलाफ जी न्यूज के संपादक एवं बिजनेस हेड सुधीर चौधरी की मानहानि याचिका खारिज कर दी है.

पटियाला हाऊस अदालत के न्यायाधीश धीरज मित्तल ने श्री चौधरी द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे को निरस्‍त कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि श्री जिंदल समेत 17 लोगों ने अक्टूबर 2012 में आयोजित एक संवाददाता सम्‍मेलन में उनका अपमान किया था.
      
न्यायालय ने कहा कि जिंदल स्टील एवं पावर लिमिटेड (जेपीएसएल) द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में दिए गए वक्तव्य शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने की आपराधिक मंशा अथवा सोची समझी रणनीति का हिस्सा कतई नहीं थे. न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि श्री जिंदल सहित सभी आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ मानहानि का अपराध साबित नहीं होता है. इस प्रकार मौजूदा शिकायत निरस्त की जाती है.

इस बीच एक अन्य मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने जी न्यूज को श्री जिंदल या उनकी कंपनी से संबंधित कार्यक्रमों के प्रसारण में न्यूज ब्रॉडमास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के दिशा-निर्देशों का अनुसरण करने का निर्देश दिया.

सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा – नहीं हैं जमानत के लिए दस हजार करोड़ रुपए

नई दिल्ली : सहारा ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट से गुरुवार को कहा है कि सहारा के पास सहारा प्रमुख सुब्रत राय की जमानत के लिए 10 हजार करोड़ रुपये नहीं है। सहारा समूह की तरफ से सर्वोच्‍च अदालत को बताया गया है कि वह इतनी बड़ी जमानत राशि दे पाने में असमर्थ है। सहारा ने कोर्ट को एक नया प्रस्‍ताव दिया है। समूह की तरफ से कहा गया कि वह 5000 करोड़ रुपए दे सकता है, जिसमें 2500 करोड़ रुपये तुरंत तथा शेष 2500 करोड़ की राशि अगले 21 दिन के भीतर जमा करा देगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत राय सहारा की जमानत के लिए 10 हजार करोड़ रुपये जमा करने की शर्त रखी थी। इससे पहले कोर्ट ने 27 मार्च को सुनवाई के दौरान उन्हें कोई राहत नहीं देते हुए 3 अप्रैल तक जेल में रहने का फरमान सुनाया था। गौरतलब है कि सहारा ग्रुप ने उनकी जमानत के लिए उस सुनवाई के दौरान भी 10,000 करोड़ रुपये की रकम देने में असमर्थता जताई थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत देने से इनकार कर दिया था।

इस मामले में सहारा प्रमुख व कंपनी के दो अन्य निदेशकों को अदालत ने चार मार्च को न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। सहारा की ओर से पेश प्रस्ताव में कहा गया कि 2,500 करोड़ की पहली किस्त तीन दिन के भीतर दे दी जाएगी। लेकिन इसके लिए खाते के संचालन पर लगी रोक हटानी होगी। 3,500-3,500 करोड़ रुपये की दूसरी, तीसरी और चौथी किस्त का भुगतान 30 जून, 31 सितंबर और 31 दिसंबर को किया जाएगा। पांचवी और आखिरी किस्त के रूप में सेबी को 7,000 करोड़ रुपये का भुगतान 31 मार्च, 2015 को किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह के इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया था तथा सुब्रत रॉय की जमानत के लिए समूह को दस हजार करोड़ रुपए जमा कराने को कहा था। सहारा समूह के कर्मचारी भी अपने तरफ से पैसे जुटाने की कोशिश में लगे थे, लेकिन कोई उत्‍साहजनक रिजल्‍ट नहीं आ पाया। फिलहाल सुब्रत राय की जमानत के मसले पर सुप्रीम कोर्ट मे सुनवाई जारी है।

जनादेश के जश्न से पहले कद्दावर नेताओं की तिकड़म

1977 में देश की सबसे कद्दावर नेता इंदिरा गांधी को राजनारायण ने जब हराया तो देश में पहली बार मैसेज यही गया कि जनता ने इंदिरा को हरा दिया। लेकिन राजनारायण उस वक्त शहीद होने के लिये इंदिरा गांधी के सामने खड़े नहीं हुये थे बल्कि इमरजेन्सी के बाद जनता के मिजाज को राजनारायण ने समझ लिया था। लेकिन इंदिरा उस वक्त भी जनता की नब्ज को पकड़ नहीं पायी थीं। और 52 हजार वोट से हार गयीं। राजनारायण 1971 में इंदिरा से हारे थे और 1977 में इंदिरा को हरा कर इतिहास लिखा था। लेकिन उसी रायबरेली में इस बार सोनिया गांधी के खिलाफ किसी कद्दावर नेता को कोई क्यों खड़ा नहीं कर रहा है यह बड़ा सवाल है। तो क्या 2014 के चुनाव में जनता की नब्ज को हर किसी ने पकड़ लिया है इसलिये कद्दावर नेताओ के खिलाफ कोई शहीद होने को तैयार नहीं है या फिर जिसने जनता की नब्ज पकड़ ली है वह कद्दावर के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने को तैयार है। यह सवाल पांच नेताओं को लेकर तो जरुर है। रायबरेली में सोनिया गांधी, बनारस में नरेन्द्र मोदी,लखनऊ में राजनाथ सिंह, आजमगढ़ में मुलायम सिंह यादव और अमेठी में राहुल गांधी।

 हर नेता का अपना कद है। अपनी पहचान है। लेकिन पहली बार इन पांच नेताओं के खिलाफ कौन सा राजनीतिक दल किसे मैदान में उतार रहा है हर किसी की नजर इसी पर है। यानी कद्दावर नेता के खिलाफ कद्दावर नेता चुनाव मैदान में उतरेंगे या कद्दावर के सामने कोई नेता शहीद होना नहीं चाहता इसलिये कद्दावर हमेसा कद्दावर ही नजर आता है। 2014 के चुनाव को लेकर यह सवाल बड़ा होते जा रहा है। राहुल गांधी के खिलाफ बीजेपी स्मृति इरानी को उतारा है। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस ने अभी तक किसी कद्दावर के नाम का एलान किया नहीं है। सोनिया गांधी के खिलाफ भी बीजेपी ने खामोशी बरती है। सपा ने तो उम्मीदवार ना उतारने का एलान इस खुशी से किया जैसे उसके सियासी समीकरण की पहली जीत हो गयी। राजनाथ के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने जावेद जाफरी को उतारकर लखनवी परंपरा को ही बदल दिया है। मुलायम के खिलाफ कांग्रेस और बीजेपी अभी तक खामोश हैं।

तो क्या पहलीबार कद्दावर नेताओं को घेरने के लिये उम्मीदवारों के एलान में देरी हो रही है या फिर सियासी जोड-तोड मौजूदा राजनीति में कद्दावर को बचाने में जुटी हुई है। यह सावल इसलिये बड़ा है क्योंकि राहुल गांधी के खिलाफ स्मृति इरानी के लड़ने का मतलब है बीजेपी में ऐसा कोई नेता नहीं जो ताल ठोक कर राहुल गांधी को चुनौती दें। क्योंकि स्मृति इरानी को हारने में ही लाभालाभ है। स्मृति फिलहाल राज्यसभा की सदस्य हैं। और चुनाव हार भी जाती हैं तो राज्यसभा की सीट पर आंच आयेगी नहीं। वैसे बीजेपी में हर बड़ा नेता अमेठी में चुनाव लड़ने की एवज में राज्यसभा की सीट मांग रहा था। लेकिन स्मृति को तो कुछ देना भी नहीं पड़ा। और चुनाव राहुल गांधी के खिलाफ लड़ रही है तो प्रचार मिलेगा ही। और राहुल गांधी के लिये स्मृति इरानी का लड़ना फायदेमंद भी साबित होगा क्योंकि स्मृति की पहचान कहीं ना कहीं टीवी सीरियल कलाकर से जुडी हुई हैं और अमेठी में ताल ठोंक रहे आप के कुमार विश्वास भी मंचीय कवि हैं तो तो झटके में राहुल बनाम कलाकार-अदाकार का केन्द्र अमेठी हो गया। यानी अमेठी 77 वाले हालात से दूर है जब गांधी परिवार के सबसे ताकतवर बेटे संजय गांधी अमेठी में चुनाव हारे थे। लेकिन उस वक्त भी संजय गांधी के खिलाफ खड़े उम्मीदवार को कोई नहीं जानता था उल्टे जनता के फैसले को बडा माना गया था।

वहीं सोनिया गांधी को लेकर कोई रणनीति किसी के पास नहीं है। रायबरेली में 37 बरस पहले इंदिरा गांधी हारी थीं। लेकिन रायबरेली में सोनिया गांधी हार सकती है यह 2014 में कोई मानने को तैयार नहीं है। इसलिये रायबरेली में कोई कद्दावर नेता शहीद होना भी नहीं चाहता। बीजेपी की उमा भारती हो या आप की शाजिया इल्मी दोनों ने ही रायबरेली से कन्नी काटी। और बीजेपी ने जिसे मैदान में उतारा वह विधायक का सीट भी नहीं जीत सकता। सपा छोड़ कर बीजेपी में शरीक हुये अजय अग्रवाल को सोनिया के खिलाफ उतार कर बीजेपी ने साफ कर दिया कि मोदी के खिलाफ वह कांग्रेस से किसी कद्दावर काग्रेसी नेता को मैदान में देखना नहीं चाहती।

तो सवाल तीन हैं। बीजेपी ने अमेठी और रायबरेली को वाकओवर दिया। तो बनारस में उम्मीदवार के एलान को लेकर रुकी कांग्रेस भी मोदी को वाकओवर दे देगी। या फिर पीएम पदत्याग से बना सोनिया का कद आज भी हर कद पर भारी है। या सोनिया 2014 के चुनाव में महज एक प्रतीक है। क्योंकि राहुल दौड़ में है। हो जो भी, लेकिन गांधी परिवार सरीखी सुविधा बाकि कद्दावर नेताओ के लिये तो बिलकुल ही नहीं है। राजनाथ या मोदी को लेकर राजनीतिक दलों की बिसात उलट है। राजनाथ हो या नरेन्द्र मोदी सत्ता के लिये दोनो ही रेस में हैं। दोनो को पता है कि लखनऊ या बनारस से जीत का मतलब दोनों नेताओ के लिये होगा क्या। इसलिये मोदी के खिलाफ चुनावी गणित को ठोक बजाकर हर दल देख रहा है और राजनाथ को हर दल ने अपने उम्मीदवारों के आसरे घेरने का प्रयास किया है। लखनऊ में चुनावी जीत हार मुस्लिम और ब्राहमण वोटरों पर ही टिकी है। 5 लाख से ज्यादा मुस्लिम और करीब 6 लाख ब्रह्मण वोटर लखनऊ में हैं। और राजनाथ के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने जैसे ही फिल्मी कलाकार जावेद जाफरी को उतारा वैसे ही कई सवाल सियासी तौर पर उठे। क्या आप मुसलिम वोटर को अपने साथ देख रहा है। वहीं बाकी तीनों दल यानी सपा, बीएसपी और कांग्रेस तीनों माने बैठे हैं कि मुस्लिम वोटर अगर उनके साथ आता है तो जीत उन्हीं की होगी क्योंकि तीनो ही दलो के उम्मीदवार ब्राह्मण हैं।

ऐसे में राजनाथ का नया संकट यही है कि अगर ब्राह्मण वोटर बीजेपी से छिटका या राजनाथ से छिटका तो राजनाथ मुश्किल में पड़ जायेंगे क्योंकि जातीय समीकरण के लिहाज राजपूतों की तादाद लखनउ में 80 हजार से भी कम है । लेकिन मुस्लिम उम्मीदवार के मैदान में उतरने से राजनाथ को लाभ है कि मुस्लिम वोटर अगर जावेद जाफरी में सिमटा तो कांग्रेस, सपा और बीएसपी के लिये यह घातक साबित होगा। वहीं राजनाथ से उलट बिसात मोदी को लेकर बनारस में हर राजनातिक दल की है क्योंकि वहां केजरीवाल को सामने कर सीधी लड़ाई के संकेत हर राजनीतिक दल की लगातार खामोशी दे रही है। बनारस में हर कोई बनारसी दांव ही चल रहा है। मोदी बनारस में मोदी से ही लड़ रहे हैं। मोदी का कद बीजेपी से बड़ा है।

मोदी पीएम पद के उम्मीदवार है। 2014 में सरकार बीजेपी की नहीं मोदी की बननी है। सोमनाथ से बाब विश्वानाथ के दरवाज में मोदी यूं ही दस्तक देने नहीं पहुंचे हैं। यह सारे जुमले मोदी को मोदी से ही लड़ा रहा हैं। इसलिये नया सवाल यही हो चला है कि मोदी के खिलाफ कांग्रेस मैदान में उतारेगी किसे। नजरें हर किसी की है। कांग्रेस के पांच नेता दिग्विजय सिंह, आनद शर्मा, प्रमोद तिवारी, राशीद अल्वी और पी चिंदबरम अभी तक जिस तरीके से मोदी को चुनौती देने के लिये अपने नाम आगे किये है और काग्रेस हाईकमान ने कोई गर्मजोशी नहीं दिखायी उससे अब नये संकेत उभरने लगे है कि मोदी को घेरने के लिये क्या हर राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार को उतारने से बनारस में बच रहे है। क्योकि मोदी के खिलाफ केजरीवाल चुनाव लड़ने की मुनादी कर चुके है और वोट बिखरे या कटे नहीं इसपर खास ध्यान हर राजनीतिक दल दे रहा है ।
 
बनारस में जितनी तादाद यहां ब्राह्मण की है उतने ही मुसलमान भी हैं। और पटेल-जयसवाल को मिला दें तो इनकी तादाद भी ब्रह्मण-मुसलमान के बराबर हो जायेगी। तो 16 लाख वोटरों वाले काशी में मोदी के शंखनाद की आवाज को खामोश तभी किया जा सकता है जब जाति और धर्म का समीकरण एक साथ चले। और यह तभी संभव है जब मुलायम-मायावती एक तरीके से सोचें और कांग्रेस मोदी को ही मुद्दा बनाकर केजरीवाल की परछाई बन जायें। असल में कांग्रेस की खामोशी या उम्मीदवार खड़ा करने को लेकर देरी इसकी संकेत देने लगी है कि वोटों के समीकरण और मोदी की परछाई को ही मोदी के खिलाफ खड़ा करने की एक नयी सियासत कांग्रेस भी बना रही है। आजमगढ पहुंचे मुलायम सिंह यादव भी बनारस में आजगढ की हवा बहाने में लगे हैं। यानी मुसलिम वोटर के गढ़ में मुलायम खुद के मौलाना होने का तमगा लेने पहुंचे हैं और बनारस के कबीरपंथी सोच में मोदी सेंध लगाने पहुंचे हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि पहली बार कद्दावर नेताओं की तिकड़मी राजनीति के सामने उसी जनादेश को छोटा कर आंका जा रहा है जो जनादेश नेताओं के कद्दावर बनाता है। तो आजादी के बाद चुनावी इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पन्ना लिखा जा रहा है 2014 में । क्योंकि जनादेश तिकड़मी कद्दावरों को धूल चटायेगा और धूल से कुर्सी तक पहुंचायेगा। इसके लिये सिर्फ इंतजार करना पड़ेगा।

 

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार।

चुनावी पैंतरा: टीम मोदी अब सेक्यूलर क्षत्रपों की भी लेने लगी ‘खबर’

चुनाव की घड़ी नजदीक आती जा रही हैं। ऐसे में, सियासी संग्राम तेज होता जा रहा है। होड़ लगी हुई है कि कैसे राजनीतिक रूप से नहले पर दहला मार दिया जाए। इधर, टीम मोदी ने भी अपनी रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है। अभी तक भाजपा के वरिष्ठ नेता अपना मुख्य राजनीतिक निशाना कांग्रेस पर ही साधते रहे हैं। लेकिन, अब रणनीति में कुछ बदलाव किया गया है। अलग-अलग राज्यों के लिए कई रणनीतियां बना ली गई हैं। कांग्रेस के साथ ही धुर-खांटी सेक्यूलर क्षत्रपों को भी निशाने पर रखा जा रहा है। इसकी आक्रामक शुरुआत खुद एनडीए के ‘पीएम इन वेटिंग’ मोदी ने शुरू की है। बिहार में वे पहले से ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जमकर निशाना साधते आए हैं। वे बिहार के दौरे पर जाते हैं, तो चुनावी सभाओं में कांग्रेस से ज्यादा नीतीश पर बरसते हैं। उनकी सेक्यूलर राजनीति पर कटाक्ष के तीखे तीर चलाने से नहीं चूकते। शुरुआती दौर में वे उत्तर प्रदेश में सपा नेतृत्व पर सीधा निशाना साधने से बचते नजर आ रहे थे। लेकिन, अब उन्होंने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनके सुपुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर तीखे कटाक्ष शुरू कर दिए हैं। मंगलवार को बरेली की रैली में तो उन्होंने सीएम अखिलेश यादव पर कई कटाक्ष किए। कह दिया कि सपा और बसपा का राज उत्तर प्रदेश को कंगाली के सिवाए और कुछ नहीं दे सकता।

 
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मोदी के बीच गुजरात के शेर भी सियासत का एक मुद्दा बन गए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर गुजरात सरकार ने अपने गिरि अभयारण्य से उपहार के तौर पर शेर भेजे हैं। जिन्हें फिल्हाल, चिड़ियाघर में रखा गया है। पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक चुनावी सभा में अखिलेश यादव ने गुजरात के शेरों के बहाने मोदी पर चुटकी ली थी। कह दिया था कि गुजरात से उन्होंने शेर मंगाए हैं। लेकिन, ये उत्तर प्रदेश में ज्यादा उछल-कूद नहीं कर पाएंगे। क्योंकि, चंबल के पास उन्होंने कई एकड़ का एक पार्क बनवाया है। इसकी दीवारों के भीतर ही गुजरात के शेर रहेंगे। उन्हें खुले मैदान में दहाड़ने का मौका भी नहीं मिलेगा। ये टिप्पणी अखिलेश ने मोदी पर राजनीतिक कटाक्ष के रूप में कही थी। इसका जवाब मंगलवार को चुनावी रैली में मोदी ने भी चुटीले अंदाज में दे डाला। कह दिया कि यूपी सरकार ने गुजरात के शेर पिंजरों में रखे हैं। क्योंकि, गुजरात के शेरों को संभालना कोई आसान काम नहीं है। क्योंकि, गुजरात का एक शेर जो खुले आम घूम रहा है, उसी ने तमाम छद्म सेक्यूलरों की बोलती बंद कर दी है। मोदी के कटाक्ष पर भीड़ ने जमकर करतल ध्वनि की। पिछले दिनों भी मोदी और सपा सुप्रीमो के बीच सियासी कटाक्ष के तीर चल चुके हैं। मुलायम सिंह यादव ने गुजरात विकास मॉडल पर तीखे तंज कसे थे। यही कहा था कि गुजरात के मुकाबले अखिलेश सरकार ने कम समय में ही यूपी का ज्यादा विकास किया है।

पलटवार करते हुए मोदी ने कहा था कि नेता जी (मुलायम सिंह) गुजरात जैसा विकास करने के लिए 56 इंच के सीने की जरूरत पड़ती है। हर कोई ऐसा विकास कर ले, यह संभव नहीं है। 56 इंच वाली टिप्पणी पर कई दिनों तक मुलायम सिंह मोदी पर बरसते रहे हैं। अब गुजरात से आए शेरों पर जुबानी जंग तेज हो गई है। राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि मोदी खास तौर पर उन सेक्यूलर क्षत्रपों पर सियासी प्रहार कर रहे हैं, जिनको लेकर वे कोई राजनीतिक जोखिम नहीं समझ रहे। दरअसल, टीम मोदी को अच्छी तरह मालूम है कि किसी भी स्थिति में मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली सपा, भाजपा सरकार की राजनीतिक बैसाखी नहीं बन सकती है। उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं। भाजपा नेता लगातार कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों से ही दिल्ली की गद्दी का निर्णायक फैसला होगा। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उम्मीद बांधे है कि इस बार 50 सीटों पर ‘कमल’ खिल सकता है। जबकि, मुलायम सिंह यादव पूरा जोर लगाए हुए हैं कि उनकी मौजूदा सीटें घट न पाएं। उल्लेखनीय है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 23 सीटों में सफलता मिली थी। 2012 में वे विधानसभा चुनाव में सपा ने अकेले दम पर बहुमत पाकर अपना सियासी सिक्का जमाया। ऐसे में, सपा और भाजपा के बीच यहां चुनावी जंग काफी तेज है।
 
प्रदेश में करीब दो दर्जन ऐसी सीटें हैं, जहां पर मुस्लिम समुदाय की रणनीति निर्णायक परिणाम दे सकती है। इस वोट बैंक पर कांग्रेस, सपा व बसपा की भी नजर है। तीनों दल अल्पसंख्यक समाज को अपने-अपने तरीके से लुभाने में लगे हैं। कांग्रेस के नेता यही प्रचार कर रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर सपा-बसपा के बजाए कांग्रेस ही मोदी के विजय रथ को रोक सकती है। ऐसे में, मुस्लिम समाज उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस का हाथ मजबूत करे। ताकि, भाजपा के मोदी मिशन को फेल किया जा सके। लेकिन, जमीनी सच्चाई यही मानी जा रही है कि यहां पर कांग्रेस के मुकाबले सपा और बसपा की सियासी स्थिति ज्यादा मजबूत है। अखिलेश सरकार दो साल से सत्ता में है। कई मुद्दों को लेकर सरकार के कामकाज को लेकर लोगों की नाराजगी बढ़ी है। इस मोर्चे पर सपा को तमाम राजनीतिक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जबकि, बसपा नेतृत्व अपने सोशल इंजीनियरिंग के चुनावी फार्मूले के जरिए ही प्रदेश में जीत की सबसे बड़ी लकीर खींचने में जुटा है। सपा का नेतृत्व मुस्लिम समाज में यह सवाल भी उछाल रहा है कि चुनाव के बाद बसपा का नेतृत्व सत्ता की जुगाड़ में एनडीए से भी हाथ मिला सकता है। ऐसे में, वे अवसरवादी ‘हाथी’ का साथ देने का जोखिम न लें।
 
यह अलग बात है कि बसपा सुप्रीमो मायावती खांटी सेक्यूलर तेवर दिखा रही हैं। ताकि, मुस्लिम वोट बैंक का पूरा विश्वास जीत सकें। इसके लिए वे हर चुनावी सभा में मोदी के खिलाफ तीखी टिप्पणियां कर रही हैं। यही कह रही हैं कि मोदी प्रधानमंत्री बन गए, तो अल्पसंख्यकों के साथ ही दलित और वंचित वर्गों के लिए तमाम मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। मायावती बार-बार सफाई दे रही हैं कि उनके राजनीतिक विरोधी ही यह अफवाह फैला रहे हैं कि बसपा सत्ता के लिए भाजपा वालों से चुनाव के बाद हाथ मिला सकती है। लेकिन, यह एकदम निराधार बात है। उल्लेखनीय है कि मायावती उत्तर प्रदेश में भाजपा के समर्थन से सत्ता तक पहुंच चुकी हैं। वे भाजपा के साथ प्रदेश में साझा सरकार भी चला चुकी हैं। सपा नेतृत्व इस हकीकत के बहाने बसपा पर ताने कस रहा है। फिलहाल मोदी, मुलायम सिंह के साथ मायावती पर भी बरस रहे हैं। लेकिन, वे माया पर रोजाना भड़कते नहीं दिखाई पड़ते। राजनीतिक हल्कों में लंबे समय से कयास रहा है कि चुनाव के बाद शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी, एनडीए से भी हाथ मिला सकती है। पिछले महीनों में कई मौकों पर पवार सहित उनके सिपहसालार बयानों में मोदी के प्रति नरमी भी दिखा चुके हैं। इन बयानों को लेकर कांग्रेस का नेतृत्व भी चिंतित रहा है।
 
पवार के नरमी के रुख को देखकर भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी दल शिवसेना नेतृत्व ने नाराजगी जताई थी। इस पार्टी के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पवार को लेकर कड़े बयान दिए थे। यह भी कहा था कि हार का खतरा देखकर अवसरवादी नेता पवार एनडीए में राजनीतिक शरण लेना चाहते हैं। लेकिन, शिवसेना ऐसा नहीं होने देगी। कहीं शिवसेना, भाजपा की नीयत पर शक न करने लगे। ऐसे में, महाराष्ट्र भाजपा के भी कई नेताओं ने पवार को जमकर कोसा। इसके बाद तो एनसीपी के नेताओं ने भी मोदी के खिलाफ बयानबाजी तेज की। पिछले दिनों शरद पवार तो यहां तक कह चुके हैं कि मोदी को किसी मानसिक अस्पताल में इलाज कराना चाहिए। क्योंकि, उनका मानसिक संतुलन ठीक नहीं रह गया। इस बयान के बाद मोदी ने भी पवार की जमकर खबर ली है। रही-सही कसर भाजपा के पूर्व अध्यध नितिन गडकरी ने पूरी कर दी है। उन्होंने कह दिया है कि पवार पर बुढ़ापे का काफी असर हो गया है। उनके कई आॅपरेशन हो चुके हैं। ऐसे में, वे उनके खिलाफ ज्यादा नहीं बोलना चाहते। क्योंकि, उनकी खराब सेहत को देखते हुए हम उनकी बदजुबानी को भी माफ करते हैं। क्योंकि, हमें पता है कि महाराष्ट्र की जनता वैसे भी कांग्रेस के साथ एनसीपी का सफाया करने जा रही है। ऐसे में, हम इन ‘बेचारों’ पर अपनी जुबान का स्वाद क्यों कसैला करें?

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।
 

कोई भी व्यक्ति मुझ पर खबर न लिखने का दबाव नहीं बना सकता

आपके वेब पोर्टल भडास पर अपने बारे में पढ़ा। धांधली के संबंध में पशुपालन विभाग के  प्रमुख सचिव का कहना था कि बिना लिखित शिकायत के कोई कार्यवाही संभव नहीं है। इस पर मैंने स्वयं शिकायत की। मेरे द्वारा की गई शिकायत पर उप्र के मुख्य सचिव श्री जावेद उस्मानी ने स्वंय जांच के आदेश दिए हैं, जोकि प्रचलित है। साथ ही पशुपालन विभाग के अधिकारियों को हिदायत भी दी गई है कि बसपा नेता की माताजी के नाम पर हाल ही में बने विवि से कापी जांचने का कार्य नहीं कराया जाएगा। किस हद तक गड़बड़ी की जा रही है, इसका अंदाजा मेरी संलग्न् खबर पढ़कर ही लग जाएगा।

जहां तक निदेशक पशुपालन द्वारा सूचना निदेशक को धमकी से संबंधित पत्र लिखने की बात है, स्वयं को जांच में बचाने के उद्देश्य से ही ऐसा किया गया है। निदेशक पशुपालन द्वारा दिए गए मोबाईल नम्बरों में से सिर्फ 8127786786 मेरा नम्बर है। बाकी दो नम्बरों के व्यक्तियों को मैं जानता तक नहीं और न ही इन नम्बरों पर कभी भी मेरी बात हुई है। निदेशक पशुपालन के अनुसार यदि, ये मेरे साथी हैं तो मेरी बात इन लोगों से अवश्य हुई होगी (कोई भी पत्रकार अथवा जांच अधिकारी कॉल डीटेल से इस तथ्य की पुष्टि कर सकता है)। निदेशक पशुपालन से मेरी सिर्फ एक बार बात हुई है वह भी बीस सेकेण्ड से भी कम समय तक, जिसे मैंने अपने शिकायती पत्र में लिखा भी किया था। कलम चलाना ही मेरा काम है, चाहे वह खबर के लिए चले, अथवा गलत चीजों का प्रतिरोध लिखित में करने के लिए चले, चाहे वह सोशल मीडिया में चले। निदेशक पशुपालन जैसा कोई भी व्यक्ति इस प्रकार से मुझ पर खबर न लिखने का दबाव नहीं बना सकता।

मुख्य बातें यह हैः

1. ओएमआर शीट की कार्बन कापी क्यों नहीं दी गई।
2. कापी जांचने की प्रक्रिया एक माह से अधिक समय तक प्रारम्भ क्यों नहीं की
गई। कापियां ऐसे ही क्यों पड़ी रहीं।
3. मनमाने तरीके से कापी जांचने का ठेका क्यों दिया गया।
4. किसी सरकारी एजेन्सी से सीसीटीवी की निगरानी में लाईव प्रसारण करके ही
धांधली रोकी जा सकती है, जिसे करने को विभाग तैयार नहीं है।

 

असलम सिद्दीकी, ब्यूरो प्रमुख,पंजाब केसरी। संपर्कः 8127786786

मूल खबर:
पंजाब केसरी का पत्रकार पशुपालन निदेशक पर बना रहा दबाव, मित्‍तल से की गई शिकायत

 

शिवराज ने किया जनता से धोखा, रिलायंस को दिलाया २९००० करोड़ का फायदा

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अनिल अम्बानी की कंपनी RPL को 29000 करोड़ का फायदा पहुँचाया है एवं मध्य प्रदेश कि जनता को ठगा है. एक तरफ तो शिवराज सिंह खुद को गरीबों का हमदर्द बताते है और दूसरी तरफ RPL जैसी कम्पनियों को फायदा पहुचाने के लिए सिफारिशी पत्र तक लिखते हैं. 2006 में कोयला मंत्रालय ने सासन UMPP के लिए २ कोल् ब्लाक (मोहेर एवं मोहेर अमलोहरी) सासन UMPP के लिए आवंटित किये थे। २ माह बाद ही 9th-अक्टूबर-2006 को ऊर्जा मंत्रालय ने यह कहते हुए कि २ कोल् ब्लाक सासन के लिए पर्याप्त नहीं होंगे, छत्रसाल कोल् ब्लाक NTPC से लेकर सासन को आवंटित कर दिया।

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि ऊर्जा मंत्रालय को ऐसा क्यों लगा जबकि कोयला मंत्रालय के अनुसार २ कोल् ब्लाक पर्याप्त थे। नवंबर २००७ में मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर यह कहा कि सासन में से सरप्लस कोल् को किसी और पॉवर प्रोजेक्ट के लिए डाइवर्ट करने कि अनुमति दी जाए, जबकि खुद RPL २००८ तक यह कहता रहा कि सासन में सरप्लस कोल् नहीं है। आखिर मुख्यमंत्री कि तरफ से ऐसे विरोधाभाषी बयान क्यों आये ? CAG की रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री की चिट्ठी के कारण सरप्लस कोल् को डाइवर्ट करने कि अनुमति मिली जिसके कारण RPL को २९,००० करोड़ का undue फायदा मिला। इस सबके बाद भी RPL ने CERC से 2013 में सासन के टैरिफ को बढ़ने कि मांग कि गयी. जिस तरह से गैस के मुद्दे पर मोदी और राहुल गांधी मौन है उसी तरह इस पूरे मुद्दे पर मध्य प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही मौन है। इससे साफ़ स्पस्ट है कि मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों अनिल अम्बानी के इशारों पर चल रहे हैं और मध्य प्रदेश में सरकार भाजपा नहीं बल्कि चंद पूंजीपति चला रहे है।

आम आदमी पार्टी मुख्यमंत्री जी से यह पूछना चाहती है कि:
(१) क्या मध्य प्रदेश सरकार केवल पूँजीपतियों को फायदा पहुँचाने के लिए बनी है और जनता के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है ?
(२) उन्होंने जो चिट्ठी प्रधानमंत्री को लिखी थी उससे RPL को 29000 करोड़ का undue फायदा हुआ. इससे आखिर जनता को क्या फायदा हुआ ?
(३) चिट्ठी लिखते समय उन्हे यह कैसे पता था कि सासन में सरप्लस कोल् है ?
(४) क्या इस पत्र को लिखते समय उन्हे यह जानकारी थी कि इस सरप्लस कोल् को कहाँ इस्तेमाल किया जाएगा ?
(५) इस diverted कोल् से उत्पन्न होने वाली बिजली के लिए अभी तक मध्य प्रदेश सरकार ने कोई पॉवर परचेस एग्रीमेंट क्यों नहीं किया ?

आम आदमी पार्टी, मध्य प्रदेश इकाई की तरफ से जारी.

पेड न्यूज के चक्कर में अमर शहीद की कुर्बानी भूल गया पंजाब केसरी!

अमर शहीद लाला जगत नारायन का पंजाब केसरी अखबार अपने स्थापना के उद्देश्यों के रास्ते से भटक गया है। देश की आजादी की लड़ाई में शामिल रहले और पंजाब में खालिस्तान समर्थकों के विरोध अपने जान गवाने वाले लाला जगत नारायण के पुत्र और पौत्र इस वक्त उनकी कुर्बानी की आड़ में गलत तरीकों से सिर्फ रुपए कमाने में लगे हैं। पिछले कई चुनावों से पेड न्यूज छापने वालों के अग्रणी पंक्ति में शामिल रहने वाले इस अखबार ने तो इस बार हद ही कर दिया है।

चुनाव से जुड़ी कोई खबर नहीं छापने वाले इस अखबार के निदेशक अपने ब्यूरो और फिल्ड कर्मियों से न्यूज के साथ  विज्ञापन का आरओ मांगा जा रहा है। इसकी वजह से कर्मचारी और रिपोर्टर काफी परेशान हैं। सुनने में यह भी आया है कि रिपोर्टर काफी परेशान हैं और प्रत्याशियों के पास जा नहीं रहे हैं। प्रत्याशियों को कहना है कि पहले न्यूज तो छापों फिर विज्ञापन की बात करों। रिपोर्टर कह रहे हैं कि पेड न्यूज का पैसा दीजिए किन्तु चुनाव आयोग के डंडे के कारण प्रत्याशी पेड न्यूज के नाम पर घबरा जा रहे हैं। बाकी अखबार उन प्रत्याशियों की खबरें छाप रहे हैं। ऐसे में पंजाब केसरी को कौन विज्ञापन देगा। रिपोर्टर तो अब कहने लगे हैं कि पंजाब केसरी पंजाब, हरियाणा और हिमाचल,जम्मू एंड कश्मीर के साथ ही अभी अपने अस्तित्व के लिए लडऩे वाले राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह का पेड न्यूज का फरमान जारी किया है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सहारा ने मुझे बर्बाद कर दिया… तो सहाराश्री खुद को मुजरिम मानते हैं?

मैं रजनीश कुमार। एक मामूली सा इंसान। पटना के बाढ़ अनुमंडल का रहने वाला हूं। कभी मैं पटना के मीडिया में जाना-पहचाना नाम हुआ करता था। दैनिक जागरण में लंबे अरसे तक रहा। फिर राष्ट्रीय सहारा का दामन थाम लिया। लेकिन, यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। जिस सहारा को मैंने सहारा समझ कर थामा था, उसी ने मुझे डुबो कर बदनामी के एक ऐसे दलदल में धकेल दिया, जहां से निकलना मेरे लिए अब नामुनकिन हो गया है।

एक स्टिंग ऑपरेशन के लिए मुझे भेजा गया। मैं भी ऐसा नादान कि उस स्टिंग के लिए ऑफिस की ओर से कोई लिखित अनुमति का पत्र नहीं लिया। इस स्टिंग के दौरान ही मेरी बहस बख्तियारपुर पुलिस से हो गई। पुलिस ने मुझे पकड़ लिया। तमाम तरह के आरोप लगाए गए। जिस मीडिया के लिए मैं तन-मन से काम करता रहा, उसी ने मेरा तमाशा बना दिया। जिस सहारा के लिए मैं पूरी ईमानदारी से परिश्रम करता रहा, उसने मुझे अपना कर्मचारी मानने तक से इनकार कर दिया। हद तो यह है कि पटना के प्रतिष्ठित अखबारों ने खबरों को लेकर मुझसे होने वाली नोंकझोंक का पूरा गुस्सा मेरी गिरफ्तारी की खबर छापकर कर निकाला।

यह मेरे लिए शर्म से डूब कर मर जाने की बात है कि जिस बदनामी से मैं पीछा छुड़ाता रहा, उसी बदनामी के कालकोठरी में जबरन मेरे ही साथियों ने मुझे बंद कर दिया। घटना 26 नवंबर 2013 की है। यह रात मेरी जिंदगी के लिए वह काली रात है, जिसका दर्द बयां करते-करते मेरा कलेजा फटने लगता है। मैं राश्ट्रीय सहारा के पटना सिटी कार्यालय में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत था। 26 नवंबर की रात भी मैं ऑफिस में सहयोगियों के साथ काम कर रहा था। इस बीच मेरी बात पटना ऑफिस के बेसिक नंबर 0612 3611441 पर लगातार हो रही थी।

बातचीत के दौरान मुझे ऑफिस की ओर से बख्तियारपुर में चल रहे देह व्यापार का स्टिंग करने का काम सौंपा गया। अमूमन मैं ऑफिस से काम खतम करने के बाद पटना सिटी स्थित किराए के मकान में ही रुक जाया करता था। ऑफिस से मिले निर्देष के बाद मैंने अपनी बाईक पटना साहिब स्टेषन के जीआरपी थाने के समीप लगा दी और ट्रेन से बख्तियारपुर के लिए रवाना हो गया। सूचना मिली थी कि बख्तियारपुर के चंपापुर में देह व्यापार का धंधा पुलिस के सहयोग से होटलों में चल रहा है। स्टेषन पर उतरने के बाद मैं होटल के समीप बैठ गया। इस बीच मैं अपने काम में लगा था। मैं रात एक बजे तक वहीं बैठा रहा। देह व्यापार के काफी सबूत हांथ लग चुके थे। इस बीच बाढ़ के रहने वाले मेरे कुछ जानकारों से वहां मेरी मुलाकात हुई। वह ऐसे लोग थे, जिनसे एक पत्रकार होने के नाते में अपराध जगत की खबरें लिया करता था। उनसे बातचीत होने लगी।

इस बीच होटल के एक कर्मचारी ने हमारी बातों को सुना और बख्तियारपुर के तत्कालीन थाना प्रभारी मृत्युंजय कुमार को स्टिंग ऑपरेषन की सूचना दे दी। थोड़ी ही देर में मेरे साथ बैठे जानकारों ने मुझसे कहा कि यहां कुछ गड़बड़ है, अब यहां से निकलना होगा। षायद उन्हें यह भनक मिल चुकी थी कि अगर पुलिस को इस स्टिंग की जानकारी मिल गई, तो वे हमें छोड़ेंगे नहीं। चूंकि, मुझे ऑफिस से स्टिंग का निर्देष मिला था, इसलिए मैंने बेफिक्री दिखाई और वहीं बैठा रहा। लेकिन, मेरी यह बेफिक्री मेरे लिए घातक साबित हुई। बख्तियारपुर के तत्कालीन थाना प्रभारी मृत्युंजय कुमार पुलिस बल के साथ उसी होटल के समीप पहुंच गए। पहुंचते ही पूछताछ षुरू की। एक बात जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी कि आखिर पुलिस वालों की टेढ़ी नजर मुझपर ही क्यों टिकी है ? मैंने पुलिस को अपना परिचय दिया। बताया रजनीष नाम है और ऑफिस के काम से आया हूं।

इतना सुनते ही उन्होंने मेरे साथ मारपीट षुरू कर दी। मेरा मोबाइल और पर्स छीन लिया गया। पत्रकारिता छुड़ा देने की धमकी दी। मैंने उन्हें ऑफिस से बात कराने का निवेदन किया। लेकिन, मेरे पैरों के नीचे से जमीन उस वक्त खिसक गई जब मेरे ऑफिस से पुलिस को यह कहा गया कि हम तो रजनीष को जानते ही नहीं…। थाना प्रभारी ने मुझसे कहा कि सहारा वाले तो तुम्हें जानते ही नहीं….? अब कहो कैसी रही पत्रकारिता ? थाना प्रभारी के एक-एक षब्द मेरे कानों को चीरते ही सीधे दिल को जख्मी कर रहे थे। मुझसे सादे कागज पर जबरन दस्तखत लिया गया। मैं हतप्रद था। मेरे खिलाफ एफआईआर लिखी गई। कहा गया कि मैं लाल बत्ती गाड़ी में घूम रहा था। जबकि, जिस गाड़ी के बारे में कहानी बनाई गई न तो वह मेरी गाड़ी थी और न ही मैं उसके बारे में कुछ जानता था। यह मेरे लिए बेहद कठिन समय था। लेकिन, मुझे क्या मालूम था कि कठिन वक्त तो अभी बस षुरू ही हुआ था। कल तक जो साथी मुझसे फोन कर खबर पूछा करते थे, उन्होंने भी अपनी पूरी भड़ास निकाली।

दैनिक हिन्दुस्तान ने तो मुझे करोड़ों की रंगदारी मांगने वाला अपराधी और कुख्यात अपराधी नागा सिंह का रिष्तेदार तक साबित कर दिया। हद तो यह है कि खबर में ऐसे-ऐसे घिनौने आरोप लगाए गए जैसा पुलिस ने भी मुझपर नहीं लगाया था। हां, मैं मानता हूं कि अपराधी नागा सिंह मेरा दूर का रिष्तेदार है। तो क्या किसी अपराधी का दूर का रिष्तेदार भी अपराधी होता है ? अगर मैं करोड़ों रूपये की रंगदारी ही वसूलता तो क्या सहारा में 5 हजार की नौकरी करता ? क्या इस महंगाई के जमाने में भी मैं 1200 रूपये के किराए के मकान में रहता ? खैर, जिन्होंने ऐसा किया, उनसे तो खबरों को लेकर मेरी प्रतिद्वंदिता थी। लेकिन, सहारा ? सहारा ने तो यह भी मानने से इनकार कर दिया कि मैं उनका कर्मचारी हूं….। क्योंकि मैं स्ट्रिंगर था ? मेरी हाजिरी जिस रजिस्टर में थी उसे गायब क्यों कर दिया गया ?

इस घटना के बाद से आज तक मैं सहारा में अपनों से यह फरियाद करता आ रहा था कि मेरे दामन पर जो दाग लगा है, उसे हटाया जाए। आज तक मुझे बस भरोसा ही दिया जाता रहा। आज मजबूर होकर मैं यह खत यषवंत भाई को भेज रहा हूं। मैं इस पूरे पत्रकारिता जगत से और खासकर सहाराश्री से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं….।

क्या ईमानदारी से काम करने का यही अंजाम होता है ?

क्या किसी पर भरोसा करने का यही अंजाम होगा ?

क्या किसी अपराधी का रिष्तेदार भी अपराधी होता है ?

क्या करोड़ों रूपये की रंगदारी वसूलने वाला इस कदर गरीबी में रहेगा ?

क्या हिन्दुस्तान अखबार इस बात का जवाब देगा कि उसने मेरे खिलाफ ऐसी खबरें क्यों छापी जिसकी चर्चा तक एफआईआर में नहीं है ?

क्या सिर्फ आरोप लगने मात्र से कोई अपराधी हो जाता है ?

अगर हां, तो क्या सहाराश्री खुद को अपराधी मानते हैं ?

क्या सहाराश्री भी सभी पदों से इस्तीफा देंगे ?

रजनीश

पटना

09304316017

साठ लाख जिंदगियों के लिये नासूर बन गये हैं सुब्रत रॉय

नयी दिल्‍ली । भारतीय रेल के बाद दूसरा सबसे बड़ा नियोक्‍ता और मासूम लोगों के 20 हजार करोड रुपये हड़पने वाले सहारा सुप्रीमो सुब्रत रॉय आज 60 लाख जिंदगियों के लिये नासूर बने हुए हैं। सहारा में काम करने वाले कर्मचारियों को एक आदेश जारी किया गया है कि वो सुब्रत रॉय को तिहाड़ से बाहर निकालवाने के लिये पैसे एकत्र करें। सहारा में 12 लाख कर्मचारी काम करते हैं जिसमें 50 हजार फूल टाइमर है और 11 लाख 50 हजार कर्मचारी रीटेनर, एजेंट और फील्ड वर्कर हैं।

सहारा ने अपने कर्मचारियों को आदेश जारी किया है कि या तो वो सुब्रत रॉय को छुड़ाने के लिये पैसे जमा करे या फिर नौकरी छोड़ दें। नाम न प्र‍काशित करने की शर्त पर सहारा समूह के एक कर्मचारी ने बताया कि जो अधिकारी वर्ग के हैं उनसे एक लाख रुपये, उनसे नीचे वर्ग के कर्मचारियों से 25 हजार रुपये और आफिस ब्‍वॉय वर्ग के कर्मचारियों से 5 हजार रुपये वसूले जाएंगे। इस तरह कुल पांच हजार करोड़ रुपए जुटाए जाने है। यह रकम सहारायन ई-मल्टीपर्पज सोसायटी लिमिटेड के शेयरों के बदले जुटाने का प्रस्ताव है। कॉन्ट्रीब्यूशन करने वाले समूह के हर कर्मचारी को इस सोसायटी के शेयर दिए जाएंगे। सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि सहारा ने अपने कर्मचारियों को दो दिन पूर्व उन्‍हें एक नोटिस सौंपा गया है कि जिसमें साफ तौर पर लिखा है कि अनिश्चित काल के लिये सैलरी रोकी जा रही है।

उल्‍लेखनीय है कि सहारा समूह के मुखिया सुब्रत रॉय 4 मार्च से तिहाड़ जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने यह प्रस्ताव किया है कि रॉय को अंतरिम जमानत मिल सकती है, लेकिन इसके लिए समूह को 10 हजार करोड़ रुपये जमा कराने होंगे। इसमें से 5 हजार करोड़ रुपये की बैंक गारंटी होगी। कर्मचारियों का बिगड़ा बजट सहारा समूह ने ऐसे वक्‍त में अपने कर्मचारियों को पैसा जमा करने का आदेश जारी किया है जिस समय में स्‍कूल का फीस जमा करना होता है। सहारा के एक कर्मचारी ने बताया कि उसने अपने परिवार के साथ गर्मी की छुट्टी बीताने के लिये किसी पहाड़ी इलाके में जाने का प्‍लान कर रहे थे। मगर अचानक सैलरी रोके जाने और पैसा दान करने के से उनका बजट बिगड़ गया है। वहीं सहारा समूह इस मामले में एक अलग ही राग अलाप रही है। इस बारे में संपर्क करने पर सहारा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि पत्र सुब्रत रॉय या प्रबंधन की ओर से जारी नहीं हुआ है। यह मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर लोगों की भावनात्मक पहल है।

वेब पोर्टल वनइंडिया हिंदी पर प्रकाशित अंकुर कुमार का विश्लेषण.

देहरादून के ‘राजसत्ता एक्सप्रेस’ में संपादक बने डॉ. बर्तवाल

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार डॉ.वीरेंद्र बर्तवाल ने देहरादून में न्यूज ट्रेस्ट आफ इंडिया मीडिया ग्रुप ज्वाइन कर लिया है। एन.ट़ी.आई. ग्रुप के हिंदी ओर अंग्रेजी में दैनिक और साप्ताहिक समाचार पत्र के अलावा अतुल्य उत्तराखंड मासिक पत्रिका भी है। इस समूह में डॉ. बर्तवाल को राजसत्ता एक्सप्रेस में संपादक का दायित्व मिला है। डॉ. बर्तवाल डेढ़ दशक से अधिक समय से मीडिया में हैं।

वे मसूरी टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, अमर उजाला में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं। पिछले साल उन्होंने दैनिक जागरण देहरादून में वरिष्ठ उपसंपादक पद से इस्तीफा दिया था और लोकभाषा पर काम कर रहे थे। इस बीच उत्तराखंड लाइव में उत्तराखंड प्रमुख का दायित्व भी देखते रहे। वे एक विश्वविद्यालय में भाषा और पत्रकारिता विभाग में गेस्ट फैकल्टी में प्राध्यापक भी हैं।

पश्चिम बंगाल में मीडिया कर्मियों पर हमला, किसी की गिरफ्तारी नहीं

पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर शहर से खबर है कि प्रांतिका बस पड़ाव पर एक महिला मीडिया कर्मी का फोटो बस चालक ने मोबाइल में ले लिया. इसका विरोध करने पर बस कर्मियों ने मीडिया कर्मियों की पिटाई कर दी. इस संदर्भ में थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है. हालांकि पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है.

घटना के संदर्भ में बताया जाता है कि दुर्गापुर के एक स्थानीय न्यूज चैनल की महिला कर्मी बस से घर जा रही थी. उसी समय किसी तरह चालक ने उसका फोटो मोबाइल में ले लिया जिसका विरोध करने पर चालक व अन्य बस कर्मियों ने दु‌र्व्यवहार किया. जानकारी मिलने पर कई मीडिया कर्मी वहां पहुंचे एवं इस घटना का विरोध किया. तभी बस कर्मी एकजुट होकर मीडिया कर्मियों पर ही हमला कर दिया जिसमें तीन-चार लोगों को चोट भी आयी. आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग पर मीडिया कर्मियों ने ए-जोन फाड़ी का घेराव किया.

तेजपाल के समर्थन में क्‍यों उतर गए अनुराग कश्‍यप?

दिल्‍ली : फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप अब रेप के आरोपी तहलका के फाउंडर एडिटर तरुण तेजपाल का बचाव करने कूद पड़े हैं. अनुराग ने फेसबुक पर तेजपाल के पक्ष में लिखकर अपनी बात रखी है. उनके इस कदम से उनके समर्थकों में भी नाराजगी है, जबकि विरोधियों को मौका मिल गया है.  अनुराग ने फेसबुक पर लिखा कि मैंने सीसीटीवी फुटेज भी देखी है और इसमें वैसा कुछ भी नहीं है, जैसा वह लड़की तरुण तेजपाल के बारे में कह रही है.

जानी मानी पत्रिका तहलका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल पर अपनी जूनियर सहकर्मी पत्रकार से रेप का आरोप है. वे इसी मामले में जेल में बंद हैं. गोवा की पणजी फास्ट ट्रैक अदालत में मामले की सुनवाई होनी है. अनुराग के अचानक तेजपाल के समर्थन में उतरने को लेकर कयास लगा रहा है. हालांकि अभी तक यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया है कि कश्यप अचानक तरुण तेजपाल के समर्थन में क्यों उतर आए.

तेजपाल पर पिछले साल नवंबर में गोवा के एक पांच सितारा होटल की लिफ्ट में सहकर्मी महिला पत्रकार से बलात्कार, यौन उत्पीड़न और उसकी मर्यादा भंग करने का आरोप है. इसके बाद ही गोवा पुलिस ने उन्‍हें हिरासत में लिया था. शुरुआती जांच के बाद पुलिस ने उन्‍हें कोर्ट में पेश किया जहां से उन्‍हें जेल भेज दिया गया. वे अब भी जेल में ही बंद हैं.

महिला प्राचार्य से रंगदारी मांग रहे पांच मीडियाकर्मियों पर आपराधिक मामला दर्ज

मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले की ब्यावरा थाना पुलिस ने शासकीय बुनियादी प्राथमिक विधालय ब्यावरा की महिला प्राचार्य को धमका कर 25 हजार रुपए मांगने के आरोप में पांच मीडियाकर्मियों के खिलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज किया है।

पुलिस निरीक्षक अरविन्द सिंह तोमर के अनुसार महिला प्राचार्य मीना विजयवर्गीय के निवास के अंदर जबरन प्रवेश कर उनसे अडीबाजी कर 25 हजार रुपए मांगने के मामले में दैनिक भास्कर के राकेश भार्गव, पत्रिका के राजेश शर्मा(नेवली), आईबीसी24 के प्रमोद क्रांति, स्टेट न्यूज़ के अरुण सक्सेना, खबरों की आवाज के हरिशंकर चौरसिया पर पुलिस ने भारतीय दंड विधान की धारा 385, 451 और जाप्ता फौजदारी की धारा 147 में मामला दर्ज किया है पुलिस आरोपियों की तलाश कर रही है।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

सोनभद्र का सूचना विभाग बना लायज़निंग का अड्डा, दस साल से सूचना अधिकारी की तैनाती नहीं

सोनभद्र। एक दशक से जिला सूचना अधिकारी की नियुक्ति की बाट जोह रहा जिला सूचना विभाग, सोनभद्र इन दिनों जिले में तैनात अधिकारियों की कारगुजारियों को छिपाने में मशगूल है। इनमें मजदूरों की हत्या तक के मामले शामिल हैं। ऐसे ही एक मामले का खुलासा दैनिक जागरण ने बुधवार को किया।

 
अखबार के मुताबिक, रॉबर्ट्सगंज मंडी समिति में तैनात मंडी इंस्पेक्टर राम प्यारे के भवन का निर्माण छपका में रॉबर्ट्सगंज ब्लॉक कार्यालय और विद्युत ट्रांसमिशन उपकेंद्र के बीच स्थित जमीन पर हो रहा था। इसी दौरान सरिया ले जाते समय तीन मजदूर हाइटेंशन तार की चपेट में आ गए। इसमें एक मजदूर की मौत हो गई जबकि दो गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को उपचार के लिए वाराणसी भेज दिया गया जबकि मृतक मजदूर के शव को गायब कर दिया गया। इस खबर को दबाने के लिए राम प्यारे ने जिला सूचना विभाग में कार्यरत एक कर्मचारी की मदद ली। उस कर्मचारी ने इसके लिए कोशिश भी की। हालांकि उसकी कोशिश कामयाब नहीं हो पाई।  

अखबार ने अपने वाराणसी संस्करण के सोनभद्र जागरण पेज (पेज-3) पर "मजदूर की मौत, शव को लगाया ठिकाने" शीर्षक से खबर प्रकाशित की है जिसमें संवाददाता ने स्पष्ट लिखा है कि मजदूर की मौत के लिए जिम्मेदार मंडी इंस्पेक्टर राम प्यारे खबर का प्रकाशन रुकवाने के लिए सूचना विभाग के एक कर्मचारी से पैरवी कराने में भी पीछे नहीं रहे। इससे स्पष्ट है कि जिला सूचना विभाग में तैनात कर्मचारी ने मंडी इंस्पेक्टर राम प्यारे की करतूतों को छिपाने के लिए पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिश की। हालांकि उसकी कोशिश दैनिक जागरण के संवाददाता की दृढ़ता के आगे बेकार हो गई। संभावना है कि उसने अन्य अखबारों के संवाददाताओं को भी प्रभावित करने की कोशिश की थी जिसमें उसे सफलता मिल गई।

ऐसा हो भी क्यों नहीं। सोनभद्र में जिला सूचना अधिकारी का पद करीब एक दशक से खाली है और वर्तमान में अपर जिलाधिकारी मनीलाल यादव के पास जिला सूचना अधिकारी का प्रभार है। इसके अलावा वे बतौर सचिव, शक्तिनगर विकास प्राधिकरण (साडा), सोनभद्र का भी कार्य कर रहे हैं। साथ ही वह जिले में हो रहे खनन के कार्यों के प्रभारी भी हैं। इसके अलावा उन्हें जिला प्रशासन के विभिन्न कार्यों का संपादन भी करना होता है। इन हालातों में वह जिला सूचना विभाग में व्याप्त अनियमितताओं पर ध्यान नहीं दे पाते। इसका फायदा उठाकर विभाग में कार्यरत एक कर्मचारी जिले में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ लाइजनिंग के कार्यों को अंजाम देता है।

वैसे इस विभाग में ऐसा हो भी क्यों नहीं जब पूरे विभाग का दारोमदार एक उर्दू अनुवादक-सह-लिपिक के कंधों पर टिका हो। ईमानदारी से पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों के साथ अभद्रता करना जिला सूचना विभाग में तैनात कर्मचारियों का शगल बन गया है क्योंकि पत्रकारों को हारकर अपने कार्यों के लिए उन्हीं से बात करनी पड़ती है। प्रभारी जिला सूचना अधिकारी कभी भी कार्यालय में बैठे नहीं मिलते। इसका फायदा उठाकर वहां तैनात कर्मचारी पत्रकारों से बार-बार बदततमिजी करते नजर आते हैं। कुछ दिनों पहले पूर्व जिलाधिकारी नरेंद्र सिंह पटेल पत्रकार वार्ता कर रहे थे। एक पत्रकार ने जब उनसे सवाल पूछने की कोशिश की तो उर्दू अनुवादक-सह-लिपिक ने उस पत्रकार को रोकने की कोशिश की। पत्रकार द्वारा इसका विरोध किए जाने के बाद भी वह नहीं माना। जब एडीएम ने उसे डांटा तो वह शांत हुआ।

सूत्रों की मानें तो विभाग में कार्यरत एक कर्मचारी ने कुछ ऐसे पत्रकारों को मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा दिला दिया है जो मानकों को पूरा नहीं करते। अगर उनके दस्तावेजों की जांच करा दी जाए तो उसमें अधिकतर के दस्तावेज फर्जी मिलेंगे।

खबरः मजदूर की मौत, शव को लगाया ठिकाने

सोनभद्र : घटना दो दिन पुरानी है लेकिन चौकाने वाली है। राबर्ट्सगंज मंडी समिति में तैनात मंडी इंस्पेक्टर के भवन निर्माण के दौरान हाईटेंशन तार की चपेट में आने से दम तोड़ने वाले मजदूर के शव को ठिकाने लगा दिया गया। हादसे में घायल दो अन्य मजदूरों का उपचार वाराणसी में चल रहा है। मामले का खुलासा सोमवार की देर शाम हुआ तो लोग चौंक गए।

छपका स्थित राबर्ट्सगंज सदर ब्लॉक कार्यालय व ट्रांसमिशन उपकेंद्र के बीच मंडी इंस्पेक्टर का मकान बन रहा है। जिस स्थान पर भवन का निर्माण हो रहा, ठीक उसी के ऊपर से हाईटेंशन तार गुजरा है। घटना रविवार को तीसरे पहर तीन बजे की है। दुद्धी के किसी गांव से काम करने आए श्रमिकों में तीन मजदूर सरिया ऊपर पहुंचा रहे थे। सरिया चढ़ाते समय हाईटेंशन तार की चपेट में आ गए। सूत्रों ने बताया कि गंभीर रूप से झुलसे एक मजदूर की घटनास्थल पर ही मौत हो गई जबकि दो अन्य झुलस गए। हैरत की बात तो यह कि मंडी इंस्पेक्टर ने इस मामले पर पर्दा डाल दिया। पड़ोसियों के मौके पर पहुंचने से पहले ही शव को घटनास्थल से हटा दिया गया। इतना ही नहीं, घायलों का जिला अस्पताल में प्राथमिक उपचार कराने की बजाय उन्हें वाराणसी पहुंचा दिया गया ताकि किसी को इसकी भनक भी न हो।

नाम न छापने के अनुरोध के साथ एक पड़ोसी ने बताया कि घटना के बाद वह मौके पर पहुंचे थे लेकिन मंडी इंस्पेक्टर यह कहकर उस मजदूर को वाहन में रखकर ले गए कि अचेत हो गया है। हैरत की बात तो यह कि घटना के बाद दुद्धी क्षेत्र के इन मजदूरों को काम से ही हटा दिया गया ताकि पोल न खुल सके। कोन इलाके के मजदूरों से अब काम कराया जा रहा है। मंडी इंस्पेक्टर रामप्यारे यह कहकर मामले को टालते रहे कि वह जिले से बाहर हैं और आने पर ही कुछ बता सकते हैं। खबर प्रकाशित न हो, इसके लिए सूचना विभाग के एक कर्मचारी से पैरवी कराने में भी पीछे नहीं रहे।

बिना नक्शा बन रहा भवन

हादसे के बाद परत दर परत विभागों की पोल भी खुलने लगी है। छपका में बन रहे मंडी इंस्पेक्टर के भवन का मास्टर प्लान से नक्शा पास नहीं कराया गया है। इस बात की पुष्टि मास्टर प्लान के अवर अभियंता एबी सिंह ने भी की। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले वह निर्माणाधीन भवन पर गए थे। काम करने वाले मजदूरों से भवन मालिक का नाम पूछा लेकिन किसी ने नहीं बताया। जेई से जब यह पूछा गया कि एक तल्ला मकान बनकर तैयार हो गया है तो वह बस इतना ही कह सके कि दो अप्रैल को काम बंद कराने के साथ ही निर्माणाधीन भवन मालिक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जाएगी।

उपजिलाधिकारी सदर राजेंद्र तिवारी को जब घटना की जानकारी हुई तो वह हैरत में पड़ गए। उन्होंने बताया कि मामले की जांच कराई जाएगी। मंडी इंस्पेक्टर आरोपी मिले तो कार्रवाई होगी। इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि बिना नक्शा बन रहे भवन का निर्माण कार्य रोक दिया जाएगा और भूमि मालिक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जाएगी।

 

सोनभद्र से शिवदास प्रजापति की रिपोर्ट। संपर्कः thepublicleader@gmail.com

शूद्र मोदी का उभार हुआ तो सारे नालायक ओबीसी दलित नेताओं की खटिया खड़ी हो जाएगी

चुनावी समर की शुरुआत हो चुकी है। भारत की महान जनता सोलहवीं लोकसभा के गठन के लिए तय तारीखों पर अपने वोट डालेगी। हर चुनाव की कुछ न कुछ खासियत होती है। लेकिन यह चुनाव, जैसा कि अनुमान है, अपने नतीजों को लेकर लंबे अरसे तक जाना जाएगा और उम्मीद यह भी है कि यह भारत की भावी राजनीति का प्रस्थान बिंदु बनेगा। अर्थात् कई दृष्टियों से यह चुनाव ऐतिहासिक महत्व का होगा। परंपरानुसार, हम अपने वोट का दान करते हैं-मतदान। इसका इस्तेमाल हम हथियार या औजार की तरह कुछ गढ़ने या संघर्ष करने के लिए नहीं करते। शायद ऐसा इसलिए भी है कि हमारा समाज और लोकतंत्र आज भी मध्ययुगीन या उससे भी प्राचीन जमाने की मानसिकता में पल-बढ़ रहा है।

लेकिन मेरा आग्रह होगा भारत की जनता अपने वोट का इस्तेमाल हथियार और औजार की तरह करे। खासकर उस जनता को तो मैं सीधे-सीधे संबोधित करना चाहूंगा, जो भारत का शोषित, उत्पीड़ित समुदाय है, जिसे बुद्ध ने बहुजन और फुले ने बलिजन कहा था, क्योंकि सुशासन की सबसे ज्यादा दरकार उन्हें ही है। तमाम सरकारों और  पूरी व्यवस्था ने उनका केवल शोषण-दोहन किया। लोकतांत्रिक सभ्यता और आर्थिक विकास का पूरा ढांचा, उनके कंधों पर टिका हुआ है, लेकिन दुर्भाग्य से वह उस सभ्यता और व्यवस्था के हिस्सा नहीं बन सके हैं। वह 'अन्य' बने हुए हैं।

मित्रों, पिछले दो दशकों से अधिक से न केवल वैचारिक या बौद्धिक स्तर पर, अपितु व्यावहारिक स्तर पर भी मैंने दलगत राजनीतिक प्रक्रियाओं को उसके भीतर शामिल होकर देखा-समझा है और सब मिलाकर यही कह सकता हूं कि बहुजन तबके को नए सिरे से सोचने-विचारने की जरूरत है। हकीकत यही है कि भारत के श्रमिक, किसान और दस्तकार, जिनमें से अधिकांश दलित, ओबीसी व आदिवासी हैं या तो राजनीति के हाशिए पर जा चुके हैं, या फिर उसके एजेंडे से उतर चुके हैं। उनके नेताओं ने उनके साथ धोखा किया है, फरेब किया है और इन सबका चेहरा उन ताकतों से ज्यादा कुत्सित है, जो हमारे वर्गशत्रु हैं। शायद बहुत विस्तार से बात करने की गुंजाइश नहीं है इसलिए मैं संक्षेप में अपनी बात रखना चाहूंगा। मैं आपका ध्यान सीधे-सीधे मुल्क की मौजूदा राजनीतिक स्थितियों की ओर खींचना चाहूंगा।

वर्तमान स्थिति

पिछले दस सालों से राज कर रही यूपीए सरकार, उसके मुखिया मनमोहन सिंह और उनकी पार्टी कांग्रेस ने चुनाव के पूर्व ही मानो पराजय स्वीकार कर ली है। उनके कार्यकलाप और बोली-बानी यही संकेत देते हैं। दूसरी तरफ, भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी लगातार आक्रामक हुए जा रहे हैं। चुनावी सर्वेक्षणों और मीडिया ने मिल-जुलकर उनको बहुत आगे कर दिया है और इसके परिणामस्वरुप अश्वमेध पर निकले नरेंद्र मोदी की धज से चुनाव के पूर्व ही शासकीय दंभ टपकने लगा है। कुछ प्रांतीय पार्टियों और बचे-खुचे वामदलों ने तीसरे फ्रंट की एक कमजोर कवायद भी शुरू की है, जो सतमासे बच्चे की तरह पॉलिटिकल क्लिनिक के इनक्यूबेटर में येन-केन सांसें गिन रहा है।

मैं नहीं समझता भारत की जनता इस फ्रंट को गंभीरता से ले रही है। यह अपने ही प्रांतों में घुट रहे राजनेताओं का एक अखिल भारतीय संगठन जैसा है। 1940 के दशक में भारतीय रजवाड़ी ताकतों (देशी रियासतों) ने ऐसा ही एक संगठन बनाया था। दरअसल, तथाकथित तीसरा मोर्चा सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक तत्वों पर टिका हुआ है। उसका एक हिस्सा जो स्वयं को लेफ्ट कहता है (जिसमें मुलायम सिंह भी अपने को शामिल मानते हैं) भाजपा के तो विरुद्ध हैं, लेकिन कांग्रेस की केवल कुछ नीतियों से ही उनकी असहमति है। दूसरा हिस्सा, जिसमें शरद यादव व नीतीश कुमार जैसे लोग हैं, भाजपा के नहीं नरेंद्र मोदी के खिलाफ हैं, उनका भी कांगेस से आंशिक ही विरोध है। तो सब मिलाकर तीसरा मोर्चा एंटी-भाजपा कम एंटी-नरेंद्र मोदी ज्यादा है और यही उसकी एकता का आधार है।  

यूपीए की वैचारिकी में भी भाजपा और नरेंद्र मोदी का विरोध ही केंद्रीय तत्व है। अन्यथा कांग्रेस, उसके सहयोगी दलों और भाजपा की आर्थिक-सामाजिक नीतियों में कोई अंतर नहीं है। धर्मनिरपेक्षता तो एक नकाब है जिससे अपने कुत्सित चेहरे को इन लोगों ने छुपा रखा है। आप जरा कल्पना करके देखिए कि यदि इस देश में मुसलमानों की संख्या पंद्रह करोड़ की बजाय ईसाईयों या सिखों के बराबर होती तो थर्ड फ्रंट या यूपीए की वैचारिकी का क्या होता। मोहम्मद अली जिन्ना गलत नहीं कहते थे कि भारत का सेकुलर स्वरूप वहां के मुसलमानों की अच्छी-खासी मौजूदगी के कारण होगा। इसी आधार पर वे पाकिस्तान में भी हिंदुओं की अच्छी-खासी मौजूदगी चाहते थे ताकि पाकिस्तान का भी सेकुलर राजनीतिक ढांचा बना रहे।

दुर्भाग्यपूर्ण यह था कि इतने समझदार जिन्ना साहब को तब पाकिस्तान का फितूर ही क्यों दिमाग में आया था। यदि खंडित भारत के मुसलमान मोदी जैसे सांप्रदायिक सोच वालों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं तो संयुक्त भारत के मुसलमान मोदी जैसों की राजनीति असंभव कर सकते थे। तब भारत के राजनेता सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर विमर्श करने के लिए मजबूर रहते। लेकिन आज तो नरेंद्र मोदी की ताकत बढ़ रही है। इसके विपरीत कांग्रेस और उनके अन्य विरोधी लगातार कमजोर होते दिख रहे हैं। इसके कारणों पर विमर्श किया गया तो तथाकथित सेकुलर ताकतें मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगी।

धर्मनिरपेक्षता के संकट की जड़

आजादी के बाद से मुसलमानों की इतनी बड़ी आबादी को अल्पसंख्यक बता-बताकर उनमें असुरक्षा के भाव पैदा किए गए और उनका लगातार शोषण किया गया। एक साजिश के तहत सांस्कृतिक संपोषण की आड़ में उन्हें मजहबी शिक्षा और संस्कारों से बांधे रखा गया। नतीजतन वे विकास की दौड़ में पिछड़ गए। ऐसा कुलीन (अशरफ) मुसलमानों की देखरेख में हुआ, जिनके बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं और अंग्रेजी छांटते हैं।  पिछड़े (पसमांदा) मुसलमानों के बच्चों को वैसे ही मदरसों के भरोसे छोड़ा गया जैसे हिंदू दलित, पिछड़े बच्चों को बदतर सरकारी स्कूलों के भरोसे। ऐसा क्यों हुआ ? ऐसा करने से आम, पिछड़े मुसलमानों को मध्ययुगीन बनाए रखना आसान हुआ और इसी सेाच के आधार पर अशराफ (ऊंची जाति) मुसलमानों का वर्चस्व उन पर बना रह सकता था। यह काम भारत की सेकुलर ताकतों ने बखूबी किया।

इसलिए बहुजन तबके से मेरा आग्रह होगा कि सेकुलरिज्म के ब्राह्मणवादी अथवा कुलीन पाठ के मुकाबले एक बहुजन पाठ विकसित करें। कबीर और फुले की तरह। कांग्रेस और तथाकथित थर्ड फ्रंट का सेकुलर पाठ न केवल दकियानूसी बल्कि खतरनाक भी है। बहुजन ताकतों को इसे खारिज करना चाहिए।

किस तरह के ओबीसी हैं मोदी?

लेकिन हम नरेंद्र मोदी का क्या करें। कोई दो साल पहले मैंने बताया था कि भाजपा अब ओबीसी कार्ड खेल सकती है। मैंने यह भी बताया था कि इसमें भाजपा को आशातीत सफलता मिलेगी। तब हमारे मित्रों ने मेरा मजाक बनाया था। आज उनको सब कुछ दिख रहा होगा। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह जोर-शोर से अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार को पिछड़ा, चायवाले का बेटा बता रहे हैं। नरेंद्र मोदी कभी गर्व से अपने को हिंदू कहते थे, आज छाती पीट-पीट कर स्वयं को पिछड़ा कह रहे हैं। भाजपा और नरेंद्र मोदी मंडल दौर में क्या कर रहे थे? आप इनसे पूछिए तो जरा कि नरेंद्र मोदी जी, जब हम लाठियां और गोलियां खा रहे थे, तब तो आप हमारे विरोध में निकले आडवाणी की सोमनाथ यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे, उनकी आरती उतार रहे थे, अपने को हिंदू बता रहे थे। आज वे हिंदू से पिछड़ा में कैसे रुपांतरित हो गए?

कई लोगों ने मुझसे पूछा कि नरेंद्र मोदी की ताकत का राज क्या है? एक अदना आदमी भी बता सकता है कि मोदी, आडवाणी, राजनाथ सिंह, जोशी, सुषमा और जेटली जैसे नेताओं से अलग हैं तो केवल इसलिए कि वे पिछड़े वर्ग के हैं। यही उनकी ताकत है। लेकिन पाखंड भी यही है। मैंने पहले ही बताया है कि मनु स्वयं तो ब्राह्मण नहीं था, लेकिन उसने ब्राह्मणवाद की संहिता तैयार की। जब भी ब्राह्मणों के हाथ से सत्ताधिकार छिटकने लगता है, तब वह अपने हितों की सुरक्षा के लिए उन शक्तियों का पृष्ठपोषण करता है जो उनके हितों की सुरक्षा कर सके। क्षत्रिय मनु ने एक समय यह काम किया था, आज एक शूद्र और कानून की भाषा में ओबीसी नरेंद्र मोदी यह काम करेंगे लेकिन वह भारतीय राजनीति की बहुजन पटकथा का निर्देशन नहीं करेंगे, उसके ब्राह्मणवादी पाठ का करेंगे।

इस पटकथा को नागपुर पीठ में तैयार किया गया है, आम्बेडकर की दीक्षाभूमि में नहीं बल्कि आरएसएस के मुख्यालय में। रामविलास पासवान, रामदास अठावले और उदित राज जैसी कठपुतलियां वहां डांस करेंगी। अन्य ओबीसी नेता भी करतब दिखाएंगे और इसी डांस पर रीझ कर आप अपनी आत्मा उड़ेल देंगे। आप अपना वोट ब्राह्मणवाद के नए पिछड़ावतार नरेंद्र मोदी की मायावी झोली में डाल देंगे, जो स्वयं जादूगरों सा धज बनाए पूरे देश में घूम-घूम कर अपने पिछड़ा होने का उद्घोष कर रहे हैं। इस बार बलिराजा नहीं, उनका बहुजन समाज ही ब्राह्मणवाद की जादुई डोरियों में बांधा जाएगा।

नरेंद्र मोदी के उभार का अंदाज हिटलर की तरह का ही है। वह भी जनतंत्र की सीढिय़ों पर चढ़कर ही आया था। उसने भी अपनी गरीबी और मोची परिवार में जन्म की बात को खूब उछाला था। कभी लालू प्रसाद अपनी मां के दही बेचने की बात उछालते थे, आज नरेंद्र मोदी अपने पिता के चाय बेचने की बात उछाल रहे हैं। लेकिन हिटलर ने सत्ता में आकर समता के आदर्श को नहीं, उस नित्शेवाद को पकड़ा जो सामाजिक न्याय की जगह सामाजिक वर्चस्ववाद की वकालत करता है। इसी वर्चस्ववाद का भारतीय संस्करण ब्राह्मणवाद है। अब एक शूद्र मोदी इस वर्चस्ववाद का गुजराती पाठ पूरे देश में लागू करेंगे। विकास की राजनीति इसी की अनुमति देती है प्रिय बहुजन मतदाताओं।

तो मेरे प्यारे बहुजन साथियो, आप क्या करेंगे? मैं आपकी पीड़ा समझता हूं। आप यही कहना चाहेंगे कि हम तो इन मुलायम सिंहों, लालू प्रसादों, मायावतियों और नीतीश कुमारों से भी वैसे ही तबाह हैं। आप की बात बिल्कुल सही है। इन सबको आप धर्मनिरपेक्ष या सेकुलर ताकतें मान रहे थे लेकिन ये सब के सब धर्महीन अथवा अधम ताकते हैं। याद रखिए, धर्मनिरपेक्ष और अधम ताकतें अलग-अलग होती हैं। झूठ, फरेब, घोटाले और कुनबावाद की अनैतिकता में आपादमस्तक डूबे ये लोग बहुजन राजनीति के नायक नहीं बन सकते। इनकी वैचारिक जड़ें फुले-आम्बेडकरवाद में नहीं, गांधी-सावरकरवाद और अब तो उससे भी बढ़कर स्वार्थवाद में धंसी हैं। ये सब प्रच्छन्न ब्राह्मणवादी हैं और गहरे अनैतिक भी। इनकी कारगुजारियों के कारण ही भाजपा का लगातार विस्तार हो रहा है।

इन सबका अतीत चाहे जैसा हो वर्तमान इतना गलीज है कि नरेंद्र मोदी इनके मुकाबले धवल दिखता है। यह भी सच है कि एक बार यदि नरेंद्र मोदी का उभार हो गया तब सामाजिक न्याय और सेकुलरवाद का साइनबोर्ड लगाए इन सारे नालायक ओबीसी दलित नेताओं की खटिया हमेशा-हमेशा के लिए खड़ी हो जाएगी। इनका अंत हृदयविदारक होगा। इनमें से ज्यादातर का अंत तो जेल की काल-कोठरियों में होगा।

तब ऐसे में हम क्या करें? हमारा आग्रह होगा कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य का बारीकी से अध्ययन करें। किसी भी स्थिति में भ्रष्ट, अनैतिक और लंपट उम्मीदवारों को अपना समर्थन नहीं दें। वोट में हिस्सा जरूर लें लेकिन उसका इस्तेमाल ऐसे करें जिससे संसदीय राजनीति में विमर्श की गुंजाइश बनी रहे और उसके लोकतांत्रिक आवेग कमजोर न हों।

 

(प्रेमकुमार मणि हिंदी के प्रतिनिधि लेखक, चिंतक व सामाजिक न्‍याय के पक्षधर राजनीतिकर्मी हैं। इन दिनों वे राष्‍ट्रीय जनता दल के उपाध्‍यक्ष हैं। उनका उपरोक्‍त लेख फारवर्ड प्रेस के (चुनाव विशेषांक) अप्रैल, 2014 में प्रकाशित हुआ है।)

पिंकसिटी के पत्रकारों ने पेपर लैस चुनाव जरिए जनता को दिया संदेश

पिंकसिटी प्रेस क्‍लब जयपुर के हाल ही हुए चुनावों में पत्रकारों ने जनता को एक संदेश भी दिया है। क्‍लब की प्रबंध कार्यकारिणी के 15 पदों के लिए हुआ चुनाव पूरी तर‍ह पेपर लैस रहा। इस पूरे चुनाव में प्रत्‍याशियों की तरफ से पोस्‍टर, बैनर, पम्‍पलैट और पर्चो का कोई उपयोग नहीं किया गया। प्रत्‍याशियों ने केवल फोन, मोबाईल और सोशल मीडिया के जरिए ही मतदाताओं से वोट देने की अपील की थी। इस चुनाव प्रक्रिया में जो सुधार किया गया, उनकी चहुंओर तारीफ हो रही है। गुलाबी नगर के अनेक संगठनों ने प्रक्रिया में सुधार की तारीफ करते हुए उसे अपनाने की बात कही है।

पिंकसिटी प्रेस क्‍लब के चुनावों में एक आदर्श आचार संहिता बनाई गई थी। इसके तहत चुनाव प्रचार में पोस्‍टर, बैनर, पम्‍पलैट और पर्चो पर पूरी पांबदी थी। इसका पूरा पालन भी हुआ। इसमें प्रत्‍याशियों का भी सहयोग रहा। इसका श्रेय मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी श्री एलएल शर्मा को जाता है। श्री शर्मा इस क्‍लब के चार बार अध्‍यक्ष रह चुके हैं और दूसरी बार मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी नियुक्‍त किए गए थे। चुनाव के लिए श्री शर्मा ने आदर्श आचार संहिता बनाई और उसका पालन कराने के लिए काफी सख्‍त भी रहे। कडे फैसले लेने और अपने अक्ख़ड व्‍यवहार को लेकर चर्चा में रहने वाले एलएल शर्मा पूरी तरह ठेठ गांव के है।  

एलएल शर्मा करीब 25 साल से दैनिक नवज्‍योति अखबार में है और अभी मुख्‍य संवाददाता के पद पर काम कर रहे हैं। पेपर लैस चुनाव के संबंध में उनका कहना है कि चुनावों में पोस्‍टर, बैनर, पम्‍पलैट और पर्चो पर भारी खर्चा किया जाता है। इससे प्रत्‍याशियों पर आर्थिक भार भी पड़ता है। इसके साथ ही दीवारे खराब की जाती है और कागज का दुरुपयोग होता है। मतदान केन्‍द्र के आसपास कागजों के ढेर लग जाते हैं, जिन्‍हें जानवर खाते रहते है। इन सभी तथ्‍यों के मद्देनजर आदर्श आचार संहिता बनाई गई और उसका पालन भी हुआ।
 

हाय यूपी, हाय गरीबीः पांच रूपए खर्च करने पर पत्नी को मार डाला

यूपी का भगवान ही मालिक है। नेता-अफसर दिनरात मालामाल होते जा रहे हैं और आम आदमी गरीबी और मुफलिसी का शिकार। यहां आमदनी अठन्नी, खर्चा रूपैया की हालत है। सरकारी फाइलों में गरीबों के लिए कई योजनाएं दौड़ रही हैं। हुक्मरान उसी कागजी आंकड़ों को उपलब्धि मान इतरा रहे हैं, बलखा रहे हैं। यूपी में आखिर यह कैसा समाजवाद है जहां गरीब मर रहे हैं और अफसर-नेता गरीबों का हक मार करोड़ों से खेलते, जमुहाई लेते तोंद पर हाथ फेर रहे हैं। नेताओं पर लक्ष्मी की कृपा बरस रही है। मुट्ठीभर नेता सैकड़ों नहीं हजार-हजार करोड़ रूपए के मालिक बन बैठे हैं।

कभी उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश का नारा देने वाली इसी समाजवादी सरकार के कार्य कौशल का नतीजा है कि एक व्यक्ति के लिए महज पांच रूपया इतना ज्यादा कीमती हो जाता है कि वह अपनी पत्नी को मार डालता है।

राजा महराजाओं की रियासत वाली अवध की नगरी प्रतापगढ़ में 31 मार्च को हैवानियत की हद पार हो गई। कुछ साल पहले जिस आदमी ने सात फेरे लेकर युवती से पूरा जीवन साथ निभाने का वादा किया था। उसी ‘पतिदेव’ ने पांच रूपए के लिए अपनी जीवनसंगिनी को पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया। मृतका का नाम राधा और हत्या के आरोपी का नाम द्वारिका है। द्वारिका द्वारा राधा की जान ले लेने की वजह केवल इतनी है कि नवरात्र का व्रत रखने वाली राधा के घर चायपत्ती नहीं थी।
 
प्रतापगढ़ जनपद के सांगीपुर थाना क्षेत्र के पूरब देउम गांव का रहने वाला द्वारिका प्रसाद तिवारी अपने पड़ोसी गांव से दावत खाने के बाद घर लौटा। पत्नी ने घर में पैसा न होने पर पति की जेब से पांच रूपए निकाल कर आठ वर्षीय बेटे सोनू को गांव की दुकान भेज चायपत्ती मंगा ली। सोनू चायपत्ती लेकर लौटा तो द्वारिका ने सोनू को पीटना शुरू कर दिया। राधा के यह बताने पर कि उसी ने सोनू को चायपत्ती लेने के लिए आपकी जेब से मैने ही पैसा देकर चायपत्ती मंगाई है। हैवान बने द्वारिका ने राधा को इतना ज्यादा पीटा कि उसने दम तोड़ दिया। पूरब देउम गांव के लोगों ने मृतका के मायके सूचना दी। मामूली बात को लेकर बहन को मार डालने वाली घटना की जानकारी पाकर युवती के भाई रमापति मिश्र हतप्रभ रह गए। वे सब रोते बिलखते घटनास्थल पर पहुंचे। सांगीपुर थाने की पुलिस ने मामले की रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी को जेल भेज दिया है।

 

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट। संपर्कः-09565694757
 

क्या वोट डालने भर से हमें बेहतर जिंदगी, वास्तविक आजादी मिल जायेगी?

16वीं लोकसभा के चुनावों की घोषणा हो चुकी है। सभी पार्टियां अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर गयी है। चुनाव आयोग ने भी अपनी कमर कास ली है "आदर्श" आचार संहिता के नाम पर। जनता को वोट डालने के लिए समझाया जा रहा है ताकि "महान" लोकतंत्र की गरिमा को बचाया जा सके। जनता को बताया जा रहा है कि कैसे उनका एक वोट देश कि तस्वीर बदल सकती है? कैसे उनका एक वोट उनके पसंद का नेता चुन सकती है? कैसे उनका एक वोट उसके सरे समस्याओं का हल कर सकती है? और जनता को ये भी समझाया जा रहा है कि कैसे उनके वोट नहीं डालने से इस "महान" लोकतंत्र पर दाग लग सकता है और दुनिया के सबसे "बड़े" लोकतंत्र की बेइज्जती हो सकती है?

जनता को ये भी समझाया जा रहा है कि उनके वोट नहीं डालने के कारण ही देश में इतनी सारी समस्याएं है यानि कि वोट नहीं डालने वाले ही देश के "विकास" में सबसे बड़ी बाधा है और वोट का बहिष्कार करनेवाले तो देश के "आतंरिक" सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा है। 15वीं लोकसभा चुनाव में भी मात्र 59% लोगों ने ही मतदान किया था, इस बात को ध्यान में रखते हुए इस बार चुनाव आयोग कह रहा है कि इस बार अगर कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं हैं तो "नोटा" पर वोट कीजिये, अब ये बात तो सबको मालूम हो चूका है कि "नोटा विकल्प" एक "थोथा विकल्प" है, ये विकल्प सिर्फ वोट के बहिष्कार करनेवाले लोगों के गुस्सा को शांत करके "महान" लोकतंत्र के "महापर्व" में हिस्सेदार बनाने के लिए है।

अब जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है तो सभी पार्टियों ने अपने एजेण्डे तय कर लिए हैं, दुनिया के सबसे अधिक अशिक्षित, सबसे अधिक बेरोजगार और सबसे अधिक कुपोषण का दंश झेल रहे देश में ये प्रमुख एजेंडे सभी पार्टियों ने सिरे से गायब कर दिया हैं। 10 साल से सरकार चला रही कांग्रेस अपने कार्यकाल में किये गए कार्यों के लिए वोट मांग रही है तो वहीँ भाजपा सभी समस्याओं का हल "नरभक्षी " नरेंद्र मोदी को सत्ता में बैठने को बता रही है। अगर कांग्रेस के 10 साल के कार्यकाल को देखा जाये तो जितने घोटाले यूपीए 2 की सरकार में हुए, उतने घोटाले 62 साल में नहीं हुए होंगे। ऐतिहासिक घोटालों की सरकार ने बड़े पूंजीपतियों के लिए लूट के द्वार पूरी तरह से खोल दिए हैं।

उदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण की नीतियों ने अमीर को और अमीर बनाया तो वहीँ गरीब को और गरीब। बेतहाशा बढ़ती मंहगाई ने आम लोगो के थाली से अनाज गायब कर दिया है। एक तरफ मंहगाई लगातार बढ़ रही है तो वही दूसरी तरफ किसानों के अनाज की कीमतें घट रही है, किसानों को अपने अनाज का समुचित मूल्य नहीं मिल पाता, जिस कारण किसानों की दर्द विदारक आत्महत्या की ख़बरें दिल को को दहला रही है। अपने 10 साल के शासनकाल में कांग्रेस ने अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है, पुरे मध्य भारत में, बिहार झारखण्ड और जिस भी राज्य के जंगलों में खनिज पदार्थ की बहुलता है, उसे पूंजीपतियों को औने-पौने दाम में सौंपने के लिए आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकार से वंचित करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी है।

इसका विरोध करने वालों के खिलाफ कभी सलवा-जुडूम तो कभी ऑपरेशन ग्रीन हंट तो कभी सेंदरा जैसे अभियान चलाकर आदिवासियों को अपने में ही लड़ने की घृणित चल चल रही है। इन जन विरोधी अभियानों के जरिये सैकड़ों घरों को जलाया गया, हजारों आंदोलनकारियों को गोलियों से भून डाला गया लेकिन फिर भी आंदोलन की आग लगातार बढ़ती ही जा रही है। अब सरकार ने देश की सुरक्षा के लिए इसे सबसे बड़ा खतरा करार दिया। जिन सरकार के शासनकाल के दौरान किये गए "कुकर्मों" की फेहरिस्त इतनी लम्बी हो, आखिर उसे फिर जनता के सामने अपने चेहरे को ले जाने में शर्म नहीं आती? जो भाजपा, मोदी का नाम लेकर चुनाव की बैतरणी पर करना चाहती है और वो जिस गुजरात मॉडल की बात करता है, आखिर हम कैसे भूल सकते हैं कि इसे मोदी के नेतृतव में 2002 में हजारों मुसलमानों को मौत के घट उतार दिया गया था? हम कैसे भूल सकते हैं कि देश में सबसे अधिक कुपोषण अगर कहीं हैं तो वो गुजरात में है? हम कैसे भूल सकते हैं कि ये मोदी उसी "संघ" के दुलारे हैं, जिनकी अघोषित निति देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने का है? क्या हम एक फासिस्ट, दंगाई और अल्पसंख्यकों के दुश्मन के हाथ में देश कि सत्ता सौंपेंगे?

इन दोनों से अलग होने का दावा करनेवाली केजरीवाल की पार्टी "आप" ने भी अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इस पार्टी की अपनी कोई विचारधारा नहीं है, इनकी अपनी कोई निति भी नहीं है, मतलब कि ये महाशय इसी व्यवस्था में अपनी "ईमानदारी" के बदौलत सुधार करेंगे। लेकिन इनकी पार्टी की ईमानदारी उसी समय तार-तार हो गयी, जब इनके साथियों ने चुनाव में टिकट ना मिलने के कारण अपने में ही सर फुटौवल चालू कर दिया और केजरीवाल की सभी दावों की पोल खोल कर रख दी। अब तो ये भी सामने आ गया कि कैसे इसने एक न्यूज चैनल को पैसे देकर सारी कहानियां लिखवाई और उस अनुसार ही अपने कदम चुनाव के मैदान में बढ़ाया। हाँ, एक बात इस पार्टी ने जरुर अच्छा किया कि वामपंथ और प्रगतिशीलता का नकाब ओढ़ें बुद्धिजीवियों का नकाब नोचकर फेंक डाला और बड़ी ही बेहूदगी और बेहयाई के साथ सुवरबाड़े में जाने के लिए ललचाये वामपंथियों ने, आंदोलन के नाम पर वसूली करनेवाले लोगों ने और एनजीओ का पैसा लेकर गरीबों का हमदर्द बनाने वाले नौटंकीबाजों ने "आप" का दमन थम लिया और सुवरबाड़े में जाने कि कसरत में लगे हुए  ,हैं।

वहीं फिर, इस बार तीसरा मोर्चा टांय -टांय फिस्स हो गया है। कुनबा बनने से पहले ही बिखरने लगा है। तीसरा मोर्चा में शामिल सभी दलों के मुखिया अपने आप को प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में ही देख रहे है। इस मोर्चे की सबसे बड़ी मुसीबत ये है की ये सभी किसी ना किसी राज्य में मजबूत है और वहाँ इसके प्रतिद्वंदी भी क्षेत्रीय दल ही है और वो आपसी विरोध के कारण एक मंच पर नहीं आ सकती है।

इस चुनाव में सबसे बुरी स्थिति संसदीय वामदलों की है, सुवरबाड़े के रास्ते क्रांति का सपना देखनेवाले ये लोग भी कहीं से भी अन्य शासकवर्गीय पार्टियों से अलग नहीं है। आज जिस दल को लेकर इन लोगों ने तीसरा मोर्चा बनाया है, वे सभी दल कभी ना कभी एनडीए या यूपीए का हिस्सा रहा है और नव संशोधनवादी पार्टी भाकपा माले लिबरेशन की स्थिति तो सबसे ख़राब है। इसे ना तो वाम मोर्चा "वाम" मानता है और नहीं दक्षिणपंथी पार्टियां अपने लायक मानती है, इसलिए ये "एकला चलो रे" की राह पर चलने को अभिशप्त है।

इस चुनाव में फ़िल्मी हीरो, हीरोइनों, गायकों, खिलाडियों, भ्रष्ट आंदोलनकारियों, देह प्रदर्शन करनेवाली मॉडलों और जंग खाये हुए नौकरशाहों की भी भरमार है यानि कि कोई भी ये मौका चूकना नहीं चाहता है और ये महान "नेतागण" सभी पार्टियों में बराबर की शोभा बढ़ा रहे हैं।

अब जबकि जगह-जगह चमकते होर्डिंगों और बैनरों ने ये साफ कर दिया है कि इस बार का चुनाव सबसे खर्चील चुनाव होने जा रहा है, तो आखिर इस देश की 80% जनता क्या करे? वो जनता क्या करे, जो हर साल सिर्फ सी उम्मीद से वोट करता है कि इस बार तो कुछ अच्छा होगा? वो जनता क्या करे, जिसको वोट डालने के नाम पर शराब और कुछ पैसे मिल जाते हैं ताकि उस पैसे से कुछ दिन उसके घर का खर्च चल सके और शराब का आनन्द भी ले सके?

आज जब ये बात साफ हो गयी है कि हमारे देश में 67 सालो से निजाम के सिर्फ चेहरे बदल रहें हैं ना कि उनकी नीतिया और हमारे देश में लोकतंत्र नहीं लूटतंत्र चल रहा है। गणतंत्र अब "गनतंत्र" में तब्दील हो चूका है। इस व्यस्था की सारी खामियां अब साफ-साफ दिखने लगी हैं। क्या इस चुनाव में वोट डालने से अर्ध औपनिवेशिक और अर्ध सामंती समाज का खत्म हो जायेगा? क्या इस चुनाव में वोट डालने से हमें एक बेहतर जिंदगी मिल पायेगी? क्या इस चुनाव में वोट डालने से हमें वास्तविक आजादी मिल जायेगी? अगर नहीं, तो फिर इस सड़ी और बदबूदार व्यवस्था का हिस्सा बनने से क्या फायदा? आज जरुरत है की हम खुले शब्दों में बोल दें कि "जेहन कि लूट को, इस खुले झूठ को मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।"

 

लेखक रूपेश कुमार सिंह से singh85.rupesh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

ढाई दर्जन पत्रकारों की रोज़ी छीनने वाले प्रभात रंजन दीन पत्रकारों के हितैषी कैसे?

लखनऊ: खासकर ब्यूरोक्रेसी पर भण्डा-फोड़ी खबरों के लिए शुरू हुए नये पोर्टल हल्लाबोल4यू के विमोचन समारोह पर बात क्या शुरू हुई कि सवालों की बौछारें शुरू हो गईं। पत्रकारिता पर बाहरी और भीतरी दबावों और खतरों को सूंघने और पत्रकारिता के भीतर पनप रहे दावों और उनके खोखलेपन पर खुलकर बातचीत शुरू हो गयी। गनीमत है कि मामला हल्की गर्मी से ज्यादा नहीं भड़क सका। इसी के साथ नये तेवर के साथ ताजा और विश्‍लेषणात्मक खबरों की एक नयी दुनिया शुरू करने का संकल्प लिया गया।

दमदार खबरों के जगत में हस्ताक्षर बन चुके प्रभात रंजन दीन ने जैसे ही इस समारोह में ऐलान किया कि ज्यूडिशियरी और ब्यूरोक्रेसी के साथ ही साथ राजनीति आज आकण्ठ बेईमानी और भ्रष्टाचार सनी-डुबी हुई है, ऐसे में केवल पत्रकारिता ही इकलौती किरण है जहां उम्मीद और आस्था रखी जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि आज पत्रकारिता में सांगठनिक और जुझारूपन की जरूरत है, और इसी के साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ी जा सकती है।

बस, फिर क्या था, हंगामा खड़ा हो गया। दरअसल, इसके ठीक बाद समारोह में बोलने के लिए आमंत्रित किये गये बेबाक व वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर ने दीन को हाथों-हाथ लपक लिया। बोले:- प्रभात रंजन दीन को अपने कहने और करने में फर्क के बीच का अंतर आम पत्रकारों तक समझना और समझाना चाहिए। कुमार सौवीर ने सवाल उठाया कि कैनविज टाइम्स से एक साथ ढाई दर्जन पत्रकारों को लेकर दीन ने अपनी नेतृत्वकारी ताकत का प्रदर्शन किया है। लेकिन सवाल-दर-सवाल तो यही उठने लगे हैं कि वायस ऑफ मूवमेंट नामक अखबार के सारे पुराने ढाई दर्जन से ज्यादा पुराने पत्रकारों को नौकरी से निकाल कर उन्हें बाहर का रास्‍ता दिखाया गया। उन्होंने दीन ने सवाल किया कि इतने पत्रकारों की रोजी छीन लेने वाले प्रभात रंजन दीन को कैसे पत्रकारों का हितैषी करार दिया जा सकता है।

समारोह के अध्यक्ष, पूर्व-न्‍यायाधीश व अधिवक्ता ने पत्रकारिता के जोश-होश की सराहना की और कहा कि हल्लाबोली खबरों ने पत्रकारिता जगत ज्यादा समृद्ध होगा। उनका कहना था कि इस समारोह में ऐसी बहस का शुरू होना ही इस हल्लाबोल4यू पोर्टल की सफलता का पैमाना है। उन्होंने इसी के साथ ही साथ राजनीति और नौकरशाही के साथ ही साथ न्यायिक-संस्‍था पर भी विस्तार से चर्चा की। हल्लाबोल के संपादक अनूप गुप्ता ने अपना संकल्प दोहराया कि उनकी कलम किसी भी कीमत पर नहीं झुकेगी। उनका कहना था कि हर व्यक्ति या संस्था का अपना एक मकसद होता है, इसी तरह मैं भी भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद में जुटा हुआ हूं।

निरालानगर में आयोजित इस खचाखच समारोह में पुरातत्व विभाग के पूर्व निदेशक और खोजी इतिहासकार राकेश तिवारी, अपर स्थानीय निर्वाचन आयुक्त जयप्रकाश सिंह समेत अनेक वरिष्ठ अधिकारी, पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी मौजूद थे।

एनडीटीवी के खिलाफ जांच से सूचना मंत्रालय ने पल्ला झाड़ा

इन्कमटैक्स कमिश्नर एसके श्रीवास्तव के बारे में एनडीटीवी के चैनल्स पर झूठी खबर चलाए जाने के मामले में एडवोकेट एसके गुप्ता द्वारा सूचना और प्रसारण मंत्रालय में शिकायत की गई थी। मंत्रालय ने उनकी शिकायत को न्यूज़ ब्रॉडकासेटर्स एसोसिएशन(एनबीए) को अग्रेतर कार्यवाही के लिए भेज दिया है।


गौरतलब है कि एनबीए न्यूज़ चैनल्स का एक निजि संगठन है और एक दवाब समूह की तरह काम करता है। मज़ेदार बात ये है कि एनबीए के अध्यक्ष केवीएल नारायन राव हैं जो खुद एनडीटीवी के एक्ज़ीक्यूटिव वाइस-प्रेसीडेंट हैं। इस संबंध में विचारणीय है कि, क्या मंत्रालय को इस बात का पता नहीं है कि वो जांच के लिए शिकायत को जहां भेज रहा है वो एक निजि संस्था है और उसका अध्यक्ष एनडीटीवी का एक्ज़ीक्यूटिव वाइस-प्रेसीडेंट है। सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जांच का हश्र क्या होगा।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।
 

Journalist moves Labor Court against Hindustan for Majithia and Manisana Wage Board.

To
   The Labour Commissioner,
   Haryana, Chandigarh.  

Sub:- Application for directing the management of Hindustan(Hindi), 18-20 Kasturba Gandhi Marg, New Delhi for releasing the wages of the applicant on the bases of Majithia wage Award 2011 and Manisana wage board award 2000 since the time of his appointment till the retrenchment of his services.  

Sir,
       The
applicant submits as under:-
 
1. That the applicant was appointed as a stringer (Part- Time correspondent) on 28-11-2001 by the management of Hindustan (Hindi) , 18-20, Kasturba Gandhi Marg , New Delhi and retrenched from services without any prior notice on 12-2-2013.

2. That the Management /Newspaper Hindustan (Hindi) is liable to pay wages on the bases and provisions of Manisana wage Board Award, 2000 and Majithia wage Board Award 2011. The Manisana wage Board is hereby reproduced as under:- “ in paragraph 9, for sub- paragraph (2) wages of part- time Correspondent and photographer shall be paid not less than fifty percent of the basic pay plus dearness allowance applicable full – time correspondent and photographer at similar level if he is working at District Headquarter and above subject to the condition that no part- time correspondent and photographer shall work for more than two newspaper establishments . The wages shall not be less than one third if the correspondents and photographers are posted at place below District level subject to the condition that he shall not work for more than three newspapers. In addition to it, payment of wages shall be on column bases, the rate of which may be decided by mutual negotiations. The Majithia wage Board award is reproduced as under:- “ (1) save as  otherwise provided in this award , a newspaper employee shall draw wages in the revised scale applicable to the group to which he belongs .

3. That besides this, as per provisions the applicant / worker is also entitled to increase his wages from time to time as per price index. The award is reproduced for your kind perusal as under :- ‘ The proposal of the wage board suggests around 35 percent and 20 percent increase in the wages / salaries over and above the salary including interim relief of employees working in the newspaper industry falling in classes 1 and IV and classes V and VIII respectively .”

4. That the management filed petitions against the aforesaid boards , but all the petitions have been dismissed by the Hon’ble Supreme Court of India and held that “ In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions , the wages as revised / determined shall be payable from 11.11.2011 when the government of India notified the recommendations of the Majithia wage board award . All the arrears upto , March 2014 shall be paid to all eligible persons in four installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April , 2014 onward .”

5. That the applicant is fully entitled and eligible person to get all the arrears and all other subsequent benefits as per price index from the management of Hindustan (Hindi) upto date along with interest.
                        
      It is therefore requested that the respondent management Hindustan ( Hindi), 18-20 , Kasturba Gandhi Marg , New Delhi for releasing the wages of the applicant , arrears and all other subsequent benefits as per price index on the bases of Majithia wage board award 2011 and Manisana wage board award 2000 in the interest of justice and failing which legal action may please be taken against the management of Hindustan ( Hindi) in this regard as per provisions of law and decision of Hon’ble Supreme court of India dated 7-2-2014 .
                     
      Any other relief to which the Labour Commissioner may deem fit may please be awarded to the applicant.

Dated:- 29-3-2014  

Applicant

Rajesh Jain – Journalist
1093, Bishan sawroop colony
Panipat (Haryana)  
(M) 94160-35430, 092530-11107

CC: DLC, Panipat
 

भुल्लर प्रकरण में बिट्टा के ‘विद्रोही विलाप’ को भुनाने को तैयार है भाजपा

खालिस्तानी आतंकवादी देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दी है। अदालत ने फांसी के अमल में हुई देरी और खराब सेहत के आधार पर भुल्लर को यह राहत दी है। सितंबर 1993 में नई दिल्ली में यूथ कांग्रेस के दफ्तर के बाहर भुल्लर और उसके साथियों ने भयानक आतंकी विस्फोट किए थे। इसमें 9 लोग मारे गए थे। मारे गए लोगों में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता और सुरक्षाकर्मी भी थे। दो दर्जन से ज्यादा लोग घायल हुए थे। घायलों में युवा कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष एम एस बिट्टा भी थे। आतंकियों के खास निशाने पर बिट्टा ही थे। लेकिन, उनकी जान बाल-बाल बच गई थी। इस हादसे के बाद बिट्टा ने आतंकविरोधी संगठन बनाकर अपनी सक्रियता बढ़ाई। भुल्लर को मिली राहत के बाद वे कांग्रेस नेतृत्व पर जमकर बरसने लगे हैं। उन्हें लगता है कि कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी के सलाहकार ठीक नहीं हैं। ऐसे में, वे आतंकवादियों के मामले में भी नरम पड़ गई हैं। इसी का फायदा भुल्लर जैसे आतंकियों को हो रहा है। इस चुनावी मौसम में भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेसी बिट्टा के विलाप को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए तैयार हो गए हैं।

 
भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी ने बैगर भुल्लर का नाम लिए कांग्रेस पर तीखे कटाक्ष शुरू कर दिए हैं। उन्होंने सोमवार को एक चुनावी रैली में कह दिया कि आतंकवाद से निपटने के लिए कांग्रेस नेताओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति को ही लकवा मार गया है। इसी का लाभ आतंकी दरिंदों को मिल रहा है। अब तो यह बात कांग्रेस के बिट्टा जैसे नेता भी खुलकर कह रहे हैं। इसी से समझा जा सकता है कि आतंकवाद के मोर्चे पर यूपीए सरकार क्यों फेल हुई है? इसकी कमजोर इच्छाशक्ति के चलते ही आतंकी ताकतों ने अपना राष्ट्रव्यापी जाल फैला लिया है। इस सरकार में दम ही नहीं है कि वह आतंकी ताकतों से कारगर मुकाबला करे। जबकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने ही भुल्लर की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला है। ऐसे में, किसी भी जिम्मेदार आदमी को अदालत के फैसले पर सवाल नहीं खड़ा करना चाहिए। क्योंकि, यह न्यायालय की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
 
अदालत से सोमवार को भुल्लर का फैसला आने के बाद बिट्टा एकदम भड़क गए। उन्होंने मीडिया से कहा है कि यूपीए सरकार कायराना रवैए के चलते ही भुल्लर जैसे आतंकी को राहत मिल गई है। इससे आतंकवादियों के हौसले और बढ़ जाएंगे। उन्हें इस बात की खास नाराजगी है कि सरकार के वकील ने दो महीने पहले ही कह दिया था कि यदि अदालत भुल्लर की सजा उम्रकैद में बदलना चाहे, तो सरकार को आपत्ति नहीं है। इसके बाद ही तय हो गया था कि इस आतंकी को राहत मिल जाएगी, वही हुआ भी। आतंकी विस्फोट करने के बाद भुल्लर ने 1994 में जर्मनी में राजनीतिक शरण ली थी। काफी मुश्किल से इसे कानूनी शिकंजे में लिया गया था। 2001 में जिला अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। 2002 में हाईकोर्ट ने इस सजा की पुष्टि कर दी थी। इसके अगले साल सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखने का फरमान दिया था।
 
जब सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखी, तो भुल्लर की पत्नी ने राष्ट्रपति के यहां दया याचिका दाखिल की थी। जिसका निस्तारण मई 2011 में हुआ। राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज कर दी थी। इस तरह से भुल्लर पर फांसी का फंदा कसना तय हो गया था। लेकिन, इसके खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर हुई। याचिका में कहा गया कि फांसी की सजा देने में लंबा समय लगाया गया है। इस बीच मेडिकल रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि भुल्लर की मानसिक स्थिति अच्छी नहीं है। उसका इलाज चल रहा है। नियमानुसार, किसी मानसिक रोगी को कानूनी तौर पर फांसी की सजा नहीं दी जा सकती। इसका भी हवाला याचिका में दिया गया। अदालत ने एक प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल से भुल्लर की मानसिक स्थिति की दोबारा जांच कराई, तो मेडिकल रिपोर्ट में कहा गया कि लंबे समय तक फांसीघर में रहने के कारण भुल्लर की मानसिक स्थिति खराब है। इसी का फायदा भुल्लर को मिला।
 
जबकि, बिट्टा ने एक खास बातचीत में कहा कि आतंकवाद के खिलाफ कांग्रेस नेतृत्व की राजनीतिक इच्छाशक्ति ही लचर है। इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को भी लाभ मिला। तीन हत्यारों की फांसी की सजा ऐसे ही तर्कों के आधार पर उम्रकैद में बदली गई। बिट्टा, ‘ऑल इंडिया एंटी टेररिस्ट फ्रंट’ के प्रमुख हैं। वे दशकों से अपने इस संगठन के जरिए आतंकवादी ताकतों के खिलाफ अपनी आवाज मुखर करते रहे हैं। कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं की कार्यशैली से उनकी नाराजगी जरूर है, लेकिन उन्होंने कांग्रेस कभी नहीं छोड़ी, कहते हैं कि कांग्रेस तो उनकी मां है। वह भला अपनी मां को कैसे छोड़ सकते हैं? लेकिन, उन्हें अफसोस है कि सोनिया गांधी भी आतंकवाद के मुद्दे पर कारगर निर्णय नहीं ले पातीं। क्योंकि, उनके सलाहकार उन्हें सही फैसला नहीं लेने देते। भुल्लर प्रकरण से बिट्टा काफी भावुक हो गए हैं। उन्होंने यह सवाल उठाया है कि सितंबर 1993 में आतंकी विस्फोट के कुछ दिन पहले ही उनकी सुरक्षा हटा ली गई थी। उन्हें आशंका है कि इसके पीछे भी कोई बड़ी साजिश हो सकती है। वे अदालत में इस मामले की जांच के लिए एक याचिका दायर करने की सोच रहे हैं।